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श्रीमणेशायन म:कने षित मित्या घोप निष तर ब्र हवि ष याव-त्व्यतिन वमस्याध्यायस्यारंस। प्रागेत स्मातक ्माण्यशेषतः परिस मापि तानि। स मस्तक माश्रयव तस्य च प्रा णस्या पा सनान्यु कानिक माग सामविषया णि- वानंतर चगार्य तसा मवि षयदर्श नव शात मुतसर्व मतयर्पा रे क में च ज्ञा नं व स म्यग नु छरितेनिष्कामस्य मुमुक्षी:सतभुध्यर्थेक्ष वतिसकामस्य तुज्ञानरहित स्यकेय का निभ्रनोतानिस्मा त्ीनिचकमी णिद क्षिण मार्ग प्रतिपत्तयपुनराठ्त ववतस्ाका विक्यासशास्त्री यया प्रया पश्चादिसावरो ताधा गति:स्यात्।अथेतयो:पया नकतरेणचनता नी मानिक्षक ट्राण्य सद दाव तन वकहता निववेति। जायस्व म्त्रिय स्व सतत् तीरयस्वा नेमितिश त प्रजा ह ति स्त्राअ याय मीयु रितिमं त्र वर्णात विशु इसत्ंतुन:क्का मसयेव बा हयादनित्या साध्य स्य साधन संबंधा दि हद ता सूर्व रुताद्ा सं रकार विशेबाद्ध वाहिर कस्व प्रसगासविष या जिका साप व्त्त तोतदेतहूसकप्रश्नप्रतिव चनेल क्षण याकसा प्र पिते के ने षित मिया घया। का ठके बो र।परोचिरवा निव्याण हव यंक स्तस्मा स राज्षपश्यतिनांत रा तम न। क वि हीर: प्रत्यंगात्मान मेक्षवदाकत्त चक्षुर म.त व मिद नू इ या दिपरीकष्यलो का ्क मचि:त रा ोनिर्वेद मा यान्ना स्त्य कक त: ृतिन तहि

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ज्ञानार्थस गुरु मे वा ल्िग धोसस मि सूा णिः श्रोज्रियं ब्र दानि षं दसा बाथर् णेएवं हिविर क सप्रख्गातमविष १बिर यंजा नंश्रो तु मं तु विज्ञातुंच सा मर्ध्उपपद्यतन न्यथा।एत स्माच्च प्रयगा तंब्र ह् विज्ञाना स सार बीजमे ज्ञानं काम कर मैं प्रवृत्तिका रणम शष तो निव तत। तत्र को मोह: क शोकएकलमतउपनय तइतिच मंत्र वर्णो त्तरतिशोक मात्मविदविरधत हृदय गंधिस्तस्मि दव् परा रेइययादिशा ति्यश्। म सहि तपिज्ञाना दतसिध्य तीति च नेो वाज सनेयके त स्यान्य का रणलवच नाडजा या मे स्या दि सादि प्रस्कतयपुत्रणाये लाक: कर्मणापित्टलो को विद्य यदे वलाकइू त्यात्मना न्य स्थलाक तय स्पकारणत्मुकवाडसनेयक तत्रे क चपा रिताज्य विधनिहतु रुत्त: किप्रज्याक रिष्या मा ये षा नो यमा त्मार्यलो क इतिातत्रायंहतथः। प्रजाक मेल कंयु क्वि द्यासि मैनु व्यपित् देवलो क साध नेरना तला क प्रतिपत्तिकारणि किं क रि ष्यामा न-चास्मार्केलो के त्र य म नित्यं साधन साध्य मि ष येषा म स्मा के स्वाक्षा विका जोडरामताल यानवई तैक नीयान्लोकड क्यसच निसेखाना विद्ानिवत्तिय लिर के णान्य साध ननि ब्यायस्त स्माल सगा म ब्रलवि ज्ञान एर्वक: सर्वेषणा स न्यो स एव कर्तव्यह ति क र्मैस हक्षावि त्ववि राधा च्े प्रययगामवि ज्ञान स्यन्द्दपात्त का रक फे लप द वि ज्ञाम नेक मणा प्रसमित सर्वजेद देशन स्थेप्रत्यंगा ता व्र ह्रि सयस्य स ह क्षा व च मप पद्यतवस्क प्रा धा न्या सय्य पुरुषतंत्रतो हू सवि ज्ञानस्ये। तस्मा कक्योबोटी साधन साध् ्याविसकस्य र्त कर्मलानो ५

विहिता प्रत्य गा तमवि षया व्र हम जिज्ञासे यँके नेषित मित्या दिश्र याप्रद व्यते शिष्या चार्य प्रतिव चनरूपेण कथ नं सक्ष्म व स्कविषय त्वा तसु ख प्रति पत्ति काउण वतक व्लृत का म्यसे च नि्तित्त व तिनेषात र्केणमतिरा पने ये तिश्कतेशर।आचार्य वा्पुरु वोवेद आचार्यी देव विद्याविदिता साधिव प्राप द तितदि प्रणि पाते ने यादिशरकतिस्म तिनिय माचकं चिद्गु रुं ब्रहमनिषविधिवदुपस प्रसयगा नावु सयाद्यने रण म प शयन्नसयं नि्यं शिव मचल मिष्ून्पप्रक तिक लते।केने षित मिया दि क नदु षिते के ने क त्रट षितंदूष्टमत्िप्रेतंसन्मनः पत तिगधूति स्वविय प्रतीति संवध्यते। दू राक्ीक्षणया र्थस्य चेहासंत्त वाल्इशा रधस्यवैत दूप मितिग म्यते। इषित मितिाहूटर प्रयोगस्कछासः1लस् व प्रशर्व स्यनियोगर्ध प्रेघित मि य्येकततू। त्ेत्र प्रेषित मित्य वो के प्रेषथित्प्रेषण वि शेष विष या कीक्षास्ाप्रषयित्विशेषणकीटे शवाप्रषण मिति दूषित मितितु विशेष ेसतित दुत्तयं नि न्ते। क स्े धाम त्रण प्रषित मिसर्थ विशेषनिह्ा रणायसयारथीि प्रेतः स्यानिमित् ताथ तैव सिंद्ध सा लित मितिनवक्तव्य।अपि चर काधिकया दर्धाधिक्यं युक्तमि तीक्ष यावा चाक में णांवा के न प्रेषित मियर्थवि नो षोव ग तुयुक्त्। न। प्रश्वसा मर्ध्यादे हुदि संधा ताद निय्यालक ्मेकार्या दिरको तो न्यत्केर सप नियंव स्कवुप्तु मानएछ्ती तिसामथ्यीदुप

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के-प.9ा. ववनिवकय नन्वतदननुरूपपरतिव चनयोनस्य श्रवमितिनेषदोष: तरयान्यथाविवोषा नवगमान यदि हियवादियापार्यतिरिक नसवय्यापारेवि शियध्योवादनियोका पद्यते।इत स्थेधा वा क मे सि दे हा दि संघात स्प प्रेर थिल चं प्रसिद्ध मिति प्रश्ोनधैकएवस्यादेव मपप ॥२।। पितनाब स्यार्थो न प्ररर्शित एव ना संनायव तोरये प्रश्न दतिप्रेर्षि वस्पार्धव शेषउपपदते। कियधाप तर सिद्ध मेव कार्य कर णसंदातस्य प्रेषथित्ट ते किया संघात वतिरिकस्य स्वतं त्र स्य छामातेणमनआ िप्रेष यित्ततव मित्य स्थार्थ स्यप्रद्शनार्ध के ने पित ततर ितेम नदति विशरेष णद्दय सुप, पद्यत नतु स्वतंत्रेमनः स्वविष ये स्वयंपत ती ति प्रसिर्द्ध।तत्रकर्थे प्रश्नउपपद्यतह त्युच्यतयदिस्वतंत्रमन: प्रच जिनिक तिविष ये स्यातर्व स्यानि षा दिचित नैन स्यादन व चज्ञाननसकल्पयति।अत्युग् दुशच कार्य पार्य माणमपिप्रवर्तेत एवम नस्तस्मायुक्तएव के नेषि त मिया दिपशःकेनय कोनियुक् प्ररितःसनूप्राज प्रे तिग वति खव्या पार प्रति।प्रथमदतिप्राणविशेषणस्पात्तसर्वकलोसैय प्रबत्तीना।9कनेषि तोवावाम मां निबुल क्षणाबदतिली कि का: तथा पंकथ्व शर्श्रच चत्तु: श्री त्रस्वे स्वे विषय क उद्वोदयोतनवा च ४ष न्युनकतिनियुंकु पेरययेवे षवते योग्या: याहगरु:्वणुेय एक् सषिमन आदि करणजा तस्थ कादेवःसवविष यं प्रति पेर थिता कर्थवाप्रे रयतीति। श्रा ्र स्यश्नांननिश्र स्शणंप्रतिकरणशा नन्येज कें श्रो त मिंदियंतस्यश्रोत्रस्य श्ो त्रंसःयस्तयाएपृश्वक्षा श उदेवायुनकीस सवविशिष ह भो त्रादी निनियु-कागम्यतेदो त्रा दि प यो क वे स देवटमननुरूपं पतिववन स्यान्नल हश रा दिनी प्रयोक्त

रा. सवव्यापोवि हो र वि न्ा दिव दर्षिगम्य ते श्रो त्रा दी ना मेव तुसं ह ता न य्यापारि णालीचन संकत्पाचा वसायलल क्षणेन फल्वसानलिं गे नावगभ्यतेजस्तिश्रा त्रा दिसषिर स दवता यसयोजन प्रयुल्ल:श्रत्राकलापों म हा ियदि तिसंह ता नो प राधला दय गम्य ते श्री त्रा दीना प्रयो कातस्मा द नु रप मे वे े प्रतिवच नंश्र तस्य श्री तमि सादि को पुनर त्रपदार्थ: श्रीत्र स्यश्रा म यदर न ्रा रथयथा प्रकाशस्वत कानर्ा त रे णने बदोपो थ मत्र पदा थ श्रो नं ताब सवविष य व्यं जन समर्धदवंत चुस्वविषयय्यंज्न सामर्था श्रात्र स्य चेत ने खास ज्योतिषिनिय से हते सर्वोतर सति ल वति ना स ती त तःश्रत्र स्य म्ो मियायु पघदतात था चाक संतराप्या सनेवा य ड्पाति षास्त तस्पक्षा सासरव मिद विज्वातिायन सर्यस्तप तितत से हु.इ त्या दी निय दा दि सगत तेनोन गङ्ा सव ते खिल। क्षत्रक्षेत्रीतथाक तन प्रका राय तीति-वगीता स का ठकक च नि ययोनि याना चेत नश् तना ना मि तिश्ा ताद्यवसरव स्थात्म क्ष तेवे तन मिति प्रसिद्वं त रिह निव सत।अस्ति किमपि बिहुर हि गम्यं सर्वतर लमे क्ूट खमज्मनर, सम्टंत मज्षय श्र त रपिश्री त्राहटित तामर्ध्यनिमिन्तमति,प्रतिव चनश ाध श्री पपदा तए व श तथा मन सा तः कर णस्य मे नोन हा तः के रणमं तरणचे तनय न्याति घादी पित स्वचि वथसेकल्या ध्ाव सा ना दि स मर्थ स्यान् स्मान्मन सोपिममन:तः इह ब हिमन सीए की छ यनिर्हे ो मेनसइतिाय हा चा ह वा चा य छ बो य स्मा दर्थ श्रि (िःसर्वे:संब ध्यत यस्मा य् तस्यश्रीत्रंयस्माननसामन्य ववा चोो हुवाच मिनिहिती या प्रथ मालेन वि परिण म्यते प्राणस्य प्रा ण इतदश नाहा चोहवा चमि खया तर नुर्धन प्राणस्थ प्रा णमित्तिकसमाव

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दिती यैव नक्रिय ते।नबहु ना म पु रोधुस्य यु्काहा च मिव्य स्प वागिसे ताव हक्तयंस उ प्राणस्म स्यप्रणडति शाब्दयातुरोधे ने वे हिबहु ना म तु रोधोयुर्तु: दकतः स्थालापष्टचर्वस्क प्रथमयैव निर्दकुयुर,कसवुसव याएप: प्राणस्प त्रा णा रव्यस्यर सतिवि शेष स्य प्राणस्तरुत हिप्राण्णस्यपसा ध्यनदाम्मनानचित स्यप्राणनमुपपर्दुल का हायान्या:प्राण्यागावतयदे पचा के। शजान् दान स्यात। उर्धप्राणमुनयसपा नंप्रत्यगस्पती त्यादिशक तिकषप: इ हा पि च व क्ष्यतिये न प्राणः प्रणीय त तदेवव्र हर्वि दीतिश्रा तरादींद्रयप स्ताव प्राण प्राणसय ने तुयु कंग्रहणासस मेवं प्राणग्णनैवत्राणस्प्राणस्यग्रणतमन्तत सव स्थेव हि करणकला पस्यदर्थप्रयुक्तापर कततस्त ह स््नोत प क रणारथीि यक्षि त:ओतथाच क्षषश्यक्ष: रूपप्र काशकस्प चस्ुबाग हणसाम थतदामचैत न्याधिकि तस्पे वातन्य क्षष-श्व क्षः पृष स्वार्थस्थ ज्ञातु ल मिष्टखला ज्रादःशत्र दिलक्षण यथो कव हज्ा वे यध्या हियता अम ताप ंतीतिफल ऋतेश्वज्ञा नाटय म्त वं प्राप्प तेज्ञाला तिमु च्ये ति सा मर्ध्याद्ा ता दिक एणक लाप मु झ्झिला ओ न दामभ्ा वे क लात दुपाधि: संस्त दात ना आा यते म्तनिय ते संसर/ चाते:श्री वादेः श न दिल क्षणेव्रल्नामतिवरदवा तिमुचा त: श्राज्ा द्या तक्षापरित्यत्य्पश्रोा दा व परिय कति त पीरा:धी में तो नहि विशिष धीम लमतरेण मोत्राद्यामत्षावेशक्प परित्य के प्रेत्य व्यायतयासमालो का सुन्र म त्रकलजबदुबु म मा है क्ष वे सेव होरल साप्रeु: ६ MY

दपेत्पम् क्षणा तत्यक सर्वेषणाप्त से यर्थो म.ता अ म र णचर्माणोक्ष वंतिन कर्मणानप्रज्ञ याधनेनययागनके अम्यत ते मा न शु:। प रांचिरवां निव्यत-आव-्त्तवक्षु मत लमदन्येरासव प्रमु- च्ेतंहसम् तेड यादि रक्रतिस्या5थ वाति मुच्येतनने वेषणा योग स्यु सिंदलाद स्मा लो का सि ा म्मा छ दी रल्वस धीयस्मादा त्र दर पिश्री त्राद्यीम्प्रेते बुसनाता नतं त्र तस्म ्वसणिचक्थििति सवार निगमना सेस वा्तथा न वो रगछा लि या चाहि ग वेउ ज्वार्य मोणो सिधय प्रकाश यति थ दात दाक्षिधे ये प्रतिवारणधतीसुच्यते तस्य-व नुदस्य तान्नर व र्स के स्य च क र ण स्या तमा ब्रा हा तो न वा गगदा ति य धाग्नि ही इकः प्रकाश कवापि सल ह्यासा नंप्रको शयतिद ह तिवा त हु तू।।उा नो म नो म नश्रा न्यस्य सकत्य यित् अथ्य वे साथित् चर्सन्ना मा नसे केल्पय सध्य व स्थतिच ते स्वा पिहिन सतईं ्रियम नाक्पा िव कनवविज्ञा नत ंगोचरान्न् स्त ह होर शमित्य तो नवि ज्ञा नी मो यधायन प्रकार णैत ट्ुस्लानुशष्या दु पदिवक्िष्या ये ससिप्रा य येटकरणगा चरत दन्य स्मेउ प देपु शक्यं जाति गुण कि या दिवि शोष णैन चजा त्या दि वि शोष णव हुस तस्मादिष मंशिय्याुपदेशेनप्र न्याययितुमिसुपदेशतदर्थग्हणेचय लातिनाय: कत्तव्यता दरशय।नवि दनविज्ञा नीमो्य येतदुनुशि य्यादित्यंत मे वोप देशप्रकार प्रसा ख्याने प्राय्ततदप वादोयस च्तासत्यमवं प्रत्यक्षारित्ति प्र माणर्नपर: प्र त्याययि तु शक्यः आग मे न वश क्वएव प्रत्याययि तृतदुप दे शार्थ माग ममाहा न्यदवत हि दितादथाजविहिता सर

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के. प.917. दधीत्ान्य देव प्ठथगेव यसहकतं श्रो व्रादी नोश्रऋादी त्क् मविषयशर ते षां त दविदि तादन्यदेव हि विदितं नामयहि ॥४।। दिक्किय या तिवायेन प्राप्त तह दिक्कि या के र्मक्त तंकचििचितस्य चि दितं स्या दितिसर्व मव व्याहते विदित में वत स्माद न्यदे वे त्र्थ।अवि दित जज्ञात तर हीति प्राप्त आ हाथाष्पवि दिता त् विदित विपरीतातूअव्या तादवि द्यालक्षणाध्या हेतबी जादधीतु पर्यर्ल क्षणयान्यदिन्य घीयद्टिय स्माद ध्ु परिसव तिततसादन्यदि ति प्रसि कं.।ए)यहि दितं तदन्पम सेदुखात् क चेतिह यंत स्मादि दितादन्यहुस्नतुक्तलहैयत्व मु क्तंस्या त्। तर्थोचिदिनाह धीसु क्तेअनु पदि यल मुत्ता कार्यो धहिकार णमन्यन्येनोपादीयत अतभ वदितुरन्यस्म प्रयो नायान्यदु पादेयनव्षवतीत्ये वं विदि ता वि दिता स्या मे न्यदि तिे यो पादेय प्रति षधेन स्वाम् नन विष य जिका साशिष्य स्यनि व र्तिता स्यात्ानहान्यस्य स्वात नवि ता वविदि ताविष्यामन्यवस्कत:सकवती ताता वा्य थाडिय मात्मा व्र हाय ओ त्माप हत पाप्सायसा क्षादपराक्षाह ह।यआन ते यदि क सेत रेक्पश्व थवसव्नसर्वि शेष रहित स्प चिन्मा त्रज्योतिबाव्र ललप्रतिपाद के स्वचार्कय स्या चार्यपदेशपरं परयाप्राप मा ह।इ तिभुमे त्यादि ब ह्लेव मा चार्यापदे शप रंपर यैवाधिगंत व्यासतर्कतः प्रकचन मेधोबहमके ततपाय का दियश्व सेवं शु क्रमश्रके ते वं तोव ये पवखा मो चार्थीणोव च ने ये जा-चार्यीनो स्म स्यं तहरव्याच-चकिर-याख्यातवतो विस्पष्टंक स्ित वे ताल वा मि सर्थ:।9।।अन्य देव ते हिदि तादथो अवि दितारघीव ने न वा क्यना साब हाति प्रतिपा

यजामुंक दि ते श्रो तु रा शं का जञाता कर्थ ला त्मा ब्र हा।आ मा हिना माधिककतःकर्मण्यपासनेच संसारीकर्मा पा सनंवा साध ने मनु छाय बह देवान्व गीवा प्रासु मिद्वेतित स्मा द न्य उपा स्येवष्णु रिश्वर= टटप्राणावा ब्रम्मस्षवितु म ह तिनतवा तमालाक प्रत्य य विरोधा त्तथा न्ये ता कि का दश्व रादा नान्य इ या चक्तेतथवाथा कर्मिणो मयजेस न्या ए व देव ता उ पा सते तस्मा यु के यदि दि तमु पोस्यत है हाज्वेन्नो पा से क इतितो मे तो मा शकाशिष्य स्प लिंगे नो पल स््यत दवा क्याहो में व शकिया:य ्चे तन्य मोत्र सज्ञा के वा चा बो गिति ल हा मूली या दिवए सुस्था ने यु विषर मानियं वर्णाना मक्िवा जकं कर ण व णोध्यार्थर्स् केत परिधि ला ए ता वे त एवं कम प्रयु का इये वं तद सिव्यंग्य: शब:पदं वागितु च्यत।अकारोवैस बोवा कू सेषास्प शी अत्तिर्व्यज्ष्य माना ब की ना ना रूपाप्त व तीतिक्रते लित म मित स्वरससा एषविका रोय स्यास्तया वाचा पद लेन परि शिन्न या कर णागु णवस्या ना्यु दित मप्रकाशित मनस्युकबनब्रह्णावव्ितथ सक रणावागत्युते चैत न्यड्योतिषा प्रका वयत युज्यतइत्यनावौ हा चा ह वा गितिहयु क वद न्यग्या य वाच मं त रोय म यतीतयिादि-य वाजस ने यके खा वा कू पु रुषे पुसा घोषेलु प्रतिपि ताक ाशय तां वेदब्राह नदूति प्रश्न मुखाद प्रतिव चनमुकक सावा ग्यया सव न ल्षाखत इति साहिवकर्व किनिस्या याकू चै तन्ये ड्योतिस्व रूपान हि कर्र केर्विपािला पो विद्यत इ लिश्कर तेस्त देवास सवर ब हनिरत नारयं समाखय

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वृहतवाट सेति विदि चि जानी हि ा थैर्वा गा यु पाधि िर्वाँ चो हवा कूचकुष श्यक्ष श स्पभोत मनसोर्मन:क्त्ताजो का विज्ञा तोनिर्यता प्रकाशिता विज्ञान मानदेबहायादय:सववहा राअसंयय व हाथ निर्विशो से पर साम्येब्र हणि प्रवज्त ते ता न युद स्या तान मव ननर्विनो षंब हवि डी येवश दार्थोने दंब ह यदि द मित्यु पा धि ले द विशि एट म ना सेश्च रा घु पा स तैध्या म ति त देव वि ही सुक्त्ते पिजे दंब् हात्य नाम नोर व्रहवं पुनरुच्तेनिय मार्थ मन्य ब स्बुदधियरसंस्या ना र्थ चायन्मनसा नमनु तंइ त्यंतःकर णंबु द्धिम न सो रक ले नगहामनुत ने नेति सर्वक रण साधारणसर्वषय व्याप केलवालू काम से कल्पा विचि कि सा श्द्राश्र हवाछ तिरधुति ही धी सी रिसेत सर्व मन एव तिश्रते का मादि व तति मन्म नस्तनमन साथ शेत न्यड्ातिर्मन सा वसत्ास के न म नुलैन से क्पयतिना पि निश्वनो तिमन सोवप्नासक लेननियं तत्ता सर्व विषर्य प्रतिप्र यगवृतिस्वात्न नवर्त्ततेंतः करण मंत स्होन हि चे तन्य ज्पोति षाक्षासित स्यमन सोम न नसामर्थ्य तेनस कसिक मनोयेन ब्रस्न णाम ते वि स योद्त व्यापमा है: कथ यंतिब सवि टस्तरमात्त देवमन्सः आ साने प्रत्यकृता्य तार चब्रे हर वाद नेद मि या दिपव व यजा धुषा नप रति न विषयीक रात्यतकरणर्वात्ति सयु क्ेन येन चक् वअंतः करण वत्तवे दाजनना9यएकक्तये: ता नि चक्ष विपस्यतिलोके तन्या सज्या तिषा ५

विषयीक रोति व्याप्तोतिय दो त्रेण नश णोतिदि न्े व ताधि वि ते नाका ना का र्ये वाम नोळसत संयु क्ते न कैनवि ससिह्

जयीक रोतिला क: येनश्रीज्े मिद यसेतन्या सज्याति षावि बयी कतं तदे व य सणन पार्विय ननारकापु र एय नातः क रणप्राण वसिरा सहित नयान्न पाणि ति गधवन्नविषयीक रो तिय नचैत न्यातम ्पोति षार्व श्ास्प ले नस्व विष यं प्रति प्रणीयतेतदेवे-सादि समा नसवाड् तिप्रथु म:रंा।थ।। ए व तयो पादेय विप रीत रह ५य आसाब सा तित्र साथित: शिष्याह मेव ब्रस्ततिसषुवे दाहमा मितिग्ठण्हीयाहि त्ा नुकिया चार्यशिष्यवुदधिचाल नार्थय दि या ह्ा न न्विधेव सुवेदाह मितिनिश्विता प्रतिपत्ति: सयमि कोनिश्यता प्रतिप तिर्नतुमुवेदी हमि तिय ह्रिये देवस्क विष यीक्ष वर्तितत्स, ए वेदि ते ना क्ये दा हामिय दग्धु मग्नेर्द्घुर्नलग्नेःस्व रूप सेव खर्वस्येह वे दितु: स्वाता ब्रस्मति सर्व वे दा ताना निश्च तोर :हच त देव प्रतिपा दितंप्रम्नप्रतिव चना सपाश्र स्यश्रा् मिय्यासु या य हा चान स्युदित मितिवि शेष तो व धोरितं ये स वित प्रदाय निश्चयश्र्वा क्का न्यदेवतहिदिता दधोअविदिता देधी तुपस हरिष्यतिचा विज्ञातं विज्ञान तो विज्ञात म विज्ञान तामितितसमा युक्तमेव शिष्यस्य सुवे देतिबु द्वि नि राकर्स नहि वेदितावदितु वीदि तुश क्पोग्लिरिव दग्धु मग्नर्न वान्योवेि ताब्र सणास्तियकस्प वेद् मन्य स्याद् सनान्यह तोस्ति वि ज्ञाजित न्यो वि ज्ञाता प्रतिषिधया तेत सातसएवे दा ्रस् प्रतिपतिमिधयो व ल स्मायुत्त म वा हा चा या ये दो तादि यदिक दाचिन्मन्य से सवेे ति थ दु वे दा ह बतिक दा विद्य याशत दुवि जेय मविक्षीणरोपा सेमेधा: कन्विस्तिपद्यते केन्ननत सातो क माहयही त्योदि। एप्ट चबए, बो क्षििपुरु वोर्टरय

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के.पक्षा ने एव आ स ति द्ो वा चैत दम्प्त मज्तय मे तत ब्र स्ेतु क्ते प्राज्ञा पय:पं डितो प सुरराट विशोचन:स्वपताव ॥६॥ दोखव शायनुप पय मान मपिधि परीतमर्थचारीरमा सेतिप्र तिपन्नस्तथा देव राट सलहिस्व्िरुके चाप्र तिपद्यमान: स्वल्लाव दाषक्षयमपेक्ष्य चतुर्थपयीये प्रथमो त्ते मवत्र सप्र तिप न्:लाके घिए कस्मा खवुरो ण्वतां क शिवतयधाव स्रतिप दत काश्य केय धानव स्ति प दाते का परेरयधाव क चिचिदि परीतं क शन्नप्र तिपद्यतकि मुव क्तव्यम तीटट्रियमात्मतखमंत्रदवि प्रतिपन्ना: सदस द्वादिन स्तार्किका:सर्वेत स्माद विदितब न्. स्ेतिसु निशचितो कम पिधिषम प्रातपप ताय दिम न्यस इत्या दिसा नो केव-वनंयुकुमेवा-वार्यस्था।१।दसे रमे वा पि न्नत्वे वे सथ आा नी ज ब्र स्णो रुपुं किम ने का निव्र सणो रुपाणिम हाति अर्त्षकाणि चये ना हदय मे वे य्या दि। वा ठ म ने का निहि नाम रूपोपाधिट तानिब्रह्म ण। रूपाणिन स्वतः स्वत सवनान् मस्य नमरुपमव्य यं तथार सेनियम गंधव छीय िति ादा दिति: सह रुपाणि प्रति विध्यतमनुये नेव धूर्मे णयट्रप्यततेव स्वं. तस्य रुूप मिति ब्रह्रणोपिय नवि रो षेणनकु पर्ण तदेव तस्यसप स्थाद त उ-्यत।चेतन्पे एर्विव्या दीनामन्ये तमस्य सर्व बा निपरिणत्ा नो बाध र्मानक्षवतितथाश्रा जादीना मंत:क रणस् चधर्मोसवती तब्रह्मणोर पमिति ब्रह्मरूपते चे तन्यनतथा चा के विज्ञान मान दबसन विज्ञा न घनए् ब से जञानपज्ञा नं ब्रस्मतिच हणोरुपंनदधिष्ट कति पु!सत्य मेवं तथावित दतः करणदा हैं दियो पा ट्वार णेव विज्ञाना/रशन दयते। तद नु का रिखाट हादि व हि सका चे है दादि घुना शिषु नखवतः।ववत स्युविज्ञा लें विजा न तो विक्ृीत मेवि ज्ञनतो

मितिस्त्तंल विष्य तियदस्यब्र सणोरूपमि तिपर्वेण सरवंधोन केवल मध्या सो पाधि परिछिन्न स्यास्यन ह णो रुपंत मल्प वै ख य द अधि दे व तो पाधि परिधिन्न स्या स्यब स्णोरपंदेवे पुवेन्वलेत दपिन नंदहर मव वे खतिमन्येहंयद्ध्या संयद पिच देवे सु उ पाधि परिगिन्न ाय धाान्ननव्ततयक् विध्वस्त सर्वो पोधिि वोषं शांत मनेंत मकम हेतै एक मा रवं नि से व स् नततवे य मित्य तिप्राय:।र।।यत एव मथनुतस्मान्म न्ये य्ा पि मी मांस्ये वि चार्य में व ते त व ब्रे हो वमा चार्यो क: शिष्यथ काँत उपविष्ठःसन्यथोकमा चार्ये ना गम मर्धलोविचार्येत के तथव निरदाय सवा नुक्ष व रालाचार्य स्का त्रां उप गम्या चमन्येहमथे दा नी वि दितं ब्रहो निकथ मितिश्णुत नाह मन्वेसुवे देतिने वा हमन्येबे देति न वत हि वि दितंत याब्र होुकआहा नो ब 6ति नवेदेतिवेदच वे देवैच शव्दा -न वे दे चान नुवि प्रतिषि हु ना हमन्येसुव देतिनोन वाेतिवेद चितियदिनम न्य से सुव देति कथं मन्य से वे दवेति अथ मन्य से व दव तकधैन मन्य से सवे देसे क वस्क्रयेन तायतते नेव-चत देववस्कनसु वि ज्ञाय त ड तिवि प्रति षिहे से िय वि पर्य य व् वान चब्रम संरावितलन ज्यंविपरीत्लेन वे तिनि यतु शाक्य संशा य विप र्यययोह सर्वत्रान पर्थकर सेनेव प्सिह्ध खेवमा -चार्यणवि चारयन्य मा ना पिति व्यानावच डाचालान्य देव तदि दिता दवविितादथी या चार्योका गम संप्रदा युब ला दु पप स्नुक्त व व ता ख ल गर्ज-चब्र सविद्यायोह द ननभव य तो य-नासन:ाक थ मित्यु च्य त योयनकामव

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के.प.श्रा.

non तो:स्मा कं सब सा चारिणो म ्येत दुतं व च नं त लो वे टसत त ब हावे द क पुनस्त तूच नमि ताहा नो न बदति वे द-चे तियदे वा न्य देव तहि दि ना दथाविदि ता दधीत्यु कं व स नुमा ना नुल वार्ां से यो ज्प निवते वार्कया रेणनानवे देलिवेद चैत्य यो च दा चौर्ये बु दिस वा दार्थ चमंदबु दिग् हणव्यप्रो हार्षच तथा चमर्सतमुपपनने स्षवति।१२) यान सहेदे तिनि प्या चाय सवा दा प्रतिनिवर्त स्वेन स्वरूपेणकतिसस्त ्सवादनि र्य.त्त मर्थ मव धार यतय स्याम तमिया दिनाय स्यब स विदोडम तम विज्ञात म विदि तंत्र स्तिमतमिय व्य्रायोनिशवय स्वस्यम ते ज्ञातंसम्युग सत्यित्तिपायाय स्पपुनःमते ज्ञात विदितं मयोब हातिनिशया नवे देव स नब स्विज्ञा नातिस विद्व दवि दुवारयथो को पक्षाव व धारय तवि ज्ञात ममतमविदितमव ब्रहि जा न तो सम्य ग्विदित्रय ता मि सेत हवि ज्ञा तं ववि दिनं ब्र हावि जा न ता म स मा ग् र्शिना मिं द य म नो नधय पाधि व्येवा तम द निनिामित्या थ: न खतंत मे वाव्यु सन्नबु ट्री ना न हि ते पा वि ज्ञात म स्मा लिर्व स तिभ व तिदंडिय मतिल मनो बुध्यु पाधि ख्वातम दर्शशिना व हे पाधििवे का नु पेलसादध्या यु पाधभ्य विज्ञात लोहि जा तं व स्पप दते कातिरित्यतः सम्यग दवो न पर्वप क्षेलेना पन्य स्यते वव ज्ञा तम विजञा नता मिस धया हेत चउत्तरा। विज्ञा ल मियादि उुचि ज्ञा ते वि ज्ञान तोमि लव छतं यदि त स्ारतंत मे वावि ज्ञातलो कि का नोब हविदा वाधि यो षः प्रा पवि जा ते विक्ञा नता मिति चेप रस्प रधिरु हैं के र्थेच वस सम्प ग्विदितंस्त वती व मर्थमाह प्रति बोोध विदि ते बोर्ध बोर्ध प्रति विदितबा्ध नाबनबो हाः प्राया उचमेते सर्व प्रस या व षरयीप्त वतियस्यस

