1. Mandukya Upanishad Praksa Bhashya of Datia Swami Hindi Tika by Krishnanand Budholiya
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माण्डूक्योपनिषद्
माण्डूक्योपनिषद्
अनन्त श्रीविभूषित गुरुवर श्री स्वामी जी की स्मृति में
चतुर्थ पुष्प
बनखण्ड श्रीपीताम्बरापीठस्थस्वामिकृता
पंचोपनिषत्
पंचोपनिषत्
(प्रकाश-भाष्य)
पर
आधारित टीका
(संस्कृत-हिन्दी)
टीकाकार
श्री कृष्णानन्द जी बुधौलिया, वेदान्त शास्त्री
दतिया (म०प्र०)
प्रकाशक:-
श्री पीताम्बरा पीठ
दतिया (म०प्र०)
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माण्डूकोपनिषद्
अनन्तश्रीविभूषित गुरुवर श्री स्वामी जी की स्मृति में
चतुर्थ पुष्प
वनखण्डीशपीताम्बरापीठस्थस्वामिकृता
पंचोपनिषत्
(प्रकाश-भाष्य)
पर
आधारित टीका
(संस्कृत-हिन्दी)
टीकाकार
श्री कृष्णानन्द जी बुधौलिया, वेदान्त शास्त्री,
दतिया (म०प्र०)
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माण्डूक्योपनिषद्
प्रकाशक : श्री पीताम्बरा पीठ दतिया (म०प्र०) टीकाकार : श्री कृष्णानन्द जी बुथौलिया, वेदान्त शास्त्री दतिया (म०प्र०) प्रथम संस्करण : 2037 (1980) पुनर्मुद्रण सम्वत् : 2066 (2009 ई०) मुद्रक : शिवशक्ति प्रेस प्रा० लि० नयागांव, ग्वालियर रोड, झांसी (उ०प्र०) फोन-0510-2441092 मूल्य : २५ रुपये
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श्री पीताम्बरा पीठाधीश्वराः परम पूज्य श्री १००८ श्री स्वामी जी महाराज वनखण्डेश्वर, दतिया
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प्राक्कथनम्
उपनिषदो हि नाम भारतीयानां महर्षीणामतिनिर्मले तपः पूते हृदि स्वतः प्रतिभाता: | एता हि तेषां चरमसाधनापरिगते-राध्यात्मिक्यानुभूतेर्मूर्तिमन्तो ग्रन्था: | सर्वजनप्रसिद्धानां वेदानामपि शीर्षण्यानामासां महत्वमनादिकालाद्यावधि भगवत्या: सुरसर्या: स्रोत इव निरवच्छिन्नं वरीवर्ति | सर्वैरपि महात्मभिरासामाश्रयादेव परमां शान्तिरलभ्यत | अतोऽध्यात्म मार्गे रुक्ष्णामपि चैतद् ग्रन्थानां स्वाध्यायोऽतीवावश्यकोऽस्ति | अध्यात्मपथिकै: सर्वैरपि महात्मभिरतिदीर्घे पथि गच्छद्भिरिदृग्दर्शनाय प्रदीपस्तम्भवद् समाश्रयो गृहीतः | भारते प्रचारितानां सर्वासां साधनानां मूलमुपनिषदग्रन्थेषूपलभ्यते | वेदानां शीर्षण्यतयैतेग्रन्था वेदान्तशब्देनाभिधीयन्ते | वेदान्तानां चरमं तात्पर्यमुपनिषत्प्रोक्ते द्वैततत्त्वे पर्यवसीयते | अतएव वेदान्तो नाम उपनिषत्प्रमाणमित्युक्तं वेदान्तसारो | यतु वेदेभ्य: (ऋग्यजु:- सामाथर्वातमूलसहिताग्रन्थेभ्य:) अवरं स्थानमुपनिषदामिति केचिदास्थितषत, तदनार्षयुक्तिवहिष्कृतमपूर्णञ्चेत्यग्राह्यम् | इदं वैदिकं विज्ञानं निगमशब्देनाभिधीयते | अस्त्येतत्सहो दरमेकन्यद् विज्ञानमागमशब्दाभिधेयम् | तदपि तत्त्वदृशां महर्षीणां दिव्यानुभूतिप्रसूतम् | अतो वैदिको धर्मोऽनादिप्रवाहादेव निगमागमशब्देन व्याहियते | “आगम: पश्चमो वेद” इति आगमिका मन्यते |
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आगतः शिववक्त्रेभ्यो गतश्च गिरिजामुखे । मतश्च वासुदेवस्य तस्मादागम उच्यते ॥
इत्यागमिकानां डिण्डिमः॥ आगमे श्लोके शिववक्त्रेभ्य इति बहुवचनान्तपदेन षडाम्नायाख्यातानां सर्वेषां मन्त्रतदुद्देवतादिस्वरुपाणामवरोधः कृतो भवति। षडाम्नायिकामन्त्राश्च पञ्चब्राह्ममन्त्राणामेव विकास इति मन्त्रविदो विदन्ति। वैदिकमन्त्राणामिव आगमीयमन्त्राणामपि ऋषिच्छन्दोदेवतादयो भवन्ति। वशिष्ठविश्वामित्र नारदादयो बहवो ऋषयस्तु उभयत्र समाना दृश्यन्ते। वीजशक्ति कीलकमिति त्रयमागमीयमन्त्रेष्वधिकम्। वैदिकेष्वपि क्वचित् फट्, वषट्, स्वाहेत्यादिबीजानि प्रयुज्यमानानि दृश्यन्ते। बीजादिज्ञानं तु आलौकिकानुभूतेर्धीनम्। वैदिकमन्त्राश्चानेके तान्त्रिकपद्धत्या विनियुक्ता भवन्ति। महर्षेसतत्रभवतो गौरीवोति शाक्तस्य षट्त्रिशदधिकं सर्वविदितं सत्रं तान्त्रिकं सदपि ताण्डयब्राह्मणेनाढ़ीकृतम्। एतद्दिश्यालोचनेन वैदिकधर्मस्यागमसोदरत्वमतिस्पष्टं भवति। एतयोमिश्रितयोरुभयोरपि वर्णनं पुराणोपपुराणेषूपलभ्यते।
"वैदिकस्तान्त्रिको मिश्र इति मे त्रिविधो मखः ।" -भास्करः ११
इत्याग्युक्तीनामयमेवाभिप्रायः । वै दिको हि धर्मों यथा कर्म, ज्ञानञ्चेति काण्डद्वयेनोपवर्णितस्ततस्तैवागमधर्मोऽपि द्विधा विभक्तो विलोक्यते
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माण्डूक्योपनिषद्
पूर्वोक्तकाण्डाभ्यां। वैदिकं कर्म, मीमांसा-कल्प-सूत्रग्रन्थाधारेण विविच्यते। उदात्तानुदात्तादिस्वरसंविधानोच्चारणदुशकतया वैदिकं कर्म विलुप्तप्रायम्। तान्त्रिकं तु तत्कलेशविनिर्मुक्तत्वात् कृतिसाध्यता सौकर्याद् बहुजनोपयोग्योसिद्ध्यत। अत एव तस्य प्रचारो लोकप्रियता चाद्याप्यक्षुण्णा वरीवर्ति। ब्रह्म-दर्शन तूभयत्र समानम्। एतच्च काश्मीरिकैर्दा क्षिणात्यै श्चाचार्यविद्वद्भिश्च दार्शनिकपद्धत्या मीमांसितम्। वैदिकस्तान्त्रिकश्चोभौ द्विविध आगमो भवतीत्युक्तं शिवार्कमणिदीपिकायाम् अप्यद्यदीक्षितेन। तान्त्रिकेषु सप्ताचार्यवकस्याचारस्य वैदिकत्व संवरूप तान्त्रिकरोचायर्हीकृतम्।
शिवावतारेण भगता श्रीशडूराचार्येणोपनिषद्भ्योदान्तेषपूर्व स्वीयं विवरणमलिख्यत जगत्प्रसिद्धम, किन्तु तान्त्रिकज्ञानाद्वैत निरुपणे तेन प्रमाणवादे सर्वत्र श्रुति: समुदाहरता सर्वथा मौनमवलम्बितम, तथापि तत्प्रणीतैस्तान्त्रिकैग्रन्थै:-तन्त्रसिद्धान्तस्तस्य सम्मत--इति स्पष्टं प्रतिभाति, तन्मतस्थागमग्रन्थेश्च: क्वचिदप्यविरोधात्।
एतद्दृष्ट्वैव षोडश-सप्तदशेभ्यो वर्षेभ्य: पूर्वमुपनिषत्प्रकाशभाष्यनामा ईश-केन-कठ-मुण्डक-माण्डूक्योपनिषदां विवरणमक्रियत। ईशोपनिषदि एकं योगपक्षीयं विवरणं पृथगपि कृतभिति पञ्चसूपनिषत्सु षडेव विवरणानि सन्ति ईशावास्योपनिषद् द्वि काण्वमाध्यन्दिनशाखाभेदेन द्विविधोपलभ्यते। अथावधि समुपलभ्यमानेषूपनिषद्भाष्येषु ईदृक् प्र यास स्याकृत तप्र यात्वात् कृतस्यापि च कदे शीयत्वात् पक्षपातदृशोपरक्ततव्वाच्च अभिनवस्यैतस्य प्रयासस्य सफलासफलत्व
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माण्डूक्योपनिषद्
निर्णये तु तद्विदो विद्वांस एव प्रमाणम्।
मया तु महामहिम्नः पराशक्तेः प्रेरणाया यथाशक्ति पालनं कृतम्। अन्यासूपनिषत्सु विवरणायां सत्यामपि समुचित सामग्रीसौलभ्याभावात कर्तव्यं पूरयितुं नाशक्यत यैर्महानुभावैरस्मिन् कार्ये सहाय्यमनुष्ठितं तेषां विस्मरणमनुचितं भवेदिति तद्त्र सोपकार स्मयिन्ते।
राजकीयसंस्कृतपाठशालाध्यापकः श्री चिरञ्जीलाल शास्त्री अनेन महानुभावेन उपलब्ध हस्तलिखितपुस्तकप्रतिलिपिकरणे मुद्रणोपयोगिसज्जिकाविधानेन च महान् परिश्रमो विहितः । स्वास्थ्ये दुर्बलेsपि पण्डित श्री चन्द्रभानुशास्त्रिणा पूफशुद्धि सम्पादनेsतिश्रमः कृतः ।
श्री वैद्यनाथ आयुर्वेदभवन सञ्चालकेन पण्डित श्रीरामनारायणवैद्यमहानुभावेन एतत्प्रकाशनस्य सर्व व्ययभारं स्वयमुद्य कलिकातायां स्वीये जनवाणी प्रिण्टर्स एण्ड पब्लिसर्स प्रा० लि० नाम्नि यन्त्रालये मुद्रापयित्वैतत्प्रकाशितम् ।
इत्युप निष्ठत्प्रतिपाद्यपरादेवता पूर्वोक्तानां महानुभावानां सततमभ्युदयं निश्रेयसं च निध्यादितिप्रार्थना ।
वनखण्डश्रीपीताम्बरापीठस्थस्य स्वामिनः ।
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प्राक्कथन (अनुवाद)
भारतीय महर्षियों के तपः पूत निर्मल हृदय में उपनिषदों का स्वयं उद्रेक हुआ है। यह उपनिषद् उनको चरम साधना की परिणाम-भूत आध्यात्मिक अनुभूति के मूर्तिमान् ग्रन्थ है। सर्वजन प्रसिद्ध वेदों के शीर्षस्थ भाग इन उपनिषदों के महत्व की धारा अनादिकाल से वर्तमान काल पर्यन्त उसी प्रकार अविच्छित्र रूप से प्रवाहित है जैसे भगवती भागीरथी के प्रवाह का निर्मल श्रोत। इनके ही आश्रय से महान् साधकों ने परम शान्ति की प्राप्ति की है। अतः आध्यात्मिक मार्ग के आरोही साधकों के लिये इनका स्वाध्याय अत्यन्त आवश्यक है। अध्यात्म मार्ग में चलने वाले समस्त महात्मा पथिकों के द्वारा प्रकाश स्तम्भ के समान दिग्दर्शन के हेतु इन उपनिषदों का ही सहारा लिया गया है। भारत वर्ष में प्रचारित समस्त साधनों का मूल श्रोत उपनिषत् ही है। वेदों में शीर्षस्थ होने के कारण ही इन ग्रन्थों को वेदान्त शब्द से सम्बोधित किया जाता है। वेदान्तों के चरम तात्पर्य का पर्यवसान उपनिषदों में प्रतिपादित अद्वैत तत्व में ही होता है। अतएव 'वेदान्त सार' नामक ग्रन्थ में उस शास्त्र को वेदान्त के नाम से कहा है जो उपनिषदों को ही प्रमाण के रूप में स्वीकार करता है। जो भी यह कहते हैं कि ऋग, यजु, साम एवं अथर्व वेदों के मूल संहिता ग्रन्थों में उपनिषदों का स्थान अपर है। उनका कथन अनर्थ, युक्तिरहित, अपूर्ण होने से
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माण्डूक्योपनिषद्
इस वैदिक विज्ञान को निगम नाम से सम्बोधित किया जात है। इस विज्ञान का सहोदर एक अन्य विज्ञान भी है जिसका नाम आगम है। यह भी तत्व द्रष्टा महर्षियों की दिव्य अनुभूति का परिणाम है। अतः वैदिक धर्म का अनादिकाल से ही निगमागम शब्द के द्वारा व्यवहार किया जाता रहा है। (आगम शास्त्र के अनुयायी) आगमिक विद्वान आगम शास्त्र को पञ्चम वेद मानते हैं।
आगतः शिव वक्त्रेभ्यो गतश्च गिरिजा मुखे। मतश्च वासुदेवस्य तस्मादागम उच्यते॥
आगमिकों की यह घोषणा है कि इस शास्त्र का आविर्भाव स्वयं शिव के मुख से हुआ है तथा गिरिजा पार्वती ने इसका श्रवण किया। इस शास्त्र में वासुदेव का मत प्रतिपादित है अतः इसको आगम नाम दिया गया है। इस श्लोक में शिववक्त्रेभ्यः शब्द का प्रयोग बहुवचन में है इसके तात्पर्य है कि यहां षडाम्नाय में आख्यात समस्त मन्त्र देवता आदि के स्वरूपोंका अवरोध किया गया है। षडाग्नायिक मन्त्रों का विकार पाञ्चब्राह्म मन्त्रों से ही हुआ है ऐसा विद्वानों का मत है। वैदिक मन्त्रों की भांति ही आगमीय मन्त्रों के भी ऋषि, छन्द, देवता आदि होते हैं। वशिष्ठ, विश्वामित्र, नारद आदि बहुत से ऋषि निगम व आगम दोनों में ही समानरूप से देखे जाते हैं। आगम
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मन्त्रों में बीज, शक्ति, कीलक का प्रयोग वैदिक मन्त्रों की अपेक्षा अधिक है। वैदिक मन्त्रों में भी कहीं फट्, वषट्, स्वाहा आदि बीजों का प्रयोग भी आगमिक मन्त्रों के समान उपलब्ध होता है। बीज आदि का ज्ञान आलौकिक अनुभूति के अधीन है। अनेकों वैदिक मन्त्रों का विनियोग तान्त्रिक पद्धति से होता है। महर्षि का सर्वविदित षट्त्रिंशादिक गौरीव शाक्त सत्र यद्यपि तान्त्रिक है
तथापि इसका ब्राह्मण ने अद्धीकार किया है। इस विषय की आलोचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि वैदिक धर्म एवं आगम का सहोदरत्व सिद्ध है। इन उभय धर्मो के मिश्रित होने की चर्चा पुराण तथा उपपुराणों में भी मिलती है जैसा कि भागवत पुराण के एकादश स्कन्ध में कहा है :-
"वैदिकास्तान्त्रिको मिश्र इति मे त्रिविधोमखः ।"
जिस प्रकार वैदिक धर्म कर्म एवं ज्ञान दो काण्डों में विभक्त है उसी प्रकार आगम धर्म भी कर्मकाण्ड एवं ज्ञान काण्डों में विभक्त है। वैदिक कर्म का विवेचन मीमांसा, कल्पसूत्र आदि ग्रन्थों के आधार पर किया जाता है। किन्तु उदात्त, अनुदात्त आदि स्वरों के संविधान के कारण वैदिक मन्त्रों का उच्चारण कठिन है
अतः इसके सम्पादन में सरलता न होने से यह कर्म लुप्तप्राय हैं। इसके विपरीत तान्त्रिक मन्त्र उच्चारण के क्लेश से मुक्त हैं तथा क्रिया की सरल पद्धति के कारण यह बहुतों के उपयोग के योग्य सिद्ध हैं अतः इनका प्रचार एवं लोकप्रियता आज भी देखी जाती
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जहां तक ब्रह्म दर्शन का प्रश्न है यह वैदिक एवं आगमिक शास्त्रों में समान है। इसके विकास की मीमांसा काश्मीरी एवं दाक्षिणात्य विद्वान आचार्यों ने दार्शनिक पद्धति से की है। अप्पय दीक्षित ने शिवार्कमणि दीपिका नामक ग्रन्थ में आगम शास्त्र को वैदिक एवं तान्त्रिक दो भागों में विभक्त किया है। तान्त्रिकों के सप्ताचार में से केवल एक आचार को वैदिक स्वीकार किया गया है।
यह जगत् प्रसिद्ध है कि भगवान शिव के अवतार श्री शङ्कराचार्य ने उपनिषद् वेदान्त पर अपना अपूर्व विवरण लिखा है। किन्तु तान्त्रिक अद्वैत-ज्ञान के निरूपण में यद्यपि आचार्य ने प्रमाणवाद में केवल श्रुतियों को उद्धृत किया है आगम के सम्बन्ध में मौन का अवलम्बन किया है तथापि उनके द्वारा लिखे गये तान्त्रिक ग्रन्थों से पता चलता है कि तन्त्र-सिद्धान्त उनके मत के अनुकूल है। इसके अतिरिक्त यह भी स्पष्ट है कि श्रीमदाचार्य के ग्रन्थों में आगम ग्रन्थों का विरोध कहीं देखा नहीं गया है।
