1. Mundaka Upanisad Hindi Translation Yamunasankar Nagar Naval Kishor 1920
Page 1
मुरडकउपनिषद्
भापाटीकासहित।
जिसमें
वादी प्रतिवादी के प्रश्नोत्तर द्वारा ब्रह्मका निर्राय, जगदुत्पत्ति, अन्नादि का सम्भव और अग्निहोत्रादि क्रियाओं का विधान मन्त्रोंद्वारा व्णित है
जिसको
श्रीमान् सवस्वर्य्यलम्पप्न श्रीमुंशानवलकिशोर सी. भाई. ई., ने बहुतसा धन रपय करके कोलाख्यनगरनिवासी पंचोली यमुनाशंकर नागर घालससे सरल देशभांपा में उतधा कराया चौथीचार
लखनऊ
केसरीदास सेठ द्वारा नवलकिशोर प्ेससे मुद्रित और प्रकाशित। सन् १६२० ई० सर्वाधिकार रक्षित।
Page 3
ॐ
एकमेवाद्वितीयम् ॥
• /सर्व उपनिष्द्दरूप प्रमाणोंके मध्य राजा के समान यह उप- नेपद्द उत्तम होने से मस्तक स्वरूपहै। एतदर्थही इसको सुंडक उप- नेषटू कहतेहैं। और इस उपनिषद् में तीन मुंडकहैं और प्रत्येक सुंडक के दोदो खंडहैं इसलिए इसके तीन मुंडक और छः खंड हैं।
चिह्न भावार्थ ।I
१ इस चिह्हान्तर मूलमन्त्रके वाक्य।। i. इस चिह्नान्तंर वाक्योंके.त्प्रक्षरार्थ।। 3.इस चिह्हान्तर अन्य श्रुतियोंके प्रमाण॥ ) इस चिह्नान्तर पर्य्याय वा शेष विशेष।। J.इस चिह्नान्तर विशेषार्थ॥
Page 4
ॐ तत्सत् ब्रह्मणे नमः।
अरथर्ववेदीय सुएडकोपनिषद्प्रारम्भ:।
ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्त्ता भुव- नस्य गोप्ता। स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥१॥
भाषा टीका का आ्रारम्भ।
प्रथम होताभया।[ब्रह्मोपनिषद् औरगर्भोपनिषद्ग आदि अ्प्रथर्वणचेद के बहुतसे उपनिषद् हैं। तिनको शारीरक सूत्रके भाष्यबिषेअनुपर योगीहोने करके तिनका व्याख्यानकरनेको अ्र्प्रनिच्छित है दाते। औ्रौ [अदृश्यमग्राह्य) इत्यादिवाक्य से, अदृश्यतात्रादिक गुशरूप धर्म के कथन से, इत्यादिक अधिकरणसूत्र बिषे उपयोगी होनेसे व्या- ख्यानकरनेकोइच्छित इससुंड क उपनिषद् के आर्प्रारंभकेपदरूप प्रती- कको यहां भाष्यकार ग्रहसाकर ते हैं ] इत्यादिरूपयहअ्पथर्वणवेदका सुंडक उपनिषद् है, सो व्याख्यान करनेको इच्छित है। [शंका. ननु, यह उपनिषद् मंत्ररूपहै, और मंत्रोंको कर्मसम्बन्धी होने के प्रयोजनवान् पनाहै। और इन मंत्रों की योजनाके करनेव
Page 5
प्रथममुएडके प्रथमखएड: । होतेहैं एतदर्थ व्याख्यान करनेको इच्छितपना संभवता नहीं॥ उ०।। हे वादिन!इस आ्र्प्राशंका का यह उत्तरहै कि इनमंघ्नोंकां कर्मसे सम्बन्धहीहै, यह तेराकथन सत्यही है, तथापि ब्रह्मविद्याके प्रकाश करनेकी सामर्थ्य से विद्यासे सम्वन्ध होगा॥ शङ्ा॥ ननु, विद्या को पुरुष कृत होनेसे तिसकी प्रकाशक इस उपनिषद्को भी पुरुष रचितपनेका प्रसंग प्रासही होताहै ताते पक्षपाती पुरुषके दोषसे जन्यता शङ्गाकरके इस उपनिषद्र् की छप्रमायता होनेसेव्याख्यान करनेको जो. इच्छितपना सो वने नहीं॥स०। हे वादिन! यहां यह अर्थहै कि, विद्या के सम्प्रदाय के प्रवर्तकही पुरुषहैं, परन्तुनवीन कल्पना से रचने वाले पुरुष नहीं। और तिनको विद्याके सम्प्रदाय का कररापना जोहै सोभी आधुनिक नहीं कि जिसकरके प्र्प्रवश्वास होय, किन्तु अनादि परम्परासे यह विद्याप्रासहै। एतदर्थ ञना- दिकालसे प्रसिद्ध न्रह्मविद्याके प्रकाशने विषेसमर्थ जो उपनिषद्ध तिनका जो.पुरुषोंस सम्वन्धहै सो सम्प्रदाय के कर्त्तापने की परम्परा- रूपही है। ताते उन पुरुषोंको विद्याके सम्प्रदायके कर्त्तापने रुपही सम्बन्धको.आदि विषेही यह उपनिषद्ध कहता है] तहां आादिविषे इस उपनिषद् के विद्या के सम्प्रदाय के कर्त्तापनेकी परम्परारूप सम्बन्धको 'ऐसेमहत् (बड़ेशेष्ठ) पुरुषोंने परम पुरुषार्थका साधन होनेकरके इसविद्याको बड़ेघमसे प्राप्तकियाहै, इस रीतिकीविद्या की स्तुत्यर्थ। अर्थात्[जैसे विद्या का पुरुषों से सम्बन्ध है उसीप- कार जब उपनिषद्कामी पुरुषकरके रचितपनेके निवारणार्थ पुरु पोंसे सम्बन्ध कहनेको इच्छितहोय, तब तिसप्रकारके सम्बंन्धकां कहनेवाला कोई अन्य चाहिये। और यहां तपही उपनिषद् करके अपनेही सम्बन्धके, कहने से आत्माश्रय दोष प्रांसहोता है॥ यह शङा चित्तविषे लाकर आरप्राचार्य कहते हैं। यहां यह अर्थथ है कि विद्या की स्तुतिविषे तात्पर्थ से अरपने सम्बन्धके कथनविषे अ्र्प्रपनी प्रवृत्ति- रूप.दोप नहीं] तपही यह उपनिषद् कहता है। और जिसकरके स्तुतिकर रुचिकी विषयभई विद्या तिसविषेभुमुक्षुजन, आदरपूर्वक
Page 6
४ सुएडक उपनिषद। 4 प्रवृत्त होतेहैं, एतदर्थ श्रोताकी बुद्धिविपे रुचिके उपजावनेके अर्थ विद्याको महान् कहते हैं। और [विद्याका जो प्रयोजन है सोई इस उपनिषड्काभी प्रयोजन होगा इस अर्प्रभिप्रायसे विद्याका प्रयोजन से सम्बन्ध कहतेहैं ] प्रयोजनके साथ विद्याके साधन साध्यरूप सम्बन्धको तौ भिद्यते हृदयग्रनथिश्छयनतेसर्वसं:हिदयकी ग्रन्थिभेद (नाश) को पावतीहै और सर्वसंशय तपने छेदन को पाव- तेहैं। इत्यादि इसही उपनिषद्के दूसरे मुंडकके दूसरेखं डकी आराठ- वीं श्रुतिवाक्यसे आरागे कहेंगे। औम्प्रौर यहां अ्रर्थात् जव संसारके कार- सकी निवृत्ति ब्रह्म विद्याका फलहै तव अपर विद्यासेही तिसकी निवृत्तिका संभवहै ताते तिस संसारके कारणकी निवृत्तिरूप फल के अर्थ ब्रह्मविद्याकी प्रकाशक उपनिषद्ट व्याख्यान करनेको योग्य नहीं। यह शङ्का विचारके कहतेहैं यहां यह भावहै कि संसारका कारण अविद्या आदि दोषहै, तिसका निवर्त्तकपना कर्मरूप त्रप राविद्याको संभवता नहीं, क्योंकि कर्म और. तविद्या आादिकों का परस्पर अविरोध है जिस करके अनेकवार प्रासायाम को करनेवाले पुरुषकोभी शुक्ति (सीपी) के साक्षात् दर्शन बिना रजत (रूपा) विषयक जो आ्रंतिरूप अरविद्या तिसकी निवृत्ति देखते नहीं [ एतदर्थ अपर विद्याको संसारका कारण जे अरविद्या तिसका निव्त्तकपना है नहीं ] विधि निषेधमात्र बिषे तत्पर जो अपरशब्दकी वाच्य ऋग्वेदादिरूप विद्याहै, तिस विषे संसार के कारण अविद्या आदि दोषका निवर्चकपना नहीं है। एतदर्थ ६ पराचैवापराच?1 परा, अपरा ।[ किवा परमपुरुषार्थ के साधन होने से ब्रह्मविद्याको परविद्यापना है, और निकृष्ट संसार- रूप फलवाली होनेसे कर्मेविद्याको अपरविद्यापना है, ताते नाम के बलसे अपरविद्याको मोक्षकी साधनताका अभावहै, ऐसे जानते हैं। इस अभिप्राय से यहां कहतेहैं ] इस प्रकार इस सुंडक उप- निषद्के चतुर्थ मन्त्रकरके विद्याके भेदके कारखपूर्वक अविद्या- यामन्तरे वर्चमानाः 2 अिद्याके भीतर वर्त्तमान इत्यादिरूप
Page 7
प्रथममुएडके प्रथमखएड:। इस प्रथम मुंडकके सोलहवें मन्त्ररूप वाक्यसे आपही कही। और [ कर्म जड़ जो कहते हैं कि केवल ब्रह्मविद्याको कर्मकी त्रप्रंग- भूत होनेसे स्वतंत्रतासे पुरुषार्थ (मोक्ष) का साघनपना नहीं है इस प्रकारका जो कथन सो पिछ्ली श्रुतिनेही निषेधकिया है। इसप्रकार यहां कहते हैं। यहां यहतपर्थहै कि, ब्रह्मविद्याकोकर्मकी अंगरूप होनेसे इस श्रुतिविषे कही जो कर्मकी निंदा सो चाहिये नहीं। और जिसकरके अ्रंग के विधानार्थ अंगीकी निंदा नहीं करते हैं। और यहां तो सर्वसाध्य और साधनकी निंदासे तिन विषयों चिपे पैराग्यके कथनपूर्वक परव्रह्मके प्राप्तिकी साधन ब्रह्मविद्या को श्रुतिकहे है। पतदर्थ ब्रह्मविद्याको तपही मुख्य होनेसे तिस की प्रकाशक उपनिषट्को कर्मकर्त्ताकी स्तुतिकी कारकता नहीं है]. तैसे 'परीक्ष्य लोकान् कर्मरचितान्]। लोकोंको कर्मरचित जान- के। यह इसही उपनिपद्के प्रथम मुंडकके द्वितीयखंडके ११ वें मन्त्रकर के सर्वसाधन और सांध्यरूप विपयविषे वैराग्यपूर्वक पर- ब्रह्म की प्राप्तिका साधन, और गुरुके [जब उपनिषद्को स्वतन्त्र ब्रह्मविद्याकी प्रकाशकता होय, तव तिनके अध्ययनकर्त्ता सर्वको ही ब्रह्मविद्ा होनी चाहिये सो क्यों नहीं होती है, यह शंकाविचार- के कहतेहैं। यहां यहभावहै कि, यद्यपि सर्वको गुरुके अनुग्रह आरादिक संसारके अपरभावसे ब्रह्मविद्या नहीं होती है परन्तु उत्तमाधि- कारी को होती है] अनुग्रह से प्रासहोनेयोग्य जो ब्रह्मविद्या है, तिसको कहते हैं। और [शंका, ब्रह्मविद्याजवस्व्र तन्त्रहै तबप्रयोजनकीसाधन न होगी, क्योंकि सुखकी प्राप्ति और दुःखकी निवृत्ति इनदोनोंको प्रवृत्तकरके साध्य होनेका निश्चयहै ताते॥ स०॥तहांकहते हैं। यहां यह अथहै कि स्मरसमात्र से विस्मरणभये सुवर्सके लाभके होते सुखकेप्रासतिकी सिद्धिहै, और रज्जुस्वरूप के ज्ञानमात्रसे सर्प- जन्यभय कम्पादिकदु:खकी निवृत्तिकी सिद्धि है ताते, सुखकी प्राप्तिः और दुःखकीनिवृत्तिरूप प्रयोजनको नियमंकरके प्रवृत्ति और निवृ- त्तिकरके साध्यपना नहीं है। एतदर्थ श्रुति, प्रतीतकिये विद्याका
Page 8
६ :मुएडक उपनिषड्।: प्रयोजन तिस प्रयोजनसे सम्बन्धको वारंवार कहती है। एतदर्थ तिस विद्याकी प्रकाशक उपनिषद् का व्याख्यान करनेकी योग्यता का संभवहै] 'बह्मविद्नहैव भवति, ब्रह्मचेत्ता न्रह्मही होता है। और परामृताः परिसुच्यन्ति स्वे2्र सर्वपर ्मृतहुए मुक्रहोते हैं। इत्यादि तृतीय सुंडकके वावयन से इस ब्रह्मविद्याके प्रयोजन को बारंबार कहते हैं। [एकदे शीके मतविषे जो कहते हैं कि स्वाध्याय (अपनी २ शाखाके सम्वन्धी वेदभाग) के अध्ययनके विधिका जो तर्थज्ञानरूप फल तिसका तीन (ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य) वर्सको अधिकार है। एतदर्थ सर्व आश्रमोंके कर्म से समुचयको प्राप्तभई ब्रह्मविद्याही मोक्षकी साधकहै। तहां कहते हैं। यहां यह अरर्थहै कि, सर्व सामग्रीके त्यागरूप संन्यास बिषे स्थित परत्रह्मकी विद्याही मोक्षका साधनहै, इसप्रकार स्वयं वेदही देखावताहै। तिसप्रकार संन्यासियोंको कर्म.साधनके अभावसे कर्मका संभव नहीं। और तिनके आश्रमका धर्ससी शम वमादिकोंसे वृध्धिको प्राप्तभई सु- विद्याविषे सम्यक् निष्ठावानंपनाही है। ओमर तिन (संन्यासी) का शौच आचमनादिक कर्मभी वस्तुतः आश्रमका धर्म नहीं। क्योंकि सोकर्म. लोकसंग्रहार्थ है ताते। और न ज्ञानेन सदशं पविश्रमिह विद्यते, यहांज्ञानके तुल्यपचित्र (अन्य) नहींहै। इस गीतास्मृति के वाकयसे, निरन्तर ज्ञानाभ्यास (छ्रात्मातुसन्धान) मात्रसेही अपार्वनता (अज्ञान) की निवृत्तिहै ताते और त्रिकाल स्नानादिक विधिको प्प्रज्ञानी संन्यासीका विषयत् है ताते। एतवर्थ कर्मकी निवृत्तिसेही ज्ञान और कर्सका समुचय बनेनहीं] यंद्पि ज्ञानमात्र बिषे सर्व आश्रम के पुरुषोंको अधिकारहै। तथापि संन्यासन्नाश्रम विषे स्थित विद्याही मोक्षका साधन है, कर्मसहित विय्या सोक्षका साधन नहीं। और यह दमैक्ष्य चर्य्यांचरन्तः। मिक्षाके भक्षणको पर्चरते हुये। प्रथममुंडक के दूसरेखंडके ११ वें मन्त्रमें और संन्या- सयोगात संन्यासयोगसेों तीसरेमुंड ककेछठे मन्त्र में इत्यादिवाक्य को स्वयं श्रुति कहतीहुई देखावेहै।और [इसकहनेके हे तुसेभी कर्म
Page 9
प्रथममुएडके प्रथमखएडः । ७
सहित विद्यामोक्षका साधननहीं इसप्रकार कहते हैं। यहां यह अर्थ है कि.मैं भ्र्रकर्त्ताव्रह्मही हैं, और कर्मकत्ताहौं यह.स्पष्टव्याघातदोष है] विद्या और कर्मके परस्पर विरोध कारगसे न्रहमं आत्माकी एकताके ज्ञानके साथस्वनविपे भी कर्म सम्पादन करने को शक्य नहीं। और [उत्पन्न हुई विद्यावाला पुरुषभीजब व्रह्म और तात्माकी एकताको भूल ताहे, तव सिवाय कर्मके और क्या करेगा, तातेज्ञान कर्म काससु- चयसंभवताहै, इसप्रकार कहनेको योग्य नहीं, सोई आचार्थ कहते हैं]विद्याके,कोईएक काल विपे अभावके निमिस्त को अरनियमितहोने से काल और कमसे संकोच को असंभव है। तनु, अद्विरा आदिक गृहस्थोंको विद्याके सम्प्रवायकी प्रवर्त्तकताके देखने से गहस्थाश्रम के. कमोंसे ज्ञानका समुचय, इस उक् लिंगसे जानाजाताहै। यह शंका विचारके कहते हैं। यहां यह भावहै कि युक्ति सहित लिंग को ही सचकता के अंगीकार करनेसे और समुच्यविषे युक्िकेश्र्र्रभांव से और उलटा विरोधके दर्शन सेलिंगसे समुचयकी सिद्धिन हीं है। और सम्प्रदायके प्रवर्तक पुरुषोंको गृहस्थाश्रमके. आ्राभासमात्रपने के अतुसंधानकर वारंवारवाघसे, और इस अर्थ विपे 'यस्यमेचास्ति सर्वत्र यस्यमेनास्तिकिश्चन। मिथिलायांप्रदीतायां नमेकिश्चन द हतइति, जिस मेरा सवत्र है और जिस मेरा कुछमी नहीं है मिथिलापुरीके दग्वभये मेरा कुछमी दग्धहोता नहीं। इस राजा जनकके उद्धार वा उद्धारको देखनेसे कर्माभास से समुचय नहीं होताहैं। और तहां प्रेरक प्रमाणरूप श्रुतिभी.नहीं देखते हैं] जो पूर्व के गृहस्थोंविषे ब्रह्मविद्याके सम्प्रदायका कर्चापना व्ादिक लिंगहै सोतो पूर्वस्थित विद्याकों बाघकरनेकों इच्छा करता है। और जब तमऔर प्रकाशका संभव अनेकन प्रकारसेभी एक ठेकाने करने को शक्य नहीं, तव केवल लिंगों (चिंह्रों) से एक ठेंकाने करने को शक्य न होय इसमें क्यां कहनाहै, कुछ भी नहीं। [श्रव सिद्ध करी जो इस उपनिषद् के व्याख्यान करनेकी योग्यता तिसको पाचार्य समाप्त कर. इस रीति से उक्र सम्बन्ध और प्रयोजन
Page 10
मुएडक उपनिषद्। वाले इस मुंडकउपनिषद्का अल्पग्रंथरूप विवरण (संक्षेपसे व्या- ख्यान) करनेका आरंभ करते हैं। [इसग्रन्थविषे उपनिपट् शब्दकी योजना कैसेहै इसशंकाके होनेसे ग्रंथको उपनषद्ट शब्दकी वाच्य विद्यारूप अर्थवाला होनेसे ग्रंथविषे उपनिषद् शब्दकी योजना लक्षणासेहै इसप्रकार देखावनेके अर्थ विद्याको उपनिपद् शब्दका पपरथपना कहते हैं। जो सुसुक्षपुरुष इस उपनिपद्रूप न्रह्मविद्या को श्रद्धा भक्किपूर्वक प्रवृत्तहुथे परम प्रेमास्पद (परम प्रेम) की विषय होनेकरके ग्रहणकरते हैं, तिनके गर्भवास जन्म जरा और रोग मरखादि क्केशोकेसमूहों को शिथिल करेहैं। अर्थात् [ यहां यह अर्थ है कि अपरिपक् ज्ञानसे दो वा तीन जन्मों करके मोक्ष होने का संभव है ताते ब्रह्मविद्या क्केशके समूहोंको शिथिल करे है ऐसे कहाहै I वा परब्रह्मको प्रात्तकरेहै। और त्रप्रन्य अ्र्रविद्यात्र्प्रादिक संसारके कारणको नाशकरे है, एतदर्थ इसको उपनिषद्ट कहते हैं। और अब इसके मन्त्रोंका व्याख्यान करते हैं, न्रह्मा जो है सो धर्म ज्ञान वैराग्य और ऐश्वर्य, इन चारंगुगों करके अन्य सर्वको उल्लंघ के वर्तताहै, एतदर्थ परिवृद्ध (सर्वसे बड़ा) है और इसही से महान्है ताते सो ब्रह्मां देवानां प्रथम: सम्वभव१ ब्रह्मादेव- ताओंके. मध्य प्रथम होतभिया। ब्रह्मा द्योतनवान् (प्रकाशयुक्) इन्द्रादि देवताओंके मध्य, गुशोंकरके प्रथम अर्थात् मुख्य वा उन देवताओंके पूर्व हुआ स्वतन्त्र होनेकरके आपपही प्रकट होताभया। जिसप्रकार धर्म अधर्म (पुएय पाप) के वशते अन्य संसारी जीव उपजते हैं तैसे नहीं। 'योसावतीन्द्रियग्राह्य इत्यादिस्मृतेःजो यह इन्द्रियनसे ग्राह्यवस्तुको उद्लंघके बर्त्तताहै सूक्ष्म है, अप्रकट है, सनातनहै, सर्वभूतमयहै, और अचिन्त्व है सो यह आप्रापही प्रकट होताभया। अर्थात् शुक शोगितके संयोग विना आविर्भाव कोपाया इस स्मृतिके प्रमाशसे ब्रह्मदेवका स्वतन्त्रपना जानाजाता है। औौर पुनः सो ब्रंह्मा. कैसा है विश्वस्यकर्त्ता सुवनस्यगोता। विश्व का उत्पन्न करनेवाला और भवनका पालन करनेवाला .4
Page 11
प्रथममुएडके प्रथमखएडः । सर्व जगत् का उत्पन्नकरनेवाला है और उत्पन्न किथे भुवनों का (जगत्का) पालन (रक्षा) करनेवाला है। यह जो विद्याके पव- सैंक ब्रह्माका विशेषण है सो विद्याकी स्तुत्पर्थ है और सब्रह्- विद्यां सर्वविद्याप्तिष्ठा। सोई सर्व विद्या की प्रतिष्ारूप ब्रह्म- विद्या को । सोई प्रख्यात सहान् भाववाला व्रह्मा, ब्रह्म जो पर- मात्मात्र्पक्षर है तिसकी जो विद्या कि (येनाक्षरंपुरुषवेदसत्यं) 1 जिसकर के लत्य (अक्षर) पुरुप जानाजाता है। जिस विद्याकरके शक्षरमह्म जानाजाता है, इस श्रुतिउक्क विशेषससे परमात्माको विषयकरनेवालीहै, एतदर्थन्रह्मविद्या कहते हैं।अथवा सर्वकेमयज (प्रथमउत्पन्नहोनेवाले) ब्रह्माने अपने वतुभवले कथन किया है, एतदर्थ इसको म्ह्मविद्या कहते हैं। और सो सर्व विद्याके व्ावि- र्भाव (प्रकट) होने की हेतु है तिसकरके सर्व विद्याओोंकी प्रतिधा (शाश्रय) है।[महावाक्यसे उत्पन्नसई बुद्धिवृततिसे श्र्प्विर्भाव (साक्षात्कार) को आपमया म्रहही मरह्मविद्या है। और सोई नह्म जिसकरके सर्वका प्रकाशक है तिसही करके सर्वविद्याकी प्रकाशक होनेकरके ाभ्य करते हैं, ऐसी जो जह्माविद्या सो सर्व विद्याकी प्रतिष्ठा (शाशय) है] अथवा सर्व विद्या करके जानने योग्य वस्तु जिल (विद्या) करके जानते हैं, अर्थात् जिस (विद्या) के उत्पन्न हुये सर्व विद्याकी समाप्ति होती है,। तथाच : येनाश्रुतं श्रुतं भवति श्रमतं सतम विज्ञातं विज्ञातसितिश्रुतेः; जिसकरके नहीं अरवस किया वस्तु श्रवशाकिया होता है। और, नहीं सनन किया वस्तु मनन किया होता है और नहीं विज्ात (निश्चय) किया वस्तु विज्ञात (निश्चय) किया होता है, इस श्रुति के प्रमाससे। एतदर्थ सो (ब्रह्मविद्याको) सर्व विद्याकी प्रतिष्ठ (अवधि) कहते हैं। तिस सर्व विद्याकी प्रतिष्ठारूप ब्रह्मावि दयाको, न्ह्ाके गनेक सृष्टिके प्रकारों बिषे एक सृष्टिके प्रकारके पूवमं अथर्व्वानास ऋषि उत्पन्न किया है, एतदर्थ सो ब्रह्माका ज्ये- पपुन्रहै, तिस । अथर्व्वायज्येष्ठपुत्रायप्राह"पथर्वर्वानाम ज्येष
Page 12
१० मुण्डक उपनिषद्। तरथर्व्वरो यां प्रवदेत ब्रह्माथव्वा तां पुरो वाचाद्गिरे ब्रह्मविद्याम। स भारह्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भारह्वा जोडद्रिरस परावराम २ । पुत्र के अर्थ कहता भया। अथर्वानासवाले अपने ज्येष्टपुत्र के ताई (ब्रह्मा) कहता अया १॥ ॐ तत्सत्॥ २ हे सौम्य। अ्रपरथर्वसे यां प्रददेत ब्रह्मा १। जिसको ग्रह्मा अथर्वाऋृषिके अर्थ कहताभया। जिस इस व्रह्मविद्या को ग्रह्मा अपने डयेषपुत्र अथर्वानामवाले भषिके अर्थ कहतायया। और 4 तांपुरोवा चांगिरे ब्ह्हविद्याम्ह। तिस ब्रह्मविद्या को पूर्व त्द्धिरा को कहतामया। तिस व्रह्मासे पाईभई ब्रह्मविद्याकोही त्रथर्व्वा नामवाला ऋषि सर्व से पूर्व (पहिले) ऋद्विरानामवाले ऋपीश्वर के अर्थ कहतामया। और सभारदाजाय सत्यवाहाय प्राह?सो भारद्वाज गोत्रोत्पन्न सत्यवाहके अर्थ कहतामया। सो तरद्गिराना- मवाला ऋषीश्वर, भारद्वाजगोत्रवाले सत्यवाहनामवाले ऋपि के अर्थ कहताभया। और भारद्वाजोद्विरसे परावराम् " भार- दाजपरसे अवर करके प्रात्तभई विद्याको अद्तिरसके अर्थ कहता भया। सो भारदवाज गोतोत्पन्न सत्यवाहनामक ऋषि जो परनह से अवर (अश्रेष्ठ) ब्रह्माकर के प्राप्तभई है परावरा है। वा पर और अपरूप सर्वविद्याके विषयविषे व्यासहोनेकरके जिसको परावरा कहते हैं। ऐसी तिस परावररूप विद्याको अद्गिरसनामवाल अपने शिष्य वा पुत्रके अर्थ कहता भया २ ॥ ३ हे सौम्य! शौनकोहवैमहाशालोऽद्विरसंविधिवदुपसन्नः पप्रच्छ१ बड़े घरवाला शौनकऋषि विधिवत् समीपत्राय नि- श्चय स्पष्ट पूछता था। महान् गहस्थ (धन कुल विद्या.स- म्पन्न) ऐसा जो शुनक नाम ऋषि का पुत्र शौनक नामवाला ऋषि, सो भरद्वाज गोत्रवाले सत्यवाह नामवाले ऋषिके शिष्य झङ्गिरस नामवाले सुनीश्वर रूप त्चार्य के ताई विधिवत्,
Page 13
परथमसुएडके प्रथमखएडः । ११ शौनको ह वै महाशालोऽद्गिरसं विधिवदुपसन्नःपप्च्छ। करिमतु भगवो विज्ञाते तर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ३॥ अर्थात शाखानुसार समिधादि द्रव्य लेके, समीप मातहोय प्रश्न करता भया। यहां शौनक और शंगिरसके सम्बन्ध के पीछे विधि- वतु, इस विशेफसा को कहा है, तिस करके पूर्वके ऋषियों के, माचार्य समीप जाय पश्न करने की विधिका त्रानियम है, ऐसा जानाजाता है। सथवा, विधिवत्, यह जो विशेषण है सो मध्य- दीपकन्याय के पमास हे, अर्थात् [जैसे देहली के ऊपर धरा दीपक दोनोंभोर प्रकाश करता है, तैसेही सूल श्रुतिविपे अंगिरा सब्द और शिष्य का विशेषण रूप, उपसन्न, शब्द इन दोनों के मध्य जो, विधिवत्, शब्द है तिसका दोनों और सम्बन्ध है] और अससदादिकों विपे भी पाचार्य के समीप जायके अरनकरने की विधिकी इषता है।। पर० ॥ सो काचार्य के समीप जायके प्रश्नका करना क्या है।। उ० ॥ शौनकउ० ॥ 1 कम्मिन्ुभगयो विज्ञातेसर्वमिवविक्ञारतभवसीति ?1 हे भगवन् ! किसके वि- शेप करके जाने हुये संर्व यह विशेष करके जानाजादा है। हे भगवन् । हे-पूजा करने योग्य! किसके विशेष करके जाने हुये यह सर्व जानने योग्य वस्तु विशेप करके जानाजाता है यहां :एक स्मिन्ज्ञाते सर्विज्ञवतीति 1 एकके जानने से सर्व का जानने चाला होता है। इसप्रकार श्िष्ट पुरुषों के संवादको शौनक ऋषि पूर्व अवस करता भया है। ताते तिस एक वस्तु के विशेष रूपके जानने की हच्छा करता भया :कस्मिस्नुविज्ञाते; । किसके जाने हुथे। ऐसे तर्कको करताहुआ पूछतामया [उपादान कारस(जैसे घटका उपादान मृत्तिका) से कार्यकी पृथकूसराका प्रभावहै, तिस करके उपादानके जानेहुये, तिसका कार्य तिस उपादान से भिन्न नहीं, इस प्रकार जानाजाता है, ऐसी लोकों विषे सामान्य व्याति है तिसके वलसे वो पूछता भया, ऐसे कहते हैं ] अथवा
Page 14