आता सर्वदोधा न्पतिबुध्यते सव प्रसय दर्नी चियू कि स्वरूप मात्रः प्रत्य ये रेव प्रसया शिविषतयाल्य तेना न्य हा रा तर मातम नो विज्ञा ना यातः प्रत्यय प्रत्यगालत या विदित बहय दातन्म तन दातसम्पग दनो न मित्य थ:ी।।१३। सर्व प्रत्य यद शिल्े चो पज ना पा य बर जितहै करच रू पता नित्य ते विश्रु हुस रुपचमा न संनिर्वि शेष ते के ह लै च सर्वद्द तघु सि द्रेंसवेलक्षणतेदाक्षा वास्योम्नडूवघट गिरि ए हवादिसुिदि ताि दिताश्या मन्य हूस्त याग म वाक्य स्यार्थए व परिशु दूउपसे ह तोक्ष व तिछे दष्टाककता श्रा ता मते मे ताविज्ञा तर्विज्ञा ततिहि अ यंतरं।यदा पुन वैिक्रियाक ततिबेधिकरि याल क्षणनत कके तरं विज्ञा नाती तियोध लक्ष पानविदित प्रति बोध विदित मिति व्याखाय ते यथा यो वृक्ष नाखाश्याल पतिसवायुरितित त्तदाबोध करिया ना क्कि माना ता ट्रवन बोध स्व रूप एव बोध र्क्र जा ्यत विन शयतिच यदा जा य ते तदा बोध करिय यास विश्रोषोय दाबोधा नरय तित दान प्ट बाधो द्रव्य मा्त्र निर्विशेष स्तत्ैवंसतिवि करियाम क सा वयवारनित्येोशुदूइत्यादयादोषानपरिह तुनक्पते यद पिकाणा दाना मासमनःसेयोगजो बोधआल निसम वैसतआत निबोध चे।न तुविक या तक आसा टव मात्र सक सव तिययट दव रागसमवायी अस्मि न्य क्षेष् चेतने द्रवयमो त्ँब हाति विज्ञान मानदप्र तानंब हो साघातयोवाधि ताः स्पुत्मग नो निश्व यं चले न प्रदे शाक्ावान्नित सयु रेला चैम न सेः सेलु स त्तिनिय मो नुप पत्तिरपरिहाक स्थात ससग

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धर्ार्मलंचाम नःश्रतिस्म तिन्या यु विरु टंक ल्पित स्या दस गोन हि सज्तकुंस वव दिति हश्क ति सरती न्यायथ्य गणव टूणव ता सं सज्य ते नार्तलाज्ञातीयम तोनिर्ग्ण निर्चिनोषं सर्ववि क्ष णकनवष्य तुल्यता तीयं सेस् डप त ईस्येत न्यायवि रु द्ृक्ष वे-तस्मा न्नित्या लुप्त विज्ञान स्वरूप त्योतिरा ता ब्र हात्र्थ:सर्वबोध यम ३ बाडलेआशना सिध्यति नान्यधा।तस्मा सतिबो सघ विदित मत मितिय चा व्या ख्यात एवार्थोस्मालिःय सुनःस्वसंवेद्यता प्रतिबोधविदित मित्यसय वाक्य स्यार थावर्ण्यतेतन्न वति सा पाधिक ले आस्नावृध्यु पाधिस्व रुूप से नलेदंपरिक लप्ा मना सो ने वे त्ी तिस ययवहार आल न् व आ सा नं प रपतिस्वय मे वा्त्मनी सानवेखलंपुरु षा्त मे तिन त निरु पाधि क स्पात्मन:एकलस्वसवे य तापर संवेद्य ताव ंप्त वततिास वेटन सरुप ा स वेदनात र पेक्षा चनसंलवतितयथाप्र का वस्यप का शांतरापक्षानसनवस्त ह है हु पक्षे स्व से वै द्य तायो तुक्षण सगर लनिशा मक ले च विज्ञानस्य स्या न्यह वि ज्ञा लवि तात र्विपरिनापाि सतेविनाशिलान्न यवप्तुसवृ गतसवाएस मे हानजआ माकरोम राम तोप्डतयाघा:तयो बाध्येरनाय सुनः प्रतिवाधचावेन नु्नि मित्ताबोध: प्रतिबोधा वथासुपस्त्यर्थ परिकल्पयतिस द्वि ज्ञान प्रतिबा धंइु सपुरेनिनि ममत्त:सरूछास रुद्दा प्रतिबाध ए वंहि सअेम्ट्रतल मम रणलावं स्वात्मनावस्खन मोक्षाह सस्माहिद तलक्षत यथो क प्रतिबाध चिदिता सका त स्मा स तिबोध विदित मेव म तमि य्तप्रो यो बोधे स्यह

प्र-खगा-माआ सविषयं च मतमम तल हेतु न हार नो ना त संममत तज व त्ातमलादार नोउम् ततांनि निमिन्ता देव मर्चलमात नोयर दविय्थानात प्रति पत्ति: के च पुन यधोक जयाललि यया ज्चे विदतइन्यतज ह। आर ना सेन रूप ण वि द तेलप्षत वीर्येबलंसा मर्व् धू न सहाय मं त्र षधि तपोयोग एक ते वीर्थम त्ून शकायत्ति स्वितुंमनित्यवस्क्रकत च्वादा तवि द्याह तेतुवीर्ये मात्नेव विं द ते ना न्ये ने त्य तान्य साधन वादा विद्यावीर्य स्यतृ देववीर्ये मत्यु श क्रा त्यत्तिक्ष वि लुंय तएव मास विद्याऊतं पीर्य ज्म नै ववि दत तो विद्यया मेविषययाधि द तेम्पत नाय मा मा बलल ही ने नल क्ष्पदत्याथरवणातःस मर्ध ह तु रमत ते हिबिं दे त दू तिक पाखेलुनं रकति रय क्प्रे ता दिपुसं सार दु खब हु लेपु प्राणिनिकाये सुजन्मज रामेर णादि सं प्रापि र ज्ञा ना दतइ हेव चन्मनृथा धिहतः समर्थ: स नम रुव दी य त्ान यथो-कलक्षण विदत वान्यथो क्ते हहे क न प्रका रेणाध तराल सत्येम तुष्यज्ञन्म न्यस्मिन्नविना चालअर्थवत्तासदरावेवापर मार्थ तावास त्येविद्य तेन चेदिह जीवेश्ये दधिकलाडवे दी द विित वान्य त दा म ह ती री दी अ नं तो विन सि: वि ना क्ा नं ज न्म जे रा मेर णादि प्रबंधा विये दलक्षणा सं सा रंगति स्त स्मा देवं गुण दोषो वि ज्ञान तो ब्रा हा णा: बह ते सुक्ह ते पुस र्वल ते तुस्तावरे ुचरतु चैक मा सा त ल ब्र ल वि चि त्य विज्ञा य सा क्षा हात्य धी राधी मं तः प्रेत्य व्याक म मा हज्ताव लक्षणा दवियया रूपाद स्मोक्ष्ो का दुपर म्यसर्वोतकक्षा व म हेतमोपन्ना: से तोउम्ट प्ाप्त वं तिब्र हो व तव ती यथ:सयोह वैतस

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के.प.्सा. दवा६ रमंब्र ह्वचेद व्र स्नेव प्तव तीतिक तेः।5निदितीय:खेडव्र ह देवि स्यावि जिग्ये अविज्ञा तंवि ज्ञा न तो विज्ञातमविज़ञा i<॥ नतामित्या दिश्रवणाय्य दस्तितहविज्ञात प्रमाणर्यन्नास्तित सदवि ज्ञा तं नानाविवणकत्यमववत्यंतमेचा सहप तथे देव सना वि ज्ञात बाद सदेवे तिर्थ मं द बू ही नो बा मो हा माकु तिर्दि त दर्धय मा रगायि का रक्ष्य तोत देव हिर्द्रस् सि सर्व प्रकारेणप्र शासत् देवाना मपि परा देव हश्व राणा भपि पर मेश्ा विज्ञियादे वानाहुरसुराणीपरा जयके तुस्त कथ ना स्ी तेत स्यार्थ स्याल कला नित्यु त् राणिव चीसिर शयते अचवाब हाविद्यारकतय कथंन स वि ज्ञा ना ट्रय गन्पाद्यो दे वानश्रष्ठ से जरमे स्ततो प्यतित रा मिंद्र इत्यथ वादु वज्ञयंत्र ससतत्यतेयनाग्या दयो लितेज सोपिके जनवब्र हवदितवंत स्त थं द्री दे वाना मीश्व रोपि सन्निति वक्ष्य मा णा प निषदवधिपरवास वब्र हम विद्या व्य तिर के णपा णिनीके तलसा कला लि मा नो मिथ्य त्यत सद र ना थ्े वार्याथि का यथादेवानो जमाया्समा न: त हू दि त ब्र हाय थो क लक्ष णपरे ह किल देवस्योर्था यवििग्येजयलव्घ्रव देवानामसु रुणी च सं ग्रा मे सु रान्स तालगदरा ती न ईश्वर स तुल्ष न्दव स्योजयंत एलंच प्रायध तजग स्थम्ने तस्यह ककिलब हाणोविज ये देवा अन्ा टु याम ही सेत महिमा न प्राप्त वेतस्तदात्म संस्थस्य प्रतंगासन ईश्व रस्य सर्वज स्येसर्व किया फृत सयालाय तु: प्रना सेर्व चक ज गतः स्थि र्तिचिकी बारयं ज यो मं हिमा चित्येव मज्ानंत सते रेवा ऐ क्षेत ई।क्षृतवतः अग्न्माहस्य रूप परिधि-्नामम एक त) समाक मेवा योवजयोस्माके मेवायुमहि मागग्नि वा ख्वंद् लारिल क्षणाजय फलक् तो स्मालि रेनुक्रय म नास्म सलयगामकतेश्वरएत तव मिध्या स मनिवत

जवतंत टुकिले षा मिश्येक्ष णंविज ज्ञो विज्ञातव तू ब्र लसर्वेषित ति तत् वेलुत कर ण पयोकवा हेवा पाहूर्वभूवत

नोच मि्ध्या ज्ञान मुपलक्ष्य मे वा सु र वु न्मध्या समिमा ना स राक्ष वे युरिति त द तु कें पया देवान्मि ध्याक्षि माना प नो दे नान ग्टव्ही या ितित त्या हे वे क्या ह किलाथाय प्रा दुब भदव स्वयोग मा हातपनिमित ना त्य दु तेन विस्मा पनी येन र पे ण देवा ना म (दिय गोचश्र दुप्त तंब हनव्यज्ा न तन ववि ज्ञोत व तोदेवा: कमिदयक्षप्ज्यंम ह,दत मिलितदेतज्ञानतो दे वाःसी तस यास्त हिलिज्ा सवोग्नि म ग्रगामिन लातवे द सं सर्वज् कलप मयुव-जुक्तरव तो है जाल व दएलद स्मह च र स्वांय सं विज्ा नी हि वि नोष तो बुध्य खवलनस जस्वी कि मे त यक्ष मति तधास्वितित यक्ष मस्यद्रव नसषतिगत वाननस्तगतवलेपपषषुतत् मीपे प्रगलसर लात्त शी का तं तद्यक्षमश्यद दद गिन प्रत्यक्षा पृत को सी तेवव ह णा ए टो जििरबरावीद पिनर्वेज गनि नो मा है असि ड्ो जा तवे दाउ तिच ना म हयन प्रसिद तथा सनशलाचय न्नितेव मुक्व तं ब्र ह्ावाचन स्मेननेवंप्सिंह गुणना मव त तवयि कि वीर्य सामध्यीम तिसवुवी दि दअग प्वदह य यदिदं स्वाब रादिष्ट थि य्ामिप लक्ष णार्थ य तोत रिक्षसव म पि द हत ए बाग्निनातस्ाएव मानष मानवते व्र ह्ात्प ण नि दधो, पू राग्नः स्थापित व तं, व्र हेतन णूमा त्र म मो म तो टहनचेरस्पा द्ध सम्धी सुंच दग्छ ला सिमा न सर्व त्रे तुक स्तण म प पे य य तणस भी पे स व जवन सवी त्ा हहक ते न वे ग नगचा न्ु३ गनवान्?

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इतितरोंह क्षेमशकमर नश नग क ना नूा क रुग्धुंस जञात वे दास्त ण दग्यु म शका वीडिता हत प्रतिकस्तपीं देवान्पति निर्वे द ते निरत्त प्रतिगत वान्नेत दाश क वा क् बा ने है वि क्ञा तुधि को सता हे ये त घेक्षमत्या था न तर वायु म बू बन्हे वा यो एताह जा नीहि इ या दि स मा नार्थ पूर्व ण बाना हम नी हो गंध ना हावा युः माते यत ररक्षे-सिति चेल ती तिमात रिश्वादद सर्व मादुदीय गण्ही या यदि दषथिव्याभि या दिस मान मे बर्थ ट्रमन्ुन्वननेत हज नीी वाददपु व वदि द्रःपर छ मेश्वरो मंध वान्य ले कला स थे तित दस्यद्रव नस्मा दिंद्रा दाम् समी पेगता त ह हति रो दधति रलत मिद्ेस्ह बाव्ति मा नोनि राकर्त ब्येडसतःसं वाद मात्र म पि ना दा दू हो द्राय त दकष यासी ला का शिउ का ना प्र दे रो आ म ने द शयि लाति शोष तर्भमिदश्य व् ह्ाणस्ति रोधा न कार्ल यस्मि-ना का रो आसीस ईं द्रस स्मि न्ेवा क शेत स्थोरकित देक्षमि तिध्यायन्नानय4ववतेअन्मावन्तप्रस्यय क्षे्क्बु धावि योमारुपिणी प्रादुर न वहेतरचीसु पास हं टू स्ता मुमोव ट शाल मा नो सर्वे बोहिशामानानो शोकनत मौ विद्यातथाब हु शलमी नेतिविशोषण मुद पन्नस्र वुततहमव ती हे मद ताक्तरे णव ती मिव बह शाज्माना मिसर्थ:।अथवाउमे वहिमवता दु्हिताहै मव तीनित मे वभ्व रेणसर्वज्न स हव,्त त इति ज्ञातं समर्धीतह लाताभु पज्गा में द्रस्ता हो मोंकि लोवो दप प्रध व्रहकिमे तद गीय ला ति रोक्ष त य क्षम तिइति तृतीय रड साब ्त हाथा चे किलव हा णई शर स्ववेदज येडम रेणे जिता अ स शयू ये तत्र निमित्त मा त्रतस्ये वेवि जय यू ये म हीय ध्वं म हि मान प्रापुथ ए त दि तकि यावि कोष णाथा मरव्याक्षिमान स्क्युब्ाक मयसस्मीक

मे वार्यविज योस्माक मे वार्यं म हि मे ति त तस्त स्मा दु मा वा क्या हू ए ब वि दोच का र ब होोोव धार णासतो है वे ति न स्वा ते न्य णय समा दगन वाडिय द्रा ए ते द वाब्र स ण: सं वा द द बी ना दि ना समी पमे पगता र स्मा त स्बैण्ड गे शति त रामिव शक्ति क णादि म हा सां्यर न्यानू देवान अत त रा मति वाथ न रत इवैते दे वाइय ना नरथ को व धार णार्थावाय दगनिवा युरिं्द्रस्ल ि दे वा य समाल एन तं ब्र स्ने दिष्ठ मेतिक लेमे प्रिय तमेपस भुःस्ट ए वं तोयथा के ब्र ह ण: सं वा दा दिप्रका रे स्तहि य स्मा ख है तर न ह सा स्रथमः प्रथमाः प्रधाना: संत इसे तहि दाँच का र वि दांच कुरित्ये त ह स्रे तिय समा द मन वा यूअ पीट वा क्यादेव विर्दा च करिं ट्रिेणय तु मावा क्या हर्थ मंश्र तत हो स्य तस्मां स्ते है ई द्रीति त शमि वातति कोन त इवान्यानदेवाना हो ने ने दिर्ष्ठ पस्प र्श थस्मा सहयन स मो दांच कार ब्र हुकार्ध वाक्य तस्य प्रदा त स्य ब हएब जा नामो प दे शोनिरुपम स्यब् ह्मा जो ये नो पर्मा ने ना पदेशा स्साय मा दे वाइ सुच्य तकित पदेतस सिहधलोके विद्यु तोव्य धु तह पात ने दे तव दिस्े त दनु पपन्नमित्तिविद्यु तो वि द्ोत नमिति कल्प्ते आड समार्था विद्युतो वि्द्यात न मि वे सध:।यथा सदा ह युत्त मिति-क्रसंतरचदर्श ना हि घुदिव हिस कदा त्ानंदर्श यि. वाति शोष् तेब ह दे वस्वाथ वा वि यु त स्ज इ सध्या हार्थ व्य पुतह द्योति त व दा दुवे विद्युतसे तः सक द्ि योतित व दिवे त्कि प्रायः।द तिरदआ द शप्रति निद वर्थ ट्रययमादे श इरतिडछूबःसमुध्चयाथः।

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के· पस्ता अयंचा पर स्त स्या देनाः को सौनय मीमिष तयथा चसर्न्य मीमि षन्नि मे बंक तवत् स्वार्थणिचूउप अध्यात्मंश 11991 मार्थ एवका रवसु सोवि पर्य प्रतिप्र का नाति रोक्षा व ूवयर्थइतवि देव ते देव तो विष यंव्र ह्मणउ पमान दश न अध अने त रप्रत्य गात्म विष य जा देश उ पे देशउच्यते।यदेतहखतीय चमनऐ ततत हाठकत टव चिष यी के रो ती वथ्या नन म न साए त लुब ह स्मर तिस मीपतः स्मर तिसाध का मीक्ष वशां से कल्पश्व म न सो ब्र यसविषयोमन: उपाधि नोह म नःसंकल्प सस त्यादि प्रत्य ये रत्य्यज्यत 5- ब्रह्म विषयीकि यमाण मिवात: सएपत्रह्णाध्या र्य मा देन: विधुनिमेषणवेदधि दैव तं टू तंपका शनध र्मिजभ्यातमेचमन:प्रत्यथसम कालातिव्य कि धर्मी सघ आ दै ना एच मादि रयु मा न हत समं बुद्धिंग भ्येक्ष व लीतिव्रस्णआदनउप देश न हिनिरुपाधिके मेवब्रहा मदबु स्षश कलष तुशक् ५ व किचतत् लाहकिल त ह न नामत स्यय ने तुहु नै त स्य प्राणि जा तस्य प्रत्य गा काततवा हुन नी य स प्तजनी य मत स्त ह न नाम प्रसात व्रसतइनमति यत स्स्मा ह नं दूत्य ने नैव गुणात्तिधाने नोपासितवयचत नीय म ने न शु छना म्नोपा सीन स्यफ लमाहास य: कश्विद तयथा कंब्र ह व यथाक गुणवे दोपास्त हए न मुपास के सर्वाणिषक तान्यत्िस वासात प्रार्थ येत व यधा ब्ररनवे म नशिष्ट्र:गष्आ चार्य मु वा चो पनि षद् हु साय जिर्य क्षोप्तगचन्त्र हीलीय मुक्तव तिशि थ ओ हो चा ्यउेक्तो लिहि त तितो वा

निषलापुन: सेत्ाहब्रा श्रं व्र स्णः पर मात्मनः इ यंतो पर मातविषय ताद तीतथ ज्ञा नस्यवा ब एवतउ पनिषद मंत मेत्युक्ा मेव पर मात विद्या मुप नि बदमे त मेतय व धारयत्युत्तरार्थ परमाम विषया मुपनिष दक्करतवृत उपनिष दलाबू हीति एछ्तःशिष्य स्य कोलिप्रायोय ि्ताष छ्रातस्या र्धस् सतः प्रश्ज: एतापिष्ट पेषणव सुनरुकोनर्थकप्रश्न: स्यादव साव शेक्ता पुनिष स्यानतस्तस्या:फल व चने नो पसे हारान युल: प्रद्या र्माल्लों का दम् ताप्ष व ती तित स्माद को पनिष छेष विष यो पिप्रश्जा न पपन ए वान व नो पि तला लक स्त ह त्ि प्राया प्रयु रित्यु च्यते। किं पूर्वाक्तो पन वेपतयात ह कारत या साध ना तरू का धनि रपेक्षेव सा पेक्षा चेदपक्षित विष या मुप निषद बूद्यथ निर पेक्षाव धारय पिप्य लादवन्ना तःपरमस्ती सेव मतिप्रायः।पत दुपपन्नआ चा र्य स्यावर्धारणव् चन मुक्तातउपनष दिति न नुना वघार णमि देयतोन्य हुक्तेवय माहाल स्पेतपोटमइयादिस सवक वयमुच्यते जचार्ये णनते को पति स कष तयात त्साथ ह का रिसाध नाचेवा।सह प ठिता ना म पिय था योग वित्त ज्यविनियोग: स्यादितिचेय थासक वा का नुमंत्रा णी यर्थादेव तवि क्षा. गस्त पौदमःकर मसत्या ना व्रहविया नोष त तह कारि साध न तं वे ति क ल्प ते व दा नोत र दगा नाचा थ प्रका चक ले न क मो कस जञानो पा यख मितेयंहय य विक्षा गो युज्य तेर्थ संबंधी पप तिसाम व्योदितिचेन्ना यर्न हार्य विक्षा गोघट नोप्रा ततिने हि स बकिया का क फलपेु बुद्धितिरस्कर प्याब्र सि या रा लराभिय पाना कि तुनलपाष्यु पाया मिम्ा येरवद स्तुदमैश्रेस हपाठेनसमी कराणा त्तय प्रभ्थती ना नीहे वे दा ना शिक्षा घगानाचसा क्षाद या: विध्या राष तत्स हकारिसा चन व विया र शाभप किमसपे

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क.प पेक्षासहकारि साधन संवं धोवा युञ्यते सर्व विष् यानवत्त प्रत्यगात विषय नषत्वाचयायास्त लुस्यच निःशरेयसस्यमाक्ष मि बॅन्स दाक मेत्य जे दे वस साध नैत्य जतवहत जेरय सकः प्रस्य स्प रंपर देतस्मा ककर्मणांस ह कारितं कर मरेषापक्षावा ने ज्ञान स्पोप पद्यतेत तो सदेव सक्वोको तुमंत्रेणव पथायो गविल्ाग इ ति त स्मादव धार णार्थ तै व प्रश्न प्रतिब चून स्यो पपद्यन ए ताय सवय मुप निब दुक्ता न्यनर पेक्षामतलाया यामि माब्रा हमी मु पनि षरदे तवाद मे तित स्पेत स्याउ क्ा था उ प निष दः पादयु यायर्षता नितआदी नितप: का यें ट्रियमन सांस माधा नें दमउपराम:कर्मागन हो त्राये तह सं रहक तस् सच श्र द्वारा तत ज्ञाना सतति ्ह प्टरा 9 पत्ति वमदि तकतन्म स्यो के विब्र हा्य प्रति पत्ति वपतत प्रतिपव यथेंद्र वि रोच न प्रकट ती ना तस्मा दि हवा तीते सुवा व हुषु ज न्मा त र सुत पआदि लि: एृत सख शदजीनम सद्यते तिथा चश तिःय स्यदेव, परीक्ष कि र्यथा देवे तथागरो। त स्यैलेक थिता हार्था: प्रका वं ा तमंत्र्णाल्ा नमुखय्तपुंस क्षया सापस्पक मेंणइ तिस्म ते रिति राब्ट्रउपप्रदन नार्थ इत्ये व मा दन्य द पिक्षा नोस तेरुपकारकममा नितम दत्षि व मित्यायप प्रद नितिंस वाति। प्रति कापा टो पा दावि या स्या से बुसत प्रति तिप्ठ ति त स् वि द्या प्रव ते पु झया मिवपु रषोवे दाश्य खार: सर्वी णि चो गा निशिक्षा दीनिएट कर्मज्ञान पकाना क त्वाहे दानात दक्षणार्थ चारं गाना प्रति पाल मधवाप्रति कारएस्य पादरुपर्क कल्यनार्थलाह दो श्वित रणि सवो गानि शर ओ दी न्यस्मि न्पक्षेशक्षादी राम ।143

नोवे दमहण नैव म ह णंप्रतेतथं जं गिनिहिग हीते : गानि ग द्ी ता न्येवव्त वंतित दाय त ला देगानी सत्य माय त नंय कृतं

त्रतिषत्युपनिषत्तदाय तर्न सतय मितिअ मायता को टिल्य वाश नः का या नोते ुि आश्वय ति विया ये मायावि नोना सु रं प्रफर ति घु मा यावि षु नयेसु जिस मन् तन माया-चेित स्मा्यमयतमित कल्प्यते तपआदिभव प्रतिक्षा लेन प्राप्स्यसत्य स्पुन रायतनवेन सरुणंसा नात ाय ापना थ। अ मस ह स्वचैतल सलेन याध ते।अश्वमेघ स ह स्त्रा्त्तुसत्य मे कं विशिष्यतइतिसरत:1येोवए ताब्र ह वदा के ने षित मित्यादिनाय धोका मेर व म हाक्षा ग्याव्रहा ह द वे स्पइ त्याद स्क तो स ववविद्या प्रतिका वे दामतलहिविं दत इत्युक मधि ब सवि ग्ाफल मं ते निग म्य ते प हत्य पा प्मा न म विद्या का मक र्मलक्षणसंसा रलक्षण विध या न ते स्चलो के सुखाम के ब्रह्म णी ते तद नै त इ तिरवि ो ष णा न्नतनिषिए् पेडन तथाए औप चारि को पि स्या दित्यत आह त्यये इतिन्येथे सयान्याय सिसर्व म ह त्त रच आ त निमु खय ए व प्रतिति ष्ठेतिनपुनःसंसार मारप द्यतडसक्षपाथ:।।इति श्रीगोविं द लगवसारदे एज्पशिष्य स्यपर महं सप रि वाज्क स्यन्नी शंकरल्गवत तप्ाप सेमा सगउत सत।।श्री रामाय नम:छाश्री1022श स्वन् केनर

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193n

ABRAAD UNIVERSITY

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UNIVERSITY ॥ अथकेनो पनिघत्पद भाव्य व्याख्यापारंभः।। ॥हेरं भसमर्थ॥

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के.उ.भा. ॐ नमो ब्लणे। प्रयल्ा वंतरेणैनमनआहे: प्रवर्तक॥विदि नाविदितान्प लस्षितंत्र साहमद्यके नेषिनमि तादि का साम टीवायो १ वेद व रवाभेद बराल णोप निष टंपद शेो व्याखव्यायापिनतु तोष्यभगवान्भाव्यकार:रीरकेन्पयिर निर्णाता र्थला दि तिन्यायप्रधाने सर्थसंग्राह के बा पेये व्योच्ति रव्या सुःपूर्वकंडन संवं धममिधितुःपूर्वकार्थस क्षेप तोदर्शय निशमास्रमिति॥कर्मणामा लभृत:आश्य भतः प्राण सस्पश्ुप्त लदिगुणविशिष्ट स्यापासनंप र्वव्ातिर ने कर्म चनित नेमिति का यने कप्कार मविदुषामनिकात मित्र् ॥। नाभ्पात्षा नकर्मभ्या भेव मोससिद्ेरन भुमुक्षोथगुपनिष दारम्यृतिश कानिरासाय तान कर्म णीवि शिनवि।य पोरिनियजा नमनाह सकर्मण एचनिर पेक्षसाधनतथा नुषा नंविकव्पस्त श्ोडमंउ लंपाप्यावर्तते के लस्यतानस्यकर्मसपुचितव श्रीगणेशाय नमः॥समास कर्मो सभूतप्राणनिषयं विज्ञान कर्म चानक प्रकारंयपोर्विकवयसमयानुछानातूदक्षिणो तरभ्योस निभ्या और स वारवनीभवत:।अनऊर्थफ लनिरपेक्षतानकर्म समुच्ययानुद्या नान् कुतात सरकार स्पाि नाल ज्ञानप्रतिबधक स्पद्वैनविषयदोषदर्शि नोनि ज्ा ताशष ला खविमयत्ा संसारबीजम ज्ञानमुनचिक्विषतः प्रसगा लविष प जिजा सो: के ने वितमि त्यात्म स्वरुपन लीववि तानायायभध्यायआरभ्य ते। 11 11 11 वा नुषानाहू स लोक प्राथस्थितएवन स्मान्नावर्तनइ त्यापेक्षिक नावृत्तिर्भवस्तिनपुनरा ं तिकीकतक लपरिछे दाभ्या मनिस लानुमानाद नसंसारफ ए क में वकरमर्का उ मि सर्थ:॥अस्तयंक में को अार्थस्तथापि निय तप,वोत्तरभावानुपपत्तिभ्यःकर्थ हेतुहेतुमद्ाबःसंबंध: कर्भकांडेन ज्ञान कों.उस्पे साकांक्षा यामाह।अतऊ प्मिति॥ का मिना नुषितकर्मय यपिस सारायभवति तरेवतुनिका मेनानुषि तसल श्रीरम मट्येस्याल्शह.सत स्यचानास जञाना भिमुर्यन जाय नेअ ना भिनिवे शस्या नर्थ सा धनतयावधारित लाडा सविषये वजि ज्ञासाजाय १ नजिता सोश्या सनिरुप आायो पनिदार ्पत इतिहे तु हेतुम दान ट सर्थ:॥

आम सरप व सत लवि ज्ञा नाथाथम ध्या य आर भ्यतेचे त् कितेन वि ज्ञानेनफए स्याहि त्यनआट।तिन चेतिण्य नोअन्यपच्यतिरेकाभ्या म जान तं त्रास सार प्रसिद्धिस्तद ये देना संतिक ससपोछेद,फल मित्यर्थः।मत्यु कारणमा ता ज्ञानमुद्येनुमिळ्ठतआ जि तासा आपतरसुक तदसत् अहंत्रसपेनेवा तानो:धिगलादधिगते ति जासा नुषप सेरि त्ाशकय।ह"अनधिगतव्वाहिति अहंत सयस्यमनुष्प लादिसमा नाधि कत स्पय्यनिरिक्त तप्रमायक लासिदे वोदि नाविप्तिपतिददर्शनाच युक्त िजञस थे॥नथापि कर्मकाडेटेहव्पतिरिक स्पालनोवि्यप ननचम् सुपद मलानमुद्ेव व्यंतलं जोहि स सारय तो- नधिगम लाया ल नोयु कातद विगमायनदरियपातिजञासा कर्मविष पेनानुकि:न हिये भिलात् अस्यविजितासितव्यस्पा सतत्व स्थकर्म विषये। वचनंकसमा दिति चे या त्मनोहिय था वद्धि ज्ञानंकर्मणाविरुध्य नेनिरति राय ब्रह्यस रूपो सा सावि जि ला पयिचितलदेवस्र स्लंविद्धि नेदं यदिद मि त्यादि श्रुने:नविशवराज्यभिषिकाप्र ए लंगमित; किंच ननमितुमिछ सतोड् सास्मी तिसबुध्धानक ंकारयिंतु शकतेवा स्नमेवातये ब्रस म न्यमान: प्र रतिंतयोजनवनी पश्य तिन चनिष्योजनापररलतिरतो विरु पतेएकर्भणाजानमसै,कर्भविषयेनुतिर्विज्ञानविशेष विषये

वितलेन विरुयिन ला त् पुनर्विता सानुपप नौकपंजि ता सो रुपनिष दारभ्यतइसां बाह।।कर्मविषय ति अस्तिदेहादि व्यतिरित:परतो कसन ध्यात से९नाव रे व सर्गका मादिनोर नाभिरपेक्षिन न तुम्रसात्म म्चलश्यफर्मविरु दत्यानतसजि ता साुक्ते त्र्थ: सग्रह याक बिरप ति। अस्पे सादि ना निर तिशय प्र स स रुपआ लोप निषददि विज्ि ज्ञा पयिधि तो सुक थमेलावनाकर्म णा विरोधर सीको साया माह। न ही तिगदेवसा रा धन रुपोहिया गोअ विव्व सवदेव नात्मभूनःपशुभावाचयव्यावसःकथदेव नोप्रणमेदित्र्थ। ॥

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के० उ.भा० वसालनव ज्ञान कर्मविरुदंचेत है शु साम लासलोपदे से नार्था कर्मति व्ाजविपितमि सन नुश्ा नमेवप्रसन्पेतअतोजिता सहेतु ले नाभिमन:क र्म का ड्ेन से बंधो: संगतर साश कामुटा व्यामिहि तसंबेधंस मर्थयलिकर्मानारंभर सादिसू, तरणउस्तति विधिविदि तोंकर्मेपास स्कारर्थलेप्म री.वा०यो०

जभाह॥देव पाजी ओेयानि आाि नाफलकामन यायो देवानू यजते सेकि शरेयानुना ता स उर्थमेवखवर्गाद्या संगहि ता योयजतेसआलपाजी प्रेमानितित्र श्रांकला लवाजी श्रेया नितिनिरुपितं वातपभे कामा नुप दात सहित मेममां गमनेन कर्मणा सस्कि यनइतिस स्कारार्थ लेनेब करो तिन काम वशमइत्पर्थ:।। ब्रा ही ब्रह्म तानाहा कि वतेत नुरितित नुस्ओ मा स्यनेवनु प्राणायुपास नंत्राप्दिभावप्राप्प कर्मलारंभदनिचे न्।विकामस्य संस्कारार्थलाल्यदि हयावि तानेनात्माविद्याविषय तवातरिति साजयिचित कर्मनतःप्रसाल नाङ्िपंक स्पदूरादस्पर्शनंचरमित्य नारंभएचकर्मणः श्रेयानतमफलत्वादायासब दगरुल्ात्त ल ज्ञानादेव च शेष:पा सेरिति चे साह्य मे न दविय्याविष यकर्मोल्यफल कादि तिदोषव टंधरुपं चस का मस्य का मान्य:कामयतइनिनुकाम यमान इत्यादि श्रुतिम्य, ननिक्ा मस्वतस्यतुसस्कारर्था न्ये वकर्मा शिभवंतिन्नर्वर्त काश् ाणविजञानस हितानि देवयाजी शेयाना सथाजी सुप क्भ्पात्मया जीतुक रोनीद मे :ननांगसंस्कियन रविसस्का रर्थभेव कर.मोपीनि याजमनेयकेमहापतैश्व यजिशर्व श्ा सीयं कि यतेन्नुर्य तोदानंतप शेयपाय ना तादिसातिश्रया है प्यादिविज्ञानंन केवलंक मे समुच्ि नवासका मस्य प्राप्ात्मपास्प र्थमेदभव तितिक्ामस्य तात् ज्ञान प्रतिर्बंध निर्मा सभव निभाद ईनर्भजेवत्"" र् मेपते नोएन सेपे देव ता ये सायु ज्यंस क तोज पतीतिश्रुते:कथमुत्तें क मनवर्चकभ्श्यपाणोा सन सहि तानिकर्मौणिस रकाराथोनीनिव चाह॥ प्राणादि विजञान चेति।विविदि या नाकोनयज्ञा युप लक्षित स्वसर्नस्य कर्मणाआ ्मता नार्थ लेनविनियुक्त लादुपासनस्चमानस श्री रम कर्मलादा क जञा नप्रतिबंध क स्यकव्ाम स्पनतिवर्दणारणस्ाात्ज्ानार्थेलम य्र्थ:।॥॥

