1. Maheshvari Tantra Rameshvar Datt Sharma Master Kheladi Lal & Sons
Page 1
'मास्टर' मणिमालाया: ५१ संख्यको मणिः ( तन्त्रविभाग )
महेश्वरप्रोक्तं
महेश्वरীয়तन्त्रम्
टीकाकार: -
पं० श्रीरामेश्वरदत्तशर्मा
प्रकाशक: -
खेलाड़ी लाल एण्ड सन्स, कछौगली, बनारस-१
मूल्य(१=)
Page 3
'मास्टर' मणिमालायाः ५१ संख्यको मणिः (तन्त्रविभागे २)
महेश्वरप्रोक्तं—
माहेश्वरীয়तन्त्रम् ।
पं० श्रीरामेश्वरदत्तशर्मकृतया
हिन्दीटीकया विलसितम् ।
तथा
काशीस्थ-'संस्कृत बुकडिपो'-इत्यस्याज्ञाधिपैः
मास्टर खेलाड़ी लाल ऐण्ड सन्स् महोदयैः
स्वीये 'मास्टर प्रिन्टिङ् वक्स्' नाम्नि मुद्रणागारे
मुद्रयित्वा प्रकाशितम् ।
अस्याधिकाराः प्रकाशकेन स्वायत्तीकृताः ।
द्वितीयं संस्करणम् ]
सन् १९५१ ई०
[ मूल्यम् १-]
Page 4
प्रकाशकः—
बी० एन० यादव, प्रोप्राइटर, मास्टर खिलाड़ीलाल ऐण्ड सन्स, कचौड़ीगली, बनारस-१
मुद्रकः—
श्रोमन्नालाल अभिमन्यु, एम० ए०, मास्टर प्रिन्टिङ् वर्क्स, बुलानाला, बनारस-१
Page 5
॥ श्रीः ॥ माहेश्वरीयतन्त्रम् भाषाटीकासहितम् ।
ग्रथ प्रथमाऽऽहः ।
श्रीगुरेशाय नमः॥ श्रीडुमामहेश्वराभ्यां नमः ॥
ध्यात्वा शिवसुमासादौं योगीन्द्रं गुरुमच्तमम् । सुभाषितं शिवागिरितन्त्रं भाषायां वितन्युते ॥ १ ॥
हिमालय की ननिद्नती उमा (पार्वती) के सहित शिवजी का ध्यान करके फिर योगियों में श्रेष्ठ श्रीगुरु रूपी भगवान् सच्चिदानन्द को प्रणाम करके शिवगिरिजो से कहे हुए तन्त्र का भाषानुवाद करता हूँ ॥१॥
श्रीमत्त्यम्बकपर्वते शिवगिरिः संन्यासिनामग्रणी-र्नोऽनातन्त्रविधानसाधनयुतो (व्यासोऽस्ततां वल्लभः । तन्त्रानुष्ठानक्रियासु सिद्धिमवदन् गत्वानुतापं सुहु-च्छके शाङररसिन्धौ सुविनयं त्यक्त्वाशानं सर्वथा ॥२॥
अनेक प्रकार की तन्त्र शास्त्र की क्रियाओं को जाननेवाला और सज्जनों का प्यारा, संन्यासियों में श्रेष्ठ, शिवगिरि नाम के सन्यासी त्र्यम्बक पर्वत पर निवास करते थे । उन्होंने तन्त्र की अनेक क्रियाओं को विधिवत् किया परन्तु सिद्धि प्राप्त न होने से दुःखित हो, अन्न, जल को छोड़, श्रीशिवजी के समीप विनीत हो प्रार्थना किया ॥ २ ॥
Page 6
तस्मै श्रोगिरिजापतिःकथितवान् स्वप्ने प्रयोगाच्छुभान् । घेभ्यः सिद्धिमुक्तिमानुभवज्ञातज्ञ सिद्धाग्रणीः ॥ सोऽस्माकं बहुसेवया कथितवान् प्रत्यक्षसिद्धिप्रदां- स्थान् मन्त्रान् पक्वीकृतोऽसि बुधियामानददर्शनश्रुतोदरन् ॥
उससे महादेवजी ने अच्छे २ प्रयोग स्वप्न में कहा जिसके करने से वह सिद्ध पुरुपों में अग्रणी हो गया । उसकी मैंने बहुत सेवा की तव उसने प्रत्यक्ष सिद्धि देने वाले मन्त्रों को बतलाया ॥ ३ ॥
यथा शिवगिरि देवः स्वप्ने कथितवान् हरः । तेनैव विधिना वक्ष्ये तन्त्रं मन्त्रसमन्वितम् ॥ ४ ॥
जिस प्रकार महादेव जी ने शिवगिरि को स्वप्न में कहा उसी विधि को मन्त्र समन्वित मैं कहता हूँ ॥ ४ ॥
स्वप्ने तु गिरिशं दृष्ट्वा तथ्सकं वृषवाहनम् । पार्वत्याः सहितं देवं योगी परमप्रचच्लु सादरम् ॥ ५ ॥
स्वप्न ( ध्यान ) में देख कर, सन्यासीगणों के गुरु, योगियों में पूज्य, शिवगिरि ने आदर सहित यह पूछा ॥ ५ ॥
नमामि सचिदानन्दं जगद्योनिसुमापतिम् । त्रिविध मोहं हेतो ! नाडिमध्यादि जीवितं सम ॥ ६ ॥
हे सत् चित् आनन्द स्वरूप ! संसार के आदि कारण ! पार्वती के प्रियपति शिवजी ! आप मेरे मन के सन्देह को दूर कीजिए, नहीं तो निराहार मैं आपके चरणों पर अपना प्राण त्याग कर दूंगा ॥ ६ ॥
भवता कथित मन्त्रास्ते कथं सिद्धिवर्जिताः । मया परीक्षिता सर्वे योग्युक्तेन चेतसा ॥ ७ ॥
क्योंकि आप से प्रयुक्त तन्त्र शास्त्र में मारण से लेकर रसायन
Page 7
तस्मात् सिद्धिविहीनास्ते यथा निःसारतां सुवि ॥ ८ ॥
पर्यन्त जो नौ क्रियाएँ हैं उनको उनके मन्त्र और विधियों से मन लगा कर किया परन्तु सिद्धि न होने से अब मेरा मन विह्वल सा हो गया है। ये मन्त्रा लोकविदित्याहालते सर्वे कीलिता मया। तस्मात् सिद्धिविहीनास्ते यथा निःसारतां सुवि ॥ ८ ॥ शिवजी ने कहा हे योगिराज ! तन्त्र शास्त्र में जितने मन्त्र प्रसिद्ध हैं उनको मैंने कीलित किया है। इसलिये वे मन्त्र निःसार होकर सिद्धि को देनेवाले नहीं हुए ॥ ८ ॥
तस्मादुक्तिष्ठ भद्रं ते कथयामि सुसिद्धिदान् । मन्त्रानां कीलितान् वत्स ! यैस्त्वं सिद्धो भविष्यसि ॥ ९ ॥
इस कारण हे पुत्र ! तुम्हारा कल्याण हो, तुम चिन्ता को छोड़ो। सिद्धि को देने वाले विना कीले हुए मन्त्रों को, मैं तुम्हारे हित के लिये और लोकोपकार के लिये कहता हूँ ॥ ९ ॥
मारणं मोहनं स्तम्भं विद्वेषोच्चाटनं वशं । आकर्षणं रक्षिणीञ्च रसायनकरं तथा ॥ १० ॥
मारण, मोहन, उच्चाटन, विद्वेषण, वशीकरण, आकर्षण, स्तंभन, चोर अथवा यक्षिणियों के साधन, और रसायन इन नौ क्रियाओं तथा इनको विधियों से युक्त ॥१०॥
प्रयोगैर्नियुक्तं तन्त्रं माहेश्वराख्यम् । इदं ते कथयिष्यामि लोकानां हितकार्यया ॥ ११ ॥
साहेश्वर नाम का तन्त्र संसार के हित के लिये तुम से कहता हूँ जिस प्रयोग को इस विधि से करने वाले को तत्काल सिद्धि का लाभ हो। यह मेरा कहा हुआ प्रयोग सत्य है, इसमें संशय नहीं करना ॥११॥
Page 8
