Books / Natya Darpana of Ramachandra and Gunachandra Hindi Translation Nagendra Dasharatha Ojha Satyadev Chowdhri

1. Natya Darpana of Ramachandra and Gunachandra Hindi Translation Nagendra Dasharatha Ojha Satyadev Chowdhri

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मुद्रकस्य कराघातैः विद्र धेनम्म भारती । कराम्बुजामृतस्पर्शैः सन्तः ! सज्जीवयन्तु ताम् ॥

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हिन्दी नाट्यदर्पण श्री रामचन्द्र-गुराचन्द्र-विराचित नाट्यदर्पण की हिन्दी व्याख्या

प्रधान सम्पादक डॉ० नगेन्द्र सम्पादक डॉ० दशरथ प्रोभा डॉ० सत्यदेव चौधरी

भूमिका-लेखक तथा व्याख्याकार वृन्दावनस्थ गुरुकुल विश्वविद्यालयके ग्रनुसन्धान-संचालक दिल्ली विश्वविद्यालय हिन्दी ग्रनुसन्धान परिपदके सम्मान्य सदस्य

ग्राचार्य विद्वद्वर सिद्धान्तशिरोमणि

प्रकाशक हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

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विषयानुक्रम

विषय भूमिका सम्पादनीय— (क) नाट्यदर्पण में रूपकोत्तर काव्यशास्त्रीय प्रसंग [डॉ० सत्यदेव चौधरी] (ख) नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों में नाट्यदर्पण का स्थान [डॉ० वासुदेव श्रोत्री] —०००— प्रयम दिवेक

वृत्तिभाग का मज़ूलाख्यरण वृत्तिभाग की श्रवतरराशका नाटघ-रचना की दुष्करता रस-कवियों की प्रधषा ध्वान्द-कवियों की निन्दा नीरसवाक्यों की निन्दा कवियों के लिए व्यवसाय-ज्ञान की उपयोिगता विद्वत्ता के साथ कवित्व ग्रावश्यक काव्यपटुवरषा की निन्दा त्रिविध काव्य-सवाद मूलग्रन्थ का मज़ू्लाख्यरण मज़ू्ल-श्लोक की दूसरौ व्याख्या प्रतिपाद्य द्रव्य रूपकों के भेद

(१) नाटक का लषर्या वतंमान चरित्रों के प्रभिनय का निपेध नाटकों में देवतागणों के नायकत्व का खण्डन नायिका दिव्य भी हो सकती है नायक के चार भेद स्वभाव-व्यववरषा चरित के दो भेद भावाभिव्यक्ति के नाटकीय प्रकार नाटकरचना-विपयक विद्देष क्षतें

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विवेक सज्जा

२. प्रकरणा का लक्षण

प्रकरण भेद

ग्रकल्प्य स्वरूप

उत्सर्ग का प्रतिदेश

३. नाटिका का लक्षण

नाटिका में कतृ व्य का उपदेश

नाटिका में करने योग्य अन्य बात

४. प्रकरणी का लक्षण

५. व्यायोग का निरूपण

संक्ष तथा प्रवसाधो की न्यूनता का उपपादन

६. समवकार का निरूपण

समवकार में किये जाने वाले अन्य कार्यों का उपदेश

मुखादि को व्याख्या

७. भाग का लक्षण

कर्तृ व्य के प्रदर्शंन द्वारा नायक का वर्णन

८. प्रहसन का लक्षण

शुद्ध प्रहसन

सङ्कीर्णा

८. डिम का लक्षण

रसों की मुख-दु खात्मकता

डिम में करने योग्य अन्य बातों का तथा नायक का निर्देश

१०. उरमृष्टकाङ्क का निरूपण

उरमृष्टकाङ्क में करने योग्य प्रयम बातों का निर्देश

११. ईहामृग का लक्षण

ईहामृग में करने योग्य प्रयम बातें

१२. दीप्यो का लक्षण

दीप्यो में तेरह पद्ध

(१) व्यायहार

(२) प्रतिवचन

(३) मण्ड

(४) प्रपञ्च

(५) विगणन

(६) हेम

(७) प्रकरन्ताप

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विप्रयम

रसादिकों में पारस्परिक कार्येंकारणभाव

.... ३४९

अनुभाव

(१) वेपथु .... ३४८

(२) स्तम्भ .... ३४८

(३) रोमाञ्च .... ३४८

(४) स्वरभेद .... ३४९

(५) मधु .... ३४९

(६) मूर्छा .... ३४९

(७) स्वेद .... ३४९

(८) विवर्णता .... ३४९

अभिनय

(१) वाचिक .... ३४९

(२) आङ्गिक .... ३४९

(३) सात्विक .... ३४९

(४) आहार्य .... ३५०

चतुर्य त्रिदशे

नान्दी .... ३५४

ध्रुवा का लक्षण

(१) प्रावेशिकी ध्रुवा .... ३५५

(२) नैष्कामिकी ध्रुवा .... ३५५

(३) प्रासादिकी ध्रुवा .... ३५७

(४) आन्तरी ध्रुवा .... ३५७

नाट्य के पात्रों की प्रकृति के भेद .... ३५८

(१) उत्तम प्रकृति-पुरुष .... ३७०

(२) मध्यम प्रकृति-पुरुष .... ३७०

(३) नीच प्रकृति-पुरुष .... ३७०

(४) उत्तम-स्त्री .... ३७१

(५) मध्यम-स्त्री .... ३७१

(६) नीच-स्त्री .... ३७२

नीच प्रकृति वाले नायक .... ३७२

मुख्य नायक का लक्षण .... ३७२

मुख्य नायक के गुण .... ३७२

(१) धीरोदात्त .... ३७३

(२) धीरललित .... ३७३

(३) धीरशान्त .... ३७३

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विषय

(८) दोषा

...

(४) श्रृङ्गारं

...

(६) गास्मीयं

...

(७) भौदायं

...

(५) सात्त्वित

...

गोण नायक

...

प्रतिनायक

...

वितूपक श्रादि की प्रकृति

...

धीररोदात्त श्रादि नायकों में से प्रत्येक के श्रलग श्रलग वितूपक

...

धीररोदात्त श्रादि के सहायक

...

श्रान्त.पुर के उपयागी परिचारक-वर्ग का वर्णन

...

नायिका का लक्षण

...

नायिकाश्रों के विशेष भेद

...

नायिकाश्रों के तीन भेद

...

(१) मुग्धा

...

(२) मध्या

...

(३) प्रगल्मा

...

नायिकाश्रों के प्रतिवद्ध भेद

...

(१) प्रोढितपतिका

...

(२) विप्रलब्धा

...

(३) खण्डिता

...

(४) कलहान्तरिता

...

(५) विरहोत्कण्ठिता

...

(६) वासकसज्जा

...

(७) स्वाधीनभर्तृका

...

(८) श्रभिसारिका

...

स्त्रियों के यौवन में होने वाले धर्म

...

तीन श्रृङ्गार भेद

...

(१) रभ

...

(२) हाव

...

(३) हेला

...

दस स्वाभाविक हाव

...

(१) विभ्रम

...

(२) विलास

...

(३) विच्छित्ति

...

(४) लील

...

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( ५ )

त्रिप्र

(८) भाषासौ

७८८

(९) तालिका

७८७

(१०) मुद्रव

७८३

(११) उद्धात्यक

७८५

(१२) प्रवर्तक

७८६

(१३) प्रवेशक

७८०

व्यायोग आदि ग्रन्थ रचकों के राधान्य, नाटक-लक्षण

७८०

तृतीय विवेक

७०३

वृत्ति-निरूपण

७०३

भारतीय वृत्ति का निरूपण

७०३

ग्राम्य का लक्षण

७०७

ग्राम्य के भेद-भूत पात्रप्रवेश के नियम

७८१

प्ररोचना-निरूपण

७८३

सात्वती वृत्ति का निरूपण

७८७

कैशिकी वृत्ति का निरूपण

७८९

आरभटी वृत्ति का निरूपण

७८५

रस-निरूपण

७९०

रस का स्वरुप

७९३

अनुभाववाद

७९३

नाट में अनुभावों की स्थिति

७९३

अनुभाव आदि संचारी का विवरण

७०३

रसभेदों का वर्णन

७०४

(१) रसों सहित शृंगार रस का निरूपण

७०६

(२) शृंगार के विभाव तथा अनुभावों का वर्णन

७०६

(३) हास्य-रस

७११

(४) हास्य के भेद

७१७

(५) करुण रस

७१३

(६) रौद्ररस

७१७

(७) वीर रस

७१८

(८) भयानक रस

७१४

(९) वीभत्स रस

७१५

(१०) अद्भुत रस

७१६

(११) शान्त रस

७१०

काव्य में रस का समावेश करने में विशेष सावधानी

७१५

विरुद्ध रसों का विरोध और उसका परिहार

७२०

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विप्र

पू०

रस-दोष

३२७

रसो के स्वाभाविक भाव

३२८

ध्यभिचारिभाव

३३०

(१) निर्वेद

३३१

(२) ग्लानि

३३२

(३) प्रप्रमार

३३३

(४) शङ्का

३३३

(५) भ्रसूया

३३५

(६) मद

३३७

(७) श्रम

३३७

(८) चिन्ता

३३८

(९) चपलता

३३८

(१०) ग्रावेग

३३६

(११) मति

३३६

(१२) व्याधि

३३९

(१३) स्मृति

३३९

(१४) धृति

३४५

(१५) प्रमर्प

३४५

(१६) मरन

३४५

(१७) मोह

३४८

(१८) निद्रा

३४०

(१९) सुप्त

३४०

(२०) उप्रत

३४१

(२१) हर्ष

३४१

(२२) विपाद

३४१

(२३) उन्माद

३४२

(२४) दैन्य

३४२

(२५) पीडा

३४३

(२६) वास

३४३

(२७) तर्क

३४७

(२८) गर्व

३४७

(२९) मोत्सुक्य

३४८

(३०) मत्रदैन्या

३४८

(३१) जाड्य

३४९

(३२) मालस्य

३४६

(३३) विदोष

३४९

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विपय

(४) विध्वोक

...

(५) विहृत

...

(६) ललित

...

(७) वृत्तद्रुतमित

...

(८) मोट्टायित

...

(१०) विलासविच्छित्ति

...

प्रयत्नज अलकार

...

(१) शोभा

...

(२) कान्ति

...

(३) दीप्ति

...

(४) माधुर्य

...

(५) मोदयं

...

(६) धैयं

...

(७) प्रगल्भता

...

नायिकाओं का नायक के साथ सम्बन्ध

...

नायिकाओं की सहायिकाए

...

वाप-विधान

...

प्राकृत-पाठ्य

...

दोषों के विपय में पुष्ट प्रकार

...

वाप-विपय के धन्य प्रकार

...

रूपकों में नाम प्राप्ति का व्यवहार

...

इसी विपय में कुछ धन्य ज्ञातव्य

...

कल्पित किये जाने वाले नामों की कल्पना करने के प्रकार

...

धन्य रूपक

...

(१) सटृक

...

(२) श्रृंगारित

...

(३) दुर्मिलिता

...

(४) प्रस्तुतान

...

(५) मोह्ठी

...

(६) हल्लीसक

...

(७) शाम्या

...

(८) प्रेक्षगूक

...

(९) रासकं

...

(१०) नाट्य रासकं

...

(११) काव्य

...

(१२) माला

...

(१३) मालिका

...

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भूमिका

प्रस्तुत ग्रंथ 'नाट्यदर्पण' के रचयिता रामचन्द्र गुणाचन्द्र पदिच्चम भारत में स्थित गुजरात देश के निवासी थे। संस्कृत साहित्य के विशाल मण्डार को इतना गौरवमय एवं समृद्ध बनाने में [कारदादेश] कारमीर के बाद गुजरात का विशेष महत्वपूर्व योगदान रहा है। गुजरात में प्रारहिल-पट्टन का प्रतिष्ठित राज्य विद्वानों का प्रमुख प्राश्रय स्थान और भारतीय वाड्मय की सेवा एवं समृद्धि में सबसे अप्रगण्य राज्य था। इस राज्य की स्थापना विक्रम सं० ७०२ [ई० सन् ७४६] में 'भ्रअहिल-गोपाल' नामक कुण्डल शिलाहि ने इस स्थान को परख कर के 'चानक्खंड' वंश के तत्कालीन राजा 'मोती सम वजाराय' को इस स्थान पर उत्साह पत्तन' बसाने का परामर्श दिया था। तदनुसार मोती सम वजाराय' ने इस स्थान पर अपनी राजधानी का निर्माण कराया और 'भ्रअहिल गोपाल' के नाम पर उसका नाम 'भ्रअहिल पट्टण' रखा। यह 'भ्रअहिल-पट्टण' आगे चल कर भारत का एक प्रमुख राज्य बना और उसने संस्कृत साहित्य को समृद्ध बनाने में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान किया।

काश्मीर के समान 'प्रअहिल-पट्टण' का राज्य भी सौव-राज्य था। उसके राजा प्रायः जैन सम्प्रदाय के अनुयायी थे। कितु साहित्य समृद्धि के क्षेत्र में वहाँ जाने माने विद्वानों का भाग रहा है। ११वीं शताब्दी से लेकर १३वीं शताब्दी तक प्रायः दो सौ वर्षों पर्यन्त 'प्रअहिल पट्टण' का प्रभुत्व अपने चरमोत्कर्ष पर रहा। इस युग में (१) सोमदेव [१०२१-६८ ई०] (२) कशांदेव [१०६८ से ८४ ई०], राजा के समय 'म्रअहिल पट्टण' चौलुक्य विद्वानों का अत्यन्त प्रिय केन्द्र बन गया था। चौलुक्यं ज्ञानेदव, सोमेश्वर पुरोहित, सुराचार्य, और मध्वदेव के श्रीहर तथा श्रीपति आदि जैन-धर्म के मानक प्रतिष्ठित विद्वान् 'म्रअहिल पट्टण' की राजसभा के रत्नों के रूप में उसे सुशोभित कर रहे थे। राजा सोमदेव के सानिध्य विप्राल्हृद' दामोदर पण्डित उस समय अपनी विद्वत्ता के लिए अत्यन्त प्रतिष्ठित थे। उनके प्रभाव से ही उस समय 'प्रअहिल-पट्टण' विद्वानों के प्राकर्षण का केन्द्र बन गया था। यों तो प्रारअहिल-पट्टण' का राज्य जैन राज्य था। उसके राजा और 'सानिध्य विप्राल्हृद' दामोदर पण्डित दोनों जैन सम्प्रदाय के अनुयायी थे, कितु उनके यहाँ सभी शास्त्रों विद्वानों की सभा को सुशोभित करते थे। एक और जहाँ चौलुक्यं ज्ञानेदव सरोखे दिग्विदग्ध जनश्रेष्ठ तार्त-नूर्ति इनश्री सभा के पण्डित थे जो 'वेद तकं से उत्पन्न दुरुह प्रमेयों' की दिशा एवं तर्क युक्ति के लिए प्रयत्न प्रस्तुत थे। पत्तन के राजद्वार जैसे सभी धर्मों और सम्प्रदायों के विद्वानों के लिए समान रूप से आकर्षण का केन्द्र था। इसे प्रकार सभी देशों और राज्यों के विद्वानों में लिए वह प्राकर्षण का केन्द्र था। 'वसंततिलका' मे 'वसंततिलक नर्तिका' मे वत्सा कारमीरी पण्डित बिल्हण और नवाहृटी टेकावार प्रजदेव सूरि ने कशांदेव के दासन् कल में 'प्रअहिल-पट्टण' को राजसभा को सुशोभित किया था। प्रस्तुत ग्रंथ 'नाट्य-दर्पण' के रचयिता श्री रामचंद्र गुणाचंद्र मी इसी विद्वज्जन श्रेष्ठ एवं प्रगतिशील राज्य की विभूति थे।

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कारय प्रसरं सिद्ध ! हुंस्तराजमसाकृतम् । श्रस्पन्दु विदिग्जा: किम्तेभू यस्तवयेऽद्योद्यता यत: ॥

इस प्रथम राजपरिचय के समय प्राचार्य हेमचन्द्र को मायुप ४६ वर्ष के लगभग थी । किसी अन्य भवसर पर राजा जयसिंहसह सिद्धराज 'प्रणहिल-पट्टन' के राजमार्ग पर हाथी पर चढ़े हुए जा रहे थे । दूसरी ओर से प्राचार्य हेमचन्द्र सूत्रि पैदल श्रा रहे थे । मार्ग में सकरा था । राजा जयसिंह सिद्धराज ने हाथी रुकवा दिया । इस पर प्राचार्य हेमचन्द्र ने उनको एक ओर से निकल ले जाने का सुभाष देते हुए तत्काल बना कर निम्न दलोक पढ़ा— हेमचन्द्राचार्य की साहित्यसेवा— उपयुंक्त विवरण कें श्रनुसार सन् ११३६ में मालव-विजयोत्सव के समारोह के प्रवसर पर प्राचार्य हेमचन्द्र का 'प्रणहिल-पट्टन' के प्रधोश्वर जयंसिह सिद्धराज के साथ प्रथम परिचय हुमा । उसके बाद सन् ११४६ में जयंसिह की समाप्ति हो गई । इस प्रकार सात वर्ष तक इन दोनों का साथ रहा । इन सात वर्षों के थोड़े से काल में राजा जयसिंह के प्रोत्साहन और प्रेरणा से, इन्होंने बहुत बड़े ग्रोर बहुत महत्वपूर्ण साहित्य की रचना की है । व्याकरण, न्याय, साहित्य, छन्द शास्त्र श्रादि सभी विषयों पर उनके प्रौढ़ एवं प्रामाण्यत उच्च कोटि के ग्रन्थ पाए जाते हैं : १ सिद्धहेमशब्दानुशासन, २ काव्यानुशासन, ३ छन्दोनुशासन, ४ वादानुशासन, ५ धातुपारायण, ६ द्वयाश्रय महाकाव्य, ७ देशीनाममाला-चिन्तामणि, ८ श्रनेकार्थ संग्रह निघण्टु, ६ सप्त स्थान महाकाव्य, १० त्रिपष्टिशलाकापुरुषचरित, ११ परिशिष्ट पर्व, १२ योगशास्त्र, १३ योगताराग स्तोत्र, १४ द्वाश्रयकोटि, १५ प्रमाणमीमांसा श्रादि उनके लिखे हुए ग्रन्थों की सूची बहुत लम्बी है । श्रोर इन्होंने प्रतिपाद्य विषयों का देश बहुत बड़ा व्यापक है । इन्होंने प्राचार्यत्व को चरितार्थ किया श्रोर संस्कृत साहित्य की महती सेवा की है ।

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सकते हैं। इस प्रकार उन्होंने संस्कृत विद्या के प्रध्ययन के निमित्त जैन धर्म एवं गुजराथ प्रदेश दोनों को स्वावलम्बी बना दिया है।

प्रतिम भाकी—

प्राचार्य हेमचन्द्र एक महान् साधुपुरुष और संस्कृत के प्रौढ़ विद्वान् थे। उनका अधिवासा समय श्राह्मण, मघ्यापन एवं साहित्यिक कार्य में व्यतीत होता था। राजा ज्रयसिंह के साथ और उनके बाद ज्रयसिंह के उत्तराधिकारी कुमारपाल ने साधु यशोभद्र सुनक्ष मनिष्ट सम्बन्ध था, किन्तु वे श्रावकों के नाई भ्रलग अपने विहार में रहते थे। प्रभावकता होने पर सिद्धराज ज्रयसिंहु और कुमारपाल उनके स्थान पर जाकर ही उनसे श्रावश्यक परामर्श प्राप्त करते थे। फिर भी राज सम्पर्कं बही युरो चला है। प्राचार्य हेमचन्द्र को इस राज-सम्पकं का बडा युरा फल भोगना पडा।

राजा ज्रयसिंहु सिद्धराज के साथ प्राचार्य हेमचन्द्र का प्रथम परिचय ११३६ में मालव-विजयोत्सव के समारोह में प्रवसर पर हुग्रा था। उस समय उभयो श्रावस्या ४६ वर्ष की थी। उसके बाद ७ वर्ष तक राजा जयसिंह सिद्धराज के साथ वनता सम्वन्ध रहा। उसके बाद उनके उत्तराधिकारी 'प्रभाविल पट्टन' के राजा कुमारपाल के साथ ३० वर्ष तक उनता सम्बन्ध रहा। इस प्रकार ४६ वर्ष की प्रायु में राज सम्पर्क में प्रारक ३७ वर्ष तक ये निरन्तर राज-सम्पकं में रहे, और ७वें वर्ष की श्रायु में उन्होंने देहत्याग हुग्रा। उनके देहत्याग पर भी श्रद्धांजलि चढाया है।

'प्रभाविल पट्टन' के राजा और प्राचार्य हेमचन्द्र के दिव्य कुमारपाल के कोई पुत्र नहीं था। एक पुत्री थी और उसका लडका प्रतापमल्ल था। ३० वर्ष राज्य करने के बाद राजा कुमारपाल वृद्ध हो गए थे, और उन्हें राज्य के उत्तराधिकारी का निश्चित करने की चिन्ता हुई। उनवे निकट सम्बन्धियों में एक था वह्ा उनका दोहितन प्रतापमल्ल और दूसरा उनका भाई प्रजपाल था। इन दोनों में से किसी को 'प्रभाविल पट्टन' की राजगद्दी का उत्तराधिकारी बनाया जा सकता था। इन दोनों में किसको राज्य सिहांसन देना उचित होगा इस विषय में परामर्श करने के लिए वृद्ध राजा कुमारपाल प्राचार्य हेमचन्द्र से परामर्श करने के लिए उनके स्थान पर गए। राजा के साथ उनका शिष्य एक जैन ध्यापारी 'वराह-श्रामह' भी था। राजा पर्याप्त सिद्धराज के साथ प्राचार्य हेमचन्द्र का सम्पर्क केवल सात वर्ष ही रहा था। इसलिए जयसिंह द्वेव धर्म के ही श्रनुपायी बने रहे, किन्तु कुमारपाल प्राचार्य हेमचन्द्र के चरदेशों को सुन कर जैन बन गए थे। उनका दोहितन प्रतापमल्ल भी जैन था। इसकिए प्राचार्य हेमचन्द्र ने राजा कुमारपाल को यह परामर्श दिया कि धर्म के हित्य के लिए प्रतापमल्ल को गद्दी देना अच्छा रहेगा। किन्तु राजा ने जैन मित्र 'वराह श्रामह की यह सम्मति थी कि-'बृद्ध भी हो, पर श्रपना नाम का' इस मर्याद के श्रनुसार 'भजपाल' को गद्दी देना ठीक होगा। प्रत में परिष्पत्तियों से विचार होकर प्रजपाल को ही राज्य का उत्तराधिकारी बनाया गया।

प्राचार्य हेमचन्द्र के इसी समय राजा वृद्ध कुमारपाल राज्य में उत्तराधिकारी के विषय में परामर्श कर रहे थे। उस समय प्राचार्य का एक शिष्य वारचन्द्र भी वहीं उपस्थित था। उस वारचन्द्र वाचक के द्वारा सुचवाप्त हो किसी तरह मच मुनि ने कहा है कि प्राचार्य हेमचन्द्र ने उमको गद्दी दिए जाने का विरोध किया है। इस बात को सुन कर उसे बडा शोभ हुग्रा और वह प्राचार्य हेमचन्द्र सपा उनके शिष्य एवं साधियों का दान बन गया। प्राचार्य

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हेमचन्द्र को प्रवासपा वस समय ३३ वर्ष की हो चुकी थी और उसके बाद बहुत दीर्घ हो चुका देहावसान हो गया । पता नहीं यह उसके किसी पड़यन्त्र का परिणाम था या यह स्वाभाविक मृत्यु थी । यद्यपि ग्रन्थों में तो इसका उल्लेख नहीं मिलता है फिर भी जयपाल की प्रकृति को देखते हुए यह आश्चर्य नहीं है कि उसने किसी पड़यन्त्र द्वारा प्राणायं हेमचन्द्र को समाप्त करा दिया हो । यपोति ग्राचार्य के निधन के बाद ३२वें दिन ही जयपाल ने दीप देकर कुमारपाल को समाश्वत कर दिया और स्वर्गीय राज्यासिंहासन पर अधिकार कर लिया । इस घटना का उल्लेख अनेक जैन ग्रन्थों में पाया जाता है । सन् १३४८ में लिखे गए राजशेखर सूरि के 'प्रबन्धकोप' में इस घटना का उल्लेख इस प्रकार किया गया है-

एवं श्रजति काले राजा कुमारपालदेवः श्री हेमचच बुद्धो जातो ! श्री हेमसूरिगच्छे-विरोधः । रामचन्द्र-गुणचन्द्रादिविन्दुमेखलः एकतो वासचन्द्रः । तस्य च द्वालचन्द्रस्य राजप्रतिबुद्धेन भजयपालेन सह मेंत्री । एकदा प्रस्तावे राज्ञो गुरुभ्यां ग्रामहस्त्य च राज्ञो मन्त्रारम्भः । राजा पृच्छति—भगवन् ! प्राहुमपुत्रः, किमहं स्वपदे रोपयामि ? गुरवो श्रुवचित्त प्रतापमलिनं दोहिरं राजानं कुत्र घमंस्तर्यस्य, भजयपालात्तु वत्स्यपितपितघमक्षयो भावो । प्रामान्तरे ग्रामढः प्राह—भगवन् ! याहास्तावद्भवः, श्रामत्यो भवतः । पुना: श्रीहेमः—प्रजयपालं राजं मा कुर्या: सर्वथैव । एवं मन्नं कुत्राsऽवस्थितास्तावद्भः । स च वन्धो वासचन्द्रेण श्रुत्वा:, भजयपालाय च कथितः । ततो हेमचच्छी-रामचन्द्रलिपिकरो हेपः: स्वामिके तु पीठितः । हेमसूरेः: ख्वांस्तं ज्ञात्वा ततो दिनद्वयांक्रातता राजा कुमारपालोडजयपालदात्तावद्विप्रकः । भजयपालो राज्ये निपतिता: । श्री हेम-देवाद्रिरामचन्द्रादिव्यधिष्यारां तप्तलोहहस्त्ररासनपातमया मारपां कृतम् । राजविहाराणां बहूनां पातनम् । सघुशुल्कानाहार्य प्रातः प्रातर्ग्रभया कतुं मस्स्यासर्पति । पूर्वंभेते चैत्यपरिपाटींकागुं रित्युपाहसतां वासचन्द्रोऽपि स्वगोत्रहुत्वाकारक इति ऋुविन्द्रहासाहार्यैर्मनसि उत्तारिषत् । श्रीमालवान् मत्या मृतः । पार्श्व पचत्यते हि सत्व्यः ।

"एवं श्रजति काले राजा कुमारपालदेवः श्री हेमचच बुद्धो जातो ! श्री हेमसूरिगच्छे-विरोधः । रामचन्द्र-गुणचन्द्रादिविन्दुमेखलः एकतो वासचन्द्रः । तस्य च द्वालचन्द्रस्य राजप्रतिबुद्धेन भजयपालेन सह मेंत्री । एकदा प्रस्तावे राज्ञो गुरुभ्यां ग्रामहस्त्य च राज्ञो मन्त्रारम्भः । राजा पृच्छति—भगवन् ! प्राहुमपुत्रः, किमहं स्वपदे रोपयामि ? गुरवो श्रुवचित्त प्रतापमलिनं दोहिरं राजानं कुत्र घमंस्तर्यस्य, भजयपालात्तु वत्स्यपितपितघमक्षयो भावो । प्रामान्तरे ग्रामढः प्राह—भगवन् ! याहास्तावद्भवः, श्रामत्यो भवतः । पुना: श्रीहेमः—प्रजयपालं राजं मा कुर्या: सर्वथैव । एवं मन्नं कुत्राsऽवस्थितास्तावद्भः । स च वन्धो वासचन्द्रेण श्रुत्वा:, भजयपालाय च कथितः । ततो हेमचच्छी-रामचन्द्रलिपिकरो हेपः: स्वामिके तु पीठितः । हेमसूरेः: ख्वांस्तं ज्ञात्वा ततो दिनद्वयांक्रातता राजा कुमारपालोडजयपालदात्तावद्विप्रकः । भजयपालो राज्ये निपतिता: । श्री हेम-देवाद्रिरामचन्द्रादिव्यधिष्यारां तप्तलोहहस्त्ररासनपातमया मारपां कृतम् । राजविहाराणां बहूनां पातनम् । सघुशुल्कानाहार्य प्रातः प्रातर्ग्रभया कतुं मस्स्यासर्पति । पूर्वंभेते चैत्यपरिपाटींकागुं रित्युपाहसतां वासचन्द्रोऽपि स्वगोत्रहुत्वाकारक इति ऋुविन्द्रहासाहार्यैर्मनसि उत्तारिषत् । श्रीमालवान् मत्या मृतः । पार्श्व पचत्यते हि सत्व्यः ।"

ग्राचार्य हेमचन्द्र के शिष्य—

प्रस्तुत ग्रन्थ नाट्यदर्पण के निर्माता रामचन्द्र चक्र गुजरात की महाविमूति ग्राचारायं हेमचन्द्र के प्रमुख शिष्य थे । राजा जयसिंह सिद्धराज के समय में ही ग्राचार्य हेमचन्द्र ने उन्हें अपना पट्ट शिष्य घोषित कर दिया था । सन् १२७७ (त० १३३४) में लिखे गए प्रभावक चरित' में रामचन्द्र के पट्टधर शिष्य होने का उल्लेख निम्न प्रकार किया गया है ।

राज्ञा श्रीसिद्धराजेन, प्रभ्यदानुप्रयुक्ते प्रभुः । भवतां कोविदस्त पद्मतृष्य योम्म्यः शिष्यो श्रुगाधिकः ।। तमस्माकं द्वयोत चित्तोत्कर्पाय, मामिव । श्रुपुत्रममुकम्पाहं पूर्व त्वां मा हम शोकथन् ।। माह श्रीहेमचन्द्रद्रश न कोविद्येऽवं हि चिन्तकः । श्राद्योऽद्यभूदितपालः सत्पात्राम्मोधिचन्द्रमा: ।। सज्ञानमहिम्नयैवं मुनिनां किं न जायते । कल्पद्रुमस्मै राज्ञि त्वयोध्दार्नि कृतस्यतो ।। प्रस्तुतमुख्यायानां रामचन्द्राख्यः कृतिगैषरः । प्राप्तरेखः प्राप्तरूपः सद्भे विटत्कलानिधिः ।। प्रभ्यदाद्दशांतेद्गुं, दिनतिपरस्य रसुज्योति च सः । मुक्तकामार्धविन्द्रहलेखार्धावपिनी व्यघात् ।।

"राज्ञा श्रीसिद्धराजेन, प्रभ्यदानुप्रयुक्ते प्रभुः । भवतां कोविदस्त पद्मतृष्य योम्म्यः शिष्यो श्रुगाधिकः ।। तमस्माकं द्वयोत चित्तोत्कर्पाय, मामिव । श्रुपुत्रममुकम्पाहं पूर्व त्वां मा हम शोकथन् ।। माह श्रीहेमचन्द्रद्रश न कोविद्येऽवं हि चिन्तकः । श्राद्योऽद्यभूदितपालः सत्पात्राम्मोधिचन्द्रमा: ।। सज्ञानमहिम्नयैवं मुनिनां किं न जायते । कल्पद्रुमस्मै राज्ञि त्वयोध्दार्नि कृतस्यतो ।। प्रस्तुतमुख्यायानां रामचन्द्राख्यः कृतिगैषरः । प्राप्तरेखः प्राप्तरूपः सद्भे विटत्कलानिधिः ।। प्रभ्यदाद्दशांतेद्गुं, दिनतिपरस्य रसुज्योति च सः । मुक्तकामार्धविन्द्रहलेखार्धावपिनी व्यघात् ।।"

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मानमाप्यधिक कविम्न सहन्वे जिगोपवः । इत्थं तु धरानाथ ! धाराधिपमपाकृपाः ॥

किजपेचु लोग (मानमाप्यधिक) अपने से तनिक मो वड़े मो सहन नही करते है, इसलिए धरानाथ ! ग्राप उस धारानाथ ध्रप्रांत मालवराज था नादा मर डालें । इस लोक में धरानाथ तथा धारानाथ दाबो के प्रयोग में चमस्कार है । इस दाबो की माथामो की मपेक्षा की जाय तो 'धरानाथ की प्रपेक्षा' 'धारानाध' में एव 'मात्रा' अधिक है । कवि ने धरानाथ सम्बोधन गुजराधीशा जयसिंह सिहरराज के लिए किया है मोर 'धारानाथ' पद से मालवराज मो पोर संबोध किया है । वह मात्रया अधिक है । इसकलए इसको नष्ट करने की बात कवि ने कही है । इस उक्ति में कुछ मविज्ञतोषित मपूर्वं चमत्कार है । इसीलिए म्राचार्यं हेमचन्द्र ने उने 'मनुक्तामोंचविदांक' एकदम मपूर्वं कहा है । मोर इसीलिए उसको सुन कर राजा या सिट मूछने लगा । जेठा कि मगले दलोक में कहा है--

विरोधूननपूर्वं च भूरालोडन हरिं दयः । रामे, वारिवराचारो विदुपां महिमसुचाम् ॥

इस प्रकरण के कवितं से विदित होता है कि माचारायं हेमचन्द्र ने राजा जयसिंहु सिद्धराज के सामने ही प्रप्रांत अपनी मूरखु से मागे ४०-४२ वपं पूर्वं ही रामचन्द्र मो अपना पट्टधर उत्तराधिकारी एव प्रभुत्वं दिष्प पापित कर दिया था । रामचन्द्र मेंं प्रतिरिक १ महेंद्रसूरि, २ गुणचन्द्र सूरि, ३ वपंमानगरि, ४ देवचन्द्र मुनि, ५ पद्मसिंहनंदि उदयचन्द्र तथा ७ मालचन्द्र दे ७ उनके सहपाठी तथा माषार्य हेमचन्द्र के विद्यार्थी कृपापात्र दिष्य थे ।

धी हेमसूरिनिप्राप्ता धीमग्गहेतुसूत्रणा । मक्तिनिष्ठेन तोयेन धरानाथेन्व प्रतिष्ठिता ॥

१. महेंद्रसूरि-इन में से महेंद्रसूरि ने माचारायं हेमचन्द्र मे 'प्रबन्धाप्रं सग्रह' नामक ग्रन्थ में ऊपर 'हेमाचायंं सवह टोका' मिलसी थी । जेठा कि उनमें निम्न म्लोक से प्रतोत होता है--

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सानिजलधिसंयंवपुं सुचिमासे रविदिने सिताष्टसंध्याम् । जिनघनंप्रतियोधः कलुष्पोडं मुजरेंद्रपुरे ॥ हेमसूरिपदपंकजहंसैः महेंद्रमुनिपं युतमेतत् । वर्धमान-गुराऽचंद्ररभिस्प्यां साक्षात्कलिततन्वास्वरहस्यं ॥

ने अपना यह ग्रंथ हेमचंद्र के शिष्य गुरुपंचंद्रार्माका तथा वर्धमानर्मार्गी को सुनाया था, इस प्रकार का उल्लेख उन्होंने स्वयं इस प्रकार किया है— इन श्लोकों में वर्धमान तथा गुरुपाश्रंद्र दोनों के नामों का उल्लेख साथ-साथ किया है और उन्हें प्राचार्य हेमचंद्र का शिष्य बताया है । इससे ये दोनों भी नाटकपदपंकारार रामचंद्र के सहपाठी सिद्ध होते हैं । इनमें से गुरुपंचंद्र तो वे हैं जिन्होंने रामचंद्र के साथ मिलकर इस प्रस्तुत ग्रंथ 'नाट्यदर्पणं' श्रोर उसकी स्वोपज्ञवृत्ति की रचना की है । वर्धमानार्माका ने भी 'कुमार विहार-प्रशस्ति' नामक ग्रंथ की व्याख्या की है । उसका परिचय निम्न लेख से मिलता है— श्रीहेमचंद्रमूर्तिरिदंयेा वर्धमानर्माग्रैना कुमारविहारप्रशस्ती, काव्येऽपुमितिमन् पदस्थैः । कृतेपि कोतुकात् पोतरोचरन् धातं ध्यायित्वन् चक्रे ॥ ४-५. देवचंद्रगणि तथा यशश्चंद्रगणि—ये दोनों भी प्राचार्य हेमचंद्र के शिष्य और नाटकदपंकारार रामचंद्र के सहपाठी थे । इनमें से देवचंद्रगणि ने 'वंदारलेख विजय' नामक 'प्रकरण' (रूपक भेद) की रचना की है, और यशश्चंद्रगणि का नाम मेघतुंग सूरि द्वारा विरचित 'प्रबन्ध-चिंतामणि' में प्राचार्य हेमचंद्र के शिष्य रूप में पाया जाता है । ६. उदयचंद्र—इनके नाम का उल्लेख प्राचार्य हेमचंद्र-विरचित 'ज्ञानामृतासन न्यास टोका' के लेखक कनकप्रभ ने निम्न प्रकार किया है— भूपालमोलिमालाऽऽकुलय-मानालाऽऽलसितशासनः । दस्संपट्कनिस्तत्नद्रोहेमचन्द्रो मुनीद्ववरः ॥ तेषाऽमुदपचन्द्रोऽस्तित शिष्यः संश्रयावर्ता वरः । यावज्जीवमभूत् यशः, व्याख्या ज्ञानामृतप्रपा ॥ तस्योपदेशाद् देवेंद्रसूरिर् शिष्यलवो व्यघात् । व्यासासक्तहृदयां मनोवां कनकप्रभः ॥ ७. बालचंद्र—रामचंद्र के सहरादियों में बालचंद्र जी का भी विशेष स्थान है । इसके नाम की चर्चा हम भी प्राचार्य हेमचंद्र की अंतिम भांकी के प्रसंग में करचुके हैं । राजा कुमारपाल की मृत्यु का कारण यहं था, और मालव्यं नहीं कि प्राचार्य हेमचंद्र की मृत्यु भी इसी कारण से हुई हो । कवि कटारमल्ल की उपाधि— कवि रामचंद्र का जन्म कब और कहाँ हुग्रा इसका ठीक निश्चय करने का कोई साधन उपलब्ध नहीं है । सन् ११२५६ में प्राचार्य हेमचंद्र को, जयसिंह सिद्धराज के साथ परिचय होने के समय वे प्राचार्य हेमचंद्र के विध्याथियों में थे । यह बात पूर्वोक्त लोकों के माधार पर कही जा सकती है, और इससे यह परिणाम भी निकाला जा सकता है कि उनका जन्म गुजरात में 'अन्हिल-पट्टन' के पास ही कहीं हुग्रा होगा । तभी उन्हें प्राचार्य हेमचंद्र के शिष्यत्व को सीमायं प्राप्त सरलता से मिल गया ।

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देव ! श्रीमदिरिदुगुमंगल ! भवतो दिग्जयेनात्रोद्यते, प्राप्तद्वैधीरत्नैरजितधुररुचिरागदमामंडलात् । वातोदूतर्जोमिलत्सुरसरिसृजाजावपचूस्यलो-

हलोक में राजा के प्रताप का वर्णन है । राजा जयसिंह सिद्दराज जय दिवसिजय करते निकलते हैं तब उनके सैनिकों के घोड़ों के खुरोंसे उड़ाई गई धूलि आकाश गंगा पर जाती है और उस पर दृश्य उग आती है । सूर्य का रथ जब आकाश गंगा पर पड़ता है तो सूर्य के घोड़े उस हरी-हरी दूव को देख कर उसे खाने के लिए रक जाते हैं । इसलिये सवयं अपने सद्य स्यान पर पहुँचने में विलम्ब हो जाता है । इसी मारे दिन बढ़ हो जाता है । उत्तर को सुन कर राजा बहुत प्रसन्न हुए । विशेषकर इसलिए कि यह दलोक कवि का तुरंत बनाया हुआ दलोक था और इससे कवि को कल्पना-शक्ति का परिचय मिलता पा ।

दूर्वाजुष्कनचञ्चुरारविरहिमास्तेनातिवृदं दिनम् ।

एतस्यास्तु पुरुष पोर्चविनिताऽऽत्मयंतानिजिता मुक्तो नाथ ! मस्तवती जहत्पगा नीतां महती जिनता । वीरत्वस्मितमिवोचचरवहचरधीरामृतसुज वाहावसी-

इस दलोक का भाव यह है कि इस 'प्रतिहिल-पट्टण' की निवासिनी दिनियों को चतुराई से पराजित होकर सरस्वती बिन्दुसर पुष्करिणी बन कर उसके मुख में 'पानी भरने लगी ।' इसलिए अपनी वीणा की कन्दली [नीचे वाले भाग] को सिद्दराज मृगाल में लाश्रय की कचुद्वी के कप में मोड़े घोड़ दिये और वीणादण्ड को राजा के दोनिस्थल के कप में पारख ड़िए और मेपाक्षी को तंत्री बनाए हुए पृथ्वी रहो है ।

तन्नोक्ष गुरुसिद्दधीरपतिमरत्नुभू निर्जं बचचयोभ् ।

यों तो दोनों दलोकों में गुढ़ गम्वार है किन्तु मथःनिहित दलोक होने के कारण यह दलोक है बारम के वाक्फो प्रसिद्ध है । रामचन्द्र को इस प्रकार की प्रतिभा का परिचय तो जयसिंह सिद्दराज को अनेक बार प्राप्त हो चुका पा । इसलिये राजा ने प्रसन्न होकर 'कविच्छत्ररमण' को उपाधि

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पातु वो हेम ! गोपालः कमबलं दण्डयुद्धहस्तः । पतद्गयं पतगुप्रां चारयन्तं जैनगोचरे ।।

एक बार काशी से विद्वेश्वर नामक कवि पण्डित प्रायःहिल-पट्टन आए । यह राजा कुमारपाल के समय की बात है । वे कविवर प्रायःचायं हेमचन्द्र की सभा में पहुँचे । उस समय राजा कुमारपाल भी प्रायःचायं हेमचन्द्र के पास बैठे हुए थे । विद्वेश्वर पण्डित ने सभा में पहुँचते ही प्रायःचायं हेमचन्द्र को प्राशीर्वाद देते हुए निम्न इलोकादर्श को पढ़ा— 'पातु वो हेम ! गोपालः कमबलं दण्डयुद्धहस्तः । दनोकादर्श का अर्थ था कि हे हेमचन्द्र ! दण्डधोर कमबल धारए किए हुए गोपाल कुष्ण तुम्हारी रक्षा करें । कवि विद्वेश्वर ने अपनी धार्मिक भावना के मनुसार कुष्ण के द्वारा उनकी रक्षा की बात कही थी । पर प्रायःचायं हेमचन्द्र और उनके प्रास-पास की सारी मण्डली हो जैन मतावलम्बनी थी । उसे तो 'कुष्ण तुम्हारी रक्षा करें, यह बात कुछ खिचड़ी नहीं मालूम पहो । उसके स्थान पर यदि 'जिन तुम्हारी रक्षा करें' यह बात कही जाती तो उन्हें मच्दा लगता । उस समय कवि रामचन्द्र भी वहीं बैठे थे । उन्हें कुष्णा का यह 'रक्षा करने का गौरव' पसन्द नहीं आया । इसलिए उन्होंने तुरन्त ही दोप मिटे श्लोक की पूर्ति निम्न प्रकार करके सुनाई— | पतद्गयं पतगुप्रां चारयन्तं जैनगोचरे ।। पहिले श्लोकादर्श में दण्ड धोर कमबलपारी गोपाल के रूप में कुष्णा को उपरिष्टत किया था । रामचन्द्र के श्लोकादर्श में यह कहा गया है कि हाय में लाठी लिए हुए भोर कधेए पर कमरिया डाले हुए वह गोपाल 'जैन गोचरे' जैनों के ढे । यहां पातद्गय रूप पतगुप्र को चरए रहा है । विद्वेश्वर कवि के हृदय में प्रामोर्वाद देते समय कुष्णा के प्रति जितना सम्मान व्यक्त हो रहा था, रामचन्द्र के श्लोकादर्श ने उतनी बुरी तरह कुष्णा की हीनता को प्रकटामित किया है । इस प्रकार यह इलोक धार्मिक सपर्द का मुगदर उदाहर्तए बन गया है । सहृदय लोगों ने उस समय भी इस का रसास्वादन किया होगा । भोर माजके सहृदयों को भी इसमें एक लोका ही सही पर विद्वेष रसास्वादन मिलेगा— "पातु वो हेम ! गोपालः कमबल दण्डयुद्धहस्तः । पतद्गां पतगुप्रां चारयन्तं जैनगोचरे ।।"

पञ्चवसद्भिः हव्याशां ददौ घोष्चान्तसुरङ्गिताम् । विद्वेश्वराय कदये तुष्टः श्री कुमारो ददौ ।। सापं नुपतिना होतुं विद्वेश्वररचितंविभोः । श्री हेमभूःरिसोऽलास्यां इचन्द्रदीप्तीरसेरितः ।। मालोच्य संसदं सूरैः'रिसंरिजनाद्विताम् । स मत्वा परितुष्टस्युस्नेमेनां अवोच्वर् ।। सूरि-नाप्यपरिस्खायै द्वे समास्ये समापयत् । 'व्याविदेशी' प्रविसड्‌ड्यवा 'भट्टनागेशोऽपि' चापरः ।। तामासां निर्वचनीयांचरनादृधुः । रसदा महा— उमारथः पूर्वंपूतपद पुरनरमनायव्योदरः ।

इस घटना का यह विवरण 'मेधतुङ्ग रचित प्रवन्ध चिन्तामणि' [पृ० २२६-२७] के आधार पर दिया गया है । हरिभद्रसूरिगण ने 'कुमारपालरित' नामक महाकाव्य' में इसी प्रकार की घटना का उल्लेख निम्न प्रकार किया है—

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कुवंसतनगनसौति विस्मयमस्रं प्रीपूर्वनिष्प लसनावत् । ग्रन्था मान्यतमोऽनिन्द्रा मतिमता श्रीरामचन्द्रोडस्यघात् ॥

यह वंशं, पूर्वं वंशंन से मिलत्न प्रकार का है । इसके मनुसार विद्वेदेवर कवि का पहिले राजा कुमारपाल ने अपनी समा में सत्कार किया । उसके बाद कवि राजा कुमारपाल के साथ ग्रामायं हैमचन्द्र की छाल में गए हैं । वहा उन्होंने ग्रामायं के शिष्यों की परोक्षा के लिए दो समस्याएं पूर्ति करने के षे । इनमें से एक समस्या 'व्यापिद्रा' या भोर दूसरो 'मुञ्जालंघ्रे' घी । इनमें पहिली समस्या की पूर्ति पहिले राजा के महामात्य 'कर्पदो' ने की । उसके बाद दूसरी समस्या की पूर्ति हैमचन्द्र सूरि के शिष्य रामचन्द्र ने की । इन दोनों के समस्या-पूर्ति दलोकों को ग्रन्थकार ने इस प्रकार प्रस्तुत किया है—

नंतस्या प्रमतिदयेन तरले ! तावये विघातु हशो सर्वत्रापि च लक्ष्यते मुवतसदिज्जोयोत्स्नावितानैरियाम् । इत्थं मधुपगता सदैविमरभितो हम्मीलनाव केलिपु, व्यापिद्रा, नयने मुखं घ रुदती स्वे गहंते सन्यकरा ॥

यह महामात्य द्वारा की गई 'व्यापिद्रा' हमस्या की पूर्ति है । रामचन्द्र द्वारा की गई दूसरी समस्या की पूर्ति निम्न प्रकार है—

तव नो गीरगुरुत्ववेनुरुदृपपतस्तस्यामृत तस्तरे तेन व्यापहरातुरां मम प्रियमेता समुज्ज्जोयय । इत्थुक्ते मुखलास्यध्वनस हृरिरिपो कानण्यमाजल्पत् मुग्जालपे मुमस्य पदं पतित नेत्राम्यां मूमण्डले ॥

इनमें से प्रयाम दलोक में कन्याों की मालार्मिचोनी की क्रोड़ा का वर्णन है । प्रातः— नित्योनी खेलने वालो सखकियों में एक लड़की भी प्रातः वधूत वधूई वही है । इतनी वधूई कि 'प्रमुतिदयेन' दोयों हारों से 'विघातु न तावये' कहने में नहीं आती है । उमधे पांल नित्योनी केंघे संसी जाय । उस लड़की में दूसरा दोष यह भी था कि वह बहन भी जावत दिप्रे, पर उठने के सौन्दर्य की कान्ति पारों भोर फंस जाने से वह दिप्री नही रह सकती है । इन दोषों बारणों से उस धन्या को 'हम्मीलन केलि' से निपाल दिवा गया—'व्यापिद्रा' । औरयह बेचारी अपने मुख तथा नेनों को मोस-कोस कर रोने लगी ।

य प्रययं निजायन हे निरोचापु पूरिते !

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रङ्गं प्रसाद्य मधुरैरिलोकैः काव्यार्थसूचकः । स्पकृत्य कवेराश्या गोत्राचार्यपि स कीर्तितः ॥

इस नियम के अनुसार प्रत्येक नाटक के आरम्भ में कवि रामचन्द्र ने अपना परिचय दिया है, परन्तु परिचय में उन्होंने अपने गोत्रप्रवर्त्तक आदि का कहीं कोई उल्लेख नहीं किया है । अपने सभी नाटकों में उन्होंने केवल आचार्य हेमचन्द्र सूरि के शिष्य-रूप में ही अपना परिचय कराया है । इस लिए उनके ठोक जन्म स्थान, पितृनाम और कुल गोत्रादि का कोई परिचय हमको नहीं मिलता है । फिर भी उनके अपने व्यक्तित्व के परिचय कराने के लिए उनकी स्वलिखित पर्याप्त सामग्री मिलती है । अपने विपय में सबसे लम्बा परिचय उन्होंने कवाचित् 'रघुविलास' की प्रस्तावना में दिया है । वह परिचय निम्न प्रकार है— ''मारिष ! सिद्धहेमचन्द्राभिधानरत्नानुसारनवि०पानवेदघसः श्रीमदाचार्यहेमचन्द्रशिष्यं रामचन्द्रं मिजानासि ? चन्द्र ०—[साक्षेपम्]— पुलस्त्यप्रवन्धमपि पण्डितमुखालानकेन विद्धारमनुसरति नृत्यति यस्य कीर्तिः । विद्याप्रियोऽपि च यमुमुक्षवत्काव्यतन्त्रं कस्तं न वेद मुखरति किल रामचन्द्रम् ? किन्तु दृश्यालद्दारतानाम प्रवन्धोढेनमिनेयरवेन तावदास्ताम् । उभयपरेर्या राघवास्मृतय यादवास्मृतय- मलविलास-रघुविलासान् सतु पुनर्न रमखीयतमत्सदृशपदीनिवेदानां विशादप्रकृतितोर्न पुनर्मध्ये कुतः प्रजानामतुरङ्गः ? यह उदाहरण 'रघुविलास' की प्रस्तावना से लिया गया है । इसमें कवि रामचन्द्र ने अपने पांच ग्रन्थों का उल्लेख किया है । इनमें से प्रथम 'दृश्यालद्दार' ग्रन्थ 'राघवाभ्र' से सम्बन्ध रखने वाला ग्रन्थ है और ये दो 'रघुविलास' रचना तक वे इसकी मिसा कर पांच ग्रन्थों की रचना कर चुके थे । और उनके पारायण उनकी पर्याप्त त्यागति हो गई थी । इस परिचय में उन्होंने अपने को 'विद्याप्रियो वसन्त' कहा है । साधारणतः 'विद्याविचार' पद से वेदविद्या व प्रहण होती है । किन्तु रामचन्द्र ने 'विद्याविदां' ये इसलिये ये वेद विद्या से उनका कोई सम्बन्ध नहीं था । उन्होंने जो 'विद्याप्रिय' या प्रयोग किया है वैसे न्याय, समराङ्गण तथा तर्काहय विद्या व प्रहण होष है । रामचन्द्र या इन तीनों वास्त्रों के उत्तर पूर्व प्रवीणकार पा, इसीलिए उन्होंने यहां अपने को 'विद्याप्रियौचयम्' तीनो विद्याओं में निपुण बहु मेर अपना परिचय दिया है । 'नाटघदर्पण' विषय के धर्त्त में—

दाडिमकम् प्रियतमम-प्रथिततमम-प्रथयतमम्-नृततमम् । परिकलनार्हतिममागां नो, प्रवाह एव जाह्नवी ॥

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शब्द-प्रकाश-साहित्य-छन्दो-लक्ष्म विधायिनाम् । श्रीहेमचन्द्रपादानां, प्रसादाय नमो नमः ॥

लिख कर उन्होंने फिर अपने को इन तीनों विद्वानों को पण्डित सूचित किया है । अपना हो नहीं अपने आचार्यं हेमचन्द्र का भी इन तीन शास्त्रों का ही पाण्डित्य 'नाटघदर्पण-विवृति' के अन्त में उन्होंने इस प्रकार वर्णन किया है —

प्राप्ता कवित्वं विच्चानां लावण्यामृत योपिताम् । नैविद्यवेदनोज्जयस्मिं, ततो नित्यं कृतस्त्रुहा ॥

"नाट्यदर्पण विवृति' के प्रारम्भ में भी— इस श्लोक से उन्होंने अपने को 'नैविद्यवेदन' कहलाकर अपना परिचय दिया है । 'सिद्धहेम-शब्दानुशासन' के ऊपर 'व्यास' टीका लिख कर उन्होंने अपने व्याकरणशास्त्र के पाण्डित्य को चारितार्थ कर दिया । अपने 'व्याकुलकार विवाद्रति' ग्रन्थ द्वारा 'व्यामिशास्त्र के परिज्ञातत्व को, और नाट्यदर्पण एव अनेक नाटकों की रचना द्वारा अपने साहित्यशास्त्र निष्णातत्व को चारितार्थ कर दिखलाया । जिनके ग्रन्थों के पढ़ने से स्पष्ट हो प्रतोत होता है कि वे इन सब शास्त्रों के मर्मज्ञ विद्वान् थे । इसलिए उनका 'त्रैविद्य-वेदित्त्व' का अभिमान यथार्थ ही था ।

नटः [विमुख] मुख ! श्रय कवि स्वयंमुपाददे उत्ताहो परोपजीवकः ? जन-प्रज्ञाप्राप्त पदमप पदायं घटयतः पराच्चावलयन्यायं न कपयतु गिरिर वेत्त'नियमः । धमावास्यायामप्यमुष्यिकनिबिडासक्त कुसुम— नयस्येह कुसुमावचयसिकारविहारायति महती ॥

२ नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र ने अपने नाटकों में अपनी स्वतन्त्रयप्रियता पर बहुत बल दिया है । उनको काव्यपरतन्त्रा बिल्कुल स्वतन्त्र है । किसी अन्य कवि की कविता मादि का उन्होंने तनिक भी श्राश्रय नहीं लिया है । इस बात को प्रदर्शित करते हुए नलविलास की प्रस्तावना में लिखा है कि— ऐसा प्रतीत होता है कि किसी मालोचक ने रामचन्द्र को गतानुगतिक प्रथ्यों पुरानी बातों का ही वर्णन एवं मनुगमन करने वाला कह दिया था ! उसने फिर विरोध करते हुए इस श्लोक में उन्होंने यह दिखलाया है कि 'हम तो सदा अपनी बुद्धि मे प्रस्फुटित नवीन पदावली की रचना करते हैं, फिर भी यदि हमें लोग दूसरों का अनुगमन करने वाले कहते हैं वह अनुचित है ! देखो न ! समार कुमुदों को चन्द्रमा ने स्फुरित कर ही दिखलने वास्ता कहता है । पर वे कुमुद तो प्रभातपया में दिन चन्द्रमा के न होने पर भी खिलते हैं । इसलिए लोगों को वात विद्वेष के योग्य नहीं है ।

माद्य च शरत्प्रसन्नेन्दुप्रददायांस्मवनभूषु प्रोतिामादधानं जनमवशोकं वातसेदेन धेनेध स्फूर्ं लोक: कदप्ये बर्हिः जटतां कुङ्किततहमं: वचोभिर्याच्चेदितेन स्पृष्टेष्टे ।

"माद्य च शरत्प्रसन्नेन्दुप्रददायांस्मवनभूषु प्रोतिामादधानं जनमवशोकं वातसेदेन धेनेध स्फूर्ं लोक: कदप्ये बर्हिः जटतां कुङ्किततहमं: वचोभिर्याच्चेदितेन स्पृष्टेष्टे ।

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कयं दोषी साधुं कथमपि न शक्ता: पुनरपि-मियं चिन्ता चेतद्रतरमति नित्यं कथमपि न: ।

पुरानी ढ़ली के जिन यशकादि प्रधान गौण चित्रकाव्यों का अर्थ भी समझना कठिन होता है, इस प्रकार के काव्यों में लोगों को विशेष अभिरुचि से लिखा होकर रामचन्द्र ने यह इलोक लिखा है। उसका भाव यह है कि हम इस प्रकार के स्वभावतः दुर्योध गौर निकृष्ट रचनाशैली का श्रवणलम्बन करने में भ्रसमर्थ हैं। तो लोग हमारे काव्य को पसन्द करेंगे या कि नहीं यही चिन्ता हमें सता रही है। पर्यात् रामचन्द्र ने पुरानी ढ़ली का श्रवणलम्बन करके ही अपने नाटकों की रचना नहीं की है। इसलिए मतामुग्धविक केतल पुरानी लकोर के फकीर नहीं हैं—

लौक लोकोक्ति गाढ़ी चलै लोकोहि चलै कपूष । तीन लोक पर ना चलै खायr गोर सपूत ।।

कवि रामचन्द्र तो धायर भी हैं गौर सपूत भी, इसलिए पुरानी लोक पर चलने वाले कैसे हो सकते हैं। उनकी रचनाशैली चित्रकाव्य की कठिन ढ़ली से सर्वथा निन्न सरल गौर सुबोध ढ़ली है। इसलिए उनकी रचना विशेष रूप से रसवती वन पड़ी है। इसी बात को उन्होंने निम्न इलोक में दिखलाया है—

प्रवन्यनाटयातु नवमरतिविदग्धगयमुरानु कवीन्द्रा निस्सन्द्रा: कवित नहि मुरारिप्रभृतय: । ऋतुते रामान्नाज्य; किसुत परकोटी घटयितु रसान्न नाटघप्राणान्न पट्टरिति वितर्को मनसि मः ।।

अर्थात् नवीन कल्पना गौर उक्तियों से भगुर काव्यों की रचना करने वाले मुरारि आदि व जाने कितने कवि हुए हैं। किन्तु नाटक के प्राप्तभूत रसों का चरमोत्कर्ष तक पहुँचाने में समर्थ, रचना को प्रस्तुत करने वाला तो रामचन्द्र के प्रतिरिक्त कोई दूसरा कवि दिखलाई नहीं देता है।

मह छो रामचन्द्र ने अपनी स्वतन्त्र रचनाशैली का प्रतिपादन किया है। किन्तु दूसरें कवियों के पद-पदार्थों का ग्रहण करने वाले कवियों को उन्होंने बडी कढ मालोचना की है। उनकी इनेक कडियों में इस ग्रहणरहू-ग्रहण ही की जिन्दा रपम्रो जतलायी है! इसमें से कुछ उदाहरस जिनने प्रकार है—

मह छो रामचन्द्र ने अपनी स्वतन्त्र रचनाशैली का प्रतिपादन किया है। किन्तु दूसरें कवियों के पद-पदार्थों का ग्रहण करने वाले कवियों को उन्होंने बडी कढ मालोचना की है। उनकी इनेक कडियों में इस ग्रहणरहू-ग्रहण ही की जिन्दा रपम्रो जतलायी है! इसमें से कुछ उदाहरस जिनने प्रकार है—

प्रकृतिवं परस्तात्तवत कलकः पाठयालिनाम् । धन्यकाव्ये: कवित्वं मु कलकृस्पापि धुविका ।।

यह इलोक नाटघदर्पण विदृत्ति के श्रादि में लिखा है। इसी प्रकार इस विदृत्ति के श्रन्त में भी उन्होंने लिखा है—

परोपनोेतसद्यार्या: स्वनाम्ना कृतकोतयं: । निबद्धारोजघुना चेन, को नो बलैरमवेष्यति ।।

ग्राजकल तो लोग दूसरों के प्रौद प्रथों को लेकर अपने नाम से प्रसिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। तब हम दोनों पर्यात् नाटघदर्पणकार रामचन्द्र गौर गुणाचन्द्र के उस कष्ट को, जो उन्होंने इस

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परोजनोतद्बारार्था स्वनाम्ना कृतकोत्सय । निवद्धारोड्युतां तेन विश्वंभरतेऽपि व सताम् ॥

कवि रामचन्द्र तु केवल काव्य-रचना के क्षेत्र में पवित्र जीवन के सभी क्षेत्रों में स्वतन्त्रता के उपासक हैं । अपनी इस स्वतन्त्रता-प्रियता का परिचय अनेक स्थलों पर दिया है । मुख्तिर्दारखाँ निम्न प्रकार है—

माध्य चेत सरस्व किमयंसममृत, वचस्तु कुरमोदकं चेत करदपिविपाण्डुगणडफुलक राकादारार्ड्रे न किम् ? स्वतन्त्र यद् जीवितावाध मुखा स्वमूं मुं वो वेमये वेदर्मी यत् वदधनम्भरा प्रीत्या सरसापाडवि किम् ?॥

इसके तीसरे चरण में उन्होंने पूर्वं स्वतन्त्रता के सामने स्वर्ग मौर तीनों लोकों के वैभव को तुच्छ बतलाया है; नलविलास के छठे प्रकास में उन्होंने किर इस स्वतन्त्र्य धो चर्चा की है—

मनुमृत न यत येन रूपं नावचिन्ति तस्य षह । न स्वतन्त्रोऽपि वा देहि परतन्त्रस्य देहिनः ॥

स्वतन्त्रो देव ! मृगायाः सारमेयोऽपि वरं मित्र । मा स्म मूव परावत्तर्निलोकत्यागि नायमः ॥

हे देव ! मैं चाहहना हूँ कि मैं स्वतन्त्र रहूँ । मुझे ही मृगों का कुत्सा वन मर रहूँ । पराधीन हो कर में तीनों लोकों का राजा भी वनना नहीं वाहता हूँ । यह स्वतन्त्रय-प्रियता का घरम रूप है । नत्यहरिरचन्र भी प्रस्ताबना में भी उन्होंने लिखा है—

सूक्तयो रामचन्द्रस्य, वसन्त, कतगीतयः । स्वतन्त्र्य, हस्तियोगश्च पचेतेऽपि ह्यप्सरस्त्रयः ॥

१ रामचन्द्र की सूक्तियाँ, २ वसन्त, ३ सुन्दर गीत, ४ स्वतन्त्रता धौर ५ हस्त का योग ये पाँचों वरतुए महानन्द रच कुल कवियों में शिरेष्ठ कहे जाते है ।

"प्राप्य स्वातन्त्र्यसुखदं मुदमप हरतां शोकहती यादवेन्द्रः"

"प्राप्य स्वातन्त्र्यसुखकमो मनुमवतु मुदं यादवोऽपि मोदते ।"

"मरालगणना वयम्. परमत्वा स्वतन्त्रो भव ।"

"मा तावत मनोभद्रं परतन्त्रनिवर मुचः ।"

"स्वातन्त्र्यमेव कि सर्वापिं विन्टि हि सः"

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कवि रामचन्द्र के ग्रन्थ -

प्रसिद्ध नाट्यदर्पण ग्रन्थ के लेखक रामचन्द्र की 'प्रबन्धसत्तकत्ना' के रूप में विद्वेप से प्रसिद्ध हैं । उन्होने स्वयं अपने अनेक ग्रन्थो में अपने को सो ग्रंथो का निर्माता 'प्रबन्धसत्तकर्त्ता' बतलाया है । 'कोविदगोमिम्राभ्याम्' की प्रस्तावना में 'प्रबन्धसारत्नाविधाननिरूपणवृत्तिना' इत्यादि द्वारा स्पष्ट रूप से अपने को १०० ग्रन्यों का निर्माता बतलाया है । इसी प्रकार 'निभंयभोमव्यायोग' की प्रस्तावना में 'प्रबन्धसत्तकत्नं महाकवे रामचन्द्रस्य' इन शब्दों में अपने को प्रबन्धसत्तकर्ता घोषित किया है । किन्तु दुर्भाग्य से उनके सबं ग्रन्थ उपलब्ध नही हो रहे हैं । छोटे-बडे 'स्तव' आदि तक को मिलाकर इस समय तक उनकी केवल ३७ कृतियाँ उपलब्ध हुई हैं । उनमें से हमारे ज्ञान में केवल छः ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं, जिनके नाम निम्न प्रकार हैं-

१. नाट्यदर्पण [बड़ोदा से प्रकाशित] २. नलविलास नाटक [बड़ोदा से प्रकाशित] ३. कौमुदीमित्रानन्द [आरमानन्द सभा भावनगर से प्रकाशित] ४. निभंयभोमव्यायोग [यशो जैन श्रावकदासा से प्रकाशित] ५. सत्यश्रीहरिदत्तनाटक [निज़ाम सागर बम्बई से प्रकाशित] ६. कुमारविहारसातक [मा० ग्रा० सभा से प्रकाशित]

हमारे ज्ञान में इन छः प्रकाशित ग्रन्थों के अतिरिक्त रामचन्द्र के नाम से निम्न चार अप्रकाशित ग्रन्यों के भी मिलते हैं जिनका उल्लेख नाट्यदर्पण में पाया जाता है—

७. मल्लिकामकरन्दप्रकगरम् [ना० द० में उद्धृत] ८. यादवाभ्युदय नाटकम् [ना० द० में उद्धृत] ९. रघुविलास-नाटकम् [ना० द० में उद्धृत] १०. राघवाभ्युदयनाटकम्-प्रकरसाम् [ना० द० में उद्धृत] ११. रोहिद्रोमृगांक-प्रकरसाम् [ना० द० में उद्धृत] १२. वनमालानाटिका [ना० द० में उद्धृत] १३. सुधाकलशः [ना० द० में उद्धृत] १४. द्वयालङ्कार [रघुविलास प्रस्तावना में उद्धृत] १५. रघुविलास [रघुविलास प्रस्तावना में उद्धृत]

इनके अतिरिक्त कवि रामचन्द्र के निम्न ग्रन्थ भी उपलब्ध होते हैं । वे सब छोटे-छोटे स्तव रूप हैं—

१६. युगादिदेवाष्टकस्तवः १७. वपतिरेकद्राष्टकस्तवः १८. प्रसाददाष्टकस्तवः १९. ग्रामदेवतस्तवः २०. मुनिसुव्रतदेवस्तवः २१. नेमिस्तवः २२. जिनस्तोत्राष्टकम् २३. हैमवूइदवृत्तिन्यासः

२४-३७ तक सोलह साधारण जिन स्तव

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नयनाभ्यां प्रहितस्तस्यां मुनिपुत्रोऽभ्युपेत्य च ।

ध्यानाद् ददृशुर्दृशिं चक्षुः … .................. ॥

करग्रामण्यमालोच्या ते गीतोस्मृतचेतसः ।

स्यातासृथ चतुर्मासीस्माधीनाास्तपसि सिथरे ॥

पर्याप्त कसी चतुर्मास के आरम्भ पर कवि रामचन्द्र की मां हनुमने माई मोर प्रयथ पीठा देने के बाद उनकी दाहिनी आँख फड़कने लगी । रामचन्द्र ने उसे भ्रातने सम्भव वा रोय अह कर सन्तोष किया । मोर पूँखबतू तपोधन करते हुए चातुर्मास्य मुनि वहाँ पूँखं किया । ऐसा प्रकोत होता है कि यह घटना उनके मुख्य १५-१६ ग्रन्थों के रचना-काल के बाद हुर्ई है । मोर रसने उनको कार्य-प्रवृत्ति एवं प्रवृत्ति को ही बलत ढिया है । इस दुर्घटनर के बाद वे प्रथम ग्रन्थों को घोष कर केवल स्तवों की रचना में लग गए । हमारे इस अनुमान का कारण यह है कि वनके स्तवों में प्रत्येक जगह हृदय-रोग की प्रार्थना पाई जाती है । 'निरामयतनु' के श्लोक में उन्होंने हृदय रोगे हेतु प्रार्थना की है--

नेमे ! निरेेेहि निवितार्तिसलतोभिराम !

चन्द्रावदातमहस्रं ममि देव ! हस्तिद्म् ।

रथास्यमांसि चिततान्यपि यान्तु नाश-मुजून्मतां सर्पदि राहवतिकः प्रकारः ॥

इसमें स्पष्टतः हृदयद्रान की प्रार्थना की गई है । 'पोथत पोहचिकर' के अन्त में मो मुखर इसो प्रकार को प्राथंना निम्न श्लोक में की गई है ।

स्वामिन्मनस्तफलकलत्पररोप्तिराम !

चन्द्रावदात चरिताच्चित्तविस्रब्धक !

राक्रतुतीहृदिसरचोदेह ! तु हि स्थतापे, देव ! प्रसोद करष्या कुर देहि हस्तिद्मू ॥

अतः हमने 'प्रभावक चरित' के जो श्लोक उद्धृत किए ये मे प्राथपि 'ध्यनम्र दृशिं चक्षुः' केबल दसिय वधु के नादा मे वाद कहो गई यो किन्तु मातृतः उद्धरो एक् हो वधु नष्ट नहीं हहू विो मपितु वे दोनोँ नेत्रों से ज्विहीन ग्रन्थों हो गए थे । धर्मोंलिये इन सब श्लोकों में चनहोंने हृदयद्रान की प्रार्थना की है । 'स्वहितेरक्नाद्रान्तिविश' के अन्त में तो उन्होंने अपने 'विधिनतागाम्य' पर्यातं द्वैवाद प्राप्त हह़े अनपथा का उल्लतेस किया है । मोर इसके साथ हो 'गरसतनुवर' पर्यातं वापंष्य वा माँ सकेतो करते हुए लिखा है--

पनति पूर्वंचिपोवेनिसोेऽनुं

विधिनताग्य-मतसतनुतार्सदिकम ।

सरसनेव विकुम्पति यः सनाथ

समिनः हृदयश्ट्टिररः रथाम् ॥

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हरयंतारमकारस्पंकतुहुरं विरवसृपं पादवं जिनं तं स्तोमुन्नतजगदिलसनगुप्राप्रमाभितामाकृतिम ।

इन दोनों इलोकों में से प्रथम इलोक में प्रनयकार ने पादवंदेव की स्तुति की है दै और उनके मनुपह से 'विधिनवान्य' मौर 'नतसनुतरा' के नाटक की माशा प्रकट की है। दूमरे इलोक में भी उन्हीं पादवंदेव की स्तुति करते हुए इसप्रकार अपने 'भाम्यारिते:' के 'विकचीभावन' की चर्चा की है। यों प्रनयता जीवन का प्रभिश्राप है। किन्तु उसमें साधु वृत्तियों का निरोध होकर मनुस्म की वृत्ति परतंत्र सी बन जाती है मौर उसके मीतर महान् मभावनु के प्रति प्रेम का उदय हो जाता है यह प्रच्छी बात है। इस दूषरे इलोक में रामचन्द्र ने अपने वसों 'भाम्यारितेक' के 'विकचीमवन' को 'प्रमोदोत्सव' कह कर मपना संतोष व्यक्त किया है।

प्रनयकार के जीवन की प्रान्तिम झांकी—

प्राचायं हेमचन्द्र के जीवन की प्रान्तिम मांकी हम देख चुके हैं। जिस समय 'प्रबन्ध-पटूत्र' के राचा कुमारपाल मपने उत्तराधिकारी के नियंय के समवन्य में परामर्श करने के लिए प्राचायं हेमचन्द्र के श्रावास-स्थान पर परामर्श कर रहे थे, उस समय प्राधायं के प्रन्यान्य शिष्यों के साथ रामचन्द्र भी उपस्थित थे। उस समय प्रजयपाल के राज्य के उत्तराधिकारी के वनाने को जो परामर्श माचायं हेमचन्द्र को मोर से दिया गया था उसमें रामचन्द्र का विद्रोप हआ या। प्राचायं हेमचन्द्र के शिष्यों में रामचन्द्र का प्रतिबिम्बनदी मोर मन ही मन उनसे द्वेप रसने वाला उसका सहपाठी बालचन्द्र भी या। उसने न ही प्रजयपाल के पास जाकर रामचन्द्र की चुगली करके प्रजयपाल को रामचन्द्र का दुश्मन बना दिया था। इसलिए जैसा कि हम पहिले पढ़ चुके हैं अब प्रजयपाल राचा बना तो उसने रामचन्द्र को बुला कर गर्मी लोहे की चादर के ऊपर बिठा कर उसका मरवा डाला। रामचन्द्र की इस नृशंस हत्या के पूर्व प्रजयपाल ने कहा था कि—

महिवोऽबहु सवराचररह जिअ सिरि दिसिअ पाय ।

तसु प्रत्यंसभु दिसोसरह होउत होइ सिराय ।।

[ महीपोऽसौ सचराचरस्थ येन शिरसि दत्तः पादः ।

तस्यास्तन्मनं दिनेशवरस्य भवितव्यं भवति सिराय ।।]

सपर्यात् जो सारे चराचर जगत् के सिर पर पैर रखकर चलता है उस दिनेशवर सूर्य का परंत में चिरकाल के लिए मस्त हो जाता है। इसी प्रकार माज हमारे सिर पर पैर रखने का मस्त करने वाले इस रामचन्द्र का मनल हो रहा है।

रामचन्द्र के सहकारी गुणचन्द्र — प्रस्तुत 'नाट्यदर्पण' ग्रन्थ की रचना में रामचन्द्र के साथ गुणचन्द्र का भी नाम माता है। अर्थात् इस ग्रन्थ की रचना रामचन्द्र गुणचन्द्र दोनों ने मिल कर की है। इनमें से रामचन्द्र के जीवन का वृत्तान्त ऊपर दिया गया है। किन्तु गुणचन्द्र के विषय में कुछ प्राधिक परिचय नहीं मिलता है। केवल इतना विदित होता है कि ये रामचन्द्र के सहपाठी घनिष्ट मित्र मोर प्राचायं हेमचन्द्र के शिष्य थे। इन्होंने मपने 'नाटक' सहित 'वृहमिनंगी' के साथ समप्रभाचायं रोचित 'कुमारपाल प्रतिबोध' का श्रवण किया था। इस बात का उल्लेख करने वाले दो इलोक हम पूठ चुके हैं

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मनः समाश्वासयित्वा पूर्वोक्तप्रकारैरेक नाम्नां प्रकरणान्नात् पात्रालोकी समाधेयं मान्दी । तपाग्नौक्तं नाट्यदर्पणेऽत्र त—तस्माद् वीजस्य कन्यासो रसभिनेयस्य वस्तुनः । इलैपैरथ समाश्वास्या नाम्ना पात्रावलोच्य तु सा ॥

इस श्लोक में 'मान्दी' के 'पात्रावली' नामक विशेष भेद का उल्लेख किया गया है किन्तु प्रस्तुत नाट्यदर्पण में यह नहीं कहा जाता है। इससे यह प्रनित होता है कि रामचन्द्र गुणचन्द्र इस प्रस्तुत नाट्य दर्पण के अतिरिक्त कोई और नाट्य दर्पण रहा होगा जिसमें कि उक्त श्लोक उद्धृत किए गए होंगे।

मट्टुप्रदीप और मादृश्य दर्पण—प्रस्तुत नाट्य दर्पण ग्रन्थ का मूल प्रचार भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र है । पर नाट्यशास्त्र में चहा विस्तार है । उसे मभरत मनीषित वचोभूषण का विस्तार भी कहा जा सकता है । नाट्य दर्पण का शास्त्र वचोभूषण बहुत ही थोड़ा है । नाट्यशास्त्र के इस वृत्ति में स्वल्पपको का वर्णन किया गया है । स्पष्टः यद्यपि के मापार पर रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने अपने इस ग्रन्थ की

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रोद्रे भयानके चैव वीरोयारमटी कृतः । वीभत्से करुणै चैव भारती सम्प्रकीर्तिता ॥

रचना को है । रामचन्द्र-गुणचन्द्र के पहिले इसी प्रकार के 'दशरूपक' नामक एक ग्रन्थ की रचना 'घनश्याम' कर चुके थे । प्रस्तुत ग्रन्थ उसी को प्रतिद्वनितता में लिखा गया प्रतीत होता है । उसकी पृष्ठभूमि में राजनोति की प्रतिसंधान को प्रेरणा रही हो तो भी कुछ खास उल्लेख नहीं है । दशरूपककार घनश्याम मालव नरेश मुज के समा पंडित थे । रामचन्द्र-गुणचन्द्र गुजरेश्वर के पंडित थे । गुर्जरात और मालवा राज्यों का सदा संघर्ष रहता था । उनमें दीर्घकाल तक युद्ध भी चलते रहे थे । इसलिए गौरव-प्राप्ति के हर क्षेत्र में दोनों राज्यों की प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी । इसी प्रतिस्पर्धा के कारण मालवाधीश के प्रात्य में निर्मित 'दशरूपक' की प्रतिस्पर्धा में इस नाट्यदर्पण की रचना हुईं हो, यह सर्वथा सम्भावित है । हम आगे यह देखेंगे कि नाट्यदर्पणकार ने १३ स्पलों पर दशरूपककार के मत का उल्लेख किया है किन्तु एक भी स्थान पर उनका नामोल्लेख नहीं किया है । 'मन्ये', 'केचित' आदि सर्वनाम-रूब्दों से पूर्वपक्ष प्रस्तुत कर उत्क्षा खंडन किया है । पर उस दशरूपक वाले प्रकरण को प्रारम्भ करने के पहिले हम भरत के नाट्य-शास्त्र और नाट्यदर्पण के त्रिपय में कुछ विचार कर लेना चाहते हैं । नाट्यदर्पण की रचना यद्यपि भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के आधार पर की गई है किन्तु रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने अनेक स्थलों पर भरतमुनि से अपन मत भेद प्रकट किया है । इस प्रकार के दो उदाहरण हम नीचे देते हैं— १. सूत्रीय विवेक में 'प्ररोचना' का वर्णन करते हुए नाट्यदर्पणकार ने लिखा है कि— "अस्य च पूर्वरङ्गस्य प्रय्याद्धारादीनांरारतथान्तानि नव नाट्यार्थनिकं, गीतकादीनि प्ररोचनान्तानि च दश बहिरङ्गनिकमध्यान्ति प्रयोज्यानि 'पूर्वरङ्गो' इति लक्षणात् । अस्माभिस्तु स्वतो लोकप्रसिद्धत्वात्, तन्त्र्यादिक्रमस्य निष्फलत्वात्, विविधदेवतापरितोषहपसस्य तत्फलस्य च श्रद्धाभुप्तारङ्गमातत्वोपेक्षितानि । प्ररोचना तु पूर्वरङ्गाज्ञात्वादपि नाट्ये प्रवृत्तौ प्रधानमध्यमिति लक्ष्यते ।" इसमें 'पूर्वरङ्गस्य' पद से भरत मुनि का संकेत किया गया है । भरत मुनि ने पूर्वरङ्ग के १९ भेदों का विधान किया है । जिनमें से ९ जवनिका के भीतर और दश जवनिका के बाहर किए जाते हैं । नाट्यदर्पणकार ने इनमें से केवल एक भेद 'प्ररोचना' को लिया है, शेप १८ भेदों को छोड़ दिया है । उनके छोड़ देने के तीन कारण यहाँ दिखलाए हैं : १. स्वतो लोकप्रसिद्धत्वात्, २. तन्त्र्यादिक्रमस्य निष्फलत्वात् और ३. विविधदेवता परितोषहपसस्य तत्फलस्य च श्रद्धाभुप्तारङ्गमातत्वोपेक्षितानि । इस स्पल पर नाट्यदर्पणकार ने भरत मुनि से अपना मतभेद प्रकट किया है । वृत्तियों के निह्नपण के प्रसङ्ग में नाट्यशास्त्र के २० वें अध्याय में निम्न इलोक आया है—

रोद्रे भयानके चैव वीरोयारमटी कृतः । वीभत्से करुणै चैव भारती सम्प्रकीर्तिता ॥ [नाट्यशास्त्र २०-६४]

इसके अनुसार केचिद् 'बीभत्स' तथा करुण रसों में 'भारती-वृत्ति' का प्रयोग भरतमुनि को अभिमत प्रतीय होता है । किन्तु उसी २०वें अध्याय में इसके पूर्व ६३वें इलोक निम्न प्रकार

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नेदास्त्यस्यास्तु विशेषोडचतुवारोऽप्यस्वमानत: । प्ररोचनामुखं चैव वोपै प्रहसनं तथा ॥

इस इलोक में प्ररोचना, प्रामुख श्रादि का तो बीभत्स तथा करुण के श्रतिरिक्त अन्य रसों से भी सम्बन्ध है। इसलिए भरतमुनि के इन वचनों में विरोध प्रवृत्त होता है । इसकी प्रालोचना करते हुए नाट्यदर्पणकार ने लिखा है कि— 'ये तु मारस्यां बीभत्स-करुणापे प्रपञ्च्र:, तै: सर्वेऽरसावोध्य-प्रधानसूक्षारदोरमाष-प्रधानहास्यप्रहसनादि स्वयमेव भरत्यामेव वृत्तौ नियतवितानि नावेदितानि ।'

'ये तु' से यहां भरतमुनि का प्राधार है । जिन भरतमुनि ने भारती वृत्ति में बीभत्स तथा करुण रस का समावेश माना है। उन्होंने स्वयं हो सर्वरससावोध्य, शौर सूक्षार या वीर रस जिसमें मुख्य है इस प्रकार के भाष्य तथा हाम्यरस जिसमें प्रधान रहता है उन प्रहसनों को भारती वृत्ति में रचना का जो निर्देश पहले किया है, उसकी उपेक्षा कर दो है । मतः उनके इस कथन में 'वदतो-व्याघात' दोष भ्राता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि जहां श्रावश्यकता पड़ी है वहां नाट्यदर्पणकार ने भरतमुनि की प्रालोचना भी की है।

नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने अपने इस ग्रन्थ में प्रायः ३२ बार 'घनये' 'मेदितु' श्रादि शब्दों से अपने पूर्ववर्तियों नाट्यसदर्पणकार धनञ्जय के मतभेद किया है। इनमें से दो स्थलों पर तो उनके मत की मालोचना करते हुए उन्हें 'न मुनिसमयाद्यवसायिन:' शौर 'वृद्धसम्प्रदायवृत्त:' कहकर १९ स्पलों पर मुसन्निध म्रादि के मेदों के विभिन्न लकणों में अपने लकणों से दातारूपक में दिसलाए गए लकणों में जो भेद पाया जाता है उसका प्रदर्शंन कराया है। जिन दो स्पलों पर रामचन्द्रगुणचन्द्र ने धनञ्जय को 'न मुनिसमयाद्यवसायिन:' भरत मुनि के मत को न समभने वाला कहा है वेप १९ स्पलों में जो भेद पाया जाता है उसको प्रदर्शित कराया है। जिन दो स्पलों पर रामचन्द्रगुणचन्द्र ने धनञ्जय को 'न मुनिसमयाद्यवसायिन:' भरत मुनि के मत को न समभने वाला कहा है शोर दूसरा प्रकार-लक्षण के भ्रध्वर पर भाया है ।

१. नाटक के लकण में नाट्यदपंकार ने 'स्वाथादरार्जितम्' [कारिका ५] महं एक विशेषण दिया है । इसके भ्रनुसार किसी इतिहास-प्रसिद्ध पूर्ववर्ती राजा के चरित या प्रवदम्बन करके हो नाटक की रचना करनी चाहिए । मर्थात् इतिहास-प्रसिद्ध पूर्ववर्ती राजा हो नाटक का नायक हो सकता है । इसके बाद मागली छठी कारिका में घोरोदात्त, घोरोदरत, घोरसत्वित तथा घोरप्रशान्त ये चार प्रकार के नायक-स्वभाव बतलाए कर प्रत्येक के उत्तम, मध्यम दो भेद किए हैं। इस प्रकार स्वभाववेद के प्रकार पर नायक के ९ भेद होते हैं । इससे मगती सातवीं कारिका में यह दिसलाया है कि 'देवता घोरोदात्ता:' देवता लोग घोरोदात्त स्वभाव के होते हैं । 'घोरोदत्ता: क्षत्रियसम्भवा:' क्षत्रिय लोग घोरप्रशान्त स्वभाव के होते हैं । राजा चारों प्रकार के स्वभाव वाले होते हैं, यह कहा है । इसके श्रनुसार नाटक का नायक चारों प्रकार के स्वभाव वाला हो सकता है।

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['राजान' इति] बहुवचनात् व्यक्तिविमेदेन चतु:स्वभावो नाटकस्य नेता । न गुरुतरेकस्य व्यक्तौ, एकत्र प्राधान्येन स्वभावचतुष्टकस्य वचनीयतुमदादपतथ्वार्दिति । प्रधाननायकस्य चायं नियम: । गोऽनेतॄणां तु स्वभावान्तरमपि पूर्वसूत्रभावरमपेक्षेन निवध्यते । ये तु नाटकस्य नेतारं धीरोदात्तमेव प्रतिजानते, न ते गुरुतरसमाधयवगाहिन: । नाटकेपु धीरललितादीनामपि नायकानां दशसन्नात्, कविसमयवशादार्षम् ।

दशारूपककार ने जो नाटक का लक्षण किया है उसमें 'धीरोदात्त: प्रतापवान' [३-२२] नायक का घीरौदात्त होना भावश्यक बतलाया है । परन्तु दशारूपककार के मनुसार नाटक का नायक केवल घीरौदात्त ही हो सकता है यह नियम नहीं है । इस विषय पर नाट्यदर्पणकार का दशारूपककार से मत भेद है । नाट्यदर्पणकार धीरललित नायदि को भी नाटक का नायक मानते हैं । धीरललित न्रादि को नहीं मानते । इसी कारण रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने दशारूपक का खण्डन करते हुए लिखा है—

प्रशयतद्रुविचित्रं प्रश्यातोदात्तनायकं चैव । राजाविवेक्यचतिरं सर्थं च दिव्यार्थोपेततम् ॥ नानाविभूति संश्रुतमृद्धिविलासादिमिर्युतं शोभचैव । श्रृङ्गारवेशकादूयं भरति हि तन्नाटकं नाम ।

इस उद्धरण में नाट्यदर्पणकार ने केवल घीरौदात्त को नाटक का नायक मानने से भरतमुनि के मत को न समक्षने वाला कहा है । भरत मुनि ने जो नाटक का लक्षण किया है वह निम्न प्रकार है—

ध्रुव प्रकारो वृत्तमुपाश्रित्य लोकरञ्जनम् । प्रमातृ-चित्र-विलसिताभिमेकं कुर्यादिच्छ नायकम् ॥

भरतमुनि के इस नाटक लक्षण में स्पष्ट रूप से 'प्रश्यातोदात्तनायकं' पद से नाटक में उद्दात्त नायक का प्रतिपादन किया है । इसी के आधार पर घनश्याम ने 'दशारूपक' में 'धीरोदात्त-प्रतापवान' श्रादि लिखा है । किन्तु रामचन्द्र उसे 'भरतमुनि' के मत को न समक्षने वाली बात कहते हैं । वह बात कुछ गलत भी प्रतीत होती है । नाट्यशास्त्र के वर्तमान संस्करणों में उपलब्ध पाठ के अनूसार तो दशरूपककार की मत भरत की अनुगामी ही है विरोध नहीं । सम्भव है रामचन्द्र-गुणचन्द्र के पास नाट्यशास्त्र का जो संस्करण रहा हो उसमें कुछ अन्य प्रकार का पाठ पाया जाता हो । यदि उस पाठ को जिसके आधार पर वे दशारूपककार को भरतमुनि के मतको न समक्षने वाला कह रहे हैं, यहाँ दे दिया होता तो बात प्राधिक स्पष्ट हो जाती, उसके बिना नाट्यदर्पणकार की बात स्पष्ट रह जाती है । परन्तु इस विषय में नाट्यदर्पणकार ने दूसरी बात यह भी लिखी है कि—'नाटकेपु धीरललितादीनामपि नायकानां दशसन्नात् कविसमयवशादार्षम्' । सम्प्रदाय के विपरीत भी है १ यह बात कुछ प्राधिक स्पष्ट है । (२) नाट्यदर्पणकार द्वारा की गई दशारूपक की प्रालोचना का दूसरा प्रसङ्ग 'प्रकरख' के लक्षण में आया है । 'प्रकरख' का लक्षण दशरूपक में निम्न प्रकार किया गया है—

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घोरप्रशान्तं सापायं धमंकामायं तत्सरम् । शोभं नाटकवत् सन्ध्यप्रवेशकरुणादिकम् ॥

इस लक्षण के अनुसार 'प्रकरण' में घोरप्रशान्त स्वभाव युक्ते धीरोदात्त, विप्र या वरिकु में से किसी एक को नायक बनाना चाहिए यह प्रथम निकषता है । किन्तु नाट्यदर्पणकार इस बात से सहमत नहीं है । उनके मत में प्रभात्य के साथ घोरप्रशान्त विदोेपण संगत नहीं होता है । प्रथम नाट्यशास्त्र की सातवीं कारिका में वे पढ़ते ही लिख चुके हैं कि 'धीररोदात्त' संज्ञामनुत्रा: सेनापति घोर धमात्य धीरोदात्त ही होते है । अर्थात् धमात्य सदा घोरोदात्त होना चाहिए । 'घोरशान्ता वीरकुद्रिप्र:' वरिकु घोर विप्र तो घोरशान्त होते हैं, किन्तु प्रभात्य घोरप्रशान्त नहीं घोरोदात्त होता है । इसलिए दर्पणकार ने जो प्रभात्य को 'प्रकरए' का नायक मान कर 'घोरशान्त' उसका विदोेपण दिया है वह उचित नहीं है । इसी बात को नाट्यदर्पणकार ने निम्न प्रकार लिखा है—

"शचिवो राजपुत्रस्य । प्रभयं वरिकुंगविप्रयोर्मध्यपात्यपि घोरोदात्त-घोरप्रशान्ती प्रकरणे नेतारौ मततः इति प्रतिपादनार्थं पृथुरुरात्रः । यस्त्वमार्त्तयं नेतारमस्युपगम्य घोरप्रशान्त-नायकर्मिति प्रकरणं विदोेपपति, स नृत्तसम्प्रदायवद्ग्यः ।"

तात्पर्य यह है कि राजपुत्र, वरिकु या विप्र के बीच ही इस प्रभात्य का भी मन्तरभाव हो सकता है अर्थात् विप्र तथा वरिकु के बीच में ही इस प्रभात्य का भी नायक होना चाहिए । इसलिए यदि उसका गलत पहचाना न किया जाता तो भी काम चल सकता था । फिर भी उसका गलत पहचाना इसलिए किया गया है कि प्रभात्य घोरोदात्त होता है और वरिकु विप्र दोनों घोरप्रशान्त होते हैं । इसलिए प्रभात्य के पृथग् पहचाने से यह ध्वनिप्राय निकलता है कि प्रकरण में घोरोदात्त तथा घोरप्रशान्त दोनों प्रकार के नायक हो सकते हैं । इस दशा में दर्पणकार ने 'प्रकरण' में प्रभात्य को नायक मानते हुए भी जो 'घोरप्रशान्त' विदोेपण द्वारा 'प्रकरण' में 'घोरप्रशान्त' के ही नायक होने का प्रतिपादन किया है, यह उचित नहीं है ।

इन दो स्पों पर खो नाट्यदपंकार ने दर्पणकार के मत को प्रालोचना की है । किन्तु इनके अतिरिक्त प्रथम ११ स्पलो ऐसें हैं जिनमें मूल संज्ञा के भेद के सदृशों में नाट्यदपंषा तथा दर्पणक...मेद... पाया_जाता है । नाट्यदर्पणकार ने इन स्पों पर अपना लसएए देने के बाद 'प्रत्ये' मादि पदों से दर्पण के सपाए मो दिगा दिए हैं । इन ११ स्पलों को हम नीचे दे रहे हैं—

१. मूल संज्ञा के पश्चयम मदनु 'उद्भोद:' किया गया है [का० १-९३] । दर्पणक में उसके स्पान पर 'उद्भेदो गूढमेदनम्' [दश० १-९३] किया गया है । नाट्यदर्पणकार ने 'स्वल्पप्ररोहजन्मे:' किया है [का० १-९३] । दर्पणक में उसके स्पान पर 'उद्भेदो गूढमेदनम्' [दश० १-९३] किया गया है । नाट्यदर्पणकार ने विदुति में ऋतु का उल्लेख 'अनये तु गूढमेदनमानन्ति' इस प्रकार किया है ।

२. नाट्यदपंषा में मूल संज्ञा का पाठयां मदनु 'मेद्न' माना गया है । समास मदानु 'मेदने पृथकिगेम्' [का० १-८४] किया गया है । दर्पणक में उसक्चा सदृशा 'मेद: प्रोदाहतनाव्' [का० १-२६] इस प्रकार किया है । नाट्यदर्पणकार ने 'मेढे तु मेदं प्रोदाहतनादृ:'

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अन्ये तु संहृतान् प्रतिपमाशा वीजफलोपप्तिनिरोधकान् विलेपक भेदल्पगुणाय भेदनं मन्यन्ते

विस्मय कर इसो भेद को दिखलाया है। इस्सी प्रसङ्ग में नाट्यदर्पणकार ने 'अन्ये तु संहृताना०' इस रूप में भेद के तृतीय लक्षण का भी उल्लेख किया है।

मुख संधि के इन दो भेदो के लक्षणो के विषय में रामचन्द्र तथा गुणचन्द्र का मतभेद है। आगे 'प्रतिमुख संधि' के भेदो के विषय में दोनो का मतभेद दिखलाते है।

३. 'प्रतिमुख संधि' का पांचवा भेद 'विप्रसंहृति' है। उसका लक्षण नाट्यदर्पण में 'विप्रषो वचांसहृति' [काव्य १४८] किया गया है।

दशरूपक में उसके स्थान पर 'वातुविप्रोंवगमन वचांसहार इष्यते' [१-३१] यह लक्षण किया है। नाट्यदर्पणकार ने इस भेद को 'अन्ये तु वचांनां द्वाह्यताद्विगो विस्थानाशा वजुप्ती वा एकत्न मोहन वचांसंहारमाचक्षते' इस प्रकार दिखलाया है।

४. 'प्रतिमुख संधि' का सातवा भेद 'नर्मसंभृति' है।

इसका लक्षण नाट्यदर्पण में 'दोपामृते तु सदृशचृति' [काव्य ४६] किया है। दशरूपक में उसके स्थान पर 'परिहासवचो नर्म, दोपामृते सदृशमति' [काव्य १-३३] यह लक्षण किया गया है। नाट्यदर्पणकार ने 'अन्ये तु नर्मंजा ध्रुतिस्तत्नजा धृतिकमता' [काव्य १-३३] यह लक्षण किया है।

५. 'गर्भ संधि' का तीसरा भेद 'लुप्त' है।

उसका लक्षण 'नाट्यदर्पणकार' ने 'लुप्त नाट्यंवसंशयम्' किया है। दशरूपक में 'लुप्त विकतंकवृन्द वाक्यम्' यह 'लुप्त' का लक्षण किया गया है। नाट्यदर्पणकार ने 'अन्ये त्वधियोतते लुप्त विकतंकवृन्द वाक्यमिति' [पृ० १४७] इस रूप में इस भेद को प्रदर्शित किया है।

६. 'गर्भ संधि' का छठा भेद 'क्रम' है।

नाट्यदपंगा में उसका लक्षण 'क्रमो भावस्य निऋंय:' [काव्य १-४४] किया गया है। दशरूपक में 'क्रम. सचिन्त्यमानान्विति' [१-३६] यह क्रम का लक्षण किया गया है। नाट्यदर्पणकार ने 'क्रमः सचिन्त्यमानान्वित इदमाहु:' लिखकर 'अन्ये तु भविष्पदसंचतथ्योपरिऋज्य क्रममिच्छन्ति' इस रूप में 'क्रम' का तीसरा लक्षण भी नाट्यदर्पणकार ने दिखलाया है।

७ 'अवमर्श संधि' का पांचवा भेद 'छादन' है।

नाट्यदर्पण में उसका लक्षण 'छादन मनुमाजन्तम' [काव्य १-४५] किया गया है। दशरूपक में 'छादन' के स्थान 'छलन' भेद पाया गया है। नाट्यदर्पणकार ने इसका उल्लेख 'अन्ये त्वस्यं स्थाने छलन अवमाननहुपमाहु.' इस रूप में किया है।

इसके प्रतिरिक्त (१) 'अन्ये तु कार्योपिंसहास्याप्यर्थस्य सहन छादनमिच्छन्ति' (२) 'अन्ये तु छन्नन सम्मोहमिच्छान्ति' इस रूप में छादन भेदो के विषय में दो मतो का उल्लेख [पृ० १६६] भीर किया है।

८. 'अवमर्श संधि' का छठा भेद 'धृति' है।

नाट्यदर्पण में उसका लक्षण 'तिरस्कारो धृति' [वही ५२] किया गया है। दशरूपक में 'तर्जनोद्रेजने धृति' [१-७६] इस प्रकार 'धृति' का लक्षण किया है। हम धृति का उल्लेख करते हुए नाट्यदर्पण में लिखा है- 'तर्जनोद्रेजन धृति कैश्चिदचिन्त्यमिति' इसके साथ हो 'अन्ये तु तर्जनाधंपो धृतिं मन्यन्ते' इस रूप में 'धृति' के तीसरे लक्षण का भी उल्लेख नाट्यदर्पणकार ने किया है।

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९. 'प्रवमदां सानिध्' का दशमं प्राज्ञ 'शक्ति' है

नाट्यदर्पणकार ने 'एके तु विरोष धामन् शक्तिमिच्छन्ति' लिख कर इस भेद का उल्लेख किया है।

१०. प्रवमदां सानिध् का ११वाँ प्राज्ञ 'व्यवसाय' है

नाट्यदर्पण में उसका लक्षण 'ग्राज्ञे तु व्यवसायः स्वशास्त्रयुक्तिः इति प्रतिन्ति' लिख कर इस भेद में प्रदर्शित किया है।

११. 'निवंहरुण सानिध्' का पाँचवाँ प्राज्ञ 'परिमापण' है

नाट्यदर्पणकार ने इस भेद को 'एके तु परिमापा मियोजलपः इति पठन्ति' लिख कर इस भेद का उल्लेख किया है।

रामचन्द्र गुणाचन्द्र के पूर्ववर्ती नाट्यलक्ष्याचार्यों में दशरूपककार धनञ्जय [सन् ९७४-९९४] के बाद दूसरा नाम 'नाटकलक्ष्यारत्नकोष' के निर्माता 'सागरनन्दी' का आता है। ये दोनो मम्मट के उत्तरवर्ती प्रायः हैं। सागरनन्दी ने धनञ्जय से लगभग १०० वर्ष बाद अपने 'नाटकलक्ष्यारत्नकोष' नामक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना भी है।

इन्होंने 'नाटकलक्ष्यारत्नकोष' ग्रन्थ, जैसा कि उसके नाम से ही स्पष्ट है नाट्यशास्त्र-विपयक ग्रन्थ है। रामचन्द्र-गुणाचन्द्र को सम्भवतः इस ग्रन्थ व अन्य दोनों परिचय प्राप्त था।

नाट्यदर्पण में जिस प्रकार नाटक की पाँचों संधियों के विविध भेदों के लक्षणा करते समय कई नाट्यलक्ष्याचार्यों के लक्षणा से भेद् ग्राया है वहाँ 'प्राज्ञे' प्राप्त वादों से दशरूपक में लक्षणा को भी उद्धृत कर दिया है।