१२ मुएडक उपनिषद्। तस्मै सहोवाच द्वेविद्ये वेदितव्य इति ह स्म यद्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ४॥ लोकनकी सामान्यदृष्टि से जानके ही पूछता भया। जैसे लोक विषे समान जातिशादिक समस्त भेद जो है सो समानजाति त्ररा- दिककी एकताके ज्ञानसे लौकिक पुरुषोंकरके जाननेविषे आावते हैं। तैसे ही सर्व जगतके भेदका एक कारण कौन है, कि जिस एक के जानेहुये सर्व जानाजाता है, यह भी लौकिक जनोंकरके जानने में आावता है। एत दर्थ सामान्य लोकोंकी दृष्टि से यह प्रश्नवनता है।[अवप्रश्न के शक्षरोंकी अरसमीचीनताका आप्राक्षेप करके समा- धान करते हैं। यहां यह अर्थ है कि, सो क्याहै इसप्रकार उच्चारण के किये श्क्षरोंकी बाहुल्यतासे श्रम होता है, तिससे भयकरके कस्मिन्ु विज्ञाते,। किसके जानने से। इसप्रकार अक्षरोंकी सुग- मताके लाघव से यह प्रश्नहै] ननु जब वज्ञातवस्तुविषे : कस्मिश्ु विज्ञाते,। किसके जानने से। यह प्रश्न अघटित है, ताते प्रथम, सो कया है, ऐसा प्रश्न युकहै, पश्चात् वस्तुके सद्भाव के सिद्धभये 'कस्मित्षु विज्ञाते, किसके जानने से। ऐसा प्रश्नहोता है, जैसे लोकविवे पेटी (सन्दूक) आदिक आ्राधारके. सद्धावका प्रथम ज्ञान होने से तब पश्चात् यह अमुकवस्तु किसविषे रखने के योग्य है, यह प्रश्न होता है तैसे। सो कथन बने नहीं। क्योंकि शिष्य अक्षरों की बाहुल्यता करके अम से भयको प्राप्तमया होता है ताते.। सो क्या है कि जिसके जानने से सर्वका जाननेवालाहोताहै, ऐसा प्रश्न सभवे नहीं, किन्तु : कस्मिश्नु विज्ञाते सर्वमिद विज्ञातं भवतीति, । किसके जानने से यह सर्व जानाजाताहै । इस प्र- कार का प्रश्न संभवता है ३॥ ४ हे सौन्य!'.तस्मै सहोवाचीतिसके अर्थ.सो स्पष्ट कहता भया। तिस प्श्नकरत्तां शौनकऋषिके त्रपर्थ सो श्र्रंगिरस वा त्र्प्रंगिरा नामक झुनीश्वर आचार्य स्पष्ट कहतामया।। प्र०'॥ क्या कहता
Page 15
प्रथममुएडके प्रथमखएडः । १३ तत्रापरा ऋग्वेदो य जुर्वेद: सामवेदोऽथर्व्ववेद: शिक्षा कल्पो व्याकरं निरुक्कं इन्दो ज्योतिषमिति। अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ५॥ भया। उ०।। अगिराउवाच देविधे वेदितव्य इतिहस्म यद् न्र हमविदो वदन्ति।। दोनोंविद्याजाननेयोग्य हैं ऐसेप्रसिद्ध ब्रह्मवेत्ता कहतेहैं। अर्थात् दोनोंविद्या जाननेयोग्य हैं, इसप्रकार प्रसिद्ध जो वेदार्थके जाननेवाले परमार्थदर्शी ब्रह्मवेता सो कहले हैं॥। प्र० ॥। कौन वे दोनों विद्याहैं॥ उ०॥"पराचैवापराच।। परा और अपरा है। एक परा, अर्थात् परमार्थ विद्या है। और दूसरी अपरा अर्थात् धर्म और त्रधर्म के साधन और तिनके फलको विषय करनेवाली विद्या है। शह्ा॥ कस्मिन्यु भगवो विज्ञाते स्वैसिदं विज्ञातं भव तीति, । किसके जाननेसे सर्वका जाननेवाला होताहै। इसप्रकार शौनक मुनिने प्रश्नकिया है। तिसके उत्तर कहनेको योग्यहोते सन्ते भी अह्धिरा मुनि दवेविद्ये वेदितव्ये2्1 दोनों विद्या जानने योग्यहैं। इत्यादिरूप वाक्यों से न पूछेहुये अर्थको कहते हैं सो योग्य नहीं॥ स०। यहदोप वने नहीं, क्योंकि प्रतिउत्तरको क्रमकी त्र- पेक्षावाला होनेसे। और जिसकरके अपरा विद्या जो है सो निषेध करनेयोग्य अरविद्या है। ताते तिसके विषयको न जानने से कुछ तत्त्व (वस्तु तिसका विषय) न जानाहुआ्रा हो ताहै। इसकरके प्रंथम पूर्वपक्षको निषेध करकेही पश्चात् सिद्धान्त कहनेको योग्य होता है। इस न्यायसे तरप्रद्गिरासुनि प्रथम न पूछेहुये अर्थको कहते हैं ४॥ ५ हे सौम्य ! पूर्व कही जो दो विद्या तिन दोनों में अपराविद्या कौनसी है तिसको अवसकरो 4 तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्व्वेद: सा- मवेदोऽथर्व्ववेद: शिक्षाकल्पो व्याकरणं निरुक्ं छन्दो ज्योतिषमि तिह तहां ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद, शिक्षा कल्प व्याकरण निरुक्त छन्द ज्योतिष, यह अपरा विद्या है । अर्थात् क- ग्यजु साम अथव्व यह चारवेद, और शिक्षा कल्प व्याकरण निरुक्
Page 16
4 १४ सुएडक उपनिषद्।: (वेदकेनामोंका कोश)छन्द (पिङ्गल), और ज्योतिष, यह ६ वेदके अद्गहैं। यह सर्वतपरा विद्या है।।औरत्रथ परायया तदक्षरमधि- गज्यते? अब जिसकरके श्रक्षर (ब्रह्मा) प्राप्तहोता है सो पराविद्या है।अब यह पराविद्या कहते हैं, जिस विद्या करके सो अगिम छठे मन्त्रसे कहनेको हैं विशेषण जिसके ऐसा अक्षर (ब्रह्म) प्राप्होय है,[जिसकरके अ्रविद्याकी निवृत्तिही परब्ह्मकी प्राप्ति कहते हैं, भिन्न अर्थ नहीं, ताते परब्रह्मकी प्रांत्ति और अधिगम शब्दके अर्थ का भेद नहीं] सो पराविद्या है। ननु [घट अङ्गसहित वेदोंको अपरप- रंविद्याकरके कहने से तिनसे मिन्नवेदसे वाहर होनेकरके ब्रह्मवि- दयाको परविद्यापना नहीं सम्भवेहै, इसप्रकार वादी आाक्षेप करता है। यहां यह अर्थ है कि विद्या को वेदसे बाहरपने के हुये, तिसशर्थ वाले उपनिषदों कोभी ऋग्वेदादिकों से बाहरपना अर्थात् वेदसे बाह्यपना प्रात होवेगा ] ब्रह्मविद्या जब मग्वेदादिकोंसे बाहर है लब सो पराविद्या कैसे होवेगी। और मोक्षकी साधन कैसे होवेगी और जिसकरके 'जो वेदसे बाह्य स्मृतियां हैं, और जो कोई कुदष्टियां हैं सो जिसकरके सरशको पायके नरक में स्थित करने बाली कहीगई हैं, एतदर्थ वे सर्व निष्फल हैं, इसप्रकार स्सृति बिषे कहाहै एत दर्थ कुदष्टिरूप होने से, और निष्फल होने से सो ब्रह्मविद्या नादर करनेको योग्य होवेगी। और उपनिषदों को ऋग्वेदा- दिकों से बाह्यपना सिद्धहोेगा। और जब सो ब्रह्मविद्या भग्वे- दादिरूप है, तब अथपरा"् अबपरा। इत्यादिरूप वाक्य तें. तिसका ऋग्वेदादिकों से पृथकूकरनाव्यर्थ है। यह कथन बनेनहीं। [उपनिषदोंको वेदसे बाह्य होनेकरके विद्याका तिनसे भिन्नकरना नहीं सम्भवता है, किन्तु यहां वस्तुको विषयकरनेवाले वैदिक ज्ञानभी शब्दकेससूह रूप वेदसे अधिकताके अभिन्नायसे विद्याका भिन्न करना है इस अभिप्राय से कहते हैं] क्योंकि यहां जानने योग्य विषय्रके विज्ञानको पराविद्या शब्द से कहने को इच्छित है ताते। और जिसकरके यहा रपनिषदों से जानने योग्य त्रक्षर
Page 17
प्रथममुएडके प्रथमखण्डः। १५ यत्तददश्य मग्राह्यमगोत्रसवर्णामचक्षु:श्रोत्रं तदपाणि- पादमू। नित्यं विमु सर्व्वगतं सुसूक्षमं तदव्ययं यद्धत- योति परिपश्यन्ति धीरा: ६।। ग्रह्मं को विषयकरनेवाला विज्ञान पराविद्याहै, इसप्रकार मुख्य- ताकरके कहने को इच्छितहै। और उपनिषद शब्दका समूह नहीं औौर वेद शब्दसे तो सर्व ठिकाने शब्द समूह कहने को इच्छित है। त्रक्षर (ग्रह्म) को शब्दके ससूह से जानने योग्य होनेसे भी गुरुके समीप जाने आरादिक अन्य उपाय विना और वैराग्यरूप अन्य प्रयक्ष विना अक्षरका विज्ञान संभवता नहीं। एतदर्थ ब्रह्म- विद्याका पृथक करना और यह परा विद्याहै, यह कथन बने है५॥ -६ हे सोम्य! जैसे विधिका विषय जो वाक्यार्थ ज्ञान तिसके कालसे अन्यकाल विषे कर्तता त्र्प्रादिक तरनेक कारकोंकी समातति के द्वार से अ्रग्निहोत्रादिरूप अनुधान करने योग्य अर्थ है। तैसे यहां पराव्रिया के विषयविषे नहीं। किन्तु यहां तो जानने रूप अर्थ वाक्यार्थ ज्ञानके समकाल विषेही तिस ऋवधिको प्रातहोता है, क्योंकि केवलशब्दसे प्रकाशकिये अर् के ज्ञानमात्रकी ही निष्ठा से भिन्न अनुष्टानका अभावहै ताते। एतदर्थ यहां अपराविद्याको पष्टचाक्यसे लेके नवमवाक्यके पर्यन्त विशेषणों सहित त्क्षर.से युक्करे हैं"पत्तवदश्यमय्राह्यमयोत्रमवर्यामचक्षः ओ्रोत्रं तदपाणि पादम्। जो ऋहश्य हैं प्रप्र्राहयहै ऋर गोत्र है प्र्प्रवर्णहै त्रा चक्षुशोत्र है सो अपािपा दहै। जो सो अदश्यहै [यहां 'जो' सो' इन शब्दों से अगिम कहनेका वस्तु, बुद्धिबिषे रखके सिद्धवत् स्मरण करते हैंI अर्थात् सर्वज्ञानेन्द्रियोंका अरप्रविषय है। और त्र्पग्राह्य है, अर्थात् कर्मेन्द्रियों का अविषय होनेसे यह करने में आवता नहीं। और परप्रगोत्रहै, अर्थात् गोत्र जो वंश तिससे रहितहै। अर्थ यह जो ज़िस करके सो पक्षर (ब्रह्म) वंशवालाहोय ऐसा तिसका कोई नहीं हैं। और जो वर्णन करते हैं ऐसे जो स्थलपने आ्दिक वा शुकलपने
Page 18
१६ मुएडक उपनिषद्।: आरादिक शुशावान् वस्तुरूप शरीरादिक द्रव्य के धर्म हैं, सो वर्सा कहते हैं। सो वर्ग जिसको अिद्यमानहै, ऐसा जिसकरके श्रक्षर है तिसकरके सो 'अवर्श है' और चक्षु और श्रोत्र जो हैं सो सर्व जीवों वा वस्तुओं के नाम और रूप विषयके ग्रहस विषे साधन (करण) हैं 'सो चक्षु और ओोत्र जिसको विद्यमान नहीं' ऐसा जिसकरके श्रक्षर (तह्मा) है तिसकरके सो <अचक्षुःशोत्रं? (चक्षु और श्रोत्र से रहितहै) है। [अभावके निषेध के प्रसंग से, यहां शक्षर शब्दको प्रधान (प्कृति) रूप अर्थकी परता है, इसप्रकार शंकाकरने को योग्य नहीं है यह सानके कहते हैं। यःसर्वज्ञस्सर्व वित्, । जो सर्वज्ञ है और सर्वनित् है। इत्यादि रूप इसही खएड केनवम मन्त्रबिषे चेतनवानूपनेरूप विशेषसाकरके ब्रह्मको संसारी जीवोंवत् चक्षु और श्रोत्रादिक साधनों से विषयों की साधकता प्राप्तभई, सो यहां चषुओत, िवक्षु भोत्र। इन विशेषणों से निवारस करते हैं। क्योंकि : पश्यत्यचक्षः सश्ुणोत्यकर्षः 1 सो (परमात्मा) चक्षुरहित हुआ देखताहै और कर्सारहित हुआ्रा सुनताहै। इत्यादि विशेषणों को देखते हैं ताते। और सो अक्षर (ब्रह्म) तरपाणि पादहै, अर्थात् कर्मेन्द्रियों करके रहितहै। जिस करके इस प्रकार पग्राह्य और अ्प्माहकरूप है तिसही कर केनित्यं विभुं सर्व्वगतं सुसक्ष्ममूी I नित्य है विसुहै सर्वगतहै और त्र्परति- शय सूक्ष्म है सो नित्य है, अर्थात् अरविनाशी है। और न्ह्मासे प्रादिलेके स्थावर पर्यन्त भ्रागियों के मेवरूप विविध प्रकार से होतेहैं ताते विभुहै। और सर्वग तहै अर्थात् आकाशवत् सर्वत्र व्यापकहै। और (आकाशसेमी)अतिशय सूक्ष्म है, क्योंकि शब्दा- दिक स्थूलभावके कारणोंसे रहित है ताते। औ्रर शव्दादिक जो है सो आकाश और वायु आ्रदिकों के उत्तरोत्तर स्थलभावके कारण हैं, तिनके परभावसे सो अतिशय सक्ष्म है और "तिदव्ययंयद्भूत- योनिम्परिपश्यन्ति धीराः॥सो प्रव्ययहै सूतयोनि है,जिसको धीर, सर्वओोरसे देखते हैं। 'सो' अव्यय है, अर्थात् उक्र धर्म-
Page 19
प्रथममुएडके प्रथमखरडः । १७ यथोर्रनाभिःसृजते गृह्ाते च.यथा पथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति। यथासतःपुरुषात् केशलोमानितथाऽक्षरात् सम्भवतीहविश्वम् ७॥ वाला होनेसेही सो घटने बढ़ने रूप व्ययको पावता नहीं, ताते मव्यय है, और जिसकरके अङ्गरहित ब्रह्मको शरीखत् अ्रद्गों के घटने रूप व्ययका होना सम्भवता नहीं। अथवा राजाओं के भएडारवत् धनके भए्डारके घटने रूप व्ययभी सम्भवता नहीं। और गुस (बुद्धिरूप) द्वारवाला व्ययभी सम्भवता नहीं, क्योंकि गुससे रहित है ताते। और सर्वका आत्माहै ताते, एतदर्थ तव्यय है और सो प्रथिवीनत स्थावर जङ्गमरूप भूतोंका कारयाहै, एतदर्थ भूतयोनि है। जिस ऐसे लक्षणवाले त्रप्रक्षर (ब्रह्म) को धीर ज़ो विवेकी पुरुष हैं सो सर्व ओरसे सर्वका आत्मारूप देखते हैं। इसप्रकार अक्षर (न्ह्) जिस विद्यासे प्रासहोता है, तिस विद्या को पराविद्या कहते हैं। यह पढ़ों में समुदाय रूप वाक्यार्थ है,॥ इति सिद्धम् ६॥ ७ हे सोम्य ! अघहीं छठे मन्त्रकरके ६ यन्द्रूतयोनिं;।जो भूतयोनिरूप । अर्थात् सर्वका कारणरूप त्रप्रक्षर (ब्रह्म) है। इस प्रकार कहाहै, तहां अ्रक्षर (ब्रह्म) का भूतयोनि (सर्वका कार) पना कैसे है, इस अर्थको लौकिक प्रसिद्ध दष्टांतों पूर्वक कहते हैं। मयथोर्गानाभि: सृजते गृह्ातेच १ जैसे ऊर्णानाभि. (मकड़ी) सृजता है पुनः ग्रहण करताहै। जैसे लोकबिषे प्रसिद्ध ऊर्ानाभि (मकड़ी आदिक) नामवाला कोई एक कीट (कीड़ा.) है, सो अन्य किसी भी कारया निमित्त की अपेक्षा न करके आपही अपने शरीरसे अपरभिन्न तन्तुत्रंको सृजता है, अर्थात् बाहरको प्र- सारित करता है पुनः तिन प्रसारित किये तन्तुतंको ग्रहणकरता है, अर्धात् तिन तन्तुओंको अपने आत्मभावके ताई प्राप्तकरताहै और [ ब्रह्म जगत्का उपादान न"दै तिसमे,
Page 20
मुएडक उपनिषद्ं:। तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽनमभिजायते। पन्रात् प्राणो मनः सत्यं लोका: कर्मसु चामृतम् ८ ॥97772
स्वरूपवत्। इस त्रन्यरीतिके अप्रनुमानका व्यस्तिचारीपना पृथिवी के टष्टन्तसे कहते हैं] यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति। जैसे पृथवी बिषे औषधियां उपजती हैं। जैसे लोकमें पृथिवी बिषे तंडुल (धान्य) आदिलेंके वृक्षादिरूप स्थावर पर्यन्त जो जो घोषधियां हैं, सो स्वरूप से अभिन्नही उत्पन्न होती है। औ्रर [जगत् जो है सो ब्रह्मरूप उपादानवाला नहीं, क्योंकि तिस से विलक्षण है ताते, और जो जिससे विलक्षण होता है सो तिस उ पादानवाला होता नहीं। जैसे घट जो है सो तन्तुरूप उपादान- वाला होता नहीं तैसे इस अनुमानकाभी पुरुष (शरीर) के सम्बन्धी केश लोमादिकों के दष्टान्त से व्यभिचार कहते हैं] यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि जैसे जीवते पुरुषसे केश रोमउ त्पन्न होतेहैं। जिसप्रकार विद्यमान अर्थात जीवते हुये पुरुष (शरीर) से केशरोम और नख यह विलक्षण उत्पन्न हो ते हैं।। हैं सौभ्य! जिस प्रकार ये सर्व हष्टान्तहैं। "तथाऽक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्।तैसे अरक्षरसे इसबिषे विश्व उत्पन्न होताहै। तिसहीप्रकार अप्न्यनिमि तकी अपेक्षासे रहित छठे मन्त्रकर के कहे प्रमाण लक्षगावाले अक्ष- र (ब्रह्म) से इस संसार मणडलविषे विपरीत लक्षरवाला और समान लक्षण सम्पूर्ण विश्व (जगत्)उत्पन होता है। [ननु एकही दृष्टान्तबिषेउक्कतीनों अनुमानोंका व्यभिचारीपना मिः लावनेको शक्य है इसप्रकारकी शङ्का करनेवालेप्रति कहते हैं] यहां तरनेक दृष्टान्तोंका जो ग्रहमाहै सो सुखपूर्वक भलीप्रकार जिज्ञासुप्रति र्थके समुझावने के अर्थ है। और ब्रह्मसे उत्पन्न भया जो विश्व (जगत्) है सो इसही क्रमसे उत्पन्न होता है। बदरीफलकी मुष्टी के फेंकनेवत् नहीं, यह भाव है॥७॥ हे सौम्य।अब सृष्टिके क्रमकेनियमकेकहनेकी इच्छारुपँ अर्थ
Page 21
प्रथमसुएडके प्रथमखए्डः। १६ वाला इस अ्रष्टम मन्न्नका प्ारंभ करते हैं १ तपसा चीय ते ब्रह्म ततोऽन्मभिजायते १1. न्रह्म तपसे स्थूलताको पावता है, तिस ब्रह्मसे त्रपन्न होताहै। उत्पत्तिकी विधिका ज्ञाताहोनेकरके भूतयोनि अक्षररूपजो ब्रह्म सो ज्ञानरूप तपसे सृष्टिकी अनुकूलतारूपस्थूल- ताको पाव्रता है, अर्थात् जलकसके पूशाहुये क्षेत्रविषे प्ररंकुरकेताईं उत्पन्न कराने को तैयारभये वीजचत्, और पुत्रकेताई उत्पन्न करने को इच्छा करते हुये पितावत, इस जगत्के ताई उत्पन्न करनेको इच्छा करता हुआप्रा शप्रक्षररूप ग्रह्म हर्षसे पुष्ठता (स्थूलता) कोपाव- ताहै। इसप्रकार सर्वज्ञपनेसे जगत्की उत्पत्ति स्थिति संहारकी शक्रिके ज्ञानवाला होने करके पुषटताको पाप्तभये तिस ब्रह्मसे यह भोगते हैं (आवरणादि रूपसे अनुभव करते हैं) इसप्रकारका, अथ- वां अन्नवत् सर्वके अर्थ साधारण होनेवाला, ऐसा जो संसारीजीवों का साधारण अव्याकृतिरूप अन्न, सो उपजावने की इच्छायुक् प्रधान अवस्थारूप से उत्पन्न होताहै। और ऋ्रन्रात्पाणो मन: सत्यं लोका:कर्मसुचामृतम् १ तिस अ्रन्नं से प्राण मन सत्य सर्वलोक कर्मोविषे अप्रमृत (होताहै)। तिल जगत् के सृजने की, परथात् [शुद्ध ब्रह्मको ईश्वरपनेका उपाधिरूप जो मायातत्तव सो महाभूतादि रूपसे सर्वजीवोंकर के देखते हैं, एतदर्थ साधारस है। तथापि सो अनादि सिद्ध होने करके कैसे उत्पन्न होता हैं, यह शंका चित्तचिपे ल्याय के कहते हैं। यहां यह रहस्य है कि क्रोई एक कहते हैं कि, कर्म के संस्काररूप अप्रपूर्चके समवाय (मिलाप) रूप सम्चनधवाला सूक्ष्मभूत शव्याकत है। सो कहना, बने नहीं। कयोंकि तिसको जीव जीवके प्रति भिन्न २ होने से ईश्वरपने की उपाधि होनेका असंभव है ताते। और सामान्यरूपसे संभवहुयेभी पृथिवी श्रादिक सामान्यरूपोंकी बाहुल्यताकरके प्रक्ृतिविषे एक ताकी श्रुतिके विरोधकी प्राप्तिहैं ताते। और जड़ महामायारूपसेही संभवहुयेभी तिसको कर्म के अपूर्व के समवाय करके युकपना नं होवेगा। क्योंकि तिस महामायाकी पंकारकरूप होने से औौर-वद्ि
Page 22
सुएंडक उपनिषद्।' आदिकों काही कारक (कर्तता) पनेका कथनहै ताते। और कार कके अवयवों विषेही क्रिया के समवायसम्बन्धकाअ्रंगीकार है ताते किंवा कार्यको अपने कारसका उपादानपना नहीं देखा है। एतदर्थ पट को तंतुके उपादानतावत्, अपश्चीकृत भूतोंकी समष्टिरूप सूक्ष्म भूतोंको अपने कारण अपच्चीकृत पंच महाभूतोंका: उपादानपना न होवेगा। एतदर्थ महाभूतोंकी उत्पत्तित्र संस्कारा आरश्रय: जो तीनगुणकी साम्य (ऐक्य) अवस्थारूप जो मायातत्वर है: सो यहां अव्याकृतादि शब्दोंका वाच्य अङ्गीकार करनेको योग्य है] इच्छायुक्र अवस्थावाले अव्याकृत (माया) रूप अ्रन्न से, ब्रह्म के अर्थात् [ पूर्व कल्पविषे हिरएयगर्भ भावकी प्राप्ति के निमित्त श्रेष्ठ उपासना औरर कर्म जिसने अप्रनुष्टान किया है, तिसके अ्रनुग्रहार्थ: माया उपाधिवाला ज्रह्म हिरएयगर्भ अवस्थाके.आपकारसे होता है। और तिस अवस्थाका अभिमानी सोकर्म और उपासनाका कर्त्ता जीव हिरययगर्भ करके कहते हैं, इस अभिप्रायस यहां प्रतिपादन करते हैं] ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति करके शुक् व्यष्टिरूप जगत् का साधारण समष्टिरूप सत्रात्मा नामवाला] अविद्या काम कर्म और भूतों के समुदायरूप बीजका अंकुर जगत्का आत्मा, हिरएय. गर्भरूप प्राण उत्पन्न होताभया। और तिस हिरएयगर्भरूप प्राम से संकल्प विकल्प संशय और निश्चयरूपमन नामवाला अन्तः करसादिकका उपादान अपश्चीकृत भूतों का पक्चक उत्पन्न होता है। और तिसं संकल्पादि रूपवाले मनसे भी संत्य नामवाला आकाशादिक अपंचीकृत भूतोंका पंचक विराट उत्पन्न होता है। और तिस सत्यनामवाले भूतों के पंचक से क्रम करके ब्रह्मांडरूप: पृंथिवीआपरादि सातलोक उत्पन्न होते हैं। औरतिन उत्पन्न भये लोकों. विषे मनुष्यादि प्रागियों के वर्णा और आाश्रमके क्रमसे कर्म उत्पन्न होता है। और तिन निसित्त रूप कर्मोविषे कर्म्मजन्य फलरूप अरमृ- त उत्पन्न होता है। और यावत्पर्यन्त शतकोटि कल्पनामेंभी कम्मे ने पावते नहीं तावतु: पर्यन्त तिनका फलभी नाशको पाव-
Page 23
प्रथमसुएडके प्रथमखएडः। यःसर्व्वज्ञ:सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतट्रह्म नामरूपमन्नञ्चजायते है।। इंति प्रथममुएडकगतः प्रथमखएडः ॥
ता नहीं। एतदर्थ इन कम्मों के फलको अमृत कहते हैं। द। हे सौम्य । कथनकियेहुये अर्थकोही संक्षेपसे कहनेकी इच्छा- वाला नवम मन्त्र सो आगे प्रतिपादन करने के अर्थको कहता है य: सव्वज्ञः स्व्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपःजो सर्वज्ञ है सर्ववित् है जिसका ज्ञानमय तपहै। जो उक्र लक्षणवाला अक्षर नाम करके परमात्मा सो सामान्य करके स्वको जानता है, अर्थात.[यहांस- मष्टिरूप मायानामक उपाधि सामान्य कहते हैं। तिससे सर्वको जानताहै याते सो सर्वज्ञहै] ताते सर्वज्ञहै। और विशेष [यहांव्यष्टि रूप अविद्यानामक उपाधि विशेष कहते हैं] और तिसकरके उपा- धिवाला हुआ उन जीवोंकरके सृजेहुये सर्व जगत्को जानता है ताते सर्ववित् है] करके सर्वको जानताहै एतदर्थ सर्ववित् है। और जिसका, ज्ञानरूप तप है, परिश्रमरूप नहीं अर्थात् [ननु, प्रजाप- तियों को तपकरके सृष्टिका स्रधापना प्रसिद्धहै, एतदर्थ स्ष्टापना विपे तपका अनुष्ठान कहनेको योग्यही है, परन्तु ईश्वरको स्ष्टा- पना विपे तपका अनुष्ठान कहने से संसारीपना प्राप्त होवेगा, यह आशङ्ा विचारके कहते हैं। यहांयह तपर्थ है कि सत्त्वगुए प्रधान माया और ज्ञाननामकजो विकारहै तिन उपाधिवाला उत्पन्नभयां जो सर्व पदार्थों के जानने रूप ज्ञानस्वरूप विकार सो विकारही ईश्वरका तपहै, परन्तु प्रजापतियों के तपवत् केशरूप तपनहीं] "तस्मादेतद्रब्रह्मनांमरूपमन्नञ चजायंते१ तिससे यह ब्रह्मनाम रूप और अन्न उत्पन्न होता है। तिस उंकलक्षंणवाले सर्वज्ञ से यह कथनकिया हिरएयगर्भ नामवाला ब्रह्म उत्पन्न होता है। और यह यज्ञदत्त है, यह देवदत्त है, यह विष्णुदत्त है, इत्यादि नाम, और यह
Page 24
२२ : सुएडक उपनिषद्।" अथ प्रथमनुएडके द्वितीयखएड आरभ्यते॥
तायांबहुधासन्ततानि। तान्याचरथनियतंसत्यकामा एषवःपन्था:स्वकृतस्यलोके १1१0॥7:/ शुल्ध(श्वेत) है, यहपीत है, यहरक (लाल) है, यह नीलहै, इत्यादि स्वरूपवाला रूप, और तंडुल यवादिरूप अंन्न, प्रथम मन्त्रविषे उक्र कमसे उत्पन्नहोते हैं।। इसप्रकार पूर्व मन्त्र से इस मन्त्रका अरविरोधजनना।है।। प्रथमभुएडकगतप्रथमखएड की भाषाटीका समात ।।
प्रथममुराडकंगतडितीयखराडकी भाषादीकाका प्रारंम्भ।
हे सौस्य। ६तत्रापर कगवेदो यजुर्वेद: सामवेदोऽथर्ववेदः) तहां ऋग् यजु साम अथर्व। इत्यादि रूप प्रथम खएडके पंचस मन्त्र से षट् अंगोंसहित वार वेदरूप अपरविद्या कही। और य नदटश्य: जो सावयव है। इत्यादि षष्ट मन्त्रसे लेके नामरूप मन्न्चजायते ,नाम रूपऔर अ्नउत्पन्न होता है। इस नवम' मन्त्र पर्यन्त जो अन्थ है तिस करके कहे लक्षणवाला जो त्रक्षर (ब्रह्मा:) है सो जिस विद्याकर के प्रासहोता है सो पराविद्या है। इंसप्रकरि विशेषणों सहित यह पराविय्या कही। याते पश्चात् इनदोनों विद्या के विषय (आधीन) जो संसार और मोक्ष है सो विवेचनकरने को योग्य है, इस प्रयोजन के अर्थ अबउत्तर- ग्रन्थ का त्र्परम्भ करते हैं, तिनमें कर्ता आादिक साधन करिया और फल के भदरूप और उपादानरूप से अनादि, और बह्मज्ञानहोने पूर्व अप्रत्यन्त निवृत्ति के असम्भवसे त्रन्तरहित जो संसार है,सो
Page 25
प्रथममुएडके द्वितीयखएड: । २३ अपर विद्यांका विषयहैं। और सोई दुःखरूप होने से सर्वशरीस्धारी जीवोंकरके [एक जीववादी जो कहते हैं कि एक चैतन्य एकही पविद्यासेवद्धमया संसारको.पावता है, और सोई कदाचित मुक् होताहै। और हम तुम आदिक जो जीवाभासहैं तिनको बन्ध और मोक्ष नहीं॥ सो पक्ष यहां जीवोंके बहुवचनकी सूचना से भाष्य- कार स्वासीने निषेध किया, क्योंकि वो एक जीववादी का मत श्रुतिसे वाह्य है ताते] त्यागने योग्य है। और नदीके प्रवाहवत् उचचेद (नाश.) रहित जो संसार है, तिसकी अत्यन्तःनिवृत्तिरूप और ब्रह्मसे अपृथकं होनेकरके, अप्रनादि तप्रनन्त अजरश्मर(त्र- पक्षयरहित, अविनाशी)श्रय:शुद्ध प्रसन्न, और अरपने पर्प्रांपविषे स्थित परमानन्दरूप अर्वैत जो मोक्षहै तरपर्थात् (सुषुप्ति अरप्रवस्था विपेभी क्रियाकारक और फलकी निवृत्ति होती है, तिस निवृत्तिसे ज्ञानपूर्वक जो निवृत्तिहै तिसकी विलक्षणता कहते हैं; यहां यह अर्थ है कि, अपनी उपाधिरूप जो अविद्या तिसके कार्यः सम्बन्धी अविद्यांकी निवृत्ति करके जो आ्रात्यंनितिकी निवृत्ति सो विद्या का फल है) सो परविद्या का विषय है। तिनमें आदिविषे प्रथम [तपर और पर दोनों विद्याके विषयको देखायके त्ब प्रथम छपर वि: दयाके विषयको देखावने विषे श्रुतिका अभिप्राय कहते हैं]अपर विद्याका जो विषयहै तिसके देखावने के अर्थ इस द्वितीयखंड का आरम्भहै। क्योंकि तिस तपपर विद्याके विषयको देखावने से तिस विषे वैराग्य होनेका सम्भव होता है ताते। और तिसही प्रकार आागे इसही उपनिषद विवे 'परकष्य लोकान्-कर्मरचितान्, लोकों को कर्मरचित जानके। इत्यादि इसही खएडकी वारहवीं श्रुति से कहेंगे। और जिसकरके न देखेहुये पदार्थकी परीक्षा (ज्ञान)स म्भवता नहीं, तिसकरके उस अपर विद्याके विषयको देखावते हुये कहते हैंतदेतत्सत्यं१1 सो यह सत्य है।।। प्र. ॥ सो क्या है।। उ० ॥ ममन्त्रेषु कर्म्माणिकवयोयान्यपश्यंस्तानित्रेतायां वहुंधासन्ततानि॥। मन्त्रों विषे कर्म है जिनको कवि देखतेभये
