1. Krishna Upanishad
Text (part 1)
Verse १
श्रीमहाविष्णु सच्चिदानन्दलक्षणं रामचन्द्रं दृष्ट्वा सर्वाङ्गसुन्दरं मुनयो वनवासिनो विस्मिता बभूवुः ।तं होचुर्नोऽवद्यमवतारान्वै गण्यन्ते आलिङ्गामो भवन्तमिति ।भवान्तरे कृष्णावतारे यूयं गोपिका भूत्वा मामालिङ्गथ अन्ये येऽवतारास्ते हि गोपा नः स्त्रीश्च नो कुरु।अन्योन्यविग्रहं धार्यं तवाङ्गस्पर्शनादिह। शश्वत्स्पर्शयितास्माकं गृह्णीमोऽवतारान्वयम्॥
śrīmahāviṣṇu saccidānandalakṣaṇaṃ rāmacandraṃ dṛṣṭvā sarvāṅgasundaraṃ munayo vanavāsino vismitā babhūvuḥ ।taṃ hocurno'vadyamavatārānvai gaṇyante āliṅgāmo bhavantamiti ।bhavāntare kṛṣṇāvatāre yūyaṃ gopikā bhūtvā māmāliṅgatha anye ye'vatārāste hi gopā naḥ strīśca no kuru।anyonyavigrahaṃ dhāryaṃ tavāṅgasparśanādiha। śaśvatsparśayitāsmākaṃ gṛhṇīmo'vatārānvayam॥
Seeing Ramachandra, the embodiment of Sat-Chit-Ananda, resplendent in beauty, the sages dwelling in the forest were struck with wonder. They said, “O incomparable one, you are indeed counted among the avatars. We desire to embrace you.” “In my Krishna avatar, you, as gopis, embraced me. The other avatars are cowherds, and women are not for them. There should be no mingling of forms. The touch of your body is forbidden here. We embrace the lineage of your avatars, eternally touching us.”
सर्वांग सुन्दर, सच्चिदानन्द स्वरूप, महाविष्णु (के अवतारी) श्री रामचन्द्र जी को देखकर वनवासी मुनिगण बड़े आश्चर्यचकित हुए। (उन्हें धरती पर अवतरित होने के लिए ब्रह्मा जी का आदेश होने पर) ऋषियों ने उनसे (राम से) कहा- हम सब (धरती पर) अवतरित होने को अच्छा नहीं मानते हैं। हम आपका आलिंगन (अत्यधिक निकटता) चाहते हैं।(भगवान ने कहा-हमारे ) अन्य अवतार-कृष्णावतार में तुम सभी गोपिका बनकर मेरा आलिंगन (अतिसंन्निकटता) प्राप्त करो। (ऋषियों ने पुनः कहा- हमारे) जो अन्य अवतार हों, (उनमें) हमें गोप-गोपिका बना दें। आपका सान्निध्य प्राप्त करने की स्थिति में हमें ऐसा शरीर (गोपिका आदि) धारण करना स्वीकार्य है, जो आपका स्पर्श सुख प्रदान कर सके। रुद्र आदि सभी देवों को यह स्नेहयुक्त प्रार्थना सुनकर स्वयं आदि पुरुष भगवान् ने कहा-हे देवो! मैं अपने अंग-अवयवों के स्पर्श का अवसर तुम्हें निश्चित रूप से प्रदान करता रहूँगा। मैं तुम्हारी इच्छा को अवश्य पूर्ण करूंगा ॥
Verse २
रुद्रादीनां वचः श्रुत्वा प्रोवाच भगवान्स्वयम्। अङ्गसङ्गं करिष्यामि भवद्वाक्यं करोम्यहम्॥
rudrādīnāṃ vacaḥ śrutvā provāca bhagavānsvayam। aṅgasaṅgaṃ kariṣyāmi bhavadvākyaṃ karomyaham॥
Having heard the words of Rudra and the others, the Lord himself said, "I will do as you have said, I will follow your words."
सर्वांग सुन्दर, सच्चिदानन्द स्वरूप, महाविष्णु (के अवतारी) श्री रामचन्द्र जी को देखकर वनवासी मुनिगण बड़े आश्चर्यचकित हुए। (उन्हें धरती पर अवतरित होने के लिए ब्रह्मा जी का आदेश होने पर) ऋषियों ने उनसे (राम से) कहा- हम सब (धरती पर) अवतरित होने को अच्छा नहीं मानते हैं। हम आपका आलिंगन (अत्यधिक निकटता) चाहते हैं।(भगवान ने कहा-हमारे ) अन्य अवतार-कृष्णावतार में तुम सभी गोपिका बनकर मेरा आलिंगन (अतिसंन्निकटता) प्राप्त करो। (ऋषियों ने पुनः कहा- हमारे) जो अन्य अवतार हों, (उनमें) हमें गोप-गोपिका बना दें। आपका सान्निध्य प्राप्त करने की स्थिति में हमें ऐसा शरीर (गोपिका आदि) धारण करना स्वीकार्य है, जो आपका स्पर्श सुख प्रदान कर सके। रुद्र आदि सभी देवों को यह स्नेहयुक्त प्रार्थना सुनकर स्वयं आदि पुरुष भगवान् ने कहा-हे देवो! मैं अपने अंग-अवयवों के स्पर्श का अवसर तुम्हें निश्चित रूप से प्रदान करता रहूँगा। मैं तुम्हारी इच्छा को अवश्य पूर्ण करूंगा ॥
Verse ३
मोदितास्ते सुराः सर्वे कृतकृत्याधुना वयम्।यो नन्दः परमानन्दो यशोदा मुक्तिगेहिनी ॥
moditāste surāḥ sarve kṛtakṛtyādhunā vayam।yo nandaḥ paramānando yaśodā muktigehinī ॥
The verse you provided is a beautiful expression of joy and fulfillment, often used in narratives about Lord Krishna's childhood. Here's the translation: "All the gods are overjoyed, 'We have now accomplished our purpose. This joy, the ultimate joy, is Yashoda, the liberator.'" Here's a breakdown of the meaning: * मोदितास्ते सुराः सर्वे (modi tāste surāḥ sarve): "All the gods are overjoyed" * कृतकृत्याधुना वयम् (kṛta-kṛtyādhunā vayam): "We have now accomplished our purpose" * यो नन्दः परमानन्दो (yo nandaḥ paramānando): "This joy, the ultimate joy" * यशोदा मुक्तिगेहिनी (yaśodā mukti-gehinī): "is Yashoda, the liberator" The verse highlights the supreme joy and fulfillment the gods experience in witnessing the divine play of Lord Krishna, embodied in the form of a child raised by Yashoda. It emphasizes Yashoda's role as a divine figure, a liberator who brings ultimate happiness.
परम पुरुष भगवान् का यह आश्वासन प्राप्त करके वे सभी देवगण अत्यधिक आनन्दित होते हुए बोले कि अब हम कृतार्थ हो गये। तदनन्तर वे समस्त देवगण भगवान् की सेवा हेतु प्रकट हुए। भगवान् का परम आनन्दमय स्वरूप ही अंशरूप में नन्दराय जी के रूप में उत्पन्न हुआ। स्वयं साक्षात् मुक्तिदेवी नन्दरानी यशोदा जी के रूप में अवतरित हुई। सुप्रसिद्ध माया तीन प्रकार की कही गयी है, जिनमें से प्रथम सात्विकी, द्वितीय राजसी और तृतीय तामसी । भगवान् के भक्त श्रीरुद्र देव में सात्त्विकी माया विद्यमान है, ब्रह्मा जी में राजसी माया है और असुरों में तामसी माया का प्राकट्य हुआ है। इस कारण से यह तीन प्रकार की बतलायी गयी है। इसके अतिरिक्त जो वैष्णवी-माया है, उसको जीतना हर किसी के लिए असंभव है। इस माया को प्राचीन काल में ब्रह्मा जी भी पराजित नहीं कर सके। देवता भी सदा जिस वैष्णवी माया की स्तुति करते हैं,यही ब्रह्मा विद्यामयी वैष्णवी माया ही देवकी के रूप में प्रादुर्भूत हुई। निगम अर्थात् वेद ही वसुदेव हैं,जो निरन्तर मुझ पूर्ण पुरुष नारायण के विराट् स्वरूप की स्तुति करते हैं। वेदों का तात्पर्यंभूत ब्रह्म ही श्री बलराम एवं श्रीकृष्ण के रूप में इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ। वह मूर्तिमय वेदार्थ ही वृन्दावन में विद्यमान गोप एवं गोपियों के साथ क्रीड़ा करता है। वेदों को ऋयाएँ उन भगवान् श्रीकृष्ण को गौएँ एवं गोपियाँ हैं। ब्रह्माजी ने लकुटी का रूप धारण किया है तथा भगवान् रुद्र वंश(वंशी)बने हुए हैं। सगोसुर इन्द्र (अर्थात् वजधारी देव इन्द्र-यहाँ गो का अर्थ वज्र तथा सुर का अर्थ देव लिया गया है।) श्रृंग (सींग का बना वाद्ययंत्र) का रूप धारण किए हुए हैं। गोकुल के नाम से प्रसिद्ध वन के रूप में जहाँ स्वयं साक्षात् वैकुण्ठ प्रतिष्ठित है, वहाँ पर द्रुमों (वृक्षों) के रूप में तप में रत महात्मा स्थित हैं। लोभ-क्रोधादि षड् विकारों ने महान् दैत्य-असुरों का रूप धारण कर लिया है, जो कलियुग में (केवल भगवान् श्रीकृष्ण के नाम जप मात्र से ही) विनष्ट हो जाते हैं।।
Verse ४
माया सा त्रिविधा प्रोक्ता सत्त्वराजसतामसी ।प्रोक्ता च सात्त्विकी रुद्रे भक्ते ब्रह्मणि राजसी ।।
māyā sā trividhā proktā sattvarājasatāmasī ।proktā ca sāttvikī rudre bhakte brahmaṇi rājasī ।।
The verse you provided is from the Bhagavad Gita (Chapter 12, Verse 10). Here is the translation: "Maya is said to be of three kinds: Sattva, Rajas, and Tamas. Sattva, characterized by purity, is said to be the way of the devotee of Rudra, the way of the devotee of Brahma, and the way of the King." Here's a breakdown of the translation: * माया सा त्रिविधा प्रोक्ता (māyā sā trividhā proktā): "Maya is said to be of three kinds" * सत्त्वराजसतामसी (sattvarajasatāmāsī): "Sattva, Rajas, and Tamas" * प्रोक्ता च सात्त्विकी रुद्रे (proktā ca sāttvikī rudre): "Sattva, characterized by purity, is said to be the way of the devotee of Rudra" * भक्ते ब्रह्मणि राजसी (bhakte brahmaṇi rājāsī): "the way of the devotee of Brahma, and the way of the King" The verse refers to the three gunas (qualities) of nature: Sattva, Rajas, and Tamas. It also describes different types of people who are associated with each guna.
परम पुरुष भगवान् का यह आश्वासन प्राप्त करके वे सभी देवगण अत्यधिक आनन्दित होते हुए बोले कि अब हम कृतार्थ हो गये। तदनन्तर वे समस्त देवगण भगवान् की सेवा हेतु प्रकट हुए। भगवान् का परम आनन्दमय स्वरूप ही अंशरूप में नन्दराय जी के रूप में उत्पन्न हुआ। स्वयं साक्षात् मुक्तिदेवी नन्दरानी यशोदा जी के रूप में अवतरित हुई। सुप्रसिद्ध माया तीन प्रकार की कही गयी है, जिनमें से प्रथम सात्विकी, द्वितीय राजसी और तृतीय तामसी । भगवान् के भक्त श्रीरुद्र देव में सात्त्विकी माया विद्यमान है, ब्रह्मा जी में राजसी माया है और असुरों में तामसी माया का प्राकट्य हुआ है। इस कारण से यह तीन प्रकार की बतलायी गयी है। इसके अतिरिक्त जो वैष्णवी-माया है, उसको जीतना हर किसी के लिए असंभव है। इस माया को प्राचीन काल में ब्रह्मा जी भी पराजित नहीं कर सके। देवता भी सदा जिस वैष्णवी माया की स्तुति करते हैं,यही ब्रह्मा विद्यामयी वैष्णवी माया ही देवकी के रूप में प्रादुर्भूत हुई। निगम अर्थात् वेद ही वसुदेव हैं,जो निरन्तर मुझ पूर्ण पुरुष नारायण के विराट् स्वरूप की स्तुति करते हैं। वेदों का तात्पर्यंभूत ब्रह्म ही श्री बलराम एवं श्रीकृष्ण के रूप में इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ। वह मूर्तिमय वेदार्थ ही वृन्दावन में विद्यमान गोप एवं गोपियों के साथ क्रीड़ा करता है। वेदों को ऋयाएँ उन भगवान् श्रीकृष्ण को गौएँ एवं गोपियाँ हैं। ब्रह्माजी ने लकुटी का रूप धारण किया है तथा भगवान् रुद्र वंश(वंशी)बने हुए हैं। सगोसुर इन्द्र (अर्थात् वजधारी देव इन्द्र-यहाँ गो का अर्थ वज्र तथा सुर का अर्थ देव लिया गया है।) श्रृंग (सींग का बना वाद्ययंत्र) का रूप धारण किए हुए हैं। गोकुल के नाम से प्रसिद्ध वन के रूप में जहाँ स्वयं साक्षात् वैकुण्ठ प्रतिष्ठित है, वहाँ पर द्रुमों (वृक्षों) के रूप में तप में रत महात्मा स्थित हैं। लोभ-क्रोधादि षड् विकारों ने महान् दैत्य-असुरों का रूप धारण कर लिया है, जो कलियुग में (केवल भगवान् श्रीकृष्ण के नाम जप मात्र से ही) विनष्ट हो जाते हैं।।
Verse ५
तामसी दैत्यपक्षेषु माया त्रेधा ह्युदाहृता।अजेया वैष्णवी माया जप्येन च सुता पुरा ॥
tāmasī daityapakṣeṣu māyā tredhā hyudāhṛtā।ajeyā vaiṣṇavī māyā japyena ca sutā purā ॥
This verse, from the Bhagavata Purana, describes the three types of Maya (illusion): "Among the demoniacal parties, Maya is described as threefold. Unconquerable Vaishnavi Maya (divine illusion) is worshipped by the ancient sages." Here's a breakdown: * तामसी दैत्यपक्षेषु (tamasi daityapaksheshu): "Among the demoniacal parties" - This refers to those who are influenced by tamas (ignorance) and are opposed to the divine. * माया त्रेधा ह्युदाहृता (maya tredha hyudaahrta): "Maya is described as threefold" - This refers to the three types of Maya. * अजेया वैष्णवी माया (ajeeya vaishnavi maya): "Unconquerable Vaishnavi Maya" - This refers to the divine illusion, which is ultimately benevolent and helps guide towards spiritual liberation. * जप्येन च सुता पुरा (japyena cha suta pura): "worshipped by the ancient sages" - The ancient sages recognized the power of Vaishnavi Maya and sought to understand and utilize it for spiritual growth. This verse highlights the concept of Maya and its various forms. It also emphasizes the importance of recognizing and utilizing the divine illusion (Vaishnavi Maya) for spiritual liberation.
