Books / Naiskarmya Siddhi of Suresvara Hindi Translation Prema Vallabha Tripathi

1. Naiskarmya Siddhi of Suresvara Hindi Translation Prema Vallabha Tripathi

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अच्युतग्रन्थमालायाः (ख) विभागे चतुर्दशं प्रसूनम्

श्रीमत्सुरेश्वराचार्यवर्यविरचिता नैष्कर्म्यसिद्धि:

धर्मशास्त्राचार्येण वेदान्तादिदर्शननिष्णातेन राजशास्त्रशास्त्रिणा श्री- पं० प्रेमवल्लभ त्रिपाठिशा स्त्रिण स्नेत भाषानुवादेन समेता

अच्युतग्रन्थमाला-श्रीविश्वनाथपुस्तकालयाध्यक्षेण साहित्याचार्य- पं० श्रीश्रीकृष्णपन्तशास्त्रिणा सम्पादिता

प्रकाशनस्थानस- अच्युतग्रन्थमाला-कार्यालयः, काशी।

प्रथमावृत्ति: १००० ] संवत् २००७

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प्रकाशक- श्रेष्ठिप्रवर श्रीगौरीशङ्कर गोयनका अच्युतग्रन्थमाला-कार्यालय, काशी

मुद्रक-

अच्युत-मुद्रणालय,

काशी

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प्राक्कथन

श्रीहरि:

औ्रत्पत्तिकी शक्तिरशेषवस्तुप्रकाशने कार्यवशेन यस्याः। विज्ञायते विश्वविवर्तहेतोर्नमामि तां वाचमचिन्त्यशक्तिम्।। यदीयसम्पर्कमवाप्य केवलं वयं कृतार्था निरवद्यकीर्तयः। जगत्सु ते तारितशिष्यपङक्तयो जयन्ति देवैश्वरपादरेएवः ॥

इस संसारमें प्राणिमात्रकी प्रवृत्तियोंका मुख्य उद्देश्य समस्त दुःखोंकी निवृत्ति और परम सुखकी प्राप्ति ही है। इसीलिए जीव सुखकी प्राप्ति और दुःखकी निवृत्तिके लिए यथाशक्ति प्रयत्न करते हैं। मनुष्य चाहता है मैं सदा सुखी रहूँ, कभी भी दुःख न पाऊँ। इसी उद्देश्यकी पूर्तिके लिए वह अथक प्रयत्न करता है। स्त्री, पुत्र, धन आदि की प्राप्तिके लिए भी प्रयत्न इसी उद्देश्यकी पूर्तिके लिए किया जाता है। मन्दबुद्धि पुरुष केवल तात्का- लिक सुखकी प्राप्तिसे ही सन्तुष्ट हो जाते हैं। इसी कारण वे आपातरम्य विषयोंमें मुग्ध होकर उनकी प्राप्तिके लिए अनेक कष्ट उठाते हैं, अनेकानेक कर्म करते हैं। शुभाशुभ कर्मके अनुसार ही प्राणी ऊँच, नीच शरीरोंको ग्रहण करते रहते हैं- नद्यां कीटा इवावर्तात् आवर्तान्तरमाशु ते। व्रजन्तो जन्मनो जन्म लभन्ते नैव निवृतिम्।। जैसे नदीके आवर्तमें पड़े हुए कीट विवश होकर एक आवर्तसे दूसरे आवर्तमें चले जाते हैं, कभी भी सुख नहीं पाते वैसे ही अविद्या- वशवर्ती जीव एक शरीरसे दूसरे शरीरमें भ्रमण करते हुए संसारमें कभी भी सुख नहीं पाते। क्योंकि सुख-प्राप्तिकी कामनासे किये गए शुभाशुभ कर्मोंसे प्रेरित हुआ यह जीव प्रारब्धानुसार जिन जिन योनियोंको धारण करता है, उन सभी योनियोंमें प्रिय-वियोग और अप्रिय-समागमसे उत्पन्न

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२) होनेवाले शोक और मोहकी आगमें प्राणी सदा झुलसता रहता है, सुख और शान्तिका लेश भी वहाँ उसे नहीं मिलता। संसारमें लौकिक कारणोंमें समानता होनेपर भी कार्यमें बड़ा भेद (वैचित्र्य) देखा जाता है। एक ही माता-पितासे उत्पन्न हुए तथा समानरूपसे पालित-पोषित बालकोंमें भिन्नता देखी जाती है। कोई बुद्धि- मान, कोई मूर्ख, कोई सुखी, कोई दुःखी, कोई धनवान्, कोई निर्धन एवं कोई स्वस्थ, कोई रोगी देखनेमें आते हैं। सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करनेपर इस वैचित्यका लौकिक कारण हमें कुछ भी नहीं प्रतीत होता। इसलिए व्याकरणके महाभाष्यकार श्रीपतञ्जलिमुनिने कहा है- 'समानमीहमानानामधीयानां केचिदथैर्युज्यन्ते नापरे, तत्र किं कर्तु शक्यतेऽस्मामिः।' अर्थात् समान परिश्रमसे अध्ययन करनेवाले छात्रोंमें कोई-कोई पशिडत होते हैं, कोई-कोई नहीं होते, इसमें हम क्या करें, क्योंकि हम समान रूपसे पढ़ानेसे अधिक और क्या कर सकते हैं ? इसीसे मानना पड़ता है कि इस विचित्रताका कारण कर्म है। उसीके अनुसार जीव ऊँच, नीच योनियोंमें प्राप्त होकर सुख, दुःख आदि विभिन्न- विभिन्न भोगों का अनुभव करता है। विषयी पुरुषको संसारमें सुखके अनु- भवकी बेलामें जो वस्तु सुखरूप प्रतीत होती है, सूक्ष्म विचार करनेपर वास्तवमें वह भी दुःखरूप ही है। कारण सुख-भोगके समय सुखके साघनोंमें राग और दुःखके कारणोंमें द्वेष चित्तमें वना ही रहता है। इन्द्रियोंकी विषयोंमें जो स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, इसी आसक्तिको राग कहते हैं और अभीष्ट पदारथमें बाधा डालनेवाले व्यक्तिके प्रति चित्तमें जो प्रतिकूल वृत्ति होती है, उसको द्वेष कहते हैं। राग-द्वेष के कारण ही सुखके अनु- भवसे सुखके संस्कार और दुःखके अनुभवसे दुंःखके संस्कार उत्पन्न होते रहते हैं, जिनसे कि जन्म-परम्परा बनी रहती है। क्योंकि इन राग-द्वेष और उनके संस्कारोंसे ही प्रेरित होकर प्राणी पुएयपापात्मक अनेकानेक प्रवृत्तियोंमें फँसकर शोक, मोह, आदिसे जन्म, जरा, मरणरूप दुःख परम्पराओंके

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३ ) V गर्तमें पड़ते हैं। इसीसे विवेकी पुरुषकी दृष्टिमें सांसारिक सुख भी परिणाममें नीरस होनेके कारण दुःखरूप ही है। इसीलिए योगसूत्रमें कहा गया है- 'परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुएवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्व विवेकिनः।' (यो०सू०२-१५) अविवेकी पुरुष अविद्यापरवश होकर दुःखके कारणभृत देहादिमें अहन्ता और ममता करता हुआ त्रिविध दुःखोंसे सन्तप्न होकर जन्म-मरण- परम्परारूप संसारमें भटकता रहता है। अतः संसार महान् दुःखरूप है। और वास्तवमें यदि देखा जाय तो जीवको उस सच्चे सुख और सच्ची शान्तिकी ओर ले जानेमें कारण भी यह दुःख ही है। क्योंकि- इस संसारमें यदि दुःख न होता और दुःखके रहनेपर भी यदि वह हेय न होता, अर्थात् यदि वह सुखके समान प्रिय होता, अथवा प्रिय न होनेपर भी यदि उसकी निवृत्ति नहीं हो सकती यानी दुःख यदि नित्य होता अथवा अनित्य होनेपर भी यदि उसकी निवृत्तिका कोई उपाय ही नहीं होता, या शास्त्रसे प्रतिपाद्य उपाय उसका निवर्तक न होता, अथवा शास्त्रप्रतिपाद्य उपायसे अन्य कोई सरल उपाय उसका निवर्तक होता, तो फिर कोई भी पुरुष सद्गुरुकी शरणमें जाकर वेदान्त वाक्योंका श्रवण (अद्वैत ब्रह्ममें तात्पर्य-निर्णयरूप श्रवण) नहीं करता, चित्तकी शुद्धिके लिए नित्यनैमित्तिक कर्मोंका अनुष्ठान एवं चित्तकी एकाग्रताके लिए भग- वान्की उपासना भी नहीं करता। परन्तु ऐसी बात नहीं है। दुःख हैं और वे एक-दो ही नहीं, अनन्त हैं। वे सब तीन विभागोंमें विभक्त हैं-आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक । आध्यात्मिक दुःख शारीरिक और मान- सिक मेदसे दो प्रकारके हैं। ज्वर, शूल, शिरोवेदना आदि रोग शारीरिक दुःख और काम, क्रोध, लोभ आदि मानसिक दुःख हैं। ये सब शरीरके भीतरी निमित्तोंसे उत्पन्न होनेके कारण आध्यात्मिक कहलाते हैं। सर्प, वृश्चिक, व्याघ्र, चौर आदि प्राणियोंके द्वाग उत्पन्न होनेवाले दुःख आधिभौतिक कहलाते हैं एवं अभि, जल, विजली आदिसे जो अतिवृष्टि अनावृष्टि आदि दुःख उत्पन्न होते हैं, वे आधिदैविक कहे जाते हैं। इन दुःखोंसे मुक्त होनेके लिए ही पुरुष वेदान्त शास्त्रका श्रवण,:

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( g ) मनन और निदिध्यासन करता है। क्योंकि शास्त्र-प्रतिपादित उपायसे (अर्थात् श्रवण, मनन और निदिध्यासन द्वारा होनेवाले आत्मसाक्षात्कारसे) अन्य कोई भी उपाय इन दुःखोंका निवर्तक नहीं है। इसलिए प्रत्येक पुरुषको शास्त्रकी जिज्ञासा होती है। क्योंकि समस्त दुःखोंकी निवृत्ति और परम- आनन्दकी प्राप्ति ही परम पुरुषार्थ है। यहाँपर कुछ लोग, अर्थ और कामको ही पुरुषार्थ माननेवाले, कहते हैं कि आप्त वैद्योंसे उपदिष्ट औषधोपचार एवं सुमनोहर वनिता, गन्ध, माल्य, नृत्य, गीत आदि विषयोंके सेवनसे जब आध्यात्मिक (शारीरिक और मानसिक) दुःखोंकी निवृत्ति हो जाती है तथा नीतिशास्त्रके ज्ञान और निर्बाध प्रदेशमें निवास करनेसे आधिभौतिक दुःखोंकी भी निवृत्ति हो सकती है एवं मणि, मन्त्र, औषधि-सेवन आदिउपायोंसे आधिदैविक दुःख भी निवृत्त हो ही सकता है। इस प्रकार लौकिक सरल उपायोंसे ही जब समस्त दुःखोंकी निवृत्ति हो सकती है, तब फिर अनेक जन्मोंके आयाससे साध्य होनेवाले शास्त्रप्रतिपादित, आत्म-साक्षात्काररूप उपायमें कौन पुरुष प्रवृत्त होगा ? इसका उत्तर यह है कि आयुर्वेदोक्त औषधोपचार आदिसे ज्वर आदि शारीरिक रोगोंकी एकदम निवृत्ति हो जाय और अवश्य निवृत्ति हो जाय यह बात नहीं है। क्योंकि वैद्यों द्वारा निर्दिष्ट औषधिका उपचार करने- पर भी वे सर्वथा नहीं निवृत्त होते, एकबार निवृत हो जानेपर भी पुनः उत्पन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार मनोज्ञ वनिता आदिके सेवनसे काम, आदिकी निवृत्ति नहीं होती, प्रत्युत उसकी और अधिक अभिवृद्धि होती है। इस रीतिसे तो शारीरिक और मानसिक दुःखोंसे छुटकारा पाना बिलकुल ही असंभव है। यही बात आधिभौतिक और आधिदैविक दुःखोंके विषयमें भी समझ लेनी चाहिए। सारांश यह है कि लौकिक उपायोंसे दुःख नहीं निवृत्त हो सकते। य़दि कहीं निवृत्त हो भी जाते हैं तो फिर उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए इन दुःखोंकी आत्यन्तिक और ऐकान्तिक निवृसिके लिए अध्यात्मशास्त्रकी जिज्ञासा अवश्य करनी चाहिए।

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इसपर मीमांसक लोगोंका कहना है कि-"लौकिक उपायोंसे दुःखोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति भले ही न हो, परन्तु अमिहोत्र, दर्श- पौर्णमास, ज्योतिष्टोम आदि वैदिक कर्म-कलापसे स्वर्गकी प्राप्ति होनेपर अवश्य ही दुःखोंकी निवृत्ति हो सकती है। तो फिर क्यों अध्यात्मशास्त्रकी जिज्ञासा की जाय? अथात् वह व्यर्थ है। क्योंकि उनके (मीमांसकोंके) मतमें धर्म, अर्थ और काम, ये तीन ही पुरुषार्थ हैं। इसलिए वे कहते हैं कि मोक्ष न चतुर्थ पुरुषार्थ है और न आत्मसाक्षात्कार उसका उपाय है। एवं उसका प्रतिपादन करनेवाला वेदान्त शास्त्र भी कोई स्वतन्त्र शास्त्र नहीं है किन्तु वह अर्थवाद के समान कर्मकाएडका ही एक अङ्ग है।" परन्तु विचार करने पर यह भी मत उचित नहीं प्रतीत होता। कारण यह कोई निश्चय नहीं है कि वैदिक उपायोंसे दुःखकी निवृत्ति हो ही जाय। संभव है कि यागमें अङ्ग-वैकल्य हो जानेसे उसका फल स्वर्ग न मिल सके और उसका फल जो स्वर्ग है, वह नित्य ही है, ऐसा भी नहीं कह सकते। क्योंकि 'तद्थेह कर्मचितो लोकः क्षीयते एवमेवामुत्र पुएयचितो लोकः क्षीयते।' (जैसे इस लोकमें कर्मसे जन्य कृषि आदि फल नष्ट हो जाता है, वैसे ही परलोकमें पुएयसे जन्य स्वर्गफल भी नष्ट हो जाता है।) इत्यादि श्रुतियों और 'क्षीणे पुएये मर्त्य- लोकं विशन्ति, इत्यादि स्मृतियोंसे प्रतीत होता है कि स्वर्गादि सुख भी अनित्य एवं सातिशय ही है। इसलिए वैदिक उपायोंसे भी लौकिक उपायों ( भक्ष्य, भोज्य, पेय, औषधोपचार आदि) के समान ही दुःखकी आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं हो सकती है। यहाँ तक कि कर्म और उपासना द्वारा प्राप्त हुए दिव्य लोकोंमें दिव्य-सुखका उपभोग प्राप्त करके भी अद्वैत ब्रह्मरूप स्वाश्रयके साथ सायुज्यकी उत्कृष्ट इच्छा बनी ही रहती है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि प्रकृति-प्राकृत नामरूपात्मक प्रपश्चके अन्तर्गत चाहे जितनी भी उन्नति एवं सुख-साम्री प्राप्त हो, परन्तु द्वैत एवं दुःखरूप होनेके कारण वह सब अनन्तसुख और शान्तिके सम्पादनमें नहीं समर्थ हो सकती। इसलिए सूक्ष्मतत्वके विवेचकोंका, कहना है कि

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दुःखोंकी आत्यन्तिक निवृत्तिरूप मोक्ष तो केवल एक वेदान्तशास्त्रके श्रवण, मनन और निदिध्यासनसे होनेवाले आत्मसाक्षात्कारसे ही होता है। इस प्रकार त्रिविध दुःखोंसे सन्तप्त प्राणी जब लौकिक और वैदिक दोनों उपायोंसे उस परम सुख और परम विश्रान्तिको नहीं प्राप्त होता, तब लौकिक एवं वैदिक अनेक विधि साधनोंके अनुष्ठानसे खिन्न हुए उस सच्चे सुख, सच्ची शान्तिके जिज्ञासुको एकमात्र श्रुतिकी ही शरण लेनी पड़ती है। श्रुति, माता-पितासे भी कोटिगुण अधिक जीवका हित चाहने- वाली भगवती श्रुति, पुत्रवत्सला जननीके समान समस्त दुःखोंकी निवृत्ति एवं परम सुखकी प्राप्तिका जो एकमात्र उपाय बतलाती है, उसको कहते हैं-आत्मदर्शन, आत्मज्ञान अर्थात् आत्माका साक्षात्कार। 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ।' 'तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नाऽन्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।' 'तद्विज्ञानार्थ स गुरुमेवाभिगच्छेत्।' इत्यादि, इसी श्रुति द्वारा निर्दिष्ट अतिगहन आत्म-दर्शनका स्पष्ट रीतिसे प्रतिपादन करनेके लिए गौतम आदि तत्वदर्शी मुनियोंने ततत् अधिकारि- योंकी रुचि और प्रवृत्तिके अनुसार न्याय, वैशेषिक आदि छः दर्शनोंकी रचना की है। इसीलिए आत्म-दर्शनके प्रतिपादक उन वेदान्तादि दर्शनोंको भी लक्षणा द्वारा 'दर्शन' कहा जाता है। जैसे कि उपनिषद् शब्दका मुख्य अर्थ है-अध्यात्मविद्या। तत्प्रतिपादक अन्थोंमें भी लक्षणावृत्तिके द्वारा उषनिषद् शब्दका प्रयोग होता है। अथवा वेदान्तादि निबन्धोंमें दर्शन शब्दका प्रयोग करणत्वेन-साधनत्वेन-किया गया गया है। इस- लिए 'दृश्यते अनेन इति दर्शनम्' जिसके द्वारा आत्माका दर्शन (साक्षा- त्कार) हो, वह वेदान्त आदि नित्रन्ध भी दर्शन शब्दसे कहा जाता है। क्योंकि श्रुतिने आत्म-दर्शनके लिए जिन श्रवण, मनन और निदिध्यासनरूप तीन साधनोंका निर्देश किया है, उनमेंसे द्वितीय साधन तर्कात्मक मननमें अपेक्षित उपपत्तिके प्रतिपादक वेदान्तादि निवन्ध भी परम्परासे आत्म-साक्षा-

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( ம) त्कार करनेमें साधन हैं। इसलिए वेदान्त आदि निबन्धोंको भी दर्शन कहते हैं। दर्शन अर्थात् आस्तिक दर्शन ६ हैं। न्याय-दर्शन, वैशेषिक-दर्शन, साङ्कयदर्शन, योगदर्शन, मीमांसा-दर्शन और वेदान्त-दर्शन। इन दर्शनोंके रचयिता गौतम, कणाद, कपिल, पतञ्जलि, जैमिनि और व्यास, ये सभी महर्षि तत्वदर्शी थे। वेदके सिद्धान्तके सूक्ष्म-रहस्यको ऋतम्भरा प्रज्ञाके द्वारा सब ठीक ठीक जानते थे। इसी कारण इन प्रत्येक महर्षिके परमार्थ तत्त्व जाननेमें लेशमात्र भी विप्रत्तिपति (संशय) नहीं है। किन्तु पर- मार्थ तत्त्वको लेकर व्यवहारकी रक्षा तथा लोकसंग्रह हो नहीं सकता है। इसलिए महर्षियोंने अधिकारियोंके भेदसे भिन्न-भिन्न कक्षाओंके अनुसार भिन्न-भिन्न प्रस्थानोंका (अलग-अलग दर्शनोंका ) निर्माण करके उन में परम गम्भीर आत्मतत्त्व्रका विवेचन करते हुए तत् तत् सिद्धान्तोंका प्रतिपादन किया है। प्रायः सभी दार्शनिकोंके मतमें मोक्ष नित्य-सुख या दुःख-निवृत्ति रूप है। सांख्य, योग, वेदान्त आदि शास्त्र धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारोंको पुरुषार्थ मानते हैं, अर्थात् इनके मतमें चार पुरुषार्थ हैं। इनमें से लौकिक सुखको काम कहते हैं। वह दो प्रकारका है दिव्य (अर्थात् स्वर्गसुख) और अदिव्य (भूलोक सुख), वह दोनों ही प्रकारका सुख उपेय (साध्य) है। अर्थ और काम उसके साघन हैं। इनमें मोक्ष ही परम पुरुषार्थ है। वही मनुप्य जीवनका मुख्य उद्देश्य है। इसीलिए योगवासिष्ठमें कहा गया है- बुद्ध्वैव पौरुषफलं पुरुषत्वमेतद् आत्मप्रयत्नपरतैव सदैव कार्या। नेया ततः सफलतां परमामथासौ सच्छास्त्रसाधुजनपएिडतसेवनेन ।I (यो० वा०, मु० प्र० ) मोक्षकी सिद्धिके लिए धर्म भी उपादेय है। धर्म की सिद्धिके लिए अर्थ भी उपादेय है। एवं 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' इस नियमके अनुसार शरीरका साधन होनेसे काम भी उपादेय ही है। जैसा कि श्रीमद्भागवतमें कहा है-

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धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य नार्थे।ऽर्थायोपकल्पते। नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः ॥ कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवैत यावता। जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः ॥ (१-२-६-१०)

(धर्म अपवर्ग-मोक्ष-के लिए कर्तव्य है, न कि धनके लिए। धन-सञ्चय धर्मके लिए कर्तव्य है, न कि विषय-सुखके लिए। विषय-सेवन जीवनके लिए ही है, इन्द्रियोंकी परितृप्तिके लिए नहीं, अर्थात् उतना ही विषय-सेवन किया जाय जितनेसे अपने जीवनका निर्वाह हो जाय और जीवन भी तत्त्वकी जिज्ञासा-आत्मसाक्षात्कार-के लिए है, नश्वर सांसारिक सुखके सञ्चयके लिए नहीं अर्थात् जीवित रहनेका फल यह नहीं है कि अनेक प्रकारके कर्मोंके चक्करमें पड़कर क्षणभङ्गर सांसारिक सुखकी प्राप्तिमें ही समस्त आयु बरबाद की जाय? क्योंकि जीवनका परम लाभ तो वास्तविक तत्वको जानना ही है।) यही बात समस्त दर्शनोंमें भिन्न-भिन्न रीतिसे प्रतिपादित की गई है। सब दर्शनों में प्रधान दर्शन है-वेदान्त दर्शन। वही सम्यग्दर्शन, वैदिक-दर्शन, आत्मदर्शन इत्यादि शब्दोंसे कहा गया है। इससे अन्य सभी आस्तिक दर्शनोंका तात्पर्य इसीमें है अर्थात् अन्य सभी दर्शन वेदान्त- द्वारा निर्दिष्ट अद्वैत-तत्त्वकी प्रतिपत्तिमें ही सहायक हैं। इसलिए सच्चे सुख, सच्ची शान्तिके ज़िज्ञासुको उसका ठीक ठीक बोध करानेमें वेदान्त- शास्त्र ही समर्थ होता है। क्योंकि वह आत्म-विषयक समस्त विप्रति- पत्तियोंका निराकरण करके, जिज्ञासुके हृदयसे अज्ञानको निवृत्त करके, सत्य अपरोक्ष आत्मतच्व प्रकाशित कर देता है। आत्माका अपरोक्षज्ञान होनेपर ही यह जीव अनादि जन्म-मरण की परम्परारूप संसार-चक्रसे मुक्त होता है। यद्यपि जीव नित्य है, वास्तवमें उसके जन्म-मरण नहीं होते। तथापि वह अपने कर्मोंके अनुसार नवीन शरीरोंका ग्रहण और प्राचीन शरीरोंका त्याग करवा रहता है। इस शरीरके ग्रहण और त्यागको ही जन्म तथा मरण

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कहते हैं। वास्तवमें जीवका जन्म-मरण नहीं होता। क्योंकि वास्तवमें वह ईश्वर ही है। उपाधिके द्वारा भिन्नसा प्रतीत होता है। यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वान् तपो भिन्ना बहुधैकोडनुगच्छन्। उपाधिना क्रियते भिन्नरूपो देवः क्षेत्रेष्वैवमजोऽयमात्मा॥ (जैसे एक ही ज्योतिरूप सूर्य भिन्न-भिन्न जलोंमें प्रतिबिम्विित होकर अनेकरूप हो जाता है, वैसे ही प्रकाशस्वरूप एक ही परमात्मा अविद्या और स्थूल सूक्ष्म शरीरोमें प्रतिविम्धित होकर अनेक (जीव) स्वरूप हो जाता है।) एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः । एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्॥ (जैसे आकाशमें एकरूपसे विद्यमान चन्द्रमा जलमें (प्रतिविम्बित होकर) अनेकरूपसे दीखता है। वैसे ही एक ही परमात्मा तत्तत् शरीरोंमें प्रतिविम्बित होकर अनेकरूप दीखता है।) इससे प्रतीत होता है कि जीव परमेश्वरका प्रतिबिम्ब है। परमेश्वर एक है। अविद्या और स्थूल-सूक्ष्म शरीरोंके भेदसे उसके प्रतिबिम्ब अनेक हैं। 'मम मुखं दर्पणे दृश्यते' 'आकाशस्थः सूर्यो जले भासते' इत्यादि अनुभवसे भी प्रतीत होता है कि भेदके भासनेपर भी बिम्ब और प्रतिबिम्ब वास्तवमें एक ही है। अतः ब्रह्म और जीव भी एक ही है, भेद-प्रतीति अ्रमसे होती है। जैसे परमार्थ ब्रह्म सत्, चित्, आनन्दरूप निर्विशेष है, वैसे ही उसके साथ ऐक्य होनेसे जीव भी सत्, चित्, आनन्दरूप निर्विशेष ही है। तथापि जैसे माया (विद्या) उपाघिसे ब्रह्म सर्वज्ञता, अन्तर्यामिता, भूतानुकम्पिता आदि कल्याण गुण-गणोंका भाजन होता है, वैसे ही अविद्या उपाधिके वश जीव अल्पज्ञ, दुःखित्व आदि अशुभ गुणोंसे युक्त हो जाता है- मायाबिम्बो वशीकृत्य तां स्यात्सर्वज्ञ ईश्वरः। अविद्यावशगस्त्वन्यः तद्वचित्र्यादनेकधा ॥ 'भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्व प्रोक्तं त्रिविधं म्रह्म एतत्' (श्वे० १-१२ )

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१० ) (भोक्ता-जीव, भोग्य-शब्दादि विषय और प्रेरिता-परमात्मा, ये तीनों विचार-दृष्टिसे ब्रह्म ही हैं।) इन वचनोंके अनुसार सम्पूर्ण द्वैत जब मिथ्या ही भासता है, परमार्थमें है ही नहीं। तब जीवमें कर्तृत्व भोक्तृत्व, सुखित्व, दुःखित्व आदि भी मिथ्या ही है, अध्यस्त है, अर्थात् अज्ञानसे कल्पित है, परमार्थमें नहीं है। जीवका वास्तविक स्वरूप सर्वािष्ठान ब्रह्म ही है, उससे भिन्न नहीं। इस प्रकारके ब्रह्मात्मैक्य ज्ञानसे अर्थात् स्वाश्रयभूत परिपूर्ण परब्रह्मके साथ जीवके अभेदज्ञानसे ही सायुज्यमुक्तिरूप कैवल्य होता है। यही जीवकी कृतकृत्यता है, यही परम पुरुषार्थकी सिद्धि है। इस आत्मज्ञानके जाननेमें मनुष्यमात्र ही नहीं, किन्तु इन्द्रादि देवता भी अधिकारी हैं। इसलिए इन्द्रादि देवता लोगोंने भी आत्मतत्वकी जिज्ञासासे ब्रह्माके पास जाकर ब्रह्मचर्यपूर्वक तत्त्वज्ञानका सम्पादन किया। अतएव परम शान्ति और विश्रान्तिके अभिलाषी पुरुषको आत्मतत्त्व्रके ज्ञानके लिए गुरुपरम्परासे अध्यात्मशास्त्रका (वेदान्तशास्त्रका ) अध्ययन करना नितान्त आवश्यक है। अस्तु, इस आत्मतत्वका विशद विवेचन यद्पि समस्त वेदों, ·उपनिषदोंमें पर्याप्त है। इस कारण [वेदोंके अनादि होनेसे ही] यह अद्वैतवाद यद्यपि संसारमें अनादि कालसे ही विद्यमान है, तथापि युगके ह्वासके अनुसार मनुष्यकी ज्ञानशंक्तिका हास होता देखकर अज्ञानके वशवर्ती जीवोंके कल्याणकी कामनासे द्वैपायन भगवान् वेदव्यासजीने चार अध्यायोंमें उत्तर-मीमांसा-(ब्रह्मसूत्र अर्थात् वेदान्तदर्शन)- की रचना करके उसमें समस्त वेदोंके अतिगूढ़ रहस्य आत्मतत्वके स्वरूपका स्पष्ट निरूपण कर दिया है। तथापि कालचक्रके प्रभावसे जब इस कलिकालमें सद्धर्मका, वैदिक धर्मका, प्रचार और अनुष्ठान लुप-सा हो गया था और आत्मतत्त्वके स्वरूपका ज्ञान भी प्रायः कुछ इने-गिने उच्चकोटिके महापुरुषोंमें ही सीमित रह गया था; तब वैदिक धर्मके प्रभावके मन्द पड़ जानेसे जन-समाज प्रायः श्रुतिसम्मत विशुद्ध अद्वैत ब्रह्मवादको भूलकर अवैदिक-

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भ्रान्त सम्प्रदायों द्वारा प्रचारित धर्मोंको ग्रहण करने लग गया था, तब उस अज्ञानप्रधान समयमें साक्षात् परमात्माकी ज्ञानशक्तिने ही श्रीशक्कराचार्य रूपमें प्रकट होकर देशव्यापक अज्ञानरूप अन्धकारको दूर करके भारतके एक कोनेसे दूसरे कोने तक वैदिक धर्म-कर्मका एकछत्र साम्राज्य स्थापित किया। भगवान् शंकराचार्यने प्रस्थानत्रय (उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र एवं गीता) पर प्रसन्न गम्भीर भाष्यकी रचना करके दृढ़तापूर्वक अवैदिक दार्शनिकोंके युक्तिजालका खएडन करके शास्त्र तथा युक्तिके बलसे वेदानुमत, निर्विशेष अद्वैत सिद्धान्तका प्रतिपादन किया। उन्होंने प्रातिभासिक, व्यावहारिक एवं पारमार्थिक भेदसे, सत्ताभेदकी कल्पना करके समस्त दर्शनोंके सिद्धान्तोंका सामञ्जस्य करके सकलसिद्धांतोंके समन्वयका मार्ग भी खोल दिया। केवल इतना ही नहीं, अद्वैत सिद्धांतका अपरोक्षतया साक्षात्कार करके जगत्में उसके प्रचारके लिए तत्-तत् देश और कालके अनुसार मठादिस्थापनके द्वारा जगत्में ज्ञानोपदेशका भी स्थायी प्रबन्ध किया। क्योंकि यह अद्वैत- सिद्धांत ही सारे संसारके लिए परमशान्ति प्रदान करनेवाला है। अस्तु, आचार्यशक्करकी लोकोत्तर विद्वत्तां और प्रतिभापर मुग्ध होकर बड़े-बड़े विद्वान् उनके शिष्य बन गए। उनमें चार शिष्य उनके प्रधान शिष्योंमें हुए। सुरेश्वराचार्य, पद्मपादाचार्य त्रोटकाचार्य, और हस्तामलकाचार्य। प्रस्तुत पुस्तकके रचयिता श्रीसुरेश्वराचार्य अपने गुरुके समान ही अलौकिक पुरुष थे। इनकी रचनाओं से इनकी असाधारण विद्वत्ता तथा असामान्य प्रतिभाका पर्याप्त परिचय मिलता है। सुरेश्वराचार्यके गृहस्थाश्रमका नाम 'मएडनमिश्र' था। मंडनमिश्र ही संन्यास ग्रहणके बाद सुरेश्वराचार्य कहलाए, इस सत्य विषयमें भ्रान्त इतिहास लिखनेवाले कुछ पाश्चात्य पशिडतों एवं उनके अनुयायी कुछ भारतीय विद्वानोंको भी 'मएडनमिश्र भिन्न थे और सुरेश्वराचार्य भिन्न थे' ऐसी भ्रान्त धारणा आजकल हो गई है। वास्तवमें यह निर्मूल है। इस विषयमें हमारे माननीय, मीमांसा एवं वेदान्तशास्त्रके मार्मिक विद्वान् पंडित श्रीसुब्रह्मए्यशास्त्रीजी महोदय (प्रोफेसर विश्वविद्यालय, काशी) ने बहुत कुछ अन्वेषण करके बहुत सामग्री प्राप्त की

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( १२ ) है। उसीका कुछ सारांश इसमें हम दे रहे हैं। आशा है कि इसके अव- लोकनसे पाठकोंका समाधान हो जायगा। अस्तु मएडनमिश्र जगत्प्रसिद्ध मीमांसक कुमारिलभट्टके शिष्य थे तथा मीमांसा एवं कर्मकाएडके अलौकिक पणडत थे। गृहस्थाश्रममें उन्होंने 'विधिविवेक' आदि मीमांसाके कई ग्रन्थ लिखे। वेदानतके विषयमें प्रसिद्ध 'ब्रह्मसिद्धि' नामक ग्रन्थ भी उन्होंने अपने पूर्वाश्रममें ही लिखा था। बादमें भगवान् शङ्कराचार्यके साथ शास्त्रार्थमें पराजित हो जानेपर, आचार्य शङ्करके सम्पर्कमें आकर उन्होंने अपने विचारोंको परिवर्तित कर दिया। उन्होंने आचार्यके विशेष सम्पर्कमें रहकर अद्वैत वेदान्तके विषयमें अलौकिक अद्भुत पासिडत्य सम्पादन किया। वेदान्तके विषयमें उनकी ऐसी अलौकिक प्रतिभासे मुग्ध होकर आचार्यने ब्रह्मसूत्रपर अपने शारीरक भाष्यमें वृत्ति लिखनेके लिए इनको ही नितान्त उपयुक्त समझकर इनसे उस कार्यके लिए कहा। परन्तु आचार्यकी शिष्यमएडलीने इस बातका विरोध किया। क्योंकि ये गृहस्थाश्रममें एक कट्टर मीमांसक थे। उस अवस्थामें इनका आग्रह कर्मकाएडपर बहुत ही अधिक था। इसीसे आचार्यकी शिप्यमंडलीको ऐसी शक्का हो गई थी कि कर्मकांडके संस्कारोंकी वासनासे कहीं आचार्यके भाष्यको भी ये कर्मपरक ही न सिद्ध कर दें? इसीकारण शिष्यम एडलीने उक्त वातका विरोध किया। यद्यपि आचार्य उनको वैसा नहीं समझते थे, वे सुरेश्वरके आशयको भलीभाँति जानते थे, तथापि शिष्योंके सन्तोषार्थ आचार्यने फिर उन्हें वेदान्तविषयपर स्वतन्त्र ग्रन्थ तथा वार्तिक लिखनेका आदेश दिया। गुरुकी आज्ञा मानकर सुरेश्वराचार्यजीने शारीरक भाष्यपर वृत्ति नहीं लिखी, किन्तु उपनिषद्भाष्यपर वार्तिक तथा यह अ्रन्थ लिखकर अद्वैत वेदान्तको पुष्ट तथा लोकप्रिय बनाया। तैत्तिरीयभाष्यवार्तिक, बृहदारएय- भाष्यवार्तिक, दक्षिणामूर्तिस्तोत्रवार्तिक, पञ्चीकरणवार्तिक, काशीमरणमोक्ष- विचार, नैष्कर्म्यसिद्धि प्रभृति ग्रन्थ इनकी विख्यात रचनाएँ हैं। इन विशाल वार्तिकोंकी रचनाके अनन्तर उन्होंने प्रस्तुत अ्रन्थ 'नैष्कर्म्य- सिद्धि' को लिखकर इसको आचार्यके सम्मुख उपस्थित किया। वेदान्तके

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इस अनुपम प्रकरण ग्रन्थको देखकर भगवान् शङ्कराचार्य उनकी विद्वत्तापर बहुत प्रसन्न और मुग्ध हुए। क्योंकि इस ग्रन्थमें उन्होंने आत्मविषयक समस्त विप्रतिपत्तियोंका युक्तिपूर्वक निराकरण करते हुए इसमें वेदान्त- दर्शनके मार्मिक रहस्यको गागरमें सागर जैसा भर दिया है। जिससे केवल एक इस पुस्तकका अनुशीलन करनेसे ही जिज्ञासुकी जिज्ञासा निवृत्त हो सकती है, अर्थात् प्रस्तुत पुस्तकका मनन करनेसे फिर आत्मज्ञानके विषयमें कोई भी संशय अवशिष्ट नहीं रह सकता। ग्रन्थके आरम्भमें ही ग्रन्थकारने जीवोंके समस्त दुखों का स्पष्ट निदान करके उनकी निवृत्तिका उपाय बतलाते हुए सांसारिक जीवोंको अखएड सुख और शान्तिका सन्देश दे दिया है। वे कहते हैं- तब्रह्मस्तम्बपर्यन्तैः सर्वप्राणिभिः सर्वप्रकारस्यापि दुःखस्य स्वरसत एव जिहासितत्वात् तन्निवृत्यर्था प्रवृत्तिरस्ति स्वरसत एव। दुःखस्य च देहोपादानैकहेतुत्वात्, देहस्य च पूर्वोपचितधर्माडधर्ममूलत्वादनु- च्छित्तिः। तयोश्च विहितप्रतिषिद्धकर्ममूलत्वादनिवृत्तिः, कर्मणश्च रागद्वेषास्पद- त्वाद्रागद्वेषयोश्च शोभनाशोभनाध्यासनिबन्धनत्वादध्यासस्य चाऽबिचारितसिद्धवस्तु- निमित्तत्वाद् द्वैतस्य च शुक्तिकारजतवत्सर्वस्यापि स्वतःसिद्धाSद्वितीयात्मानवबोध- मात्रोपाद/नत्वादव्यावृत्तिरतः सर्वानर्थहेतुरात्म।Sनवबोध एव।' (ब्रह्मासे लेकर छोटेसे-छोटे तृणपर्यन्त अर्थात् कीट पतङ्गपर्यन्त सब प्राणियोंको सब प्रकारके दुःखोंको छोड़नेकी इच्छा स्वाभाविक ही रहती है, इस- लिए उनको दूर करनेके निमित्त (प्राणियोंकी) चेष्टा भी स्वयमेव होती हैं। देहधारण करना ही दुःखका एकमात्र कारण है और देह पूर्वजन्ममें सञ्चित धर्माडधर्मसे उत्पन्न होता है, अतएव उनके उच्छेद हुए बिना, धर्म और अधर्मके निवृत्त हुए बिना, देहका उच्छेद नहीं हो सकता है। और जबतक विहित एवं प्रतिषिद्ध कर्मोंका आचरण होता रहता है, तब तक धर्माडधर्मकी भी निवृत्ति नहीं हो सकती है। कर्म राग-द्वेषमूलक हैं। राग- द्वेष विषयोंमें सुन्दरता और असुन्दरताबुद्धिरूप मिथ्याभ्रमसे उत्पन्न होते हैं। मिथ्याभ्रान्ति जिसकी सत्ता विचार न करने से ही है ऐसे द्वैत- वस्तुके कारण हुआ करती है और समस्त द्वैतका उपादान कारण, शुक्तिमें

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रजतभ्रमके समान, स्वयम्प्रकाश अद्वितीय आत्माका अज्ञान ही है। इस- लिए परम्परासे सब अनर्थोंका मूल कारण आत्माका अज्ञान ही है। अतएव उसकी निवृत्ति हुए बिना पूर्वोक्त दुःखादिसे छुटकारा नहीं हो सकता है।)

नमतस्तस्योच्छित्तावशेषपुरुषार्थपरिसमाप्तिः। अज्ञाननिवृत्तेश्र सभ्यग्ज्ञानस्वरूपलाम- मात्रहेतुत्वा त्तदुपादानम् अशेषाSनर्थहेत्वात्माSनवबोधविषयस्य चाऽनागमिकप्रत्यक्षा- दिलौकिकप्रमाणाविषयत्वाद्वेदान्तागमवाक्यादेव सम्यग्ज्ञानम्। अरप्रतोऽशेषवेदान्तसार- संग्रह प्रकर ण मिदमारभ्यते।' (पूर्वोक्त अज्ञान केवल अनर्थोका ही कारण है ऐसा नहीं, किन्तु उत्पत्ति और नाशसे रहित तथा कभी पराधीन न होनेवाला जो निर्विशेष आत्मस्वरूप सुख है, उसका भी वह आवरण करनेवाला है। इसलिए उसके नाश होनेसे ही सम्पूर्ण पुरुषार्थकी परिसमाप्ति अर्थात् कृतकृत्यता की प्राप्ति होती है। सम्यगज्ञानरूप आत्मसाक्षात्कार तत्त्वज्ञान) ही अज्ञानके नाशका एकमात्र कारण है। अतएव उसके अधिकारीको अन्य उपायोंका परित्याग करके उसका (तत्त्वज्ञानका) सम्पादन करना चाहिए। समस्त अनर्थोंके उत्पादक आत्मस्वरूपाज्ञानके चिषयका-आत्माका- साक्षात्कार अशास्त्रीय प्रत्यक्षादि लौकिक प्रमाणों द्वारा न हो सकने के कारण केवल एक वेदान्तशास्त्रके वाक्योंसे ही होता है। इसलिए समस्त वेदान्तके सारका सडग्रह करके यह प्रकरण प्रारम्भ किया जाता है।) अस्तु, प्रस्तुत पुस्तक अ्रन्थकारका सर्वोक्षम ग्रन्थ है। इसमें कई उद्धरण 'उपदेश-साहस्री' से उद्धत किए हैं। इसमें ३६ कारिकाएँ बृहदारएय- वार्तिककी हैं। इसमें अ्रन्थकारने मुक्तिका साधन ज्ञान है, या कर्म है, अथवा दोनोंका समुच्चय है, इस विषयका युक्तियुक्त समाधान करते हुए तीन प्रकारके समुच्चयवादका खए्डन किया है। और चार प्रकारसे अन्वयव्यतिरेक बतलाकर बड़े ही सरल और सु्पप्ट रीतिसे जीव और ब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन करते हुए अद्वैत सिद्धान्तको निःसन्दिग्ध सिद्ध किया है। और प्रस्तुत पुस्तकका नाम भी अन्वर्थक रक्खा गया है-इसका अर्थ है-'निर्गत

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( १x ) कर्म यस्मात् सः निष्कर्मा, निष्कमणो भावः नैष्कर्म्यम्, तस्य सिद्धिःनिश्चयः, अर्थात् सर्वकर्मसंन्यासपूर्वक ब्रह्मात्मावबोध। अथवा-निष्कर्म ब्रह्म, तद्विषयं विचारपरिनिष्पन्नं ज्ञानं नैष्कर्म्य तद्रपां सिद्धिम्, अर्थात् विचारजनित ब्रह्मविषयक ज्ञानकी सिद्धि। अस्तु, वेदान्तके प्रसिद्ध अनुपम अ्रन्थ 'संक्षेपशरीरक' के रचयिता श्री सर्वज्ञात्म मुनि इन्हीं सुरेश्वराचार्यजीके शिष्य थे। उन्होंने अपने ग्रन्थके प्रारंभमें ही आचार्य सुरेश्वरके चरणकमलोंकी वन्दना की है। प्रकृत ग्रन्थ तथा संक्षेपशारीरकके अनुशीलनसे तो ऐसा प्रतीत होता है कि सर्वज्ञात्म मुनिको प्रस्तुत ग्रन्थपर बहुत अधिक प्रेम रहा होगा और इसमें प्रतिपादित विषयको ही उन्होंने सुमनोहर पद्योंमें बद्ध करके 'संक्षेप-शारीरक' अ्न्थ लिखा। क्योंकि संक्षेप- शारीरकमें कई अंश इसीका छायानुवांद है। इस ग्रन्थपर मूलके अभिप्रायको स्पष्ट करनेवाली म० म० पं० श्री ज्ञानोत्तम मिश्र विरचित संस्कृत टीका है। प्रस्तुत अनुवाद उसीके आधार- पर किया है। इसके अतिरिक्त श्रीज्ञानामृत विरचित 'विद्यासुरभि' नामकी दूसरी टीका तथा श्रीचित्सुखाचार्य विरचित 'भावतत्वप्रकाशिका' नामकी एक तीसरी टीका भी इसपर है। प्रस्तुत. ग्रन्थका यथार्थ अनुवाद करना तो गुरुारम्परासे वेदान्त शास्त्रका ज्ञान सम्पादन किये हुए पुरुष धौरेयोंका ही काम था; मुझ सदृश अल्पज्ञ और अल्पमतिके लिए तो यह एक उपहासकी बात है। तथापि निष्कारणकरुण भगवान् शक्कर एवं प्रातः स्मरणीय सद्गुरुक्ी परम अनुकम्पासे प्रेरित होकर स्वान्तासुखाय प्रवृत्त होनेपर जैसा भी हो सका है, 'तत्कुरुष्व मदर्पणम्' के अनुसार वह सब उन्होंकी सेवामें समर्पित है। श्रीरस्तु ।

गोयनका संस्कृत महाविद्यालय, काशी विनीत- भाद्र कृष्ण १३ सं० २००७ प्रमवल्लभ त्रिपाठी

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श्रीः

वक्तारमासाद्य यमेव नित्या सरस्वती स्वार्थसमन्विताऽडसीत्। निरस्तदुस्तर्केकलङ्कपङ्का नमामि तं शङ्करमर्चिताज्घिम्।।

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मरडनमिश्र ही सुरेश्वराचार्य हैं

मएडनमिश्रजीके बारेमें पाश्चात्य और भारतीय विद्वानोंमें बड़ा मतभेद है। पाश्चात्य विद्वान् लोग भाषाविज्ञानके आधारसे कुछ इतिहासके बलसे कुछ ऐसे एक सिद्धान्तको मानकर उसीका समर्थन करनेके लिए कटिबद्ध हो जाते हैं, यह बात सर्वानुभवसिद्ध है। ये लोग मएडनमिश्र और सुरेश्वरा- चार्यजी, इन दोनोंको एक नहींमानते, किन्तु अलग-अलग मानते हैं। इसका पहला व्याख्याता मैसूर यूनीवर्सीटीके दर्शनका प्रधानाध्यापक है। उसने मंडनमिश्र और सुरेश्वराचार्यजी के ग्रन्थोंको आपाततः देखकर कुछ भाषाके भेदसें, कुछ प्रतिपाद्य विषयके भेदसे मण्डन और सुरेश्वर, इन दोनोंको भिन्न- भिन्न सिद्ध किया है। उसमें पहला कारण यह है कि "भगवान् शङ्कराचार्य अद्वैत सम्प्रदायके प्रवर्तक हैं। उन्होंने जीवन्मुक्तिको सिद्ध किया है। यह बात शाङ्करभाष्यादिमें प्रसिद्ध है। यदि मएडनमिश्र उनके शिष्य होते तो वे उस सिद्धान्तका खएडन कैसे करते? मए्डनमिश्रजीने ब्रह्मसिद्धिमें जीवन्मुक्तिका खंडन किया है। दूसरा कारण यह है कि अविद्याका आश्रय और विषय ब्रह्म है, यह शङ्कराचार्यजीका सिद्धान्त है और ब्रह्मसिद्धिमें मएडनमिश्रजीने अविद्याका विषय ब्रह्मको मानकर आश्रय जीवको माना है। इसी सिद्धान्तको भामतीकार श्रीवाचस्पतिजीने भी अपनाया है। यह बात वेदान्तियोंमें प्रसिद्ध है :-

'वाचस्पतिर्मएडनपृष्ठसेवी।' इत्यादि

इसी प्रकार कई श्रुतियोंके व्याख्यानमें मएडन और सुरेश्वराचार्य- जीमें अन्तर दीख पड़ता है।" इत्यादि इत्यादि आभास हेतुओंको देखकर अंग्रेजी भाषामें इस विषयको लिखा है। जिससे संस्कृतके विद्वान् लोग इसे न जानें, इसके ऊपर कुछ न कह सकें। इसीको आधारकरके महामहोपाध्याय पं० कुप्पुस्वामी शास्त्रीजीने भी ब्रह्मसिद्धिकी भूमिकामें यथाशक्ति उसी मतका समर्थन किया है। इसी

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बातको 'लकीरके फकीर' इस कहावतके अनुसार प्रायः सभी अंग्रेजीके शिक्षित मानते आ रहे हैं। पंडित बलदेव उपाध्यायजी एम्० ए०, साहित्याचार्य (प्रोफेसर बनारस हिन्दू-यूनीवर्सीटी) महोदयने भी इसी आधारको सामने रख कर अपनी 'शङ्कराचार्य' नामक पुस्तकमें मएडनमिश्र और सुरेश्वराचार्यजीको भिन्न-भिन्न सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है। यह सब संस्कृतभाषाका विशिष्ट अध्ययन न होना, किसी सम्प्रदाय- परम्परासे अध्ययन न करना तथा केवल अपनी बुद्धिसे ग्रन्थ लगा लेनेका ही फल है। यदि किसी देशके या किसी व्यक्तिके विषयमें हमें इतिहास लिखना है तो उस देशकी, उस समाजकी, स्थितिको देख अथवा सुनकर ही उस बातको सिद्ध करना चाहिए, अपने मनसे नहीं। इस बातको पाश्चात्य और भारतीय सभी विद्वान् लोग मानते हैं। ऋषि-महर्षियोंकी जन्भभूमि समस्त भूमएडलके आदर्श भारतवर्षमें जत्रसे मए्डनमिश्र हो गए हैं, तबसे आज तकका संस्कृत विद्वत्समाज, यहाँकी जनता, भगवान् शङ्कराचार्य- जीसे चलाया मठाम्नाय एवं तत्-तत् समयमें रचे गए विद्वानोंके शक्करदिग्वि- जयादि काव्य, इस बातको निर्विवाद पुष्ट करते हैं कि मडनमिश्र ही शङ्कराचार्यजीसे शास्त्रार्थ करके पराजित होनेके बाद उनके शिष्य बन कर सुरेश्वराचार्य नामसे प्रसिद्ध हुए। अस्तु, पाश्चात्य विद्वानोंने भारतीय सभ्यता और संस्कृतिपर यहाँकी जनताकी अनास्था और अरुचि होनेके लिए ऐसा ऐसा उत्पात मचा रखा है। उन लोगोंने संस्कृतके विद्वानोंको एक प्रकारसे अनपढ़ सिद्ध करनेके लिए प्रयत्न किए हैं और कर रहे हैं। परन्तु यह अनुचित है। संस्कृत विद्वानोंको आधुनिक वैज्ञानिक जगत्में प्रक्रियात्मक ज्ञान न होनेपर भी आजकलके विज्ञान-शास्त्रियों और दार्शनिकोंसे वे कई गुने बढ़े-चढ़े हैं, यह बात सर्वविदित है? जैसे आज विज्ञान-जगत्में श्रीजगदीशवसुको बड़ा मानते हैं। उन्होंने सारे जीवनको लगा कर स्थावरोंमें भी प्राणशक्ति है, इस बातको अमे-

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(३) रिकामें किसी विज्ञानशास्त्रियोंके अधिवेशनमें इन्जक्शन द्वारा सिद्ध करके दिखलाया है। तबसे वैदेशिक विद्वान भी स्थावरोंमें भी प्राणशक्ति है, यह मानने लगे हैं। परन्तु हमारे यहां तो मनुजीने, पहलेसे ही, जब कि आजका विज्ञान गर्भमें भी नहीं आया था, लिख रखा है कि- 'अन्तःसंज्ञा भवन्त्येते सुखदुःखसमन्विताः।' इस विषयमें अधिक कहना पिष्टपेषण है। प्रकृत विषयमें हमें कहना यह है कि हमने जहां तक इनके ग्रन्थोंका अध्ययन और मनन किया है, इससे स्पष्ट यही प्रतीत होता है कि पूर्वोक्त कारण सब हेत्वा- भास हैं। एक विद्वान् बाल्यावस्थामें किसी विषयको लेकर ग्रन्थ लिखता है। पीछे पठन-पाठन और विचारसे ज्ञानगरिमा होती है, तब उस समय पहले जो कुछ लिखा है, वह उसीको गलत मालूम पड़ता है। 'तत्त्वपक्ष- पातो हि घियां स्वभावः' ऐसा प्राचीनोंका कथन है। जैसे मीमांसामें शाबर भाष्यपर दो व्याख्याता बड़े बड़े हो गए हैं। कुमारिलभट्ट और प्रभाकरमिश्र। प्रभाकरमिश्र बड़े यौकतिक और प्रतिभा- शाली थे, इस विषयको कहना उनके अन्थोंका परिशीलन करनेवालोंके सामने भगवान् सूर्यको दीपदर्शन कराना है। उन्होंने शाबर भाष्यके ऊपर शब्द-सामर्थ्य तथा अर्थ-सामथ्यको लेकर दो प्रकारका व्याख्यान किया है। उन दोनोंका नाम है-(१) विवरण और (२) निबन्ध। जो विवरण आजकल बृहती नामसे प्रसिद्ध है। इस अभिप्रायको श्रीरामानुजा- चार्यजी प्रभाकर मतानुसारी 'तन्त्ररहस्य' नामक ग्रन्थमें लिखे हैं। 'शलोच्य शब्दबलमर्थबलं श्रुतीनां टीकाद्रयं व्यरचयद् बृहतीं च लध्वीम्।' इत्यादि। इन ग्रन्थोंमें बहुत सिद्धन्तोंमें अन्तर है। इसका विवेचन हम दूसरे समयमें करेंगे। इससे यह नहीं सिद्ध होता है कि प्रभाकर मिश्र दो थे। ज्ञानपरिपाकके मैदसे प्रतिपाद्य विषयोंमें भेद होता है, यह सर्वानुभव सिद्ध है। अप्पय्य दीक्षितजीको सभी जानते हैं। उन्होंने 'नयनमुखमालिका, इत्यादि तीन ग्रन्थ लिखे हैं। उनमेंसे एकमें अद्वैत सिद्धान्तका समर्थन,

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(४) दूसरेमें विशिष्टाद्वैत सम्प्रदायका समर्थन और तीसरेमें मध्वमतका समर्थन किया है। बादमें फिर इनका खंडन भी किया है। क्या इससे अप्पय्य- दीक्षित अनेक सिद्ध होते हैं ? 'व्याख्या बुद्धिबलापेक्ष।' यह कहावत है। अतः यह सब कहनेका अभिप्राय यह है कि अवस्थाके भेदसे मनुष्यका ज्ञान विकसित होता है और सङ्गके द्वारा भी सिद्धान्तमें परिवर्तन होता है। यद्यपि मएडनमिश्रजी गृहस्थाश्रममें कर्मकाएडके समर्थक और ज्ञानकाएडके कटटर विरोधी थे। परन्तु जब शक्कराचार्यजीसे शास्त्रार्थ हुआ तभीसे शक्कराचार्यजीके सिद्धान्तोंसे प्रभावित होकर वे उनके शिप्य बने, उनके अनुयायी और उनके सिद्धान्तोंके समर्थक हो गए। यह भी देखा जाता है कि हर एक विद्वान् किसी आचार्यके मतका अनुसरण करते हुए अपने अभिमत पक्षका भी ग्रन्थमें सन्निवेश कर देता है ? तावता वह अन्य सिद्धान्तका हो गया, यह नहीं कह सकते ! इस- लिए उपर्युक्त प्रमाणोंसे यही सिद्ध होता है कि मिथिलावासी-मएडनमिश्र ही संन्यास ग्रहण करनेके अनन्तर सुरेश्वराचार्य कहलाने लगे और श्रृंगेरी- मठमें पहले आचार्य हुए। उनकी समाधि भी शृङ्गेरी मठमें अब तक विद्यमान है। जैसे भारतवासी सब भारतके रहनेवाले नहीं, किन्तु बाहरसे आए हुए हैं, ऐसा वैदेशिक (पाश्चात्य) विद्वान् एवं तदनुयायी यहांके कुछ विद्वान् लिखते और कहते हैं। तथापि हम लोग बाहरके नहीं, यहीके हैं, यह हमारा दृढ़ विश्वास है। अतः मएडनमिश्र ही सुरेश्वराचार्य हैं, दूसरे नहीं। इस बातको जन- ताके सामने रखते हुए इस विषयका मैं उपसंहार करता हूँ। इसके विष- यमें हमारे पास बहुतसी सामती है। किसी अवसर पर निबन्धके रूपमें उसको प्रकाशित करेंगे।

-वेदान्तमीमांसाचार्यं श्री पं० सुबहरायशास्त्री (प्रो. सं० त्रि०, काशी हिन्दूयूनीवर्सीटी)

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बिषय-सूची

विषय श्लोक अधिकारीका उपपादन .. ... १ आत्माका अज्ञान ही सब अनर्थोंका मुख्य कारण है, यह कथन १

प्रस्तुत प्रकरणका विषयोपन्यास ...

प्रकरयासे प्रतिपाद्य चार विषयोंका (अ्रनर्थ, अनर्थहेतु, पुरुषार्थ और पुरुषार्थहेतुका) प्रतिपादन ... ...

IS ज्ञान ही मोक्षका साधन है, कर्म नहीं, यह प्रतिपादन ...

प्रतिज्ञात विषयकी पुष्टिके लिए पूर्वपक्ष-(ज्ञानको स्वीकार करते हुए) कर्म ही मोक्षका साधन है, यह कथन ... w ...

केवल ज्ञान विधिप्राप्त नहीं, यह प्रतिपाद्न .. ... १५ (ज्ञानको मुक्तिका साधन मानने०्र भी) केवल ज्ञान मुक्ति- का साधन नहीं, कर्मसमुच्चित ज्ञान ही मुक्तिका साधन है, यह कथन २० पूर्वपक्षका खएडन- .. २२ चारों प्रकारके कर्मफलसे मुक्ति नहीं (मुक्ति चारों प्रकारके कर्मका फल नहीं है) यह कथन ... २४ केवल आत्म ज्ञानसे ही मुक्ति होती है, यह निरूपण ... २६ ज्ञान (कर्मके समान अविद्याजन्य होनेपर भी) अज्ञानका निवर्तक कैसे हो सकता है, इस शङ्काका निराकरण -.. ३६ कर्म मुक्तिमें किस प्रकार उपयोगी है, यह प्रतिपादन ४५ कर्मानुष्ठानसे चित्तशुद्धि द्वारा वैराग्य ... ... ४७ बैराग्योच्तर सर्वकर्मसंन्यासका अधिकार .. ... ४६ इस तरह कर्म मुक्तिमें उपयोगी है यों उपसंहार ...

मुक्ति कर्मसे साध्य नहीं है, यह कथन ... ५३ कर्म और ज्ञानके समसमुच्चयका खएडन ... ...

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विषय श्ोक ज्ञान और कर्मके समुच्चयाभावमें अन्य कारणोंका निर्देश .. ६६ भेदाऽभेदवादीके मतमें भी ज्ञान-कमके समुच्चयका असंभव कथन ६६ कर्मवादियोंकी उक्तियोंका क्रमशः खएडन ...

विधिबोधित न होनेके कारण वेदान्त-वाक्योंका प्रामाएय नहीं हो सकता, इस शङ्काका खएडन ... בת

स्वतःसिद्ध आरत्मवस्तुमें अ्रपरविश्वास नहीं हो सकता आात्मामें कतृ त्व नहीं है ... हर आत्मामें भोक्तृत्व नहीं है ... ६४ देहाभिमानी पुरुषका ही कर्ममें अधिकार है, श्र्भेददर्शीका नहीं ...

ज्ञानसे ही मुक्ति होती है, इसका उपसंहार .·. हह

द्वितीय अध्याय

उत्थानिका (वक्यमाण अध्यायका तात्पर्य) ...

त्वंपदार्थका प्रतिपादन १ वाक्यके बिना ब्रह्मज्ञान नहीं हो सकता है, यह प्रतिपादन ४ देह आत्मा नहीं, यह कथन १६ भट्ट मीमांसकके मतका निराकरण २४ बौद्ध मतका निराकरण ३६ अहक्कारकी निवृत्तिसे अद्वैतभावकी सिद्धि ५३ लच्का वस्तुके स्वरूपका कथन ... ... ५७ बुद्धि ही परिणामिनी है, आत्मा नहीं ... ७० आत्मा ही समस्त बुद्धियोंका साक्षी है ... ... ७१-७५ आरत्मा कूटस्थ-अविकारी है ...

युक्तियों द्वारा बुद्धिका परिणामित्व और आत्माकी कूटस्थता वदान्तके सिद्धांतपर अपविश्वास असंभव ... ६३ सांख्य-सिद्धांतसे वेदान्त-सिद्धांतकी भिन्नता ...

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३)

विषय शोक आत्मा और अनात्माका इतरेतराध्यास ... ... १०१ तत्वदर्शनसे अरविद्याकी निवृत्ति ... ... १०३ इत रेतराध्यासके फलका उपसंहार ... .. १११

जड़वस्तु का मिथ्यात्व ... ११४ प्रपख्चके मिथ्यात्वका उपसंहार ... ... ११६ विद्याका फल और अध्यायका उपसंहार ... ... ११६

तृतीय अध्याय- इस अध्यायकी पूर्वाध्यायसे सङ्गति, वाक्यसे अरज्ञानकी निवृत्ति, १

वाक्यके व्याख्यानका उपक्रम, पद, पदार्थ और प्रत्यगात्माका सामानाधिकरएय, विशेषण बिशेष्यता और लक्ष्य लक्षण सम्बन्ध ज्ञानसाधनविषयिणी प्रवृत्ति विधिप्रयुक्त है ... ४

सांख्योंकी शंका और उसका समाधान उपायान्तरसे कैवल्यपक्षका निराकरण ... .. ७

लक््यलक्षणकी व्याख्या ... ... ११ परिणामी (अहंकार) और कूटस्थ (आत्मा) का लक्षण ... १६-१७ अज्ञानके कारण ही अहंकार और आत्माका सम्बन्ध है, वास्तविक नहीं, यह प्रतिपादन .. २० प्रतिबन्धकी निवृत्ति होनेपर ही वाक्य द्वाराआत्मज्ञान होता है २६ वाक्य अन्वय-व्यतिरेक द्वारा आत्माका प्रतिपादन करता है, इसकी पुष्टिके लिए श्रुतिका उदाहर .. ... ... ३६ तत्त्वमस्यादि वाक्यमें प्रत्यक्षादि विरोध नहीं है, इसका उपसंहार ४४ अतीन्द्रिय पदार्थमें अभिधाश्रति (तत्त्वमस्यादि वाक्य) का प्रामाएय प्रतिपादन .. ... .. .. ४७ उक्त युक्तियों द्वारा आत्माके प्रमाणान्तरागोचरत्वका निराकरण ५२ पूर्वाध्यायोक्त (आत्मज्ञानोपयोगी) अन्वयव्यतिरेकका पुनः संच्ेपसे वर्णन ... ... ५४ साङ्गथमतका उत्थापन और उसका समाधान .·. ... ५७

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( g )

विषय श्लोक त्वंपदार्थ तत्पदार्थ कैसे हो सकता है, इसका समाधान ... ७K तत् और त्वं पदकी अखएड-एकरसाथनिष्ठता ... ७६ त्वंपदमें प्रतीत अहंकार और तत्पदमें प्रतीत परोक्षता- की हेयता .. ... ... ७७

तदर्थ त्वमर्थसे अभिन्न होकर अविद्यासे उत्पन्न द्वितीयताका निराकरण कैसे करता है, ऐसी शङ्का और समाधान ... ७६

तत्-त्वंपदके लक्षणा द्वारा त्रखंड-आत्माके बोधनमें प्रत्य- क्षादिका अविरोध ... ८१ 'तत्वमसि' आरदि वाक्य उपासनापरक नहीं हैं दष्टान्त द्वारा वाक्य और प्रत्यक्षका परस्र अविरोध ८४

शब्दादि प्रमाणोंका स्वतःप्रामाएय ८६ उपासना और कर्मफल स्थायी नहीं है .. ... ६३ अहंवृत्तिसे आत्मा लच्षित होता है ... ६७ शब्द गौणीवृत्तिसे आरत्माका बोध कराता है, मुख्यसे नहीं १०२-१०४ शब्द अपने अर्थसे सम्बन्धित हुए बिना कैसे उसका बोध करा सकता है इसमें दृष्टान्त- ... .. १०५ आत्मा अज्ञान और ज्ञानका आश्रय होनेसे विकारी नहीं है ... ... १०७ श्रुति और आचार्य द्वारा आत्मबोध होनेमें शङ्का-समाधान १०८ आत्मामें अज्ञान स्थिर नहीं है ११० अविद्याकी घृष्टता ... १११ आत्मामें किसी प्रकार भी अविद्याकी संभावना नहीं है ११२ (अन्वय व्यतिरेक रूप) अनुमानसे युक्त वाक्य द्वारा अविद्याकी निवृत्ति ... ... .. ११३ अज्ञाननिद्रामें प्रसुप्त जीवको श्रुति ही जगा सकती है ... ११५ वाक्यसे अन्य प्रमाण द्वारा आत्मज्ञान असंभव .. वेदन्तोंके उपासनापरक होनेमें शङ्कासमाधान ११७ .. १२३

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विषय श्लोक प्रसंख्यान विधिके अस्वीकारमें दोषकी आरपशङ्का और उसका समाधान ... .. .. १२६ चतुर्थ अध्याय पुनरुक्तिका परिहार ... ...

आत्मासे ही अनात्माकी सिद्धि .. ... 3 देहेन्द्रियादिमें आरत्मसंशय ... ४

वाक्य द्वारा ही आत्माका ज्ञान होता है, यह कथन ... ७

वाक्यार्थज्ञानमें क्रमका निरूपण ..

स्वयंप्रकाशका साक्षात्कार न होनेमें कारण १० भौतिकी दृष्टिसे आरत्मज्ञान असंभव .. ११ विवेकका आधार बुद्धि .. ... ... १४ प्रत्यक्षादिसे अरगम्य ब्रह्मका परिज्ञान केवल श्रतिप्रमाणसे. उक्त-विषयमें आचार्यकी उक्ति ... १६ उपदेश साहस्रीका पूर्वपक्ष और उत्तर ... २० अन्वय-व्यतिरेक द्वारा पद-पदार्थके ज्ञानमें आचार्यकी सम्मति २२ वाक्यकी एकत्वप्रतिपादकतामें,आचार्यकी सम्मति ... २४ प्रकारान्तरसे आचार्योक्त अन्वय-व्यतिरेक ... २६ प्रकृत विषयकी पुष्टिमें आरचार्यकी उक्ति ... ३१ विवेकीको आत्मज्ञान होता है, इस विषयमें आचार्यकी उक्तिका प्रामाएय ... ... ... ... ३४ ज्ञानके साधन श्रुति आचार्यादि आत्मासे अभिन्न हैं, यह कथन ३७-३७ ब्रह्मज्ञान प्रपस्से भिन्न है, या अभिन्न, इसका निर्णय ... ३८ पूर्वोक्त विषयमें कारण निर्देश .. ३६ अविद्याकी निवृत्तिके लिए वाक्यकी आवश्यकत्ाका प्रतिपादन ४० पूर्वोक्तविषयकी पुष्टिमें उदाहरस ... ४१ तुरीयपद्की प्राप्ति कब होती है, यह कथन ... ४२ उपदेशसाहस्रीका उदाहरण ... ... ४३

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नैष्कर्मर्यसिद्धि

आाब्रह्म स्तम्बपर्थन्तैः सर्वप्रासिसिः सर्वप्रकारस्यापि दुःखस्य स्वरसत एव जिहासितत्वात् तन्निवृत्यर्था प्रवृत्तिरस्ति स्वरसत एव। व्रह्म।से लेकर छोटेसे-छोटे तृषपर्यन्त अर्थात कीटपतङ्ग पर्यन्त सब्र प्राणियोंमें सय प्रकारके दुःखोंको छोड़नेकी इच्छा स्वमावतः ही रहनी है, इसलिए उनको दूर करनेके निमित्त (प्राषियोंकी) चेटा भी स्वयमेत्र होती है। दुःखस्य च देहोपादानैकहेतुत्वात्, देहस्य च पूर्वोपचितधर्माऽ- धर्ममूलत्वादनुच्छित्तिः। तयोश्र विहितप्रतिपिद्धकर्ममूलत्वादनिवृत्तिः, कर्मसाश् रागद्वेषास्पदत्वाद्रागद्वषयोश् शोभनाशोभनाध्यासनिबन्धनत्वाद- व्यासस्य चाऽविचारितसिद्धद्वैतवस्तुनिमित्तत्वात्, द्वैनस्य च शुक्तिका-

वृत्तिरतः सर्वानर्थहेतुरात्माऽनवबोध एव। देह धारण करना ही दुःखका एकमात्र कारण है और देह पूर्वजन्ममें सच्चित धर्माधर्मसे उत्पन्न होता है, अतएव उनका उच्छेद हुए बिना, धर्म और अधर्मके निवृत्त हुए बिना, देहका उच्छेर नहीं हो सकता। और जवतक विहित एवं ग्रतिषिद्ध कर्मोंका आचरण होता रहता है, तबतक धर्म और त्रधर्मकी भीं निवृत्ति नहीं हो सकती। कर्म राग-देषनूलक हैं। राग-द्वेप विषयोंमें सुन्दरता और अमुन्दरता बुद्धिरूप मिश्या- भ्रमसे उत्पन्न होते हैं। मिथ्याभ्रान्ति जिसकी सत्ता विचार न करनेसे ही है ऐसे द्वतवस्तुके कारण हुआ्रा करती है और समस्त द्वैतका उपादान कारण, शुक्तिमें रजतभ्रमके समान, स्वयम्प्रकाश अप्द्वितीय आ्र्प्रात्माका अ्र्ज्ञान ही है। इसलिए परम्परासे सब अ्रनर्थीका

१ यहाँ ग्रन्थकारने 'तन्निवृत्त्यर्था प्रवृत्तिरस्ति स्वरसत एव' इससे यह सूचित किया है कि समस्न दुवोंकी निवृत्ति चाहनेवाला पुरुप इसका अ्र्पधिकारी है। 'दुग्वस्य' इत्यादिसे 'अशेष पुरुषार्थपरिसमातिः' इत्यन्त ग्रन्थके द्वारा यह सूचित किया है कि- दुःखकी आत्यन्तिक निवृत्ति ही इसका प्रयोजन है और वह आत्मज्ञानसे व्यत्तिरिक्त अन्य साधनोंसे तसाध्य है। २ यहाँ "आत्मनः विषयभूतस्य, आत्मनि आ्रश्रयभूते" ऐसा अर्थ करना चाहिए। क्योंकि अविद्याका आश्रय और विष्य शुद्ध चैतन्य ही है, जैसा कि संक्षेप- शारीरकमें कहा गया है- आाश्रयत्त्रविषयत्वभागिनी निर्विभागचितिरेव केवला। पूर्वसिद्धतमसो हि पश्चिमो नाश्रयो भवति नापि गोचरः ॥ और इस अध्यायके ७वें श्रोकमें भी यह बात कही गई है।

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भापानुवादसहिता ३

मूल कारण आत्माका अ्रज्ञान ही है। अतएव उसकी निवृत्ति हुए बिना पूर्वोक्त दुःादिसे छुटकारा नहीं हो सकता।

धविपयस्य चाऽनागमिकुप्रत्यक्षादिलौ किकप्रमाणाविपयत्वाद्व दान्तागमवा- क्यादेव सम्यग्ज्ञानम्। अतोऽशेपवेदान्तसारसंग्रह2प्रकरणमिदमारभ्एते। पूर्वोक्त अज्ञान केवल अनर्थोंका हो कार है, ऐसा ही नहीं, किन्तु उत्पत्ति और नारासे रहित तथा कभी पराधीन न होनेवाला जो आत्मस्वरूप सुख है, उसका भी वह आवरण करदेनेवाला है। इसलिए उसका नाश होनेसे ही सम्पूर्ण पुरुषार्थकी परिसमाति अर्थात् कृतकृत्यता प्राप्त होती है। सम्यग् ज्ञानरूप आ्र्प्रात्मसाक्षात्कार ( त्त्त्वज्ञान) ही अ्रज्ञानके नाशका एकमात्र कारण है। अतएव उसके अधिकारीको अन्य उपायोंका परित्याग करके उसका (तत्वज्ञानका) सम्पादन करना चाहिए। समस्त अनर्थोंके उत्पादक आ्त्मस्वरूपाज्ञानके विष्रयका-आत्माका-पाक्ात्कार अरश्यास्त्रीय प्रत्यक्षादि लौकिक प्रमाणों द्वारा न हो सकनेके कारण केवल एक वेदान्तशास्त्रके वाक्योसे ही होता है। एतदर्थ समस्त वेदान्तके सारका संग्रह करके यह प्रंकरण प्रारम्भ किया जाता है। तत्राऽभिलपितार्थप्रचयाय प्रकरणार्थसंसूत्रणाय चायमादः श्रोक :- उसमें अभिलषित अर्थ-(शिष्यपरम्परा द्वारा शिष्ट पुरुषोंमें) प्रकरण के प्रचार एवं प्रकरणार्थका-विषय और प्रयोजनका-संक्षेपसे सूचन करने के लिए इष्टदेवता नमस्काररूप मङ्गलाचरण इस प्रथम श्लोकसे करते हैं- खाऽनिलाऽग्न्यब्धरत्यन्तं सक्फणीवोद्गतं यतः। ध्वान्तच्छिदे' नमस्तस्मै हरये बुद्धिसाकियो । १।। १ तस्य सुग्वात्मनोऽनववोधः पिधानमावरणम् सुखाप्रतीत्या विपरीतप्रतीतिहेतुः । २ शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यानतरे स्थितम्। आरहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चितः ॥ अर्थातू-जो शास्त्रके एकदेशसे सम्वन्धित हो और शा्त्रके कार्यान्तरमें स्थित हो, ऐसे ग्रन्थभेदको विद्वान् लोग प्रकरण कहते हैं। ३ 'प्रकरार्थसंसूचनाय' ऐसा भी पाठ है। ४ 'ध्वान्तच्छिदे' इसके द्वारा अज्ञाननिवृत्तिरूप प्रयोजन कहा गया है। ५ 'हरये बुद्धिसाचिणे' इस सामानाधिकरएयसे प्रत्यगात्मा (जीव) औरपर परमात्मा (ब्रह्म ) का एकत्वरूप विषय द्योनिति किया गया है।

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नैष्कर्भ्यसिद्धि:

मालामें सर्पकी भाँति जिसमें आरकाश; वायु, तेज, जल और पृथिवी आदिरूप जगत् का प्रतिभास (अज्ञानसे ) हुआ है तथा जो अज्ञानरूप अन्धकारको दूर करनेबाल। और बुद्धिका साक्षी है, उस परमात्माको नमस्कर है॥ १॥ स्वसम्प्रदायस्य चोदितप्रमाणपूर्वकत्वज्ञापनाय विशिष्टगुणसङ्की- र्तनपूर्विका गुरोर्नमस्कारस्क्रिया। सद्विद्योपदेशरूप अपरपने सम्प्रदायको पूर्वीक्त शास्त्रमूलक बतलानेके लिए आरचाय (भगवान् श्रीशङ्गराचार्यके) उत्कृष्टगुणोंका कीर्तन करते हुए उनको प्रणाम करते हैं- अलच्धाऽतिशयं यस्माद् व्याव्ृत्तास्तमनादयः । गरीयसे नमस्तस्मा अविद्याग्रन्थिभेदिने॥ २॥ जिस गुरुवरके अतिरिक्त कहीं भी उत्कर्षताको न पाकर तमप् आरदि उत्कर्षवाचक शब्द (अन्यत्र कहीं स्थान न मिलनेसे) केवल उन्हीं में रहते हैं। और जो शिष्योंकी अरविद्या-ग्रन्थिके भेदन करनेमें अतीव समर्थ एवं सबसे श्रेष्ठ हैं उन श्रीगुरुवर (भगवान् श्रीशङ्कराचार्य) को हमारा प्रणाम है। नमस्कारनिमित्तस्वाशयाविष्करणार्थः१- जिस अभिप्रायसे गुरुको प्रमाण किया, उसे प्रकाशित करनेके लिए अग्रिम श्लोकसे कहते हैं- वेदान्तोदरसंगूढं संसारोत्सारि वस्तुगम्। ज्ञानं व्याकृतमप्यन्यैर्वक्ष्ये गुर्वनुशिक्षया॥ ३॥ जो (ज्ञान) वेदान्तशास्त्रोंके तन्दर अत्यन्त गूढ़ है, जिसको स्थूलबुद्धिवाले लोग नहीं जान सकते और जो अविष्ठानभूत ब्रह्मको विषय करके सम्पूर्ण संसारका बाधकर देता है, उस विज्ञानका वर्णन यद्यपि अरन्य विद्वानोंने अरनेक प्रकारसे किया है, तथापि श्रीगुरुकी आराज्ञाका पालन करनेके लिए मैं उसका स्पष्ट रूपसे वर्णन करता हूँ॥ ३॥ किविषयं प्रकरणमिति चेदुपन्यास :- इस प्रकरणमें किस विषयका प्रतिपादन किया जायगा? इस बातका वर्णन अग्रिम श्लोकसे करते हैं-

१ 'स्वाशयाविष्करणार्थम्' भी पाठं है। २ ज्ञानम्-ज्ञायते अ्रनेन इति ज्ञानम्-प्रकरणम् 'ज्ञानं वदये' इत्यत्र वाक्य- प्रयोगानुकूलव्यावारो वचघातोरर्थः । जनकत्वं द्वितीयार्थः । ततोऽन्वयः ।

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भाषानुवादसहिता

यन्सिद्धाविदम: सिद्धिर्यदसिद्धौ न किश्चन । प्रत्यग्धर्मेकनिष्ठस्य याथात्म्यं वक्ष्यते स्फुटम् ॥४ ॥ जिस चैतन्यरूप ब्रह्मके अन्तःकरण आररदिमें प्रतिब्िम्बितं होनेसे इदम् पदार्थ- प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि जड़ जगत्की सिद्धि (रफुरण) होती है और जिस के प्रतित्निम्बित न होनेसे सिद्धि नहीं होती, उस ब्रह्मतत्त्वका यथार्थ स्वरूप इस ग्रन्थमें स्पष्ट रीतिसे वर्णन किया जाता है॥ ४ ॥ विवक्षित प्रकर सार्थ प्ररोच नायानुक्त दुरुक्त्ताप्रामाखयकारपाशङ्गाव्युदा- सेन स्वगुरो: प्रामाएयवर्णानम्- इस प्रकरणमें प्रतिपाद् विषयपर मुमुत्तुओंकी श्रद्धा उत्पन्न करानेके लिए "यह विषय गुरुजीने नहीं कहा, या कहा भी हो तो यह सुन्दर कथन नहीं है, इसलिए अप्र- माग है।" इत्यादि शङ्कात्ररंको दूर करते हुए उक्त विषयमें अपने गुरुका प्रामाएय वर्णन करते हैं- गुरूक्तो वेदराद्वान्तस्तत्र नो वच्म्यशक्तितः । सहस्रकिरणव्याप्त खद्योतः किं प्रकाशयेत्॥ ५ ॥ श्रोगुरुने जिस वेदसिद्धान्तका वर्णन किया है, उस पर मैं कह ही क्या सकता हूँ, क्योंकि उनके प्रतिपादित विषयोंमें कुछ अधिक कहनेकी शक्ति मुझमें है नहीं। भला भगवान् सूर्य अपनी प्रखर किरणोंसे जिस देशको प्रकाशित कर रहे हों, वहाँ बेचारा खद्योत किसको प्रकाशित कर सकता है ॥ ५ ॥ गुरुशौव वेदार्थस्य परिसमापितत्वात्प्रकरणोक्तौ ख्यात्याद्यप्रामा- एयकारणाशङ्कृति चेत्तदयुदासार्थमुपन्यास :- जब गुरुजीने ही समस्त वेदार्थका व्याख्यान भलीभाँति कर दिया है, तब इस नूतन ग्रन्थकी रचनासे आर््रपका अ्र्प्रभिप्राय ज्ञात होता है लोगोंमें प्रतिष्ठा अ्रथवा धन आरादि प्राप्त करनेका है, यदि आर्रप इसी इच्छासे ग्रन्थका निर्माण करते हैं तो यह अ्रप्रा- माणिक है, इत्यादि शङ्गात्रंका निरास करनेके लिए अग्रिम श्रोकसे कहते हैं -- न ख्यातिलाभपूजार्थ ग्रन्थोऽस्माभिरुदीरयते। स्वबोधपरिशुद्धचर्थ ब्रह्मविन्निकषाश्मसु ॥ ६॥

