1. Narada-Parivrajaka Upanishad
Text (part 1)
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ॐ भद्रं कर्णेभिः ............इति शान्तिः ॥(द्रष्टव्य- अथर्वशिर उपनिषद्) - ॥प्रथमोपदेशः॥ अथ कदाचित्परिव्राजकाभरणो नारदः सर्वलोकसंचारं कुर्वन्नपूर्वपुण्यस्थलानि पुण्यतीर्थानि तीर्थीकुर्वन्नवलोक्य चित्तशुद्धिं प्राप्य निर्वैरः शान्तो दान्तः सर्वतो निर्वेदमासाद्य स्वरूपानुसंधानमनुसंधाय नियमानन्दविशेषगण्यं मुनिजनैरुपसंकीर्णं नैमिषारण्य पुण्यस्थलमवलोक्य सरिगमपधनिससंज्ञैर्वैराग्यबोधकरैः स्वरविशेषैःप्रापञ्चिकपराङ्- मुखैहरिकथालापैःस्थावरजङ्गमनामकैर्भगवद्भक्तिविशेषैर्नरमृगकिंपुरुषामरकिंनराप्सरो गणान्संमोहयन्नागतं ब्रह्मात्मजं भगवद्भक्तं नारदमवलोक्य द्वादशवर्षसत्रयागोपस्थिताः श्रुताध्ययनसंपन्नाः सर्वज्ञास्तपोनिष्ठापराश्च ज्ञानवैराग्यसंपन्नाः शौनकादिमहर्षयः प्रत्युत्थानं कृत्वा नत्वा यथोचितातिथ्यपूर्वकमुपवेशयित्वा स्वयं सर्वेऽप्युपविष्टा भो भगवन् ब्रह्मपुत्र कथं मुक्त्युपायोऽस्माकं वक्तव्यम्॥१॥
एक बार परिव्राजकों में सर्वश्रेष्ठ देवर्षि नारद जी समस्त लोकों में भ्रमण करते हुए अत्यन्त पुण्यदायी। स्थानों एवं तीर्थ स्थलों में गये। वे समस्त स्थल उनके शुभागमन से और भी अधिक पवित्र हो गये। उन सभी तीर्थों के दर्शन मात्र से ही उन देवर्षि ने अपने चित्त की शुद्धि प्राप्त की। उन देव ऋषि का मन अत्यधिक शान्त था, सभी इन्द्रियाँ उनके वश में थीं, वे सभी तरफ से विरक्त थे तथा उनके मन में किसी भी जीव के प्रति द्वेष- १२७ – नारदपारव्राजकापानषद् - भाव नहीं था। वे सभी तरफ से विरक्त हो, स्वयं के स्वरूप के अनुसंधान में लगे हुए थे। भ्रमण करते-करते वे नैमिषारण्य में आये, जो नियम-संयम से आनन्दित करने के कारण विशेष गणना करने योग्य पवित्र तीर्थ है। उस तीर्थ में अनेकों ऋषि-मुनि निवास करते थे। उन देवर्षि नारद जी ने उस पुण्य भूमि का दर्शन किया, वहाँ वैराग्य का बोध कराने वाले विशेष वीणा के स्वर झंकृत हो रहे थे। वे सांसारिक चर्चा से परे रहकर भगवान् की वीणा द्वारा मधुर कथा के गीतों में रस लेते थे। उन देवर्षि के गीतों का श्रवण करके समस्त स्थावर-जंगम प्राणिसमुदाय आनन्द से झूम उठता था। उनका भक्ति रस से परिपूर्ण संगीत मनुष्य, पशु, देवता, किन्नर, गन्धर्व एवं अप्सरा आदि को भी आकृष्ट कर रहा था। उस समय उस सुप्रसिद्ध स्थल पर बारह वर्षीय सत्र-याग सम्पन्न किया जा रहा था। उस महान् यज्ञ में समस्त देवगण, तपस्वीजन, ज्ञान-वैराग्य से ओत-प्रोत शौनक आदि महर्षि जन सम्मिलित हुए। उन महर्षिजनों ने परम भागवत देवर्षि नारद को आया देखकर अतिभव्य स्वागत-सत्कार किया। उनके चरणों में मस्तक झुकाया तथा उन्हें सर्वश्रेष्ठ आसन पर प्रतिष्ठित किया। तदनन्तर समस्त महर्षिजन अपने-अपने आसनों पर सुशोभित हुए, फिर शौनक आदि ऋषियों ने उनसे नम्रतापूर्वक प्रश्न किया-हे देवर्षे ! संसार के बन्धनों से मुक्ति का क्या उपाय है? कृपा करके हमें यह बताने का अनुग्रह करें॥१॥
इत्युक्तस्तान् स होवाच नारदः सत्कुलभवोपनीतः सम्यगुपनयनपूर्वकं चतुश्चत्वा-रिंशत्संस्कारसंपन्नः स्वाभिमतैकगुरुसमीपे स्वशाखाध्ययनपूर्वकं सर्वविद्याभ्यासं कृत्वा द्वादशवर्षशुश्रूषापूर्वकं ब्रह्मचर्यं पञ्चविंशतिवत्सरं गार्हस्थ्यं पञ्चविंशतिवत्सरं वानप्रस्थाश्रम तद्विधिवक्रमात्रिर्वर्त्य चतुर्विधब्रह्मचर्यं षड्विधं गार्हस्थ्यं चतुर्विधं वानप्रस्थधर्म सम्बगभ्यस्य तचितं कर्म सर्वं निर्वर्त्य साधनचतुष्टयसंपन्नः सर्वसंसारोपरि मनोवाक्कायकर्मभिर्यथा-शानिवृत्तस्तथा वासनैषणोपर्यपि निर्वैरः शान्तो दान्तः संन्यासी परमहंसाश्रमेणास्खलित-स्वस्वरूपध्यानेन देहत्यागं करोति स मुक्तो भवति स मुक्तो भवतीत्युपनिषत्॥२॥
उन शौनकादि महर्षिजनों के इस प्रकार प्रश्न करने पर उन त्रिलोक-प्रसिद्ध देवर्षि नारद जी ने कहा- श्रेष्ठ कुल में प्रादुर्भूत पुरुष यदि उपनयन संस्कार में संस्कृत न हुआ हो, तो सर्वप्रथम उसका विधिवत् उपनयन-संस्कार सम्पन्न कराये। तदनन्तर चवालीस संस्कारों से सम्पन्न होकर तथा अपने मनोनुरूप गुरु के समीप आश्रम में प्रतिष्ठित हो। वहाँ (आश्रम में) गुरु की सेवा-शुश्रूषा करते हुए सर्वप्रथम अपनी (वेद की) शाखा का अध्ययन करे। तदनन्तर क्रमानुसार समस्त विद्याओं का अभ्यास करते हुए बारह वर्षों तक गुरु सेवा करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करता रहे। इसके पश्चात् क्रमशः पच्चीस वर्षों तक गृहस्थ-धर्म का तथा पच्चीस वर्षों तक वानप्रस्थ धर्म का विधिवत् पालन करना चाहिए। प्रबुद्धजन चार तरह का ब्रह्मचर्य बतलाते हैं, गार्हस्थ्य छ: प्रकार का तथा वानप्रस्थ चार तरह का बतलाया गया है। इन सभी आश्रमों का भलीभाँति अभ्यास करते हुए उन-उन आश्रमों के सभी कर्मों का समुचित अनुष्ठान करे। तत्पश्चात् साधन चतुष्टय से युक्त होकर सम्पूर्ण विश्व
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उपदश २ मन्त्र १ १२८ ॥ द्वितीयोपदेशः॥ अथ हैनं भगवन्तं नारदं सर्वे शौनकादयः पप्रच्छुर्भो भगवन् संन्यासविधिं नो ब्रूहीति तानवलोक्य नारदस्तत्स्वरूपं सर्वं पितामहमुखेनैव तुमुचितमित्युक्त्वा सत्रयागपूर्त्यनन्तरं तैः सह सत्यलोकं गत्वा विधिवद्ब्रह्मनिष्ठावरं परमेष्ठिनं नत्वा स्तुत्वा यथोचितं तदाज्ञया तैः सहोपविश्य नारदः पितामहमुवाच गुरुस्त्वं जनकस्त्वं सर्वविद्यारहस्यज्ञः सर्वज्ञस्त्वमतो मत्तो मदिष्टं रहस्यमेकं वक्तव्यं त्वद्विना मदभिमतरहस्यं वक्तुं कः समर्थः । किमिति चेत् पारिवाज्यस्व-रूपक्रमं नो ब्रहीति नारदेन प्रार्थितः परमेष्ठी सर्वतः सर्वानवलोक्य हूर्तमानं समाधिनिष्ठो भूत्वा संसारार्तिनिवृत्त्यन्वेषण इति निश्चित्य नारदमवलोक्य तमाह पितामहः। पुरा मत्पुत्र पुरुषसूक्तोपनिषद्रहस्यप्रकारं निरतिशयाकारावलम्बिना विराट्पुरुषेणोपदिष्टं रहस्यं ते
उन शौनकादि महर्षिजनों के इस प्रकार प्रश्न करने पर उन त्रिलोक-प्रसिद्ध देवर्षि नारद जी ने कहा- श्रेष्ठ कुल में प्रादुर्भूत पुरुष यदि उपनयन संस्कार में संस्कृत न हुआ हो, तो सर्वप्रथम उसका धिवत् उपनयन-संस्कार सम्पन्न कराये। तदनन्तर चवालीस संस्कारों से सम्पन्न होकर तथा अपने मनोनुरूप गुरु के समीप आश्रम में प्रतिष्ठित हो। वहाँ (आश्रम में) गुरु की सेवा-शुश्रूषा करते हुए सर्वप्रथम पनी (वेद की) शाखा का अध्ययन करे। तदनन्तर क्रमानुसार समस्त विद्याओं का अभ्यास करते हुए बारह वर्षों तक गुरु सेवा करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करता रहे। इसके पश्चात् क्रमशः पच्चीस र्षों तक गृहस्थ-धर्म का तथा पच्चीस वर्षों तक वानप्रस्थ धर्म का विधिवत् पालन करना चाहिए। प्रबुद्धजन चार तरह का ब्रह्मचर्य बतलाते हैं, गार्हस्थ्य छ: प्रकार का तथा वानप्रस्थ चार तरह का तलाया गया है। इन सभी आश्रमों का भलीभाँति अभ्यास करते हुए उन-उन आश्रमों के सभी कर्मों का समुचित अनुष्ठान करे। तत्पश्चात् साधन चतुष्टय से युक्त होकर सम्पूर्ण विश्व से ऊपर उठकर मन, वाणी, कर्म, देह आदि के द्वारा सभी तरह की आशा का परित्याग करे और वासनाओं एवं एषणाओं का भी सर्वथा त्याग कर दे। इसके बाद सभी के प्रति वैरभाव का परित्याग करके मन एवं न्द्रियों को वश में रखते हुए संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए तथा संन्यास आश्रम में रहकर अपने अविनाशी स्वरूप का ध्यान करते रहना चाहिए। इस प्रकार से चिन्तन में लीन हुआ जो पुरुष शरीर का रित्याग करता है वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है, वह मुक्त हो जाता है। यही उपनिषद् (गूढ़ रहस्य युक्त विशिष्ट ज्ञान) है॥ २॥ उपदश २ मन्त्र १ १२८ ॥ द्वितीयोपदेशः॥
अथ हैनं भगवन्तं नारदं सर्वे शौनकादयः पप्रच्छुर्भो भगवन् संन्यासविधिं नो ब्रूहीति तानवलोक्य नारदस्तत्स्वरूपं सर्वं पितामहमुखेनैव ज्ञातुमुचितमित्युक्त्वा सत्रयागपूर्त्यनन्तरं तैः सह सत्यलोकं गत्वा विधिवद्ब्रह्मनिष्ठावरं परमेष्ठिनं नत्वा स्तुत्वा यथोचितं तदाज्ञया तैः सहोपविश्य नारदः पितामहमुवाच गुरुस्त्वं जनकस्त्वं सर्वविद्यारहस्यज्ञः सर्वज्ञस्त्वमतो मत्तो मदिष्टं रहस्यमेकं वक्तव्यं त्वद्विना दभिमतरहस्यं वक्तुं कः समर्थः । किमिति चेत् पारिवाज्यस्व-रूपक्रमं नो ब्रहीति नारदेन प्रार्थितः परमेष्ठी सर्वतः सर्वानवलोक्य मुहूर्तमानं समाधिनिष्ठो भूत्वा संसारार्तिनिवृत्त्यन्वेषण इति निश्चित्य नारदमवलोक्य तमाह पितामहः। पुरा मत्पुत्रपुरुषसूक्तोपनिषद्रहस्यप्रकारं निरतिशयाकारावलम्बिना विराट्पुरुषेणोपदिष्टं रहस्यं ते विविच्योच्यते तत्क्रममतिरहस्यं बाढमवहितो भूत्वा श्रूयताम्। भो नारद धिवदादावनुपनीतोपनयनानंतरं तत्सत्कुलप्रसूतः पितृमातृविधेयः पितृस-मीपादन्यत्र सत्संप्रदायस्थं श्रद्धावन्तं सत्कुलभवं श्रोत्रियंशास्त्रवात्सल्यं गुणवंतमकुटिलं सद्गुरु-मासाध नत्वा यथोपयोगशुश्रूषापूर्वकं स्वाभिमतं विज्ञाप्य द्वादशवर्षसेवापुरःसरं सर्वविद्याभ्यास कृत्वा तदनुज्ञया स्वकुलानुरूपामभिमतकन्यां विवाह्य पञ्चविंशतिवत्सरं गुरुकुलवासं कृत्वाथ गुर्वनुज्ञया गृहस्थोचितकर्म कुर्वन्दौाह्मण्यनिवृत्तिमेत्य स्ववंशवृद्धिकामः पुत्रमेकमासाद्य गार्ह-स्थ्योचितपञ्चविंशतिवत्सरंती ततः पञ्चविंशतिवत्सरपर्यन्तं त्रिषवणमुदकस्पर्शनपूर्वकं चतु-र्थकालमेकवारमाहारमाहरन्नयमेक एव वनस्थो भूत्वा पुरग्रामप्राक्तनसंचारं विहाय निकिर विर-हिततदाश्रितकर्मोचितकृत्यं दृष्टश्रवणविषयवैतृष्ण्यमेत्य चत्वारिंशत्संस्कारसंपन्नः सर्वतो विर-क्तश्चित्तशुद्धिमेत्याशासूयेाहंकारं दग्ध्वा साधनचतुष्टयसंपन्नः संन्यस्तुमर्हतीत्युपनिषत्॥१॥
इसके पश्चात् वे शौनक आदि महर्षिजन पुनः देवर्षि नारद जी से प्रार्थना करते हुए कहने लगे-हे भगवन्! आप हम सभी को संन्यास की विधि बताने की कृपा करें। नारद जी ने उन सभी पर स्नेहपूरित दृष्टिपात किया और कहने लगे- 'हे महर्षे ! संन्यास का सम्पूर्ण स्वरूप लोक पितामह ब्रह्माजी के श्रीमुख से ही श्रवण करना श्रेयस्कर होगा।' ऐसा कहकर सत्र-याग के सम्पन्न होने पर उन सभी के सहित वे देवर्षि नारद ब्रह्मलोक में आकर परब्रह्म का चिन्तन करते हुए, नमन-वन्दन करते हुए ब्रह्माजी की स्तुति करने लगे। तदनन्तर ब्रह्माजी ने सभी को यथोचित आसन पर बैठने को कहा। तत्पश्चात् नारद जी भगवान् ब्रह्माजी की स्तुति करते हुए कहने लगे- 'ब्रह्मन् ! आप हम सभी के गुरु एवं पिता हैं । आप सभी कुछ जानने वाले तथा सम्पूर्ण विद्याओं के ज्ञाता हैं। अतः आप हमारे एक अत्यन्त-प्रिय रहस्य को प्रकट करने का अनुग्रह करें। आपके अतिरिक्त ऐसा कोई __ भी नहीं है, जो हम सभी के इच्छित रहस्य को भली प्रकार से स्पष्ट कर सके। यदि आप हमारे अभीष्ट विषय के रहस्य को बताने के लिए तैयार हों, तो सर्वप्रथम कृपा करके आप परिव्राजक के स्वरूप एवं क्रम (नियम) को हम सभी के समक्ष उपदेश करने की कृपा करें। देवर्षि नारद के द्वारा इस प्रकार की जिज्ञासा व्यक्त किये जाने पर ब्रह्मा जी ने एक बार देखा तथा दो घड़ी के लिए समाधिस्थ होकर जन्म-मृत्यु रूप सांसारिक कष्टों से मुक्ति प्राप्त करने का उपाय खोजने लगे- "हे नारद! पुरातन समय में 'पुरुषसूक्त' में तथा उपनिषदों में वर्णित १२९
१२९ नारदपरिव्राजकोपनिषद् किये गये गूढ़ रहस्यानुकूल अति श्रेष्ठ दिव्य विग्रहधारी विराट् पुरुष ने जो मेरे लिए उपदेश किया था, उसी दिव्य ज्ञान को तुम सभी के समक्ष प्रकट कर रहा हूँ"। परिव्राजक का स्वरूप एवं क्रम अत्यधिक रहस्यमय है। उसको तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। माता-पिता की आज्ञा मानने वाले सर्वश्रेष्ठ कुल में प्रादुर्भूत बालक का यदि उपनयन संस्कार न सम्पन्न हुआ हो, तो सर्वप्रथम उस बालक का उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार सम्पन्न कराना चाहिए। तदनन्तर उस बालक को अपने माता-पिता के समीप न रहकर किसी उच्चकुलीन उत्पन्न सद्गुरु के आश्रम में जाकर निवास करना चाहिए। वे महान् गुरु श्रोत्रिय शास्त्र के प्रति अनुराग रखने वाले श्रद्धावान् एवं गुणवान् हों। उन समर्थ गुरु की सेवा में उपस्थित होकर उनके चरणों में नमन-वन्दन करते हुए उन पर सर्वस्व समर्पित कर देना चाहिए। तत्पश्चात् उन की आज्ञा प्राप्त करके बारह वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुरु की सेवा-शुश्रूषा करते हुए समस्त विद्याओं का अभ्यास करना चाहिए। अध्ययन पूर्ण हो जाने के पश्चात् कुलानुरूप किसी श्रेष्ठ कन्या से गुरु की आज्ञा प्राप्त करके विवाह करे तथा पच्चीस वर्षों तक गृहस्थाश्रम का पालन करना चाहिए। अपने वंश की अभिवद्धि हेत पत्रोत्पत्ति कर्म पूर्ण करे। गहस्थ के पच्चीस वर्ष पूर्ण करने के पश्चात वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करे। इस आश्रम में सतत परिव्रज्या करते हुए पच्चीस वर्ष तक निवास करे। तीनों संध्याओं में स्नान एवं दिवस के चौथे प्रहर में एक बार भोजन ग्रहण करे। ग्राम या नगर के परिचित मार्गों का परित्याग करके अकेला ही वन में विचरण करे। बिना जोती-बोई हुई भूमि में उत्पन्न हुए चावल आदि इकट्ठा करके उसी से आश्रमा-नुरूप धर्म का पालन करते हुए दृश्य-श्रव्यादि विषयों से विरक्त होकर चालीस संस्कारों से युक्त होकर चित्त को सर्वतोभावेन सदैव के लिए पवित्र कर ले। आशा, असूया, ईर्ष्या, अहंकार आदि का परित्याग करके साधन चतुष्टय से परिपूर्ण हो जाए। इन सभी से युक्त होकर वह संन्यास ग्रहण करने का अधिकारी बन जाता है॥१॥
3a
॥ तृतीयोपदेशः॥ अथ हैनं नारदः पितामहं पप्रच्छ भगवन् केन संन्यासाधिकारी वेत्येवमादौ संन्यासाधि-कारिणं निरूप्य पश्चात्संन्यासविधिरुच्यते अवहितः शृणु।अथषण्ढः पतितोऽविकलः स्त्रैणो बधिरोऽर्भको मूकः पाषण्डश्चक्री लिङ्गी वैखानसहरद्विजौ भृतकाध्यापकः शिपिविष्टोऽनग्निको वैराग्यवन्तोऽप्येते न न्यासार्हाः संन्यस्ता यद्यपि महावाक्योपदेशेनाधिकारिण: पूर्वसंन्यासी परमहंसाधिकारी॥१॥
इसके पश्चात् देवर्षि नारद ने पितामह ब्रह्माजी से प्रश्न किया-भगवन् ! संन्यास किसके द्वारा लिया जाता है तथा संन्यास का अधिकारी कौन है? ब्रह्माजी ने कहा-पहले यह निरूपण करते हैं कि संन्यास का अधिकारी कौन है? तत्पश्चात् संन्यास धारण करने की विधि पर प्रकाश डालेंगे। सावधानी पूर्वक सुनो-नपुंसक, पतित, अंगविहीन, अत्यधिक स्त्री आसक्त, बधिर, गूंगे, बालक, पाखण्डी, चक्री (कुचक्र रचने वाला), लिङ्गी (वेषधारण करने वाला), वैखानस (वानप्रस्थी), हरद्विज (शिवभक्त), वेतन लेकर शिक्षण करने वाले ध्यापक, शिपिविष्ट (गंजे या कोढ़ी), अग्निहोत्र न करने वाले ये सभी विरक्त होने पर भी संन्यास ग्रहण करने के अधिकारी नहीं हैं। यदि वे किसी प्रकार संन्यास ग्रहण कर भी लें, तो भी महावाक्यों का उपदेश ग्रहण करने के अधिकारी नहीं हैं। जो पूर्व से (ब्रह्मचर्य एवं गृहस्थाश्रम के समय से) ही संन्यासाश्रम के अनुसार आचरण करने वाले हैं,वे ही संन्यास धारण करने के अधिकारी हैं ॥ १॥ __उपदेश ३ मन्त्र १३
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परेणैवात्मनश्चापि परस्यैवात्मना तथा।अभयं समवाप्नोति स परिवाडिति स्मृतिः ॥२॥
जो दूसरों से न भयभीत होता है और न ही स्वयं दूसरों को भयभीत करता है, वही वस्तुतः परिव्राजक है, ऐसा स्मृतियों का कथन है॥२॥
3c
षण्ढोऽथ विकलोऽप्यन्धो बालकश्चापि पातकी। पतितश्च परद्वारी वैखानसहरद्विजौ॥३॥
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चक्री लिङ्गीच पाषण्डी शिपिविष्टोऽप्यनग्निकः। द्वित्रिवारेण संन्यस्तो भृतकाध्यापकोऽपिच। एते नार्हन्ति संन्यासमातुरेण विना क्रमम्॥४॥ नपुंसक, विकलाङ्ग, अन्धे, बालक, पातकी, पतित, परस्त्रीरत, वैखानस, हरद्विज (शिवभक्त), कुचक्र रचने वाले, लिङ्गी (वेषधारी), पाखण्डी, शिपिविष्ट, अयाज्ञिक, वेतनभोगी शिक्षक तथा दो-तीन बार संन्यास ले चुकने वाले ये सभी आतुर संन्यास लेने योग्य हो सकते हैं, क्रमशः संन्यास लेने योग्य नहीं ॥३-४॥
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आतुरकालः कथमार्यसम्मतः। प्राणस्योत्क्रमणासनकालस्त्वातुरसंज्ञकः।नेतरस्त्वातुरः कालो मुक्तिमार्गप्रवर्तकः॥५॥
(नारद का प्रश्न) आतुर संन्यास का कौन सा समय विद्वज्जनों द्वारा माना गया है ? (ब्रह्मा का उत्तर-) प्राणों के निकलने का समय जब अत्यन्त निकट हो, तभी आतुर संन्यास लेने का उचित समय माना गया है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई समय उचित नहीं है। आतुर संन्यास यदि ठीक समय पर सम्पन्न हो जाये, तो वह
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आतुरेऽपिच संन्यासेतत्तन्मन्त्रपुरःसरम्।मन्त्रावृत्तिं च कृत्वैव संन्यसेद्विधिवबुधः॥६॥
(नारद का प्रश्न) आतुर संन्यास का कौन सा समय विद्वज्जनों द्वारा माना गया है ? (ब्रह्मा का उत्तर-) प्राणों के निकलने का समय जब अत्यन्त निकट हो, तभी आतुर संन्यास लेने का उचित समय माना गया है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई समय उचित नहीं है। आतुर संन्यास यदि ठीक समय पर सम्पन्न हो जाये, तो वह
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आतुरेऽपि क्रमे वापि प्रैषभेदो न कुत्रचित्।न मन्त्रं कर्मरहितं कर्म मन्त्रमपेक्षते॥७॥
(नारद का प्रश्न) आतुर संन्यास का कौन सा समय विद्वज्जनों द्वारा माना गया है ? (ब्रह्मा का उत्तर-) प्राणों के निकलने का समय जब अत्यन्त निकट हो, तभी आतुर संन्यास लेने का उचित समय माना गया है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई समय उचित नहीं है। आतुर संन्यास यदि ठीक समय पर सम्पन्न हो जाये, तो वह
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अकर्म मन्त्ररहितं नातो मन्त्रं परित्यजेत्। मन्त्रं विना कर्म कुर्याद्भस्मन्या-हुतिवद्भवेत्॥ ८॥
(नारद का प्रश्न) आतुर संन्यास का कौन सा समय विद्वज्जनों द्वारा माना गया है ? (ब्रह्मा का उत्तर-) प्राणों के निकलने का समय जब अत्यन्त निकट हो, तभी आतुर संन्यास लेने का उचित समय माना गया है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई समय उचित नहीं है। आतुर संन्यास यदि ठीक समय पर सम्पन्न हो जाये, तो वह
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विध्युक्तकर्म संक्षेपात्संन्यासस्त्वातुरःस्मृतः। तस्मादातुरसंन्यासे मन्त्रावृत्तिविधिर्मुने॥९॥
(नारद का प्रश्न) आतुर संन्यास का कौन सा समय विद्वज्जनों द्वारा माना गया है ? (ब्रह्मा का उत्तर-) प्राणों के निकलने का समय जब अत्यन्त निकट हो, तभी आतुर संन्यास लेने का उचित समय माना गया है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई समय उचित नहीं है। आतुर संन्यास यदि ठीक समय पर सम्पन्न हो जाये, तो वह
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आहिताग्निर्विरक्तश्चेद्देशान्तरगतो यदि।प्राजापत्येष्टिमप्स्वेव निवृत्यैवाथ संन्यसेत् ॥१०॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
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मनसा वाथ विध्युक्तमन्त्रावृत्त्याथ वा जले। श्रुत्यनुष्ठानमार्गेण कर्मानुष्ठानमेव वा। समाप्य संन्यसेद्विद्वानो चेत्पातित्यमाप्नुयात्॥११॥ यदि अग्निहोत्र सम्पन्न करने वाला पुरुष किसी अन्य देश में गया हो और वहाँ उसे वैराग्य उत्पन्न हो जाए, तो जल में प्राजापत्य इष्टि सम्पन्न करके संन्यास ग्रहण कर ले। यह प्राजापत्य याग केवल मन से करे अथवा शास्त्र विहित मन्त्रों के उच्चारण पूर्वक अथवा वेदोक्त विधान से कर्मानुष्ठान पूर्वक सम्पन्न करे। यह सब करके ही विद्वान् पुरुष संन्यास ले, अन्यथा वह अपने धर्म से च्युत हो जाता है॥१०-११॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
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यदा मनसि संजातं वैतृष्ण्यं सर्ववस्तुषु। तदा संन्यासमिच्छेत पतितः स्याद्विपर्यये॥१२॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
13.0
विरक्तः प्रव्रजेद्धीमान्सरक्तस्तु गृहे वसेत् । सरागो नरकं याति प्रव्रजन्हि द्विजाधमः ॥१३॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
14.0
यस्यैतानि सुगुप्तानि जिह्वोपस्थोदरं करः। संन्यसेदकृतोद्वाहो ब्राह्मणो ब्रह्मचर्यवान्॥१४॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
15.0
संसारमेव निःसारं दृष्ट्वा सारदिदृक्षया। प्रव्रजन्त्यकृतोद्वाहः परं वैराग्यमाश्रितः॥ १५॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
16.0
प्रवृत्तिलक्षणं कर्म ज्ञानं संन्यासलक्षणम्। तस्माज्ज्ञानं पुरस्कृत्य संन्यसेदिह बुद्धिमान् ॥१६॥ जिसकी रसना (जिह्वा), उपस्थेन्द्रिय, उदर और हस्त-पाद आदि इन्द्रियाँ पूर्णरूपेण वश में हों अथवा जिसने विवाह न किया हो, ऐसा ब्रह्मचर्यवान् ब्राह्मण ही संन्यास ग्रहण करने का अधिकारी है। विद्वान् पुरुष संसार को निस्सार समझकर सार तत्त्व पाने की कामना से अविवाहित रहकर ही वैराग्याश्रित होकर संन्यास ग्रहण कर लेते हैं। कर्म प्रवृत्ति का लक्षण है तथा ज्ञान संन्यास का मुख्य लक्षण है। अस्तु, बुद्धिमान् पुरुष को चाहिए कि वह ज्ञान को लक्ष्य करके ही संन्यासाश्रम में प्रवेश करे॥ १४-१६॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
17.0
यदा तु विदितं तत्त्वं परं ब्रह्म सनातनम्। तदैकदण्डं संगृह्य सोपवीतां शिखां त्यजेत्॥१७॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
18.0
परमात्मनि यो रक्तो विरक्तोऽपरमात्मनि। सर्वैषणाविनिर्मुक्तः स भैक्षं भोक्तुमर्हति ॥१८॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
19.0
पूजितो वन्दितश्चैव सुप्रसन्नो यथा भवेत्। तथा चेत्ताड्यमानस्तु तदा भवति भैक्षभुक्॥१९॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
20.0
अहमेवाक्षरं ब्रह्म वासुदेवाख्यमद्वयम्। इति भावो ध्रुवो यस्य तदा भवति भैक्षभुक्॥२०॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
21.0
यस्मिन्शान्तिः शमः शौचंसत्यं संतोष आर्जवम्।अकिंचनमदम्भश्च स कैवल्याश्रमे वसेत्॥२१॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
22.0
यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु पापकम्। कर्मणा मनसा वाचा तदा भवति भैक्षभुक्॥२२॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
23.0
दशलक्षणकं धर्ममनुतिष्ठन्समाहितः। वेदान्तान्विधिवच्छ्रुत्वा संन्यसेदनृणो द्विजः ॥२३॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
24.0
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।धीविद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥२४॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
Text (part 2)
25.0
अतीतान्न स्मरेद्भोगान्न तथानागतानपि। प्राप्तांश्च नाभिनन्देद्यः स कैवल्याश्रमे वसेत्॥२५॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
26.0
अन्तःस्थानीन्द्रियाण्यन्तर्बहिष्ठान्विषयान्बहिः ।शक्नोति यः सदा कर्तुंस कैवल्याश्रमे वसेत्॥२६॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
27.0
प्राणे गते यथा देहः सुखं दुःखं न विन्दति। तथा चेत्प्राणयुक्तोऽपिस कैवल्याश्रमे वसेत्॥२७॥
जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन. कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षान्न ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक-थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय १३२
उपदेश ३ मन्त्र ४० द्वारा ऋषिऋण से, यज्ञानुष्ठान द्वारा देवऋण से तथा पुत्रोत्पत्ति द्वारा पितृऋण से मुक्ति का प्रयास करे) वही संन्यास ग्रहण करने का अधिकारी है। धैर्य, क्षमा, दमन (मन को वश में रखना), अस्तेय (चोरी न करना), पवित्रता, इन्द्रिय निग्रह, धी (सबुद्धि), विद्या, सत्य एवं अक्रोध ये धर्म के दस लक्षण कहे गये हैं। जो पुरुष अतीत के भोगों का चिन्तन नहीं करता, वर्तमान में प्राप्त भोगों का अभिनन्दन स्वागत) नहीं करता तथा भविष्य में प्राप्त होने वाले भोगों की कामना नहीं करता, वही संन्यासाश्रम में प्रवेश करने का अधिकार रखता है। जो पुरुष अन्त:करण में विराजमान इन्द्रियों तथा बाह्याभ्यन्तर के विषयों को मन में न न दे, वही कैवल्याश्रम संन्यास) में रहने के योग्य है। जिस प्रकार प्राणविहीन शरीर सुख-दुःख का अनुभव नहीं करता, उसी प्रकार जो व्यक्ति प्राणों के रहने पर भी सुख-दुःख का अनुभव न करे, वही संन्यास लेने के योग्य है ।। १७-२७ ॥
28.0
कौपीनयुगलं कन्था दण्ड एकः परिग्रहः। यते: परमहंसस्य नाधिकं तु विधीयते॥२८॥
दो कौपीन, एक कन्था (गुदड़ी) तथा एक दण्ड इनसे अधिक वस्तुएँ संग्रह करने का परमहंस (संन्यासी) को अधिकार नहीं है। यदि वह इनसे अधिक वस्तुएँ संग्रह करता है, तो वह मरणोपरान्त रौरव नामक नरक में जाता है, तत्पश्चात् तिर्यक् (पशु-पक्षी आदि) योनियों में जाता है। संन्यासी को चाहिए कि वह शीत आदि से रक्षा के लिए जीर्ण-शीर्ण; किन्तु साफ-सुथरे वस्त्रों को सिलकर कन्था (गुदड़ी) बनाये और नगर या ग्राम से बाहर निर्जन स्थान में जाकर रहे तथा गेरुआ वस्त्र धारण करे। संन्यासी एक वस्त्र धारण करे अथवा वस्त्रहीन रहे। दृष्टि को इधर-उधर न रखकर एकाग्रचित्त रहे तथा समस्त वस्तुओं के प्रति अलोलुप रहे। वह सतत एकाकी ही विचरण करे और वर्षाकाल (चातुर्मास) में एक स्थान पर निवास करे। स्त्री-पुत्र, कुटुम्ब, वेदाङ्गों के ग्रन्थ (व्याकरण आदि), यज्ञ और यज्ञोपवीत को सर्वथा विसर्जित करके संन्यासी को सदैव अपने को गूढ़ बनाकर (अपना विज्ञापन किये बिना) विचरण करना चाहिए ।। २८-३२ ॥
29.0
यदि वा कुरुते रागादधिकस्य परिग्रहम्। रौरवं नरकं गत्वा तिर्यग्योनिषु जायते॥ २९॥
दो कौपीन, एक कन्था (गुदड़ी) तथा एक दण्ड इनसे अधिक वस्तुएँ संग्रह करने का परमहंस (संन्यासी) को अधिकार नहीं है। यदि वह इनसे अधिक वस्तुएँ संग्रह करता है, तो वह मरणोपरान्त रौरव नामक नरक में जाता है, तत्पश्चात् तिर्यक् (पशु-पक्षी आदि) योनियों में जाता है। संन्यासी को चाहिए कि वह शीत आदि से रक्षा के लिए जीर्ण-शीर्ण; किन्तु साफ-सुथरे वस्त्रों को सिलकर कन्था (गुदड़ी) बनाये और नगर या ग्राम से बाहर निर्जन स्थान में जाकर रहे तथा गेरुआ वस्त्र धारण करे। संन्यासी एक वस्त्र धारण करे अथवा वस्त्रहीन रहे। दृष्टि को इधर-उधर न रखकर एकाग्रचित्त रहे तथा समस्त वस्तुओं के प्रति अलोलुप रहे। वह सतत एकाकी ही विचरण करे और वर्षाकाल (चातुर्मास) में एक स्थान पर निवास करे। स्त्री-पुत्र, कुटुम्ब, वेदाङ्गों के ग्रन्थ (व्याकरण आदि), यज्ञ और यज्ञोपवीत को सर्वथा विसर्जित करके संन्यासी को सदैव अपने को गूढ़ बनाकर (अपना विज्ञापन किये बिना) विचरण करना चाहिए ।। २८-३२ ॥
30.0
विशीर्णान्यमलान्येव चेलानि ग्रथितानि तु।कृत्वा कन्थांबहिर्वासो धारयेद्धातुरञ्जितम्॥३०॥
दो कौपीन, एक कन्था (गुदड़ी) तथा एक दण्ड इनसे अधिक वस्तुएँ संग्रह करने का परमहंस (संन्यासी) को अधिकार नहीं है। यदि वह इनसे अधिक वस्तुएँ संग्रह करता है, तो वह मरणोपरान्त रौरव नामक नरक में जाता है, तत्पश्चात् तिर्यक् (पशु-पक्षी आदि) योनियों में जाता है। संन्यासी को चाहिए कि वह शीत आदि से रक्षा के लिए जीर्ण-शीर्ण; किन्तु साफ-सुथरे वस्त्रों को सिलकर कन्था (गुदड़ी) बनाये और नगर या ग्राम से बाहर निर्जन स्थान में जाकर रहे तथा गेरुआ वस्त्र धारण करे। संन्यासी एक वस्त्र धारण करे अथवा वस्त्रहीन रहे। दृष्टि को इधर-उधर न रखकर एकाग्रचित्त रहे तथा समस्त वस्तुओं के प्रति अलोलुप रहे। वह सतत एकाकी ही विचरण करे और वर्षाकाल (चातुर्मास) में एक स्थान पर निवास करे। स्त्री-पुत्र, कुटुम्ब, वेदाङ्गों के ग्रन्थ (व्याकरण आदि), यज्ञ और यज्ञोपवीत को सर्वथा विसर्जित करके संन्यासी को सदैव अपने को गूढ़ बनाकर (अपना विज्ञापन किये बिना) विचरण करना चाहिए ।। २८-३२ ॥
31.0
एकवासा अवासा वा एकदृष्टिरलोलुपः। एक एव चरेन्नित्यं वर्षास्वेकत्र संवसेत्॥ ३१॥
दो कौपीन, एक कन्था (गुदड़ी) तथा एक दण्ड इनसे अधिक वस्तुएँ संग्रह करने का परमहंस (संन्यासी) को अधिकार नहीं है। यदि वह इनसे अधिक वस्तुएँ संग्रह करता है, तो वह मरणोपरान्त रौरव नामक नरक में जाता है, तत्पश्चात् तिर्यक् (पशु-पक्षी आदि) योनियों में जाता है। संन्यासी को चाहिए कि वह शीत आदि से रक्षा के लिए जीर्ण-शीर्ण; किन्तु साफ-सुथरे वस्त्रों को सिलकर कन्था (गुदड़ी) बनाये और नगर या ग्राम से बाहर निर्जन स्थान में जाकर रहे तथा गेरुआ वस्त्र धारण करे। संन्यासी एक वस्त्र धारण करे अथवा वस्त्रहीन रहे। दृष्टि को इधर-उधर न रखकर एकाग्रचित्त रहे तथा समस्त वस्तुओं के प्रति अलोलुप रहे। वह सतत एकाकी ही विचरण करे और वर्षाकाल (चातुर्मास) में एक स्थान पर निवास करे। स्त्री-पुत्र, कुटुम्ब, वेदाङ्गों के ग्रन्थ (व्याकरण आदि), यज्ञ और यज्ञोपवीत को सर्वथा विसर्जित करके संन्यासी को सदैव अपने को गूढ़ बनाकर (अपना विज्ञापन किये बिना) विचरण करना चाहिए ।। २८-३२ ॥
32.0
कुटुम्बं पुत्रदारांश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः। यज्ञं यज्ञोपवीतं च त्यक्त्वा गूढश्चरेद्यतिः॥३२॥
दो कौपीन, एक कन्था (गुदड़ी) तथा एक दण्ड इनसे अधिक वस्तुएँ संग्रह करने का परमहंस (संन्यासी) को अधिकार नहीं है। यदि वह इनसे अधिक वस्तुएँ संग्रह करता है, तो वह मरणोपरान्त रौरव नामक नरक में जाता है, तत्पश्चात् तिर्यक् (पशु-पक्षी आदि) योनियों में जाता है। संन्यासी को चाहिए कि वह शीत आदि से रक्षा के लिए जीर्ण-शीर्ण; किन्तु साफ-सुथरे वस्त्रों को सिलकर कन्था (गुदड़ी) बनाये और नगर या ग्राम से बाहर निर्जन स्थान में जाकर रहे तथा गेरुआ वस्त्र धारण करे। संन्यासी एक वस्त्र धारण करे अथवा वस्त्रहीन रहे। दृष्टि को इधर-उधर न रखकर एकाग्रचित्त रहे तथा समस्त वस्तुओं के प्रति अलोलुप रहे। वह सतत एकाकी ही विचरण करे और वर्षाकाल (चातुर्मास) में एक स्थान पर निवास करे। स्त्री-पुत्र, कुटुम्ब, वेदाङ्गों के ग्रन्थ (व्याकरण आदि), यज्ञ और यज्ञोपवीत को सर्वथा विसर्जित करके संन्यासी को सदैव अपने को गूढ़ बनाकर (अपना विज्ञापन किये बिना) विचरण करना चाहिए ।। २८-३२ ॥
33.0
कामः क्रोधस्तथा दो लोभमोहादयश्च ये।तांस्तु दोषान्परित्यज्य परिव्राण्निर्ममो भवेत्॥३३॥
___ काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकारादि समस्त दोषों का परित्याग करके संन्यासी को सब ओर से निर्मम (ममतारहित) हो जाना चाहिए। उसे समस्त रागों से विरक्त होकर मिट्टी के ढेले, पत्थर और. स्वर्ण में समान भाव रखना चाहिए। उसे हिंसा से परे और निस्पृह हो जाना चाहिए। जो संन्यासी दम्भ, अहंकार, हिंसा, रनिन्दा __ आदि दोषों से दूर है तथा आत्मज्ञान उपलब्ध कराने वाले गुणों से सुशोभित है, वही मुक्ति का अधिकारी है। १३३ नारदपरिव्राजकोपनिषद् इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हो जाने पर व्यक्ति निःसन्देह दुर्गुणों से लिप्त हो जाता है; परन्तु इन्हीं इन्द्रियों को वह सम्यक् रूप से वश में कर ले, तो (मुक्ति रूप) सिद्धि को प्राप्त करता है। सांसारिक भोगों का निरन्तर उपभोग करने से, उन्हें भोगने की कामना कभी शान्त नहीं होती, वह उसी तरह और बढ़ती जाती है, जैसे अग्नि में घृत डालने पर वह और अधिक प्रज्वलित होती है। जो (साधक) मृदु या कटु वचनों का श्रवण करके, स्वादिष्ट या स्वादरहित भोजन करके, सुन्दर या कुरूप दृश्य देखकर तथा सुगन्धित या दुर्गन्धपूर्ण पदार्थ सूंघ कर न तो हर्षोल्लसित होता है और न ही ग्लानि का अनुभव करता है, उसी को जितेन्द्रिय जानना चाहिए। जिसका मन और वाणी पवित्रता से ओत-प्रोत है, जो सभी प्रकार के दोषों से सर्वथा मुक्त है, वही वेदान्त सुनने का फल प्राप्त करता है। ब्राह्मण को चाहिए कि वह सम्मान को विष तुल्य उद्विग्नकारी तथा अपमान को अमृत तुल्य मानकर सदा उसकी कामना करे॥ ३३-४०॥ ।
34.0
