Books / Kularnava Tantra Chapter 1 Ed. Unknown Vigyan Mandir Rishikesh

1. Kularnava Tantra Chapter 1 Ed. Unknown Vigyan Mandir Rishikesh

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कुलार्णव-तन्त्र

[ प्रथम उल्लास ]

(माया टीका सहित)

R. M. MAKHIJA RISHIKESH

ACC NO....63

विज्ञान मनिदर, ऋषिकेश (उ०प्र०)

[ श्रोत्रे

मूल्य ]

24.00 KUL

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SRI RAMAKRISHNA ASHRA M LIBRARY Shivaiya, Karan Nagar, SRINAGAR. Class No. 294.5513 (Lit) Book No. KUL T , 1 Accession No. 633

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प्रथम

उल्लास

श्री देव्युवाच— भगवन् देव देवेश ! पंचकृत्य विधायक ! सर्वज्ञ ! भक्ति सुलभ ! शरणागत वत्सल !।१।। कुलेश ! परमेशान ! करुणामृत वारिधे ! घोर संसारे सर्व दुःख मलीमसा: भव नाना विध शरीरस्था अज्ञान्ता जीवराशय: !।२।। जानन्ते च प्रियन्ते च तपोमान्ता न विद्यते !।३।। घोर दुःखातुरादेव न सुखी जायते क्वचित !। केनोपायेन देवेश ! मुच्यते वद मे प्रभो !।४।।

प्रथम

उल्लास

सांसारिक प्राप्रियों को नाना प्रकार के दुःख, क्लेश उठा

प्रथम

उल्लास

[ १ ]

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श्रृणु देवी प्रवक्ष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि। यस्य श्रवणमात्रेण संशयान्मुच्यते नरः॥५॥

हे देवि! सुनो, जो तुम पूछ रही हो; उसे मैं कहूँगा, जिसके सुनने मात्र से मनुष्य संशय से छुटकारा पा सकता है। ग्रस्ति देवि! परब्रह्म स्वरूपी निष्कलः शिवः॥६॥

सर्वज्ञः सर्वकर्ता च सर्वेशो निर्मलाशयः। श्रयं ज्योतिरनन्तो निर्विकारः परात्परः॥७॥

निर्गुणः सच्चिदानन्द स्तदंशा जीव संज्ञकाः। ग्रसत्य विद्योपहत यथाग्नौ विस्फुलिङ्गकाः॥८॥

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सुख दु:ख प्रदै: स्वीयै: पुथय पापै नियन्न्रिततन: ।

सत्तजाजति युतं देहं श्रायुभोंगं च कर्मजम् ।९।

प्रति जन्म प्रपद्यन्ते तेषामन्तो न चिन्त्यते ।

सूक्ष्म लिंग शरीरं तदा मोक्षादक्षयं प्रिये ।१०।

स्थावराः क्रमयचाञ्जः पक्षिणः पशवो नराः ।

धार्मिका स्त्रिदशास्तदनमो क्षराश्च यथाक्रमम् ।११।

चतुर्विध शारीराणि धृत्वा धृत्वा सहस्रशः ।

सकृत्सकृद्मानवो भूत्वा ज्ञानी चेतन्मोक्ष माप्नुयात् ।१२।

हे देवि ! पर ब्रह्म स्वरूप, निष्कल, सर्व कल्याणकारी

सर्वज्ञ, निर्मेल, घ्रादि-ग्रान्त-विहीन, निर्विकार, परात्पर,

निर्गुण, सत्-चित्-ग्रानन्द रूप; सर्वकर्ता, परमदुर्लय एक

शक्ति है और ये सब जीव-जन्तु उसी के ग्रंश हैं ।

ये ग्रापी ग्रवस्त्य ग्रौर ग्रविद्या से ढके होने के कारण

ग्रपने स्वरूप को उसी प्रकार नहीं जानते जैसे राख से ढकी

हुई ग्रग्नि की चिनगारी जानी नहीं जाती । सब प्रकार

की उपाधियों से रहित होते पर भी ग्रपने इस ग्रज्ञानवश,

ग्रच्छे-बुरे कमों को करते हुए, नाना प्रकार की योनियों में

पड़कर, तदनुसार शरीर धारण करते हैं ग्रौर ग्रायु तथा ग्रन्य

भोगों को भोगते रहते हैं। उनके इस जन्म-मरण का क्रम

चलता ही रहता है, इसका कभी ग्रन्त नहीं होता ।

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चतुश्चतारिलक्षषु शरीरेषु शरीरिषु ।

न मानवयं विनान्यत्र तत्वज्ञानं तु लभ्यते ॥१३॥

इस संसार में चौरासी लाख योनियों में पड़ने के बाद भी, मनुष्य योनि में आये विना, अन्य शरीरों में प्राप्ती को ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति नहीं होती।

जन्म सहस्रेषु सहस्रेऽपि पावंती !

कदाचिदुचैभते जन्म मनुष्य पुरुष संश्रयात्‌ ॥१४॥

है पार्वती ! यह प्रापी हजारों वार जन्म-मरण की यातनाएँ सहने के बाद ही बड़े पुण्य के कारण मनुष्य की योनि प्राप्त करता है।

स्वत्वानुभूतं मोक्षस्य मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम्‌ ।

यस्तारयति नात्मानं तस्मात् पाप रतोडधिकः ॥१५॥

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जो प्रापी इस मोददायक दुर्लभ मनुष्य देह को प्राप्त करने के वाद भी ब्रह्म-चिन्तन के द्वारा अपने आपको आवागमन के बन्धन से मुक्त नहीं करता, उसके समान इस संसार में दूसरा पापी और कौन हो सकता है?

ततसुचाऽप्युतमं जन्म लब्धवा चेइन्द्रिय सौष्ठवम् । न वेध्यात्महितं यस्तु स भवेद ब्रह्मघातकः ॥१६॥

जो प्रापी उत्तम मनुष्य जन्म तथा सुन्दर शरीर प्राप्त करके भी अपने भले-बुरे को नहीं पहचानता अर्थात आवागवन के चक्कर से छुटकारा पाने के लिए ईश्वर-चिन्तन नहीं करता, वह महा पापी (ब्रह्म-घातक) कहलाता है ।

विना देहेन कस्यापि पुरुषार्थो न विद्यते । तस्मादेहं रक्ष्यं पुण्य कर्माणि साधयेत ॥१७॥

विना शरीर के चतुर्वर्ग के फल की प्राप्ति नहीं हो सकती, इसलिये अवश्य इस शरीर की रक्षा करके अच्छे-अच्छे कार्य करने चाहियें ।

रक्षेत सर्वात्मनात्मानं आत्मा सर्वस्य भजनम् । रक्ष्यपो यत्नमातिष्ठेद यावत्तव न पश्यति ॥१८॥

हर प्रकार से इस आत्मा (शरीर) की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि आत्मा ही सबका आधार है । जब तक तत्त्व-साक्षात्कार

