1. Nada Bindu Upanishad
Text
Verse १
ॐ अकारो दक्षिणः पक्ष उकारस्तूत्तरः स्मृतः।मकारं पुच्छमित्याहुरर्धमात्रा तु मस्तकम्॥
oṃ akāro dakṣiṇaḥ pakṣa ukārastūttaraḥ smṛtaḥ।makāraṃ pucchamityāhurardhamātrā tu mastakam॥
The syllable 'A' is considered to be its (the bird Om's) right wing, 'Upanishad', its left; 'M', its tail; and the Ardha-Matra (half-metre) is said to be its head.
ॐ कार रूप हंस का ‘अकार’ दक्षिण पक्ष (दाहिना पंख) तथा ‘उकार’ उत्तर पक्ष (बायाँ पंख) कहा गया है। उसकी पूँछ ही ‘मकार’ हैं और अर्धमात्रा ही उसका शीर्ष भाग है॥
Verse २
पादादिकं गुणास्तस्य शरीरं तत्त्वमुच्यते।धर्मोऽस्य दक्षिणं चक्षुरधर्मोऽथो परः स्मृतः॥
pādādikaṃ guṇāstasya śarīraṃ tattvamucyate।dharmo'sya dakṣiṇaṃ cakṣuradharmo'tho paraḥ smṛtaḥ॥
The (Rajasic and Tamasic) qualities, its feet upwards (to the loins); Sattva, its (main) body; Dharma is considered to be its right eye, and Adharma, its left.
उस (ॐ कार रूप हंस) के दोनों पैर रजोगुण एवं तमोगुण हैं और (उसका) शरीर सतोगुण कहा गया है। धर्म (उसका) दक्षिण चक्षु है और अधर्म बायाँ चक्षु (नेत्र) कहा गया है ॥
Verse ३
भूर्लोकः पादयोस्तस्य भुवर्लोकस्तु जानुनि।सुवर्लोकः कटीदेशे नाभिदेशे महर्जगत् ॥
bhūrlokaḥ pādayostasya bhuvarlokastu jānuni।suvarlokaḥ kaṭīdeśe nābhideśe maharjagat ॥
The Bhur-Loka is situated in its feet; the Bhuvar-Loka, in its knees; the Suvar-Loka, in its loins; and the Mahar-Loka, in its navel.
उस (हंस) के दोनों पैरों में भूः (पृथ्वी) लोक स्थित है। उसकी जंघाओं में भुवः (अन्तरिक्ष) लोक केन्द्रित है। स्वः (स्वर्ग-ऊर्ध्व) लोक उसके कटिप्रदेश तथा महः लोक उसके नाभि प्रदेश में स्थित है।।
Verse ४
जनोलोकस्तु हृद्देशे कण्ठे लोकस्तपस्ततः।भ्रुवोर्ललाटमध्ये तु सत्यलोको व्यवस्थितः।।
janolokastu hṛddeśe kaṇṭhe lokastapastataḥ।bhruvorlalāṭamadhye tu satyaloko vyavasthitaḥ।।
In its heart is situate the Janoloka; Tapoloka in its throat and the Satya-Loka in the centre of the forehead between the eyebrows.
उसके हृदय स्थल में जनः लोक और कण्ठ प्रदेश में तपोलोक विद्यमान है। ललाट और भौहों के मध्य में सत्य लोक स्थित है॥
Verse ५
सहस्रार्णमतीवात्र मन्त्र एष प्रदर्शितः।एवमेत समारूढो हंसयोगविचक्षणः॥
sahasrārṇamatīvātra mantra eṣa pradarśitaḥ।evameta samārūḍho haṃsayogavicakṣaṇaḥ॥
इस प्रकार से वर्णित सहस्रावयव युक्त प्रणवरूप हंस पर आसीन होकर कर्मानुष्ठान-ध्यान आदि में रत हंस योगी- विचक्षण पुरुष ओंकार की श्रेष्ठ विधि से मनन व चिन्तन करता हुआ सहस्रों-करोड़ों पापों से निवृत्त होकर मोक्ष पद को प्राप्त कर लेता है।(ॐकार के देवता अग्नि हैं। उसका स्वरूप भी अग्नि मण्डल जैसा है। ‘अकार’ नामक (प्रणव की) प्रथम मात्रा ‘आग्नेयी’ कही गयी है और(‘उकार’ नामक) द्वितीया मात्रा ‘वायव्या’ कही गयी है। (इस वायव्या के देवता वायु हैं और यह वायुमण्डल की भाँति रंग-रूप वाली है) ॥
Verse ६
न भिद्यते कर्मचारैः पापकोटिशतैरपि।आग्नेयी प्रथमा मात्रा वायव्येषा तथापरा॥
na bhidyate karmacāraiḥ pāpakoṭiśatairapi।āgneyī prathamā mātrā vāyavyeṣā tathāparā॥
इस प्रकार से वर्णित सहस्रावयव युक्त प्रणवरूप हंस पर आसीन होकर कर्मानुष्ठान-ध्यान आदि में रत हंस योगी- विचक्षण पुरुष ओंकार की श्रेष्ठ विधि से मनन व चिन्तन करता हुआ सहस्रों-करोड़ों पापों से निवृत्त होकर मोक्ष पद को प्राप्त कर लेता है।(ॐकार के देवता अग्नि हैं। उसका स्वरूप भी अग्नि मण्डल जैसा है। ‘अकार’ नामक (प्रणव की) प्रथम मात्रा ‘आग्नेयी’ कही गयी है और(‘उकार’ नामक) द्वितीया मात्रा ‘वायव्या’ कही गयी है। (इस वायव्या के देवता वायु हैं और यह वायुमण्डल की भाँति रंग-रूप वाली है) ॥
Verse ७
भानुमण्डलसंकाशा भवेन्मात्रा तथोत्तरा।परमा चार्धमात्रा या वारुणीं तां विदुर्बुधाः॥
bhānumaṇḍalasaṃkāśā bhavenmātrā tathottarā।paramā cārdhamātrā yā vāruṇīṃ tāṃ vidurbudhāḥ॥
तत्पश्चात् ‘मकार’ नामक यह तृतीय ‘मात्रा’ सूर्य मण्डल के समतुल्य है। (इस मात्रा के देवता सूर्य हैं तथा) चतुर्थ मात्रा ‘अर्धमात्रा’ के रूप में ‘वारुणी’ कही गयी है। (इस वारुणी के देवता वरुण हैं) ॥
Verse ८
कालत्रयेऽपि यस्येमा मात्रा नूनं प्रतिष्ठिताः।एष ओंकार आख्यातो धारणाभिर्निबोधत॥
kālatraye'pi yasyemā mātrā nūnaṃ pratiṣṭhitāḥ।eṣa oṃkāra ākhyāto dhāraṇābhirnibodhata॥
Each of these Matras has indeed three Kalas (parts). This is called Omkara. Know it by means of the Dharanas, viz., concentration on each of the twelve Kalas (or the variations of the Matras produced by the difference of Svaras or intonation).