Page 26
२४ मुएडक उपनिषद्। सो त्रेता विषे बहुत प्रकार से प्रवृत्तभये हैं। ऋग्वेदादि नामवाले मन्त्रोंबिषे जो अग्निहोत्रादि कर्महैं, और मन्त्रों करकेही प्रकाशित भये ज़िन कर्मोंको वशिष्ठादि कवि (बुद्धिमान्) देखतेभये। ऐसा जो क्मोंका समुदाय है सो सत्य है अर्थात् [इष्ट फल का साधन होनेसे अथवा अनिष्टफलका साधन होनेसे, वेदकरके जो कर्म बोधित किये हैं, तिन कर्मोंको प्तिबनधके अविद्यमान हुये तिन तिन फलोंके साधनहोने का अव्यभिचारहै सोई तिस कर्म का संत्यपनाहै, वरुपसे अंबाधहोने रूप सत्यपना नहीं। क्योंकि प्रवाहोते पपदढाःद। जिसकरके यह प्रव। अर्थात्.फलसहित विनाशी कर्मवाले हैं-इत्यादि यह इसही खएडके सातवें.मन्त्र करके निन्दा किये हुये ताते! और कर्मोंके स्वरुपसेही अवाध्यता रूप सत्यताके होनेसे, स्वप्की कामनावत्.सफल: क्रियाकी निः वाहकता रूप अरबाध्यता घटेहै, इसअभिप्राय से कहते हैं । क्यों- कि पुरुषार्थका अर्थात् [धर्म. अर्थकाम और मोक्ष, इन चारोंका नाम पुरुषार्थ है, परन्तु यहां मोक्षको छोड़के अन्य तीनों का ग्रहण है ऐसा जानना ] अव्यभिचारी, साधनहै ताते। और वो. वेद विदित और ऋषियों करके देखेहुये कर्म तिनके संयोगमयहोत्र अध्वर्यव और उद्गात्र, अर्थात् [ऋग्वेदविषेविधानकिया पदार्थ तिसको होत्र कहते हैं, और यजुर्वेदविषे विधानकिया पदार्थ ति सको ध्वर्यव कहते हैं, और सामवेदबिषे विधानकिये पदार्थ ति- - - नको औद्दगात्र कहते हैं, इनतीन प्रकार के कर्मरूप त्रेताबिषे] इन तीन प्रकार स्वरूप आ्धाररूप त्रेतांबिषे, अथवा त्रेतायुगविषे कर्मिष्ट लोगों करके किये हुये, बहुत प्रकारसे प्रवृत्तभये। एतदर्थ हे लोको! 1तान्याचरथनियतं सत्यकामा एषवः पन्थाः स्वक्कृतरय लोके १ सत्यकामहुये तिनको नित्य आरप्रचरसाकरो यह आ्रापको आप करके आचरण किये हुये कर्मके लोकविषे मार्ग है। आप.सत्य- काम.हुये अर्थांत् जैसा विद्यमान है तैसे कर्म फलकी इच्छावाले हुये तिन कर्मोको नित्यनिर्वाह करो। जैसे नगरकी प्रात्तिबिषे
Page 27
प्रथमसुएडके द्वितीयखरंड: । यदा लेलायतेह्यार्ि: समिद्धे हव्यवाहने । तदाडज्य भागावन्तरेसाहुती अतिपादयेच्छुद्या हुतब २११।।
निमित्तरूप मार्गका चलना है। तैसेही यह आपको आापकरके आचरण किये कर्म सो अपने फलरूप लोकविषे, अर्थात् कर्मके फलकी प्राततिविपे निमित्तरूप मार्ग है, अर्थात् जो जो अ्रग्निहों- पादिरुूप भग्वेदादि तीनों बेदों विपे प्रतिपादन किये कर्म हैं, सो यह मार्ग (अवश्य फलकी पाति का साधन) है१।१०॥
हे सौम्य! तिन (कर्भो) मे से आदिविषे तंहां पर्यन्त, अर्थात् प्रन्त:कर सकी शुद्धिपर्यन्त प्रग्तिहोन्रादि देखावने के अर्थ कहेहैं, क्योंकि अ्रग्निहोत्र सर्वक्सो के सघ्य प्रथम है ताते॥। प्र० ॥ सो ऋग्निहोत्र कैसे होता है। उं० ॥१ यदालेलायतेह्य्च्ि:समिद्दे हव्यवाहने जब समिधाओं करके प्रज्वलितभये त्र्प्रग्निविषे.जवा- ला उठती है। जिससमय अर्थात् पातःकाल औोर सायङाल में सर्वओोर से समिधा करके प्रज्वलित भथे अग्निषिषे ज्वाला उठ-
1 तब घृतके भाग मध्यरूप (कुएड) विषे आाहुतियों को डालना श्रद्धासे होम किया है। जिस समय उठतीहुई ज्वालामें दर्श और पूर्णाभासरूप दोनों घृतके भागोंको संध्य कुराड़विपे देवताओ्रपरंका उ- देश करके शाहुतियों को डालना॥ शं० ॥[7 सूर्यायस्वाहा,प्रजा पतथेस्वाहा, इसप्रकार प्रातंःकाल विषे। औरर म्मयेस्वाह और प्रजापतयेस्व्राहा, इसप्कार सायद्वाल विषे, यह दोनों त्रांहु तिया प्रसिद्ध हैं। तव यहीं श्रुतिविषे श्रराहुति शब्दको बहुवचन कैसे है।। स० ॥ अनेक दिवस, पर्यन्त जो आराहुतिको डालनेका शनुधन है तिसकी अपेक्षासे यहां शु तिविषे श्राहुति शब्दको बहुः वचन है] यह सम्यक् प्रकार, शहुति डालनेरूप कर्म परलोक की प्राप्तिके और मार्ग है। और श्रद्धा से जो हवन कियाहै तिलका
Page 28
मुखडक उपनिषद्। थस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्रामासमचातुर्मास्यमनाग्रय रामतिथिवर्जितश्च। अहुतमवैश्वदेवसविधिनाहुतमा सप्तमांस्तस्य लोकान् हिनस्ति ३१२।। सभ्यक प्रकार तरप्राचरण दुष्कर है, अर्थात् तिसबिपे विपतत्तियां त् नेक हैं सो देखावते हैं २। ११॥
अरग्निहोत्र दर्शरहिंत, पौर्समास रहित, चातुर्मास्यरहित, तरययण रहित, अरतिथि रहित है,।त्र्थात् जिसअरग्निहोत्री का ऋग्निहोत्रदर्श नामक कर्म से रहितहै, और पौर्यमास नामक कर्म से रहितहै,और चातुर्मास्य नामक कर्म से रहितहै, और शरदादि कालविषे [नवीन उत्पन्नभये जे अ्र्रन्नादिक तिनसे करनेयोग्य जो] आ्राग्नयण नासक कर्म तिनसे रहितहै। और तैसेही जिसका अग्निहोत्र अतिथि से रहित है, अर्थात् जिस तग्निहोत्री के अग्निहोत्र में नित्यनित्य अ्र- तिथिका पूजन कियाजावे नहीं। और अहु तम वैश्वदेवमविघिना हुतमासतमांस्तिस्य लोकान् हिनस्ति१ होम कियाहोयनहीं, वैश्व- देवसे रहित, तविधि से होम कियाहै, सतलोक सहित नाश करैहै। जिसके अ्रग्निहोत्र कालमें सम्यक प्रकार होम किया होता नहीं; और जिसका अग्निहोत्र वैश्वदेव नामवाले कर्मसे रहित है, और जिसने हवन किया है तथापि सो शविधि से कियाहै सोअग्निहोत्र तिस अग्निहोत्रीरूप कर्ता के सक्षमलोक सहित जो लोक हैं तिन लोकोंको नाशकरनेवत् नाश करे है क्योंकि उक़ कर्सका श्रममात्र- ही फलहै ताते। और जिसकरके कर्मोंको सम्यक करनेसे उनक सोंके परिणामरूप से पृथिवी आदि सत्यपर्यन्त सप्लोकरूप फल (जो ससव्याहृतियों के नामसे प्रख्यात हैं) सो प्राप्त होते हैं। सो लोक उक्कप्रकारके अग्निहोत्रादि कर्म से प्राप्त होने के अयोग्य होने से नाशहुयेकत् होतेहैं, अर्थात् उक्कप्रकारके त्रप्रग्निहोत्रादि कर्मोसे
Page 29
प्रथममुएडके द्वितीयखएड:। :२७ काली करालीं च मनोजवा च सलोहिता या च सुघम् चर्णा। स्फुलिङ्गिनी विश्वरूपी च देवी लेलायमाना इंति सतजिह्वा ४११३॥ एतेषुयश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्याद- दायन्। तन्नयन्त्येताः सूर्य्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पति- रेकोषिवास: ५।१8॥ उंक्र सातलोकों में से किसीकीभी प्रात्ति होती नहीं। और परि- श्रममात्र तो शव्यभिचारतासे भयाही है, एतदर्थ उनलोकों को नाशकरे है ऐसा कहा है।। त्र्र्रथन्रा पिएडदानादिरूप अप्रनुगहंसे सं- म्बन्धको प्रासतभये [यजमान जोहै सो पिता आदि तीनों का पिंड उदकके दानसे उपकार कहै, और पुत्रादितीनोंका अन्नवस्त्रादिकों के दानसे उपकार करता है। एतदर्थ यहां मध्यवर्ती यजसान से सम्बन्धको प्रास्तभये पूर्वले और पिछले तीन तीन ग्रहंणा करते हैं ऐसा कहतेहैं] पिता, पितामह,प्रपितामह और पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र जो आपसहित सातलो कहैं, सो उक्रप्रकार के अरप्रग्नि होत्रादि कर्म से अपने उपकारके करनेवाले होते नहीं। एतदर्थ नाश होते हैं ऐसा कहते हैं। इस उक्ररीतिसे अरग्निहोत्रादि कर्मसे उपलक्षित जो कर्म सो दुष्करहैं ३। १२।। हे सौम्य!"काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या चसु- धूम्रवर्णा।। काली और कराली पुनः मनोजवा, और पुनः सुलो- हिता और जो सुधूम्ररर्णां और 1स्फुलिद्गिनी विश्वरूपी च देवी लेलायमाना इति ससजिहा ॥। स्फुलिंगिनी और विश्वरूपी, पुनः देवी, यह सात जलती (प्रज्यलित) हुई ज्वालारूप त्र- गनिकी जिह्ना हैं। सो त्ंग्निको हवन किये द्रव्यके असन करनें के अर्थ उक्क सपज़िहा हैं। इति सिद्धमू ४।१३।। हे सौम्य! एतेषु यश्चरते ब्राजमानेषु यथाकालं चाहुतपो ह्याददायन्।। इन प्रकाशमान लिषे जो यथाकाल आाहुतियों को
Page 30
२८ !सुणडक उपनिषट। .. एहेहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्थ्यस्य रश्मिमिर्यज मानं वहन्ति। प्रियां वाचाभमिवदन्त्योड़र्व्वयन्त्य एव वः पुरायः सुकृतो ब्रह्मलोक: ६।१५॥ देताहुआ आाचरता है। इन प्रकाशमान अग्निकी जिहा के भेदों बिषे जो अग्निहोत्र का कर्ता कालके विभागानुसार अम्निहोत्रादि रूप कर्मको करता हैतन्नयन्त्येताःसर्य्यस्य रश्सयो यत्र देवानां पतिरेकोधिवास:' तिसको यह ग्रहस करती हुई किरणारूप होके प्रांत करे है जहां एक देवताछोंका पति निवास करता है। विस यजमानको यह यजमान करके करीगई आाहुतियां महण करती हुई सूर्य्यकी किरणरूप होके तिन किरणरूप द्वारसे तिस यजमानको तिस स्वर्गविषे प्राप्त करे हैं। प्र० ॥ किस स्वर्ग विपे प्राप्त करे-हैं।। उ०।। जहां एक देवताओं का पति इन्द्र निवास करता है ५ । १४ ।. हे सौभ्य! सो आहुतियां सूर्थ्यकी किरणों से पजमानको स्वर्ग विषे जिस प्रकार पाप्त करती हैं तिसको श्रवण करो ॥ पेहीति तमाहुतय: सुवर्चसःसूर्य्यस्यरश्मिमिर्यजमानं वहन्ति॥। वे छा- हुतियां प्रकाशमान हुई तिक् यजमानको सूर्य्यकी किरसों द्वारा लेजाती हैं। और कहती हैं। प्र०॥ क्या कहती हैं॥। उ० ॥। प्रिरयांवाचामभिवदन्त्योऽर्च्च्यन्त्य एवं वः पुएः सुकृतो ब्रह्मलो कः१ पूजन करतीहुई प्रियवाणी को कहती हैं कि यह आापका पुरय रूप सुकतका फल बह्मलोकहै।। त्रप्रथत्रा सो आहुतियां आायो २ ऐसे, बोलावती हुई और प्रकाशमान और जैसे ब्रह्मलोक पुएंयका फलरूप है, तैसा यह आपका पुएयरूप सुकत का फलरूप ब्रह्मलोक (स्वर्ग) है इसप्रकार प्रियवाी को कहली हुई और पूजन करती हुई तिस यजमान को सर्य्यकी किरणोंरुपी द्वार मार्ग से लेजाती हैं ६। १५ ॥ हे सौम्य! अब यह उपासनारहित केव्रलकर्म्भ जो है सो जिस
Page 31
प्रथमसुएडके द्वितीयख़एड:। : प्रवाहेते पंढा यज्ञरूपाअष्टादशोक्कमवरंः येषु कर्म। एतच्छेयो येडभिनन्दन्ति मूढा जरां मृत्युं पुनरेवापि यान्ति ७११६ ॥।
करके उक्र फलवाला है, और प्रविद्या काम और कियाका: कार्य है, एतदर्थ पसाररूप औौर दुःखका कारंया है, इसप्रकार तिनके वल कम्मोंकी निंदा वेदभगवान् करते हैं।। मंवाह्योते अंढायज्ञ रूपा अष्टादशोकमवरयेपुकर्म्स। यंह यजके निर्वाहक अधादश शदृद़ कर्मके आपथ्रयहैं और तिसविषे त्र्प्रभरेष्ठ कर्म्म हैं।अर्थात् जिस करके यह यज्ञकें निर्वाहक सोलह त्विक् यजमानकी सी और यंजमान इस भेद से शराध्टादश १= संख्यावाले हैं सो अदढ़ (त्र- स्थिर) इस कर्म्म के आश्रय हैं, इसप्रकार चेदने कहाहै और जिन पष्टादश श्ाश्यों विपे उपासनारहित होनेसे त्ररश्रेष्ठ केवल कर्म है। एतदर्थ उन अशेष्ठ (निकृष्ट) कर्मके आश्यरूप अष्टादश संख्यावालेको अ्रप्रस्थिर औरर विनाशवान् होनेसे तिन्होंकरके सा:य जो कर्म सो फल सहित विनाश को प्राप्त होतेहैं जैसेदूध और दधि आदिकों के आध्यरुप मृत्तिका के पात्रके विनाश से तदाश्रितों का विनाश होता है, तैसेही तिन केवल कर्म के आश्य फल स्वर्गरूपस्थान विनाश होता है। अर्थात् केवल कर्म औरपर तिनके · फल यह दोनों विनाशवान् हैं। जिस करके यह ऐसे हैं तिसही करके एतच्छ्रेयोयेऽभिनन्दन्ति मूहाजर्रामृत्युंपुन रवापियान्ति। 1 जो सूढ़ यह कर्म श्रेय है.ऐसे हर्षको आसहोते हैं सो फेरभी जरा और मृत्युको पावते हैं। जो अविवेकी मूढपुरुष, यह कर्म श्रेय (सोक्षकी साधन) है ऐसे जानके हर्षको प्राप्त होते हैं सो थोड़े ·कालपर्यन्त स्वर्गविपे स्थितहोयके फिर भी जरा मृत्युरूप संसार कोही पावतेहैं। तर्थात् उनका तावागसन कूटता नहीं ७।:१६॥ हे सौम्य! वे सूढ़ त्र्प्रविद्यायामन्तरे वर्त्तमाना: स्वयंधीरा: पाएड -तम्मन्यमानाः ॥ अविद्याके अन्तर वर्त्तमान हुये हमंहीं बुद्धि-
Page 32
मुएडक उपनिषद्। अरविद्यायामन्तरे वर्त्तमानाः स्वयंधीराः परडतम्म न्यमानाः। जङ्मन्यमाना: परियन्ति मूढा अरन्धेनैव नीयमा ना यथाऽन्धा: ८।१७॥ अरविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्य निति बालाः। यत्कम्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात्तेनातुराः क्षी सालोकाश्च्यवन्ते ६। ८॥ मान् पाणडत हैं ऐसे मानतेहैं। वे केवल कर्मकेही आाश्रय श्रेयको माननेवाले सूंढ़ अविद्याके भीतर वर्त्तमान हुये, अर्थात् अत्यन्त विवेकयुक्रहुये, और तत्त्वदर्शी आरचार्यों के उपदेशकी अपेक्षाके विना अपनेही मनकरके, हमहीं वुद्धिमान् और हमहीं जानने योग्य वस्तुके जाननेवाले पिडतहैं, इसप्रकार आपको मानतेहैं। जंघन्यसाना: परियन्ति मूढा अरन्धेनैव नीयमाना यथाऽन्धाः१ सूह अपरत्यन्त पीड़ा को पावते हुये सर्व ओरसे भ्रमते हैं, जैसे तर्न्धेकर के प्राप्त किया अरन्धा (गिरता है)। सो मूढ़पुरुष जरा रोगादि तनेक अ्नर्थ के समूहों करके ये त्त्यन्त खेदको प्रासतहोते हुये सर्वशोरसे भ्रमते हैं, जैसे लोकविषे अ्रन्धे (चक्षुरहित) पुरुषकरके प्राप्त किये जे मार्गके न देखनेवाले त्र््रन्ध (चक्षुविहीन) पुरुष गर्त कंटकादि विषमस्थान विषे गिरते और कष्ट पावते हैं, तैसे वो मूद पविवेकी कर्मी पुरुषभी संसाररूप अ्र्न्धकूप में गिरके कष्टपावते हैं। इति सिद्धम् ८। १७॥ हे सौम्य! "अविद्यार्या बहुधा वर्त्तमाना वयं कृतार्था इत्यभि- मन्यन्ति बालाः।बालक अपरविद्या विषे बहुतप्रकारसे वर्त्तमानहुये हमहीं कवतार्थ हैं ऐसे अभिमानको करते हैं। अरज्ञानीरूप जो बालक (मूर्ख) हैं सो तरविद्या विषे बहुतप्रकार से वर्त्तमानहुये, हमहीं कृतार्थ, अर्थात् प्रयोजनको प्राप्तहुये हैं, इसप्रकार अभिमानको करतेहैं। और यत्कर्मिखो न प्रवेदयन्ति रागान्तेनातुराः क्षीसलो- "शच्यवन्ते॥ जाते कर्मिष्ठ पुरुष रागसे तिस करके आतुर हुये
Page 33
प्रथममुरडके द्वितीयखणड: । ३१ इष्टापूर्तमन्यमाना वरिष्ठंनान्यच्छेयो वेदयन्ते प्रमूढाः नाकस्य पष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरञ्चाविशं न्ति १०।१६॥
क्षीएलोक होते हैं। जिसकरके ऐसे कर्म करने वाले पुरुष कर्मफलकें रागसे होता जो अपना तिरस्कार तिसके निमित्तको जानते नहीं तिसकारससे दुःखसे आतुरहुये क्षीसाभयाहै कर्मका फलरूप लोक जिसका, ऐसे हुये स्वर्गलोक से गिरतेहैं ६।१८ ॥ हे सौम्य। इष्टापूर्त मन्यमाना वरिष्ठ नान्यच्छेयो वेदयन्ते प्रमूढाः॥प्रमूह इषऔरपूर्तको मुख्य जानतेहुये अन्यशेयको जा- नते नहीं। पुत्र पशु और स्त्ी आदिकों विषे प्रमादको प्राप्तहोने क- रके जो सूह, इष्ट कहिये जो यज्ञादिरूप श्रुतिकर के प्रतिपाद्यकरम्म हैं औरपूर्त कहिचे वापी कूप तड़ाग आराम धर्मशालाआदि निर्माण करने यह स्मृतिप्रतिपाद्य कर्म्महैं, तिन्होंको यही तरप्रतिशय करके मुख्यपुरुपार्थ (मोक्ष) कासाधनहै, इसप्रकार चिन्तन करतेहुयेअन्य जो आत्मज्ञानसंज्ञक परम श्रेयका साधन है तिसको तो जानते ही नहीं॥ हे सौम्य! ऐसा जेपरम पुरुषार्थ साधक साक्षात् आत्मज्ञान तिसको न जाननेवाले जे मूढ़ हैं । नाकस्यपृष्ठे ते सुक्कतेऽनुभत्वरमं लोकं हीन तरञ्चाविशन्ति॥। सो स्वर्गके ऊपर (अयन) सुकतके (फलको) अनुभव करके (पुनः) इस लोकको वा त्र्प्रतिशय हीन लोक को पावते हैं। सो स्वर्गलोक ऊपर विद्यमान दिव्य भोगों के स्थान विपे अपने सुकृत कर्म के फलको साक्षात् अनुभव करके पुनः इस मनुष्यशरीररूंपी लोकको त्रथवा इस अनुष्य शरीर- रूपी लोक से अतिशय हीन तिर्यक (पक्षी) श्वान शकरादि नारकी शरीररूप लोकको शेष रहे अपने कर्म्मानुसार पावते हैं। योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरात्यायदेहिनः। स्थागुमन्येन संयान्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्;।।१०।१६।। .हे सौम्य![ उक्र प्रकार केवल कर्मिष्ठों के फलको कहके, त्रप्रब
Page 34
३२ सुरड़क उपनिषद्।1 तपः श्रच्वेयेह्यापवसन्त्यर राये, शान्ताविद्ांसो मैक्ष्यचर्या चरन्तः। सूर्य्यद्वारेण ते विरजा: प्रयान्ति यनामत: सपुरू पोहयव्ययात्मा ११।२०॥ संगुाबह्मकी उपासना सहित आराश्रमके कर्मकरके युक्र पुरुषोंके संसारगोचरही फलकों देखावते हैं]। तपःश्रच्धेयेअपवसन्त्यरगये शान्ता विद्वांसो मैक्ष्य चर्य्या चरन्तः१ जो शान्त विर्द्वान् सिक्षाक अन्नको भोजनकरते हुये अरयबिषे तप और श्रद्धाको सेवन कर-े तेहैं। जो केवल कर्म करनेवाले से अन्य उपासनायुक्क सन्यासी औरवानपस्थ और जो शान्त (जितेंद्रिय ब्रह्मचारी) विद्ान (उपा- सनाप्रधान गृहस्थ) भिक्षनको भोजन करतेहुये संग्ह के अ्र्रभावः से स्तरी शादिक विक्षेपकारी जनसमहोंसेरहित अरायविषे वर्त्तमान हुये अपने आश्रमयोन्य शास्तविहित कर्मरूप तप औरर हिरएयग -: मदिकों को विषय कर नेवाली। उपासनारूप श्रद्धा इन दोनोंको। यथाविधि सेवनकरते हैं। सूर्यद्ारेश तेविरजा: प्रयानित, यत्रामृ- तः सपुरुषोहावययादमा। सो सूर्यछवारसे विरजहुये जाते हैं जिस विषे अमृतरूप सो अविनांशी स्वभाववाला स्थित पुरुष हैसो सर्थ्य करके उपलक्षित जे.उत्तरायसरूप द्वार तिस द्वारसे विरज़ हुये, अर्थात् मानो पुरायपाप कर्मरूप मलसे रहित हुयेहोवें तैसेहुये, तिसविषे जातेहैं, कि जिस सत्यलोक्का विकोंबिषे अमृतस्वरूप सो पंथसउ़त्पज्ञभया और अर्प्रविनाशी स्वभववाला, अर्थत यावत्पर्यनत संसारहै तावत्पर्यन्त रहनेवाला हिर्यग़र्भरूप पुरुषहै:।। हे सौम्य ! 1 यहांपर्यन्ततो त्र्प्र परविद्या के आश्रंय प्रापहीने योग्य संसार की गतियां हैं। कई एक पुरुष निश्चय करके, ब्ह्मलोककी प्राततिरूप मोक्षकी इच्छा करते नहीं, किन्तु इहैव सर्वे पविली यन्ते कामास्ते सर्वंग स- ... वत पाप्य पीरा सुकात्मान:सर्वमेवाविशन्तीति, यहांही अर्थात् मुक्र पुरुषोंके यहांही सर्वकाम के अ्रभावको और सर्वात्मभावकोश्रुतिरयां *- देखावे हैं। और ब्रह्मलोककी प्रासितो देशसे परिच्छिन फल है,
Page 35
प्रथममुए्डके द्वितीयखरढः। परीक्ष्य लोकान् कर्म्मरचितान ब्राह्मणोनिर्वेदमाया न्नास्त्यकृत: कृलेन.॥ तद्विज्ञानार्थ सगुरुमेवाभिगच्ेत्स मित्पारि: श्रोत्रियं न्रह्मनिष्ठम॥ १२।२१॥ पप्र्थात् किसीएक देशविपे हैं, ताते सोक्ष नहीं है, इसप्रकार यहां कहते हैं] तिनके सर्वकाम पररंभाव होते हैं।। और वो धीरपुरुष एकाय्र चित्तवाले हुये सर्वगत व्यापक वस्तुको सर्व्रोरसे पायके सर्व्वां- त्मभावको पावते हैं, इत्यावि श्रुतियों से और पसंगसे यह जो ऊपर कहीगई सो अपरविद्याके न्रामरित मतिहैं, इस प्रकार जाना- जाता हैं। और जिसकरके यह प्रसंग, अपर विद्याके प्रसंगके प्रवृत्त हुये पप्रकस्मात् प्रवृत्तमयाहै, एतदर्थ यह मोक्षका प्रसंग नहीं है। और पुएयपापरूप कर्मकी क्षीणतारूप विरजपना जो कहाहै सो तो आपेक्षिकहै, एतंदर्थ समस्त साध्य और साधनरूप क्रिया कारक और फलके मेदसे भिन्न हिरएयगर्भकी प्रातिपर्यन्त जो द्वैतहै इत- नाही अपर विद्याका कार्य है।। तैसेहुये स्थांव्ररादिरूप संसारकी गतिको उन्लंघन करनेवांले पुरुषोंको :नहा विश्वसरजो धर्मो महा- नव्यकमेवच। उत्तमां सात्विकीमेता गतिमाहुर्मनीषिय इति "त्रह्मा, मरीच्यादि प्रजापति, यम, महतत्व (सूत्रात्मा) और अव्य- क्र (त्रिगुणात्मक प्रकृति) रूप. इस. गतिको पंडिंतजन सात्विक उत्तमगति कहतेहैं। इस स्मृतिके प्रमाणसे ब्रह्मलो कादिकी प्रात्ति- रूप उत्तमगति होतीहै यह सिद्धभया ॥११॥२०॥ हेसौम्थ ! अव इससाध्य और साधनरूप सव संसारसे विरक्र पुरुषको ब्रह्मविद्याविषे अधिकार के देखावनेके अर्थ यह कहते हैं परीक्ष्य लोकान् कर्मरचितान् ब्राह्मरो निर्वेदमायान्नास्त्यक्ृंतः कृतेन ब्राह्मण कर्ससे रचित लोकों को निश्चयकरके वैराग्य को करे अकृत नहीं है कृतसे क्याहै।:यथैकतासमता इंति स्मृते :- ब्राह्मणका जैसा एकता समता और सत्यता (आादिरूप)
Page 36
३४ मुएडक उपनिपट्ट। प्रधान व्यवहारवाला होने से ब्रह्मविद्याका मुख्य अधिकार ब्राह्मकोही है [इस अभिप्राय से यहां श्रुतिविषे अधिकारीका, विशेषणारूप न्राह्मगापद है ] ब्राह्मण जो है सो अविद्याशादिक दोषवाले पुरुषके प्रतिही विधान किया होनेसे स्वाभाविक अ्रविद्या काम और कर्मरूप दोषवाले पुरुपकरके अप्रनुष्ठान करने योग्य जो यह ऋग्वेदादिरूप अपर विद्याका विषयहै, तिसको। और जो तिस अनुहानके कार्य हुये फलरूप लोक हैं, और जो विहित कर्मका अकरण, और प्रतिषेध कर्मका करना, और मर्य्यादा के उह्लंघनरूप दोषकरके साध्य जे नरक तिर्यक प्रेतादि योनिरूप नरक हैं, तिन संसारकी गतिरूप त्र्प्रव्याकृतादि लेके स्थावर पर्थन्त व्याकृत और अध्याकृतस्वरूप, चीज और अंकुरवत् परस्परकी उत्पत्तिके निमित्त अ्नेक शत और सहस् अनर्थों करके पूर्ख कदलीके स्तम्भवत् पसारमूत, माया (छल) मरीचि जल गन्धर्वनगरके प्रकार, स्वन्, जलगत बुद्बुद और फेनके तुल्य प्रतिक्ष नाश होनेवाले,पीछे से देखे हुये अविद्या और कामरूप दोषकरके प्रवृत्तभये धर्म अरधर्मरूप कर्म से रचित लोकनको, प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, और शब्द (शास्त्र) रूप इनचार प्रमाणोंसे [इस लोकसम्बन्धी कर्मके फल- रूप पुत्रादिकों के नाशको विषयकरनेवाला प्रत्यक्ष प्रमाण है। और विवादका विषय स्वर्गादिक अनित्य है; कियाकरके साध्य होने से, घटवत्, यह अनुमान पर लोकसम्बन्धी फलके नाशको विषय करनेवाला। : तदथेह कर्मचितो लोकः क्षीयत, । सो जैसे यहां कर्मकरके सम्पादित लोक क्षयको पावताहै। तैसे वहां :पुएय- चितो लोक: क्षीयत,। पुएयसे सम्पादित किया लोक क्षयको पावताहै। इत्यादिरूप शब्द (तगम) प्रमाण है। तीन प्रमाणों कर के अनित्य होनेसे सर्व प्रकारसे निश्चय करके यह अर्थहै] सर्व ओोरसे यथार्थपने से निश्चयकरके, तिनसे वैराग्यको करे। सो दैराग्यका प्रकार देखावतेहैं, इस संसारविषे कोई भी त्ररकरृत (अ्र-