रागद्वेषवियुक्तात्मा समलोष्टाश्मकाञ्चनः। प्राणिहिंसानिवृत्तश्च मुनिः स्यात्सर्वनिस्पृहः॥३४॥
___ काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकारादि समस्त दोषों का परित्याग करके संन्यासी को सब ओर से निर्मम (ममतारहित) हो जाना चाहिए। उसे समस्त रागों से विरक्त होकर मिट्टी के ढेले, पत्थर और. स्वर्ण में समान भाव रखना चाहिए। उसे हिंसा से परे और निस्पृह हो जाना चाहिए। जो संन्यासी दम्भ, अहंकार, हिंसा, रनिन्दा __ आदि दोषों से दूर है तथा आत्मज्ञान उपलब्ध कराने वाले गुणों से सुशोभित है, वही मुक्ति का अधिकारी है। १३३ नारदपरिव्राजकोपनिषद् इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हो जाने पर व्यक्ति निःसन्देह दुर्गुणों से लिप्त हो जाता है; परन्तु इन्हीं इन्द्रियों को वह सम्यक् रूप से वश में कर ले, तो (मुक्ति रूप) सिद्धि को प्राप्त करता है। सांसारिक भोगों का निरन्तर उपभोग करने से, उन्हें भोगने की कामना कभी शान्त नहीं होती, वह उसी तरह और बढ़ती जाती है, जैसे अग्नि में घृत डालने पर वह और अधिक प्रज्वलित होती है। जो (साधक) मृदु या कटु वचनों का श्रवण करके, स्वादिष्ट या स्वादरहित भोजन करके, सुन्दर या कुरूप दृश्य देखकर तथा सुगन्धित या दुर्गन्धपूर्ण पदार्थ सूंघ कर न तो हर्षोल्लसित होता है और न ही ग्लानि का अनुभव करता है, उसी को जितेन्द्रिय जानना चाहिए। जिसका मन और वाणी पवित्रता से ओत-प्रोत है, जो सभी प्रकार के दोषों से सर्वथा मुक्त है, वही वेदान्त सुनने का फल प्राप्त करता है। ब्राह्मण को चाहिए कि वह सम्मान को विष तुल्य उद्विग्नकारी तथा अपमान को अमृत तुल्य मानकर सदा उसकी कामना करे॥ ३३-४०॥ ।
35.0
दम्भाहंकारनिर्मुक्तो हिंसापैशुन्यवर्जितः। आत्मज्ञानगुणोपेतो यतिर्मोक्षमवाप्नुयात् ॥३५॥
___ काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकारादि समस्त दोषों का परित्याग करके संन्यासी को सब ओर से निर्मम (ममतारहित) हो जाना चाहिए। उसे समस्त रागों से विरक्त होकर मिट्टी के ढेले, पत्थर और. स्वर्ण में समान भाव रखना चाहिए। उसे हिंसा से परे और निस्पृह हो जाना चाहिए। जो संन्यासी दम्भ, अहंकार, हिंसा, रनिन्दा __ आदि दोषों से दूर है तथा आत्मज्ञान उपलब्ध कराने वाले गुणों से सुशोभित है, वही मुक्ति का अधिकारी है। १३३ नारदपरिव्राजकोपनिषद् इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हो जाने पर व्यक्ति निःसन्देह दुर्गुणों से लिप्त हो जाता है; परन्तु इन्हीं इन्द्रियों को वह सम्यक् रूप से वश में कर ले, तो (मुक्ति रूप) सिद्धि को प्राप्त करता है। सांसारिक भोगों का निरन्तर उपभोग करने से, उन्हें भोगने की कामना कभी शान्त नहीं होती, वह उसी तरह और बढ़ती जाती है, जैसे अग्नि में घृत डालने पर वह और अधिक प्रज्वलित होती है। जो (साधक) मृदु या कटु वचनों का श्रवण करके, स्वादिष्ट या स्वादरहित भोजन करके, सुन्दर या कुरूप दृश्य देखकर तथा सुगन्धित या दुर्गन्धपूर्ण पदार्थ सूंघ कर न तो हर्षोल्लसित होता है और न ही ग्लानि का अनुभव करता है, उसी को जितेन्द्रिय जानना चाहिए। जिसका मन और वाणी पवित्रता से ओत-प्रोत है, जो सभी प्रकार के दोषों से सर्वथा मुक्त है, वही वेदान्त सुनने का फल प्राप्त करता है। ब्राह्मण को चाहिए कि वह सम्मान को विष तुल्य उद्विग्नकारी तथा अपमान को अमृत तुल्य मानकर सदा उसकी कामना करे॥ ३३-४०॥ ।
36.0
इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्यसंशयः।संनियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं निगच्छति॥३६॥
___ काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकारादि समस्त दोषों का परित्याग करके संन्यासी को सब ओर से निर्मम (ममतारहित) हो जाना चाहिए। उसे समस्त रागों से विरक्त होकर मिट्टी के ढेले, पत्थर और. स्वर्ण में समान भाव रखना चाहिए। उसे हिंसा से परे और निस्पृह हो जाना चाहिए। जो संन्यासी दम्भ, अहंकार, हिंसा, रनिन्दा __ आदि दोषों से दूर है तथा आत्मज्ञान उपलब्ध कराने वाले गुणों से सुशोभित है, वही मुक्ति का अधिकारी है। १३३ नारदपरिव्राजकोपनिषद् इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हो जाने पर व्यक्ति निःसन्देह दुर्गुणों से लिप्त हो जाता है; परन्तु इन्हीं इन्द्रियों को वह सम्यक् रूप से वश में कर ले, तो (मुक्ति रूप) सिद्धि को प्राप्त करता है। सांसारिक भोगों का निरन्तर उपभोग करने से, उन्हें भोगने की कामना कभी शान्त नहीं होती, वह उसी तरह और बढ़ती जाती है, जैसे अग्नि में घृत डालने पर वह और अधिक प्रज्वलित होती है। जो (साधक) मृदु या कटु वचनों का श्रवण करके, स्वादिष्ट या स्वादरहित भोजन करके, सुन्दर या कुरूप दृश्य देखकर तथा सुगन्धित या दुर्गन्धपूर्ण पदार्थ सूंघ कर न तो हर्षोल्लसित होता है और न ही ग्लानि का अनुभव करता है, उसी को जितेन्द्रिय जानना चाहिए। जिसका मन और वाणी पवित्रता से ओत-प्रोत है, जो सभी प्रकार के दोषों से सर्वथा मुक्त है, वही वेदान्त सुनने का फल प्राप्त करता है। ब्राह्मण को चाहिए कि वह सम्मान को विष तुल्य उद्विग्नकारी तथा अपमान को अमृत तुल्य मानकर सदा उसकी कामना करे॥ ३३-४०॥ ।
37.0
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्मेव भूय एवाभिवर्धते॥३७॥
___ काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकारादि समस्त दोषों का परित्याग करके संन्यासी को सब ओर से निर्मम (ममतारहित) हो जाना चाहिए। उसे समस्त रागों से विरक्त होकर मिट्टी के ढेले, पत्थर और. स्वर्ण में समान भाव रखना चाहिए। उसे हिंसा से परे और निस्पृह हो जाना चाहिए। जो संन्यासी दम्भ, अहंकार, हिंसा, रनिन्दा __ आदि दोषों से दूर है तथा आत्मज्ञान उपलब्ध कराने वाले गुणों से सुशोभित है, वही मुक्ति का अधिकारी है। १३३ नारदपरिव्राजकोपनिषद् इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हो जाने पर व्यक्ति निःसन्देह दुर्गुणों से लिप्त हो जाता है; परन्तु इन्हीं इन्द्रियों को वह सम्यक् रूप से वश में कर ले, तो (मुक्ति रूप) सिद्धि को प्राप्त करता है। सांसारिक भोगों का निरन्तर उपभोग करने से, उन्हें भोगने की कामना कभी शान्त नहीं होती, वह उसी तरह और बढ़ती जाती है, जैसे अग्नि में घृत डालने पर वह और अधिक प्रज्वलित होती है। जो (साधक) मृदु या कटु वचनों का श्रवण करके, स्वादिष्ट या स्वादरहित भोजन करके, सुन्दर या कुरूप दृश्य देखकर तथा सुगन्धित या दुर्गन्धपूर्ण पदार्थ सूंघ कर न तो हर्षोल्लसित होता है और न ही ग्लानि का अनुभव करता है, उसी को जितेन्द्रिय जानना चाहिए। जिसका मन और वाणी पवित्रता से ओत-प्रोत है, जो सभी प्रकार के दोषों से सर्वथा मुक्त है, वही वेदान्त सुनने का फल प्राप्त करता है। ब्राह्मण को चाहिए कि वह सम्मान को विष तुल्य उद्विग्नकारी तथा अपमान को अमृत तुल्य मानकर सदा उसकी कामना करे॥ ३३-४०॥ ।
38.0
श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च भुक्त्वा च दृष्ट्वा घ्रात्वा च यो नरः। न हृष्यति ग्लायति वा स विज्ञेयो जितेन्द्रियः॥
___ काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकारादि समस्त दोषों का परित्याग करके संन्यासी को सब ओर से निर्मम (ममतारहित) हो जाना चाहिए। उसे समस्त रागों से विरक्त होकर मिट्टी के ढेले, पत्थर और. स्वर्ण में समान भाव रखना चाहिए। उसे हिंसा से परे और निस्पृह हो जाना चाहिए। जो संन्यासी दम्भ, अहंकार, हिंसा, रनिन्दा __ आदि दोषों से दूर है तथा आत्मज्ञान उपलब्ध कराने वाले गुणों से सुशोभित है, वही मुक्ति का अधिकारी है। १३३ नारदपरिव्राजकोपनिषद् इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हो जाने पर व्यक्ति निःसन्देह दुर्गुणों से लिप्त हो जाता है; परन्तु इन्हीं इन्द्रियों को वह सम्यक् रूप से वश में कर ले, तो (मुक्ति रूप) सिद्धि को प्राप्त करता है। सांसारिक भोगों का निरन्तर उपभोग करने से, उन्हें भोगने की कामना कभी शान्त नहीं होती, वह उसी तरह और बढ़ती जाती है, जैसे अग्नि में घृत डालने पर वह और अधिक प्रज्वलित होती है। जो (साधक) मृदु या कटु वचनों का श्रवण करके, स्वादिष्ट या स्वादरहित भोजन करके, सुन्दर या कुरूप दृश्य देखकर तथा सुगन्धित या दुर्गन्धपूर्ण पदार्थ सूंघ कर न तो हर्षोल्लसित होता है और न ही ग्लानि का अनुभव करता है, उसी को जितेन्द्रिय जानना चाहिए। जिसका मन और वाणी पवित्रता से ओत-प्रोत है, जो सभी प्रकार के दोषों से सर्वथा मुक्त है, वही वेदान्त सुनने का फल प्राप्त करता है। ब्राह्मण को चाहिए कि वह सम्मान को विष तुल्य उद्विग्नकारी तथा अपमान को अमृत तुल्य मानकर सदा उसकी कामना करे॥ ३३-४०॥ ।
39.0
यस्य वाड्मनसी शुद्धे सम्यग्गुप्ते च सर्वदा। स वै सर्वमवाप्रोति वेदान्तोपगतं फलम्॥३९॥
___ काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकारादि समस्त दोषों का परित्याग करके संन्यासी को सब ओर से निर्मम (ममतारहित) हो जाना चाहिए। उसे समस्त रागों से विरक्त होकर मिट्टी के ढेले, पत्थर और. स्वर्ण में समान भाव रखना चाहिए। उसे हिंसा से परे और निस्पृह हो जाना चाहिए। जो संन्यासी दम्भ, अहंकार, हिंसा, रनिन्दा __ आदि दोषों से दूर है तथा आत्मज्ञान उपलब्ध कराने वाले गुणों से सुशोभित है, वही मुक्ति का अधिकारी है। १३३ नारदपरिव्राजकोपनिषद् इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हो जाने पर व्यक्ति निःसन्देह दुर्गुणों से लिप्त हो जाता है; परन्तु इन्हीं इन्द्रियों को वह सम्यक् रूप से वश में कर ले, तो (मुक्ति रूप) सिद्धि को प्राप्त करता है। सांसारिक भोगों का निरन्तर उपभोग करने से, उन्हें भोगने की कामना कभी शान्त नहीं होती, वह उसी तरह और बढ़ती जाती है, जैसे अग्नि में घृत डालने पर वह और अधिक प्रज्वलित होती है। जो (साधक) मृदु या कटु वचनों का श्रवण करके, स्वादिष्ट या स्वादरहित भोजन करके, सुन्दर या कुरूप दृश्य देखकर तथा सुगन्धित या दुर्गन्धपूर्ण पदार्थ सूंघ कर न तो हर्षोल्लसित होता है और न ही ग्लानि का अनुभव करता है, उसी को जितेन्द्रिय जानना चाहिए। जिसका मन और वाणी पवित्रता से ओत-प्रोत है, जो सभी प्रकार के दोषों से सर्वथा मुक्त है, वही वेदान्त सुनने का फल प्राप्त करता है। ब्राह्मण को चाहिए कि वह सम्मान को विष तुल्य उद्विग्नकारी तथा अपमान को अमृत तुल्य मानकर सदा उसकी कामना करे॥ ३३-४०॥ ।
40.0
संमानाद्ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव।अमृतस्येव चाकाक्षेदवमानस्य सर्वदा ॥४०॥
___ काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकारादि समस्त दोषों का परित्याग करके संन्यासी को सब ओर से निर्मम (ममतारहित) हो जाना चाहिए। उसे समस्त रागों से विरक्त होकर मिट्टी के ढेले, पत्थर और. स्वर्ण में समान भाव रखना चाहिए। उसे हिंसा से परे और निस्पृह हो जाना चाहिए। जो संन्यासी दम्भ, अहंकार, हिंसा, रनिन्दा __ आदि दोषों से दूर है तथा आत्मज्ञान उपलब्ध कराने वाले गुणों से सुशोभित है, वही मुक्ति का अधिकारी है। १३३ नारदपरिव्राजकोपनिषद् इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हो जाने पर व्यक्ति निःसन्देह दुर्गुणों से लिप्त हो जाता है; परन्तु इन्हीं इन्द्रियों को वह सम्यक् रूप से वश में कर ले, तो (मुक्ति रूप) सिद्धि को प्राप्त करता है। सांसारिक भोगों का निरन्तर उपभोग करने से, उन्हें भोगने की कामना कभी शान्त नहीं होती, वह उसी तरह और बढ़ती जाती है, जैसे अग्नि में घृत डालने पर वह और अधिक प्रज्वलित होती है। जो (साधक) मृदु या कटु वचनों का श्रवण करके, स्वादिष्ट या स्वादरहित भोजन करके, सुन्दर या कुरूप दृश्य देखकर तथा सुगन्धित या दुर्गन्धपूर्ण पदार्थ सूंघ कर न तो हर्षोल्लसित होता है और न ही ग्लानि का अनुभव करता है, उसी को जितेन्द्रिय जानना चाहिए। जिसका मन और वाणी पवित्रता से ओत-प्रोत है, जो सभी प्रकार के दोषों से सर्वथा मुक्त है, वही वेदान्त सुनने का फल प्राप्त करता है। ब्राह्मण को चाहिए कि वह सम्मान को विष तुल्य उद्विग्नकारी तथा अपमान को अमृत तुल्य मानकर सदा उसकी कामना करे॥ ३३-४०॥ ।
41.0
सुखं हवमतः शेते सुखं च प्रतिबुध्यते। सुखं चरति लोकेऽस्मिन्नवमन्ता विनश्यति॥४१॥
____ अपमान प्राप्त करने वाला पुरुष सुखपूर्वक शयन करता, सुखपूर्वक जागता और इस संसार में सुखी होकर विचरता है, परन्तु (किसी का) अपमान करने वाला व्यक्ति अपने आप ही विनष्ट हो जाता है। दूसरों के कठोर वचनों (अतिवादों) को सहन करने का अभ्यास करे, किसी का भी अनादर न करे तथा इस नाशवान् शरीर के लिए किसी से वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करे, उसके प्रति क्रोधित न हो, यदि कोई अपशब्द कहे तो उसके प्रति भी मधुर वचन कहे। सप्तद्वारों (दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र और एक मुख) से सम्बद्ध जिह्वा को कभी अनत भाषण (झठ बोलने) के लिए प्रयक्त न करे। सख प्राप्ति की इच्छा वाले को चाहिए कि वह आध्यात्मिक विषयों में मन को संलग्न करके, स्थिर भाव से बैठे,किसी से कुछ अपेक्षा न रखे, मन से मस्त कामनाओं को निष्कासित कर दे और अपने आप अपनी सहायता करते हुए इस संसार में एकाकी ही विचरता रहे। इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखे, राग-द्वेष को समाप्त कर दे एवं किसी की भी हिंसा न करे। ऐसा करने से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है। यह काया रोगों का आगार है, जिसमें अस्थिरूपी स्तम्भ लगे हैं, जिसमें स्नायुओं का जाल डोरियों के रूप में पूरित है, जिस पर रक्त और मांस का लेपन (प्लास्टर) है तथा जिसे चर्म से मानो मढ़ दिया गया है। यह सदैव मल-मूत्र से पूरित रहता है, जिसमें दुर्गन्ध भरी है। इस (शरीर) उपदेश ३ मन्त्र ६१ १३४ में जरावस्था और रोगों के कारण निरन्तर संताप और आतुरता रहती है। रज और वीर्य से त्पन्न होने के कारण यह शरीर रजस्वल (रजोगुण प्रधान अथवा धूलि से भरा-विकारों से भरा) है। यह शरीर अनित्य है अर्थात् किस दिन इसका अवसान हो जायेगा, यह पता नहीं है। पञ्च महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश) सदैव डेरा डाले रहते हैं, अत: इसे त्याग देना चाहिए अर्थात् इसके प्रति मोह को त्याग देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य रक्त, रस, मांस, मज्जा, अस्थि, मल-मूत्र और नाड़ियों से निर्मित इस शरीर से प्रेम करता है, वह नरक से भी अवश्य प्रेम करेगा। शरीर में स्थित अहंभाव ही कालसत्र नामक नरक को ले जाने वाला है, वही कालवीचि नरक में भी ले जाने वाले जाल के रूप में भी बिछा है। वही (अहं) असिपत्र वन नामक नरक की कोटि का है। शरीर में स्थित अहंता कुत्ते का मांस भक्षण करने वाली चण्डालिनी के समान है। सभी प्रकार के उपाय करके इस अहंता को त्याग देना चाहिए। कल्याण कामी पुरुष को चाहिए कि वह सर्वनाश उपस्थित हो जाने पर भी इस अहंता का स्पर्श तक न होने दे। अपने प्रिय जनों में स्थित पुण्य और अप्रियजनों में स्थित दुष्कृत्यों (पाप) के अतिरिक्त स्वयं उनसे किसी प्रकार भी सम्बन्ध न रखे। ऐसा करने वाला साधक ध्यान योग के द्वारा सनातन पुरुष ब्रह्म की प्राप्ति करता है। इस तरह समस्त विषयों से धीरे-धीरे आसक्ति का परित्याग करके संन्यासी समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर परब्रह्म परमेश्वर में स्थित हो जाता है। सिद्धि के इच्छुक धक को चाहिए कि वह असहायक बनकर सतत एकाकी ही विचरण करे। संन्यासी किसी की सिद्धि को देखकर अपनी साधना नहीं छोड़ता और वह सिद्धि से वञ्चित भी नहीं होता।। ४१-५३॥
42.0
अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कंचन।न चेमंदेहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित्॥४२॥
____ अपमान प्राप्त करने वाला पुरुष सुखपूर्वक शयन करता, सुखपूर्वक जागता और इस संसार में सुखी होकर विचरता है, परन्तु (किसी का) अपमान करने वाला व्यक्ति अपने आप ही विनष्ट हो जाता है। दूसरों के कठोर वचनों (अतिवादों) को सहन करने का अभ्यास करे, किसी का भी अनादर न करे तथा इस नाशवान् शरीर के लिए किसी से वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करे, उसके प्रति क्रोधित न हो, यदि कोई अपशब्द कहे तो उसके प्रति भी मधुर वचन कहे। सप्तद्वारों (दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र और एक मुख) से सम्बद्ध जिह्वा को कभी अनत भाषण (झठ बोलने) के लिए प्रयक्त न करे। सख प्राप्ति की इच्छा वाले को चाहिए कि वह आध्यात्मिक विषयों में मन को संलग्न करके, स्थिर भाव से बैठे,किसी से कुछ अपेक्षा न रखे, मन से मस्त कामनाओं को निष्कासित कर दे और अपने आप अपनी सहायता करते हुए इस संसार में एकाकी ही विचरता रहे। इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखे, राग-द्वेष को समाप्त कर दे एवं किसी की भी हिंसा न करे। ऐसा करने से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है। यह काया रोगों का आगार है, जिसमें अस्थिरूपी स्तम्भ लगे हैं, जिसमें स्नायुओं का जाल डोरियों के रूप में पूरित है, जिस पर रक्त और मांस का लेपन (प्लास्टर) है तथा जिसे चर्म से मानो मढ़ दिया गया है। यह सदैव मल-मूत्र से पूरित रहता है, जिसमें दुर्गन्ध भरी है। इस (शरीर) उपदेश ३ मन्त्र ६१ १३४ में जरावस्था और रोगों के कारण निरन्तर संताप और आतुरता रहती है। रज और वीर्य से त्पन्न होने के कारण यह शरीर रजस्वल (रजोगुण प्रधान अथवा धूलि से भरा-विकारों से भरा) है। यह शरीर अनित्य है अर्थात् किस दिन इसका अवसान हो जायेगा, यह पता नहीं है। पञ्च महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश) सदैव डेरा डाले रहते हैं, अत: इसे त्याग देना चाहिए अर्थात् इसके प्रति मोह को त्याग देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य रक्त, रस, मांस, मज्जा, अस्थि, मल-मूत्र और नाड़ियों से निर्मित इस शरीर से प्रेम करता है, वह नरक से भी अवश्य प्रेम करेगा। शरीर में स्थित अहंभाव ही कालसत्र नामक नरक को ले जाने वाला है, वही कालवीचि नरक में भी ले जाने वाले जाल के रूप में भी बिछा है। वही (अहं) असिपत्र वन नामक नरक की कोटि का है। शरीर में स्थित अहंता कुत्ते का मांस भक्षण करने वाली चण्डालिनी के समान है। सभी प्रकार के उपाय करके इस अहंता को त्याग देना चाहिए। कल्याण कामी पुरुष को चाहिए कि वह सर्वनाश उपस्थित हो जाने पर भी इस अहंता का स्पर्श तक न होने दे। अपने प्रिय जनों में स्थित पुण्य और अप्रियजनों में स्थित दुष्कृत्यों (पाप) के अतिरिक्त स्वयं उनसे किसी प्रकार भी सम्बन्ध न रखे। ऐसा करने वाला साधक ध्यान योग के द्वारा सनातन पुरुष ब्रह्म की प्राप्ति करता है। इस तरह समस्त विषयों से धीरे-धीरे आसक्ति का परित्याग करके संन्यासी समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर परब्रह्म परमेश्वर में स्थित हो जाता है। सिद्धि के इच्छुक धक को चाहिए कि वह असहायक बनकर सतत एकाकी ही विचरण करे। संन्यासी किसी की सिद्धि को देखकर अपनी साधना नहीं छोड़ता और वह सिद्धि से वञ्चित भी नहीं होता।। ४१-५३॥
43.0
क्रुध्यन्तं न प्रतिक्रुध्येदाक्रुष्टः कुशलं वदेत्। सप्तद्वारावकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत्॥४३॥
____ अपमान प्राप्त करने वाला पुरुष सुखपूर्वक शयन करता, सुखपूर्वक जागता और इस संसार में सुखी होकर विचरता है, परन्तु (किसी का) अपमान करने वाला व्यक्ति अपने आप ही विनष्ट हो जाता है। दूसरों के कठोर वचनों (अतिवादों) को सहन करने का अभ्यास करे, किसी का भी अनादर न करे तथा इस नाशवान् शरीर के लिए किसी से वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करे, उसके प्रति क्रोधित न हो, यदि कोई अपशब्द कहे तो उसके प्रति भी मधुर वचन कहे। सप्तद्वारों (दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र और एक मुख) से सम्बद्ध जिह्वा को कभी अनत भाषण (झठ बोलने) के लिए प्रयक्त न करे। सख प्राप्ति की इच्छा वाले को चाहिए कि वह आध्यात्मिक विषयों में मन को संलग्न करके, स्थिर भाव से बैठे,किसी से कुछ अपेक्षा न रखे, मन से मस्त कामनाओं को निष्कासित कर दे और अपने आप अपनी सहायता करते हुए इस संसार में एकाकी ही विचरता रहे। इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखे, राग-द्वेष को समाप्त कर दे एवं किसी की भी हिंसा न करे। ऐसा करने से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है। यह काया रोगों का आगार है, जिसमें अस्थिरूपी स्तम्भ लगे हैं, जिसमें स्नायुओं का जाल डोरियों के रूप में पूरित है, जिस पर रक्त और मांस का लेपन (प्लास्टर) है तथा जिसे चर्म से मानो मढ़ दिया गया है। यह सदैव मल-मूत्र से पूरित रहता है, जिसमें दुर्गन्ध भरी है। इस (शरीर) उपदेश ३ मन्त्र ६१ १३४ में जरावस्था और रोगों के कारण निरन्तर संताप और आतुरता रहती है। रज और वीर्य से त्पन्न होने के कारण यह शरीर रजस्वल (रजोगुण प्रधान अथवा धूलि से भरा-विकारों से भरा) है। यह शरीर अनित्य है अर्थात् किस दिन इसका अवसान हो जायेगा, यह पता नहीं है। पञ्च महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश) सदैव डेरा डाले रहते हैं, अत: इसे त्याग देना चाहिए अर्थात् इसके प्रति मोह को त्याग देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य रक्त, रस, मांस, मज्जा, अस्थि, मल-मूत्र और नाड़ियों से निर्मित इस शरीर से प्रेम करता है, वह नरक से भी अवश्य प्रेम करेगा। शरीर में स्थित अहंभाव ही कालसत्र नामक नरक को ले जाने वाला है, वही कालवीचि नरक में भी ले जाने वाले जाल के रूप में भी बिछा है। वही (अहं) असिपत्र वन नामक नरक की कोटि का है। शरीर में स्थित अहंता कुत्ते का मांस भक्षण करने वाली चण्डालिनी के समान है। सभी प्रकार के उपाय करके इस अहंता को त्याग देना चाहिए। कल्याण कामी पुरुष को चाहिए कि वह सर्वनाश उपस्थित हो जाने पर भी इस अहंता का स्पर्श तक न होने दे। अपने प्रिय जनों में स्थित पुण्य और अप्रियजनों में स्थित दुष्कृत्यों (पाप) के अतिरिक्त स्वयं उनसे किसी प्रकार भी सम्बन्ध न रखे। ऐसा करने वाला साधक ध्यान योग के द्वारा सनातन पुरुष ब्रह्म की प्राप्ति करता है। इस तरह समस्त विषयों से धीरे-धीरे आसक्ति का परित्याग करके संन्यासी समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर परब्रह्म परमेश्वर में स्थित हो जाता है। सिद्धि के इच्छुक धक को चाहिए कि वह असहायक बनकर सतत एकाकी ही विचरण करे। संन्यासी किसी की सिद्धि को देखकर अपनी साधना नहीं छोड़ता और वह सिद्धि से वञ्चित भी नहीं होता।। ४१-५३॥
44.0
अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निराशिषः। आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह॥४४॥
____ अपमान प्राप्त करने वाला पुरुष सुखपूर्वक शयन करता, सुखपूर्वक जागता और इस संसार में सुखी होकर विचरता है, परन्तु (किसी का) अपमान करने वाला व्यक्ति अपने आप ही विनष्ट हो जाता है। दूसरों के कठोर वचनों (अतिवादों) को सहन करने का अभ्यास करे, किसी का भी अनादर न करे तथा इस नाशवान् शरीर के लिए किसी से वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करे, उसके प्रति क्रोधित न हो, यदि कोई अपशब्द कहे तो उसके प्रति भी मधुर वचन कहे। सप्तद्वारों (दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र और एक मुख) से सम्बद्ध जिह्वा को कभी अनत भाषण (झठ बोलने) के लिए प्रयक्त न करे। सख प्राप्ति की इच्छा वाले को चाहिए कि वह आध्यात्मिक विषयों में मन को संलग्न करके, स्थिर भाव से बैठे,किसी से कुछ अपेक्षा न रखे, मन से मस्त कामनाओं को निष्कासित कर दे और अपने आप अपनी सहायता करते हुए इस संसार में एकाकी ही विचरता रहे। इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखे, राग-द्वेष को समाप्त कर दे एवं किसी की भी हिंसा न करे। ऐसा करने से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है। यह काया रोगों का आगार है, जिसमें अस्थिरूपी स्तम्भ लगे हैं, जिसमें स्नायुओं का जाल डोरियों के रूप में पूरित है, जिस पर रक्त और मांस का लेपन (प्लास्टर) है तथा जिसे चर्म से मानो मढ़ दिया गया है। यह सदैव मल-मूत्र से पूरित रहता है, जिसमें दुर्गन्ध भरी है। इस (शरीर) उपदेश ३ मन्त्र ६१ १३४ में जरावस्था और रोगों के कारण निरन्तर संताप और आतुरता रहती है। रज और वीर्य से त्पन्न होने के कारण यह शरीर रजस्वल (रजोगुण प्रधान अथवा धूलि से भरा-विकारों से भरा) है। यह शरीर अनित्य है अर्थात् किस दिन इसका अवसान हो जायेगा, यह पता नहीं है। पञ्च महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश) सदैव डेरा डाले रहते हैं, अत: इसे त्याग देना चाहिए अर्थात् इसके प्रति मोह को त्याग देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य रक्त, रस, मांस, मज्जा, अस्थि, मल-मूत्र और नाड़ियों से निर्मित इस शरीर से प्रेम करता है, वह नरक से भी अवश्य प्रेम करेगा। शरीर में स्थित अहंभाव ही कालसत्र नामक नरक को ले जाने वाला है, वही कालवीचि नरक में भी ले जाने वाले जाल के रूप में भी बिछा है। वही (अहं) असिपत्र वन नामक नरक की कोटि का है। शरीर में स्थित अहंता कुत्ते का मांस भक्षण करने वाली चण्डालिनी के समान है। सभी प्रकार के उपाय करके इस अहंता को त्याग देना चाहिए। कल्याण कामी पुरुष को चाहिए कि वह सर्वनाश उपस्थित हो जाने पर भी इस अहंता का स्पर्श तक न होने दे। अपने प्रिय जनों में स्थित पुण्य और अप्रियजनों में स्थित दुष्कृत्यों (पाप) के अतिरिक्त स्वयं उनसे किसी प्रकार भी सम्बन्ध न रखे। ऐसा करने वाला साधक ध्यान योग के द्वारा सनातन पुरुष ब्रह्म की प्राप्ति करता है। इस तरह समस्त विषयों से धीरे-धीरे आसक्ति का परित्याग करके संन्यासी समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर परब्रह्म परमेश्वर में स्थित हो जाता है। सिद्धि के इच्छुक धक को चाहिए कि वह असहायक बनकर सतत एकाकी ही विचरण करे। संन्यासी किसी की सिद्धि को देखकर अपनी साधना नहीं छोड़ता और वह सिद्धि से वञ्चित भी नहीं होता।। ४१-५३॥
45.0
इन्द्रियाणां निरोधेन रागद्वेषक्षयेण च। अहिंसया च भूतानाममृतत्वाय कल्पते॥४५॥
____ अपमान प्राप्त करने वाला पुरुष सुखपूर्वक शयन करता, सुखपूर्वक जागता और इस संसार में सुखी होकर विचरता है, परन्तु (किसी का) अपमान करने वाला व्यक्ति अपने आप ही विनष्ट हो जाता है। दूसरों के कठोर वचनों (अतिवादों) को सहन करने का अभ्यास करे, किसी का भी अनादर न करे तथा इस नाशवान् शरीर के लिए किसी से वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करे, उसके प्रति क्रोधित न हो, यदि कोई अपशब्द कहे तो उसके प्रति भी मधुर वचन कहे। सप्तद्वारों (दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र और एक मुख) से सम्बद्ध जिह्वा को कभी अनत भाषण (झठ बोलने) के लिए प्रयक्त न करे। सख प्राप्ति की इच्छा वाले को चाहिए कि वह आध्यात्मिक विषयों में मन को संलग्न करके, स्थिर भाव से बैठे,किसी से कुछ अपेक्षा न रखे, मन से मस्त कामनाओं को निष्कासित कर दे और अपने आप अपनी सहायता करते हुए इस संसार में एकाकी ही विचरता रहे। इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखे, राग-द्वेष को समाप्त कर दे एवं किसी की भी हिंसा न करे। ऐसा करने से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है। यह काया रोगों का आगार है, जिसमें अस्थिरूपी स्तम्भ लगे हैं, जिसमें स्नायुओं का जाल डोरियों के रूप में पूरित है, जिस पर रक्त और मांस का लेपन (प्लास्टर) है तथा जिसे चर्म से मानो मढ़ दिया गया है। यह सदैव मल-मूत्र से पूरित रहता है, जिसमें दुर्गन्ध भरी है। इस (शरीर) उपदेश ३ मन्त्र ६१ १३४ में जरावस्था और रोगों के कारण निरन्तर संताप और आतुरता रहती है। रज और वीर्य से त्पन्न होने के कारण यह शरीर रजस्वल (रजोगुण प्रधान अथवा धूलि से भरा-विकारों से भरा) है। यह शरीर अनित्य है अर्थात् किस दिन इसका अवसान हो जायेगा, यह पता नहीं है। पञ्च महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश) सदैव डेरा डाले रहते हैं, अत: इसे त्याग देना चाहिए अर्थात् इसके प्रति मोह को त्याग देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य रक्त, रस, मांस, मज्जा, अस्थि, मल-मूत्र और नाड़ियों से निर्मित इस शरीर से प्रेम करता है, वह नरक से भी अवश्य प्रेम करेगा। शरीर में स्थित अहंभाव ही कालसत्र नामक नरक को ले जाने वाला है, वही कालवीचि नरक में भी ले जाने वाले जाल के रूप में भी बिछा है। वही (अहं) असिपत्र वन नामक नरक की कोटि का है। शरीर में स्थित अहंता कुत्ते का मांस भक्षण करने वाली चण्डालिनी के समान है। सभी प्रकार के उपाय करके इस अहंता को त्याग देना चाहिए। कल्याण कामी पुरुष को चाहिए कि वह सर्वनाश उपस्थित हो जाने पर भी इस अहंता का स्पर्श तक न होने दे। अपने प्रिय जनों में स्थित पुण्य और अप्रियजनों में स्थित दुष्कृत्यों (पाप) के अतिरिक्त स्वयं उनसे किसी प्रकार भी सम्बन्ध न रखे। ऐसा करने वाला साधक ध्यान योग के द्वारा सनातन पुरुष ब्रह्म की प्राप्ति करता है। इस तरह समस्त विषयों से धीरे-धीरे आसक्ति का परित्याग करके संन्यासी समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर परब्रह्म परमेश्वर में स्थित हो जाता है। सिद्धि के इच्छुक धक को चाहिए कि वह असहायक बनकर सतत एकाकी ही विचरण करे। संन्यासी किसी की सिद्धि को देखकर अपनी साधना नहीं छोड़ता और वह सिद्धि से वञ्चित भी नहीं होता।। ४१-५३॥
Text (part 3)
46.0
अस्थिस्थूणं स्नायुबद्धं मांसशोणितलेपितम्। चर्मावबद्धं दुर्गन्धि पूर्ण मूत्रपुरीषयोः॥ ४६॥