१. वाग्भटप्रकाशकार मम्मट रामचन्द्र गुणाचन्द्र के पूर्ववर्ती आचार्य हैं

वाग्भटप्रकाश में नाटक-सम्बन्धी विषयों की विवेचना भी है। इसलिये नाट्यदर्पण का मम्मट ने साधर्म्य व वैधर्म्य दोनों ही दृष्टि से किया है।

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"केचिदन हयग्रीववने हयग्रीववर्णामनुदाहरन्ति । स पुनर्वैष्णवो वृत्तनायकस्याल्पवर्णनाद् । तनु हि दोरो रसः, स विच्छेपतो वध्यस्य शोभां विनिभृत्यतिशाययत्यस्मै न सुष्ठु हन्ति ।"

इसके स्पष्टीकरण में नाट्यदर्पणकार कहते हैं - 'प्रणामोऽस्तु यम् । भृङ्गारो मूर्धन्यरसपोषकतया प्रियवयभूतस्योक्तं' विस्तारेऽपि कृतत्वाद् वृत्तान्ते नायकेनार्चितमिव रसम्य मृदु हृदयं हि: कृतज्ञाधिवपम् ।" [ना० द० ३-२३]

"प्रसादे वत्स्व, प्रकटयमुदं, सञ्चय्य रूपं प्रिये शुद्धान्त्यनुरागसञ्चयमभिते सिञ्चतु वचः । निधानं शोभयानां द्वयेऽपि मिमित्सुं स्थापय मूलं न गृहीषे प्रियेषु प्रमदासु फुल्लहृदया: ।"

२. 'प्रतिकूल-दिवावधि प्रह' नाम का दूसरा रस-दोष है । काव्यप्रकाश में इसका उदाहरण निम्न प्रकार दिया गया है- 'मत्न शृङ्गारे प्रतिकूलनिदर्श शान्तस्यापि नित्यता प्रकटयति रूपो विमावस्तत्प्रकाशितो निवेदयति च वपुविचारी उपात्त ।" [का० प्र० ३६०]

"तपजत मानमयी बत विपहैनं पुनरेभिर्गर्तं चतुर वयः । परमुन्मारिनीव निवेदिते, स्मरमते रमते स्म वधूजनः । मन् शृङ्गारप्रतिकूलनिदर्श सान्तस्यापि नित्यता प्रकटयनरूपो विमावस्तत्प्रकाशितो निवेदयति च वपुविचारी उपात्त ।"

अर्थात् इस इलोक में भृङ्गार रस के प्रतिकूल शान्त रस का स्थायी उसके मानसिक-रागात्मक निवेदनद्वारा व्यक्तिचारिभाव का प्रकाशक होने से यहाँ 'प्रतिकूलदिवावधि प्रहर' रूप रस दोष होता है । नाट्यदर्पणकार ने इस उदाहरण को किसी भी प्रकार की आलोचना न करते हुए भी इसका दूसरा उदाहरण निम्न प्रकार दिया है-

"तमजत मानमयी बत विपहैनं पुनरेभिर्गर्तं चतुर वयः । परमुन्मारिनीव निवेदिते, स्मरमते रमते स्म वधूजनः ।"

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इन दोनों में केवल इलोक का भेदतर है, भाव दोनों उदाहरणों का बिल्कुल एक ही है। इसके अतिरिक्क 'प्रकाण्डे प्रथनं, प्रकाण्डे क्ष्वेः द्वीप्तिः पुन्नपुनः तथा मणिनोज्ज्वलतनुस्थयानम्, इन चारों रस-दीपों के उदाहरणाए काव्यप्रकाशा तथा, नाट्यदर्पण में बिल्कुल एक ही दिए है।

३. रस-दीपों के निरूपराए के प्रसङ्ग में काव्यप्रकाशा में 'व्यभिचारि-रस-स्थायिमावान् शब्दवाच्यता' को सबसे पहिला रस-दीप कहा गया है। अभिप्राय मम्मट के अनुमार व्यभिचारि-भाव अथवा रस अथवा स्थायिभावों को अपने वाचक शाब्द द्वारा कथन नहीं करना चाहिये। उनका स्वशब्द से कथन करने पर रसासुत्रोक्ति का ग्रहकथक होने से दीपाधायक होता है। किन्तु नाट्यदर्पणकार इस बात से सहमत नहीं है। इसकिए इस विषय में मम्मट का खण्डन करते हुए उन्होंने लिखा है—

"केचितु 'व्यभिचारि-रस-स्थायिनां' स्वशब्दवाच्यत्वं रसदोपमाहुः। तदयुक्तम्। व्यभिचार्यादीनां स्ववाचकपदप्रयोगेऽपि विभावादपुष्टे:-

दूरादुरसुकमारपते विरचितं सम्भाव्यपि स्फारितं, सन्दिल्यपररूष्णा गृहीतवदने किञ्चाऽऽदिचतभ्रूःततम् । मानिन्याचरचाराऽऽननविधयत्कुर्वे वाष्पाम्बुपूरैरप्सु, छद्युरितमहो ! प्रपंचचतुरं जातु अर्गसि श्रेयांसि ॥

इसमें उत्सुक, विरचित आदि व्यभिचारिमावों का स्वशाब्द से कथन होने पर भी रस की परिपुष्टि हो रही है, इस लिए विभावादि का स्वशब्द से ग्रहणए दोष नहीं है। यह नाट्यदर्पण-कार का अभिप्राय है।

४. इस प्रकार 'कथनकल्पनया व्यक्तिरनुभावविभावयोः' [का० प्र० कारिका ६०, पृ० ३४७] को दूसरा रसदीप माना गया है। पर नाट्यदर्पणकार का मत इस विषय में भी मम्मट से भिन्न है। अपने मत को व्यक्त करते हुए उन्होंने लिखा है—

"एवमुमयरस साधारराविभावपदार्थान् कट्टिनि नियतविभावाम्चायपिस्वाधिगमोऽपि सन्दिग्धतल्लक्षणो वाध्यदोप एव। यथा— परिहरति मातृं राञ्चि शुनोति, स्वलाविवशो परिवर्तते च मूर्छः । हन्ति वत्स विभ्रमाद्दर्शनेन स्वेदं, परंवाप्रसभं किमन्त्र गुम्भः॥ मत्र रतिपरिहारादीनां विभावानां कदर्थादार्यपि सम्भवाद् मुख्खंरं प्रति मास्रद-संदेह इव ।"

इस प्रकार मम्मट ने काव्य प्रकाशा में जिन आठ प्रकार के रसदोपों का वर्णन किया था, नाट्यदर्पणकार ने उनमें से छीनों का बिल्कुल खण्डन कर दिया, और चार को उदाहरणए में परिवर्तन करते हुए स्वीकार कर लिया है।

रामचन्द्र गौर शभिनवगुप्त— नाट्यदर्पण पर 'अभिनवभारती' नामक वृत्ति के निर्माता अभिनवगुप्त भी नाट्यदर्पणकार के पूर्ववर्ती आचार्य हैं। रस-निरूपराए के प्रसङ्ग में नाट्यदर्पणकार ने उनके मत के आधार पर श्रृंगारे मत की याथार्थता को है। जितने नयनों से भी उन्होंने अभिनवगुप्त की परवशता उत्पन्न कर दी है—

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करुणाद्रिद्रपि रसे जायते मृत्परं सुखम् । सचेवद्रुमनुजस्य प्रभाएं तन्र केयसम् ॥ कीदृशं हेतु मता दुःखं न कोऽपि स्वयात्तदनुसुखः । तथा रौद्रादीनां मविता दुःख हेतुतथा ॥

विश्वनाथ कवि के इस सुखात्मकवाद के विपरीत प्रभिनवगुप्त ने प्रत्येक रस को सुखदुःखोभयात्मक रस माना है । अभिप्राय उनके मत में प्रत्येक रस में सुख की प्रधानता होते हुए भी दुःख का संस्पर्श रहता है । उन्होंने लिखा है— 'इत्यन्नद्रूपता सर्वत्रसामा । किलत्सूपररूजकविपयदशायां तेषामपि कतुद्वितारस्पर्शोऽस्ति वीरस्येव । स हि वीरेष्वहिंस्युपरिदशा एव ।'

श च सुख-दुःखपरा विचित्रेऽपि समनुगतो न तु तदेकात्मा । तथाहि—रति-द्वेष-चमत्कार-विस्मयान् मुवसद्भावान् । तत्र तु चिरकालव्यापिप्रसङ्गानुसन्धिपत्प्रवैन विपयेग्नुमुख्य-प्राप्तावपि तथाइप्यासावाहुल्येन शृङ्गारमोहाद् दु खादानुवेधो रसते । हास्ये सातुसन्धानरस विष्टत्स-हास्यास्त्रालिकोलपदुःखानुवेधः सुखानुगतःः। उत्साहाद्‌स्य तार्कालिक-दुःखायास-निमज्जनरूपानु-सन्धानं भाविवहजनोपकारित्वरकास्माविसुखसमाचिकीर्षाप्रतनु । मुखरूपता । विस्मयस्य निरतुसन्धानडितुल्यमुखरूपता । क्रोध-मप-शोक-श्रुप्सानां तु दुःखास्वरूपता । तत्र चिरकालदुःखानुसन्धप्रज्ञो विपयेगतर-डस्यन्तिकनिरासभावनां तदाकासप्रज्ञातया सुखदु खानुवेधवान् क्रोधः । विमुखे हि मुखस्येतरकालिकदुःख-प्राप्तावपि तदपगमाकाङ्क्षोत्तेजितसुखानुसन्धिर्निम्नन् भयम् । हृकालिकस्तद्भीतविपयेनासूजः प्राक्तन-मुखस्मरणानुवेधः सवपंहु दुःखरूपः शोकः । 'उत्पाद्यमानदुःखानुसन्धानजीविषविषयाद् वेदनाविपयात् पलायनपरैराहुःपरा निवेद्यममानकितमुखानुविटता झुपसार । समस्तपु वन्दुःख-सदृशव्य स्मरस्य प्राज्ञितः सम्भाविततदुपरमबहुलसुखमयो निवेदः ।

इन तीनों भानुच्छेदों में अभिनवगुप्त ने शृङ्गार, हास्य, वीर तथा भद्रुत रसों में सुख की प्रधानता के साथ-साथ दुःखानुवेध को, तथा रौद्र, भयानक, करुण तथा बीभत्स रसों में दुःख की प्रधानता के साथ सुखानुवेध की चर्चा करते हुए मन्त में निवेद को नितान्त सुखरमय ठहराया है ।

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रसों के विपय में नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र का मत पूर्वोक्त दोनों मतों से भिन्न प्रकार का है। उसे हम विमज्यवादी मत कह सकते हैं। विद्वान् आचार्य भामह ने सभी रसों को शृंगारमक रस माना है। प्रभिनवगुप्त ने शृंगार रसों को शृंगारमक रस माना है। किन्तु नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने सभी रसों को शृंगारमक रस माना है, और न सभी रसों में शृंगार-शृंगार दोनों का समावेश माना है। उन्होंने रसों को शृंगार-शृंगार दो भागों में विभक्त कर दिया है। जिनमें से शृंगार, हास्य, वीर, अद्‌भुत तथा वात्सल्य इन पाँच को शृंगारमक रस कहा, रोद्र, वीरभयानक तथा बीभत्स इन चार को सर्वथा शृंगारमक रस बतलाया। अपने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन नाट्यदर्पण में उन्होंने निम्न प्रकार से किया है -

शृङ्गार-हास्यवीर-प्रद्भुत-वात्सल्याः पञ्च सुक्तारसमानः । करुण-रोद्र-वीभत्स-भयानकाः शृंगारो दु:खात्मानः ।

"तत्रेष्टौ शृंगावादिप्रविष्टवत्स्वरूपसम्पत्तयः शृङ्गार-हास्यवीर प्रद्भुत-वात्सल्या: पञ्च सुक्तारसमान: । मपरे पुनरनिष्टविमावाद्युपनोत्कारसमान: करुण-रोद्र-वीभत्स-भयानकाः शृंगारो दु:खात्मानः । यत् पुन: सर्वरसातां शृंगारमकरसुज्यते, तत्रप्रोतिविभावादिषु । भावतां नाम मुख्यविमावोपरचितः, कार्याभिनयोपेत-विमावोपरचितोऽपि भयानकादौ वीभत्स:, करुणे गद्गदो वा रमा-स्वादवतामनार्हयेऽपि कार्यं भवेताद्यामुपनयति । मतएव भयानकादिमिरुडिते समाज: । न तत्र सुखावहादपि गौ: पवते ।" [नाट्यदर्पण ३-४]

३. इस उदाहरण में रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने स्पष्ट रूप से पाँच रसों को शृंगारमक तथा चार रसों को दु:खात्मक यह कह कर रसों को दो मार्गों में विभक्त कर दिया है। मत: शुनका मत विमज्यवादी मत कहा जा सकता है।

९. हमारा प्रश्न जहाँ रामचन्द्र-गुणचन्द्र भामिनीविलास में घाघ है, शान्तरस का प्रकटया है।

शृङ्गार-हास्य-करुण-रोद्र-वीर-भयानकाः । वीभत्साद्भुतसंसर्गी शांतरष: स्मृतः ॥ [नाट्यशास्त्र -१४]

इस भरतवचन के प्राधार पर अनेक विद्वान् नाटक में शांतरस को रिष्यति मानते थे। किन्तु भामिनीविलास भादि अनेक विद्वानों के मतानुसार इस भरत-वचन के उत्तरार्ध का पाठ 'वीभत्साद्भुतसंश्रयी शांतरष: स्मृतः' इस प्रकार है। भामिनीविलास के नाट्यदर्पण ने छठे अध्याय पर 'भामिनीविलासतो' ध्याख्या लिसते हुए वत्के ग्रन्थ में बहुत विस्तार के साथ शान्तरस का विवेचन किया है। उन्होंने पूर्वं नाट्यशास्त्र के दूसरे ग्रन्थ में बहुत विस्तार के साथ शान्तरस का विवेचन किया है। उन्होंने पूर्वं नाट्यशास्त्र के दूसरे अध्याय में शान्तरस को नाट्यरस माना है। और उक्त भरत वचन में पाटान्तर के

शृङ्गार-हास्य-करुण-रोद्र-वीर-भयानकाः । वीभत्साद्भुतसंश्रयी नव मातृये रस: स्मृतः ॥

उद्भट ने भी शान्त रस को माना है। बल्कि उद्भट ने एक प्रेमान्त रस हो जो शांतरस को संश्रया कर दो है। उनका स्तोत्र निम्न प्रकार है-

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शृङ्गार-वीर-करुणादि-वीभत्स-रभयानकाद्भुता हास्यः । रोद्र-वान्तः श्रेयानिति मन्तव्याः रसाः नव ॥

आठ रसों को मान कर शान्तरस का सण्ङन करने वालो में दशरूपककार धनञ्जय प्रोर उनके टीकाकार धनिक का नाम विशेष रूप से उल्लेख-योग्य है । धनञ्जय ने लिखा है— रामस्य कोचित्त प्राहुः पुष्टिंनिरूपितेयुपु नंतस्य । निर्वेदादिरतस्याप्यादस्पायी स्वदते करयम् । वैरस्याप्येव लत्पोषपतेःमग्रो स्पामिनो मवः ॥

अयं शान्तो रसः ।

इसीको व्याख्या करते हुए धनिक ने लिखा है— "अयं शान्तः प्रति वादिनामनेकविधा विप्रतिपत्तयः । केचिताः नास्त्येव शान्तो रसः । तस्यायोगेऽपि प्रतिपादनाल्लक्षयात्कारयाव् । अथ्ये तु घस्तुतस्तद्यभाव वसंयन्ति । मनादिकालप्रवाहितातराग्रे प्योरुच्यते स्मरस्यात्तावाद् । अथये तु वीरबीभत्सादाशान्तर्भाव वरसंयत्नि । एव वदन्तः तमपि नैच्छुन्निति । यथातथा मस्तु । सर्वथा नाटकादौ ग्रभिनयात्तमनुसन्धेयः । तथ्य समस्तव्यापारप्रविलवहरपस्य प्रभिनययोग्यत्वात् ।

शृङ्गारहास्यकरुणाः, रौद्रवीरभयानकाः । वीभत्साद्भुतशांतश्च, रसाः सन्त्रिनव स्मृताः ॥

दशरूपककार के शान्तरस के विरोधी होने पर भी नाट्यशास्त्र के प्रमुख व्याख्याता उद्भट, मृदुनाथक, प्रभिनवगुप्त प्रादि ने शान्तरस को सत्ता स्वीकार की है मोर उसे नाट्यरस माना है इसलिये उसका निपेध करना उचित नही है । नाटघदर्पकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र मी इस विषय में प्रभिनवगुप्त के साथ है । रस के जेद करते हुए उन्होंने लिखा है—

(३) शान्तरस की सिथापति के बाद तीसरा प्रशन शान्तरस में स्थायीभाव क्या है ? शान्तरस का स्पायिभाव क्या है ? इस विषय में घनेक मत पाए जाते हैं । मम्मट ने 'निवेद' को शान्तरस का स्पायिभाव बतलाते हुए 'निवेदादस्पायिभावोऽस्रित शान्तोऽपि नवमो रसः' [काव्य प्र० सूत्र ७०, का० ३५] । भरतमुनि ने ध्यभिचारिभावों की गणना कराते समय 'निवेद' को सबसे पहिला ध्यभिचारी भाव गिनाया है । तब उसे शान्तरस का स्थायीभाव कैस कहा जा सकता है ? यह शंका हो सकती है । इस बात को मन में रख कर काव्यप्रकाशकार मम्मट ने उसका समाधान करने का यत्न किया है । उनका कहना है कि 'निवेद' स्वरूपतः श्रमङ्गल रूप है । उसको व्यभिचारिभावों की गणना में सबसे पहिले नही गिनना चाहिए था । किन्तु भरत मुनि ने उस प्रमुखालिक 'निवेद' का जो सबसे पहिले प्रहण किया है, वह इसलिये किया है कि 'निवेद' एक ऐसा भाव है जो व्यभिचारिभावों में परिस्फुट होने पर शान्तरस का स्थायिभाव है । उसकी सिथायिता की सूचना के लिये ही भरत मुनि ने 'निवेद' का ग्रहण सबसे पहिले किया है । मम्मट ने अपने इस प्रभिप्राय को निम्न प्रकार से प्रकट किया—

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निवेदस्यामज्ज्ञसप्रायस्य प्रथममनुपादेयत्वेऽपि उपादानं व्यभिचारित्वेऽपि स्थापयितार-डिभघानार्थं ।

सङ्जीतरत्नाकर में भोज इसी युक्तिक्रम से निवेद को शान्त रस का स्थायिभाव सिद्ध करते हुए लिखा है— वर्त्तिष्य स्वापिनः प्राप्ते समये व्यभिचारिणाम् । प्रमज्जलमपि ऋते पूर्वं निवेदमेव यतः ।। मुनिमनेरस्प चानूनं स्थापिता-व्यभिचारते । पूर्वापरान्वयो हस्य मध्यस्थस्यानुपपत्तितः ।। [सङ्जीतरत्नाकर १३५-१३६] नाटयदर्पणकार इस बात को नहीं मानते हैं । उनके मत में ‘निवेद’ केवल व्यभिचारिभाव है, स्थायिभाव नहीं है । इसलिए उसे शान्तरस का स्थायिभाव नहीं कहा जा सकता है । उन्होंने लिखा है— "अथ च [निवेदः] रसेप्वनियतत्वात् कादाचित्कत्वाच्च व्यभिचारी, न रसाधयो ।" [नाटयदर्पण ३-२५] भामिनवगुप्त ने भी निवेद को शान्तरस का स्थायिभाव नहीं माना है । उन्होंने विस्तार पूर्वक इसका सण्डन करते हुए अभिनवभारती में पृ० ६१३-६१७ तक इसका विवेचन किया है । उसके अभिमत में लिखा है कि— "ततरच वस्त्वज्ञानमेवेदं तत्वज्ञानमालया परिणोप्यमाणे मिति न निवेदः स्थायी, किन्तु वस्त्वाममेव स्पायोति मवेत् ।" [अभिनवभारती पृ० ६१७] इससे यह स्पष्ट है कि युक्तिक्रम के मिन्न होने पर भी निवेद शान्तरस का स्थायिभाव नहीं है । इस विषय में नाटयदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र व भामिनव गुप्त के साध्य में नाटप व दर्पण का विषय— रामचन्द्र गुणचन्द्र ने अपने ‘नाटयप्रदर्पण’ ग्रन्थ की रचना यद्यपि भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के आधार पर की है किन्तु इन दोनों में बहुत अन्तर है । नाटप शास्त्र ३६ अध्यायों का एक विशाल विद्वकोप है जिसमें प्रायः सभी ललित कलाओं का व साहित्य का पाथा जाता है । उसके सामने ‘नाटयदर्पण’ बहुत छोटा सा ग्रन्थ है । इसमें नाटयशास्त्र के केवल १८वें अध्याय में वर्णित विषय का ही प्रतिपादन किया गया है । नाटय शास्त्र के १९वें अध्याय वा ‘दशरूपक-निरूपणाध्याय’ है । इसमें १ मुख, २ प्रतिमुख, ३ गर्भ, ४ विमर्श, ५ निर्वहण ये पाँच सन्धियाँ तथा ६० वृत्तियाँ हैं दश प्रकरण के लक्षणों का वर्णन किया गया है । इसी अध्याय के आधार पर धनञ्जय ने ‘दशारूपक’ को रचना की थी प्रो० सुशी के आधार पर रामचन्द्र गुणचन्द्र ने ‘नाटयदर्पण’

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भनपोच ,वन्धयोगादेको मेद: प्रयोक्तृभिर्यप: । प्रकारतस्त्वतरौ वा नाट्योक्तौ कार्ये काव्ये ॥

मेद नाटक तथा प्रकरण इन दोनों में मिश्रण से बने होते हैं । भरत मुनि ने इनका विधान निम्न श्लोक में किया है — भनपोच ,वन्धयोगादेको मेद: प्रयोक्तृभिर्यप: । प्रकारतस्त्वतरौ वा नाट्योक्तौ कार्ये काव्ये ॥ [नाट्यशास्त्र १५, ४७] श्लोक का प्रथम कुद्ध अर्थ स्पष्ट है किन्तु इसका यह गौणप्राय प्रतीत होता है कि नाटक तथ। प्रकरण इन दोनों के योग से एक नाटिका या नाटी नाम से प्रसिद्ध मेद सम्भवना चाहिए । ये मेदो 'नाटी' नाम से कहे जाते हैं।

भनपोच वन्धयोगादेको मेद: प्रयोक्तृभिर्यप: । प्रकारतस्त्वतरौ वा नाट्योक्तश्रिते काव्ये ॥

इस श्लोक की गौणप्रता के कारण कुछ लोग 'नाटिका' तथा 'प्रकरखी' दो सद्दूरकृत मेद मानते हैं और कुद लोग दोनों के सदृर से बना हुमा केवल एक सद्दूरकृत मेद मानते हैं और उसे 'नाटी' या 'नाटिका' नाम से कहते हैं । दशारुककार धनन्जय 'नाटिका' रूप केवल एक सद्दूरों मेद मानते हैं और 'नाट्यदर्पणकार' 'नाटिका' तथा 'प्रकरखी' रूप दो सद्दूरकृत मेद मानते हैं । दशरूपक की व्याख्या करने वाले धनिक ने दो मेद मानते हुये स्पष्टीकरण किया है — 'अत्र केचित्— भनपोच वन्धयोगादेको मेद: प्रयोक्तृभिर्यप: । प्रकारतस्त्वतरौ वा नाट्योक्तश्रिते काव्ये ॥ "इत्यपु' भरतौः श्लोकं, 'एको मेद: प्रकारतो नाटिकादृय:, इतरेतवप्रक्यात: प्रकरणिकालक्षण-मिप्रानात् । समानलक्षणयदृवे वा मेदाभावात् । रसु-रस-नायकानां प्रकरणामेदादपि प्रकरणिकाया: । मनोज्ञदृश्राया नाटिकाया यन्मुनिना लक्षणं इततं तन्रायमभिप्राय:—श्रुदलसख्या-श्रृङ्गारदेश तललक्षणयै: शेषैरपि लक्षणै: सततं युक्तं निमित्तं विश्रयते ।"

इसका गौणप्राय यह है कि 'भनपोच वन्धयोगादि' इत्यादि भरतमुनि के श्लोक के प्रावार पर कुछ लोग नाटिका मौर प्रकरणी दो सद्दूरकृत मेद मानते हैं । किन्तु उनकी यह मान्यता अस्वीकृत है । इसके चार कारण हैं — १. आधिका तथा प्रकरणी नाम से दो भलग-भलग मेदो का उल्लेख भरवमुनि ने कहीं भी नहीं किया है । २. यदि नाटिका तथा प्रकरणी दोनों का लक्षण एक सा ही माना जाय तो उनमें मेद नहीं रहता है । ३. प्रकरणी का अलग मेद मानने वाले चसका जो लक्षण करते हैं उसके मनुसार 'प्रकरणी' की वृत्ति, रस श्रोर नायक सब 'प्रकरण' के समान होते हैं इसलिए उसे 'प्रकरणी' से अलग मानना असंगत हो जाता है । इसलिए प्रारम्म में कवित 'इदिते' न होने पर भी भरतमुनि ने 'नाटिका' का जो लक्षण किया है उसका यह गौणप्राय है कि सद्दूरमेदों में से केवल एक 'नाटिका' की वृत्ति करनी चाहिए ।

एव प्रकरणी किन्नु नेता प्रकरणोदित: ।

'एव प्रकरणी किन्नु नेता प्रकरणोदित:' । मर्थात् नाटिका के समान चतुरङ्गादि धर्मो से युक्त 'प्रकरणी' होती है । किन्तु इस में मेद यह है कि नाटकोक्त नायक के स्थान पर प्रकलोक्त नायिकादि नायक होना

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हैं। इस नायक-भेद के कारण ही इसके नाम का भेद हो जाता है। 'नायकानुसारितत्वाद् मवंबवबहुयाताम्' यहाँ नायक के अनुरूप ही नायक के भेद होते हैं। इसीप्रकार प्रकरणोक्त नायक होने के कारण चतुरज्ज्ञ प्रादि धर्मो से युक्त रूपक भेद को 'प्रकरसी' कहते हैं। यह प्रन्यकाकार मति प्रतिपाद्य है। इस प्रकार नाट्यदर्पण में १० मुख्य रूपक तथा नाटिका एवं प्रकरणी रूप दो सद्दियोंं भेदों को मिलाकर कुल १२ प्रकार के रूपकों का वर्णन किया गया है।

दशरूपककार धनञ्जय ने दश प्रकार के मुख्य रूपकों के साथ 'नाटिका' रूप एवं सद्दियोंं भेद को मिला कर १८ रूपकों का निरूपण किया है। फिर भी उन्होंने अपने प्रन्य का नाम 'दशारूपक' ही रखा है। इसकता कारण कुछ तो भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में १४वें अध्याय के लिए प्रयुक्त होने वाला 'दशारूपकनिरूपणाध्याय' नाम है। उसमें भी नाटिका सहित १८ भेदों का निरूपण होने पर भी उसका नाम 'दशरूपकनिरूपणाध्याय' रखा गया है। उसीके अनुरूप धनञ्जय ने भी अपने प्रन्य का नाम 'दशरूपक' रखा है। इसके साथ ध्वान्तिम माधन के अनुसार विश्वु

"दशरूपकान्वयेहस्य माझान्ति मावनः। नमः सर्वविदे तस्मै विद्यानये भरताय च ।"

[दशरूपक १, ३७]

जिस प्रकार यहाँ धनञ्जय ने रूपकों की दश संख्या का अपने दृष्ट देव विप्पु (धनञ्जय के पिता का नाम श्री विष्णु ही था) के प्रति व्रित्य हेतु किया। वे इस प्रवक्ताओं के साथ सम्बन्ध जोड़ कर अपनी धार्मिक भावुकता वा परितोष दिखा है, इसी प्रकार नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने रूपकों की दश संख्या जोड़ कर अपने धर्म में प्रतिपादित माधार से लेकर ह्रस्विदाद-पयंत द्वादश मज्जूषा में साथ सर्वबन्ध जोड़ कर हो अपना मङ्गलाचरण इसोक लिखा है—

"शतुवं गेंकलं नित्यं जैनो वाचमुपास्महे । ह्रपंहादशाभिवंद्य यया नान्ये पृथं वयम् ।"

[नाट्यदपंण १-१]

इस प्रकार दश मे स्थान पर १२ रूपक भेदों का त्रिस्पष्ट नाट्यदर्पण वा प्रतिपाद्य विषय है। हम विषय का प्रतिपादन करने के लिए प्रन्यकाकार ने अपने प्रन्य को चार मार्गों में विभक्त किया है। उन्हें 'विवेक' नाम से निर्दिष्ट किया है। प्रथम विवेक में उग्होंने केवल नाटक का निरूपण किया है। द्वितीय विवेक में 'प्रकरगा' प्रादि होकर १८ रूपक भेदों का निरूपण किया है। इस प्रकार अपने मुख्य प्रतिपाद्य विषय धर्मान्त दश रूपकों के सदृश्यों का प्रतिपादन उग्होंनें दो विवेकों में हो कर दिया है। उमके बाद तृतीय विवेक में नाटप से सम्बद्ध वृत्ति, रस, भाव मोर पमिनय आदि

विवेचन किया है, जोर चतुर्थ विवेक में कुछ ऐसी बातों को चर्चा की है जो सारे रूपकों में समान रूप से उपयोग में लाने वाली है। इससिए इस विवेक का नाम 'सर्वहपसाधारगालसद्भावनिरूपणं' रखा गया है। दशरूपककार धनञ्जय ने नाटक के प्रतिरिक्त अन्य रूप भेदों के निरूपण में बहुत संक्षेप से काम लिया है। प्रारम्भिक रूपकों का निरूपण उग्होंने दो चार श्लोकों में ही। समाप्त कर दिया है। नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र गुणचन्द्र ने नाटक के समान अन्य अठारह भेदों का

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नाट्यदर्पण के उदाहरण— नाट्यदर्पण का विषय-प्रतिपादन जैसे धनञ्जयक वो प्रपेञ्च प्रकार विदादू मोर विस्तृत है, इसो प्रकार तसके उदाहरणों का ढेर भी दनञ्जयक वो प्रपेञ्च कहियो प्रकार व्याप्तक है । रामचन्द्र गुणाचन्द्र ने अपने प्रतिपाद्य विषय के स्पष्टीकरण के लिए इस ग्रन्थ में जो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं वे प्रायः ६३ नाटकों से लिए गए हैं । इन ६३ नाटकों की सूची बहुत लम्बी है । धनञ्जयक में यह बात कही है ? इन ६३ नाटकोंमे ११ नाटक हो स्वयं रामचन्द्र के अपने बनाए हुए नाटक हैं । अभिनवमति के (१२) उत्तर रामचरित (१३) महावीर चरित प्रोद (१४) मालती माधव दोनों नाटक इस सूची में उपनिबद्ध है । इसो प्रकार कालिदास के (१५) अभिज्ञान शाकुन्तलम्, (१६) विक्रमोर्वशीय तथा (१७) मालविकाग्निमित्र इन तीनों नाटकों के उदाहरण इसमें प्रस्तुत किए गए हैं । यह बात विशेष रूप से उल्लेख योग्य है कि इसमें 'मालविकाग्निमित्र' का नाम सचन्द्र 'मालतिकाग्निमित्र' दिया गया है । विश्वनाथ कविराज (१८) मुदारराक्षस नाटक के साथ उनके (१९) देवीचन्द्र गुप्त नाटक के सदाहरण भी इसमें दिए गए हैं । मुरारिकवि के (२०) अनङ्गराघव, श्रीहर्ष के (२१) नागानन्द, मोर (२२) रत्नावली, (२३) प्रियदर्शिका के मुख्यक नाटक, (२४) मट्ट नारायण के वेणीसंहार के उदाहरण भी दिए गए हैं । (२५) भास के स्वप्नवासवदत्तम् तथा (२६) दरिद्रचारुदत्तम् नाटकों का उल्लेख इसमें आया है । इसमें विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि भास के स्वप्नवासवदत्तम् से 'वादाक्रान्ताऽनि गुप्तनायिका' इत्यादि एक ही दलोक [क० ४३ में घनुमान के उदाहरणरूप में] दिया गया है किन्तु इनकी 'स्वप्नवासवदत्तम्' के वतमान मुद्रित संस्करणों में नहीं पाया जाता है । और दो-एक के उदाहरण भी मिले हैं । रामचन्द्र गुणाचन्द्र ने इसे 'वीरराघव' की रचना बतलाया है जव कि वर्तमान उपनिबद्ध 'कुन्दमाला' नाटक दिङ्नाग की कृति है । सम्भव है दिङ्नाग वा हो दूसरा नाम 'वीरराघव' हो । माधुक के (२७) 'चित्रलेखालङ्कारितम्' नाटक के उदाहरण भी इसमें दिए गए हैं । पता नहीं यह माधुक भरत के व्याख्याकार माधुक हैं या कोई दूसरे । वाणभट्ट को (२८) कादम्बरी, (३०) कालिदास के कुमारसम्भव, माघकवि की (३१) शिशुपालवध, माघ के (३२) महाभारत प्रोद अतुसंमेध के (३३) हमप्रीतवंश के उदाहरण भी दिए गए हैं । ये ३३ ग्रन्थ तो प्राप्त: प्रतिष्ठित ग्रन्थ हैं । किन्तु इनके प्रतिरिक्त प्रायः ३० ऐसे ग्रन्यों के उदाहरण भी रामचन्द्र गुणाचन्द्र ने अपने इस नाट्यदर्पण में प्रस्तुत किए हैं जो अत्यन्त अप्रसिद्ध है और अब तक प्रकाशित नहीं हुए हैं । उनका कुछ थोड़ा सा परिचय देना आवश्यक है । अतः हम इनका सामान्य परिचय नीचे दे रहे हैं ।

१. प्रनङ्ग्रवती नाटिका—नाट्यदर्पण के तुलीय भनुरूद्धेद के प्रारम्भ में दूसरी कारिका को व्याख्या में पूर्ववर्ती के ग्रन्थ में 'स्थापक' द्वारा 'प्रामुख' के प्रतिपादन के उदाहरण के लिए "तथा च 'प्रनङ्ग्रवती' नाटिकायाम्" इहस्पते 'पूर्वंरङ्गंते स्थापक' इति" इस रूप में प्रनङ्ग्रवती 'नाटिका' का उल्लेख केवल एक बार किया गया है । भोर कहो भी इसका उल्लेख नहीं मिलता है । इसका निर्माण किसने मोर कब किया इसका परिचय प्राप्त होना सम्भव नहीं है । ग्रन्थ के मलम्भ होने से इसकी कपावस्तु का भी पता नहीं चल सकता है ।

भोज के 'शृङ्गारप्रकाश' [११-१४०] हेमचन्द्र के 'काव्यानुशासन' [४,३३५] तथा चारुदत्तनय के 'भावप्रकाशन' [पृ० २६५ पङ्कि ९] में 'प्रनङ्ग्रवती' का उल्लेख तिस्स प्रकार मिलता है—

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"शुद्रकथा मन्युल्लो येदु महाग्राष्ट्रमापया मवति । गोरोचनेच कार्यां सानझूवतीव वा कविविभः ।।"

इन तीनो ग्रन्थो में जिस 'मनागवतो' का उल्लेख मिलता है वह नाट्यदर्पण में वदृत 'मनागवतो' नाटिका से मिलता कोर्द्ध और हीी चीज है । क्योंकि 'नाट्यदपंष' की 'मनगवती नाटिका' जैनां कि उसके 'पूर्वरागान्ते स्वापक' इस उद्तराण से प्रतीत होता है । सर्वत्र मापा में लिस्सो गई गोरो श्युगारप्रकानि' मादि तीनो ग्रन्थो में चत्ल्लिस्थित 'गोगेचना मनगवती' महाराष्ट्र प्रेत मापा: में लिस्सो हुई कोर्द्ध शुद्र कथा है जिसे महाराष्ट्र भापा में 'मगुबनी' बहते है । इस लिए नाट्पदपंष' की मनगवती नाटिका' उससे बिल्कुल मिन्न है । सेमेद्र की 'बृहत्कथामञ्जरी' [५ ८८.१८] में एक मनगवती के चरित्र का उल्सेख मिलता है । सम्भव है कि 'नाट्यदपंष' वाले 'मनगवती नाटिका' की रचना इसी कथा से प्राधार पर ली गई हो, और जैसे उदयनत-वासवदत्ता की कथा ने पापार पर मनेक नाटको की रचना हुई है इसी प्रकार 'मनागवती' की यह कथा भी महाराष्ट्र श्री प्रेत मापा में शुद्र कथा ने रूप में प्रसिद्ध हुई हो। इस सबके होने पर भी 'नाट्पदर्पण' की 'मनगवती नाटिका' के कर्ता वादि वा विषय बिल्कुल अनघारार में रहता है ।

"प्रेतमहाराष्ट्रभापया शुद्रकथा गोरोचनाङ्कितवत्यादितत् मन्यल्लिका । शुद्र कथा मन्यलनी प्रेत महाराष्ट्रभापया मवति । गोरोचनेच कार्यां सानझूवक्ती वाफंपेटो [कवि] विभः ।।"

२ मनगवतीनाहृदिन्द्रमपवरकम्—नाट्पदर्पण के प्रपम विवेक में 'प्रमदां सनिप' मे पत्त यो प्रगा दान' के निलरपषा में प्रणपार ने— "यथा श्री मुक्तिसासकुमारविरचिते धनङ्गसेनाहृदिन्दिनि प्रदरेए नवमेऽद्रे राजपुन चन्द्रकेतनादि कर्गाविष्कारायासव रचिता मापल्य नाटकमा नेपितम ।"

"यथा श्री मुक्तिसासकुमारविरचिते धनङ्गसेनाहृदिन्दिनि प्रदरेए नवमेऽद्रे राजपुन चन्द्रकेतनादि कर्गाविष्कारायासव रचिता मापल्य नाटकमा नेपितम ।"

हरशद हर में 'घनगसेता-हृदिन्द्रमपवरकम्' का उल्तेस किया है, और से 'मुक्तिसास कुमार' की दृति वतलाया है । किन्तु ये मुक्तिसाहकुमार' कोन है ? इसवा मुल्क पता महीं चलता है । इसतिए उनके पाल मादि का निलचय महीं दिया जा सकता है ।

"यथा द्वीरसामिमद्रविच्चेउदिनवरपदे— रसापत्: (उदयंष) पामो ! विरसम समुमम् । पस्त्रयेय राजपमहोनरप पवित्र, वाम्यप्रकायपतना प्रतिद्वप्रपाम्न: । पुष्ट दुर्गादि पराशिवेममुद्रनेप्म, वीरस्य माटकमन्स्यचमानभारम ।"

१. प्रभिनवरापयमु—नाट्पदपंष मे पृतीय विवेक में 'प्ररोचना' के मदारे के प्रसंग मे प्रणपार ने निल्न प्रदार से केवल एक बार इस नाटक का उल्तेस किया है—

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मट्टेन्दुराजनचिरान्जनतताऽभिवास, हृदयशुनोऽपि ननवगुप्तपदाऽऽमिघोज्ज्वम् । वत्स ! कौतुकवशेनुरसूनु स्मुटप्यामि मत्वा— लोकसुलोचन-नियोजनगत जाहृपम् ॥

यहां नाट्यदर्पणकार ने कोई उल्लेख नहीं किया है किन्तु इसके निर्माता धनञ्जयलोककार प्रानन्दवर्धन हैं। यह प्रानन्दवर्धन का लिखा एक महाकाव्य है। श्रानन्दवर्धन ने अपने 'धनञ्जलोक' में दो बार इसका उल्लेख निम्न प्रकार किया है— 'वाचस्त्रिषयं हि नवरात्रवशेन नायकृत्य भयपराक्रान्ताविसम्मत्त सुनरामयुयोतिता मवन्ति । यथा मदोये म्रजुंननचारिते म्रजुनस्य पावालावतरगाऽप्रसृज्यो वैचद्येन प्रदर्शितम् ।'

समुत्थिते पतथर्वणोऽपि भयावहे किरेऽटति । महानुपलब्धभवत् पुरे पुरन्दरद्विपाम् ॥ प्रस्तुत नाटकस्य वीरः प्रतिप्लवहास्याम तु सयानकः ।'

प्रानन्दवर्धन का यह म्रजुननचारित नाटक नहीं रचित महाकाव्य है। इस बात का उल्लेख भी धनञ्जय ने स्वयम् हो किया है— "यथा च मदोयेऽपि म्रजुंन चरिते महाकाव्ये × × × ×" उद्रट के 'काव्यालङ्कार-वृत्ति' टीका में 'नीलि साधु' ने 'म्रजुननचारित प्रानन्दवर्धनोक्त-काव्यम्' कह कर म्रजुननचारित को प्राकृत का काव्य बताया है। किन्तु उनका

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यह कथन ठीक नहीं है। जो इलोक यहाँ मातङ्गवरपण्डितार ने उद्धृत किया है वह संस्कृत का पद्य है। इसलिए यह स्पष्ट है कि ग्रञ्जुनचारील प्रानन्दवर्धनाचार्य का संस्कृत महाकाव्य है। नमिसाधु ने बिना देखे ही अनुमान से उसे प्राकृत काव्य कह दिया है। यह काव्य इस समय उपलब्ध नहीं है, इसलिए उसका नाम प्रभ्रमिद्ध ग्रन्थों की सूची में दिया है।

(५) इन्दुलेखानाटिका—नाट्यदर्पण के प्रथम विवेक में निवंह्रा संज्ञा के काव्य-सहकार नामक भेद के निर्देश के प्रसङ्ग में [का०रि० ६१] ग्रन्थकार ने इन्दुलेखा नाटिका का एक प्राकृत भाग उद्धृत किया है। [ना० द० १० १६४] किन्तु इस नाटिका का कर्ता कौन है ? इसका कोई परिचय कहीं तक उपलब्ध नहीं हुआ है।

(६) इन्दुलेखावीथी—नाट्यदर्पण के द्वितीय विवेक में 'वीथी' के पांचवें भेद् 'त्रिगत' [का० ३७] के निर्देश के प्रसङ्ग में—

यथो इन्दुलेहाओ बीर्या राजा-वयस्स ! कि तु कलहमनादो, मधुरो मधुराभिनउ मकार । हृदयगृृद्देवतायास्तस्या मु समूगरस्चरितः ॥ इति"

यह एक इलोक उद्धृत किया है। महाराज भोज ने 'शृङ्गार प्रकाश' [१२-१६वाँ] तथा धारादित्य ने 'भावप्रकाशन' [माधि० ५, पृ० २८२] में भी यहाँ पद्य इसी नाम से उद्धृत किया गया है। किन्तु 'भावप्रकाशन' में 'हृदयागतदेवताया' ने स्पष्म पर 'हृदयगृृद्देवताया' पाठ दिया गया है। नाट्यदर्पण तथा शृङ्गारप्रकाश का पाठ एक ही है, और प्रधिन मच्चे पाठ है। ज्ञात कि नाम से हो प्रथट है कि 'इन्दुलेखा नाटिका' तथा 'इन्दुलेखा वीथी' एद् ही क्यात्मक पर ऊपर लिखे हुये दो भलग ग्रन्थ हैं। किन्तु दोनो में से किसी के भी कर्ता का पता नहीं मिलता है।

(७) उदयनचरितम्—नाटघदर्पण के तृतीय विवेक में मारमती वृत्ति में निश्र्रय के 'छद्म' के उदाहरण रूप में उदयनचरिते किलिज्जहरिस्तप्रयोग। (पृ० १८०) इस रूप में 'उदयनचरित' का उल्लेख किया है। 'दशरूपक' को 'मल्लोक' टीका में [२१ ४३], और राहवभट्ट [९-१३५] में भी इसी रूप में उदयनचरित का उल्लेख किया गया है। वैसे उदयन की क्या संस्कृत साहित्य में अत्यन्त प्रसिद्ध और वड़ी चावचक कया है। मूलतः उदयन का चरित वृहत्कथा से लिया गया है, और उसके आधार पर अनेक नाटकों की रचना हुई है। सम्भव है उसमें प्रथकार पर 'उदयनचरित' नामक किसी नाटक की रचना हुई हो। पर वह न उपलब् है और न उसके कर्ता का मोर्दि पता चलता है। यहाँ जिस रूप में उसका उल्लेख हुमा है उससे कसी विप्रप नाटक के रूप में नहीं, अपितु सामान्य रूप से उदयन-चरितम्* उदयनचरित क्या प्रथवा भरन से मो काम चलता है। वैसे भामह के 'काव्यालङ्कार' में [विजिगीषु पुरुषस्य वलवद् वीररन्तनमः] [६-३६], वामनिदास के मेवदूत में 'प्रस्याततीमोदयनकथारोविदपामवृन्दान्', माशायं हरिमद्रुमूर्ति 'भावरम्य मूर्त्तिवृति' में [पृ० ६६-६७, ६७३, ६७४], माधायं हेमचन्द्र विरचित् त्रिपिटकसारावलीपुरुषचरिते' [पद्यं० १० व ११ ८४-८६२], सोमप्रभ में 'कुमारपालप्रतिबोध' [पृ० ५०-५२] आदि जैन-ग्रन्थों में भी समान रूप से उदयन को क्या का उल्लेख मिलता है। यह वात इस कथा को भरयन्त लोकप्रियता की सूचक है।

(८) उदयनसौभम्—नाटघदर्पण में 'उदात्तरागम्' नाटक में उसका उल्लेख तीन वार किया गया है। पहली वार प्रथम विवेक को ४५ वों कारिका की व्याख्या में, दूसरी वार

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प्रथम विवेक को बिल्कुल समाप्त कर प्रौर तोसरीं वार चतुयं विवेक की द्वितीय कारिका को व्याख्या में। दशारुपक' के ग्रालोचक-आलोकार ने तृतीय प्रकार की २५वीं कारिका की व्याख्या में 'यथा दृश्यतां वारिधिग्धो मायुराजेन उदात्तराधवं परित्यकृतः', इस रूप में उदात्तराधव का उल्लेख करते हुए उमे मायुराज की कृति बनाया है। 'दक्षोक्तिजीवित-कार' कुन्तक ने भी 'यथा उदात्तराधवे कविना वेदश्रुतदर्शन-मार्गाप प्रयाततयप लक्म्मीरूपं परित्रायाथं सीतया कातरतवन्तं रामः प्रेरित इत्युपनिबदध्रमू' इस रूप में 'उदात्तराधव' का उल्लेख किया है। इन दोनों उल्लेखों से यह्ह स्पष्ट प्रतीत होता है कि इसे 'उदात्तराधव' के कवि ने रामकावस्तु में नये सँशोधन किए हैं। इसलिए कुन्तक ने लिखा भी है [क—

यथा (एकस्यामेव दाशारिकरायां) राममुख्युदय-उदात्तराधव-वीरचरित-वालरामायण-कृतयारावण्या-मायापुष्पकप्रभृतयः। ते हि प्रवन्धप्रवरारस्तेनैव कयामार्गेण निरङ्कुशरासारगम्भ-सम्पदा प्रतिपदं प्रतिवाक्यं च प्रकाङ्क्षमार्गामिनववधूवत् -X X X हृद्यान्तिरेकमनेकरोऽप्यस्खादवदमानः समुत्पादयन्ति सहृदयानाम् ।

दशारुपकावलोक' में [३-४६, ३-३१, ४-२३, २८] उदात्तराधव के तीन श्लोक भी उद्धृत किए गए हैं। विश्वनाथ ने 'साहित्यदर्पण' [परि० ६, श्लोक २७, ४०, १४४] में इसके श्लोक उद्धरण किए हैं। भोजदेव के 'शृङ्गारप्रकाश' [पृ० ११२], सरस्वती कण्ठाभरण [पृ० ६४५], हेमचन्द्राचार्य के 'काव्यानुशासन' को स्वोपज्ञ मलयारचूडामणिर्वृत्ति [पृ० १५०] में भी इसके उदाहररएा दिए गए हैं। इससे यह नाटक प्रस्तुत लोक प्रिय रहा प्रतीत होता है। राजशेखर ने 'मायुराज' को कल्हुरि वंश का कवि कहा है। ऐसा कल्हुरि-सँग्रहीत 'शृङ्गारमुक्तावली' के निम्न श्लोक से प्रतीत होता है—

राजशेखर— मायुराजसमो जातो नान्यः फलधुरिः कविः । उदयवतः समुत्तस्यः कवित वा तुहिनाश्रवः ॥

इस प्रकार बहुम्रसंसिक्त, बहुग्रन्थसक्त मह् उदात्तराधव नाटक निर्देश्य हो प्रत्यन्त उच्चकोटि का नाटक रहा होगा, किन्तु दुर्भाग्य से इस समय यह् उपलब्ध नहीं हो रहा है।

(९) कृत्यारावण-नाट्यरपचार ने कृत्यारावण के १३ उदाहरण इस ग्रन्थ में दिए हैं। इसके 'ग्रामुख' में से 'प्रबन्धनिति' का उदाहरण [२-३६], प्रथम ग्रदृ से 'प्रतिबल' का उदाहररएा [२-९१] द्वितीय ग्रदृ से 'यथ' का उदाहरण [१-४०], चतुर्थ ग्रदृ से 'प्रायपन्ता' वा उदाहररएा [१-२३], पञ्चम ग्रदृ से 'विन्द्रव' का उदाहरण [१-४३], और सप्तम ग्रदृ से 'विरोध' और 'तात्कि' के उदाहरण में [१-४६. ४०] व उदाहररएा वो ग्रदृ-निर्देश पूर्वंक उद्धृत किए हैं। इनके प्रतिरिक्त हर, युक्ति, छेद, माधय, मार्मट-मुक्ति, म्रद्रकोप्यम् इस ६ के उदाहरण मट्टोलेनल के बिना दिए है। इस प्रकार भवेवस नाटकल्पषा' में १३ वार 'कृत्यारावएा' नाटक वा उल्लेख हुवा है। इसके प्रतिरिक्त प्रभिनयुग्त वो प्रभिनवमारतीय [म० १= पृ० ४१०, पृ० ५० पृ० १०३-१०४, म० ३२ पृ० १०६ ह त० २, पृ० ४३, ४२३. ४२६ त० ३ पृ० १३, ७०] में ५ जगह भोजदेव के 'श्रृङ्गारप्रकाश' में प्र० १२, १५७, १६७, २०० तीन जगह, हेमचन्द्राचार्य के 'काव्यानुशासन-प्रदीप' में एक जगह [म० ६, पृ० २७९] सारसवतय के 'भाव-

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यथा प्रमात्रकुकविरचिते चित्रोपप्लावलसद्भतके प्रकरणे पश्चमेडङ्के नेपथ्ये सचीत्कारम्-

"यथा प्रमात्रकुकविरचिते चित्रोपप्लावलसद्भतके प्रकरणे पश्चमेऽङ्के नेपथ्ये सचीत्कारम्-" हर्षवर्द्धन के श्लोक में 'चित्रोपप्लावलसद्भतक' प्रकरण को प्रमात्रकुक् कवि की कृति प्रतिपादित किया है। शकुक का नाम तो साहित्यशास्त्र के इतिहास में अत्यन्त प्रसिद्ध है। काव्यप्रकाशकार ने रस-निरूपण के प्रसङ्ग में चतुर्थ उल्लास में, अभिनवगुप्त ने 'अभिनवभारती' में प्रवेश द्वार दाकुक का नाम उल्लेख किया है। किन्तु सब जगह उनके मत का सङ्कलन ही किया गया है। वदाङ्गरूयपं- तेन शकुकादिमि × × × सुप्यो बहत्तरमुपन्यासतम्। [प्र० २ पू० ६७] धङ्करत्वाह × × एतदप्यसत्। [प्र० ६, २७४] यथवम् शकुकेनोक्त × × × तदसत् [प्र० ६, २८२] इति श्रीनुकु। एतच्च पूर्वोदाहृतस्मरयाजिज्ञासितमसद् [प्रध्वम्स ६, २८३] हम्मीं प्रकार यहाँ नाट्यदर्पण में द्वितीय विवेक के 'वीथी' निरूपण में प्रसङ्ग में उनके मत को अनुसरति का प्रतिपादन करते हुए प्रयागकार ने लिखा है- 'शकुकस्य प्रथमप्रस्तावपरिसरमनिच्छत्व प्रहसन-नायादो हास्यरसरप्रधाने विटारे-नायकत्व प्रतिपादयन् कथमुरादेव स्वादिति ।'

[नाट्यदर्पण २-३८ ] राजतरङ्गिणी[त० ४, ७०४] में- मविखुं पुमान् त्रियु चान्तः शकुकान्विप । यमुक्त्वादारोदितं वात्स्य भुवनाम्बुय्यामिषम् ॥

इत्यादि पद्य द्वारा मङ्गुक को 'भुवनाम्बुरयम्' नामक काव्य का निर्माण बतलाया है। वस्तुमदेव मल्लहीन 'गुभाविलासम्' में [२३६, २३६, २४२ उ०, ५०३, ५०७, ६०७, १२३७, १२३७, ३३७ मख्या के] स्वरह पच लाहुक के नाम से सद्भुत किए गए है। नाट्यमादर्श के द्वारा शास्त्र के श्लोक में उनकी कीर्ति प्रसिद्ध है। हेमचन्द्राचार्य के काव्यानुशासन [प्र० २ पू० ४७ दि०] पोत पारदर्शन के 'मादृशालक्षण' [प्र० व पू० २५२], में मो श्लोक का सन्दर्भ दिया

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गया है । ऐगा प्रतीत होता है कि ये शाकुक हो । इन 'चित्रोत्पलावलदिन्तक' प्रकरण के निर्माता होगे । किन्तु वे किसके शप्रमाण्य थे इसका पता नही चल रहा है । यह ग्रन्थ भी उपलब्ध नही है ।

(१२) छलनतरामम्—नाट्यदर्पंगाकार ने चार स्थानों पर 'छलनतराम' नाटक के नाम का उल्लेख करते हुए उदाहृत प्रसृतु किए है । कुंतक के वक्रोक्तिजीवित में भी 'छलनतराम' का उल्लेख पाया जाता है । धनिक के 'दशारूपकावलोक' मे [१-४९, ३-८३, १७] तीन स्थानों पर, मोज के 'भृङ्गारप्रकाश' [पृ० १९, पृ० १२३] तथा सरस्वतीकण्ठाभरण [पृ० ३७७, ६४५] तथा विद्वनाथ के साहित्यदर्पणे [परि० ६ पृ० २६१] मे भी इसका उल्लेख पाया जाता है । किन्तु न तो इसके कर्त्ता का पता चलता है और न यह ग्रन्थ ही उपलब्ध होता है ।

(१३) जामदग्न्यजयम्—'नाट्यदर्पण' के द्वितीय विवेक में 'वियोग' के लक्षण के प्रसङ्ग मे 'प्रस्तावनिमित्त सर्गोऽन' जिसमें हत्नो की प्राप्ति के लिए सग्राम न हो वह वियोग होता है इसका उदाहृत उदाहरण के लिए—'म्लेच्छेति म्रदयपयंसप्रामस्ययुक्कशच । यथा— जामदग्न्यजये परशुरामेऽ महिषाजु नृपं वेष । कृत । इस रूप में इस 'जामदग्न्यजय वियोग' का उल्लेख किया है । 'दशारूपक के मूल में प्रो० मबलोक' टीका में भी वियोग के लक्षण के प्रसङ्ग मे 'प्रस्तावनिमित्तसर्गो जामदग्न्यजये यथा' [३-६१], लिख कर इसका निर्देश इसी रूप में किया गया है । किन्तु इसकी रचना किसने कब की इसका कोई पता नही लगता है । यह ग्रन्थ भी इस समय उपलब्ध नही हो रहा है ।

(१४) तरङ्गदत्तम्—नाट्यदर्पण के द्वितीय विवेक में प्रकरण के निष्पर्या प्रसङ्ग में का० ३ तथा ४ की व्याख्या में दो जगह 'वरङ्गदत्त' प्रकरण का उल्लेख किया गया है । धनिक के 'दशारूपकावलोक' [३-३६], पारदातनय के 'भावप्रकाशन' [प्र०८, पृ० २८३] और विद्वनाथ के साहित्यदर्पणे [परि० ६ पृ० २६१] मे भी इसका उल्लेख पाया जाता है किन्तु इसवा कर्त्ता कौन है इस विषय में कोई पता नही चलता है, और न यह ग्रन्थ मिलता है ।

(१५) देवोत्तररुपतम्—'नाट्यदर्पण' में सात वार देवीचन्द्रगुप्त नाटक का उल्लेख पाया है और उसे 'मुद्राराक्षसकार' विशालदेव या विश्वासदत्त भी कृति बतलाया गया है । इन उदाहरनों से इस नाटक की कश्यासिद्ध प्राप्ति स्पष्ट हो जाती है । राजा रामगुप्त ने प्रवेश कर राक्षस के माँगने पर भ्रातृज्येष्ठ राजा चन्द्रगुप्त को हत करने के हेतु अपनी रानी ध्रुवदेवी को देनें स्वीकृत कर लिया । बाद को रामगुप्त के मारे चन्द्रगुप्त गुप्तदेवी के वेष में द्वारपाल के द्वार में गया और वहाँ पहुँच कर चन्द्रगुप्त ने राकराज का वध कर डाला, यह इस नाटक की कथा है । इस वथा का उल्लेख 'द्विपंचारित' में पाया जाता है—

नकाननादायं नकारिप्रति चरगुप्ताभातुजायां भ्रातृदेवों प्राप्यमानः; चरगुप्तेस्तन गुदेवेयपरिरतिस्वेन रहसि ब्यापादित दति ।

[द्विपंचारित पृ० २००]

दरवा नद्वारत् रसापिपत्तये देवो भ्रातृस्वसामों यथावत् ।

'भावप्रकाशन' में भी इस वथा का उल्लेख पाता है—

निवर्तते श्रीरामगुप्तो नृपः ।

[भावप्रकाशन पृ० ९०]

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हस कथाको लेकर देवोत्तरद्विगुप्त नाटक की रचना हुईहै। उसका उल्लेख भी अनेक जगहहै पाया जाता है। किन्तु यह ग्रन्थ इस समय उपलब्य नहींहै।

मुदाराराक्षस तथा देवोत्तरद्विगुप्त के प्रातिनिधिक 'प्रभिसारिकवञ्चितक' नामक एक और नाटक भी विशाखदेव ने बनाया था। इस बात का उल्लेख प्रभिनवभारती [प्र० २२२ पृ० १९७, खण्ड ३ पृ० २५] तथा 'शृङ्गारप्रकाश' में मिलता है। यह नाटक वत्सराज उदयन के चरित को लेकर लिखा गया था, यह बात भी निम्न उदाहरणों से विदित होती है—

यथा विशाखदेवेन प्राभिसारिकवञ्चितके वत्सराजस्य पात्रारती गामरोदेवीपाधायचरितं रूपकं लोलभ्रष्टितात् कामः प्रतिपादितः॥

[द्र० मा० प्र० २२२ पृ० १९७]

यथा श्रीविशाखदेवकृते प्राभिसारिकावञ्चितके वत्सराजः सम्भावितपुत्रवधायै पश्वाद्वयै कृतद्रुःसमां चाम्पभात्॥

[शृङ्गारप्रकाश प्र० १२र पृ० १९७]

१६. पयोदिनिमयनम्-नाट्यदर्पणस्य के द्वितीय 'विवेक' में 'समवकार' के निह्नपञ्च प्रसंग में 'मत्त द्वादशनेतारः' [कान्तो २-१२] के उदाहरण में 'यथा पयोदिनिम- मयने हर्षद्वलनप्रभृतोनां लब्ध्यादिलस्मा:' इस रूप में 'पयोदिनिमयन' का उल्लेख होने से यह 'समवकार' प्रतीत होता है। 'दशरूपक' के समवकार निरूपण में भी 'बहुवीररसं: सर्वे यद्यपि स्मो- धिमत्यने' [३-६४] इस रूप में 'पम्मोदिमपन' का उल्लेख किया गया है। यह 'पयोदिमपन' का ही दूसरा नामान्तर है। भोमदेव के 'शृङ्गारप्रकाश' में [प्र० ११ पृ० १९८] तथा हेमचन्द्राचार्य के 'काव्यानुशासन' में 'प्रपञ्च'शब्द भाया में लिखे गए एक 'प्रतिमनयन' का उल्लेख निम्न प्रकार मिलता है—

योऽप्रभ्रं तानिवदो मानादिनोऽमिमतोल्वपधियाम्। वाच्यः सन्निकर्षः जनतुं लोकतां रियमपथर्दि॥

[शृङ्गारप्रकाश पृ० २१, पृ० १८६]

प्रपञ्चदामारातिनिबद्धसन्ध्यरपमपथनर्दि।

[काव्यानुशासन प्र० ५ पृ० ३३७]

पता नहीं इसी 'प्रतिमपन' को नाट्यदर्पणकार ने यहाँ 'पयोदिमयन' के नाम से निर्दिष्ट किया है, या यह कोई अन्य ग्रन्थ है। न यह ग्रन्थ मिलता है और न उसके कर्ता आदि का पता चलता है।

१७. पाण्डवाभ्युदयम्-नाट्यदर्पणस्य के द्वितीय विवेक में 'चौथी' के 'उदुपात्यक' नामक ११वें भङ्ग के उदाहरण में पाण्डवानन्द या सूचनभार तथा पारिपार्श्विक श्री चरित-प्रयुक्ति रूप 'वा भूपा बलिनो राराम' इत्यादि एक इलोक उद्धृत किया गया है। उसकी द्वितीयराश्ता में—'यथा पाण्डवाभ्युदये सूचनभार-परिपार्श्विकयोः्चितप्रयुक्ती—' इस रूप में 'पाण्डवाभ्युदय' का उल्लेख किया गया है। 'योगी' के प्रसंग में निर्दिष्ट होने के कारण यह 'योगी' है ऐसा अनुमान होता है। 'दशरूपकावलोक' में 'उदुपात्यक' के उदाहरण रूप में तनिक से पाठ भेद के साथ यहही पद्य उद्धृत किया गया है। 'प्रभिनवभारती' [पृ० १५ पृ० *x] में भी 'पाण्डवा- नन्द' या यह पद्य उद्धृत हुआ है और वार्तिकतनय के 'भावप्रकाशनम्' [पृ० २३०] में भी यह पद्य 'पाण्डवानन्द' ये नाटक पाया जाता है। किन्तु इस बात का निश्चय कदापि नहीं हो सकता है कि यह ग्रन्थ

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तत्र तु'मोर्दपि ह्री: यथा 'पार्थिविजये' मुनध्वेः पराजितस्य बदसस्य म्रजुनैन विक्रम्य म्राचतस्मै दुर्योधनस्य ।

१७. पा॑र्थिविजयम्—नाट्यदर्पण के प्रथम विवेक में प्रं'तिमूल संधि के म्राठवें अ्रंग 'ताप' तथा 'घनुपवंसा' के निष्प्रयापा के प्रसंग में 'यथा पा॑र्थिविजये' निस् कर तीन बार 'पा॑र्थिविजय' के उद्धरण दिए गए हैं। भोजराज के 'भूपाल प्रकाश' में भी [प० १२, प्रा० वि० पृ० १६४, १६७ १९१] साम, दून रूप सन्ध्यंगो के उदाहरणस् हेतु में 'पा॑र्थिविजय' के कुछ् प्रसंग उद्धृत किए गये हैं।

नद्र साम यथा पार्थिविजये' भगवान् वासुदेवो दौत्येन गतो दुर्योधनमाह्व

[भूपालप्रकाश प्र० १२, प्रा० वि० पृ० १९७, १८४]

कतुं त्रिलोचनादन्यः कः पार्थिविजय्यां कथम् । तदस्य तावपते दृश्यं लोचनद्वयेऽपि कथम् ॥

'सूक्तिमुक्तावली' में राजधर के नाम से निम्न पद्य उद्धृत हुमा है— [सूक्तिमुक्तावली वि० त्रि० २. ६३] इस श्लोक से प्रतীত होता है कि इस 'पा॑र्थिविजय' के निर्माता त्रिलोचन कवि हैं। प्रसिद्ध दाम्भिक वाचस्पति मिश्र ने 'न्यायचन्द्रिक-तात्पर्यटीका' में 'त्रिलोचनगुरूकोतिमाग्निगमनोःमुखं:' लिख कर त्रिलोचन म्रपनाम गुरु योपित किया है। इन्ही त्रिलोचन कवि का बनाया हुमा यह 'पा॑र्थिविजय' नाटक था। किन्तु इस समय तक उपलब्ध या प्रकाशित नहीं हुमा है।

१८. पुष्टपौृतिकम्—नाट्यदर्पण के प्रथम तथा द्वितीय विवेक में कुल मिलाकर म्राठ स्वानों पर 'पुष्टपौृतिकम्' के नाम तथा उसके उद्धरण दिए गए हैं। 'वक्रोक्तिजीवित' का जो उद्धरण हम 'कुवलयमाल' के विवेचन के प्रसंग पृष्ठ ३६ पर दे म्राए हैं उसमें भी म्री 'पुष्टपौृतिक' का नाम भ्राया है। परिमितभारती [प्र० १६ पृ० ४३२] तथा 'दशरूपकावलोक' [प्र० ३, इलोक ७४] में 'पुष्टपौृतिक' का उल्लेख पाया जाता है। इसमें तथ्यप्रस्तुत नाटक के लेखक नाटककार तथा कुलशर्मा का उल्लेख्योल्लिखित किया दो गया है। विविध ग्रन्यों में इसके उद्धरण मिलने पर यह ग्रन्थ म्राज् उपलब्ध या प्रकाशित नहीं है।

१६ प्रतिमानिरुद्धम्—नाट्यदर्पण के प्रथम विवेक के प्रस्तुत में—'श्री मोमदेव-सूनोश्चुनागस्य कृतो प्रतिमानिरुद्धे' इन शब्दों में 'प्रतिमानिरुद्ध' नाटक का निर्देश किया गया है। म्रभिनवभारती [प० १६, पृ० ३] में म्री मोमदेव-सूनु वसुनाग म्री कृति के रूप में 'प्रतिमानिरुद्ध' पाया जाता है। वल्लमदेव-संहित 'सुमतिप्रितावली' में [इलोक १२७४, १२८३, १६२] तोन श्लोक वसुनाग कृत उद्धृत किए गए हैं। वे 'प्रतिमानिरुद्ध' के निर्माणा वसुनाग के हो बनाए हुए प्रतीत होते हैं। यह नाटक म्री इस समय उपलब्ध नहीं है।

२०. प्रयोगमुद्रणम्—नाट्यदर्पण के द्वितीय विवेक में 'वीथी' के व्रृतं म्रंग 'प्रपंच' के निरूपण के प्रसंग में विल्हण के श्लोकी म्रथ संग्रह 'प्रयोगमुद्रण' से उद्धृत किया गया है। इससे प्रतीत होता है कि यह 'वीथी' श्रेणी का रूपक् है। मोजदेव के 'भूपालप्रकाश'

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में मो [प्र० १६, पृ० १६१] 'प्रयोगामृतोदय' का ठीक यही ग्रंथ उद्दृत हुआ है । परन्तु यह ग्रंथ भी इस समय उपलब्ध नहीं है ।

२१. वालिकाव्यतिकम्—नलविलास में 'वालिकाव्यतिकतक्' के उदाहरणरूप दो वार दिए गए हैं; एक उदाहरणरुप वाक्य के प्रारम्भ से लिया गया है । उसमें 'वीथी' के नवम भाग 'नाली' का प्रयोग निम्न प्रकार दिखलाया है ।

यथा वालिकाव्यतिकतके— परं वालिकरवं जिनेति पारिषत्संशकः । तपनोयुक्तवत्करकं कुलपतिरादिचि मासमनामास्वचि । तेजोमयं दिनकराद् द्वितीयमाचचत्व मे मृतम् ॥ घत्त निरूढो मारदलकखोड्यः … हलोके 'द्वितीयमेतं' 'मृतं परम्' इति चतुर्यंपादान्त्यधा-करखोऽपि व्याश्रयात् हति ॥

[नाटयदर्पण २-३१] इसमें प्रकारान्तर-मार्ग से दृष्टव्य के पास जाते हुए नारद का वर्णन है । दूसरे स्थान पर—

यथा वा वालिकाव्यतिकके— ऋष्टतावदुदप्रहृतजृंभिकटः प्रोल्लेकेंद्रकल्पो वपुः, सप्तद्वीपसमुद्रजस्य पयसः शोभास्पदां पूथनां । केतो वाजितनः शूरविपचटयेदप्तुंनभोमेदिनीं, साघं वध्विरेवमूर्जितबल कः कंसमहारचदाति ॥'

[नाटयदर्पण २-३२] प्रायः इनोक इस 'वालिकाव्यतिकतक्' से उद्धृत किए गए हैं । इन उद्धरणों से प्रतीत होता है कि यह रूपक कंस को कथा को लेकर लिखा गया है, जोर उसमें 'वालिसा' पद मदाचित् रावण के लिए प्रयुक्त हुआ होगा । दुरभिनय से यह रूपक भी उपलब्ध नहीं हुआ है ।

२२. मनोरमावतसराजम्—नाटयदर्पण के द्वितीय विशिष्ट में 'वीथी' के 'प्रस्तावप्रलाप' नामक अंश के निर्देश के प्रसंग में केवल एक बार इसवा उल्लेख किया गया है । उसमें 'यथा मोमट-विरचिरे मनोरमावतसराजे' इस रूप में इस रूपक का निर्देश किया गया है; जैसा कि इसके नाम से हो प्रकट है यह रसिक वतसराज उदयन की कथा को लेकर लिखा गया है । उदयन के चरित को लेकर संस्कृत साहित्य में अनेक ग्रन्थों की रचना हुई है । (१) वासवदत्ता, (२) वोधाय-वासवदत्ता, (३) स्वप्नवासवदत्ता, (४) प्रतिज्ञायौगन्धरायण, (५) रत्नावली, (६) प्रियदर्शिका, (७) धीरानुका, (८) प्रोमगीतगोविन्दक, (९) तापसवतसराज, (१०) उदयनचारित प्रायः सभी अन्य एक हो कथा को लेकर लिखे गए हैं । मोमट यदि वही यह 'मनोरमावतसराज' रूपक

मलिन्तनरपतिस्वकके मोमटः पञ्चनाटकीम् । प्राप्तप्रणयराजस्रव तेनु स्वप्नवसाननम् ॥

[मूक्तमुखावली २-६३] पर्याप्त मोमट मति करिनिष्ठ नर के राजा थे । उन्होंने पांच नाटक बनाए थे जिनमें 'रसिक-रसालन' नामक रसोद्घाटक था । पिटकान्त पण्डित के मतानुमार 'रासलीयसन' नामक ग्रन्थ के निर्माण में मोद पर मति करिनिष्ठ नरराज मोमट एक ही स्वतन्त्र हैं । सेद मो जानते हैं कि उन्होंने यह कृति भी इसी

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ग्रास्य हार्यमकर दंशादूषयसासं विम्बाधर सोदरं, पीयूषस्प वचासि मन्मथमहाराजस्य तेजांसि च । हस्तित्रिङ्गुपचन्द्रिका, स्तनतटी लक्ष्मोनटीना टङ्गमूः, श्रोज्चत्याचरतां विनासकरतां तथा प्रशस्यावधं ॥

२३. मल्लिकामकरन्दम्—यह रामचन्द्र का रपना वनाया ‘प्रकररण’ रूपक है । 'नाटघदर्पण' के तृतीय विवेक की २१वीं कारिका की व्याख्या में 'यथा वा ग्रासमदुपजे' मल्लिकामकरन्दे प्रकाररणे— इस रूप में 'मल्लिकामकरन्द' का उदाहरण केवल एक बार दिया गया है। प्राज से :०० वपं पढ़िले १७वीं शताब्दी में कान्तिविजयगणि द्वारा तैयार किए गए सूचीपत्र में 'तस्पयेँ [प० रामचन्द्रस्म] मल्लिकामकरन्दनाटकम्' १५०० । [पुरातत्व पु० दे० म० ४, ४२४-५२४] इस रूप में मल्लिकामकरन्द-को रामचन्द्र का नाटक बताया है। किन्तु यह ठीक नहीं है। क्योंकि ग्रंथकार ने स्वयं उसे 'नाटक' के स्थान पर 'प्रकररण' कहा—है । १५०० इलोक पर्यन्त अनुद्धृत इसका परिमारग्या पा, किन्तु यह ग्रन्थ अब तक मप्राप्त मोर म्रप्रकाशित है ।

यथा मायापुष्पकं इलाप. प्रविस्य वचनक्रमेऽह— केकेयी मच पतित्रता भगवती ववैवैविप वारिधि:, धर्मात्मा कथ रघूदृढः मथ गमितोऽरण्य सजायानुज । सुत स्वच्छो मरत रच वा पित्रुरधर्मान्नान्नाधिक दहते किं कुत्वेन कृतो मया धाराप्रपाताऽघ्ये कुतस्य क्षयः ॥

२४. मायापुष्पकम्---'नाटघदर्पण' के प्रथम विवेक में 'दृश्य' का निल्पया करने वालो २४वीं कारिका की व्याख्या में— इस रूप में मायापुष्पक का उदाहरण प्रस्तुत किया है । इसी प्रकार ग्रापगे पताका के ससए के प्रसंग में [कारि ३३] फिर 'यथा मायापुष्पके' लिख कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया है । इन उदाहरणों से प्रतोत होता है कि यह नाटक है मोर रामचन्द्र की कथा को लेकर लिखा गया है । ग्राभिनवभारती [म० १३ पू० २१६, म० १९ पू० १०, म० २२ पू० १६६] में भी तीन बार इसका उल्लेख हुमा है, मोर कुतक के 'वक्रोक्तिजीवित' का जो उल्लेख हेम मभो 'कुत्पारवत्या' की विवेचना (पु० ३६) में दे माए हैं उसमें भी 'मायापुष्पक' के नाम का उल्लेख है । किन्तु इस नाटक का कर्ता कौन है इसके विषय में कोई पता नहीं चलता है, मोर न यह नाटक मब तक प्रकाशित हो हुमा है ।

२५ यात्रारागमुदये—यह नाटक स्वयं नाटघदर्पणकार रामचन्द्र कवि का बनाया हुमा है । 'यथा धारामदुप्रज एवं पादारागमुदये' लिख कर ग्रंथकार ने अपने इस नाटक से सात स्पानों पर उदाहरण उद्धृत किए हैं । ग्रंथकार के परितय के प्रसंग में हमने उनके 'रूपकतार' नाटक में प्राप्त से जो उदाहरण दिया था उसमें उनकी सर्वश्रेष्ठ पांच नाटकों में इस 'यादवारागमुद नाटक' का भी नाम है । जैसा कि इसके नाम से हो प्रतोत होता है इसमें यदुवंशी कृष्ण के घरित्र का वर्णन है । कुछ मोर जरासंध मादि को मार कर भारते पर कृप्प हो साधार्य का प्रदर्शन उसके काथोपकथार के निम्न इलोक में दिखलाया है—

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द्वातो घोषयुशा विधृतं मधुजितं कस राय सम्नितं, सद्रत्येय विनिमितं मगधभूततुं। कवि घ वपु १ पादाक्रान्तमजायताद्दर्मरत सदू भूमिह न कि परं, श्रेयोद्देशमापि पाण्डवेदा पुनरप्यादास्महे सदू वयम् ॥

[नाट्यदर्पण १-६४] यह् नाटक यों तो स्वय नाट्यदर्पंकार रामचंद्र षा बनाया हुषा है, कितु मच ठक मनुपलब्ध मोर मप्रकाशित है । भ्रतए्व यहा उसका समावेश किया गया है।

२६ रघुविलासम्-प्रश्रकार के परिशष मे प्रसद्ध मे 'रघुविलास' षा पो उद्धरएए हम ऊपर दे चुके है इससे स्पष्ट होता है कि यह 'रघुविलास' नाटक नाट्यदपंकार रामचंद्र की अपनी रचना है, मोर वह् उन्मेे स्वहस्तलेख पांच नाटकों मे से एक है । नाट्यदपं मे वद्धोंने अपने इस नाटक मे १४ उदाहराा दिए है । कितु दुर्भाग्य वश बात है कि स्वय नाट्यदपंख्कार षा यह् नाटक श्री प्राप्त तथ् उपलष्य तथ् प्रमाणित नही हो सका है ।

२७ राघवाभ्युदयप्र- 'राघवाभ्युदयसुब्धि' के समान यह् 'राघवाभ्युदय' नाटक भी नाट्यदपंकार रामचंद्र षा बनाया हुषा नाटक है मोर उन्मेे श्रेष्ठोत्तम पांच नाटषो मे गिनाया गया है । जेन्साछित्य संग्रह स० १ प्र० २ मे 'राघवाभ्युदय नाटक' षो रामचंद्र कृत १० पद्यों से प्रतिपाद होता है कि यह् नाटक दस मेदकों का बहा नाटक है । कितु भ्रन्य वृतियो मे समान पदक तथ् भनुपलब्ध मोर मप्रकाशित है ।

मेघार्द्रनिरसनिधे: काननविधावाचायक कल्पयतु निर्ह्रासे मुरजस्य मूर्छदितवार्तां वेत्युस्मानपूर्वितः । योजयतु पदं तयेन गरजानुपदधतीभू मूर्छनां यां वयं च ननुकृतवतयां रमयधुरिो पादये ॥

[पमिनवभारती दिल्ली षहररज पू० २१४] हसी पच रो भभिनकमारधी के पचमार्ग्य मे फिर मेघजसमासा निवरयके वथ्म' [प० ख० २१४ प्र० ६] हम पदवधालिका के साथ उद्धत किया है । 'गुज्जारप्रश्रानि' मे 'यथा रासबद्धु' [प्र० १३, पृ० १८२] इन दानों मे हसी 'रासबद्धु' का उल्लेख किया गया है ।

२८ राघाविप्रलम्मम्- नाट्यदपंख' मे प्रथम विवेक के म्रत मे यथा मेघजस- विराधिते राघाविप्रलम्मे रासकानू परिकर परिपातमोदपसपेएड मुखवाद तदित्थ-घ । एघ परस्परतमवे चतुरङ्गोद्दोपि वचावि साेधरमति १' इस रूप मे 'प्रकार ने 'राघाविप्रलम्म' को मेघजल मदि विराधित राषक१दू वचषाया है । हसका उल्लेख 'मभिनवभारती' मे मी माया है मोर वहा इसवत एक दलोक निरिन प्रकट उद्दत किया गया है—

२६ रामाभ्युदम्-नाटपरपंल मेे प्रपकार मे नाम का उलेख दिए बिना ह स्थानों पर 'रामाभ्युद्य' नाटक' के उद्धरए दिए गए है । इस नाटक के त्रियोपाद ये लोका के प्रति मुबोध को वेदेशोकि, मारोद, राषक मोर प्रहमका शव्द दिए गए है । चतुर्थं पदू ते मेघा मे पंक्ति 'वागीशतनु' के उनद्धरए मे, मादि विरोधग्न 'मारुती' छोता-परित्याग का पद्मानक 'पष्प' के वदाहरण कम मे, मादि विरोधग्न 'मारुती'

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कविचापतिराजभवभूत्यादिसेवितः । जितो यदोर्वर्मा तद्गुणरसुतिर्वन्दिताम् ॥

भवभूति इन्हीं कार्णकुब्जेश्वर यशोवर्मा के यहां रहते थे । इस युद्ध में पराजय प्राप्त करने के बाद काश्मीर-नरेश ललितादित्य ने इन्हें अपने 'तन्त्रालोक' ग्रन्थ में इस घटना का उल्लेख निम्न शब्दों में किया है— नन्वचपलचापास्त्रहतं किल मध्यदेशः, तस्मिन्धरजयत गृणांप्यधिको हिर्जनमा । कोन्यत्रिगुर्त इति नामनिरीक्ष्यगोत्रः, दारस्वामिपुत्रवशैकलोष्टदगस्थगोत्रः ॥ तमप्य ललितादित्यो राजा स्वकं पुरमानयद् । प्रतापरमसात्कारमोराजस्यं हिमासयमूर्ध्रजं ॥ इन यशोवर्मा ने यहां विद्वानों का संग्रह था । मम्मट वाग्भटतिराज, भवभूति आदि इन्हीं को राजवर्मा में रहते थे । सम्भव है इन्हीं यशोवर्मा ने इस 'रामाभ्युदय' नाटक की रचना की हो । यह नाटक भी धनञ्जय तक उपलब्ध नहीं हुआ है ।

३०. रोहितोर्मृगाढ्य—नाटकपरपञ्च के प्रथम द्विवेक में 'मुखसन्धि' के 'प्रतिन्यास' नामक सूत्रीय पद्य के निरूपण-प्रसङ्ग में— 'यथा वा भरमुखपदो रोहितोर्मृगाद्यौ मपाने प्रकारये मुखाद्दु' प्रति यशन्तः ।' हम रूप में 'रोहितोर्मृगाढच' को नाटकदर्पणकार ने स्वयं अपनी कृति पोषित किया है । आगे फिर मुख सन्धि' के परिभाषण नामक १३ वें पद्य के उदाहरए रूप में भी 'रोहितो- मृगाढ़' प्रकारण से एक दृष्टान्त उद्धृत किया है । पर यह 'प्रकरण' भी इस समय उपलब्ध नहीं है ।

३१. वनमालावाटितकम्—'रोहितोर्मृगाढ़' प्रकारण के समान 'वनमालावाटितकम्' भी नाटकदर्पणकार की कृति है । नाटकपरपञ्च के तृतीय विवेक में २१ वें बारिको की व्याख्या में—'यथा वा भरमुखपदो वनमालावाटितकादौ मातिफलावी' इन शब्दों के मथ किया है ।

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विधिविलसितम्--नाट्यदर्पणे कें प्रथम विवेक में विमर्श संधि के लक्षण के प्रसङ्ग [का० ३९] में 'विधिविलसितम्' का केवल एक उदाहरण निम्न प्रकार दिया है-- देवताद्या 'विधिविलसिते पच्यमाने दढ्ढे- 'मडचुने!--हा धिक् कष्टम्, नैवोःलघ्यः प्राक्तनः कर्मविपाकः-- वार्तांसि नैव यदिहास्ति स राजचन्द्रः तेनोक्तिता विधिविमोहितचेतनेन । देवा वने त्रिदशानाथविलासिनोऽभूत्, वत्सु त्वया जगति सत्यमाति प्रहादः ॥ इस उदाहरण की लक्ष्य के साथ योजना करते हुए नाट्यदर्पणकार ने लिखा है-- "अत्र सूत्रधारावलोकनेन तुझे देववर्यकत्-दमयन्ती-राजप्रतिनिधिजो विनयः ।" इस पक्ति से स्पष्ट प्रतीत होता है कि नल-दमयन्ती के चरित्र को लेकर इस नाटक का रचना की गई थी। किन्तु इसक निपुणता से कौन या इसका मुख्य पात्र ? तहॉँ चलता । नाटक भी अब तक उपलब्ध तथा प्रकाशित नहीं हुआ है ।

३३. विलसदुपोषणम्--नाट्यदर्पण के प्रथम विवेक में 'प्रतिमुख-संधि' के नवम् प्रकृत 'पुष्ट' के उदाहरण [का० ४६] के रूप में-- यथा विलसदुपोषणेन--शीत्-- पश्यते हृदयं मज्ञामि यदि वा साध्वी त्वदेव वार्ता सः । सम्प्रत्येक तु गोप्ट्रहे यदभवत् तत् तावदार्घ्यताम् । एकः पूर्वदुराशयः स बहुमिः'रस्तलोवन्तरं यावन्तो वयमाहुःप्रणयिनः तावन्त एषाग्युनाः ॥ इस एक उदाहरण के प्रतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी 'विलसदुपोषण' का नाम नहीं मिलता है। इस लिए यह महो कद्दा जा सकता है कि इसकल मतल्ला कौन है । यह नाटक अब तक प्रकाशित भी नहीं हुआ है ।

३४. सुप्राकृतः--'नाट्यसर्पण' के द्वितीय विवेक में वीर रस के 'मृत्यम्' नामक भज्ज के निहपाए में 'यथा प्रसङ्गदुपे शुष्कावलोकते' मोर 'यथा सुप्राकृतः' इन प्रवतराणिकामों के साथ दो स्लोक उदाहरण रूप में प्रस्तुत किए हैं। ये दोनों ही स्लोक प्राकृत माया के हैं । इससे यह प्रतीत होता है कि यह 'सुप्राकृतः' नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र की मुक्तर, भावाभिव्यञ्जन भववा प्राकृत-माया प्रधान कृति है । यह कोई नाटक या रूपक नहीं, अपितु सुभाषित-संग्रहु का ग्रन्थ है, यह बात जोन

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वभूव वल्मीकिमवः पुरा कविः, त्वत्तः प्रपेदे मुखी मत्वमेष्टताम् । स्थितः पुनर्यो भवभूतिरेकया तवंतते सम्रप्ति राजशेखरः ॥

राजशेखर ने ही दूसरी जगह काव्यमीमांसा में यह लिखा है कि दिन्नाग नामक अर्थात उज्जयिनी नगरी में जाकर बड़े-बड़े महाकवियों में परोक्षा होती है कि कौन कितने पानी में है। उसमें जाकर ही कालिदास और मत्वमेष्ट की परोक्षा हुई। यही जाकर भवभूति, वाण, सूर और मारवि का परा फैला, और हरिश्चन्द्र तथा चन्द्रगुप्त की परोक्षा भी यही परकार हुई। इन सब कवियों में कालिदास, मत्वमेष्ट तथा मारवि तोन तो प्रसिद्ध कवि है। ये परस्पर अप्रसिद्ध कवि हैं। फेर भी अपने समय में उज्जयिनी में उसका अपनना कुछ विोषेष गौरव रहा होंगा। राजशेखर का यह इलोक निम्न प्रकार है— इह कालिदासमत्वमेष्टो भवभूति-रुप-सूर-मारवयः । हरिश्चन्द्र-चन्द्रगुप्तौ परोक्षिताविह विशालया मुनि ॥

वाक्प्रस्तया मेष्टराजस्य वदन्तया सुस्थितस्यताम । पारिद्धा दर पुनरन्ति मूर्धान् कविकुजराः ॥ मासो रांमासिक्को नराधः श्री साहसांकः मतिर्निर्मिक्को वररुचिः सुकवि यः । मेष्ठो मारो मधु-कलिदास-वरसः रचनाः सुवदुष यः ॥

राजशेखर मत्वमेष्ट के बारे में प्रधान श्लोक यह। यह बात इन ऊपर संदर्भ दिए हुए दोनों श्लोको से स्पष्ट प्रतीत होती है। जल्हण की सुप्रसिद्ध 'सूक्तिमुक्तावली' में भी राजशेखर के नाम से एक पद्य मिलता है, जिसमें राजशेखर ने मत्वमेष्ट को मुक्तियों की तुलना 'मुक्ता' अर्थात हांथी को हांकने वाले मकु से और कवियों की तुलना कुंजर से की है। राजशेखर का कहना है कि जैसे 'मुक्ता' के सामने पर हाथी व सिर झुकाने लगता है इसी प्रकार मत्वमेष्ट भी मुक्तियों को पद कर कविकुंजर परमाप्त महाकवियों के सिर झुकाने लगते है। अपनी वाक्प्रतिभा से मेष्टराजस्य को उन्होंने श्लोक में निम्न प्रकार व्यकत किया है—

"वाक्प्रस्तया मेष्टराजस्य वदन्तया सुस्थितस्यताम । पारिद्धा दर पुनरन्ति मूर्धान् कविकुजराः ॥"

वाग्गंवपरप्याति में भी मत्वमेष्ट नाम का वलोक में निम्न प्रकार पाया जाता है—

मासो रांमासिक्को नराधः श्री साहसांकः मतिर्निर्मिक्को वररुचिः सुकवि यः । मेष्ठो मारो मधु-कलिदास-वरसः रचनाः सुवदुष यः ॥

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दण्डी वाणदिवाकरौ मरापतिं मान्तरच रत्नाकरः । सिद्धा यस्य सरस्वती रमवती के तस्मै सर्वेऽपि ते ॥

कवि पुष्पगुप्तने भो–जिनका दूसरा नाम परिमल भी था–‘नवसाहसाङ्कचरित’ नामक अपने ग्रन्थ में भतृमेढ़ का स्मररण बड़े आदर के साथ करते हुए उनकी प्रसिद्धि सूचक निम्न दो श्लोक लिखे हैं—

तरवस्पूजिते कवये पुरातनौ श्रीमतू मेढ प्रभुवा जयर्ते । निश्चिताद्भारासहदर्शन येऽपि वन्दभंागेव गिरः प्रवृत्ताः ॥

भतृमेढ़ सहसा कवि विसार में सर्वोत्तमवंशाली हैं जिनकी वाणी तलवार की धार के समान वैदर्भी रीति का प्रवर्तन करके प्रवाहित होती रहती है। इस पद्य में भतृमेढ के काव्य में वैदर्भी रीति की प्रघानता सूचित करते हुए उसकी अत्यन्त प्रसिद्धि मोर उसके प्रति आदर भाव को प्रकट किया गया है।

पूर्वानुभववादिपि सुन्दराणां तेजोमदूर पुरता येऽभिषते । ये मेढादिकवोन्द्रसूरीक– रक्षतोपदिष्टेन पथा प्रयाति ॥

उन्ही पुष्पगुप्त ने भतृमेढ को प्रसंसा में दूसरा श्लोक निम्न प्रकार लिखा है—

हयग्रीववध मेढ़स्तवगे ददयं ननम् । परात्साह्वति तस्मै तेनाप्तं सार्धचिन्तितं वचः ॥ प्रथमं परिभूषितं सहृदयैः पुस्तकैः प्रस्तुतं त्यगात् । साधुण्यन्वितयैर्धिया तद्गुणः स्वयैर्माजनम् ॥

श्रमातृ जो नवीन कविगण भतृमेढ जैसे नवोन्द्र की सूक्तियों द्वारा स्पष्ट रूप से उपदिष्ट मार्ग पर चलते हैं उन्हें भतृमेढ के समान वैदर्भी रीति का प्रवर्तन करके मोद्र ही पूर्वजमा के चन्द्रमा से भी प्रधिक सुंदर यश प्राप्त होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि न केवल राजशेखर ही भतृमेढ के प्रशासक है, अपितु पुष्पगुप्त भी उनके वंशे ही भक्त मोर प्रशासक प्रतीत होते हैं। 'सूक्तिमुक्तावली' तथा 'शार्ङ्गधरपद्धति' भी भतृमेढ का गुथश–गान कर रही है। इन्हीं प्रसिद्ध कविराज भतृमेढ ने 'हयग्रीववध' नामक महाकाव्य की रचना की थी।

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अन्तर्हतमपि तरसि ताहस्र्या क्रुवल्लकृतिः । मतुंमेठः कविस्सने पुनरुक्तं श्रियोज्ज्वलेऽपि ॥

[राजतरंगिणी त० ३, २६०-२६२] काव्यप्रकाश की 'धालवोधिनी' टीका में वामनाचार्य ने [पृ० ७४९] हयग्रीववध को नाटक बतलाया है। मैसूर से 'राजकीय ग्रन्थमाला' में प्रकाशित काव्यप्रकाश में भी 'हयग्रीववध' का नाटक रूप में ही उल्लेख किया गया है। इसे लक्ष्य हमने भी ऋजनी काव्य प्रकाश की टीका में नाटक रूप में हो उसका निर्देश कर दिया है। किन्तु 'संगराप्रकाश', 'काव्यालंकारसंग्रह' आदि प्राचीन ग्रन्थों से विदित होता है कि यह नाटक नही, श्रभित 'सर्गबन्ध' महाकाव्य है। हेमचन्द्राचार्य के 'काव्यानुशासन' में [पृ० चतुर्थ, पृ० ३२७] 'संस्कृतमागधादिनिबद्धसर्गबन्ध हयग्रीववधादि' लिख कर ग्रन्थकार ने इसे स्पष्ट रूप से श्रध्य काव्य ही सूचित किया है। भोजदेव के 'श्रृंगारप्रकाश' में भी 'हयग्रीववध' का अनेक स्थानों पर उल्लेख ग्राया है। वहाँ भी इसे महाकाव्य ही माना है। 'श्रृंगारप्रकाश' के कुछ स्पल, जिनमें 'हयग्रीववध' की चर्चा की गई है निम्न प्रकार हैं— "हयग्रीववधादयो महादेवादीनामंतिहासिकं चरितभावेदयन्ति ।" [श्रृंगारप्रकाश प्र० १२, पृ० १६८] "भासोद् दैत्यो हयग्रीवः...... रामिवरैरां किरणाजुंनीप-कुमारसरम्भव-शिवुप्रसादवध-हयग्रीववधादौ ।" [श्रृंगारप्रकाश प्र० ११, पृ० १४८] मत्स्यन् इतिहासार्थनिपेशालान् पेतालान् कवि: कुर्वते । स हयग्रीववधादिप्रबन्ध द्व सर्गबन्धः स्वयादिति ॥" [श्रृंगारप्रकाश प्र० पृ० १५६] कवि श्रीहेन्द्र ने 'सुवृत्त तिलक' [३, १६] में सर्गबन्ध महाकाव्य के श्रारम्भ में भनुद्रुप के प्रयोग का उदाहरण देते हुए हयग्रीववध का 'भासोद् दैत्यो हयग्रीव:' इत्यादि पद उद्धृत किया है। इससे भी प्रतीत होता है कि 'हयग्रीववध' नाटक नहीं, काव्य है। श्री मल्लिक कवि ने अपने 'श्रीकृष्णचरित' में मत्यन्त श्रद्धा के साथ मतृंमेठ कवि का उल्लेख करते हुए लिखा है— मेठे स्वंदिरदाराधिरोहिहि, वंशं याते सुवर्णभो विपे: । श्रान्ने हन्तु भ्रारवो), विप्राट्टहे बाहुं विवादसंप्राः । वारदेव्या विरमनु यत्न विगुरा द्रागु हृदयचैष्टते । सिद्ध: कवस्सन यः प्रसादर्यति तां यद्वार्ता सदाधीनिनी ॥ ऐसे महाकवि ये मतृंमेठ, जिनका यशोगान संस्कृत साहित्य के प्रनेकानेक कवियों ने मुक्तकण्ठ से किया है। किन्तु काव्यप्रकाशकार सम्मट की टीका में मेठकवि जंधे नहीं। उन्होंने दो तीन जगह मेठकवि का उल्लेख किया है पर वह प्रयत्नात-व्यंजक नहीं है। सबसे पहिले काव्यप्रकाश के प्रथम उल्लास में उन्होंने सबसे निपुण विद्वान् काव्य का जो उदाहरण दिया है वह हयग्रीववध में से खोज कर निकाला है— विनिगिरां मानदमारममिंदिराराद्- मकरसुरश्रुमुख यतनुज्यादिपि यम । स-समप्रहेलनृत्युपहितांगस निमोलितादृष्टि मिदाननादधो ॥

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भद्रस्पाप्यतिस्पष्टतिसृरैव वर्णं पदं ह्यप्रौवधे ह्यप्रचस्प ।

इन सब चिन्तनेखों से प्रतीत होता है कि काव्यप्रकाशकार मम्मट की दृष्टि में हयग्रीववधप एक नितान्त निम्न श्रेणी की कृति है। हमारे प्रस्तुत नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र गुणचन्द्र मम्मट के इस विचार से सहमत नहीं हैं। मम्मट ने हयग्रीववध में जिस प्रतिदाय वर्णन को रस दोष माना है, रामचन्द्र गुणचन्द्र ने उसे दोप न मान कर रस का उत्तमपौषायक गुण माना है। इन्हें मत में हो सकता है, रस का दोष न हो वहाँ गुण हो यह 'वृत्तिदोप' पर्य्याप्त नहीं। रस में दो हृदय में हो वह वर्णन श्रोतृसभ उत्कृष्टपौषायक हो है अपयप्यंगकार नहीं। इसी प्रसंग में 'नाट्यदर्पण' में एक बार हयग्रीववध का उल्लेख नाट्यदर्पणकार ने किया है। मम्मट ने जिसे 'प्रज्ञाविप्रतिसंस्तृति' दोष कहा है उसे नाट्यदर्पणकार ने 'भद्रोप्यम्' नाम ये निर्दिष्ट किया है। इसके उदाहरण रूप में उन्होंने 'व्यारावृत्त' से जगत्सुबपु, सद्गत-नकिरमेद, सीतारामिरसि श्रवण प्रापि से उत्पन्न वार-वार म्लानित भए रस का अतिदाय हो प्रस्तुत किया है, और उसके बाद काव्यप्रकाशकार के मत का संक्षेप मरते हुए इन्होंने लिखा है— 'देवदत्त हयग्रीवेऽपे हयग्रीववधेऽनुसदाहरण । स पुनः सरोपी वत्तनाप्यस्मालवत्प्रतिपाद्यते । वन हि वीरों रस, न विचेपवो वभूवेदिन्द्रियादिगमनेन रूप्यते ।'

देवदत्त हयग्रीवेऽपे हयग्रीववधेऽनुसदाहरण । स पुनः सरोपी वत्तनाप्यस्मालवत्प्रतिपाद्यते । वन हि वीरों रस, न विचेपवो वभूवेदिन्द्रियादिगमनेन रूप्यते ।

पर्यन्त [काव्यप्रकाश कारिकादि] कुछ लोग 'हयग्रीववध' में हयग्रीव में रघुवीर के रघुवंश 'भद्रोप्यम्' ने उदाहरण रूप में प्रस्तुत करते हैं किन्तु वह वृत्त पर्याप्त न माना भाग का दोष है। अपोद्भट ने नायकर चरितों में नन किया गया है। वह रस का दोष नहीं है। परोक्त वध में हनुमान, वीर्य, विस्मृति, मादि के प्रतिदाय वर्णन से उस वृत्त चार रघुवीर का नायकत्व हो होता है। परन्तु नहीं। इसकलिए हयग्रीव का प्रतिनय वर्णन रस दोष न हो वहाँ का छठवा है। यह नाट्यदर्पणकार रामचन्द्रगुणचन्द्र को सम्मति है।

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रसप्लवेदपि रसुराति प्रकाशं, रहनलवेदपि सुकुमारि प्रकामं ।

"कवि चित्तदालेयकरः कवित्ते, प्रविसदनामा सुवि भतृमेठः । रसप्लवेदपि रसुराति प्रकाशं, रहनलवेदपि सुकुमारि प्रकामं । वयंपु यस्योज्जवलतां तयैव ॥"

इस प्रकार के बहुप्रशंसित, बहुचर्चित और बड़े-बड़े कवियों के श्रद्धाभाजन भतृमेठ को एकमात्र कृति को प्रथम काव्य की श्रेणी में रहना और उससे रसदोषों का अन्वेषण करना मम्मट की केवल दोपदृष्टि की विशेषता को ही प्रथयापित करता है । भतृमेठ तो ग्रह भी 'कवि चित्तदालेयकरः कवित्ते'—कविता के पूर्व चित्त चित्रार है । जिनके चित्र में 'रसप्लवेऽपि' रस का प्रवाह मरा होने पर भी, और दूसरे पक्ष में पानी पड़ जाने पर भी 'रसुराति प्रकाशं' यस्यो-ज्वलरः तथ्यं चरां को, और दूसरे पक्ष में चित्र के रंगों को चमक बसी ही बनी रहती है । तनिक भी मलिन नहीं हो पाती है ।