इन उपर्युक्त चारों मात्राओं में से हर एक मात्रा तीन-तीन काल अथवा कला रूप है। इस प्रकार ‘ॐकार’ को द्वादश कलाओं से युक्त कहा गया है। धारणा, ध्यान एवं समाधि के द्वारा इसे जानने का प्रयास करना चाहिए।।[ॐकार साधना मात्र उच्चारण से पूरी नहीं होती, दिव्य प्राण प्रवाह रूप ॐकार की अनुभूति धारणा ध्यानादि द्वारा की जाती है।]
Verse ९
घोषिणी प्रथमा मात्रा विद्युन्मात्रा तथापरा ।पतङ्गिनी तृतीया स्याच्चतुर्थी वायुवेगिनी॥
ghoṣiṇī prathamā mātrā vidyunmātrā tathāparā ।pataṅginī tṛtīyā syāccaturthī vāyuveginī॥
(इस प्रकार बारह कलाओं की मात्राओं में) प्रथम मात्रा ‘घोषिणी’ कही गई है। द्वितीय मात्रा का नाम ‘विद्युन्मात्रा’ है, तृतीय मात्रा ‘पातङ्गी’ और चतुर्थ मात्रा ‘वायुवेगिनी’ के नाम से जानी जाती है।।
Verse १०
पञ्चमी नामधेया तु षष्ठी चैन्द्रयभिधीयते।सप्तमी वैष्णवी नाम अष्टमी शांकरीति च ॥
pañcamī nāmadheyā tu ṣaṣṭhī caindrayabhidhīyate।saptamī vaiṣṇavī nāma aṣṭamī śāṃkarīti ca ॥
पाँचवीं मात्रा का नाम ‘नामधेया’ है और छठवीं मात्रा ‘ऐन्द्री’ के नाम से जानी जाती है। सातवीं मात्रा का नाम ‘वैष्णवी’ और आठवीं मात्रा ‘शाङ्करी’ के नाम से प्रसिद्ध है॥
Verse ११
नवमी महती नाम धृतिस्तु दशमी मता।एकादशी भवेन्नारी ब्राह्मी तु द्वादशी परा॥
navamī mahatī nāma dhṛtistu daśamī matā।ekādaśī bhavennārī brāhmī tu dvādaśī parā॥
नौवीं मात्रा ‘महती’ तथा दसवीं मात्रा को ‘धृति’ (ध्रुवा) कहा गया है। ग्यारहवीं मात्रा ‘नारी’ (मौनी) और बारहवीं मात्रा ‘ब्राह्मी’ के नाम से जानी जाती है॥
Verse १२
प्रथमायां तु मात्रायां यदि प्राणैर्वियुच्यते।भरते वर्षराजासौ सार्वभौमः प्रजायते॥
prathamāyāṃ tu mātrāyāṃ yadi prāṇairviyucyate।bharate varṣarājāsau sārvabhaumaḥ prajāyate॥
If a person happens to die in the first Matra (while contemplating on it), he is born again as a great emperor in Bharatavarsha.
(ॐकार की इन द्वादश कलाओं की) प्रथम मात्रा में यदि साधक अपने प्राणों का परित्याग कर देता है, तो वह भारतवर्ष में सार्वभौमिक चक्रवर्ती सम्राट् के रूप में प्रादुर्भूत होता है॥
Verse १३
द्वितीयायां समुत्क्रान्तो भवेद्यक्षो महात्मवान्।विद्याधरस्तृतीयायां गान्धर्वस्तु चतुर्थिका॥
dvitīyāyāṃ samutkrānto bhavedyakṣo mahātmavān।vidyādharastṛtīyāyāṃ gāndharvastu caturthikā॥
If in the second Matra, he becomes an illustrious Yaksha; if in the third Matra, a Vidyadhara; if in the fourth, a Gandharva (these three being the celestial hosts).
ॐकार की) द्वितीय मात्रा में जब साधक के प्राणों का उत्क्रमण होता है, तब वह महान् महिमाशाली यक्ष के रूप में उत्पन्न होता है। (ॐकार की) तृतीय मात्रा में प्राण त्याग करने पर (वह) विद्याधर के रूप में और चतुर्थ मात्रा में प्राण के परित्याग करने से (वह) गन्धर्व के रूप में जन्म लेता है।।[अपने प्राणों के स्पन्दन का ॐकार रूप महाप्राण की जिस कोटि के साथ तादात्म्य होता है, उसी के अनुरूप देहान्तर की प्राप्ति होती है।]
Verse १४
पञ्चम्यामथ मात्रायां यदि प्राणैर्वियुज्यते ।उषितः सह देवत्वं सोमलोके महीयते॥
pañcamyāmatha mātrāyāṃ yadi prāṇairviyujyate ।uṣitaḥ saha devatvaṃ somaloke mahīyate॥
If he happens to die in the fifth, viz., Ardha-Matra, he lives in the world of the moon, with the rank of a Deva greatly glorified there.
यदि पाँचवीं मात्रा में उस (साधक) के प्राणों का उत्क्रमण होता है, तो वह ‘तुषित’ नामक देवों के साथ निवास करता हुआ चन्द्रलोक में सम्मानित होता है ॥
Verse १५
षष्ठ्यामिन्द्रस्य सायुज्यं सप्तम्यां वैष्णवं पदम् ।अष्टम्यां व्रजते रुद्रं पशूनां च पतिं तथा॥
ṣaṣṭhyāmindrasya sāyujyaṃ saptamyāṃ vaiṣṇavaṃ padam ।aṣṭamyāṃ vrajate rudraṃ paśūnāṃ ca patiṃ tathā॥
If in the sixth, he merges, into Indra; if in the seventh, he reaches the seat of Vishnu; if in the eighth, Rudra, the Lord of all creatures.
