1. Mudgala Upanishad
Mudgala Upanishad
[ Sutra 1.1 ]
सहस्रशीर्षेत्यत्र सशब्दोऽनन्तवाचकः । अनन्तयोजनं प्राह दशाङ्गुलवचस्तथा ॥1.1॥
sahasraśīrṣetyatra saśabdo'nantavācakaḥ0 । anantayojanaṃ prāha daśāṅgulavacastathā ॥1.1॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘पुरुष सूक्त’ में प्रयुक्त ‘सहस्र’ शब्द अनन्त का बोध कराता है । इसी प्रकार यह ‘दशाङ्गुलम्’ पद भी अनन्त योजनों (दूरी) की सूचना प्रदान करता है ॥ [यहाँ प्रयुक्त ‘सशब्दों’ के स्थान पर ‘सहस्र’ पाठ भी उपलब्ध होता है, जो अधिक समीचीन है।] ॥1.1॥
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[ Sutra 1.2 ]
तस्य प्रथमया विष्णोर्देशतो व्याप्तिरीरिता । द्वितीयया चास्य विष्णो: कालतो व्याप्तिरुच्यते ॥1.2॥
tasya prathamayā viṣṇordeśato vyāptirīritā । dvitīyayā cāsya viṣṇo: kālato vyāptirucyate ॥1.2॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘पुरुष सूक्त’ के इस प्रथम मन्त्र ‘सहरुलशीर्षा०’ में भगवान् विष्णु की सर्वव्यापी विभुता का विशद वर्णन किया गया है । पुरुष सूक्त का द्वितीय मन्त्र (पुरुषऽएवेदं०) इन्हीं लोकनायक विष्णु की शाश्वत व्याप्ति का संकेत करता है । वे सर्व-कालव्यापी हैं । हर समय विद्यमान रहते हैं ॥1.2॥
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[ Sutra 1.3 ]
विष्णोर्मोक्षप्रदत्वं च कथितं तु तृतीयया । एतावानिति मन्त्रेण वैभवं कथितं हरेः ॥1.3॥
viṣṇormokṣapradatvaṃ ca kathitaṃ tu tṛtīyayā । etāvāniti mantreṇa vaibhavaṃ kathitaṃ hareḥ ॥1.3॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘पुरुषसूक्त’ का तृतीय मन्त्र उन विराट् पुरुष भगवान् विष्णु को मोक्ष प्रदान करने वाला बतलाता है । ‘एतानस्य’ इस तृतीय मन्त्र में भगवान् श्री हरि के वैभव का -उनकी सामर्थ्य का विस्तार से वर्णन किया गया है ॥1.3॥
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[ Sutra 1.4 ]
एतेनैव च मन्त्रेण चतुर्व्यूहो विभाषितः । त्रिपादित्यनया प्रोक्तमनिरुद्धस्य वैभवम् ॥1.4॥
etenaiva ca mantreṇa caturvyūho vibhāṣitaḥ । tripādityanayā proktamaniruddhasya vaibhavam ॥1.4॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — तीन मन्त्रों के इस समूह में भगवान् के चतुर्व्यूह से सम्बन्धित स्वरूप का उल्लेख है । ‘त्रिपाद्’ इस चतुर्थ मंत्र में चतुर्व्यूह के अनिरुद्ध स्वरूप का विस्तृत वैभव वर्णित किया गया है ॥1.4॥
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[ Sutra 1.5 ]
तस्माद्विराडित्यनया पादनारायणाद्धरेः । प्रकृतेः पुरुषस्यापि समुत्पत्तिःप्रदर्शिता ॥1.5॥
tasmādvirāḍityanayā pādanārāyaṇāddhareḥ । prakṛteḥ puruṣasyāpi samutpattiḥpradarśitā ॥1.5॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘पुरुष सूक्त’ के इस पञ्चम मंत्र ‘तस्माद्विराड्०’ में पाद विभूति रूप भगवान् नारायण द्वारा श्री हरि की आश्रयभूता प्रकृति (माया) और पुरुष (जीव) का प्राकट्य दर्शाया गया है ॥1.5॥
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[ Sutra 1.6 ]
यत्पुरुषेणेत्यनया सृष्टियज्ञः समीरितः । सप्तास्यासन्परिधयःसमिधश्च समीरिताः ॥1.6॥