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नहीं होता, तब तक देह-रक्षा के लिए सत्र प्रकार से प्रयत्नशील रहना चाहिए।

पुनः ग्रामाः पुनः क्षेत्रं पुनर्वित्तं पुनः मत्र हम्‌।

पुनः शुभाशुभं कर्म न शरीरं पुनः पुनः ॥१६॥

ग्राम, क्षेत्र, धन, मकान और शुभ-अशुभ कमं वार-वार मिल सकते हैं, किन्तु यह मानव-शरीर वार-वार नहीं मिलता।

शरीर रक्षार्थायासः क्रियते सर्वदा जने: ।

नहीं च्यवन्ति तनुत्यागमपि कुष्ठादि रोगिणः ॥२०॥

इसी से प्रत्येक मनुष्य अपने शरीर की रक्षा के लिए सदा ही प्रयत्नशील रहता है, यहाँ तक कि कोढ़ आदि रोगों से पीड़ित भी अपने शरीर को त्यागना नहीं चाहते ।

तद्गोपितं स्वाद्यत्तेन धर्मज्ञानार्थ मेव च ।

जीवनं च ध्यानं योगस्थ स्थितियोगधारणो भवेत ॥२१॥

श्रतएव धर्म, ज्ञान और ध्यान के निमित्त ही शरीर की यत्नपूर्वक रक्षा करे, क्योंकि इन्हीं से मोक्षसिद्धि सत्वर होती है ।

श्रात्मैव यदि नात्मनमहितेभ्यो निवारयेत ।

कोटन्यो हितकरस्तस्मादात्मानं तारयिष्यति ॥२२॥

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यदि श्रापने को स्वयं ही बुराइयों से न बचाया जाय तो फिर कौन दूसरा रक्षा के लिए श्राएगा ?

इहैव नरक व्याधे श्विकिरसां न करोति यः । गत्वा निरौषधं स्थानं व्याधिस्थः किं करिष्यति ? ॥२३॥

जो मनुष्य इस जन्म में ही नरक रूपी व्याधि की चिकित्सा नहीं करता, वह रोगाकुल फिर श्रौषधि-रहित स्थान में जाकर श्रापनी क्या चिकित्सा कर सकता है ? श्रर्थात् जन्म, मृत्यु, जरा श्रादि व्याधियों की चिकित्सा इस मनुष्य-जन्म में ही सुलभ है,—ग्रन्यत्र नहीं।

यावत्तिष्ठति देहोयं तावत्तत्त्वं समभ्यसेत् । संदीप्ते भवने को वा कूपं खनति दुर्मतिः ॥२४॥

जब तक यह मनुष्य-शरीर विद्यमान है, तभी तक ईश्वर-प्राप्ति के लिए यथाशक्ति प्रयत्न करना चाहिये क्योंकि मकान में श्राग लग जाने पर कौन मूर्ख कुआँ खोदता है ? श्रर्थात् जो कुछ करना हो, इसी जन्म में करे ।

व्याध्रीवास्ते जरा चायुर्याति भिन्न घटाम्बुवत् । निघ्नन्ति रिपुवद्रोगा सत्समाच्छेयः समाचरेत् ॥२५॥

मनुष्य-शरीर को बुढ़ापा सिंहनी के समान श्रा दबाता है, श्रायु फूटे घड़े के जल की भांति नष्ट हो जाती है श्रौर रोग शत्रुवत् नाश करते हैं ।

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जरा, मृत्यु श्रादि रोग शत्रु की भांति शरीर पर श्राक्रमण करते हैं, इसलिये (श्रात्मशक्ति) शुभ कार्य करने चाहियें (जिस से कल्याण होवे)।

यावन्नाश्रयते दुःखं यावन्नायान्ति चापदः ।

यावन्नेन्द्रिय वैकल्यं तावच्छ्रेयः समाचरेत् ॥२६॥

जव तक यह शरीर (किसी प्रकार के) दुःख श्रौर मुसीवतों से ग्रछूता है ग्रौर तमाम इन्द्रियाँ श्रच्‍छी प्रकार से कार्य करती हैं, तब तक इस शरीर से ग्रात्म-कल्याण के शुभ कार्य करते रहना चाहिये।

कालो न ज्ञायते नाना कार्यैः संसार संभवे: ।

सुख दुःख रतो जन्तुनं वेत्ति हितममन्: ॥२७॥

मानव विविध जागतिक कार्यों तथा सुख-दुःखों में काल को भूल जाता है ग्रौर वह सर्वप्रिय ग्रात्मीय हित से भी विमुख होता है, किन्तु काल उसे मार देता है। ग्रर्थात माया में ग्रनुरक्त रहते ही जीव को काल मार डालता है।

यातनार्त्तान्तपद्गतान् दृष्ट्वाति दुःखितान् मृतान् ।

लोको मोह सुरां पीत्वा न वेत्ति हितमात्मनः ॥२८॥

ग्रनेक प्रकार की यातनाओं से पीड़ित, ग्रापत्तियों में फँसे हुए महा दुखियों ग्रौर मरे हुए व्यक्तियों को देख कर भी

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मनुष्य मोहरूपी सुरा को पीकर ग्रात्म-विस्मृत हो जाता है ग्रौर उसे ग्रपने भले-बुरे का भी ज्ञान नहीं रहता।

सम्पदः स्वप्न सकाशा यौवनं कुसुमापमम्‌ ।

तडिच्चंचलमायुश्च कस्य कस्मादतो धृतिः ॥२९॥

संसार की समस्त सम्पदाएँ स्वप्न के समान, यौवन फूल के समान ग्रौर ग्रायु विद्युत (विजली) के समान चञ्चल होती है, इसलिए मनुष्य को चाहिए कि इन सब को ध्यान में रख कर ही दैनिक कार्य करे ।

शतं जीवितमित्य च निद्रा स्वादर्‌द्रारिय ।

वाल्यरोग जरा दुःखैर्द्ध तदपि निष्फलम ॥३०॥

मनुष्य की सौ वर्ष की ग्रायु में से ग्राधा भाग तो निद्रा (ग्रादि व्यसनों) के करण नष्ट हो जाता है ग्रौर शेष ग्राधा बाल्य, रोग, बीमारी ग्रौर दुःखों ग्रादि के कारण समाप्त हो जाता है (ग्रथात्‌ यह मानव शरीर यों ही गंवा दिया जाता है)।

प्रारनबघये निरुद्योगो जागर्तव्ये सुषुप्तकः ।

विश्वस्तव्यो भय स्थाने घातकः किं न हन्यते ॥३१॥

किसी प्रारम्भ करने योग्य काम में उद्योग रहित (ग्रालसी), जागने योग्य काम में सोने वाला ग्रौर भय के स्थान में विश्वास करने वाला मनुष्य भला क्यों न मारा जाय ? (ग्रथात्‌ मनुष्य को ऐसे दुर्गुणों से बचना चाहिए)।

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को ईश्वर-प्राप्ति के लिये सदैव जागरूक और निर्भय होकर तपस्या करनी चाहिए, तभी कल्याण संभव है)।

तौय फेन समे देहे जीवे शाकुनिवत् स्थिते । ग्रनित्ये डप्रिय संसारे कथं तिष्ठन्ति निर्भया: ॥३२॥

जल के भाग (बुद्बुदों) के तुल्य इस शरीर में प्राण (जीव) एक पत्ती की भांति स्थित है जो किसी भी समय अवसर पाते ही उड़ सकता है। इस अनित्य (अस्थायी) और प्रप्रिय संसार में मनुष्य निर्भय कैसे रह सकता है?