Page 37
प्रथममुएडके द्वितीयखएड: । ३५ कर्मरचित होने से अनित्य हैं 'ताते कुछमी वस्तु नित्य नहीं यह अभिप्नाय है। और सम्पूर्ण कर्म अनित्यकाही साधन है। और जिसकरके उत्पत्ति होनेयोग्य, वा प्राप्ति होने योग्य; वा संस्कार करने योग्य, वा विकार करनेयोग्य इनभेदसे चारपकारकाही स- . मस्त कर्मका कार्य है। एतदर्थ इससे पर (अन्य) कर्मका विषय नहीं हैं। और मैं, नित्य, तमृत, पभय, कूटस्थ (परिणामरहित) अचल (स्फुरसरहित) घ्ुव(प्रयतरहित),वस्तुसे अर्थ(प्रयोजन) वालाहा, तिससे विपरीत वस्तुसे प्रयोजनवाला, नहीं। एददर्थ बहुत श्रमकरके युक्न और अनर्थके साधनरूपकृत (कर्म) तिनसें क्या प्रयोजनहै इसप्रकार वैराग्यको प्रास्तहोवे। पश्चात् तदि- ज्ञानार्थ सगुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्। सो समित्पागिहुआ तिसके विशेषज्ञानार्थ श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु के ताईही शरसको प्राप्तहोयां सो वैराग्यको प्राप्तभया ब्राह्मणा, समिधोंका भार ग्रहण किया है जिसने अर्थात् अगर्वता विनयता आरादि दैवीसम्पत्तिमान् ऐसाहुआर्र, अ्रभय शिवअकृत और नित्य- रूप जो पदहै तिसकी विशेषकरके प्राप्तिके अर्थशम दम और दया करके सम्पन्न श्रोत्रिय, अर्थात् वेद शास्त्र अध्ययनकिये और तिनके अवसकिये तर्थ करके सत्पन्न, और ब्रह्मनिष्ठ, सर्व क्रमोंको त्याग के केवल अद्वैतरूप ब्रह्मविषे जिसकी निष्ठा होय [ यहां ज्ह्मनिष्ठ शब्द है सो तपोनिष्ट शब्दवत् है। और जिसकर के कर्म और आ्रात्म- ज्ञान इन दोनोंका परस्पर विरोध है, तिसही करके कर्मिष्ठ पुरुष को ब्रह्मनिष्ठता सम्भवे नहीं। एतदर्थ ही यहां सर्व कर्मको त्याग के ब्रह्मविषे निष्ठा कही। और त्रप्रमुक कर्मके करनेसे परमुक फलकी प्राप्ति होगी, और तिनके न करने से प्रत्यवायआरदि अ्रनर्थ की प्राप्तिहोगी, इस बुद्धिपूर्वक जो कर्मका अथवा किसी अन्य साधन का करना, तिसको कर्त्तव्य कहते हैं, तिस कर्तव्यकी बुद्धिका जो त्याग सोई यहां सवर्कमका त्याग है कियामात्रका त्याग नहीं] ऐसे सद्दगरुकी शरणको प्राप्तहोय। सो ब्राह्मण तिस गुरुके अर्थ
Page 38
मुएडक उपनिषद। तस्मै सं विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय। येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो
इति प्रथममुरडकगतद्वितीयखएडः समाप्तः II: इति प्रंथमभुएडंकम ।। शास्त्रके अनुसार समीपर्गयाहुआ्रा गुरुको सेवाआ्प्रादिकों से प्रसन्न करके सत्य और श्रक्षर (अविनाशी) रूप पुरुषको पूंछे॥१२२१॥ हे सौम्य! ' तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शुमान्विताय॥। तिस समीप आराये शान्तचित्तवाले शम कस्के युक्के अर्थ सो विद्वान्, तिस शास्त्रानुसार समीप पराये शान्तचित्त वाले. अपर्थात् गर्वादिदोषरहित, और बाह्य ज्ञानेन्द्रियोंकी उपरति रूप शमकरके युक्त (सर्व से विरक) शिष्यके तर्थ सो विद्वान्, अर्थात् ब्रह्मनिष्ठ गुरु।५येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोषाच र्ता तख- तो ब्रह्मविद्याम्। तिससे सत्य और अक्षर रूप पुरुषको जान- ताहै तिस ब्रह्मविद्याको यथार्थ कहै। जिस परविद्यारूप विज्ञानसे ऋदृश्यत्वादि विशेषणावाले सत्य और त्रक्षररूप, [त्र्रवयवोंके अन्यथा भावरूप परिशामस्वरूप क्षरगासे रहित होने से, औ्रप्रौर शरीर रहितरूप शक्षतपने से, और विकाररूप क्षयसे रहित होने से यह पुरुष (आत्मा) को अक्षर कहते हैं ] पुरुषको जानताहै, तिस ब्रह्मविद्याको यथार्थ कहै॥ आ्चार्यकाभी यह नियम है जो, न्यायसे प्राप्तभये शिष्यको त्रप्रविद्यारूप अरप्रपार महोदिसे उद्धार करना ॥ १३। २२॥ इति मुएडकउपनिषद्गत प्रथममुण्डकके द्वितीय खएडकी भाषाटीका समास ॥I
Page 39
द्वितीयमुएडके प्रथमखरडः। अथ द्वितीयमुएडके प्रथमखएड प्रारभ्यते॥
तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्रात् पावकाडिस्फुलिङ्ा सहसश प्रभवन्त स्वरूपा। तथाक्षराद्विविधाः सोग्य भावा: प्रजायनते तत्र चैवापियान्ति ॥१२३॥ द्विती यमुरडकम तप्रथमखए डकी भाषाटीका का, प्रारम्भ।। हे सौम्य ! यहां पर्यन्त त्र्प्रपरविद्याका सर्वकार्य कहा, अरथात् [ दद्वेविदयेवेदितव्ये, दोविद्याजानने को योग्य है। यह इस उप- निषट् के प्रथम मुएडकके प्रथम खराडके चतुर्थ मन्त्र से दोनों विद्याके कहनेका आरम्भकरके, प्रथम मुए्डक से अपर विद्याका वर्सानकरके परविद्याका वर्गान करनेको द्वितीय मुएडकका प्रारम्भ है, इस प्रकार यहां कहते हैं] अब सो अपर विद्याकांकार्य (विषय) रूप संसार जिस सारवाला है, और जिस अक्षरनामवाले मूल से उपजता है, और जिसविषे लीन होता है, सो पुरुषनामवाला अ्क्षर सत्य है। और जिसके जानने से यह सर्व जानाजाता है, सो परारूप ब्रह्मविद्याका विषय है सो कहने योग्य है। ताते यह उत्तरग्रंथ को आरम्भ करते हैं। [ जैसा पूर्वकर्मका भी सत्यपना कहा है, तैसाही यह पर विद्याके विषयका सत्यपना माननेको योग्य नहीं ऐसा कहते हैं] जो अपराविद्याका विषय कर्मका फल सत्य है सो आरपेक्षिकहै। और यह पराविद्याका विषय तो परमार्थ से सत्य- रूपहोने करके। तदेतत्सत्यम्१1 सो यहसत्य हैं। सो यह विद्याका विषय सत्य यथार्थहै। और अरपरन्यन्रविद्याका विषय होने से मिथ्या है। [ यहां यह हार्दव है ब्रह्मको, पुएयपापरूप अधूर्ववत् अत्यन्त' परोक्षताहै, तिसकरके अर्थात् एक शब्द (शास्त्र) रूप प्रमाणकर के जानने को योग्य है ताते उसका प्रत्यक्षज्ञान सम्भवता नहीं, और मोक्ष जोहै सो साक्षातकार के आधीन है, विना ब्रह्मके साक्षात
Page 40
*सुएडक उपनिषट्। कैसे प्रंत्यक्ष प्रमाणवत् प्रास्तहोवेंगे। इस अ्रभिप्रायसे जीवब्रह्मकी एकता बिषे दष्टान्त कहते हैं। यहां यह अर्थहै कि ब्रह्म आत्माकी एकता होनेसे, जव प्रत्यकूरूप आ्रप्रात्मा अ्रप्रपना आ्राप तप्रपरोक्षहै तब ब्रह्मका भी जैसे एकदेशी घटके प्रत्यक्ष ज्ञानहोने से सर्वदेशके सर्व घटोंका ज्ञान प्रत्यक्ष होता है तद्वत्, प्रत्यक्षपना होगा यहां उक्र. दष्टान्त और सिद्धान्तका यह वर्णान है कि जैसे अरग्नि के सूक्ष्म अवयवरूप विस्फुलिङ्गों (चिनगारियों) विषे भिन्न भिन्न देशके अरवच्छेदसे, अरथात् पृथक् २ देशोंकरके युक्र होने से आराकार अ्व- यवादि पनेका व्यवहार है, अर्थात् अग्निकी चिनगारियों विषे पृथक् २ आरप्रकारादि विकार व्यवहार है परन्तु स्वरूप करके फेर भी सर्वचिनगारियों विषे एक समान अरग्निरूपताही है, क्योंकि उष्णता और प्रकाशता का त्र्प्र विशेषपनाहै ताते, अर्थात् सर्वचिनगा- रियोविषे उष्णता और प्रकाशतालक्षणवाला निर्विशेष अरप्रग्नि एक हीहै तैसेही चैतन्य रूपताके तप्रविशेषसे जीवोंको स्वरूपसे ब्रह्मरूप- ताही है अर्थात् जैसे सोपाधि अग्निके नानाप्रकार विस्फुलिङ्गहोते हैं परन्तु तिनसर्वविषे निरुंपाधि समान उष्णता और प्रकाशतारूप लक्षणावाला अग्नि एकही है, तैसेही मायोपाधियुक्र चैतन्यरूप अग्निसे नानालिङ्ग (जीव) रूप विस्फुलिङ्ग पृथक् २ निकलते हैं -परन्तु तिन सर्वबिषे चैतन्यतादि लक्षणवाला निरुपाधि ब्रह्मएक- ही होने से सर्व जीवों को स्वरूपसे ब्रह्मरूपताही है ] श्रक्षरवस्तु को अत्यन्त त्रपरोक्ष होनेसे प्रत्यक्ष (घट) वत् कैसे प्रासहोवेंगे, इंस शङ्गाको मनविषे ल्यायके दष्टान्त कहते हैं १ यथा सुदीक्षात पावकाद्विस्फुलिङ्गा: सहस्रशः प्रभवन्ते स्वरूपाः १ जैसे भली, प्रकारकरके प्रज्वलित भये त्रप्रग्निसे त्रप्रनेक अ्रग्नि के समान रूप. वाले विस्फुलिङ्ग निकलते हैं। जैसे भलीप्रकारसे प्रज्वलितभये ऋग्नि से सहस्रावधि अग्निके समानरूपवाले अ्र्प्रग्निके त्प्रवयव रूप विस्फुलिङ्ग (चिनगारे) निकलते हैं। १ तथाऽक्षराद्विविधाः सान्य भावा: प्रजायन्ते तन्र चैवापियान्ति॥ हे सौम्य! तैसेही
Page 41
द्वितीयमुएडके प्रथमखएडः । ३६ दिव्याह्यमूर्त्तः पुरुषः सवाह्याभ्यन्तरो ह्यजः।अर्रभाणो ह्यमना: शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः॥ २२४॥ अक्षर से विविध भाव उपजते हैं, पुनः तहांही लीन होते हैं। हे सौम्य ! हे प्रियदर्शन! तिसही प्रकार उक्र लक्षणवाले त्रप्रक्षर से आकाशादिकोंवत् नाना देहरूप उपाधि के भेदके अनुसारही होने से विविध (नाना) प्रकारके भाव (जीव) उपजते हैं जैसे घटादि उपाधिकर के परिच्छिन्न नानाप्रकारके आकाशरूप छिद्रके भेद, घटादिकों के भेदके अनुसारही होते हैं, इसही प्रकार जीव भी :- नाना नामरूप रचित देहरूप उपाधिके भेदके अनुसारही होते हैं। और पुनः भी घटादिकों के विलय भये पश्चात् आ्रराकाशरूप छिद्रन के विलयहोनेवत तिसही अक्षरविषे देह (लिंग) रूप उपा- घिके विलयभये पश्चात् लीन होते हैं। और जैसे आकाश को छिद्रों के भेद के उत्पत्ति और प्रलय का निमित्तपना जो है सो घटादि उपाधियोंका कियाहै, तैसेही अक्षरको भी जीवोंकी उत्प- त्ति और प्रलयका निमित्तपना जो है सो नामरूप कृत देहउपाधि रूप निमित्तका कियाही है।।१।२३ ।। हे सौम्य! श्रव[शरक्षर पुरुषको जो उपाधिका किया जीवों की उत्पत्ति और प्रलयका निमित्तपना कहा, सो कार्य कार भात्रकरके तिनकी पभेदताकी सिदर्थ है। और परमार्थ से स्तुतिरूप निमित्तवाला जीवोंकी उत्पत्ति और प्रलय का निमिच् भावभी नहीं है, ऐसा कहते हैं [ नामरूपके बीजभृत श्रव्याकृत नामवाले और अपने कार्यकी अपेक्षा करके पर (श्रेष्ठ)त्र्रक्षरसे पर जो सर्व उपाधियों के भेदसे रहित, और आकाशवत् सर्व मूर्ति (आकार) से रहित, और नेतिनेति,। कार्यरूपभी नहीं और कारस रूपभी नहीं। इत्यादि विशेषसवाला जो अक्षरकाही स्वरूप है तिसको कहनेकी इच्छाकरते हुये कहते हैं। "दिव्योह्यमूर्त्त: पुरुषः
Page 42
४० 1 सुएडक उपनिषद्। अजही वर्त्तताहै। जो स्वयंज्योति रूप होने से दिव्य (प्रकाशमान) है, अथवा अपने आत्मरूप स्वर्ग विषे स्थित है, एतदर्थ दिव्यहै, अथवा अलौकिकहै ताते दिव्यहै। और जिसकरके सर्व मूर्त्ति से रहि तहै इसही से अभूत हैं। और पूर्स है, अथवा शरीररूपी पुरियों विषेरहताहै ताते पुरुष है। ऐसादिव्य और तपमूर्त (आकाररहित) जो पुरुष है सो बाहर [देहकी अपेक्षासे जो वाहर और भीतररूप वेशप्रसिद्धहै तिसकेसाथ ही तादात्यंसे, अथवा तिसके अधिष्ठान- पने से वर्त्तता है, एतदर्थ सबाह्याभ्यन्तरः'वाहर भीतर सहितहै। एतदर्थ सर्वरूप होनेसे तिससे पृथक जन्मके निमित्तका पप्रभावहै तातेप्रज (जन्मरहित) है] औ्र्स्भीतरके देशकरके सहित वर्त्तता हैं। और अजन्मा है, अर्थात् किंसी से भी जन्मको पावता नहीं, 1 क्योंकि स्वरूप से जो अजन्माहै तिसके जन्मके निमित्तंका अ्रभाव है ताते। और जैसे स्वरूपसे जन्मवाले जलगत वुदबुद आदिकों के जन्मके निमिन्त वायुआरादिक हैं। और जैसे स्वरूपसे जन्मवाले आकाशके छिद्रों के भेदक जन्मके निमित्त घटादिकहैं, तिसप्रकारे स्वरूपसे जन्मरहित परमात्माके जन्मका निमित्त नहीं है। और एतदर्थसर्व [जायते (जन्म),अंस्ति (प्रकटता), विपरिणमते (वि परिणाम),अपक्षीयते (तर्रपक्षय), विनश्यति (विनाश.), इनया- स्कनामवाले सुनिने निरुक्नामक गन्थ बिषे कथन किये षट- अंनिर्वचनीय भवरूप विकारोंके निषेध विषेशजशब्दके तात्पर्यको कहते हैं] भावरूप विकारोंको जन्मरूप मूलवाले होने से तिसजन्म के निषेधसे सर्वविकार निषेधको प्रातहोते हैं। और जिसकरके यह - पुरुष बाहर भीतर रहित है और अरजन्माहै, इसहीसे अजर है, अमृ- तहै, अ्रक्षयहै, ध्रुव है, और अभयहै, यह अर्थ है।[जीवोंको प्राख पादिककरके युक्रहोने से तिनकी स्वरूपताकेहुये ब्रह्म कोभी पाएं आरादिककरके युकपना प्राप्तभया तिसको निवारण करते हैं] यवपि देहादिक उपाधियोंके भेदकीदृथ्टिवाले पुरुषोंकी तलमल आदिक
Page 43
द्वितीयमुएडके प्रथमखर्ड: । प्राएासहित मन सहित इन्द्रिय सहित और विषय सहित प्रतीत होता है, तथापि स्वरुप से परसार्थ करके देखाहुंआा क्रियाशक्ति के भेदवाला चलन रूप प्रसिद्ध विद्यमान प्ाणावायु जिसविषेवद्य- मान नहीं है यातेत्रपाणोह्यमना: शुभ्री धक्षरात्परतःपरः। प्रासहै अमनाहै शुभ्है श्क्षर से पर सो पुरुषहै। पुरुष परं्राण है:। औौर तैसेही अनेकज्ञान शक्रिक भेदवाला सङल्पादिकरूपमनभी जिस विपे अवद्यमानहै, एतदर्थ यह पुरुष त्रमना है यहां अप्राय औौर चमना; इस कथनसे प्रासादिक वायु के भेद, कर्मेन्द्रियां और तिनके विषय, तैसे मनबुद्धि ज्ञानेन्द्रिर्या और तिनके विषय, निषेधं कियेजानने ।और जैसे :ध्यायतीव लेलायतीव, ध्यान करतेहुं- 7 येवत् औररौर लीला (कीड़ा) करतेहुयेमत् है। इसअन्य श्रुतिविषेदोनों उपाधियों के निषेधसे सर्व उपाधियों का निषेध जनायाहै, तैसही यहांभी जानलेना और जिसकरके उक्रप्रकार उपाधियों से रहित ऋद्दैतरूपहै, तिसही करके शुप्र (शुद्ध)रूपहै। और जिसकरके शुभ्र है, इसहीसे नामरूपके चीज (ब्रहम) का उपाधि होनेकरके लक्षित है स्वरूप जिसका, ऐसे माया उपाधिरूप और तिस उपाधिकरकें विशिष वशरूप सर्वकार्योसे पर। [नन, मायातत्त्वरूप श्रक्षसं को परपना कैसे है इस संगथ के होनेसे कहते हैं, जिसकर के साया- तत्व समस्त कार्य कारणका ब्रीज होनेकरके लखिये हैं, तिसकर के परं है। और कार्य जो है सो अपर (अश्ेष्ट) रूप प्रसिद्ध हैं। और जो तिसकार्यका कारण होनेकरके जानने बिषे आवता हैं एतदर्थ मायावेत्वपर (भ्रेष्ट) है। और योकिकबाधसे अनिर्वचनीय हुये भी तिसके स्वरूपके उच्छेद (नाश) के अभाव माया तत्त्व शक्षर है। सो गीताशाल के पन्द्रहवें अध्यायविषे कहा है:सरःसर्वाणि
हंत:१ ससर्व (कार्यकारशरूप) मतक्षर हैं। और कूटस्य (कफ्टवत्). मिथ्या स्थित होनेवाला मायातत्व क्षर है। और उत्तमपुरुष तो इनसे अन्यही है जो परमातमा नामसे कहा जाता है] (भेष)
Page 44
४२ सुएडक़ उपनिषद्। एतस्माजायते प्राणो मनःसर्व्वेन्द्रियाषि च। खंवायु ज्योतिरापःपथिवी विश्वस्य धारिणी।। ३।२५।। श्क्षर से पर (निरुपाधि) सो पुरुष है। यह अर्थ है।। प्र० ॥। ननुजिस विषे सो आकाशनासक पक्षर सम्यक् व्यवहार का विषय हुआ ओर्प्रत और प्रोतहै, तिसश्पक्षर पुरुषको पुनः प्राण दिकों से रहितपना कैसे है।। उ० ॥ जव प्राणादिक अरपनी उत्पत्ति से पूर्व पुरुषवत् अपने स्वरूपकरके विद्यमानहोय तव पुरुषको विद्यमान प्रागादिकों से प्राणादिवान्पना होय। परन्तु वे प्राशादिक अ्रपनी उत्पत्तिसे पूर्व विद्यमानहैं नहीं, एतदर्थ पुरुष (शक्षर) प्रामादिकों से रहित है। २।२४॥। हे सौम्य 1 जैसे पुत्रके अनुत्पन्नभये देवदत्त पुत्र से रहित है ऐसा कहते हैं। तैले परमात्मा नामवाले पुरुष को वे प्राणादिक कैसे विद्यमान नहीं हैं। यह शंका विचार के कहते हैं । [जोई चैतन्य निरुपाधि शुद्ध अविकल्परूप ब्रह्म, तत्वज्ञान से जीवों का कैवल्य मोक्षरूपहै, सोई ब्रह्म मायाविषे प्रतिबिम्बरूपसे स्थित हुआ कारण होता है ऐसा कहते हैं] 1 एतस्माजायते प्राणो मनःस्व्वेन्द्रियाणि, च १ इससेही प्राण उपजे हैं, और मन और सर्व इंद्रियां (उपजे हैं)। जिसकरके नाम रूपके बीज (ब्रह्म) के उपाधि करके लक्षित इस पुरुष सेही तविद्या के ताधीन: [जब प्रासकी उत्पत्ति से पूर्व पत्माको प्राणसहितपना नहीं है, तब प्राणकी उत्पत्तिसे पश्चात् प्रात्माको प्राणसहितपना होगा.। इस शंकाकी निवृन्ति के अर्थ प्रसिद्ध प्राणाके विशेषणको कहते हैं] कार्यरूप नाममात्र मिथ्यास्वरूप प्राण उपजता है : वाचारम्भणं विकारोनामधेयमिति,! वाणीसे उच्चारण किया विकार (कार्य) नाममान्रहै। इस छन्दोग्यकी श्रुतिसे। तिस हेतुसे, जैसे पुत्ररहितः देवदन्त को स्वननविषे देखेहुये पुत्रकरके पुत्रसहितपना नहीं है, तैसेही अविद्याके विष्य (आधीन) और गुरायुक प्राससे परपुरुष 1
Page 45
द्वितीयमुएडके प्रथमखएडः । ऋप्रग्निर्मर्द्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्य्यौ दिश: श्रोत्रे वाग्विट- त्ाश्च वेदाः। वायुः प्राणो हृदय विश्वमस्य पद्धर्ांपृथिवी ह्येष सर्व्वभतान्तरात्मा॥४।२६॥ का प्रास सहितपना नहीं है। तैसेही मन और सर्व इन्द्रियां और तिन के विषय इसही पुरुपसे उपजते हैं। एतदर्थ इस पुरुषको आरोपसे रहित (यथार्थ) प्रासादिकसे रहितपना सिद्धभया। और जैसे वे प्राखादिक अपनी उत्पत्ति से पूर्व परमार्थ से अ्रविद्यमानहैं, तैसे- ही उत्पत्तिसे पीछे तिसहीविषे लीनहोते हैं, इसप्रकार जानना। और जैसे इस पुरुष से मन और इन्द्रियरूप करण उपजते हैं, तैसेही शरीर और विषयों के कारण खंवायुर्ज्योतिरापःपृथिवी वि- श्वस्यधारिसी आकाश वायु अ्र््ति जल और्पौर विश्वके धारण करनेवालीपृथिवी (उपजेहैं)।आ्र्रकाशऔरौर आ्र्प्रावहृआ्र्रादिक सातभेद' वाला वाह्यका वायुऔर अग्नि और जल और विश्व को धारण करने वाली पृथिवी, यह शब्दस्पर्श रूपरस और गन्धरूपपिछले २ गुय वाले और पूर्व पूर्वके गुसारहित पंचभूत इसही पुरुषसे उपजते हैं।। दिव्योह्यमूर्त: पुरुपः१। दिव्य त्रप्ररसूर्च पुरुष है। इत्यादि मन्त्र से निर्विशेष सत्य शक्षर पुरुषरूप परवद्याके विषयको संक्षेप से कहके पुनः सोई पूर्वोक सविशेष वस्तु अब सविस्तर कहने को योग्यहै। और जिसकरके सूत्रभाष्य की युक्किवत् एकही प्रसङ्ग विषे संक्षेप और विस्तारसे कहाहुआ पदार्थ सुख से जानने में 1
धावता है, एतदर्थ पूर्व संक्षेप से कथन किये निरुपाधिक वस्तुको अब सोपाधिकपने करके सविस्तर कहते हैं॥ ३। २५॥ हे सौम्य!जो प्रथम उत्पन्नभये हिररायगर्भ रूप प्राससे उपजा है। और अन्यतत्व सहित आकाशके स्वरूपसे लक्षविषे भावता है ऐसा जो इस हिरएयगर्भ के भीतर वर्तमान विराड है सो भी इसी पुरुष से उपजा है और इसी का स्वरूप है. इसी अर्थको कहते हैं। और उस विराडपुरुषको विशेषण देते हैं अग्निर्मूर्द्धा
Page 46
४४; सुएडक उपनिषद्। चृक्षुषी चन्द्रसूर्थ्योदिशः श्रोत्रे वाग्विवृत्तारचवेदाः श्ग्नि मस्तक चन्द्रसूर्य दोनों चक्षु दिशा भोत्र प्रसिद्ध वेद हैं वासी (जिसकी)। हे गौतम ! :असौवाव लोको गौतमांग्निरिति श्रुतेः' यह प्रसिद्ध स्वर्गलोक अ्र्रग्नि है, इस श्रुतिकरके, अर्पग्नि जो स्वर्गलोंक सो. है मस्तक जिसका। और चन्द्र सूर्य हैं दोनों चक्षु जिसके औ्ौर दशो दिशा हैं कोत्र जिसके और पसिद्द चारोंवेद हैं वाखी जि- सकी । और 'िायु: प्राणो हृदयं विश्वमस्य पञ्चयां पुथिवी द्येप सर्वभतान्तरात्मा ॥ वायु है पस (और), समस्त, विश्वहै हृदय. जिसका (और) पादोंसे पथियी है यह सर्व भूर्तोका अन्तरात्माहै। वायु है आाए जिसका। और समस्त जगत् है हृदय (अ्न्तः करण) जिसका। एतदर्थ अन्त:करणका विकाररूपही सर्वजगत् सनविषे ही स्थितहै, क्योंकि सुषुप्ति विषे जगतका प्रलय देखते हैं। और जायत् वेषे भी किसी मनसेही, अग्निसे चिनगारेवत, उत्पन होता है, एतदर्थ यहां सर्व विश्वविराड्का अन्तःकरण कहा है। और 1 जिससे दोनों चरणोंसे परथिवी भई है। यह प्रथस शरीरधारी त्रैलोक्यमय देहरूप उपाधिवाला अनन्तरूप विष्यादेव आकाशादि सूर्व भूतोंका अन्दरात्सा अर्थात स्थूल पंचमृतरूप शरीरवाला विशड् है। सोई सर्वभूलों विषे द्रष्टा ओोता मन्ता विज्ञाता और सरच करणोंका स्वरूप है। और पांच, अर्थात [स्वर्गलोक, मेघ, पृथिवी, पुरुष और स्त्री, इन पांचोविषे अग्निकी दृष्टिको, अान्य: कान्दोग्य उपनिषद्क्ें पंचसाध्याय सम्बन्धी पंचाम्निविद्याविषे उक होनेसे उन स्वर्गादिक ] पांच अग्निरप द्वारसे जो प्जा व्यवहार करे हैं सो प्जाभी उसी पुरुषसे उपजे हैं, इसप्रकार अब अगिले मन्न करके कहते हैं ॥ ४/ २ ६ू.।। :हे सौन्य। : तस्ना दग्नि: समिघोयस्यसूर्य्यः१।जिससे त गन होता है कि जिसका समिध सर्य्य है। तिस पुरुष से प्रजाकी स्थिति विशेषरूप जो स्वर्गलोकरूप अग्नि है सो उत्पन्न होताहै, कि जिस अग्निका सूर्य समिधावत् समिध है। और जिस करके
Page 47
द्वितीयमुएडके प्रथमखसड: । तरमादरिनः समिधो यस्य सूर्य्य: सोमात्पर्जर्जन्य पोषधयः पृथिव्याम्। पुमान्रेत: सिञ्चति योषितायां वह्नी: प्रजा: पुरुषात्सम्प्रसूता:॥५।२0 सूर्य्य से स्वर्गलोक प्रकाशित होता है तिसकरके सथ्य उसका सं- मिधहै, स्वयंप्रकाशी गोलही स्वर्गलोक है। औौर 1सोमात् पर्जन्यश्रोषधयः पथिव्याम् चन्द्रमा से मेघ और पृथिवीविषे शषधियाँ (होती हैं)। तिस स्वर्गलोकरूप अग्नि से -सोनोराजा सम्भवति- उत्पन्न भया जो चन्द्रमा तिस-चन्द्रमा से मेघरूप द्वितीय अ्रग्नि उत्पन्न होताहै। और तिस मेघ से भई वर्षा तिस करके परथिवी विपे ओषधिर्यां (ब्रीहि यंवादि अन्न) उत्पन्न होताहै। और पुमान् रेतः सिश्धति योषितायां ।। पुरुष है सो स्तरी विषे रेतको सिंचन करता है। पुरुष रूप प्रग्नि बिषे हुवने की हुंई अ् -: ननादि ओपधियों से उत्पन्न भया जो रेत (वीर्य) तिसको पुरुष स्त्रीरूपा अग्निविषे सिंचन करता है। इस प्रकार क्रम करके 1 वह्नीः प्रजाः पुरुपात सम्प्रसूंता: १ पुरुष से बहुतसी प्रजा उत्पन्न होती हैं। परनहारूप पुरुष से आाह्मशादि बहुतसी प्रजा उत्पन्न होती हैं।। और.कर्म के साधन और फल उसी पुरुष से उत्पन्न होते हैं; इस प्रकार पप्रव अरगिले मंत्रकरके केहैंगे॥५I२७॥ हे सौम्य।। प्र०॥ है भगवन्। तिस पुरुष से कर्म के साधन औरर फल कैसे होते हैं॥उ०॥' तस्माटच:सामयजूंषि तिससे चा (छग्वेद) सामवेद यजुर्वेद (होते हैं?। तिस पुरुष से निय मित अक्षरवाले पद हैं अन्तविषे जिसके, ऐसे गायत्री आदिक छन्द करके युक मंत्ररूप मचा, और पांच अवयववाला और सपअ- वयववाला [ हिद्ार, प्रस्ताव, उद्वीथ, प्रतिहार, और निघन, इन नामक पांच अवयववाला और हिद्गार, प्रस्ताव, आंद्,उदीयर प्रतिहार, उपद्रव और निधन, इननामक सात अवयवोंवाला, जो साम है सो प्रांच विभक्रिक और सात विभक्रिक है]और तर्थरहित