yatpuruṣeṇetyanayā sṛṣṭiyajñaḥ samīritaḥ । saptāsyāsanparidhayaḥsamidhaśca samīritāḥ ॥1.6॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इसी सूक्त के ‘यत्पुरुषेण०’ मन्त्र के द्वारा सृष्टि स्वरूप यज्ञ का प्रतिपादन किया गया है एवं ‘सप्तास्यासन् परिधय:०’ द्वारा उस सृष्टि रूप यज्ञ कार्य में प्रयुक्त समिधा का विवेचन किया गया है ॥1.6॥
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[ Sutra 1.7 ]
तं यज्ञमिति मन्त्रेण सृष्टियज्ञःसमीरितः । अनेनैव च मन्त्रेण मोक्षश्च समुदीरितः ॥1.7॥
taṃ yajñamiti mantreṇa sṛṣṭiyajñaḥsamīritaḥ । anenaiva ca mantreṇa mokṣaśca samudīritaḥ ॥1.7॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — यही सृष्टियज्ञ इसी सूक्त के अगले मन्त्र ‘तं यज्ञम्०’ के द्वारा प्रतिपादित किया गया है । साथ ही मोक्ष का वर्णन भी इसी मन्त्र के द्वारा किया गया है ॥1.7॥
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[ Sutra 1.8 ]
तस्मादिति च मन्त्रेण जगत्सृष्टिः समीरिता । वेदाहमिति मन्त्राभ्यां वैभवं कथितं हरेः ॥1.8॥
tasmāditi ca mantreṇa jagatsṛṣṭiḥ samīritā । vedāhamiti mantrābhyāṃ vaibhavaṃ kathitaṃ hareḥ ॥1.8॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘पुरुष सूक्त’ के ‘तस्माद्०’ आदि सात मन्त्रों द्वारा इस सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का उल्लेख किया गया है । ‘वेदाहम्०’ इत्यादि दो मन्त्रों के द्वारा भगवान् श्री हरि के वैभव (कीर्ति) का विशेष वर्णन प्राप्त होता है ॥1.8॥
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[ Sutra 1.9 ]
यज्ञेनेत्युपसंहारःसृष्टेर्मोक्षस्य चेरितः । य एवमेतज्जानाति स हि मुक्तो भवेदिति ॥1.9॥
yajñenetyupasaṃhāraḥsṛṣṭermokṣasya ceritaḥ । ya evametajjānāti sa hi mukto bhavediti ॥1.9॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘यज्ञेन यज्ञमयजन्त०’ मन्त्र के द्वारा सृष्टि एवं मोक्ष का उपसंहारात्मक वर्णन किया गया है । इस भाँति जो भी ‘पुरुष सूक्त’ को ज्ञान के द्वारा आत्मसात् करता है, वह अवश्य ही मुक्ति को प्राप्त कर लेता है ॥1.9॥
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[ Sutra 2.1 ]
अथ तथा मुद्गलोपनिषदि पुरुषसूक्तस्य वैभवं विस्तरेण प्रतिपादितम् । वासुदेव इन्द्राय भगवज्ज्ञानमुपदिश्य पुनरपि सूक्ष्मश्रवणाय प्रणतायेन्द्राय परमरहस्यभूतं पुरुषसूक्ताभ्यां खण्डद्वयाभ्यामुपादिशत् ॥2.1॥
atha tathā mudgalopaniṣadi puruṣasūktasya vaibhavaṃ vistareṇa pratipāditam । vāsudeva indrāya bhagavajjñānamupadiśya punarapi sūkṣmaśravaṇāya praṇatāyendrāya paramarahasyabhūtaṃ puruṣasūktābhyāṃ khaṇḍadvayābhyāmupādiśat ॥2.1॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस प्रकार मुद्गलोपनिषद् (के प्रथम खण्ड के) द्वारा ‘पुरुषसूक्त’ के जिस विशिष्ट वैभव का प्रतिपादन हुआ है, उस विशेष भगवद्ज्ञान का उपदेश भगवान् श्री वासुदेव ने इन्द्र को प्रदान किया था । उस सूक्ष्म तत्त्वज्ञान को पुनः श्रवण करने के लिए इन्द्रदेव नतमस्तक होकर भगवान् वासुदेव की शरण में उपस्थित हुए । भगवान् ने उस परम कल्याणकारी रहस्य का ज्ञान पुरुषसूक्त के दो खण्डों में इन्द्रदेव को प्रदान किया ॥2.1॥
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[ Sutra 2.2 ]