ग्रहिते हितबुद्धि: स्याद्‌बुधेव श्रुवचिन्तक: । ग्रनथे चार्थविज्ञानी स्व मृत्युम् न हि वेत्ति किम् ॥३३॥

बुरी वस्तु को भी अच्छी समभने वाला, अनिश्चित को निश्चित समभने वाला और ग्रनर्थ को अर्थ समभने वाला व्यक्ति भी क्या अपनी मृत्यु को नहीं जानता?

परितन्द्रिप न परितत् से श्रवणद्रिप न बुध्यति । पठन्नपि न जानाति तव माया विमोहित: ॥३४॥

(हे देवि !) इस संसार में जन्म लेकर मनुष्य तेरी माया के जाल में पड़कर देखता हुया भी नहीं देखता, सुनता हुया भी नहीं सुनता, समभता हुया भी नहीं समकता और पढ़ता हुया भी नहीं जानता अर्थात् अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता।

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सन्निमज्जगदीदं गंभीरें काल सागरें । मृत्युरोग महाग्राहे न किंचिदपि बुध्यति ॥३५॥

मृत्यु चौर भयंकर रोग रूपी मगरमच्छों से युक्त गंभीर काल रूपी सागर में इस सारे संसार को डूवते देखकर भी यह मानव कुछ नहीं समक पाता ।

प्रतिक्षणयं कायो जीर्यमाणो निरीक्ष्यते । ग्रामकुंभ इवाम्भःस्थो विशीर्ण इव भाव्यते ॥३६॥

यह शरीर प्रति क्षण (हर समय लगातार) नष्ट होता जाता है और जल में रख्खे हुए मिट्टी के कच्चे घड़े के समान (धीरे-धीरे) नष्ट होता जाता है ।

युध्यते वेष्टनं वायो राकाशस्य च खंडनम् । ग्रन्थनं च तरं माणामास्था नायुषि युध्यते ॥३७॥

वायु का वाँघा जान, श्राकाश के टुकड़े किया जाना और तरंगों (लहरों) का हार पिरोया जाना संभव है,—परन्तु श्रायु के चिर-स्थायित्व पर विश्वास नहीं किया जा सकता ।

पृथ्वी दह्यते येन मेरुरचपि विशीर्यते । शुष्यते सागर जलं शरीरे देवि ! का कथा ॥३८॥

हे देवि ! जो इस पृथवी को जला सकता है तथा मेरु पर्वत

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को टुकड़े कर सकता है और (अथाह) समुद्र जल को सुखा (कर उड़ा) सकता है (उस भगवान के आगे) इस शरीर की चर्चा ही क्या है ?

अपत्यं मे कलत्रं मे धनं मे बान्धवाश्च मे । जलपान्तमिति मर्त्यो हि हन्ति कालवृकोदरः ॥१३६॥

'यह मेरी सन्तान है, यह मेरी पत्नी है, यह मेरा धन है और ये मेरे भाई-बन्धु (रिश्तेदार) हैं'—पुकारते हुए इस मनुष्य को काल रूपी सेङिया समाप्त कर देता है ।

इदं कृतमिदं कार्य मिदमन्यत कृताकृतम् । एवंमिहा समायुक्तं मृत्यु रति जना प्रिये ! ॥१४०॥

हे देवि !—'मैंने यह किया है और अभी वह करना बाकी है'—इस प्रकार के संकल्प-विकल्प में उलझे हुए मनुष्य को मृत्यु हरप कर जाती है ।

स्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाहे चापराह्निकम् । न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वाप्यथ वा कृतम् ॥१४२॥

जो कल करना है, उसे आज कर लो, जो मध्याह्न में करना है, उसे पूर्वाह्न (प्रातःकाल) में ही कर लेना चाहिए, क्योंकि मृत्यु किसी के किए और न किए (अर्थात् करने योग्य शेष रहे कार्य) की प्रतीक्षा नहीं करती । अर्थात् जो कुछ भी आत्म-कल्याण के लिए करना है, उसे जितना शीघ्र संभव हो, कर लेना चाहिए ।

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जरा-दर्शित-पन्थानं प्रचण्ड-व्याधि-सैनिकैः। मृत्युराजु समादिष्ट मायान्तं किं न पश्यसि ? ॥४२॥

क्या तुम बुढ़ापे द्वारा मार्ग दिखाए हुए और यमराज द्वारा आदिष्ट (आज्ञा दिए हुए) प्रचण्ड (घोर) व्याधि रूपी सैनिक को झाते हुए नहीं देख रहे हो ?

कृष्णा सूची विनिर्मित्तं मिश्रं विषय-सरिषा। रागद्वेषनले पक्वं मृत्युरन्नाति मानवम् ॥४३॥

काल रूपी सूई से छिदे हुए तथा विषया-वासना रूपी घी से लिपटे हुए और राग-द्वेष रूपी अग्नि में पके हुए मनुष्य को मृत्यु अपने ग्रास बना लेती है।

बालांश्र यौवनस्थांश्र वृद्धान् गर्भगतानपि। सर्वानादिशते मृत्युरेवं मृतमिदं जगत् ॥४४॥

यह संसार ऐसा (व्यसार) है कि इस में बाल, युवक, वृद्ध और गर्भस्थ प्राणियाँ को भी मृत्यु अपने आहार बना लेती है।

ब्रह्मा विष्णु महेशादि हवता भूतजातयः। नाशमेवानुधावन्ति तस्माच्छ्रेयः समाचरेत् ॥४५॥

ब्रह्मा, विष्णु, महेश और समस्त प्राणीसात्र नाशा की ओर दौड़ते हैं,—इसलिए (मनुष्य को) अपने कल्याण के लिए कार्य करने चाहिए।

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स्व स्व वर्णाश्रमाचार लङ्घनादुष्टप्रतिग्रहात् । परस्त्री धनलोभाच नृणामायु: क्षयोभवेत् ॥४६॥

ग्रप्ते-ग्रप्ते वर्णाश्रम और आचार-व्यवहार का उल्लंघन करने से, दुष्टप्रतिग्रह से, पर-स्त्री और पर-धन के लोभ से मनुष्यों की आयु नष्ट होती जाती है ।

वेद शास्त्राध्ययनात् तथैव गुरुवर्च नात् । नृणामायु: क्षयो भव्यात् इन्द्रियाणामनिग्रहात् ॥४७॥