Page 48
४६ सुरड़क उपनिषद्। तस्मादचःसामयजूंषि दीक्षा यज्ञांश्च सव्चे कतवो दक्षिणाश्च। संवत्सरश्च यजमानशच लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्य्यः ॥ ६। २८।। शर्रक्षररूप स्तोमन्नादिकके गान करके युक्र भेदसे तीनप्रकारका साम और नियमरहित अक्षरवाले पदहैं. अन्तविषे जिसके, ऐसे वाक्यरूप यजुर्वेदके मन्त्र ऐसे तीन प्रकार के मन्त्नरूप वेद होते भये। और दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे कतवो दक्षिणाश्च।। दीक्षा और यज्ञके स्तम्भसहित सर्व क्रतुरूप यज्ञ और दक्षिणा (होतेभये)।य- झोपवीतादि लक्षणवाले कर्त्ता के संत्यभाषणादि नियम विशेष. रूपदीक्षा और यज्ञके यूप (स्तंभ)आदिक सहित अग्निहोत्रादिक क्रतुरूप यज्ञ, और एक गौसे आदिलेके [विश्वजित् और सर्वमेध, इनदोनो यंज्ञोंविषे सर्वस्व (सर्वंधन) की दक्षिणा होती है, एतदर्थ एक गौसे ले के सर्वस्वधन पर्यन्त दक्षिणा दीजाती है] अपरिमित सर्व धनके दानपर्यन्त दक्षिणा और संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवतेयत्र सूर्य्यः ॥ संवत्सर औप्रर यजमान और लोक (उपजते हैं) और जिनविषे चन्द्रमा पोषस करताहै और जिनविषे सूर्य्य पत्रताहै। कालरूप संवत्सर, और कर्त्तारूप यजमान, यह कर्मों के साधन (सामग्री) और तिनकर्त्ता के कर्म के फलरूप लोक, उपजते हैं। और जिन लोकोंविषे चन्द्रमा लोकोंको (प्रजाको) पो- षएकरताहै, और जिन लोकोंविषे सूर्य्य तपता है, सो लोक दक्षिणा- यन और उत्तरायरूप उभय मागोसे गमन करनेयोग्य विद्वान् और अविद्वानरूप कर्त्ता के. कर्मफलहैं ॥६॥२८॥ हे सौम्य! तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः१तिससे बहुतंप्र- कारके देवता सम्यक उत्पन्न होतेभये। तिस परमात्माख्य पुरुष से क्मके अंगभूत वसुआदिक गणों के भेदसे बहुत प्रकार के देवता सम्यकू प्रकारसे उत्पन्न, होतेभये। और 1साध्या मनुष्या: पशवो वर्यासि।। साध्य और मंनुष्य और पशऔर पक्षी उत्पन्न(होते भये)।
Page 49
द्वितीयमुएडके प्रथमखएडः । ४७ तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि। प्राणापानौ ब्रीहियवौ तपश्च श्रद्दा सत्यं ब्रह्मचर्य विधिश्च 1 ७1२1 न साध्य नामवाले देवविशेष, और कर्मके अधिकारी मनुष्य, और आ्राम तथा वनके निवासी 'अरएया याम्याश्च ये,पशु और पक्षी। उत्पन्न होतेभये। और "प्राखपानौ ब्ीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्य विधिश्च! पाण और त्रपान, धान्य औौर यव और तप औरर श्रद्धा और सत्य और ब्रह्म चर्य और विधि (उत्पन्न होतेभये)। मनुष्यादिकोंका जीवन पाए और अपान,और हवनरूप अर्थवाले धान्य और यव, और कर्मका अङ्ग ['पयोब्ाह्मणस्य त्रतंयवागूराज- त्यस्यामिक्षा वैश्यस्येत्यादि श्रतिः ब्राह्मणका पयोवत, और क्षत्रियका यवागू (कांजी) वत है,और वैश्यका आमिक्षा (मिश्रित दूधऔर दधिकाविकार) वतहै, इत्यादिश्वतिचिषे विधानकिया।जो कृच्छर और चांद्रायण आदिक वत, सो-कर्मका अङ्गभूत पप्रादिक तप है ] पुरुषके संस्काररूप और स्वतन्त्र कर्मका साधनरूप तप, और जिसके पूर्व होने से सर्व पुरुषाथों के साधनको कारणरूपचित्त की प्रसन्नता होती है, ऐसी आस्तिकपने की बुद्धिरूप श्रद्धा, और खेदक़ा न करनेवाला भूठसे रहित यथार्थ अर्थका कथनरूप सत्य, शरमैथुन (स्त्रीसंग).के अकररा(त्याग)रूप ब्रह्मचर्य, और कर्त्तव्य- तारूपा विधि यह सर्व उक्र वक्षरसे उत्पन्न होतेभये ॥७२६॥ .हे, सौम्य!'सपप्राणाःप्रभवन्तितस्मात्सपार्चिषः सप्त समिधः सपहोमाः। तिससे सात प्राण और सातज्वाला और सात समि- ध और सातहोम होतेभये। किवा तिसही पुरुषसे मस्तकबिषे स्थित जो, दोशोत्र, दोनेत्र, दोधाण और एक मुखान्तर रसना, यह सात पागासज्ञक इन्द्रियां होती हैं, अर्थात् चक्षःभोत्रेमुख- नासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रतिष्ठते, इस प्रश्न उपनिषद्के तृतीय प्रश्नकी पाँचवीं श्रुिके प्रमागसे उक सातों स्थानों विषे मं
Page 50
- मुण्डक उपनिषद्दाही :सप्तपाणा: प्रभवन्ति तस्मात्सप्ार्चिषः सप्त समिधः सपहोमा:। लप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिता: सत् सप्॥क॥३०॥ :: ग प्ाणा प्रतिष्ठित (वर्तता) है ताते उक इन्द्रियों की आाण संज्ञाहै। और उन प्राणोंकी अपने २ विषयको प्रकाशनेवाली ज्ञानयुक्क ृन्तिरूपी इर्चियां (ज्वाला) होती हैं, और तैसेही उन अच्ियों के अरथ सात विषयरूप समिध होती हैं, अर्थात् जिसकरके विषयों से मिलके यह इन्द्रिया रूप प्राण, जैसे समिध से मिलके अग्निकी ज्वाला तैसे, बाहय प्रवृत्त होती है। तातें विषय इन्होंके समिधहै। और यं दस्य विज्ञान तज्जुहोतीति अत्यन्तरात्, जो इसका विज्ञान हैं तिसको होमकरता है। इस अन्य श्रुतिके प्रमाण से, उन विषयोंके विज्ञानरूप सातहोम होते हैं इइन्द्रियाग्निष जुहती, औौर, सिस इमेलोका येषुचरन्ति पाणा गुहाशया निहिता:सपसत। जिनबिषे प्रास विचरते हैं यह सातलोक(होते हैं, और मुहाविषे रहते हैं, और सात सात (स्थान कहते हैं)। जिन्होंबिषे प्राण विचरते हैं ऐसे इन्द्रि- योंके स्थानरूप यह सातलोक होते हैं। और सो प्राए कैसे हैं कि, जो निदराकाल में शरीर रूप अंथवा हृदयरूप गुहांबिषे रहतेहैं, और जो परमेखवरने प्रागियोंके भेदके प्रति सात सात स्थान किये हैं। • हे सान्य। इस सम्पूर्ण प्रकरणका यह अर्थ है कि, आत्मयाजी, पंरथात् 15सकलमिदमहंच वासुदेव:२ ।यह सर्वे जगत् और मैं परमात्माही है। इस प्रकार की हढ़ भवना पूर्वक परमेश्वर की आराधनकी बुद्धिसे जो यजन करते हैं तिनको प्रत्मयाजी कहते हैं:। विद्वान् पुरुषों के जो कर्म औरर तिन कमोंके साधन और कर्मों के फल हैं? और अविद्ान पुरुषोंके कम और तिन कमो और कमों के फल हैं, यह सर्व जगत् सवज्ञ पर पुरुष (अक्षर के सधिन ब्रह्म) से ही उत्पन्न भया है।126 हे सौम्य त्प्रंतः समद्रा गिरयशच सरवोडस्मात्स्यन्दन्ते
Page 51
द्वितीयमुएंडके प्रथमखरड: । मपंतः समुद्रा गिरयश्च सव्वेSस्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्व्वरूपाः। तप्रतश्च सर्व्वा ओषधयो रसश्च येनैष भूतै सितिष्ठते ह्यन्तरात्मा-॥६३१॥ सिन्धवः सर्वरूपाः१ इसते सातों समुद्र और सर्व पर्वत और सर्व- रूपवाली नदियां होती हैं। इस अक्षर नामवाले पुरुष से क्षारा- दिक सख समुद्रं होते हैं और हिमालय विन्ध्याचल आादि सर्व पर्वत, इस उक़ पुरुषसेही होते हैं, और बहुत रूपवाली जे गङ्गा यसुना सिन्धु आरदिक नदियां सो भी इसही पुरुषले संवती हैं,और 4प्रतश्च स्व्ाओ्र्ोषधयो रसश्च येनैष भृतैस्तिष्ठते हयन्तरात्मा। इसही से सर्व (अन्नादि) ओोषधियां और रस होते हैं कि जिस करके भूतों करके अन्तरात्मा स्थित होता है।: इसही पुरुष से तएडुल यवादि सर्व ओषधिर्या उपजती हैं। और इसही पुरुष से मधुरादि अर्थात् मधु मीठा और कटु (कडुवा) और अम्ल (खदा) औौर तीक्षण (तीखा) और क्षार (खारा) और कसा- यल. (कसायला) यह छः प्रकारका रस होता है। औौर जिस रस करके स्थूल पंचभूतों करके आवृतभया अरन्तरात्मा (लिंगशरीर) स्थित होता है। अर्थात् लिंगरूप जो सूक्ष्म, शरीर है सो जिसकरके स्थुल शरीर और आत्माके सध्यविषे बढ़ता (पुष्ट होता) है तिस करके इस लिङ्गको अन्तरात्मा कहते हैं।। ६। ३१ ।।, हे सौम्य! इसप्रकार पुरुष (अ्रक्षर) से यह सर्व उत्पन्न भया है। एतदर्थ वाचारम्भणं विकारो नामधेयं, वाखीसे उच्चार किया विकार नाममात्र (मिथ्या) होता है। और पुरुष (अक्षरंब्रह्म) ही सत्य है। एतदर्थ "पुरुषएवेद विश्वं कर्म तपोब्रह्मपरायृतम्। पुरुषही यह सर्व है (सर्वक्याहै). कर्म और तप ब्रह्म पर अमृतरूपा पुरुष (शक्षर):ही यह सवहे । पुरुष से अन्य, विश्वनामक कुछ भी वस्तु नहीं है। एतदर्थ:कस्मिन्तु विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भव- तीति; 1 हे भगवन् ! किसके जानेहुये-सर्व यह जाना जाता है।
Page 52
मुएडक उपनिषद्। पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपोब्रह्मपरामतम्। एतदोवेद
इति द्वितीयमुरडके प्रथमखएडः॥
यह इसही उपनेषद् के प्रथम सुएडकके प्रथमखएडके तासरे मंत्र विषे जो कहाथा, सो यह कथन किया। अर्थात्[ जो प्रथम मुण्डक के तृतीय मंत्र करके जो शिष्यने प्रश्नकिया था कि हे भगवन्! किसके जानने से यह सर्व जानाजाता है तिसका उत्तर निरुपंस किया। यह नामरूपात्मक सर्व परमात्मा सेही उपजता है। एत- दर्थ परमांत्मस्वरूप 'यह सर्व, तिस परमात्मा के ही जानने से जाना जाताहै। इस प्रकार (आ्रचार्यने शिष्यकी) अविद्याकें क्ष- यरूप फलके कथनसे समाप् किया]। ननु, सर्वके कारणभूत परमात्मा के जानने से पुरुष एवेदं विश्वं, पुरुषही यह सर्व विश्वहै। इसप्रकार जानाजाता है।। प्र०॥। पुनः यह विश्व क्या है। उ०॥ अग्निहोत्रादिरूप कर्म, और तिस कर्मका किया ज्ञानमय तप और अन्यभी जो यह सर्व है, सो जिस करके ब्रह्मका कार्य है तिसही करके "एतदो वेद निहित गुहार्या सोSविद्यागन्थि विकि- . - रतीहसौम्य। हिसौम्य! गुहाबिषे स्थित परम प्रमृतरूप, इस ब्रह्म को जो जानताहै सो अविद्यायन्धिको नाश करे है। हे सौम्य ! (हेप्रियदर्शन !) सर्व प्राशियोंकी हृदयरूपी गुहाविषे स्थित परम अमृतमय इसब्रह्म को अहमेवेति,।यह मैंहीहूं।इसप्रकार जो जानता है, सो ऐसे अभेद विज्ञान से यहां (संसारबिषे) जीवता हुआही अपरथात् विनाही मरे, अविद्याकी ग्रन्थिको, अर्थात् ग्रन्थिवत् दढ़भई जे.अविद्याकी वासना तिसको नाश करेहै॥ १०। ३२ ॥ इति मुएडक उपनिषद्गत द्वितीयमुएडकके प्रथमखएडकीं भाषाटीका समास्।1
Page 53
द्वितीयमुए्डके द्वितीयखणड: । ५१ अथ द्वितीयमुएडके द्वितीयखएड: प्रारभ्यते। इपाविः सन्निहितं गुहाचरन्नाममहत्पदमेवैतत् समार्पि- तम्। एजतप्रारांननिमिषच् यदेतजानथ सदसद्वरेरयं पर विज्ञानादद्वरिष्ठं त्जानाम् ॥१।३३॥ · द्वितीयमुएडकगतद्वितीयखएडकी भाषाटीका प्रारंभ। हे सौम्य![अब जिसको एकबार आ्रादेश (उपदेश) मान्रसे 'त्रह्मास्मीति अद्वितीय ब्रह्म मैंहूं, ऐसा वाक्यार्थ का ज्ञान छंनु- भव पर्यन्त होवे नहीं, तिस पुरुषको वाक्यके अर्थ कीही बारम्बार भावना और युकिके अनुसन्धानरूप उपायका अानुष्ान कर्तव्य उचित है, इस अ्रभिप्रायसे कहते हैं] शिष्यका प्रश्न है कि, अरूप औचौर सद्रूप जो त्र्प्रक्षर (ब्रह्म) है सो किसंप् कारसे जानने को योग्य है।।उ०।। "आरवि: सन्निहित प्रकाशरूपहै और सम्यक् स्थितहै। सो ब्रह्म स्वयं ज्योति (प्रकाशरूप) है तपर्थात[विश्वके ज्ञानरूपकरके प्रकाश- मान ब्रह्महै, तिसकी मुसुक्षुजन सदा भावना करें। यह अर्थ है सो अन्य ग्रन्थकारों ने भी कहा है जो है, जो भासताहै, सो आत्मरूप है। तिससे अन्य भासता नहीं, और अन्यहै भी नहीं। किन्तु केवल अपरपनी आप सत्तारूप संवित (चैतन्य ) भासता है। और ग्रह्य (विषय) और ग्रहीता (विषयी) यह सर्व कल्पना मिथ्याही है इति ] और सम्यक स्थित है अर्थात् [सर्व आाणियों के हृदय विषे स्थित वागादि उपाधियों से शव्दादि विषयों को प्राप्तहुयेवत् ब्रह्मही जीवभावको प्राततहुयेवत् भासताहै, एतदर्थ सो अपरोक्ष है, इसप्रकार सदाही समरगकरे 1 कहिये वांगाछुपाधिमिज्वं लति भ्राजतीति, शुत्यन्तरे, वासीआादिक उपाधियोंसे प्रकाशता है और विराजमान है। इस अन्थ श्ुतिके प्रमाणकरके शब्दादि कोंको प्रकांशताहुआ भासता हैं और दर्शन श्रवय मनन और
Page 54
५२ सुगडक उपनिषट् विज्ञान न्रादिक उपाधियों के धमासे प्रकटहुआना सर्व प्रागियों के हृदय निये लखाजादाहे। और जो यह प्रक्हुआ ब्रहमा हवयविये सम्यक् स्थित हैं सो दर्शन श्रव्वसादिग्रकारों से 1 गुहाचरनाम। हदयरूप गुहा विषविवर नवाला (गुहाचर ऐसे, नामवालाप्रस्यात हैं। और[अव यह सर्व जगत् कार्यरूप और परिच्छिनरूप ह, क्योंकि आश्य सहितका कार्यरूपहोने से औौर परिच्छिनरूप होने से घवादिकोंचत्। एतवर्थ जो सर्वका आधरवरूप है, सोई नायाका आधरय आतमरूप है। इस युक्तिके अनुसन्धानको कहते हैं]1 मह- सदू गे। सहसद है। जो ब्हम सर्वसे बड़ा हनिसे महत् हैं। औौर सर्व पदायोंका चाथवहानेसे सर्बसे प्राततहो ताहे, याते परहे एतदर्य ही,महतपतरूप है॥। प्र० ॥ सान्रह्य महतवदरूप केसे हैं॥ उ० ॥ म एजत्प्रापत्रितिपन।। चजनेवाला प्रासवाका निमिपवाला हैं। जो चलनेवाजें पक्षी झादिक हैं, और प्राण अ्पान शरादिक प्राणोंवाले सनुप्य पशुआदिक हैं, चर निमिय आदिक किया चालाहै, और जा अनिमिपवालाहै। और अ्न्रेतत्ससर्पित ।यह इसविये प्रवेशको पाचाहै। चह सर्व इस ब्रह्मनिषे प्रवेशको पाचा हैं। और चहेतम्जानथी। जो है इसको जानो। ऐसा जो (सर् का) आाअयहै, इसको, हे शिप्य! तुम सर्वजानो औोर "सदसह- रेएचं ।। सत् अलत् स्वरप है और परेरय हैं। सो ब्रह्म तुम्हारा आात्मरुपहें और सत्=सत् रूपहै, क्योंकि सत्कहिये अमूर्च औौर तसत् कहिये सर्चरप जो स्थून और सूक्ष्म प्रपचह निसको तिस ब्रह्म से मिन्न भोवका अभाव है ताते, और सोई जहम वरेषच है, अर्थात् नित्य हानेसे सर्वको माननयोग्य है। और परविज्ञानार्दद रिट्ं प्रजानों। प्रजाके विज्ञानसे परहेऔर वरिषह। ब्रजाके विज्ञान स पर (प्रथक) है, अर्थान् लोकिक ज्ञानसे अगोचरहै और परिद्ठ्है, अर्थात् सर्वश्ेष्ट पदार्थाविष सोई एकहम अतिशायकरके अष है। क्योंकि सर्व दोपोंकरके रहतहे तातें ॥१।३३॥ ह सौम्य।[बटाविकोवनसूर्चर्याविकों को जडताके होनेसेमी जो
Page 55
द्विती यंमुएडके द्वितीयखएंडः। ५३ यदर्िमद्यदणुभ्योऽ यस्मिन् लोका निहिता लोकिनश्च। तदेतदक्षरं ब्रह्म सप्राशास्तदुवाङ्मनः तदेतत्सत्यं तदमतं तद्देद्व्यं सौम्य विद्वि॥ २॥३४॥ प्रकाशवानूपने विषे विचित्रता है, तिसका ब्रह्मरूप प्रकाश विना अंसंभव है। तिस पप्रसंभवरूप अर्थापत्ति प्रमाणसेभी तिसका का- रस निश्चय करनेको योग्यहै इसप्रकार यहां कहते हैं] 1यंदर्चिम- त्ै।जो प्रकाशचान् है। जो ब्रह्म अपने प्रकाशसे सर्य्यादिकोंकोप्र- काशताहै एतदर्थ प्रकाशवान्है [ब्रह्मकोप्रकाशवान् होनेसे सूर्या दिकोंवत् इन्द्रियोंका विपयत्व प्राप्तभया, इस शंकाकायहां नि- पेघ करते हैं। और यदणुभ्योऽु'ो सूक्ष्मसेभी सूक्ष्म है।.किंवा जो सामा (अन्नविशेष) श्ादिक सक्ष्म वस्तुओं से भी सक्ष्म हैं॥ शंका।। [ तव ब्रह्मको परमाणु के परिमाणकरके युक्रपना होगा॥ उ०। यह शंका करनेको योग्य नहीं ऐसा कहते हैं] और वो ५थि .- व्यादि स्थूल वस्तुओंसेभी ्रप्रतिशयकरके स्थूल है :अणोरणीयान् महतो महीयान्; [ शंका, तव त्रह्मस्थूल होनेसे अन्य आ्राधारवाला होवेगा।। उ०।। यह शंका करनेको योग्यनहीं, ऐसा कहते हैं] "य- स्मिन् लोका निहिता लोकिनश्च १। जिसविषे लोक और लोक्- निवासी स्थित हैं। जिसविषे पृथिवीत्रप्रादिक लोक और जो मनुष्या- दिक चैतन्यके आश्रय प्रसिद्ध सर्वलोक के निवासी प्रजा हैं सो स्थित हैं। और तदेतदक्षरं ब्रह्म सप्रास्तदुवाऊनः१।सोयह शररक्षर त्हहै सो प्रासाहै और सोवाक और मनहै । [अब प्राण- दिकों की जो प्रवृत्ति है सो चैतन्य अधिष्ठानरूप निमिन्तवाली है जड़ोंकी प्रवृत्ति होनेसे रथ शदिकों की प्रवृत्तिवत् और चैतन्य के भेद होने विषे प्रमाणका अभाव है ताते एक चैतन्यमात्र है ऐसे विचार करना। यह कहतेहैं.] सो यह सर्वका ऋरप्ाश्रय त्ररक्षर (अररवि= नाशी)ब्रह्म है सो प्रामहै और सोई वाक (वाणी) और मन है। और च शब्द करके उपलक्षित सर्व कारणरूपहैं। अर्थात् प्रामादिकों के
Page 56
मुए्डक उपनिषद।4. धनुर्गहीत्वौपनिषदं महासं शरं हपासानिशीतं सन्धीयत। वयम्य तज्रावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सौम्य विद्वि ॥ ३ ३५॥ भीतर विद्यमान जो चैतन्यहै, सो उनका आश्रय होनेसे प्राण और इन्द्रियादिक सर्व संघातरूप है। क्योंकि प्राणस्यप्राएंःप्राणकाभी प्रापहै! इत्यादि अन्यभ्रुतियोंका प्रमाणहै ताते। और जो प्रास- दिकोंके भीतर चैतन्यरूप त्क्षरहै तदेतंत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्जव्यं सौम्यविद्धि सो यह सत्यहै, सो अरमृतहै, सो बेधनेको योग्यहै, हे सौम्य! बेधनकर। सो यह सत्य है, एतदर्थ सो अमृत (अविना- शी) है सो मन करके बेधने को (ताड़नाकरनेको) योग्यहै। अर्थात् तिस बिषे मनका समाधान करना योग्य है। हे सौम्य! जिसकरके यह ऐसे है, तिसही करके बेधन करो, अर्थात् (अक्षर विषे चित् को एकाग्र.करो)॥ २।३४॥ हेसौम्य![अ्ब विचारविषे असमर्थको का रका त्प्राश्रयकरके ब्रह्म और आरात्माविषे क्रममुकिरूप फलवाली चितकी एकांग्रता के देखावनेका आ्र्ारम्भ करते हैं। यहां यह अभिप्रायहै कि प्रणावो ब्रह्मेति, अकार ब्रह्महै। इसप्रकार ध्यानकरनेवाले जितेन्द्रिय पुरुषको जो अंकार सम्बन्धी प्रतिबिम्ब स्फुरता है, 'तदात्मेति' सो आत्मा है। ऐसा जो चिंतन सो प्रणावरूय धनुषबिषे बांखका सन्धान है। और तिस ब्रह्म का चैतन्यके प्रतिबिम्बरूप जीवसेएक: तारूप जो. अ्ररनुसन्धान, सो लक्ष्यका बेधहै ]। शंका ॥ कैसे बेधने को योग्यहै॥ उ०॥1 धनुर्गहीत्वापनिषदं महासतं शरं हुपासानिः शीतं सन्धीयत उपनिषद्बिष प्रसिद्ध धनुषरूप महान् तस्त्रको लेके निरन्तरध्यानसे.तीक्ष्मंकिये बाणको सन्धान करना । उपनि पदोविषे प्रसिद्ध प्रतिपाद्य जे धनुषरूपं महान् पस्त्र तिसको लेके तिस धनुषबिषे, निरन्तर ध्यानकरके तीक्ष्णाकिये बाणको सन्धान करना। जिसकर के यहां हाथसेही धनुषका आकर्षण (खींचना)
Page 57
द्वितीयमुएडके द्वितीयखएड: । प्रसवो धनुःशरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।अप्रम त्तेन वेद्व्यं शरवत्तन्मयोभवेत् ॥४।३६॥ सम्भवता नहीं, एतदर्थत्ररायम्य तज्जावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवा क्षरं सौम्य विद्वि।िसविषेभावनाको प्राप्तभये चित्तसे त्प्राकर्षर करके हे सौम्य!तिसहीअपरक्षररूप लक्ष्यको वेधनकरो। तिसन्र्पक्षर (ब्रह्म) रूप लक्ष्यचिपे भावनाको प्राप्तभये चित्तसे इन्द्रिय सहित अन्त: करसंको अरपरंपने विषय से निवृत्त करके लक्ष्यविषेही प्राप्तकर· ने रूप धनुषका आ्रकर्षण करके, हे सौम्य!तिसही उक्र लक्षण- वाले पक्षररूप लक्ष्यको वेधनकर, अर्थात् लक्ष्य विषे चित्तको एकाग्र करो (यह वेदकी आज्ञाहै)। ३।३५।। हे सौम्य !शरव कथन किये जे धनुषादिक तिनको स्पष्ट कहते हैं १ प्रसवोधनुः १। प्रसव उकार धनुषहै। जैसेधनुष जो है सो लक्ष्य (निशाना) विषे वासके प्रवेशका कारण है, तैसे त्र्प्रात्मा- रूपी वासका त्रप्रक्षररूप लक्ष्यविपे प्रवेशका, कारण ॐकार है। और जैसे अभ्यासकिये धनुपसे संस्कार युक्क, और तिस धनुषरूप झश्रयवाला हुंप्रा वाएा लक्ष्यविषे स्थित होताहै, तैसेही जिस करके अभ्यास किये ॐकारसे संस्कार (ध्यान) युक्,और तिस उकार रूप आश्रयवाला हुआ आत्मा (बुद्धिविशिष्टचैतन्य) अक्षर (ब्रह्मविषे स्थित होता है, एतदर्थ, उकार जो है सो धनुषवत् धनुषहै, और शरोह्यात्मा"[आात्मारूपी) वाणहैं। अर्थात्उपाधि -1 करके लक्षित परमात्माही, जलादिगत सूर्य्यादिकों के प्रतिबि- म्वादिकोंवत् इस देहरूप, घटविषे सर्व बुद्धि (रूपजल) की वृत्ति (रूपतंरंगन) का साक्षी होने करके प्रवेश को पायाहै सो (तर्प्रात्मा) वासवत्है और अप्रमत्तेनवेद्दव्यं" प्रमादसे रहितंपने करके बेधनकरने को योग्यहै। छ्प्रात्माके अर्थ विषयोंकी प्राप्तिकी तृष्णा रूप प्रमादसे रहित, और सर्चसे विरक और जितेन्द्रिय, और एकाय चित्तसें बैधनें को योग्यहै। और " ब्रह्मतल्लक्ष्यमुच्यते।" ब्रह्मसो लक्ष्य कहते हैं। ऐसा जो श्रक्षर (ब्रह्म) तिसको लक्ष्य कहते हैं।
Page 58
५ ६ : मुए्डक उपनिषद्।. : न्स्मिन् दौः पथिवी चान्तरिक्षमेते मनः सहप्राणोश्च सव्वेंः। तमेवैंकं जानथ आात्मानमन्यावाचो विमुञ्चथ अमृतस्यैष सेतु: ॥५३७॥ एतदर्थ तिस बेधन करने के पश्चात् 1 शरवत्तन्मयोभवेंत्। ं बाखवत् तन्मयं होताहै। वासवत् तन्मय (लक्ष्यकारुप) होता है। जिस प्रकार बांगको लक्ष्यके सांथ एकतारूप फल होताहै, तैसे वेहादिक अनात्माकार वृत्तियों के तिरस्कार होनेसे श्क्षर (ब्रह्म) के साथ एकरूपतामय फलको सम्पादन करना, यह अर्थ है।। इति सिद्धम् ॥४ ३६ ॥ : हे सौम्य ! त्र्प्रक्षर(ब्रह्म.) दुःख से जानने के योग्य होने करके तिसका बारम्बार जो कथन है सो उसका सुखपर्वक लक्ष्य करावने के अर्थ है, एतदर्थ तिसहीको वारम्वार कहते हैं 'त्रस्मिन्द्यौः पृंथिवी चान्तरिक्षमेते मनः सह प्राणौश्च सव्वैंः ।' जिस विषें स्वर्ग पृथिवी और श्रन्तरिक्ष आ्र्प्रकाश प्रवेशको पाया है। सर्व करणा (इन्द्रिर्या) सहित मन (प्रवेशको पायाहै) जिस शरक्षर पुरुषविषे स्वर्ग पृंथिवीं और आरकाशरूप सर्व जगत् प्रवेशको पायाहै, औौर प्रन्य सर्वप्राण (करणा, इन्द्रियां) करके सहित मन प्रवेश को पायाहै। और ' तमेवैक जानथ आत्मानमन्यावाचो विमुञ्चथ। . ैं तिसही एक आररत्माको जानके अन्यवाणी को छोड़ो। हे सौम्य! तिसहीसर्वके आश्रय एक अद्वितीयरूप तुम्हारें और अन्य सर्व प्रासधारियों के पत्यकरूप आरत्माको जानो और तिस त्र्प्रात्माको जानके अन्य अपर विद्यारूप वाणीको और तिस करके प्रतिपाध साधन सहित सर्व कर्मको परित्यांग करो, [त्रब साधन सहित सर्व कर्म को त्यागके एक आ्ररत्माही जानने को योग्यहै, इस विषयं में कारण कहते हैं4[अमृतस्यैषसेतुः।'। यह अरप्रमृतका सेतु है। क्योंकि यह सम्यक आत्मज्ञान तमृत का, अपर्थात् मोक्षरूप: पारकी प्रासतिकें अर्थ.सेतु (पुल) है क्योंकि संसाररूप महोदंधि
Page 59