इसी दृष्टि से तैतीस वर्ष पूर्व ईश, केन, कठ, मुण्डक तथा माण्डूक्य उपनिषदों का प्रकाश नामक भाष्य किया था। ईशावास्य उपनिषद् का पृथक से एक योग पक्षीय भाष्य भी किया था इस प्रकार पांच उपनिषदों पर छै भाष्य लिखे गये हैं। काण्व एवं माध्यमदिनीय शाखाओं के भेद से ईशोपनिषद् किंचित् भिन्नता के साथ दो प्रकार
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माण्डूक्योपनिषद् का है। उपनिषदों में आज तक जो भाष्य किये गये हैं वे एकदेशीय होने से पक्षपात पूर्ण हैं तथा सम्प्रदाय के प्रभाव से अछूते नहीं हैं। प्रस्तुत भाष्य को इस दोष से मुक्त रखने का प्रयत्न किया गया है। इस अभिनव प्रयास की सफलता अथवा असफलता का प्रमाण विद्वान् ही हो सकते हैं। मैंने तो महामहिम पराशक्ति की प्रेरणा का यथाशक्ति पालन किया है।
मूल संस्कृत-लेखक वनखण्ड श्री पीताम्बरा पीठस्थ अनन्तश्रीविभूषित श्री स्वामी जी महाराज अनुवादक साधक कृष्णानन्द पीताम्बरापीठ, दतिया
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वेदप्रतिपाद्या सनातनी भारतीया संस्कृति: इति पुरातनात् कालात् सर्वेषां हिन्दुधर्मीयानां श्रद्धा बलवती। न केवलं-हिन्दुधर्मानुयायिनामेव एषा कल्पना, प्राय: सर्वेषां धर्माभ्यासकानां संमता एषा। ऐतिहासिकानां च अत्र वैमत्यं स्पष्टं दरिदृश्यते। न सर्व: भारतीय: धर्म: वेदपुरस्कृत:, न वा वेदप्रमाणक:, इति विविधै: सम्प्रदायै: ये विचार: प्रस्तुता: तस्मात् अवगम्यते। केचन सम्प्रदाय: वेदप्रामाण्यं न स्वीकृर्वन्ति। अतएव आस्तिक-नास्तिक-रूप: भेद: दर्शानानाम्। भारतीय: तत्त्वचिन्तका: न तथा ईश्वर-ब्रह्मादि-तत्त्वप्रमाणका:, यथा विचारप्रणाली चिकित्सादृशा विचारप्रमाणका:, इत्यपि वक्तुं शक्यते। अत: नास्ति आश्र्चर्यकारकं किंचित् यदि एकैकस्मिन् सम्प्रदाय विचार बाहुल्यस्य आधारेण बहुविध: विचारधार: कालीघे समुत्पत्र: एषु विचारेषु तान्त्रिक: वैदिक: उत अवैदिक:, तथा च तन्त्रसम्प्रदाय: प्रथमं वेदानुयायिषु स्वीक्त: उत बौद्धादिभि: तत्पूर्ववर्तिभि: वा अन्यै: उपासित: उत्तरे काले भारतीयतत्त्वचिन्तकै: अज्ञीकृत: इति प्रश्नदयं अद्यापि न सर्वथा समाहितं दृश्यते तत्त्वज्ञानस्य इतिहासे।
स्मृत्युपोदबलनेन दृढस्य वेदधर्मस्य आगमादिग्रन्थानां प्रामाण्योपगमितेन अतिमात्रं प्रसृतस्य तन्त्रमार्गस्य च क: सम्बन्ध: इति महान् विवाद: अनुभवते। य: किल वेदस्मृत्यादिप्रतिपादित: रूढाचार:, यश्च तन्त्रग्रन्थे: समर्थित: गूढाचार:, तयो: मध्ये भवति काचन अनुभूतिगोचरा विसंगति:। यै: च शंकर भगवत्पादप्रभृतिभि: बौद्धादीनां खण्डनेन वेदधर्मस्य पताकाम् उत्तोलयित्वा अभूतपूर्वा
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धर्मक्रान्ति: भारतस्य इतिहासे पुरस्कृता, तै: अपि तन्त्रमार्गस्य अवलम्बनं न निराकृतं, प्रत्युत स्वसमर्थनेन समादरं प्राप्तितम् । अतः तन्त्रमार्गेण गच्छताम् अपि धार्मिकाणां भवत्येव स्वीकार्यता इति विमति: भवितुं नार्हति। वामाचार-दक्षिणाचार-रूपेण निमित्तत्वं अभ्यर्हितत्वं चाधी अनुगम्यते। को वाम: को वा दक्षिण:, सर्वमपि अस्माकं विचारसंदर्भानुसारं भवति इति विचार: अपि कैश्चन आत्मानं दृढतया वेदानुयायिनं मन्यमानै: प्रकटित: । अतः वैदिकाः तान्त्रिकाः च परस्परं विचारविनिमयेन स्वस्वविचारप्रणालीम् अभ्यसेतु: इति युज्यते।
महत्त्वपूर्णं खलु कार्यं कृतम् अस्य समन्वयविचारस्य उपादानेन श्रीमद्ध् वेङ्खण्डनाथाश्रमस्वामिभि: । वैदिकी उपासनापद्धति:, तान्त्रिकी च उपासनापद्धति: समाना, वसिष्ठविश्वामित्रनारदप्रभृतय: ऋषय: समाना:, इति एतै: प्रतिपादितम् । उपासनापद्धते: विचार: कर्तुंशक्यते। ऋषि-विचारस्तु कठिन: । तथापि वैदिकधर्मस्य तन्त्रमार्गसोदरत्वम् अज्ञीकरतुं न क्षति: । 'श्रुतिस्तु द्विविधा वैदिकी तान्त्रिकी च' इति कुल्लूकभट्टेन, तथा च 'वैदिकस्तान्त्रिकश्चेति द्विविध: आगमो भवति' इति अप्यथर्ववेदादिकतन प्रमाणितत्वात्, शंकराचार्यादिभि: तन्त्रमार्गस्य अभ्यर्हणीयत्वेन दर्शितत्वात् च वस्तुत: द्वैधं नाडस्तु इति भवति मति: ।
तथापि विचाराणां बाहुल्येन, आचाराणामपि च सुविस्तृतत्वात्, रुचीनां वैचित्र्यात् च, क्वचन शंकावसर: भवितुम् अर्हति तान्त्रिकाणां संमते अद्वैतवादे अपि श्रुति: एव समुदाहरद्धि: आचार्यै: । तन्त्रसिद्धान्ते अन्यत्र स्वयं प्रतिपादिते अपि वेदान्तनिरूपणे मौनम् अवलम्बितं संशयावसरं निर्याति ।
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माण्डूक्योपनिषत्
पीताम्बरपीठस्थैः स्वामिभिः ईशादिपञ्चोपनिषदत्सु प्रकाशसंज्ञकं भाष्यं निर्माय अस्य समन्वयविचारस्य दादृश्यं सम्पादयितुं प्रयतितम् इति समुचित दिशैव विचारितम् ।
सर्वथा अभिनन्दनीयः अयम् उपक्रमः वेदान्तानां सत्यावेदक त्वरुपप्रामाण्यस्थापनाय भेदाभेददृशामिव वेदतन्त्रानुयायिनां समकक्षताप्रदर्शनपथा । जगत्कारणम् आप्नस्य शिवस्य अपरिमितं सामर्थ्यं परिकल्पितम् उपनिषत्सु । "परास्य शक्तिरिविधैव श्रूयते', 'एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगात्" इत्यादिनी वचनानि शुद्धतत्वस्य आकलनाकटिन्यं परियन्ति । अतः शिवात्मकं यत् तुरीयं तत्वं तत् द्वैताद दृष्टादिरुपाद, व्यवहरहितात्.... अचिन्त्यरुपं, केवलेन अवहितमनसा लक्ष्यरुपेण बोद्धुं शक्यते इति प्रकाशकारैः यदुक्तं तस्य सत्यत्वं मनसि दृढं भवति ।
तान्त्रिकाणां परमं ध्येयं, वैदिकानां च अन्तिमतत्वरुपं ज्ञानं सर्वथा एकरुपम् इति प्रमाणपुरःसरं प्रतिपादयितुं कृतं पद्योपनिषत्सु भाष्यं नैकेषु भाष्येषु स्वकीयं स्थानम् आददीत इति प्रतिभाति । वेदान्तशास्त्राभिः पण्डित-कृष्णानन्द-बुद्धौलिया महोदयैः कृतं माण्डूक्योपनिषत्प्रकाशस्य हिन्दीभाषया अनुवादं दृष्ट्वा प्रमोदः भवति । प्रकाशभाष्यस्य शेषांशशोडपि तैः सरलया सुबोधया हिन्दीभाषया सर्वजनसौलभ्यार्थ प्रकाशितः भवतु इति आशास्यते ॥
डॉ. स.मी. अयाचितः
एम.ए.पीएच.डी. वेदान्त विशारदः
नागपुरविद्यापीठस्थः हस्तलिखिताधिकारी
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प्रकाशकीय पूज्यपाद पीताम्बरा पीठाधीश्वर श्री स्वामी जी महाराज द्वारा अन्य उपनिषदों के अतिरिक्त माण्डूक्योपनिषद की भी शाक्त मत परक प्रकाश भाष्य की संस्कृत में रचना की गई हैं। उल्लेखनीय है कि उपनिषदों पर अन्य अनेक भाष्य उपलब्ध थे। किन्तु शक्तिपरक भाष्य का अभाव था। पूज्यपाद ने प्रस्तुत माण्डूक्योपनिषद पर प्रकाश भाष्य के माध्यम से शाक्त सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया, जो विद्वान पाठकों के लिए सर्वथा नवीन एवं अनूठा सिद्ध हुआ प्रकाश भाष्य संस्कृत में होने के कारण सर्वसाधारण की समझ से बाहर ही रहा। अतः जिज्ञासु पाठकों की भावना के अनुरुप श्री पीताम्बरा पीठ के विद्वान साधक पं. कृष्णानन्द जी बुधौलिया द्वारा माण्डूक्योपनिषद के प्रकाश भाष्य का हिन्दी अनुवाद अत्यन्त सरल एवं सुबोध भाषा में किया गया है। पूज्यपाद श्री स्वामी जी कृत प्रकाश भाष्य एवं श्री बुधौलिया जी द्वारा किया गयाा हिन्दी अनुवाद सभी पाठको में इतना लोकप्रिय सिद्ध हुआ है कि अब इसकी द्वितीय आवृत्ति उपलब्ध कराई जा रही है। आशा है कि पुस्तक जिज्ञासुओं का पूर्ववत मार्ग दर्शन करती रहेगी
भवदीय श्रीमती रेणु शर्मा मन्त्री श्री पीताम्बरा पीठ द्वितीय (मन्त्रप्रस्थ)
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माण्डूक्योपनिषद्
भूमिका
ब्रह्मप्रतिपादकवेदान्तवचसां हि तद्रुपेणैव तद्रुपेण च प्रवृत्तिदृश्यते। अतएव केचिद् वेदान्तिनः द्वैते, अद्वैते, द्वैताद्वैते विशिष्टाद्वैते वा तात्पर्यं वेदान्तानां कल्पयन्ति। तन्निर्णेतुंचित्तप्रक्रम्यते। द्वैतिनः “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिसस्वजाते” इत्यादिश्रुत्या रूपकेण जीवेश्वरप्रकृतितत्त्वानां ग्रहणेन एतेषां च भेदस्य नित्यत्वेन द्वैतसिद्धान्तः सिद्ध्यति। अन्यच्चाद्वैतबोधकवाक्यानी गौणान्येव परमात्मनः एकत्वे तेषां तात्पर्यमिति वदन्ति। केचिद् “एकमेवाद्वितीयम्” “आत्मा वा इदमेक असीत्” इत्यादि वाक्यैरद्दैतं शृूयते। तेन द्वैतवचनानां गौणत्वमद्वैतवाक्यानां च मुख्यत्वमभ्युपगम्यते। केचिद् द्वैताद्वैतं, स्वाभाविकभेदाभिन्नं च वर्णयन्ति। केचिद् जीवप्रकृतिविशिष्टं ब्रह्मतत्त्वं विशिष्टाद्वैते तमिति कृत्वा मन्वते, इत्यादि मतभेदानां समवायोवेदान्तसाहित्येषूपलभ्यते। द्वैतस्य स्वतः सिद्धत्वात् तदुपदेशाऽज्ञानार्थज्ञापकत्वं शास्त्रत्वमिति लक्षणेनोपदेशकोटिबहिर्भूत इत्यनुमन्यते “नेह नानास्ति किञ्चन” “तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः:” इत्यादिवचनैरद्दैतं स्तूयते। “द्वितीयाद् वै भयं भवति” यदल्पं तन्मर्त्यम्” योडन्यादेवतमुपास्ते....असौ पशुः स देवानाम् इति द्वैतनिन्दावचनं च दृश्यते। एतादृशं क्वापि अद्वैतान्दादनुपलब्धेरद्दैत एव तात्पर्यं निश्चीयते। द्वैताद्वैतमतमपि
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माण्डूक्योपनिषद्
एतादृशमेवास्ति मुण्डकभाष्ये विस्तारेण प्रदर्शितं चैतत्। सर्वैरद्वैतवादिभिः अद्वैतप्रदर्शनार्थं माण्डूक्योपनिषदवलम्बिता अनेकटीकाष्टिप्पण्यादय आविष्कृताश्च परं वस्तुत अस्या अभिप्रायः शैवसिद्धान्तानुसारमेव प्रतीयते। यतः "शान्तं शिवमद्वैतम्" "शिवोऽद्वैत एव" इतिवचनेन शैवाद्वैत एव तात्पर्यमवसीयते। शैवशाक्तमतप्रसिद्धानां तत्त्वानां च निरूपणदर्शनात् अभ्यर्हिततत्त्वमस्य सिद्धयति। एतेननान्येषां मतानामात्रावकाशो दृश्यते। अतएव एतत्स्पष्टीकरणमारम्भः। शक्तिशक्तिमतोर्भेदमास्थाय शाक्तसममतविषयाणामपि निरूपणं कृतम्। यतः "उभयोरक्योः" उक्तं च शक्तिसूत्रे--"चितिस्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः" "चैतन्यश्चात्मा" इति शिवसूत्रम्, इत्युभयो रैक्यमवगतमन्यच्चोक्तम्--"शक्तो यया शम्भुयुक्तौ मुक्तौ च पशुगणस्यास्य। "तामेनां चिद्रूपामद्यां सर्वत्मनास्मि नतः" एतयोरमतयोरद्वैतं समानमेव सम्मतम्। भगवत्पादमते यदद्वैतं सम्मतं तच्च मायातत्त्वपर्यन्तं निरूप्य मायानिवृत्त्यनन्तरमद्वैतमात्रमबशिष्यते। विद्यातत्त्वं, ईश्वरतत्त्वं, सदाशिवतत्त्वं, शिवशक्तितत्त्वं, च निरूपणत्वे, नाङ्गीकृतं तत्त्वमसि इत्यादि वाक्योथं ज्ञानमपि अविद्याकोटावेव मतम्। परमेतन्मते शुद्धविद्यातत्त्वं अद्वैतबोधकं सत्यमस्ति अनपायात्। सत्ख्यातिवादमतानुसारं जगत्सत्यत्वमभिमतं केवलं मायाजन्यो भेदो मिथ्यात्वेनाभिमतः। श्रीभगवत्पादमतेन भेदेनसार्धं जगतोऽपि मिथ्यात्वम्। एवं स्वीकृते शास्त्रगुरुशिष्यादीनां सर्वेषां च व्यर्थत्वमायातमिति वदन्ति। श्री भगवत्पादमते ईश्वरतत्त्वं मायातत्त्वान्तर्गतं मायासिद्धौ तत्सिद्धिः कल्पितैश्वर्ययुक्तः सः। परन्तु एतन्मते नित्यैश्वर्ययुक्ता मायातत्त्वाद्
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माण्डूक्योपनिषद्
भित्रस्तत्स्वामी च इत्थन्योरभेद:। सच्चिदानन्दरुपस्य परतत्वस्य इच्छया आनन्दांशत: शिवशक्तितत्वं समुद्रभूतम् । चिदंशत: ब्रह्म ईश्वरसदाशिवविद्यातत्वानि सदंशत: जडतत्वं मायामारभ्य पृथिवीपर्यन्तानि एकत्रिंशत्तत्वानि इति । पूर्वोक्तानां सर्वेषां तत्त्वानां परस्मिन् ऐक्यमस्ति । तदेव सच्चिदानन्दरुपेणाभिमतमद्वैताख्यम् । ईश्वरसदाशिवतत्वं तु एकमेव । उक्तं च "ईश्वरता कर्तृत्वं स्वतन्त्रता चित्स्वरुपता चेति" । एतेचाहन्ताया: पर्याया: सद्द्रि रुच्यन्ते । पराहन्ता भुव ईश्वरतत्वं शुद्ध सत्वप्रधानमृददा "एकोऽहं बहुस्याम" इति श्रुत्युक्तं यदा विरलतरसत्वप्रधानस्तदा ईश्वर एव सदाशिवेति पदवाच्यो भवति मन्त्रेश्वरो वा कथ्यते । शब्दब्रह्मतत्वावच्छिन्ने ब्रह्मात्मैव सदाशिवो भवति । उभयोरैक्यं कृत्वा ईश्वर एव श्रुतौ निर्दिष्ट: "प्रभवाप्ययौ हि भूतानामित्यादि । "अयमात्मा ब्रह्मेति" विद्यातत्वं सर्वेषु तत्वेषु अभेदबोधकं निर्दिष्टं 'सर्व खल्विदं ब्रह्म' "शिवोऽहम्" "अहं ब्रह्मास्मि" "सोऽहम्" इत्यादि श्रुति प्रोक्तम् । पञ्चकञ्चुकाविष्टो जीवपदार्थोऽपि अहम्ममाभिमानवान् सन् प्रवर्तते । यदा विद्यया अद्वैतरुपया शिवतत्वं साक्षात् करोति तदा शिवतां लभते । स द्विविध: समष्टिरुपो व्यष्टिरुपश्च । हिरण्यगर्भो विराडिति समष्टि: । प्राज्ञस्तैजसो विश्व इति व्यष्टि: अज्ञाझिविवक्षया उक्त: । "सप्ताझ्" इति पदे न मायादिसप्तशुद्धाशुद्धतत्वानि निर्दिष्टानि । "एकोनविंशतिमुख:" इत्ययेन प्रकृतिमारभ्य पृथिवीपर्यन्तानि तत्वानि उपदिष्टानि एवमेकत्रिंशत्तत्वानि भवन्ति । "स्थूलभुग्" इत्यत्र स्थूलानां पञ्चशब्दादीनामपि पञ्चार्थानामपि संग्रह: कर्तव्य: उभयोरैक्यं कृत्वा
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निर्देशः। एवं षट्त्रिंशत्तत्वानां समावेशः। ओंकारमवलम्ब्य
ब्रह्मसाक्षात्कार इति सम्प्रदायः, ओंकारजन्यमन्त्राणां वीजानां च विभूतिमात्रविषयः। प्रणवेन भुक्ति-मुक्ति उभयमेव अतएव प्रणव एवात्रिनः। जगत् आविर्भावतिरोभावौ शक्त्या एव भवतः। कारणात्मना विद्यमानेव जगत् आविर्भवति पुनश्च तिरोधत्ते।