१ यस्य सद्रपस्यात्मनः सिद्धौ सत्तास्फूर्तिरूपेण सच्वे घटादेर्द्टश्यस्यापि सत्वेन व्यवहारः। यदसिद्वौ न किंचन। अध्यस्तस्याधिष्ठानसत्तातिरिक्तसत्ताऽनङ्गीकारात्। २ प्रत्यग्धर्मेकनिष्ठस्य =जीवस्य। ३ सहस्रकिरणव्याप्े 'आ्काशे' इति शेषः।

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कीर्ति, धन या सत्कार प्राप्तिके लिए हम इस ग्रन्थका निर्माख नहीं करते। किन्तु जैसे सुधर्ाकार सुवर्सकी परीक्षाके लिए उसे कसौटीपर घिसता है, वैसे ही श्रीगुरु-कृपासे हमें जो ज्ञान प्राप्त हुआ है, उसमें अभी कु भ्रान्तिरूप मलका सम्पर्क तो नहीं है? इसकी परीक्षाके लिए ब्रह्मवेतातोंके सामने अपने ज्ञानको उपस्थित करनेके निमित्त यह प्रयल्न किया जाता है। क्योंकि वे लोग ज्ञानरूप स्वर्णकी परीक्षा करनेमें कमौटीके समान है॥६॥

  • अनर्थ, अनर्थका कारस, पुरुषार्थ और पुरुषार्थका कारस, इन चार निपयोंका वर्णान इस ग्रन्थमें किया जायगा। इस बातको सूचित करनेके लिए संक्षेपसे उन चिपयों- का स्वरूप वर्णन करते हैं -- ऐकात्म्याऽप्रतिपत्तिर्या स्वात्मानुभवसंश्रया। साऽविद्या संसृतेर्बीजं तन्नाशो मुक्तिरात्मनः ॥७॥। 'आत्मा एक अद्वितीय है' ऐसा न जानकर 'यह नाना एवं सुख् दुःाहि द्वन्द्वोसे सुन, है' ऐसा विपरीत समझना ही जिसका स्वरूप है और ज्ञानस्वरूप आ्र्प्रात्माह्टी केवल जिसका आश्रय है, वही त्रवद्या समस्त संसारकी जननी है उसीका नाश आ्रत्माकी मुक्ति है॥३।। पुरुषार्थहेतोरवशिष्टत्वात्तदभिव्याहार :- पूर्वोंक्त चार विषयोमें तीनका कथन हो चुका अवशिष्ट पुरुपार्थ हेतु-तत्त्वज़ान- का वर्णन करते हैं-

3दन्दहीत्यात्मनो मोहं न कर्माऽप्रतिकूलतः ॥ ८ ॥ वेदान्तवाक्योंसे उत्पन्न ह्ुआ त्त्वज्ञानरूप अभि आत्माके आश्ित अज्ञानको एक दम भस्म कर देता है। परन्तु विरोधी न होनेके कारण कर्म उसका (अ्ज्ञानका) नाश नहीं कर सकता ॥८ ॥ प्रतिज्ञातार्थसंशुद्धचर्थ पूर्वपन्ोक्तिः। तत्र ज्ञानमभ्युपगम्य तावदु- पन्यास :- अनर्थ-संसार, अनर्थका कारए-अविद्या, पुरुषार्थ-अविद्याका नाशरूप मोक्ष, पुरुषार्थका कारण-तत्वज्ञान। १ 'मुक्तिस्तन्नाश आर्प्रात्मनः' भी पाठ है। २ ज्ञानागि: सर्वकर्माि भस्मसात् कुरुते तथा। ३ दन्दहीति = समूलघातं हन्ति, ऐकान्तिकात्यन्तिकोच्छेदं करोतीति यावत्। ४ 'विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निररयः, इस न्यायसे ज्ञान ही मुक्तिका सांधन है, कर्म नहीं, इस प्रतिज्ञात विपयकी दृढ़ताके लिए पूर्वपक्ष किया गया है।

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भाषानुवादसहिता ७

(पूर्वश्रोकमें प्रतिज्ञा की गई कि ज्ञान ही मुक्तिका साधन है, कर्म नहीं)। अब इस प्रतिज्ञात अर्थकी दढ़ताके लिए पूर्वपक्ष किया जाता है। यहाँ पर प्रथम कर्मवादी लोग ब्रह्मज्ञानको स्वीकार करके भी मुक्तिप्रापिमें उसे अनावश्यक कहते हुए कर्भ ही को मुक्तिका साधन सिद्ध करते हैं- मुक्तेः क्रियाभि: सिद्धत्वाज्ज्ञानं तत्र करोति किम्। कथं चेच्छणु तत्सर्वं प्रसिधाय मनो यथा। ९॥ केवल कमोंसे ही मोक्ष सिद्ध हो सकता है, तो फिर मोक्षकी प्रापिमें ज्ञानकी क्या आवश्यकता है ? यदि अनित्य कर्म मोक्षकी सिद्धि कैसे कर सकता है? ऐसी श्ङ्का हो तो उस प्रकारको सावधान होकर एकाग्रचित्तसे सुनिए ? ॥ ६ ॥ अकुर्वतः क्रियाः कोम्या निषिद्धास्त्यजतस्तथा। नित्यं नैमित्तिकं कर्म विधिवच्चानुतिष्ठतः।१० ।। जो पुरुष काम्य कर्मोंको न करते, निषिद्ध कमें को सवथा त्यागते नित्य-नैमित्तिक कर्मोंका विधिपूर्वक अनुष्ठान करता है, वह (स्वरूप स्थितिके प्रतिब्न्धक सम्पूर्ण कर्मोंका नाश होनेके कारण) स्वस्वरूपमें स्थितिरूप मोक्षको (ज्ञानकी सहायताके बिना ही) प्राप्त होता है। किमतो भवति ? शङ्का-इस प्रकार काम्य कर्मोंके न करने तथा निषिद्ध कर्मोंका त्याग करनेसे क्या होता है ? काम्यकर्मफलं तस्माइवादीमं न ढौकते। निषिद्िस्य निरस्तत्वान्नारकीं नैत्यधोगतिम् ॥ ११ ॥ उत्तर-काम्य कमोंके न करनेसे देवादिभाव और निषिद्ध कर्मोके त्यागसे नरक सम्बन्धिनी अधोगति उस पुरुषको नहीं प्राप्त होती ॥ ११ । देहारम्भकयोश धर्म्मधि्म्मयोर्ानिना सह कर्मिणः समांनौ चोद्परिहारौ। जिन धर्माडधर्मोने वर्तमान देहको उत्पन्न किया है, उनके विषयमें तो ज्ञानवादियोंके साथ कर्मवादियोंका शङ्का-समाधान एक समान ही है। क्योंकि- वर्तमानमिदं याभ्यां शरीरं सुखदुःखदम्। आरब्धं पुएयपापाभ्यां भोगादेव तयोः चयः ॥ १२॥

१ मुक्तिर्भवतीति शेषः ।

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नैष्कमर्यसिद्धि: 15

ज़िन पुए और पानोंने सुख और दुःख देनेवाला यह शरीर उत्पन्न किय। है, उना तो भोगनेसे ही क्षय होता है (ज्ञानवादी भी इसी सिद्धान्तपर आरूढ़ हैं) ॥१२॥

निरासस्य सिद्धत्वात् किं नित्यानुष्ठानेनेति चेत्, तन्न; तदकरणाद- प्यानर्थक्यप्रसक्त: । शङ्का-यह संसार काम्य तथा निषिद्ध कर्मोंका ही फल है, अतएव उनकी निवृत्तिसे ही सब अनर्थोंकी निवृत्ति होगी। फिर नित्य करमोंके तरनुष्ठानसे क्या प्रयोजन है? उत्तर-ऐसी शङ्का मत कीजिए। क्योंकि नित्यकमोके न करनेसे भी अनर्थका कारखपाप उत्पन्न होता है। नित्यानुष्ठानतश्चैनं प्रत्यवायो न संस्पृशेत्। अनादृत्यात्मविज्ञानमतः कर्मासि संश्रयेत् ॥ १३ ॥ अरतएव नित्यकमोका आ्र्प्राचरण करनेसे त्र्प्रधिकारी पुरुषको ( नित्यकर्मोंके न करनेसे उत्पन्न होनेवाला) पाप नहीं लगता। इसलिए (मोक्षप्रापिके लिए) आ्त्मज्ञानका आदर न करके कमोंका ही आश्रय लेना चाहिए।। १३।। अभ्युपेत्यैवमुच्यते न तु. यथावस्थितात्मवस्तुविषयं ज्ञानमस्ति, तत्प्रतिपादकप्रमाणाभावात् । यहां तक तो कर्मवादियोंने ब्रह्मज्ञानको २स्वीकार करके ही उसको मुक्ति-प्राप्तिमें अनावश्यक सिद्ध किया। अब वे लोग कहते हैं कि 'वास्तवमें स्व्रतःसिद्ध आत्मवस्तुका ज्ञान कोई चीज़ ही नहीं है, क्योंकि उसकी सिद्धिमं कोई प्रमाख नहीं मिलता। जैसे कि- याव त्यश्रेह विद्यन्ते श्रुतयः स्मृतिभिः सह। विदधत्युरुयत्नेन कर्माडतो भूरिसाधनम्॥ १४ ॥ जितनी श्रुति और स्मृतियाँ हैं वे सभी बड़ी तत्पर होकर कर्मका विधान करती हैं, इसलिए कर्म ही मोक्ष प्राप्तिका पर्याप्त साधन है। स्यात्प्रमाणासम्भवो भवदपराधादिति चेतु, तन्न; यतः- वेदान्त वाक्य तो "ज्ञान ही मुक्तिका साधन है, ऐमा प्रतिपादन करते हैं, परन्तु

१'अकुर्वन् विहतं कर्म निन्दितं च समाचरन्। प्रपक्तश्चेन्द्रियायेंयु प्रायश्चित्तीयते नरः ॥' (म० स्मृ० )। २ 'तमेव विदित्वाSतिमृत्युमेति नाडन्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' इस श्रुतिके अ्र्प्रनुसार। ३ यावन्त्यः, भी पाठ है।

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भाषानुवादसहिता

आररप उन वाक्योंका तात्पर्य न समझ कर ही ज्ञानमें प्रमाणोंका अ्रभाव बतलाते हो" ऐसी शङ्का यवि कीजिए तो वह ठीक नहीं। क्योंकि- यत्नतो वीक्षमाणोऽपि विधिं ज्ञानस्य न क्वचित्। श्रुतौ स्मृतौ वा पश्यामि विश्वासो नाऽन्यतोडस्ति न: ॥१५॥ बड़े प्रयत्नपूर्वक अप्रन्वेषए करनेपर भी श्रुनियों औ्र स्मृतियोंमें [ मुक्ति-प्राप्तिके लिए] जानका विधान हमें कहीं दृष्टिगोचर नहीं होना। और श्रुति-्मृतियोंको छोड़कर अन्यत्र तो हम लोगोंको कहीं विश्वास है नहीं। स्वात्प्रवृत्तिरन्तरेणाऽपि विधिं लोकवदिति चेत्, तन्न; यतः- यदि ऐमा शङ्का हो कि "जैसे भोजनादि कृत्योंमें शास्त्रीय विधिके बिना रागसे ही, सर्वसाधारणकी प्रवृत्ति होती है। वैसे ही ज्ञानसे अ्र्परज्ञानकी निवृत्ति अ्रनुनव-सिद्ध है। तब शास्त्रीय विधिके न होनेपर भी उसमें प्रवृत्ति हो सकती है" तो यह भी उचित नहीं, क्योंकि [यदि त्रज्ञाननिवृत्तिरूप मोक्ष दृष्टकल होता, तब तो यह शङ्का उचित थी, परन्तु वह तो देहपातके अनन्तर होनेवाले कर्मफलके समान अदपरूप है। अतएव शास्तविधानके बरिना ज्ञान उसका साधन नहीं माना जा सकता।] अन्तरेण विधिं मोहाद्यः कुर्यात्साम्परायिकम्। न स्यात्तदुपकाराय भम्मनीव हुतं हविः ॥ १६॥ शास्त्रविधानके बिना ही मोहवश यदि कोई अष्टार्थक-पारलौकिक कर्म करना है, तो उसका वह कृत्य भम्ममें दी हुई तहुतिके समान निग्थक है ॥ १६ ॥

पूर्वाक्त मन्तव्य केवल युक्तियोंसे ही सिट्ट होता है, ऐसी बात नहीं, किन्तु सम्पूर्र आस्तिक लोग जिनको प्रामाशिक मानते हैं और जो सभी वेदार्थ-ज्ञानाओंमें श्रेष्ठ हैं, वह महर्ि जैमिनि भी यही कहते हैं। आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमितोऽन्यथा। इति साटोपमाहोचैर्वेदविज्जैमिनिः म्वयम् ॥ १७॥ "सम्प्ररा वेढ क्मोंका प्रतिपादन करते हैं। इसलिए जो वेदभाग इससे विनरीत है, वह निरर्थक है।" इस प्रकार वदोंके तात्पर्यका जाननेवाले मर्ि जैमिनिजीने भी अपने "आम्नायम्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानां तस्मादनित्यमुच्यते" (मी०सू०१।२।१) इस सूत्रमें बड़े प्रयन्नपूर्वक समस्त वेदको कर्मका ही विधायक माना है ॥ १७ ॥ मन्त्रवणाच। वेदके मन्त्रसे भी यही बात सिद्ध होती है। २

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नैष्कर्म्यसिद्धि:

"कुर्वन्नेवेह कर्मासि जिजीविषेच्छतं समाः।" इति मन्त्रोऽपि निःशेषं कमाियायुरवासृजत् ॥ १८ ।। "कर्म करता हुआ ही साधक अपनी आयु व्यतीत करनेकी इच्छा करे" इस प्रकार अध्यात्म-प्रकरणमें पठित यह वेदमन्त्र भी सम्पूर्ण आयुको कर्म करनेमें ही नियुक्त करता है ॥ १८ ॥ ज्ञानिनश्च वस्तुनि वाक्यप्रामाएयाम्युपगमाद् वाक्यम्य च क्रिया- पदप्रधानत्वात्ततश्चाभि्र तज्ञानाभाव :- ज्ञानवादियोंके मतमें भी ब्रह्मरूप सिद्ध वस्तुमें वाक्य ही प्रमाण है औ्रर वाक्य क्रियापदके बिना लोकमें अर्थका बोधक नहीं दीग्व पड़ता। इसलिए वाक्यमें क्रियापदको ही प्रधान मानना चाहिए। यदि वह् प्रधान है तो वह क्रियाका ही प्रति- पादक है। इस प्रकार वाक्यका सम्बन्ध क्रियामे न रगकर उससे केवल जो व्रह्मज्ञान त्र्भि- प्रेत है, वह् कैसे हो सकता है ? क्योंकि विरहय्य क्रियां नैव संहन्यन्ते पदान्याप। न समस्त्यपदं वाक्यं यत्स्याज्ज्ञानविधायकम् ॥ १९ ॥ [श्रोताओरंको तत्तत् वस्तुओंका पृथक् २ तपने अपने स्वरूपसे ज्ञान दूसरे प्रमाणंसे ही सिद्ध है, इसलिए इस प्रकारके ज्ञानको उत्पन्न करानेके लिए पदोंका प्रयोग करना निरर्थक होगा। अतएव जो अज्ञात है, उसीको समझाने के लिए पदोंका परस्पर सम्बन्ध किया जाता है, ऐसा मानना पड़ेगा और सत कारकोंका परसु्पर सम्बन्ध क्रियाके बिना सिद्ध नहीं होता। इस कारस क्रियाका ही बोध करानेमें सब शब्दोंकी सामर्थ्य है। अतएव] क्रियापद्के बिना अन्य पदोंका भी परसपर सम्बन्ध नहीं हो सकता और ऐसा कोई भी वाक्य नहीं है जो पदोंके बिना ज्ञानका विधायक हो। ( ज्ञानका विधा- न तो क्या, पदोंके मिले बिना वह अपने स्वरूपको ही नहीं प्रात्त हो सकता।) ॥ १६ ॥ ज्ञानाऽभ्युपगमेऽपि न दोप:, यतः- ज्ञानको मोक्षका साधन मान भी लिया जाय, तो भी कोई दोष नहीं है, क्यों कि कर्मसोडङ्गाङ्गिभावेन स्वप्रधानतयाऽथवा। सम्वन्धस्येह संसिद्धेर्ज्ञाने सत्यप्यदोषतः ॥ २० ॥ ज्ञानको चाहे कर्मका अङ्ग मानो अरथवा स्वतन्त्र मानो, दोनों ही प्रकारसे ज्ञान और कर्म मिलकर मोक्षके साधन हैं, केवल ज्ञान नहीं। इस प्रकार ज्ञानका कर्मके साथ अ्रङ्गा- ङ्गीमाव या समुच यरूप सम्बन्ध सिद्ध ही है।

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भाषानुवादसहिता

यस्माज्ज्ञानाऽभ्युपगमाऽनभ्युपगसेऽपि न ज्ञानान्मुक्ति: A .. ज्ञानको मुक्तिका साधन मानिये या न मानिये, दोनों ही पक्षोंमें केवल ज्ञाानसे मुक्ति नहीं होती, यह सिद्ध हुआ। अपरतः सर्वाश्रमाणां हि वाङ्मनःकावकमभिः । म्वनुष्ठितैर्यथाशक्ति मुक्ति: स्यान्ाऽन्यसाघनात् ॥ २१।। इसलिए सभी आश्रमवाले पुरुषोंको मन, वचन, और शरीर द्वारा यथाशक्ति भली-भाँति कमोंके आचरससे ही मुक्ति प्रात् हो सकती है, अन्य किसी साधनसे नहीं। [ यहाँ तक ज्ञान और कर्म के समुच्चयको मोक्षका साधन माननेवालों की ओ्ररसे पूर्वपक्ष किया गया है। अ्र्प्रब्य ] अरसदर्थप्रलापोऽयमिति दूपससम्भावनायाऽऽह- उपर्युक्त पूर्वपक्षमें दोष दिखलानेके लिए उसको 'यह व्यर्थ प्रलाप है, ऐसा कहत हैं- इति हृष्टधियां वाचः स्वप्रज्ञाध्मातचेतसाम्। घुष्यन्ते यज्ञशालासु धूमानद्धधियां किल ॥ २२॥ 'कवल कर्मानुष्ठानसे ही हम लोगोंको स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति हो जाएगी' इस प्रकारकी आशाशं से जिनकी बुद्धि प्रफुल्नित हो रही है, जिनका अन्तःकरण युत्ति एवं शास्त्रसे विरुद्ध अपनी ही कपोलकल्पनाओसे परिपूरित है, और जिनकी दृष्टि धुँएसे विकृत हुई है, अर्थात् यथार्थ वस्तुको सम्यक् नहीं ग्रहण कर सकती है, ऐसे कर्मवादी लोगोंकी पूर्वोक्त बातें प्रायः यज्ञशालाओ में सुनाई देती हैं ॥ २२॥

पूर्वोक्त कर्मवादियों के पूर्वपक्षमें कहाँतक और किस किस प्रकारसे दोष दिस्त्- लाए जाएँगे, यह कहते हैं- अत्राऽभिद्ध्महे दोषान्क्रमशो न्यायवृ हितैः। वचोभि: पूर्वपक्षोक्तिघातिभिर्नाऽतिसम्भ्रमात् ॥२३॥ त्प्रब 'केवल कर्म ही मुक्तिका साधन है, इस पूर्वपक्षकी प्रक्रियाका निराकरण करनेमें समर्थ तथा युक्तिपूर्ण वचनों के द्वारा (असत् उत्तरका स्प्श न करते) क्रमशः दोपोंका निरूपण करते हैं॥ २३ ॥ चतुविधस्याऽपि कर्मकार्यस्य मुक्तावसंभवान्न मुक्त: कर्मकार्यत्वम्- उत्पत्ति, प्राप्ति, विकार और संस्कार इन चार प्रकारके कर्म-फलंमेंसे मुक्ति कोई भी फल नहीं हो सकती, क्योंकि स्वरूपस्थितिरूप मुक्ति नित्यसिद्ध होनेके कारण आत्मरूप है। अतएव मुक्ति कर्म-साध्य नहीं हो सकती। और-

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१२ नष्करम्यसिद्धि:

अज्ञानहानमात्रत्वान्मुक्त: कर्म नं साधनम्। कर्माऽपमार्षटि नाऽज्ञानं तमसीवोन्थितं तमः ॥ २४॥ अ्रज्ञाननिवृत्ति ही मुंक्तिका स्वरूप है। इसलिए ी कर्म उसका साधन नहीं हो सकता। यदि कहिये कि "अज्ञानकी निवृत्ति कर्मसे क्यों नहीं होती?" सो यह ठीक नहीं है। क्योंकि जसे अन्धकारमें उत्पन्न हुए रज्जु-सपके भ्रमको अ्र्न्धकार नहीं दूरं कर सकता, वैसे ही अज्ञानोत्पन्न कर्म मीत्रज्ञानका नाश करनेमें त्समर्थ है॥ २४॥ कर्मकार्यत्वाऽम्युपगमेऽपि दोष एव- मोक्षको कर्मका कार्य मान भी लिया जाय, तब भी त्रनेक दोष आतं हैं- एकेन वा भवेन्मुक्तिर्यदि वा सर्वकर्मभिः। प्रत्येकं चेद् वृथाऽन्यानि सर्वेभ्योऽप्येककर्मता ॥ २५॥ क्या एक कर्मका फल मोक्ष है या सम्पूर् करमोंका? यदि एक कर्मका फल मोक है, तब तो अरन्य सब कर्म व्यर्थ हो जाएंगे और यदि सब कर्म मिल कर मोनजनक हैं, नाना करमोंके नाना फल जो श्रुतियोंमें कहे हैं, वे सब असङ्गत हो जाएँगे॥। २५ ।। [इसपर यदि कोई शङ्का करे कि "नित्य नैमित्तिक कर्मोका कोई फल श्रुनिमें नहीं बतलाया है, इसलिए उन कर्मोंकों फलकी आकाङका है। मोक्ष भी एक फल है। उसकी भी साधनकी आकाइक्षा है। इस प्रकार परस्परकी आ्रकाड्कासे कर्म औ्र्प्रौर मोक्षका साध्य-साधनभाव परिशंधानुमानसे सहजमें सिद्ध होता है। तथा श्रन्थ भी ऐसे बहुतसे कर्म हैं, जिनका फल कुछ भी नहीं बनलाया है। उनका भी मोक्षमें ही विनियोग हो जायगा।",तो यह भी ठीक नहीं है। क्योंकि] सर्वप्रकारस्याऽपि कर्मणः उत्पत्तित एव विशिष्टसाध्याभिसम्घ- न्धान्न पारिशेष्यसिद्धिः। [विधिवाक्य इष्टसाधन कर्मोंका प्रतिपादन करते हैं, इष्ट साध्य पदार्थ कों कहते हैं, परन्तु मोक्ष तो साध्य नहीं है। "अिहोत्रं जुहोति" (तिहोत्र करे) इत्यादि विधि- वाक्योंसे ही अग्निहोत्रादि किसी इष्टके साधन है, ऐसा सिद्ध हो जाता है और जिन विश्वजित् आदि करमोंका कोई फल विविवाक्योंमें श्रुत नहीं है, उनका भी स्वर्ग ही फल हैं, ऐसा निररय महर्षि जैमिनिजीने किया है। इस कारण] सत्र प्रकारके कर्मोका उत्पत्ति-अपने अपने विधिवाक्यों-से ही किसी न किसी विशिष्ट साध्य फलके साथ अङ्गाङ्गीभावरूप सम्बन्ध पाया जाता है। अतएव परस्पराकाङ्क्षा न होनेके कारण परिशेषानुमानसे कर्म मोक्षका साधन नहीं सिद्ध हो सकता। दुरितक्षपणार्थत्वान्न नित्यं स्याद्विमुक्तये। स्वर्गादिफलसम्बन्धात् काम्यं कर्म तथैव न ॥ २६॥

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भापानुवादसहिता १३

और आपके (मीमांसकके) मतके अनुसार भी नित्यकररमोका फल पापनाश और काम्य कर्मोका फल स्वर्गादि है। तब दोनों प्रकारके कर्म मोक्षके साधन कसे हो सकते हैं ?॥ २६ ॥ प्रमाणासम्भवाच्- और मोनका साधन कर्म है, इस विषयमें कोई ग्रामण भी नहीं है। साध्यसाधनभावोडयं वचनात्पारलौकिक: । नाऽश्रौपं मोक्षदं कर्म श्रुतर्वक्त्रात्कथञ्चन॥२७।। साधनका परलोकमें होनेवाले अर्थात् अदप्टरूप फलके साथ अङ्गाङ्गी भाव श्रुतिवचनोंसे सिद्ध होता है। परन्तु ऐसा कोई वचन श्रुति या स्मृतिमें हमने कहीं नहीं सुना, जिममें कि कर्म मोक्षका साधन है, ऐसा वर्णन किया हो॥ २७॥ अभ्युपगताभ्युपमान्च श्वश्रूनिर्गच्छोक्तिवत् भवतो निष्प्रयोजनः प्रलाप: । पूर्वमें जो आपने निपिद्ध तथा काम्य कर्मोंका त्याग करना एवं नित्य कमोंका निप्फल होना कहा है, इतना प्रपञ्च करके भी अन्तमें आर्रपको हमारा ही सिद्धान्त स्वीकार करना है। सुतराम् आ्रपका यह सब कथन ऐसा ही निष्प्रयोजन प्रतान है जैसे कि कोई सास अपनी बहूको किसी मित्तुकसे "यहाँ कुछ नहीं मिलेगा" यह कहते मुनकर उसे कहे कि "तेरा घरमें क्या अधिकार है जो तू इस भित्तुकसे कहती है कि यहाँ कुछ नहीं मिलेगा ?' इस प्रकार का कलह कर पुनः उस भित्तुकसे (वह भी) यही कहे कि "जाओ यहाँ कुछ नहीं मिलेगा।" क्योंकि- निषिद्धकाम्ययोस्त्यागस्त्वयाऽपीष्टो मया यथा। नित्यस्याऽफलवत्वाच्च न मोक्ष: कर्मसाधनः ॥ २८ ॥ निषिंद् औरर काम्य कर्मोंका त्याग जैसे आपको इष्ट है, हम भी उसको वैसे ही मानते हैं, और नित्य कर्मोंका फल कुछ नहीं है। इसलिए कर्म मोक्षका साधन नहीं हो सकता ॥ २८ ॥ एवं तावन्मुक्त: क्रियाभिः सिद्धत्वादिति निरस्तोडयं पक्षोडथाऽघुना सर्वकर्मप्रवृत्तिहेतुनिरूपणन यथावस्थितात्मवस्तुविषय केवलज्ञानमात्रादेव सकल संसाराऽन्थनिवृत्तिरितीमं पक्षं द्रयितुकाम आ्रह- इस प्रकार 'कर्मसे ही मुक्ति सिद्ध है' इस पक्षका खएडन हो चुका। अब आगे इसके अ्रनन्तर सबर प्रकारके कर्मोंमे प्रवृत्तिके कारणका विचार करते हुए 'नित्यसिद्ध आत्मवस्तुके ज्ञानसे ही सकल संसारके अनर्थोंकी निवृत्ति हो सकती. है' इस पक्षको दृढ़ करनेके लिए कहते हैँ।

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१४ नैष्कर्म्यसिद्धि:

इह चेदं परीक्ष्यते-किं यथा प्रतिपिद्धेषु यादृच्छिकेपु च कमसु स्वाभाविकस्वाशयोत्थनिमित्तवशादेवेदं हितमिदमहितमिति [विशेषान] परिकल्व्य मृगतृष्णिकोदकपिपासुरि लौकिकप्रमाससिद्धान्येव च साधनान्युपादाय इष्टप्राप्तयेऽहितनिवृत्तये च स्वयमेव प्रवर्तते निवनते च तथवाऽदष्टार्थेषु काम्येपु निन्येषु च कर्मसु, किंवाऽन्यदेव तत्र प्रतनि- निमित्तमिति। यहाँ इस बातका मी विचार किया जाता है कि जैसे निषिद्ध और वाहा-न (स्वच्छामात्रसे होनेवाले-भोजनादि) कर्मोंमें शास्त्रविधानके बिना ही स्वामाबिक मिथ्याज्ञानसे उत्पन्न हुए रागद्वेषादिरूप प्रवृत्ति और निवृततिके कारगो से 'य वम्न हितकर है और यह अरहितकर है' ऐसी कल्पना करके-मृगतृपणकि जलको पान करनेकी अभिलाषा करनेवाले मनुष्यके समान-लौकिक प्रमाखसे सिद्ध साधनों को ग्रहकर सुखप्राप्ति और दुःनिवृत्तिके लिए यह पुरुष अपने आप ही प्रृत्त और निवृत्त होता है। क्या वैसे ही तदष्टार्थ काम्य और नित्य करमोंमें सी प्रृत्त औ्रर निब्ुन होता है ? या उनमें प्रवत्तिका कारण कोई दूसरा ही है ? किश्चाऽतो यद्येवम् ? शृणु, यदि तावत् यथावस्थित वस्तुसम्य- र्ज्ञानं प्रभाणभूतमागमिकं लौकिक वा अवृत्तिनिमित्तमिति निश्चयो निवृत्तिशास्त्रं च नाभ्युपगम्यते तदा हताः कर्मत्यागिनो भ्रान्तिविज्ञान- मात्रावष्टम्भात् अथ सर्व- प्रवृत्तिनिमित्तं तदा वद्धमिहे वयं हताःस्थ यूयमिति। शङ्का-यदि काम्य और नित्यकमोंमें भी मिथ्याज्ञानसे उत्पन्न रागद्वेबादि ह। प्रवृत्तिके निमित्त हो अथवा अन्य कोई हो, इससे आपका क्या प्रयोजन सिद्ध होगा ? समाधान-[ पूर्वीक्त बिचारसे हमारा यह प्रयोजन यह है कि-] यदि वस्तुके अनुरूप होनेके कारण जो अत्यन्त प्रांमाणिक है, ऐसा वैदिक अथवा लौकिक यथार्थज्ञान ही करमोंमं प्रवृत्तिका कारण है, ऐसा आपका निश्चय है। और निवृत्तिशास्त्र अर्थात् कर्मसंन्यास-विधायक शास्त्रको -- आजीवन अभिहोत्रादिकमोंका विधान करनेवाले 'य।वज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति' (.जबतक आयु हो, तब तक अग्निहोत्र करे) शास्त्रसे विरुद्ध होनेके कारण कर्मोंमें-अनधिकारी अन्धे, लूले, लँगड़े आदि लोगोंके लिए मानकर उसे सर्वसाधारके लिए न माना जाय, तब तो कर्मत्यागियों को बड़ी स्वार्थहानि हुई। क्यों कि उनका सिद्वान्त भ्रान्तिमूलक टहर गया और वैदिक प्रमाणोस

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भाषानुवादसहिता १५

प्रतिपादित कर्मोंका अनुधान भी उन्होंने छोड़ दिया? और यदि मृगतृप्णिका जलके अभिलाषी मनुष्यकी प्रवृत्तिके समान त्र्प्रयथार्थ ( जैसी वस्तु है उसके विपरीत हानेवाला) भ्रान्तिज्ञान ही इन सतर कर्मोंमें प्रवृत्तिका कारणा है, तब हम लोगों का सिद्धान्त यथार्थ- ज्ञानमूलक और कर्मवादी लोगोंका सिद्धान्त मिथ्याज्ञानमूलक सिद्ध होनेसे हम लोगों की विजय और आरपकी हानि होगी ? हितं सम्प्रप्सतां मोहादहितं च जिहासताम्। उपायान्प्राप्तिहानार्थान् शास्त्रं भासयतेऽर्कवत्।।२९।। शास्त्र हितकी प्राप्ति और तहितिका परित्याग करनेकी इच्छा करनेवाले अज्ञानके वशवर्ती लोगों को उनकी इच्छाके अनुसार प्रकाशमय सूर्यके समान सुखप्रामि औरर दुःग्निवृत्तिके उपायों को बतलाता है॥ २६ ॥ [ यहाँ यह बात विचारने योग्य है कि सुपुतिदशामें विषयसम्बन्धी सुखके न रहनेपर भी उठनेपर मैं अत्र तक सुखसे सोया' इस प्रकारके अनुभवसे आत्माकी सुखरूपता अनुभवसे सिद्ध है। सब प्राणियों का सब वस्तुओ से अपनी आत्मामें अधिक प्रेम देखा जाता है और अधिक प्रेम सुखरूपमें होता है। इस प्रकार अनुमान प्रमाखसे भी आरत्माकी सुगरूपता निश्चित है। श्रुतियों में भी त्र््रत्माकी नित्य निरतिशयानन्द- रूपताका बार बार वर्णन किया है और श्रुतियोंसे ही उस आत्माकी कूटस्थता, तसङ्गता और साचिता भी सिद्ध है। अतएव स्वभावसे ही सब प्रकारके दुःखोका आत्मामें तभाव है। इसलिए पूर्ववर्सित निरतिशयसुख्स्वरूप आ्रत्माके अ्र्पज्ञानसे ही सुखप्राप्ति और दुःखनिवृत्तिकी इच्छा हुआ करती है। न कि शास्त्र मनुष्यों को "तुम लोग कर्त्ता और भोक्ता हो, तुम्हारे लिए कुछ वस्तु ग्रहणा करने योग्य और कुछ वस्तु त्यागने योग्य हैं। इसलिए तुम्हें ग्रहण करने योग्यों का ग्रहण और त्यागने योग्य वस्तुओ के परित्यागकी इच्छा करनी चाहिए। और तुम लोग वर्ण, आश्रम, दशा (अवस्था) आदिसे युक्त हो।" ऐसा उपदेश देकर इस प्रकार उनमें कर्तृत्वादि धर्मोंका नवीनतया उत्पादन करता है। बल्कि अपने आप ही विपरीत धर्मोंका अपने ऊपर आरोप करके अपने आप ही ग्रहणा या त्याग करने योग्य वस्तुओं के ग्रहण और त्यागके उपायों को ढूँढनेवाले मनुष्योंके लिए तत् तत् फलो के साथ तत् तत् कर्मोंके अङ्गाङ्गी भावका प्रति- पादन करता है। उनकी प्रवृत्ति और निवृत्तिका विधान करनेमें शाम्र प्रवृत्त नहीं है किन्तु उदासीन है। ] एवं तावत्प्रत्यक्षानुमानागमप्रमाणवष्टम्भादेवाSSत्मनो निरतिशय- सुखहिताव्यतिरेकसिद्धरहितस्य च षष्ठगोचरवत् स्वत एवाऽनभिसम्ब- न्धात्। एवं स्वाभाव्यात्मानवबोधमात्रादेव हितं मे स्यादहितं मे माभू-

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१६ नैष्कर्म्यसिद्धि:

दिति मिथ्याज्ञानं तूषरशुक्तिकानवबोधोत्थमिथ्याज्ञानवत्प्रवृत्तिनिमित्त- मित्यवधारितम् । शास्त्र च न पदार्थशक्त्याधानकृदित्यस्यैवोत्तरत्र प्रपञ्च आररभ्यते। इस प्रकार प्रत्यक्ष अर्प्रनुमान तथा आ्र्प्रगम इन तीन प्रमाणोंके बलसे ही आरत्माकी न्यूनाधिक्यरहित सुखरूपता सिद्ध है और दुःखका सम्बन्ध-अनुपलब्धि प्रमाणके विषय-अभावके समान-न होनेके कारण स्वभावसिद्ध दुःखसम्तन्धसे रहिन सुग्स्वरप आ्रत्मवस्तु के अज्ञानसे 'मुझे सुख हो, दुःख न हो, ऐसा मिश्याज्ञान ही-मरुस्थल और शुक्तिमें उनके न जाननेसे उत्पन्न हुए (जल और रजतरूप) मिथ्याज्ञानके समान- प्रवृत्ति और निवृत्तिका कारण है। शास्त्र किसीं पदार्थमं नवीन शक्ति उत्पन्न नहींकरता किन्तु वह वस्तुओं की वर्तमान शक्तिको प्रकाशित करता है, यह निर्धारित किया गया। तब आगे इसी बातका विस्तार किया जाता है- न परीप्सां जिहासां वा पुंसः शास्त्र करोति हि। निजे एव तु ते यस्मात् पश्वादावपि दर्शनात् ॥ ३० ॥ शास्त्र पुरुषोंकी किसी वस्तुमें इच्छा अथवा अरुचि उत्पन्न नहीं करता। किन्तु अपने स्वाभाविक त्रज्ञानवश ही वे हुआ करती हैं। क्योंकि शास्त्रीय ज्ञानके बिना भी पशु आदिमें इच्छा और द्वेष स्वभावतः देखे जाते हैं॥ ३० ॥ उक्तं तावदनबुद्धवस्तुयाथात्म्य एव विधिप्रतिषेधशास्त्र ष्वधि- क्रियत इति।अथाधुना विषयस्वभावानुरोधेन अवृत्त्यसंभवं वक्तुकाम श्रह- जिस पुरुषको अपने स्वरूपका त्र्प्रज्ञान है, वही विधि-निपेध शास्त्रमें अ्रधिकारी होता है, यह पहिले कहा जां चुका है। अब तत्वज्ञानके विपयभूत आ्त्माके स्वरूपका विचार करनेसे भी क्ममें प्रवृत्ति नहीं हो सकती है, यह बात कहते हैं- लिप्सतेऽज्ञानतो लब्धं करठे चामीकरं यथा। वर्जितं च स्वतो भ्रान्त्या छायायामात्मनो यथा॥ ३१॥ भयान्मोहावनद्धात्मा रक्षःपरिजिहीर्षति। यच्चाऽपरिहतं वस्तु तथाऽलब्धं च लिप्सते॥ ३२ ॥ यह मनुष्य अज्ञानके कारण जो पहलेसे ही प्राप्त है, उसको भूले हुए करठके हारके समान, प्राप्त करनेकी तथा भय या मोहसे अभिभूतमनवाला होकर (भ्रान्तिसे) अरपनी छायामें कल्पित राक्षसके समान, जो वस्तु कदापि नहीं प्राप्त है, उसको दूर करनेकी चेष्टा करता है। और जो वास्तवमें अपनेसे अपरिहृत-चोर, व्याघ्र आदि हैं एवं अलब्ध-वित्तादि पदार्थ हैं उनका परित्याग एवं ग्रहगा करनेकी इच्छा करता है ॥३१-३२॥।

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भाषानुवादसहिता १७

[ इस श्लोकमें ग्रन्थकारने लोकप्रवृत्तिके चार भेद बतलाए हैं। (१) जो वस्तु स्वयं ही प्राप्त है, अज्ञानवश उसकी प्राप्तिके लिए। जैसे कि भूले हुए कराठके हारकी प्राप्तिके लिए (२) जो वस्तु कदापि प्राप्त नहीं है, भ्रमवरा उसको छोड़नेके लिए। जैसे कि भयके कारण अपनी छायामें कल्पित भूतकी निवृत्तिके लिए (३) जो वास्तवमें छोड़ने योग्य वस्तु है, उसके छोड़ने के लिए। जैसे कि पैरमें लपटे हुए सर्प आदि को दूर करनेके लिए। और (४) जो यथार्थमें अप्राप्त है उस वस्तुकी प्राप्तिके लिए। जैसे कि ग्रामादिकी प्राप्तिके लिए लोकमें प्रवृत्ति देखी जाती है। ] तत्रैतेषु चतुर्षु विषयेषु प्राप्तये परिहाराय च विभज्य न्यायः प्रदश्यते। अब इन चार विषयोंमें प्राप्ति और परिहारके लिए पृथक्-पृथक् युक्तिपूर्वक उपाय दिखलाया जाता है- प्राप्तव्यपरिहार्येषु ज्ञात्वोपायान् श्रुतेः पृथक्। कृत्वाऽथ प्राप्तुयात्प्राप्यं तथाऽनिष्टं जहात्यपि॥ ३३ ॥ प्रात करने योग्य स्वर्गादि पदार्थोंकी प्राप्ति और त्यागने योग्य नरकादि पदार्थोंके परिहारके लिएसमर्थ तत्-तत् उपयोंको शास्त्र द्वारा पृथक्-पृथक् जानकर (अधिकारी) पुरुष (विधिपूर्वक अ्र्प्रनुष्ठान करके उससे उत्पन्न हुए अदृष्टसे ) इष्ट वस्तुकी प्रातति त्र्र त्रनिष्टका परित्याग करता है॥ ३३ ॥ अथावशिष्टयोः स्वभावतः- वर्जितावाप्तर्योरबोधाद्धानप्राप्ती न कमया। मोहमात्रान्तरायत्वात् क्रियया ते न सिद्यतः ॥ ३४ ॥ औ्रर बाँकी बचे हुए स्वाभाविक नित्यप्रास्त सुख और नित्यनिवृत्त दुःख, इन दोनों प्रकारके पदार्थोंकी प्रात्ति और निवृत्ति ज्ञानसे ही होती है। क्योंकि उनकी प्राप्ति और निवृत्तिमें प्रतिबन्धक केवल अज्ञान ही है, इस कारण वे दोनों क्रियाके द्वारा प्राप्त और निवृत्त नहीं हो सकते ॥ ३४ ॥

सुखप्राप्ति-निःशेष-दुःखनिवृत्ती भवतः, न तु कमशोति ? उच्यते- किस कारण ऐसा कहा जाता है कि आत्मवस्तुके यथार्थज्ञानमात्रसे ही अभिलषित, निरतिशय (तारतम्यरहित) सुखकी प्रातति और निःशेष दुःखकी समूल निवृत्ति होती है, कर्मसे नहीं ? इस शङ्काका समाधान करते हैं- मोहापनुत्तये। सम्यग्ज्ञानं विरोध्यस्य तमिस्त्रस्यांऽशुमानिव॥ ३५॥ ३

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१८ नैष्कर्म्यसिद्धि:

अरज्ञानसे उत्पन्न होनेके कारण कर्म उसकी (अज्ञानकी) निवृत्ति करनेमें समर्थ नहीं है और तत्वज्ञान मिथ्याऽज्ञानका विरोधी है, इसलिए वह, अन्धकारको सूर्यके समान, मिथ्या-अज्ञानको नष्ट करनेमें समर्थ है॥ ३५ ॥ नन्वात्मज्ञानमप्यविद्योपादानं न हि शास्त्रशिष्याचार्याद्यनु- पादायाऽडत्मज्ञानमात्मानं लभत इति। शङ्का-आत्मज्ञानका उपादान कारख भी तो तविद्या ही है। क्योंकि शास्त्र, शिष्य और गुरु इत्यादि अज्ञानसे माने हुए वस्तुओंके बरिना तो वह उत्पन्न ही नहीं होता। (जत्र वह स्वयं अज्ञानसे उत्पन्न हुआ है तब्र वह भी अज्ञानको कैसे नष्ट कर सकता है?) नैष दोषः। यत आत्मज्ञानं हि स्वतःसिद्धपरमार्थात्मवस्तु- स्वात्मोत्पत्तावेव शास्त्राद्यपेक्षते नोत्पन्नमविद्यानिवृत्तौ। कर्म पुनः स्वात्मोत्पत्तावुत्पन्नं च । नहि क्रिया कारकनिःस्पृहा कल्पकोटिव्यवहितफलदानाय स्वात्मानं विभर्ति, साध्यमानमात्ररूपत्वात्तस्याः । न च क्रियाऽऽत्मज्ञानवत् स्वात्म- प्रतिलम्भकाल एव स्वर्गादिफलेन कर्तारं सम्बन्नाति। आत्मज्ञानं पुनः पुरुषार्थसिद्धौ नोत्पद्यमानस्वरूपव्यतिरेकेणान्यद्रपान्तरं साधनान्तरं वापेक्षते। कुत एतद्यतः । उत्तर-यह कोई दोष नहीं है। क्योंकि आत्मज्ञान स्वयंप्रकाश, वास्तवमें सत् रूप आत्मवस्तुको विषय करता हुआ उसीके बलसे अविद्या और उससे उत्पन्न हुई कारण- सामग्रीको नष्ट करता है और केवल अपनी उत्पत्तिके लिए ही शास्त्रादिकी अपेक्षा करता है। उत्पन्न होनेपर अविद्याको नष्ट करनेके लिए वह किसी दूसरेकी अपेक्षा नहीं करता। परन्तु कर्म तो अपनी उत्पत्तिके लिए और उत्पन्न होनेपर फल देनेके लिए भी अविद्याकी अपेक्षा करता है। कोई भी क्रिया अपने कारखकी (अविद्याका) अपेक्षा न रखती हुई करोड़ों कल्पोंके अनन्तर उत्पन्न होनेवाले फलको देनेके लिए अपने आत्माको-स्वरूपको-धारण नहीं कर सकती। क्योंकि क्रियाका स्वरूप स्वंदा ही परतन्त्र तथा साध्यमात्र ही है और वह आत्म-ज्ञानके समान उत्पन्न होते हो कर्ताक? अपने द्वारा उत्पन्न होनेवाले स्वर्गादि फलोंसे संयुक्त नहीं करती; परन्तु आत्मज्ञान तो अज्ञाननिवृत्तिरूप मोक्षका सम्पादन करनेके लिए अपनी उत्पत्तिके अतिरिक्त अभ्यास या कर्म, किसीकी भी अपेक्षा नहीं करता। [शङ्का-द्वैतज्ञान अनादि कालसे चला आता है और उसके संस्कार भी अरनादि

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भाषानुवादसहिता १६

कालसे हैं और तत्त्वज्ञान तो अभी उत्पन्न हुआ है, इसलिए वह अनादि कालसे प्रवृत्त मिथ्या अज्ञानसे दब जायगा। अतः उसको अपनी स्थितिके लिए अभ्यासकी अपेक्षा अवश्य होनी चाहिए, परन्तु क्या कारण है जो वह अभ्यासकी अपेक्षा नहीं करता ? समाधान-] बलवद्धि प्रमाणोत्थसम्यग्ज्ञानं न बाध्यते। आकाङ्क्षते न चाऽप्यन्यद्वाधनं प्रति साधनम्॥३६॥ यह तत्वज्ञान प्रमाणसे उत्पन्न होनेके कारण प्रवल है, इसलिए मिथ्याज्ञानसे बाधित नहीं होता और प्रबल होनेके कारण ही वह मिथ्याज्ञानके संस्कारोंको नष्ट करनेमें किसी दूसरे सहायककी अपेक्षा भी नहीं करता ॥ ३६॥ स्वपक्स्य हेत्ववष्टम्भेन समर्थितत्वान्निराशङ्कमुपसंहियते। प्रबल प्रमाणोंसे अपने पक्षका समर्थन करके अब निःशङ्क होकर अग्रिम श्लोकसे उपसंहार किया जाता है- तस्माद्दुःखोदधेह तोरज्ञानस्याऽपनुत्तये। सम्यग्ज्ञानं सुपर्यापं क्रिया चेन्नोक्तहेतुतः ॥ ३७॥ पूर्वोक्त करणोंसे दु.ख-समुद्रके कारण अज्ञानको दूर करनेके लिए तत्वज्ञान ही समर्थ है, पूर्वोक्त दोषोंके कारए कर्म नहीं॥ ३७ ॥ ननु बलवद्पि सम्यग्ज्ञानं सदप्रमाणोत्थेनाऽसम्यग्ज्ञानेन बाध्यमानमुपलभामहे। यत उत्पन्नपरमार्थबोधंस्याऽपि कर्त त्वभोक्तत्वरा- गद्वषाद्यनवबोधोत्थप्रत्यया आविर्भवन्ति। न ह्यवाधिते सम्यग्ज्ञाने तद्विरु- द्वानां प्रत्ययानां सम्भवोऽस्ति । शङ्का-तत्त्वज्ञान अत्यन्त प्रबल होनेपर भी अप्रमाणसे उत्पन्न हुए मिथ्याज्ञानसे बाधित होते देखा जाता है। क्योंकि तत्वज्ञानीको भी सांसारिक पुरुषोंके समान अज्ञानसे उत्पन्न कर्तृत्व, भोक्तृत्व, राग, द्वेष इत्यादि भावनाएँ, उत्पन्न होती हैं। बिना तत्त्वज्ञानके बाधित हुए तो उसके विरुद्ध यह सब मिथ्याज्ञान हो ही नहीं सकते? (इसलिए तत्वज्ञान का मिथ्याअज्ञानसे बाघ अवश्य होता है?) नैतदेवम्। कुत :- बाधितत्वादविद्याया विद्यां सा नैव बाधते। तद्वासना निमित्तत्वं यान्ति विद्यास्मृतेर्ध्रुवम् ॥ ३८ ॥ समाधान-(आपके कथनानुसार) तत्त्वज्ञान मिथ्याअरज्ञानसे बाधित नहीं होता। क्योंकि तत्वज्ञानसे अविद्या बाधित अर्थात् नष्ट हो जाती है, इसलिए वह उसका

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२० नैष्कम्यसिद्धि:

बाध नहीं कर सकती, प्रत्युत तत्वज्ञानके संस्कारोंसे बारम्बार उसीका स्मरण निश्चयरूपसे होता रहता है। इससे यदि कभी द्वैतका स्मरण हो भी जाय तो भी मिथ्यातज्ञान तत्त्वज्ञानका बाध नहीं कर सकता ॥ ३८ ॥ "कर्माडज्ञानसमुत्थत्वादि"-त्युक्तो हेतुस्तस्य च समर्थनं पूर्वमे- वाऽभिहितं-"हितं सम्प्र'प्सतामि"-त्यादिना। तदभ्युच्चयार्थमविद्यान्वयेन च संसारान्वयं प्रदर्शयिष्यामीत्यत आ्रह- "कर्म अज्ञानकों नहीं नष्ट कर सकता" इस प्रतिज्ञाकी पुष्टि के लिए 'कर्मा- Sज्ञानसमुत्थत्वात् इस (३५ वें) श्लोकमें हेतुका वर्णन किया और उसका समर्थन भी 'हितं सम्प्रेप्सताम्' (२८) इत्यादि श्लोकोसे पूर्व ही कर दिया। अब 'कर्म मिथ्याअज्ञान- को उत्पन्न करता हुआ फिर भी कर्ममें ही प्रवृत्त करता है। इस कारणसे भी कर्म मिथ्याऽज्ञानका नाशक नहीं हो सकता' यह दूसरी युक्ति अग्रिम श्लोकसे दिखलाते हैं- ब्राहमएयाद्यात्मके देहे लात्वा नाऽऽत्मेति भावनाम् । श्रुतेः किङ्करतामेति वाखनःकायकर्मभिः ॥३९॥ यह पुरुष वर्ण, आश्रम, आयु, अवस्था इत्यादिसे युक्त देहमें 'यही आत्मा है' ऐसा आरोंप करके वाखी, मन तथा शरीर द्वारा कर्म करता हुआ वेदशास्त्रांका किङ्कर बन जाता है॥ ३६ ॥ यस्मात्कर्माऽज्ञानसमुत्थमेव, तस्मातद्वयावृत्तौ निवर्तत इत्युच्यते। क्योकि कर्म अज्ञानसे ही उत्पन्न हुआ है, इस कारण अज्ञानकी निवृत्तिसे ही वह निवृत्त होता है, यह कहते हैं- दग्धाखिलाऽधिकारश्रेद् ब्रह्मज्ञानागनिना मुनिः । वर्तमान: श्रुतेरमूर्न्नि नैव स्याद्वेदकिङ्करः॥ ४०॥ ब्रह्मज्ञानरूप अरग्निसे जिस पुरुषका कर्मप्रवाह दग्व हो गया है, ऐसा मननशील महात्मा तो वेदशास्त्रों के मस्तकपर आरूढ होता हुआ फिर उनका किङ्कर-दास-नहीं, रह सकता॥ ४० ॥ अथेतरो घनतराऽविद्यापटलसंवीतान्तःकरणोडङ्गीकृतकतृ त्वाद्य- शेषकर्माधिकारकारणो विधिप्रतिषेधचोदनासंदंशोपदष्टः कर्मसु प्रवर्तमान :- और ब्रह्मज्ञानीसे भिन्न-अन्य संसारी पुरुष, जिसका कि अन्त:करण गाढ़ अकि द्यारूप अन्धकारसे आच्छादित है, जिसने कर्मप्रवाहके प्रधान कारण 'मैं कर्ता हूँ', 'मैं भोक्ता हूँ' इत्यादि अभिमानोंको अङ्गीकार किया है और जो 'यह करना चाहिए' 'यह नहीं करना चाहिए' इंत्यादि विधि और निषेधरूप सँडसीसे जकडा हुआ कर्मों में प्रवृत्त हो रहा है, वह-

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भाषानुवादसहिता २१

शुभैराम्रोति देवत्वं निषिद्धैर्नािकीं गतिम्। उभाभ्यां पुरायपापाभ्यां मानुष्यं लभतेऽवशः ॥ ४१ ॥ शुभ कमोंसे देवादिभाव, अ्रशुभ कर्मसे नरक गति और शुभाशुभ-मिश्रित- कर्मोंसे मनुष्य शरीरको विवश होकर प्रात्त होता है। आब्रह्मस्तम्घपर्यन्ते धोरे दुःखोदधौ घटीयन्त्रवदारोहावरोह- न्यायेनाऽधममध्यमोत्तमसुख - दुःखमाहविद्यच्चपलसम्पतदायिनीर्विचित्र-

भाशुभव्यामिश्रकर्मवायुसमीरितः- ब्रह्मासे लेकर तृपर्यन्त भयङ्कर दुःखरूप संसारसमुद्रमं, जिस प्रकार कुएँमें चलते हुए रहटके छोटे छोटे घड़े कभी ऊपर और कभी नीचे जाते हैं; इसी प्रकार विजलीकी चमकके समान क्षशिक सुख, दुःख और मोहको उत्पन्न करनेवाली, नाना प्रकारकी विचित्र अधम, मध्यम और उत्तम योनियोंको ग्रहण करता हुआ, प्रचएड एवं कोर डालनेवाले वायुके वेगसे चपेटा हुआर, समुद्रमें पड़े हुए सूखे तुंवेके समान- शुभ, अशुभ एवं सम्मिलित कर्मरूप वायुसे इतस्ततः प्रोरत होकर इतस्ततः भटकता हुआ- एवं चङ्क्रम्यमाणोऽयमविद्याकामकर्मभिः। पाशितो जायते कामी म्रियते चाऽसुखावृतः ॥ ४२॥ अरविद्या, पूर्ववासना तथा पुरयपाप रूप कर्मसे बाँधा (फाँसा) हुआ कामी पुरुप सुख-दुःखोंसे.वेरा हुआ जन्म लेता और मरता रहता है ॥ ४२॥ यथोक्तऽर्थे आदरविधोनाय प्रमाणोपन्यास :- पूर्वोक्त विषयमं जिज्ञासुतंका अधिक आदर उत्पन्न करनेके लिए अ्रग्रिम श्लोक द्वारा उसमें प्रमाण देते हैं- श्रुतिश्चेमं जगादार्थ कामस्य विनिवृत्तये। तन्मूला संसृतियस्मात्तन्नाशोऽज्ञानहानतः ॥। ४३।। श्रुति भी कामनातंके परित्याग करनेके लिए इसी अर्थ-विषय-का वर्णन करती है। "क्योंकि यह सारा संसार अज्ञानका कार्य है, अतः अज्ञानका नाश होनेसे यह नष्ट होता है"। का त्वसौ श्रुतिरिति चेत् ? शङ्का-वह श्रुति कौनसी है ?- "यदा सर्वे प्रमुच्यन्त" "इतिन्वि" ति च वाजिनः । कामबन्धनमेवेदं व्यासोऽप्याह पदे पदे॥ ४४ ॥

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२२ नैष्कर्म्यसिद्धि:

उत्तर-"यदा सर्वें प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः ।" यह तथा "इति नु कामयमान" इत्यादि वृहदारएयक-श्रुति 'कामनाओंके छूट जानेपर यह पुरुष ब्रह्मकी प्रास्त हो जाता है' इसी सिद्धान्तका प्रतिपादन करती है और भगवान् श्रीव्यास भी जहों- तहाँ यही बात कहते हैं॥ ४४ ॥ एवं संसारपन्था व्याख्यातः । अथेदानीं तद्वयावृत्तये कर्माया- रादुपकारकत्वेन यथा मोक्षहेतुतां प्रतिपद्यन्ते तथाऽभिधीयते। यह संसारके कारणका, व्याख्यान किया गया। इसके अनन्तर अ्भ उससे छुटकारा पानेके लिए 'कर्म किस प्रकार परम्परासे मोक्षके साधक हो सकते हैं' यह प्रतिपादन किया जाता है- तस्यैवं दुःखतप्तस्य कथश्चित् पुएयशीलनात्। नित्येहाक्षालितधियो वैराग्यं जायते हृदि॥ ४५ ॥ इस प्रकार दुःखसे सन्तत् मनुष्यके हृदयमें, किसी प्रकार पुएयशील हा जानेसे नित्यकर्मानुष्ठानके प्रभावसे चित्तकी शुद्धि होनेसे वैराग्य उत्पन्न हो जाता है॥ ४५। कीदग्वैराग्यमुत्पद्यत इति, उच्यते- किस प्रकारका वैराग्य उत्पन्न होता है, यह त्रग्रिम श्लोकसे कहतें हैं- काम्यफलादप। यथार्थदर्शनात्तस्मान्नित्यं कर्म चिकीर्षति ॥४६ ॥ जिस प्रकार इस साधक पुरुषको नरकसे भय हुआ करता था, उसा प्रकार काम्यकर्मोंके फलसे भी "यह अ्नित्य है और तारतम्यसे युक्त है" इस प्रकारके यथार्थ ज्ञानसे, उसको भय होता है। इसलिए फिर वह (काम्यकर्मोंको छोढ़कर) केवल नित्यकर्म करनेकी इच्छा करता है॥ ४६॥ एवं नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठानेन- शुद्धयमानं तु तच्चित्तमीश्वरापितकर्मभिः । वैराग्यं ब्रह्मलोकादौ व्यनक्त्यथ सुनिर्मलम्॥४७॥ इस प्रकार नित्य और नैमिचिक कर्मोंको ईश्वरापण करनेसे चित शुद्धिकं द्वारा ब्रह्मलोक पर्यन्त समस्त अनात्म वस्तुओंमें अतीव निर्मल-विशुद्ध-वैराग्य हो जाता है॥। ४७ ॥ यस्माद्रजस्तमोमलोपसंसृष्टमेव चित्तं कामब डिशेनाSSकृष्य विषयदुरन्तसूनास्थानेषु निःच्िप्यत, तस्मान्नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठान- परिमार्जनेनापविद्धरजस्तमोमलं प्रसभ्नमनाकुलं सम्मार्जितस्फटिकशिला-

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भाषानुवादसहिता २३

कल्पं बाह्यविषयहेतुकेन च रागद्वेषात्मकेनाSतिग्रहवडिशेनाऽनाकृष्यमायं निर्धूताशेषकल्मषं प्रत्यङ्मात्रप्रवरं चित्तदर्पणमवतिष्ठतेऽत इदमभि- धीयत- क्योंकि रजोगुण और तमोगुके मलसे मलिन हुआ चित ही, काँटेमें लगे आटेसे आकृष्ट हुई मछलीके समान, कामनाओंसे खिंचकर शब्द, स्पर्शादि विषयरूप हिंसाके स्थानोंमें फेंका जाता है। इसलिए जब नित्य तथा नैमित्तिक कर्मोंके अनुष्ठानरूप मार्जनसे रजोगुण और तमोगुणके मलसे रहित हो जानेके कारण प्रसन्न, प्रशान्त एवं वोई हुई स्फटिक शिलाके समान ततीव स्वच्छ, बाह्य विषयोंमें उत्पन्न हुए राग- देषरूप महान् वन्धनकारी बडिशों (बंसी) द्वारा नहीं खींचा जाता हुआ तथा समस्त पाप से रहित और केवल एक आत्माकी ओर ही झुका हुआ चित्तरूप दर्पण स्थिर हो जाता है; तब यह कहा जाता है कि- व्युत्थिताशेषकामेभ्यो यदा धीरवतिष्ठते। तदैव प्रत्यगात्मानं स्वयमेवाऽडविविक्षति ॥।४८ ।। जिस समय बुद्धि समस्त कामनाओंसे हटकर शुद्ध और स्थिर हो जाती है, उस समय वह अपने आप ही आत्माकी तरर प्रविष्ट होने लगती है॥ ४८॥ अतः परमवसिताधिकाराणि कर्माणि प्रत्यकप्रवसतासूनौ कृत- सम्प्रत्तिकानि चरितार्थानि सन्ति- बुद्धि शुद्ध होनेके अनन्तर कर्मोंका सब कृत्य समास हो जाता है। इसलिए वे बुद्धि को आत्माकी और आकर्षण करके (झुका करके) अर्थात् उन्हें अपने सब्र कार्य सौंपकर कृतार्थ हो जाते हैं- प्रत्यकूप्रवणातां बुद्ध: कर्माएयुत्पाद्य शुद्धितः । कृतार्थान्यस्तमायान्ति प्रावृडन्ते घना इव ॥ ४९ ॥ (इस प्रकार) कर्म बुद्धिको शुद्ध करके उसे आत्माकी ओरर लगाके कृतार्थ होकर वर्षा ऋतुके अन्तमें मेघोंके समान अस्त हो जाते हैं॥ ४६॥ यतो नित्यकर्म्मानुष्ठानस्यैष महिमा- तस्मान्मुमुक्षुभिः कार्यमात्मज्ञानाभिलाषिभिः। नित्यं नैमित्तिकं कर्म सदैवाऽऽत्मविशुद्धये॥ ५० ॥ क्योंकि यह बुद्धिका शुद्ध होना आदि सब नित्य कर्मके अनुष्ठानकी ही महिमा है, इसलिए आत्मज्ञानके अभिलाषी मुमुत्तुओंको अपने अन्तःकरखकी शुद्धिके लिए नित्य और नैमित्तिक कर्मोंका अनुष्ठान सर्वदा ही करना चाहिए। ५० ।।

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२४ नैष्कम्यसिद्धि:

यथोक्तऽर्थे सर्वज्ञवचनं प्रमाणम्। कहे हुए विषयमें सर्वज्ञ भगवान् श्रीकृष्णके वचनको प्रमाणरूपसे उद्धत करते हैं- आरुरुक्षोर्मुनेयोंगं कर्म कारमुच्यते। योगारूढस्य तन्यैव शमः करसमुच्यते॥ ५१॥ जो त्त्वज्ञानके साधन ध्यानयोगकों प्राप्त करनेकी इच्छा तो करता है, पर उसका त्नुष्ठान करनेमें समर्थ नहीं है ऐसे साधकके लिए कर्म साधन है और योगानुष्ठानमें समर्थ उसी योगीके लिए शम (संन्यास योग) अर्थात् कर्मोंका त्याग ही साधन है॥५१॥ नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठानादूर्मोत्पत्तिः, धर्मोत्पत्तः पापहानि: त- तश्चित्तशुद्धि:ततः संसारयाथात्म्यावबोधः, ततो वैराग्यम्, ततो मुमुक्षुत्वम्, त- तस्तदुपायपययेषणम्, ततः सर्वकर्मतत्साधनसंन्यासः, ततो योगाभ्यासः, तत-

दः, ततश्र स्वात्मन्येवावस्थानम् ।ब्रह्मैत्र सन् ब्रह्माप्येति', 'विमुक्तश्र विमुच्यते" इति। पारम्पर्येण कमैंवं स्यादविद्यानिवृत्तये। ज्ञानवन्नाविरोधित्वात्कर्माऽविद्यां निरस्यति ॥५२। नित्य औरर नैमित्तिक कर्मोंके अनुष्ानसे धर्मोत्पत्ति, धर्मात्पत्तिसे पापोंका नाश, पापनाशसे चित्तकी शुद्धि, चित्तशुद्धिसे संसारके वास्तविकरूपका बोध, संसारके यथार्थ स्वरूपके ज्ञानसे संसारसे वैराग्य, वैराग्यसे मुक्ति प्राप्त करनेकी (संसार-बन्नोंसे छूटनेकी) इच्छा, मुक्ति- प्राप्तिकी इच्छासे उसके उपायका अन्वेषश, उससे सम्पूर् कर्म और उनके साधनोंका परि- त्याग, तदनन्तर योगाभ्यास, योगाभ्याससे चित्तकी प्रत्यकप्रवणता अर्थात् चित्तका आ्र्रात्मा- की ही तर लगना, उससे 'तत्त्वमसि' (वही नू है) इत्यादि वाक्योंके अर्थभूत शुद्ध- ब्रह्मका साक्षात्कार, साक्षात्कारसे अविद्याकी निवृत्ति और और अविद्याकी निवृत्तिसे केवल आत्मस्व रूपसे परमात्मामें स्थिति होती है। जैसा कि श्रुति प्रतिपादन करती है- "ज्ञान होनेके पूर्व भी ब्रह्मरूपमें स्थित आत्मा ब्रह्म ही को प्राप्त हो जाता है।" "र मुक्त हुआ ही ज्ञान होनेपर मुक्त हो जाता है।" इस प्रकार कर्म परम्परासे अविद्याके नाशमें कारण हो सकता है। परन्तु ज्ञानके समान अविद्याका विरोधी न होनेके कारण अज्ञानकी निवृत्तिका साक्षात्कारण वह नहीं हो सकता ॥ ५२॥ 1

न च कर्मरः कार्यमएवपि मुक्तौ सम्भाव्यते, नापि मुक्तौ यत्सम्भवति तत्कर्माडपेक्षते। तदुच्यते-

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भाषानुवादसहिता २५

कर्मका प्रयोजन तरणुमात्र भी मुक्तिमें सम्भावित नहीं है और जो मुक्तिमें सम्भा- वित है 'स्वरूपमें स्थित होना' वह कर्मकी अपेक्षा नहीं रखता। इसलिए यह कहा जाता है- उत्पाद्यमाप्यं संस्कार्य विकार्य च क्रियाफलम्। नैवं मुक्तिर्यतस्तस्मात्कर्म तस्या न साधनम् ॥ ५३॥ मुक्ति उत्पाद्य, प्राप्य, संस्कार्य और विकार्य, ऐसे चार प्रकारके कर्म-फलेोंमें से कोई भी नहीं हो सकती। इसलिए कर्म उसका साधन नहीं हो सकता॥ ५३॥ एवं तावत् केवलं कर्म साक्षादविद्यापनुत्तये ने पर्याप्तमिति प्रपञ्चितम्, मुक्तौ च सुमृक्षुज्ञानतद्विपयस्वाभाव्यानुरोधेन सर्वप्रकारस्यापि कर्मणोऽसंभव उक्तो 'हितं सम्प्रप्सतामि' त्यादिना। यादशश्राऽडरादुपका- रकत्वेन ज्ञानोत्पत्तौ कर्मणां समुचयः संभवति तथा प्रतिपादितम्। अ्वि- द्योच्छित्तौ तु लब्धात्मस्वभावस्याऽडत्मज्ञानस्यैवाऽसाधारणं साधकतमत्वं नान्यस्य प्रधानभूतस्य गुसभूतस्य वेत्येनदधुनोच्यते। इस प्रकार केवल कर्म साक्षात्सम्पन्वसे अरविद्याका नाश करनेके लिए समर्थ नहीं है, यह विस्तारपूर्वक निरूपण किया गया। अ्ररनित्य कर्म-फलसे विरक्त होना मुमुत्तुका स्वभाव है, प्रमाण एवं वस्तुके परतन्त्र होनेके कारख त्र्प्रविद्याको निवृत्त करना ज्ञानका स्वमाव है और कूटस्थ होनेके कारख साध्य न होना यह ज्ञानके विषय-आत्माका स्वभाव है। इन कारगोंसे मुक्तिमें किसी प्रकारके भी कर्मका कारण (साधन) होना असंभव है, यह "हितं सम्प्रेप्सताम्" (२८) इत्यादि श्लोकोंसे प्रतिपादन किया गया। औरर पर- म्परासम्बन्धसे ज्ञानोत्पच्तिमें उपकारक होनेके कार कर्मका ज्ञानके साथ समुचय जिस प्रकार हो सकता है, वह भी प्रतिपादन कहा किया गया। परन्तु अरविद्याकी निवृत्ति करनेमें तो अपने स्वरूपको प्राप्त हुआर दृढ़ आत्मज्ञान ही प्रधान कारण है, उसका कोई दूसरा प्रधान या गौण भावसे सहायक नहीं है, इस बातका निरूपण अब आगे किया जाता है। तत्र ज्ञानं गुसभूतं तावदहेतुरित्येतदाह उसमें से प्रथम मुक्ति-प्राप्तिमें ज्ञान गौणवसे और कर्म प्रधानभावसे साधन है, इस पक्षका निरास करते हुए कहते हैं- सन्निपत्य न च ज्ञानं कर्माज्ञानं निरस्यति। साध्यसाधनभावत्वादेककालानवस्थितेः ॥५४॥ ज्ञान कर्मका अङ्ग होकर अविद्याकी निवृत्ति नहीं कर सकता, क्योंकि कर्म अन्तःकरण-शुद्धि द्वारा ज्ञानका साधन है, इसलिए साध्यभूत ज्ञानके साथ उसकी एक- कालमें स्थिति न होनेसे ज्ञान और कर्मका अङ्गाङ्गी भाव हो नहीं सकता॥ ५४ ॥ oC

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२६ नैष्कर्म्यसिद्धि:

समप्रधानयोरण्यसभ्भव एव- कर्म और ज्ञान दोनोंका समप्रधानभाव (अर्थात् मोक्ष-सिद्धिमें कर्म और ज्ञान दोनोंकी तुल्यतलता) भी नहीं हो सकता, क्योंकि- बाध्यवाधकभावाच्च पञ्चास्योरणयोरिव । एकदेशानवस्थानान्न समुच्चयता तयोः ॥ ५५॥ जिस प्रकार सिंह और मेषका (भेड़का) परस्पर विरोध होनेके कारण एक स्थानपर रहना असम्भव है। वैसे ही ज्ञान और कर्मका बाध्यवाधक भाव (अर्थात् ज्ञान कर्मका बाधक और कर्म ज्ञानसे बाध्य) होने के कारण, ये दोनों एक ही समय एक पुरुषमें रह ही नहीं सकते, इसलिए समप्रधानभाव भी नहीं हो सकता॥ ५५ू॥ कुतो बाध्यवाधकभावः, यस्मात् शङ्का-इन दोनोंका-कर्म और ज्ञानका-बाध्य-बाधकभाव क्यों है? अयथावस्त्वविद्या स्याद्विद्या तस्या विरोधिनी। समुच्वयस्तयोरेवं रविशार्वरयोरिव ॥५६ ॥ समाधान-चूँकि अज्ञान मिथ्यवस्तुविषयक है और ज्ञान उसका विरोधी है! इसलिए सूर्य और अन्वकारके समान इन दोनोंका समुच्चय हो नहीं सकता ॥ ५६॥ तस्मादकार कत्रह्मात्मनि परिसमाप्तावबोधस्याऽशेषकर्मचेदना नाम चोधस्वाभाव्यात्कुषिठता, कथम् तद्अभिधीयते- कर्ता, कर्म तथा करण आदि कारकोंके लक्षणोंसे रहित अर्थात् जो वास्तवमें किसीका कर्ता, कर्म या करण आदि नहीं हो सकता ऐसे ब्रह्म वस्तुका ज्ञानके द्वारा जिसने साक्षात्कार कर लिया है, उस पुरुषको क्ममें प्रवृत्त करानेमें सम्पूर्णं विधिनिषेध शास्त्र कुरिठत-स्त्रभाव हो जाते हैं। इसका कारण क्या है? यह दष्टान्त द्वारा बतलाते हैं- बृहस्पतिसवे यद्वत क्षत्रियो न प्रवर्तते। ब्राह्मसत्वाद्यहंमानी विप्रो वा कषात्रकर्मणि । ५ ७ ॥ जैसे क्षत्रियत्व्का अभिमान रखनेवाले पुरुषकी ब्राह्मणके लिए विहित बृहस्पति- सव नामक यागमें प्रवृत्ति नहीं होती और ब्राह्मखत्वका अभिमान रखनेवालेकी प्रवृत्ति भी क्षत्रियोचित-राजसूयादि-कममें नहीं होती॥ ५७ ॥ यथाऽयं दृष्टान्त एवं दार्ष्टान्तिकोऽपीत्याह- जैसा यह दृष्ठान्त है, वैसा ही दार्ष्टान्तिक भी है, यह कहते हैं- विदेहो वीतसन्देहो नेतिनेत्यवशेषितः। देहादनात्मदक् तद्वत् तत्क्रियां वीक्षतेऽपि न ॥ ५८ ॥

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भाषानुवादसहिता २७

इसी प्रकार, जिस पुरुषका देहाभिमान तथा सम्पूर्ण सन्देह नष्ट हो गये हैं, जो 'नेति नेति' इत्यादि श्रुति-वाक्यों द्वारा अनात्म वस्तुओरंका बाध करके केवल आत्मस्व- रूपमें स्थित है, वह (निरभिमान एवं निःसन्दिग्ध) पुरुष अनात्माकी-देहादि की- क्रियातंको देखता तक नहीं है॥ ५८ ॥

देहादिमें मिथ्याभिमानवालेकी ही प्रवृत्ति होती है, अभिमान-रहितकी नहीं। इस विपयको दष्टान्त द्वारा समझाते हैं- मृत्स्नेभके यथेभत्वं शिशुरध्यस्य बल्गति। अध्यस्याऽडत्मनि देहादीन् मूढस्तद्वद्विचेष्टते ॥ ५९॥ जैसे मिट्टीके हाथीमें ( खिलौनेमें) यह हाथी है, ऐसा आरोप करके बालक कीड़ा करता है ऐसे ही अज्ञानी पुरुष अनात्म देहादि वस्तुओंका आत्मामें आरोप कर नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करता है॥ ५९॥ न च वयं ज्ञानकर्मणो: सर्वत्रैव समुचयं प्रत्याचक्ष्महे, यत्र प्रयोज्य- प्रयोजकभावो ज्ञानकर्मणोस्तत्र नाडस्मत्पित्राऽपि शक्यते निवारयितुम्। तत्र विभागप्रदर्शनायोदाहरसां प्रदर्श्यते- हम सर्वत्र ही ज्ञान और कर्मके समुच्चयका खएडन नहीं करते, क्योंकि जहाँपर उनका अङ्गाङ्गी भाव है, वहाँ हमारे पिताजी भी उनके समुच्चयका वारख नहीं कर सकते? किस जगहपर ज्ञान और कर्मका अङ्गाङ्गी भाव है? इसका निरूपण करने के लिए उदा- हरण दिखलाते हैं- स्थाणुं चोरधियाऽडलाय भीतो यद्वत्पलायते। बुद्धयादिभिस्तथाऽडत्मानं भ्रान्तोऽध्यारोप्य चेष्टते ॥६०॥ जैसे मनुष्य स्थाणुको-वृक्षके ठूँठको-चोर समझकर मयसे भागने लगता है। वैसे ही भ्रान्त पुरुष आत्माको देहेन्द्रियरूप समझकर कर्म करता है। [ऐसे स्थलोंमें ज्ञान (देहादिमें आत्मज्ञान होनेसे) कर्मोंमें प्रवृत्तिका निमित्त होनेके कारण कर्मका अङ्ग है]॥६० ॥ एवं यत्र यत्र ज्ञानकमणो: प्रयोज्यप्रयोजकभावस्तत्र तत्र सर्वत्रा- डयं न्यायः । यत्र तु न समकालं नाऽपि क्रमेणोपद्यते समुचयः स विषय उच्यते। इस प्रकार जहाँ जहाँ ज्ञान और कर्मका अङ्गाङ्गी भाव है वहाँ सर्वत्र यही न्याय

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२८ नैष्कर्म्यसिद्धि:

समझ लेना चाहिए। और जहाँ ज्ञान एवं कर्मका एक ही समय त्रथवा कमसे भी समुच्चय नहीं हो सकता, उस विषयको तब कहते हैं। स्थाणोः सतच्वविज्ञानं यथा नाडङ्गं पलायने। आत्मनस्तत्वविज्ञानं तद्वनाङ्ग क्रियाविधौ॥ ६१ ॥ जैसे यह चोर नहीं, किन्तु वृक्ष ठूँठ है; इस प्रकारसे सूखे वृक्षका यथार्थज्ञान भागनेमें कारण नहीं होता। वैसे ही आत्माका तत्त्वज्ञान (मैं अकर्ता, अभोक्ता-ब्रह्म हूँ, इस प्रकारका ज्ञान) कर्म करनेमें निमित्त नहीं हो सकता ॥ ६१ ॥ यस्माद्गु रास्यैतत्स्वामाव्यम्- यद्धि यस्याऽनुरोधेन स्वभावमनुवर्तते। तत्तस्य गुशभूतं स्यान्न प्रधानाद् गुशी यत: ॥ ६२ ॥ क्योंकि गुखका (तप्रधानका) यह रूमाव है कि जो जिसके अ्रनुरोधसे जिसके स्वभावका अनुगमन करता है, वह पदार्थ उसका गुगूत कहलाता है। तर जो प्रधानका त्नुगमन नहीं करता बल्कि उसका विरोधी है, वह उसका गुग ( अङ्ग) नहीं कहलाता ॥ ६२ ॥ यस्मात्- कर्म-प्रकरणाकाङृच्ि ज्ञानं कर्म-गुखो भवेत्। यद्धि प्रकरणो यस्य तत्तदङ्ग प्रचक्षते ॥६३॥ क्योंकि कर्मप्रकरणमें यदि ज्ञानका विधान किया गया होता तो वह कर्मका अङ्ग हो सकता क्योंकि जो जिसके प्रकरसमें विहित है वह उसका त्ङ्ग मीमांसा- शास्त्रमें माना गया है॥ ६३ ॥ स्वरूपलाभमात्रेण यत्वविद्या निहन्ति नः । न तदङ्गं प्रधानं वा ज्ञानं स्यात्कर्मणः क्वचित ॥ ६४॥ जो (ज्ञान) उत्पन्न होते ही हमारी अविद्याको समूल नष्ट कर देता है वह ज्ञान कर्मका अङ् अथवा प्रधान नहीं हो सकता है ॥ ६४॥ समुच्चयवादिनाऽप्यवश्यमेव तदभ्युपगन्तव्यम्। यस्मात्- आरत्मज्ञानका कर्मके साथ समुच्य माननेवालेको भी प्रमाणसे उत्पन्न होनेके कारण ज्ञानको अज्ञानका नाशंक अवश्य ही मानना पड़ेगा। क्योंकि- अज्ञानमनिराकुर्वज्ज्ञानमेव न सिध्यति। विपन्नकारकग्रामं ज्ञानं कर्म न ढौकते॥ ६५ ॥

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भाषानुवादसहिता २६

अरज्ञानको निवृत्त किये बिना तो वह ज्ञान ही नहीं कहला सकता। और यदि उसको अज्ञानका नाशक मानिये तो जिसने अज्ञानसे उत्पन्न सम्पूर् कारकोंका नाश कर दिया है वह (ज्ञान) फिर कर्मका स्पर्श ही कैसे कर सकता है॥ ६५ ॥ इदं चाडपरं कारसं ज्ञानकर्मणो: समुच्चय निवर्हि- हेतुस्वरूपकार्याशि प्रकाशतमसोरिव ! विरोधिनि ततो नाऽस्ति साङ्गत्यं ज्ञानकर्मणोः ॥६६ ॥ ज्ञान और कर्मका समुचय न होनेमें यह एक और भी कारण है कि ज्ञानके कारण, स्वरूप और फल कर्मके कारख, स्वरूप और फलसे-अन्धकारके कारण आ्रदिसे प्रकाशके कारस आरप्रदिके समान-सर्वथा परस्पर विरोधी होते हैं। इसलिए उनका-ज्ञान और कर्मका-सहमाव किसी ्रकार भी नहीं हो सकता ॥ ६६ ॥

वाक्यादहंब्रह्मेति विज्ञानं समुत्पद्यते, तन्नैव स्वोत्पत्तिमात्रेसाज्ञानं निरस्यति। कितर्हि? अहन्यहनि द्राधीयमा कालेनोपासीनस्य सतो भावनोपचयान्निःशेषमज्ञानमपणच्छति, "देवो भूत्वा देवानप्येति" इति श्रुतेः। अपरे तु व्र वते-वेदान्तवाक्यजनितमहं ब्रह्मेति विज्ञानं संसर्गात्मकत्वादात्मवस्तुयाथात्म्यावगाह्यव न भवति, किंतर्हि? एतदेव

द्यते तदेवाSशेपाज्ञानतिमिरोत्सारीति 'विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः' इति श्रुतेः । इत्यस्य पक्षद्वयस्य निवृत्तये इदमभिधीयते। [ "ज्ञान उत्पन्न होते ही कर्मका नाशक होता है, इसलिए कर्मके साथ उसका समुच्चय कदापि नहीं हो सकता. यह सिद्धान्त स्थिर हुआ। ] इसपर कोई लोग अपने साम्प्रदायिक बलके सहारेसे यह कहते हैं कि "यह जो वेदान्त वाक्योंसे 'ग्रहं ब्रह्म' (मैं व्रह्म हूँ) ऐसा ज्ञान होता है, वह उत्पन्न होते ही अविद्याकी निवृत्ति नहीं करता किन्तु दीघकालपर्यन्त प्रतिदिन उसका निदिध्यासन करनेसे उसके संस्कार दृढ़ होते हैं तब वह तज्ञानको नष्ट करता है। क्योकि "शवयं देव बनकर देवोंको प्राप्त होता है" यह श्रुति शुद्ध भावनातरंकी वृद्धि होनेसे फिर देहपतनके बाद देवभावको प्रात्त होना प्रतिपादन करती है।' और दूसरे लोग इसपर यह कहते हैं कि वेदान्त-वाक्योंसे उत्पन्न हुआ 'अहं ब्रह्म' यह ज्ञान विशेषण और विशेष्यके सम्बन्धको विष्य करनेवाला होनेके कारण (अर्थात् इसमें 'मैं' इस पदसे विशेष्यरूपसे जीवात्मा और 'ब्रह्म' इस पदसे विशेषणरूपसे

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३० नैष्कर्म्यसिद्धिः

ब्रह्म के सम्बन्धका विषय करनेवाला ज्ञान होता है, इसलिए आत्मवस्तुके यथार्थ स्वरूपको वह विषय ही नहीं कर सकता। किन्तु इसी ज्ञानका निरन्तर गङ्गाप्रवाहके समान अभ्यास करते करते ऐसा एक ज्ञान (जिसमें विशेषण, विशेष्य और उनका सम्बन्ध, इन तीनीं पदार्थोंका भान नहीं होता) उदय होता है। वही सम्पूर्ण अज्ञानान्धकारको दूर करता है। क्योंकि "विज्ञाय"-इस प्रथम शब्दसे विशिष्ट ज्ञानको प्राप्त कर पश्चात्-'प्रज्ञां कुर्वीत'-निर्विकल्प ज्ञानका सम्पादन करे, ऐसा यह श्रुति प्रतिपादन करती है।" इन दोनों पक्षोंका खएडन करनेके लिए अग्रिम प्रकरणका प्रारम्भ किया जाता है- सकृत्प्रवृत्या मृद्नाति क्रियाकारकरूपभृत्। अज्ञानमागमज्ञानं साङ्गत्यं नाऽस्त्यतोऽनयो: ॥६७॥ वेदान्तवाक्योंसे उत्पन्न हुआ व्रह्मज्ञान उत्पन्न होते ही क्रिया, कारक आदि द्वैतके उत्पादक अज्ञानको नष्ट कर देता है। इस कारणसे इन दोनोंका सम्बन्ध कदापि नहीं हो सकता ॥ ६७ ॥ एवं तावदनानात्वे ब्रह्मणि ज्ञानकर्मणोः समृचयो निराकृतः । अथाऽधुना पक्षान्तराभ्युपगमेनाऽपि प्रत्यवस्थाने पूर्ववदनाश्वासो यथा तथाऽभिधीयते- इस प्रकार एक अद्वितीय अ्खएड ब्रह्मको मानकर ज्ञान और कर्मके समुच्चयका निराकरण किया। अब इसके अनन्तर यदि कोई जीवात्मका ब्रह्मके साथ मेदाजमेदवाद मानकर भी उसकी प्राप्तिके लिए ज्ञान-कर्मका समुच्चय सिद्ध करे तो भी पूर्ववत् ही दोष आते हैं, यह कहा जाता है- अनुत्सारितनानात्वं ब्रह्म यस्याऽपि वादिनः । तन्मतेनाऽपि दुःसाध्यो ज्ञानकर्म्मसमुचचयः॥६८॥ जिस वादीके मतमें जीवसे ब्रह्म पृथक् भी है और अभिन्न भी है, उसके भतमें भी उसकी प्राप्तिके लिए ज्ञान कर्मका समुच्चय होना कठिन है॥ ६८॥ तस्य विभागोक्तिर्दूषणविभागप्रज्ञप्ये- भेदवादियोंके मतोंमें पृथक्-पृथक् दूषण दिखानेके लिए उनका मत कितने प्रकार का है, यह बतलांते हैं- ब्रह्मात्मा वा भवेत्तस्य यदि वाऽनात्मरूपकम् ।

उन वादियोंके मतमें ब्रह्म आत्मरूप हैं, किवा आत्मभिन्न-अनात्मरूप है ?

