Books / Mudgala Upanishad

4. चतुर्थःखण्डः

चतुर्थःखण्डः

Verse १

तद्ब्रह्म तापत्रयातीतं षट्कोशविनिर्मुक्तं षडूर्मिवर्जितं पञ्चकोशातीतं षड्भाव - विकारशून्यमेवमादिसर्वविलक्षणं भवति॥

tadbrahma tāpatrayātītaṃ ṣaṭkośavinirmuktaṃ ṣaḍūrmivarjitaṃ pañcakośātītaṃ ṣaḍbhāva - vikāraśūnyamevamādisarvavilakṣaṇaṃ bhavati॥

वह ब्रह्म (पूर्ण पुरुष) त्रिताप शून्य, छ: कोषों से परे , षड् ऊर्मियों से रहित, पंच कोषों से रहित और षड्भाव विकारों से अतीत है। इस प्रकार (वह ब्रह्म) सभी से विलक्षण है॥


Verse २

तापत्रयं त्वाध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकं कर्तृकर्मकार्यज्ञातृज्ञानज्ञेयभोक्तृ-भोगभोग्यमिति त्रिविधम्॥

tāpatrayaṃ tvādhyātmikādhibhautikādhidaivikaṃ kartṛkarmakāryajñātṛjñānajñeyabhoktṛ-bhogabhogyamiti trividham॥

ये ‘त्रिताप’ आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं आधिदैविक हैं, जो कर्ता, कर्म, कार्य; ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय तथा भोक्ता, भोग, भोग्य इस प्रकार ये तीनों एक-एक होते हुए भी त्रिविध अर्थात् तीन-तीन प्रकार के हैं॥


Verse ३

त्वङ्मांसशोणितास्थिस्नायुमज्जाःषट्कोशाः॥

tvaṅmāṃsaśoṇitāsthisnāyumajjāḥṣaṭkośāḥ॥

छः कोश (धातु) क्रमश: चर्म, मांस, अस्थि, स्नायु (नसे), रक्त एवं मज्जा कहे गये हैं।।


Verse ४

कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यमित्यरिषड्वर्गः॥

kāmakrodhalobhamohamadamātsaryamityariṣaḍvargaḥ॥

काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य- ये छ: षड्रिपु कहे गये हैं॥


Verse ५

अन्नमयप्राणमयमनोमयविज्ञानमयानन्दमया इति पञ्चकोशाः।।

annamayaprāṇamayamanomayavijñānamayānandamayā iti pañcakośāḥ।।

अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय ये शरीर के पाँच कोश हैं॥


Verse ६

प्रियात्मजननवर्धनपरिणामक्षयनाशा; षड्भावाः॥

priyātmajananavardhanapariṇāmakṣayanāśā; ṣaḍbhāvāḥ॥

छ:भावविकार क्रमशः प्रिय होना, प्रादुर्भूत होना, वर्द्धित होना, परिवर्तित होना, क्षय अर्थात् न्यूनातिन्यून होते जाना तथा विनाश होना बताये गये हैं॥


Verse ७

अशनायापिपासाशोकमोहजरामरणानीति षडूर्मयः॥

aśanāyāpipāsāśokamohajarāmaraṇānīti ṣaḍūrmayaḥ॥

छ: ऊर्मियाँ क्रमशः क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह, वृद्धावस्था और मृत्यु कही गयी हैं॥


Verse ८

कुलगोत्रजातिवर्णाश्रमरूपाणि षड्भ्रमाः॥

kulagotrajātivarṇāśramarūpāṇi ṣaḍbhramāḥ॥

कुल (वंश), गोत्र, जाति, वर्ण, आश्रम एवं रूप (सौन्दर्य) ये षड्भ्रम कहे गये हैं॥


Verse ९

एतद्योगेन परमपुरुषो जीवो भवति नान्यः॥

etadyogena paramapuruṣo jīvo bhavati nānyaḥ॥

इन सभी के योग से (वह) परम पुरुष ही जीव (प्राणिरूप में परिणत) होता है, अन्य और कोई दूसरा समर्थ नहीं हो सकता॥