अ ज्ञाभिप्रायेया सजयोजन वला नंप्र सना रंभय संग आश्रयही न३तुसं ज्ञान्य भिप्रायेणलनिष्टापादन स्पेशपटनरूपत्वाहासंग स्याभास माह।उत्पन्नालाविद्य स्पतिान के वलं श्रुनिप्राभाण्यादेपबियेकिनः कर्मा नारंभ: साध्यशिद्ो साधन नाडि यत इतिलोकि के न्याया च कर्मा नारभःसिदर सर्थ:।ज्ञानफले कैन ल्पेनुप योगा-व तानिन: कर्मानारंभ इष्टर साह । नहिस्वभानसिद्धं 1 खादिना।।

उसन्नात् विद्यस्पल नारभोनिरर्थकला कर्मणावध्यतेज नुर्वियया नविमु च्यनेन स्मा तकर्मन कुर्नतियन:यःपा रद शिनदति कियापपश्रेयपुर स्तान् स न्यासशपत यो:सन्या सए चानिरे चय दिति: खागेने के। ना न्य:पंथाविद्य तइ त्यादि शुतिभ्यका न्यायाज उपायभूमानीहि क माणिसस्का रहरिणज्ञानस्प तानेन लम् नल परासिर म्त लंहि विदते विद्यपा निंदनेभ्न मिसादिनाश्र्ुतिसति भ्पशनहिन याः पारगो ना यन मुचतिय धेथ दे नागभ नं प्रतिसपामवये सति नहि सभाव सिदधवसु सिध धयि षतिसाध नोसभा वसि दश्यात्मातथानापिषापविपित आतमा लवसतिमि साप्षतात्। नाविवि कार थिषिन: आतम ले सतिनिस्लदवि कारिला द्विषय त्ाद म नेला सुनेश्व नवर्स नेकर्म णे तादि सा ते ्र्वावि का र्योयमुच्य नह्तिनचसचि कार्षि तः श्ह्म पापबिद्धंर साद्तिश्ुतिभ्य:अनन्य लाज अन्येनान्पलारिक यतेन चात नो न्यण ताकि पास्तिनच सेने गाल नामासा न संनिक र्वत् नन्नव स्ततराधा ननित्यं प्राप्तिर्वव स्त्वतर स्यनितानित्यल नेद्मोक्षख अतउसनंविय स्वक मरे भो नुपपन्त:।। 11 उपत्ित्षिर्किकृतिः सं क तिश्ने तिच तु विधकरियाफ लंखरुपायस्थानेकेव जेन संभवतीुकंयिचयरमानदृय पास्यात्मन्याभानंब्सा सादूहि: स्पितश्र सप्राधिर्वाती च स्पकेयज्पक यनवर्हभ वित्यलंदुर्वारमि त्याहनचवरन राधानमिति।॥६

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के उु० भा. ए. वसुपनिष दारं भं सभाव्य वाकय स्यार्थसंग क्वाति॥ प्रवततिलिंगादितिमहि या चार्य पोः प्रश्नपति वचनरूपाश्रुतिःसुखप्तिपत्पर्था प्रव त्तात हिल्या.यो- च प्रशःकिज्ञाने: जानेवेत्ति चोद निरा सा पसामा न्य नो ज्ञाते पिवि शेषतशर्या साते संभवतिविकन्प करणवदितिस।चित मेत द्विवपोतिर थादी नांही तिमन आदी नामेव चेनन लाद चेतनप्रवत्ि त्ादि तसि डोहे पुरिति ना एं कनीय मि साह।करणानिदीतिम अन्यत्रम नाअ व न्ादरशमि त्ादि लोका नुभवा ननआदी नो क रणलंसिद्धंननः प्रदीपव द्चेन नलं सिदधमित्यर्थेः।। प्रृनिलिंगतिशषार्थ: प्रशाउपपन्तःरथा सीनाहि चेत नावद पिक्विता नो पर निर्दशनान धिष्वितानामनआदीवाचा चेत नाना प रत्ति र्ट रयने नडिसिं गचेत ना वतोघिष्ठा तुरस्तिलेकरणानिहि मनआदीनिनिय मेननवर्ततेनन्ता सतिचे तना वा त्यधिष्ठातरिऊ पप यते तदविशेषस्य चानधि गमच्चेल नाव सामान्ये चाधिगते विशेषार्य:प्रशउपपद्य नेकेनेवि ऊ के नेषितपात तिप्रेषितंम न:। सं के नेष्ट क स्ये छामा त्रेण मनःपततिगछ तिश्विधयेनिय मेनव्यत्रियतइत्र्थ:मनुने-ननेतिविजञान निमित्त मतः करणंमनः प्रेषितमिवेसुयमार्थोन विविषित्तप्रिषितशब््योर र्थविहसंभवत नहि शिधानिवमनआदीनिषिय यभ्य: प्रेषपता ाविविक्नित्यनिस्वरु पतयातु निमित्तमावं प्रवृन्तोनि तयचिकिसाधिष्वानवृत्।। इछा मचे णोतिपय लाद्य भा वो रु क्ष्यतेनलिका स्ति लंनिर्विकारतायाचिवक्षिततवा स्ेषितमिवनीव शष्टरा प्याहारेणकिमिति श्रीस म ्यासव्मातंयथारा ज्रे रुछमात्रिणाकाचिद त्यप्रवृत्ति: काचिन्व वागादि य्या परिया तह दिह कि न स्यादि स्ाश ववाह।नस्विति सकिय स्यस वस्यानित तया व धारित लांनिक्कि यंव सुपिष्टद्िषिनंत तो नार्थभेदःसभवतीसर्थःविषयभ्य रतिविय कि पगहणार्थानितर चित् सायामभिष्ठातुश्वकर स्पसंन्तिधिमात्रेणावथा राज भोज नारिपर निनिमिन्लंत ददि सर्थ:॥6

प्रकर जदिनिकरणसनिधाना दिय थे:।। प्रतिवचन या व्यार्थ संग्रहविय, पोति।विकरियादी सादि ना।भनआदीनाय:प्रवर्त्तकःस किवि शेषद् तिपश्न स्य निर्विशेषतैव वि शेषर त्युनरंकरि यायागुणस्पसव धस्पवविशेषस्य व्यवर्तकधर्मस्पदर्शयिनुमशका लाहधि पादि म लेघ यादि वद नात्म लग संगाद तो निर्ति शेष चैत न्यात्म कोहमि त्येव त्ा नंसम्पक ज्ञानंन चाभावेन संदू पल प्रसंगस्स्य। ए्टथकुस लाभावा न्स्वरुपेणव्यवहा शंगत्वादितु क्तअन्यन य दिशो र्यादिव तकोपिवि वो षोअ भविव्यतदानमवस्यत् श्रुतिलूपस प्राण इतिनासिका भव: प्रकरणा साथमलंच र्लेन किया या: प्राणनिमित्त लात्म तोविषयाव भा समा न्रं करणा नोप वतिश विदि। पातु पाणस्येवम नआदिपुत स्मा साथम्यप्राणस्प प्रतिगछतियुक्त:पयुक्त:सेनवा चोकद नंकिन्तिमि नपाणिनाचसु: श्रत्रयोश्र कोदेवःप्रयोक्ताकरणानामधिछ्ठाता चत ना वान्य: सकि विन्ोषणद तर्थ,श्रवस्पश्ी ितादिप निवचननि क न: प्राणः प्रथम: पैतियुत्तः।के नेपिता वाच मिमावव तिच क्षुःश्रोचकउदेवायुनकि॥श्रत्शोमनसोमना रविशेष स्यनिमित्त लार्थविकि मारि विशेषरहित स्पालनोमन आदिप्रपटृत्तौनि मित्त तमि सेतत्श्रोत्र स्श्रोत् मित्यादिपतिकचन स्पार्थ: अनुगमाद नुगता निहय रास्मिन्नर्थसराणिक थंभ जोस ने नेलिश्रतरतस्प्ावभा सक लंश्रोत लं।७।। ण र, तै व प्रतिवच नंबुवाणा निर्वि शेष लंम न्यतेरतिश्रुत्य क्षरानु साराह्म्पतइ त्याह।अनुगमादित्ति।निर्विशेषत्वाच पदा भावा कथनि विनोषे क्षरानुगम इँ त्याह।कथमिति। निर्चिनोषस्यवाच कता क्यायाकया र्थ त्वा भविध्युपल सणा व. साभविष्यती सभि प्रेतयश्रात्रनाडू स्पताव नुरव्यार्थभाह।ऋणोतीति।॥

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के०उ०भा० श्र राय भासक व स्वश तयेव भवि व्यति श्रो स्प ं तस्यना आावभा सकले ना तोप लक्षथित व्यय साको सा मा माह क दोपसबध रुपत पेति।राकि:सनःप्रका राभा नस्येव याच्याना स तोsप्रका 2 मानस्य नाविषा णाय बानलेन रकिम लानुपप ते:। सनाप का शश्र्या मरु पंतद्रे देमाना भावादत:उपरप तादा सप ने व श त्स्या व भासक सन रा तं व्येणजउ लाछ्ाउस्सनाहीन लालूभु किरु पस्पे वे सर्थः।।श्ीत स्यायभासक ले मुप त-रवादा कय नि तिय घुपल व्यपलस्ष्यनेत र्धुपत वारथ्यव भासकलूमन्याधीन मित्यनवस्थाप्रा प्रोती सा मा कयाह आाता न श्ेति खवप्रक ३ लादुपररुब्धुःसना प्रती त्योरनन्यायनलान्तानवस्थ सर्थ:।नबलेव मनवस्थाभावःत थापिक पंत्रातस्य श्रत्रमि सासो च्यलरसान्नियाह।यनश्ोचस्तिनदा सनि मि न ला दितितस्पास निमित्त ला न होप ऊ थ्यरप क्या: व भासक लनखत-ओ नस्याचिदप लात् ओहनशचिद्प तायछो नस्उपल ध्धलैना पभा सक तत दात्म निभित्त तओवस्य श्रीमितुध्य तय यास तस्यक्षत्र य प्ा वादकस्योष्यभग्निनि मि वा चोह वाचस3 प्रा घास्य प्राणाश्र् क्षुषश्र्व क्षु रतिमुच्यू।। नमितिदापुरप्युदक स्पदग्धाग्निरुच्य तेवदक मविहय म सयोगाद ग्निरु च्पत वहदनिल य (सयोगा दुपलन्ध, तुंत करणश्री चा दिउदक स्पेवद्गय लमनि ं हित त्रनत्।। आ.्र स्पश्रीत्रमि युपलक्ष्यते निर्वि शोष चैतन्यमात्रमि यूर्थयुथासे स्ि क्षत्र जाति निया म ककर्म क्षत्रमित्यु च्यतेयथे सर्थ:य द. श्री वाटि मा स्यातमास्निक थको काय तिका देः श्रो वादि घ पीपलपतज्यवहारद त्याशं क्याह उदकू मयीति तहटुपमश्रीराम बंधा ओो चादिषप उव्धतवव्ययहार इतर्थ: भवन्म त्तेताह निलाप लध सभावआतमो तिया ऋ:करण तवन स्यात पायाहिक रणा पेक्षे तयाका क्षायामा ह।र्अनित्य यदिति।प्रभातु ये सव धादनिस भुपरू पI तं भवतिबुर्धि परिणामेल छ्ो त्रादिक रणबुद्धि यतपेक्षया भवेतीसर्थ:।। 5 =

श्रो त्रि संगत्रेप्र मातरि अनि सोप उवत सभवे पितया संग स्यसाद क्षिण:कथमुप उब्ध् लव्य पदे वइयाएंकाह।यत्रतिनिए कमर्थसंसषिप्याद।श्री आदििति।श्री तदियु निमि तघुसुत्मुश्रजदि संह ने प्रमातरिओन लादिरुपोपल्पिरिसुपरब् तवमिस थेः भनसोभनट त्यादिकेव ममितिदि शतिमनआदि चेव मितिन्याय सामा न्याय भोक्तंव्याख्यानंद्रष्टव्यंनहिम नसो ॥॥।

मत्रतुनित्य मुपलव्ध तभ ग्नावि वोषय सनि सो परुभ्ि स्व रूप लाग्ध नोप ल क्ो च्यतिश्रो जदिुशतवादु परुब्धिनित्यानित्या चातमन्पतःशवस्प श्रोनमि साय क्षग्मर्था नुपग मादुपपदनेनिर्विशघ स्योपलधध सचरुपःस्यातम नोमनआदि प वृति निमित्त लमिति मनआदि पेवंय थे क वा चोह वा चं पाणस्यप्रा ज इ्रनिवि भक्तिह् पंस र्चचेव दृष्टच्यं।।कर्थपृष् लात्च रूपनिर्देशः प्र थमरयेवचनिर्दशःतस्पचतेयलात्र्म लंइिदि तीया अतोवा चोह वा चंप्राण स्यपाणद्रत्यरमातू सर्वन्रैवविभकितयं।।

मनस्तवां ची वा लं वा स्वान त्येण संभव ति अध्यस्त लाद नोभिष्वानस ताप काशाभ्यामेवसताप्रकाशलंमनआद्खत धाि ष्ठा नंनि र्विशोष में वोपल क्षयित व्यवि शोषच ले अध्यस्न लप संगा दिति भाव:विभत्ति दयनि रदेशता सर्य माह वा चो हे सा दिना मन आदे:प्रवर्तकः कि खभावदतिपष् लान् सरूपनिर्देश: कर्न प्यःसचप्रथम यानिर्देश प्रथमप्रो क्तेतिस्मर णादि त्यर्थ: ॥ 41 =

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के.उ.मा- अतिमुन्यतिधीरादू तयु न रं वा कच साध्या हर योजयनि। य दे तदि त्यादि नाएतत् बु ध्ाम ताभव तीतिसंवं ः तादा ्य नाध्यारोपिनाधोन री.वा.यो व्यादिरन व बोधनिमिन्त: संसार स नो मोक्षणता दालयाध्यासनिव, निर्दएंफ लमम ताभवनीतिविहेहमु कतिरट एफलमि सर्क मणासवं धानु पपत्तिरितिशेष:।निमिनाभात करीराय नारं भेअम.ताभवंतीति प्रयोदांगातुकलममनतस्पति शं कानिव त्र्थमाह गा ३ ररादितिएअना दिभव परंपर याशरीर्या संपर स्ताच् भविष्यामीतिशरी रदि सता ना विकेटस्य प्रति संधानधर्मा यधिकारित्वाध्यास: यदेत लोजा युपलब्धिनिमित्तंश्रो त्रस्पश्रो त्रमि त्यादि लक्षणनितयोपलब्धिस्वरुपनिर्विशेषमा त्त्वं बुध्ाति मुच्यानव बोधनिमिच्ाडध्यारोपितात् वुध्यादिलक्षणा से सारा न्क्षयं्कलाधीरा:पी मंतःपे तास्मा को कालुरी रते त्वियु त्या न्यस्मि न्नप्रति संधीय मनिनिर्निमित्त लादम् ता भपंतिसतिहा ज्ञाने क माणि शरीरंतरंपतिसदय ने आ आाव बोधिन: सर्चकर्भारंभ निमिता ज्ञानि परीत विय्याग्निविपुष्ट तवा कर्मणामिस नारंभे अमृताएवभवंतिशरी गदि संताना वि केदप्रविसंधा ना यपेक्षया ध्यारोपितम, सुवियोगा सूर वर्मप्यमता: संतोनि सात्मस्वरूप लादम नाभ धीरा:प्रे सास्माठो काटम ता भवं ति। नत बच सुगेदवतिनवागाछतिनोमन्ः॥६1। ६। ६।। वंसी सुप चर्यतेनतत्र चर्षगछ तीसु केपिपर्यनु योगेहेतुरप्रतिपतिःश्रोवस्यश्वोत् मिते नमादि नोके प्यात्मन लेअप्रतिपन्न ता ला स्मत हतोवस्तुनःपुनःपुनःपर्यनुयु युक्षाकारण माह:नतत्रचक्षुगद्तीतित त्रसोजा घास भतेच्शुरादीनिया कु च सुपो:सवें दरि योप ल क्षणार्थ लातू नवि ज्ञानमुताद यंतिसुरवादिवन्त हिम्ट ह्े श्राराम्

ंतः करणेनातआह।नोमनःन सु सािव म्नलोविषयस्तत् ।।॥काम्यदिदोष कवपनचैतस्माद ध्यारोपितो मो मृतय स्दि पो गा पक्षया पमलसे स्पभव न मौप चारि के मि सूर्भ:1वतबच सु गछती निया वषार्थसंय प्ाति आ चार्येजो के पिव लोस व्य स्पाप्रतिपत्तहैं तो: पर्यतु योगेहेतुनतत्र व सुर्गद् ती से तहिव प्योतिश्रीवस्यओ्रवरमि सादििना॥॥७॥

आत्मानेदियविष पो5 भौतिक लान्न रविषाणवृत् मनश्वेद्रियंत्रसिध्ध ततस स्ाथ्यविययर साहांद्रियाि।षय लादितिन वि ोनविज्ञानीम इसाथभ्पास:सवधातःकरणाविषय लख्यापनार्थ:आ क्षेपपरतयाच्यारव्यायश को त्तरलेन व्या चषे। अभ्ने सादि ना। इतउप लक्षणप्का राद न्येन प्र करेणन ए क्यतेटर्शयितुंकि या गुणा दि विशेषश्रून्प त्वादि तर्थ:।आग मंद तुपदेशपारंपर्यमाहेविस बंधःआगमस्पार्थमाह।।

मित्तं भवेनदविषयला नवि सोनविजानीमो, थवाओ टी नांश्वदिल क्षणप्विशेषेणदर्शपेयुक्त: आचार्याह नशाने दर्शयितुंक स्मान्ततत्रचसुर्गछती सारिपूर्वव त्र्वम त्र नुविशेष,पथेनदनुशिष्यादि तियभैतदनुशिष्यासतिपाद येतूअन्योपिशि व्यानितोन्येनविधिने तपभिश्रा यःसर्वथापित्रल् बोधये सुकःआचार्यआहअन्यदेव तदिहिनार घोअविदिनादधी त्ागमंविदि वाव्िदि नाभ्यामन्यलंयोहिजाता सएच सःमर्चासक लादतः सर्वात्मनो ज्ञानु श्षी वंतरा भा वाष्िदि काद न्यल सनेतिवेद्यनच त स्पास्ति

वेनेतिच मंत्रवर्णाहि जाना रम रेकेन विजा नी या दिति वाज सनेय केपिचि व्यक्तमेवविदिनंतस्माद न्यदिसभिग्रायः पहितंय कं. तदन्यद्विचय लाद रप सषविरोधततो; नि समतएवानेक लादभुद्धं अलएब नहि उकणंत्रलेतिसिद्ं अस्तुतर्हि भविदिन नविता नानपेक्ष लातूयख्य विदिनंनदिजञाना पेक्षमविदित विज्ञानायहि के कपन निरि्दिंतुविज्ञा नानपे क्षकस्माहि जानस चिदिता निदिताभ्याम न्य व्वमितिअ्पदातानविदि तमविदितं वास्याद नोविदिता विदिन लनिषेधेन आतनोन्यत व विदपा विनिवर्त्पा ला ख हे ुपदिष्टंभवती सर्थ:॥। विदितान्य लवेयु किमाहयोही तपादिना।विदि तान्यत्वन नस्पार्थिकमर्थमाह॥अफिे तिकार्या व्यावृत्ति:सि कनी सर्थ:।। 11 = =

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के. धे.भा आतमा ययप्पन्यतोवि ज्ञानं ना पेक्षते नथापिस्व प्राह कत्वातव स्मा दे ववि ज्ञानमपेक्षते तेनविज्ञा नानपेक्ष लभसिद्ध मिसा शंक्या टीवायो हानचस्वतएवेति। सवभाव त यान पेक्षमेव सिद्ध लवादपेक्षाश ष्ार्थोन पटने खव याहक तवं चा सि ्द, एव व न्तिवि रो चादि त्यर्थ:।वि तानस ज्ञातीयानपेक्षपरकाशंप का शला स दीप वृदि त्य नु मान मभिप्रे सदषानमाहनहीति।तमोध सयेहालाकपिकषात दभावश्या लो के स्वनएव सिद्, इू. सर्थ,प्रदीप स्य

न च सवनएवा पे क्षाअनपेक्षमेवसिद्ध ला न्हिप्रदीप:स्वरुपाभिव्य को प्रशातरमन्यपेक्षते स्वतोवायउज्च नपेक्षत तवन एव सिद्धे प का शात्म कला सपरदीप स्यपिक्िताष्य नर्थ क:स्पात काशेविशेषा भावा नहित्र दीपस्पस्वरु पाभिव्य को प्रदीप प्र काशोर्थवा नून चेवमा तम नान्यच्रविजा नम सिवियन सव रुप वि तनयपव क्ष्य ते ।। चि रोध रतिन न्वान्य ला स्सच रुपवि ज्ञानवि ज्ञानसवरप लाहि तानो नरं नापेक्षतर स्येतदसत् ह श्यतेहि विपरीत ज्ञानमा तानिस भ्यकू ज्ञानंचन जा ना भ्या ता न मितिश्ुनेश्व्वत लमस्या त्मानमे वावेदेत व।्, र् नभा त्मानं विदि तेति च सर्वत्रश्रुतिषुआ मवि ज्ञाने वि ज्ञा नोत रापेक्षलं टश्पनेतस्मा सक्ष शुनि विरोध् वतैजस स्यतैज सांत रानपेक्ष लेपिविजातीय प्र काश स्यज्ञान स्यापेक्षास्व व्यवहारपि ट पातथात्र सणोपि विजानी यजानपिक्षाभ विष्यतीतिन चवाच्यमि त्ाह न चेव मा तन इति। श्रलणोन्प स्यसर्वस्या ज्ञाना सका दा नसं भाय नेव नास्सन्पन्नततन विजानी श्रीराम

पज्ञा नापेक्ष मपिज से त्र्थ:। ज्ञा नान पेक्ष े लोकि कानु भव विरोध चो,डा व्यप रिहर ति । वि रोचद ति चेन्नान्य त्वा दिति स्, व्र स्यपूर्व पक्षभागंविभजतेश्व रूप वि ज्ञान इत्यादि ना।। 1I

विज्ञानान पेक्षतंब्रस णोभा शिसापेक्षलजीवश रवाच्यस्पउ पाधिविशिष् स्यानुभूयते तोन्विषय ला नविराधा त्याहानक स्मादि त्यादिना॥। बुख्या रोका ये का रणासं पातेय साभिभावनसंता नो नि परंप पाि स्विे रूपमनिवाच्यम ज्ञानकक्षणचिह्ंय स्पचि ्प्ति बिवस्पसतथोत्त:पचित्तंत्रंहा निर्वा चयम जान चैतन्यमबवय साव छि न्ेय या सरुपाव भामंत्र

यंतेतधानथाचि स्पतिबिंब: प्रमात लादिरपेणभवतीतिन साधानोयसस्विविष्टस्पन त्लतयेवस लाहिशिया तर्निवरोयआत निसचितसव रुपःस एव सा रोयस्मिन सतथोकः बुदपरिणाम णानी उपीनादिप सयानामुस ननविनाशव लानदुपर करुसे

नक सपाद न्योहिसओ ता बुध्यादि कार्यकरण संघातार्भिमानसं तानाविछेद लक्षणो, निनेकातम कोवुस्यवभासनचा नश्वसुरादिकर पोनित्यचित्चरसा त्मांतः सारोय नानि त्यंविज्ञानम वमासने वोद्द् प्र सया नामावि भोवनिरोभान धर्मकलात्तप्ष मैं तथेवविलक्षणमपि नावभा सनेंन:करणस्यमनसोविभ नो तर्गनला सवीतरश्ुनेः॥। ॥॥

णानि सं चैतन्यय नाव भासने सा ्योजीव:सर्वाण्य नानिजीन विशेषणान्य न्यलस्फुटीकरणार्थानिनकेव मनित्व लंविशविष्टापाधिरुऊ या विज्ञान स्पतन्दूर म नैवाव भासनेमन्तुरो हं जाना मीतिप्रतिजारी रंवि लक्षणमपिचत न्य मब भासनेविशिष्ट भे दादित्यर्थ:।पर मार्थन कीटश चैन न्यंय स्यविशिष्टधर्म नावभासनेतवाह॥अनःकरणस्पेति। 11

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के-उ.भा० ननुविशेषणसंवप् ए्वरुपेस भारोपिताविशि ष्टोभानित स्पमिध्या लात्कथमा सव्यास् ार्विष्टवा य गतेन चित्स रुपेण तादा तयाहा हाउत्यना त्मापि बुद्धि विशिष्ट आत्मे सुप्गता लोकिकैरितिस बध: अनहत्युक्तधर्मव लाद स्ुनित्यति ज्ञा नाटि ल क्षापोजीन:कथमेनाव त वि रोध: परित्त तःउ त्ाकोक्षा यामाहन बही ति।एवं लोकानु भवविरो ेपरित्ट नेपिशास्त्र वि राधोनपरिहन इत्थाह "न लमिति।विशिष्ट स्यमिथ्या ला टू लास्मी सनुभवायोगा न्मोस्षाह ला योगा चनलमसी सुप देशोन

अंत्गतन नित्य विज्ञानसवरूपेण्णाका शवन्अप्रचलितात नातंर्गर्भभूतेन चा तोवुथ्यातानह्विलक्षणअर्निभि रियागिि: प्र सपै राविरभाव निरोभावधर्म कर्वि ज्ञाना भासरुपैर निलेरनि त्यविज्ञान आत्मामुखीदुःखीत्यम्पुपगनेलेकि केर तो न्योनि सवि ज्ञान स्वरुपादात्मनस्त ऋि विज्ञानापेक्षाविपरीन ज्ञानलं चपपयुतेनपुन र्नियविज्ञनिन तमसीनि वाधोपदेशोनापपय नद्तिचेनू आत्मा न मे वाविरिलेच मादी नि चनित्य बोधा तमक लान्नहवा दि सेन्पिन प्रका पने न स्वर दुर्थ बोधोप देशोनर्थक इतिचेन्न को कछवधया रोपा पोहार्थ लान् सर्वा त्मनिहि नित विज्ञानेयुध्या घनि सभ मालेकिरध्यारोपिना: आत्मा: विचेकन स्तद पोहार्थोवोधोपदेशोवोधामानः॥।४।।।। तेचे तर्जहन पाए वोपदेशे।हिस साशं क्या हु। आ ल्ान मे या वेदिति।एच मादिनि वा क्या निव्रलोप देशपक्षेन सेग वनेतननितफ श्रीरत्म उाभावा दि तर्थ:॥ विशष्टस्यनिरुपाधिकस्य चत्रह्ाणः उपदेशासं भवे प्युपाधिविशिष चित्ारु पजीवपट लस्यस्पवेशि स द्वा रेणोप दे ऐेष भव ्ध्यतिक उंत स्या रो पितवं पनिवत्तिरि साह॥न लोक ति।।

ननुसो क वा देना लोच्यते अ नात्मा या ना य आ त्म नोधिषठान तयाध्यासकर्त ला सभावा के नहि श्रुत्ति का या रजत भध्य स्पतिनश किकेक ध्यास करव से चातम नः प्राये वाध्या मात नतं वाचं कर्ततस् प्राग्भा वुनिय मात्ता चा इनिर्मोक्ष संग: फर्नलस्पाध्या स नकर्ते लभात्म नस्तद्विप यकत लातरा भा चात् भावे चानवस्था ना न्दिती योजड लाद ना लनाएध्यास कर्त, ला नुपप ते ने त नोहि देवद तोध्य स्पनी तिप् सि्दूं अथजैस्याप्यासकर्,स नामशरां साश्रय लं यद्यपिन संभवतित थापिभनिनिमित्तलंह र जपाकु सुमादे ने तस्यस स सपोपाधिकव संभवादाव्य का रमवेचज उस्य सर्वस्याध्या सात्म कलादध्यास हेतुलन संभव तिनस्माद संव दमिद भाष् न काध्यारोपा पो हार्थ ला दि तिलोक शब्े नाहं काराद्यउ च्यनेतेषा पान हरि कस सल स्यारथ के या समर्थ ले नाभ्युपगमात् सधर्मारो पनिमि तले नापाधिसंभ वात रमार्थ स वा स्ये वोपाधित्व मि त्य न्रास्मा ्पतिश्रो ताभा वा दह का रादय श्वचि तंत्रा नाद्यनिर्वाच्या तत्रच वोभा वोपौसमेन सो।।६।। िय्या मयभूतसूक्ष्म विकारअविद्यावदिन्नएव चेन न्येनिप नंतिउपाधिवि का राणा मुपहिनेपक्षपानिता यादर्शनान् यथाजउच नादी नात रान्ना सं गतभाष्यननुबोभाल नो ना बोध:समंनस:पकाशाप् काशयोर्निरोधप्रसिद्धेवोोपिचबोपालनानसमेज सोनिर्विकार ला न् कथ बोभास नो बोधोप देश: सार्थकस्तनाह।नत्रचेति॥बोचादनयस्या बोषास कले नावाधाश्रयलन समंज संआत्माश्नयलप्रसं गादिनिवृन्तित संगाव तस्य बोधा संभ वात्त समाहोधात्मनएवाबोध:समसः।प रिशेषादरोभश्ा सिद्ध : साक्षिवेद लाह्व!पोपितवरैव समंज सोध दादेर्वेषि ता भसिदेश घ्य स ए वबुद्धिपरिणामे बोधशह ययुसतेःपरिणा भ्यतः करणोपहित स्पबोधा बोधात नोबोधव लंसमेज समित्र्थ:।

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के.उ-मा० सामज स्पे है लर माहअन्यनिमित्त लादि ति।अन्यत्राहं का रदि संघाते वा दिनों कोकिका नाच बोधा बधाप्रसिद्धोतो चात्म बोधसं टीवा्यो ८ वंधादि तिभा तमनो मुख्यो बोधा वो पीय तसं वधादन्यत्रय दुपचर्य ते तत्त वमु खवयंय भाग्तिसंबंधा दुट कस्यो प्सउप चारेणाग्ोलन सव्यमि तर्थ: आर निमितीचेदन्यत्र बोधा वोचीनहि निमित्तलादात नाव्यापारप्र संगस्त चाहरनीचेनिधादित सन्तिध्य संन्निधिमात्रनिमित्ते को के सयह नीभव तोन हादिखःकचनस्वाप यतिउयाप यतिवा अतो निमित् लंनव्या पार वलावि नाभूजमित्र्थ: ननुआ मनि वोधस्नि सलकभ कााेयवहारःजासि शास्ाथमिदानीं चजानामिपुन तोस् सी ति त त्राहड शतं॥।नित्यावौचयप्र काशानिति॥ तद्द्विषय स्यका लानकि न्तलन कालाव छोटव्पवहारःस्वरुपेणनि सपिवाधे अन्यनि मिन्तलादुद क इयोष्ण्यमग्निनिमिन रा्य हनीर यादि सनिमि ने लो के नित्ावौषयप्र काशा यगन्यादि संयारन्य वभा वाभावयोर्निमित्त लाद निसाविवोप चर्य तेघक्ष्य सग्नि:प्रका श विष्य तिसविते तिनदन्एवं चसुख दुःख बंधमो

चितासी प्र कानूम्य सा त्मान मितिनद न् बोधा बोष कर्त तेच नित बोधात्मनिज स्मादन्पद विहिनादधिश वृक्ष्यान्पार्थे यहायद्िय स्याधि तत्त तो न्य सामर्थ्याय्यथा:धिभ तादीनाराजा।। 11 = नवि रूध्यतेद त्पर्थ:॥आत्मनि योधा बोधयो:साभंजस्येकि सिद्ध मित्पतआह एचं नेति॥आगंतुकविषय स बंधा त दुपस्ुरूपेण बोध स्या गंनुकलपि ट्दानी म या खा ता बुध्यने इतिनित्य बोधा सनिकथ बोधकर्तल समायुवर्ति.क.तामोक्ल नेव न समारि,कनाय पदेशड साशक्यावर कापनय स्यागतुक लेनभ विष्यती ताह।।यथा सविता साविति।य स्मादनयोपाधिक मात निवोध कनेलंसतःपु श्रीराम नर्वि जा ना नपेक्षत मेवत स्मादिज्ञानानपेक्ष लाटविदि तादन्यलंसिनूं। कथमन्य सविव क्षाया मधिनादद:से गछनिनवराह ॥अधिवा टशवेति।क ८ नियातानामने कार्थ लाल क्षवायच त्र्थः ।७।।

अविदि ताद न्यल स्थार्थिक मर्थभाह॥अव्यक मेवेति विदिनं नभवतिअविदिनंच नभव ती सो के कनिवेधस्वा वा सर्यमुत्कासमुदायार्थमाह ।निदितमविदि तें चेति।च्याच चक्षिरइसरवात त्र्यत र्क प्रतिषेधार्थमि सेततमालंविर णोति।येन सदि तिवय हा चेतिमं नानुवादोहठ पतीत अव्यक्तमेवा: विदिनंतनोन्यदि त्र्थ:॥ विदितमविदि नंचव्य क्ताव्यक्ते कार्य कारया लेनविक ल्पिते तान्या मन्यवूब्र सविज्ञान सरुपंसा र्व विवोषप्रसस्भिनमित्य यसमुदायार्थ:।अनए वात्मतवान्हयपाेयोअन्यधन्पेनहय मुपटेयंवाज जने नेव वयक्षकस्पचि ट्रेय मुपा देय नामन त्यात्मा चत्र सवोतराता लादविषय भतान्य स्पा पिन हेयमुपादे यंवा:न्याभावाञ इदि मुशुमपूरवेषामि स्ाग मोपदेरीप्याच् चस्षिरउत्यसातंन्यतर्कअति षधार्थयेनख ड्रलोकवनसेनिमेवागमे तिप द कं व्या खव्याल वंतीन पुनःस् बुद्धि प्रभवेणवर्केणोकवंतइ सागभपा रप पविकेद द्शय तिविय्यास्तुलयेतके सतचन