द्वितीयमुएड़के द्वितीयखएड: । ५७ 'ऋराइव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यरसएषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः। 3मित्येवंध्यायथ त्रप्रात्मानं स्वस्ति वः पारायतमसः परस्तात् ॥६।३८॥ (बड़ासमुद्र) के पार जाने को (सुमुक्ष के अर्थ) कारण है ताते, और जैसे यह प्रात्मज्ञान सोक्षकी प्राप्तिके अर्थ सेतु पुल- वत् सेतुहै। तैसे : तमेवविदित्वातिपृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते Sयनायेति;[तिसही को जानके मृत्युको लंघिके जाता है, मोक्ष की प्राप्तिके अपर्थ अन्यमार्ग नहीं।। यह अरपन्य श्वेताश्वतरकी श्रुति भी कहती है 'इति वेदानुशासनम्'॥५३७॥ .'हे सौम्य।त्रराइव रथनाभौसंहता यत्रनाड्यस्सएषोऽनतश्चर- तेव हुधाजायमानः जैसरथकी नाभिविषे प्रवेशको प्रात्तभये अरे हैं तैसे जिसविषे नाड़ियां सम्यकू प्रवेश को प्राप्तभई हैं, सो यह तिस हृंदयविषे वर्तता है, अनेक प्रकार होता है। जिसप्रकार रथकी नाभि (मध्यकाकाष) विपे प्रवेशको प्राप्तभये अपरा (सीधेकाष्ठ) हैं, इसस्रकार जिस हृंदयविषे, सर्व श्रोरले देहविषे व्यापनेवाली प्रसिद्ध नाडियां सम्यकंप्रकार प्रवेश को पाई हैं, तिस हृदयविषे बुद्धिकी वृत्तियों का साक्षीरूप सो यह प्रसंग विषे प्रात् भया आात्मा तिस हृदय के मव्यचिषे देखता हुआ, सुनताहुआरा, मनन करंता हुआरा, जानता हुआ, बर्तता है, और क्रोध हर्ष आादिक वृत्तियों करके अनेक प्रकार को हुयेवत् होताहै। अर्थात् त्रन्तः- करणरूप उपाधि के अविवेक करके युक होनेसे इसको लौकिक जन हर्षवान् और कोधवान् कहते हैं। तिस अमित्येवं ध्यायथ झात्मानंस्वस्तिवः पारायतमसः परस्तात्" आात्माको ॐ इस प्रकार से ध्यानकरो तमसेपर पारके अर्थ निर्विन्न होवो। आात्माको ॐ इंसप्रकार से ॐकाररूप पांश्रयवाले हुये शास्त्रोक कल्पना से ध्यान करो। इस प्रकार ज्ञानवान् आचार्य ने शिष्य के अंर्थ कहने योग्य जो वस्तुहै सो कहा। तरब ब्रह्म विद्याके जानने
Page 60
५.८ i मुएडक उपनिषद्। : यः सर्वज्ञ: सर्व्वविद्यस्यैषमहिमा भुवि दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्माप्रतिष्ठितः। मनोमयः प्राखशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय तदविज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा उानन्दरूपममतं यद्विभाति ॥७।३६॥ की इच्छावाले कर्मरहित और मोक्ष के मार्ग में प्रवृत्तभये जे जि ज्ञांसु शिष्य हैं, तिनको विद्यारहित होने करके, आाचार्य ब्रह्मकी- प्राप्तिको चाहते हैं। हे शिष्य! तुमको मैंने कथन किया जो [सवें- श्वस्पना और मनोमयपना तर्प्रादिक गुणाकर के युक्रव्रह्मका, हृदय- कमलविषे जो ध्यान है, सो क्रम मुकिरूप फलवालाहै। एतदर्थ हे मन्द्रबुद्धिवाले ब्रह्मवेत्ता (अधिकांरी)! तुम तिस ध्यानको करो। इसप्रकार देखावने के अर्थ जो इस संसाररूप महोदधिको लं- - घिके प्राप्तहोने योग्य परविद्याका विषय है इस प्रकार कहा है] यह संसाररूप महान् अपार समुद्र तिसको लंघिके प्राप्तहोने योग्य परं (ब्रह्म) विद्याका विषय है सो तुझको. मेरे उपदेश से पश्चात् श्रविद्यारूप तमसे पर [ कर्मके सङ्गीजनों की सङ्गति से कर्मविषे श्रद्धा और विषयों विषे श्रद्धा होती है। सो वाक्यार्थ के ज्ञानकी अनुभवपर्यन्तताकी प्रतिबन्धकरूप विघ् है। सो विन्न तुमको मत पराप्त होय। इसप्रकारका कथनहै परन्तु वाक्यार्थ के पनुभव के उत्पन्न भये फलकी प्राप्ति विषे विघ्नकी शङ्गा नहीं है, इस अभिप्राय से कहते हैं] जो तविद्यारूप तम (तन्धकार) का पर पारहै, तिसके अर्थ,अर्थात् ऋविद्या रहित ब्रह्मात्मस्वरूप की प्राप्तिके अर्थ निर्विन्न जैसे होय तैसे होवो हइत्यादेश।।।६।३८।।- हे सौम्य! (। प्र०॥ सो आत्मा किस विषे बर्तताहै॥ उ०॥) ५ य: सर्व्वज्ञ:सर्वविद्यस्यैष महिमाभुविदिव्येब्रह्मपुरेह्येषव्योम्न्या- त्माप्रतिष्ठितः।जो सर्वज्ञ है, सर्ववित्है, और जिसकी यह पृथिवी िषे महिमाहै, सो यह आत्मा प्रकाशक ब्रह्मपुर बिषे विद्यमान )पाकाश विषे स्थितहै। जो सर्वज्ञ है, सर्ववित् है, और :जिसकी
Page 61
द्वितीयमुएडके द्वितीयखएड: । यह प्रसिद्ध परृथिवी विषे महिमा (विभूति है) ।प्र०॥ कौन यह महिमा है।उ०। यह स्वर्ग और पृथिवी दोनों जिसंकी त्र्प्राज्ञाविषे धारण कियेहुये स्थित होते हैं। और सूर्य्य और चन्द्रमा यह दोनों जिसकी तर्राज्ञाबिषे,अर्द्धदग्ध काष्टके भ्रसावनेरूपअ्र्रारल्जांत (बनेठी) चंक्रवत् निरन्तर (आकाशमार्गमें)अ्रमते हैं। और जिसकी आ्राज्ञा विषे वर्त्तमान नदियां और समुद्र अपने देशको लंघिके बर्त्ततेनहीं। तैसे स्थावर और जंगमरूप यावतहैं, सो जिसकी आज्ञासे अपने२ नियममें स्थितहैं। और तिसही प्रकार षद्ऋतु औरदोअयन, और साठशव्ध (संवत्सर, वर्ष, साल) जो हैं सो जिसकी आर्राज्ञा को लं- घिकेबत्तते नहीं। तैसेही कर्ता कर्म्म और फल जो हैं सो जिसकी आ्रपराज्ञांसे अपपने २ कालको लंघिके ब्त्तते नहीं॥ सो यह सहिमा है।। इसप्रकार जिसकी पृथिवीलोकविषे महिमाहै, सो यह सर्वज्ञ है। सो यह नपरात्मा सर्ववुद्धि वृत्तिके प्रकाशक हृदयरूप ब्रह्मपुर विषे विद्यमान प्रकाश विषे स्थितहुयेवत् भासतां और जिस करके आकाशवत् सर्व व्यापक आत्माको गमनागमन वा स्थिति अन्यप्रकारसे, संभवे नहीं। एतदर्थ सो आत्मा मनकी वृत्तिसेही तिसहृदयाकाश नामवाले ब्रह्मलोक बिषे स्थितहुआ भासता है। और मनोमयः प्रागशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽनने हृदयंसन्निधायं" मनोमयहुआरर प्रासऔरर शरीर का लेजानेवालाहै,और अ्र्रन्नबिषे बुद्धिको स्थापित करके स्थितभया है। मनरूप उपाधिवाला हो- नेसे मनोमय हुआ यह आत्मा प्रास और शरीर का लेजानेवाला है। तर्थात् स्थूल शरीरसे अन्य सक्ष्म शरीर को लेजाता है। और नित्य नित्य बढ़नेवाले और घटने वाले भोजन किये अन्न के परिणाममय पिएडरूप अन्नविषे हृदयकमलगत छिद्र में अपनी उपाधिरूप बुद्धिको भंलीप्रकार स्थापित करके स्थितभया है। और जिसकरके बुद्धिकी स्थितिही तात्माकी त्रन्न विषेस्थिति है, एतदर्थ यहां, बुद्धिको स्थापित करके अन्नबिषे स्थित होताभया ऐसा कहाहै। तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आ्र्प्रानन्दरूपममृतं
Page 62
६० सुएडक उपनिषद।. भिद्यते हृदयग्रन्थिश्व्िद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्म्माशि तरमन्दष्टे परावरे ॥ ८४॥ यद्विभाति।' तिसको धीर श्रेष्ठज्ञानसे सर्वत्र्प्रोरसे पूर्ण जानते हैं (तिनको) आनन्दरूप और पमृतरूप हुआ्र्प् विशेषकरके भासता हैं तिसं तात्मतत्वको जो धीर (बुद्धिमान् विवेकी) पुरुष हैं, सो शास्त्र और आरचार्य के उपदेशसे जन्य और शम दम ध्यान और वैराग्यकरके उद्भवको प्राप्तभये उच्चम ज्ञानसे सर्वत्रमोर से पूर्सं जानते हैं तिन पुरुषोंको जो सर्वश्र नर्थ और दुःख और श्रमसेरहित पानन्दरूप औरर त्रप्रमृत त्रविनाशी रूप हुआ्रा अपने श्र्प्राप विषे सदैव विशेषकरके भासता है। सोई आत्मा श्र्परक्षर ब्रह्म है।।७।३६।। हे सौम्य! अब इस (जिज्ञासु) पुरुषको (आचार्यकरके) कथन किये, अर्थांत् (उपदेशकिये) सम्यक् परमात्मज्ञानका (जो फल -होताहै सो) यह कहते हैं॥ १तस्मिन्टष्टे परावरे" तिसपर औरर त्रवरके देखने से। अर्थात् तिस उपदेशकिये परमात्माविषे, कारण रूपसे पर (श्रेष्ठ जे प्रकृति) औरर कार्य रूपसे त्रप्रवर (अश्नेष्ठ जगत्) सो रज्जुमें सर्पवत् वाचारंम्भरामात्रही है सो सर्वज्ञ असंसारी पर- मात्माको, "यह साक्षात् मैंहूं" इसप्रकार (अभेदतासे) देखेहुंये " भिद्यते हृदयग्रन्थिः।'। हृदयकीग्रन्थि भेदनको पावताहै। इस पुरुषकी त्रविद्याकी वासनामय हृदयकी ग्रन्थि, अर्थांत्हृद्दयशब्द करके उपलक्षित बुद्धिके आश्नितगन्थि अपने नाशको प्राप्तहो- ती है।[ यहां यहशङ्का समाधानरूप एक विचारहै, कि यहां (श्री- शंङराचार्य्यने) भाष्यविषे, अविद्याकी वासना के समुदायरूपहृदय की ग्रन्थिभेद (नाश) को पराप्त होती है, ऐसाकहाहै, तिस कहनेका -क्याशरर्थ (प्रयोजन)है, तिसको जानने के अर्थ वादी शङ्ाकरताहै।। शङ्ा।। हे सिद्धान्तिन्! बुद्धिके विद्यमानहोते अरविद्या तरप्रादिक का भेद-(नाश) ज्ञानकाफलहै, अथवा तिसबुद्धिकी निवृत्तिके हुये म- विद्या आदिककाभेद (नाश) ज्ञानका फलहै, यह दो विकल्पहै, तिन
Page 63
द्वितीयमुएडके द्वितीयखएड: । ६१ में प्रथमपक्ष बने नहीं क्योंकि उपादानके विद्यमानहुये कार्य के अत्यन्ताभावका अ्रासम्भवहै ताते।औरद्वितीय पक्षभी बनता नहीं, क्योंकि ज्ञान को त्रप्रज्ञानसेही साक्षात् विरोधकी प्रसिद्धिहै ताते।। अथवा बुद्धिभी अरनादि है वा सादिहै, इसका जो विचारकरिये तो भी प्रथमपक्ष वने नहीं। क्योंकि : एतस्माज्जायतेप्राणोमनःस- व्वेंन्द्रियासिच,1 इससे प्राणहोते हैं, मन होताहै, सर्वइन्द्रियां होतीहैं। इस श्ुति से विरोध होताहै ताते। और (सादिरूप) द्विती- थपक्ष भी चनता नहीं, क्योकिप्रलयतिषे ब्रह्मज्ञान विनाही बुद्धि के नाशका सम्भवहै ताते। और बुद्धिके सादिपने के होनेसे वुद्धि का उपादान जव साक्षात् ब्रह्मही है, तब तिस उपादानरूप ब्रह्म के नाश हुये विना वुद्धिका अप्रत्यन्त नाश होनेका नहीं। और जो कदापि बुद्धिकी उपादान मायाहै, तब सो द्रशागत ज्ञान से नाश होनेको योग्यनहीं। क्योंकि लोकविख्यात जो मायावी पुरुष तिस विपे स्थित जो माया तिसका दष्टागत ज्ञानसे नाशका परदर्शनहै ताते। किंतरा वुद्धिका जो नाशहै, सोतिस वुद्धिका फलनहीं क्योंकि अपने नाशको अ्रफल रूपता है ताते। और सो वुद्धिका नाश आत्मा का भी फल नहीं, क्योंकि तिस वत्माको बुद्धिके संगका परभाव है ताते, तिस चुद्धिके नाशको अफलरूपता होनेसे। किंवा आत्मा के अविद्या आ्दिकों के अनाश्रयपनेका कथन है ताते सोश्रुतिसे विरुद्द्है। क्योंकि आरम्भविषे त्र्रविद्यायामन्तरेवर्तमानाः॥ ं ऋ्रविद्या के भीतर-वर्त्तमान। ऐसा श्रवण होनेसेतरु समाप्ति बिषे अनीशयाशोचतिमुद्यमानःनीशासे मोहकोपाया हुआ शोच (शोक) को करता है'ऐसा श्रवण होने से॥और जो कहो कि, बुद्धि गतही ऋविद्यादिकोंका आात्माविषे अध्यास होता है, तो अध्यास होताहै, इसशब्द का कौन अर्थ है। आत्माविषे स्थापित करते हैं (सोअरध्यासहै) वा भ्रान्ति से देखते हैं (सो अध्यास है)। तिनमें प्रथमपक्ष (जा आप्रात्माबिष स्थापनो सो) बनेनहीं क्योोंकि अन्यके धर्मकी अन्यके विषेस्थिति(होने) का असम्भवहै ताते।और ज़ोदि-
Page 64
सुएडक उपनिषद्द। तीयपक्ष (भ्रान्तिसे) कहोगे तो भ्रांतिसे (जो देखते हैं सो) किसकर के देखते हैं, आत्माकरके वा बुद्धिकर के तहां प्रथमपक्षजो स्र्प्रात्मा करके (भ्रान्ति) सोबनेनहीं, क्योंकिआत्माको अतरिद्याकी प्राथ्- यताका अनङ्गीकार है। ताते और द्वितीय पक्ष जोबुद्धिकर के सोभी देखना बनेनहीं, क्योंकि बुद्धिको आतमाके ताई विषय कर नेका अ्ास- म्भवहै, तिसकरके आत्मागत अविद्या आदिकोंके दर्शनका पभाव है ताते और भ्रान्तिको अपपने आश्रयविषे स्थित यथार्थ अ्रनुभवसे निवृत्त होनेकी प्रसिद्धिहै ताते। और बुद्धिको अपनुभवकीत्रप्राश्रयता का प्रसंग है ताते।एतदर्थ इसभाष्यका सम्यक् अ्पर् हम देखते नहीं॥ उ.॥ हे वादिन् ! अव तेरी शङ्गाका समाधान कहते हैं तिसको श्र- वणकरो। चैतन्यके त्र्प्राधीन ञनादि त्र्प्प्रनिर्वचनीय जो त्रप्रविद्या है, सो चैतन्य को श्रप्रविच्छिन्न करके आप्रापकर के त्र्प्रविच्छिन्न (विशिष्ट)चै- तन्यको बुद्धि आादिकों से तादात्म्यरूपकरके वर्त्तती है, तिस त्र्प्रवि- द्या के ब्रह्मात्माके साक्षात्कार से निवृत्त होने रूपके अङ्गीकार से, तिस अविद्याकी निवृत्तिकेहुये तिस अविद्या से उत्पन्न जो हृदय की ग्रन्थियां तिनकाभेद (नाश) श्रतिने कहाहै।और भाष्यकारका जो बुद्धिके आश्रयकरके हृदयकी ग्रन्थिका कथनहै, सो बुद्धिको उ़क् तादात्म्यरूप ब्हङ्मारको विशेषण होने करके त्रविद्या ादि कों के व्यावहारिकपने के अपरभिप्राय से है। और तर्प्रात्माको ग्रन्थिकी अनाश्यंताका जो कथन है, सो आत्माकी निर्विकारताके अररभि- प्रायसे है] तैसे 'कामायेऽस्य हृदिश्रिताः-इतिश्ुत्यन्तरात्,जो काम इसके हृदयबिषे आरश्रित हैं। यह अन्य कठवल्लीकी श्रुतिके प्रमासासे बुद्धिके आश्रित कथन किये जे काम हैं, सो नाश को प्राप्त होते हैं। और यह ग्रन्थि हृदय के आशितहै, आात्माके आ्रप्ाश्रय - नहीं, ऐसा जानाजाता है। और छिद्यन्ते सर्व्वसंशयाः१ 1 सर्व संशय वेदन (नाश) को पावते हैं। इसके लौकिक जनों को मरणपर्यन्त गङ्गाके प्रवाहवत् प्रवृत्तसये जो श्र्प्रज्ञानको विषय करनेवाले सर्वसंशय हैं सो अपने नाशको प्राप्त होते हैं। और "क्षी-
Page 65
द्वितीयसुएडके द्वितीयखरड: । हिरएमये परेकोशे विरज़ं ब्रह्मनिष्कलम्। तच्तुम्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदु:।६ यन्ते चास्य कर्माएि१ इसके कर्म क्षयको पावते हैं। इस निःसं- शंयभये अविद्यारहित पुरुषके, जो ज्ञानोत्पततिसे पूर्व इस जन्म विषेकिये। और फलके आरम्भसे रहित जन्मान्तर बिषे किये। और इसजन्म विषे ज्ञानोत्पत्ति के साथ होनेवाले, जे कर्म सो सर्व क्षय को पावते हैं। परन्तु इस वर्त्तमान जन्मके आारम्भक जे प्रा- रध कमहैं सों क्षयको (नाशको) पावते नहीं, क्योंकि सो अपना फल देनेको प्रवृत्तहोचुके हैं ताते। इसप्रकार यह सम्यक् ज्ञान- वानू पुरुष जन्म मरणादिरूप संसार के नाशहोनेसे मुकहोता है। यह अभिप्राय है॥ ८ 1 ४० ॥ हे सौम्य ! कथनकिये त्रर्थकोही संक्षेपसे कहनेवाले अरग्रिम तीन मन्त्रहैं, तिनकाभी व्याख्यान श्रब करतहैं। 1 हिरएसये परे कोशे घिरजं ब्रह्मनिष्कलम्।'1 पर प्रकाशमय कोशविषे रजरहित निष्कल ब्रह्महैं। तलवारके कोश (न्यान) वत्, आात्मस्वरूपकी प्रापतिका स्थान होनेसे, और सर्व के भीतर होनेसे पर जो बुद्धि के विज्ञानरूप प्रकाशमय कोशहै तिसविषे त्ररविद्या शांदिक दोष- रूंप रज (मल) से रहित और सर्व से बड़ा होनेसे और सर्वका एक पप्रात्मा होनेसे ब्रह्मरूप, और सोलह कलारूप अवयवसे रहित होनेसे निष्कलरूप है। औ्रर जिसकरके, विरज और.नि- षकलरूप है, तिसहीकरके तच्छुमं ज्योतिषा ज्योतिस्तयदात्म विदोविदुः"' सो शुभ्रहै (और) सर्वज्योतियों का ज्योति है, ऐसा जो है तिसको पात्माके जाननेवाले जानते हैं। सो शुभ्र (शुद्ध) है। और अग्निआआदि सर्वज्योति (प्रकाशवान्) का भी सो ज्योति (प्रकाशक है)। अर्थात् अ्रग्निआ्र्ादिकोंका भी, जो. ज्यो- तिपना है, सो अपने अन्तर्गगत ब्ह्मात्म चैतन्यरूप ज्योति का किया है। और जो अन्य्र प्रकाशोंसे प्रभासमान आात्मरूप ज्योति
Page 66
सुएडक उपनिषद्। न तन्न सूर्य्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमाविद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेवभान्तमनुभाति सर्व्व तस्य भासा सर्व्वमिदं विभाति ।.१०।४२।: (प्रकांश) है, सोई परमज्योति है। ऐसा जो परमज्योति है तिसको, शब्दादि विषय और बुद्धिकी वृत्तिके साक्षीरूप आ्र्प्रात्मा को जाननेवाले त्रात्माकार वृत्तिके अपनुसारी त्रात्मवेत्ता विवेकी पुरुष जानते हैं। और जिसकरके सो परम ज्योति है, तिसही से वो आत्माकारवृत्ति के अनुसारी पुरुषही तिसको जानते हैं। औरं तिससे अन्य जे बाह्य अर्थाकारवृत्ति के अनुसारी पुरुष हैं सो जानते नहीं ॥ ह। ४१ ॥ हे सौम्य।। प्र० ॥ सो ब्रह्म ज्योतियों का ज्योति कैसे है॥ उ०॥1 न तन्र सर्य्यों भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः॥। तिसविषे सूर्य भासता नहीं (और) चन्द्रमा (और) तारागए भासते नहीं (शर) यह विजलियां भासती नहीं, यह अग्नि कहासे भासेगा। तहां, अर्थात् तिस अपने आरा- त्मारूप ब्रह्मविषे, सर्वका प्रकाशक सूर्य भी भासता नहीं, अर्थात्. ब्रह्म को प्रकाशता नहीं। और सो सूर्य तिसही के प्रकाशसे शन्य सर्व अनात्माके समूहको प्रकाशता है, परन्तु तिसका अपने आपसेही प्रकाश के करने बिषे सामर्थ्यनहीं। यह अर्थ है। और तैसेही तिसबिषे चन्द्रमा सहित तारागणके भासता नहीं और यह बिजलियां जो मेघाश्रितहुई प्रकाशती हैं सो भी भासती (प्र- काशती) नहीं तब यह हमलोकों करके प्रकटकिया जो तरग्नि सो कहांसे आासेगा किन्तु बहुत कहनेसे क्याहै तमेव भान्त मनुभाति सर्व्व तस्य भासा सर्व्वमिदं विभाति। सर्व तिसही के भासमानहुये पीछे भासता है, और तिसहीके प्रकाशसे यह सर्व भासता है। परन्तु यह [ यहां प्रकट अर्थ विषे वाधित भये जगत्की अनुवृचि (याधभये: पीछे. प्रतीति) देखाई इस करके
Page 67
द्वितीयमुएडके द्वितीयखएड:। ६ ५ ब्रह्मैवेदममृत पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्व्रह्मदक्षियत- श्चोत्तरेण। अघश्चोर्डच्च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरि- श्रम् ॥ १११४३॥ इति द्वितीयमुरडके द्वितीयखएड:॥ शरीर सहित को बन्ध भ्रान्तिकी निवृत्तिरूप जीवन्मुक्कि विरोधको प्रास्त होती नहीं] जो जगत भासता है सो सब तिसही परमेश्वर के स्वरूप से प्रकाशरूप होने से भासमान होने पीछे भासता है, जैसे अग्निके संयोग से जल और अर्द्धदग्ध काष्ठवादिक जो है, सो जलावनेवाले अरग्निके पीछे जलावते हैं, आपसे नहीं,। तैसेही सर्व जगत् तिसही के प्रकाशमान हुये पीछे प्रकाशता है, आपसे नहीं। तिसही के प्रकाश से यह सर्वसूर्य्यादि प्रकाशमानों कर के युक्र जगत् भासताहै।['तस्यभासा सर्वमिदं विभाति, तिस के प्रकांश से सर्व यह भासता है। इसप्रकार इस ब्रह्मकी स्वयं प्रकाशरूपता विषे तात्पर्य कहते हैं ] जिस करके इसप्रकार सोई ब्रह्म भासताहै, और कार्यमत विविधप्रकारके प्रकाश से विशेषकर के भासता (प्रकाशता) है, एतदर्थ तिस ब्रह्मका स्वरूपसे प्रकाश- b mhe r रू.पतापना जानाजा ताहै।और जो वस्तु स्वरूपसे अविद्यमान है, सो अन्यको प्रकाशने विषे समर्थ होती नहीं, क्योंकि स्वरूपसे श्रविद्यमान पकाशवाले घटादिकों को अ्रन्यकी प्काशकता देखने में आवती नहीं ताते, और प्काशरूप सूर्य्यादिकों को अन्यकी प्रकाशकता को देखते हैं तातें ॥१०॥४॥ हे सौम्य।अ्रब [समापति के मन्त्रका तातपर्य कहते हैं, इस मन्त्र विपे बह्मसे विविध प्रकारका करते नहीं, ऐसा तिसका विकार (कार्य) रूप जगत् जो यह स्थाुहै, सो पुरुष है, इस वाक्यवत् 'स्व्वखवल्विदव्ह्म' सर्व ब्रह्मही है। ऐसे वाधबिषे समानाधि- करणके हुये अन्वय और व्यतिरेक करके बांधरूप अ्रप्रभावके नि- बेधमे सह्यमात्र बोधन करते हैं। जो. सो ज्योतियों का ज्योति
Page 68
सुएडक उपनिषद्। त्रथ तृतीयमुएडके प्रथमखएंड प्रारम्यते॥ द्वासुपर्ण सुजा सखाया समानं वक्षम्परिषस्वजा- ते। तयोरन्यःपिप्पलं स्वाद्वत्यनशनन्नन्योडभिचांकशी
ं वाशी से त्र्प्रारम्भ किया विकार नाममात्र है। तिसका कार्य है सो सर्व मिथ्या है। इस विस्तारसे हेतुकरके प्रतिपादन किये अार्थ को वेदस्थानी इस मन्त्रसे फेर समाप् करते हैं। यह जो अविदा युक् दष्टिवाले पुरुषको ज्रंह्मैवेदममृतंपुर रतावब्रह्म पश्चाद्न्ह्मदः क्षिए तश्चोत्तरेण।। अरंग्रभाग बिषे भासमान अमृतरूपब्रह्मही है, पींछे ब्रह्महै, दक्षिण ओरसे न्रह्महै, उत्तर शर से ब्ह्महै। अ्रंग्र- आगंबिषे आासमान वस्तुहै, सोउक्र दक्षिरवाला पमृतरूप ब्रह्मा ही है, तैसे पीछे ब्रह्म है, तैसे दक्षिण ओरसे ब्रह्महै, तैसे उत्तर (वास.) ओरसे ब्रह्म है। तैसेही श्रधश्चोद्ट्ञ्च प्रसृतंत्रह्मैवेदं विश्वः मिदंवरिष्ठम्। नीचे पुनः ऊपर ब्रह्महै, यह कैलाहुआ्र ज्रह्मही है, यह जगत् अत्यन्त श्रेष्ठ ब्रह्मही है नीचे ब्रह्महै और ऊंचे ब्रह्महै। और अन्यभी कार्यके आ्राकारसे सर्वश्रोरसे फैलाहुआ नामरूपा- ला यह भासमानजो वस्तु सो ब्रह्महै:॥ हे सौम्य !अब बहुत क- हने करके याहै, परन्तु यह सर्व विश्व (जगत्)वपत्यन्त श्रेष्ट ज्हा ही है। और ब्रह्मासे भिन्नप्रतीति है सो सर्व्वरज्जुविषे सर्पकी प्रतीति- वत् अविद्यामान्र है। और ब्रह्मैवैक परमार्थसत्यमिति, एक ब्रह्मही परमार्थ से सत्य है। यह वेदकी आज्ञा है॥११।४३॥ इति श्रीसुरंडकउपनिषद्गतद्वितीयसुराड़कके द्वितीय खएडकी भाषाटीका समास॥ :
तृतीयमुएडकगतप्रथमखरड की भाषाटी का-प्रारंभ।
Page 69
तृतीयमुए्डके प्रथमखएडः। प्राप्तहोताहै। और जिसकी प्रात्तिके होने से हृदयकी ग्रन्थि और संशय ऋरादिक संसार के कारण का अत्यन्त नाशहोता है, ऐसी जो पराविद्या सो कही और अरक्षरके दर्शनका उपाय जो योग्यहै, सो धनुपादिकों के ग्रहसकी कल्पनासे कहा। अब तिस ज्ञान के सहकारी सत्यादि साधन, कहने को योग्य हैं, तिनके. अर्थ उत्तर अन्थका पप्रव त्रप्रारम्भ हैं। तहां यथार्थ त्रप्ात्मतत्त्व को त्र्प्रति दुःख से जानने योग्य होने करके, जो पूर्व किया भी तत्त्वका उपदेश (निर्वार)सो पुनःअन्यप्रकारसे कहते हैं। तहां सूत्ररूप जो प्रथम मन्त्रहे, सो परसार्थरूप वस्तुके निश्चयार्थ प्रारम्भ कहते हैं। "द्ा- सुपर्शासयुजासखायासमानंदृक्षंपरिपस्त्रजाते।। दो पक्षी हैं साथ ही चुकहैं (और) संखाहें (और) समान हैं वृक्षको आश्रय करते भये। जीव और ईश्वर यह दोनों, शोभायुक्र गमनवाले [जीवको प्रज्ञानी होने करके। और नियम में रखने के योग्य होने करके उचित होने से, और ईश्वर को सर्वज्ञ होनेकरके, और नियाम- कपने की शक्तिके योगसे, जीव और ईश्वर इन दोनोंका वियम्य और नियामक भावकी प्रातिरूप गमन (उड़ना.) क्चित् है] होने से अथवा पक्षीके समान होनेसे पक्षी हैं सो सर्वदा साथही युक्र (रहते) हैं। और जिसकरके तुल्य प्रख्याति कहावने की यो- ज्यता) चाले हैं, और तुल्यही प्रकाशके कारण हैं। एतदर्थ परस्पर सखा हैं। और समान हैं,। इसप्रंकार होनेसे दोनोंके ज्ञानका स्थानक होनेसे, एक, जो वृक्षतत् छेदन (नाश) रूप धर्मकी तु- ल्यतासे शरीररूपी वृक्षहै, तिसके अर्थ एक वृक्षके प्रति फल के उपभोगार्थ दोनों पक्षीत्रत् मिलापको करतेभये। अर्थात् यह शरीररूपी वृक्ष 'ऊर्ध्वमूलोऽ्वांकशाखएपोऽश्वत्थः सनातनः ऊंचे (त्रह्मरूप) मूलवाला है, और (प्रामादिक) नीची शाखवाला है। और अंपनी स्थितिके नियमसे रहित होनेसे अश्वत्थ (5्ं- 'स्थिर) है और अज्ञान पर्यन्त होने (रहने) वालाहै, और क्षेत्र- ..