Verse १०

य एतदुपनिषदं नित्यमधीते सोऽग्निपूतो भवति।स वायुपूतो भवति।स आदित्यपूतो भवति।अरोगी भवति।श्रीमांश्च भवति।पुत्रपौत्रादिभिः समृद्धो भवति। विद्वांश्च भवति। महापातकात्पूतो भवति।सुरापानात्पूतो भवति ।अगम्यागमनात्पूतो भवति।मातृगमनात्पूतो भवति। दुहितृस्नुषाभिगमनात्पूतो भवति। स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति।वेदिजन्महानात्पूतो भवति। गुरोरशुश्रूषणात्पूतो भवति। अयाज्ययाजनात् पूतो भवति। अभक्ष्यभक्षणात् पूतो भवति। उग्रप्रतिग्रहात्पूतो भवति।परदारगमनात्पूतो भवति। कामक्रोधलोभमोहेष्यदिभिरबाधितो भवति।सर्वेभ्यःपापेभ्यो मुक्तो भवति।इह जन्मनि पुरुषो भवति॥

ya etadupaniṣadaṃ nityamadhīte so'gnipūto bhavati।sa vāyupūto bhavati।sa ādityapūto bhavati।arogī bhavati।śrīmāṃśca bhavati।putrapautrādibhiḥ samṛddho bhavati। vidvāṃśca bhavati। mahāpātakātpūto bhavati।surāpānātpūto bhavati ।agamyāgamanātpūto bhavati।mātṛgamanātpūto bhavati। duhitṛsnuṣābhigamanātpūto bhavati। svarṇasteyātpūto bhavati।vedijanmahānātpūto bhavati। guroraśuśrūṣaṇātpūto bhavati। ayājyayājanāt pūto bhavati। abhakṣyabhakṣaṇāt pūto bhavati। ugrapratigrahātpūto bhavati।paradāragamanātpūto bhavati। kāmakrodhalobhamoheṣyadibhirabādhito bhavati।sarvebhyaḥpāpebhyo mukto bhavati।iha janmani puruṣo bhavati॥

जो (भी व्यक्ति) इस उपनिषद् का प्रतिदिन अध्ययन करता है, वह अग्नि की भाँति पवित्र होता है। वह वायु की तरह शुद्ध होता है। वह आदित्य के समान प्रखर (गतिशील) होता है। यह सभी रोगों से रहित हो जाता है। वह श्री सम्पन्न एवं पुत्र-पौत्रादि से समृद्ध हो जाता है।वह विद्वान् हो जाता है। माहान् पातक (पाप) से पवित्र हो जाता है। अनाचरण जन्य दोष से मुक्त हो जाता है। वह माता के प्रति कदाचरण से मुक्त हो जाता है। (वह) पुत्री एवं बहिन के प्रति विकारों से मुक्त हो जाता है। सुवर्ण आदि धन की चोरी के पाप भावों से मुक्त हो जाता है। वेदाध्ययन करके उसे भूल जाने से उत्पन्न पाप से मुक्त हो जाता है। गुरु की सेवा शुश्रूषा में उत्पन्न (आलस्य-प्रमादादि) पाप भावों से रहित हो जाता है। यज्ञीय कार्यों में अयाज्य (अपवित्र पदार्थों) के यजन आदि पापों से रहित हो जाता है। अभक्ष्य आहार आदि पाप प्रवृत्तियों से मुक्त हो जाता है।उग्र प्रतिग्रह (निकृष्ट दान) से भी पवित्र हो जाता है। परस्त्री के प्रति पाप दृष्टि से मुक्त हो जाता है। वह काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, क्रोधादि पापों से नहीं बँधता। (वह व्यक्ति) सभी पापों से रहित हो जाता है और इसी जन्म में ही पूर्ण पुरुष अर्थात् परमात्मा के ज्ञान से युक्त होकर पुरुष (श्रेष्ठ पुरुष या पवित्र) हो जाता है॥ [उपनिषद् के हम वाक्य का अर्थ विवेकपूर्वक किया जाना चाहिए। बहुधा लोग इसका यह अर्थ लगाते हैं कि पाप वृत्तियों के वशीभूत होका जो पापकर्म करता है, उसके दण्ड से मुक्त हो जाता है, लेकिन ऋषि कहते हैं कि वह ज्ञानी विभिन्न पाप वृत्तियों-अन्तरंग दोषों से मुक्त हो जाता है, न कि पाप कर्मों के दण्ड से।ज्ञानी अपनी ज्ञान दृष्टि से वास्तविकता को पहचान लेता है, इसलिए पाप वृत्तियों के प्रलोधन में फँसता ही नहीं है।]