छठवीं मात्रा में (शरीर से प्राणों का उत्क्रमण होने पर) साधक देवराज इन्द्र के सायुज्य पद को प्राप्त करता है। सातवीं मात्रा में भगवान् विष्णु के पद-वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करता हैं तथा आठवीं मात्रा में पशुपति भगवान् शिव के रुद्रलोक में जाकर उनकी समीपता का लाभ प्राप्त करता है॥
Verse १६
नवम्यां तु महर्लोकं दशम्यां तु जनं व्रजेत्।एकादश्यां तपोलोकं द्वादश्यां ब्रह्म शाश्वतम्॥
navamyāṃ tu maharlokaṃ daśamyāṃ tu janaṃ vrajet।ekādaśyāṃ tapolokaṃ dvādaśyāṃ brahma śāśvatam॥
If in the ninth, in Mahar-Loka; if in the tenth, in Janoloka (Dhruva-Loka --?); if in the eleventh, Tapoloka, and if in the twelfth, he attains the eternal state of Brahma.
नवीं मात्रा में महः लोक को, दसवीं मात्रा में जनः लोक (ध्रुवलोक) को प्राप्त होता है। ग्यारहवीं मात्रा में तपोलोक को और बारहवीं मात्रा में साधक शाश्वत ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है।।
Verse १७
ततः परतरं शुद्धं व्यापकं निर्मलं शिवम्।सदोदितं परं ब्रह्म ज्योतिषामुदयो यतः॥
tataḥ parataraṃ śuddhaṃ vyāpakaṃ nirmalaṃ śivam।sadoditaṃ paraṃ brahma jyotiṣāmudayo yataḥ॥
That which is beyond these, (viz.,) Para-Brahman which is beyond (the above Matras), the pure, the all-pervading, beyond Kalas, the ever resplendent and the source of all Jyotis (light) should be known.
इससे भी परतर (परे), श्रेष्ठ, व्यापक, शुद्ध, निर्मल, कल्याणकारी, सदैव उदीयमान (वह) परमब्रह्म-तत्त्व है। उसी से सभी तरह की ज्योतियाँ (अग्नि, सूर्य एवं चन्द्र आदि) प्रादुर्भूत हुई हैं।।
Verse १८
अतीन्द्रियं गुणातीतं मनो लीनं यदा भवेत्।अनूपमं शिवं शान्तं योगयुक्तं सदाविशेत् ॥
atīndriyaṃ guṇātītaṃ mano līnaṃ yadā bhavet।anūpamaṃ śivaṃ śāntaṃ yogayuktaṃ sadāviśet ॥
When the mind goes beyond the organs and the Gunas and is absorbed, having no separate existence and no mental action, then (the Guru) should instruct him (as to his further course of development).
जब श्रेष्ठ साधक का मन समस्त इन्द्रियों एवं सत् , रज और तम आदि तीनों गुणों से परे होकर परमतत्व में विलीन हो जाता है, तब वह उपमारहित, कल्याणकारी, शान्तस्वरुप हो जाता है; ऐसी उच्च स्थिति में पहुँचे हुए साधकों को योग युक्त कहा जाना चाहिए ॥
Verse १९
तद्युक्तस्तन्मयो जन्तुः शनैर्मुञ्चेत्कलेवरम्।संस्थितो योगचारेण सर्वसङ्गविवर्जितः॥
tadyuktastanmayo jantuḥ śanairmuñcetkalevaram।saṃsthito yogacāreṇa sarvasaṅgavivarjitaḥ॥
That person always engaged in its contemplation and always absorbed in it should gradually leave off his body (or family) following the course of Yoga and avoiding all intercourse with society.
उस योगयुक्त और तन्मय हुए साधक को अविद्या आदि दोषों से मुक्त और योग पद्धति से स्वस्थ ( आत्मा में स्थित) होकर सभी प्रकार के आसक्ति आदि दोषों से रहित हो जाना चाहिए ॥
Verse २०
ततो विलीनपाशोऽसौ विमल: कमलाप्रभुः।तेनैव ब्रह्मभावेन परमानन्दमश्नुते॥
tato vilīnapāśo'sau vimala: kamalāprabhuḥ।tenaiva brahmabhāvena paramānandamaśnute॥
Then he, being freed from the bonds of karma and the existence as a Jiva and being pure, enjoys the supreme bliss by his attaining of the state of Brahma.
इस प्रकार उस (साधक) के समस्त सांसारिक बन्धनों का शमन ( क्षय) हो जाता है। यह निर्मल, कैवल्यपद को प्राप्त कर स्वयं ही परमात्म स्वरूप हो जाता है । यह ब्रह्मभाव से परमानन्द को प्राप्त करके असीम आनन्द की अनुभूति करता है।।
Verse २१
आत्मानं सततं ज्ञात्वा कालं नय महामते।प्रारब्धमखिलं भुञ्जन्नोद्वेगं कर्तुमर्हसि ॥
ātmānaṃ satataṃ jñātvā kālaṃ naya mahāmate।prārabdhamakhilaṃ bhuñjannodvegaṃ kartumarhasi ॥
O intelligent man, spend your life always in the knowing of the supreme bliss, enjoying the whole of your Prarabdha (that portion of past Karma now being enjoyed) without making any complaint (of it).