वस्थितो आां तोपिभ व नीतिय हा चेनिम ना नु चा दोर ठ प्रनीने: अन्यदे व तहिदि नादितियोयमागमार्थो शासणो के स्पेव रडीग्नेम नाकय हाचे सादय: पञ्च तेयट्रहाचावाटेन नाुस्मन ्युक्तमपका शितमि सेलवयेनबाग सुद्त इतिवाकू प्रकाश हेतु लोकि: येनप्का श्यस इतिवानदोभिधान स्याभिपेथप्रकाशक लस्यहेतु लभुच्यतेव्रहणःॐ उत्तंच के नेक्तावा च भिमांवद तिय हा चाह वाच मितितदेव बल ंचिी सविषय लेन बसणआतन्येवस्थापत दविस न मे तदि भज ते॥अन्यदे वे सादि ना वेन वागम्पुद्यत सनेन वा कुप्र क शो हेतुसाति श्रक्षण: करियत इनियोजनाएतन् सू.वं विदणोति।येने सादि नातदेवब्र लंविद्ी सादयाम्नायआतन्येववु द्वेर वस्थाप नार्थ: उपसहा रार्थ:अविषय लन त्र ति रिक्त सरूसे थावे य त्वास भवादितियेजना।। 11 911 11

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के-उ.भा- एन स. अंविभते जमय हाचे खादिना॥। मंत्रसमुदायस्यार्थमाह।सर्वकारणा नामि त्यादि ना।।य तर्वक रणानामवि व येयेन निर्विशेषेणसर्वाणिकर टी.चा.यो. णानि भास्प वेतहू सैव वे तनोनिरित, जञानापयलान कर्नवइतियलपरमएन लक्यतेविन्दी यने नातिरिकं मावि री सभि प्राय:॥ इतिप्रथमारव:।।यदि मन्य सेसु वेदे सने न या वचे न शिष्यमु द्धि वि चा ल नानि, पतेस्थूणानिखनन न्यायेनम्हीतस्पया थ्यार्थमेततंग हंवा कवितृकोनिविदि ताविदिन यहा चान स्पु दि तं ना कू प का इनिमिन चेतिव्र सणोsविषय क्षेनवस्तं तर जिष् क्षानि वृस स्वात्मन्पेचावस्थापय सा स्ा यस्देवब्र ल संविद्धीतिपलंउपरमयतिनेद मुपास्य प्रतिषेधाञ् यन्मन से सादि् स मानम नोममि तिये न हणाम नोपिविषयी रुतंनित्विज्ञा नस्वर पेणे सेनत् सर्व कारणाना मविषियं नानिचसन्यापारा णिक्षविष पाणिनि तवि ज्ञान सव रुपानभासनयापे नावभास्पन इतिश्ररोका र्थ क्षेत्र केत्रीतथा क तनंत का गं तीतिस् े: नस्य मासेति ना थर्ष णोपेनपा णइतिक्तिया शाक्तिर या विाननिमिने सेन् इतियथ

पहा चानम्पुदि तियेन वामस्युथने।नदेव अ्रसलंविद्िनेद पिद मुपासने।यन्मनसानम नुनेये नाहर्म नोम॥वेि दिनेदं पदिदमुपा सते।।पचक्षुपान पस्पतियेन चक्षविपश्यति। नदेव ब्लनलविद्धिनेटंयदिद मुपासनेय ब्रोेणन ऋणोतियेन श्रो तभिद्श्रुत ।व देवब्र हलंविद्धि नेदं परिद मुपासतप ताणेनन पणितियेनप्राणःप्रणीपने।वदेवजस ल्यं विद्धिनेदं पदिदि सुपासतेइतिप्रथभःखः॥ यदि मन्यसेसु वोटेविर अ्रमे वापिनू नं ।। ७।। 11 वज एलं चि्दी तिस्वा राज्ये भिषि-व्यउपास्वप्रतिवेधेनाथापयस्प वुदधिविचाल यति। यदि्मन्यसेसुवेहश्रसतिलनतो लपमेब ोपंवेलमिति न तं निश््चि वम न्यतेर ता चार्य:।सापुन र्निचा लना किमर्थैत्युच्यने पूर्वमडी तेवसु निय र:स्थिरता ये।देवेघ पिसु वेदा हमितिमन्पतेयःसाथ श्रीराम स्पशलणोससं दहर मेन वेतिनन करमादविषय लाल स्पचच ट्रहणः अभवाभव्पमे वा स्पाध्कात्मि कंमनुवेयुदेवेपुच आविदेविकम स्पबल भ्यामि सारिना। अज्य भेवत्र सणारु पन नं लने स नि कामन्य तूत्या का क्षा यामह। मन्यनद सा चार्य द्तिणम दितिवाटरमस्यबसोुपत मस स्ता हव दे वे अपियोमन्पते सोविद हर मे वनूतंमनपेत इतियोजना।। लोय ट्रपंतदितिसंवं प: अथन् निदेन:भीमा सा या:।।।

पथनु रसि सो वुर्मिमा साया रतिसंयहवा चय विय गति।यस्मादि सादिना। प्रतिब चनस्वार्थ सगहीतकृणोति सम्यगि त्याहि ना।। वि चार्म मया चिदि ते व्रसति कि प्रतिब च नंद दा सु ता विदिन मिनिवानासःआचार्यागमप्रत्वयविरोधहैदनविषयतवाच् घटयद बह्सपसंगा दववि नलेन ममनि कारिलापाताच्च नहितीय गोपा दिम्यो5वि शेषप्रसंगात्त णीम वर्था नेवा प्रतिभाप्संमादि तिवि चार्यकेकपसदोष परिजिह र्षपाविदिनमविदितं चति समुचि त वका अ ज्ञान से रया यमा वाहिदिनवदनविषय ताभा या कविदि तमितिसुप रिनि परमाद हर मेवसु विदि नं श्रल्म णोरु पेअन्यदेवतदिदि नादि सुक्तवात्सु वेदे तिचम न्यसेअतोsए मेयवेसतंबसनोरुपय स्माद थनुत स्मा नी मां स्पर्मेवा द्यापिते तव प्र ल वि चार्य मेव यावहि दि ताविदित प्रतिषेधागमार्थानुभवर समन्येविदितमि ति निथ्य स्पमीमा सानंत रोक्तिः प्र वयत्रय संगतेः सम्यगवस्तु निश्र याय वििचालित:शिष्पआचार्ये णमीमास्वमेवनइतिचो क ए कनेसमा हि तोभू ला वि चार्ययथो कसु परि निश्नितःसन्ा हाभ मा चार्या तानुभवप्रतयत्रय स्ैकविष पलनसंग सेघए वृहि सुपरि निध् व्वि ताविद्या सफ लास्या न्जानि श्रिते तिन्यायःप्रदर्शितो भव तिम न्ये विदि नमिति परिनिष्वितनिश्चितविज्ञा नतति ज्ञाहे न के; परिनिकिनंसफ लंविज्ञा नं प्रति जानी ने आ चार्यो मनि श्रय योस्तुज्य नयियस्मा हे तमाह नाहमन्ये सुपेदे ति॥आहे स व धारणार्था निपातानैवम न्येर सेन यावत् अपरिनिकित विज्ञानं नावत्सुवेद सुछ वे दाह त्रतिविपरीतोम मनिश् यआसीत् सोपज गा मभवद्धि विन्रा लित स्पय थी कार्थमिमा साफ ल भूता तवा त वल ल निशवेय रुपा सम्यकु ह श्रिवतःसनू प्रतिवचन माहे सरथः प्र सयत्रयसष्पसंगतिःसंघटनमे कसिानविषये कि मर्थमुच्यने।सवादाधीन पामा्य मितिनार्कि कसि तर्निश्ययार्थरन: प्रा माण्यपक्षे ला गमार्थप स्यां तर संचाद सवासर्पद्योनक:प्रति बंधनिरा सेनोप चारेण निश्चय हेतुरि तिस र्व स्यप्रतिवचनवा वय स्यना सर्यमु ्कामन्येविटितमिसो कदेशस्यार्थसंग हगतिस गहिं तं स्फु. टयति।।परिनिकठि तमि त्ाहि ना।७

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के-उ०मा० विरुद तादिनिविपरीतप्र त्यस्पसम्य कूज्ञानविरु द् लात्तददय मा त्राद्विपरीतप्रसयोपगतइत्यर्थ:। नकेव लंविप रीतप य स्यसनाय 2 टी.वा०यो० १० स्यचाभावा न्यम निश््व तविज्ञा नम ज्ञा नाभा वा च साहा यस्मा ज्वे ि।अथ वाबेदचे सस्पा न्यार्थ:क्यते य धनिसमा विता नंस्यानर्ह तस्य आ्रागभावकाले प्र्थ्साभाव का ले वा। जञोन सभा वये तन तुतदस्तिनि संहि विज्ञानं ब्रलमम स्वरूपं तलो नोनवेद यदि चवेदनंभमवि किया भवे न्दा चिकि याया: का दाचिकला ल दा चिद ह वे देति सं वयेन नतु तदलि स्व रपविज्ञान स्अन्पथाला सभवा क दविदवाहय थासत भाविका च लतथापर्वता स्तिष्ठ तीति न्यप देशस्तदू दि सर्थ:॥रसतार्था स्यं प्रमेति खप का शल मादायव्याख्यानं चए ार्थमाह।वि चिक उूलादवो नाहम व्येसुयेदेति।य समा ववनन्तव व ेनिमन्यतनवर्नतेअविदित बल प्रविषिधात् कथनर्हम न्यस व सुक्तआहवेदचचशख रादेद चनवेद चे स भिप्ा यो विदिताचिदि नाम्पामन्यलाट्र,हणस्तस्मान्मयाविदिनं अमति मन्यलइति वा चचार्थ: अथवा वेदचेविनि स्विज्ञानव ह स्वरूप तया नोनवेदवे देवचाह सवरुपेविकि याभा वादिशषविज्ञान नाहम न्ये सु वेदे ति नोन वे देनिचेदच।। पोन सहेद नदेद नोनचेदेतिवेदच।।७।। चप राध्य सते न रन इतिपर मार्थ तोन चवे देति योनसद्े दनदवेदेतिप क्षा नरनिरा सार्थमा म्तापउ कार्थानुबादात् योनोस्मा कंमध्ये सए्वतत् बलवेद नान्यःउपास्यत्र हवि लाट तोन्प स्वय थाहं वे दे तिपक्षां तरेत्र सवि ंनिरस्पत कु ताय मर्थो 1I I1 शषविज्ञानंचेति।आग माहिचार मह कता ज्जा व लात्मता्पमंःकरणपरिणामरुप लासीतिविश षवि ज्ञानंनेा चसीयतद्सुच्यते॥ 11 श्रीराम तः क र णो नो पाधिनातम न्यध्य स्नं नपरमार्थ तोजञानव लमातम न टलिनयेद चेति प्रकाशं तरेणापि प्रसविज्ञानंसंभवती तिश का निरा सार्थ बाकक १० कदेशाइ त्याह॥योनस्नट्ेट तदेदेति1 इटसत वाक्यविरणोति।योनो:साकमि ति।योर्नोस्मकंम प्ेतदविदिनाविदितान्यलंवेदे वि शेम:पथाइं ये दूतो-्पेन प्रकारे णवि द्षउयास्यञ्रलविलादितियोजना। ६।।-८

उक्ता नुचा दादित्यम्पा सास्य ना सर्मलिंग दर्श ना द्विषय नमैव व्र सवि ानंविवक्षितमि सर्थ:।यस्याममिति वा क्यार्थसंगहीन व्यारयाति। शिथ्या नाथे सादि ना। श्रनमि तिशिथ्यस्या चार्यस् चोकि नेभवतीति स्याप नार्थ तेन शीतेन व चनेनकथमुस्यर सा कां क्षायामाह।पदुक मिति। यद्धलविदिताद न्यदुक्तमितिसंवंध: गोपा लादीना मिनामततंन विवसिनं किंतु बहणआलफलासानोपोव बोघोयस्स बोकवास्स्य उउकानुवादादु कं स नु वद ति नोन वे देनिवेद चेति।य स्याम तमिति श्रीतमाख्यायिकार्थप से हाराथशव्या चार्योकितसुत्तिउक्षण यानुभवयुक्ति प्रधान यासयायिक था योर्थ: सिह्ध:सश्रीतेनचचने नागभप्रधानेन निगमन स्थानीयेन सक्षेपतउच्तेयदुतंविदिनादन्प हागादी नामगोचर लातूमीमां सितं चानुभनोपपतिभ्यां ब्रहत नथेच जातव्यं के स्माय स्यामतयस्पविविदिना प्रयुक्तपननस्यसा क स्पामत मवि ज्ञातम विद्िनं ले सालत लंनिशयफलावास ना बोधत यविविदिषानित से भिपायःतस्यम नंज्ञानवेन विदितं अ् ला येनाविष मलेन प्रतिबुक्षमि सर्थ:ससम्पग्दर्शयस्चिज्ञानानंतरभेव त्रलात्मावस्यानसितला र्चे नः का य स्यामतंतस्यम तंम तंय स्पनवेदसः॥अवि जातंविजान तोवितातमविजा ननों ॥७॥ र्योभावोविपर्ययेणमिथ्या ज्ञानोभचनिक थमतं विदिनं तातंम यात्र सेतिय स्य विज्ञानंसमिथ्यादर्शीविप रीनवि जञानो विदिना दन्पला तू ब्रक् णोनवेद सन चिज्ञा। नातिननश्र्सिद्ध मनैदिक स्यवितानस्यमिध्या लंअ्न सविषय नयानिदिन लातू तथाकपिल कण भुगादिस मय स्या पिविदित त्र लविषय वादनव स्थितवर्कजन्प ताहि चिदिषा: निवृते श्र मिथ्या लमिति।स्मतेश्रयावेदवा हा: सरतयोयाश्र्वकाश्र्व कुटवय रति।।अचिज्ञातंविजान तांवि ज्ञान मचिजान नामितिपूर्व हैनकिर नुवाद स्यानर्थेक्या न्।६।। भावस्त तानयावु भु सानिव नावि चार्य माणेअ् लपःआततनपर्यवसाना दतिरिक मंन व्याभानादभनमिताथेः।। ॥७॥

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के०उ-मा० अविज्ञानंिज्ञान तामि त्युत्त रार्धस्यार्थसंगहीत विनृ गोति।अनुवाद मात्र त्यादिनाहेलर्थलेनेतय मर्थ। पूर्वेषा ब्र सविजाननाम वि ११ ज्ञानलेनेव ब्रहण: प्रसिद्ध आादि दानी मय्यवि षयत या ज्ञान सम्पा ने। तथा पूंर्पषाभ विदुषावि तानलेनेव त्र लुणः प्रसिद्ध त्वदि

अनुवाद मालरेण नर्थ कवचन मितिपूर्वों क योर्य स्याम न मि सादि ना जाना जञानपोर्ह लर्थ लेनेदमु चयते।अविज्ञान मततिविदि तमा लले नावि च यत या त्र ह विज्ञान तीय स्मान्त समानदेवजञानं।। एते पोवि त्ा तंविदि तं व् कमेवबुस्यदिविष पंत्र ह्लाचिजान तीवि दिनाविदित व्याव सभा लभू तंनि सवि ज्ञान ररु पमातस्थ मवि कियममनम जरमभयमनन्प खादविषय मिसेव मविजाननो पुध्यादि्विष या ततपैव निसं वित्ञातंत्र हावस्मादिदिनाचिदिनव्यकधर्माध्यारोपेणकार्य

प्रति बोधविदि तं मतं। का रण भावेनसचिकत््प म यथार्थविषय लातूभुत्ति कां दोर अता दध्या रोपण ज्ञानवन्मिध्या ज्ञानवेषांध सिबोधविदिव भतमिप्रिवीसाप्र सयया ना मारमाव बो धदार लात्।। 11 = 11 = रानीमपि विषयतया ज्ञान म सभ्य रानमितिवु ध्यादिविषयसद्ूपतया बुद्धिरा कामन आतंदियमा सेनिविज्ञान वेद वाधा नांब लनौक्षा श्रीराम दीनांप्रसिदध ननइ दानी सपितना तानु सारिणाभ्रोा ाभे्ुध्यादि विषयम नालरप मात्मयाभिममित्र्थ:॥के न दारेपात हीन चयतपास्मा वगभ्पता मिसा का क्षायामाह।प्रतिबोधेति। ११

संग्र है वा कध विृणगोति। बोष प्रतीत्ादि नायथा, स्मिनू गरीरेबुसषिपरिणामाजाअपिवि श्राप्त या सवेदनवदवभासं इतिसभा व्यतज ना स्चाभाविकप्र का शानुपप त्े स्त या स वे शरीरेषु वौकषा: प्रसयायझापन यासवेदनवद्ासने सो सीति सभा व्यने एत्दु के भचति शरोतश रीसवशिन् बौद्ध प्रसय सास्यिक रमर्: नदित सर् ारीा विन्ी ू ाये स्तर्र्थचिन्मत्र ्या र्त मा ुसंभाद्वू भत्त ले चाना न्म ला दिदोष प्र संगा सं भावितमेक तंतदेवब्रस्म लमिति या कयन बुद्धि,व, नावविषय तथा प्रज्का जते बा स्मीतिय स्मा तानन्य न् जअान वभा स यतीनिनदन्याव भासआ मा सर व ज उ चि ल क्षणो व गंतु श क्य ते त स्मा दि स्ु पसंहारः प्रतिबोधमवभा साश स्तिबिना स्ने पांप सगात्मतरया व्यभिचरितस्व रुपेणविवस्थानीये ने के न रूपेणयहूँवेदननम्प्ट र्शन मिस्र्थ:विषयविज्ञानसम्पक वोधंप्रति बोध प्रनीतिविका सर्वपर सयव्याप्सर्था वो द्वाहि सर्वेत सया सप ोहन न्सवितान सरुपा ल्याम लारि जञान सवरु सावभा सा सद न्याचभा सशा मावहिल क्षणोग्निव टुप उभ्पने इनितेन ते द्वारीभवंतिआ लोपल ब्धौत अमृत तंहिविदने। स्मा स्ति बो घाच भा सप्र सगा त्न या यद्विदि तंनह सतदेवमनं जा तंन दे नसम्पाज्ञा नंय तूप त्यगातविज्ञाननविषय विज्ञानमा सलेनपतगा सान मेक्षपितिच का ठकेअमनलंहिविंदन इतिहेतुवच नविपर्ययमम् सु भत्ते:।। ज्ञाननभवनीसब्हे तुमाह॥आत्मलिने ति॥ ब्रह्मण, आतमालेनविषय ला सेभ वादि सर्थ:अद्यानंदरप स्पर् तलादिधर्मक्षक स्य श्रह्मण: शास्त्रिक समधिगम्प लान रस् स्याप रोक्ष लन संभ वतिकिंतुप्र तक रूपेनये साभिे सकाह के पिविशेषणमि सर्च, प्रत्यक्तया अप रोक्षत्ह जञानतदेयसम्यप्ज्ञान मित्यन्र कोहेतुरि याश क्याप रोक्ष बधाप्या सस्प रोक्ष ताना न्िवृत संभ वादपर्क्ष ज्ञानस्पचन निनवर्नने ना मनलसाधन त्ादि त्युत्तर वा क्पार्थेसंग ह्राति अमनलहीति।

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के उनभा स तविभजने ।विषया तेनिविष येषु बुध्यादियुआ वि ज्ञानेविषयनया वाब्य तिरि क स्योपास्यतया ज्ञानेम,युःपारभतेमय मितिप्रसिद्धेत टी.वा०्यो० १२ ध्यादि संघातमा त्मानमन्यमानस्यो पास कस्पचकर्त,भ्मा निव तेरथयेन्पथातोविदुरन्पराजानसेक्षप्यलो का भवंनी सादि श्रुतिम्यश्र तरनिशो क मात्म विदि त्यादि श्ुतिपुच आत्म ज्ञान ममृतलनिमित्तं प्रसिद्धमित्यर्थ:।। ना उंव नपूर्व कमिति किविदुपास्य माल बनी स स नदुपा सन साध्य तथानविं दतर सर्थ: कथन हि विद्नेपनि प्रयोगट सा काक्षाया माह॥आतवि ज्ञा नापेक्षमिति।आतमवि ताने नम सेर वमनिवत्तिमपेक्ष्या मतल लाभउपचर्यत हत्पर्थ:॥मु खव्यार्थेबाधमाह।यहिहीत्यादि ना।आ ना तावि जायतेयेन तना विज्ञानमनाय विष या तम वि ज्ञानिहिमत्युः भार भतर साह्म विज्ञानममन वनिभिन्तमितियुक्तंहेतुष चनमम्त लंहिबिंदतइ् निआात्म ्ञानेन किम मृततमु सायने नक प्तहिग आत्म ना विंदते स्वे नवनित्या तास्च भावेना मृत संविदतेना लंब नपूर्वक विंद नइतिआ बि वेज्ञा नापेक्षयदिहिविद्यो सायम मनल स्यादनि सं भवेलर्मे का र्यवद नोनविद्या सादय दिचा सने वाम,तलंविदते किंपुनर्वि य याकि यतर त्यु च्यते अ ना त्म विज्ञानंनिव ने पंती सातंनिय ताखा भावि क स्या भतलस्यनिमिन्तमितिक वपतेयत आह।। आत्मनाविद तेवी र्यविद्य याविंदने: म नं ।। पीर्य विद्य या विंद तेवी यये सामर्थ्यम ना तमाध्याहोप मा यासात ध्ो तानभिभा व्यलक्षण वहविय्य याविद तेत चर्कि विशिष्ट मम, तमविना अविद्याजंदिनी र्मवि नाशिविद्य या अविद्याया बाध्य लातू।। ।। निर्वाच्यमात्मा ज्ञानमि सर्थ:पुनर ज्ञानां तरोदयेन वंधई का यो कथंस लद तान निष्ट त्िमा ने षामृत लनिमितलं ज्ञान स्पे साश क्याह॥यम आहेति। स्यो नोवछेदोभव तियेनधतेनतवा न ध्वांसम ना त्माध्या रोपोम नुव्यलायभिमान:पारमेश्वरीनाकति मयानीव तवनिमित्तमज्ञानसानधानएतिःसवै ्हभिभवनीपोनभवसा ाय श्रीएम

नविध्या रु ने ना ति इयननही यंविद्ान ल भते पूर्वसिर् स्पाका ना दे नो शात् मायापाठयस्पतोजीच संधक लाभावाद मिनवस्या ज्ञानस्पासत्तो का १२ रगाभानाल्प्रत् तफककर्माक्षिपतस्पचा ज्ञानहेश स्पद नाथ भा सस्य वि दद न भिभाव क लान् दुरब क लान्निश्रीय ने सम्प मानस्या मत लहेतु लमि सर्थ:।।७।

थ ननु विद्या लेपेकेमविना शीकलकुस्यचि ना श त्नियमादि त्याश वया है॥ नन विद्याया इति।भावहेहपाने नायम नोदे नावभा सःविययाबध्येश्वन भामभिभविमु शका नी संव ए भोवीर्य नस्पावि नारिअमनलत कोर णेविया या अ वाध्य लाभिआये पो ्यतेन सरुप ना न भा वाभिन्ा ये छेसर्थः प्रतिबोपस्प योगिकम धव्यार्यायर वपभिन्नापेण यानये।अभवेतिअश्षेष नथाविप रीतनिरस्त सस्का रयन नोपेन सप नि वोध: युगपत् कम्ावि य्या त् कार्पनवरन क: सथोमुक्ति हैंतु रि सथ।। प्रति बोधरात सवधा प्या ख्याल से वा थ व्याख्यानेपुक्त मिल्ा हू।। पूसलिति। नतुथि या पा आध को स्तिह तिवि धाजमम्टतवीर पेअलोवियापवलेनिमितमान्रंभव तिना पमात्माव रदीनेन लभ् इतिचाचर्व पे लोके पि विय्याजमे वब लभ भिभवतिन बारीरादि सानर्थ्ययथाह स्साटे:अथना प्रतिबोभविदिनंम तमितिस रुदेवानषविपरीतनिरस्तसस्कारण सवन प्रति बोधवददिि नंत देव मन ज्ञातंभवनी सथ पा गुरुप देश: प्रति बोधवेन वाविदि नंमनमि सुभपतच प्रतिबोधराष् प्रयोगोश्तिसु नप्रतियु सयुरूणा पति बोधित दरतिपूर्व तुथथार्थसिह चेद वदी दि सवश्य कर्तवयसक्ति विपर्य पेविनाशशुतेहमनुष्जननिस सव्यमा ह चेदवेटीदथस समस्तिन चेदिहाबेदी न हतिविनषि:।भनेषुभतेषुनिचि सधीरा। प्रे सास्मा को काद मृ,ता भनंनि।।२।। इनिदि-रं।। तावेदिन व्य उसितहे पीयने क थमिह चेट् वेदीहि दिन वा नथस संपरमार्थन लमसस वा सजस्यअन्म सफमितभि आय:न चेददेहा वेदीत नवि दि।न वा न व येवज न्यापिच महनीविन विम हान्विना शोजनमरण प्रबंधाविवेद प्राततिसणस्ायत सस्मादवश्यंनदि के दायजेय आतमाज्ञनेनन किस्पादि सुच्यने भलेषुभ लेधर चरा चरेपुसवैंधि सर्थोविचि त्रथ कनिषयेकमसंसामेरस्पमातम ावे सर्थ: अने ाथेा दानू.ना नपु नश्र्ि तेतिसंभ वतिविरोधान धीरधी मंतो विचेकिन: विनिव,त वासविष याभि ला षा परे सम्पला, स्मा कोकाकरी राय नाल रक व्ाआवन्त ममत्वअहं कारा:संतर सर्थ:अम वाअमरधर्माजोनि सवि त्ाना मुनल सभा वा एचभपंति। इनिदिनीय: रंउ:॥। गरुपदेशेस सविपति बो भं व्याप का तानु सं धानंविना अप रोक्षा वगमा संभ वा तयोभु के श्वाशा स्त्री वषष्यास वा दो धोदे गनिने एव सिव प लादि र्य: इद चेदने दी दित्यादियावयार्थ संगृही नं विर णोनिणइह मनुचयजना नी सादिना।वि रोघादि येक स्नि न्निरंशेनिनमान्रेचयन स्ाध्वी पोदेश निवेशन स्पेष्ट का नामिया सभ वादि त्र्थ:।इनि्हिनीय खेर।।॥ छ।।

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केशउ.भा० पःसुर पांजये हे तुर सुराणांपराजयेसक्षप्रधानयाशक्या संपन्नः सोहमीश्वर: इतिज लहे साथा ख्यायि कायास्तासर्यसंग हीनवि तृ णोतियस टै.वा.यो० १३ मासे सादि ना। ता सर्यातरमाह॥समाद्य धिति सं ग्रह वा क्य विवृ णोति ।श मादि वेति॥अभिआ्र या तरमा रायिका यास गृका तिवसगुण

असहदेवेभ्पद्रनित्र सणोदुर्षिनयतो ति र पजाविक्यार्था समासा व हवि या यदधीनःपुरुषार्षअवऊर्ध्वमर्थेवदिनत्र हणे। दुर्वि तेय तो च्यतित द्वि ता ने क थं नू नामयत्न मधिकं कु र्यादितिशमा यर्थो वाम्ता योभिमान शातनानशमादिर्वात्र हवि य्या साध नं विधित्सिनतद थी यमर्थवादा म्ायोनहिश मा दि साध न रहिन स्याभिमा नरागदेषा दियुक्त स्यब निज्ञानेसा मर्थ्यमस्ति-्याएन वाहामिध्यापसययाहा लाड सणोयस्मान्ा्यादी नाज याभिमा नंशात यतिननश्रब्सविज्ञा नंद शेय सभिमा नोपशमेन रमामादिसाधनविदा नार्थी वाइयमर्थवादड ससीय नेसगुणोपास नार्यपोदिव लान्ेदंयदिद मुपासतइ सुपा स्य लं अहणो पोदिन आपोदिन लाद नुपा स्यले प्रापेन सपेव श्र हाथाःस गुणलिनापि देनमध्या संच उपासनं विधान व्यमिसेव मर्थी वा इसधि देवन वदनमि सुपा सित व्यमितिदिन स्पतित्रसेनिप रोलिंगान हान्यतपरादी श्ररान्नि सस वे ज्ञा सरि भया ग्यादी सणंव त्रीकर्तुसा मर्थ्य मस्तिन नशशाकद्ग्धुमि तादि रिंगा पह रादीश्र रनि ससर्व ता सरिम या ह ट्र, ल शट् वा न्यई श्र सवसीय ने नहा न्यथाग्निस्णट्ाधु नो तहतेवायुर्या दानुमीश्ररे छथावणमपिवजीभव ती सुपपद्यतें।।६।। 1। श्रीराम संग्ृहीन विद् फोति ॥नेदमि त्ादि ना। रस्नारव्यायि का यास्ना सर्यमुक्न ल रार्थमाह। लेतिरो सि गादिनिएत आ स्याति 11 १३ । नह न्यत्रे सादिना ॥

कापत हौन्च रसिद्धिरि त्या कांक्षा या भाह।तति ्रि तिनु सदि मिरवे्ेिेमितिोयर वृत्तिलिंग कानु मा नसत्रि तेन चाह। श्रुतिसर निप्नसिद्धि भिरित्ति4याथतर्केणसंभवोनानुग सते ताव छास्त्र प्रतियननोपीव रोननिश्री पतेअर्थवाय लशंका प्र बधाद त: शास्तार्थ सेश्रस्पनिय मायनिशव याय सामा न्यंत ृएमनुमानंशास्तानुगाह करुप सले ो चते।एत या रव्यातिवल स्पे वर से सादि नाखनादि प्रसिद्ध कर्तव्य निरि कंजगदर्भी के सथ यपीश्वर:सिसाधयिषितः तथा पिजग तो बहनिवि वोषण निससार वि लक्षण र्त संभाव नार्य नैयायिका सतुव्याव्यस्प पक्षधर्मनाव का झाप कविशेष: पक्षधर्मःसि्वतितनःसत न्मनुमानईश्वरनिश्वायकमादु:न तदूषगप्रक वर्चेदए्व्या सामान्यतोटव्टर च पतिएनज्जगदो ने को कर्मणांच विभा गयोजा नातितत्ू र्वक भवि मुम हनीविप निज्ञाअन्रजगन्तिमिन नतु सिद्धिर्जग तोनियनपरने शुतिस्म, ति प्रसिद्धि भिर्नि सस ्वं विज्ञानईश्रेसर्बा त्मनि सर्वशक्रो सिद्धपिशा स्वार्थनिश्व्वयार्यमु ध्यनेत स्पेश्घर स्पस जाव सि्ि: कु तीभन ती तुच्य तेय दि दजगदेव गंधर्वयसरक्षपिन् पिशा नाटिवक्षणंयुनियसथचिया दिसच दरगहनक्षचविचि नविविध प्राण्मुपु भोगयो्युस्थान साधन संबधितव्तंत,कुशशिल्य भिरमि् दुर्निर्मणदश कानिमिना दनु रुसनियेत प्र तिनि वृ त्ि कम भेत-जककम विभा गज्ञ प्रयलप वरकभवितुमह तिकार्य लेसतिय थोक्तलक्षणलात् पहपा सादरथशय नास नादि वहिपक्षेआ सादिय त्।। टष्टनिष्य सर्थो पोनीवा नांपयलस्न सूर्चक लजगत:सिद्ध मिति सिद्ध, साधनलं चद तोनिरीश्चर वादि नो निरा सा यविशेषणभो कृ कर्मवि आगन्ञेति॥नहि जीवाना मे तेभो क्ारोस्मि न्देश कालेवा,स्पकमफले स्वविविभाग ज्ञानं सं भव निवि शोषानभिज्ञलादि सर्थ:यथोकल क्षण त्वाि निविचिच लादि तुक्ते व्यभि चार: स्मादा त्मादि स भाव वेचिव्यस्प यत् पूर्यै क साभावान् नदर्थ कार्य लेसतीनि वि शेषण। का र्यलादि सुक्तेअलु दिपूर्व कारि का र्पविभागतप्रपलपू र बक लंना स्ीतिअने कांतिक संस्पा तदर्थय घोक्त लक्षण ला दिति। यदिचि त्रंतद्विर्भोत ग प्रयत्नपूर्वकथथा गहादि:जा ना से वहित क्षादिर यंग हादिर स्पसवा मिनो दूव्य दा नादि पूर्व कवास्यनिमों मे त्ंचे तित तोन सा ध्यवैक ण व न्यंयथाभ् हिसा धनटृषणेना भिपार्येशात विपस व्यतिरकेआ मादिवदि युदाहरणय हिभागत परयतपूबैक नभव तिनदविशिष का म पिन भवतिपथासा को शादी स न्यन्पति रेक प्रयोग सर्थ:॥

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के-उ०भा० विनि त्रका र्पतभस्तु विभाग कप्रपत् पूर्क से नभविव्यनिकि बाध क गदेचिव्यस्कर्मवचयादेव सभवातःपक्षएव साध्यभाश टीन्वा०य० १४ कथाशंकित विप क्षेवर्नमा नो हे तु: शकितवय मि चार इत्यभि ये साह॥कर्मणए वेति चेवदिनि।परि हरति नप रेतिय न॥कन परन नस्यक मेणोनिमित मात्र लात् खात न्ेणनिमि तला संभवा कार्य वैचित्य स्पभंगप्रसंगोवाभ कःकततोरम नरेणातःपक्ेसाध भावशं का नु पप त्े:नशंकि वव्यभि चारिल मितिभाव:॥संयह वा कय स्यपूर्व पक्षभागंविवृ णोतियदिद मि सादिना।। यदिद मीश्वर वा कमखएवेति-चेन्तपरतंत्र स्यनिमित्तभात्र लातू।। यदिद, मुपभोगवैचित्यंप्राणिनासतसाधनवैचिययं चदेशका निभिनानुरु पनियत प्रनृतिनिवृन्िक मंच ततून नित्य सर्वज्ञकरव्ट कर्किनर्हि कर्मणएवतस्याचिस प्रभाव ला त्सर्वेशरपफलहे तुलाभ्ु पभ मातू सविक मेण:फ लहे तु ले किमी श्वराधिक कव्षयनयेतिचे नननि सस्येश्वर स्यनित्य सर्वेतवकिफ लहेतु चे नि चेन्न कर्मणएवोप भोगवैचितया युपपद्य लेकरमा ल स्टेतं ला क मेणशरितिमत् यतन निर्व वहिकर्मत लाप लोपरमा दुपरत सद्देशात रेकालानरेवानि मि त्तविशेषापेक्षक र्चुःफ ऐजनयिथ्थतीतिनयुक्तमनपेश्ष्या न्यदा्नपयोकृ नेविफ ल का ले अयो क्ते तिचन म या निर्व त्िनोसि यां प्रयोक्ष्येफ लययदातमा नु रू पंफल मिति।।नदेशकालनिमित विशे वा नभिज्ञलाय दिहि कर्त्ता दे ना विशेषाभित: सनू खात -येण कर्मनयुंज्यास्ततो निष्टफ ल स्या प्रयोक्ता स्यात्॥। दिभिरपिवेषक्ष्य नर्धष्यदोषप रि हारायक म बोज गद्देचित्र्य हेतु ल मिए्ट तत संप्रतिपननंविहा या पूर्व ईश्वरलयेधर्मी त स्थफ लहेतुलचधर्म:क र्पनीय स्े लिगीरवंस्यादि साह ननि सस्ये श्वर स्पेति सति का ध ने गो रवद्षण स्यनह त श्रीराम