अहमिप्रलयं कुर्वत्ऋद्मः प्रतियोगिनः
इत्युक्तः: आविर्भावेन अभ्युदयधर्मोपदिष्टाचरणेन भुक्तिः:, तिरोभावेन मोक्षाख्यधर्माचरणान्नः श्रेयसमिति प्रयोजननिष्पत्तिः। अत्रद्द्वैताख्यमोक्ष एव परम प्रयोजनम्।
एवमुपनिषद् वर्णितानामर्थानां संगतिर्भवति।
श्री पीताम्बरापीठस्थः स्वामी
श्रीपीताम्बरापीठ-दतिया
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माण्डूक्योपनिषद भूमिका
ब्रह्म के प्रतिपादक वेदान्त वाक्यों की, द्वैत एवं अद्वैत, दो रूपों में प्रवृत्ति देखी जाती है। अतएव वेदान्ती, द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि विभिन्न रूपों में वेदान्त के तात्पर्य को कल्पित करते हैं। इस प्रकार वेदान्त दर्शन में कल्पित विभिन्न मतों के निर्णय के हेतु यहां प्रयत्न किया जा रहा है। द्वैत समर्थक वेदान्तियों ने माण्डूक्य श्रुति के “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिसस्वजाते” आदि वाक्य को प्रमाण मान्य कर, जीव, ईश्वर एवं प्रकृति तीन तत्वों को स्वीकार कर भेद को नित्य प्रतिपादित किया है। अन्य विद्वान् अद्वैत परक वाक्यों को गौण मान्य कर इन को केवल परमात्मा के एकत्व का प्रतिपादक सिद्ध करते हैं। कतिपय वेदान्ती “एकमेवाद्वितीयम्”, आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्” इत्यादि वाक्यों के द्वारा श्रुति में अद्वैत सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं। यह अद्वैतवादी विद्वान् श्रुति गत द्वैत वचनों की गौणता एवं अद्वैत वाक्यों की मुख्यता मान्य करते हैं। कोई द्वैताद्वैत सिद्धान्त के समर्थक भेद-भिन्नता को स्वाभाविक प्रतिपादित करते हैं। (अर्थात् यह विद्वान् कहते हैं कि स्वयं आत्मतत्व ही भेदात्मक भिन्न रूपों में प्रकट होता है।) कतिपय
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वेदान्ती ब्रह्म को जीव एवं प्रकृति से विशिष्ट प्रतिपादित कर विशिष्टाद्वैत मत का निरुपण करते हैं। इस प्रकार वेदान्त साहित्य में विभिन्न मतभेदों का समवाय उपलब्ध होता है। वस्तुतः अज्ञात अर्थ के ज्ञापन के हेतु शास्त्र के उपदेश की आवश्यकता होती है अतः शास्त्र का लक्षण "अज्ञातार्थ ज्ञापकत्वं शास्त्रत्वं" निरुपित किया गया है, किन्तु सब के अनुभव का विषय होने से द्वैत स्वतः सिद्ध है अतएव द्वैत की सिद्धि के हेतु किसी शास्त्र के उपदेश की अपेक्षा नहीं है। इस कारण अद्वैतवादी द्वैत को उपदेश-कोटि से बाहिर मान्य करते हैं, तथा "नेह नानास्ति किंजिचन", "तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः:" आदि श्रुति वाक्यों के आधार पर अद्वैत सिद्धान्त का निरुपण करते हैं अर्थात श्रुति कहती है कि यहां नानात्व के लिये किज्जिवत् भी स्थान नहीं है। एवं जो इस प्रकार एकत्व का दर्शन करता है उसको शोक एवं मोह से ग्रस्त होना नहीं है। श्रुति के यह वाक्य अद्वैत के समर्थक हैं। इसके अतिरिक्त श्रुति में द्वैत के विरुद्ध निन्दा-परक वाक्य भी उपलब्ध होते हैं जैसे, "द्वितीयाद्वै भयं भवति", "यदल्पं तन्मात्र्यम्", "योऽन्यां देवतामुपास्ते.... असौ पशुः स देवानाम्" इत्यादि। अर्थात श्रुति कहती है कि 'द्वैत से भय की उत्पत्ति होती है', 'जो अल्प है वह नाशवान् है', "जो अद्वैत के अतिरिक्त किसी अन्य देवता की उपासना करता है वह उस देवता का पशु है।" इत्यादि। इसके विपरीय अद्वैत की निन्दा में श्रुति का कोई प्रमाण
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उपलब्ध नहीं है। अतः अद्वैतवादी कहते हैं कि श्रुति का निश्चयात्मक तात्पर्य अद्वैत-सिद्धान्त के पक्ष में है। इसी प्रकार द्वैताद्वैत वाद का भी निरास किया जाता है जिसका विस्तृत विवेचन लेखक द्वारा मुण्डक उपनिषत् के प्रकाश भाष्य में किया गया है।
सभी अद्वैत वादी विद्वानों ने, अद्वैत मत के प्रतिपादन के हेतु, माण्डूक्य उपनिषत् का आश्रय लिया है, तथा अपने अपने मत के अनुसार इसकी अनेक टीकाओं की रचना की है। परन्तु इस उपनिषत् का वास्तविक अभिप्राय शैव सिद्धान्त के अनुरुप प्रतीत होता है, कारण यह है कि "शान्तं शिवमद्वैतम", "शिवोSद्वैत एव", आदि वाक्य उपनिषत् में उपलब्ध हैं अतएव इस के तात्पर्य का पर्यवसान शिवाद्वैत में ही प्रतिपादित किया जा सकता है। इस निष्कर्ष की सिद्धि इस तथ्य से भी होती है कि इस ग्रन्थ में शैव एवं शाक्त मतों में प्रसिद्धतया प्रतिपादित तत्वों का निरुपण प्रत्यक्षतः देखा जा सकता है। इस कारण अन्य मतों के समर्थन के लिये यहां अवकाश नहीं है अतएव शिवाद्वैत सिद्धान्त के अनुरुप स्पष्टीकरण के हेतु प्रस्तुत भाष्य में प्रयास किया जा रहा है।
शक्ति एवं शक्तिमान में अभेद है। इस के आधार पर यहां शाक्तसममत विषयों का भी निरुपण किया गया है। शक्ति एवं शक्तिमान दोनों एक हैं। शक्ति सूत्र में कहा भी है। "चिति स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः", एवं "चैतन्यशक्तिः" (शिवसूत्र)। अर्थात
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विश्व की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार करने में चिति स्वतन्त्र है। तथा शिवसूत्रों में चैतन्य को ही आत्मा कहा गया है। इस कारण शिव-शक्ति दोनों के ऐक्य का ज्ञान होता है। इस के अतिरिक्त अन्य उदाहरण भी है — यथा "शक्तो यथा शम्भुमुक्तामुक्तौ च पशुगणस्यास्य, तामेनां चिद्रूपामद्यां सर्वात्मनास्मिन्मत:" अर्थात् जिसके द्वारा शम्भु जीव को भोग एवं मोक्ष प्रदान करते हैं उस चिद्रूपा आद्या शक्ति की सर्व भावेन स्तुति की गई है। शाक्त एवं शैव उभय मतों में अद्वैत के स्वरूप का प्रतिपादन एक समान ही उपलब्ध होता है अर्थात् भिन्नता नहीं है। भगवान् पाद के अनुसार निरुपित अद्वैत मत में केवल माया पर्यन्त तत्वों का प्रतिपादन है, माया की निवृत्ति के अनन्तर अद्वैत मात्र अवशिष्ट रह जाता है। इनके मत में विद्यातत्त्व, ईश्वर तत्त्व, सदाशिव तत्त्व, शिव-शक्ति तत्त्व को अंगीकार नहीं किया गया है एवं 'तत्त्वमसि' वाक्यजन्य ज्ञान को भी अविद्या-कोटि में प्रतिपादित किया है। इस के विपरीत शैव एवं शाक्त मतों में शुद्ध विद्या तत्त्व के अद्वैत का बोधक निर्धारित कर सत्य कोटि में स्वीकार किया है। सत्ख्यातिवाद के अनुसार जगत् को सत्य किन्तु केवल माया जन्य भेद को मिथ्या निरुपित किया गया है। परन्तु श्री भगवान्तपाद के मत के अनुसार भेद के साथ जगत् का मिथ्यात्व भी सिद्ध किया है। यदि इस प्रकार स्वीकार कर लिया जावे तब गुरु, शास्त्र, शिष्य आदि का निरुपण भी व्यर्थ सिद्ध हो जाता है। श्रीभगवत्पाद के मत में ईश्वर तत्त्व को माया तत्त्व की सत्यता सिद्ध होने पर ही ईश्वर
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तत्व का सत्यत्व सिद्ध होता है अन्यथा माया तत्व के समान ईश्वर का ऐश्वर्य भी कल्पित है। परन्तु शैव मत में ईश्वर तत्व को नित्य ऐश्वर्य से युक्त निरुपित किया है अतएव यह माया तत्व के केवल भिन्न ही नहीं अपितु माया का स्वामी भी है। शाक्त एवं शैव मतों में यही भिन्नता है।
सच्चिदानन्द रूप पर शिव के इच्छा से आनन्द अंश से शिव-शक्ति तत्व, चिंदश से ईश्वर, सदाशिव, शुद्धविद्या तत्व, एवं सत् अंश से माया से पृथ्वी पर्यन्त इकतीस जड़ तत्वों की उत्पत्ति होती है। पूर्वोक्त समस्त तत्वों का पर तत्व में ऐक्य होता है जो सच्चिदानन्द रूप से अभिमत अद्वैत नामक तत्व कहा गया है।
"ईश्वर तत्व एवं सदाशिव तत्व एक ही हैं, जैसा कि कहा है, "ईश्वरता कर्तृत्व स्वतन्त्रता चित्स्वरुपता चेति"। विद्वानों ने इन तत्वों को आहंता का पर्यायवाची कहा है। शुद्ध सत्व की प्रधानता से ईश्वर तत्व को ही पराहंता निरुपित किया जाता है, श्रुति कहती है "एकोऽहं बहुस्याम" अर्थात् एक ही अनेक रुपों में व्यक्त होता है। जब सत्व की विरलता अर्थात् अप्रधानता हो जानी है तब ईश्वर तत्व ही सदाशिव पद का वाच्य होता है अथवा मन्त्रेश्वर नाम से सम्बोधित किया जाता है। शब्द-ब्रह्म तत्व से अवच्छिन्न ब्रह्म ही सदाशिव तत्व है। श्रुति में "प्रभवाप्ययौ हि भूतानां" इत्यादि वाक्यों के द्वारा ही अभय तत्वों के ऐक्य को ही ईश्वर निर्दिष्ट किया गया है। "अयमात्मा ब्रह्मोति" अर्थात् 'यह आत्मा ब्रह्म है' वाक्य के द्वारा विद्यातत्व को समस्त तत्वों के अंतर्गत
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अभेद का बोधक निरूपित किया है, इसके समर्थन में श्रुति के "सर्व खल्विदं ब्रह्म", शिवोऽहम्, "अहं ब्रह्मास्मि", "सोऽहम्" इत्यादि वाक्य भी उपलब्ध हैं। अर्थात् श्रुति का यह निश्चित मत है कि यह समस्त जगत् ब्रह्म का ही स्वरूप है, अंश शिव है, अहं ब्रह्म ही है, जीव एवं ब्रह्म में अभेद है। पञ्च कञ्चुकों में आविष्ट जीव पदार्थ भी अहं एवं मम (अर्थात् मैं और मेरा) अभिमान से युक्त है। जीव जब अद्वैत रूपा विद्या के द्वारा शिवतत्त्व से साक्षात्कार करता है तब शिवत्व प्राप्त करता है अर्थात् स्वयं शिव रूप हो जाता है।
शिव समष्टि एवं व्यष्टि भेद से दो प्रकार है। हिरण्यगर्भ अर्थात विराट समष्टि रूप है। प्रज्ञ, तैजस, एवं विश्व व्यष्टि रूप हैं। शिव एवं जीव में अज्ञान भाव को दर्शाने के लिए समष्टि एवं व्यष्टि रूप से में प्रतिपादन किया हैं। उपनिषत् में जो सप्ताझ पद का प्रयोग किया गया है उससे माया आदि सात शुद्ध एवं अशुद्ध तत्वों का निर्देशन होता है। "एकोनविंशति मुख:" पद के द्वारा प्रकृति से पृथ्वी पर्यन्त उन्तीस तत्वों का उपदेश किया गया है। इस प्रकार पांच समष्टि व्यष्टि रूप तत्त्व, सप्ताझ एवं एकोनविंशतिमुख अर्थात् उन्तीस का एकत्र योग इक्तीस होता है। पांच शब्द आदि तन्मात्राओं एवं पांच महाभूतों का एक साथ स्थूलभूग प्रतिपादित किया गया है। इस प्रकार इक्तीस एवं पांच का योग छत्तीस तत्वों के नाम से समाविष्ट किया गया है। ओंकार का अवलम्बन कर ब्रह्म का साक्षात्कार करना ही सम्प्रदाय
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है। ओंकार जन्य मन्त्र एवं बीजों का विषय विभूतिमात्र है। प्रणव से ही भुक्ति एवं मुक्ति की प्राप्ति होती है अतः अभय प्रणव के ही आश्रित हैं।
जगत के आविर्भाव एवं तिरोभाव का कारण शक्ति है। कारण रूप शक्ति के अन्तर्गत विद्यमान जगत का ही आविर्भाव होता है तथा पुनः शक्ति के अन्तः में ही तिरोधान होता जाता है जैसा कि तन्त्र में कहा गया है "अहमिप्रलयं कुर्वत्रिदमः प्रतियोगिनः"
अर्थात् इदं के द्वारा अभिव्यक्त जगत् रूप प्रतियोगी को अहंमात्क अनुभूति में विलय करना ही साधक का ध्येय है। अभ्युदय की प्राप्ति के हेतु उपदिष्ट आचरण से जिस फल का आविर्भाव होता है वह भुक्ति है तथा तिरोभाव अर्थात मोक्ष धर्म के आचरण से नि:श्रेयस् की प्राप्ति ही प्रयोजन है। यहां अद्वैत नामक मोक्ष ही रम प्रयोजन है। इस प्रकार उपनिषद् में वर्णित अर्थ की संगति निरुपित की गई है।
श्री पीताम्बरापीठस्थः स्वामी
श्री पीताम्बरापीठ-दतिया
दिप्पणी : शैवागम के अनुसार छत्तीस तत्त्व १-शिव
२-शक्ति ३- सदाशिव ४- ईश्वर ५- शुद्ध विद्या ६-माया
७-कला ८- विद्या ९-राग १०-काल ११- नियति १२-पुरुष
१३- प्रकृति १४- बुद्धि १५- अहंकार १६- मन १७- श्रोत्र
१८- त्वक् १९- चक्षु २०- जिहा २१- घ्राण २२-वाक् २३- पाणि
२४- पाद २५- पायु २६- उपस्थ २७- शब्द २८- स्पर्श
२९- रूप ३०- रस ३१- गन्ध ३२- आकाश ३३-वायु ३४-बधि
३५- सलिल ३६- भूमि।
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माण्डूक्योपनिषद्
ओं भद्रं कर्णेभिः श्रुणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा षं सस्तनूभिर्व्यशेम हि देवहितं यदायुः॥
माण्डूक्योपनिषद्
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
माण्डूक्योपनिषद्
॥ ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
मण्डला चरण
जाग्रदादिषु भावेषु प्रणवाभ्यास पाटवात् । सर्वभ्रंश्च परं तत्वं शिवं पश्यन्ति योगिनः॥
मण्डला चरण
इयम माण्डूक्योपनिषदर्थे वेदान्तर्गतता, अस्या एकस्या एवानुसन्धानेन उपनिषत्परम प्रयोजनस्य सिद्दिर्भवति।
उक्तज्य मुक्तिके — 'माण्डूक्यमेकमेवालं मुमुक्षूणां विमुक्तये' इति।
मण्डला चरण
मुण्डके परमात्मप्राप्तिहेतुकं 'प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा' इत्यादि मन्त्रे यत्तत्वमुपदिष्टं तस्यैव वैशद्यप्रदर्शनार्थमस्या आरम्भः, वाच्यवाचक सम्बन्धमभिलक्ष्य निखिलं तत्वमुपदिष्टम्।
मण्डला चरण
षट्त्रिंशत्तत्वरूपं यच्छिवशक्तिपरिणामभूतं तत्सर्वमस्यामुपनिषदि निर्दिष्टम्।
एतद् विज्ञान योगी अद्वै तनिष्टो भवति।
मण्डला चरण