द्वौ खण्डावुच्यते । योऽयमुक्तः स पुरुषो नामरूपज्ञानागोचरं संसारिणामतिदुर्ज्ञेयं विषयं विहाय क्लेशादिभिःसंक्लिष्टदेवादिजिहीर्षया सहस्रकलावयवकल्याणं दृष्टमात्रेण मोक्षदं वेषमाददे । तेन वेषेण भूम्यादिलोकं व्याप्यानन्तयोजनमत्यतिष्ठत् ॥2.2॥
dvau khaṇḍāvucyate । yo'yamuktaḥ sa puruṣo nāmarūpajñānāgocaraṃ saṃsāriṇāmatidurjñeyaṃ viṣayaṃ vihāya kleśādibhiḥsaṃkliṣṭadevādijihīrṣayā sahasrakalāvayavakalyāṇaṃ dṛṣṭamātreṇa mokṣadaṃ veṣamādade । tena veṣeṇa bhūmyādilokaṃ vyāpyānantayojanamatyatiṣṭhat ॥2.2॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘पुरुष सूक्त’ के दो खण्ड निर्धारित किये गये हैं । इस सूक्त में जिस विराट् पुरुष का उल्लेख किया गया है, वह नाम-रूप एवं ज्ञान से परे होने के कारण विश्व के समस्त जीवों (प्राणियों) के लिए अगम्य है । अतः अपने इस अगम्य रूप को त्याग कर क्लेशादि में पड़े हुए देवादि विशिष्ट प्राणियों के उद्धार एवं समस्त जीवों के कल्याण की इच्छा से उन्होंने अनन्त कलाओं वाले रूप को धारण किया । यह रूप दर्शन मात्र से ही मोक्ष प्रदान करने वाला है । उसी रूप (वेष) से पृथिवी आदि लोकों में व्याप्त होकर उन्होंने अपना विस्तार अनन्त योजनों तक कर लिया ॥2.2॥
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[ Sutra 2.3 ]
पुरुषो नारायणो भूतं भव्यं भविष्यच्चासीत् । स एष सर्वेषां मोक्षदशचासीत् । स च । सर्वस्मान्महिम्नो ज्यायान् । तस्मान्न कोऽपि न्यायान् ॥2.3॥
puruṣo nārāyaṇo bhūtaṃ bhavyaṃ bhaviṣyaccāsīt । sa eṣa sarveṣāṃ mokṣadaśacāsīt । sa ca । sarvasmānmahimno jyāyān । tasmānna ko'pi nyāyān ॥2.3॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — सृष्टि रचना के पहले पूर्ण पुरुष भगवान् श्रीनारायण ही भूत, वर्तमान और भविष्यत् तीन कालों के रूप में विद्यमान थे। वे (नारायण) ही इन समस्त प्राणियों को मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। वे ही महान् शक्तिशाली जनों में विशिष्ट हैं। उन (विराट् पुरुष) से अधिक विशिष्ट अन्य कोई भी नहीं है। वही सर्व शक्तिमान् हैं ॥2.3॥
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[ Sutra 2.4 ]
महापुरुष आत्मानं चतुर्धा कृत्वा त्रिपादेन परमे व्योम्नि चासीत् । इतरेण चतुर्थेनानिरुद्धनारायणेन विश्वान्यासन् ॥2.4॥
mahāpuruṣa ātmānaṃ caturdhā kṛtvā tripādena parame vyomni cāsīt । itareṇa caturthenāniruddhanārāyaṇena viśvānyāsan ॥2.4॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — उन परम पुरुष (परमात्मा) ने स्वयं को चार भागों में विभक्त करके चतुर्व्यूहों के रूप में उत्पन्न किया । उनमें से तीन अंशों (वासुदेव, प्रद्युम्न और सङ्कर्षण रूप) का निवास परमधाम वैकुण्ठ में है । चतुर्थ अंश व्यूह स्वरूप अनिरुद्ध नाम से प्रसिद्ध भगवान् श्रीनारायण के द्वारा ही सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि हुई ॥ [उस विराट् पुरुष के तीन चरण उच्च लोकों में ही निरुद्ध (नियंत्रित-रोके हुए) रहते हैं । एक चरण अनिरुद्ध (जिसे व्यक्त होने से रोका नहीं गया) होता है । उसी व्यक्त चरण से यह सृष्टि उपजी है । शेष तीन नाम मन्त्र में व्यक्त नहीं हैं, फिर भी अनिरुद्ध के आधार पर भगवान् के इन नामों को विद्वानों ने मान्य किया है । ये चरण वासुदेव सबको वास देने वाले, प्रद्युम्न- विशेष रूप से प्रकाशमान तथा संकर्षण-आकर्षण करने वाले हैं, फिर भी अव्यक्त हैं।] ॥2.4॥