स स्ती सभि प्रे ससिद्धा नवि रणोति। नकर्मणाए वे सादे ना। आ तमनोन्यहा वत्तंक मन पक्ष्य कर्मचे लफ ेज नयति १४ रहि कर्चा जीव एव प्रयोज को स्वि तिभं किलापरिह र ति कतै वे या दि ना।। 11

अनिषृफल भोगसिध्यन्यभानुपपसा कुर्तुःक मैनियोक्त न सभवनिचेलर्है निर्निमित्तमेव कर्मफ ला कारेणपरिणमनदतिजरत्कर्ममिमा सका नो मत माश्रा व्याह ॥न चनिर्निमितमिति।कर्नुरनिछयाक मनिक रोतीस त्रटषाना भावा व् वार्मण्ोपिनि का रस्प सनिमित्त लादि सर्थ: पच्च सौगतेनो च्यतेफल का ल पर्यतंकरनुरवस्था नाभा वान्न कर्च्तसमवेनं कर्म कितु क्षणि कवि ताने नात नावन कदाचिकरस्या ऋ, भवतिय थायस्कातोमणि:कदाविच्चेननेन प्रयुकोन्पदामि सोह म्य प्रेर कोभवनि वह दिनित तरानचास कमिति। करणाटीनिकार काविय: पेरय करोतिस प्रधान कर्तोत्त सभवेतंकर्भेघसि्ह नस्यचफ एक्लपर्येनस्थायिल मेष्टवपंअन्यथाअृताभ्यागम रृतविप्रणाश पसंगातूप सभिज्ञाप नननिर्निमिन न दनिछयात सभवेनंत ज्र्मवद्धि करनि कर्मन नुआलकनंअकर्, समवेनमयस्कांतमणिवदा कए,भवतिप्र धाक ने सभवेनत्वा कर्मणोभताश्रयमितिचनन साधन लातु केर ले. किया याःसाधनभू नानिकिया कालेनुमतवयापारा णिसमापी चह लाखिवक व्ापरित्य क्ता निन फलं का लोतरकर्मुमुतहं ते नहि ह लं से वाहीहीनग हंत्र वेशायनिभ तकर्मणोश्वाचेन नलावचनःप्रवतनुपप निःवायुचदितिचेन्ना सिद्धलान्नहिवा योरचिति मनःखवनःप्रयृि सिद्धा रथादिम दर्शनात् शास्त्रालमे एएवेतिशास्ंहि कियानः पछसिदि माहनेश्यवदेःसर्ग का मोपजेने ादिन चप्रमाणाधिगनला दानर्थक्य युर्नं ।। 11 ६7 माणयाजे सर्थ: को का पति कामित्रायमु दाव्यदप यतिभता श्रयमि त्ाहि नामआधुनिक कर्ममि मास का नाममु दावयति॥ शा स्ादि सादि ना।यजेनदत्या खव्यालय दात् सा मान्येन समीहिन साधनंयागघनीय तेकस्यस मीहित स्य साधन मि तिविनोषा कोक्षायो सर्ग कामफ्टसन्न धाना काम्यमान सर्गसाधनलंमयपन गम्यतेतथापिक्षणिक स्ययामस्य का लतीय सर्गसाधनलासभान्नि:फल लंबो केते साश क्वाह॥ नचेति॥औषधपा नाटे:कर्मणःस्थायि स स्कार द्ूरेणका लांतरी यिम्याटिफ वहेनुलेप सि द्रयागस्पश्रुसाधनलति र्ो हा पस्थाम्य वात एापूंर्वेपरिकव््य नेजेन नला नर्थे क्य नि दघ वा क्याधिग लादि सर्थ:॥

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के-उ०भा शतसाधन लसिद्य न्यभा नुपप त्ाकि मिनीश्वरएवने व्यनेववाह।न चे श्वरदति।नेय मर्थायपत्ति सरीश्रा स्ति लेमाणमन्यआाप्युपपन्न टी+वान्यो १५ तान्चमा नोनरम खिग्तटिषयश्षुत्ा देवर्थवादतादि तर्थ। न वद् रेणश्रुनिर्वोहःकपनीयःहितफलं करमं व्चै प्र युक्तफल मिति टश्टया ्यापे हनि प्र संगादन:श्ुत साधनल सिध्यनुपप सेश्रःफतानाकपनीयत्याह।नदषेति से पहना कंच वि वृ णोति॥ ककियाही त्यादि ना।फ लोदये नाप वर्गोना ऐयस्या:प लापवर्गिणीनफलटानारएथगपेक्षतेरसर्य:उसन्न प्र घ्ुसिनीतिउसनास नीफ लमदलैव प्र पेसनेनव स्नत फ लदाना का तोते रेपेक्षनर त्र्थः॥यागादिफलकर्मा यमिज्ञे नवेश्व रास्ति ले प्रमा णोतरमसीतिव्वेन्नटए्टन्यायहा ना नुपपतेः कि याहि द्िविधाटष्टफला टप्टफला चट एफला पित्टिविधाअनंतरफ लागामिफ लाच अनंतरफ लागतिभुजिलक्षणा का लोनरफ का च कृषिसे वादिल क्षणात ना नंनरफ लाफ पवर्गिव्येव का लां तरफ कातूत्न्तप्रध्सिनीआत्म सेव्यायधीनंहि कुषि से वा दे:फ लंयव:न योम यन्या य व्यतिरेक्रेणस नं त्रं क र्मेतनोवाफ लंदप्टनथाच कर्म फलप्रा मोनटष्ट न्यायहान सुपपय ने नस्माछतिया गादिकर्माणिनित्य:कने कर्मफकवि भागझ ईश्वरःसे व्यादिव यागायनुरपफ लदा नोपपध नेसचआ त्म भूनःसम नरदग्यमानं व्यव हिनफल लात् सेवाफएवदि साह। तस्मा दृतिया गादीति।ननुजीव कूस्तावत् खोप भो गसा धननियं नावतस्यापीश् रःफलदानेन नियं ता चे दिव्यने नहिनियंतुःसव्पतिरिक्नियम्प लांगी का राटीश्वर स्पाप्य न्योनियं ता प सन्यननियं तला विशेषाद नो5नवस्थाप संगनाधित मनुभानमि साइं क्याह।सचभा तभूतःसर्व स्पेति कलनिपत भेद मा त्रेणनियम्यनियामक भावोय श्रीराम प त्ेरन तालिक भेदा व का शः ना लिक भेदव लेच घ या दिव कार्य तादि प संगस्त नोतिरि क नियम्पलय्याभावान्ता नवस्थाप १५ संगयू सर्थ: । E

राज ददीशर: फ ला दावा चेन हिनि घहानुमहकर्न ला डा गाटिमा नस्यात ताहकि याफलेतिय थालै किक साक्षीक स्वनिन्वय हे तुरन्य स्वप राज यहे नु रपिनरा गादिमान् कथ्यनेयथापल -धभाषितातथेम्परःकियादि सासी रा गादिमान्नभनिष्यति अ ननुरु पाहाल लान् राजा प्यसाधन् देडयन्साधू नप रिरक्ष न्नरागादिमान्कथ्पतेरनिभा व:।। साकषिले नहि ईश्वर स्येक्षण कियास्या नन्ा हनि सेतिनि सवि ज्ञान स्वभावस्पानिरवा च्यविष याचछेदेन साक्षि तवं कल्पितमि सर्थ: सर्वस्य जीवस्या तमभन श्रेीश्र:हिसंसा र्मद प्यन संसार्यभे दा दिसा श कयाह॥संसारेति।नकेव लसु पपतिमिरी श्ार सिद्धिश्रुनेरपीतयुकं ता.श्रु.तीरू दाहरति।।।। सर्चकि पाफलप्रत्यथ साक्षीनिसविज्ञान स्वभाष:स सार ध्मेर सं स्पष्टः श्रुतेश्वानलिय से लोकदुःखेनवालोज रोम नयुम सेनिविजरोमिभ सुःससकाम:स सुर्सक्पएष सवेश्वरःपुण्य कर्म का स्यतिअनश्नन्योअभिचया क शीतिए त स्पवाक्षरस्पध शासनइ साथा:असं सारिणए कक्षा स्या नोनिसमुक्त स्यसिदोश्ुनय:स तय श्र सहस्र शोवियंनेन चार्थवादा:श क्यं तेकव्वयितु मनन्ययोगिलेस तिचिज्ञा नो साइ कलान्न चोस नंविज्ञानं

नलिप्यत इत्ादिना। सनयश्मय पासर्वगत सोक्ष्म्या दाकाश नोपलिध् ते॥ सभ सर्वेणु भृतेषुईश्र:सर्व भतानामिसा प्ा.प दुक्त मर्थादला हयपा माण्यनवाह।नचेति।ईश्वरविषया णिवा क्यानिन कर्म विधिस निधिसभाग्ना तानिअतो नन्य शेष लेस तिवोध कलातू स्वार्थप्रमाणा निक मविधिना क्यव दिस रथः के चार्थ वाद ले पिना प्रामाण्यपद सभन्वयवलेन जायमानस्पज्ञानस्य वाधादर्श नालू सवत्तः प्रामाण्यादस्यवाधकतानोपपयतइ्साह। न चोस न्मिति। ॥4।।

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के प.भा० इतशब ना प्रा माण्य मि साह।अप्तिषेधाचेति।यथा देवाब अलणोरुपेम्र्त वैयाम ने-वे तिप्र स्तुत नेतिनेती तिपर स्ता स्तिषेभति टी० वा०यो. १६ नेवमीश्वरंप् स्तुस प्रतिषेधउप लभ्पतर सर्थ:। प्रतिषेधा भावःसलान्त भवतिर्कित प्राप्तताय्यथा रागतःपपाभहिं सानिषेध्यतेने वमीश्वस्य प्रापिरस्तीतिअ न्यथासिद्वि,मार्श क परिहरति। प्रास्ी सादि ना।अप्रतिषेधादितिसंग हया कय प्रकारी तरेषा व्या च हे। अथ वेति। स्वर्ग का मोयजे ने सादियाा स्पं याग स्यफ लदायि नी शकि यो यतिग्नसह कार्यनरं निषेधयतियाव भेदप्रसंगादित ्थ:।इन शव शास्त्रम पो गव्यवछेदर क पार्च्य नान्ययोगव्यवछेदकेएंदन वनिता दिनिमि ननिरपेक्षस्वकर्मण:फवहेतुलानुप कंभा दतोयधामा नांतर सिद्ध स्र.कंदनवनि ता देर्निमिन लमिष तथेश्व रस्याप्येषवयमि तवाह।नचनिमि नातर निरपेक्षमिति।इत जयतिषेधाच॥न चेश्व रो ना स्तीति निषेधोस्तिपा स्पभा वादिति चेन्नोकलान् हिंस्पादितिब लास्य भावात् प्रतिषेषो नारम्य ् न इतिचेन्न॥ईश्वर स दवे न्यायस्योक्त लान्। अथवाअप्रतिषेधावितिकरमेणा:फलटानेईश्वर कारण वादिनान प्रतिषेधोस्ति।नचनिमित्तां तर निरपेक्षके वलन क्नैवप्रयुनं फ लदं टए्।। न चविन शिपि याग, काजोवरेफउदोम पति॥ सेव्य बुद्धिव लेवकेन सर्वत्ेश्र्वरंबु द्दौतु संसक नाया या गादि कर्मण्ा विन रेपि कमणसे व्यादिवेश्वरासएं करतुर्भ ववेश्वरःफलदानायकव्यःप्रध्व स्वस्ययागस्पकारणला संभवानियनपर्वक्षपासतंहि कार णह। नचा पूर्चदारे पोपपय तेअसति द्वार वति द्वार वला नुपपते:। न व्यीष धपा ना हिट यां त:औषधाय वय वा नो स सक ता ना फ लका लपर्य तम नुवर्तमाना ना मेव काल सरीयफत हेतु लादि त मिग्रे साह॥मचचिन षृद्रति॥ क थंतर्हि ईश् रोवापिनष्ट स्यफलदा नोपधनेतवाह॥सव्पबुद्िवदिति कत ्मने ना नुष्ठितमिति कर्मणेश्वर स्पबु दावारोह एवकर्मेणा स स्कार स् दशाटि नष्े पिक मेणीश् राएलंयु कंय थाने श्रीराम नाहं सेवित द्तिसेव्य युन्द सं स्रुतायों का लातरेविन सायामपि से वार्या से ्याट्रा न दे:फ.लंभववितद्टिलर्थ:॥ m ॥ १५

ययपिोकिका नाक र्भणाफ लसाधन वं चेतना धी नंदसृतथ। वैदिक स्यया गादेःफल दा तारंविनापिया वय्र माण्यात्भविष्य तीतिना शंकनीयमि त्ाहमननुपुनरिनि।अव्वय योग्यानीपदार्थोनी संसर्ग बोधकमेववाक्यनतुतहजटसदर्थःसभावस्सकुशकान डू सर्च:॥ वीजक्षेच्रपो:संस्कारत सरिरक्षाचनहि जान वान्य:कर्नतदपेक्ष्य फलंक व्यादिट ष्टसे वादि कं चविज्ञानया नयःसेव्य सहद्ि संस्का रापेक्षफ लं दष्टतथा यागादे:कर्मण कालानरफल लादवि ज्ञा नव कर्पेक्षफ ललानुपपतो करमादि विभागजक र्रपेक्षफलल नसुपुनः पदार्थाया कय शने नापिदे शांत र काला तरे वाखवसं खभाव जहति। नहिदे श का ला तरेषु चअग्निरनुष्योभवनि। एवं कर्मणोपि का लां तरेफलंहि प्रकार मे वोप लभ्पते।।बीज क्षेव्रसंस्का र रक्षाविज्ञा नव न्कर्पेक्षफ तं प्यादि विज्ञान व तेव्यवुद्धि सेस्का रापेक्षफलं च से वादि या गादे:कर्मणस्त थाउवि जानवत कर् पेक्षफ उल्वानुपप तौका लातरफसलात कर्म देशकाल निमित्तवि पाकविभागजबुद्धि संस्कारा पेक्षफ संभ वृतु मर्ह ति।सेवादि कर्मानुरुपफ रूजसेव्यलुन्धि संस्कारापेसफल स्थेव त स्मात सिह्ध :सर्वत इश्वरःसर्प जनुबुद्धि कर्मफ ल वि भाग साक्षी सर्वभू तांनरात्माय ताक्षादपरोक्षाय आत्म्ा सर्बा्तर इ्तिश्रुने: सएव चा ता त्माजंनू नाना न्पो तोस्विद ष्ाश तामं नावि जा नानान्पद नोस्िवि ज्ञानरिता ययाानर प्ति षेपश्ुते स्नल म सीति चात्म लोपदेशान्।नहि म्टसिंउ: काच ना रलेनोपटिश्यते।। = ने भवितु मर्ह नी त्र्थ:1। लौकिक कम सेक विभेघ पिमध्ये सेवायागदिर नुरूपोहष्तयमिे्पुनराह।सेवादीनि से वादि क र्मानुरु पंफलं जा नानिय: सेव्यस्तदुदयःसंस्कार सदपेक्षफ ल स्पसे वा देर्यान स्वातं ऋ्यंत हदित्यर्थ:1एचं ता वंन्तिरीश्वर वादि नं प्रति ईश्व रंघ साध्यसेे्चर वादिना मभिमत वास्त वभेदनिरा साय प्रकमने। सए पेति। 1011

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के०उ०भा जीय ईश्व राद्द्िन्वस्वदि रुद पर्मा कात लायोयद्विरुत् धर्मा का तःसत तोभिन्तःपथा्थात्महिषद्त्नुमानमुद्धा्यसेदनि १७ दानुपप त्ुनुगहीना:भेदश्रुतिविरोधात् का ला सप्यायदिष्ट लमाह।ज्ञान शक्ती तादि नासं गह वाक्यविवणोतिय्बुक्त मि ज्ञानशक्ति कर्मो पा स्योपासक भुद्धसुद्ध मु क्तामुक्तभेदादात्म भेटलवेतिचेननभेद टससप वादा यदु कं स सारिणईश्व एदनन्याद्निण्न-नर्कि नर्हि भेदएव संसार्या त ना क स्मालक्षणमेदाटश्वम हषवसुकथंलक्षणभेदर तुच्यते।। ईश्वरस्य नावन्नित्यं सर्वविष्यं ज्ञानं सविवप्रकानय त हिपरीतं संसारिणाख योतबतथेयाशति मे दोपिनित्यासर्ववि वया चे श्वरशक्ति ्विपरीेनर स्पक मे चचितच रुपात सत्ता मात्रनिमिनमीश्वर स्योक्षस्वरूपदव्यसना मात्रनिमित्तद ह नक मवतूरा जाय स्कोत प्रका शकर्मब-्व स्वा त्मा वि किया रुपं विपरीतमितरस्योपासतेतिचचना दुपा स्यइश्घरोगुरुरा जव दुपासक श्रीत्तरःशिष्यभस्वद्पह तपा प्ा दिश्रवणानत्य मुद्धईश्र: पुण्यपपुष्पनेतिवच नाहिपरी न इतरोड न ए वनिस मुक्तएच दश्व रोडनिसा शुद्धियो गात् संसारीनरोपिचय त्रविज्ञा नादि ल क्षणमेटोस्िन बभे से टष्टयथाश्व महिपयोस्तयाता ना दिल क्षणभेदादीश्वरादालना भेदोसी तिचेननक समाद न्योसावन्योहमस्मी श्रीराम तिन सवेद तेकय्पको का भवंनिम, सो:सम सु मान्नोती तिभे ददृषिहिापो दतेएकल प्रति पादिन्यःश्रुनयःसह स्रशोवि १७ धंते।यदुकतं ज्ञाना दिल क्षण भे दादि त त्रोच्यते।। सादि ना॥ स्वा त्म नोविकरि या रुपं जग दुपाद नादि लक्षण कर्मईश्वस्ये सर्थ:।। दूषणातराभिधित् यानुवद ति।यटु क मिति॥।।।।

जीबा:वि तु ध्यारिविशि ष्टाश्वि सनिविंबाधर्मिलेनगहा ने किवादेवमनुष्यादिश एवाच्या:सचिति का देहा कि बात तीय:विलक्षणरुपाधि नि कभेदभिन्न श्र्वेतन:॥आयेसिष्द साधनलमाह।ना नभ्युपग मादि सा दि नाचितं ज्ञानचैसा:सुसाद योबीज मवि यादिनी जिशरीर नतस्व भावोविशिष्टस्पविशेषण ता ट्ा स्यादि सर्थ:॥पस्वि ष्रुपस्या विकदेविषचितच रुप स्पससारव्यवहारस्पेपति विव

नामभ्युपग मात्।।बुध्यादिभ्योव्यतिरि काविलक्षणाश्रेश्राट्रिन्न लक्षणा आात्ानोन संतिए कए वेश्वरश्याताम वे भ ना नानि समु को भ्युपगम्पने वाहाश् क्षुनुध्यादि सभा हार संता ना हं कारभम खादि विपरीतप्रत्यायप्र बधा विवेद लपणो निशुदधबुद्ध मुक्त विज्ञाना तेश्वरगर्भो निसवि ज्ञा नाचभासश्वितचे सबीबीतिस भाचः कज्पितो: नि तवितान ईश्घर उक्षणविपरी नो अभ्युय गम्यते॥ य स्याविछेदे संसार व्यवहा रोविछे देच मोक्ष व् हारीनयश्म स्लेपव स सक्षपथ्वं सो देवपि त म नुष्यादि लक्षणो भतवि शेषस माहा रोनपुनशर्वतुर्था न्योभिन्न उक्षण ईश्व रादम्युप गभ्पते बुध्यादि क ल्पिता सव्य तिरे का भिषायेणतु लक्षण भेदा दियया श्रयासिद्धो हे तुरीश्वराट्न्य स्यालनोड सलाटी श्वर सपेवविरुद लक्षलमयुक्तमिनिचेत्सु ख दुःरादि योगश्र।। =

रूपस्प विंन संप त्या मोक्षव्यव हारोभवतिएस कल्पितरुपःपृथगभ्युय गम्पते॥अःस सा नमत्र्थ:। द्विीयवि क सपिसिद्ध साधनल माह॥न््िीि क ल्पेुध्य दि क्पितेया िशिष्टा ्ो व्यतरे केण िरु ाधि कसव रु पा भि प्ायेण पक्षीक रणेहेतुराश्रयासिद्ट स्ताटशस्याश्रयस्य मानक लाविक ला लादि सर्थ:।।५।।

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केणउ०भा० इश्चरादन्यआत्मा नास्तीति व ट ता सर्वोपाधिस्थईश्व रएचात तयुक्तंभ वतित दाचब्दत मुक्ततवादि विरुद्धर्म लं सुख दुःखादियो टीथवा०यो० १८ गश्वासंग स्यविरुद:प्रसन्पेते ततो वास्तवमसंसारि लं कलन्पितेन संसारिलेन नवि रुध्य तेदतिदर्श यिनुयस्य स्यात:करणादि विकार स्पोदयादे: सन्निधिमात्रेणा ानिमिनं तस्थले। कैरहं का शदि् भिर्विपरीत रुपस्याध्यारोपणादात्मनःससारिलमिसु हृमननिमिनले सती त्यादिना।ईश्रे सुखा धारोपर सुक्तेमयोपाधि के ब्रह्नणीश्व रशय्वा च्येसुराद्यध्यास नोका स्या नन्निवत्य र्थ माह निसविज्ञान शक्तिरुपइ ति। यथा: ग्न्यादि शक्ति: शैन नर मनरेणर स्वभावादेव कार्यो सादनानुकू लानधानिसविता ननिमिन्तले सति लोकवियर्यया ध्यारोपणा सवित वया थाहि सविता नि तप काश रूप ला छो कामिव्य तय नभि व्यक्ति निमिनलेस तिलो क ृष्िवि पर्य येणोटयास्मयाहोरा वादिकर्न लाध्यारोप भा ग् भवति।।एच मीश् रेनि त विज्ञान शक्ति रुपे लो क ज्ञाना पोहसुखदुःखस्म, ययादि निमित ले सति लो क विपरीत बुध्याध्यारोपि नविपरीत लक्षणल सुखदुः खाद यश्नसवन:आ लट सनुरूपाध्यारोपाययाथ नादि कीर्णवरेयेने वसविव प्रका शनटशपतेस आत्मटप्स ुरूप मे वाध्य स्पति सवि ते दा नी मिहन प्रका नायनीतिस सेवप काशो न्यनशरवयाए्वमिह बौह्मा दिव त्युद वाभिभवा कु ल भ्ां ता ध्यो रोपित:सुखस-रादि योगउपपद्यते॥५॥ न स्वभावस न्निधिमात्रेणांतःकर आादि प्रवृत्तिनिमित्त मितिशक्तिम यमुच्यनेतस्मिन्रान=पाटीश्वरपद लकयेचिरुद्धानेकरमो ्यासो नविरुध्यतइ सर्थ:। ोकस्ा नायो होवि स्मणनस्व दतिनपरम र्थ तोविरुदा ने कधर्मत मित्य र्थः।। भतस्पस्वद्नुरुपाध्या श्रीराम आारोप दर्शना ए्र नाध्या सो वस्तु क्ष तिकर इत्याह ॥आ तह रीति॥ बौद्धा दिव ती नामु द वाभि भवा भ्यामा कुलस्य वेचित्यमाप नवस्य क १८ नीना मे यो दवाभि भवौनन आा प क चैतन्य स्पेतिविचे क शून्य लोकस्पश्रासेतियो तना।। छ।।

चैतन्यस्य ज्ञानमुखाद्य सादेनिमित्तलं नके वर्लमन्वय व्यतिरे क सिद्धंत तुमरणा व्य भगवद्ा क्या चसिद्वमित्यर्थ।ईश्वरेसंसारि लमीश्वर:ससारी तिय्ा सेध्यमा वाहिशिष्टा नुग तचितवरपइ तिव्यार्यय"एतेनतिसिध्वसाधन लाहिदूषणेनप्रतिशरीरं ज्ञानसु रादी नामाश्रय भदस्तालक-प्रत्यु क्तमं त-य:।। कि चव्याक्तक धर्मशाव व्यया ए निःसिध्यतिसा ख्यमते चपुरुषाणाचन न्यमात्ररूपा णानव्यार्वर्त को धर्मािवेशेषिक मते सं त्यविवोष कल्प नान्योन्याश्यपरा ह ता अतोनिवि शेष लासुंसान मेदलालक इत्याह॥ सो क्म्येतियकव्चिदुःरीकश्र्पि त्सुरवादुःरादिविक्ि या व्यवस्थान्य श्ानुपपत्याआश्रयभेद सालिकःकलप्यवेतताहयवि

त्ममरणा श्वतस्येवेश्चर स्पैवस्परणंमतःस ति. ज्ञनमपोहनं च नाद नेक स्वचिा पमित्या दि अतोनितयमुर्क्तएक स्मिन सवितरीवलो का विद्या ध्यारोपितमीश्चरेसंसा रितं शास्त्रादिप्ामाण्याटभयुयगत्मसंसा रिलमि त्यविरोधडतिएतन अ्रत्ये कें जा नादि मेद: प्रत्युक्त: सोक्यचे त न्यसर्वगलाद्यविरोषेच भेद हैखभा वादि किया वले चानितयला मोसे-चविरषा नश्युपगमाद भ्यपगमे चानि यलप्संगाह विद्यावहुप लभ्यलाज मेदस्यतत स्र्वनुपपतिरितिसि दमेक ले।।तस्माष ररे द्रियमनी वृद्धिविषयवेह नासता नस्याह काररंस व धाट ज्ञानवीजस्यनित्यज्ञानान्य निमित्तस्या त्मत लयाथा ल्स विज्ञा नादिनि वृ त्ताव ज्ञान बीजस्यविद्येद आत्मनो मो क्षे स ज्ञा विपय मे चबंधसे जा।।

कि याव ले चेतिसुखा दि बिक्रिया मा मुयाधि धर्मला न्रात्म भेदसाधकव्यधिकरणासिद्ध लादित्र्था। किचसवेर बमो क्षेअविकिया दिविशेषद्ृ व्यतेस्वरुप वस्थानंच मरोक्ष:ततःसविशोष लंनखा भाविक मित्याह।। मोल्े चेति।किय जाय तसवप्रयोर विद्यावभ्द मरी ते रुपलं भात्युपुपिसमा ध्योम्नत्य भावेनुषलंभानू मिश्या ल भे दस्यसिदमित्याह।अविद्या वदिति।।जीवा नाक मेणानेकशारीरा नुया यिला स्म्राति भासिकस्य वारीरा दिस तान स्यमि ध्याभि मानविषयलाछ किरप्थवद ज्ञानवी जस्य विद्येद आत्मनोमोक्षस क्षेतिस बैध।।

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के-उ०प०भाण। आत्मनइतिक रमादु च्य ते विशिष्स्य बं धमोक्षो कि नेष्येने तनाह॥ सरुपापेक्ष ादितिविशिष्टसमो क्षेअन्वयासभवाद वयेवससारानि 1 भानटीणा वततिझस गाद न्यस्य च न घ:न्यस्प चमी स्षेसा धनवैये धर्यादुपा धिवविव्स द्वारेण स्वरुपस्य, वोपाधिन्नति यकपस् मं धमा क्षीजति विवोहिवा च्यरुपणमि ध्याक स्यरपेणतु विवमेवरवरू पावस्था नंमु तिरुपपद्यने तदुरक।उ पाधि नासा र्धमुषा धिजन्यमौषाघिकंस

स्वरुसापेक्षलादु भया:। त्र तहदत्ये तित्वार्थःपुरा किलदेवासुरसंग्रामे जगत्थि तिपरिपाल यिषयाआत्मानशासना नवर्ति भ्योदे वभ्योथिभ्योथयिविजिग्येजैपी दसुरानपत्मण दछानिमित्तोविजयोदेवा नावभुवेत्यर्धत स्यहबत्मणो विजयेदेवाअमही यं ता्य तादि लो क स्थित्य पहारि व्वसुरेषपराजितेषुदेवाहथ्िंप जीवाश्रा सर्वतसऐक्षतेतिमि ध्याम ॥.ॐ व त्मृह देवे भ्योविजिग्येतस हत्त त्मणोविजयेदेवाअमहीयता।तऐ क्षतारमा कमेवार्यविजयो/साकनेवायमहिमेति।

वयलाटेयल ख्याप नार्थे आग्ाय:।। ईश्वरनिमिने बिजये रसाम धर्यनिमित्तोरमा कमेवार्य विजयोस्ाक मेवार्यमहिमे त्यात्म नो जयादिष्येयो निमितंसर वीत्मानमात्मस्थ सर्वकतन्याणास्पदमीश्वरमेवा त्मले ना कुध्वार्पिटमा नाभिमाना:संतो्य मि थ्या अत्ययंच कुःस्यपिं डमात्रविषय सेनमिथ्याअत्मयल्लातसर्वातमेश्वरयाथात्यावबोघेनहातव्यतारव्यापनार्थसद्वेषा मित्याद्याख्या थिका ्नाय॥।

र्वभ वैहिमि थ्या।। भागम षाचिसाति बिब केपिविवंपुनःसत्यमरेषमे वेति। नऐक् तइ ति देवा नामीक्षणस्यमिथ्याम त्य लात् मिथ्या भिमा नस्यहेय लखव्याप नार्थाव तणवप्ादुर्भवड तियोजना। सुजमि दं व्याख्यातीश्वर निमिन इत्यादिना जयादिश्रेक ेनिनितम न्यमानु Nएश॥

तिशेषः =

शिव शशिवशव शिव शशिवशिव शिव श विवशि वशवबि वशि वशवशवश वशवशिव शिवशिवशवशिवशवव व तदुत्मह किलएषादे वानामभिन्नानंममथ्याहंकारस्संविद्ा सी विज्ञातवत जञाला चमिभ्यातिमान जानने नतद नुनिय्य क्षयादेवेभ्योर्थाय तेपामे बेंद्रियगोचरे नातिदरेआ दुर्बनव म हेश्रनकिमायोपाने मा त्यंतानुते नपादुर भतेंकेलके नचि द्रषविदोमेणतत्किलोपलभ मा.ना अपिदेवानव्यजान तजयि ज्ञातव तः किमिदयदे त दक्षपू्ज्य मितितहहै ज्ञानायाग्तिम नवन तृण निधाने यमभिआायोत तस भावित चारगनिमार तयोस्ट णदह नादा नावातयात्मस भावनाशाति ता भवेदितिईं इआदितयोक तभ् दा विरोधादिद्रोप नसैषोबिज जोने-योहआदुर्व भूवतन्तरव्य जा नतकि मिदय क्षमिनितेसिम बुवन- जातवेद एत हि जानीहि किमेनद्यक्षमिति नभतितदभ्यद वत मभ्म वद कोसी त्यभिर्वअहमस्मीत्य बबीग्जात वे दावाअ हमस्मीति। तस्प्रिए स्तवयि किवीर्यमित्यमी दय सवे दहे य यदिद प अिव्या मितितस्मे त्र्ण निद धावेत दहेति।नदुष प्रेयायस व जवे नत पवाशा के दय घुंसतनए वननिवय मन तृदशक वि ज्ञातय देतद्यक्षमिति।अथवायुम बुव-वायवे तहि जा नी हकि म तद्य क्षमिति॥त भेनितदभ्यद्वतम भ्यवद कासी तिवासुवीअ हम स्पीत् बवीन्मातरिश्वावा अहमस्ती तिवत स्मि- स्वयिर्कि वीर्यमित्यपीद५सर्वमाददीयंयदि्दय धिच्या मिनि नरमे त्हणनिद धावेतदादतति।तदुप पे यायसर्य जवे नन नंवा शाका दा तसत तएव निबद तनेत दश के वित्ा तुयदेतद्यक्षमिनिबअबेंद्रम बुषनाधव ने तहि जा नी हिकि मे तद्यक्षमितिन थेनितद भ्य दुबन स्ानिरोदधेसतस्मि लेवाका शेल्मियमाजमामव हुशो भमा नामुमा हैमवनीताहावा चकिमे तद्यक्षमिति।इनिनतीयरंबटसमास:।।।।।।। सर्पणेतर त्मतिरोद घडत्यन्ायमभिन्नायःइंद्रोहमित्यधतिक तमो भिमानोस्व साह म्यादि भिःझासंवा वसंभाषणमाजमव्यने ननभासे। स्पीत्यभिमानंक थंतुनाम जत्यारितितदन प्रहायेवातर्हितत अत्म न भवसगां ता मिमान इंदो त्यर्थ वत्मविति जासुर्यत्मिन्नाकारो ब्रह्माणः श्रा दुरभवआसीतिरो धानंच तस्मि शरेव सस्रियम निरु पिणी विद्यामा जगामा भिआ्रायबोध हैतुलादुद्रप ल्युमाहेमबतीबसा= शोभमाना विद्येव विरुपोषि विद्यावानू येहजोभते।। =

रामरा रामरामराम रामरामरामराम रामरामर राम रामरामरामरामरा मरामराम रामरामरामरासा बस दाशिवहरह हह रहहरह

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केउ०प०भा. विद्येतिस तप्न थाना शक्ति शव तादा तमाप ताजो घहेतुस्तस्मादित्यसमापेक्षितंपाठ व्यत्यासेन वयाचऐे।यस्मादि त्यादिना। श्रीसा बझ 1 भा. रीणा