परम पुरुष भगवान् का यह आश्वासन प्राप्त करके वे सभी देवगण अत्यधिक आनन्दित होते हुए बोले कि अब हम कृतार्थ हो गये। तदनन्तर वे समस्त देवगण भगवान् की सेवा हेतु प्रकट हुए। भगवान् का परम आनन्दमय स्वरूप ही अंशरूप में नन्दराय जी के रूप में उत्पन्न हुआ। स्वयं साक्षात् मुक्तिदेवी नन्दरानी यशोदा जी के रूप में अवतरित हुई। सुप्रसिद्ध माया तीन प्रकार की कही गयी है, जिनमें से प्रथम सात्विकी, द्वितीय राजसी और तृतीय तामसी । भगवान् के भक्त श्रीरुद्र देव में सात्त्विकी माया विद्यमान है, ब्रह्मा जी में राजसी माया है और असुरों में तामसी माया का प्राकट्य हुआ है। इस कारण से यह तीन प्रकार की बतलायी गयी है। इसके अतिरिक्त जो वैष्णवी-माया है, उसको जीतना हर किसी के लिए असंभव है। इस माया को प्राचीन काल में ब्रह्मा जी भी पराजित नहीं कर सके। देवता भी सदा जिस वैष्णवी माया की स्तुति करते हैं,यही ब्रह्मा विद्यामयी वैष्णवी माया ही देवकी के रूप में प्रादुर्भूत हुई। निगम अर्थात् वेद ही वसुदेव हैं,जो निरन्तर मुझ पूर्ण पुरुष नारायण के विराट् स्वरूप की स्तुति करते हैं। वेदों का तात्पर्यंभूत ब्रह्म ही श्री बलराम एवं श्रीकृष्ण के रूप में इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ। वह मूर्तिमय वेदार्थ ही वृन्दावन में विद्यमान गोप एवं गोपियों के साथ क्रीड़ा करता है। वेदों को ऋयाएँ उन भगवान् श्रीकृष्ण को गौएँ एवं गोपियाँ हैं। ब्रह्माजी ने लकुटी का रूप धारण किया है तथा भगवान् रुद्र वंश(वंशी)बने हुए हैं। सगोसुर इन्द्र (अर्थात् वजधारी देव इन्द्र-यहाँ गो का अर्थ वज्र तथा सुर का अर्थ देव लिया गया है।) श्रृंग (सींग का बना वाद्ययंत्र) का रूप धारण किए हुए हैं। गोकुल के नाम से प्रसिद्ध वन के रूप में जहाँ स्वयं साक्षात् वैकुण्ठ प्रतिष्ठित है, वहाँ पर द्रुमों (वृक्षों) के रूप में तप में रत महात्मा स्थित हैं। लोभ-क्रोधादि षड् विकारों ने महान् दैत्य-असुरों का रूप धारण कर लिया है, जो कलियुग में (केवल भगवान् श्रीकृष्ण के नाम जप मात्र से ही) विनष्ट हो जाते हैं।।
Verse ६
देवकी ब्रह्मपुत्रा सा या वेदैरुपगीयते ।निगमो वसुदेवो यो वेदार्थ: कृष्णरामयोः ।।
devakī brahmaputrā sā yā vedairupagīyate ।nigamo vasudevo yo vedārtha: kṛṣṇarāmayoḥ ।।
This verse is about the relationship between Krishna, Vasudeva, and the Vedas: Devaki, the daughter of Brahma, is praised in the Vedas. The essence of the Vedas is Vasudeva, and the meaning of the Vedas is Krishna and Rama. Here's a breakdown of the translation: * देवकी (Devaki): Daughter of Brahma, referring to Devaki, the mother of Krishna * ब्रह्मपुत्रा (Brahmaputrā): Daughter of Brahma * सा (sā): She * या (yā): Who * वेदैरुपगीयते (vedairupagīyate): Is praised in the Vedas * निगमो (nigamo): Essence, summary, conclusion * वसुदेवो (Vasudevo): Vasudeva, Krishna's father * यो (yo): Who * वेदार्थ: (vedārthaḥ): Meaning of the Vedas * कृष्णरामयोः (kṛṣṇarāmayoḥ): Krishna and Rama This verse suggests that the Vedas are ultimately pointing towards the divine nature of Krishna and Rama, who are considered to be incarnations of Vishnu. It highlights the connection between these figures and the ancient wisdom of the Vedas.
परम पुरुष भगवान् का यह आश्वासन प्राप्त करके वे सभी देवगण अत्यधिक आनन्दित होते हुए बोले कि अब हम कृतार्थ हो गये। तदनन्तर वे समस्त देवगण भगवान् की सेवा हेतु प्रकट हुए। भगवान् का परम आनन्दमय स्वरूप ही अंशरूप में नन्दराय जी के रूप में उत्पन्न हुआ। स्वयं साक्षात् मुक्तिदेवी नन्दरानी यशोदा जी के रूप में अवतरित हुई। सुप्रसिद्ध माया तीन प्रकार की कही गयी है, जिनमें से प्रथम सात्विकी, द्वितीय राजसी और तृतीय तामसी । भगवान् के भक्त श्रीरुद्र देव में सात्त्विकी माया विद्यमान है, ब्रह्मा जी में राजसी माया है और असुरों में तामसी माया का प्राकट्य हुआ है। इस कारण से यह तीन प्रकार की बतलायी गयी है। इसके अतिरिक्त जो वैष्णवी-माया है, उसको जीतना हर किसी के लिए असंभव है। इस माया को प्राचीन काल में ब्रह्मा जी भी पराजित नहीं कर सके। देवता भी सदा जिस वैष्णवी माया की स्तुति करते हैं,यही ब्रह्मा विद्यामयी वैष्णवी माया ही देवकी के रूप में प्रादुर्भूत हुई। निगम अर्थात् वेद ही वसुदेव हैं,जो निरन्तर मुझ पूर्ण पुरुष नारायण के विराट् स्वरूप की स्तुति करते हैं। वेदों का तात्पर्यंभूत ब्रह्म ही श्री बलराम एवं श्रीकृष्ण के रूप में इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ। वह मूर्तिमय वेदार्थ ही वृन्दावन में विद्यमान गोप एवं गोपियों के साथ क्रीड़ा करता है। वेदों को ऋयाएँ उन भगवान् श्रीकृष्ण को गौएँ एवं गोपियाँ हैं। ब्रह्माजी ने लकुटी का रूप धारण किया है तथा भगवान् रुद्र वंश(वंशी)बने हुए हैं। सगोसुर इन्द्र (अर्थात् वजधारी देव इन्द्र-यहाँ गो का अर्थ वज्र तथा सुर का अर्थ देव लिया गया है।) श्रृंग (सींग का बना वाद्ययंत्र) का रूप धारण किए हुए हैं। गोकुल के नाम से प्रसिद्ध वन के रूप में जहाँ स्वयं साक्षात् वैकुण्ठ प्रतिष्ठित है, वहाँ पर द्रुमों (वृक्षों) के रूप में तप में रत महात्मा स्थित हैं। लोभ-क्रोधादि षड् विकारों ने महान् दैत्य-असुरों का रूप धारण कर लिया है, जो कलियुग में (केवल भगवान् श्रीकृष्ण के नाम जप मात्र से ही) विनष्ट हो जाते हैं।।
Verse ७
स्तुवते सततं यस्तु सोऽवतीर्णो महीतले।वने वृन्दावने क्रीडन्गोपगोपीसुरैः सह ॥
stuvate satataṃ yastu so'vatīrṇo mahītale।vane vṛndāvane krīḍangopagopīsuraiḥ saha ॥
The verse you provided translates to: "He who is eternally praised, who descended to the earth, playing in the forest of Vrindavan with the cowherd boys and gopis (cowherd girls)." Here's a breakdown of the translation: * स्तुवते सततं यस्तु: "He who is eternally praised" * सोऽवतीर्णो महीतले: "who descended to the earth" * वने वृन्दावने: "in the forest of Vrindavan" * क्रीडन्गोपगोपीसुरैः सह: "playing with the cowherd boys and gopis" This verse likely refers to a deity, perhaps Krishna, who is known for his playful nature and association with the forest of Vrindavan.
परम पुरुष भगवान् का यह आश्वासन प्राप्त करके वे सभी देवगण अत्यधिक आनन्दित होते हुए बोले कि अब हम कृतार्थ हो गये। तदनन्तर वे समस्त देवगण भगवान् की सेवा हेतु प्रकट हुए। भगवान् का परम आनन्दमय स्वरूप ही अंशरूप में नन्दराय जी के रूप में उत्पन्न हुआ। स्वयं साक्षात् मुक्तिदेवी नन्दरानी यशोदा जी के रूप में अवतरित हुई। सुप्रसिद्ध माया तीन प्रकार की कही गयी है, जिनमें से प्रथम सात्विकी, द्वितीय राजसी और तृतीय तामसी । भगवान् के भक्त श्रीरुद्र देव में सात्त्विकी माया विद्यमान है, ब्रह्मा जी में राजसी माया है और असुरों में तामसी माया का प्राकट्य हुआ है। इस कारण से यह तीन प्रकार की बतलायी गयी है। इसके अतिरिक्त जो वैष्णवी-माया है, उसको जीतना हर किसी के लिए असंभव है। इस माया को प्राचीन काल में ब्रह्मा जी भी पराजित नहीं कर सके। देवता भी सदा जिस वैष्णवी माया की स्तुति करते हैं,यही ब्रह्मा विद्यामयी वैष्णवी माया ही देवकी के रूप में प्रादुर्भूत हुई। निगम अर्थात् वेद ही वसुदेव हैं,जो निरन्तर मुझ पूर्ण पुरुष नारायण के विराट् स्वरूप की स्तुति करते हैं। वेदों का तात्पर्यंभूत ब्रह्म ही श्री बलराम एवं श्रीकृष्ण के रूप में इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ। वह मूर्तिमय वेदार्थ ही वृन्दावन में विद्यमान गोप एवं गोपियों के साथ क्रीड़ा करता है। वेदों को ऋयाएँ उन भगवान् श्रीकृष्ण को गौएँ एवं गोपियाँ हैं। ब्रह्माजी ने लकुटी का रूप धारण किया है तथा भगवान् रुद्र वंश(वंशी)बने हुए हैं। सगोसुर इन्द्र (अर्थात् वजधारी देव इन्द्र-यहाँ गो का अर्थ वज्र तथा सुर का अर्थ देव लिया गया है।) श्रृंग (सींग का बना वाद्ययंत्र) का रूप धारण किए हुए हैं। गोकुल के नाम से प्रसिद्ध वन के रूप में जहाँ स्वयं साक्षात् वैकुण्ठ प्रतिष्ठित है, वहाँ पर द्रुमों (वृक्षों) के रूप में तप में रत महात्मा स्थित हैं। लोभ-क्रोधादि षड् विकारों ने महान् दैत्य-असुरों का रूप धारण कर लिया है, जो कलियुग में (केवल भगवान् श्रीकृष्ण के नाम जप मात्र से ही) विनष्ट हो जाते हैं।।
Verse ८
गोप्यो गाव ऋचस्तस्य यष्टिका कमलासनः । वंशस्तु भगवान् रुद्रः शृङ्गमिन्द्रः सगोसुरः ॥
gopyo gāva ṛcastasya yaṣṭikā kamalāsanaḥ । vaṃśastu bhagavān rudraḥ śṛṅgamindraḥ sagosuraḥ ॥
The verse describes the attributes of Lord Shiva: * गोप्यो गाव ऋचस्तस्य: His cows are the Gopikas (cowherd women), his chants are the Vedas (ancient scriptures). * यष्टिका कमलासनः: His staff is the lotus flower, his seat is the lotus. * वंशस्तु भगवान् रुद्रः: He is Lord Rudra, the one who destroys and recreates, his arrow is the bamboo. * शृङ्गमिन्द्रः सगोसुरः: His bow is Indra, the king of gods, along with his celestial beings (Devas). In English: "His cows are the Gopikas, his chants are the Vedas. His staff is the lotus, his seat is the lotus. He is Lord Rudra, whose arrow is the bamboo. His bow is Indra, the king of gods, along with his celestial beings." This verse is a beautiful description of Lord Shiva's power and his association with various symbols and deities. It highlights his role as a destroyer and creator, as well as his connection to the divine feminine (Gopikas) and the sacred texts (Vedas).