Page 70
मुएडक उपनिषद्। समाने वृक्षे पुरुषोनिमग्नोऽनीशया शोचति मुह्य- मान: । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोक:॥। २।४५। फलका आाश्रय है, तिस (शरीररूपवृक्ष) को पक्षियोंवत् त्रप्रविद्या काम और कर्मकी वासना के आअय लिंगशरीररुपी उपाधिवा- लाआत्मा (जीव) और ईश्वर यह दोनों मिलतेभये। और 1तयो- रन्यः पिप्पलंस्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति१ तिन दोनोंके मध्य एक वृक्षके फलके स्वाद को भोकाहै औरर दूसरा भोका नहीं किन्तु देखता है। मिलेहुये तिन दोनों के मध्य एक जो लिङ्गशरीर- रूपी उपाधियुक्त क्षेत्रज्ञ नामवाला जीवहै सो शरीररूपी वृक्षको पप्राश्रय करताहुआ अपने पाप पुरायमय कर्मजन्य सुखदुःखमय अरपनेक प्रकारकी वेदना (दुःख) के अनुभवरूप स्वांद फलको पप्रविवेकता करके भोकाहै, और अन्य (दूसरा जोनित्वशुद्ध बुद्ध मुक्र स्त्रभाववाला सर्वज्ञ शुद्ध सत्यगुसाप्रधान मायोपाधिवाला ईश्वरहै सो भोका नहीं और जिसकरके यह ईश्वर नित्य साक्षी- पनेकी सत्तामात्रसे भोग्य और भोका दोनोंका प्रेरक है, एनदर्थ सो तो अभोकाहुआ वृक्षसे पृथक् होके केवल उदासीन हुआ देखताही है। और तिसका दर्शनमात्रसेही राजावत् प्रेरकपना सिद्धहै (विक्रियावान् नहीं) ॥ १॥ ४४॥ हे सौम्य! ' समानेवृक्षेपुरुषोनिमग्नोऽनीशयाशोचतिमुद्य- मांनः१ एक वृक्षविषे पुरुषनिमग्न हुआ् श्रनीशासे मोंहकोपावता हुआ शोकको पावता है। तहां ऐसे होनेसे उक्प्रकारके शरीररूप एकवृक्षविषे पुरुष जो भोका जीवहै, सो तरविद्या काम कर्म फल रागद्वेषादिरूप बड़ेभारकरके आक्रान्त(रोका) हुआ संसारसागर विषे तूंबेवत् निमग्न भयाहै अर्थात् दढ़करके देह (संघात) बिषे पात्मभावको प्राप्तभयाहै। और यहही हस्त पादादि त्र्प्रचयवर्युक्क शरीररूप पिंद में अ्रमक /टेवतन) का पत्रदौं चौर दर्स("-
Page 71
तृतीयसुएडके प्रथमखएडः । ६६ का पोत्रहौं, दुर्वलहौं, मोटाहों, गुसरान् हौं, निर्गुसह, सुखी हौं, दुःखीहों, इसप्रकारका (अज्ञानलक्षणात्मक) ज्ञान इसको होता है, इससे अन्य (सम्यक) ज्ञान इसको नहीं होताहै। इसप्रकार जन्मता मरता रहता है। और सम्बन्धी वान्धवादिकों से संयोग विदोगको पावताहै। इस हेतुसे मोहको [आरावरस और विक्षेप यह दोनों अत्रिद्या के कार्य हैं। तिनमें ईश्वरभावकी अप्रातति रूप जो अनीशा, सो आवरस है औ्रर जो शोकको करता है सो विक्षेप है। और इन दोनोंका हेतु जो अनिर्वचनीय पज्ञान सो मोह है तिससोह करके विशिष्टभया। इत्वर्थ:] पावताहुआ। अर्थात् अ्रनेक प्रकारके अ्रनर्थो से अवित्रेकी होताहै तिसकरके चिन्ताको प्राप्त हुआ्रा मैं किसीमी कार्यके करनेविपे समर्थ नहीं हों, मेरा पुत्र नष्ट मयाहै, मेरी भार्या (स्री) मृत्युवश भई है, अव मुझको जीवने साथ कहो क्या प्रयोजन है कुछमी नहीं।। इस प्रकार अत्यन्त दीनभावतारूप जो अनीशा (अशक्रता) है,तिसकरके सन्तापरूप शोकोंको पावता है॥ सो इसप्रकार प्रेत तिर्थक् (पक्षी) और मनु- प्यादिक योनियोंचिषे वेगवान्ताको प्राप्तभया जीव कदाचित् नेक जन्मोंविषे स्य किये शुद्ध धर्मरूप कर्म तिस निभिन्न से कोई एक परमदयालुआ्तचार्य पुरुषने देखाया जो योगमार्ग तिस विपे, तरहिंसा, सत्य (यथार्थभापण) ्रह्मचर्य, वैराग्य और शम दमादि साधन तिनकरके युक्र, एकाथ्रचित्तवालाहुआ,जिससमय पप्रनेक योगीजनों करके औ्रर त्र्प्रनेक कर्मिष्ट जनोंकरके 1 जुष्ट यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोक: १ सेवन किये अन्य ईश्वरको और इसकी महिमाको जिसकाल विषे देखता है तव वीतशोक होताहै। सेवनकिये, देहरूप (वृक्षकी) उपाधि के लक्षससे अन्य (विलक्षण) क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह,जरा, और मृत्यु, यह जो देह, प्रा, मनकी पट्ऊर्मी हैं तिनसे रहित असं- सारी, ईश्वरको और यह मैं सर्व जगत्का आत्माहौं और सर्व को समानहो(सय्यवत और समपर्ण भर्तोंविषेस्थितहों और अन्य
Page 72
७० सुएडक उपनिषद्। : यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्री कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्म योनिम्। तदा विद्वान् पुएयपापे विधूय निरञ्जन: परमं साम्यमुपैति॥ ३॥४६॥ अपविद्याजन्य उपाधि सो जो परिच्छिन्न मिथ्या आत्मा सो मैं नहीं हौं। और जगत् जो है सो इसही मुझ परमेश्वरकका रूपहै। इस प्रकारकी विभूतिरूप इसकी महिमाको ध्यावताहुआ देखता है तब वीतशोक होता है। अर्थात् सर्व शोकमय सागर से मुक (उंतीर्थ) होताहै॥ २। ४५ ॥ हे सौम्य! अन्य मन्त्र भी उक्र अर्थकोही सविस्तर कहते हैं, सोभी श्रवणा करो । यदा पश्यः पश्यते रुवमवर्ण कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम ॥जिसका लवषे विद्ान (जिज्ञासु पुरुप)स्वयंज्यो- तिस्वरूपवाले (सर्वजगत्के) कर्त्ता ब्रह्मयोनि ईश्वररूप पुरुप को (अप्रपनानप्राप) देखताहै।।'तदा विद्वान् पुरायपापे विधूय निरज्जनः परमं साम्यसुपैति१ तिससमय (सो देखनेवाला) विद्वान् (बन्ध- नरूंप) पुरयपाप. (मय कर्म) को (समूल) दग्ध करके, वा (पुएय पापमय कर्मरूप सलसे अत्यन्तशुद्ध होयके) निरंजन (त्रविद्या से रहित) हुआ परम (सर्वसे श्रेष्ट) ऋद्वितीयरूप साम्य (एकता) भावको प्राप्त होता है। ॥ ३ ४६ ॥ हे सौम्य!"प्राणो ह्वोष,यः सर्व्तभूतैर्विभाति.विजानन् विद्वान् भवते नातिवांदी॥जो. यह प्राण सर्वभूतों करके विविध प्रकार का भासता है विद्वान् जानता है अतिवादी नहीं होता है। जो यह प्राए का प्राण परमेश्वर ब्रह्मा से लेके तृमादि पर्यन्त सर्व भूतोंबिषे स्थिंत सर्वात्मा हुआ्न्र विविध प्रकार का सासताहैं। इस प्रकार सर्वभूतोबिषे स्थित सर्वात्मा परमेश्वर को जो वाक्यार्थ के 4 ज्ञानविषे विद्वान हुआ यह मैंहूं इस प्रकार साक्षात् तरात्मभाव से जानताहै, सो पुरुष अन्यसर्वको उल्लंघनकरके तरतिवादी (कहने के स्वभाववाला) नहीं होताहै। अर्थात् जो पुरुष उकप्रकार 'प्रा
Page 73
तृतीयमुरडके प्रथमखयडः। ७१ प्राणो ह्येष य: सर्व्वभूतैर्विभाति विजानन्विद्वान् भवते नांतिवादी। त्र्ात्मकीड परप्रात्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरेष्ठः ॥४1४७॥ : रास्य प्राणः, प्रासाकेभी प्राणरूप.आ्र्पत्माको साक्षात् सोहमस्मि भावसे जानताहै सो अरपरतिवादी नहीं होताहे। क्योंकि जब:नात्मै- वेद संव्र; सर्वनास रूपात्मक आंत्माही हैं, तिससे पृथक् रंचकमात्रं भी नहीहै, तव यह आात्मंनिष्ट विद्वान् किसको उब्लंघन (निषेध) करके कहै। और जिस पुरुपको उत्तम मध्यम अन्यवस्तु देखनेबिषे भवंतीहैं सो तिसको उह्ंघनकरके कहताहै। और यह आात्मानु भची त्रिद्वान् तो अपने आपसे नान्यत्पश्यति,नान्यचशोति, ना- न्यहिजानाति, अन्य को देखता नहीं, अन्य को सुनता नहीं, अन्य को जानता नहीं, एतदर्थ पप्रतिवादी होता नहीं। और आरमक्रोड आत्मरतिः क्रियावानेप ब्रह्मविदांवरिष्ः॥यह त्रात्मक्रीड़, आत्म- रति, क्रियावान् ब्रह्मवेत्तांश्ररंविपे, श्रेषट्है। यह विद्वान् कि आत्मा विपेहै करीड़ा (वरिचारात्मकरमण) जिसकी, अान्य पुत्रदारा वित्ता- दिकोंविषे नहीं, सो कहिये; आात्मक्रीड़, और तप्रात्मा विषेहीहै प्रीति जिसकी, अन्य देहादिकोंविषे नहीं सो कहिये आंतंमरति। और तैसेही ज्ञान ध्यान और वैराग्यादिक हैं करिया जिसकी अन्यश्रौंत- स्मार्न्तादिक नहीं सो कहिये क्रियावान् इसप्रकारहै।[यहां ज्ञानं कर्मके समुचयके प्रतिपादक चेदान्तके एकदेशीके व्याख्यानकों प्रकटकरके निषेध करते हैं] कोईएक (एकदेशीमतवाले) वांदी तो क्रियावान् इसपद के अपर्र को अ्र्प्र ्नि होत्रादिरूप (बाह्य) कर्म और व्रंह्मविद्याके समुचयबिषे इच्छा करतेहैं। परन्तु सो उनका इच्छा करना 'एषब्रह्मविदा चरिष्ठः, इस मुख्य अर्थवाले वचनसे विरोध को प्राप्त होताहै। व, जिसकरके वाह्यक्रियां और आत्माविषे प्रीति (निर्विकल्पता) यह दोनों समकाल (साथही) होनेको अशक्य हैं। किन्तु कोई एक अग्निहोत्रादि वाहय कियासे सम्यक् प्रकारसे
Page 74
७२ सुयडक उपनिषद्द। सत्येनलभ्यस्तपसा ह्येषत्पात्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रंह्मच यर्येस नित्यम्। अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयोहिशुभ्रोयंपश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः॥५।४८।। निवृत्तहुआ पुरुषही आंत्मक्रीड़ होताहै, क्योंकि (अनात्माश्रय) बाह्यक्रिया, और (आत्माश्रय) आ्ात्मक्रीड़ाका परस्पर विरोध है ताते। जैसे तम और प्रकाशकी एकत्र स्थिति सम्भवे नहीं, तैसे 'क्रियावान्' इस वाक्य से जो बाह्य करिया और ज्ञान (आात्मानुसंधान) का समुच्चय परस्परके विरोध कारण से सं- भवे नहीं, ताते ज्ञान और कर्मका जो समुच्चय प्रतिपादन करना सो व्यर्थ वाचालता (बकवाद) है। और :अन्यावाचोविमुच्यः थ;। अ्रन्य वासी को छोड़ो। और :संन्यासयोगात्; संन्यास योगसे । इत्यादि श्रुतियोंके प्रमासासे। एतदर्थ जो ज्ञान ध्याना- दिक क्रियावाला और भेदरहित अर्थ की मर्यादावाला संन्यासी है सोई यहां क्रियावान् है। जो ऐसे लक्षणवाला त्र्रतिवाद रहित पात्मकीड़, आ्र्ात्मरति और योगादि क्रियावान् ब्रह्मनिषठहै सो यह सर्व ब्रह्मवेत्ताओ्ोंके मध्य वरिष्ठ सर्वमें मुख्यहै ॥४।४॥ हे सौम्य!अब.संन्यासीको सम्यक् ज्ञानके[यहां सम्यक् ज्ञान शब्दकरके वस्तुको विषयकरनेवाले अनुभवरूप फल पर्यन्त वा- क्यार्थके ज्ञानको कहतेहैं। और जिसकरके अपरोक्ष अनुभवरूप जो ज्ञान तिसज्ञानको अविद्याकी निवृत्तिरूप जो अपना कर्तृत्वरूप कार्य तिसके करनेविषे सहकारीकी अपेक्षाका असंभवहै, एतदर्थ परिपक्क विद्याके लाभार्थ परिपक ज्ञानका और सत्यादि साधनों का समुचय मानतेही हैं। और इसकरके भास्कर के मतकी सिद्धि होती नहीं। क्योंकि परिपक विद्या में सहकारीकी अ्रपेक्षा बिषे प्रमाखका अप्रभावहै, अर्थात् परिपक विद्याका सहायक और वि- रोधी कोई नहीं, ताते और तिस विद्यासे कमके अलेपका श्रवण है, अर्थात् : नलिप्यतेकर्मखपापकेनेति;। इत्यादि प्माए से
Page 75
तृतीचंनुपडके प्रथमखएड: । ७३ परिपक विद्यावाला विद्वान् कम्मासे लिप्यमान होता नहीं, ताते। और कर्मरहित देवतादिकोका शुक्र होना सुना जाता हैं ताते ] सहकारी जो निदृतिप्धान सत्वादिक साधन हैं, सो विधान करते हैं। 1 सत्येन सभ्यस्त्रपसा होप आात्मा सम्यग्ानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्॥ यह आात्मा नित्य सत्यसे प्रात होने योग्य है (नित्य) तप से (प्राप्त होने योग्य है) और यथार्थ त्रात्म- ज्ञान के दर्शन से (नित्य प्रातहोने को योग्य है) और (नित्य) ब्रह्मचर्य से (प्राप होने योग्य है)। यह पात्मा नित्यही अलत्य भावण के त्यागरूप संत्य से प्रात होने योग्य है। और नित्यही इन्द्रिय और मनकी एकायतार तपसे पाप्त होने के योग्य है। तथाच'मनसश्चेन्द्रियाणामेकायर्ज परमं तपक्रमन और इन्द्रि- योंकी पकायता परम तप है। इस प्रकार रसृतिविषे कहाहै ताते उक्र तपका लक्षमा गुक्र है। और जिस करके सो तप आ्रात्माके दर्शन के अभिमुस (सम्मुख) होनेसे छातमदर्शन विपे, छानुकूल है, एनदर्थ यह तपन परमसाधन है। और अन्य जे चान्द्रायसादि रूप तपहें सो तिस (घात्मदर्शन) का परम साधन नहीं। फिंवा, यथार्थ तरत्मज्ञानके दर्शन (विचार) से नित्य पासहोने योग्यहै और नित्य मैथुन के अरनाचरसरूप न्रहाचर्यसे प्राप्तहोनेको योग्य है। और जिसप्रकार यह साधन कहे, तैसही नयेषुजिलम- मृतं न सायाचेति, जिन विपे कपट भूठ और माया नहीं है-। यह प्रश्न उपनिषड्के वाक्य करके कहा है।। प्र० ॥ जो इन साधनों से प्राप्त होताहै यह आत्मा कौन और कहाँ है।। उ०॥ '।ञ्रन्त :- शरीरे ज्योतिर्मयोहि शुध्धोयं पश्यन्ति यतयः क्षीसादोषाः शरीर के भीतर प्रकाशमय शुख्धहैं, जिसको दोपोंसे रहित सन्खाली पा- चते हैं। शरीरके भीतर हृदयकमल नासक एक मासपिंडी है तद्गत आाकाशरूप अन्त:कर याविये प्रकाशमय शुद्ध आत्मा है, जिंस आत्माको. कान, कोघादिक चिसके मजरूप द्ोषोंसे रहित संन्यासी देखते (पावते) हैं। अर्थात् सो आत्मा नित्य सत्या
Page 76
७४ झुएडक उपनिषद्। सत्यमेव जयते नानतं सत्येन पन्था वितंतो देवयानः। येनाक्रामन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधा नमू॥६॥४६॥ दिरूप साधनोंसे सन्यासियों करके प्रासहोता है। कदाचित् होने वाले सत्यादिकोंसे पात् होता नहीं। यहां यह सत्यरूप साधन की स्तुत्यर्थ अर्थवाद है। ५।४८ ।। हे सौम्य ! ' सत्यसेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देव- यानः१। सत्यही जयको पावता है अरपतृत नहीं, सत्यसे देवयान नामक मार्ग प्रवृत्तभया है सत्यवान्ही जयको पावता है, अनृत 4 (भूठ) बोजनेवाला नहीं। जिस करके पुरुष के अनाधितही केवल सत्य और भूठके सम्भवहुये, जय वा पराजय सम्भवे नहीं किन्तु असत्यवान् जो अनृत (भूठ) बोलनेवाला पराभव को पावता है। सत्यवादी नहीं, यह लोकविषे प्रसिद्ध है। इसकरके सत्यका बलवान् साधनपना सिद्ध भया। किंवा सत्यका छति- शय साधनपना गास्रसे भी जाना जाता है।। प्र० ॥ किसप्रकार जानता है।।उ० ।यथार्थ चोलने की व्यवस्थारूप सत्यसे देवयान नामवाला मार्ग निरन्तरपनेसे प्रवृत्तम या है। और 'ेनाक्रासन्तृष- यो हयास्त कामा यत्र तत्सत्यस्य परसं निधानम् जजिहां सत्यका पर मनिधान है तहां जिसन्कारसे आापकाम वषिजन गमन करतेहैं। +4 जहाँ सत्यरूप उत्तम साधनका साध्य सो परसार्थ तत्त्वरूप पुरुषार्थ स्वरूपते वर्तमान परमनिधानहै। ऐसा जो ब्रह्मलोक, तहां जिस प्रकारके पशावादि उपासनावाले और कपट साया फूठ अहंकार दम्भ शठता (आदि आसुरीसम्पदा) से रहित और सर्व औोर से तृष्णा रहित ऋषिलोक गमन करते हैं। सो सत्यसे निरन्तरपने करके प्रवृत्त मया है। यह पूर्वके पदसे सम्बन्ध है। ६। ४६ । हे सौन्य! झत्यका निधान जो पूर्व कहा तिसको पुनः विशे- ; षरायुक्क कहते हैं।। प्र० ॥ सो सत्यका निधान क्या है, और सो
Page 77
तृतीयमुएडके प्रथमखएडः । ७५
तृहच्च तहिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत्सूक्ष्मतरं वि- भाति। दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्सियहैव निहितं गुहायाम् ॥७५0 ॥ किस धर्मवाला है।।उ० ॥ 1 बृहन्व तदिव्यमचिन्त्वरूपं सूक्ष्साव तत्सूक्ष्मतरं विभाति।। सो बड़ा है और स्वयं प्रकाशहै औ्प्रर आार्ि- त्वरूप हे, औौर सूक्ष्मसे भी अ्र्प्रतिशय सूक्ष्म है और विविधंन्रकार भासता है। सो प्रसंग विपे प्रातभया न्ह्मा, संत्यादि साधन करके सर्व और से व्यात है ताते वड़ा है, और स्वयंप्रकाश (इन्द्रियोंका सविषय) है और एतदर्थ ही, अचिन्त्यरूप है, और सो त्राका- शादि सूक्ष्मोंसे भी अतिशय करके सूक्ष्महै। और जिस करके यह सर्वका कारण है, तिसकरकेही इसको सर्वसे अधिक सूक्ष्मता है। और ऐसाहुआ भी सूर्थ्य और चन्द्रादिक आकारसे नाना प्रकार का भासता (प्रकाशता) है। किंवा "दूरात्सुदूरे तदिहा- न्तिके च पश्यत्स्विहैध निहितं गुहार्या"।सो दूरसे दूर है इसमें स- मीप वर्तता हे, यहांही चेतनावाले गुहाविपे स्थित है। सो व्रह्म पज्ञानी पुरुषों को अत्यन्त त्रगम होनेसे दूर से भी दूरदेश विषे चर्तता है, और विद्वानों का तात्माहोने से और सर्व्वान्तर होनेसे, और श्र्ाकाशमन्तरोयं" वा श्ररकाशशरीरंव्रह्म *आाकाशकेभी भीतर है इस श्षुतिसे, इस देहमें समीप विषे बर्तता-है। और यहां ही चेतनावाले पुरुषों के मध्य बुद्धिरूपी गुहाविषे स्थित यह ब्र हदर्शनादि क्रियावाला होने करके योगी पुरुषोंसे लक्ष्य में आ्रा- वताहै, तथापि अविद्यासे शाइत हुआ तहांही स्थित ब्रह्म छवि- द्वानों करके कदापि लक्ष्यमें आावता नहीं। इति सिद्धम् ॥७५०॥ हे सौम्य! फेर भी, असाधारण विषे भी असाधारगरूप जो तिसके ज्ञानार्थ साधनकहते हैं न चक्षुषा गंहयते नापि वाचा नान्यै- दैवैस्तपसा कर्मावा। चक्षुकर के नहीं ग्रहणकरते, और वार्णीकरके भी नहीं (अहसकरते) और अन्यदे वताओंले भी नहीं (महाकरते)
Page 78
७६ सुएडक उपनिषद् न चक्षुषा ग्रहयाते नापि वा चा ना न्यैर्देवस्तपसा कर्म्मण बा। ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः॥८।५१।। और तपसेभी (नहीं ग्रहसकरते)और कर्मसेभी (नहींग्रहणकरते)।. जिलकरके यह ब्रह्मसे अरभिन्न छात्मा सो अरूप होने से किसी भी पुरुषकरके चक्षसे अहसा (विषय) किया जाता नहीं, और पवाच्य होनेसे वासीसे भीग्रहण किया (कहां) जाता नहीं, और अन्य जे देवता (इन्द्रियां) तिनकरके भी महसा (विषय) किया जाता नहीं, और तप जो सर्व फलकी प्रातिका साधन तिस तप करकेभी ग्रहण कियाजाता नहीं, क्योंकि तपआदिकों के फलादि- कोसे पृथक है। अथवा तैसे प्रसिद्ध महद्भाववाले अरग्निहोत्रादि रूप वैदिक कर्मसे भी ग्रहण किया जाता नहीं।। प्र० ॥ जव उक्क प्रकार से नहीं ग्रहण होता, तब तिसके ग्रहसका साधन कौन है।। उ० ॥।ग ज्ञानप्रसादेन विशुद्सत्वस्ततस्तुतं पश्यतें निष्कलं ध्यायमान:१। ज्ञानके प्रसाद से शुद्ध अन्त:करणवाला जानने को योग्यहै ताते सो तिस निष्कलको देखता है। ज्ञान जो है; सो सर्व प्राखधारियोंको स्वभावसेही झात्माके वोधन करने विषे समर्थ है, तथापि बाहय विषयों विषे रागादि दोषोंकरके मलिन हुआरा नित्य समीपस्थ आत्माको भी, मैलसे आवृत दर्पसावत्, ऋरु चंचलजलवत्, बोधनकरता नहीं। सो ज्ञान,जब इन्द्रिय और विषयोंके सम्बन्धसे उत्पन्न भये जे रागादिक मैल तिन मैलको दूर करनेसे दर्पय अरु जलादिकोंवत प्रसन्न (स्वच्छ और शान्त) स्थित होता है, तव ज्ञानका [जिसकरके अर्थको जानिये ऐसी जो बुद्धि तिसको ज्ञान कहते हैं। लिसकी जो प्रसन्नता तिसको 'ज्ञान प्रसाद' कहते हैं। पुरुष ध्यान करता हुआ ज्ञानप्रसाद को पांव ताह। और ज्ञानके पसाद से आत्माको देखता हैं। इस प्रकार प्रथका क्म यहां जानना। क्योंकि संशय आदि मलसे रहित
Page 79
तृतीयसुएडके प्रथमखएडः । ७७
एषोसुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन प्रायः पञ्चधा संविवेश। प्रायौश्चितं सर्वमोतंप्रजानां यस्मिन्विशुद्धे वि भवत्येष आरात्मा:॥।६।५२।। प्रमाके ज्ञानकोही साक्षात्कारका हेतु होने से ध्यानक्रिया को "प्रमाज्ञानकी साधनता की असिद्धि है तते ] प्रसाद होता है। तिस ज्ञानके प्रसादसे शुद्ध अरन्तःकरणवाला पुरुष, जिस करके म्रह्मके देखने को योग्य है, एतंदर्थ यह पुरुप सर्व तर्प्रवयवों के भेद से रहित निष्कलरूप तिस ब्रह्मको सत्यादिसाधनवान् और जिते- न्द्रिय होयके एकाय्रमन से ध्यान करताहुआ पत्मा कोही देखता (प्रासहोता) है।। = । ५१ ॥ हे सौम्य। एपोगुरात्मा चेतसावेदितव्योयस्मिन् प्राणःपञ्च- धा संविवेश। यह अपत्मासूक्ष्म है, सो जिस विषे पाण पांचप्रकार से सम्यक प्रवेश को पायाहै तिस विषे चित्त करके जानने को योग्यहै। यह तररात्मा सक्ष्महै, सो जिस शरीर विषे प्राणवायु प्रांस अपरपानादि पांचप्रकार के भेद करकें सम्यक प्रकार प्रवेशको पायाहै, तिसही शरीर विपे हृदय कंमलरूप देशमें केवल वि- शुद्ध ज्ञानरूप चित्तकरके जानने को योग्यहै॥ प्र०॥ किसप्रकार चित्तसे आत्मा जानने को योग्य है।उ०॥ घृतसे दूधवत, औ्रर अग्निसे काष्ववत् [ बौद्ध तरादिकों को चिस्तादिकों विषे चेतना के अ्रमकें दर्शन से, चित्त जो है सो तिस अपने सम्वन्धी वस्तु विपे चैतन्यका पाविर्भाव करने में स्वभाव सेही योग्यहै। एत- दर्थ चित्तविषे परमात्माकी अभिव्यक् (प्रकटता) के सम्भवसे चित्तसे ब्रह्मको जानने की योग्यता कहते हैं, इसप्रकार की स- म्भावना के अर्थ यहां कहते हैं 1 म्ाौश्चिन सर्व्वमोतं प्रजा- नांयस्मिन् विशुद्धे विभवत्वेपआरत्मा। प्राए और इन्द्रियां सहित सर्व. प्रजाका अन्तःकरणं व्यासहै, तिस विशुद्ध (चित्त) विषे. यंहः पात्मा विशेष करके प्रकाशताहै। जिस चैतन्य करके प्राण और
Page 80
७८ सुएडक उपनिषद्। यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते याश्च कामानू। ततं लोक जायते तांश्च कामांस्तस्मादा- त्मज्ञ ह्यर्चयेद्भृतिकामः ॥१०॥५३॥ इति तृतीयमुरडके प्रथमखरड: ॥
इन्द्रियों करके सहित, प्रजाका सव अन्तःकरणा व्याप है। और जिस करके लोक विषे प्रजाका सर्व अन्तःकरण चेतनावाला प्र सिद्ध है तिसही कर के लिस चेतनावान् (अनुसन्धानात्मक)वृत्ति- रूप चित्त से आरत्मा जानने को योग्यहै। पुनः यह चित्त कैसा है कि, जिसकेशादि मल रहित शुद्धहुये चित्तविषे यह कथनकिया पात्मा विशेष करके स्वस्वरूप सेही प्रकाशताहै ॥६।५र॥ हे सौम्य ! जो. पुरुष ऐसे उक्क लक्षणवाले सर्व के पात्मा को अपना परप्राप आत्मभाव से प्रात्भया है तिस पुरुषको सर्व्वात्मा होने से सर्वकी प्राततिरूप फलहोता है, इसप्रकार कहते हैं। यंयं लोकं सनसा संविभाति विशुद्धसत्त्व: कामयते यांश्व कामान्? निर्मल अन्तःकरया। जिस जिस लोकको मन करके चितवता है और जिन भोगों की इच्छा करता है। जो क्ेशादि मल रहित है, और आरपात्माविषे शुद्ध पन्तःकरणवाला पुरुषहै सो, जिस जिस पुत्रादिरूप लोकको महासन्यस्मैवा भवेदिति।'मेरेअ्प्र्थवाअ्न्य के अर्थ होवे । इसपकार मनसे चितवता है औौर जिन जिन भोगों की इच्छा करता है तिंत लोकं जायते ताश्च कार्मास्तस्मादात्मज्ञं हर्चयेद् सूतिकामः '१ तिस तिस लोक को और तिन भोगों को पावता है, ताते विभृति की इच्छावाला आत्मज्ञानी का पूजन करे। (एतदर्थ विद्वानको सत्यसङ्गल्पवाला होने से विभूति (ध- नादिक)की इच्छावाला जो पुरुषहै सो आ्ात्मज्ञानसे शुद्धभयें: अन्तःकरयावाले पत्मज्ञानी को पाढपरक्षालनादि: सेवा और
Page 81
तृतीयमुएडके द्वितीयखएड: । ७६ अथ तृतीयसुडकेद्वितीयखएड आरभ्यते॥।
सवेदैतत्पर मं ब्रह्मधाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्र- म्। उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीरा:॥1928॥ नमस्कारादि पूजन करे॥ हे सौम्य ! इसप्रकार प्र्प्रात्मज्ञानी देव- तान्ंवत् पूजने योग्यही है॥१०।५३॥ इति मुएडकउपानषद्गततृतीयसुएडक के प्रथमखाडकी आषाटीका समास। तृतीयमुरडकगत द्वितीयखएडकी भाषाटीका प्रारंभ।I: हे सौन्य!"सवेदैतत्परमं ब्रह्मधाम यत्र विश्वं निहितं भातिशुभ्र मू।' सो परमधामको जानताहै जिस विषे जगत स्थितहै, और जो ब्रंह्मरूप धाम शुद्दहुआ भासता है। जिस करके 'सो यह' इस उपलक्षणवाले न्रह्मरूप सर्व कामना के नरश्रय परमधाम को जानता है। और जिस ब्रह्मरूप धामविषे सर्व जगत् स्थितहै। और जो तहारूप धाम आप शुद्धहुआ अपने प्रकाशसे शपही भास- ता है। और "उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुकमेतदतिवर्त्तन्ति धी- राः । पुरुषको भी बुद्धिमान् कामनासे रहितहुये उपासते हैं सो यह प्रख्यात वीर्य को उद्लंघ जाते हैं। एतदर्थ ऐसे उस झात्मज्ञानी पुरुषको भी जो धीर (वुद्धिमान्) पुरुष वैभव वि भृतिकी कामना से रहित केवल मोक्षकी कामनावाले हुये, जैसे परमात्मरूप देवको, तैसे उपासते हैं सो पुरुष इस प्रसद्ध शरीर के उपादान कारण बीजरूप वीर्यको उल्लंघके जाते हैं, बारंबार योनिको धारते नहीं 1 नपुनः करर्तिकरोतीति।' पुनः किसी विषे प्रीतिको करता नहीं । इस श्रृतिके प्रमाण से। एतदर्थ तिस सम्यक आारमज्ञानी को सर्वप्रकारसे उपासना योग्यहै॥ १५४