ता चप क्ृातस्याएवव च नादिवां चकार विदि तवा नत इंद्रस्य बोधहेतु लाहिदेवोमाविद्यासहायवानीश्र स्ते इतिसमति:यरमादिंद्रविज्ञा नपर्व कमग्िवाध्विंद्रा त्यननेटमतिसमीपंबत्मा विद्ययाबत्मपासासंतः४ पस्पृर्श्:स्प.ष्टवंतस्ते हिप्नथमःप्रथम विदां चकार विदाच कु रित्वितत्त स्ाद तितरा मतीत्ान्यानतिवा

ॐ बुल्मेतिहोवाच वत्मणावाएतहि जयेमहीय ध्वमितित तो है व विदा चकार बत्मे ति तस्मादाएते देवा अतितरामिवान्यानरेवान्य दगििवासुरिंद्रस्त तवेन नेदिष्ठपस्पर्श्ुस्ते

वि१ येनदीव्यतेःनयान्देवांरत लोपें। द्रोतितरांदीय्यते। आदौवत्मे ज्ञाना नस्येषआदे रस्तस्यब्रत्मणएपवक््यमा णआदेश उपास नो पदेशइत्यर्थः।। यस्मादेवे भ्योविदयुदिवसहसे वप्रादुर्भूतंब्रत्मद्युतिमत्तस्मादिद्युतोदि द्यातनंयथायदेतत् बत्मव्यद्युतत् विद्योतितवत्! 184 नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायणयेकांगसंगिनीगं भापाव यत्यखलं जगतू।अंगप्न त्यंग

अर्थवादोपसंहारोयंविध्युप कमा र्थविद्युद व्षातेना त्वंनदीसिम लंनिमेषणट प्टाने नदेवेर पिद ज्ञैय लमितिगुणद यं देवानधिक त्यवि्विक्षितमतए वन द्ुणद्ूय विशिव्टोपास नमाधि दैविकमु सतेअहै हेंण वेत कर्त्त व्यम्ति त्यमिन्े त्याध्यो लिकरूस माह।उन यात्मे ािना।वनस्तत्क आइवे त्युपमार्थआश व्दोयधाघनांधकार विदार्य विय्युत्सर्वतःप्रका जरा त एवंत वत्देवानांपुरतःसर्वतःप्रका शवव्दय की भृतमतो व्य धुतदि वे त्युपास्य यथास लहि यु त्तमिति च वा जसनेय केयस्मा ेदो पसूर्पण का लेन्यम। िषद्यथाकशयेऋक्षुनिमेषण वतवा नितिद नीरि त्यनर्थ कोनिया मी निमिमितवदिततिरा भतामे त्येवमधि देवतंदेवतायाअधिय दर्वनमधिदे वतंतत अथान तरम घ्यात मात्मनो:ध्यात्मविषयम ध्यात्ममु ्यतइतिवाकरोषियद तद्यथोक लक्षण वत्टगंकती व प्रापा तीव विषय। करत वि त्यर्थ:नपुनर्विषयीक रातिमनसाsविषय ला ह त्णो। नोमनोनगछतियेना हुर्म नामतमितिहि चोकं गछती वेनितुमनसा पिम नस्वा दात भूतला श्द्र त्णस्त त्सम लम नावर्नतरत्युपस्मर त्यनेनम नसेवतदत् ववद्दा-यसमात्तस्पातब आदतिन्यमीमिषदा:हत्यधिदेवतमथाध्या त्मंयदे तद छत्तीव् चमनोनेन चेतदुपरमरत्य भ।क्ष्णसकपः तद्नद नंनामतद नमित्युपा सितव्ये।।सयएतदेवैवदा भि देनसर्वाणिभू तानि संवांछ ति।। ।उ। ।

भू तम पास्याम तय मिन्ना यस्तस्म चा ध्या तमु पास नेगुणोविधी यते तद्ुनद नृत देत हत्मत वतहनंचत तराक्षेवनसभजनी यंवन सेस त र्मण रुपनस्मा त दन नामत्र त्णोगोण है। दं नाम तसमाद ने नगुण ननह नमि त्युपासितव्यंसय:क्पिदितयय धौकमवयथोकते नगुणे नव नमित्यने न नाम्साभि धेर्य वृत्मवे दोमा र।। त स्ये तत्फ लमुच्यतसवीणे भृतान्यनमुपास कम भिसंवांछती हाभिसं भ जंतेसे वंतेसइ त्यर्थ:।।

र्मणदतिवनसंभज ने इत्यस्यधा तो: सं भजनार्थस्थरु पंव नमितित हासि ंवननगत्वतइत्यर्थ:। गो णमिति।अवयवशक्ति लम्पन = मं

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के-उ०प०भा0 ब्रात्मण जातेरुप निषद मिति। ब्रा तमण जा त्य नुपे यां विद्यामा म ज्ञानसाधनभ तामितर्थःव तेतिवेदसतन्मान्ताश्रयातआदीनि वे भाटीभा यथा गुणोपास नहिफ लें उपनिषद भोजदीतुक्तायमय्युपनिषदिशिव्येणोकोआ चार्यआह उक्ताक थितातेतु ्यमुपनिष दा लोपास नें याधु नाव्रा तमीवावते तुभ्यं बृतनणोब्रात्मण जातेरुपनिषद्मबूमोवक्यामइ् त्पर्थ:।।वस्मतिहिबातनोक्ता उक्तालालोपनिमत्तस्मा न्भ, ताभिप्रायाब्ुमे सयंवादसस्या:वश्यमाणाया उपनिषदस्तपोबलचर्यादिद मुउप रामु:कर्मा मिहोबादी न्वेतानिव्नतिष्ठा,शयःएतेपुहिस सु बा युपनिषत् प्रतिवित्ता भवतिवेदाध्य लारोगानि सवीणिभतिष्ठे तनु उपनिषदं भोलूही सुक्तानउपनिष द्वाती वावनउपनिषदमबूमेतितस्थेतपोदम: कर्मतिप्तिष्ठा वेदा: सर्वागानिस त्यमायय तनयो वाए नामे वंवेद अपहृत्यपाभानम नतेस्वर्गे लो के ज्ययप्र तिनिष्वतिमतितिष्ठति।उतिच तुर्थ: खंङ।। Q।उग NIVERSITY

वर्तते॥ बुत्माश्नया हिविद्यास त्यंयथ्ाभूतव चनमपीडाकर मायतनं निवास:सत्पवत्सुहिसर्वयथोक्तमायृतनदवावस्थि ने तामे तातप आद्यंगात त्परातिष्ठा बात्मी मुप निषदसायत नामा त्म ज्ञानहेतभू तामेवयथा व्द्योवेदा नुब नने नु तिर्वति तस्येनतफ लमा ह।अपृहत्यपा भानमस्थ्य धर्माधर्मावित्यर्थ:4अनंतेअपारेअव्द्यमानातेखवर्गलो केसुख आायेनिर्दु:

दों गानिअन्यांगानियस्या:॥सत्य काम: स्वयंसि दःसवेशोयः सवडात्ति न:सएवांत:प्रविषोहमुपास्यःसर्वदे हिना॥१।अंथसंख्या३३। ॥छ. ।। इतिसामवेरि यातल बकार शारबोका के नोपनिष त्समासा।।थ।। इनिश्री मसरमहंसपरिवा ज का चार्यश्रीगोविंद भगव त्पाइमूज्यशिव्यपरमहंसपरिवाजका चार्यशरी मद्ांकर भगवतःलतौततवकारोपनियव्सुद गणेवा क्यविवत जसेपूरण।।

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श्रीमणेशायन म:कने षित मित्या घोप निष तर ब्र हवि ष याव-त्व्यतिन वमस्याध्यायस्यारंस। प्रागेत स्मातक ्माण्यशेषतः परिस मापि तानि। स मस्तक माश्रयव तस्य च प्रा णस्या पा सनान्यु कानिक माग सामविषया णि- वानंतर चगार्य तसा मवि षयदर्श नव शात मुतसर्व मतयर्पा रे क में च ज्ञा नं व स म्यग नु छरितेनिष्कामस्य मुमुक्षी:सतभुध्यर्थेक्ष वतिसकामस्य तुज्ञानरहित स्यकेय का निभ्रनोतानिस्मा त्ीनिचकमी णिद क्षिण मार्ग प्रतिपत्तयपुनराठ्त ववतस्ाका विक्यासशास्त्री यया प्रया पश्चादिसावरो ताधा गति:स्यात्।अथेतयो:पया नकतरेणचनता नी मानिक्षक ट्राण्य सद दाव तन वकहता निववेति। जायस्व म्त्रिय स्व सतत् तीरयस्वा नेमितिश त प्रजा ह ति स्त्राअ याय मीयु रितिमं त्र वर्णात विशु इसत्ंतुन:क्का मसयेव बा हयादनित्या साध्य स्य साधन संबंधा दि हद ता सूर्व रुताद्ा सं रकार विशेबाद्ध वाहिर कस्व प्रसगासविष या जिका साप व्त्त तोतदेतहूसकप्रश्नप्रतिव चनेल क्षण याकसा प्र पिते के ने षित मिया घया। का ठके बो र।परोचिरवा निव्याण हव यंक स्तस्मा स राज्षपश्यतिनांत रा तम न। क वि हीर: प्रत्यंगात्मान मेक्षवदाकत्त चक्षुर म.त व मिद नू इ या दिपरीकष्यलो का ्क मचि:त रा ोनिर्वेद मा यान्ना स्त्य कक त: ृतिन तहि

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ज्ञानार्थस गुरु मे वा ल्िग धोसस मि सूा णिः श्रोज्रियं ब्र दानि षं दसा बाथर् णेएवं हिविर क सप्रख्गातमविष १बिर यंजा नंश्रो तु मं तु विज्ञातुंच सा मर्ध्उपपद्यतन न्यथा।एत स्माच्च प्रयगा तंब्र ह् विज्ञाना स सार बीजमे ज्ञानं काम कर मैं प्रवृत्तिका रणम शष तो निव तत। तत्र को मोह: क शोकएकलमतउपनय तइतिच मंत्र वर्णो त्तरतिशोक मात्मविदविरधत हृदय गंधिस्तस्मि दव् परा रेइययादिशा ति्यश्। म सहि तपिज्ञाना दतसिध्य तीति च नेो वाज सनेयके त स्यान्य का रणलवच नाडजा या मे स्या दि सादि प्रस्कतयपुत्रणाये लाक: कर्मणापित्टलो को विद्य यदे वलाकइू त्यात्मना न्य स्थलाक तय स्पकारणत्मुकवाडसनेयक तत्रे क चपा रिताज्य विधनिहतु रुत्त: किप्रज्याक रिष्या मा ये षा नो यमा त्मार्यलो क इतिातत्रायंहतथः। प्रजाक मेल कंयु क्वि द्यासि मैनु व्यपित् देवलो क साध नेरना तला क प्रतिपत्तिकारणि किं क रि ष्यामा न-चास्मार्केलो के त्र य म नित्यं साधन साध्य मि ष येषा म स्मा के स्वाक्षा विका जोडरामताल यानवई तैक नीयान्लोकड क्यसच निसेखाना विद्ानिवत्तिय लिर के णान्य साध ननि ब्यायस्त स्माल सगा म ब्रलवि ज्ञान एर्वक: सर्वेषणा स न्यो स एव कर्तव्यह ति क र्मैस हक्षावि त्ववि राधा च्े प्रययगामवि ज्ञान स्यन्द्दपात्त का रक फे लप द वि ज्ञाम नेक मणा प्रसमित सर्वजेद देशन स्थेप्रत्यंगा ता व्र ह्रि सयस्य स ह क्षा व च मप पद्यतवस्क प्रा धा न्या सय्य पुरुषतंत्रतो हू सवि ज्ञानस्ये। तस्मा कक्योबोटी साधन साध् ्याविसकस्य र्त कर्मलानो ५

विहिता प्रत्य गा तमवि षया व्र हम जिज्ञासे यँके नेषित मित्या दिश्र याप्रद व्यते शिष्या चार्य प्रतिव चनरूपेण कथ नं सक्ष्म व स्कविषय त्वा तसु ख प्रति पत्ति काउण वतक व्लृत का म्यसे च नि्तित्त व तिनेषात र्केणमतिरा पने ये तिश्कतेशर।आचार्य वा्पुरु वोवेद आचार्यी देव विद्याविदिता साधिव प्राप द तितदि प्रणि पाते ने यादिशरकतिस्म तिनिय माचकं चिद्गु रुं ब्रहमनिषविधिवदुपस प्रसयगा नावु सयाद्यने रण म प शयन्नसयं नि्यं शिव मचल मिष्ून्पप्रक तिक लते।केने षित मिया दि क नदु षिते के ने क त्रट षितंदूष्टमत्िप्रेतंसन्मनः पत तिगधूति स्वविय प्रतीति संवध्यते। दू राक्ीक्षणया र्थस्य चेहासंत्त वाल्इशा रधस्यवैत दूप मितिग म्यते। इषित मितिाहूटर प्रयोगस्कछासः1लस् व प्रशर्व स्यनियोगर्ध प्रेघित मि य्येकततू। त्ेत्र प्रेषित मित्य वो के प्रेषथित्प्रेषण वि शेष विष या कीक्षास्ाप्रषयित्विशेषणकीटे शवाप्रषण मिति दूषित मितितु विशेष ेसतित दुत्तयं नि न्ते। क स्े धाम त्रण प्रषित मिसर्थ विशेषनिह्ा रणायसयारथीि प्रेतः स्यानिमित् ताथ तैव सिंद्ध सा लित मितिनवक्तव्य।अपि चर काधिकया दर्धाधिक्यं युक्तमि तीक्ष यावा चाक में णांवा के न प्रेषित मियर्थवि नो षोव ग तुयुक्त्। न। प्रश्वसा मर्ध्यादे हुदि संधा ताद निय्यालक ्मेकार्या दिरको तो न्यत्केर सप नियंव स्कवुप्तु मानएछ्ती तिसामथ्यीदुप

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के-प.9ा. ववनिवकय नन्वतदननुरूपपरतिव चनयोनस्य श्रवमितिनेषदोष: तरयान्यथाविवोषा नवगमान यदि हियवादियापार्यतिरिक नसवय्यापारेवि शियध्योवादनियोका पद्यते।इत स्थेधा वा क मे सि दे हा दि संघात स्प प्रेर थिल चं प्रसिद्ध मिति प्रश्ोनधैकएवस्यादेव मपप ॥२।। पितनाब स्यार्थो न प्ररर्शित एव ना संनायव तोरये प्रश्न दतिप्रेर्षि वस्पार्धव शेषउपपदते। कियधाप तर सिद्ध मेव कार्य कर णसंदातस्य प्रेषथित्ट ते किया संघात वतिरिकस्य स्वतं त्र स्य छामातेणमनआ िप्रेष यित्ततव मित्य स्थार्थ स्यप्रद्शनार्ध के ने पित ततर ितेम नदति विशरेष णद्दय सुप, पद्यत नतु स्वतंत्रेमनः स्वविष ये स्वयंपत ती ति प्रसिर्द्ध।तत्रकर्थे प्रश्नउपपद्यतह त्युच्यतयदिस्वतंत्रमन: प्रच जिनिक तिविष ये स्यातर्व स्यानि षा दिचित नैन स्यादन व चज्ञाननसकल्पयति।अत्युग् दुशच कार्य पार्य माणमपिप्रवर्तेत एवम नस्तस्मायुक्तएव के नेषि त मिया दिपशःकेनय कोनियुक् प्ररितःसनूप्राज प्रे तिग वति खव्या पार प्रति।प्रथमदतिप्राणविशेषणस्पात्तसर्वकलोसैय प्रबत्तीना।9कनेषि तोवावाम मां निबुल क्षणाबदतिली कि का: तथा पंकथ्व शर्श्रच चत्तु: श्री त्रस्वे स्वे विषय क उद्वोदयोतनवा च ४ष न्युनकतिनियुंकु पेरययेवे षवते योग्या: याहगरु:्वणुेय एक् सषिमन आदि करणजा तस्थ कादेवःसवविष यं प्रति पेर थिता कर्थवाप्रे रयतीति। श्रा ्र स्यश्नांननिश्र स्शणंप्रतिकरणशा नन्येज कें श्रो त मिंदियंतस्यश्रोत्रस्य श्ो त्रंसःयस्तयाएपृश्वक्षा श उदेवायुनकीस सवविशिष ह भो त्रादी निनियु-कागम्यतेदो त्रा दि प यो क वे स देवटमननुरूपं पतिववन स्यान्नल हश रा दिनी प्रयोक्त

रा. सवव्यापोवि हो र वि न्ा दिव दर्षिगम्य ते श्रो त्रा दी ना मेव तुसं ह ता न य्यापारि णालीचन संकत्पाचा वसायलल क्षणेन फल्वसानलिं गे नावगभ्यतेजस्तिश्रा त्रा दिसषिर स दवता यसयोजन प्रयुल्ल:श्रत्राकलापों म हा ियदि तिसंह ता नो प राधला दय गम्य ते श्री त्रा दीना प्रयो कातस्मा द नु रप मे वे े प्रतिवच नंश्र तस्य श्री तमि सादि को पुनर त्रपदार्थ: श्रीत्र स्यश्रा म यदर न ्रा रथयथा प्रकाशस्वत कानर्ा त रे णने बदोपो थ मत्र पदा थ श्रो नं ताब सवविष य व्यं जन समर्धदवंत चुस्वविषयय्यंज्न सामर्था श्रात्र स्य चेत ने खास ज्योतिषिनिय से हते सर्वोतर सति ल वति ना स ती त तःश्रत्र स्य म्ो मियायु पघदतात था चाक संतराप्या सनेवा य ड्पाति षास्त तस्पक्षा सासरव मिद विज्वातिायन सर्यस्तप तितत से हु.इ त्या दी निय दा दि सगत तेनोन गङ्ा सव ते खिल। क्षत्रक्षेत्रीतथाक तन प्रका राय तीति-वगीता स का ठकक च नि ययोनि याना चेत नश् तना ना मि तिश्ा ताद्यवसरव स्थात्म क्ष तेवे तन मिति प्रसिद्वं त रिह निव सत।अस्ति किमपि बिहुर हि गम्यं सर्वतर लमे क्ूट खमज्मनर, सम्टंत मज्षय श्र त रपिश्री त्राहटित तामर्ध्यनिमिन्तमति,प्रतिव चनश ाध श्री पपदा तए व श तथा मन सा तः कर णस्य मे नोन हा तः के रणमं तरणचे तनय न्याति घादी पित स्वचि वथसेकल्या ध्ाव सा ना दि स मर्थ स्यान् स्मान्मन सोपिममन:तः इह ब हिमन सीए की छ यनिर्हे ो मेनसइतिाय हा चा ह वा चा य छ बो य स्मा दर्थ श्रि (िःसर्वे:संब ध्यत यस्मा य् तस्यश्रीत्रंयस्माननसामन्य ववा चोो हुवाच मिनिहिती या प्रथ मालेन वि परिण म्यते प्राणस्य प्रा ण इतदश नाहा चोहवा चमि खया तर नुर्धन प्राणस्थ प्रा णमित्तिकसमाव

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दिती यैव नक्रिय ते।नबहु ना म पु रोधुस्य यु्काहा च मिव्य स्प वागिसे ताव हक्तयंस उ प्राणस्म स्यप्रणडति शाब्दयातुरोधे ने वे हिबहु ना म तु रोधोयुर्तु: दकतः स्थालापष्टचर्वस्क प्रथमयैव निर्दकुयुर,कसवुसव याएप: प्राणस्प त्रा णा रव्यस्यर सतिवि शेष स्य प्राणस्तरुत हिप्राण्णस्यपसा ध्यनदाम्मनानचित स्यप्राणनमुपपर्दुल का हायान्या:प्राण्यागावतयदे पचा के। शजान् दान स्यात। उर्धप्राणमुनयसपा नंप्रत्यगस्पती त्यादिशक तिकषप: इ हा पि च व क्ष्यतिये न प्राणः प्रणीय त तदेवव्र हर्वि दीतिश्रा तरादींद्रयप स्ताव प्राण प्राणसय ने तुयु कंग्रहणासस मेवं प्राणग्णनैवत्राणस्प्राणस्यग्रणतमन्तत सव स्थेव हि करणकला पस्यदर्थप्रयुक्तापर कततस्त ह स््नोत प क रणारथीि यक्षि त:ओतथाच क्षषश्यक्ष: रूपप्र काशकस्प चस्ुबाग हणसाम थतदामचैत न्याधिकि तस्पे वातन्य क्षष-श्व क्षः पृष स्वार्थस्थ ज्ञातु ल मिष्टखला ज्रादःशत्र दिलक्षण यथो कव हज्ा वे यध्या हियता अम ताप ंतीतिफल ऋतेश्वज्ञा नाटय म्त वं प्राप्प तेज्ञाला तिमु च्ये ति सा मर्ध्याद्ा ता दिक एणक लाप मु झ्झिला ओ न दामभ्ा वे क लात दुपाधि: संस्त दात ना आा यते म्तनिय ते संसर/ चाते:श्री वादेः श न दिल क्षणेव्रल्नामतिवरदवा तिमुचा त: श्राज्ा द्या तक्षापरित्यत्य्पश्रोा दा व परिय कति त पीरा:धी में तो नहि विशिष धीम लमतरेण मोत्राद्यामत्षावेशक्प परित्य के प्रेत्य व्यायतयासमालो का सुन्र म त्रकलजबदुबु म मा है क्ष वे सेव होरल साप्रeु: ६ MY

दपेत्पम् क्षणा तत्यक सर्वेषणाप्त से यर्थो म.ता अ म र णचर्माणोक्ष वंतिन कर्मणानप्रज्ञ याधनेनययागनके अम्यत ते मा न शु:। प रांचिरवां निव्यत-आव-्त्तवक्षु मत लमदन्येरासव प्रमु- च्ेतंहसम् तेड यादि रक्रतिस्या5थ वाति मुच्येतनने वेषणा योग स्यु सिंदलाद स्मा लो का सि ा म्मा छ दी रल्वस धीयस्मादा त्र दर पिश्री त्राद्यीम्प्रेते बुसनाता नतं त्र तस्म ्वसणिचक्थििति सवार निगमना सेस वा्तथा न वो रगछा लि या चाहि ग वेउ ज्वार्य मोणो सिधय प्रकाश यति थ दात दाक्षिधे ये प्रतिवारणधतीसुच्यते तस्य-व नुदस्य तान्नर व र्स के स्य च क र ण स्या तमा ब्रा हा तो न वा गगदा ति य धाग्नि ही इकः प्रकाश कवापि सल ह्यासा नंप्रको शयतिद ह तिवा त हु तू।।उा नो म नो म नश्रा न्यस्य सकत्य यित् अथ्य वे साथित् चर्सन्ना मा नसे केल्पय सध्य व स्थतिच ते स्वा पिहिन सतईं ्रियम नाक्पा िव कनवविज्ञा नत ंगोचरान्न् स्त ह होर शमित्य तो नवि ज्ञा नी मो यधायन प्रकार णैत ट्ुस्लानुशष्या दु पदिवक्िष्या ये ससिप्रा य येटकरणगा चरत दन्य स्मेउ प देपु शक्यं जाति गुण कि या दिवि शोष णैन चजा त्या दि वि शोष णव हुस तस्मादिष मंशिय्याुपदेशेनप्र न्याययितुमिसुपदेशतदर्थग्हणेचय लातिनाय: कत्तव्यता दरशय।नवि दनविज्ञा नीमो्य येतदुनुशि य्यादित्यंत मे वोप देशप्रकार प्रसा ख्याने प्राय्ततदप वादोयस च्तासत्यमवं प्रत्यक्षारित्ति प्र माणर्नपर: प्र त्याययि तु शक्यः आग मे न वश क्वएव प्रत्याययि तृतदुप दे शार्थ माग ममाहा न्यदवत हि दितादथाजविहिता सर

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के. प.917. दधीत्ान्य देव प्ठथगेव यसहकतं श्रो व्रादी नोश्रऋादी त्क् मविषयशर ते षां त दविदि तादन्यदेव हि विदितं नामयहि ॥४।। दिक्किय या तिवायेन प्राप्त तह दिक्कि या के र्मक्त तंकचििचितस्य चि दितं स्या दितिसर्व मव व्याहते विदित में वत स्माद न्यदे वे त्र्थ।अवि दित जज्ञात तर हीति प्राप्त आ हाथाष्पवि दिता त् विदित विपरीतातूअव्या तादवि द्यालक्षणाध्या हेतबी जादधीतु पर्यर्ल क्षणयान्यदिन्य घीयद्टिय स्माद ध्ु परिसव तिततसादन्यदि ति प्रसि कं.।ए)यहि दितं तदन्पम सेदुखात् क चेतिह यंत स्मादि दितादन्यहुस्नतुक्तलहैयत्व मु क्तंस्या त्। तर्थोचिदिनाह धीसु क्तेअनु पदि यल मुत्ता कार्यो धहिकार णमन्यन्येनोपादीयत अतभ वदितुरन्यस्म प्रयो नायान्यदु पादेयनव्षवतीत्ये वं विदि ता वि दिता स्या मे न्यदि तिे यो पादेय प्रति षधेन स्वाम् नन विष य जिका साशिष्य स्यनि व र्तिता स्यात्ानहान्यस्य स्वात नवि ता वविदि ताविष्यामन्यवस्कत:सकवती ताता वा्य थाडिय मात्मा व्र हाय ओ त्माप हत पाप्सायसा क्षादपराक्षाह ह।यआन ते यदि क सेत रेक्पश्व थवसव्नसर्वि शेष रहित स्प चिन्मा त्रज्योतिबाव्र ललप्रतिपाद के स्वचार्कय स्या चार्यपदेशपरं परयाप्राप मा ह।इ तिभुमे त्यादि ब ह्लेव मा चार्यापदे शप रंपर यैवाधिगंत व्यासतर्कतः प्रकचन मेधोबहमके ततपाय का दियश्व सेवं शु क्रमश्रके ते वं तोव ये पवखा मो चार्थीणोव च ने ये जा-चार्यीनो स्म स्यं तहरव्याच-चकिर-याख्यातवतो विस्पष्टंक स्ित वे ताल वा मि सर्थ:।9।।अन्य देव ते हिदि तादथो अवि दितारघीव ने न वा क्यना साब हाति प्रतिपा

यजामुंक दि ते श्रो तु रा शं का जञाता कर्थ ला त्मा ब्र हा।आ मा हिना माधिककतःकर्मण्यपासनेच संसारीकर्मा पा सनंवा साध ने मनु छाय बह देवान्व गीवा प्रासु मिद्वेतित स्मा द न्य उपा स्येवष्णु रिश्वर= टटप्राणावा ब्रम्मस्षवितु म ह तिनतवा तमालाक प्रत्य य विरोधा त्तथा न्ये ता कि का दश्व रादा नान्य इ या चक्तेतथवाथा कर्मिणो मयजेस न्या ए व देव ता उ पा सते तस्मा यु के यदि दि तमु पोस्यत है हाज्वेन्नो पा से क इतितो मे तो मा शकाशिष्य स्प लिंगे नो पल स््यत दवा क्याहो में व शकिया:य ्चे तन्य मोत्र सज्ञा के वा चा बो गिति ल हा मूली या दिवए सुस्था ने यु विषर मानियं वर्णाना मक्िवा जकं कर ण व णोध्यार्थर्स् केत परिधि ला ए ता वे त एवं कम प्रयु का इये वं तद सिव्यंग्य: शब:पदं वागितु च्यत।अकारोवैस बोवा कू सेषास्प शी अत्तिर्व्यज्ष्य माना ब की ना ना रूपाप्त व तीतिक्रते लित म मित स्वरससा एषविका रोय स्यास्तया वाचा पद लेन परि शिन्न या कर णागु णवस्या ना्यु दित मप्रकाशित मनस्युकबनब्रह्णावव्ितथ सक रणावागत्युते चैत न्यड्योतिषा प्रका वयत युज्यतइत्यनावौ हा चा ह वा गितिहयु क वद न्यग्या य वाच मं त रोय म यतीतयिादि-य वाजस ने यके खा वा कू पु रुषे पुसा घोषेलु प्रतिपि ताक ाशय तां वेदब्राह नदूति प्रश्न मुखाद प्रतिव चनमुकक सावा ग्यया सव न ल्षाखत इति साहिवकर्व किनिस्या याकू चै तन्ये ड्योतिस्व रूपान हि कर्र केर्विपािला पो विद्यत इ लिश्कर तेस्त देवास सवर ब हनिरत नारयं समाखय

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वृहतवाट सेति विदि चि जानी हि ा थैर्वा गा यु पाधि िर्वाँ चो हवा कूचकुष श्यक्ष श स्पभोत मनसोर्मन:क्त्ताजो का विज्ञा तोनिर्यता प्रकाशिता विज्ञान मानदेबहायादय:सववहा राअसंयय व हाथ निर्विशो से पर साम्येब्र हणि प्रवज्त ते ता न युद स्या तान मव ननर्विनो षंब हवि डी येवश दार्थोने दंब ह यदि द मित्यु पा धि ले द विशि एट म ना सेश्च रा घु पा स तैध्या म ति त देव वि ही सुक्त्ते पिजे दंब् हात्य नाम नोर व्रहवं पुनरुच्तेनिय मार्थ मन्य ब स्बुदधियरसंस्या ना र्थ चायन्मनसा नमनु तंइ त्यंतःकर णंबु द्धिम न सो रक ले नगहामनुत ने नेति सर्वक रण साधारणसर्वषय व्याप केलवालू काम से कल्पा विचि कि सा श्द्राश्र हवाछ तिरधुति ही धी सी रिसेत सर्व मन एव तिश्रते का मादि व तति मन्म नस्तनमन साथ शेत न्यड्ातिर्मन सा वसत्ास के न म नुलैन से क्पयतिना पि निश्वनो तिमन सोवप्नासक लेननियं तत्ता सर्व विषर्य प्रतिप्र यगवृतिस्वात्न नवर्त्ततेंतः करण मंत स्होन हि चे तन्य ज्पोति षाक्षासित स्यमन सोम न नसामर्थ्य तेनस कसिक मनोयेन ब्रस्न णाम ते वि स योद्त व्यापमा है: कथ यंतिब सवि टस्तरमात्त देवमन्सः आ साने प्रत्यकृता्य तार चब्रे हर वाद नेद मि या दिपव व यजा धुषा नप रति न विषयीक रात्यतकरणर्वात्ति सयु क्ेन येन चक् वअंतः करण वत्तवे दाजनना9यएकक्तये: ता नि चक्ष विपस्यतिलोके तन्या सज्या तिषा ५

विषयीक रोति व्याप्तोतिय दो त्रेण नश णोतिदि न्े व ताधि वि ते नाका ना का र्ये वाम नोळसत संयु क्ते न कैनवि ससिह्

जयीक रोतिला क: येनश्रीज्े मिद यसेतन्या सज्याति षावि बयी कतं तदे व य सणन पार्विय ननारकापु र एय नातः क रणप्राण वसिरा सहित नयान्न पाणि ति गधवन्नविषयीक रो तिय नचैत न्यातम ्पोति षार्व श्ास्प ले नस्व विष यं प्रति प्रणीयतेतदेवे-सादि समा नसवाड् तिप्रथु म:रंा।थ।। ए व तयो पादेय विप रीत रह ५य आसाब सा तित्र साथित: शिष्याह मेव ब्रस्ततिसषुवे दाहमा मितिग्ठण्हीयाहि त्ा नुकिया चार्यशिष्यवुदधिचाल नार्थय दि या ह्ा न न्विधेव सुवेदाह मितिनिश्विता प्रतिपत्ति: सयमि कोनिश्यता प्रतिप तिर्नतुमुवेदी हमि तिय ह्रिये देवस्क विष यीक्ष वर्तितत्स, ए वेदि ते ना क्ये दा हामिय दग्धु मग्नेर्द्घुर्नलग्नेःस्व रूप सेव खर्वस्येह वे दितु: स्वाता ब्रस्मति सर्व वे दा ताना निश्च तोर :हच त देव प्रतिपा दितंप्रम्नप्रतिव चना सपाश्र स्यश्रा् मिय्यासु या य हा चान स्युदित मितिवि शेष तो व धोरितं ये स वित प्रदाय निश्चयश्र्वा क्का न्यदेवतहिदिता दधोअविदिता देधी तुपस हरिष्यतिचा विज्ञातं विज्ञान तो विज्ञात म विज्ञान तामितितसमा युक्तमेव शिष्यस्य सुवे देतिबु द्वि नि राकर्स नहि वेदितावदितु वीदि तुश क्पोग्लिरिव दग्धु मग्नर्न वान्योवेि ताब्र सणास्तियकस्प वेद् मन्य स्याद् सनान्यह तोस्ति वि ज्ञाजित न्यो वि ज्ञाता प्रतिषिधया तेत सातसएवे दा ्रस् प्रतिपतिमिधयो व ल स्मायुत्त म वा हा चा या ये दो तादि यदिक दाचिन्मन्य से सवेे ति थ दु वे दा ह बतिक दा विद्य याशत दुवि जेय मविक्षीणरोपा सेमेधा: कन्विस्तिपद्यते केन्ननत सातो क माहयही त्योदि। एप्ट चबए, बो क्षििपुरु वोर्टरय