अथाडतः कथयिष्यामि प्रयोगं मारणाभिघम् । सद्यः सिद्धिकरं पुणां श्रृणुष्वावहितो मुने ! ॥ १ ॥
शिवजी ने कहा कि तन्त्र शास्त्र में सब से पूर्व मरण का प्रयोग लिखा है इसलिये मरण को कहता हूँ । हे योगोराज ! तुम सावधान होकर सुनो ॥ १ ॥
मारनं न वृथा कार्ये घस्च कस्य चिदाचन । प्राणान्तसकूटे जाते कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥ २ ॥
बिना कारण किसी के अनिष्ट की अथवा अपने लाभ की इच्छा से मरण नहीं करना चाहिये, मरण का प्रयोग जब करे जब किसी के द्वारा अपने प्राप् पर विपत्ति पड़े तब करना चाहिये ॥ २ ॥
ब्रह्मह्मानं तु वित्ततं हुष्टुवा विज्ञानचतुषा । sर्वत्र सरनं कायेसन्यथा दोषभाजन्वचेत् ॥ ३ ॥
क्योंकि सब प्राणी ईश्वर के अंश हैं जैसा कि लिखा है कि (ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ) भगवान् स्वयं कहते हैं कि यह संसार हमारा स्वरूप है, इस प्रकार ज्ञान रुपी नेत्रों से देख अर्थात विचार कर मरण का प्रयोग करना चाहिये, इसके अतिरिक्त प्रयोग करने में दोष का भागी होता है ॥ ३ ॥
मूर्वेण तु कुते तन्त्रे स्वरुपमन्नेव समापधेत् । तस्माद्रक्ष्यं सदाश्श्र्मानं मारनं न कचिच्चरेत ॥ ४ ॥
अज्ञानी मूर्ख यदि मरण प्रयोग करता है तो उसका फल उसी को होता है अर्थात वह स्वयं मर जाता है । इसलिए अनिष्ट चाहने वाले शत्रु पर यदि मरण प्रयोग करना हो तो पहिले अपनी रक्षा करे, फिर जहाँ तक हो सके वहाँ तक प्रयोग करे ॥ ४ ॥
Page 9
कर्त्तव्यं मारणं चेत् स्यात्तदा कृत्यं समाचरेत्। शत्रुपादतलात् पांसुं गृहीत्वाद्भौमवासरे ॥ ५॥
मारन विधि में पहिले मङ्गल के दिन स्नानादि नित्य कर्मों से निपट कर पवित्रता पूर्वक शत्रु के पैर के नीचे की धूलि को मौन होकर लावे और उसको एकान्त स्थान में रखे ॥ ५ ॥
गोमूत्रेण च सिक्त्वा प्रतिमां कारयेद् द्विष: । निर्जने च नदीतीरे स्थापयेत् स्थण्डिलोपरि ॥ ६॥
फिर किसी पात्र में गोमूत्र को लावे, उस धूल को गोमूत्र से गीला करके शत्रु की मूर्ति बनावे और निर्जन नदी के तट पर पहले से बनाई हुई वेदी पर उस मूर्ति को स्थापित करे ॥ ६ ॥
लोहरूलं च निखननेतद्रक्षसि सुदारुणम् । तद्रामे भैरवं कृष्णं बलिभि: प्रत्यहं घजेत् ॥ ७॥
फिर उस मूर्ति की छाती में तीक्ष्ण और कठिन लोहे का एक त्रिशूल गाड़ देवें, और उसकी बाईं ओर बलिदान देकर काल भैरव का नित्य षोडशोपचार से पूजन किया करे ॥ ७ ॥
एकादशाब्दूंस्तत्र परमान्नेन भोजयेत् । अक्षराढदीपं तस्याडग्रे कदुतेलैर्न्वालयेत् ॥ ८॥
और उसो जगह ग्यारह बालकों को पकान्न भोजन करावे, और उस मिट्टी की प्रतिमा के आगे कडुआ तेल का अखंड दीपक जलावे अर्थात् कार्य सिद्धिपर्यन्त दिन रात वह दीपक जलता रहे, दीपक बुझ जाने पर कार्य सिद्धि में विघ्न हो सकता है ॥ ५ ॥
व्याघ्रचर्मासनं कृत्वा निवसेत् तस्य दक्षिणे । दक्षिणाभिमुखो रात्रौ जपेन्मन्त्रमतन्द्रित: ॥ ९॥
आसन प्रकरण में तन्त्र शास्त्र का वचन है कि मारण प्रयोग में व्याघ्र के चमड़े का आसन बिछाकर उससे दक्षिण की ओर बैठे, और रात्रि
Page 10
को दक्षिण दिशा की ओर मुख करके सावधान होकर निम्नलिखित मन्त्र को जपे ॥ ९ ॥
दक्षिण दिशा की ओर मुख करके सावधान होकर निम्नलिखित मन्त्र को जपे ॥ ९ ॥
"ॐ नमो भगवते कालभैरवाय कालाम्रितेजसे असुकं मे शत्रुं मारय मारय, पोथय पोथय हूँ फट् स्वाहा" इस मन्त्र को एकाग्र चित्त सावधान होकर जप की विधि से जप करे ।
"ॐ नमो भगवते कालभैरवाय कालाम्रितेजसे असुकं मे शत्रुं मारय मारय, पोथय पोथय हूँ फट् स्वाहा" इस मन्त्र को एकाग्र चित्त सावधान होकर जप की विधि से जप करे ।
अयुतं प्रजपेदिनं मन्त्रं निशि समाहितः। एकोनत्रिंशादिवारसैर्मारणं जायते ध्रुवम् ॥१०॥
इस मारण मन्त्र को रात्रि समय में दश हजार प्रति दिन जप करने से निश्चय २९ उन्नतीस दिन में उसके शत्रु का मारण हो जायगा, इस प्रयोग में सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १० ॥
इत्येवं मारणं मन्त्रं सत्य: सिद्धिकरं नृणाम् । कथितं शिवतुल्येभ्यो मोहनं शृणुध्वोपरम् ॥११॥
यह मारण तन्त्र मनुष्यों को तत्काल सिद्धि देने वाला है। हे योगिराज ! अब मोहन प्रयोग को सुनो ॥११॥
तृतीयाऽऽहः ।
ईश्वर उवाच—
अथाऽऽत: सप्रपञ्चाश्मि प्रयोगं मोहनाभिधम् ।
अब मोहन प्रयोग को कहता हूँ। जिस प्रयोग से मनुष्यों को तत्काल सिद्धि मिल सकती है उस प्रयोग को सावधान हो कर सुनो ।
सच: सिद्धिकरं चाणं श्रृणु योगीन्द्र ! घत्नतः ॥ १ ॥
पेशयेत् तुलसीबीजं सहदेवी रसेन च । रवी यस्तिलकं कुुर्यान्मोहयेत् सकलं जगत् ॥ २ ॥
रविवार के दिन सहदेवी ( सहदेइया घास ) के रस में तुलसी
Page 11
हरितालं चाडवगन्धां पेशयेत् कदलीरसैः। गोरोचनेन संयुक्तं तिलकं लोकमोहनम् ॥ २ ॥
रविवार या मंगलवार को हरताल, असगन्ध और गोरोचन को केले के रस में पीस कर मोहन मन्त्र से तिलक लगावे तो संसार को मोहित कर ले ॥३॥
भृङ्गीचन्दनकुष्टेन वचाधूपेन धूपयेत् । वच्याणि च सुखं चैव सर्वजन्तून् विमोहयेत् ॥ ४ ॥
रविवार के दिन काफ़्ऱासिंगी, चन्दन, कूट और वच इन चार चीजों का धूप मुख और अपने कपड़े में देने से सब को मोहित कर सकता है ॥४॥