चपसंहार

यहाँ ३५ नाटकों और काव्यों का परिचय हमने यहाँ चर्वोस्पत किया है । इन ग्रन्यों का उल्लेख संस्कृत साहित्य के अनेकानेक ग्रन्यों में पाया जाता है । भोज से ५०० वर्ष पूर्व १२वीं शताब्दी में नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र गुणचन्द्र के समय में ये ग्रन्थ उपलब्ध थे । ग्रन्थकार ने उनमें से अनेक उदाहरण स्वयम् दिए हैं । परन्तु आज तक ये ग्रन्थ प्रकाशित नहीं हुए हैं । सम्भवतः उपलब्ध भी नहीं हुए हैं । धन्यथा उनका प्रकाशन प्रवश्य होता । इतने सुप्रसिद्ध एवं महर्षि पूज्यों के ग्रन्यों का इस ५०० वर्ष के बीच में सर्वथा लोप हो जाना आश्चर्य की बात है, या फिर उनकी प्राप्ति संभव न होना हमारे प्रमाद की सूचक है । नाट्यदर्पणकार ने इन महर्षि पूज्यों ग्रन्यों का नाम और परिषय हमको दिया, इसके लिए हम उनके कृतज्ञ हैं । अब हमको खोज करना और उनके प्रकाशन को चेष्टा करनी है ताकि उनकी उपलब्धि सर्वसापारत्न को हो सके ।

वसन्त पञ्चमी, सं० २०१७ जनवरी १६६१

प्रवन्ध किशोरिदास वाजपेयी

विचारवेधीत्त सिदान्तविदोर्मार्ग माचायं

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सम्पादकीय

(क) नाट्यदर्पण में रूपकतर काव्यशास्त्रीय प्रसंग

नाट्यदर्पण अपने नाम के अनुरूप नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थ है, जिसे ग्रन्थकारों ने चार विवेकों में विभक्त किया है । इन्होंने छलक के दश भेदों में नाटिका और प्रकरणों को जोड़कर इसके कुल चारह भेद स्वीकार किये हैं । इन दोनों लेखकों ने इतनी सहायता प्रदान इसलिए गिनायी है कि 'जैनों वार्त्ती' के मो १२ रूप माने गये हैं । ग्रन्थ के प्रथम विवेक में 'नाटक' नामक प्रथम रूपक भेद का स्वरूप एवं विवेचन प्रस्तुत किया है और द्वितीय विवेक में 'प्रकरण' ग्रादि शेष तेरह भेदों का । तृतीय विवेक में रसवृत्ति, रस, रस दोष तथा प्रभिनय का विवेचन है तथा चतुर्थ विवेक में रूपकों-पयोगों ग्रन्थ सामग्री का, जिसके प्रस्तंगत नायक नायिका भेद को भी स्थान मिला है । इस प्रकार इस ग्रन्थ में रूपक सम्बन्धी प्रचलित सामग्री को एकत्र निबद्धित, व्यवस्थित एवं विवेचित किया गया है । कलेबर की दृष्टि से सर्वाधिक स्थान ग्रन्थ के प्रमुख विषय रूपक को ही मिला है । इस दृष्टि से दूसरा स्थान रस का है और तीसरा स्थान नायक-नायिका भेद का । उक्त विषयों के अतिरिक्त इस ग्रन्थ में कतिपय ग्रन्थ विपयों पर भी प्रकाश पड़ गया है, जैसे— काव्यप्रयोजन, काव्यहेतु, कवित्त-महिमा, प्रभलंकार, वक्रोक्ति, प्रौचित्य, मनोचित्र, दोष ग्रादि । इस लेख में रूपक के अतिरिक्त प्राप्त सभी प्रसंगों पर ग्रन्थकारों वा हस्तलेखों प्रस्तुत करने वा प्रयास किया जायगा ।

१. काव्यप्रयोजन

इस ग्रन्थ में काव्यप्रयोजन-प्रसंग को स्वतन्त्र स्थान नहीं मिला । ग्रन्थ के निम्नोक्त मंगलाचररण में—

चतुर्वर्गफल नित्यं जैनों वाचामुपास्महे । रूपद्रवद्रविर्विद्य यथा म्याय्ये घृतं पाय ।।

—में ग्रन्थकारों ने 'जैनों वार्त्ती' की उपासना करते हुए इसे चतुर्वर्ग फल-प्रदायिनी कहा है और ग्रन्थों दृष्टि में इस फल को अभिनेय भाव्य प्रयोजन हेतुकाव्य है साथ ही सफल किया है । इस सम्बन्ध में उनका मन्तव्य इस प्रकार है

१. हस्य काव्य द्वारा धर्म, श्रेयं और काम ये दोनों फल तो प्राप्त होते ही हैं, इससे मोक्ष-प्राप्ति भी होती है ।

२ मोक्ष-प्राप्ति का एक कारण तो यह है कि इससे सद्दुदय को शिक्षा मिलती है कि रामादि के समान आचरणा का ग्रहण करना चाहिए और रावणादि के समान आचरणा न त्याग । दूसरा कारण यह है कि धर्म नायक पुरुषार्थ की स्वीकारित कर लेने पर इससे द्वारा परम्परा-रूप से मोक्ष-प्राप्ति भी संभव है । 'हवीं मोक्षप्राप्ति रूप फल धर्म के की ग्रपेक्षा गौण फल होता है ।'

प्रयाभिनेयवावपरता इलोकौघैः स्वार्थ्यपत्ते । यथावत् कालाद् ग्रन्यांवसरमफलत्वयेद नाटकादीनि तदपि 'रामवधू वतितद्य न रावणाद्रू' इति हेतोःपदेयहानोपादानपरतया, प्रमाण न मोक्षहेतुत्वं नाटकादेः फलं स्मृतम् ।

२. मोक्षस्तु धर्मकायंश्चात्व गौण फलसम् । —यहाँ, पृष्ठ २१

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इद्यस्मात्प्रातिपाद्यच फलस्तयो मो हि पुरुषार्थोऽभिमोष्ठ: स तस्य प्राप्नुयाम् ।

३. 'जेनी' वाक्यो के अनरूप काव्य के द्वारा भी इन पुरुपार्थीं में से रचितया प्रयवा पाठक को वही फल प्रधानता से प्राप्त होता है जो उसे श्रभिमोष्ठ होता है श्रोर चेप फल उसे गौण रूप से मिलते हैं ।१

४. 'जेनी' वाक्यो से तात्पर्य काव्य नाटक भी लिया जा सकता है, क्योकि यह वाक्यो (रचना) भी 'जिनो' श्रर्थाद् राम श्रादि के विजेताश्रो—काव्यनाटककारो—की होती है ।२

काव्यप्रयोजनो में पुरुपार्थचतुष्टय को सर्वप्रथम भामह ने स्पान दिया था । श्रोर इनके उपरान्त कुन्तक श्रौर भामिनपुराणकार ने मोक्ष को छोड़ कर शेप त्रिवर्ग को ही काव्यप्रयोजन माना था । रामचन्द्र-गुणचन्द्र के उपरान्त विश्वनाथ ने भी पुरुपार्थचतुष्टय को काव्यप्रयोजन के रूप में स्वीकृत किया । इन चारों में से श्राभप्राप्ति ऐसा प्रयोजन है, जिस पर कोई विवाद नहीं किया जा सकता । 'धमॆ:' से तात्पयं यदि 'ध्यायन्त इति धमॆ:' श्रर्थाव् शुभ कत॑धय का पालन है, तो यह काव्य का सात्त्विक प्रयोजन न होकर तामसिकाद प्रयोजन है । कत॑यव् वस्तुत् उस कम॑ का नाम है जिसे हम दूसरो की प्रेरणा प्रयवा उपदेश द्वारा करते हैं तथा दूसरो के चुपकार के लिए करते हैं, किन्तु काव्य-सजन भला प्रेरणा से प्रवृत होने के कारन न तो दूसरो की प्रेरणा प्रयवा उपदेश की श्रपेक्षा रखता है श्रोर न इसके द्वारा दूसरो का उपकार करना कवि का प्रमुख उद्देय होता है । श्रोर मोद 'श्रानन्द' से तात्पय 'पुरुषकल-श्रात्मा' लिया जाए तो इसे श्रात्म के बुद्धि-वृत्ति का मानव स्वीकृत नही करेगा । ठीक यही स्थिति 'मोक्ष' शब्द काव्यप्रयोजन की भी माननी चाहिए, क्योकि स्वप्न श्रनिकाकार ने घम॑ श्रोर मोक्ष में कारण—काव्यं सम्बन्ध स्वीकृत किया है । घोप रहता है एक पुरुपार्थ—'काम' श्रभिप्राय श्रभिमोष्ठ फल की प्राप्ति । 'काम' शब्द से यदि मानवीय रागात्मक भावो की इच्छापूर्वक यह श्रभिलाषा लिया जाए तो इसे प्रकारान्तर से श्रलौकिक श्रानन्दप्राप्ति का पर्याय मान सकते हैं जिसे मम्मट ने 'सद्य:परनिवृत्ति' नाम दिया है । वस्तुत् यही फल काव्य का प्रमुख एवं श्रभिमोष्ठ प्रयोजन है । किन्तु नाट्यदपंण में इसे स्पष्ट शब्दो में स्थान नही मिला ।

इस ग्रन्थ के इस प्रकरण में वपयुं क एक विशेषता उल्लेखनीय है कि जो सहृदय जिस फल प्राप्ति के लिए काव्य-निमार्ण प्रयवा काव्य-पठन करता है उसे वही फल तो प्रमुख रूप से मिलता है श्रोर चेप फल गौण रूप से । निस्संदेह उनकी यह धारणा बहुत काव्यशास्त्रीय रूपो में देखने को नही मिलती । किन्तु 'यस्यास्ति भावना सस्य सिद्धिर्मंवति ताह्नो:' इस कथन पर भी श्राज का बुद्धिवादी मानव पूण॑ श्रास्था एवं विश्वास नही रखता । दूसरो उल्लिखित विधेपता यह है कि इनहोने काव्य-नाटक की रचना को भी 'जेनी' वाक्यो इसलिए कहा है कि यह राजा श्रादि के विजेताश्रो को धारए होती है । भनकारो ने यथास्पत्न श्रलेप के बल पर ही मधु संचयालन करने का प्रयत्न किया है, किन्तु उनकी यह धारणा निस्संदेह मान्य है । काव्य-नाटक प्रणेता इनके प्रयत्न के समय सांसारिक रागद्वेप, सुख-दु:ख श्रादि प्राकृत हादयो से ऊपर उठ जाता है । चित्त की एकाग्रता के बिना वह नदिचयं भी नही कर सकता । समाधि की मवस्थाश्रो श्रथवा वेचारगतरपोऽनुगृहीतता इस कम॑ में लिए नितान्त श्रावइयक है । तटस्थतया इस कम॑ की पार्थारम्भिला है । यही कारण है कि किसी च्छन्द:श्रास्त्र को सदय में रख कर रचित प्रनम श्रथवा नाट्य-नाटक वास्तबिक 'काव्य' बहाने के श्रधिकारी नही होते । ऐसे वास्त्रो वे साम्प्रदायिक्ता प्रयवा 'प्रोपेगडा' के हत्पन्न भी लपटें उठा करती है ।

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२. काव्यहेतु

संस्कृत नाट्यशास्त्रियों में से जिन्होंने काव्यहेतुप्रों का निरूपण किया है उनमें से दण्डी वामन, कुन्तक और मम्मट का नाम उल्लेख है। मम्मट ने पूर्ववर्ती काव्यशास्त्रियों का सारप्रहण करते हुए केवल तीन काव्यहेतु निर्दिष्ट किये थे—शक्ति, निपुणता और अभ्यास। नाट्यदर्पण के रचयिताओं ने इस ओर स्पष्ट संकेत नहीं किया। ग्रंथारम्भ में काव्यनाट्य-निर्माण पर चलनांश प्रकास डालते हुए वे कहते हैं कि ‘जो कवि निपुण से लेकर राजा तक की ‘श्रोचती’ अर्थात् उनके सामान्य व्यवहार से अवगत न होते हुए भी काव्य-निर्माण की कामना करते हैं, वे विद्धजनों में उपहास के पात्र बनते हैं—

प्रारब्धारौ भ्रान्तौ यावदोचितौ न विदन्ति ये। सृज्यमान्ति कवित्काव्यं, खेलनं ते कुमारताम् ॥१८॥

तथा जो नाटककार न तो पोथ, वाद्य, नृत्य आदि जानते हैं, न लोकस्थिति से परिचित हैं, नाट्य न प्रयन्धों रश्यों नाटकों का निर्माण ही कर सकते हैं ये भी नाटक-रचना करने के अधिकारी नहीं है—

न मोतव्यानुसत्ता; लोकसिथितविदो न ये । प्रभिनेतुं च कतुं च प्रभृन्यास्ते बहुध्नु खा॥ १८॥

उपयुक्त दोनो पद्यों में दो काव्यहेतुओं की प्रकारान्तर से चर्चा हुई है—शक्ति, वाच् (श्रुति) अभिनय श्रादि का क्रियात्मक ज्ञान तथा रस से राजा-पर्यन्त लोक-व्यवहार से परिचित होना। इन दोनों हेतुप्रों को ह्रदय और कुन्तक के शब्दों में ‘प्रतिभा’ सोम तक ‘व्युत्पत्ति’ वह कहते हैं मम्मट के शब्दों में ‘निपुणता’। पूंवें सोमा तक हेतुप्रों कि इन श्राखाओं ने ‘व्युत्पत्ति’ और ‘निपुणता’ के ग्रन्थगंत लोक-व्यवहारज्ञान के प्रतिरिक्त काव्यग्रन्यों एवं काव्यशास्त्रीय ग्रन्यों का पठन-पाठन भी सम्मिलित किया है। वस्तुतः रामचन्द्रगुणचन्द्र के उपर्युक्त कथन से यह न समझना चाहिए कि उन्हें केवल ‘व्यवहार ज्ञान’ को ही काव्यहेतु मानना समीचीन होगा और जो दो को, प्रतिभा और अभ्यास को, नहीं। जैसे कि ऊपर कहा आये हैं उनका सद्देश्य काव्यहेतुप्रो का निरूपण करना नहीं था, केवल कविकर्म-महिमा प्रकरण में उन्होंने इस प्रसंग की चर्चामात्र कर दी है। निस्सन्देह शक्तितत्व प्रतिभा काव्य-रचना का प्रथवा निर्माणाय हेतु है, और लोकज्ञान तथा इसके साथ साथ ‘अभ्यास’ भी हेतु हैं। किन्तु इन दोनों से शक्तिका परिकार पद सुरक्षित होता है—वह भी प्रतिसन्देह रूप से सत्य है।

प्रतिभास्य हेतुः । श्युत्पत्त्यव्याससासम्पां संस्कार्या। —काव्यानुशासन (हेमचन्द्र), पृष्ठ ६

३. कवित्व-महिमा

विद्धजनों को शास्त्रज्ञान के साथ कविकर्म में भी निपुण होना चाहिए, इस सम्बन्ध में इस ग्रन्थ में इन शब्दों में चर्चा की गयी है—जिस प्रकार सावन्या सारी का प्राप्त है उसी प्रकार कवित्व सफल विद्वानों का प्राप्य है। यही धारणा है कि तीनों विद्याओं अर्थात् तीनों वेदों के ज्ञाता भी सर्वदा कवित्व निर्माण की प्राभिलाषा रखते हैं। सत्य तो यह है कि कवित्व निर्माण का श्रभ्यास विद्वानों के लिए एक ऐसा व्रतक है जैसा कि नासिका के ऊपर कोद्रहोता है, भ्रुव यह भाव ऐसा है जैसे दिशों मृगनयनों के तीरों पर कुचों का प्रभाव हो।

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इस सम्वन्ध में विचारणीय यह है कि यदि यह स्वीकार किया जाना है कि 'मौलिकता' नामक या तरक्व नितान्त दुर्लंभ है, तो भावसाम्य के आधार पर किसी की भी संज्ञा क्यो को जाए ? भावसाम्य का एक कारण तो मानव मन का ऐसय है । विभिन्न देश और काल में वनंमान व्यक्तियों ने जो कि प्रत्येक दृष्टि से एक दूसरे से ग्रप्रमावित है एक हो प्रकार के विचार प्रकट किये हैं ! निस्संदेह इस प्रकार का भावसाम्य उपस्थित करने वाला व्यक्ति किसी भी हर में ग्रपराध तथा निदंा का पात्र नही है। कभो कोई बात, कोई घटना प्रयवा कोई विचार पढ़ा-सुना जाने पर हमारे हृदय के किसी वानी पर जा पड़ता है और फिर कभी परिस्थितिवश जागृत होकर वनिव्यास वावयो प्रयवा लेखनो द्वारा ति मूत हो जाता है और श्रोता भाव साम्य का करण वन जाता है। किन्तु इस प्रकार की माम्यता पर मानव का कोई प्रात्कार नही है, कयोकि न तो वह दूसरो के विचारो को अपने मन में सततार रूप में ग्रहण कर सकता है और न हो उन्हें श्रमिभव्यक्त होने से । कभी हम दूसरो के विचारो को पढ़ श्रोत सुनकर उन्हें नवीन एवं व्यक्तिस्पित रूप में प्रतिपादित करने के लिए ललायित हो उठते हैं और उन्हें नवनधं, कविता, नाटक, कद्वानी उपन्यास ग्रादि के रूप ढाल देते हैं । निस्संदेह यह प्रक्रिया मी निन्दनीय नही है, कयोकि इससे पूर्वं भावो को नवीन दिसा मिलती है, हमारी, कल्पना का सहयोग पा कर ये भाव कहों श्रमिक स्पष्ट, विशद, ग्राहय एवं प्रमावशाली वन जाते हैं । इस पुनराव्यापन प्रक्रिया को चाहें तो मौलिकता का नाम मी दे सकते हैं । पूर्वजोात भाव हमारी कल्पना का योग पाकर यदि नवीन हर में प्रतिपादित हो जाए तो इसे 'मौलिकता' मान लेने में श्रमिचत ग्रापत्ति मही होनी चाहिए । श्रव सघरर्णीय है किन्तु नाटक का मार्ग रस की कल्लोलो से परिपूर्ण होने के कारऱा प्रतयन्त कठिन है ।'

४ श्रलकार ग्रन्थ के मूल भाग में निम्नोक्त स्थलों पर श्रलंकार की चर्चा हुई है

१ कथा' ग्रादि का मार्ग श्रलकारों द्वारा कोमल होने कें कारएा सुवपूर्वंक सघरर्णीय है किन्तु नाटक का मार्ग रस की कल्लोलो से परिपूर्ण होने के कारऱा प्रतयन्त कठिन है ।'

२. वह वायेंी जो श्रनेक श्रलकारो से युक्त होने पर भी रसप्रवाह से रोहत होने कें मारण कठोर होतो है वह [मोटा कें] मन को उस प्रकार प्रहुल्लित नही करती जिस प्रकार दुर्भंग [ग्रर्थात् यौन रस न निकले के कारएा कठोर मग वाली] स्त्रियाँ पुरुषो को ग्राह्लादित नही करतीं ।'

३. नाटक नामक रूप में श्रलकारों द्वारा रस का गलन ग्रपान्त सलत्तन प्रयवा मग नही होना चाहिए ।' प्रतकारयाादृं" रगलदूरतस । ।१।४।

प्रलकारमयु पन्या कदाचन गुःसच्वर । दु सद्वरस्तु नाट्यस्य रसलोलोलताकुल ॥ ११३

इलेपवक्रोक्तिमाधुर्यै रसोनिष्पत्तिदक्ष्क्कथा । दुर्भगा इव कामिन्यो प्रीएाति न मनो गिर ॥ ३१७

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उक्त स्पलों के प्रतिकूल निम्नोक्त दो अन्य स्पलों में भलंकाल की चर्चा साक्षात् न हो कर प्रसाक्षात् रूप से हुई है :

१. जो कवि (नाटककार) नानाविध शब्द तथा अर्थं मे लोल्य (चमत्कार) के कारण रस रूप प्रभूत से परिपुष्ट हो जाते हैं वे विद्वान् होते हुए भी उत्तम कवियों की गणना में नहीं आते ।'

१. नानायंशब्दलो ल्येन भराम्बुचो ये रसामृतात् ।

२. नाट्य (नाटक) में श्रव्य और दृश्य शब्द की उत्कृष्टता (कलपना) इतनी अलौकिक नहीं है जितना कि रस अलौकिक है । पका़र हमारा और सुन्दर भी माम यद्य रस-रूप हो धो [भोक्ता के मन में] उसके प्रति उद्रेजना (घृणा, विरक्ति) उत्पन्न हो जाची है ।²

२. न तया श्रव्यदृशो त्प्रेक्षा; इलौक्य: काव्ये यथा रस: ।

उद्वेजयति नीरसतम् ॥

इन दोनो स्पलों में शब्द और अर्थ के लोल्य (चमत्कार) और इनकी उद्रेक्षा (कल्पना) से भन्यकालरो का तादृशं दाब्दालकार श्रो अर्थालंकार से ही है ।

ग्रन्थ के मूलभाग में ग्रन्थम् भी 'भलकार' शब्द का प्रयोग हुया है । पर वहां इस शब्द से तादृश्य है—नायिका के यौवनस्थ भाव, हाव श्रादि २० धमं जो तीन स्पों में विभक्त किये गये हैं ।'

किन्तु प्रस्तुत प्रकरण से इन भलकारो का कोई सम्बन्ध नही है, क्योंकि ये शाब्दार्थ रूप काव्य-श्रलंकार के शोभाकारक धर्मों न होकर नायिका के व्यक्तित्व के शोभाकारक धर्मं हैं ।

उपयुक्त्त उदतररपो में से प्रथम उदतररप में कवि की अपेक्षा नाटक को इस श्राधार पर उत्कृष्ट माना गया है कि रस के बिना भी केवल भलकार-प्रयोग के बल पर कविता का निर्माण हो सकता है किन्तु नाटक के लिए रस एक अनिवार्यं तत्वं है । वस्तुत: यह धारणा संस्कृत के दशकुमारचरित, वासवदत्ता श्रादि कथा-प्रास्यायिका साहित्य को लक्ष्य में रखकर प्रस्तुत की गयी प्रतीत होती है, जिनमें अलकारो का अतिशय प्रयोग हुया है । इसका एक कारएा पाठक की दृष्टि से या मोर दूसरा कारएा कवि की ह्रटि से । यह साहित्य सामान्य स्तर से उच्च वर्गों के लिए निमित्त होना था । इनसे एक ग्रोर ये यथाक् श्रतिशय, यमक, श्लेष, परिषह्या, विरोधाभास श्रादि से चमत्कृत होते नही प्रतीत थे, ग्रोर उद्धर दूसरी ग्रोर 'गद्यं कवीनां निकष: वदन्ति' इस उक्ति के श्राधार पर भलकार-प्रयोग द्वारा चमकार-प्रदर्शन समक्षा जाने लगा था ।

किन्तु उक्त धारणाओं वतंगत कथा-साहित्य के लिए निमित्त उपयुक्त नही है । नाटक के समान इसकी रहती । इसी प्रकार प्रवच-चमत्कार ग्रोर मुक्तककार कवियों में भी रामचन्द्र-गुप्तचन्द्र ने इसी प्रकार का ही शन्तर निर्देश³ किया है जो कि मुक्तिसंगत प्रतीत नही होता ।

विद्वांसस्ते कवोद्रपामिहं तु पुन: कयाम् ॥

ना० द० ११६

न तपायं श्रव्यदृशो त्प्रेक्षा; इलौक्य: काव्ये यथा रस: ।

उद्वेजयति नीरसतम् ॥

ना० द० ३२१२

× × × × × । योगयतां च रसनिवेशंकावसाग्रिन प्रदर्शककवयो

विद्वांनि, न पुन: सां द्रायंप्रप्त वंचितुम्मात्रोंनदिष्टपेवो मुक्तककवय: ।

हे० नां० द० पृष्ट १५७

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चतुर्थ हितीय उदहारए में रस और अलंकार के पारस्परिक सम्बन्ध पर प्रकाश डालते हुए प्रकारान्तर से अलंकार को रस की अपेक्षा दो हित्पतियों में अनुत्कृष्ट माना गया है :

(क) रस हो काव्य का मनिवायं धर्म है, अलंकार नही,

(ख) अलंकार का अनुवृत प्रयाग रसास्वाद में वाचक बनता है।

ये दोनों धारएँ रस-सिद्धान्त में हो अनुतूल प्रस्तुत की गयीं हैं।

अलंकारवादियों ने घभी काव्य-शोमाकर वयों को 'अलंकार' की सज्ञा देते हुए' किसी विशेष वाध्याग को काव्य के अनिवायं तत्व के रूप में स्वीकृत नहों किया था । उन्हीं हष्टि में न केवल अनुत्प्रास एव उपमा आदि हो अलंकार ये, अपितु गुण, रीति, रस, ध्वनि, वाटवृत्ति आदि ये सभी वाव्यशोमाकर होने के कारण 'अलंकार' नाम से अभिहित किये गये ये । यत. उनके अनुसार यदि़ किसी वाव्यांग को काव्य का अनिवायं तरव स्वीकृत वरना चाहँ तो उसका नाम 'अलंकार' हो होगा । चाhe वह अनुप्रास-उपमा आदि का वाचक हो, अपवा गुण, रीति, रस और ध्वनि हो । किन्तु रसवादियों ने केवल रस को हो काव्य की आत्मा अर्थात अनिवायं तत्व हृटिगत किय, तया अलंकार को वाभायं वा गौणवृत्त्यं पर्मं मानते हुए प्रकारान्तर से इसमे रस को मो उत्कयं वा मान लिया और वह मो नित्य रूप से नही । नित्यशून से अलंकार को रस वा उत्कयं करता है, वथी मही वथा वमी इसक उत्कयं मो वदता है—ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार सटकनुंडल आदि मामिनों में वारीक के दोशवदं होते हुए उसी मन हित्पति में अनुतार कमो उसकी आत्मा वा उत्कयं वरते हैं, वमी नहों वरते और कमो उत्कयं मो वरते हैं।

रस और अलंकार मे पारस्परिक सम्बन्ध निद्धेत प्रयग में अलंकारवादियों वा यद्ध मतव्य मो उल्लेखनीप है वि ये रस, भाव आदि वो प्रागोभूत और प्रागभूव दोनो वपों में स्वीकार वरते हुए वदें निम् रूप से 'अलंकार' में प्रथमभूत वरते थे—प्रागभूत रस वो रसवत अलंकार में, पत्नोमूत भाव वो प्रेयसवत में, मज्जोभूत रसाभास एवं भावाभास वो ऊर्जस्वी में, मज्जीभूत भावोदय, भावशान्ति और भावसबलता को हेतों नामों से हो अलंकारों में प्रस्तुतं किया गया है । इसके घनिरिक्त, उहोंने मज्जीभूत रस, भाव आदि को हितीय उदाहत परमकार हो में अनुतमूत किय! । विmtu वतुतव रस, भाव आदि से जन्य समरहार नितान्त वासु म होत्कार नितान्त मान्यत है । अलंकार हो रचना प्रतिपाद्यतः मावि के सामान् नाम-योजन पर आधृत है और उक्तत अलंकार नाम एव वपयं नहों है, मोत उक्तत पारवाद नाम एव वपयं नहों है । पारद्योजन यदि़ प्रतुत न मो हो, तो मो रसता रचना व्यनुपायं के वल पर सदृदय के लिए प्रासवान प्रदान की वामता है । 'प्रायवेन वमदनि' इस मिदात में अनुतार यह निद्धयं नितरांशेष निकामा या वरता है वि एक पर अलंकार' निद्धित है वह दूसरो और 'रस' सहशप निह। मूत्रत हृदयों मापारों पर रगवादी रस को परवारी में पतनुमूत वरने में वद्रुत है । उ्होंने रस को वाम्य वो आत्मा मं हृद मंं स्वीकृत वरवे हर अलंकार वो प्रतिनियायं वर में त्पा उहगयंत धर्मं माना विया । वत: वतों

९. वाव्यशोमारान् धर्मान् अलंकारान् प्रभासने ।

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( ६० )

प्रड्डोभूत रस, भाव प्राधि को इन्हीं नामों से हो प्रभिहित किया । हाँ, प्रड्डोभूत रस, श्रोद्र भाव को इन्होंे कमसा: रपद्व पूर्व प्रेप्स्वद् भलङ्कार नाम द्विरा, रसमास तथा भावाभास को कनस्त्वी भलङ्कार श्रोद्र भावधान्ति को समाहित भलङ्कार । इसके प्रतिरिक्त भावोदय श्राधि तोनों को भ्रलङ्करूप में वाच्यत होने पर इन्हीं नामों के हो भ्रलङ्कारों से प्रभिहित किया गया । वहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि रसवद् ध्वलङ्कारों को भनुप्रास तथा उपमा प्राधि के समान चित्नकाव्य का श्रङ्ग न मानकर गुणीभूतन्यङ्गप के 'मारतस्याङ्ग' नामक भेद का श्रङ्ग स्वीकार करके मम्मट ने प्रकारान्तर से यह मो संकत किया कि ये भलङ्कार भनुप्रास, उपमा प्राधि भलङ्कारों को प्रभेषा उच्च भाव-मूमि पर भ्रवस्थित है—क्योंकि इनमें वाच्यार्थ की भ्रपेक्षा व्यङ्गचार्थी मले हो गौण हो, किन्तु भनुप्रास, उपमा श्राधि, के समान इनमें वाच्यार्थी की भ्रपेशा व्यङ्गचार्थी की मस्फुटता नहो होती । भस्तु !

रसवादी ग्राचार्यों का भलङ्कार के प्रति यही हृद्यिकोद्र है, श्रोद्र इसी के हो श्राधार पर रामचन्द्रगुणचन्द्र की उक्त कयन में प्रकारान्तर से स्वीकृति है कि रस हो काव्य का भ्रानिवायं धर्म है, भलङ्कार नहो ।

( २ )

श्रथ रामचन्द्रगुणचन्द्र की दूमरी पारण को लें कि भलङ्कार का भनुचित प्रयोग रस-सवद में वाधक वनता है । दूमरे शब्दों में, भलङ्कार का मोचित्यपूर्ण प्रयोग हो रस का उत्कयं कर सकता है, भ्रनौचित्यपूर्ण प्रयोग नहो । इस सम्बन्ध में वामन, भोजराज श्रोद्र श्रोमेन्द्र के निम्नोक्त कयन श्रवलोकनीय है :

ग्रामूपयों के श्रादशों-प्रयोग के लिए केवल ऐसा सारोत ही ग्रधिकारी है जो हर प्रकार से सुपात्र हो । इस हृष्टि से न तो भ्रचेतन शाव भलङ्कारों का भधिकारी है, न किसी यति का श्रोद्र न किसी नारी का यौवनवत्य वधु । इधर सजीव, स्वसस्य, सुन्दर चरोर पर भी ग्रामूपयों का प्रयोग भ्रोचित्य को भ्रपेक्षा रखता है—ग्रंञ्जन को कालिमा बडी बडी श्रांखों में हो शोभित होती है प्रयत्न नहो, मुक्ताहार उद्धत तीन पयोथरों पर मुसोभित होते है प्रयत्न नहो—

दीप्तोपान्तं नयनयुगलं -भूषयत्यजनश्री:

तुण्डोज्ज्वलाभि: प्रभववति कुचाविवृन्ति हारयष्टि: । सङ्क० भ० ११८६०

किन्तु इसके विपरीत कण्ठ में मेखला का, नितम्बफलक पर सुन्दर हार का, हाथों में नूपुरों का, चरणों में केयूरों का भावधा रक्खा कितना कुश, बद्धा श्रोद्र हास्यप्रद बनेगा यह कहने को श्रावश्यकता नहो है ।

१. (क) तथा हि व्रचेतनं दवसरोरं कुण्डलतायुपेतमपि न भाति, भलङ्कार्यस्याभावात् । यतिशारीरं कटकादियुक्तं हास्यावहं भवति, भलङ्कारस्य भनौचित्यात् ।

(ख) वपुरिव यौवनवत्यमज्जनाया: । का० सू० धृ० ३११२ (वृत्ति)

२. कण्ठे मेखला नितम्बफलके तारलै हारैर वा । पादयो तु पुरबन्धनेन चरथो केयूरपद्योत वा ।। शोभां प्रापते विरद्धी कृतगतया, नापन्नति के हारयष्टि:, श्रोचित्येन विन त्रता हि प्रथनुते, नालं कृतिनोऽनुप्रया: ।।

श्रो० वि० पृ०, पृष्ठ ९

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उन तीन कवनों से स्पष्ट है कि 'ग्राम्योपयोगी' का प्रयोग जहाँ सजीव एवं सुन्दर शरीर की अपेक्षा रखता है, वहाँ 'प्रोचित्य' में उसके लिए 'ग्रनिवायत्व' तत्व है । काश्यपत 'मलकारो' के दोमावह प्रयोग में भी इन्हीं दोनों तत्वों को ग्रनिवायंता अपेक्षित है— (१) मलकारों का सरस काव्य में प्रयोग (२) सरस काव्य में भी 'ग्राम्य' मलकारों का प्रोचित्यपूर्ण प्रयोग । एक ओर पद-दाव, यति, शरीर ग्रथवा यौवनवन्ध्यवपु पर ग्रामूपयोगी का 'ग्रवघारस्य' एक कोतुहल मात्र है, तो दूसरी ओर शृङ्गार काव्य में भी 'मलकार-प्रयोग' का अन्य नाम 'उक्ति वैचित्र्य-मात्र' है—'वस्तु तु नास्ति रसः तत्र (मलकारः) उक्तिवैचित्र्यमात्रप्रसाधितः ।' जिस प्रकार हायों में नपुंसक का शौर शरमो में केशों का वर्णन समुचित नहीं है, उसी प्रकार विप्रलम्भ शृङ्गार में भी यमक ग्रादि का वर्णन समुचित नहीं है । अतएव यह कि लौकिक शौर काव्यगत दोनों प्रकार के मलकारों का जीवन शौर उनकी मलकारिता उचित स्थानविन्यास पर ही ग्राश्रित है । फिर भी शारीर-सौन्दयं को ग्रपेक्षा काव्य-सौन्दयं प्रधान सर्वेदनशील है । उदाहरणार्थ रसकर का ग्रनुप्रास विप्रलम्भ शृङ्गार के एक उदाहरण में रस का उपकार करता है तो टकार का ग्रनुप्रास उसी हो रस के दूसरे उदाहरण में रस का चुपकार नहीं करता । तभी मम्मट को मलकारों के विपय में लिखना पड़ा—'श्रवचितु सन्त्रमपि नोपकुर्वन्ति । स्पष्ट है कि एक ही रस के दो उदाहरणों में कोमल वर्ण 'रसकर' शौर कठोर वर्ण 'टकार' की सघ्यता ग्रथवा प्रसङ्ग्यता का उत्तरदायित्व प्रोचित्य के ही सन्निवेश ग्रथवा प्रभाव पर निर्भर है ।

जहाँ तक शब्दालकारों शौर ग्रर्थालकारों के पारस्परिक तारतम्य का प्रश्न है, संस्कृत का काव्यशास्त्री शब्दालकारों के प्रयोग के ग्रनौचित्य के विपय में प्रपेक्षाकृत ग्राधिक ग्राराक्तित रहा है । यही कारण है कि दण्डी जैसे मलकारवादी ने भी ग्रनुप्रास शौर यमक के प्रति अपनी प्रवहेलना प्रकट की है; शौर रुद्रट जैसे मलकारप्रिय ग्राचार्य ने ग्रनुप्रास प्रकार की स्वसम्पत मधुरा, मृदुला ग्रादि पाँच वृत्तियों के प्रोचित्यपूर्ण प्रयोग पर विशेष बल दिया है । भामनदवन्धन ने ग्रनुप्रास-बन्ध के विपय में एक चेतावनी दी है कि 'श्रृङ्गार के सभी प्रभेदों में ग्रनुप्रास का बन्ध सदा एक सा प्रभविष्यजक नहीं हुग्रा करता । भ्रत, कवि को इस मलकार के प्रोचित्यपूर्ण प्रयोग के लिए विशेष सावधानी बरतनी चाहिए । शृङ्गार विप्रलम्भ शृङ्गार में भमदक का (छद्मशलेदश, छिन भ्रादि का भी) प्रयोग कवि के प्रमाद का सूचक है ।

काव्यप्रकाश, ५ उल्लास, पृष्ठ ३०

१. काव्यप्रकाश, ५ उल्लास, पृष्ठ ३०

(क) कदर्थयितसखीस्तरुं किं मिथ्यापरिलक्षितैरखैः । वस्य जोवितमोचित्यं विचिन्त्योक्तिप न हर्यते ॥ ग्रो० विं० पू० ७

२. (क) कदर्थयितसखीस्तरुं किं मिथ्यापरिलक्षितैरखैः । वस्य जोवितमोचित्यं विचिन्त्योक्तिप न हर्यते ॥ ग्रो० विं० पू० ७

(ख) उचितं 'श्राननदिन्यासादलकृतिरलकलकुचितिः । यहो पू० ६ ।

(ख) उचितं 'श्राननदिन्यासादलकृतिरलकलकुचितिः । यहो पू० ६ ।

३. देखिए मम्मट द्वारा उद्धृत बोनों उदाहरण—

(क) ग्रपसारय धनस्तरम्

(क) ग्रपसारय धनस्तरम्

(ख) चित्ते विहृत्यिरे टट् टकारि (काव्यप्रकाश, ५ म उल्लास)

(ख) चित्ते विहृत्यिरे टट् टकारि (काव्यप्रकाश, ५ म उल्लास)

काव्यादर्श १ । ४३,४४,५६ ।

४. काव्यादर्श १ । ४३,४४,५६ ।

काव्यप्रकाश २ । ३२ ।

५. काव्यप्रकाश २ । ३२ ।

(क) शृङ्खारस्पांगितो मत्तादेकहपानुमुग्धवातु । सर्वदेवप्रभेदेषु ग्रानुप्रासः प्रकारकः ॥ ध्व० २ । १४ ॥

६. (क) शृङ्खारस्पांगितो मत्तादेकहपानुमुग्धवातु । सर्वदेवप्रभेदेषु ग्रानुप्रासः प्रकारकः ॥ ध्व० २ । १४ ॥

(ख) ध्वन्यातमभ्रूतभूयस्तरे यमकाविनिवन्धननमः । शास्त्राश्रयी प्रमादित्वं विप्रलम्भे विशेषतः ॥ व० जो० २ । ५ ।

(ख) ध्वन्यातमभ्रूतभूयस्तरे यमकाविनिवन्धननमः । शास्त्राश्रयी प्रमादित्वं विप्रलम्भे विशेषतः ॥ व० जो० २ । ५ ।

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(संस्कुलता-पूर्वं वद्यता) के पक्ष में नहीं है, भोर यदि ऐसी रचना हो भी जाए; तो उसे प्रयुकुमार नहों वनाना चाहिये' । भट्टलोल्लट (?) के मत में यमक् श्रादि वाव्दालंकार रस के प्रतिविरोधी हैं । इनका प्रयोग कवि के श्रमिमान का सूचक है, श्रथवा मेढ़चाल के समान है ।

इन सब श्राचार्यों के श्रनुरूप रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने भी श्रलंकार विशेषतः श्लेष श्रलंकार को अपने उत्त काव्य में रस के श्रंगन मर्याद् भंग का कारक माना है' ।

हमने देखा कि वाव्दालंकारों के श्रौचित्य को सम्भावते-सम्भालते संस्कृत के प्राचार्यों कहों कहो उनका विरोध भोर निपेध तक कर बैठा है । पर श्रर्थालंकारों के प्रयोग का निपेध वह् किसी श्रवस्था में करने को चहता नहीं है । वह हमें स्वस्य रूप में देखना चाहता है । श्रलंकार का स्वस्थ रूप है—रस, भाव श्रादि का श्रंग वन कर रहना ।" उसे यह रूप देने के लिए एक प्रबुद्ध कवि को विशेष प्रकार के समीक्षात्मक की श्रदा मपेक्षा रहनी चाहिए । इसके प्रतिरिक्त श्रर्थालंकारों का प्रयोग करते चले जाना कवि की स्वेच्छा पर भी निर्भर नहीं है । ये वदनि के उपकारक तभी समझे जाएंगे, जब ये रस में दचतिच्चित, प्रतिबिम्बान् कवि के सामने हांप जोड़े चले श्राएं; ' श्रर्थात् किसी प्रयत्न के बिना रचना में रसानुकूल समाधिग् होकर स्वयं कवि को भी ग्राश्चर्यचकित कर दें । निष्कर्ष यह् कि श्रर्थालंकारों के श्रौचित्यपूर्ण प्रयोंग की कसौटी है—ग्रपूर्वसयत्न-रूप से रसानुकूलता की प्राप्ति—

रसाश्रिप्ततया यत्नं वन्यते न च मक्रियः भवेत् । ग्रपूर्वसयत्ननिवर्त्यः सौदलंकारो ध्वनो मतः ॥ ध्वन्या २।१६।

और यदि वाव्दालंकारों का भी, रसोपयोगी वन कर श्रपूर्वसयत्न-रूप से, रचना में स्वतःसमावेश सम्भव होता, तो ध्वनिसूक्त के श्राचार्यों ने श्रर्थालंकारों के समान इन्हें भी निश्चित ही समान महत्व दे दिया होता ।

श्रर्थालंकारों का श्रौचित्यपूर्ण प्रयोंग करने के लिए श्रानन्दवर्धन ने निम्न सापनों में थे किसी एक का श्राश्रय लेने की सम्मति दो है—

(१) ग्रंगीभूत रस के प्रति रूपक श्रादि श्रलंकारों का सदा ग्रंगारूप से विवक्षा करना ।

(२) ग्रंगीभूत में श्रलंकारों की विवक्षा न करना ।

(३-४) प्रवसर पर इसका ग्रहण श्रथवा त्याग करना ।

नातिनिबध्यवधिता, नात्यपे शालश्रौष्ठिता । व० जो० २।४।

९. नातिनिबध्यवधिता, नात्यपे शालश्रौष्ठिता । व० जो० २।४।

यमकातुलोलमतदितरचक्रादिविधिदो तिरसाविरोधिन्य- । प्रभिमानामात्रमतेदृश् मदुरिकावि प्रवाहो वा ॥ का० प्रनु० (हेम) पृष्ठ

२. यमकातुलोलमतदितरचक्रादिविधिदो तिरसाविरोधिन्य- । प्रभिमानामात्रमतेदृश् मदुरिकावि प्रवाहो वा ॥ का० प्रनु० (हेम) पृष्ठ

३.

रसभावादितात्पयंमाधिक्यप विनिवेशनम । श्रलंकृतोनां सर्वासामलंकातृरसराश्रयणम् ॥ व् प० १।२२।

४. रसभावादितात्पयंमाधिक्यप विनिवेशनम । श्रलंकृतोनां सर्वासामलंकातृरसराश्रयणम् ॥ व् प० १।२२।

प्रलंकातरतात्पर्य-रससमाहितचेतसः । प्रतिबिम्बतः कवेर्हृदयिकया परावतन्ति । (ध्वन्या० २।१६।१८) यति)

५. प्रलंकातरतात्पर्य-रससमाहितचेतसः । प्रतिबिम्बतः कवेर्हृदयिकया परावतन्ति । (ध्वन्या० २।१६।१८) यति)

६. ध्वन्या० २।१६,१८ ।

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ध्वन्यात्मभूते मुखद्रारे समोक्ष्य विनिवेशयेत्। रसपाकाविरलकारकैर् एति यथायथं तमाम्॥ ध्व० २।१७॥

५. गुए रस प्रोर गुए के परस्पर-सम्बन्ध का निर्देश करते हुए एक स्थान पर ग्रन्थकार लिखते हैं कि 'व्यायोग' नामक रूपक में वीर, रौद्र श्रादि दीप्त रसो की स्थिति होती है। इस में गद्य तथा पद्य दोनों श्रोजगुए-युक्त होने चाहिये : दीप्तन योररौद्रादिभिर् रसाधान्य्। भ्रतएवात्र गद्य पद्य चोजोगुएयुक्तम्' (हि० ना० द० पृ० २२१) भयानकवद्‌दनं तथा उन्तवे मनुवादियों के मनुसार गुए का रस के साध दोहरा सम्बन्ध होता है—एक सम्बन्ध प्रधान है प्रोर दूसरा गोए। प्रधान सम्बन्ध व माधार सहृदय की चित्तवृत्ति है, प्रोर गोए सम्बन्ध का माधार वएँ, पद मोर मयँ है । मतलव गुए प्रधानत रस का धर्मँ है प्रोर गोएात। वर्‌याति का! (१) रस के साष गुए का प्रधान सम्बन्ध होता है। इसका तात्पर्य यह है कि शृगार, करुण श्रादि कोमल रसो में चित्त की द्रुति होने के कारण माधुर्य गुए भी स्वीकृति होगी, प्रोर वीर, रौद्र श्रादि कठोर रघो में चित्त की दीप्ति होने के कारण प्रोज गुए को। कोमल प्रयवा कठोर रसों में से किसी भी रस में यदि भर्य का प्रथवोध त्वरित हो जाएगा तो वहाँ चित्त की ध्याप्ति होने के कारएा माधुर्यं प्रोज के धर्मतिरिक्त प्रसाद गुए की भी स्वीकृति की जाएगी। दूसरे शब्दों में, किसी सरस रचना में यदि त्वरित प्रर्थबोध न होगा, तो वहाँ रस के श्रनुभवूल माधुर्यं प्रोर प्रसाद गुए माना जाएगा, मोर यदि त्वरित श्रथवबोध हो जाएगा तो वहाँ रस के श्रनुभवूल माधुर्यं प्रयवा प्रोज में किसी एक गुए की स्थिति मानो जाएगी, मोर यदि त्वरित श्रर्थावबोध हो जाएगा तो वहाँ रस के श्रनुभवूल माधुर्यं प्रोज प्रोर प्रसाद गुए दो दो गुए की स्थिति स्वीकृत होगी। इस प्रकार ये गुए सहृदय के चित्त की विभिन्न प्रवस्थाप्रो पर श्राधारित हैं। चित्त की द्रुति, दीप्ति श्रयवा ध्याप्ति नामक प्रवस्थाए पहले होती हैं प्रोर रसाभिव्यक्ति इनके बाद होती है। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि सहृदय का मन इन प्रवस्थाप्रो में से न गुजरे प्रोर रस का अभिव्यक्ति हो जाए। निष्कर्षत चित्तवृत्ति रूप गुए प्रोर रस में पूर्वपर सम्बन्ध है तथा यह सम्बन्ध नित्य प्रयाप्त्‌ मनिवायँ है। (२) गुए का रस के साष गोए सम्बन्ध मी है। इसका तात्पर्य यह है कि शृगार, वच्र्य

ते रसग्य्‌दीनो धर्माः। × × प्रचलत्स्थितयो गुयाः।

गुर्यावृत्या पुनस्तैर्वा वृत्ति द्राथाप्योमता। काव्यप्र० ११६,७१

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ग्रादि कोमल रसों में कोमल वयों का प्रयोग होना चाहिए तथा समस्त पदों का प्रयोग या तो न हो, यदि हो तो श्रृंगार हो जिसमें समस्त पद लघु हो । इसीलिए वीर, रौद्र श्रादि कठोर रसों में कठोर वयों का प्रयोग करना चाहिए, तथा सघन शृंगार श्रादि समासों का प्रयोग होना चाहिए । उत्तम वयों एवं पदों का प्रयोग कोमल रसों में माधुर्य गुण का श्रभिव्यञ्जक कहाता है शृंगार कठोर रसों में श्रोज गुण का । इनके प्रतिरिक्त यदि किसी भी सरस रचना में ग्रयं का चावबोध त्वरित हो जाएगा तो उसमें चाहे किन्से भी वयों शृंगार पदों का प्रयोग हो वहाँ माधुर्य श्रथवा श्रोष में से किसी एक गुण के साथ प्रसाद गुण की स्वीकृति भी की जाएगी । इस प्रकार ये गुण वयों शृंगार पद पर श्राधारित है, रचना श्रथवा काव्य के वाह्य पक्ष पर श्राधारित है, पूर्वोक्त गुणों के समान सहृदय की नित्यवृत्ति पर्यन्त काव्य के ग्रान्तरिक पक्ष पर श्राधारित नहीं है । इसके प्रतिरिक्त पूर्वोक्त गुणों के समान इन गुणों का रस के साथ नित्य सम्बन्ध भी नही है ।

उदाहरणार्थ, श्रृंगार रस के किसी पद्य में यदि कोई श्रप्रस्तुत कवि दीर्घ-समस्तवृत्ति शृंगार टरगर्विति से युक्त कठोर वयों-योजना का प्रयोग कर लेगा, तो उस विप्रलिप्ति में भी उस पद्य में रसगत माधुर्य गुण को ही स्वीकृति होगी शृंगार वर्णादिगत श्रोप्रगुण की । क्योंकि गुणों की स्थिति रस पर श्राधृत है न कि वर्णोयोजना पर । हाँ, इस पद्य में 'वर्ण-प्रतिसंस्कता' नामक दोष भी प्रवृत्त माना जाएगा । किन्तु श्रादर्श सिथति यही है कि शृंगार श्रादि रसों में माधुर्यगुण के श्रभिव्यञ्जक वर्णों प्रयुक्त किये जाने चाहिए शृंगार रौद्र श्रादि दोष्प रसों में रसगत श्रोप्रज गुण तो स्वतः सिद्ध है ही, वहाँ वर्णादिगत भी श्रोप्रज गुण हो होना चाहिए ।

६. वक्रोक्ति

प्रस्तुत ग्रन्थ में 'वक्रोक्ति' शब्द का प्रयोग जिन प्रसंगों में हुआ है, उनमें निम्नोक्त चार प्रसंग उल्लेखनीय हैं—वक्रोक्ति, शृंगार रस, माधुर्य, श्रोप्रज रसदोष । इन्हीं प्रसंगो में वक्रोक्ति को न तो काव्य का मूल दिया गया है, तथा न सामान्य प्रयं में न होकर तीन विशिष्ट प्रयं में हुम्रा है :

(१) 'वक्रोक्ति'-प्रसंग में वक्रोक्ति से तात्पयं है—विवक्षिता विचित्रता, प्रयवा चावलता । ग्रन्थकारों ने वक्रोक्ति के लक्षण में इसे नाटकादि द्वादश रूपकों को उपवारीकृत कहा है । श्रोप्रज इस प्रकार यह बतलाया है कि वक्रोक्ति में श्रथाहार, श्राधिकय ग्रादि १३ प्रकार के नाटक श्रादि सभी रूपकों में उपयोर्गो है, श्रोप्रज इन ग्रभो के सम्बन्ध में चमत्कारोक्ति प्रयवा दास्सलताप्रो से युक्त है—

तथ्यैरपि प्रकाशितां नाटकाद्योक्तं वप्रोक्तिमादिसुलता । वचोभिरालप्रयेरोन उपयोक्तुं वंचयितुमर्हति ॥

हि० ना० पृ० २७१

इसी प्रकरण में होने शृंगार श्रोप्रज हास्य को अनेक प्रकार की वक्रोक्तियों से युक्त कहा गया है । यहाँ भी 'वक्रोक्ति' का तात्पयं विचित्रता हो है—

वक्रोक्तिराहुलसुस्तवेन ३' वारहास्यप्रयोगः श्रूयतामाभ्रयात् किञ्चिदो मुखरीक्रियताम् ।

—मही

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परस्परावलोकन-चुम्बन-विवित्रश्लेषोक्त्यादिभेदतोऽनन्त-प्रयं सम्भोगाल्यो बहु ।

इसी प्रकार शृंगार रस के निम्नोक्त प्रसंग में भी वक्रोक्ति से प्रभिप्राय है सुन्दर वार्तालाप, न कि कुन्तक-सम्मत वक्रोक्ति— प्रथम सम्भोगाल्यो बहु । परस्परावलोकन-चुम्बन-विवित्रश्लेषोक्त्यादिभेदतोऽनन्त-प्रकार । हिं० ना० द० पृ० ९०७

(३) 'ग्राम्यल-प्रसंग' में 'वक्रोक्ति' (वक्रोक्ति) शब्द का प्रयोग रुष्ट वचन से विपरीत प्रयं में हुम्रा है : “ग्राम्यल में सूत्रधार दो प्रकार के वचनों का प्रयोग करता है—एप मोर वक्रोक्त ।" वक्रोक्त से तात्पयं है साक्षात् विवक्षित ग्रथ्यं का श्रप्रतिपादक कथन—“वक्रोक्तः साक्षाद् विवक्षितार्थ-प्रस्यप्रतिपादकं。” अर्थात् वह वचन जो स्पष्टतया न कहा जा कर घुमाकर कहा जाए, जैसा कि संस्कृत-नाटकों के 'ग्रामुख' में प्रायः व्यवहृत होता है ।

(४) रसदोष प्रसंग में 'वक्रोक्ति' शब्द का प्रयोग तो नहीं हुग्रा, 'ग्रववक्रोक्ति' का हुग्रा है । यहांँ 'वक्रोक्ति' से प्रभिप्राप्त है—युक्त, रचित, मान्य, संगत ग्रादि । रस, रसाभास, व्यभिचारिभाव, ग्रादि की स्वरादवदव्याप्ति का सर्वप्रथम सङ्केत उद्भट ने किया था, तथा कुन्तक, मम्मट ग्रादि ग्राचार्यों ने इसे एक दोष माना था, किन्तु रामचन्द्र गुणचन्द्र ने इस दोष कल्पना को प्रयुक्त कहा है, तथा इसे मध्यमपदलोपी की उक्ति के रूप में स्वीकार करते हुए इसे 'ग्रववक्रोक्ति' श्रर्थात् प्रभयुक्त, श्रनुचित, ग्रमान्य, ग्रसंगत पारसा माना है 'तस्माद् प्रभयुक्तमप्योचितवादवक्रोक्तिरेवेयमु' (हिं० ना० द०)। उक्त धारणा प्रयुक्त है ग्रप्रयवा नहीं, यहां यह विचारणीय नहीं है । विचारणीय यह है कि क्या 'वक्रोक्ति' शब्द का अर्थ 'युक्त' ग्रादि भी हो सकता है ? शब्द के वाच्यार्थं से तो इस ग्रर्थ का बोध नहीं होता, हां यदि व्युत्पत्तिन की जाए तो वक्रोक्ति = नायप का वाच्य साधन = काव्य का उपयुक्त ग्रथवा युक्त, मान्य, रुचित तत्व । व्रात वक्रोक्ति का अर्थ हुग्रा युक्त ग्रौर ग्रववक्रोक्ति का ग्रयुक्त । किन्तु इस धारणा से मनस्तुष्टि नहीं होती । सम्मतवत् यह पाठ ही ग्रभ्रुद्ध है । 'प्रवक्त' वक्रोक्ति शब्द का ग्रर्थ काव्यत्व भी लिया जा सकता है, जिसके ग्रनुरूप 'ग्रववक्रोक्ति' का ग्रर्थ होगा—'काव्यत्व से बहिष्कृत' । ग्रवक्तु ! यह शब्द यहांँ 'ग्रप्रयुक्त' के रूप से दूषित है ।

१. विधिवचनतो माध्ये प्रस्तुतासेवी भावनाभूः । मूर्त्यभावेऽपि वक्रोक्तिः स्पष्टोक्त्यन्तं तदनुरूपम् ॥

इसके श्रतिरिक्त इस ग्रंथ में निम्नोक्त स्थल पर पद्यपि 'वकता' प्रभिधवा 'वक्रोक्ति' शब्द का घ्यवहार नहीं किया गया, तथा जिस धारणा को वहां प्रस्तुत किया गया है उसका मूल 'बीज' नामक रूपक भेद के १३ श्रंगों में से १० वां श्रंग है मृदवम्— जिसका लक्षण है जिसमें मुख ग्रौर दोपों का पारस्परिक वयत्नयम हो—'व्यतययोर्मुखदोपयोः । मृदवम् ।' (हिं० ना० द० पृष्ट २६३)। इस प्रकार 'मृदव' नामक वीर्यभेद के दो रूप हैं ग्रुणों का दोप वन जाना ग्रौर दोपों का ग्रुण वन जाना । प्रथम रूप के उदाहरणरूप स्वरूप नाट्यदर्पण में तीन उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं जिनमें ग्रुण को दोष बताया गया है । इनमें से प्रथम दो उदाहरण लीजिए :

२. केविन्तु व्यभिचारिररसरसाभिपन्ना स्वरादवदव्याप्त्यर्थं रसदोषमाहुः, तद्युक्तम् । हिं० ना० द० पृ० ३२५

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(क) दूत-सभा मे बेचारी द्रोपदी 'यो: गो:' [प्रथमात में तुम्हारी 'गो' हूँ, मुझे वचाग्रे, मुझे वचनाम्रो] चिल्लाती रही कितु उस समय क्या घनुर्धारी प्रधुन ने वहाँ मही या जो उसे बचा सक्ता ? 'वेयोसंहार' मे दुर्योधन जयद्रथ की मातृा की चेतावनी को प्रव्हेलना करते हुए बोले ।

पहले पद्य मे 'ग्र्रजुन' का 'घनुर्धरत्व' और दूसरे पद्य में कुचद्रदों की 'कठोरता'—यचापि ये दोनो गुण हैं तथापि इनहे दो पद ल्प में स्वीकृत किया गया है । इन उदाहरणों से दो बातें स्पष्ट है । एक यह कि यहाँ 'गुणा' शब्द काव्यगुणो का सूचक न होकर लोभिक गुणो का सूचक है, और दूसरी यह कि इस प्रकार की दोपता का प्राधार वचन को वकता है जिससे गुणा दोप न बन कर मोर भी शधिक निखर जाता है तथा काव्य-सौन्दर्यं का कारण बनता है ।

(ख) [मेरे माने पर] तुम्हारे मुखचन्द्र ने मुस्करा कर मेरा स्वागत किया, नेत्रो ने प्रमुज्ज्वलित होकर, बाहुम्रो ने रोमांचित होकर और मोर वाणी ने मधुर स्वर को घारगा करकै, कितु तुम्हारे कुचद्रों में कोई परिवर्तन नही झाया, वे यैसे के वैैसे कठोर स्य्यति जड़ बने रहे 'तलविलास' मे नल दमयन्ती से बोले ।

इसो प्रकार दोप के गुणा बन जाने के सम्बन्ध में भी जो तदाहरणा प्रस्तुत किये गये हैं उनमें सभी दोप काव्य-दोष के सूचक न होकर लोभिक दोपो के सूचक है तथा वे गुणा रूप में वणिंत किए जाने पर भी प्राघात मे बने कर त्याज्य बन गये हैं । इस वरान्त प्रकार का मूल प्राधार भी दर्शन की वकता हो है ।

(क) द्रोपां, करं, जयद्रथ ग्रादि सात महारथियो द्वारा प्रभिहन्य के घघ का समांचार सुनकर दुर्योंघन कह उठा कि साधु पर किया गया मपकार मी नि.सन्देहु मृत्यन्वे प्राणंददायक होता है ।

(ख) सब की पत्नियाँ सुंदर नही होती, परनारोगामो पुरुष राज्यदण्ड का भागी बनता है, × × × × × ×, यदि दूसरो के हित मे सलग्न वेश्यायें न हो तो बेचारे कामातं जन कहाँ जायें?

प्रथम पद्य में 'स्त्रीत्व' का परित्याग' रूप दोप वताया गया है. और द्वितीय पद्य में 'वेश्यागमन' रूप दोष भी गुणा रूप में स्वीकृत किया गया है । किन्तु इन दोनो पद्यो के वक्तासो के प्रति न तो कवि की सहानुभूति है और न हो उसके मनुरूप सहृदय की । भ्रतः वचन-वकता के प्राधार पर ये दोनो लोभिक दोप मोर भी मधिक स्वाज्य रूप मे वणि्य हो गये हैं ।

७. प्रोचित्य मौर ग्रनौचित्य

(क) प्रोचित्य—

इस ग्रन्थ मे 'प्रोचित्य' का प्रयोग निम्नोक्त चार स्थलो पर हुमा है—

(१) कवि [भीरोरात्र ग्रादि मुख्य पात्र के लिये] पपने हृदय से किसी फल-विशेष मा उत्कपं यथेष्ट नही करने लगा जाता, अपितु 'प्रोचित्य' प्रप्राप्त उचितता को देखकर हो वह ऐसा करता है: "कपिराजिन न स्वच्छंदा फलतेय यथेप्सितं निबधुमर्हति किंतु प्रोचित्येन" (रघु ९०)

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(२) जो वृत्त नायक अथवा प्रकृत रस के प्रयुक्त अथवा विरुद्ध हो उसे या तो छोड़ देना चाहिए, अथवा उसकी अन्यथा कल्पना कर लेनी चाहिए। (१११५) यहां 'प्रयुक्त' शब्द से स्वयम् प्रयत्नकारों का अभिप्राय है औचित्य अथवा प्रविरोघ-प्रन्येथितमौचित्ययेन विरोधेन वा । उदाहरणार्थ, नलविलास में नल जैसे शृंगारललित नायक द्वारा निरपराध पत्नी का त्याग वर्णित है "किन्तु काव्यालिक के प्रयोग से वह [सचितता-(औचित्य-) पूर्वक] निवद्ध हो गया है, धतः यह प्रसंग अननुबन्धनीय नहीं है। (पृष्ठ १६)

(३) जिस प्रकार नाटक में अभीनेय प्रवन्ध के लिए उपयुक्त फल, शक, उपाय, × × × रस प्रादि का प्रयोग किया जाता है उसी प्रकार प्रकरण में भी इन सब का प्रयोग औचित्य (चितितता) का उल्लंघन किये बिना करना चाहिए-"प्रभिनेप्रवन्धोचितं फलादीनां रसादिकं यथा नाटकेऽसक्तं तथाद्यप्रादि सर्वमौचित्यादनतिक्रमेणैष्यते ।" (पृ० २१२)

प्रयत्नैरसत् यथायोगं रसानां व्यभिचारिषु ।

(घ) निर्दोष प्रादि तेँतीस संचारीभाव शृंगारादि रसो में यथायोग प्रयुक्त करने चाहिए : "प्रयत्नैरसत् यथायोगं रसानां व्यभिचारिषु ।" यहां 'यथायोग' का तात्पर्य है—रसों के औचित्य (उचितता) का अनुल्लंघन अथवा इसका सम्यक् पालन—'यथायोगम' इति रसौचित्य-जनतिक्रमेण । (हिं ना० द० पृष्ठ ३३१)

कुछ विद्वानों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि 'औचित्य' शब्द का प्रयोग लोहेन्द्र-सम्पत औचित्य-सिद्धान्त के परिभाषापूर्वक अर्थ में न किया जाकर 'उचितता' अर्थ में किया गया है, यद्यपि यह गलत बात है कि मूलतः जो कुछ लोहेन्द्र को अभीष्ट है लगभग वहीं कुछ रामचन्द्र-गुणचन्द्र को भी अभीष्ट है । लोहेन्द्र के शब्दों में 'उचिततया यो भावस्तदौचित्यं प्रचक्षते', किन्तु उन्होंने लोहेन्द्र के समान सात्त्विक् अथवा रसाद्यात् रूप में इसे 'काव्य को जीवित' स्वीकार नहीं किया ।

(ल) ग्रनौचित्य— इस ग्रन्थ में कतिपय स्थलों पर 'ग्रनौचित्य' शब्द का भी प्रयोग हुमा है । एक स्थल पर यह पांच रसदोषों में से एक रसदोष है । पांच रसदोष हैं—ग्रनौचित्य, ग्रंथ की उप्रता, अप्रुष्टि, मर्यादाक्ति शौर श्रद्वैविधम् । इनमें से 'ग्रनौचित्य' नामक रसदोष का उदाहरण है—वह कर्म जो सहृदयों के मन में विचिकित्सा अथवा संदेह का कारण बने—सहृदयानां विचिकित्सा-हेतु कर्मानौचित्यम् । (पृष्ठ ३२४)

आगे चलकर इसी प्रसंग में ग्रनौचित्य को 'रसदोष' का पर्याय स्वीकार करते हुए ग्रन्थकारों ने कहा है कि यद्यपि ग्रंथ की उप्रता श्रादि दोष चार रसदोषों में मूखतः 'ग्रनौचित्य' नामक दोष में ही अन्तर्भूत हो सकते हैं, [मतः इनका पृथक् निरूपण नहीं करना चाहिए], तथापि सहृदयों को ग्रनौचित्य अर्थात् रसदोष का सम्यक् ज्ञान हो जाए, इसलिए ऐसा किया गया है—"ग्रंगोप्रायस्यरच दोषाः परमार्गतोनौचित्यगताः । पतिनोपीति सहृदयानामनौचित्यघ्युत्पादनार्थम्-मुदाहरणार्थवेनोपात्ता । पृष्ठ (३२८)

कुछ दोनो स्थलों से भी यही ज्ञात होता है कि 'ग्रनौचित्य' शब्द लोहेन्द्र-सम्पत् पारिभाषिक 'औचित्य' के प्रभावात्मक अर्थ में प्रयुक्त न होकर रसदोष प्रायं में ही स्वीकृत हुमा है ।

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इसका कारण सम्भवत. प्रानन्दवर्धन का यह कथन प्रतीत होता है कि 'ग्रनौचित्य के बिना रसमज्ञ का कोई अन्य कारण नही होता-'प्रनौचित्याद् ऋते होते नान्यद् रसमदृरुप कारणम् ।' (ध्वन्या. ३/१४ वृत्ति) प्रानन्दवर्धन ने रसभंग कोर ग्रनौचित्य में परस्पर सम्बन्ध जोडा तो रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने इसे 'रसदोष' का हो समाना्थंक मान लिया । इसी प्रसंग में यह ज्ञातव्य है कि ग्रनौचित्य शब्द का दोष के श्रथं में सम्भवत. सर्वप्रथम प्रयोग महिमभट्ट ने किया था तथा इसके श्रनेक भेदों की मी चर्चा की थी, किन्तु वहां नन तो इसे रसदोष के श्रथं में प्रयुक्त किया गया है श्रोर न ही इसके भेद रसदोष हो हैं। वहां तो इसे काव्य-दोष के सामान्य श्रथं का ही वाचक माना गया है । (दे. व्यक्तिविवेक शप विमसँ)

हां, प्रस्तुत ग्रन्थ मे निम्नोक्त स्थल पर 'ग्रनौचित्य' शब्द का प्रयोग क्षेमेन्द्र-सम्मत 'ग्रोचित्य' के प्रमाबात्नक रूप में मो चपरिस्थित किया गया है--"प्रहसन नामक रूपक केवल हास्य रस का हो विपय है । यह शुंगार रस का विपय नही हो सकता, क्योकि [इस रूपक के मुख्य पात्रों] मिरिन्दनीय पाखण्डी श्रादि का शुंगार रस के रूप में निरुपण करना ग्रनौचित्य (ग्रनौचित्य के प्रभाव) का सूचक है--निन्द्यपाखण्डिप्रभृतिभि शुंगारस्याजनौचित्येनाभावात् केवलहास्यविपयत्वमेष । (पृष्ठ ३२१) श्रभिनवगुप्त मो रस के ग्रनौचित्य के विपय में प्रतयन्त् ग्राप्रहशील हैं--

कुयन्न् सर्वश्रपे व्याप्तिमोचित्यदरिद्रचिरो रस । मधुमास इवारोचकं करोत्यङ्कुरितं मनः ॥

तथा वे रसों के पारस्परिक संयोग में ग्रनौचित्य को हष्टकर ननहीं मानते--

तेषां पट्संरालेवात् कुयादग्रोचित्यरसेप्सुम् । ग्रनौचित्येन संस्पृष्टः कलयेदो रससङ्कर ।।

—वही, १५

५. दोष

पीछे निर्दिष्ट कर ग्राये हैं कि इस ग्रन्थ में पांच रस-दोषों का निश्चपण किया गया है । इस प्रसंग के ग्रातिरिक्त दोष पर विशेष निन्दा प्रकाश ननहीं डाला गया है ।१ इस प्रसंग में ग्रन्थकारों ने उत्त पांच रसदोषों के भेदों/उपभेदों का निश्रपण किया है जिन्हें इनसे पूर्वं मम्मट ने मो थोडे-बहत वन्वत के साथ वल्ल्लभित किया था । इस प्रसंग की दो उल्लेखनीय विसोपताएं हैं--(१) रसादि को स्वतद्र्योक्ति को दोष न मानना, तथा (२) 'विमाव' की कल्पना द्वारा व्यक्ति' के समम्मट मे समान रसदोष न मानकर 'सनिदष' नामक सामान्यदोष मानना । ये दोनो रस्पत विचारणीय हैं ।

(१)

रसादि की स्वतद्र्योक्ति का सर्वप्रथम उल्लेख रुद्रट ने ग्रपने 'काव्यालङ्कारसारसंग्रह' में तसवद् मलकार का मलकार प्रसतुत करते हुए इन दोनो में किया था—

रसादिव्यतिरेकेण--इतरस्योक्ताविधयम् । स्वदारदोष्याविसंचारिरिवभावाभिनयास्तपदम् ॥

फा. सा. सं. ७१३

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तामुद्वीक्ष्य कुचंगासी रसो नः कोडप्यजायत । व्रीड्यमण्डलमालाभिर्भूषिते मणिमन्तरम् ॥ प्रजायत रतिस्तस्या। त्वदृशि लोचननोचरे । जाता लज्जायती मृग्या प्रियस्य परितुम्बने

कुन्तक के उपरान्त मम्मट ने 'रस ग्रादि की स्वादबुद्द्वाच्यता' को रसदोषो में परिगणित किया। उन्हे इस दोप की प्रेरणा मानन्दवर्धन मोर सम्मट कुन्तक के उक्त प्रसंगो से मिली होगी। मम्मट के श्रनुकरण पर विद्वानाथ ने भी इस दोप की स्वीकृति की मोर निम्नोक्त उदाहरण प्रस्तुत किये— (क) तामुद्वीक्ष्य कुचंगासी रसो नः कोडप्यजायत । (ख) व्रीड्यमण्डलमालाभिर्भूषिते मणिमन्तरम् । (ग) प्रजायत रतिस्तस्या। त्वदृशि लोचननोचरे । (घ) जाता लज्जायती मृग्या प्रियस्य परितुम्बने । इघर रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने सम्मतवतः मम्मट के इस प्रसंग से प्रेरणा प्राप्त कर जनसे ग्रस्वरमति प्रकट करते हुए उक्त रूप में इस दोप को ग्रस्वीकृति की है। इस सम्बन्ध में हमारी विनम्र सम्मति यह है कि— (क) जहा विभावादि-सामग्री म्रपूर्ज एघं ग्रप्रपरिपक्व रूप में प्रस्तुत की जाती है, प्रयवा इसका प्रभाव हो रहता है, वहा यदि रस, शृंगार, रति, लज्जा ग्रादि शब्दो द्वारा कथन को सरस बनाने की चेष्टा की जाए तो निस्संदेह ऐसे कथन नु तो सरस कहाएंगे म्रोर न काव्यत्व को किसी कोटि में ही ये गनुमूत होंगे। ये केवल साधारगा वार्तामात्र ही होंगे जैसे कि विश्ननाथ द्वारा प्रस्तुत उक्त चार वाक्य।

(ख) जहा विभावादि की सम्पूर्ण सामग्री का उपस्थापन सम्यक् रूप से किया जाए, मोर यदि वहा रस ग्रादि में से किसी एक का नाम-निर्देश भी मनायास हो जाए तो इन सरस प्रसंगो में यह दोप प्रथम तो स्वतः नही करना चाहिए, मोर यदि स्वतः किया भी जाए तो उसे क्षम्य समकना चाहिए, यद्योकि इससे रस-प्राप्ति में कोई व्याघात उपस्थित नही होता । उदाहरणार्थ, रामचन्द्र-गुणचन्द्र प्रस्तुत पद्य में मानिनो के नेत्रो का प्रपलच-चातुर्यंपूर्वक वर्णन काव्यालङ्कादकता का उत्कादक है, किन्तु केवल 'जयमकमु' नामक सञ्चारिमाव के प्रयोग से इसमें रसदोष मानकर काव्यत्व की ग्रस्वीकृति मथवा होन-काव्यत्व को स्वीकृति करना समुचित नही है । इसौ प्रकार एक मोर उदाहरण तथा दूसरी मोर स्वप्न मम्मट द्वारा प्रस्तुत दो उदाहरण भी केवल धातांमात्र न होकर काव्यचमत्कार के उत्पाद में सक्षम हैं, क्योंकि उस सहृदय को जो इस पारिमारिक काव्य-दोष से नितान्त ग्रपरिचित है, इन शब्दो के प्रयोग के कारगा उसके ग्राह्लाद में तनिक भी व्याघात नही पहुँचता।

(ग) काव्यप्रकाश के टीकाकारो ने इस प्रसंग में यह संकेत भी किया है कि स्पार्थ-भाव, सञ्चारिमाव ग्रादि के प्रचलित नामो के स्थान पर यदि उनके पर्यायवाची शन्द रख दिया जाए हो वहा दोप नही रहता। उदाहरणार्थ "उत्ककारः शृङ्गतदुत्साहस्तस्म कोप्यभूत" में 'उत्साह' नामक स्यायिमाव का प्रयोग दोप का कारगा है, पर यदि यह पाठ कर दिया जाए तो यह दोष न रहेगा—'प्रभोदस्तस्य कोप्यभूत १' किन्तु यह धारणा भी समुचित नही है । इस दोष का एक

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मान्य ग्राह्य है काव्यचमत्कार की अपुष्टि । मम्मट-प्रस्तुत यह पद्य 'हस्ते ग्राह्य' इस ग्राधार पर भले ही सदोष हो, पर इस कारएा कदापि सदोष नही मानना चाहिए कि इसमें 'उत्साह' शब्द का प्रयोग हुमा है, भयवा 'प्रमोद' शब्द रख देने से यह अपुष्टि दूर हो जाएगी मोर यह सदोष न रहेगा ।

(घ) वस्तुतः इस दोष की स्वीकृति का मूल उद्गम व्यङ्ग्यार्थों की महत्ता स्पष्ट करना है । मतः-यदि रस, स्थायिभाव आदि का प्रयोग न किया जाए तो यह श्रादर्श स्थिति है, विभावादि की परिपकवता में इनका प्रयोग सदोष नही है तथा इनकी अपरिपकवता में दोष है ।

मतः रामचन्द्र-गुएाचन्द्र की उक्त धारणा भ्रामक रूप से ग्राह्य है—पूर्वोक्त न हो ।

परिह्रतति रांति मोहं चुम्बते सकलतितरां परिवसंतं च भूतमः । हति वच विघमां दशां स्वदेहं पातभरति प्रभभ किमत्र कुरङ्गः ॥

अब दूसरे दोष को लें—'विभाव की कट्घकल्पना द्वारा व्यक्ति (भ्रमिभ्यक्ति)' इस दोष का मम्मट तथा रामचन्द्र-गुएाचन्द्र ने निम्नोक्त उदाहरण प्रस्तुत किया है—

परिह्रतति रांति मोहं चुम्बते सकलतितरां परिवसंतं च भूतमः । हति वच विघमां दशां स्वदेहं पातभरति प्रभभ किमत्र कुरङ्गः ॥

अर्थात् यह नायिका किसी प्रकार की हठि नही रखती, इसकी बुद्धि दूषित हो गयी है, यह निरन्तर गिरती पडती है तथा बार बार करवट बदलती है । इस प्रकार की इसके देह की अवस्था विपम है, इसका क्या उपाय किया जाए ?—इस कथन से यह सन्देह बना रहता है कि इस नायिका की यह दशा विपयोग (रति) के कारएा है अथवा शोक के कारएा । मतः यह निश्चितपूर्वक नही कह सकते कि यह उदाहरण विप्रलम्भ श्रृङ्गार रस का है अथवा करुण रस का । मम्मट ने इसे 'विभावस्य कट्घकल्पनया व्यक्ति' नामक रसदोष माना है । मोर रामचन्द्र-गुएाचन्द्र ने 'सन्दिग्ध' नामक वाक्यदोष । नाट्यदर्पएा में रसदोषों के प्रतिरिक्त अन्य दोषों का निरूपण नही किया गया । काव्यप्रकारा में वाक्यगत सन्दिग्ध का उदाहरण है—

करिमिन्द्न् करभकिन्द्न् साभयं नमय नोत्पततेतरामू । ध्रयं सापुचरस्तस्माद् भ्रूजलिबन्ध्यातामिह ॥ का० प्र० ७/२०४

अर्थात्, इस पुएय को दात्ति किस कार्य में प्रकट नही होती ? यह ব্যকित हो 'साभुचर' है । मतः इसे मम्मटकार कोजिए । 'साभुचर' से यह स्पष्ट प्रकट नही होता कि वह 'साभुप्रों' में घूमता-फिरता है' भयवा 'पहले साधु रहा है ।' मतः यहां मम्मट के मत में वाक्यगत सन्देह है । निस्सन्देह चक 'परिहरति रांति'...... पद्य में इस प्रकार का सन्देह नही है । यहां रस-विपयक सन्देह है । वाक्य-

हसी प्रकंग में पर्यंगत सन्देह का उदतरएा भी द्रष्टव्य है---

मारसंयमुत्सग्यं विचार्यं कार्यमार्य्या। समर्यासमुदाहरन्तु । सेव्यः: नितम्बाः किमु भ्रूव्रराएामृत स्मरस्मेरविलासिनीनाम् ॥ का० प्र० ७/२६२

१. संप्रहारेऽपि हररां प्रहाराइामपरस्सरम् । ठलेपकारः भूतिकर्तृसाहसस्तस्य कादम्बमूत् ॥ का० प्र० ७/३४७

२. का० प्र० ७/३२६, ना० द० ३/२३ पुस्ति ।

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अर्थात् क्या पवंतों के नितम्ब (प्रान्तर भाग) सेवनीय हैं अथवा विलासिनियों के नितम्ब—इस काव्य में प्रकारणाभाव के कारण यह सन्देह बना रहता है कि यह उदाहरण शृंगार रस का है अथवा शान्त रस का । "परिहरति रतिं …" पद्य तथा इस पद्य में समास्पद एक ही है कि दो रसों में से इसे किस रस का उदाहरण माना जाए । किन्तु साथ ही दोनों पद्यों में अन्र्तर है वह यह कि एक में स्लेप के कारण सन्देह है और दूसरे में उसके विन। वस्तुतः प्रथयद्वयतिरेक-सम्बन्ध के प्रभाव पर 'सेव्या: नितम्बा:' ' काव्य में अ्रथदोपता की अपेक्षा पददोपता अधिक है, जैसे कि स्वर्य मम्मट ने पदगत सन्देह का ऐस ही उदाहरण प्रस्तुत किया है—"भ्रशोःपरम्परां वध्वां कुर्वीत कुपां कुलु" इसमें 'वन्याम्' का अर्थ सन्दिग्ध है । क्या इसका अर्थ 'वनदेन्या अ्रथात नत्सकरनीय को' है, अथवा वन्याम (वधाम्) का अर्थ 'वन्दनीकत महिला में' है? किन्तु 'सेव्या. नितम्बा:' में रस-विप—

यक सन्देह है जो कि 'स्लेप' पर आधरारित है, और 'भ्रशोःपरम्परां वन्याम…' में स्लेप तो है किन्तु यहां रस-विपर्यय सन्देह नहों है । 'प्रतः प्राधान्येन व्यपदेशः भवति' के अनुसार प्रथम पद्य में रसदोष है और द्वितीय पद्य में सदोष । 'स्लेप' के सम्बन्ध में ध्वाचार्यों के मत की स्पष्ट धारणा है कि इसकी स्रिथति तब माननी चाहिए जब यह स्वतन्त्र रूप में प्रयुक्त हो । इसकी परतन्त्र अथवा गौण स्रिथति में प्रचानलता वस काव्य-दोष की माननी चाहिए जिसका यह पोषक हो ।

रक्त विवेचन के प्रभाव पर हम कह सकते हैं कि 'सेव्या. नितम्बा:' और 'परिहरति रतिं…' इन दोनो पद्यों में सन्दिग्ध नामक रसदोष हो है । किन्तु एक श्रनतर के साच—प्रथम में विलष्ट सन्दिग्ध दोष है और दूसरे में मिलष्ट, पर दोनो ही हैं रसगत ही । क्योंकि दोष की दृष्टि से रस-निरूपण में सन्दिग्धता बना रहना ही दोनो का प्रतिपाद्य है । 'परिहरति रतिं…' में 'विमाव कष्टकल्पना द्वारा अभिप्रायिक' नामक दोष की स्वीकृति इसकिए नहों माननी चाहिए कि विभावादि तो रस-सिद्ध के लिए श्रावश्यक हैं । इस पद्य में रस का निरूप्य सन्दिग्ध रह जाने के कारण सन्दिग्ध दोष मानना चाहिए और वह भी रसगत । निष्कर्षतः राचन्द्र-गुपचन्द्र की यह धारणा सन्दिग्ध दोष है ग्रसदत । मान्य है, क्योंकि यहां वाव्यगत सन्दिग्ध दोष है न्रंरसत हो वाव्यगत नहों ।

ट. रस

नाटघरंग में ग्रन्य काव्योपरलकारी के समान रस भर श्री के केवल इस दृष्टि से प्रकारण डाला गया है कि इसका स्वरुप के साच क्या सम्बन्ध है । कौन कोन से रस इसके विभिन्न मेदो अथवा श्रंगों के साच सम्बद्ध हैं ग्रादि । उदाहरणायँ—'भ्रात' रूपक में शृंगार और वीर रस की प्रधानता होती है, 'डिम' में रौद्र रस को तथा 'अ्रन्युष्टुब्ध' में करुण रस की, और 'वीथ्य' का सम्बन्ध सब रसों के साच होता है, इत्यादि । 'मारतो' नामक नाटघवृत्ति सब रसों के साच सम्वद्ध होती है, ' सात्वती' रौद्र, वीर, शान्त और श्रृंगारत रसों के साच, 'कैशिकी' हाम्य और श्रृंगार रस में: साच, तथा 'भारभटी' रौद्र ग्रादि दोष रसों के साच । इसी प्रकार रूपकों में कौन कोन से रस परस्पर मिल होते हैं तथा कोन से विरोधी और विरोधी, रसों का परिहार जिस प्रकार किया

जाए, ग्रादि—इन वदृनुरूपित विषयों पर भी इस ग्रन्थ में प्रकारण डाला गया है ।

१. धनञ्जय चौपमाल्टकारीविसतारोदित विषय: इति । की० प्र० ६ में उद्, इत्यप्रकाशः ।

२. हिन्दी नाटपपरंपरा २/१६, २१, २३, २५ ।

३. महो १/२३, ४, ६ । ४. महो पृ० ३२० ।

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एक ओर रस के पारस्परिक सम्बन्ध-निर्देशक उपयुक्त स्पष्टीकरण के अतिरिक्त इस ग्रन्थ में रस-विषयक कतिपय ग्रन्थ समास्याओं एवं प्रसंगों की भी चर्चा की गयी है, जैसे—

(१) रस की महत्ता। (२) प्रवक्तित से इतर सचरितभावों तथा रसो का नाम-निर्देश। (३) नो रसों का क्रम-निर्देश। (४) श्रृंगार रस के दो भेदों का निरूपणात्मक आधार। (५) ग्रन्थत रस की महत्ता एवं स्थिति। (६) शान्त रस का स्थायिभाव। (७) ग्रभिनय शृंगार नट तथा प्रेक्षक। (८) रस की सुखदुःखात्मकता।

ग्रन्थ इन प्रसंगों का दिग्दर्शन एवं सामान्य विवेचन प्रस्तुत है।

(१) रस की महत्ता

प्रस्तुत ग्रन्थ में अनेक स्थलों पर यह निर्दिष्ट किया गया है कि रस नाटक में अपनी विशिष्ट महत्ता रखता है। इनमें से कुछ स्थलों पर रस को काव्य के अन्य उपकर-णों—विेषेपतया अलंकार—से श्रेष्ठ दर्शाया सर्वोत्तम उपकररण के रूप में स्वीकृत किया गया है, जिनका उल्लेख पीछे यथास्थान किया जा चुका है। इस सन्दर्भ में ग्रन्थ के उल्लेखनीय स्थल इस प्रकार हैं—

(१) 'नाट्य का प्राण रस को करुण रसों से परिपूर्ण होता है।'

१. पन्था। × × × नाटकस्य रसकलोलसकुलः। हि० ना० दृ० पृ० ३

(२) 'नाट्य का एक मात्र प्राधान्य रस हो है।'

२. रसाधायंम्रतररराणा शुल्ककथयौ यमककलिलेरवीयोनामेव निबन्धमहैंन्ति, न तु रसेकररपस्म नाटप्रस्य। —वही, पृ० ३२०

(३) '(नाट्य के) काव्यांग में विच्छेद न आने देना रस की परिपुष्टि के लिए किया जाता है।'

३. इतिकृतस्माडविच्छेद रसपुष्टपयं।। —वही पृ० १९६

(४) 'प्रकररण' नामक रूपक में पुरानी बातों में भी कवि को रस की परिपुष्टि के लिए नई बातें और बढ़ा देनी चाहिए।'

४. यदपि ग्रन्थ प्राक्तनं निवद्धरते तथापि कविना रसपुष्टिहेतुंरपिकाव्यापो विधेयः। —वही पृ० २११

(५) कवि (नाटककार, प्रबन्धकार) की समग्र चेतना एकमात्र रस-विधान में ही सलग्र रहती है, वह रस-निवेदक में सिद्घहस्त होता है।'

५. रसैकभावनचेतसः कवेः × × × रसानिवेदकवचवस्तीर्ण प्रबन्धेषु × × ×। —वही, पृ० १५६-१५७

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नाटक शृंगार रस के पारस्परिक सम्बन्ध की चर्चा भरत मुनि के समय से हो रही रही है। इन्होने नाट्य (नाटक) के लक्षण में प्राण तत्वो के साथ रसतरव का भी समावेश किया है; नाट्य के प्रधान अंगो में पाठ्य, गीत, प्राभिनय के अतिरिक्त रस की भी गणना की है, तथा नाट्य में रस को प्राणिवाय सिथति को प्रकारान्तर से स्वीकृत किया है। इस सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि नाट्यदर्पण में कवि श्री मुक्तक-काव्य की सिधि प्रतिपादन-चमत्कार पर आधारीत की गयी है शृंगार नाटक तथा प्रवन्ध-काव्य की रस पर। किन्तु प्रयम धाराणा शाश्वतः सत्य है, शृंगार दूसरी धाराणा के सम्बन्ध में इतना शौर ज्ञातव्य है कि प्रवन्धकाव्यो की अपेक्षा नाटक में रस की पुष्टि प्रधिक सुकुलता के साठ को जा सकती है, क्योकि इस में विभावादि सामग्री ग्रहण येपावत् रूप में सन्निविष्ट रहती है।

इसी प्रसंग में यह भी उल्लेखनीय है कि रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने शब्दायों को काव्य का तारोर मानते हुए कहा है कि इस तारोर में प्राण-सचार करने वाला रस हो है। यही कारण है कि कविजनो की प्रोति रस की प्रति हो होती है—

प्रथमवतद्वपुः काव्यं रसः प्राणोऽविसर्पति । रक्तजसा तेन सोहागं रसेषु कविमानिनाम् ॥ ना० द० ३/२१

(१) प्रचलित से इतर रसो तथा सचारिभावो का नामनिर्देश—

इस ग्रन्थ में प्रचलित से इतर सचारिभावो तथा रसो का नाम-निर्देश किया गया है, कितु इनका स्वरूप प्रस्तुत नही किया गया। इनकी सूची इस प्रकार है—

सचारिभाव —श्रुत, तृष्णा, मैत्री, मुदिता, श्रध्दा, दया, उपेक्षा, रति, सन्तोप, समा, मार्दव, गर्व, दास्य ग्रादि।

रस—लोल्य, स्नेह, ध्यसन, धृति, ल, सुख ग्रादि। इन पांचों के स्यायिभाव कमशः ये है— गर्व (तृष्णा), मार्दवता, मात्सर्य, घ्ररति शौर सन्तोप। किन्तु कई प्राचार्यें इनका ग्रन्तर्माव प्रचलित रसो में मानते है।

(२) नव रसो का क्रम

इस ग्रन्थ में श्रृंगार ग्रादि नौ रसो को पूर्वोक्त-क्रम सिथति के सम्बन्ध में निम्नोक्त सर्गतिया प्रस्तुत की गयीो है जोकि प्रायः मनस्तोर्वाक है। (१) सर्वप्रथम श्रृंगार रस की गणना करनी चाहिए क्योकि 'राम' सब प्राणियो में सुलभ तरव है, तथा उसे भत्पन्न परिचित रहता है, भत सब को मनोहर प्रतीत होता है। (२) श्रृंगार ने उपरान्त हास्यरस की गणना की जाती है, क्योकि यह रस श्रृ गार का अनुगामी (उससे उद्भूत एवं उसका पोषक) होता है। (३) इसके उपरान्त

१. वह्नुकतरससंगम् × × × ना० द० १६/११-

२. जपाह पाटलमरवेदृत्त सामम्मो गोतमेव च । यशुनेवासभिनयान् रसानाध्यास्यपादरचि ॥ वही १/१७

३. ये रसाः इति पठ्यन्ते नाट्ये नाट्याविचक्षणैः। वही ६/२

४. वेलिए पृष्ठ ६

५, ६. हिन्दी नाट्यदर्पण पृष्ठ ३३९, ३०५

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करुण रस—क्योंकि यह हास्य रस का विरोधी श्रप्रधात् उसके विपरीत होता है । (y) इसके उपरान्त रौद्र रस—क्योंकि यह रस श्रथंप्रधान है और श्रथं की उत्पत्ति क्रोध से होती है । (x) इस के उपरान्त वीर रस—क्योंकि यह रस धर्मप्रधान है और धर्म की उत्पत्ति काम श्रोर श्रथं दोनों से होती है । (६) इस के उपरान्त श्रभयानक रस—क्योंकि वीररस का मुख्य उद्देय है भीत जनों को श्रभय-प्रदान । (७) इसके उपरान्त बीभत्स रस—क्योंकि सात्विक जन भय के प्रति जुगुप्सा प्रकट करते हैं । (c) इसके उपरान्त श्रद्भुत रस—क्योंकि बीभत्स को विस्मय द्वारा दूर किया जा सकता है । (९) सब से श्रन्त में शान्त रस को गयानम् कहा जाता है, क्योंकि शम सर्व धर्मों का मूल कारण है ।

निष्कर्षत: उक्त प्रसंग में 'काम' को प्रधान माना गया है, क्योंकि इसी पर ही धर्मं और श्रथं दोनों श्राधारित हैं, तथा इन तीनों के बल पर शृंगार श्रादि नौ रसों की पूर्वापर-संपत्ति निर्धारित की गयी है, तथा साथ ही प्रवारांतर से शृंगार रस की प्रचानलता भी सिद्ध की गयी है, क्योंकि शृंगार ही श्टृ गार रस हो ऐसा है जो 'काम' से सम्बद्ध है । श्टृ गार के प्रतिरिक्त अन्य रस या तो श्रथं श्रोर धर्म में से किसी एक प्रधान हैं या दोनों पर श्रवलम्वित हैं अथवा एक दूसरे रस पर । इस प्रकार से रामचन्द्र गुगाचन्द्र ने मधिनपुराणकार एवं भोजराज की एतद्विषयक प्रभ्यात धाराओं का श्रनु रूप से समर्थन किया है कि श्टृ गार रस सर्वोपरि रस है ।

(४) श्टृ गार रस के दोनों भेदों का निर्णायक प्राधार

अवस्थयोर्योभोलानिर्वचने च सारतिशयादचमत्कारः।

इनमें से प्रथम धारया का श्राधार व्याकरशास्त्र का यह प्रसिद्ध सिद्धांत है कि 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति ।' निस्संदेह श्टृ गार के दोनों भेदों में इतरेतर भेद या श्रन्तर सर्वलित रहता है और उस व्यपदेशक प्राधार है किसी एक तत्व का प्राधान्य । किन्तु दूसरी धारया विचारणीय है । प्रथम तो ऐसे पद्यों का मिलना श्रसम्भव है जिन में सम्भोग श्रयवा विप्रलम्भ में से किसी एक रूप की प्रधानता सक्तित न होती हो, और दूसरे, परवर्त्ती जगन्नाथ के श्राद्देश में संयग और विप्रलम्भ का एक मान ग्राधार ग्रहण की वृत्ति-विरोध है, वाह्य वातावरण भी नहीं है । रामचन्द्र गुगाचन्द्र ने इस प्रसंग में जो उदाहरण प्रस्तुत किया है, उसी से मिलता जुलता उदाहरण जगन्नाथ ने भी इसी प्रसंग में दिया है—

१, २. हि० ना० द० पृष्ठ ३०५, ३०६

३. 'इमौ सयोगवियोगावप्येकत्र वृत्तिविरोधौ । —रसगंगाधर पृष्ठ ४१

४. "एकस्मिन्न् शयने पराङ्मुखत्वा यौत्सुत्तर ताम्यतो" इत्यादि

—हि० ना० द० पृष्ठ ३०९

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नाविस्मारविघ्नेऽप्यनौत्सवाराः सफलीकत्सुर्महो मनोरथान् । दधिता दरिताननाद्भुजदरमोललपनाश्च निरीक्षते ॥

इन दोनो उदाहरणो में ग्रन्थ कर्त्ति के श्राधार पर ग्रन्थत सम्भोग श्रृङगार को ही स्वीकृति होगी, विभोग की भावना तो यहाँ उद्धृतक मात्र है ।

(४) श्रद्भुत रस की महत्ता एवं स्थिति

नाट्यदर्पण में श्रद्भुत रस को चर्चा दो स्थलों पर की गयी है—एक 'परिग्रहण' नामक निर्वंहण सन्ध्य् के प्रसंग में ग्रोर दूसरे 'नाटक' नामक रूपक के प्रसंग में।

पहिले प्रसंग में श्रद्भुत रस का सामान्य सा स्वरूप-निर्देश है—'श्रद्भुत रस की प्राप्ति 'उपमृहन' (परिग्रहण) कहलाती है । इसका स्थापिभाव 'विस्मय' है । उदाहरणाथं, रामाभ्युदय नाटक में सीता जलन प्रकरण के ग्रन्थर्गत सीता के लिए प्रभिन्देव का प्रवेश प्राप्त है" ।

दूसरे प्रसंग में श्रद्भुत रस की महत्ता एवं स्थिति पर प्रकाश डाला गया है—'नाटक नामक रूपक में एक रस प्रपोष्ट्य में होना चाहिए, तथा ग्रन्य रस ग्रङ्गरूप मे । इसके ग्रन्त में श्रद्भुत रस होना चाहिए । एकःडिसमवायोऽद्भुतान्तम्' । 'श्रद्भुतान्तम्' पद का विरोध करते हुए ग्राचार्य कहते हैं कि ' श्रद्भुत एवं रसोदन्ते निर्वंहणेऽपि यत्र', ग्रर्थात नाटक के ग्रन्त में—निर्वंहण संध् में—श्रद्भुत रस होना चाहिए । इसकी व्याख्या में ग्रागे कहा गया है कि "नाटक में एक ग्रोर श्रृङगार, वीर, रौद्र ग्रादि रसो द्वारा स्त्रोत्स्न, पृथ्वीलाभ, राज्यलुक्ष्मी रुप सम्पत्तियों को प्राप्त होती है, ग्रोर दूसरी ग्रोर करुण, भयानक तथा वीभत्स रसो द्वारा हन सब की ग्रप्राप्ति । किन्तु नाटक के ग्रन्त में श्रद्भुत रस द्वारा लोकोत्तर एवं ग्रत्सम्माद्य फललप प्राप्ति दिखलानी चाहिए, क्योंकि प्रत्येक क्रिया का कोई न कोई फल तो ग्रवश्य होता है, ग्रन्त यदि नाटक में ग्रत्साधारण वस्तु रुप फल की कल्पना न की गयी तो फिर इसके निर्माण में परिश्रम करने से क्या लाभ ?