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भाषानुवादसहिता ३१

यदि आत्मरूप ही है, तब तो उसकी अप्राप्ति अज्ञानसे ही माननी पड़ेगी और यदि ब्रह्म जीवात्मासे भिन्न ही है, तो वास्तवमें अनात्मा होनेसे सर्वदा उसकी अप्रासि ही रहेगी; फिर वहाँ ज्ञान या कर्मसे क्या प्रयोजन है ? तत्र यदि वास्तवेनैव वृत्तेन ब्रह्मप्राप्तमात्मस्वाभाव्यात्केवल- मासुरमोहपिधानमात्रमेवाऽनाप्तिनिमित्तं तस्मिन्पक्षे- यदि ब्रह्म आत्मरूप होनेके कारण वास्तवमें प्राप्त ही है, तब तो केवल अज्ञानका, जो आसुर मोह कहलाता है, आवरमात्र ही ब्रह्मकी अप्राततिमें कारण होगा। सो उस पक्षमें- मोहापिधानभङ्गाय नैव कर्माशि कारणम्। ज्ञानेनैव फलवाप्तेस्तत्र कर्म निरर्थकम्॥७० ॥ मोहावरणका नाश करनेके लिए कर्म कारण नहीं बन सकता, क्योंकि ज्ञानसे ही उसकी (मोहकी निवृत्ति) हो जायगी। वहाँ कर्म निरर्थक ही होगा॥ ७०॥ अनात्मरूपके तु ब्रह्मणि न कर्म साधनभावं प्रतिपद्यते नाऽपि ज्ञानं कर्मसमुच्चितमसमुच्चितं वा, यस्मादन्यस्य स्वत एव साधकस्य ब्रह्मणोऽप्यन्यत्वं स्वत एव सिद्धम्। तत्रैवम्- और यदि ब्रह्म आत्मासे भिन्न है तो भी (मोहकी निवृत्तिमें) कर्म साधन नहीं हो सकता और न कर्मसहित अथवा केवल ज्ञान ही साधन हो सकता है, क्योंकि ब्रह्म- प्राप्तिके लिए साधनोंका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषको-ब्रह्मसे स्वत एव भिन्न होनेके कारण-ब्रह्मकी प्राति नहीं हो सकेगी। यदि कहो कि जीवका ब्रह्मके साथ है तो वास्तवमें भेद ही, परन्तु उस भेदको ही नष्ट करनेके लिए प्रयत्न करते हैं ? [ तो यह नहीं हो सकता, क्योंकि-] अन्यस्याऽन्यात्मताप्राप्तौ न क्वचिद्धतुसम्भवः । तस्मिन्सत्यपि नाऽनष्टः परात्मानं प्रपद्यते॥ ७१॥ अन्यका अन्यके साथ अभेद कर देनेके लिए कहीं भी कोई हेतु नहीं देखा गया है। यदि अन्यरूप होनेवाला विद्यमान रहे तो वह विरुद्ध होनेके कारण अन्यका रूप नहीं बन सकता। यदि वह नष्ट हो जाय तो अन्यरू कौन होगा ? क्योंकि वह तो रहा हो नहीं जो दूसरेका रूप बन जाय ।। ७१ ॥ अपरस्मिंस्तु पक्षे न विधि :- परमात्मानुकूलेन ज्ञानाभ्यासेन दुःखिनः । द्वैतिनोऽपि विसुच्येरन् न परात्मविरोधिना॥ ७२॥

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३२ नैष्कर्म्यसिद्धिः

जिनके सिद्धान्तमें जीवात्माका व्रझ्मके साथ भेदाभेद (अर्थात् स्त्व, चैतन्य, विभुत्व आदि साधम्यसे अभेद और अल्पज्ञत्व, कर्मफलभोक्तृत्व आदि वैधर्म्यसे भेद) माना जाता है, उनको भी केवल अद्वतज्ञानसे मोक्ष न मानकर "मैं ब्रह्मरूप हूँ" इस आत्मरूपताके अनुकूल भावनाकी (जिसको उपासना कहते हैं) मोक्षकी प्राप्तिके लिए विधि माननी पड़ेगी। इस आत्मस्वभावानुकूल 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकारकी भावनासे बेचारे दुःखी द्वैतवादी लोग भी मुक्त हो जायँगे। परन्तु आ्रत्मस्वरूपके विरुद्ध कमोंसे नहीं ॥ e२ ॥ इतरस्मिस्तु पक्षे विधेरेवाऽनवकाशत्वम्। कथम् ? और जिस मतमें जीव और ब्रह्मका सवथा अभेद ही है, उस पक्षमें तो उपासना-विधिके लिए भी अवकाश नहीं है। क्योंकि- समस्तव्यस्तभूतस्य ब्रह्मएयेवाऽवतिष्ठुतः । ब्रूत कर्माणि को हेतुः सर्वानन्यत्वदरशिनः ॥ ७३॥ जो समस्त कर्म करनेवालेमें से पृथक हो गया है, अथवा जो समष्टि-व्यष्टिरूप हुआ है तथा जो केवल ब्रह्म में ही स्थित है, उस-सत पदार्थोंके साथ अभेदको जाननेवाले-पुरुषको आ्रप ही कहिए, कर्ममें कौन प्रवृत्त कर सकता है?॥ ७३॥ सर्कर्मनिभित्तसंभवाऽसंभवाभ्यां सर्वकर्मसङ्गर्श् प्रामोति। यस्मात- अभेदपक्षमें ब्रह्मज्ञानीकी कर्ममें प्रवृत्ति मान ली जाय तो- उसकी प्रवृत्तिमें कर्गोंका सङ्कर हो जाएगा। क्योंकि- सर्वजात्यादिमत्वेऽस्य नितरां हेत्वसम्भवः । विशेषं हयनुपादाय कर्म नैव प्रवर्तते॥ ७॥॥ ब्रह्मज्ञानी पुरुष तो सर्वात्मक ब्रह्मके साथ एकीभूत होनेके कारण सभी जातियों- से युक्त हुआ है। इस कारण ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य, इनमें से किसी एकके ही कर्ममें इसकी प्रवृत्ति होनेका कोई कारण नहीं है। और बिना 'मैं ब्रह्मण हूँ, या 'क्षत्रिय हूँ' इत्यादि विशेषके समझे कममें प्रवृत्ति नहीं हो सकती और उसको यह विशेष ज्ञान रहता नहीं। इस कारण उसकी किसी कममें प्रवृत्ति नहीं होती॥ ७४॥ स्याद्विधिरध्यात्माभिमानादिति, चेन्नैवम्। यस्मात्- न चाध्यात्माऽभिमानोऽपि विदुषोऽस्त्यासुरत्वतः । विदुषोऽप्यासुरश्रेत्स्यान्निष्फलं ब्रह्मदर्शनम् ॥७५॥ शङ्का-यद्यपि ब्रह्मज्ञानीका सर्वात्मक ब्रह्मके साथ अभेद है, तथापि ब्राह्माण,

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भाषानुवादसहिता ३३

क्षत्रिय, वैश्य आदि जातियोंसे युक्त शरीरका अ्मिमान होनेके कारण 'मैं ब्राह्मख हूँ' इत्यादि विशेष भावको प्रात्त होकर ब्राह्मखादि जात्युचित कर्मोंमें प्रवृत्ति होनी चाहिए ? समाधान-यह ठीक नहीं; क्योंकि ब्रह्मज्ञानीको ग्रासुर मोह न होनेके कारण देहादिमें ममत्व- बुद्धि ही नहीं है। यदि ब्रह्मज्ञानीको भी आसुर मोह 'माना जाय, तब उसका ब्रह्मज्ञान निष्फल हो जायगा ॥ ७५॥ अज्ञानकार्यत्वाच्च न समकालं नापि क्रमेण ज्ञान-कर्मणोर्वस्त्व- वस्तुतन्त्रत्वात् सङ्गतिरस्तीत्येवं निराकृतोपि काशं कुशं वाडवलंम्ब्याSडह। कर्म अज्ञानका कार्य है और ज्ञान उसका नाशक है। इसलिए कर्म और ज्ञानका एककालमें सम्बन्ध नहीं हो सकता और न क्रमसे हो सकता है, क्योंकि ज्ञान वस्तुके तधोन होता है। कर्मका यथावत् वस्तुके अधीन होनेका कोई नियम नहीं है। इस प्रकार पूर्वप्रकरएमें ज्ञान और कर्मके सहभावका निराकरण करनेपर भी वादी काश- कुशावलम्बन न्यायसे फिर शङ्का करता है- अथाऽध्यात्मं पुनर्यायादाश्रितो मूढतां भवेत्। स करोत्येव कर्माशि को ह्यज्ञं विनिवारयेत् ॥ ७२ ॥ यदि तत्त्वज्ञानीको भी शरीर, इन्द्रियादिमं अभिमान होता है ऐसा मान लीजिए तो यह ठीक नहीं। क्योंकि जिसको देहादिमं अभिमान रहेगा, वह तत्वज्ञानी ही नहीं, किन्तु अज्ञानी ही कहलाएगा। फिर अज्ञ तो कर्मोका आचरण करता ही है, उसको (कर्मोंसे) हटा ही कौन सकता है ?॥ ७६ ॥ सिद्धूत्वाच्च न साध्यम्ं, यत :- सामान्येतररूपाभ्यां कर्मात्मैवाऽस्य योगिनः । निःश्वासोच्छ्रासव त्तस्मान नियोगमपेक्षते॥७७ ॥ ब्रह्मज्ञानीके लिए आप जो कर्म कर्तव्य मानते हैं, उसके विधान करनेकी आरव- श्यकता नहीं, उसके लिए कर्म तो स्वयं ही सिद्ध हैं। इसमें कारण यह है कि ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मस्वरूप हो जाता है, संसारमें जो कुछ भी सामान्य और, विशेषरूप वस्तु है, वह सब्र ब्रह्मसे अरभिन्न है। कर्म भी सामान्य-विशेषमें अरन्तर्भूत होनेके कारण ब्रह्मस्वरूप है, इस- लिए ब्रह्मज्ञानीसे भिन्न नहीं है। अतएव श्वास-प्रश्वासके समान स्वतः सिद्ध होनेके कारण वह (कर्म) कृतिका विषय नहीं है और न किसी विधि-विशेषकी अपेक्षा करता है॥७७॥ आस्तु तर्हि भिन्नाभिन्नात्मकं ब्रह्म। तथा च सति ज्ञानकर्मणी सम्भवतो भेदाभेदविषयत्वात्तयोः । तत्र तावदयं पक्ष एव न सम्भ- वति। किं कारणम् ? न हि मिन्नोऽयमित्यभेदबुद्विमनिराकृत्य भेद-

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३४ नैष्कर्म्यसिद्धि:

बुद्धिः पदार्थमालिङ्गते। एवं ह्यनम्युपगमे भिन्नाऽभिन्नपदार्थयोरलौकिक- न्वं प्रसज्येत। अथ निष्प्रमाणाकमप्याश्रीपते, तदप्युभयपक्षाभ्युपगमाद- भेदपक्षे दुःखि ब्रह्म स्यादित्यत आरह- शङ्का-अच्छा, यदि अभेदपक्षमें दोष आते हैं, तो ब्रह्मको जीवसे भिन्न और अभिन्न, दोनों ही प्रकारसे मान लिया जाय? ऐसा मान लेनेसे ज्ञान और कर्म-दोनों की ही व्यवस्था हो जाएगी, क्योंकि भेद-बुद्धिसे कर्मानुष्ठान और अभेदबुद्धिसे 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकारका ज्ञानभीं सङ्गत हो जाएगा ? समाधान-यह तो पक्ष ही नहीं बन सकता, क्योंकि यह उससे भिन्न है, इस प्रकारकी बुद्धि एक ही पदार्थमें, यह उससे भिन्न नहीं है, इस प्रकारकी बुद्धिका निराकरण किए बिना नहीं उत्पन्न हो सकती। यदि यह न माना जाय तो ये दोनों पदार्थ लोकमें अरप्रसिद्ध हो जाएगे। यदि प्रमाणसे रहित होनेपर भी भेदाडभेदपक्षका अनलम्बन करते ही हो, तो अभेद पक्षमें ब्रह्म के दुःवी होनेका दोष आएगा। इसी बातको कहते हैं- भिन्नाभिन्नं विशेषश्रे्ःखि स्याद् ब्रह्म ते ध्रुवम्। अशेषदुःखिता चेत्स्यादहो प्रज्ञाऽऽत्मवादिनाम्॥ ७८॥ सामान्य और विशेषरूपसे वर्तमान सब वस्तुओंके साथ यदि ब्रह्मको अभिन्न मानो तो सम्पूर्णणं वस्तु दुःखमय हैं, इसलिए निश्चय ही ब्रह्म दुःखमय हो जाएगा। क्योंकि सम्पूर्ण जीवोंका ब्रह्मके साथ त्भेद हो जाएगा इससे जीवोंका सम्पूगों दुःख भी ब्रह्ममें आ जाएगा। ऐसा माननेसे तो जो ज्ञानी लोग ब्रह्मको प्राप्त होंगे वे दुःखमय ब्रह्मको प्राप्त होनेके कारण संसारियोंसे भी निकृष्ट हो जाएँगे। यदि ऐसा ही आपको स्वीकार है तो वलिहारी है आपकी बुद्धिकी, जो कि महान् दुःखको पुरुषार्थ समझ रही है!॥७८ ॥ तस्मात्सम्यगेवाऽभिहितं न ज्ञानकमशोः समुचय इत्युपसंहियते- इसलिए यह बहुत ठीक कहा गया है कि -- (मुक्तिप्राप्तिकेलिए) ज्ञान और कमका समुच्चय नहीं हो सकता। इसका उपसंहार (अग्रिम-श्लोकसे) करते हैं- तमोऽङ्गत्वं यथा भानोरगने: शीताङ्गता यथा। वारिसश्रोष्णता यद्वज्ज्ञानस्यैवं क्रियाङ्गता॥ ७९॥ जिस प्रकार सूर्यको अन्धकारका, अरग्निको शीतका और जलको उष्णताका अङ्ग मानना सवथा अज्ञपन है, इसी प्रकार ज्ञानको कर्मका अङ्ग मानना भी सर्वथा अज्ञपन है। अर्थात् जैसे सूर्य, अभि और जल अन्धकार, शीत और उष्खताके नाशक होनेके कारण उनके अङ्ग नहीं हो सकते, वैसे ही ज्ञान भी कर्मका नाशक होनेके कारण उसका अङ्ग नहीं हो सकता॥ ७६॥

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भाषानुवादसहिता ३५

यथोक्तोपपत्तिवलेनैव पूर्वपक्षस्योत्सारितत्वाद् वक्तव्यं नाऽवशे- षितमित्यतः प्रतिपत्तिकर्मवत्पूर्वपक्षपरिहाराय यत्किश्चिद्वक्तव्यमित्यत इदमभिधीयते। मुक्ति-प्रापतिका एकमात्र साधन ज्ञान ही है, यह सिद्ध होनेसे केवल कर्म अरथवा ज्ञानकमका समुच्चय मुक्तिका साधन नहीं हो सकता, यह बात स्वत एव सिद्ध हो गयी। अत्र इस विषयमें कहना तवशिष्ट नहीं है। तथापि पूर्वपक्षीने कर्मको मुत्तिका साधन सिंद्ध करनेमें जो युक्तियाँ दी हैं, उनका खएडन जब्र तक न किया जाय तब तक पराधीन बुद्धिवाले लोगोंको सन्तोष नहीं होगा इसलिए प्रतिपत्ति कमसे (अर्थात् जिस वस्तुसे कार्य हो चुका वह फिर निरर्थक हो जाती है उसका त्याग स्वयमेत हो जाता है, परन्तु उसको विधिपूर्वक किसी स्थल-विशेषपर प्रत्ित कर देना (रख देना) अच्छा होता है, इस प्रकारसे) पूर्वपक्षीकी सम्पूर्ण युक्तियोंका परिहार करनेके लिए कुछ कहना बाकी है। उसके लिए यह प्रकरण आरम्भ किया जाता है- मुक्त: क्रियाभिः सिद्धत्वादित्याद्यनुचितं बहु। यदभाशि तदन्याय्यं यथा तदधुनोच्यते॥ ८० ॥ काम्य तथा निषिद्ध कमोंके त्यागपूर्वक नित्य कर्मोंका त्र्नुष्ठान करनेसे मुक्ति- प्राप्ति हो जाती है, फिर उसके लिए ज्ञानकी क्या आवश्यकता है? इत्यादि पूर्वपक्षीका कथन जिस प्रकार अयुक्त है, वह अब कहते हैं॥ ८० ॥ योडयं काम्यानां प्रतिषिद्धानां च त्यागः प्रतिज्ञायते सा प्रतिज्ञा तावन्न शक्यतेऽनुष्ठातुंम्। कि कारखम् ? कर्मणो हि निर्वृत्तात्मनो द्वाभ्यां प्रकाराभ्यां निवृत्तिः सम्भवति। आरब्धफलस्योपभोगेनाS- नारब्धफलस्याऽशुभस्य प्रायश्चिचैरिति। तृतीयोऽपि त्यागग्रकारोडक- त्रात्मावबोधात्, स त्वात्मज्ञानाऽनभ्युपगमाद् भवता नाऽभ्युपगम्यते। तत्र यान्यनुपभुक्तफलान्यनारब्धफलानि तानीश्वरेखाऽपि केनचिदपि न शक्य- न्ते परित्यक्तुम् । अथाऽऽरब्धफलानि त्यज्यन्ते तान्यपि न शक्यन्ते त्य- क्तुम्। किं कारणम् ? अनिवृत्तेः। अनिर्वृत्तं हि चिकीर्षितं कर्म शक्यते त्यक्तुम्, प्रवृत्तिनिवृत्ती प्रति कर्तुः स्वातन्त्र्यात्। निर्वृत्ते तु कर्मणि तदस- म्भवाद् दुरनुष्ठेयः प्रतिज्ञातार्थः। अशक्यप्रतिज्ञानाच। न शक्यते प्रतिज्ञातुं यावज्जीवं काम्यानि प्रतिषिद्धानि च कर्माणि न करिष्यामीति सुनिपुणा- नामप्यपराधदर्शनात् प्रमाणाभावाच्च। न च प्रमाणमस्ति मोक्षकामो

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३६ नैष्करम्यसिद्धि:

नित्यनैमित्तिके कर्मणी कुर्यात्काम्यप्रतिषिद्धे च वर्जयेद् आरब्धले चोप- भोगेन नपयेदिति। आनन्त्याच्च। न चोपचितानां कर्मणामियत्ताडस्ति, संसारस्याऽनादित्वात्। न च काम्यैः प्रतिषिद्वैर्वा तेषां निवृत्तिरस्ति । शुद्धयशुद्धिसाम्ये सत्यविरोधादित्यत आरराह- यह जो काम्य और प्रतिषिद्ध कर्मके त्यागकी प्रतिज्ञा की जाती है, उसका पालन नहीं हो सकता, क्योंकि, जो कर्म हो चुके उनकी निवृत्ति दो ही प्रकारसे की जासकती है। (१) जिन शुभाशुभ कर्मोंने फल देना आरम्भ कर दिया है, उनकी निवृत्ति उप- भोगसे और (२) जिन्होंने फल देना आरम्भ नहीं किया है, ऐसे अशुभ कर्मोंकी (निवृत्ति) प्रायश्चित्तसे। और हाँ, एक तीसरा प्रकार भी-'मैं अरकर्ता हूँ, अभोक्ता हूँ' इस प्रकार का ज्ञान भी-किए हुए करमोंकी निवृत्तिका कारण है। परन्तु उसको तो आत्मज्ञानको न माननेवाले आप (कर्मवादी लोग) मानते ही नहीं हो। उनमें से जिनका फल भोगा नहीं गया है और जिन्होंने फल देना आरम्भ नहीं किया है, उनका नाश तो बिना भोगे ईश्वर अथवा और कोई भी नहीं कर सकता। और जिन्होंने फल देना आरम्भ कर दिया है उनका भी नाश नहीं हो सकता, क्योंकि किए हुए कर्मोंका नारा माननेमें तुम्हारे- कर्मवादियोंके-मतमें दोष आएगा। और जो कर्म अभी किया नहीं गया है; किन्तु जिसके करनेकी इच्छामात्र की गई है, उस कर्मका त्याग हो सकता है। क्योंकि अपनी प्रवृत्तिके रोक लेनेमें कर्ताको स्वतन्त्रता है। परन्तु जब कर्म कर लिया तव तो उसकी निवृत्ति होना सवथा असम्भव है। इसलिए आपकी प्रतिज्ञाका पालन होना कठिन है, कठिन क्या सर्वथा अशक्य है। कोई भी यह प्रतिज्ञा नहीं कर सकता कि मैं जब्न तक जीऊँगा तब तक काम्य या प्रतिषिद्ध कर्म नहीं करूँगा। क्योंकि बड़े-बड़े सुनिपुण-कर्तव्यपरायणोंसे भी सूक्ष्म अप- राध हो जाते हैं और इसमें कोई प्रमाण भी नहीं मिल सकता। ऐसा कोई मी शास्त्रका प्रमाण नहीं है जो यह कहता हो कि "मोक्षकी इच्छावाला नित्य नैमित्तिक कर्म करे, काम्य और निषिद्ध कर्मको छोड़ दे और जिन्हांने फल देना आरम्भ कर दिया है, उन्हें भोग कर समाप्त कर दे।" कर्म त्र्नन्त हैं। संसार अनादिं होनेके कारण किये हुए, कर्मोंका कोई अन्त नहीं है और न काम्य एवं प्रतिषिद्ध कर्मोंसे उनकी निवृत्ति हो सकती है। क्योंकि दोनींमें शुद्धि तथा अशुद्धि बरातर होनेके कारण विरोध नहीं है। यही बात अरग्रिम श्लोकसे कहते हैं-

निषिद्धकर्मणश्रेत्त व्यतीतानन्तजन्मसु ॥८१ ॥ जन्म-जन्मान्तरोंमें अरप्रनुष्ठित सम्पूर्ण काम्य अथवा निषिद्ध कर्मोंका त्याग उनके अरनन्त होनेके कारण सम्भव नहीं हो सकता ॥८१ ॥

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भाषानुचादसहिता ३७

स्यान्मतं व्यतीतानन्तजन्मोपात्तानां कर्मणाम्- क्षयो नित्येन तेषां चेत्प्रायश्िैर्यथैनसः। निष्फलत्वान्न नित्येन काम्यादेविनिवारयम्।। ८२ ।। यदि कहो कि व्यतीत अरनेक जन्मोंमें किये हुए कर्मों का इस जन्मके नित्यकर्मा- नुष्ठानसे, प्रायश्चित्तसे पापनिवृत्तिके समान, नाश हो जाएगा? तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि तुम्हारे मतमें नित्यकर्म निष्फ़ल हैं, इसलिए काम्य कर्मोंकी निवृत्ति करना उनका फल नहीं हो सकता ॥ ८२ ॥ प्रमाणाभावाच, कथम् ?- पापापनुन्तये वाक्यात्प्रायश्चित्तं यथा तथा। गम्यत काम्यहानार्थ नित्यं कर्म न वाक्यतः ॥। =३ ।। और नित्यकम के अ्रनुष्ठानसे काम्यकमोंकी निवृत्ति होती है, इसमें कोई प्रमाण भी नहीं है, क्योंकि जैसे प्रायश्चित्तसे पाप निवृत्त होता है, इस विषयमें शास्त्रके वाक्य प्रमाण हैं उसी प्रकार नित्यक्मोंके अनुष्ठानसे काम्यक्मोंकी निवृत्ति होती है, इस विषयमें कोई वाक्य प्रमाण नहीं है ।। ८३ ॥ अथाऽपि स्यात्काम्यैरेव काम्यानां पूर्वजन्मोपचितानां क्यो भविष्यतीति। तन्न। यत :- यदि यह कहो कि वर्तमान जन्ममें किये हुए काम्य क्मोंसे ही पूर्वजन्ममें किये काम्य कर्मोंका क्षय हो जायगा, तो यह भी युक्त नहीं। क्योंकि- पाप्मनां पाप्मभिर्नाऽस्ति यथैवेह निराक्रिया। काम्यैरपि तथैवाऽस्तु काम्यानामविरोधतः ॥८४॥ जसे पापोंसे पापोंकी निवृत्ति नहीं हो सकती, इसी प्रकार विरोध न होने के कारण काम्य कमोंसे काम्यकर्मों की निवृत्ति भी नहीं हो सकती॥ ८४ ॥ एवं तावन्मुक्ते: क्रियाभिः सिद्धत्वादिति निराकृतम्। अथाऽऽ- त्मज्ञानस्य सद्भावे प्रमाणाऽसम्भव उक्तस्तत्परिहारायाऽडह- इस प्रकार "मुक्ति क्रियाओंसे ही सिद्द है, उसके लिए ज्ञानकी क्या आवश्यकता है ?" इस पक्षका निराकरण किया गया। अब आत्मज्ञानके अस्तित्वमें पूर्वपक्षीने जो प्रमाणोंका अभाव बताया था, उसका प्रतिकार करनेके लिए कहते हैं- श्रृतयः स्मृतिभिः साकमानन्त्यात्कामिनामिह। विदधत्युरुयत्नेन कर्माडतो भूरिकामदम्॥ ८५ ॥

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नैष्कर्म्यसिद्धि:

जगत्में कामी पुरुषोंकी संख्या अत्यन्त अधिक है। इस कारख समस्न श्रुति और स्मृतियाँ इच्छ्ित फल देनेमें समर्थ अ्रनेक कर्मोंका विधान करती हैं। [ इससे यह नहीं सिद्ध होता कि आत्मज्ञान नहीं है अथवा वह मोक्षका सुख्य साधन नहीं है। इसलिए वादीका यह कहना कि "आत्मवस्तुविपयक ज्ञानका प्रतिपादक कोई प्रमाण नहीं मिलता" सर्वथा असङ्गत है ]॥८ ॥ न च बाहुल्यं प्रामाएये कारणभावं प्रतिपद्यते। अत आरह यदि कोई शङ्का करे कि 'जिस विपयके प्रतिपादक वाक्य अ्रधिक होंगे वे ही प्रमाण माने जाएँगे। जो अल्प हैं वह प्रमाण नहीं माने जा सकते। सुतरां कर्म- विधायक वाक्य अधिक हैं और ज्ञान विधायक वेदान्त वाक्य अ्रत्यन्त ही अल्प हैं, अनः अनन्त कर्म-विधायक वाक्योंके बलसे थोड़ेसे ज्ञानविधायक वेदान्तवाक्योंका नात्पर्य मी कममें ही मानना चाहिए। स्वतन्त्र आरत्माका प्रतिपादन करनेमें नहीं।' नो यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि- प्रामासयाय न बाहुल्यं न ह्यकत्र प्रमाणताम्। वस्तुन्यटन्ति मानानि त्वेकत्रैकस्य मानता ॥ ८६ ॥ वेदान्तवाक्योंका प्रामारय स्वतःसिद्ध होनेके कारख उनको अपने विषयको सिद्धिके लिये दूसरे अनुमोदक प्रमाणकी आवश्यकता नहीं है। यह कोई नियम नहीं है कि किसी एक िपयके प्रतिपादक वाक्य जबतक दूसरे वाक्य अनुमोदक न हो, प्रमाण ह। नहीं हो सकते। और कमेकाएडमें भी तो एक-एक कर्ममें एक-एक वाक्यको ही प्रमाग मान 'लिया जाता है। कर्म अ्रनेक हैं, इसलिए उनके प्रतिपादक वाक्य भी अ्रनेक ही होने चाहिए। परन्तु आत्मा तो एकरूप है। अतएव अल्पसंख्यावाले भी वेदान्त- वाक्य उसके (आत्माके) ज्ञानके प्रतिपादनमें अ्र्धिक होंगे॥ द६ ॥ यत्तुक्तं 'यत्रतो वीक्षमाणोऽपीति' तत्राऽपि भवत एवाऽपराध: कस्मात : यत :- और पहले जो यह कहा था "यत्नसे देखनेपर भी वेदान्त-वाक्योंमं आरत्मज्ञानका विधान नहीं मिलता, इसलिए वेदान्त वाक्य आत्मज्ञानमें प्रमाण नहीं हैं ?" इसमें भी आपका ह। अपराध है। क्योंकि- 'परीक्ष्य लोकान्' इत्याद्या आत्मज्ञान-विधायिनीः । नैष्कर्म्यप्रवणणाः साध्वीः श्रुतीः किं न शृणोषि ताः ॥ ८७ ॥ "कमोंसे सम्पादित भोग्य-विषयोंको अनित्य समझकर" इत्यादि कर्मफलेंको अनित्य और हेय बतलानेवाली, आत्मज्ञानके लिए आचार्यके समीप गमनका विधान करनेवाली और मोक्षका मार्ग बतलानेवाली पवित्र श्रुतियोंको क्या आप नहीं सुनते ?

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माषानुवादसहिता ३९

ननु 'आत्मेत्येवोपासीत' 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यपूर्व- विधिश्रुतेः पुरुषस्याऽऽत्मदर्शनक्रियायां नियोगोऽवसीयत इति। नैवम्।

रिणो मुक्तिहेतोरिति, विध्यम्युपगमेऽपि नाडपूर्वविधिरयम्। यत आ्रराह- शङ्का-'त्त्मेत्येवोपासीत' 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादि अरपूर्वविधिश्रुतियोंसे "यह समस्त संसार आत्मा ही है, ऐसी उपासना करो" "आत्माका दर्शन करना चाहिए" इस प्रकार पुरुषके लिए आत्मदर्शनरूप क्रियाकी विधि पाई जाती है। तब आप कैसे कहते हैं कि 'वेदान्तवाक्य क्रियापूरक नहीं हैं।' उत्तर-यह शङ्का उचित नहीं है, क्यों कि, विधि उसी विषयमें हो सकती है जिसके करने, न करने और अन्यथा (विपरीत) करनेमें पुरुष स्वतन्त्र हो। जैसे कि "(अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः) स्वगकी इच्छावाला पुरुष अरग्निहोत्र द्वारा स्वर्गको प्राप्त करे।" इस विधिमें अग्निहोत्र करना पुरुषके अधीन है, वह चाहे उसे करे, या न करे अथवा विपरीत करे। परन्तु समस्त अनर्थोंके बीजोंका नारक और मुक्तिका हेतु तत्त्वज्ञान तो पुरुषके अरधीन नहीं है, किन्तु प्रमाण और प्रमेयके अधीन है [ जैसे भाद्रपट शुक्ल चतुर्थीके दिन चन्द्रदर्शनका निषेध होनेपर भी चन्द्रका, चत्तुके साथ सम्बन्ध होनेपर, ज्ञान हो ही जाता है। किसीसे रुकता नहीं है। ] अतएव उसमें विधिकी अपेक्षा नहीं है। यदि विधि मानी भी जाय तो अपूर्व विवि नहीं मान सकते। यह बात अग्रिम श्लोकसे कहते है --

*अपूर्व, नियम और परिसङ्गया, इन भेदोंसे विधि तीन प्रकारकी है। (१) अपूर्व- विधि-जिससे ऐसी कोई बात विधान की जाय, जो किसी दूसरे प्रकारसे प्राप्त न हो। जैसे-'अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः' इस श्रुतिसे स्वर्गाभिलाषियोंको अरग्निहोत्र द्वारा स्वर्ग प्राप्त करना बतलाया है। बिना इस वाक्यके स्वर्गाभिलाषी लोग अभ्निहोत्रमें प्रवृत्त नहीं हो सकते थे। इस वाक्यने स्वर्गाभिलाषियोंके लिए स्वगका एक नूतन साधन का विधान किया, इसलिए स्वर्गप्राप्तिके लिए यह त्र््रग्निहोत्रकी विधि 'त्पूर्वविधि' है। (२) नियम- विधि-जिससे, किसी कृत्यके दो प्रकार प्राप्त हों तो (उनमेंसे) एकका निषेध करके एकका विधान किया जाता है। जैसे-'व्रीहीनवहन्ति' यहाँ धानोंका तुषरहित करना प्रयोजन है। वह नख-विदलनादिसे (नाखूनोंसे) भी हो सकता है। परन्तु इस विधि- से नियम किया जाता है कि अवहनन (उलूखलमें कूटने) से ही धानोंको तुषरहित करना नखोंसे नहीं। (३) परिसङ्गया विधि-जिससे दो वस्तु प्राप्त हों तो एकका सर्वथा निषेध करना और दूसरेका विंधान भी न करना। जैसे-'पञ्च पञ्चनखा भत््याः' इस विधिसे शशादिके भक्षणका विधान नहीं किया गया है।

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नैष्कम्यसिद्धि:

नियम: परिसङ्ख्या वा विध्यर्थोऽत्र भवेद्यनः । अनात्माऽदर्शनेनैव परात्मानमुपास्महे॥। ८८ ॥ यहाँपर यदि विधि हो सकती है, तो नियम या परिसङ्गयाविधि हो सकती है। क्योंकि अनात्म वस्तु जिस प्रकार व्यानमें न आरवे उस प्रकार हम परमात्माकी उपासना करते हैं॥ दद ॥ यच्चोक्तं 'विश्वासो नान्यतोऽस्ति नः' इति, तदपि निद्रातुर- चेतसा त्वया स्वमायमानेन प्रलपितम्। किं कारसम् : न हि वयं प्रमाण- बलेनैकात्म्यं प्रतिपद्यामहे। तस्य स्वत एवाऽजुभवमात्रात्मकत्वात्। अत एव सर्वप्रमाणणवतारासम्भवं वक्ष्यति। अमाणव्यवस्थायाश्राऽनुभवमात्रा- श्रयत्वात्। अप्रत आ्र्र्राह- और जो आपने 'विश्वासो नाऽन्यतोडस्ति नः' इत्यादि प्रकारणमें श्रतिस्मृतिसे अन्य प्रमाणोंपर हमें विश्वास नहीं है, इत्यादि कहा, वह भी आपने ऊँघते ऊँघते स्वप्न देखते हुए प्रलाप किया है। (अर्थात् वह सत्र आपने हमारे सिद्धान्तको न समझकर ही कहा है।) शङ्का-क्या कारण ? उत्तर-हम लोग प्रमाणके बलसे, जीव-ब्रह्मकी एकताका स्थापन नहीं करते। क्योंकि वह तो स्वयं अनुमवरूप ही है। इसीलिए हम आगे जीव-ब्रह्मकी एकताके विषयमें कहेगें कि जीव-ब्रह्मकी एकता किसी प्रमाणंका प्रमेय नहीं। और जब प्रमाणों- की सिद्धि ही अनुभवके अधीन है तो अनुभवरूप जीव-व्रह्मकी एकताके साधक प्रमाण हो ही कैसे सकते हैं, इसलिए कहते हैं- वाक्यैकगम्यं यद् वस्तु नाडन्यम्मानत्र विश्वसेत्। नाऽप्रमेये स्वतःसिद्धऽविश्वासः कथमात्मनि ॥८॥ जो वस्तु केवल वाक्यमात्रसे ही जानी जा सकती हो उसके विषयमें तो मनुप्यको और किसी प्रकारसे विश्वास नहीं करना चाहिए। परन्तु जो स्वतः सिद्धतया समस्त प्रमा-' गोंका अविषय है, ऐसे आत्माके विषयमें मनुष्य कैसे विश्वास रहित हो सकता है?॥८६॥ यद्प्युक्तमन्तरेण विधिमिति, तदप्यबुद्धिपूर्वकमित नः प्रतिभाति। यस्मात् कालान्तरफलदायिषु कर्मस्वेतद् घटते आत्मलाभकाल एव फल- दायिनि त्वात्मज्ञाने नैतत्समञ्जसमित्याह- और जो आपने यह कहा था कि, "जो बिना शास्त्र विधानके परलोकमें फल- देनेवाले कर्मोंको करता है, तो वे उसको फलदायक नहीं होते। इसी प्रकार ब्रह्मज्ञान

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भाषानुवादसहिता ४१

भी परलोकमें ही फलदायक है, सो वह भी विधिके बिना नहीं माना जा सकता।" यह भी बिना विचारे ही कहा जान पड़ता है। क्योंकि चिरकाल बीतनेपर फल देने- वाले कमोंमें यह नियम हो सकता है। परन्तु उत्पन्न होते ही फल देनेवाले आरत्म- ज्ञानके विषयमें यह कदापि नहीं हो सकता। यही बात अग्रिम श्लोकसे कहते हैं- ज्ञानात्फले ह्यवाप्तेडस्मिन् प्रत्यक्षे भवघातिनि। उपकाराय तन्नेति तन्न्याय्यं भाति नो वचः ॥ ९०॥ जब ज्ञानसे समस्त संसारको नष्ट करनेवाला कैवल्यरूप फल प्रत्यक्षमें होते देखा जाता है, तो फिर आ्ररपका यह कथन कि 'विधिके बिना आत्मज्ञान फलदायक नहीं होगा' प्रत्यक्ष विरुद्ध होनेके कारण सर्वथा असङ्त है॥ ६० ॥ यदपि जैमिनीयं वचनमुद्घाटयसि तदपि तद्विवक्षापरि- ज्ञानादेवोन्धाव्यतेर। किं कारणम्? यतो न जैमिनेरयमभिप्राय आम्रायः सर्व एव क्रियार्थ इति। यदि ह्ययमभिग्रायोऽभविष्यदथाऽतो न्रह्मजिज्ञासा, जन्माद्यस्य यतः, इत्येवमादिव्रह्मवस्तुस्वरूपमात्रयाथात्म्य- प्रकाशनपरं गम्भीरन्यायसंदब्धं सर्ववेदान्तार्थमीमांसनं श्रीमच्छारीरकं नाऽसूत्रयिप्यत्। असूत्रयच्च3। तस्माज्जैमिनेरेवाऽयमभिप्रायो गम्यते यथैव विधिवाक्यानां स्वार्थमात्रे प्रामायमेवमैकात्म्यवाक्यानामप्यनधि- गतवस्तुपरिच्छेद४-साम्यादिति। अत इदमभिधीयते। और जो आप जैमिनिजीके वचनका प्रमाण देते हो वह भी उनके वचनके आशयको न समझ कर ही। क्योंकि जैमिनिका यह अभिप्राय ही नहीं है कि सम्पूर्ख व्ेद कर्मके ही प्रतिपादक हैं। यदि उनका यही अभिप्राय होता तो 'साधनचतुष्टय सम्पन्न अधिकारी पुरुषको ब्रह्मकी जिज्ञासा करनी चाहिए' और 'जिससे जगत्की उत्पा्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं वह व्रह्म है' इत्यादि व्रह्मवस्तुके यथार्थस्वरूपको प्रकाशित करनेमें उपयोगी, गम्भीर-युक्तियोंसे परिपूर्ण तथा समस्त वेदान्तवाक्योंकी मीमांसा करनेवाले शारीरकसूत्रकी रचना महर्षि व्यास न करते। परन्तु रचना तो की है। इसलिए महर्षि जैमिनिजीका यही अभिप्राय प्रतीत होता है कि जैसे विधि- वाक्योंका उनके बोधित किए हुए अर्थमें प्रामारय है, इसी प्रकार जीव-ब्रह्मकी एकताके

१-न न्याय्यं भाति नो वचः, ऐसा भी पाठ है। २-उद्धाटयते, ऐसा भी पाठ है। ३-असूत्रयच्च तत्, भी पाठ है। भगवान् बादराथण इति शेषः । ४-परिच्छेदसामर्थ्यात्, भी पाठ है। ६

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४२ नैष्कर्मर्यसिद्धि:

बीधक वेदान्त वाक्य भी उक्त ऐकात्म्यमें प्रमाण हैं। क्योंकि अज्ञात वस्तुका ज्ञापन कराना दोनोंमें समान ही है। इसलिए यह कहते हैं- अधिचोदनमाम्ायस्तस्यैव स्यात्क्रियार्थता । तत्वमस्यादिवाक्यानां बरूत कर्मार्थता कथम् ॥ ९१ ॥ विधि-प्रकरणमें पढ़े हुए निष्फल अर्थवादादि वाक्य ही (विधिके अनुरोघसे) क्रियापरक होते हैं। परन्तु 'तत्त्वमसि' आदि वाक्य, जब कि वे विधिके प्रकरणमें नहीं हैं और सार्थक हैं, किस प्रकार क्रियापरक हो सकते हैं, यह आ्प ही कहए ? ॥ ६१ ॥ अपि च, एकात्म्यपक्ष इवाऽदष्टार्थकर्मसु भवत्पक्षेऽपि प्रवृत्ति- दुलक्ष्या। यतः । स्वर्ग यियासुजु हुयादग्निहोत्रं यथाविधि। देहाद्व्युत्थापितस्यैवं कर्तृ त्वं जैमिने: कथम् ॥९२ ॥ और आपके पक्षमें भी तो जीवव्रह्मकी एकताके समान ही अदृष्ट फलवाले कमेमें प्रवृत्ति होनी कठिन है। क्योंकि "्वर्गको जानेकी इच्छरा करनेवाला पुरुष यथा- विधि अग्निहोत्रका अनुष्ठान करे" इस विधिके द्वारा देहसे मिन्न ज्ञात हुए आ्त्मामें जैमि- निजीके मतमें कर्तृत्व किस प्रकार सिद्ध हो सकता है? क्यांकि देहादिसे तरतिरिक्त निरवयव आत्मामें क्रियाके न होनेसे कर्तृत्व नहीं है। तथा प्रयत्न भी त्रन्तःकरणका धर्म होनेसे आत्माका गुख नहीं है।६२।।

कर्मस्वधिकारः । यस्मात्- सर्वप्रमाणणासम्भाव्यो युष्मदर्थमनादित्सुर्जैमिनिः प्रर्यत कथम् ॥ ९३ ।। समस्त शरौरादि साधनोंका त्याग कर देना ही जिसका स्वभाव है। अतएव जिसमें किसी धर्मका समावेश नहीं है। क्योंकि, जो सच प्रमाणोंका अगोचर, अहं- कारवृत्तिमें अ्रभिव्यक्त होनेवाला तथा अहंकारादि अनात्म वस्तुशंसे तसंस्पृष्ट है; वह जैमिनिजीके शरीरमें रहनेवाला आत्मा विधिसे कैसे प्रेरित हो सकता है ?॥ ६३॥ प्रवृत्तिकारणाभावाच्च । यस्मात्। .-

१-अधिचोदनं य आम्रायः, भी पाठ है। २-अहंवृत्त्यैकसाधनः, भी पाठ है।

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भाषानुवादसहिता

सुखदुःखादिभियोग आत्मनो नाऽहमेक्ष्यते। पराक्त्वात्प्रत्यगात्मत्वाज्जैमिनिः प्रयते कथम् ।।९४।। और प्रवृत्तिका कारस प्रयोजन भी नहीं है। क्यांकि सुखदुःखादिका आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है। उसमें जिन सुखदुःादिकी प्रतीति हो रही है, वे तो सब अरन्तःकरणसे ही ज्ञात होते हैं। और सुबदुःखादि सब ब्ाह्य हैं तथा आत्मा प्रत्यकूरूप है, अर्थात् सुखदुःखादि दृश्योंका द्रट्टा है। इस कारणसे भी जैमिनिके शरीरमें रहनेवाले आ्रत्माकी प्रवृत्ति नहीं बन सकती ॥ ६४ ॥ किश्च- न तावद्योग एवाडस्ति शरीरेसाऽडत्मनः सदा। विषयैर्दूरतो नाऽस्ति स्वर्गादौ स्यात्कथं सुखम् ॥९५॥ और भी सुनिए ! आत्माका शरीरके साथ सम्बन्ध किसी अवस्थामें जब नहीं है, तब्न विपयोंके साथ तो सुतरां नहीं है। फिर स्वर्गादि स्थानोंमें आ्त्माके सुखका सम्बन्ध किस प्रकार प्राप्त हो सकता है?॥ ६५ ॥ यस्मादन्यथा नोपपद्यते। नरभिमानिनं तस्मात् कारकाद्यात्मदर्शिनम्। मन्त्र आहोररीकृत्य "कुर्वन्नि"ति न निर्द्वयम् ॥ ९६ ॥ चूँकि 'कुर्वन्नेवेह कर्माशि' यह मन्त्र और किसी प्रंकारसे भी सङ्गत नहीं हो सकता, इसलिए जिनको मनुष्यत्वका अभिमान है तथा जो अपने आपको कर्त्ता भोक्ता आदि समझते हैं, उनके लिए ही उक्त मन्त्र समस्त आयुपर्यन्त कर्म करनेकी आज्ञा देता है। जो अद्वितीय ब्रह्मको प्राप्त हो गये हैं उनके लिए नहीं ॥ ६६ ॥ यच्चोक्तं 'विरहय्य' इति, तदपि न सम्यगेव। तथाऽपि तुन या काचित्क्रिया यत्र क्व चाऽध्याहरणीया, किन्तु या यत्राऽभिप्र तसम्बन्धं घटयितुं शक्रोति आकाङक्ां च वाक्यस्य पूरयति सैवाऽध्याहरणीया। एवं विशिष्टा च क्रियाऽस्माभिरभ्युपगतैव। सा तूपादित्सितवाक्यार्था- विरोधिन्येव नाऽभूतार्थप्रादुर्भावफलेति। षड्भावविकाररहितात्मवस्तुनो निर्धूताशेषद्वैतानर्थस्याऽपराधीनप्रकाशस्य विजिज्ञापयिषितत्वादस्यस्मी- त्यादिक्रियापदं स्वमहिम सिद्धार्थप्रतिपादनसमर्थमभ्युपगन्तव्यं नहि विपरी- तार्थप्रतिपादनमिति। १-नाहमेष्यते, भी पाठ है।

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४४ नैष्कर्म्यसिद्धि

धावेदिति न दानार्थे पदं यद्वत्प्रयुज्यते। एधीत्यादि तथा नेच्छेत् स्वतः सिद्धार्थवाचिनि ॥९७॥ और जो पहले आपने यह कहा था कि 'क्रियापदके बिना कोई वाक्य ही नहीं बन सकता, इसलिए वेदान्तवाक्य भी क्रियाके प्रतिपादक हैं, यह भी ठीक नहीं। क्योंकि (यद्यपि वाक्य क्रियापदके बिना अरपना स्वरूप लाभ नहीं कर सकता, तथापि ) चाहे जहाँ, चाहे जिस किसी क्रियाका अध्याहार नहीं करना चाहिए। किन्तु जो क्रिया जहाँ ईप्सित अर्थके सम्बन्धको संघटित कर सकती हो, उसीका अध्याहार करना उचित है। ऐसी क्रियाको तो हम भी स्वीकार करते ही हैं। और वह क्रिया ईप्सित वाक्यार्थके अनुकूल है तथा मिथ्या अर्थकी साधिका भी नहीं है। यहाँ भी उत्पत्ति, वृद्धि, स्थिति, परिखति, क्षय और नाश-इन छः प्रकारके विकारोंसे रहित, द्वतबुद्धिरूप अ्र्प्रनर्थसे अ्रप्रत्यन्त पृथक् तथा स्वयम्प्रकाश आ्र्प्रत्मरूप वस्तुका प्रतिपादन करना त्भीष्ट है। इसलिए 'त्रसि' (है), 'अस्मि' (हूँ) इत्यादि अपने माहात्म्यसे ही सिद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेवाले क्रियापदोंका अध्याहार करना चाहिए। विरुद्धअरर्थका प्रतिपादन करनेवालोंका नहीं। जिस प्रकार 'दानरूप' अथमें 'वावेत्-दौड़े', इस क्रियाका प्रयोग नहीं किया जा सकता है, इसी प्रकार स्वतःसिद्ध तथा वृद्धयादि विकारोंसे रहित आ््त्मवस्तुके प्रतिपादक वाक्योंमें 'एधि'-बढ़ो, इत्यादि विकार-प्रतिपादक क्रियाओंका प्रयोग नहीं होता॥ ६७।। न च यथोक्तवस्तुवृत्तप्रतिपादनव्यतिरेकेण तत्वमस्यादिवाक्यं वाक्यार्थान्तरं वक्तीति शक्यमध्यवसितुमित्याह- 'तत्वमसि' इत्यादि वेदान्तवाक्य पूर्वोक्त स्वतःसिद्ध, उत्पत्ति-क्षयसे रहित आत्म- स्वरूप वस्तुका प्रतिपादन नहीं करते। किन्तु "तदहमस्मि-वह मैं हूँ, ऐसी उपासना करे" ऐसी उपासना विधिका प्रतिपादन करते हैं, यह कहना भी युक्त नहीं है, यह बात कहते हैं- तच्वमस्यादिवाक्यानां स्वतःसिद्धार्थबोधनात्। अर्थान्तरं न संद्रष्डुं शक्यते त्रिदशैरपि॥ ९८॥। 'तत्वमसि' इत्यादि वेदान्तवाक्योंका, स्वतःसिद्ध आ्त्मवस्तुका बोध करानेके अतिरिक्त और कोई अर्थ देवता लोग भी नहीं कर सकते ॥ ६८ ॥ यस्मादेवम्- अतः सर्वाश्रमाणां तु वाङमनःकायकमभिः। स्वनुष्ठितैन मुक्ति:स्याज्ज्ञानादेव हि सा यतः ॥ ९९॥ १-तत्त्वमसि वाक्यं, भी पाठ है। २-वाक्यमर्थान्तरं वक्ति, भी पाठ है।

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भाषानुवादसहिता ४५

जब्र कि 'तत्वमसि' इत्यादि ब्रह्मज्ञान-प्रतिपादक वाक्योंका अर्थ व्रह्मज्ञान-प्रति- पादन करनेके अतिरिक्त तर कुछ नहीं हो सकता है। अतः सभी आश्रमवालोंकी मुक्ति वाखी, मन और शरीर द्वारा किए हुऐ कमोंसे नहीं हो सकती, क्योंकि वह तो केवल ज्ञानसे ही होती है ।। ६९ ।। तस्माच् कारसादेतदप्युपपन्नम्- इस कार एसे भी यही उपपन्न (सिद्ध) हुआर कि स्वमनोरथसङ्कप्त-प्रज्ञाध्मातधियामतः । श्रोत्रियेष्वेव वाचस्ताः शोभन्ते नाऽडत्मवेदिपु॥१०० ॥ अपने मनोरथोसे कल्पित किये बनावटी विचारोंसे जिनकी बुद्धि परिपूर्ण है, ऐसे लोगोंकी, पीछे कही हुई ये सब बानें याज्ञिक लोगोमें ही शोभा पाती हैं, ब्रह्मज्ञानियोंमें नहीं ॥ १०० ॥

प्रथमोऽध्यायः समातः ।

1:0 :-

अथ द्वितीयोऽध्यायः

प्रत्यक्षादीनामनेवंविपयत्वात् तेषां स्वारम्भकविपयोपनिपपति

ज्ञानदिवाकरोदयहेतुत्वं वस्तुमात्रयाथात्म्यप्रकाशनपटीयसस्तत्वमस्यादेर्व- चस एवेति वह्वीभिरुपपत्तिमि: प्रदशितम्। अतस्तदर्थाप्रतिपनौ यत्कारसं तदपनयनाय द्वितीयोऽध्याय आरभ्यते। प्रत्यक्ष (चत्तु) आदि प्रमाण अपने अपने कारख दब्दादिगुसयुक्त त्र््राका- शादिसे उत्पन्न होनेके कारख शब्यदि विपयोंको ही ग्रहण करते हैं। और आत्मा त्रराका- शादि के समान नहीं है, किन्तु समस्त प्रमेय पदार्थोंसे वह विलक्षण ही है। इसलिए समस्त अनर्थोंके एकमात्र कारण अज्ञानका समूलोच्छेदन करनेवाले ज्ञानरूप सूर्या- दयका कारण एवं वस्तुमात्रके स्वरूपको प्रकाशित करनेमें समर्थ 'तत्वमसि' इत्यादि वदान्त वाक्य ही है, इस बातको बहुत सी युक्तियोंसे सिद्ध किया। अब उसके अर्थको-आत्माको-न जाननेमें जो कारण हैं, उनको दूर करनेके लिए द्वितीय अध्यायका आरम्भ किया जाता है।

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४६ नैष्कस्यंसिद्धि:

श्रावितो वेत्ति वाक्यार्थ न चेत्तत्वभसीत्यतः।

'त्वं' पदके अर्थका ज्ञान न होनेके कारण सुनानेपर भी 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योंका अर्थ समझमें नहीं आता। इसलिए 'सवं' पदके अर्थका प्रतिपाइन करते है॥१i योडयमहं ब्रह्मेति वाकपार्थसतत्तिय निर्वाक्यादेवेति ग्रत्यनादीना मजेवंविषयत्वात्, इत्यवादिपय्, तस्य विशुद्ध्यर्थमनैकान्तिकत्वं पूर्वपक्ष त्वेनोपस्थाप्यते। यह जो 'मैं व्रह्म हूँ' इस प्रकारका ज्ञान है, वह वास्य से ही उत्पन्न होता है। क्योंकि चन्तु आदि-प्रत्यन्तादि-प्रमाख उसकी विपय नहीं कर सकते, ऐसा पह़ल कहा गया है। अब उसकी पुष्टि (परीक्षा) क्नेके लिए धाक्यके बिना गी आान उत्पन्न हो सकता है, इसलिए वाकय नियनरूपसे ज्ञान उत्पन्न नहीं करता' इस प्रकार पूर्वपक्ष उपस्थापित करते हैं। कृत्स्नानात्मनिवृतौ च कश्िदामोति निष्टेतिय। श्रुतवाक्यस्मृतेशाऽन्यः स्मार्यते च वचोऽपरः ॥ २ ॥ कोई शुद्धमति महात्मा तो सम्पूर्ण अ्र्प्रनात्मवस्तुओंकी निवृत्तिहोनें पर, में:र उपाधिके न रहनेसे, वाक्योपदेशके बिना ही एकतारूप मोक्षकी प्रात्त होते हैं और काई सुने हुए वाक्योंका स्मरख करके, और कोई लोग आचार्योंक वाक्यों द्वारा भारणा कराए जानेपर 'मैं व्रह्म हूँ' इस प्रकार समझार, मुक्त होने हैं। (इन तीन उद़ाहर खोंमें से प्रथम उदाहरखमें तो ज्ञान होनेके लिए वाक्यकी कोई आपश्यकता हो नहीं है और अन्थ दो उदाहरणोंमें भी वाक्यके स्मरण या स्मारसकी ही आ्वश्यकता है, वाक्थ की नहीं। इससे यह जान पड़ता है कि वाक्य ज्ञानोत्पां्तिका नियत कारणा नहीं है) ॥२॥ एतत्प्रसङ्ग न श्रोत्रन्तरोपन्यासमुभयत्राऽपि सम्भावनायाऽSह- वाक्यके बिना भी ज्ञान उत्पन्न होता है, यह कहा। अन इसी प्रसङ्गसे वाक्य नियतरूपसे ज्ञान उत्पन्न नहीं करता, यह दिखानेके लिए दूसर प्रकार के श्रोनाओंका उदाहरख देकर कहीं कहीं वाक्यसे भी ज्ञान उत्पन्न होता है, यह कहते हैं- वाक्यश्रवरामात्राच्च पिशाचकवदाप यात्। त्रिषु यादृच्छिकी सिद्धिः स्मार्यमाणो तु निश्चिता॥ ३॥ जत्र श्रीकृष्ण अरजुनको ज्ञानोपदेश दे रहे थे, तब व वाक्य किसी पिशाचने भी सुन लिए। उसको उन वाक्योंके श्रवणमात्रसे ही ज्ञान हो गया। इस प्रकार १-उत्थाप्यते, पाठ भी है। २-स्मर्यमाएे, भी पाठ है।

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भाषानुवादसहिता 85

किसीको वाक्यके श्रवणमात्रसे ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है। इन कई प्रकारसे ज्ञान करने- वालोंमेंसे स्व्रयमेव्र त्र्प्रनात्मवस्तुक्ी निवृत्तिसे जिनको ज्ञान उत्तन्न हुआ है, ऐसे विराट् और वाक्यके स्मरणसे ज्ञान प्राप्त करनेवाले भृगु एवं वाक्यश्रवसमात्रसे ज्ञान प्राप्त करने- वाला पिशाच-इन तीनोंकी सिद्धि यादच्छिक अर्थात् अनिश्चित है। परन्तु गुरुने जिसको वाक्यार्थका स्मरख कराया है ऐसे श्वेतकेतुकी सिद्धि निश्चित है। (इसलिए ब्रह्मज्ञान उत्पन्न करनेमें 'तत्त्वमसि' इत्यादि वेदान्तवाक्य निश्चित कारण नहीं हैं, किन्तु सुने हुए वाक्यका स्मग्स कराया जाना ही निश्चित कारख है।) ॥ ३ ॥ नाऽयमनैकान्तिको हेतुर्यतः- सर्वोडयं सहिमा जेयो वाक्यस्यैव यथोदितः। वाक्यार्थ न ह्यते वाक्यात्कशिज्ञानाति तच्वतः ॥ ४ ॥ [अव इम शङ्काके समाधानके लिए सिद्धान्तका प्रतिपादन करते हैं- ] ब्रह्मज्ञानोत्पत्तिमें वेदान्तवाक्य अर्प्रनिश्चित हेतु नहीं हैं, क्योंकि पूर्वोक्क यह सन माहात्म्य वाक्यका ही जानना चाहिए। इसमें कारण यह है कि कोई भी वाक्यके बिना वावयार्थको यथार्थरूपसे नहीं जान सकता ।॥४॥ वारक्य च प्रतिपादनाय प्रवृत्तं सत्प्रतिपाद्यत्येव्र, सवत्रमाखाना- मप्येवंवृत्तत्वात्। और यह भी नहीं कहा जा सकता कि अनुमोदक कोई दूसरा प्रमाग नहीं है, इस- लिए वाक्य स्वार्थका निश्चय नहीं कर सकता, क्योंकि अपने विषयोंका त्वबोधन करा- नेके लिए प्रवृत्त हुए प्रमाण बिना अनुमोदक प्रमाखींके भी अपने विपयोंका निश्चय कराते हुए देखे जाते हैं। [और यदि यह प्रश्न किया जाय कि हम "अनुमोदक प्रमाणन्तर नहीं है इस' लिए वाक्य प्रतिपादन नहीं कर सकता" ऐसा नहीं कहते, किन्तु जीत्र ब्रह्मकी एकतारूप अर्थं प्रमाखान्तरोंसे विरुद्ध है। इसलिए वाक्य प्रमाण नहीं बन सकते? तो इस शङ्काका परिहार करते हैं-] नाऽहंग्राह्ये न तद्ीने न प्रत्यङ् नाऽपि दुःखिनि। विरोधः सदसीत्यस्माद् वाक्याभिज्ञस्य जायते ॥ ५ ॥ प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके जो विषय हैं उनके साथ तो ब्रह्मका अभेद श्रुति प्रति- पादन नहीं करती, तब विरोध कहाँसे उपस्थित होगा ? जैसे-मैं मनुष्य हूँ, इस प्रकार

१-एवं प्रवृत्तत्वात्, भी पाठ है।

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नैष्कर्म्यसिद्धि:

अहंप्रत्यनके विषय शरीरमें विरोध बुद्धि नहीं हो सकती। क्योंकि वह त्वं पदका लक्ष्य ही नहीं है। इसलिए उसका तत्पदके साथ अभेद नहीं बनता तो न बने, उससे कोई विरोध नहीं। तथा 'मैं' आँखसे देखता हूँ, कानसे सुनता हूँ, इस प्रकार जिन इन्द्रियोंमें यह विषय ग्रहण करनेके साधन मात्र हैं, ऐसा अनुभव हो रहा है, उनसे "मैं" इस ज्ञानके विषय होनेपर भी कोई विरोध नहीं। क्योंकि उन इन्द्रियोंके साथ 'तत्'पदार्थकी एकता नहीं मानते हैं। इसी प्रकार शुद्ध 'तग्' पद-लद्य-आत्ाका 'तत' पः लक्ष्य-ब्रह्मके साथ एकत्व होनेमें कोई आपत्ति नहीं है। और सुवदुःखविशिए अन्तः- करससे युक्त जीवके साथ तत्पदलक्ष्य ब्रह्मका एकत्व नहीं माना गया है। इस प्रकार 'तत्त्वमसि' इत्यादि वेदान्तवाक्यका तात्पर्य जाननेवराले पुरुपको 'मैं' इस प्रत्ययसे ग्राह्य शरीर, इस प्रत्ययके विषय न होनेवाले इन्द्रियादि, प्रत्यगात्मा और मुवदुःादि विनिष्ट अ्र्प्रन्तःकरग, इन चारों पदार्थोमें विरोध बुद्धि नहीं होती॥ ५ ॥ नाऽविरक्तस्य संसारान्निविद्ृत्सा ततो भवेत। न चाऽनिवृत्ततृष्यास्य पुरुषस्य मुुक्षुता ॥ ६॥ जो पुरुष संसारसे विरक्त नहीं है, उसे संसारसे निवृत्त होनेकी इच्छा नहीं होती। और जिसकी तृष्णा श्ान्त नहीं हुई है, उसको मोक्षकी इच्छा भी नहीं होती॥ ६ ॥ [ यहाँपर यह शङ्का होती है कि 'यदि वाक्य अपना अथ प्रतिपादन करनेके लिए दूसरे प्रमाणोंकीं अपेक्षा नहीं करता और प्रमाणान्तरका विरोध भी नहीं है, तो फिर वाक्यका श्रवण करते ही सभीको क्यों नहीं ज्ञान उत्पन्न होता? इसका उत्तर 'जो ब्रह्म- ज्ञानके साधन वैराग्य आदिसे युक्त हैं, उन्हींको ज्ञान उत्पन्न होता है' इस प्रकारसे तरग्रिम श्लोकसे देते हैं। ] गुरुपादोपसर्पम्। न विना गुरुसस्बन्धं वाक्यस्य श्रवणं भवेत्। ७॥ जो मुमुत्तु नहीं है, वह पुरुष गुरुचरणोंके समीप नहीं पहुँचता और बिना गुरुचरणोंके समीप पहुँचे वेदान्त-वाक्यका श्रवण नहीं होता है॥ ७॥ तथा पदपदार्थो च न स्तो वाक्यमृते क्वचित्। अन्वयव्यतिरेकौ च तावृते स्तां किमाश्रयौ॥८ ॥ और वाक्यके बिना पद-पदार्थ कहीं नहीं रह सकते हैं एवं पदपदार्थोंके बिना अन्वय और व्यतिरेक भी किसके सहारे रह सकेंगे । ८ ॥ अन्वयव्यतिरेकाभ्यां विना वाक्यार्थबोधनम्। न स्यात्तेन विना ध्वंसो नाऽज्ञानस्योपपद्यते ॥ ९ ॥ १-नाशो नाज्ञानस्योपजायते, ऐसा तथा 'ज्ञानम्रहाशं नोपपद्यते, भी पाठ है।

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भाषानुवादसहिता ४९

अन्वय-व्यतिरेकके बिना वाक्यार्थका ज्ञान नहीं हो सकता और वाक्यार्थज्ञानके विना तज्ञानका नाश नहीं हो सकता है॥ ६।। विनाऽज्ञानप्रहारोन पुरुषार्थः सुदुर्लभः। तस्माद्यथोक्तसिद्ूचर्थं परो ग्रन्थोऽवतार्यते ॥ १० ॥ विना अज्ञानकी निवृत्ति हुए पुरुषार्थका लाभ अत्यन्त दुर्लभ है। इसलिए पूर्वोक्त प्रयोजनकी सिद्धिके लिए, अन्धय-व्यतिरेकसे त्वं पदार्थका स्पष्टाकरण करनेके लिए, अग्रिम ग्रन्थका प्रारम्भ करते हैं ॥ १०॥ वर्चस्कं त्वन्नकार्यत्वाद्यथानाऽत्मेति गम्यते। तद्भागः सेन्द्रियो देहस्तद्वत्किमिति नेक्ष्यते ॥ ११ ॥ जैसे शरीरका मल अन्नका परिणाम होनेके कारख स्पष्ट ही अनात्मा है। वैसे ही इन्द्रियोंके सहित शरीर भी त्रन्नका ही परिणाम होनेके कारण अनात्मा है, ऐसा क्यों नहीं अनुमानसे निश्चय करते ? ॥ ११ ॥ आद्यन्तयोरनात्मत्वे प्रसिद्ध मध्ये3 कः प्रतिबन्धः । जब आदि और अन्तमें अनात्मपन प्रसिद्ध है, तो मव्यमें उसे अ्नात्मा माननेमें क्या रुकावट है ? ग्रागनात्मैव जग्धं सदात्मतामेत्यविद्यया। स्रगालेपनव द्ेहं भक्षणके पहले अन्न अनार्मा है, खा लेनेपर अविद्याके कारख वह आत्मा प्रतीत होने लगता है। इसलिए विवेकी पुरुषको माला, चन्दन इत्यादि वस्तुओंके समान ही देहको भी (अ्रनाव्मा) समझना चाहिए ॥ १२ ।। अथैवमपि मद्चनं नाऽडद्रियसे स्वयमेवैतस्माच्छरीरादशुचि- राशेर्निराशो भविष्यसि। इतना कहनेपर भी यदि आप मेरे वचनपर श्रद्धा नहीं करते तो स्वयं ही इस तपवित्रताकी खान शरीरसे निराश५ हो जाओगे।

१ -- वर्चस्कमन्नकार्यत्वात्, भी पाठ मिलता है। २-नेच्यते=नानुमीयते, देहेन्द्रियादि नात्मरूपम्, अन्नकार्यत्वात्, पुरीषवत्, इति प्रयोग: । ३-मध्येऽपि कः प्रतिबन्धः, भी पाठ है। ४-विविक्ती:, भी पाठ है। ५ -- वियुच, अ्रर्थात् उसमें अभिमान शून्य। ७

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नैष्कर्म्यसिद्धिः

मन्यसे तातदस्मीति यावदस्मान्न नीयसे। श्वभिः क्रोडीकृते देहे नैवं त्वमभिमंस्यसे ॥ १३ ॥ तभीतक आरप इस शरीरमें अरहंबुद्धि कर सको हैं जबतक कि इससे निकलते नहीं। जहाँ आप इस शरीरसे निकले तभी इसपर कुते आकरमण करेगे और फिर आपका इसपर किञ्चिन्मात्र भी अभिमान न २ह जायगा ॥ १३ ॥ शिर आक्रम्य पादेन भर्त्सयत्यपरान् शुनः । दृष्ट्रा साधारणं देहं कस्मात्स कोऽसि तत्र भोः ॥१४॥ जिस शरीरपर आप इस समय बड़ा अभिमान करते हो, उसी शरीरके शिरपर पैर रखकर, आपके त्याग देनेके पश्चात्, कुत्ता अभिमान करेगा और दूसरे कुत्ते जो उसको लेना चाहेंगे उनकों फिडकेगा। अरे मित्र! ऐसे साधारख शरीरमें क्यों फँस रहे हो ? ॥ १४ ॥ श्रुतिप्रतिपःदितोऽयमर्थोनात्मा बुद्धयादिर्देहान्त इतीदमाह। बुद्धिसे लेकर देह पर्यन्त सत्र वस्तु अनात्मा है, यह बात श्रुतसे भी सिद्ध है। यह अग्रिम श्लोकसे कहते हैं- वुसत्रीहिपलालांशैर्चीजमेकं त्रिधा यथा। बुद्धिमांसपुरीषांशैरन्नं तद्वदवस्थितम् ॥१॥॥ जैसे एक ही बीज भूसी, चावल और पलाल इन तीन अंशोंमें परिखत होता . है। वैसे ही खाया हुआ तन्न बुद्धि (मन); मांस और मल इन तीन अंरोमं परित होता है।। १५ ॥। यथोक्तार्थप्रतिपत्तौ सत्यां न रागद्वेषाम्यां विक्रियते विप्चि- दित्यस्याऽर्थस्य प्रतिपत्तये दृष्टान्तः । पूर्वोक्त अर्थको यथावत् जान लेनेपर अर्थात् देहादिमें आत्मत्वाभिमानकी निवृत्ति हो जानेसे आररत्मत्वरूपका ज्ञान होनेपर विद्वान् पुरुष रागद्वेपसे अभिभूत नहों होता। इस बातको स्पष्ट करनेके लिए दष्टान्त देते हैं- वर्च के सम्परित्यक्ते दोपतश्चाऽवधारिते। यदि दोषं वदेतस्मै कि तत्रोच्चरितुर्भवेत् ॥ १६ ॥ तद्वत् सूक्ष्मे तथा रथूले देहे त्यक्ते विवेरुतः। यदि द्वोषं वदेत्ताभ्यां किं तत्र विदुषो भवेत् ॥ १७॥

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भाषानुवादसहिता ५१

जिस मलको वास्तवमें दोषयुक्त समभकर स्याग दिया है, उसको यदि कोई दोष देने लगे (उसकी निन्दा करने लगे), तो क्या वह दोष मलत्याग करनेवालेको लगेगा ? इसी प्रकार जिसने विवेकसे स्थूल और सूक्ष्म शरीरका त्याग कर दिया है, उससे अभिमान हटा लिया है, उस विद्वान्के शरीरमें यदि कोई मनुष्य दोष निकाले तो इससे विद्वान्का क्या विगड़ता है॥ १६-१७॥ एतावदेव ह्यहं ब्रह्माऽस्मीति वाक्यर्थाप्रतिपत्तौ कारं यदुत बुद्धयादौ देहान्ते ह्यहं ममेति निःसन्धिबन्धनो ग्रहस्तद्यतिरेके हि न कुतश्चिद्विभज्यत एकल एव प्रत्यगात्मन्यवतिष्ठुत इत्याह। 'मैं ब्रह्म हूँ' इस ज्ञानके उत्पन्न होनेमें रुकावट केवल यही है कि बुद्धिसे लेकर देह पय्यन्त वस्तुओंमें 'मैं औरर मेरा' इस प्रकारका निःसन्धि-निरन्तर-अर्थात् जिसमें बाधक ज्ञान बीचमें नहीं है ऐसा, आग्रह (निश्चय) होना। इस अहं मम अभिमानके निवृत्त होनेसे फिर वह पुरुप किसी पदार्थसे भी अपनेको पृथक् नहीं समकता, किन्तु अर्द्वितीय प्रत्यगात्मामें ही उसकी स्थिति होती है। यह बात कहते हैं- रिपौ बन्धौ स्वदेहे च समैकात्म्यं प्रपश्यतः । विवेकिन:२ कुतः कोपः स्वदेहावयवेष्विव ॥ १८ ।। शत्रु, मित्र और अपने देहमें सम एक आत्माको देखनेवाले विवेकी पुरुषको कोप कैसे होगा? जैसे कि अनने देहके अङ्गोंका अपने ही देहके अङ्गोंसे सङ्गष (अरभिघात ) होनेसे किसीको भी क्रोध नहीं उत्पन्न होता है ॥ १८ ॥ इतश्चाऽनात्मा देहादि:। और देहादिके अनात्मा होनेमें यह भी कारण है कि- घटादिवच्च दृश्यत्वाचैरेव करगोरदशेः। स्वप्ने चाऽनन्वयाज्ज्यो देहोऽनात्मेति सूरिभिः ॥१९॥ देह घटादि के समान दृश्य है (यदि वह आत्मरून होता तो दृश्य नहीं होता।) और पदार्थोंका आलोचन करने के लिए जीवात्माके साधनरूप इन्द्रियोंके साथ शरीरका सम्बन्ध सब्र कालमें नहीं रहता, इससे इन्द्रियाँ भी आत्मरूप नहीं हैं। यदि वे आत्मरूप होती तो सब कालमें विपयोंका ग्रहण करतीं। परन्तु स्वप्नावस्थामें देखा जाता है कि बिना इन्द्रियोंकी सहायताके विषयोंका ग्रहण होता है। इससे विद्वानोंको निश्चय कर लेना चाहिए कि देह त्रर इन्द्रियाँ आरत्मा नहीं हैं, (किन्तु जाग्रत् अवस्थामें विषयोंका ग्रहण करनेके लिए आत्माके साधनमात्र हैं।) ॥ १६ ॥ १-थदुक्तबुद्धयादौ, ऐसा भी पाठ है। २-विचेकिन: पुनः कोपः, भी पाठ है।

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४२ नैष्कम्यसिद्धि:

देहादिकार्यकरण-सङ्गातव्यतिरेकाव्यतिरेकदशिनः प्रत्यक्षृत एव विरुद्ध कार्यसुपलभ्यते। देहेन्द्रियादि कार्यकरख सङ्कातसे अपनेको भिन्न समझनेवालों औ्रर अ्र्प्रमिन्न समभनेवालोंके कार्य भी प्रत्यक्षसे ही विरुद्ध देखे जाते हैं। चतुर्भिरुह्यते यत्तत्सवशकत्या शरीरकम्। तूलायते तदेवाऽहंधियाऽऽघ्रातमचेनसाम्२॥२०॥ जिस शरीरपर अहंबुद्धिके न रहनेपर [मरनेके अनन्तर ] चार आदमी उसे बड़ी कठिनतासे उठा सकते हैं, उसी शरीरको, निर्बुद्धि लोग 'मैं यह देह ही हूँ' ऐसा समझते हुए, तूलके समान लिए फिरते हैं (स्वदेह और परदेह इनमें बोई भे नहीं है, केवल अहंबुद्धिमात्रसे ही स्वदेहका भार हम लोगोंको नहीं होता। इससे सिद्ध हुआ कि देह आात्मा नहीं है।)॥ २ ॥।

चार्वाकको छोड़र बाँकी सन वादियोंके मतमें स्थूल देदसे आत्माका भेद सिद्ध ही है। इसलिए प्रकरखाथका उपसहार करते हैं- स्थूलं युक्त्या निरस्यैवं नभसो नीलतामिव। देहं सूक्ष्मं निराकुर्यादतो युक्तिभिरात्मनः ॥२१॥ जिस प्रकार आररकायमें नीलिमाका सर्वथा त्र्प्रभाव है, इसी प्रकार स्थूल शरीरमें भी आत्मपनका सर्वथा अरभाव है। ऐसा निश्चय करके (तदनन्तर) युक्तियोंके द्वारा सूक्षम देहमें भौ आत्मपनका निराकर करना चाहिए॥ २१ ॥ कथं देहं सूक्ष्मं निराकुर्यादिति ? उच्यते। सूक्ष्म देहसे आत्मबुद्धिका निराकरख किस प्रकारसे करना चाहिए, यह कहते हैं- अहंममत्वयत्नेच्छा नाऽऽत्मधर्मा: कृशत्ववत्। कर्मत्वेनोप्लभ्यत्वादपायित्वाच्च वस्त्रनत् ॥ २२ ॥ जिस प्रकार कृशता, स्थूलता आदि स्थून शरीरके धर्मे हैं, आत्माके नहीं। इसी प्रकार अहङ्कार, ममता, यत, इच्छा आदि भी सूक्ष्म शरीरके धर्म हैं, आत्माके नहीं, क्योंकि ये सब वस्त्रादिकी भाँति आत्माके दृश्य हैं और आगमापायी हैं॥ २३॥ वैधर्म्ये दृष्टानत :-