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[ Sutra 2.5 ]
स च पादनारायणो जगत्स्रष्टुं प्रकृतिमजनयत्। स समृद्धकायः सन्सृष्टिकर्म न जज्ञिवान् । सोऽनिरुद्धनारायणस्तस्मै सृष्टिमुपादिशत् । ब्रह्मंस्तवेन्द्रियाणि याजकानि ध्यात्वा कोशभूतं दृढं ग्रन्थिकलेवरं हविर्ध्यात्वा मां हविर्भुजं ध्यात्वा वसन्तकालमाज्यं ध्यात्वा ग्रीष्ममिध्मं ध्यात्वा शरदृतुं रसं ध्यात्वैवमग्नौ हुत्वाङ्गस्पर्शात्कलेवरो वज्रं हीष्यते । ततः स्वकार्यान्सर्वप्राणिजीवान्सृष्ट्वा पश्चाद्याःप्रादुर्भविष्यन्ति । ततः स्थावरजङ्गमात्मकं जगद्भविष्यति ॥2.5॥
sa ca pādanārāyaṇo jagatsraṣṭuṃ prakṛtimajanayat । sa samṛddhakāyaḥ sansṛṣṭikarma na jajñivān।so'niruddhanārāyaṇastasmai sṛṣṭimupādiśat । brahmaṃstavendriyāṇi yājakāni dhyātvā kośabhūtaṃ dṛḍhaṃ granthikalevaraṃ havirdhyātvā māṃ havirbhujaṃ dhyātvā vasantakālamājyaṃ dhyātvā grīṣmamidhmaṃ dhyātvā śaradṛtuṃ rasaṃ dhyātvaivamagnau hutvāṅgasparśātkalevaro vajraṃ hīṣyate । tataḥ svakāryānsarvaprāṇijīvānsṛṣṭvā paścādyāḥprādurbhaviṣyanti । tataḥ sthāvarajaṅgamātmakaṃ jagadbhaviṣyati ॥2.5॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — उन चतुर्थपादात्मक नारायण ने विश्व की रचना के निमित्त प्रकृति को प्रादुर्भूत किया । (प्रकृतिरूप) ब्रह्मा जी शरीर प्राप्त करने के उपरान्त भी सृष्टि रचना के रहस्य को नहीं समझ सके । तदनन्तर उन अनिरुद्ध स्वरूप नारायण ने ब्रह्माजी को सृष्टि संरचना का उपदेश दिया । उन्होंने कहा- हे ब्रह्मन्! आप अपनी वागादि सभी इन्द्रियों को यज्ञकर्त्ताओं के रूप में माने । कमलकोश से प्रकट, सुदृढ़ शक्ति सम्पन्न अपने शरीर को हवि रूप में जानें । वसन्त ऋतु को घृत, ग्रीष्म ऋतु को समिधा तथा शरद् ऋतु को रसरूप में अनुभव करें । इस तरह से अग्नि में यज्ञ करने के उपरान्त आपका शरीर अत्यन्त शक्ति-सम्पन्न हो जाएगा। और इस शरीर के स्पर्श से वज्र भी कुण्ठित हो जायेगा । तत्पश्चात् इस यज्ञकर्म के प्रतिफल स्वरूप समस्त प्राणि -समुदाय प्रकट होंगे । इस प्रकार सभी स्थावर-जङ्गम से परिपूर्ण यह समस्त विश्व दृष्टिगोचर होने लगेगा ॥2.5॥
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[ Sutra 2.6 ]
एतेन जीवात्मनोर्योगेन मोक्षप्रकारश्च कथित इत्यनुसंधेयम् ॥2.6॥
etena jīvātmanoryogena mokṣaprakāraśca kathita ityanusaṃdheyam ॥2.6॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस प्रकार जीव और आत्मा के मिलन द्वारा मोक्ष की प्राप्ति का वर्णन किया गया है ॥2.6॥
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[ Sutra 2.7 ]
य इमं सृष्टियज्ञं जानाति मोक्षप्रकारं च सर्वमायुरेति ॥2.7॥
ya imaṃ sṛṣṭiyajñaṃ jānāti mokṣaprakāraṃ ca sarvamāyureti ॥2.7॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो भी साधक इस सृष्टि-यज्ञ और मोक्ष की विधि को समझता है, वह व्यक्ति पूर्ण आयुष्य प्राप्त करने में समर्थ होता है ॥2.7॥
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[ Sutra 3.1 ]