मनःशिलां च कपूरं पेशयेत् कदलोरसैः । तिलकं मोहनं नृणां नाड्यथा सम भाषितम् ॥ ५ ॥
रविवार के दिन मैनसिल, और कपूर इन दो चीजों को केले के रस में पीसकर मोहन मन्त्र से तिलक करे तो मनुष्यों को मोहित कर ले, यह मेरा कहना सत्य है, इसमें संशय नहीं ॥ ५ ॥
सिन्दूरं कुड्कुं चैव गोरोचनसमन्वितम् । धात्रीरसैः संयुक्तं तिलकं लोकमोहनम् ॥ ६ ॥
रविवार के दिन सिन्दूर, केसर और गोरोचन इन तीन चीजों को आँवले के रस में पीस कर मोहन मन्त्र से तिलक करे तो संसार को मोहित कर सकता है ॥६॥
औदुम्बरस्य पुष्पेण वर्तिं कृत्वा प्रदीपयेत् । नवनोतेन संयुक्तं कज्जलं लोकमोहनम् ॥ ७ ॥
रविवार के दिन गूलर के फूल की बत्ती बनाकर मक्खन के साथ नवनीत (मक्खन) से संयुक्त कज्जल लोकमोहन होता है ॥ ७ ॥
Page 12
इवेतार्कमूलमादाय इवेतचन्दनसंयुतम् । अननेन तिलकं दद्याद मोहनं जगतोऽवेत् ॥ ८ ॥
सफेद आक की जड़ और सफेद चन्दन इनको पीस कर एक में मिला कर रगड़े और मोहन मन्त्र से उसका तिलक लगावे तो संसार को मोहित कर सकता है ॥ ८ ॥
विजयावचसामादाय इवेतसर्षपसंयुतम् । उद्दर्तनेन देहस्य जगतो मोहनमावेत् ॥ ९ ॥
विजया, वच और सरसो इनको पीस कर एक में मिलावे उसका उबटन लगावे तो संसार को मोहित करे ॥ ९ ॥ मोहन मन्त्र—ॐ रक्तचन्दन सर्वजन्तून् मोहय मोहय सम्म वशं कुरु कुरु स्वाहा । सपादलक्षजपात सिद्धिर्भवति । इस मोहन मन्त्र को जप की विधि से सवा लाख जप करने से मोहन की सिद्धि होती है।
ईश्वर उवाच—
सम्प्रवक्ष्यामि प्रयोगस्तस्मन्नामिधानम् । यस्य साधनमात्रेण सिद्धिः करतालेऽवेत् ॥ १ ॥
अथातः—शिवजी कहते हैं——हे योगिराज ! अब अग्निस्तंभन, आसन स्तंभन, बुद्धिस्तंभन का प्रयोग कहता हूँ, सुनो ! । जिसके साधन करने से सिद्धि हाथ में आ जाती है ॥ १ ॥
कुमारीरसयुक्तेन तैलेनाङ्घ्रिँडमाचरेत् । अग्निना न दहेदङ्घ्रिंग्रिस्तम्मः प्रजायते ॥ २ ॥
Page 13
सफेद घृत कुमार ( घीकुवार ) के रस को तेल में मिला कर शरीर में लगाने से शरीर अग्नि में जलता नहीं बल्कि अग्नि का स्तम्भन हो जाता है ॥ २ ॥
कदलीरसमाादाय कुमारोरसं लोपयेत् । अकन्दुग्धे तथा युक्तमाग्निस्तम्भः प्रजायते ॥ ३ ॥
केले का रस और घृत कुमार ( घीकुवार ) का रस तथा आक ( सन्दार ) का दूध इनको एक में मिला कर स्तम्भन मन्त्र से लगाने से अग्नि स्तम्भन हो जाता है ॥ ३ ॥
कुमारोरसललेपेन अग्निस्तम्भनयोगोऽयं नाऽन्यथा सम्भावितम् ॥ ४ ॥
घीकुवार के रस का लेप करने से कोई वस्तु आग में जलती नहीं, यह मेरा कहना मिथ्या नहीं है । यह अग्निस्तम्भन का योग है ॥ ४ ॥
ॐ नमो अग्निरुपाय मम शरीरे स्तम्भनं कुरु कुरु स्वाहा ।
इस मन्त्र को एक लाख जप करने से स्तम्भन प्रयोग सिद्ध होता है ।
नृकपालेऽपि मृदं क्षिपत्वा इवेतगुज्जा च निर्वपेत् । गोदुग्धेन तु संसिच्य कुयाद्गुज्जावलातां शुभाम् ॥ ५ ॥
मनुष्य के कपाल ( खोपड़ी ) में मिट्टी भर कर उसमें सफेद घुँचची का बीज बोवे, फिर उस बीज को गौ के दूध से सींचने पर उसमें घुँचची का सुन्दर वृक्ष निकाला हुआ दिखाई पड़ेगा ॥ ५ ॥
घस्याऽऽदौ तल्लता क्षिप्ता स्थानस्तम्भः प्रजायते । घस्य नाम्ना च लवणं ईशानाग्नौ जुहोत्तथा ॥ ६ ॥
वह वृक्ष जिसके अग्र ( पर डाल दिया जाय उसी के आसन का स्तम्भन हो जायगा । और जिसका नाम लेकर मृतक पर चिता की अग्नि में लवण ( नोन ) से होम करे तो उस मनुष्य का भी स्तम्भन हो जावे ॥६॥
Page 14
आासनस्तम्भनमन्त्रः—ॐ नमो दिगम्बराय अमुकस्यासनं स्तम्भय स्तम्भय फट् स्वाहा॥ अस्य मन्त्रस्य लक्षजपात् सिद्धिर्भवति॥ इस स्तम्भन मन्त्र का एक लाख जप करने से सिद्धि होती है पहले मन्त्र सिद्ध करके पोढे कार्य करे॥
भृङ्गराजिमपामूलैः सिद्धार्थैः सहदेविका॥७॥ कोलेन् वचा च इक्षेतार्कः: सत्वमेषां समाहरेत्। भङ्गराई, चिचिडी, सरसों, सहदेवी, कंकोल वच और आँक (मन्दार) की जड़ लेकर इन सबका सत निकाले॥७॥
लोहपात्रे विनिक्षिप्य त्रिदिनं मर्दयेत् शुद्धी:। ललाटे तिलकं कुर्वीतद्रु दृशद्रुद्धि: प्रणदियति ॥८॥
उस सत को लोहे के पात्र में रख कर तीन दिन तक घोंटे फिर उसका तिलक मस्तक में लगावे। उस तिलक को जो देखे उसकी बुद्धि क्षण भर में नष्ट हो जावे॥८॥
उल्लूकस्ग कपिवेष्टपि ताम्बूले घृस्य दापयेत्। विष्टाप्रयत्नतस्तस्य बुद्धिस्तम्भ: प्रजायते ॥९॥
उल्लू पक्षी अथवा वानर की विष्टा पान में रख कर जिसे खिलावे उसी की बुद्धि का स्तम्भन हो जावे॥९॥
बुद्धिस्तम्भनमन्त्रः—ॐ नमो भगवते नृसिंहाय अमुकस्य बुद्धिस्तम्भनं कुरु कुरु फट् स्वाहा॥ सपादलक्षजपात् सिद्धिर्भवति॥ इस मन्त्र का सवा लाख जप करने से सिद्धि होती है। मन्त्र सिद्ध होने पर स्तम्भन करना चाहिये॥
पुष्यार्केन्धि समादाय अपामार्गस्य मूलकम्। घृटटवा लिम्पेच्छरीरेः स्वे शस्तस्तम्भ: प्रजायते ॥१०॥
रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र में चिचिडी की जड़ लाकर उसको रगड़ कर अपने शरीर में लेप करे तो शस्त्रों के घाव जारी में नहीं लगते क्योंकि शस्त्रों का स्तंभन हो जाता है॥१०॥
Page 15
चितारातेण विलिखेनमन्त्रं पात्रे च मृन्मये । रिपुनामयुतं तत्र जलकुएड विनिक्षिपेत् ॥११॥