शिवतां चोपगच्छति वाच्यवाचकतत्वज्ञानादेव तत्वरूपावगतिरिति प्रथमं परब्रह्मवाचकमोङ्कार स्वरूपमुपदिशत्राह——ओंमिति:-
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माण्डूक्योपनिषद्
माण्डूक्योपनिषद् का गुरुवर श्री स्वामी जी कृत प्रकाश भाष्य का हिन्दी अनुवाद मण्डल चरण
जाग्रदादि भावेषु प्रणवाभ्यास पाठवत्। सर्वेभ्यश्च परं तत्वं शिवं पश्यन्ति योगिनः॥
भाषानुवाद
जाग्रादि भावों में करके प्रणबमन्त्र का पटु अभ्यास। सब से परे तत्व शिव जिसका योगिजनों को होता भास॥
माण्डूक्योपनिषद् अथर्व वेद के अंतर्गत है। केवल माण्डूक्य के अनुसंधान से ही उपनिषद् विद्या के परम प्रयोजन की सिद्धि हो जाती है। जैसा कि मुक्तिक उपनिषद् में कहा है, "माण्डूक्यमेकमेवालं मुमुक्षूणां विमुक्तये" अर्थात् मुमुक्षुओं की मुक्ति के हेतु केवल एक माण्डूक्य उपनिषद् ही पर्याप्त है। परमात्मा की प्राप्ति के हेतु मुण्डक उपनिषद् के अंतर्गत, "प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्मतल्लक्ष्यमुच्यते। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत् तन्मयो भवेत्" मन्त्र में जो तत्व उपदिष्ट
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है उसके विशद व्याख्यान के हेतु इस उपनिषद् का आरम्भ किया गया है। यहां वाच्य वाचक सम्बन्ध को अभिलक्षित कर निखिल तत्व का उपदेश है। शिव-शक्ति का परिणाम भूत जो कुछ षट्-त्रिंशत्-तत्त्वात्मक विश्व है उसका सर्वस्व इस उपनिषद् में निर्दिष्ट है। इस सब का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर योगी अद्वैत निष्ठ हो जाता है एवं शिवतत्व में समावेश प्राप्त करता है। वाच्य एवं वाचक तत्वों के ज्ञान से ही शिव शक्त्यात्मक स्वरूप की अवगति (ज्ञान) होती है अतएव सर्वप्रथम, परब्रह्म के वाचक ओंकार के स्वरूप का उपदेश करते हुए “ओमिति” मन्त्र का प्रारम्भ किया है।
मन्त्र
॥१॥ “ओमित्येकाक्षरमिदं सर्व तस्योपव्याख्यानं भूतं भवत् भविष्यदिति सर्वमोंकार एव यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदपि ओंकार एव” ॥१॥
प्रकाशाभाष्य
ओमिति अवति साधक वृन्दमज्ञानादित्योम् अथवा एतद् भजत: साधकान् स्वीकरोति इत्येवं नामकमेकं प्रधानमक्षरं न क्षरतीति अनश्वरम् “ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म” इति स्मृते: । स्फोटवर्णात्मक: शब्द: प्रणवस्वरूप एवेति शाब्दिका: । परब्रह्म परमात्मनो वाचक: वाच्यवाचकयोर्मेद: अतएव वाच्येन साधर्म्यमेदं कृतवा उच्यते – “इदं सर्वमिति” यथा “सर्व खल्विदं ब्रह्म” तथा सर्व
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माण्डूक्योपनिषद्
शब्दब्रह्मैवेदभिल्याभिप्रायः। तस्य प्रणवस्य उपव्याख्यानं विस्तरेण इदं कथनं कर्तव्यमिति शेषः। भूतं भवद् भविष्य दिति सर्वमोङ्कार एव हि कालकृत त एवं सृष्टिव्यवहारः तमधिकृत्य सर्वातमतां ब्रह्मोङ्कारस्याह-भूतमित्यादि-भूतं अतीतं भवत् प्रवर्तमानं भविष्यद् व आगामि यत् भविष्यति तत्सर्वमोङ्कार एव।
इदं नाम से सम्बोधित यह समस्त विश्व एक अक्षर ओं का ही स्वरूप है। उसका यह उपव्याख्यान है। भूत, भवत् (प्रवतमन) एवं भविष्यत् सब ओंकार ही है। इससे अन्य जो त्रिकालातीत है वह भी ओंकार है।
कार्यस्य कारणादव्यतिरेकात् कालतत्त्वादपि ऊर्ध्व यन्मसि वाचा निर्वक्तुमशक्यं ब्रह्मतत्त्वं तदपि ओङ्कार एव अतएव यच्चेत्युक्तं यच्चकार्यमतीतं, अन्यत् त्रिकालातीतं तदपि ओङ्कार वाच्यमेव । १९ ।
ओं जो साधक वृन्द की अज्ञान से रक्षा करता है वह ओं है अथवा ओं परमात्मा का नाम है जो इस मन्त्र के उपासकों को स्वीकार करता है (अर्थात् स्वयं में लीन कर लेता है।) ओं नामक यह प्रधान अक्षर है। जिसका क्षरण नहीं होता अर्थात् जो अनश्वर है उसको अक्षर कहा जाता है। स्मृति में भी ओं को एकाक्षर ब्रह्म कहा जाता है "ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म" इति।
मन्त्रानुवाद
मन्त्र
शाब्दिक अर्थात् वैयाकरण स्फोटवाद के प्रतिपादक हैं
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माण्डूक्योपनिषद्
विस्तरेण यस्मात्तम्तामवतिष्यद् यन्मस्साच्चेत्युक्तं ब्रह्म वाग्विलासः ।। १ ।।
इसके मत के अनुसार वर्णों के रूप में शब्द का ही स्फोट होता ड़ार एव है अतएव स्फोट से उद्दूत वर्णात्मक शब्द प्रगवस्वरूप है । इस त्मताम कारण शब्द परब्रह्म परमात्मा का वाचक है । सिद्धान्ततः वाच्य एवं वाचक का अभेद प्रतिपादित है । जिस प्रकार श्रुति में “सर्व खल्विदं ब्रह्म” निर्वचन के द्वारा इदं नामक समस्त विश्व को ब्रह्म निरुपित यन्मसा किया गया है इसी प्रकार यहां ब्रह्म के वाचक ओं का वाच्य इदं चेत्युक्तं के साथ अभेद सम्पादित कर समस्त इदंमात्मक विश्व को शब्द ब्रह्म का स्वरूप निरुपित किया गया है । अर्थात् मन्त्र का अभिप्राय है कि यह समस्त विश्व शब्द ब्रह्म है । उस प्रणव का उपव्याख्यान अर्थात् विस्तृत कथन करना चाहिये मन्त्र के अन्त में यह वाक्य शेष है ।
माण्डूक्योपनिषद्
भूतं भवत् भविष्यत् सर्वमोंकार एव । यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तेऽप्योंकार एव ।। २ ।।
भूत, भवत्, भविष्यत् सब ओंकार ही है । सृष्टि का व्यवहार कालकृत है, उस काल को आधार मानकर ओंकार की सर्वात्मकता प्रतिपादित की गई है अर्थात् भूत, प्रवर्तमान, एवं आगामी जो कुछ भविष्य में होगा वह सब ओंकार ही है । कार्य का कारण से अव्यतिरेक है अर्थात् अभेद होता है अतएव कालतत्व से परे, जिसका मन एवं वाणी से कथन नहीं किया जा सकता है, वह ब्रह्म–तत्व भी ओंकार ही है अतः जो कुछ कहा गया है, एवं जो नश्वर कार्य से भी परे हैं तथा जो त्रिकालातीत है वह भी ओंकार ही है ।
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॥२॥
वाचक स्वरूप मभिधाय वाच्य-तत्त्वमाह-सर्वमति:-
सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पाद् ॥२॥
मन्त्र
प्रकाश भाष्य
एतन्नामरूपविभागेन भितं सर्व जगद् ब्रह्म तदुत्पन्नत्वाद् ब्रह्मण उपादानत्वाच्च, अयमात्मा ब्रह्म अन्थःकरणवृत्तिसाक्षी प्रत्यक्त्वेन प्रसिद्ध: आत्मा चेतनो ब्रह्मैव 'तत्सृष्ट्वातदेवानुप्राविशत्' इति श्रुते:। स तत् पदबोध्य आत्मा तथायमात्मा जीवसाक्षित्वेन प्रसिद्धशचतुष्पाद उभयो श्चतु ष्पादत्वे न तुल्यत्वम्। ननु आत्मन एकत्वात्कथमभयो:रित्युच्यते? सत्यं, भेदस्य व्यवहारिकत्वादभेदस्य च पारमार्थिकत्वादोष:, सुवर्णकटक कुण्डलादि व्यवहार वत्तस्मात्रास्ति चोद्यावकाश इति ॥२॥
॥२॥
वाचक (ओं) के स्वरूप का कथन करने के पश्चात वाच्य तत्व का निर्वचन किया जाता है ।
मन्त्रानुवाद
॥२॥ यह सब (नाम रूपात्मक) जगत् ब्रह्म है । यह आत्मा ब्रह्म है । वह एवं यह आत्मा चतुष्पाद है । (अर्थात् चार पदों से युक्त है)॥२॥
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प्रकाश-भाष्यानुवाद
(एतत्) नाम एवं रूप दो भागों में विभाजित यह समस्त जगत् ब्रह्म है, कारण यह कि ब्रह्म से ही इस की उत्पत्ति होती है एवं ब्रह्म ही इस का उपादान (आश्रय) है । (अयम्) यह आत्मा ब्रह्म है । अर्थात् अन्तःकरण साक्षी के रूप में प्रत्यक्तया प्रसिद्ध आत्मा चेतन है अतः ब्रह्म ही है । श्रुति कहती है कि उस जगत् की सृष्टि के पश्चात् वह ब्रह्म उसमें ही प्रविष्ट हो गया, यथा “तत्सृष्ट्वातदेवानुप्राविशत्” । उपर्युक्त श्रुति में कथित तत् (वह) पद द्वारा बोध्य आत्मा एवं अयं पद से निर्दिष्ट यह जीवात्मा साक्षी के रूप में प्रसिद्ध हैं एवं चतुष्पाद निरुपित किये गये हैं । चतुष्पाद होने के कारण उभय आत्माओं में तुल्यता प्रतिपादित की गई है । यहां यह शङ्का उत्पन्न होती है कि एक बार आत्मा के एकत्व का निरुपण करने के पश्चात् पुनः उभय आत्मा ऐसा प्रयोग करने का कारण क्या है? सिद्धान्ती को उत्तर है कि भेद व्यावहारिक है तथा अभेद पारमार्थिक है । इस कारण उभय आत्मा कहने में कोई दोष नहीं है । जिस कारण सुवर्ण में कटक, कुण्डल आदि आभूषणों का व्यवहार होता है उसी प्रकार एक आत्मा का ही भिन्न रुपों में व्यवहार किया जाता है । अतः यहां शङ्का के लिये अवकाश नहीं है । ॥२॥
॥३॥
प्रथमपादमाह–जागरितेति
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मन्त्र
॥३॥ जागरित स्थानो बहिः प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूल भुग् वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥३॥
॥३॥ जागरितं स्थानं यस्यासौ जागरितस्थानः स बहिः प्रज्ञः, बहिः शब्दादिविषयेषु प्रज्ञा प्रवणा बुद्धिर्यस्य स आत्मानमविषयी कृत्य अविद्यया केवलं बहिः पदार्थेषु रतिं कुर्वत्रास्त इत्यर्थः सप्ताङ्गनो माया-विद्या-कला-नियति-राग-काल-जीवा: सप्ताङ्गो व्यष्टि समष्टिरुपाणि अज्ञानि यस्य सः, एकोनविंशति मुखः ज्ञानेंद्रियपञ्चकं, कर्मेन्द्रियपञ्चकं, तन्मात्रपञ्चकंमहड्डारतत्व महत्त्वं मनस्तत्वं प्रकृतितत्वमित्येकोनविंशति मुखत्वेन कथ्यते एमिरात्मा शब्दादीन् विषयानुपलभते । स्थूलभुकस्थूलानि पञ्चमहाभूतानि भुड्क्ते इति स्थूलभुक्, शब्दादीनां भूतानां च एकत्वमभिप्रेत्योक्तं पञ्चेति, वैश्वानरः विश्वेनरा यस्य स "नरे च संज्ञायाम" इति दीर्घ: विश्वानर एव वैश्वानरः । स्वार्थिकोण्। सर्वेषां स्थूल व्यवहारणां नराणामधिष्ठाता विराडित्यर्थः। जीव दृष्ट्या समष्टिरुपस्याझत्व, समष्टिदृष्ट्या व्यष्टेरऋत्वमिति विवेकः एष आत्मनः प्रथमः पादः स्वरूप इत्यर्थः ॥३॥
॥३॥
जागरित पद से आरम्भ किये गये इस मन्त्र के द्वारा आत्मा के प्रथम पाद का निर्वचन किया गया है।
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मन्त्रानुवाद
आत्मा का वैश्वानर नामक यह प्रथम पद है। जागरित अर्थात् जाग्रत अवस्था जिसका स्थान है, बाह्य विषयों में रत् होने से जिसको बहिः प्रज्ञ कहा गया है। इसके सात अङ्ग हैं, एवं स बहिः उन्नीस मुख हैं तथा यह स्थूल तत्वों का भोक्ता होने से स्थूल-भुक्मविषयी कहा गया है।।३।।
जागरितं स्थानं यस्य असौ व्युत्पत्ति के अनुसार इस पद का स्थान जागरित है अतएव इसको जागरित स्थान कहा गया है। स बहिः प्रज्ञ:- बहिः अर्थात् शब्द आदि विषयों में जिसकी प्रज्ञा अर्थात् बुद्धि अनुरक्त है एवं आत्मा जिसकी अनुभूति का विषय नहीं है जो केवल बाह्य पदार्थों में ही रति करता है वह बहिः प्रज्ञ है। इस के सात अङ्ग हैं जिनका नाम माया-अविद्या-कला-नियति-राग-काल-जीव है। यह सात अङ्ग वृहत्त्वं व्यष्टि एवं समष्टि रूप है। ज्ञानेन्द्रिय पञ्चक, कर्मेन्द्रिय पञ्चक, तन्मात्र पञ्चक, अहङ्कार तत्व महत्तत्व, मनस्तत्व, प्रकृतितत्व यह उन्तीस मुख हैं। इन मुखों से आत्मा शब्द आदि विषयों को ग्रहण करता है। अतएव इसको एकोनविंशति मुख कहा गया है। आत्मा का वैश्वानर नामक प्रथम पद स्थूल पञ्च महाभूतों का भोक्ता है अतएव इसको स्थूलभुक् नाम से सम्बोधित किया गया है। यह आत्मा शब्द आदि तन्मात्राओं का भी उपभोक्ता है
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माण्डूक्योपनिषद्
माण्डूक्योपनिषद् अतएव यहां पञ्चभूतों के साथ तन्मात्राएँ भी सम्मिलित हैं। वैश्वानर: शब्द की व्युत्पत्ति है विश्वेनरा यस्य स अर्थात् विश्व में.जो नर रूप है अर्थात् प्राणियों के रूप में अवस्थित है। स्थूल जगत् में व्यवहार कर्ता समस्त प्राणियों का जो अधिष्ठाता विराट् कहा गया है वही वैश्वानर नामक प्रथम पाद है। व्याकरण के 'न च सेझ्जायाम' सूत्र के अनुसार दीर्घ हो जाता है अतएव विश्वेनर का रूप विश्वानर बन जाता है। विश्वानर ही 'स्वार्थिककोडण' सू के अनुसार वैश्वानर हो जाता है। जिसका अर्थ है समस्त नरों क अधिष्ठाता विराट् स्वरूप। यह समष्टि पक्षीय अर्थ है। व्यष्टि पक्षीय अर्थ के अनुसार स्थूल देह के अधिष्ठाता जीव को वैश्वानर कहा जाता है। जीव की दृष्टि से समष्टि रूप अज्ञ है एवं समष्टि की दृष्टि से जीव अज्ञ है अर्थात् समष्टि अज्ञ है तथा जीव अ
इस प्रकार यह आत्मा के प्रथम पाद का स्वरूप है॥३॥ टिप्पणी - वैश्वानर :- श्रीमद् शङ्कराचार्य ने वैश्वानर पद की दो प्रकार से व्युत्पत्ति की है- (१) विश्वेषां नराणामेकधा नयनाद्वैश्वानर:। अर्थात् सम्पूर्ण नरों को अनेक योनियों में ले जाता है अतः यह आत्मा वैश्वानर कहा जाता है। (२) विश्वश्चासौ नरश्चेति विश्वानर: वैश्वानर एवं वैश्वानर:। अर्थात् यह विश्व ही नर रूप है। "अपि वा विश्वानर जन्तून अर:" ऋ गतौ इत्यस्य छान्दसत्वात् पदाद्यच् वा विश्वान जन्तून अर:। ऋ गतौ इत्यस्य छान्दसत्वात् पदाद्यच् उपपद विभक्तेश्चालुक। सर्वाणि भूतानि अर: प्रतिगतः प्रविश्टिति विश्वानर: प्राण: से जिसकी उत्पत्ति है, यह वैश्वानर हैं।
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॥ १४ ॥ द्वितीयं पादमाह–स्वप्न स्थान इति