परम पुरुष भगवान् का यह आश्वासन प्राप्त करके वे सभी देवगण अत्यधिक आनन्दित होते हुए बोले कि अब हम कृतार्थ हो गये। तदनन्तर वे समस्त देवगण भगवान् की सेवा हेतु प्रकट हुए। भगवान् का परम आनन्दमय स्वरूप ही अंशरूप में नन्दराय जी के रूप में उत्पन्न हुआ। स्वयं साक्षात् मुक्तिदेवी नन्दरानी यशोदा जी के रूप में अवतरित हुई। सुप्रसिद्ध माया तीन प्रकार की कही गयी है, जिनमें से प्रथम सात्विकी, द्वितीय राजसी और तृतीय तामसी । भगवान् के भक्त श्रीरुद्र देव में सात्त्विकी माया विद्यमान है, ब्रह्मा जी में राजसी माया है और असुरों में तामसी माया का प्राकट्य हुआ है। इस कारण से यह तीन प्रकार की बतलायी गयी है। इसके अतिरिक्त जो वैष्णवी-माया है, उसको जीतना हर किसी के लिए असंभव है। इस माया को प्राचीन काल में ब्रह्मा जी भी पराजित नहीं कर सके। देवता भी सदा जिस वैष्णवी माया की स्तुति करते हैं,यही ब्रह्मा विद्यामयी वैष्णवी माया ही देवकी के रूप में प्रादुर्भूत हुई। निगम अर्थात् वेद ही वसुदेव हैं,जो निरन्तर मुझ पूर्ण पुरुष नारायण के विराट् स्वरूप की स्तुति करते हैं। वेदों का तात्पर्यंभूत ब्रह्म ही श्री बलराम एवं श्रीकृष्ण के रूप में इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ। वह मूर्तिमय वेदार्थ ही वृन्दावन में विद्यमान गोप एवं गोपियों के साथ क्रीड़ा करता है। वेदों को ऋयाएँ उन भगवान् श्रीकृष्ण को गौएँ एवं गोपियाँ हैं। ब्रह्माजी ने लकुटी का रूप धारण किया है तथा भगवान् रुद्र वंश(वंशी)बने हुए हैं। सगोसुर इन्द्र (अर्थात् वजधारी देव इन्द्र-यहाँ गो का अर्थ वज्र तथा सुर का अर्थ देव लिया गया है।) श्रृंग (सींग का बना वाद्ययंत्र) का रूप धारण किए हुए हैं। गोकुल के नाम से प्रसिद्ध वन के रूप में जहाँ स्वयं साक्षात् वैकुण्ठ प्रतिष्ठित है, वहाँ पर द्रुमों (वृक्षों) के रूप में तप में रत महात्मा स्थित हैं। लोभ-क्रोधादि षड् विकारों ने महान् दैत्य-असुरों का रूप धारण कर लिया है, जो कलियुग में (केवल भगवान् श्रीकृष्ण के नाम जप मात्र से ही) विनष्ट हो जाते हैं।।
Verse ९
गोकुलं वनवैकुण्ठं तापसास्तत्र ते द्रुमाः । लोभक्रोधादयो दैत्याः कलिकालस्तिरस्कृतः ।।
gokulaṃ vanavaikuṇṭhaṃ tāpasāstatra te drumāḥ । lobhakrodhādayo daityāḥ kalikālastiraskṛtaḥ ।।
The verse translates to: "Gokula is like a forest Vaikuntha, the sages there are the trees. Greed, anger, and other demons are rejected, the Kali Yuga is despised." Here's a breakdown: * गोकुलं (Gokulam): Refers to the village where Lord Krishna grew up. * वनवैकुण्ठं (vanavaikuntham): "Forest Vaikuntha" implies a place of peace and divine presence, like the heavenly abode of Lord Vishnu. * तापसास्तत्र ते द्रुमाः (tapasastaatra te drumaah): "The sages there are the trees" - suggests that the residents of Gokula were as virtuous and peaceful as the trees in a forest, representing a pure and serene atmosphere. * लोभक्रोधादयो दैत्याः (lobhakrodhadayo daityah): "Greed, anger, and other demons" are symbolic of negative qualities and vices. * कलिकालस्तिरस्कृतः (kalikaalastiraskrtah): "The Kali Yuga is despised" - implies that the negativity and corruption of the Kali Yuga (present age) had no place in Gokula. The verse paints a picture of Gokula as a haven of peace and righteousness, untouched by the darkness of the present age. It emphasizes the purity and spiritual strength of its inhabitants, who were free from negative influences.
परम पुरुष भगवान् का यह आश्वासन प्राप्त करके वे सभी देवगण अत्यधिक आनन्दित होते हुए बोले कि अब हम कृतार्थ हो गये। तदनन्तर वे समस्त देवगण भगवान् की सेवा हेतु प्रकट हुए। भगवान् का परम आनन्दमय स्वरूप ही अंशरूप में नन्दराय जी के रूप में उत्पन्न हुआ। स्वयं साक्षात् मुक्तिदेवी नन्दरानी यशोदा जी के रूप में अवतरित हुई। सुप्रसिद्ध माया तीन प्रकार की कही गयी है, जिनमें से प्रथम सात्विकी, द्वितीय राजसी और तृतीय तामसी । भगवान् के भक्त श्रीरुद्र देव में सात्त्विकी माया विद्यमान है, ब्रह्मा जी में राजसी माया है और असुरों में तामसी माया का प्राकट्य हुआ है। इस कारण से यह तीन प्रकार की बतलायी गयी है। इसके अतिरिक्त जो वैष्णवी-माया है, उसको जीतना हर किसी के लिए असंभव है। इस माया को प्राचीन काल में ब्रह्मा जी भी पराजित नहीं कर सके। देवता भी सदा जिस वैष्णवी माया की स्तुति करते हैं,यही ब्रह्मा विद्यामयी वैष्णवी माया ही देवकी के रूप में प्रादुर्भूत हुई। निगम अर्थात् वेद ही वसुदेव हैं,जो निरन्तर मुझ पूर्ण पुरुष नारायण के विराट् स्वरूप की स्तुति करते हैं। वेदों का तात्पर्यंभूत ब्रह्म ही श्री बलराम एवं श्रीकृष्ण के रूप में इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ। वह मूर्तिमय वेदार्थ ही वृन्दावन में विद्यमान गोप एवं गोपियों के साथ क्रीड़ा करता है। वेदों को ऋयाएँ उन भगवान् श्रीकृष्ण को गौएँ एवं गोपियाँ हैं। ब्रह्माजी ने लकुटी का रूप धारण किया है तथा भगवान् रुद्र वंश(वंशी)बने हुए हैं। सगोसुर इन्द्र (अर्थात् वजधारी देव इन्द्र-यहाँ गो का अर्थ वज्र तथा सुर का अर्थ देव लिया गया है।) श्रृंग (सींग का बना वाद्ययंत्र) का रूप धारण किए हुए हैं। गोकुल के नाम से प्रसिद्ध वन के रूप में जहाँ स्वयं साक्षात् वैकुण्ठ प्रतिष्ठित है, वहाँ पर द्रुमों (वृक्षों) के रूप में तप में रत महात्मा स्थित हैं। लोभ-क्रोधादि षड् विकारों ने महान् दैत्य-असुरों का रूप धारण कर लिया है, जो कलियुग में (केवल भगवान् श्रीकृष्ण के नाम जप मात्र से ही) विनष्ट हो जाते हैं।।
Verse १०
गोपरूपो हरिः साक्षान्मायाविग्रहधारणः।दुर्बोधं कुहकं तस्य मायया मोहितं जगत्॥
goparūpo hariḥ sākṣānmāyāvigrahadhāraṇaḥ।durbodhaṃ kuhakaṃ tasya māyayā mohitaṃ jagat॥
The verse you provided is from the Bhagavad Gita, Chapter 7, Verse 25. Here is the translation: "Hari, the Supreme Lord, appears in the form of a cowherd. He wears a body of Maya (illusion). The world is deluded by His Maya, and therefore, His true nature is difficult to understand." Here is a breakdown of the translation: * गोपरूपो हरिः साक्षान् - "Hari, the Supreme Lord, appears in the form of a cowherd" * मायाविग्रहधारणः - "He wears a body of Maya (illusion)" * दुर्बोधं कुहकं तस्य - "His true nature is difficult to understand" * मायया मोहितं जगत् - "The world is deluded by His Maya" Explanation: The verse refers to the concept of "Lila," which means "divine play." It states that the Supreme Lord (Hari) manifests in various forms, including that of a cowherd, to interact with the world. He does so through Maya, which creates an illusionary reality that obscures His true nature. This illusionary reality is what the world experiences, making it difficult to understand the Lord's true self. The verse highlights the following ideas: * The divine nature of Krishna: The verse emphasizes that the cowherd Krishna is in fact Hari, the Supreme Lord. * The power of Maya: Maya is a powerful force that creates an illusionary world, making it difficult to discern reality. * The need for spiritual understanding: To understand the true nature of the Supreme Lord, one needs to transcend the illusion of Maya and attain spiritual wisdom.
स्वयं साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही गोषरूप में लीला-विग्रह का रूप धारण किये हुए हैं। यह नश्वर जगत् माया से ग्रसित है, इस कारण उसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण की माया का रहस्य जानना बहुत ही दुष्कर है। वह प्रभु की माया सभी देवताओं के लिए भी दुर्जय है। जिन भगवान् की माया के वश में होकर ब्रह्मा जी लकुटी का रूप धारण किए हुए हैं तथा जिन्होंने भगवान् शिव को वंशी बनने के लिए विवश कर रखा है, उन प्रभु की माया को सामान्य जगत् किस प्रकार जान सकता है? निश्चित रूप से देवों का जो ज्ञान युक्त थल है, उसे भगवान् की माया ने क्षण भर में हरण कर लिया है। श्रीशेषनाग जी श्री बलराम के रूप में जन्मे और सनातन ब्रह्म हो भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए। भगवान् श्रीकृष्ण की रुक्मिणी आदि सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ ही वेदों की ऋचाएँ एवं उपनिषद् हैं, इनके अतिरिक्त वेदों की जो ब्रह्म स्वरूपा ऋचाएँ हैं, वे सभी ब्रजभूमि में गोपिकाओं के रूप में अवतरित हुई। द्वेष ही चाणूर मल्ल के रूप में है, मत्सर ही दुर्जय मुष्टिक रूप में तथा दर्प ही कुवलयापीड हाथी के रूप में प्रकट हुआ है। गर्व ही आकाश में गमन करने वाले बकासुर राक्षस के रूप में अवतरित हुआ। माता रोहिणी के रूप में दया का प्राकट्य हुआ है और माँ पृथ्वी ही सत्यभामा के रूप में अवतरित हुई हैं। अघासुर के रूप में महाव्याधि और स्वयं साक्षात् कलि ही राजा कंस के रूप में प्रकट हुआ। श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा जी ही 'शम्' हैं, सत्य के रूप में अक्रूर जी और दम के रूप में उद्धवजी उत्पन्न हुए। शंख स्वयं विष्णुरूप है और लक्ष्मी का भ्राता होने के कारण वह लक्ष्मी रूप भी है, उसका प्राकट्य क्षीरसागर से हुआ है। मेघ के सदृश उसका गम्भीर घोष नाद है। भगवान् ने दूध दही के भण्डार से युक्त जो मटके फोड़े तथा उन मटकों से जो दूध दही प्रवाहित हुआ, उसके रूप में भगवान् ने स्वयं साक्षात् क्षीरसागर को ही प्रादुर्भुत किया है और वे ( भगवान् श्रीकृष्ण) उस महासागर में बालक रुप में अवस्थित हो पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे हैं। शत्रुओं के शमन एवं साधुजनों के संरक्षण में वे पूर्णरूपेण तत्पर रहते हैं। समस्त भूत प्राणियों पर अहैतुकी कृपा करने के लिए एवं अपने आत्मज स्वरूप धर्म के अभ्युदय हेतु ही भगवान् श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ है, ऐसा ही जानना चाहिए। भगवान् महाकाल (शिव) ने श्रीहरि को समर्पित करने के लिए जिस चक्र को उत्पन्न किया था, भगवान् ( श्री कृष्ण) के हाथ में शोभायमान वह चक्र भी ब्रह्ममय ही है।।
Verse ११
दुर्जया सा सुरैः सर्वैर्धृष्टिरूपो भवेद्विजः ।रुद्रो येन कृतो वंशस्तस्य माया जगत्कथम्॥
durjayā sā suraiḥ sarvairdhṛṣṭirūpo bhavedvijaḥ ।rudro yena kṛto vaṃśastasya māyā jagatkatham॥
The verse you provided translates to: "He who is invincible even by all the gods, whose form is that of boldness, he is the conqueror. By him, the lineage of Rudra is established. How is his illusion the world?" Here is a breakdown of the translation: * दुर्जया (durjaya) - Invincible * सा सुरैः सर्वैः (sa suraiḥ sarvaiḥ) - By all the gods * धृष्टिरूपो (dhṛṣṭirūpa) - Whose form is that of boldness * भवेद्विजः (bhaved vijaḥ) - He is the conqueror * रुद्रो येन कृतो वंशः (rudro yena kṛto vaṁśaḥ) - The lineage of Rudra is established by him * तस्य माया जगत् कथम् (tasya māyā jagat katham) - How is his illusion the world? The verse is likely from a Hindu scripture, possibly a Purana or an Upanishad. It speaks about a powerful and enigmatic being who is described as invincible and bold, and who has established the lineage of Rudra, a powerful deity. The final line raises a question about the nature of reality and the illusionary nature of the world, suggesting that this being may have created or be responsible for the world in some way.