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के.पक्षा ने एव आ स ति द्ो वा चैत दम्प्त मज्तय मे तत ब्र स्ेतु क्ते प्राज्ञा पय:पं डितो प सुरराट विशोचन:स्वपताव ॥६॥ दोखव शायनुप पय मान मपिधि परीतमर्थचारीरमा सेतिप्र तिपन्नस्तथा देव राट सलहिस्व्िरुके चाप्र तिपद्यमान: स्वल्लाव दाषक्षयमपेक्ष्य चतुर्थपयीये प्रथमो त्ते मवत्र सप्र तिप न्:लाके घिए कस्मा खवुरो ण्वतां क शिवतयधाव स्रतिप दत काश्य केय धानव स्ति प दाते का परेरयधाव क चिचिदि परीतं क शन्नप्र तिपद्यतकि मुव क्तव्यम तीटट्रियमात्मतखमंत्रदवि प्रतिपन्ना: सदस द्वादिन स्तार्किका:सर्वेत स्माद विदितब न्. स्ेतिसु निशचितो कम पिधिषम प्रातपप ताय दिम न्यस इत्या दिसा नो केव-वनंयुकुमेवा-वार्यस्था।१।दसे रमे वा पि न्नत्वे वे सथ आा नी ज ब्र स्णो रुपुं किम ने का निव्र सणो रुपाणिम हाति अर्त्षकाणि चये ना हदय मे वे य्या दि। वा ठ म ने का निहि नाम रूपोपाधिट तानिब्रह्म ण। रूपाणिन स्वतः स्वत सवनान् मस्य नमरुपमव्य यं तथार सेनियम गंधव छीय िति ादा दिति: सह रुपाणि प्रति विध्यतमनुये नेव धूर्मे णयट्रप्यततेव स्वं. तस्य रुूप मिति ब्रह्रणोपिय नवि रो षेणनकु पर्ण तदेव तस्यसप स्थाद त उ-्यत।चेतन्पे एर्विव्या दीनामन्ये तमस्य सर्व बा निपरिणत्ा नो बाध र्मानक्षवतितथाश्रा जादीना मंत:क रणस् चधर्मोसवती तब्रह्मणोर पमिति ब्रह्मरूपते चे तन्यनतथा चा के विज्ञान मान दबसन विज्ञा न घनए् ब से जञानपज्ञा नं ब्रस्मतिच हणोरुपंनदधिष्ट कति पु!सत्य मेवं तथावित दतः करणदा हैं दियो पा ट्वार णेव विज्ञाना/रशन दयते। तद नु का रिखाट हादि व हि सका चे है दादि घुना शिषु नखवतः।ववत स्युविज्ञा लें विजा न तो विक्ृीत मेवि ज्ञनतो

मितिस्त्तंल विष्य तियदस्यब्र सणोरूपमि तिपर्वेण सरवंधोन केवल मध्या सो पाधि परिछिन्न स्यास्यन ह णो रुपंत मल्प वै ख य द अधि दे व तो पाधि परिधिन्न स्या स्यब स्णोरपंदेवे पुवेन्वलेत दपिन नंदहर मव वे खतिमन्येहंयद्ध्या संयद पिच देवे सु उ पाधि परिगिन्न ाय धाान्ननव्ततयक् विध्वस्त सर्वो पोधिि वोषं शांत मनेंत मकम हेतै एक मा रवं नि से व स् नततवे य मित्य तिप्राय:।र।।यत एव मथनुतस्मान्म न्ये य्ा पि मी मांस्ये वि चार्य में व ते त व ब्रे हो वमा चार्यो क: शिष्यथ काँत उपविष्ठःसन्यथोकमा चार्ये ना गम मर्धलोविचार्येत के तथव निरदाय सवा नुक्ष व रालाचार्य स्का त्रां उप गम्या चमन्येहमथे दा नी वि दितं ब्रहो निकथ मितिश्णुत नाह मन्वेसुवे देतिने वा हमन्येबे देति न वत हि वि दितंत याब्र होुकआहा नो ब 6ति नवेदेतिवेदच वे देवैच शव्दा -न वे दे चान नुवि प्रतिषि हु ना हमन्येसुव देतिनोन वाेतिवेद चितियदिनम न्य से सुव देति कथं मन्य से वे दवेति अथ मन्य से व दव तकधैन मन्य से सवे देसे क वस्क्रयेन तायतते नेव-चत देववस्कनसु वि ज्ञाय त ड तिवि प्रति षिहे से िय वि पर्य य व् वान चब्रम संरावितलन ज्यंविपरीत्लेन वे तिनि यतु शाक्य संशा य विप र्यययोह सर्वत्रान पर्थकर सेनेव प्सिह्ध खेवमा -चार्यणवि चारयन्य मा ना पिति व्यानावच डाचालान्य देव तदि दिता दवविितादथी या चार्योका गम संप्रदा युब ला दु पप स्नुक्त व व ता ख ल गर्ज-चब्र सविद्यायोह द ननभव य तो य-नासन:ाक थ मित्यु च्य त योयनकामव

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के.प.श्रा.

non तो:स्मा कं सब सा चारिणो म ्येत दुतं व च नं त लो वे टसत त ब हावे द क पुनस्त तूच नमि ताहा नो न बदति वे द-चे तियदे वा न्य देव तहि दि ना दथाविदि ता दधीत्यु कं व स नुमा ना नुल वार्ां से यो ज्प निवते वार्कया रेणनानवे देलिवेद चैत्य यो च दा चौर्ये बु दिस वा दार्थ चमंदबु दिग् हणव्यप्रो हार्षच तथा चमर्सतमुपपनने स्षवति।१२) यान सहेदे तिनि प्या चाय सवा दा प्रतिनिवर्त स्वेन स्वरूपेणकतिसस्त ्सवादनि र्य.त्त मर्थ मव धार यतय स्याम तमिया दिनाय स्यब स विदोडम तम विज्ञात म विदि तंत्र स्तिमतमिय व्य्रायोनिशवय स्वस्यम ते ज्ञातंसम्युग सत्यित्तिपायाय स्पपुनःमते ज्ञात विदितं मयोब हातिनिशया नवे देव स नब स्विज्ञा नातिस विद्व दवि दुवारयथो को पक्षाव व धारय तवि ज्ञात ममतमविदितमव ब्रहि जा न तो सम्य ग्विदित्रय ता मि सेत हवि ज्ञा तं ववि दिनं ब्र हावि जा न ता म स मा ग् र्शिना मिं द य म नो नधय पाधि व्येवा तम द निनिामित्या थ: न खतंत मे वाव्यु सन्नबु ट्री ना न हि ते पा वि ज्ञात म स्मा लिर्व स तिभ व तिदंडिय मतिल मनो बुध्यु पाधि ख्वातम दर्शशिना व हे पाधििवे का नु पेलसादध्या यु पाधभ्य विज्ञात लोहि जा तं व स्पप दते कातिरित्यतः सम्यग दवो न पर्वप क्षेलेना पन्य स्यते वव ज्ञा तम विजञा नता मिस धया हेत चउत्तरा। विज्ञा ल मियादि उुचि ज्ञा ते वि ज्ञान तोमि लव छतं यदि त स्ारतंत मे वावि ज्ञातलो कि का नोब हविदा वाधि यो षः प्रा पवि जा ते विक्ञा नता मिति चेप रस्प रधिरु हैं के र्थेच वस सम्प ग्विदितंस्त वती व मर्थमाह प्रति बोोध विदि ते बोर्ध बोर्ध प्रति विदितबा्ध नाबनबो हाः प्राया उचमेते सर्व प्रस या व षरयीप्त वतियस्यस

आता सर्वदोधा न्पतिबुध्यते सव प्रसय दर्नी चियू कि स्वरूप मात्रः प्रत्य ये रेव प्रसया शिविषतयाल्य तेना न्य हा रा तर मातम नो विज्ञा ना यातः प्रत्यय प्रत्यगालत या विदित बहय दातन्म तन दातसम्पग दनो न मित्य थ:ी।।१३। सर्व प्रत्य यद शिल्े चो पज ना पा य बर जितहै करच रू पता नित्य ते विश्रु हुस रुपचमा न संनिर्वि शेष ते के ह लै च सर्वद्द तघु सि द्रेंसवेलक्षणतेदाक्षा वास्योम्नडूवघट गिरि ए हवादिसुिदि ताि दिताश्या मन्य हूस्त याग म वाक्य स्यार्थए व परिशु दूउपसे ह तोक्ष व तिछे दष्टाककता श्रा ता मते मे ताविज्ञा तर्विज्ञा ततिहि अ यंतरं।यदा पुन वैिक्रियाक ततिबेधिकरि याल क्षणनत कके तरं विज्ञा नाती तियोध लक्ष पानविदित प्रति बोध विदित मिति व्याखाय ते यथा यो वृक्ष नाखाश्याल पतिसवायुरितित त्तदाबोध करिया ना क्कि माना ता ट्रवन बोध स्व रूप एव बोध र्क्र जा ्यत विन शयतिच यदा जा य ते तदा बोध करिय यास विश्रोषोय दाबोधा नरय तित दान प्ट बाधो द्रव्य मा्त्र निर्विशेष स्तत्ैवंसतिवि करियाम क सा वयवारनित्येोशुदूइत्यादयादोषानपरिह तुनक्पते यद पिकाणा दाना मासमनःसेयोगजो बोधआल निसम वैसतआत निबोध चे।न तुविक या तक आसा टव मात्र सक सव तिययट दव रागसमवायी अस्मि न्य क्षेष् चेतने द्रवयमो त्ँब हाति विज्ञान मानदप्र तानंब हो साघातयोवाधि ताः स्पुत्मग नो निश्व यं चले न प्रदे शाक्ावान्नित सयु रेला चैम न सेः सेलु स त्तिनिय मो नुप पत्तिरपरिहाक स्थात ससग

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धर्ार्मलंचाम नःश्रतिस्म तिन्या यु विरु टंक ल्पित स्या दस गोन हि सज्तकुंस वव दिति हश्क ति सरती न्यायथ्य गणव टूणव ता सं सज्य ते नार्तलाज्ञातीयम तोनिर्ग्ण निर्चिनोषं सर्ववि क्ष णकनवष्य तुल्यता तीयं सेस् डप त ईस्येत न्यायवि रु द्ृक्ष वे-तस्मा न्नित्या लुप्त विज्ञान स्वरूप त्योतिरा ता ब्र हात्र्थ:सर्वबोध यम ३ बाडलेआशना सिध्यति नान्यधा।तस्मा सतिबो सघ विदित मत मितिय चा व्या ख्यात एवार्थोस्मालिःय सुनःस्वसंवेद्यता प्रतिबोधविदित मित्यसय वाक्य स्यार थावर्ण्यतेतन्न वति सा पाधिक ले आस्नावृध्यु पाधिस्व रुूप से नलेदंपरिक लप्ा मना सो ने वे त्ी तिस ययवहार आल न् व आ सा नं प रपतिस्वय मे वा्त्मनी सानवेखलंपुरु षा्त मे तिन त निरु पाधि क स्पात्मन:एकलस्वसवे य तापर संवेद्य ताव ंप्त वततिास वेटन सरुप ा स वेदनात र पेक्षा चनसंलवतितयथाप्र का वस्यप का शांतरापक्षानसनवस्त ह है हु पक्षे स्व से वै द्य तायो तुक्षण सगर लनिशा मक ले च विज्ञानस्य स्या न्यह वि ज्ञा लवि तात र्विपरिनापाि सतेविनाशिलान्न यवप्तुसवृ गतसवाएस मे हानजआ माकरोम राम तोप्डतयाघा:तयो बाध्येरनाय सुनः प्रतिवाधचावेन नु्नि मित्ताबोध: प्रतिबोधा वथासुपस्त्यर्थ परिकल्पयतिस द्वि ज्ञान प्रतिबा धंइु सपुरेनिनि ममत्त:सरूछास रुद्दा प्रतिबाध ए वंहि सअेम्ट्रतल मम रणलावं स्वात्मनावस्खन मोक्षाह सस्माहिद तलक्षत यथो क प्रतिबाध चिदिता सका त स्मा स तिबोध विदित मेव म तमि य्तप्रो यो बोधे स्यह

प्र-खगा-माआ सविषयं च मतमम तल हेतु न हार नो ना त संममत तज व त्ातमलादार नोउम् ततांनि निमिन्ता देव मर्चलमात नोयर दविय्थानात प्रति पत्ति: के च पुन यधोक जयाललि यया ज्चे विदतइन्यतज ह। आर ना सेन रूप ण वि द तेलप्षत वीर्येबलंसा मर्व् धू न सहाय मं त्र षधि तपोयोग एक ते वीर्थम त्ून शकायत्ति स्वितुंमनित्यवस्क्रकत च्वादा तवि द्याह तेतुवीर्ये मात्नेव विं द ते ना न्ये ने त्य तान्य साधन वादा विद्यावीर्य स्यतृ देववीर्ये मत्यु श क्रा त्यत्तिक्ष वि लुंय तएव मास विद्याऊतं पीर्य ज्म नै ववि दत तो विद्यया मेविषययाधि द तेम्पत नाय मा मा बलल ही ने नल क्ष्पदत्याथरवणातःस मर्ध ह तु रमत ते हिबिं दे त दू तिक पाखेलुनं रकति रय क्प्रे ता दिपुसं सार दु खब हु लेपु प्राणिनिकाये सुजन्मज रामेर णादि सं प्रापि र ज्ञा ना दतइ हेव चन्मनृथा धिहतः समर्थ: स नम रुव दी य त्ान यथो-कलक्षण विदत वान्यथो क्ते हहे क न प्रका रेणाध तराल सत्येम तुष्यज्ञन्म न्यस्मिन्नविना चालअर्थवत्तासदरावेवापर मार्थ तावास त्येविद्य तेन चेदिह जीवेश्ये दधिकलाडवे दी द विित वान्य त दा म ह ती री दी अ नं तो विन सि: वि ना क्ा नं ज न्म जे रा मेर णादि प्रबंधा विये दलक्षणा सं सा रंगति स्त स्मा देवं गुण दोषो वि ज्ञान तो ब्रा हा णा: बह ते सुक्ह ते पुस र्वल ते तुस्तावरे ुचरतु चैक मा सा त ल ब्र ल वि चि त्य विज्ञा य सा क्षा हात्य धी राधी मं तः प्रेत्य व्याक म मा हज्ताव लक्षणा दवियया रूपाद स्मोक्ष्ो का दुपर म्यसर्वोतकक्षा व म हेतमोपन्ना: से तोउम्ट प्ाप्त वं तिब्र हो व तव ती यथ:सयोह वैतस

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के.प.्सा. दवा६ रमंब्र ह्वचेद व्र स्नेव प्तव तीतिक तेः।5निदितीय:खेडव्र ह देवि स्यावि जिग्ये अविज्ञा तंवि ज्ञा न तो विज्ञातमविज़ञा i<॥ नतामित्या दिश्रवणाय्य दस्तितहविज्ञात प्रमाणर्यन्नास्तित सदवि ज्ञा तं नानाविवणकत्यमववत्यंतमेचा सहप तथे देव सना वि ज्ञात बाद सदेवे तिर्थ मं द बू ही नो बा मो हा माकु तिर्दि त दर्धय मा रगायि का रक्ष्य तोत देव हिर्द्रस् सि सर्व प्रकारेणप्र शासत् देवाना मपि परा देव हश्व राणा भपि पर मेश्ा विज्ञियादे वानाहुरसुराणीपरा जयके तुस्त कथ ना स्ी तेत स्यार्थ स्याल कला नित्यु त् राणिव चीसिर शयते अचवाब हाविद्यारकतय कथंन स वि ज्ञा ना ट्रय गन्पाद्यो दे वानश्रष्ठ से जरमे स्ततो प्यतित रा मिंद्र इत्यथ वादु वज्ञयंत्र ससतत्यतेयनाग्या दयो लितेज सोपिके जनवब्र हवदितवंत स्त थं द्री दे वाना मीश्व रोपि सन्निति वक्ष्य मा णा प निषदवधिपरवास वब्र हम विद्या व्य तिर के णपा णिनीके तलसा कला लि मा नो मिथ्य त्यत सद र ना थ्े वार्याथि का यथादेवानो जमाया्समा न: त हू दि त ब्र हाय थो क लक्ष णपरे ह किल देवस्योर्था यवििग्येजयलव्घ्रव देवानामसु रुणी च सं ग्रा मे सु रान्स तालगदरा ती न ईश्वर स तुल्ष न्दव स्योजयंत एलंच प्रायध तजग स्थम्ने तस्यह ककिलब हाणोविज ये देवा अन्ा टु याम ही सेत महिमा न प्राप्त वेतस्तदात्म संस्थस्य प्रतंगासन ईश्व रस्य सर्वज स्येसर्व किया फृत सयालाय तु: प्रना सेर्व चक ज गतः स्थि र्तिचिकी बारयं ज यो मं हिमा चित्येव मज्ानंत सते रेवा ऐ क्षेत ई।क्षृतवतः अग्न्माहस्य रूप परिधि-्नामम एक त) समाक मेवा योवजयोस्माके मेवायुमहि मागग्नि वा ख्वंद् लारिल क्षणाजय फलक् तो स्मालि रेनुक्रय म नास्म सलयगामकतेश्वरएत तव मिध्या स मनिवत

जवतंत टुकिले षा मिश्येक्ष णंविज ज्ञो विज्ञातव तू ब्र लसर्वेषित ति तत् वेलुत कर ण पयोकवा हेवा पाहूर्वभूवत

नोच मि्ध्या ज्ञान मुपलक्ष्य मे वा सु र वु न्मध्या समिमा ना स राक्ष वे युरिति त द तु कें पया देवान्मि ध्याक्षि माना प नो दे नान ग्टव्ही या ितित त्या हे वे क्या ह किलाथाय प्रा दुब भदव स्वयोग मा हातपनिमित ना त्य दु तेन विस्मा पनी येन र पे ण देवा ना म (दिय गोचश्र दुप्त तंब हनव्यज्ा न तन ववि ज्ञोत व तोदेवा: कमिदयक्षप्ज्यंम ह,दत मिलितदेतज्ञानतो दे वाःसी तस यास्त हिलिज्ा सवोग्नि म ग्रगामिन लातवे द सं सर्वज् कलप मयुव-जुक्तरव तो है जाल व दएलद स्मह च र स्वांय सं विज्ा नी हि वि नोष तो बुध्य खवलनस जस्वी कि मे त यक्ष मति तधास्वितित यक्ष मस्यद्रव नसषतिगत वाननस्तगतवलेपपषषुतत् मीपे प्रगलसर लात्त शी का तं तद्यक्षमश्यद दद गिन प्रत्यक्षा पृत को सी तेवव ह णा ए टो जििरबरावीद पिनर्वेज गनि नो मा है असि ड्ो जा तवे दाउ तिच ना म हयन प्रसिद तथा सनशलाचय न्नितेव मुक्व तं ब्र ह्ावाचन स्मेननेवंप्सिंह गुणना मव त तवयि कि वीर्य सामध्यीम तिसवुवी दि दअग प्वदह य यदिदं स्वाब रादिष्ट थि य्ामिप लक्ष णार्थ य तोत रिक्षसव म पि द हत ए बाग्निनातस्ाएव मानष मानवते व्र ह्ात्प ण नि दधो, पू राग्नः स्थापित व तं, व्र हेतन णूमा त्र म मो म तो टहनचेरस्पा द्ध सम्धी सुंच दग्छ ला सिमा न सर्व त्रे तुक स्तण म प पे य य तणस भी पे स व जवन सवी त्ा हहक ते न वे ग नगचा न्ु३ गनवान्?

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इतितरोंह क्षेमशकमर नश नग क ना नूा क रुग्धुंस जञात वे दास्त ण दग्यु म शका वीडिता हत प्रतिकस्तपीं देवान्पति निर्वे द ते निरत्त प्रतिगत वान्नेत दाश क वा क् बा ने है वि क्ञा तुधि को सता हे ये त घेक्षमत्या था न तर वायु म बू बन्हे वा यो एताह जा नीहि इ या दि स मा नार्थ पूर्व ण बाना हम नी हो गंध ना हावा युः माते यत ररक्षे-सिति चेल ती तिमात रिश्वादद सर्व मादुदीय गण्ही या यदि दषथिव्याभि या दिस मान मे बर्थ ट्रमन्ुन्वननेत हज नीी वाददपु व वदि द्रःपर छ मेश्वरो मंध वान्य ले कला स थे तित दस्यद्रव नस्मा दिंद्रा दाम् समी पेगता त ह हति रो दधति रलत मिद्ेस्ह बाव्ति मा नोनि राकर्त ब्येडसतःसं वाद मात्र म पि ना दा दू हो द्राय त दकष यासी ला का शिउ का ना प्र दे रो आ म ने द शयि लाति शोष तर्भमिदश्य व् ह्ाणस्ति रोधा न कार्ल यस्मि-ना का रो आसीस ईं द्रस स्मि न्ेवा क शेत स्थोरकित देक्षमि तिध्यायन्नानय4ववतेअन्मावन्तप्रस्यय क्षे्क्बु धावि योमारुपिणी प्रादुर न वहेतरचीसु पास हं टू स्ता मुमोव ट शाल मा नो सर्वे बोहिशामानानो शोकनत मौ विद्यातथाब हु शलमी नेतिविशोषण मुद पन्नस्र वुततहमव ती हे मद ताक्तरे णव ती मिव बह शाज्माना मिसर्थ:।अथवाउमे वहिमवता दु्हिताहै मव तीनित मे वभ्व रेणसर्वज्न स हव,्त त इति ज्ञातं समर्धीतह लाताभु पज्गा में द्रस्ता हो मोंकि लोवो दप प्रध व्रहकिमे तद गीय ला ति रोक्ष त य क्षम तिइति तृतीय रड साब ्त हाथा चे किलव हा णई शर स्ववेदज येडम रेणे जिता अ स शयू ये तत्र निमित्त मा त्रतस्ये वेवि जय यू ये म हीय ध्वं म हि मान प्रापुथ ए त दि तकि यावि कोष णाथा मरव्याक्षिमान स्क्युब्ाक मयसस्मीक

मे वार्यविज योस्माक मे वार्यं म हि मे ति त तस्त स्मा दु मा वा क्या हू ए ब वि दोच का र ब होोोव धार णासतो है वे ति न स्वा ते न्य णय समा दगन वाडिय द्रा ए ते द वाब्र स ण: सं वा द द बी ना दि ना समी पमे पगता र स्मा त स्बैण्ड गे शति त रामिव शक्ति क णादि म हा सां्यर न्यानू देवान अत त रा मति वाथ न रत इवैते दे वाइय ना नरथ को व धार णार्थावाय दगनिवा युरिं्द्रस्ल ि दे वा य समाल एन तं ब्र स्ने दिष्ठ मेतिक लेमे प्रिय तमेपस भुःस्ट ए वं तोयथा के ब्र ह ण: सं वा दा दिप्रका रे स्तहि य स्मा ख है तर न ह सा स्रथमः प्रथमाः प्रधाना: संत इसे तहि दाँच का र वि दांच कुरित्ये त ह स्रे तिय समा द मन वा यूअ पीट वा क्यादेव विर्दा च करिं ट्रिेणय तु मावा क्या हर्थ मंश्र तत हो स्य तस्मां स्ते है ई द्रीति त शमि वातति कोन त इवान्यानदेवाना हो ने ने दिर्ष्ठ पस्प र्श थस्मा सहयन स मो दांच कार ब्र हुकार्ध वाक्य तस्य प्रदा त स्य ब हएब जा नामो प दे शोनिरुपम स्यब् ह्मा जो ये नो पर्मा ने ना पदेशा स्साय मा दे वाइ सुच्य तकित पदेतस सिहधलोके विद्यु तोव्य धु तह पात ने दे तव दिस्े त दनु पपन्नमित्तिविद्यु तो वि द्ोत नमिति कल्प्ते आड समार्था विद्युतो वि्द्यात न मि वे सध:।यथा सदा ह युत्त मिति-क्रसंतरचदर्श ना हि घुदिव हिस कदा त्ानंदर्श यि. वाति शोष् तेब ह दे वस्वाथ वा वि यु त स्ज इ सध्या हार्थ व्य पुतह द्योति त व दा दुवे विद्युतसे तः सक द्ि योतित व दिवे त्कि प्रायः।द तिरदआ द शप्रति निद वर्थ ट्रययमादे श इरतिडछूबःसमुध्चयाथः।

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के· पस्ता अयंचा पर स्त स्या देनाः को सौनय मीमिष तयथा चसर्न्य मीमि षन्नि मे बंक तवत् स्वार्थणिचूउप अध्यात्मंश 11991 मार्थ एवका रवसु सोवि पर्य प्रतिप्र का नाति रोक्षा व ूवयर्थइतवि देव ते देव तो विष यंव्र ह्मणउ पमान दश न अध अने त रप्रत्य गात्म विष य जा देश उ पे देशउच्यते।यदेतहखतीय चमनऐ ततत हाठकत टव चिष यी के रो ती वथ्या नन म न साए त लुब ह स्मर तिस मीपतः स्मर तिसाध का मीक्ष वशां से कल्पश्व म न सो ब्र यसविषयोमन: उपाधि नोह म नःसंकल्प सस त्यादि प्रत्य ये रत्य्यज्यत 5- ब्रह्म विषयीकि यमाण मिवात: सएपत्रह्णाध्या र्य मा देन: विधुनिमेषणवेदधि दैव तं टू तंपका शनध र्मिजभ्यातमेचमन:प्रत्यथसम कालातिव्य कि धर्मी सघ आ दै ना एच मादि रयु मा न हत समं बुद्धिंग भ्येक्ष व लीतिव्रस्णआदनउप देश न हिनिरुपाधिके मेवब्रहा मदबु स्षश कलष तुशक् ५ व किचतत् लाहकिल त ह न नामत स्यय ने तुहु नै त स्य प्राणि जा तस्य प्रत्य गा काततवा हुन नी य स प्तजनी य मत स्त ह न नाम प्रसात व्रसतइनमति यत स्स्मा ह नं दूत्य ने नैव गुणात्तिधाने नोपासितवयचत नीय म ने न शु छना म्नोपा सीन स्यफ लमाहास य: कश्विद तयथा कंब्र ह व यथाक गुणवे दोपास्त हए न मुपास के सर्वाणिषक तान्यत्िस वासात प्रार्थ येत व यधा ब्ररनवे म नशिष्ट्र:गष्आ चार्य मु वा चो पनि षद् हु साय जिर्य क्षोप्तगचन्त्र हीलीय मुक्तव तिशि थ ओ हो चा ्यउेक्तो लिहि त तितो वा

निषलापुन: सेत्ाहब्रा श्रं व्र स्णः पर मात्मनः इ यंतो पर मातविषय ताद तीतथ ज्ञा नस्यवा ब एवतउ पनिषद मंत मेत्युक्ा मेव पर मात विद्या मुप नि बदमे त मेतय व धारयत्युत्तरार्थ परमाम विषया मुपनिष दक्करतवृत उपनिष दलाबू हीति एछ्तःशिष्य स्य कोलिप्रायोय ि्ताष छ्रातस्या र्धस् सतः प्रश्ज: एतापिष्ट पेषणव सुनरुकोनर्थकप्रश्न: स्यादव साव शेक्ता पुनिष स्यानतस्तस्या:फल व चने नो पसे हारान युल: प्रद्या र्माल्लों का दम् ताप्ष व ती तित स्माद को पनिष छेष विष यो पिप्रश्जा न पपन ए वान व नो पि तला लक स्त ह त्ि प्राया प्रयु रित्यु च्यते। किं पूर्वाक्तो पन वेपतयात ह कारत या साध ना तरू का धनि रपेक्षेव सा पेक्षा चेदपक्षित विष या मुप निषद बूद्यथ निर पेक्षाव धारय पिप्य लादवन्ना तःपरमस्ती सेव मतिप्रायः।पत दुपपन्नआ चा र्य स्यावर्धारणव् चन मुक्तातउपनष दिति न नुना वघार णमि देयतोन्य हुक्तेवय माहाल स्पेतपोटमइयादिस सवक वयमुच्यते जचार्ये णनते को पति स कष तयात त्साथ ह का रिसाध नाचेवा।सह प ठिता ना म पिय था योग वित्त ज्यविनियोग: स्यादितिचेय थासक वा का नुमंत्रा णी यर्थादेव तवि क्षा. गस्त पौदमःकर मसत्या ना व्रहविया नोष त तह कारि साध न तं वे ति क ल्प ते व दा नोत र दगा नाचा थ प्रका चक ले न क मो कस जञानो पा यख मितेयंहय य विक्षा गो युज्य तेर्थ संबंधी पप तिसाम व्योदितिचेन्ना यर्न हार्य विक्षा गोघट नोप्रा ततिने हि स बकिया का क फलपेु बुद्धितिरस्कर प्याब्र सि या रा लराभिय पाना कि तुनलपाष्यु पाया मिम्ा येरवद स्तुदमैश्रेस हपाठेनसमी कराणा त्तय प्रभ्थती ना नीहे वे दा ना शिक्षा घगानाचसा क्षाद या: विध्या राष तत्स हकारिसा चन व विया र शाभप किमसपे

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क.प पेक्षासहकारि साधन संवं धोवा युञ्यते सर्व विष् यानवत्त प्रत्यगात विषय नषत्वाचयायास्त लुस्यच निःशरेयसस्यमाक्ष मि बॅन्स दाक मेत्य जे दे वस साध नैत्य जतवहत जेरय सकः प्रस्य स्प रंपर देतस्मा ककर्मणांस ह कारितं कर मरेषापक्षावा ने ज्ञान स्पोप पद्यतेत तो सदेव सक्वोको तुमंत्रेणव पथायो गविल्ाग इ ति त स्मादव धार णार्थ तै व प्रश्न प्रतिब चून स्यो पपद्यन ए ताय सवय मुप निब दुक्ता न्यनर पेक्षामतलाया यामि माब्रा हमी मु पनि षरदे तवाद मे तित स्पेत स्याउ क्ा था उ प निष दः पादयु यायर्षता नितआदी नितप: का यें ट्रियमन सांस माधा नें दमउपराम:कर्मागन हो त्राये तह सं रहक तस् सच श्र द्वारा तत ज्ञाना सतति ्ह प्टरा 9 पत्ति वमदि तकतन्म स्यो के विब्र हा्य प्रति पत्ति वपतत प्रतिपव यथेंद्र वि रोच न प्रकट ती ना तस्मा दि हवा तीते सुवा व हुषु ज न्मा त र सुत पआदि लि: एृत सख शदजीनम सद्यते तिथा चश तिःय स्यदेव, परीक्ष कि र्यथा देवे तथागरो। त स्यैलेक थिता हार्था: प्रका वं ा तमंत्र्णाल्ा नमुखय्तपुंस क्षया सापस्पक मेंणइ तिस्म ते रिति राब्ट्रउपप्रदन नार्थ इत्ये व मा दन्य द पिक्षा नोस तेरुपकारकममा नितम दत्षि व मित्यायप प्रद नितिंस वाति। प्रति कापा टो पा दावि या स्या से बुसत प्रति तिप्ठ ति त स् वि द्या प्रव ते पु झया मिवपु रषोवे दाश्य खार: सर्वी णि चो गा निशिक्षा दीनिएट कर्मज्ञान पकाना क त्वाहे दानात दक्षणार्थ चारं गाना प्रति पाल मधवाप्रति कारएस्य पादरुपर्क कल्यनार्थलाह दो श्वित रणि सवो गानि शर ओ दी न्यस्मि न्पक्षेशक्षादी राम ।143

नोवे दमहण नैव म ह णंप्रतेतथं जं गिनिहिग हीते : गानि ग द्ी ता न्येवव्त वंतित दाय त ला देगानी सत्य माय त नंय कृतं

त्रतिषत्युपनिषत्तदाय तर्न सतय मितिअ मायता को टिल्य वाश नः का या नोते ुि आश्वय ति विया ये मायावि नोना सु रं प्रफर ति घु मा यावि षु नयेसु जिस मन् तन माया-चेित स्मा्यमयतमित कल्प्यते तपआदिभव प्रतिक्षा लेन प्राप्स्यसत्य स्पुन रायतनवेन सरुणंसा नात ाय ापना थ। अ मस ह स्वचैतल सलेन याध ते।अश्वमेघ स ह स्त्रा्त्तुसत्य मे कं विशिष्यतइतिसरत:1येोवए ताब्र ह वदा के ने षित मित्यादिनाय धोका मेर व म हाक्षा ग्याव्रहा ह द वे स्पइ त्याद स्क तो स ववविद्या प्रतिका वे दामतलहिविं दत इत्युक मधि ब सवि ग्ाफल मं ते निग म्य ते प हत्य पा प्मा न म विद्या का मक र्मलक्षणसंसा रलक्षण विध या न ते स्चलो के सुखाम के ब्रह्म णी ते तद नै त इ तिरवि ो ष णा न्नतनिषिए् पेडन तथाए औप चारि को पि स्या दित्यत आह त्यये इतिन्येथे सयान्याय सिसर्व म ह त्त रच आ त निमु खय ए व प्रतिति ष्ठेतिनपुनःसंसार मारप द्यतडसक्षपाथ:।।इति श्रीगोविं द लगवसारदे एज्पशिष्य स्यपर महं सप रि वाज्क स्यन्नी शंकरल्गवत तप्ाप सेमा सगउत सत।।श्री रामाय नम:छाश्री1022श स्वन् केनर

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शरीगोपाल वस्डायनम:॥ 4ॐ समापक मतममतपाणविष यवित्ञानंक मना नेकपकारं्य योि कल्प सुमु यानुछा नादक्षिणोत्तराम्या श्रे तिम्यामाह ज्यनाहतीमरवंतअतउरपफलनिर पे क्षंज्ञानकमसमुख्या उछा नालृता मंस रकार स्योकिनात ज्ान प्रतिबंधक स्यदैतविष य दोष दाश नोनितीता रोषवा घविषय ा्स सार बी,जम ता नमु च्ि्व पृतप्रत्यगात्म विष षयनिता सो के नेषितमित्या मेखपतते विज्ञा नायायमध्यायआर म्पतेण ते नवमृत्युपद दवत मज्ञान मुकेत्तयंत तंत्रो हि ससो र नधि गतलादा मनोयुक्कतदिग मायतहिषया लिज्ञासा क मवि यये चा नु क्रि स्तद्ि रोधि ताद स्य विजितास्षित स्यस्या त्मत लस्य कर्मविषयेआवच नंद समा दितिचे न आत्म नो हिय या व द्िज्ञा नंक मणा विरुध्यते नि रतिराय् ब्रा हॉख रूपोहा ता विजि पि तापयित स्तदे वबत् लवंविद्दि नेदय दिद मिता दि शरते नहि खवारात्ये मिषिक ब्रम ंगमित ह.म कैचननमतुमिद्धतअतोब होस्मीति स बुद्धनक र्मकार वितु शा क्यतनहा मा नम वाहार्थ ब्रसमन्य मान: प्रव्ृततिपयोजेनवतीप नयतिननिःयोजनामत्ति त विरुध्यतए कर्मैणाज्ञा नंगभते:क मविष ये अपुत्रिर्विज्ञा नवि रोष विषयेवनिता साा क र्मानार मर तिचे त्णनानिका मस्यस सकारार्थताना यदि हयालमवि ज्ञा ने ना ताविद्या विषय त्वानपरितिया जाय