॥१४॥ स्वप्नस्थानोडन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविभक्तभुक् तैजसो द्वितीयः पादः ॥१४॥
प्रकाश-भाष्य
स्वप्नस्थानः जागरित संस्कारजन्यं स्थानं यस्यासौ, अन्तः प्रज्ञान्तर्हृदि प्रज्ञाबुद्धिस्य आसौ, सप्ताङ्ग एकोनविंशति मुखः इति विश्वेनार व्याख्यातं, प्रविभक्तभुक् प्रविभक्तं सूक्ष्म केवलं वासनामयं भुङ्क्त इत्यर्थः, स तैजसः प्रकाशमयः द्वितीयः पादः स्वरूपः ॥१४॥
मन्त्रानुवाद
॥१४॥ आत्मा का द्वितीय पाद तैजस है। इस का स्थान स्वप्नावस्था है। यह अन्तः प्रज्ञ है। इसके सात अङ्ग एवं उन्तीस मुख हैं। यह प्रविभक्त भोक्ता अर्थात् सूक्ष्म का भक्ता है ॥१४॥
प्रकाश-भाष्यानुवाद
जागरित संस्कारों से जन्य स्वप्न जिसका स्थान है उसकी “अपि स्वप्नस्थानः कहा गया है। आत्मा का यह पाद अन्तः प्रज्ञ है। अदाऽच जिसकी प्रज्ञा अर्थात् बुद्धि अन्तः हृदय में है उसको अन्तः प्रज्ञ विशिष्टति कहते हैं। इस के सात अर एवं उन्तीस मुख हैं जिनकी व्याख्या तृतीय मन्त्र के भाष्य में कर दी गई है। यह सूक्ष्म तत्त्वों का भोक्ता
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माण्डूक्योपनिषद्
है। अतएव सूक्ष्म अर्थात् केवल वासनामय तत्त्वों का भोक्ता होने से इसको प्रविविक्त भुक् कहा गया है। आत्मा के इस द्वितीय पाद का स्वरूप प्रकाशमय है अतः इस को तैजस नाम से सम्बोधित किया गया है।॥५॥
तृतीयपादं यत्रत्याह
मन्त्रार्थ
यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते, न कञ्चन स्वप्नं पश्यति, तत् सुषुप्तम्। सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमय एवानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः॥५॥
प्रकाश-भाष्य
यत्र यस्स्यामवस्थायां सुप्तो न कञ्चन कामं काम्यं विषयं कामयते इच्छति, न कञ्चन जागरित-वासना-जन्यं स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तमित्युच्यते। सुषुप्ति स्थाने एकीभूत एकत्वमापन्नः प्रज्ञानघनः सर्वेषां जाग्रत्स्वप्नज्ञानानां कारणरूपेण घन एक पिण्डीभावो यस्मिन् स प्रज्ञानघन एवं आनन्दमयः केवलमानन्दमेव भुङ्क्ते चेतोमुखः चिद्रूपः प्राज्ञः समष्टिरूपेण प्रकृष्ट ज्ञानवानित्यर्थः तृतीय पादः॥५॥
मन्त्रानुवाद
जिस अवस्था में (प्रसुप्त) जीव न किसी काम की कामना करता है एवं न किसी स्वप्न को देखता है, वह सुषुप्ति
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स द्वितीय पामोक्ता, एवं एकीभूत होने से प्रज्ञानघन कहा गया है॥५॥
जिस अवस्था में जीव न तो किसी काम्य विषय की इच्छा करता है और न ही किसी प्रकार की जागरित वासना सेजन्य सपनों को देखता है उस अवस्था को सुषुप्त अवस्था कहा गया है। यह सुषुप्त स्थान आत्मा का तृतीय पाद है। इस अवस्था में समस्त कंचन स्वजाग्रत एवं स्वप्नात्मक जानानुभूति पिण्ड रूप से एकाकार हो एवानन्दम जाती है अतएव यहां आत्मा को प्रज्ञानघन निरुपित किया गया है। कारण रूप होने से इसकी घन अर्थात् पिण्ड रूप कहा गया है। इस अवस्था में आत्मा आनन्दमय है अतएव इसको आनन्द-भुक् कहा है। समष्टि रूप होने से यह आत्मा प्रकृष्टतया ज्ञान रूप काम्यं विष होता है अर्थात् समस्त जाग्रत एवं स्वप्नात्मक ज्ञानानुभूति का पिण्ड है अतः चित् रूप होने से इसकी प्राज्ञ संज्ञा दी गई है। यह प्रज्ञानघन तृतीय पाद है॥५॥
समष्टिव्यष्टि रुपेणात्मनः पादत्रयं सामान्नेन प्रदर्श्य साम्प्रतं सर्वकारणं सर्वेश्वरं नित्यं शड् विधेश्वर्ययुक्तं पादत्रयात्मकं विशेषतः वर्णयन्नाह-एष इति-५
एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोडन्तर्यामी एषः योनिः
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सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्। १६ ।।
एष समष्टि प्राज्ञः सर्वेश्वरः सर्वेषां स्थूलसूक्ष्मकार्यभूतानां पदार्थानामेश्वरः स्वामी ईशनशक्तिः, एष सर्वज्ञः सर्व जीवृज्ञानज्ञ स्वरूपं जानाति वेत्ति इति। समष्टिज्ञानशकत्यधिष्ठिततत्वात् एष सर्वस्य कार्यजातस्य योनिः कारणम्, "जन्मादस्य यतः" इति न्यायात्, हि निश्चयेन भूतानामुक्त पदार्थानां प्रभवाप्ययौ भवन्ति "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते" इत्यादि श्रुतेः। एवं सामर्थ्ययुक्तत् ब्रह्मण एव भूतानामुत्पत्तिस्थिति प्रलया भवन्ति "जनिकर्तृ प्रकृति" इति स्मरणात्। "आनन्दमयोऽभ्यासात्" इत्यादिश्रुताविदमेव कारणत्वेन गृहीतम्। वस्तुतः शक्ति तत् त्वमेवकारणं शिवतत्त्वमेव। ये शक्तिरुपोपादानकारणं शिवस्तु कत कार्यकारणभावरहितमेव। एवं उत्पत्तिस्थिति संहारपदेनोपलक्षणेन च पञ्चकृत्यमपि कथयति। तेषामपि मतमौपनिषदमेव। उक्तं च- "नारायणं शिवं शान्तं सर्ववेदान्तगोचरम्। सृष्टिस्थितिश्च संहारतिरोधानानुसम्मतम् पञ्चकृत्यस्य कर्तारं नारायणमनामयम्॥" (नारायण पूर्व तापिनी) "उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम्" इति श्रुतेः। "सर्वोप्युभय संयुक्तः प्रकृत्या पुरुषेण च, प्रकृति यस्स्योपादानमाधार पुरुषः परः" (भा. ११-स्क. १६-१६)। ये च कथयन्ति शाक्ताभिमत ब्रह्मोपादानं शक्ति निमित्त कारणमिति तेषां मूलं मृग्यम्। १६ ।।
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निरुपण करने के पश्चात् अब सर्वकारण, सर्वेश्वर, नित्य षडविध ऐश्वर्य से युक्त, पादत्रयात्मक स्वरूप का विशेष प्रतिपादन किया जा रहा है।
मन्त्रानुवाद
यह पादत्रयात्मक समष्टिरूप आत्मतत्त्व सब का ईश्वर है, त्वात् एष सर्वज्ञ है, यह अन्तर्यामी है, यह योनि अर्थात् कारण रूप है, भवाप्ययौ यह समस्त भूतों का उद्भव-स्थान है। ॥ ६ ॥
प्र.भा. भाष्यानुवाद
यह समष्टि रूप प्राज्ञ सर्वेश्वर है अर्थात् समस्त कार्य भूत स्थूल एवं सूक्ष्म पदार्थों का ईश्वर है। ईश्वर का अर्थ है ईशनशील अर्थात् स्वामी। ज्ञाता-ज्ञेय-ज्ञान के स्वरूप को जानने के कारण यह सर्वज्ञ कहा जाता है। समष्टि रूप ज्ञान-शक्ति, अर्थात् जागृत एवं स्वप्न आदि अवस्थाओं में अनुभूत ज्ञान की समष्टि में अधिष्ठित होने से यह कार्य रूप में प्रादुर्भूत समस्त जगत् का योनि अर्थात् कारण है। वेदान्त सूत्र के “जन्माद्यस्य यतः” सूत्र का भी यही अभिप्राय है।
यह समष्टि रूप प्राज्ञ निश्चय रूप से भूतों अर्थात् उक्त पदार्थों का प्रभव है तथा उत्पत्ति एवं विनाश का कारण भी है। जैसा कि “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते” आदि उप निषद् के प्रमाण से ज्ञात होता है। सर्व सामर्थ्य युक्त ब्रह्म ही भूतों की उत्पत्ति स्थिति एवं प्रलय का कारण है। “जनिकर्तृ: प्रकृति:” स्मृति
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माण्डूक्योपनिषद्
वाक्य से भी इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन होता है। वेदान्त सूत्र के "आनन्दमयोऽभ्यासात्" सूत्र से भी सर्वेश्वर प्राज्ञ को ही हि उत्पत्ति स्थिति लय का कारण निरुपित किया गया है। किन्तु दृश्य वस्तुतः शक्ति तत्व ही कारण है तथा शिव तत्व कार्य कारण भाव से रहित है।
कतिपय विद्वानों ने अपने मत के अनुसार शक्ति तत्व को य उपादान कारण एवं शिव को कर्ता कहा है, तथा ब्रह्म उत्पत्ति-स्थिति-संहार पद से उपलक्षण के रूप में शिव के पञ्चकृत्यों (अर्थात् जन्म-स्थिति-लय-तिरोधान-अनुग्रह) का प्रतिपादन किया है इन का मत भी उपनिषदों के अनुरूप ही है।
इस सिद्धान्त के समर्थन में नारायणपूर्वतापिनी उपनिषद् का वाक्य उपलब्ध है: "नारायणं शिवं शान्तं सर्ववेदान्त गोचरम्। सृष्टिस्थितिशच संहार तिरो धानानु सम्मतम्॥ पञ्चकृत् तस्य कर्तारं नारायणमनामयम्॥ एवं "उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तं" श्रुति॥
इन प्रमाणों के अतिरिक्त भागवत का प्रमाण भी है: "सर्वोप्यभय-संयुक्तः प्रकृत्या पुरुषेण च। प्रकृतिह्रस्योपादान माघारः पुरुषः परः॥" (मा. ११ स्क. १६-१६) अर्थात् समस्त विश्व प्रकृति एवं पुरुष से संयुक्त है। प्रकृति इसका उपादान कारण तथा पुरुष निमित्त कारण है।
आचार्य वल्लभ का एक अन्य मत है, जिसको शाक्त मत के समक्ष कहा जाता है, जिसके अनुसार ब्रह्म को जगत् का
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नान्तः प्रज्ञं न बहिः प्रज्ञं नोभयतः प्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्॥
तच्छिवतत्त्वं नान्तः प्रज्ञमन्तःप्रज्ञा जागरितवासना जन्य स्वप्नविषयाणि तदरहितं, न बहिः प्रज्ञं स्थूल विषयक प्रवृत्तिरहितं, नोभयतः प्रज्ञमुभयसंश्लज्ञानरहितं, यथा न प्रज्ञानघनं सुषुप्तिविलक्षणं, न प्रज्ञं, नाप्रज्ञमपि चराचर विलक्षणत्वात्, अदृष्टं दृष्टविलक्षणमिन्द्रियाग्राह्यत्वात्, अव्यवहार्य नामरूपात्मकस्य जगतो व्यवहारानर्हम्, अग्राह्यं निरवयवत्वात् सावयवं हि ग्राह्यत्वेन व्याप्तम्। लक्षणत्वावच्छिन्नं मिथ्यात्वेनाविनाभूतमतेव लक्षणं, लक्षण प्रवृत्तिरहितं स्वप्रमात्वात्, लक्षणं न प्रकाशितुमशक्यमित्यर्थः॥
अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणं अचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा विज्ञेयः॥७॥
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अचिन्त्यं मनसा मन्तुमशक्यम् । अव्यपदेश्यं हे तु वादे निर्देश्टुमशक्यमनुमानप्रवृत्तेर्हिभूतत्वात् । व्याप्र्ति निष्ट स्मृतिकरणत निरुपितसाध्यत्वावच्छेदकावच्छिन्नं हि हेतुत्वावच्छेदकावच्छिन्नेन साधितं भवति तच्च मिथ्या विषयत्वमेव भेदविषयत्वात्तदस्येत्यभिप्रायः
एकात्मप्रत्यय सारं एक आत्मा एव प्रत्ययः सारो मुख्योडस्मिन् तत केवलं स्वेनैवानुभवितुं शक्य इतिभावः । यतः प्रपञ्चोपशमं प्रपञ्चस्य जगत उपशमो यत्र तत् प्रपञ्चोपशमं शिवरूपेण तिरोधान कार्य-कारण बुद्ध्योर्निवर्तनात् अतएव शान्तं क्रियाभाववत्त्वेन शान्तजलाशय तरङ्गवत् इति भावः । शिवं कल्याणस्वरूप साच्चिदानन्दस्वरूपमपेक्ष्य द्वैतर्हित निर्वृत्त प्रपञ्चाधिष्ठानमित्यर्थः
चतुर्थ विश्वतैजसप्राज्ञापेक्षया चतुर्थ मातृत्वेन तु एकमेव मन्यते तत्वविदः, स आत्मा विज्ञेयो मुमुक्षुभिः इत्यर्थः । अथातो ब्रह्म जिज्ञासेति न्यायात् । अद्वैतस्य मुख्यत्वात् प्रपञ्चस्य शक्तिविलसितत्वाच्च -सामरस्येन शिवशक्त्योरभेदावस्थायां स्थितायां प्रपञ्चाप्रतीतेर्मृदघटो यथा । शक्तितत्वमपि शिवस्यातभूतत्वेन सम्मतम् ।
“ननु अद्वैते सिद्धान्ते प्रपञ्च मिथ्यात्वं श्रीभगवत्पादैः प्रतिपादितं तत्कथमेवंस्यादितिचेत्-तच्च माया तत्वपरम् इति मन्तव्यम् । तथा च “मायामात्रमिदं सर्वमद्वैतं परमार्थतः” “नेत नानास्ति किञ्चन” माया कल्पितस्य जगतो डधिष्ठानं ब्रह्मतत्वं रज्जुप्रतीतिजनकशुक्तिक्कितवत् । वस्तुतस्तु ब्रह्म परिणामभूतत्वं जगतस्तेन जगत्सत्यत्वं मृदघटवत् स्वीकारणे अद्वैत श्रुतीनां विरोधः द्वैतनिर्वाहरच । एतावन्मात्रेण व्यवस्थोपपत्तेः सर्वस्य जगतो
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मिथ्यात्वकल्पनं निरर्थकमेव भेदमात्रस्य मिथ्यात्वात्। एतेन विशिष्टाद्वैताज्जातवादादय आपेक्षिकैव मन्तव्या:। कबलमद्वैतदृढीकरणार्थ युक्तिवादमेवाश्रितमेव तेषां प्रवृत्ति:। अजातवादस्य कारणे मतिदाढ़्यार्थमेव प्रवृत्ति:। श्री भास्कररायै चार्यैण द्वैताद्वैतमेव व्यवस्थापितं-शास्त्रस्य सत्यावेदकत्वरूप प्रामाण्यनिर्वाहाय सर्वेषां वेदान्तानामद्वैते पारमार्थिके परब्रह्मणि साक्षात्परम्परया वा तात्पर्यस्य वक्तव्यत्वाद् भेदप्रतिपादकशास्त्रस्य पञ्चपाद्गुलग्रासावेदकोपराग-शास्त्रस्यैव व्यावहारिकदृष्टयैव प्रवृत्तिरिति न भेदाभेदयो: समकक्षतैतिभाव:।१७। (ललितासहस्रनाम भाष्य १८६)।
प्रकाश-भाष्य-भाष्यानुवाद
उपर्युक्त वैश्वानर, तैजस एवं प्राज्ञ तीनों पादों में शिव से अभिन्न शक्ति तत्व की महिमा का निरुपण कर चौथे पाद के स्वरूप केवल शिव तत्व का "नान्त: प्रज्ञं" आदि मन्त्र के द्वारा प्रतिपादित किया गया है। यद्यपि शिव तत्व कदाचित् भी शक्ति तत्व से व्यतिरिक्त नहीं है तथापि भेद की केवल बौद्धिक कल्पना करके शिव के स्वरूप के प्रतिपादन की इच्छा से यह मन्त्र कहा गया है।
मन्त्रार्थ
शिव न अन्त: प्रज्ञ है, न बहि: प्रज्ञ है और न इस को उभय प्रज्ञ ही कहा जा सकता है। यह न प्रज्ञान घन है, न प्रज्ञ है और
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माण्डूक्योपनिषद
माण्डूक्योपनिषद
अप्रज्ञ भी नहीं है। यह शिव जिसको चतुर्थ पाद मान्य किया गया
है अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण, अव्यपदेश्य, एकात्म प्रत्यय
का सार है जिसमें प्रपञ्च का शमन हो जाता है। अतएव यह
शान्त शिव ही अद्वैत तत्व है, जिसको चतुर्थपाद कहा है। शिव
नामक चतुर्थपाद को ही आत्मा जानना चाहिये। ॥ ७ ॥
प्रकाश-भाष्यानुवाद
प्रकाश-भाष्यानुवाद
यह शिव तत्व अन्तः प्रज्ञ नहीं है। जाग्रदावस्था में अनुभूत
विषयों से जनित वासना से स्वप्न के विषयों का प्रादुर्भाव होता है