स्वयं साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही गोषरूप में लीला-विग्रह का रूप धारण किये हुए हैं। यह नश्वर जगत् माया से ग्रसित है, इस कारण उसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण की माया का रहस्य जानना बहुत ही दुष्कर है। वह प्रभु की माया सभी देवताओं के लिए भी दुर्जय है। जिन भगवान् की माया के वश में होकर ब्रह्मा जी लकुटी का रूप धारण किए हुए हैं तथा जिन्होंने भगवान् शिव को वंशी बनने के लिए विवश कर रखा है, उन प्रभु की माया को सामान्य जगत् किस प्रकार जान सकता है? निश्चित रूप से देवों का जो ज्ञान युक्त थल है, उसे भगवान् की माया ने क्षण भर में हरण कर लिया है। श्रीशेषनाग जी श्री बलराम के रूप में जन्मे और सनातन ब्रह्म हो भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए। भगवान् श्रीकृष्ण की रुक्मिणी आदि सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ ही वेदों की ऋचाएँ एवं उपनिषद् हैं, इनके अतिरिक्त वेदों की जो ब्रह्म स्वरूपा ऋचाएँ हैं, वे सभी ब्रजभूमि में गोपिकाओं के रूप में अवतरित हुई। द्वेष ही चाणूर मल्ल के रूप में है, मत्सर ही दुर्जय मुष्टिक रूप में तथा दर्प ही कुवलयापीड हाथी के रूप में प्रकट हुआ है। गर्व ही आकाश में गमन करने वाले बकासुर राक्षस के रूप में अवतरित हुआ। माता रोहिणी के रूप में दया का प्राकट्य हुआ है और माँ पृथ्वी ही सत्यभामा के रूप में अवतरित हुई हैं। अघासुर के रूप में महाव्याधि और स्वयं साक्षात् कलि ही राजा कंस के रूप में प्रकट हुआ। श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा जी ही 'शम्' हैं, सत्य के रूप में अक्रूर जी और दम के रूप में उद्धवजी उत्पन्न हुए। शंख स्वयं विष्णुरूप है और लक्ष्मी का भ्राता होने के कारण वह लक्ष्मी रूप भी है, उसका प्राकट्य क्षीरसागर से हुआ है। मेघ के सदृश उसका गम्भीर घोष नाद है। भगवान् ने दूध दही के भण्डार से युक्त जो मटके फोड़े तथा उन मटकों से जो दूध दही प्रवाहित हुआ, उसके रूप में भगवान् ने स्वयं साक्षात् क्षीरसागर को ही प्रादुर्भुत किया है और वे ( भगवान् श्रीकृष्ण) उस महासागर में बालक रुप में अवस्थित हो पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे हैं। शत्रुओं के शमन एवं साधुजनों के संरक्षण में वे पूर्णरूपेण तत्पर रहते हैं। समस्त भूत प्राणियों पर अहैतुकी कृपा करने के लिए एवं अपने आत्मज स्वरूप धर्म के अभ्युदय हेतु ही भगवान् श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ है, ऐसा ही जानना चाहिए। भगवान् महाकाल (शिव) ने श्रीहरि को समर्पित करने के लिए जिस चक्र को उत्पन्न किया था, भगवान् ( श्री कृष्ण) के हाथ में शोभायमान वह चक्र भी ब्रह्ममय ही है।।
Verse १२
बलं ज्ञानं सुराणां वै तेषां ज्ञानं हृतं क्षणात्। शेषनागोभवेद्रामः कृष्णो ब्रहमैव शाश्वतम् ॥
balaṃ jñānaṃ surāṇāṃ vai teṣāṃ jñānaṃ hṛtaṃ kṣaṇāt। śeṣanāgobhavedrāmaḥ kṛṣṇo brahamaiva śāśvatam ॥
This verse is from the Bhagavata Purana (10.36.21) and describes Krishna's divine qualities: English Translation: "Strength and knowledge are the attributes of the demigods, but even their knowledge can be taken away in a moment. But Rama, who is the same as the eternal Brahman, remains eternally powerful and knowledgeable, like the serpent Sheshanaga." Explanation: * बलं ज्ञानं सुराणां वै: Strength and knowledge belong to the demigods. * तेषां ज्ञानं हृतं क्षणात्: Their knowledge can be taken away in a moment. * शेषनागोभवेद्रामः: Rama, like the serpent Sheshanaga, remains eternally powerful. * कृष्णो ब्रहमैव शाश्वतम्: Krishna is the eternal Brahman. The verse emphasizes Krishna's eternal nature and supremacy over even the demigods. It is a declaration of his ultimate power and knowledge, which cannot be taken away or diminished.
स्वयं साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही गोषरूप में लीला-विग्रह का रूप धारण किये हुए हैं। यह नश्वर जगत् माया से ग्रसित है, इस कारण उसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण की माया का रहस्य जानना बहुत ही दुष्कर है। वह प्रभु की माया सभी देवताओं के लिए भी दुर्जय है। जिन भगवान् की माया के वश में होकर ब्रह्मा जी लकुटी का रूप धारण किए हुए हैं तथा जिन्होंने भगवान् शिव को वंशी बनने के लिए विवश कर रखा है, उन प्रभु की माया को सामान्य जगत् किस प्रकार जान सकता है? निश्चित रूप से देवों का जो ज्ञान युक्त थल है, उसे भगवान् की माया ने क्षण भर में हरण कर लिया है। श्रीशेषनाग जी श्री बलराम के रूप में जन्मे और सनातन ब्रह्म हो भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए। भगवान् श्रीकृष्ण की रुक्मिणी आदि सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ ही वेदों की ऋचाएँ एवं उपनिषद् हैं, इनके अतिरिक्त वेदों की जो ब्रह्म स्वरूपा ऋचाएँ हैं, वे सभी ब्रजभूमि में गोपिकाओं के रूप में अवतरित हुई। द्वेष ही चाणूर मल्ल के रूप में है, मत्सर ही दुर्जय मुष्टिक रूप में तथा दर्प ही कुवलयापीड हाथी के रूप में प्रकट हुआ है। गर्व ही आकाश में गमन करने वाले बकासुर राक्षस के रूप में अवतरित हुआ। माता रोहिणी के रूप में दया का प्राकट्य हुआ है और माँ पृथ्वी ही सत्यभामा के रूप में अवतरित हुई हैं। अघासुर के रूप में महाव्याधि और स्वयं साक्षात् कलि ही राजा कंस के रूप में प्रकट हुआ। श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा जी ही 'शम्' हैं, सत्य के रूप में अक्रूर जी और दम के रूप में उद्धवजी उत्पन्न हुए। शंख स्वयं विष्णुरूप है और लक्ष्मी का भ्राता होने के कारण वह लक्ष्मी रूप भी है, उसका प्राकट्य क्षीरसागर से हुआ है। मेघ के सदृश उसका गम्भीर घोष नाद है। भगवान् ने दूध दही के भण्डार से युक्त जो मटके फोड़े तथा उन मटकों से जो दूध दही प्रवाहित हुआ, उसके रूप में भगवान् ने स्वयं साक्षात् क्षीरसागर को ही प्रादुर्भुत किया है और वे ( भगवान् श्रीकृष्ण) उस महासागर में बालक रुप में अवस्थित हो पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे हैं। शत्रुओं के शमन एवं साधुजनों के संरक्षण में वे पूर्णरूपेण तत्पर रहते हैं। समस्त भूत प्राणियों पर अहैतुकी कृपा करने के लिए एवं अपने आत्मज स्वरूप धर्म के अभ्युदय हेतु ही भगवान् श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ है, ऐसा ही जानना चाहिए। भगवान् महाकाल (शिव) ने श्रीहरि को समर्पित करने के लिए जिस चक्र को उत्पन्न किया था, भगवान् ( श्री कृष्ण) के हाथ में शोभायमान वह चक्र भी ब्रह्ममय ही है।।
Text (part 2)
Verse १३
अष्टावष्टसहस्त्रे द्वे शताधिक्यः स्त्रियस्तथा। ऋचोपनिषदस्ता वै ब्रह्मरूपा ऋचः स्त्रियः ॥
aṣṭāvaṣṭasahastre dve śatādhikyaḥ striyastathā। ṛcopaniṣadastā vai brahmarūpā ṛcaḥ striyaḥ ॥
The verse translates to: "There are eight thousand eight hundred and two women, plus one hundred. They are the Rikas (hymns) and Upanishads, and they are the feminine forms of Brahman (the ultimate reality)." Explanation: * अष्टावष्टसहस्त्रे (aṣṭāvaṣṭasahasre): Eight thousand eight hundred * द्वे शताधिक्यः (dve śatādhikyah): Plus two hundred * स्त्रियस्तथा (striyas tatha): Women are those * ऋचोपनिषदस्ता वै (ṛcopaniṣadastā vai): The Rikas and Upanishads are * ब्रह्मरूपा (brahmarūpā): Forms of Brahman * ऋचः स्त्रियः (ṛcaḥ striyaḥ): The hymns are women Context: This verse is likely from a Hindu text discussing the symbolism of the feminine principle in the scriptures. It suggests that the Rikas (hymns) and Upanishads, which are considered sacred texts, represent the feminine aspect of Brahman. The number "8802" might be symbolic and may relate to a specific interpretation of the scriptures within a particular school of thought.
स्वयं साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही गोषरूप में लीला-विग्रह का रूप धारण किये हुए हैं। यह नश्वर जगत् माया से ग्रसित है, इस कारण उसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण की माया का रहस्य जानना बहुत ही दुष्कर है। वह प्रभु की माया सभी देवताओं के लिए भी दुर्जय है। जिन भगवान् की माया के वश में होकर ब्रह्मा जी लकुटी का रूप धारण किए हुए हैं तथा जिन्होंने भगवान् शिव को वंशी बनने के लिए विवश कर रखा है, उन प्रभु की माया को सामान्य जगत् किस प्रकार जान सकता है? निश्चित रूप से देवों का जो ज्ञान युक्त थल है, उसे भगवान् की माया ने क्षण भर में हरण कर लिया है। श्रीशेषनाग जी श्री बलराम के रूप में जन्मे और सनातन ब्रह्म हो भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए। भगवान् श्रीकृष्ण की रुक्मिणी आदि सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ ही वेदों की ऋचाएँ एवं उपनिषद् हैं, इनके अतिरिक्त वेदों की जो ब्रह्म स्वरूपा ऋचाएँ हैं, वे सभी ब्रजभूमि में गोपिकाओं के रूप में अवतरित हुई। द्वेष ही चाणूर मल्ल के रूप में है, मत्सर ही दुर्जय मुष्टिक रूप में तथा दर्प ही कुवलयापीड हाथी के रूप में प्रकट हुआ है। गर्व ही आकाश में गमन करने वाले बकासुर राक्षस के रूप में अवतरित हुआ। माता रोहिणी के रूप में दया का प्राकट्य हुआ है और माँ पृथ्वी ही सत्यभामा के रूप में अवतरित हुई हैं। अघासुर के रूप में महाव्याधि और स्वयं साक्षात् कलि ही राजा कंस के रूप में प्रकट हुआ। श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा जी ही 'शम्' हैं, सत्य के रूप में अक्रूर जी और दम के रूप में उद्धवजी उत्पन्न हुए। शंख स्वयं विष्णुरूप है और लक्ष्मी का भ्राता होने के कारण वह लक्ष्मी रूप भी है, उसका प्राकट्य क्षीरसागर से हुआ है। मेघ के सदृश उसका गम्भीर घोष नाद है। भगवान् ने दूध दही के भण्डार से युक्त जो मटके फोड़े तथा उन मटकों से जो दूध दही प्रवाहित हुआ, उसके रूप में भगवान् ने स्वयं साक्षात् क्षीरसागर को ही प्रादुर्भुत किया है और वे ( भगवान् श्रीकृष्ण) उस महासागर में बालक रुप में अवस्थित हो पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे हैं। शत्रुओं के शमन एवं साधुजनों के संरक्षण में वे पूर्णरूपेण तत्पर रहते हैं। समस्त भूत प्राणियों पर अहैतुकी कृपा करने के लिए एवं अपने आत्मज स्वरूप धर्म के अभ्युदय हेतु ही भगवान् श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ है, ऐसा ही जानना चाहिए। भगवान् महाकाल (शिव) ने श्रीहरि को समर्पित करने के लिए जिस चक्र को उत्पन्न किया था, भगवान् ( श्री कृष्ण) के हाथ में शोभायमान वह चक्र भी ब्रह्ममय ही है।।
Verse १४
द्वेषश्चाणूरमल्लोऽयं मत्सरो मुष्टिको जयः।दर्पः कुवलयापीडो गर्वो रक्षः खगो बकः ॥
dveṣaścāṇūramallo'yaṃ matsaro muṣṭiko jayaḥ।darpaḥ kuvalayāpīḍo garvo rakṣaḥ khago bakaḥ ॥
This verse describes various negative qualities with metaphorical imagery: * द्वेषश्चाणूरमल्लोऽयं: "Hatred is like the wrestler Aṇura, strong and fierce." * मत्सरो मुष्टिको जयः: "Envy is like a fist, aimed at victory." * दर्पः कुवलयापीडो: "Pride is like a heavy weight crushing a lotus flower." * गर्वो रक्षः खगो बकः: "Arrogance is like a demon bird, a crow." In summary: The verse compares hatred to a powerful wrestler, envy to a forceful fist, pride to a crushing weight, and arrogance to a demon bird. These metaphors vividly illustrate the destructive nature of these negative qualities.