हे ज्ञानवान् पुरुष ! तुम सतत प्रयत्न करते हुए आत्मा के स्वरूप को समझने का प्रयास करो। उसी के सच्चिन्तन में अपने समय को लगाओ। प्रारब्ध कर्मानुसार जो भी कष्ट कठिनाइयाँ सामने आयें, उनको भोगते हुए तुम्हें उद्विग्न (खिन्न-दु:खी) नहीं होना चाहिए॥
Verse २२
उत्पन्ने तत्त्वविज्ञाने प्रारब्धं नैव मुञ्चति।तत्त्वज्ञानोदयादूर्ध्वं प्रारब्धं नैव विद्यते॥
utpanne tattvavijñāne prārabdhaṃ naiva muñcati।tattvajñānodayādūrdhvaṃ prārabdhaṃ naiva vidyate॥
आत्मज्ञान के प्रादुर्भूत होने पर भी प्रारब्ध (संस्कार) स्वयं त्याग नहीं करता, किन्तु जैसे ही तत्त्वज्ञान का प्राकट्य होता है, वैसे ही प्रारब्ध कर्म का क्षय हो जाता है। जैसा कि स्वप्नलोक के देहादिक असत् होने के कारण जाग्रत् होने पर विलुप्त हो जाते हैं, विगत जन्मों में जो किये हुए कर्म हैं, उन्हीं कर्मों को प्रारब्ध कर्म को संज्ञा प्रदान की गई है॥
Verse २३
देहादीनामसत्त्वात्तु यथा स्वप्ने विबोधतः।कर्म जन्मान्तरीयं यत्प्रारब्धमिति कीर्तितम्॥
dehādīnāmasattvāttu yathā svapne vibodhataḥ।karma janmāntarīyaṃ yatprārabdhamiti kīrtitam॥
आत्मज्ञान के प्रादुर्भूत होने पर भी प्रारब्ध (संस्कार) स्वयं त्याग नहीं करता, किन्तु जैसे ही तत्त्वज्ञान का प्राकट्य होता है, वैसे ही प्रारब्ध कर्म का क्षय हो जाता है। जैसा कि स्वप्नलोक के देहादिक असत् होने के कारण जाग्रत् होने पर विलुप्त हो जाते हैं, विगत जन्मों में जो किये हुए कर्म हैं, उन्हीं कर्मों को प्रारब्ध कर्म को संज्ञा प्रदान की गई है॥
Verse २४
यत्तु जन्मान्तराभावात्पुंसो नैवास्ति कर्हिचित्।स्वप्नदेहो यथाध्यस्तस्तथैवायं हि देहकः॥
yattu janmāntarābhāvātpuṃso naivāsti karhicit।svapnadeho yathādhyastastathaivāyaṃ hi dehakaḥ॥
ज्ञानी के लिए तो जन्म-जन्मान्तर भी नहीं है। इसलिए प्रारब्ध कर्म ज्ञानी के लिए कभी भी बाधक नहीं होता। जैसे स्वप्नकालीन देह, देह नहीं होती, केवल अध्यास मात्र (रस्सी में साँप की तरह) ही होती है, वैसे ही यह जाग्रत् अवस्था का शरीर भी अध्यास मात्र ही है॥
Verse २५
अध्यस्तस्य कुतो जन्म जन्माभावे कुतः स्थितिः।उपादानं प्रपञ्चस्य मृद्भाण्डस्येव पश्यति ॥
adhyastasya kuto janma janmābhāve kutaḥ sthitiḥ।upādānaṃ prapañcasya mṛdbhāṇḍasyeva paśyati ॥
अध्यस्त (अयथार्थ) की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? और उत्पत्ति के अभाव में उस वस्तु की स्थिति कैसे होगी ? (जिस प्रकार रज्जु-रस्सी में सर्प का अध्यास होने पर रज्जु में सर्प नहीं उत्पन्न होता और न ही उस स्थान में सर्प की स्थिति हो होती है।) इसलिए इस प्रपञ्च का मुख्य उपादान कारण आत्मा ही है। जैसे कि मिट्टी के द्वारा निर्मित पात्रों का उपादान कारण मिट्टी होती है॥
Verse २६
अज्ञानं चेति वेदान्तैस्तस्मिन्नष्टे क्व विश्वता।यथा रज्जुं परित्यज्य सर्पं गृह्णाति वै भ्रमात्॥
ajñānaṃ ceti vedāntaistasminnaṣṭe kva viśvatā।yathā rajjuṃ parityajya sarpaṃ gṛhṇāti vai bhramāt॥
वेदान्तानुसार ये सभी सांसारिक प्रपञ्च अज्ञानान्धकार के कारण आत्मा में ही प्रतिभासित होते हैं। अज्ञानरूपी अन्धकार के विनष्ट होने पर संसार की स्थिति नहीं रह जाती। जिस तरह भ्रम बुद्धि से ग्रस्त मनुष्य रज्जु बुद्धि का परित्याग कर उसे सर्प बुद्धि से ग्रहण करता है, अर्थात् रस्सी को सर्प समझने लगता है, इसी तरह अज्ञानी (मूढ़) मनुष्य सत्य (आत्मा) का ज्ञान (बोध) न होने के कारण इस भ्रम -बुद्धिवश सांसारिक प्रपञ्च का अवलोकन करता है। जब मनुष्य ठीक तरह से उस रस्सी को पहचान लेता है, तो पूर्व में दृष्टिगोचर होने वाले सर्प की भावना नहीं रह जाती ॥
Verse २७
तद्वत्सत्यमविज्ञाय जगत्पश्यति मूढधीः।रज्जुखण्डे परिज्ञाते सर्परूपं न तिष्ठति॥
tadvatsatyamavijñāya jagatpaśyati mūḍhadhīḥ।rajjukhaṇḍe parijñāte sarparūpaṃ na tiṣṭhati॥
वेदान्तानुसार ये सभी सांसारिक प्रपञ्च अज्ञानान्धकार के कारण आत्मा में ही प्रतिभासित होते हैं। अज्ञानरूपी अन्धकार के विनष्ट होने पर संसार की स्थिति नहीं रह जाती। जिस तरह भ्रम बुद्धि से ग्रस्त मनुष्य रज्जु बुद्धि का परित्याग कर उसे सर्प बुद्धि से ग्रहण करता है, अर्थात् रस्सी को सर्प समझने लगता है, इसी तरह अज्ञानी (मूढ़) मनुष्य सत्य (आत्मा) का ज्ञान (बोध) न होने के कारण इस भ्रम -बुद्धिवश सांसारिक प्रपञ्च का अवलोकन करता है। जब मनुष्य ठीक तरह से उस रस्सी को पहचान लेता है, तो पूर्व में दृष्टिगोचर होने वाले सर्प की भावना नहीं रह जाती ॥
Verse २८
अधिष्ठाने तथा ज्ञाते प्रपञ्चे शून्यतां गते।देहस्यापि प्रपञ्चत्वात्प्रारब्धावस्थितिः कुतः॥
adhiṣṭhāne tathā jñāte prapañce śūnyatāṃ gate।dehasyāpi prapañcatvātprārabdhāvasthitiḥ kutaḥ॥
जिस तरह अधिष्ठान (आधार) स्वरूप आत्मतत्त्व का ज्ञान हो जाने पर प्रपञ्च (संसार) शून्यता को प्राप्त हो जाता है, ऐसी स्थिति में देह (शरीर) भी प्रपञ्चरूप (अयथार्थ) होने के कारण प्रारब्ध की स्थिति किस प्रकार रह सकती है?॥
Verse २९
अज्ञानजनबोधार्थं प्रारब्धमिति चोच्यते।तत: कालवशादेव प्रारब्धे तु क्षयं गते॥
ajñānajanabodhārthaṃ prārabdhamiti cocyate।tata: kālavaśādeva prārabdhe tu kṣayaṃ gate॥
अज्ञान से ग्रसित लोगों को बोध कराने के लिए प्रारब्ध कर्म की बात कही जाती है। तदनन्तर कालवश ही सांसारिक प्रारब्ध कर्मों का विनाश हो जाता हैं॥
Verse ३०
ब्रह्मप्रणवसंधानं नादो ज्योतिर्मयः शिवः।स्वयमाविर्भवेदात्मा मेघापायेंऽशुमानिव॥
brahmapraṇavasaṃdhānaṃ nādo jyotirmayaḥ śivaḥ।svayamāvirbhavedātmā meghāpāyeṃ'śumāniva॥
तत्पश्चात् (प्रारब्ध कर्मों के समाप्त होने पर) ‘ॐकार’ स्वरूप ब्रह्म की आत्मा के साथ एकता के चिन्तन से नादरूप में स्वयं प्रकाशमान शिव के कल्याणकारी स्वरूप (परब्रह्म) का प्रादुर्भाव उसी प्रकार हो जाता है, जिस प्रकार बादलों के हट जाने पर भगवान् भास्कर प्रकाशित हो जाते हैं॥
Verse ३१
सिद्धासने स्थितो योगी मुद्रां संधाय वैष्णवीम्।शृणुयाद्दक्षिणे कर्णे नादमन्तर्गतं सदा॥
siddhāsane sthito yogī mudrāṃ saṃdhāya vaiṣṇavīm।śṛṇuyāddakṣiṇe karṇe nādamantargataṃ sadā॥
The Yogin being in the Siddhasana (posture) and practising the Vaishnavi-Mudra, should always hear the internal sound through the right ear.