जिसको अन्तः प्रज्ञ कहा जाता है। शिव तत्व अन्तः प्रज्ञ अर्थात्
स्वप्न में अनुभूत विषयों से रहित है अतः शिव को अन्तः प्रज्ञ नाम
से सम्बोधित नहीं किया जा सकता है।
यह स्थूल विषयक प्रवृत्ति से भी रहित है अतः यह वहिः प्रज्ञ
भी नहीं है।
अन्तः प्रज्ञ एवं वहिः प्रज्ञ के सन्धि ज्ञान से रहित होने के
कारण यह उभय-प्रज्ञ भी नहीं कहा जा सकता है।
शिवावस्था की अनुभूति सुषुप्ति से विलक्षण है अतः यह
प्रज्ञान घन भी नहीं है।
चराचर सृष्टि से विलक्षण होने के कारण शिव तत्व न प्रज्ञ
है और न ही अप्रज्ञ है।
शिव तत्व का ग्रहण (ज्ञान) इन्द्रियों द्वारा सम्भव नहीं है अतः
दृष्ट पदार्थों से भिन्न होने के कारण इसको अदृष्ट कहा है।
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माण्डूक्योपनिषद्
शिव के अन्तर्गत नाम-रूपात्मक जगत् का तिरोधान हो जाता है अतः यह व्यवहार के योग्य नहीं है। व्यवहार केवल नाम-रूपात्मक जगत् का होता है अनाम तथा अरूप का नहीं अतः इसको अव्यवहार्य कहा गया है।
माण्डूक्योपनिषद्
अग्राह्य
शिव के अंशों का निरुपण सम्भव नहीं है। इन्द्रियों द्वारा केवल सावयव का ग्रहण होता है। शिव तत्व निरवयव है अतः इसको अग्राह्य कहा है।
माण्डूक्योपनिषद्
अलक्षण
लक्षण से तात्पर्य है परिभाषा। जो लक्ष्यत्व से अविच्छित्र है उसका मिथ्यात्व से अविनाभाव सम्बन्ध होता है। अर्थात् केवल मिथ्या पदार्थ का ही लक्षण सम्भव है सत्य का नहीं। शिव सत्य स्वरूप है अतः अलक्षण है। स्वप्रभ अर्थात् स्वयं प्रकाशरूप होने से शिव किसी लक्षण से लक्षित होने योग्य नहीं है।
माण्डूक्योपनिषद्
अव्यपदेश्य
जिसका मन से मनन नहीं किया जा सकता वह अव्यपदेश्य कहा जाता है। शिव तत्व अनुमान प्रवृत्ति से बाहर है अतः इसका हेतुवाद अर्थात् तर्क के द्वारा निर्देश नहीं किया जा सकता है। तर्क का सिद्धान्त है कि व्याप्ति से निश्चित कारण के द्वारा साध्य की सिद्धि होती है। धूम्र को देखने पर ही अग्नि का अनुमान होता है। यह अनुभूति का विषय है कि जहां-जहां धूम्र होता है वहां अग्नि का होना निश्चित है। पूर्व में देखे गये धूम्र एवं अग्नि के साहचर्य की स्मृति से ही वर्तमान देखे गये धूम्र से अग्नि का अनुमान होता है। अतः अग्निरूप साध्य की सिद्धि में स्मृति ही कारण है।
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माण्डूक्योपनिषद् हेतु है। स्मृति भेद का विषय है, भेद मिथ्या है अतएव मिथ्यात्व का विषय होने से हेतुवाद शिव के निरुपण में कारण नहीं हो सकता है। अतः शिव तत्व मन के क्षेत्र से परे होने के कारण अव्यपदेश्य है। (यहां भाष्यकार ने "व्याप्तिनिष्ठि से प्रारम्भ होने वाले वाक्य में नव्य न्याय की भाषा का प्रयोग किया है।)
शिव तत्व की अनुभूति आत्मा से ही सम्भव है अतः यहां एकात्मप्रत्यय सार शब्द का प्रयोग किया जाता है। शिव में जगत् रूप प्रपञ्च का शमन हो जाता है अर्थात् जगत का शिव के अंतर्गत तिरोधान हो जाता है अतः इसको प्रपञ्चोशम नाम से कहा है। कार्य कारण बुद्धि की निवृत्ति हो जाने पर क्रिया का व्यापार समाप्त हो जाता है। अतएव क्रिया के अभाव में शिव का स्वरूप उसी प्रकार शान्त होता है जिस प्रकार वायु के अभाव में जलाशय निस्तरङ्ग हो जाता है। अतः शिवावस्था को शान्त शब्द से सम्बोधित किया है। कल्याणप्रद सच्चिदानन्द स्वरूप होने से इसका नाम शिव है एवं प्रपञ्चाधिष्ठान से निवृत्त द्वैत रहित होने से अद्वैत कहा है।
आत्मा के विश्व, तैजस, प्राज्ञ, नामक तीन पाद कहे हैं, इनकी अपेक्षा यह चौथा पाद है अतः इसका तुरीय नाम से सम्बोधित किया है। तुरीय शब्द का अर्थ है चतुर्थ । वस्तुतः मुमुक्षुओं को चारों पादों से युक्त आत्मा को एक ही जानना चाहिये। ब्रह्मसूत्रों के "अथातो ब्रह्म जिज्ञासा" सूत्र में भी आत्मा के एकत्व का प्रतिपादन किया गया है।
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माण्डूक्योपनिषद्
इस प्रकार अद्वैत तत्व मुख्य है। जगदूप प्रपञ्च शक्ति का विलास है तथा सामरस्य के कारण शिवशक्ति की अभेद अवस्था में स्थित प्रपञ्च की अप्रतीति उसी प्रकार है जिस प्रकार प्रकट होने से पूर्व घट की मृत्तिका में स्थित कहा जाता है। अर्थात् जिस प्रकार निर्माण होने से पूर्व मृत्तिका में घट का स्वरूप छिपा रहता है उसी प्रकार शिवशक्ति की सामरस्य अवस्था में जगत् रूप प्रपञ्च का स्वरूप अन्तर्हित होता है।
माण्डूक्योपनिषद्
इस प्रकार परमार्थिक दृष्टि से शिवशक्त्यात्म सिद्धान्त स्वीकार करने से श्री भगवान् के अद्वैत सिद्धान्त के निरास की शङ्का उत्पन्न होती है जिसमें प्रपञ्च को मिथ्या निरुपित किया गया है। किन्तु यह शङ्का उचित नहीं है कारण है कि भगवान् पाद ने केवल माया पर्यन्त तत्वों का प्रतिपादन किया है। इसके अतिरिक्त "माया मात्रमिदं सर्व" "नेह नानास्ति किञ्चन" आदि वाक्यों से प्रकट होता है कि जिस प्रकार शक्ति रजत की प्रतीति का जनक है उसी प्रकार माया-कल्पित जगत् का अधिष्ठान ब्रह्म है। वस्तुतः जगत् ब्रह्म का परिणाम हैं। जिस प्रकार मृत्तिका में घट की स्थिति है अर्थात् मृत्तिका ही सत्य है जो नाना रूपों में परिणत हो जाती है। उसी प्रकार ब्रह्म सत्य है जो नाना रूपों में परिणत हो जाता है। इस प्रकार जगत् को ब्रह्म का परिणाम स्वीकार कर लेने पर अद्वैत प्रतिपादक श्रुतियों का विरोध किये बिना ही द्वैत का निर्वाह हो जाता है। इस प्रकार से प्रतिपादित व्यवस्था का स्वीकार कर लेने मात्र से समस्त जगत् के मिथ्यात्व की कल्पना निरर्थक हो
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माण्डूक्योपनिषद्
जाती है केवल भेद मात्र को मिथ्या मान्य कर लेने से द्वैत का निरास हो जाता है। अर्थात् ब्रह्म एवं जगत् में भेद की कल्पना मात्र मिथ्या सिद्ध होती है न कि जगत्। इस युक्ति के आश्रय से विशिष्टाद्वैत एवं अजातवाद आदि सिद्धान्त आपेक्षिक मानना ही उचित है। युक्तिवाद के आश्रय से इन सिद्धान्तों को प्रवृत्ति केवल अद्वैत मत को दृढ़तर प्रतिपादित करने की ओर से सिद्ध होती है इस प्रकार कारण रूप ब्रह्म में मति दृढ़ करने के हेतु अजातवाद की प्रवृत्ति है।
आचार्य भास्करराय ने द्वैताद्वैत मत को व्यवस्थापित किया है। शास्त्र सत्य का आवेदक है। अतः शास्त्र के सम्प्रदाय-प्रतिपादक स्वरूप की प्रामाणिकता के निर्वाह के हेतु समस्त वेदान्त शास्त्र पारमार्थिक दृष्टि से परब्रह्म के अद्वैत स्वरूप का बोधक है एवं साक्षात् परम्परा से भी अद्वैत मत का ही समर्थन सिद्ध है। "हाथ से भोजन करो" इस प्रकार आवेदन करने की भेद-प्रतिपादक शास्त्र की प्रवृत्ति केवल व्यावहारिक है पारमार्थिक नहीं अतः भेदाभेद सिद्धान्त अद्वैत के समकक्ष नहीं है।
संक्षिप्तं विवरणम्
"एकमेवाद्वितीयम्" इति श्रुत्युत्तरीत्या उक्ते: प्रकारैरद्वैतोपदेश: प्रदर्शितः। परमतत्त्ववादमनसयोरविषयत्वेन सर्वत्रवेदान्तेषु निश्चितम्। तच्च "अयमात्मा ब्रह्म, "तत्त्वमसि, "अहं ब्रह्मास्मि" इत्यादि वाक्यैर्ज्ञायते। तस्मादेव पराश्रुत्या कारणं तत्त्वमभिलक्ष्यते
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अन्तर्यामितत्वं च तदेव प्रकाशविमर्शात्मकं कारणं जगत् इति सिद्धान्तः आगम विदाम् । शक्तिसाहचर्येणैव जगद् रचनायाः सम्भवात् । उक्तं च-“जगत्कारणमापत्रः शिवो यो मुनिसत्तमः । तस्यापि सा भवच्छक्तिस्तया हीनो निरर्थकः ।।” “शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं” मिथ्यादि । तुरीये शिवेऽपि स्वरूपभूतेयं महाभागा वर्तते । तथा चाहुर्भगवतादाचार्याः-“परास्यशक्तिरिविधैव श्रूयते,” “एको डवर्णो बहुधा शक्तियोगात्” इति श्रुतेश्च । शिवशक्तिस्वरुपकमेव महाविन्दुस्तस्मान्नादः सम्भवति तद् शब्दब्रह्मेति कथ्यते । उक्तं च-“विन्दो स्तस्माद् भिद्यमानाद् रवोद्यक्तात्मकोडभवत् । स एव श्रुतिमापन्नः शब्दब्रह्मेति कथ्यते ।” उक्त च-“विन्दोस्तस्माद् भिद्यमानाद् रवोदव्यक्तात्मकोडभवत् । स एव श्रुतिमापन्नः शब्दब्रह्मेति कथ्यते ।” परापश्यन्ती-मध्यमा-वैखरीतिचतसः संज्ञास्तस्यैव अवस्थाभेदेन भवन्ति । “चत्वारि वाक् परिमिता पदানি” इति श्रुतेः । सर्वा वाच ओंकार एवान्विताः सन्ति सर्वासां कारणत्वात् । “ओंकार एव सर्वा वाक् स्पर्शोष्मभिव्यज्यमाना नानारूपा भवति” इति श्रुतेः । ओंकार एव स्वम् दर्शयतु भिर् हिरण्यगर्भे श्वरशिवतत्त्वाख्यं वाच्यंवाचकरुपेण विषयीकरोति ।
तदवच्छिन्नश्चेतनः साक्ष्यतत्त्वं मन्त्रेश्वरो वा कथ्यते तदधीना: मन्त्राः सिद्दाः साधकाश्च, ओमित्येकाक्षरमित्यनेनात्र दर्शितम् । ईश्वरतत्त्वं समष्टिप्राज्ञः “एष सर्वज्ञ” इत्यादिनो पदिष्टम् । अयमात्माब्रह्मेति महावाक्यं सर्वशास्त्रसमन्वयात्मकं विद्यातत्त्वमिमानि शुद्धतत्त्ववाच्यानि पञ्चतत्त्वानि, परब्रह्मणः स्वरूपभूतान्येव ।
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माण्डूक्योपनिषद
चतुर्विधःतत्त्वस्वरूपमुक्ततम्। "मायान्तमात्मतत्त्वं विद्यातत्त्वं सदाशिवान्तं स्यात्। शक्तिशिवौ शिवतत्त्वं तुरीयतत्त्वं समष्टिरेतेषाम्।" एतदनन्तरं मायातत्त्वेन तादात्म्यीकृत्य जीवतत्त्वं हिरण्यगर्भविराज्ञामकं समष्टिरुपेणाविर्भवति। विद्यातत्त्व मेवान्त्योन्याभावरूपभेदबुद्धिप्रधान्य सूक्ष्मतत्त्वे षु मायातत्त्वमुच्यते अनैनैव द्वैतं भवति। अपूर्णत्वाल्पत्वदःखित्वादिमन्यमानं जीवतत्त्वमुच्यते। प्राज्ञःतैजसादिः तस्यैव अवस्थाभेदाः। कालाविद्या (किंचिज्ज्ञत्वरूपम्) रागः, कालो, नियति: सप्तैतानि शुद्धाशुद्धरूपाणि तत्त्वानि। किंचित्कर्तृत्वरूपं कलातत्त्वं, रागो विषयेषु प्रीतिः सृष्टिव्यवहारं व्यज्जयन्ती कालाख्या शिवस्य शक्ति:, यत् त्रिकालातीतामित्यादिना सूचितम्। पञ्चाना कञ्चुकानामुपलक्षणं यैतत्। अवशमात्मानं कृत्याकृत्येषुनियोक्त्री शक्तिः नियति:। अपूर्णा किंचिज्ज्ञत्वरूपाशक्तिर्विद्यातत्त्वम् "सप्ताङ्ग" इति पदेनात्र सूचितम्। एतत्सर्वं जीवतत्त्वेऽन्तर्गतं बोद्धव्यम्। चतुर्विंशति संख्याकानि प्रकृतिमारभ्य पृथिवीपर्यन्तानि जातानि तत्त्वानि सांख्यप्रसिद्धानि "एकोनविंशतिमुख:" इत्यनेनोपवर्णितानि। "मूलप्रकृतिरविकृतिमहदाद्या: प्रकृतिविकृतयः सप्त षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः" (सां०का० ३)। इमानि अशुद्धतत्त्वानि कथ्यन्ते। नारदपरित्राजकोपनिषदि "षट्त्रिंशत्तत्त्ववातीतः" इत्युक्त्वा ततः पश्चात् माण्डूक्यमन्त्राः कथितास्तेन ज्ञायते तत्त्वानामस्यामुपनिषदि समावेशो भवति। "ब्रह्माण्डादिशिवान्ताया: षट्त्रिंशत्तत्त्वस्वहेतुः। भगवञ्च व्याप्यवृत्तित्वमशेषं माह्ममाह्दयम्" (परमात्मिकोपनिषद् १००)। शिवशक्त्योः परिणामभूतानि सर्वाणि,
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माण्डूक्योपनिषद्
त्रिगुणमधिकृत्य ब्रह्मविष्णुरुद्रेति संज्ञाभिः स एव भगवान् शिवो व्यवहरति इति समुदितार्थः। सर्व ह्येतद् ब्रह्मोति उक्तत्वात्। मायया अल्पीभावमाप्तं जीवत्वं शुद्धविद्यां लब्धवा शिवत्वं लभते। “ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः” इति श्रुते:, आगमेषु लज्जाघृणादिं पाशाष्टकं प्रसिद्धमस्ति। श्री गौडपादै: अजातवाद: समर्थितः सतयुक्तिक एव। वेदेषु जगत्सत्यत्वमपि श्रूयते “विश्वं सत्यं मघवाना युवोरिदापश्च न प्र मिनन्ति वाम” (ऋ०सं० २-६-३-२)। “तुच्छेनाभ्यवपिहितं यदासीत्” (ऋ०सं० ८-७-१७-३)। इत्यस्मिन् मन्त्रे मिथ्यार्थपरित्यज्य सूक्ष्मार्थस्य विवक्ष्यात। सत्यस्य सत्यामिति श्रुतस्तु व्यावहारिकपारमार्थिक्योरभेदनिरुपणे संगति:। मिथ्यात्वं तु केवलं जगदन्तर्गतभेदमात्रे मायाकल्पिते चरितार्थमुक्तप्रकरण इति संक्षेप:॥
सक्षिप्तं विवरणम्
“एकमेवाद्वितीय” परम सत्य एक अद्वितीय ही है श्रुति के इस वाक्य के अनुसार अद्वैत का ही उपदेश किया गया है। समस्त वेदान्त में निश्चित रूप से परम तत्व को वाक् एवं मन का विषय प्रतिपादित नहीं किया गया है। परम तत्व ब्रह्म का ज्ञान “अयमात्मा ब्रह्म”, “तत्वमसि”, अहं ब्रह्मास्मि” इत्यादि श्रुति वाक्यों के द्वारा होता है। आगम शास्त्र का मत है कि उस वागात्मक पराशक्ति के कारण तत्व की अभिव्यञ्जना होती है। प्रकाश–विमर्शात्मक कारण–जगत् भी वही अन्तर्यामी तत्व है। शक्तिके साहचर्य से ही जगत की रचना सम्भव है कहा भी है:-
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माण्डूक्योपनिषद्
"जगत्कारणमपन्नः शिवो यो मुनिसत्तमः । तस्यापि साभवच्छक्तिस्तस्तया हीनो निरर्थकः ॥"
अर्थात् जो शिव जगत का कारण है वह परा उसकी भी शक्ति है एवं उसके बिना वह निरर्थक है । तथा
माण्डूक्योपनिषद्
"शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्त: प्रभवितुम्"