____ अपमान प्राप्त करने वाला पुरुष सुखपूर्वक शयन करता, सुखपूर्वक जागता और इस संसार में सुखी होकर विचरता है, परन्तु (किसी का) अपमान करने वाला व्यक्ति अपने आप ही विनष्ट हो जाता है। दूसरों के कठोर वचनों (अतिवादों) को सहन करने का अभ्यास करे, किसी का भी अनादर न करे तथा इस नाशवान् शरीर के लिए किसी से वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करे, उसके प्रति क्रोधित न हो, यदि कोई अपशब्द कहे तो उसके प्रति भी मधुर वचन कहे। सप्तद्वारों (दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र और एक मुख) से सम्बद्ध जिह्वा को कभी अनत भाषण (झठ बोलने) के लिए प्रयक्त न करे। सख प्राप्ति की इच्छा वाले को चाहिए कि वह आध्यात्मिक विषयों में मन को संलग्न करके, स्थिर भाव से बैठे,किसी से कुछ अपेक्षा न रखे, मन से मस्त कामनाओं को निष्कासित कर दे और अपने आप अपनी सहायता करते हुए इस संसार में एकाकी ही विचरता रहे। इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखे, राग-द्वेष को समाप्त कर दे एवं किसी की भी हिंसा न करे। ऐसा करने से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है। यह काया रोगों का आगार है, जिसमें अस्थिरूपी स्तम्भ लगे हैं, जिसमें स्नायुओं का जाल डोरियों के रूप में पूरित है, जिस पर रक्त और मांस का लेपन (प्लास्टर) है तथा जिसे चर्म से मानो मढ़ दिया गया है। यह सदैव मल-मूत्र से पूरित रहता है, जिसमें दुर्गन्ध भरी है। इस (शरीर) उपदेश ३ मन्त्र ६१ १३४ में जरावस्था और रोगों के कारण निरन्तर संताप और आतुरता रहती है। रज और वीर्य से त्पन्न होने के कारण यह शरीर रजस्वल (रजोगुण प्रधान अथवा धूलि से भरा-विकारों से भरा) है। यह शरीर अनित्य है अर्थात् किस दिन इसका अवसान हो जायेगा, यह पता नहीं है। पञ्च महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश) सदैव डेरा डाले रहते हैं, अत: इसे त्याग देना चाहिए अर्थात् इसके प्रति मोह को त्याग देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य रक्त, रस, मांस, मज्जा, अस्थि, मल-मूत्र और नाड़ियों से निर्मित इस शरीर से प्रेम करता है, वह नरक से भी अवश्य प्रेम करेगा। शरीर में स्थित अहंभाव ही कालसत्र नामक नरक को ले जाने वाला है, वही कालवीचि नरक में भी ले जाने वाले जाल के रूप में भी बिछा है। वही (अहं) असिपत्र वन नामक नरक की कोटि का है। शरीर में स्थित अहंता कुत्ते का मांस भक्षण करने वाली चण्डालिनी के समान है। सभी प्रकार के उपाय करके इस अहंता को त्याग देना चाहिए। कल्याण कामी पुरुष को चाहिए कि वह सर्वनाश उपस्थित हो जाने पर भी इस अहंता का स्पर्श तक न होने दे। अपने प्रिय जनों में स्थित पुण्य और अप्रियजनों में स्थित दुष्कृत्यों (पाप) के अतिरिक्त स्वयं उनसे किसी प्रकार भी सम्बन्ध न रखे। ऐसा करने वाला साधक ध्यान योग के द्वारा सनातन पुरुष ब्रह्म की प्राप्ति करता है। इस तरह समस्त विषयों से धीरे-धीरे आसक्ति का परित्याग करके संन्यासी समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर परब्रह्म परमेश्वर में स्थित हो जाता है। सिद्धि के इच्छुक धक को चाहिए कि वह असहायक बनकर सतत एकाकी ही विचरण करे। संन्यासी किसी की सिद्धि को देखकर अपनी साधना नहीं छोड़ता और वह सिद्धि से वञ्चित भी नहीं होता।। ४१-५३॥
47.0
जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम्। रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत्॥४७॥
____ अपमान प्राप्त करने वाला पुरुष सुखपूर्वक शयन करता, सुखपूर्वक जागता और इस संसार में सुखी होकर विचरता है, परन्तु (किसी का) अपमान करने वाला व्यक्ति अपने आप ही विनष्ट हो जाता है। दूसरों के कठोर वचनों (अतिवादों) को सहन करने का अभ्यास करे, किसी का भी अनादर न करे तथा इस नाशवान् शरीर के लिए किसी से वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करे, उसके प्रति क्रोधित न हो, यदि कोई अपशब्द कहे तो उसके प्रति भी मधुर वचन कहे। सप्तद्वारों (दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र और एक मुख) से सम्बद्ध जिह्वा को कभी अनत भाषण (झठ बोलने) के लिए प्रयक्त न करे। सख प्राप्ति की इच्छा वाले को चाहिए कि वह आध्यात्मिक विषयों में मन को संलग्न करके, स्थिर भाव से बैठे,किसी से कुछ अपेक्षा न रखे, मन से मस्त कामनाओं को निष्कासित कर दे और अपने आप अपनी सहायता करते हुए इस संसार में एकाकी ही विचरता रहे। इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखे, राग-द्वेष को समाप्त कर दे एवं किसी की भी हिंसा न करे। ऐसा करने से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है। यह काया रोगों का आगार है, जिसमें अस्थिरूपी स्तम्भ लगे हैं, जिसमें स्नायुओं का जाल डोरियों के रूप में पूरित है, जिस पर रक्त और मांस का लेपन (प्लास्टर) है तथा जिसे चर्म से मानो मढ़ दिया गया है। यह सदैव मल-मूत्र से पूरित रहता है, जिसमें दुर्गन्ध भरी है। इस (शरीर) उपदेश ३ मन्त्र ६१ १३४ में जरावस्था और रोगों के कारण निरन्तर संताप और आतुरता रहती है। रज और वीर्य से त्पन्न होने के कारण यह शरीर रजस्वल (रजोगुण प्रधान अथवा धूलि से भरा-विकारों से भरा) है। यह शरीर अनित्य है अर्थात् किस दिन इसका अवसान हो जायेगा, यह पता नहीं है। पञ्च महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश) सदैव डेरा डाले रहते हैं, अत: इसे त्याग देना चाहिए अर्थात् इसके प्रति मोह को त्याग देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य रक्त, रस, मांस, मज्जा, अस्थि, मल-मूत्र और नाड़ियों से निर्मित इस शरीर से प्रेम करता है, वह नरक से भी अवश्य प्रेम करेगा। शरीर में स्थित अहंभाव ही कालसत्र नामक नरक को ले जाने वाला है, वही कालवीचि नरक में भी ले जाने वाले जाल के रूप में भी बिछा है। वही (अहं) असिपत्र वन नामक नरक की कोटि का है। शरीर में स्थित अहंता कुत्ते का मांस भक्षण करने वाली चण्डालिनी के समान है। सभी प्रकार के उपाय करके इस अहंता को त्याग देना चाहिए। कल्याण कामी पुरुष को चाहिए कि वह सर्वनाश उपस्थित हो जाने पर भी इस अहंता का स्पर्श तक न होने दे। अपने प्रिय जनों में स्थित पुण्य और अप्रियजनों में स्थित दुष्कृत्यों (पाप) के अतिरिक्त स्वयं उनसे किसी प्रकार भी सम्बन्ध न रखे। ऐसा करने वाला साधक ध्यान योग के द्वारा सनातन पुरुष ब्रह्म की प्राप्ति करता है। इस तरह समस्त विषयों से धीरे-धीरे आसक्ति का परित्याग करके संन्यासी समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर परब्रह्म परमेश्वर में स्थित हो जाता है। सिद्धि के इच्छुक धक को चाहिए कि वह असहायक बनकर सतत एकाकी ही विचरण करे। संन्यासी किसी की सिद्धि को देखकर अपनी साधना नहीं छोड़ता और वह सिद्धि से वञ्चित भी नहीं होता।। ४१-५३॥
48.0
मांसासृक्पूयविण्मूत्रस्नायुमजास्थिसंहतौ। देहे चेत्प्रीतिमान्मूढो भविता नरकेऽपि सः॥४८॥
____ अपमान प्राप्त करने वाला पुरुष सुखपूर्वक शयन करता, सुखपूर्वक जागता और इस संसार में सुखी होकर विचरता है, परन्तु (किसी का) अपमान करने वाला व्यक्ति अपने आप ही विनष्ट हो जाता है। दूसरों के कठोर वचनों (अतिवादों) को सहन करने का अभ्यास करे, किसी का भी अनादर न करे तथा इस नाशवान् शरीर के लिए किसी से वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करे, उसके प्रति क्रोधित न हो, यदि कोई अपशब्द कहे तो उसके प्रति भी मधुर वचन कहे। सप्तद्वारों (दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र और एक मुख) से सम्बद्ध जिह्वा को कभी अनत भाषण (झठ बोलने) के लिए प्रयक्त न करे। सख प्राप्ति की इच्छा वाले को चाहिए कि वह आध्यात्मिक विषयों में मन को संलग्न करके, स्थिर भाव से बैठे,किसी से कुछ अपेक्षा न रखे, मन से मस्त कामनाओं को निष्कासित कर दे और अपने आप अपनी सहायता करते हुए इस संसार में एकाकी ही विचरता रहे। इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखे, राग-द्वेष को समाप्त कर दे एवं किसी की भी हिंसा न करे। ऐसा करने से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है। यह काया रोगों का आगार है, जिसमें अस्थिरूपी स्तम्भ लगे हैं, जिसमें स्नायुओं का जाल डोरियों के रूप में पूरित है, जिस पर रक्त और मांस का लेपन (प्लास्टर) है तथा जिसे चर्म से मानो मढ़ दिया गया है। यह सदैव मल-मूत्र से पूरित रहता है, जिसमें दुर्गन्ध भरी है। इस (शरीर) उपदेश ३ मन्त्र ६१ १३४ में जरावस्था और रोगों के कारण निरन्तर संताप और आतुरता रहती है। रज और वीर्य से त्पन्न होने के कारण यह शरीर रजस्वल (रजोगुण प्रधान अथवा धूलि से भरा-विकारों से भरा) है। यह शरीर अनित्य है अर्थात् किस दिन इसका अवसान हो जायेगा, यह पता नहीं है। पञ्च महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश) सदैव डेरा डाले रहते हैं, अत: इसे त्याग देना चाहिए अर्थात् इसके प्रति मोह को त्याग देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य रक्त, रस, मांस, मज्जा, अस्थि, मल-मूत्र और नाड़ियों से निर्मित इस शरीर से प्रेम करता है, वह नरक से भी अवश्य प्रेम करेगा। शरीर में स्थित अहंभाव ही कालसत्र नामक नरक को ले जाने वाला है, वही कालवीचि नरक में भी ले जाने वाले जाल के रूप में भी बिछा है। वही (अहं) असिपत्र वन नामक नरक की कोटि का है। शरीर में स्थित अहंता कुत्ते का मांस भक्षण करने वाली चण्डालिनी के समान है। सभी प्रकार के उपाय करके इस अहंता को त्याग देना चाहिए। कल्याण कामी पुरुष को चाहिए कि वह सर्वनाश उपस्थित हो जाने पर भी इस अहंता का स्पर्श तक न होने दे। अपने प्रिय जनों में स्थित पुण्य और अप्रियजनों में स्थित दुष्कृत्यों (पाप) के अतिरिक्त स्वयं उनसे किसी प्रकार भी सम्बन्ध न रखे। ऐसा करने वाला साधक ध्यान योग के द्वारा सनातन पुरुष ब्रह्म की प्राप्ति करता है। इस तरह समस्त विषयों से धीरे-धीरे आसक्ति का परित्याग करके संन्यासी समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर परब्रह्म परमेश्वर में स्थित हो जाता है। सिद्धि के इच्छुक धक को चाहिए कि वह असहायक बनकर सतत एकाकी ही विचरण करे। संन्यासी किसी की सिद्धि को देखकर अपनी साधना नहीं छोड़ता और वह सिद्धि से वञ्चित भी नहीं होता।। ४१-५३॥
49.0
सा कालपुत्रपदवी सा महावीचिवागुरा। सासिपत्रवनश्रेणी या देहेऽहमिति स्थितिः॥४९॥
____ अपमान प्राप्त करने वाला पुरुष सुखपूर्वक शयन करता, सुखपूर्वक जागता और इस संसार में सुखी होकर विचरता है, परन्तु (किसी का) अपमान करने वाला व्यक्ति अपने आप ही विनष्ट हो जाता है। दूसरों के कठोर वचनों (अतिवादों) को सहन करने का अभ्यास करे, किसी का भी अनादर न करे तथा इस नाशवान् शरीर के लिए किसी से वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करे, उसके प्रति क्रोधित न हो, यदि कोई अपशब्द कहे तो उसके प्रति भी मधुर वचन कहे। सप्तद्वारों (दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र और एक मुख) से सम्बद्ध जिह्वा को कभी अनत भाषण (झठ बोलने) के लिए प्रयक्त न करे। सख प्राप्ति की इच्छा वाले को चाहिए कि वह आध्यात्मिक विषयों में मन को संलग्न करके, स्थिर भाव से बैठे,किसी से कुछ अपेक्षा न रखे, मन से मस्त कामनाओं को निष्कासित कर दे और अपने आप अपनी सहायता करते हुए इस संसार में एकाकी ही विचरता रहे। इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखे, राग-द्वेष को समाप्त कर दे एवं किसी की भी हिंसा न करे। ऐसा करने से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है। यह काया रोगों का आगार है, जिसमें अस्थिरूपी स्तम्भ लगे हैं, जिसमें स्नायुओं का जाल डोरियों के रूप में पूरित है, जिस पर रक्त और मांस का लेपन (प्लास्टर) है तथा जिसे चर्म से मानो मढ़ दिया गया है। यह सदैव मल-मूत्र से पूरित रहता है, जिसमें दुर्गन्ध भरी है। इस (शरीर) उपदेश ३ मन्त्र ६१ १३४ में जरावस्था और रोगों के कारण निरन्तर संताप और आतुरता रहती है। रज और वीर्य से त्पन्न होने के कारण यह शरीर रजस्वल (रजोगुण प्रधान अथवा धूलि से भरा-विकारों से भरा) है। यह शरीर अनित्य है अर्थात् किस दिन इसका अवसान हो जायेगा, यह पता नहीं है। पञ्च महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश) सदैव डेरा डाले रहते हैं, अत: इसे त्याग देना चाहिए अर्थात् इसके प्रति मोह को त्याग देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य रक्त, रस, मांस, मज्जा, अस्थि, मल-मूत्र और नाड़ियों से निर्मित इस शरीर से प्रेम करता है, वह नरक से भी अवश्य प्रेम करेगा। शरीर में स्थित अहंभाव ही कालसत्र नामक नरक को ले जाने वाला है, वही कालवीचि नरक में भी ले जाने वाले जाल के रूप में भी बिछा है। वही (अहं) असिपत्र वन नामक नरक की कोटि का है। शरीर में स्थित अहंता कुत्ते का मांस भक्षण करने वाली चण्डालिनी के समान है। सभी प्रकार के उपाय करके इस अहंता को त्याग देना चाहिए। कल्याण कामी पुरुष को चाहिए कि वह सर्वनाश उपस्थित हो जाने पर भी इस अहंता का स्पर्श तक न होने दे। अपने प्रिय जनों में स्थित पुण्य और अप्रियजनों में स्थित दुष्कृत्यों (पाप) के अतिरिक्त स्वयं उनसे किसी प्रकार भी सम्बन्ध न रखे। ऐसा करने वाला साधक ध्यान योग के द्वारा सनातन पुरुष ब्रह्म की प्राप्ति करता है। इस तरह समस्त विषयों से धीरे-धीरे आसक्ति का परित्याग करके संन्यासी समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर परब्रह्म परमेश्वर में स्थित हो जाता है। सिद्धि के इच्छुक धक को चाहिए कि वह असहायक बनकर सतत एकाकी ही विचरण करे। संन्यासी किसी की सिद्धि को देखकर अपनी साधना नहीं छोड़ता और वह सिद्धि से वञ्चित भी नहीं होता।। ४१-५३॥
50.0
सा त्याज्या सर्वयत्नेन सर्वनाशेऽप्युपस्थिते। स्प्रष्टव्या सा न भव्येन सश्वमांसेव पुल्कसी॥५०॥
____ अपमान प्राप्त करने वाला पुरुष सुखपूर्वक शयन करता, सुखपूर्वक जागता और इस संसार में सुखी होकर विचरता है, परन्तु (किसी का) अपमान करने वाला व्यक्ति अपने आप ही विनष्ट हो जाता है। दूसरों के कठोर वचनों (अतिवादों) को सहन करने का अभ्यास करे, किसी का भी अनादर न करे तथा इस नाशवान् शरीर के लिए किसी से वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करे, उसके प्रति क्रोधित न हो, यदि कोई अपशब्द कहे तो उसके प्रति भी मधुर वचन कहे। सप्तद्वारों (दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र और एक मुख) से सम्बद्ध जिह्वा को कभी अनत भाषण (झठ बोलने) के लिए प्रयक्त न करे। सख प्राप्ति की इच्छा वाले को चाहिए कि वह आध्यात्मिक विषयों में मन को संलग्न करके, स्थिर भाव से बैठे,किसी से कुछ अपेक्षा न रखे, मन से मस्त कामनाओं को निष्कासित कर दे और अपने आप अपनी सहायता करते हुए इस संसार में एकाकी ही विचरता रहे। इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखे, राग-द्वेष को समाप्त कर दे एवं किसी की भी हिंसा न करे। ऐसा करने से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है। यह काया रोगों का आगार है, जिसमें अस्थिरूपी स्तम्भ लगे हैं, जिसमें स्नायुओं का जाल डोरियों के रूप में पूरित है, जिस पर रक्त और मांस का लेपन (प्लास्टर) है तथा जिसे चर्म से मानो मढ़ दिया गया है। यह सदैव मल-मूत्र से पूरित रहता है, जिसमें दुर्गन्ध भरी है। इस (शरीर) उपदेश ३ मन्त्र ६१ १३४ में जरावस्था और रोगों के कारण निरन्तर संताप और आतुरता रहती है। रज और वीर्य से त्पन्न होने के कारण यह शरीर रजस्वल (रजोगुण प्रधान अथवा धूलि से भरा-विकारों से भरा) है। यह शरीर अनित्य है अर्थात् किस दिन इसका अवसान हो जायेगा, यह पता नहीं है। पञ्च महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश) सदैव डेरा डाले रहते हैं, अत: इसे त्याग देना चाहिए अर्थात् इसके प्रति मोह को त्याग देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य रक्त, रस, मांस, मज्जा, अस्थि, मल-मूत्र और नाड़ियों से निर्मित इस शरीर से प्रेम करता है, वह नरक से भी अवश्य प्रेम करेगा। शरीर में स्थित अहंभाव ही कालसत्र नामक नरक को ले जाने वाला है, वही कालवीचि नरक में भी ले जाने वाले जाल के रूप में भी बिछा है। वही (अहं) असिपत्र वन नामक नरक की कोटि का है। शरीर में स्थित अहंता कुत्ते का मांस भक्षण करने वाली चण्डालिनी के समान है। सभी प्रकार के उपाय करके इस अहंता को त्याग देना चाहिए। कल्याण कामी पुरुष को चाहिए कि वह सर्वनाश उपस्थित हो जाने पर भी इस अहंता का स्पर्श तक न होने दे। अपने प्रिय जनों में स्थित पुण्य और अप्रियजनों में स्थित दुष्कृत्यों (पाप) के अतिरिक्त स्वयं उनसे किसी प्रकार भी सम्बन्ध न रखे। ऐसा करने वाला साधक ध्यान योग के द्वारा सनातन पुरुष ब्रह्म की प्राप्ति करता है। इस तरह समस्त विषयों से धीरे-धीरे आसक्ति का परित्याग करके संन्यासी समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर परब्रह्म परमेश्वर में स्थित हो जाता है। सिद्धि के इच्छुक धक को चाहिए कि वह असहायक बनकर सतत एकाकी ही विचरण करे। संन्यासी किसी की सिद्धि को देखकर अपनी साधना नहीं छोड़ता और वह सिद्धि से वञ्चित भी नहीं होता।। ४१-५३॥
51.0
प्रियेषु स्वेषु सुकृतमप्रियेषु च दुष्कृतम्। विसृज्य ध्यानयोगेन ब्रह्माप्येति सनातनम्॥५१॥
____ अपमान प्राप्त करने वाला पुरुष सुखपूर्वक शयन करता, सुखपूर्वक जागता और इस संसार में सुखी होकर विचरता है, परन्तु (किसी का) अपमान करने वाला व्यक्ति अपने आप ही विनष्ट हो जाता है। दूसरों के कठोर वचनों (अतिवादों) को सहन करने का अभ्यास करे, किसी का भी अनादर न करे तथा इस नाशवान् शरीर के लिए किसी से वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करे, उसके प्रति क्रोधित न हो, यदि कोई अपशब्द कहे तो उसके प्रति भी मधुर वचन कहे। सप्तद्वारों (दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र और एक मुख) से सम्बद्ध जिह्वा को कभी अनत भाषण (झठ बोलने) के लिए प्रयक्त न करे। सख प्राप्ति की इच्छा वाले को चाहिए कि वह आध्यात्मिक विषयों में मन को संलग्न करके, स्थिर भाव से बैठे,किसी से कुछ अपेक्षा न रखे, मन से मस्त कामनाओं को निष्कासित कर दे और अपने आप अपनी सहायता करते हुए इस संसार में एकाकी ही विचरता रहे। इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखे, राग-द्वेष को समाप्त कर दे एवं किसी की भी हिंसा न करे। ऐसा करने से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है। यह काया रोगों का आगार है, जिसमें अस्थिरूपी स्तम्भ लगे हैं, जिसमें स्नायुओं का जाल डोरियों के रूप में पूरित है, जिस पर रक्त और मांस का लेपन (प्लास्टर) है तथा जिसे चर्म से मानो मढ़ दिया गया है। यह सदैव मल-मूत्र से पूरित रहता है, जिसमें दुर्गन्ध भरी है। इस (शरीर) उपदेश ३ मन्त्र ६१ १३४ में जरावस्था और रोगों के कारण निरन्तर संताप और आतुरता रहती है। रज और वीर्य से त्पन्न होने के कारण यह शरीर रजस्वल (रजोगुण प्रधान अथवा धूलि से भरा-विकारों से भरा) है। यह शरीर अनित्य है अर्थात् किस दिन इसका अवसान हो जायेगा, यह पता नहीं है। पञ्च महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश) सदैव डेरा डाले रहते हैं, अत: इसे त्याग देना चाहिए अर्थात् इसके प्रति मोह को त्याग देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य रक्त, रस, मांस, मज्जा, अस्थि, मल-मूत्र और नाड़ियों से निर्मित इस शरीर से प्रेम करता है, वह नरक से भी अवश्य प्रेम करेगा। शरीर में स्थित अहंभाव ही कालसत्र नामक नरक को ले जाने वाला है, वही कालवीचि नरक में भी ले जाने वाले जाल के रूप में भी बिछा है। वही (अहं) असिपत्र वन नामक नरक की कोटि का है। शरीर में स्थित अहंता कुत्ते का मांस भक्षण करने वाली चण्डालिनी के समान है। सभी प्रकार के उपाय करके इस अहंता को त्याग देना चाहिए। कल्याण कामी पुरुष को चाहिए कि वह सर्वनाश उपस्थित हो जाने पर भी इस अहंता का स्पर्श तक न होने दे। अपने प्रिय जनों में स्थित पुण्य और अप्रियजनों में स्थित दुष्कृत्यों (पाप) के अतिरिक्त स्वयं उनसे किसी प्रकार भी सम्बन्ध न रखे। ऐसा करने वाला साधक ध्यान योग के द्वारा सनातन पुरुष ब्रह्म की प्राप्ति करता है। इस तरह समस्त विषयों से धीरे-धीरे आसक्ति का परित्याग करके संन्यासी समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर परब्रह्म परमेश्वर में स्थित हो जाता है। सिद्धि के इच्छुक धक को चाहिए कि वह असहायक बनकर सतत एकाकी ही विचरण करे। संन्यासी किसी की सिद्धि को देखकर अपनी साधना नहीं छोड़ता और वह सिद्धि से वञ्चित भी नहीं होता।। ४१-५३॥
52.0
अनेन विधिना सर्वांस्त्यक्त्वा सङ्गान्शनैः शनैः। सर्वद्वन्द्वैर्विनिर्मुक्तो ब्रह्मण्येवावतिष्ठते॥५२॥
____ अपमान प्राप्त करने वाला पुरुष सुखपूर्वक शयन करता, सुखपूर्वक जागता और इस संसार में सुखी होकर विचरता है, परन्तु (किसी का) अपमान करने वाला व्यक्ति अपने आप ही विनष्ट हो जाता है। दूसरों के कठोर वचनों (अतिवादों) को सहन करने का अभ्यास करे, किसी का भी अनादर न करे तथा इस नाशवान् शरीर के लिए किसी से वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करे, उसके प्रति क्रोधित न हो, यदि कोई अपशब्द कहे तो उसके प्रति भी मधुर वचन कहे। सप्तद्वारों (दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र और एक मुख) से सम्बद्ध जिह्वा को कभी अनत भाषण (झठ बोलने) के लिए प्रयक्त न करे। सख प्राप्ति की इच्छा वाले को चाहिए कि वह आध्यात्मिक विषयों में मन को संलग्न करके, स्थिर भाव से बैठे,किसी से कुछ अपेक्षा न रखे, मन से मस्त कामनाओं को निष्कासित कर दे और अपने आप अपनी सहायता करते हुए इस संसार में एकाकी ही विचरता रहे। इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखे, राग-द्वेष को समाप्त कर दे एवं किसी की भी हिंसा न करे। ऐसा करने से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है। यह काया रोगों का आगार है, जिसमें अस्थिरूपी स्तम्भ लगे हैं, जिसमें स्नायुओं का जाल डोरियों के रूप में पूरित है, जिस पर रक्त और मांस का लेपन (प्लास्टर) है तथा जिसे चर्म से मानो मढ़ दिया गया है। यह सदैव मल-मूत्र से पूरित रहता है, जिसमें दुर्गन्ध भरी है। इस (शरीर) उपदेश ३ मन्त्र ६१ १३४ में जरावस्था और रोगों के कारण निरन्तर संताप और आतुरता रहती है। रज और वीर्य से त्पन्न होने के कारण यह शरीर रजस्वल (रजोगुण प्रधान अथवा धूलि से भरा-विकारों से भरा) है। यह शरीर अनित्य है अर्थात् किस दिन इसका अवसान हो जायेगा, यह पता नहीं है। पञ्च महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश) सदैव डेरा डाले रहते हैं, अत: इसे त्याग देना चाहिए अर्थात् इसके प्रति मोह को त्याग देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य रक्त, रस, मांस, मज्जा, अस्थि, मल-मूत्र और नाड़ियों से निर्मित इस शरीर से प्रेम करता है, वह नरक से भी अवश्य प्रेम करेगा। शरीर में स्थित अहंभाव ही कालसत्र नामक नरक को ले जाने वाला है, वही कालवीचि नरक में भी ले जाने वाले जाल के रूप में भी बिछा है। वही (अहं) असिपत्र वन नामक नरक की कोटि का है। शरीर में स्थित अहंता कुत्ते का मांस भक्षण करने वाली चण्डालिनी के समान है। सभी प्रकार के उपाय करके इस अहंता को त्याग देना चाहिए। कल्याण कामी पुरुष को चाहिए कि वह सर्वनाश उपस्थित हो जाने पर भी इस अहंता का स्पर्श तक न होने दे। अपने प्रिय जनों में स्थित पुण्य और अप्रियजनों में स्थित दुष्कृत्यों (पाप) के अतिरिक्त स्वयं उनसे किसी प्रकार भी सम्बन्ध न रखे। ऐसा करने वाला साधक ध्यान योग के द्वारा सनातन पुरुष ब्रह्म की प्राप्ति करता है। इस तरह समस्त विषयों से धीरे-धीरे आसक्ति का परित्याग करके संन्यासी समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर परब्रह्म परमेश्वर में स्थित हो जाता है। सिद्धि के इच्छुक धक को चाहिए कि वह असहायक बनकर सतत एकाकी ही विचरण करे। संन्यासी किसी की सिद्धि को देखकर अपनी साधना नहीं छोड़ता और वह सिद्धि से वञ्चित भी नहीं होता।। ४१-५३॥
53.0
एक एव चरेन्नित्यं सिद्धयर्थमसहायकः। सिद्धिमेकस्य पश्यन्हि न जहाति न हीयते ॥५३॥
____ अपमान प्राप्त करने वाला पुरुष सुखपूर्वक शयन करता, सुखपूर्वक जागता और इस संसार में सुखी होकर विचरता है, परन्तु (किसी का) अपमान करने वाला व्यक्ति अपने आप ही विनष्ट हो जाता है। दूसरों के कठोर वचनों (अतिवादों) को सहन करने का अभ्यास करे, किसी का भी अनादर न करे तथा इस नाशवान् शरीर के लिए किसी से वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करे, उसके प्रति क्रोधित न हो, यदि कोई अपशब्द कहे तो उसके प्रति भी मधुर वचन कहे। सप्तद्वारों (दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र और एक मुख) से सम्बद्ध जिह्वा को कभी अनत भाषण (झठ बोलने) के लिए प्रयक्त न करे। सख प्राप्ति की इच्छा वाले को चाहिए कि वह आध्यात्मिक विषयों में मन को संलग्न करके, स्थिर भाव से बैठे,किसी से कुछ अपेक्षा न रखे, मन से मस्त कामनाओं को निष्कासित कर दे और अपने आप अपनी सहायता करते हुए इस संसार में एकाकी ही विचरता रहे। इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखे, राग-द्वेष को समाप्त कर दे एवं किसी की भी हिंसा न करे। ऐसा करने से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है। यह काया रोगों का आगार है, जिसमें अस्थिरूपी स्तम्भ लगे हैं, जिसमें स्नायुओं का जाल डोरियों के रूप में पूरित है, जिस पर रक्त और मांस का लेपन (प्लास्टर) है तथा जिसे चर्म से मानो मढ़ दिया गया है। यह सदैव मल-मूत्र से पूरित रहता है, जिसमें दुर्गन्ध भरी है। इस (शरीर) उपदेश ३ मन्त्र ६१ १३४ में जरावस्था और रोगों के कारण निरन्तर संताप और आतुरता रहती है। रज और वीर्य से त्पन्न होने के कारण यह शरीर रजस्वल (रजोगुण प्रधान अथवा धूलि से भरा-विकारों से भरा) है। यह शरीर अनित्य है अर्थात् किस दिन इसका अवसान हो जायेगा, यह पता नहीं है। पञ्च महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश) सदैव डेरा डाले रहते हैं, अत: इसे त्याग देना चाहिए अर्थात् इसके प्रति मोह को त्याग देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य रक्त, रस, मांस, मज्जा, अस्थि, मल-मूत्र और नाड़ियों से निर्मित इस शरीर से प्रेम करता है, वह नरक से भी अवश्य प्रेम करेगा। शरीर में स्थित अहंभाव ही कालसत्र नामक नरक को ले जाने वाला है, वही कालवीचि नरक में भी ले जाने वाले जाल के रूप में भी बिछा है। वही (अहं) असिपत्र वन नामक नरक की कोटि का है। शरीर में स्थित अहंता कुत्ते का मांस भक्षण करने वाली चण्डालिनी के समान है। सभी प्रकार के उपाय करके इस अहंता को त्याग देना चाहिए। कल्याण कामी पुरुष को चाहिए कि वह सर्वनाश उपस्थित हो जाने पर भी इस अहंता का स्पर्श तक न होने दे। अपने प्रिय जनों में स्थित पुण्य और अप्रियजनों में स्थित दुष्कृत्यों (पाप) के अतिरिक्त स्वयं उनसे किसी प्रकार भी सम्बन्ध न रखे। ऐसा करने वाला साधक ध्यान योग के द्वारा सनातन पुरुष ब्रह्म की प्राप्ति करता है। इस तरह समस्त विषयों से धीरे-धीरे आसक्ति का परित्याग करके संन्यासी समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर परब्रह्म परमेश्वर में स्थित हो जाता है। सिद्धि के इच्छुक धक को चाहिए कि वह असहायक बनकर सतत एकाकी ही विचरण करे। संन्यासी किसी की सिद्धि को देखकर अपनी साधना नहीं छोड़ता और वह सिद्धि से वञ्चित भी नहीं होता।। ४१-५३॥
54.0
कपालं वृक्षमूलानि कुचेलान्यसहायता। समता चैव सर्वस्मिन्नेतन्मुक्तस्य लक्षणम्॥ ५४॥
जल पीने के लिए कपाल (नारियल अथवा लकड़ी का पात्र), निवास करने के लिए किसी वृक्ष का मूल, धारण करने के लिए जीर्ण-शीर्ण वस्त्र, सदैव अकेले रहने का स्वभाव एवं समस्त जीद-धारियों के प्रति समत्व का भाव ये सभी जीवनमुक्त पुरुष के लक्षण हैं। संन्यासी को समस्त प्राणियों का हितैषो होना चाहिए। उसे शान्तचित्त रहकर सतत त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण करके केवल आत्मा में ही रमण करते रहना चाहिए। वह सब कुछ त्यागकर अकेला ही विचरण करे, जब भिक्षा लेना हो तभी ग्राम में प्रवेश करे। शास्त्रों में एकाकी रहने वाले संन्यासी को ही भिक्षु कहा गया है; क्योंकि एक से दो होते ही उसे मिथुन (युगल) माना जाता है। दो से तीन हो, तो ग्राम और इससे अधिक व्यक्तियों का समुदाय एक साथ हो जाय, तब तो नगर ही कहा जायेगा। संन्यासी को अपने पास किसी अन्य को आने का अवसर नहीं देना चाहिए; ताकि मिथुन, ग्राम या नगर की स्थिति न बने। ऐसा करने से वह अपने धर्म से पतित हो जाता है। अनेक व्यक्तियों का एक साथ संयोग होने से उनमें विभिन्न चर्चाएँ प्रारम्भ हो जायेंगी और उनमें राजा, सेठ आदि के विषय में तथा कहाँ-कैसी १३५ नारदपारव्राजकापनिषद् भिक्षा मिलती है, इस पर चर्चा होगी। इसके पश्चात् विभिन्न बातों के फलस्वरूप परस्पर राग-द्वेष, चुगली आदि के भाव उत्पन्न होंगे ही, इसमें कोई संशय नहीं है। इसीलिए शास्त्रों ने संन्यासी को निस्पृह भाव से एकाकी ही रहने का आदेश दिया है। वह किसी के साथ व्यर्थ बातचीत न करे। दूसरों की बात या नमन का उत्तर नारायण कहकर दे। निर्जन स्थान में अकेले रहकर मन, वचन, शरीर और क्रिया द्वारा एकमात्र ब्रह्म का ही ध्यान करता रहे। जीवन अथवा मृत्यु का कभी अभिनन्दन न करे। मृत्युकाल आने तक की प्रतीक्षा करता रहे। संन्यासी जीवन और मृत्यु में से किसी की प्रतीक्षा न करे। साधक को चाहिए कि वह भृतक (वैतनिक कर्मचारी) के द्वारा अपने स्वामी के आदेश की प्रतीक्षा करने की तरह एकमात्र काल की प्रतीक्षा करता रहे ॥५४-६१॥
55.0
सर्वभूतहितः शान्तस्त्रिदण्डी सकमण्डलुः। एकारामः परिव्रज्य भिक्षार्थं ग्राममाविशेत्॥५५॥
जल पीने के लिए कपाल (नारियल अथवा लकड़ी का पात्र), निवास करने के लिए किसी वृक्ष का मूल, धारण करने के लिए जीर्ण-शीर्ण वस्त्र, सदैव अकेले रहने का स्वभाव एवं समस्त जीद-धारियों के प्रति समत्व का भाव ये सभी जीवनमुक्त पुरुष के लक्षण हैं। संन्यासी को समस्त प्राणियों का हितैषो होना चाहिए। उसे शान्तचित्त रहकर सतत त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण करके केवल आत्मा में ही रमण करते रहना चाहिए। वह सब कुछ त्यागकर अकेला ही विचरण करे, जब भिक्षा लेना हो तभी ग्राम में प्रवेश करे। शास्त्रों में एकाकी रहने वाले संन्यासी को ही भिक्षु कहा गया है; क्योंकि एक से दो होते ही उसे मिथुन (युगल) माना जाता है। दो से तीन हो, तो ग्राम और इससे अधिक व्यक्तियों का समुदाय एक साथ हो जाय, तब तो नगर ही कहा जायेगा। संन्यासी को अपने पास किसी अन्य को आने का अवसर नहीं देना चाहिए; ताकि मिथुन, ग्राम या नगर की स्थिति न बने। ऐसा करने से वह अपने धर्म से पतित हो जाता है। अनेक व्यक्तियों का एक साथ संयोग होने से उनमें विभिन्न चर्चाएँ प्रारम्भ हो जायेंगी और उनमें राजा, सेठ आदि के विषय में तथा कहाँ-कैसी १३५ नारदपारव्राजकापनिषद् भिक्षा मिलती है, इस पर चर्चा होगी। इसके पश्चात् विभिन्न बातों के फलस्वरूप परस्पर राग-द्वेष, चुगली आदि के भाव उत्पन्न होंगे ही, इसमें कोई संशय नहीं है। इसीलिए शास्त्रों ने संन्यासी को निस्पृह भाव से एकाकी ही रहने का आदेश दिया है। वह किसी के साथ व्यर्थ बातचीत न करे। दूसरों की बात या नमन का उत्तर नारायण कहकर दे। निर्जन स्थान में अकेले रहकर मन, वचन, शरीर और क्रिया द्वारा एकमात्र ब्रह्म का ही ध्यान करता रहे। जीवन अथवा मृत्यु का कभी अभिनन्दन न करे। मृत्युकाल आने तक की प्रतीक्षा करता रहे। संन्यासी जीवन और मृत्यु में से किसी की प्रतीक्षा न करे। साधक को चाहिए कि वह भृतक (वैतनिक कर्मचारी) के द्वारा अपने स्वामी के आदेश की प्रतीक्षा करने की तरह एकमात्र काल की प्रतीक्षा करता रहे ॥५४-६१॥
56.0
एको भिक्षुर्यथोक्तः स्यावावेव मिथुनं स्मृतम्।त्रयो ग्रामः समाख्यात ऊर्ध्वं तु नगरायते॥५६॥