वेदादि शास्त्रों का स्वाध्याय तथा गुरुजनों का सम्मान न करने से और इन्द्रियों पर संयम न रखने से मनुष्यों की आयु नष्ट होती है ।

व्याधिरारिविषं शास्त्रं ना सर्प: पशावमृग: । निर्वासं येन निर्दिष्टं तेन गच्छन्ति जन्तव: ॥४८॥

व्याधि (रोग), व्याधि (मानसिक दुःखथा), विष (जहर), शस्त्र, मनुष्य, तप, पशु और मृग आदि समस्त जन्तु निश्चित आयु को प्राप्त करते हैं अर्थात् सबको एक न एक दिन कथावशेष हो जाना है ।

जीवस्तृणां जलौकैव दंहादेहान्तरं ब्रजेत् । सम्प्राप्य परमं क्षेमं देहं त्यजति पूर्वजम् ॥४९॥

जिस प्रकार घास का एक तिनका समुद्र में पड़ कर थपेड़े

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खाता हुया कहिं का कहिं पहुँच जाता है, उसी प्रकार यह जीव भी एक शरीर से दुसरे शरीर में प्रवेश करता रहता है और परमंश (ब्रह्म) को प्राप्त कर इस शरीर का परित्याग करता है।

बाल्य यौवन वृद्धत्वं यथा देहान्तरादिकम् ।

तथा देहान्तर प्राप्तिगृहमिवागतिः ॥९०॥

जिस प्रकार कोई व्यक्ति एक घर से दुसरे घर जाता है, उसी प्रकार यह जीव भी नाना प्रकार के शरीरों को धारन करता रहता है और बाल्यावस्था, यौवन एवं वृद्धत्व,—इन तीनों प्रकार की व्यवस्थाओं का उपयोग करता रहता है।

जना: कृत्वेह कर्माणि सुख दु:खानि भुंजते ।

परत्र हानितो देिव ! यान्त्यायान्ति पुन: पुन: ॥९१॥

हे देवि ! इस संसार में मानव नाना प्रकार के कर्म करके सुख और दु:खं भोगते रहते हैं और लोक तथा परलोक में वार-वार आते-जाते रहते हैं।

इह यत् क्रियते कर्म तत् परत्रोपभुज्यते ।

सिक्त मूलस्य वृक्षस्य फलं शाखासु दृश्यते ॥९२॥

इस लोक में जैसा भी अच्छा या बुरा कर्म मनुष्य करता है, उसका फल दुसरे जन्म में भोगता है, क्योंकि जिस वृक्ष की जड़ों को पानी डालकर सींचा जाता है, उसी की शाखाओं पर फल लगे दिखाई पड़ते हैं।

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दारिद्रच दुःखं रोगाश्च बंधनं व्यसनानि च। ग्रात्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम् ॥५३॥

दरिद्रता, दु:ख, नाना प्रकार के रोग, (जन्म-मरण रूपी) बन्धन और नाना प्रकार के व्यसन,—ये सब प्राणियों के स्वयं अपने द्वारा किए हुए ग्रपराध रूपी वृक्ष के फल हैं।

निःसंग एव मोक्षः स्याद् दोषाः सर्वे च संगतः । संगाच्चलते ज्ञानी चावश्यं क्रिमितालपवित् ॥५४॥

इस संमार से ग्रलगाव रखने पर ही मोच की प्राप्ति होती है। ग्रधिक लगाव से ही सब प्रकार के दोष उत्पन्न होते हैं ग्रौर ज्ञानी लोग भी ग्रपने लगाव से विचलित हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में स्वल्प बुद्धि वाले व्यक्तियों का तो कहना ही क्या है? ग्रर्थात् इस संसार के नाते-रिश्तों के माया-जाल में फँसकर ज्ञानी-ध्यानी भी ग्रपने कर्त्तव्य को भूल जाते हैं,— इसलिए जहाँ तक हो चरम लगय की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए।

सज्जः सर्वात्मना त्याग्यः सचेतन् त्यक्तुं न शक्यते । सद्भिः सह च कर्तव्यः सतां संगो हि भेषजम् ॥५५॥

इस संसार में ग्रधिक मेल-मिलाप के मायाजाल में नहीं फँसना चाहिए। यदि मेल-मिलाप करना ही ग्रावश्यक हो तो सज्जनों के साथ करना चाहिए, क्योंकि सज्जनों का संग एक

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प्रकार की श्रौषधि है (जिस से जन्म-मरण के रोग से निवृत्ति हो जाती है)।

सत्सङ्गश्च विवेकश्च निश्चलं नयनद्वयम् ।

यस्य नास्ति नरः सोऽन्धः कथं न स्यादमार्गगः ॥१५६॥

सत्संग और विवेक,—ये मनुष्य के दो निश्चल नयन हैं । जिसके ये नयन नहीं हैं, वह मनुष्य अन्धा है (ऐसी अवस्था में) वह् (सत्संग और विवेक रूपी नयनों से हीन मनुष्य) क्यों न कुमार्गगामी बने ?

यावतः कुरुते जन्तुः सम्बन्धान् मनसः प्रियान् ।

तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकशङ्कवः ॥१५७॥

हे देवि ! इस संसार में आकर यह प्राणी जितने अपने प्यारे (रिश्ते-नाते) सम्बन्ध बनाता है, उतनी ही उसके हृदय में शोक रूपी कीलें ठोकी जाती हैं, क्योंकि यह जीव तो अन्त में अपने शरीर को भी छोड़ कर चला जाता है ।

स्त्री मातृ पितृ पुत्रादि सम्बन्धः केन हेतुना ।

दुःखमूलो हि संसारः स यस्यास्ति स दु:खितः ॥१५८॥

तस्य त्यागः कृतो नेन स सुखी नापरः प्रिये !

हे देवि ! स्त्री, माता, पिता और पुत्रादि का सम्बन्ध किस लिए किया जाए ? (अर्थात् ग्रन्थ समय पर इन में से कोई भी

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काम नहींँ त्यातः)। यह संसार समस्त दुःखों का मूल है। जो इस संसार में है, वह हर प्रकार से दुःखी है। जिसने इस संसार का परित्याग किया है, वही सुखी है, दूसरा कोई नहीं।

प्रभवं सर्वदुःखानामाश्रयः सकलापदाम् । त्यालयं सर्वपापानां संसारं वर्जयेत प्रिये !!५९!!