स्वयं साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही गोषरूप में लीला-विग्रह का रूप धारण किये हुए हैं। यह नश्वर जगत् माया से ग्रसित है, इस कारण उसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण की माया का रहस्य जानना बहुत ही दुष्कर है। वह प्रभु की माया सभी देवताओं के लिए भी दुर्जय है। जिन भगवान् की माया के वश में होकर ब्रह्मा जी लकुटी का रूप धारण किए हुए हैं तथा जिन्होंने भगवान् शिव को वंशी बनने के लिए विवश कर रखा है, उन प्रभु की माया को सामान्य जगत् किस प्रकार जान सकता है? निश्चित रूप से देवों का जो ज्ञान युक्त थल है, उसे भगवान् की माया ने क्षण भर में हरण कर लिया है। श्रीशेषनाग जी श्री बलराम के रूप में जन्मे और सनातन ब्रह्म हो भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए। भगवान् श्रीकृष्ण की रुक्मिणी आदि सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ ही वेदों की ऋचाएँ एवं उपनिषद् हैं, इनके अतिरिक्त वेदों की जो ब्रह्म स्वरूपा ऋचाएँ हैं, वे सभी ब्रजभूमि में गोपिकाओं के रूप में अवतरित हुई। द्वेष ही चाणूर मल्ल के रूप में है, मत्सर ही दुर्जय मुष्टिक रूप में तथा दर्प ही कुवलयापीड हाथी के रूप में प्रकट हुआ है। गर्व ही आकाश में गमन करने वाले बकासुर राक्षस के रूप में अवतरित हुआ। माता रोहिणी के रूप में दया का प्राकट्य हुआ है और माँ पृथ्वी ही सत्यभामा के रूप में अवतरित हुई हैं। अघासुर के रूप में महाव्याधि और स्वयं साक्षात् कलि ही राजा कंस के रूप में प्रकट हुआ। श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा जी ही 'शम्' हैं, सत्य के रूप में अक्रूर जी और दम के रूप में उद्धवजी उत्पन्न हुए। शंख स्वयं विष्णुरूप है और लक्ष्मी का भ्राता होने के कारण वह लक्ष्मी रूप भी है, उसका प्राकट्य क्षीरसागर से हुआ है। मेघ के सदृश उसका गम्भीर घोष नाद है। भगवान् ने दूध दही के भण्डार से युक्त जो मटके फोड़े तथा उन मटकों से जो दूध दही प्रवाहित हुआ, उसके रूप में भगवान् ने स्वयं साक्षात् क्षीरसागर को ही प्रादुर्भुत किया है और वे ( भगवान् श्रीकृष्ण) उस महासागर में बालक रुप में अवस्थित हो पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे हैं। शत्रुओं के शमन एवं साधुजनों के संरक्षण में वे पूर्णरूपेण तत्पर रहते हैं। समस्त भूत प्राणियों पर अहैतुकी कृपा करने के लिए एवं अपने आत्मज स्वरूप धर्म के अभ्युदय हेतु ही भगवान् श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ है, ऐसा ही जानना चाहिए। भगवान् महाकाल (शिव) ने श्रीहरि को समर्पित करने के लिए जिस चक्र को उत्पन्न किया था, भगवान् ( श्री कृष्ण) के हाथ में शोभायमान वह चक्र भी ब्रह्ममय ही है।।
Verse १५
दया सा रोहिणी माता सत्यभामा धरेति वै।अघासुरो महाव्याधिः कलिः कंसः स भूपतिः ॥
dayā sā rohiṇī mātā satyabhāmā dhareti vai।aghāsuro mahāvyādhiḥ kaliḥ kaṃsaḥ sa bhūpatiḥ ॥
This verse is a description of the various evil forces that threaten the world, personified as different characters. Here's a translation: "Compassion is Rohini, the mother, Satyabhāma embraces truth. Aghasura is the great disease, Kali is the evil age, Kamsa is the king." Here's a breakdown of the verse: * दया सा रोहिणी माता: "Compassion (is) that Rohini, the mother" - Rohini is a star constellation and is also associated with compassion. * सत्यभामा धरेति वै: "Satyabhāma embraces truth" - Satyabhāma is a consort of Krishna who is known for her truthfulness. * अघासुरो महाव्याधिः: "Aghasura (is) the great disease" - Aghasura is a demon who represents illness and suffering. * कलिः कंसः स भूपतिः: "Kali (is) Kamsa, the king" - Kali is the age of darkness and corruption, and Kamsa is a wicked king who embodies these traits. The verse highlights the importance of compassion and truthfulness in overcoming the evils of the world, represented by Aghasura, Kali, and Kamsa.
स्वयं साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही गोषरूप में लीला-विग्रह का रूप धारण किये हुए हैं। यह नश्वर जगत् माया से ग्रसित है, इस कारण उसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण की माया का रहस्य जानना बहुत ही दुष्कर है। वह प्रभु की माया सभी देवताओं के लिए भी दुर्जय है। जिन भगवान् की माया के वश में होकर ब्रह्मा जी लकुटी का रूप धारण किए हुए हैं तथा जिन्होंने भगवान् शिव को वंशी बनने के लिए विवश कर रखा है, उन प्रभु की माया को सामान्य जगत् किस प्रकार जान सकता है? निश्चित रूप से देवों का जो ज्ञान युक्त थल है, उसे भगवान् की माया ने क्षण भर में हरण कर लिया है। श्रीशेषनाग जी श्री बलराम के रूप में जन्मे और सनातन ब्रह्म हो भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए। भगवान् श्रीकृष्ण की रुक्मिणी आदि सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ ही वेदों की ऋचाएँ एवं उपनिषद् हैं, इनके अतिरिक्त वेदों की जो ब्रह्म स्वरूपा ऋचाएँ हैं, वे सभी ब्रजभूमि में गोपिकाओं के रूप में अवतरित हुई। द्वेष ही चाणूर मल्ल के रूप में है, मत्सर ही दुर्जय मुष्टिक रूप में तथा दर्प ही कुवलयापीड हाथी के रूप में प्रकट हुआ है। गर्व ही आकाश में गमन करने वाले बकासुर राक्षस के रूप में अवतरित हुआ। माता रोहिणी के रूप में दया का प्राकट्य हुआ है और माँ पृथ्वी ही सत्यभामा के रूप में अवतरित हुई हैं। अघासुर के रूप में महाव्याधि और स्वयं साक्षात् कलि ही राजा कंस के रूप में प्रकट हुआ। श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा जी ही 'शम्' हैं, सत्य के रूप में अक्रूर जी और दम के रूप में उद्धवजी उत्पन्न हुए। शंख स्वयं विष्णुरूप है और लक्ष्मी का भ्राता होने के कारण वह लक्ष्मी रूप भी है, उसका प्राकट्य क्षीरसागर से हुआ है। मेघ के सदृश उसका गम्भीर घोष नाद है। भगवान् ने दूध दही के भण्डार से युक्त जो मटके फोड़े तथा उन मटकों से जो दूध दही प्रवाहित हुआ, उसके रूप में भगवान् ने स्वयं साक्षात् क्षीरसागर को ही प्रादुर्भुत किया है और वे ( भगवान् श्रीकृष्ण) उस महासागर में बालक रुप में अवस्थित हो पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे हैं। शत्रुओं के शमन एवं साधुजनों के संरक्षण में वे पूर्णरूपेण तत्पर रहते हैं। समस्त भूत प्राणियों पर अहैतुकी कृपा करने के लिए एवं अपने आत्मज स्वरूप धर्म के अभ्युदय हेतु ही भगवान् श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ है, ऐसा ही जानना चाहिए। भगवान् महाकाल (शिव) ने श्रीहरि को समर्पित करने के लिए जिस चक्र को उत्पन्न किया था, भगवान् ( श्री कृष्ण) के हाथ में शोभायमान वह चक्र भी ब्रह्ममय ही है।।
Verse १६
शमो मित्रः सुदामा च सत्याक्रूरोद्धवो दमः ।यः शङ्खः स स्वयं विष्णुर्लक्ष्मीरूपो व्यवस्थितः ॥
śamo mitraḥ sudāmā ca satyākrūroddhavo damaḥ ।yaḥ śaṅkhaḥ sa svayaṃ viṣṇurlakṣmīrūpo vyavasthitaḥ ॥
This verse from the Bhagavata Purana describes the different aspects of Vishnu: "Peace (Shama) is his friend, Sudama is his faithful companion, Satyaki is his courageous warrior, Uddhava is his devoted servant, and Restraint (Dama) is his control. The Conch (Shankha) itself is Vishnu, with Lakshmi residing by his side." Here's a breakdown of the translation: * शमो मित्रः (Shamo Mitra): Peace (Shama) is his friend. * सुदामा च (Sudama cha): Sudama is his faithful companion. * सत्याक्रूरोद्धवो दमः (Satyakruroddhava dama): Satyaki is his courageous warrior, Uddhava is his devoted servant, and Restraint (Dama) is his control. * यः शङ्खः स स्वयं विष्णुर्लक्ष्मीरूपो व्यवस्थितः (Yah Shankhah Sa Swayam Vishnu Lakshmirupo Vyavasthitah): The Conch (Shankha) itself is Vishnu, with Lakshmi residing by his side. This verse highlights the multifaceted nature of Vishnu and his divine attributes, emphasizing his association with peace, friendship, loyalty, courage, devotion, and control. The conch shell, a symbol of Vishnu, is also seen as an embodiment of his divine presence.
स्वयं साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही गोषरूप में लीला-विग्रह का रूप धारण किये हुए हैं। यह नश्वर जगत् माया से ग्रसित है, इस कारण उसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण की माया का रहस्य जानना बहुत ही दुष्कर है। वह प्रभु की माया सभी देवताओं के लिए भी दुर्जय है। जिन भगवान् की माया के वश में होकर ब्रह्मा जी लकुटी का रूप धारण किए हुए हैं तथा जिन्होंने भगवान् शिव को वंशी बनने के लिए विवश कर रखा है, उन प्रभु की माया को सामान्य जगत् किस प्रकार जान सकता है? निश्चित रूप से देवों का जो ज्ञान युक्त थल है, उसे भगवान् की माया ने क्षण भर में हरण कर लिया है। श्रीशेषनाग जी श्री बलराम के रूप में जन्मे और सनातन ब्रह्म हो भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए। भगवान् श्रीकृष्ण की रुक्मिणी आदि सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ ही वेदों की ऋचाएँ एवं उपनिषद् हैं, इनके अतिरिक्त वेदों की जो ब्रह्म स्वरूपा ऋचाएँ हैं, वे सभी ब्रजभूमि में गोपिकाओं के रूप में अवतरित हुई। द्वेष ही चाणूर मल्ल के रूप में है, मत्सर ही दुर्जय मुष्टिक रूप में तथा दर्प ही कुवलयापीड हाथी के रूप में प्रकट हुआ है। गर्व ही आकाश में गमन करने वाले बकासुर राक्षस के रूप में अवतरित हुआ। माता रोहिणी के रूप में दया का प्राकट्य हुआ है और माँ पृथ्वी ही सत्यभामा के रूप में अवतरित हुई हैं। अघासुर के रूप में महाव्याधि और स्वयं साक्षात् कलि ही राजा कंस के रूप में प्रकट हुआ। श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा जी ही 'शम्' हैं, सत्य के रूप में अक्रूर जी और दम के रूप में उद्धवजी उत्पन्न हुए। शंख स्वयं विष्णुरूप है और लक्ष्मी का भ्राता होने के कारण वह लक्ष्मी रूप भी है, उसका प्राकट्य क्षीरसागर से हुआ है। मेघ के सदृश उसका गम्भीर घोष नाद है। भगवान् ने दूध दही के भण्डार से युक्त जो मटके फोड़े तथा उन मटकों से जो दूध दही प्रवाहित हुआ, उसके रूप में भगवान् ने स्वयं साक्षात् क्षीरसागर को ही प्रादुर्भुत किया है और वे ( भगवान् श्रीकृष्ण) उस महासागर में बालक रुप में अवस्थित हो पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे हैं। शत्रुओं के शमन एवं साधुजनों के संरक्षण में वे पूर्णरूपेण तत्पर रहते हैं। समस्त भूत प्राणियों पर अहैतुकी कृपा करने के लिए एवं अपने आत्मज स्वरूप धर्म के अभ्युदय हेतु ही भगवान् श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ है, ऐसा ही जानना चाहिए। भगवान् महाकाल (शिव) ने श्रीहरि को समर्पित करने के लिए जिस चक्र को उत्पन्न किया था, भगवान् ( श्री कृष्ण) के हाथ में शोभायमान वह चक्र भी ब्रह्ममय ही है।।
Verse १७
दुग्धसिन्धौ समुत्पन्नो मेघघोषस्तु संस्मृतः।दुग्धोदधिः कृतस्तेन भग्नभाण्डो दधिग्रहे॥
dugdhasindhau samutpanno meghaghoṣastu saṃsmṛtaḥ।dugdhodadhiḥ kṛtastena bhagnabhāṇḍo dadhigrahe॥
The verse you provided describes a scenario where a thunderous sound, reminiscent of thunder, arose from a sea of milk. This sound was caused by a pot of curd that was broken in a house filled with milk and curd. Here's a more literal translation: * दुग्धसिन्धौ समुत्पन्नो मेघघोषस्तु संस्मृतः: It is remembered that a thunderous sound like clouds arose from the sea of milk. * दुग्धोदधिः कृतस्तेन भग्नभाण्डो दधिग्रहे: A pot of curd was broken in the house of curd, by that (sound). Overall meaning: A thunderous sound, similar to thunder, erupted from a house filled with milk and curd, caused by a broken pot of curd.