जल पीने के लिए कपाल (नारियल अथवा लकड़ी का पात्र), निवास करने के लिए किसी वृक्ष का मूल, धारण करने के लिए जीर्ण-शीर्ण वस्त्र, सदैव अकेले रहने का स्वभाव एवं समस्त जीद-धारियों के प्रति समत्व का भाव ये सभी जीवनमुक्त पुरुष के लक्षण हैं। संन्यासी को समस्त प्राणियों का हितैषो होना चाहिए। उसे शान्तचित्त रहकर सतत त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण करके केवल आत्मा में ही रमण करते रहना चाहिए। वह सब कुछ त्यागकर अकेला ही विचरण करे, जब भिक्षा लेना हो तभी ग्राम में प्रवेश करे। शास्त्रों में एकाकी रहने वाले संन्यासी को ही भिक्षु कहा गया है; क्योंकि एक से दो होते ही उसे मिथुन (युगल) माना जाता है। दो से तीन हो, तो ग्राम और इससे अधिक व्यक्तियों का समुदाय एक साथ हो जाय, तब तो नगर ही कहा जायेगा। संन्यासी को अपने पास किसी अन्य को आने का अवसर नहीं देना चाहिए; ताकि मिथुन, ग्राम या नगर की स्थिति न बने। ऐसा करने से वह अपने धर्म से पतित हो जाता है। अनेक व्यक्तियों का एक साथ संयोग होने से उनमें विभिन्न चर्चाएँ प्रारम्भ हो जायेंगी और उनमें राजा, सेठ आदि के विषय में तथा कहाँ-कैसी १३५ नारदपारव्राजकापनिषद् भिक्षा मिलती है, इस पर चर्चा होगी। इसके पश्चात् विभिन्न बातों के फलस्वरूप परस्पर राग-द्वेष, चुगली आदि के भाव उत्पन्न होंगे ही, इसमें कोई संशय नहीं है। इसीलिए शास्त्रों ने संन्यासी को निस्पृह भाव से एकाकी ही रहने का आदेश दिया है। वह किसी के साथ व्यर्थ बातचीत न करे। दूसरों की बात या नमन का उत्तर नारायण कहकर दे। निर्जन स्थान में अकेले रहकर मन, वचन, शरीर और क्रिया द्वारा एकमात्र ब्रह्म का ही ध्यान करता रहे। जीवन अथवा मृत्यु का कभी अभिनन्दन न करे। मृत्युकाल आने तक की प्रतीक्षा करता रहे। संन्यासी जीवन और मृत्यु में से किसी की प्रतीक्षा न करे। साधक को चाहिए कि वह भृतक (वैतनिक कर्मचारी) के द्वारा अपने स्वामी के आदेश की प्रतीक्षा करने की तरह एकमात्र काल की प्रतीक्षा करता रहे ॥५४-६१॥
57.0
नगरं नहि कर्त्तव्यं ग्रामो वा मिथुनं तथा। एतत्त्रयं प्रकुर्वाणः स्वधर्माच्च्यवते यतिः॥५७॥
जल पीने के लिए कपाल (नारियल अथवा लकड़ी का पात्र), निवास करने के लिए किसी वृक्ष का मूल, धारण करने के लिए जीर्ण-शीर्ण वस्त्र, सदैव अकेले रहने का स्वभाव एवं समस्त जीद-धारियों के प्रति समत्व का भाव ये सभी जीवनमुक्त पुरुष के लक्षण हैं। संन्यासी को समस्त प्राणियों का हितैषो होना चाहिए। उसे शान्तचित्त रहकर सतत त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण करके केवल आत्मा में ही रमण करते रहना चाहिए। वह सब कुछ त्यागकर अकेला ही विचरण करे, जब भिक्षा लेना हो तभी ग्राम में प्रवेश करे। शास्त्रों में एकाकी रहने वाले संन्यासी को ही भिक्षु कहा गया है; क्योंकि एक से दो होते ही उसे मिथुन (युगल) माना जाता है। दो से तीन हो, तो ग्राम और इससे अधिक व्यक्तियों का समुदाय एक साथ हो जाय, तब तो नगर ही कहा जायेगा। संन्यासी को अपने पास किसी अन्य को आने का अवसर नहीं देना चाहिए; ताकि मिथुन, ग्राम या नगर की स्थिति न बने। ऐसा करने से वह अपने धर्म से पतित हो जाता है। अनेक व्यक्तियों का एक साथ संयोग होने से उनमें विभिन्न चर्चाएँ प्रारम्भ हो जायेंगी और उनमें राजा, सेठ आदि के विषय में तथा कहाँ-कैसी १३५ नारदपारव्राजकापनिषद् भिक्षा मिलती है, इस पर चर्चा होगी। इसके पश्चात् विभिन्न बातों के फलस्वरूप परस्पर राग-द्वेष, चुगली आदि के भाव उत्पन्न होंगे ही, इसमें कोई संशय नहीं है। इसीलिए शास्त्रों ने संन्यासी को निस्पृह भाव से एकाकी ही रहने का आदेश दिया है। वह किसी के साथ व्यर्थ बातचीत न करे। दूसरों की बात या नमन का उत्तर नारायण कहकर दे। निर्जन स्थान में अकेले रहकर मन, वचन, शरीर और क्रिया द्वारा एकमात्र ब्रह्म का ही ध्यान करता रहे। जीवन अथवा मृत्यु का कभी अभिनन्दन न करे। मृत्युकाल आने तक की प्रतीक्षा करता रहे। संन्यासी जीवन और मृत्यु में से किसी की प्रतीक्षा न करे। साधक को चाहिए कि वह भृतक (वैतनिक कर्मचारी) के द्वारा अपने स्वामी के आदेश की प्रतीक्षा करने की तरह एकमात्र काल की प्रतीक्षा करता रहे ॥५४-६१॥
58.0
राजवार्तादि तेषां स्याद्भिक्षावार्ता परस्परम्। स्नेहपैशुन्यमात्सर्यं संनिकर्षान संशयः॥ ५८॥
जल पीने के लिए कपाल (नारियल अथवा लकड़ी का पात्र), निवास करने के लिए किसी वृक्ष का मूल, धारण करने के लिए जीर्ण-शीर्ण वस्त्र, सदैव अकेले रहने का स्वभाव एवं समस्त जीद-धारियों के प्रति समत्व का भाव ये सभी जीवनमुक्त पुरुष के लक्षण हैं। संन्यासी को समस्त प्राणियों का हितैषो होना चाहिए। उसे शान्तचित्त रहकर सतत त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण करके केवल आत्मा में ही रमण करते रहना चाहिए। वह सब कुछ त्यागकर अकेला ही विचरण करे, जब भिक्षा लेना हो तभी ग्राम में प्रवेश करे। शास्त्रों में एकाकी रहने वाले संन्यासी को ही भिक्षु कहा गया है; क्योंकि एक से दो होते ही उसे मिथुन (युगल) माना जाता है। दो से तीन हो, तो ग्राम और इससे अधिक व्यक्तियों का समुदाय एक साथ हो जाय, तब तो नगर ही कहा जायेगा। संन्यासी को अपने पास किसी अन्य को आने का अवसर नहीं देना चाहिए; ताकि मिथुन, ग्राम या नगर की स्थिति न बने। ऐसा करने से वह अपने धर्म से पतित हो जाता है। अनेक व्यक्तियों का एक साथ संयोग होने से उनमें विभिन्न चर्चाएँ प्रारम्भ हो जायेंगी और उनमें राजा, सेठ आदि के विषय में तथा कहाँ-कैसी १३५ नारदपारव्राजकापनिषद् भिक्षा मिलती है, इस पर चर्चा होगी। इसके पश्चात् विभिन्न बातों के फलस्वरूप परस्पर राग-द्वेष, चुगली आदि के भाव उत्पन्न होंगे ही, इसमें कोई संशय नहीं है। इसीलिए शास्त्रों ने संन्यासी को निस्पृह भाव से एकाकी ही रहने का आदेश दिया है। वह किसी के साथ व्यर्थ बातचीत न करे। दूसरों की बात या नमन का उत्तर नारायण कहकर दे। निर्जन स्थान में अकेले रहकर मन, वचन, शरीर और क्रिया द्वारा एकमात्र ब्रह्म का ही ध्यान करता रहे। जीवन अथवा मृत्यु का कभी अभिनन्दन न करे। मृत्युकाल आने तक की प्रतीक्षा करता रहे। संन्यासी जीवन और मृत्यु में से किसी की प्रतीक्षा न करे। साधक को चाहिए कि वह भृतक (वैतनिक कर्मचारी) के द्वारा अपने स्वामी के आदेश की प्रतीक्षा करने की तरह एकमात्र काल की प्रतीक्षा करता रहे ॥५४-६१॥
59.0
एकाकी निःस्पृहस्तिष्ठेन्न हि केन सहालपेत्। दद्यान्नारायणेत्येव प्रतिवाक्यं सदा यतिः॥५९॥
जल पीने के लिए कपाल (नारियल अथवा लकड़ी का पात्र), निवास करने के लिए किसी वृक्ष का मूल, धारण करने के लिए जीर्ण-शीर्ण वस्त्र, सदैव अकेले रहने का स्वभाव एवं समस्त जीद-धारियों के प्रति समत्व का भाव ये सभी जीवनमुक्त पुरुष के लक्षण हैं। संन्यासी को समस्त प्राणियों का हितैषो होना चाहिए। उसे शान्तचित्त रहकर सतत त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण करके केवल आत्मा में ही रमण करते रहना चाहिए। वह सब कुछ त्यागकर अकेला ही विचरण करे, जब भिक्षा लेना हो तभी ग्राम में प्रवेश करे। शास्त्रों में एकाकी रहने वाले संन्यासी को ही भिक्षु कहा गया है; क्योंकि एक से दो होते ही उसे मिथुन (युगल) माना जाता है। दो से तीन हो, तो ग्राम और इससे अधिक व्यक्तियों का समुदाय एक साथ हो जाय, तब तो नगर ही कहा जायेगा। संन्यासी को अपने पास किसी अन्य को आने का अवसर नहीं देना चाहिए; ताकि मिथुन, ग्राम या नगर की स्थिति न बने। ऐसा करने से वह अपने धर्म से पतित हो जाता है। अनेक व्यक्तियों का एक साथ संयोग होने से उनमें विभिन्न चर्चाएँ प्रारम्भ हो जायेंगी और उनमें राजा, सेठ आदि के विषय में तथा कहाँ-कैसी १३५ नारदपारव्राजकापनिषद् भिक्षा मिलती है, इस पर चर्चा होगी। इसके पश्चात् विभिन्न बातों के फलस्वरूप परस्पर राग-द्वेष, चुगली आदि के भाव उत्पन्न होंगे ही, इसमें कोई संशय नहीं है। इसीलिए शास्त्रों ने संन्यासी को निस्पृह भाव से एकाकी ही रहने का आदेश दिया है। वह किसी के साथ व्यर्थ बातचीत न करे। दूसरों की बात या नमन का उत्तर नारायण कहकर दे। निर्जन स्थान में अकेले रहकर मन, वचन, शरीर और क्रिया द्वारा एकमात्र ब्रह्म का ही ध्यान करता रहे। जीवन अथवा मृत्यु का कभी अभिनन्दन न करे। मृत्युकाल आने तक की प्रतीक्षा करता रहे। संन्यासी जीवन और मृत्यु में से किसी की प्रतीक्षा न करे। साधक को चाहिए कि वह भृतक (वैतनिक कर्मचारी) के द्वारा अपने स्वामी के आदेश की प्रतीक्षा करने की तरह एकमात्र काल की प्रतीक्षा करता रहे ॥५४-६१॥
60.0
एकाकी चिन्तयेद्ब्रह्म मनोवाक्कायकर्मभिः। मृत्युं च नाभिनन्देत जीवितं वा कथंचन॥६०॥
जल पीने के लिए कपाल (नारियल अथवा लकड़ी का पात्र), निवास करने के लिए किसी वृक्ष का मूल, धारण करने के लिए जीर्ण-शीर्ण वस्त्र, सदैव अकेले रहने का स्वभाव एवं समस्त जीद-धारियों के प्रति समत्व का भाव ये सभी जीवनमुक्त पुरुष के लक्षण हैं। संन्यासी को समस्त प्राणियों का हितैषो होना चाहिए। उसे शान्तचित्त रहकर सतत त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण करके केवल आत्मा में ही रमण करते रहना चाहिए। वह सब कुछ त्यागकर अकेला ही विचरण करे, जब भिक्षा लेना हो तभी ग्राम में प्रवेश करे। शास्त्रों में एकाकी रहने वाले संन्यासी को ही भिक्षु कहा गया है; क्योंकि एक से दो होते ही उसे मिथुन (युगल) माना जाता है। दो से तीन हो, तो ग्राम और इससे अधिक व्यक्तियों का समुदाय एक साथ हो जाय, तब तो नगर ही कहा जायेगा। संन्यासी को अपने पास किसी अन्य को आने का अवसर नहीं देना चाहिए; ताकि मिथुन, ग्राम या नगर की स्थिति न बने। ऐसा करने से वह अपने धर्म से पतित हो जाता है। अनेक व्यक्तियों का एक साथ संयोग होने से उनमें विभिन्न चर्चाएँ प्रारम्भ हो जायेंगी और उनमें राजा, सेठ आदि के विषय में तथा कहाँ-कैसी १३५ नारदपारव्राजकापनिषद् भिक्षा मिलती है, इस पर चर्चा होगी। इसके पश्चात् विभिन्न बातों के फलस्वरूप परस्पर राग-द्वेष, चुगली आदि के भाव उत्पन्न होंगे ही, इसमें कोई संशय नहीं है। इसीलिए शास्त्रों ने संन्यासी को निस्पृह भाव से एकाकी ही रहने का आदेश दिया है। वह किसी के साथ व्यर्थ बातचीत न करे। दूसरों की बात या नमन का उत्तर नारायण कहकर दे। निर्जन स्थान में अकेले रहकर मन, वचन, शरीर और क्रिया द्वारा एकमात्र ब्रह्म का ही ध्यान करता रहे। जीवन अथवा मृत्यु का कभी अभिनन्दन न करे। मृत्युकाल आने तक की प्रतीक्षा करता रहे। संन्यासी जीवन और मृत्यु में से किसी की प्रतीक्षा न करे। साधक को चाहिए कि वह भृतक (वैतनिक कर्मचारी) के द्वारा अपने स्वामी के आदेश की प्रतीक्षा करने की तरह एकमात्र काल की प्रतीक्षा करता रहे ॥५४-६१॥
Text (part 4)
61.0
कालमेव प्रतीक्षेत यावदायुः समाप्यते । नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम्। कालमेव प्रतीक्षेत निर्देशं भृतको यथा॥६१॥
जल पीने के लिए कपाल (नारियल अथवा लकड़ी का पात्र), निवास करने के लिए किसी वृक्ष का मूल, धारण करने के लिए जीर्ण-शीर्ण वस्त्र, सदैव अकेले रहने का स्वभाव एवं समस्त जीद-धारियों के प्रति समत्व का भाव ये सभी जीवनमुक्त पुरुष के लक्षण हैं। संन्यासी को समस्त प्राणियों का हितैषो होना चाहिए। उसे शान्तचित्त रहकर सतत त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण करके केवल आत्मा में ही रमण करते रहना चाहिए। वह सब कुछ त्यागकर अकेला ही विचरण करे, जब भिक्षा लेना हो तभी ग्राम में प्रवेश करे। शास्त्रों में एकाकी रहने वाले संन्यासी को ही भिक्षु कहा गया है; क्योंकि एक से दो होते ही उसे मिथुन (युगल) माना जाता है। दो से तीन हो, तो ग्राम और इससे अधिक व्यक्तियों का समुदाय एक साथ हो जाय, तब तो नगर ही कहा जायेगा। संन्यासी को अपने पास किसी अन्य को आने का अवसर नहीं देना चाहिए; ताकि मिथुन, ग्राम या नगर की स्थिति न बने। ऐसा करने से वह अपने धर्म से पतित हो जाता है। अनेक व्यक्तियों का एक साथ संयोग होने से उनमें विभिन्न चर्चाएँ प्रारम्भ हो जायेंगी और उनमें राजा, सेठ आदि के विषय में तथा कहाँ-कैसी १३५ नारदपारव्राजकापनिषद् भिक्षा मिलती है, इस पर चर्चा होगी। इसके पश्चात् विभिन्न बातों के फलस्वरूप परस्पर राग-द्वेष, चुगली आदि के भाव उत्पन्न होंगे ही, इसमें कोई संशय नहीं है। इसीलिए शास्त्रों ने संन्यासी को निस्पृह भाव से एकाकी ही रहने का आदेश दिया है। वह किसी के साथ व्यर्थ बातचीत न करे। दूसरों की बात या नमन का उत्तर नारायण कहकर दे। निर्जन स्थान में अकेले रहकर मन, वचन, शरीर और क्रिया द्वारा एकमात्र ब्रह्म का ही ध्यान करता रहे। जीवन अथवा मृत्यु का कभी अभिनन्दन न करे। मृत्युकाल आने तक की प्रतीक्षा करता रहे। संन्यासी जीवन और मृत्यु में से किसी की प्रतीक्षा न करे। साधक को चाहिए कि वह भृतक (वैतनिक कर्मचारी) के द्वारा अपने स्वामी के आदेश की प्रतीक्षा करने की तरह एकमात्र काल की प्रतीक्षा करता रहे ॥५४-६१॥
62.0
__ अजिह्वः षण्डकः पङ्गरन्धो बधिर एव च। मुग्धश्च मुच्यते भिक्षुः षड्भिरेतैर्न संशयः॥६२॥
नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छ: गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्ग ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्राय: दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छ: की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना--ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६ ॥
63.0
इदमिष्टमिदं नेति योऽश्रन्नपि न सजति । हितं सत्यं मितं वक्ति तमजिह्व प्रचक्षते॥६३॥
नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छ: गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्ग ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्राय: दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छ: की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना--ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६ ॥
64.0
अद्यजातां यथा नारी तथा षोडशवार्षिकीम्।शतवर्षां च यो दृष्ट्वा निर्विकारः स षण्डकः ।।६४॥
नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छ: गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्ग ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्राय: दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छ: की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना--ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६ ॥
65.0
भिक्षार्थमटनं यस्य विण्मूत्रकरणाय च।योजनान्न परं याति सर्वथा परेव सः ॥६५॥
नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छ: गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्ग ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्राय: दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छ: की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना--ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६ ॥
66.0
तिष्ठतो व्रजतो वापि यस्य चक्षुर्न दूरगम्। चतुर्युगां भुवं मुक्त्वा परिव्राट् सोऽन्ध उच्यते॥६६॥
नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छ: गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्ग ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्राय: दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छ: की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना--ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६ ॥
67.0
हिताहितं मनोरामं वचः शोकावहं तु यत् । श्रुत्वापि न शृणोतीव बधिरः स प्रकीर्तितः॥६७॥
नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छ: गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्ग ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्राय: दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छ: की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना--ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६ ॥
68.0
सान्निध्ये विषयाणां यः समर्थो विकलेन्द्रियः। सुप्तवद्वर्तते नित्यं स भिक्षुर्मुग्ध उच्यते॥६८॥
नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छ: गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्ग ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्राय: दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छ: की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना--ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६ ॥
69.0
नटादिप्रेक्षणं द्यूतं प्रमदासुहृदं तथा। भक्ष्यं भोज्यमुदक्यां च षण्न पश्येत्कदाचन॥६९॥
नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छ: गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्ग ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्राय: दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छ: की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना--ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६ ॥
70.0
राग द्वेषं मदं मायां द्रोहं मोहं परात्मसु।षडेतानि यतिर्नित्यं मनसापि न चिन्तयेत्॥७॥
नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छ: गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्ग ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्राय: दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छ: की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना--ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६ ॥
71.0
मञ्चकंशुक्लवस्त्रं च स्त्रीकथालौल्यमेव च।दिवा स्वापंच यानंच यतीनां पातनानिषट्।७१॥
नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छ: गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्ग ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्राय: दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छ: की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना--ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६ ॥
72.0
दूरयात्रां प्रयत्नेन वर्जयेदात्मचिन्तकः । सदोपनिषदं विद्यामभ्यसेन्मुक्तिहैतुकीम् ॥७२॥
नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छ: गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्ग ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्राय: दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छ: की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना--ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६ ॥
73.0
न तीर्थसेवी नित्यं स्यानोपवासपरो यतिः। न चाध्ययनशीलः स्यान्न व्याख्यानपरो भवेत्॥७३॥
नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छ: गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्ग ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्राय: दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छ: की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना--ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६ ॥
74.0
अपापमशठं वृत्तमजिह्यं नित्यमाचरेत्। इन्द्रियाणि समाहृत्य कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः॥ ७४॥
नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छ: गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्ग ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्राय: दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छ: की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना--ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६ ॥
Text (part 5)
75.0
क्षीणेन्द्रियमनोवृत्तिनिराशीनिष्परिग्रहः। निर्द्वन्द्वो निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च ॥ ७५॥
नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छ: गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्ग ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्राय: दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छ: की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना--ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६ ॥
76.0
निर्ममो निरहंकारो निरपेक्षो निराशिषः। विविक्तदेशसंसक्तो मुच्यते नात्र संशय इति ॥७६॥
नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छ: गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्ग ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्राय: दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छ: की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना--ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६ ॥
77.0
अप्रमत्तः कर्मभक्तिज्ञानसंपन्नः स्वतन्त्रो वैराग्यमेत्य ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो वा मुख्यवृत्तिका चेद्ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद्गृहाद्वनी भूत्वा प्रव्रजेद्यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वाऽथ पुनरव्रती वा व्रती वा स्नातको वाऽस्नातको वोत्सनाग्निरनग्निको वा यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत्तद्धैके प्राजापत्यामेवेष्टिं कुर्वन्त्यथवा न कुर्यादाग्न्येय्यामेव कुर्यादग्निर्हि प्राणः प्राणमेवैतया करोति स्मात्रैधातवीयामेव कुर्यादेतयैव त्रयो धातवो यदुत सत्त्वं रजस्तम इति॥७७॥
___कोई भी ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थी जो ज्ञान, कर्म, और भक्ति से युक्त है तथा प्रमादरहित होकर आत्मा के अधीन रहता है, उसे यदि वैराग्य उत्पन्न हो आए, तो वह संन्यास ग्रहण कर सकता है। यदि वैराग्य परिपक्व न हुआ हो, तो क्रमशः ब्रह्मचर्याश्रम की अवधि पूरी करके गृहस्थ में प्रविष्ट हो, तत्पश्चात् वानप्रस्थ आश्रम में जाए और उसकी भी अवधि पूर्ण करके संन्यास ग्रहण करे। यदि वैराग्य तीव्र हो जाए, तो ब्रह्मचर्याश्रम के बाद सीधे ही संन्यास ग्रहण कर ले। गृहस्थाश्रम अथवा वानप्रस्थाश्रम में यदि तीव्र वैराग्य हो जाए, तो उसके बाद भी सीधे ही संन्यास ग्रहण किया जा सकता है। ब्रह्मचारी-अब्रह्मचारी, स्नातक-स्नातक, अग्निहोत्री-अनग्निहोत्री (अग्निहोत्र का त्याग कर चुकने वाला कोई भी हो), जब उसे तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो ये, तभी गृह-त्याग करके संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए। संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होते समय कुछ विद्वान् प्राजापत्य इष्टि सम्पन्न करते हैं, (तीव्र वैराग्य होने पर) उसे भी करना आवश्यक नहीं है अथवा केवल आग्नेयी इष्टि ही सम्पन्न करे। अनि ही प्राण है. इस इष्टि से साधक प्राण का ही पोषण करता है अथवा त्रैधातवी (जो १३७ नारदपरिव्राजकोपनिषद् इन्द्र से सम्बन्धित है) इष्टि ही सम्पन्न करे। सत्त्व, रज और तम ये तीन ही धातुएँ हैं। इस इष्टि द्वारा साधक इन्हीं तीनों का हवन करता है। विधिवत् इष्टि करके 'अयं ते योनिः' इस मंत्र से अग्नि को सूंघे। मन्त्रार्थ इस प्रकार है-'हे अग्निदेव! यह समष्टिगत प्राण ही तुम्हारी उत्पत्ति का मूल है। इसी कारण तुम उत्तम कान्ति से सुशोभित हो रहे हो। तुम अपने उत्पादक प्राण को जानकर इसमें विराजो। इस प्रकार हमारे प्राण में प्रतिष्ठित होकर हमारे ज्ञान-धन को समृद्ध करो।' निश्चय ही यह प्राणतत्त्व अग्नि के प्राकट्य का हेतु है। अत: इस कारण मन्त्र में अग्नि एवं प्राण की एकात्मता सिद्ध हुई है। आहवनीय अग्नि में से अग्नि प्राप्त कर उपर्युक्त तरीके से इष्टि करके अग्नि का अवघ्राण करे। यदि किसी कारणवश अग्नि प्राप्त न हो सके, तो जल में ही यजन कृत्य पूर्ण कर लेना चाहिए। अवश्य ही समस्त देवगण जलरूप हैं। समस्त देवों के लिए मैं यजन-कृत्य कर रहा हूँ, यह हवि उन देवों को प्राप्त हो (ऐसा भाव करना चाहिए)। तत्पश्चात् उस जल-राशि में से थोड़ा सा जल लेकर उससे आचमन कर लेना चाहिए। वह घृत मिश्रित जल आरोग्यप्रद एवं मोक्षप्रदाता होता है। तदनन्तर शिखा (चोटी), यज्ञोपवीत, पिता, पुत्र, स्त्री, कर्म, अध्ययन-अध्यापन तथा अन्यान्य विभिन्न तरह के मन्त्रों का परित्याग कर देने वाला ही आत्मवेत्ता मनुष्य परिव्राजक होता है। त्रैधातवीय मोक्ष से सम्बन्धित मन्त्रों से ब्रह्म को जानना चाहिए। जो शाश्वत सत्य एवं ज्ञान आदि श्रेष्ठ लक्षणों से सम्पन्न है, वही परब्रह्म परमेश्वर है, वही उपासना के अनुकूल है। उसी की ही उपासना करनी चाहिए। यह ठीक इसी प्रकार ही है।। ७७-७९ ॥
78.0
अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः।तंजाननग्न आरोहाथानो वर्धया रयिम्॥७८॥
___कोई भी ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थी जो ज्ञान, कर्म, और भक्ति से युक्त है तथा प्रमादरहित होकर आत्मा के अधीन रहता है, उसे यदि वैराग्य उत्पन्न हो आए, तो वह संन्यास ग्रहण कर सकता है। यदि वैराग्य परिपक्व न हुआ हो, तो क्रमशः ब्रह्मचर्याश्रम की अवधि पूरी करके गृहस्थ में प्रविष्ट हो, तत्पश्चात् वानप्रस्थ आश्रम में जाए और उसकी भी अवधि पूर्ण करके संन्यास ग्रहण करे। यदि वैराग्य तीव्र हो जाए, तो ब्रह्मचर्याश्रम के बाद सीधे ही संन्यास ग्रहण कर ले। गृहस्थाश्रम अथवा वानप्रस्थाश्रम में यदि तीव्र वैराग्य हो जाए, तो उसके बाद भी सीधे ही संन्यास ग्रहण किया जा सकता है। ब्रह्मचारी-अब्रह्मचारी, स्नातक-स्नातक, अग्निहोत्री-अनग्निहोत्री (अग्निहोत्र का त्याग कर चुकने वाला कोई भी हो), जब उसे तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो ये, तभी गृह-त्याग करके संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए। संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होते समय कुछ विद्वान् प्राजापत्य इष्टि सम्पन्न करते हैं, (तीव्र वैराग्य होने पर) उसे भी करना आवश्यक नहीं है अथवा केवल आग्नेयी इष्टि ही सम्पन्न करे। अनि ही प्राण है. इस इष्टि से साधक प्राण का ही पोषण करता है अथवा त्रैधातवी (जो १३७ नारदपरिव्राजकोपनिषद् इन्द्र से सम्बन्धित है) इष्टि ही सम्पन्न करे। सत्त्व, रज और तम ये तीन ही धातुएँ हैं। इस इष्टि द्वारा साधक इन्हीं तीनों का हवन करता है। विधिवत् इष्टि करके 'अयं ते योनिः' इस मंत्र से अग्नि को सूंघे। मन्त्रार्थ इस प्रकार है-'हे अग्निदेव! यह समष्टिगत प्राण ही तुम्हारी उत्पत्ति का मूल है। इसी कारण तुम उत्तम कान्ति से सुशोभित हो रहे हो। तुम अपने उत्पादक प्राण को जानकर इसमें विराजो। इस प्रकार हमारे प्राण में प्रतिष्ठित होकर हमारे ज्ञान-धन को समृद्ध करो।' निश्चय ही यह प्राणतत्त्व अग्नि के प्राकट्य का हेतु है। अत: इस कारण मन्त्र में अग्नि एवं प्राण की एकात्मता सिद्ध हुई है। आहवनीय अग्नि में से अग्नि प्राप्त कर उपर्युक्त तरीके से इष्टि करके अग्नि का अवघ्राण करे। यदि किसी कारणवश अग्नि प्राप्त न हो सके, तो जल में ही यजन कृत्य पूर्ण कर लेना चाहिए। अवश्य ही समस्त देवगण जलरूप हैं। समस्त देवों के लिए मैं यजन-कृत्य कर रहा हूँ, यह हवि उन देवों को प्राप्त हो (ऐसा भाव करना चाहिए)। तत्पश्चात् उस जल-राशि में से थोड़ा सा जल लेकर उससे आचमन कर लेना चाहिए। वह घृत मिश्रित जल आरोग्यप्रद एवं मोक्षप्रदाता होता है। तदनन्तर शिखा (चोटी), यज्ञोपवीत, पिता, पुत्र, स्त्री, कर्म, अध्ययन-अध्यापन तथा अन्यान्य विभिन्न तरह के मन्त्रों का परित्याग कर देने वाला ही आत्मवेत्ता मनुष्य परिव्राजक होता है। त्रैधातवीय मोक्ष से सम्बन्धित मन्त्रों से ब्रह्म को जानना चाहिए। जो शाश्वत सत्य एवं ज्ञान आदि श्रेष्ठ लक्षणों से सम्पन्न है, वही परब्रह्म परमेश्वर है, वही उपासना के अनुकूल है। उसी की ही उपासना करनी चाहिए। यह ठीक इसी प्रकार ही है।। ७७-७९ ॥
79.0
इत्यनेन मन्त्रेणाग्निमाजि देष वा अग्नेयॊनिर्यः प्राणः प्राणं गच्छ स्वां योनि गच्छ स्वाहेत्येवमेवैतदाहवनीयादग्निमाहृत्य पूर्ववदग्निमाजिनेद्यदग्निं न विन्देदप्सु जुहुयादापो वै सर्वा देवताः सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुहोमि स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य तदुदकं प्राश्रीयात्साज्यं हविरनामयं मोदमिति शिखां यज्ञोपवीतं पितरं पुत्रं कलत्रं कर्मचाध्ययनं मन्त्रान्तरंविसृज्यैव परिव्रजत्यात्म-विन्मोक्षमन्त्रैस्त्रैधातवीयैर्विधेस्तद्ब्रह्म तदुपासितव्यमेवैतदिति ॥७९॥
___कोई भी ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थी जो ज्ञान, कर्म, और भक्ति से युक्त है तथा प्रमादरहित होकर आत्मा के अधीन रहता है, उसे यदि वैराग्य उत्पन्न हो आए, तो वह संन्यास ग्रहण कर सकता है। यदि वैराग्य परिपक्व न हुआ हो, तो क्रमशः ब्रह्मचर्याश्रम की अवधि पूरी करके गृहस्थ में प्रविष्ट हो, तत्पश्चात् वानप्रस्थ आश्रम में जाए और उसकी भी अवधि पूर्ण करके संन्यास ग्रहण करे। यदि वैराग्य तीव्र हो जाए, तो ब्रह्मचर्याश्रम के बाद सीधे ही संन्यास ग्रहण कर ले। गृहस्थाश्रम अथवा वानप्रस्थाश्रम में यदि तीव्र वैराग्य हो जाए, तो उसके बाद भी सीधे ही संन्यास ग्रहण किया जा सकता है। ब्रह्मचारी-अब्रह्मचारी, स्नातक-स्नातक, अग्निहोत्री-अनग्निहोत्री (अग्निहोत्र का त्याग कर चुकने वाला कोई भी हो), जब उसे तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो ये, तभी गृह-त्याग करके संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए। संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होते समय कुछ विद्वान् प्राजापत्य इष्टि सम्पन्न करते हैं, (तीव्र वैराग्य होने पर) उसे भी करना आवश्यक नहीं है अथवा केवल आग्नेयी इष्टि ही सम्पन्न करे। अनि ही प्राण है. इस इष्टि से साधक प्राण का ही पोषण करता है अथवा त्रैधातवी (जो १३७ नारदपरिव्राजकोपनिषद् इन्द्र से सम्बन्धित है) इष्टि ही सम्पन्न करे। सत्त्व, रज और तम ये तीन ही धातुएँ हैं। इस इष्टि द्वारा साधक इन्हीं तीनों का हवन करता है। विधिवत् इष्टि करके 'अयं ते योनिः' इस मंत्र से अग्नि को सूंघे। मन्त्रार्थ इस प्रकार है-'हे अग्निदेव! यह समष्टिगत प्राण ही तुम्हारी उत्पत्ति का मूल है। इसी कारण तुम उत्तम कान्ति से सुशोभित हो रहे हो। तुम अपने उत्पादक प्राण को जानकर इसमें विराजो। इस प्रकार हमारे प्राण में प्रतिष्ठित होकर हमारे ज्ञान-धन को समृद्ध करो।' निश्चय ही यह प्राणतत्त्व अग्नि के प्राकट्य का हेतु है। अत: इस कारण मन्त्र में अग्नि एवं प्राण की एकात्मता सिद्ध हुई है। आहवनीय अग्नि में से अग्नि प्राप्त कर उपर्युक्त तरीके से इष्टि करके अग्नि का अवघ्राण करे। यदि किसी कारणवश अग्नि प्राप्त न हो सके, तो जल में ही यजन कृत्य पूर्ण कर लेना चाहिए। अवश्य ही समस्त देवगण जलरूप हैं। समस्त देवों के लिए मैं यजन-कृत्य कर रहा हूँ, यह हवि उन देवों को प्राप्त हो (ऐसा भाव करना चाहिए)। तत्पश्चात् उस जल-राशि में से थोड़ा सा जल लेकर उससे आचमन कर लेना चाहिए। वह घृत मिश्रित जल आरोग्यप्रद एवं मोक्षप्रदाता होता है। तदनन्तर शिखा (चोटी), यज्ञोपवीत, पिता, पुत्र, स्त्री, कर्म, अध्ययन-अध्यापन तथा अन्यान्य विभिन्न तरह के मन्त्रों का परित्याग कर देने वाला ही आत्मवेत्ता मनुष्य परिव्राजक होता है। त्रैधातवीय मोक्ष से सम्बन्धित मन्त्रों से ब्रह्म को जानना चाहिए। जो शाश्वत सत्य एवं ज्ञान आदि श्रेष्ठ लक्षणों से सम्पन्न है, वही परब्रह्म परमेश्वर है, वही उपासना के अनुकूल है। उसी की ही उपासना करनी चाहिए। यह ठीक इसी प्रकार ही है।। ७७-७९ ॥
80.0
पितामहं पुनः पप्रच्छ नारदः कथमयज्ञोपवीती ब्राह्मण इति। तमाह पितामहः॥८०॥