एको देवो बहुधा निविष्ट अजायमानो बहुधा विजायते ॥3.1॥
eko devo bahudhā niviṣṭa ajāyamāno bahudhā vijāyate ॥3.1॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — (इस सृष्टि में) अनेक रूपों में समाविष्ट हुआ वह एक ही देव है, जो स्वयं अजन्मी रहते हुए भी विभिन्न प्रकार से उत्पन्न होता रहता है ॥3.1॥
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[ Sutra 3.2 ]
तमेतमग्निरित्यध्वर्यव उपासते । यजुरित्येष हीदं सर्वं युनक्ति । सामेति छन्दोगाः । एतस्मिन्हीदं सर्वे प्रतिष्ठितम् । विषमिति सर्पाः । सर्प इति सर्पविदः । ऊर्गिति देवाः । रयिरिति मनुष्याः । मायेत्यसुराः । स्वधेति पितरः । देवजन इति देवजनविदः । रूपमिति गन्धर्वाः । गन्धर्व इत्यप्सरसः ॥3.2॥
tametamagnirityadhvaryava upāsate । yajurityeṣa hīdaṃ sarvaṃ yunakti । sāmeti chandogāḥ । etasminhīdaṃ sarve pratiṣṭhitam । viṣamiti sarpāḥ । sarpa iti sarpavidaḥ । ūrgiti devāḥ । rayiriti manuṣyāḥ । māyetyasurāḥ । svadheti pitaraḥ । devajana iti devajanavidaḥ । rūpamiti gandharvāḥ । gandharva ityapsarasaḥ ॥3.2॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — उसी (विराट् पुरुष) की उपासना समस्त अध्यर्युओं ने अग्निदेव के रूप में की है । यजुर्वेदीय याज्ञिक उस (देव) को ‘यह यजु: है’ ऐसा मानते हुए सर्व यज्ञीय कर्मों में नियोजित करते हैं । सामगान वाले उस (देव) को साम के रूप में जानते हैं । इसी (विराट पुरुष) रूप में निश्चित ही वह सर्वत्र विद्यमान है । सर्प (गतिशील प्राण) उसे (विराट् पुरुष को ) विष रूप में स्वीकार करते हैं तथा सर्पवेत्ता (योगी) सर्प-प्राण रूप से उसे प्राप्त करते हैं । देवगण उसे अमृत रूप में ग्रहण करते हैं तथा सामान्य जन इसे (जीवन) धन समझकर जीवनयापन करते हैं । असुर (इन्हें) माया के रूप में जानते हैं, पितर स्वधा (अर्थात पितृ भोजन के रूप में) मानते हैं, देवोपासक इसे देव रूप में स्वीकार करते हैं । गन्धर्वगण रूप-सौन्दर्य के रूप में जानते हैं तथा अप्सराएँ गन्धर्व के रूप में उस (विराट् देवपुरुष) को जानती हैं ॥3.2॥
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[ Sutra 3.3 ]
तं यथायथोपासते तथैव भवति । तस्माद् ब्राह्मणः पुरुषरूपं परब्रह्मैवाहमिति भावयेत् । तद्रूपो भवति । य एवं वेद ॥3.3॥
taṃ yathāyathopāsate tathaiva bhavati । tasmād brāhmaṇaḥ puruṣarūpaṃ parabrahmaivāhamiti bhāvayet । tadrūpo bhavat । ya evaṃ veda ॥3.3॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — उस (श्रेष्ठ परमात्मतत्त्व) की (जो साधक) जिस-जिस भाव से उपासना करता है, वह परमात्मतत्त्व उसके लिए उसी ही भाव (रूप) का हो जाता है । अत: ब्रह्मज्ञानी जनों को ‘पूर्ण पुरुष रूप’ परम ब्रह्म ‘मैं स्वयं ही हूँ’ इस प्रकार का भाव अपने अन्त:करण में रखना चाहिए । इस प्रकार के भाव से वह (साधक) उसी देव स्वरूप को प्राप्त कर लेता है । जो भी मनुष्य (साधक) इस रहस्य को इस भाँति समझता है, वह स्वयमेव उसी के अनुरूप हो जाता है ॥3.3॥
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[ Sutra 4.1 ]
तद्ब्रह्म तापत्रयातीतं षट्कोशविनिर्मुक्तं षडूर्मिवर्जितं पञ्चकोशातीतं षड्भाव - विकारशून्यमेवमादिसर्वविलक्षणं भवति ॥4.1॥