१-कार्यकारण, ऐसा भी पाठ मिलता है। २-घियाध्यातम्, और 'अमेधसाम्' भी पाठ मिलता है।

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भाषानुवादसहिता ५३

यदि अहङ्कार आदि आत्माके धर्म होते तो वे उसके दृश्य न होते। जो जिसका धर्म होता है वह उसका दृश्य नहीं होता। इस विषयमें (एक) दष्टान्त देते हैं- नोष्सिमानं दहत्यग्निः स्वरूपत्वाद्यथा ज्वलन्। तथैवाऽऽत्माऽऽत्मनो विद्यादहं नैवाऽविशेषनः ॥२३॥ जैसे जलता हुआ अतनि अपनी स्वरूपभूत उप्पताको, उसका ही स्वरून होनेके कारख, नहीं जला सकता है। वैसे ही यरि अहङ्कार आदि आत्मत्वरूप या आ्रत्माके धर्म होते, तो आत्मासे वे प्रकाशित न होते। प्रकाशित तो वे होते हैं। इससे सिद्ध है कि वे अनात्मा हैं । २३॥ एकस्याSSतमन: कर्मकर्तृ भावः सर्वथा नोपपद्यते, इति श्रुत्वा मीमांसरुः प्रत्यवतिष्ठते। अहंप्रत्ययग्राह्यत्वाद् ग्राहक आत्मेति। तन्नि- वृश्त्यर्थमाह। एक हो आत्मामें कर्मकर्तृभाव सर्वथा नहीं बन सकता। इस बातको सुनकर मीमांसक लोग शङ्का करते हैं कि-'एक ही आत्मा 'अहं' इस ज्ञानका विषय होनेके कारण कर्म है और इसका प्रकारक होनेके कारण कर्ता है। इस प्रकार एक ही आ्रत्मामें कर्मकर्तृमाव यथावत् हो सकता है।' इस शङ्काकी निवृत्तिके लिए कहते हैं- यत्कर्मको हि यो भावो नाऽसौ तत्कर्तृ को यतः१। घटारत्ययवत्तरमान्नाऽहं स्याद् द्रष्टकर्मकः ॥ २४ ॥ जिस क्रियाका जो कर्ता है, वह उसीका कर्म नहीं होना। जैसे घटके ज्ञानमें घट कर्म है, अर्थात् विषय है, तो वह उसके ज्ञानमें कर्ता नहीं हो सकता है। वैसे ही 'अहम्' यह ज्ञान आत्म-विषयक नहीं होता। क्योंकि उसमें वह कर्ता है॥ २४ ॥ अरत्राऽडह, प्रत्यक्षेणाSSत्मनः कर्मकर्तृ त्वाभ्युपगमे तत्पादोपजी- विनाञनुमानेन प्रत्यक्षोत्सारणमयुक्तमिति चोदम्। तन्निराकरणाय प्रत्य- च्ोपन्यासः । इस पर कोई लोग कहते हैं कि 'प्रत्यक्ष प्रमायसे जत्र आ्र््रात्मामें कर्मत्व औरर कर्तृत्व दोनों सिद्ध हैं, फिर आप प्रत्यक्षके अनुयायी अ्रनुमानसे प्रत्यक्षका बाध कैसे कर सकते हो' १ इस शङ्काका समाधान करनेके लिए कहते हैं-

१-ग्राह्यग्राहक ऐसा पाठ भी है। २-मतः, भी पाठ है।

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५४ठ नैष्कर््यसिद्धि:

यत्र यो दृश्यते द्रष्टा तस्यैवाडसौ गुखो न तु। द्रष्टस्थो® दृश्यतां यस्मान्नैवेयाद्ृष्ट्रबोधवत् ॥ २॥॥ जिस अन्तःकरणमें जो 'अहम्' (मैं) यह ज्ञान साक्षीसे भासित होता है, वह ज्ञान उसी अन्तःकरणका धर्म (परिमाए) है, साक्षीका नहीं। यदि ऐसा न होता तो द्रष्टाके स्वरूपभूत ज्ञानके समान, वह भी साक्षीसे प्रकाशित नहीं होता ॥ २५ ॥ प्रत्यक्षेशौव भवदभिमतस्थ प्रत्यक्षस्याऽभासीकृतत्वात्सुस्थमेवा- डनुमानम्। ततस्तदेव प्रक्रियते। तत्र च विकल्पदूषणाभिधानम्। प्रत्यक्षसे ही आरप्रापका त्र्प्रभीष्ट है। प्रत्यक्ष दोषयुक्त सिद्ध हो गया है औरर पूर्वोक्त अ्रनुमान दोष रहित स्थित है। इसलिए पुनः उसीका खएडन करते हैं। वहाँपर दो कोटियाँ करके दोप दिग्वलाते हैं- नाऽडत्मना न तदंशेन गुणाः स्वस्थोऽवगम्यते। अभिन्नत्वात्समत्वाच्च निरंशत्वादकर्मतः ॥ २६॥ आ्रत्मा अपने गुसको स्वयं अ्थवा अपने त्रंशसे ग्रहगा नहीं कर सकता। क्योंकि वह किसीसे मिन्न नहीं है, सर्वत्र सम है, उसका कोई अंश नहीं है और वह कभी किसीका कर्म नहीं होता॥ २६॥ न युगपन्नाऽपि क्रमेणोभयथा चैकस्य धर्मिो ग्राह्यग्राहकत्व- मुपपद्यत इति प्रतिपादनाय शरह- एक ही धर्मीमें ग्राह्यत्व और ग्राहकत्व न एक कालमें और न क्रमसे ही रह सकते हैं, इस बातका प्रतिपादन करनेके लिए कहते हैं- द्रष्टृत्वेनोपयुक्तत्वात्तदैव स्यान्न दृश्यता। कालान्तरे चेद् दृश्यत्वं न ह्यद्रट्टक्मिष्यते ॥ २७ ॥ जिस कालमें आत्मा द्रष्टा है, उसी कालमें तो वह दृश्य हो ही नहीं सकता। यदि यह कहा जाय कि कालान्तरमें दृश्य हो जायगा, यह भी ठीक नहीं। क्योंकि उस समयमें द्रष्टा कोई नहीं होगा, तत्र फिर दृश्य किसका ? क्योंकि दृश्य तो द्रष्टाके बिना होता ही नहीं ॥ २७॥

१-द्रष्टृस्थं दृश्यतां, ऐसा भी पाठ मिलता है। २-प्रत्यक्षेणाभिमतस्य, ऐसा भी पाठ है। ३-विकल्प्य दूषणाभिधानम, भी पाठ है।

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भाषानुवादसहिता ५५

सन्तु काममनात्मधर्मा ममत्वादयोऽप्युक्तन्यायबलात, अना- त्मनयैत्र च तेषु व्यवहारात्। अहंरूपस्य तु ग्रत्यगात्मसम्बन्धितयैव१ प्रसिद्धो, अहं ब्रह्मास्मीति श्रुनेश्वानात्मधर्मत्वमयुक्तमिति चेत्, तन्न। शङ्का-ग्रस्तु, ममता, प्रयत्न, इच्छा आदि धर्म उक्त युक्तियोंके बलसे चाहे अप्रनात्माके धर्म सिद्ध हों जाएँ। क्योंकि उनमें व्यवहार भी अनात्माके समान ही होता है। परन्तु अहङ्गार तो आरात्मरूपसे ही प्रसिद्ध है और 'अहं ब्रह्मास्मि' इस श्रुतिमें भी 'अ्हम्' इस शब्से आत्माका ही ग्रहण प्रतीत होता है। इसलिए तईंकारको अ्रनात्मा कहना तयुक्त है। समाधान-

गौरोऽहमिनयनैकान्तो वाक्यं तद्वयपनेतृ तत्॥ २८॥ यदि 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) इस वाक्यसे अहं कार और ब्रह्म का अभेद बौधित होता है तो मैं गौर (गोरा) हूँ' इस वाक्यसे भी गौरवर्णके साथ आरत्माका अभेद हो जायगा ? क्योंकि 'मैं गौर (गोरा) हूँ' यह वाक्य भी लोकमें प्रयुक्त होता है। परन्तु गौर वर्णका आरात्माके साथ अभेश तो नहीं होता है। इसलिए 'मैं व्रह्म हूँ' इससे भी अहङ्कार और ब्रह्मका अभेद नहीं बोधित होता, किन्तु अहङ्कारका बोध होता है। अर्थात् 'अहं ब्रम्माडसम'इस वाक्यका यह अर्थ होता है कि 'मैं अहङ्कार नहीं, किन्तु ब्रह्म हूँ ॥२८॥ कथं वाक्यं तद्व्यपनेत तदिति उच्चते- 'अहं ब्रझ्म.स्मि' यह वाक्य किस प्रकार तहक्वारका बाधक होता है, यह बत- लाते हैं- योडयं स्थाणुः पुमानेषः पुंधिया स्थाणुधीरित। ब्रह्माऽस्मीतिधियाऽशेषामहं बुद्धिं निवर्तये३्३। २९।। जैसे पुरुषमें भ्रमसे उत्पन्न हुई स्थाणु बुद्धि 'यह पुरुष है' इस प्रकारके ज्ञानसे बाघित हो जाती है। वैसे ही 'मैं अहक्कार हूँ' इस बुद्धिको 'मैं अहङ्गार नहीं, किन्तु ब्रह्म हूँ' इस बुद्धसे निवृत्त करना चाहिए॥ २६ ॥। अहंपरिच्छेदव्यावृत्तौ3 न किश्चिदव्यावृच्तं द्वैतजातमवशिग्यते, द्वितीयसम्बन्धस्य तन्मूलत्वादत शराह-

१-यथोक्तन्यायबलाज्, भी पाठ है। २-प्रत्यगात्मतयैव, भी पाठ है। ३-निवारयेत्। ऐसा तथा 'अशेषा ह्यहंबुद्विर विवर्त्यते, भी पाठ है।

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५ूद नैष्कमर्यसिद्धि:

'अहम्' इस प्रकारके ज्ञानसे, अहंबुद्धिसे अर्थात् अहं कारसे होनेवाले भेदग्रहकी निवृत्ति होनेपर कोई भी द्व त निवृत्त होनेके लिए अवशिष्ट नहीं रहता। क्योंकि द्व तके सम्बन्धका मूल कारस यह त्रहंबुद्धि ही है। यह बात कंहते हैं- निवृत्तायामहंबुद्धौ ममधीः प्रविलीयते। अहंबीजा हिसा सिद्ध यत्तमोऽभावे कुतः फणी ॥ ३० ॥ त्र्हं बुद्धि ही ममताका क्षेत्र है। इसलिए अहङ्गारके निवृत्त हो जानेपर ममता भी लय हो जाती है। क्योंकि जत्र रज्जुमें सर्पका भ्रम होनेका बीज-अन्धकार- ही नहीं रहा, तो फिर उसमें सर्पका भ्रम हो ही कैसे सकता है॥ ३०॥ विवच्ितदष्टान्तांशज्ञापनाय दष्टान्तव्याख्या- उक्त दष्टान्तके विवक्षित त्रंशको जनानेके लिए दृष्टान्तकी व्याख्या करते हैं- तमोभिभूतचित्तो हि रज्ज्वां पश्यति रोषणम्। भ्रान्त्या भ्रान्त्या विना तस्मान्नोरगं स्रजि वीचते ॥ ३१ ॥ अज्ञानसे आच्छादित चित्तवाला मनुष्य भ्रान्तिसे रज्जुमें सर्पको देखता है और जब् भ्रान्ति नहीं रहती, तब वह मनुष्य रज्जु अथवा मालामें सर्पको नहीं देखता२॥ ३१॥

त्र्रात्माके साथ अ्रनुगत न होनेके कारग भी त्र्हङ्कार आ्र््रात्माका धर्म नहीं 1 हो सकता। आत्मनंश्चेदहं धर्मो यायान्मुक्तिसुषुप्तयोः3। यतो नाऽन्वेति तेनाऽयमन्यदीयो भवेदहम् ॥ ३२ ॥ यदि अ्हङ्कार आत्माका धर्म होता तो वह मुक्ति और सुषुति अवस्थामें भी आत्माके साथ अरनुगत रहता। परन्तु मुक्ति और सुषुतिमें वह आत्माके साथ अनुगत नहीं पाया जाता। इसलिए अहक्कार किसी औरका ही धर्म है, आत्माका नहीं॥ ३२॥

और अहङ़कारको आत्माका धर्म माननेपर और भी अनेक अपरिहार्य दोप आ् जाएँगे।

१-संसिध्येत, ऐसा भी पाठ है। २-अर्थात् जैसे मालामें सर्पकी प्रतीति अ्रान्तिसे होती है वैसे ही आरत्मा में अ्रहंकारकी प्रतीति अरविद्यासे होती है। अविद्याकी निवृत्ति होनेपर उससे उत्पन्न अ्रहंवृत्ति भी निवृत्त हो जाती है, तब केवल ब्रह्माकार चितवृत्ति स्थित हो जाती है। ३-मुक्तसुषुप्तबोः, भी पाठ है।

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भाषानुवादसहिता ५७

यद्यात्मधर्मोऽहङ्कारो नित्यत्वं तस्य बोधवत्। नित्यत्वे मोक्षशास्त्राणां वैयर्थ्य प्राप्तुयात् ध्रुवम् ॥ ३३।। मदि अहङ्कारको आत्माका धर्म माना जाय तो उसको, ज्ञानके समान, नित्य मानना पड़ेगा। यदि उसको नित्य ही मान लिया जाय तो मोक्षशास्त्र सब व्यर्थ हो जाएँगे ॥। ३३ ॥। स्यात्परिहार: ति चेत् ? तन्न। हाँ, यदि कहो कि अहङ्कारको आ्रत्माका स्वापाबिक धर्म माननेपर भी कोई दोष नहीं आता। जैसे आम्रफलका हरितवर्ण स्वाभाविक होनेपर भी, वह नष्ट हो जाता है, इसी प्रकार अहङ्कार आत्माका स्वाभाविक धर्म होनेपर भी नष्ट हो जाएगा? तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि- आम्रादेः परिणामित्वाद् गुखहानिर्गुणान्तरैः3। अविकारि तु तद् ब्रह्म न हि द्रष्टुरिति श्रुतेः ॥ ३४ ॥ आम्रादि फल परिणामी है, इसलिए उसमें गुखान्तरोंके उदित होनेसे पूर्व- गुणोंकी हानि हो सकती है, परन्तु यह ब्रह्म तो सर्वथा विकार-रहित है। जैसा कि 'न- हि द्रष्टुर्द्दष्टर्वविपरिलोपो विद्यते' इत्यादि श्रुतियोंमें वर्णन किया गया है ॥ ३४ ॥

उपयन्नपयन्" धर्मो विकरोति हि धर्मिसम्॥ ३५ ॥। अहङ्कार उत्पत्ति और नाशसे युक्त है। इसलिए उसको यदि आत्माका धर्म मानोगे तो आत्मा भी उत्पत्ति और नाशयुक्त होनेसे अनित्य हो जाएगा। क्योंकि धर्म उत्पन्न या नष्ट होता हुआ अपने धर्मोको विकारी बना देता है, यह नियम है॥३५॥ अस्त्वनित्यत्वं कमुपालभेमहि, प्रमाणोपपन्नत्वादिति चेत तन्न। शङ्का-अहङ्कारको आत्माका, धर्म माननेसे यदि आत्मामें अनित्यत्व दोष त्राजाता है, तो आवे, किसे उपालम्भ दिया जाय ? प्रमाणोंसे ऐसा ही सिद्ध है।

१-नित्यत्व मित्यस्य प्राप्नुयादित्यत्र सम्बन्धः । २-बोधशास्त्राणां, ऐसा भी पाठ है। ३-गुखान्तरे, भी पाठ है। ४-इयादशेः, ऐसा भी पाठ है। ५-उपयन्=प्रादुभवन्, अपयन् =तिरोभवन्।

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५ू८ नैष्कर्म्यसिद्धि:

समाधान-ऐसा कहना टीक नहीं। क्योंकि- सदाऽविलुप्तसाच्तित्वं स्वतः सिद्ध न पार्यते। अपह्वोतुं घटस्येव कुशाग्रीयधियात्मनः ॥ ३६॥ कुशाग्रके समान सूक्ष्म बुद्धिवाले पुरुष स्वतः सिद्ध, सदा अलुत् द्रष्टत्वरूप आरत्माके सातित्वको, घटादिके समान, छिपा नहीं सकते हैं॥ ३६ ॥ एतस्माच हेतोरहङ्कारस्याऽनात्मधर्मत्वमवसीयताम्।

यतो राद्विः प्रमाणानां स कथं तैः प्रसिद्धयति ॥ ३७॥ और इस कारणसे मी त्रहङ्कारको त्र्र्रात्मासे भिन्नका (अनात्माका) धर्म समझना चाहिए कि अहक्कारका बटादिके समान प्रमाणसे ग्रहण किया जाता है। यदि कहो कि आत्माका भी तो प्रमाणोंसे ही ग्रहण किया जाता है, इसलिए वह भी अनात्मा हो जायगा, तो यह ठीक नहीं। क्योंकि जिससे समस्त प्रमाणोंकी सिद्धि होती है, वह त्र्ात्मा प्रमाणोंसे कैसे सिद्ध किया जा सकता है ?॥ ३७ ॥ धर्मधर्मिणोश्चेतरेतर विरुद्धात्मकत्वादसङ्गतिः । धर्मिणश्च विरुद्धत्वान्न दृश्यगुणसङ्गतिः। मारुतान्दोलितज्वालं शैत्यं नाऽग्निं सिसृप्सति॥ ३८ ॥ धर्म (अहंकार) और धर्मी (आत्मा) दोनों परस्पर विरुद्व हैं, इसलिए भी उनका सम्बन्ध नहीं हो सकता है। जैसे वायुसे प्रज्वलित अ्झनिको शीतका स्पर्श नहीं हो सकता है। वैसे ही दृश्यके गुणोंके साथ धर्मी आत्माका विरोध होनेके कारण उनका (दृश्यके गुणोंका) उससे (आत्मासे) सम्बन्ध नहीं हो सकता है। तस्माद् विस्रब्धमुपगम्यताम्। द्रष्टत्वं दृश्यता चैव नैकस्मिन्नेकदा क्वचित्। दृश्यदृश्यो न च द्रष्टा द्रष्टुर्दर्शी दृशिर्ने च ॥ ३९॥ इसलिए निःशङ्क होकर मान लीजिए कि द्रष्टत्व और दृश्यत्व कभी भी, कहीं भी एक समय एकमें नहीं रहते। तथा द्रष्टा दृश्योंका दृश्य और दृश्य द्रष्टाका द्रष्टा कदापि नहीं होता ॥ ३६ ॥ १-एवं धर्मधर्मिणोः, ऐसा पाठ भी है। २-'सिसृच्यति, और सिसृप्स्यति, ऐसा भी पाठ है।' सिसृप्सति = उपगच्छति, सम्बध्यत इति यावत्।

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भाषानुवादसहिता ५९

सर्वच्यवहारलोपश्च प्रामोति। यस्मात्- द्रष्टाऽपि यदि दृश्याया आरत्मेयात्कर्मतां धियः । यौगपद्यमदृश्यत्वं वैयर्थ्यं चाऽऽप्नुयाच्छ्रुतिः ॥ ४० ॥ यदि द्रष्टामें दृश्यत्व माना जाय, तब सब व्यवहारोंका लोप प्राप्त होगा। क्योंकि यदि द्रष्टा होकर भी आ्रत्मा दृश्यभूत बुद्धिका प्रकाश्य बनेगा तो बुद्धि और आरत्मा दोनोंको ही एक ही समयमें द्रष्टत्व और दृश्यत्व एवं (दोनों ही द्रष्टा होनेके कारण) दोनोंको अदृश्यत्व भी प्राप्त होगा। तरप्रर फिर "न हि द्रष्टुर्रष्टेर्विपरिलोपो विद्यते- विनाशित्वात्'-अविनाशी हौनेके कारण द्रष्टा आत्माकी दृष्टिका कभी लोप नहीं होता।" यह श्रुति भी व्यर्थ हो जायगी ॥४० ॥ कुतः । यस्मात्। नाऽलुप्तद्रष्टद्देश्यत्वं दृश्यत्वे द्रष्टता कुतः । स्याच्चेदटगेकं निर्दृश्यं जगद्वा स्यादसान्िकम् ॥ ४१ ॥ शङ्का-आत्मा क्यों दृश्य नहीं बन सकता? उत्तर- घटादि पदार्थोंके समान द्रष्टिका लोप हुए बिना तो दृश्यत्व नहीं बन सकता और जो दृश्य हो गया वह फिर द्रष्टा कैसे हो सकता है? यदि दृश्य होनेपर भी उसका द्रष्टा होना माना जाय तो यह सम्पूर्ण जगत् द्रष्टारूप हो जानेसे दृश्यशून्य केवल द्रष्टा ही शेष रहेगा और यदि द्रष्टाका दृश्य होना माना जाय तो सारा जगत् द्रष्टासे शून्य हो जायगा॥४१ ॥ उक्तयुक्ति® द्रढीकर्तुमागमोदाहरणोपन्यास :- आर्चमन्यद्दशेः सर्वं नेति नेतीति वाडसकृत्। वदन्ती निर्गुरां ब्रह्म कथं श्रुतिरुपेक्ष्यते ॥ ४२ ॥ महाभूतान्यहङ्कार इत्येतत्क्षेत्रमुच्यते। न दशेर्द्वैतयोगोऽस्ति3 विश्वेश्वरमतादपि॥ ४३॥ पूर्वोक्त युक्तिको दढ़ करनेके लिए श्रुतिके प्रमाणोंको उद्धृत करते हैं- 'अतोऽन्यदतम्' (द्रष्टाके अतिरिक्त सब वस्तु मिथ्या हैं) तथा 'नेति नेति' (यह जो कुछ द्ृश्यमान है, वह तात्मा नहीं है) इत्यादि नि्गुख ब्रह्मको प्रतिपादन

१-स्याच्चेद्गेका निदश्या, ऐसा भी षाठ है। २-उक्तयुक्तिद्रढिम्ने, ऐसा भी पाठान्तर है। ३-द्वैतभोगोऽस्ति, भी पाठ है।

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नैष्कर्म्यसिद्धि:

करनेवाली श्रुतियोंकी कैसे उपेक्षाकी जाय? ॥ ४२॥ "महाभूत औरर अरहंकार, ये सत्र क्षेत्र कहलाते हैं।" इस प्रकार भगवान् श्रीकृप्णके मतसे भी द्रष्टाका द्वैतसे कोई सम्बन्ध नहीं है, यही सिद्ध होता है॥ ४३॥ अधुना प्रकृतार्थोपसंहारः । अब (अनात्म वस्तुके क्षेत्ररूप होनेके कारण विकारयुक्त सिद्ध होनेपर) अहङ्कारादि द्वतप्रपञ्च सब अनात्मरूप तथा मिथ्या है, इस प्रकृत तर्थका उपसंहार करते हैं- एवमेतद्विरुग्जेयं मिथ्यासिद्धमनात्मकम् । मोहमूलं सुदुर्बोधं द्वैतं युक्तिभिरात्मनः ॥। ४४॥ इस प्रकार मिथ्या भ्रमसे सिद्ध, त्रज्ञानमूलक आत्मस्वभावसे रहित होनेके कारण प्रमाण एवं युक्तियोंसे विरुद्ध द्वैतको पूर्ववर्सित युक्तियोंके द्वारा आत्मासे पृथक जानना चाहिए॥। ४ ।। कुतो मिथ्यासिद्धत्वं द्वैतस्येति चेत् ? न पृथङ् नात्मना सिद्धिरात्मनोऽन्यस्य वस्तुनः ।

शङ्का-किस कारगसे दवूँत मिथ्या है? समाधान-आत्मासे व्यतिरिक्त द्वैतवस्तुकी सिद्धि आत्मासे पृथ्करूपसे अरथवा अभेद रूपसे नहीं हो सकती है। इसलिए आत्मामें अहङ्कार आदि कल्पित हैं॥४५॥ तस्मादज्ञानविज़म्भितमेतत- दृश्या: शब्दादयः कृप्ा द्रष्ट च ब्रह्म निर्गुराम्। अहं तदुभयं बिभ्रद् भ्रान्तिमात्मनि यच्छति॥४३ ॥ इसलिए यह सब अज्ञानका प्रभाव है कि- जो शब्दादि विषय दृश्य बनाए गये हैं और निर्गुण ब्रह्म उनका द्रष्टा बनाया गया है, यह सत्र वास्तवमें अहङ्कार ही इन दोनोंरूपोंको धारण करके आत्मामें द्रष्टत्वादिकी भ्रान्ति उत्पन्न करता है॥ ४६ ॥ तत एवेयमभिन्नस्याऽत्मनो भेदबुद्विः। दृगेका सर्वभूतेषु भाति दृश्यैरनेकवत् । जलभाजनमेदेन मयूखस्त्रग्विभेदवत् ॥ ४७ ॥ इस अहङ्कारके ही कारण एक अभिन्न आत्मामें (यह सुखी है, दुःखी है, मूरें है, पिडत है, इत्यादि) भैदुद्धि उत्पन्न हुई है। सब्र प्राखियोंमें एक ही व्यापक आत्मा दश्यभेदोसे-जल-पात्रमें प्रतिबिम्बित सूर्य

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भाषानुवादसहिता ६१

जिस प्रकार एक होनेपर भी अनेक-सा प्रतीत होता है इसी प्रकार-अ्रनेकसा प्रतीत होता है॥। ४७॥ यथोक्तार्थस्य प्रतिपत्तये द्ष्टान्त :- मित्रोदासीनशत्रुत्वं यथैकस्याऽन्यकल्पनात्। अभिन्नस्य चितेस्तद्वद् भेदोऽन्त करसाश्रयः॥ ४८ ॥ अपहारो यथा भानो: सर्वतो जलपात्रकैः। तत्क्रियाकृतिदेशाप्तिस्तथा बुद्धिभिरात्मनः ॥४९॥ पूर्वोंक्त भावको स्पष्ट करनेके लिए दृष्टान्त दिया जाता है- जैसे एक ही मनुष्यमें दूसरोंकी कल्पनासे मित्र, शत्रु, उदासीन आदि भेद हो जाते हैं। वैसे ही एक आत्मामें अन्तःकरणोंके भिन्न होनेसे सुखी, दुःखी इत्यादि नाना भेद हो गए हैं॥ ४६॥ और जैसे अनेक जलपात्र एक ही सूर्यको प्रतिबिम्ब रूपतया अरप्रनेक रूपसे ग्रहण करत हैं वैसे ही अनेक अ्रन्तःकरण एक ही आत्माको अपने अपने व्यानादि क्रिया, आकार, धर्म, आधारभूत हृदयादि देश, इत्यादि नानारूपोंसे ग्रहण करते हैं॥ ४६॥ न च विरुद्धधर्माणामेकत्राऽनुपपत्तिः। किं कारणम् ? कल्पितानामवस्तुत्वात्स्यादेकत्राऽवि सम्भवः। कमनीया शुचिः स्वाद्वीत्येकस्यामिव योषिति॥। ५० ।। और यह भी शक्का नहीं करनी चाहिए कि एक ही आत्मामें सुख, दुःख, राग, द्वष इत्यादि विरुद्ध धर्म कैसे रह सकेंगे? क्योंकि कल्पित पदार्थ वास्तवमें होते नहीं। इसलिए वे परस्पर विरुद्ध होनेपर भी एक स्थानमें रह सकते हैं। जैसे कि एक ही स्त्रीके शरीरमें कामियोंके लिए कमनीयत्व, संन्यासियोंके लिए अशुचित्व और कुत्तोंके लिए स्वादुत्व, ये परस्पर विरुद्ध धर्म रहते हैं॥५०॥ न चाडयं क्रियाकारकफलात्मक आभास ईषदपि परमार्थवस्तु स्पृशति, तस्य मोहमात्रोपादानत्वात्। अभूताभिनिवेशेन स्वात्मानं वश्चयत्ययम्। असत्यपि द्वितीयेऽर्थ सोमशमेपिता यथा॥ ५१॥ 5-अपहार: = प्रतिबिम्बरूपेण ग्रहणम्। २-यही पज्ञदशी में भी कहा है- भार्था स्नुपा ननान्देति याता मातेत्यनेकधा। प्रतियोगिधिया योपिद भिद्यते न स्वरूपतः ॥

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नैष्कम्यसिद्धि:

और यह क्रिया, कारण एवं फलरूप मिथ्याभास केवल मोहसे ही उत्पन्न होनेके कारख परमार्थ वस्तुको लेशमात्र भी स्पर्श नहीं कर सकता। द्वैत प्रपञ्चके न होनेपर भी मिथ्याभिनिवेशसे ही यह लोक 'मैं मुग्ी हूँ' मैं दुःबी हूँ, इस प्रकार अपने आपको ऐसे वञ्चित कर रहा है। जैसे कि मनोरथसे कल्पित सोमशर्मा पुत्रका कल्पित पिता (कोई मनुष्य)६॥५१॥ वस्तुयाथात्म्यानवबोधपटलावनद्धाक्षः सन्। सुभ्रः सुनासा सुमुखी सुनेत्रा चारुहासिनी। कल्पनामात्रसम्मोहाद्रामेत्यालिङ्गतेऽशुचिम् ॥ ५२ ॥ वस्तुके यथार्थ स्वरूपके अप्रज्ञानरूप अरन्कारसे आ्रच्छादितनेत्र होकर-कल्पना- मात्रसे बावला (पागल) होता हुआ यह पुरुप अत्यन्त अपवित्र स्त्रीशरीरको सुन्दर माँह, सुन्दरनासिका, सुमनोहरमुख, सुन्दर नेत्र और मनोहर हास्यवाली समझकर उसस आलिङ्गन करता है॥ ५२ ॥ सर्वस्याऽनर्थजातस्य जिहासितस्य मूलमहङ्कार एव तस्याऽडत्माना- त्मोपरागात्। न तु परमार्थत आत्मनोऽविद्यया तत्कार्येए वा सम्बन्धो- डभूदस्ति भविष्यति वा। तस्याऽपरिलुप्तदृष्टिस्वाभाव्यात्। स्वथा त्यागने योग्य इस सारे अनर्थसमूहका मूल अदक्कार ही है। क्योंकि उसका आत्मा और अनात्मा दोनोंके साथ सम्बन्ध है। परन्तु वास्तवमें तो आत्माका सम्बन्ध

  • कोई अत्यन्त दरिद्र बह्वाशी ब्रह्मचारी भिक्षा माँगता हुआ किसी दुर्भिक्षकं समय एकपात्रमें सत्तकी धूलि लेकर किसी पर्वतमें वृक्षकी छायामें सोता हुआर मनोरथ करने लगा कि-मैं इस सत्तूसे कई गौ खरीदकर उन्हें खूब परिपुष्ट करूँगा। फिर वे २।३ मर्ष में कई बछड़े उत्पन्न करेंगी। तब मैं उन वृपर्भीसे खूय हल जांतकर स्ेतोंमें बहुतसा अन्न पैदाकर धान्यंसे बहुत सम्पन्न हो जाऊँगा। फिर बहुतसे दास-दासियोंसे युक्त एक अतीव सुन्दर महल बनाऊँगा। उसे देखकर फिर काई योग्य व्यक्ति अपना योग्य कन्याका मेरे साथ व्याह कर देगा। तब मैं यथायोग्य गृहस्थ सम्बन्धी उत्तमोत्तम सुखोंका अनुभव करते हुए वंशका विस्तार करनेवाला पुत्र उत्पन्न करूँगा-उसका नाम रखूँगा-'सोमशर्मा'। पीछे कुटुम्ब सौख्यकी अनुभव वेलामें कार्यवश रोते हुए बच्चेको छोक़्कर अपना कार्य करनेवाली अपनी स्त्रीको मैं पुत्रनिमित्तक कोपावेशमें आकर खूब पीटूँगा।" ऐसा सोचते हुए उस ब्रह्मचारीने कोपावेशमें आकर ज्यों ही अपना हाथ जोरसे उस मृण्मय भित्षापात्रमें मारा, त्योंही उस भिक्षापात्रके दो टुकड़े हो गये औरर सत्त सब मट्टीमें मिल गया। तब वह पीछे हाथ, मैं नष्ट हो गया। अरे, अब क्या करूँ? हाथ, मेरा भाग्य बड़ा मन्द है? ऐसा कहता हुआ खूब पश्चात्ताप करने लगा।

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भाषानुवादसहिता ६३

अरविद्या अथवा उसके कायोंसे न कभी हुआ, न है और न होगा। क्योंकि वह अविनाशी- ज्ञान स्वरूप है। दृश्यानुरक्तं तद्द्रष्ट्ट दृश्यं द्रष्ट्तुरञ्जितम्। अहंवृत्योभयं रक्तं तन्नाशेऽद्वैतमात्मनः ॥५३॥ शब्दादि दृश्य विषयोंसे सम्बद्ध होकर अन्तःकरण उनका द्रष्टा होता है औरर वही अन्तःकरणा द्रष्टासे त्नुरञ्षित (संमिलित) होकर चैतन्यका दृश्य अर्थात् उससे भासित होता है। इस प्रकार अहक्कारसे द्रष्टा और दृश्य ढोनोंका सम्बन्ध है। इसलिए अहक्कार- का नाश होनेसे आत्माकी अद्वैतावस्था (अपने आप) सिद्ध होती है॥ ५३॥ इह केचिच्चोदयन्ति, योऽयमन्वयव्यतिरेकाभ्यामनात्मतयोत्सा- रितोऽहङ्कारो वाक्यार्थप्रतिपत्तये, सोडयं विपरीतार्थः संवृत्तो यस्मादहं ब्रह्मास्मीति ब्रह्माहंपदार्थयोः सामानाधिकरणयश्रवणात् अनात्मार्थेन सामानाधिकरएयं प्रप्नोति। वक्तव्या च प्रत्यगात्मनि वृत्ति:, सोच्यते प्रसिद्धलक्षणा गुवृत्तिभिः ।

इसपर कोई लोग यह शङ्का करते हैं कि जो यह त्रन्वय व्यनिरेक द्वारा 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योंके अर्थज्ञानके लिए अहङ्कारको अनात्मा ठहराकर उसे पृथक कर दिया है, सो यह विपरीत हो गया है। क्योंकि 'अहं त्रह्माऽस्मि' इस श्रुतिमें ब्रह्म और अह- झ्ारका अभेद प्रतिपादन किया है, परन्तु आम्र्माके साथ तो अनात्माका अभेद नहीं हो सकता है। इसलिए अहं शब्दकी प्रत्यगात्मामें वृत्ति कहनी चाहिए। अर्थात् अहंशब्द आत्माका किस वृत्ति (शकि अथवा लक्षणा) से बोधक होता है, यह बतलाना चाहिए। वही कहते हैं-अहं शब्द मुख्य-वृत्ति (शक्ति), लक्षणा-वृत्ति और गौणी- वृत्तिसे आ्र्प्रात्माका बोधक है। प्रथम लक्षणाव्ृत्तिसे अरहंशब्द किस प्रकार आत्माका वाचक है, यह बतलाते हैं- नाऽज्ञासिषमिति प्राह सुषुप्तादुत्थितोऽपि हि। अयोदाहादिवचेन लक्षसं परमात्मनः ॥५४॥ मनुष्य सोकर उठनेपर मैं इतनी देर तक कुछ नहीं जानता था, ऐसा कहता है। ऐसे स्थलोंमें तहङ्गार-रहित केवल आत्मामें भी अहं शब्दका प्रयोग होता है। इसलिए जिस प्रकार 'लोहा जलाता है' इत्यादि प्रयोग-स्थलोंमें लोहमें जलाना न बन मकनेके कारग, लोहा इस शब्दका, अझनितत लोहा, ऐसा अर्थ लक्षणावृत्तिसे किया जाता है। इसी प्रकार 'अहं ब्रह्मास्मि' यहाँ भी दृश्यभूत तरहङ्कारकी कभी निर्गुण ब्रह्मसे

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६४ नैष्कम्यसिद्धि:

एकता नहीं हो सकती है, इसलिए यहाँ अजहल्लक्षणा द्वारा 'अहं' शब्द प्रत्यगात्माका बोधक है॥ ५४ ॥ [अरब गौणीवृत्तिसे 'अ्र्हं' शब्द आरत्माका बोधक होता है, यह दिखलाते हैं-] प्रत्यक्त्वादतिसूक्ष्मत्वादात्मदृष्टयनुशीलनात् - उतो वृत्तीर्विहायाऽन्या ह्यहंवृत्त्योपलक्ष्यते॥ ५५ ॥ अहङ्कारसे अतिरिक्त और जितने भी अनात्म पदार्थ हैं, उन सभीसे अहङ्गार ही आन्तर (आत्माका अधिक समीपवर्ती) है और आत्माके समान अति सूक्षम है एवं उसमें आरत्मदृष्टिका अनुशीलन अनादिकालसे होता आया है। इन सब कारणोंसे अहङ्कार और आत्माका साम्य होनेसे-जिस प्रकार तिलोंके तैलसे१ समा- नता होनेके कारण सरसों आदिसे निकले हुए तैलका भी गौणीवृत्ति द्वारा तैल शब्दसे ग्रहण होता है। इसी प्रकार-अन्य वृत्तियोंको छोड़कर गौणीवृत्ति द्वारा अहं शब्दसे आात्माका ग्रहण होता है॥ ५५ ॥ [अरच मुख्य वृत्तिसे त्र्हं शब्द अन्तःकरण विशिष्टआरत्माका वाचक है, इसलिए शुद्ध आत्माका भी वाचक है। क्योंकि विशिष्टमें विशेषण और विशेष्य दोनों होते हैं। यह कहते हैं-] आत्मना चाविनाभावमन्यथा विलयं त्रजेत्। न तु पक्षान्तरं यायादतश्चाऽहंधियोच्यते॥ ५६॥ अहङ्कार अपने स्थितिकालमें आत्माके बिना अस्तित्व नहीं रख सकता है। त्रन्यथा आ्रत्माके बिना उसका विलय ही हो जायगा। इसके अतिरिक्त और कोई गति नहीं हो सकती। जहाँ अहंकार है वहाँ आत्मा है उसको छोड़कर उसकी स्थिति नहीं है। इसलिए अहं शब्द शक्ति द्वारा ही आत्माका बोधक होता है॥ ५६॥ कीटकू पुनर्वस्तु लक्ष्यम् ? नामादिभ्यः परो भूमा निष्कलोऽकारकोऽक्रियः । स एवाऽऽत्मवतामात्मा स्वतः सिद्धः स एव नः ॥५७॥ प्रश्न-उस लक्ष्य आरत्माका (ब्रह्मका) कैसा स्वरूप है ? उत्तर-छान्दोग्य उपनिषद्में कथित नामसे लेकर प्राणपर्यन्त सब्र पदार्थोसे परे, व्यापक, विभागसे (भेदसे) रहित, जो किसीका साधन नहीं है और जो स्वयं क्रियासे शून्य है, वही सब आत्मवादियोंके मतमें आत्मा है।, प्रभ-उक्त विशेषण युक्त ब्रह्म आपके मतमें लक्ष्य रहे, परन्तु अन्य प्रमाणोंसे सिद्ध हुए बिना वास्तवमें वह लक्ष्य हो कैसे सकता है। (१) तैल-शब्द अरभिधा-शक्तिसे तिलोंसे निकले हुए तेलका ही बाचक है।

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भाषानुवादसहिता उत्तर-हमारे मतमें ब्रह्म स्वतः एव सिद्ध है। उसको अपनी सिद्धिके जिए प्रमाखान्तरोंकी आवश्यकता ही नहीं है॥ ५७ ॥ अज्ञानोत्थबुद्धयादिकर्त त्वोपाधिमात्मानं परिगृह्यैवाऽन्वयव्यति रेकाम्यामहं सुखी दुःखी चेत्यहङ्कारादेरनात्मधर्मत्वमुक्तम्। केत्रलात्मा- भ्युपगमेऽशक्यत्वान् फलाभावाच्च। अथेदानीम विद्यापरिकल्पितं साच्तित्व- माश्रित्य कर्तृ त्वाद्यशेषपरिणामप्रतिषेवायाऽडह। -अज्ञानसे उन्पन्न बुद्धयादिरूत कर्तृत्व, भोक्तृत्व उपाधियोंसे युक्त आत्माको लेकर ही अन्वय और व्यतिरे+से मैं सुबी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ' इस प्रकारके अहङ्कारादिको अनात्माका धर्म बतलाया। क्योंकि अविद्यासे कल्पित रूपको त्याग कर केवल आत्मा म.ननेपर अन्वय त्रौर व्यतिरेक व्यवहार नहीं हो सकते हैं और उनसे कुछ प्रयोजन भी नहीं है। इसके तरपनन्तर अरप्रब अविद्यासे कल्पित सा्ित्वको लेकर कर्तृत्वाडि समस्त परिणामोंका निषेध करनेके लिए कहते हैं- एष सर्वधियां नृत्तमविलु सैकदर्शनः। वीक्षतेऽवीक्षमाणोऽपि निमिषत्तद्ध्रुवोऽध्रुवम् ॥५८॥ यह अपरिखामी, अद्वितीय तथा नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा स्वयं दृष्टिका विषय न होता हुआ भी जड़रूप बुद्धि आदिके नृत्यको देखता है॥ २८॥ नतु सर्वसिद्धान्तानामपि स्वदृष्टयपेक्षयोपपन्नत्वादितरेतर- दृष्टयपेक्षया च दुःस्थितसिद्धिकत्वान्नैकत्राऽपि विश्वासं पश्यामो न च सवतार्किकैरदूषितं समर्थितं सवतार्फिकोपद्रवापसर्पणाय वर्त्म संभावयामः। उच्यते। विश्रब्धैः सम्भाव्यतामतुभवमात्रशरणत्वात्सर्वतार्किकप्रस्था- नानाम्। तदभिधीयते। शङ्का-सभी शास्त्रकारोंके सिद्धान्त अपनी-अपनी इष्टिसे सङ्गत और विपक्षी लोगोंकी दृष्टिमें परस्पर विरुद्ध होनेके कारण हमें किसी एक सिद्धान्तपर विश्वास नहीं होता और (ऐसा कोई भी बिषय नहीं है जिसका समस्त तार्किकोंने खएडन या मएडन नहों किया हो। इसलिए) ऐस्र कोई मार्ग नहीं दीव पड़ता जिससे समस्त नार्फिकेोंका उपद्रव (वादविवाद) शान्त हो जाय? समाधान-इस बातको निःशङ्क होकर मान लीजिए कि आत्मा स्वयम्प्रकाश, अकर्ता तथा अभोक्ता है। क्योंकि समस्त दर्शनोंका एकमात्र शरण अनुभव ही है। यही भात (अग्रिम श्रोकसे) कही जाती है-

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६६ नैष्कम्यसिद्धि:

इमं प्राश्चिक्ुमुद्दिश्य तर्कज्वरभृशातुराः।

इसी अनुभवरूपी मध्यस्थको उद्देश्य करके तर्करूप ज्वरसे अत्यन्त आरत हुए वादी लोग 'स्वात्' शब्द जिनके अन्तमें है ऐसे 'एतत्वात्' 'अमुकत्वात्' इत्यादि बाग्जालोंसे एक दूसरेको मोहित करते हैं॥ ५६॥। अत्रापि चोदयन्ति। अरपरतुभवात्मनोऽपि विक्रियाम्युपगमेऽ- नम्पुपगमेऽपि दोष एव। यस्मादाह। इसपर भी कोई लोग यह शङ्का करते हैं कि उस अनुभवरूप आ्रत्माको विकार- युक्त अरथवा तद्रहित चाहे जैसा मानो, दोनों प्रकारसे दोष आता है। क्योंकि- वर्षातपाम्यां कि व्योम्नश्र्मसयस्ति तयो: फलम्। चर्मोपमश्चेत्सोनित्यः खतुल्यश्चेदसत्समः ॥६० ॥ बुद्धिजन्मनि पुंसश्च अथाऽविकृतिरेवाडयं प्रमातेति न युज्यते ॥ ६१ ॥ वृष्टि अथवा धूपसे आकाशमें तो कोई विकार नहीं हो सकता, किन्तु उनका (वृष्टि और धूपका) फल त्वचामें ही प्रतीत होता है। सो यदि आत्मा चर्मके समान विकारवाला है, तत तो अनित्य है और यदि आकाशके समान निर्विकार है, तब वद तभावरूप हो जायगा ॥ ६० ॥। नाना बुद्धियोंके उत्पन्न होनेसे त्रत्मामें यदि विकार माना जाय तब वह अनिस्य हो जायगा और यदि उसे निर्विकार माना जाय तब वह प्रमाता नहीं बन सकता ॥ ६१ ॥ अस्य परिहारः। इस राङाका परिहार कहते है- ऊर्ध्व गच्छति धूमे खं भिद्ने स्वििन्न भिद्यते। न भिद्यते चेत्स्थास्तुत्वं मिद्यते चेद्ध्िदाऽस्य का ॥ ६२॥ धूएँ के ऊपरको उठनेसे आकाश विदीर्णं होता है या नहीं? यदि नहीं विदीरण होता है, तो धुँआ ऊपरको जा नहीं सकता और यदि विदीर्ण होता है तो आकाशमें क्या विकार हो सकता है? (अर्थात् जैसे धूमकी गतिसे आकांश विकृत नहीं होता है, वैसे ही बुद्धियोंका प्रमाता होनेपर भी आरात्मामें विकार नहीं हो सकता है !) ॥ ६२॥

१- चर्मण्येव, ऐसा भी पाठ है। २-अथाविकृत एवायं, पाठ भी है।

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भाषानुवादसहिता

उक्त दष्टान्तको समझानेके लिए कहते हैं- अविक्रियस्य भोक्तृत्वं स्यादहंबुद्धिविभ्रमाद। नौयानविभ्रमाद्यद्वन्नगेषु गतिकल्पनम् ॥ ६३ ॥ जिस प्रकार चलती हुई नौकापर बैठे हुए मनुष्योंको नदीके तीरपर स्थित वृक्ष आररादि भ्रान्तिसे चलते हुए जान पड़ते हैं। इसी प्रकार विकाररहित आत्मामें भोक्त्व आदि विकार अहंबुद्धिसे उत्पन्न हुई भ्रान्तिसे होते हैं ॥ ६३ ॥ यथोक्तार्थाविष्करणाय दृष्टान्तान्तरोपादानम्। पूर्वोक्त अर्थको स्फुट करनेके लिए एक और दष्टान्त देते हैं। यथा जात्यमणेः शुभ्रा ज्वलनी निश्ला शिखा। सन्निध्यसन्निधानेषु घटादीनामविक्रिया ॥ ६४ ॥ जिस प्रकार उत्तम मखिकी प्रंकारमान, निश्चल प्रभा प्रकाश्य वटादि पदार्थोंके समीप होने और न होनेपर भी विकारवाली नहीं होती॥ ६४ ॥ अयमत्रांशो विवक्तित इति ज्ञापनायाऽऽह। इस दष्टान्तका कौन सा अंग दार्टान्तिकमें विवक्ित है यह बतलानेके लिए कहते हैं- यद्वस्था व्यनक्तीति तदवस्थैव सा पुनः । भएयते न व्यनक्तीति घटादीनामसन्निधौः॥६५॥ जिस स्वरूपसे वह मखिकी प्रभा घटादि पदार्थोंके समीप होनेपर उनकी प्रकाशिका कहलाती है, उसी स्वरूपसे उनके समीप न होनेपर उनकी अप्रकाशिका कहलाती है॥६५॥ तत्र च- प्रदीपकः। सन्निध्यसन्निधानेषु धीवृत्तीनामविक्रियः ॥ ६६ ॥ इसी प्रकार जिस ज्ञानस्वरूपसे यह आ्त्मप्रदीप (आत्मारूपी दीपक) बुद्धिकी वृत्तियोंका, उनसे सन्निधान होनेपर, प्रकाशक है, उसी रूपमें उनके सन्निहित न होनेसे उनका अप्रकाशक है। प्रकाशक अवस्थामें वह विकारी और अप्रकाशक अवस्थामें असत्रूप अर्थात् वह नहीं है ऐसा, नहीं होता ॥ ६६ ॥

१- अमननिधे, ऐसा भी पाठ है।

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नैष्कम्यसिद्धि

न प्रकाशक्रिया काचिदस्य स्वात्मनि विद्यते। उपचारात् क्रिया साऽस्य यः प्रकाश्यस्य सन्निधिः ॥६७॥ इस आात्मामें बुद्धयार्दिको प्रकाशित करनेवाली कोई क्रिया नहीं है। केवल प्रकाश्य विषयोंका सान्निध्य ही उपचारमे इसकी क्रिया (इस शब्दसे) कहा जाता है। मैवरं शङ्किष्ठाः साङ्यराद्वान्तोऽयमिति। यतः, यथा विशुद्ध आकाशे सहसैवाऽभ्रमएडलम्। भूत्वा विलीयते तद्वदात्मनीहाऽखिलं जगत् ॥ ६८ ॥ ऐसी शङ्का मत कीजिए कि 'यह तो तुमने साङ्गयके सिद्धान्तको स्वीकार कर लिया है !' क्योंकि जैसे विशुद्ध आकाशमें एकाएक मेघकी काली काली घटाएँ, उत्पन्न हो होकर विलीन होती रहती हैं, इसी प्रकार आत्मामें यह सपूररं जगत् उत्पन्न और विलीन होता रहता है.॥। ६८ ॥। तम्मादेष कूटस्थो न द्वैतं मनागपि स्पृशति। यतः। शब्दाद्याकारनिर्भासाः च्षणप्रध्वंसिनीदशा। नित्योऽक्रमदृगात्मैको व्यापोतीव धियोऽनिशम् ॥६९॥ इस कारण यह निर्विकार आत्मा दवतसे किञ्चिन्मात्र भी सम्बद्ध नहीं होता.।. क्योक यह नित्य; एक और सर्वदाप्रकाशक आरत्मा अपने स्वरूपभूत चैतन्यसे, मानो शब्दादि विष्योंके आकारोंको धारण करनेवाली और प्रतिक्षए नष्ट होनेवाली बुद्धिवृत्तियोंको, व्याप्त कर रहा है, ऐसा प्रतीत होता है ॥ ६९ ॥ ६ और ६६ इन दोनों श्लोकोंमें ग्रन्थकारने जगन्मिश्यात्व और ऐकावम्य दिखलाकर साङ्गयवादियोंके जगत्संत्यत्ववाद औ्रर नानात्मवादसे, अपनी ६द वें श्ोककी अनुक्रमणिकामें की हुई प्रतिज्ञाके अनुसार, वैलक्षएय टिग्वाया है, यह जानना चाहिए।] एवश्च सति बुद्धः परिणामित्वं युक्तम्। अतीतानागतेहत्यान् युगपत्सवंगोचरान् । वेच्यात्मवन्न धीर्यस्मात्तेनेयं परिणामिनी॥ ७ ॥ इसलिए बुद्धिंको परिणामिनी मानना युक्त है। भूत, भविष्यत् और वर्तमान, इन सब पदार्थोंको, आत्माके समान, बुद्धि एक कालमें ही नहीं जान सकती। इस कारण वह परिखामिनी है॥ ७०॥

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भाषानुवादसहिता ततश्चैतस्सिद्धम्- अपश्यन्पश्यनीं बुद्धिमशृएतन् शृरवतीं तथा। निर्मल्ोऽविक्रियोSनिच्छन्निच्छन्तीं चाडप्यलुपदक्।७१॥ द्विषन्तोमद्विषन्नात्मा कुप्यन्तीं चाउप्यकोपनः । निर्दुःखो दुःखिनीं चैत्र निःसुखः सुखिनीमपि॥७२॥ अमुह्यमानो मुह्यन्तीं कल्पयन्तीमकल्पयन्। स्मरन्तीमस्मरंश्रवैव शयानामस्वपन् मुहुः॥७३॥ सर्वाकारां निराकार: स्वार्थोऽस्वार्था निरिङ्गनः । निस्त्रि कालस्त्रि काल थां कूटस्थः क्षणभंगुराम्॥ ७४॥ निरपेक्ष्र सापेक्षां पराचों प्रत्यगद्वयः। सावधिं निर्गतेयत्तः सर्वदेहेषु पश्यति ॥ ७५॥ इससे यह सिद्ध हुआ्रा कि, देखना, सुनना, चाहना, द्वेष करना, कुपित होना, दुःखी होना, सुखी होना, मोहित होना, कल्पना करना, स्मरण करना, सोना इत्यादि विकारोंसे रहित, निरपेक्ष,विषयोंसे विरुद्ध, सर्वदा स्वयंप्रकाश, निर्मल, स्वार्थ, कूटस्थ तथा क्रियाओंसे रहित यह आत्मा देखती, सुनती, चाहती, द्वेषकरती, कुपित होती, दुःखी होती, सुखी होती, मोहित होती, कल्पना करती, स्मरस करती, बार-बार सोती, और नाना आकारोंमें परिखित होती हुई, क्षण- भंगुरा, अपेक्षा करनेवाली, विषयोंमें लित होनेवाली औरर सावधिक (परिच्छिन्न) बुद्धि, को सब् देहोंमें देखता है॥ ७१-७२-७३-७९-७५॥

एतस्माच कारणादयमर्थो व्यवसीयताम्- दुःखी यदि भवेदात्मा क:साक्षी दुःखिनो भवेत्। दुःखिनःसाच्िताऽयुक्ता साच्िणो दुःखिता तथा॥ ७६।। इस कारणसे यह निश्चय कर लेना चाहिए कि- यदि आरत्मा दुःखी (दुःख आदि पन्णिामयुक्त) है तो उसका संक्षी कौन होगा? क्योंकि जो दुःखी है, वह साक्षी कैसे हो सकता है और जो साक्षी है वह दुःखी नहीं हो सकता है॥ ७६ ॥

१-निर्यत्नोऽविक्रियः, ऐसा भी पाठ है।

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नैष्कश्यसिद्धि:

पूर्वस्येव व्याख्यानार्थमाह। नर्ते स्याद्विक्रियां दुःखी साच्षिता का विकारिखः । धीविक्रियासहस्राणां साक्ष्यतोऽहमविक्रियः । ७७॥ पूतोंक्त विषयके ही व्याख्यानके लिए कहते हैं- विकार हुए बिना दुःी नहीं हो सकता है और जो विकारी है वह साक्षा नहीं हो सकता है। इसलिए अनेक बुद्धि-विकारोका सात्ती अहं-शब्डका लक्ष्य आत्मा विकार रहित है॥ ७७॥ एवं सर्वस्मिन् व्यमिचारिएयात्मवस्त्वेवाऽव्यभिचारीत्यनुभवतो वयवस्थापनायाऽऽह। इस प्रकार जब सब पदार्थों का मिथ्या होना सिंद्ध हुआ, तत (इतर सब पदार्थोंके व्यमिचारो२ होनेसे) केवल एक आत्मा ही 3 अव्यभिचारी है अर्थात् उसका कभी अभाव नहीं होता। इस बातको अनुभवसे सिद्ध करनेके लिए कहते हैं- प्रमाणतन्निभेष्वस्या नोच्छिततिर्मम संविद:। मत्तोऽन्यदूपमाभाति यत्तत्स्यात्वसभ्गि हि॥ ७८॥ उत्पतिम्थितिभङ्गषु कुम्भस्य वियतो यथा। नोत्पत्तिस्थितिनाशाः स्युर्बुद्वेरेवं ममाऽपि न॥७९॥ बुद्धि-परिणामरूप प्रमाण अथवा प्रमाणाभास नष्ट होते रहें, परन्तु ज्ञान-स्वरूप आरक्माका कभी अरपरभाव नहीं होता है और आत्मासे अन्य जितने पदार्थ जान विषय होते हैं वे सब कषषमंगुर है।। ७८॥ जैसे घटकी उत्पत्ति, स्थिति और नाशसे आकाशकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश नहीं होते, इसी प्रकार बुद्धिकी उत्पत्ति, स्थिति और नाशोंसे आत्मा उनसे सम्बद्ध नहीं . होता॥ ७६॥ सुखदुःखतत्सम्बन्धानां च प्रत्यक्षत्वान् श्रद्धामात्रग्राद्यमेतत्। सुखदुःखादिसम्बद्धां यथा दएडेन दणडिनम्। राधको वीक्षते बुद्धिं साक्षी तद्वदसंहृतः ॥ ८० ॥ बुद्धि प्रत्यक्ष ही सुखदुःखादिसे युक्त देखी जाती है। इसलिए यह बात केवल श्रद्धामात्रसे ग्रहण करने योग्य नहीं है।

१-धीविक्रियासहस्रस्य, भी पाठान्तर है। २-मिथ्यारूप। ३-सत्य। 8-समापि थ, और 'ममापि नो' भी पाठ है।

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भाषानुवादसहिता

जैसे दएडी पुरुषको लक्षणरूप दण्डसे पहचान लेते हैं। वैसे ही सुख- दुःखादिसे युक्त बुद्धिको, उनसे असंस्पृष्ठ माक्षी भली प्रकार देखता है, अतएव उसके धर्मोंका सम्बन्ध उसमें नहीं है॥ ८0 ॥ एतस्माच्च हेतोघियः परिणामित्वं युक्त्तम् । येनैवाऽस्या भवेद्योग: सुखकुम्भादिना धियः। तं विदन्ती तदैवाऽन्यं वेत्ति नाऽतो विकारिणी॥ ८१ ॥ इस कारखसे भी बुद्धिको परिखामी कहना ठीक है कि, सुख-दुःख अथवा घटपटादि जिन-जिन विषयोंसे बुद्धिका सम्बन्ध होता है (अर्थात् बुद्धि जिन जिन आकारोंको प्रात्त होती है) उन्हीं विषयोंको वह ग्रइण करती है। जिनसे उसका मम्बन्ध नहीं होता है, उनको वह ग्रहण नहीं करती। इसलिए वह विकारिणी है॥८॥ अस्याश् क्षणभङ्गुरत्वे स्वयमेवाउडत्मा साक्षी। न हि कूट- स्थावबोधमन्तरे बुद्ध रैवाऽडविर्भावतिरोभावादिसिद्धिरस्ति। परिणामिधियां वृत्तं नित्याक्रमदगात्मना। षड्भावविक्रियामेति व्याप्ं खेनाडड्कुरो यथा ॥। ८२ ॥। इस बुद्धिकी क्षणमङ्गुरतांका साक्षी स्वयं आत्मा ही है। क्योंकि नित्यसिद्ध सान्ी रूप ज्ञानके बिना बुद्धिके उत्पत्ति और विनाश प्रतीत नहीं हो सकते। जैसे आकारसे व्याप्त होकर ही अङ्कर उत्पत्ति, अस्तित्व, वृद्धि, स्थिति, क्षय और नाशको प्राप्त होता है। इसी प्रकार परिखामी बुद्धि भी आरत्मासे व्याप्त होकर ही उत्पत्ति आरदि छः विकारोंका अनुभव करती है ॥ ८२॥ सत आत्मनश्राऽविकारित्वे युक्ति:, सत् रूप आत्माके अविकारी होनेमें युक्ति देते हैं- स्मृतिस्वम्नाऽवबोधेषु न कश्चित्प्रत्ययो धियः। दशाऽव्याप्तोऽस्त्यतो नित्यमविकारी स्वयंदशिः॥८३॥ स्मरण के समय, जाग्रत् एवं स्वप्तावस्थामें कोई भी बुद्धिकी वृत्ति ऐसी नहीं होती जो आत्मासे व्याप नहीं है। इसलिर आत्मा नित्य अविकारी और स्वयं प्रकाश हैं।।८३॥। एवं तावत्पराभ्युपगतप्रक्रियाप्रस्थानेन निरस्ताशेष विकारै- कात्म्यं प्रतिपादितमुपपत्तिभिः। अथाऽधुना श्रौतीं प्रक्रियामव- लम्ब्योच्यते। १-बुद्ध: परिशामित्वं, इस प्रकारका पाठ भी है। २- कूठस्थावरोधमन्तरेय, पाठ भी है।

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इस प्रकार वादियोंके मतमें मानी हुई प्रक्रियाको मानकर युक्तियोंके द्वारा सम्पूर्ण विकारोंसे रहित एक ही आत्मा है, ऐना निरूनण किया। अब श्रुतिके अनुकूल प्रक्रियाका अवलम्बन करके उसी बातका निरूपण करते हैं- अस्तु वा परिणामोऽस्य दशे: कूटस्थरूपतः । कल्पितोऽपि मृषैत्ासौ दएडम्येवाडप्सु वक्रता॥ ८४ ।। अथवा यदि आत्मामें परिखाम मान भी लिया जाय तो भी वह कल्पित होनेके कारण मिथ्या है ऐसा मानना पड़ेगा। क्योंकि श्रुतिने उसको कूटस्थ कहा है। (चैतन्यके प्रतिबिम्बसे वृत्तियोंमें भी जब एकाकारता प्रतीत होती है, तब फिग शुद्ध आात्मामें भेद कहाँसे हो सकेगा) इसलिए वह जलमें दएडकी वक्रताके समान आत्मामें कल्पित है। ८४ ॥ षट्सु भावविकारेपु निषिद्ध ष्वेवमात्मनि। दोषः कश्चिदिहासक्त न शक्यस्तार्किकश्चमिः ॥८५ ॥ इस प्रकार आत्मामें उत्पत्ति, वृद्धि, इत्यादि छः विकारोंका निषेध कर देनेपर फिर तार्किक लोग कोई भी दोप नहीं निकाल सकते !॥ द५ ॥ प्रकृतमेवोपादाय बुद्घेः परिणामित्वमात्मनश् कूटस्थत्वं युक्तिभिरुच्यते। पूर्वोक्त श्रौत प्रक्रियाको लेकर ही बुद्धिकी परिगामिता और आत्माकी कूट- स्थताको युक्तियोंसे सिद्ध करते हैं- प्रत्यर्थ तु विभिद्यन्ते बुद्धयो विषयोन्मुखाः। न भिदाऽवगतेस्तद्वत्सर्वास्ताश्चिन्निमा यतः ॥ ८६ ॥ बुद्धियाँ जिस प्रकार प्रत्येक विषयमें मिन्न-भिन्न प्रकार्की होती हैं, इस प्रकार च्चैतन्यमें भेद नहीं है। क्योंकि वे सत् बुद्धि-वृत्तियाँ भी चिदाकार हैं। चैतन्यके प्रति- बिम्बसे वृंत्तयोंमें भी जत्र एकाकारता प्रतीत होती है, तत शुद्ध आरत्मामें भेद कहाँसे हो सकेगा ? स्वतः उसमें कोई भेद प्रतीत नहीं होता। केवल उपाधिमेसे ही भेद प्रतीत होता है॥ ८६ ॥ सवसम्बद्धार्थ एव । साऽवशेषपरिच्छेदिन्यत एव न कृत्स्नवित्। नो चेत्परिण मेद्वुद्धिः सर्वज्ञा *साऽडत्मवन्दवेत् ॥ ८७ ॥ १-सम्बन्धार्थ एव, पाठ भी मिलता है। उच्यते, इति शेषः । २-स्वाध्मवद भवेन, भी पाठ है।

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भाषानुवादसहिता

बुद्धिका उसके परिखामोंके साथ सम्बन्ध प्रतिपादन करते हैं- बुद्धि परिणामिनी है, इसलिए वह कतिपय ही पदार्थोंको जान सकती है, सबको नहीं। यदि वह परिणामिनी न होती तो आत्माके समान सर्वज्ञ हो जाती ।८७॥

इसलिए ज्ञानरूप चैतन्यके अरपरद्वितीय होनेके कारण। चएडालबुद्धेर्यद् द्रष्ष्ट तदेव ब्रह्मबुद्धिद्टक्। एकं तदुभयोर्ज्योतिर्भास्यभेदादनेकवत् ॥८८ ॥ चाएडाल बुद्धिका जो द्रष्टा है वही ब्रह्मबुद्धिका भी द्रष्टा है, उन दोनों बुद्धियोंका प्रकाशक एक ही है। केवल भास्यके भेदसे अ्रप्रनेक-सा प्रतीत होता है॥ दद॥

कस्मात् ? अवस्थादेशकालादिभेदो नास्त्यनयोर्यतः । तस्माजगद्वियां वृचं ज्योतिरेकं सदेक्षते ॥ ८९॥ प्रश्न-यह कैसे ? उत्तर-अवस्था, देश और काल इत्यादि भेद चाएडाल बुद्धिके साक्षी और ब्रह्मबुद्धिके साक्षी, इन दोनोंमें नहीं है। इसलिंए सारे जगत्की बुद्धियोंको देखनेवाला एक ही प्रकाशस्वरूप आ्र्प्रात्मा है। सर्वदेहेष्वात्मैकत्वे प्रतिबुद्धपरमार्थत्त्वस्यापि अप्रतिबुद्धदेह- सम्बन्धादशेषदुःखसम्बन्ध इति चेत् । तन्न- शङ्का-यदि सम्पूर्ण देहोंमें आत्मा एक ही है, तब जिसने परमार्थवस्तुभूत आत्माका साक्षात्कार कर लिया है, उसको भी व्रज्ञ लोगोंके शरीरोंके साथ सम्बन्ध होनेके कारख समस्त दुःखोंका सम्बन्ध हो जाएगा? समाधान-ऐसी शङ्का ठीक नहीं है। क्योंकि- बोधात्प्रागपि दुःखित्वं नान्यदेहोत्थमस्ति नः । बोधाद्ध्व कुतस्तत्स्याद्यत्र स्वगतमप्यसत्२।। ९० ।। जब कि ज्ञानके उत्पन्न होनेसे पहले भी अन्य देहोंसे उत्पन्नं हुआ दुःख हमें नहीं था, तब ज्ञान उत्पन्न होने पर वह कैसे हो सकता है? जब कि स्वयं अपने शरीरके दुःखका भी अपनेमें सम्बन्ध नहीं रहता॥ ९० ॥

१-सदीक्षते, ऐसा भी पाठ है। २-प्राक्तनमप्यसत्, भी पाठ है। १०

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७४ नैष्कम्यसिद्धि:

न चेयं स्वमनीषिकेति ग्राह्यम्। कुतः । श्रुत्यवष्टम्भात्। शब्दाद्याकार निर्भासा हानोपादानधर्मिखी। भास्येत्याह श्रुतिर्दृष्टिमात्मनोऽपरिणामिनः ॥९१॥ यह केवल हमारी कल्पनामात्र ही नहीं है। किन्तु श्रुति भी इस बातको प्रति- पादन करती है। शब्दादि विषयोंके आकारको धारणकर तद्रपसे प्रकाशित होनेवाली तथा किसी विषय- का ग्रहण और किसीका त्याग करती हुई बुद्धि अपरिणामी आत्मवस्तुके द्वारा प्रकाशित होती है, न कि आत्मा उस बुद्धिसे प्रकाशित होता है। ऐसा श्रुतिने प्रतिपादन किया है ॥९१॥ का त्वसौ श्रुतिः ? दृष्टद्रषटारमात्मानं न विज्ञातारमरे केन विजानीयाद्वियां पतिम्॥९२॥ प्रश्न-वह श्रुति कौन सी है? उत्तर-'न दष्टेर्द्रष्टारं पश्येत्'-"बुद्धिकी वृत्तियोंके द्रष्ा आत्माको इस बुद्धिका दृश्य मत समझो।" 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्'-"बुद्धि के साक्षी-आत्माको किस साधन से जान सकते हैं।" इत्यादि श्रुति इस विषयमें प्रमाण हैं ॥ ९२॥

त्यन्धा इवाऽनुकम्पनीया इत्याह। बुद्धि परिणामिनी है और आत्मा कूटस्थ एवं नित्य है, यह बात सर्वं प्रमाखोंसे सिद्ध है। इसलिए इसके विरुद्ध बोलनेवाले लोग जन्मान्घोंकी तरह कृपापात्र हैं, यह बात कहते हैं। तदेतद्द्वयं ब्रह्मनिर्विकारं जात्यन्धगजदृष्टय व कुबुद्विभिः। कोटिशः परिकल्प्यते ॥ ९३॥ उसी (प्रसिद्ध) निर्विकार अ्रद्वितीय ब्रह्मको मूर्ख लोगोंने-जैसे कई जन्मान्ध लोग एक ही हाथीकी कई प्रकारसे कल्पना कर लेते हैं, इसी प्रकार-अनेक कल्पनाओरंसे अ्रनेकरूप बना रक्खा है॥ ९३॥

प्रमाणोंसे सिद्ध अरर्थके ऊपर भी विश्वास न करके वे लोग असम्भावना करते हैं, इसलिए कृपाके योग्य हैं, यह सिद्ध हुआ। इसी बातको कहते हैं। १-दृष्टिरात्मनो, भी पाठ है। २-दश्यमानया, भी पाठ है। * सकनबुद्धिवृत्तिप्रकाशकम् ।

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भाषानुवादसहिता ७५

यद् यद् विशेषणं दृष्टं नात्मनस्तदनन्वयात्। खस्य कुम्भादिवत्तस्मादात्मा स्याननिर्विशेषणः ॥। ९४ ।। जो जो विशेषण दीख पड़ता है वह वह आत्मामें अन्वित नहीं होता है। क्योंकि आत्माका उन विशेषणोंके साथ, आकाशका घटादिके समान, कोई सम्ब्न्ध नहीं है। इसलिए आ्रत्मा सब्र विशेषणोंसे रंहित है॥। ६४ ॥ अतश्रात्मनो भेदासंस्पर्शो भेदस्य मिथ्यास्वाभाव्यादत आह। इसलिए भी आत्मामें भेदका सम्बन्ध नहीं है। क्योंकि भेदका स्वरूप मिथ्या है। इसी बातको कहते हैं- अवगत्यात्मनो यस्मादागमापायि कुम्भवत्। साऽहङ्कारमिंद विश्वं तस्मात्तत्स्यात्कचादिवत् ॥ ९५॥ वूँकि अहङ्कार सहित यह सम्पूर्ण जगत् ज्ञान स्वरूप आत्मासे ही उत्पत्ति और विनाशको प्राप्त हो रहा है, इसी कारण घटादिके समान आत्मासे भिन्न है, अत- एव केशोएड्रक१ आदिभ्रमके समान मिथ्या है॥ ६५ ॥ सं्वस्यैवानुमानव्यापारस्य२ फलमियदेव यद्विवेकग्रहणम् तदुच्यते। पूर्वोक्त सब अनुमान करने का फल यही है कि-तत्वज्ञान का उत्पन्न होना। यही अब आगे कहते हैं- बुद्धेर नात्मधर्मेत्वमनुमानात्प्रसिद्धयति आत्मनोऽप्यद्वितीयत्वमात्मत्वादेव सिद्धूयति॥९६॥ बुद्धि अनात्माका धर्म है, यह बात अनुमानसे सिद्ध होती है औरर आत्माकी अरद्वितीयता भी उसके स्वभावसे ही सिद्ध है॥ ६६ ॥ यद्यप्ययं ग्रहीतृग्रहणग्राह्यगृहीतितत्फलात्मक आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तः संसारोऽन्वयव्यतिरेकाभ्यामनात्मतया निर्माल्यवद्पविद्स्तथापि तु नैवासौ स्वतःसिद्धात्मव्यतिरिक्तानात्मप्रकृतिपदार्थव्यपाश्रयः साङ्या- नामिव, किन्तर्हि ? स्वतःसिद्धानुदिताऽनस्तमितकूटस्थात्मप्रज्ञानमात्र-

१-खे अत्तिदीषेए केशसदृदशं किञ्चित् दृश्यते तत्केशोराड्रकम्-नेत्रदोष केकारण आकाशमें केशके सदश जो प्रतीत होता है, उसको केशोराड्क कहते हैं। २-अनुमानव्यायामस्य, भी पाठ है।

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७६ नैष्कर्म्यसिद्धि:

शरीर प्रतिबिम्विताSविचारित सिद्धात्माऽनवबोधाश्रय एव। तदुपादान- त्वात्तस्येतीममर्थ निर्वक्तुकाम आह। यद्यपि यह ज्ञाता, ज्ञानसाधन; विषय और ज्ञान तथा उससे उत्पन्न होनेवाला फल, एतद्रूप ब्रह्मासे लेकर कीट पतङ्ग पर्यन्त समस्त संसार अं्वय व्यतिरेकसे अरनात्मा होनेके कारख निर्माल्य (सारहीनवस्तु) के समान दूर हटा दिया। तथापि वह साङ्कयवादियोंके समान स्वतःसिद्ध आत्मासे भिन्न प्रकृति आरप्रादि किसी अनात्मपद,थंके आश्रित नहीं है। किन्तु स्वतः सिद्ध, सदा उदित, निरन्तर प्रकाशयुक्त, कूटस्थ तथा ज्ञानस्वरूप आ्रत्मामें प्रतिबिम्नित अरविवेकसे सिद्ध आत्मस्वरूपांज्ञान ही इस समस्त संसारका आश्रय है। क्योंकि आत्मस्वरूपका अज्ञान ही इसका उपादान कारख है। इसी बातको स्पष्ट करनेकी इच्छासे आरगे कहते हैं- ऋते ज्ञानं न सन्त्यर्था अस्ति ज्ञानमृतेऽपि तान्। एवं धियो हिरुग्ज्योतिर्विविच्यादनुमानतः ।९७। जैसे ज्ञानके बिना विषय (पदार्थं) प्रकाशित नहीं होते, परन्तु ज्ञान उनके बिना भी प्रकाशमान है। इसी प्रकार आररत्माके बिना बुद्धियाँ नहीं रहतीं। पर आत्मा बुद्धियोंके न रहने पर भी है, ऐसे अनुमांन द्वारा विवेकसे आत्माको बुद्धिसे पृथक देखना चाहिए॥ ९७।। यस्मात्प्रमाणप्रमेयव्यवहार आत्मानवबोधाश्रय एव, तस्मा- त्सिद्धमात्मनोऽप्रमेयत्वम्। नैव हि कार्य स्वकारणमतिलङ्ग्याऽन्यत्रा- ड्कारके आस्पदमुपनिबन्नात्यत आह। चूँकि प्रमाण, प्रमेय इत्यादि सर्व व्यवहार आरत्माके न जाननेसे ही उत्न्न हुश है। इसलिए आत्मा किसी प्रमाण का विषय नहीं है, यह सिद्ध हुआ और कार्य कभी भी अपने कारखको उल्लङ्वन करके दूसरे स्थानमं अपनी स्थिति नहीं करता। इसलिए कहते हैं- व्यवधीयन्त एवामी बुद्धिदेहघटादयः। आत्मत्वादात्मनः केन व्यवधानं मनागपि॥ ९८॥ बुद्धिकी सिद्धिमें आ्र्प्रात्म-प्रतित्निन्तकी अपपेक्षा है तथा देह-सिद्धिमें बुद्धि औरर इन्द्रियोंकी भी अपेक्षा है। बाह्य घटादि पदार्थोंकी सिद्धिमें तो देश, कालादिकी भी अपेक्षा है। अतएव देह, इन्द्रिय, बुद्धि इत्य दि प्रमेय हैं। आरत्मा तो समस्त वस्तुओंका स्वरूप है। अतएव उसमें किसी वस्तुका व्यवधान किचिन्मात्र भी नहीं है। इसलिए वह अप्रमेय है॥ ६८ ॥

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भाषानुवादसहिता ७७

स्वयमनवगमात्मकत्वादनवगमात्मकत्वं च मोहमात्रोपादान- त्वात्। प्रमाणमन्तरेणैषां बुद्धयादीनामसिदूता। अनुभूतिफलार्थत्वादात्मज्ञः किमपेक्षते ॥ ९९॥ बुद्धयादि पदार्थ स्वयं अज्ञानरूप अर्थात् जड़ हैं। क्योंकि उनका उपादान कारख मोहमात्र ही है। इसलिए भी उनको इतरकी अपेक्षा होनेसे उनकी अप्रकाशरूपता सिद्ध होती है। बुद्धि आरदिकी सिद्धि बिना प्रमाणोंके नहीं होती। क्योंकि स्वयं वे अनुभव- रूप फलसे युक्त नहीं हैं। अतएव उनको प्रमाणादिकी अपेक्षा है। शङ्का-आ्र्रात्मा भी तो उपनिषदोंके प्रमाणोंके बिना सिद्ध नहीं होता ? समाधान-आत्मा ज्ञानस्वरूप है, इसलिए उसको अज्ञाननिवृत्तिसे अरतिरिक्त औ्रर किसीकी भी अपेक्षा नहीं है॥ ९९॥

घटबुद्धेर्घटाच्चार्थाद् द्रष्टुर्यद्वद्विभिन्नता। अहंबुद्धेरहंगम्याद् दुःखिनश्र तथा दशेः॥१००॥ आगे जिसका प्रतिपादन करेंगे उस आत्म-अनात्माके परस्पर अध्यासको सिद्ध करनेके लिए पूर्वोंक्त अरनात्मासे (आत्माके) भेदका अनुवाद किया जाता है- वटज्ञान और घटस्वरूप अर्थ, इन दोनोसे जिस प्रकार द्रष्टा भिन्न है, इसी प्रकार 'अहम्'-'मैं'-इस प्रकारका ज्ञान और उसके विषय दुःखादियुक्त पदार्थसे त्रत्मा भिन्न है ॥ १०० ॥ एवमेतयोरात्मानात्मनोः स्वतः परतः सिद्ध्योलोंकिकरज्जु- सर्पाध्यारोपवदविद्योपाश्रय एवेतरेतराध्यारोप इत्येतदाह। इस प्रकार जो यह स्वतः सिद्ध और परतः सिद्ध आत्मा और अनात्मा, ऐसे दो पदार्थ हैं, इनका एकका दूसरेमें तध्यास लौकिक रज्जुमें सपके अध्यासके समान है। यही बात कहते हैं- अभ्रयानं यथा मोहाच्छशभृत्यध्यवस्यते। 2सुखित्वादीन् ियो धर्मास्तद्वदात्मनि मन्यते॥ १०१ ॥ जैसे कोई मेघोंकी गमनादि क्रियाको मोहब्रश चन्द्रमामें समझ लेता है। इसी प्रकार सुखदुःखादि बुद्धिके धर्मोंको त्र्प्रज्ञानो आ्त्मामें समझ लेता है ॥ १०१ ॥ / १-फलार्थित्वात्, भी पाठ है। २-दुःखित्वादीन्, पाठान्तर हैं।

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७६ नैष्करमर्यसिद्धि:

दग्घृत्वं च यथा वह्वेर्यसो मन्यते हुधीः। चैतन्यं तद्वदात्मीयं मोहात्कर्तरि मन्यते॥ १०२॥ जैसे मूर्ख पुरुष अग्निके धर्म-जलानेको लोहेमें समझ लेता है। वैसे ही आश्माके चैतन्यको मूर्खतावश बुद्धिका चैतन्य सम लेता है ॥ १०२॥ सर्व एवाऽयमात्मानात्मविभागः प्रत्यक्षादिग्रमाणवर्त्मन्यनुपाति- तोऽवि द्योत्सङ्गवर्त्येव न परमात्मव्यपाश्रयः । अस्याश्वाऽविद्याया: सर्वाऽ- नर्थहेतो: कुतो निवृत्तिरिति चेत्तदाह। प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे सिद्व यह सत्र आत्मा और अनात्मा, इस प्रकारका द्वैत प्रपञ्च अविद्याके ही आश्रय है। परमात्माके आश्रय नहीं। इसलिए समस्त अनर्थोकी जननी इस तरप्रविद्याकी निवृत्ति किससे होती है ? इत प्रश्न का उत्तर देते हैं- दुःखराशेर्विचित्रस्य सेयं आ्रान्तिश्चिरन्तनी। मूलं संसारवृक्षस्य तद्नाधस्तत्वदर्शनात् ॥ १०३।। इस दुःखराशिरूप विचित्र संसार-वृक्षका बीज यही अनादिकालसे चली आ्र्रनी हुई भ्रान्ति है। उसका सर्वथा नाश तत्त्वज्ञानसे होता है॥ १०३ ॥ तद् बाधस्तत्त्वदर्शनादिति कुतः सम्भाव्यते, इति चेदत आह। आगोपालाऽविपालपंडितमियमेव प्रसिद्धि:। अ्रमोत्थं प्रमोत्थेन ज्ञानं ज्ञानेन बाध्यते। अहिरज्ज्वादिवद् बाधो देहाद्यात्ममतिस्तथा॥ १०४॥ शङ्का-उस भ्रान्तिका नाश तत्वज्ञानसे होता है, यह कैसे सम्भावित है? समाधान-गोपाल और अजापालोंसे लेकर पसिडतों तक यह बात प्रसिद्ध है कि भ्रान्तिसे उत्पन्न मिथ्याज्ञान प्रमाणसे उत्पन्न यथार्थशनसे बाधित होता है। जैसे रज्जुमें भ्रान्तिसे उत्पन्न सर्पका भ्रम रज्जुके यथार्थज्ञानसे निवृत्त हो जाता है। वैसे ही देहादिमें उत्पन्न आत्मबुद्धिका नाश भी आ्रत्मज्ञानसे होता है॥१०४॥ लौकिकप्रमेयवैलक्षए्यादात्मनो नेहानधिगताधिगमः प्रमाण- फलम्। अविद्यानाशमात्रं तु फलमित्युपचर्यते। नाऽज्ञातज्ञापनं न्याय्यमवगत्येकरूपतः ॥ १०५ ॥ लोकप्रसिद्ध जानने योग्य विषयोंसे आरत्मा विलक्षण है, इसलिए इस आरत्माको