देवर्षि नारद जी ने पितामह ब्रह्माजी से पुनः प्रश्न किया- 'हे ब्रह्मन् ! मनुष्य यज्ञोपवीत को धारण न किये रहने से ब्राह्मण कैसे हो सकता है ? तब पितामह ने उन देवर्षि नारद से कहा-हे नारद! ज्ञानवान् पुरुषों को शिखा के सहित सिर के सभी केशों का मुण्डन कराके शरीर पर यज्ञोपवीत के रूप में धारण किये हुए बाह्य सूत्र का परित्याग कर देना चाहिए तथा जो अविनाशी शाश्वत परब्रह्म परमेश्वर है, उसी को सभी में व्याप्त सूत्र रूप में जान करके अपने अन्त: में धारण करे। जो सूचना अर्थात् जानकारी का कारण हो, उसे ही सूत्र कहते हैं। इसके कारण से 'सूत्र' परमपद का नाम है। जिस ज्ञानी पुरुष ने उस परमपद रूप सूत्र को जान लिया, वही वेदों का जानने वाला श्रेष्ठ ब्राह्मण है। जिस प्रकार सूत्र (धागे) में मनके (दाने) पिरोये होते हैं, उसी प्रकार जिस अविनाशी परमात्मतत्त्व में यह सम्पूर्ण संसार पिरोया हुआ है, वही सूत्र है। योग-विद्या का जानकार तत्त्वज्ञ योगी उसा श्रेष्ठ सूत्र को अपने अन्तः में धारण करे। ज्ञानी मनुष्य श्रेष्ठ योग का आश्रय प्राप्त करके बाह्य सूत्र का त्याग. उपदश ३ मन्त्र ९० १३८ कर दे; क्योंकि इस ब्रह्मरूप सूत्र के धारण करने से परिव्राजक न तो कभी उच्छिष्ट (जूठा) होता है और न ही कभी अपवित्र होता है। सद्ज्ञान रूप यज्ञोपवीत धारण करने वाले जिन परिव्राजकों के अन्त:करण में वह ब्रह्मरूप सूत्र प्रतिष्ठित है, वे ही इस जगत् में सूत्र के यथार्थ रूप को जानने वाले तथा यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं। परिव्राजक (संन्यासी) ज्ञानरूपी शिखा को धारण करते हैं, ज्ञान में ही प्रतिष्ठित होते हैं तथा ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को ही धारण करते हैं। उन परिव्राजकों के लिए ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होता है। ज्ञान को ही सबसे पवित्र कहा गया है। जिस तरह से अग्नि की शिखा उसके स्वरूप से अलग नहीं होती, उसी तरह जिस श्रेष्ठज्ञानी परिव्राजक ने ज्ञानरूपी शिखा को धारण कर रखा है, वही शिखाधारी कहा जाता है; दूसरे अन्य लोग जो मात्र केश को धारण करते हैं, वे वास्तविक शिखा को धारण करने वाले नहीं होते। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मादि के श्रेष्ठ अधिकारी माने जाते हैं, उन्हीं श्रेष्ठजनों को यह बाह्य सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वही कर्म का श्रेष्ठ अंग माना गया है। जिन परिव्राजकों के पास ज्ञानरूपी शिखा एवं ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत है, उसी परिव्राजक में पूर्णरूपेण ब्राह्मणत्व विद्यमान है। ब्रह्मज्ञानी जन ऐसा ही मानते हैं॥८०-८९ ॥
81.0
सशिखं वपनं कृत्वा बहिःसूत्रं त्यजेद्बुधः। यदक्षरं परं ब्रह्म तत्सूत्रमिति धारयेत्॥८१॥
देवर्षि नारद जी ने पितामह ब्रह्माजी से पुनः प्रश्न किया- 'हे ब्रह्मन् ! मनुष्य यज्ञोपवीत को धारण न किये रहने से ब्राह्मण कैसे हो सकता है ? तब पितामह ने उन देवर्षि नारद से कहा-हे नारद! ज्ञानवान् पुरुषों को शिखा के सहित सिर के सभी केशों का मुण्डन कराके शरीर पर यज्ञोपवीत के रूप में धारण किये हुए बाह्य सूत्र का परित्याग कर देना चाहिए तथा जो अविनाशी शाश्वत परब्रह्म परमेश्वर है, उसी को सभी में व्याप्त सूत्र रूप में जान करके अपने अन्त: में धारण करे। जो सूचना अर्थात् जानकारी का कारण हो, उसे ही सूत्र कहते हैं। इसके कारण से 'सूत्र' परमपद का नाम है। जिस ज्ञानी पुरुष ने उस परमपद रूप सूत्र को जान लिया, वही वेदों का जानने वाला श्रेष्ठ ब्राह्मण है। जिस प्रकार सूत्र (धागे) में मनके (दाने) पिरोये होते हैं, उसी प्रकार जिस अविनाशी परमात्मतत्त्व में यह सम्पूर्ण संसार पिरोया हुआ है, वही सूत्र है। योग-विद्या का जानकार तत्त्वज्ञ योगी उसा श्रेष्ठ सूत्र को अपने अन्तः में धारण करे। ज्ञानी मनुष्य श्रेष्ठ योग का आश्रय प्राप्त करके बाह्य सूत्र का त्याग. उपदश ३ मन्त्र ९० १३८ कर दे; क्योंकि इस ब्रह्मरूप सूत्र के धारण करने से परिव्राजक न तो कभी उच्छिष्ट (जूठा) होता है और न ही कभी अपवित्र होता है। सद्ज्ञान रूप यज्ञोपवीत धारण करने वाले जिन परिव्राजकों के अन्त:करण में वह ब्रह्मरूप सूत्र प्रतिष्ठित है, वे ही इस जगत् में सूत्र के यथार्थ रूप को जानने वाले तथा यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं। परिव्राजक (संन्यासी) ज्ञानरूपी शिखा को धारण करते हैं, ज्ञान में ही प्रतिष्ठित होते हैं तथा ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को ही धारण करते हैं। उन परिव्राजकों के लिए ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होता है। ज्ञान को ही सबसे पवित्र कहा गया है। जिस तरह से अग्नि की शिखा उसके स्वरूप से अलग नहीं होती, उसी तरह जिस श्रेष्ठज्ञानी परिव्राजक ने ज्ञानरूपी शिखा को धारण कर रखा है, वही शिखाधारी कहा जाता है; दूसरे अन्य लोग जो मात्र केश को धारण करते हैं, वे वास्तविक शिखा को धारण करने वाले नहीं होते। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मादि के श्रेष्ठ अधिकारी माने जाते हैं, उन्हीं श्रेष्ठजनों को यह बाह्य सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वही कर्म का श्रेष्ठ अंग माना गया है। जिन परिव्राजकों के पास ज्ञानरूपी शिखा एवं ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत है, उसी परिव्राजक में पूर्णरूपेण ब्राह्मणत्व विद्यमान है। ब्रह्मज्ञानी जन ऐसा ही मानते हैं॥८०-८९ ॥
82.0
सूचनात्सूत्रमित्याहुः सूत्रं नाम परं पदम् । तत्सूत्रं विदितं येन स विप्रो वेदपारगः॥८२॥
देवर्षि नारद जी ने पितामह ब्रह्माजी से पुनः प्रश्न किया- 'हे ब्रह्मन् ! मनुष्य यज्ञोपवीत को धारण न किये रहने से ब्राह्मण कैसे हो सकता है ? तब पितामह ने उन देवर्षि नारद से कहा-हे नारद! ज्ञानवान् पुरुषों को शिखा के सहित सिर के सभी केशों का मुण्डन कराके शरीर पर यज्ञोपवीत के रूप में धारण किये हुए बाह्य सूत्र का परित्याग कर देना चाहिए तथा जो अविनाशी शाश्वत परब्रह्म परमेश्वर है, उसी को सभी में व्याप्त सूत्र रूप में जान करके अपने अन्त: में धारण करे। जो सूचना अर्थात् जानकारी का कारण हो, उसे ही सूत्र कहते हैं। इसके कारण से 'सूत्र' परमपद का नाम है। जिस ज्ञानी पुरुष ने उस परमपद रूप सूत्र को जान लिया, वही वेदों का जानने वाला श्रेष्ठ ब्राह्मण है। जिस प्रकार सूत्र (धागे) में मनके (दाने) पिरोये होते हैं, उसी प्रकार जिस अविनाशी परमात्मतत्त्व में यह सम्पूर्ण संसार पिरोया हुआ है, वही सूत्र है। योग-विद्या का जानकार तत्त्वज्ञ योगी उसा श्रेष्ठ सूत्र को अपने अन्तः में धारण करे। ज्ञानी मनुष्य श्रेष्ठ योग का आश्रय प्राप्त करके बाह्य सूत्र का त्याग. उपदश ३ मन्त्र ९० १३८ कर दे; क्योंकि इस ब्रह्मरूप सूत्र के धारण करने से परिव्राजक न तो कभी उच्छिष्ट (जूठा) होता है और न ही कभी अपवित्र होता है। सद्ज्ञान रूप यज्ञोपवीत धारण करने वाले जिन परिव्राजकों के अन्त:करण में वह ब्रह्मरूप सूत्र प्रतिष्ठित है, वे ही इस जगत् में सूत्र के यथार्थ रूप को जानने वाले तथा यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं। परिव्राजक (संन्यासी) ज्ञानरूपी शिखा को धारण करते हैं, ज्ञान में ही प्रतिष्ठित होते हैं तथा ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को ही धारण करते हैं। उन परिव्राजकों के लिए ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होता है। ज्ञान को ही सबसे पवित्र कहा गया है। जिस तरह से अग्नि की शिखा उसके स्वरूप से अलग नहीं होती, उसी तरह जिस श्रेष्ठज्ञानी परिव्राजक ने ज्ञानरूपी शिखा को धारण कर रखा है, वही शिखाधारी कहा जाता है; दूसरे अन्य लोग जो मात्र केश को धारण करते हैं, वे वास्तविक शिखा को धारण करने वाले नहीं होते। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मादि के श्रेष्ठ अधिकारी माने जाते हैं, उन्हीं श्रेष्ठजनों को यह बाह्य सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वही कर्म का श्रेष्ठ अंग माना गया है। जिन परिव्राजकों के पास ज्ञानरूपी शिखा एवं ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत है, उसी परिव्राजक में पूर्णरूपेण ब्राह्मणत्व विद्यमान है। ब्रह्मज्ञानी जन ऐसा ही मानते हैं॥८०-८९ ॥
83.0
येन सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । तत्सूत्रं धारयेद्योगी योगवित्तत्त्वदर्शनः ॥८३॥
देवर्षि नारद जी ने पितामह ब्रह्माजी से पुनः प्रश्न किया- 'हे ब्रह्मन् ! मनुष्य यज्ञोपवीत को धारण न किये रहने से ब्राह्मण कैसे हो सकता है ? तब पितामह ने उन देवर्षि नारद से कहा-हे नारद! ज्ञानवान् पुरुषों को शिखा के सहित सिर के सभी केशों का मुण्डन कराके शरीर पर यज्ञोपवीत के रूप में धारण किये हुए बाह्य सूत्र का परित्याग कर देना चाहिए तथा जो अविनाशी शाश्वत परब्रह्म परमेश्वर है, उसी को सभी में व्याप्त सूत्र रूप में जान करके अपने अन्त: में धारण करे। जो सूचना अर्थात् जानकारी का कारण हो, उसे ही सूत्र कहते हैं। इसके कारण से 'सूत्र' परमपद का नाम है। जिस ज्ञानी पुरुष ने उस परमपद रूप सूत्र को जान लिया, वही वेदों का जानने वाला श्रेष्ठ ब्राह्मण है। जिस प्रकार सूत्र (धागे) में मनके (दाने) पिरोये होते हैं, उसी प्रकार जिस अविनाशी परमात्मतत्त्व में यह सम्पूर्ण संसार पिरोया हुआ है, वही सूत्र है। योग-विद्या का जानकार तत्त्वज्ञ योगी उसा श्रेष्ठ सूत्र को अपने अन्तः में धारण करे। ज्ञानी मनुष्य श्रेष्ठ योग का आश्रय प्राप्त करके बाह्य सूत्र का त्याग. उपदश ३ मन्त्र ९० १३८ कर दे; क्योंकि इस ब्रह्मरूप सूत्र के धारण करने से परिव्राजक न तो कभी उच्छिष्ट (जूठा) होता है और न ही कभी अपवित्र होता है। सद्ज्ञान रूप यज्ञोपवीत धारण करने वाले जिन परिव्राजकों के अन्त:करण में वह ब्रह्मरूप सूत्र प्रतिष्ठित है, वे ही इस जगत् में सूत्र के यथार्थ रूप को जानने वाले तथा यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं। परिव्राजक (संन्यासी) ज्ञानरूपी शिखा को धारण करते हैं, ज्ञान में ही प्रतिष्ठित होते हैं तथा ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को ही धारण करते हैं। उन परिव्राजकों के लिए ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होता है। ज्ञान को ही सबसे पवित्र कहा गया है। जिस तरह से अग्नि की शिखा उसके स्वरूप से अलग नहीं होती, उसी तरह जिस श्रेष्ठज्ञानी परिव्राजक ने ज्ञानरूपी शिखा को धारण कर रखा है, वही शिखाधारी कहा जाता है; दूसरे अन्य लोग जो मात्र केश को धारण करते हैं, वे वास्तविक शिखा को धारण करने वाले नहीं होते। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मादि के श्रेष्ठ अधिकारी माने जाते हैं, उन्हीं श्रेष्ठजनों को यह बाह्य सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वही कर्म का श्रेष्ठ अंग माना गया है। जिन परिव्राजकों के पास ज्ञानरूपी शिखा एवं ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत है, उसी परिव्राजक में पूर्णरूपेण ब्राह्मणत्व विद्यमान है। ब्रह्मज्ञानी जन ऐसा ही मानते हैं॥८०-८९ ॥
84.0
बहिः सूत्रं त्यजेद्विद्वान्योगमुत्तममास्थितः । ब्रह्मभावमिदं सूत्रं धारयेद्यः सचेतनः । धारणात्तस्य सूत्रस्य नोच्छिष्टो नाशुचिर्भवेत्॥८४॥
देवर्षि नारद जी ने पितामह ब्रह्माजी से पुनः प्रश्न किया- 'हे ब्रह्मन् ! मनुष्य यज्ञोपवीत को धारण न किये रहने से ब्राह्मण कैसे हो सकता है ? तब पितामह ने उन देवर्षि नारद से कहा-हे नारद! ज्ञानवान् पुरुषों को शिखा के सहित सिर के सभी केशों का मुण्डन कराके शरीर पर यज्ञोपवीत के रूप में धारण किये हुए बाह्य सूत्र का परित्याग कर देना चाहिए तथा जो अविनाशी शाश्वत परब्रह्म परमेश्वर है, उसी को सभी में व्याप्त सूत्र रूप में जान करके अपने अन्त: में धारण करे। जो सूचना अर्थात् जानकारी का कारण हो, उसे ही सूत्र कहते हैं। इसके कारण से 'सूत्र' परमपद का नाम है। जिस ज्ञानी पुरुष ने उस परमपद रूप सूत्र को जान लिया, वही वेदों का जानने वाला श्रेष्ठ ब्राह्मण है। जिस प्रकार सूत्र (धागे) में मनके (दाने) पिरोये होते हैं, उसी प्रकार जिस अविनाशी परमात्मतत्त्व में यह सम्पूर्ण संसार पिरोया हुआ है, वही सूत्र है। योग-विद्या का जानकार तत्त्वज्ञ योगी उसा श्रेष्ठ सूत्र को अपने अन्तः में धारण करे। ज्ञानी मनुष्य श्रेष्ठ योग का आश्रय प्राप्त करके बाह्य सूत्र का त्याग. उपदश ३ मन्त्र ९० १३८ कर दे; क्योंकि इस ब्रह्मरूप सूत्र के धारण करने से परिव्राजक न तो कभी उच्छिष्ट (जूठा) होता है और न ही कभी अपवित्र होता है। सद्ज्ञान रूप यज्ञोपवीत धारण करने वाले जिन परिव्राजकों के अन्त:करण में वह ब्रह्मरूप सूत्र प्रतिष्ठित है, वे ही इस जगत् में सूत्र के यथार्थ रूप को जानने वाले तथा यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं। परिव्राजक (संन्यासी) ज्ञानरूपी शिखा को धारण करते हैं, ज्ञान में ही प्रतिष्ठित होते हैं तथा ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को ही धारण करते हैं। उन परिव्राजकों के लिए ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होता है। ज्ञान को ही सबसे पवित्र कहा गया है। जिस तरह से अग्नि की शिखा उसके स्वरूप से अलग नहीं होती, उसी तरह जिस श्रेष्ठज्ञानी परिव्राजक ने ज्ञानरूपी शिखा को धारण कर रखा है, वही शिखाधारी कहा जाता है; दूसरे अन्य लोग जो मात्र केश को धारण करते हैं, वे वास्तविक शिखा को धारण करने वाले नहीं होते। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मादि के श्रेष्ठ अधिकारी माने जाते हैं, उन्हीं श्रेष्ठजनों को यह बाह्य सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वही कर्म का श्रेष्ठ अंग माना गया है। जिन परिव्राजकों के पास ज्ञानरूपी शिखा एवं ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत है, उसी परिव्राजक में पूर्णरूपेण ब्राह्मणत्व विद्यमान है। ब्रह्मज्ञानी जन ऐसा ही मानते हैं॥८०-८९ ॥
85.0
सूत्रमन्तर्गतं येषां ज्ञानयज्ञोपवीतिनाम् । ते वै सूत्रविदो लोके ते च यज्ञोपवीतिनः॥८५॥
देवर्षि नारद जी ने पितामह ब्रह्माजी से पुनः प्रश्न किया- 'हे ब्रह्मन् ! मनुष्य यज्ञोपवीत को धारण न किये रहने से ब्राह्मण कैसे हो सकता है ? तब पितामह ने उन देवर्षि नारद से कहा-हे नारद! ज्ञानवान् पुरुषों को शिखा के सहित सिर के सभी केशों का मुण्डन कराके शरीर पर यज्ञोपवीत के रूप में धारण किये हुए बाह्य सूत्र का परित्याग कर देना चाहिए तथा जो अविनाशी शाश्वत परब्रह्म परमेश्वर है, उसी को सभी में व्याप्त सूत्र रूप में जान करके अपने अन्त: में धारण करे। जो सूचना अर्थात् जानकारी का कारण हो, उसे ही सूत्र कहते हैं। इसके कारण से 'सूत्र' परमपद का नाम है। जिस ज्ञानी पुरुष ने उस परमपद रूप सूत्र को जान लिया, वही वेदों का जानने वाला श्रेष्ठ ब्राह्मण है। जिस प्रकार सूत्र (धागे) में मनके (दाने) पिरोये होते हैं, उसी प्रकार जिस अविनाशी परमात्मतत्त्व में यह सम्पूर्ण संसार पिरोया हुआ है, वही सूत्र है। योग-विद्या का जानकार तत्त्वज्ञ योगी उसा श्रेष्ठ सूत्र को अपने अन्तः में धारण करे। ज्ञानी मनुष्य श्रेष्ठ योग का आश्रय प्राप्त करके बाह्य सूत्र का त्याग. उपदश ३ मन्त्र ९० १३८ कर दे; क्योंकि इस ब्रह्मरूप सूत्र के धारण करने से परिव्राजक न तो कभी उच्छिष्ट (जूठा) होता है और न ही कभी अपवित्र होता है। सद्ज्ञान रूप यज्ञोपवीत धारण करने वाले जिन परिव्राजकों के अन्त:करण में वह ब्रह्मरूप सूत्र प्रतिष्ठित है, वे ही इस जगत् में सूत्र के यथार्थ रूप को जानने वाले तथा यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं। परिव्राजक (संन्यासी) ज्ञानरूपी शिखा को धारण करते हैं, ज्ञान में ही प्रतिष्ठित होते हैं तथा ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को ही धारण करते हैं। उन परिव्राजकों के लिए ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होता है। ज्ञान को ही सबसे पवित्र कहा गया है। जिस तरह से अग्नि की शिखा उसके स्वरूप से अलग नहीं होती, उसी तरह जिस श्रेष्ठज्ञानी परिव्राजक ने ज्ञानरूपी शिखा को धारण कर रखा है, वही शिखाधारी कहा जाता है; दूसरे अन्य लोग जो मात्र केश को धारण करते हैं, वे वास्तविक शिखा को धारण करने वाले नहीं होते। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मादि के श्रेष्ठ अधिकारी माने जाते हैं, उन्हीं श्रेष्ठजनों को यह बाह्य सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वही कर्म का श्रेष्ठ अंग माना गया है। जिन परिव्राजकों के पास ज्ञानरूपी शिखा एवं ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत है, उसी परिव्राजक में पूर्णरूपेण ब्राह्मणत्व विद्यमान है। ब्रह्मज्ञानी जन ऐसा ही मानते हैं॥८०-८९ ॥
86.0
ज्ञानशिखा ज्ञाननिष्ठा ज्ञानयज्ञोपवीतिनः । ज्ञानमेव परं तेषां पवित्रं ज्ञानमुच्यते ॥८६॥
देवर्षि नारद जी ने पितामह ब्रह्माजी से पुनः प्रश्न किया- 'हे ब्रह्मन् ! मनुष्य यज्ञोपवीत को धारण न किये रहने से ब्राह्मण कैसे हो सकता है ? तब पितामह ने उन देवर्षि नारद से कहा-हे नारद! ज्ञानवान् पुरुषों को शिखा के सहित सिर के सभी केशों का मुण्डन कराके शरीर पर यज्ञोपवीत के रूप में धारण किये हुए बाह्य सूत्र का परित्याग कर देना चाहिए तथा जो अविनाशी शाश्वत परब्रह्म परमेश्वर है, उसी को सभी में व्याप्त सूत्र रूप में जान करके अपने अन्त: में धारण करे। जो सूचना अर्थात् जानकारी का कारण हो, उसे ही सूत्र कहते हैं। इसके कारण से 'सूत्र' परमपद का नाम है। जिस ज्ञानी पुरुष ने उस परमपद रूप सूत्र को जान लिया, वही वेदों का जानने वाला श्रेष्ठ ब्राह्मण है। जिस प्रकार सूत्र (धागे) में मनके (दाने) पिरोये होते हैं, उसी प्रकार जिस अविनाशी परमात्मतत्त्व में यह सम्पूर्ण संसार पिरोया हुआ है, वही सूत्र है। योग-विद्या का जानकार तत्त्वज्ञ योगी उसा श्रेष्ठ सूत्र को अपने अन्तः में धारण करे। ज्ञानी मनुष्य श्रेष्ठ योग का आश्रय प्राप्त करके बाह्य सूत्र का त्याग. उपदश ३ मन्त्र ९० १३८ कर दे; क्योंकि इस ब्रह्मरूप सूत्र के धारण करने से परिव्राजक न तो कभी उच्छिष्ट (जूठा) होता है और न ही कभी अपवित्र होता है। सद्ज्ञान रूप यज्ञोपवीत धारण करने वाले जिन परिव्राजकों के अन्त:करण में वह ब्रह्मरूप सूत्र प्रतिष्ठित है, वे ही इस जगत् में सूत्र के यथार्थ रूप को जानने वाले तथा यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं। परिव्राजक (संन्यासी) ज्ञानरूपी शिखा को धारण करते हैं, ज्ञान में ही प्रतिष्ठित होते हैं तथा ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को ही धारण करते हैं। उन परिव्राजकों के लिए ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होता है। ज्ञान को ही सबसे पवित्र कहा गया है। जिस तरह से अग्नि की शिखा उसके स्वरूप से अलग नहीं होती, उसी तरह जिस श्रेष्ठज्ञानी परिव्राजक ने ज्ञानरूपी शिखा को धारण कर रखा है, वही शिखाधारी कहा जाता है; दूसरे अन्य लोग जो मात्र केश को धारण करते हैं, वे वास्तविक शिखा को धारण करने वाले नहीं होते। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मादि के श्रेष्ठ अधिकारी माने जाते हैं, उन्हीं श्रेष्ठजनों को यह बाह्य सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वही कर्म का श्रेष्ठ अंग माना गया है। जिन परिव्राजकों के पास ज्ञानरूपी शिखा एवं ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत है, उसी परिव्राजक में पूर्णरूपेण ब्राह्मणत्व विद्यमान है। ब्रह्मज्ञानी जन ऐसा ही मानते हैं॥८०-८९ ॥
87.0
अग्नेरिव शिखा नान्या यस्य ज्ञानमयी शिखा। स शिखीत्युच्यते विद्वान्नेतरे केशधारिणः ॥४७॥
देवर्षि नारद जी ने पितामह ब्रह्माजी से पुनः प्रश्न किया- 'हे ब्रह्मन् ! मनुष्य यज्ञोपवीत को धारण न किये रहने से ब्राह्मण कैसे हो सकता है ? तब पितामह ने उन देवर्षि नारद से कहा-हे नारद! ज्ञानवान् पुरुषों को शिखा के सहित सिर के सभी केशों का मुण्डन कराके शरीर पर यज्ञोपवीत के रूप में धारण किये हुए बाह्य सूत्र का परित्याग कर देना चाहिए तथा जो अविनाशी शाश्वत परब्रह्म परमेश्वर है, उसी को सभी में व्याप्त सूत्र रूप में जान करके अपने अन्त: में धारण करे। जो सूचना अर्थात् जानकारी का कारण हो, उसे ही सूत्र कहते हैं। इसके कारण से 'सूत्र' परमपद का नाम है। जिस ज्ञानी पुरुष ने उस परमपद रूप सूत्र को जान लिया, वही वेदों का जानने वाला श्रेष्ठ ब्राह्मण है। जिस प्रकार सूत्र (धागे) में मनके (दाने) पिरोये होते हैं, उसी प्रकार जिस अविनाशी परमात्मतत्त्व में यह सम्पूर्ण संसार पिरोया हुआ है, वही सूत्र है। योग-विद्या का जानकार तत्त्वज्ञ योगी उसा श्रेष्ठ सूत्र को अपने अन्तः में धारण करे। ज्ञानी मनुष्य श्रेष्ठ योग का आश्रय प्राप्त करके बाह्य सूत्र का त्याग. उपदश ३ मन्त्र ९० १३८ कर दे; क्योंकि इस ब्रह्मरूप सूत्र के धारण करने से परिव्राजक न तो कभी उच्छिष्ट (जूठा) होता है और न ही कभी अपवित्र होता है। सद्ज्ञान रूप यज्ञोपवीत धारण करने वाले जिन परिव्राजकों के अन्त:करण में वह ब्रह्मरूप सूत्र प्रतिष्ठित है, वे ही इस जगत् में सूत्र के यथार्थ रूप को जानने वाले तथा यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं। परिव्राजक (संन्यासी) ज्ञानरूपी शिखा को धारण करते हैं, ज्ञान में ही प्रतिष्ठित होते हैं तथा ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को ही धारण करते हैं। उन परिव्राजकों के लिए ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होता है। ज्ञान को ही सबसे पवित्र कहा गया है। जिस तरह से अग्नि की शिखा उसके स्वरूप से अलग नहीं होती, उसी तरह जिस श्रेष्ठज्ञानी परिव्राजक ने ज्ञानरूपी शिखा को धारण कर रखा है, वही शिखाधारी कहा जाता है; दूसरे अन्य लोग जो मात्र केश को धारण करते हैं, वे वास्तविक शिखा को धारण करने वाले नहीं होते। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मादि के श्रेष्ठ अधिकारी माने जाते हैं, उन्हीं श्रेष्ठजनों को यह बाह्य सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वही कर्म का श्रेष्ठ अंग माना गया है। जिन परिव्राजकों के पास ज्ञानरूपी शिखा एवं ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत है, उसी परिव्राजक में पूर्णरूपेण ब्राह्मणत्व विद्यमान है। ब्रह्मज्ञानी जन ऐसा ही मानते हैं॥८०-८९ ॥
88.0
कर्मण्यधिकृता ये तु वैदिके ब्राह्मणादयः। तैर्विधार्यमिदं सूत्रं क्रियाङ्गं तद्धि वैस्मृतम्॥८८॥
देवर्षि नारद जी ने पितामह ब्रह्माजी से पुनः प्रश्न किया- 'हे ब्रह्मन् ! मनुष्य यज्ञोपवीत को धारण न किये रहने से ब्राह्मण कैसे हो सकता है ? तब पितामह ने उन देवर्षि नारद से कहा-हे नारद! ज्ञानवान् पुरुषों को शिखा के सहित सिर के सभी केशों का मुण्डन कराके शरीर पर यज्ञोपवीत के रूप में धारण किये हुए बाह्य सूत्र का परित्याग कर देना चाहिए तथा जो अविनाशी शाश्वत परब्रह्म परमेश्वर है, उसी को सभी में व्याप्त सूत्र रूप में जान करके अपने अन्त: में धारण करे। जो सूचना अर्थात् जानकारी का कारण हो, उसे ही सूत्र कहते हैं। इसके कारण से 'सूत्र' परमपद का नाम है। जिस ज्ञानी पुरुष ने उस परमपद रूप सूत्र को जान लिया, वही वेदों का जानने वाला श्रेष्ठ ब्राह्मण है। जिस प्रकार सूत्र (धागे) में मनके (दाने) पिरोये होते हैं, उसी प्रकार जिस अविनाशी परमात्मतत्त्व में यह सम्पूर्ण संसार पिरोया हुआ है, वही सूत्र है। योग-विद्या का जानकार तत्त्वज्ञ योगी उसा श्रेष्ठ सूत्र को अपने अन्तः में धारण करे। ज्ञानी मनुष्य श्रेष्ठ योग का आश्रय प्राप्त करके बाह्य सूत्र का त्याग. उपदश ३ मन्त्र ९० १३८ कर दे; क्योंकि इस ब्रह्मरूप सूत्र के धारण करने से परिव्राजक न तो कभी उच्छिष्ट (जूठा) होता है और न ही कभी अपवित्र होता है। सद्ज्ञान रूप यज्ञोपवीत धारण करने वाले जिन परिव्राजकों के अन्त:करण में वह ब्रह्मरूप सूत्र प्रतिष्ठित है, वे ही इस जगत् में सूत्र के यथार्थ रूप को जानने वाले तथा यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं। परिव्राजक (संन्यासी) ज्ञानरूपी शिखा को धारण करते हैं, ज्ञान में ही प्रतिष्ठित होते हैं तथा ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को ही धारण करते हैं। उन परिव्राजकों के लिए ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होता है। ज्ञान को ही सबसे पवित्र कहा गया है। जिस तरह से अग्नि की शिखा उसके स्वरूप से अलग नहीं होती, उसी तरह जिस श्रेष्ठज्ञानी परिव्राजक ने ज्ञानरूपी शिखा को धारण कर रखा है, वही शिखाधारी कहा जाता है; दूसरे अन्य लोग जो मात्र केश को धारण करते हैं, वे वास्तविक शिखा को धारण करने वाले नहीं होते। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मादि के श्रेष्ठ अधिकारी माने जाते हैं, उन्हीं श्रेष्ठजनों को यह बाह्य सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वही कर्म का श्रेष्ठ अंग माना गया है। जिन परिव्राजकों के पास ज्ञानरूपी शिखा एवं ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत है, उसी परिव्राजक में पूर्णरूपेण ब्राह्मणत्व विद्यमान है। ब्रह्मज्ञानी जन ऐसा ही मानते हैं॥८०-८९ ॥
Text (part 6)
89.0
शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम्। ब्राह्मण्यं सकलं तस्य इति ब्रह्मविदो विदुरिति॥८९॥
देवर्षि नारद जी ने पितामह ब्रह्माजी से पुनः प्रश्न किया- 'हे ब्रह्मन् ! मनुष्य यज्ञोपवीत को धारण न किये रहने से ब्राह्मण कैसे हो सकता है ? तब पितामह ने उन देवर्षि नारद से कहा-हे नारद! ज्ञानवान् पुरुषों को शिखा के सहित सिर के सभी केशों का मुण्डन कराके शरीर पर यज्ञोपवीत के रूप में धारण किये हुए बाह्य सूत्र का परित्याग कर देना चाहिए तथा जो अविनाशी शाश्वत परब्रह्म परमेश्वर है, उसी को सभी में व्याप्त सूत्र रूप में जान करके अपने अन्त: में धारण करे। जो सूचना अर्थात् जानकारी का कारण हो, उसे ही सूत्र कहते हैं। इसके कारण से 'सूत्र' परमपद का नाम है। जिस ज्ञानी पुरुष ने उस परमपद रूप सूत्र को जान लिया, वही वेदों का जानने वाला श्रेष्ठ ब्राह्मण है। जिस प्रकार सूत्र (धागे) में मनके (दाने) पिरोये होते हैं, उसी प्रकार जिस अविनाशी परमात्मतत्त्व में यह सम्पूर्ण संसार पिरोया हुआ है, वही सूत्र है। योग-विद्या का जानकार तत्त्वज्ञ योगी उसा श्रेष्ठ सूत्र को अपने अन्तः में धारण करे। ज्ञानी मनुष्य श्रेष्ठ योग का आश्रय प्राप्त करके बाह्य सूत्र का त्याग. उपदश ३ मन्त्र ९० १३८ कर दे; क्योंकि इस ब्रह्मरूप सूत्र के धारण करने से परिव्राजक न तो कभी उच्छिष्ट (जूठा) होता है और न ही कभी अपवित्र होता है। सद्ज्ञान रूप यज्ञोपवीत धारण करने वाले जिन परिव्राजकों के अन्त:करण में वह ब्रह्मरूप सूत्र प्रतिष्ठित है, वे ही इस जगत् में सूत्र के यथार्थ रूप को जानने वाले तथा यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं। परिव्राजक (संन्यासी) ज्ञानरूपी शिखा को धारण करते हैं, ज्ञान में ही प्रतिष्ठित होते हैं तथा ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को ही धारण करते हैं। उन परिव्राजकों के लिए ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होता है। ज्ञान को ही सबसे पवित्र कहा गया है। जिस तरह से अग्नि की शिखा उसके स्वरूप से अलग नहीं होती, उसी तरह जिस श्रेष्ठज्ञानी परिव्राजक ने ज्ञानरूपी शिखा को धारण कर रखा है, वही शिखाधारी कहा जाता है; दूसरे अन्य लोग जो मात्र केश को धारण करते हैं, वे वास्तविक शिखा को धारण करने वाले नहीं होते। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मादि के श्रेष्ठ अधिकारी माने जाते हैं, उन्हीं श्रेष्ठजनों को यह बाह्य सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वही कर्म का श्रेष्ठ अंग माना गया है। जिन परिव्राजकों के पास ज्ञानरूपी शिखा एवं ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत है, उसी परिव्राजक में पूर्णरूपेण ब्राह्मणत्व विद्यमान है। ब्रह्मज्ञानी जन ऐसा ही मानते हैं॥८०-८९ ॥
90.0
तदेतद्विज्ञाय ब्राह्मणः परिव्रज्य परिवाडेकशाटी मुण्डोऽपरिग्रहः शरीरक्लेशासहिष्णुश्चेदथवा यथाविधिश्चेजातरूपधरो भूत्वा सपुत्रमित्रकलत्राप्तबन्ध्वादीनि स्वाध्यायं सर्वकर्मणि संन्यस्यायं ब्रह्माण्डं च सर्वं कौपीनं दण्डमाच्छादनं च त्यक्त्वा द्वन्द्वसहिष्णुर्न शीतं न चोष्णं न सुखं न दुःखं ननिद्रा नमानावमाने च षडूमिवर्जितो निन्दाहंकारमत्सरगर्वदम्भेासूयेच्छाद्वेषसुखदुःख-कामक्रोधलोभमोहादीन्विसृज्य स्ववपुः शवाकारमिव स्मृत्वा स्वव्यतिरिक्तं सर्वमन्तर्बहिरमन्य-मानः कस्यापि वन्दनमकृत्वा न नमस्कारो न स्वाहाकारोन स्वधाकारो न निन्दास्तुतिर्यादृच्छिको भवेद्यदृच्छालाभसंतुष्टः सुवर्णादीन्न परिग्रहेन्नावाहनं न विसर्जनंनमन्त्रं नामन्त्रं न ध्यानं नोपासनं नलक्ष्यं नालक्ष्यं न पृथक् नापृथक् न त्वन्यत्र सर्वत्रानिकेतः रमतिः शून्यागारवृक्षमूलदेवगृह तृणकूटकुलालशालाग्रिहोत्रशालाग्रिदिगन्तरनदीतटपुलिनभूगृहकन्दरनिर्झरस्थण्डिलेषुवनेवा श्वेतकेतुऋभुनिदाघऋषभदुर्वासःसंवर्तकदत्तात्रेयरैवतकवदव्यक्तलिङ्गोऽव्यक्ताचारो बालो-न्मत्तपिशाचवदनुन्मत्तोन्मत्तवदाचरंस्त्रिदण्डं शिक्यं पात्रं कमण्डलुंकटिसूत्रं कौपीनं च तत्सर्वं भूःस्वाहेत्यप्सु परित्यज्य॥९०॥
इस प्रकार से ब्राह्मण उपर्युक्त सभी नियमोपनियम जानकर घर का परित्याग करके संन्यासी हो जाए; मात्र एक ही वस्त्र धारण करे, सिर के बालों का मुण्डन करा ले तथा किसी भी तरह की वस्तुओं, पदार्थों आदि का संग्रह न करे। यदि वह शारीरिक क्लेशों को सहने में सक्षम न हो, तो उसे कौपीन (लँगोटी) धारण कर लेनी चाहिए और यदि शारीरिक क्लेशों-परेशानियों को सहने में समर्थ हो, तो विधिवत् संन्यास धर्म को ग्रहण कर वस्त्र रहित हो, जीवन-यापन करे। (वह) अपने मित्र, पुत्र, स्त्री, श्रेष्ठ गुरुजन एवं बन्धु-बान्धव, भाई आदि को त्यागकर विचरण करे। स्वाध्याय तथा वैदिक कर्मों के अनुष्ठान को छोड़कर सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड के साथ अपना सम्बन्ध परित्याग कर दे। अपने पास कौपीन, दण्ड एवं अंगाच्छादन हेतु वस्त्रादि ही रखे। सभी तरह के द्वन्द्वों को पूर्णरूपेण सहन करते हुए सर्दी-गर्मी आदि पर ध्यान न दे; न कभी सुख की इच्छा करे और न ही कभी दुःख आदि द्वन्द्वों से परेशान हो। निद्रा की भी चिन्ता न करे। मान-अपमान में सदैव सम भाव से रहे। छहों प्रकार की ऊर्मियों से वह कभी भी प्रभावित न हो। निन्दा, मत्सर (डाह), अहंकार, गर्व, दम्भ, ईर्ष्या, दोष-दृष्टि, इच्छा, द्वेष, सुख-दुःख, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि का परित्याग कर अपने शरीर को मृतवत् नकर, आत्मा के अलावा दूसरी अन्य किसी भी वस्तु को बाह्य एवं अन्तः से स्वीकार न करते हुए कभी भी किसी के १३९ नारदपरिव्राजकोपनिषद् समक्ष सिर न झुकाये और न ही यज्ञ एवं श्राद्धादि करे, किसी की निन्दा एवं स्तुति (अनुनय-विनय) आदि भी न करे । एकाकी ही स्वच्छन्द सर्वत्र विचरण करता रहे। ईश्वरेच्छा से जो कुछ भी भोजन आदि मिले, उस पर ही सन्तोष रखे। स्वर्णाभूषण आदि रत्नों का कभी भी अपने पास संग्रह न करे। न कभी किसी का आवाहन करे और न ही कभी विसर्जन। मन्त्रादि का न तो प्रयोग करे और न ही उसका त्याग करे। ध्यान एवं उपासनादि भी न करे। न कोई उसका लक्ष्य हो तथा लक्ष्यहीनता भी नहीं होनी चाहिए। न कभी किसी से अलग रहे और न ही कभी किसी के साथ रहे। न कभी किसी एक स्थान पर निवास करने का आग्रह करे और न ही किसी दूसरी जगह जाने का अनुरोध करे। उस ब्राह्मण का अपना निज का कोई आश्रम अथवा घर आदि भी नहीं होना चाहिए। उसकी बुद्धि सदैव स्थिर रहनी चाहिए। परिजनों से रहित भवन, वृक्ष की जड़, मन्दिर, पर्णकुटी, कुलालशाला, अग्निहोत्रशाला, अग्निदिगन्तर (आग्रेयदिशा), नदी का किनारा, कछार, भूगृह अर्थात् गुफा, पर्वतीय गुफा, झरने के समीप चबूतरे या वेदी या फिर जंगल में निवास करे। ऋभु. श्वेतकेतु, निदाघ, ऋषभ, संवर्तक, दुर्वासा, दत्तात्रेय एवं रैवतक की भाँति न कोई चिह्न स्वीकार करे और न ही अपने आचरण को ही किसी पर प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होने दे। उन्मत्त बालक अथवा पिशाच की तरह से व्यवहार करे। उन्मत्त न होते हुए भी उन्मत्त की तरह से आचरण करे। त्रिदण्ड, पात्र, झोली, कमण्डलु, कटिसूत्र एवं कौपीन आदि सभी कुछ 'भूः स्वाहा कहकर के जल में विसर्जित कर दे॥८९-९०॥