tadbrahma tāpatrayātītaṃ ṣaṭkośavinirmuktaṃ ṣaḍūrmivarjitaṃ pañcakośātītaṃ ṣaḍbhāva - vikāraśūnyamevamādisarvavilakṣaṇaṃ bhavati ॥4.1॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — वह ब्रह्म (पूर्ण पुरुष) त्रिताप शून्य, छ: कोषों से परे , षड् ऊर्मियों से रहित, पंच कोषों से रहित और षड्भाव विकारों से अतीत है । इस प्रकार (वह ब्रह्म) सभी से विलक्षण है ॥4.1॥
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[ Sutra 4.2 ]
तापत्रयं त्वाध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकं कर्तृकर्मकार्यज्ञातृज्ञानज्ञेयभोक्तृ-भोगभोग्यमिति त्रिविधम् ॥4.2॥
tāpatrayaṃ tvādhyātmikādhibhautikādhidaivikaṃ kartṛkarmakāryajñātṛjñānajñeyabhoktṛ-bhogabhogyamiti trividham ॥4.2॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — ये ‘त्रिताप’ आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं आधिदैविक हैं, जो कर्ता, कर्म, कार्य; ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय तथा भोक्ता, भोग, भोग्य इस प्रकार ये तीनों एक-एक होते हुए भी त्रिविध अर्थात् तीन-तीन प्रकार के हैं ॥4.2॥
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[ Sutra 4.3 ]
त्वङ्मांसशोणितास्थिस्नायुमज्जाःषट्कोशाः ॥4.3॥
tvaṅmāṃsaśoṇitāsthisnāyumajjāḥṣaṭkośāḥ ॥4.3॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — छः कोश (धातु) क्रमश: चर्म, मांस, अस्थि, स्नायु (नसे), रक्त एवं मज्जा कहे गये हैं ॥4.3॥
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[ Sutra 4.4 ]
कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यमित्यरिषड्वर्गः ॥4.4॥
kāmakrodhalobhamohamadamātsaryamityariṣaḍvargaḥ ॥4.4॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य- ये छ: षड्रिपु कहे गये हैं ॥4.4॥
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[ Sutra 4.5 ]
अन्नमयप्राणमयमनोमयविज्ञानमयानन्दमया इति पञ्चकोशाः ॥4.5॥
annamayaprāṇamayamanomayavijñānamayānandamayā iti pañcakośāḥ ॥4.5॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय ये शरीर के पाँच कोश हैं ॥4.5॥
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[ Sutra 4.6 ]
प्रियात्मजननवर्धनपरिणामक्षयनाशा; षड्भावाः ॥4.6॥
priyātmajananavardhanapariṇāmakṣayanāśā; ṣaḍbhāvāḥ ॥4.6॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — छ:भावविकार क्रमशः प्रिय होना, प्रादुर्भूत होना, वर्द्धित होना, परिवर्तित होना, क्षय अर्थात् न्यूनातिन्यून होते जाना तथा विनाश होना बताये गये हैं ॥4.6॥
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[ Sutra 4.7 ]
अशनायापिपासाशोकमोहजरामरणानीति षडूर्मयः ॥4.7॥
aśanāyāpipāsāśokamohajarāmaraṇānīti ṣaḍūrmayaḥ ॥4.7॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — छ: ऊर्मियाँ क्रमशः क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह, वृद्धावस्था और मृत्यु कही गयी हैं ॥4.7॥
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[ Sutra 4.8 ]
कुलगोत्रजातिवर्णाश्रमरूपाणि षड्भ्रमाः ॥4.8॥
kulagotrajātivarṇāśramarūpāṇi ṣaḍbhramāḥ ॥4.8॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — कुल (वंश), गोत्र, जाति, वर्ण, आश्रम एवं रूप (सौन्दर्य) ये षड्भ्रम कहे गये हैं ॥4.8॥