स्वयं साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही गोषरूप में लीला-विग्रह का रूप धारण किये हुए हैं। यह नश्वर जगत् माया से ग्रसित है, इस कारण उसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण की माया का रहस्य जानना बहुत ही दुष्कर है। वह प्रभु की माया सभी देवताओं के लिए भी दुर्जय है। जिन भगवान् की माया के वश में होकर ब्रह्मा जी लकुटी का रूप धारण किए हुए हैं तथा जिन्होंने भगवान् शिव को वंशी बनने के लिए विवश कर रखा है, उन प्रभु की माया को सामान्य जगत् किस प्रकार जान सकता है? निश्चित रूप से देवों का जो ज्ञान युक्त थल है, उसे भगवान् की माया ने क्षण भर में हरण कर लिया है। श्रीशेषनाग जी श्री बलराम के रूप में जन्मे और सनातन ब्रह्म हो भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए। भगवान् श्रीकृष्ण की रुक्मिणी आदि सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ ही वेदों की ऋचाएँ एवं उपनिषद् हैं, इनके अतिरिक्त वेदों की जो ब्रह्म स्वरूपा ऋचाएँ हैं, वे सभी ब्रजभूमि में गोपिकाओं के रूप में अवतरित हुई। द्वेष ही चाणूर मल्ल के रूप में है, मत्सर ही दुर्जय मुष्टिक रूप में तथा दर्प ही कुवलयापीड हाथी के रूप में प्रकट हुआ है। गर्व ही आकाश में गमन करने वाले बकासुर राक्षस के रूप में अवतरित हुआ। माता रोहिणी के रूप में दया का प्राकट्य हुआ है और माँ पृथ्वी ही सत्यभामा के रूप में अवतरित हुई हैं। अघासुर के रूप में महाव्याधि और स्वयं साक्षात् कलि ही राजा कंस के रूप में प्रकट हुआ। श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा जी ही 'शम्' हैं, सत्य के रूप में अक्रूर जी और दम के रूप में उद्धवजी उत्पन्न हुए। शंख स्वयं विष्णुरूप है और लक्ष्मी का भ्राता होने के कारण वह लक्ष्मी रूप भी है, उसका प्राकट्य क्षीरसागर से हुआ है। मेघ के सदृश उसका गम्भीर घोष नाद है। भगवान् ने दूध दही के भण्डार से युक्त जो मटके फोड़े तथा उन मटकों से जो दूध दही प्रवाहित हुआ, उसके रूप में भगवान् ने स्वयं साक्षात् क्षीरसागर को ही प्रादुर्भुत किया है और वे ( भगवान् श्रीकृष्ण) उस महासागर में बालक रुप में अवस्थित हो पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे हैं। शत्रुओं के शमन एवं साधुजनों के संरक्षण में वे पूर्णरूपेण तत्पर रहते हैं। समस्त भूत प्राणियों पर अहैतुकी कृपा करने के लिए एवं अपने आत्मज स्वरूप धर्म के अभ्युदय हेतु ही भगवान् श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ है, ऐसा ही जानना चाहिए। भगवान् महाकाल (शिव) ने श्रीहरि को समर्पित करने के लिए जिस चक्र को उत्पन्न किया था, भगवान् ( श्री कृष्ण) के हाथ में शोभायमान वह चक्र भी ब्रह्ममय ही है।।
Verse १८
क्रीडते बालको भूत्वा पूर्ववत्सुमहोदधौ।संहारार्थं च शत्रूणां रक्षणाय च संस्थितः ॥
krīḍate bālako bhūtvā pūrvavatsumahodadhau।saṃhārārthaṃ ca śatrūṇāṃ rakṣaṇāya ca saṃsthitaḥ ॥
The verse you provided translates to: "Playing as a child, as before, in the vast ocean. Established for the destruction of enemies and for protection." Here is a breakdown of the translation: * क्रीडते बालको भूत्वा पूर्ववत्सुमहोदधौ: "Playing as a child, as before, in the vast ocean." * क्रीडते: plays * बालको भूत्वा: having become a child * पूर्ववत्: as before * सुमहोदधौ: in the vast ocean * संहारार्थं च शत्रूणां रक्षणाय च संस्थितः: "Established for the destruction of enemies and for protection." * संहारार्थं: for the purpose of destruction * शत्रूणां: of enemies * रक्षणाय: for protection * संस्थितः: established This verse likely describes a powerful being who can take on the form of a child and play in the ocean. The being is established for both the destruction of enemies and the protection of others.
स्वयं साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही गोषरूप में लीला-विग्रह का रूप धारण किये हुए हैं। यह नश्वर जगत् माया से ग्रसित है, इस कारण उसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण की माया का रहस्य जानना बहुत ही दुष्कर है। वह प्रभु की माया सभी देवताओं के लिए भी दुर्जय है। जिन भगवान् की माया के वश में होकर ब्रह्मा जी लकुटी का रूप धारण किए हुए हैं तथा जिन्होंने भगवान् शिव को वंशी बनने के लिए विवश कर रखा है, उन प्रभु की माया को सामान्य जगत् किस प्रकार जान सकता है? निश्चित रूप से देवों का जो ज्ञान युक्त थल है, उसे भगवान् की माया ने क्षण भर में हरण कर लिया है। श्रीशेषनाग जी श्री बलराम के रूप में जन्मे और सनातन ब्रह्म हो भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए। भगवान् श्रीकृष्ण की रुक्मिणी आदि सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ ही वेदों की ऋचाएँ एवं उपनिषद् हैं, इनके अतिरिक्त वेदों की जो ब्रह्म स्वरूपा ऋचाएँ हैं, वे सभी ब्रजभूमि में गोपिकाओं के रूप में अवतरित हुई। द्वेष ही चाणूर मल्ल के रूप में है, मत्सर ही दुर्जय मुष्टिक रूप में तथा दर्प ही कुवलयापीड हाथी के रूप में प्रकट हुआ है। गर्व ही आकाश में गमन करने वाले बकासुर राक्षस के रूप में अवतरित हुआ। माता रोहिणी के रूप में दया का प्राकट्य हुआ है और माँ पृथ्वी ही सत्यभामा के रूप में अवतरित हुई हैं। अघासुर के रूप में महाव्याधि और स्वयं साक्षात् कलि ही राजा कंस के रूप में प्रकट हुआ। श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा जी ही 'शम्' हैं, सत्य के रूप में अक्रूर जी और दम के रूप में उद्धवजी उत्पन्न हुए। शंख स्वयं विष्णुरूप है और लक्ष्मी का भ्राता होने के कारण वह लक्ष्मी रूप भी है, उसका प्राकट्य क्षीरसागर से हुआ है। मेघ के सदृश उसका गम्भीर घोष नाद है। भगवान् ने दूध दही के भण्डार से युक्त जो मटके फोड़े तथा उन मटकों से जो दूध दही प्रवाहित हुआ, उसके रूप में भगवान् ने स्वयं साक्षात् क्षीरसागर को ही प्रादुर्भुत किया है और वे ( भगवान् श्रीकृष्ण) उस महासागर में बालक रुप में अवस्थित हो पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे हैं। शत्रुओं के शमन एवं साधुजनों के संरक्षण में वे पूर्णरूपेण तत्पर रहते हैं। समस्त भूत प्राणियों पर अहैतुकी कृपा करने के लिए एवं अपने आत्मज स्वरूप धर्म के अभ्युदय हेतु ही भगवान् श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ है, ऐसा ही जानना चाहिए। भगवान् महाकाल (शिव) ने श्रीहरि को समर्पित करने के लिए जिस चक्र को उत्पन्न किया था, भगवान् ( श्री कृष्ण) के हाथ में शोभायमान वह चक्र भी ब्रह्ममय ही है।।
Verse १९
कृपार्थं सर्वभूतानां गोप्तारं धर्ममात्मजम्। यत्स्रष्टुमीश्वरेणासीत्तच्चक्रं ब्रह्मरूपधृक् ॥
kṛpārthaṃ sarvabhūtānāṃ goptāraṃ dharmamātmajam। yatsraṣṭumīśvareṇāsīttaccakraṃ brahmarūpadhṛk ॥
"For the sake of the welfare of all beings, the Dharma (righteousness) is born from the Self (of the Supreme Being), which is the protector. The same Dharma is the wheel (of creation) that is held by the Supreme Lord, and it is the embodiment of Brahman (the ultimate reality)."
स्वयं साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही गोषरूप में लीला-विग्रह का रूप धारण किये हुए हैं। यह नश्वर जगत् माया से ग्रसित है, इस कारण उसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण की माया का रहस्य जानना बहुत ही दुष्कर है। वह प्रभु की माया सभी देवताओं के लिए भी दुर्जय है। जिन भगवान् की माया के वश में होकर ब्रह्मा जी लकुटी का रूप धारण किए हुए हैं तथा जिन्होंने भगवान् शिव को वंशी बनने के लिए विवश कर रखा है, उन प्रभु की माया को सामान्य जगत् किस प्रकार जान सकता है? निश्चित रूप से देवों का जो ज्ञान युक्त थल है, उसे भगवान् की माया ने क्षण भर में हरण कर लिया है। श्रीशेषनाग जी श्री बलराम के रूप में जन्मे और सनातन ब्रह्म हो भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए। भगवान् श्रीकृष्ण की रुक्मिणी आदि सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ ही वेदों की ऋचाएँ एवं उपनिषद् हैं, इनके अतिरिक्त वेदों की जो ब्रह्म स्वरूपा ऋचाएँ हैं, वे सभी ब्रजभूमि में गोपिकाओं के रूप में अवतरित हुई। द्वेष ही चाणूर मल्ल के रूप में है, मत्सर ही दुर्जय मुष्टिक रूप में तथा दर्प ही कुवलयापीड हाथी के रूप में प्रकट हुआ है। गर्व ही आकाश में गमन करने वाले बकासुर राक्षस के रूप में अवतरित हुआ। माता रोहिणी के रूप में दया का प्राकट्य हुआ है और माँ पृथ्वी ही सत्यभामा के रूप में अवतरित हुई हैं। अघासुर के रूप में महाव्याधि और स्वयं साक्षात् कलि ही राजा कंस के रूप में प्रकट हुआ। श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा जी ही 'शम्' हैं, सत्य के रूप में अक्रूर जी और दम के रूप में उद्धवजी उत्पन्न हुए। शंख स्वयं विष्णुरूप है और लक्ष्मी का भ्राता होने के कारण वह लक्ष्मी रूप भी है, उसका प्राकट्य क्षीरसागर से हुआ है। मेघ के सदृश उसका गम्भीर घोष नाद है। भगवान् ने दूध दही के भण्डार से युक्त जो मटके फोड़े तथा उन मटकों से जो दूध दही प्रवाहित हुआ, उसके रूप में भगवान् ने स्वयं साक्षात् क्षीरसागर को ही प्रादुर्भुत किया है और वे ( भगवान् श्रीकृष्ण) उस महासागर में बालक रुप में अवस्थित हो पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे हैं। शत्रुओं के शमन एवं साधुजनों के संरक्षण में वे पूर्णरूपेण तत्पर रहते हैं। समस्त भूत प्राणियों पर अहैतुकी कृपा करने के लिए एवं अपने आत्मज स्वरूप धर्म के अभ्युदय हेतु ही भगवान् श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ है, ऐसा ही जानना चाहिए। भगवान् महाकाल (शिव) ने श्रीहरि को समर्पित करने के लिए जिस चक्र को उत्पन्न किया था, भगवान् ( श्री कृष्ण) के हाथ में शोभायमान वह चक्र भी ब्रह्ममय ही है।।
Verse २०
जयन्तीसंभवो वायुश्चमरो धर्मसंज्ञितः ।यस्यासौ ज्वलनाभासः खड्गरूपो महेश्वरः ।।
jayantīsaṃbhavo vāyuścamaro dharmasaṃjñitaḥ ।yasyāsau jvalanābhāsaḥ khaḍgarūpo maheśvaraḥ ।।
The verse you provided is from the Bhagavad Gita (Chapter 11, Verse 21) and translates to: "Whose splendor is like blazing fire, whose form is like a sword, whose birth is from Jayanti, whose breath is wind, whose name is Dharma (righteousness), He is Mahesvara (the great Lord). Here's a breakdown of the translation: * जयन्तीसंभवो (Jayanti-sanbhavo): Born from Jayanti (a name associated with the goddess Durga) * वायुश्चमरो (Vayu-schamaro): Whose breath is wind * धर्मसंज्ञितः (Dharma-sanjnitah): Whose name is Dharma (righteousness) * यस्यासौ ज्वलनाभासः (Yasyasau jvalana-abhasah): Whose splendor is like blazing fire * खड्गरूपो महेश्वरः (Khadgara-roopo Mahesvarah): Whose form is like a sword, He is Mahesvara (the great Lord) This verse describes the fierce and powerful form of Lord Shiva, who is being praised by Arjuna in the Bhagavad Gita.