91.0
कटिसूत्रं च कौपीनं दण्डं वस्त्रं कमण्डलुं। सर्वमप्सु विसृज्याथ जातरूपधरश्चरेत् ॥ ९१॥
परिव्राजक कटिसूत्र, कौपीन, दण्ड, वस्त्र एवं कमण्डलु आदि सभी को (नदी या सरोवर के) जल में विसर्जित करके वस्त्र रहित हो सर्वत्र विचरण करे। अपनी ही आत्मा का सतत अनुसंधान करता रहे, दिगम्बर (वस्त्र रहित) होकर द्वन्द्वों (विकारों) को सहन करता रहे। उन द्वन्द्वों से प्रभावित न हो। किसी भी तरह की वस्तुओं का संग्रह कदापि न करे। आत्मतत्त्व एवं परब्रह्म परमात्मा का बोध कराने वाले ज्ञान-मार्ग में दृढनिश्चय होकर प्रतिष्ठित रहे। अपने मन को सदा पवित्र रखे। (अपने) प्राणों की रक्षा के लिए निश्चित समय पर कर (हाथ ) रूपी पात्र से या फिर किसी पात्र से, बिना किसी से याचना किये ही जो कुछ मिल जाए, उसी आहार (भोजन) को स्वीकार करे। हानि-लाभ को समान समझते हुए ममता से विलग हो जाए। मात्र अविनाशी शाश्वत परब्रह्म का ही सतत चिन्तन करे। अध्यात्म के चिन्तन में ही अपनी निष्ठा को सतत नियोजित किया करे। शुभ एवं अशुभ कर्मों का मूल्यांकन करता हुआ सदैव अपने आत्मा के उत्थान के अतिरिक्त सभी प्रिय वस्तुओं-पदार्थों का हमेशा के लिए परित्याग कर दे। एक मात्र आनन्द स्वरूप परब्रह्म परमात्मा के साक्षात्कार से युक्त हो, 'अहं ब्रह्मास्मि' अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूँ, इस प्रकार दृढनिश्चयी हो भ्रमर का ध्यान करने वाले कृमि-कीट की भाँति एक मात्र परब्रह्म स्वरूप ॐकार का ही ध्यान करता रहे। तीनों शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीर) के प्रति अहंकार एवं मोह के भाव का परित्याग करके, सर्वस्व विसर्जित करके ही परिव्राजक अपने शरीर का परित्याग करे। इस तरह से उपर्युक्त बताये हुए नियमों को जो भी संन्यासी अपनाता है, वह कृतार्थ हो जाता है। ईश्वर सान्निध्य को प्राप्त कर लेता है, यह ऐसा ही उपनिषद् है ॥ ९१-९२॥
92.0
आत्मानमन्विच्छेद्यथा जातरूपधरो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहस्तत्त्वब्रह्ममार्गेसग्यक्सम्पन्नः शुद्धमानसः प्राणसंधारणार्थं यथोक्तकाले करपात्रेणान्येन वा याचिताहारमाहरन् लाभालाभे समो भूत्वा निर्ममः शुक्लध्यानपरायणोऽध्यात्मनिष्ठःशुभाशुभकर्मनिर्मूलनपरः संन्यस्य पूर्णानन्दैकबोधस्त-ब्रह्माहमस्मीति ब्रह्मप्रणवमनुस्मरन्भ्रमरकीटन्यायेन शरीरत्रयमुत्सृज्य संन्यासेनैवदेहत्यागं करोति स कृतकृत्यो भवतीत्युपनिषत्॥९२॥
परिव्राजक कटिसूत्र, कौपीन, दण्ड, वस्त्र एवं कमण्डलु आदि सभी को (नदी या सरोवर के) जल में विसर्जित करके वस्त्र रहित हो सर्वत्र विचरण करे। अपनी ही आत्मा का सतत अनुसंधान करता रहे, दिगम्बर (वस्त्र रहित) होकर द्वन्द्वों (विकारों) को सहन करता रहे। उन द्वन्द्वों से प्रभावित न हो। किसी भी तरह की वस्तुओं का संग्रह कदापि न करे। आत्मतत्त्व एवं परब्रह्म परमात्मा का बोध कराने वाले ज्ञान-मार्ग में दृढनिश्चय होकर प्रतिष्ठित रहे। अपने मन को सदा पवित्र रखे। (अपने) प्राणों की रक्षा के लिए निश्चित समय पर कर (हाथ ) रूपी पात्र से या फिर किसी पात्र से, बिना किसी से याचना किये ही जो कुछ मिल जाए, उसी आहार (भोजन) को स्वीकार करे। हानि-लाभ को समान समझते हुए ममता से विलग हो जाए। मात्र अविनाशी शाश्वत परब्रह्म का ही सतत चिन्तन करे। अध्यात्म के चिन्तन में ही अपनी निष्ठा को सतत नियोजित किया करे। शुभ एवं अशुभ कर्मों का मूल्यांकन करता हुआ सदैव अपने आत्मा के उत्थान के अतिरिक्त सभी प्रिय वस्तुओं-पदार्थों का हमेशा के लिए परित्याग कर दे। एक मात्र आनन्द स्वरूप परब्रह्म परमात्मा के साक्षात्कार से युक्त हो, 'अहं ब्रह्मास्मि' अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूँ, इस प्रकार दृढनिश्चयी हो भ्रमर का ध्यान करने वाले कृमि-कीट की भाँति एक मात्र परब्रह्म स्वरूप ॐकार का ही ध्यान करता रहे। तीनों शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीर) के प्रति अहंकार एवं मोह के भाव का परित्याग करके, सर्वस्व विसर्जित करके ही परिव्राजक अपने शरीर का परित्याग करे। इस तरह से उपर्युक्त बताये हुए नियमों को जो भी संन्यासी अपनाता है, वह कृतार्थ हो जाता है। ईश्वर सान्निध्य को प्राप्त कर लेता है, यह ऐसा ही उपनिषद् है ॥ ९१-९२॥
1.0
उपदेश ४ मन्त्र १२ ॥चतुर्थोपदेशः॥ [संन्यास-धर्म के पालन का महत्त्व एवं संन्यास-धर्म को धारण करने की शास्त्रीय विधि] त्यक्त्वा लोकांश्च वेदांश्च विषयानिन्द्रियाणि च।आत्मन्येव स्थितो यस्तु स याति परमां गतिम्॥१॥
जो ज्ञानी मनुष्य लोक, वेद, विषय-वासनाओं के भोग एवं समस्त इन्द्रियों की अधीनता का परित्याग करके एक मात्र अपने आत्मा के उत्थान में सतत स्थिर रहता है, वही परिव्राजक (संन्यासी) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है। उत्तम परिव्राजक नाम, गोत्र आदि के वरण, देश, काल, शास्त्रीय ज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, व्रत-उपवास एवं शील आदि का प्रकाशन (प्रचार-प्रसार) कदापि न करे। (वह) किसी भी स्त्री से वार्तालाप कभी न करे। पूर्व में देखी हुई किसी भी परिचित स्त्री का अपने मन में स्मरण तक भी न करे, उन स्त्रियों की चर्चा से सदैव दूर रहे और उनके चित्र आदि को भी कभी न देखे। भाषण-सम्भाषण, स्मरण, चर्चा एवं चित्रों को देखना, स्त्रियों से सम्बन्धित इन चार तरह की बातों का जो (मनुष्य) मोह के वश हुआ आचरण करता है, निश्चय ही उसके चित्त में विकार उत्पन्न हो जाते हैं और उन विकारों से उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाता है। संन्यासियों के लिए आसक्ति, क्रोध, झूठ, माया, मोह, लोभ, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यान करना, कामना, राग, संग्रह, अहंकार, परगृह निवास, चिकित्सा का व्यवसाय, ममता, धर्म के लिए साहसिक कार्य, मन्त्र प्रयोग, औषधि-वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना आदि ये सभी कार्य वर्जित हैं। इनका उपयोग करने वाला परिव्राजक अपने धर्म (लक्ष्य) से पदच्युत हो जाता है। मोक्ष धर्म में सतत संलग्न रहने वाला ज्ञानी संन्यासी अपने किसी हितैषी (शुभचिन्तक) के लिए भी आओ, जाओ, रुको आदि स्वागत एवं सम्मान की बात कभी न करे । स्वप्न में भी कभी किसी के द्वारा दिया हुआ दान स्वीकार न करे। दूसरे अन्य किसी को भी न लवाए और न खुद ही किसी को देने-लेने के लिए बाध्य करे। स्त्री-पुरुष आदि भी आत्मीय स्वजनों के शुभ थवा अशुभ समाचारों को सुनकर-देखकर कभी भी अपने लक्ष्य से विचलित न हो, दुःख-सुख को सदैव के लिए त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, इन्द्रिय-निग्रह, अपरिग्रह (आदि का पालन करना), उद्दण्डता के भाव से रहित होना, किसी व्यक्ति विशेष के समक्ष दीन-हीन न होना, प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, १४१ नारदपरिव्राजकोपनिषद् अस्नेह (किसी से अत्यधिक लगाव न रखना), गुरु की सेवा-शुश्रूषा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियों का संयम, मन का निग्रह, सभी प्रियजनों के प्रति उदासीनता का भाव, धीरता, मृदुलता, सहनशीलता, करुणा, लजा, ज्ञान-विज्ञान-परायणता , स्वल्प आहार एवं धृति (धैर्य), ये सभी मन को वश में रखने वाले परिव्राजकों (संन्यासियों) के श्रेष्ठ प्रख्यात धर्म हैं ॥१-१२॥
2.0
नामगोत्रादिवरणं देशं कालं श्रुतं कुलम् । वयो वृत्तं शीलं ख्यापयेन्नैव सद्यतिः ॥२॥
जो ज्ञानी मनुष्य लोक, वेद, विषय-वासनाओं के भोग एवं समस्त इन्द्रियों की अधीनता का परित्याग करके एक मात्र अपने आत्मा के उत्थान में सतत स्थिर रहता है, वही परिव्राजक (संन्यासी) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है। उत्तम परिव्राजक नाम, गोत्र आदि के वरण, देश, काल, शास्त्रीय ज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, व्रत-उपवास एवं शील आदि का प्रकाशन (प्रचार-प्रसार) कदापि न करे। (वह) किसी भी स्त्री से वार्तालाप कभी न करे। पूर्व में देखी हुई किसी भी परिचित स्त्री का अपने मन में स्मरण तक भी न करे, उन स्त्रियों की चर्चा से सदैव दूर रहे और उनके चित्र आदि को भी कभी न देखे। भाषण-सम्भाषण, स्मरण, चर्चा एवं चित्रों को देखना, स्त्रियों से सम्बन्धित इन चार तरह की बातों का जो (मनुष्य) मोह के वश हुआ आचरण करता है, निश्चय ही उसके चित्त में विकार उत्पन्न हो जाते हैं और उन विकारों से उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाता है। संन्यासियों के लिए आसक्ति, क्रोध, झूठ, माया, मोह, लोभ, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यान करना, कामना, राग, संग्रह, अहंकार, परगृह निवास, चिकित्सा का व्यवसाय, ममता, धर्म के लिए साहसिक कार्य, मन्त्र प्रयोग, औषधि-वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना आदि ये सभी कार्य वर्जित हैं। इनका उपयोग करने वाला परिव्राजक अपने धर्म (लक्ष्य) से पदच्युत हो जाता है। मोक्ष धर्म में सतत संलग्न रहने वाला ज्ञानी संन्यासी अपने किसी हितैषी (शुभचिन्तक) के लिए भी आओ, जाओ, रुको आदि स्वागत एवं सम्मान की बात कभी न करे । स्वप्न में भी कभी किसी के द्वारा दिया हुआ दान स्वीकार न करे। दूसरे अन्य किसी को भी न लवाए और न खुद ही किसी को देने-लेने के लिए बाध्य करे। स्त्री-पुरुष आदि भी आत्मीय स्वजनों के शुभ थवा अशुभ समाचारों को सुनकर-देखकर कभी भी अपने लक्ष्य से विचलित न हो, दुःख-सुख को सदैव के लिए त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, इन्द्रिय-निग्रह, अपरिग्रह (आदि का पालन करना), उद्दण्डता के भाव से रहित होना, किसी व्यक्ति विशेष के समक्ष दीन-हीन न होना, प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, १४१ नारदपरिव्राजकोपनिषद् अस्नेह (किसी से अत्यधिक लगाव न रखना), गुरु की सेवा-शुश्रूषा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियों का संयम, मन का निग्रह, सभी प्रियजनों के प्रति उदासीनता का भाव, धीरता, मृदुलता, सहनशीलता, करुणा, लजा, ज्ञान-विज्ञान-परायणता , स्वल्प आहार एवं धृति (धैर्य), ये सभी मन को वश में रखने वाले परिव्राजकों (संन्यासियों) के श्रेष्ठ प्रख्यात धर्म हैं ॥१-१२॥
3.0
न संभाषेत्स्त्रियं कांचित्पूर्वदृष्टां च न स्मरेत्।कथांच वर्जयेत्तासां न पश्यल्लिखितामपि ॥३॥
जो ज्ञानी मनुष्य लोक, वेद, विषय-वासनाओं के भोग एवं समस्त इन्द्रियों की अधीनता का परित्याग करके एक मात्र अपने आत्मा के उत्थान में सतत स्थिर रहता है, वही परिव्राजक (संन्यासी) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है। उत्तम परिव्राजक नाम, गोत्र आदि के वरण, देश, काल, शास्त्रीय ज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, व्रत-उपवास एवं शील आदि का प्रकाशन (प्रचार-प्रसार) कदापि न करे। (वह) किसी भी स्त्री से वार्तालाप कभी न करे। पूर्व में देखी हुई किसी भी परिचित स्त्री का अपने मन में स्मरण तक भी न करे, उन स्त्रियों की चर्चा से सदैव दूर रहे और उनके चित्र आदि को भी कभी न देखे। भाषण-सम्भाषण, स्मरण, चर्चा एवं चित्रों को देखना, स्त्रियों से सम्बन्धित इन चार तरह की बातों का जो (मनुष्य) मोह के वश हुआ आचरण करता है, निश्चय ही उसके चित्त में विकार उत्पन्न हो जाते हैं और उन विकारों से उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाता है। संन्यासियों के लिए आसक्ति, क्रोध, झूठ, माया, मोह, लोभ, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यान करना, कामना, राग, संग्रह, अहंकार, परगृह निवास, चिकित्सा का व्यवसाय, ममता, धर्म के लिए साहसिक कार्य, मन्त्र प्रयोग, औषधि-वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना आदि ये सभी कार्य वर्जित हैं। इनका उपयोग करने वाला परिव्राजक अपने धर्म (लक्ष्य) से पदच्युत हो जाता है। मोक्ष धर्म में सतत संलग्न रहने वाला ज्ञानी संन्यासी अपने किसी हितैषी (शुभचिन्तक) के लिए भी आओ, जाओ, रुको आदि स्वागत एवं सम्मान की बात कभी न करे । स्वप्न में भी कभी किसी के द्वारा दिया हुआ दान स्वीकार न करे। दूसरे अन्य किसी को भी न लवाए और न खुद ही किसी को देने-लेने के लिए बाध्य करे। स्त्री-पुरुष आदि भी आत्मीय स्वजनों के शुभ थवा अशुभ समाचारों को सुनकर-देखकर कभी भी अपने लक्ष्य से विचलित न हो, दुःख-सुख को सदैव के लिए त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, इन्द्रिय-निग्रह, अपरिग्रह (आदि का पालन करना), उद्दण्डता के भाव से रहित होना, किसी व्यक्ति विशेष के समक्ष दीन-हीन न होना, प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, १४१ नारदपरिव्राजकोपनिषद् अस्नेह (किसी से अत्यधिक लगाव न रखना), गुरु की सेवा-शुश्रूषा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियों का संयम, मन का निग्रह, सभी प्रियजनों के प्रति उदासीनता का भाव, धीरता, मृदुलता, सहनशीलता, करुणा, लजा, ज्ञान-विज्ञान-परायणता , स्वल्प आहार एवं धृति (धैर्य), ये सभी मन को वश में रखने वाले परिव्राजकों (संन्यासियों) के श्रेष्ठ प्रख्यात धर्म हैं ॥१-१२॥
4.0
एतच्चतुष्टयं मोहात्स्त्रीणामाचरतो यतेः । चित्तं विक्रियतेऽवश्यं तद्विकारात्प्रणश्यति॥४॥
जो ज्ञानी मनुष्य लोक, वेद, विषय-वासनाओं के भोग एवं समस्त इन्द्रियों की अधीनता का परित्याग करके एक मात्र अपने आत्मा के उत्थान में सतत स्थिर रहता है, वही परिव्राजक (संन्यासी) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है। उत्तम परिव्राजक नाम, गोत्र आदि के वरण, देश, काल, शास्त्रीय ज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, व्रत-उपवास एवं शील आदि का प्रकाशन (प्रचार-प्रसार) कदापि न करे। (वह) किसी भी स्त्री से वार्तालाप कभी न करे। पूर्व में देखी हुई किसी भी परिचित स्त्री का अपने मन में स्मरण तक भी न करे, उन स्त्रियों की चर्चा से सदैव दूर रहे और उनके चित्र आदि को भी कभी न देखे। भाषण-सम्भाषण, स्मरण, चर्चा एवं चित्रों को देखना, स्त्रियों से सम्बन्धित इन चार तरह की बातों का जो (मनुष्य) मोह के वश हुआ आचरण करता है, निश्चय ही उसके चित्त में विकार उत्पन्न हो जाते हैं और उन विकारों से उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाता है। संन्यासियों के लिए आसक्ति, क्रोध, झूठ, माया, मोह, लोभ, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यान करना, कामना, राग, संग्रह, अहंकार, परगृह निवास, चिकित्सा का व्यवसाय, ममता, धर्म के लिए साहसिक कार्य, मन्त्र प्रयोग, औषधि-वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना आदि ये सभी कार्य वर्जित हैं। इनका उपयोग करने वाला परिव्राजक अपने धर्म (लक्ष्य) से पदच्युत हो जाता है। मोक्ष धर्म में सतत संलग्न रहने वाला ज्ञानी संन्यासी अपने किसी हितैषी (शुभचिन्तक) के लिए भी आओ, जाओ, रुको आदि स्वागत एवं सम्मान की बात कभी न करे । स्वप्न में भी कभी किसी के द्वारा दिया हुआ दान स्वीकार न करे। दूसरे अन्य किसी को भी न लवाए और न खुद ही किसी को देने-लेने के लिए बाध्य करे। स्त्री-पुरुष आदि भी आत्मीय स्वजनों के शुभ थवा अशुभ समाचारों को सुनकर-देखकर कभी भी अपने लक्ष्य से विचलित न हो, दुःख-सुख को सदैव के लिए त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, इन्द्रिय-निग्रह, अपरिग्रह (आदि का पालन करना), उद्दण्डता के भाव से रहित होना, किसी व्यक्ति विशेष के समक्ष दीन-हीन न होना, प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, १४१ नारदपरिव्राजकोपनिषद् अस्नेह (किसी से अत्यधिक लगाव न रखना), गुरु की सेवा-शुश्रूषा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियों का संयम, मन का निग्रह, सभी प्रियजनों के प्रति उदासीनता का भाव, धीरता, मृदुलता, सहनशीलता, करुणा, लजा, ज्ञान-विज्ञान-परायणता , स्वल्प आहार एवं धृति (धैर्य), ये सभी मन को वश में रखने वाले परिव्राजकों (संन्यासियों) के श्रेष्ठ प्रख्यात धर्म हैं ॥१-१२॥
5.0
तृष्णा क्रोधोऽनृतं माया लोभमोहौ प्रियाप्रिये।शिल्पं व्याख्यानयोगश्च कामोरागपरिग्रहः ॥५॥
जो ज्ञानी मनुष्य लोक, वेद, विषय-वासनाओं के भोग एवं समस्त इन्द्रियों की अधीनता का परित्याग करके एक मात्र अपने आत्मा के उत्थान में सतत स्थिर रहता है, वही परिव्राजक (संन्यासी) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है। उत्तम परिव्राजक नाम, गोत्र आदि के वरण, देश, काल, शास्त्रीय ज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, व्रत-उपवास एवं शील आदि का प्रकाशन (प्रचार-प्रसार) कदापि न करे। (वह) किसी भी स्त्री से वार्तालाप कभी न करे। पूर्व में देखी हुई किसी भी परिचित स्त्री का अपने मन में स्मरण तक भी न करे, उन स्त्रियों की चर्चा से सदैव दूर रहे और उनके चित्र आदि को भी कभी न देखे। भाषण-सम्भाषण, स्मरण, चर्चा एवं चित्रों को देखना, स्त्रियों से सम्बन्धित इन चार तरह की बातों का जो (मनुष्य) मोह के वश हुआ आचरण करता है, निश्चय ही उसके चित्त में विकार उत्पन्न हो जाते हैं और उन विकारों से उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाता है। संन्यासियों के लिए आसक्ति, क्रोध, झूठ, माया, मोह, लोभ, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यान करना, कामना, राग, संग्रह, अहंकार, परगृह निवास, चिकित्सा का व्यवसाय, ममता, धर्म के लिए साहसिक कार्य, मन्त्र प्रयोग, औषधि-वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना आदि ये सभी कार्य वर्जित हैं। इनका उपयोग करने वाला परिव्राजक अपने धर्म (लक्ष्य) से पदच्युत हो जाता है। मोक्ष धर्म में सतत संलग्न रहने वाला ज्ञानी संन्यासी अपने किसी हितैषी (शुभचिन्तक) के लिए भी आओ, जाओ, रुको आदि स्वागत एवं सम्मान की बात कभी न करे । स्वप्न में भी कभी किसी के द्वारा दिया हुआ दान स्वीकार न करे। दूसरे अन्य किसी को भी न लवाए और न खुद ही किसी को देने-लेने के लिए बाध्य करे। स्त्री-पुरुष आदि भी आत्मीय स्वजनों के शुभ थवा अशुभ समाचारों को सुनकर-देखकर कभी भी अपने लक्ष्य से विचलित न हो, दुःख-सुख को सदैव के लिए त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, इन्द्रिय-निग्रह, अपरिग्रह (आदि का पालन करना), उद्दण्डता के भाव से रहित होना, किसी व्यक्ति विशेष के समक्ष दीन-हीन न होना, प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, १४१ नारदपरिव्राजकोपनिषद् अस्नेह (किसी से अत्यधिक लगाव न रखना), गुरु की सेवा-शुश्रूषा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियों का संयम, मन का निग्रह, सभी प्रियजनों के प्रति उदासीनता का भाव, धीरता, मृदुलता, सहनशीलता, करुणा, लजा, ज्ञान-विज्ञान-परायणता , स्वल्प आहार एवं धृति (धैर्य), ये सभी मन को वश में रखने वाले परिव्राजकों (संन्यासियों) के श्रेष्ठ प्रख्यात धर्म हैं ॥१-१२॥
6.0
अहंकारो ममत्वं च चिकित्सा धर्मसाहसम् । प्रायश्चित्तं प्रवासश्च मन्त्रौषधपराशिषः। प्रतिषिद्धानि चैतानि सेवमानो व्रजेदधः॥६॥
जो ज्ञानी मनुष्य लोक, वेद, विषय-वासनाओं के भोग एवं समस्त इन्द्रियों की अधीनता का परित्याग करके एक मात्र अपने आत्मा के उत्थान में सतत स्थिर रहता है, वही परिव्राजक (संन्यासी) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है। उत्तम परिव्राजक नाम, गोत्र आदि के वरण, देश, काल, शास्त्रीय ज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, व्रत-उपवास एवं शील आदि का प्रकाशन (प्रचार-प्रसार) कदापि न करे। (वह) किसी भी स्त्री से वार्तालाप कभी न करे। पूर्व में देखी हुई किसी भी परिचित स्त्री का अपने मन में स्मरण तक भी न करे, उन स्त्रियों की चर्चा से सदैव दूर रहे और उनके चित्र आदि को भी कभी न देखे। भाषण-सम्भाषण, स्मरण, चर्चा एवं चित्रों को देखना, स्त्रियों से सम्बन्धित इन चार तरह की बातों का जो (मनुष्य) मोह के वश हुआ आचरण करता है, निश्चय ही उसके चित्त में विकार उत्पन्न हो जाते हैं और उन विकारों से उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाता है। संन्यासियों के लिए आसक्ति, क्रोध, झूठ, माया, मोह, लोभ, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यान करना, कामना, राग, संग्रह, अहंकार, परगृह निवास, चिकित्सा का व्यवसाय, ममता, धर्म के लिए साहसिक कार्य, मन्त्र प्रयोग, औषधि-वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना आदि ये सभी कार्य वर्जित हैं। इनका उपयोग करने वाला परिव्राजक अपने धर्म (लक्ष्य) से पदच्युत हो जाता है। मोक्ष धर्म में सतत संलग्न रहने वाला ज्ञानी संन्यासी अपने किसी हितैषी (शुभचिन्तक) के लिए भी आओ, जाओ, रुको आदि स्वागत एवं सम्मान की बात कभी न करे । स्वप्न में भी कभी किसी के द्वारा दिया हुआ दान स्वीकार न करे। दूसरे अन्य किसी को भी न लवाए और न खुद ही किसी को देने-लेने के लिए बाध्य करे। स्त्री-पुरुष आदि भी आत्मीय स्वजनों के शुभ थवा अशुभ समाचारों को सुनकर-देखकर कभी भी अपने लक्ष्य से विचलित न हो, दुःख-सुख को सदैव के लिए त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, इन्द्रिय-निग्रह, अपरिग्रह (आदि का पालन करना), उद्दण्डता के भाव से रहित होना, किसी व्यक्ति विशेष के समक्ष दीन-हीन न होना, प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, १४१ नारदपरिव्राजकोपनिषद् अस्नेह (किसी से अत्यधिक लगाव न रखना), गुरु की सेवा-शुश्रूषा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियों का संयम, मन का निग्रह, सभी प्रियजनों के प्रति उदासीनता का भाव, धीरता, मृदुलता, सहनशीलता, करुणा, लजा, ज्ञान-विज्ञान-परायणता , स्वल्प आहार एवं धृति (धैर्य), ये सभी मन को वश में रखने वाले परिव्राजकों (संन्यासियों) के श्रेष्ठ प्रख्यात धर्म हैं ॥१-१२॥
7.0
आगच्छ गच्छ तिष्ठेति स्वागतं सुहृदोऽपि वा। सम्माननं च न ब्रूयान्मुनिर्मोक्षपरायणः॥७॥
जो ज्ञानी मनुष्य लोक, वेद, विषय-वासनाओं के भोग एवं समस्त इन्द्रियों की अधीनता का परित्याग करके एक मात्र अपने आत्मा के उत्थान में सतत स्थिर रहता है, वही परिव्राजक (संन्यासी) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है। उत्तम परिव्राजक नाम, गोत्र आदि के वरण, देश, काल, शास्त्रीय ज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, व्रत-उपवास एवं शील आदि का प्रकाशन (प्रचार-प्रसार) कदापि न करे। (वह) किसी भी स्त्री से वार्तालाप कभी न करे। पूर्व में देखी हुई किसी भी परिचित स्त्री का अपने मन में स्मरण तक भी न करे, उन स्त्रियों की चर्चा से सदैव दूर रहे और उनके चित्र आदि को भी कभी न देखे। भाषण-सम्भाषण, स्मरण, चर्चा एवं चित्रों को देखना, स्त्रियों से सम्बन्धित इन चार तरह की बातों का जो (मनुष्य) मोह के वश हुआ आचरण करता है, निश्चय ही उसके चित्त में विकार उत्पन्न हो जाते हैं और उन विकारों से उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाता है। संन्यासियों के लिए आसक्ति, क्रोध, झूठ, माया, मोह, लोभ, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यान करना, कामना, राग, संग्रह, अहंकार, परगृह निवास, चिकित्सा का व्यवसाय, ममता, धर्म के लिए साहसिक कार्य, मन्त्र प्रयोग, औषधि-वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना आदि ये सभी कार्य वर्जित हैं। इनका उपयोग करने वाला परिव्राजक अपने धर्म (लक्ष्य) से पदच्युत हो जाता है। मोक्ष धर्म में सतत संलग्न रहने वाला ज्ञानी संन्यासी अपने किसी हितैषी (शुभचिन्तक) के लिए भी आओ, जाओ, रुको आदि स्वागत एवं सम्मान की बात कभी न करे । स्वप्न में भी कभी किसी के द्वारा दिया हुआ दान स्वीकार न करे। दूसरे अन्य किसी को भी न लवाए और न खुद ही किसी को देने-लेने के लिए बाध्य करे। स्त्री-पुरुष आदि भी आत्मीय स्वजनों के शुभ थवा अशुभ समाचारों को सुनकर-देखकर कभी भी अपने लक्ष्य से विचलित न हो, दुःख-सुख को सदैव के लिए त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, इन्द्रिय-निग्रह, अपरिग्रह (आदि का पालन करना), उद्दण्डता के भाव से रहित होना, किसी व्यक्ति विशेष के समक्ष दीन-हीन न होना, प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, १४१ नारदपरिव्राजकोपनिषद् अस्नेह (किसी से अत्यधिक लगाव न रखना), गुरु की सेवा-शुश्रूषा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियों का संयम, मन का निग्रह, सभी प्रियजनों के प्रति उदासीनता का भाव, धीरता, मृदुलता, सहनशीलता, करुणा, लजा, ज्ञान-विज्ञान-परायणता , स्वल्प आहार एवं धृति (धैर्य), ये सभी मन को वश में रखने वाले परिव्राजकों (संन्यासियों) के श्रेष्ठ प्रख्यात धर्म हैं ॥१-१२॥
8.0
प्रतिग्रहं न गृह्णीयान्नैव चान्यं प्रदापयेत्। प्रेरयेद्वा तया भिक्षुः स्वप्रेऽपि न कदाचन॥८॥
जो ज्ञानी मनुष्य लोक, वेद, विषय-वासनाओं के भोग एवं समस्त इन्द्रियों की अधीनता का परित्याग करके एक मात्र अपने आत्मा के उत्थान में सतत स्थिर रहता है, वही परिव्राजक (संन्यासी) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है। उत्तम परिव्राजक नाम, गोत्र आदि के वरण, देश, काल, शास्त्रीय ज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, व्रत-उपवास एवं शील आदि का प्रकाशन (प्रचार-प्रसार) कदापि न करे। (वह) किसी भी स्त्री से वार्तालाप कभी न करे। पूर्व में देखी हुई किसी भी परिचित स्त्री का अपने मन में स्मरण तक भी न करे, उन स्त्रियों की चर्चा से सदैव दूर रहे और उनके चित्र आदि को भी कभी न देखे। भाषण-सम्भाषण, स्मरण, चर्चा एवं चित्रों को देखना, स्त्रियों से सम्बन्धित इन चार तरह की बातों का जो (मनुष्य) मोह के वश हुआ आचरण करता है, निश्चय ही उसके चित्त में विकार उत्पन्न हो जाते हैं और उन विकारों से उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाता है। संन्यासियों के लिए आसक्ति, क्रोध, झूठ, माया, मोह, लोभ, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यान करना, कामना, राग, संग्रह, अहंकार, परगृह निवास, चिकित्सा का व्यवसाय, ममता, धर्म के लिए साहसिक कार्य, मन्त्र प्रयोग, औषधि-वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना आदि ये सभी कार्य वर्जित हैं। इनका उपयोग करने वाला परिव्राजक अपने धर्म (लक्ष्य) से पदच्युत हो जाता है। मोक्ष धर्म में सतत संलग्न रहने वाला ज्ञानी संन्यासी अपने किसी हितैषी (शुभचिन्तक) के लिए भी आओ, जाओ, रुको आदि स्वागत एवं सम्मान की बात कभी न करे । स्वप्न में भी कभी किसी के द्वारा दिया हुआ दान स्वीकार न करे। दूसरे अन्य किसी को भी न लवाए और न खुद ही किसी को देने-लेने के लिए बाध्य करे। स्त्री-पुरुष आदि भी आत्मीय स्वजनों के शुभ थवा अशुभ समाचारों को सुनकर-देखकर कभी भी अपने लक्ष्य से विचलित न हो, दुःख-सुख को सदैव के लिए त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, इन्द्रिय-निग्रह, अपरिग्रह (आदि का पालन करना), उद्दण्डता के भाव से रहित होना, किसी व्यक्ति विशेष के समक्ष दीन-हीन न होना, प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, १४१ नारदपरिव्राजकोपनिषद् अस्नेह (किसी से अत्यधिक लगाव न रखना), गुरु की सेवा-शुश्रूषा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियों का संयम, मन का निग्रह, सभी प्रियजनों के प्रति उदासीनता का भाव, धीरता, मृदुलता, सहनशीलता, करुणा, लजा, ज्ञान-विज्ञान-परायणता , स्वल्प आहार एवं धृति (धैर्य), ये सभी मन को वश में रखने वाले परिव्राजकों (संन्यासियों) के श्रेष्ठ प्रख्यात धर्म हैं ॥१-१२॥
9.0
जायाभ्रातृसुतादीनां बन्धूनां च शुभाशुभम्। श्रुत्वा दृष्ट्वा न कम्पेत शोकहर्षों त्यजेद्यतिः॥ ९॥
जो ज्ञानी मनुष्य लोक, वेद, विषय-वासनाओं के भोग एवं समस्त इन्द्रियों की अधीनता का परित्याग करके एक मात्र अपने आत्मा के उत्थान में सतत स्थिर रहता है, वही परिव्राजक (संन्यासी) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है। उत्तम परिव्राजक नाम, गोत्र आदि के वरण, देश, काल, शास्त्रीय ज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, व्रत-उपवास एवं शील आदि का प्रकाशन (प्रचार-प्रसार) कदापि न करे। (वह) किसी भी स्त्री से वार्तालाप कभी न करे। पूर्व में देखी हुई किसी भी परिचित स्त्री का अपने मन में स्मरण तक भी न करे, उन स्त्रियों की चर्चा से सदैव दूर रहे और उनके चित्र आदि को भी कभी न देखे। भाषण-सम्भाषण, स्मरण, चर्चा एवं चित्रों को देखना, स्त्रियों से सम्बन्धित इन चार तरह की बातों का जो (मनुष्य) मोह के वश हुआ आचरण करता है, निश्चय ही उसके चित्त में विकार उत्पन्न हो जाते हैं और उन विकारों से उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाता है। संन्यासियों के लिए आसक्ति, क्रोध, झूठ, माया, मोह, लोभ, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यान करना, कामना, राग, संग्रह, अहंकार, परगृह निवास, चिकित्सा का व्यवसाय, ममता, धर्म के लिए साहसिक कार्य, मन्त्र प्रयोग, औषधि-वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना आदि ये सभी कार्य वर्जित हैं। इनका उपयोग करने वाला परिव्राजक अपने धर्म (लक्ष्य) से पदच्युत हो जाता है। मोक्ष धर्म में सतत संलग्न रहने वाला ज्ञानी संन्यासी अपने किसी हितैषी (शुभचिन्तक) के लिए भी आओ, जाओ, रुको आदि स्वागत एवं सम्मान की बात कभी न करे । स्वप्न में भी कभी किसी के द्वारा दिया हुआ दान स्वीकार न करे। दूसरे अन्य किसी को भी न लवाए और न खुद ही किसी को देने-लेने के लिए बाध्य करे। स्त्री-पुरुष आदि भी आत्मीय स्वजनों के शुभ थवा अशुभ समाचारों को सुनकर-देखकर कभी भी अपने लक्ष्य से विचलित न हो, दुःख-सुख को सदैव के लिए त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, इन्द्रिय-निग्रह, अपरिग्रह (आदि का पालन करना), उद्दण्डता के भाव से रहित होना, किसी व्यक्ति विशेष के समक्ष दीन-हीन न होना, प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, १४१ नारदपरिव्राजकोपनिषद् अस्नेह (किसी से अत्यधिक लगाव न रखना), गुरु की सेवा-शुश्रूषा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियों का संयम, मन का निग्रह, सभी प्रियजनों के प्रति उदासीनता का भाव, धीरता, मृदुलता, सहनशीलता, करुणा, लजा, ज्ञान-विज्ञान-परायणता , स्वल्प आहार एवं धृति (धैर्य), ये सभी मन को वश में रखने वाले परिव्राजकों (संन्यासियों) के श्रेष्ठ प्रख्यात धर्म हैं ॥१-१२॥
10.0
अहिंसा सत्यमस्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहाः। अनौद्धत्यमदीनत्वं प्रसादः स्थैर्यमार्जवम्॥१०॥