हे प्रिये ! सब प्रकार के दुःखों के उत्पादक तथा सब प्रकार की विपत्तियों के आश्राधार और सब प्रकार के पापों के घर-रूप इस संसार को छोड़ देना चाहिए (जिससे परम पद की प्राप्ति हो)।

ग्रवन्य वन्यनं घोरं मिश्रीकृतं महाविषम् । ग्रशास्त्र म्रडनं देवि ! संसारासक्त चेतसाम् ॥६०॥

हे देवि ! जिन लोगों का मन इस संसार में लगा हुग्रा है, उनके लिए यह संसार घोर वनधन, मीठा विष एवं बिना शस्त्र के संहार करने वाला है।

ग्रादि मध्यावसानेषु सर्वदुःखमिदं जगत् । तस्मात्संत्यज्य संसारं तत्त्वनिष्ठः सुखी भवेत् ॥६१॥

यह संसार प्रारम्भ, मध्य ग्रौर ग्रन्त,—तीनों ही ग्रवस्थाग्रों में दुःखों से भरपूर है, इसलिए इस संसार को त्यागकर ब्रह्म-चिन्तन करने वाला व्यक्ति ही सुखी है।

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लोह दारुमयैः पाशैः हृदयबन्धोडपि मुच्यते । स्त्री धनादिषु सक्तो मुच्यते न कदाचन ॥६२॥

लोह ग्रार लकड़ो के भयंकर पाश (जाल) में फंसे हुए व्यक्ति का छुटकारा पाना संभव है, किन्तु स्त्री (पुत्र) धन ग्रादि के सांसारिक बन्धनों में बन्धे हुए व्यक्ति का छुटकारा पाना कदापि संभव नहीं ।

कुटुम्ब चिन्ता युक्तस्य श्रुत शीलादयो गुणाः । ग्रापक्व कुम्भ जलवच्चरन्त्यगेन तेन हि ॥६३॥

जिस प्रकार कच्चे (मिट्टी के) घड़े में जल भरने से वह जल घड़े के (गल जाने के कारण) साथ ही नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार दिन-रात ग्रापने कुटुम्ब के पालन-पोषण की चिन्ता में लगे हुए व्यक्ति के श्रुत, शील ग्रादि गुण नष्ट हो जाते हैं । (इसलिए कुटुम्ब-पalan के साथ-साथ ग्रात्म-कल्याण के हितार्थ प्रभु-चिन्तन भी करना चाहिए)।

वांछिता रपि चित्तस्थ निरर्थं लोकविनाशितः । हा हन्त !! विषयाहारैर्देहस्थेन्द्रिय तस्करैः ॥६४॥

हाय शोकसोस ! शरीर में निवास करने वाले ये इन्द्रिय रूपी चोर,—जिनका स्वाहार विषय-वासना है ग्रौर जिनकी कभी भी तृप्ति नहीं होती,—इस मानव को दिन-रात नष्ट करते रहते हैं ।

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मांस लुब्धो यथा मत्स्यो लौह शंकुं न पर्यति । सुख लुब्ध स्तथा देही माया शीलं न पर्यति ॥६५॥

हिताहितं न जानन्ति नित्यमुन्मार्ग गामिनः । कुक्षिपूरगा निष्ठा ये तेडबुधा नारका: प्रिये ! ॥६६॥

है देवि ! जो रात-दिन कुमार्गे का अनुसरण करते हैं और अपने भले-बुरे को भी नहीं पहचानते, वे व्यक्ति मूर्ख हैं और उन्हें केवल अपने पेट भरने की ही चिन्ता रहती है। ऐसे ही व्यक्ति नरक भोगते हैं।

निद्रादि मैथुनाहारा: सर्वेषां प्राणिनां समाः । ज्ञानवान् मानव: प्रोक्तो, ज्ञानहीन: पशुः प्रिये ! ॥६७॥

हे देवि ! निद्रा, मैथुन और आहार आदि क्रियाएं सभी प्राणी समान रूप से करते हैं। जिसको अच्छे और बुरे का ज्ञान है, वही मनुष्य है और ज्ञान-हीन पशु है।

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प्रभाते मल मूत्राभ्यां क्षुत्तृषाभ्यां मध्यगे रवौ । रात्रौ मदन निद्राभ्यां बाध्यन्ते मानवाः प्रिये ! ॥६८॥

हे देवि ! इस संसार में मनुष्यों को प्रातःकाल मल-मूत्र, मध्यान्ह में भूख-प्यास और रात्रि में काम-क्रोधा, निद्रा आदि क्रियाओं ने बांधा हुया है । (अर्थात् मनुष्य इन क्रिया-कलापों में फँसा हुया परब्रह्म परमेश्वर को भूल जाता है) ।

स्वदेह धर्म दारादि-निरताः सर्वजन्तवः । जायतेऽपि प्रियन्ते च हि अज्ञान मोहिताः ॥६९॥

हा ग्रफसोस ! इस संसार में अाकर मनुष्य अ्रपने शरीर, धर्म, (पुत्र) कलत्रादि के पालन-पोषण में उलझे रहते हैं और बार-बार जनमते-मरते रहते हैं । (ग्रज्ञान से मोहित रहने के कारण उनको इस ग्रावागमन से छुटकारा नहीं मिलता) ।

स्व स्व वृत्ताश्रमाचार निरताः सर्वे मानवाः । न जानन्ति परं तत्वं मूढा नश्यन्ति पार्वति ! ॥७०॥

हे पार्वती ! (इस संसार में) सभी मनुष्य अ्रपने वरों, अ्राश्रम और अ्राचार-विचार के चक्कर में फंसे रहते हैं और पर ब्रह्म परमेश्वर को नहीं जान पाते । इस अज्ञान के कारण ही वे नष्ट हो जाते हैं ।

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[ २२ ]

क्रियायासपराः केचिदू व्रत धर्मादि संयुताः ।

ज्ञान संबृतात्मानः संचरन्ति प्रतारकाः ॥७१॥

इस संसार में कुछ ऐसे आत्मवञ्चक भी हैं जो कुछ यौगिक क्रियायों का ज्ञान प्राप्त कर और व्रत, धर्म आदि का अनुष्ठान कर के अज्ञान (अहंकार) के ही भार से लदे फिरते रहते हैं ।

नाम मात्रेऽस्तुष्टाः कर्मकारडरताः नराः ।

मन्त्रोच्चारेऽपि होमादेः श्रौमिताः कतु विस्तारेः ॥७२॥

एक भक्तोपवासादेः नियमेः काय शोणेः ।

मुद्रामोक्ष मिच्छन्ति तव माया विमोहिताः ॥७३॥

और, हे देवी ! तेरी माया से विमोहित कुछ ज्ञानी लोग थोड़ी देर के लिए अपने मन को खुश करने के लिए कर्मकाण्ड में लगे रहते हैं और मन्त्र-जप, हवन, याज्ञिक क्रियायों, एक भक्ति, उपवास आदि नियमों से अपने शरीर को सुखाकर ही मोक्ष की कामना करते रहते हैं (परन्तु वास्तव में उनको मोक्ष नहीं मिलता) ।

देहदण्डन मातृप्या का सिद्धि रविबेकिनाम् ।

वल्मीक ताडनादेवी ! मृतः कोटत्र महोरगः ॥७४॥

हे देवी ! शरीर को (इस प्रकार) कष्ट देने से अविबेकी व्यक्तियों को कोई सिद्धि नहीं होती, जैसे कि बाँबी (साँप के बिल) को (लाठी से) पीटने पर कभी साँप नहीं मरा करता ।