चिता की राख को मिट्टी के बरतन में शत्रु के नाम के साथ मन्त्र लिख कर उसको जल से भरी कूण्डी में गाड़ दे ॥ ११ ॥
शिलया स्तम्भयेद्द्वारं सेनाहतारभः प्रजायते । उद्ध्वस्थित निखनेदितु पशुस्तम्भः प्रजायते ॥१२॥
और उसके ऊपर से पत्थर की चट्टान से ढॉक दे तो चली हुई शत्रु की सेना का स्तंभन हो जावे । और जिस पशु के चारो ओर ऊंट की हड्डी को गाड़ दे उस पशु का स्तंभन हो जाता है ॥ १२॥
ऋतुमत्या योनिवक्खो लिखेद्गोरोचनैनरम् । तन्नाम्रा प्रक्षिपेत्कुम्भे नरस्तम्भः प्रजायते ॥१३॥
रजस्वला स्त्री की योनि के वख को लेकर उस वख पर गोरोचन से मनुष्य की मूर्ति बनाए, फिर उसके नाम के साथ उस वख को घड़े में गाड़ दे तो मनुष्य का स्तंभन हो जाता है ॥ १३ ॥
इष्टकासम्पुटं कृत्वा लसिमन्न मेघं समालिखेत् । इमशानभस्मना स्थाप्य भूमौ स्तम्भः प्रजायते ॥१४॥
ईंट का सम्पुट बनाकर उसमें चिता की राख से बादलों का चित्र बनाए और उस चित्र को भूमि में गाड़ दे तो मेघों का स्तंभन हो जाता है ॥ १४ ॥
मधुना बृहतीमृखो रक्ष्यये लोचनद्रयम् । निद्रास्यो भवेत्कार्य नाड्यथा मम भाषितम् ॥१५॥
शहद में भटकटैया की जड़ को रगड़ कर आँख में आंजन लगाने से निद्रा का स्तंभन हो जाता है अर्थात निद्रा नहीं आती है ॥ १५ ॥
भरतयां क्षीरकाष्ठस्य कीलं पश्वाड लुं वनेच् । नौकामध्ये तदा नौकास्तम्भनं जायते ध्रुवम् ॥१६॥
Page 16
पुष्पार्केण तु गृह्लीयात् कृष्णधत्तूरमूलकम् । कष्यां बध्वा गर्भिणीनां गर्भेस्थम्भः प्रजायते ॥१७॥
रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र में काले धतूरे की जड़ को लेकर गर्भिणी के कमर में बाँध देवेँ तो गर्भ का स्तम्भन हो जाता है ॥ १७ ॥
बिम्बाकाष्ठस्य धूपेन योनिं धूपयते यदा । सुकगर्भा तदा नारी जायते नाडीः संशयः ॥१८॥
बिंबा काष्ठ के धूएँ से योनि में धूप देने से ही का गर्भ पतन हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ १५ ॥
ॐ नमो भगवते महात्रिसिहोय सर्वस्तम्भनकर्ने सर्वस्तम्भनं कुरु कुरु स्वाहा । सपादलक्षजापत् सिद्धिभवति ।
इस मन्त्र का सवा लाख जाप करने से स्तम्भन प्रयोग सिद्ध होता है ॥
ईश्वर उवाच— अथातः श्रृणु योगीन्द्र ! प्रयोगं द्वेषणाभिधम् । अस्मिन् कृते महासिद्धिर्जायते द्वेषणाथिका ॥ १ ॥
श्रोशिवजी बोले हे योगिराज ! अब द्वेषण प्रयोग को कहता हूँ । सावधान होकर सुनो; इस प्रयोग को करने से द्वेषणप्रयोग में बड़ी सिद्धि प्राप्त होती है ॥ १ ॥
मार्जारकामूषकयोर्विष्ठामादाय विद्विषः पादतलतो मृतमादाय छत्ततः मिश्रयेत् ॥ २ ॥
Page 17
विलास और चूहे का विष्ठा लेकर उसमें शत्रु के पैर के नीचे की मिटटी को लेकर मिलावे॥२॥
जपेन्मन्त्रंत्रातं कुर्याज्जरपुत्तलिकां शुभाम् । नीलवस्त्रेण संवीज्य तद्गृहे निखनेत्प्रभदि ॥३॥
फिर विद्वेषण मन्त्र का सौ बार जप करके उससे आदमी का पुतला बनावे, उस मूर्ति में नीला कपड़ा लपेट कर उसके घर में गाड़ दे ॥ ३ ॥
विद्वेषो जायते शीघ्रं पितापुत्रावपि ध्रुवम् । चिताभस्मयुक्तं बघ्ने सर्पयोदन्तचूर्णीकम् ॥४॥
तो पिता पुत्र की भी लड़ाई हो जावे । फिर साँप और नेवले के दाँत को लेकर एक में पीस डाले फिर उसमें चिता की राख को मिलावे ॥४॥
पृथक् पुत्तलिकां कृत्वा तत्तन्नामासिमन्त्रताम् । उद्याने निखनेद्वूमौ विद्वेषो जायते ध्रुवम् ॥५॥
और फिर उसकी अलग अलग मूर्ति बना कर उनके नाम को लेकर मन्त्रों से उन मूर्तियों पर जल का छींटा देवे और किसी बगीचे की भूमि में उन मूर्तियों को गाड़ देवे तो उनमें आपस में लड़ाई हो ॥ ५ ॥
गजकेशरिणोर्दन्तान् नवनोतेन पेषयेत् । चूर्णाम्ना हूयते चाग्नौ तयोविंद्वेषणं भवेत् ॥६॥
हाथी और व्याघ्र के दाँतों को पीस कर और उनमें मक्खन मिला कर जिसका नाम लेकर अग्नि में होम करे तो उनमें अवश्य लड़ाई हो जावे ॥ ६ ॥
द्वेषणका मन्त्र - ॐ नमो नारदाय अनयोरविद्वेषं कुरु कुरु ऐं ह्रीं फट् स्वाहा । चतुलक्षजपात् सिद्धिर्भवति ।
इस मन्त्र को चार लाख जप करने से सिद्धि होती है, बिना मन्त्र सिद्ध किये प्रयोग में सिद्धि नहीं हो सकती ।
Page 18
ईश्वर उवाच- श्रृणु योगीन्द्र ! वक्ष्यामि उच्चाटनविधिं परम् । यस्य साधनमात्रेण भवेदुच्चाटनं नृणाम् ॥ १ ॥
फिर शिवजी बोल हे योगीन्द्र ! में उच्चाटन की उत्तम विधि को कहता हूँ सावधान होकर, सुनो—। जिस प्रयोग के करने से मनुष्यों का उच्चाटन हो जाता है ॥ १ ॥
ब्रह्मदण्डी चिताभस्मसिद्धार्थः सम्प्लेपयेत् । शिवलिङ्गं मन्दवारे तद्गृहीत्वा गृहे क्षिपेत् ॥ २ ॥
शनिवार के दिन ब्रह्मदण्डो, चिता की भस्म, सरसों में पीस कर शिवजी के लिङ्ग पर लेपन करे फिर उस लपन को लाकर जिस के घर में फेंके ॥ २ ॥
यस्य तस्योच्चाटनं स्वात् पशुपुत्रादिमिः सह । काकोलूकस्य पक्षाणि यस्य चुल्ल्यां खनेद्रवौ ॥ ३ ॥
उसका पशु और परिवार सहित उच्चाटन हो जाता है । कौआ और चल्लू के पंख को रविवार को जिसके चूल्हे में गाड़ दे ॥ ३ ॥
आदर्शेऽदृष्टकाष्ठस्य कीलकं चतुरङ्गुलम् । गुरुज्ञ लसद् लसत् ॥ ४ ॥
उसका उच्चाटन हो यह मेरा कहना झूठा नहीं है । गूलर का गोला काष्ठ का चार अंगुल का कील लेकर ॥ ४ ॥