१-मंस्यते, ऐसा तथा 'अन्धधी;, ऐसा भी पाठ है।

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भाषानुवादसहिता ७१

प्रकाशित करना यह प्रमाणका फल नहीं हो सकता। किन्तु अविद्याका नाशमात्र ही यहाँ गौणरीत्या प्रमाका फल व्यवहृत होता है। अज्ञात आत्माका प्रकाशित होना यह मानना युक्तियुक्त नहीं है। क्योंकि आत्मा सर्वदा ज्ञानरूप है अतएव उसमें आरवरखका सम्भव ही नहीं है॥ १०५॥ यस्मादात्माऽनवबोधमात्रोपाढ़ानाः प्रमात्रादयस्तस्मात्। न विदन्त्यात्मनः सत्तां द्रष्टदर्शनगोचराः। न चान्योऽन्यमतोऽमीपां झयत्वं भिन्नसाधनम् ॥१०६।। क्योंकि आत्माके अज्ञानमात्रसे ही यह प्रनाता, प्रमाख प्रमेय इत्यादि द्वैत है इस- लिए द्रष्टा (प्रमाता), दर्शन (ज्ञान) औरप्रर गोचर (विषय) अर्थात् बुद्धिकी वृत्ति ये अपनी सत्ताको नहीं जानते और न ये परस्र ही एक दूसरे को जानते हैं। क्योंकि वे जड़ हैं, इस कारणसे इनका प्रकाश किसी दूसरेके द्वारा होता है॥ १०६॥ द्रष्टादेरसाधारणस्वरूपज्ञापनायाह। द्रष्टा, दर्शन और विषयका अरसाधारण स्वरूप बतलानेके लिए कहते हैं- बाह्य आकारवान् ग्राह्यो ग्रहणं निश्चयादिमत्। अन्वय्यहमिति ज्ञेय: साक्षी त्वात्मा घ्रुवः सदा॥ १०७॥ ग्रहण करने योन्य अरपनेसे भिन्न तथा आकारयुक्त पदार्थोंको विषय कहते हैं। निश्चय, संशय इत्यादि वृत्तियोंको ग्रहण कहते हैं। 'मैं सुनता हूँ' 'मैं निश्चय करता हूँ' 'मैं स्मरण करता हूँ' इस प्रकार निश्चयादि वृत्तियोंमें जो एक 'अरहम्'-'मैं' अनुगत भासमान होता है, वह द्रष्टा है। और जो इन तीनोके भावाभावोंका साधक, सुषुप्ति और मोक्षादि अवस्थाओंमें अ्रनुगत, कूटस्थ तथा निस्य है, वह आत्मा साक्षी कहलाता है।। १०७ ॥ सर्वकारकक्रियाविभागात्मकसंसारशून्य आत्मेति कारक- क्रियाफलविभागसाक्षित्वादात्मनस्तदाह। ग्राह कग्रहण ग्राह्यविभागे योऽविभागवान्। हानोपादानयोः साक्षी हानोपादानवर्जितः॥१०८। आ्रप्रात्मा कारक, किया और फल इत्यादि सर्वं प्रकारके द्वैतका साक्षी हैं। इस कथनसे आत्मा सब प्रकारके क्रिया, कारक आदि द्वैतोंसे शून्य है, यह सिद्ध हो गया। इसी बात को कहते हैं- ग्राहक, ग्रहण और विषय इन तीनोंके विभक्त होनेपर भी जिसका स्फुरण- स्वरूपसे कभी विभाग नहीं होता तथा जो स्वयं भावाऽभावोंसे रहित होता हुआ ग्राहक आदिके भावाभावों का साक्षी है (वह आत्मा है।) ॥ १०८ ।।

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८0 नैष्क्म्यसिद्धि:

ग्राहकादिनिष्ठैव ग्राहकादिभावाभावविभागसिद्धि: कस्मान्नेति चेत्तदाह। स्वसाधनं स्वयं नष्टो न नाशं वेच्यभावतः । अतएव न चाऽन्येषामतोऽसौ भिन्नसाक्षिकः ॥ १०९॥ शङ्का-पूर्वोक्त ग्राह्य, ग्रह तथा ग्राहक इत्यादि पदार्थोकी सत्ता या असत्ताकी सिद्धि इन्होंसे क्यों नहीं हो सकती ? उत्तर-ग्राहकादि पदार्थ प्रमाण रूप न होनेसे अपनी सत्ताको ग्रहण नहीं कर सकते तथा नष्ट हो जानेपर असत् हैं। इसलिए वे अपने असत्वका (अभावका)भी ग्रहण नहीं कर सकते। इसीलिए औरोंको भी सिद्धि इनसे नहीं हो सकती, अतएव इनका प्रकाशक-साक्षी कोई और ही है ॥ १०६ ॥ ग्राहकादेरन्य साक्षिपूर्व कत्व सििदिधे: स्व्ष््यस्ष - पूर्व कत्वादनवस्थेति चेत्तन्न। साक्षिणो व्यतिरिक्तहेत्वनपेक्षत्वात्। अत आह। शङ्का-ग्राहकादिकी सिद्धि यदि किसी अन्य साक्षीसे होती है, तो अपने साक्षीकी सिद्धि भी किसी दूसरे साक्षीको माननी पड़ेगी। इस प्रकारसे अनवस्था दोष आरता है? उत्तर-साक्षीको अपनी सिद्धिके लिए किसी दूसरे कारणकी अपेक्षा नहीं है। इसलिए कहते हैं -- धीवन्नापेक्षते सिद्घिमात्माऽन्यस्मादविक्रियः । निरपेक्षमपेक्ष्यैव सिद्ध्यत्यन्ये न तु स्वयम् ॥ ११० ॥ आत्मा अविकारी है, अतएव बुद्धिके समान अपने प्रकाशके लिए वह दूसरे की अपेक्षा नहीं रखता। क्योंकि अन्य सब पदार्थ आत्मासे प्रकाश्य हैं; इसलिए वे आत्माके प्रकाशक नहीं हो सकते ? ॥ ११० ॥ यतो ग्राहकादिष्वात्मभावोऽविद्यानिबन्धन एव। तस्मात्। अन्वयव्यतिरेकाभ्यां विभज्यानात्मनः स्वयम्। उत्पत्तिस्थितिनाशेषु योऽवगत्यैव वर्तते। जगतोऽविकारयाऽवेहि तमस्मीति न नश्वरम् ॥१११ ॥ ग्राहक, ग्रहण और ग्र्राह्यमें आर्प्रत्मभाव अविद्यामूलक ही है। इसलिए-अन्वय और व्यतिरेकके द्वारा स्वयं अनात्माको पृथक करके जो जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और

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भाषानुवादसहिता ८१

नाश इन सब अवस्थाओं में विकार रहित एवं अनुभवरूपसे वर्तमान है, उसीको अपना स्वरूप समझो और जो नष्ट होनेवाले ममता आदि हैं, उन्हें अपना स्वरूप मत समझो॥ १११॥ स्वतः

न्द्रजालस्य- न स्वयं स्वस्य नानात्वं नाऽवगत्यात्मना यतः । नोभाभ्यामप्यतः सिद्धमद्वैतं द्वैतवाधया॥ ११२॥ अपनी सिद्धिके लिए दूसरे प्रमाणोंकी अपेक्षा न करनेवाले चैतन्यस्वरूप आत्माके प्रतिबिम्ब्रित होनेसे प्रकाशमान तथा अविवेकावस्थामें ही प्रतीत होनेवाले अतएव आ्रत्मा- के अज्ञानसे ही उत्पन्न और आपसमें एक दूसरेकी अपेक्षा रखकर सिद्ध होनेवाले, स्त्रयं सिद्ध न होनेवाले इस द्वतरूप इन्द्रजालका-नानात्व न तो अपने ही से वास्तवमें सिद्ध है, क्योंकि यह स्वयं जड़ है। और न चैतन्य आत्मा द्वारा इसकी वास्तवि- क सिद्धि हो सकती है; क्योंकि जड़ और चेतनकी एकता नहीं है। इस प्रकार जन् द्वूत प्रपञ्च दोनों प्रकारसे बाधित है, तब्र सुनरां अद्वत सिद्ध हुआ्ा॥ ११२॥ यथोक्तार्थद्रढिम्ने श्रुत्युदाहरणोपन्यासः । पूर्वोक्त अर्थको दढ़ कनेके लिए श्रुतिवाक्योंको उद्वृत करते हैं- नित्याऽवगतिरूपत्वात् कारकादिने चाऽडत्मनः । अस्थूलं नेति नेतीति न जायत इति श्रुतिः ॥ ११३ ।। आत्मा नित्य ज्ञानस्वरूप है। इसलिए उसमें कारक आदि द्वूत नहीं है। इस बातको "यह आत्मा स्थूल नहीं है" "यह नामरूपात्मक पदार्थ आत्मा नहीं है" "यह आत्मा उत्पन्न नहीं होता" इत्यादि श्रुतियाँ पुष्ट करती हैं॥ ११३ ॥

स्वयं सेद्धुमशक्यत्वात् आत्मसिद्धेश्चानुपादेयत्वात्- आत्मनश्चेन्निवार्यन्ते बुद्धिदेहघटादयः। षष्ठगोचरकल्पास्ते विज्ञेयाः परमार्थतः ॥११४॥ सम्पूर्णं ब्रुद्धि आदि द्वत प्रपञ्च, जोकि आत्माके अज्ञानसे ही भासमान होता है, स्वरयं अपनेसे जड़ होनेके कारख सिद्ध नहीं हो सकता और आत्माकी सिद्धिका इसकी

१-द्वैतभाषया, ऐसा भी पाठ है। ११

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नैष्कम्यसिड्धि

सिद्धिमें उपयोग नहीं है क्योंकि वह चेतन है। उसका उसके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। इसलिए बुद्धि आदि पदार्थोंको आत्माके स्वरूपमें प्रवेशित न करके, उससे पृथक् देखने से, ये सत्र वास्तवमें असद्रूप ही प्रतीत होने लगते हैं॥ ११४॥ कुतो न्यायवलादेवं निश्चितं प्रतीयते? यस्नात्। नित्यां संविदमाश्रित्य स्वतःसिद्धामविक्रियाम् । सिद्धायन्ते धियो बोधास्ताँश्चा5श्रित्य घटादयः ॥११५॥ शङ्का-किस युक्तिके बलसे यह निश्चित जाना जाता है? · समाधान-जिस कारण-स्वयम्प्रकाश, निर्विकार तथा नित्य ज्ञानस्वरूप आत्माको ही आश्रय करके बुद्धिकी वृत्तियाँ सिद्ध होती हैं और उनसे ये घटादि पदार्थ सिद्ध होते हैं।॥ ११५ ॥ यस्मान्न क्याचिदपि युक्त्यात्मनः कारकत्वं क्रियात्वं फलत्त्व-

रजो धूमतुषारनीहारनीलत्वाद्याभासो यथोक्तात्मनि रार्वोडयं क्रियाकारक- फलात्मकसंसारोऽहंममत्वयत्नेच्छादिमिध्याध्यास एवेति सिद्धम्। इममर्थमाह। चूँकि किसी युक्तिसे भी आत्मामें क्रिया, कारण, फल इत्यादि भेद सिद्ध नहीं होता, इस कारण आत्मवस्तुके यथार्थं स्वरूपको न जाननेमात्रसे ही यह द्वूत उत्पन्न हुआ है। इसलिए आकाशमें रज, धूम, तुषार और नीलता इत्यादि भ्रान्तिके समान यह सब क्रिया, कारक और फल रूप संसार अहङ्गार, ममता, यत्न और इच्छा आदिका मिथ्याध्यास ही है, यह सिद्ध हुआर। इसी बरातको कहते हैं- अहं मिथ्याभिशापेन दुःख्यात्मा तद्बुभुत्सया२। इतः श्रुतिं तथा नेतीत्युक्त: कैकल्यमास्थितः ॥ ११६ ॥ मिथ्याभिमानसे दुःको आरोपित कर दुःखसे छूटनेकी इच्छासे यह आरत्मा (करुणामयी जननीके समान भगत्रती) श्रुतिकी शरण में गया। तब 'नेति नेति' इत्यादि श्रुतिद्वारा भ्रान्ति जब्र निवृत्त हुई, तब स्वस्थ होकर कैाल्यरून मोक्षको प्राप्त होता है॥। ११६ ॥

१-ताश्चाश्रित्य, ऐसा पाठ भी है। २-तद्बुमुतसया, के स्थान में कहीं कहीं तच्छुशुत्सया' ऐसा भी पाठ हैं। ३-हेकल आश्रितः, भी पाठान्तर है।

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भाषानुंवादसहिता

तस्याऽस्य मुमुक्षोः श्रताद्वचसः स्वमनिमित्तोत्सारितनिद्र स्येवेयं निश्चितार्था प्रमा जायते।

भानाविव तमोध्यासोऽपह्नवश्र तथा मयि॥ ११७॥ उस (पूर्वोंक्त) मुमुत्तुको श्रुतिवाक्योंसे रवप्नके कारण रू निद्रासे रहित पुरुषके समान निश्चयात्मक यह ज्ञान होता है कि- मैं अङ्गार नहीं हूँ और मेरा कोई नहीं है। मैं केवल आत्मस्वरूप हूँ। इस- लिए सर्वदा अनात्मासे त्रस्पृष्ट हूँ। जिस प्रकार सूर्यमें अन्धकारकी भ्रान्ति होना औरर उसका नाश होना, दोनों ही मिथ्य हैं। इसी प्रकार मुझमें बन्ध और मोक्ष दोनों ही मिथ्या हैं ॥ ११७॥

यत्र त्वस्वेति माठोपं कृत्स्रव्वतनिपेधिनीम्। प्रो.सारयन्तीं संसारमध्यश्रौषं श्रुतिं न क्िम्।। ११८।। इस प्रकार वह ब्रह्मज्ञानी सच्चिदानन्दस्वरूप आ््त्माको पाकर पाश्चात्ताप करता है कि, आहा-"जिस अवस्थामें ज्ञानी पुरुषकी दष्टिसे सम्पूर्ण प्रपञ्च आत्मस्वरूपमें लीन हो जाता है उस अवत्थामें किस कारण से, किस वम्तुको देखे, कोई वस्तु ही पृथक न रही!" इस प्रकार वलपूर्वक समस्त संसारका निषेध करनेवाली श्रुतियोंको मैंने क्या (पहले ) नहीं सुना था ? ॥ ११८॥ इत्योमित्यवबुद्धात्मा२ निष्कलोऽकारकोऽक्रिय: । विरक्त्त इस प्रकार वह ब्रह्मज्ञानी प्रवके अर्थ आत्मस्वरूपको जानकर अज्ञान तथा कारक

है॥ ११६ ॥ आदि द्वतसे रहित होकर बुद्व्यादिसे विरक्त हो आत्मस्धरूामें स्थित हो जाता

इति श्रीमत्सुरेश्वराचार्यविरचितायां नैष्कर्म्यसिव्धौ सम्बन्धाख्यायां द्वितीयोऽध्यायः

१-संसारं मय्यश्रौषम्, भी पाठभेद है। २-इत्योमित्येव बुद्धात्मा, ऐसा और निष्फलोऽकारकः, ऐसा पाठ भी है।

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नैष्कर्म्यसिद्धिः

अथ नैष्कर्म्यसिद्धौ तृतीयोऽध्यायः

सर्वोडयं प्रमितिप्रमाणप्रमेयप्रमातृत्वलक्षण आब्रह्मस्तम्वपर्य- न्तो मिथ्याध्यास एवेति बहुश उपपत्तिभिरसिहितम्। आत्मा च जन्मादिषड्भाव-विकारवर्जिंतः कूटस्थबोधः एवेति स्फुटीकृतम्। तयोश् मिथ्याध्यासकूटस्थात्मनोर्नाऽन्तरेणाऽज्ञानं सम्बन्धोऽन्यत्र चोदनापरिप्रापितात् यथा-'इयमेव ऋगग्निः साम' इति। तच्चाऽज्ञानं स्वात्ममात्रनिमित्तं न सम्भवति इति कस्यचित् कस्मिंश्रिद् विषये भवतीत्यभ्युपगन्तव्यम्। इह च पदार्थद्वयं निर्द्वारितमात्माऽनात्मा च।

न हि स्वतोऽज्ञानस्याज्ञानं घटते, सम्भवदप्यज्ञानस्वभावेऽज्ञानं कमति- शयं जनयेत्१ न च तत्र ज्ञानप्राप्तिरस्ति, येन तत्प्रतिषेधात्मक मज्ञानं स्यात्। अनात्मनश्राऽज्ञानप्रसूतत्वात्। न हि पूंर्वसिद्घं सत्ततो लब्धा- त्मलाभस्य सेत्स्यत आश्रयस्याऽडश्रयि सम्भवति। तदनपेक्षितस्य च तस्य निःस्वभावत्वात्। एतेभ्य एव हेतुभ्यो नाऽनात्मविषयमज्ञानं सम्भवतीति ग्राह्यम्*। यह समस्त प्रमा (यथार्थज्ञान) प्रमाण (यथार्थज्ञानका साधन), प्रमेय और प्रमाता (जाननेवाला) इत्यादिरूप, ब्रह्मासे लेकर चुद्र कीट पर्यन्त, संसार मिथ्यारून ही है, इस बातको अरपनेक युक्तियोंके द्वारा कहा। और आत्मा छः प्रकारके भाव विकारोंसे रहित, कूटस्थ ज्ञानरूप ही है, यह भी स्पष्ट कर दिया। और यह भी कह दिया है कि- मिथ्याभ्रान्तिरूप संसार और कूटस्थ आत्मा, इन दोनोंका सम्बन्ध अज्ञानके बिना नहीं है। हाँ, जहाँपर श्रुतिने उपासना के लिए अभेदका प्रतिपादन किया है। जैसे-इयमेव ऋक अरगनि: साम' यहाँ पर पृथवीमें ऋक् दृष्टि और अरभि में सामकी दृष्टि करनेके लिए ही परथिवीमें ऋकका और अझ्निमें सामका अभेद न होनेपर भी अभेद दिखलाया है, ऐसे स्थलों में अज्ञानके बरिना भी सम्न्ध हो। परन्तु इन स्थलोंको छोड़कर अन्यत्र तो अज्ञानके बिना कभी भी सम्बन्ध नहीं होता, यह सिद्धान्त है। किन्तु उस अज्ञानकी

१-उपपत्तिभिरभिरहितम्, भी पाठ है। २-संबन्धः, ऐसा पाठ है। १-तत्प्रतिषेध्यात्मक, पाठ भी है। ४-संभवतीति प्राप्तम, भी पाठ है।

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भाषानुवादसहिता

भी सत्ता अपने आप ही हो नहीं सकती। इसलिए किसी पुरुषका किसी विषयमें अरज्ञान होता है, क्योंकि आश्रय और विषयके बिना उसका निरूपण ही नहीं होता, ऐसा मानना चाहिए। इस शास्त्रमें दो ही पदार्थ माने गये हैं आरत्मा और अनात्मा। उनमें अनात्माअरज्ञानका विषय और आश्रय नहीं हो सकता क्योंकि अनात्माका स्वरूप ही अज्ञान है उसको और अज्ञान क्या होगा ? स्वतः अज्ञान अ्ज्ञानसे आवृत है, ऐसी बात कभी भी नहीं घटती। कदाचित् अज्ञानपर अज्ञान मान भी लें तो उससे लाभ क्या? अज्ञानमें तज्ञानसे कोई विशेष तो होनेवाला नहीं है। यदि अज्ञानमें ज्ञानकी प्राप्ति होती, तो भी उसके प्रतिषेधके लिए अज्ञानमें अज्ञान मान भी लिया जाता, सो भी नहीं। और अनात्मा अज्ञानसे उत्पन्न हुआ है, फिर अज्ञानका आश्रय अनात्मा कैसे हो सकता है? यह बात कभी भी मानी नहीं जा सकती कि पूर्वसे सिद्ध जो वस्तु है, वह उससे ही स्वरूप सत्ताको प्राप्त होनेवाले और प्रतीत होनेवाले पदार्थका आश्रय करके रह सकती है। इन्हों कारणोंसे अ्रनात्मा अज्ञानका विषय है, यह भी नहीं कह सकते। एवं तावन्नाऽनात्मनोऽज्ञानित्वं-नाऽपि तद्विषयमज्ञानम्। पारि- शेष्यादात्मन एवाडस्त्वज्ञानं तस्याऽज्ञोऽस्मीत्यनुभवदर्शनात्। 'सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नाऽडत्मवित्' इति श्रुतेः। न चाउडत्मनोऽज्ञान- स्वरूपता, तस्य चैतन्यमात्रस्वाभाव्यात्। अतिशयश्च सम्भवति ज्ञानपरिलोपो ज्ञानप्राप्तेश्र सम्भवस्तस्य ज्ञानकारित्वात्। न चाऽज्ञान- कार्यत्वं, कूटस्थात्मस्वाभाव्यात्। अज्ञानानपेक्षस्य च आत्मनः स्वतएव स्वरूपसिद्धेर्युक्तमात्मन एवाऽज्ञत्वम्। किंविषयं पुनस्तदात्मनोऽज्ञानम्? आत्मविषयमिति ब्रूम:। इस प्रकार अरपरनात्मा अर्पज्ञोनका आश्रय और विषय जब्र नहीं हो सकता। फिर, बचा आश्मा। इसलिए यह मान लेना पड़ता है कि उसमें (आत्मामें) अज्ञान है क्योंकि आ्रत्माको ही 'मैं अज्ञ हूँ' इस प्रकार अज्ञान का अनुभव हो रहा है। जैसा कि श्रुतिमें भी वर्णन किया है-'हे भगवन् ! मैं मन्त्रोंको ही जानता हूँ आरत्नाको नहीं।" और आत्मा अनात्माकी भाँति अज्ञानस्वरूप भी नहीं है। क्योंकि वह चैतन्य-स्वरूप है। इसी कारण उसमें अज्ञान माननेसे विशेष अर्थात् विलक्षणता भी बन सकती है-अज्ञानसे आरत्मस्वरूप ज्ञानका आवरख होकर विपरीत रूपसे आत्माका स्फुरण तथा उस आवरण और विपरीत स्फुर को नष्ट करनेवाले क्ञनकी प्राप्ति भी हो सकती है। क्यांकि आत्मा अविद्यासे उत्पन्न अन्त:करणादि वृत्तिमें प्रतिबिम्बित होकर वृत्ति-

१- विचारलोपोडज्ञानग्राप्तेः, भी पाठ है।

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नैष्कम्यसिद्धि:

प्रतिविम्बित चैतन्यरूप ज्ञानको उत्पन्न करता है। और वह आ्रत्मा अज्ञानका कार्य भी नहीं है। क्योंकि वह कूटस्थ एवं नित्य है, अज्ञानकी अपक्षाके बिना हो आरप्रात्माकी स्वतःसिद्धि है। इसलिए आरत्मामें ही अज्ञानको मानना उचित है। शङ्का-वह आत्माका अज्ञान किसको विषय करता है ? समाधान-हमारा सिद्धान्त है कि अज्ञान आत्माको ही विषय करता है। नन्वात्मनोऽपि ज्ञानस्वरूपत्वादनन्यत्वाच्च ज्ञानप्रकृतित्वादिभ्यो हेतुभ्यो नैवाडज्ञानं घटते? घटत एव। कथम्? अज्ञानमात्र- निमित्तत्वात्तद्विभागस्य, सर्पात्मतेव रज्ज्वाः । तस्मात्तद्पनुत्तौ द्वैता- नर्थाभावः। तदपनोदश्च वाक्यादेव तत्पदार्थाभिज्ञस्य। अतो वाक्य- व्याख्यानायाऽध्याय आरभ्यते। शङ्का-आात्मा ज्ञानस्वरू और त्र्प्रद्वितीय है। इसलिए भेद ही जत्र नहीं है, तब वह किसीका आधार नहीं हो सकता। अतएव वज्ञानका भी आ्श्रय कैसे हो सकता है और आत्मामें अज्ञानके विरोधी ज्ञानको उत्पन्न करनेकी शक्ति भी है। इन कारणोंसे आत्मामें अज्ञान नहीं हो सकता है? उत्तर-आत्मा अज्ञानका आश्रय हो सकता है। क्योंकि वास्तवमें वह अद्वितीय अर्थात् भेदशून्य होने पर भी, रज्जुमं अज्ञानसे कल्पित सर्पकी गाँति, कल्पित भेद होनेके कारणअज्ञानका आश्रय है। अतएव इस अज्ञानकी निवृत्ति होनेसे द्व तरूप अनर्थका नाश होता है। और अज्ञानका नाश महावाक्यके द्वारा उसके पद-पदार्थके ज्ञाताको होता है। इसलिए अच वाक्यका व्याख्यान करनेके लिए (तृतीय) अध्यायका आरम्भ किया जाता है। तत्र यथोक्तेन प्रकारेण तत्त्वमस्यादिवाक्योपनिविष्टपद3- पदार्थयोः कृतान्वयव्यतिरेकः । यदा ना तत्वमस्यादेर्वहाऽस्मीत्यवगच्छति। प्रध्वस्ताऽहंममो नैति तदा गीर्मनसोः सृतिम् ॥ १॥ पूर्वाक्त प्रकारसे 'तत्वमसि-वह तू है' इत्यादि वाक्योंमें प्रविष्ट पद तथा उनके अर्थोंका अन्वय व्यतिरेकसे ज्ञान प्राप्त किया हुआ-पुरुष तत्वमस्यादि वाक्योंसे 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा निश्चय जब कर लेता. है, तब्र उसका अहङ्कार और ममकार नष्ट दो जाता है, फिर वह वाणी और मनके रचे सब व्यवहारोंसे अतीत (मुक्त) हो जाता है ॥ १ ॥

३-उपनिविष्टपदार्थयोः, भी पाठान्तर है।

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भाषानुवादसहिता यदैव तदर्थ त्वमर्थेऽवैति तदैवावाक्यार्थतां प्रतिपद्यते गीर्म- नसोः सृ्ति न प्रतिपद्यत इति, कुत एतदध्यव नीयते ? यस्मात्। तत्पदं अकृतार्थ स्याच्वंपदं अ्रत्यगात्मनि। नीलोत्पलवदेताभ्यां दुःख्यनात्मत्ववारणे॥ २ ॥ शङ्का-जिज्ञासु पुरुष जब तत्पदके अर्थको त्वं पदके अर्थके साथ अभेदरूपसे जान लेता है, तब वह वाणी और मनके रचे व्यवहारोंसे अतीन हो जाता है, इसमें प्रमाण क्या है ? उत्तर-प्रमाण यह है कि-'तत्वमसि' इस वाक्यमें तत्पद अद्वितीय ब्रह्मका और त्वम्पद प्रत्यगात्माका बोधक है, अतएव 'यह नील कमल है' ऐसा कहनेसे कमलमें नीलका भेद और नीलका कमलके साथ असम्बन्ध जैसे निवृत्त हो जाता है। इसमें देश, काल तथा साधनोंकी त्पेक्षा नहीं है। वैसे ही 'तत्वमसि' इस वाक्यसे प्रत्यगात्मामें दुःखित्वादि तथा परमात्मामें अनात्मत्वादिकी निवृत्ति होकर शुद्ध आत्मतत्त्वका बोध होता है ॥ २ ॥ एवं कृतान्वयव्यतिरेको वाक्याड़ेवाऽवाकार्थ प्रतिपद्यत इत्यु- क्तम्। अतस्तद्व्याख्यानाय सूत्रोपन्यासः । सामानाधिकरएयञ्च विशेषणविशेष्यता। लक्ष्यलक्षणसम्बन्ध: पदार्थेमत्यगात्मनाम् ॥ ३॥ इंस प्रकार जिसने अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा विवेकज्ञानका सम्पादन किया है वह वाक्यसे ही वाक्य द्वारा अवाच्य-अखरड 'अद्वितीय' व्रह्मरूप त्र्थको जान लेता है, यह प्रतिपादन किया। इसलिए अब् वाक्यसे ज्ञान किस प्रकार होता है, इसका प्रतिपादन करनेके लिए अग्रिम सूत्र (श्लोक) का उपन्यास करते हैं- 'तत्मसि' आदि महावाक्य तीन प्रकारके सम्बन्धोंसे अखएड वस्तुका ज्ञान कराते हैं-उनमें (१) हला सम्तन्ध है-पहोंका परस्पर सामानाधिकरएय (२) दूसरा सम्बन्ध है-विशेषष विशेष्यमात्र (अर्थात् तत् पदका अथ व्रह्म और त्वं पदका अर्थ जीव, इन दोनोंका परस्पर (ब्रह्मका) विशेषगारूपसे और (-जीव्का) विशेष्यरूपसे बोध होना), और (३) तीसरा सम्बन्ध है-लक्ष्य लक्षण (अर्थात् तत्पःर्थ सर्वं- जत्वादि रूप ब्रह्मधर्म और त्वंपदार्थ अल्पज्ञत्वादिरूप जीवधर्मको त्यागकर शुद्ध, अखएड, चिन्मात्रका लक्षणासे बोध होना) ।३॥

  • सामानाधिकरण्य उसे कहते है जहाँ दोनों पद एक ही विभक्तिसे युक्त होकर एक अर्थका प्रतिपादन करते हैं।

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नैष्कर्म्यसिद्धि: בב

अस्मिन्सूत्रे उपन्यस्ते कश्चिच्चोद्यति-योऽयं वाक्यार्थप्रतिपत्तौ पूर्वाध्यायेनान्वयव्यतिरेकलक्षणो न्यायः सर्वकर्मसंन्यासपूर्वकोऽभिहितः किमयं विधिपरिप्रापितः, किं वा स्वरसत एवाडत्र पुमान् प्रवर्तत इति ? किश्चाऽतः ? शृणु। यद्यात्मवस्तुसाक्षात्करणाय विधिप्रापितोऽयं न्यायस्तदाऽवश्यमात्मवस्तुसाक्षात्कर साय व्यावृत्तशुभाशुभकर्म- राशिरेकाग्रमना अन्वयव्यतिरेका्यां यथोक्ताभ्यामात्मदर्शन करोति। अपरिसमाप्याऽडत्मदर्शनं ततः प्रच्यवमान आरूढपतितो भवति। यदि पुनर्यदच्छातः प्रवर्तते तदा न कश्चिद्दोष इति। विधिपरिग्रापित इति ब्रूम: यत आह। पूर्वपक्ष-इस प्रकार सूत्ररूप श्लोकसे उक्तविषयका प्रतिपादन करनेपर कोई कहता हैं कि 'यह जो पूर्व अध्यायमें वाक्यर्थ ज्ञानके लिए सर्वकर्म त्यागरूप संन्यासपूर्बक अर्प्रन्वयव्यतिरेकरूप न्यायका प्रतिपादन किया, क्या वह विधिसे प्रात्त है? किं वा स्वभावसे ही अर्थात् स्वयं ही पुरुष इस विषयमें प्रवृत्त होता है? यदि कहो कि इस प्रश्नका क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? सो सुनिए,-यदि आत्मवस्तु साक्षा- त्कार-करनेके लिए अन्वय व्यतिरेकरूप युक्तियोंका विचार करना विधिसे प्राप्त है, ऐसा कहो! तब तो जिसने आत्मवस्तुके दर्शनके लिए सर्व कर्मोका त्याग किया है और मनको एकाग्र किया है, अवश्य ही वह जिज्ञासु पुरुष अन्वय व्यतिरेक द्वारा आत्म- दर्शन कर सकता है। क्योंकि आत्मसाक्षात्काररूप फल-सिद्धि तक अ्नुष्ठान न करे तो (आत्मदर्शनको प्राप्त न होकर) उससे भ्र् होनेसे आररूढपतित हो जाता है। यदि यहच्छासे ही इन युक्तियोंका विचार करनेमें पुरुष प्रवृत्त होता है, ऐसा कहो तब कोई दोष नहीं है।

[इस शङ्काका तात्पर्य यह है कि-अज्ञाननिव्ृत्तिरूप फल अरदष्ट नहीं, किन्तु प्रत्यक्ष है। अतएव उसका साधन जो ज्ञान है वह भी स्वयं विधान करने योग्य नहीं है और ज्ञानके साधन श्रवादि भी अन्वय व्यतिरेकसे ही-स्वयमेव सिद्ध हैं। फिर विधिके न रहने पर जिसको ज्ञानकी इच्छा होगी, वह स्वयं श्रवादिमें प्रवृत्त हो जायगा। अतएव शास्त्रीय विशिष्टाधिकारी कोई न रहा और यह बात भी शास्त्र प्रसिद्ध है कि वेद अधिकारीको ज्ञान उत्पन्न करता है। यहाँ विधि न होनेसे कोई शास्त्रीय अधिकारी न रहा, तब तत्त्वमस्यादि वाक्य किसको बोध करायेंगे। सुतराम् उसके व्याख्यान करनेके लिए सूत्ररूप श्लोकका कहना व्यर्थ है? ] सिद्धान्त-विचार करनेपर प्रवृत्ति विधि प्रयुक्त ही है। क्योंकि-

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भाषानुवादसहिता

शमादिसाधनः पश्येदात्मन्यात्मानमञ्जसा । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां त्यक्त्वा युष्मदशेषतः ।।४।। युष्मदर्थे® परित्यक्ते पूर्वोक्तहेतुभिः श्रुतिः । वीक्षापन्नस्य कोडस्मीति तच्चमित्याह सौहृदात् ॥५।। "अन्वथ व्यतिरेकसे अनात्माका परित्याग करके शान्त, दान्त, उपरत, तितिनु, समाधानयुक्त तथा श्रद्धायुक्त होकर आत्माको देखे।" इस श्रुतिमें ज्ञानका विधान नहीं किया है। किन्तु जो देखे वह शान्त, दान्त होकर देखे, इस प्रकार ज्ञानसाधनके विघा- नमें ही इस वाक्यका पर्यवसान होनेके कारण तथा श्रवण आदि दृष्ट उपाय होनेपर भी नियम विधिके होनेमें कोई बाधा न होनेसे शास्त्रीय विशिष्ट अधिकारी मिल गया। इस- लिए पूर्वाध्यायमें कथित अन्वय-व्यतिरेक हेतुओंके द्वारा अनात्म वस्तुका परित्याग करने- पर अद्वितीय आत्मवस्तुके अज्ञानसे आच्छादित होनेके कारण 'मैं कौन हूँ' ऐसी जिज्ञासा जिस पुरुषको हुई है, उसको श्रुति माताके समान बड़े प्र मसे अज्ञान दूर करनेके लिए 'तू वही ब्रह्म है' ऐसा उपदेश करती है॥ ४-५॥

अत्राऽपि चोद्यन्ति साङयाः-शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिष्वना- त्मस्वात्मेति निःसन्धिवन्धनं मिथ्याज्ञानमज्ञानं तन्निबन्धनोह्यात्मनो- नेकानर्थसम्बन्धस्तस्य* चाऽन्वयव्यतिरेकाभ्यामेव निरस्त्वान्निर्विषयं तत्त्व- मस्यादिवाक्यं प्राप्तम्। तस्माद् वाक्यस्य चैष महिमा योऽयमात्मा- नात्मनोविंभाग इति, तन्निकरणायेदमुच्यते। इसपर भी साङ्गयवादी लोग ऐसी शङ्का करते हैं कि-"शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धिरूप अनात्माओ्रपरंमें, यह आात्मा है, इस प्रकार बिलकुल भेदका तिरोधान होकर जो ऐक्यका ज्ञान है वही मिथ्याज्ञान अज्ञान है। (इससे अतिरिक्त एक अनादि अज्ञान है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है।) इसी मिथ्याज्ञानरूप अज्ञानसे आरत्मामें अनेक श्रनर्थो- की उत्पत्ति हुई है। इस मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति अरन्वयव्यतिरेकसे ही जब्र सिद्ध है, फिर तत्वमस्यादि वाक्यकी क्या आवश्यकता है? अतएव वह वाक्य निर्विषय ही प्राप्त हुआ? इसलिए कहना चाहिए कि वाक्यका यही माहात्म्य अर्थात् प्रयोजन है कि "आत्मा और अनात्माका विभाग करना; इसके सिवाय और कुछ नहीं ?" इस आशङ्काका निराकरण करनेके लिए इस अग्रिम प्रकरणका आरम्भ करते हैं-

१ युष्मद्यथ। २ अनेकार्थसम्बन्धः । १२

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९० नैष्कर्म्यसिद्धि:

भेदसंविदिदं ज्ञानं भेदाभावश्च साक्षिणि। कार्यमेतदविद्याया ज्ञात्मना त्याजयेदवचः ॥ ६॥ जो यह आत्मा और अनात्माका विवेकज्ञान है, वह भेद निश्चयका फल है। श्रुतियांसे सात्तिचैतन्यमें भेदका अ्रप्रभाव सुना जाता है। इसलिए यह विवेकज्ञान भेद- शून्य वस्तुमें होनेसे अविद्याका कार्य अर्थात् भ्रन्तिरूप है, अतएव वह वाक्य-जन्य नहीं है। किन्तु वाक्य अखरड अद्वितीय चैतन्यका ज्ञान उत्पन्न करके कार्यसहित इस अज्ञानको दूर कर देता है॥ ६ ॥ 'ज्ञात्मना त्याजयेद् वचः' इत्युपश्रुत्याह कश्रित्-मिथ्याज्ञान- व्यतिरेकेणात्मानवबोधस्याऽभावात्किं वाक्येन निवत्यते? अज्ञानं हि नाम ज्ञानाभावः तस्य चाऽवस्तुस्वाभाव्यात् कुतः संसारकारणत्वम् ? न ह्यसतः सज्जन्मेष्यते-'कुतस्तु खल सोम्यैवं स्यादिति कथमसतः सज्जा- यते' इति श्रुतेरिति। अत्रोच्यते- 'तत्त्वमसि' वाक्य अद्वितीय बोधाकार वृत्तिद्वारा ब्रह्मरूपताको प्राप्त कराकर तरविद्याकी निवृत्ति करते हैं; इस बातको सुनकर कोई वादी शङ्का करते हैं कि मिथ्या- ज्ञानरूप आ्रान्तिज्ञानसे अतिरिक्त तथा ज्ञानाभावसे अपरतिरिक्त भावरूप अज्ञान नामक पदार्थ ही नहीं है। फिर वाक्यके द्वारा किसकी निवृत्ति की जाय? अज्ञान कहनेसे ज्ञानका अभाव बोघित होता है, इसलिए अज्ञान अभावरूप है। अभाव तो कोई चीज़ नहीं है। फिर वह संसारका कारण किस प्रकार हो सकता है? क्योंकि अभावसे कभी भाव- की उत्पत्ति नहीं होती। श्रुति भी कहती है कि-हे प्रियदर्शन ! भला यह बात किस प्रमाणसे सिद्ध हो सकती है असत्से सत् कैसे हो सकता है ? इस शङ्काके समाधानके लिए कहते हैं- अभावके ज्ञानमें, उसके प्रतियोगीका ज्ञान (जिसका अभाव हो उसको प्रति- योगी कहते हैं उसका ज्ञान) और धर्मीका ज्ञान (जहाँपर अभावका ज्ञान हो उसको धर्मी कहते हैं उसका ज्ञान) आवश्यक है। धर्मी और प्रतियोगीके ज्ञानके बिना अभावका ज्ञान कभी नहीं होता। जब ऐसा नियम है तब विचार करना चाहिये कि अज्ञान यदि ज्ञानाभावरूप हो तो सोकर उठनेके बाद प्राखिमात्रको इस प्रकार स्मरण होता है कि- "मैं अबतक कुछ भी नहीं जानता था।" यदि यह ज्ञानाभावका ही स्मरण है, तो स्मरण अनुभवके बिना नहीं होता, इसलिए सुषुमि दशामें ज्ञानाडभावका अनुभव हुआ है, ऐसा कहना पड़ेगा, किन्तु यह बात उपपन्न नहीं होती। कारण, अभावके ज्ञानमें धर्मी और प्रतियोगीके ज्ञानकी आवश्यकता है। यदि उस समय धर्मी और प्रतियोगीका ज्ञान हो तब सुषुप्ति ही नहीं होगी और ज्ञानाभाव भी नहीं होगा। क्योंकि धर्मी और प्रतियोगीका

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भाषानुवादसहिता ११

ज्ञान है, इसलिए सुषुप्तिमें ज्ञानाभावका अनुभव नहीं हो सकता। सुतराम् उठनेके बाद स्मरख भी नहीं हो सकता। इसलिए उत्थानानन्तर "मैं अब तक कुछ भी नहीं जानता था" ऐसा जो ज्ञान होता है वह सुधुप्ति कालमें ज्ञनामावका अनुमानरूप है, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि अनुमानमें कोई हेतु नहीं है। यदि कहो कि स्मरख न होना यही हेतु हो सकता है-यदि सुषुप्तिकालमें कोई भी ज्ञान होता तो हमको अवश्य उसका स्मरख होता। स्मरण नहीं होता है, इसलिए सुषुति कालमें कोई ज्ञान नहीं है, ऐसा अरनुमान कर सकते हैं। यह भी कहना ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा कोई नियम नहीं है कि ज्ञान होनेसे ही उसका स्मरख कालान्तरमें जरूर हो। ऐसा बहुत देखा जाता है कि बाल्यावस्था में बहुत-सी बातोंका ज्ञान हुआ है, परन्तु वृद्धावस्थामें उन सबका स्मरख नहीं होता। अतएव उत्थानानन्तर स्मरण नहीं होता। इसलिए उस समय ज्ञान नहीं था, ऐसा अनुमान नहीं कर सकते। अतः जिस कारण स्मरण होता है उसी कारण- से सुषुति दशामें भावरूप अज्ञानका साक्षीरूप अनुभव है, ऐसा कहना चाहिए। इसीसे भावरूप अज्ञान सिद्ध हुआ। क्योंकि जिस कारण धर्मी और प्रतियोगीके ज्ञान होनेके पूर्व सभी पदार्थ अज्ञात रहता है। यदि सभ। पदार्थ अज्ञानके विषय है, ऐसा कहिये? तो पहले जो कहा था कि आत्मा ही अज्ञानका विषय हैं, यह बात गयी? इस शङ्काको दूर करनेके लिए कहते हैं- अज्ञात एव सर्वोऽर्थः आ्राग्यतो बुद्धिजन्मनः। एकेनैव सता संश्च सन्नज्ञातो भवेत्ततः ।। ७।। नामरूपात्मक सारा प्रपञ्च प्रलयकालके सदश, सुषुतिमें अज्ञातसद्रप-वस्तुमात्र- रूपसे प्रलीन होता है। फिर प्रबोध समयमें उद्धूत होता है। यह वेदान्तका सिद्धान्त है। क्योंकि-श्रुतियोंमें सुषुप्तिमें प्रलय और जाग्रत्में सृष्टिका कथन किया है। द्वतमात्र शुक्तिमें रजतके सदश कल्पित है, इसलिए अपने अधिष्ठान-सद्रप ब्रह्मसे पृथकरूपमें उसकी स्थिति भी नहीं हो सकती है। अतएव सुषुतिकालमें एक ही सद्रूप ब्रह्मसे समस्त वस्तुओंकी सत्ता है। वही सद्रूप (ब्रह्म) अनादि अज्ञानका विषय है, उससे भिन्न वस्तुमात्र अज्ञानसे कल्पित होनेके कारख अज्ञानका विषय नहीं हो सकता। इसलिए सत्पदार्थ ही सुषुप्तिमें अज्ञात है, अतएव आत्मा ही अज्ञान का विषय है, यह सिद्धान्त. त्यक्त नहीं हुआ। [अथवा प्रकारान्तरसे इस श्लोककी व्याख्या हो सकती है-] जाग्रत् अवस्थामें भी सभी पदार्थ ज्ञान होनेके पहले अज्ञात रहते हैं, इस बातक. सभी स्वीकार करते हैं। क्योंकि यदि पहले वस्तुका ज्ञान रहे तो पीछेसे तद्विषयक ज्ञान नहीं हो सकता है। जिस समय ज्ञान नहीं है, उस समय वस्तुका व्यवहार नहीं हो सकता।

१ सता सत्म्।

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९२ नैष्कर्म्यसिद्धि:

सामान्याकारसे ज्ञान होनेपर भी अज्ञाताकारकी ज्ञातता नहीं हो सकती और अज्ञात आकारका अनुवाद भी नहीं हो सकता। इसलिए ज्ञानाऽमावसे विलक्षण भावरूप अरज्ञानसे वह आवृत है, ऐसा कहना चाहिए। यदि सभी पदार्थ अज्ञात हों, तब प्रमाणके बिना अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हों सकती। इसलिए आत्माके सदश उनको भी प्रमेयत्व प्रात हुआ। इस आशङ्काकी निवृत्ति के लिए कहते हैं कि समस्त विशेषोंमें अनुगत- रूपसे रहनेवाला सत्पदार्थ ही अज्ञात होनेके कारण प्रमेय है। न कि अन्य पदार्थं। इसलिए यह सिद्ध हुआ कि सत्य पदार्थ ही अज्ञात है।। ७॥ - 'सन्नज्ञातो भवेत्ततः' इत्युक्तमधस्तनेन श्लोकेन। कौऽसौ सन्नज्ञातः ? इत्यपेक्षायां तत्स्वरूपप्रतिपादनायाऽह- सद्रूप वस्तु ही अज्ञानका विषय है, यह पहले श्लोकसे कहा। वह सत्पदार्थ क्या है,जो कि अज्ञानका विषय होता है? ऐसी आशक्का होनेपर उसका स्वरूप बतलानेके लिए कहते हैं- प्रमित्सायां य आभाति स्वयं मातृप्रमाणयोः । स्वमहिस्रा च यः सिद्ध: सोऽज्ञातार्थोऽवसीयताम्॥ ८॥ जिस समय किसी पदार्थको जाननेकी इच्छा होती है उस समय जो प्रमाता और प्रमाणोंके स्फुरणरूपसे स्फुरख समयमें प्रकाशमान होता है जब जाननेकी इच्छा नहीं होती उस समय उसके अभाव को प्रकाशित करता हुआ सुषुति कालमें स्वरूपसे ही प्रकाशित होता है। वही सद्रप (आत्मा) अज्ञानका विषय है, ऐसा जानिए ॥ ८ ॥ अत्र केचिदाहुः 'यत्किश्चिदिह वाक्यं लौकिक वैदिक वा तत्सवें संसर्गात्मकमेव वाक्यार्थ गमयति। अतस्तत्वमस्यादिवाक्येभ्यः संसर्गात्मकमहं त्रह्मेति विज्ञाय तावन्निदिध्यासीत यावदवाक्यार्थात्मकः प्रत्यगात्मकः प्रत्यगात्मविषयोऽहं ब्रह्मेति समभिजायते तस्मादेवं विज्ञानात्कैवल्पमान्नोति' इति। तन्निराकरणायेदमुच्यते- इसपर कोई लोग ऐसा कहते हैं कि जगत्में लौकिक अथवा वैदिक जितने प्रकारके वाक्य होते हैं, वे सभी संसर्गरूप वाक्यार्थको ही बोधित करते हैं। इसलिए 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योंसे संसर्ग रूपसे (अर्थात् दोनों पदार्थोंके परस्पर भेदसे) प्रथम ब्रह्म को जानकर पश्चात् तब तक निदिध्यासन करे जब तक वाक्यार्थरूप न होनेवाला अरखएड प्रत्यगात्मरूप प्रत्यगात्माको ही विषय करनेवाला-'मैं ब्रह्मरूप हूँ' ऐसा ज्ञान

१ यावत्किञ्चित्। २ समभिज्ञायते।

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भाषानुवादसहिता

उत्पन्न हो। इस ज्ञानसे ही कैवल्य होता है।" इस मतका निराकरण करनेके लिए यह कहते हैं-

व्यावृत्तेः स्यादवाक्यार्थः साक्षान्नस्तच्वमर्थयोः ॥९॥ यद्यपि यह नील कमल है, इत्यादि प्रयोगोंमें सामानाधिकरएय और विशेषण- विशेष्य भावसे संसर्गात्मक (नील और कमलका) नीलरूपवाला कमल है, ऐसा ज्ञान होता है। तथापि घटाकाश महाकाश है इत्यादि लौकिक वाक्योंमें घटविशिष्ट आकाश और महाकाश इन दोनोंका परस्पर जो विरोध है उसको दूर करनेके लिए लक्षणा द्वारा घटाकाशका परिच्छिन्नत्व और महाकाशका महत्त्वरूप धर्म हटाकर केवल आकाशस्वरूप मात्रका ही बोध जैसे उत्पन्न होता हुआ दीख पढ़ता है वैसे ही 'तत्वमसि' इत्यादि वाक्योंमें भी पदोंका परस्पर सामानाधिकरएय१ और विशेषण-विशेष्य- भाव होनेके कारण सम्बन्ध प्राप्त होनेपर भी विरोध परिहारके लिए त्वंपदार्थके दुःखित्वादि धर्म और तत्पदार्थ के परोक्षत्वादि धमोंकी लक्षणा द्वारा व्यावृत्ति (निराकरख) कर देनेसे अखएड एकरस ब्रह्म वस्तुका बोध होता है, इसलिए पूर्वोक्त निदिध्यासनकी अपेक्षा नहीं है।। ६ ॥। कुतो वाक्यार्थोऽवसीयते इति चेत् १ तत्प्रतिपच्वर्थ विशेषण- विशेष्ययो: सामर्थ्योक्ति: एक पदसे कहीं भी वाक्य नहीं बनता, इसलिए वाक्यकी आवश्यकता हो तो अ्नेक पदोंका ग्रहण करना चाहिये इसपर भी सभी पद एकही अर्थके बोधक हों तो पौनरुत्त्य दोष होगा। अतएव अपुनरुक्तार्थक पदोंका अखएड अ्थमें पर्यंवसान नहीं बनता : इसलिए संसर्गको ही वाक्यार्थ मानना पड़ेगा। फिर-अखरडार्थका बोध कैसे हो सकता है? ऐसा आक्षेप यदि कोई करे, तो उसको दूर करने के लिए' अखएडार्थ ज्ञानके लिए विशेषण और विशेष्यका सामर्थ्य दिखाते हैं- निर्दुःखित्वं त्वमर्थस्य तदर्थेन विशेषणम्। प्रत्यक्ता च तदर्थस्य त्वंपदेनाऽस्य सन्निधेः ॥१०॥ तत्पदार्थके साथ अभेद होनेसे त्वंपदार्थके दुःखित्वादि धर्म दूर हो जाते हैं। ऐसे ही त्वंपदार्थके सन्निधानसे तत्पदार्थके भी परोक्षत्वादि धर्म निवृत्त हो जाते हैं ॥१॥॥ उक्तं सामानाधिकरएयं विशेषणविशेष्यभावश्च संक्षेपतः।

१ एक विभक्तिसे युक्त होकर एक अर्थका प्रतिपादन करना।

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९४ नैष्कम्यसिद्धि:

कूटस्थबोधप्रत्यक्त्वमनिमित्त सदात्मनः । बोद्धताहन्तयोहेतुस्ताभ्यां तेनोपलक्ष्यते ॥ ११ ॥ सामानाधिकररय और विशेषख विशेष्य भावका संक्षेपसे व्याख्पान कर दिया। अब लक्ष्य-लक्षण भाव रूप तृतीय सम्बन्धका व्याख्यान करनेके लिए कहते हैं- आत्माकी लक्ष्यभूत कूटस्थज्ञानरूपता तथा प्रत्यगरूपता सर्वकालमें स्वाभाविक है। स्वभावसे बोधरहित जड़रूप बुद्धिमें बोद्धत्व और अहन्ताका वही हेतु है। इसलिए बुद्धिनिष्ठ बोद्धृत्व और तहन्तासे आत्मा लक्षित होता है। इस प्रकारसे त्वंपदका वाच्यार्थ जो बुद्धि-विशिष्ट चैतन्य है वह लक्षण और शुद्ध आत्मा लक्ष्य सिद्ध हुआ ॥ ११॥ बुद्धे: कूटस्थबोधप्रत्यक्त्वनिमिचे बोड्धता प्रत्यक्त्वे ये असा- धारणे तयोविंशेषवचनम्- वोद्धृता कर्तृता बुद्धेः कर्मता स्यादहन्तया। तयोरैक्यं तथा बुद्धौ पूर्वयोरेवमात्मनि ॥ १२॥ बुद्धिनिष्ट बोद्धत्व और प्रत्यक्त्व यदि शुद्ध चैतन्यनिष्ठ बोद्धत्व औरर प्रत्यक्त्वका निमित्त हो, तब दोनोंका कुछ विशेष कहना चाहिए। नहीं तो दोनोंका हेतुहेतुमन्भ्ाव नहीं हो सकेगा। इसलिए बुद्धि और चैतन्य, दोनोंमें जो बोद्धृत्व प्रत्यक्खव है उनका वैलक्षरय कहते हैं- -बुद्धिमें जो बोद्धृत्व है, वह विविध विषयाकारोंसे युक्त ज्ञानरूप परिणामका कर्तृत्वरूप ही है। आ्रत्माके सदृश कूटस्थ ज्ञानरूप नहीं है। वैसे ही बुद्धिका प्रत्यक्श भी यही है जो अहंरूप अर्थात् शबलरूपसे चैतत्यका कर्म अर्थात् भास्य होना। न कि शररात्माके समान प्रत्यक्त्व है कतिपय देह, इन्द्रिय, विषय इश्यादिकोंकी अपेक्षासे बुद्धिको प्रत्यक्त्ध है, किन्तु बुद्धिमें होनेवाले बोद्धत्व और प्रत्यकृत्वका जैसा परस्पर अभेद है, वैसा ही आत्मनिष्ठ बोद्धत्व और प्रत्यक्त्वका भेद नहीं है किन्तु भिन्नके समान प्रतीत होनेपर भी वस्तुतः एक ही है॥ १२ ॥ यथा बुद्धौ पूर्वयोरेवमात्मनीत्यतिदेशेन बुद्धिसाधर्म्य- विंधानाननानात्वप्रसक्तौ तदपवादार्थमाह- धर्मधर्मित्वभेदोऽस्याः सोऽपि नैवाऽऽत्मनो यतः। प्रत्यग्ज्योतिरतोऽभिन्नं भेदहेतोरसम्भवात् ॥ १३ ॥ जैसे बुद्धिके बोडत्व और प्रत्यक्त्वका परस्पर भेद नहीं है। ऐसे ही आरत्मनिष्ठ कूटस्थ भोध और प्रत्यक्त्का भेद नहीं, ऐसा बुद्धिके साथ आरत्माका सादृश्य दिखलाया।

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भाषानुवादसहिता

उसको सुनकर यदि किसीको ऐसी शङ्का हो कि आत्मा धर्मी है ये दोनों धर्म हैं। अतएव भेद तो रहा ही। तो इस शङ्काको निवृत्त करनेके लिए कहते हैं- बुद्धि में धर्मधर्मिभावरूपसे भेद हो सकेगा। परन्तु आत्मामें उस प्रकारका भी भेद नहीं है। क्योंकि भेद होनेमें कोई प्रमा नहीं, इसलिए कूटस्थ ज्ञान और प्रत्यक्ष रूप आ्र्प्रात्मा है; ये दोनों धर्म हैं। आत्मा उनका आश्रय है। इस प्रकार भेद नहीं है॥ १३ ॥ भेदहेत्वसम्भवं दर्शयन्नाह- बोधप्रत्यक्त्वयोर्भिंदा व्यभिचारोऽथवा दृष्टो यथाऽहं तद्विदो सदा॥ १४॥ भेदके कारखकी कोई सम्भावना नहीं हो सकती। इस बातको दिखलाते हुए कहते हैं कि-किसी भी अवस्थामें बोध और प्रत्यकरूपता, इन दोनोंका भेद नहीं दीखता। अथवा परस्पर व्यभिचार भी नहीं दृष्ट होता। जैसे-अहंकार और समीचाका परस्पर एक जड़ दूसरा चेतन होनेके कारख भाष्य भासक भावरूपसे भेद है। किंवा- सुषुप्तिमें साक्षी विद्यमान होनेपर भी तहक्कार नहीं है, ऐसे बोध और प्रत्यक्त्वका किसी प्रकार भेद नहीं है॥ १४ ॥ यस्मादज्ञानोपादानाया एव बुद्धेभेदो न आत्मनस्तस्मादेत- त्सिद्धम्- कूटस्थबोधतोऽद्वैतं सांक्षाच्वं परत्यंगात्मन: । कूटस्थबोधाद् बोद्धी धीः स्वतो हीयं विनश्वरी॥ १५।। जिस कारण अज्ञानसे उत्पन्न बुद्धिका ही भेद है, आत्माका नहीं। इस कारख यह सिद्ध हुआ कि- आत्माका कूटस्थ ज्ञान ही स्वरूप है। अतएव समस्त बुद्धियोंमें परस्पर भेद होनेपर भी इसकी एकता ही है। तथा सर्वत्र प्रत्यक्षरूपता ही है। परोक्षरूपता नहीं है। किन्तु बुद्धिमें जो द्रष्टत्व प्रतीत होता है वह आ्रात्माके ही सम्बन्घसे है। क्योंकि स्वयं बुद्धि अनित्य है॥ १५ ॥ अथाऽधुना प्रकृतस्यैव परिणामिनः कूटस्थस्य च लक्षण- मुच्यते- विशेषं कश्चिदाश्रित्य यत्स्वरूपं प्रतीयते। प्रत्यभिज्ञाप्रमाणेन परिणामी स देहवत् ॥१६ ॥

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९६ नैष्कर्म्यसिद्धि:

सामान्याच्च विशेषाच्च स्वमहिन्नैव यो भवेत्। व्युत्थायाऽप्यविकारी स्यात्कुम्भाकाशादिवत्तु नः ।।१७।। यहाँ तकके ग्रन्थसे परिणामी अहंकारसे कूटम्थ आत्मा कैसे लक्षित होता है, इस बात को दिखलाया, अब इन दोनों का लक्षण कहते हैं- मैं घटको जानता हूँ, पटको जानता हूँ, सुखी हूँ, दुःखी हूँ, इस प्रकार विशेषका आश्रय करके जिसका स्वरूप प्रतीत होता है अर्थात् बाल्य यौवनादि अवस्थाका भेद जैसा है, वैसा अहक्कारका भी अवस्थाभेद है। तो भी जो मैं पहले सुखी था, वही मैं इस समय दुःखी हूँ, इस प्रकार प्रत्यभिज्ञाके बलसे एकसा प्रतीत होता है, देहकी भाँति वह परिणामी है॥ १६ ॥ जो सामान्य और विशेषको आश्रय न कर उनसे पृथकूरूप होकर स्वप्रकाश रूपसे ही प्रतीत होता है, वह कूटस्थ कहलाता है। जैसे घटाकाश, मठाकाश इत्यादि प्रकारसे उपाधियुक्त रूपसे भासमान होनेपर भी आरकाश घयादि उपाधिगत विकारोंसे विकृत नहीं होता, किन्तु इनसे पृथकरूपसे रहकर कूटस्थ ही रहता है। वैसे ही आत्मा विकारको प्राप्त न होकर कूटस्थ ही रहता है॥ १७ ॥ आत्मनो बुद्धेश्च बोधप्रत्यगात्मत्वमभिहित तयोरसाधारण- लक्षणाभिधानार्थमाह- बुद्धेर्यत्प्रत्यगात्मत्वं तत्स्याद्देहाद्युपाश्रयात्। आत्मनस्तु स्वरूपं तन्नभसः सुपिता यथा॥ १८ ॥ बोद्धृत्वं तद्वदेवाऽस्याः प्रत्ययोत्पत्तिहेतुतः। आत्मनस्तु स्वरूपं तत्तिष्ठन्तीव महीभृतः ॥ १९ ॥ इस प्रकार लक्ष्य लक्षणरूप आरत्मा और बुद्धि, इन दोनोंकी बोधरूपता तथा प्रत्यगात्मरूपताका वर्णन किया। अब इन दोनों रूपोंका असाधारण लक्षण कहते हैं- बुद्धिमें जो प्रत्यकरूपत्त्र प्रतीत होता है वह देहादिकी अपेक्षासे प्रतीत होता है। आत्माकी जो प्रत्यकरूपता है वह किसी अन्य की अपेक्षासे नहीं है किन्तु वह आत्माका स्वाभाविक स्वरूप है जैसे आरकारका पोलापन स्वाभाविक है ॥१८ ॥ ऐसे ही बुदि्ध में जो बोद्धृत्व है, वह भी तत्तद्विषयाकारसे परिणत बुद्धिवृत्ति- रूप बोधकतृ त्वरूप है। क्योंकि जन्र बुद्धिका विषयाकारसे परिणाम होकर वृचतिमें चैतन्य- का प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसी समय बुद्धिमें बोद्धृत्व व्यवहार होता है नहीं तो नहीं। किन्तु आत्माका बोद्धृत्व वैसा नहीं है, किन्तु स्वाभाविक है। जैसे चञ्चल पदार्थों में गति निवृत्ति जब होती है तब ये खड़े हैं, इस प्रकार 'स्था' धातु का प्रयोग होता है।

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भाषानुवादसहिता ९७

परन्तु जो स्त्रभावसे ही गति-क्रिया-शून्य पर्वतादि हैं, उनमें स्वभावसिद्ध अचलत्वकी दृष्टिसे ही 'स्था' धातुका प्रयोग होता है ॥ १६ ॥ तयो: कूटस्थपरिणामिनोरात्माऽनवबोध एव सम्बन्धहेतुर्न- पुनर्वास्तवः कश्विदपि सम्बन्ध उपपद्यत इत्याह- सम्यकसंशयमिथ्यात्वैर्धीरेवेयं विभज्यते। हानोपादानताऽमीषां मोहादध्यस्यते दशौ ॥ २० ॥ ऐसे कूटस्थ और परिखामी आत्मा और अहङ्कारका परस्पर सम्बन्ध करानेवाला अज्ञान ही है और कोई दूसरा वास्तविक अर्थात् सत्य पदार्थ नहीं है। इस बातको कहते हैं- तत्वज्ञान, संशय और भ्रान्ति इत्यादि धर्मोंसे बुद्धि ही युक्त है। अतएव इन धर्मोंकी सत्ता या असत्ता अज्ञानवश साक्षीमें आरोपित होती है। इसलिए साक्षीमें कोई विशेष धर्म नहीं है॥ २० ॥ कुतः कूटस्थात्मसिद्धिरिति चेत्, यत :- न हानं हानमात्रेण नोदयोऽपीयता यतः। तत्सिद्धि:स्यान्तु तद्धीने हानादानविधर्मिणि ॥२१। बुद्धि सम्बन्धके बिना आत्मामें बोद्धृत्व नहीं दीख पड़ता, इसलिए आरत्माकी कूटस्थता कैसे सिद्ध होगी ? इस शङ्काको दूर करते हैं- बुद्धि और उसकी वृच्ि,इनका हान अर्थात् अभाव वह केवल अपनेसे ही सिद्ध नहीं हो सकता, तथा इनका उदय यानी सद्भाव भी उसौसे सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि वे जड़ हैं। अतएव हानोपादान रहित साक्षीमें अध्यस्त होनेसे ही हो सकता है। इसलिए कूटस्थ साक्षी मानना चाहिए, जिससे इनकी सिद्धि होवे॥ २१ ॥ एवम्- आगमापायिहेतुभ्यां धूत्वा सर्वाननात्मनः । ततस्तत्वमसीत्येतद्धन्त्यस्मदि3 निजंतमः ॥२२॥ इस प्रकार-'तत्त्वमसि' यह वाक्य अन्वय और व्यतिरेकसे आत्मा और

१ हानादान विधर्मके, हानादानविधर्मिएाम्, हानोपादानवर्मके, ऐसा ऐसा पाठ भेद भी उपलब्ध होता है। २ आगमापायहेतुभ्याम्, ऐसा भी पाठ है। ३ यस्मादिद्ध निजं तमः, पाठ भी है। १३

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९८ नैष्कर्म्यसिद्धि:

अनात्मा, दोनोंके विवेकज्ञानको उत्पन्नकर पश्चात् सकन् संसारको प्रलय करनेवाले आत्माश्रित अ्ज्ञानको नष्ट कर देता है॥ २२ ॥ इत्यादि पुनः पुनरुच्यते ग्रंन्थलाघवाद् बुद्धिलाघवं प्रयोजक-

वत्पारोक्ष्यसद्वितीयोऽर्थः प्रतीयते। तथापि तु नैवासावर्थः श्रुत्या तात्पर्येग प्रतिपिपादयिषितः प्रागप्येतस्य प्रतीतत्वादितीममर्थमाह- 'यदा ना तत्त्रमस्यादेर्ज्ञात्मना त्याजयेद्वचः' इत्यादि ग्रन्थके द्वारा पहले अ्रनेक बार इसका प्रतिपादन किया, इसलिए पुनरुक्ति क्यों करते हो? ऐसी शङ्का यदि कोई करे तो उसका समाधान यह है कि आत्मव्स्तु अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे बुद्धिमें स्थिर नहीं होती। इसका विस्तृतरूपसे प्रथम ही यदि प्रतिपादन करने लग जायँ तो उसका धारण नहीं होगा। अल्पग्रन्थसे अनेक बार कहनेसे समझनेमें सौकर्य होता है। इसलिए ग्रन्थलाघवकी अपेक्षासे बुद्धिमें लावव अर्थात् सौकर्य होगा। इस अभिप्रायसे कथितका ही पुनः कथन किया जाता है। यद्यपि तत्त्वमस्यादि वाक्यसे ग्रहण करनेके लिए अभीष्ट अद्वितीय आत्मरूप अर्थके सदृश परोक्षना और सद्वितीयताका प्रतिपादन श्रुति तात्पयसे नहीं करना चाहती। क्योंकि वाक्य श्रवणके पहले ही सबको यह बात मालूम है। अतएव ज्ञात वस्तुको वाक्य पुनः क्यों प्रतिपादन करेगा? उसका प्रतिपादन करनेसे कोई फल भी नहीं है। इस बातको स्पष्ट करनेके लिए कहते हैं- तदित्येतत्पदं लोके बह्वर्थेप्रतिपादक्रम् । अपरित्यज्य पारोक्ष्यमभिधानोत्थमेव तत् ॥। २३ ।। 'लोकमें' तत् पद देशकालव्यवधाननिमित्तक परोक्षत्वका परित्याग न करके अ्रनेक अर्रर्थोंका बोधन करता है, ऐसा प्रतीत होता हैं। तथापि शब्दसे वह परोक्षत्व अनिघाशक्तिके द्वारा आपातरूपसे प्रतीतमात्र होता है। वस्तुसे उसका स्पर्श नहीं है। तथा उसका प्रंतिपादन करना श्रुतिको इष्ट भी नहीं है ॥ २३ ॥ त्वमित्यपि पदं तद्वत् साक्षान्मात्रार्थवाचि तु। संसारितामसन्त्यज्य साऽपि स्यादभिधानजा ॥ २४॥ तथा त्वंपद भी पहलेसे ही ज्ञात, जो संसारित्व है, उसका परित्याग न करके ही नित्य अपरोक्ष वस्तुका बोधक है। इसलिए वह संसारिता मा आरपातहष्टिसे शब्दके द्वारा भासमान होती है। वस्तुसे उसका सम्बन्ध नहीं है॥ २४॥ विरुद्धोद्देशनत्वाच्च पारोक्ष्यदुःखित्वयोरविवक्षितत्वमित्याह- उद्दिश्यमानं वाक्यस्थं नोद्देशनगुणान्वितम्। आकाङक्षितपदार्थेन मंसरगे प्रतिपद्यते ॥ २५॥

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भाषातुवादसहिता ९९

तत् त्वं पदार्थका निर्हेश भी विरुद्ध है, इसलिए परोक्षत्व, दुःखित्व यहाँ विवच्तित नहीं है, यह कहते हैं- 'तत्वमसि'-वाक्ष्यमें उद्दिश्यमान त्वं पदार्थात्मक वस्तु उद्देश्य दशामें प्रतीत होने- वाले संसारित्व गुणसे युक्त होकर विधेय जो सकल संसार रहित वस्तु है उसके साथ सम्बन्ध- को प्राप्त नहीं हो सकती। ऐसे ही तत्पदार्थ भी उद्देश हो तो उस समय भी वह परोक्षत्वादि विरुद्ध गुणोसे युक्त होकर नित्य अपरोक्ष प्रत्यगात्माके साथ अरपन्वित नहीं हो सकता इसलिए दोनों जगह विरुद्ध धमोंकी अविवक्षा है॥ २५॥ यत एतदेवमतोऽनुपादित्सितयोरि तत्त्वमर्थयोविशेषणवि- शेष्यभावो भेद रहितसंसर्गवाक्यार्थलक्षणयैवेति उपसंहार :- तदो विशेषणार्थत्वं विशेष्यत्वं त्वमस्तथा। लक्ष्यलक्षणसम्बन्धस्तयोः स्यात्प्रत्यगात्मना ॥ २६॥ क्योंकि विरुद्ध धमोंकी विवक्षा यहाँ नहीं है, इसीलिए अनुपादित्सित अर्थात् अविवच्षित भी त्वंपदार्थ और तत्पदार्थका विशेषण विशेष्भाव भेद न रहनेके कारण संसर्ग किंवा विशिष्टरूप वाक्यार्थसे मिन्न अखरडरूप वाक्यार्थमें ही लक्षणाद्वारा प्यवसित होता है। ऐसा उपसंहार करते हैं- तत्पदार्थ विशेषण है और त्वंपदार्थ विशेष्य है। क्योंकि वह सामान्यरूपसे प्रसिद्ध है, और उसीमें ब्रह्मत्वज्ञानसे अनर्थनिव्ृत्तिपूर्वक पुरुषार्थ सिद्ध होनेवाला है। इन दोनोंमें विरोधस्फूर्ति हो तो दोनों पदार्थोंसे लक्ष्यलक्षणभाव सम्बन्धसे शुद्ध अखएड आत्माका ज्ञान होता है॥ २६॥ कथ पुनरविवक्षितविरुद्धनिरस्यमानस्य लक्षणार्थत्वम्? लक्षणं सर्पवद्रज्ज्वाः प्रतीचः स्यादहं तथा। तद्वाधेनैव वाक्यार्थ वेत्ति सोऽपि तदाश्रयात् ॥२७॥ शङ्का-अदङ्कारद्वारा शुद्ध आत्म, कैसे लक्ित हो सकता है ? क्योंकि जहाँपर लक्षणा होती है, जैसे-'गङ्गायां घोषः' इत्यादि स्थलोंमें। वहाँ गङ्गाशब्दसे तीर लक्षित-होता है। परन्तु गङ्गा शब्दका वाच्यार्थ जा जलप्रवाह है वह अविवक्ित नहीं होता। कारण- गङ्गातीरका बोधन करनेके निमित्त उसकी आवश्यकता होती है। ऐसे ही यहाँपर वाच्यार्थका लक्ष्यार्थसे विरोध भी नहीं है, एवं वाच्यार्थ जो जलप्रवाह है उसका लक्ष्यार्थ तीरके साथ सम्बन्ध भी है। प्रकृत स्थलमें तो सर्वथा उलटा है। जैसे अहङ्गार अपुरु- षार्थ होनेसे शरविवच्तित है और मिथ्या होनेसे शुद्ध आरत्मासे अत्यन्त विरोध भी है। ऐसे शुद्ध लक्ष्य पदार्थके ज्ञानसे बाधित भी होता है तब यह लक्षक कैसे हो सकता है? १ भेदसंसर्गरहितावाक्यार्थ, भी पाठ है।

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१०० नैष्कम्यसि

समाधान-जो यह सर्प है, वह रज्जु है। ऐसे प्रयोगमें सर्पस्वरूप अरसत्य होनेसे विवच्तित नहीं है। अतएव रज्जुसे उस सपका वास्तव सम्बन्ध भी नहीं है। और रज्जुके ज्ञानसे वह सर्प बाधित भी होता है। ऐसा होनेपर भी वह मिथ्यासर्प स्वाधिष्ठान- भूत रज्जुका लक्षक जैसे होता है? क्योंकि प्रतिभासमान सर्पाकारका अनुवाद किये बिना अप्रकाशमान रज्जुके आकारका ज्ञान शब्दसे नहीं हो सकता। वैसे ही अहङ्कार अरविव्तित, सम्बन्धरहित और बाधित है। तथापि शुद्ध आत्मामें अध्यस्त होकर उसका लक्षक हो सकेगा। भ्रान्तिसे अहं इस रूपसे गृहीत आत्माका उसके अनुवादके बिना तात्विकरूपसे वाक्य द्वारा उसका प्रतिपादन नहीं हो सकता। अतएव जैसे रज्जुके ज्ञानसे सर्पको बाधित कर ही 'जो सर्प है वह रज्जु है, इस वाक्यसे अर्थ बोध होता है। वैसे ही 'मैं ब्रह्म हूँ' इस वाक्यसे अर्थज्ञान अहङ्कारका बाध होनेपर ही होगा। इसलिए 'ब्रह्म' पद और 'अहम्' पद, इन दोनोंमें भिन्नार्थत्वकी शङ्का नहीं करनी चाहिए । २७ ।।

देहादीन्प्रत्यगञ्चति। तावत्तावत्तदर्थोऽपि त्वमर्थ प्रविविक्षति ॥ २८॥ यह पूर्वोक्त अखएडार्थका ज्ञान अन्वय और व्यतिरेकको जाननेवालेको ही हो सकता है। क्योंकि- ज्यों ज्यों यह मुमुक्षु देहसे लेकर मायापर्यन्त अनात्म पदार्थोको, जो कि आत्म- बुद्धिसे गरहीत हैं, निरास करता है, त्यों त्यों तत्पदार्थ भी त्वंपदार्थके साथ त्रभेद ज्ञान होनेसे एक रूप अखएड प्रकाशित होता है। क्योंकि विरोधी जो परिच्छेदाभिमान है वह निवृत्त हो जाता है ॥ २८ ॥ कस्मात्पुनः कारणाहेहादनात्मत्वप्रतिपत्तावेवात्मा तदर्थमा- त्मत्वेनाभिलिङ्गते, न वियर्यय इति ? उच्यते-प्रत्यगात्माऽनवबोध-

त्वमविद्याकृतमेवात्मत्वमिवाऽनात्मत्वपि साविद्यस्यैव। यतो निरविद्यो विद्वानवाक्यार्थरूप एव केवलोऽवशिष्यते। तस्मादुच्यते- देहादिव्यवधानत्वात्तदर्थ स्वयंमप्यतः । पारोक्ष्येणैव जानाति साक्षा्च्वं तदनात्मनः ॥ २९ ॥ शङ्का-देहादिमें अरनात्मत्वका निश्चय होनेपर ही प्रत्यगात्मा तत्पदार्थमें अरभिन्न- रूपसे मिलता है। निश्चय न हुआ तो नहीं। इसका क्या कारण है?