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धनार्जनोपयुक्तास्ते दाम्भिकावेशधारिया: । भ्रमन्ति ज्ञानविल्लूढा भ्रामयन्ति जनानपि ॥ १७५॥

इस प्रकार के छद्म वेषधारी लोग अपने को ज्ञानी समभते हुए, धन कमाते हुए, विचरते रहते हैं और अन्य ठगकियों को भी भ्रम में डालते रहते हैं।

सांसारिक सुखासक्त ब्रह्मज्ञोऽस्मीति वादिनम् । कर्म ब्रह्मोभय भ्रष्टं तं त्यजेदन्त्यजं यथा ॥ १७६॥

सांसारिक सुखों में लीन, अपने को ब्रह्मज्ञ कहने वाले कर्म और ब्रह्म दोनों से भ्रष्ट मनुष्य को अन्त्यज (अछूत) की भांति त्याग देना चाहिए।

गृहारण्यसमालोके गत ब्रीडा दिगम्बरा: । चरन्ति गर्दभाद्याश्च विविक्तास्ते भवन्ति किम् ? ॥ १७७॥

गर्दभ आदि पशु घर में और जंगल में निर्लज्ज होकर नंगे घूमते रहते हैं। पर क्या इससे उनको ब्रह्म का ज्ञान होता है? (अर्थात् नहीं)।

ग्राजन्म मरगान्तं च गंगादि तटिनी स्थिता: । मातंग मत्स्य प्रमुखा व्रतिनस्ते भवन्ति किम् ? ॥ १७८॥

हाथी और मछली आदि जानवर मरने पर्यन्त जन्मभर गंगा आदि (पवित्र) नदियों के किनारे पर निवास करते हैं, क्या वे व्रती होते हैं?

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वदन्ति हृदयानन्दं पठन्ति शुक सारिकाः । तत्रैव पुरतो देवि ! विवुधाः किं भवन्ति हि ? ॥७९॥

और, हे देवि ! इस लोक में तोते और मैना (आदि जानवर) बहुत हृदयाल्हादकारी (मीठे) वचन बोलते हैं, पर इससे क्या वे विवेकी हो जाते हैं ?

तृणपर्योदकाहारा: सततं वनवासिनः । हरिणादिमृगा देवि ! तपसास्ते भवन्ति किम् ? ॥८०॥

हे देवि ! हिरन श्रादि जानवर सदा जंगलों में निवास करते हैं और घास के तिनके तथा पत्ते खाकर निर्वाह करते हैं, पर ऐसा करने से क्या वे तपस्वी हो जाते हैं ?

पारावता: शिलाहाराः परमेश्वरि ! चातका: । न विचिन्ति मही तोयं योगिनस्ते भवन्ति किम् ? ॥८१॥

हे देवि ! कंकड़-पत्थरों को चुग-चुग कर खाने वाले कबूतर और पृथ्वी पर पड़े जल को न पीने वाले चातक क्या (वास्तव में) योगी होते हैं ?

शीत वातातपसहा जङ्गालरमशया: प्रिये ! तिष्ठन्ति शृङ्काद्याश्च योगिनस्ते भवन्ति किम् ॥ ८२ ॥

हे देवि ! जंगल में गीदड़, शेर और सूअर आदि जानवर निरन्तर सर्दी, वायु और धूप को सहते रहते हैं,—पर क्या वे योगी वन जाते हैं ?

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तस्मादित्यादिकं कर्म लोकर्जन कारणाम् । मोक्षस्य कारणं साक्षात् तत्वज्ञानं कुलेश्वरी ! ॥८३॥

इसलिए, हे कुलेश्वरी ! उपरोक्त सब क्रिया-कर्म तो केवल सांसारिक सन्तोष के ही लिए हैं । मोक्ष का कारण तो साक्षात् तत्वज्ञान ही है ।

षडदर्शन महाकूपे पतिता: पशव: प्रिये ! परमार्थ न जानन्ति पशुपाश-नियन्त्रिता: ॥८४॥

हे देवि ! षडदर्शन के महाकूप (विशाल कुएं) में गिरे हुए यह पशु परमार्थ को नहीं जानते, क्योंकि उनके ऊपर माया के जाल का नियन्त्रण रहता है ।

वेदार्थमपरिज्ञाय दयमानाः इतस्ततः । कालोऽमिणा ग्रहग्रस्ता सिस्तिष्ठति हि कुतार्किका: ॥८५॥

वेदों के अर्थ को न जानने के कारण कुतार्किक लोग काल रूपी तरंगों में, कुमह से ग्रस्त की भांति, इधर-उधर भटकते हैं ।

वेदागमपुराणज्ञाः परमार्थ न वेदति च । विडम्बकस्य तस्यापि सत्सव काक भाषितम् ॥८६॥

जो वेद, शास्त्र और पुराणों का ज्ञान रखते हुए भी परमार्थ को नहीं जानता, उस मायाग्रस्त के लिये यदि कोई परमार्थ की बात कहीं जाह, तो वह काकभाषित (के तुल्य) है ।

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'इदं ज्ञानमिदं जेयं' इति चिंता समाकुला: । पठन्त्यहनिशं देवि ! परतत्त्वपरामुखा: ॥८७॥

हे देवी ! परतत्त्व को न जानने वाले व्यक्ति—"यह ज्ञान है और वह ज्ञेय है"—दिन-रात इसी विवाद में उलझे हुए चिन्ता में घुलते रहते हैं ।

काव्यच्छन्दो निबंधेन काव्यालंकार शोभिता: । चिंतयादु:खितामूढा स्तिष्ठन्ति व्याकुलेन्द्रिया: ॥८८॥

काव्य, छन्द, निबन्ध और अलंकारों की गुत्थियों में लगे हुए मूढ़ लोग चिन्ता से दुःखी एवं इन्द्रियों से व्याकुल रहते हैं ।

ग्रन्थथा परमं तत्त्वं जना: क्लिश्यन्ति चान्यथा । ग्रन्थथाशास्त्र सद्भावं व्याख्यां कुर्वन्ति चान्यथा ॥८९॥

इस प्रकार परमतत्त्व को न जानने के कारण लोग क्लेश भोगते रहते हैं और शास्त्रों के सद्भावों की गलत व्याख्या करते रहते हैं ।

कथयन्त्युन्मनी भावं स्वयं नानुभवन्ति हि । श्रद्धद्धारहता: केचित् उपदेशं विरर्जिता: ॥९०॥

बहुत से श्राहंकारी लोग गुरुजनों से उपदेश और स्वयं उनमें श्रवस्था का अनुभव प्राप्त किये बिना ही बकवास करते रहते हैं ।

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पठन्ति वेद् शास्त्राणि दुर्लभा भववेदकः ।