Page 82
मुएडक उपनिषद् । कामान्यः कामयते मन्यमान: सकामभिरजायते तत्र तत्र। पर्य्ाप्तकामस्य कृतात्मनस्तु इहैव सर्व्वे प्रचिलीय न्ति कामा:॥ २। ५ू५॥ हे सौस्य! ऋरव सोक्षकी इच्छावाले को सर्वथा कामका त्यां- गही सुख्य साधन है, इसवातको वेद़ भगवान् देखावते हैं।का- मान्य: कामय ने मन्यमान: सकामसिरजाय सें तत्रतन्न।। जो भोगों को चितवताहु आ इच्छाकरता है सो का मना के साथ तहां सहां जन्मता है। जो पुरुष हष्ट और अद्दष्ट विपयरूप भोगोंको गुश बुद्िसे चि- तवता हुआ इच्छा करताहै, सो तिन धर्म अधर्स विषे प्रवृत्ति के कारण जे विषयोंकी इच्छारूप कामना तिसके साथ तहां तहां जन्मता है। अप्रधात् जिन जिन विपयों विषे, विपयों की प्राप्ति के निमित्त जो कामना तो कर्मोविषे पुरुषको प्रेरणाकरे है, उन उन विषयों विषे उन कामनाओंसे वेष्टित हुयेवत् जन्मता है। औौर "पर्य्यातकामस्य क्वतात्मनस्तु इहैव स्व्वे प्रविलीयन्ति कामाः' . " पूर्सकाम कृतात्मा के तो इसही विपे लर्व काम विनाश को पावते हैं। जो पुरुष परमार्थ तत्त्व्रके ज्ञानसे आतकाम होने करके सर्व ओरोर से प्राप्त भचे हैं काम (भोग.) जिलको सो पूर्णाकामहै और निकृष्ट रूप अविद्याके स्वरूपसे निकालके, विद्याकरके अपने श्रेष्टरूप से कियाहै तपरात्मा जिसका, ऐसे कतात्मा हैं। तिस पूर्णाकाम कृ- तात्मा पुरुष के तो इसही विद्यमान शरीर विषे सर्व धर्म त्रधर्स में प्रवृत्ति के हेतुरूप काम [विषयों विषे यथार्थ दोपोंको देखने से पुरुष पूर्राकाम होताहै (अर्थात् उसकी सर्व कामना समाप् होती हैं) और सो विरुद्लक्ष एसे पप्राप्तकाम भया है, और तिस प्र्प्रा रमाकीजिज्ञासासही चित्त को वशकरनेवाले पुरुपके, वरिपयोंसे इच्छा के भेदरूप, काम निवत हो ते हैं] विनाशकों पावतेहैं। तिस कामके जन्मके कार णके विनाशसे वे काम उपजते नहीं। अर्थात् [उत्पन्न भये कामोंका ज्ञान विनाभी क्षयहोना सममवहै, ताते यहां स्वहेतु
Page 83
तृतीयमुएड़के द्वितीयखणड: । नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैंष ठशुते तेन लभ्यस्तस्यैप आरात्मा दसुते तनूं स्वाम्॥ ३। ५६॥ के विनाशसे काम पुनः उपजते नहीं ] इत्यभिप्रायः॥२५५॥ हे सौम्य! जव इसप्रकार परमात्मा के लाभसे सर्व का लांभ होताहै, तब तिसके लाभार्थ शास्त्र अध्ययनादि उपाय विशेप करके करने को योग्य है। इसप्रकार पासहुए यह कहते हैं। १नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेन"। ह पत्मा बहुत पढ़ने से प्राप्तहोने योग्य नहीं, और बुद्धि से पावने योग्य नहीं, और बहुत से सुनने से भी पातने योग्य नहीं। परम पुरुपार्थरूप जिसका लाभ है, इसप्रकार व्यास्चान किया जो यह आतमा, सोवेद और शास्त के बहुतसे अध्ययनरूप प्रवचनसे प्रातहोने योग्य नहींऔर तैसेही वेदादिकोंके अर्थकी धारणा शकिरूप मेघा (चुद्धि) सेभी पावने योग्य नहीं, और तैलेही उपनिपदों के विचार से इतर बहुत से शास्त्रों के अवसा करने से भी पावने योग्य नहीं ॥प्०॥ तब वो आत्मा किन साधनों से पावने योग्य है।। उ० ॥ "यमेवैषवृसुते तेन लभ्यस्तस्यैप आपत्मा इसाते तनूं स्वाम्"। । यह जिसकोही पावने की इच्छा करताहै, तिससे यह पावने को योग्य है तिसको यह आपरात्मा अपनी तनूको प्रकाशता है। यह विद्वान् जिसन्रात्माकोही पादनेकी इच्छाकरताहै, तिसवर्न (भजन) से [ मैंपरमातमाहूं,। इसप्रकार अभेद के अनुसन्धानको वर्णन कहते हैं तिस वर्णन से यह आरात्मा पावने को योग्य होता है, और वहिमुख पुरुषों करके तो सैकड़ोंबार अ्रवखादिक के किये हुएमी यह आरत्मा प्रांत होता नहीं। एतदर्थ मैं परमात्माहों इस चिन्तनरूप परमात्माके भजनको पूर्वकरकेही श्रवसादिक सम्पादन करनेको योग्य है, यहभावहै। अथवा जिस परंमात्माको पावनेकी इच्छा करताहै सो तिस मुमुकषरूप से स्थित भथे परमात्माकरके अ्र्प्रभेदके प्रप्रनुसन्धानरूप प्रार्थनाकरके सुमृक्षु
Page 84
८२ सुएडक उपनिषद्। नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात्। एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आ्र्प्रात्मा विशते ब्रह्मधाम ॥४।॥५७॥ रूप से स्थित भया परमात्माही प्रापहोने को योग्य है। इसप्रकार पभेद के अनुसन्धानसेही आपात्मा प्रासहोने योग्य है, कर्मसे कदापि नहीं। इत्यर्थ: ] यह परमात्मा प्राप्तहोने योग्य है अ्न्य साधनोंसे नहीं, क्योंकि त्र्परात्मा नित्य प्रात्त स्वभाववाला है ताते ॥ प्र० ॥ विद्वान् को यह आात्माका लाभ किसप्रकार का है। उ० ॥ तिस विद्वान् का यह आत्मा अविद्या से आवृत तपनी उत्कृष्ट स्वात्म तत्त्वस्वरूप तनुको प्रकाशता है, अर्थात् विद्याके होनेसे घटादिकों के प्रकाशवत् तरराविभावको पावता है, एतदर्थ तन्यके त्याग से आात्मा के लाभकी प्रार्थनाही आत्मप्राप्ति का साधन है।। इति सिद्धम् ॥३ । ५६ ॥ हे सौम्य ! जिसकरके यह लिङ्गयुक्र संन्यास सहित वल अ्रप्र- माद और तपरूप साधन आत्माकी प्रार्थना के सहकारी है। नाय मात्माबलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात्"।। यह आप्रात्मा बलहीन करके पावने को योग्य नहीं, और प्रमाद से पावने को योग्य नहीं, और लिङ्ग से रहित तपसे पावने के योग्य नहीं। एतदर्थ यह तत्मा आत्मनिष्ठा से उत्पन्नभये बलसे रहित पुरुष करके प्राप्त होने को योग्य नहीं और पुत्र पशुशादिक विषयों की आर्रा. सकिरूप निमिन्त से हुए कर्त्तव्य के विस्मरसरूप प्रमाद से प्राप्त होनेको योग्य नहीं। और तैसेही संन्यासरूप लिङ्ग से [।। प्र० ।। इन्द्र जनक गार्गी आदिकों को भीभात्मलाभ हुआरा ऐसा श्रवर है तब संन्यासरूप लिङ्ग से रहित ज्ञानरूप तपसे भी त्रप्रात्मा प्रास्त होनेको योग्यनहीं, ऐसा कैसे कहतेहौ॥ उ० ॥ यद्यपि इन्द्र जनकादिकों को बाह्य संन्यासका अप्रभाव होने से भी तरात्मलाभ भया है यह तेरां कथन सत्य है,तथापि संन्यासनाम सर्व के सम्यक त्यागका है।
Page 85
तृतीयमुएडके द्वितीयखणड: । संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतप्ताः कृतात्मानो वीतरांगाः प्रशान्ताः। ते स्व्वजं सर्व्वतः प्राप्य धीरा युक्कात्मानः सर्व्चमेवाविशन्ति ॥ ५।५८ ॥ और तिनजनकादिकों को ममतास्पद और अहंतास्पदचिषे सम्य- .क.वैराग्य होनेसे त्रन्तरका संन्यास विद्यमानहीथा। और बाह्य का लिंग (चिह्न संन्यास) सो श्रुति करके कहनेको इच्छित नहीं। अर्थात् वाह्य चिह्न (संन्यास) का श्रुतिको त्रागह् नहीं, क्योंकि 'नलिङ्गंधर्म्मकारणम्' । लिंग (बाह्य चिह्न) जो है सो धर्म्मका कारण नहीं। यह समृतिका प्रसासहै ताते ] रहित ज्ञानरूप तपसे भी प्रासहोने को योग्य नहीं। और पतै रुपायैर्य तते यस्तु विद्वास्त- स्यैष त्रात्मा विशते ब्रह्मधाम"। जो विद्ान् उक्र उपायोंसे प्रयत करताहै तिसका यह आात्मा ब्रह्मधाम के अर्थ सम्यक् प्रवेश करता है। जो विद्वान तंत्परहुआ इन बल, अप्रमाद, त्याग और ज्ञान .. रूप उपायों से भलीप्रकार यत करता है तिस विद्वान्का यह (बुद्धिविशिष्ट) आत्मा ब्रह्मरूप धाम विषे (कि जहांका गया पुनः नहीं आावता) सम्यक् प्रवेश करता है (समुद्रमें नदीवत), इंत्यभिप्राय: ॥४५७ ॥ हे सौम्य ! प्र० ॥ विद्वान् ब्रह्म के विषे किसप्रकार प्रवेशको कर- तेहैं।। उ०॥ 'संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृस्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ता:१ऋषिलोग इसको जानके ज्ञानसे तृप्तहुये सिद्धभये पात्मावाले हुये रागादि दोषोंसे रहित जितेन्द्रिय भये हैं जोपर मातमाके दर्शनवाले ऋषिलोग इस (अपनेआरप) आत्माको जान- के तिसही ज्ञानसे तुप्हुये, कुछ शरीरकी वृद्धि क्षयके कारण जे बाह्यकी तृप्तिके साधन तिनसे नहीं, और परमात्माके स्वरूप से ही सिद्धभये आात्मावाले हुये रागद्वेवादि दोषोंसे रहित जितेन्द्रिय हुयेहैं। और 'तिसव्वज्ञ स्व्वतः प्राप्यधीरा युक्नात्मान: सर्व्वभेवा विशन्ति सो अत्यन्त विवेकी नित्य चित्तकी एकाग्रताके
Page 86
सुबडक उंपनिषद्। वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसंत्वाः । ते ब्रंह्मलोकेषु परान्तकाजे परामृताः परि- सुच्यन्ति सव्वे॥ ६। ५६॥ स्व्रभाववाले पुरुष सर्वव्यापक अद्धैत ब्रह्मको स्व्वन्न पायके सव्वं के अर्थ प्रवेशको करते हैं। सो अत्यन्त विवेकशील योग करके नित्य विक्षेपसे रहित चित्तकी एकाग्रता के स्वमाववाले छात्म वेचा पुरुष आकाशवत सर्वव्यापक अद्दैत ब्रह्मको कुछ उपाधि से परिच्छिन्न एक देशसे नहीं पावते, किन्तु, सर्वत्र पाय के शरीर के पतनहुये भी सव्वके विषे भवेश करते हैं। ऋर्थात् फूटे घटके मा- काशदत् उपाधिकृत परिच्छेदको छोड़ते हैं। इसपकार ब्रह्मवेत्ता ब्ह्मरूप घामके ताई प्रवेश करतेहैं।। इति भावार्थः ॥५ ५८॥ हे सौन्य! वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्था संन्यासयोंगाययत- यः शुद्धसत्वाः॥। वेदान्तले जनेत विज्ञानके अर्थ के नि्चयवाले हुये सन्यास योगसे यतिहैं और शुद्ध चित्तवाले हैं। जो पुरुष वेदा- न्तशास्त्र से उत्पन्नमये विज्ञानके, परंभात्माके जानने योग्य, अर्थ को निश्चय करनेवाजेहैं, और सर्वकर्मके परित्यागपूर्वक केवल ब्रह्मनिष्ठतारूप सन्यास योगकरके प्रयक्न करने के स्वभाववाले यतिहैं, संन्यास योग करफे शुद्धचित्तवाले हैं'। त ब्ह्मलोकेषु परान्तकाले परामृता: परिसुच्यन्ति सव्वे"'सो सर्व परान्तकाल विषे परामृतहुये सर्व ओरोरसे झुक्क होतेहैं। सो सर्व परान्तंकाल बिषे अर्थात् [संसारी पुरुषोंका जो मरणकालहै (सो परान्त काल है। और तिनकी अपेक्षासे मुमुक्षुओंकां संसारके अन्त विषेज़ो चरम देहके परित्यागका कांलहै (पर्थात मुसुक्षुका इस दृश्य शरीर के त्याग के समकालही संसार का अन्त है, क्योंकि पुनः उस को संसार नहीं, ताते उक्पकार सुसुक्षु का जो चरम देह के त्याग का काल है) सो परान्तकाल है, तिस परान्तकाल विषे ]: जह्मारप लोकविधे अरथात[(यह' जो ब्ह्मलोक को बहुवचन'
Page 87
तृतीयझुएडके द्वितीयखएड: । गता: काला पचदशप्रतिष्ठा देवाश्च सव्चे प्रतिः देवतास। कर्म्माशि विज्ञानमयश्च आ्प्रात्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥७६॥ है सो) यहां साधनों को बहुत होने से, जो बह्मरूप लोक एक है तोभी अनेकवत् देखते हैं और पावते हैं एतदर्थ बहुवचन है। : परन्तु ब्रह्मलोकेष, इस शब्दका अर्थ ब्रह्मषिषे है] जीवतेहुयेही परम और मरमधमरहित वह्महैं आ्रत्मा जिनका ऐसे, परामृत हुये सर्वेओोर से दीपकके निवोणत अर्थात् [दीपकको बत्ती के 1किये अवच्छेदके ध्वंस होने से जिसप्रकार तेज के सामान्यभाव की प्राप्तिहोती है, तैसेही इन आत्मज्ञानी पुरुषों को उपाधिके किये अवच्छेदके ध्वंस होने से चैतन्यके सामान्यभावकी आसतिहोती है] और (घटकेध्वंस हुये) घटाकाशवत मुकहोता है। और गमनकरने याग्य अन्यदेश (लोक वा देहं) को अपेक्षा करते नहीं, क्योंकि पपदयथानदश्येत तथाज्ञानविदागतिः म्रनध्यगात्रघ्वसुपारयि- लगवइति, जैसे आकाशविषे पक्षियोंका और जलबिषे जलच रोका पाद (खोज) नहीं पायाजाता है। तसेही ज्ञानी पुरुषों की गति है और संसार के मागोंके पार (समांति) होने की इच्छा ाले पुरुष नहीं गमनकरनेवाले होते हैं। ऐसा श्रुति और स्मृति "का प्रमाण है ताते [यहां तर्क से भी मोक्ष कहने को योग्यहै, ऐसा कहते हैं] जिससे देशकरके परिच्छिन्न जो गति है सा संसार को विषयकरनेवालीही है, क्योंकि परिच्छिन्न साधनकरके साध्य है ताते। और ब्रह्म तो सवरूप हनसे देशके परिच्छेद.स गमन करने योग्य नहीं है। जब देशसे परिच्छिन ब्रहम होय तब मत्त द्रव्यवत् आदि अन्तवाला अन्य के आश्रित सावयव अनित्य और क्रिया साध्य होवेगा। परन्तु ब्रह्मा इसप्रकारका हानियोग्य नहीं, एतदर्थ तिसकी प्रासिभी देशकरक परि्छित्न होने योग्य नहीं ॥६५ह॥ हे साम्य!ब्रह्मवेत्ता पुरुष जो हैं सो श्रविद्या आदिक संसार के
Page 88
र६- सुएडक उपनिपद्ट। बन्धनकी निवृत्तिरूप मोक्षकी इच्छा करते हैं, कार्यरूप मोक्ष की नहीं करते। किंवा गताःकला: पश्चदशप्रतिष्ठा देवाश्च सव्वे प्रति देवतासुर पंचदश कला लयको प्रातहोती हैं और सर्व देवता प्रति देवताको प्राप्तहोते हैं। मोक्षकाल विवे जो देहकी आ्ररारम्भ करने वाली प्रणादि पन्द्रह संख्यावाली कला प्रश्नउपनिपद्रूप इस उपनिषद् के ब्राह्मसभाग के छठें प्रश्नविपे कही हैं सो अपने २ का रंगविषे लयको प्राप्तहोती हैं। औरप्रौर देहके आर्प्राश्रित चक्षुत्रप्रादि- क करणोविषे स्थित जे इन्द्रयाघिष्ठाता देवता सो सूर्य्यादिक प्रति देवताविषे प्राप्त होते हैं। और 1 कर्म्माशि विज्ञानमयशच परप्रात्मा परेऽवयये सर्वएकीभवन्ति१ कर्म और विज्ञानमय (बुद्धि- विशिष्ट) तात्मापर त्र्प्रव्ययविषे सर्व एकताको पावते हैं। जो मुमुश्षु के किये कर्म हैं, तिन में से फलके आरम्भ करनेवाले (पारव्धरूप कर्मोंको उपभोगसेही क्षीण होना है, ताते तिनको छोड़के यहां अ्रवशेष रहे जे फलके त्रप्रारम्भसे रहित (संचित कर्म हैं तिनका ग्रहसा है। और तरप्रात्मा जो है सो तररविद्या से रचित वुद्धि आदिक उपाधिको अपना स्वरूप मान के जलादिकों विषे सूयर्यादिकों के प्रतिबिम्बवत् तिसही विज्ञानमय स्वरूपके साथ इस देहके भेद विषे प्रवेशको पाया है। क्योंकि कर्मका उस विज्ञानमय वुद्धि के ताईं फलदेने के अर्थ होना है ताते, एतदर्थ आात्मा विज्ञांनमय कहा जाता है) कर्म और विज्ञानमय श्ात्मा, सो यह सर्व उपा- घिंकी निवृत्ति से, सत्य, पर, अव्यथ, पक्षर त्रप्राकाशतुल्य त्रजन्मा, अरजर, अमर, अकार्य, पकारण, तन्तररहित, बाहररहित, इद्वैत, शिव और शान्त ब्रह्मविषेजलादिक आधार के दूरहोने से जला दिकों बिषे सूर्य्यादिकों के प्रतिबिम्बवत् और घटादिकों के अपभाव भये . घटादिकों के सम्बन्धी त्र्प्राकाशवत् एकता को पावता है।।७। ६० ।। हे सौम्य! "यथा नद्यः स्यन्दमाना: समुद्रेऽस्तङ्गच्छन्ति नामरू पे विहाय। जैसे (गङ्गात्र्प्रादिक) नदियां बहतीहुई (समुद्रको पांथके) नामरूपको त्यागके समुद्र बिषे अस्तता (पभेदता) को
Page 89
तृतीयमुएडके द्वितीयखएड: । ८७ यथानद्य: स्यन्दमाना: ससुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय। तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्त: परात्परम्पुरुषमुपौति दिव्यम्॥ ८६१॥ : स यो हवै तत्परमं ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्म- वित्कुले भवति। तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्कोऽमतो भवति ॥६६२॥ प्रांसहोती हैं तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्: परात्परम्पुरुषसुपैति - दिव्यम्१। तैसे विद्वान् (आत्मज्ञानी अविद्याकृत) नाम और रूप से (भलीप्रकार) सुक्र हुआ (पूर्व कहे प्रकार पक्षररूप) पर से पर दिव्य (उंक लक्षणवाले) पुरुष को पावता है। इतिवेदा- - नुंशासनम् ॥८॥६१॥ हे सौम्य।। शंका॥ ननु, मोक्षविषेत्र््रनेक विन्न प्रसिद्धहैं,एतं- दर्थ ब्रह्मवेत्ताभी पंचक्केशों के मध्य किसी एक क्ेशकरके, और वाद बिषे अन्यवादी करके किये विप्नसे मरको पायाहुआ अन्य गति को पावेगा ब्रह्मको नहीं॥स०॥ यह कहना तेरा बने नहीं, क्योंकि विद्यासेही सर्व प्रतिबन्धोंका अरभाव करते हैं ताते और मोक्ष जो है सो केवल अप्रंविद्यारूप प्रतिबन्धवाला है अन्य प्रतिबन्धवाला है नहीं, क्योंकि मोक्ष नित्यहै ताते और आत्मरूपहै ताते। एतदर्थ गैस थो हवै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवाि।। सो जो कोई एकलोक विषे प्रसिद्ध तिस परमब्रह्मको जानता है सो ब्रह्मही होता है। सो जो कोई एक लोक विषे प्रसिद्ध तिस परमब्रह्मको साक्षात् मैंही हौं, इसप्रकार अभेदतासे जानता है, सो अन्य गति को पावता नहीं, क्योंकि देवताओं की भी इसकी ब्रह्मप्राप्तिके विषे विघकरनेकी सामर्थ्य नहीं, क्योंकि यह ज्ञानी देवता आदि सर्व का आत्मा होता है, 'ज्ञानीत्वात्मैव मे मतम्' एतदर्थ ब्रह्मका जान- नेवाला विद्वान् ब्रह्मही होता हैं। और "नास्याब्रह्मवित्कुले भवति। इसके कुलविषे श्रन्रह्मवित् होता नहीं। इसविद्ान् के कुल (शिष्य
Page 90
मुएडक उपनिषद्र। ·तदेतहचाऽम्युक्तं क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्कते एकर्षि श्रध्धयन्तस्तेषामेवैता ब्रह्मविद्यां वदेद शिरोव्रतं विधिवय्यैस्तुचीर्णम् ॥। १०।६३॥ परम्परा) विषे अज्रह्मवित् (ब्रह्मका नजाननेवाला) होता नहीं। और तिरति शोकं तरति पाप्मानं गुहायन्थिभ्योविमुक्कोऽपृतो भव- ति"। शोकको तरताहै, पापको तरता है, गुहारूप ग्रन्थिसे मुक्- हुआत्ररमृत होता है। किंवा यह आत्सवेत्ता जीवताहुआही पनेक इष्टवस्तुके वियोगरूप निभित्तसे भये जे मनके संतापरूप शोक तिनसे तरता (ळूटता) है, और धर्म तरधर्म नामक पापसेभी, तरता है, और गुहा (बुद्धि) रूप अ्रन्थिसोंभी मुक्हुआरा असृतरूप होत। हैं।। यहं 5 मिद्यते हृदयग्रन्थिः, इत्यादि इसही विषे पूर्व प्रति पादन कियाहै। इति सिद्धमं ॥ ६॥६२॥ हे सौम्य !तब ब्रह्मविद्याके दानकी विधिके देखावने से, इस उपनिषद्की समाप्ति करते हैं, । तदेतटचाऽभ्युक्कंक्रियावन्तः ओ्रो त्रियाब्रह्मनिष्ठाः"।सो यह मन्त्रने कहा है, क्रियावाले श्रोत्रिर ब्रह्मनिष्ठहैं। सो यह विद्याके दानका विधान इस मन्त्रने कहा है, जो शास्त्र उक्र कर्मके अरप्रनुष्ठा नरूप क्रियावाले और श्रोत्रिय, अर्थात् अपर ब्रह्मकीं विद्याविषे कुशलहैं, और ब्रह्मनिष्ठ र्थात् परन्ह्मकी जिज्ञासावाले हैं। और('स्वयं जुह्ृते एकर्षि श्रद्धयन्तस्तेषामेवें- ता ब्रह्मविर्द्यां वदेत"शश्रद्धावान् हुये आप एकर्षिनामवाले श्रग्निः के अर्थ हवनकरते हैं, तिनसंस्कारयुक् चित्तवाले अधिकारीरूपपु- रुषके अर्थही इस ब्रह्मिद्याको कहना। और [शिरोव्रतं विधिवयै- स्तुचीर्णाम्"। शिरोव्रत जिन्होंने विधिके अनुसार कियाहै। मस्तक विषे अंग्निके धारणकरनेरूप अप्रथर्वसवेदबिषे प्रसिद्ध जो शिरोव्रत हैं सो जिन्होंने शास्त्रउक़ विधिक़े अनुसार कियाहै तिनके अर्थही इस ब्रह्मविद्याको कहना ॥ १०।६३॥ हे सौम्य।।'तदेतत्सत्यमृषिरङ्गिरा: पुरोवाच नैतदचीं ब्रतो
Page 91
तृतीयसुएड़के द्वितीयखण्ड:। C&
तदेतत्सत्यमृषिरद्िरा: पुरोवाच नैतदचीणी व्रतो- उधीते।नमः परमऋषिभ्यो नस: परमऋषिभ्य:१९६४॥ इति तृतीयमुरडके द्वितीयखएड:॥
5धीतेतिस इस सत्यको पूर्व अङ्गिरा मुनीश्वर कहताभया, इस वतके आाचरंग से अध्ययन करताभी नहीं। तिस इस अक्षर नामवाल पुरुषरूप सत्यको पूर्व अद्धिरा नामक मुनाश्वर, विधि- वत् समीप प्रातभये और प्रश्नकत्ताश निक नामवाले ऋषिके अर्थ कहतभयां। इसप्रकार पंप्रन्य झ्रांचार्यभी तिसही प्रकार से मोक्षके अर्थ विधिवत् समीप प्राप्तभये मोक्षार्थी मुमुन्नके अर्थ कहै। और इस गन्थको वतके आचरणसे रहित पुरुष अध्ययन करता भी नहीं। और जिसकरके वतके आचरणवालेकी विद्या संस्कारयुक हुई फलके अर्थ होती है, एतदर्थ वतरहित पुरुष इसमन्थके अध्य- यनयाग्य नहीं हैं। इसप्रकार समाप्भई जे ब्रह्मविद्या, सो जिन ब्रह्मादिकों से परम्पराकमसे सम्यक प्रातभई हैं। नमःपरमनषि- भ्यो नमः परमभ्मषिभ्यःशी तिन परमःऋषियों के अपर्थ नमस्कार है और जे ब्रह्मादिकपरमब्रह्म को साक्षात् जानते भये सो परमऋषि हैं। तिन परमऋृषियों के अर्थ पुनः भी नमस्कार है। यहां दोबार जो नमस्कारकों कथन हैं सो अत्यन्त आदर के अर्थ है। और य्रह तृतीयमुयडक और उपनिषद्की समाप्ति के अर्थ है।।११।६४ ।। इति मुण्डकउपनिषड्गत तृतीयसुएडकके द्वितीयखएडकी भाषाटीका समांस। 3 ब्रह्मानन्दं परमसुखद केवलं ज्ञानमूर्ति इन्द्ातीतं गगनसदशं त्त्वेमस्यादिलक्यम।। एक नित्य विम लमचलं सर्वधीसाक्षिभत भावाती तं त्रिगसर ितंसद् गरुंतन्नमामि।
Page 92
विज्ञापन। नीचे लिखे हुए उपनिषदों का भापाटीका राय पसा बाबू ज़ालिमसिंह साहब, पोस्टमास्टर जनरल रियासत ग्वा लियर, ने बड़ी योग्यता से किया है। इन उपनिपदों में पहिले मूल, फिर पदच्छेद, वाईं ओर संस्कृत अन्वय और दाहिरन ओर पदार्थ-भावार्थ-छापा गया है। जिन्हें संस्कृत की यो ग्यता कम हो, जो मन्त्रों का पूरा २ अर्थ समझ न सकते हों, उनके लिये यह निम्नलिखित उपनिषद् अतीव उपयोगी हैं। ईशावास्य उपनिषद्-सटीक। पृष्ठसंख्या ३६; मूल्य=) ऐतरेयोपनिषद्-सटीक। पृष्ठसंख्या ५४; मूल्य)।। कठवल्ली उपनिषद्-सटी्कं। पृप्ठसंख्या १६०; मूल्य #) केनउपनिषद्-सटीक। पृष्ठसंख्या ४४; मूय=j।। छान्दोग्योपनिपद्-सटीक। जैसे सामवेद गान करके पढ़ा जाता है, वैसे ही यह छान्दोग्योपनिपद् भी गाकर पढ़ा जाता है। वह बाह्य-फल-स्वर्गादिक-को देता है और यह ब्रह्मज्ञान उत्पन्न करके जीवात्मा को अ्रजर-अमर बना देता है एवं जीव और ईश्वर : के भेद को हटाकर दोनों को ऐक्य कर देता है। इसमें पहिले :मूल, फिर पदच्छेद, बाईं ओर अन्वय, दाहिनी ओर शब्दों का अर्थ औौर सब से नीचे भावार्थ दिया गया है। पृष्ठसंखया ६६८; मूल्य २।।) तैतिरियोपनिषद्-संटीक। पृष्ठसंख्या १३४; मूल्य ।।- प्रश्नोपनिषद्-सटीक। पृष्ठसंख्या ६8; मूल्य।] माराडूक्यउपनिषद्-सटीक। पृष्ठसंख्या २०; मूल्य=) सुरडकोपनिषंद्-सटीक। पृष्ठसंख्या ६०; मूल्य। मिलने का पता :- मैनेजर, नवलकिशोर प्रेस, लखनऊ,
Page 94
लखनऊ के सुप्रसिद्ध 'नवलकिशोर प्रेस' के नीचे लिखे हुए उपनिषद् भी तवश्य देखिये।
नीचे लिखे हुए उपनिषदों का भाषा टीका राय बहादुर बाबू जालिमसिंह साहब, पोस्टमास्टर जनरल रियासत ग्वालियर ने बड़ी योग्यता से किया है। इन उपनिषदों में पहिले मूल, फिर पदच्छेद, बाई ओर संस्कृत अ्रन्वय और दाहिनी ओर पदार्थ- भावार्थ-छापा गया है। जिन्हें संस्कृत की योग्यता कम हो, जो मन्त्रों का पूरा २ अर्थ समक न सकते हों उनके लिए यह निम्न लिखित उपनिषद् अतीव उपयोगी हैं। ईशावास्य उपनिषद् सर्टीक-पृष्ठ संख्या ३६; मूल्य ऐतरेयोपनिषद् सटीक-पृष्ठ संख्या १६०; मूल्य।। कठवल्लीउपनिषद् सटीक-पृष्ठ संख्या १६०; मूल्य ।!) केनोपनिषद् सटीक-पृष्ठ संख्या ४४; मूल्य छान्दरोग्योपनिषद् सटीक-पृष्ठ संख्या ६६८; मूल्य २।।।) तैत्तिरीयांपनिषद् सटीक-पृष्ठ संख्या १३४; मूल्य-I1- प्रश्नोपनिषद् सटीक-पृष्ठ संख्या ६४; भूल्य मास्डूक्यउपनिषद् सटीक-पृष्ठ संख्या २०; मूल्य मुएडकोपनिषद् मटीक-पृष्ठ संख्या ६०; मूल्य 12)
पता-मैनेजर नवलकिशोर प्रेस, लखनऊ.