धर्म ने चँवर का रूप धारण किया है, वायुदेव वैजयन्ती माला के रूप में उत्पन्न हुए हैं और महेश्वर ने अग्नि की भाँति चमकते हुए खड्ग का रूप स्वीकार किया है। नन्द जी के घर में कश्यप ऋषि ऊखल के रूप में प्रतिष्ठित हैं तथा माता अदिति रस्सी के रूप में प्रकट हुई हैं। जिस प्रकार समस्त अक्षरों के ऊपर अनुस्वार सुशोभित होता है, वैसे ही सभी के ऊपर जो शोभायमान आकाश है, उसको ही भगवान् श्रीकृष्ण का छत्र समझना चाहिए। व्यास, वाल्मीकि आदि ज्ञानी महात्माजन देवों के जितने रूपों का वर्णन करते हैं और जिनजिन को लोग देवरूप में समझ कर नमन-वंदन करते हैं, वे समस्त देवगण भगवान् श्रीकृष्ण का ही एक मात्र अवलम्बन प्राप्त करते हैं। भगवान् के हाथ की गदा सम्पूर्ण शत्रुओं को विनष्ट करने वाली साक्षात् कालिका है। शार्ङ्रधनुष के रूप में स्वयं वैष्णवी माया ही उपस्थित है तथा प्राणों का संहार करने वाला काल ही भगवान् का बाण है। इस विश्व-वसुधा के बीज स्वरूप कमल को भगवान ने लीलापूर्वक हाथ में ग्रहण किया है। भाण्डीर वट का रुप। गरुड़ ने धारण कर रखा है और देवर्षि नारद उनके सुदामा नामक सखा के रूप में अवतरित हुए हैं। भक्ति ने वृन्दा का रूप धारण किया है। समस्त भूत-प्राणियों को प्रकाश प्रदान करने वाली जो बुद्धि है, वही भगवान् की क्रियाशक्ति है। इस कारण ये गोप एवं गोपिकाएँ आदि सभी भगवान् श्रीकृष्ण से अलग नहीं हैं। तथा विभु-परमात्मा श्रीकृष्ण भी इन सभी से अलग नहीं हैं। उन भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वर्गवासियों को एवं समस्त वैकुण्ठ धाम को पृथिवीतल पर अवतरित कर लिया है, जो भी मनुष्य इस तरह से उन भगवान् को जानता है, वह समस्त तीर्थों के फल को प्राप्त कर लेता है और शारीरिक-बन्धनों से मुक्त हो जाता है, ऐसी ही यह उपनिषद् है।।
Verse २१
कश्यपोलूखलः ख्यातो रज्जुर्माताऽदितिस्तथा।चक्रं शङ्खं च संसिद्धिं बिन्दुं च सर्वमूर्धनि ।।
kaśyapolūkhalaḥ khyāto rajjurmātā'ditistathā।cakraṃ śaṅkhaṃ ca saṃsiddhiṃ binduṃ ca sarvamūrdhani ।।
The verse you provided is a description of Vishnu, the Hindu deity, based on the iconography associated with him. Here's a translation: "Kashaya (red) loincloth, a shell (shankha) in hand, Aditi as mother, a discus (chakra) and conch (shankha), prosperity (siddhi), and a mark (bindu) - all are on his head." Explanation: * Kashaya (red) loincloth (oolukhalah): Vishnu is often depicted wearing a yellow or red dhoti (loincloth). This refers to his traditional attire. * Rajjurmata Aditi (Ropes and Aditi as mother): "Rajju" can be interpreted as "ropes," but here it likely refers to the "Sudarshana Chakra," Vishnu's weapon. Aditi, a celestial being, is considered his mother. * Chakra (discus) and Shankha (conch): These are two of Vishnu's primary weapons and symbols of his power. * Siddhi (Prosperity) and Bindu (Mark): These refer to auspicious symbols often depicted on Vishnu's head. The "bindu" (dot) might represent the "Srivatsa" mark on his chest. This verse describes a traditional iconography of Vishnu, highlighting his attributes and emphasizing his divinity.
धर्म ने चँवर का रूप धारण किया है, वायुदेव वैजयन्ती माला के रूप में उत्पन्न हुए हैं और महेश्वर ने अग्नि की भाँति चमकते हुए खड्ग का रूप स्वीकार किया है। नन्द जी के घर में कश्यप ऋषि ऊखल के रूप में प्रतिष्ठित हैं तथा माता अदिति रस्सी के रूप में प्रकट हुई हैं। जिस प्रकार समस्त अक्षरों के ऊपर अनुस्वार सुशोभित होता है, वैसे ही सभी के ऊपर जो शोभायमान आकाश है, उसको ही भगवान् श्रीकृष्ण का छत्र समझना चाहिए। व्यास, वाल्मीकि आदि ज्ञानी महात्माजन देवों के जितने रूपों का वर्णन करते हैं और जिनजिन को लोग देवरूप में समझ कर नमन-वंदन करते हैं, वे समस्त देवगण भगवान् श्रीकृष्ण का ही एक मात्र अवलम्बन प्राप्त करते हैं। भगवान् के हाथ की गदा सम्पूर्ण शत्रुओं को विनष्ट करने वाली साक्षात् कालिका है। शार्ङ्रधनुष के रूप में स्वयं वैष्णवी माया ही उपस्थित है तथा प्राणों का संहार करने वाला काल ही भगवान् का बाण है। इस विश्व-वसुधा के बीज स्वरूप कमल को भगवान ने लीलापूर्वक हाथ में ग्रहण किया है। भाण्डीर वट का रुप। गरुड़ ने धारण कर रखा है और देवर्षि नारद उनके सुदामा नामक सखा के रूप में अवतरित हुए हैं। भक्ति ने वृन्दा का रूप धारण किया है। समस्त भूत-प्राणियों को प्रकाश प्रदान करने वाली जो बुद्धि है, वही भगवान् की क्रियाशक्ति है। इस कारण ये गोप एवं गोपिकाएँ आदि सभी भगवान् श्रीकृष्ण से अलग नहीं हैं। तथा विभु-परमात्मा श्रीकृष्ण भी इन सभी से अलग नहीं हैं। उन भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वर्गवासियों को एवं समस्त वैकुण्ठ धाम को पृथिवीतल पर अवतरित कर लिया है, जो भी मनुष्य इस तरह से उन भगवान् को जानता है, वह समस्त तीर्थों के फल को प्राप्त कर लेता है और शारीरिक-बन्धनों से मुक्त हो जाता है, ऐसी ही यह उपनिषद् है।।
Verse २२
यावन्ति देवरूपाणि वदन्ति विबुधा जनाः।नमन्ति देवरूपेभ्य एवमादि न संशयः ।।
yāvanti devarūpāṇi vadanti vibudhā janāḥ।namanti devarūpebhya evamādi na saṃśayaḥ ।।
The verse you provided is a Sanskrit shloka from the Bhagavad Gita. Here is the translation: "As many forms of the Divine are spoken of by the learned, so do people worship those forms. There is no doubt about it." Explanation: * यावन्ति देवरूपाणि (yaavanti devaroopaani) - "As many forms of the Divine" * वदन्ति विबुधा जनाः (vadanti vibudhaa janaah) - "are spoken of by the learned people" * नमन्ति देवरूपेभ्यः (namanti devaroopebhyah) - "people worship those forms" * एवमादि न संशयः (evamaadi na samshayah) - "There is no doubt about it." This shloka emphasizes the diverse nature of the Divine and how different people experience and worship God in various forms.
धर्म ने चँवर का रूप धारण किया है, वायुदेव वैजयन्ती माला के रूप में उत्पन्न हुए हैं और महेश्वर ने अग्नि की भाँति चमकते हुए खड्ग का रूप स्वीकार किया है। नन्द जी के घर में कश्यप ऋषि ऊखल के रूप में प्रतिष्ठित हैं तथा माता अदिति रस्सी के रूप में प्रकट हुई हैं। जिस प्रकार समस्त अक्षरों के ऊपर अनुस्वार सुशोभित होता है, वैसे ही सभी के ऊपर जो शोभायमान आकाश है, उसको ही भगवान् श्रीकृष्ण का छत्र समझना चाहिए। व्यास, वाल्मीकि आदि ज्ञानी महात्माजन देवों के जितने रूपों का वर्णन करते हैं और जिनजिन को लोग देवरूप में समझ कर नमन-वंदन करते हैं, वे समस्त देवगण भगवान् श्रीकृष्ण का ही एक मात्र अवलम्बन प्राप्त करते हैं। भगवान् के हाथ की गदा सम्पूर्ण शत्रुओं को विनष्ट करने वाली साक्षात् कालिका है। शार्ङ्रधनुष के रूप में स्वयं वैष्णवी माया ही उपस्थित है तथा प्राणों का संहार करने वाला काल ही भगवान् का बाण है। इस विश्व-वसुधा के बीज स्वरूप कमल को भगवान ने लीलापूर्वक हाथ में ग्रहण किया है। भाण्डीर वट का रुप। गरुड़ ने धारण कर रखा है और देवर्षि नारद उनके सुदामा नामक सखा के रूप में अवतरित हुए हैं। भक्ति ने वृन्दा का रूप धारण किया है। समस्त भूत-प्राणियों को प्रकाश प्रदान करने वाली जो बुद्धि है, वही भगवान् की क्रियाशक्ति है। इस कारण ये गोप एवं गोपिकाएँ आदि सभी भगवान् श्रीकृष्ण से अलग नहीं हैं। तथा विभु-परमात्मा श्रीकृष्ण भी इन सभी से अलग नहीं हैं। उन भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वर्गवासियों को एवं समस्त वैकुण्ठ धाम को पृथिवीतल पर अवतरित कर लिया है, जो भी मनुष्य इस तरह से उन भगवान् को जानता है, वह समस्त तीर्थों के फल को प्राप्त कर लेता है और शारीरिक-बन्धनों से मुक्त हो जाता है, ऐसी ही यह उपनिषद् है।।
Verse २३
गदा च कालिका साक्षात्सर्वशत्रुनिबर्हणी।धनुः शार्ङंग स्वमाया च शरत्कालः सुभोजनः ।।
gadā ca kālikā sākṣātsarvaśatrunibarhaṇī।dhanuḥ śārṅaṃga svamāyā ca śaratkālaḥ subhojanaḥ ।।
The verse you provided is from the Bhagavata Purana (10.48.11), describing Krishna's divine attributes. Here's the translation: "His mace is Kālika, directly annihilating all enemies. His bow is Sharṅga, his illusion is his own, and autumn is his season for good food." Here's a breakdown: * गदा च कालिका साक्षात्सर्वशत्रुनिबर्हणी - "His mace is Kālika, directly annihilating all enemies." * गदा (gada) - mace * कालिका (Kālika) - a powerful mace, specifically mentioned in the Puranas * साक्षात् (sākṣāt) - directly, personally * सर्वशत्रुनिबर्हणी (sarva-śatrū-nibarhaṇī) - annihilating all enemies * धनुः शार्ङंग स्वमाया च शरत्कालः सुभोजनः ।। - "His bow is Sharṅga, his illusion is his own, and autumn is his season for good food." * धनुः (dhanuḥ) - bow * शार्ङंग (Sharṅga) - the divine bow of Vishnu, often used by Krishna * स्वमाया (svamāyā) - his own illusion (referring to his divine powers) * शरत्कालः (śaratkālaḥ) - autumn (Krishna is often depicted as having a fondness for the autumn season) * सुभोजनः (subhojanaḥ) - good food This verse describes Krishna's divine attributes in a poetic way, emphasizing his power, his mastery over illusion, and his enjoyment of the simple pleasures of life.