न जानन्ति परं तत्वं दर्वी पाक रसं यथा ॥९१॥

इस संसार में लोग वेद-शास्त्र पढ़ते तो हैं, पर संसार की वास्तविकता का ज्ञान रखने वाले बहुत दुर्लभ हैं और वे भी परम तत्व को नहीं जानते। उनकी दशा ठीक कड़छी के समान है जो स्वयं पाक के रस के ज्ञान से शून्य रहती है।

शिरो वहति पुष्पाणि गन्धं जानाति नासिका ।

पठन्ति वेदशास्त्राणि विवादन्ते परस्परम् ॥९२॥

जैसे मनुष्य के शिर पर लदे हुए पुष्पों की सुगन्धि को नासिका ही ग्रहण करती है, शिर नहीं करता, ठीक ऐसी ही दशा उन व्यक्तियों की है जो वेद-शास्त्र पढ़ने के वाद उनका मनन न करते हुए परस्पर में वाद-विवाद में ही रहते हैं।

तत्वमात्मस्मज्ञान्त्वा मूढः शास्त्रेषु मुह्यति ।

गोप: कक्षगतं छागं कूपे पश्यति दुम्मतिः ॥९३॥

जिस प्रकार प्यासा ग्वाला अपनी बगल में टंगी हुई छागल (पानी के वर्तन) को न जानता हुया पानी के लिए कुएं की और ताकता है, उसी प्रकार मूर्ख व्यक्ति अपने ही में स्थित तत्व को न जानकर व्यर्थ ही शास्त्रों के मोह-बन्धन में उलझ जाता है ।

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संसर मात्र नाशाय शाब्द बोधो न हि क्षमः । न निवर्त्ते तिमिरं कदाचिद्दीपशिखया ॥ ९४॥

संसर (व्यावागमन) के नाश के लिये शाब्दिक ज्ञान प्राप्त कर लेने से ही कार्य नहीं चलता । जैसे कि दीप-वर्तिका मात्र से ही ज्ञानकार का नाश नहीं होता, ञ्रपितु उसके लिये ञ्रग्नि, तेल ञ्रादि वस्तुग्रों की भी ञ्रावश्यकता होती है, उसी प्रकार ञ्रात्मकल्याण के लिए भी ञ्रात्मज्ञान की परमावश्यकता है ।

प्रज्ञाहीनस्य पठनो ह्यक्षरव्याकरणं यथा ॥ ९५॥

देवि ! प्रज्ञावतः शास्त्रं तत्वज्ञानस्य कारणम् ।

हे देवि ! जिस प्रकार बुद्धिहीन व्यक्ति पढ़ सकता है ञ्रौर ग्रन्थ ञ्रथवा ग्रंथों के न होने से न देखता हुग्रा भी देखता है (ञ्रथवा ञ्रन्तर्ज्योति से सब कुछ देख सकता है), उसी प्रकार वेदादि शास्त्रों के ञ्रध्ययन से बुद्धिमान व्यक्ति तत्वज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं ।

ञ्रग्रतः पृष्ठतः केचित् पार्श्वयोरपि केचन । तत्वमीदृक् तादृगिति विवदन्ति परस्परम् ॥ ९६॥

सत् विद्या, दान ञ्रादि गुणों से विख्यात कुछ व्यक्ति ञ्रागे, पीछे ञ्रौर इधर-उधर की बातों में परस्पर "तत्व ऐसा है, वैसा है" कहते हुए भगड़ते रहते हैं ।

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ईदृश स्तादृशावेतिदूरस्थ: कथ्यते जनै: । प्रत्यक्ष ग्रहणां नास्ति वार्ताया ग्रहणं प्रिये !! एवं ये शास्त्र समूहा सते दूरस्था न संशय: ॥१५७॥

हे देिव ! इस प्रकार ये लोग तत्त्वज्ञान को ऐसा है, वैसा है, दूर है इत्यादि कहते रहते हैं और उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं कर पाते । जो लोग केवल शास्त्रों के मोहजाल में ही फँसे रहते हैं, वे निस्संदेह तत्त्वज्ञान से बहुत दूर रहते हैं । इदं ज्ञानमिदं श्रेयं सर्वतः श्रोतुमिच्छति ।

दंवि वर्ष सहस्रायु: शास्त्रान्तं नैव गच्छति ॥१९८॥

हे देिव ! जो व्यक्ति 'यह ज्ञान है, यह श्रेय है' इत्यादि ही सर्वत्र सुनने की इच्छा रखता है, वह हजार वर्ष की आयु प्राप्त कर के भी शास्त्रों के अन्त को नहीं प्राप्त कर सकता । वेदाद्यनेक शास्त्राथि स्वल्पायुर्विंधन कोटय: ।

तस्मात सारं विजानीयात क्षीरं हंस इवाम्भसि ॥१९९॥

वेद आदि शास्त्र अनेक हैं, पर मनुष्य की आयु स्वल्प है और करोड़ों विद्न-बाधाएं हैं । इसलिए मनुष्य को चाहिए कि शास्त्रों का सार ग्रहण करे, जिस प्रकार हंस जल में मिश्रित दूध को ही ग्रहण करता है ।

ग्राह्यस्य सर्व शास्त्राणि तत्त्वं ज्ञात्वा हि बुद्धिमान । पलालमिव धान्यार्थी सर्व शास्त्रं परित्यजेत ॥१००॥

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बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह सब शास्त्रों के (श्रध्ययन) श्रभ्यास द्वारा परब्रह्म परम तत्व का ज्ञान प्राप्त कर के, जैसे किसान श्रन्न को निकालकर भूष को छोड़ देता है, उसी प्रकार सब शास्त्रों का परित्याग कर दे।

यथामृतेन तृषस्य नाहारेण प्रयोजनम्‌ ।

तथा देवि ! न शास्त्रेण प्रयोजनम्‌ ॥१०१॥

हे देवि ! जिस प्रकार श्रमृत पीकर तृप्त हुए व्यक्ति को भोजन से प्रयोजन नहीं रह जाता, उसी प्रकार तत्व-ज्ञाता को शास्त्रों से भी कोई प्रयोजन नहीं रहता।

न वेदाध्ययनान्मुक्तिर्न शास्त्र पठनादपि ।

ज्ञानादेव हि मुक्तिः स्यान्नान्यथा वीर वन्दते ॥१०२॥

हे वीर वन्दन्या ! केवल वेदों के श्रध्ययन श्रौर शास्त्रों के पढ़ने से ही मुक्ति नहीं होती, श्रापितु ज्ञान-प्राप्ति से ही होती है।

न वेदाः कारणां मुक्तेर्नाति न कार्माणि ।

तथैव सर्वशास्त्राणि ज्ञानमेव हि कारणम्‌ ॥१०३॥

वेद, दर्शन श्रौर सब शास्त्र मुक्ति का कारण नहीं हैं, श्रापितु मुक्ति तो ज्ञान से ही होती है।