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संराह कनिY मितंक मततः प्रक्षाल नादि पंक स्यद राद स्र्शनवरमित ना र भए वक र्मण थ या न्अल्प फल ादा यासब हुललाचा ज्ञा ना देवा शे यसपाधे रि तिवेन सतय मेनन। अविद्या विमयं करमा ल् फल लागिदोष वन बघरुपचसकामस्या का मा न्य: कामयते दति नुका मयमान इ त्या दिश्नतिम्य:। नानिक्ाम स्यत स्यनु संस्का रार्थन्यवक मोकिमवति तन्रव तका श्रय ना णवित्ता न सहितानि देवयाजी श्रेया नातम याजीत्ुप कम्यातम याजी तुक रोतीद भेअ ने नाग संख्वियत इतिस स्कारा र्य ने वक र्माणी तिवाज सनेयके ब्रिाहीयं कियतेतउुग्य जोदा नंतप श्रेवपावनानीतिसम तनघा णादि विज्ञा ने प के व लंक मैंस मुख्ित वासका मस्य ताणातकप्य र्थमे व मवतिनिक्षा मूस्यलात विज्ञानपति बधनि मीट्टम वति आद कीनि मर्जनवनाउसे नामम विद्य स्लनारं मिर ये क ोत कर्मण बंध्यतेजउवि द्य या चविसु च्यतात स्मान्न कर्मकुवातयतमपार दशिन इतिाकियापय कुख शेव पुरस्तासन्यास ्श्ातयोन्यासए वात्य रेचनये। यागनके नान्य पंथाविद्यतवता दिशि्य लाध्पर पा्याया चाउपायम्हूतनिहिक मण संस्कार हारेणज्ञान स्वृ ज्ञाने नलमृत ल पम मतत १

माधन मादि हिविद ते। विद्य या अमृत लाम यादि श्र्र तिस्म तिम्य श्ा नहिन यापार गोनावन मुनतिपयथा इश देव गमन परति खात ये सति नहि खव मा व लद् व स्त्रसि साधायष तिसा घ न। ख्मससिद छातमाममन: तृथानापे थषत:आतल सतिननत्या प तवा न्ा नपविचि कारवषित:ाआत भजोमार्गिणोति४

विष्वताठ१ ले सतिनित्य ाना अविकारितादमतताअतेश्रनवर्दतेक मणे ता दिस् ते अवपिकायेयमुय्य त द्तिप्न-च सचि कीर्पितः। शुद्ध मपाय विद् ममत्या दि शतिम्यः उ नन्यत्वा चा न्य नन्यतसस्वयते न चात्म नोन्य भू ताकिया स्तिन च रवेने वात्मना स मा मान स चिकी बेतान च न र्लत राधाननित्यं पासियो व स्तंत र स्यनितया नित्याचं चेए मोक्षस्याउतउत् नविदयस्य कमर मोs उपपन्ाअतोव्या पत्तबाहाबु हेरात्म वि्ञानाय के नेवितममतादयारं म त्रत्तिलिंगादि रोषा थेप्रश्न उपपनार मादी नो हिचे त नाव द धिष्ठितानो प्रवत्ति टष्टानान िक्षा ता नौमन आदीनो चचित नानापवत्ति दशयत तद्विलि गं चेत ना व तोधि खानुर स्तिलोक रणा निहिम नआदीनिनिय मे नत्रवचतंततत नास तिचेत नाव त्यधिघ्ातार उपपछदता तद्वोषस्य ा निग मा चेत वत्सा मा त्ये वा धिगते विनोषा ना रप: प्रशउपपदते के नेषितं के ने एक स्ये कामा चेणम नाःप तति ग उति सव विष येनिय मेन व्याखियतर त्यर्थ:पम नुतेहने ने ति विज्ञा ननिमित्मंत: क र पोमनःवेषित मिवेत्युपमार्थेनितषित षितनायोर र्थाविद संभवत:नदितविाव्या निवमनआदतिविषयेम्यः प्रेषयत्मो तयोविवित्नितय चित्व रूप तयानुनि मित्तमात्रं प्रव्ट त्ोनित्य चिकित्सापिद्यात वनपाणदतिना सि कामव प्रकर णाखय महचलि क्ियाया पाण निम्मतला ख तो विषया वु मासमान्रवं- करणनापुटतिचलिि यानुप्राणस्येवम नआदि घुप्त स्मा सराथम्यंताया स्यततगवाायुत्त पयु तदहेत दोचाववन

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चा० किं निमित प्राणिनां चक्षु श्रोनयेोश् कोदेव: 9योका कर णमधि काताचेत नवान्य: सकिवि रोष षपाद् तर्थ: ओस्यश्ेनमित्या दिव्तव चर्ननिविरेष स्यनन मिततार्थव विया दि विरोष वतित स्यानमनोमन आदि प्रष्ट तोनिमित् लमित्येत कोनस्यश्रनित्यादिपततिवचन स्याधाअ गमादनुगतानिद्यत्मिन्नय अक्षराणिकि धोष्टणोत्य ने नेतित्र नग्तएराछाभास कर्तवश्ोजस्य श्रोनस्सेलार टपलबुरपतयाव मालक ंनखवत स्याइचिदृप चार्टया तनप्चिद्पला दकोत्र स्य पल ख ले नाव मा सकतंतदा मनिमितताओनस् शो नमितय च्यता यपाक्षत्र स्पक्षत्र यथावोद कस्यनोष्पय म मिननिमि त्तममितिदगधुर प्युदक स्यदाधामि रू च्यते।उद कमपिद्यमिसय। गादशिरु च्यते तहदनितंत्य स यो गाहुपल व्यवंताकरकश्रो नादि उदक स्ेव द्धलनित्य हिततत धतरतुनित्य मुपलबुल म मविवोष्दां सनतोपलन्धिलरुप वादघे नोपलब्चोच्ताश्रोन्ा दि षुश्रोतताघ्यपलकराजत्या नित्या चालयत श्री सओरे नमितयाघक्षराणा मर्थनगमादुप रा पद्यते निर्वि रो ष स्योप ल्धसव रूप स्या म नोमन आदि ट तनिमित्तभप्तामन आदि यवयोत वा चोहवा चं प्राण स्यपा पद तिविमत्िद यंस र्वत्रेव दृषटय्योकथाषय ताल सरु पनिरदे श प्रथतम यैवचनर्दे रास्त स्पच तेय लोकर मलमप नी या। अतीवा चोह वाचंघ्राणसघाणइ व्यस्मात्व

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वि रीत व द्यायि विद्युष् वाक र्मणालित्य कारभे,मताए व भवतबारी रादि संता नवि केदत्रति संघानाघ पेक्षयाउध्यारो पित मत्येमो गात र्वमप्यम्तासंतोनित्याम,खवरुप लार्दे म् तामवंतीतयुपचर्यतिनतत्रचसु गकतीत्यु केपिपरयतुयोंगे हे तुार प्रततियनि:श्र वस्य श्री मितेव मा ददिना केप्यात्मतता पतिपन्नासठ क्षम व्वह तारव रतन:युन: पुनःपर्य नुयुयुं क्षाकारण माहनत नचक्षर मकतीतित्तन श्र नाद्यातम मतेच क्षरादी निवा वुक्ष, पो.सवेद्द्धि योप लक्षणार्थलानवि ज्ञान मुताद यं तिलुखाद्ि् वत ाग ह्ोतांतः करणे न4 नातआहानो मनोनसरादिव न्मनसोविषय स्तदिंद्िय विषय तोन विझोन विज्ञानी मोतःक रणेय न थेतट समन आदिक रण जातम नुशिष्याद शासनंकुर्या न त्िनि मितय थाभवेतद्विषयतान् विया नविजानी मोथवा श्ोघादीनोश्रीजादिलक्षणज सविरोषे णद नयित्युक्तआचार्याआहानशक्य तेद नययि तुंक स्मान् नत न्रचक्षतछती या दिशरववा सर्व मत्र नुख रोष: यथैतदनु शिष्यादि तियथेत द नुशिष्यान् प्रतिपाद येदन्योपिष्या निता ्येन वि धिनेत्यममप्ायःसर्वथा पि ब्रम बोघय्यु

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त्मयाना मार्विभविष्त रो भावच र्मवातह् मतयेवविल क्षणमप्पन मास तेंतः कृरणस्य मनसोपिम नोवर्गत वाह्स कतरश्तेरं ततननित्य वित्ता नेस्वरूपे णाका रावर्दपचलिता नातग ्भभूतेनवाहयोबुद्दयामाि लक्ष णोचिार वा भिःतत्यय वा विमा वातरो माव घर्मकैख ता ना भा स रूप रितरनित्य प ता नओमा सखी दुःखीत ा्युयग तो ला वि केर तोन्योनित विज्ञान रुपा दा मनसहि वित्यामां पे क्षाबिपरीत ज्ञानलेको पप्द्यतोन पुन ्नित्य वित्ञाने तलमसीति बोधोपदेश। नो पम दतेह ति चेदा-मनमेवावेदि सैच मादीनि चेनित तये वोचा तक ता न द्यादियोन्येनप्रका उयते अतसत दर्ष बोधोपदे शोड नर्थकरचेति ताान लो का ध्यारो पाडपोहा च धलातसवी त निद्ह नित्य वित्ता ने वुध्याय नितयध मा लो के रध्यारोपिता:आता विवेक तःस्तदपोहाथेविघोप द शोबो घात नरत त् हि वो पाबाधोस मजसावनयनिमितताउद् कर वोश मअनि मिश्रा चहनीर वाहिय निमि तलोक नित्या नो १3 प्रका शाव य्या दित्य योर न्यत्र भावा भाव मोनिमित लादनियाववोप चयेते व्यक्यत्य सि:शका राप्यष्य ति स विते प्तानहदेवं च स सडःसबंध मो क्षाय ध्या रोपो लो कस्या देतपेकष्य तलम स्यारमानमे वावेदियाभाव बोधो पदेशेनश्रतय.वे व लमध्या रोपाप वादार्था।यथा सविता से पकाशय यासानातित वाधा बा ध करत ल चानत बो धात्म नितस्माद न्यद विदि तादधिताव थ्रा न्यार्थ य दाय दिय स्पाधितन तोन्य च सामर्थ्यधिथा हम हादी ना राजा। अव्यत् मे वा विदितंत तो पन्यदितर्थःविद्ित म्वदितं-वव्य काव्य त कार्य कटण लेनविकाल्पते ताभ्यामन्य दलवित्ञान सवरूपं सर्वविशेषपतस्तमितामसयं समुदायार्थःत

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वा० एवात्मताननह यउ पादे यो का। अन्यद्-येनहेयमु पादेयंवानतेनैववस्क स्यचद्ेय मुपदेय वामवत्यात्माच ब्रह्म सर्वतर: लादविषयम तौन्य स्यापनरुय मुपादे यवान्यामा वा चद तिशुश्रुमपर्नेषा मिाग मो पदेशो व्याच चक्षिरद्त स्वात -्यवर्वप् तिषधार्थयेनस्तह लातनंत स्ेनिय मे कांग मंब ह पतिपादक व्याखातव तानपुन:लबुद्धि प्रमव नत हैणो तवतइत्याग मपाईं पर्यावियेदं,दर्शय तिविद्यास तयो त स्वनार तोपरातोमिभवतीतिय हाचे ति मंत्रा नु वादाह७ परतीतोयहुसवा चा श ले नानम्युदित मनम्यु त्मंत काशि ५. अन्यदेवु तहि दिता ि पिचा य माग मार्था नामणोक्ोअ सवटदि म्नेमना यडा चे ता दय पद्यतेह तमिहेत् देनवागम्युद्यतइ तिाचप कारा हेतु तो किम नपकाश्यत रतिावा चोमिधान स्यामिधेयप्रकाना कतवसयहन मुग्ते ब्रहणउत्त व क ने खता वा चमि माव द तिय दा चोह वा मतिततदेवब्रहनलविड़ी तयविषयावेन ब्रहण आम न्यव स्कापनार्थ स्नायय दान भ्युदि तेवा नय्रका शन मेत चेति ब्र ही णो चा विषयवनवस्वंतरजिघ क्षोनित्ट लेखा तन्येवाव स्ापयत्यास्तरा यस्तदेवब ह बंविदीतिप्यतत उप रमयतिनेद मित्यु पास्पप्र तिषधाचयन्मनसेता दिस मा नम नो मत मितियेन बहमा णा ममो विविषयास तनित्य विज्ञानस्वरूपेणो हेतसर्वक रणानामधषया तानिव सवा पा राणिस विद्य याणिनित्य विज्ञा नस्वरुपावमा सातेया ये नावमास्येतरतिशो कार्थ:क्षेक्षेत्रीत थाहतंपका र यती तिसते तस्यमा से ति चा थरव णोये न प्राणण इतिककिया राति रप्यातवित्ञानन मितेतेतन्॥प्रथमःखड:1

यदि मन्य सेसु वे देतिशिष्य् बुद्धिवि चालना ग, हीतस्ठर तायै विद्दिता एवदि ताम्योनिन ्व्यबुद्धिशशिष्यक् स्वातन्यवस्काय्यत देवबर ल्वविद्धीति सवा राजयमि मिच्ोपा स्य प तिषे पेनाथा स्यबु द्विविचालयतिय दिमन्य सेस ए वेदाह जल ति वत तोल्य मे वब् हणो रु पंवेश लनति न न निश्ितं मन्यते आ वार्यं: सापु नर्व चा लनाक मर्थे तयु न्यतेद वग्हीतेव स्तनिबुद्ेसकिर ता ये देवे वपिस वेदाह मतिम न्यय:सोप ते स्य बस णोरपंद्हरमेववेल्ञिन्,नंगक स्माद विषय चात स्यचचिद्लण:।अथवामेवा स्याध्यामि? मॐ:9 कदेवे कुचाि देविन मस्यञ् लणोमदपंत दित संबंः। अयन्वितिहे तुमी मो सा याकसमाद हरमेव सुविदितंबह्णो रु. पाअन्यदेवताददिता दित्यु नलान्वेदेतिचमन्यसतो नमवे थले ब्रहम णो रूप यस्माद्थनुत स्मान्मी मख्यमे य9 वाद्या पितेतव जरहावि चार्य में व याबा इै दिता विदित प्रतिष धा गमार्थी नुमनरत्यथ्मन्यविदित ममतिशिष्यस्मी मा स नत रा च: प त्ययनय संगतेः।सम्यग्वस्तनिश्वयायविचा लित:शिष्या चार्यणमी मास्यमेवतदतिचोक् एकतस माहि तो म तावि चार्यय धोत सुप रि निश्वत:सन्राहाग मा चार्कमा उुभव प्रत्ययन यस्येक विषय लेनस गत्यर्धए वं हिसूप रिनि खिताविद्या स फ लास्या न्ा न ते तिन्यायः प्रदकितो मव /ाम् न्ये विदित मतिपररिनि द्वित निम्चितविज्ञान प्रतिजाहे ननें पनिव्वितंसफ लवतानंप ति ज्ञानीते आ चायीय निययोस्क ल्पता यै।यस्माहेतु माहनाह मन्येसुवेदेति महेत्यव घार णा ये्निया तो नेव मन्पड त्येवद्यावद प रिनि्विते वित्तानंताव सवेदेतिसुष् वेदाह बहे तिवप दीतो मम निश्र य आक्षी ब्ोपज गामभव देर्वि-चानित स्पाय थो प्ार् मी मासा फल म तात्सा मब्रेहा बननिश्र यकुकातम्यापत्ययाहिरुद् लाद तो नाह मन्ये सवेदेति।य एमा चत ननै व नवे देति ननदे मन्यद व्यनुव त्तते। अ विदित ब लपतिषेधाताव थंत हमन्यसद्ट् व्युत्त आह वेद चनादददनवेद चेत्यमप्र देति

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  • पक्षां तरे चहम विले निर व्यता कृताय मयेविसीय तड् ्व्ते=४ वा य:विदिताविदिता।्यामन्य्ः दु.लाह्णसम्मा नममावि दितंबसे तिमन्यतदतिवा क्यार्थअथवावेद चे तिनित्य विज्ञान बरह खर पत यानानवेद वदेव चार्हस्वरपवितियामा वा दिवोष विज्ञानंच पराध्यस्तन खवतरतिम्परमा 4न वतोन चवे देतिायोनस्त देद तहे दे तिप क्षोत रमिरा सा र्थमा म्ायउत्तार्थामुककतायोनोस्माक मध्येसएवंद ह्रवेदना न्यउपास्मव हा थिलाद तो न्यस्या म ा हविदति= वुउक्ता नुवादादु ने सनुवदति नोन वेदे तिय स्यामत/तिप्परोत मारवायिका घेपिहा र्थविष्या चार्यौकिनट तनिल क्षणमानु मव युत्रिप्र धान याख्यायिक यायो र्थसिद: सश्रते न चनेना ग मेत्र धाने ननि ग मन् का नीयेन सक्षेपत उच्यते बडु न विभ्द ताद प्यदा गा दी ना म गोचर लार मी मोलषित व नुक्वो पपतिम्या बह तन्त थेव ज्ातव्याक समाय स्यामतंय स्यवि विदिषाष युत्त प्तथ्य सा ध व स्या मृत म वित्तात म विदित बलयाम लो तलनिश्रयफ लाव साव बोधुतथा विविदिषानिर ने तयन्तिपायस्त स्यमत ज्ञाल तेन विदवित ब्ह यनाविषय लेना ८स तम लेनपति बद्ध मित्युर्थ:सम्यदर्वृशियस्य विज्ञानानतर मेनपझाममावस्याव सित तान्सर्वत: कार्य भावव पर्यये णामभ्याज्ञातो भ तिक य विदितं ज्ञा तम याबर ह। ति मस्य विज्ञाना समिथ्यादनी।विपरीतविज्ञानोवि दिताद-पलाह लणो नवे दस नविजानतिपतत भसिद्ध मवे दिन स्यविज्ञान स्यमिथ्या लेअ ब्रहन विषयतयानिदि तत्वात्तथा क पिल कूणभुगा दिसमयस्या पिविदित ब्रह्यावषय बाद नवरसततवी जन्य लादिविदिषा निद्टत श्र मिथ्या लमिति।एर तेश्ा या वंदबा ह्यास्म तयो पाश् का श् कु ट षंद ति अ वि ज्ञात विज्ञान तो वि ज्ञात मविजानता भितिप वे हे न किरनु वाद स्यान मे क्योद उुवाद मान्रे5नर्थक वच नममितिप्रर्वेन योर्यस्या मतमित्यादि नाजानमो ्हे लर्घबेनेद मुन्यते।अविज्ञात म विदितमा मतनाववय य तयो ब ली विजान तोय स्मा त स्मा त देव नाश यत्तालय तै पा विज्ञात विदितय्यन् मे व बुध्यादिखष यंत्र लविजान तीविदिता विदि त य्ा तमा मभू ताव्य मते 9 विपरिय्य पन थ्या जानपोनयमसर्वी सामिष्य लापे सत म निक्ा दिता कतेो४

विज्ञान ए्व रूप माममस विप्नयममतमजरममयमनन्य लादविषयममव्येव विज्ञा नता। वुध्यादिविष यातत येवनित्यं वित्ता तं बह्मात स्माहइददे ता विदि तव्य काव्य तघ मीध्यारोपे णकर्यकारण नवनच सविक लम यथार्थविष यला कनि कादार जता यध्या रोपण ज्ञान वन थ्याज्ञान ते षां प् विबोध विदतममतिनी सापृत्य या नामा ाव बोघह्वारलबोघ पतिबाध पतीनिनी सा सवप तय य्याप्र्थी बैदाहिसवे पत्ययास्तस लेदव नित्यविज्ञान खवरुपा म व्यास वादिज्ञान खवरुपावृ मा सा: स्तेद न्यावमा स क्षा ममा तहिलक्षणो मिवडुपलमम तेड वितेन ते दा रभवं त्या लो पल औ्यी।तस्माखृति ीचाव मा क्षप त्यगा तत या यहिदि ततद् मतदेवमतज्षा तेण्तेदेव क्षम्पग्जानयस्र यगम विज्ञानविनृषयत्ताविनमाम लेनाघल गामान मैक्षटिकेच काठके अम तवहि विंदते ड तिहेनुवच ने विपयर्य म्त्यु पानविषया त विज्ञानेहिम्युःपार भतद ति आ म विज्ञानममृत लनिमन्नमितियु नहिनुवचनम् सृत लहिविद् तेद तिआातम वित्तानेन वि ममत लमु साद्यतानकथतहिआ ममना विंद ते सव नेव नितया म खव मावे नाम तल विद ते नाल बन पर्वक विद तड तयाम विज्ञानपे क्षय दिहिववद्य। साध मम्तलस्यादन त्यं नवेल म कार्यवद् तो न विद्यो साद्या यदि नातानैकम्त तबिंद ते किपुन विद्ययाकरिय तइतयुच्यतेअनाम विज्ञा ने निव र्तयति सात निह त्यासवा भाविकस्या स तल स्यनिमित्तामतिक ल्पतेयत आहावीय वि द्ययाविदते वीर्ये सामर्धथर्यम नाताध्यारोप माया सवातर स्वाता नाम माव्यलक्षणन लंविद्य कविद तेत विखि माष्टम म्टतमविनाय विद्या नहिवय विनान्िविद्यया विद्याया बाध्य लाचननुविद्या याबा घ को स्तीतिविद्याज मूम् तं री न म ते वि द्याम्यत ले निममित मा त् भव तिना य माता बल हीने नलम्य इ तिचा थवणेोले एि के पवि दाज मेव बुल मम मवतिन रारीरा दिसा मर्थयी

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अथ ससंपर मार्थतत्व मखप वा सं त स्य जन्म सफ लमितनि प्रायनचे दिहा वेदी नविदत वानू ४ यथार व्यादि अथवाप्रतिबोध विदि तं मतममतिस रदे वाशोष निर स्विप रीत संस्कारे णालन प्रतिबोघव घहिदितंतदेवमते ज्ञातेमव सी लथका गुरुपदेना पातबोघस्तेन वा विदि तम तमित्यु मयन प्रबोघ रा मयो वि2 गोस्ति सुपपतिबु द्ो गुरुणा प ति नोघि तद्ति पर्वनुधार्थमिह चेदवे दाताव नम कृतव्य नोत्िवियर्यय विद्रा नो शतःय दहमउथजनमनिसत्यव र आला वेदित वद् तत्षाद्धीयते कथमह चेदवेदी विदित व न्त थेवजनमाइ पिचमहती विनष्टिम हा न्चि न) शोजन्म मरणत्रबंधा विखेद प्ात्तिलल्षणःस्वाद्यत स स्मादव नवताददिलयय ज्ेयश तातेन किं स्यादित्यु च्यते।। ते युम्धते युचर। चरे घुसवेषित्य येविचि त्यष्टकातियष्ेक मा तततसमषा रथमेर स्ट माल मावे नोपलम्येतथ।। अ नेकर्थवाडाननाननश् से तिसं मवतिविरा घात चीराःजी मुतोविवेवि नोविनिरत् बाद्य विषयामिला मा. पे सम् ला, स्मालोकाछ रीराघयना मल क्णात् याहतममता हंकारा: संतइसर्थ:तरमता त्र्रमरणघर्माणोनित्यविज्ञानामृतलखमावाएव मवतिाद्वितीय:खड: बहहद वेदेम्यदतिब्र हणोदु विज्ञेय तो त्िर्य लाधि क्याथसिमाबालX ता1 विद्यायद पीन परुषार्थअत दुर्घम र्यवादेन ब्रहणोद्धविज्ञेयतो चते। त ा ज्ा नेक पंतना मयत्न कुर्या दित्ति। ना माधर्थोर वासा योभिमान शात नावू रुड़० रामा दिवा ब्रा विद्या सा धनविधि तं तद घेायमर्थवादाम्ा योनिश मादि साघनरहित स्यामिमानरागद्द षादियुत्ञस्ये ब्रह्मज्ञानेसामर्थ्य मस्त व्याह सवाह मिथ्या पत्यय गाहलात ब्रह्मणोय क्षा चा्यदीनाज माय: मिनोशा तयतिततश् ब्रह्मवि वि मधिकं3

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क्मा नुपयोगित से व्यादिव द्यागादय नुरूपफळ दातोपप दते्स चात मूतःसर्वस्य करि या फवप्रसय साक्षीनित्य वित्ञान ववमा नः लसा रधमेर सस्टष्ठश्तेश्रानलय्यते लोक डुःखेन वाघोज राम्त्युम तेतिविज रोविम्तुःसत्यकामःसत्य संकल्प एष सर्वेश्वर:पृण्कर्मकार यति अनप्र न्न्योअमनाक शीतिएतस्यवा स्रस्यपशा सने ता मससा रिण एनस्यात्नो नित्य मुनस्यसिद्श्र, तयः सतयश्रसहसशोवि्द्यतेना र्थे वादा कयतेपयिनुसन न्ययोगिलेस तिवित्ञानो त्यादकलान्चोल ने विज्ञानं वा्ध्यते। कापतिषेधा जान चेश्रो ना सी तिप तिपेधोस्ति पाथ्यमा वा दितिच न्ान लाना न हि स्या दितिव त्वाध्यमावाठ ति षेघोनारम्यदति चे ना ईश्वर स द्ावे न्याय स्यो त्पवानमपवाअ पतिषेघा दितिकर्मण:फछदानेईभ्वट कालादीनानपंतिष को स नच निित्ती तरनरपेक ू के ब ले न क ने व प् यु त्र फवदंद् ए न जविनस्टो पिया ग: का लोतरफलदोमवति से व्य बु द्विवते व के न सर्वजञेश्वर बूद्ौ तुसस्त तायोया गा दिक मैणा वनष्टपि करमण से यादि वेश्वरा तलंव नुभवितीतियु तं न तुपुन: पदावीा कय नृतनाषिदेशोतरे का लो तरे वास्वं स्वमावंत हतिन हिदे नाकालो त रेबुद टिरउस नवतिएवकर्मणोपिका लो तरेफ लंदःप्रकार मेनोपलम्यते।बीजक्षेत्र संरकादपुरिक्षा विक्ञानवत्वजपेसंपलं उथ्यादिविज्ञानवतेयबुदधि संस्कारापेक्षफ लच से वादि। या गादि: कर्मणलथाविज्ञानव कर्पेकष पुतलानुपपतोका लातफलाक नद राका ल निम्तविया कविया गाज्ञ बुद्धिसंसकारापेक्षफुलंभव तु्म्हतिसे वाषवरमानुरूपफवतसव्यबुद्धि संस्कारपेक्षप लस्येवात स्मैसिद: सर्वत्ञ ईशर: सर्वंतुु दिकर्मफ लविमा गसा क्षी लवन तांत रा त्मय सा क्षादपरोक्षा ङुहयश भालवतर इतिश्रतेएचा मा नानानोस्श्रो तो रुषोमंता विज्ञाती।नान

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घमललपव स््रतलपरर्थं सद वपित मनुष्या दिलक्षणोम तविनोषस् माहाटोनपुनवतुर्ययभिनलक्षए ।ईश्राद+ युप गम्यते।बुध्यादिक लप ता तव्य तिरे काभिघयणतुल कषमेदादियत्रयालद्ोहेनुरीम्व रादन्य स्पात्मनोरसलादीघर वविर डलक्षणलमपुत मितिवेतसखदुःखादियोगखन निमितले सति लो क विपर्यया ध्यारोपणास वित् वद्य थाहि सविता नित्यप्र काशा रूप ला लो कभि य्यतय नमय्यतिनिमित्तते सति लोकहलि ८ पर्ययेणोद यास्तमयोहोटा ना दिकर्तता ध्यारोपभागा भवतिएवमी खरेनित्य विज्ञान व निरुवेलोक ज्ञानापो हसखडुः रव त्ादिनिमतले स तिलोक विप रात बुध्याच्यारो पितं विप रीतल क्षणलंसखंडःखादयख्चुन स्व तः ग्राम हस्यनु रुपाध्यारोपा ज्ा य थाघ ना दि विका णबरेयेनेवस विवपका शोशहरयतेस पमहस्य उरूपमेवाध्य स्यतित वितेदानी मिहनप्काशेयतीतिस त्येवप काशेन्य ज ांत्या एव मिहबाहादिह तुद्धवा लिमवाकुलमी व्याथ्या दोपित:स.खउः खादि यउपपुद्यतेप्त स्मरणा चात स्यवेश्वर स्येवहि स्मरणीमत्ःसतिजा नूमपोह नंचानाद तकस्यचि साप मित्ा दि।अतोनित्यमुरत एक सष्मिवितरी वलो क विद्या ध्यारोपित मीम्रे सं सरिताशा रज्रादि पा माण्यादभ्युपगतमसंसारिव मेत्य विरोध इत्तिाएतन पत्येकज्ञा नादिभेद:प्त्युत्तःशक्ष्म्य चैतन्यस वगत ला घ विशरोषेच मेद हे ल भा वादि किया व ले चानित्य लान्मोक्षेविरोषानःयुपगादयुपगमे चनियल संगादविद्यान दुप लम्यताच मैद स्प ता ल्षये नु पपश्ञिरि तिसिड् मेक ल। तस्मा क रोरेंदिय मनोबुद्धिविषयन दनासं तान स्याहं कार सं ब धादज्ान बी जस्पानित्य वि त्ञाना न्यनिमित्र स्पाम तल याथा म वित्ञानाि निवतो

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तिर्ा सर्यस्मिन्नाक रहणःत्राहुमविआसतरिरो घानंचतस्मे नेवखिय मतिरूपिजीविया माऊगा मामिपरीय बोघ हे तला डु डप त्युमाहम वतीव सा सी शा म मा ना विदयवाविद्ुफेविद्यावाण शोभतिता चएलातस्याएववचना दिदा च क्रार विदितिवामत ईदस्पवो पहेनता दिर्द वोमा विद्यासहाय वानी खवर इतिस्मति:यस्मा दिंदविकानध्वकम 2र वामिंडा स्ेचेन ने दिए मितिस मारम ब लविय या अनशामा संत: पस्व ्मुःस्याए वंत सोहिम यमप्थ माविदा्चकारविदा क कुरित्येतन स्मांद तितरा मती व्या न्या नति शमेनदीप्पत ान्देवास्त तोथ्य इंकोतित रादा पत आदो वनविकञा नात स्वेष आदेवा स्तख्थ लणएववृक्ष्य माणआदे शाउप। सनापद नाइत्यर्थ।। यस्मा है वे म्योविय दिव सह सेव घाउ म त बसद तिमत स्मोवि धुतोवि द्यतिन सय पायदेत हुह य धुतदि दा ित आद वेत्युपमा र्थ आ रादय या घ नध कार सिदायव घुलर्वतःपका जातए व ते ह सद वानेपुरतः सर्वतः परकाशवद की मततम वधु तदेवेत्युपास्ययथासहतघृन मितिच वाह सन्य कैयुस्ना चें दो पसर्पण का लेन्य नी मिष धथा काल वक्ष नमे षणहत वा नितिाद ती दिस थको निपा तोंनि मिषित वदिवति रो् तमिलोवं मिदेव तदे,बताया अधियद शनि माधदेव तत्॥। प्रधानंनर मथ्यात्म मात नो ध्याविषयम ध्यातुच्तरतिवा क्य रेष पदव यथोतलस णब लंग कतीव फ्र प्ती न विमयीक रोतीवेस ध।न युन र्विष यीकरो तिमन सदविषय लाटया णोड तोम नो नगउतियेना हर्मनो मत मितिहि चोक गछतीवे तिनु मन सो पिमनस्ता दाम मूतला न बहणसातस मी क्िम नोव ततत इत्प स्मरत्य ने न मन सेवतड लविद्ा न्य स्मात स्माह लग छतीवित्यु व्यताअ मीसणयुन:पुने-्र्सक न्यो नप्रेषितस्म

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वा. न से्त३पस्मरणसंक ल्पादि मालरे ब्नमन:सी सृत मुमा स्मनित्यमिप्यसक्ष्य वाध्यालयुपा= सने या 70 सपणविषीयते नद्नेद चनंतदेते हु अत-व तद नं चततरो सव नं सभजनीय वनने स्तल र्मणस्त स्मा शटन तामब्रृतणोगोजही देनामातसमादेते नगुपोनतडनम खुफसितन्यं। सयाकशववदनघ यो श्र मेवेय थो नैन गुणेन वनमित्यनेनना मानि ये यत्र लवेदोमास्तात स्येत सल मुच्य तीस कणिमहता नयेनमुपासकमन संवोछती हामभ कम जते से वतेस्मद सर्थ यथा पणोपास नंहिफ लंउ पनषद मो बिदीतुक्ायाम प्युपन षदितथ्येणोकआ चार्य हउ ताक वता तेनुम्यमुपनषदाला पालन चा धुना बोलीकाव तेउसयं बलणो ब्रालणजते रुप निषद शे म वध्या मदतर्थ।नक्य तहिबाली नो का उक लातोपर्निष तस्मा न भूतामिया योखू मेतयंश्राह. सास्या:वेक्ष्य माणायाउप निघदस्त पॉ अल चर्मादि मउप राम के मी मिहोन द्ये ताप्रत छाश्रयएते प्ुहिस् सबराहय पनेषनप तिर्थता भव तिवेदा घ लारो गानिच सर्कणिप् तिद्ेत्सनुवर्तति बला ययाहि विद्या सत्यय या मूत वचनमयी दो कार मायृ तननिवा स सतव सा सर्वय ोत मायूतनवावक ताता मे तोत आदयामातह तिसर ब्राल्नी मुप नषद सायत ना मात ज्ञानह बुदसता नषय या ह वे दयावे दानुव नत, तिप्तित स्येतकल साह अपहतयपा सानमपक्षय्यथ माषयच मोवित्याअनत अपारे अविद्य मानृति स्चोलोवे सुखपाये निडखवा म निपर बहणिजाय्यम हति सर्व मह त सवमहत्त रज ति त छाते सववदात बला वे द्यक्मले नावंग म्पतदेव वन प्रतिषधते इतथ।।॥इतिीम सर महसपरि ब्राजका चूार्यश्री गो विदभगव त्ादव जवादाना वरमहसपरिव कावायश्री मळ करमगवत हतीत लव को रो पानेषने ल्भमणेवा क्य सनरोर कका।श्री गोपा नह हतं॥