Verse ११

तस्मादेतत्पुरुषसूक्तार्थमतिरहस्यं राजगुह्यं देवगुह्यं गुह्यादपि गुह्यतरं नादीक्षिता-योपदिशेत्।नानूचानाय। नायज्ञशीलाय। नावैष्णवाय।नायोगिने।न बहुभाषिणे।नाप्रियवादिने। नासंवत्सरवेदिने।नातुष्टाय।नानधीतवेदायोपदिशेत्॥

tasmādetatpuruṣasūktārthamatirahasyaṃ rājaguhyaṃ devaguhyaṃ guhyādapi guhyataraṃ nādīkṣitā-yopadiśet।nānūcānāya। nāyajñaśīlāya। nāvaiṣṇavāya।nāyogine।na bahubhāṣiṇe।nāpriyavādine। nāsaṃvatsaravedine।nātuṣṭāya।nānadhītavedāyopadiśet॥

इस प्रकार इस ‘पुरुषसूक्त’ का अर्थ अति रहस्यमय है। यह सूक्त राजगुह्य, देवगुह्य तथा गूढ़ से भी अतिगूढ़ (रिछपा हुआ) है। जो (गुरु द्वारा) दीक्षित न किया गया हो, उसे इस (सूक्त) का उपदेश न करे।जो प्रबुद्ध होने पर भी जिज्ञासा के भाव से प्रश्न न पूछता हो, जो अयज्ञोय हो, अवैष्णव, अयोगी, बहुभाषी एवं अप्रियभाषी हो, जो प्रति संवत्सर (वर्ष) में एक बार वेदों का स्वाध्याय न कर ले, जो तुष्ट न हो अर्थात् असंतोषी हो तथा जिस व्यक्ति ने वेदों का अध्ययन (पठन-पाठन) न किया हो, उसको इस (पुरुष सूक्त) का उपदेश नहीं करना चाहिए॥


Verse १२

गुरुरप्येवंविच्छुचौ देशे पुण्यनक्षत्रे प्राणानायम्य पुरुषं ध्यायन्नुपसन्नाय शिष्याय दक्षिणकर्णे पुरुषसूक्तार्थमुपदिशेद्विद्वान्।न बहुशो वदेत्।यातयामो भवति।असकृत्कर्णमुपदिशेत्।एतत्कुर्वाणोऽध्येताध्यापकञ्च इह जन्मनि पुरुषों भवतीत्युपनिषत्॥

gururapyevaṃvicchucau deśe puṇyanakṣatre prāṇānāyamya puruṣaṃ dhyāyannupasannāya śiṣyāya dakṣiṇakarṇe puruṣasūktārthamupadiśedvidvān।na bahuśo vadet।yātayāmo bhavati।asakṛtkarṇamupadiśet।etatkurvāṇo'dhyetādhyāpakañca iha janmani puruṣoṃ bhavatītyupaniṣat॥

इस पुरुष सूक्त के अर्थ के इस प्रकार भली-भाँति से जानने वाला वेदविद् गुरु भी शुद्ध पवित्र देश में पुण्य (शुभ) नक्षत्र में, प्राणायाम करके, परम पुरुष का चिन्तन करता हुआ अति विनम्रता से समीप में आये हुए शिष्य को ही उसके दाहिने श्रोत्र में उपदेश दे। अधिक वार्ता न करे, नहीं तो वह श्रेष्ठ ज्ञान (उपदेश) यातयामत्व (निःसारता) रूप दोष से दूषित हो जाता है। इस प्रकार इस सूक्त के अर्थ का बहुशः उपदेश करे। ऐसे शिष्य (अध्येता) और गुरु (ज्ञानदाता) दोनों इसी जन्म में पूर्ण पुरुष (ब्रह्ममय) हो जाते हैं॥