वाक्य द्वारा सौन्दर्य लहरी में श्रीमद् शङ्कराचार्य ने भी इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है । तुरीय-शिव में भी महाभागा परा की स्थिति है । सौन्दर्य लहरी नामक इसी ग्रन्थ में दुरधिगम निःसीम महिमा परा को तुरीया कहा है :-
माण्डूक्योपनिषद्
"तुरीया कापि त्वं दुरधिगम निःसीम महिमा"
(सौ. ल.) इसके अतिरिक्त श्रुति भी कहती है :- "परास्य शक्तिः विविधैव श्रूयते" तथा "एकोडवर्णो बहुधा शक्ति योगात्"
माण्डूक्योपनिषद्
"विन्दोस्तस्माद् भिद्यमानाद् रवोडव्यक्तत्मकोडभवत् । स एव श्रुतिभापन्नः शब्द ब्रह्मेति कथ्यते ॥"
उसी शक्ति के अवस्था भेद से परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी चार नाम हैं । श्रुति में भी इन चार अवस्थाओं की चर्चा है । कहा है, "चत्वारि वाक् परिमिता पदानी" समस्त वाणी का कारण अकार है अतएव अकार में ही समस्त वाक् आन्न्वित हैं । श्रुति कहती है कि "ओंकार एव सर्वा वाक्, स्फुर्शोऽभि: व्यज्यमाना नाना"
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माण्डूक्योपनिषद्
रूपा भवति"। अर्थात् स्पर्श एवं ऊष्माण वर्णों द्वारा अभिव्यक्त समस्त वाक् ओंकार ही है जो नाना रूपों में व्यक्त होता है। विराड्, हिरण्यगर्भ, ईश्वर, शिव नामक स्वगत भेदात्मक वाच्य तत्वों का स्वयं ओंकार ही वाचक रूप से विषयीकरण करता है। वाच्य तत्व स्वयं वाचक रूप से ओंकार के ही विषय हैं। ओंकार से अविच्छिन्न चेतन तत्व सदाशिव है जो मन्त्रेश्व र नाम से भी कहा जाता है। मन्त्र, सिद्ध एवं साधक सदाशिव के अधीन हैं, यह तथ्य ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म मन्त्र के द्वारा प्रदर्शित किया गया है। छटवें मन्त्र में "एष सर्वेश्वर, एष सर्वज्ञ" आदि वाक्यों में ईश्वर तत्व को समष्टि प्रज्ञा के रूप में प्रतिपादित किया गया है। 'अयमात्मा ब्रह्म' द्वतीय मन्त्र की यह महावाक्य समस्त शास्त्र की समन्वयात्मकता का द्योतक है।
यह विद्यातत्व शुद्ध नाम से सम्बोधित पञ्चमहाभूत हैं जो परब्रह्म के स्वरूप हैं। तत्वों का चतुविध स्वरूप है जिसको विराड् आदि नाम से कहा गया है।
आत्म तत्व माया पर्यन्त एवं विद्या तत्व सदाशिव पर्यन्त है। शिव-शक्ति (एकत्र) का नाम शिव तत्व है। इनका समष्टि रूप तुरीय तत्व है। इसके पश्चात् माया के साथ एकीकृत जीव हिरण्यगर्भ है जिसका विराड् कहा जाता है। विराड् का शिव-शक्ति
के समष्टि रूप से आविर्भाव होता है। अन्योन्य अभाव रूप, भेद-बुद्धि-प्रधान विद्या तत्व ही सूक्ष्म तत्वों के अन्तर्गत माया तत्व के नाम से कहा जाता है। माया तत्व से ही द्वैत की उत्पत्ति
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जो स्वयं को अपूर्ण, अल्प, दुःखी आदि मानता है वह जीव है। प्राज्ञ-तैजस आदि उसी की अवस्थाओं के भेद हैं। कला, विद्या, राग, काल, नियति, सहित माया एवं जीव सात शुद्धाशुद्ध तत्व हैं। किश्चित् ज्ञातृत्व विद्या तथा किश्चित् कर्तृत्व रूप कला तत्व है। विषयों में प्रीति राग है। शिव की कला नामक शक्ति सृष्टि के व्यवहार का अभिव्यञ्जन करती है, त्रिकालातीत आदि शब्दों से प्रथम मन्त्र में सूचित किया गया है। यह पञ्च कञ्चुकों का उपलक्षण है। अवश जीव को कृत्य तथा अकृत्य में नियुक्त-कर्तु शक्ति का नाम नियति है। जिस शक्ति के द्वारा जीव आदि को अपूर्ण एवं किश्चित् ज्ञाता रूप में मान्य करता है वह शक्ति विद्या नाम से सम्बोधित है। यहां जो सप्ताङ्ग नाम से सूचित किया है वह सब जीव तत्व के अन्तर्गत है। प्रकृति पृथिवी पर्यन्त सांख्य शास्त्र में प्रसिद्ध चौबीस तत्वों को यहां उन्तीस मुख के नाम से प्रदर्शित किया है। "मूल प्रकृतिरविकृतिमहदाद्या: प्रकृति विकृतय: सप्त; षोडशकस्तु विकारो न प्रकृति: न विकृति: पुरुष:" चौबीस तत्वों को अशुद्ध तत्व कहा जाता है। नारद परिव्राजकोपनिषद् में षट्त्रिंशत तत्वातीत अर्थात् छत्तीस तत्वों से अतीत तत्व का निरुपण करने के पश्चात् माण्डूक्य मन्त्रों का कथन किया गया है जिसके कारण ज्ञात होता है कि प्रस्तुत उपनिषद् में तत्वों को समाविष्ट किया है।
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समुदाय को ईश्वर की ही महिमा कहा गया है। "ब्रह्माण्डादि शिवान्ताया: षट् त्रिंशत्तत्वसंहते:, भगश्च व्याप्य वृत्तितवमेश्र्य महिमाहयम् ।१"
इस प्रकार समस्त तत्त्व शिव–शक्ति के ही परिगणित हैं, सत्, रज तम तीन गुणों के आधार से कल्पित ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र नाम से भगवान शिव की व्यवहत होते हैं। यह सब ब्रह्म ही है। माया के कारण अल्पता को प्राप्त जीव शुद्ध–विद्या के प्रभाव से पुनः शिवत्व को प्राप्त करता है। श्रुति कहती है "ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशै:" अर्थात देवता का ज्ञान हो जाने पर समस्त पाशों से मुक्त हो जाता है। आगम शास्त्र में लज्जा, घृणा, शड्का, भय, जुगुप्सा, कुल, शील, जाति नामक आठ पाशों का विवेचन है। घृणा शड्का भयं लज्जा, जुगुप्सा चेति पञ्चमी। कुलं शील च जातिश्चेत्यष्टौ पाशा: प्रकीर्तिता:॥ आचार्य श्री गौढपाद से अजातवाद का समर्थन किया है वह केवल युक्तिवाद ही है।
वेदों में ऐसी श्रुतियाँ भी उपलब्ध है जो जगत् के सत्यत्व की समर्थक हैं :- यथा- "विश्वं सत्यं मघवाना युवरिदापश्च न प्र मिनन्ति वाम्।" ऋ० सं० २-६-३-२ तथा- "तुच्छेनाभपिहितं यदासीत" (ऋ०सं. ५-६-७-३) मन्त्र में मिथ्या अर्थ का परित्याग कर सूक्ष्म अर्थ का निर्वचन किया गया है। अर्थात् जगत् को मिथ्या न कहकर
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माण्डूक्योपनिषद
मन्त्र में इसको सूक्ष्म प्रतिपादित किया है। इस प्रकार अर्थ करने से जो श्रुति द्वारा ब्रह्म को (सत्यस्य सत्यं) अर्थात् सत्य का ही सत्य कहा गया है इस वचन का भी व्यावहारिक एवं पारमार्थिक में निरूपण में निर्वाह हो जाता है। इस प्रकार मिथ्यात्व तो केवल जगत् के अन्तर्गत माया कल्पित भेद मात्र में चरितार्थ होता है कि जगत् में।
इति संक्षेपः
टिप्पणी :- इस प्रकार उपनिषद् के भाष्य में भाष्यकार स्वामी जी महाराज गुरुवर ने भेद एवं भेदाभेद प्रतिपादक मतों का निरस्त कर वेदान्त के अद्वैत प्रतिपादक मतों से आगमोक्त अद्वैत के स्वरूप का सामञ्जस्य स्थापित किया है। अजातवाद आचार्य गौड़पाद का मत है। आचार्य ने माण्डूक्य उपनिषद् पर कारिकाओं की रचना का अजातवाद एवं अस्पर्शयोग का प्रतिपादन किया है पूज्य आचार्य ने प्राणितवाद, भूतात्मवाद, गुणात्मवाद, तत्वोक्तवाद, देवात्मवाद, वेदात्मवाद आदि अनेकों मतों का युक्तिपूर्वक खण्डन किया है। तथा जगत् रूपी प्रपञ्च को स्वप्न, माया अथवा गन्धर्वनगर के समान प्रतिपादित किया है। आचार्य के मत में एक अद्वैत तत्व के अतिरिक्त उत्पत्ति, प्रलय, वद्ध, साधक, मुमुक्षु और मुक्त किसी भी प्रकार का व्यवहार नहीं। यही परामर्थता है।
यथा-
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शिवतत्त्वमुपदिश्य तत्स्वरूपाधिगमाय साधनं श्रेष्ठं प्रणवं वक्तुं प्रक्रमते :-
भाष्यानुवाद शिव तत्व का उपदेश करने के पश्चात् उनके स्वरूप के ज्ञान के लिए साधनों में श्रेष्ठ प्रणव का निरुपण करते हैं :
॥ ५॥ सोऽयमात्माध्यक्षरमोंकारोऽधिमात्रं, पादा मात्रा मात्राश्च पादा आकार उकारो मकार इति॥ ५॥
मन्त्र
न निरोधो न चोत्पत्तिर् न बद्धो न च साधकः / न मुमुक्षुर्न वैमुक्त इत्येषा परमार्थता॥
सिद्धान्ततः भेद केवल व्यावहारिक दृष्टि से ही सम्भव है। परमार्थतः इसका कोई अस्तित्व नहीं है। यदि भेद को सत्य मान लिये जायें तब कारण ब्रह्म उत्पत्तिशील सिद्ध होने से नित्य नहीं कहा जा सकता। वस्तुतः न सद् वस्तु का जन्म होता है न असत् वस्तु का। अतः यह समस्त जगत् मनोदृश्य मात्र है। उन्मनी भाव के उत्पन्न होने पर द्वैतात्मकता का विलय हो जाता है। आचार्य ने कारिकाओं के अलातशान्ति नामक प्रकरण में कहा जैसे अलात (मशाल) के घुमाने से अनेक प्रकार की आकृतियां दिखाई देती हैं तथा मशाल का चक्कर बन्द हो जाने पर वे सब आकृतियां विलीन हो जाती है। उसी प्रकार
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प्रकाश-भाष्य
सोड्यमालाध्यक्षरमोंकारमधिकृत्य कथ्यमानोऽध्यक्षरम् । ओङ्कारो मात्रामधिकृत्य वर्तमान इत्यधिमात्रम् । आत्मनो ये पादास्ते ओङ्कारमात्राऽनुर्वर्तन्ते । ता मात्रा आकार उकार मकार इति । ॥१॥
ओङ्कार अक्षर को अधिकृत (आश्रय) कर इस आत्मा का निर्वचन किया गया है अतः इसको अध्यक्षर कहा है। ओङ्कार मात्राओं को अधिकृत कर वर्तमान (स्थित) है अतः इसको अधिमात्र मन के सङ्कल्पन से गतिशील प्रपञ्च होने वाला यह दृश्यप्रपञ्च मन की उन्मनी अवस्था उत्पन्न होते ही विलय हो जाता है । परमार्थ दृष्टि से इसकी उत्पत्ति एवं लय दोनों ही भ्रान्ति मूलक हैं । इस भ्रान्ति का आधार परब्रह्म ही है। रज्जु में सर्प अथवा शुक्ति में रजत की भ्रान्ति के समान ही परब्रह्म में ही प्रपञ्च की भ्रान्ति होती है ।
प्रकाश भाष्यकार के मत से अजातवाद आगमाद्दित नहीं विरोधी नहिं अपितु समर्थक है । -गुरूजी महाराज ने इस मत के समर्थन में अनेक बार निम्न श्लोकों का उपदेश किया :-
नेत्यो विभोरिवर्तोऽस्ति परिणामश्च न क्वचित् । अथवा द्वयमप्यस्तु तथाप्यस्य न खण्डना ॥
विवर्तेऽप्यथारुपस्तथा भासि त्वमच्युत । परिणामेऽप्यस्यारुपस्तथा त्वं सुवर्णमिव कुण्डले ॥
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माण्डूक्योपनिषद् कहते हैं। आत्मा के जो पाद कहे गये हैं वे ओंङ्कार की मात्राओं का अनुसरण करते हैं। वे मात्राएँ अकार, उकार तथा मकार हैं। आत्मा के पाद की मात्राएँ हैं एवं मात्रा ही पाद हैं॥ ४ ॥
विशेषण कथयति-जागरितेति। अब विशेषतया जाग्रत् का कथन करते हैं।
॥ ६ ॥ जागरित स्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्रा प्रथमया ह वै सर्वान् कामान् आदिरश्च भवति य एवं वेद॥६॥
वैश्वानर, जिसका जागरित स्थान है, आत्मा का प्रथम पाद है। यह व्याप्तित्व एवं आदिमत्व के कारण ओंकार की प्रथम मात्रा अकार है। जो साधक इस प्रकार जानता है वह सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त करता है, तथा साधकों में श्रेष्ठ हो जाता है।
जागरित स्थानो वैश्वानरः समष्टिव्यष्टिरुपोङ्काराख्यामोङ्कारस्य प्रथमां मात्रामनुगतश्चिन्तनीयः। आप्तेर्याप्तेरकारस्य "अकारो वै सर्वा वाक्" इति श्रुते:, आदिमत्त्वाद्वा सर्वेषां वर्णानां प्रथमत्वाद्वा एवं चिन्तकः साधकः सर्वान् कामान् मनोवाञ्छितान् काम्यमानान् पदार्थान् ह वै निश्चयेन आप्नोति। तथा सर्वेषां साधकानां मध्ये आदि: प्रथमो
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माण्डूक्योपनिषद्
भवति, य एवं वेद जानाति इत्यर्थः, "प्रयत्नः साधकः" इति प्रमाणात् । ॥६॥
प्रकाश-भाष्य-भाष्यानुवाद
जाग्रत अवस्था में अनुभूत समष्टि एवं व्यष्टि रूप आत्मा के वैश्वानर नामक प्रथम पाद का चिन्तन ओंकार की प्रथम मात्रा आकार के अनुगत करना चाहिये। अर्थात आत्मा का जागरित स्थानीय वैश्वानर नामक प्रथम पाद ओंकार की प्रथम मात्रा आकार है।
आकार समस्त वाक् तत्व में व्याप्त है। श्रुति कहती है "अकारो वै सर्वा वाक्"। अतः आकार के व्यापृत्व के समान आत्मा का प्रथमपाद आकार के अनुगत होने से सर्वव्यापी है। अथवा इस प्रकार भी कहा
टिप्पणी :- "प्रयत्नः साधकः" शिव सूत्रों के शाक्तोपाय नामक द्वितीय उन्मेष का द्वितीय सूत्र है। मन्त्रसाधन में जो अकृत्रिम अन्तःप्रयत्न होता है, अर्थात जो प्रथम अन्तः उन्मेष होता है, जिसके कारण चिन्तक का पर-प्रतिभा में लय हो जाता है उसके चिर काल का निरोध का नाम प्रयत्न है। यह प्रयत्न के साधक नाम से कहा है जिसमें मन्त्री, मन्त्र एवं देवता का तादात्म्य हो जाता है।
(शिवसूत्र विमर्शनी एवं श्री स्वामीजी कृत ऋजुर्थ बोधिनी टीका देखिये)
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माण्डूक्योपनिषद्
जा सकता है कि आकार समस्त वर्णो में प्रथम है इस कारण आत्मा का प्रथम पाद प्रथम मात्रा आकार है। इस प्रकार चिन्तन करने से साधक निश्चय ही समस्त मनोवाञ्छित पदार्थो को प्राप्त करता है, तथा जो इस प्रकार जानता है वह समस्त साधकों में आदि अर्थात प्रथम हो जाता है। "प्रयत्न साधक:" सूत्र इस मत के समर्थन में प्रमाण है।
सम्बन्ध निरुपण
॥९०॥ विश्वेन साधर्म्यकारस्यैक्य चिन्तनफलं प्रदर्श्य তৈजसेन साधर्म्यमकार मात्रा: ध्यानरीतिफलं चाह। स्वप्नस्थानैति- ॥९०॥
भाष्यानुवाद
वैश्वानर के साथ आकार के तादात्म्य के चिन्तन का फल प्रदर्शित कर आगे उकार मात्रा का तैजस के साथ ध्यान करने का फल कहते हैं:-
मन्त्र
स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीय मात्रा उत्कर्षादुभयत्वाद्वा, उत्कर्षति ह वै ज्ञानसंततिं समानश्च भवति, नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद।