इस कथन का ग्रभिप्राय यह है कि ग्रगो रस चाहे कोई भी हो किन्तु वत्स रस से सम्बद्ध फल 'श्रद्भुत' से मिश्रित होना चाहिए । 'श्रद्भुत' से यहाँ तात्पर्य है ऐसा फल जो एक ग्रोर तो ग्रत्सम्माद्य हो, ग्रर्थात जो सामान्य परिस्थितियों में सुलभ न हो, प्राप्तवा जिसके लिए नायक को लोकाचार से किचिद् विलक्षण ग्राचरण करना पड़े, ग्रोर दूसरी ग्रोर वह लोकोत्तर हो, ग्रर्थात जिसकी प्राप्ति सामान्य जन के लिए ग्रप्राय। लोकव्यवहार के समान केबल विवाह सम्बन्ध द्वारा नामिका की प्राप्ति में श्रद्भुत तत्व का समावेश न होने के कारण यह नाटक का विषय नही है । हाँ, दुष्यन्त शकुन्तला का प्रेम-प्रसंग नाटक का विषय बन सकता है, ग्रथवा इसमें एक ग्रोर लोकाचार से विलक्षण ग्राचरणए दिया गया है ग्रोर दूसरी ग्रोर ग्रतिश्र्च सुन्दरी शकुन्तला रुप फलप्राप्ति प्रत्येक सहृदय में लालसा एवं कामना का विषय बन गया है । इसको प्रकार पृथ्वीराज-समयोगिता स्वप्नवर' भी श्रत्सामान्य वरमाला प्रसंग के समावेश में ग्रारुढ नाटक का विषय बन सकता है । इसी प्रकार शौर रस के नाटकों में भी नैपोलियन का पहू कथन भी कि 'मैं गया, मैंने देखा ग्रोर मैंने जीत लिया" उसी स्थिति में नाटक

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का विपय वन सकता है जव कि या तो शत्रुपक्ष का कार्यतापूर्व पलायन मो साप ही दिलाया जाए, या फिर यह दिखाया जाए कि शत्रुमो के रक्त की प्यासो तलवार जो को रयो लिखो रह गयी घोर वह 'देवारा' जनपदूण्य दारुण-नगरो में हाय मलता रह गया । किन्तु इस सवसे वद्कर प्रादर्श स्यिति राम-रावण युद्ध प्रसंग की माननी चाहिए जिसमें राम ने रावण पर आक्रमण करके उसकी सेना एवं सहययोगी वीर सम्वन्धियों का मूलोच्छेदन करके लका-विजय के उपरान्त सीता का उद्धार किया ।

इन सव प्रकरणो में श्रृंगार रस श्रृंगार प्रयवा वीर रस स्वीकृत किये जाएंगे । यदि इनमें अन्य रसों की भलक मिलेगी भी तो वे श्रृंगी के पोपक होने के कारण श्रृंगरूप में स्वीकृत रहेंगे । किन्तु श्रृंगी (नोयप) रस के चमत्कार का मूल कारण ये श्रृंग (पोपक) रस नहीं है, श्रपितु 'प्रद्मुत' का समावेश हो है—यह रामचन्द्र-गुणचन्द्र का मूल श्रीप्रयाय है, और शायद इसी प्रयवा इस प्रकार की धारसा से प्रेरित होकर धर्मदत्त नामक प्राचायं ने निम्नलिखित कयन में प्रद्मुत रस की सवंत्र (सव सरस रचनाओ में) स्वीकृति कर ली थी—

रसे सादृर: चमत्कार: सर्वत्राध्यास्यभूतते । तच्चमत्कारसारत्वे सर्वत्राप्यद्भुतो रसः ॥१॥

और इसी प्रकार पर ही नारायण नामक श्राचायं (प्राचायं विश्वनाथ के प्रतिपादमह) ने केबल प्रद्मुत रस को ही एकमात्र रस घोषित किया था—तन्मात्र प्रदभुतमेवाह कृतेऽ नारायणो रमम् ।१।२।

निरतनदेह रस में चमत्कार हो सारमूत तत्व है । चमत्कार को विश्वनाथ के दाब्दों में विस्मय वा अपर पर्याय मो कह सकते हैं, जिससे सहृदय के चित्त का विस्तार होता है ।

'चमत्कार: चित्तविस्तारहपो विस्मयापरपर्याय:'

और इस चमत्कार प्रयवा विस्मय को स्वीकार कर 'प्रद्मुत' का भी पर्याय मान लेने में कोई श्रापत्ति नहीं होनी चाहिए, श्रोर यही मद्मुत भी रसो में एक मनिवायं तत्व भी है, क्योंकि इसके बिना रस की सिद्धि हो सम्भव नहीं है । किन्तु यह सव स्वीकृत करते हुए भी—

(१) न तो रामचन्द्र गुणाचन्द्र प्राचार्यों के समान इस 'प्रद्मुत' को 'श्रद्मुत रस' इस नाम से ग्रहण करना चाहिए, श्रोर

(२) न श्राचार्य नारायण के समान इस प्रद्मुत को हो एकमात्र रस स्वीकृत करना चाहिए । क्योंकि उक्त स्वीकृति में यह 'चमत्कार' प्रयवा 'प्रद्मुत' नामक तत्व रचना के मूल रस का केवल साधन मात्र होता है, साध्य नहीं होता, साध्य तो श्रृंगार श्रादि श्रन्य रस हो होते है । केवल इतना हो वयों, यहां तक कि जिस रचना में प्रद्मुत रस साध्य रूप में रहेगा, वहां भी चमत्कार का हो पर्याय है, प्रद्मुत रस का नहो ।

(६) श्रद्भुत रस का स्यायिभाव— रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने श्रद्भुत रस का स्यायिभाव निर्वेद न मानकर 'विस्मय' माना है । इस सम्बन्ध में उनके निम्न कथन उल्लेखनीय है—

१,२. साहित्यदर्पणेऽपि ३१३ वृत्तौ ।

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( १ ) निःस्पृहता ( इच्छा के प्रभाव ) को 'शम' कहते हैं—निःस्पृहत्वं शमः । ( पृष्ठ ३३० ) काम, क्रोध, लोभ, मान, माया प्रादि से रहित, विपयैःसलग्नतया से विमुक्त, प्रभिलष्ट चित्तवृत्ति से 'शम' नामक स्थायिभाव ज्ञात होता है [ केशव में शमसयुक्त ] छानुपरक्त-पराग्नुवतां-निवर्ंजतार्किलष्टचेतोहप्यामस्यायो ज्ञांतो रसो भवति । ( पृष्ठ ३१७ )

( २ ) दरिद्रता, व्याधि, अपमान, ईर्ष्या, भ्रम, ग्राक्रोश, ताडन, इष्टवियोग, पर-विश्लेषणं आदि ( सांसारिक ) वलेदो के कारण विरसता ( वैराग्यभाव ) तथा तत्वज्ञान को निर्वेद नामक संचारीभाव कहते हैं—निवेदस्तत्वर्थीः फलेध्वंररसपम् । ( पृष्ठ ३३१ )

( ३ ) जन्म-मरण से युक्त संसार से, भय तथा वैराग्य से, जीव, भग्राजीव ( परमात्मा ग्रोर प्रकृति ), पाप-पुण्य श्रादि तत्वो तथा मोक्ष के उपायो के प्रतिपादक शास्त्रो के विमर्श से ज्ञात रस की उत्पत्ति होती है । ( पृष्ठ ३१७ )

स्पष्टतः उक्त कथनो में 'शम' को स्थायिभाव माना गया है ग्रोर 'निर्वेद' को संचारीभाव । रामचन्द्र-गुणचन्द्र से पूर्व मम्मट ने निर्वेद को स्थायिभाव भी माना था ग्रोर सच्चारिभाव भी, तथा के इस मतभेद को स्पष्ट करते हुए कहा है कि एक ही भाव को इन दोनो नामो से ग्रभिहित करना स्ववचनविरोध है । किन्तु उक्त ग्राचायों ने मम्मट

को ग्रही ग्रभिप्रेत है जो इन दोनो ग्राचायों को है । उन्होने समी स्थायिभावो तथा संचारीभावो की सूची प्रस्तुत करके 'इन्हें 'लक्ष्यग्रं प्रवदार' समभे कर इनका लक्षण प्रस्तुत नही किया । किन्तु उनके शान्त रस के प्रयायात उदाहरणो 'ब्रह्म वा हारे वा कुसुमश्रयने वा हरपदि वा' से निःसंदेह यही प्रतीत होता है कि निर्वेद नामक-स्थायिभाव तत्वज्ञान से उत्पन्न भाव है, न कि सांसारिक वलेदो के कारण उत्पन्न वैराग्य भाव से । हाँ, यह दूसरा रूप इसे सचारिभाव की ही संज्ञा देगा, स्थायिभाव की नही ।

मम्मट को इन्ही ग्राचार्यो को मम्मट के टीकाकारो ने भी समभा ग्रा मोर स्पष्टतः लिखा था—

स्यायि शमाद् विपयेष्टदेव तत्वज्ञानाद् भवेद् यदि । इष्टानिष्टवियोगाप्तिस्थिततस्तु स्यभिचार्यते ॥

का० प्र० ( यातायोधिनी टीका ) पृष्ठ ११६

किन्तु फिर भी, रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने निर्वेद ग्रोर शम का स्वरूप भिन्न-मिन्न दिखाकर विपय भी स्पष्टता में पूर्व सहयाग दिया है, ग्रोर सम्भवतः उनके ग्रन्थ से ग्रचवा इन्ही के ग्रनुरूप विद्धी

९. (क) निर्वेदस्य × × × प्रयसमं × × × उपपादनं स्यामिताभिनानार्थम् । व्या० प्र० ७१३८

(ख) निर्वेदस्थायिभावोऽस्ति शान्तोऽपि रसः ।

वही ७१३८

२. मम्मटस्तु स्वविचारदर्शनप्रस्ताये निर्वेदस्य शान्तरसं प्रति स्थायित्त्वं, 'प्रतीतिस्थिरभावादि-परिप्रह.' हरयमु संक्षेप प्रति स्वविचारिता च व पुनरुक्ता स्ववचनविरोधेन प्रतीत हनि ।

—हि० सा० द० पृष्ठ ३३२ ।

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अन्य ग्रन्थ से प्रेरया प्राप्त कर विवाद्याप नैं भी काव्यप्रकाश के समान 'निवेद' को दोनों रूपों में स्वीकार न कर इन्हीं के मनुरूप धाम तथा निवेद दोनों भावों की अलग-अलग स्वीकृति की है वस्तुतः स्वच्छ प्रतिपादन के लिये श्रावश्यक भी यहीं था ।

(७) प्रभिनय प्रोर नट तथा प्रेषक—

'प्रभिनीयते इति प्रभिनय' । प्रभिनय उसे कहते हैं जिसके द्वारा [प्रमोझ] अर्थ (विपय) सामाजिकों के सम्मुख साक्षात् रूप से प्रस्तुत किया जाता है—सामाजिकानां भिमुखे सासाकारे नीयते प्राप्यते ऽङ्गैरनिति प्रभिनयः ।

प्रनुकर्त्ता (नट) अपने प्रनुकरण द्वारा मनुकायं (रामादि) प्रोर प्रेषक के बीच सम्बन्ध स्थापित करता है : उसके प्रनुकरण के वल पर प्रेक्षक उसे ही प्रनुकायं समभने लगता है । किन्तु यह सब कैसे सम्भव होता है क्योंकि न तो प्रनुकर्त्ता ने प्रनुकायं को देखा होता है, प्रोर न प्रेषक ने । प्रथत् न तो प्रनुकर्त्ता प्रनुकायं का [यथावत] प्रनुकरण कर सकता है प्रोर न प्रेषक प्रनुकर्त्ता के प्रनुकरण को देखते हुए भी इसे [वास्तविक] प्रनुकरण मान सकता है ।

इस शंका के समाधान में रामचन्द्र-गुणचन्द्र के निम्न कथन उल्लेखनीय हैं :

१. श्रभिनेतारं कवयः प्रोत्पाद्य रामादि के चारित को पकड़ कर अध्यवसाय द्वारा ऐसा श्रनुभव करने लगता है कि उसने श्रनुकायं को स्वयं देख लिया है जोर पुनः यह श्रध्यवसान करने लगता है कि मैं उसी का हो श्रनुकरण कर रहा हूँ ।

२. यहा एक दाक्ष कही जा सकती है कि कवि जन अपने नाटकों में राम श्रादि श्रनुकायं की भावस्या का चित्रण कैसे कर पाते हैं जवकि उन्होंने भी तो राम को नहीं देखा होता । इसके उत्तर में कहा गया है कि 'श्रकलदर्शी ऋषिपियों से उन्हें यह ज्ञान मिलता है, जिसके श्राधार पर वे अपने नाटकों का निर्माण करते हैं, तथा इनके हो ज्ञान पर पूर्ण विद्वास करने श्रे प्रेक्षक भी नट को श्रनुकायं समभने लगता है ।

१. साहित्यदर्पण ३ । १४२, १७३, २४४

२. रामादेर्मुखायंरस्य प्रेक्षकस्य स्वयमहष्टतया । प्रनुकर्त्ता हि मनुकायंर्महष्ट्वा नानु- कतुं मम । प्रेक्षकोरपि चादृष्टानुकायान् नाजनुर्तुं रनुकृत त्वमनुमन्यते ।

३. तदयं नटो रामादेर्न चरितं वदति । × × × इत्येवमदरोषेमनि रामादिलक्षितं दृश्योचः कारद्वाजिना तानेन निन्दिच्च कवयो नाटके निवन्धनित । तत्र चापे मुनिजनाननद्वयासात नदयं साक्षाद् वेदान्तेषु ।

४. परमार्थतस्तु लोकस्यप्यहारोर्वाच्यमनुवतते ।

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४. जबपर प्रेक्षक भी यद्यपि देश-काल के भेद के कारणएँ नट को रामादि समझने में प्रसक्तयं होता है, तो भी नट द्वारा उच्चारित रामादि के शब्द-सकेतों के श्रवण तथा प्रतिन्त मनोरम संगीत श्रादि के दर्शन होकर उस नट को रामादि समभने लगता है जो [वाचिक श्रादि] चार प्रकार के श्रभिनय से श्रभिनन्दित हो चुका होता है।—उसका श्रयत्ना वास्तविक रूप रामादि के रूप ग्रवस्थाओं में लीन हो जाता है।'

५. इसके प्रतिरिक्त श्रनुकर्त्ता को श्रनुकायं समभक लेने का कारण श्रान्ति भी है, जिसके बल पर प्रेक्षक श्रृंगार श्रादि रसो का ग्रास्वाद प्राप्त करता है : 'उनिम्रान्त च भातेरपि श्रृंगारादिप् । क्योंकि इसे श्रान्ति के हो कारणएँ स्वप्न में सो कामिनी, वेश्या श्रथवा चोर श्रादि को देख कर स्वप्नद्रष्टा स्तम्भ श्रादि श्रनुभावों का श्रनुमव करते हैं।'

सक्त कथनो का निष्कयं यह है कि कोई प्रेक्षक जब तक श्रनुकर्त्ता को कुत्रिम ध्वनि समक रहाँ होता है तब तक उसे रसास्वाद प्राप्त नही हो सक्ता । किन्तु जब वह उसे श्रनुकायं समभने लगता है तभी उसे रसास्वाद की प्राप्ति होती है। उसे श्रनुकायं समभ लेने का कारण उसका श्रभिनय-कौशल तथा ग्रनन्य रगमञ्चनीप मनोहारो दृश्यस्थली इन दोनो को नाटघदपंण के मनुसार 'श्रान्ति' श्रथवा चकाचौंध भी कह सकते हैं । उधर श्रनुकर्त्ता का ग्रभिनय-कौशल नो इसी मध्यवस्ान पर श्राधारित है कि वह श्रपने ग्रापको श्रनुकायों हो समभ ले ग्रोर यह तभी सम्भव है जव एक ग्रोर तो वह कवि-निबद्ध नाटक का पुनः पुनः श्रभ्यास कर रसातल है ग्रोर दूसरी ग्रोर वह लोकिक व्यक्वहार से विमिन्न प्रकार के मनोभावो का प्रदर्शान सीखता है । श्रोर रहाँ कवि का प्रश्न कि उसे श्रनुकायों को विमित्र मनोदशाग्रो का ज्ञान कैसे हो जाता है ? वह इसे ज्ञानचक्षुम्रो से देखने वाले ऋषिप्रो से प्राप्त करता है ।

रामचन्द्र-गुणचन्द्र का उक्त विवेचन प्रधिकांशत: मान्य है । उनका ग्रनितम कथन किचितु शिथिल है। इसका श्रभिप्राय केबल यही लिया जा सकता है कि कविजन काव्य नाटक के निर्माण के समय अपनी कल्पना के बल पर जो विवरए प्रस्तुत करते है वे श्रायम्द लगभग वैसे ही होने जैसे कि ग्रनुकायों के साथ घटित हुए होगे । जिसे माज का ग्रालोचक कल्पना (इमेजिनेशन) कहता है उस रामचन्द्र-गुणचन्द्र के शब्दों में 'ग्रदृश्यता' की ज्ञानचक्षु वह सकते है । स्वप्न में बाल्मीकि भी यदि राम के समय में रहे हों तो भी वे उनकी सर्वं प्रकार की मनोदशाग्रों से ग्रवगत नही होगे । ग्रतएव उनकी ज्ञानचक्षु मे 'कल्पना' का पर्याय मान सकते है । इस प्रकार मास, कालिदास ग्रादि नाटककारो ने ग्रन्य मुनियों के सम्पकं द्वारा श्रनुकायं व्यक्त की मनोदशाग्रो का ज्ञान प्राप्त किया होग—यह मानना भी न तो ग्रपहार-संघट है ग्रोर न युक्तिसंगत ।

१. प्रेक्षकोऽपि रामादिषदृदशतयाऽऽनु प्रतिहृदयसंगीतकादिहितवयवसंधयार्च्च स्वहृदयदेशकालभेदेन-प्रभिनेयचतुर्भि:पञ्चभिर्दशभिर्दशानां तु सपाङ्गतेनैव नटेन रामादीन् मध्यक्ष्यति । प्रतएव तामु सुलदुर्लभपायातु रामादवस्थामपातु तन्मयो भवति । —यहो, पृष्ठ ३५२-३५३

२. स्वप्नदृष्ट च भातेरपि श्रृंगारादि: कामिनीवैन्ति-चौरादीन् प्रविभावनानिभावयत: पुंत: कथम् प्रपरस्य रसाप्ररोहं रोहयितास्म्र स्तम्भादयोऽनुभावाः । प्रावुभिंचेवुनिमित्त ।—यहो, पृष्ठ ३५३

३. हृशिममेतद् द्रति मानतो (प्रेक्षक:) न रामादिषु लब्धु थेपु सरम्पीभवेयुः । —यहो

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गत ज्ञान प्रयवा लोकानुरूति । इसी के ही बल पर कविजन राम के परमपरागत प्रयवा लोकानुरूत रूप का चित्रण करते चले ग्राये है। यद्यपि अपनी कल्पना के ग्राधार पर वे उनके चरित्र में इधर-उधर परिवर्तन भी कर देते हैं, तथापि उन के मूल रूप में, उनकी मूल भावना में, कोई ग्रन्तर नहीं ग्राता । वह अपने ही देश-विशेष प्रयवा काल-विशेष के ध्यक्ति के रूप में ही चित्रित किये जाते हैं, अन्य देश या प्रयवा काल के व्यक्ति के रूप में नहीं । इसी प्रकार नट भी यद्यपि नाटक में निर्दिष्ट नाटक-कार (प्रयवा निदेशक) के 'स्वगत, प्रकट, सावेग, संकोप, सहपं 'तारस्वरेण' ग्रादि निर्देशोंो द्वारा ग्रभिनय-कोशल प्राप्त करता है, किन्तु किसी व्यक्ति विशेष के ग्रभिनय के लिए उसे निर्देशान लोक-परम्परा द्वारा ही मिलता है । विरही राम, विरही यक्ष मोर विरही पुष्परब के विरह-विलाप में या ग्रन्तर है यह ज्ञान उसे प्रयवा उसके निर्देशांक को केवल लोक-परम्परा द्वारा ही मिलता है। ठीक यही स्थिति प्रेक्षक की भी है । सोता के विषय में 'राम' यदि रसमच पर विरूनने लगता है तो भारतीय परम्परा से ग्रभिज्ञ प्रेक्षक का 'करूण' रस हास्य-विनोद में परिणत हो जाता है, क़िन्तु इस परम्परा से ग्रनभिज्ञ किसी विदेशी के रसास्वाद में कोई ग्रन्तर नहीं ग्राता । वियोगी भी कदाचित् राम जैसे धीरोदात्त नायक के प्रसंग में । इस रसांग प्रयवा रसास्वाद का एक मात्र कारण है लोक-परम्परागत ज्ञान प्रयवा लोकानुरूति । इसी कसौटी पर यदि कोई नट ग्रभिनय करता है तो प्रेक्षक उसे ग्रानुकूल्य समभकर रसास्वाद प्राप्त करता है ।

त रस को मुखदुःखात्मकता

इस ग्रन्थ नें सर्वाधिक महत्वपूणाँ प्रसंग वह है जिसमें रस को सुखदुःखात्मक कहा गया है—मुखदुःखात्मको रसः । (३।७) इस कथन को स्पष्ट करते हुए ग्रन्थकारों का प्रभिमत है कि जहाँ शृंगार, हांस्य, वीर, प्रदर्शित मोर शान्त ये पाँच रस सुखात्मक है, वहाँ करुणा, रौद्र, बीभत्स मोर भयानक ये चार रस दुःखात्मक हैं । 'प्रथम वर्ग के रस तो निर्विवाद रूप से सुखात्मक हैं हो, किन्तु द्वितीय वर्ग के रसों को भी यदि सुखात्मक मान लिया जाता है तो इसी पर रामचन्द्र-गुरणचन्द्र को प्राप्ति है । इस सम्बन्ध में उन्होंने निम्नोक्त चार तर्क उपस्थित किये हैं :

१ उनका पहला तर्क यह है कि भयानक ग्रादि रस सहृदयों को किसी ग्रवस्थंनरीय वेदनाद्रुता तक पहुँचा देते हैं । इनसे सामाजिक उद्वेग प्राप्त करते हैं । रसास्वाद से भी मला कहीं कोई उद्विग्न होता है ? २ सीता का हरण, रावण के वधो तथा केशो का करपाण, हनुमचन्द्र की चाण्डाल के यहाँ दासता, रोहिताश्च को मृत्यु ग्रादि घटनाग्रो के ग्रभिनय को देखकर कौन ऐसा सहृदय है जो सुखास्वाद को प्राप्त करता हो ?

२. दूसरा तर्क यह है कि काव्य नाटक में लौकिक ग्राचार-व्यवहार न चित्रण यथायं रूप में ही किया जाता है । कविजन तात्वारिक सुखों का वर्णन मूल-रूप में करते हैं मोर दुःखो का वर्षों दुःख रूप में । विरही राम-सीता ग्रादि पात्रों को करुणा-दशाएं निस्सन्देह दुःखात्मक

न तु नाम सुखास्वाद उद्वेगो घटते ।

१. हिन्दी नाट्यदर्पण, पृष्ट १८० । २. भयानको वीभत्स करुो रौद्रो वा रसास्वादवतां प्रमाद्येया धारमवि वेदनाद्रुतामुप-नयति । नतएव भयानकादिविरचिदिजते समाज । न नाम सुखास्वाद उद्वेगो घटते । —वही, पृष्ट २६१-२६२ ।

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होती हैं, मतत् यदि उनके काव्य-नाटक गत अनुकार्य को सुखात्मक माना जाए तो वह अनुकार्य वास्तविक न होगा, क्योंकि वह लौकिक वस्तुस्थिति से विपरीत हो रहेगा।

३. रस को सुखात्मक मानने वालों की ओर से यह कहा जा सकता है कि जैसे लोक में विरही एवं शोकाकुल जनों के सम्मुख करुण रसात्मक प्रसंगो का वर्णन अत्यन्त श्राभिनय करने से उन्हें सुख-सात्वना मिलती है, इसी प्रकार काव्य-नाटक गत करुण, भयानक आदि रस भी सुखात्मक ही हैं, नु खातमक नहीं हैं।

किन्तु रामचन्द्र-गुणचन्द्र का कथन है कि वस्तुतः ऐसे प्रसंगों में भी दुःखी जनों को जो सुखास्वाद मिलता प्रतीत होता है, मूलतः वह भी दुःखास्वाद ही है, क्योंकि यदि वही व्यक्ति दुःखपूर्ण वातावरण से सुख-सात् अनुकूल प्रतीत करता है, तो प्रमोदपूर्ण वातावरण से [इतर जनों के समान] सुख का अनुकूल न भाव विकसित ही होता है।

मतत् वादियों का उक्त सहानुभूति-मूलक तकें मनस्तोपक एवं मान्य नहीं है।

४. यद्यपि भयानक, करुण आदि रस दुःखात्मक ही हैं, फिर भी यदि इनसे सहृदय परम आनन्द मे प्राप्त करते हैं तो केवलमात्र कवि एवं नट की कुशलता से चमत्कृत होकर ही।

इस वचन से ग्रन्थकारों का तात्पर्य यह है कि कवि के ध्वनित एवं मार्मिक निष्पण को पढ़कर ग्रथवा नट के सुन्दर एवं हृदयपेशारी श्राभनय को देखकर हमें जो ग्रानन्द प्राप्त होता है, उसको लोकोत्तरता ही सहृदय को ग्रानन्द को प्रदान करती है तथा उन्हें बार बार पढ़ने/देखने की ग्रोर प्रवृत्त कराती है, मनपया ये रस तो दुःखात्मक हो होते हैं।

एक उदाहरण द्वारा अपने कथन की पुष्टि करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि जिस प्रकार लोक में वीर पुरुष अपने शत्रु-प्राति-घातक शस्त्र को भी देखकर प्रास्मयंचकित से रह जाते हैं जो प्रहार करने में प्रधानत निपुण होता है, उसी प्रकार प्रेक्षक भी ग्राभिषा नटके कौशल द्वारा चमत्कृत हो जाते हैं।

उक्त तकों में से प्रथम तकं मन के उद्वेग को लक्ष्य में रख कर प्रस्तुत किया गया है जोर द्वितीय तकं लौकिक व्यवहार जोर काव्य-रचना की पारस्परिक घन्वस्ति को।

तृतीय तकं लौकिक सहानुभूति एवं सात्वना से सम्बद्ध है जोर चतुर्थ तकं काव्यश्व एवं श्राभनय-जन्य वाध्य चमत्कार से।

यदि समीक्षात्मक दृष्टिकोण से विचार करें तो इन चारों तकों के मूल में एक ही ग्रान्त धारणा निहित है कि लौकिक व्यवहार जोर कवि-कृति में कोई भन्तर नहीं है, ये दोनों एक ही धरातल पर प्रतिष्ठित है।

कवयस्तु सुखदुःखात्मकतासारतोनुरूप्येन रामादिचरितं निबन्धनात् सुपदु सुखात्मक-रसानुवेधमेव प्रसन्नति ।

९. (क)

तप्तानुतापायंगसाच कदएवयः परिदेवितानुरूपयंवभावात् तायं यु.सात्का एव । यदि चानुकरो सुखात्मकः स्यात् न सम्भवः मनुकरणां स्यात् । विपरीतरसेयो भासनाद् इति ।

९. (ख) —यहो, पृष्ठ २८१-२८२ ।

प्रननेनेध न तादृशाह्लादेन शोकनटस्य निगमनं चमत्कारेऽपि प्रतीयते ।

३. —यहो, पृष्ठ २८२ ।

विरमपरते हि निरदरेररितारावपि प्रहातुंनसनेन वं तितला लोकैरमामिनः ।

४. —पृ॑

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(क) पेतस्वरुपया सुलब्धु सजनननाटक्युक्ता त्रिपयसामग्री ग्राह्रांय सुलब्धु खस्वभावो रस ।

द्वारा वैसे ही उद्रिग्न एवं विकलित समप्त् लिया गया है जैसा कि सामान्य व्यवसाय में जयमीत प्रयत्न कहाजु/प्रस्तुत उपक्ति को । यन्तु वस्तुतः लौकिक रति, शोक प्रादि भावो में तथा काव्यगत इन भावो में सदा भन्तर रहता है । लौकिक भाव एक देश, काल एवं व्यक्ति तक सीमित रहते हैं और काव्य-गत भाव प्रत्येक प्रकार की सीमा से नितान्त विमुक्त होते हैं । इसी प्रकार दूसरे तकं में उक्त धारणा के ही बल पर लौकिक घटनाओ मौर काव्य-गत घटनाओं को एक-समान समप्त् लिया गया है । किन्तु यह एक ग्रमान्य मन्तव्य है । दोनो में बहुविध तथा बहुहेतुक भन्तर रहता है । इनमें से एक भ्रन्तर तो यह है कि काव्य में लौकिक घटनाओं के भ्रसममान केवल यथार्यं का चित्रण न होकर यथार्यं के साथ कल्पना-तत्व्व का समिश्रणपभी प्रानिवायं रहता है । प्रस्तुत ! भ्रतः लोक और काव्य की पारस्परिक भ्रनुकूलता को प्राधार मानकर भ्रानुकृत्य के ही भ्रनुरूप सहृदय के मुखदुःख का निःश्वं करना मूलत भ्रमपूर्ण है। श्रत तीसरे तकं को लें । उधर लोक में पुनः विच्छेदादिविह्हला माता के शोक में, और इधर ऐसी माता को रगमच पर देखकर अ्रथवा इसके चरित्र को पढकर शोक-चिह्नल सहृदय के शोक में भ्रन्तर है । उधर सान्त्वना से दुःख का ह्रास होना, इस का कुछ सानो के लिए खुप्त हो जाना श्रथवा इसका बढ जाना श्रादि सभी स्थितियां सम्भव है, किन्तु इधर शोक स्पायिमाव से उद्रिग्न प्रयवा भ्राकुल [यदिं इस स्थिति को यह नाम दें तो] सहृदय के लिए प्रथम तो सान्त्वना प्रदान का प्रशन हो उपसिथत नहीं होता, क्योकि काव्य नाटकगत घटनाओ से इततर घटनाओं के साथ उसकf कोई सम्बन्ध ही नही । और यदिं उसके सममुख रेशी घटनाएं लायी भी जाती है तो उस समय वह सहृदय न होकर सामान्यक व्यकि-मात्र रह जाता है । चतुर्थं तकं में सल्यता श्रश्य है, पर एकांगी । कवि के रचना कौशल से और विशिष्टः तथा के ग्रभिनय-कोशल से जन्म चमत्कार निःसदेह सहृदय को भ्रमिभूत कर देता है । इस काव्य की पुष्टि में एक प्रत्युदाहृरण लीजिए कि किस प्रकार एक प्रस्तुत कर्थ्योत्पादक एवं हृदयविदारक दृश्य भी एक महान्‌ट नट के ग्रभिनय प्रदर्शंन द्वारा कथा के स्थान पर हाम्य का रूप धारण कर लेता है । प्रस्तुत ! कवि और नट की कुशलता से उत्पन्न चमत्कार से किसी भी स्थिति में इनकार नही किया जा सकता, किन्तु यह चमत्कार पूर्ववर्ती प्रभाव का उद्दीपक कारण होता है, उसका उत्पादक कारण नही होता । उदाहरल्यांपं, श्रृंगार रस में वह सहृदय के रति भाव को उद्दीप्त करता है और नट की प्रतिभा के प्रति प्रेक्षक के हृदय में प्रादचर्यंमाव भो उत्पन्न करता है । किन्तु जैसा कि रामचन्द्र शुक्लचन्द्र का मन्तव्य है कि इसी प्रादचर्यंभाव को कथा रस में मूल--प्राप्ति का कारण नही ' मानना चहिए । यह प्रादचर्यंभाव लौकिक होता है । भ्रत इससे लौकिक ग्राह्लाद ही उत्पन्न हो सकता है, नाट्यगत रस—सुवातमक रस—उत्पन्न नहीं हो सकता ।

रसों को मुलातमक धोर हु खातमक स्वीकfर करने वाले प्रयम ग्राचायं रामचन्द्र शुक्लचन्द्र नही है । इनसे पूर्वं भी कुछ इस प्रकार के स्पष्ट कपन मिल जाते है ।

(क) पेतस्वरुपया सुलब्धु सजनननाटक्युक्ता त्रिपयसामग्री ग्राह्रांय सुलब्धु खस्वभावो रस । [प्रस्तुत ग्राह्यायं] प्रभिनवभारतो, भा० १ पृष्ट २७८

विशेष विवरण के लिए द्रष्टव्य—'रसविद्धान्तः स्वरूप विश्लेषण' (प्रनिन्द्रप्रकाश दीक्षित) पृष्ठ २०६-२३०

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रसस्य मुख्यः स्थायिभावस्तथा तदुभयलक्षणैरपि तदुपपत्तेः प्रातैव तदुभयजनकत्वम्‌।

किन्तु इन कथनों से यदि यह स्पष्ट प्रतोत नहीं होता कि उक्त प्राचार्यों के सभी रसों को मुख्यत्मक और तु स्थायिक स्वीकार करते ये प्राचार्य मुख्य को द्रु स्थायिक, करुण आदि को द्रु स्थायिक मानते होंगे और भयानक, करुण आदि को द्रु स्थायिक। इन कथनों के प्रतिरिक्त आचार्य वामन ने किसी आचार्य के नाम पर ऐसा कथन भी उद्धृत किया है, जिससे यह स्पष्ट प्रतोत होता है कि वह स्वयं ग्राचार्य सम्मत था। कुछ अन्य आचार्यों भी करुण रस में सुख द्रु ख दोनों का सम्मिश्रण मानते थे।

करुणाप्रकाशैरप्येयु समस्तव सुखदुःखयोः । यथाज्ञूभवत् सिद्धस्तत्प्रेयोज प्रसादयोः ॥

अर्थात् जिस प्रकार करुण रस के नाटकों में सुख शोक दुःख वा मिश्रण सहृदयजननो के अनुभाव द्वारा सिद्ध है, उसो प्रकार शृंगार आदि के मिश्रण भी उनके अनुभाव द्वारा सिद्ध है। सुख पहले होता है अथवा दुःख पहले—इस श्लोक में कोई सकेत नहीं है, किन्तु ऐसा प्रतोत होता है कि उन्हें करुण रस में दुःख की स्थिति पूर्वंमुख्य होगी, और सुख की बाद में। दूसरे शब्दों में, सहृदय लोकिक दुःख का अनुभाव करता हृदय भी ग्रानन्द का—ग्रालोकिक सुख का—अनुभव करता है। कुछ इस प्रकार की धारणा को व्याख्या मधुसूदन सरस्वती ने सर्वप्रथम मौलिक रूप से की है। उनके कथन का प्राभिप्राय यह है कि सभी रसों से निस्संदेह सुख का ग्रानुभव होता है, परन्तु यह ग्रानुभव सब रसों में तुल्य रूप से नहीं होता। इसकत कारण यह है कि सत्वगुण की प्रधामता ही सुख का हेतु है, किन्तु ऐसा कभी नहीं होता कि किसी रस में रजोगुण और तमोगुण निवृत्त हो जाएं ग्रौर सत्वगुण पूर्णत: प्रविभूत प्रयवा रजोगुण और तमोगुण किसी एक रस तक प्रवृत्त विद्वान् रहते हैं। ये किस रस में कितनी मात्रा में विद्यमान रहते हैं, यद्यपि इसका निर्णय सर करना कठिन है तथापि ये रहते प्रवश्य है। प्रति उनके मिश्रण के तारतम्य के अनुसार सब रसों में सुख के साथ दुःख वा मिश्रण भी ग्रपेक्षित चाहिए।

रसो हि शृंगारवीरादिः करुणादिः स चाद्भुतः ।

इस प्रकार हमारे सम्मुख निम्नांकित—चार विकल्प उपस्थित होते हैं—

(क) सभी रस सुखात्मक हैं,

(ख) सभी रस दुःखात्मक हैं

(ग) शृंगार, हास्य आदि रस सुखात्मक हैं और भयानक, करुण आदि रस दुःखात्मक हैं।

(घ) श्रृंगार आदि रस तो सुखात्मक हैं किन्तु भयानक आदि रस सुखदुःखात्मक हैं।

स त्वयोरसेपु वृत्त्यनुभावैः रजस्तमोभ्यां मिश्रितसत्त्वोदयैः । रसरत्नमौक्तिक मिथ्यादृत् तारतम्य- मधिगत्यत्मन् ।

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करुणाद्रापि रसे जायते परपरः मुसलम्। सचेतसामनुभवः प्रमादात्तत्र नेयसम्।। रिंच तेनु पदातु क न कोडपि स्पातद्गुमुखः॥

इन विकल्पों में से रामचन्द्र गुणचन्द्र मर्चाण्टि स्वग्रत. तीसरे विकल्प को स्वीकार करते हुए भयानक रासि जो हु सात्मक स्वीकृत करते हैं तपापि वे दृश्यं मन्तत. मुखातमक भी स्वीकार करते होंगे। मुद्ध इग प्रकार मा सफेत उन्होने स्वय मो दिया है—पानकमाध्यमेनिम च सोडपि- स्वादेन वु मात्यादेन गुनरान् मुखानिन् स्वादग्ने इति । (हि. ना. डा. पृथ २७६) पर्यन्त "जिम प्रकार पानक (मट्टे-मीठे सीधे पेय) को मिटास हु सम्वादजनक तोदृय पदायँ के मिश्रण से प्रोर भी अधिक मुसास्वाद प्रदान करती है, उसी प्रकार करुण रासि रसो में भी हु स नु मिश्रण मुसास्वाद प्रदान करती है।" वस्तुत. देखना यह है कि पानक पदायँ प्रोर करुण रस में स्यापित यह उसम्याद- सम्वन्ध यथावत् एव मुपचित प्रवोध नहीं होता, क्योंकि पानक में माधुर्य प्रोर तोदृयता के मिश्रण में मने ही पूर्वान्वित सम्बन्ध हो, किन्तु उसके प्रास्वाद में पूर्वान्वित- सम्बन्ध नहीं रहता, किन्तु करुण रस के लोक (लौकिक हु स) प्रोर हतु रस के प्रास्वाद (रस) में निस्मदेह पूर्वान्वित सम्वन्ध बना रहता है, यद्यपि यह मलग बात है कि इनमें दाल या मन्तर इतना स्वारत एवं स्पष्ट होता है कि यह बहते नहीं बनता कि इस हु स प्रोर गुम में कोई दाल सम्बन्धी मन्तर है मो। प्रस्तु ! जो हो, रामचन्द्र गुणचन्द्र का यह उदरण यह मानने के लिए पर्याप्त है कि वह उक्त विकल्पों में से तीसरे विकल्प को स्वीकार न मर चौये हैं। प्रयवा यो कहिये कि हु सात्मक न होकर मुखदु सात्मक है। पूर्वस्थिति में यह हु.सात्मक है प्रोर प्रस्तिम सिथान्ति में मुस्सात्मक। यदि यहाँ उनकी मान्यता है तो इसको ध्याख्या उपस्थित को जा सकती है। यदि वे भयानक, करुण मादि को निस्सन्देह हु सात्मक स्वीकार करते हैं तो उनकी यह पारणा काव्यनास्न मनोविचान पे तो प्रतिकूल है ही, क्यवाहार के भी सांख्य प्रतिकूल होने के मारण सद्देप्य ग्रमान्य है। इस दृष्टि पे दिग्वनायथ करै वेदल एक यही तकँ इसे सामान्य ठहराने के लिए पर्याप्त है कि करुण मादि रस हृदोय के लिए मुसास्मक है कि सहृदय जन इसे देखने के लिए सदा उन्मुस्र रहते हैं—

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हो जाती है तो उसका रति प्रादि लोक नाव उसे लौकिक सुख ग्रथवा दुःख की ग्रनुभूति करायेगा। वह प्रेक्षक नाटघग्रृह में बैठा हुग्रा भी तटस्थ के लिए रहुदय न होकर सांसारिक व्यक्ति ही होता है। किन्तु जिस क्षए वह्ही व्यक्ति निजत्व को मादनता से ऊपर उठ जाता है, वही द्रषय रसदशा' कर रहा है—रतिजन्य सांसारिक सुख ग्रथवा दुःखजन्य सांसारिक दुःख इस रस-दशा को पुष्टंस्पति वन जाते हैं ग्रोर रस-दशा' प्रनितम् स्थिति वन जाती है।

२. काव्यशास्त्रीय प्रभाव पर लौकिक कारएा, कार्यं एवं सहकारिकारए काव्य में इसीलिए क्रमशः विभाव, ग्रनुभाव ग्रौर उचचारिभाव कहलाते हैं कि ये ग्रपने लौकिक क्षेत्र से ऊपर उठकर ग्रलौकिकता के क्षेत्र में जा पहुंचते हैं। जब तक रप, शोक ग्रादि भाव लौकिक कारएा ग्रादि से सम्पुक्त है, (चाहे वह घटनाः-शृङ्गार नाटघग्रृह भी क्यों न हो), तब तक दे निस्सन्देह दुःखात्मक हैं, किन्तु विभाव ग्रादि से सम्पुक्त होने के कारएा ये सुखात्मक भयानक, करुएा ग्रादि रसों के रूप में परिएत हो जाते हैं।

३. भयानक, करुएा ग्रादि को अपनी परिपत्ति में सुखात्मक स्वीकृत करने के लिए काव्याचार्यों' का 'साधारएीकरए' नामक सिद्धान्त एक प्रवत्त सादहन है, जिसके वल पर सहृदय ग्रसाधारएय (विशेष) से साधारएय (सामान्य) भावभूमि पर उतर ग्राता है।१ उसका भय ग्रथवा काल-काल-विध्वप से मुक्त हो जाता है।२ वह ग्रपने समस्त मोह, संकट ग्रादि (से जन्य ग्रज्ञान) से निवृत्त हो जाता है।३ परिपामतः काव्य-नाटकगत कोई पात्र ग्रथवा उसके लिए ग्रपना विशिष्ट ग्रपक्तित्व खोकर मानव-मात्र वन जाता है—राम नामक पुत्प पात्र पुरुषमात्र वन जाता है ग्रोर सीता नामक स्त्री-पात्र स्त्रीमात्र वन जाता है;४ ग्रोर इसका प्रगला परिएाम यह होता है कि सहृदय निजत्व ग्रोर परत्व दोनों प्रकार के विश्वासों से विनिर्मुंक्त हो जाता है । ग्रतः इस प्रकार की परिस्थति में सहृदय के लिए न तो शृङ्गार ग्रादि रसों द्वारा लौकिक सुखानुभूति स्वीकार की जा सकती है, ग्रोर न सामान्य ग्रादि रसों द्वारा लौकिक दुःखानुभूति — यह ग्रवस्था दोनों प्रकार के रसों में ग्रलौकिक सुखात्मक ही होती है ।

इस प्रकार ग्रह्हत में हम कह सकते हैं कि—

१. प्रत्येक स्थायिभाव ग्रपरिपुष्टव ग्रवस्था में लौकिक सुख ग्रथवा दुःख का कारएा वनता है, किन्तु परिपुष्ट ग्रवस्था में केवल ग्रलौकिक सुख का ही।

२. भयानक, करुएा ग्रादि रसों में निस्सन्देह प्रेक्षक भय, शोक ग्रादि से जन्य दुःख का ग्रनुभव करता है—किन्तु वह लौकिक दुःख ही होता है—ठीक उसी प्रकार जैसे वह शृङ्गार, हाम्य ग्रादि रसों में रति, हास ग्रादि से जन्य लौकिक सुख का ग्रनुभव करता है। किन्तु यह लौकिक सुख ग्रयवा दुःख रस-दशा की पूवर्ती ग्रवस्था है ग्रोर रस-दशा उसकी परवर्ती ग्रवस्था है।

१. (क) ग्रसाधारएयस्य साधारएीकरराम् इति साधारएीकरराम् । —हिन्दी प्रतिभारतीय पृष्ठ ४५०

२. × × × भयमेव परं देशकालाव्‍चाद्याव्‍चलितम् ।

३. काव्ये × × नाटचक्ने च × × निविडनिजमोहसंकटतादिनिवारएकारिर्या विभावदिसाधारएी-करएारतमना × × × । —वहीं, पृष्ठ ४५४-४५५

४. तत्र सौतादिनारदा. परित्यक्तमनकतयाभिर्विशेषा स्त्रीमान्रवाचिनः । —वशारूपक ४/४० वृत्ति

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३. विन्तु यह वथा प्रकारक मही कि प्रत्येक सहृदय को इस प्रकार के लौकिक सुत् ग्रमवया दुःख की ग्रनुमूति हो हो, जिन्हों सहृदयो को नहीं भी होनी, यद्यपि ऐसे सहृदयों की संख्या बहुत ग्रल्प होतो है, किन्तु दोनो प्रकार के रसों से उन्हें ग्रलौकिक सुखानुमूति द्वारइय प्राप्त होती है।

३. विन्तु यह वथा प्रकारक मही कि प्रत्येक सहृदय को इस प्रकार के लौकिक सुत् ग्रमवया दुःख की ग्रनुमूति हो हो, जिन्हों सहृदयो को नहीं भी होनी, यद्यपि ऐसे सहृदयों की संख्या बहुत ग्रल्प होतो है, किन्तु दोनो प्रकार के रसों से उन्हें ग्रलौकिक सुखानुमूति द्वारइय प्राप्त होती है।

४. म्रथः मयानक ग्रादि रसों को नित्य रूप से दुःखात्मक नही मान सकते, ग्रोर ग्रधिकारात्: ऐसा मान लेने पर भी वह दुःख लौकिक ही होता है, किन्तु यह दुःख परवर्तीं ग्रलौकिक सुखानुमूति को प्राप्ति के लिए किसी भी रूप में न तो ग्रनिवार्यं साधन है ग्रोर न ही सहायक साधन। हाँ, यह ग्रत्पयं श्रावश्यक सहृदयो को ग्रलौकिक सुखानुमूति के लिए उद्दीपक कारण ग्रवरय सिद्ध हो सकता है।

४. म्रथः मयानक ग्रादि रसों को नित्य रूप से दुःखात्मक नही मान सकते, ग्रोर ग्रधिकारात्: ऐसा मान लेने पर भी वह दुःख लौकिक ही होता है, किन्तु यह दुःख परवर्तीं ग्रलौकिक सुखानुमूति को प्राप्ति के लिए किसी भी रूप में न तो ग्रनिवार्यं साधन है ग्रोर न ही सहायक साधन। हाँ, यह ग्रत्पयं श्रावश्यक सहृदयो को ग्रलौकिक सुखानुमूति के लिए उद्दीपक कारण ग्रवरय सिद्ध हो सकता है।

५. निष्कर्षंत: मयानक, करुण ग्रादि रस दुःखात्मक नहीं है, वे भी शृंगार ग्रादि के समान सुखात्मक ही हैं।

५. निष्कर्षंत: मयानक, करुण ग्रादि रस दुःखात्मक नहीं है, वे भी शृंगार ग्रादि के समान सुखात्मक ही हैं।

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(ख) नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों में नाट्यदर्पण का स्थान

नाट्यशास्त्र-सम्बन्धी उपलब्ध एवं श्रतुप्रस्तुत नाट्य साहित्य का अवलोकन करने से हमें प्रमुख नाट्याचार्यों की सात कोटियाँ मिलती हैं :-

(१) भरत के पूर्ववर्ती प्राचार्य जिनकी रचनाओं को भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में सङ्केत प्राप्त कर लिया है। इन प्राचार्यों की रचनाएँ अभी तक अनुपलब्ध हैं।

(२) प्राचीन भरत जिनका नाट्यशास्त्र सातवीं शताब्दी तक प्रायः समस्त प्राचार्यों की रचनात्रों का मूलाधार बना रहा।

(३) भरत के श्रनुवर्ती प्राचार्य जिनकी रचनाएँ भरत के नाट्यशास्त्र पर श्राधृत हैं। इन्होंने कारिकाएँ एवं वृत्तियाँ लिखकर भरत के मत का स्पष्टीकरण किया। इस वर्ग के प्रमुख प्राचार्य हैं-प्रभिनवगुप्त, धनञ्जय, सागरनन्दी, रामचन्द्र-गुणचन्द्र, पार्श्वदेव, नन्दिकेश्वर, लोल्लट, शङ्कुक, भट्टनायक, कीर्तिधर

(४) वे प्राचार्य जिनकी समस्त रचनाएँ तो श्रनुपलब्ध हैं, किन्तु प्रथम प्राचार्यों ने अपनी रचनाओं में जिनका उल्लेख करते हुए कहीं-कहीं उनके उद्धरण दिये हैं। उदाहरणार्थ-प्रभिनवगुप्त ने अपने प्रथम अध्याय में नान्दी का विवेचन करते हुए 'कोहलप्रदर्शिता नान्दी' लिखकर यह सिद्ध किया है कि उन्हें कोहल की कोई-न-कोई रचना उपलब्ध थी जो श्रब अनुपलब्ध है। वे एक स्थान पर भरत से कोहल का मत विभिन्य दिखलाते हुए लिखते हैं :

प्राप्ते तु लोकेन कोहलमतं नैकदाऽऽद्रियन्त्यते। न तु ते भारते॥

[प्रभिनवभारती, प्रध्याय ६ कारिका १० की वृत्ति]

प्रभिनवगुप्त ने दत्तिलाचार्य के ग्रन्थों को भी चौदह वार उद्धृत किया है। इससे सिद्ध होता है कि दत्तिल नामक श्राचार्य की कोई-न-कोई रचना प्रभिनवगुप्त को प्राप्त थी। सागरनन्दी के 'नाटकलक्षयोरत्नकोप' में भरतकृत और बादरायण की रचनाओं के कई उद्धरण प्राप्त होते हैं। इसी ग्रन्थ में शारिकर्णी नामक श्राचार्य के कई उद्धरण पाये जाते हैं।

१. रचना-प्रभिनवभारती - समय दसवीं शाताब्दी का अन्त ।

२. ,, दर्पणलुपक - समय ६७४ से ६७८ ई० ।

३. ,, नाटकलक्षयोरत्नकोश - समय ११ शतक का पूर्वार्ध ।

४. ,, नाटकदर्पण - समय १२ शतक का मध्यभाग ।

५. ,, भावप्रकाशन - समय १२ औ्रर १३ शतक के मध्य ।

६. ,, नाटकपरिभाषा - समय १४ शतक ।

७. ,, नाटकचन्द्रिका - समय १५ शतक ।

८. ,, नाट्यप्रदीप - समय १६१३ ई० ।

६. ,, प्रभिनयदर्पण - समय १६-१७ शती ई० (सम्भवतः)।

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ने तुंबह नामक प्राचांयं को रचना का उदाहरण देकर एक स्थान पर लिखा है—‘तुंबसरोद-सुक्तम् ।’

अभिनवभारती के चोरहवें अध्याय में कात्यायन का मत कई इलोकों में उद्धृत किया गया है । कात्यायन ने वोरो के सुजदह के वर्णों में स्रघरा छन्द श्रोर नाटिका-वर्गों में वसन्ततिलका श्रा प्रयोग विहित माना है । इसप्रकार इसी ग्रन्थ के सोपे अध्याय में राहुल नामक प्राचांय का मत देते हुए अभिनवगुप्त लिखते हैं—‘यपोक्क राहूसेन,’ तथा ‘हे व यथाह राहुला’ विश्वनाथ ने अपने ग्रन्थ साहित्यदर्पणे में नटिकुट्ट की रचनाओं के उदाहरण दिवे है । इस प्रकार इस कोटि के प्रमुख नाट्याचार्य हुए —मार्तण्ड, दत्तिल, प्रभाकर, वातरामग, सातकर्णी, तमुख, वारपायन, राहूल, नटिकुट्ट श्रादि ।

(४) पांचवी कोटि में वे प्राचायं श्राते हैं जिनका एकमात्र नामोल्लेख पाया जाता है, किन्तु जिनकी न तो कोई रचना उपलब्ध है, न किसी इलोक का उदाहरण ही कहीं पाया जाता है ।

ऐसे श्राचार्यों में भरत के पूर्ववर्ती हैं—तिलोत्तमु, कुशारव, ध्रूतिल, राग्डिल्य, वात्स्य जिनव्या उल्लेख भरत के नाट्यशास्त्र में पाया जाता है । अभिनवभारतो, दशरूपक श्रोर भावप्रकाशन में सदाशिव, पद्मभू, द्रोहिणी, क्याध, प्राज्जनेय नामक श्राचार्यों का नाट्यशास्त्र के रूप में वर्णन मिलता है, परन्तु उनकी किसी रचना का उदाहरण नहीं पाया जाता ।

वात्स्यायन ने अपने ग्रन्थ भावप्रकाशन में सुवर्णभू का उल्लेख किया है । यदि यह सुवर्णभू वासवदत्ता के रचयिता हो हैं तो उनका समय पांचवीं शताब्दी में मानना होगा, किन्तु नाट्यसम्बन्धी उनकी कोई भी रचना प्राप्त नहीं है ।

(५) छठी कोटि में वे श्राचार्य श्राते हैं जिन्होंने नाटक के सम्बन्ध में कोई स्वतन्त्र रचना न करके केवल भरत-नाट्यशास्त्र का भाष्य प्रस्तुत किया है ।

ऐसे श्राचार्यों में श्रभिनवगुप्त, कीर्तिधर, नान्यदेव, मट्ट उद्भट, श्रोजशुक, मट्टयवन प्रसिद्ध हैं ।

(७) सातवीं कोटि में वे श्राचार्य हैं, जिन्होंने काव्यशास्त्र के सभी ग्रगों को प्रवृत्त करके उसके कुल प्रधयायों में नाट्य-शास्त्र का विवेचन किया ।

ऐसे श्राचार्यों में विश्वनाथ, रुइय्यक, विद्यानाथ श्रोर विश्वनाथ प्रसिद्ध हैं ।

विद्यनाथ ने अपने ग्रन्थ ‘रसार्णव-सुधाकर’ में एक श्रोर तो ‘नाटक-परिभाषा’ की रचना केवल नाट्य-विषयों को ले कर की, श्रोर दूसरी श्रोर इस ग्रन्थ के प्रतिम भाग में काव्य के श्रन्य विषयों के साथ नाट्यशास्त्र पर भी प्रकाश डाला ।

इसी प्रकार भोजराज ने ‘शृंगारप्रकाश’ के बारहवें प्रकाश में नाटक का विवेचन किया श्रोर योरद में सरस्वतीकण्ठाभरण के समी प्रमुख परिरच्छेद में ‘सरस्वतीकण्ठाभरणप्रकाश’ के पूर्ववर्ती परिरच्छेद में तो नाटक का विवेचन किया श्रोर शेष प्रध्यायों में काव्यशास्त्र के श्रन्य श्रगों का ।

विद्यानाथ ने ‘प्रतापरुद्रयशोभूषण’ नामक ग्रन्थ के केवल तीसरे प्रकरण में नाटक का विवेचन किया श्रोर विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण के छठे परिच्छेद में नाट्य-सम्बन्धी लक्षणों पर प्रकाश डाला ।

इन श्राचार्यों ने भरत-नाट्यशास्त्र एवं दशरूपक को अपनी रचनाओं का आधार बनाया ।

उक्त श्राचार्यों में से प्रधिकांश ने अपने को भरत के नाट्यशास्त्र का ऋणगी माना है, किन्तु नाट्यदर्पण के रचयिता रामचन्द्र गुणचन्द्र वड़े गर्व के साथ श्रपनी रचना को सर्वथा मौलिक मानते हैं, श्रोर भरत-नाट्यदर्पण पर श्रादृत दशरूपक के मतों का स्थान स्थान पर खण्डन करते हैं ।

रामचन्द्रगुणचन्द्र के पूर्व धनञ्जय श्रोर उनके सतुथ विद्धिक भी दशरूपक पर प्रतिलोभ-भूति का इतना प्रचार हो गया था कि सबत्र उसी ग्रन्थ हो समादृत हो रहा था ।

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तोन सातादिद्यो योत चुस्री मो, मोर इस काल में ऐमे अनेक नाटक विरचित हो चुके थे, जिन्हें देख कर रामचन्द्रगुणाचन्द्र को दशरूपक के लक्षण प्रोद उदाहरणादि अपर्याप्त प्रतीत होने लगे, और उन्हे नाट्यशास्त्र पर एक स्वतन्र ग्रन्थ लिखने की प्रावश्यक्ता जान पडी।

रचना की प्रेरणा रामचन्द्रगुणाचन्द्र के पूर्व नाट्यशास्त्र सम्बन्धी तोन ग्रन्थ प्रति प्रसिद्ध थे। १. भरतकृत 'नाट्यशास्त्र' २. धनन्जय-धनिककृत 'दशारूपक' ३. सागरनन्दी-कृत 'नाटकसर्वस्वारत्नकोप' । नाटकदर्पण में स्थान स्थान पर उपयुक्त तीनो ग्रन्थो से मतभेद मिलता है। रामचन्द्र स्वय एक सफल नाटककार थे। उन्होने एक दर्जन से अधिक नाटको की रचना की। अपने ग्रन्थ नाटकदर्पण में पारिभाषिक शब्दो का लक्षण देते हुए उदाहरणो के लिए उन्होने अपने नाटको से उद्धरण दिये। इससे यह प्राभास मिलता है कि वे पूर्ववर्ती प्राचार्यों के लक्षण और उदाहरणो से असन्तुष्ट होकर नवीन ग्रन्थो की रचना भावश्यक समझते थे। वे स्वय लिखते है कि कालिदास आदि महान कवियों के बनाए हुए अनेक रूपको को देख कर और स्वय भी अनेक रूपको का निर्माण करके हम दोनो नाट्य-लक्षणा की विवेचना प्रारम्भ करते है। (ना० द० १।२)

ग्रन्थारम्भ के अवसर पर ग्रन्थकार ने भूमिका में इस ग्रन्थ की रचना का प्रयोजन स्पष्ट करते हुए लिखा है "इसकी पूर्वभूमि में राजनीति की प्रतिस्पर्धा की प्रेरणा हो या न हो तो भी युद्ध श्रादिर्थ्य नहीं है। दशरूपककार धनन्जय मालवदेश मुज के शाभापन्नत थे। रामचन्द्रगुणाचन्द्र गुर्जरेश्वर के पण्डित थे। गुर्जरात और मालवा राज्यों का सदा सघपं रहता था। इसमें दीर्घकाल तक युद्ध भी चलते रहे थे। इसलिए गौरव-प्राप्ति के हर क्षेत्र में दोनो राज्यों की प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। इसी प्रतिस्पर्धा के कारण मालवाभीषण के प्राश्रय में निर्मित दशरूपक की प्रतिस्पर्धा में इस नाटकदर्पण की रचना हुई हो, यह सर्वथा सम्भावित है।

दशरूपक और नाटकलक्षणारत्नकोष से नाटकदर्पण की तुलना करते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि रामचन्द्र को पूर्ववर्ती प्राचार्यों के नाट्यसम्बन्धी लक्षणो से कई स्थलों पर इतना असन्तोष था कि उन्हे अपने मत को व्यक्त करने के लिए एक नये ग्रन्थ की रचना करनी पडी। इस ग्रन्थ की रचना करते समय श्रावश्यक प्रतीत हुई। दशरूपक और नाटकदर्पण की तुलना करते हुए २१ स्थलो पर मतभेद मिलता है, जिसका विस्तृत विवेचन भूमिका के पृष्ठ २१ से २५ तक देखा जा सकता है। सागरनन्दी के मत से भी ये ग्रन्थकार कई स्थलो पर मतभेद रखते है, इसका विस्तृत विवेचन भी पृष्ठ २५ पर देखा जा सकता है।

रामचन्द्रगुणाचन्द्र की मौलिकता रामचन्द्र गुणाचन्द्र निर्मीक वात्स्य प्रणेता थे। उन्होने न केवल धनन्जय और सागरनन्दी के ही मतो का खण्डन किया है अपितु भरतमुनि के मत का भी खण्डन करने में उन्हे संकोच नही हुआ। निदर्शन एवं प्ररोचना के लिए जिनका प्रसग दृश्य है— तृतीय विवेक में प्ररोचना के सम्बन्ध में उनका मत देखा जा सकता है। इसके लिए भूमिका का पृष्ठ २० द्रष्टव्य है। वृत्तियों का निरूपण भी भरतमुनि के मत से भिन्न जान पडता है।

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रामचन्द्र ने भरतमुनि के 'भारती वृत्ति विवेचन' में 'वदतोव्याघात दोष' दिखा कर भरतमुनि के मत की आलोचना की है। भरतमुनि ने जहाँ रूपक के दस भेद किये हैं वहाँ 'नाट्यदर्पणकार' ने इसके वारह भेद करके भगलाचार्य्य में हो जिनचार्यों के प्राचारादि से लेकर ह्रस्वादि पर्यन्त वारह श्रृंगार के भ्रातुसार रूपक के वारह भेदों का संकेत कर दिया है। भरतमुनि के दशरूपक से दो भेद नाटिका और प्रकररणी प्रधिक मान कर इन्होंने नयी पद्धति से वारह रूपक-भेदों का वर्गीकरण किया है। वह होने नाटक, प्रकरण, नाटिका, प्रौढ़ प्रकरणी में कैशिकी, सात्वती, भारभटी और भारती वृत्तियाँ रहती हैं। कविकुंजर, समन्वकार, माला, महासेन, डिम् उत्कृष्टनाटक, ईहामृग एव वीथी में कैशिकी रहित केवल तीन वृत्तियाँ। इसप्रकार वृत्तियों के आधार पर नाटकों का वर्गीकरण रामचन्द्र-गुणचन्द्र की अपनी मौलिक सूझ है।

नाट्यदर्पण में रस विवेचन भी पूर्वाचार्यों से कही कही भिन्न प्रतीत होता है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र अपने पूर्ववर्तियों श्राचार्यों में सम्मट के मत का खंडन करते हुए कही भी संकोच नही करते। सम्मट 'प्राधक विस्तार' को रसदोष में परिगणित करते है, किन्तु नाट्यदर्पणकार इसे रसदोष न मान कर वृत्तिदोष मानते हैं। उनका कथन है कि रस की दृष्टि से यह दोष न होकर गुण है। "प्रतिपक्षी का प्रत्यक उत्कर्ष दिखलाकर नायक द्वारा उसका वध कराने में वह नायक का उत्सर्प बढ़ता हो है, इसलिए यह दोष नहीँ पतितु गुण है।" इसका विस्तारपूर्वक वर्णन नाट्यदर्पण के पूष्ठ १४५ पर देख जा सकता है। इसी प्रकार इन श्राचार्यों ने भामिनीविलास में मतों का भी रस की दृष्टि में खंडन किया है। इसके लिए सूचीका (पृष्ठ २६ से ३१) तक द्रव्य है।

नाट्यदर्पणकार का रस विवेचन सर्वथा मान्य भले ही न हो, पर वह मौलिक प्रयास है। उन्होंने रस को मुख्यतः ख्यातमक दोनो माना है, उनके मत से शृंगार, हास्य, वीर, अद्भुत और शांत तो सुख्यात्मक रस है किन्तु करुण, रौद्र, वीभत्स और भयानक रस दुख्यात्मक हो है। तृतीय विवेचन में कतिपय श्राचार्यों के सभी रसों की मुख्यात्मकता का खंडन करते हुए रामचन्द्र-गुणचन्द्र कारिका की वृत्ति में कहते हैं :-

[कुछ श्राचार्यों के द्वारा] जो सब रसों को मुख्यात्मक बतलाया जाता है, वह प्रतीति के विपरीत [होने से सामान्प प्रसंगत] है। मुख्य [पर्याप्त वास्वतिक] विभावों से उत्पन्न करुण श्रादि की दुखात्मकता तो ज्ञात हो जाने दो, काव्य के प्रभिप्राय में प्राश्चर्य [विस्मय] विभाव, श्रादि से उत्पन्न हुम्रा भी सप्राणक वीभत्स, करुणा, श्रद्भुत रौद्र रस श्रास्वादन करने वाले को कुछ प्रवश्यंम्भावी सी क्लेश दसाँ को उत्पन्न कर देता है। इसलिए भयानक श्रादि [दृष्यो] से सामाजिकों को घबराहट होता है [यदि सब रस मुख्यात्मक हो तो] सुलास्वाद से तो किसी को उद्वेग नही होता [इसलिए करुणादि रस दुखात्मक हो होते हैं]।

१. स्वाद्योभवाः श्रोतृकृद्भिः विभावाद्यविचारिभिः । स्पष्टानुभावनिष्पेष्य मुख्यदु खात्मकको रसः ॥

२. यत् पुनः संयमसानां मुख्यदु खारमकत्वमुद्यते तत् प्रतीतिबाधितम् । प्रास्तां नाम मुख्यविभावोपचिता, काव्याभिनयोपनीतसविभावोपचितैरद्भिर्भयानको रौद्रो वीभत्सो वा रसास्वाददतत्सामग्रीभिः कलेशदशामुपजन्यते । न प्रास्तयेऽपि भयानकादिभिरसद्दशैः सहते समाजः । न नाम सुलास्वादोद्वेगौ घटते । हि० ना० ६० पृष्ठ २६०-२६१

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सभी रसों को सुखात्मक मानने वाले प्राचायों के तर्कों का खंडन करते हुए नाट्यदर्पणकार कहते हैं कि कवि एवं पात्रिनेताओं के शोकाल के द्वारा करुण आदि रसों में भी चुदंमान व्यक्ति को परमानंद की अनुभूति होती है, यह धारणामात्र है। रामचंद्र गुणचंद्र के मत से पुष्टि यह है कि कविगण तो मूल-दु खात्मक संसार के अनुरूप हो रामादि के चरित्र को रचना करते समय सुखदु खात्मक रसों से युक्त हो (काव्यनाटक आदि को) रचना करते हैं। जब कवि को स्वतः दु खात्मक रस की अनुभूति होनी है तो रोहिताद्रव मे मग्न, लहलहाते खेतों मे रत्ति मे रत प्रादि को देखकर सामाजिक को सुख का आह्लाद कैसे हो सकता है ? [इसलिए करुणादि रसों को सुखात्मक मानना उचित नहीं है।]

उनका दूसरा तर्क यह है कि पात्रुकायंगत करुणाादि विलापादि युक्त होने के कारण निश्चित रूप से दु खात्मक होते हैं। यदि उनको पात्रुकरण में सुखात्मक माना जाय तो वह सम्पक् अनुवर्तण नहीं हो सकता है।

तीसरा तर्क है कि इष्टजन के विनाश से जो दु खियों के सामने करुणाादि का वर्णन किये जाने अथवा अभिनय किये जाने पर जो सुखास्वाद होता है वह भी वास्तव में दु खात्मक ही होता है।

नाट्यदपंकार करते हैं कि दु खात्मक और विप्रलम्भ श्रृंगार को सुखात्मक स्वीकार करते हुए कारिका वताते है कि-विप्रलम्भशृंगारस्तु बाहादिकायैव बाह्यै दु खैरपोढपि सम्भोगसंभावनाभिसंवात् सुखात्मक ।

प्रथमतः विप्रलम्भ श्रृंगार तो इष्टजन के बाह्यादि द्वारा विनाश को प्रतीति से जन्य होने के कारण दु ख रूप होने पर भी उसमें सम्भोग (पुनर्मिलन) की सम्भावना वनी रहने से सुखात्मक ही है।

नाट्यदपंकार का रससिद्धान्त भी प्राचायों के सिद्धान्त से भिन्न है। वे काव्य और नाटक में सामानय विपयक श्रृंगार विपयक द्विविध रसो की रिश्ति मानते हैं। जहां प्रथम प्राचायं लोक में होने वाली स्थाई रूप को परस्पर रत्ति को रस नहीं मानते, वहां नाट्यदपंकार लोकिक रति रूप प्रादि से भिन्न वासनारूप रति को रस मानते हैं एवं इसी 'रति' शब्द से निर्दिष्ट करते हैं।

ग्रंथकार के मत से रसानुभूति के पांच प्रायात होते हैं (१) लौदिक हृदय में तिरसत् पुरुष (२) नट (३) काव्य नाटक के श्रोता (४) काव्यनाटक के ग्नुतस.मातृ अर्थात कवि एवं नाटककार (x) सामाजिक ।

प्रत्यक्ष रूप में रसानुभूति होती है कि तु सामाजिक को परोक्ष रूप में । रामचंद्र गुणचंद्र के मत से प्रेक्षक प्रादि में रहने वाला रस लोकोत्तर है और श्रोप लौकिक ।

रसभेद सर्वधी ग्रथकार का मत भ्रय ग्राचायों के मत से भिन्न है। यद्यपि रामचंद्र गुणचंद्र रस के मूलत: नौ भेद मानते हैं, कि तु इनके प्रतिरिक्त तृप्या को स्थायी भाव मान कर लौक्यरस, श्रृदातर रति को रसस्थायी भाव मान कर वत्सलरस, मरति को स्थायिभाव मान कर दय रस को स्थायी मान कर सुख रस की भी अनुभूति वे स्वीकार करते हैं।

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ध्यात्वा राजचरितं परमं कमायामृतसङ्कलम् । साधूपमादर्श-संघि-वृत्त्यादीन् तत्न नाटकम् ॥ १९॥

रामचन्द्रगणपतिं ने 'ग्रभिनवगुप्त' के नाटक शब्द की व्युत्पत्ति की मालोचना की है। ग्रभिनवगुप्त ने 'नाट् नृतौ' के स्थान पर 'नटनतो' पाठ मान कर नति अर्थात् नमनार्थक नटृ धातु से नाटक को सिद्धि मानी है, जो उनके विचार से 'निवा हेतोः ६।४।६२ (प्रदशा०) सूत्र से लिङुपरे रहते उपधा को ह्रस्व करने के विधान से 'नटक' शब्द 'घट्क' के समान वनता है। किन्तु रामचन्द्र की यह आपत्ति उपयुक्त नहीं है, क्योंकि ग्रभिनवगुप्त ने नटतांनार्थक नृतु से भी नाटक शब्द की सिद्धि की है। (विसेष विवेचन के लिए नाट्यदर्पण की प्रस्तुत हिन्दी व्याख्या पु० २३ देखिए ।) इस सम्बन्ध में विवेचन करते हुए ग्राचायों विश्चेश्वर ने यह निष्पयं निकाला है कि ग्रभिनवगुप्त ने केवल नमनार्थक नृत् से ही नहीं, ग्रपितु नटतांनार्थक नृतु से भी नाटक शब्द की सिद्धि की है। ग्रभिनवगुप्त लिखते हैं:- नाटकं नाम तच्चेष्टितं प्रह्लादभावदायकं भवति तथा हृदयानुप्रवेशरजजनोल्लासनम् । हृदयं हारी च नर्त्यति नाटकम् ।

प्रकृतित्वाद्यतयेपां भूयो रसपरिप्लुताव् । सम्पूर्णसरसत्नवाच्च पूर्वं नाटकमुच्यते ॥

[नाटक ग्रन्थ प्रकार के हपकों की प्रकृति है । म्रथन्तु प्रकारएा प्रकारदि मेरीं वा रसएा नाटक के प्रारघार पर ही किया जाता है। जो- नाटक में बहुत ग्राधिक एवं वलि परिप्लुत होता है, और उसमें सपूणों रसाए होते हैं ।]

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सभी रसों को मुखरातमक मानने वाले प्राचायों के मतों वा रूढन करते हुए नाट्यदपंणकार कहते है कि कवि एव प्रमिनेता के कौशल के द्वारा करुण आदि रसों में भी बुद्धिमान् व्यक्ति को परमानन्द की अनुभूति होती है, यह धारणामात्र है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र की युक्ति यह है कि कविगण तो सुख-दुःखात्मक संसार के मनुरूप होइ रामादि के चरित्र की रचना करते समय सुखदुःखात्मक रसों से युक्त होइ (कार्यनाटक ग्रादि को) रचना करते हैं। जव कवि को स्वतः दुःखात्मक रस की मनुभूति होती है तो रोहिताश्व ने मरतपुत्र, लडमण्णा के शक्तिभेदन ग्रादि को देखकर सामाजिक को सुख का अनुभव कैसे हो सकता है ? [इसलिए करुणादि रसों को मुखरातमक मानना उचित नहीं है।]

उनका दूसरा तर्क यह है कि मनुरागमगत रसत्वादि विभावादि युक्त होने के कारण रस निश्चय रूप से दुःखात्मक हो होते हैं। यदि उनको मनुकरण में सुखात्मक माना जाय तो वह सम्पर्क अनुवरण नही हो सकता है।

तीसरा तर्क है कि इष्टजन के विनाश से दुःखियो के सामने कृत्यान्ति का दर्शन किये जाने पर जो सुखानुभव होता है वह भी वास्तव में दुःखात्मक हो होता है।

विप्रलम्भभृङ्गारस्तु इष्टजनविच्छेदाद् दाहादिकार्यतया दुःखपोषकः ।

नाट्यदर्पणकार कहते हैं कि दुःखात्मक होने पर विप्रलम्भ शृङ्गार को सुखात्मक स्वीकार करते हुए आचार्य वताते हैं कि-विप्रलम्भभृङ्गारस्तु इष्टजनविच्छेदाद् दाहादिकार्यतया दुःखपोषकः । सम्भावनाभङ्गेत्वाद् सुखात्मक !

शृङगारतो विप्रलम्भशृङगारो हि इष्टजनविच्छेदाद् दाहादिकार्यतया दुःखात्मकः ।

अर्थात् विप्रलम्भ शृङगार तो इष्टजन के विच्छेद से दाहादि के द्वारा विनाश की प्रतीति से जन्म होने के कारण दुःख रूप होने पर भी उसमें सम्भोग (पुनर्मिलन) की सम्भावना बनी रहने से सुखात्मक होइ है।

नाट्यदर्पणकार का रससिद्धान्त ग्रन्थ प्राचार्यों के सिद्धान्त से भिन्न है। वे काव्य ग्रोर नाटक में सामान्य-विशेष श्रोत्र विशेष-विशेष द्विविध रसों की सत्ता मानते हैं ! जहाँ प्रायः प्राचार्यें लोक में होने वाली स्त्री पुरुष की परस्पर रति को रस नहीं मानते, वहाँ नाट्यदर्पणकार स्पष्टतः स्त्री पुरुष ग्रादि को भी विभावादि शब्दों से भिन्न उनको रति ग्रादि को 'रस' शब्द से निर्दिष्ट करते हैं।

ग्राचार्य के मत से रसानुभूति के पाँच प्राधार होते हैं (१) लौकिक रूप में स्थित पुरुष (२) नट (३) काव्य नाटक के श्रोता (y) काव्यनाटक के प्रमुसंधाता मर्यात् कवि एवं नाटयकार (४) सामाजिक । मनुकायं, मनुकर्त्ता, श्रोता एव मनुभाव्यत्मा को तो प्रत्यक्ष रूप में रसानुभूति होती है किन्तु सामाजिक को परोक्ष रूप में । रामचन्द्र गुणाचन्द्र के मत से प्रेक्षक ग्रादि में रहने वाला रस लोकोत्तर है ग्रोर लौ लोकिक ।

रसभेद सबधी प्राचार्य का मत प्रन्य प्राचार्यों के मत से भिन्न है। यद्यपि रामचन्द्र-गुणचन्द्र रस के मूलतः तो मेद मानते है, किन्तु इनके प्रत्येक के तृप्पा को स्थायी मान मान कर लोकरस, श्रृङ्गारत्व श्री स्थायिभाव सहेतु रह रस, भयानकरस, मरति को स्थायिभाव मान कर दुःख रस, ग्रोर सतोप को स्थायी भाव मान कर शृङ्ग रस की भी ग्रनुभूति वे स्वीकार करते हैं।

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स्पातात्यराजचरितं धमंकमारामयंसत्फलम् । साख्योपायादश-संधि-वियालसूत्रं ततः नाटकंम् ॥ १५॥

रामचंद्रगणचंद्र ने प्रभिनवगुप्त के नाटक शब्द की व्युत्पत्ति की मालोचना की है। प्रभिनवगुप्त ने 'नाट् तृन्' के स्थाल पर 'डसनतौ' पाठ मान कर नति अर्थात नमनाॅर्थक नटू धातु से नाटक की सिद्धि मानी है, जो उनके विचार से 'मिता ह्रस्वः ६।४।६२ (भट्टि०) सूत्र से लिच्चु परे रहते उपधा को ह्रस्व करने के विधान से नटक' शब्द के 'नटाक' के समान वनता है । किन्तु रामचंद्र की यह मारत्ति उपयुक्त नहीं है, क्योंकि प्रभिनवगुप्त ने नतॅनार्थक धातु से भी नाटक शब्द की सिद्धि की है । (विशेप विवेचन के लिए नाट्यदर्पण की प्रस्तुत हिन्दी व्याख्या पृ० २३ देखिए ।)

नाटकं नाम तच्चेष्टितं प्रह्रेष्ठभाववायिकं भवति तथा हृदयानुप्रविश्यारूजनोल्लसनया हृदयं वारीर च नतंसंयति नाटकंम् ।

नाट्यदर्पणकार के पूर्वं प्राचार्यों ने नाटक एवं नाटकeter काव्य में उक्तनी स्पष्टता के साथ प्रस्तुत नहीं दिखलाया है जितनी स्पष्टता हमें रामचंद्रगणचंद्र की रचना नाट्यदर्पण में मिलती है। आचार्यं धनंज्जय ने नाटक और नाटकeter रूपकों में प्रस्तुत दिखाते हुए लिखा है—

प्रकृतिस्थादयैःपेयां भूयो रसपरिप्लुताम् । संपूर्णतथारतवाच्य पूर्वं नाटकमुख्यते ॥

[नाटक ग्रनय प्रकार के रूपकों में प्रकृति है । परिपाक्त प्रकटए भ्रादि भेदो का लक्षण माटक के प्राधार पर हो किया जाता है । नाटक में बहुत अधिक रस का परिप्लाव होता है, और उसमें सवोंं लक्षण होते हैं ।]

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यहाँ पनडशप ने नाटक ग्रोर ग्रन्य स्वप्नों में मन्तर दिलाने का प्रयत्न किया है, पर हपथ ग्रोर हपथ से दतर सहीत्य मथ ग्रनतर नहीं नहीँ हपष्ट किमा है । रामचन्द्रगुणचन्द्र ने इस समस्या को सुलभाने का प्रयत्न किया है—

१. रामचन्द्रगुणचन्द्र ने 'नाटक ग्रोर चपाश्र्रहत्य में उपाख्येय धर्मों स्पष्पित करते हुए कहा है कि यचपि क्याथ्रादि भी योताप्रो के हृदय को तचा देते हैं कितु वे उपाथ्रादि यँचिम्य हेतुबों के श्रुमाद में उचने उल्लासमारो नहीं होते ।

२. 'नाटक के द्वारा राजा ग्रोर वसनै भग हप में प्रामाथ्र्यादि को च्युतपथ्र किया जाता है, जो नाटकेतर साहित्य में सम्भव नहीं है ।

३. क्याथ्रादिहत्य ग्रोर नाटक की रचनाथ्रोंली में स्पष्प प्रनतर इस प्रकार होता है । श्रभम्थ्रादथ्र में पद्य हो पद्य ग्रोर कास्पाथ्रपिकाथ्रों में गयथ हो होतथ है ग्रोर सेभ्रो में सदुब्ध, नदीँ, सूरयँ, चन्द्र ग्रादि के प्राकृतिक मथाँन का बाहुल्य होता है। कितु नाटक में पद्य की समस्या हत्वप ग्रोर गयथर्थोनी भी प्रास्पाथ्रपिकर से भिम्न होती है । कादबररी एवं वासवदत्ता ग्रादि माथ्याथ्रिकाथ्र यँचि मथँ दींयँ सामाथ्रिक गयथ स्पृहाथ्रीय है। कितु नाटक में सरल एवं दोँघं सामास-रहित गयथ हो वाञ्छनीय है। ककिंतु ग्रोर ग्राधिकर समासबहुलयुयक गयथ ठोक नहीं। नाटक में नदीँ ग्रोर कदर्थवसु की योजना होती है जो परपरथा से फल की साघक होती है । रामचन्द्रगुणचन्द्र ने अपने 'नसकविलाथ्र्र' नामक नाटक का उल्सेख करते हुथए दम्पयँती के चितदशोंथ्रों द्वारा नल के हृदय में भसुराग उत्पन करने का प्रमाथ्र किया है, अतएव चितदशोंथ्र की प्रवान्तर क्या नाटक के सदँया उपयुयक्त हो मानी जायगी ।

४. नदीँ, समुद्र, सूरयँ, चन्द्रमा, पर्वत, मघुपान जलक्रीडाथ्र प्रादि का वयँथ्र्र्र नाटकेतर साहित्य में प्रासंगिक माना जाता है, किंतु नाटक में इन समस्त वयँथ्र्र्रों से नाटक-रस तिरोभूत हो जाता है। इनका प्रयाथ्रप वथँपंथ्र्र थो स्वीकाथ्र्य हो सकता है पर विस्तृत वयँथ्र्र्र्र्र नाटकोपयोगी नहीं माना जा सकता ।

५. 'मलकारों' का विनोप प्रयोग भी नाटक में उपादयेँ नहीं समभा जाता । नाटयँ-दपँणकार कहते हैं कि उन्हें श्लोपमार्द्र्र्र्र का प्रयोग करना चाहिये जो रससिद्धि के लिये किप्ये जाते वाथ्र्र्र प्रयत्न से ही सिद्ध होते हैं । काव्याभाग में उपखेप श्रादि सन्ध्यंगो की रचना इस प्रकार करनी चाहिये कि जिससे वे रस को तिरोभूत न कर सकें ।

लक्शथ्र्र ग्रोर उदाथ्र्रहरण— नाटयदपँणकारने पारिभाथ्र्रिक शबदाथ्र्रों के लक्शथ्र्र एवं उदाथ्र्रहरण पूर्ववर्त्ती ग्राचारयँ्र्र्रों से पूरयक हप में कियेँ हैं । उचहोन न तो मरत न ग्र मुनिसुरथ्र्र्र्र किया है ग्रोर न ग्रन्य पूर्ववर्त्ती नाटयाचारयँ्र्र्रों का । उचहोंने लक्शथ्र्र ग्रोर उदाथ्र्रहरणथ्र्र्र की एक नवन पद्धति ग्रपनायी है । सूत्रों में सामाथ्र्र्य लक्शथ्र्र ग्रोर वृत्ति में उसका विवेचन किया है । यहाँ दो चार पारिभाथ्र्रिक शबदों के लक्शथ्र्र ग्रोर उदाथ्र्रहरण लिखकर रामचन्द्रगुणचन्द्र की मौलिकता पर प्रकाथ्र्र डालने का प्रयाथ्र्र किया जायगा । भरत मुनि इस प्रकार लिखते हैं—

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ग्रद्नू इति रुदिरद्रयो भावरच रसैइच रोहयत्यर्थान् । नानारविधानयुक्तो यसमात्तमादृवेवेदूः ॥

इस लक्षण से 'प्रद्नू' का स्वरूप स्पष्ट नहीं होता। धनञ्जय ने भी 'प्रद्नू' का लक्षण स्पष्ट नहीं किया। नाट्यदर्पणकार ने 'प्रद्नू' का लक्षण प्रयत्न-प्रायश्चित्तों को प्रवेष्टा अधिक विस्तार के साथ इस प्रकार लिखा है—

यप्रावेश्य समाप्यतेऽत्र व योजस्य भवति संहारः । क्रियाविच्छेदसमन्वितस्य तोहृदृ इति सदावगुन्तस्यः ॥

प्रभिनवगुप्त ने इस लक्षण का आधार लेकर 'प्रद्नू' लक्षण अधिक स्पष्ट किया है। प्रभिनवगुप्त ने इस लक्षण का आधार लेकर

प्रद्नू हत्यपे सक्षातो न सः । प्रयतोऽव्यवदेष्टरं तसाक्षात् प्रभिनेये सताव्य-वस्थासु तन्वप्रयासादनुप्रारम्यतारतरेण प्रथमसंध्योमाजनया सास्रारोष्यमरोधो मर्वति । प्राथमभिनयस्थायितादालोच्य प्रथमावेश्य समाप्यते तोहृदृः । मुखाविभुमप्यपेक्ष्य द्वितीयतरवृत्त इति नाम ।

प्रभिनवगुप्त ने भरतमत को विस्तार से कहा है। तात्पर्य यह है। तारतम्य से 'नाटक-मुखप्रकरोऽपि' में 'प्रद्नू' में यत्न श्रदान्यामों का मुख द्विप्रेष्टम् । अर्थाद दीप्तांश में पडित होने

२. प्रन्षेपत्रपरिसुतुं नाटकस्यैकतमाङ्गम् । उक्तिव्यापारविच्छेदो यत्र स प्रन्षेपः स्मृतः ॥

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वाले कार्यो को भद्र में स्थान नही देना चाहिए , किन्तु भद्र फी भद्र विशेषताओं का कहीं उल्लेख नही किया ।

उपयुक्त लक्ष्यों की तुसना करते हुए यह स्वाभाविक करना पड़ेगा कि रामचन्द्रगुएचन्द्र ने पूर्ववर्ती नाट्याचार्यों के भद्र-चन्द्रचयो लक्षएयो को स्वतन्त्र रीति से सोचते हुए और व्यापक बनाने का प्रयत्न किया है । इसो प्रकार प्रयंप्रकृति के लक्षणों का तुलनात्मक पदर्शन प्रस्तुत करने से भी हम उक्त निष्कर्ष पर ही पहुचते है ।

प्रयं-प्रकृति-

भरतमुनि ने बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी और कार्य नामक पांच प्रयंप्रकृतियों का विवेचन किया है । परवर्ती सभी प्राचार्यों ने भरतमुनि का ही अनुसरण किया और उन्ही के निर्धारित लक्षणों को आधार बनाया । सभी ने प्रयोजन-सिद्धि के पांच हेतुओं का उपयुक्त क्रम रखा। किन्तु रामचन्द्रगुएचन्द्र ने इनमें परिवर्तन कर दिया । उन्होने प्रयंप्रकृति को 'उपाय' नाम थे प्रभिहित किया और उनका क्रम रखा—

बीजं पताका प्रकरी बिन्दु; कार्यं यथार्हत्नि । फलसं हेतुतः पश्चाद् चेतनाचेतनात्मिका ॥ सूत्र ११२६

उन्होने कारिका की कृति में यह स्पष्ट किया है कि रचि के अनुरूप इनके क्रम में परिवर्तन किया जा सकता है । मन्य आचार्य इस मत से सहमत नही । दूसरा भन्तर यह है कि रामचन्द्रगुएचन्द्र इन उपायों का विभाजन चेतन एवं अचेतन की दृष्टि से एक विलक्षण रीति से करना चाहते हैं । चेतन हेतु भी मुख्य और प्रमुख भेद से दो प्रकार का होता है । 'बीज' मुख्य प्रचेतन हेतु है और 'कार्य' प्रमुख । इसी प्रकार चेतन हेतु भी मुख्य और उपकरएाभूत दृष्टि से दो प्रकार के होते हैं । 'बिन्दु' मुख्य चेतन हेतु है । उपकरएाभूत चेतन हेतु दो प्रकार के होते है—(१) स्वार्थसिद्धि युक्त होने के साथ परार्थ-सिद्धिपर (२) परार्थ-सिद्धितत्पर । प्रथम का नाम 'पताका' है, और द्वितीय का नाम प्रकरी ।

इस प्रकार का वर्गीकरण और क्रम हमें मन्य किसी आचार्य की रचना में नही दिखाई पडता । पांच उपायों के लक्षण भी अन्य आचार्यों से कहों-कहीं भिन्न रूप में दिखाई पडते है । रामचन्द्र की विशेषता यह है कि वे लक्षणों के उपरान्त स्वरचित उदाहरण देकर लक्षणों की पुष्टि करते है । बीज और बिन्दु के लक्षण और उदाहरण कई आचार्यों को अपेक्षा अधिक स्पष्ट और द्वोगभ्य है । प्रावश्यकतानुसार एक हो 'उपाय' के चार चार उदाहरण देकर उन्होने कठिन विषय को सरल बना देने का प्रयास किया है । उदाहरणार्थ, बीज के लक्षण के उपरान्त रत्नावली, सत्यहरिश्चन्द्र, स्वरचित यादवाभ्युदय एवं मुद्राराक्षस के उन स्थलों का विश्लेषए किया है जहां से 'बीज' प्रारम्म होकर साक्षात् रूप में विस्तृत पाता है ।

उपयुक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि रामचन्द्र-गुएचन्द्र ने नाटच-सम्बन्धी पूर्व स्थलों का मौलिक रीति में जिल्लेषण करने का प्रयास किया है । इतना अवश्य है कि मौलिकता के उत्साह में वे कहीं कहीं इततने बहक गए हैं कि मूलतत्व तक पहुचते पहुचते रह जाते हैं । जैसे रस-निरूपण के कितिपय प्रसंगों में ।

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नाट्यदर्पणकार का योगदान

रामचन्द्र उन प्रतिभाशाली प्राचार्यों में परिगणित होने योग्य हैं जिनमें भरतवंश्री एवं मारवंश्री दोनों प्रकार की प्रतिभा विशिष्ट रूप से मिलती है। नाट्यदर्पण के अतिरिक्त विदूषक, मतिसागर, मधुररुद्रम्, यादवारुद्रम्, रूपकसासङ्ग, रामपाणिरुद्रम्, रोद्ररौम्यागादक्रम्, वनमाला नाटिका आदि नाटक एवं सुप्रसिद्ध नानक काव्य की रचना की। अपने नाट्यप्रथ के लिए उन्होंने अपने मन में नाट्य-रचना की प्रेरणा उठते ही चपकचाह नाटक-रचना में सुप्रसिद्ध प्राचीन नाट्यप्रसङ्गों में अनुसन्धान भी प्रारम्भ कर दिया।

यथापि नाट्यदर्पणमें विदूषक स्वाभाविक को मनोरञ्जन कियायें दिखाई पड़ते हैं, और प्रारम्भ भी नयनों मनोन्यानियों का सङ्घटन भी कर सकते हैं। पर इतना तो स्पष्ट ही स्वीकार करना पड़ेगा कि (१) वत दोनो प्रयत्नकारों ने मनोरञ्जनात्मक नाट्यपं प्रयोगों का प्रदर्शन मरने अपने प्राचार्य पर एक नये नाट्यशास्त्र का निर्माण किया। (२) प्राचीन मनोरञ्जन प्रयत्नों व विपय प्रवेश में सशक्त नाट्यम् माहित्य की समृद्धि की। (३) नाट्य चाहिये और नाट्यनाटक व नये युग से चिन्तन किया। (४) अपने श्रम्भीर विषयों का मनाने महानुभाव सुप्रतिष्ठरत्न किया। (५) विराट् प्रस्थान जैसे समारोह में नृत्य मार-प्रधान नाट्यविलासिय को भी समादृत किया। (६) पूर्वाचार्यों द्वारा निर्मित नाट्य-लक्षणों में संशोधन परिवर्तन करने का साहस मरने नवीन संशो- पर कोषपने या मार्गं प्रस्तुत किया। (७) रस-विवेचन में इन प्राचार्यों ने एक नया विचार उत्पन्न किया। ये प्राचार्य रसों को परिनिदगकुल्य मे समाप्त न हो गुस-दुःख हरि भाव मे मानने हैं। य इनका मत पनजय वनिन्दु हृदय विद्वानों मे महान् मुग्यारमकवाची ही है। पतञ्जलि मत विमलपवाची मत वृहुत्साह है जिसके द्विपय में हम पूण विवेचना पर मात रखते हैं।

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चतुर्थेऽङ्केऽपि नित्यं जैनौँ वाच्यप्रशंसामहे । हपैङ्कोद्भवशङ्कि चिन्त्यं या न्याय्ये भूतं पठ्य ॥१॥

प्रथं श्रीमदाचार्यपादविरदवे श्वरमिदान्तशिरोमणिगुरुविरचितां नाट्यदर्पणदीपिकां हिन्दी व्याख्याम् । उनैंत पुरन्द जनिना कवीसंां मनोऽनुरः सुत्रनरवरसतत ध्याम । उमा उ ते प्रयसो वधेमाना मनोवाता थघ तु घरमंइ मनम ॥ विगच-नाट्यमिदं सुत्रधारो यमनुते सदा । रमरत्नरविमपाथ थर्मे सूरआतमने नमः ॥ यदंश-भाष्यें भरते सगृतीके कुंतं, न पूर्वि विंपयस्य नाचवा । श्रनोदय पूर्वे परिदिश्रृपवत् । तनोमि वृत्ति मलु नाट्यरपेगे ॥

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महाकविविनिर्मितान् दृष्ट्वा रूपकाणि भूरिशः । स्वयञ्च कृतवान् स्वोपज्ञं नाट्यलक्षणं विग्रुपदैः ॥२॥

६ ज्ञाताधंकारा, ७ उपासमदर्शा, = प्रत्नतत्वविद्, ६ भनुत्तरौपपादिक, १० प्रत्न- व्याकरएँ, ११ विप्रः श्रोत्र १२ हष्टिवाद । भाषाराड्ल से लेकर हष्टिवाद पर्यन्त इन 'द्वादश रूपों' के द्वारा हो रागादिमें विजता जिनोंकी वाग्मीने विश्रवको गर्भसागमें स्थित रहनेंकी प्रेरणा प्रदान को है । इसलिये ग्रंथकारने यहाँ उन द्वादश-रूपों वावी जिन वागींमो नमस्कार किया है । किन्तु इसके प्रतिरिक्त यहाँ 'द्वादश-रूपों' मो चर्चा भरनेबा कुछ श्चोर भी वाताएँ है, उसका सम्बन्ध इस ग्रन्थसे नाट्यदपंणके भारम्भम जो यह मड्ढन इलोक' लिखा गया है उसका प्रतिपाद्य नाट्य विपयकै साथ भी कुछ सम्बन्ध होना चाहिए । इस हेतुसे ग्रन्थकार इसको नाट्यपरक ष्पारसा भी प्रापं स्वप्न प्रस्तुत करेंगे । इस व्याख्यामें 'द्वादशरूपं' से बारह प्रकारके रूपक- भेदाका ग्रहण किया जापनां । इसो हेतिसे ग्रंथकारने यहाँ विशेष रूपसे 'हप्टिदर्शनाभि' पदाका समावेश किया है । नाटयके विपयक समस्त प्राचीन श्चोर प्रामाणिक ग्रंथ भरत मुनिका 'नाट्यशास्त्र' है । उसके बाद 'दशारूपक', 'भावप्रकाश', 'साहित्यदर्पण' तथा 'प्रतापरुद्रयशोभूषएँ' श्रादि ग्रन्थों प्रथ्यों नाट्य सम्नधी विपयका विवेचन किया गया है । इन सवमें हो प्रायः हपंक के दस भेद मिनाए गए है । दश रूपककार धनन्जयने तो अपने ग्रंथका नाम हो 'दशारूपक' रखा है । उससे यह ध्वनिके मुख्य दस भेदोंकी सूचना मिलती है । उन्होंने दस रूपकोंका सम्बन्ध दश प्रवतारोंके साथ भी जोड़ा है । दश प्रवतारोंके समान रूपक भी दस हो है, यह उनका मत है । परन्तु फिर भी उन्होंने गोपी भेदके रूपमें व्याहरह भेद 'नाटिका' का भी उल्लेख किया है । और 'रत्नावली नाटिका' के बहुतसे उदाहरण भी ग्रथम प्रस्तुत किए है । 'भावप्रकाश तथा साहित्यदपंणकारने भी 'नाटिका' को व्याहरहां भेद माना है और उसके उदाहरणरुपमे 'रत्नावली नाटिका' का उल्लेख किया है । इस प्रकार श्री च ज्ञाताधोंके मतमें मो हपंकके प्राठारह भेद वन जाते हैं । किन्तु वहाँ ग्रंथकारने 'प्रकरखो' नामक एक श्चोर भेद करके रूपकके बारह भेद कर दिए है । उसी श्राधारपर यहाँ द्वादश रूपों की चर्चा की गई है । इस ग्रथके दो भाग हैं एक कारिकाभाग श्चोर दूसरा उसका वृत्ति ग्रयवा विवरण भाग । दोनों भागोंके रचयिता एक हो हैं । पर्याप्त जिन्होंने मूल कारिकाओंकी रचना की है, उन्होंने उनपर स्वय हो वृत्ति भी लिखी है । इसलिये यह मड्ढन श्लोक कारिका भाग श्चोर वृत्ति भाग दोनोंके मारम्भमें दिया गया है । महाँशर यह श्लोक वृत्ति भागके मड्ढनाछरएाके रूपम दिया गया है । मूलकारिका भागके मड्ढनाचारएाके रूपमें ग्रन्थे फिर इसको लिखकर इसकं व्याख्या करेंगे । सम्प्रति वृत्ति भागको मदत्तरांशकावें हपंम बारह श्लोक लिखते है ।

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प्रलङ्कारमृदुः पन्थाः कयादीनां सुखच्चरः । दुःसञ्चरस्तु नायस्य रसकक्षोलसङ्कुलः ॥३॥ न गीतावाधनृत्यज्ञा लोकस्थितिविदो न ये । श्रभिनेता च कतुं न प्रयन्धांस्ते चहिर्सुखाः ॥४॥

वेशकफर घोर हयें भो [प्रनेस रपशोस्स] निर्मासू करमे [रप्यात् नाटससकस प्रारीक पूऽां जान प्रेर प्रभुभाव प्राप्त करक] हम दोनों [प्रत्यात् हत प्रन्धके रचयिता रामचन्द्र गुरुपचन्द्र हता ना मप्रथपंला प्रयमे] नाट्य-लससकी विवेचना [प्रारथभ] करते हैं ।२। जेसा कि उपर लिपा जा चुका है कि इस प्रन्धके रत्तां रामचन्द्र घोर मुगचन्द्र दो व्यक्ति हैं । उन दोनोने मिलकर इस प्रन्धकी रचना की है । इस नाट्यप्रथके प्रतिरिक्त 'द्रपारलङ्कारयुक्ति' नामप एक घोर भी ऐसा प्रथ है जिसकी रचना तन दोनोने मिलकर मो है । मुगचन्द्रक स्वत्तं रपसे निमा हुमा कोई प्रथ नही मिलता है । परन्तु रामचन्द्र ने स्वतं रपसे भी बहुगमे प्रथोकी रपतना की है । उनकी प्राय 'प्रदप वातनर्ता' उपापि रचनाका को थी । ननहरे कम प्रथमे से प्रथ, तब नही मिले है । घोर न स्वप्नि नाम हो प्रात है किन्तु किर भी अपने रयारह नाटकोसत उल्तेम उन्होने अपने हत प्रथमें सथान-स्यारपर किया है । मर्गार प्रथिक नही तो कम मे-कम रपारह नाटक तो उहोने ननाए हो है । जब उनने नाटक उन्होने स्वय बनाऐ है तो रामभत प्राने समयमे उपसथ प्राय: मभी नाटक उहोने पद डाले होगे । इतने नाटकोके पढने घोर हयव बनानेसे साद उहोने इस नाट्य- दंगामकी रचनाम हाथ लगाया है । इससे विदित होत है कि पे द्रता विपयपर प्राय ननागने ने सनर परान्त उदयुक्त घोर मपिारो र्यकित है । इसा मातसे मुनित करनेसे जिन उहोने इस रनोकमें मबसे पहिले अपने नाट्य-ननयक हत वनधान प्रनुभवा उरेग उपगं प्रकारमे ककया है ।

नाट्यरचनायाः कुशलता माधुर्ये, श्रव्यत्व-चाहे नाटके पौर्वापर्यम् । नैक एव न यत्र न स्यात् हुर्तरात्रि विभागकरो ह्यन्वितो हि— क्या प्राप्त [नाट्येन वत्प्रभेदेनो रचना] वा नां तत्तदररां शोभन हो जाने पारस सुपन्वंक सत्त्वरस कराने योग्य है [वप्त्र् सनपूर प्रायं क्या तार्तिक रचना तत्तत्सारे जो जा सकतो है] जिनु तत्को रत्तोसार परिनिगं होने नाटयक मां परपर वस्नि [च्‌मत्कर] है ।

जो मोन वाट-जगय महितो मरो असने है ओर जो मोक-सपयारगे कुसल मगो है पे [प्रनगार रपपान्] नाटकोंका परिनव करने कोर रचना करतनेत जिन [रपगुंन क कल्ग] पौर्वापर्य होत है । १ ।

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स कविसतस्य काव्येन मर्त्यो ग्रापि सुघान्धसः । रसैरिमृदृपितानाख्यो यस्मिन् नृत्यति भारती ॥५॥ नानार्थशब्दौच्येन पराखो ये रसामृततद् । विद्वांसस्ते कवोन्द्राख्यामर्हन्ति न पुनः कथाम् ॥६॥

इन श्लोकोंमें ग्रानन्ददायक कथा मोरित काव्यरचनाओंमें 'रस कल्लोल सुकुल' होनेके मारण 'भनन्दकरूपक' भरतकाव्यको 'मुसक्चर' कहा है । घोर नाटककी रचनाके मार्गोंमें 'रस वल्लोल सुकुल' होनेके मारण 'दु सन्धर' चतलाया है । किन्तु कथा श्रादि गद्य-पद्यात्मक रचनाओंके लेखकोंको 'गद्य कविता निकष वर्दन्ति' लिखकर उस गद्य रचनाको हो कवियोंकी प्रतिभाकी परखके लिए कसौटी माना है । इसी प्रकार पद्यात्मक प्रभन्ध काव्योंके लेखकोंोंने छ्न्दोंके परिमित श्रृङ्खलाके बन्धनमें बंधकर कवी जाने वाली वाङ्ग्य रचना हो कवि प्रतिभाका निकष माना है । वास्तवमें प्रतिभावान् कवियोंके लिए तो सभी मार्ग मुसक्चर है घोर श्रप्रतिभावानोंके लिए सभी जगह कठिनाई है । पण्डितराज जगन्नाथने अपनी रचनाएँ रसिकोंकी प्रशंसा करते हुए लिखा है— साहित्ये सुधुमारवस्तुनि रसनायामहमन्यले । तर्के वा मयि सविभ्यतदनि सम जीवाश्रिते भारती ॥ श्रुत्या वा श्वसन मुद्रू सरचछन्दवसी दबौडकुरेरारसृता । भूमिर्या हृदयङमो यदि पतितसुल्या रक्रियोन्विता म् ॥ जिस प्रकार धनुकूल पतिके होनेपर चाहे कठोर भूमि हो या नोमल मुसज्जित वाम्पा हो त्रियोगे ग्रानन्द भोर विलासमें कोई भ्रान्तर नहीं पड़ता है इसी प्रकार प्रतिभावान् कविके होनेपर वह किसी मार्गसे चले उसके ग्रागे सरस्वती सम्मान रूपसे हो अपने सौ दयंकों प्रविभक्त करती है, उसमें श्रान्तर नहीं पाता है । रसकवियोंकी प्रशंसा— नाटककी रचनाओं 'रस-कल्लोल सुकुल' होनेके कारण हो मर्त्य महर्षि गमा था । किन्तु वह रस हो नाट्य या वाङ्यन प्राश्रय पाता है । इसीलिए 'रसविद्धा कवोश्वरा' रस-कवियोंको सर्वश्रेष्ठ माना गया है । मगले इलोकमें ग्रनुप्रास भी उनकी प्रदास भरते हुए लिखते हैं— वहो [ यात्रतविप ] कवि है घोर उसके वद्य [ के वदनने ] से मष्यन्तलोकके वासी [मनुब्य] भी [काव्यरस रूप] प्रमृतका पान करते पाले वन जाते हैं जिसकी वारगी नाटकोंमें रसाढो तटतरियोंमें चकराती हुई सी मावती है । ४ । शब्द-कवियोंकी निन्दा— जो कवि नानायंक [प्रयंन्त्र ग्रनेषांय-साचार विलष्ट] शब्दोंकि प्रलोभनमें [परकर] रसामृतसे पराङ्मुख हो जाते हैं [प्रप्राप्त रसकी उपेक्षा कर, केवल नादिके निर्धंहके लिए द्वार-प्रपान गुञ्जनबोंमें लगा जाते हैं] मे विद्वान् [रसदपदुतिते कारगा विदग्ध तो पहे जा सकते हैं किन्तु ये 'कयोन्द्राख्याम् कया' न ग्रईन्ति] उनको कवि महों पट्टा सकते हैं । ६ ।