मुक्तिदा गुरुवाेगका विद्या: सर्वा विदम्बका: ।

काष्ठभार श्रमादेकं संजीवनं परम्‌ ॥१०४॥

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श्रद्धैतन्तु शिवेनोक्तं क्रियायास विवर्जितम् । गुरुवक्त्रेग्रा लभ्येत नान्यतोऽगम कोटिभिः ॥१०५॥

भगवान शिव के मुखारविन्द से प्रतिपादित श्रद्धैत ज्ञान के लिये क्रियाओं का ठ्यर्थ परिश्रम ग्रावश्यक नहीं है, वह तो गुरुदेव के उपदेश से ही प्राप्त हो सकता है, करोड़ों वेद-शाखों के ग्रध्ययन से नहीं।

ग्रागमोथ्यं विवेकोथ्यं द्विधा ज्ञानं प्रचक्षते । शब्द ब्रह्मागमयं परब्रह्म विवेकज ॥१०६॥

संसार में श्रागमोथ्य तथा विवेकोथ्य दो प्रकार का ज्ञान कहा जाता है। श्रागम (शाखों) द्वारा प्राप्त ज्ञान 'शब्द ब्रह्म' और विवेक द्वारा प्राप्त ज्ञान 'पर ब्रह्म' कहा जाता है।

श्रद्धैतं केचिदिच्छन्ति द्वैत मिच्छन्ति चापरे । मम तत्त्वं विजानन्तो द्वैताद्वैत विरर्जितम् ॥१०७॥

कुछ व्यकि्त श्रद्धैत ज्ञान और कुछ द्वैत ज्ञान को प्राप्त करना चाहते हैं, परन्तु तत्त्वतः 'मम' को जानने वाले द्वैत-ग्रद्वैत दोनों का ही परित्याग करते हैं।

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द्वे पदे बन्धमोक्षाय ममेति निर्ममेति च ।

ममेति बध्यते जन्तुर्निर्ममेति विमुच्यते ॥१०५॥

संसार में 'मम' (ग्रहभाव) श्रौर 'निर्मम' (ग्रहंभाव-शून्य) ये दो ही बन्धन ग्रौर मोक्ष के कारण हैं। मम भाव से ग्रस्त व्यक्ति बन्धन में फंस जाता है ग्रौर निर्मम सांसारिक बन्धनों से मुक्त हो जाता है।

तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये ।

ग्रायासायापरं कर्म विद्यायाः शिल्पनैपुणम् ॥१०६॥

कर्म वही (श्रेष्ठ) है जो मनुष्य के लिए बन्धन का कारण न हो ग्रौर विद्या वही (श्रेष्ठ) है जिस से मनुष्य ग्रनावागमन से मुक्ति पा सके। अन्यान्य विद्यायें केवल निपुणता मात्र के लिए ही हैं।

ग्रन्य ग्रनेकों काम तो करने भर के लिए तथा

यावत्कामादि दीप्येत यावत्संसार वासना ।

यावदिन्द्रियचापल्यं तावत्तत्वकथा कुतः ॥११०॥

जब तक शरीर में इच्छाएं (संकल्प-विकल्प) हैं, संसार भोगने की इच्छा बनी है, इन्द्रियों की चंचलता विचुमान है, तब तक परम तत्व की चर्चा कहाँ ?

अ्रर्थात् सांसारिक कार्यों से उपरामता ग्रौर इन्द्रिय-निग्रह के बिना परब्रह्म की प्राप्ति कठिन ग्रौर ग्रसंभव है।

यावत्प्रयत्न रोगोस्ति यावत्संकल्पकल्पना ।

यावन्न मनसः स्थैर्यं तावत्तत्वकथा कुतः ॥१११॥

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जव तक किसी इष्ट वस्तु की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने का रोग (ग्रापके मन में) विद्यमान है ग्रौर संकल्प-विकल्प का कम जारी है एवं मन की पूर्ण रूप से निश्चलता नहीं है, तब तक परम तत्व की प्राप्ति भी संभव नहीं है।

यावदेहाभिमानश् ममता यावदस्ति हि ।

यावन्न गुरु कारुण्यं तावत्तत्व कथा कुतः ।।११२।।

जव तक ग्रापने शरीर का ग्रभिमान तथा मोह-ममता विद्यमान है ग्रौर गुरु महाराज की पूर्ण रूप से ग्रनुकम्पा नहीं हो जाती, तब तक परम तत्व की प्राप्ति संभव कहाँ?

यावत्तपो व्रतं तीर्थ जप होमादिकम् ।

वेद शास्त्रागम कथा तावत्तत्व कथा कुतः ।।११३।।

जव तक तप, व्रत, तीर्थाटन, जप, होम, पूजा-पाठ का कम ग्रौर वेद-शास्त्रों का श्रध्ययन, श्रवण ही प्रधान है, तब तक तत्वप्राप्ति संभव नहीं।

तस्मात् सत्रे प्रयत्नेन सर्वावस्थासु सर्वदा ।

तत्वनिष्ठो भवेद् देवी ! यदिच्छेत् सिद्धिमात्मनः ।।११४।।

इसलिए, हे देवी ! यदि मनुष्य ग्रात्म-सिद्धि करना चाहता है तो उसे पूरे यत्न के साथ प्रत्येक ग्रवस्था में तत्वनिष्ठ होना चाहिए (तभी उस को तत्वज्ञान की प्राप्ति हो सकती है)।

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धर्मज्ञान स्वं पुष्पस्य स्वकुलोक्त फलस्य च।

तापत्रयार्ति संततं इच्छायां कल्पतरुः श्रयेत् ॥११५॥

इसलिए इस संसार में तापत्रय से संतप्त व्यक्ति को स्वाध्यान-

ज्ञान रूपी पुष्प एवं स्वकुलोक्त फल युक्त कल्पतरु की ध्याया का

आश्रय प्राप्त करना चाहिए।

बहुनात्र किमुक्तं रहस्यं श्रृणु पार्वति !

कुलधर्म्मृते मुक्तिर्नास्ति सत्यं न संशयः ॥११६॥

हे पावंती ! श्रवणिक कहने से क्या लाभ है ? रहस्य की बात

सुनो । कुल-धर्मे (तत्वज्ञान के लिए शक्तिजागरण) के बिना

मनुष्य की मुक्ति नहीं होती, यह निस्संदेह सत्य मानो ।

तस्माद्ददामि तत्त्वं ते विज्ञायात्र गुरोमुखात् ।

सुखेन मुच्यते ह्येव ! घोर संसार वन्धनात् ॥ ११७॥

इसलिए मैं तुम्हें तत्वज्ञान बताता हूँ, जिसे श्री गुरु-मुख से

जानकर मनुष्य संसार के घोर बन्धनों से सुखपूर्वक मुक्त हो

जाता हैं ।

इति ।

समाप्त

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-: मुद्रक :- श्री देवेन्द्र विज्ञानी, विज्ञान प्रैस, ऋषिपिकेश ।