योगी (साधक) को सिद्धासन से बैठने के पश्चात् वैष्णवी मुद्रा धारण करनी चाहिए। तदनन्तर दाहिने कान के अन्दर उठते हुए नाद (अनाहत ध्वनि) का सतत श्रवण करना चाहिए॥ [बायें पैर की एड़ी से गुदा स्थान को तथा दाहिने पैर से जननेन्द्रिय मूल को दबाकर, शरीर को सीधा रखकर त्रिबन्ध (मूल, जालन्धर, उड्डीयान) लगाने को सिद्धासन कहा जाता है तथा अपलक नेत्रों से बाह्य दृष्टि को अन्तर्लक्ष्य करके ( भृकुटि-मध्य में) देखना वैष्णवी मुद्रा कहलाती है।]
Verse ३२
अभ्यस्यमानो नादोऽयं बाह्यमावृणुते ध्वनिः।पक्षाद्विपक्षमखिलं जित्वा तुर्यपदं व्रजेत्॥
abhyasyamāno nādo'yaṃ bāhyamāvṛṇute dhvaniḥ।pakṣādvipakṣamakhilaṃ jitvā turyapadaṃ vrajet॥
The sound which he thus practises makes him deaf to all external sounds. Having overcome all obstacles, he enters the Turya state within fifteen days.
इस प्रकार नाद का किया गया अभ्यास बाह्म ध्वनियों को आवृत कर लेता है, इस तरह (योगी साधक) दोनों पक्षों ‘अकार’ और ‘मकार’ को जीतकर क्रमशः सम्पूर्ण ‘ओंकार’ को शनैः शनैः आत्मसात् कर तुर्यावस्था को प्राप्त कर लेता है॥
Verse ३३
श्रूयते प्रथमाभ्यासे नादी नानाविधी महान्।वर्धमाने तथाभ्यासे श्रूयते सूक्ष्मसूक्ष्मतः॥
śrūyate prathamābhyāse nādī nānāvidhī mahān।vardhamāne tathābhyāse śrūyate sūkṣmasūkṣmataḥ॥
In the beginning of his practice, he hears many loud sounds. They gradually increase in pitch and are heard more and more subtly.
अभ्यास की प्रारम्भिक अवस्था में यह महान् नाद (अनाहत ध्वनि) विभिन्न तरह से सुनायी देता है। इसके अनन्तर जब अभ्यास अधिक बढ़ जाता है, तब उसके सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप (भेद) सुनायी पड़ने लगते हैं।।
Verse ३४
आदौ जलधिजीमूतभेरीनिर्झरसंभवः।मध्ये मर्दलशब्दाभो घण्टाकाहलजस्तथा॥
ādau jaladhijīmūtabherīnirjharasaṃbhavaḥ।madhye mardalaśabdābho ghaṇṭākāhalajastathā॥
At first, the sounds are like those proceeding from the ocean, clouds, kettle-drum and cataracts; in the middle (stage) those proceeding from Mardala (a musical instrument), bell and horn.
इस नाद की ध्वनि प्रारम्भिक काल में समुद्र, मेघ, भेरी तथा झरनों से उत्पन्न ध्वनि के समान सुनायी देती है। इसके बाद बीच की अवस्था (मध्यमावस्था) में मृदङ्ग, घंटे और नगाड़े की भाँति यह ध्वनि सुनाई पड़ती है। अन्त में अर्थात् उत्तरावस्था में किङ्किणी, वंशी, वीणा एवं भ्रमर की ध्वनि के समान मधुर नाद ध्वनि सुनायी पड़ती है। इस प्रकार सूक्ष्मातिसूक्ष्म होते हुए नाना प्रकार के नाद सुनायी पड़ते हैं ॥
Verse ३५
अन्ते तु किंकिणीवंशवीणाभ्रमरनि:स्वनः।इति नानाविधा नादाः श्रूयन्ते सूक्ष्मसूक्ष्मतः॥
ante tu kiṃkiṇīvaṃśavīṇābhramarani:svanaḥ।iti nānāvidhā nādāḥ śrūyante sūkṣmasūkṣmataḥ॥
At the last stage, those proceeding from tinkling bells, flute, Vina (a musical instrument) and bees. Thus he hears many such sounds more and more subtle.
इस नाद की ध्वनि प्रारम्भिक काल में समुद्र, मेघ, भेरी तथा झरनों से उत्पन्न ध्वनि के समान सुनायी देती है। इसके बाद बीच की अवस्था (मध्यमावस्था) में मृदङ्ग, घंटे और नगाड़े की भाँति यह ध्वनि सुनाई पड़ती है। अन्त में अर्थात् उत्तरावस्था में किङ्किणी, वंशी, वीणा एवं भ्रमर की ध्वनि के समान मधुर नाद ध्वनि सुनायी पड़ती है। इस प्रकार सूक्ष्मातिसूक्ष्म होते हुए नाना प्रकार के नाद सुनायी पड़ते हैं ॥
Verse ३६
महति श्रूयमाणे तु महाभेर्यादिकध्वनौ।तत्र सूक्ष्मं सूक्ष्मतरं नादमेव परामृशेत्॥
mahati śrūyamāṇe tu mahābheryādikadhvanau।tatra sūkṣmaṃ sūkṣmataraṃ nādameva parāmṛśet॥
When he comes to that stage when the sound of the great kettle-drum is being heard, he should try to distinguish only sounds more and more subtle.