१ इयं च वाक्यार्थप्रतिपत्तिः, ऐसा भी पाठ भेद है।

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भाषानुवादसहिता १०१

समाधान-प्रत्यगात्माका अनवबोध (अज्ञान) जड़ स्वरूप, दृश्य एवं ज्ञानसे निवृत्त होने वाला है, इसलिए उसकी अनात्मरूपता स्वभाविक ही है। बुद्धिसे लेकर देहपर्यन्त पदार्थ उसी अज्ञानके कार्य हैं; अतएव उनका भी अनात्मत्व सिद्ध ही है। क्योंकि वे शुद्ध ब्रह्मके कार्य नहीं हैं। तथा आरत्मा चिद्रप, कूटस्थ, स्वयम्प्रकाशरूप होनेसे ब्रह्मरूप है। उसमें किसीकी अपेक्षा नहीं है। परन्तु जब्र देहादिसे आत्मबुद्धि निवृत्त हो, तभी वह स्वाभाविक भी व्रह्मरूपता आविभूत होती है। ऐसा होनेपर भी यह शङ्का होती है कि अ्रनात्म पदार्थोकी स्वरूपसे स्थिति है इसलिए आत्यन्तिक अनर्थ निवृत्ति कैसे होगी ? इस शङ्काको दूर करनेके लिए यह कहा जाता है कि-देहादिपदार्थोकी आत्मरूपता जैसे अज्ञान निमित्तक है, वैसे उनका अनात्मपन भी अज्ञान निमित्तक ही है। इसलिए अविद्या नष्ट हो जाय तो फिर अनर्थकी सम्भावना नहीं है। क्योंकि-अविद्यासे रहित आत्मज्ञानवान् पुरुष अखएड ब्रह्मरूप होकर केवल एक ही अवशिष्ट रहता है। इसलिए यह कहा जाता है कि- - देहादिरूप व्यवधान होनेके कारख स्वस्वरूप होनेपर भी तत्पदार्थ ब्रह्मको परोक्ष- रूपसेही जानता है, अर्थात् अपनेसे भिन्नरूपसे जानता है। जब्र देहादिकी अनात्माका निश्चय अन्वय-व्यतिरेकसे हो जाता है तब तत्पदार्थ अपरोक्ष हो जाता है॥ २६॥ यथोक्तार्थप्रतिपत्तिसौकर्याय दृष्टान्तोपादानम्- प्रत्यगुद्भूतपित्तस्य यथा बाह्यार्थपीतता। चैतन्यं प्रत्यगात्मीयं बहिर्वद्दृश्यते तथा॥ ३० ॥ पूर्वोक्तअर्थको सुगमताके साथ जाननेके लिए दष्टान्तका-उपादान करते हैं- जैसे पित्त अपने शरीरके भीतर ही एक देशमें अर्थात् चक्तुमें उत्पन्न होता है। परन्तु बाह्य शङ्गादि पदार्थोंके साथ सम्बन्ध होनेसे शङ्कादिमें ही पीतिमाँ हैं, ऐसा मालूम पढ़ता है। ऐसे ही प्रत्यगात्मा ब्रह्मरूप है, ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। परन्तु त्रनात्म- भूत अज्याकृतादि पदार्थोंके साथ सम्बन्ध होनेसे वह ब्रह्म जीवको परोक्ष-जैसा प्रतीत होता है॥ ३० ॥ यस्मादेवमतो विशु'द्धमवसीयताम्- पदान्युद्धृत्य वाक्येभ्यो ह्यन्वयव्यतिरेकतः । *पदर्थाल्लोकतो बुद्ध्वा वेत्ति वाक्यार्थमञ्जसा।।४१॥ तत्वमस्यादि वाक्यका अखरडार्थमें पर्यवसान होनेके कारण किसी प्रकारका विरोध नहीं है। अतएव निःशङ्क होकर पूर्वोक्त अरथका निश्चय कर लेना चाहिए-

१ विस्नब्धमवसीयताम्। ऐसा भी पाठ है। २ पेदार्थ लोकतो, भी पाठ है।

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१०२ नैष्कम्यसिद्धि:

भिन्न भिन्न प्रयोगोंमें पदोंका आवाप और उद्वाप (अर्थात् किसी नये पदकों उस वाक्यमें जोड़ना, और जो है उसको उसमेंसे निकालना) तथा अन्वय-व्यतिरेकसे वृद्ध व्यवहार द्वारा पदार्थोंको समभकर वाक्यके तात्पर्यके अनुसार वाक्यार्थका ज्ञान होता है॥ ३१ ॥ कुतः पुनः सामान्यमात्रवृत्तः पदस्य वाक्यार्थेग्रतिपत्तिहेतु- त्वमिति ! वाढम् । सामान्यं हि पदं ब्रूते विशेषो वाक्यकर्तृकः। श्रुत्यादिप्रतिबद्धं सद्विशेषार्थ भवेत्पदस् ।। ३२ ।। शङ्गा-सामान्य अर्थात् जातिमात्रका बोधक जो शब्द है, उससे विशेषरूप वाक्यार्थकी प्रतीति कैसे हो सकती है ? क्योंकि शन्दोंकी शक्ति तो दूसरेमें ही और बोध दूसरेका हो, ऐसा कहीं देखनेमें नहीं आया ? उत्तर-हाँ, शब्द अर्थात् पदमात्र यदयपि सामान्यका ही वाचक है, तो भी विशेषकी प्रतीति वाक्यके तात्पर्यबलसे होती है। अतरव श्रुत्यादिसे सङ्कचित होकर पद भी विशेषार्थक होता है ॥ ३२ ॥ अन्वयव्यतिरेकपुरस्सरं वाक्यमेव सामानाधिकरएयादिना- Sविद्यापटलप्रध्वंसद्वारेण मुमुक्षुं स्वाराज्येऽभिषेचयति न त्वन्वयव्यति- रेकमात्रसाध्योऽयमर्थ इत्याह- बुद्ध्यादीनामनात्मत्वं लिङ्गादपि च सिद्धयति। निवृत्तिस्तावता नेती'त्यतो वाक्यं समाश्रयेत् ॥ ३३ ।। अन्वय व्यतिरेक पूर्वक वाक्य ही सामानाधिकरएयादि द्वारा अविद्याके आवरणको नष्टकर मुमुत्तुको स्वाराज्यपदमें अरभिषिक्त करता है, केवल अ्रन्वयत्यतिरेक मात्रसे यह साध्य नहीं है, यह बात कहते हैं- बुद्धयादिका अनात्मपन युक्तिसे भी सिद्ध होता है। परन्तु उनके कारणीभूत अज्ञानकी निवृत्ति पुरस्सर इनकी।नवृत्ति युक्तिमात्रसे सिद्ध नहीं होती। क्योंकि युक्ति स्वयं प्रमाण नहीं है। अतएव युक्तिसे अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती। इसलिए प्रमाखभूत वाक्यका ही आलम्बन करना चाहिए ।। ३३ ॥। न केवलमनुमानमात्रशरणोऽभिलषितमर्थ न प्राप्नोतीत्यनर्थ च प्राप्नोतीत्याहं-

१ अविध्यामल, भी पाठ है। २ नैतीत्यतः ,भी पाठ है।

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भाषानुवादसहिता १०३

अनादृत्य श्रुति मोहादतो वौद्धास्तमस्विनः । आपेदिरे निरात्मत्वमनुमानैकचक्षुषः॥ ३४॥ जो अनुमानको ही शरण माननेवाला है, वह केवल अपनी इष्ट सिद्घिसे ही वश्चित रहता है, यही नहीं। किन्तु-अनर्थको भी प्राप्त होता है। इसी बातको कहते हैं- अनुमानमात्रको ही प्रमाख माननेसे तमोगुणाप्रधान बौद्ध लोग मोहसे श्रुतिका अनादर करके निरात्मवादी बने और शून्य हो गये ॥ ३४ ॥ न चानादरे कारणमस्ति प्रमाणस्य प्रमाणान्तर-प्रतिपन्नप्रतिपादनंवा विपरीतप्रतिपादनं वासंशयित- प्रतिपादनं वान वा प्रतिपादनमिति, न चैतेषामन्य'तमदपि कारण- मस्ति। यत आह- मानान्तरानवष्टब्धं निर्दुःख्यात्मानमञ्जसा। बोधयन्ती श्रुतिः केन न प्रमाणमितीर्यते ॥ ३५॥ श्रुतिके अनादरमें कोई कारण भी नहीं है। क्योंकि सर्वत्र प्रमाके अररनादरमें यही कारण होता है कि जो बात प्रमाणान्तरसे ज्ञात हो उसको प्रकाशित करना, अथवा प्रमाखान्तरसे जो बात विरुद्ध हो उसको कहना, या जिस बातका प्रतिपादन करना है, उसको सन्दिग्धरूपसे प्रतिपादन करना, किंवा प्रतिपादन न करना, इन चार कारणोंमेंसे प्रकृत विषयमें कोई भी नहीं है। इसलिए कहते हैं- आत्मा प्रमाखान्तरसे ज्ञात नहीं है, अथवा प्रमाखान्तरसे विरुद्ध भी नहीं है। अथवा उसका श्रुतिसे सन्दिग्ध ज्ञान होता है, यह भी नहीं और श्रुतिसे उसका बोध ही नहीं होता, यह बात भी नहीं है तब उसको दुःखरहित, नित्य श्रनन्द- रूपसे अनायास प्रतिपादन करनेवाली श्रुपि प्रमाण नहीं है, ऐसी बात किसके मुखसे निकलेगी? ॥ ३५ ॥ न च संशयितव्य मवगमयति। यतः- सर्वसंशयहेतौ हि निरस्ते कथमात्मनि। जायेत संशयो वाक्यादनुमानेन युष्मदि॥ ३६॥ और वेदसे आत्माका बोध संशयात्मक भी नहीं होता। क्योंकि-समस्त संशयांका कारग अहङ्कार प्रभृति अनात्मवर्ग अनुमानके द्वारा जन्र आत्मासे निरस्त हो गया है, तब वाक्यसे संशय कैसे हो सकता है ?॥ ३६ ॥ अन्यतरत्, भी पाठ है। २ संशयितं, ऐसा और 'अवगमं प्रति, ऐसा भी पाठ है।

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१०४ नैष्कमर द्धे:

अपि च- यत्र स्यात्संशयो नाऽसौ ज्ञेय आत्मेति षंडितैः। न यतः संशयप्राप्तिरात्मनोऽवगतित्वतः॥ ३७॥ और भी इस बातको कहते हैं- जहाँ पर संशय हो उसको पसिडतलोगोंने आत्मरूपसे नहीं समझना चाहिए। क्योंकि आत्मामें किसी प्रकार सामान्य-विशेष भाव नहीं है। स्वयंप्रकाश होनेसे सर्वदा वह अपरोक्ष ही है। अत एव उसमें संश्रय होनेकी गुस्जाइश ही नहीं है, आत्मा ज्ञानस्वरूप होने से समस्त संशयको नष्ट करनेवाला है। आरोपित हश्यविशिष्टरूसे संशयका विषय हो तो भी विशिष्टरूपसे वह आरपरात्मा ही नहीं है और केवल जो आत्मा है, उसमें कदापि संशय नहीं हो सकता ॥ ३७॥ अनववोधकत्वं तु दूरोत्सारितमेव। यत आह- बोध्ये ऽप्यनुभवो यस्य न कथञ्चन जायते। तं कथ बोधयेच्छास्त्रं लोषठ नरसमाकृतिम् ॥ ३८॥ श्रुति आत्माका प्रतिपादन करती ही नहीं, यह बात शङ्कास्पद ही नहीं है। क्योंकि-जो वस्तु जानने योग्य है उस वस्तुका भी अनुभव जिसको 'नहीं होता, उस मनुष्याकार मिट्टीके ढेलेको, निरेजड़को, शास्त्र किस प्रकारसे बोध करा सकेगा ? ॥३८॥ अन्वयव्यतिरेकपुरस्स ं प्रतिपादयतीत्यस्य पक्षस्य द्रढिस्ने श्रुत्युदाहरणमुपन्यस्यति- जिघ्राणीममहं गन्धमिति यो वेच्यविक्रियः । स आत्मा तत्परं ज्योतिः शिरसीदं वचः श्रुतेः॥ ३९॥ अन्वय व्यतिरेकसे वाक्य ही अखएड आत्माका प्रतिपादन करता है, इस पक्षकी दढ़ताके लिए श्रुतिका उदाहरण देते हैं- 'मैं इस गन्धको ग्रहण करूँ' ऐसा जो किसी प्रकारके विकारको प्राप्त न होकर जानता है, वही स्वप्रकाश आत्मा है, ऐसा उपनिषद् का कथन है ॥ ३९ ॥ यथा 'तत्सत्य स आत्मा 'तत्वमसि' इत्यस्थ शेषत्वेनाड- न्वयव्यतिरेकश्रुतिर्यथा 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इत्याद्या, 'अथ यो वेदेदं जिघ्राणि' इत्यन्ता। तथा 'अहं ब्रह्माऽस्मि' इत्यस्य शेषः। अहमः प्रत्यगात्मार्ऽर्थो निरस्ताऽशेषयुष्मदः । वम्भणीति श्रुतिर्न्याय्या योऽय मित्यादिनाऽसकृत्॥४०॥ १ बोधेऽपि, ऐसा भी पाठ है। २ अवयव्यतिरेकसचिवं, भी पाठ है।

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भाषानुवादसहिता १०५

जैसे छान्दोग्य उपनिषद् में 'वही सत्य है' 'वही आत्मा है' 'वहीं तू' है' इस वाक्य की अङ्गभूत अन्वय-व्यतिरेकबोधक यह श्रुति है। जैसे-'जो यहँ भेत्रोंमें पुरुष देख पड़ता है' यहाँसे लेकर 'अनन्तर जो ऐसा जानता है, मैं इसको श्रागी करूं' यहाँतक। वैसे ही बृहदारएयक उपनिषद्में भी 'मैं ब्रह्म हूँ' इस वाक्यकी शेषभूत 'योऽयं विज्ञानमयः' इत्यादि श्रुति 'अहं ब्र्माडस्मि' इस महावाक्यके अरहं पदका अर्थ सम्पूर्ण अनात्मासे रहित, अहङ्कारका साक्षी, लक्ष्यभूत प्रत्यगात्मा है, ऐसा युक्ति- पूर्वक बार-बार प्रतिपादन करती है॥४० ॥ कथं पुनरयमर्थोऽवसीयते 'अह व्याजेनात्रात्मार्थो वुबोधयिषित इति। यत :- एष आत्मा स्वयञ्ज्योती रविसोमाग्निवाक्षु सः। इतेष्वस्तं दृगेवास्ते भासयँश्रित्तचेष्टितम् ।४१॥ शङ्का-किस युक्तिसे यह सिद्ध होता है कि 'अहम्' शब्द वाच्यार्थका परित्याग करके लक्षखसे कूटस्थ आत्माका बोधन करता है, ऐसा श्रुतिको अरभिमत है? समाधान-चूँकि सूर्य, चन्द्रमा, अभि, वाखी इत्यादि प्रकाशक पदार्थो के अरस्त हो जानेपर भी स्वप्नावस्थामें सब प्रकारके चित्त-व्यापारको जो प्रकाशित करता है, वह स्वयं-प्रकाश आ्रत्मा है, ऐसा श्रुतिने प्रतिपादन किया है ॥ ४१ ॥ निर्णेनेक्ति च पृष्टो मुनि :- आत्मनैवेत्युपश्रुत्य कोऽयमात्मेत्युदीरिते। बुद्धेः परं स्वतो मुक्तमात्मानं मुनिरभ्यधात् ॥४२॥ आत्मप्रकाशसे ही समस्त व्यवहार होता है, इसको सुनकर शिष्यने जत्र प्रभ किया कि आत्मा शब्द तो कोश-पञ्चकमें भी प्रयुक्त होनेसे साधारण है । अतएब आत्म- शब्दका मुख्य अर्थ क्या है ? इसपर श्रीयाज्ञवल्क्य मुनिने पुनः पुनः निर्णय करके बत- लाया कि बुद्धिसे परे नित्यमुक्त जो वस्तु है, वही आत्मशब्दका अर्थ है॥ ४२॥ यस्माच्चात्माSत्राऽहंव्याजेन पत्यङ्मात्रो जिग्राहयिषितस्तस्मा- दहंवृत्तिः स्वरूपस्य विलयेनैव वाक्यार्थाऽवगमाय कारखत्वं प्रतिष्घत इती ममर्थमाह- अहंवृत्यैव तद्ब्रह्म यस्मादेषोऽ्वगच्छति। २तत्स्वरूपलयेनातः कारणं स्यादहंकतिः॥४३॥ १ विलयेनैवावाक्यार्थम्, ऐसा पाठ भी है। २ मत्स्वरूप, ऐसा श्री पाठ है। १४

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१०६ नैष्कम्यसिद्धि:

चूँकि यहाँपर अहङ्कारके व्याजसे शुद्धं प्रत्यगात्माका ग्रहए कराना इष्ट है। इस कारख अहंवृत्ति भी अपने स्वरूपके विलय द्वारा ही वाक्यार्थके ज्ञानमें कारण होती है, इस बातको कहते हैं-क्योंकि, यह मुमुत्तु 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार अहङ्कारसे ही ब्रह्मको जानता है। इस कारए अहङ्कार-स्वरूपके बाघ द्वारा ही अहङ्गार वाक्यार्थ-ज्ञानमें कारण है॥ ४३ ॥ अत एव च यः प्रतिज्ञातोर्ऽर्थो 'नाऽहंग्राहे न तद्ीने' इत्यादि: स युक्तिभिरुपपादित इति कृत्वोपसंहियते- इसलिए जो प्रतिज्ञा की गयी थी कि "अहङ्कारसे ग्राह्य जो आत्मा है, अथवा उससे रहित जो विशुद्ध आत्मा है, इन दोनोंमें विरोध नहीं है" इत्यादि- उसका युक्तियोंसे उनादन किया गया, इसलिए अब उपसंहार करते हैं- गृहीताऽहंपदार्थश्वेत्कस्माज्ज्ञो न प्रपद्यते। प्रत्यक्षादिविरोधाच्चेत्प्रतीच्युक्तिर्न युष्मदि।४४। यदि 'अहम्' पदार्थका ज्ञान हुआ है तो फिर क्यों विद्वान् पुरुष 'अहं ब्रह्मास्मि' वाक्यके अर्थको नहीं ग्रहण करता ? यदि कहो कि प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके साथ विरोध होनेसे नहीं जानता, सो यह ठीक नहीं। क्योंकि 'तत्वमस्यादि' वाक्योंसे जो अभेदका कथन किया है, वह उपाधि-विशिष्टोंका नहीं किया है, किन्तु शुद्ध आत्माका किया है। प्रत्यक्षादि तो उपाधि-विशिष्टका बोधन करनेवाले हैं, न कि शुद्ध आत्माका। इसलिए दोनोंका विषय भिन्न होनेसे कोई विरोध नहीं है॥ ४४॥ पूर्व स्यैव श्लोकार्थस्यविस्पष्टतामाह- पराञ्च्येव तु सर्वाणि प्रत्यक्षादीनि नात्मनि। प्रतीच्येव प्रवृत्तं तत्सदसीति वचोऽञ्जसा ॥ ४५ ॥ पूर्वोक्त श्लोकके अरथको ही स्पष्ट करते हैं- प्रत्यक्षादि प्रमाण पराक् अर्थात् जड़ वस्तुको ही विषय करनेवाले हैं, प्रत्य- कआात्माको विषय नहीं कर सकते। इसी कारणसे 'तत्त्त्वमसि' इत्यादि वाक्य अनायाससे शुद्ध आत्माका अभेद प्रतिपादन कर सकते हैं॥। ४५॥ तस्मात्प्रमातृप्रमाणप्रमेयेभ्यो हीयमानोपादीयमानेभ्योऽन्वय- व्यतिरेकाभ्यां मुञ्जेषीकावदशेषबुद्धिविक्रियासाक्षितयाऽडत्मानं निष्क- ष्य तत्त्वमस्यादिवाक्येभ्योऽपूर्वादिलक्षणमात्मानं विजानीयात् । तदेतदाह- १ पूर्वस्यैव पदार्थस्य, ऐसा और 'विस्पष्टार्थमाह, ऐसा भी पाठ है। २ मुश्जेषीकादिवत्, ऐसा पाठ भी है।

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भाषानुवादसहिता १०७

चूँकि शोधित तत्-त्वम् पदार्थके ज्ञानमें प्रमाणान्तरसे विरोध नहीं है, इसलिए हीयमान अर्थात् त्यागने योग्य और उपादीयमान अर्थात् ग्रहण करने योग्य प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय अन्वयव्यतिरेक द्वारा, जिस प्रकार सुकज (मूँज) नामक तृससे उसके भीतर रहनेवाले सूक्षम तृसको बड़ीं सावधानीसे पृथक करते हैं, उसी प्रकार आत्माको सम्पूर्ण बुद्धि-विकारोंका यह साक्षी है, इस रूपसे पृथक जानकर तत्त्वमत्यादि वाक्योंसे, अज्ञात सच्चिदानन्दरूप आत्माको जानना चाहिए। इसी बात को कहते हैं- अहं दुःखी सुखी चेति येनाडयं प्रत्ययोऽधुवः। अवगत्यन्त आभाति स म आत्मेति वाक्यधीः ॥४६ ॥ 'मैं दुःखी हूँ, सुखी हूँ' इत्यादि ज्ञान अध्रुव अर्थात् क्षखिक हैं। इन सत्र वृत्तियों तथा इनकी प्रमितियोंका भी प्रकाश जिससे होता है, दही मेरा आत्मा है, ऐसी बुद्धि वाक्यके द्वारा होती है॥ ४६ ॥ प्रमाणान्तराऽनवष्टब्धं निरस्ताऽशेषकार्यकारणात्मकद्वैतप्रप्श्च सत्यज्ञानानन्दलक्षणमात्मानं ततत्वमस्यहंब्रह्मास्मीत्यादिवाक्यं संशयित- मिथ्याज्ञानाऽज्ञानप्रध्वंसमुखेन साक्षादपरोक्षात्करतलन्यस्ताऽमलक- वत्प्रतिपाद्यत्येवेत्यसकृदभिहितम्।

त्म्यान्वाख्याननिष्ठैन यथोक्तोर्ऽर्थः प्रतिपत्तुं शक्यतेऽ्भिधाश्रुतित्वात्ते- षाम्। न हि लोकेऽभिधाश्रुतेः प्रमाणान्तरनिरपेक्षाया नद्यास्तीरे फलानि सन्तीत्यादिकायाः प्रामाएपमभ्युपगतम्। अतो नियोगमुखेनैवाऽभि- धाश्रुतेः प्रामाएयं युक्तं प्रमाणान्तरनिरपेक्षत्वान्नियोगस्य। अस्य परि- हारार्थमशेषप्रत्यक्षादिप्रमेयत्व निराकरणद्वारेणाSतीन्द्रियार्थविषयत्वाद- भिधाश्रुतेः प्रामाएयं सुप्तपुरुषप्रबोधकवाक्यस्येव वक्तव्यमित्ययमारम्भ :- प्रमाणन्तरसे अज्ञात, कार्यकारखात्मक द्वैतप्रपञ्चसे रहित, श्रखरड, सत्य ज्ञान, आनन्द स्वरूप आरत्माका-सन्देह, मिथ्याज्ञान, भ्रान्ति, तथा अज्ञानका नाश करके प्रत्यक्षरूपसे हस्तस्थित आरमलक (आँवले) के सदश-प्रत्यक्षात्मक ज्ञान तत्त्वमस्यादि वाक्यसे उत्पन्न होता है। इस बातका अनेक बार प्रतिपादन किया। इसपर कोई ऐसा कहते हैं कि "सिद्धार्थ वस्तुपर अर्थात् जो वस्तु जैसी है उसका यथार्थरूपसे बोध

१ याथात्म्यव्याख्यान, ऐसा भी पाठ है। २ अनिन्द्रियार्थविषयत्वात्, ऐसा पाठ भी है।

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नैष्कर्म्यसिद्धि:

करनेमें तत्पर जो तत्वमस्यादि वाक्य हैं, इनसे पूर्वोक्त अखएड आत्मस्वरूपका ज्ञान होता है, ऐसा जो कहते हो, वह ठीक नहीं। क्योंकि ये सब वाक्य अभिधायक श्रुतिरूप हैं, विधायक श्रुतिरूप लिङ् आदि प्रत्ययोंसे युक्त नहीं हैं। लोकमें कहीं भी अभिधायक श्रुतिको, यदि मूलभूत प्रमाखन्तर न रहे, तो अमाण नहीं माना जा सकता। जैसे- नदीके तीरमें पाँच फल हैं, इस वाक्यको प्रमाख तभी माना जायगा, जत्र किसीने अन्य प्रमाणसे नदीके तीरमें पाँच फल हैं, इस बात को जानकर पीछेसे इस वाक्यका प्रयोग किया हो, नहीं तो नहीं। इसलिए अभिधायक श्रुतिका विधायक श्रुतिके साथ एकवाक्यतासे ही प्रामाख्य हो सकता है। क्योंकि विधिप्रत्ययके अर्थको प्रमाणान्तरकी अपेक्षा नहीं है। अतएव वेदान्तवाक्य भी जब विधिपरक होंगे, तभी प्रमाण हो सकते हैं, नहीं तो नहीं।" इस आक्षेपको हटानेके लिए यह कहा जाता है कि यह आत्मा वेदान्तसे इतर सम्पूर्ण प्रत्यक्षादि प्रमाणोंका विषय ही नहीं होता। जब वह इतर प्रमाणोंका विषय नहीं होता, तब विधि-प्रत्यय रहित अभिधायक श्रुतिरूप वेदान्तवाक्यका अतीन्द्रिय वस्तुका बोधन करनेमें, सुप पुरुषको जाग्रत् करनेके लिए प्रयुक्त वाक्यकी भाँति, सामर्थ्य हे और प्रामाएय भी है, इस बातको कहनेके लिए अग्रिम ग्रन्थका आरम्भ होता है- नित्यावगतिरूपत्वादन्यमानानपेक्षणात्। शब्दादिगुणहीनत्वात्संशयानवतारतः ॥।४७।। तृष्णानिष्ठीवनैर्नात्मा प्रत्यक्षादैः प्रमीयते। प्रत्यगात्मत्वहेतोश्च स्वार्थत्वादप्रेमयतः ॥। ४८ ॥ यह आत्मा प्रश्यक्षादि प्रमाणोंसे गृहीत नहीं होता। इसका कारण यह है कि ग्राहककी प्रवृत्ति होनेके अरनन्तर पुरुषको जब्र देखनेकी इच्छा होती है, तब प्रश्य- त्ादिकी प्रवृत्ति होती है। अतएव वे तृष्णाके कार्य हैं, उनसे सर्वावभासक आ्रत्मा कैसे प्रकाशित हो सकता है और जो ज्ञानरूप नहीं है उसी वस्तुको प्रकाशित होनेके लिए प्रमाखान्तरकी अरपपेक्षा होती है। आत्मा तो कूटस्थ और प्रकाशरूप है, अतएव उसको प्रमाणन्तरकी अपपेक्षा क्यों होगी? और प्रत्यगात्मरूप होनेके कारण किसीसे उसका व्यवधान भी नहीं है। स्वार्थ होनेके कारण वह अन्यसे उपभोग्य नहीं है और अविषय होनेसे प्रमेय होनेके योग्य भी नहीं है। और श्रोत्रादि-प्रवृत्तिके विषय जो शब्दादि गुण है, उनसे रहित होनेसे वह किसी प्रकार सन्देहका भी विषय नहीं होता, इसी कारख वह अनुमान आदि प्रमाणोंका विषय भी नहीं होता॥ ४७,४८ ॥ श्रुतिरपीममर्थ निर्वदति-

विपरीतमतो दृष्टया स्वतो बुद्ध न पश्यति॥४९॥

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भाषानुवादसद्विता .१०९

न्यायसिद्धमतो वक्ति दृष्टेर्द्रष्टारमात्मनः । न पश्येत्प्रत्यगात्मानं प्रमाणं श्रुतिरादरात् ।। ५० ।। श्रुति भी इसी अर्थका प्रतिपादन करती है- प्रत्यक्षादि दृष्टि दृश्य, परिच्छिन्न, जड़स्वरूप रूपादिको विषय करनेवाली है। अत-एव अदश्य, अपरिच्छिन्न, चेतन, स्वयम्प्रकाश आत्माको वह कैसे ग्रहख कर सकती है।। ४६ ॥ इसीलिए युक्तिसिद्ध इस अर्थको प्रमासभूत श्रुति बड़े आदरके साथ कहती है कि जो अनित्यभूत दृश्य-दृष्टिका भी प्रकाशक, साक्षी तथा आत्माका भी आरत्मा है उसको अनित्य दृष्टिसे जाननेका प्रयत्न न करो। ॥ ५० ॥ अनुमानाऽविषयत्वेऽन्यदपि कारणमुच्यते- प्रत्यक्षस्य पराक्त्वान्न सम्बन्धग्रहणं यतः । आत्मनोऽतोऽनुमित्यास्यानुभवो न कथश्चन ॥ ५१॥। आत्मा अनुमानका विषय नहीं होता, इस विषयमें और भी कारण बतलाते हैं- क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण जढ़ वस्तुको विषय करता है, इस कारण वह इससे विपरीत स्वयं-प्रकाश आत्माको ग्रहख नहीं कर सकता। अनुमान करनेके पूर्व, अनुमानसे जिसकी सिद्धि करनी है, उसके साथ किसी वस्तुका आयासिज्ञान आवश्यक है, वह प्रत्यक्षसे होता है। आत्मा जब प्रत्यक्षका विषय नहीं है, तब व्यासिज्ञान किस प्रकारसे होगा ? व्यापि- ज्ञान न होनेसे अनुमान भी नहीं बन सकता। इसलिए अनुमानसे आत्माका अनुभव किसी प्रकारसे भी नहीं हो सकता? ॥ ५१ ॥ एवमयं प्रमातृप्रमाणप्रमेयव्यवहारः सर्व एव पराचीनविषय एव न अतीचीनमात्मानमवगाहयितुमलम्। एवं च सत्यनेनैव यथो- क्तोर्ऽर्थोडनुमातुं शक्यत इत्याह- प्रमाणव्यवहारोऽयं सर्व एव पराग्यतः। सुविचार्याऽप्यतोऽनेन युष्मद्येव दिद्क्षते॥ ५२॥ इस प्रकार प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय इत्यादि सभी व्यवहार जड़ वस्तुको ही विषय करनेवाले हैं, प्रत्यगात्माको विषय करनेमें समर्थ नहीं हैं। इसलिए इसीसे इस बातका (उक्तविषयका) अनुमान किया जा सकता है, यह कहते हैं- क्योंकि प्रमाख श्रादि समस्त व्यवहार जड़ वस्तुको ही विषय करता है, इस कारख

१ अवसातुं शक्यते, और 'अवसितु' शक्यते, पार भी मिलता है।

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११०

अच्छी तरहसे विचार करके भी यही निश्चित होता है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणसे अनात्माका ही ग्रहण होता है। ५२॥

क्यार्थस्तस्मात्- अन्वयव्यतिरेकाभ्यां निरस्याऽडग्राणतो यतेः। वीक्षापन्नस्य कोऽस्मीति तदसीति श्रुतिर्जगौ ॥ ५३॥ ूँकि लौकिक प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे 'अहं ब्रह्माडस्मि' इत्यादि महावाक्य द्वारा प्रतिपादित अरखएड ब्रह्मज्ञान नहीं होता। अतएव-अन्वय-व्यतिरेकसे देहसे लेकर प्राखपर्यन्त सकल अनात्माओरंका निरास करके 'मैं कौन हूँ' ऐसी जिज्ञासा जिस पुरुषको हुई है, उस पुरुषको श्रुतिने उस शुद्ध स्वरूपके प्रतिपादन करनेके लिए 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्यका उपदेश दिया है॥ ५३ ॥ सोऽयमन्वयव्यतिरेकन्याय एतावानेव, यदवसानो वाक्या- र्थस्तदभिज्ञस्य 'अहं ब्रह्माऽस्मीति' आविर्भवति। द्रष्टदृश्यविभागेना- गमापायिसाक्षिविभागेन च श्रुत्यभ्युपगमतः सङ्भिप्योच्यते- दृश्यत्वाद्टव द्देहो देहवच्चेन्द्रियाएयपि। मनश्चेन्द्रियवज्ज्ञेयं मनोवन्निश्वयादिमत् ॥५४॥ पूर्वोक्त अन्वय-व्यतिरेककी सीमा यही है कि जत्र 'अहं ब्रह्मास्मि' इस वाक्यका अर्थ अ्रपसम्भावना औरर विपरीतभावनाके निराससे प्रत्यक्षरूपसे आरपरविर्भूत हो। इसी अ्रपन्वय व्यतिरेक न्यायको श्रुतिके अपनुसार द्रष्टा, दृश्य औरर उत्पत्ति विनाशवान् वस्तु एवं उसका साक्षी, इस विभागसे सं्ेपसे वर्णन करते हैं- देह दृश्य होनेके कारख घटादिके समान अनात्मा है। देहकी भाँति इन्द्रियों औरर इन्द्रियोंके तुल्य मनको भी समझना चाहिए और मनके तुल्य निश्चयादि वृत्तिवाला अन्तः- करण भी अनात्मा है, ऐसा जानना चाहिए॥। ५४॥

प्रागसद्याति पश्चात्सत् सच्च यायादसत्तथा। अनात्माभिजनं तत्स्याद्विपरीतः स्वयं दशिः ॥५५॥

१ सदसीति, ऐसा पाठ भी है। २ आगमापाय०, ऐसा भी पाठ है। ३ तस्माद्विपरीतस्त्वयं दशि:, ऐसा पाठ भी है।

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भाषानुवादसहिता १११

ऐसे ही समस्त कार्य, कारण तथा उत्पत्ति-विनाशवान् कल्पित प्रपञ्च का साच्षिरूप आरात्मा है- जो उत्पत्तिके पहले नहीं था, असद्रूप था, वही बादमें सद्रूप होता है। ऐसे ही जो वर्तमान समयमें सत् है, वही नाशके अनन्तर असत् हो जाता है। ऐसी जो जो वस्तु है वह सब अनात्मा ही है। आत्मा तो स्वप्रकाश है। अतएव अनात्माओंसे विप- रीत, कूटस्थ, नित्य है॥ ५५ ॥ तत्र घटादीनां दृश्यानामनात्मत्वं द्रष्ट्रात्मपूर्वकं प्रत्यक्षेणैव

मापायादिभिर्धमेंः शरीरेन्द्रियमनोनिश्चयादिवृत्तीरनात्मतया व्युदस्या- डहंवृत्तिमतोऽपि दृश्यत्वाविशेषाद् द्रष्टपूर्वकत्वमवसीयते। तदेतदाह- घटादि दृश्य पदार्थोंके अनात्मपनको तथा इनका द्रष्टा आत्मा इनसे पृथक है, इस बातको प्रत्यक्ष प्रमाणसे ही देखकर अरनात्माके असाधारख धमोंको निश्चय करके उन दृश्यत्व आगमापायित्व आदि धर्मोंसे शरीर, इन्द्रिय, मन और निश्चयादिवृत्तियोंको आर्प्रात्मासे पृथक समझकर, अरदङ्कारवृश्तिमान् अ्रहङ्कारके भी दृश्य होनेके कारण इसका द्रष्टा इससे त्र्परतिरिक्त कोई अन्य है, ऐसा अनुमानसे सिद्ध कर सकते हैं। वही कहते हैं- घटादयो यथा लिङ्गं स्युः परम्परयाऽहमः । दृश्यत्वादहमप्येवं लिङ्गं स्याद् द्रष्टुरात्मनः ॥ ५६ ॥ जैसे घटादि विषय हैं, इसलिए वे देहादि विशिष्ट द्रष्टाके ज्ञापक होते हैं। तथा ऐसे ही देह भी इन्द्रिय-विशिष्ट द्रष्टाका, इन्द्रियाँ भी मनोविशिष्ट द्रष्टाका, मन भी बुद्धि- विशिष्ट द्रष्टाका और बुद्धि भी अहङ्कारविशिष्ट द्रष्टाका, जैसे ज्ञापक होते हैं। ऐसे ही अहङ्कार भी दृश्य होनेके कारख स्वन्यतिरिक्त द्रष्टाका ज्ञापक है॥ ५६॥

द्यत्साक्षिकौ तेषा मागमापायौस आगमापायविभागरहित आत्मा। यथा यन्निबन्धनौ जगतः प्रकाशाऽप्रकाशौ स प्रकाशाऽप्रकाशविभागरहितः सूर्य इति। यदा चैंव तदा वाक्यावगम्यस्यार्थस्याऽनुदितानस्तमित- विज्ञानमात्रस्त्भावस्याऽनुमानेनैव प्रतिपन्नत्वात्पुनरपि वाक्यस्य निर्वि- षयत्वप्रसङ्ग: । नैप दोषः। लिङ्गव्यवधानेन तत्प्रतिपत्तेः। ननु

१ प्रत्यक्त्वेनैव, ऐसा भी पाठ मिलता है। २ आगमापायरहित:, भी पाठ है।

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११२ नैष्कर्म्य सेखि:

साक्षादपरोक्षादात्मस्वभावेनानात्मनो हानोपादानयोः सम्बन्धग्रहणा- त्कमतिशयं वाक्यं कुर्यात्। मैवं वोच :- लिङ्गाधीनत्वात्तत्प्रतिपत्तेः। न हि लिङ्गव्यवधानेनात्मप्रतिपत्तिः साक्षात्प्रतिपत्तिर्भवति 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विव्ृणुते' इति श्रुतेः। अत आह- शङ्का-द्रष्टा, दर्शन और दृश्य इन तीनोंका जाग्रत्, स्वप्न और सुपुष्टि इन अवस्थाओंमें उत्पत्ति और विनाश दीख पड़ता है। इनका यह उत्पत्ति और विनाश जिसको साक्षी मानकर होता है, वह आत्मा उत्पत्ति नाशसे रहित है। जैसे जगत्का प्रकाश और अप्रकाश जिसके द्वारा होता है वह सूर्य प्रकाश और अप्रकाश इन अव- स्थाओ से रहित, सर्वदा एकरूप है। जन ऐसी बात सिद्ध है, तब्र वेदान्त वाक्यसे जिस उत्पत्ति विनाश रहित ज्ञानमात्ररूप आर्रत्मांका रूप सम्पादन करना है, उसका बोध तो अनुमानसे ही सिद्ध हो गया। फिर वेदान्तवाक्यकी आवश्यकता न होनेसे वे अप्रमाण हो जायँगे ? समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि अनुमानसे जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह परोक्षरूपसे वस्तुका बोधक है, अपरोक्षरूपसे नहीं। अतएव प्रत्यक्षरूपसे ग्रहण होनेके लिए वाक्यकी अपेक्षा है। शङ्का-द्रष्टा, दर्शन, दृश्य इन तीनोंकी उत्पत्ति और विनाशका साक्षात प्रत्यक्ष- रूप साक्षीके साथ साक्षय-सा्िभावरूप सम्बन्ध गृहीत है। अतएव ये साक्षय हैं तो इनका कोई साक्षी भी होना चाहिए। इस प्रकार अनुमानसे भी साक्षीका प्रत्यक्षरूपसे भी ग्रहण हो सकता है, फिर प्रत्यक्ष ज्ञानके लिए वाक्य की क्या आवश्यकता है? समाधान-ऐसा मत कहिए। क्योंकि दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकमें रहनेवाला जो साधार धर्म है, उसीको अनुमानसे सिद्धि होती है, ऐसा मानना चाहिए। नहीं तो अनुमानका उच्छेद ही हो जायगा। इसलिए यह मानना पड़ेगा कि अनुमानसे आत्माकी जो प्रतीति होगी वह सामान्यरूपसे ही होगी, विशेषरूपसे नहीं। अतएव प्रत्यक्षात्मक हनेके लिए वेदान्तवाक्यकी अपेक्षा है। लिङ्गाधीन होनेवाली प्रतीति प्रत्यक्ष प्रतीति नहीं हो सकती; इसलिए श्रुति कहती है कि "यह साधक मुमुत्तु जिस निर्विशेष आरत्माको निरन्तर तन्निष्ठ होकर भजता है, उसको यह् आत्मा प्राप्त हो सकता है" इसलिए कहते हैं- लिङ्गमस्तित्वनिष्ठत्वान्न स्याद्वाक्यार्थबोधकम्। सदसद्वयु त्थिात्माऽयमतो वाक्यात्प्रतीयते ॥५७॥ अनुमानसे इतनामात्र सिद्ध हो सकता है कि कोई एक आत्मा पदार्थ है। किन्तु वह सत् है, अथवा असत् है, इत्यादि विकल्नोंसे रहित शुद्ध, बुद्ध आत्मा है; इस

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भाषानुवादसहिता ११३

प्रकार विशेषरूपसे बोध अनुमानसे नहीं होता। अतएव वेदान्तवाक्यसे ही उसका पूर्र बोध होता है॥ ५७ ॥ ननु यदि व्यावृत्तसदसद्विकल्पजालं वस्त्वभीष्ट वाक्याद् भवत- स्तथापि तूत्सार्यते वाक्यविषया तृष्णा। यस्मादन्तरेणापि वाक्यश्रवणं निरस्ताशेषविक्ल्पमागोपालाविपालपण्डितं सुषुप्ते वस्तु सिद्धमतो नार्थो वाक्यश्रवणेन? नैतदेवम्। कि कारणम्१ सर्वानर्थवीजस्यात्मानव- ोधस्य सुषुप्ते सम्भवाद। यदि हि सुषुसेऽज्ञानं नाऽभविष्यदन्तरेणापि वेदान्तवाक्यश्रवणमनननिदिध्यासनान्यहं ब्रह्माऽस्मीत्यव्यवसायात्सर्व- प्राणभृत्तामपि स्वरसत एव सुषुप्तप्रतिपत्तेः सकलसंसारोच्छित्तिप्रसङ्ग: न च कैवल्यात्पुनरुत्थानं न्याय्यमनिर्मोक्षप्रसङ्गात्। न चाऽन्य एव सुषुपोऽन्य® एवोत्थित इति शक्यं वक्तुं नाद्राक्षमहं सुषुप्तेऽन्यत्किश्िद- पीत्युत्थितस्य प्रत्यभिज्ञादर्शनात्। तस्मादवश्यं सुषुप्तेऽज्ञानमभ्युपगन्त- व्यम्। ननु यदि तत्राऽज्ञानमभविष्यद्रागद्वेषघटाज्ञानादिवत्प्रत्यक्षम- भविष्यत्। यथेह लोके घटं न जानामीत्यज्ञानमव्यवहितं प्रत्यक्षम्। अत्रोच्यते। न। अभिव्यञ्जकाभावात्। कथमभिव्यञ्जकाभाव इति चेच्छृणु- शङ्का-यदि यह आरप्रपको अभीष्ट हो कि सदसद्-विकल्पजालसे रहित शुद्ध, वुद्ध वस्तुका वेदान्तवाक्योंसे बोध होता है; तथापि हमारी श्रद्धा वेदान्तवाक्यसे हटती जाती है। क्योंकि वाक्यके बिना भी, सम्पूणं विकल्पोंसे रहित ब्रह्मका ज्ञान, परिडतोंसे लेकर गोपाल और मेषपाल पर्यन्त (ग्वालेगड़रियों तक) समीको सुषुपि दशामें होता ही है। फिर वेदान्तवाक्यकी क्या आवश्यकता है? समाधान-ऐसा कहना उचित नहीं। क्योंकि सुषुति समयमें सम्पूर्ण उपद्रवोंका मूलभूत अज्ञान बना रहता है। यदि सुषुतिमें अज्ञान न होता, तब तो वेदान्तवाक्योंके श्रवख, मनन और निदिच्यासनके बिना भी 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसे निश्चयसे समस्त प्राखियोंको स्वभावसे ही प्रतिदिन सुषुप्ति होनेके कारण सकल संसारका उच्छेद होनेसे कैवल्यकी- मोक्षकी-प्राति हो जाती और जहाँ एकबार मोक्ष हो गया फिर उसका उत्थान (जागना) नहीं हो सकता ? क्योंकि यदि कैवल्यसे भी पुनरुत्थान हो सकता तब तो फिर मोक्ष ही नहीं हो सकता। यदि कोई ऐसा कहे कि 'जिसको सुषुति हुई है, वह तो

१ सुस्ोऽन्य:, भी पाठ है। १४

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११४ नैष्कम्यसिद्धि:

मुक्त ही हुआ है जिसको प्रनोध हुआ है, वह दूसरा ही है।' सो यह भी कहना ठीक नहीं है, क्योंकि निद्रासे उठे हुए पुरुषको ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है कि मैंने सुषुपि कालमें किसी अन्य वस्तुको नहीं देखा। इसलिए शयन करनेवाला और प्रबुद्ध एक ही व्यक्ति है; ऐसा मानना चाहिए। जब ऐसा सिद्ध हुआ तब अवश्य ही सुषुप्तिमें अज्ञान भी मानना चाहिए। इसपर यदि कोई कहे कि यदि सुषुपिमें अज्ञान होता तो वह रागद्वेष और घटादि पदार्थोंके अज्ञानकी भाँति प्रत्यक्ष होता। जैसे जाग्रत्में 'मैं घटको नहीं जानता' इस प्रकार अज्ञानका प्रत्यक्ष होता है।' तो यह कहना ठोक नहीं है, क्योंकि उस समय जो अज्ञानादिकी प्रतीति नहीं होती उसमें कारण यह है कि उस समय उनका अभिव्यक्षक नहीं है। यदि कहिए कि अभिव्यक्षकका अभाव कैसे हुआ १ तो सुनिए- बाह्यां वृत्तिमनुत्पाद्य व्यक्ति: स्यान्नाऽहमो यथा। नर्तेऽन्तःकरणं तद्वत् ध्वान्तस्य व्यक्तिराञ्जसी ॥५८ ॥ जैसे बाह्य वृत्तिका उत्पादन किए बिना अहङ्कारकी अभिव्यक्ति नहीं होती, वैसे ही बिना अन्तःकरणके अज्ञानकी प्रतीति स्पष्टरूपसे नहीं हो सकती॥ ५८ ॥ कश्चिदतिक्रान्तं प्रतिस्मृत्य 'दृश्यत्वादहमप्येवं लिंद्ग स्याद्रष्ट- रात्मनः' इति निर्युक्तिकमभिहितमित्याह। कि कारणम्? अहं तज्ज्ञात्रोविंवेकाऽप्रसिद्धेः। यथेह घटदेवदत्तयोर्ग्राह्यग्राहकत्वेन स्फुटतरो विभाग: प्रसिद्धो लोके न तथेहाऽहङ्कारतज्ज्ञात्रोर्विभागोऽस्तीति। तस्मादसाध्वेतदभिहितमिति । अत्रोच्यते- दाह्यदाहकतैकत्र यथा स्याद्वह्विदारुणोः। ज्ञेयज्ञातृकतैवं स्यादहंज्ञात्रोः परस्परम्॥ ५९॥ कोई वादी पहले कही हुई बातों को भूलकर कहता है कि "इस प्रकार दृश्यत्व तुल्य होनेसे अहङ्कार भी द्रष्टा आत्माका ज्ञापक है" यह बात जो पहले कही गथी है, वह युक्तिशून्य है। कारण अहङ्कार और उसके द्रष्टा साक्षी, इन दोनोंमें भेद प्रतीत नहीं होता। जैसे इस लोकमें घटादि पदार्थोंका, जो कि दश्य हैं, उनसे उनका द्रष्टा जो देवइत्त है, इन दोनोंका परस्पर भेद प्रसिद्ध है। वैसे ही अहङ्कार और साक्षीका विवेक प्रसिद्ध नहीं है ? इसका उत्तर देते हैं- जैसे दाह्यत्व और दाहकत्व एक ही जगह, वह्नि और काठ्ठमें मालूम पड़ता है है, ऐसे हो अहङ्कार और साक्षीका परस्पर ज्ञातृशेयभाव एकत्र मालूम पड़ता है। इस कथनका तात्पर्य यह है कि यद्यपि मैं देखता हूँ, सुनता हूँ, इत्यादि प्रतीतिमें

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माषानुवादसहिता ११५

ग्राह्यत्व औरर ग्राहकत्व दोनों एकत्र हैं, ऐसा मालूम पढ़ता है। परन्तु अन्य स्थलोंमें प्रत्येकका भिन्न-भिन्न स्थलोंमें अरप्रवस्थान देख पड़ता है। जैसे आ्रत्माका अन्तःकरणके बिना भी सुषुपिमें द्रष्टत्व है। अतएव सुखदुःखादिरूप विविधज्ञान विषय ध्मोंसे युक्त अहङ्गारका घटादि जड़ पदार्थोंके सदश द्रष्टत्व नहीं हो सकता, इसलिए ग्राह्यत्व ही उसमें है जो कि ग्राहकत्व भी देख पढ़ता है। वह अहङ्कार और आत्माके परस्पराव्याससे आत्मनिष्ठ ग्राहकत्व अर्थात् द्रष्टत्व अदङ्गारमें भासमान होता है। जैसे केवल वह्निमें ही दाहकता है, परन्तु वह्निके संयोगसे काष्ठमें भी उसका व्यवहार होता है, इसलिए ग्राइक- का ज्ञापक अहङ्कार है, ऐसा कहनेमें कोई दोष नहीं है॥ ५९॥ एवं तावदविद्योत्थस्यान्तःकरणस्य बाह्यविषय निमित्तरूपाऽव-

नावबोधरूपस्याव्यवधानतया विषयभावं प्रतिपद्यत इति। तत्र तयोर्ज्ञा- त्रहन्तारूपयोरवभासकावभास्यत्वसम्बन्धव्यतिरेकेण नाऽन्यत्सम्बन्धा- न्तरमुपपद्यते। अहन्तारूपं त्वात्मसात्कृत्वाऽहंकच्चुकं परिधायोपकार्य- त्वोपकारकत्वक्षमः सन् बाह्यविषयेणोपकारिणाऽपकारिणा3 वाऽडत्मात्मीयं सम्बन्धं प्रतिपद्यते। तदभिधीयते। इस प्रकार अविद्यासे उत्पन्न अन्तःकरखका बाह्य शब्दादि विषय प्रयुक्त जो वृत्तिज्ञानरूप परिणाम है उसको जाननेके लिए 'मैं' इस प्रकार अहंवृत्ति होती है, उससे युक्त होकर वही अन्तःकरण कूटस्थ प्रत्यगात्म निमित्तक जो अरहङ्कारवृत्ति- विशिष्ट अन्तःकरणप्रतिबिम्नित चैतन्याभ्यास है उसका, अव्यवधानसे, विषय होता है। यहाँपर ज्ञाता और अहङ्ार इन दोनोंका भास्य भासक भाव सम्बन्धको छोड़कर और कोई सम्बन्ध उपपन्न नहीं होता। इसीलिए घटादिके सदृश आत्मीयरूपसे प्रतीति नहीं होती। प्रत्यगात्माने अहङ्कारात्मक अन्तःकरखको अपनेमें मिलाकर अहंरूप परिच्छेदको भी अपने ऊपर आरोपित कर लिया है, इसौ कारख वह घटाद्य पकार और अपकारका विषय होता है। इसी कारण घटादि विषयोंके साथ आत्मीयरूपसे सम्बन्धको प्राप्त होता है। इस कारण स्वस्वामिभावरूप सम्बन्धान्तर विद्यमान है, इसलिए घटा- दिमें मदीयपुद्धिविषयता है। वही कहते हैं-

१ अनवबोधरूपस्य, भी पाठ है। २ अहंकर्सृकं परिधाय, ऐसा और 'परिधायीपकार्यात्वापकार्यत्व०, ऐसा पाठ भी है। ३ बाह्यविषयोपकारिया, भी पाठ है।

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११६ नैष्कम्यसिद्धि

इदं ज्ञानं भवेज्ज्ञातुर्ममज्ञानं तथाऽहमः। अज्ञानोपाधिनेदं® स्याद्विक्रियाऽतोऽहमो मम ॥ ६० ॥ ज्ञाता साक्षीको इस प्रकारका ज्ञान साक्षात अपनेसे भास्य अहंवृत्तिविशिष्ट अन्तः- करणमें होता है। वही साक्षी अहङ्कारके साथ एकताको अध्याससे जब प्राप्त होता है, तब घटादिमें 'यह मेरा है' इस प्रकारका ज्ञान उपकार्यापकारकभावरूप सम्बन्धसे होता है। अज्ञानोपाधिक चैतन्याभ्याससे इदं इत्याकारक ज्ञान होता है, उसके बाद बाह्यउ- पकारादि सम्बन्धसे त्रहंपदार्थको 'मम' इस प्रकारका विकार होता है॥ ६० ॥ एकस्यैव ज्ञातुरन्तर्वाहिनिमित्तभेदाद्विभिन्ने Sपि विषय इदं समेति ज्ञानं द्वैरूप्यं3 जायत इत्युक्तम्। अत्रोपक्रियमाणापक्रियमाणस्यैव ज्ञातुविंषये मम प्रत्ययो भवति, विपयये चेदंप्रत्यय इति कथमवगम्यते? अवगभ्यतामन्वयव्यतिरेकाभ्याम्। तत्कथमित्याह- अनुपक्रियमाणत्वान्न ज्ञातुः स्यादहं मम। वटादिवदिदं तु स्यान्मोहमात्रव्यपाश्रयात् ॥ ६१॥ श्रन्तर्निमित्त चैतन्याभास, बाह्यनिमित्त उपकारादिं विषयज्ञान परिणामके भेदसे भिन्न-भिन्न विषय अन्तःकरण और घटादिमें 'इदम्' और 'मम' ऐसा ज्ञानद्वय होता है, ऐसा कहा गया। इसपर यह शङ्का होती है कि-"अहंकारोपा- घिक ज्ञाताको घटादिविषयमें स्वामिभाव रूप सम्बन्धसे 'मम' ऐसा ज्ञान होता है औरर अज्ञानमात्रोपाधिकका अन्तःकरखमें 'इदम्' ऐसा ज्ञान होता है, यह कैसे जाना जाता है ?" इसका समाधान यह है कि-अन्वय व्यतिरेकसे ! वह कैसे, सो बतलाते हैं- ज्ञाता साक्षी अहक्ारसे उपकृत या अपकृत नहीं होता, इसलिए अहंकार घटादि- के सदश 'मम' ऐसे ज्ञानका विषय नहीं होता। मोहमात्र ही आलम्बन जिस चिदा भास का है, उसके सम्बन्धसे 'इद' इस रूपसे अवभास्य होता है। उपकारकत्वादि शून्य अहंकारमें साक्षीका 'इद' इत्याकारक प्रत्यय देख पड़ता है, इसलिए एतादश घटादिमें . 'इदम्' इत्याकारक ज्ञान ही होगा। उपकारकत्वादि धर्म युक्तमें 'मम' ऐसा ज्ञान होगा, यह देखना चाहिए।। ६१ ।। मोहतत्कार्याश्रयत्वाज्ज्ञातृत्वविक्रिययोः पूर्वत्रेदंममज्ञानान्वयः प्रदशिंतः । अथाऽधुना तद्वयतिरेकेण व्यतिरेकप्रदर्शनार्थमाह-

१ अज्ञानोपाधिनैवं स्यात्, भी पाठ है। २ भेदाभिन्ने, भी पाठ है। ३ ज्ञानद्वैरूप्यम्, भी पाठ है।

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भाषानुवादसद्विता ११७

विक्रियाऽज्ञानशून्यत्वान्नेदं न च ममाऽडत्मनः । उत्थितस्य सतोऽज्ञानं नाऽ्हमज्ञासिंष यतः ॥ ६२ ॥ आत्मामें अज्ञानरूप उपाधिके निमित्त अहंकारसाकिता है और अज्ञानकार्य परि- खामी अ्रन्तःकरण के सम्बन्धसे परिणामित्वादि होता है। इस कारण अज्ञान और उसके कार्य अन्तःकरणादि उपाधियोंसे आरत्माको अहंकार और घटादिमें यथाक्रमसे 'इदम्' और 'मम' ऐसा ज्ञान होता है। इस प्रकार अन्वय दिखलाया। अब अज्ञान तत्कार्य- के न होनेसे पूर्वोक्त ज्ञानद्वय नहीं होता, ऐसा व्यतिरेक दिखलाने के लिए कहते हैं- सुषुति समयमें शब्दादि आकारसे परिखाम होना, इस प्रकारका विकार या अज्ञान 'नहीं है, इसलिए उस समय 'इदम्' या 'मम' इस प्रकारका ज्ञान नहीं होता, क्योंकि उत्थित होनेपर मैं अब तक कुछ नहीं जानता था, ऐसी स्मृति होती है ॥ ६२ ॥ आत्मानात्मविवेकस्येय त्ताप्रदर्शनार्थमाह- वाक्यप्रत्यक्षमानाभ्यामियानर्थः प्रतीयते। अनर्थकृत्तमोहानिर्वाक्यादेव सदात्मनः ॥६३।।

आत्मा और अनात्माके विबेककी अवधि दिखानेके लिए कहते हैं- 'त्वम्' पदार्थ शोधक वाक्य और अन्वयव्यतिरेकसे उत्पन्न आत्मानात्मविवेका- नुभव रूप प्रत्यक्ष, इन दो प्रमाणोंसे सम्पूर्ण अनात्मासे पृथक् शुद्ध आत्माका अनुभव होता है। तब 'तत्वमसि' इत्यादि वाक्योंकी कोई आवश्यकता ही नहीं है, ऐसी शङ्का मत कीजिए ? क्योंकि समस्त अनर्थके मूलभूत आत्माके अज्ञानकी निवृत्ति सदा महावाक्यसे ही होती है। दूसरे प्रमाणोंसे नहीं सकती ॥ ६३ ॥ द्वितीयाध्यायादौ श्रोतृचतुष्टयमुपन्यस्तम्। तत्र कृत्स्नानात्म- निवृत्तौ सत्यां यः प्रत्यगात्मन्यवाक्यार्थतां प्रतिपद्यते, सः क्षपिताशेषा- न्तरायहेतुरिति न तं प्रति वक्तव्यं किश्चिदप्यवशिष्यते। योऽपि वाक्यश्रवणमात्रादेव प्रतिपद्यते तस्याऽप्यतीन्द्रियशक्तिमत्वान्न किश्चि- दप्यपेक्षितव्यमस्ति। यश्च श्राविततत्त्वमस्यादिवाक्यः स्वयमेवाऽन्वय- व्यतिरेकौ कृत्वा तदवसान एव वाक्यार्थ प्रतिपद्यतेऽसावपि यथार्थ प्रतिपन्न इति पूर्ववदेवोपेक्षितव्यः। यः पुनरन्वयव्यतिरेकौ कारयित्वा- डपि पुनः पुनर्वक्यं श्राव्यते यथाभूतार्थप्रतिपत्तये तस्य कृतान्वयव्यति- रेकस्य सतः कथ वाक्यं श्राव्यत इति। उच्यते-

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११८ नैष्कम्यसिद्धि:

नवसङ््याहृतज्ञानो दशमो विभ्रमाद्यथा। न वेत्ति दशमोऽस्मीति वीक्षमाणोऽपि तान्नव ।। ६४।। द्वितीयाध्यायके प्रारम्भमें चार प्रकारके श्रोताओरंका वर्णन किया गया। उनमें जिसको सम्पूर्ण अनात्माकी निवृत्ति होकरं स्वस्वरूप शुद्ध ब्रह्मका साक्षात्कार हुआ है वह तो सम्पूर्ण प्रतिबन्धकोंकी निवृत्ति होनेसे शुःध हुआ ही है। इसलिए उनके विषय- में कुछ वक्तव्य अवशिष्ट नहीं है और जो कि वाक्य श्रवण मात्रसे ही स्वस्वरूपको जान सकता है, उसको अतीन्द्रियपदार्थोंके समझनेकी शक्ति स्वतः ही है, इसलिए उसको भी कुछ कहना अवशिष्ट नहीं है। ऐसे ही जिसने आचार्यके मुखसे 'तत्त्रमस' इत्यादि वाक्योंका अच्छी तरहसे अर्थ श्रवण करके स्वयमेव अन्वय व्यतिरेक पूर्वक यथोचित मनन करके अन्तमें साक्षात्कारको प्राप्त किया है वह भी ठीक ही समझा है, इसलिए पूर्ववत् उपेक्षीय है। परन्तु जिसको अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा पुनः पुनः ज्ञान कराकर, यथार्थ ज्ञान होने के लिए, वाक्यका श्रवण कराया जाता है, उस पुरुषको अन्वय-व्यतिरेकके अनन्तर किस चालसे वाक्यका श्रवण कराया जाता है, यह कहते है- जैसे [ दस आदमी किसी कामके लिए इकट्े होकर ग्रामसे अररायमें गये। वहाँसे लौटनेपर विचार करने लगे कि हमलोग जितने गये थे, सब् आये कि नहीं ? तब उस समय ] गखना करनेमें प्रवृत्त हुआ पुरुष अपनेसे अतिरिक्त नौ आदमियोंको देखता हुआ भी नवसङ्गयासे भ्रान्तिमें पड़कर 'दसवाँ तू है ?' इस वाक्यके श्रवणके बिना अप- नेको 'मैं दशम हूँ' ऐसा नहीं जानता ॥ ६४ ॥ अथ दृष्टान्तगतमर्थ दार्ष्टान्तिकार्थे समर्पयिष्यन्नाह- अपविद्धद्वयोऽप्येवं तत्वमस्यादिना विना। वेत्ति नैकलमात्मानं नाऽन्वेष्यं चाऽत्र कारणम् ॥ ६५। दष्टान्त के प्रतिपादनसे सिद्ध अर्थको दार्ष्टान्तिकमें समर्पित करते हुये कहते हैं- ऐसे ही संसारी पुरुष वस्तुतः शुद्ध बुद्ध ब्रह्मरूप होनेपर भी अज्ञानसे अपने स्वरूप को भूल कर बिना 'तत्वमसि' इस वाक्यके श्रवण किये 'मैं वही परब्रह्म हूँ' ऐसा नहीं जानता। स्वयंप्रकाश आत्मामें अज्ञान कहाँसे आया, ऐसी शङ्का मत कीजिये? क्योंकि वह अनिर्वचनीय है। इसलिए उसके कारखके अन्वेषणमें मत लगिये!॥ ६५ ॥ नाऽन्वेष्यं चात्रकारणमित्युक्तं तत्कस्मादिति चोदिते- -

प्रत्याह। अन्वेषणाऽसहिष्णुत्वात्। तत्कथमित्याह- सेयं भ्रान्तिर्निरालम्बा सर्वन्यायविरोधिनी। सहते न विचारं सा तमो यद्वद् दिवाकरम्॥ ६६॥

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भाषानुवादसहिता ११९

'इसमें कारखका अन्वेषख मत करो।' ऐसा कहा गया। इसपर यदि कोई प्रश्न करे कि क्यों नहीं करें ? तो इसका उत्तर यह है कि वह अज्ञान (भ्रान्ति) अन्वे- षणको सहन नहीं कर सकता। सो कैसे? यह बतलाते हैं- जो यह आत्मस्वरूपकी विस्मृतिसे विपरीत भ्रान्ति हुई है, वह लोकसिद्ध पदा- थोंके सदश कारणवाली नहीं है। अतएव उचित आलम्बनसे रहित है। समस्त युक्तियोंसे विरुद्ध है। इसलिए जैसे अन्धकार सूर्यको नहीं सह सकता, उसी प्रकार यह भी विचारको सहन नहीं कर सकती[अर्थात् विचार करनेपर वह एकदम ही निवृत्त हो जाती है। ] ॥ ६६ ।। तस्याः खल्वस्या अविद्याया भ्रान्तेः सम्यग्ज्ञानोत्पत्तिद्वारेण निवृत्तिः। बुभुत्सोच्छेदिनी चाऽस्य सदसीत्यादिना दृढम्। प्रतीचि प्रतिपत्तिः स्यान्नासौ मानान्तराद् भवेत् ॥ ६७ ॥ पूर्वोक्त इस अविद्यारूप भ्रान्तिकी निवृत्ति तत्वज्ञानका उदय होने से ही होती है, अन्य किसी साधनसे नहीं। और सर्वविध संशयोंको दूर करनेवाला-'तू वही है' इस प्रकारका दृढ़ तत्वज्ञान 'तत्वमसि' इत्यादि वेदान्तवाक्योंसे ही हो सकता है, प्रमाणन्तरसे नहीं ॥६७ ॥ कथ पुनर्वाक्य प्रतिपादयत्येवेति चेत्, दृष्टान्तोक्ति :- जिज्ञासोर्दशमं यद्वन्नवातिक्रम्य ताम्यतः। त्वमेव दशमोऽसीति कुर्यादेवं प्रमां वचः ॥ ६८॥ जो ज्ञान प्रमाणन्तरसे नहीं हो सकता, उसको वाक्य कैसे उत्पन्न कर सकता है, ऐसा यदि कहो तो, इसमें दृष्टान्त देते हैं- जैसे, नौ आदमियोंसे अरतिरिक्त दशवेंको ढूँढनेमें परेशान हुए पुरुषको 'दसवाँ तू है' यह वाक्य यथार्थ ज्ञानका उत्पन्न करदेता है, वैसे ही 'त्त्वमसि' इन्यादि वाक्य जिज्ञासुपुरुषको यथार्थ ज्ञान करा देता है। ॥६८ ॥ साच तत्त्वमस्यादिवाक्यश्रवणजा प्रमोत्पन्नत्वादेव। न च नैवमिति प्रत्ययान्तरं जायते। तदेतद् दृष्टान्तेन प्रतिपादयति- दशमोऽनीति वाक्योत्था न धीरस्य विहन्यते। आदिमध्यावसानेषु न नवस्वस्य संशयः ॥ ६९ ॥ १ डडा, ऐसा पाठ भी है।

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एवं ततच्वमसीत्यस्माद् द्वैतनुत्प्रत्यगात्मनि। सम्यग्ज्ञातत्वमर्थस्य जायेतैव प्रमा दृढा॥ ७० ॥

'तत्वमसि' इस्यादि वेदान्तवाक्यके श्रवणसे होनेवाला ज्ञान यथार्थ ही है। क्योंकि वह समस्त हू तप्रत्ययों को बाधित करके उत्पन्न हुआ है और उसके उदय होने के अनन्तरं उसका बाधक ज्ञानान्तर (दूसरा ज्ञान) उत्तन्न होता हुआ नहीं दिखाई पड़ता। इसी बातका दष्टान्त द्वारा प्रतिपादन करते हैं- 'मैं दशम हूँ' इस ज्ञानके उत्पन्न होनेके पूर्व, अथवा उस समयमें, या उत्तर- कालमें गना करनेवाले पुरुषको, नौ आदमियों के विषयमें संशय न होनेसे 'दशम तू है' इस वाक्यसे 'मैं दशम हूँ !' इस प्रकारका ज्ञान जैसे दृढ़ हो जाता है। वैसे ही जिस पुरुषकों 'त्वम्' पदार्थका ज्ञान भली प्रकारसे हुआ है, उसको 'तत्वमसि' इत्यादि वाक्यसे, समस्त दैतको वाधित करनेवाला, प्रत्यगात्माका यथार्थज्ञान दढ़ होता ही है॥ ६६ ७० ॥।

प्रत्यागात्मनि प्रमोपजायत इत्युक्तम्। तत्र चोदते। किं यथा घटादिप्रमेयविषया प्रमा कर्त्रादिकारकमेदाऽनपह्ववेन जायते तथैंव उताऽशेषकार कग्रामोपमर्देन कर्तुः प्रत्यगात्मनीति, उच्यते- प्रत्यक्ताऽस्य स्वतोरूपं निप्क्रियाकारकाफलम्। अद्वितीयं तदिद्वा धीः प्रत्यगात्मेव लक्ष्यते॥ ७१ ॥ प्रत्यगात्माका यथार्थज्ञान होता है, यह बात कही गई। इसपर ऐसी शङ्का होती है कि जैसे घटादि पदार्थोंका यथार्थ ज्ञान कर्त्ता, करणा, कर्म इत्यादि पदार्थोंके भेदको बाधित न करता हुआ उत्पन्न होता है। आत्मज्ञान भी वैसे ही उत्पन्न होता है अथवा सम्पूर्रं द्व तको वाधित करके उत्पन्न होता है? इसका उत्तर देते हैं- इस आत्माका जो प्रत्यक्त्व अर्थात् चैतन्य सर्वान्तर-स्वरूप है, वही निष्क्रिय, अकारक और अफल, अद्वितीय आत्माका वास्तविक स्वरूप है। इससे इतर जो है, वह सब अविद्यासे आरोपित है। जत्र आत्माका वास्तबमें ऐसा स्वरून है, तब्र उसका जो ज्ञान है वह भी आत्मस्वरूपसे व्यास होकर वैसा ही होता है, अर्थात् आ्रत्मज्ञान समस्त प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय, प्रमा, इत्यादि द्वत प्रपञ्चका नाश करके ही उदय होता है।। ७१ ॥

१ जायते वे प्रमा डढ़ा, ऐसा पाठ भी है।

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भाषानुवादलडिता १२१

यस्मादेवम्- विपश्चितोऽप्यतस्तस्यामात्मभावं वितन्वते। दवीय:स्विन्द्रियार्थेषु क्षीयते हयुत्तरोत्तरम् ॥ ७२॥। जन कि ऐसा है अर्थात् चिदाभास द्वारा चैतन्यके साथ तादात्म्य होनेसे हो बुद्ध्यादिमें प्रत्यक्त्व है, स्वाभाविक नहीं। इसी कारण विद्वान् लोग भी व्यवहार कालमें उसी बुद्घिमें आत्मत्वकी भ्रान्तिमें पढ़ते हैं.। इसीसे बुद्धिमें चैतन्याभासा- नुविद्धत्व है, यह प्रतीत होता है और बुद्धिसे दूर रहनेवाले शरीरादि बाह्म पदार्थोंमें उत्तरोत्तर आ्र्प्रात्मभ्रान्तिकी विरलता देख पड़ती है। [इसलिए भी नुद्धिमें चैतन्याभास अनुविद्ध है, यह जाना जाता है। ] आह। यदि वाक्यमेव यथाभूतार्थावबोधकमथ कस्य हेतो- रविद्योत्थापितस्य कर्तत्वादेरुपदेश इत्युक्ते प्रतिविधीयते- भ्रान्तिप्रसिद्धयाऽनूद्यार्थ तत्तत्वं भ्रान्तिबाधया। अयं नेत्युपदिश्येत तथैवं तत्वमित्यपि॥७३॥ इसपर कोई शङ्का करता है कि यदि 'तत्वमसि' इत्यादि वाक्य ही आंत्माके यथार्थ स्वरूपको बोधन करता है, तो फिर श्रति किस कारणसे अरविद्या-प्रयुक्त कतृत्वादि- धर्मोंका उपदेश करती है? इसका उत्तर देते हैं- यह क्या स्थाणु है, कि वा पुरुष है, इस प्रकारका सन्देह, अथवा यह पुरुष ही है, ऐसा विपरीत : निश्चय जिस विषयमें हुआरप्र है, वहाँपर भ्रान्तियुक्त पुरुष-प्रसिद्घिका अनुवाद करके 'जो यह पुरुष देख पड़ता है, वह स्थाणु है, पुरुष नहीं।' इस प्रकार आरोपित पुरुषाकारको बाध करके पुरोवर्ती वस्तुके स्वरूपका जैसे उपदेश दिया जाता है। वैसे ही अविद्यासे आरोपित कर्तृत्व, भोक्तत्वादिका अनुवाद करके, उस आारोपित रूपका बाध करके जीवका, यथार्थ स्वरूप बोधन किया जाता है॥ ७३॥ इममर्थ दृष्टान्तेन बुद्धावारोपयति- स्थाणुः स्थाणुरितीवोक्तिर्न नृबुद्धि निरस्यति । अनुवादात्तथैवोक्तिभ्रान्तिं पुंसो न बाधते।। ७४॥ इसी बातको व्यतिरेक दष्टान्तसे बुद्धिमें आरूढ़ कराते हैं- जैसे आरोपित पुरुषाकारका अनुवाद न करनेसे विरोध प्रतीत न होने के कारण

१ दवीयसेन्द्रि०, ऐसा पांठ भी है। २ यथैवं, ऐसा पाठ भी है। १६

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नैष्कम्यसिद्धि:

'यह स्थाणु है' 'स्थाणु है' केवल ऐसी उक्ति पुरुष बुद्धिको नहीं निवृत्त कर सकती। वैसे ही 'वह तू है' केवल इतना ही कहनेपर, यदि विरुद्धाकारका अनुवाद न किया जाय तो, संसारित्वका निराकरण भी स्पष्ट नहीं होगा ॥। ७४॥ यस्माच्छोतृ प्रसिद्धानुवाद्येव त्वमिति पदं तस्मादुद्दिश्यमान- स्थत्वात् दुःखित्वादेरविवक्षितत्वमेत्र। विधीयमानत्वे हि सति विरोध- प्रसङ्गो न तु विधीयमानानूद्यमानयोरिति। स्वप्रधानयोर्हि पद्योर्विरोधा- शंङ्कासामान्यालिङ्गितत्वात्तयोर्न विपर्यये। अनालिङ्गितसामान्यौ न जिहासितवादिनौ। व्युत्थितौ तत्वमौ तस्मादन्योन्याभिसमीक्षणौ'।७५॥ [यदि कोई ऐसी शङ्का करे कि 'संसार जिसमें प्रत्यक्षसे अरनुभूयमान है उस जीवकी असंसारी ब्रह्मके साथ एकता कैसे होगी ?' तो उसका यह उत्तर है कि ब्रह्मरूपता विधान करनेके लिए केवल 'त्वम्' पदार्थका अनुवादमात्र कर रहे हैं, विधान नहीं करते।] चूँकि विधान नहीं है, केवल श्रोतृप्रसिद्धिका अनुवाद ही त्वं पदसे किया है, इस कारण उद्दिश्यमान त्वम् पदार्थमें रहनेवाला दुःखित्वादिरूप संसार विवच्तित नहीं है। यदि वह विधीयमान होता, तब विरोध प्रसङ्ग होता। विधीयमान और अनूदमानका तो कोई. विरोध नहीं है। यदि दोनों पद स्वप्रधान हों तब विरोधकी शङ्का होती है। क्योंकि जैसे गौ अश्व है, इत्यादि प्रयोगोंमें गोपद-वाच्य तथा अ्श्वपद-वाच्य गोत्व एवं अश्वन्व सामान्यका परित्याग न होनेसे दोनों पदोंका एकार्थत्ोधकत्वरूप सामान्या- घिकरण विरुद्धं होता है। दोनों ही अपने-अपने सामान्य धर्मोंसे युक्त हैं। जहाँ इसका वैपरीत्य है अर्थात् एक अप्रधान (अङ्गरूप) और दूसरा प्रधानरूप (अङ्गी) है, वहाँ विरोध नहीं होता, इसी बातको कहते हैं- जिन्होंने सामान्य अर्थात् दुःखित्व, अदुःखित्व, परोक्षत्व, अपरोक्षत्वरूप धर्मोंका परिस्यांग किया है अर्थात् जिनमें ये अविवत्तित हैं, उन 'तत् त्वम्' पदार्थोंका कोई विरोध नहीं है। वे दोनों पद अखएड अद्वितीय वाक्यारथमें तात्पर्य होनेके कारण जिहासित अर्थात् परित्याग करनेके लिए इष्ट जो परोक्षत्व, सद्वितीयत्व और परिच्छिन- स्वादि हैं उनका बोध नहीं करते। क्योंकि वे परस्परंके अनुरोधसे अपने अपने वाच्यार्थ- सामान्यरूपसे व्युस्थित हैं अर्थात् परस्पर विरुद्ध अ्रंशको परित्याग करके शररविरुद्ध अर्पंश- मात्रमें व्यवस्थित हैं। अतएव कोई विरोध नहीं है॥ ७५॥

१ अन्योन्याभिसमीत्षणात्। ऐसा पाठ भी है।

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भाषानुवादसहिता अपास्तसामान्यार्थत्वादनुवादस्थत्वाद्विधीयमानेन च सह विरोधाद्दुःखित्वादेरस्तु कामं जिहासितार्थयोरसंसर्गो यथोपन्यस्त- दोषविरहात्त्त्वमर्थयोः संसर्गोऽस्तु नीलोत्पलवदिति चेननैवमप्युपपद्यते। तस्मात्- तदर्थयोस्तु निष्ठात्माद्वयपारोक्ष्यवर्जितः नाऽद्वितीयं विनाऽडत्मानं नात्मा नित्य दृशा विना।७६।। शङ्का-परोक्षस्वर, सद्वितीयत्वरूप वाच्यार्थ सामान्य है, इस कारण परित्यक्त है और दुःखित्वादि अनूद्यमान त्वंपदार्थ में रहनेवाला है एवं विधीयमान तत् पदार्थके साथ विरुदध है। इसलिए दोनों वाच्यार्थोंका सम्बन्ध न होनेपर भी 'नील-कमलके समान' दोनों लक्ष्यार्थोंका परस्पर सम्बन्ध ही वाक्यार्थ क्यों नहीं होता ? समाधान-यह भी उपपन्न (युक्त) नहीं। क्योंकि, जो तत्पदार्थ और स्वम्पदार्थ लक्षणभूत हैं, उनका पर्यवसानत्वरूप जो आरत्मा है वह द्वत तथा परोक्षतासे रहित, केवल अखएडस्वरूप है। तब् नील और उत्पलके सदश भेद प्रतीत न होनेपर 'संसर्ग' वाक्यार्थ कैसे हो सकता है। अद्वितीय तत्पदलक्ष्य ब्रह्म प्रत्यगात्माके बिना स्वरूपको प्राप्त नहीं होता। वैसा होनेसे अद्वितीय ही नहीं होगा। ऐसे ही स्वंपदलच्य आश्मा भी तत्पदलक्य नित्य-सिद्ध वैतन्यज्योतिके बिना स्वरूनको प्राप्त नहीं होता। वैसा होनेसे नित्य अपरोक्ष चित् रूपता नहीं बनती। इस प्रकार जब भेद प्रतीत नहीं होता, अतएव तत्त्वम् पदकी अखएडार्थता है॥ ७६ ॥ अत्राऽडह। किमिह जिहासितं कि वोपादित्सितमिति! उच्यते। प्रत्यगात्मार्था' विधायिनस्त्वंपदादुभयं प्रतीयतेऽहं दुःखी प्रत्यगात्मा च। तत्र च प्रत्यगात्मनोऽहं दुःखीत्यनेनाभिसम्बन्ध आत्मयाथात्म्यानवबोध- हेतुक एव। अतोऽहमर्थोऽनर्थोपसृष्टत्वादज्ञानोत्थत्वाच्च हेय इति प्रत्य- क्षतोवसीयते। तदर्थे कि हेयं कि वोपादेयमिति नावधियते। तत इदमभिधीयते। पारोक्ष्यं यत्तदर्थे स्यात्तद्धेयमहमर्थवत्। प्रतीचेवाऽहमोडभेदः पारोक्ष्येणात्मनोऽपि मे ॥७७॥ इसपर कोई शङ्का करते हैं कि 'जब श्वमूपद शुद्ध आ्रत्माका प्रतिपादक है, तब इसमें त्यागने योग्य तथा ग्रहण करने योग्य अंश कौनसे हैं ?' इसका उत्तर देते : सर्थविधायिन:। ऐसा पाठ भी है।

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१२४ नैष्कम्यसिद्धि:

हैं कि त्वं पद केवल शुद्ध आत्माका ही प्रतिपादक नहीं है, किन्तु म्रत्यगात्मप्रतिपादक त्वं पदसे दोनों प्रतीत होते हैं-दुःखित्वादि धर्मविशिष्ट अहङ्कार और प्रत्यगात्मा। इसपर भी कोई कहता है कि-"यदि त्वं पदसे दोनोंकी प्रतीति होती है तब दोनों ही उपादेय होने चाहिए, क्यों इनमेंसे एकको उपादेय और दूसरेको हेय बतलाते हो? यदि किसीको हेय बनाना हो चाहिए, ऐसा ही आगह हो, तब आत्मांशको ही हेय और दुःख- त्वांशको ही उपादेय क्यों नहीं मानते हो ?" इसका उत्तर यह है कि शुद्ध आरत्माको दुःखित्वादि विशिष्ट अहङ्कारसे जो सम्बन्ध हुआ है वह आत्मस्वरूपके यथार्थ ज्ञान न होनेसे, केवल अज्ञानसे, ही हुआ है। अतएव अहङ्कार ही अनर्थका कारण है और अज्ञानसे उत्पन्न होनेसे असत्य भी है। इसलिए वही हेय है, ऐसा प्रत्यक्षसे जाना जाता है। किन्तु तत्पदार्थमें कौन त्ंश हेय है और कौन अंश उपादेय है, यह अभी तक नहीं जाना। इसलिए उसका निर्षय करनेके लिए यह कहते हैं- तत्पदार्थमें जो परोक्षता है वह अहक़ारकी तरह त्यागने योग्य है। क्योंकि जैसे प्रश्यगात्माके साथ अद्दद्मारका अभेद अज्ञानसे ही हुआ है, वैसे ही साक्षीस्वरूप परमात्मा का भी परोक्षताके साथ अभेद अज्ञानकृत ही है, अतएव परोक्षत्वांश हेय है॥ ७७॥ कथं पुनस्तदर्थोऽद्वितीयलक्षणः प्रत्यगात्मोपाश्रयं सद्वितीयत्वं दुःखित्वं निरन्वयमपनुदतीति ! उच्यते। न चैतयोनिंवर्तकनिवर्त्यभावं वयं ब्रूम:। कथ तहिं ? त्वमर्थे प्रत्यगात्मनि प्रागनवबुद्धाद्वितीयता साडने- नाऽवबोध्यते। अतोऽनवबोधनिरासेन तदुत्थस्य सद्वितीयत्वस्य त्वमर्थ- स्थस्य परोक्षत्वस्य च तदर्थस्थस्य निरसनान्न वैयधिकरणयादिचोदयस्या- वसरोऽस्तीति। तदिदमभिधीयते -- तत्वमर्थेन संपृक्तो नानात्वं विनिवर्तयेत्। 2नाऽपरित्यक्तपारोक्ष्यं त्वं तदर्थ सिसृप्सति॥७८॥ शङ्का-तत्पदार्थके साथ अभेद होनेसे त्वंपदार्थमें वर्तमान दुःखििस्वादि धर्म हेय हे, ऐसा आपने बतलाया। परन्तु यह ठीक नहीं है। क्योंकि, तत्पद त्वंपदार्थका वबोधक न होनेसे त्वंपदार्थमें आरोप्ति संसारका निवर्त्तक नहीं हो सकता। क्योंकि ऐसा कहीं देखनेमें नहीं आता कि शुक्तिके ज्ञानसे रज्जुमें सर्पभ्रम नष्ट हो जाता हो। औरर यदि 'तत्' पद मी 'खम्' पदार्थका अवबोधक है, ऐसा कहा जाय, तब पौनरक्तय, बुद्धि- सङ्कर, पदान्तर-वैयर्थ्य, इत्यादि दोष उपस्थित होंगे? १ संपृक्तौ, ऐसा पाठ भी है। २ नापरित्यज्य, ऐसा पाठ भी है।

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भाषानुवादसहिता १२५

समाधान-हम त्वंपद और तत्पद अथवा इनके जो अर्थ हैं, उनका साक्षात् निवर्त्यनिवर्त्तक भाव है, ऐसा नहीं कहते, किन्तु त्वंपदार्थमें तत् शब्दसे अरद्वितीय ब्रह्मरू- पता का विधान करनेसे उसका अज्ञान निवृत्त हो जाता है। इसलिए अज्ञानके निराससे अज्ञानजनित त्वंपदार्थनिष्ठ सद्वितीयत्व तथा तत्पदार्थनिंष्ठ परोक्षत्वका निरास होता है। अतएव पूर्वोक्त दोषकी आशङ्का नहीं करनी चाहिए। इन्हीं सब बातों का प्रतिपादन करते हैं- तत्पदार्थ त्वंपदार्थके साथ अभेदसे मिलनेपर त्वंपदार्थके नानात्वको निवृत्त कर देता है। ऐसे ही त्वंपदार्थ भी तत्पदार्थके परोक्षत्वरूप विरुद्ध धर्मका निवर्चन किये बिना तस्पदार्थके साथ अभिन्न नहीं होता। इसीलिए त्वंपदार्थके अभेदसे तत्पदार्थकी परोक्षता निवृत्त हो जाती है॥ ७८॥ कस्मात्पुनः कारणात्तदर्थोऽद्वितीयलक्षणस्त्वमर्थेन प्रत्यगा त्मना पृथगर्थः सन्नविद्योत्थं सद्वितीयत्वं निहन्तीति। उच्यते। विरो- धात्। तदुच्यते- संसारिताऽद्वितीयेन पारोक्ष्यं चात्मना सह। प्रासङ्गिकं विरुद्धत्वात्तत्वंभ्यां बाधनं तयोः ॥७९॥ शङ्का-'तत्त्रमंसि' आदि वाक्यका जीव-ब्रह्म के एकत्व प्रतिपादनमें ही तात्पर्य है दुःखित्वादि निवृत्तमें नहीं है। यदि दुःखित्वादि निवृत्तिमें भी तात्पर्य माना जाय, तब वाक्यमेद हो जायगा! दो तात्पर्य होनेसे वाक्यभेद दोष शास्त्रकारोंने माना है। अतएव यह जो कहते हो कि अद्वितीय तत्पदार्थ त्वंपदार्थ-प्रत्यगात्मा साक्षीसे अभेदको प्राप्त होकर अरविद्या-जनित सद्वितीयत्वका निवत्तक होता है, यह बात ठीक नहीं है? समाधान-तत्वमसि, इत्यादि वाक्यका तात्पर्य-विषय जो जीव और ब्रह्म का ऐक्य है, उसके साथ विरोध होनेके कारण दुःखित्वादिकी भी निवृत्ति हो जाती है। वही कहते हैं- अद्वितीयत्व के साथ संसारित्व विरुद्ध है तथा अपरोक्ष आत्माके साथ परोकत विरुद्ष है। इस प्रकारसे दोनोंका प्रतिपाद्य अद्वितीयत्व और प्रत्यक्त्वके साथ विरोध रहनेसे ऐक्यपरक तत्पद और त्वंपदसे दोनोंका बाध स्वभावतः हो जाता है अर्थात् अपने आप विरुद्व घर्मोंकी निवृत्ति हो जाती है॥ ७६॥ तत्त्वमर्थयोस्तु बाधकत्वेऽन्यदपि कारणमुच्यते-