शयने यस्य निखनेत्तस्योच्चाटनकं भुवम् । उत्कूकविष्टामपि वा निखनेच्छूल्यने तथा ॥ ५ ॥
जिस के पलङ में उरश दे उसका निश्चित उच्चाटन हो । अथवा चुल्हू की विष्ठा शय्या में लगा देते उसका भी उच्चाटन हो जाता है ॥५॥
Page 19
नरास्थिकोलकं द्वारि निखनेच्चतुरङ्गुलम् । तत्न मूत्रं तु घः कुर्यात्तस्योच्चाटनकं भवेत् ॥ ६ ॥
आदमी की हड्डो की चार अङ्गुल की कील दरवाजे पर गाड देवे और वहाँ जो मूत्र करे तो उसका उच्चाटन हो जावे ॥ ६ ॥ उच्चाटन का मन्त्रः— ॐ नमो भगवते महारुद्राय रौद्ररूपाय अमुकस्य सपरिवारस्योच्चाटनं कुरु कुरु फट् स्वाहा । इस मन्त्र का सवा लाख जप करने से सिद्धि होती है । बिना मन्त्र सिद्ध किये प्रयोग नहीं करना चाहिये ।
सप्तमाङ्कः । ईश्वर उवाच—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि वशीकरणमद्भुतम् । यत्प्रयोगाद्द्रां मान्ति नराः नार्येश्व सर्वशाः ॥ १ ॥
यत्प्रयोगाद्द्रां मान्ति नराः नार्येश्व सर्वशाः ॥ १ ॥
श्रीशिवजी बोले—हे सन्य्यासिन् ! अब अद्भुत वशीकरण कहता हूँ, सुनो, जिस के प्रयोग से पुरुष, नारी सब वश में हो जाते हैं ॥ १ ॥
ब्रह्मदण्डीवचाकुष्टचूर्णं सूर्यस्य वासरे । ताम्बूलेन तु ये दद्यात् स वश्यो वर्तते सदा ॥ २ ॥
रविवार के दिन ब्रह्मदण्डी, वच और कूट इनका चूर्ण पान में रख कर जिसको खिला दे वह सदा के लिये वश में हो जावे ॥ २ ॥
सहदेवीं गृथ्य पुष्यार्के छायाशुष्कां विधाय च । दद्याच्चूर्ण्णे तु ताम्बूले सर्वलोकवशां नयेत् ॥ ३ ॥
रविवार के दिन पुष्यनक्षत्र में सहदेवी को लाकर छाया में सुखा लेवें उसका चूर्ण पान में रख कर जिसको देवे उसको वश में कर लेवे ॥ ३ ॥
देवदाल्या च सिद्धार्थगुष्टिकां कार्यपदुबुधः । मुखे निक्षिप्य भाषेत सर्वलोकान् वशान् नयेत् ॥ ४ ॥
Page 20
देवदाली और सरसों की गोली बना कर और उसे सुख में रखकर बातचीत करे तो सव संसार के लोग वश में हो जावें ॥ ४ ॥
कुङ्कुमं तगरं कुष्ठं हरितालं मनःशिला । अनामिकाग्रा रक्तेन तिलकं तुवरकाबकम् ॥ ५ ॥
केसर, तगर, कूट, हरताल और मैनसिल इनको एक में मिलाकर उसमें अनामिका अँगुली का रक्त मिला कर तिलक करे तो सब को वश में कर लेवे ॥ ५ ॥
वशीकरण मन्त्र—ॐ ह्रीं नमो मोहिन्यै सर्वलोकान् मे वशां कुरु कुरु हुँफट् स्वाहा । सपादलक्षजपात् सिद्धिर्भवति ।
इस मन्त्र को सवा लाख जप करने से सिद्धि होती है । बिना मन्त्र सिद्ध किये प्रयोग नहीं करना चाहिये ।
श्रीवश्यम् ।
करपादनखानां च शरम् ताम्बूलपात्रके । दातह्यं रविवारे च वशीकरणमद्भुतम् ॥ ६ ॥
रविवार के दिन हाथ और पैर के नखों की राख पान में रख कर खिला देवे तो श्री वश में हो जावे ॥ ६ ॥
भौमवारे रक्तं च लिङ्गमध्ये च निक्षिपेत् । बुधेऽनिष्कास्य ताम्बूले दद्यात् सा वशगा भवेत् ॥ ७ ॥
मंगलवार के दिन एक लोंग लेकर लिङ्ग के छिद्र में रख देवें । दूसरे दिन उसको निकाल कर पान में रख कर जिस स्त्री को खिला देवे वह उसके वश में हो जावे ॥ ७ ॥
वामपादतलात् पांचुर्व्रनिताया: धानेऽहरेत् । तस्य पुत्तलिकां कुुर्यांतस्याः केशान् नियोजयेत् ॥ ८ ॥
शनिवार के दिन स्त्री के बाएँ पैर के नीचे से मिट्टी ले आवे उसकी पुतली बनाकर उस मूर्ति में बाल लगावे ॥ ८ ॥
Page 21
नीलवस्त्रैर्वेष्ट्यपत्वा स्ववीर्यं तु भगे क्षिपेत्। सिन्दुरेण समायुक्तं निखनेद्वारदेशके ॥ ९ ॥
फिर उस स्त्री की पुतली को नीले कपड़े से लपेट कर उसके भग में अपना वीर्य गिरावे और फिर सिन्दूर लगाकर उस पुतली को उस स्त्री के दरवाजे पर गाड़ देवे ॥ ९ ॥
उल्लङ्घनाद्द्रवं याति प्राणेरपि धनैरपि । कृतज्ञः स्ववशं कुर्वन्निमोदते सुचिरं सुवि ॥ १० ॥
उस पुतली को लङ्घने से वह स्त्री धन और प्राण सहित वश में हो जावे । फिर कार्य में कुशल मनुष्य उस स्त्री के साथ चिरकाल तक पृथ्वी पर आनन्द करे ॥ १० ॥
तैलासुकुञ्चितगुलिकां क्षौमां सुवत्काम् । सिद्धार्थतैलै निक्षिप्य कज्जलं नमस्तके ॥ ११ ॥
रेशम की वत्ती बनाकर तालीस, कूट और तमार इनको पीसकर उस वत्ती में लपेट कर मनुष्य की खोपड़ी में सरसों का तेल भरकर उस वत्ती को जलावे और उसका काजल पारे ॥ ११ ॥
पातयेद् जन्त्तस्य सर्वदा भुवनत्रये । हस्तिगौचरमायातः सर्वो भवति दासवत् ॥ १२ ॥
उस काजल को आँखों में लगाने से हर समय सामने आए हुए मनुष्य दास के समान हो जावेंगे, इस प्रयोग में संशय नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥
विप्राय वेदविदुषे दत्त्वा कर्ष सुवर्णकम् । एतन्मन्त्रं जपेदित्याद्रयं सिद्ध्यति नाड्न्यथा ॥ १३ ॥
वेदपाठी ब्राह्मण को सोलह मासे सोना देकर प्रयत्न पूर्वक इस लिखित वशीकरण मन्त्र का सवालाख जप करने से सिद्धि होती है, इसमें संशय नहीं ॥ १३ ॥
Page 22
वशीकरण मन्त्रः—ॐ नमः कामार्यै दैत्यै असुर्कि से वशं कुरु कुरु फट् स्वाहा। सपादलक्षजपात् सिद्धिर्भवति। राजवश्यम्।
इस वशीकरण मन्त्र का सवा लाख जप करने से सिद्धि होता है। राजवश्यम्।
विष्णुकान्ताबीजतैलं दोपे प्रद्वाल्य्य घटनत:। दर्शो कार्तिकमासस्य सोमवारेर्द्धरात्रके ॥१४॥
कार्तिक में दीपावलो के दिन सोमवार पड़े तो आधी रात के दिन विष्णुकान्ता के बीज का तेल लेकर उसको दिया में भर दे फिर बत्ती डाल कर दिया जलावे ॥१४॥