जो ज्ञानी मनुष्य लोक, वेद, विषय-वासनाओं के भोग एवं समस्त इन्द्रियों की अधीनता का परित्याग करके एक मात्र अपने आत्मा के उत्थान में सतत स्थिर रहता है, वही परिव्राजक (संन्यासी) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है। उत्तम परिव्राजक नाम, गोत्र आदि के वरण, देश, काल, शास्त्रीय ज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, व्रत-उपवास एवं शील आदि का प्रकाशन (प्रचार-प्रसार) कदापि न करे। (वह) किसी भी स्त्री से वार्तालाप कभी न करे। पूर्व में देखी हुई किसी भी परिचित स्त्री का अपने मन में स्मरण तक भी न करे, उन स्त्रियों की चर्चा से सदैव दूर रहे और उनके चित्र आदि को भी कभी न देखे। भाषण-सम्भाषण, स्मरण, चर्चा एवं चित्रों को देखना, स्त्रियों से सम्बन्धित इन चार तरह की बातों का जो (मनुष्य) मोह के वश हुआ आचरण करता है, निश्चय ही उसके चित्त में विकार उत्पन्न हो जाते हैं और उन विकारों से उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाता है। संन्यासियों के लिए आसक्ति, क्रोध, झूठ, माया, मोह, लोभ, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यान करना, कामना, राग, संग्रह, अहंकार, परगृह निवास, चिकित्सा का व्यवसाय, ममता, धर्म के लिए साहसिक कार्य, मन्त्र प्रयोग, औषधि-वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना आदि ये सभी कार्य वर्जित हैं। इनका उपयोग करने वाला परिव्राजक अपने धर्म (लक्ष्य) से पदच्युत हो जाता है। मोक्ष धर्म में सतत संलग्न रहने वाला ज्ञानी संन्यासी अपने किसी हितैषी (शुभचिन्तक) के लिए भी आओ, जाओ, रुको आदि स्वागत एवं सम्मान की बात कभी न करे । स्वप्न में भी कभी किसी के द्वारा दिया हुआ दान स्वीकार न करे। दूसरे अन्य किसी को भी न लवाए और न खुद ही किसी को देने-लेने के लिए बाध्य करे। स्त्री-पुरुष आदि भी आत्मीय स्वजनों के शुभ थवा अशुभ समाचारों को सुनकर-देखकर कभी भी अपने लक्ष्य से विचलित न हो, दुःख-सुख को सदैव के लिए त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, इन्द्रिय-निग्रह, अपरिग्रह (आदि का पालन करना), उद्दण्डता के भाव से रहित होना, किसी व्यक्ति विशेष के समक्ष दीन-हीन न होना, प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, १४१ नारदपरिव्राजकोपनिषद् अस्नेह (किसी से अत्यधिक लगाव न रखना), गुरु की सेवा-शुश्रूषा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियों का संयम, मन का निग्रह, सभी प्रियजनों के प्रति उदासीनता का भाव, धीरता, मृदुलता, सहनशीलता, करुणा, लजा, ज्ञान-विज्ञान-परायणता , स्वल्प आहार एवं धृति (धैर्य), ये सभी मन को वश में रखने वाले परिव्राजकों (संन्यासियों) के श्रेष्ठ प्रख्यात धर्म हैं ॥१-१२॥
11.0
अस्नेहो गुरुशुश्रूषा श्रद्धा क्षान्तिर्दमः शमः। उपेक्षा धैर्यमाधुर्ये तितिक्षा करुणा तथा॥११॥
जो ज्ञानी मनुष्य लोक, वेद, विषय-वासनाओं के भोग एवं समस्त इन्द्रियों की अधीनता का परित्याग करके एक मात्र अपने आत्मा के उत्थान में सतत स्थिर रहता है, वही परिव्राजक (संन्यासी) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है। उत्तम परिव्राजक नाम, गोत्र आदि के वरण, देश, काल, शास्त्रीय ज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, व्रत-उपवास एवं शील आदि का प्रकाशन (प्रचार-प्रसार) कदापि न करे। (वह) किसी भी स्त्री से वार्तालाप कभी न करे। पूर्व में देखी हुई किसी भी परिचित स्त्री का अपने मन में स्मरण तक भी न करे, उन स्त्रियों की चर्चा से सदैव दूर रहे और उनके चित्र आदि को भी कभी न देखे। भाषण-सम्भाषण, स्मरण, चर्चा एवं चित्रों को देखना, स्त्रियों से सम्बन्धित इन चार तरह की बातों का जो (मनुष्य) मोह के वश हुआ आचरण करता है, निश्चय ही उसके चित्त में विकार उत्पन्न हो जाते हैं और उन विकारों से उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाता है। संन्यासियों के लिए आसक्ति, क्रोध, झूठ, माया, मोह, लोभ, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यान करना, कामना, राग, संग्रह, अहंकार, परगृह निवास, चिकित्सा का व्यवसाय, ममता, धर्म के लिए साहसिक कार्य, मन्त्र प्रयोग, औषधि-वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना आदि ये सभी कार्य वर्जित हैं। इनका उपयोग करने वाला परिव्राजक अपने धर्म (लक्ष्य) से पदच्युत हो जाता है। मोक्ष धर्म में सतत संलग्न रहने वाला ज्ञानी संन्यासी अपने किसी हितैषी (शुभचिन्तक) के लिए भी आओ, जाओ, रुको आदि स्वागत एवं सम्मान की बात कभी न करे । स्वप्न में भी कभी किसी के द्वारा दिया हुआ दान स्वीकार न करे। दूसरे अन्य किसी को भी न लवाए और न खुद ही किसी को देने-लेने के लिए बाध्य करे। स्त्री-पुरुष आदि भी आत्मीय स्वजनों के शुभ थवा अशुभ समाचारों को सुनकर-देखकर कभी भी अपने लक्ष्य से विचलित न हो, दुःख-सुख को सदैव के लिए त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, इन्द्रिय-निग्रह, अपरिग्रह (आदि का पालन करना), उद्दण्डता के भाव से रहित होना, किसी व्यक्ति विशेष के समक्ष दीन-हीन न होना, प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, १४१ नारदपरिव्राजकोपनिषद् अस्नेह (किसी से अत्यधिक लगाव न रखना), गुरु की सेवा-शुश्रूषा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियों का संयम, मन का निग्रह, सभी प्रियजनों के प्रति उदासीनता का भाव, धीरता, मृदुलता, सहनशीलता, करुणा, लजा, ज्ञान-विज्ञान-परायणता , स्वल्प आहार एवं धृति (धैर्य), ये सभी मन को वश में रखने वाले परिव्राजकों (संन्यासियों) के श्रेष्ठ प्रख्यात धर्म हैं ॥१-१२॥
Text (part 7)
12.0
ह्रीस्तथा ज्ञानविज्ञाने योगो लघ्वशनं धृतिः। एष स्वधर्मा विख्यातो यतीनां नियतात्मनाम्॥१२॥
जो ज्ञानी मनुष्य लोक, वेद, विषय-वासनाओं के भोग एवं समस्त इन्द्रियों की अधीनता का परित्याग करके एक मात्र अपने आत्मा के उत्थान में सतत स्थिर रहता है, वही परिव्राजक (संन्यासी) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है। उत्तम परिव्राजक नाम, गोत्र आदि के वरण, देश, काल, शास्त्रीय ज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, व्रत-उपवास एवं शील आदि का प्रकाशन (प्रचार-प्रसार) कदापि न करे। (वह) किसी भी स्त्री से वार्तालाप कभी न करे। पूर्व में देखी हुई किसी भी परिचित स्त्री का अपने मन में स्मरण तक भी न करे, उन स्त्रियों की चर्चा से सदैव दूर रहे और उनके चित्र आदि को भी कभी न देखे। भाषण-सम्भाषण, स्मरण, चर्चा एवं चित्रों को देखना, स्त्रियों से सम्बन्धित इन चार तरह की बातों का जो (मनुष्य) मोह के वश हुआ आचरण करता है, निश्चय ही उसके चित्त में विकार उत्पन्न हो जाते हैं और उन विकारों से उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाता है। संन्यासियों के लिए आसक्ति, क्रोध, झूठ, माया, मोह, लोभ, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यान करना, कामना, राग, संग्रह, अहंकार, परगृह निवास, चिकित्सा का व्यवसाय, ममता, धर्म के लिए साहसिक कार्य, मन्त्र प्रयोग, औषधि-वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना आदि ये सभी कार्य वर्जित हैं। इनका उपयोग करने वाला परिव्राजक अपने धर्म (लक्ष्य) से पदच्युत हो जाता है। मोक्ष धर्म में सतत संलग्न रहने वाला ज्ञानी संन्यासी अपने किसी हितैषी (शुभचिन्तक) के लिए भी आओ, जाओ, रुको आदि स्वागत एवं सम्मान की बात कभी न करे । स्वप्न में भी कभी किसी के द्वारा दिया हुआ दान स्वीकार न करे। दूसरे अन्य किसी को भी न लवाए और न खुद ही किसी को देने-लेने के लिए बाध्य करे। स्त्री-पुरुष आदि भी आत्मीय स्वजनों के शुभ थवा अशुभ समाचारों को सुनकर-देखकर कभी भी अपने लक्ष्य से विचलित न हो, दुःख-सुख को सदैव के लिए त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, इन्द्रिय-निग्रह, अपरिग्रह (आदि का पालन करना), उद्दण्डता के भाव से रहित होना, किसी व्यक्ति विशेष के समक्ष दीन-हीन न होना, प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, १४१ नारदपरिव्राजकोपनिषद् अस्नेह (किसी से अत्यधिक लगाव न रखना), गुरु की सेवा-शुश्रूषा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियों का संयम, मन का निग्रह, सभी प्रियजनों के प्रति उदासीनता का भाव, धीरता, मृदुलता, सहनशीलता, करुणा, लजा, ज्ञान-विज्ञान-परायणता , स्वल्प आहार एवं धृति (धैर्य), ये सभी मन को वश में रखने वाले परिव्राजकों (संन्यासियों) के श्रेष्ठ प्रख्यात धर्म हैं ॥१-१२॥
13.0
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थः सर्वत्र समदर्शनः। तुरीयः परमो हंसः साक्षान्नारायणो यतिः॥१३॥
___ द्वन्द्व आदि विकारों से रहित होकर, सात्त्विक गुणों में सर्वदा प्रतिष्ठित रहकर सर्वत्र सम दृष्टि रखने वाला तुरीयावस्था में स्थित परमहंस संन्यासी साक्षात् भगवान् श्रीमन्नारायण का साकार रूप है। (वह) गाँव में एक रात्रि ही निवास के लिए रहे और बड़े नगर में मात्र पाँच रात्रि ही व्यतीत करे, परन्तु यह नियम वर्षाऋतु के अतिरिक्त समय के लिए ही निर्धारित है। वर्षाकाल में वह (संन्यासी) चार माह तक किसी एक निश्चित स्थान पर वास करे। संन्यासी एक गाँव में दो रात्रियाँ कभी न रहे। यदि वह रहता है, तो सम्भव है कि उसके अन्त:करण में राग आदि विकारों का भाव आ जाय। इन विकारों से वह नरक में गमन करने वाला हो जाता है। गाँव से बाहर किसी एकान्त स्थल में मन एवं इन्द्रियों को संयमित करके निवास करे। कहीं पर भी (वह) अपने निवास के लिए आश्रम या कुटी (मठ) आदि न बनाये। जिस तरह से कृमि-कीट हमेशा यत्र-तत्र भ्रमण करते रहते हैं, उसी तरह से आठ मास तक परिव्राजक इस वसुन्धरा पर विचरण करता रहे। मात्र वर्षाकाल चार मास वह एक ही स्थल पर निवास करे। संन्यासी मात्र एक ही वस्त्र अपने शरीर पर धारण करे या फिर वस्त्ररहित होकर रहे। उस (संन्यासी) की दृष्टि यत्र-तत्र अस्थिर (चंचल) न होकर एक लक्ष्यविशेष पर ही केन्द्रित रहे । कभी भी विषयभोगों में आसक्त न होकर एवं सजन पुरुषों के मार्ग को कलुषित न करते हुए सतत परमात्मा के ध्यान में स्थित होकर पृथ्वी पर विचरण करे, वह अपने धर्म का निर्वाह करते हुए सदैव पवित्र स्थल पर ही निवास करे। योग-परायण परिव्राजक पृथ्वी तल पर (नीचे की ओर) दृष्टि रखते हुए ही सर्वदा विचरण करता रहे। रात्रि को, मध्याह्न में तथा दोनों सन्ध्याओं (प्रात:-सायं) के समय कभी भी इधर-उधर भ्रमण न करे और ऐसे स्थलों पर भी भ्रमण न करे, जो निर्जन, दुर्गम एवं समस्त प्राणियों के लिए बाधा पहुँचाने वाले हों। गाँव में एक रात्रि, पुरवे में दो दिन, पत्तन अर्थात् छोटे शहर-कस्बे में तीन दिन तथा नगर में पाँच रात्रियों तक परिव्राजक को ठहरना चाहिए। वर्षाकाल में किसी एक विशेष स्थल पर, जो चारों तरफ से शुद्ध जल से घिरा हुआ हो, अपना निवास बनाए। परिव्राजक समस्त भूत-प्राणियों को अपने ही सदृश देखता हुआ उपदेश ४ मन्त्र ३६ १४२ अंधे, मूर्ख, बधिर, पागल तथा गूंगे की तरह से इच्छा रखता हुआ भूमि पर विचरता रहे। बहूदक एवं वन में स्थिर संन्यासियों के लिए त्रिकाल स्नान कहा गया है, लेकिन 'हंस' नामक संन्यासी के लिए दिन में मात्र एक ही बार स्नान करने का नियम है । 'हंस' नामक संन्यासी से श्रेष्ठ-उच्च स्थिति वाले 'परमहंस' नामक संन्यासी के लिए स्नान आदि का कोई विशेष नियम नहीं है। १३-२३॥
14.0
एकरात्रं वसेद्ग्रामे नगरे पञ्चरात्रकम्। वर्षाभ्योऽन्यत्र वर्षासु मासांश्च चतुरो वसेत्॥१४॥
___ द्वन्द्व आदि विकारों से रहित होकर, सात्त्विक गुणों में सर्वदा प्रतिष्ठित रहकर सर्वत्र सम दृष्टि रखने वाला तुरीयावस्था में स्थित परमहंस संन्यासी साक्षात् भगवान् श्रीमन्नारायण का साकार रूप है। (वह) गाँव में एक रात्रि ही निवास के लिए रहे और बड़े नगर में मात्र पाँच रात्रि ही व्यतीत करे, परन्तु यह नियम वर्षाऋतु के अतिरिक्त समय के लिए ही निर्धारित है। वर्षाकाल में वह (संन्यासी) चार माह तक किसी एक निश्चित स्थान पर वास करे। संन्यासी एक गाँव में दो रात्रियाँ कभी न रहे। यदि वह रहता है, तो सम्भव है कि उसके अन्त:करण में राग आदि विकारों का भाव आ जाय। इन विकारों से वह नरक में गमन करने वाला हो जाता है। गाँव से बाहर किसी एकान्त स्थल में मन एवं इन्द्रियों को संयमित करके निवास करे। कहीं पर भी (वह) अपने निवास के लिए आश्रम या कुटी (मठ) आदि न बनाये। जिस तरह से कृमि-कीट हमेशा यत्र-तत्र भ्रमण करते रहते हैं, उसी तरह से आठ मास तक परिव्राजक इस वसुन्धरा पर विचरण करता रहे। मात्र वर्षाकाल चार मास वह एक ही स्थल पर निवास करे। संन्यासी मात्र एक ही वस्त्र अपने शरीर पर धारण करे या फिर वस्त्ररहित होकर रहे। उस (संन्यासी) की दृष्टि यत्र-तत्र अस्थिर (चंचल) न होकर एक लक्ष्यविशेष पर ही केन्द्रित रहे । कभी भी विषयभोगों में आसक्त न होकर एवं सजन पुरुषों के मार्ग को कलुषित न करते हुए सतत परमात्मा के ध्यान में स्थित होकर पृथ्वी पर विचरण करे, वह अपने धर्म का निर्वाह करते हुए सदैव पवित्र स्थल पर ही निवास करे। योग-परायण परिव्राजक पृथ्वी तल पर (नीचे की ओर) दृष्टि रखते हुए ही सर्वदा विचरण करता रहे। रात्रि को, मध्याह्न में तथा दोनों सन्ध्याओं (प्रात:-सायं) के समय कभी भी इधर-उधर भ्रमण न करे और ऐसे स्थलों पर भी भ्रमण न करे, जो निर्जन, दुर्गम एवं समस्त प्राणियों के लिए बाधा पहुँचाने वाले हों। गाँव में एक रात्रि, पुरवे में दो दिन, पत्तन अर्थात् छोटे शहर-कस्बे में तीन दिन तथा नगर में पाँच रात्रियों तक परिव्राजक को ठहरना चाहिए। वर्षाकाल में किसी एक विशेष स्थल पर, जो चारों तरफ से शुद्ध जल से घिरा हुआ हो, अपना निवास बनाए। परिव्राजक समस्त भूत-प्राणियों को अपने ही सदृश देखता हुआ उपदेश ४ मन्त्र ३६ १४२ अंधे, मूर्ख, बधिर, पागल तथा गूंगे की तरह से इच्छा रखता हुआ भूमि पर विचरता रहे। बहूदक एवं वन में स्थिर संन्यासियों के लिए त्रिकाल स्नान कहा गया है, लेकिन 'हंस' नामक संन्यासी के लिए दिन में मात्र एक ही बार स्नान करने का नियम है । 'हंस' नामक संन्यासी से श्रेष्ठ-उच्च स्थिति वाले 'परमहंस' नामक संन्यासी के लिए स्नान आदि का कोई विशेष नियम नहीं है। १३-२३॥
15.0
द्विरात्रं न वसेद्ग्रामे भिक्षुर्यदि वसेत्तदा। रागादयः प्रसज्येरंस्तेनासौ नारकी भवेत्॥१५॥
___ द्वन्द्व आदि विकारों से रहित होकर, सात्त्विक गुणों में सर्वदा प्रतिष्ठित रहकर सर्वत्र सम दृष्टि रखने वाला तुरीयावस्था में स्थित परमहंस संन्यासी साक्षात् भगवान् श्रीमन्नारायण का साकार रूप है। (वह) गाँव में एक रात्रि ही निवास के लिए रहे और बड़े नगर में मात्र पाँच रात्रि ही व्यतीत करे, परन्तु यह नियम वर्षाऋतु के अतिरिक्त समय के लिए ही निर्धारित है। वर्षाकाल में वह (संन्यासी) चार माह तक किसी एक निश्चित स्थान पर वास करे। संन्यासी एक गाँव में दो रात्रियाँ कभी न रहे। यदि वह रहता है, तो सम्भव है कि उसके अन्त:करण में राग आदि विकारों का भाव आ जाय। इन विकारों से वह नरक में गमन करने वाला हो जाता है। गाँव से बाहर किसी एकान्त स्थल में मन एवं इन्द्रियों को संयमित करके निवास करे। कहीं पर भी (वह) अपने निवास के लिए आश्रम या कुटी (मठ) आदि न बनाये। जिस तरह से कृमि-कीट हमेशा यत्र-तत्र भ्रमण करते रहते हैं, उसी तरह से आठ मास तक परिव्राजक इस वसुन्धरा पर विचरण करता रहे। मात्र वर्षाकाल चार मास वह एक ही स्थल पर निवास करे। संन्यासी मात्र एक ही वस्त्र अपने शरीर पर धारण करे या फिर वस्त्ररहित होकर रहे। उस (संन्यासी) की दृष्टि यत्र-तत्र अस्थिर (चंचल) न होकर एक लक्ष्यविशेष पर ही केन्द्रित रहे । कभी भी विषयभोगों में आसक्त न होकर एवं सजन पुरुषों के मार्ग को कलुषित न करते हुए सतत परमात्मा के ध्यान में स्थित होकर पृथ्वी पर विचरण करे, वह अपने धर्म का निर्वाह करते हुए सदैव पवित्र स्थल पर ही निवास करे। योग-परायण परिव्राजक पृथ्वी तल पर (नीचे की ओर) दृष्टि रखते हुए ही सर्वदा विचरण करता रहे। रात्रि को, मध्याह्न में तथा दोनों सन्ध्याओं (प्रात:-सायं) के समय कभी भी इधर-उधर भ्रमण न करे और ऐसे स्थलों पर भी भ्रमण न करे, जो निर्जन, दुर्गम एवं समस्त प्राणियों के लिए बाधा पहुँचाने वाले हों। गाँव में एक रात्रि, पुरवे में दो दिन, पत्तन अर्थात् छोटे शहर-कस्बे में तीन दिन तथा नगर में पाँच रात्रियों तक परिव्राजक को ठहरना चाहिए। वर्षाकाल में किसी एक विशेष स्थल पर, जो चारों तरफ से शुद्ध जल से घिरा हुआ हो, अपना निवास बनाए। परिव्राजक समस्त भूत-प्राणियों को अपने ही सदृश देखता हुआ उपदेश ४ मन्त्र ३६ १४२ अंधे, मूर्ख, बधिर, पागल तथा गूंगे की तरह से इच्छा रखता हुआ भूमि पर विचरता रहे। बहूदक एवं वन में स्थिर संन्यासियों के लिए त्रिकाल स्नान कहा गया है, लेकिन 'हंस' नामक संन्यासी के लिए दिन में मात्र एक ही बार स्नान करने का नियम है । 'हंस' नामक संन्यासी से श्रेष्ठ-उच्च स्थिति वाले 'परमहंस' नामक संन्यासी के लिए स्नान आदि का कोई विशेष नियम नहीं है। १३-२३॥
16.0
ग्रामान्ते निर्जने देशे नियतात्माऽनिकेतनः। पर्यटेत्कीटवद्भूमौ वर्षास्वेकत्र संवसेत्॥१६॥
___ द्वन्द्व आदि विकारों से रहित होकर, सात्त्विक गुणों में सर्वदा प्रतिष्ठित रहकर सर्वत्र सम दृष्टि रखने वाला तुरीयावस्था में स्थित परमहंस संन्यासी साक्षात् भगवान् श्रीमन्नारायण का साकार रूप है। (वह) गाँव में एक रात्रि ही निवास के लिए रहे और बड़े नगर में मात्र पाँच रात्रि ही व्यतीत करे, परन्तु यह नियम वर्षाऋतु के अतिरिक्त समय के लिए ही निर्धारित है। वर्षाकाल में वह (संन्यासी) चार माह तक किसी एक निश्चित स्थान पर वास करे। संन्यासी एक गाँव में दो रात्रियाँ कभी न रहे। यदि वह रहता है, तो सम्भव है कि उसके अन्त:करण में राग आदि विकारों का भाव आ जाय। इन विकारों से वह नरक में गमन करने वाला हो जाता है। गाँव से बाहर किसी एकान्त स्थल में मन एवं इन्द्रियों को संयमित करके निवास करे। कहीं पर भी (वह) अपने निवास के लिए आश्रम या कुटी (मठ) आदि न बनाये। जिस तरह से कृमि-कीट हमेशा यत्र-तत्र भ्रमण करते रहते हैं, उसी तरह से आठ मास तक परिव्राजक इस वसुन्धरा पर विचरण करता रहे। मात्र वर्षाकाल चार मास वह एक ही स्थल पर निवास करे। संन्यासी मात्र एक ही वस्त्र अपने शरीर पर धारण करे या फिर वस्त्ररहित होकर रहे। उस (संन्यासी) की दृष्टि यत्र-तत्र अस्थिर (चंचल) न होकर एक लक्ष्यविशेष पर ही केन्द्रित रहे । कभी भी विषयभोगों में आसक्त न होकर एवं सजन पुरुषों के मार्ग को कलुषित न करते हुए सतत परमात्मा के ध्यान में स्थित होकर पृथ्वी पर विचरण करे, वह अपने धर्म का निर्वाह करते हुए सदैव पवित्र स्थल पर ही निवास करे। योग-परायण परिव्राजक पृथ्वी तल पर (नीचे की ओर) दृष्टि रखते हुए ही सर्वदा विचरण करता रहे। रात्रि को, मध्याह्न में तथा दोनों सन्ध्याओं (प्रात:-सायं) के समय कभी भी इधर-उधर भ्रमण न करे और ऐसे स्थलों पर भी भ्रमण न करे, जो निर्जन, दुर्गम एवं समस्त प्राणियों के लिए बाधा पहुँचाने वाले हों। गाँव में एक रात्रि, पुरवे में दो दिन, पत्तन अर्थात् छोटे शहर-कस्बे में तीन दिन तथा नगर में पाँच रात्रियों तक परिव्राजक को ठहरना चाहिए। वर्षाकाल में किसी एक विशेष स्थल पर, जो चारों तरफ से शुद्ध जल से घिरा हुआ हो, अपना निवास बनाए। परिव्राजक समस्त भूत-प्राणियों को अपने ही सदृश देखता हुआ उपदेश ४ मन्त्र ३६ १४२ अंधे, मूर्ख, बधिर, पागल तथा गूंगे की तरह से इच्छा रखता हुआ भूमि पर विचरता रहे। बहूदक एवं वन में स्थिर संन्यासियों के लिए त्रिकाल स्नान कहा गया है, लेकिन 'हंस' नामक संन्यासी के लिए दिन में मात्र एक ही बार स्नान करने का नियम है । 'हंस' नामक संन्यासी से श्रेष्ठ-उच्च स्थिति वाले 'परमहंस' नामक संन्यासी के लिए स्नान आदि का कोई विशेष नियम नहीं है। १३-२३॥
17.0
एकवासा अवासा वा एकदृष्टिरलोलुपः । अदूषयन्सतां मार्ग ध्यानयुक्तो महीं चरेत्॥१७॥
___ द्वन्द्व आदि विकारों से रहित होकर, सात्त्विक गुणों में सर्वदा प्रतिष्ठित रहकर सर्वत्र सम दृष्टि रखने वाला तुरीयावस्था में स्थित परमहंस संन्यासी साक्षात् भगवान् श्रीमन्नारायण का साकार रूप है। (वह) गाँव में एक रात्रि ही निवास के लिए रहे और बड़े नगर में मात्र पाँच रात्रि ही व्यतीत करे, परन्तु यह नियम वर्षाऋतु के अतिरिक्त समय के लिए ही निर्धारित है। वर्षाकाल में वह (संन्यासी) चार माह तक किसी एक निश्चित स्थान पर वास करे। संन्यासी एक गाँव में दो रात्रियाँ कभी न रहे। यदि वह रहता है, तो सम्भव है कि उसके अन्त:करण में राग आदि विकारों का भाव आ जाय। इन विकारों से वह नरक में गमन करने वाला हो जाता है। गाँव से बाहर किसी एकान्त स्थल में मन एवं इन्द्रियों को संयमित करके निवास करे। कहीं पर भी (वह) अपने निवास के लिए आश्रम या कुटी (मठ) आदि न बनाये। जिस तरह से कृमि-कीट हमेशा यत्र-तत्र भ्रमण करते रहते हैं, उसी तरह से आठ मास तक परिव्राजक इस वसुन्धरा पर विचरण करता रहे। मात्र वर्षाकाल चार मास वह एक ही स्थल पर निवास करे। संन्यासी मात्र एक ही वस्त्र अपने शरीर पर धारण करे या फिर वस्त्ररहित होकर रहे। उस (संन्यासी) की दृष्टि यत्र-तत्र अस्थिर (चंचल) न होकर एक लक्ष्यविशेष पर ही केन्द्रित रहे । कभी भी विषयभोगों में आसक्त न होकर एवं सजन पुरुषों के मार्ग को कलुषित न करते हुए सतत परमात्मा के ध्यान में स्थित होकर पृथ्वी पर विचरण करे, वह अपने धर्म का निर्वाह करते हुए सदैव पवित्र स्थल पर ही निवास करे। योग-परायण परिव्राजक पृथ्वी तल पर (नीचे की ओर) दृष्टि रखते हुए ही सर्वदा विचरण करता रहे। रात्रि को, मध्याह्न में तथा दोनों सन्ध्याओं (प्रात:-सायं) के समय कभी भी इधर-उधर भ्रमण न करे और ऐसे स्थलों पर भी भ्रमण न करे, जो निर्जन, दुर्गम एवं समस्त प्राणियों के लिए बाधा पहुँचाने वाले हों। गाँव में एक रात्रि, पुरवे में दो दिन, पत्तन अर्थात् छोटे शहर-कस्बे में तीन दिन तथा नगर में पाँच रात्रियों तक परिव्राजक को ठहरना चाहिए। वर्षाकाल में किसी एक विशेष स्थल पर, जो चारों तरफ से शुद्ध जल से घिरा हुआ हो, अपना निवास बनाए। परिव्राजक समस्त भूत-प्राणियों को अपने ही सदृश देखता हुआ उपदेश ४ मन्त्र ३६ १४२ अंधे, मूर्ख, बधिर, पागल तथा गूंगे की तरह से इच्छा रखता हुआ भूमि पर विचरता रहे। बहूदक एवं वन में स्थिर संन्यासियों के लिए त्रिकाल स्नान कहा गया है, लेकिन 'हंस' नामक संन्यासी के लिए दिन में मात्र एक ही बार स्नान करने का नियम है । 'हंस' नामक संन्यासी से श्रेष्ठ-उच्च स्थिति वाले 'परमहंस' नामक संन्यासी के लिए स्नान आदि का कोई विशेष नियम नहीं है। १३-२३॥
18.0
शुचौ देशे सदा भिक्षुः स्वधर्ममनुपालयन्।पर्यटेत सदा योगी वीक्षयन्वसुधातलम्॥१८॥
___ द्वन्द्व आदि विकारों से रहित होकर, सात्त्विक गुणों में सर्वदा प्रतिष्ठित रहकर सर्वत्र सम दृष्टि रखने वाला तुरीयावस्था में स्थित परमहंस संन्यासी साक्षात् भगवान् श्रीमन्नारायण का साकार रूप है। (वह) गाँव में एक रात्रि ही निवास के लिए रहे और बड़े नगर में मात्र पाँच रात्रि ही व्यतीत करे, परन्तु यह नियम वर्षाऋतु के अतिरिक्त समय के लिए ही निर्धारित है। वर्षाकाल में वह (संन्यासी) चार माह तक किसी एक निश्चित स्थान पर वास करे। संन्यासी एक गाँव में दो रात्रियाँ कभी न रहे। यदि वह रहता है, तो सम्भव है कि उसके अन्त:करण में राग आदि विकारों का भाव आ जाय। इन विकारों से वह नरक में गमन करने वाला हो जाता है। गाँव से बाहर किसी एकान्त स्थल में मन एवं इन्द्रियों को संयमित करके निवास करे। कहीं पर भी (वह) अपने निवास के लिए आश्रम या कुटी (मठ) आदि न बनाये। जिस तरह से कृमि-कीट हमेशा यत्र-तत्र भ्रमण करते रहते हैं, उसी तरह से आठ मास तक परिव्राजक इस वसुन्धरा पर विचरण करता रहे। मात्र वर्षाकाल चार मास वह एक ही स्थल पर निवास करे। संन्यासी मात्र एक ही वस्त्र अपने शरीर पर धारण करे या फिर वस्त्ररहित होकर रहे। उस (संन्यासी) की दृष्टि यत्र-तत्र अस्थिर (चंचल) न होकर एक लक्ष्यविशेष पर ही केन्द्रित रहे । कभी भी विषयभोगों में आसक्त न होकर एवं सजन पुरुषों के मार्ग को कलुषित न करते हुए सतत परमात्मा के ध्यान में स्थित होकर पृथ्वी पर विचरण करे, वह अपने धर्म का निर्वाह करते हुए सदैव पवित्र स्थल पर ही निवास करे। योग-परायण परिव्राजक पृथ्वी तल पर (नीचे की ओर) दृष्टि रखते हुए ही सर्वदा विचरण करता रहे। रात्रि को, मध्याह्न में तथा दोनों सन्ध्याओं (प्रात:-सायं) के समय कभी भी इधर-उधर भ्रमण न करे और ऐसे स्थलों पर भी भ्रमण न करे, जो निर्जन, दुर्गम एवं समस्त प्राणियों के लिए बाधा पहुँचाने वाले हों। गाँव में एक रात्रि, पुरवे में दो दिन, पत्तन अर्थात् छोटे शहर-कस्बे में तीन दिन तथा नगर में पाँच रात्रियों तक परिव्राजक को ठहरना चाहिए। वर्षाकाल में किसी एक विशेष स्थल पर, जो चारों तरफ से शुद्ध जल से घिरा हुआ हो, अपना निवास बनाए। परिव्राजक समस्त भूत-प्राणियों को अपने ही सदृश देखता हुआ उपदेश ४ मन्त्र ३६ १४२ अंधे, मूर्ख, बधिर, पागल तथा गूंगे की तरह से इच्छा रखता हुआ भूमि पर विचरता रहे। बहूदक एवं वन में स्थिर संन्यासियों के लिए त्रिकाल स्नान कहा गया है, लेकिन 'हंस' नामक संन्यासी के लिए दिन में मात्र एक ही बार स्नान करने का नियम है । 'हंस' नामक संन्यासी से श्रेष्ठ-उच्च स्थिति वाले 'परमहंस' नामक संन्यासी के लिए स्नान आदि का कोई विशेष नियम नहीं है। १३-२३॥
19.0
न रात्रौ न च मध्याह्ने संध्ययोनैव पर्यटन् । न शून्ये न च दुर्गे वा प्राणिबाधाकरे न च॥१९॥
___ द्वन्द्व आदि विकारों से रहित होकर, सात्त्विक गुणों में सर्वदा प्रतिष्ठित रहकर सर्वत्र सम दृष्टि रखने वाला तुरीयावस्था में स्थित परमहंस संन्यासी साक्षात् भगवान् श्रीमन्नारायण का साकार रूप है। (वह) गाँव में एक रात्रि ही निवास के लिए रहे और बड़े नगर में मात्र पाँच रात्रि ही व्यतीत करे, परन्तु यह नियम वर्षाऋतु के अतिरिक्त समय के लिए ही निर्धारित है। वर्षाकाल में वह (संन्यासी) चार माह तक किसी एक निश्चित स्थान पर वास करे। संन्यासी एक गाँव में दो रात्रियाँ कभी न रहे। यदि वह रहता है, तो सम्भव है कि उसके अन्त:करण में राग आदि विकारों का भाव आ जाय। इन विकारों से वह नरक में गमन करने वाला हो जाता है। गाँव से बाहर किसी एकान्त स्थल में मन एवं इन्द्रियों को संयमित करके निवास करे। कहीं पर भी (वह) अपने निवास के लिए आश्रम या कुटी (मठ) आदि न बनाये। जिस तरह से कृमि-कीट हमेशा यत्र-तत्र भ्रमण करते रहते हैं, उसी तरह से आठ मास तक परिव्राजक इस वसुन्धरा पर विचरण करता रहे। मात्र वर्षाकाल चार मास वह एक ही स्थल पर निवास करे। संन्यासी मात्र एक ही वस्त्र अपने शरीर पर धारण करे या फिर वस्त्ररहित होकर रहे। उस (संन्यासी) की दृष्टि यत्र-तत्र अस्थिर (चंचल) न होकर एक लक्ष्यविशेष पर ही केन्द्रित रहे । कभी भी विषयभोगों में आसक्त न होकर एवं सजन पुरुषों के मार्ग को कलुषित न करते हुए सतत परमात्मा के ध्यान में स्थित होकर पृथ्वी पर विचरण करे, वह अपने धर्म का निर्वाह करते हुए सदैव पवित्र स्थल पर ही निवास करे। योग-परायण परिव्राजक पृथ्वी तल पर (नीचे की ओर) दृष्टि रखते हुए ही सर्वदा विचरण करता रहे। रात्रि को, मध्याह्न में तथा दोनों सन्ध्याओं (प्रात:-सायं) के समय कभी भी इधर-उधर भ्रमण न करे और ऐसे स्थलों पर भी भ्रमण न करे, जो निर्जन, दुर्गम एवं समस्त प्राणियों के लिए बाधा पहुँचाने वाले हों। गाँव में एक रात्रि, पुरवे में दो दिन, पत्तन अर्थात् छोटे शहर-कस्बे में तीन दिन तथा नगर में पाँच रात्रियों तक परिव्राजक को ठहरना चाहिए। वर्षाकाल में किसी एक विशेष स्थल पर, जो चारों तरफ से शुद्ध जल से घिरा हुआ हो, अपना निवास बनाए। परिव्राजक समस्त भूत-प्राणियों को अपने ही सदृश देखता हुआ उपदेश ४ मन्त्र ३६ १४२ अंधे, मूर्ख, बधिर, पागल तथा गूंगे की तरह से इच्छा रखता हुआ भूमि पर विचरता रहे। बहूदक एवं वन में स्थिर संन्यासियों के लिए त्रिकाल स्नान कहा गया है, लेकिन 'हंस' नामक संन्यासी के लिए दिन में मात्र एक ही बार स्नान करने का नियम है । 'हंस' नामक संन्यासी से श्रेष्ठ-उच्च स्थिति वाले 'परमहंस' नामक संन्यासी के लिए स्नान आदि का कोई विशेष नियम नहीं है। १३-२३॥
20.0
एकरात्रं वसेद्ग्रामे पत्तने तु दिनत्रयम् । पुरे दिनद्वयं भिक्षुर्नगरे पञ्चरात्रकम् । वर्षास्वेकत्र तिष्ठेत स्थाने पुण्यजलावृते ॥२०॥
___ द्वन्द्व आदि विकारों से रहित होकर, सात्त्विक गुणों में सर्वदा प्रतिष्ठित रहकर सर्वत्र सम दृष्टि रखने वाला तुरीयावस्था में स्थित परमहंस संन्यासी साक्षात् भगवान् श्रीमन्नारायण का साकार रूप है। (वह) गाँव में एक रात्रि ही निवास के लिए रहे और बड़े नगर में मात्र पाँच रात्रि ही व्यतीत करे, परन्तु यह नियम वर्षाऋतु के अतिरिक्त समय के लिए ही निर्धारित है। वर्षाकाल में वह (संन्यासी) चार माह तक किसी एक निश्चित स्थान पर वास करे। संन्यासी एक गाँव में दो रात्रियाँ कभी न रहे। यदि वह रहता है, तो सम्भव है कि उसके अन्त:करण में राग आदि विकारों का भाव आ जाय। इन विकारों से वह नरक में गमन करने वाला हो जाता है। गाँव से बाहर किसी एकान्त स्थल में मन एवं इन्द्रियों को संयमित करके निवास करे। कहीं पर भी (वह) अपने निवास के लिए आश्रम या कुटी (मठ) आदि न बनाये। जिस तरह से कृमि-कीट हमेशा यत्र-तत्र भ्रमण करते रहते हैं, उसी तरह से आठ मास तक परिव्राजक इस वसुन्धरा पर विचरण करता रहे। मात्र वर्षाकाल चार मास वह एक ही स्थल पर निवास करे। संन्यासी मात्र एक ही वस्त्र अपने शरीर पर धारण करे या फिर वस्त्ररहित होकर रहे। उस (संन्यासी) की दृष्टि यत्र-तत्र अस्थिर (चंचल) न होकर एक लक्ष्यविशेष पर ही केन्द्रित रहे । कभी भी विषयभोगों में आसक्त न होकर एवं सजन पुरुषों के मार्ग को कलुषित न करते हुए सतत परमात्मा के ध्यान में स्थित होकर पृथ्वी पर विचरण करे, वह अपने धर्म का निर्वाह करते हुए सदैव पवित्र स्थल पर ही निवास करे। योग-परायण परिव्राजक पृथ्वी तल पर (नीचे की ओर) दृष्टि रखते हुए ही सर्वदा विचरण करता रहे। रात्रि को, मध्याह्न में तथा दोनों सन्ध्याओं (प्रात:-सायं) के समय कभी भी इधर-उधर भ्रमण न करे और ऐसे स्थलों पर भी भ्रमण न करे, जो निर्जन, दुर्गम एवं समस्त प्राणियों के लिए बाधा पहुँचाने वाले हों। गाँव में एक रात्रि, पुरवे में दो दिन, पत्तन अर्थात् छोटे शहर-कस्बे में तीन दिन तथा नगर में पाँच रात्रियों तक परिव्राजक को ठहरना चाहिए। वर्षाकाल में किसी एक विशेष स्थल पर, जो चारों तरफ से शुद्ध जल से घिरा हुआ हो, अपना निवास बनाए। परिव्राजक समस्त भूत-प्राणियों को अपने ही सदृश देखता हुआ उपदेश ४ मन्त्र ३६ १४२ अंधे, मूर्ख, बधिर, पागल तथा गूंगे की तरह से इच्छा रखता हुआ भूमि पर विचरता रहे। बहूदक एवं वन में स्थिर संन्यासियों के लिए त्रिकाल स्नान कहा गया है, लेकिन 'हंस' नामक संन्यासी के लिए दिन में मात्र एक ही बार स्नान करने का नियम है । 'हंस' नामक संन्यासी से श्रेष्ठ-उच्च स्थिति वाले 'परमहंस' नामक संन्यासी के लिए स्नान आदि का कोई विशेष नियम नहीं है। १३-२३॥
21.0
आत्मवत्सर्वभूतानि पश्यन्भिक्षुश्चरेन्महीम्। अन्धवत्कुब्जवच्चैव बधिरोन्मत्तमूकवत्॥२१॥