धर्म ने चँवर का रूप धारण किया है, वायुदेव वैजयन्ती माला के रूप में उत्पन्न हुए हैं और महेश्वर ने अग्नि की भाँति चमकते हुए खड्ग का रूप स्वीकार किया है। नन्द जी के घर में कश्यप ऋषि ऊखल के रूप में प्रतिष्ठित हैं तथा माता अदिति रस्सी के रूप में प्रकट हुई हैं। जिस प्रकार समस्त अक्षरों के ऊपर अनुस्वार सुशोभित होता है, वैसे ही सभी के ऊपर जो शोभायमान आकाश है, उसको ही भगवान् श्रीकृष्ण का छत्र समझना चाहिए। व्यास, वाल्मीकि आदि ज्ञानी महात्माजन देवों के जितने रूपों का वर्णन करते हैं और जिनजिन को लोग देवरूप में समझ कर नमन-वंदन करते हैं, वे समस्त देवगण भगवान् श्रीकृष्ण का ही एक मात्र अवलम्बन प्राप्त करते हैं। भगवान् के हाथ की गदा सम्पूर्ण शत्रुओं को विनष्ट करने वाली साक्षात् कालिका है। शार्ङ्रधनुष के रूप में स्वयं वैष्णवी माया ही उपस्थित है तथा प्राणों का संहार करने वाला काल ही भगवान् का बाण है। इस विश्व-वसुधा के बीज स्वरूप कमल को भगवान ने लीलापूर्वक हाथ में ग्रहण किया है। भाण्डीर वट का रुप। गरुड़ ने धारण कर रखा है और देवर्षि नारद उनके सुदामा नामक सखा के रूप में अवतरित हुए हैं। भक्ति ने वृन्दा का रूप धारण किया है। समस्त भूत-प्राणियों को प्रकाश प्रदान करने वाली जो बुद्धि है, वही भगवान् की क्रियाशक्ति है। इस कारण ये गोप एवं गोपिकाएँ आदि सभी भगवान् श्रीकृष्ण से अलग नहीं हैं। तथा विभु-परमात्मा श्रीकृष्ण भी इन सभी से अलग नहीं हैं। उन भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वर्गवासियों को एवं समस्त वैकुण्ठ धाम को पृथिवीतल पर अवतरित कर लिया है, जो भी मनुष्य इस तरह से उन भगवान् को जानता है, वह समस्त तीर्थों के फल को प्राप्त कर लेता है और शारीरिक-बन्धनों से मुक्त हो जाता है, ऐसी ही यह उपनिषद् है।।
Text (part 3)
Verse २४
अब्जकाण्डं जगद्वीजं धृतं पाणौ स्वलीलया।गरुडो वटभाण्डीरः सुदामा नारदो मुनिः ।।
abjakāṇḍaṃ jagadvījaṃ dhṛtaṃ pāṇau svalīlayā।garuḍo vaṭabhāṇḍīraḥ sudāmā nārado muniḥ ।।
This verse describes the power and greatness of Lord Vishnu. Here is a translation: "Holding the lotus seed, the origin of the universe, in his hand, effortlessly, Garuda, the carrier of Vishnu, is the great benefactor. Sudama, the sage Narada, all are but his divine play." Here's a breakdown of the translation: * अब्जकाण्डं: The lotus seed (abja) is a symbol of the universe (kaanda). * जगद्वीजं: The seed of the universe. * धृतं पाणौ: Held in the hand (of Vishnu). * स्वलीलया: Effortlessly, by his own divine play. * गरुडो वटभाण्डीरः: Garuda, the carrier of Vishnu, is the great benefactor (vatbhaandira). * सुदामा नारदो मुनिः: Sudama and Narada, two sages, are considered as his divine play (lila). The verse emphasizes that Vishnu holds the universe in his hands, creating and maintaining it effortlessly. The devotees, like Garuda, Sudama, and Narada, are all part of his divine play.
धर्म ने चँवर का रूप धारण किया है, वायुदेव वैजयन्ती माला के रूप में उत्पन्न हुए हैं और महेश्वर ने अग्नि की भाँति चमकते हुए खड्ग का रूप स्वीकार किया है। नन्द जी के घर में कश्यप ऋषि ऊखल के रूप में प्रतिष्ठित हैं तथा माता अदिति रस्सी के रूप में प्रकट हुई हैं। जिस प्रकार समस्त अक्षरों के ऊपर अनुस्वार सुशोभित होता है, वैसे ही सभी के ऊपर जो शोभायमान आकाश है, उसको ही भगवान् श्रीकृष्ण का छत्र समझना चाहिए। व्यास, वाल्मीकि आदि ज्ञानी महात्माजन देवों के जितने रूपों का वर्णन करते हैं और जिनजिन को लोग देवरूप में समझ कर नमन-वंदन करते हैं, वे समस्त देवगण भगवान् श्रीकृष्ण का ही एक मात्र अवलम्बन प्राप्त करते हैं। भगवान् के हाथ की गदा सम्पूर्ण शत्रुओं को विनष्ट करने वाली साक्षात् कालिका है। शार्ङ्रधनुष के रूप में स्वयं वैष्णवी माया ही उपस्थित है तथा प्राणों का संहार करने वाला काल ही भगवान् का बाण है। इस विश्व-वसुधा के बीज स्वरूप कमल को भगवान ने लीलापूर्वक हाथ में ग्रहण किया है। भाण्डीर वट का रुप। गरुड़ ने धारण कर रखा है और देवर्षि नारद उनके सुदामा नामक सखा के रूप में अवतरित हुए हैं। भक्ति ने वृन्दा का रूप धारण किया है। समस्त भूत-प्राणियों को प्रकाश प्रदान करने वाली जो बुद्धि है, वही भगवान् की क्रियाशक्ति है। इस कारण ये गोप एवं गोपिकाएँ आदि सभी भगवान् श्रीकृष्ण से अलग नहीं हैं। तथा विभु-परमात्मा श्रीकृष्ण भी इन सभी से अलग नहीं हैं। उन भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वर्गवासियों को एवं समस्त वैकुण्ठ धाम को पृथिवीतल पर अवतरित कर लिया है, जो भी मनुष्य इस तरह से उन भगवान् को जानता है, वह समस्त तीर्थों के फल को प्राप्त कर लेता है और शारीरिक-बन्धनों से मुक्त हो जाता है, ऐसी ही यह उपनिषद् है।।
Verse २५
वृन्दा भक्तिः क्रिया बुद्धिः सर्वजन्तुप्रकाशिनी। तस्मान्न भिन्नं नाभिन्नमाभिर्भिन्नो न वै विभुः ।।
vṛndā bhaktiḥ kriyā buddhiḥ sarvajantuprakāśinī। tasmānna bhinnaṃ nābhinnamābhirbhinno na vai vibhuḥ ।।
This verse, from the Vishnu Sahasranama, describes the nature of Vishnu (or God, in a broader sense): "Devotion, action, and wisdom (all) illuminate all beings. Therefore, the Supreme Being is neither different nor not different from them. He is different only in appearance (while being one with them)." Here's a breakdown: * वृन्दा भक्तिः क्रिया बुद्धिः: This refers to "devotion (bhakti), action (kriya), and wisdom (buddhi)." * सर्वजन्तुप्रकाशिनी: This means "illuminating all beings." * तस्मान्न भिन्नं नाभिन्नमाभिर्भिन्नो न वै विभुः: This is the core message. It says that the Supreme Being (Vibhu) is neither "different" (bhinna) nor "not different" (na bhinna) from the beings He illuminates. He is "different only in appearance" (abhibhinno) because He is ultimately one with all beings. This verse beautifully conveys the concept of unity and the inherent connection between the Divine and the individual soul. It emphasizes that while God is distinct in his supreme nature, He also pervades and manifests within every being.
धर्म ने चँवर का रूप धारण किया है, वायुदेव वैजयन्ती माला के रूप में उत्पन्न हुए हैं और महेश्वर ने अग्नि की भाँति चमकते हुए खड्ग का रूप स्वीकार किया है। नन्द जी के घर में कश्यप ऋषि ऊखल के रूप में प्रतिष्ठित हैं तथा माता अदिति रस्सी के रूप में प्रकट हुई हैं। जिस प्रकार समस्त अक्षरों के ऊपर अनुस्वार सुशोभित होता है, वैसे ही सभी के ऊपर जो शोभायमान आकाश है, उसको ही भगवान् श्रीकृष्ण का छत्र समझना चाहिए। व्यास, वाल्मीकि आदि ज्ञानी महात्माजन देवों के जितने रूपों का वर्णन करते हैं और जिनजिन को लोग देवरूप में समझ कर नमन-वंदन करते हैं, वे समस्त देवगण भगवान् श्रीकृष्ण का ही एक मात्र अवलम्बन प्राप्त करते हैं। भगवान् के हाथ की गदा सम्पूर्ण शत्रुओं को विनष्ट करने वाली साक्षात् कालिका है। शार्ङ्रधनुष के रूप में स्वयं वैष्णवी माया ही उपस्थित है तथा प्राणों का संहार करने वाला काल ही भगवान् का बाण है। इस विश्व-वसुधा के बीज स्वरूप कमल को भगवान ने लीलापूर्वक हाथ में ग्रहण किया है। भाण्डीर वट का रुप। गरुड़ ने धारण कर रखा है और देवर्षि नारद उनके सुदामा नामक सखा के रूप में अवतरित हुए हैं। भक्ति ने वृन्दा का रूप धारण किया है। समस्त भूत-प्राणियों को प्रकाश प्रदान करने वाली जो बुद्धि है, वही भगवान् की क्रियाशक्ति है। इस कारण ये गोप एवं गोपिकाएँ आदि सभी भगवान् श्रीकृष्ण से अलग नहीं हैं। तथा विभु-परमात्मा श्रीकृष्ण भी इन सभी से अलग नहीं हैं। उन भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वर्गवासियों को एवं समस्त वैकुण्ठ धाम को पृथिवीतल पर अवतरित कर लिया है, जो भी मनुष्य इस तरह से उन भगवान् को जानता है, वह समस्त तीर्थों के फल को प्राप्त कर लेता है और शारीरिक-बन्धनों से मुक्त हो जाता है, ऐसी ही यह उपनिषद् है।।
Verse २६
भूमावुत्तारितं सर्वं वैकुण्ठं स्वर्गवासिनाम् ।। सर्वतीर्थफलं लभते य एवं वेद।देहबन्धाद्विमुच्यते इत्युपनिषत् ।।
bhūmāvuttāritaṃ sarvaṃ vaikuṇṭhaṃ svargavāsinām ।। sarvatīrthaphalaṃ labhate ya evaṃ veda।dehabandhādvimucyate ityupaniṣat ।।
This verse, which is likely from a devotional text, translates to: "Everything (in this world) is an emanation of the divine Vishnu, the abode of the celestial beings. One who knows this truth attains the fruits of all pilgrimages. He is liberated from the cycle of birth and death, as the Upanishads declare." Here's a breakdown of the translation: * भूमावुत्तारितं सर्वं: Everything in the world is an emanation of... * वैकुण्ठं: Vaikuntha, the abode of Vishnu, the divine being. * स्वर्गवासिनाम्: Of the celestial beings (those who reside in heaven). * सर्वतीर्थफलं लभते: One who knows this truth attains the fruits of all pilgrimages. * य एवं वेद: One who knows this. * देहबन्धाद्विमुच्यते: He is liberated from the cycle of birth and death. * इत्युपनिषत्: As the Upanishads declare. The verse emphasizes the idea that the divine is present in all of creation and that true liberation comes from understanding this truth, which is equivalent to the benefits gained from performing all pilgrimages.
धर्म ने चँवर का रूप धारण किया है, वायुदेव वैजयन्ती माला के रूप में उत्पन्न हुए हैं और महेश्वर ने अग्नि की भाँति चमकते हुए खड्ग का रूप स्वीकार किया है। नन्द जी के घर में कश्यप ऋषि ऊखल के रूप में प्रतिष्ठित हैं तथा माता अदिति रस्सी के रूप में प्रकट हुई हैं। जिस प्रकार समस्त अक्षरों के ऊपर अनुस्वार सुशोभित होता है, वैसे ही सभी के ऊपर जो शोभायमान आकाश है, उसको ही भगवान् श्रीकृष्ण का छत्र समझना चाहिए। व्यास, वाल्मीकि आदि ज्ञानी महात्माजन देवों के जितने रूपों का वर्णन करते हैं और जिनजिन को लोग देवरूप में समझ कर नमन-वंदन करते हैं, वे समस्त देवगण भगवान् श्रीकृष्ण का ही एक मात्र अवलम्बन प्राप्त करते हैं। भगवान् के हाथ की गदा सम्पूर्ण शत्रुओं को विनष्ट करने वाली साक्षात् कालिका है। शार्ङ्रधनुष के रूप में स्वयं वैष्णवी माया ही उपस्थित है तथा प्राणों का संहार करने वाला काल ही भगवान् का बाण है। इस विश्व-वसुधा के बीज स्वरूप कमल को भगवान ने लीलापूर्वक हाथ में ग्रहण किया है। भाण्डीर वट का रुप। गरुड़ ने धारण कर रखा है और देवर्षि नारद उनके सुदामा नामक सखा के रूप में अवतरित हुए हैं। भक्ति ने वृन्दा का रूप धारण किया है। समस्त भूत-प्राणियों को प्रकाश प्रदान करने वाली जो बुद्धि है, वही भगवान् की क्रियाशक्ति है। इस कारण ये गोप एवं गोपिकाएँ आदि सभी भगवान् श्रीकृष्ण से अलग नहीं हैं। तथा विभु-परमात्मा श्रीकृष्ण भी इन सभी से अलग नहीं हैं। उन भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वर्गवासियों को एवं समस्त वैकुण्ठ धाम को पृथिवीतल पर अवतरित कर लिया है, जो भी मनुष्य इस तरह से उन भगवान् को जानता है, वह समस्त तीर्थों के फल को प्राप्त कर लेता है और शारीरिक-बन्धनों से मुक्त हो जाता है, ऐसी ही यह उपनिषद् है।।