प्रकाश-भाष्य
स्वप्नस्थानस्तैजस ओकारस्य उकाराख्यमात्रया चिन्त्यते। उत्कर्षाद आकाराद उत्कृष्टा हि उकाराख्यामात्रा,
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उभयत्वादवा-अकारमकारयोर्मध्यस्थत्वाद्-विश्वप्राज्ञयोर्मध्ये तैजसः सूक्ष्मत्वात्। विशवादुक्तृष्टस्तैजसो। य एवं वेद स ह वै निश्चयेन ज्ञानसंततिं विज्ञान परम्परामुत्कर्षति वर्धयति, समानश्च मित्रारिपक्षयोः भवति। अस्य कुले वशी अब्रह्मवित् ब्रह्मज्ञानिहिता अन्योऽपि कार्येऽस्मिन् भवतीत्यर्थः। ॥१०॥
मन्त्र भाष्य (१०) ओं की द्वितीया मात्रा उकार है, स्वप्नावस्था इसका स्थान है। आत्मा के तैजस नामक द्वितीय पद का बोधक उकार नामक द्वितीय मात्रा है। उकार आकार से उत्कृष्ट है अतएव इस को द्वितीया मात्रा कहा है। अथवा प्रथम एवं तृतीय मात्रा आकार एवं मकार के मध्य में स्थित होने से उभयात्मक है। उकार मात्रा तैजस का रूप है विश्व एवं प्राज्ञ के मध्य में स्थित तैजस का स्वरूप सूक्ष्म है। तैजस विश्व से उत्कृष्ट है जो ऐसा जानता है उसके ज्ञान प्रवाह का इससे उत्कर्ष होता है। तथा साधक में समत्व बुद्धि उत्पन्न होती है। जो साधक इस प्रकार जानता है उसके कुल में कोई भी ब्रह्म-ज्ञान से विहीन नहीं होता है।
प्रकाश-भाष्य (भाषा) आत्मा के स्वप्नस्थानीय तैजस नामक द्वितीय पद का चिन्तन ओंकार की उकार नामक द्वितीय मात्रा के द्वारा किया जाता है। उकार उत्कर्ष का द्योतक है अर्थात् आकार से उकार नामक मात्रा उत्कृष्ट हैं। अथवा प्रथम मात्रा आकार एवं तृतीय
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माण्डूक्योपनिषद्
मात्रा मकार के मध्य में स्थित होने से उकार उभयात्मक है। इस कारण भी इसको उत्कृष्ट कहा है। आत्मा के विश्व एवं प्राज्ञ पादों के मध्य में स्थित तैजस सूक्ष्म होने के कारण भी उत्कृष्ट है। जो यह जानता है कि तैजस पाद विश्वपाद से उत्कृष्ट है वह निश्चय ही ज्ञान-प्रवाह का उत्कर्ष करता है एवं विज्ञान परम्परा का संवर्धन करता है तथा शत्रु एवं मित्र में समत्व की अनुभूति करता है। इसके कुल में कोई भी ब्रह्म-ज्ञान से विहीन उत्पन्न नहीं होता है॥ ९० ॥
मकार मात्रया प्राज्ञस्यैक्य चिन्तनप्रकारमाह। सुषुप्तस्थानेऽति॥ ९१ ॥
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रामितेरपीतेर्वा मिनोति ह वै इदं सर्वमप्रीतिश्च भवति य एवं वेद॥ ९१ ॥
प्रकाश-भाष्य
सुषुप्त स्थानः प्राज्ञः समष्टिव्यष्टिरूपः मकारो मकाराख्यो वेदितव्यः तृतीया मात्रा ओंकारस्येयं चिन्तयितव्या, तया सममेकीकृत्य मित्रेःमितिमानं परिमाणमित्यर्थः। मीयते अनया मात्रया विश्वस्तैजसश्च तयोराविर्भावतिरोभावौ हि प्राज्ञादेवेति मानकार्य निर्देशः। अपीतेःवा अपीतिलयः एकीभाव इति, यावत् विश्वतैजसो हि लयं गच्छतः सुषुप्तौ। य एवं वेद जानाति स ह वै निश्चयेन इदं सर्व जगन्
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मिनौति जानाति तथा अप्रीतिश्च भवति। सर्वस्य आत्मा कारणरूपो निखिल जन प्रियो वा भवतीत्यर्थः। अत्र श्लोको भवति–
अकारो नयते विश्वमुकारश्चापि तैजसम्। मकारश्च पुनः प्राज्ञं नामात्रे विद्यतेगतिः॥११॥
प्रकाश-भाष्य-भाषा
अब ओंकार की तृतीया मात्रा मकार के साथ आत्मा के तृतीय पाद प्राज्ञ के ऐक्य की साधना पर विचार करते हैं।
मन्त्रार्थ
ओंकार की तृतीया मात्रा मकार आत्मा के प्राज्ञ नामक सुषुप्त-स्थानीय तृतीय पाद की वाचक है। इस मात्रा से प्राज्ञ के मिति एवं अपीति दो कार्यों का निर्देश होता है। मकार सब का मापक है एवं लय स्थान भी है। जो इस प्रकार जानता है उस साधक को लय की सिद्धि हो जाती है।
प्रकाश-भाष्य
ओंकार की समष्टि एवं व्यष्टि रूप मकार नामक मात्रा सुषुप्ति अवस्था में अनुभूत आत्मा का प्राज्ञ नामक तृतीय पाद है। मकार एवं प्राज्ञ के ऐक्यरूप चिन्तन से विश्व एवं तैजस नामक पादों के परिमाण का माप होता है अर्थात् विश्व एवं तैजस के आविर्भाव एवं तिरोभाव के मान कार्य का निर्देश प्राज्ञ से होता है। अपीति का अर्थ है लय अतएव सुषुप्ति में लय होते हुए विश्व एवं तैजस का प्राज्ञ से एक भाव हो जाता है। जो इस प्रकार जानता
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माण्डूक्योपनिषद्
है वह ज्ञानी है। वह निश्चय ही इदं पद वाच्य समस्त जगत का परिमाण जानता है तथा अपीति अर्थात् जगत से एकाकार हो जाता है। एवं कारण रूप सब का आत्मा वह साधक जनप्रिय हो जाता है।
उपर्युक्त आशय को प्रकट करने के लिए निम्नलिखित श्लोक प्रमाण है :-
"अकारो नयते विश्वमुकारश्चापि तैजसम्। मकारश्च पुनः प्राज्ञं नामात्रे विद्यते गति:॥"
अर्थात् आकार की उपासना से विश्व की, उकार से तैजस की एवं मकार से प्राज्ञ की सिद्धि होती है किन्तु शिव की अ मात्र रूप से दर्शाने में शब्द की गति नहीं है॥१११॥
एवं पादत्रयस्य मात्रात्रयेण चिन्तनं विधाय चतुर्थपादमात्ररूपं लक्ष्यात्मकमोंकारस्यामात्रया प्रदर्शयत्यमात्रेति :-
भाष्यानुवाद
इस प्रकार मात्रात्रय के साधन से आत्मा के पादत्रय के चिन्तन का प्रतिपादन कर आत्मा के अमात्र चतुर्थ पाद को प्रदर्शित करते हैं।
॥११२॥ अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मानं य एवं वेद, य एवं वेद॥११२॥
मन्त्र
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प्रकाश-भाष्य
चतुर्थ: पादत्रयापेक्ष: न तु वस्तुत:। यतो हि कार्यकारणविलक्षण: स संख्यारहितः, अव्यवहार्य: केनापि हेतुना व्यवर्तुमयोग्य:, प्रपञ्चोपशम: प्रपञ्चस्य क्रियात्मकव्यवहारस्य जगत उपशमो लय: तिरोभावो निवृत्तिर्या यत्रासौ, शिवो ब्रह्मत्वं सामरस्याभिघेयोद्वैतैत एवोंकार आत्मैव ब्रह्मस्वरूप एव, वाच्यवाचकयोरभेदात्। य एव ओंकार तत्व वेद जानाति। स आत्मनास्वरुपेणात्मानं विशति ब्रह्म रूपो भवति जीवब्रह्मणोरेक्यमनुभवति इत्यर्थे: साधनप्रयोजनं सम्यक् तस्मै भवति इत्यभिप्राय:। एवं ब्रह्म-विद्यायास्तत्व संक्षिप्तशक: सम्पूर्ण मुपदिश्य श्रुतिरभ्यासेनादरातिशयेन वा समापत्ति च सूचयति य एव वेद एवं वेदेति। १२ ॥
मन्त्रार्थ १२ ॥ आत्मा का अमान्र चतुर्थ पाद जो अव्यवहार्य है, जहां प्रपञ्च का उपशम हो जाता है वही शिव नामक अद्वैत तत्व ओंकार है। जो इस प्रकार ओंकार तत्व को जानता है वह आत्म-स्वरूप होकर स्वयं आत्मा में प्रविष्ट हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है।
प्रकाश-भाष्य-भाषा
आत्मा के इस अमान्र पाद को अन्य तीन पादों की अपेक्षा करके ही चतुर्थ कहा गया है, वास्तव में चतुर्थ नहीं है क्योंकि जो
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कार्य कारण भाव से विलक्षण है वह संख्या से भी रहित है अर्थात् संख्या से विभाजित नहीं किया जा सकता। किसी भी हेतु से यह अমাত্র पाद व्यवहार के योग्य नहीं है अतएव इसको अव्यवहार्य कहा गया है।
यहां प्रपञ्च अर्थात् जगत् के क्रियात्मक व्यवहार का उपशम हो जाता है अतः इसको प्रपञ्चोपशम निरुपित किया गया है। उपशम का का अर्थ है लय, तिरोभाव अथवा निवृत्ति। (आगम शास्त्र में) सामरस्य नाम से प्रसिद्ध शिवात्मक अद्वैत ब्रह्म-तत्व ही ओंकार है। वाच्य अर्थ एवं वाचक शब्द में शास्त्र अभेद का प्रतिपादन करता है अतएव ओंकार नाम से प्रतिपादित आत्मा ही ब्रह्म का स्वरूप है। जो ओंकार तत्व को जानता है वही ज्ञानी है। वह आत्म स्वरूप से आत्मा में प्रविष्ट हो जाता है। वह ब्रह्म रूप हो जाता है अर्थात् जीव एवं ब्रह्म के ऐक्य का अनुभव करता है। उसी का साधन एवं प्रयोजन पूर्ण होता है।
इस प्रकार ब्रह्म-विद्या तत्व का संक्षिप्त अक्षरों से सम्पूर्ण उपदेश करके श्रुति के अभ्यास के हेतु अत्यन्त आदर सूचक शब्दों में ‘य एवं वेद, य वेद’ उपनिषत् के अन्त में कहा गया है तथा यह पुनरुक्ति समाप्ति की सूचक भी है।
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माण्डूक्योपनिषद् टिप्पणी :- यहां शास्त्रकार ने अমাত্র अव्यवहार्य तत्व का अत्यन्त श्रेयस्कर होने से शिव शब्द से निर्देश किया है। वस्तुतः यह निरामक है निरूप है। नाम एवं रूप दोनों ही प्रपञ्चात्मक हैं। अभेदार्थकथनिकाओं में सिद्धनाथ ने लिखा है :-
वस्तुनो भावशून्यस्य त्वग्राह्यस्य निराकृतेः । कल्पना मात्रमेवतत् यच्चिद्व व्यवदेशनम् ॥
भावशून्य निराकृति एवं अग्राह्यवस्तु का शिव नाम से व्यपदेश करना कल्पना मात्र है।
इति अथर्ववेदान्तर्गत माण्डूक्योपनिषदः, प्रकाश भाष्य सम्पूर्णम् ।
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अत्रैते श्लोकाश्च संगच्छन्ते
माण्डूक्योपनिषद् के प्रकाश भाष्य के सार के रूप में भाष्यकार ने निम्न श्लोकों की रचना की है।
विश्वं पादं सुचित्स्य विमलभिते: स्थूलकायेऽनिमग्नं, ओंकारस्यादिमात्रामनुगतमखिलामाद्यरूपं विभक्तम्। ध्यात्रवा प्राथम्यमाप्तिं निखिलमिह सुखं प्राप्यमोदं गतास्ते, भावैस्तत्वज्ञश्रेष्ठै: सकल शुभगुणैराद्भावं लभन्ते॥१॥
ओंकार की प्रथम मात्रा आकार में अनुगत आत्मा का विश्व नामक प्रथम पाद स्थूल कार्य में निमग्न है तथा यह आकार निखिल विश्व का रूप है। प्रथम मात्रा आकार का ध्यान करने से साधक समस्त सुखों से युक्त प्रसन्नता को प्राप्त होता है तथा सब तत्वज्ञों में श्रेष्ठ व सकल शुभ गुणों से युक्त होकर साधकों में अग्रिणी हो जाता है॥१॥
सूक्ष्मं स्वप्नेश्वरूपं द्वितयमनुगतं पादश्रेष्ठं मनीषिन्, जाग्रद्भावातमकृष्टं मननरतियुतास्तेजसं यान्ति रूपम्। तेशां वंशे कदाचिन्नहि भवति जनो ब्रह्मतत्वादिरक्त:, साम्यं सर्वत्र लब्धवा परमपदगता भान्ति वन्द्या: सुरेन्द्रै:॥२॥
ओंकार की द्वितीया मात्रा उकार के अनुगत आत्मा का द्वितीय तैजस नाम पद है। यह स्वप्नरूप सूक्ष्म पाद है तथा
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जागृत् भाव से प्रकृष्ट है। इसको मनन करने से साधक तैजस रूप को प्राप्त होता है। इसके वंश में कोई ब्रह्म-ज्ञान से विरक्त नहीं होता है तथा सर्वत्र साम्य भाव को प्राप्त कर परमपद को प्राप्त होता है॥१२॥
सौषुप्तं स्थानमुक्तं मितिरिति च त्रयं प्राज्ञसंज्ञोत्र देवः, स्वानन्दं सर्व संस्थो विलयमुपगतो भुज्जयन् कारणात्मा। मात्रां तार्तीयरूपां वितत सुविमलां मान्तरुपां प्रसिद्धां, एतां संचिन्त्य नित्यं मुनिवरमुकुटो नैव गच्छेद् भवाब्धिम्॥१३॥
आत्मा के तृतीय पाद प्राज्ञ का सुषुप्ति स्थान है। यह आनन्द रूप सर्वव्यापी कारण आत्मा है। यह ओंकार की तृतीया मात्रा मकार रूप है। इस मात्रा के चिन्तन से योगी संसार सागर से पार हो जाता है॥१३॥
शैवं तत्वं चतुर्थं निखिल भुवनगं स्वात्मना भेद शून्यं, द्वैताद् दृष्टादिरुपाद् व्यवहति रहितान्मात्र्याडचिन्त्यरुपम्। शान्तं प्राज्ञादि भावैर वहित मनसा लक्ष्य रुपेण बोद्धुम्, शाक्यं शम्भोः पदाख्यं स्तुतममरगणैः प्राप्त्य तं नौमि नित्यम्॥१४॥
शैव तत्व चतुर्थ है जो समस्त भुवनों में व्याप्त तथा स्वगत भेद से शून्य है। यह अद्वैत है, दृष्ट आदि रूपों से रहित है, वाणी से परे है तथा चिन्तन से परे रूप वाला है। यह शम्भु का पद है जो प्राज्ञ आदि भावों से रहित मन के द्वारा लक्ष्य रूप से ही जाना जा सकता है। देवताओं द्वारा स्तुत्य उस चतुर्थ पद को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ॥१४॥
टिप्पणी - नमस्कार :- विषयेभ्यः परावर्तनन वृत्तीनां ब्रह्मैक प्रवणता नमस्कार: - विषयों से परावृत्त होकर वृत्तियों का ब्रह्म में एकाकार हो जाने का नाम नमस्कार है।
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माण्डूक्योपनिषद्
भेद से रहित है। शैव तत्व द्वैतात्मक दृश्य रूपों से एवं व्यावहारिक दृष्टि से रहित होने के कारण अचिन्त्य है। शान्त, प्राज्ञ आदि भावों से रहित केवल मन के द्वारा लक्ष्य रूप में जाना जा सकता है। देवताओं द्वारा स्तुत शम्भु के इस पद को इस 'नमस्कार' करते हैं॥ ४॥
आद्यं तत्वं शिवाख्यं श्रुतिमुनिवचसां नैव दृष्टं पराख्यं, शक्तिस्तस्यात्म-भूता चितिरिति विमला स्वस्वरूपा-प्रतिष्ठा। तत्वं तद् योग सिद्धं सदिति शुभमतिश्चेश्वरं मन्यते हि, विद्यां शुद्धां प्रसिद्धामनुभवविततं पञ्चकं शुद्धतत्वम्॥ ५॥
परमशिव नामक आद्य तत्व श्रुति एवं मुनियों की वाणी से भी अगम्य है, चिति नामक विमल शक्ति परशिव की आत्मभूत है तथा आत्मा के स्वरूप की प्रतिष्ठा है। जिस तत्व को सिद्ध जन ईश्वर मानते है वह सत् तत्व योग द्वारा सिद्ध है। पञ्चम तत्व शुद्ध विद्या है जो अनुभव द्वारा गम्य है॥ ५॥
अनुवाद
माया, कला, विद्या, राग, नियति, काल, जीव, यह सात शुद्ध तत्व हैं। तथा सांख्य शास्त्र में निरूपित शेष बीस जड़ तत्व तुरीय सहित माण्डूक्य–उपनिषद् में प्रतिपादित हैं ऐसा विद्वानों का मत है।