काजलं पातयेद्द्रीमाच्छुभे हेमदरावके। तदअनुच्चाटनवर्ती राजा वशमवाप्नुयात् ॥ १५॥
फिर सोने की साफ कटोरी में काजल पारे, उसको आँख में लगाने से चक्रवर्ती राजा भी वश में हो जाता है ॥१५॥
भौमवारे दर्शदिने कुर्याद् नित्यक्रियात: शुचि:। वने गत्वा ह्यपामार्गवृक्षं पद्येगुदड्मुख: ॥१६॥
मंगलवार के दिन अमावस्या हो तो अपने नित्य कर्म से निपट कर पवित्रता पूर्वक बन में चला जाय और उत्तर को तरफ मुख करके चिचिडी़ के वृक्ष को देखे ॥१६॥
तत्र विप्रं समाहूय कृत्वा पूजां यथाविधि:। पलमेकं सुवर्णस्य दद्यात्तरमै द्विजन्मने ॥१७॥
वहाँ ब्राह्मण को बुलाकर उस चिचिडी़ के वृक्ष को विधिपूर्वक पूजा करके उस ब्राह्मण को ६४ चौसठ मासे सोना देवे॥१७॥
तस्य हस्तेन गृहीयादपामार्गस्य बीजकान्। मौनेन स्वगृहं गच्छेत कृत्वा बीजान्स्तु निस्तुषान् ॥१८॥
फिर उसके हाथ से चिचिडी़ के बीज को तोड़वा कर उस बीज को
Page 23
गौरीशां हृदये ध्यात्वा राजानं खादयेच तान् । घृतैः केनापि पुप्राधानै रविद्रवै रमेद्रद्रवैः ॥१८॥
चुपचाप अपने घर में ठाकर उस बीज का छिलका निकाल कर उसको साफ करे ॥१८॥ गौरीशां हृदये ध्यात्वा राजानं खादयेच तान् । घृतैः केनापि पुप्राधानै रविद्रवै रमेद्रद्रवैः ॥१८॥
फिर शिवजी का ध्यान करके उस बीज को किसी उपाय से राजा को खिला देवे तो वह राजा जीवन पर्यन्त उसके वश में हो जावे ॥१९॥
फिर शिवजी का ध्यान करके उस बीज को किसी उपाय से राजा को खिला देवे तो वह राजा जीवन पर्यन्त उसके वश में हो जावे ॥१९॥
चक्रवर्त्ती वशं याति नाड्यथासम भाषितम । न नीचाय प्रदातव्यं प्रयोगमनुभूतिदम् ॥२०॥
चक्रवर्त्ती वशं याति नाड्यथासम भाषितम । न नीचाय प्रदातव्यं प्रयोगमनुभूतिदम् ॥२०॥
इस उपाय और प्रयोग से चक्रवर्ती भी राजा वश में हो सकता है, यह मेरा वचन मिथ्या नहीं है, यह प्रयोग ऐश्वर्य को देने वाला है । यह नास्तिक और विश्वास न करने वाले को नहीं कहे ॥२०॥
इस उपाय और प्रयोग से चक्रवर्ती भी राजा वश में हो सकता है, यह मेरा वचन मिथ्या नहीं है, यह प्रयोग ऐश्वर्य को देने वाला है । यह नास्तिक और विश्वास न करने वाले को नहीं कहे ॥२०॥
राजवश्यमन्त्रः—ॐ नमो भास्कराय जगदादिम्ने राजानं वशमानय कार्यं कुरु कुरु फट् स्वाहा । सापादलक्षजपात् सिद्धिमवाप्ति ।
राजवश्यमन्त्रः—ॐ नमो भास्कराय जगदादिम्ने राजानं वशमानय कार्यं कुरु कुरु फट् स्वाहा । सापादलक्षजपात् सिद्धिमवाप्ति ।
इस मन्त्र का सवा लाख जप करने से सिद्धि होती है । बिना मन्त्र सिद्ध किये प्रयोग नहीं करना चाहिये ।
इस मन्त्र का सवा लाख जप करने से सिद्धि होती है । बिना मन्त्र सिद्ध किये प्रयोग नहीं करना चाहिये ।
अथाकर्षणि प्रवक्ष्यामि श्रुपुष्वैकमन मुनेः ! यस्मात प्रयोक्तः कृष्यन्ते ऽत्राप दूरस्थिताः नराः: ॥ १ ॥
ईश्वर उवाच— अथाकर्षणि प्रवक्ष्यामि श्रुपुष्वैकमन मुनेः ! यस्मात प्रयोक्तः कृष्यन्ते ऽत्राप दूरस्थिताः नराः: ॥ १ ॥
श्री शिवजी ने कहा हे योगिन्! अब मैं आकर्षण प्रयोग को कहता हूँ । तुम एकाग्र मन होकर सुनो । इस आकर्षण का प्रयोग करके दूर में रहने वाले मनुष्य को अपने समीप बुला सकता है ॥१॥
श्री शिवजी ने कहा हे योगिन्! अब मैं आकर्षण प्रयोग को कहता हूँ । तुम एकाग्र मन होकर सुनो । इस आकर्षण का प्रयोग करके दूर में रहने वाले मनुष्य को अपने समीप बुला सकता है ॥१॥
कृष्णघत्तूरपत्राणां रसैर्गोरोचनायुतैः । करवीरस्य लेबिन्या यन्त्रं पञ्चदशां लिखेत् ॥२॥
कृष्णघत्तूरपत्राणां रसैर्गोरोचनायुतैः । करवीरस्य लेबिन्या यन्त्रं पञ्चदशां लिखेत् ॥२॥
Page 24
काले धतूरे के पत्ते के रस में गोरोचन मिलाकर कनैल की कलम से पत्रह का यन्त्र ।।३।।
भोजपत्र पर लिख कर जिसका आकर्षण करना हो उसका नाम लेकर उस यन्त्र को खैर की आंच से तपावे तौ सौ योजन दूर रहने बाला भी जल्दी से आ जावे, इसमें संशय नहीं ।।३।।
भूर्जपत्रेषु तन्नाम्ना तापयेत खदिराग्निना । शत्रुथ जिनेन बाणेन शत्रि सिद्धयाथ नाड्यथा ।।३।।
नृकपाले लिखवेधेन्त्र गोरोचन-कुक्कुमे: । खदिराग्नौ शस्ताप्यं त्रिसन्ध्यं नस्य नासतः ।।४।।
गोरोचन और कुंकुम मिलाकर मनुष्य की खोपड़ी में उस यन्त्र को लिख कर और उस आदमी का नाम लेकर तीनों काल खैर की आँच से तपावे ।।४।।
मन्त्रं जपेत खुसंसीदं कर्षयेदवंश सीमपि । ब्रह्मदंडीं समादाय पुष्ट्याकेर्ण तु चूर्णयेत ।।५।।
और सिद्ध मन्त्र का जप करे तो उर्वशी का भी आकर्षण हो जावे । रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र में ब्रह्मदण्डी को ले आवे फिर छाया में सुखाकर उसका चूर्ण बना लेवे ।।५।।
कामार्तां कामिनीं दृष्ट्वा हस्तामलके विनिक्षिपेत । पृष्ठतः सौ सन्ध्यायाति नाड्यथा सम्भावितम ।।६।।
फिर काम से पीड़ित जिस स्त्री को देखकर उसके सिर पर छोड़ देवे तो वह भी उसके साथ हो जावे; यह मेरा कहनां सत्य है ।।६।।
आकर्षण मन्त्र:- ॐ नमो वीरवेतालाय मन्त्रराजाचलवासिने भस्मुकम् आकर्षय आकर्षय ह्रीं फट् स्वाहा । हाक्षत्रयजपात सिद्धिर्भवति ।।
यह आकर्षण मन्त्र तीन लाख जप करने से सिद्ध होता है । बिना मन्त्र सिद्ध किये प्रयोग करने में सफलत्ता नहीं होगी ।