निरन्तर नाद का अभ्यास करते हुए जब भेरी आदि की ध्वनि (आवाज) तेजी से सुनायी पड़ने लगे, तब उसमें भी सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर नाद के सुनने का विचार करना चाहिए॥
Verse ३७
घनमुत्सृज्य वा सूक्ष्मे सूक्ष्ममुत्सृज्य वा घने।रममाणमपि क्षिप्तं मनो नान्यत्र चालयेत्॥
ghanamutsṛjya vā sūkṣme sūkṣmamutsṛjya vā ghane।ramamāṇamapi kṣiptaṃ mano nānyatra cālayet॥
He may change his concentration from the gross sound to the subtle, or from the subtle to the gross, but he should not allow his mind to be diverted from them towards others.
(नाद में रुचि रखने वाले साधक को चाहिए कि वह घन नाद को छोड़कर सूक्ष्मनाद (मन्द ध्वनि) या फिर सूक्ष्म नाद का परित्याग करके घन नाद में मन को केन्द्रित करे। अन्यत्र और कहीं भी इधर-उधर मन को भ्रमित न होने दे॥
Verse ३८
यत्र कुत्रापि वा नादे लगति प्रथमं मनः।तत्र तत्र स्थिरीभूत्वा तेन सार्धं विलीयते॥
yatra kutrāpi vā nāde lagati prathamaṃ manaḥ।tatra tatra sthirībhūtvā tena sārdhaṃ vilīyate॥
The mind having at first concentrated itself on any one sound fixes firmly to that and is absorbed in it.
साधक का मन सर्वप्रथम जहाँ-कहीं किसी भी सूक्ष्म (अतिमन्द) अथवा घननाद (अभेद्यध्वनि) में लगता है। उसको (मन को) वहाँ केन्द्रित करना चाहिए। ऐसा करने से वह (चित्त) स्वयमेव तन्मय (विलीन) होने लगता है॥
Verse ३९
विस्मृत्य सकलं बाह्यं नादे दुग्धाम्बुवन्मनः।एकीभूयाथ सहसा चिदाकाशे विलीयते॥
vismṛtya sakalaṃ bāhyaṃ nāde dugdhāmbuvanmanaḥ।ekībhūyātha sahasā cidākāśe vilīyate॥
It (the mind) becoming insensible to the external impressions, becomes one with the sound as milk with water and then becomes rapidly absorbed in Chidakasa (the Akasa where Chit prevails).
साधक का मन सभी सांसारिक बाह्य-प्रपंचों से विस्मृत होकर दूध में मिश्रित जल की भाँति नाद (ध्वनि) में एकीभूत हो जाता है। इस प्रकार वह (मन) नाद के साथ अकस्मात् ही चिदाकाश में स्वयं को विलय कर लेता है॥
Verse ४०
उदासीनस्ततो भूत्वा सदाभ्यासेन संयमी।उन्मनीकारकं सद्यो नादमेवावधारयेत्॥
udāsīnastato bhūtvā sadābhyāsena saṃyamī।unmanīkārakaṃ sadyo nādamevāvadhārayet॥
Being indifferent towards all objects, the Yogin having controlled his passions, should by continual practice concentrate his attention upon the sound which destroys the mind.
संयमी पुरुष को चाहिए कि नाद-श्रवण से भिन्न विषयों-वासनाओं को उपेक्षित करके सतत अभ्यास द्वारा मन को तत्क्षण ही उस नाद में नियोजित करे और सदैव चिन्तन के द्वारा उसी में रमण करता रहे॥
Verse ४१
सर्वचिन्तां समुत्सृज्य सर्वचेष्टाविवर्जितः।नादमेवानुसंदध्यान्नादे चित्तं विलीयते ॥
sarvacintāṃ samutsṛjya sarvaceṣṭāvivarjitaḥ।nādamevānusaṃdadhyānnāde cittaṃ vilīyate ॥
Having abandoned all thoughts and being freed from all actions, he should always concentrate his attention on the sound and (then) his Chitta becomes absorbed in it.
योगी साधक को चाहिए कि सतत चिन्तन करते हुए समस्त चिन्ताओं का परित्याग कर सभी तरह की चेष्टाओं से मन को हटाकर (उस) नाद का ही अनुसन्धान (श्रवण-मनन-चिन्तन) करे; क्योंकि (चिन्तन द्वारा सहज हो) चित्त का नाद में लय हो जाता है॥
Verse ४२
मकरन्दं पिबन्भृङ्गो गन्धान्नापेक्षते यथा।नादासक्तं सदा चित्तं विषयं न हि काङ्क्षति॥
makarandaṃ pibanbhṛṅgo gandhānnāpekṣate yathā।nādāsaktaṃ sadā cittaṃ viṣayaṃ na hi kāṅkṣati॥
जिस प्रकार भ्रमर फूलों का रस ग्रहण करता हुआ पुष्पो के गन्ध की अपेक्षा नहीं रखता है, ठीक वैसे ही सतत नाद में तल्लीन रहने वाला चित्त विषय-वासना आदि की आकांक्षा नहीं करता है॥
Verse ४३
बद्धः सुनादगन्धेन सद्यः संत्यक्तचापलः।नादग्रहणतश्चित्तमन्तरङ्गभुजङ्गमः॥
baddhaḥ sunādagandhena sadyaḥ saṃtyaktacāpalaḥ।nādagrahaṇataścittamantaraṅgabhujaṅgamaḥ॥
यह चित्त रूपी अन्तरङ्ग भुजङ्ग (सर्प) नाद को सुनने के पश्चात् उस सुन्दर नाद की गन्ध से आबद्ध हो जाता है और तत्क्षण ही सभी तरह की चपलताओं का परित्याग कर देता है॥
Verse ४४
विस्मृत्य विश्वमेकाग्रः कुत्रचिन्न हि धावति।मनोमत्तगजेन्द्रस्य विषयोद्यानचारिणः॥
vismṛtya viśvamekāgraḥ kutracinna hi dhāvati।manomattagajendrasya viṣayodyānacāriṇaḥ॥
तदनन्तर (वह मन) विश्व (सांसारिकता) को विस्मृत करके तथा एकाग्रता को धारण करके (विषयों में) इधर-उधर कहीं भी नहीं दौड़ता है। विषय-वासना रूपी उद्यान में विचरण करने वाले मन रूपी उन्मत्त गजेन्द्र को वश में करने में यह नादरूपी अति तीक्ष्ण अङ्कुश ही समर्थ होता है। यह नाद मनरूपी हिरण को बाँधने में जाल का कार्य करता है और मन रूपी तरङ्ग को रोकने में तट का काम करता है। ब्रह्मरूप प्रणव में संयुक्त हुआ यह नाद स्वयं ही प्रकाश स्वरूप होता है।।