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रसेपालद्धारभाजोडपि रसानिस्यन्दकक्‍या: । दुर्बंगा इव कामिन्य: प्रीक्षन्ति न मनो गिर: ।।७।। ग्रारद्धाद् भूयातिं यावदौचित्यं न विदद्‍ति ये । स्फ़ुरहन्ति कवित्वाय खेलनं ते सुमेधसाम् ।।८।।

रस-विरोधी निन्द्रा— रलेप प्रलद्धारोसे युक्त होनेपर भी रस-प्रवाहसे रहित होनेके कारण वह रसके कवन्ध [कवियों की] यासों [उसी प्रकार [सहृदयपोके] मनको प्रफुल्लित नहीं करती है जिस प्रकार ग्रालिद्वान फरतो हुई प्रोढ़ प्रसङ्घारोसे सजी हुई होनेपर भी [योनि] रसके न निकलने के कारण कठोर भग वाली [दुबंगा] स्त्रियाँ [पुरुषोंको] ग्राह्लादित नहीं भरतीं हैं ।। ७ ।। इस प्रकार इन दोनो लोकोंमें ग्रन्थकारने रसमयीको प्रशसा करते हुए यह दिखलाया है कि रस हो काव्य या नाटकका सर्वस्व है । उससे रहित नाटकको श्रलद्धार श्रादिसे चाहे जितना भी श्रलंकृत कर दिया जाय वे सहृदयोंको श्राकृष्ट नहीं कर सकते हैं । सहृदयोंके मङ्कण्टकेलिये रसप्रधान नाटक हो उपयुक्त हो सकते हैं । कवियोंकेलिये श्रद्वद्वार ज्ञानकी उपयोगिता— उत्तम काव्य या नाटकको रचनाके लिये सबसे मुख्य कारण तो 'श्रद्वार' ही प्रतिभा है । किन्तु उसके बाद कविकी वाक्योत्पत्ति श्रद्यन्त लौकिक तथापि शास्त्रीय ब्यवहारका परिज्ञान भी दूसरा श्रभिवायं कारण है । समस्त श्रादिन तो इन दोनोको श्रलग-श्रलग कारण न मानकर सम्मिलित रूपसे कारण माना है । श्रोर उनके साथ 'वाव्यागिशास्त्राभ्यास.' श्रादि ग्रन्यासकों भी जोड़कर— शक्ति-निपुणता लोक-शास्त्र-काव्याद्वचेदकपातु । काठचादिशास्त्रयाभ्यास इतिहेतुतदुद्रवे ।। काव्यप्रकाश १—२ । शक्ति श्रथन्त कवित्त्वकी वाक्योज्जूत प्रतिभा, लोक, शास्त्र तथा काव्यादिके परिशोलन से उत्पन्न निपुणता श्रथन्त काव्यमें निर्माणा तथा उसको विवेचनामें समर्थ काव्यशास्त्रों विशारदे श्रनुसारं प्रतिपादन करना ये तोनों मिलकर 'हेतु' श्रथन्त काव्यके कारण होते हैं । 'न तु हेतव:' श्रालङ्गम् श्रलङ्ग तोम कारण नही होते हैं । इसी हेतुसे यहाँ भी श्रन्यवार लोककाविहार श्रादिकी उपयोगामिताका प्रतिपादन करते हुए लिखते हैं— निधुनंसे लेकर राजा तक [के ब्यवहार] के प्रोदित्यको जो नहीं जानते हैं श्रोर कवित्त्वकी कामना करते हैं [श्रथन्त कवि बनना चाहते हैं] वे विद्वानोंके उपहासके [मनोरजनके] पात्र बनते हैं [लेखन से सुमेधसाम्] ।। ग्रगले श्लोकमें ग्रन्थकार इस वातपर बल देते हैं कि लोक रजन श्रोर लोकमें प्रतिष्ठाकी प्राप्ति केवल विद्वत्ताके द्वारा नही हों सकती है । इनकी प्राप्तिके लिए शास्त्रीय विद्वत्ताके साथ कवित्त्वकी शक्ति भी श्रावश्यक है । कवित्त्वके बिना नोच विद्वान् लोकमें न प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता है ग्रोर लोकका ध्यान श्राकृष्ट कर सकता है ।

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ग्रापा: कवित्वं विद्यानां लावण्यपमित्न पोपिताम्र। नैविध्योदिनोडप्यस्मै ततो नित्यं कृतस्फुटा: ॥६॥ नान्सिकान्ते द्वयं रित्रं दृश्योचींडा रसज्ञयो: ।

स्त्रियोँके लावण्यके समान कवित्व, विद्याओंकी प्रातिरूप है । इसलिये नारीविद्याके जानने वाले [विदोंके विद्वान्] भी इस [कवित्वकी प्राप्ति] के लिये सदा उत्सुक रहते हैं ।६। [इलोकके उत्तरार्द्धमें कही जाने वाली] दो वस्तुएँ नाटकके ऊपर हुए श्रोत्रे समान है और [इन] दोनों रसज्ञोंको लगना होती है । ये दोनों वस्तुएँ श्रोत्रे तो यह कहते हैं । उनमेसे एक तो] मृगनयनी [सुन्दरी] के स्तनोको व्रणाय [मसौनू घोड़े स्तन का होना और दूसरा) विदग्धका काव्याभाव [प्रथ्यात् कवि न होना, ये दोनों नाथपरखे भोड़े के समान लज्जाप्रद होते हैं] १८०१ काव्यप्राहरककी निन्द्रा—

कुचाभाव: कुरङ्गाक्या: काव्याभावो विपश्चित: ॥९०॥ श्रकवित्नं परस्तावत् कुलड्क: पाठशालिनाम् । ग्रन्थकारगणै: कवित्वं तु फलड्करस्यापि चूलिका ॥९१॥

जैसा कि पूर्वोक्त इलोकोंमें कहा गया है बिना कवित्वरूपी नेत्रों दोनों विद्वानोंको भी जगत्में श्रादर प्राप्त वरना कठिन हो जाता है । इसलिये सभो-वभी कवितवकी प्रतिमा से होन, किन्तु लोकमें श्रादर पानेके लिये उत्सुक, विद्वान् भी दूसरोक काव्यों चुरान्तर ग्रपहररपं कर अपने नामसे प्रसिद्ध कर देते हैं श्रोर इस प्रकार मनायास होँ तोकमे श्रादर प्राप्त करनेक प्रयन करते हैं । इस प्रकार लोगोंको निन्दा करते हुए ग्रन्थकार यगने दतों में लिखते हैं—

[पाठशालिनाम् श्रकवित्] विद्वानोंके लिये कवि न होना हो बड़ा कलङ्क है । किन्तु ग्रन्यों के काशकर्ते [प्रथ्यात् दूसरोंने यथायथा प्रपहररपं करकं अपने नामसे प्रसिद्ध करानेते] पदिचय [ये प्राप्त करनेक यत्न] तो मनस्वीक भी दूतिका [ग्रोर भी प्रतिभा कढाने पात्री वेष्टा] है । १९।

राजशेखर प्रादिने इस प्रकार श्रपने ग्रन्थोंका दरहस्त विचेचन किया है । उन्होंने पविचोने प्रकार भेद निए है । (१) उत्पादक मवि, (२) परिवर्त्तक कवि, (३) श्राच्छादक कवि श्रोर (४) वर्गंक मवि । इनमें 'उत्पादक' कवि उन्में पहचते हैं जो अपनी प्रतिभा वचने मुन्दर सृजन सद्वपवी रचता करता है । वही यास्त्रव्यमे कवि परनागेता मधु-

पारी है । दूसर 'परिवर्त्तक' कवि यह पहुनाता है, जो किसी श्रन्य यास्त्र विशेपके भाव श्रोर रचनी में हर-पर करने उगपो धारणा वर वस्य बना लेता है । पर्याप्त कुरद परिवर्त्तनोंडार कुरेरेकी कविनामर श्रपने स्यातिश्रयो लाप बना दैत है । तीसरे प्रकारका कवि 'ग्राच्छादक' कवि होता है, प्रथानिग पोनपर रचाश्रो दिरा देता है, श्रपानिग पोनपर पयारत नाँ देता ? जैोर उगों पिनको-उनकी या होन नेप्टिकी भी पतनी पदितापीं ग्रनिद नत् देता है ।

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श्रव० ] प्रयमो विवेक [ ७

मूलम-मूल्ना श्रपना वहरूतर प्रकारित वरनेमा दुस्माहम करताहै यह 'सयगंध कवि' म्हं-साताहै । परिनवं कवि और प्राचद्धादक कवि यद्यपि चोर कवि है तो सदपि कवि डाकू कवि है । कवियाके पे सद भेद प्राचीन कालमे भी पाए जाते थे और श्राव भी पाए जाते हैं । इस प्रकारके कवियाफ विपयम निम्न इनाकम श्रच्छी छुटफी ली गईहै-

काव्रनुहर्त्तिन्नच्छय्या, श्रथ्यै कुमतिंच, पद्धादिक चोरंच । सकलप्रचरन्धर्त्तिं साहसमत्त्रें नमस्तस्मै॥

श्रथ्यांत कवि पद मभी काव्यपाहररपवा मनन वरताहै तो वह चेचल छायामात्ना हो श्रपहरणा करताहै । कवि दूसरेके माच्यसे श्रथ्यंक श्रपहरणा करताहै । चोर कवि पदाधिकाक श्रपहरणा करताहै । नु-नु जो सारे प्रव ध, सारे माच्यका हो! श्रपहरणा कर लता हैं उस साहसिक डाकूको दुरसे नमस्कार है ।

इसनं प्रभिप्राय यह हुमा कि दूसरोकै काव्यसे छायामात्नाका श्रपहरणा करना, प्रहेप्या कर लेना श्रनुचित नहीं है उसकी श्रगुमति सुरविक्न लिए भी प्रदान की गईहै । यदि तु श्रप्राकृत-हरप्या, पद्ऱापहरप्या और प्रन ध श्रापहरणा उत्तरोततर गुरूतर श्रपराध वन जातहै ।

उपरदे इनोكم 'प्रतिसुतहृति' छायाकर लिखकर कविको छायापाहररपकको श्रनुमति मो प्रदान कर दो गई प्रतीत होतोहै । इसका तारपर्य यह है कि काव्योम बहुतुधा साम्य भी पाया जाताहै । और वह साम्य कदापि मभी महाकवियोक प्राप्योप भी पाया जाताहै । पर वह छाया-साम्य हो होताहै । धनंजयलोकार काव ग्रानन्दवर्धन तथा राजशेखर ग्रादि ने इस प्रकारके वाध्य साम्यको तीन मागोम विभक्त किया है । (१) प्रतिनिम्मित्र कलप साम्य, (२) ग्रानन्दयप्रश्न साम्य और (३) तुल्यदे हिवतू साम्य । इनका वर्णन करते हुए ग्रानन्दवर्धनाचायने लिसाहै-

सदृशो हन्यमादृश्य तनुं पुनः प्रतिबिम्ववत। ध्वनालोकेरकारवतु तुल्यदेहेदिवन्नच शारीरियाम् ॥

धन्या लो ४ १३ । इतने लक्षण राजशेखरत निन्न प्रकारसे किये हैं-

श्रवयं म तव सव्यों वाक्यान्तरविरचनापरो यत्र । तद्वपरमार्याविंभेद काठय प्रतिबिम्बकल्प स्यातु ॥

कियत्नापि यत्र सरकारकर्मणां वसनु मिन्नवधू भाति । तनु कधितमर्थचतुरे रालोकेरप्रथयमिति वाड्यम् ॥

श्रथ्यांत प्रतिबिम्वकल्प वाड्य मूलग्रन्थता प्रतिबिम्वमात्र प्रनीत होताहै । उसके श्रप्रतिकृत रव और स्वस्प मूला काव्यसे धन्याग प्रनीत नहीं होताहै । ग्रानन्दवर्धनाचायने इस प्रकारके माच्यो 'तात्पव चोर और श्रन्य ग्रन्थकपरने उसका 'ग्रप्रपराम्य विभेद म्हाहै । यह काव्य मर्यादा हेयहै । हमारे ग्रानन्दप्रश्न काव्यम मूला काव्यका कुशल मस्तार करके उसकी रचना को जातीहै । जिसम यह प्रतिबिम्बभावना छाड्कर ग्रन्थम्प या निवंधे समान प्रतीत होताहै । यह भी हैप हो माना जाताहै । तीसरा 'तुल्यदे हिवतू' साम्य माना गया है । ग्रानन्दवर्धनने इसकने विपयम लिसाहै-

तद्वव्यानुकार्थमेद्धाव् पृथक्प्रतिभयसुभाषितम् । वस्तु भातितरा तन्लया शशिनच्छायामिवाननम् ॥

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कवित्वरन्ध्रया किलाशयन्ते सुशाक्तुर्जगान्ति ये । नेत्रे निमील्य विदांस्तेऽधिरोहन्ति पर्वतम् ॥१ २॥

ग्रथ्यः शिष्टसमयपरिपालनाय प्रत्यर्थव्यूहोपशमनाय च सक्लसन्दर्भमार्य्यर्तवनागमं समुचितेष्ट्रधिदैवतस्य सूत्रकारौ तमस्कारसलोकं परामृशात — [सूत्र ९]— चतुर्यंगफलां नित्यं जैनी वाचमुपास्महे । रूपैद्वैदर्शिभि-र्विंशवं यथा न्याय्ये पथि धृतम् ॥९॥

चतुर्यंगफलां नित्यं जैनी वाचमुपास्महे । रूपैद्वैदर्शिभि-र्विंशवं यथा न्याय्ये पथि धृतम् ॥९॥

ग्रथ्यांत जिस प्रकार कामिनीका मुख पूर्ववर्ती चंद्रमा की कान्तिका अनुसरण वरनने पर भी अत्यन्त शोभित होता है इसी प्रकार पूर्वंकाव्यककी ध्वायाका अनुसरण करनेवाला नवीन काव्य भी चमत्कारयुक्‍त हो सकता है । आनन्दवर्धन इस प्रकारके नाट्य शास्त्रके समथंक है इसीको पूर्व इलोकमे “कविरहृति च्छायां” लिसकर ग्राह्य कहा गया है । कवित्वरन्ध्रसे रहित जो [विदग्ध ग्रथंप्रनी कोटिो विशाखे ग्रंथारपर] जगदुशो प्रसन्न [सुखो] बनानेकी यलेक्श उद्धाते हैं वे विदग्ध मानो ग्रंथों मेंच वर पर्वतपर चढनेका पथन करते हैं । [प्रथिते च काव्ये श्रोने काव्ये सफल नहो हो सकते हैं] उनका वह प्रयत्न ग्रावश्यकरूपं है ॥१२॥

मूल ग्रंथका मल्लनाचार्य—उपरोके वारह इलोक ग्रंथकी ग्रावतरंगिका रूपमे लिये गए थे । वे मूल ग्रंथ के भाग न होकर उसके व्यास्याभूत विवरणके भाग थे । ग्रव माभेमेसे मूल ग्रंथ और उसकी व्याख्याका प्रारंभ होता है । जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है यह ग्रंथ दो भागोमे विभक्त है—एक मूल काव्य या भाग जिसको सूत्रभाग भी कहा जाता है, और दूसरा उसक व्याह्या भाग विवरणा भाग बहलता है । इन दोनों भागोके निर्माता एक ही व्याक्ति है । प्रयांत मूत्रकारोंने रूपम ही उसपर विवरणा भी लिखा है । इसलिए मूल मूल ग्रथका जो मल्लनाचार्यने रूपमे भी दे दिया है । 'चतुर्यंगफला इत्यादि इलोकोंको हम इससे पहिने भी दे चुके है, वही इलोक ग्रंथ पिर आ गया है । इसवा यहाँ वारस्य है । पहिली जगह विवरण या व्यास्यात्माका भागवे मल्लनाचार्यने रूपम उतारो दिया गया । या भर उमे मूल मूल ग्रंथ मे मल्लनादर्शोकद्वरूपम लिराकर स्वयम मूत्रकार हो उसको व्यास्यात्म पर रहे हैं । इन वात मरे समभक लनेसे इलोकों पुनरावृत्ति मे जिसो प्रतातर्ता साध्य या भ्रम उतपन नही होगा ।

सदाजारहे परिपालनकेलए मोत वृत्त-समुदायके नाश करनेकेलए सूत्रकार [प्रयांत मूल मूल ग्रथमे] निर्माता [याच्चंद्र गुरुस्तदन] समपूण प्रन्यके प्रयंक की सुस्तितसे मुनन [प्रयथे प्रारंभमे नमस्कार करने योम] समुचित इष्टदेवता [जैनी माथ ग्र्यांत सारस्वतो] नमस्कार-परक इलोक सिखते हैं—[श्लोक १०]—[यमं, पपं, काम मोक्ष रूप] चतुर्यंगपास्मिन कलकलो प्रदान करने वालो [रागादि दोषोने जोते हुने चरिते एम] जिनां [मयों जिन मतमो म्हे जाते वां तों] ते [उत] पालोके [इस ग्रंथके निर्देशा हम दोनो] नमस्कार करते हैं जितने

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‘चतुर्वर्गो’ इत्यादि—चतुर्वर्गो धर्म-श्रथ-काम-मोक्षौ, यथोक्तं प्रधानं मोक्षं वा ‘फलं’ यथ्या: । समुदाय-समुदायिनोरभेदोपचारात्, तेन पुरुषभेदेन एक-द्वि-त्रि-पुरुषार्थफलत्वेऽप चतुर्वर्गेऽफलत्वं न विरोध्यते ।

अपने प्राचाराजू से लेकर हर्षवर्धन पर्यन्त प्रतिष्ठि बारह शासको द्वारा समस्त जगत्को न्यायोचित [धर्मानुकूल] मार्गमे नियन्त्रित किया है ।१। ‘चतुवर्ग’ इत्यादि [व्याख्येय इसोक का प्रतिपाद्य-भाग है । श्रागे उसकी व्याख्या करते हैं] चतुर्वर्गों श्रर्थात् धर्म, श्रर्थ, काम श्रोर मोक्ष [रूप चारों पुरुषार्थ प्रकरणानुसार] प्रविभक्त प्रकारसे जिसके प्रधान या गोमग फल हैं [वह चतुर्वर्गफलका वाची है] समुदाय प्रोर समुदायी [प्रर्थात् समष्टि श्रोर व्यष्टि] का प्रभेद होने [माना जाता] है । इसलिए पुरुषभेदसे [कहीं] एक [फलहो] दो श्रोर [कहीं] तीन पुरुषार्थके फल होनेपर भी चतुर्वर्गफलत्व का विरोध नहीं होता है । इसका प्रतिप्राप्त यह है कि यहाँ जिन-वाच्योका जो ‘चतुर्वर्गफलत्व’ प्रतिपादन किया है वह सर्वत्र समान रूपसे चरित नहीं होता है । पुरुषभेदसे उसमें भेद पाया जाता है । वहीं धर्म श्रथं कामादिमेंसे केवल एक ही फलकी प्राप्ति होती है । वहीँ दो फल भी मिल सकते हैं श्रोर कहीं तीन या चार फल भी मिल सकते हैं । इसलिए जिन-वाच्यों कहींँ एकफल, कहीं द्विफला, श्रोर कहीं त्रिफला भी हो सकती है । इसलिये यहाँ जो ‘चतुर्वर्गफलत्व’ कहा है सो उचित नहीं है । यह बाधू हो सकती है । इस बाधूका समाधान करनेके लिए ग्रन्थकारने समुदाय श्रोर समुदायी श्रर्थात् समष्टि प्रोर व्यष्टिके प्रभेद-सिद्धान्तका ग्रहण लिया है । इस सिद्धांतके श्रनुसार समुदायी श्रर्थात् व्यष्टि रूप धर्म, श्रर्थ आदि भ्रलाग व्यक्तियो श्रोर उन चारोके समुदाय प्रर्थात् समष्टिको अभिन्न मानकर केवल एक, दो या तीन फलोंके होने पर भी चतुर्वर्गफलत्व-वन जाता है । उसमें कोई दोष नहीँ होता है । यह प्रतिकारकथा श्रति-प्राप्त है । ये चारो फल सर्वत्र समान स्यातिमें भी नहीं होते हैं । कोई प्रधान होता है श्रोर कोई गौण । जो फल जिस समय जिस व्यक्तिमें विलेप रूपसे प्रभिष्ट होता है वह उस समय प्रधान फल बहलाता है श्रोर शेप फल गौण बहलाते हैं । परन्तु वह फल चाहे प्रधान रूप हो श्रथवा गौण रूप, प्रत्येक दशामें चतुर्वर्गफलके वीतर गिना जाता है । तभी उन चारोंके फलत्वका उपपादन हो उक्ता है एसी बातको श्रागे कहते हैं—

ग्रोर फलके हेतु होनेसे [ग्रर्थात् प्रभिष्ट प्रयंथके हो फल-प्रद-वाच्य होनेसे धर्मादि चारो पुरुषार्थोमें जिस समय] जो पुरुषार्थ जिसका प्रभिष्ट है वह उसके लिए प्रधान [फल] होता है श्रोर शेष [पुरुषार्थ] गौएँ [फल] होते हैं । ‘चतुर्वर्गफलत्व’ के साथ प्रविष्ट होने [नित्यत्वं] इस पदसे वाच्योका चतुर्वर्गफलके प्रति सावनत्वं-प्रतिबन्ध-हेतुत्व

ग्रोर फलके हेतु होने [प्रर्थात् प्राभीष्ट प्रयंथके हो फल-प्रद-वाच्य होनेसे धर्मादि चारो पुरुषार्थोमें जिस समय] जो पुरुषार्थ जिसकी प्राभीष्ट है वह उसके लिए प्रधान [फल] होता है श्रोर शेष [पुरुषार्थ] गौएँ [फल] होते हैं । ‘चतुर्वर्गफलत्व’ के साथ प्रविष्ट होने [नित्यत्वं] इस पदसे वाच्योका चतुर्वर्गफलके प्रति सावनत्वं-प्रतिबन्ध-हेतुत्व

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नियम इत्यस्यात्रापि सम्भन्धादुपासनस्यार्थाविच्छेदात् स्यादपरा । हपाश्च ग्रहान्त्राचारादीनि हविष्टादपर्यन्तानि । द्वादश प्रसिद्धानि । सदर्थानिर्देशेन चार्न्नयन्त्रतसङ्ख्याया जिनवार्त । प्रस्तुतातुल्यत्वेन द्वयवच्छेद ऋष्यते ।

‘नियम’ इस पदका ग्रन्थय एक बार पहिले ‘चतुर्वर्गाफला’ के साथ कर चुके है : किन्तु द्वादश ‘उपासमहे’ के साथ भी ग्रन्थकार उसका ग्रन्थय करना चाहते हैं । और इस प्रकार उपासनाकी नित्यता या निरतरता सूचित करना चाहते हैं । इसलिए प्रथलो पक्तिमें वे अपने इस अभिप्रायको व्यक्त करते हुए लिखते हैं— ‘नित्यम् इस [पद] का यहाँ [उपासमहे पदके साथ] भी ग्रन्थय होनेसे उपासनाकी प्रविच्छेद [नेरंतर्य] सूचित किया है । [वारह रूप प्रथमान प्राधारादिसे लेकर हविष्टाद पर्यन्त वारह ग्रह प्रसिद्ध हैं । [द्वादश इस] सख्याके निर्देशसे प्रनितयत-सप्तप्ति वारी जिन-वार्तोके प्रस्तुत [प्रयाय्न द्वादश सख्या वाले ऋषकमेदो] के साथ समानता न होनेसे व्यवच्छेद किया गया है ।

विश्वम इति समुदायापेक्षत्वम् । कर्मभूमित्यात् प्राथान्र्यावचत्नया मनुष्यलोको वा विश्वम् । न्याये न्यायादपेते । धृतम व्यवस्थापतम । द्वयवस्थापनस्य चोत्तरोऽपि ग्रन्थवर्तिनिर्देशोऽर्थापेक्षया न योज्यो न्नाहित्कर्म्यापन्नार्थे । पथि इति पुढ्पार्थप्रापणोपायवाचदिसा-दानादिक धर्मे लद्यते ।

इसवा यह अभिप्राय हुन्ग्रा कि जिनोकी वातो तो ग्रन्थ विपयोमे समवन्ध रखते वाली अनेक प्रकारकी हो सकती है किन्तु यहाँ उस सख्या ग्रहण नही किया गया है । द्वादशाक्ष वाली जिन-वार्तोकी ही प्रस्तुत द्वादश प्रन्थारके रूपोके साथ समानता हो सकती है इसलिए प्राधारादिसे लेकर हविष्टाद पर्यन्त द्वादश भेदो प्रतिपादन करने वाली जिन-वार्तोको यहाँ नमस्कार किया है । ‘विश्वम इस पदमें समुदायकी हष्टिसे एक वचन [का प्रयोग किया पाया] है । [प्रर्याप्त जस एव यचनसे समष्टि रूपसे तारे घराचार जगत्नुश्र प्रहण करना चाहिए] । प्रथवा कमंभूfि [प्रर्याप्त शमं-कोति] होनेसे प्राथान्त्र्यावचत्नया [पदसे अभिप्रेत हो सक्ता] है । [धर्मपप्ये न्ग्यायामनपेते प्राट। इस ग्रन्थसे न्याय-शास्त्रो मत प्रनपय करके ‘न्याय’ ग्रथान्त र्यापते धनपेत [ग्रामादूर्स माग] में । ‘पुढतम’ पर्याप्त र्यवस्थापत किया । [इस] व्यवस्थापनक ग्रंथारसद्ध होने

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२—ग्रथाभिने यथाक्यपरतया श्लोकोडयं व्याख्यायते । यथापि सच्चानु धर्मार्थ-कामफलान्वितेव नाटकादौनि तथापि 'रामवद् वतितव्यं न राज्ञावद्' इति हेयोपादेय-हानोपादानपरतया, धर्मस्य च मोचहेतुतया मोक्षोऽपि परमंप्येष्टं फलम् । 'नियतम्' इत्यनेन चतुर्थगफलान्वितेन रूपकाणां निधनस्थानीयम् इति व्याख्यते। जिनानां रागादिजेतृत्वात् लब्ध्वाप्रशयनापेक्षत्वं 'जिनो' । न नाम सर्वेऽपदिष्टं लब्ध्वा न । नवेत्सु डवाद्वीनटशं मत्वे पविस्तराभ्यां तत् कतुं प्रवृत्त ।

पर भी [प्रयाप्त जिन-वार्तीके द्वारा जगत्को न्याय-मार्गमें घ्यवस्थित करनेका कार्यं, भूत भविष्य वतंमान तीनों कालोंमें ही होता रहता है । फिर भी 'पृथत्प' पदमें ग्रतीतकालके सूचक वत्-प्रत्ययके द्वारा केबल] ग्रतीत कालका निवेदन वारोंके ग्रनादितत्त्वको सूचित करने के लिए किया गया है । 'पृथ' मागमें इस [पद] से [धर्म, प्रय्य, काम और मोक्ष रूप] पुरुषार्थोंके प्राप्त करनेका उपाय होनेके कारएा ग्राहिंसा दान श्रादि धर्मोंका ग्रहएा [पृथ पदसे] होता है । [प्रयाप्त जिनोंकी वार्तीसे विश्वको ग्राहिंसा दान श्रादि धर्मोंमें लगाया यह 'पृथ पृतम्' का श्रर्थ है] । मझल श्लोककी दूसरी व्याख्या। यहाँ तक विवेचनएककारिका में द्विविधलक्षणे । सामान्य यथेष्टलक्षणे-परक व्याख्याको है । ग्रागे वे इसकी दूसरे प्रकारकी व्याख्या करेंगे । इस दूसरो व्याख्याका सम्वन्ध प्रवन नाट्यादि रूप त्रिपयके साथ होगा । इसलएि इसमें 'वाच्यम्' शब्दसे सामान्य वाच्यो मानका ग्रहएा न होकर केवल नाट्यादि रूप वार्तीका ही ग्रहएा किया जायगा । दोप पदके ग्रर्थोंमें तो कोई विशेष ग्रन्तर नहीं किया गया है किन्तु उनको व्याख्या नाट्यादिपरक रूपसे भिन्न प्रकारमें दिखाई है। उमीका श्रागे श्रनुवादमें लिखते हैं— ग्रथ ग्रागे श्रभिनेय-वाच्य [प्रयाप्त नाटक श्रादि] परक रूपमें इस श्लोककी [दूसरे प्रकारसे] व्याख्या करते हैं । यद्यपि साक्षात् रूपसे नाटक श्रादि [वारहों प्रकारके रूपक] धर्म, ग्रर्थ और काम [इन तोनोंमें हो किसो एक] फलको हो प्रदान करने वाले होते हैं [प्रयाप्त मोक्ष रूप चतुर्थ फलके साध नाटकादिका कोई साक्षात् सम्बन्ध नहीं होता है] फिर भी 'राक्षके समान श्राचरण करना चाहिए, राजाके समान नहीं' हमें प्रकारकी हेय [त्याज्य] श्राचरणके त्याग करने योग्य ग्रहर्माचरणरूप] और उपादेय [प्रयाप्त ग्रहएा करने योग्य धर्माचरण के [क्रमशः] त्याग [प्रयाप्त परित्याग] और उपादान [प्रयाप्त ग्रहएा] परम होनेसे [नाटकादि मोक्षके प्रति भी परम्परया कारएा हो सकते हैं । इसलएि मोक्षको भी उनका फल कहा जा सकता है । इसका दूसरा कारएा भी प्रगली पक्तिमें देते हैं कि] और धर्मोंमें [भी] मोक्षजनक चतुर्थ फल [के साधक, प्रयाप्त चतुर्थ रूप फलको प्रदर्शित करने वाले] वाले नाटकादि की रचना [कवियोंको] करनी चाहिए यह बात ['नियतम्' पदसे] सूचित की गई है । [जो इस पदमें 'जिन' पदसे तस्मैदवयम् ग्रस्तु । इस सूत्रके द्वारा वत्-प्रत्यय करके 'जिनो' पद वनता है । इसलिए उसका प्रय्ये] जिनारामिय जिनो' [जिनोंको यह । प्रयाप्त जिन-स्वर्ग-निधानो वाओं यह होता है । और 'जिन' शब्दसे रागादिके विजेता सन्तोंका ग्रहएा होता है इसलएि] 'जिनों' प्रयाप्त राम ग्रादिको वशमें कर सेनादालोंको यह [वाले साक्षात् रूपसे जिनप्रवोध न

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‘वाच्यम् ’ नाटकस्या, ‘उपास्महे’ परिशीलयाम । ‘नित्यम् ’ इति श्रग्राप समग्रथयते । सततापरिशीलिताभिनेयवाचो हि कुतो नामौचित्यवाचांदनो भवेयु । हृद्यन्ते श्रभिनेयान्ते इति हृपाया नाटकदीक्षिनि । धयानभिनेयाना रूपशब्दप्रतोते । सामान्यनिर्देशेऽपि वाचोडभिनेयत्व लभ्यते । भूरिभेदतवेद्याभिनेयवाचो ‘द्वादशाभि’ इति प्रशुतवदकरषापेत्तमु । ‘चिश्रवम् ’ इति पूर्ववतू, समवकारादीनां देवदेवयचिरतज्युपादेक्वानू । ‘पाथ्य’ इति यथो सम्भवदुपायितयात् कृत्य लब्यते । नायकप्रतिनायकयोधि न्यायात्कलोपपादशनेन नाटकमादिमि हुंदातचेतसा न्यायादू नपेते कृतये प्रयुक्तिट्ठर्यवस्थाऽयते ॥

ग्रत्रापिं व्याख्याने श्रद्धापरत्चेन नमस्कारपरतैब शलोकस्य । व्याख्येयन्या-न्यायानयोरेककृतौ करवक्यापनार्थमयमेव श्लोको विवरएाम्याध्यादावधीत इति ॥ ९ ॥ होने पर भी मूल रूपमें [लक्षणोंकी रचनाकी दृष्टिसे ‘जैनो’ [पार्शी कही जा सकती] है । [यहांपर यह शङ्का हो सकती है कि नाटकके लक्षण तो भरतादिके ग्रन्थोंमें सर्वत्र पाए जाते हैं फिर उनको जिन प्रश्नोत कंसे कह सकते हैं । इसका उत्तर देनेकी दृष्टिसे प्रागतो पकितने लिखते हैं कि] सदैव उपदिष्ट श्रयं लक्षण न हो ऐसी बात नहीं है । [क्योंकि मूल रूपसे जिनों द्वारा प्रतिपादित लक्षणोंको हो] नचान हस्त्यादि [अथवा शास्त्र श्रादि ग्रन्थ] विस्तारके द्वारा उनको [फिर] कर सकते हैं । ‘वाच्यम् ’ श्राद्यन्त नाटकादि रूप [वाची] को ‘उपास्महे’ ग्रथन्त हम परिशोलित [निरूपित] करते हैं । [प्रथम स्वास्यमाने भी ‘नित्य’ पदका सम्बन्ध सतुवंरचना’ और [निरूपित] करते हैं । इसीलिये वृत्त्यामें भी दोनोंके साथ सम्बन्ध माना है । इसीलिये वृत्त्यामें भी दोनोंके माथ एक बार ग्रभिनत होऊं चुकना है किन्तु बुधारा] यहां [उपास्महेने साथ] भी ध्रुवत होता है । ‘उपास्महे’ के साथ ‘नित्यम् ’ पदके सह्नन्ध-प्रसङ्ग यह प्रभिप्राय निकलता है कि नाटकग्रादिका निरन्तर परिशोलन करने से हो नाटकके लक्षणादिका निरूपण ठीक तरहसे किया जा सकता है । धयानभिनय वार्तो [प्रथचात् नाटकादि] वा निरन्तर श्रनुशोलन न करने वाले [नाटकलक्षणादिपर प्रथ त लिखने वाले विद्वान्] ग्राचायों को प्रतिपादन करने वाले [ प्रयत्न नाटकविमें उचित नियमोंसे प्रतिपादक ] फंसे हो सकते हैं ? नाटकादिका निरन्तर परिशोलन न करनेयाले विद्वान् ग्रनुभवहीन होनेके कारण नाटकादिके लकणां ग्रोर ग्राचार्य ग्रादिका प्रतिपादन नहीं कर सकते हैं । इसलिए हमनें धर्मादि इस ग्रन्थके प्रश्ने सत् रामचन्द्र ग्रोर गुणचन्द्र नाटचोरे मतत परिशोलता करने ग्रनुभव प्राप्त करनेये बाद हो इस ग्रन्थकी रचनाका साहस किया है यह ग्रथवारार्य निमित प्रभिप्राय है ।

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ग्रथ लक्षणं विपयप्रतिजानीते—

यहां वाच्यका सामान्य निर्देश होनेपर भी उससे 'ग्रामिनेय' [नाटकादि रूप] वाच्यके [वारहसे प्राधान्येन भेद] होनेपर भी 'हाररामि' वार्तृ यह [पद] प्रस्तुत प्रकरणके अनुकूल कहा गया है । 'निसद्भम्' यह [पद] पूर्वं [यथालया] में समान [वहां इस द्वितीय व्याख्यामें भी समुदायकी दृष्टि से एकत्वचनमें प्रयुक्त हुवा] है । [व्योंकि नाट्यके भेद ह्रस्व] समासकार प्राचीनमें देय तथा देश्य प्रादिने चरित पा प्रदर्शन होनेसे [नाट्य सप्तत विद्वत्से हि समन्वय रसत्वा है] । 'वृच्य' यह [पद] यथा सम्प्रदानके उपाय होनेसे उसमं कायोंको योजित करता है । नायक और प्रतिनायकके धर्म और धर्ममंये फलोको दिखताकर नाटकादि दुर्दान्तचित्त [अर्थात्‌षष] के स्ववहारक्षो भी न्यास्प मांगमं ध्यवस्थित रहते हैं ।

(सूत्र २)—ग्रामिनेयस्य काव्यस्य भूरिमेधभृतः कियत्त् । कियतां डपि प्रतिद्दृश्य रप्टं लचम् प्रचचमहे ॥२॥

इस [दूसरे] व्याख्यामें भी यथोपरक होनेसे यह इलोक नमस्कार पूर्वक हैं सम्भना चाहिए । व्याख्येय [सूत्र सारांश] और व्याख्या [प्रस्तुत इस विवरणसे यान्त्र मती] ग्राभिन् होनेसे इतसो इलोककेो विवरणसके प्रसङ्गमे भी दे दिया गया है । [पहलेप यह मूल प्रस्तुत कियाकाने रूपमे प्रापा है । ग्रत: उसको व्याख्या भी की गई है । पहुतसो बार विवरणके मज्नत-प्रतिपाद्य विपय—

प्रथम द्वेभम् मद्न्ताचरन् करणेभे यथा पदं द्वितीय बारिस्थे ग्राम्येभे प्रतिपाद्य विपमे दिग्दर्शनं कराने हैं । जेमां कि प्रथममें नाम्रो ही स्पश्ट है गान्दमे समन्वय रसाने वाने तचगाः मादिरक् प्रतिपादन हो इस प्रणयका मुल्य एव प्रभाव प्रस्तुत किया जा सकता है । इस तचगां प्रादिक् प्रतिपादन भी ग्रन्थकार पूर्वप्रनोत भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' प्रादिके ग्रापाश्रपर करेंगे । इसीलिए मुल्ल ग्रन्थका पहा है—'हष्टं ततम्

प्रथममें नाम्रो ही स्पश्ट है गान्दमे समन्वय रसाने वाने तचगाः मादिरक् प्रतिपादन हो इस प्रणयका मुल्य एव प्रभाव प्रस्तुत किया जा सकता है । इस तचगां प्रादिक् प्रतिपादन भी ग्रन्थकार पूर्वप्रनोत भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' प्रादिके ग्रापाश्रपर करेंगे । इसीलिए मुल्ल ग्रन्थका पहा है—'हृष्टं ततम् प्रचचधमहे' पद्यौ पूर्व-प्रतिपादित लक्ष्यादिते मोचारपर हहं लचेमां सोद् लिगेम । चनतर् कहना है कि भरतमुनिभे समान नाट्यशास्त्रें मरेे विद्वदोका और सारे मेधेकां प्रतिपादन न करेे मुनि जुने भेदों और विययोंका हों तदागा करेगे और वह भी बहत्न विवरणर्‌ साप नहों प्रतिनु सरेपमे करेगे । रमो हृष्टिसे करिबाने [कित्सोंत] और विद्वन् मेध प्रचचक्ेे दोनो वरु 'निम्नन्' पदपर प्रयेग् किय्‌ गया पा । इसमं जह्ह 'नियमोर्त' या टोका्प यह है कि मरेे नाट्यशास्त्रेर्‌ल नही प्रतिनु वेधन कुद् मेनेात्‌ हहं समागा करेगे । दूमगे उरह् किहन् पद्‌ परनिमार्व यह्‌ है कि विद्वारपूवक् समाल्‌ न करेे कुद् पोशाला हो मित्न मरा्‌ करेगे ।

ग्रथ [तथा परन्त] नाट्यशास्त्रे विद्वद्भर प्रतिपादन [शो प्रतिज्ञा] करते ह—

[ग्रन्थ २]—ग्रन्थ प्रस्तावे मेंनेति मुल्ल प्रतिनेय-नाप्य [मथित् मार्ग] मने गुद मति-[मागे] ने [भरत नाट्यशास्त्रादि विलक्षणसङ्ग]। प्रथमतः कृत [प्रतिज्ञा] सङ्कल्‌पम्‌ [मती] के [भरने इस पददं पाले] कर रहे हैं ।

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शब्दार्थेऽथन्यासं कविक्रियापरस्य । 'भूरिनृ' रसप्रधानान्नाटकादीन्, रसप्रधानरसांश्च दृश्यादिति-श्रोगदित-आशीः प्राथान-रामकादीन् 'भेदान्' विचिन्ति । 'कियत्' इति श्रनन्तरीयकस्य रङ्गसन्ध्यनन्तरालादिलक्षणस्यास्प परिहारेणैव चमत्कारप्रधनघटना-दर्शन-ग्रथननान्तरीयकं कतिपयं लद्मेति योगः ।

'श्रभिनेयस्य' वाचिक-श्राङ्गिक-सात्त्विक-ग्राहार्यैरभिनेयः । प्रत्यक्षीभवन-योग्यस्य । सूत्रकाराभिप्रायापेक्षं चैतत्, तेन रस-भाव-नायक-नायिकादिलक्षणस्य श्रभिनेयं प्रति प्रयुक्तस्य श्रनभिनेयस्यापि वेदपि न विरोधः । 'काव्यस्य' वर्रानातमनः शब्दार्थयोर्न्यासं कविक्रियापरस्य । 'भूरिनृ' रसप्रधानान्नाटकादीन्, रसप्रधानरसांश्च दृश्यादिति-श्रोगदित-आशीः प्राथान-रामकादीन् 'भेदान्' विचिन्ति । 'कियत्' इति श्रनन्तरीयकस्य रङ्गसन्ध्यनन्तरालादिलक्षणस्यास्प परिहारेणैव चमत्कारप्रधनघटना-दर्शन-ग्रथननान्तरीयकं कतिपयं लद्मेति योगः । 'कियतोडपि' लद्मप्रकारविधावभिप्रेतस्य । तेन नोद्दृश्योत्कलद्माखः सातकादयो न लद्यन्ते । लद्यप्यादाहुल्येऽपि हि यावत्येऽपि भागेऽपि ललद्यितुः श्रद्धा तावानेव लद्यते । कियतोडपि च 'प्रसिद्धस्य' रसप्राधान्याद्विलोक्योकरकृतया व्यासस्य नाटकादेः । 'हृदृद्' पूर्वस्मुनिप्रणीतानालद्मयोपचारामर्शेन उपयुक्ततया निक्षिप्तम् । एवं च स्वसम्प्रदायानिगमसेन लद्यपस्योपादेयत्वसुवत्तम् । लद्यर्थ्यात् श्रभिनेयादच कियतोडपि व्यवच्छिन्ननिश्चित 'लद्म' लद्म । 'हृदृद्महे' सारोपादानहानाभ्यां सङ्केप-विस्ताराभ्यां च प्रकारेऽपि वूमहः । एवं चापरमप्येतल्लद्माभ्यां त्पकपेऽपि निष्प्रयो जनतश्चमत्कारमाविमोति ॥१२॥

'श्रभिनेय [काव्य]' के श्रर्थात् वाचिक, श्राङ्गिक, सात्त्विक [प्रर्थात् मानस] श्रौर श्राहार्य [प्रर्थात् वेष-भूषात्मक चार प्रकारके] श्रभिनयोंके द्वारा प्रत्यक्ष होने योग्य [नाट्य] का [लक्षण पहेंगे] । यह बात सूत्रकारके श्रभिप्रायको दृष्टिसे कही है । इसलिए रस भाव नायक-नायिका श्रादिके लक्षण श्रभिनेय [काव्य] की दृष्टिसे लिखे गये हैं उनके ग्रन्थमें पाए जाने पर भी विरोध नहीं होता है । 'काव्यस्य' श्रर्थात् वर्णनात्मक शब्द श्रौर श्रर्थके ग्रन्थन रूप कविके व्यापारका । 'बहुतरसे' श्रर्थात् रस प्रधान नाटक श्रादि, श्रौर गौण रस वाले धु्रव्नलित, योगदित, श्राशीः, प्रद्योत श्रौर रासक श्रादि भेदोंको धारण करने वाले [यह 'भूरिमेदसूत्र' पदका प्रर्थ हु्रा] । 'कियत्' इससे ग्रनन्तरीयक रङ्गसन्ध्यनन्तराल श्रादिके लक्षणोंको छोड़कर मुख्य प्रकरणके रसाद्धोंको रसानुकूल प्रवन्धोंके लिए श्रावश्यकपढ़ 'कुछ' लक्षणोंको कहेंगें [चा श्रभिप्राय] है । इसका श्राभिप्राय यह हु्रा कि भरतमुनि-प्रसूत नाट्यशास्त्र श्रादिमें रङ्गसन्ध्यालाके निरूपण श्रादिके विपयको बहुत सूदृढ़ [विवेचना करते हुए] श्रत्यन्त विस्तारके साथ प्रतिपादन किया गया है । प्रकृत ग्रन्थराने वस्तु विपयनो विश्रृङ्खल छोड़ दिया है । उन्होंने अपने देशका बहुत विस्तार न करके सीमित देखोंको हो श्रपना विषय बनाया है । उसको दृष्टिसे जितना भाग श्रत्यन्त श्रावश्यक समझा गया है उसीका प्रतिपादन यहाँ किया है । श्रौर वह भी श्रभिनेय काव्यके श्रेवनल कुछ मेदोके सम्बन्धमें हो लिखा गया है । तरह प्रकारके श्रभिनेय-काव्यने भेदोंकी विशेषता हो इस ग्रन्थमें वों गई है । मत-ग्रन्थकारका सद्भुत् उन भेदों विवेचना तक हो सोमित है । इस वातको ध्याने लिए लिखते हैं—

'कियतोडपि' श्रव्यात् अन्य [लक्षणादिचि] से श्रभिप्रेत हेतु होनेसे [भेदों] वा [हो लक्षण करेंगे] । इसलिए [नाट्यशास्त्रों भरतमुनिसे भी प्राचीनतर श्राचार्य] मोहत प्रयोत साधक [सूत्रक] श्रादिकका लक्षण यहाँ नहीं किया गया है । लद्मी [प्रर्थात् श्रभिनेय-

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श्रथ व्यक्तिभेदानुदेशो, नियतं न शक्यते लच्ष्यमात्रास्यातुमिति तदनुदिशति— [सूत्र ३]—नाटकं प्रकरणं च नाटिका प्रकरणथ । व्यायोगः समवकारो भाणा: प्रहसनं डिमः ॥३॥

‘नाट्यो’] का यथार्थ [बहुतायत] होनेपर भी जितने भागोंमें [लक्षितु’ लचक़ा करने वाले प्रभेद] प्रविभक्त होते हैं उतने हो ‘भागों’ [प्रकारोंतथल चारह ‘भेदों’] हो लक्षणा करते हैं। प्रोर ‘भियतेरपि च प्रतिष्ठतस्य’ कुछ प्रसिद्ध [प्रभिनेय-वध्यों] का प्रधान रसकी प्रधनता होनेके श्चारत्न समस्त जगत्के ग्राह्यहारके कारणत्न रूपसे प्रसिद्ध नाटक श्रादिकों [हो लचक़ा करेंगे]। ‘हष्प’ प्रयात्तं [भरत श्रादि] पूर्वाचार्योंद्वारा रचे गए नाट्य लचणोंके तारतम्य [पौर्वापर्य] का विचार करके उपयुक्ततया निर्देश किए हुए [लचणोंफे कहेंगे]। इस प्रकार [‘हष्प’ पदद्वारा पूर्वाचार्योंके लचणोंद्वारा उपदेयता तारतम्यकी विवेचना करके लचक़ा कहेंगे इस यातको सूचित करनेसे] अपनी वलपनामात्रत्नेन निरास द्वारा लचणोंको उपादेयताकी प्रतिपादन किया है। [प्रागे ‘लचणां’ द्वावक्ना धर्म करते हैं] जो प्रभिनेय ग्रोर कध्ध ग्रन्थभिनेयोंते भी श्रथक् करता है वह लचक़ा है [समानासमानजातीयपचवच्छेदो हि लचणांय्] इसके श्रनुसार समनजातीय श्रग्रप्रभिनेय वच्योंते श्रोर ह्रसमनजातीय ग्रन्थभिन्नेय वच्योते मिल्ना वरणे वाली हो नाटक श्रादिकों लचणाए होती हैं। यह वात इस प्रकरणमें सूचित हो है। ‘प्रकृष्टस्यप्ते कह रहे हैं’ प्रयात्तं [पूर्वाचार्योंके लचणोंमें] सार भागोंको प्रहण करने ग्रोर श्चातार भागोंको त्याग कर ग्रोर सक्षेप तथा विस्तारके द्वारा [प्रयात्त जहाँ पूर्वाचार्योंने बहुत सक्षेप कर द्विया है वहाँ कुछ विस्तार करके ग्रोर जहाँ उन्होंने श्राधिक विस्तार द्विया है वहाँ सक्षेप करके] प्रकृष्टहप्तसे कह रहे हैं। इस प्रकार ग्रन्थोंद्वारा रचे लचणोंसे उद्दयं द्वित्वलाकर [अपनी रचनात्मक] निप्रयोजनत्वका निराकरणत्न कर द्विया है [प्रयात् उपयोगिता प्रदर्शित करदी है] ॥३॥

उपमेदो भेद— जैसाकि ग्रन्थकार प्रथम मझल इलोकमें सपष्टत्न बर चुके हैं इस ग्रन्थ वारह प्रकारके रूपक भेदोंका निष्पापा किया जायगा। इसलिए ग्रागे दो कारिकाध्यों ग्रन्थकार ने वारह भेदोंके नाम गिनाते हैं। इन नाम गिनानेकी प्रक्रियाको शास्त्रीय परम्परामें ‘उद्देश’ शब्वद्रारा बहा जाता है। उद्देशा’ शब्वद्रका ग्रन्थ ‘नाममात्रेए वस्तुस्कूकेतन उद्देश’ श्रथात् नाममात्रसे वस्तुका कथन करना उद्देशा कहलाता है यह द्विया गया है। प्राप शास्त्रोंमें उद्देश लचक़ा ग्रोर परोक्षा इन तीन प्रक्रारक उपायोंके द्वारा अपने विपयका प्रतिपादन द्विया जाता है। उस पढनेत्ना हो प्रवलब्भन करके ग्र यकास यहाँ रूपक भेदोंका नाममात्रसे कथन या ‘उद्देश इन दो कारिकाग्रोंम्र कर रहे हैं। किर श्रागे उनके लचक़ा श्रादि करेंगे।

[सूत्र ३]—१ नाटक ग्रोर २ प्रकरण तथा ३ नाटिका, ४ प्रकरणी एव्ं ५ व्यायोग, ६ समवकार, ७ भाणा = प्रहसन, ९ डिम । १० उत्सृष्टिकाकू, ११ ईहामृग, १२ वीथी [ये वारह रूपकके भेद होते हैं। उनमेंसे नाटक प्रकरणए नाटिका श्रोर प्रकरणी ये] चार [भेद केंलिकों, शास्त्री श्चारभटी तथा भारती हप] मुख वृत्तिमेंसि युक्त होते हैं ग्रोर वाक्यके ग्राठ [रूपक भेद] कंशिकोवृत्तिमें रहित

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श्रद्रू ईहामृगो वीथी चत्वारः सर्ववृत्तयः । त्रिवृत्क्षयः परे त्वद्यै कैशिकीपरिजर्जनात् ॥४॥

'चत्वारः' सचेतपुरुपार्थैफलत्वेन महापुरुपोपदेशार्थंचरिततवेन च प्रवृत्तेपू नाटकप्रकरयोः । प्राधान्यम् । 'श्रद्रू'-शब्दो नाटकादिचतुष्टयाद् ग्रपूर्यसंधि-त्वेन विटरमक-प्रवेशकार्यतवेन श्रनुपदेशार्थंचरिततवेन च उत्तरेषां पार्थक्यं लभर्थाति । 'चत्वारः' इति त्रिविधप्रकाराः, तु पुनस्त्रिविधासामध्येऽपि । तत्रद्वतां मध्ये पाठात्, द्वंद्वोदितुरोषाच्च परदेशोनाभिधानात् । 'चत्वारः' इति प्रकारणन्ता व्यक्तिभेदाः । 'सर्वाः' सुप्ता-प्रधानभावेन चतस्रोऽपि वृत्तयो भारती-सात्वती-आरभटी-कैशिकीत्य वचयमालच्यतां यत्र । 'तिस्रः' भारती-सात्वती-आरभटी-कैशिक्यो वृत्तयो येषु । शत्न च येषु । व्यायोग-समवकार-ईहामृग-डिमेपु एतदृया वृत्तनेत-लक्ष्यत इति प्राधान्यान्निर्देशः । येषु तु भेदेपु भाणा प्रहसनो उन्नृष्टि-काव्य.पु यस्या वृत्ते रविषेच्छया प्राधान्यं निर्द्धयते । येषु तु प्रकारे वृत्ते प्राधान्यनिर्देशस्तेषु प्रतिलोव्यक्ते तस्र्या एव प्राधान्यम् । 'कैशिक्या' पद्रि सामस्त्रेन 'द्वयेन' श्रभाव । यद्यपि गौणत्वमलपत्वाद्भावो वा । 'कैशिक्या' पद्रि सामस्त्रेन 'द्वयेन' श्रभाव । यद्यपि नमवकारे श्रृङ्गारतन्मतस्तथापि न तत्र कैशिकी । न तत्रु काममात्रं श्रृङ्गार, किंतु विलासमात्रकप । न चासौ रौद्रप्रकृतौ नेतुंग्राम । श्रृङ्गारशब्दरशच तत्र काममात्रप्रयेद-सार्थाति ॥ ४ ॥ होनके चारसा [केवल सात्वती प्रारभटी तथा भारती इन] तीन प्रकारकी वृत्तियोंसे युक्त होते हैं । ३-४ । [कारिकामे 'प्रकरयोः' के बाद दिया हुवा] चकार, समस्त [प्रर्थात चारों प्रकारके] पुरुपार्थोके प्रदान करने वाले होनेसे तथा महापुरुषोंके उपदेश-योग्य चारित्रोंसे युक्त होनेके कारण [आरहों प्रकारके इन] प्रवन्धों [प्रसिनेय-काव्यों] में नाटक तथा प्रकरणको प्रधानताकी सूचना करता है । ['प्रकरयोः' के बाद प्रयुक्त हुवा] श्रद्रू-शब्द १ समूर्ं [प्रर्थात मुखे कहो जाने वाली पांच प्रकायों] सहित्योते युक्त म होनके कारण, २ विटरमक तथा प्रवेशक [इनको लक्षणोंके लिए जावोगे] के प्रसंगसे होनेसे, चार इ । उपरोक्क प्रदान करनेवाले वातोचयं चारित्रोंसे पूर्य होनेके कारण [ध्यायोगसे लेकर वीथी पर्यन्त] नाटकादि [प्रथम चार भेदों] से भेद सूचित करता है । [कारिकामे ग्राप हुए] 'श्रद्रू' द्वारदसे 'जसृष्टिकाद्रू' म्रथ [पहुना करना चहिए] प्रयस्या समास्मित प्रादिरूप ग्रद्रूोक । नहीं । प्रद्रू पुरत [नाटकादि] के मध्यमें पड़ने होनेके धनदके धनुरोधसे [उत्सृष्टिकाद्रू पूरा द्वार न रहकर] एकदेत [मद्रू-पथ] से मदन किया गया है । [चार] पर्याय् [नाटकसे लेकर] 'प्रकरयोः' पर्यन्त [रपकोंमें] । सचित-भेद । [सर्ववृत्तं] सव वृत्तियोंसे युक्त होते हैं । इतवा प्रयं करते हैं] सव प्रयत्न प्रधान भावसे भारती सात्वती प्रारभटी तथा कैंशिकी धारों वृत्तियां जिनमें रहतीं हैं । [ये नाट-

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अथ यथोदेशन लच्षणमाद्-

[सूत्र ४]-रूपाताद्राराजचरितं धर्मकामार्थसङफलम्

साढोपाय-दश-सन्धि-द्दिव्याद्दुं तत्र नाटकम् ॥५॥

तत्त्वरूपसे [समस्ता] जिनमे रहती हैं [ये व्यायोगसे लेकर वीथी पर्यन्त प्राठ श्रपभेद 'त्रिवि-

नय' तीन योनियों वाले होते हैं]। इनमे जित व्यायोग समवकार ईहामृग शौर जिसमें

उनके लच्षणोंमे एक-एक वृत्तिके प्राधान्यका निर्देश [किया हुग्रा] है उनमे वृत्तिके-भेदसे कवि

अपनी स्वेच्छासे एक-एक वृत्तिको प्रधान रूपसे निवद्ध करता है। शौर जिन भेदोंमे श्रप्र्यात्

भाषा प्राद्हसन, उत्सृष्टिकाङ्‌ श्रोैर योयोमे जित [विशेष] वृत्तिका [नाम लेकर] प्राधान्यका

निर्देश किया गया है उनमे [कवि अपनी स्वेच्छासे नहीं ग्रपितु उसी निर्देशके श्रनुसार] उसी

वृत्तिको प्रधान रूपसे ग्रोर ग्रन्थ दोनों [वृत्तियों] की गोचर रूपसे श्रथवा श्रलप्ताके कारन

सर्वथा प्रभावको [उपनिबद्ध करता है । श्रागे 'कैशिक्योपरिवर्जनात्' का ग्रयं करते हैं—]

केन्दीशिको [वृत्ति] का 'परित' प्रयोग सम्पूर्णंतया यथंजं वृत्त्य्‌ श्रथवा शृङ्गार [होनेसे व्यायोगसे लेकर वीथी

पर्यन्त प्राठ भेद केवल तीन वृत्तियों वाले होते हैं]। यद्यपि समवकारसे शृङ्गारव

का भाव काम [प्रदान] होता है किन्तु फिर भी [शृङ्गारमे होनेवाली] केंन्दीशी-वृत्ति वहाँ

नहीं रहती है। ययोकि केवल साधारराकामका ही नाम शृङ्गार नहीं है किन्तु [जिसके] विलास

वा उत्कर्ष [उदात्तीकरके शृङ्गार शान्दसे कहा जाता है । समवकारमे सामान्य शौकिक काम-

व्यापारमात्रका प्रदर्शन होता है उसके विलासोत्कर्ष या उदात्तीकरराकी नहीं]। क्योंकि [यह]

समवकारमे प्रस्तुत किए जाने वाले [रोद्र-प्रकृतिके] पात्रोंमे नहीं हो सकता है । इसलिए

समवकारमे यद्यपि शृङ्गारका प्रदर्शन सम्भव नहीं है] श्रोैर उसमे प्रयुक्त शृङ्गार वासव

इत्यादि यह ग्रभिप्राय है कि तीन वृत्तियों वाले ग्राठ श्रपभेदोंमे समवकारमे यद्यपि

कामकी प्रवृत्तियोंका दर्शन होता है किन्तु उसको उदात्त रूप न होनेसे शृङ्गार शान्दसे नहीं

कहा जा सकता है । इसलिए उसमे केंन्दीशो वृत्तिका उपयोग नहीं होता है । श्रृङ्गार एवं व्याय-

योग ग्रादि ग्रन्य सात भेदोंमे साथ, नाम युक्त होनेपर भी समवकारको कैशिकी-वृत्ति होन

वाले तीन वृत्तियों वाले वर्गमे रखा गया है ॥३-४॥

९ नाटक लच्षरां—

पिद्धली बारिकध्रोम ग्रथप्रमारने रूपकके वारह प्रधान भेदोंमे 'उद्देश' ग्रर्थात 'नाम-

मात्रेया वस्तुसदृशोक्तान' किया है । 'प्रविभिदा च रास्यस्य प्रवृत्ति, उद्देशो लच्षरां परोच्ता च' इस

सिद्धान्तके ग्रनुसार 'उद्देश' के बाद लच्षराकाक ग्रावसर ग्राता है । श्रृङ्गार एवं श्रागे ग्रन्थकार

उद्देशाद्वके क्रमसे हो लच्षराकी निस्पत्ति ग्रारम्भ करते हैं : उद्देशाक्रममे सबसे पहले नाटकका

ग्रव उद्देश कामके ग्रनुसार [नाटकके] लच्षराके कहते हैं—

[सूत्र ४] उन [रूपक-भेदों] से धर्म, प्रयं ग्रोर काम [त्रिवि] फलोंवाला,

ग्रह्‌, उपाय, दशा, सङ्घते वृत्तक, देवता ग्रादि जिसमें [प्रधान नायकके] ग्रद्भुत प्रयात] सहा-

यक हो, इस प्रकारका पूर्वकल्के प्रख्यात राजाम्राक चरित [प्रवन्ध करनेवाला ग्राभि-

नेय काव्य] नाटक [नामसे कहा जाता] है ।४।

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अथातः कथयामः चरितं यच्रेत्यनन्यपदार्थं । इह स्वातात्वं त्रिधा, नाम्ना, चेष्टया, देहेन च । कौशाम्ब्यां चरित वत्सराजेनैव रुञ्जकम् । चरितमपि वत्सराजस्य कौशाम्ब्यां वासवदत्तालाभिकसेव । वासवदत्तालाभिकं वत्सराजस्य कौशाम्ब्यामेव ।

पूर्वंकालके प्रसिद्ध राजाका चरित्र जिसमें [प्रदर्शित किया गया] हो वह 'स्वातात्वराजचरित' श्रभिनेय कार्य होता], यह मुख्य-पदार्थ-प्रधान [बहुतोंमें हिस्सा-मात्र 'स्वातात्वराजचरित' इस पदमें [किया गया] है । इसमें प्रसिद्धत्व तोन प्रकारसे होता है, १ नायकसे [प्रसिद्धत्व], २ कार्योसे [वेष्टितेन प्रसिद्धत्व] प्रोर ३ वेशसे [प्रसिद्धत्व] । [ग्रागे इन तोनों प्रकारके प्रसिद्धत्वको उदाहरणों द्वारा स्पष्ट रूपसे दिखलाते हैं । जैसे नासको प्रसिद्धिका उदाहरणपा यह है कि] कौशाम्बीमें चरित [प्रर्थात् चेष्टाएँ श्रमिनय] वत्सराज [के नाम] से हो हृदयाकर्षक होता है । [प्रथवा इस रूपमें वत्सराज नामसे नायक उदयनका स्वातात्व बनता है । दूसरा चरितसे प्रसिद्धका उदाहरणपा दिललाते हैं] प्रोर वत्सराज [उदयन] का कौशाम्बीमें वासवदत्ता-प्राप्ति रूप चरित हो [हृदयाकर्षंक होता है] । यह चरित कार्यो द्वारा प्रसिद्धिका उदाहरणपा हुग्रा । इसीको तीसरे प्रकारसे बदल देनेपर] वत्सराज [उदयन] का वासवदत्ता-लाभादिक [चरित] कौशाम्बीमें ही [हृदयाकर्षंक होता है यह देशसे प्रोर कार्यसे प्रसिद्धिका उदाहरणपा हुग्रा । श्रथांत एक वत्सराजके चरितमें हो तोनों प्रकारको प्रसिद्धि जाई जाती है] ।

चरितस्वयातत्वं च प्रधानचरितापेक्षया । तत्सदृशमनुकार्योति रुज्कर्त्वार्थम्-स्वयातात्वपि चरितान्ति क्रियन्ते । तेन ब्रहपि रामप्रवन्चेप सीताहरणानयनोपायानां युद्धानां गौपपत्त्राच्चापि । न्यपरेपां च भवितविवशोपादीनां भेदैरडपि न विरोध ।

यह चरितकी स्वाति प्रधान नायककी हृदयसे हो [सी जाती] है । इसलिए शोभावान् करनेके उस [प्रधान-नायक] के प्रतुपायों श्रमप्रसिद्ध चरित्र भी [नाटकमें उपनिबद्ध] किए जाते हैं । इसलिए बहुतसे राम-काव्योंमें सीताके हरण तथा पुनः प्राप्तिके यत्नोंमें गो-पपत्त्राचापि] में विरोध नहीं होता है । वहाँ ग्रन्थकाराने नाम्ना, चेष्टितेन देहोन च' तोनों प्रकारकी प्रसिद्धि एक वत्सराज उदयनके चरितमें हो दिखलाई है । प्रोर उसकेलिए तोन भिन्न-भिन्न स्थलोंपर 'एवकार' का प्रयोग किया है । 'कौशाम्ब्या चरित वत्सराजेनैव रुज्कम्' । इस वाक्यमें 'एव कार' द्वारा वत्सराज नामपर बल दिया गया है । श्रथांत कौशाम्बीमें वत्सराजके चरितसे हो हृदयाकर्षक होता है । पूर्व्वकालों राजा वत्सराज उदयनका नाम प्रसिद्ध है इसलिए वहाँ उसका चरित्र हो लोगोंको प्रिय लगता है । यह 'वत्सराजेनैव' मे वत्सराज नाम मुख प्रयुक्त 'एवकार' वा प्रभिप्राय है । दूसरी जगह 'चरित-स्य वासवदत्तालाभिकसेव' में मुख 'एवकार' वामवदत्ता प्राप्ति हन चरितके ऊपर हो बल देता है । श्रथांत वत्सराज उदयनके मुख्य चरित रहने हृदयाकर्षंक नहीं हैं जितना कि व वासवदत्तां प्राप्तिका वृत्तान्त । यह 'चेष्टितेन' प्रभिध्या उदाहरणपा हुग्रा । सोधरोरो श्रनुः 'वागवदत्ता नानात्वा वत्सराजस्य कौशाम्ब्यामेव' यहीं 'कोशाम्ब्यो' में मान मुख 'एवकार' मौनान्वों में देनपर विरोध रूप वदता है । ग्रथांत वत्सराज उदयनका वामवदत्ता-नामक चरित्र भी केवल कौशाम्बीमें हो विख्यात् होता है ।

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ग्राद्ये ति पूर्वः, तेन वर्तमानभविष्यतोर्निरासः। कविना हि रक्षत्नार्थं किञ्चित् सदृशुपेद्यते, किञ्चिदसदृद्याद्रियते। वर्तमानेऽ च नेतरि तत्वं लप्रसिद्धिवाघया रसहानिः स्यात्। पूर्वेमहापुरुषचरितेपु च श्रथद्धानं स्यात्। भविष्यतस्तु वृत्तं चारित्रमपि न भवति। चर्येते रसश्चरितमित्यतीनिदेशात्।

यह 'देशन' प्रसिद्धिका उदाहरण है। इस प्रकार एक वत्सराज उदयन के चरित्र में ही दो नो प्रकार केो प्रमिद्धिके उदाहरण ग्रन्थकारने दिखला दिए हैं। वर्तमान चरित्रोंके श्रभिनयका निपेध— नाटकों में केवल पूर्वकालके प्रसिद्ध राजाओं को ही नायक रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है वर्तमान या भविष्पत के राजाओं को चरित नायक के रूप में प्रस्तुत नहों करना चाहिए इस बात को यहाँ ग्रन्थकारने 'ग्राद्य-राज' पद से सूचित किया है। इस वात को विद्वानों ने द्विवलाते हैं—

"प्रसुपरितोपाय प्रभुचित कदाचननाटये वर्णनीयमिति" यथा दृष्यः सुरैरजिता। इत्येतस्माल्लभ्यत इति केचिदाहुः । सदसत्त्। दशरूप-लदृशे युक्तितो विरोधात। तत्र हि किञ्चित् प्रसिद्ध-

"प्रसुपरितोपाय प्रभुचित कदाचननाटये वर्णनीयमिति" यथा दृष्यः सुरैरजिता।' इत्येतस्माल्लभ्यत इति केचिदाहुः । सदसत्त्। दशरूप-लदृशे युक्तितो विरोधात। तत्र हि किञ्चित् प्रसिद्ध-

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राजेति नत्रियामात्रं, न पुनरर्भियिक्त एव । राम-जीमूतवाहन-पार्थादीनामन-मिथिकानामपि दशोनात्। नत्रियो मृत्य एव, तेन न देवतैरुकं नाटकमित्युक्तं भवति । नाटकं हि रामाद्यर्तिततयं न रावणवत् इत्युपदेशपरम्। देवतानां तु दुरुपपादस्य-र्थस्यैवेत्यादि रीतित तच्चरितमरक्यमनुष्टानतद्वान्त मत्यानामुपदेश-योग्यम् । तेन ये दिव्यमपि नेतारं मन्यन्ते न ते सम्मुग्रमंसतेति ॥

"न च वतमानचरितानुसारो युक्तस्तो, विनेयानां तत्र राग-द्वेषमद्यरतया-दिना तन्मयोभावाभावे प्रीतिरभावेन न्यायुपपत्तेरस्यभावान्। इति न्यायेन न्यायुपपत्तेरस्यभावान्धिकम् । एतदुक्तं दशरुपकाध्याय वितनिष्याम इत्यार्तां तावत्" । इसका श्रभिप्राय यह है कि प्रभु-राजादिके प्रसन्न करनेके लिए कभी-कभी उसके चरित्रका भी श्रभिनय उनको दिखलाना चाहिए । ऐसा जो लोग मानते हैं उनका कथन उचित नहीं है । क्योंकि दशरुपकौके लक्षणोंमें कुछ नाटकादि प्रसिद्ध-चरित वाले माने गए है ग्रोर समवकार ग्रादि कुछ भेद उस्वाद्य-चरित श्रर्थात् कल्पित चरित्रके श्राधारपर निर्मित माने गए हैं । वतमान राजादिका चरित इन दोनोंमें किसी श्रेभागमें नहीं ग्राता है । ग्रात् जिसका श्रभिनय उचित न होवे । इस सम्बन्धमें दूसरी युक्ति यह है कि वतमान चरित्रोंमें देखने वाले का राग-द्वेप-माद्यस्थ्य ग्रादि होनेसे उनका न मनोरंजन होगा ग्रोर न उनको कोई शिक्षा ही मिलेगी । श्रर्थात् नाटकके दोनो हो प्रयोजन व्यर्थ हो जावेंगे । मृतः वतमान चरित्रका श्रभिनय न होना चाहिए । इसी विपयमें श्रभिनवगुप्तने तोभरो युक्ति यह दी है कि वतमान चरितमें यदि धर्मादिका फल तुरन्त प्रत्यक्ष हो जाता है तो नाटकके प्रयोगका कोई लाभ सामाजिको नहीं मिलता है । ग्रोर यदि धर्मादिका फलका प्रत्यक्ष नहीं होता है तो उससे कोई शिक्षा नहीं मिल सकती है । भ्रतः वतमान नरितका श्रभिनय उचित नहीं है । यहां प्रकृत ग्रन्थमें रामचन्द्र-गुणचन्द्रने भी वतमान चरित्रके श्रभिनयको ग्रन्थयुक्त ठहराया है । उनकी युक्तियां श्रभिनवगुप्तकी युक्तियोंसे भिन्न हैं किन्तु उनकी कल्पना सुन्दर है । इन दोनोंकी युक्तियोंको मिलाकर इस विपयको एक सुन्दर विवरण उपस्थित जाता है । इसलिए हमने श्रभिनवगुप्तके मतका यहां उल्लेख कर दिया है । ग्रोर 'राजा' पदसे श्रत्रियामात्रका ग्रहण करना चाहिए केवल श्रभिषिक्तका हो [ग्रहण] नहों [करना चाहिए] । क्योंकि राम, जोमूतवाहन ग्रौर सुप्रतिष्ठ श्रादि मनभिषिक्त भी [नायक हपमें] पाए जाते हैं । सत्रियस्ते मानव [स्प सत्रिय] का हो ग्रहण करना चाहिए इसक यह श्रभिप्राय होता है कि नाटकमे देवताओंको नायक नहीं बनाया जा सकता है । क्योंकि 'रामके समान ग्राचरण करना चाहिए रावणके समान नहीं', इस उपदेशको देनेयालता नाटक होता है । ग्रोर देवताओंकेलिए तो भतव्यत कठिन कायौं सिद्ध हो उनकी इच्छा मात्रसे हो हो जाती है इसलिए उनके चरितहे ग्रनुसार ग्राचरण सम्भव न होनसे वह मनुष्योंके लिए उपदेशक्रम नहीं हो सकता है [इसलिए देवताओंको नायक बनाना देवच ग्रोर चनुपयुक्त है] । इसलिए जो देवताओंको हो [नाटकोंको] नायक मानते हैं उनका मत ठीक नहीं है ।

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नायिका तु दिव्यापि भवति यथोवेशी। प्रधानेऽपि तद्वच्चरितेऽन्तर्भावात्। उपदेशानर्हप्रायधृष्टतरेरदीतरसत्त्वेनैव च समवकारादौ दिव्योऽपि नेता न विधते। चरितमित्याचरितं न तु कविवुद्धिकलिपतम्। बाहुल्यापेक्षं चैतत्त, तेनाहवं किंचिद्रुढजकं कलिपतमपि न दोषायेत।

नायिका तो दिव्य भी हो सकती है जैसे उर्वशी। क्योंकि प्रधान मानव [रूप नायक] के चरित्रने उस [दिव्य नायिका] के चरित्रका अन्तर्भाव हो जाता है। उपदेश प्रदान करनेकी शक्तिसे रहित शौर दीप्त उस वाला होनेसे समवकार श्रादिमें तो दिव्य [प्रथित वैतालप्रभृति] नेता माननेपर भी कोई विरोध नहीं होता है। 'चरितमें' इस पदसे [पहले] प्राचरण किया हुमा [यह ग्रन्थ गृहीत होता है]। कविकी बुद्धिसे कल्पित [चरित्रका] का [प्रहण] नहीं होता है। शौर यह व बाहुल्यकी दृष्टिसे [कहा गया] है इसलिए थोड़ा-सा कुछ सौन्दर्याधायक [वृत्त] कल्पित होनेपरभी दोषावहक नहीं होता है।

धर्मकामार्थसुखफलम्। सन्तोडचिरभावित्वाद्वा वर्तमानो वा धर्मेऽर्थकामौ। फलम्। तेन भाविकमार्यफलत्वादागमो न नाटकम्।

[ग्रन्थे 'धर्मकामार्थसुखफलम्' इस कारिकाभागकी व्याख्या करते हैं—] प्रलग प्रलग [व्यस्त] या समस्त [समष्टि] रूपसे धर्म, काम शौर अर्थ [जिनके सत् प्रयोजन्त् प्रधान फल हैं [वह 'धर्मकामार्थसुखफलम्' हेतुग]। मोक्ष तो धर्मंका कार्य [धर्म जन्य] होनेसे गौण फल होता है [इसलिए यहाँ उसकी गणना नहीं कराई है]। ग्रपवा प्रत्यक्षत सोध्र प्राप्त होने वाले होनेसे भावी धर्मादिको भी सत् कहा जा सकता है इसलिए सत् प्रयोजन्त् वतमान [वतमाननिष्ठ] समीपस्थ वतमानलयद्ध] धर्म काम शौर अर्थ जिनके फल है [यह 'धर्मंकामार्थसुखफलम्' की दूसरी व्याख्या हुई]। इस व्याख्याके अनुसार [सदुरवर्ती जन्मान्तरमें प्राप्त होने वाले] भावी फल [का प्रतिपादन करने] वाले 'ग्रागम', नाटक [प्रेयोगमें] नहीं [माने जाते] हैं।

तत्र धर्मंफले नाट्ये दया-दम-दान-न्यायप्राय हर्षफलं श्रामुदितमखफलं च राज्यायमाधया नेतुश्चरिते त्युपपाद्यते। न पुनः सर्वसन्ध्यपरित्यागं कृत्वा। वतमानचरितमित्यभफलमेव। साचाद्व हर्षफलार्थी हि लोकः।

उन [धर्म, काम शौर अर्थ फल वाले नाटकों जैसे] में से धर्मं-फल वाले नाटकोंमें दया, दान शौर न्याय श्रादि हर्ष फल तथा राज्य ग्रादिकी प्रवादिकी प्रभावासे पारलौकिक फल वाले नेता के चरिनका प्रदर्शन कराया जाता है। समस्त सन्ध्यको परित्याग करके [नायकके चरित] का [प्रदर्शन] नहीं बत्कर भनुढान किया इस रूप में प्राभविषयक फल वाले [नायकके चरित] का [प्रदर्शन] नहीं [कराया जाता है]। इसका कारण यह है [कि] ससार साक्षात् हर्ष फलको [देता] चाहता है।

'धर्मंकामार्थससफलम्' इस कारिकाभागमें धर्मं फल वाले नाटकभी चर्चा की गई है। धर्मके भोतर विधिरूप शौर निपेधरूप दोनो प्रकारके धर्मोंका समावेश हो सकता है। दया दान श्रादिको के रूप वतमान्ति निपेध रकप धर्म है। शौर सद् न्यायपरायणते नेयेप्ति रूप वतमान्ति निपेध रकप धर्म है। यहाँ नाटकमे दया दानादि रूप विधि धर्मोंका ही धर्म पदश्र प्रहण करना चहिए। सर्वंद्यापारोपरति हि धर्मंस्य प्रहण नहीं करना चहिए क्योंकि उम प्रकारके धर्मों

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कामफलेऽप दिव्यकुलजस्त्रीसम्भोग-सज्जीभूत-कारचारोपवनाविहारप्रायम् । अर्थफलेऽप्यर्थकृच्छ्रेऽर-सम्भृत-विमहाहिर्दरार्ज्यविचिन्ताप्रायमिति ॥ 'साड़, इति श्राद्ध-उपाय-दर्शा सन्ध्याभिवन्दनमागेऽपि सदृश वर्त्तते । 'दिव्याद्रुम, इति दिव्यं देवता सन्योंदपि चोत्तम प्रधानस्य नेतुरङ्घ्रिसदृशाय: पताका-प्रकरी-नायक-लक्ष्माभो यच । दिव्यो हि नेतैव विरुध्यते न पुनः सहायः। छद्मतस्तु भक्तितामेव नाम देवता। प्रसोदन्तीति देवताराधनपुर सरं उपायानुष्ठानमाधेयमिति व्युत्पादनार्थं दिव्योऽप्यह्नतचेन काय ॥

का फल लोकेमें साक्षात् नहीं देखा जाता है ; इसलिए जिन व्रतादिके प्रदर्शनसे सामाजिको साक्षात् फलका दर्शन न हो सके उसके उस प्रकारके धर्मंका ग्रहण यहां धर्म पदमें अभिप्रेत नहीं है । राज्यादिकी वाधाका भ्रमाल तो उसके पूर्वंकृत धर्मंका हेतु फल हो सकता है किन्तु व्रतानुष्ठानका फल उस समय देखनेको नहीं मिल सकता है । व्रत दान आदि दृश्यफल तथा राज्यादि बाधाका श्रमाव ग्रादि अमुद्रिक धर्म फल माने जा सकते हैं । यह प्रयाकारका अभिप्राय प्रतीत होता है । ग्रोर कामफल वाले [नाटक] में दिव्य [प्रयांत् श्रेष्ठवंशवाला] प्रयवा [उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई] कुलोत्तम स्त्रीका सम्भोग, सज्जोत, कामचार [प्रथांत् यथेष्टचेष्टा] उपवन-विहार ग्रादि [प्रधान फल प्रदर्शित किया] है । अर्थफल वाले [नाटक] मे शत्रुका नाश, सन्धि-विप्रह ग्रादि राज्य [चिन्ताका] [प्रधान फलके रूपमें प्रदर्शित किया जाता] है । यहां तक ग्रन्थकारने 'धर्मंकामार्थसंश्रित्फलम्' इस कारिका-भागको व्याख्या की है । अब आगे 'साड़ोपायदर्शासन्ध' इस पदकी व्याख्या करते हैं । इसमें श्राद्ध, उपाय, दान श्रोर सन्धि पद ग्राए हैं, ये सब नाट्यशास्त्रके पारिभाषिक शब्द हैं । ग्रन्थकार ने सबके लक्षण यहां ग्रहण न करे । उन श्राद्ध श्रादि सबके युक्त, पूर्वकालिक राजाओंके चरित्रका प्रस्तुत करने वाल नाटक होता है यह इस पदका रहस्यार्थ है । इसको अभिनयको ग्रांगीकार देते हैं— ग्रागे कहे जाने वाले श्राद्ध, उपाय, दान तथा सन्धिसे युक्त [श्रद्भुतराजचरित नाटक कहलाता है] । 'दिव्याद्रुम' [इस पदके दो प्रकारके अर्थ हो सकते हैं । उनमेसे पहिला अर्थ यह है कि] दिव्य प्रयांत् देवता [प्रयवा] भो [कोई] उत्तम-प्रकृति [महानुभाव] प्रधान [होता है] । दिव्याद्रुम यह नामकके रसे जानेके [सङ्घटन कर चुके हैं] फिर उसके तुरन्त बाद हो देवताग्रेको नायकका सहायक प्रयवा पताका-नायक या प्रकरी नायक वनानेकी बात कह रहे हैं । ये दोनों विरुद्ध बातें हैं इसका समाधान करते हैं कि] देवताओंको नायक बनाना हो [प्रनुचित] नहीं [है] । प्रत्यन्त भक्तोंके ऊपर हो देवता प्रसन्न [होकर उनके] सहायक बननेके लिए उद्यत् होते हैं । इसलिए देवताओंको पूजन [हो उपयुक्त] होता पताकादि बनता चाहिए इस यत्नको निक्षा देनेकेलिए देवताग्रोंको भी सहायक [हमारे प्रस्तुत] करना चाहिए [यह इस पदतका प्रयोजन है] ।

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तत्र देवता यथा नाटनन्दे गौरी । उत्तमप्रकृतियेथा रामादिप्रवन्धेपु सुग्रीवद्विरिति । यद्वा दिव्यान्ति स्वनवध्यानि श्रद्धानि वद्यमाश्रानि उपदेशादीति यत्र ।

तत्रेति निर्देशार्थः । श्रभिने यममुद्रायाम् प्रभानपुरुपार्थभ्रुतविनेयराजदिव्युपाख्यानगुणोभेन नाटकं निर्दार्यते । नाटकामिति नाट्यत्न विचित्रं रक्खनाप्रवेशेन सम्भानां हृदयं नतंयति इति नाटकं । श्रभिनेयमुपरिष्टु नमननाट्यस्थापि नट-नाटक शब्दो दृश्युपाद्यते । तत्र तु घटादित्येन हेत्वभावाश्रिच्चन तनयः ।

हृदयमेव पठितम् । हेतुना विवेक पूर्वंपठितस्य नाट्यस्य । यत्कारितु नटस्यापरेषा । वाच्यार्थाभिनयेन नाट्यम् । पठारो तु नृत्य गृहम् याप । दर्शयति नटान्तिक्यूपदेता । पदर्थाभिनयेन नृत्तम् । गानविदोपमात्र नृत्यम् । नृचिनु पठारो हि नट नृत्तं पठन्ति ।

"हृदयमेव पठितम्" इत्यादि । यहाँ विवेक पूर्वंपठितस्य नाट्यस्य हेतुना यत्कारितु नटस्यापरेषा वाच्यार्थाभिनयेन नाट्यम् । पठारो तु नृत्य गृहम् याप दर्शयति नटान्तिक्यूपदेता पदर्थाभिनयेन नृत्तम् । गानविदोपमात्र नृत्यम् नृचिनु पठारो हि नट नृत्तं पठन्ति ।

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यद्यापि कश्चाद्योडपि भोत्कृतदय नाट्यन्ति तथापि शृद्धोेपायादीनां चैचचर्यहेतूनामभावात् न तथा रुक्कृतचर्मिंत न ते नाकटम्! तथा नाटकं प्रधानपुरुपार्थेपु राज्ञां तदङ्गमूतेष्वमात्यादीनां च वहूनां व्युत्पादकर्म्माति कतिपयच्युत्पादवात् दृश्यादीन्यपि न नाटकभिति ॥ ४ ॥

प्रकरण होता है । इस 'प्रहृीभाव' थोर 'नति' शब्दोंसे उल्ललेश नाटक नाटककी व्युत्पत्तिके प्रसङ्गमे ध्रावश्य कियी है । श्राचार्यने ग्रन्थारम्भमे नाटकके विवेचनके प्रसङ्गमे-- (१) नृपतीनांेच नाटकन्नाम तन्व्वेेष्टितं प्रह्हीभावदायक भर्वाति [प्र० ४१३, पक्ति ५] । (२) यद्यपि सर्वसूत्रकाराणांमर्थो हृदये प्रविष्टो विनेयाश्च विनीवान् करोति [प्र० ४१४, पक्ति ५] । (३) प्रधान पुरुपार्थे प्रधानविनेयाना, ग्रन्थान्नान्येपां वेदयतोङवनत्ति व्युत्पत्ति ददाति । तत्त एव नाटकमुच्यते । [प्र० ४१४, पक्ति ७] । इत्यादि रूपमे श्रनेक स्थानोंपर नमन प्रह्हीभाव, नति श्रादि भावोंसे नाटक शब्दके साथ सम्वन्ध दिललाया है । जिससे प्रतीत होता है कि प्रभिनवगुप्त नमनार्थंक नट धातुसे भी नाटक शद्बदकी व्युत्पत्ति मानते हैं । परन्तु प्रकार रामचन्द्र गुरणचन्द्र इस व्युत्पत्तिसे सहमत नहो हैं । उनका कहना है कि घटादि गरा पलित धातुको हो कुछ लोगों ने 'नृतो' के बजाय 'नतो' श्रथं मे माना है । घटादि गर पलित धातुप्रोंको शिव सज्ञा होकर उनमे मिता हृस्व. सूत्रसे हृस्व हो जाता है । उस दशामे नाटक पदम भी ह्रस्व होकर 'घटक' के समान 'नटंक' पद बनना चाहिए । 'नाटक' शद्बद उस धातुसे नही वन सकता है । भ्रत एव रामचन्द्र-गुणचन्द्रने इस व्युत्पत्तिपर जो प्राप्तत्ति की है वह घटादि गरूपस्थ नट-धानुप्रोमे तत्पयंंक माननेपर हो वन सकती है । यदि उससे भिन्न पहलिले रसप्तर ३१० धातु-महया थाने नट धातुसे नमनार्थंक मान लिया जाय तो इस प्रकारकी प्राप्तत्ति नहो उठ सकती है । सम्भव है प्रभिनवगुप्त उसी रसप्तर 'नट नतो' पाठ मानते हो दूवरो जगह नहो । इस दशामे उनको व्युत्पत्तिमे कोई दोप नहो होगा । प्रभिनवगुप्त केबल नमनार्थंक धातुसे हो नहो प्राप्तितु [प्र० ४१३, मध्याय १=] नतं- नाययं धातुसे भी नाटक शद्बदकी मिद्धि कर है । नाटक नाम तच्च्चेष्टित प्रह्हीभावदायक भर्वाति तथा हृदयामुप्रवेशकरोशलासया हृदय 'तरीत च नतंम्पत्ति' नाटकम् ये दोनों प्रकारसे व्युत्पत्ति मभिनचगुप्त मो हैं । यद्यापि कशा ग्रादि भी भ्रोतारो हृदयस्थौ [ग्रानन्दातिरेकसे] नचाते हैं किञ्च ये उपाय ग्रादि चेष्टचर्येते हेतुभिर्मे हेतुभिर्योतेगे इतने ग्रानन्द दायक नहो होते हैं इसलिये उर्हे नाटक नहो कहते हैं । पोत नाटक प्रधान पुरुपार्थपें विपयमें राजा [प्रयाज्ञा पुऱप नामक] प्रोर उसके प्रिय नपुंसके प्राप्त्यादि वहुतोंको ध्युत्पन्न कराने वासा होता है इसलिये [जैसे भिन्न] देखने शुन्य [मिने पुने व्युत्पत्तिं] को सुपुष्टत्ति प्रदान कराने वाले प्रकारत श्रादि [प्रभेद-राद्योरेे पच प्रकारों भें] नाटक नरों [कहलाते] हैं ।

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अथ राजशब्दं व्याख्यातुं सामान्यान्नेतुः स्वरूपमाह— उद्भुतोदात्त-ललित-शान्ता धीरविचित्रपेशा: । वस्र्यौ: स्वभावाश्रयस्वारो नेतृभ्यां मध्यमोत्तमा: ॥६॥

'धीरोदात्त', 'धीरोल्लसित', 'धीरप्रशान्ता' इत्यवयवाः । एतद् नाम धीरोदात्तादिस्वभावो नेतृभ्यां यथा-तथा वा मन्तु । 'नेतृभाम्' इति बहुवचनात् प्रयेषामपि कश्चिद् धर्मिर्येकैकः स्वभावः, क्वचिदेव तु चतुर्वारः । 'मध्यमोत्तमा:' इति—यथापि स्वस्थाने सर्वेऽपि उत्तममध्यमाधमभेदेन त्रिधा, तथापि धीरोदात्तादय: स्वभावा उत्तम-मध्यमभेदेनैव वस्र्यौनीयात इति ॥ ६ ॥

इस ग्रन्थके निर्माता रामचन्द्र गुणचन्द्रने इस नाटकके लक्षण-भूत्रो रचनामें अपने कोशलमै बड़ा ग्रच्छा परिचय दिया है । अन्य ग्रंथोंमे जहाँ नाटकका लक्षण किया गया है वहाँ कहीं इलोेक इसकें लक्षणके रूपमें लिये गये हैं। स्वयं भरतमुनिने अपने ग्रन्थके आठ इलोकोंमें नाटकका लक्षण इस प्रकार किया गया है— प्रह्योत्पत्तिस्तु विप्रेयं प्रह्योत्पत्तिरिति स्मृता । राजपुत्रप्रवेशश्च तथैव दृश्याश्रयोपे सम् ॥९॥ नानाविभूतिरार्यस्य तं श्रद्धावालासादितं भयुगैरपिेच्छैव । अंकप्रवेश्याश्चाह्नं भवति हि तन्नाटकं नाम ॥९३॥ नृपतीनां यशश्चरितं नाना रस-भाव-चेष्टितं बहुधा । सुप्रदुःखोत्पत्तिकृतं भवति हि तन्नाटकं नाम ॥१५॥ श्र० ६=॥

विन्तु यहाँ ग्रन्थकारने केवल एक ही इलोकमें नाटकके लक्षणों सर्वांग-पूरां बना दिया है । यह उनके रचना-कोविदत्वा घोतक है । नायकके चरर भेद—

अथ राज शब्दं [पर्यायवाचक] को व्यारपया करानेकेलिये सामान्य रूपसे नायकोंके स्वरूपका यथेष्टं करते हैं—

[सूत्र ५]—नायक्रो धीर विलोपपद्ये युक्त उद्धत उदात्त, सलिल धीर प्रशान्त [प्रशान्तु उत्तम [दो स्त्रोंमें] हो वस्र्रौँ बनाने चाहिये [पाँचम नहीं] ॥ ५ ॥ धीरेत्यादि धीरोदात्त, धीरोल्लसित तथा धीरप्रशान्त [इन चार प्रकारके स्वभावयुक्ता नेतृभाम्] वसान करना चाहिये] । इस प्रकाररह [स्वभावोंका] वसान [चपित] करि [अपने नाटकमें] भरता है । [जगमें] नायकोंके जगन्में उत्पन्न स्वभाव पाए जाते हैं। 'नेतृभाम्' इस बहुवचन के निर्देशने यह प्रतोत होता है कि] प्रायः एक-एक स्वभाविनं एक-एक प्रकाररह हो स्वभाव [कारक-नाटक] में होता है । चारों स्वभाव तो ऋतुः [परस्पर] हो पाए जाने हैं । 'मध्यमोत्तमा:' इससे [वसमें श्रह सूचित होना है कि] प्रायः अपने-अपने स्वानपर सब हो [परस्पर] उत्तम, मध्यम घोर अधम भेदने होनो है । [इनमिरे घोरोदात्तपरत्वं भी ये तीन-

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अथ बहुवचनादिषु भेदं स्पष्टयति— [सूत्र ६]—देवता धीरोदात्ता। धीरोदात्तः सैन्येश-मन्त्रिष्यः। धीरोदात्ता वशिगृ-विप्रा:, राजानस्तु चतुर्विधा:॥७॥ स्वभाव स्वभावितेरभेदात् सामान्याधिकार वचनादेश।। राज्ञां चातुविच्य- भयानात् देवता धीरोदत्ता एवं, सैन्येश-मन्त्रिष्यो धीरोदात्ता एवं, वशिगण-विप्रा धीरोदात्ता एवं, वर्ष्मनोया इति स्वयोगव्यवस्थायनिवेशनावबन्धार्यते नाट्ययोगव्य- वच्छेदेन।

तीन भेद हो सकते हैं] फिर भी धीरोदत्त आदि [नायकके स्वभाव] उत्तम तथा मध्यम [केवल दो] भेदोंमें ही वरीयत्न करना चाहिए [प्रथात् उनके प्रथम हपको नाटकोंमें प्रस्तुत नहीं करना वाहिए]॥ ६ ॥ स्वभाव व्यवस्था— पिछली कारिकामें नायकके चार प्रकारके स्वभावोका वर्णन किया था। उसकी व्याख्यामें यह भी कहा या कि सामान्य रूपसे एक व्यक्तिमें एक ही प्रकारका स्वभाव पाया जाता है। किंतु कई-कही चारो प्रकारके स्वभाव भी एक्‌ व्यक्तिमें पाए जा सकते हैं। प्रथमतः इन चारों प्रकारके स्वभावोकी व्यवस्था ग्रथान्तु कितने लोगोमे किस प्रकारका स्वभाव पाया जाता है अथवा किसका किस प्रकारका स्वभाव नाट॰पदिमें चित्रित करना चाहिए इस बात को इस कारिकामें कहते हैं— [सूत्र ६]—देवता धीरोदत्त [स्वभाव] सेनापति तथा मन्त्रो धोरोदात्त [स्वभाव] वशिक् तथा विप्र घोरप्रशान्त [स्वभाव तथा] क्षत्रिय चारो प्रकारके [स्वभाववाले] हो सकते हैं॥ ७ ॥ इस वारिकामें धोरललितका कोई उल्लेख नहीं किया है। व्यक्तिभेदसे क्षत्रिय चारों स्वभावके हो सकते हैं। इस कथनसे क्षत्रियमें धोरललितत्व समावेश हो जाता है। श्रीकृष्ण प्रादि धोरललित-नायकके उदाहरण हैं। यहाँ जो देवतागणको धीरोदत्त, सेनापति धीर मन्त्रियोको धीरोदात्त, तथा विप्र तथा वशिक्को धीरप्रशान्त बतलाया है, उसका अभिप्राय स्वयोगव्यवस्थापन-मात्र है, न तु प्रयोग॰व्यवच्छेदकावेन नहीं। प्रथात् देवता आदि उक्त प्रकारका स्वभाव चित्रित करना चाहिए यही इस व्यवस्थाका अभिप्राय है। ऋ॰योमे इस प्रकारका स्वभाव नही हो सकता है, यह इसका ताल्लुक्में नही है। इस बातको विद्वज्जन अपने लिखते हैं— स्वभाव तथा स्वभाव्यात् दोनोका प्रभेद मानकर 'देवता धीरोदत्त:' आदि में स्वभाव परक 'धीरोद्यता' तथा स्वभावयात् 'देवत' दोनो पदोंका समान विमक्तित तथा समान यचनमें प्रयोग रूप] सामान्याधिरण्य-निवृत्ता किया गया है। राजा [प्रथात् क्षत्रियों] के चातुविच्यभेद हहे जानेसे देवता धोरोदत्त हो [हो सकते हैं], सेनापति तथा मन्त्रिो धोरोदात्त हो, धीर वशिक् तथा विप्र धोरप्रशान्त हो॑ यात होने चाहिए यह् बात स्वयोगव्यवस्थापकवेन हो निर्मित होती है नतु प्रयोग-व्यवच्छेदकावेन नहीं। मथुन बात ऐसी हो होनी चाहिए इस भावमे समुक्त होने वाला 'एव' शब्‌द निरर्थक्य-

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य. पुनः परशुरामस्यातिकृतस्वरस्यापनार्थी धीरोदात्ततत्त्वनिचयन्धः । म 'भापाप्रकृतिवेपाद्रे' कार्यते । कापि लङ्घनम् 'इति वपादातोऽविमृशः । श्यां च नियमो देवानां मत्यांपेक्षया न म्वापेक्षया ! शिरादीनामुदात्तानां, ब्रह्मादीनां शान्तानामपि च दर्श- नान् । 'राजान्' इति क्षत्रियजातिः । बहुवचनात् व्यक्तिभेदेन चतुः स्वभावो नाटकस्य नेताः, न पुनरेकस्या धयक्कः । एकत्र प्राधान्येन स्वभाववतुरस्मय वाक्यैरितरस्वभावयत्वादिति । प्रधाननायकस्य चाय नियमो गौणनेतृषु । तु स्वभावोत्तरमपि पूर्वस्व- भावत्यागेन निवेश्यते । ये तु नाटकस्य नेतारं धीरोदात्तमेव प्रतिजानते न ते मुनि- समयाद्यनागाहिन । नाटकेपु धीरतिलितादीनामपि नायकाना दर्शनात् । इदिसमय- वाह्याश्र ॥३५॥

प्रायंक माना जाता है । इसके प्रायः तीन प्रकारके प्रयोग माने जाते हैं । 'विशेष्य सम्वद्ध एकवार' । अन्ययोगव्यवच्छेदकः 'प्रर्यांत् विशेष्य पदसे जब 'एव' वा पद सम्बन्ध होता है तो वह अन्ययोगव्यवच्छेदक होना है । जैसे 'पापं एव धनुर्धरः' इसमें 'पापं' धनुर्धरको छोड़कर अन्य धनुर्धर नहीं हैं यह अन्ययोगव्यवच्छेद होता है । इसी प्रकार 'विशेष्य सगत एवकार अन्ययोगव्यवच्छेदक होता है जिसमें 'पापों धनुर्धर एव' पर्यन्त श्रजुन धनुर्धर हो है यहाँ 'एव' शब्द श्रजुननंमे धनुर्धरत्वनये अन्ययोग पर्याप्त प्रभवस्य सम्बन्धया सोतक है । इसी अन्ययोगव्यवच्छेदक एकवारको यहाँ प्रयोकारने 'स्वयोगव्यवच्छेदक' माना है । घोरोदत्त ग्रादि विशेषणोंके साथ सम्वद्ध एवकार अन्य- योगका व्यवच्छेदक नहीं ग्रपितु अन्ययोगव्यवच्छेदक अथवा स्वयोगव्यवच्छेदककमात्र है यह प्रयं- वाचक अभिप्राय है । तीसरा एकवार क्रियाके साथ सम्वद्ध होता है । 'क्रिया-सम्बद्ध एवकारो भवतत्ययोगव्यवच्छेदकः' क्रियाके साथ सम्वद्ध हाने वाला 'एवकार' भवतत्ययोगका व्यवच्छेदक होता है । जैसे 'नील कमल भवत्येव' इसमे 'भवति' क्रियाके साथ सम्वद्ध 'एवकार' कमलमें नीलत्वके निषय करने नील कमल भी हो सकता है । इस पर्यंकको योजित करना है । ग्रोर जो [विप्र] परशुरामके प्रतिकृतत्वसे सूचित करनेकेलिये घोरोदत्ततत्त्व1 वाक्यैन किया गया है वह 'नहीं कयंकर्ता [त्रिप्रेप प्रयोजनेन] भापा-प्रकृति घोर येप ग्रादि [विपयप नियमों] का उल्लघन भो किया जा सकता है' ह्मे प्रयवादके विधमान होनेसे प्रतिपादित नहीं है [प्रर्यांत् यहाँ प्रयवाद रूपसे ही परशुरामके ब्राह्मणता होते हुए भी घोरोदत्त-स्वभाववश वाक्यैन किया गया है यह सम्भवना चहिए] । देवनाम्रोमें यह [घोरोदत्त स्वभाववश] नियम अन्वप्यो- की दृष्टिसे है, भ्रपनो दृष्टो नहीं । यपि [देवनाम्रोमें भो] नित्य श्रादि घोरोदत्त तथा भत्याादि घोरग्रान्त [नायक] भी दिसलाई देते हैं । 'राजान्' पदसे [राजाके हो परतए न करने] क्षत्रियजाति मात्र [का ग्रहण करना चाहिए] । घोर [राजान पदमें] यतुवचन [के प्रयोेग] से व्यक्तिभेदे नाटकके नेता चारों प्रकारके स्वभाव याने हो सकते हैं, एक व्यक्तिमें [चारों प्रकारके स्वभाव] नहीं [हो सकते हैं यह वान मूनित नहो है] । यपि एक व्यक्तिमें हो चारों प्रकारके स्वभावोश्व यद्यपि एक व्यक्तिमें वयैन चरत सकना प्रससम्भव है । घोर यह नियम [प्रर्यांत् चारों प्रकारके स्वभाववश एक व्यक्तिमें वयैन नहीं दिया जा सक्ना है] नपन नायकके [विपयमें हो] है । घोर नायकोंमें तो पूर्वं-स्वभाववश घोरोदत्त प्रभ्य स्वभावका दर्शन भो किया जा सकता है ।