१ अपृथगर्थ:, ऐसा पाठ भी है।

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१२६ नैष्करमर्यसिद्धि:

अज्ञातपुरुषार्थत्वाच्छ्ौतत्वात्त्त्वमर्थयोः स्वमर्थमपरित्यज्य बाधकौ स्तां विरुदयोः॥ ८।। संसारित्व और परोक्षत्वरूप धर्मोंका विरोध होनेके कारण यदि तत् स्वं पदार्थसे बाध होता है, फिर विरोध समान होनेसे विपरीत ही क्यों नहीं होता अर्थात् तत् खं पदार्थका ही बाध क्यों नहीं होता? इस आशङ्काको दूर करनेके लिए तत् त्वम् पदार्थ ही बाधक होते हैं, इस विषयमें और भी कारण बतलाते हैं- तत् पदार्थ और स्म् पदार्थका ऐक्य प्रमाखान्तरसे अज्ञात है तथा ज्ञात होनेसे मुक्तिरूप फलको देता है, इसलिए वह श्रुतिके तात्पयंका विषय है। परोक्षत्व्र तथा संसारित्व पूर्वोक्त प्रकारसे अज्ञात अथवा पुरुषार्थरूप नहीं है, इसलिए श्रुतिका उनके कथनमें तात्पर्य नहों है। इसीलिए त्त्वं पदार्थ ही अपना विशेषण विशेष्यभावरूप अर्थका परिश्याग न करके विरोधीभूत परोक्षत्व, दुःखित्वादिके बाधक होते हैं ॥ ८० ॥ एवं तावद्यथोपक्रान्तेन प्रक्रियावर्त्मना न प्रत्यक्षादिप्रमाणा- न्तरैर्विरोधगन्धोऽपि सम्भाव्यते। यदा पुनः सर्वप्रकारेणाऽपि यतमाना नैवेमं वाक्यार्थ सम्भावयामः प्रत्यक्षादिप्रमाणन्तरविरोधत एव। तस्मिन्नपि पक्ष उच्यते- प्रत्यक्षादिविरुद्ध चेद्वाक्यमर्थ वदेत्कचित्। स्यात्तु तद् दृष्टिविध्यर्थ योषाऽग्निवद्संशयम् ॥ ८१॥ इस प्रकार पूर्वोक प्रकियाके मार्गेसे प्रत्यक्षादि प्रमखान्तरसे विरोधका लेश भी सम्भावित नहीं होता। यदि प्रत्यक्षादि प्रमाखान्तरसे विरोध है, ऐसा ही मान कर सब प्रकारसे यत करनेपर भी अखएड वाक्यार्थकी सम्भवना नहीं ही हो सकती, ऐसा ही आापका हठ हो तो उस प्रक्षमें भी कोई क्षति नहीं है। यह कहते है- यदि वाक्य कहींपर प्रत्यक्तादि विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करे, तब वह वाक्य निःसंशय उपासना विधानार्थ होगा। जैसे कि-'स्त्री अग्नि है' यह वाक्य स्रांमें अग्रि- बुद्धिका विधान करनेके लिए है। क्योंकि यह वाक्य प्रश्यक्षादि प्रमाणोंसे विरुद्ध है। ऐसा प्रकृतमें मान लेनेसे 'तत्त्वमसि' इश्यादि वाक्यकी वस्तुनिष्ठताका परित्याग करके दृष्टिके विधानके लिए यह वाक्य है, ऐसा मानना पड़ेगा ॥ ८१ ॥ यदा तु तत्त्वमस्यादिवाक्यं सर्वप्रकारेणापि विचार्यमाणं न क्रियां कटाक्षेणाऽपि वीक्षते, तदा प्रसङ्गयानादिव्यापारो दुःसम्भाव्य इति। तदुच्यते- १ बाघकौ एसः, पेसा पाठ भी है।

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भाषानुचाइसहिता १२७

वस्त्वेकनिष्ठ वाक्यं चेन्न तस्य स्यात्क्रियार्थता। वस्तुनो ह्येकरूपत्वाद्विकल्पस्याप्यसम्भवः ॥८२॥ जत्र कि उपक्रम, उपसंहारादि षडविध तालर्यं-निर्णायक लिङ्गसे विचार करके प्रयत्नसे देखनेपर भी तत्वमस्यादि वाक्य क्रियापर है, ऐसी सम्भावना तक नहीं होती, तब यह वाक्य उपासना-विधिपरक है, यह कहना अत्यन्त असम्भावित है, वही कहते हैं- वाक्य यदि केवल वस्तुपरक है, तत्र वस्तु, जो जीव-ब्रह्मका ऐस्य है, वह कूटस्थ होनेसे क्रियासाध्य नहीं हो सकता। क्योंकि कूटस्थ होनेसे ही वह नित्यसिद्ध है। औरर वह उपासनादि क्रियासाव्य है, ऐसा विकल्प भी नहीं हो सकता। अतएव यह वाक्य प्रसङ्गयानका अर्थात् उपासनाका विधायक नहीं है॥ द२ ॥ भिन्नविषयत्वाच्च न प्रमाणान्तरविरोधः। कथम्। उच्यते- अपूर्वाधिगमं कुर्वत् अ्रमाणं स्यान्न चेन्न तत्। न विरोधस्ततो युक्तो विभिन्नार्थावबोधिनोः ॥८३॥ [प्रमाखन्तरके साथ विरोध है, ऐसा मान लेनेपर भी उसका परिहार कहा, अरपरब यह कहते हैं कि-] दोनोंका (वाक्य और प्रत्यक्षका) विषय भिन्न-भिन्न है, इस- लिए भी प्रमाखान्तरके साथ विरोध नहीं है। क्यों नहीं है? यह बतलाते हैं- अरन्य प्रमाणसे अरज्ञात अर्थको कहनेवांला ही प्रमाण प्रमाण मीना जाता है। यदि प्रमाण अज्ञात अर्थका बोध न करके ज्ञात अर्थका ही बोध करे तब वद अनुवादककी तरह प्रमाख नहीं हो सकेगा। इसलिए प्रश्यक्ष और वाक्य इन दोनों प्रमायोंका विषय परस्पर भिन्न ही है, ऐसा मानना चाहिए। तब भिन्न-भिन्न अथोंका बोध करानेवालोंका परस्पर विरोध कैसे होगा? अर्थात् विरोध नहीं हो सकता । ८३॥ य एवमपि भिन्नविषयाणां विरोधं वक्ति सोऽत्रापि विरोधं ब्रूयात्- नाडयं शब्द: कुतो यस्मादूपं पश्यामि चक्षुषा। इति यद्वत्तथैवाऽयं विरोधोऽक्षजवाक्ययोः ॥८४॥ जो इस प्रकार भी (इतना समझनेपर भी) मिन्न-विषयवाले प्रत्यक्ष औरर वाक्य इन दोनोंका परस्पर विरोध है, ऐसा कहता है वह वादी तो ऐसे स्थलों में भी विरोध कह सकता है, जैसे कि-'यह शब्द नहीं है। क्योंकि मैं चच्तुसे रूपको देखता हूँ' अर्थात् ऐसे स्थलमें रूप-ग्राहक चन्तु एवं शब्द-ग्राहक श्रोत्रमें जैसे विरोध नहीं हो सकता। ऐसे ही प्रकृत स्थलमें भी विरोध नहीं है॥ ८४॥

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१२८ नैष्कमर्यसिरि

प्रामाणानां सतां न विरोधः श्रोत्रादीनामिव भिन्नविषयत्वात्। ययोश्चाऽभिन्नविषयत्वं तयोराखुनकुलयोरिव प्रतिनियत एव वाध्य- वाधकभावः स्तात्। अतस्तदुच्यते- प्रत्यक्ष चेन्न शाब्दं स्याच्छाब्दं चेदक्षजं कथम्। प्रत्यक्षाभासः प्रत्यक्षे ह्यागमाभास आगमे॥ ८५॥ शङ्का-कहीं प्रत्यक्ष अनुमानसे बाधित होता है। जैसे-'सैत्रेयं ज्वाला' यहाँपर ज्वालाका ऐक्य प्रत्यक्ष अनुमानसे बाघित होता है। ऐसे ही 'न हिंस्यात्सर्वा भूतानि' यह वाक्य 'अरश्नीषोमीयं पशुमालमेत' इस वाक्यसे बाधित होता है। तब प्रमाणोंका विरोध नहीं है, यह बांत कैसे कह सकते हैं ! समाधान-जहाँ दोनों प्रमाख एक ही विषयमें भिन्नरूपताका बोध कराते हैं, वहाँपर उनका बाध्य-ब्ाधकभाव होनेपर भी दोनों प्रमाण नहीं, किन्तु एक ही प्रमाण है। जो बाधित हुआ है वह अप्रमा है। जहाँ दोनों प्रमाख हैं वहाँ उनका विरोध ही नहीं है। क्योंकि श्रोत्रादिके समान दोनोंके विषय ही भिन्न हैं। और जहाँ दोनोंका विषय एक है वहाँ चूहा और नकुलके समान बाध्य-बाधक भाव व्यवस्थित है, विपरीत "नहीं होता। यह कहते हैं- जो वस्तुतः प्रत्यक्ष प्रमाणसे सिद्ध है, वह शन्द प्रमाणसे बाधित भी नहीं होगा किंवा बोघित भी नहीं होगा। इसलिए वह शब्द-प्रमाणक नहीं है। जो शब्दप्रमाखक है वह प्रत्यक्षसे बाघित भी नहीं होता किंवा बोधित भी नहीं होता। इसलिए प्रमाखोंका कोई विरोध नहीं है। जिनमें बाध्य-चाधकभाव रहता है, उन दोनोंमें एक ही प्रमाण है, दूसरा अप्रमाण है। जैसे-'यह शुक्ति है, ऐसा प्रत्यक्ष प्रमाण मानन पर 'यह रजत है' ऐसा प्रत्यक्ष ज्ञान अप्रमा होता है। ऐसे ही एक विषयमें शब्द प्रमाण मान लिया गया तो वहाँ उसका विरोधी दूसरा शब्द प्रमाणभास हो जाता है। इस प्रकारसे आरगम और प्रत्यक्ष तथा प्रत्यक्ष और अनुमानका बाध्य-बाघकभाव प्रसिद्ध है, अन्य प्रकारसे नहीं ॥ द५ ॥ न च प्रतिज्ञाहेतुद्ृष्टान्तन्याय इह सम्भवति शब्दादीनां प्रत्येकं प्रमाणात्वात्। अत आह- स्वमहिस्रा प्रमाणानि कुर्वन्त्यर्थ्रावबोधनम्। इतरेतरसाचिव्ये प्रामाएयं नेष्यते स्वतः ॥८६।। यदि कोई कहे कि 'जैसे प्रतिज्ञा, हेतु और दष्टान्त, ये परस्पर सापेच, रहकर ही बोध कराते हैं। वैसे ही प्रत्यक्ष और अनुमान में भी परस्परापेक्षासे ही बोधकता

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माषानुवादसहिता १२९

होनी चाहिए !' तो यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि प्रतिज्ञा आदि प्रमाणके अतयव हैं, इसलिए वहाँ परत्पर एक दूमरे की अपेक्षा रहती है। प्रत्यक्षादि तो स्वतः प्रमाण हैं, इसलिए उनहें परस्परकी अपेक्षा नहीं है। यदि उनमें परस्परकी अपेक्षासे प्रामाएय हो तब उनका स्वतःप्रामाएय नष्ट हो जायगा ॥ द६ ॥ न च सुखदुःखादिसम्वन्धोऽवगत्यात्मनः अत्यक्षादिप्रमाणै- गृंहते, येन विरोघः प्रत्यक्षादिप्रमाणरुद्धाव्यते। कथम् ! शृणु- दुःखिताऽवगतिश्चेत्स्यान्न प्रमीयेत साउडत्मवत्। कर्मएयेव ग्रमा न्याय्या न तु कर्तर्यपि क्कचित्॥८७।। [आत्माका दुःखादिके साथ सम्बन्ध प्रमाणन्तरसे गहीत होता है, यह मानकर नी उसके साथ विरोध होनेसे 'तत्वमसि' आदि वाक्यका प्रामाएय नष्ट नहीं होता, ऐसा पूर्वमें कहा गया। अब यह कहते हैं कि-] ज्ञानरूप आत्मामें सुख-दुःखादिका सम्बन्ध प्रत्यक्षादि प्रमाणासे गृहीत ही नहीं होता, जिससे प्रत्यक्षादिके साथ बेदान्त- वाक्यके विरोधकी शङ्का होती। यदि कहिए कि आत्मामें सुख दुःखादिका सम्बन्व प्रत्यक्षादिसे कैसे नहीं गृहीत होता ? तो सुनिए- यदि ज्ञानस्वरूप आर्त्मामें दुःखादि धर्म हैं, ऐसा मानोगे तब आत्माकी भाँति उनका भी ज्ञान नहीं होगा। क्योंकि धर्मीके ज्ञानके बरिना वर्मका ज्ञान नहीं होता, ऐसा नियम है। धर्मीरूप आत्मा प्रमाका वियष कभी भी नहीं होता। क्योंकि प्रमामत्र ही कर्म अर्थात् ज्ञानसे भिन्न विषयको ग्रहण करता है, कतृ स्वरूपको ग्रहण नहीं करता। इसलिए कर्मकर्तृ विरोध ग्रसङ्ग भी हो जायगा ॥ द७ ॥। अभ्युपगमेऽपि च प्रसङ्मयानशतेनापि नैवत्वं सम्भावितदोषा- न्मुच्यसे। अत आह- प्रमाणबद्धमूलत्वाद् दुःखित्वं केन वार्यते। अग्न्युष्णवन्निवृत्तिश्चेन्नैरात्म्यं ह्येति सौगतम् ।। ८८।। [ पहले इस बातका निरूपण किया गया कि प्रमाणोंका विषय भिन्न-भिन्न हे, एवं दुःखित्वादि, यदि आत्माके धर्म हैं तो प्रमाणगम्य भी नहीं हो सकते। इसलिए प्रमाणन्तरके साथ विरोध न होनेसे वाक्य प्रसङ्ख्यानविधिपरक नहीं है। अबर यह कहते हैं कि-] दुःादि धर्म आत्मामें प्रमाखसे जाने जाते हैं और उनके साथ विरोध होसे वाक्य भी प्रमङ्गयानविधिपरक है, ऐसा यदि मान भी लिया जाय तो भी सहसों प्रसङ्गयानेों -ध्यानों अर्थात् उपासनाओ से भी दुःखरूप संसार बन्धनसे आत्माका छुटकारा नहीं १ प्रमाणैरुद्वाव्यते, ऐसा पाठ भी है।

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१३० नैष्कम्यसिद्धिः

हो सकता। अतः ऐसा मान लेनेसे भी अनिर्मोक्ष प्रसङ्ग दोषसे आप छूट नहीं सकते हो। इसलिए कहते हैं कि- आत्मामें दुःखादिसंसार प्रमाणसे ही ज्ञात हुआ है, ऐसा मान लेनेपर दुःख आदि आत्मामें पारमार्थिक ही हैं, ऐसा कहना पड़ेगा। तब उनकी निवृत्ति किसी प्रकारसे नहीं हो सकेगी। जैसे अग्निकी उष्णता अझिके रहते किसी प्रकार भी निवृत्त नहीं हो सकती। वैसे ही दुःखादि परिखाम परिखामी पदार्थके (आत्माके) अत्यन्त निवृत्त हुए बिना तो कदापि नहीं निवृत्त हो सकेंगे। अतः परिणामी-आत्माकी-भी निवृत्ति होती है, ऐसा मानो तो आत्माकी निवृत्ति हो जानेपर बौद्धाभिमत शून्यवादका प्रसङ्ग हो जाएगा ।। दद। अथ मतम्- निराकुर्यात्प्रसङ्गयानं दुःखित्वं चेत्स्वनुष्ठितम्। प्रत्यक्षादिविरुद्धत्वात्कथमुत्पादयेत्प्रमाम् ।।८ ९ ॥ यदि ऐसा कहिए कि 'दुःखादिको आत्माके स्वरूपभूत भी मान लें तो भी उनकी निवृत्ति हो सकती है। क्योंकि ध्यान अच्छे प्रकार करनेसे वह दुःखित्वादिसे विपरीत तत्त्वज्ञानको उत्पन्न करके दुःखादिको दूर कर सकता है?' तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि प्रसङ्गयान अर्थात् चित्तकी एकाग्रतारूप ध्यान (परिगणित प्रमाणोंके मध्यमें किसी भी प्रमाणके अन्तर्गत नहीं है। फिर भी, यदि इसको प्रमाण मान भी लिया जाय तो भी वह) प्रत्यक्षादि विरोध होनेसे प्रमाका उत्पादन कैसे कर सकेगा ? ॥८६॥ ननु प्रसङ्ग्यानं नाम तच्वमस्यादिशब्दार्थान्वयव्यतिरेक- युक्तिविषयबुद्ध्याऽडम्रेडनमभिधीयते तच्चानुष्ठीयमानं प्रमिति- वद्र्धनया परिपूर्णा प्रमिरति जनयति न पुनरैका्यवर्धनयेति ।.यथाS शेषाशुचिनीडे स्त्रीकुणपे कामिनीति निर्वस्तुक: पुरुषायासमात्रजनितः प्रत्यय इति। तन। यत :- अभ्यासोपचयाद् बुद्धेर्येत्स्यादैकाय्यमेव तत्।

शङ्का-तत्वमस्यादि वेदान्तवाक्यसे प्रतिपाद् अर्थका पुनः पुनः ज्ञान तथा अन्वयव्यतिरेक र्यु योंका जो बार-बार ज्ञान है, उसीको 'प्रसंख्यान' कहते है। वह प्रसङ्गयान दढ़तर संस्कारो उत्पन्न करता हुआ प्रामतिको बढ़ाकर परिपूर्ण ज्ञानको उत्पन्न करता है, न कि केवल एकाग्रताको जढ़ाकर। जैसे सम्पूर्ण अपवित्रताओंकी खान

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भाषानुवादसहिता १३१

ज्ञान होता है। स्त्रीशरीरमें केवल पुरुषकी कल्पनामात्रसे आरोपित कामिनी, इस प्रकारका निस्तत्व

समाधान-ऐसा मत कहिए ? क्योंकि- अभ्यासके बढ़नेसे बुद्धिमें जो कुछ विशेषता उत्पन्न होती है, वह एकाग्रता ही है। क्योंकि प्रमाणोंका अ्रभ्यास करनेपर ही वे प्रमाए अर्थका अवबोधन नहीं करते॥ ६ ॥ अभ्यासोपचिता कृत्स्नं भावना चेन्निवर्तयेत्। नैकान्तिकी निवृत्तिः स्याद् भावनाजं हि तत्फलम्।९१। इसपर ऐसी शङ्का होती है कि "अभ्याससे उत्पन्न हुई भावना सम्पूर्ण सांसा- रिक् दुःखोंको दूर कर ब्रह्मरूपत्व प्राप्तिमें कारण है। ऐसा श्रुतिमें लिखा है कि इस लोकमें पुरुष जैसी भावना करता है, मरनेके बाद वह वैसा ही होता है।" इसका समाधान यह है कि श्रुतिमें जो लिखा है वह सत्य ही है। परन्तु वह प्राप्ति आ्रत्यन्तिक नहीं हो सकती। भावना से उत्पन्न होनेके कारख अनित्य हो जाएगी। अतएव भावनाका फल उपास्यका साक्षात्कार होना ही है, न कि ऐकान्तिक और शरत्यन्तिक दुःखकी निवृत्ति । अतएव वाक्य निरर्थक नहीं हुआ॥ ६१ ॥ अपि चाह- दुःख्यस्मीत्यपि चेद् ध्वस्ता कल्पकोद्युपबृंहिता। स्वल्पीयोऽभ्यासजा®स्थास्न्वी भावनेत्यत्र का प्रमा ।। ९२ ।। और भी इस विषयमें कहते हैं- अनादि कालसे, न जाने कितने कोटि कोटि कल्प व्यतीत हो चुके हैं तब से, प्रवृत्त हुई 'मैं सुखी हूँ', 'दुःखी हूँ' इत्यादि भावना यदि निवृत्तिको प्रात्त हो जाती है, तब फिर अल्पकालके अभ्याससे उत्पन्न हुई यह ब्रह्मभावना चिरस्थायिनी हो जाएगी, इसमें क्या प्रमाख है?॥ ६२ ॥ ननु शास्त्रात्स्थास्तुत्वं भविष्यति १ नैवम्। यथावस्थितवस्तु- याथात्म्यावबोधमात्रकारित्वाच्छास्त्रस्य। न हि पदार्थशक्त्याधानकृच्छा- स्त्रम्। प्रसिद्धं च लोके- भावनाजं फलं यत्स्याद्यच्च स्यात्कर्मणः फलम्। न तत्स्थास्न्विति मन्तव्यं द्रविडेष्विव संगतम्२।।९३।। इसपर ऐसी शङ्ा उठ सकती है कि "न स पुनरावर्तते-वह उपासक १-स्वल्पीयाभ्यासजा, ऐसा पाठ भी है। २-संगतिः, ऐसा पाठ भी मिलता है।

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१३२ नैष्कर्म्यसिद्धि:

फिर से लौटता नहीं, इत्यादि शास्त्रप्रणाखके बलसे भावनाजनित फल भी नित्य हो सकता है ?" परन्तु यह ठीक नहीं। क्योंकि-शास्त्र जैसा पदार्थ है, उसी प्रकार उसके यथार्थ स्वरूपमात्रका बोघन करा देता है, न कि किसी वस्तुनें एक नवीन तिलक्षण शक्तिको उत्पन्न कर देता है। और लोगोंनें यह बात भी प्रसिद्व है कि भावना (सगु- खोपासना) तथा कमसे जो फल उत्पन्न होता है, उसको द्रविड लोगोंकी मैत्रीके समान स्थिर नहीं मानना चाहिए।। ६३ ।। यद्यपि प्रत्यक्षादिगमाणोपात्तमात्मनो दुःखित्वं तथापि तत्व- मस्यादिवाक्योत्थप्रत्यय एव बलीयानिति निश्चयोऽव्यभिचारिप्रा- माण्यवाक्योपात्तत्वात प्रमेयस्य च स्वत एव निर्दुःखित्वसिद्धेः। प्रत्य- क्षादेस्तु सव्यभिचारित्वात् सम्भावनायाश्च पुरुषपरिकल्पनामात्रावष्ट- म्भत्वाच्चेति। निर्दुःखित्वं स्वतःसिद्ध प्रत्यक्षादेश् दुःखिता। को ह्यात्मानमनादृत्य विश्वसेद्वाह्यमानतः॥९४॥ [पहले यह कहा गया कि प्रमाणोंका परस्पर विरोध न होनेसे दुःखित्वादि प्रमा- खान्तरके योग्य नहीं हैं, इसलिए तत्त्वमस्यादि वाक्य प्रमाणन्तरके साथ विरोध न होनेसे प्रसङ्गयानपरक नहां हैं। अब यह कहते हैं कि दुःस्वित्ादिको प्रत्यक्ष प्रमाणसे सिद्ध माननेपर भी हानि नहीं, किन्तु तत्त्रमस्यादि वाक्यजन्य ज्ञान ही प्रमाणन्तरसे सिद्ध अर्थं का बाधक है-] यद्यपि आत्मामें दुःखआ्रदि प्रत्यक्षादि प्रमाणसे सिद्ध है, तथापि तत्वमस्यादि वाक्यजनित ज्ञान ही बलवान् है, ऐसा निश्चय यथार्थ है। क्योंकि वह निश्चय किसी कालमें अरप्रमाण नहीं हो सकता। क्योंकि वह वाक्यसे उत्पन्न हुआर है। और ज्ञानके विषयभूत आत्माकी निर्दुःखिरता स्वयम्प्रकाशमान होनेसे सुष्रुप्तिमें स्वतःसिद्ध है, इसलिए वह बलवान् है। और प्रत्यक्षादि प्रमाखोमें दोषोंकी सम्भावना है। इस प्रकार सम्भावित दोषसे युक्त प्रन्यक्षादि प्रमाणोंका प्रामाएय स्थिर रहता नहीं। इसीलिए प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे सिद्ध आत्मामें दुःख आदि केवल सम्भावनामात्रसे ही सिद्ध हैं, ऐसा कहना पड़ता है और सम्भावना केवल पुरुषकी कल्पनामात्रके जोरसे उत्पन्न होती है। इसलिए वास्तवमें आत्मामें दुःख आदि नहीं है, किन्तु निदुःखत्व ही स्वतःसिद्ध है। दुःख आदि प्रत्यक्षादि प्रमाण से सिद्ध हैं। जो स्वयं सिद्ध है वही वास्तव है। तब कौन पुरुष अपने आरप्रात्माका अनादर करके बाह्यप्रमाणोंके ऊपर विश्वास करेगा ? ॥ ६४ ॥ सम्बन्धार्थ एव-

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भाषानुवादसद्विता १३३

अपि प्रत्यक्षवाधेन प्रवृत्तिः प्रत्यगात्मनि। पराश्चि खानीत्येतस्माद् वचसो गम्यते श्रुतेः ॥ ९५॥ पूर्वोंक्त अर्थका ही प्रतिपादन करते हैं- प्रत्यक्षका बाध करके श्रुति प्रत्यगात्माको बोधन करती है, यह ब्रात 'पराज्चि खानि' इस्यादि श्रुतिसे स्पष्ट सिद्ध होती है। अतएव श्रुतिके सामने प्रत्यक्ष कुछ नहीं है॥९५॥ अभ्युपगम्यैवमुच्यते न तु प्रमाणं सत्प्रमाणान्तरेण विरुद्यत इत्यसकृदवोचाम। यत्राऽपि वाक्यप्रत्यक्षयोर्विरोधाशङ्का तत्राऽपि पुरुषमोहवशादेव सा जायते न तु परमार्थत इति। अत आह- प्रमां चेज्जनयेद्वाक्यं प्रत्यक्षादिविरोधिनीम्। गौणीं प्रत्यक्षतां ब्रूयान्मुख्यार्थासम्भवाद् बुधः ॥९६॥ प्रत्यक्ष प्रमाणका श्रुतिके साथ विरोध है, ऐसा मान कर उसका परिहार कहा गया। वस्तुतः यदि कोई भी प्रमाण है तो वह प्रमाखन्तरसे विरुद्ध नहीं हो सकता, इस बातको हम बारबार पहले कह चुके हैं। जहाँ भी श्रुति और प्रत्यक्ष इन दोनोंके परस्पर विरोधकी प्रतीति होती है, वहाँपर भी वह प्रतीति पुरुषोंको मोहवशसे ही भासमान होती है। वातवमें विरोधकी शङ्का नहीं है। इसलिए कहते हैं- यदि श्रुतिसे प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरुद्ध ज्ञान उत्पन्न होता है, तब विद्वान् पुरुषको कहना चाहिए कि 'मैं दुंःखी हूँ' इस प्रकार जो प्रत्यक्षज्ञांन होता है, वह गौए अर्थात् श्रन्तःकरण गत दुःखादिका ही आत्मामें प्रसिभास हो रहा है। क्योंकि स्वय- म्प्रकाश चैतन्यरूप आ्र््रत्माका दुःखादिरूप परिणाम न होने से 'मैं दुःखी हूँ' ऐसा ज्ञान यथार्थ कैसे हो सकता है ? इसीलिए जीवको ब्रह्मरूप बतलानेवाले 'तत्वमस्यादि' वाक्यसे प्रत्यक्षका कोई विरोध नहीं है॥ ६६ । तस्यार्थस्य सुखप्रतिपत्यर्थमुदाहरणम्- अग्निः सम्यगधीतेऽसौ जहासोच्चैश्र मश्चकः । यथा तद्वदहंवृत्त्या लक्ष्यतेऽनर्हयाऽपि सः ॥९७॥ 'मैं दुःखी हूँ' यह ज्ञान गौण है, इस बातको द्ृष्टान्तके द्वारा स्पष्ट करनेके लिए उदाहरख देते हैं- यह अझि अच्छी तरहसे पढ़ता है, पलङ्ग खूत जोर से हँसा, इत्यादि प्रयोगोमें जैसे अननि और पलङ्ग ये दोनों शब्द क्रमसे पढ़नेवाले विद्यार्थी और बालक या श्रन्य किसी पुरुषको लक्षखा द्वारा बोधन करते हैं। इसी प्रकार स्वयंप्रकाश चैतन्यका बोधन करनेमें असमर्थ भी यह अहंवृत्ति लक्षणाद्वारा आत्माको ज्ञापन करती है॥ ६७॥

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१३४ 0 नैष्कम्यसिद्धि:

कस्मात्पुनः कारणात्साक्षादेवात्मा नाभिधीयते किमनया कल्पनयेति तत्राह- त्वमित्येतद् विहायाऽन्यन्न वर्त्माऽडत्मावबोधने। समस्तीह त्वमर्थोऽपि गुणलेशेन वर्तते ॥ ९८॥ इसपर यदि कोई शङ्का करे कि मुख्यवृत्तिसे आरत्माकों बतलानेवाला कोई शब्द है या नहीं? यदि नहीं है, तब आत्मा लक्ष्य भी कैसे होंगा ! क्योंकि जो वाच्य होता है वही लक्ष्य भी होता है। अगर मुख्य वृत्तिसे बतलाने वाला शब्द हैं, तब उसीसे आत्माका कथन कीजिए, इस लक्षणाकी कल्पनासे क्या प्रयोजन है? इसका उत्तर देनेके लिए कहते हैं -- 'तू' 'मैं' इत्यादि शब्दोंको छोड़कर आत्माको समझानेके लिए और कोई पद हैं नहीं। वे पद भी गुणवृत्ति या लक्षणावृत्तिसे ही शरत्माके बोधक हैं, न कि मुख्यवृत्तिसे। अतएव मुख्यवृत्तिसे बोधन करनेवाला कोई पद है नहीं। तो भी, वह किसी पदका लक्ष्य नहीं है, इससे कोई दोष नहीं होता। क्योंकि वाच्यत्व लक्ष्यत्वका प्रयोजक नहीं है। मुख्यार्थके साथ सम्बन्ध होने ही से वह लक्ष्य हो जाएगा, ऐसा कहीं देखनेमें नहीं आया कि मुख्यार्थं सम्बन्ध तो है, परन्तु वाच्यत्व नहीं है, इसलिए वह लक्ष्य नहीं हुआ। शुद्ध आत्मामें जाति, गुख, क्रियादिके न रहनेसे और श्रुतिने वाच्यत्वका निषेध भी किया है इसलिए उसमें, वाच्यत्व नहीं है। तो भी वाच्यार्थ जो प्रमाता है, उसके साथ सन्बन्ध है। इसलिए 'तम्' 'अहम्' इत्यादि शब्दोंसे, गुख सम्बन्धद्वारा आत्मा लच्षित होता है ॥ ६८ ॥ कस्मात्पुनर्हेतोर्ह्यहमित्येतदपि गुणलेशेन वर्तते न पुनः साक्षा- देवेति। विधूतसर्वकल्पनाकारणस्वाभाव्यादात्मनः। अत आह- ्योम्ि धूमतुषाराभ्रमलिनानीव दुर्धिय:। कल्पयेयुस्तथा मूढा: संसारं प्रत्यगात्मनि ॥ ९९॥ यदि कोई कहे कि 'तू' 'मैं' इस्यादि शब्द यदि प्रत्यगात्माके बोधक हैं, तब क्या कारख है कि इन शब्दोंसे आत्माका साक्षात् बोध नहीं होता, किन्तु गुखबृचिसे होता है? तो इसका उत्तर यह है कि वाच्य, वाचक इत्यादि कल्पनाओंका कारण गुण, क्रिया किंवा जाति, कोई भी आस्मामें वास्तवमें नहीं है। इसी कारण साक्षात् किसी शब्दसे उसका प्रतिपादन न होकर लक्षणा आदिसे मानना पड़ता है। इसी बात को पुष्टि करनेके लिए कहते हैं-

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भाषानुवादसहिता १३५

जैसे तरविवेकी पुरुष निर्मल आकाशमें धूम, तुषार अथवा मेवमालिन्य आदिकी कल्पना करते हैं। वैसे ही मूढ़ लोग शुद्ध प्रत्यक आरत्मामें संसारकी कल्पना करते हैं ॥ ६६ ॥ ननु१ सर्वकल्पनानामप्यात्मन्यत्यन्ताऽसम्भवे समानेऽहंवृत्तौ कः पक्षपाते हेतुर्येन वृत्त्यन्तराणि विधूयाऽहंवृत्त्यैवात्मोपलक्ष्यत इति। उच्यते- चिन्निभेयमहंवृत्तिः प्रतीचीवात्मनोऽ्न्यतः । पूर्वोक्तेभ्यश्च हेतुभ्यस्तस्मादात्माऽनयोच्यते ॥ १०० ॥ वृत्तिभिर्युष्मदर्थार्भिलक्ष्यतेचेद्दशिः परः। अनात्मत्वं भवेत्तस्य वितथं च वचः श्रुतेः ॥१०१॥ शङ्का-अहंवृत्तिके सभी पदार्थ-घट, पट, शरीरादि-अघिष्ठान आ्रत्मामें कल्पित हैं। इसमें कोई विशेष तो है नहीं। फिर वृत्त्यन्तरको छोड़कर केवल तहंवृत्ति- में ही आपका क्यों इतना आग्रह है, जो कि इसी वृत्तिसे लक्षखाद्वारा आत्माकी प्रतीति होती है, ऐसा कहते हो? समाधान-अहंवृत्ति चैतन्यप्रतिब्निम्बको धारखकर बिलकुल चित्रूप हो गई है, इसीलिए आत्मासे अन्य देहादिकी अपेक्षा यह (अहंवृत्ति) प्रत्यगभूत (आन्तर) है अतएव पूर्वोक्त कारणोंसे भी इसीसे आत्माकी लक्षणा द्वारा प्रतीति होती है और घटादि वृत्ति द्वारा तथा घटादि शब्दोंसे आत्माकी प्रतीति लक्षणासे होगी, ऐसा माननेपर घटादिके समान आत्माको अनात्मरूपसे प्रतीति होने लगेगी और ब्रह्मरूपसे प्रतीति नहीं होगी। तब 'अह ब्रह्माऽस्मि' 'तत्व्रमसि' इत्यादि एकत्व-प्रतिपादक वाक्यों- का वैयर्थ्य और अप्रामाएय हो जाएगा॥ १००,१०१।। यथोक्तेन- अनेन गुणलेशेन ह्यत्यहंकर्तृकर्मया। लक्ष्यतेSसावहंवृत्त्या नाञ्जसाऽत्राभिधीयते3॥१०२॥ अतएव पूर्वोक्त-गुएलेशके सन्ब्रन्धसे अहक्कार, कर्ता (प्रमाता) उसके कर्म- देह, वटादिको अतिक्रम करके रहनेव्ाली जो कूटस्थ चैतन्यरूग अहंवृत्ति है, उसीसे १-सर्वविकल्पकल्पनानां, पाठ भी मिलता है। २-आत्मा तयोच्यते, ऐसा पाठ भी मिलता है। ३-नाअसान्नाभिधायकः, ऐसा पाठ भी मिलता है।

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१३६ नैष्कम्यसिद्धि:

आत्माका प्रतिपादन होता है, साक्षात् नहीं। क्योंकि आत्माका साक्षात् अभिधा शक्तिके द्वारा प्रतिपादन नहीं हो सकता ॥ १०२॥ नाडब्ज्रसाSत्राभिधीयते, इति को हेतुरिति चेत्? षष्टीगुणक्रियाजातिरूढयः शब्दहेतवः। नात्मन्यन्यतमोऽमीषां तेनाऽडत्मा नाभिधीयते ॥१०३।। शङ्का-साक्षात् शव्दसे आत्माका प्रतिपादन नहीं होता (किन्तु लक्षण द्वारा होता है) इसमें क्या कारण है? समाधान-लोकमें सर्वत्र शब्द किसी वस्तुमें सम्बन्ध, गुएा, क्रिया, जाति अथवा रूढि, इनमेंसे किसीके रहनेसे प्रवृत्त होता है। आत्मामें इनमें से एक भी नहीं है, क्योंकि आत्मा असङ्ग, निर्गुण, निष्क्रिय, जातिरहित और सम्बन्धसे शून्य है; इसी कारण किसी शब्दसे आत्मा साक्षात् नहीं कहा जा सकता है॥ १०३॥ यदि शब्दोऽभिधानाऽभिधेयत्वसम्बन्धाङ्गीकारेण नात्मनि वर्तते, कथ शब्दादहं ब्रह्मास्मीति सम्यग्बोधोत्पत्तिः ? उच्यते- असत्ये वर्त्मनि स्थित्वा निरुपायमुपेयते। आत्मत्वकारणाद् विद्मो® गुणवृत्या विबोधिताः॥१०४।। इसपर यह शङ्गा होती है कि यदि कोई भी शब्द वाच्य-वाचकभाव सम्बन्ध- को अङ्गीकार करके आत्मामें प्रवृत्त नहीं होता, तब फिर 'अहं व्रह्माऽस्मि' ऐसा ज्ञान वाक्यसे कैसे होगा? इसका समाधान यह है कि- आररोपित मार्गमें स्थित होकर (अर्थात् शबलात्माके वाचक शब्दादिसे ही) निरुपाय अर्थात् साक्षात् उपायरहित आत्मतत्व प्राप्त किया जाता है। जैसे शाखाग्रसे चन्द्रमांका ज्ञान या रेखाओ से सत्यवरणोंका ज्ञान होता है। और सभीका आ्त्मा स्व- प्रकाश है, इसलिए लक्षणवृत्तिसे ही उसका बोध हो जाता है॥ १०४॥ कथं पुनरभिधानमभिधेयेनाऽनभिसम्बद्रधं सदनभिधेयेऽर्थे प्रमां जनयतीति। शृणु यथाऽनभिसम्बद्धमप्यनभिधेयेऽर्थेऽविद्यानिरा- करणमुखेन बोधयतीत्याह- शयाना: प्रायशो लोके वोध्यमाना: स्वनामभिः। सहसैव प्रबुद्धयन्ते यथैवं प्रत्यगात्मनि ॥ १०५॥ उपायमात्र उपेयके साथ सत्य सम्बन्ध रहित होनेपर भी बोधक हो सके, परन्तु १- कारणात्सिद्धा, ऐसा पाठ भी मिलता है।

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भाषानुवादसहिता

शब्द अपने अर्थके साथ सम्बद्ध न हो तो वह किस प्रकारसे अनभिधेय अर्थका यथार्थज्ञान उत्पन्न करेगा ? ऐसी शङ्का यदि कोई करे तो उसका समाधान यह है कि जिस प्रकार शब्द प्रकृनमें अ्रसम्बद्ध होनेपर भी अपनभिधेय अर्थका बोधक होता है और अविद्याका निवारक भी होता है। यही बात कहते हैं-जैने निद्रित पुरुष 'हे देवदत्त उठो, जागो !' ऐसे पुकारनेपर, उस नामसे पुकार हुई है, इसलिए जाग जाता है। ऐसे हा तश्वमर्गदि वेदान्तवाक्योंसे मी अरविद्यानिद्रामें निमम पुरुष शब्दके साथ किसी प्रकारका सम्जन्ध- ज्ञान न होनेपर भी प्रबुद्ध हो जाता है॥ १०५ ॥ [ यद्यपि निद्रावस्थामें पुरुषको अपने नामका अपने साथ सम्बन्ध गृहीत नहीं है, तथापि पहले तो सम्बन्ध-ज्ञान था, उतीसे उस समय भी बोध हो जाता है, ऐेसी शङ्का यदि कोई करे, तो उसका उत्तर यह है-] न हि नाम्नाऽस्ति सम्बन्धो व्युत्थितस्य शरीरतः । तथापि बुद्धयते तेन यथैवं तत्त्वमित्यतः ॥ १०६ ॥ शरीरसे अलग हुआ अर्थात् देह इन्द्रियादिके अभिमानसे रहित-सोया हुआ पुरुष मेरा यह नाम है और नामके साथ मेरा सम्बन्ध है, ऐसा नहीं जानता। क्योंकि उस कालमें शब्दका श्रव्ण और सम्बन्वका स्मरख, दोनों नहीं हैं : यदि ये दोनों तथा शरीर-सम्बन्ध है, ऐसा मानो तब अन्योन्याश्रय दोष होगा। शरीर सम्बन्ध होनेसे प्रतिबोध और प्रतिबोध होनेसे शरीरसम्बन्ध, अथवा प्रतिबोध होनेसे श्र्ण, और श्रवण होनेसे प्रतिबोध। अतएव मानना पड़ेगा कि स्मरण हुर बिना ही नामको सुनुप्तिअवस्थामें बोधन करानेकी शक्ति है। इसलिर वाचक शब्दको वाच्य अथेमें ही सम्त्न्धज्ञानकी अपेक्षा है; लक्षपमें नहीं। क्योंकि गङ्गारब्द्रका प्रवाहमें सम्बन्ध-ज्ञान रहनेपर भी तीरमें सम्बन्धज्ञान बिना ही बोधकत्व दीख पढ़ता है। ऐसे ही अनात्म- मिश्रत शबलमें गृहीत-सम्बन्ध तत्वमस्यादि वाक्योंको लक्षणासे अखएड ब्रह्मका बोव करानेमें कोई बाधा नहीं है॥ १०६ ॥ यथा च- बोधाऽबोधौ नभोऽस्पृष्ट्वा कृष्णधीनीडगौ यथा। बाध्येतरात्मकौ स्यातां तथेहात्मनि गम्यताम्॥ १०७॥ इस पर ऐसी शङ्का होती है कि अच्छा, शब्दसे पूर्वोक्त युक्तिके अनुसार आत्मज्ञान हो, तो भी आत्मा ज्ञान और अज्ञान दोनोंका आश्रय होनेसे विकारी बन जायगा ? इस आशङ्काको द्ृष्टान्तके द्वारा दूर करते हैं- जैसे आकाश अमूर्त होनेसे नीरूप है, इस प्रकारके यथार्थज्ञान और यह

१-बुध्यते येन, ऐसा पाठ भी है।

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नैष्कर्म्यसिद्धि:

चूँकि अविद्याकी प्रतीति प्रत्यक्षरूपसे अ्रज्ञ लोगोंको हो रही है, इसी कारण अविद्याकी कल्पना की गई है। इसलिए आत्माके स्वरूपको देखकर उसके अरनुगेवसे यह सिद्ध होता है कि आत्नामें अविद्याकी सम्भावना भी किसी प्रकारसे सिद्ध नहीं हो सकती। क्योंकि, जिस त्रत्माका स्वाभाविक स्वरूप क्रिया और कारकसे रहित ज्ञान ही है। वहाँपर अविद्याकी सम्भावना भी किस कारखसे होगी ? ॥ ११२ ॥ सोऽयमेवमनुदिताऽनस्तमितावगतिमात्रशरीर आत्मापि सन्नविचारितप्रसिद्धाऽविद्यामात्रव्यवहित एवाऽतथैवेक्ष्यते यतोऽतः- अनुमानादयं भावाद्यावृत्तोऽभावमाश्रितः । ततोऽप्यस्य निवृत्तिः स्याद्वाक्यादेव बुभुत्सतः ।११३।। क्योंकि उत्पत्ति विनाश रहित ज्ञानमात्रस्वरूप होकर भी आ्र्प्रात्मा अरविवेकके चंशवर्त्ती अज्ञ जनों के कलपनामा त्रसे सिद्ध अ विद्यारूपी आरवरणसे विपरीत-सा दीख पढ़ता है। इसी काग्ख पहले आतमरूपसे गत देह इन्द्रियात्मक भावपदार्थोंसे आत्माको अनुमानकी सहायतासे पृषक समझना चाहिए कि यह आत्मा देहादिरूप नहीं है। ऐसे पृथक रूपसे ज्ञात हुआ यह आत्मा अभावरूप हुआ-सा भासमान हो रहा है। अतएव देहादिसे पृथककृत आत्मामें 'मैं कौन हूँ' ऐसी उत्कट जिज्ञासावाले पुरुषको वेदान्तवाक्यसे ही ब्रह्मरूनताकी दृढ़ प्रतीति हो जानेसे अभावसे भी व्यावृत्ति अर्थात् पार्थक्य हो जाता है। तब अविद्याकी भी निवृत्ति हो जाती है ॥ ११३॥ भाववदभावादपि निवृत्तिरनुमानादेव किमिति न भवतीति चेच्छरणु- न व्यावृत्तिर्यथा भावाद्दावेनैवाऽविशेषतः'। अभावाद्प्यभावत्वाद्2 व्यावृत्तिर्न तथेष्यते॥ ११४॥ शङ्का-देहादि मात्र पदार्थोसे व्यावृत्ति जैसे अनुमानसे सिद्ध होती है। वैसे ही अ्र्प्भावसे भी व्यावृत्ति अनुमानसे ही क्यों नहीं होती ? समांधान-सुनिए, देहेन्द्रियादि भाव पदार्थसे आरत्माकी व्यावृत्ति जैसे भावत्वके कारंख नहीं होती, कार दोनों भावरूप तुल्य हैं। किन्तु पूर्वोक्त चतुर्विध अरन्धथ व्यतिरेवरूप अ्र्प्रनुमानसे ही होती है। ऐसे ही त्रभावरूपतासे भी व्यावृत्ति श्रनुमानसे निश्चित नहीं होती, क्योंकि अभावत्व निश्चित है। इसलिए भाव और अभावसे बिलचष ब्रह्मरू पत्व प्रतिपादक वाक्यसे ही श्रभावसे व्यावृत्ति प्रतीत होती है॥ ११४ ॥ :- अवशेषतः, ऐसा भी पाठ है। २-अन्यभावत्वात्, ऐसा भी पाठ है।

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माषानुवादसद्विता १४१

यतो नाऽनुमानेन स्वाराज्येऽरभिषेक्तुं शक्यते तस्मात्- अविद्यानिद्रया' सोडयं प्रसुप्ो दुर्षिवेकया। भावाऽभावव्युदासिन्या श्रुत्येव प्रतिबोद्धयते ॥११५॥ चूँकि अनुमानके बलसे सम्पूर्ण क्रिया, कारक और फ़लसे रहित, शुद्ध ब्रह्मरूप स्वाराज्यमें अरभिषिक्त नहीं कर सकते, इसलिए- प्रमाणन्तरसे निवृत्त नहीं होनेवाली इस अरविद्यारूप निद्रामें सोया हुआ यह पुरुष भाव और अभावको दूर करनेवाली श्रुतिसे ही जगाया जाता है ॥ ११५॥ अत्राऽडह, अनुदिताऽनस्तमित विज्ञानात्ममात्रस्वरूपत्वाद् दुःसम्भाव्याडविद्येति। नैतदेवम्। कुतः ? यत आह- कुतोऽविद्येति चोदं स्यान्नैवं प्राग्घेत्वाभवात्। कालन्रयाऽपरिच्छित्तेर्न चोर्ध्वं चोदसंभवः ॥११६ ॥ उत्पत्ति और विनाशसे रहित ज्ञानस्वरूप आरत्मामें अरपशिदियाका कैसे संभव हो सकता है? ऐसी शङ्का नहीं करना चाहिए, क्योंकि- क्या विद्याके पूर्व अविद्याका होना सम्भातित समझते हैं, या विद्याके अनन्तर? यदि कहिए कि विद्याके पूर्व अविद्याकी सम्मावना नहीं, तो यह ठीक नहीं। कारण, आत्मा ज्ञानरूप है, ऐसा ज्ञान ही जब नहीं उदय हुआ, तब यह शङ्का कैसे हो सकेगी? यदि ज्ञान होनेके बाद शङ्का करो, तत्र तो आत्मामें कालत्रयमें भी अविद्या नहीं है, ऐसा बोध जब्र हो गया, तब् ऐसी शङ्का किस तरहसे हो सकती है?॥ ११६ ॥

नुदति। तस्मात्- अद्धातममनादृत्य प्रमाणं सदसीति ये। वुभुत्सन्तेऽन्यतः कुर्युस्तेऽक्ष्णापि रसवेदनम् ॥ ११७॥ चूँके 'तत्त्रमसि' इत्यादि वाक्य हो आत्माकी समस्त अविद्याको, जिसको कि आत्मासे किसी प्रकार भी सम्बन्ध हो ही नहीं सकता, दूर इटा देता है। इसलिए- जो लोग साक्षात् आत्मतत्वके ज्ञान करानेमें समर्थ, सुनिश्चित प्रमाण-'तत्वमसि' आदि मदावाक्यका अनादर करके शन्य प्रसङ्गयानादि (ध्यान, उपासना आदि) के

१-अनिद्ो निद्रया, ऐसा भी पाठ है। २-वुभुत्सन्तः, ऐसा पाठ भी है।

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नैष्कर्म्यसि्ि

द्वारा आत्मतत्वका साक्षात्कार करना चाहते हैं, वे लोग तो नेत्र इन्द्रियके द्वारा रसज्ञानका अनुभव कर सकते हैं ?॥ ११७ ॥ एवमप्रतिहतामहं ब्रह्मेति प्रमां तत्वमस्यादिवाक्यं कुर्वदपि न प्रतिपाद्यतीति चेदभिमतं न कुतश्चनापि प्रतिपत्ति: स्यादत आह- इदं चेदनृतं' ज्रूयात्सत्यामवगतावपि। `न चाऽन्यत्राऽपि विश्वासो ह्यवगत्यविशेषतः ॥११८।। - इस प्रकार तत्वमस्यादि वाक्यसे 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकारका प्रमात्मक अवा- घित ज्ञान यदि हो रहदा है, तब यह वाक्य एतादृश वस्तुका प्रतिपादन नहीं करता, ऐसा ही आपको अरभीष्ट हो तन्र तो किसीसे भी ऐसी अरवगति (ज्ञान) नहीं होगी, इसलिए कहते हैं- 'तस्तमसि' इत्यादि वाक्योंसे पूर्वोक्त निश्चितरूपसे ज्ञान होनेपर भी यदि कोई यह असत्य है, अप्रमाण है, ऐसा कहेगा, उस पुरुषको ज्ञान होनेपर भी विशेषता न रहनेसे शरन्यत्र भी, सम्पूर्ण वेदमें कहीं भी, विश्वास नहीं रहेगां॥ ११८।। न चोपादित्सिताद् वाक्यार्थाद् वाक्यार्थान्तरं कल्पयितुं युक्तम्। यस्मात्- न चेदनुभवोऽत: स्यात्पदार्थावगतावपि। कल्प्यं विध्यन्तरं: तत्र न ह्यन्योऽर्थोऽवगम्यते ॥ ११९॥ इसपर यदि कोई ऐसा कहे कि 'हम वेदान्तोंको अप्रमाख नहीं कहते, किन्तु वेदान्त उपासना विधिपरक हैं ऐसा कहते हैं' तो ऐसा कहना भी युक्त नहीं है। क्योंकि- यदि तत् खवं पदार्थके जाननेवालेको वाक्यश्रवणसे वाक्यार्थका ज्ञान न होता, तब विधिपरत्वकी कल्पना उचित थी, वह बात तो है नहीं। क्योंकि अधिकारी पुरुषको वाक्यसे ज्ञान होता हुआ अनुभवसे देख पढ़ता है। और पूर्वोक्त रीतिसे मुख्य शर्थ संभव हो तो विधिकी कल्पना कर भी नहीं सकते। इसलिए विधिपरतया प्रामाएय नहीं कह सकते। और 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य जिस प्रकरणमें पठित हैं, उसमें कोई विधि श्रुत भौ नहीं है ॥। ११६।। न च यथाऽभिमतोर्ऽर्थो यथोक्तेन न्यायेन नावसीयते। कोऽ- सौ न्याय इत्याह- नामादिभ्यो निराकृत्य त्वमर्थ निष्परिग्रहः। निःस्पृहो युष्मदर्थेभ्यः शमादिविधिचोदितः ॥१२०॥ १-न चान्यत्रापि वाक्ये स्याद्विश्वासो अविशेषतः, ऐसा भी पाठ है।

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भाषानुवादसहिता १४३

और यह भी नहीं कह सकते कि जैसा हमको अभीष्ट है, वैसा अर्थ कहे हुए न्यायसे प्रतीत नहीं होता। वह न्याय कौनसा है? यह कहते हैं- छान्दोग्य उपनिषद्में दिखाये हुए नामसे लेकर प्राणपर्यन्त पदार्थोंसे आरत्माको प्रथक् समभकर 'अहम्' 'मम' इस प्रकारके अभिमानके परित्यागसे क्षेत्र, पुत्रादि परि- अ्रहोंसे रहित युष्मदर्थ तनाक्म प्रपञ्चसे निःस्पृह् अर्थात् उसके उपभोग करनेकी तृष्णासे रहित, शमदमादि साघन चतुष्ृयसे सम्पन्न होकर-॥ १२० ॥ भङ़त्वा चानमयादींस्तान् पञ्चानात्मतया्ऽर्गलान्। अहं ब्रह्मेति वाक्यार्थ वेति चेननार्थ ईहया॥ १२१ ॥ तैत्तिरीयक उपनिषद्में प्रतिपादित अन्नमयादि पाँच कोंशोंमें 'अ्रह्रम्' 'मम' त्रभि- मानका परित्याग करके स्वरूपप्राप्तिमें प्रतिचन्धक जितने हैं, उन सभीका क्षय करके यदि पुरुष ब्रह्मस्वरूपताका लाभ कर सकता है, तो उपासनादि व्यापारसे क्या प्रयोजन है? न चेदेवमुपगम्यते वाक्यस्य प्रमाणस्य सतोऽप्रामाएयं प्रामोति। तदाह- यदर्थ च प्रवृत्त् यद् वाक्यं तत्र न चेच्छुतम्। प्रमामुत्पादयेत्तस्य ग्रामाएयं केन हेतुना ॥ १२२ ॥ इस प्रकार अधिकारी पुरुषको वेदान्तसे यथार्थ ज्ञान उत्तन्न होता है, यह बात पहले कही। यदि वांदी इस बातको न माने तब वेदान्तवाक्योंमें अप्रामारयरूप दोषकीं प्रसक्ति हो जायगी? यही कहते हैं- जिस बातको समझाने के लिए जो वाक्य प्रवृत्त हुआ है, उस वाक्यके श्रवणसे उस अर्थकी प्रतीति यदि न उत्न्न हो, तब उसका प्रमाण किस तरहसे मान सकते हैं ॥१२२॥ अथ मन्यसे- जानीयाच्चेत्प्रसङ्खयानाच्छन्दः सत्यवचा: कथम्। पारोक्ष्यं शब्दो नः प्राह प्रसङ्मयानाच्वसंशयम् ॥१२३॥ हाँ, यदि ऐसा आपका अभिप्राय है कि "अधिकारी पुरुषको जो ज्ञान होता है, वह वेदान्त विहित ध्यानबलसे ही होता है" तब वेदान्तोंका तात्पर्य ध्यानके विधान करनेमें ही है, ऐमा मानना पड़ेगा? अद्वितीय वस्तुमें तात्र्य तो है नहीं फिर प्रत्यक्षादि विरुद्ध ऋरद्वितीय वस्तुमें वेदान्त प्रमाण कैसे हो सकता है? उसको अप्रमाण कहना पड़ेगा। यदि कहिए कि "नहीं, इम लोगोंको शब्दसे तो परोक्ष ही ब्रह्मका बोध होता है, शब्द और युक्तिका अभ्यासरूप-ध्यानसे असन्दिग्ध ब्रह्मरूपताका साच्षात् ज्ञान होता है ?" तो इसका उत्तर देते हैं-

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१४४ नेष्कम्यसद्धि:

र्भविष्यतीति सम्भावयामः। यस्मात्- युक्तिशब्दौ पुराऽप्यस्य न चेदकुरुतां प्रमाम्। साक्षादावर्त्तनात्ताभ्यां क्िमपूर्व फलिष्यति ॥ १२४ ॥ शब्द और युक्तिका पुनः पुनः चिन्तन करना, इस प्रकारके ध्यानसे ठीक ठीक साक्षात्कार होगा, ऐसी सम्भावना हम नहीं करते हैं। क्योंकि- इस अधिकारी पुरुषको जब्र पहलेसे ही युक्ति और शब्द, इन दोनोंने अपरोक्ष प्रमा (यथार्थ ज्ञान) उत्पन्न नहीं की तब पाछेसे अभ्यासके बलसे उन्हीं दोनोंसे नया ज्ञान क्या उत्पन्न हो सकता है?॥ १२४ ॥ अथैवमपि प्रसङ्गयानमन्तरेण प्राणान् धारयितुं न शक्रोषीति चेच्छाणादावेव सम्पादयिष्यामः । कथम् - प्रसङ्मयानं२ श्रुतावस्य न्यायोऽरत्वाम्रेडनात्मकः । ईषच्छ तं सामिश्रुतं सम्यक्श्रुत्वाऽवगच्छति ॥ १२५ ॥ और इसपर भी यदि आंप ऐसा कहो कि. "सूत्रकारने ही शब्द और युक्ति- का अभ्यास करना चाहिए, इस प्रकारसे प्रसङ्गयानको स्वीकार किया है। इसीलिए उसके बिना वाक्य किस प्रकारसे बोधक होगा ?" तो यह ठीक नहीं ! सूत्रकारका तातर्य यह है कि जीवको ब्रह्मम्वरूप जाननेमें साधनीभून श्रवण, मननादिकी ही आवृत्ति करनी चाहिए। न कि श्रखादि उपायोंसे साध्य जो ज्ञान है उसनें उस आवृत्तिका उपयोग करना चाहिए। आंत्माके श्राणमें प्रसङ्गयान अर्थात् शरवृत्तिका उपयोग है। अतएव सूत्रकारके कहे हुए अभ्यासन्यायका भी यही तात्पर्य है। क्योंकि आपातसे श्रुत अथवा अर्धश्रुत अर्थका अच्छी तरहसे श्रवण करके ज्ञानको प्राप्त होता है॥। १२५ ॥ ननु प्रसङ्ख्यानविधिमनभ्युपगच्छतः पारमहंसी चर्या बौद्धा दिचर्यावदशास्त्रपूर्विका प्राम्नोति। ततश्रारूढपतितत्वं न स्यात् अशेष- कर्मणां च निवृत्तिर्न प्राम्नोतीति। उच्यते- त्वमर्थस्याऽवबोधाय विधिरप्याश्रितो यतः। तमन्तरेण ये दोषास्तेऽपि नायान्त्यहेतवः ॥ १२६ ॥ १-न शक्कोमि, ऐसा पाठ भी है। २-प्रसंख्यानं, ऐसा और प्रसंख्यानश्रुता० ऐसा पाठ भी है।

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माषानुवादसहिता

शङ्का-मुमुत्तुकी नित्य और नैमित्तिक विधिसे बोधित कर्मोंमें प्रवृत्ति तो आपको इष्ट नहीं है। और प्रसङ्गयानकी विधि भी आप नहीं मानते। तब तो किसी तरह से भी शास्त्रीय प्रवृत्ति नहीं है। अतः पाखएडोंकी तरह परमहंस चर्या भी निर्मूल ही प्रतीत होती हैं। तब सकल श्रुति, स्मृति, इतिहास-पुराखोंमें प्रसिद्ध अरूढपतितत्व भी नहीं होगा। अथवा विधिबोधित सकल कर्मके परिन्याग से आरूढपतिख हो जाएगा और प्रसङ्गयानकी विधि नहीं मानोगे तो नित्य-नैमित्तिक कर्मोंकी निवृत्ति नहीं सिद्ध होगी ? प्रसङ्गयानकी विधि यदि मानते हो, तब तो सर्वदा अनन्यचित होकर ज्ञानाभ्यासमें प्रवृत्त होनेसे तद्विरुद्ध कर्मोंकी निवृत्ति होती है। यदि उसकी विधि नहीं मानते हो तब 'यावज्जीव' इत्यादि श्रुतियोंसे जो यावज्जीवन कर्म करनेके लिए कहा है, उसीका अनुसरख करना पड़ेगा। तब फिर सर्वकर्म-संन्यासका अवसर ही नहीं है ?' समाधान-'ववं' पदार्थके विवेकके लिए श्रवखादिकी विधि मानी है और तदङ्- तया सर्व-कर्मोंका सन्यास श्रुति और स्मृतिमें विहित है। अतएव श्रशास्त्री- यत्वादि दोषकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है॥ १२६ ॥

इति श्रीमत्पूज्यपाद श्री श्रीसुरेश्वराचार्यकृत नैष्कर्म्यसिद्दिके तृतीयाध्यायका भाषानुवाद समाप् हुआ्रप्रा ।।

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॥ श्रीगुरुः शरम् ॥ नैष्कर्म्यसिद्धौ चतुर्थोडध्यायः प्रारभ्यते।

पूर्वाध्यायेषु यद् वस्तु विस्तरेणोदित स्फुटम्। सङ्क्षेपतोऽधुना वक्ष्ये तदेव सुखवित्तये॥१। प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय अध्यायोंमें जिस वस्तुका विस्तार पूर्वक वर्खन किया, उसीको सुखपूर्वक-अनायाससे-जानने के लिए अब सं्ेपसे इस (चतुर्थ) अध्यायमें हपष्ट वर्णन करता हूँ॥१ ॥ सदकक्षेपविस्तराभ्यां हि मन्दोत्तमधियां नृणाम् । वस्तूच्यमानमेत्यन्तःकरणं तेन भख्यते ॥ २ ॥ (कही हुई बातों' को फिर से क्यों कहते हो, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए।) क्योंकि संक्षेप और विस्तार, दोनों तरहसे वस्तुतस्त्रका निरूप करनेसे मन्द, मध्यम, उत्तम-सभी प्रकारके लोगोंके अन्तःकरणमें वह विषय स्थिर हो जाता है॥ २॥ आत्माऽनात्मा च लोकेऽस्मिन् प्रत्यक्षादिप्रमाणतः । सिद्धस्तयोरनात्मा तु सर्वत्रैवात्मपूर्वकः॥३॥ इस जगत्में आत्मा और अनात्मा ये दोनों प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे सिद्ध हैं। परन्तु उनमें अनात्मा सर्वकालमें आत्मासे ही सिद्ध है। क्योंकि द्रष्टाके विना दृश्यकी सिद्धि नहीं होती।। ३ ।। अनात्मत्वं स्वतःसिद्ध देहाद्भिन्नस्य वस्तुनः । ज्ञातुरप्यात्मता तद्वन्मध्ये संशयदर्शनम्॥४॥ देइसे भिन्न घंटादि दृश्य तो अनात्मरूपसे और ज्ञाता आत्मरूपसे स्वतः हो सिद्ध हैं। किन्तु घटादि विषय और प्रत्यगात्मा, इनके मध्यमें वर्तमान शरीर, इन्द्रियादिमें कौनसा आत्मा है, ऐसा वादियोंके विवादसे संशय होता है॥ ४ ॥ असाधारणांस्तयोर्धर्मान् ज्ञात्वा धूमाग्निवद् बुधः। अनात्मनोऽथ बुद्धयन्तान् जानीयादनुमानतः ॥५॥ आत्माके असाधारण धर्म द्रष्टश्वादि और अनास्माके दृश्यत्व, जडख्वादि धर्मों को पृथक-पृथक जान कर परिडतको-जैसे धूमको देख कर अग्निका निर्णय होता है, वैसे ही-देहसे लेकर बुद्धिपर्यन्त पदार्थोंका अनात्मत्व अनुमानसे निश्रित कर लेना चाहिए।। ५ ॥।

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मावानुवादसहिता १४७

इदमित्येव वाह्येर्थे ह्यहमित्येव बोद्धरि। दवय दृष्टं यतो देहे तेनाऽयं मुह्यते जनः ॥ ६ ॥ वटादि बाह्य विषयोंमं 'इदम्' ऐसी बुद्धि होती है। ज्ञाताका ज्ञान 'अहम्' (मैं) इस प्रकारसे होता है। शरीरमें-'मेरा यह शरीर है' 'मैं मनुष्य हूँ' इस तरहसे दोनों प्रकारका ज्ञान उपलब्ध हो रहा है। इसी कारख लोगोंको संशय होता है॥ ६ ॥ केन पुनर्न्यायेनात्मानात्मनोरखमहिषयोरिव विभाग: क्रियत इति ! उच्यते- न्याय: पुरोदितोऽस्माभिरात्मानात्मविभागकृत्। तेनेदमर्थमुत्सार्य ह्यहमित्यत्र यो भवेत्॥ ७ ॥ किन युक्तियोंसे अ्रश्व और महिषके तुल्य आत्मा और अनात्माका विवेक सिद्ध होता है, ऐसी आशङ्का होनेपर कहते हैं- आराश्मा और अनात्माके विवेकको दिखलानेवाली युक्तियाँ पूर्वाध्यायोंमें कही गई हैं। उन्हींके अनुशीलनसे सन्दिग्ध अहङ्कारमें जो 'इदम्' अंश है, उसको दृश्यत्वादि हेतुओसे अरनात्मा समझकर जो अवशिष्ट अ्ंश है-॥। ७।। सदा। अनन्तरमबाह्यार्थे प्रत्यक्स्थं' मुनिरञ्जसा ॥८॥ उसीको मननशील पुरुष अनायाससे 'तत्वमसि' वाक्यसे वृत्तियोंके भावाभावका प्रकाशक, बाह्याभ्यन्तरशून्य, सर्वान्तर, साव्षिस्वरूप जाने ॥ ८॥ उच्यवां तहिं कया तु परिपाठ्या वाक्यार्थ वेत्तीति ? उच्यते। अन्वयव्यतिरेकाभ्याम्। त्यक्तकृत्सेदमर्थत्वात् त्यक्तोऽहमिति मन्यते। नाऽवगच्छाम्यहं यस्मान्निजात्मानमनात्मनः ।। ९।। तब कहिए किस क्रमसे वाक्यार्थका ज्ञान होता है? कहते हैं-प्रथम अरन्वय व्यतिरेक द्वारा सम्पूर्ण इदमर्थको अरपनात्मा समझ कर त्याग देनेके कारय मुमुत्तु आत्माका भी परित्याग हो गया है, ऐसा मान लेता है। क्योंकि अनात्मासे पृथक करके अपने आरत्माको मैं नहीं जानता हूँ, अतएव मैं नष्ट हो गया हूँ, ऐसा मान लेता है॥।६। अथ शरीरादिबुद्धिपर्यन्तः स सर्वोऽनात्मैवेति प्रमाणाद विनि- श्चित्य किमिति बुभुत्सातो नोपरमते ? शृणु- १-प्रत्यञ्चं, ऐसा पाठ भी है।

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१४८ नैष्कर्म्यसिद्धि:

प्रत्यग्घेतोरनात्मनः । दोलायमानचित्तोऽयं मुह्यते भौतवन्नरः ॥ १० ॥ शङ्का-शरीरसे लेकर बुद्धिपर्यन्त सब पदार्थ अनात्मा है, ऐसा प्रमाखसे निश्चित होनेके बाद भी मुमुत्तु क्यों जिज्ञासासे विरत नहीं होता ? समाधान-सुनिए- अहङ्कारादिमें भी प्रत्यक्त् प्रतीत होता है, इसलिए यह पुरुष भ्रान्तपुरुषकी (भूतसे उपगहीत पुरुषकी ) भाँति सन्दिग्ध चित्त होकर जिज्ञासु बना रहता है॥ १० ॥ अलुप्तविज्ञानात्मन आत्मत्वादेव नित्यसान्निध्याद् बुभुत्सु: किमिति न प्रतिपद्यत इति ? यस्मात्- यैरद्राक्षीत्पुरात्मानं यमनात्मेति वीक्षते। दृष्टेद्रष्टारमात्मानं तैः प्रसिद्धः प्रमित्सति ॥ ११ ॥ शङ्का-आरात्मा नित्य, स्वयम्प्रकाश है और स्वस्वरूप होनेके कारण वह नित्य ही सन्निहित भी है। फिर जिज्ञासु पुरुषको उसका निश्रयात्मक ज्ञान होकर जिज्ञासाकी शान्ति क्यों नहों होती ? समाधान-इसलिए कि ज्ञान होनेके पूर्व जिन चक्तु आदि इन्द्रियोंके द्वारा देहादिको आत्मरूपसे देखता था, जिनको कि इस समय अनात्मरूपसे देखता है; उन्हीं प्रसिद्ध करखोंसे (इन्द्रियों से) वृत्तिके साक्षीको भी जानना चाहता है। इसी कारख स्वस्वरूप होनेपर भी आ्रात्माको नहीं जानता ॥ ११ ॥ कस्मात्पुनहेतोः पराचीनाभिः शब्दाद्वलोडिनीभिर्बुद्धि- भिरात्मानमनात्मवन्न वीक्षत इति ? उच्यते- . चक्षुर्न वीक्षते शब्दमतदात्मत्वकारणात् । यथैवं भौतिकी दृष्टिर्नात्मानं परिपश्यति ॥ १२॥ शङ्का-शब्दादिविषयोंको प्रकाशित करनेवाली बुद्धियोंके द्वारा शरीरादिकी तरह आत्माको यह पुरुषको क्यों नहीं जान लेता ? समाधान-कहते हैं। जैसे चक्तु शब्दगुणक द्रव्य (आ्रकाश) से उत्पन्न न होनेके कारख शब्दको नहीं प्रकाशित कर सकता है? वैसे ही भौतिक अन्तःकरणसे उत्पन्न हुआ वृत्तिरूप ज्ञान नित्य आत्माको नहीं प्रकाशित कर सकता ॥ १२ ॥ प्रत्यक्षादिप्रमाणस्वाभाव्यानुरोधेन तावत्तद्दर्शनकारणमुक्तम्। अथ प्रमेयस्वाभाव्यानुरोधेन प्रतिषेध उच्यते- :- शब्दाद्यवलेहिनीभिः, ऐसा भी पाठ है।

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माषानुंवादसद्दित। १४१

धीविक्रियासहस्राणां हानोपादनधर्मिणाम्। सदा साक्षिणमात्मानं प्रत्यक्त्वान्नाऽहमीक्षते'।।१३। यहाँ तक प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके स्वरूपका विचार करके उन प्रमाणोंसे श्रप्रात्माके प्रकाशित न होनेमें कारण बतलाया। अ्रत प्रमेय आरत्मस्वरूपके विचार करनेसे भी प्रत्यक्षादि प्रमाणोंका निपेध करते हैं- जो सम्पूर्ण बुद्धि- वृत्तियोंकी उत्पत्ति और विनाशका साक्षी है। उस इन्द्रिया- दिके तविषयभूत साक्षीको अरन्तःकरख प्रकाशित नहीं कर सकता।॥ १३ ॥ क्व पुनरियं विवेकबुद्धि: किमात्मन्युताऽनात्मनीति। किश्चातः। यद्यात्मनि कूटस्थत्वव्याघातोऽनात्मदरशित्वात्। अथाऽऽनात्मनि 2तस्याऽप्यचैतन्यान्न विवेकसम्बन्ध3 इत्युच्यते 'दाह्यदाहकतैकत्र' इत्युक्त-परिहारात्। बुद्धावेव विवेकोऽयं यदनात्मतया भिदा। बुद्धिमेवोपमृद्राति कदलीं तत्फलं यथा॥ १४ ॥ शङ्का-फिर यह विवेकबुद्धि किसको होती है? आत्माको होती है या अनात्माको? यदि कहिए कि इससे क्या प्रयोजन सिद्ध होगा? तो सुनिए-यदि श्रात्मा उस विवेकबुद्धिका आश्रय हो अर्थात् यदि विवेकबुद्धिरूप परिखामको आत्मामें माना जाय, तब उसकी कूटस्थताका व्याघात होगा और यदि अनात्माको विवेकबुद्विका आश्रय मार्ने तो वह भी ठीक नहीं। क्योंकि वह जढ़ है? समाधान-जैसे अग्निका लोहपिएडके साथ तादात्म्याध्यास होनेसे उसमें दाह्यत्व और दाहकत्व ये दोनों धर्म एकत्रित होते हैं। उसी प्रकार तहङ्कार और आत्माके तादास्म्या- ध्याससे अरचेतन भी अहक्कारको ज्ञातृत्व होता है; ऐसा पहले ही प्रतिपादन किया है। इसी कारख अहङ्कारपरिखामरूप विवेकज्ञानको आ्त्माके ऊपर आरोपित किया जाता है। अतएव आत्माकी कूटस्थता भी नष्ट नहीं हुई और न केवल अचेतनको ज्ञानका आश्रय मानना पड़ा। अ्रतः- जिस (बुद्धि) की अनात्मता होनेके कारण आत्मासे भेद माना जाता है, उस बुद्धिका ही धर्म विवेक है। इसलिए जैसे कदलीफल (केला) अपनी उत्पत्तिसे अपने

१-नाहमेक्षते, ऐसा पाठ भी है। २-तस्या अप्यचैतन्यस्य, ऐसा पाठ भी है। ३-विवेकसंभवः, ऐसा भी पाठ है।

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ही आधारको-कदलीवृक्षको-नष्ट कर देता है, वैसे ही वह विबेक बुद्धिका नाशक बन जाता है॥ १४ ॥ सो्यमतत्वे तच्वटक्- अनुमानप्रदीपेन हित्वा सर्वाननात्मनः। संसारैकावलम्विन्या तदभावं धियेप्सति॥ १५ ।। इसपर यदि ऐसी आशङ्का करो कि 'यथोक्त विवेकसे ही द्वत प्रपञ्चकी निवृत्ति होती है तो फिरं वेदान्त-वाक्योंकी क्या आवश्यकता है ?' तो यह ठीक नहीं। क्योंकि आत्मा और अनात्माका जो भेद है वह भी अद्ध तके विपरीत होनेसे अतत्त्व ही कहाता है। अतएव विवेकबुद्धि भी भ्रान्ति ही है। इसलिए यह जो अतत्व (आरत्मा- अ्रनात्माका विवेक) है, उसमें तत्वदृष्टि रखनेवाला पुरुष अरनुमानंरूप प्रदीपसे सम्पूर्ण अनात्माको त्यागकर भेदरूप संसारको अ्रवलम्बन करनेवाली विवेकबुद्धिके द्वारा उसकी भी निवृत्ति चाहता है। अतएव वाक्यार्थज्ञानके बिना संसारकी निवृत्ति नहीं होती ॥१५॥ योऽयमन्वयव्यतिरेकजो विवेक आत्माऽनात्मविभाग- लक्षणोऽनात्मस्थः स्थाणौ संशयावबोधवत् प्रतिपत्तव्योऽयथावस्तु- स्वाभाव्यान्मृगतृष्णिकोद कप्रबोधवदित्यत आह- संसारबीजसंस्थोऽयं तड्धिया मुक्तिमिच्छति। शशो निमीलनेनेव2 मृत्युं परिजिहीर्षति॥१६॥ यह जो पहले अन्वय और व्यतिरेकसे उत्पन्न हुआ, आत्मा और अनात्मा के विभागको प्रकाशित करनेवाला, अनात्मामें (अन्तःकरणमें) रहनेवाला विवेक दिखलाया वह भी स्थाणुमें संशयात्मक ज्ञानके तुल्य ही है; ऐसा समझना चाहिए। क्योंकि भेद आत्मस्वरूप नहीं है, अतएव मृगतृष्खाके उदकज्ञानके समान ही मिथ्या है। इसीलिए कहते हैं- संसारके बीज अज्ञानमें ही रहकर यह विबेक बुद्धिवाला पुरुष यदि अज्ञान-कल्पित भेदबुद्धिसे ही मुक्ति चाहता है, तो वह उसका चाहना, जैसे शश (खरगोश) [ बिल्ली आरदिके सामने ] अपनी आँखोंको मूँद लेनेसे ही मृत्युको जीतना चाहता है, ठीक उसीके समान है॥ १६ ॥ अस्यारऽर्थस्य द्रंढिम्ने श्रुत्युदाहरणम्-

१-अनात्मस्थः सनू, ऐसा और स्थायोः, ऐसा भी पाठ है। २-दशो निमोलनेनेव, ऐसा पाठ भी है।

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भाषानुवादसहिता १५१

इममर्थ पुरस्कृत्य श्रुत्या सम्यगुदाहृतम्। यच्चक्षुषेति विस्रब्धं न दृष्टेरिति च स्फुटम् ॥ १७॥ वाक्य-जन्य ज्ञानसे ही संसारकी निवृत्ति होती है, इस विषयको दृढ़ करनेके लिए श्रुतिके प्रमाखोंका उपन्यास करते हैं- वाक्य ही अज्ञानका निवत्तक है, दूसरा नहीं। इसी बातको दढ़ करनेके लिए श्रतिने विस्पष्ट और निःसन्देहसे अच्छो-प्रकार यह कहा है कि "ब्रह्मरूप वस्तुको चत्तुसे नहीं देख सकते" "बुद्धिवृत्तिके साक्षीको दृश्यबुद्धिसे जाननेकी कोशिश मत करो ?"॥ १७ ॥ बुद्धयन्तमपविद्धचैवं कोन्वहं स्यामितीक्षितुः। श्रुतिस्तत्वमसीत्याह सर्वमानातिगामिनी॥ १८ ॥ (यदि प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे आ्ररात्मतत्व नहीं ज्ञात हो सकता, तब्र कैसे उसका ज्ञान होगा ? इस प्रश्नका उत्तर देते हैं-) पूर्वोक्त अन्वय-व्यतिरेकसे शरीरसे लेकर बुद्धिपर्यन्त अ्रनाश्म-पदार्थोंका संशोधन करके 'मैं कौन हूँ' इस प्रकार अपने स्वरूपका अन्वेषण करनेवाले पुरुषको-समस्त प्रमाणोंको अर्प्रतिक्रमण करके अरद्वत वस्तुका बोधन करानेवाली-श्रुति कहती है कि 'तू वही सत् चित् आनन्द स्वरूप ब्रह्म है।'।।१८।। एष संक्षेपतः पूर्वाऽध्यायत्रयस्याऽर्थ उक्तः । सोऽयं न्याय्यो- 5पि वेदान्तार्थः शास्त्राचार्य प्रसादलभ्योऽप्यनपेक्षितशास्त्राचार्यप्रसा- दोऽनन्यापेक्षसिद्धस्वभावत्वात्कैश्चिच्छद्दधानैर्न प्रतीयते। तेषां सङ््ग्रहार्थ- मभिमतप्रामाएंयोदाहरणम्2। उदाहार्येवमेव सुविस्पष्टोऽस्मदुक्तोऽर्थः सर्वभूतहितैषिभिः ॥ १९॥ तु।

इस प्रकार सङ्क्षेपसे पूर्वोक्त तीन अध्यायोंके अर्थका वर्णन किया। सो यह युक्तियुक्त वेदान्त-प्रतिपाद्य जोत और ब्रह्मकी एकतारूप अर्थ शास्र एवं आचार्यके प्रसादसे प्राप्त होने योग्य होनेपर भी शास्त्र और आचार्यके प्रसादकी अपेक्षा नहीं रखता। क्योंकि यह निरपेक्ष अन्य किसीकी अपेक्षा न रखनेवाला, स्वयंसिद्धस्वरूप है। अतएव जिन श्रद्धालुओंको उसकी प्रतीति नहीं होती उनके सड्ग्रहार्थ, जिनका

१-ईप्ितुम, ऐसा भी पाठ है। २-प्रामाण्योदीरराम, ऐसा पाठ भी है। ३-चाप्युदाहारि, ऐसा पाठ भी है।

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१५२ नैष्कर्म्यसिद्धि:

प्रामाएय लोकमें प्रसिद्ध है, ऐसे आचार्योंके (भगवान् श्रीशङ्गराचार्यजीके) वाक्यका उदाहरण देते हैं- मैंने जिस विषयको कहा ह, उसीका समस्त प्राणियोंका हित चाइनेवाले श्रीशङ्करभगवत्पूज्यपादाचार्यजीने भी (उपदेशसाइस्रीमें ) स्पष्ट रीतिसे व्णन किया है।। १६॥। कि परमात्मन उपदेश उताऽपरमात्मन इति ? किश्चातः ? यदि परमात्मनस्तस्योपदेशमन्तरेणैव मुक्तत्वाननिरर्थक उपदेशः। अथाऽपरमात्मनस्तस्यापि स्वत एव संसारस्वभावत्वान्निष्फल उपदेशः। एवमुभयत्राऽपि दोषवत्वाद्। अत आह- अविविच्योभयं वक्ति श्रुतिश्चेत्स्याद् ग्रहस्तथा। इति पक्षमुपादाय पूर्वपक्षं निशात्य च।। २०॥ पूर्वपक्ष-क्या परमात्माको उपदेश किया है, या जीव को? यदि कहिए कि इस प्रश्नसे क्या प्रयोजन है? तो सुनिए-यदि परमात्माको उपदेश देते हो तो वह उपदेशके बिना ही मुक्त है, इसलिए उपदेश करना निरर्थक है। और यदि अपरमात्मा-जीव- को उपदेश होता है, ऐसा कहिए, तब्र तो जो स्वयमेत्र संसारी स्वभाववाला है, वह उस स्वभावसे कदापि छूट नहीं सकता, इस कारण उपदेश सवथा निष्फल होगा। इस प्रकार दोनों ही पक्षों में दोष है। सिद्धान्त-इसपर (पूज्यपादने जो उत्तर दिया है, उसे) कहते हैं- अदङ्कार और आत्मा, इन दोनों का परस्पर अध्यास होकर जो एक वस्तु शबल- रूप जीवनामक व्यवस्थित है, उसीको उद्दश्य करके श्रति यदि अभेदका उप़देश करे तो उपदेश हो सकता है। इसलिए पहले भी यह कहा है कि-'केवल अ्रनात्मा या शुद्घ परमात्मा, इन दोनोंके लिए उपदेश नहीं हो सकता।' वही बात पूर्वपक्षका निराकरण करते हुए-'अविविक्त आत्मा और अनात्मा ही उपदेशके योग्य हैं' इस प्रकार सिद्धान्त रूपसे स्थिर करते हुए जो हमने कहा है, वही पूज्यपाद श्रीभाष्यकारने भी प्रदर्शित किया है॥२० ॥ तच्चेदमविवेकात्स्वतो विविक्तात्मने तत्वमसीत्युपदिष्टम् -. युष्मदस्मद्विभागज्ञे स्यादर्थवदिद वचः। यतोऽनभिज्ञे वाक्यं स्याद् बधिरेष्विव, गायनम्॥२१॥ इस प्रकार 'ब्रह्म ही अज्ञानी हुआ, उसने अपने आपको जाना' इत्यादि वृद- १-संसारि०, ऐसा भी पाठ है।

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माषानुवादसहिता १५३

दारएयक उपनिषद्के वाक्यकी आरलोचना करके अज्ञानवश अहङ्कारादिसे अभिन्न हुआ ब्रह्म ही उपदेशका भागी होता है, यह कहा। अब् यह शङ्का होती है कि आरत्मा- नात्मविवेकके लिए अन्वय-व्यतिरेककी क्या आंवश्यकता है? इसके निवारणार्थ कहते हैं- जिसने स्वयमेव वाक्योंके विचार करनेके पूर्व ही अन्यथ-व्यतिरेकसे देह, इन्द्रिया- दिसे आत्माको पृथक् विवेचित किया है, उसीको पूर्वोक्त जीव औरर ब्रह्मका ऐक्य 'तत्त्रमसि' इत्यादि शास्त्र उपदेश करता है, अतएव उसकी व्यर्थता नहीं है। इसपर यदि कोई कहे कि-'तब तो अन्वय और व्यतिरेकसे ही मुक्ति होती है, फिर उपदेशका क्या प्रयोजन है ?' तो यह ठीक नहीं। क्योंकि- देहेन्द्रियादिसे आत्माको पृथक जान लेनेपर भी अज्ञान निवृत्त नहीं होता है। उसके निवारणार्थ यह उपदेश है। जो आत्मा और अनात्माके त्रिभेदको जाननेवाला है, उसीको उपदेश करना सार्थक है। क्योंकि जिसको उसकी अमिज्ञता नहीं है, उसको उपदेश करना, बघिरोंको गायन सुनानेके तुल्य है॥ २१ ॥ तस्य च युष्मदस्मद्विभागविज्ञानस्य का युक्तिरुपायभावं प्रतिपद्यते। शृणु- अन्वयव्यतिरेकौ हि पदार्थस्य पदस्य च। स्यादेतदहमित्यत्र युक्तिरेवाऽवधारणे ॥ २२ ॥ पूर्वोक्त आरत्मा और अनात्माका विवेक कौनसी युक्तिसे होगा ? इस प्रश्नका उत्तर सुनिए- पद-पदार्थोंका अन्वय और व्यतिरेक ही, यह आत्मा है यह अनात्मा है, ऐसे पृथक पृथक् भेदज्ञानके कारण हैं॥ २२ ॥ कथं तौ युक्तिरित्यत्राह- नाद्राक्षमहमित्यस्मिन् न वारयति दृष्टिं स्वां प्रत्ययं तु निषेधति॥ २३॥ वे श्रन्वय-व्यतिरेक किस रीतिसे विवेकका उत्पादन करते हैं, इसका उत्तर आचार्यपादकी ही उक्तिसे देते हैं- "प्रबुद्ध पुरुष निद्रित तवस्थामें-सुषुसिमें-'मैं अपनेसे अतिरिक्त किसीको भी नहीं जानता था, ऐसा स्मरण करता हुआ स्वस्वरूप दृष्टिका निवारख नहीं करता। क्योंकि स्मरण होनेके लिए अपेक्षित पूर्वानुभवरूपसे वहाँपर वही स्थित है। किन्तु घट, पट आदि बिषयोंके ज्ञानका ही निषेध करता है। इस कारए आत्मा ही अव्यभिचारी (अ्रबाघित) २०

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१५४ नेष्कम्यसिद्धि:

है। अन्य दृश्यपदार्थं सब व्यभिचारी होनेके कारण बाघित हैं।" ऐसा जो निश्चय ह, उसोको अन्वय-व्यतिरेक कहते हैं ॥ २३ ॥ एवं विज्ञातवाच्यार्थे श्रुतिलोकप्रसिद्धितः । श्रुतिस्तत्त्वमसीत्याह श्रोतुर्मोहापनुत्तये।। २४ ।। इस प्रकार जिसने अन्वयव्यतिरेकका ज्ञान सम्पादन किया है, उस पुरुषको वेदान्त वाक्य ही पूर्वोक्त एकत्वका प्रतिपादन करता है। यह भी आचार्यपादका कहा हुआ है-"द्रष्टा दश्यभूत दृष्टिका विषय नहीं होता" इत्यादि श्रुति औरर लोक प्रसिद्धिके अनुसार अनात्माका निरास करके विविक्त (शुद्ध) प्रत्यगात्माका ज्ञान होनेपर श्रति 'तत्वमसि' इस वाक्यसे श्रोताके अज्ञानको दूर करनेके लिए ऐक्यका प्रतिपादन करती है॥ २४ ॥ तत्र त्वमिति पदं यत्र लक्षणया वर्तते सोऽर्थ उच्यतै- अहं शब्दस्य या निष्ठा ज्योतिषि प्रत्यगामनि। सैवोक्ता सदसीत्येवं फलं तत्र विमुक्तता ॥ २५॥ अहं शब्दमें लक्षणावृचिके द्वारा जिस स्वप्रकाश प्रत्यगात्माका बोध कराने- की सामर्थ्य है, वही 'तत्त्वमसि, इस वाक्यका भी अर्थ है, अर्थात् रवं पदार्थसे तत्पदके लक्ष्यार्थका कोई भेद नहीं है और दोनोंका ऐक्य होनेसे मुक्ति ही फल है।। २५ ॥। अन्यच्चाऽन्वयव्य तिरेकोदाहरणम्। तथा। छिच्वा त्यक्तेन हस्तेन स्वयं नात्मा विशेष्यते। तथा शिष्टेन सर्वेण येन येन विशेष्यते ॥ २६॥ पूज्यपाद आचार्यने प्रकारान्तरसे अन्वय-व्यतिरेक का उदाहरण देकर जो आ्रत्मा और अनात्माके विवेकको दिखलाया है, वह भी कहते हैं- जैसे काटकर अलग फेंक दिये हुए हाथसे स्वयं आत्मा पहले 'यह पुरुष सुन्दर हाथ अथवा खराब हाथवाला है, ऐसा कहानेपर भी वर्तमान समयमें वैसा व्यवहृत नहीं होता। वैसे ही जो जो अवशिष्ट स्थूलदेह, श्रोत्रादि इन्द्रिय तथा सूक्ष्मशरीरमें रहनेवाले दुःखित्वादि धर्म हैं, उनसे पूर्वमें विशेषित होनेपर भी इस समय उनसे व्यवहार नहीं होता ॥ २६ ॥ विशेषणमिदं सर्वें साध्वलङ्करणं यथा। *अविद्याध्यस्तमतः सर्वें ज्ञात आत्मन्यसद्भवेत् ॥२७॥ :- अविद्यास्तमसः, ऐसा भी पाठ है।

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माषानुवादसहिता १५५ जैसे सुवर्ादिसे बने सुन्दर अलङ्कारादि, देहके अध्यासवश देहादिसे व्यतिरिक्त आत्मामें अध्यस्त होते हैं। वैसे ही पूर्वोक्त जितने विशेषण कहे गये हैं, वे भी अरविद्या वश आत्मामें कल्पित हैं। अतएव शास्त्र और गुरु की कृपासे शुद्ध आत्माके ज्ञान होनेपर वे सब असत् रूप हो जाते हैं॥ २७ ॥ तस्मात्यक्तेन हस्तेन तुल्यं सर्वं विशेषणम्। अनात्मत्वेन तस्माज्ज्ञो मुक्तः सर्वविशेषणैः ॥२८॥ क्योंकि पूर्वोक्त काखत्व, बधिरत्व, दुःखित्वादि विशेषण अविद्यासे ही आरत्मामें कल्पित हैं, इसलिए वे छिन्नहस्तके सदशु अनात्मा ही हैं। अतएव ज्ञानी पुरुष समस्त विशेषणोंसे मुक्त हो जाता है॥ २८॥ ज्ञातैवात्मा सदा ग्राह्यो ज्ञेयमुत्सृज्य केवलः। अहमित्यपि यद्ग्राह्यं व्यपेताऽङ्गसमं हि तत् ॥ २९॥ (सर्वदा स्थित न होनेके कारण ये विशेषण आात्माके नहीं हो सकते तो श्रात्मा कौनसा है, इस आशङ्काको दूर करते हैं,-) जो सर्वदा न रहनेवाले समस्त विशेषोंके भाव और अभावका साक्षीरूपसे सर्वदा स्थित है, उसीको सम्पूर्ण (ज्ञेय) विशेषणोंको परित्याग करके आरत्मा समिए और जो 'अह्म्' ऐसा प्रतीत हो रहा है उसे भी सुपुप्तिमें न रहनेसे छिन्नहस्त-पादादिके समान अनात्मरूप समझना चाहिए॥ २६ ।। दृश्यत्वादहमित्येष नात्मधर्मो घटादिवत्। तथाऽन्ये प्रत्यया ज्ञेया दोषाश्चात्माऽमलो ह्यतः ॥३०।। (व्यभिचारी होनेसे ये अहङ्कारादि छिन्न इस्तपादादिके समान अनात्मरूप हैं' और ये आत्मधर्म भी नहीं हैं, ऐसा कह कर दश्य होनेके कारख भी ये आत्मा या उसके धर्म नहीं हैं, ऐसा आचार्यने कहा है-) चूँकि यह अहङ्कार हश्य है, अतएव घटादिके समान आश्मा या उसका धर्म नहीं है तथा और भी जो वृत्तिरूप सुख, दुःख, राग, द्वषादि दोष हैं, वे भी दृश्य होनेके कारख आत्मरूप नहीं हैं, ऐसा समझिए। अतएव आत्मा सवथा विशुद्ध हैं ॥ ३० ।। सर्वन्यायोपसड््ग्रह :- नित्यमुक्तत्वविज्ञानं वाक्याद् भवति नाऽन्यतः । वाक्यार्थस्याऽपि विज्ञानं पदार्थस्मृतिपूर्वकम् ॥३१।। फिर भी जो पूज्यपाद आचार्योंने हमारे कहे अर्थको 'तत्त्वमसि' प्रकरणमें दिख-

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१५६ नैष्कम्यसिद्धि:

लाईं हुई युक्तियोंके साथ समस्त न्यायका उपसंहार करनेवाले पाँच श्लोकोंसे कहा है, उसीको कहते हैं- मैं नित्यमुक्त हूँ, ऐसा ज्ञान 'तत्वमसि' इत्यादि वाक्योंसे उत्पन्न होता है और किसी साधनके अनुष्ठानसे नहीं होता। वाक्यार्थका भी ज्ञान तत् और स्वम् पदके अर्थके स्मरणसे होता है। ३१ ॥ अन्वयव्यंतिरेकाभ्यां पदार्थः स्मर्यते ध्रुवम्। एवं निर्दुःखमात्मानमक्रियं प्रतिपद्यते ॥३२।। तत् और त्वम् पदके अर्थका स्मरख पूर्वोक्त अन्वय और व्यतिरेकसे होता है। इस प्रकार सर्व विशेषणोंसे रहित आरत्माको 'मैं ब्रह्म हूँ' इत्यादि वाक्योंसे जानता है।। ३२ । सदेवेत्यादिवाक्येभ्यः प्रमा स्फुटतरा भवेत्। दशमस्त्वमसीत्यस्माद्यथैवं प्रत्यगात्मनि॥३३ ॥ 'यह सारा नाम-रूपात्मक जगत् उत्पत्तिके पूर्व केवल ब्रझ ही था, इत्यादि वाक्योंसे अवगत ब्रह्मका जब्र आचार्य 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यसे-'तू वही ब्रह् है' ऐसा बोध कराता है, तब उस पुरुषको,-जैसे भ्रान्त पुरुषको 'तू दशम है' इस वाक्यसे 'मैंदशम हूँ' ऐसी स्पष्ट प्रतीति होती है। वैसे ही ;- 'मैं व्रह्म हूँ' ऐसा अपरोक्ष ज्ञान होता है।३३॥ वीक्षापन्नम्योदाहरणम्। नववुद्धयपहाराद्वि स्वात्मानं दशपूरणम् । अपश्यन् ज्ञातुमेवेच्छेत्स्वमात्मानं जनस्तथा ॥ ३४॥ अविद्याबद्धचक्षुष्टात् कामापहृतधीः' सदा। विविक्तं दृशिमात्मानं नेक्षते दशमं यथा॥ ३५॥ जो इमने तीसरे अध्यायमें सन्दिग्ध पुरुषको 'मैं कौन हूँ' ऐसी जिशासा होती है, ऐसा कहा और उसमें दष्टान्तका प्रदर्शन करके दार्ष्टान्तिकको दिखलाया था, वह सब आचार्यने भी कहा हे, उसीको दिखाते हैं- जैसे, गखनामें प्रवृत्त हुआ पुरुष 'हम लोग नौ ही हैं' इस प्रकार नव संख्यामें अभिनिवेश होनेके कारण अपना दशम होना, भूलकर अपनेसे अतिरिक्त नौ आदमियोंको देखता हुआ भी भ्रान्ति से 'मैं दशम हूँ' ऐसा न जानता हुआ उसे जाननेकी इच्छा करता है। वैसे ही शविद्यासे जिसका स्वरूप आवृत्त हुआ है, ऐसा पुरुष विषयोंमें आरसक्तिरूप १-कामापहतघीः, ऐसा पाठ भी है।

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भाषानुवादसहिता १५७

कामसे विषयों की ओर खिंचकर सम्पूर्ण द्व तोंसे सर्वदा मुक्त, सर्वसाक्षी, अपरोक्ष अपने आपको, दशमकी भाँति, नहीं जानता ।३४,३५।। सोऽयमेवमविद्यापटलावगुष्ठितदष्टि: सन् कथमुत्थाप्यत इत्याह- यथा स्वापनिमित्तेन स्वम्नदकूप्रतिबोधितः । करणं कर्म कर्चारं स्वामं नैवेक्षते स्वतः ॥ ३६॥ अनात्मज्ञस्तथैवाऽयं सम्यकश्रुत्याऽववोधितः । गुरुं शास्त्र' तथा मूढं स्वात्मनोऽन्यन्न पश्यति ॥३७॥ इसपर ऐसी आशक्का होती है कि इस प्रकार अविद्यासे स्वस्वरूपको भूले हुए पुरुषको ज्ञान होनेमें जो कारख होते हैं, वे क्या सच्चे हैं या झूठे हैं ? यदि सत्य हों तो अद्ध तसिद्धान्तका भङ्ग होता है और यदि उन्हें असत्य माना जाय, तो उनसे यथार्थ ज्ञान कैसे होगा ? इस शक्काका परिहार द्ृष्टान्तके द्वारा करते हैं- जैसे स्वप्न देखनेवाला अपनी अविद्यासे स्वप्नदशामें ही कल्पित चोर या व्याव्रादिको देखकर डरता हुआ एकदम जाग जाता है। और स्वप्में अज्ञानसे कल्पित कारणको अपनेसे विलक्षण समझता है, अर्थात् सत्य नहीं मानता। वैसे ही अनादि अविद्यारूपी गाढनिद्रामें निमन्न पुरुष मोहरूपी निद्रासे ही कल्पित श्रुति, आरचार्य इत्यादि कारणसामग्रीसे 'मैं परं व्रह्म हूँ' इस प्रकार प्रतिबुद्धि होकर गुरु, शास्त्र, मूढ, आचार्य आदिको अपनेसे अतिरिक्त नहीं देखता। इसलिए अद्ध तकी कोई क्षति नहीं हुई। और विद्या (यथार्थज्ञान) का उदय नहीं होगा, यह आपत्ति भी नहीं हुई, क्योंकि मिथ्याभूतसे भी यथार्थज्ञान उत्पन्न होता है, यह पहले दिखलाया ही है॥ २६-३७ ॥ स किं सकलसंसारप्रविविक्तमात्मानं वाक्यात्प्रतिपद्यत उत नेतीति १ अत्र ब्रूम:। कूटस्थाऽवगतिमात्रशेषत्वात्प्रतिपत्तेरत आह- दएडावसाननिष्ठः स्याद् दएडसर्पो यथा तथा। नित्याऽवगतिनिष्ठं स्याद् वाक्याज्जगदसंशयम्॥ ३८।। शङ्का-अच्छा, इस प्रकार ज्ञानकी उत्पत्ति हो। परन्तु इस प्रकार ब्रह्मका ज्ञान क्या प्रपञ्चसे भिन्न होता है या अभिन्न ? प्रथम पक्षको अ्रङ्गीकार करिये तो अद् तका भज्ग हो जायगा और द्वितीय पक्षके माननेसे ब्रझ्ममें सप्रपञ्चता हो जायगी! समाधान-प्रपञ्च आत्मामें अविद्यासे कल्पित है, इसलिए उससे भेद कि वा अमेद दोनों ही मिथ्या हैं। अतएव वाक्यसे जो बोध होता है, वह केवल शुद्ध चैतन्य- १-गुरुशाखं, भी पाठ है। २-शेषमात्रत्वात्, ऐसा पाठ भी है।

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१५८ नैष्कर्मर्यसिद्धि:

मात्ररूपको विषय करनेवाला होता है। जैसे दएडमें कल्पित सर्पका पर्यवसान दएड ही अवशेष होना है, न कि उस दएडमें कल्पित सर्पकी सत्ता या असत्ता है। क्योंकि सर्प ही नहीं है, तो उसका अभाव भी एक पदार्थ कहाँसे रहेगा। वैसे ही जगत्का केवल ज्ञानरूप ब्रह्ममें ही पर्यवसान है॥ ३८ ॥ कुत एतत् यस्मात्- पश्यन्निति यदाहोच्चैः प्रत्यक्त्वमजमव्ययम्। अपूर्वानपरानन्तं त्वमा वदुपलक्ष्यते ॥ ३९ ॥ शङ्का-किस प्रमाणसे यह सिद्ध होता है? समाधान-क्योंकि "सुषुप्ति अवस्थामें जो द्रष्टा किसी विषयको नहीं जानता, वह स्वयम्प्रकाशरूप होता हुआ ही नहीं प्रकाश करता है, न कि वह जबरूप है, इस कारखसे। क्योंकि द्रष्टाकी स्वरूपभूत दृष्टिका लोप नहीं होता। उस अवस्थामें उससे कोई भिन्न वस्तु ही नहीं है, किसको प्रकाशित करे ?" इस प्रकार श्रुति मुक्तकएठसे आरत्माको सुषुप्ति अवस्थामें समस्त द्व तरहित, कूटस्थ, ज्ञानरूप बतलाती हैं। ऐसी जो उत्पत्तिरहित, द्वैतसे शून्य, कार्यकारणसे रहित और बाह्याभ्यन्तर शून्य प्रत्यक पदार्थ है, वही 'ह्वम्' पदसे लक्षित होता है॥ ३६ ॥ तत्वमस्यादिवाक्योत्थविज्ञानेनैव बाध्यते। यस्मात्- पूर्वोक्त युक्तिके अनुसार तत्त्वमसि इत्यादि वाक्योंसे उत्पन्न हुए तत्वज्ञानसे ही अरविद्याका नाश होता है। इसलिए वाक्यकी अपेक्षा है। अतएव वह व्यर्थ है, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए। अस्मादयदपरं रूपं नास्तीत्येव निरूप्यते। अन्यथाग्रहणाभावाद् बीजं तत्स्वमबोधयोः ॥४० ॥ शङ्का-यदि अरविद्याकी निवृत्ति 'तत्वमसि' वाक्यसे उत्पन्न तत्त्वश्ञानसे ही होती है, तब सुषुप्ति अवस्थामें निर्विशेष वस्तुकी सिद्धि श्रुतिने कैसे कहो? समाधान-सुषुप्तिमें विपरीत ज्ञानके न होनेसे द्व तरूप जाग्रत् औरर स्वप्न नहीं है। अतएव वहाँ इस प्रकृत आत्मस्वरूपसे अरतिरिक्त स्वरूप नहीं है, यह 'न तु तद्द्वितीय' इत्यादि श्रुतिने निरूपण किया है। न कि विपरीत ज्ञानकी कारए अविद्या नहीं है, इस अभिप्रायसे। क्योंकि स्वप्न और. जाग्रत् अवस्थाकी कारण जो अविद्या है, वह सुषुप्तिमें है ही, इसलिए उसकी निवृत्तिके लिए वाक्य भी सार्थक हुआ॥ ४० ॥ अस्यार्थस्य द्रढिस्ने उदाहरणम्- :- अजमद्दयम्, ऐसा पाठ भी है।

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माषानुवादसहिता १५९

कार्यकारणवद्धौ ताविष्येते विश्वतैजसौ। प्राज्ञ: कारणबद्धस्तु' द्वौ तौ तुर्ये न सिद्यतः । ४१॥ पूर्वोक्त अर्थकी पुष्टिके लिए गौड़पादाचार्यके वाक्यको प्रमाणरूपसे उद्धृत करते हैं-विश्व-जाग्रत् अवस्थाभिमानी आत्माऔर तैजस-स्वप्नावस्थाभिमानीं आ्रात्मा, ये दोनों विपरीत ज्ञान और अज्ञान, दोनोंसे बद्ध हैं। सुपुतिअवस्थाभिमानी प्राज्ञ तो केवल अज्ञानसे ही आवृत है। तुरीय अवस्थामें विपरीत ज्ञान और अज्ञान दोनों ही नहीं हैं।। ४१ ।। अन्यथागृह्तः स्वमो निद्रा तत्त्वमजानतः । विपर्यासे तयोः क्षीणे तुरीयं पदमश्नुते॥ ४२॥ (किस समय तुरीय पदकी प्राप्ति होती है, इस बातको आरचार्यने कहा है-) विपरीत ज्ञानसे स्वप्न होता है और केवल तत्वके अज्ञ.नसे निद्रा. अर्थात् सुपुप्ति होती है। इन दोनों अवस्थाओंका विपरीत ज्ञान और अज्ञानरूप विपर्यास जब तत्वज्ञानसे कषीख होता है, तब तुरीय पदकी प्राप्ति होती है॥ ४२ ॥ तथा भगवत्पादीयमुदाहरणम् सुषुप्ताख्यं तमोऽज्ञानं बीजं स्वमप्रबोधयोः। आत्मबोधप्रदग्धं स्याद् बीजं दग्धं यथाभवम्॥४३॥ भगवत्पूज्यपाद आचार्यने भी (उपदेश साहस्रीमें) ऐसा ही कहा है -- सुषुपित, तम, अज्ञान इन पर्यायवाची शब्दोंसे वाच्य जो अज्ञान (अग्रहण) स्वप्न और जाग्रत्का कारख है, बह स्वात्माके ज्ञानसे अतिशय दग्ध हो जानेपर दग्ध बीजके सदश पुनः संसाररूप अंकुरको नहीं उत्पन्न करता ॥४३॥ एवं गौडैर्द्राविडैर्न: पूज्यैरयमर्थः२ प्रभाषितः । अज्ञानमात्रोपाधि: सन्नहमादिदृगीश्वरः। ४४।। इस प्रकार हमारे पूज्य गौडपादाचार्य और द्राविड भगवत्पूज्यपादाचार्यने भी यही बात कही है कि-अज्ञानमात्र ही जिसकी उपाधि है, ऐसा परमात्मा अदङ्कारादि- का साक्षी होकर जीव रूपसे स्थित होता है॥ ४४ ॥ तत्राऽन्यथाग्रहणवद्न्यथाग्रहणबीजमग्रहणमनात्मधर्म एवेत्याह- इदं ज्ञानमहं ज्ञाता ज्ञेयमेतदिति त्रयम्। योऽविकारो विजानाति परागेवाऽस्य तत्तमः ॥४५॥ १-बुद्धौ तु, ऐसा पाठ भी है। २-पूर्वरयं, ऐसा पाठ भी है।

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२६० नैष्कर्म्यसिद्धि:

मिथ्याअज्ञान जैसे अनात्माका धर्म है, वैसे ही उसका कारण अज्ञान भी अना- समाका ही धर्म है, यह कहते हैं- ज्ञान (प्रमाख), ज्ञाता (अदङ्कार) तथा ज्ञेय इन तीनोंको जो अविकारी रहकर ही प्रकाशित करता है, उस आत्माके बाहर ही अज्ञानरूप तम रहता है, अर्थात् अज्ञान उस आात्माका स्वरूप भी नहीं हो सकता और धर्म भी नहीं हो सकता है॥५४। यत एतदेवमतस्तस्यैव वीजात्मनस्तमसश्चित्तधर्मविशिष्टस्य स्वकार्यद्वितीयाभिसम्बन्धो न त्वविकारिण आत्मन इत्याह दृष्टान्तेन- रूपप्रकाशयोर्यद्वत्सङ्गतिविंक्रियावतोः। सुखदुःखादिसम्बन्धश्चितस्यैवं विकारिणः ॥४६ ॥। चूँकि विकाररहित ही आत्मा इन पूर्वोक्त तीनोंको जानता है, अतएच चित्त परिषामोंसे विशिष्ट बीजरूप अज्ञानका ही स्वकार्यरूप द्वितीयके साथ (साक्षात्) सम्बन्ध होता है, न कि अविकारी आ्र्त्माका ? उसका सम्बन्ध तो श्रज्ञानोपाघिसे उत्पन्न हुए चिशरूप उपाधिके द्वारा ही होता है, स्वभावसे नहीं ; इस बातको दृष्टान्त द्वारा समझाते हैं- जैसे रूप और प्रकाश, ये दोनों ही विकारी हैं, अतएव उन दोनोंका परस्पर सन्त्रन्ध होता है। वैसे ही सुखदुःखादिसे सन्बन्ध विकारी चित्तका ही होता है आत्माका नहीं ॥ ४६॥ तदेतदन्वयव्यतिरेकाभ्यां दर्शयिष्यन्नाह- सम्प्रसादेऽविकारित्वादस्तं याते विकारिणि। पश्यतो नात्मन: किश्चिद्द्वितीयं स्पृशतेऽरवपि॥४७॥ चित्तके साथ सम्बन्ध रहनेसे ही आत्माका दुःखादिके साथ सम्बन्ध होता है, उसके न रहनेसे नहीं होता। इस कही हुई बातको अन्वय-व्यतिरेकसे दिखलाते हुएं कहते हैं- जव सुषुप्ति समयमं विकारी चित्त अस्तको प्राप्त होता है, तब अविकारी और अलुप्तदृष्टि स्वरूप, प्रकाशमय आरत्माके साथ किञ्चिन्मात्र भी द्वैतका स्पर्श नहीं होता।४७।। सोडयं कूटस्थज्ञानमूर्तिरात्मा- यथा प्राज्ञे तथवाऽयं स्वम्नजागरितान्तयोः। पश्यन्नप्यविकारित्वाद् द्वितीयं नैव पश्यति ॥४८ ।। श्रतः यह कूटस्थ ज्ञानस्वरूप आरत्मा जैसे सुषुप्ति अवस्थामें अरविकारी :- विक्रियावतः, ऐसा पाठ भी है।

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भाषानुवादसहिता १६१

होनेसे देखता हुआ भी द्वितीय वस्तुको नहीं देखता। वैसे ही स्वप्न और जाग्रत् त्र्वस्थामें भी द्वैतको नहीं देखता ?॥ ४८।। एवं ज्ञानवतो नास्ति ममाऽहंमतिसंश्रयः । भास्वत्प्रदीपहस्तस्य ह्यन्धकार इवाऽग्रत:॥ ४९॥ इस प्रकार आ्र््रत्मस्वरूपका ज्ञान जिस पुरुषको हो गया है उसको प्रकाशमान दौपकको हाथमें रखनेवाले पुरुषके सामने जैसे अन्धकार नहीं रह सकता। वैसे ही, अहम् मम, ऐसी बुद्धि कभी नहीं होती।। ४६ ।। तत्र दष्टान्त :- आ प्रबोधाद्यथाऽसिद्धिर्द्वैतादन्यस्य वस्तुनः । वोधादेवमसिद्धत्वं बुद्धयादेः प्रत्यगात्मनः ॥५०॥- इस विषयमें अन्य द्ष्टान्त देते हैं -- जैसे जब तक बोध नहीं होता, तभी तक द्वैतसे भिन्न अर्थात् अद्वितीय वस्तुकी अ्सिद्धि है। वैसे ही ज्ञान होनेके बाद प्रत्यगात्मा के साथ बुद्धयादिका सम्बन्ध भी नहीं होता॥ ५० ॥ स एष विद्वान् हानोपादानशून्यमात्मानमात्मनि पश्यन्- सर्वमेवाऽनुजानाति सर्वमेव निषेधति। भेदात्मलाभोऽनुज्ञा स्यान्निषेधोऽतत्स्वभावतः ।५१॥ पूर्वोंक्त तर्वज्ञानी पुरुष जो हेय भी नहीं है और उपादेय भी नहीं है ऐसे आत्माको अपना स्वरूप समझता हुआ- द्वतप्रपञ्चकी अ्रप्रनुज्ञा भी करता है और समस्त वस्तु का निपेध भी करता है। व्यवहार टष्टिसे द्वैतप्रपञ्चका स्वरूप्लाभ ही अनुज्ञा कहाती है। तत्वदृष्टिसे उस प्रपञ्चका न होना ही निषेध कहाता है॥ ५१॥ सर्वस्योक्तत्वादु५संहार :- परमार्थात्मनिष्ठं यत्सर्ववेदान्तनिश्चितम्। तमोपनुद्धियां ज्ञानं तदेतत्कथितं मया॥५२॥ जो कुछ कहना था, वह सब कहा गया। इसलिए अब उपसंहार करते हैं- जो समस्त वेदान्तोंसे निश्चितरूपसे उत्पन्न हुश अन्तःकरणके अन्धकार को निवृत्त करने वाला आष्माका तत्वज्ञान है, वह सब इस प्ररणमें मैंने कह दिया है, अर्थात् इससे ततिरिक्त कुछ जीवोंके लिए ज्ञातव्य या कथनीय अवशिष्ट नहीं है॥५२॥ १-तमोपनुद्धि यज्ज्ञानं, पाठ भी है।

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१६२ नैष्कर्म्यसिद्धिः

एतावदिहोक्त्तम्-

इत्यजानन् विजानाति यः स ब्रह्मविदुत्तमः ॥५३॥ [ साङ्गयवादियोंके समान नानात्मवादकी शङ्का को निवृत्त करनेके लिए फिर भी उक्त अरथका संग्रह करके उसे दिखाते हैं-] इस प्रकरणमें यह कहा गया है कि- मुझसे अन्य कोई ब्रह्मवेत्ता नहीं है और मुझसे ततिरिक्त अज्ञ भी कोई नहीं है अर्थात् ज्ञान और अज्ञानका आश्रय मैं ही हूँ। इस प्रकारसे अद्वितीय आत्माको वृत्तिज्ञानसे विषय न करते हुए-केवल स्वरूप चैतन्यके द्वारा स्वप्रकाश रूपसे जो जानता है, वह पुरुष व्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ है॥ ५३॥ एवमात्मानं ज्ञात्वा किं ग्रवर्तितव्यमुत निवर्तितव्यमाहोस्वि- न्मुक्त प्रग्रहतेति ? उच्यते- ज्ञेयाऽभिन्नमिंद यस्माद् ज्ञेयवस्त्वनुसार्यतः। न प्रवृत्तिं निवृर्त्ति वा कटाक्षेणाऽपि वीक्षते ॥ ५४ ॥ इस प्रकार तत्वविचारको समाप्त करके तत्त्ववेत्ताकी (ब्रह्मवेत्ताकी) चर्याका निरूपख करते हुए विकल्प करते हैं कि "ज्ञानोत्तर कालमें ब्रह्मज्ञानीको वर्णांश्रम धर्मों में प्रवृत होना चाहिये? या उनसे निवृत्ति ही उचित है ? अथवा उसको स्वच्छन्द वर्त्ताव करना चाहिए ?" इसका उत्तर देते हैं- चूँकि यह ज्ञान ज्ञेय वस्तु, जो अद्वितीय चैतन्य है, से अभिन्न है। अतएव उसी का अनुकरस करता है और चैतन्य प्रवृत्ति एवं निवृत्तिसे शून्य है। इस कारण ब्रह्मवेत्ता उसी रूपसे स्थित होता है। प्रवृत्ति और निवृत्ति, किसीको कटाक्षसे भी नहीं देखता॥५४॥ कुत एतज्ज्ञेयाऽभिन्नमिति ? यतः- प्रागात्मवोधाद् बोधोऽयं बाह्यवस्तूपसर्जनः२ । प्रध्वस्ताऽखिलसंसार आत्मैकालम्बनः श्रुतेः3 ॥ ५५॥ शङ्का-ज्ञान श्ञेयभूत चैतन्यसे अभिन्न है, इसमें क्या कारण है? समाधान-चूँकि आत्मज्ञान होनेके पूर्व यह ज्ञान बाह्य वस्तुको विषय करता था, इसलिए भेद था। जब्र कि श्रुतिके द्वारा तत्वज्ञानका उदय होकर

१-न मत्तोऽन्योऽस्ति, पाठ भी है। २-बाह्यवस्तूप्सर्ननम्, पाठ भी है। ३-आत्मैकालम्बनं श्रुतेः, ऐसा पाठ भी है।

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माषानुवादसहिता १६३

सम्पूर्ण संसार का नाश हो चुका, तब केवल एक आत्मा ही अवशिष्ट रह जाता है।। ५ू५ू।। एवमवगतपरमार्थत्त्वस्य न शेषशेषिभावस्तत्कारणस्योत्सा- रितत्वादित्याह- वास्तवेनैव वृत्तेन निरुणद्धि यतो भवम्। निवृत्तिमपि मृद्नाति सम्यग्बोधः प्रवृत्तिवत् ॥५६ ॥ इस प्रकार आत्मतत्वके यथार्थज्ञानवाले पुरुषका किसी विधिके साथ शेषशेषी भाव नहीं है। क्योंकि विघिसे प्रवृत्ति उत्पन्न होनेके लिए जो अथित्वादि उपेक्षित है उसका कारण अविद्या है, वह तत्वज्ञानसे निवृत्त हो गई है, यह कहते हैं- चूँकि तत्त्वज्ञान प्रवृत्ति और निवृत्तिसे शून्य आत्मवस्तुके अरनुरोधसे संसारको नष्ट कर देता है। इसी कारख ज्ञानी पुरुषकी जैसे विधिसे प्रवृत्ति नहीं होती, वैसे ही निवृत्ति भी नहीं होती। केवल वस्तु-स्वभावसे ही अमानित्वादि धर्म उसमें रहते हैं॥ ५६॥ सकृदात्मप्रसूत्यैव निरुणद्यखिलं भवम्। ध्वान्तमात्रनिरासेन न ततोऽन्यान्यथामतिः। ५७।। तत्बज्ञानकी उत्पत्तिमात्रसे ही अरविद्याकी निवृत्ति हो जाती है, यह अ्रन्वय और व्यतिरेकसे ही लोकमें सिद्ध है। अतएव आरत्मतत्वका यथार्थज्ञान अपनी उत्पत्तिसे ही उसी त्ण मिथ्याज्ञान और तजन्य संस्काररूप सकल जगत्को नष्ट कर डालता है। उसके लिए अरभ्यास आदिकी आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि मिथ्याज्ञान आदि तविद्याका कार्य है; इसलिए अविद्याके नष्ट होते ही सारा जगत् नष्ट हो जाता है। अतः इस अवसरमें विधिका अवकाश ही नहीं है॥ ५७॥

नानुत्पन्नमदग्धं वा ज्ञानमज्ञानमस्त्यतः ॥ ५८ ॥ लोकमें जो घटादिज्ञान उत्पन्न होते हैं, वे तत् तत् देश और कालसे नियत अपने अपने विषयोंके अज्ञानका ही निराकरण करते हैं, न कि सकल अज्ञानका ! इसका कारण यह है कि वे समस्त ज्ञान देश, काल, अवस्थादिसे परिछिन्न हैं तरर जब हैं। आत्मा तो अविद्याकार्य देशकालादिके संसर्गसे रहित और स्वयम्प्रकाश है। अतएव उसमें अन्य अनिवृत्त अज्ञान या उसे निवृत्त करनेके लिए अपेक्ित अनुत्पन्न ज्ञानान्तर भी नहीं है॥ ५८ ॥

१-देशकालाद्यसंबन्धान्, और 'देहादेः, ऐसा पाठान्तर भी है।

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१६४ नैष्कम्यसिद्धि:

सम्यग्ज्ञानशिखिप्लुष्टमोहतत्कार्यरूपिणः सकृन्निवृत्तेर्वाध्यस्य किं कार्यमवशिष्यते॥५९॥ तत्वज्ञानरूप अरप्रभनिसे जिसका त्र्प्रज्ञान औरप्रर उसका कार्य दग्ध हो चुका है, बाध करने योग्य सम्पूर्ण प्रपञ्च एक बार ही निवृत्त हो चुका है, उस आरत्माका फिर क्या कर्तव्य अवशिष्ट है? (अतएव ऐसे पुरुषको फिर कोई विधि प्रेरित नहीं कर सकती, यह ठीक ही कहा है।) ॥ ५६ ॥ वास्तवेनैव वृत्तनाऽविद्यायाः प्रध्वस्तत्वान्न किश्चिदवशिष्यत इत्युक्त: परिहारः । अथाऽपरः साम्प्रदायिक :- निवृत्तसर्पः सर्पोत्थं यथा कम्पं न मुञ्चति। विध्वस्ताऽखिलमोहोऽपि मोहकार्य तथात्मवित॥ ६०॥ यथार्थरीतिसे विचार करनेपर अविद्याके बिलकुल ही नष्ट हो जानेके कारण ज्ञानीका किञ्चित् भी कर्तव्य अ्ररवशिष्ट नहीं है, ऐसा परिहार कर दिया। अब जीवन्मुक्ति पक्षको स्वीकार करके सम्प्रदायप्रसिद्ध दूसरा भी परिहार बताते हैं- जैसे रज्जुके तत्वज्ञानसे सर्पभ्रान्तिकी निवृत्ति हो जानेपर भी उससे उत्पन्न हुए भय- कम्पादिसे कुछ काल तक पुरुष युक्त ही रहता है। वैसे ही आत्मज्ञानी अविद्या और उसका सम्पूर्ण कार्य बाधित होनेपर भी कुछ देर तक, प्रारब्ध फलके भोग पर्यन्त, संसार- कार्यों से युक्त रहता है॥ ६० ॥ यतः प्रवृत्तिबीजमुच्छिन्नं तस्मात्- तरोरुत्खातमूलस्य स्पर्शेनैव१ यथा क्षयः । तथा बुद्धात्मतत्च्वस्य निवृत्त्यैव तनुक्षयः ॥६१।। चूँकि सारे प्रवृत्तिके कारण अ्रविद्या, काम आदि तत्वज्ञानसे उच्छिन्न हो जाते हैं, अतएव- जिस बृक्षकी जढ़ कट गई हो, उसका क्षय जैसे हस्तके स्प्शसे ही हो जाता है। ऐसे ही ज्ञानीके प्रातिभासिक शरीरादिका क्षय केवल निवृत्तिसे ही हो जाता है ॥ ६१॥ अथालेपकपक्षनिरासार्थमाह- बुद्धाउद्वैतसतच्वस्य यथेष्टाचरणं यदि। शुनां तत्त्वदशां चैव को भेदोऽशुचिभक्षणे ॥६२ ॥ यदि कोई कहे कि "तश्ववेत्ताकी प्रवृत्ति विधि-निमित्तक न मानी जाय तो

१-शोषेगौव, ऐसा पाठ भी है।

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माषानुवादसहिता १६५-

फिर रागद्वषादि निमित्तसे ही माननी पड़ेगी। तब तो दथेच्छाचार करनेपर भी तत्त्वज्को कोई दोष नहीं प्राप्त होगा ?" तो इस शंकाके निराकरणके लिए कहते हैं- अद्वैत आ्रत्माके यथार्थ स्वरूपको जान लेनेपर भी यदि यथेष्टाचरण होने लगे, तो फिर अशुचि पदार्थका सेवन करनेमें तत्वज्ञानी और कुत्ते एक सरीखे हो जाएँगे। इसलिए ऐसा नहीं माना जाता। संस्कारवशसे भी तत्तवज्ञानीकी प्रवृत्ति मनुष्यत्व जात्युचित कर्मो में नहीं होती। किन्तु वर्णाश्रमधर्मों के संस्कारवश प्रातिभासिक वर्षाश्रमोचित ही होती है! इसलिए ज्ञानीका यथेष्टाचरण कदापि नहीं हो सकता?॥६२॥ कस्मान्न भवति ? यस्मात- अधमाज्जायते ज्ञानं यथेष्टाचरणं ततः। धर्मकार्ये कर्थ तत्स्याद् यत्र धर्मोऽपि नेष्यते॥ ६३.॥ शङ्का-वर्णाभ्रमाभिमान तो आगन्तुक है, जात्यभिमान स्वाभाविक है। इसलिए संस्कारके बलसे मनुष्यत्व जात्युचित ही प्रवृत्ति क्यों नहीं होती ? समाधान-इसलिए कि जन्म जन्मान्तरमें किये हुए अधमसे (पापोंसे) अज्ञान अर्थात् शरभक्य-भक्षणादिमें कर्तव्यताबुद्धि होती है, अज्ञानसे फिर यथेष्टाचरण होता है। तत्वज्ञान तो अरनेक जन्भोंमें किए सुकतोंसे होता है, धमसे ही सुख और ज्ञान होता है। तो फिर जिसके (ज्ञानके) होनेसे कामादि दोषोंका अत्यन्त उच्छेद हो जानेके कारण धर्माचरसमें भी प्रवृत्ति नहीं होती। भला, उस ज्ञानके उदय होनेपर यथेष्टाचरण कैसे हो सकेगा? (अर्थात् तत्त्ववेत्ताके तो ततीत अनेक जन्मोंमें भी यथेष्टाचरणकी वार्ता तक नहीं है। अतएव उसके संस्कार भी नहीं हैं, इसलिए उसका यथेष्टाचरण नहीं हो सकता !) ॥ ६३ ॥ प्रत्याचक्षाण आहाऽतो यथेष्टाचरणं हरिः। यस्य सर्वे समारम्भाः प्रकाशं चेति सर्वददक॥ ६४ ॥ इसीलिए भगवान्ने गीतामें ज्ञानीके यथेष्टाचरणका खएडन करनेके लिए . ज्ञानीका लक्षण ऐसा बतलाया है कि-"जिसके सब कार्य काम संकल्पसे वर्जित होते हैं," "जो सत्व, रज और तमोगुखके कार्यों-प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह-में आरसक्ति या द्वष नहीं करता वह गुखातीत कहाता है।" ॥ ६४ ॥। तिष्ठतु तावत् सर्वप्रवृत्तिबीजघस्मरं ज्ञानं, मुमुक्ष्ववस्थायामपि न सम्भवति यथेष्टाचरणम्। तदाह-

१-सत्यदकू, ऐसा पाठ भी है।

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यो हि यत्र विरक्त: स्यान्नाऽसौ तस्मै प्रवर्तते। किमितीहते ॥ ६५॥ अस्तु, तत्वज्ञान तो समस्त प्रवृत्तिके बीजको ही भस्म कर देता है, इसलिए उसकी तो बात रहे। जब कि मुमुत्तु अवस्थामें भी यथेष्टाचरए नहीं हो सकता, तब ज्ञान होनेपर कैसे होगा? क्योंकि जो जिस विषयमें विरक्त है, वह उसके साधनमें प्रवृत्त नहीं होता। मुमुत्तु तो लोकत्रयसे विरक्त है, तब वह उसमें क्यों प्रवृत्त होगा? अर्थात् मुमुत्तु भी जिस विषयमें चेष्टा नहीं करता है, उसमें मुक्त पुरुष चेष्टा नहीं करता, इसमें तो कहना ही क्या है१॥ ६५ ॥

तत्र दष्टान्त :- -क्षुधया पीड्यमानोऽपि न विषं हयत्तुमिच्छति।

इस विषयमें दृष्टान्त देते हैं- जैसे कुधासे पीडित भी मनुष्य उसे शान्त करने के लिए विष नहीं खाना चाहता तो फिर जब मिष्टान्नके भक्षण करनेसे क्षुधा निवृत्त हो चुकी, तब भला वह विष खानेमें कैसे प्रतृत्त हो सकता है ? वैसे ही मुमुक्तुदशामें वर्तमान यह पुरुष ऐहिक और पार- लौकिक सुखोंसे विरक्त होकर जब उनके साधनीमे नहीं प्रवृत्त हुआ, तब फिर ब्रह्मानन्दका अनुभव करनेके बाद वह विषयसुखोंमें प्रवृत्त होंगा, यह बात सम्भावित भी नहीं हो सकती? ॥ ६६ ॥ यतोऽवगतपरमार्थतत्त्वस्य यथेष्टाचरणं नमनागपि घटते मुमु- क्षुत्वेऽपि च तस्मात् - रागो लिङ्गमवोधस्य चित्तव्यायामभूमिषु । कुतः शादलता तस्य यस्याऽगि: कोटरे तरोः ॥ ६७॥ क्योंकि परमार्थ तत्वके ज्ञाता (तत्ववेत्ता) का एवं मुमुत्तु अवस्था में वर्तमान पुरुष का भी किश्चिन्मात्र भी यथेष्टाचरण नहीं हो सकता, इसलिए- चित्तकी स्वतःप्रवृत्तिके आरलम्बनभूत-शब्दादिविषयोंमें जो अनुराग होता है उसको अज्ञानका चिह्न समझना चाहिए, क्योंकि जिस वृक्षके कोटरमें अ्रगनिका निवास रहता है, उसमें हरियाली कैसे शर सकती है? ॥६७॥

१- तत्र प्रवरतते, ऐसा पाठ मी है। २-मृष्टानं, ऐसा पाठ भी है

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माषानुवादसद्वित। १६७

सकलपुरुषार्थसमाप्तिकारिणोऽस्याऽत्मावबोधस्य कुतः प्रसूति- रिति। उच्यते- अमानित्वादिनिष्ठो यो यश्चाउद्वेष्ट्रादिसाधनः । ज्ञानमुत्पद्यते तस्य न वहिमुखचेतसः ॥ ६८॥ समस्त पुरुषार्थ को समाप्त करने (मनुप्यको कृतकृत्य कर देने) बाला यह आ्रत्म- ज्ञान कैसे उत्पन्न होता है, यह बात कहते हैं- जो पुरुष गीतोक्त 'अमानित्व आदि गुणों से युक्त' तथा 'अद्ष्टृतव आरदि साधनोंसे सम्पन्न है, उसे यह ज्ञान होता है। जो ब्हिर्मु है उसको नहीं होता ॥ ६७ ।। उत्पन्न आत्मविज्ञाने किमविद्याकार्यत्वात प्रवृत्तिवन्निवृत्त्यात्म- काऽमानित्वादयो निवर्चन्ते उत नेति। नेति ब्रमः । किं कारणम्? निवृत्तिशास्त्राSविरुद्धस्वाभाव्यात्वरमात्मनो न तु नियोगवशात्। कथं त्हिं। शृणु- उत्पन्नाऽडत्मप्रबोधस्य त्वद्वेष्टृत्वादयो गुणाः । अयत्नतो भवन्त्यस्य न तु साधनरूपिण ॥ ६९।। शङ्का-अच्छा, आत्मज्ञानके उत्पन्न होनेपर अ्रविद्याके निवृश हो जाने से उसका कार्य प्रवृत्ति जैसे नहीं होती, वैसे ही निवृत्तिरूप अमानित्वादि गुख भी निवृत्त हो जाते हैं या नहीं निवृत्त होते ? समाधान-नहीं निवृत होते, क्योंकि आत्माका स्वभाव निवृत्तिशास्त्रके अनु. कूल है, अतएव उसमें अमानित्वादि गुख विधिके बशसे नहीं रहते। तब कैसे रहते हैं ? यह सुनिए -- आत्मतस्तके ज्ञातामें अद्वष्टत्वादि गुर प्रथत्नके ही बिना सिद्ध रहते हैं। साधन अवस्थामें जैसे प्रयत्नसे उनका सम्पादन करना पड़ता है, सिद्धावस्थामें वैसे नहीं ॥ ६९ ॥ यत एतदेवमतः- इमं ग्रन्थमुपादित्सुरमानित्वादिसाधनः - यत्नतः स्यान्न दु्वृत्तः प्रत्यग्धर्मानुगो ह्ययम् ॥ ७० ॥ जब साधकके साधनरूपसे और सिद्धके सिद्धरूपसे ये अरमानित्वादि लक्षण हैं भ्रतएव- इस ग्रन्थको ग्रहण करनेकी इच्छा करनेवाला पुरुष भी यत्नपूर्वक त्ररमानिश्वादि

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१६८ नैष्कर्म्यसिद्धि:

साधनोंका सम्पादन करे, दुराचरण कदापि न करे। क्योंकि यह ग्रन्थ आत्मस्वरूपका अनुकरण करनेवाला है॥ ७० ॥ न दातव्यश्चायं ग्रन्थ :- नाऽविरक्ताय संसारान्नाऽनिरस्तैषणाय च । न चाऽयमवते देयं वेदान्तार्थप्रवेशनम् ॥ ७१॥ गुरुजनों को भी इस ग्रन्थका अध्यापन ऐसे पुरुषको नहीं कराना चाहिए जो कि संसारसे विरक्त न हुआ हो, जिसकी इच्छाएँ निबृक्ष न हुई हों और जो अ्हिंसा आदि यमोंसे सम्पन्न न हो उसको भी वेदान्तप्रतिपाद् विषयमें चित्तको प्रवेश कराने- वाला यह ग्रन्थ नहीं पढाना चाहिए।। ७१।। ज्ञात्वा यथोदित सम्यग्ज्ञातव्यं नाऽवशिष्यते। न चाऽनिरस्तकर्मेदं जानीयादञ्जसा ततः ॥ ७२॥ इस ग्रन्थमें जैसा प्रतिपादन किया है, वैसा जान लेनेसे फिर कुछ भी ज्ञातव्य अवशिष्ट नहीं रहता। और जिसने सर्व कर्मोंका संन्यास नहीं किया है, बह अनायाससे इस ग्रन्थके मर्मको नहीं समझ सकता। अतएव ॥ ७२॥ निरस्तसर्वकर्माणः प्रत्यक्प्रवणवुद्धयः निष्कामा यतयः शान्ता जानन्तीदं यथोदितम्॥ ७३॥ जिन्होंने (विधिपूर्वक) सर्व कर्मोंका संन्यास किया हो, जिनकी बुद्धि (एकमात्र) आत्माकी ओर लगी हो, तथा जिनके अन्तःकरणके धर्म-कामादि दोष-दूर हुए हों, जिनका मन विक्षित न हो वे विरक्त शान्त पुरुष ही इस ग्रन्थके यथोक्त मर्मको अच्छे प्रकारसे समझ सकेंगे॥ ७३ ॥ श्रीमच्छङ्करपादपद्मयुगलं संसेव्य लब्ध्ोचिवान् ज्ञानं पारमहंस्यमेतदमलं स्वान्तान्धकारापनुद्। माभूदत्र विरोधिनी मतिरतः सद्भिः परीक्ष्यं बुधैः सर्वत्रैव विशुद्धये मतमिंद सन्तः परं कारणम्॥ ७४॥ मैंने श्रीमत्पूज्यपाद भगवान् श्रीशङ्कराचार्य गुरुवर्यके चरणारविन्दकी निष्कपट सेवा करके हृदयके अन्धकारको दूर करनेवाला, निर्मल परमहंमरूपताको देनेवाला जो ज्ञान प्राप्त किया, उसीको इस ग्रन्थ रूपसे प्रतिपादन किया है। इसलिए इस ग्रन्थपर कोई भी पुरुष दोषदृष्टि न करें। किन्तु महात्मा लोग प्रयत्नसे इसकी परीक्षा करें। क्योंकि महात्मा पषि्डितजन ही गुण अथवा दोषोंको सिद्ध करनेमें प्रमाण हैं॥ ७४॥ १-निरस्य सर्वकर्माणि, ऐसा भी पाठ है।

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भाषानुवादसहिता १६९

सुभाषितं चार्वपि नाऽमहात्मनां दिवाकरो नक्तदशामिवाऽमलः । प्रभाति भात्येव विशुद्धचेतसां निधिर्यथाऽपास्ततृषां महाघनः ॥ ७५॥ अत्यन्त सुन्दर भी कथन क्यों न हो, तथापि जो महात्मा नहीं हैं उनको वह अच्छा नहीं मालूम पड़ता। जैसे कि दिवान्धोंको (उल्लुओंकों) निर्मल प्रकाशमान भी सूर्य नहीं दीख पड़ता। परन्तु जिनके अन्तःकरण स्वच्छ हैं, उनको इसका ज्ञान होता ही है। जैसे कि तृष्खाका परित्याग किए हुए विरक्त महापुरुषोंको बड़ी-बड़ी निधियाँ दीख पड़ती हैं।। ७५॥ विष्णो: पादानुगां यां निखिलभवनुदं शङ्करोवाप योगात् सर्वज्ञं ब्रह्मसंस्थं मुनिगणसहितं सम्यगभ्यर्च्य भक्त्या। विद्यां गङ्गामिवाऽहं प्रवरगुणनिधेः प्राप्य वेदान्तदीप्ां कारुण्यात्तामवोच जनिमृतिनिवहध्वस्तये दुःखितेभ्य:॥७६॥। जिस प्रकार सर्वव्यापक भगवान् विष्णुके पादपम्मसे विनिःसृत एवं संसारके समस्त दुःखोंको मिटा देनेवाली जिस गङ्गाको भगवान् श्रीशङ्करने अपने योगके प्रभावसे प्राप्त किया, तत्पश्चात् उसी (गङ्गा) को महाराज भगीरथने, मुनिगए सहित उन सर्वज्ञ, परब्रह्मस्वरूप भगवान् शङ्करका भक्तिपूर्वक आराधन करके उनसे प्राप्त कर करुखावश लोककल्याखार्थ उसे संसारमें प्रकट किया। इसी प्रकार-जगत्कारण परमात्माके अधिष्ठान सच्चिदानन्द ब्रह्मका अनुभव करनेवाली तथा (गङ्गाजीके समान) सम्पूर् सांसारिक दुःखोंको दूर कर देनेवाली जिस ब्रह्मविद्याको अपने योगसामर्थ्यसे आचार्य शङ्करने प्राप्त किया। उसी वेदान्तप्रतिपादित ब्रह्मविद्याको उन सर्वज्ञ, ब्रह्निष्ठ, मुनिगण के सहित आचार्य शङ्करका भक्तिपूर्वक पूजन करके उनसे प्राप्त करके करुणावश संसारके दुःखोंसे दुःखित हुए लोगोंके जन्ममरणरूपी महादुःखको मिटाने- के लिए मैंने उसका इस ग्रन्थमें प्रतिपादन किया है॥ ७६ ॥ वेदान्तोदरवर्तिभास्वदमलं ध्वान्तच्छिदस्मद्वियो दिव्यं ज्ञानमतीन्द्रियेऽपि विषये व्याहन्यते न क्वचित्। यो नो न्यायशलाकथैव निखिलं संसारबीज तमः प्रोत्सार्याSSविरकारषीदू गुरुगुरु: पूज्याय तस्मै नमः॥७७॥ जो (ज्ञान) वेदान्त शास्त्रके अन्दर अत्यन्त गूढ़ है, जो सबका प्रकाशक एवं

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१७० नैष्कम्यसिद्धि:

अतीव निर्मल, विशुद्ध सत्यरूप है, जो हम लोगोंकी बुद्धिके आवरक अज्ञानरूप अन्धकारको दूर करनेवाला है तथा जो अतीन्द्रिय है, किसी विषयमें भी प्रतिहत नहीं होता अर्थात् जो समस्त वस्तुओंका ज्ञान कराता है, ऐसा दिव्य ज्ञान सम्पूर्ण संसारके बीज अज्ञानको दूर हटाकर जिस सद्गुरुने न्यायरूपी शलाकासे हमारे हृदयमें प्रकट किया, उस जगद्वन्दनीय गुरुशंके गुरु आचार्य श्रीशङ्करको इमारा प्रखाम है। ७७॥ सम्बन्धोक्तिरियं साध्वी प्रतिश्लोकमुदाहृता। नैष्कर्म्यसिद्धेर्ज्ञात्वेमां व्याख्याताऽसौ भवेद् ध्रुवम्।७८।। इति श्रीमत्परमहंसपरित्राजकाचार्यश्रीमच्छङ्करपूज्यपादशिष्य- श्रीसुरेश्वराचार्यविरचितायां नैष्कर्म्यसिद्धौ चतुर्थोऽध्यायः

नैष्कर्म्य-सिद्धिके प्रत्येक श्लोककी यह सङ्गति मैंने कही है, जो इसको अच्छे प्रकारसे सभुझ लेगा, वह अवश्य इस ग्रन्थका व्याखयान कर सकता है॥ ७८ ॥

धर्मशास्त्राचार्य परिडत श्रीप्रमवल्लमत्रिपाठिशास्त्रिविरचित नैष्कर्म्यसिद्धि के भाषानुवादमें चतुर्थ अध्याय समाप्त

समाप्ोऽयं अ्न्थः।

१-ष्याख्यातास्य, ऐसा भी पाठ है।

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नैष्कर्म्यसिद्धिश्लोकानुक्रमणिका

त०श्लो० श्र० श्लो० अकुवतः क्रिया: कान्याः १० अन्यथा गृहतः स्वप्न: ४ ४२ अरगि: सम्यगधीतेऽसौ ३ अन्यस्यान्यात्मताप्रासी ९ ७१ अरज्ञात एव सर्वो उर्थ: ७ श्रन्वयव्यतिरेकाभ्यां निरस्य ५३ mY' w अज्ञातपुरुषाथत्वात् ८० अ्रन्वयव्यतिरेकाभ्यां विना २ अरज्ञानमनिराकुवत् ६५ अन्वयव्यतिरेकौ हि ४ २२

अज्ञानहानमात्रखात् २४ अरपविद्धद्वयो ऽप्येव ३ ६५ अतः सवाश्रमाणं तु अपश्यन्पश्यती २ ७१ अतः सर्वाश्रमाखां हि १ २१ अपहारो यथा भानो: २ ४६ अतिदुःस्थोप्रबोधोत्र ३ ११• अरपि प्रत्यक्षबाधेन ३ ६५ त्रपरतीतानागतेहत्यान् DY २ ७० अपूर्वाधिगमं कुर्वत् ८३ अन्नाभिदध्महे १ २३ श्रप्रमोस्थं प्रमोत्थेन १ १०४ प्रथाध्याश्मं १ ७६ अभूताभिनिवेशेन २ ५१ अद्धातममनादृस्य ३ ११७ अधर्माजायतेऽज्ञानं अभ्यासोपचयाद् बुद्धे: ३ ६० ४ ६३ अ्रधिचोदनं अभ्यासोरपाचता कृतस्नं ३ ६१

अ्रनात्मश्ञस्तथैवाडयं ४ ६७ अभ्रयानं यथा २ १०१

अनाश्मत्वं स्वतःसिद्धूं ४ ४ अरमानित्वादिनिष्ठो यः ४ ६६

प्रनादस्य श्रतिं मोहात् ३ ३४ अमुह्यमानो मुह्यन्तीं २ ७३

३ ७५ श्रयथावस्त्वविद्या १ ५६

४ १० अलब्ध्वातिशयं १ २

१ श्रवगत्यात्मनः २ ७५

प्र नुपक्रियमाणत्वात् ३ ६१ अ्रपवस्थादेशकालादि

अरनुमानप्रदीपेन ४ १५ तरत्रिक्रियस्य भोक्तत्वं २ ६३

अनुमानादयं भावात् ३ ११३ श्रविद्यानाशमात्रं २१०५

अ्रनेन गुपलेशेन ३ १०२ श्रविद्यानिद्रया सोडयं १११५

शन्तरेण विधि १ १६ श्रविविच्योभयं बक्ति ४ २०

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( २ )

अ०श्लो० अ०श्लो० अ्रसत्ये वर्त्मनि स्थित्ा ३ १०४ इमं प्राश्षिकमुत्सृज्य २ ५६ श्रसाधारणांस्तयोरधर्मान् ४ इममर्थ पुरस्कृत्य ४ १७ عر

ऋरस्तु वा परिणाम: २ (उ) त्रस्मादयदपरं रूपं ४ ४० उत्पत्तिस्थितिनाशेषु २ १११

अहंवृत्त्यैव तद्ब्रह्म ३ ४३ उत्पत्तिस्थि तिभंगेषु २ ७६

अहं दुःखी सुखी चेति ३ ४६ उत्पन्नाक्म प्रबोधस्य ४ ६६

अहं शब्दस्य या निष्ठा ४ २५ उत्पाद्यमाप्यं १ ५३

अहंधर्मस्त्वभिन्नः २ २८ उद्दिश्यमानं वाक्यस्थं ३ २५ अ्रहम: प्रत्यगात्माथः ३ ४० (ऊ)

तहंममत्वयत्नेच्छा २ २२ ऊध्व गच्छति धूमे २ ६२

अरहंमिथ्यामिशापेन २ ११६ (ऋ)

श्रहो धाष्टय मविद्यायाः ३ ११५ ऋते ज्ञानं न सन्त्यर्था: २ ६७

आ्रगमापायिनिष्ठत्वात् २ ३५ ( ए ) एकेन वा भवेन्मुक्ति: १ २५ श्रागमापायिहेतुभ्यां ३ २२ एवं गौडैद्राविडैर्न: ४ ४४ आरत्मनश्चेदहंधमः २ ३२ एवं चंक्रम्यमाणः १ ४२ आरत्मनश्रेन्निवार्यनते २११४ एवं ज्ञानवतो नास्ति ४ ४६ आंत्मना चाविनाभावं २ ५६ एवं तत्वमसीश्यस्मात् ३ ७० ३ ४२ ४ आत्मानात्मा च लोकेडस्मिन् एवं विज्ञातवाच्याथें २४ ४ ३ ४४ आप्रबोघादयथा सिद्धि: एवमेतद्धिरुक २ ४ ५० एष आत्मा स्वयंज्योतिः ३ ४१ आम्रायस्य क्रियार्थत्वात् १ १७ एष सर्वाधियां द्रष्टा आम्रादेः परिणामिख्वात् २ ३४ (ऐ) १ ५१ ऐकात्म्याप्रतिपत्तिः ७

आतमन्यदशेः २ ४२ (क) १ २० W इति हृष्टघियां १ २२ कर्मप्रकरणाकांचि १ ६३

इत्येवं चोदयेद्योपि ३ १०९ १ ३५

इत्योमित्यवबुद्धात्मा २ ११६ कल्पितानामवस्तुस्वात् २ ५०

इदं चेदनृतं ब्रयात् ३ ११६ काम्यकर्मफलम् ११

इदं ज्ञानमहं ज्ञाता ४ ४५ कार्यकारणबद्धौ तौ ४ ४१

इदं ज्ञानं भवेज्जातु: ३ ६० कुतो विध्येति चोदं स्यात ३ ११६

इदमित्येव बाह्येडयें ४ कुर्वन्नेवेह कर्माणि १

इमं ग्रन्थमुपादित्सुः ४ ७० कूटस्थबोधतोऽद्वैतं ३ १५

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( ३)

श्र०श्लो० अ्र०श्लो० कटस्थ बोध प्रत्यक्त्वं ३ ११ तदित्येतत्पदं लोके ३ २३ कृत्स्नानात्मनिवृत्तौ २ २ तदेतददवयं ब्रह्म २ ६३ क्षयो नित्येन तेषां १ तदो विशेषणाथरवं ३ २६

चुधया पीद्यमानोऽपि ४ ६६ तद्वत्सूद्मे तथा स्थूले २ १७

(ख) तमोङ्गलं यथा १ ७६ खानिलाग््यब्धरित्यन्तं १ १ तमोभिभूतचित्त: २ ३१ ६१ गुरूक्तो वेदराद्धान्तः (ग) तरोरुश्खातम्लस्य ४ १ ५ तत्मात्यक्तेन हस्तेन ४ २६ गृहीताहंपदार्थश्चत् ३ ४४ १ ग्राहकग्रहणग्राह्य २१०८ तस्माद्दुःखोदधेः ३७

( घ) तस्मान्मुमुत्तुभि: १ ५०

घटबुद्धघटाच्चार्थात् २ १०० तस्यैवं दुःखतप्तस्य १ ४५

घटादयो यथा लिङ्गं ३ ५६ तृष्णानिष्ठीवनैर्नात्मा ३ ४८

घटादिवच्च २ १६ ४ ε

चच्तुर्न वीक्षते शब्दं (च ) स्वमथस्यावबोधाय ३ १२६ ४ १२ त्वमित्यपि पदं ३ २४ चएडालबुद्द: २ त्वमित्येत द्विहायान्यत् ३ चतुर्भिरुह्यते २ २० בב (द ) चिन्निभेयमहंवृत्ति: ३ १०० दग्धाखिलाधिकारः १ ४०

('छ) दग्घृश्वं च यथा २१०२ छिस्वा त्यक्तेन हस्तेन ४ २६ दएडावसाननिष्ठः यात् ४ ३८ (ज) दशमोऽसीति वाक्योत्था ३ ३ १२२ पूह जिघ्राणीममहं गन्धं दाह्यदाहकतैकत्र ३ ३६ ४६ जिज्ञासोदर्शनं यद्धत् दिदक्षित परिच्छिन्न ३ 3 ६८ दुःखराशेविचित्रस्य २१०३ ज्ञातैवात्मा सदा ग्राह्यः ४ २६ दुःखितावगतिश्चेत्स्यात् ३ ज्ञात्वा यथोदितं सम्यक X ७२ दुःखी यदि भवेदात्मा २ ७६ ज्ञानं यस्य निजं रूपं ३ ११२ दुःख्यस्मीत्यपि चेद्ध्वस्ता ३ ६२ ज्ञानाष्फले ह्यवाप्ते १ ६० दुरितक्षपणाथत्वात् १ २६ ज्ञयाभिन्नमिदं यस्मात् ४ ५४ दगे का स्वभूतेषु २ ४७ (त) तत्वमर्थेन संपृक्त: दृश्यत्वादह मित्येषः ४ ३० ३ ७८ तत्वमस्यादिवाक्यानां १ ६र दश्यत्वाद्टवद् देह: ३ ५४

तश्पदं प्रकृतार्थ स्यात् ३ २ हश्या: शब्दादय: २ ४६

तथा पदपदार्थौ २ दश्यानुरक्त २ ५३

तदर्थयोस्तु निष्ठात्मा ३६ ७ दृष्टद्रष्टारमात्मानं २ ६२.

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४ )

अ०श्लो० त्र०श्लो० देश कालाचसंबद्दात् ४ ५ू नात्मना न तदंशेन २ २६ देहादिव्यवधानत्वात् २६ नाद्रचमइमित्यस्मिन् ४ २३ द्रष्टापि यदि दश्याया: २ ४० नामादिभ्यः परो भूमा २ ५७ द्रष्टृत्वं दृश्यता चैत्र २ २६ नामादिभ्यो निराकृत्य ३ १२० . द्रष्टृत्वनोपयुक्तत्वात् २ २७ नाडयं शब्द: कुती यस्मात् द्विषन्तीम द्विषन् २ ७२ नाडलुप्तदष्टेटश्यत्वं २ ४१ (ध) नाऽविरक्तस्य संसारात् २ ६ धर्मधर्मिंत्व मेदोऽस्पा: ३ १३ नाऽविरक्ताय संसारात् ४ ७१ घावेदिति न दानाथें १ ५७ नासन्नुपायो लोकेडस्ति ३ १०८ धीवन्नापेक्षते सिद्धिं २ ११० नाहंग्राहय २ AC ४ १३ नाहं न च ममात्मत्वात् २ ११७ (न) नित्यमुक्तत्वविज्ञानं ४ न कस्यांचिदवस्थायां ३१ ३ १४ न कृत्स्नकाम्यसंत्यागः निस्यानुष्ठानतः १३ १ न रन्यातिलाभपू जार्थ नित्यां संविदमाश्रित्य २ ११५ १ ६ न चाध्यास्माभिमानोऽपि नित्यावगतिरूपत्वातकारकादि: २ ११३ १ ७५ नित्यावगतिरूपत्वादन्य ३ ४७ न चामुमुच्तो: २ ७ नियम: परिसंखया वा १ न चेदनुभवोऽत: स्यात् ३ ११९ निरपेक्षश्र सापेक्षां २ ७५ 22

न तावद्योग: १ ६५ निरस्तसर्वकर्माणः ४ ४३ म परीप्सां जिहासां वा १ ३

न पृथङनात्मना २ ४५ निदुखिश्वं स्वमर्थस्य ३ ९० न प्रकाशक्रिया २ ६७ निदुखित्वं स्वतःसिद्धं ९५ नरकान्दीयेथास्याभूत १ ४६ निवृत्तसर्पः सर्पोत्थं ४ ६० नराभिमानिनं १ ६६ निवृत्तायामहंबुद्धौ २ ३०

नतेस्याद्विक्रियां २ निषिद्धकाम्ययोः ७७ १ २८

४ ३४ ४ ५३

नव संख्याहृतज्ञान: ३ ६४ नोष्एिमानं दहत्यगिः २ २३

न विदन्ध्यात्मनः सत्तां २१०६ न्याय: पुरोदितोऽस्माभि: ७

न व्यावृत्तियथाभावात् ३ ११४ न्यायसिद्धमतो वक्ति ३ ५०

न स्वयं स्वस्य २ ११२ (प)

न हानं हानमात्रेष ३ २१ पदान्युद्धृत्य वाक्येभ्यः ३१ परमात्मानुकूलेन ७२ न हि नाम्नास्ति सम्बन्ध: ३१०६ परमार्थनिष्ठं यत् ४ ५२ नाऽज्ञासिषमिति ५४ पराज््येव तु सर्वाषि ४५

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प्र०श्लो० प्०श्लो० परिणामिधियां २ दर (च ) परिहतावासयो: १ ३४ बलवद्धि प्रमाणोत्थम् १ ३.६ परीक्षय लोकान् १ बाधितत्वादविद्यायाः .३५ पश्यन्निति यदाहोच्चैः ४ ३६ नाध्यबाधकभावात् १ ५ू५ पापापनुत्तये १ बाह्य आकारवान् २१०७ पाष्मनां पाप्मभि: १ ८४ बाह्यां वृत्तिमनुस्पाद्य ३ ५ूद पारम्पयेण कर्मैंवं १ ५२ बुद्धाद्वतसतत्वस्य ४ ६२ पारोद्यं यत्तदर्थे स्यात् ३ ७७ बुद्धावेव वितेकोडयं ४ १४ पूर्वाध्यायेषु यद्रस्तु ४ १ बुद्धिजन्मनि पुंसश्च २ ६१ प्रत्यक्तास्य स्वतोरुपं ७१ बुद्ध रनात्मधमेत्वं २ ६६

२ ५५ू बुद्ध यत्प्रश्यगात्मत्वं ३ १८ प्रश्यक्प्रवखतां १. ४६ बुद्धयन्तमपत्रिद्धर्येवं ४ १८

प्रत्यक्षं चेन्न शाब्दं स्यात् ३ द५ बुद्धयादीनामनात्मत्वं ३३

प्रत्यक्षस्य पराक्त्वात् ३ ५१ बुभुत्सोच्छेदिनी चास्य ३ ६७

प्रश्यक्षादिविरुद्धं चेत् ३ ८१ वुसब्रीहिपलालांशेः २ १५

प्रत्यगुन्भ तपित्तस्य ३ ३० बृहस्पतिसवे १ ५७

प्रश्यर्थ तु विभिद्यन्ते २ ८६ बोद्धृताकतृ ताबुद्धेः १२ AY प्रत्याचवाण आहात: ४ ६४ बोदुंधृत्वं तद्वदेवास्याः १६

प्रमाख तन्निभेषु २ बोधाटपागपि २ ६०

प्रमाणबद्धमूलत्वात् बोधाबोघी नमोडपृष्ठा ३, १७

प्रमाणमन्तरेखैषाम् '२ बोध्येप्यनुभवो यस्य ३ ३८

प्रमाणव्यवहारोड्यम् पूर ब्रह्मात्मा वा भवेत् १ ६६

प्रमाणश्रागम्यत्वात् २ ३७ ब्राह्मएयाद्यात्मके १ ३६

प्रमां चेजनयेद्वाक्यम् ६६ (भ)

प्रमित्सायां य त्र्प्राभाति ३ भगवत्पूज्यपादैश्र ב ४ १९ प्रसंख्यानं श्रतावस्य ३ १२५ भङ्क्त्ांचान्नमयादीन् ३ १२१ प्रागनात्मैव २ १२ १ ३२

प्रांगसद्याति पश्चात्सत् ५५ भावनाजं फलं यक््यात् ९२

प्रागात्मबोधाद्रोघोऽयम् ४ ५५ भिन्नाभिन्नं ७८

प्राप्तव्यपरिहार्यषु १ ३३ भेदसंविदिदं ज्ञानं ३ ६

कमाएयाय न बाहुल्यम् १ ८६ ३ ७३

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(६)

अ्र०श्लो० अर०श्लो० (म ) यैरद्राक्षी पुराष्मानं ४ ११ मन्यसे तावत् २ १३ योडयं स्थाणु: २ २१ महाभूतान्यहंकार: २ ४३ यो हि यत्र विरक्त: स्यात् ४ ६५ मानान्तरानवष््धं ३ ३५ २ .४८ रागो लिङ्गमन्रोधस्य (र )

मित्रोदासीनशत्रुत्वं ४ ६७

मुक्ते: क्रियाभि: सिद्धत्वाज्जानं रिपौ बन्धौ स्वदेहे च १ २

मुक्ते:क्रियाभिःसिद्धत्वादिति रूपप्रकाशयोर्यद्वत् १ ४ ४६ בי

लक्षणं सपवद्रज्ज्वा: (ल) मृत्स्नेभके १ ५ह ३ २७ मोहापिधानभङ्गाय १ ७० (य) लिङ्गमस्तित्वनिष्ठत्वात् ५७

यह्कर्मको हि २४ लिप्सतेऽज्ञानतः १ ३१ २

वर्चस्कं तु ( व) यत्रतो वीक्षमायोपि १ ५५ २ ११ यत्र त्वस्येति साटोपं २ ११८ वर्चचस्के संपरित्यक्त २ १६ यभ यो दृश्यते २ २५ यत्र स्याश्संशयो नासौ वतमानमिदं ३ १२ ३ ३७ वर्षातपाभ्यां कि २ ६० यत्सिद्धाविदम: १ ४ वस्त्वेकनिष्ठं वाक्य ३ द२ यथा जात्यमयेः २ ६४ वाक्यप्रश्यक्षमानाभ्यां ३ ६३ यथा प्राज्ञे तथैवायं ४ ४८ २ ३ यथा विशुद्ध आकाशे २ ६७ वाक्यैकगम्यं १ यथा स्वापनिमित्तेन ४ ३६ वास्तवेनैव वृत्तेन ४ ५६ यदर्थ च प्रवृत्तं यत् ३ १२२ विक्रियाज्ञानशून्यत्वात् ३ ६२ यदवस्था व्यनक्तीति २ ६५ विदेहो वीतसंदेहः १ यदा ना तत्त्वमस्यादे: ३ १ ४ १८ यदा सवें प्रमुच्यन्ते १ ४४ २ १०

यद्धि यस्यानुरोधेन १ ६२ ३ ७२ यद्यद्विशेषणं ष्टं २ ९४ विरहय्य क्रियां १ १६

यद्यात्मधर्मो ऽहंकार: २ ३३ विशेषणमिदं सर्व ४ २७

यावद्यावन्निरस्यायं ३ २८ विशेषं कंचिदाश्रिस्य ३ १६

यावन्त्यश्रेह विद्यन्ते १ विप्णो: पादानुगां ४ ७६ युक्तिशब्दी पुराप्यस्य ३ ११४ वृत्तिभिर्युष्मदर्थाभि: ३ १०१ युष्मदयें परित्यक्ते ३ ५ वेदान्तोदरवर्ति ४ ७७

युष्मदस्मद्विभागज्ञे ४ २१ वेदान्तोदरसंगूढ १ ३ येनैवास्या भवेद्योग: २ ६१ वेदावसानवाक्योत्थं १

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( ७)

अ०श्लो० अ०श्लो० व्यवधीयन्त एवामी २ ९३ सवघीव्यञ्ञक: ·२ ६६ १ ४८ सवप्रमाखासंभाव्य: १ वयोम्ि धूमतुषाराभ्र ३ ६९ सर्वमे व्रानुजानाति ४ ५१ · (श) सर्व संशयहेतौ हि ३ ३६ शब्दाद्याकार निर्भासा २ ९१ सर्वाकारां निराकार: २ ७४ शब्दाद्याकारनिर्भासा: २ ६६ सर्वोडयं महिमा २ ४ शमादिसाघनः ३ ४ साध्यसाधनभावः १ २७ शयाना:प्रायशो लोके ३ १०५ सामानाधिकरएयं च ३ शिर आक्रम्य २ १४ सामानाधिकरएयादे: ३ ९ शुध्यमानं तु ४७ सामान्यं दि पदं ब्रते ३ ३२ शुभैः प्राप्नोति १ ४१ सामान्याच्च विशेषाच्च १७ श्रावितो वति २ १ सामान्येतररूपाभ्यां १ १७

४ ७४ सावशेषपरिच्छेदिनी २ श्रतयः स्मृतिभि: १ सुखदुःखादिभि: १ ६४ श्रुतिश्चमं जगाद १ ४३ सुखदुःखादिसंबद्धां २ ( ष ) सुभाषितं चावपि ४. ७५ षट्सु भावविकारेषु २ सुभ्रू: सुनासा २ ५२ षष्ठीगुण क्रिया जातिरूढ़य: ३१०३ सुषुप्ाखयं तमोऽज्ञानं ४ ४३ (स) सेयं भ्रान्तिर्निरालम्बा ३ ६६ संक्षेपविस्तराभ्यां हि ४ २ स्थाणुः स्थाणुरितीवोक्ति: ७७ संनिपत्य न च ९ ५४ स्थाणुं चोरघिया १ ६९ संप्रसादे विकारित्वात् ४ ४७ स्थायोः सतत्वविज्ञानं १ ६५ संबन्धोक्तिरियं साध्वी ४ ७८ स्थूलं युक्त्या निरस्य २ २५ संसारबीजसंस्थोऽयं ४ १६ स्मृतिस्वप्न प्रबोधेषु २ ६३ संसारिताद्वितीयेन ३ ७६ स्वमनोरथसंक्लृप्त १ १००

सकृत्प्रवृश्या ६७ स्वमहिम्ना प्रमाखानि ३

सकृदात्मप्रसूत्यैव ५७ स्वरूपलाभमात्रेण १ ६४ सदाविलुप्तसाच्तित्वं २ ३६ स्वर्ग यियासु: १ ह२

समस्तव्यस्तभूतस्य ७३ स्वसाधनं स्वयं नष्टः १ १०९ सम्यकसंशयमिथ्यात्वैः ३ २० (ह) सम्यग्ज्ञानशिखिप्लुष्ट ४ ५६ हितं सम्प्रेप्सतां १ २६ सर्व जात्यादिमत्त्व १ ७४ हेतुस्वरूपकार्याखि १ ६६