Verse ४५
नियामनसमर्थोऽयं निनादो निशिताङ्कुशः।नादोऽन्तरङ्गसारङ्गबन्धने वागुरायते॥
niyāmanasamartho'yaṃ ninādo niśitāṅkuśaḥ।nādo'ntaraṅgasāraṅgabandhane vāgurāyate॥
तदनन्तर (वह मन) विश्व (सांसारिकता) को विस्मृत करके तथा एकाग्रता को धारण करके (विषयों में) इधर-उधर कहीं भी नहीं दौड़ता है। विषय-वासना रूपी उद्यान में विचरण करने वाले मन रूपी उन्मत्त गजेन्द्र को वश में करने में यह नादरूपी अति तीक्ष्ण अङ्कुश ही समर्थ होता है। यह नाद मनरूपी हिरण को बाँधने में जाल का कार्य करता है और मन रूपी तरङ्ग को रोकने में तट का काम करता है। ब्रह्मरूप प्रणव में संयुक्त हुआ यह नाद स्वयं ही प्रकाश स्वरूप होता है।।
Verse ४६
अन्तरङ्गसमुद्रस्य रोधे वेलायतेऽपि वा।ब्रह्मप्रणवसंलग्ननादो ज्योतिर्मयात्मकः॥
antaraṅgasamudrasya rodhe velāyate'pi vā।brahmapraṇavasaṃlagnanādo jyotirmayātmakaḥ॥
तदनन्तर (वह मन) विश्व (सांसारिकता) को विस्मृत करके तथा एकाग्रता को धारण करके (विषयों में) इधर-उधर कहीं भी नहीं दौड़ता है। विषय-वासना रूपी उद्यान में विचरण करने वाले मन रूपी उन्मत्त गजेन्द्र को वश में करने में यह नादरूपी अति तीक्ष्ण अङ्कुश ही समर्थ होता है। यह नाद मनरूपी हिरण को बाँधने में जाल का कार्य करता है और मन रूपी तरङ्ग को रोकने में तट का काम करता है। ब्रह्मरूप प्रणव में संयुक्त हुआ यह नाद स्वयं ही प्रकाश स्वरूप होता है।।
Verse ४७
मनस्तत्र लयं याति तद्विष्णोः परमं पदम्।तावदाकाशसंकल्पो यावच्छब्दः प्रवर्तते।।
manastatra layaṃ yāti tadviṣṇoḥ paramaṃ padam।tāvadākāśasaṃkalpo yāvacchabdaḥ pravartate।।
मन वहाँ ही (उस प्रकाश तत्त्व में) विलय को प्राप्त हो जाता है। वहीं परम श्रेष्ठ भगवान् विष्णु का परम पद है। मन में आकाश तत्त्व का संकल्प तभी तक रहता है, जब तक कि शब्दों का उच्चारण और श्रवण होता है।।
Verse ४८
नि:शब्दं तत्परं ब्रह्म परमात्मा समीयते।नादो यावन्मनस्तावन्नादान्तेऽपि मनोन्मनी।।
ni:śabdaṃ tatparaṃ brahma paramātmā samīyate।nādo yāvanmanastāvannādānte'pi manonmanī।।
नि:शब्द (शब्दरहित) होने पर तो वह (मन) परमब्रह्म के परमात्म-तत्व का अनुभव करने लगता है। नाद (ध्वनि) के रहने तक ही मन का अस्तित्व बना रहता है । नाद के समापन होने पर मन भी ‘अमन’ (शून्यवत्) हो जाता है॥
Verse ४९
सशब्दश्चाक्षरे क्षीणे नि:शब्दं परमं पदम्।सदा नादानुसंधानात्संक्षीणा वासना तु या।।
saśabdaścākṣare kṣīṇe ni:śabdaṃ paramaṃ padam।sadā nādānusaṃdhānātsaṃkṣīṇā vāsanā tu yā।।
सशब्द अर्थात् शब्दयुक्त नाद (ध्वनि) के अक्षर स्वरूप ब्रह्म में क्षीण (लय) हो जाने पर वह नि:शब्द परमपद कहलाता है। जब सतत नाद का अनुसन्धान करने पर समस्त विषय-वासनाएँ पूर्णरूपेण नष्ट हो जाती है, तदुपरान्त मन एवं प्राण दोनों संशयरहित हो उस निराकार परमब्रह्म में लय हो जाते हैं। करोड़ों-करोड़ नाद एवं बिन्दु उस ब्रह्मरूप प्रणव नाद में विलीन हो जाते हैं। वह योगी जाग्रत् , स्वप्न तथा सुषुप्ति आदि सभी अवस्थाओं से मुक्त होकर सभी तरह की चिन्ताओं से रहित हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह योगी मरे हुए व्यक्ति की भाँति (मृतवत्) रहता है। निश्चय ही वह योगी मुक्तावस्था प्राप्त कर लेता है और वह (योगी) शङ्ख- दुन्दुभि आदि (लौकिक) नाद का श्रवण कभी भी नहीं करता ।।
Verse ५०
निरञ्जने विलीयेते मनोवायू न संशयः।नादकोटिसहस्राणि बिन्दुकोटिशतानि च॥
nirañjane vilīyete manovāyū na saṃśayaḥ।nādakoṭisahasrāṇi bindukoṭiśatāni ca॥
सशब्द अर्थात् शब्दयुक्त नाद (ध्वनि) के अक्षर स्वरूप ब्रह्म में क्षीण (लय) हो जाने पर वह नि:शब्द परमपद कहलाता है। जब सतत नाद का अनुसन्धान करने पर समस्त विषय-वासनाएँ पूर्णरूपेण नष्ट हो जाती है, तदुपरान्त मन एवं प्राण दोनों संशयरहित हो उस निराकार परमब्रह्म में लय हो जाते हैं। करोड़ों-करोड़ नाद एवं बिन्दु उस ब्रह्मरूप प्रणव नाद में विलीन हो जाते हैं। वह योगी जाग्रत् , स्वप्न तथा सुषुप्ति आदि सभी अवस्थाओं से मुक्त होकर सभी तरह की चिन्ताओं से रहित हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह योगी मरे हुए व्यक्ति की भाँति (मृतवत्) रहता है। निश्चय ही वह योगी मुक्तावस्था प्राप्त कर लेता है और वह (योगी) शङ्ख- दुन्दुभि आदि (लौकिक) नाद का श्रवण कभी भी नहीं करता ।।
Verse ५१
सर्वे तत्र लयं यान्ति ब्रह्मप्रणवनादके।सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सर्वचिन्ताविवर्जितः॥
sarve tatra layaṃ yānti brahmapraṇavanādake।sarvāvasthāvinirmuktaḥ sarvacintāvivarjitaḥ॥