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धीरोरोद्रतातीनां यथोदेशमर्यमाह— [सूत्र ७]—धीरोरोद्रतमश्रएडो दर्पी दस्सी विकत्थनः । धीरोरोद्राच्चडतिगम्भीरों न्यायी सच्ची चमी स्थिरः ॥७॥ mृद्गारी धीरललितः कलासक्तः सुखी मृदुः । धीरशान्तोदनहड्कारः क्रपालुरविनयी नयी ॥८॥

अथ धीरोदात्तादीनां यथोदेशमर्यमाह— [सूत्र ७]—धीरोरोद्रतमश्रएडो दर्पी दस्सी विकत्थनः । धीरोरोद्राच्चडतिगम्भीरों न्यायी सच्ची चमी स्थिरः ॥७॥ मृद्गारी धीरललितः कलासक्तः सुखी मृदुः । धीरशान्तोदनहड्कारः क्रपालुरविनयी नयी ॥८॥ अकावतरवं धीरशब्दस्यार्थः सर्वत्र समान एव । चलतव्वदंस पुनरुद्दतातीनां शब्दानामर्थाः । चलोऽनवस्थितः । चएडो रौद्रः । दर्पी शौर्योदिसंपदः । दस्सः क्रूरप्रयोगः । विकत्थनः स्वप्रशंसी । अतिगम्भीरो दुरवबोधमध्ये सत्ववी शोक-क्रोध-यननिभवचनोयः । स्थिरो विमुख्यकारी । कलासक्तो गीतादिकत्परः । सुखी मन्त्रन्यसतराजचिन्ताभारत्वान्निरराधिः । मृदुरकराचारः । अनहड्कारः सर्वथाप्यनवलेपः । धीरोरोदात्तसत्व विनयाद्दैन्तान्तावलेपः, इति मेदः । विनयी गुरूजनाच्यमुल्लंधीति । उपलत्तयामात्रं चैवत् तेनोद्दतातीनां यथोचित्यमपरेऽपि धर्मान् वक्ष्या इति ॥८-९॥ है । जो नाटकके नायकको केवल धीरोदात्त हो मानते हैं वे भरतमुनिके सिद्धान्तको नहीं समभते हैं । और नाटकोंमें धीरललित आदि नायकोंको भी पाए जानेसे कवियोंके व्यवहारसे अप्रतीत प्रतोत होते हैं । अर्थांत् भरतमुनिके सिद्धांत तथा कवियोंके व्यवहार दोनोंके अनुसार नाटकोंमें चारों प्रकारके नायकोंको चित्रित किया जा सकता है । केवल धीरोदात्त ही नायक हो ऐसा कोई नियम नहीं है ॥८७॥ [सूत्र ७]धीरोद्रत [नायक] अत्यन्त गम्भीर, न्यायप्रिय, शोक-क्रोध श्रादिके यथो- भूत न होने वाला [सत्ववी], समाधोल मोर स्थिर [सोच-विचार कर कायं करने वाला होता है ] ॥८८॥ [सूत्र ७] धीरललित [नायक] भडारप्रिय, [गीत-वाघादि] कलाओंका प्रेमी [रसिकभसरकः] मदनोेक्ले रसपुष्टर निर्ज्जित हुये रहनेवाला [मुखो] क्रोध क्रोधेस्लु इवभावका [होता है] । और धीरप्रशान्त [नायक] सर्वथा महज्जुद्-रहित, दयालु, विनम्रतिस मोर नीतिका धवलम्भन करने वाला होता है ॥८९॥ [कारिकामें ग्राए हुए] 'धीर' शब्दका पर्यं प्रकारतरव [न पद्ज्ञानत] है । वह [धीरोदात्त प्रादि चारों म्रकारके नायकोंमें] सबमें समान हो है । और चलतव्व आदि उद्दात श्रादि नायोंके पयं हैं । 'चस' पर्यात् प्रतिस्पर्वित । 'चंड' पर्यात भयडूर । नोंपंडिके घमणडवा नाम 'दर्प' है । 'दस्स' का पर्य क्रूरप्रयोग [दल] है । पारमार्था करनेवाला 'विकत्थनः' [होता] है । 'अतिगम्भीर' पर्यात् जिसके मनकी बात सहज न समभी जा सके । 'सतव्वी' पर्यात शोक-क्रोध प्रादिके वशमें न होनेवाला ! 'स्थिर' पर्यात सोच-विचार कर कायं करनेवाला । कलासक्त पर्यात गीत [वाद्य] श्रादि [कलाम्रो] का प्रेमी । 'सुखी' पर्यात राजयचो चिन्ताका भार मस्त्रीको सोपकर निश्चित हो जानेवाला । 'मृदुः' पर्यात् क्रूर आचरण न ।

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मुख्यं प्रयोज्यमस्पृष्टं, उपेत्स्यं तच्चरुविंधम् ।।१०।।

मुख्य सर्वप्रधानत्वापितत्वात् प्रधानम् इष्टं सर्वोत्तर्पे अतिकवेरभिप्रेतं फलं यस्य । वृत्त चरितम् । श्रेष्ठं मुख्यवृत्तस्यातुभायितवादवयवः । प्रसिद्धात् परकीय-यत्नादोगते प्रसिद्धिकम् । इह तावत् न निसर्गतः कश्चिद्विच्छिन्नचरितं मुख्यमद्भुतं वा, किन्तु बहुध्र्वाप फलेऽपि कविर्येषु श्लाघ्यनतुल्यं*पंमभिप्रेतिं तत्रफलमिश्रम् । श्राने च यत् फलवद् वृत्त तदिह मुख्यम् । तदितरत् श्लाघ्यत्वाद्‌प्रासिद्धिकम् । रामप्रणयेच्छेपु हि सुप्रीतमैत्री-शरर्र्र्रागत-

करते याला । 'प्रतिहत्‌काम:' प्रयात्री सर्वथा प्रभिमान-शून्य । प्रीरोद्वात [नायक] तो [प्रभिमानयुक्त होनेपर भी] विनयके द्वारा अपने प्रभिमानको छिपा लेने वाला होता है यह [घोर प्रशान्ततसे उसका] भेद है । 'विनयो'ऽप्रयात्री गुरुत्व ग्रादि [को प्राप्तव्य पद मर्यादा] का उल्लघन न करने वाला । वे घर्मं केवल उपलक्षण मात्र है । इसलिये प्रोचित्यके मनुसार प्रीरोद्वात . चारितके दो भेद हैं—

नाटकमें व्रीएत् ग्राद्यान-वस्तु [जिसको महीँ प्रयत्नकरने 'वृत्त' तथा 'चरित' नाम्दोने निर्दिष्ट किया है दो प्रकारका होता है । एक मुख्य प्रोर दूसरा उपनन ग्रद्भुत । नाटकमे युक्त प्रयान करनी प्राप्ति जिसको होती है वह पान नाटकवा नायन म्या प्रधान पान्म होता है । उसश चरित मुख्य चरित कललाता है । प्रोर लेव मव चरित उसशो यवंम्र्रिद्धिके उप-मारक होते हैं इसलिए वे सब उसके ग्रद्भुत चरित माने जाते हैं । इसी वातका प्रतिपादन धनन्जय इस मरारिकाके विदरशाने निम्न प्रकार करते हैं—

[सूत्र ट]—[कविके द्वारा प्रभिप्रेत] प्रधान फल जिसको प्राप्त होता है उसश चरित [इष्टफल वृत्त] मुख्य [चरित कललाता है] । प्रोर [प्रनिवायँ रूपसे साक्षात् नहीं प्राप्तु 'प्रस्वचित्‌' पर्यात]—कहीं-कहीं [यत्रत् प्रसाद्धिक [वृत्त] पन्थ [प्रप्रधान चरित कललाता] है । [इन दोनो प्रकारके] चरितोंके भी उनशो प्राभिप्र्यविनाशने प्रति्विद्राकी होते चरित भेद होते हैं । उनके नाम इस श्रारिकाके निम्न प्रकार विश्लास्र्राए हैं] वह भी १ मुख्य, २ प्रयोज्य, ३ प्रभ्मूल सारे प्रधान्य [पर्यन्त सारे नाटकमे प्रादिसे लेकर प्रन्त सक निर्नर] व्यापक रहनेनो प्रधान [चरित हो] मुख्य [चरित कललाता] है । [उसश लकष्या पहाँ 'इष्टफलसम्‌' दिया गया है] । इसलिये इस नायनका प्रयय चाहने देते हैं । 'इष्ट' पर्थ्यांत् कमि जिसदेव फलको साक्षोस लदृष्ट

मुख्य चरितका म्रतुगामी होनेसे उत्तका प्रयपप [मुख—चरित कललाता] है । प्रस्न्न पर्यात्य म्रद्य [विपय] पतनाने प्राप्त होने यातु वृत्त प्रासद्धिक [चरित कललाता] है । इनमेश कोई भी चरित सद्भावात् मुख्य म्रथवा ग्रद्भुत—लव नहीं होना है । किचु ग्रनेय कवियोंसे कवि जिसको प्रस्तुतन उसशे [इष्टस्यान्ना] पाहुता है वह पन 'इष्ट' [पन होता] है ।

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विभीषरचणया-रावणवध-सोतापत्ययानयनादिपु सीताप्रत्यानयनस्यैव प्रासङ्गिकं कार्यनाप्रतिपादितम् । तत्सम्पादनाय तदितरेषु प्रयुक्त्ते । श्रुत एष सान्यप्यजानि । क्विरपि न स्वेच्छया फलरयोत्कर्प निबद्धघुमर्हति, किन्त्वोच्चतयेन । यस्य घोरोदातादे-र्यदेव फलमुच्यते तस्यैवोत्कर्षो निबन्धनीयः । प्रासङ्गिकस्यापि च मुख्यवृत्तप्रयत्नेनैव निष्पत्तिरविधेया । प्रयत्नान्तरे हि तदपि मुख्यं स्यात् । तापसवत्सराजे हि वत्सराजस्य मुख्याय कौशाम्बीराज्यताभाय प्रयत्नेनैव यौगन्धरायस्याल्यापारेऽपि प्रासङ्गिकं वासवदत्तासङ्गम-पतिपादनं तात्पर्येण ।

यह फल जिसका प्राप्त होता है वह ‘चरित‘ यहां मुख्य [‘चरित‘ कहलाता] है । उससे भिन्न मन्त्रों, शृङ्गारादि विभोपराको रक्षा, रावण-दय घोर सीताका लोटाना आदिमेंसे किसीको हो प्रधान बनाने उसे [सीता-प्रत्यानयन] के सम्पादनकेलिए ही प्रवृत्त होनेसे [सीता-प्रत्यानयन ही प्रधान फल है । ग्रन्थ प्रधान नहीं है] इसलिए ये प्रग [कहलाते] हैं । कवि भी अपनी इच्छासे [किसी विशेष] फलका उत्कर्षं वरण नहीं कर सकता है । किन्तु प्रोचितयके अनुषार [हो वह उत्कर्षंका वरण करता है] । जिस घोरोदात प्रादि [नायक के] लिए जो फल उचित हो उसका हो उत्कर्ष वरण करना चाहिए । प्रोर मुख्यवृत्तके लिए किए गए प्रयत्नके द्वारा हो प्रारसङ्गिक [वृत्त] की भी सिद्धि करनी चाहिए । उस [प्रासङ्गिक वृत्तकी सिद्धि] केलए पृथक प्रयत्न करनेपर तो वह भी मुख्य बन जावेगा । ‘तापस-वत्सराज‘ [नामक नाटक] मे वत्सराज [उदयन] के कौशाम्बीके राज्यकी प्राप्ति रूप मुख्य फलके लिए किए गए [वत्सराजके मत्री] यौगन्धरायके व्यापारसे हो वासवदत्ताका समागम श्रृङ्गार वत्सराजको प्राप्ति आदि रूप प्रासङ्गिक कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं ।

'क्चचित्' इति यत्नैव मुख्यो नेता फलसिद्धयै सन्नियोजितस्तत्रैव प्रासङ्गिकम् । न सर्वत्र । यथा भट्टश्रीभवभूतिचूडामणिरपि विरचितायां कोशालिकायां नाटिकायां कोशालिकाश्रितादिमपिकृत्य प्रवृत्तस्य वत्सराजस्य न प्रासङ्गिकम् । यथा वारमद्रुपज्ञे सत्य-हरिश्चन्द्र नाटके प्रतिज्ञादित्वांहं प्रति प्रवृत्तस्य हरिश्चन्द्रस्य । 'तच्चतुर्विधम्' इति तत्- सामान्पेन वृत्तम् ॥९०॥

इसी प्रकार सर्वत्र मुख्य फलकी प्राप्तिके लिए किए जाने वाले व्यापारसे हो प्रासङ्गिक कार्योंकी सिद्धि दिखलानी चाहिए । उसके लिए पृथक व्यापारकी प्रारवश्यकता नहीं होती चाहिए । अन्यथा वह ग्रन्थ न रहकर प्रधान बन जासगा] । [कारिकामें ग्राए हुए] ‘क्चचित्‘ इस पदसे [यह सूचित किया है कि] जहां मुख्य नायक [प्रपने] फलकी सिद्धिके लिए सहायकोंको चाहता है वहां हो प्रासङ्गिक [चरित] की श्रावश्यकता होती है । [वहांपर उसकार वरण करना चाहिए] तब जगह नहीं । जैसे श्री भवभूति चूडामणि भट्ट द्वारा विरचित 'कोशलिका' [नामक] नाटिकामें कोशालिका श्राश्रित न होने से [जसमें] वत्सराजका [कोई सहायक प्रावश्यकत न होने से जसमें] प्रारसङ्गिक [वृत्त] या चरित्र नहीं है ।

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अथ चातुर्विध्यमेन स्पष्टयति— [सूत्र ६]—नीरसानुचितं सूच्यं, प्रयोज्यं तद्द्विपर्ययः । उदयं तद्विनाभूतं, उपेक्ष्यं तु जुगुप्सितम्‌ ॥१९१॥

नीरसञ् श्रानुचितञ्च । श्रनुचितन्तु सरसत्वेनहीनं श्रालिङ्गन चुम्बनादि । तत् सूच्यं विप्रकृष्टादिभिञ्ज्ञाप्यम् । तथा नीरसश्रानुचितस्य विपर्ययेण सरसत्वचितं च प्रयुज्यते, वाचिकसात्विकाभिनयैरमुख्ये सामाजिकोऽद्भिर्यत प्रयोज्ययोरविनाभूतं देशान्तरमाप्तस्याद्‌ गमनादि उद्भाते श्रवय वितर्क्यते इति उद्दाम ! न नाम देशान्तरमाप्ति पादविक्षेपादिकं विना भवति । उपेक्ष्यते श्रीडादिदर्शनेत्सवाद्‌वचगत्यते इत्यूपेक्ष्यम्‌' । जुगुप्सनीयं भोजनस्नान-राग-प्रतियोधादि । यत् पुनर्मुत्ततररामचरिते सौताया, श्रात्मदुषणो नलचिलासे श्राएये दमन्त्यार्थ प्रयुक्तं तत् प्रस्तुततोपयोगिहेतु रक्षतवान्न च दुष्यम्‌ ॥१९१॥

पुसं करणेऽपि प्रवृत्त हरिद्वदृशा [कोई सहायक या प्रासङ्गिक वृत्त या चरित्र नहीं है । कारिकाके श्रनुरूप बनाए हुए ] 'तच्चतुर्विधप्रपञ्चम्‌' इस [पद] में 'तत्‌' [पदसे] सामान्ग्य रपते चरित पात्रि भेदोंसे चार प्रकारष हो सकता है यह बात परिकर द्वारा सुचित की गई है ॥१९०॥

चरितको चार प्रकार श्रवस्थाएँ या स्थितियाँ— प्रव्‌ [विद्वानों कारिकाके यतसाई हुईँ चरितको] चार प्रकारकी स्थितिको हो [इस कारिकाके] स्पष्टी करते हैं—

[प्रत्य ६]—[प्रस्तुत चरितमे जो मुख्य भाग] नीरस या श्रनुचित हो यह [विलसाने योग्य नहीं होता है । प्रवितु वितरङ्गभादिमें धन्योंकी उक्ति द्वारा] सूचित करने योग्य [होता] है । [प्रत उक्तो 'सूच्य' गृहत जाता है] उसके विपरीत [अर्थात् सरस और उचित भाग हो] 'प्रयोज्य' [प्रभिनय द्वारा दिखलाने योग्य होता] है । उसपर श्रविनाभूत [अर्थात् जिनके बिना 'सूच्य' तथा 'प्रयोज्य' भागका प्रभिनय ही न हो उसे यह भाग स्वयम्‌] 'उद्‌'थ् [अर्थात् प्रकटनीयर्य] होता है । घोर गृप्ता उपनयन करते वाला [जुगुप्सित भाग] 'उपेक्ष्यलीय' [होता] है । [अर्थात् उसका प्रभिनय नहों करना चाहिए] ॥१९२॥

नीरस श्रर्थात् जो मनोरञ्जक न हो । श्रनुचित पर्य्यन्त जो सरस होनेपर भी [विलसानेहे] प्रयोज्य हो जंसे प्रासङ्गिक, चुभवन पारद, यह 'सूच्य' पर्य्यन्त [प्रर्थात् चरपंने द्वारा योध्य होना] है । [पागे 'तद्द्विपर्यय' मा पदं कहते हैं—] उपम्न श्रर्थात् नीरस और ग्रोर प्रस्तुचित हप 'सूच्य' भागका विपरीत पर्य्यन्त सरस और उचित है यह प्रस्तुत किया जाता है श्रर्थात् वाचिक पारदि [चारों प्रकासे] प्रभिनयों द्वारा सामाजिर्यों में तस्मते प्रस्तुत-प्रज्ञा किया जाता है इसलिए 'प्रयोज्य' [महत्स्यात्] है ; उन 'सूच्य' तथा 'प्रयोज्य' भांगन उपपादन हो न हो उसे ] जैसे प्रय स्यानपर पड़नेके लिए [उपस्थितरायें] गमन श्रादिको ग्यय करना,

१. उपेक्ष्यते गीर्वाङिदर्शनेत्सवाद्‌वचगत्यते इत्यूपेक्ष्यम्‌ । २. तथो सूच्य प्रयोज्ययो श्रृङ्ग स्तनीय भोजन स्नानादिप्रचरणादि ।

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अथ ग्रन्थार्थापि वृत्तभेदान् दर्शयति--- प्रकाशों ज्ञाप्यमन्येपां स्वगतं स्वाहदि स्थितम् । परार्थं रहस्यारुद्यान्यस्मै तदपवारितम् ॥१२॥

धर्वात्न् फलप्राप्ति को जो सकता है इसलिए यह 'कथ्य' [कहलाता] है । श्रोताओं परोंसे चले बिना दूसरों स्वानपर नहीं पहुँचा जा सकता है। जो उपेक्षित किया जाता है श्रोताओं-जैसे होनेके कारण प्रनादित किया जाता है यह 'उपेक्ष्य' [कहलाता] है । भोजन-स्त्यान-दान ग्रोर मूत्र त्याग श्रादि [प्रसवसे] जुगुप्सित [कहलाते] हैं । किन्तु 'उत्तररामचरित' में रामकी गोदमें पड़ी हुई सीताका भोर हमारे बनाए हुए 'नलविलास' मे वनमें दमयन्तीके शपनका जो ग्रभिनय दिखलाया गया है यह प्रस्तुतमें उपयोगी होने श्रोर मनोरञ्जक होनेके कारण दोष नहीं है ॥१२॥ भावाभिनयसक्तके नाटकीय प्रकार— नाटकमै प्रोर लोकमें भी सारी बातें एक ही हृपमेंसे नहीं कही जातीं हैं । भिन्न भिन्न प्रवसरोंपर भिन्न भिन्न प्रकारकी शैलोका ग्रवलम्बन वार्तालापमें किया जाता है । कोई बात ऐसी होती है जो सबके सामने कही जाती है । कोई ऐसी होती है जिसे वक्ता दूसरोंने छिपा कर अपने तक हो सीमित रखना चाहता है । इन दोनों के लिए नाटकमे भिन्न-भिन्न शैलियो का ग्रवलम्बन किया जाता है । जो बात गोप्य नही है, वक्ता सबको उस बातको सुनाना चाहता है उसको नाट्यको परिभाषामें 'प्रकाशम्' शब्दसे कहा जाता है । ग्रोर जिसको वक्ता ग्रन्य सबसे छिपाकर केवल अपने तक हो सीमित रखना चाहता है इस प्रकारकी बातकेलए नाटकमे 'स्वगतम्' शब्दका प्रयोग किया जाता है । ये 'प्रकाशाम्' तथा 'स्वगतम्' शब्द नाटकमे भावाभिनयसक्तिकी विशेष प्रकारकी शैलोको सूचित करते हैं । 'स्वगतम्' रूपसे कही जाने वाली बात गोप्य होती है । परन्तु उसकी गोप्यता केवल ग्रभिनय करने वाले पात्रोंकी दृष्टिसे हो होती है । नाटकके देखने वाले सामाजिकोंकी दृष्टिसे नही । नाटकमे लिखते समय जिसको 'स्वगतम्' लिखा जाता है वह बात भी सामाजिकोंको सुनाई हो होती है । शनयया सामा-जिकता रसास्वाद गडबडा जायगा । इसलिए ग्रभिनय करते समय उस स्वगत भागको भी जोरसे बोला जाता है कि जिससे सामाजिकगण उसे स्पष्ट रूपसे सुन सकें । केवल मूल-मूत्रादिक द्वारा ऐसा ग्रभिनय किया जाता है कि मानो वक्ता ग्रपने मनमें हो कह रहा है । इसो प्रकार जो बात ग्रनेक पात्रोंसे छिपाकर किसी एक पात्र पर प्रकट होती है उसे ग्रन्य लोगोंकी श्रोर से मूल मोडकर उस एक श्रद्वितसे कहा जाता है । उसको 'अप-वारित' नामसे कहा गया है : इस 'ग्रपवारितम्' को भी सामाजिकगण सुनाना अवश्य ग्रभिप्रेत होता है : इसो बातको इस कारिकामें लिखते हैं— प्रवृत्त [की ग्रभिप्रायक्त] के ग्रन्य प्रकारोंको भी दिखलाते हैं— [सूत्र १०]—ग्रन्य सबको जतलाने योग्य [वृत्त या बात] को 'प्रकाशम्' ग्रोर केवल अपने हृदयमें स्थित [गोप्य बात] को 'स्वगतम्' [तोलोसे] कहर जाता है । [बहुतोंसे छिपाकर एक हो व्यक्ति पर प्रकट करनेकेलए प्रपनोंको ग्रोरसे] मूल मोडकर रहस्यका कथन करना 'तपवारितम्' कहा जाता है ॥१२॥

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[सू० ११]—त्रिप्रताकान्तरोडन्येन जन्यो यस्तज्ज्ञान्तिकम् । स्वकाशोकिः स्वयम्-प्रस्तुत-प्रत्युतरमाशङ्कम् ॥१३॥

जो बात गोत्र न होनेसे अपनेसे भिन्न प्रकृत सेओको भी वतलाने योग्य है उसको प्रकट किए जानेके कारण 'प्रकाशम्' कहते हैं । जोर जो [वात] अन्योन्ते किपाने योग्य होनेसे अपने मनमें हो रतलो होता है उसको 'स्वगतम्' कहलाते हैं । पारोको धुमादि जिनको सुनाना नहीं है उनको गोत्रे वुल मोकर किसी दूसरे रहस्यका कपन करना महसोते दिसपाए जानेके कारण 'अपवारितम्' इति 'अपवारितम्' इस शुप्तिसके अभुतात 'अपवारितम' महसूसार है । जिसको कहा जाय वह 'श्रालया' है । [यह कारिका में आए हुए 'श्रालयो' तात्पर्य भुप्रस्ति है । इसक अनुमार महसार तात्पय] कमंमें [प्रकटम् कहते] तिर्य होता है । इसलिए [कमंभूत प्रयान्त कहाँ जाने वरतार] वृत 'अपवारित' [महसूसार] है । इसको प्रकार पाने [जल्प आदि तत्त्वोंकी सुप्रस्ति] भो सभवनी वाविए ॥१३॥

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जल्प्यते इति जल्पो उत्तमेव । उभयेषांगुल्यादिकानामिकां करस्नप्तपाताकः ! सोडंवरमश्राव्यं प्रति वयवधानं यत्र । श्रनयेनेह सह जल्पो जनानामेकरयैच गोप्र्यत्वात् बहूनामन्तरं, श्राश्रव्यतया निकटं, 'जनान्तिकम्' ! इह यद् उत्तमेकरयैच गोप्र्यं बहूनामगोप्र्यं तज्जनान्तिकम्। तद्विपरीतमपचारितम् । प्रश्नशच प्रत्युत्तरं चेति समाहारः । श्रप्रात्रममू, रङ्गप्रविष्टद्वितीयपात्रप्राहृतम् । रङ्गप्रविष्टप्रथेपात्रे स्वयमार्महेतुच ग्रहेणा वच्यतां तद्विपर्यं पत्नप्रत्युत्ते रुप्यते वाक्तिः 'प्रकाशोक्ति'ः । उच्चते इति उक्तिः । प्रश्नोत्तरविचपयोद्र्यः । क्वचिच्छु स्वोत्तरार्थमनुभापयेच्छ्रायया परकीयः प्रश्नः, क्वचिच्छु स्वप्रश्नस्यानुभापयाच्छायया परकीयमुत्तरं इद्युभयर्माप श्राकाशोक्तिरिति ॥१२३॥

वह 'जनान्तिक' और बिना पात्रके स्वपहो प्रश्न तथा उत्तरका श्रध्यन 'प्रकाशोक्ति' [कहलाता] है ॥१२३॥ जो कहा जाता है वह 'जल्प' 'वृत' ही होता है । श्रनुमिकार डंगलीको भुकाकर और सव श्रगुलियां उठो हों ऐसा हाथ 'प्रतिपातक' [कहलाता] है । उसको वाधाव्य [प्रयान्तु जिस एक वयक्तिको वाते सुनाता प्रभोष्ट नही है उस एक [वयक्ति] के प्रति वयवधान जिसमें बढाया जाय । [वह जब 'विप्रतिपातकान्तर जल्प' होता] । ग्राभयके साथ [विशेष प्रकाशक] वार्तालाप'एकहीके प्रति गोप्य होने, और [बहुतोंके प्रति श्रगोप्य होनेसे] बहुतसे जनोके लिए श्राध्य होनेसे 'परन्तिक' [कहलाता] है । 'श्रप्रयं' 'प्रचारित' और 'जनान्तिक' का विशेष मेद दिखलाते हैं— इनमेसे जो बात एकही [वयक्ति] से चिपाना हो बहुतोंसे गोप्य न हो वह 'जनान्तिक' [कहलाता] है । उसके विपरीत [श्रर्थात् बहतोंसे गोप्य और एकपर हो प्रकाशनीय श्रथं] 'श्रपचारितम्' [कहा जाता] है । [कारिकामें बताए हुए 'प्रश्नप्रत्युत्तरम्' पदमें ] प्रश्न और प्रश्न उत्तर इन दोनोका समाहार है । 'श्रप्रात्रमम्' [पदका ] रङ्गमें प्रविट दूसरे पात्रसे रहित [यह माव है] । रङ्गमें प्रविट पात्रके द्वारा जब स्वय श्रपने-श्रापही प्रश्न और प्रत्युत्तर किया जाता है वह श्राकाशमें श्रर्थात् दूसरे पात्र न होनेसे श्रुपमें कथन होनेसे 'प्रकाशोक्ति' [कहलाती] है । जो कहा जाय वह [प्रश्न] 'उक्त' है । श्रप्रयात् प्रश्न और उत्तरको विशयभूत श्रथं [दोही पदसे श्रभिप्रेत हैं । इसके भी दो प्रकार होते हैं] कहीं स्वप उत्तर दंबके लिए श्रनुभावयाके द्वारा दूसरे का प्रश्न, श्रोर कहों श्रपने प्रश्नके [उत्तर रूपमें] श्रनुभावयांके द्वारा दूसरेका उत्तर [प्रकाशोक्तिके हपमें कहा जाता है] । ये दोनो हो प्रकाशोक्ति [कहलाते] हैं । [श्रनुभावयाश्रद्वारयाका श्रभिप्राय यह है कि उस परकीय प्रश्न या उत्तरको स्वप कहके सुनाता है श्रथयात् वहों प्रश्नाश्र क्रकादार्भावित हप होता है, श्रोर कहीं उत्तर भाग श्राकाशाद्भावित हप होता है । इस 'श्राकाशादाभावित' शब्द का प्रयोग भी नाटकों मे पाया जाता है । ] वारह तथा तरह सच्चयांकि इन दोनो कारिकाझ्रोंमें नाटकीय भावाभिव्यक्तिके पांच दोलीं दिखलाई है । इनमेंसे 'प्रकाशम्' तथा 'स्वगतम्' ये दोनो शब्द परस्पर सवद्ध श्रर्थ रखते है । जय 'स्वगतम्' हुपसे कहीपर कुछ बात कही जाती है तब उसके बाद फिर जहांपर गोपनीय बात समाप्त हो जाती है श्रौर वयक्तिको सबके सुनाने योग्य बात कहनी प्रारंभ करता है वहांपर 'प्रकाशम्' शब्दका प्रयोग किया जाता है । हर जगह 'प्रकाशम्' दान्दका प्रयोग

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का० १२, सू० ११ ] प्रथमो विच्छेकः [ ३४ नहीं होता है। क्योंकि नाटक का सारा भाग तो सर्वेश्राध्य श्योक्त 'प्रकाश्यम्' होता ही है। उसकेलिए हर जगह 'प्रकाश्यम्' लिखनेकी आवश्यक्ता नहीं होती । उस 'प्रकाश्यम्' के बीच जहाँ कुछ भाग ऐसा आ जाता है जिसे वक्ता स्वयं अपने तक ही सीमित रखना चाहता है उसके लिये 'स्वगतम्' शब्दका प्रयोग होता है। अर्थात् 'स्वगतम्' शब्दसे अपने मनमें कही जाने वाली 'स्वगत स्वहृदि स्थितम्' वातका ही ग्रहण होता है कि वह बोली इतने उच्च- स्वरसे जाती है कि नाटक देखने वाले सामाजिक उसे भी सुन सकें। जहाँ कोई ऐसी बात कहनी होती है जिसको उस समय सामाजिकको भी सुनाना प्रभोष्ट नहीं होता है वहाँ उस वातको 'स्वगतम्' पदसे न कहकर 'आत्मगतम्' लिख कर वाक्यमें कहलाया जाता है। 'स्व- गतम्' के रूपमें कही जाने वाली बात केवल अन्य पात्रोंसे गोपनीय होती है। सामाजिकको एक चार जब स्वगतम्' लिख दिया गया तथ वह 'स्वगतम्' के रूपमें कही जाने वाली बात जहाँपर समाप्त होती है उसके बाद 'प्रकाश्यम्' पदका निर्देश करमा आवश्यक होता है। इसलिये 'स्वगतम्' के समाप्त होनेके बाद 'प्रकाश्यम्' का उल्लेख नाट्यज्ञोंमे रूचत्र किया जाता है।

गोपनीय वातको प्रकट करनेके लिये 'स्वगतम्' द्वयम् । इसके प्रतिरित दो प्रकार और भी है। एक 'आत्मगतम्' और दूसरा 'जनान्तिकम्' । इनमेंसे जब एक व्यक्तिमें शिष्य कर मक्षित व्यक्तिपर वातको प्रकट करना प्रभोष्ट होता है तथ उम वातको 'जनान्तिकम्' नामसे कहा जाता है। 'जनान्तिकम्' शब्‍दका श्रथं हो यह वतलाता रहता है कि बहुतसे 'जनो' के 'ग्रान्तिक' समीप जो हो वह 'जनान्तिकम्' कहलाने योग्य है। इसलिये नाटकके लिए श्राश्रय होनेके वारसा उनके 'ग्रान्तिक' श्रथवा 'निकट' होनेसे 'जनान्तिक' नामसे कही जाती है। इसके विपरीत जो बात बहुतोंके द्वारा कर एक ही व्यक्तिपर प्रकट किये जाने योग्य हो उसको प्रकट करनेके लिए 'आत्मगारितम्' शाद्दका प्रयोग किया जाता है। यह शाद्द भी नाटकोंमें बहुत प्रयुक्त होता है।

इस प्रकार गोपनीय वातको प्रकट करनेके लिए (१)'स्वगतम्' (२)'आत्मगतिम्' और (३) 'जनान्तिकम्' इन तीन शब्दों ये प्रभिप्रायको स्पष्टतया निर्देश किया गया है। इन सभी पात्रोंके द्वारा प्रभिद्यक्त किए जाते वाले भाव सामाजिकोंके लिए श्राश्रय हो होने हैं। इस- लिये इनके द्वारा प्रभिन्यक्त किए जानेके लिए जाते है कि सामाजिक बिना किसी कठिनाईँके इन्हें सुन सकें। केवल प्रभिनयही मुख्यात्रोंके द्वारा अपनी गोपनीयताका प्रदर्शन किया जाता है। आगे कही जाने वाली दृश्यवा पूर्वँ कही जो बात सामाजिकों भी नही सुनानी हातीं है उसके लिए इनसे मिन (४) 'कथ्यो अपि नेष्यते' का उल्लेख चौथीं कोटिमें भी पाई जाती है। उमरा निर्देश यहाँ नहीं किया गया है। भाग १६वीं शताब्दी में इसके उल्लेख करणें मद्द 'एपनेव' वातोँद्वारा नाटकोंमें बहुत वन सायास विरत नग्में हो प्रयोग होतीं है। और नाटकमें एक वारसे परभिक इसक प्रयाग प्राप् नहीं पाया जाता है। (x) प्रकरणम् वाक्योँमे मुख्य प्रभिद्यक्ता वातीं है। जो सारे नाटकों में मादृत रक्खीं हैं।

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स्वल्पवृत्यै कर्तव्यगुणान्वितैः—स्वल्पपद्यं लघुगद्यं हिलष्टावान्तरवस्तुकम्‌ । सिन्धु-स्थैयेन्तु-कालादिवर्णनाधियविजंतम्‌ ॥१८४॥

[सूत्र १९]—स्वल्पपद्यं लघुगद्यं हिलष्टावान्तरवस्तुकम्‌ सिन्धु-स्थैयेन्तु-कालादिवर्णनाधियविजंतम्‌ ॥१८४॥ सुन्द्धु प्रसन्नार्थं प्रसिद्धशब्दं श्ल्पं परिमितं पद्यं यत्र। गद्ये न ह्रस्वः मध्यमात्रः सुवाचवोधो भवति। लघु ह्रस्वैः परिमितं च गद्यं यत्र। कर्कशं बहुस्मासं च गद्यं दुर्योग्रहत्वात्‌ सेदसमुपत्ययाति। हिलष्टावानि पारम्पर्येण प्रधानफलसम्वन्धानि स्वव्यान्तराणि प्रथयुतान्वरलाख्वरत्नोनि वस्तुनि यत्र। नाटके हि तदेवावान्तरं वृत्यायोज्यं यत्‌ पारम्पर्येण प्रधानफलसाध्यं यथा रसनावल्यानि प्लावगसम्पातः सारिकानुरागो$स्य कतककथय सम्भ्रमनिहेतुः। यथा वारमदुपहते नलाविलासे कापालिक-चिटकपरिणयुद्धराझोनुरागो$मूलस्य दमयन्तीप्रतिकृतिदर्शनस्य हेतुः। सिन्धुरन्तर्द्धि समुद्रो वा। सूर्येंदुभ्यां तदुदयास्तौ गृहीते ते। कालो वस्तान्तादि प्रभावादिरच । स्वादिस्वादान्‌ मृगैर-मध्युपान-जलक्रीडादि । सिन्ध्वादिक हि माध्यकर्हूशयान्नस्पृशं न वर्षेणीयम्‌। सफलमध्येषु द्वाभ्यां वा वृत्याभ्याम्‌ स्वाधिक्येन्तु रसमन्तरयतीति ॥१८४॥

नाटक-रचनाविषयक विशेष बातें— ग्रन्थी दो कारिकाग्रोंमें ग्रन्थकारोंने नाटककी रचनामें ध्यान रखने योग्य कुछ विशेष बातोंका उल्लेख निम्न प्रकार किया है— श्रथ वृत्तके [ग्रथोत्‌ नाटककी रचनाके अवश्यक] करने योग्य गुणोंको कहते हैं— [सूत्र १९]—सुन्दर श्लोर थोड़े पद्यों तथा सरल गद्यसे एवं परस्पर सम्बद्ध प्रवान्तर [क्या ग्रावि] वस्तुओंसे युक्त, समुद्र, नदी, शून्य-चन्द्र [के उदयास्त] ग्रोर [वस्तुतः या प्रभावादि] कालके श्रधिक वरोंसे रहित [ग्रथात्‌ स्वल्प वरोंसे युक्त नाटककी रचना करनी चाहिए यह बात नाट्य-रचनामें ग्रवश्य-कर्तव्य ग्रथात्‌ विशेष ध्यान देने योग्य है । १८४। सुन्दर प्रयात्‌ सरल श्लोर प्रसिद्ध शब्दों वाला, योडा ग्रथात्‌ परिमित पद्य जिसमें हो [यह स्वल्पपद्य का ग्रथ है हुमा] । यपयोकि गद्यके द्वारा कहा गया ग्रथ्य जल्दी समभमें ग्रा जाता है । 'तद्य' ग्रथात्‌ पद्योर्ह ग्रोर परिमित गद्य जिसमें हो [यह 'लघुगद्य' का ग्रर्थ है] । कर्कश ग्रोर ग्रधिक समासों वाला गद्य कठिनायक होता है हिलष्ट ग्रथात्‌ परम्परासे प्रधान फल से हो सम्बन्ध रखने वाली प्रवान्तर ग्रथवा समृद्ध है । सूर्यं ग्रोर इन्दु पदोंसे उनके उदय-ग्रस्तका प्रभाव होता है । ग्रादि शब्दसे पर्वत, मध्युपान, जलक्रीडा ग्रादि [का ग्रहण होता है] । केवल काव्यरचनाकी भूलों मिटाने के लिए सम्पूर्ण ग्रादिका श्रध्याह करना चाहिए । सार्थक होनेपर भी एक-दो वाक्यों

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एकाङ्गिरसमन्वितोऽपि मद्दुतान्तं रसोऽभिभि: । श्रृङ्गारद्भुतमलङ्कार-कथादैरङ्गलद्रसम् ॥ ११५॥

एको नायकश्चितयेनान्नयत्समो श्रृङ्गी प्रधानरसो यत्र । श्रृङ्ग्ये श्रृङ्गारसादपरे रसा श्रृङ्गा गौणाः यत्र । नाटकं हि सर्वेररसै:, केवलमेको श्रृङ्गी, तदपरे गौणाः । श्रृङ्गुत एव श्रृङ्गारने निवेद्येऽपि यत्र । यतः श्रृङ्गी रसः-रौद्रः-वीरः-शृङ्गारमुख्योऽङ्गत्रयोपेतश्चलन्वर्ति । करुणा-भयानक-वीभत्सैः तनिनिवृत्तिः । इति इयता कमेऽपि लोकेतररससम्भाव्यफलप्राप्तौ भवितव्यमन्ते श्रृङ्गुतेऽपि । यद्यपि च नाटकस्यासाधारण्येन तुलाभः फलतस्त्वेन यदि न कलङ्क्यते तदान्तरी क्रियाया: फलमात्रं 'किश्चित्कदाचित्प्रयेतिं कि तत्रोपायव्युत्पादनक्लेशोन । 'रसोऽभिभि:' रसाधिक्येन 'श्रृङ्गारद्भुतम्' अविनिद्रित्रम् न नाम रसस्परतथा कथाशरीरमनुत्तरयेत् ।

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श्रलङ्कार. श्लेपोपमादयः। कथा वृत्तम्। श्रङ्गानुपचेष्टादीनि, श्रङ्गभूत। रमादच, तैरगमन श्रङ्गरुतम् रसो यथ्र । त एव श्लेपोपमादयो विधेया ये रसनिष्पत्ति-प्रयत्नेनैव निष्पध्यन्ते । वृत्तान्ते श्रङ्गानि उपचेष्टादीनि च तथ। निबध्यन्ते यथा रसमन्तरयन्ति । श्रङ्गभूता रसाश्रय तथा नियोज्या यथा न नादृशं रसं तिरोदधत इति ॥१४॥

श्रलङ्कार श्लेप उपमादि है। कथा श्रर्थात् वृत्तान्त । श्रङ्गमें उपचेष्ट श्रादि श्रङ्गों तथा श्रङ्गभूत रसोंका प्रधान रसोंके द्वारा जिससे [प्रधान] रसका विच्छेद न हो । उन्हीं उपचेष्टादि श्रङ्गों श्रप्रधान रसों] के द्वारा जिसमे [प्रधान] रसकी तिरोभूति न कर सकें । तथा श्रङ्गभूत श्रप्रधान रसोंको इस ढंगसे रखना चाहिए कि वे प्रधान रसको तिरोभूत न कर सकें ॥१४॥

तत् कुर्यें श्रावयेद् येन न याति पुनरुक्तताम् ॥१६॥

'उक्त' पूर्वं, वद्यमाना पुरः प्रकाश्यमानानम्। प्रयोजनवशाद् भूयोरपि यद् वृत्तमुच्यते तत् पुनरुक्तताभ्याम्। पात्रस्य वचः कविः श्रावयेत् । तथा च हरते 'कयैवमेव' ॥१६॥

उदात्त रक्षकौ भावौः स्थापनीयौः पुरः पुरः॥१७॥

गोपुच्छकेशकल्पनपानि नाटचवस्तूनि कल्पयेत् । उदात्त तथा रक्षकौ भावौः स्थापनीयौः पुरः पुरः। गोपुच्छक्म्य च केशचिन् स्तोकमात्रयाचिन्, केचिद् मध्यावलयध्रयः, केचिद्-वलयापन्न । एवं प्रवनचस्तून्यपि । यथा रत्नावलयों प्रमोदोऽसचो मुखसन्धावेव निश्चितत । मुखोपसंहृप्नो वाङ्गादिवृत्तान्तश्च निवेदयारम्भे। रत्नावली प्राप्त्यो-

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दृश्यत्वं नाट्यरूपाः पदाथाः त्रिभिर्न ते इति । उदात्तता उत्तमप्रकृतियोग्याः । अनुदात्ता स्थावप ये रसकथा भावार्थे सकलतया|पि प्रधानधरयमारोढार्यं पुरः पुरों निवेशनीयाः इति॥४७॥

श्रयुक्कं च विरुद्धं च नायकस्य रसस्य च । वृत्तं यत् तत् परित्याज्यं प्रकल्प्यमध्यवडन्यथा ॥ १८ ॥ श्रयुक्कमनुचितं, विरुद्धं चिपरीतं । परित्याज्यमुपेक्ष्यसिपम् । धीरोललितस्य हनुचितं परस्त्रोसम्भोगादि, विरुद्धं धोeroद्धतस्यादि । शृङ्गारस्य प्रत्यक्षमालिङ्गन-शयनादि श्रनुचितं, वीरभ्रशस्तु विरुद्धः । यथायथं यथोचितेन विरोधेन वा । यथा नलविलासे धोrerललितस्य नायकस्य दोषं विना मधर्मचारित्रोपतियोगोऽनुचित इति कापालिकप्रयोगेसा निवेश्य । एवमन्यत्राप्यन्यन्यसम्भर्मिति ॥ ४८ ॥ यादृशस्य प्रादुर्भावो वृत्तान्त निर्बन्ध-सङ्कल्पे प्रारब्धमे [समाप्त हो गया है] मोर रत्नावली प्रारब्धे श्रादि सारभूत पदाथों वृत्तमे [समाप्त हुए हैं] । उदात्त [भाव] मर्यात् उत्तम प्रकृतिके योग्य [भाव मुख्यरूपमे प्रस्तुत करने चाहिए] प्रोर पतुदात्त होनेपर भी जो रक्षक भाव हैं वे भी सारे नाटकके रसके प्रतिरोहण [पोपण] मेलिए प्राणो प्रागे [प्रथान रूपसे] रखने चाहिए ॥४७॥ इसी भावको श्रभिप्रेत करने केलए प्रनिमवं नो पुनरीक्तिव वचोभि तिए प्रयुक्त मिए जानेवाले भावाश्रयदर्शकनने माघवने रूपमे प्रस्तुत किया है । जिसको गोचव वातको श्रभिप्रयत्न वरनेकेलि भी इस मागका प्रवालम्बन किया जाता है । नाटकमे परित्याज्य— विद्यावी कारिकाप्रोमे नाटककी रचनाम्रं प्रहण करने योग्य विनेय वातोकी मोर ध्यान दिलाया गया या । म्रत्र वृद कारिकार्मे नाटकमे परित्याग वरने योग्य वातोका उल्लेख करते हुए प्रधनार दिग्वते हैं—

ग्रन्थ [नाटकमे] न रसने योग्य [वातोको] कहते हैं— [सूत्र १४] जो [वात] नायथके म्रप्रवा [प्रकृत] रसके लिए श्रनुचित म्रथवा विपरीत हो उसको परित्याग मर देना चाहिए [नाटकमे प्रस्तुत नहीँ मरना चहिए] म्रप्रवा ग्रन्य प्रकारसे उसको कल्पना कर लेना चाहिए [प्रयत्नत् उसको बदल देना चहिए] । श्रयुक्क प्रयात्तं श्रनुचितं ग्रोर विरुद्धं श्रथ्यात् विपरीतं [ग्रयुक्को] परित्याज्य श्रथवात् उपेक्षा करने योग्य [समभना चहिए] । जैसे धीरोदात्त [नायक] केलए परस्त्रीके सय सम्भोग घरना श्रनुचित है [इसलए परित्याज्य है] । म्रोर धीरोद्धतत्वादि विरुद्ध है । [इसलिए परित्याज्य है] । [इसलिए धोरललित नायकके यथानुमे उसमे धीरोद्धतत्वके गुणा स्वभाव श्रादिक चिप्राप्त नहीँ करना चाहिए । म्रागे रसकेलए श्रनुचित तथा विरुद्धत्वादि उदाहरण देते हैं] प्रत्यक्ष दिललाया दृश्य म्रालिङ्गनानुचुम्बन श्रादि शृङ्गाररसके श्रनुचित है तथा वीरभ्रशान्त शृङ्गाररसवदे] विरुद्ध है । ग्रन्थ प्रयकारसे [कल्पना कर लेना चाहिए जिससे वहँ विरोषो न रहे इस प्रकारसे [कल्पना करले] । जैसे नलविलासोने धोरललित नायककेलए विना दोपके सदृधर्मारित्रोपतियोग श्रनुचित है इसलए कापालिकके प्रयोगके कारसा [नलने दमयतीका परित्याग किया हु] । इस हि रूपम [ग्रन्था कल्पना करके] प्रयोगके कारसा [नलने कापालिकत्व प्राप्त किया गया है । इसी प्रकार ग्रन्य [स्थलोपर भी] समभ लेना चहिए ।

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प्रवस्थाया: समापितोर्हेदो वा कार्ययोगत: । यद्यद्: सर्विन्दुर्द्रेश्यार्थ: चतुर्थीं मो मुहुर्त्तवत् ।। १६ ।।

दुष्यन्ततलाके द्वारा दुष्यन्तलालां विस्मृति और प्रत्यास्यान भी इसौ प्रकारकौ घटनाएँ हैं जिनको कविने नाटकके चरितको समकौ दिया है । महाभारतमैं जहाँतक कि शकुन्तलाकौ प्रत्याख्यान लिया गया है—दुष्यन्त एक अत्यन्त लम्पट प्रकृतिका राजा है । जो मधुकरकै समान नऐ—नऐ पुष्पोकौ रसास्वादन वरनेकौ व्यसनी है । इसी प्रसङ्गमे उसने वण्मुनिके माध्यममे उनकै मनुपस्थितिमै पहुंचकर सव कुछ किया और घोर उसको अपने महलमै बुलानेवा वचन देकरभी भूल गया । पर कालिदास ने इसको दुष्यन्तकौ स्वाभाविक ब्यापार न मानकर दुर्वासाके शापको उसका कारण माना है । कालिदासने अपनी इस प्रक्रियाद्वारा इसकै कारण रूपमै दुर्वासाकै शापों वलप्तना करके दुष्यन्तको न केवल लम्पटताकै छत दोपसे हो वचा लिया है चल्कि शकुन्तलाकौ प्रत्याख्यान करवाकर उसे उच्चकोटिके आदर्शोचरितके रूपमै चित्रितकर उसको घोरोदात्त नायककौ रूप प्रदान कर दिया है ।। १६ ।।

श्रद्धुलद्गय— पाँचवौ कारिकामैं 'व्याताद्यराजचरित' आदिसे नाटककौ लक्शए किया गया था । उशीकौ विशेष ब्याख्या आगे चल रही है । इसमेसे केवल 'व्याताद्यराजचरित' इस प्रथम पदकौ हो विस्तृत विवेचना १५ वौ कारिकातक को गई है । उस नाटक-लक्शएमै दूसर पद 'धमंकामार्थंसत्फलम्' यह है । परन्तु यह पद बहुत सरल है इसलिए इसकौ अलमसे विशेष ब्याख्या न करके, अग्रले 'साङ्ख्योपायदर्शनिघ' इत्यादिकौ विशेष ब्याख्या आगे प्रारम्भ करते है । इसमै सवसे पहला 'प्रदृ' पद है इसलिए इस कारिकामै 'प्रदृ' का लक्शए करते हैं । 'धमंकामार्थंसत्फलम्' यह सरल [पद] है इसलिए उसको छोड्कर अग्रले साङ्ख्योपायदर्शनिघ इस [अग्रले पदौ] मे [प्रथम] 'प्रदृ' पदकौ लक्शए करते हैं—

[सूत्र १६]—[कार्यंको प्रारम्भ प्रादि रूप] प्रवस्थाकौ समापित् ग्रथवा कार्यंवधा प्रसमाप्त प्रवस्थाका भो विच्छेद [जो अग्रले प्रदृकौ कथाके बीज प्रयवा] विना तुस मुक्त ग्रोर [वो घड़े प्रथान्त यत् मिलदके] 'मुहुर्त्त' से लेकर चार प्रहरु [बारह घण्टे] तकके दशांवीप काथसे मुक्त हो वह 'श्रद्ध' कहलाता है [यह श्रद्धकौ लक्शए हुमा] । १६ ।

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व । तदशादिसरसथाया भ्रान्तराले यशस्करः क्रियते सोऽप्यचक् इत्यर्थे । ऐतावद्क-लक्षणम् । सर्विन्दुरिति सह विन्दुना वर्णते । विन्चिन्तनविरहुतार्थिय उत्तराद्दुरयान्तुसन्धानारमा वृत्तसन्दे प उत्तरत्र विरतायेमार्गत्वादुदके तैला विन्दुरिच 'विन्दु' । पूर्वोत्तरयोगरड्योरसमभद्वार्थत्वं मा भूदिति पूर्वाद्दिश्यास्ते विन्दुनिवन्धनীয় ।

एक दिनमें न हो सकने वाले दूर-दूरागमन श्रादि श्रादवा बहुत लम्बा होने के कारण एक दिनमें जिसक प्राभनप किया जाना सम्भव न हो [उसका प्रभाव होता है] । उसके कारए जो प्रवास्याका थोड़ेमें हो विद्देषेद कर दिया जाता है यह भी 'ग्रड्ड' [श्र नियासक] है यह श्राभप्राप्त है । इतनाही नहूए तक कहा है । [कारिकाके] 'सर्विन्दु' [कथ्यते] विन्दुते मुक्तः [पूर्व ग्रड्डमें] विच्चिन्तन विस्तृत श्रर्थ-वा श्रगले श्रड्डकमें सम्भवन दिखलानेवाला कयाकथ सूक्ष्म भाग, श्रागे विस्तार पानेके कारए तैलविन्दुके समान 'विन्दु' [महलाता] है । श्रागे-पीछे वाले ग्रड्डक परस्पर श्रसम्बद्ध न हो जाये इसलिए पूर्व ग्रड्डके श्रन्तमें 'विन्दु' की रचना करनी चाहिए ।

ग्रागेके ग्रड्डकके विपयक सदेशमें प्रतिपादक होनेसे इसको 'विन्दु के उदाहररत् रूपमें यहाँ प्रस्तुत किया गया है । 'विन्दु' पदका प्रयोग यहाँ 'तैल विन्दु' के साथसे किया जा रहा है। तैलनु छोटामा विन्दु जसैमे पानीम पडनेपर वड श्राकार में फँलतां जाता है इसी प्रकार वृक्षकी द्वायाको ग्रारम्भमें श्रप्रत्यक्ष मान करवे पतिसे स्ंख्वर दूर चली जाती है है प्रयोंद माननेके थोेडकंर पलितके पास ग्रातो है इसी प्रकार ऊपर उठने हुए मूँपका सँताप वृक्षकी द्वायाको मलय त छोेटा बना देता है । प्रोर ग्रनतम जव नायिका सर्वाङ्गीना नायवस्री चरवार्तिनी होकर उसको गोदमै श्रा जाती है तब नायक उसकां जैसे प्रतिज्ञ्न पासमे बाँध लेता है हसौ प्रकार मच्याह्नमें वृक्ष प्रियाके समान श्रपने ही भीतर समर्पितत छायाको स्रर्-समन ग्रपनां लेता है । यह इस इलोकका भाव है । इस प्रकार इस इलोकमं कविने वृक्ष ग्रोर छायाके व्यवहारपर नायक नायिकाके व्यवहारका श्रारोप कर जिस व्यवहारको सूचित किया है उसी प्रकारका व्यवहार नाटकके चतुर्थ ग्रड्डमं नायक-नायिकाना पाया जाता है । इसलिए

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यथा तापसरसराजे- ग्रादी मनपरिमहद्रेपा गुरुपा दूरं समारोपितां परचात् तपमरेऽप तानवकृता नीतां परं लाघवम् । उत्तज्नैः तरवर्तिनो मनुगमान् सम्प्रेषितसाद्र्वोमिमां सर्वज्ञ प्रसयं प्रियामिव तरहद्रायां समालम्यते ॥"

इति ऋतुसंहारमालती उतरार्धकथायोनुसंधायको विन्धुः । यथा वा नलविलासमे चतुर्थे स्वयम्वराजे नेपथ्ये वन्दी- विनःसद्याभिनवोदये त्रियमये राक्षि प्रतापोज्जितो दू तस्य ठ्यमनोज्ञ वृसरकरः सन्त्रुपदाशारस्थितः । निद्रायहललोचनां कमलिनीं सन्त्रयज मध्येवेनं कामथयच्वरसङडमात्रविभवो देशान्तरं गोपतिः ।इति॥ जैसे तपस पतसराज चरितमे- प्रथम्भमें [द्यावा-पक्षमे] प्रातःकल ग्रोर नलपिका-पक्षमे मानके प्रदानमे] प्रवल मान [परिमाण प्रोर नलकों] को प्रहणप घरवं दूर तक फँली हुई [द्यावा पक्षमें दूर तक फँली हुई] ग्रोर नलपिका पक्षमे नोचकेस दूर भोगी हुई], वोधिका [नलुतिकाके प्रदानो कराने वाले] सुताप ग्राप्त हुई, इसलिए [अनुगताम् प्रर्थ्यात्] लोटकर ग्रपढ़ोंको समेटकर गोदमे समाई प्रिपाइं समान छायाको वृक्ष सव वृक्षोंसे प्रेम पृथक् प्रहणप कर रहा है । यहाँ तृतीयादि ग्राद्यमालती उतरार्धकथायोनुसंधायको 'विन्धुः' रखा गया है ।

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ददृ च पदसुपयोगावेशम् । तेन सर्वेऽपकपयंततद्रेपु, पकादृपे च रूपेपु, समवकारादृपु च उपयोगाभावाद् विन्दोरनिद्रधः ।

छोड़कर केवल प्राकृतका अशेष [प्रर्याप्त पश्चिम भाग] हो जिसमें विभक्त रह गया है [नल पक्षमें 'प्रभवर-लणडमाधवविभव' , जिसके पास केवल एक वधू मात्र हो सम्पत्ति देव है] इस प्रकारका 'गोपति' [प्रर्याप्त सूर्यं ग्रोर दूसरे पक्षमें राजा नल] देशान्तरको [प्रर्याप्त सूर्यं पक्षमें पाताल लोकको ग्रोर नल पक्षमें प्रथ्न्य स्थनाको] जा रहा है । यह रलोकका साधारराए ग्रपन्य है । इसमे वंतालिक सन्ज्ञाकालीन सूर्यास्तके दृश्यका अत्यन्त कर रहा है । पर उनमें ग्रगले ग्रदृश्यमें दिखाई जाने वाली सम्पूर्ण घटनाऐं बीज-रूप से वड़ा सुन्दर चित्राए किया गया है । यह चतुर्यं ग्रदृश्य स्वयंमबरादृश है । इसमे नलका दमयन्तीके साथ विवाहका दृश्य दिसलाया गया है । प्रगले पदृश्यमें नलकी द्युतक्रोडा प्राद्रिका वर्यांन है । नल द्युतक्रोडामें राज-पाट सब कुछ हारकर वनमें चले जाते हैं । दमयन्ती भी उनके साथ जाती है । राजा नल वधूके भूखसे व्याकुल होकर ग्रपनो सिथितिसे विल्कुल निराश हो जाते हैं । प्रोर ग्रन्नमें वनमें जब दमयन्ती सो जाती है तो उसको छोड़कर महो प्रोर भाग जाते है । इस सब घटनाऋमको ग्रगालि ग्रदृश्यमें दिसलाया गया है । किन्तु यहा कवि ने वंतालिकके द्वारा किए जाने वाले चतुर्यं ग्रादि ग्रनितम इलोकमें उस सारे घटनाऋमको इलेष द्वारा वड़े सुन्दर रूपमें वयक्त कर दिया है !

नल चुएं हरकर नवकेत सम्पत्ति प्राप्त करने वाले विजयी राजाको प्रदानो सम्पत्ति प्रदान कर ग्रोर स्वयं प्रताप-रहित होकर दूतथ्यसानीके समान मलिन ह्राथ ग्रोर सम्पूर्ण ग्राताम्रोंका परित्याग कर ग्रत्यन्त निराश होकर केवल एक कपड़ेसे दुबका हो जिनका वेभव देव रहा गया है इस प्रकारके गोपति प्रयातो पृथिवीपाल वनकर 'निद्रापरशलोचना' कमलिनीके समान दमयन्तीको वनमें ग्रोथैला सोता हुमा छोड़कर किसी ग्रन्य देशाको चले जाते हैं यह ग्रथ्यें भी इलेष द्वारा इस इलोकसे सूचित किया गया है । इस प्रकार सक्षेपमें ग्रगले ग्रदृश्यकी कथाका सुत्चक होनेसे यह ग्रदृश्यें ग्रन्नमें पढा हुमा यह इलोक 'बिन्दु' था सुन्दर उदाहरण वन पडा है ।

इस प्रकार 'बिन्दु' पदके, वधूके ग्रन्नमें ग्रगले ग्रहृदृश्यमें ग्राने वाली कथाके सम्बन्ध सूचित करनेकेलिए 'बिन्दु' की रचना ग्रावश्यक बतलाई गई है । जिस प्रकार पानीमें पढा हुमा तेलका विन्दु फेलकर विस्तृत हो जाता है इसी प्रकार ग्रदृश्यांतमें 'विन्दु' रूपसे जिस कथा-भागको सकेत किया जाता है वह कथा भाग ग्रगले ग्रदृश्य में विस्तृत होकर फेल जाता है । इसीलिए ग्रदृश्यांतमें किए जाने वाले इस सक्षिप्त सन्केतकेलिए यहाँ 'विन्दु' शब्दशा प्रयोग किया गया है । यह विन्दु प्रत्येक ग्रदृश्यके ग्रन्नमें ग्रवश्य हो यह ग्रावश्यक नहो है ग्रपितु उपयोगकी ग्रपेक्षासे हो उसकी रचना की जाती है । जहाँ उसका उपयोग नहो हो सकता है वहाँ उसकी रचना ग्रावश्यक नहो है । जैसे नाटक ग्रादिके ग्रनितम ग्रदृश्योमें विन्दुका कोई उपयग नहो हो सकता है वयोकि उसके ग्रगे तो फिर कोई नया ग्रदृश्य ग्रन्थ हो नहो है जिसमे उसका विस्तार हो सके । इसलिए ग्रनितम ग्रदृश्यमें 'विन्दु ना सन्निवेशो नहो किया जाता है । इसी प्रकार एकाकी नाटकामो ग्रोर दूसरे काव्य ग्रन्थोमें 'विन्दु' का कोई उपयग नहो होता है । इस वासते ग्रगे लिखते है -

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'दश्यार्थ.' इति हश्यां, रञ्जकत्वाद् दर्शनीयां, स्वथो नायकचरितोपभोग्य यत्र । चरितासात्कात्कारे हि प्रेक्षकाः। मङ्युत्पत्ति । सम्भोगासात्कारे च किमनेन महाक्लेशेन ति वैरसयं स्यात्‌। शापावसानविच्छित्ताद्योदपि रञ्जकत्वात् सादात्कार्याः । यथा उद्वेग्यः शापोद्ववस्य जताभावस्य नाशः । हश्याविनाभाविनो सूच्यो-उद्भट-प्रयथोः कवचिद् भवत । एतद्‌दश्रय स्वरूपम् ।

यह [वृत्तु] पद उपयुक्त होने हो रचा गया है । इसलिये शार्दूलविक्रीडिते वृत्तोंमे एकादश रपकोंमें शोर समासकार प्राधिके भद्रोंमें उपयोग न होनेसे 'वृत्तु' को रचना नहीं की जाती है ।

भद्रके लक्षणमें 'सविन्दु' के बाद प्रगला 'दश्यार्थ.' पद है । इसलिये प्रगले अनुवृत्तेऽपि जिसका व्याख्या करते हुए लिखते हैं—

'दश्यायं' इससते [यह अभिप्राय है कि] हश्य प्रर्थात् मनोरञ्जक होनेसे देखने योग्य नायकके चरित शोर उपभोग जिसमें हों [यह 'दश्यार्थ:' हुदा । इसमें चरित शोर उपभोग दोनोंका साक्षात्कार ध्वावयक है । यथोक्त] चरितका सासात्कार न होनेपर देखने-वालोंको [रमादिर्वस् प्रख्यातंति्यं न रावणादिवत् इस प्रकारकी] शिक्षा प्राप्त नहीं हो सकती है । शोर सुन्दर भोगका साक्षात्कार न होनेपर [नायकके द्वारा उठाए गए] इस महान् फलनेवाले पथ्य लाभ हुब्रा ऐसा ग्रनुभव होनेसे [नाटक] शोरस हो जायगा । शावकी निवृत्ति शोर विवाह प्रादि भो रञ्जक होनेसे [प्रेक्षके श्रोतर] साक्षात् विश्रान्तने चाहिए । [प्रर्थात् दिललाना निपिद्ध नहीं है] । जैसे [विक्रमोर्वशीयमें] उवंशोके शापवशा प्राप्त हुये सतत-भावको निवृत्ति [दिललाई गई] है । हश्यके प्राधिनाभूत होनेसे 'सूच्य' प्रोर 'उद्भट' प्रयथों भो कहाँ [प्रयुक्त] हो सकते हैं । यह सूदका स्वरूप है ।

यहाँपर ग्रन्थकारने 'एतद्‌दश्रय स्वरूपम्‌' कहा है । इसके पूर्वं ३६ पृष्ठ पर एतादृश्लक्षणाम् यह लिख चुके हैं । प्रर्थात् भद्रके लक्षणकी व्याख्या करते हुए एक जगह 'एतादृश्लक्षणाम' शोर दूसरी जगह 'एतद्‌दश्रयस्वरूपम्‌' यह लिखा है । इस दो प्रकारके ललक्षणा दो प्रकारके माने गए है, एक तटस्थ-लक्षणा प्रोर दूसरा स्वरूप-लक्षरा । जो स्वरूपके ऋजुतागंत न होकर यौ व्यञ्यसे बोध कराने चाला हो उसका 'तटस्थ-लक्षरा' कहते हैं । शोर जो स्वरूपको ऋजुतागंत होकर ग्रभिप्रये व्याप्ति कराक्षा है वह 'स्वरूप-लक्षरा' कहलाता है । जैसे 'जन्मायस्य यत्‌' जिससे जगत्का जन्मादि म्रर्थाद् उत्पत्ति, स्थिति प्रोर प्रलय होता है वह ब्रह्म या ईश्वर है । इसमें जगत्का जन्मादि ईश्वर म्रथवा ब्रह्मके स्वरूपके ग्रनतगंत न होनेपर भी ब्यावतं होनेसे 'तटस्थ-लक्षरा' कहलाता है । शोर 'सच्चिदानन्द ब्रह्म' मादि ब्रह्मके 'स्वरूप लक्षण' होते हैं । इसौ प्रकार यहाँ 'प्रवसथमा: समाप्तिन्त्यो द्वे दो वा वाः प्रयोक्तव्यत:' यह श्रद्रका 'स्वरूप' म्रर्थात् 'तटस्थ लक्षण' है शोर 'सविन्दु दश्यार्थ.' यह प्रद्रका स्वरूप श्रथांत् स्वरूप-लक्षणा है । इस अभिप्राये ये दोनों पद लिखे गए हैं ।

इस प्रकार 'प्रद्र' के, लक्षण तथा हश्यका प्रतिपादन करनेके बाद प्रगले चरणमें प्रकार 'प्रक' के काल-परिमार्या। निदशा करते हैं । इसमें एक मुहूर्त म्रर्थात् दो घड़ी [४८ मिनट] से लेवर चार पहर [१२ घण्टा] तक भमवा काल-परिमारा बतलाया है । प्रर्थात् एक नाटक विस्तार उतना हो होना चाहिए जिसका मभिनय इस समयके भीतर

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चतुर्योमो मुहूर्तंतः' इति मुहूर्तोदाहरण यामचतुष्टय यावत्तः । सर्वोपकर्पेषु परिपूर्षंतवेग, यामचतुष्टयादिक्ये द्वावश्यकर्मविरोधेन च प्रेक्षक प्रयोजनस्याप वैरसयं स्यात् । पतदद्वारेणापक्रष्यमध्यमोत्तमकुष्ट कालमानमिति ।

समाप्त हो सके । इसी बातको आगे कहते हैं— 'चतुर्योमो मुहूर्तंत' 'प्रथमतः' 'मुहूर्तंत' से लेकर चार पहर [जिसका प्रभिनय हो] । पर्याप्त कमसे कम [मुहूर्त भर] दो घड़ी [४८ मिनट] मे प्रभिनय करने योग्य । घोर प्राधिकसे-अधिक [चार प्रहर] तेईस घड़ी [बारह घण्टे] मे प्रभिनय करने योग्य । मुहूर्तत्से भी कम [प्रयोगसमय] यवसू ग्रभदि] प्रावश्यक काव्योंमे विछन पड़नेसे देखने वालों और प्रभिनय करने वालों [दोनो] के लिए हो भयानक हो जायेगा । यह [कालकी दृष्टिसे] ग्रदृकका कमसे कम, मध्यम और सबसे प्रधिक काल परिमाण चाहा है ।

अ्रमुना दृश्यमप्रदायातेनाङ्कुलच्क्षएते सङ्घयमाश्रनोच्य दृश्यसख्यापरिमाण-मुपवर्णयति । ये तु दृश्यमप्रदायारमवधृत्य दृढकमध्येडयवस्थाः । समापयन्ति तन्मतेनग्रदृश्यैरथ उत्तराधेमेव लद्यतेप । श्रन पुगडदकमयै।नियमकारूपमतमन्देयमिति ॥१६॥

यहाँ सबस् प्रधिक जो चार प्रहर अ्रथवा् बारह घण्टेश प्रभिनयका काल परिमाएा लिखा है वह केवल एकाङ्की रूपकौम हो लागू हो सकता है । अनेक ग्रङ्को वाले नाटक ग्रादि मे एक एक ग्रङ्कक प्रभिनय वार प्रहरम समा०त हो यह् बात तो बिल्कुल मसंगत है । ग्रत उसे केवल एकाङ्की रूपकों ही सीमित समझना चाहिए । मध्य काल परिमाएा मध्याप या ४८ मिनटक माना गया है ।

पूर्वाङ्कायोंवे मतानुसार परम्परासे ग्राए हुए इस ग्रदृक्-लक्ष्येस्से ग्रागे कहो जाने वालो ग्रदृक्ेकी सत्यास्या परिमाएा भी बन जाता है । जो लोग प्राचीन ग्राचार्योंक मतको उपेक्षा करके ग्रदृक्ेकी वेष्टम भी द्रवस्यकी समाप्ति कर देते हैं उनके मतवत् सग्रहू करनेकेलिए उसे राचयं हो सकचाए है । ग्रोर इस मतमें ग्रदृक्ेसंख्याके नियमका कोई ग्रोर कारएा सोजना होगा।११६।

नाटकौेकी ग्रदृक् सत्याक्या विषय इस ग्रनिर्यम दृदृक्ेके लक्ष्यसे ग्रदृक्ेकी सत्याके निर्चयकी बात कही है । उसका यह प्रभिप्राय है कि ग्रवस्थाओी समासि एक ग्रदृक्मे हो करनी चाहिए ग्रथवा यथवसर उसंक विच्छेद जहाँ होता है वह ग्रदृक् वहलाता है । पर्यात् ग्रदृक्ेकी रचना ग्रवस्थाभोदेव प्राधारपर श्ची जाती है । नाटकम प्रस्तुत काव्योँ १ प्रारभ, २ यत्न ३ प्राप्यप्राप्ता ४ नियताप्ति ग्रोर ५ फलागम ये पाँच ग्रवस्थाएँ मानी गई हैं । उनका वथान ग्रागे होगा । इनमच समा०यत एक एक ग्रवस्याकी एम एक ग्रङ्क पूरात्त हो जानेपर नाटककी समाप्ति होच ग्रङ्कोमे हो जानी चाहिए । ग्रतद जिन्सौ ग्रवस्थाओ्की पूर्ति हो गयी हो नाटकके एक ग्रङ्क हो सकते हैं । दो ग्रवस्यामोम दो दो ग्रङ्क लग जाने पर सात या पाँचो ग्रवस्थाओमोम दो दो ग्रङ्क लग जाने

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श्रधादूष्य लतयेशेऽपं संध्यापरिमलामाद्‌-प्राशयकाविरोध्यर्थः स्वल्पपात्रः सनिष्णिमः । पञ्चसंध्योदपकर्षपेऽपि द्रासंस्पदः प्रकर्षतः ॥ २०॥

एकाशिनन्नके सावदचत्सराश्च वह्निना कार्याणि न निर्वहनीयानि । यद्यापि निर्वह्यन्ते तत्राव्याचार्यैस्तु नृत्ताद्यावननं-भोजनादेरविरोधेन । सुतु कुर्यादुपचोगीनी श्ल्पपानि संलक्ष्य पात्राणि यन्त । सत्रौत्कर्षे दश, मध्यमस्तथाऽऽश्रटौ, स्वापकर्षपेऽपि चरवार्ति पञ्च वा पात्राणि । श्रावश्यक तु पात्रसम्भवर्देव प्रभिनयचतुष्टय प्रेक्षकास्वाम विभावनीयं स्यात् । प्रभुत्पुरुपसादृध्ये पञ्चोत्तकराश्रापि न रक्षे दशान्नीमित्युक्त भरत । समवकारादौ तु वहुपात्रवेऽपि विरोधोपादानान्न दोप । 'सनिर्गम' इति तनिगमो रक्षप्रविष्टपात्राखा स्वकार्यार्था कृतयापि निप्र्रत्मो जवचितक्या । तिरोघानम् ।

पर श्रधहसे यधिक दस प्रकट तक रहे जा सकते हैं । इस प्रकार नाटकोका कमसे-कम पांच पात्र और अधिकसे-अधिक दस पात्रोको रखनेशका विधान किया गया है । यह सब विधान श्रव स्थानोको विभाजनका आधार मानकर ही किया गया है । इस सातकका प्रतिपादन भगती ग्रंथ श्रृङ्गारके लक्षणोके नेप भाग और श्रोर सह्या-परिमालको कहलते हैं—

[सूत्र १७]—प्राशयक [संध्या वंदन भोजन श्रादि भावों] मे बाधा न डालनेवाला किसका [प्रभिनेय] श्रर्य है [इस प्रकारके], सुंदर श्रोर परिमिति सटपा वाले पात्रोसे युक्त तथा [प्रस्तुतमे सारे पात्रोंके] बाहर चले जाने [को दिखलाने] वाला कमसे-कम पांच सह्या श्रोर प्रविष्टो यधिक इस सख्या युक्त श्रृङ्गार होता है । [यह १५-२० दो कारिकाश्रोंको मिला कर श्रृङ्गारका लक्षण बना रहे हैं] । २० ।

एक श्रृङ्गार दीपकके बहुतसे कायोंकि समावेश नहीं करना चाहिए । नहीं कहों करमा हो पड़े वहां भी श्रावश्यक संध्या वंदन भोजनादि कायोंकि बाधा न श्राने देना चाहिए । सुप्ट, सुंदर श्रृङ्गारति कायमें उपयोगी श्रोर मत्याद्वो हरिसे 'श्रृङ्गार' -कम पात्र, जिसमे हो [वह 'स्वल्पपात्र' हत्प्रा] । इसमे [श्रर्थात प्रत्येक श्रृङ्गारमे] अधिकसे-अधिक दस, मध्ममे श्राठ श्रोर कमसे कम चार या पांच पात्र होते चाहिए । श्रधिक [सख्या] होनेपर तो पात्रोक भोड-भाडके कारण ही चाइें प्रकारक श्रभिनय देखनेवालोंको टोक तहसे नहीं दीस सक्गे । इसका यह श्राशय भी हुग्रा कि बहुत श्रधिक पात्रोंकि द्वार साध्य पवंतकका उठाना श्रादि कायं रक्ष्मूचिमे नहीं दिसलाने चाइए । रामवकार श्रादिमे तो श्रधिक पात्र होनेपर भी विरोध

रक्ष्मूचिमे नहीं दिसलाने चाइए । रामवकार श्रादिमे तो श्रधिक पात्र होनेपर भी विरोध [प्रभिनयें] का प्रभाव हो सकने [मे बाधा न होने] से दोप नहीं होता है । [प्रयातु समवकार मादिमे दससे श्रधिक पात्र भी श्रृङ्गारमे रहे जा सकते हैं] । 'सनिर्गम', प्रयातु रक्ष्मूने प्राप्त हुए पात्रोंका अपने कायोंको करके बाहर चता जाना श्रयात जवनिकाके पीछे चता जाना [जिसमे हो वह श्रृङ्गार कहलाता है] ।

समवकारादिम दससे श्रधिक पात्र होनेपर भी 'विरोधोपादान्त दोप' प्रभिनयके वि्रोप हपोष ग्रहण करनेमे कोई दोप नहीं होता है यह बात जो नहीं नहीं है उत्पन्ना कारण यह है कि समवकारमे देवताभा प्रभवा दैत्यादिका प्रभिनय दिसलाया जाता है इसलिए इसकको

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'पञ्चसंख्य' इति श्रुत्यन्तरतोक्तताया पञ्चाङ्कः । सर्वोत्तमकपेक्ष दर्श । मध्यममध्येृत्या पत्, सत्त, श्रेष्ठी, नव 'इष्टकृत्संख्या'या भेदा । यदा एकैकस्यामवस्थाया एकैकोद्-स्तद्रा पञ्चाङ्कः। यदा तु कार्यशेषेन कार्यवस्था उपक्रमोपसंहाराभ्यां द्विचते तदा पत् । एक उपक्रमाङ्क, एक उपसंहाराङ्क । श्रपरावस्थाचतुःपयस्य तु चत्वारः । एतत् कृत्स्नश्रेष्ठी नव च । सर्वावस्थाभेदे तु दृश्येति ।

मण्डप भी सामान्य नाट्य मण्डपने बहुत बड़ा बनता है । इसलिए उसमें ग्रभिनय प्रवृत्त नहीं होता है । मानव-चरितका ग्रभिनय प्रदर्शित करनकेलए जो मध्यम मण्डप बनता है उसमें प्राधिक पात्रोंके ग्रा जाननेपर ग्रभिनय प्रवृत्त हो जाता है । इसलिए नाटकादिमें दस पात्रोंके मध्यम पात्रोंके एक साथ रत्नभूमिमें ध्यानेका निर्देश है ।

यदापि कार्येहुत्वान् कार्यवस्था द्विधा तस्याझपुम्पती दृश्येते । एकस्या कयाश्र्चिद्रेकाङ्ककरस्यात । एकस्या चावस्थायामद्भुतनय हृश्यते । यथा वेङ्कीसहारेऽपि गर्भेसन्धौ प्राप्त्याशावसथालद्रने तृतीय-चतुर्थ-पञ्चमाङ्के श्रङ्क । नयूने तु स्वल्पानामेकाङ्क-तापि स्याम । तथा च पञ्च संध्यो नोपसंह्रियेयन् । श्राविक्ये पुनर्नातियतस यत्पुनः स्यादिति मधयमा वृत्तिराश्रयेत । नाटिका-प्रकरयोस्तु चतुरङ्कत्वम् । कस्याश्चिद्वय-स्थाया श्रवस्थान्तरे मिश्रणमिति ॥१२८॥

'पञ्चाङ्क' 'पाँच ग्रङ्क वाला' इससे कमसे कम पाँच ग्रङ्क हों [ यह प्रभिप्राय है ] । सबससे अधिक दस [ ग्रङ्क हो सकते हैं ] । मध्यम दशाने द्रथ, सात, ग्राठ या नौ तक ग्रङ्कोंकी संख्या हो सकती है । जब [ पूर्वोक्त पाँच ग्रवस्थाग्रोंमेंसे ] एक-एक ग्रवस्थाके लिए एक एक ग्रङ्क हो तब पाँच ग्रङ्क हुए । जब कार्यवश किसी ग्रवस्थाके उपक्रम ग्रोर उपसंहार [ ग्रलग-ग्रलग दो ग्रङ्कोंमें ] बंट जाता है तब छः ग्रङ्क हो जाते हैं । एक उपक्रमाङ्क । दूसरा उपसंहाराङ्क । ग्रोर येप चारों ग्रवस्थाग्रोंके चार ग्रङ्क [ मिलकर कुल छः ग्रङ्क हो जाते हैं ] । पाँचों [ सन्धियों ] ग्रवस्थाग्रोंमें [ उपक्रम उपसंहार रूपसे ग्रलग-ग्रलग ग्रङ्कोंमें ] बंट जानेपर ता [ मिलाकर ] दस ग्रङ्क हो सकते हैं ।

ग्रोर ग्रव कार्यके ग्राधारपर ग्राधिके कार्यका जिसो ग्रवस्थामें तीन ग्रङ्क हो जायें तो भो [ सब मिलाकर ] प्राधिक से-प्राधिक दस हो ग्रङ्क होने चाहिए । [ इसके लिए ] किसी [ धन्य ] ग्रवस्थामें एक हो ग्रङ्क करके [ कुल संख्या दससे ग्रधिक नहीं होनी चाहिए ] । दस हो होने चाहिए । जैसे वेङ्कीसहार में प्राप्त्याशा [ प् तोसरी ग्रवस्था ] से गुरुत 'गर्भसन्धि' [ नामक तृतीय सन्धि-मेद ] में [ नाटकके ] तृतीय चतुर्थ ग्रोर पञ्चम [ तीन ] ग्रङ्क [ लग गए हैं ] । कम होनेपर तो एक ग्रङ्क भी हो सकता है । किन्तु उससे पाँचों सन्धियोंका प्रदर्शान नहीं हो सकेगा । ग्रोर [ दससे भो ] ग्राधिक होनेपर सबका कोई ग्रवबाध नहीं रहेगा । इसलिए मध्यम ग्राङ्गका प्रवतन करन उचित है । नाटिका ग्रोर प्रकरणोंमें तो चार ग्रङ्क होने चाहिए । किसी ग्रवस्थामें दूसरो ग्रवस्याका मिश्रण कर देनेमें [ पाँचके ध्यानपर चार ग्रङ्क हो जावोगे ] ।

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श्राभिघातः प्रधानस्य नेतर्र्रेथ्यो न कुन्त्रचित् । वन्धे पलायनं सन्ध्योर्वा फललिप्सया ॥२ १॥

श्राभिघात शोचितहेतु प्रहारः । प्रधानस्य मुख्यस्य । तेन पताकाप्रकरीनायकादीनां ग्रस्थित पव कुन्त्राचिदिति विशिष्टम्भकादार्यपि । सामान्जोक्तिर्वर्याभिघातः । परपरकृत । तेन यदर्थमाभि सत्यहरिश्चन्द्रे हरिश्चन्द्रे देवतोपहारोध्द्रवय स्वमांसोत्तरे तैनं निच्छद्यं न तद् दोपाय ।

ग्रन्थकोंमें श्रादर्शनीय तत्वोंमेंसे एक नाटकग्रन्थमें प्रधन्य लक्शया करनेके बाद श्रन्रय ग्रन्थली व्रारिकामें ग्रन्थकार पिद्धले दो वारिकाप्रोमें प्रधुन्य लक्शया करनेके बाद श्रन्रय ग्रन्थली व्रारिकामें ग्रन्थकार यह दिखलाना चाहते हैं कि ग्रन्थकोंमें किन-किन बातोंको नहीं दिखलाना चाहिए । जिन बातों का ग्रहणोंमें दिखलानेकार निषेध है उनमें प्रधान नायकत्व 'ग्राभिघात' सबसे मुख्य है । ग्राभिघात शब्दका ग्रर्थ 'रक्त प्रवाहित कर देनेवाला प्रहार' किया गया है । प्रधान नायकका ग्राभिघात तो न केवस ग्रन्थोंमें ग्रवितु विशिष्टम्भक ग्रादिमें भी मही किसी प्रकार नहीं दिखलाना चाहिए । उसका वन्धन पलायन ग्रादि भी सामान्य रूपसे नहीं दिखलाना चाहिए । किन्तु विशेष स्थिति में यदि वन्घ ग्रादिके द्वारा विशेष फलकी सिद्धि हो तब उनको प्रदर्शित किया जा सकता है ।

ग्रन्रय ग्रन्थों में न रखने योग्य [ग्रयों] को कहते हैं— [प्रधान नायकका ग्राभिघात [शोचित जनक प्रहार] कहाँ भी [ग्रन्थ ग्रादि ग्रन्थों में तो नहीं हो दिखलाना चाहिए किन्तु उसके ग्रन्तरियत्त विशिष्टम्भक ग्रादिमें भी] नहीं दिसलाना चाहिए । [प्रधान नायकका] वन्धन पलायन ग्रथवा सन्धि [भी सामान्य रूप से नहीं दिखलाना चाहिए किन्तु] विशेष फलकी ग्राप्तिकी इच्छासे प्रदर्शित किया जा सकता है । २ १ ।

'ग्राभिघात' श्रर्थात् रक्तको प्रवाहित करनेवाला प्रहार । प्रधान प्रयकका मुख्य [नायक] का [नहीं दिखलाना चाहिए] । इस [नयन] से पताका-नायक ग्रोर प्रकरी-नायक ग्रादि [ ग्रनुख्य नायकों] का [ ग्राभिघात भी ] ग्रवित किया ही जाता है [यह ग्राभिप्राय है] । 'कुन्त्रचित्' इससे विशिष्टम्भक ग्रादिमें भी [नहीं दिखलाना या वर्णन करना चाहिए वह ग्रभिप्राय है । ग्राभिघात स्वकृत ग्रोर परकृत दोनों प्रकारका हो सकता है । विशेष निदर्शनके बिना] सामान्य रूपसे कल्पित होनेपर भी यहां परहत [का ही ग्रहार करना चाहिए] । इसनिए हमने 'सत्यहरिश्चन्द्र' [नाटक] में देवराजों उपहार रूपमें हरिश्चन्द्रके हो द्वारा ह्वय ग्रपने मांसके काटनेकाजो वरद्वान दिया है वह [परकृत ग्राभिघात न होके कारण] दोषाधायक नहीं है ।

इसमें प्रधान नायकके ग्राभिघातका निपय करते हुए वृत्तिन्त्रप्रमें पताका-नायक तथा प्रकरी नायकके ग्राभिघातकी ग्रनुमति दे दो गई है । इन पताका ग्रोर प्रकरी-नायककोे लस्षाए ग्राप्त किए जावेंगे । किन्तु इस प्रकारके ग्रथयों सम्भननेक लिए सदैवसे उनका ज्ञान भावश्यक है । 'यद्यपि प्रासङ्गिकं वृत्त पताके रससिद्धीयते' यह 'पताका' का लक्शाए, ग्रोर 'प्रासङ्गिक'

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परेषांपि विपत्तेषु कृतो निविध्यते । तेन नागानन्दे गरुडकृताभिप्रातरय जोमूतवाहनस्य माञ्जारकस्यां परोपकाराय सर्वाधिकार्येन विशेपतो रसपुष्टिमवटति । योडपि चार्माभिर रघुविलासे शक्तिसक्तवत्ससो लद्मणस्य प्रवेशः कृतः, मोडपि न दोषाय । सीतासड्गनयलताग्राफलसमयनधेेन राघवस्य मुल्यंवान् । 'घःघ' इति परेषां श्रवणम् । यथा वामवदतात्रुतवारे वत्सराजस्य । पलायनमपसर रसाभ । यदाहु — 'आशङ्को मरुस्थलसज्ज्ञापाक्षितैः' । हृपा हि जोषत । पुनरस्स्वादनिषंधा सुप्रयोजनीयत्वमो । इति । 'सन्धि:' सन्धानम् । सङ्कुक्रम्— "प्रयुक्तचक्रेऽपि कृतान्तो राज्ञा बलवता डबल । सन्धानोपनमेतु तूर्यं कोष-हस्तात्सम्भूमिभिः" इति । फलतिप्सयेतिच—वत्सनादीनां तावन्न योजयितुं यदिच च योज्यते तदा पर्यन्ते विशिष्टं फलमवेदय, न पुनरेवमेति ॥२१॥

प्रदेशस्थ चरित प्रकरे मताः' यह 'प्रकरी'वत लक्षण है । धर्मादि प्रासङ्गिक किन्तु व्यापक चरित व नाम 'पताका' है जैसे राम प्रदर्श्योने मुखोद्गीर्वा चरित रामकै बाद व्यापक चरित है । यत्रत उसका नायक सुप्रोच 'पत्ताका नायक' माना जाता है । इसके विषयोत्त एकदेशस्थ प्रासङ्गिक वृत्तको 'प्रकरी' कहा जाता है जैसे जटायुना वृत्तान्त रामायणे 'प्रकरी' चरित है । उसका नामक जटायु 'प्रकरी-नामक' है । उसके ग्रभिप्यात और वध तक भीो दिखलाया जा सकता है और दिखलाया भी गया है । [परकृत ग्रभिपातमे भी] 'पर' शब्दसे शनुके द्वारा किया गया [ग्रभिपात] हो निपिद्ध है । इस लिए नागानन्दे गरुडके द्वारा ग्रभिपात किए हुए [रक्त प्रवाहित होते हुए] जोमूत-वाहनके शक्तिसक्तकरसे परोपकारके प्रवल उत्साहके कारण रसके चिनेश हष्टे पुष्टि होती है । [इस लिए वह दोपाघायक नहीं है] । और हमने भी रघुविलासे जो द्वातोने शक्त्ति लगे हुए लक्मणरुपक [रघुवंश्यपर] प्रवेश कराया है वह दोपाघायक नहीं है । क्योंकि सीताके घापस लाने हप फल सम्बन्धके कारण राम मुखप [नायक] है । [लक्मण सुप्य नायक नहीं है] । यत्रत उनकी ग्रभिपात प्रदर्शित करना दोपावहायक नहीं है । कारणमे ग्राए हुए] 'वत्स' [पदक ग्रन्थ] दूसरो के द्वारा परकृत जाना है । जैसे वसवदत्ताकी मृल्युशालामे घटसराजक [वत्सन दिसलामा गया है यहु विप्रेय फलकी सिदिका यनक होनेसे दोपाघायक नहीं है] । पलायनका प्रय [मुद्रादिसे] हट जाता है । जैसाकि [उसके ग्रभिप्रेतको दिसलानेकेलिए] पहरा गया है 'प्रसमयं हो जानेपर सच कुछ छोड़कर चला जाये' । यप्योकि जीवित रहते फिर वापिस माना देखा जाता है । जैसे सुपाय और उदयनका । [इस लिए जीवन-रक्षाके लिए प्राणिवयं होनेपर पलायन भी चरित है] । 'सःप' प्रयर्थात मेल कर लेना । जैसाकि [उसका ग्रौचित्य दिसलाते हुए] कहो है— [जिसका चक्र चल रहा है उस] प्रभावशाली बलवतां राजाके साथ दुर्बल राजा को दण्ड और ग्रपनो भूमि प्रादिके द्वारा सधि कर ले । 'फलतिप्सयेतिच' इसका यह ग्रभिप्राय है कि [तामान्यत ] वत्स ग्रादिको योजनां नहीं करनी चाहिए हितु मुदि योजनाधीन हो जाय तो ग्रनतने किसी विशेष फलको देखकर हो की जाय, ऐसे ही नहीं ॥२१॥

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अथ विशिष्टमकादीनां लक्षणं कथनार्थं श्रद्धावशान्नीये विशिष्टमकादिभिवर्गौनीयमित्याह-[सूत्र १८]—दूराध्वपानं पूरोधो राज्य-देशादिविप्लकः । रतं मृत्युः समीकादि वस्थं विशिष्टमकादिभिः ॥२२॥

दूराध्वयानिमित्त। मूर्हूतत्रिक-चतुरक्षणाद्ध्ये देशान्तरगमनं शस्यतद्वाद्धे दृप दर्श्यते । यत् पुनरधिकाराद्ध्य तदशकयत्वात् विशिष्टमकादिरेव वस्थ्यं । विध्यांतरस्थान-शयन-पान-भोजनादीनां बहूनामभिनयक्रियाणां प्रकाशनात् । समवकारादौ तु दूराध्वयानदर्शनेऽपि न दोष । दिव्यरस गगनक्रमप्तासामध्यात्।

विशिष्टमकादि-प्रयोग— नाटकादिमे 'दृश्य', 'सूच्य' तथा 'उभय' तीन प्रकारके अर्थ होते हैं द्वास बातका उल्लेख वृत्तिकार १९ मरीकावे वृत्तिभागमे कर चुके हैं । इनमेसे जिन अर्थोको नाटकमे साक्षाद् प्रभिनय द्वारा दिखलाया जाता है वे 'दृश्य' अर्थ कहलाते हैं । नाटकादिका ग्रधिकाश भाग 'दृश्य' हो होता है । उनकता नम हो 'दृश्य काव्य' है । किन्तु कुछ भाग ऐसा भी होता है जिसको प्रभिनय द्वारा दिखलाने नत सम्भव हो सकतत है ग्रोट न कविको प्रभोष्ट हो सकतत है । ऐसे श्रथोंको कवि ग्रनप सूच्य कहलवाबर सूचितमात्र करता है । उनको 'सूच्य' श्रयं कहते हैं । इन 'सूच्य' श्रयामे प्राय दो प्रकारके श्रथ होते हैं— एवं मारते भर पूरत मति विस्तीर्ण एवं ग्रनुपयागी । रामादिके जीवनके मुख्यभागोंमे ही प्रभिनय द्वारा प्रदर्शित कियत जाता है । छोटी छोटी बातोको प्रभिनय द्वारा दिखलानेसे नाटकका बहुत विस्तार हो जाया करता है इसलिए उन श्रथोको पानोके वार्तालाप द्वारा सूचित कराया जाता है । इसी प्रकार नीरस श्रथंको भी सूचनामात्र दी जाती है । उन श्रथोंको 'सूच्य' श्रयं कहते हैं । ग्रोट उनके लिए नाटकमे श्रदृश्ये भिन्न विशेष भागोश्वे रचना की जाती है । उस भागोका सामान्य नाम 'ग्रथ्योपक्षेपक' है । ये 'ग्रथ्योंपक्षेपक' पांच प्रकारके माने गए हैं । जिनको समझ १ विलक्मक, २ प्रदेशक, ३ चूलिका, ४ श्रद्धावास्य, ग्रोर ५ प्रकाशातर कहते हैं । इन्हीके तत्त्वर्य करनकेलिए ग्रथ्यकार ने विशिष्टमक ग्रादिके द्वारत सूचनीय श्रथोंकी चर्चात इस कारिकामे जिस्न प्रकार करते हैं— ग्रथव विशिष्टमक ग्रादि [पांच प्रकारके ग्रंथ्योपक्षेपकों] के लक्शणर करनकेलिए ग्रद्धोंमे श्रवश्यानीय [मध्यस्थ-भाग] को विशिष्टमकादिके द्वारात वल्केन [ग्रंथ्यत सूचन] करनत चाहिए ।

[सूत्र १५]—दूर देशको गमन, नगरावरेध, राज्य तथा देशादिका विश्वल सम्भोग, मृत्य, भ्रूभङ्गादि श्रादि [ग्रदृश्योमे न दिखलाने योग्य प्रयों] को 'विशष्टमक' ग्रादिके द्वारा दर्शंन कराना चाहिए । २२ ।

'दूर मार्गका गमन' इसका यह प्रभिप्राय है कि तीन-चार मुहूर्तमे जिसको समाप्ति हो सके इस प्रकारका देशांतर-गमन तो सम्भव होनेसे श्रदृश्योमे भी दिखलाया जा सकता है । किन्तु जो ग्रधिक कालमे समाप्त हो वह [ग्रदृश्योमे दिखलानेके] ग्रयोग्य होनेसे विशिष्टमक ग्रादि के द्वारा हो दर्शित किया जाना चाहिए । मयोकि उससे ढँढोरनेका पड़ाव, वसत, पान, भोजन ग्रादि बहुत सो ग्ररुचिकर परिस्थितिका समावेश होगा । समयकार ग्रावश्यक हो तो दूर मार्गकी यात्राके दिखलानेमे भी दोष नही है क्योकि दृश्यतप्रायोगिक आकार-शासनादिकी सामर्थ्य होती है ।

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नगररोऽपोद्येवमेव, सेनाया. पर्यकुटी-यत्न-सुरद्विदानव्यापाराणां च वाहुल्यात् । राजय-देशनिदेश्रोदपि पतन-मरतादिसम्भवान् तथैव । रत्नार्मिकग्रालिङ्गन चुम्बनादि ग्रीडादान्त्वादेवमेव । तेन तदनुकूलानि रहःप्रवेश-वम्रौषध-दीर्घयद्रेडपि दर्श्यन्ते । मृत्युः प्रयासनिग्रह एव । समीक्ष्य हस्त-पादादिच्छेद प्रच । तेन नागानन्दे जोमूतवाहनस्य चेष्टाभाविनां इन्द्रयवैकल्यादीनां, रघुविलासे च रावणस्य विभोपणं प्रति माताप चन्द्रहासभ्रातृयुद्धोऽभिप्रायोऽपि प्रभूतकाल-श्लेषसाध्यं ग्रीडातत्कदायि पर गृह्यते । श्रादर्शावदन प्रवेशम-ग्राद्धारय-चूलिकादावाताराणां ग्रहणमिति ॥२२॥

नाटकमें 'दूराद्वयान' अर्थात् प्रथिक लम्बी यात्राको पात्रों द्वारा दिललाने का निपेक्ष किया गया है । इसका कारण यह है कि प्रथिक लम्बी यात्रामें रास्तेमे ठहरनेके लिये पड़ाव, उनमें होने वाले भोजन, पान तमन् समी व्यापारोको दिखलाना श्रावश्यक होगा । वह सव एवं तो अत्यन्त नीरस हो जायगा घोर दूसरे लम्बा मो प्रधिक हो जायगा । इसलिये नाटकमें उसको प्रत्यक्ष दिखलानेवा निपेध कर 'समवकार' ग्रादि रूपकभेदोंमे दूराद्वयानका दिखलानेषा मो निपेक्ष नहीं किया गया है। इसका कारण यह है कि 'समवकार' में देशादिके चरित्रका प्रदर्शन किया जाता है । उन देशतामोंमें ग्रावागमनका सामर्थ्य होता है प्रत् उनमें बीचमें पड़ाव, ग्रादि सख्वंधी व्यापारोको दिखलाने की ग्रावश्यकता न रहनेसे न नीरसता ग्राती है ग्रोर न दीपंता ।

नगरावरोध भी इसी प्रकार [नीरस व्यापारोसे पूरां होनेके कारण दिखलाया नहीं जा सकता] है। [क्योंकि उसमें] सेनाके [ठहरनेकेलिये] पर्यकुटी [टेरा या भोंपड़े] यन्थ मुरङ्ग सगाने ग्रादि व्यापारोको वाहुल्य होता है । राज्य देशादिके विप्लवभी पतन-मरतादि ग्रादि [नेक प्रकारके नीरस ग्रोर प्रशोभनীয় व्यापारों] की सम्भावनातों पूरां होनेके कारण [पर्याप्त नाटकमे न दिखलाकर केयस सूचित कराने योग्य] है । सम्भोग भो प्रारम्भन चुम्बन ग्रादि सज्जनतक [व्यापारसे परिपूर्ण] होनेके कारण उसाँ प्रकारका [रक्तिमग्रन्थपर न दिसलाने योग्य] है । इसलिये उस [मुरत-सम्मोग] केलिये प्रभुद्रव्यप्राप्ति-रत्नादिम प्रवेस घोर वृथा रति मो पद्युभूमि भो दिखलाए जाते हैं । [किन्तु उसके प्रारम्भन-चुम्बनादि प्रारम्म होता है उस भागको योहारिक होनेमे पड़ोंमें रङ्गमञ्चपर दिसलाना निन्दित माना गया है] । मुरुप्रये प्राप्त निकट जाननेर हो पड़ता होता है । 'समोश' का प्रथं हृदयपर ग्राविष्ट होना हो है । इसलिये नागानन्दमें जोमूतवाहनका युध्य समप होने परात इन्द्रपुत्रीय रत्नं, ग्रोर रघुविलासमें रावणारावि विभोषणं प्रति गो रघने तलवाररता पहुँए [कुरू पर्यात प्रारब्धविमोचन प्रयवा तमोन पर्यात हृदयन्दरं देवन तथ न पहुँचनेसे, दिखलाया जानेपर] भो दोनोऽपायक नहीं है । [समोशार्द में प्रयुक्त] 'ग्रादि' द्योतते प्रभूत वन ग्रोर प्रभूत वननादासे सान्न्य तथ द्रोहादायक ग्रादि प्रथ प्रपोचरा मो पहुँए होता है । [पोर विरहमवारिभि में प्रभुक्त] 'वार्द' रसमें प्रदर्शक, पदचाप, ध्वनिरा घोर मदनानार [५४ रस चारों रसोपसंघपात्र] चा मो पतन होता है । [पर्याप्त मूत्य ग्रथं मो इन सौं प्रकारक व्यापारोको] हरते हो सूचित करना काहिए । पसिद्धान् एवम मया दिसाना चादिए] ॥२२॥

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श्रव प्रथम विशिष्टमक शुद्धाशुद्धभेद लस्सयति—

[सूत्र २०]—श्रद्धानहेस्प वृत्तस्य त्रिकालस्यातुरङ्गिना । संक्षिप्य संस्कृतेनोक्तिरङ्गादौ मध्यमेर्जनैः ॥२३॥