Page 25
ईश्वर उवाच-- अथानः सम्प्रवक्ष्यामि यक्षिणीनां सुसाधनम् । यस्य सिद्धौ मनुष्याणां सर्वे सिद्धयन्ति हच्छया: ॥१॥
श्री शिवजी बोले हे मुनि ! अब यक्षिणियों ( चुड़ैलों ) का साधन कहता हूँ सावधान होकर सुनो । जिसके सिद्ध करने से मनुष्य की सब अभिलाषा पूरी हो जाती है ॥ १ ॥
आषाढपूर्णिमायां तु कृत्वा क्षौरादिकाः क्रियाः । सितेतद्ययोरमौध्ये तु साधयेच्छक्षिणीं नरः ॥ २ ॥
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिन क्षौर करा कर गुरू और शुक्र के उदय में यक्षिणी को मनुष्य सिद्ध करे ॥ २ ॥
प्रतिपदिनमारभ्य श्रावणेन्तद्वलान्वितम् । मासमात्रप्रयोगेनैवं निर्विघ्नं विधिमाचरेत् ॥ ३ ॥
फिर श्रावण कृष्ण पडिवा से चन्द्रमा को अनुकूल देखकर तीन मास तक निर्विघ्नता पूर्वक इस प्रयोग को करे ॥ ३ ॥
निर्जने बिल्ववृक्षस्य मूले कुुर्याच्च्छिवार्चनम् । बोधचौरुपचारैस्तु रुद्रपाठसमन्वितम् ॥ ४ ॥
एकान्त स्थान में बेल के वृक्ष के नीचे शिवजी का षोडशोपचार से पूजन करे और रुद्री का पाठ करे ॥ ४ ॥
इत्युबकेनतस्य जपं पश्चसहस्रकम् । दिवसे दिवसे कृत्वा कुबेरस्य च पूजनम् ॥ ५ ॥
फिर “त्र्यम्बकं यजामहे” इष मन्त्र का पाँच हजार जप करे और प्रतिदिन विधिवत् बलि आदि से धनाधिप कुबेरजी का पूजन किया करे॥
कुबेरमन्त्र:--यक्षराज ! नमस्तुभ्यं शङ्करप्रियबान्धव ! । एकां मे वशगां नित्यं यक्षिणीं कुरु ते नमः॥
Page 26
इति मन्त्रं कुबेरस्य जपेदष्टोत्तरं शतम् । ब्रह्मचर्येण मौनेन हविष्याशी भवेहिवा ॥ ६ ॥
इसी मन्त्र से कुबेर जी का प्रतिदिन विधिवत् पूजा करे । और इसी कुबेर मन्त्र को एक सौ आठ बार जप करे । ब्रह्मचर्य से रहे, दिन में मौन धारण करे तथा हविष्यान्न भोजन करे ॥ ६ ॥
रात्रेस्तु मध्यमौ यामौ विनिद्रो मितभोजनः । बिल्ववृक्षं समासाद्य जपेन्त्रिमिमं सदा ॥ ७ ॥
तथा रात्रि में कुछ भोजन करके निद्रा रहित हो वेल के वृक्ष के ऊपर बैठ जावे और इस नितिलिखित मन्त्र का जप करे ॥ ७ ॥
यक्षिणीमन्र:- ॐ क्लीं ह्रीं ऐं ॐ श्री महायक्षिण्यै सर्वैश्वर्यप्रदात्र्यै नमः श्री क्लीं ह्रीं ऐं ॐ स्वाहा । इति मन्त्रस्य च जपं सहस्रत्रयसम्मितम् । कुयाद्बिल्वसमाश्रितो मासमात्रमतन्द्रितः ॥ ८ ॥
यक्षिणी मन्त्र:- ॐ क्लीं ह्रीं ऐं ॐ श्री महायक्षिण्यै सर्वैश्वर्यप्रदात्र्यै नमः श्री क्लीं ह्रीं ऐं ॐ स्वाहा । इस यक्षिणी मन्त्र को वेल वृक्ष पर बैठकर सावधान होकर तीन मास तक प्रति दिन तीन हजार जप करे ॥ ८ ॥
मध्याह्निषबलिं तत्र कल्पयेत संस्कृतं पुरः । नानारुपघरा यक्षी कचिन्नागमिष्यति ॥ ९ ॥
मध्याह्न में बलि कल्पयेत् संस्कृतं पुरः । फिर यक्षिणी की बलि के वास्ते उत्तम मछली और मांस अपने सामने रख ले क्योंकि अनेक रूप को धारण करने वाली यक्षिणी किसी न किसी समय वहाँ अवश्य आवेगी ॥ ९ ॥
तां दृष्ट्रा न भयं कुयाज्जपे संस्कृतमानसः । यस्मिन् दिने बलिं सुकृत्वा वरं दातुं समर्थ्यते ॥१०॥
उसे देख कर भय नहीं माने, सावधान होकर अपना जप किया ही करे, जिस दिन बलि का भोजन कर वह वर देना चाहे ।
तदा वरान् वै ऋणुयान्नास्तान् वै मनसेप्सितान् ।
तदा वरान् वै ऋणुयान्नास्तान् वै मनसेप्सितान् ।
Page 27
धनमानचितुं ब्रूयादथवा कर्णवातिकीम् ॥११॥
उस समय जो जो इच्छा हो सो सब वरदान मांग ले, धन मंगवाने का वर मांग ले या अपने कार्ये की सब बात कहलाने का वरदान मांग ले ॥११॥
मोगार्थेस्थवा वश्यार्थं कर्तुमप्याथ वा । भूतानांचितुं वश्यपि क्षियामनचितुं तथा ॥१२॥
भोग भोगने के लिये अथवा नाच देखने के'लिये वरदान मांगे अथवा प्राणियों को तथा स्त्रियों को यक्षिणी के द्वारा अपने पास बुलाने का वर मांगे ॥१२॥
राजानं वा वशीकर्तुमायुर्विद्यायशोबलम् । एतचदन्यचद्रिप्सेत साधकस्ततु याचताम् ॥१३॥
अथवा राजा को वश में करने का वा आयु, विद्या, यश और बल का वर मांग ले, इसके अतिरिक्त साधक की जो इच्छा हो सो वरदान मांगे ॥१३॥
चेत्प्रसन्ना यक्षिणी स्यात सर्वे दत्ते न संशय: । अशक्तस्तु द्विजै: कुर्यात प्रयोगं सुरपूजितम् ॥१४॥
यदि यक्षिणी प्रसन्न हो जावे तो निश्चित साधक की इच्छा को पूर्ण करने वाले सब प्रकार के वर को देती है। यदि इस प्रयोग को करने में स्वयं असमर्थ हो तो ब्राह्मणों से इस प्रयोग का साधन करावे ॥१४॥
सहायानथवा गृह्य ब्राह्मणान साधयेद्वलम् । नित्यं कुमारिका भोज्या: परमान्नेन चैव न ॥१५॥
अथवा ब्राह्मणों की सहाय्यता लेकर इस प्रयोग का साधन करे, और इस प्रयोग में तीन कुमारि कन्याओं का प्रतिदिन भोजन दिया करे ॥१५॥
सिद्धे धनादिकेनैव सदा सत्कर्म चाचरेत । कुकर्मणि व्ययहचेतस्यातिसिद्धिगंच्छति नान्यथा ॥१६॥
यक्षिणी के सिद्ध होने पर जो धन आदि प्राप्त हो उसे शुभ कर्मों में खर्च करे । निन्दित कर्मों में यक्षिणी के दिये धन को खर्च करने से सिद्धि नष्ट हो जाती है ॥१६॥
Page 28
गुरसेव विधिना कार्य प्रकाशां नैव कार्यित्। प्रकाइो वहवो विधिना जायते नात्र संशयः ॥१७॥
इस प्रयोग को गुप्त रूप से करे, कदापि इसे प्रकाश न करे। प्रकाश करने से तिरस्कृत बहुत से विकृत होते हैं ॥१७॥