सशब्द अर्थात् शब्दयुक्त नाद (ध्वनि) के अक्षर स्वरूप ब्रह्म में क्षीण (लय) हो जाने पर वह नि:शब्द परमपद कहलाता है। जब सतत नाद का अनुसन्धान करने पर समस्त विषय-वासनाएँ पूर्णरूपेण नष्ट हो जाती है, तदुपरान्त मन एवं प्राण दोनों संशयरहित हो उस निराकार परमब्रह्म में लय हो जाते हैं। करोड़ों-करोड़ नाद एवं बिन्दु उस ब्रह्मरूप प्रणव नाद में विलीन हो जाते हैं। वह योगी जाग्रत् , स्वप्न तथा सुषुप्ति आदि सभी अवस्थाओं से मुक्त होकर सभी तरह की चिन्ताओं से रहित हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह योगी मरे हुए व्यक्ति की भाँति (मृतवत्) रहता है। निश्चय ही वह योगी मुक्तावस्था प्राप्त कर लेता है और वह (योगी) शङ्ख- दुन्दुभि आदि (लौकिक) नाद का श्रवण कभी भी नहीं करता ।।
Verse ५२
मृतवत्तिष्ठते योगी स मुक्तो नात्र संशयः।शङ्खदुन्दुभिनादं च न शृणोति कदाचन ॥
mṛtavattiṣṭhate yogī sa mukto nātra saṃśayaḥ।śaṅkhadundubhinādaṃ ca na śṛṇoti kadācana ॥
सशब्द अर्थात् शब्दयुक्त नाद (ध्वनि) के अक्षर स्वरूप ब्रह्म में क्षीण (लय) हो जाने पर वह नि:शब्द परमपद कहलाता है। जब सतत नाद का अनुसन्धान करने पर समस्त विषय-वासनाएँ पूर्णरूपेण नष्ट हो जाती है, तदुपरान्त मन एवं प्राण दोनों संशयरहित हो उस निराकार परमब्रह्म में लय हो जाते हैं। करोड़ों-करोड़ नाद एवं बिन्दु उस ब्रह्मरूप प्रणव नाद में विलीन हो जाते हैं। वह योगी जाग्रत् , स्वप्न तथा सुषुप्ति आदि सभी अवस्थाओं से मुक्त होकर सभी तरह की चिन्ताओं से रहित हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह योगी मरे हुए व्यक्ति की भाँति (मृतवत्) रहता है। निश्चय ही वह योगी मुक्तावस्था प्राप्त कर लेता है और वह (योगी) शङ्ख- दुन्दुभि आदि (लौकिक) नाद का श्रवण कभी भी नहीं करता ।।
Verse ५३
काष्ठवज्ज्ञायते देह उन्मन्यावस्थया ध्रुवम्।न जानाति स शीतोष्णं न दुःखं न सुखं तथा ॥
kāṣṭhavajjñāyate deha unmanyāvasthayā dhruvam।na jānāti sa śītoṣṇaṃ na duḥkhaṃ na sukhaṃ tathā ॥
The body in the state of Unmani is certainly like a log and does not feel heat or cold, joy or sorrow.
जिस अवस्था में मन ‘अमन’ हो जाता है, उस अवस्था के प्राप्त होने पर शरीर लकड़ी की भाँति चेष्टारहित सा हो जाता है। वह (मन) ने शीत जानता है, न गर्मी जानता है और न ही वह सुख-दुःख का अनुभव करता है॥
Verse ५४
न मानं नावमानं च संत्यक्त्वा तु समाधिना।अवस्थात्रयमन्वेति न चित्तं योगिनः सदा॥
na mānaṃ nāvamānaṃ ca saṃtyaktvā tu samādhinā।avasthātrayamanveti na cittaṃ yoginaḥ sadā॥
The Yogin's Chitta having given up fame or disgrace is in Samadhi above the three states.
वह (योगी) मान-अपमान से परे हो जाता है। समाधि द्वारा वह इन सभी का पूर्णतया परित्याग कर देता है। योगी का चित्त तीनों अवस्थाओं-जाग्रत् , स्वप्न, सुषुप्ति आदि का कभी भी अनुगमन नहीं करता है (अर्थात् उससे परे हो जाता है)॥
Verse ५५
जाग्रन्निद्राविनिर्मुक्त: स्वरूपावस्थतामियात्॥
jāgrannidrāvinirmukta: svarūpāvasthatāmiyāt॥
Being freed from the waking and the sleeping states, he attains to his true state. 56. When the (spiritual) sight becomes fixed without any object to be seen, when the Vayu (Prana) becomes still without any effort, and when the Chitta becomes firm without any support, he becomes of the form of the internal sound of Brahma-Pranava. Such is the Upanishad.
(वह) योगी जाग्रत् और निद्रा (स्वप्न) की अवस्था से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप में स्थिर हो जाता है। दृश्य वस्तु के अभाव में भी जिसकी दृष्टि स्थिर हो जाती है, बिना प्रयास के ही जिसका प्राण अपने स्थान पर सुस्थिर हो जाता है तथा बिना किसी आश्रय अथवा अवलम्बन के ही जिसका चित्त स्थिरता को प्राप्त हो जाता है, ऐसा वह (योगी) ब्रह्ममय प्रणव नाद के अन्तर्वर्ती तुरीयावस्था (परमानंद) में सदैव स्थित हो जाता है। यही उपनिषद् (रहस्यात्मक ज्ञान) है॥
Verse ५६
दृष्टिः स्थिरा यस्य विनासदृश्यं वायुः स्थिरो यस्य विना प्रयत्नम्।चित्तं स्थिरं यस्य विनावलम्बं स ब्रह्मतारान्तरनादरूप इत्युपनिषत्॥
dṛṣṭiḥ sthirā yasya vināsadṛśyaṃ vāyuḥ sthiro yasya vinā prayatnam।cittaṃ sthiraṃ yasya vināvalambaṃ sa brahmatārāntaranādarūpa ityupaniṣat॥
(वह) योगी जाग्रत् और निद्रा (स्वप्न) की अवस्था से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप में स्थिर हो जाता है। दृश्य वस्तु के अभाव में भी जिसकी दृष्टि स्थिर हो जाती है, बिना प्रयास के ही जिसका प्राण अपने स्थान पर सुस्थिर हो जाता है तथा बिना किसी आश्रय अथवा अवलम्बन के ही जिसका चित्त स्थिरता को प्राप्त हो जाता है, ऐसा वह (योगी) ब्रह्ममय प्रणव नाद के अन्तर्वर्ती तुरीयावस्था (परमानंद) में सदैव स्थित हो जाता है। यही उपनिषद् (रहस्यात्मक ज्ञान) है॥