विशिष्टमकलक्षण— पिछली कारिकामे प्रथकारने नाटकके श्रद्धौमे जिन वादोमे साक्षात् रूपसे दिखलाना वाञ्छित है उनका उल्लेख किया गया है । इनमेसे द्वाराघ्यान ग्रादि कुछ नायं प्रभूतकाल साध्य या प्रभूत श्रमसाध्य होनेसे, कुछ नायं वीरादायी होनेसे, प्रोर कुछ कारं शातचूदायी होनेके कारण भी श्रद्धानहं श्रद्धौमे साक्षात् रूपसे दिखलानेके प्रयोञ्य माने गए हैं । परन्तु कथा भागकी सङ्घति बनाए रखनेके लिए इन भागोकी भी सावध्या उपेक्षा नही की जा सकती है । इसलिए प्रेक्षकोंको इन कथा भागोसे परिचित करानेके लिए 'विशष्टमक' ग्रादि पांच प्रकारके 'प्रथ्यो- पक्षेपको'१ की रचनानोकी व्यवस्था नाट्यशास्त्रमे की गई है । इन 'श्रद्धोंपक्षेपकमे' मे सबसे मुख्य 'विशष्टमक' है । इसलिए प्रगली दो कारिकाग्रोमे ग्रन्थकारने 'विशष्टमक' व लक्षण निम्न प्रकार किया है ।

श्रव [पाचो 'प्रथ्योऽपक्षेपको' मे] सबसे पहले युद्ध शोर श्रशुद्ध भेद वाने [दो प्रकारके] 'विशष्टमक' का लक्षण करते हैं—

[सूत्र २०]—श्रव [पाच प्रकारके 'प्रथ्योऽपक्षेपको'] मेसे [भूत भविष्यत् शोर वर्तमान] तीनो कालोके [श्रद्धानहं] श्रद्धौमे न दिखलाने योग्य वृत्त [कथा भाग] को श्रद्धौके प्रारम्भमे सक्षिप्त करके मध्यम पात्रोके द्वारा सस्कृते कहलानेको 'शुद्ध विशष्टमक' [कहते है] शोर नीच तथा मध्यम पात्रोके द्वारा [सक्षिप्त तथा प्राकृत सापाने कहलानेका यत्न] सक्षेपां [विशष्टमक कहलाता] है । [शुद्ध शोर सक्षिप्त दोनो प्रकारका विशष्टमक] श्रद्ध [के प्रतिपाद्य विपयको सक्ष्ति] को जोडने वाला [श्रथवा दो श्रद्धोके वीचके कथा भागकी सक्ष्तिको जोडने वाला] 'श्रद्धान्धायक' होता है । शोर जितने कालकी सृति सम्भव हो उसने भरतोत्काल [को स्मृति कराने] वला [श्रोक्यसन्धानातितकलवान्] होता है ।२३-२४। प्रन्थकारने यह 'विशष्टमक' का लक्षण किया है । लक्षणकी रचनाशैली कुछ प्रस्पष्ट- सो प्रतीत होती है । इसलिए उसको ठीक तरहसे समझनेकेलिए विशेष प्रयत्न करनेकी श्राव- श्यकता है । इस लक्षणमे तीन वातें समाविष्ट को गई हैं—

१. विशष्टमक पद्दुनहं श्रध्यातं जिसका नाटकके श्रद्धौमे दिखलाना उचित नहीं है उन्ही वातोका समावेश किया जाता है । २. उस श्रद्धानहं भागको मध्यमपात्रोके द्वारा प्रथवा नीच शोर मध्यम दोनो प्रकार के पात्रों द्वारा कहलाया जाता है । केवल मध्यम पात्रोके द्वारा कहलाए जाने पर 'शुद्ध विशष्टमक' तथा नीच मध्यम द्विविध पात्रो द्वारा कहलाए जानेपर 'सक्षिप्त विशष्टमक' होता है । ३ विशष्टमकमे प्रथंकी सूचना देने वाले पात्रोकी भावाक भी छलसे की

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स्वरक्षकं च, रक्षकस्यापि एकदिनाशक्याभिनयं च, प्रेक्षकैर्माचादतुपलभ्यमानं 'श्रद्घानहैं' । 'त्रिकालदय' वृत्त वत्स्येन्दु-वत्सेमानकलदय । श्रगुरक्षिनेत्यादि श्रसमरतेन श्रथरीध्वसमासेन च प्रमाणेन । 'संधिलय' विशिष्टस्यापि उत्तरार्धमन्थानोपयोगेच्छृत्या । संस्कृतेनेऽपि शुद्धविश्रंभमापेक्षम । सद्धृश्यों तु संस्कतेनासंकृतेऽपि च, नीचपात्र-स्वापि तन्न भावान् । श्रद्घादीप्तौ प्रथमे दृश्ये श्रमुप्रदीप्तश्च, श्रन्येषु पुनरारम्भ इति न्यायः स च समामनन्ति । कोहलः पुनरेतत् प्रथमाद्दादावेवेच्छति ॥

किन्तु उसमें केवल शुद्धाविश्रंभमकके पात्रोंकी भापा संस्कृत होती है । सद्धृश्यों विशिष्टरभकमें जो मध्यम पात्र हों वे हो संस्कृत बोलते हैं प्रोर नीच पात्र प्राकृत भावानोही प्रवतनयन करते हैं । टीकामें तो इस भेदका उल्लेख किया गया है किन्तु मूलमे उसका उल्लेख न होनेसे प्रयं स्पष्ट नहीं हो पाता है । य 'श्रद्घासंधायक' तथा 'नावयसंधानालोचितकलवान्' मे दो पद जो लक्षणामें रखे गए हैं वे प्रधिक श्रस्पष्ट हैं । 'मधुरंघायम्' वा प्रभिप्राय यह है कि विश्रकभक दो मद्धोंके बीचके कपाभागको जोडकर कथमात्रको प्रविच्छिन्न बनाता है । प्रोर 'समाससंघानालोचितकल-वान्' वा प्रभिप्राय यह है कि घटोत्कालक्री जिन घटनाओंपरोा उल्लेख उसमें किया जाता है वे घटनाएँ बहुत अधिक पुरानी नहीं होनी चाहिए । केवल उतनी पुरानी हों जितनेा स्मरण सामन्ज्य रूपसे अनुभवको रह सकता है । ४ पांचवी बात यह है कि विश्रकभककी रचना प्रादृश्रके प्रारम्भमें हो जो जाती है । धन्तमें या बीचमें नहीं । 'प्रादृश्शोः' वा यह भी प्रभिप्राय है कि यह विश्रकभक प्रथम मद्धूमं श्री रखा जा सकता है । किन्तु वहाँ यह भामुखके बाद हो भा सकता है जमदे पहले नहीं । श्रम्य मद्धोंमे श्रमुखके प्रारम्भमें होता हो है । इन्हीं सब बातोंको लेकर ध्वार्यायार इन दानोंभेदोंकी व्याख्या निम्न प्रकार करते हैं— [प्रारक्षक धर्मोभूत] नेरस्य, प्रयत्नैर रसस होनेपर भी [प्रत्यन्त विस्तीर्णं होनेन कार्ण] जिसका प्रभिनय एक दिनमें करना सम्भव न हो [इसलिए] प्रेक्षकोंको साक्षात् [प्रभिनय दर्शने] में दिखलायी जाने वाली [वेद्यमागा] गत्यार्घ्यां [श्रादृश्य न दिवसान्तरम्] प्रथवा नाटकके प्रथम दिन [पश्यभाज] को भी प्रागले धारयरा सम्वन्ध जोडने मात्र [संदेश्य] यन वर [वह- साना] । 'सरहतेन' [सरकृत भापाके द्वारा कहलाना] । यह केवल शुद्ध-विश्रकभककी हष्टिये महा गया है । सद्धृश्यों [विश्रकभक] में तो सरकृत प्रोर [प्रसकृत प्रयान्त] प्राकृतमें भी [प्रथावं यपि] दोनों भावापोंके द्वारा वृत्त कथमात्रको जानता है] यमोग्रे उसमें नीच पात्र भी होने हैं [वे मसकृत महों बोल सकते हैं] । प्रात वे प्राकृत भावाम भापतेु करते हैं प्रोर जा मध्पम पात्र होने हैं वे सरकृतभापते । इस प्रकार सदृश्यों विश्रकभकमे सरकृत तथा प्राकृत दोनो भावाप्रोंका उप- योग होता है] । 'श्रद्घादीप्त भ्रद्घक मोकारम्भ इति [पट् श्रादितः प्रयत्नैर इति] यस्य न भवेत् [प्राकृत मर्यादा] प्रस्तावनान्ते वाद, प्रोर नेय सदृशोंमे श्रद्घकं प्रारम्भमें हो [विश्रकभकी रचना होना चाहिए] ।

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मध्यमैरिति श्रामात्य-सेनापतिं वशीक-विप्रादिभिः । न पुनर्दैवतं कुमार-नायक-प्रतिनायकादिभिः । मध्यमतमं चैपा राजापेक्षया । राजपरिजनापेक्षया तु तैरडपि प्रधानम् । जनैरिति पुष्टिम्., श्रीमिः, श्री-पुसेर्ष, सामान्यवाचत्वात् । बहुवचनमतन्त्रम् । तेनैकेनापि स्वगत्तेनाकाशोक्त्या च निवध्यते । जनैरिति सामान्य-निर्देशादेव च शुद्धविप्रक्रमे क्रिया ग्रापि संघृततैनैव पाठ । शुद्धो नीचाप्रवेशात् ।

यह बात [नाट्यशास्त्रके] सब [ग्राचायों] मानते हैं । किन्तु कोहल [नामक नाट्याचार्य] इसे केवल प्रथम श्रदृकेके आरम्भने ही मानते हैं । इसका श्रभिप्राय यह हैग्रा कि भरत श्रादि ग्रन्थ सब नाट्याचार्योंके मतमे नाटकके विसो भी श्रदृश्ये प्रवास्यकत्यानुसार विप्रक्रमकका प्रयोग किया जा सकता है । किन्तु केबल इतना ध्यान रखना है कि जब कभी भी विप्रक्रमका प्रयोग किया जाय वह सदै श्रदृश्येके मारम्भने ही होना चाहिए । बीचमे या श्रन्तमे नहीं । किन्तु कोहलाचार्यका मत इससे भिन्न है । उनका यह कहना है कि विप्रक्रमका प्रयोग नित्यदल प्रथम श्रदृश्येके श्रारम्भने ही किया जा सकता है । ग्रन्य श्रदृश्येोमे उसका प्रयोग नहीं हो सकता है । या फिर श्रदृश्येके मध्य श्रथवा श्रन्तमे कहीं भी किया जा सकता है ।

विप्रक्रमादिति पश्चात्तम मध्यात्त्‌ त्रिभेदत्वेन विप्रक्रमको निर्धार्यते । श्रथ सदृशोऽपि नीचस्यापि प्रवेशात् । नीचा दास-चेटादयः । 'श्राहुसंधायक' इति श्रद्वयसू

'मध्यमे' इस पदसे श्रामात्य सेनापति वशीक विप्र श्रादिके द्वारा [यह ग्रन्यं श्रस्ता चाहिए] महारानी, राजकुमार, नायक, 'प्रतिनायक' श्रादिके द्वारा [यह श्रस्त्यं] नहिं [लेना चाहिए] । इन [ग्रामात्य सेनापति श्रादि] को [मौ] मध्यमतमं राजाकी दृष्टिसे है । राजादे ग्रन्य सेवकोंकी श्रपेक्षासे तो वे भी प्रधान हैं । 'जनैः' इस पदसे [पदके] सामान्य-वाचक होनेसे पुरुषोंके द्वार, प्रयवा स्त्रियोंके द्वार, प्रयवा दोनोके द्वार यह ग्रन्यं प्रधान [करना चाहिए] । इसमे बहुवचन श्रविशिष्ट है । [प्रर्थात् बहुतसे पात्र हो प्रयुक्त किए जायं यह इस पदका श्रभिप्राय नहिं है] । इसलिए 'स्वगत' श्रथवा 'प्राकाशभाषितके' इसमे एक पात्रके द्वारा भी [प्रथवा प्रस्तुत प्रयोक्तको मुख्य कर विप्रक्रमभका] प्रयोग किया जाता है । 'जनैः' इस सामान्य निर्देशके कारण ही शुद्ध विप्रक्रममे क्रियोके द्वारा भी संस्कृतमे हो पाठ किया जाता है । [इसीसे प्रभिप्राय यह है कि सामान्य रूपसे लिखोके मुखसे प्रकृत भाषाके हो प्रयोग नाटकोमे भरपूर जतार है । किन्तु शुद्ध विप्रक्रममे यदि कोई सदृशम श्रथवा-

तत्रेति विप्रक्रमादिपु पश्चात्तम मध्यात्त्‌ त्रिभेदत्वेन विप्रक्रमको निर्धार्यते ।

पात्र हो तो उसको सदृशतमे भाषण कराया जा सकता है] । शुद्ध [विप्रक्रम] नीच [पात्रों] के प्रवेस न होनेसे [ही नुद्र पहुतात] है । [अ्रथवा विप्रक्रम सदृशता निश्चन दिसलाते हैं] 'विप्रक्नाति' प्रयोत्क् स्मृतिके द्वारा क्याभाष्यो [जोङ्कर] पुष्ट यनाता है इसतिए [उसको] 'विप्रक्रमक' कहा जाता है [यह विप्रक्रमक नादरका पददपयार्य है] ।

तत्र' इतसे 'विप्रक्रमक' श्रादि पांच [प्रकारोंसे] मध्यममें [चुने तथा श्रोत्पं लप] दो भेद वाता 'विप्रक्रमक' प्रसंग निरूपण किया गया है [यह बात 'तत्र' पदते सूचित थी है] । 'तत्रप्रपंच' शब््रो रसभूमिके श्रपंमे नट-निर्यारकम् 'तत्र' नाटद बना है । दोर 'पतच निर्यारकम्' [जिसको रसभूमिको पुनः कर प्रसंग किया जाय उसको निर्धारलमे सयमो

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श्रद्धार्थेभ्यो मन्थायिक: संसूचक: प्रथमाहुःसभावी । श्रद्धयोरद्दार्थयोः । सन्धायिक: पुनरद्धद्रयान्तरालभावी । शक्ष्यं सन्यानमनुस्मरस्य यस्यासौ शक्ष्यसन्धानः । स चासावतीतकालो वृत्तोऽर्थेन्तद्धान विधर्मभको भरति । इह तावत् पुरुपणद्वापेक्षया विशकर्म कार्य कालो नियध्यते । रामयुवाविच्छिरादयो हि चिरातीतकल्प्यर्थमनुसन्धयतीति म तथैव नियध्यते । ये तु प्राकृता स्तोककालमेवार्थमनुसन्धते तदर्थस्तथैव निध्यायते । काममले तु नीतिक वपुष्कृत्समत्वे निवेध्यते । परन्तु संस्मृतो विच्छिद्यते ॥२३-२४॥

विभक्ति होती है । यहाँ ससमी विभक्तिके द्वारा बने 'तत्र' पदसे निर्धारण—घांटना—घ्रतलग करना सूचित होता है यह यहाँ अभीष्ट है । आगे सङ्घोऐं [विश्कम्भकको] नीच [पात्रों] का भी प्रवेश होनेसे [सङ्घोऐं विश्कम्भक] कहते हैं । नीच प्रयत्नात् वास-वासो ग्रादि । 'प्रडूसन्धायक.' इससे [दो प्रयं निकलते हैं । एक तो यह है कि] प्रडूका श्रर्थात् एक प्रडूसे प्रयंकका सन्धायक प्रय्यांत् सूचक । इस प्रकरण [एक प्रडूक्त प्रयांत् एक प्रडूते सम्बद्ध प्रयंकका सूचक जो विश्कम्भक होता है वह] प्रथम प्रडूके प्रारम्भमें ही होता है । ['श्रडू-सन्धायक' का दूसरा प्रयं यह भी है कि] दो प्रडूकोंका श्रर्थात् दो प्रडूोंके प्रय्यों का सन्धायक श्रर्थात् सम्बन्ध कराने वाला [जोड़ने वाला] वह दो प्रडूोंके वीचमें [प्रथमत् उत्तरवर्ती प्रडूके प्रारम्भमें] होता है । [ग्रांगे 'श्रद्यसन्धानातोत्तकालवाचं' पदका श्रयं उसे दो भागोंमें विभक्त करते हैं । पहले 'श्रद्यसन्धान' इस भागका प्रयं कहते हैं] जिसकॊ सन्धान श्रर्थात् अनुस्मरण हो सकता है [उत्तना ग्रतीतकाल श्रद्यसन्धान हुग्रा] । इस प्रकरणा [श्रद्यसन्धान] जो श्रतीतकाल श्रर्थात् श्रतीत कालमें हुग्रा कथा भाग उससे युक्त [श्रर्थात् उसको सूचित करने वाला] विश्कम्भक ['श्रद्यसन्धानातोत्तकालवान्' विश्कम्भक हुग्रा] । [इसमें पुरयोंकी स्मरयेधाकित [प्रथ्न] की श्रपेक्षासे विश्कम्भकके [प्रथ्नात् कथा भाग] के मातको [श्रद्यसन्धान जिसका सम्भव हो सके इसके प्रभुसार] निवद्ध किया गया है । राम युधि ष्ठिर ग्रादि [प्रवल स्मरयेधाक्ति वाले उत्तम पात्र] बहुत पुराने श्रतीत प्रयकों भी स्मरएा कर सकते हैं इसलिए उनका उसी प्रकारका दिखलाया जाता है । जोर जो स्मरणशक्त पुरष योनी देखी हो वही स्मरएा कर सकते हैं उनके लिए उतसो प्रकारको रचना करनी चाहिए । कामप्रधान कलवाले नाटकमें तो [विश्कम्भकके स्पने] एक ही यपंके वृत्तकी रचना को जानो है । उसके बाद [प्रथ्नात् एक यपंसे श्राधिककालके प्रेमले] संस्कारोका विच्छेद हो जाता है ग्रोर श्रवस्था भूत जानेसे भी । [श्रृङ्गार रसमें श्राधिक पुरानी बातोंका स्मरएा प्रयं हो जाता है] ॥२३-२४॥

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अथ विष्टरमभकलनुवादेन प्रवेशकलक्षणयति—

[सूत्र २१]—एवं प्रवेशको नीचैः परार्थैः प्राकृतादिना ।

अतौ प्रभृतकार्यस्वान्नाटकादिचतुष्पये ॥२५॥

एवमिति ‘अद्भुतनहस्य’ इत्यादि सर्वं विष्टरमभकलनुवादमत्रातिदिश्यते। केवतमलौ नीचैरेष पात्रे परार्थैः स्वद्यनाटकादिकार्येनिष्ठैरै पुनः स्वच्छृङ्खलैकतत्परैः ।

यथा—

"ग्रापात्त मिह भट्टदारियाए इत्यादि ।

[आज्ञासिमि भर्तृदारिकया इत्यादि । इति साकृतम]

प्रवेशकका लक्षण—

प्रथौपद्यशेपकोऽपे विष्टरमभकवे’ बाद दूसरा स्थान ‘प्रवेशक’ वा ‘प्रस्ताव’ है । विष्टरमभके जो कार्य बतलाए गए है प्राय वे ही सब कार्ये ‘प्रवेशक’ के द्वारा भी सम्पन्न किए जाते हैं । फिर भी उन दोनोंको अलग-अलग माना गया है । इसका कारण यह है कि प्रवेशकमें केवल नीच पात्रोंका प्रयोग होता है । और विष्टरमभकमे केवल मध्यम, या नीच और मध्म दोनों प्रकारके पात्रोंका प्रयोग होता है । विष्टरमभकमे केवल नीच पात्रोंका प्रयोग नहीं होता है । इस भेदके कारणवश आचार्य लोग

ग्रथ विष्टरमभके लक्षणका अनुवाद करते हुए प्रवेशकका लक्षण दिखलाते हैं—

[सूत्र २१]—इस प्रकार [प्रथमतः प्राद्धानहं श्राद्धोभे न दिखलाने योग्य त्रिकालवर्ती

ग्रथंको सूचित करने वाला] दूसरोंके लिए कार्य करने वाले [प्रयात्न स्वामी श्रादिकों प्राज्ञके श्रदुसार कायमें निमूक्त] नीच पात्रों [दास-दासी आदि] के द्वारा [समृद्धते मित्र] प्राकृत श्रादि [भाषाधमें श्रप्रयोग] से [नतस्यनयतातीतकालके ग्रथंक सूचित करने वाला] ‘प्रवेशक’

होता है । [इतना प्रयेसकका तथा हुासका] अधिक कायं [कि साधक] होनेके कारण नाटकादि

चारमे [पर्याप्त नाटक, नाटिका, स्करषा श्रोर प्रकरणी इन चारमे], इनायमभक या प्राद्धानहं

भागको सदिस करके हूवन करनकेलए विष्टमभ श्रोर प्रवेशक इन दोनों [प्रयोनसपेक्षों] का

प्रवेलम्भन किया जाता है ।२५।

इस प्रकार ‘एव’ इस पदसे ‘प्रजूरनहस्य’ इत्यादि विष्टरमभकका सारा लक्षण यहा

[प्रवेशकमें] सम्वद्ध होना है । [सकयधमंस्पान्त्यग्रोंगिसम्वद्धो प्रतिदेव । प्रत्ये धमंका प्रयत्न

समन्वय दिखलाना ‘प्रतिदेव’ कहलाता है । विष्टरमभकसे सारे धर्मोंका प्रवेशकमें सदा समन्वय

प्रदर्शान हप ‘प्रतिदेवा’ विसा गया है । उन दोनोंमे ग्रन्तर केवल इतना है कि] यह [प्रवेसक]

मेदल नीच और दूसरॉदे कायमें लगे हुए प्रायः मुख नायप प्रादिके कायमें तल्लीन, न कि

स्वप अपने वायमें लगे हुए पातो द्वारा [प्रयुक्त होता है] जैस—

मांसी कि स्वामिपुत्रोने ज्ञाप्ता दी है [तदनुसार में प्रमुब श्रापं हर रहो हू] इत्यादि

[नीच पात्र चेटो आदि द्वारा प्रयुक्त प्रवेशकका उदाहरण है] ।

इस प्रदार विष्टमभमें प्रवेशकमे एक मेद तो यह हमा कि विष्टरमभमें मध्मम

पात्रोंकि उपादान भी होती है और नीच पात्रोंका भी प्रयोग हर सकता है ।

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नीचप्रयुक्तत्वादेव च प्राम्यार्थप्रयोगेषु प्राकृतं, स्वादिशाब्दात् शौरसेन्यादिना प्रवेशको भवति। स्वप्रत्ययार्थान्तात् सामाजिकहृदये प्रवेशयतीति प्रवेशकः। केचित् प्रवेशकं प्रथमाङ्कस्यादौ नेकद्धा न्ति। एतावति विशिष्टमभक-प्रवेशकौ। नाटकादि चतुष्टयं नाटक-प्रकरण-नाटिका-प्रकरणय। नाटकादौ हि परिभावितोपायेन बहुपु मुख्यादान्तरकार्येणु नृपादीनां तनुग्रहायान्नां चामात्यादीनां डयुरूपत्ति। क्रियते इति स्वग्रैव प्रभूतमार्य-व्युत्पत्तिको विशिष्टमभक-प्रवेशको। मे ऽध्यायोगादिषु एकाङ्केषु ताचह्नुपयन्त्येव न लुप्तप्रायोऽपि। वह्नेरक्षैर्वपि समवकारस्य परम्परासम्भवदङ्कडुत्वात्, स्वपरे पान्तु ऋतिपय-दिनयुक्तत्वादिति। स्वकास्यादीनि तु स्वल्पसूचयत्वेन यथासम्भवं रूपकान्तरेतद्वपि भवन्ति॥२५॥

मे निर्दिष्ट रूपसे नीच पात्रोंके ही प्रयोग होता है। इसीसे दूसरा ग्राम्याविपयक भेद भी ज्ञा जाता है। विशिष्टमभके शकृत भाषा मुख्य रहती है किन्तु प्रवेशकमें प्राकृतभावाका ही प्रयोग होता है। इसको बातको आगे लिखते हैं— नीच [पात्रो] के द्वारा प्रयुक्त होनेके कारण ही ग्राम्य [ग्राम्येत] अर्थसे युक्त प्राकृतके द्वारा, स्वादि शब्दसे [जनमे भoi] शौरसेनी आदिके द्वारा प्रदर्शक [का प्रयोग] होता है। ग्रामो प्रवेशक शब्दकी व्युत्पत्ति दिखलाते हैं। ग्रामप्रत्यक्ष प्रयोजको सामाजिकों हृदयमे प्रवष्ट कराता है इसलिए ‘प्रवेशक’ कहलाता है। कुछ [नाटयाचार्य] लोग प्रयोग ढाकके आदिमे इस [प्रवेशक] का प्रयोग नहीं मानते हैं। [यह विशिष्टमभकसे इसका तीसरा भेद हुwa]। ‘एतदो’ श्रधात् विशिष्टमभक और प्रवेशक। नाटकादि चारमे [रहते हैं। इसमे नाटकादि चार नाटक, २ प्रकरण, ३ नाटिका और ४ प्रकरणी [इन चारका प्रकार करना चाहिए]। नाटकादिमे [ब्रंक रूप] परिमित साधनोके द्वारा मुख्य तथा गौणतर [गौण] कार्योका परितान राजा और उसके सहायक मन्त्री आदिको कराना होता है। इसलिए इनमे ही विस्तृत गौणांतर कार्योका परित्य करानेके लिए ये विशिष्टमभक और प्रवेशक [प्रयुक्त] होते हैं। ‘व्यायोग’ आदिकी एकाङ्की [रूपक] मे थोड़ा-सो हो क्याभाग होनेसे कम कार्य होने कारण [इन विशिष्टमभक और प्रवेशकोका प्रयोग] नहीं होता है। और अनेक अङ्कों वालोमे भी ‘समवकार’ के अङ्कों परस्पर सम्वद्ध न होनेसे, तथा अन्योमें कुल दिनका हो वृत्तान्त होने से [प्रवेशक तथा विशिष्टमभककी श्रावश्यकता नहीं होती है]। यह अभिप्राय है। १ प्रकारादि [शेष तीन प्रथोंपथेपक] तो प्रायः वृत्तके सूचक होते हैं। इमकानुसार] अन्य रूपकोंमे भी प्रयुक्त होते हैं। इस प्रकार इस लक्षणमे प्रवेशकके विरतभक तथा अन्य प्रयोगोंसे जो भेद दिखलाए गए हैं वे मुख्य रूपसे निम्न प्रकार है— १ विशिष्टमभक मे मुख्यपात्र भी प्रयुक्त होते हैं इसलिए शकृत भाषा भी श्राश्रय लिया जाता है। किन्तु प्रवेशकमे केवल नीचपात्र ही होते हैं इसलिए उनमे केवल प्राकृत भाषा का ही उपयोग होता है। २ विशिष्टमभका प्रयोग मुख्यत: प्रादिम भी प्रस्तादनाके साथ किया जा सकता है किन्तु प्रवेशकका प्रयोग प्रथम अङ्कमे नहीं होता है। ३. पदकाऽध्य आदि अन्य प्रयोगोका प्रयोग नाटकादिमे भी हो सकता है किन्तु

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श्रय श्रद्धास्य-चूलिके लक्षण्यति— [सूत्र २२]—श्रद्धास्पनतपात्रेषु छिन्नाद्भुप्रयोजनम् । वस्तुनः सूचनं चूला पात्रैर्नेपथ्यसंस्थितैः ॥२२६॥

श्रन्तपात्रेति पूर्वश्रद्धास्पन्ने स्त्री-पुंसान्यतरेषु पात्रेषु । दिन्नस्य श्रद्मवद्रूप उत्तराद्रुमरस्य योजनमुपचेपो यस्तत्न 'श्रद्धास्यम्' श्रेष्ठमुदम् । यथा वोरचित्ने द्वितीयाह्नान्ते— "प्रविश्य सुमन्त्र.—भगवन्तौ वसिष्ठ-विश्वामित्रौ भवतः सभार्गेवान्नाहयते इति । इतरे तु-स्व भगवन्तौ? सुमन्त्र —महाराजद्वारथस्याग्नितले । इतरे—तदनुरोधात्न तत्रैव गच्छाम् । इतयदूषमाप्तो—तत्न प्रवेशान्ति वसिष्ठ-विश्वामित्र शतानन्द-जनक-परशुरामा: ।" इत्यग्र पूर्वोदाहृते तत्र प्रवेशतेन सुमनःप्रपात्रेण शतानन्द-जनकप्रभृथैर्यार्थविनिर्देशे उत्तराद्रुमुसूचनान्न श्रद्धास्यमिति । निप्कम्भन गौर प्रवेदकस्य प्रयोग एकाकी न्यायोगादि गौर परस्परासम्बद्ध मृदूको वान्न सम्पवार तथाऽनुप्रवृत्त वाले प्रयोग स्पकभेदोंमें नहीं किया जाता है । श्रव प्राणो 'श्रद्धास्य' तथा 'चूलिका' ये दोनों लक्षण [एक हो कार्योको] करते हैं—

[सूत्र २२]—[मूखके म्रतमें हो प्रवृष्ट होने वाले] प्रतिनिपात्नके द्वारा [पूर्व श्रदृशे व्रसम्बद्ध] विच्छिन्न [प्रागले उत्तरवर्ती]प्र्रदृशके प्रारम्भका सम्बन्ध जोड़नेवाले 'श्रदृश्य' नामक श्रप्रयो-लेपक होता है] प्रोङ नेऽप्य स्त्रियत पात्रोंके द्वारा वस्तुकी सूचना 'चूलिष' [पहलाती] है ॥२२६॥

श्रन्तिम भानके द्वारा श्रप्रस्तुत पूर्व श्रदृशूके श्रन्तमे [प्रवृष्ट होने वाले] स्त्री या पुरुप किसी भी पात्रके द्वारा दिन्न श्रप्र्यत्न [पूर्व श्रदृशके साथ] व्रसम्बद्ध श्रप्रले श्रदृशूके प्रारम्भ [मुख] को जो योजना श्रप्र्यन्त उपक्षेप [बोजारोपण] करना वह 'श्रदृश्यास्य' श्र्रथान्न 'श्रदृश्युस' [कहलाता] है । जैसे महाभारत चरितके द्वितीय श्रदृशूके, श्रन्तमे— "प्रविष्ट होकर सुमन्त्र [कहते हैं कि]—महर्षि वसिष्ठ तथा विश्वामित्र, भागंव परशुराम सहित श्राप दोनों [शतानन्द और जनक] को बुला रहे हैं । श्रन्य दोनों—[जनक श्रोत शतानन्द] ये दोनों वहाँ हैं [यह पूछते हैं]? सुमन्त्र—[उत्तर देते हैं]—महाराज दशरथके समीप हैं । श्रन्य दोनों—उनको इच्छाके भनुसार हम सब वहाँ जाते हैं । यह श्रदृशूको [द्वितीय] समाप्तमे [प्राप्त है] । उसके बाद [प्रागले श्रदृशूके श्रारम्भमें] वसिष्ठ विश्नामित्र शतानन्द जनक श्रोरे परशुराम श्रप्रविष्ट होते हैं ।" इस उदाहररामें पूर्ववर्ती द्वितीय श्रदृशूके श्रन्तमे हो प्रवृष्ट होने वाले सुमन्त्र पात्रके शतानन्द श्रोरे जनकके वार्तालाप रूप श्रप्र्यनको विच्छित्न करके [प्रागले तृतीय श्रदृशमें] वसिष्ठ विश्नामित्र श्रादिके साथ होने वाले जनक शतानन्दके वार्तालाप रूप] श्रदृशूके प्रारम्भकी सूचना दी है [इसलिए यह श्र दृश्यास्यक श्रदाहरण है] ।

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वस्तुन' इति कस्यचिदर्थस्य सूचनमुपच्ञेपः । 'पात्रे:' स्त्रोपुंसक । 'नेपथ्यसंस्थितै:' यवनिकान्तर्देशस्थैरार्यभि: । सा चृद्धेव चृद्धलका । रज्ज्वाभनेयार्थस्य नेपथ्यपात्रोकते: शिर्यागालपत्वात । यथा 'उत्तररामचरिते' द्वितीयाड्कस्यादौ—

'वस्तुन' इति कस्यचिदर्थस्य सूचनमुपच्ञेपः । 'पात्रे:' स्त्रोपुंसक । 'नेपथ्यसंस्थितै:' यवनिकान्तर्देशस्थैरार्यभि: । सा चृद्धेव चृद्धलका । रज्ज्वाभनेयार्थस्य नेपथ्यपात्रोकते: शिर्यागालपत्वात । यथा 'उत्तररामचरिते' द्वितीयाड्कस्यादौ—

"स्वागतं तपोधनाया: । ततः प्रविशाति तपोधना ।"

श्रात्र नेपथ्यपात्रेपा त्रिलयां वामनिकया श्रात्रेयींवस्तुन' सूचनात चूलीखा । यथा वा 'नलोडवलासे' द्वितीयाड्कस्यादौ—

"स्वागतं सपरिच्छदाया कलहंसकस्य । ततः प्रविशाति कलहंसी मकरिकाप्रभृतिकरच परिवारः ।"

श्रात्र नेपथ्यपात्रेपा पुंसां श्रेषतरेषु कलहंसादिवस्तुन: सूचनात चूलीकति । यथा वा रत्नावलयां—

"च्रस्तापास्तस्मस्तभार्ग नभसः पारं प्रयाते रवौ श्रास्थानां समुचे सरं नृपजनः सायंतनं संपततु । सम्प्रत्येप मरोरहयुतिमुप: पादांस्तवासे वितु' प्रोत्पुरुष्पकृतो न शामुखयस्स्थेयो वोधिच्छते ।"

यद 'चूलीकास्य' का उदाहरण दिया है इसमें 'छिन्नाड' पद विशेष रूप घ्यान देने योग्य है । इसी पदके द्वारा चूलीकास्य भ्रोर मुख्वावतारका भेद होना है । चूलीकास्यमें प्रथला मचू पूर्वं चूलीकसे ग्रभिनव रपमें प्रारम्भ होता है भोर मुख्वावतारमें पूर्वं चूलीके श्राग रपमें हो नया चूलीक प्रारम्भ होता है । यहा इन दोनोन्में भेद है ।

'वस्तुन' श्रर्थान किसि श्रर्थकका 'सूचन' श्रर्थान्त उपक्षेप करना । 'पात्रं' श्रर्थान्त स्त्रीपुष्पोके द्वारा । 'नेपथ्यसं्थितै:' श्रर्थान्त यवनिकाके भीतर स्थित 'चूलीक' श्रर्थान्त निसाके समान होनेसे 'चूलीका' है । कयोंकि नेपथ्यकी उन्ति रज्नुंमें रभिनय किए जानेवाले श्रर्थकी शिरसाके समान होता है । जैसे उत्तररामचरितें द्वितीय भ्रङ्कके प्राप्तिमें—

[नेपथ्ये] तपोधनाका स्वागत है ।" इसके बाद तपोधना प्रवेश करती है ।" इसमें नेपथ्यमें स्थित वासनिककृत श्रव स्त्रोपात्रके द्वारा ग्रात्रेयीं रूप वस्तुके सूचित होनेसे यह 'चूलीखा' [कला उदाहणराग] है ।

"तत्परिवारवार वसहसकका स्वागत है । इसके बाद कलहंस श्रोर मकरिका श्रादि परिवार सहित होता है ।" इसमें नेपथ्यवर्ती 'नेकर' नामक पुरुपपात्रें द्वारा कलहंसादि वस्तुनें सूचित होनेते 'चूलीका है ।

प्रथवा जैसे रत्नावलीमे—[प्रथम भ्रङ्कमें]—

"धपनी समस्त प्रभाोे प्रथताचतपर वितेरकर, मूयंके प्राकारके पार पते जानेपर, रात्रिकालके समय सभा-मण्डपमें एक साथ प्रवृष्ट होते हुए सारे राजा श्रलंलोंकी कान्तिकां हरने हाने [प्रर्थात् कमलोंके समान मुदर] श्रोर प्रतत्पत पाननद [प्रोत्कुल्यप] को प्रदान करने वाने [वरदराज्ञो किरणोंके समान वमतत्नशोभाप्रहारो श्रोर प्रातःप्रभाकर] सतत उदयकोस घद्रमाेके पदोने समान प्राप्त उदपन' के [पादों] चरणोंकी सेवा [उपारना] करनेश्चि

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इति नेपथ्यपात्रेप्रेक्षा वचिद्ना काननरयस्योदयनवस्तुनः सामारिकं प्राति सूचनात चूलिका ॥२६॥

[सूत्र २६]--मोदूघाततारो यत् पात्रैर्गत्पान्तरमक्षचनम् । पात्रान्तराभावेन प्रयैवात्रस्य पात्रेरविच्छिद्नार्थेतया सूचनीया र्थस्याभाषात प्रवेशक-विप्कम्भक सूचनानुरहितमद्रान्तरं भवति, स द्वितीया डघाततारषा डवतारः । यथा मालविकाग्निमित्रे प्रथमेडङ्के-- "वितृपत्नः- तेन हि दुवे वि देवोण पेक्खागिहं मज्झम गीओवक्खरं गहिव तत्थभवदो दूइं विसज्जेय । श्रथवा मुत्तें गमदो हियेय जं उत्थावइमदि । [ तेन हि द्वारवि देव्या: प्रेक्षागृहं मध्यम गीतोपक्षरं गृहीत्वा । तत्थभवती दूती विसर्जयेताम् । श्रथवा मुहूर्त्तमद्रशब्द एव तमुत्थापयिष्यति । संस्कृतम् ]" इत्थुपक्रमे मुद्रद्रशब्द श्रवणानन्तरं तान्येव सर्वोत्तमा पात्राणि द्वितीया डघावतारमनते इति । श्रनये तु यथादृष्टे श्रन्यादृशानां वीक्ष्यतत्परो डयोंडवतार्यते तमद्रावतारमात्रन्निन्ति । यथा रत्नावल्यां द्वितीयो डङ्कः । तत्र हि-- यहाँ नेपथ्यवर्ती चारण हप पात्रके द्वारा सागरिकाके प्रति उदयन रूप वस्तुके पूचनते चूलिका [ बनती] है । इस प्रकार इस एक हो कारिकास्मे प्रय्यककारने 'ग्रद्घमुख' ग्रोर 'चूलिका' इन दो श्रयोंपेक्षपोके लक्शशण सुन्दरताके साथ प्रस्तुत किए हैं ॥ २६॥

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"ईदृशस्तु कनकावयवैः प्रदीपे चैव वरे श्राहिलासेव मोदृढचं । [ईदृशमय कनयारत्नश्रदंश एव चरेडशिलापेषा भवितव्यतन्यम् । इति सच्चवम्]" इत्यादिकोऽनुसारेण लक्ष्य सर्वाङ्गानामर्थ इति । यथ च गर्भाङ्कोड्यते

यदाहु - "श्रदृष्टरेव चादौ निपतति यस्मिन् प्रयोगमसाध । वाचाथयुक्तोयुक्तो गर्भाङ्को नाम विधीयते ॥" इति । यथ त्रिक्रमकादीनां विषय-व्यवस्थामाह -

[घृत २४]—श्रादौ दृश्ये वह्नावन्ये क्रमादल्पे तरे तमे ॥ २७ ॥

तर-तम-प्रतयोर् नान्तरीयकतया सन्निधानाच्चाल्यशब्दन प्रकृतिमात्रपंव, सेनाल्पतरे श्राल्पतमे इत्यर्थः । 'चन्द्रोडनुरोयाच्च' प्रययानुसारेऽन्वेष्टव्यः । 'धन्ये' श्रदृष्टय-चूलिका-श्रदृष्टतारः । 'भ्रमदिति लड्लट्क्रमेऽपि' 'वह्नौ', बहुले च सूत्रे श्राद्यौ त्रिक्रमभक प्रवे शको । 'चल्पे' श्रल्पकाले चाद्यास्त्रय, श्राल्पतमे श्राल्पतमकाले चाद्यावतार इति ॥ २७ ॥

जाते हैं उसके 'श्रदृष्टात्तार' कहते हैं । जैसे रत्नावलीमें दूसरा श्रदृष्ट [इनके मतसे श्रदृष्टावतार का उदाहरण है] वनता है । यहाँ क्योंकि उसमें - "इस प्रकारके वनातलका हत्स प्रकारके व्ररमें हो प्रथमतः होना चाहिए" इत्यादिसे सब श्रदृष्टोका [वोजभूत] भ्रतुराग रूप श्राद्यं [प्रदर्शित किया गया है] हत्स लिए [यह त्रितोयादि हो श्रदृष्टावतार मानर जाता है] । द्वसोफो [लोग] 'गर्भाङ्क' भी कहते हैं ।

जहीं प्रयोग [कि श्राद्यसर] हो प्राप्त करके श्रदृष्टुपे भीतर हो वीजायं श्रोत युक्ति सहित नयोन श्रदृष्ट [उससे प्रविच्छिन्न स्वपसे] मारम्म हो जाता है उसका 'गर्भाङ्क' नामसे सम्भवना चाहिए ।

विप्रक्रमकादिही विपय-व्यवस्था—विधीयसी करिष्यामो विततं यथा, प्रधानं प्राथे पच प्रथारने प्रयोगसेपवर्गोऽपि वग्नं क्रिया था उनके विपयका उल्लेख करते हुए २७ वाँ परिणामिक उत्तरार्ध भागम इसकल प्रयोग कनु कब करना चाहिए हम त्रिप्रक्रमादिव्यवस्थाका निर्देश करते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं—प्रच विप्रक्रमक प्राथिको त्रिपय-व्यवस्थामको कहते हैं--

[सूत्र २७]—चूचत प्रोत यह्नास-स्थापो [पयंशे] सूचनोय होनेपल प्रादिके दो [पर्याय विप्रक्रमभो मोत प्रवे शदचा प्रथोग करनो चाहिए] घोर प्रथप, मल्त्पतर एव प्रथपनस [पर्याये सूचनोय] होने पर कमसे [प्रद्याय, चूलिका श्रोत प्रदृष्टात्तार हप] प्रथोग कस्ता चराहिए । २७ ।

[वार्तिकमें दिए हुए] तर, सम दोनोऽ प्रतयप [प्रथनिरपे बिना न रह सानेकी बातस्य] अपेक्ष्याभूत होनेसे प्रोद सना नहित होनेसे भरतरा 'प्रत्य' नामसको भरति हपने मारोपित कर सेते हैं । हत्सालिए मल्त्पतर प्रोद प्रथपनम यह प्रथय हो जाता है । [मूल भरितकामे] चन्द्रे अनरोप कस्ता [मल्त्पतत प्रथपनस न चहचर देवत तर तम द्वार) प्राप्यते भनुरोध कस्ता निवेदित किया गया है । [वार्तिकमे ग्राए हुए] 'प्रत्य' [पर] हो प्रद्याय, चूलिका प्रोद पदृ-

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वीजं पताकां प्रकृरी विंदुं कायं यथारुचि । फलस्य हेतुं पञ्च चेतनाचेतनात्मकाः ॥ २७ ॥

उपायस्वरूपपरिज्ञाने तद्विप्रयुक्तामारम्भादीनां स्वहुपपरिज्ञानासंभव इति उपायस्वरूपं नयत्प्रधानम् । 'प्रयत्नारम्भ' इति नैषधीयेशिको निधनस्थकम् । सर्वेपामवश्यम्भावित्वं वा । 'फलस्य' मुख्यसाध्यस्य 'हेतव' उपायाः । इह हेतुद्विधा श्रचेता च श्रचेतनश्च । श्रचेतनोऽपि मुखयभेदाद्द्विधा । मुख्यो बीजम्, तन्मूलत्वादितरेऽपि । श्र्रमुख्यस्तु कार्यम् । चेतनोऽपि द्विधा मुख्य उपकराऽभृतश्च । मुख्यो वतारः [का श्रारम्भ होता है] । 'क्रमात्' इस पदसे लशरके क्रमसे [श्रद्धास्य झलिका भङ्गावतारका प्रारम्भ करना चाहिए । स्वेच्छया नहीं यह श्रभिप्राय है] । बहुत तथा बहुकाल व्याप्ती [प्रयंके] सूचनोय होनेपर ग्रादिके दो श्रप्रयांत् विक्रमभक श्रोर प्रदेर्शक [प्रयुक्त होते हैं] । फलप भोर फलप्रकालीन [प्रयंके सूचनोय] होनेपर भ्रद्धावस्थ, [उससे शीघ्र कम] फलप्तर श्रोर फलप्तरकालीन [प्रयंके सूचनोय] होनेपर झलिका, तथा [उससे भी शीघ्र कम] फलप्ततम श्रोर फलप्ततमकालीन [प्रयंके सूचनोय] होनेपर भङ्गावतार [का प्रयोग किया जाना चाहिए] यह श्रामिप्राय है । २७ ॥

[मूल २८]—१. बीजं, २ पताका, ३. प्रकृरी, ४. बिंदु श्रोर ५. कायं [पताका प्रकरो श्रोर विन्दु ये तीन चेतन तथा बीज एतद् कायंको दो प्रवेतेन इस प्रकार] ये चेतन भ्रचेतनात्मक फलके हेतु पांच ['उपाय' कहलाते हैं] [उनका] अपनी रचिके अनुसार [प्रयुक्त] करे ।२८।

उपायोंके स्वहुपका जाने बिना उनके सम्बन्धमें श्रारम्भादिके स्वहुपका परिज्ञान भी प्रारम्भ है, इस लिए 'उपायोंके स्वहुपका परिचय करवामा जा रहा है । [कारिकामें प्राए

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विन्दु, कार्योfमनिधानलुप्तवाच् । उपकरसाभूतो द्विधा (१) स्वार्थसिद्धयादियुत: परार्थे सिद्धिपर, (२) परार्थंसिद्धिपरश्च । पूर्व: पताका, अन्यमकरोति । अत्र चाचेतनचेतनानं मध्ये योजविन्द्रोfस्त्यत्रमू, सर्वंकथ्यापतिवादिति ॥२५॥

[सूत्र २६]—स्तोकोदित: फलप्राप्तो हेतुर्जी प्ररोह्यताम् । श्रादौ गभोरेरवादलोfपि चिप्ता मुख्यफलावसानस्च यो हतुमु स्वसाध्यो-पाय., म धान्येनोfजवदु 'वीजमू'। 'प्ररोह्यताम्' उत्तरत्र शासोपशासादिभिविस्तर-पात्र। इदं च श्रासुराजनतरं निवध्यते । योजं हि नाटकराजीनामितिवृत्तार्थस्योपाय । श्रासुरपु तु रूपकप्रस्तावनार्थं नटस्यैव वृत्तमू । यथा पुनरत्र नाटकार्थेsपुशो नटोक्त-यस्ता: प्रयोगपातनिरोधमेव । श्रतं पच श्रासुरोक्ता स्वप्न योजोक्ततय: प्रदृष्ट-नाटकपात्रेषु पुनरुच्यते । तथ च रसतावल्याम—

'यथारसति' इस [पद] से [यह सूचित किया है कि] कि प्रोद्दीनक [प्रप्राप्त जिस कमसे उनके यहाँ पढा गया है उसे] कमसे [नाटकमें] उनका प्रयोग-क्रम [प्रेप्सित] नहीं है । और न सब [पाँचो उपायों] का [प्रयपरिहार्यंत्व [प्रेप्सित] है । [प्रयत्न सवं या नाटककार अपने श्रादौदृष्टिको ध्यानुसार उनमेंसे रहनोको और किसे भी कमसे प्रयोग कर सकता है] । 'फल' [प्रप्राप्त 'नाटकके] मुख्य साध्यके 'हेतु' उपाय [हलाते] हैं । ये हेतु भी मुख्य तथा प्रमुख्य भेदसे दो प्रकारका होता है । मुख्य [प्रवेतन हेतु] 'बीज' [हलाता] है । योंsपि प्रन्य सब उसके श्राभित होते हैं । प्रमुख्य [प्रचेतन हेतु] 'बिन्दु' [हलाता] है । चेतन [हेतु] भी मुख्य और उपकरसाभूत दो प्रकारका होता है । मुख्य [चेतन हेतु] कार्य-निधान रूप होनेसे 'विन्दु' [हलाता] हैं । उपकरसाभूत [चेतन हेतु भी] दो प्रकारका होता तत्पर । [इनमेंसे] पहिसा [प्रप्राप्त स्वार्थसिद्धियुक्त होनेके साथ परार्थंसिद्धिपर चेतन साधन] 'पताका' । और [एवंल परार्थंसिद्धिपर] दूसरा [चेतन साधन] 'प्रकरी' [हलाता] है । इनमे से [भी] प्रचेतन तथा चेतन [साधनों प्रोक्त उपायों] मेंसे [कमस ] बीज प्रोक्त [नाटक-श्रथी माल्यान-यस्तुमे] सर्वश्र ध्यापार होनेसे मुलपत्ता है ॥२५॥

[सूत्र २६]—[प्रादिमें] सूक्ष्मतरूपसे बहा गया प्रोक्त [प्रप्रतमें] फल रूपमें पपंचत होनेबातर [मुख्य प्रचेतन] हेतु [उसके बीजने समाप्त दाला श्रादि रूपसे] विसृत हो जानेबे 'बीज' [हलाता] है । [नाटकके] प्रारंभमें, [गभीर] दुतों होनेमे मुख्य फलमें समाप्त होनेबाला जो हेतु, मुख्यसाध्य उपाय है वह पायने बीजने समाप्त दाला श्रादि [रूपसे] विसृत हो जानेसे 'बीज' [हलाता] है । [निरंतरने प्राप्त हुये] 'प्ररोह्यात' [पदका परिभाषा] 'श्रामा-ग्रानामा रूपमें पंस जानेबे' यह है । [नाटकके रचनामें] प्रामुख्य [प्रयायनता] ने वय हत [बीज] को पहचते हैं—

होनेवातर [मुख्य प्रचेतन] हेतु [उसके बीजने समाप्त दाला श्रादि रूपसे] विसृत हो जानेबे 'बीज' [हलाता] है । [नाटकके] प्रारंभमें, [गभीर] दुतों होनेमे मुख्य फलमें समाप्त होनेबाला जो हेतु, मुख्यसाध्य उपाय है वह पायने बीजने समाप्त दाला श्रादि [रूपसे] विसृत हो जानेसे 'बीज' [हलाता] है । [निरंतरने प्राप्त हुये] 'प्ररोह्यात' [पदका परिभाषा] 'श्रामा-ग्रानामा रूपमें पंस जानेबे' यह है । [नाटकके रचनामें] प्रामुख्य [प्रयायनता] ने वय हत [बीज] को पहचते हैं—

बीज नाटक इनियुक्त [मुख्यान-यतु] को उपाय [हीन] है । [fिन्नु] पापुस तो पतथो प्रयुक्त भरनेकेलए नटतर हो ब्यापार [वृत्त] है । [पर्याप्त

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"दीपादन्यसमादपि मध्यादपि जलनिधेरिंदुशोभितयन्तात्‌। पानीय मृणालतति घटयाति विविधिरभिमतमभिमुखोभूतः ॥"

ग्रामुख-भागका नाटककी मुख्य ग्राश्रयान-वस्तु या इतिवृत्त क्या ग्राश्रयके साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता है]। इस [ग्रामुख] मे जो नाटकके मुख्य कथानक भाग [कथ्यं] को स्पष्टं करनेवाली नटोंकी उक्तियाँ होती हैं वे प्रयोगको श्रव्यतरिश्रवणकेलिए हो होती हैं [मुख्य नाटककी श्रृङ्गारादि रसोंको उक्तियों होते हैं ये प्रयोगको दृश्यतरोपयोगिकेलिए नहीं होती है]। इसीलिए रत्नावलीमें— "अनुकूलताको प्राप्त हूया [प्रभिमुखोभूत] देव, अन्य दीपसे, सागरके वीचसे और दिशाओंके छोरसे भी अपने श्राश्रित श्रयंकों लाकर मिलादेता है ।" ग्रामुखमे कहे हूए [नाटकके कथाभागको स्पष्टं करनेवाले] इस [श्लोक] को [ग्रामुख के बाद प्रवष्ट हूया नाटकका पात्र] योगन्धरायण फिर पढ़ता है ।

रत्नावलीके ग्रामुखमे नटोंने नटसे यह कहा था कि मेरी एक ही लहककी है तुमने बड़े दूर देशमें उसका सम्बन्ध पक्का कर दिया है । पता नही इतनी दूरसे श्राकर वह कब मेरी लडककीका पाणिग्रहण करेगी । मैं तो इसी जिन्दगिमे मरी जा रही हू । इसलिए मेरा मन गाने-बानेको नहीं करता है । इसक उत्तरमे नटने इस श्लोकको कहा है । उसका भाव यह है कि तुम चिन्ता क्यो करती हो। भगवान्के श्रनुकूल होनेपर वे तो दूसरे द्वीपसे, समुद्रके मध्यसे और दीश्राओंके छोरसे भी श्रभिमत श्रयंकों लाकर मिला देते हैं । तब यह कार्यं भी पूरा होगा ही । क्योकि मैंने तो भगवान्की प्रेरणासे हो यह सम्बन्ध पक्का किया है । इस प्रकरण यह इलोक मुख्य हूपसे नटोंकी [चिन्तानिदान्त्तिकेलिए नटके द्वारा कहा गया है । किन्तु वह प्रकृत नाटककी कयावस्तुको स्पष्टं कर रहा है । इस नाटककी नायिका रत्नावली सिंहलेश्वरकी पुत्री है । किसी ज्योतिपीने इस नाटकके नायक राजा उदयन को उनके मन्त्री योगन्धरायणको बतलाया था कि सिंहलेश्वर्की पुत्री इस रत्नावलीके साथ जिसका विवाह होगा वह चक्रवर्ती साम्राज्यको प्राप्त करेगा । इस लिए उदयनकी प्रोरसे योगन्धरायणने उसके पिता के सामने वासवदत्ताके मर जानेके समाचार फॅंता देनेके बाद वही प्रस्ताव फिर रखा । किन्तु उस समय उदयनकी रानी वासवदत्ता विधमान थी जो दूरके सम्बन्धमें रत्नावलीकी बहिन लगती थी । सिंहलेश्वरने यहू सोवकर कि इस जाहसे रत्नावलीकी वासवदत्ताको वलेग होगा——उस प्रस्तावको ग्रस्वीकार कर दिया । कुछ समय बाद योगन्धरायणने वासवदत्ताके मर जानेक समाचार फॅंता देनेके बाद वही प्रस्ताव फिर सिंहलेशवरके सामने रखा । द्वि० बार से सम्बन्ध करनेके लिए तैयार हो गये । उस प्रसङ्गमें रत्नावली सिंहलसे भारत ग्रा रही थी । उसका जहाज डूब गया । वह जेसे-तैसे किसी काठ के सहारे बचकर उघरसे श्रानेबाले व्यापा-रियोंके द्वारा योगन्धरायणके पास प्राप्त हुई । योगन्धरायणने उसे श्रपनी बहिन बतलाकर रक्षाके लिए राजमहलमे रानी वासवदत्ताके पास कुछ दिनोंके लिए रख दिया । यह कन्या सागरसे प्राप्त हुई थी इस लिए इसका नाम भी 'सागरिका' रख दिया था । कन्याको वासवदत्ताके श्रपनते पास रख तो लिया किन्तु उसके ग्रपूर्वं रूप लावण्यको देखकर वह बड़ी सशङ्क हो गई कि वही राजाकी दृष्टि

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सत्त्वैकतानवृत्तीनां प्रतिज्ञातार्थकारिषाम् । प्रभविष्णुर्गुणैर्देवोऽपि कि पुनः प्राकृतो जनः ॥

इत्यादि सुवोक्तं हरिश्चन्द्र पठति । यथा वा श्रुतमदुपद्न एवं 'यादवाभ्युदये'-उदयनाभिमुखीभूयमीक्षा सम्प्रवर्त्येध विपत्सु यः । उदवलितानले प्रपात- कनकस्य हि तेजसो युज्यते ॥ इति नाटकपात्र गुप्तमन्य पठति ।

इस पर न पड जाय । इस लिए वह बडे यत्न पूर्वक राजा उदयनकी दृष्टिसे उसको बचाए रखनेका यत्न करती थी । किन्तु राजमहलमे रहकर यह कब तक सम्भव था । प्राखिर राजा के कानो तक उसके षड लावण्यकी चर्चा पहुंची ही । और फिर सब प्रकारके उपायोंका अवलम्बन करके राजाने चसका साक्षात्कार करने और अन्तमे उसके साथ विवाहू करनेंमे सफलता प्राप्त कर ही ली । इस क्रमसे धनुर्वेदवाने सिंहल नामक दूसरे द्वीपसे, समुद्रके मध्यसे और दिशाओं घोरसे रत्नावलीको लाकर उदयनके साथ सम्बद्ध कर ही दिया । इस प्रकार मामुख्य मे जो यह इलोक केवल नटीकी सान्त्वनाके लिए कहा गया था वह नाटककी मुख्य कथा वस्तुकास्वर कर रहा है । इसलिए प्रामुख्यकी समाप्तिके बाद जब नाटकके पात्रके रूपमे उदयनके मन्थी योगन्धरायण रत्नावली पर प्रवृष्ट होते हैं तो किर वे इस इलोकको दोहराते हैं ।

मामुख्य मे बडा हृदय यह इलोक मुख्य कवाभागका स्पर्श करनेवाला होनेपर भी नाटोकिमात्र था, नाटकवा भाग नही । इसो लिए मुख्य नाटकसे सम्बद्ध करनेंके लिए योगन्धरायणके द्वारा जसका पुनः पाठ दिखलाया गया है । इसो प्रकारके और उदाहरण भी आगे देते हैं ।

दैवत सत्त्व-प्रधान वृत्तियों धारों और प्रतिज्ञात प्रयंकों [निद्दिष्ट रूपसे] पूरां करने वाले [कि नायकोंने समय समयोपरि वर्म्मा [सम्पत्ति] को प्राप्त किया है] कासो [कि मामुख्य वाथा द्रलिमुज] के लिए देव भी समर्थ होते हैं फिर प्राकृत [लोकरिक] जन्तु सो बात हो क्या ?

प्रयववा जैसे 'सत्यहरिश्चन्द्र' [नाटक] मे-प्रामुख्य मे कहे हुए इस [इलोक] को [नाटकके पात्रके रूपमे प्रविष्ट हुम्रा] हरिश्चन्द्र [फिर दुबारा] पढता है ।

प्रयववा जैसे हमारे हो बनाएं हुए यादवाभ्युदय मे-उननतिको और प्रगतिशील पुरुषयोंकी विपत्तियों भी उनके सम्पद [सम्पत्ति] पें लिए हो होती हैं । सेनेका प्रथ्वलित वन्हिमें पड़ना भी उसको कान्तिश्रो बढानेबाला होता है । [प्रामुख्य मे प्राप्त हुए कवि स्पर्शो इस योगभूत इलोकके] गुप्तमन्न [नाटभर पात्र फिर] पड़ता है ।

ये तीनों इलोक उक्त-उस नाटकवने प्रामुख्य मे जिस प्रथद रूपमे वह गए हैं कि 'यु उनके द्वारा मुख्य नाटकव प्रास्यान वस्युो सादित हृदय मूर्छित करनेवाली रटिये हो उन इनेपम इलोकों

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तत्र यो जं रचयितृ नयापाररुपम् । यथा रत्नावल्यां वत्सराज जसय रत्नावती-प्राप्तिद्दे तुरनुकू लतदैव. सगिरिकान्तःपुरनिद्देषादियोंगन्धरायाक्य नयापारः । करचित्तु व्यसननिर्वृ त्तिफले रूपके व्यसनोपच्तेपारुपम । यथा 'मायापुरुपके' शाप प्रविश्य वचनक्रमेपाह- कैकेयी कव पतित्रता भगवती कवैषंविधे वाञ्छति धर्मात्मा कव रघुव्रहः । कव गमितोडरएयं स जातायोज्जः । कव स्वचछो भरत- कव वा पितृघ्नान्मातृराधिंकं दृश्यते किं कृतवैति कृतो मया दशरथे वध्द्ये कुलस्य तस्मैः ॥

प्रयोग करता है । परन्तु गामुख भागमें प्रयुक्त इस प्रकारकी उक्तिको बीज नही माना जाता है । गामुखके बाद बीजका ग्रारोपणया होता है । इसी लिये गामुखकी समाप्तिके बाद मुख्य नाटकका जो भाग रज्जुमखपर ग्राता है उसके द्वारा इस प्रकारकी उक्तियोंको पुन कहलाकर नाटककार बीजका प्रारोपण करता है । यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है । यह बीज रूप उपाय, नाटकोके प्रारम्भ-वस्तुके घनुसार विभिन्न रचना होता है । नाटकका प्रवसान जिस रूपमें होना है उसीके घनुसार नाटकके प्रारम्भमें उस उस बीज-रुपसे पहिला उदाहरण रत्नावली नाटिकासे दिया गया है । रत्नावली नाटिकामें जंसाकि पहिले कहा जा चुका है सागरसे प्राप्त हुई रत्नावलियोंको योगन्धरायणने सारिका नामकी हपनी वध्दिन कहलाकर उदयनमें राजमहलमें वासवदत्ताके पास रख दिया है । यहे इस्सा बीज भाग है । इसौके द्वारा वत्सराज उदयनमें धीरे चले कर रत्नावलोकी प्राप्ति हो सम्भे है । यह बीज योगन्धरायणका व्यापार-रूप है । इसी बातको ग्रागे लिखते हैं— जोर यह बीज यहाँ व्यापाररूप होता है । जैसे रत्नावली [नाटिकामें] वत्सराज [उदयन] को रत्नावलेश्रो प्राप्त करानेवाला देवकी पुत्रकुलतसे युक्त साररिकाका मन्त्र पुरमें [वारवधदत्ताके समीप] रखते भारिका योगन्धरायणेनापुरं ध्यापारः । इस प्रकार रत्नावलीमें योगन्धरायणका व्यापार बीजभूत चपायकके रूपमें प्रयुक्त हुवा है । इसमें रत्नावलेश्रोकी प्राप्ति नाटकका अन्तिम फल प्रोत्प है । इस लिए रत्नावलो- ग्रन्थ मथ गुरू-निलेश 'उत्स इति हेतोः' 'बीज' है । 'इतस् नाटकेऽसौ द्विप्रकृतिस्थोऽपि त्रिवृतित मान्यन वस्तुन चरम फल ग्रमोष्ट होना है उसमें उस द्विप्रकृतिस्था प्रारम्भ हो 'बीज' इस उपायके हपमें प्रस्तुत किया जाता है । इसक उदाहरन ग्रागे देते हैं । वहाँ, जंहॉ [नायकपर् प्रानेवाली विटसि] विपत्तिस्था निवारण हो [नाटकका मुख्य] फल है । उस नाटकमें विपत्तिका प्रारम्भ [बीज रूपमें प्रस्तुत किया जाता है] । जंसी 'माया-पुषक' [नाटक] में 'पयागुप्तुमारकेन पथके वाद उसने धन्ये मातृ-पितृ द्वारा वसारपं दिय हुपा] शाप [मानस षप्में] प्रविट होकर वचनप्रमत्ते [नाटकके भावीो मालान-दतुनः] करता है—

नटी तो पतित्रता भगवती गे नंदेधी घोर नटी ! इस प्रकारस यनोल्ले विप [उदमन], नटी परमात्मा सानघरार पौत्र नंदो नंदो हरिो पौत्र भारधे, ग्राम कुलो] सेना ज्ञात्वा, हरि सख्खु हतप भरत घोर बहू पितारे यपरे ष्हारए मात्रासे भी पधिक प्रचालित गमागपे

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कवचिद् द्वयमनोज्ञयोरनुज्ञेयपरुषम् । यथा ‘तापसवत्सराजे’ मान्यकक:- "श्रमरणोऽपि पचं ममिता श्रपथ्योऽपिकृतनामारंते ए वईं श्रायासितो ! पथ्युदं च शेषा नमततामसेधि सद् संपधारिय सामभत्तोए मर्दावह्हवस्स य श्रागुन्तवं" इत्यादि ।

[श्रमात्योडन्येवं स्त्रामिना श्रातमन. प्रतीकृतमाचरता हृद्मायासितः । प्रभुत्व चानिते नक्खइवेमित्ते । सद् मेहावीर्ये समासमत्त्या मादाविमहस्सय चाउत्थप्पं । हति मं कुनाम] ।

कवचिद् द्वयमनोज्ञोपतिपाते तनिनकुसुमवक्रमलप्पम् । यथा मुत्ताराजाच्चसे चाग्गम्य:- "श्रः क पप मथि स्थिते चंगुणतमिभविचतुमिन्द्धंति & नंदकुलयलसुज्जइ गोपानलयहलहूमलताम । श्रलालप वध्यमाने वध्य ये तेंड्घाति शिरामें ॥ इत्यादि नायक प्रतिनायक-श्रमात्ययोधेया विचित्तपो वीओपणयाम त्ति ।

[प्रथवा माताके द्वारा हु करेजे] भोग रह्या है । [मुख गोपके द्वारा] हंवंस दसरथके होइ वध्य होने पर भो मैंने यह सारे कुलटा विताण रथ्यों कर डाल्या । कहों यवन तथा वसुमतिपा [प्रथवी बहुत होनहारके वलवान या विपत्ति श्रारे उसके बाद प्राप्त होनेवाले श्रानन्दपदापं प्रदर्शंत जिस नाटकको मथ्या वस्तुमें किया गया है उस प्रकार के नाटकमें] दोनोका [योन हवंपे] उपक्षेप [होता है] जंसे तापसवत्सराजचरितमें मान्यकक [प्रविष्ट होकर कहता है कि]-

इस प्रकार स्वामीने [वत्सराज उदयननरे] स्वयं अपने प्रतिकूल प्रारच्तरए करणसे श्रमात्य को भो श्रमांत वचट दिय। । किंतु उस [श्रमात्य योगनपराए] ने स्वामिभकिन मोर अपने युधि-यंभकके प्रथमुप [दूसरे मंश्री] मंथवान् मियंकें साथ विचार घर [कायंक] प्रारंभ कर दिय। । वहीं [प्रारंभमें नायकके ऊपर] विपत्तिकं श्राने [को तनमायना होने] पर उसकी निस्रुंतिका उपत्रम [योग रपंमे प्रस्तुत किया जात। । है] जंसे मुत्ताराजासमें धारारय [कहता है]-

श्ररे मेरे रह्ते यह कोन चंडालिक्को यलपूरवंक प्रभिभूत करना चहता है ? यह कोन मृकुंड प्रविभावयां [यप्प क] नंदकुल [को विनाशा करनेयालो, उस्] मरे कालो नारिन रुप मोर [मेरे] प्रचंड केपानतक्फो नीली घुमरेस रप मेरी शिपाकों पाज [नंदकुलवा नाल हो जनेपर] भो यंवने नरों देना चहता है । इत्यादि । [इस प्रकार] नायक-प्रतिनायक श्रामात्य प्रादिर्ने श्राधवे [नाटकमें] योजनां मारोपए नाना प्रकारसे किया ज सपना है ।

मुत्ताराजसं राक्षस मोर मलयवंतु मिलकर या चंगुणतों राजद्युत मरणेसि योजना बना रहे हैं । नंदकुलवइ [विनाश कर चालगययं हूं । चंडगुप्तो राजा बनायो है । द्मलिं जंव उमे यह मालूम होआ१ है कि मलयवंतुंमे साथ मिलकर नंदकुतवा पुरान मंनो राख्खस चंडगुप्तको राजद्युत करना वाहाना है तंव उसने यह दंनोक म्हा है । यहो दंनोक मुत्ताराजासं नाटकवा बोझभूत है । द्मोने दार्ता श्रमात्यादिकों हवंमे द्वाग वदालागमें चाग्गपए मथ्या राजास दोनो'े प्रकतोत्पा परित्यम मिलता है । उमका परिणाम भंतेम राजासो चालुपपो प्रारम-समर्पा होतां है ।

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पताका-निरूपण—

इस कारिकाके पूर्वार्द्ध-भागमें बीजहप प्रशम उपायका वर्णन किया गया है । अम्र उत्तरार्द्ध-भागमें पताकाक रुप दूसरे उपायका वर्णन प्रारम्भ करते हैं । जेमां कि ऊपर कहा जा चुका है, पांच उपायोंमें चेतन तथा अचेतन भेदसे दो भागोंमें विभक्त किया गया है । पांचों साधनोंमेंसे बीज तथा कार्यरुप रुप दो उपायोंको अचेतन साधनोंमें और शेष पताका प्रकारों तथा नायकोंके चेतन साधनोंमें जिनका जिक्र आगे है । पिछले प्रकरणमें ‘बीज’ रुप अचेतन साधनका वर्णन किया था इस लिए सामान्यतः उसके बाद दूसरे अचेतन साधन ‘कार्य’ का वर्णन करना चाहिए था । किन्तु मूल कारिकामें ‘बीज’ के बाद पताका’ का नामत कथन या उद्देश किया गया है । इसलिए उद्देश क्रमसे ही उनके लक्षणा करना उचित मानकर ‘बीज’ के बाद ‘पताका’ का सक्ष्षण किया गया है—पांचों उपायोंका नामत कथन या उद्देश करनेवाली कारिकामें जो बीजके बाद पताकाका नाम रखा गया है वह अकाराचित् अनुवोधसे ही रखा गया है ।

पताका शब्दका प्रसिद्ध अर्थ है ध्वजा । परन्तु यहां वह अर्थ अभिप्रेत नहीं है । ध्वजा रुप पताका अचेतन पदार्थ है । यहां पताकाके शब्दसे चेतन प्रयंका ग्रहण किया गया है । इस लिए पताकाके शब्दका मुख्य सिद्ध अर्थ यहां सज्जुत नहीं होता है । यहां नायकके कार्यकी सिद्धिमें सहायता देनेवाले किसी चेतन व्यक्तिके लिए ‘पताका’ शब्दका प्रयोग किया गया है । जैसे रामचन्द्र के चरित्रमें सीतानयन आदि रुप कार्यकी सिद्धिमें उनके सहायक सुग्रीव रहे हैं द्वारा लिए ये ‘पताका’ या ‘पताका-नायक’ कहलाते हैं । पताका जिस प्रकार प्रतिष्ठा तथा प्राशस्त्रयकी सूचना होती है । इसी प्रकार पताका-नायक भी प्रधाान-नायककी प्रतिष्ठा तथा प्राशस्त्य आदिका सूचक होता है । इस लिए पताकाके सदृश होनेसे उसको भी ‘पताका’ या ‘पताका-नायक’ कहा जाता है ।

पताका और प्रकरी—

‘पताका’ के साथ ही दूसरां शब्द ‘प्रकरी’ भी इन पांचों उपायोंकी गण्यतानामें प्रयुक्त किया गया है । ये दोनों प्रधान नायककी कार्यंसिद्धिमें उसके प्रधान सहा़यक होते हैं । दोनोंमें परस्पर यह अन्तर होता है कि ‘पताका-नायक’ के अपने मुख्य स्वार्थं होता है । और ‘प्रकरी’ का अपना कोई स्वार्थ नहीं होता है । ‘पताका-नायक’ अपने स्वार्थों की सिद्धिमें साथ-साथ प्रधान-नायकके कार्यकी सिद्धिमें सहायक होता है । कि तु ‘प्रकरी’ अपने किसी स्वार्थकी अपेक्षा न रखकर निरपेक्ष भावसे प्रधान-नायकका सहायक होता है । ‘रामचरित में सुप्रीव ‘पताका-नामक’ है और जटायु ‘प्रकरी’ का सदाहरणरुप है । सुप्रीव वालिसे अपने राज्य और अपनी पत्निको वापिस दिलानेके स्वार्थको सिद्ध कर रामानुज बना है । और जटायु निरपेक्ष भावसे रामकी सहायता करता है । इस लिए स्वार्थसिद्धियुक्त होनेके द्वारा सुप्रीव ‘पताका-नायक’ और केवल परार्थंसिद्धि-पर होनेके मारण जटायु प्रकरी नायक है । इसी प्रकारवाले लेकर प्रायः प्रकार ‘पताका’ और ‘प्रकरी’ के सभेदा देते हैं । उनमधे भी पहिले ये पताकाभा तथा प्रक्राथ रहते हैं ।

पताका और प्रकरीका दूसरां भेद—

पताका और प्रकरीका एक भेद तो यह हुमा कि पताका नायकके साथ स्वार्थं

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समवन्य भी रहता है और प्रकारके साथ स्वाभ्यंसिद्धिका कोई प्रश्न नहीं रहता है। इनमे पहला भेद दोनोँके चरित्रकी व्यापकताकी दृष्टिसे है। 'प्रकरी' का चरित्र बिलकुल एकदेशी और सीमित होता है। 'पताका'-नायकका चरित्र उससे प्रपेक्षा प्रथाम्ल वडा और अधिक देश-व्यापी होना है। पताका-नायकके चरित्रकी व्यापकता हो प्रदर्शित की गई है। नाटकके कथाभागोंके पाँच भागोंमेँ वाटकर उसमें पाँच प्रकारकी सन्धियोंका प्रयोग करनेंका विधान किया है। इन सन्धियोंके नाम —१. मुख-सन्धि, २. प्रतिमुख सन्धि, ३. गर्भ सन्धि, ४. विमर्श-सन्धि और ५. निर्वहण-सन्धि रखे गए हैं। इतमें पताका-नायकके चरित्र मुख्य सन्धिसे प्रारम्भ होकर 'ग्रा विमर्शान्त' विमर्श सन्धितक व्याप्त हो सकता है। 'ग्रा विमर्शान्त' पदमें माप हुए मुख-उपसर्गों भी दो प्रयत्न हैं। एवं 'मर्यादा' और दूसरा 'अभिविधि'। 'तैन जिना मर्यादा' और 'तस्सहितोऽभिविधि'। ग्रा-विमर्शान्त पदमें यदि मुख-उपसर्गों मर्यादायँच मानें तो 'तैन जिना' अर्थात् विशयों मान्यकाॅं छोड़कर पर्याप्त समयँ सन्धि पर्य्यन्त पताका नायक के चरित्रका क्षेत्र रहता है। और यदि मुख-उपसर्गों 'प्रभिविधि' पदमें मानते हैं तो 'तैन सह प्रभिविधिप्' इस लक्ष्यके अनुतार 'प्राविमर्शान्त' पदमे विसत्नँ-सन्धिके भी सम्मिलित ठहरवे मुख, प्रतिमुख, गर्म और विमर्श इत चारों सन्धियोंसे पताका नायकका चरित्र व्यापक हो सकता है। परन्तु 'प्रकरी' का चरित्र बिलकुल एकदेशी होती है।

पताका अनिवार्य नहीं-- पताका और प्रकरी दोनोँके विषयमें एक बात यह भी ध्यान रखने योग्य है कि इन दोनोमेंसे किसी भी सन्धि नाटकमें अनिवार्यं नहीं है। इन दोनोँके बिना भी नाटककी रचना हो सकती है। इतनी बात अवश्यंम्भावी है कि जब मुख्य-नायकको सहायता करनेवाला दूसरा नायक होता है। जिस नायकको इस प्रकारके सहायककी आवश्यकता नहीं होती उसके चरित्रको लेकर लिखे गए नाटक में रचना इनके बिना भी की जा सकती है।

पताका और पताकास्थान-- इस सम्बन्धमें एक बात और ध्यान में रख लेनी चाहिए कि यह पताका और पताकास्थान दोनोँ भिन्न वस्तु हैं। यह जो यहाँ पताकास्थान लक्ष्य किया जा रहा है वह प्रयोग-नायकके सहायकव पताक-नायकके लक्ष्य किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त चार प्रकारमें पताकास्थानों भी चारों प्रयोग मापेगे। वे 'पताकास्थान' इस पताकाते विलग्न भिन्न वस्तु है। जहाँ केवल 'पताका' शब्दका ही प्रयोग किया जाता है वहाँ इससे 'पताका नायक' का ही प्रहण होता है। पताकास्थानोंकी चर्चा जहाँ प्रभिम्रत होती है वहाँ केवल पताका शब्दका ही प्रयोग न करके 'पताकास्थान' शब्दका ही प्रयोग किया जाता है। इन दोनोँके लक्षणों पर विचार करने पताका सङ्ग्रहमे वात्पधिक करने पताका सङ्ग्रहके बाद हो 'पताका-स्थानोऽ' भी सङ्ग्रह कर दिया है। वेंमें प्रकारान्तर हृदय नन्दन तकें सङ्गनयाँ होती प्रसन्न नहीं वय।

इस विचारोंको समझने पर प्रायः यह हृदय 'पताका'-प्रकरणमें मर्यादा-प्रधानक सम्प्रनेत्म मरसभ होगो।

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श्रथ पताकानिरूपयति-- [सूत्र २७]--श्राविमर्शः पताका चेतनश्चेतनः स परार्थकृत् ।।२६।।

स्वार्थीय प्रयुत्सो यो हेतुश्चेतन परस्य प्रधानस्य प्रयोजनं सम्पादयति स प्रसिद्धि प्राशस्त्यहेतुत्वात् पताकैव ‘पताका’ । सुग्रीव-विभीषणादिहि रामादिनोेपक्रियामात्रो रामादेरात्मनट्शोकाराय भवन्, रामादे प्रसिद्धि प्राशस्त्यं च सम्पादयति । ‘चेतनः’ इति यद्यन फतरागधने साहाय्यापेक्षया नायकानां चरितं निवेध्यते, सदा पताका भवति । न तु स्वपराक्रमवहुमानिनांस्मिति । एवं प्रकृत्यैप । श्राविमर्श इति यदा मयोंदायामाढ़, तदा मुख-प्रतिमुख-गर्भों, यदा पुनर्रभिविघौ, तदा विमर्श-मभिड्यायं विरमति । तावतयेन पताकानायकस्य स्वफलसिद्धिनिबध्यते । निवेश्याप-सन्ध्यावपि तत्कने नियन्ध्यमाने तुल्य कालयोगत्पकारोपकारवत्वाभावात्, न तेन प्रधानस्योपकार स्यात् । सिद्धकत्स्वसौ प्रधानफल एव क्याप्रियमात्रो भूतपूर्वंगतया पताकारहद्वाच्य इति ।।२६।।

ग्रथ [प्रायंसिद्धिके साथ साथ परार्थंसिद्धि-प उपकरसमृत चेतनसाधन रूप] पताक का निरूपण करते है— [सूत्र २७]—[पताकाकी होना श्रापेक्षित नहीं है किन्तु] यदि वह चेतन [प्रयोजसिद्धि-सहित] पताथकारी हो तो [मुल्ल्स्था पात्रे लेन्न्न] त्रिमसंस्थिद-पयंन्त ‘पताका’ [नायक] हो सकता है । निवेश्ह्र्स्थानिध्ये जिसका निधानि नहीं रहनी चाहिए] १२६।

जो चेतन हेतु स्वपने स्वार्थ्यके लिए प्रवृत्त होनें पर भी दूसरे श्रथात् प्रधान नायकके प्रयोजनदों सिद्ध करता है वह [प्रधान-नायकके] प्रसिद्धि एवं प्राशस्त्यके हेतु होनेंसे पताक के समान [मौए रूपसे] ‘पताका’ [कहलाता] है । सुप्रीय विभीषणादि रामादिके द्वारा उप-कृत होकर रामादिके श्रोर श्रपनें दोनोफे उपकारक होकर रामादिको प्रसिद्धि श्रोर प्राशस्त्य को सिद्ध करते हैं [इसलिए ‘पताका’ महालातें हैं] । ‘चेतन्’ इस पदसे [यह वान सूचित की है कि] यदि फतरागधने साहाय्यपेक्षा रशनें वाले नायकदोरे चरित्नवा धर्संण किया जाता है तथ तो पताकाक’ होता है किन्तु स्वपनें हो पराक्रमको बहुत सम्भन्ते वानें [नायकके चरित्र के वयांत] मे [पताक्रा नायक] नहीं होना है । इसी श्रक्नार ‘प्रकृत्या’ मे भो सम्भन्ना चहिए । ‘ग्रा-विमर्दो’ इस पदमे जब ग्राढ़ ‘मर्यांदा’ प्रयंमे है तथ [‘तेन बिना मर्यादात’ उस विमर्श-सनियको छोड़कर] मुख प्रतिमुख श्रोर मभिंसंधियोमे, श्रोर जब ‘प्रभिविधि’ मे [ग्राठ्का प्रयोग माने तो तेन सह ‘ग्रभिविधि’ उस विमर्दां सानिध्यको भी सन्न्मिलित करके] विमर्दां सन्धि पयंन्त पताक [नाप्य्का चरित्न] समासत होता है । [प्राधकने प्रधिष्त] यहाँ तक हो पताकानायक के चरने अपने फनत्नरे सिद्ध हुये जाती है । म्रद निवेश्ह्रूप तद्‌ घमे भो उस [पताक नायक] क कर यथांन किया जाय तो समान काल तक रहनें वात्ले [प्रधारा-नायक श्रोर पताका नायक के चरिग्रोमे] उपरांत्‌-उपकारक भावके सम्भवय न होनेंमे उस [पताका-नाप्यक] के द्वारा प्रधान-नायकस्स उपकार नहों हो संग्या । [विमर्दोसानिध्य पयंन्त हो] पताकी इतो हो जानेपर तो [निरपेक्षत्निप्रों] वह प्रधान-नायकके लिए हुये वलन चरनाथा द्वार [पय पताका न रहनें पर भो] भूतपूयं पतिनने ‘पताक’ हास्त्र्मे बट्ठा जाना है ।।२६।।

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अथ पताकास्थितावातं पताकास्थानकानां सामान्यलक्षणं भेदांश्चाश्र-- [सूत्र २८]--चिनिततार्थात्परप्राप्ति-वृत्ते चे यत्रोपकारिष्यो । पताकास्थानकं तचु चतुर्द्धा मेदानं कचिचत् ॥३०॥

इस प्रकार पताका नामक प्रकरणा होनेसे [उसमें मिलते हुए] पताका स्थानके सामान्य लक्षण और उसके भेदोंके कहते हैं-- [सूत्र २८]--'चे' हि अर्थ्य [प्रयोजन तथा उपाय] रूपे प्रयंयौ [प्रयत्नायाम] प्राप्ति जहाँ इतिकृत्य [प्राप्तच्यान घरस्य] में उपकारिखो हो जाती है वह [नाटकमें] निरंतर न रखना] पत्थों-पंक्तियों होने पाना चार प्रकारकी प्रकारणा 'पताकास्थान' [करताता] है। [पहले पहिले हुए पताका-नायकपक्षे सामान्य प्राप्त होने] उप-कारकत्वमाप्तिसी सामान्यतस्त्वे कारकत्व पताकाकी पर्थात् पताका-नायकके स्थान पर्याप्तिके मुख्य श्रोणिमें घट 'पताकास्थान' [हस्तताना] है। [पताका नायक कें द्वितीय होने] 'पताकारथानोप' ही नहीं है। [प्रथान्त पताकारस्थान पताकाक स्वरुप नहीं किन्तु प्रयानोपकारकत्वशे सामान्यताक बारसा पताकारथे तुल्य है]। इमोक्तिमारिफालें पाया [एवचचन] ते [पर मुखित किया है कि एक स्थानपर प्राप्त]। पद्य भी पताकास्थान नाटच- काव्यक सोद्द्योयापक हो जाता है किर दो, तोन, चार [प्रकारकें भेदे जाते वाने प्रयत्न पथिक स्थानोंपर प्राप्त हुये पताकारथानजो] न तो पताका ही क्या है। [नाटकमें विदेय रूपमें पताकारथानका प्रयोग प्रयत्नय करना वाजिब यह [नाटकके माव] 'अर्थचिन्त' इस [पर मृपिचन किया है कि नाटकमें] शोध्य म्रकार [बहुतों थी पताकारथानोका मृल्गत करना पड़ता] पताका [नायक] के सामान्य निरंतर [उनको उद्देश्यप्रति प्राप्त कराना] मर्ने [है] इसकोप्ति [पताका स्वान] पताका [नायक] से मिन [माना जाता है]॥३०॥

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स्वथ स्वाथभेदमाद—

[सूत्र २६]—सहसैषार्थेलाभश्च 'सहस' इत्याकस्मिकृत्चेन सभ्याना चमत्कारहेतुत्वमाद । यथा 'रत्नावल्यां' सागरिकायां पाशावलम्बनश्रुत्तायां वासवदत्तेति मन्यमानो राजा पाशादिमोच्यते, तदा तदकृत्या सागरिकां पत्नोमिश्रयाह— "कथम मे प्रिया सागरिका ? श्लाघ्यमलमतिमतिरेप्या" इत्यादि ! शतान्न्यातन प्रयोजनं चिन्तितं, वैचिच्चकारि च प्रयोजनान्तरं सम्पन्नम्। यथा वा 'नलविलासे', चिदूपक-कापालिकनियुद्ध निवासरायोदतस्य राज्ञो दमयन्तीप्रतिरूपतिलाभ इति । अन्यस्मिन्ननुपाये चिन्तिते सहसोपायानन्तरप्राप्तिर्यया नायको नन्दे जीवतवाहन-स्व शापचूडादप्राप्तवध्यपटस्य कृत्चुकिनां वासोयुक्तार्पणेऽमिति ॥

अथ [चार प्रकारके पताकास्थानोंमेंसे] प्रथम भेदको कहते हैं— 'सहसा' [प्रारब्धसिद्ध रूपसे प्राप्त होनेके कारण] सम्पोयते [सम्यक् प्रकारसे] चमत्कार-जनक] इष्ट वस्तुकी प्राप्ति [कहा जाता है प्रथम प्रकारका पताकास्थान कहलाता है] । 'सहसा' इस [पद] से प्रारब्धसिद्ध रूपसे प्राप्त होनेके कारण सम्पोयते चमत्कारहेतुत्व सूचित किया है । जैसे रत्नावलीमें [तृतीय अंकमें] सागरिकाके [अपने गलनेमें] फँसी सगानमें प्रविष्ट होनेपर राजा उदयन उसके [अपनी मृत्य रानी] वासवदत्ता सम्भकर फाँसी से छुड़ाते हैं । उस समय उसकी उक्तिको सुनकर सागरिकाको पहिचान कर कहते हैं कि— "भद्रे यह तो मेरी प्रिया सागरिका है । हतो हतो यह प्रतिसाहस मत करो" इत्यादि । यहां [राजा उदयनके वासवदत्ताके] पातालने छुडाने रपमें] छुद्र दूसरा ही प्रयोजन सोचा था किन्तु [सम्पोंके लिए प्रोर स्वयं राजाके]लए भी ] चमत्कार-जनक [प्रारब्धसिद्ध रूपसे सागरिकाकी प्राप्ति रूप] छुद्र प्रोर हो [प्रयोजन रूपप्राप्त] काय हो गया ।

[प्रयायान्न लडाई बचानेके लिए] उचित प्रयत्न करते समय] राजा [नल] को [चिदूपकके वागसमेत निकल कर गिरो हुइ] दमयन्तीकी तद्योगकी प्राप्ति । इससे पूर्व यात्रिकाने माए हुए 'ध्रुवं' तदर्थको ध्यार्या करते समय यत्न करन दो प्रकारको धुरपस्ति मान कर 'पायं' नामधने [प्रयोजन समा 'उपाय' दो यत्नें किये दे । 'सहमेष्टार्साभयस' इस प्रथम पताकास्थानमें लडाईमें भी 'ध्रुवं' तदर्थने ये दोनों प्रयं भिम्रेष्ठ हैं । दानोंमें 'प्रयोजन' हत यत्नको जेबर दो उदाहरन दे दिए । पद पाओ 'उपाय' रूप प्रदं। प्रय उपायने तोचनेपर सहसा [प्रारब्धसिद्ध हपने ] अनप उपयायकी प्राप्ति [न युदाहरन] अथो मागाकारने जोमूतवाहनश्वो नतभ्रष्टेन मध्यस्थेन [वार्त कराने योग्य] वरयोले प्राप्त न होनेपर [प्रत्यमान् वात] कचुकेरे द्वारा [साम रह] उपायने मोनो-सम्पन्न [इष्ट वतुकी पूण्ति बताई है] ।

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शिलष्टसातिशया च वाक् । शिलष्टा प्रकृतमन्यत्र, सातिशया चाऽन्यद्‌मुलार्था । यथा ‘रामाश्रुयुगे’ द्वितीयेड्‌ङे सीतां प्रति सुप्रयोगे सन्देशोक्ति.—

इस प्रकार प्रथम प्रकारके पताकास्थानमे तीन उदाहररएं प्रभञ्चवारने यहां प्रस्तुत किए हैं: इन तीनों उदाहररएंमें नायकके द्वारा श्रचिन्तित, श्रसम्बत् श्राख्यस्मित र‌ूपसे हृ्ट प्रयोजन या हृ्ट उपाय र‌ूप हृ्ट प्रयत्नों प्राप्ति हो गई है। इसलिए ये तीनों उदाहररएं प्रथम प्रकारके पताकास्थानके हुए। श्रब द्वितीय प्रभाकरके पताकास्थानका वर्णन श्रारम्भ करते हैं। द्वितीय पताकास्थानमें सहसा हृ्टि प्राप्त नहीं होनी है। किन्तु प्रकट प्रकरणसे सम्बद्ध कोई ऐसी श्रदृष्ट बात किसी पात्रके मुखसे निकल जाती है जिससे श्रागेके कथाभागमें श्रदृष्ट प्रभाव दिसलाई देता है। इसीका वर्णन श्रागे करते हैं। श्रब द्वितीय [पताकास्थान] को कहते हैं—

"बहुना्त्र निःमक्तेन पारेडपि जलधे, स्थितास्म । श्रचिरादेवि देवि त्वामाहारिष्यति राघव. ॥"

[द्विती०]—[शिलष्ट] प्रकृत-सम्बद्ध ग्रोर [सातिशया] श्रदृष्टमार्थंक वचन [द्वितीय प्रकारके पताकास्थान कहलाते हैं]। ‘शिलष्ट’ प्रकृत [प्रकरणे] से सम्बद्ध ग्रोर ‘सातिशया’ श्र्यन्तं प्रत्यन्त प्रदृष्ट प्रयं-वाची [धारणिका श्राख्यस्मिक प्रयोग द्वितीय प्रकारका पताकास्थान कहलाता है]। जैसे रामाश्रुयुगमे द्वितीय श्रदृष्टमे होताके प्रति सुप्रयोगेो [निम्नलिखित] सन्देशोक्ति [में पाया जाता है]—

"ग्राधिक क्रया कृतो यावत्, समुद्रके पार स्थितो हनुमान् ग्रो हि तावत् रामचन्द्रग्रा ग्राप्नोति ततो ही ते श्रावयिष्ये ।"

यहां ‘पारेडपि जलधे’ स्थितास्म’ समुद्र-पार रहतेपर भी यह प्रतिशयोक्तिमात्रसे विचारित प्रयोजनसे भिन्न उसी प्रकार [समुद्रपारसे] सीताका ग्राहाररए र‌ूप प्रयोजन हो गया। यह [पताकास्थानका] सामान्य लक्षण [जो इसमें सम्भवत् हो जाता] है। इसी प्रकार की श्रद्भुत भवभूतिके उत्तररामचरित्रमे भी पाई जाती है। वसिष्ठ का स्नेहं दयातु च सौहृद्यं च यत्नि वा जानकीमपि । श्राराधनाय लोकस्य मुग्धतां नारित मे यथा ॥

ग्रथोन्तु सौहृदं माराधनाय लोकस्येति प्रजाकी प्रसन्नतां सानुर रामचन्द्रग्रा ग्राभिप्रायो मुनिसे कहते हैं—

यहां तक कि स्वयं जानकीको भी छोड़ देनेमें कोई हृ्ट नही होगा। यहां यह बात तो प्रति-

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द्वयर्था च 'वाक्' इति इह, उत्तमत्र च सम्भाष्यते । द्वयर्था इतेयादिवशात् प्रस्तुतोपयोग्यर्थांतरोगपच्येपिस्पी । यथा- 'गीतगुजाकुला दर्शयितुमायोहतरोदितोचिते' प्रति ।

[सूत्र ३१] द्वयर्था च 'वाक्' इति इह, उत्तमत्र च सम्भाष्यते । द्वयर्था इतेयादिवशात् प्रस्तुतोपयोग्यर्थांतरोगपच्येपिस्पी । यथा- 'गीतगुजाकुला दर्शयितुमायोहतरोदितोचिते' प्रति । अर्थात् हि संशयाच्चोभयप्रयोजननेत काव्यं प्रभुक्तं, सा-गिरिकां प्रति उदयनाभिद्वयक्षितलक्ष्यां प्रयोजनांतरं सम्पाद्यति । तथा च सा-गरिका- 'अयं सो राय उदयस्यो, जरस् अयं तादृशो दित्सुया' इति । [अयं स राजा उदयनो यस्याहं तादृशा दित्स्ता । इति संक्षेप्तम् ]। रायोक्ति रूपमे ही कही गई थी किन्तु उसके बाद श्लेष ही रामचन्द्रने अपने स्नेह, दया और सौस्यके साथ जानकीका भो परित्याग कर दिया है । इस द्वितीय पताकास्थानके लक्षणमें 'दित्सु:' पदका प्रयोग किया गया है किन्तु उसका अर्थ केवल 'प्रदत्तत्से समृद्ध:' इतना ही है । यहां 'दित्सु:' पद दो अर्थोंके वाचक सद्दसका प्राहक नहीं है । प्रथले तृतीय पताकास्थानमें 'दित्सु:' प्रयुक्त द्वयर्थक पदके द्वारा चिन्तित अर्थ से भिन्न, प्रयोजन या उपाय रूपी मुख्य अर्थकी प्रतीति होती है । इस मेदके बारण तृतीय पताकास्थान पहिले और दुसरे दोनो पताकास्थानोसे भिन्न है । पहिले और दुसरे किसी भी पताकास्थानमे 'दित्सु:' ऋष्यांत द्वयर्थक पदका प्रयोग नही होता है । तृतीय पताकास्थानमं ग्राहार द्वयर्थक शब्द हो होता है । इस्सी कारण उसको भिन्न रूपमे कहते हैं । अब तीसरे पताकास्थानको कहते हैं—

द्वो प्रयोऽवालो [वाच्योका प्रयोग करके चिन्तित ग्रयंसे अन्य ग्रयंको प्रतीति जिसमे होती है वह तृतीय पताका स्थान कहलाता है] ।

[सूत्र ३१] द्वो प्रयोऽवालो [वाच्योका प्रयोग करके चिन्तित ग्रयंसे अन्य ग्रयंको प्रतीति जिसमे होती है वह तृतीय पताका स्थान कहलाता है] । [द्वितीय पताकास्थानके लक्षणमें कहा हुग्रा] 'वाक्' यह पद यहां [तृतीय पताकास्थान के लक्षणमें] भी समृद्ध होता है । 'दो प्रयोऽवालो' अर्थात् इतेयादिके कारण प्रस्तुतके उपयोगो द्वारा प्रषंका घोष करानेवाली वाणी जैसे [रत्नावली नाटिकाके प्रथम श्रङ्कके प्रारंभ भूतसखे चेटलिक राज्ञी स्तुति करते हुए कहते हैं कि]— "उदोपमान चन्द्रमा्थी नयनानन्ददायिनी किरकोके समान [राजा लोग उदयन राजाके घरगोचरी भोर] देख रहे हैं ।" यहां सप्तदा-वसांके प्रयोजनमं वाक्यस्था [इलोकस्थ] प्रयोग किया गया है । किमु यह सा-गरिकाकी प्रति उदयन [राजा हर प्रयं] धो प्रभिधर्मात् रूप द्वारा प्रयोजनस सम्पादित कर रहा है । इसे ले लिए [ इत मोक्तो हननेनेले यात] सा-गरिका [कहानी है कि]— [ मद्धा ] ये वे राजा उदयन हूं जिन्हें [विनागिने मुंभं [ अपने संकल्प द्वारा ] दिया गया । इस इलोकमं सन्ष्यामात्र वग्गत म्रहा है । उसमें 'उदोपमान' यह पद दित्सु प्रयोऽवालो घोष है । सामान्य रूप से वने नरोचित पद्मावली के लिए प्रभुक्त किमा गया । किन्तु 'उदयन' राजाका भी श्लेष हुग्रा है । अतः यह तृतीय पताकास्थान है ।

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ग्रथ चतुर्थमाह--ग्रप्रकटे शिलष्ट-स्पष्ट-प्रतयभिधापि च ॥३१॥

प्रब चतुर्थ में [प्रकारास्थान] श्री कहते हैं । [सूत्र ३२] ग्रप्रकट [प्रप्राप्त उत्तर देनेवाले व्यक्ति को भी प्रज्ञात] प्रयंके उपस्थित होने पर [प्रन्य अभिप्राय से बहुना जानेपर भी प्रकृत प्रकरणमें] मुसम्वद्ध तथा [उस प्रस्तुत ग्रप्रकट ग्रर्थके विपयमें विशेष रूपसे निश्चित करानेवाला] स्पष्ट उत्तर भी [चतुर्थ प्रकारक] पताकास्थान कहलाता है । ३१ ।

ग्रप्रकट प्रयं प्रतुतरं देनेचालेगो प्राविदित प्रयंको किसो वक्ताके द्वारा प्रस्तुन किए जानेपर [लिळे ग्रर्थान ग्रन्य ग्रभिप्राय से कथित होनेपर भी प्रकृत ग्रर्थसे सम्बद्ध श्रोइर स्पष्ट ग्रर्थान [उस प्रस्तुत ग्रप्रकट ग्रर्थके विषषमें] विशेष निश्चय करानेवाला जो उत्तर उस वाकी वाचो [चतुर्थ प्रकारक] पताकास्थान कहलातीो है।

जैसे मुद्राराक्षसमें--"चाणकय--यथा दुरात्मा राक्षस पकड मे ग्रा सकेगा ?" इस प्रकारके ग्रप्रकट [ग्रर्थात उत्तर देतेवाले सिद्धार्थक को जिस ग्रर्थका ज्ञान नहीं है। श्रमात् सिद्धार्थंकने इस बातको नहीं सुना है उस प्रकारके] प्रयंके प्रस्तुत होनेपर--'ग्रन्य कायंवना चाणकयके पास ग्राया हुम्रा' सिद्धार्थक [प्रविष्ट होकर कहता है] प्रापं [प्राफना सदेश] पहुँचाकर कर लिया।

सिद्धार्थंकने प्रवेशके पहिले चाणकयने स्वागत करनें 'प्राप्त नाम दुरात्मा राक्षसो गृद्यो त' यह चाणक्य कहा था । सिद्धार्थंकने उम चाणक्यनो नहीं सुना था । उसे इस बातका कोई ज्ञान नहीँ था । कितु चाणकयके द्रस नाटकपनो उद्देश्य करसनेतक मथ हू प्रन्य चरयंकन पास ग्राया हुग्रा सिद्धार्थक प्रविप्ट होकर कहता है 'ग्राप्य गृद्योोन.' तब इस वावयका चाणकयके वावयक समप सम्वन्ध वन जाना है प्रोर उससे चाणक्यवप्रो यह ग्रनुमान होनाँ है दि 'प्रायं दुरात्मा राक्षस पकड लिया गया सम्भवो ।'

[इस प्रकार सिद्धार्थक द्वारा कहाँ गया ] यह प्रयुतरं [राक्षस पहुँचे एव] प्रयंमें सम्वद्ध श्च। विशेप हपमें [राक्षससे परे जानेपर] निश्चय करनेवाला [हो जाता] है।

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इदं प्रयुक्तं मन्त्रदेश-प्रहसनाङ्गापनप्रयोजनेन प्रयुक्तं, चाश्रुक्यस्य राचसस्येह निश्चितायंरति इति सामान्यलच्ष्याम् । प्रत्येकं चकारशचतुर्यामपि नाटकं प्रति प्राधान्यकथ्यापनार्थ इति ॥३१॥