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[ Sutra 4.9 ]
एतद्योगेन परमपुरुषो जीवो भवति नान्यः ॥4.9॥
etadyogena paramapuruṣo jīvo bhavati nānyaḥ ॥4.9॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इन सभी के योग से (वह) परम पुरुष ही जीव (प्राणिरूप में परिणत) होता है, अन्य और कोई दूसरा समर्थ नहीं हो सकता ॥4.9॥
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[ Sutra 4.10 ]
य एतदुपनिषदं नित्यमधीते सोऽग्निपूतो भवति । स वायुपूतो भवति । स आदित्यपूतो भवति । अरोगी भवति । श्रीमांश्च भवति । पुत्रपौत्रादिभिः समृद्धो भवति । विद्वांश्च भवति । महापातकात्पूतो भवति । सुरापानात्पूतो भवति । अगम्यागमनात्पूतो भवति । मातृगमनात्पूतो भवति । दुहितृस्नुषाभिगमनात्पूतो भवति । स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति । वेदिजन्महानात्पूतो भवति । गुरोरशुश्रूषणात्पूतो भवति । अयाज्ययाजनात् पूतो भवति । अभक्ष्यभक्षणात् पूतो भवति । उग्रप्रतिग्रहात्पूतो भवति । परदारगमनात्पूतो भवति । कामक्रोधलोभमोहेष्यदिभिरबाधितो भवति । सर्वेभ्यःपापेभ्यो मुक्तो भवति । इह जन्मनि पुरुषो भवति ॥4.10॥
ya etadupaniṣadaṃ nityamadhīte so'gnipūto bhavati । sa vāyupūto bhavati । sa ādityapūto bhavati।arogī bhavati । śrīmāṃśca bhavati । putrapautrādibhiḥ samṛddho bhavati । vidvāṃśca bhavati । mahāpātakātpūto bhavati । surāpānātpūto bhavati । agamyāgamanātpūto bhavati । mātṛgamanātpūto bhavati । duhitṛsnuṣābhigamanātpūto bhavati । svarṇasteyātpūto bhavati । vedijanmahānātpūto bhavati । guroraśuśrūṣaṇātpūto bhavati । ayājyayājanāt pūto bhavati । abhakṣyabhakṣaṇāt pūto bhavati । ugrapratigrahātpūto bhavati । paradāragamanātpūto bhavati । kāmakrodhalobhamoheṣyadibhirabādhito bhavati । sarvebhyaḥpāpebhyo mukto bhavati । iha janmani puruṣo bhavati ॥4.10॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो (भी व्यक्ति) इस उपनिषद् का प्रतिदिन अध्ययन करता है, वह अग्नि की भाँति पवित्र होता है। वह वायु की तरह शुद्ध होता है। वह आदित्य के समान प्रखर (गतिशील) होता है। यह सभी रोगों से रहित हो जाता है । वह श्री सम्पन्न एवं पुत्र-पौत्रादि से समृद्ध हो जाता है । वह विद्वान् हो जाता है । माहान् पातक (पाप) से पवित्र हो जाता है । अनाचरण जन्य दोष से मुक्त हो जाता है । वह माता के प्रति कदाचरण से मुक्त हो जाता है । (वह) पुत्री एवं बहिन के प्रति विकारों से मुक्त हो जाता है । सुवर्ण आदि धन की चोरी के पाप भावों से मुक्त हो जाता है । वेदाध्ययन करके उसे भूल जाने से उत्पन्न पाप से मुक्त हो जाता है । गुरु की सेवा शुश्रूषा में उत्पन्न (आलस्य-प्रमादादि) पाप भावों से रहित हो जाता है । यज्ञीय कार्यों में अयाज्य (अपवित्र पदार्थों) के यजन आदि पापों से रहित हो जाता है । अभक्ष्य आहार आदि पाप प्रवृत्तियों से मुक्त हो जाता है । उग्र प्रतिग्रह (निकृष्ट दान) से भी पवित्र हो जाता है । परस्त्री के प्रति पाप दृष्टि से मुक्त हो जाता है । वह काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, क्रोधादि पापों से नहीं बँधता । (वह व्यक्ति) सभी पापों से रहित हो जाता है और इसी जन्म में ही पूर्ण पुरुष अर्थात् परमात्मा के ज्ञान से युक्त होकर पुरुष (श्रेष्ठ पुरुष या पवित्र) हो जाता है ॥ [उपनिषद् के हम वाक्य का अर्थ विवेकपूर्वक किया जाना चाहिए । बहुधा लोग इसका यह अर्थ लगाते हैं कि पाप वृत्तियों के वशीभूत होका जो पापकर्म करता है, उसके दण्ड से मुक्त हो जाता है, लेकिन ऋषि कहते हैं कि वह ज्ञानी विभिन्न पाप वृत्तियों-अन्तरंग दोषों से मुक्त हो जाता है, न कि पाप कर्मों के दण्ड से । ज्ञानी अपनी ज्ञान दृष्टि से वास्तविकता को पहचान लेता है, इसलिए पाप वृत्तियों के प्रलोधन में फँसता ही नहीं है।] ॥4.10॥
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[ Sutra 4.11 ]
तस्मादेतत्पुरुषसूक्तार्थमतिरहस्यं राजगुह्यं देवगुह्यं गुह्यादपि गुह्यतरं नादीक्षिता-योपदिशेत् । नानूचानाय । नायज्ञशीलाय । नावैष्णवाय। नायोगिने । न बहुभाषिणे । नाप्रियवादिने । नासंवत्सरवेदिने । नातुष्टाय । नानधीतवेदायोपदिशेत् ॥4.11॥
tasmādetatpuruṣasūktārthamatirahasyaṃ rājaguhyaṃ devaguhyaṃ guhyādapi guhyataraṃ nādīkṣitā-yopadiśet । nānūcānāya । nāyajñaśīlāya । nāvaiṣṇavāya । nāyogine । na bahubhāṣiṇe । nāpriyavādine । nāsaṃvatsaravedine । nātuṣṭāya । nānadhītavedāyopadiśet ॥4.11॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस प्रकार इस ‘पुरुषसूक्त’ का अर्थ अति रहस्यमय है । यह सूक्त राजगुह्य, देवगुह्य तथा गूढ़ से भी अतिगूढ़ (रिछपा हुआ) है । जो (गुरु द्वारा) दीक्षित न किया गया हो, उसे इस (सूक्त) का उपदेश न करे । जो प्रबुद्ध होने पर भी जिज्ञासा के भाव से प्रश्न न पूछता हो, जो अयज्ञोय हो, अवैष्णव, अयोगी, बहुभाषी एवं अप्रियभाषी हो, जो प्रति संवत्सर (वर्ष) में एक बार वेदों का स्वाध्याय न कर ले, जो तुष्ट न हो अर्थात् असंतोषी हो तथा जिस व्यक्ति ने वेदों का अध्ययन (पठन-पाठन) न किया हो, उसको इस (पुरुष सूक्त) का उपदेश नहीं करना चाहिए ॥4.11॥
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[ Sutra 4.12 ]
गुरुरप्येवंविच्छुचौ देशे पुण्यनक्षत्रे प्राणानायम्य पुरुषं ध्यायन्नुपसन्नाय शिष्याय दक्षिणकर्णे पुरुषसूक्तार्थमुपदिशेद्विद्वान् । न बहुशो वदेत् । यातयामो भवति । असकृत्कर्णमुपदिशेत् । एतत्कुर्वाणोऽध्येताध्यापकञ्च इह जन्मनि पुरुषों भवतीत्युपनिषत् ॥4.12॥
gururapyevaṃvicchucau deśe puṇyanakṣatre prāṇānāyamya puruṣaṃ dhyāyannupasannāya śiṣyāya dakṣiṇakarṇe puruṣasūktārthamupadiśedvidvān । na bahuśo vadet । yātayāmo bhavati । asakṛtkarṇamupadiśet । etatkurvāṇo'dhyetādhyāpakañca iha janmani puruṣoṃ bhavatītyupaniṣat ॥4.12॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस पुरुष सूक्त के अर्थ के इस प्रकार भली-भाँति से जानने वाला वेदविद् गुरु भी शुद्ध पवित्र देश में पुण्य (शुभ) नक्षत्र में, प्राणायाम करके, परम पुरुष का चिन्तन करता हुआ अति विनम्रता से समीप में आये हुए शिष्य को ही उसके दाहिने श्रोत्र में उपदेश दे । अधिक वार्ता न करे, नहीं तो वह श्रेष्ठ ज्ञान (उपदेश) यातयामत्व (निःसारता) रूप दोष से दूषित हो जाता है । इस प्रकार इस सूक्त के अर्थ का बहुशः उपदेश करे । ऐसे शिष्य (अध्येता) और गुरु (ज्ञानदाता) दोनों इसी जन्म में पूर्ण पुरुष (ब्रह्ममय) हो जाते हैं ॥4.12॥