___ द्वन्द्व आदि विकारों से रहित होकर, सात्त्विक गुणों में सर्वदा प्रतिष्ठित रहकर सर्वत्र सम दृष्टि रखने वाला तुरीयावस्था में स्थित परमहंस संन्यासी साक्षात् भगवान् श्रीमन्नारायण का साकार रूप है। (वह) गाँव में एक रात्रि ही निवास के लिए रहे और बड़े नगर में मात्र पाँच रात्रि ही व्यतीत करे, परन्तु यह नियम वर्षाऋतु के अतिरिक्त समय के लिए ही निर्धारित है। वर्षाकाल में वह (संन्यासी) चार माह तक किसी एक निश्चित स्थान पर वास करे। संन्यासी एक गाँव में दो रात्रियाँ कभी न रहे। यदि वह रहता है, तो सम्भव है कि उसके अन्त:करण में राग आदि विकारों का भाव आ जाय। इन विकारों से वह नरक में गमन करने वाला हो जाता है। गाँव से बाहर किसी एकान्त स्थल में मन एवं इन्द्रियों को संयमित करके निवास करे। कहीं पर भी (वह) अपने निवास के लिए आश्रम या कुटी (मठ) आदि न बनाये। जिस तरह से कृमि-कीट हमेशा यत्र-तत्र भ्रमण करते रहते हैं, उसी तरह से आठ मास तक परिव्राजक इस वसुन्धरा पर विचरण करता रहे। मात्र वर्षाकाल चार मास वह एक ही स्थल पर निवास करे। संन्यासी मात्र एक ही वस्त्र अपने शरीर पर धारण करे या फिर वस्त्ररहित होकर रहे। उस (संन्यासी) की दृष्टि यत्र-तत्र अस्थिर (चंचल) न होकर एक लक्ष्यविशेष पर ही केन्द्रित रहे । कभी भी विषयभोगों में आसक्त न होकर एवं सजन पुरुषों के मार्ग को कलुषित न करते हुए सतत परमात्मा के ध्यान में स्थित होकर पृथ्वी पर विचरण करे, वह अपने धर्म का निर्वाह करते हुए सदैव पवित्र स्थल पर ही निवास करे। योग-परायण परिव्राजक पृथ्वी तल पर (नीचे की ओर) दृष्टि रखते हुए ही सर्वदा विचरण करता रहे। रात्रि को, मध्याह्न में तथा दोनों सन्ध्याओं (प्रात:-सायं) के समय कभी भी इधर-उधर भ्रमण न करे और ऐसे स्थलों पर भी भ्रमण न करे, जो निर्जन, दुर्गम एवं समस्त प्राणियों के लिए बाधा पहुँचाने वाले हों। गाँव में एक रात्रि, पुरवे में दो दिन, पत्तन अर्थात् छोटे शहर-कस्बे में तीन दिन तथा नगर में पाँच रात्रियों तक परिव्राजक को ठहरना चाहिए। वर्षाकाल में किसी एक विशेष स्थल पर, जो चारों तरफ से शुद्ध जल से घिरा हुआ हो, अपना निवास बनाए। परिव्राजक समस्त भूत-प्राणियों को अपने ही सदृश देखता हुआ उपदेश ४ मन्त्र ३६ १४२ अंधे, मूर्ख, बधिर, पागल तथा गूंगे की तरह से इच्छा रखता हुआ भूमि पर विचरता रहे। बहूदक एवं वन में स्थिर संन्यासियों के लिए त्रिकाल स्नान कहा गया है, लेकिन 'हंस' नामक संन्यासी के लिए दिन में मात्र एक ही बार स्नान करने का नियम है । 'हंस' नामक संन्यासी से श्रेष्ठ-उच्च स्थिति वाले 'परमहंस' नामक संन्यासी के लिए स्नान आदि का कोई विशेष नियम नहीं है। १३-२३॥
22.0
स्त्रानं त्रिषवणं प्रोक्तं बहूदकवनस्थयोः । हंसे तु सकृदेव स्यात्परहंसे न विद्यते ॥२२॥
___ द्वन्द्व आदि विकारों से रहित होकर, सात्त्विक गुणों में सर्वदा प्रतिष्ठित रहकर सर्वत्र सम दृष्टि रखने वाला तुरीयावस्था में स्थित परमहंस संन्यासी साक्षात् भगवान् श्रीमन्नारायण का साकार रूप है। (वह) गाँव में एक रात्रि ही निवास के लिए रहे और बड़े नगर में मात्र पाँच रात्रि ही व्यतीत करे, परन्तु यह नियम वर्षाऋतु के अतिरिक्त समय के लिए ही निर्धारित है। वर्षाकाल में वह (संन्यासी) चार माह तक किसी एक निश्चित स्थान पर वास करे। संन्यासी एक गाँव में दो रात्रियाँ कभी न रहे। यदि वह रहता है, तो सम्भव है कि उसके अन्त:करण में राग आदि विकारों का भाव आ जाय। इन विकारों से वह नरक में गमन करने वाला हो जाता है। गाँव से बाहर किसी एकान्त स्थल में मन एवं इन्द्रियों को संयमित करके निवास करे। कहीं पर भी (वह) अपने निवास के लिए आश्रम या कुटी (मठ) आदि न बनाये। जिस तरह से कृमि-कीट हमेशा यत्र-तत्र भ्रमण करते रहते हैं, उसी तरह से आठ मास तक परिव्राजक इस वसुन्धरा पर विचरण करता रहे। मात्र वर्षाकाल चार मास वह एक ही स्थल पर निवास करे। संन्यासी मात्र एक ही वस्त्र अपने शरीर पर धारण करे या फिर वस्त्ररहित होकर रहे। उस (संन्यासी) की दृष्टि यत्र-तत्र अस्थिर (चंचल) न होकर एक लक्ष्यविशेष पर ही केन्द्रित रहे । कभी भी विषयभोगों में आसक्त न होकर एवं सजन पुरुषों के मार्ग को कलुषित न करते हुए सतत परमात्मा के ध्यान में स्थित होकर पृथ्वी पर विचरण करे, वह अपने धर्म का निर्वाह करते हुए सदैव पवित्र स्थल पर ही निवास करे। योग-परायण परिव्राजक पृथ्वी तल पर (नीचे की ओर) दृष्टि रखते हुए ही सर्वदा विचरण करता रहे। रात्रि को, मध्याह्न में तथा दोनों सन्ध्याओं (प्रात:-सायं) के समय कभी भी इधर-उधर भ्रमण न करे और ऐसे स्थलों पर भी भ्रमण न करे, जो निर्जन, दुर्गम एवं समस्त प्राणियों के लिए बाधा पहुँचाने वाले हों। गाँव में एक रात्रि, पुरवे में दो दिन, पत्तन अर्थात् छोटे शहर-कस्बे में तीन दिन तथा नगर में पाँच रात्रियों तक परिव्राजक को ठहरना चाहिए। वर्षाकाल में किसी एक विशेष स्थल पर, जो चारों तरफ से शुद्ध जल से घिरा हुआ हो, अपना निवास बनाए। परिव्राजक समस्त भूत-प्राणियों को अपने ही सदृश देखता हुआ उपदेश ४ मन्त्र ३६ १४२ अंधे, मूर्ख, बधिर, पागल तथा गूंगे की तरह से इच्छा रखता हुआ भूमि पर विचरता रहे। बहूदक एवं वन में स्थिर संन्यासियों के लिए त्रिकाल स्नान कहा गया है, लेकिन 'हंस' नामक संन्यासी के लिए दिन में मात्र एक ही बार स्नान करने का नियम है । 'हंस' नामक संन्यासी से श्रेष्ठ-उच्च स्थिति वाले 'परमहंस' नामक संन्यासी के लिए स्नान आदि का कोई विशेष नियम नहीं है। १३-२३॥
23.0
मौनं योगासनं योगस्तितिक्षकान्तशीलता। निःस्पृहत्वं समत्वं च सप्तैतान्येकदण्डिनाम्॥२३॥
एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मजा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुप्ताङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्त:करण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुप्ताङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के __ चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का नारदपरिव्राजकोपनिषद् चिह्न विशेष होते हुए भी उसमें ज्ञान ही विशेष रूप से मुक्ति का माध्यम होता है। प्राणियों के लिए विभिन्न तरह के चिह्नों का धारण मोक्ष साधक ज्ञान के अभाव में व्यर्थ ही होता है। जिस (व्यक्ति) के सन्दर्भ में कोई भी यह न जानने में समर्थ हो कि वह साधु है या असाधु, अज्ञानी है या ज्ञानवान् या फिर वह सदाचारी है या दुराचारी, वास्तव में वही सच्चा ब्रह्मपरायण ब्राह्मण है। इस कारणज्ञानी परिव्राजक चिह्न विशेष को न धारण करके अपने धर्म का ज्ञान रखते हुए सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमात्म सत्ता के ध्यान-व्रत का पालन करे। वह गूढातिगूढ धर्म का आश्रय प्राप्त करके ऐसा आचरण करे, ससे उस संन्यासी के आचरण के सम्बन्ध में कोई भी बात दूसरे अन्य लोगों पर परिलक्षित न हो। समस्त प्राणिजनों के लिए संदेह का विषय बना हुआ वह वर्ण-जाति एवं आश्रय से विहीन होकर अन्धे, जड़ एवं गूंगे केसदृश भूमि पर विचरण करता रहे। ऐसे श्रेष्ठ शान्तचित्त परिव्राजक का दर्शन करके देवगण भी उसके जैसी स्थिति पाने के लिए सर्वदा आतुर होते रहते हैं। जब अपनी आत्मसत्ता के सिवाय दूसरी अन्य किसी वस्तु के अस्तित्व का चिह्न भी शेष न रह जाए, तभी कैवल्य की प्राप्ति होती है। ऐसा ही यह ब्रह्मतत्त्व का विशेष दिव्य सन्देश है ॥ २३-३६॥
24.0
परहंसाश्रमस्थो हि स्नानादेरविधानतः । अशेषचित्तवृत्तीनां त्यागं केवलमाचरेत्॥२४॥
एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मजा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुप्ताङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्त:करण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुप्ताङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के __ चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का नारदपरिव्राजकोपनिषद् चिह्न विशेष होते हुए भी उसमें ज्ञान ही विशेष रूप से मुक्ति का माध्यम होता है। प्राणियों के लिए विभिन्न तरह के चिह्नों का धारण मोक्ष साधक ज्ञान के अभाव में व्यर्थ ही होता है। जिस (व्यक्ति) के सन्दर्भ में कोई भी यह न जानने में समर्थ हो कि वह साधु है या असाधु, अज्ञानी है या ज्ञानवान् या फिर वह सदाचारी है या दुराचारी, वास्तव में वही सच्चा ब्रह्मपरायण ब्राह्मण है। इस कारणज्ञानी परिव्राजक चिह्न विशेष को न धारण करके अपने धर्म का ज्ञान रखते हुए सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमात्म सत्ता के ध्यान-व्रत का पालन करे। वह गूढातिगूढ धर्म का आश्रय प्राप्त करके ऐसा आचरण करे, ससे उस संन्यासी के आचरण के सम्बन्ध में कोई भी बात दूसरे अन्य लोगों पर परिलक्षित न हो। समस्त प्राणिजनों के लिए संदेह का विषय बना हुआ वह वर्ण-जाति एवं आश्रय से विहीन होकर अन्धे, जड़ एवं गूंगे केसदृश भूमि पर विचरण करता रहे। ऐसे श्रेष्ठ शान्तचित्त परिव्राजक का दर्शन करके देवगण भी उसके जैसी स्थिति पाने के लिए सर्वदा आतुर होते रहते हैं। जब अपनी आत्मसत्ता के सिवाय दूसरी अन्य किसी वस्तु के अस्तित्व का चिह्न भी शेष न रह जाए, तभी कैवल्य की प्राप्ति होती है। ऐसा ही यह ब्रह्मतत्त्व का विशेष दिव्य सन्देश है ॥ २३-३६॥
25.0
त्वङ्मांसरुधिरस्नायुमज्जामेदोस्थिसंहतौ।विण्मूत्रपूये रमतां क्रिमीणां कियदन्तरम् ॥२५॥
एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मजा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुप्ताङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्त:करण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुप्ताङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के __ चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का नारदपरिव्राजकोपनिषद् चिह्न विशेष होते हुए भी उसमें ज्ञान ही विशेष रूप से मुक्ति का माध्यम होता है। प्राणियों के लिए विभिन्न तरह के चिह्नों का धारण मोक्ष साधक ज्ञान के अभाव में व्यर्थ ही होता है। जिस (व्यक्ति) के सन्दर्भ में कोई भी यह न जानने में समर्थ हो कि वह साधु है या असाधु, अज्ञानी है या ज्ञानवान् या फिर वह सदाचारी है या दुराचारी, वास्तव में वही सच्चा ब्रह्मपरायण ब्राह्मण है। इस कारणज्ञानी परिव्राजक चिह्न विशेष को न धारण करके अपने धर्म का ज्ञान रखते हुए सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमात्म सत्ता के ध्यान-व्रत का पालन करे। वह गूढातिगूढ धर्म का आश्रय प्राप्त करके ऐसा आचरण करे, ससे उस संन्यासी के आचरण के सम्बन्ध में कोई भी बात दूसरे अन्य लोगों पर परिलक्षित न हो। समस्त प्राणिजनों के लिए संदेह का विषय बना हुआ वह वर्ण-जाति एवं आश्रय से विहीन होकर अन्धे, जड़ एवं गूंगे केसदृश भूमि पर विचरण करता रहे। ऐसे श्रेष्ठ शान्तचित्त परिव्राजक का दर्शन करके देवगण भी उसके जैसी स्थिति पाने के लिए सर्वदा आतुर होते रहते हैं। जब अपनी आत्मसत्ता के सिवाय दूसरी अन्य किसी वस्तु के अस्तित्व का चिह्न भी शेष न रह जाए, तभी कैवल्य की प्राप्ति होती है। ऐसा ही यह ब्रह्मतत्त्व का विशेष दिव्य सन्देश है ॥ २३-३६॥
Text (part 8)
26.0
व शरीरमशेषाणां श्रेष्मादीनां महाचयः। क चाङ्गशोभा सौभाग्यकमनीयादयो गुणाः ॥२६॥
एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मजा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुप्ताङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्त:करण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुप्ताङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के __ चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का नारदपरिव्राजकोपनिषद् चिह्न विशेष होते हुए भी उसमें ज्ञान ही विशेष रूप से मुक्ति का माध्यम होता है। प्राणियों के लिए विभिन्न तरह के चिह्नों का धारण मोक्ष साधक ज्ञान के अभाव में व्यर्थ ही होता है। जिस (व्यक्ति) के सन्दर्भ में कोई भी यह न जानने में समर्थ हो कि वह साधु है या असाधु, अज्ञानी है या ज्ञानवान् या फिर वह सदाचारी है या दुराचारी, वास्तव में वही सच्चा ब्रह्मपरायण ब्राह्मण है। इस कारणज्ञानी परिव्राजक चिह्न विशेष को न धारण करके अपने धर्म का ज्ञान रखते हुए सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमात्म सत्ता के ध्यान-व्रत का पालन करे। वह गूढातिगूढ धर्म का आश्रय प्राप्त करके ऐसा आचरण करे, ससे उस संन्यासी के आचरण के सम्बन्ध में कोई भी बात दूसरे अन्य लोगों पर परिलक्षित न हो। समस्त प्राणिजनों के लिए संदेह का विषय बना हुआ वह वर्ण-जाति एवं आश्रय से विहीन होकर अन्धे, जड़ एवं गूंगे केसदृश भूमि पर विचरण करता रहे। ऐसे श्रेष्ठ शान्तचित्त परिव्राजक का दर्शन करके देवगण भी उसके जैसी स्थिति पाने के लिए सर्वदा आतुर होते रहते हैं। जब अपनी आत्मसत्ता के सिवाय दूसरी अन्य किसी वस्तु के अस्तित्व का चिह्न भी शेष न रह जाए, तभी कैवल्य की प्राप्ति होती है। ऐसा ही यह ब्रह्मतत्त्व का विशेष दिव्य सन्देश है ॥ २३-३६॥
27.0
मांसासृक्पूयविण्मूत्रस्नायुमज्जास्थिसंहतो। देहे चेत्प्रीतिमान्मूढो भविता नरकेऽपि सः ॥२७॥
एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मजा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुप्ताङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्त:करण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुप्ताङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के __ चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का नारदपरिव्राजकोपनिषद् चिह्न विशेष होते हुए भी उसमें ज्ञान ही विशेष रूप से मुक्ति का माध्यम होता है। प्राणियों के लिए विभिन्न तरह के चिह्नों का धारण मोक्ष साधक ज्ञान के अभाव में व्यर्थ ही होता है। जिस (व्यक्ति) के सन्दर्भ में कोई भी यह न जानने में समर्थ हो कि वह साधु है या असाधु, अज्ञानी है या ज्ञानवान् या फिर वह सदाचारी है या दुराचारी, वास्तव में वही सच्चा ब्रह्मपरायण ब्राह्मण है। इस कारणज्ञानी परिव्राजक चिह्न विशेष को न धारण करके अपने धर्म का ज्ञान रखते हुए सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमात्म सत्ता के ध्यान-व्रत का पालन करे। वह गूढातिगूढ धर्म का आश्रय प्राप्त करके ऐसा आचरण करे, ससे उस संन्यासी के आचरण के सम्बन्ध में कोई भी बात दूसरे अन्य लोगों पर परिलक्षित न हो। समस्त प्राणिजनों के लिए संदेह का विषय बना हुआ वह वर्ण-जाति एवं आश्रय से विहीन होकर अन्धे, जड़ एवं गूंगे केसदृश भूमि पर विचरण करता रहे। ऐसे श्रेष्ठ शान्तचित्त परिव्राजक का दर्शन करके देवगण भी उसके जैसी स्थिति पाने के लिए सर्वदा आतुर होते रहते हैं। जब अपनी आत्मसत्ता के सिवाय दूसरी अन्य किसी वस्तु के अस्तित्व का चिह्न भी शेष न रह जाए, तभी कैवल्य की प्राप्ति होती है। ऐसा ही यह ब्रह्मतत्त्व का विशेष दिव्य सन्देश है ॥ २३-३६॥
28.0
स्त्रीणामवाच्यदेशस्य क्लिननाडीव्रणस्य च।अभेदेऽपिमनोभेदाजनः प्रायेण वञ्च्यते ॥२८॥
एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मजा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुप्ताङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्त:करण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुप्ताङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के __ चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का नारदपरिव्राजकोपनिषद् चिह्न विशेष होते हुए भी उसमें ज्ञान ही विशेष रूप से मुक्ति का माध्यम होता है। प्राणियों के लिए विभिन्न तरह के चिह्नों का धारण मोक्ष साधक ज्ञान के अभाव में व्यर्थ ही होता है। जिस (व्यक्ति) के सन्दर्भ में कोई भी यह न जानने में समर्थ हो कि वह साधु है या असाधु, अज्ञानी है या ज्ञानवान् या फिर वह सदाचारी है या दुराचारी, वास्तव में वही सच्चा ब्रह्मपरायण ब्राह्मण है। इस कारणज्ञानी परिव्राजक चिह्न विशेष को न धारण करके अपने धर्म का ज्ञान रखते हुए सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमात्म सत्ता के ध्यान-व्रत का पालन करे। वह गूढातिगूढ धर्म का आश्रय प्राप्त करके ऐसा आचरण करे, ससे उस संन्यासी के आचरण के सम्बन्ध में कोई भी बात दूसरे अन्य लोगों पर परिलक्षित न हो। समस्त प्राणिजनों के लिए संदेह का विषय बना हुआ वह वर्ण-जाति एवं आश्रय से विहीन होकर अन्धे, जड़ एवं गूंगे केसदृश भूमि पर विचरण करता रहे। ऐसे श्रेष्ठ शान्तचित्त परिव्राजक का दर्शन करके देवगण भी उसके जैसी स्थिति पाने के लिए सर्वदा आतुर होते रहते हैं। जब अपनी आत्मसत्ता के सिवाय दूसरी अन्य किसी वस्तु के अस्तित्व का चिह्न भी शेष न रह जाए, तभी कैवल्य की प्राप्ति होती है। ऐसा ही यह ब्रह्मतत्त्व का विशेष दिव्य सन्देश है ॥ २३-३६॥
29.0
चर्मखण्डं द्विधा भिन्नमपानोदगारधूपितम् । ये रमन्ति नमस्तेभ्यः साहसं किमतः परम्॥२९॥
एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मजा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुप्ताङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्त:करण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुप्ताङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के __ चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का नारदपरिव्राजकोपनिषद् चिह्न विशेष होते हुए भी उसमें ज्ञान ही विशेष रूप से मुक्ति का माध्यम होता है। प्राणियों के लिए विभिन्न तरह के चिह्नों का धारण मोक्ष साधक ज्ञान के अभाव में व्यर्थ ही होता है। जिस (व्यक्ति) के सन्दर्भ में कोई भी यह न जानने में समर्थ हो कि वह साधु है या असाधु, अज्ञानी है या ज्ञानवान् या फिर वह सदाचारी है या दुराचारी, वास्तव में वही सच्चा ब्रह्मपरायण ब्राह्मण है। इस कारणज्ञानी परिव्राजक चिह्न विशेष को न धारण करके अपने धर्म का ज्ञान रखते हुए सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमात्म सत्ता के ध्यान-व्रत का पालन करे। वह गूढातिगूढ धर्म का आश्रय प्राप्त करके ऐसा आचरण करे, ससे उस संन्यासी के आचरण के सम्बन्ध में कोई भी बात दूसरे अन्य लोगों पर परिलक्षित न हो। समस्त प्राणिजनों के लिए संदेह का विषय बना हुआ वह वर्ण-जाति एवं आश्रय से विहीन होकर अन्धे, जड़ एवं गूंगे केसदृश भूमि पर विचरण करता रहे। ऐसे श्रेष्ठ शान्तचित्त परिव्राजक का दर्शन करके देवगण भी उसके जैसी स्थिति पाने के लिए सर्वदा आतुर होते रहते हैं। जब अपनी आत्मसत्ता के सिवाय दूसरी अन्य किसी वस्तु के अस्तित्व का चिह्न भी शेष न रह जाए, तभी कैवल्य की प्राप्ति होती है। ऐसा ही यह ब्रह्मतत्त्व का विशेष दिव्य सन्देश है ॥ २३-३६॥
30.0
न तस्य विद्यते कार्यं न लिङ्गंवा विपश्चितः।निर्ममो निर्भयः शान्तो निर्द्वन्द्वोऽवर्णभोजनः ॥३०॥
एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मजा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुप्ताङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्त:करण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुप्ताङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के __ चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का नारदपरिव्राजकोपनिषद् चिह्न विशेष होते हुए भी उसमें ज्ञान ही विशेष रूप से मुक्ति का माध्यम होता है। प्राणियों के लिए विभिन्न तरह के चिह्नों का धारण मोक्ष साधक ज्ञान के अभाव में व्यर्थ ही होता है। जिस (व्यक्ति) के सन्दर्भ में कोई भी यह न जानने में समर्थ हो कि वह साधु है या असाधु, अज्ञानी है या ज्ञानवान् या फिर वह सदाचारी है या दुराचारी, वास्तव में वही सच्चा ब्रह्मपरायण ब्राह्मण है। इस कारणज्ञानी परिव्राजक चिह्न विशेष को न धारण करके अपने धर्म का ज्ञान रखते हुए सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमात्म सत्ता के ध्यान-व्रत का पालन करे। वह गूढातिगूढ धर्म का आश्रय प्राप्त करके ऐसा आचरण करे, ससे उस संन्यासी के आचरण के सम्बन्ध में कोई भी बात दूसरे अन्य लोगों पर परिलक्षित न हो। समस्त प्राणिजनों के लिए संदेह का विषय बना हुआ वह वर्ण-जाति एवं आश्रय से विहीन होकर अन्धे, जड़ एवं गूंगे केसदृश भूमि पर विचरण करता रहे। ऐसे श्रेष्ठ शान्तचित्त परिव्राजक का दर्शन करके देवगण भी उसके जैसी स्थिति पाने के लिए सर्वदा आतुर होते रहते हैं। जब अपनी आत्मसत्ता के सिवाय दूसरी अन्य किसी वस्तु के अस्तित्व का चिह्न भी शेष न रह जाए, तभी कैवल्य की प्राप्ति होती है। ऐसा ही यह ब्रह्मतत्त्व का विशेष दिव्य सन्देश है ॥ २३-३६॥
31.0
मुनिः कौपीनवासाः स्यान्ननो वा ध्यानतत्परः। एवं ज्ञानपरो योगी ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥३१॥
एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मजा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुप्ताङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्त:करण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुप्ताङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के __ चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का नारदपरिव्राजकोपनिषद् चिह्न विशेष होते हुए भी उसमें ज्ञान ही विशेष रूप से मुक्ति का माध्यम होता है। प्राणियों के लिए विभिन्न तरह के चिह्नों का धारण मोक्ष साधक ज्ञान के अभाव में व्यर्थ ही होता है। जिस (व्यक्ति) के सन्दर्भ में कोई भी यह न जानने में समर्थ हो कि वह साधु है या असाधु, अज्ञानी है या ज्ञानवान् या फिर वह सदाचारी है या दुराचारी, वास्तव में वही सच्चा ब्रह्मपरायण ब्राह्मण है। इस कारणज्ञानी परिव्राजक चिह्न विशेष को न धारण करके अपने धर्म का ज्ञान रखते हुए सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमात्म सत्ता के ध्यान-व्रत का पालन करे। वह गूढातिगूढ धर्म का आश्रय प्राप्त करके ऐसा आचरण करे, ससे उस संन्यासी के आचरण के सम्बन्ध में कोई भी बात दूसरे अन्य लोगों पर परिलक्षित न हो। समस्त प्राणिजनों के लिए संदेह का विषय बना हुआ वह वर्ण-जाति एवं आश्रय से विहीन होकर अन्धे, जड़ एवं गूंगे केसदृश भूमि पर विचरण करता रहे। ऐसे श्रेष्ठ शान्तचित्त परिव्राजक का दर्शन करके देवगण भी उसके जैसी स्थिति पाने के लिए सर्वदा आतुर होते रहते हैं। जब अपनी आत्मसत्ता के सिवाय दूसरी अन्य किसी वस्तु के अस्तित्व का चिह्न भी शेष न रह जाए, तभी कैवल्य की प्राप्ति होती है। ऐसा ही यह ब्रह्मतत्त्व का विशेष दिव्य सन्देश है ॥ २३-३६॥
32.0
लिङ्गे सत्यपि खल्वस्मिज्ञानमेव हि कारणम्।निर्मोक्षायेह भूतानां लिङ्गग्रामो निरर्थकः ॥३२॥
एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मजा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुप्ताङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्त:करण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुप्ताङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के __ चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का नारदपरिव्राजकोपनिषद् चिह्न विशेष होते हुए भी उसमें ज्ञान ही विशेष रूप से मुक्ति का माध्यम होता है। प्राणियों के लिए विभिन्न तरह के चिह्नों का धारण मोक्ष साधक ज्ञान के अभाव में व्यर्थ ही होता है। जिस (व्यक्ति) के सन्दर्भ में कोई भी यह न जानने में समर्थ हो कि वह साधु है या असाधु, अज्ञानी है या ज्ञानवान् या फिर वह सदाचारी है या दुराचारी, वास्तव में वही सच्चा ब्रह्मपरायण ब्राह्मण है। इस कारणज्ञानी परिव्राजक चिह्न विशेष को न धारण करके अपने धर्म का ज्ञान रखते हुए सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमात्म सत्ता के ध्यान-व्रत का पालन करे। वह गूढातिगूढ धर्म का आश्रय प्राप्त करके ऐसा आचरण करे, ससे उस संन्यासी के आचरण के सम्बन्ध में कोई भी बात दूसरे अन्य लोगों पर परिलक्षित न हो। समस्त प्राणिजनों के लिए संदेह का विषय बना हुआ वह वर्ण-जाति एवं आश्रय से विहीन होकर अन्धे, जड़ एवं गूंगे केसदृश भूमि पर विचरण करता रहे। ऐसे श्रेष्ठ शान्तचित्त परिव्राजक का दर्शन करके देवगण भी उसके जैसी स्थिति पाने के लिए सर्वदा आतुर होते रहते हैं। जब अपनी आत्मसत्ता के सिवाय दूसरी अन्य किसी वस्तु के अस्तित्व का चिह्न भी शेष न रह जाए, तभी कैवल्य की प्राप्ति होती है। ऐसा ही यह ब्रह्मतत्त्व का विशेष दिव्य सन्देश है ॥ २३-३६॥
33.0
यन्न सन्तं न चासन्तं नाश्रुतं न बहुश्रुतम्। न सुवृत्तं न दुर्वृत्तं वेद कश्चित्स ब्राह्मणः॥ ३३॥
एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मजा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुप्ताङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्त:करण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुप्ताङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के __ चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का नारदपरिव्राजकोपनिषद् चिह्न विशेष होते हुए भी उसमें ज्ञान ही विशेष रूप से मुक्ति का माध्यम होता है। प्राणियों के लिए विभिन्न तरह के चिह्नों का धारण मोक्ष साधक ज्ञान के अभाव में व्यर्थ ही होता है। जिस (व्यक्ति) के सन्दर्भ में कोई भी यह न जानने में समर्थ हो कि वह साधु है या असाधु, अज्ञानी है या ज्ञानवान् या फिर वह सदाचारी है या दुराचारी, वास्तव में वही सच्चा ब्रह्मपरायण ब्राह्मण है। इस कारणज्ञानी परिव्राजक चिह्न विशेष को न धारण करके अपने धर्म का ज्ञान रखते हुए सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमात्म सत्ता के ध्यान-व्रत का पालन करे। वह गूढातिगूढ धर्म का आश्रय प्राप्त करके ऐसा आचरण करे, ससे उस संन्यासी के आचरण के सम्बन्ध में कोई भी बात दूसरे अन्य लोगों पर परिलक्षित न हो। समस्त प्राणिजनों के लिए संदेह का विषय बना हुआ वह वर्ण-जाति एवं आश्रय से विहीन होकर अन्धे, जड़ एवं गूंगे केसदृश भूमि पर विचरण करता रहे। ऐसे श्रेष्ठ शान्तचित्त परिव्राजक का दर्शन करके देवगण भी उसके जैसी स्थिति पाने के लिए सर्वदा आतुर होते रहते हैं। जब अपनी आत्मसत्ता के सिवाय दूसरी अन्य किसी वस्तु के अस्तित्व का चिह्न भी शेष न रह जाए, तभी कैवल्य की प्राप्ति होती है। ऐसा ही यह ब्रह्मतत्त्व का विशेष दिव्य सन्देश है ॥ २३-३६॥
34.0
तस्मादलिङ्गो धर्मज्ञो ब्रह्मवृत्तमनुव्रतम् । गूढधर्माश्रितो विद्वानज्ञातचरितं चरेत् ॥३४॥
एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मजा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुप्ताङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्त:करण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुप्ताङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के __ चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का नारदपरिव्राजकोपनिषद् चिह्न विशेष होते हुए भी उसमें ज्ञान ही विशेष रूप से मुक्ति का माध्यम होता है। प्राणियों के लिए विभिन्न तरह के चिह्नों का धारण मोक्ष साधक ज्ञान के अभाव में व्यर्थ ही होता है। जिस (व्यक्ति) के सन्दर्भ में कोई भी यह न जानने में समर्थ हो कि वह साधु है या असाधु, अज्ञानी है या ज्ञानवान् या फिर वह सदाचारी है या दुराचारी, वास्तव में वही सच्चा ब्रह्मपरायण ब्राह्मण है। इस कारणज्ञानी परिव्राजक चिह्न विशेष को न धारण करके अपने धर्म का ज्ञान रखते हुए सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमात्म सत्ता के ध्यान-व्रत का पालन करे। वह गूढातिगूढ धर्म का आश्रय प्राप्त करके ऐसा आचरण करे, ससे उस संन्यासी के आचरण के सम्बन्ध में कोई भी बात दूसरे अन्य लोगों पर परिलक्षित न हो। समस्त प्राणिजनों के लिए संदेह का विषय बना हुआ वह वर्ण-जाति एवं आश्रय से विहीन होकर अन्धे, जड़ एवं गूंगे केसदृश भूमि पर विचरण करता रहे। ऐसे श्रेष्ठ शान्तचित्त परिव्राजक का दर्शन करके देवगण भी उसके जैसी स्थिति पाने के लिए सर्वदा आतुर होते रहते हैं। जब अपनी आत्मसत्ता के सिवाय दूसरी अन्य किसी वस्तु के अस्तित्व का चिह्न भी शेष न रह जाए, तभी कैवल्य की प्राप्ति होती है। ऐसा ही यह ब्रह्मतत्त्व का विशेष दिव्य सन्देश है ॥ २३-३६॥
35.0
संदिग्धः सर्वभूतानां वर्णाश्रमविवर्जितः।अन्धवज्जडवच्चापि मूकवच्च महीं चरेत्॥३५॥
एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मजा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुप्ताङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्त:करण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुप्ताङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के __ चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का नारदपरिव्राजकोपनिषद् चिह्न विशेष होते हुए भी उसमें ज्ञान ही विशेष रूप से मुक्ति का माध्यम होता है। प्राणियों के लिए विभिन्न तरह के चिह्नों का धारण मोक्ष साधक ज्ञान के अभाव में व्यर्थ ही होता है। जिस (व्यक्ति) के सन्दर्भ में कोई भी यह न जानने में समर्थ हो कि वह साधु है या असाधु, अज्ञानी है या ज्ञानवान् या फिर वह सदाचारी है या दुराचारी, वास्तव में वही सच्चा ब्रह्मपरायण ब्राह्मण है। इस कारणज्ञानी परिव्राजक चिह्न विशेष को न धारण करके अपने धर्म का ज्ञान रखते हुए सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमात्म सत्ता के ध्यान-व्रत का पालन करे। वह गूढातिगूढ धर्म का आश्रय प्राप्त करके ऐसा आचरण करे, ससे उस संन्यासी के आचरण के सम्बन्ध में कोई भी बात दूसरे अन्य लोगों पर परिलक्षित न हो। समस्त प्राणिजनों के लिए संदेह का विषय बना हुआ वह वर्ण-जाति एवं आश्रय से विहीन होकर अन्धे, जड़ एवं गूंगे केसदृश भूमि पर विचरण करता रहे। ऐसे श्रेष्ठ शान्तचित्त परिव्राजक का दर्शन करके देवगण भी उसके जैसी स्थिति पाने के लिए सर्वदा आतुर होते रहते हैं। जब अपनी आत्मसत्ता के सिवाय दूसरी अन्य किसी वस्तु के अस्तित्व का चिह्न भी शेष न रह जाए, तभी कैवल्य की प्राप्ति होती है। ऐसा ही यह ब्रह्मतत्त्व का विशेष दिव्य सन्देश है ॥ २३-३६॥
36.0
तं दृष्ट्वा शान्तमनसंस्पृहयन्ति दिवौकसः।लिङ्गाभावात्तु कैवल्यमिति ब्रह्मानुशासनमिति ॥३६॥
एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मजा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुप्ताङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्त:करण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुप्ताङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के __ चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का नारदपरिव्राजकोपनिषद् चिह्न विशेष होते हुए भी उसमें ज्ञान ही विशेष रूप से मुक्ति का माध्यम होता है। प्राणियों के लिए विभिन्न तरह के चिह्नों का धारण मोक्ष साधक ज्ञान के अभाव में व्यर्थ ही होता है। जिस (व्यक्ति) के सन्दर्भ में कोई भी यह न जानने में समर्थ हो कि वह साधु है या असाधु, अज्ञानी है या ज्ञानवान् या फिर वह सदाचारी है या दुराचारी, वास्तव में वही सच्चा ब्रह्मपरायण ब्राह्मण है। इस कारणज्ञानी परिव्राजक चिह्न विशेष को न धारण करके अपने धर्म का ज्ञान रखते हुए सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमात्म सत्ता के ध्यान-व्रत का पालन करे। वह गूढातिगूढ धर्म का आश्रय प्राप्त करके ऐसा आचरण करे, ससे उस संन्यासी के आचरण के सम्बन्ध में कोई भी बात दूसरे अन्य लोगों पर परिलक्षित न हो। समस्त प्राणिजनों के लिए संदेह का विषय बना हुआ वह वर्ण-जाति एवं आश्रय से विहीन होकर अन्धे, जड़ एवं गूंगे केसदृश भूमि पर विचरण करता रहे। ऐसे श्रेष्ठ शान्तचित्त परिव्राजक का दर्शन करके देवगण भी उसके जैसी स्थिति पाने के लिए सर्वदा आतुर होते रहते हैं। जब अपनी आत्मसत्ता के सिवाय दूसरी अन्य किसी वस्तु के अस्तित्व का चिह्न भी शेष न रह जाए, तभी कैवल्य की प्राप्ति होती है। ऐसा ही यह ब्रह्मतत्त्व का विशेष दिव्य सन्देश है ॥ २३-३६॥