तस्माऽऽनुभवदाचारः । निर्विघ्नेन विधानेऽ भवेत् सिद्धिरनुत्तमा ॥१८॥
यह अनुभव किया हुआ सिद्ध प्रयोग है, इसको यत्नपूर्वक करना चाहिये, इस प्रयोग को निर्विघ्न समाप्न करनेसे अच्छी सिद्धि होतो है॥१८॥
गोप्यं वेदं महातन्त्रं गृहमै कर्स्सै न दापयेत् । दुर्जनसंसर्गाद्भया भवत्यल्पकला यतः ॥१९॥
इस महातन्त्र को गुप्त रखे, नास्तिक, पाखण्डी, शठ और--कृपण इन से कभी न प्रकाश करे क्योंकि दुर्जन के संसर्ग से सिद्ध प्रयोग का फल नष्ट हो जाता है ॥१९॥
दशमाङ्कः ।
ईश्वर उवाच— अथ ते कथयिष्यामि रसायनविधिं परम् । कुबेरतुल्यो भवति यस्मात् सिद्धो नरो भवि ॥१॥
श्री शिवजी बोले हैं योगिराज ! अब मैं तुझसे रसायन विधि कहता हूँ। सावधान होकर सुनो, जिस के करने से पृथ्वी पर मनुष्य कुबेर के समान हो जाता है ॥१॥
गोमूत्रं हरितालं च गन्धकं च मनःशिलाम् । समं समं गुहीत्वा तु यावच्छुष्कं तु पेषयेत् ॥२॥
हरताल, गन्धक, मैनसिल इनको बराबर लेकर जब तक ये सूख न जावें तब तक गोमूत्र में खरल करे ॥२॥
Page 29
गोमूत्रं रक्तवर्णीच मन्थकं रक्तवर्णकम् ।
लाल गाय का मूत्र और लाल गन्धक इन्हें पवित्र होकर ग्यारह दिन पर्यन्त यत्न पूर्वक रखे ॥३॥
एकादशादिनं ध्यात्वा धातुना वै शुचि ॥३॥
गोलं कृत्वा द्वादशेऽहि रक्तवस्त्रेण वेष्टयेत् ।
नारहवें दिन इसका गोला बनाकर उसपर लाल कपड़ा लपेटे और चार अंगुल मोटी मिट्टी उसपर लगा कर उस गोले को घाम में सुखा ले ॥४॥
चतुरङ्गुलसानेन मृदं लिप्सवा विशेषयेत् ॥४॥
पञ्चहस्तप्रमाेण भूमौ गर्त्त तु कारयेत् ।
फिर भूमि में पांच हाथ का गड्ढा खोद कर उसके बीच में गोला रख देवे । उसके चारों ओर से पलाश का कोयला गड्ढे में भर देवें ॥५॥
पलाशकाष्ठलोष्टैस्तु पूरयेद्द्रवयमध्यगम् ॥५॥
अग्निं दद्यात् प्रयत्नेन स्वाङ्गार्शीतं समुद्ररेत् ।
उस कोयले में यत्न पूर्वक अग्नि लगा देवें, जब अग्नि जल कर अपने से ठण्डी हो जावे तो उसमें से गोले को बाहर निकाल लेवे और तांबे के पत्र को भी आग में तपाकर उसपर गोले की राख को डाल देवें ॥६॥
ताम्रपत्रेषु सन्तप्ते तद्रसम् तु प्रदापयेत् ॥६॥
गुज्जैकं तत्क्षणात् स्वर्ण जायते ताम्रपात्रकम् ।
तो एक घुंघुची के वरावर वह तांबे का पत्र उसो समय सुवर्ण का हो जावेगा । फिर वन में, एकान्त स्थान में, शिवजी के मन्दिर के समीप में ॥७॥
अरण्ये निजने देशे शिवालयसमीपतः ॥७॥
शुक्लपक्षे सुचन्द्रेर्हि प्रयोगं साधयेत् शुचिः ।
शुक्लपक्ष में जिस दिन चन्द्रमा बलवान् हो उस दिन यह प्रयोग करे और 'त्र्यम्बकं यजामहे' इस मन्त्र का प्रतिदिन दस हजार जप करे ॥८॥
त्र्यम्बकं च मन्त्रस्य जपं दशसहस्रकम् ॥८॥
Page 30
प्रत्यहं कारयेन्द्रिप्रान् भोजयेदुद्रसमित्तान् । यावत् सिद्धिं जायेत तावदेतह्समाचरेत् ॥९॥
इस प्रकार प्रतिदिन करे और ग्यारह ब्राह्मणों को नित्य भोजन करावे, जब तक सिद्धि न हो तब तक ऐसा ही करे ॥१९॥ द्वृटयमर्दनमन्त्रः—— ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वर्णादीनामेशाय रसायनस्य सिद्धिं कुरु कुरु फट् स्वाहा । प्रत्यहं मर्दनेsयुतं जपेत् । इन क्रियाओं को करते समय प्रतिदिन इस उपरोक्त मन्त्र का दस हजार जप करे ॥
इत्येवं शाम्भवा प्रोक्ता मन्त्रा: प्रत्यक्षसिद्धिदा: । स्वप्रे शिवाद्रिगिरयेsनुभूूतास्तु तेन वै ॥१०॥
यह प्रत्यक्षसिद्धि देनेवाले मन्त्र को ध्यान में शिवजी ने अपने भक्त शिवांगारि से कहा है और शिवगिरि ने इन मन्त्रों की परीक्षा करके प्रकट किया है ॥१०॥
शिवाज्ञया सुनिर्वन्धा: झुभै: पञ्चैर्थामतिः । अननेन विधिना मर्त्या ये करिष्यन्तह्संशया: ॥११॥
शिवजी की आज्ञा से महर्षि शिवगिरि ने यथा शास्त्र और यथा मातृ के अनुसार उन प्रयोगों को इलोकबद्ध किया जो कि शिवजी ने उपदेश दिया था । जो मनुष्य श्रद्धा पूर्वक उक्त प्रकार से उन प्रयोगों को करेंगे ।
सिद्धिं हालौकिकीं लब्ध्वा भौवष्यन्ति सुपूजिता: । सन्देहोऽत्र न कर्तव्य: साक्षाच्छङ्करभाषिते ॥१२॥
उन्हें अलौकिक सिद्धि प्राप्त होगी और वह साधक संसार में पूज्य होगा । शिवजी के कथे प्रयोग में सन्देह नहीं करना चाहिये ॥१२॥
इति श्रीमहेश्वरप्रोक्तं माहेश्वरीयतन्त्रं समाप्तम् ।
Page 32
श्रसमत्काशितस्तोत्रापि
दुर्गासप्तशती—मूलमात्र सचित्र पत्नात्मक यन्त्रस्थ दुर्गासप्तशती—तांबीजो
बगलामुखी पञ्चाङ अपराजिता स्तोत्र—मूलमात्र ऋणमोचनमञ्जलस्तोत्र गुह्येश्वरी सहस्रनामस्तोत्र ताराक्षिपूजस्तोत्र—सं टि, भा टि, पञ्चाङ्गवाद दुर्गाशतनाम स्तोत्र दैवत्यपराधक्षमापनस्तोत्र-भा०टि० तथा सरस्वतीकवच-भा०टि०
प्रतिज्ञावरी—भा० टि० तथा चण्डीपञ्चरी ब्रह्मचारीन्त्रिका-मोहमुद्गर महाकाल सहस्र नाम स्तोत्र--शिवागमकल्पोक्त मञ्जलागौरीस्तोत्र—भा० टि० महाकाल शान्तिमृत्युजय स्तोत्र महाकाली शतनामस्तोत्र कालिकवच महामृत्युजय जपाङ्गादि वेदोक्त-तन्त्रोक्त महाविद्यास्तोत्र—सप्तयोग महालक्ष्यष्टक स्तव महिषस्तोत्र—मूलमात्र ललितासहस्रनामवडी विपरीतप्रत्यङ्झिरास्तोत्र शनिस्तोत्र सूर्यस्तवराजादि—अष्टोत्तरस्तोत्र
पुस्तकप्रकाशन- मास्टर खेलाड़ी लालत ऐड सन्स संस्कृत बुकडिपो, कचौड़ीगली, बनारस-१