वृत्तान्त:- [सहपात्र के साथ मृगया] इन्त गृहोतो दुर्हतम् राच्चस: । इति । इदं प्रयुक्तं मन्त्रदेश-प्रहसनाङ्गापनप्रयोजनैन प्रयुक्तं, चाश्रुक्यस्य राचसमहं निश्चारयति इति सामान्यलच्ष्याम् । प्रत्येकं चकारशचतुर्यामपि नाटकं प्रति प्राधान्यकथ्यापनार्थ इति ॥३१॥ [सूत्र ३१]—प्रथृरी चेतू कवचिद्रावी चेतनोडनन्यप्रयोजनः । 'कवचिद्रावी' यूतैवेदेशराच्यपी। अन्यमस्य 'मुख्यनायकस्य [प्रयोजनमेव] प्रयोजनं यस्म। स चेतन: सहकारी प्रकर्षेण स्वार्थानपेच्चया करोतीति प्रकरी । श्रोपादिके इ-प्रत्यये संज्ञाशब्दृतवेन स्त्रीलवम् । यथा रामप्रबन्धे चेपु जलायुः । 'चेतृ' इत्यनेन पताकारथदनवश्यम्भावितवमाह् । कवचिद्रावी इति वात् स्वार्थेनिरपेचत्वाच्च पताकास्थो भेद इति । इसी लए फिर [चारथय, सिद्यार्थकके इस कथनको अपने वाथपके साथ जोडकर और उसे राक्षसके पकड़नेमे शवपनी सफलताका निश्चायककारक मानकर अपने मनमें प्रसत्न होकर कहता है कि—] "चारथय—[सहृदय अपने मनमें कहता है] बड़ी प्रसन्नताको बात है कि राक्षस पकड़मे आ गया ।" [यहाँ सिद्यार्थक द्वारा कथ्य श्यथमें प्रभुक्त वाच्य रुप] यह उतर [चारथयकने] संदेशष्ठ प्रहरुण कर लनेके सूचित करनेके प्रयोजनसे [सिद्यार्थंकने] प्रभुक्त किया था किन्तु [वह] चारयवप को राक्षसके पकड़े जानेका निश्चय कराता है । इस लए [उसमे ‘निश्चितार्थ परप्राप्ति’ यह पताकारथ्यात्मक] सामान्थलच्ष्यण [समन्वित हो जाता] है । [पताकारथ्यतके पूवेंक चारों तच्कषोमें] प्रत्येकके साथ प्रभुक्त चकार.नाटकके प्रति शव प्रकरीका लच्कषण कहते हैं— [सूत्र ३२]— यद् [हर्यावसानप्रेप्सया हेतु] श्यथ [धिया तु मुख्य नायक] के प्रयोजन को सिदध करानेवाला चेतन [सहायक नाटकके श्यधिक भागमे स्वाथक न होकर केवल] किसे एक वेशमे होनेवाला हो हो तो उसे ‘प्रकरी’ कहा जाता है ।

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अथ निन्दुर्लक्ष्यतिः—हेतोर्निन्देऽडनुमन्धानं वधूनां निन्दुराफलान् ॥३२॥

[सूत्र ३४]—हेतोर्निन्देऽडनुमन्धानं वधूनां निन्दुराफलान् ॥३२॥ उपाख्यानस्यान्तस्यावश्यकृत्सेध्यादिना व्यवघाने मर्त्ति नायर्मातिनादेशमाल्य- दोनां यदनुमन्धानं धानपक्षो धानविचारस्याफललाभोपायवादे निन्दु । मर्वोद्यापर- स्वाङ्गा जले तैलमिव निन्दुरिव श्राफलादिर्गात यीजवनंममतेतद्युक्ततद्यापघस्तवमाह । फलेन धोजे मुनेःसनन्ध्येरेक प्रमुष्टान्त निबध्यते, निन्दुरस्तु तदनन्तरंमाति । इह तावन्नाट्यकमहार्योभयेभ्याङ्गाङ्गभू फर्नासिद्ध । तत्र सदैवं स्वट्यापार- विच्छिदत्तानुसारं नानातमा निन्दुनिर्निध्यते । यथा च नायकेन प्रतिपचेऽतिकृत्स्नमनुमन्यो- यते, तथा प्रतिपचेऽपि नायकस्यैतद्युक्तमनुमन्योयते । श्रतत खलु वधूनामित्युपात्तम् । प्रकरो शोनोफा धरित्र धरपरिहार्यं नहों है ]। देवत एक देवनें होनेले धारला [न्रिविध्रुविचार स्वात] प्रौर सप्तार्शानुपेश होनेते [प्रकरोर्नायसकर] पताका नायकसे भेद है । पांच उपायोंमें ओड़, पताका प्रौर प्रकरो इन तीन उपायाका म्रपेक्षां हो गया । प्रमथ शोेध उपाप 'निन्दु' का वगैन प्रसङ्ग प्राप्त है। उपायोशा हेतुन पचेतन रूपमें जो दो प्रकार वर विभाजन किया गया पा । उन्मं पताका, प्रकरो तथा निन्दु दा तौनशे चेतन साधनोके वर्गमे रखे पा । उनमेंभी पताका प्रौर प्रकरो रूप दा चेतन साधनो॑ यग्गुन हो शुए प्रथ तोसरे हेतन साघाप 'निन्दु' का वगैन करते हैं ।

[सूत्र ३४]—प्रथ मावनपक परामर्श वारतं ] हेतु [ परिन् उपापानुष्टान ] न विममारए हो जानेपर भो किसते स्मरतां 'निन्दु' [वहतनाता] है । प्रौर वह [नायक प्रतिनायक प्रभात्यय पादि रूप] पझूंतोंश तयाप कनप्रातिष्ट-न्ययंत्त [सारे नाटकमें व्याप्त हो सकता] है ।

पावनपक पतनन्ध पारदृक् द्वारा उपायानुष्टानसका [व्यपपान] विदधेैर हो जानेपर नायक, पतिनायक, प्रभात्याविदेॆ द्वारा मो उपस्थित पुन स्मरतां [वप मान] वट मान प्रौर विचारशे पत प्रातिष्ट उपाय होनेते 'निन्यु' [वहतनाता] है । पयप्या [नाटकमें] सद्नन्ध व्यापक होनेते [जतमें तंतकः कृत् जने सारे जत्तम दूषं जातत् है हु्रा प्रकृत सारे नाटकमे व्यापक होनेते] जतमें तत्त दिग्युकं समान 'निन्दु' [वहुसाता] है । 'पावनपात' द्रा [पर] से योजने समान [निन्दुशे भो] सारे पकारभानम् प्यासितो मुक्तित कियत है । [प्रचिन् पोतत्मे समान हे निन्दु भो सारे नाटकमें प्रथन तर त्रिवमान रसात है । नतर] नियय [जनता है कि] पोत्र मुख्तर्गमुखे प्रारम्भमे शुने निबध होना है प्रौर किन्यु उस्तने वार [पारम्भ होता है । किन्यु दोनों नाटकमें पतत सक व्यापक रहते हैं वले दोनोंकी समानतनत्]।

परा। [नाटकमें] नायक [न धार होने पार्म]२ प्रकाइ [न त्रा] तयाप उन दोनों से निस्मर तीन श्चारतों पक्तिनिन्दित होोती है । [जन्त मघतरे भो] पनने पतनातनत्ना विदधेैर थे मानने पर पुन स्मरतां हो मर्य्यादि है ।[तनिम्नं नायक प्रौर जन्त नायपे समन्वयादि] उन वाह न्ही [तनयपपोते] पनने पश्ने [विप्रुम्न पतनाततरो मुग्न ह्य निन्दु की रचनत होोंी # ।

[पोर न न्तर नायक महा समाने] परिमितन्वके मारपपे भो प्रकाइ] अये नायक, पतिनायकके मुन [वृत्या] का चतुप्रपात् ।

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कलत्रवध्वि रक्षितुं निजमशक्रमस्माभिरवय-प्रसूतसम्भिवोदय मामहृद जाततनुजान्तरः । प्रकाशयितुमच्युतं तयस्मादपि स्वमाश्रिते जने प्रयत्निं चरमोत्कर्षों पविष्ठितुमेप देवो रविः ॥ इत्यनेन पुनः सीतापहारदु.प्रभाव्यसहितोभिति ।

[व्याख्या] करता है इसी प्रकार प्रतिनायक भी नायकके चरित्रका ध्यान [प्रतिसंधान] करता है [इसलिए प्रतिनायककी दृष्टि भी कचुका विन्यात माटकमें हो. सभवत है] । इसको लिए [कारिका]में 'भूयात' इस [शब्द] का प्रयोग किया गया है । 'विन्दु' का यह सामाय लक्ष्य किया गया है । इस लक्ष्यके देखनेसे प्रतीत होता है कि नायक या उसके सहाय्यक भरतस्यादि के प्रयत्न प्रतिनायक और उसके सहाय्यक भरतादिक कार्योंमें व्याप्त हो जानेसे कुछ न कुछके लिए मुख्य बीज रूप उपायककी विस्मृति या निश्शेष हो जायेके बाद उसकी जो पुनः स्मृति होती है उसका 'विन्दु' करते हैं । इस स्मृतिका या अनुसंधानके बिना नाटकका भावं भ्रापे नही बढ सकता है इसलिए यहा होना श्रादर्शक है । एक नाटकमे एक ही समय नहीो अनेक बार इसकका उपयोग किया जाता है : उपायोके चेतन अचेतन रूप जो द्विकृत विभाजन किया गया था उसमें इस विन्दुके चेतन उपायोंसे विन्दु गया था । पर यहा विन्दु स्त्रय तो चेतन रूप नही है । चेतनक अचेतार रूप है । परन्तु उस स्मररू या अनुसंधान रूप प्रचेतन व्यापारको चेतन रूपमें मानकर हो चेतन उपायोके वर्गमें द्वि-चृका प्रथनभाक किया गया है । मागे विन्दुके उदारहण प्रस्तुत करते है ।

उनमेसे नायकके विन्दु [का उदाहरण] जैसे हमारे बनाए, राघवाभ्युदय [नाटक] में पञ्चम अङ्कमें सुप्रतीकके चरित्रके सुननेते सीताके अपहरणके हेतु उसके [कुछ रूपकके लिए] विस्मृत हो जानेपर [फिर दुबारा] सीताको स्मररू करके राम [निम्न उदाहरण कहते हैं]—"अपने स्त्रियों को रोता देखकर भी हमारा मुखको व्याप्त [सौम्य] चिह्नाने अपना हृदय देखकर लज्जाते सन्त्रस्त [सुप्रतीक] ध्रुवा भरको भी लोगोंको अपन मूल द्वेषकेने प्रकटम हो जानेने कारक यह सूर्य देव पञ्चितन सागरमें डूबने जा रहे हैं । इस [इलोक] के द्वारा [कुछ देरके लिए विस्मृत हुए] सीतापहरणके हेतु उसके [राम-चन्द्र] पुनः स्मररू करते हैं ।

इस प्रकार यह नायकके 'विन्दु' का उदारहण है । इसी प्रकारका दूसरा उदाहररू मागे 'तारसवसाराज चरितो दूने' है । उसमें नाटकके नामक दशसराज उदयन मुख्या प्रादि व्यापारो में लगा जानेसे कुछ समयके लिए अपनी रानी वासवदत्ताको मूल जाते हैं । इसी बोचमें राजा के मूर्छा सविदिरम जहाँ तहाँ वासवदत्ता ढही हुई थी श्राप लग जाने और रानीके उसे सविदिरके भीतर जन जानेने समाचार राजाको मिलता है । उस समाचारको सुनकर राजा को पुनः वासवदत्ताकी स्मृति हो आती है । उत्सी प्रसङ्गमेंहे तारसवसाराजचरितोका द्वितीय अङ्ग्पारने यहाँ उद्दृृत किया है ।

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इति वासवदत्तायामप्राप्तविघेपानं तदेवानुरक्तहितं । पतिमत्रोत्तरेऽवल्यद्धृदयं नायकं विन्दुर्यनिवद्योडस्ति । एवं मद्दार-उदय-विप्रनाशारामपि स्त्रिग्यापारातुमन्यानारमा विन्दुरेवेतदयः ॥ ३२ ॥

प्रथमा जैसे 'तापसवत्सराजचरितमे' मृगया आदि तथा अन्य माल्यों के [द्वारा प्रयोजित] ग्रन्य रचपारोंके द्वारा वत्सराज [उदयन] को प्रिया [वासवदत्ता] के समागममें प्रोत्साहित करने हेतु प्रयोजनरहे विस्मृत हो जानेपर भी द्वितीय दृश्यमें राजा [वत्सराज उदयन द्विविद्रमें] वासवदत्ताके' जल जाने [के समाचार] यो सुनकर करते हैं— 'राज्ञा रमण्येन द्वोड़े । मुभे [मत पृच्छो] घोड़े दो । वैसे भी घूमसे कलुपित, क्षीणक् शिर्यातिवाले प्रौर चारों ओर अत्यालम्बौष तांडव करनेबाले इत श्रुद्र प्राणिसे में अपने भाग्यके दोषसे ही डर गया हूँ । प्रौर ऋषा [वहा जाओ] हे मित्र ! रमण्येन] तुम मेरे दृव्यके भीतर भरे हुए दुःखानलको नहीं देख पा रहे हो इसीलिए [मदिनमें जलकर मरनेके द्वारा] त्रिपाश। घवुसरेण मरनेमें मुभे शोक रहे हो । में प्रभाप्रद् यथा वरा करूं । वासवदत्ताके प्रति विनोद प्राप्त होनेसे [उसके मदिनमें जलकर मर जानेबा समाचार मुनकर राजाओं] उसोका स्मरण हो पाया है [जिसको ये मृगया आदिर्ने प्रसन्नने भूत पापी थे] । इसी प्रकार [नाटकादि-रचयितरों] प्रथल प्रबन्धों को नाटवरूप विलासु [प्रेक्ष्य नायक यापोंके प्रसन्नते हृदय सम्प्रेलिए विस्मृत प्रयंधो स्मृति ] वा निबन्धन किया गया है । वय्ट 'तदेवानुरक्तहितं' में 'तनु' पदमे 'प्रियांमागमोःसुखं वा प्रयत्न' चलतिए । 'तदेव' में 'तनु' पद नपुं-निङन्त है इस निम्ति उमसे न तो यामवदत्ताया पदस्य हो सकता है प्रौर न प्राप्तृक्तः । प्रयत्न हो मक्ता है । इस निम्ति यह! वासवदत्ताया स्मरण या प्राप्तृक्तः समरण नहों भवितु त्रिपाशे ममागमके पोःसुखस्य स्मरस्य हुमा है । इसो भाति [नाटकरे] नायप, प्रयपचा [नायक पौर तारपा] दोनों के प्रोर विपत् [अर्थात् प्रतिनायक प्रौर उमसें महाविपत् ] वा भी चरिते [निरतुन्] रचपारक्ता समरस्य रप 'विन्दु' समम्भ सेना चाहिए । [अर्थात् जैसे उदाहरग्गा नाटकोंमें सदय हृदय मेत्ने वार्तिप्] । नतत् उक्तो विधिना कोन्वितः, पदाथैः, श्लोकः, छन्दः, काव्यं वा रसैः पार उपपाद्य विरूप विवरण यथा महृं न तु पर दिना ।

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अथ कार्यं विधीयोत—

[सूत्र ३३]—साध्ये बीजसहकारी कार्यम्‌ ।

अथमत्नोपायां निमित्तसंत्वेप: । सहायान्पेत्यां नायकानां युत्ने बीज-चिन्तु-कार्यान्विति त्रय एवोपाया। सहायापेतासां तु पताकाप्रकराभ्यां अन्यतरया वा सह पञ्च चतुवारो वेधि ।

यहाँ 'कार्य' केप रह जाता है । इसका लक्षण ग्रन्थकार करते हैं । जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है चेतन और अचेतन वर्गमें जो उपायोका द्विविध विभाग किया गया है उसमें सबसे प्रथम उपाय बीज तथा सबसे प्रान्तिम उपाय कार्य इन दो उपायोको अचेतन उपायोके वर्गमें रखा गया था । वेह कार्य जो लक्षण ग्रन्थमें किया जा रहा है उसमें भी कार्यंक बीज का सहकारी चतलाया गया है । इस लिए इन दोनोंका परस्पर विरोध सम्बन्ध है ।

अथ प्रधान कार्यस्य स्वाध्य्या करते—

[सूत्र ३४]—साध्य [प्रर्यन्त प्रधान फलकी सिद्धि] मे बीजका सहकारी [द्रव्य, गुण आदि चेतन साधन] 'कार्य' (कहलाता) है ।

प्रधान-नायक, पताका-नायक या प्रकरीनायकके द्वारा साध्य प्रय्यन्त प्रधान फल हवसे प्राभिप्रेत, [ द्विप्र ] मे [ योजय प्रथन्ति ] प्रारम्भावस्थाके रूपमे आरोपित बीज य्रपादि प्रधानोपाय रूप बीजका सहकारी प्रय्यन्त [उसको] पूर्व्यन्ता तक पहुँचानेवाला सैन्य, शोक, दु:खं, सामादि उपाय रूप द्रव्य, गुण, क्रिया ग्रादि सारा हो [ चेतन साधनभूत ] प्रय्यं, चेतनों के द्वारा फल [साध्यको सिद्धिमें विशेष रूपसे प्रवृत्त प्रय्यन्त] उपयुक्त कराया जाता है । इस ['चेतनं: कार्यंते फलमिति कार्यम्पं' इतरा रूपत्वात्] से 'कार्य' (कहलाता) है ।

यह पांचो प्रकारके उपायोका सक्षिप्त रूपमें वर्णन हुग्रा । ये पांचो उपाय सत्रं ग्रप्ररिहत्म्र हैं । किन्तु ग्रावश्यकताके ग्रनुसार ही उनका उपयोग किया जाता है । जिन नायकको सहायकोंकी विशेष ग्रावश्यकता नहीं होती है और स्वयं ग्रपने सामर्थ्यसे ही जो सारे कार्यंक सिद्ध कर लेते हैं उनके चरित्रको लेकर लिखे गये नाटकोंमें पताका' तथा 'प्रकरी'का कोई उपयोग न होनेसे उनकी रचना नहीं की जाती है । उस दशामें इन नाटकोंमें तीन ही उपायोका प्रयोग होता है । सहायकोंकी ग्रावश्यकता जिनको पड़ती है उनके चरित्रमें ग्रावश्यकतानुसार केवल पताका या केवल प्रकरी किसी एक का उपयोग होनेपर चार, और दोनोंका उपयोग होनेपर पांचों उपाय काममें ग्राते हैं । इसी वातको प्रकारान्तरसे कहते हैं—

सहायकको प्रपेक्षा न रखनेवाले नायकोंके चरित्रमें बीज, चिन्तु और कार्य तीन हो उपाय [प्रयुक्त] होते हैं। और सहायकोंकी ग्रपेक्षा रखनेवाले नायकों [के चरित्रों] में तो पताका तथा प्रकरी दोनोंको मिलाकर पांच, अथवा उन दोनोंमेंसे किसी [एकको बीजादि तीनके साथ] मिलाकर वार [उपायोंका प्रयुक्त किए जाते] हैं ।

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स्थाम्नो वा मुख्यतयैवस्थायां हेतुमाद्- कार्येस्सु मुख्यता ।

कार्यों फलं प्रत्युपकारविगेपे: । पुनर्धीजादिनां मुख्यता वाहुल्यं प्राधान्यं वा निरपेक्षनीयम् । तत्र धीजादिन्द्रोपेतावन्मुख्यतयैवमेव, सर्वेऽप्यापेक्षावत् । पताकाप्रकरीकार्यों तु मुख्यफलं प्रत्युपयोगापेक्षया मुखस्य द्वयोस्स्र्यायां च मुख्यतयैवम् । तत्र पताकाया मुख्यत्वेन यथा श्रीमूद्रक-विरचिताया मुद्रारक्‍षस्मात् पूर्वोपकाररोपगृहीतमय श्वार्थकस्म । प्रकृतयो यथा——वीराग्निवद्धायां कुन्दमालायां सीताया मस्तकपत्न्योरेव पाज्जन-संयोजनाभ्यां स्फुरनिरपेक्षस्य वाल्मीके: । उपजोयस्थ——रामप्रबन्धेपु कुमार-विभीपण-जटायु-हनुमदूद्दद्धाश्चैना च । पताकाप्रकृत्यो:लपत्वे श्वभावे वा सर्वत्र कार्येस्य मुख्यत्वम् ।

उपायोंकी मुख्यता के नियायफ हेतु—— [पांचों उपायोंके लक्षण आदि करमेके बाद] प्रय इनकी मुख्यता [मोर गौरात्व] को धपेक्ष्यस्मै हेतु बतलाते हैं——

[सूत्र ३४]---[कनमें प्रति उपकार विशेष रूप] कार्यंकि प्रयुसाद मुख्यता [निर्धारित] होती है ।

कामें प्रय्यांत् फलोके प्रति उपकार-विशेषके द्वारा बीजादि [उपायों] की मुख्यता परप्यात् वाहुल्यं प्रयम प्रथानतयक रचता करनी च्चाहिए । उन [पांचों उपायों] मेंसे [प्चेतनम उपाय] बीज तथा [चेतन उपाय] विन्दु इन दोनोंमे [नाटक्मे आदिर्से प्रभ्त तक] सर्वत्र स्वापक् होनेसे मुख्यता ह्यै होती है । पताका, प्रकरो मोर श्वं [इन तीनों उपायों] की तो मुख्य फलशे प्रति उपयोगिताकी हद्दिसे [कहीं] एक्के [कहों] वोल्की प्राथ्य [कहों] तोदोशे मुख्यता मोर लेपककी गौराता [प्रुख्यता] होती है ।

उनमेंसे पताकाकी मुखयता [का उदाहरण] जैसे श्रो मूद्रक् [अषि] विरचित मृच्‍चकटिक [नाटक] मे पूर्वं उपकारके कारक् वह्नीरभत प्रायंक [नाम्र पताकानायक] की [मुख्यम पताका] पाई जाती है] ।

प्रकरो [नायक] की [मुख्यताका उदाहरण] जैसे वोरनाप विरचित 'कुन्दमाल'ा' [नाटक] मे [रामदशरथ रि परित्यक्का मभिलाष] सीता मोर उससे [कुन्ज सव दोनों] पुत्रोंक पासन तथा [उन दोनों पुत्रो सहित सीताका रामंक साथ] संयोज कराने [स्प वध] मे ड़ग्न अपने जिनो फलको प्रवेष्टा न रचनेके [इतसैए प्रकरो नापयक लश्‌अमे मुक्त्] यानमोदिक्को [मुख्यतत् पाई जांतो ह्] ।

[पताका-नायक तथा प्रकृतीनायक] दोनोंको [मुख्यताका उदाहरऩ] जोंे राम प्रभन्धों मे [पर्थांनू रूपसे धारप्रप्त] लश्‌ष्मण सिंम नाटक्में] सुपोष, विभोषण् जटायु, हनुमत् पत्न्वादशे [मुख्यता पाई जानो ह्] । पताक-नायक तथा प्रकरो-नापयक्मे प्राय: दोनोप्र [प्रपत्वे] षपच्चय्‌ा न होनेपार [पभवे था] तथा बोजेप्सो हो मुख्यता रहतो ह् ।

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स्वथ पताकाया प्रधानत्वे समर्थिते मनिप्रधानं निरस्यति— पताकायाः प्रधानत्वेऽनुसन्धिः स्चनादिभिः ॥३३॥

[सूत्र ३६]—पताकाकी प्रधानता होनेपर [मुख्य सन्धि नहीं होते हैं किन्तु] सूचना प्रादिके द्वारा अनसुधि [गौण सन्धि] होते हैं । ३३ । 'अनुसन्धि' अर्थात् मुख्य सधिके अनुगत सन्धि प्रयुक्त होते हैं गौण सन्धि होते हैं यह प्रभिप्राय है । यद्यपि पताका [नायक] के प्रधान होनेपर मुख्य [नायक] के चरित्रके समान [उसमें भी मुख्य] सधि होने चाहिए फिर भी ये [मुख्य सन्धि न होकर] मुख्य सधिको उपयुक्त [गौण] होनेसे गौण होनेके कारण 'अनुसन्धि' [कहलाते] हैं । अनयथा [यदि पताका नायकके वृत्तमें प्रयुक्त सधिको मुख्य सधि हों माना जाय तो] पताका नायकके चरितनको गौरवत्ता [प्रासङ्किकत्व] नहों बनेगी । इसलिए [ गौण सन्धि होनेके कारण ] ये [प्रनुसध] सूचना प्रादिके द्वारा प्रकाशित होते हैं । प्रादि द्वारसे [यह भी सूचित होता है कि] कहों [उनकी] कल्पना भी जाती है श्रोेर कहोंं प्रथात [ अनसुधिको रूपमें ] रचना की जाती है । किन्तु मुख्य सधियोंसे अतिरिक [अनुसन्धि] [पदमें प्रयुक्त] एकवचन परिवक्षित है । योंकि [पताका-नायकके चरितमें भी] मुख्य श्रोेर निर्वहणीय रूप दो [ अनसुधियोपयोगी ] का होना प्रावश्यक है । इसलिए [एक सधि तो होता ही नहों है] दो-से लेकर [तो-चार प्रादि] भतु सधि होते हैं । जैसे माया पुष्पकमें— जिन ॠरामचन्द्रजी] की कृपार्से [हमको] दुर्ग भृमि, व्रामात्य, मित्र, स्त्रो, दरोर, धन, मान, दातृत्व नायकका मुख्य श्रोेर देव-कल्प [रामचन्द्रजी] के साथ मित्रता यह सब प्राप्त हु्रा है, ब्राज हम प्रियारे विरहित उनके लिए यथेष्ट रूपमें प्राप्त होनेवाले पर्वतके समान बड़े-बड़े शिलोखण्डों [समुद्रके ऊपर पुल बनाकर] मार्गों निर्माण करनेमें भी समय नहों हो रहे हैं [यह लज्जा श्रोेर बु खको बात है] ।

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अत्र सुप्रादिमनिर्धारितधनुर्धरौ रामेया मह मैत्रेयादिक मसृज्यमुपपद हत्य सुग्रीववचनादू रामशक्तिममपन्नसाभ्युदय निरेंहमप्येव वृत्तमुपनिबद्धमिति । यथा वा राघवाभ्युदये— मित्र दशाननवधादपि गहित क्रिकन्धमागत्य च, जुष्टा जुष्टमति स साहसगतिरेता सतारा मही। इत्यं तेन वितन्वता न विहितं देवेन रामेण कि, तन्न मत्यं सम तथ्य कतुं सुचित प्रायैरपि प्रीगनम् ॥

यहां 'प्रर्यांत इस उदाहरणमें] मुखसंधि में वरांगीय रामचंद्र के साथ मंत्री आदिपूर्वक प्रयंकों सुप्रीवके वचनसे कल्पना करके, [प्रयांत उसका साक्षात् रूपसे वरांन न करके] रामचंद्रकी शक्तिमें प्राप्त श्रभ्युदय हवि निर्बंहण [सपिंमे वरांन किए जाने योग्य] वृत्तका ही वरांन किया है । इस प्रकार इसमे मुखमति तथा निर्बंहण संधिके प्रयंकको दो भनुसंधियोंका ममावेशर किया गया है। इसलिए यह दो भनुसंधियों के ममावेशका उदाहरण है । मांगे चार भनुसंधियोंके प्रयोगका उदा०र्या राघवाभ्युदयमे देते हैं । प्रययरा जंसे 'राघवाभ्युदय' [नाटक] मे [चार भनुसंधियोंका समावेशर निम्न इसोकमे पाताका-नायक सुप्रीवके वृत्तांतमे पाया जाता है]— [जिन श्यामचंद्रजीने मुग्रीवको] देखते ही श्रपना मित्र मान लिया, [? मुखसंधि], शुद्रुमति शत्रु सहितारमाति [प्रयांत दुष्टतापूर्वंक परदारापहरण श्रादि प्रकार्यं करनिवाते] उस दुष्ट [वाली] भा नात न दिया [? विमर्शां संधि], घोर [मेरे पत्तनों] ताराके सहित वृत्सियों [प्रयांत मेरा राज्य मुग्रीवको] प्रदान कीं [४ निर्बंहण संधि] । इस प्रकार [मेरे हितमें समस्त कार्यं] करते हुए भगवान् रामचंद्रजीने [मेरे लिए] सव कुछ किया, मेरे सारे मनोरथ पूरैं कर दिए] । इसलिये यह विल्कुल सत्य है कि मुझने श्रपने प्राणो [मूल्य] मे भी [प्रयांत प्राणोंको देकर भी] उसके प्रसन्नताका सम्पादन करना चाहिए ।

अत्र 'मित्रम्' इत्यादिना मुखं, 'क्रिकन्ध' इत्यादिना पतिमुख, 'जुष्टा' इत्यादिना विमर्शो, 'दूता मतारा मही' इति निर्बंहणं सुग्रीववचनान् प्रकाशितम् । उत्तरार्धेन तु मुख्यनाथकानुर्यात्वदर्शनादनुमितत्व रयापितंमिति । प्रक्रयांस्तु प्रायैरपि शवलपुष्टतया मन्ध्यनुरसंधियाच नैव नारसीति ॥३३॥

प्रकरो [ नाटम् ] नु दो प्रायाय होनेनर भी [उसका] पोषगा हो वृत्त होनेनें मारस [उसमें] सधि या भनुसंधि प्रकारो किता हो नहीं होनी है ॥ ३३ ॥

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अथ उपायानन्तरमुखदर्शनं लक्षयितुं तद्रूपानुदिशति---

(३) अथ उपायानन्तरमुखदर्शनं लक्षयितुं तद्रूपानुदिशति--- [सूत्र ३७]—ग्रारम्भ-यत्न-प्राप्त्याशा-नियताप्ति-फलागमा: । नेत्वच्चे प्रधाने स्पुः पश्चावस्या भवं क्रमात् ॥३७॥ 'नेतु:' मुख्यं फलं प्रति बीजाद्युपायान् प्रयोक्तुः । 'श्रुवम्' इनि प्रधाने वृत्ते पञ्चानामवश्यमभावमाह । तेन प्रारब्धिके द्वयादयो श्रादुसनिधवद् गौणायाश्र भवन्ति । नाटकलक्षणप्रस्तावाच्चात्राटकं, नाटकरचनानुसारिप्रकारण-नाटिका-प्रकरणांकपु चायं नियम । तेन क्यायोगार्द्ध यथालक्षणं न्यूनावस्थरचमपि न दोषाय । 'क्रमात्' इतो उद्देशोक्तक्रमेऽपि निवन्ध्यन्ते, नापायचनं क्रमाक्रमात् । प्रेच्छापूर्वककारियां हि प्रथममारम्भ., ततः प्रयत्नः; ततः सम्भावना, ततः निश्चित्य, ततः फलग्राप्तिरितयमेव क्रम इति ॥३७॥

(३) पांच दशाओं का निरूपण— पाँचवीं कारिका में नाटक में लक्षणा करते समय १ श्रारम्भ मोर २ उपाय के श्रनन्तर तोसरे 'दशा' शान्दवा प्रयोग किया गया था । 'दशा' भी नाटकका एक मुख्य भाग है । इसलिये उपायोंके नित्परें कर चुननेके बाद 'दशा' का नित्परें प्रारम्भ करते है । विश्कम्भक श्रादि पांच श्रर्थौपक्षेपकोंका वर्णन करनेके बाद बीज श्रादि पांच उपायोंका वर्णन किया गया था । उसी प्रकार श्रवस्थाओं श्रोरेर श्रागे बर्हो जानने वाली संनिपातोभी सध्या पांच पाँच है । इस समय पहले पांच श्रवस्थाओंका वर्णन करते है । श्रव उपायोंके बाद उद्दिष्ट 'दशा' का लक्षणा करनेकेलिये उसके भेदोंको गिनाते है ['उदिदशाति' नामसादृशेना मध्ययति]— [सूत्र ३७]—नाटकके मुख्य चरित्र [वृत्त] मे १ श्रारम्भ, २ यत्न, ३ प्राप्त्याशा, ४ नियताप्ति श्रोरेर ४ फलागम ये पांच श्रवस्थाएं [इसो] क्रमसे श्रोरेर श्रवस्थायें होती ॰ [इसमें पांच

नेता श्यर्यादि मुख्य फलं [को प्राप्ति] के प्रति बीजादि उपायेका प्रयोग करने बालोके,

[वर्त्तनमे पांच श्रवस्थाएं श्रवचय होती हैं] । 'श्रवस्था' श्यर्यांत प्रधान चरित्रके विषयमे शरोर, वारणो तथा मनके वयापारार । 'भवस्' इस [पद] से प्रधान [नायक] के चरित्रमे [वृत्ते] पांच [श्रवस्थायों] की श्यपरपरिहार्यत सूचित को है । इसलिये प्रारसद्धिक [प्रर्थात् पता का प्रकरो श्रादिके चरित्रमे] श्रादुसनिधिययोंके समान दो श्रादि [प्रवस्थाएं] भी हो सकते हैं श्रोरेर ये गोण हैं । नाटकके लक्षणाकी प्रक्रियां होनेसे नाटकमे तथा नाटकके लक्षणाका भनुसररप करने वाले प्रकरसण नाटिका तथा प्रक्रियांपको भी यही नियम है [प्रर्थात् पांचों प्रवस्थायोंका होना प्रति वायं है] । इसलिये क्यायोग द्वादिमे उनके लकषपोंके भनुमार [पांचों श्रवस्यायोंका प्रयोग न फरकें] न्यूनतव [प्रर्यात् दो-तोण-चार श्रवस्थायोंका प्रयोग] भी दोपारायक नहीं होता है । 'क्रमात्' इस [पद] से [यह सूचित किया है कि पांचों श्रवस्थाएं] इसो कमसे निवद्ध करनी चहिए उपायोंके समान कम या श्यतिकममे नहीं । बुडिमानू पुरुषोंके कार्यमे पहले श्रारम्भ, फिर उसके बाद प्रयतन, उसके बाद सम्भावना, उसके बाद नित्यय श्रोरेर फलप्राप्ति यही क्रम रहता है । [इसलिये नाटकमे भी इसो क्रमसे श्रवस्थायोंका समवेद होना चहिए] ॥३७॥

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आरम्भं द्व्युपपादयति—

(९) आरम्भं द्व्युपपादयति— [सूत्र ३८]—फलायौसुख्यमारम्भः । फलं मुख्यं मध्यमं । तत्रेऽर्थमौसुख्यं उपायविषयं, श्रननेनोपायेन पतत्नु सिद्ध्यतीति । स्मरस्पोतृण्ठादि कर्म, तदनुगुणो द्व्यापारस्तद्भयमारम्भः । उपायविषयमोःसुखं, द्वोतसुख्यानुगुणो द्व्यापारस्तद्भयमारम्भोऽवस्थेत्यर्थः । यथा चेष्टासंहारं प्रथमेडके, महादेवं प्रति— "भीमः—श्रथ भगवान् कुष्णः केन पथेन सुखोषणां प्रति ममिंधं सततुं प्राहतुं । महादेवः—आार्य नतु पथ्यभिमांसे !" इत्यादि । यथा वा नलविलासे प्रथमेऽङ्के—"नेपथ्ये तूर्येर्ध्वानिः । कलहंसः—देव युगादिदेवेन—देवातायतन—मन्ध्या वलिपतडध्वनिर यम् ॥ राजा— [ स्वगतं ] श्रहो परमं श्लाघ्यं । [ पुनश्चिरमृष्य ] प्रेपयाम्येतं कलहंसं दमयन्त्या। पाश्वं । नपा च मर्काटकं विदर्भाभापा—नेपाचारकुशला सहेव यातु ?" इत्यादि । विदर्भो चारिकाके पाँचो प्रवद्यायग्रोको 'उद्देश' अर्थात् नाममात्र में वर्णन किया गया था उनमें से एक 'प्रवस्या' अर्थात् दमयन्ती के स्वयंवर में लधुगा श्रादि करते है । उससे पूर्व पद्यले ग्राभन प्रवस्याका लक्षण देने हैं । (९) आरम्भावस्था— ग्रब आरम्भ [प्रवस्या] का विवेचन करते हैं— [सूत्र ३८]—फल [को प्राप्ति] केलिए प्रोःसुख्य 'आरम्भ' [प्रवस्या कहलाती] है । फल [का प्रयोजन] मुख्य साध्य [है] । उसमें तिलक उपाय—त्रिपयक प्रोःसुख्य प्रयोजन इस उसके प्राप्ति केलिये दोनो ग्रारम्भ [प्रवस्या होने] हैं । प्रयोजन उपाय—त्रिपयक प्रोःसुख्य, और प्रोःसुख्यहेतु ध्यापार [दोनो] प्रारम्भावस्या हैं यह प्रभिप्राय है । जैसे वेपोत्तरारके प्रयत्न पञ्चुसे सहदेवके प्रति [भोम कहते हैं कि]— "भोम—मद्या भगवान् कनकाङ्को जित नारोपरि द्रोण्णिकां पातु साङ्ग्यं वरलेनलहि भेजा है ? सहदेव—ग्रार्य पञ्च गौयोंने द्वार ।" इत्यादि । यथा नलविलासके प्रथम पञ्चुमे— "नेपथ्ये वार्तावहनि [सुनाई देता है] । कलहत—देव, युगादिदेवके मानिदर [देवतायतन] में मधुरालापीत पूजनकरे समपकरे वाद्योपरि यह स्वनित है । राजा [स्वगत] पहो यह वड़े प्रसङ्ग नाहुन है । [ किर विचार कर ] तय इस हंस-हुंकारो दमयन्तीके पास भेज दू । और विदर्भ देवोंको भाग येष तथा प्राप्तार पारितो जानने वाली यत्र मर्कटिका [दासी] भी जम्बें साथ हो मिले दो जाप" इत्यादि । यह ग्रब मूलत पांचवे पञ्चुमे तिल उपम [त्रिपयक] पोःसुख्य नपा तदनुगत ध्यापारकं मूलप है । अतः य प्रारम्भावस्याका प्रदशर्न करमे हैं ।

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एतासु चावस्थासु नायक-सहाय-प्रतिपात्र-दैव-वध्या-पारार्थ्यां श्रन्थवतमस्य, द्र्योः-कथायाश्चतुर्षां च एतस्यां, द्व्योरितस्यपु चतसृपु पञ्चस्र्वाप च यथायथगुणन्मीलनं वृत्ति। फलयोगस्तु मुख्यकथार्थैव । न च दैवात्कर्मणः प्रारम्भाश्रयन्मीलने मानुपकर्माभ्यांनाटकस्यार्थगुम्त्प्राप्तहेतुत्वम्। दैव-मानुपलद्यापारयोः परस्परापेक्ष्यैव शुभाशुभफलसाधकद्वात्। दैवाद्विध्य परियन्ते पुएयैर्मुपचतु मानुपकर्मणां प्रवर्त्तनात्। उपभोगेच चोभयमप्यनु-कूलदैव प्रति विहितप्राप्तास्रियाः प्रतिपत्तेरनुत्ति सर्वत्र दैवस्य मानुपदैवव्यापारापेक्ष-त्वात् देवायस्तफलान्वयपि रूपकाणि सामाजिलकानां युद्धक्षेत्रागय निधनस्थनानि चान्ति । यथा पुएपदृतिकं मृद्नशुकटिकम्। चेति॥

य प्रारम्भभावाके लक्षण प्रोर उदाहरणे उपरगे प्रनुच्छेदेमे दिसलाए हैं। प्रथ मगले प्रनुच्छेदेमे प्रन्थकार यह दिसलाना चाहते हैं कि इन प्रवस्थाप्रोमे प्रदर्शंन नायकके व्यापार द्वारा भी हो सक्ता है प्रोर नहों प्रतिनायक, सहाय्यक तथा दैव ब्यापारद्वे द्वारा भी सनता है। प्रोदर वह केवल प्रारम्भावस्थामें हो नहों ग्रपितु सभी प्रवस्थाप्रोमे हो सक्ता है। वभी-नभी नायक, सहाय्यक, प्रतिपथ प्रोदर दैव ब्यापारोमेसे दो, तीन या चारो मिलकर किसी प्रवस्थाका प्रदर्शन करते हैं। कभो ये चारो या इनमेंसे एक, दो, या तीन किसी एक प्रवस्थाका श्रथवा एकसे ग्रधिक दो, तीन, चार या पांचों प्रवस्थाप्रोका उन्मीलन कराते हैं। दोसी वातने प्रगले प्रनुच्छेदेमे इस प्रकार दिया है— इन [पाँचो] प्रवस्थाप्रोमे १ नायक, २ सहाय्यक [पताका प्रकरो], ३ प्रतिनायक प्रोदर ४ दैव [इन चारो ब्यापारोके] मेसे किसी एक या दो या तीन प्रयवा चारोका, किसी एक [प्रवस्थाके उन्मीलन] मे, अथवा दो या तीन श्रथवा चार या पांचों [प्रवस्थाप्रो] के उन्मीलन मे ग्रावश्यकतानुसार ब्यापार होता है। [प्रवस्थाप्रोक्ता प्रकारानान या उन्मोलन चारे किसी भी ब्यापारसे हो किन्तु] फलकी प्राप्ति [सदैव] मुख्य नायकको हो होतो है। इन प्रवस्थाप्रोके प्रकासनमे दैव-व्यापार भी कारणा हो सक्ता है यह बात ग्रभी इस ग्रनुच्छेदेमे कही हो है। दैव ब्यापार को पचविध प्रवस्थाप्रोके प्रकासनमे कारणा माननेपर यह प्रदन उठ सक्ता है कि नाटकको उद्देएय मनोरन्जनके साथ कस्त्यंग्गत्मत्की शिक्षा देना हो है। जब दैवको कारणा मानेंगे तो उसपर मनुष्यक्या नियनत्रण न होनेके कारणा दैवान्ित कायरोंसे कोई शिक्षा नहों मिलेगी। यह दाष्ट्रा उठाकर उसपर समाधन प्रगले प्रनुच्छेदेमे करते हैं— दैवके ब्यापारसे प्रारम्भ ग्रादि [प्रवस्थाप्रो] के उन्मीलन होनेपर उसमे मानुप ब्यापारका प्रभाव होनेसे नाटकको शिक्षा प्रदायकका हेतु नहों कहा जा सकंगा। यह बात नहों समकनी चहिए। [क्योन्कि] दैव तथा मानुप-व्यापार दोनो एक-दूसरेको सहायमतासे हैं। शुभ प्रोदर ग्रशुभ फलके साधक होते हैं। [दूसरो बात यह भी है कि] भारयसे भी प्रथंककी प्राप्ति देखकर [देखने वाले] पुण्यका संबन्ध करनेकेलिए मनुष्य साध्य कार्योमे प्रभुत होर सक्ते हैं। प्रोदर जीवनके सकटमे पड जानेपर भी [विहितप्राप्तास्रियात्] प्रत्येक दैवके उपभोग द्वारा नष्ट होनेकी प्रतोक्षा कर सक्ते हैं। इसलिए दैवके सर्वत्र मानुप-व्यापारकी ग्रपेक्षा रक्ननेसे दैवके प्रभाव हो [जिनका फल है इस प्रकारके रूपक भी सामाजिकोके बुद्धिको शुद्िकलए बनाने हो चाहीए। जैसे 'पुएपदृतिक' तथा 'मृद्नशुकटिक' ग्रादि [दैवापत्त फल वाले रूपक हैं]।

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प्रयत्नो व्याप्तिमात्र त्वरा । मुख्यफलोपायापरैस्त्वरा, ध्याननोपायेन विना फलं न भवतोरिति निश्चित्य परमोत्सुक्ये, प्रकटपेंषु यत्नः प्रयत्न । औत्सुक्यमात्रमारम्भः, परमोत्सुक्य तु प्रयत्न इत्यर्थः ।

उनसे भो सामाजिकोँको शिक्षा मिलती हो है । (३) प्रयत्नावस्था—प्रवृत्त प्रयत्न [के सक्षेप मेँ] को कहते हैं—फलेच्छ उपाओंके व्यापारमें नोप्रवृत्त [करना] प्रयत्न बहुसाता है । मुख्य फल [को प्राप्ति] के उपायोंको लागू करनेमें नोप्रवृत्ता प्रवृत्तौ इस उपायोंके बिना यह फल सिद्ध नहीँ हो सकता है । इस प्रकारके निश्चित्य कराने [उपायोंको प्रस्तुत करनेके] प्रयत्न उत्मुकता, प्रकाश्यैष यत्न [प्रयत्न इस घुत्पत्तित्त्रेँ ग्रनुसार] 'प्रवत्न' [बहुसाता] है । [इसकी भामिप्राय यह हुँआ कि] केवल औत्मुक्य धारकम [प्रवृत्तिमात्र], और परम औत्मुक्य प्रयत्न [प्रवृत्त्यामें परिणत] होता है । जैसे रत्नावल्यामें—"फिर भी दनाँनशा ग्राप्त कोई़ उपाय नहीँ है । इसलिये जंमे चित्त चनाचर हो अपनी इच्छाश्रो पूर्तित मरता हूँ ।" प्रयथा जैसे नलविलासे तृतीय प्रक्रमें—"राजा—[ नोप्रवृत्तहो] मकरिके ! क्या तुम राजपुत्रीहो घट! तो सब्स्री हो ? मकरिका—मेँ [अपनी ग्रोरले पुऱा] प्रयत्न मरुँगी । किनुु माना भगवान्‌वें दपोन है । राजा—तो [ नोप्र हेँ] मन्न करो ।"

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हेतुमात्रेन फलान्वययोगः प्रतिवन्धनिश्चयेन द्वयोरन्वयः । फलान्तरसम्भावनाविरोधाच्चोपायादीप्तः प्रधानफलस्य या सम्भावना न तु निश्चयः, सा प्राप्ते: प्रवान्तफलताभस्य श्राशा प्राप्त्याशा ।

मात्रशब्देन फलान्वयरयोगः प्रतिवन्धनिश्चयेन द्वयोरन्वयः । फलान्तरसम्भन्यान विरोधाच्चोपायादीप्तः प्रधानफलस्य या सम्भावना न तु निश्चयः, सा प्राप्ते: प्रवान्तफलताभस्य श्राशा प्राप्त्याशा । यथा वेङ्कीमाध्वरे तृतीयेऽङ्के । "भीम——कृथा येन शिरोरुहेषु पशुना पाञ्चालराजातमजः, येनास्या: परिधानमल्यपहृतं राज्ञां गुरूषु पुर । यस्सोर: स्थलशोभितासवमहं पातु प्रतिज्ञातकामं, सोऽयं मद्भुजपञ्जरान्तगतः सरहस्यां कौतुकवाच ॥" इत्यत्र दुःशासनवधारोपकौरववधसम्भावनेन युद्धिष्ठिरस्य राज्यप्राप्ति-सम्भवः । यथा वा नलविलासे चतुर्थेऽङ्के स्वयम्वराङ्के——"नलः——कलहं ! मकरिके ! फलितः म एस् नां प्रयासः । कलहंसः——देव नार्योः प्रयासः किन्तु देवस्य खप्तः ।"

हेतुमात्रेण फलको [प्राशिकी] कचिद् सम्भावना [हो जानां] 'प्राप्त्याशा' [कहलाती] है ।

मान् शब्दसे [मुख्य फलके प्रतीरक्त या मुख्य फलसे भिन्न] अन्य फलका सम्बन्ध तथा प्रतिबन्धके निश्चित्यका विचारसां किया है । [उस हेतुके साथ] अन्य फलका सम्बन्ध न होनेसे धार्तराष्ट्रके विनाशके साथसाथ श्रभिमन्यु उपादेः प्रधान फलका [प्राशिकी] थोड़ी सी सम्भावना, न कि निश्चित्य होना, प्राशिकी श्रर्थात् प्रधन फलको प्राशिकी श्राशा होनेसे 'प्राप्त्याशा' [कहलाती] है । जैसे वेङ्कीसहारके तोड़रे भ्रङ्कमें । "भोम——जिस दुष्ट [पशुना] से पाञ्चालराजको पुत्रीके केशोंको श्चोंचा था और जिसने राजाधिरो तथा गुरूञ्रोंके सामने उसके वस्त्रोंको भी ग्रपहरण [करनेका घत्न] किया । जिसकी छातीपर रक्त पोंछने मैने प्रतिज्ञा की थो वह [दुष्ट दुशासन इस समय] मेरी भुजाओंके शिकजे-

"नलः——कलहं ! मकरिके ! फलितः म एस् नां प्रयामः । कलहंसः——देव नार्योः प्रयासः किन्तु देवस्य खप्तः ।"

में ग्रा गया है । हे कौतुबो ! [तुम्हारी सामर्थ्यं हो तो ग्राकर ग्रब] इसकी रक्षा कर लो ? इसमें दुःशासनके वधसे समस्त कौरवोंके वधकी सम्भावना हो जानेसे युद्धिष्ठिरको राज्यप्राप्तिको सम्भावना [प्राप्त्याशा] हो गई है । श्रन्यवत् जैसे नलविलासक स्वयम्वराङ्के, नामक चतुर्थ प्रङ्कमें——"नल——है कलहम ! हे मकरिके ! तुम दोनोंका वह् प्रयास सफल हो गया । कलहम——देव ! हम दोनोंका प्रयत्न नहीं किन्तु श्रापकां खप्त [सफल हुग्रा] ।

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नट-नममुदिदानीं स्वननार्थेऽप्याशा । इति ॥ ३५ ॥

(४) श्रथ नियतार्थस्ते स्पष्टयति— [सूत्र ४१]—नियतार्थस्तु प्रयानां साफल्यात् कार्यनिष्पयः । प्रयाणफलदेतूनां प्रतिनध्यप्रयाभावेन मफलसहकारिसम्पया कार्यस्य प्रधानफलस्य निश्चितो भविष्यत्पयेच्छेति निध्यमो, नियतां फलाद्यभिचारिणी श्राशानियतार्थः । यथो वेङ्कीमाधारे— "कर्णा श्वेतचञ्कानां जतुमयशरमपोढोपनः मोडभिमानी, राजा दुःशासनादेर्गुरुनरुजततस्याक्कराराज्ञा मित्रकम । कृपाणके शस्त्रोत्तरीयवपनयनपटु पाण्डवा यस्य दास , कपाम्मे दुर्योधनादमौ मथयत न रूपा द्रष्टुमश्यागती स्वः ॥" नट—मव स्वननके प्रथेको प्राप्तिको माना हो गई है ।" इत्यादि ॥३५॥

४ नियतार्थी स्वरस्य— प्रयत्न, यत्न, और प्रयास का रूप तीन प्रकार प्रवृत्याप्रवा वृत्तों वर चुकनेके बाद प्रव 'नियतार्थी' रूप सन्नुघटित हवेमध्येके लश्करीदिखावा प्रवृत्त होता है व मते प्रागे उमे वर्षन प्रारंभ करते है । प्रथम नियतार्थी [बे लश्करा प्रालि] को स्पष्ट करते है— [सूत्र ४१]—उपायोंसे सफल होजानेसे कायं [की प्राप्ति] या निष्पय 'नियतार्थी' महताती है । प्रधान फलके हेतुप्रोंके, पतिनध्यप्रथ [करतों] का नाम [प्रभाव] हो जानेके और [उसको उत्पत्तिक] समस्त सहकारियोंसे प्राप्त हो जातेके बारए कायं पर्याप्त प्रधान फलश निष्पय पर्याप्त प्रवृत्त होगा हो द्वास प्रथारका निदचय, नियता पर्याप्त फलशे प्रयथभिचारिली निदिचित प्राप्ति होनेसे [हम ध्युत्पत्तिके भघुतार] नियतार्थी [कहलाते] है। यथो वेङ्कीमाधारेम—

"[हम पाण्डवोंके साथ] चतुर दम [करके हमारा राज्य वपपरलाए] भरते यातात, सातके घर [मे यनद रहते हम तमो] को जलाने यारा, हु नातान भानिदार वह धाभिमानो ररकर, रोे भनत्योेकर लुच [वपयेक शरद], पाण्डवर [कर्ण] म्रर [भिख, श्रेष्ठोते मेन्र, मोर म्यो, वा प्रपहरत म्रनानेके पदु मोर [पपिक या कहें] पाण्डय जियारे 'कात' है वह दुयोंपन प्रव रहूी है। यनतापो, हम दोनों [पर्थीं प्रजुंन मोर भीम] योंपं [जने मारनेके निए] नहाँ भेजे [मिलनेके लए प्राए है ।" दूस्यादि [वचन] मे भीम तथा पजुंनन्हें द्वारा धरतीके वचे हुए दुर्योंपार। धन्येनाल [जो जानेके बारए [पाञ्चवोंको रामके प्रातिको निदचय षे जाने मे । वर] नियतार्थी हु । वेङ्कीमाधारेमे पद्यम ध्रुवम वना दम नक म्रनान्नाद व यव हु । आानर मोर दुर्योंपनका शीन भी मधुरुम वह जहंवर मूतिथ दुर्योंपनहो रयम रकर मारीव उचके रुप फे भगा जाना है । हेमी दशामें पुरषत्पा मा पार्ई दुर्योधनहो मम रक र । उती मघन दुर्योंपनहो रोजन हुं भीम मोर पजुंन उतर सि fित 1 8

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यथा वा राघवाभ्युदये पञ्चडके-- "सुमीवः--[जागवन्तं प्रति] भवतु यादृशतात्‍शो वा स पारदारिको राक्षसरतथापि देवपादानां वध्यः । रामः--[मोतापद्घारं मृत्वा सर्गदौविशादम्‍] कृपिराज ! प्रतिराजाविक्रम- यामिनीतपनोद्रये भर्वाति सहर्ये सति-- निह्ह्त्य दर्शकन्धरं सह् विपुलरथःकथ-- प्रथाभिरधिगदृरां जनकजा प्रहृष्टये ध्रुवम् । शशाक न स रक्षितुं रघुपतिं: परेष्यै: प्रियै-- मयं तद्वपि सम्भवी चिरमकीतिशोलादलः ॥" इति ।

भूमिको उद्धृत है । इसको मुनिकर कोरङ्गपक्षके मुख्य सेनानायकोंने मारे जाने पर दुर्योधनके अकेले ही शेष रह जानेसे प्रवृत्त पाण्डवोंकी राज्यप्राप्ति प्रायः निश्चित हो जाती है । इसलिए ग्रन्थकारने इसे कार्यङ्क 'निपतति' हप चतुर्थी प्रवस्थाके उदाहररुपके हपमें यहाँ प्रस्तुत किया है । इसे प्रकार नियताप्तिका दूसरा उदाहररुप ग्रन्थे अपने वताए राघवाभ्युदय नाटक में इसे प्रस्तुत करते हैं । प्रथवा जैसे राघवाभ्युदयके पञ्चडकमें-- सुमीव--[जागवन्तके प्रति कहते हैं कि] हे भ्रमणलय ! वह दूसरेकी स्त्रीका अपहरण करने वाला रावण [राक्षस] चाहे कत्सा भी [बलवान् और विद्वान्] हो किन्तु [दूसरेकी स्त्री का अपहरण करने वाला होनेके कारण वह पापी है व्रत एव] देव पाद [श्री रामचन्द्रजी] के लिए वध्य ही है । राम--[सीताके अपहरणके दुःखको स्मरके करुणा तथा विपादके सहित कहते हैं कि] हे कृपिराज ! [प्रतिराज] के विद्धाम रूप यामिने [रामन्‍] के लिए सूर्यके समान [अर्थात् शत्रुश्रोंके पराभवको नप्त करने वाले] अपने सहायक होनेपर-- जनकजा सीताको धाम कर लूंगा । फिर भी वह रघुपति दूसरोंके क्रपनो प्रियाको रक्षा करनेमें भी समर्थ नहीं हुया इस प्रकारका अपकोतिका कोलाहल सदाके लिए हो हो गया । यहाँ । यहाँ भी फलसिद्धिके बाधकका निराकररुपा और फलप्राप्ति प्रयत्नारू सीताके उद्धारके साधनोके उपस्थित हो जानेसे रामचन्द्रको सीताके उद्धार हप फलको प्राप्ति निश्चित हो गया है । इसलिए यह भी 'नियताप्ति' हप चतुर्थी प्रवस्थाके उदाहररुप रूपमें प्रस्तुत किया गया है । इस प्रकार यहाँ तक कार्यङ्की आरम्भ आदि पाँच धवस्थाओंकेलने चार धरमध्यायोंके लक्षण तथा उदाहररुप ग्राप्त सहित विस्तारपूर्वक् विवेचन हो चुका । प्रकृत एक 'फलागम' हप अन्तिम श्रवस्था दोप रह जाती है । उसका निप्पण ग्रन्थे इनोकार्थ द्वारा प्रस्तुत करते हैं ।

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मातृदिष्टार्थसम्भृतिर्नायिकस्य फलागमः ॥३६॥

साङ्गानुसमनन्तरं, न तु दानादिविषयं स्वर्गादिफलमिव जन्मान्तरभाविनी । इष्टस्याभिप्रेतस्य, श्राथस्य प्रयोजनस्य, सम्यक् पूर्र्यतेन, भूतान्तरप्राप्तिः, फलस्यागमे श्रागमारम्भो न पतनरागाद्भवम् । तद् फलागम्योत्पत्त्यादेश पञ्चस्ववस्थासु । तद्पन्नाभय न नायकेन य सम्भोगस्तन प्रवन्धरस्य मुख्यं माघ्यम् । श्रत एव फले साङ्ख्ये नायकस्य पञ्चावस्था मङ्गरान्ते । 'नायकस्य' इत्यनेन चावस्थानेराङ्गि सचिव-नायिका विपन्न-नेयादिद्व्यापारैर-रपि निवन्ध्यते इत्युक्तं भवति । तानि तु तथा निमित्तानार्याप फत्तसो नायक एव पर्यवस्यन्ति । श्रत पच रसनावल्या - 'ग्रारामभेदरिमन् रसामिनो वृत्तिदेहतां' इत्यादि रसामिगतवेग्न योगन्धरायसनेोचतम् । फलागम पुनर्नायकस्यैव निवेश्यते ।

॥३६॥

(y) फलागम श्रवसरधा— ग्रब फलागम [हप पञ्चमो श्रवस्था] का निरूपण करते हैं— [सूत्र ५२]—नायककृतो साक्षात् [जन्मान्तरभावी फलकं रूपमे नहों मपित्त इसीलिए जन्म में वापस नहीं श्राता] इष्ट श्रयंकृतो प्राप्तिः फलागमः [हप पञ्चमो प्रवस्था कहलाती] है । ॥३६॥ [कारिकामें पाया हुग्रा ] 'साक्षात् [पद समनन्तर] तुरन्त वाद्मे [ होनेवाली इष्टायं प्राक्षिका सूचक है] न कि दानादिसे प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि फलके समान दूसरे जन्ममें प्राप्त होनेवाली [इष्टायं प्राक्षिता का प्राप्ति उससे होता है] । 'इष्ट' श्रर्थात् ग्राभिप्रेत [चाहे हुए] 'प्रयम्' श्रर्थात् प्रयोजकम् [सम्भूति प्रयोजन] सम्यक् पूर्र्य हपसे [भली प्रकार] भृति प्रय्यर्थात् उत्पत्ति । 'फलागम' [कहताती] है । फलागम [इस पदमें] 'ग्रागम प्रय्यर्थात् प्रारम्भ [करना चाहिए] न कि 'प्रागतस्य प्रय्यर्थात् फलके] सिद्धि । श्रर्थात् फलकी उत्पत्तिका प्रारम्भ पञ्चमो [फलागम हप] प्रवस्थाप्र [से प्रभिप्रेत] है । ग्रोर [पूरे हपसे] उत्पन्न [फल] का जो नायकद्वारा उपयोग है वह प्रक्तृका मुख्य साध्य है । [प्रवस्था हप नहीं] । इसलिए फलके सिद्धिने नायकके पाँच प्रवस्थाएं हैं— 'नायकस्य' इस [पद ] से [यह सूचित किया है कि फलागम हप पञ्चम प्रवस्थाको गौणतकर] रूप [चारो] प्रवस्थाएं सचिव, नायिका, प्रतिनायक या देव प्रादि में ध्यापारोंद्वारा भी प्रयोजित हो सकर्ती हैं [कितु फलागम हप प्रतिम अवस्याका भेद नायकको हो प्राप्त होता] । यह प्रभिप्रेत है । वे [प्रारम्भ प्रादि हप चार प्रवस्थाएं] उस प्रकारसे [पर्याय नायकसे भिन्न सचिव, नायिका, प्रतिनायक तथा देवांदि द्वार] निवेश होनेपर भी पत हपमें [प्रथन्त् नायकमें हो] पर्यवसित होते हैं [प्रर्थात् नोप धारो प्रवस्थापों] ध्यायोजना चाहे किसीं भी प्रकार हो प्रयोजनमें हो किन्तु ग्रन्तमें उत्कृष्ट फल नायककृतो हो प्राप्त होना है] । इसीलिए रसनावलोमें—'स्वार्गादिको वृत्तिद हेतुभूत इस वावन' इत्यादि स्वामिगत हपसे हो [फलक निद्देंना करते हुए] योगन्धरायसने महा है । [प्रर्थात् रसनावलोसे पारम्भमें प्रारम्भ वस्पासां प्रायोजित यत्कार्त्र्व वेनासं योगपरापन्ना किया है किन्तु उत्कृष्ट फल स्वामिगत हपसे हो निर्दिष्ट किया है] । फलागम [पञ्चमो प्रवस्था पंवत] नायकके हो यथाकित मने जानी है ।

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भूमौ निपतति शरीरं निहितमिदं मस्तकं चलन्वाभोग माझे, लक्ष्मीरायं निपतन्ति चतुरतरधियः सीमया सार्धं सुखंया । मृत्याः मिन्राणि योधाः कुरुचरणमनुजां द्रुङ्घमेतद् रघाम्नां, नामैकं यद् वृण्णीषि जितिप ! तदघुना यातैराश्रष्य निपम ।।

फलागम रूप पतञ्जमो ग्रावस्पाके लक्षणोंको व्याख्यामें 'साङ्काल' तथा 'फलागम' इन दो हेतुओंकी व्यास्यापर प्र.थयारने विशेष बल दिया है । 'साङ्काल' पदसे उन्होंने यह श्रथं लिया है कि हनू अर्थकी प्राप्ति दानादि वर्मोंसे प्राप्त होनेयाले स्वर्गादि हप फलके समान जन्मान्तरभाविनों न होकर 'साक्षात्' इसो जन्ममें श्रोत्र वर्मोंके ग्रन.तत्‍‌ ही होनी चाहिए । इसवा वारया यह है कि यदि नाटकवर्म भी जन्मान्तरभाविनों फलप्राप्तिका वथान किया जाय तो फिर प्रेक्षकको वर्म श्रोत्र उसके फलका सम्वन्ध प्रतक्ष् हपसे गृहीत न हो सवनसे उसे नाटकसे फलें प्राप्ततथ्यकी शिक्षा प्राप्त नही हो सकेगी । इसलिये फलप्राप्ति साक्षात् हपमें ही शद्धित होनी चाहिए । दूसरा बल उन्होने 'फलागम' पदकी व्यास्यापर दिया है । फलागम हेतुदसे उन्होंने फलको पूर्वां हपसे प्राप्ति नहीे प्रतिप्‍‌ति वेवल फलप्राप्तिका आरम्भ यह श्रथं लिया है । इसका कारया यह है कि फलकी पूर्वों हपसे प्राप्ति तो अवस्थाओं भीतर नही प्राप्तो है । वह तो अनितम साधय है । यहां अनितम साधयका नहीे श्रपितु सेवल अवस्थाश्रोंका वरांन् चल रहा है । इसलिये फलागम शद्वमें फलप्राप्तिका आरम्भ यह ग्रथं ग्रन्यकारने लिया है । जो सर्वथा उचित है ।

वैदेहीं हतवांस्तदेव महत् मन्त्र्ये विपह्य रलमानं, चक्रेऽपातिततनुधरो दशमुखं धीनाराधामीक्षत ।

आगे फलागम हप पतञ्जमो ग्रावस्पाके दो उदाहरणा देते है । जैसे वेपोसंहारके ढंके डके— [दुर्योधनके] शारीरको पृथिवीपर पटककर उसका यह रक्त मैनें चरदनके समान अपने शरीरमें लगा लिया है । चारों समुद्रोंका जल जिसकी सोभा है इस प्रकारको पृथिवीकेसाय लक्ष्मीको प्राप्त [युधिष्ठिर] में स्थापित कर दिया है । [कौरवों] भृत्‍‌प, मिन्र, पौत्रागार, कुदसेना श्रोत्र [दुर्योधनके] भाई सब इस रणाग्निमें भस्म हो गए । हे राजन् [युधिष्ठिर] ! प्राप्त जिस नामको बोल रहे हैँ [धृतराष्ट्रके पुत्र] दुर्योधनका वेवल एक वही [नाममात्र हो] रह गया है । इससे दुर्योधनको मारकर भोमसेनने युधिष्ठिरको राज्यापं हप फलको प्रदर्शित किया है । [श्रत यह फलागमका उदाहरणा है] ।

राम कह रहे हैं कि— [रावण] यदहोका दपहरसु किया था इसलिये सप्रेमीं महामन्यु व थो चक्रसे मर्दन वाटकर उस रावणको यमराजके प्राप्त कर दिया ।

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प्राप्तान् यद्विरहेडप्यहं विधृतवांस्तेन त्रपामुखदरं, चक्षुर्दशेऽपि तु तथा न पुरस्नस्या विलचः चम्॥

इति। उद् च तावन् पुरुषमारमात्राभिनिवेशिनां देवमपाकुर्वता नारिकानां देव-वैहु मानव्युपत्तये पुरुपकोडप्यकृतमततर्भावोऽपि मफल इति दर्शनीयम्। ततः देवायत्तकृतं दरिद्रचादरत्तादृशपु पुरुषयापारम्य गौप्यववान् यथं प्रारम्भाद्य स्युः? न, तत्रापि नायकस्य फलार्थित्वान्, फलस्य च प्रारम्भादिनान्तरीयकत्वान्। अतुनान्र्यपि हि मम्यान्ति युधिष्ठिरे मघ्यावितायां शुचि चन्दनतामनम्यभवन्-पुरपोद्द्गम-कमेश्चैव फलान्ति। यत्रापि हि सेवाच्यागे प्रयापारविगुणन्। पुरुपो न ह्याप्रियथे, तथापि हृदयेऽरितो राजादिव्योऽप्रियन् अस्ति। मच राजादिगतो व्यायारः पुरुषगत प्रवृत्तिः। तद्यापारमाध्य-फलार्थित्वान्। स्वपथ्या परन्तु प्राप्तमपि फलं नाद्रियत इति॥३८॥

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अथ दर्शानन्तरमुद्दिशान क्यारत्यातु सन्धीनुपपत्तिपति- : सन्धयो मुखयदृचांशा: पञ्चावस्थातुगाः क्रमात् ॥३७॥

(४) अथ दर्शानन्तरमुद्दिशान क्यारत्यातु सन्धीनुपपत्तिपति- : मुखं प्रतिमुखं गर्भो विमर्शो निर्वहणं चेत्यमी । सन्धयस्तु मुखयदृचांशा: पञ्चावस्थातुगाः क्रमात् ॥३७॥ मुखयस्य स्वतन्त्रस्य महावाक्यार्थेस्यांशा भागा, परस्पर स्वरूपेण चाक्त्रे सम्बन्धिन्ते इति सन्धयः । श्रवस्थाभिः प्रारम्भोद्देशोन्मुखता, श्रवस्थासंभाविता च समाप्ति व्यन्त इत्यर्थे।। श्रवस्थानां च ध्रुवभावान्वितत्वात् सन्धयोऽपि नाटक-प्रकरस-नाटिका-प्रकरणीपु पञ्चावस्थयम्भाविन्त । समवकारादौ तु विशेषोपादानाद्दूनसर्वेऽप न दोष । क्रमादिति मुखादुदेशक्रमेऽप श्रवस्थाक्रमेऽप च निर्वध्यान्ते । दृश तावत् प्रवन्ध-निबन्धनोऽर्थोऽङोऽङ्गावस्थाभेदन पञ्चभिर्भागै: परिकल्प्यते। एकैकशश्र भंगेो द्वोंदश-त्रयोदशेत्यादिरूपया श्रङ्गसङ्ख्यया च विभज्यते । प्रार्स्न्निकृत्स्नसन्धयस्तु मुखयसन्ध्य-नुयायितवादतुसन्धय एवेत्युक्तमेवेति ॥३७॥ (५) सन्धि-निरूपण- पञ्च वार्तिकामे निर्दिष्ट नाटक लक्षणामे 'ग्रङ्ग' 'उपाय' ग्रोर 'दशा' के वाद 'सन्धयो' का उल्लेख किया गया है । 'श्रङ्ग' एवं दशाश्रोंका निरूपण कर चुके होने के बाद प्रवन्ध परिसमाप्तिोप निरूपण ग्रारम्भ करते हैं । पाँच ग्रथ्योंपक्षेपेभ, पाँच ग्रङ्ग ग्रोर पाँच दशाओंके समान सन्धयो की सङ्ख्या भी पाँच हो है । यहाँसे ग्रागे उन पाँचों सन्धियोंका निरूपण किया जायगा । श्रव 'दशा' के श्रनन्तर कहे हुए [सन्धियों] को व्याख्या करनेके लिए 'सन्धियों' का ग्रारम्भ करते हैं--

मुख प्रयातान् स्वतन्त्र महावाक्यार्थे प्रयत्नानुगमन करने वाले मुख कयारके पाँच भाग 'सन्धि' कहलाते हैं ॥३७॥ मुख प्रयातान् स्वतन्त्र महावाक्यार्थ [नाटकके कथाभाग] मेंे प्रथमा ग्रर्थात् भाग, परस्पर अपने हपरो ग्रोर ग्रङ्गोड़े साभ मिलते हैं इसलिए 'सन्धि' [फसाते हैं] । प्रारम्भ श्रादि [पाँच] प्रवस्थाप्रोंके साथ घटने वाले [हैं इसलिए] प्रवस्थाको समरसिपर [साँप भी समाप्त हो जाते हैं । यह [प्रवस्थातुग]' पदका] शभिप्राय है । [नाटकोमें श्रवस्थाके लक्षणामें कहे गए 'ध्रुव' पदसे] प्रवस्थाप्रोंमें ग्रप्रतिहत होनेसे [जन्या अनुगमनेने याने पाँचों] सत्र्च्य भो नाटक प्रशंरतु नाटिका ध्रोर प्रकरणीमें सर्पतिहरयं हैं । समवकार श्रादि [प्रवन्ध भेदों] में तो [सन्धियोंके सथपक्षा] विशेष हपते निर्देश होनेसे करण कम [तथ्या] होने पर भो दोष नहीं है । [क्रमात् इस [पद] से मुख्यादि रपने उक्तं श्र वस्थाप्रोंके क्रममें [प्रवच्यामें] प्रवस्थानीय {प्रारम्भ श्रादि] प्रवस्थाप्रोंके भेदमें पाँच भांगोंमें विभत्त [क्या जाता है । ग्रोर उनमेंते प्रत्येक भांगमें [ये हो पाँच सान्ध ग्रारत-तेहु ग्रादि रप पञ्चोंकी सङ्ख्याने वाटा जाता है । प्रातिस्निकृत्स्न [पनार्न पारि में] परित्रहे तच्य तो मुख सन्धिप्रोंगे प्रुगासो होनेसे शर्र्ग 'वतुकसन्धि' हो होते हैं ग्र पान पोते भरो ना पुणे है ॥३७॥

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मुखं प्रधानवृत्तांशो वीजोत्वपत्ति-रसास्वादः ।

(१) श्रथ मुख लक्षणं— [सूत्र ४४]—मुखं प्रधानवृत्तांशो वीजोत्वपत्ति-रसास्वादः । प्रारम्भावस्थाभिवत्वान् प्रधानवृत्तस्य भागो मुखं स्मृतम् । 'वीजोत्वपत्तेः' मुखोपायोपच्तेपथ्य, 'रसास्वादः' च शब्दारादीनामाश्रयोडवसरः यत्र । प्रारम्भोपचोगो यावानर्थेऽनुशंसितव्यो वीचित्ररससंवित्तिहेताव् मुखमुनिरस्यर्थः । यथा 'रत्नावल्यां' प्रथमो डङ्कः । अत्र हि सागरिकाराजकन्याहरणे ह्यपि श्रमत्य-प्रारम्भविपयोक्कुनेहर्थंगशो ग्रामाद्ययोगान्ध रायपक्षस्य प्रथिवीसाम्राट्यविगोपो-वीर, वत्सराजस्य वसन्ताविभाव-शृङ्गार, पौरमोहावलोकनादभुत् । ततः उद्योगमनु-दारभ्य पुनः शृङ्गार इति । यथा वा 'मत्पहरिचन्द्रे' प्रथमो डङ्कः । तत्र हि कुलपतिप्राग्भाविपच्योक्त्ते प्रथिवी-सुवर्गोत्तालाङ्गुपगमसत्वे श्रथर्रशोभिः राज्ञः प्रथमं महावरा्हदर्शनेऽभद्भुत, प्रहतहरिणीदर्शनेऽनुकम्पा, पुनराश्रमदर्शनेऽनु श्रद्भुत, हरिणीचश्वस्याङ्गनुद्धम्य कुलपते रौद्र, ततः प्रथिवीसुवर्गोत्तारावाभुपगमेऽभिज्ञा दानवीर इति । रसप्रायं नाटकं विचित्र-रसितव्यसनसंततिरसन्वितपि दृश्यतेऽस्मिन्निति ।

(२) मुखसंधि— मुख [संधि] का लक्षण करनेके लिये कहते हैं— [सूत्र ४४] वीजको उद्भवति तथा रसका प्राश्रयभूत मुखं कथाभारकं [कथाभागं] प्रारम्भावस्थाके साथ होनेके कारण प्रधान वृत्तका [प्रारम्भक] भाग मुखके समान [सवगे पहिले हत्प्र होनेके] मुख' [संधि कहलाता] है । वोजको उत्पत्ति प्रयत्नं मुख्य उपायरै [उपक्षेप] प्रारम्भकका और पुष्टजारादि रसोंका प्राश्रय अत्यन्तं प्रयत्न [नाटकके] प्रारम्भक प्रयोगी जितना संप्रवेश [प्रवेशके लिये उपयोगी है] वह मुखसंधि कहलाता है । प्रयत्नां नानार्भाैर् प्रसक्तप्रतिप्रसक्त चरितानि परस्परित रूपसे विचित्र रसोंका [जितना] संप्रवेश [प्रवेशके लिये उपयोगी है] वह स मुख महावसंधि [हैे प्रतिभात] है । क्योंकि उसम प्रमाण्य [प्रमाण्य] योगधरायां] में प्रारम्भ [व्यापार] कें विपमपूल मार्गद्वारैर् राज्ञां द्वारा देये जाने रूप श्रायंगमुदायमें त्रिविक् सांप्रायेणै प्राप्त करनेरौ हेतुं रसनेवानेरौ प्रमाण्य योगधराप्राखर घोररम, वमत रूप [उद्दोपन] विभाव से मुक्त वत्सराजः शृङ्गारस पुरकामिभावे प्ररोद्भवे प्रवतोदनसे प्रद्भुतं और उसके बाद उद्योगमें प्राप्तेम सकर किर शृङ्गार [पाया जाता है] । प्रयया जंते सत्प्रतिप्रसक्तश्चे श्रपथम पङ्कः [मुखसंधिका उदाहररए है] । उगमें मुन्तपनि क प्रयम्भे विपमपूल रूपिको और मुखारादानस्य स्वोचार करने हप प्रारमगमुरायमें राज्ञां प्रथम महावरा्हदर्शने ह्याद्भुत रूप प्रद्भुत, [उसके बाद] मारो म्ह हरिणीश्वर् देणेनेः शरत, उदार बोह साधमकै खेचरपत्, किर हरिलीशप [ह् ममाचार] गो मुन्तर लब् हत-प्रतिपत् रौद्र और किर त्रिविको और मुखसों का दान करनेर राजास दानवीर । रस प्राप्त है । [इस प्रकार इस मुखसंधिमें मुखसंधिर्ने नाना रसोंक्त विचित्र संप्रवेशें द्विपा पपा

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प्रतिमुखं क्रियालक्ष्यस्य बीजोद्घाटनम्न्वितः ।३८।

‘प्रधानवृत्तांश’ इदंोत्तरेऽपु च स्मर्यंते । क्रियालक्ष्यस्य मुखमन्ध्यौ गभीरतरे न्यस्तत्वादौपन प्रकाशस्य बीजस्य प्रधानोपायस्य, उद्घाटनेन प्रविलप्रकाशनेन, सम्यगनुगमतः, प्रयत्नावस्थापरिच्छेदो य प्रधानवृत्तांशः स मुखस्याभिमुखयेन वर्तते इति ‘प्रतिमुखम्’ । "द्वोपादन्यसमादपि" इत्यादिना ह्यमात्येन सागरिकचेष्टितरूपं बीजं मुखसन्धौ नयतं, वसन्तोत्सवकामदेवत्पूजादिना तिरोधितत्वादौप्तद्नदयम् । तस्य च मुसद्न्तारचित राज-सागरिकासेमागमेन द्वितीयोऽ श्रद्न उद्घाट इति ।३८। हैं । श्रत एतत् भी मुसन्ध रसास्वाद है । नाट्यक रचनाका प्रथमतः हो रस है इसलिये [प्रतिमुख श्रादि] श्रादि सधियोमे भी रसास्वयत्व होना चाहिए ।

श्रथ प्रतिमुखसन्धिः— श्रथ प्रतिमुख [सन्धि] को व्याख्या करते हैं— [सूत्र ४९]—[ मुखसन्धिमे ] सूक्ष्मरूपसे दिखाई देने वाले [ वियप्रद्मय ] बीजके उद्घाटनेस युक्त प्रथिमुख [सन्धि] होती है । इदानीं [मुखसन्धिके लक्षणामिसे] ‘प्रधानवृत्तांश.’ इस वाक्यका यह श्रर्थ किपा है । [ क्रियालक्ष्यस्य ] [ पदक श्रभिप्राय यह है कि ] मुख-सन्धिमे सूक्ष्म रूपसे श्रारोपित किए गए, इसलए सूक्ष्म रूपसे दिखाई देने वाले बीजके श्रयनि प्रधान उपायने, उद्घाटन श्रर्थात् प्रवल रूपसे प्रकाशानने, सम्यक् श्रनुगत, प्रयत्नावस्थामात्रमे व्याप्त, प्रधान वृत्तका जो भाग होता है वह मुखके सामने श्रागे वियमान होनेमे ‘प्रतिमुख’ [प्रतिमुखसन्ध कहलाता] है ।

वहाँ है कि ‘प्रधानवृत्तान’ इस वाक्यका मसम्बन्ध मुखसन्धके लक्षणसे वहाँ भी तात्पर्य है । दूसरी बात यह है कि मुखसन्धिमे बीजवा सूक्ष्मरूपसे जो निवेश किया जाता है वह प्रतिमुखसन्धौ मधिस्पष्ट रूपसे विकसात उद्घाटन किया जाता है । और तोसरो वान यह है कि जैसे मुनसन्ध पारम्भावस्थाका भनुमरस कराने वाला होता है । प्रारम्भ-वथायने समाप्त होनेके माथ ही मुखसन्ध समाप्त हो जाता है । इसी प्रकार प्रतिमुखसन्ध व प्रयत्न द्वितीयावस्थाका प्रतुगामी होना है । द्वितीयावस्थाक समात होनेके साथ समात हो जाता है । श्रागे हमोत उदाहणस्प प्रस्तुत करते है ।

जंमे {रसनावलीमे} ‘द्वोपादन्यसमादपि’ इत्यादिसे प्रकारय [योग्यघरारस] ने नता सगारिकाशा व्याप्त रप बीज [प्रथमासूत्रे] मुसन्धौ [मूक्ष्मरुपमे] स्यापित किपा था । वह वसन्तोसत्सव, कामदेव-पूनादिकं द्वार तिरोधित होनेके कार णमोर-ता वितस्माई वेन्या था । उतत्सर मुसद्न्तार द्वार मरतप गए राजा मोत सागरिसाके समागमने द्वार दितीयावस्ममे उद्घाटन [प्रपिक विस्तार] किया गया है । [पक पच द्वितोपावस्सक्प्रयाग उम माटरमे प्रतिमुसन्ध वरसाता है]

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अथ गर्भं व्याख्यातुमाह-[सूत्र ४६]—वीजस्योन्मुखयवाद् गर्भों लाभालाभगरेप्यपै। उत्पत्तिरुद्भाटनदर्शाद्राविष्टस्य वीजस्य श्रो-मूर्त्य फलजन्तामिमूर्त्यं तद्राज। प्राप्त्याशया तृतीयावस्थया परिचिच्छ्र्रो लाभालाभगेपपै। पुनः-पुनर्भवद्भिरयुक्त यथा वेगौौसहारं तृतीयं-चतुर्थं पञ्चमेग्रपरेपु। फलसाधकानां प्राप्तवानां वृत्ते नेपथ्ये भीमसेनेन—'कृशा येन शिरोरोहपे पशुना'।

अथ गर्भ [संधि] की व्याख्या करनेके लिए कहते हैं-[सू० ४६]—[मुख फलकरे] साम अर्थात् प्रारंभ कबी प्राप्तिकी आाशा और कभी प्राप्तिकी निराशा के अनुुसारनेके द्वारा योजनाओँ मुक्त [कयाभाग] गर्भ संधि रहलात है । पहले मुख तथा प्रतिमुख सन्धिमें रही हुई उत्पत्ति तथा उद्भाटन रूप दो प्रवृत्तियाँ जो फल-जननके उन्मुख होना, जत्ते मुखत [सीमरा गर्भसंधि होना है । और यह] प्राप्त्वानाथा रप तृतीयावस्थाके सोमित [प्रधान्त तृतीयावस्थाके] साम प्रात्ति होनेवाला होता है । बार-बार होनेवाले लाभ तथा प्रसाभके अनुुसारचाने मुखत प्रदान क्याकारा भाग गर्भसंधि [नहसातत] है। जत्ते वेगौौसहारं तृतीयं, चतुर्थं और पञ्चचम पद्रूोंप [गर्भंगपि निम्न प्रकार पाया जाता है]। फलके सामर्थ पाप्र्वेकति घरिन्में नेपथ्यमें भीमसेनके द्वारा —"कृशा येन शिरोरोहदेवु" [तृतीय पद्रूसे युज्यें इतोऽस्मिन् हेतवे चयं पोप्दे, दृष्ट पर देतों]।

इत्यादिने प्रतिज्ञानिर्वेदख्योपरमात् विजयादनुगुण्यलाभेन वीजस्योन्मुख्य दर्शितम् । तथा—'भगदत्तेन हिलकुसुम्मके' [भगदत्तेनधिरसुकुसुम्मके]। इत्यादिने राज्ञा समुपसूचितेन प्रधानयोधवचने । 'परो खुधिरजुयापेप्स केरोपु गृहीतव्या त्रेपो दयपाद्यते' ['एप कल् धृष्टगुम्नेन केरोपु गृहीत्वा त्रेपो दयपाद्यते' इति संस्कृतम् ।] इत्यादिने राज्ञा समुपसूचितेन सेनापतिवचने । स्वनेलद्रोमकोदरेपु कर्रु-३ गर्भेसंधि—

इत्यादिमें [भीमसेनके द्वारा अपनी ] प्रतिज्ञा पूलं करनेके उपरमनें विजयप्राप्तिरें द्वारा योजनाओँ कसेोमुस्साराश प्रदत्तन किया है । और [उसो मूत्तोय पद्रूों प्रवेग्रपे]—"भगदत्तने रिपरत्र हृपा परर" इत्यादिरें द्वारा राज्ञामिके मुख्तने गूंजन भरार्त गए प्रधान-योधा [भगदत्त] के वचने, और [तथा प्रवेग्रपे] "यह हतपुत्र वास पराजित होकर मरोखो मार रहा है" इगरेन् द्वारा राज्ञा मुख्रग्र मूर्छिन्त कराए गए सेनापर्तितके वयने, चपो [जसो पद्रूमें] पर्थनी सेनार्मे पर्नात्ति पंरा करनेबाने करोड़

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श्रवथ्याम्नो. कलहेन च दुर्योधनस्य विजयालाभतत्स्ये पारडववृत्ते फलानुगुणा बीजस्यौन्मुख्यम् । तथा—

तथा श्रवथ्याम्नोके कलहसे, दुर्योधनको पराजय रूप ग्रोर पाण्डवोंके पक्षसे फलके श्रनुकूल बीज का ग्रोन्मुख्य [दिखलाया गया है] । तथा [चतुर्यं श्रद्धुम्]—

"ग्रा शक्तिरसि्त श्रृकोदरस्य मथि जीवति वत्सस्य द्यायामथ्याक्मितुम् ।" इति योज्यं निष्कान्तेन दुर्योधनेन विजयान्वेषणा|हप श्रौन्मुख्यम् । तथा—

'ग्रा' मेरे जोते रहते भीम, वरस हु द्रासनको द्याया तक झूनेकी शक्ति नहीं रसता है' [यह कहकर ] मुद्रके लिये निष्कान्त हुए दुर्योधनके द्वारा विजयकेवेषणा हप फलोन्मुसता [दिखलाई गई हैं] तथा—

"राज्ञो मानधनस्य कामुकभृतो दुर्योधनस्याप्रत, प्रत्यञ्चं क्रुषानघ्रस्य सिषत: करोस्य शल्यस्य च । पीतं तथ्य मयाद्य पाण्डववधूपेशाम्बराक्पिसः;, कोप्यां जीवति एव तीदृशाकरजचुर्यपादसुग् वच्चस �|"

"राज्ञो मानधनस्य कामुकभृतो दुर्योधनस्याप्रत, प्रत्यञ्चं क्रुषानघ्रस्य सिषत: करोस्य शल्यस्य च । पीतं तथ्य मयाद्य पाण्डववधूपेशाम्बराक्पिसः;, कोप्यां जीवति एव तीदृशाकरजचुर्यपादसुग् वच्चस �|"

इत्यादिना भीमसेनेऽन दुशासनवधात् विजयलाभरूपमोन्मुख्यम् । एवमन्त्र पुन: पुनर्लोाभावलाभवेप्सा|व्वोजसौन्मुख्यम् दर्शितम् । श्रांत एव फलप्राप्तिसम्भावनाहपो गर्भेसन्धिरुच्यते ।

इत्यादि [वाक्य] से भीमसेनके द्वारा हु द्रासनके वधसे [पाण्डवोंके] विजयलाभ हप फलकी उन्मुसता [दिखलाई गई है] । इस प्रकार यहाँ [वेष्टोसहारमे] वार-वार [विजयके] लाभ ग्रालाभके श्रनुसधान द्वारा श्रोजकी [फलके प्रति] उन्मुसता दिललाई गई है । श्रत एवं फलकी प्राप्तिकी सम्भावना हप गर्मंसंधि कहलाता है ।

वेष्टोसहार वो|तरस प्रधान नाटक है । उसमें पाण्डवोंकी विजयलाभ हप मुख्य वस्तु है । प्रथम श्रद्धुम् उसमें 'लक्ष्मागृह|नलविपात्त' इत्यादि भीमसेनादि|क्कित्से जिस ग्रोरववर्गके नाश के बीजका प्रारोपण किया गया था उससेा दितीय श्रद्धुम् ग्रधिक उद्वोध होकर वृतोय श्रद्धुम् ग्रधिक प्रासिक्री ग्राशा हो जाती है । इन श्रद्धुमोंमें ग्रनेक स्थानोंपर ग्रोरवोंके प्रपान पुरुपोंके वधकी सूचना मिलती है । यह पाण्डवोंकी विजयपे ग्रनुदूल जाती है । वही वही दुर्योधन ग्रादि कभी अपनी विजयके लिये प्रयत्नशील दिखलाई देते हैं । वह स्मल मुख्य एवंबी प्राप्त्तिम् वाप्यं प्रतोत होते हैं । सम मिलकर लावधी ग्रादाय ग्राप्तिन रहती है । इसलिए इस मार्गम प्राप्त्याशा हप वृतो|वारस्य ग्रोर गर्म्सान्ध हप वृतोय सानिध्यो हो निवड किया गया है । इसी दृष्टिसे ग्रन्थकाराने गर्म्सान्धने उदा||हरण|रूपमे चस् भागशो प्रस्तु|त किया है ।

यह वोररस प्रधान नाटकमें गर्म्सान्धिक प्रदर्शंन पराया । इसी प्रकार शृङ्गार ग्रादि यह नाटकोंमें भौ दिसनाया जा सकता है । इसी वातको ग्रागे कहते—

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पथ्यं श्रृङ्गारादिप्रधानेऽपि रूपकेऽपु लाभालाभवै पश्यादन दर्शनीयान्नि । इह गर्भे संधयो ग्रप्राप्त्यंशा. प्रधानं फलसन्धानात्मकत्वात् । ग्रन्थया फल-निश्चया-त्मक एव स्यात् । श्रावमर्यादौ तु प्राप्त्यंशं प्रधानं फल-निश्चयरूपत्वादिति विशेषः ।

इसो प्रकार मुख्य-प्रधान रूपकोमें भी [फलका] लाभालाभवे प्रयोजनस्थान दिखलाने चाहियें । हम गर्भंसंधिमें, उसके फलसन्धानात्मक रूप होनेसे प्रयोजनकी प्रधानता रहती है । ग्रन्थया [गर्भंसधि न रहकर] फल-निश्चयात्मक हो वन जाय । विमर्श-संधिमें प्राप्तिका. ग्रन्था प्रधान रहता है । क्योंकि वह फल-निश्चय रूप होता है । यह [गर्भंसधि तथा विमर्श-संधि] भेद है ।

४ विमर्श-संधि— ग्रथ विमर्शो [संधि] को कहते हैं— [बीजको उत्पत्ति, उद्भाटन ग्रोर फलोन्मुखपे द्वारा] उद्भिन्न पर्यन्त पूर्ं होनेवाले के लिए प्रस्तुत जो साध्य, उसमें विलास ग्रादिके द्वारा विचिन-स्वरूप विमनं [संधि] महस्राता है । ३६ ।

[मुख, प्रतिमुख तथा गर्भंसंधियोंमें प्रधान ] बीजको उर्पत्ति, उद्भाटन तथा फलोत्पत्ति [सफल] होनेतक जो साध्य, प्रयत्नत प्रधान फल, उसकी विलपन-स्वरूप पर्याप्तं उसमें विकल्पात रूप नियतत्वाति नामक चतुर्थीं पर्याप्त चतुर्थीं पर्याप्तोके उदयने साप उदय ग्रोर उसको समाप्तितकें साथ समाप्त होनेवाला मुख्य वचाका भागको जिसमें कि 'विमृश्नाति' पर्याप्तं वतयातं विदनोंने पा जाननेो प्रत्यासन्न फलने प्रति भी यापक सन्देहर्ने पड़ जाता है । इसलिये [इसो व्युत्पत्तिलग्य पर्यंने कारक] 'विमनं' [संधि कहा जाता] है । इस [विमनं] संधिने नियताप्ति रूप [चतुर्थीं] फलावस्थामें प्राप्त होनेपर भी ग्रोर साम्भावनार् [पर्याप्तं उज्ज्वल रोतिदेवे सादृश्य] ने ग्रन"तर सन्देहका प्रचार न होनेपर भी फलके प्रति जनक ग्रोर उसको 'विधान' दोनोंमु मुलपदन होने ने बतारए [विमनौं-संधिप्रे] सन्देहात्मकता होती है । ग्रोर [सन्देहात्मकता रोते एे] 'विमर्शने' यार-यार ग्रावर्तन होनेपर भी महापुरुप ग्रोर पापिन् यतत [वन प्राप्तिते निपात] करते हैं इसलिये वास्तवन यह नियताप्ति रूप होता है । 'संधिभिर्विलसितैः' भो रूपकोमें अनेक विन्न होते ही हैं । द्वार्साए विदत्रोंके मार्मोने उपस्थित होनेपर भो रामोवन्ती

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फलामिहपतवम् । 'श्रेयांसि बहुविघ्नानि भवन्ति' इति विघ्नहेतुसम्पातेऽपि प्रत्यासन्नवर्तिनि फले न निवर्तनीयमिति च ध्युत्पादयाथुमवशयमग्रे संध्यौ विघ्नहेतवो निवर्तनीयाः ।

[फल] की प्राप्ति से निवृत्त नहीं होना चाहिए [कितने ही विघ्न श्रावें अपने प्रयत्नको नहीं छोड़ना चाहिए] इस बातकी शिक्षा [सामाजिकोंको] देनेकेलिए [विमर्श] सत्रथमे विघ्नोंके कारणोंको श्रवणप प्रदर्शित करना चाहिए । [कारिकामे ग्राए हुए] 'व्यसनादिभि:' मे ग्रादि कारकोंको ग्रहणप ग्रहण करना चाहिए । [प्रथमतः प्रत्यासन्न फलको सिद्धिमे जो विघ्न-बाधाएं उपस्थित होती हैं उसके ध्यान प्रयांत बलेश या श्रापादि ग्रनेक कारण हो सकते हैं । उनमेंसे सकट [ध्यसन] के कारण विघ्न [की उपस्थितिका उदाहरण] जैसे राम-शुदग्रपमे पञ्चवट भ्रूण्मे । राम [कहते हैं कि]--

सोतुं नकचं तथा स्त्रिया कुलजानो भर्तु यथोचितं: शिरः । व्ययर्थ समप्रति विश्वता धनुरिदं त्वदृश्ययापदः सातिष्णा, रामेष प्रियजीवितेन तु कृत प्रेम्णा: प्रिये ! नोचिततम् ॥

'निदंयो रावणस्' [रावणने] प्रत्याश्रयान् [प्रर्यांत् उसकी प्रयायंनाके फलको रोककर] कर देनेसे उत्पन्न क्रोधके कारए तुमहारे साथ उचित हो [व्यवहार] किया [प्रर्यांत् रावणने तुम्हारे इनकार कर देनेपर तुम्हारे साथ जो व्यवहार किया वह उसके क्रोधके अनुरूप हो गया]। और तुमने भी उस [प्रत्याशयान्] को इस प्रकारते सहन किया जिससे उच्च कुलको स्त्रियाँ प्राज्ञ भी गंवंसो मसत्तक ऊँचा करती हैं । किन्तु तुम्हारो विपत्तियोंको संभालस्पते देखनेवाले [ग्रोर उसक प्रतिकार न करनेके कारए] ध्ययंही होत पुरुरारए मरनेवाले अपने जीवनहे लोभी रामने हे प्रिये ! श्रपने प्रें मपे भनुत्प कायं नहीं किया ।

यथा वा रघुविलासे पञ्चवटडके । लद्मणः-- 'नाकीर्यां दशकन्धरी पलमुजां पत्युः शितैः पत्रिभिः, दत्ता नापि विभीपणाय सुहृदे लद्द्राधिपत्रास्थितातिः । वैदेही विरहाग्निसमनमनसो नार्येस्य सन्दर्शिता, जातं जन्म यथा हत्था ! रसाधराधौरेयदोषेण मम ॥'

यहां रावणके द्वारा बनावटी सीताके जो मार डाला गया था उस ध्यानते सोनार्दे प्राप्तिमे विघ्न था पहनेसे यह व्यसन-जन्य विमर्श [सप्ति] है । प्रपञ्च जैसे रघुविलासके पञ्चवट डके । सक्कमण [कह रहे हैं]--

[मैं सक्कमए] रासत्सराज [पलमुजां पत्मुः] के दरा निरोंके श्रमुदायकं सोडए गएथे द्वारा काटकर गिरा नहीं पाया, न मित्रवर विभोषणको सद्दूए लद्दूरा रामात् पर हितो पाया ग्रोर न विरहामिते सतप्त मनवासे प्रायं रामचन्द्रंभे मन्देहोन् दतां हो त्रा पाया

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शत्रु लद्मणास्य शक्तिभेटनयसनेन फलंप्राप्तिविधनजनमा विमर्शः । शापायथा स्वभिज्ञानशकुन्तले पञ्चमेडङ्के दुर्वासा शापविमोहितत्बेन त्वक्त्वारां शकुन्तलामन्तर्हिताया अ च, पञ्चेडङ्के ऋगुलीयकदर्शनेन समुपजातस्मृतो राजन्न दुर्वासः शापविधनजो विमर्शः:1 देवतो यथा विधिविलसिते पञ्चमेडङ्के—

पाया । इस लिये रपकी धुरावो धारया करनेवाली मेरी भूतमिका जन्म हो गया । यहां सहमनेत्रे दर्वासा ऋषि जानेने वारिसू उपास्यते विसननेस फलप्राप्तिम विधन भा पञ्चनेत्रे उत्पन्न [विसन जन्म] विमर्श [सधि] है । इस प्रकार इन दोनो इलोको द्वारा प्रयकारने प्रयामन्वन फलस्यो सिद्धिमें किसी प्रकारसिमम् [विसनके भा जानेसे विसन-जन्य सनाय या विमर्शने वपिस्थित हो जानेके उदाहरण दिए हैं ।

"कचुको—हा धिकू कष्टम्, नैवोल्लङ्घ्य प्राक्तन कर्मेविपाकः । वार्तापि नैव यदिहारित स राजचन्द्र;, तेनेऽजिता विधिविमोहितचेतसने । देवा वने त्रिदशनाथविलासिनीसभि., कतु गता जगति सह्यमिति प्रचादः ॥ शत्रु सूदाचाराघलभ्यान् मते देवत्यकतदमयन्नी-राज्यप्राप्तिविधनजा विमश । क्राधामथा येषांसंद्दारे पञ्चेडङ्के सिद्धरुपेडपि कार्ये कोधातिशयादपयुँपिता

शापसे उतन्न [विमर्शे सन्ध्यरा उदाहरण] जैसे प्रभिज्ञान नाटुन्तल [नाटक] के पञ्चम भ्रसङ्के दुर्वासाके शापसे येमुष होतेके कारन्या [दुप्य तक्ने द्वारा] शकुन्तला सा परिस्याग कर देने श्रोत्र उसने प्रभ्न्तहित हो जानेके याद, पञ्च भ्रसङ्के प्रभूठोको देख्कार राजाको उसका समराए मानेश्वर, दुर्वासाके शापहप विसनजन्य विमर्श सन्धि है । देवताया [विमर्शका उदाहरण] जैसे 'विपुल वितरसति' [नाटकके] पञ्चमाडङ्के—कचुको—हा धिक्, बडे हू कष्टे बात है कि पूर्व्य जन्मके वमोंके फलने वच नहों रास्ते हैं ।

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तीर्थं भोममहेद्रस्य कथयसि द्रोणानले निवृतं ते, फर्णाश्चीविपभोगिनाम् प्रशमिते शान्ते च याते दिवम्। भीमसेन त्रियमहेन रभसान् शस्त्रपाणेश्चरेः कथं, सर्वे जीवितसारायं वयमभी वाचा समारोपिता ॥

एवमनेकहेतुभिर्विमर्शोऽन्वितः॥१३९॥ अथ तिर्यग्वासनिन्यं निलयपतति— [श्लोक ४८]—सङ्गोजविकृतावस्था; नानाभावा मुखादयः! फलसंयोगभिनो यस्यिन्, श्रसिर्निवेदयितो ध्रुवम्॥४८॥ धीगस्य विकृतं विकार इतिपत्तिः—उद्भट फलोन्मुखतादिक सह वीजांकितैः सक्ते नो विकलनयाति, उभौ दिनौ पूर्व होमेवालो प्रतिज्ञा कर लेनेपर, और दुर्योधनके जलते भीतर क्षिप जाते तथा प्राप्तान्-नष्टांक खोज कलतेहू भी न मिलनेबर प्रतयन्त हुो होकर 'विमर्श' करते हुए युधििष्ठर कहलते हैं— "भीष्म रुप महुलागारको पार कर लेनेपर, जैसेभैसे करके द्रोणाचार्य स्प प्रतितो शान्त करनेके बाद, भोर करूण रुप भयकर नागराजको नाश करनेके तथा शाल्यके शरम् विवाद जानेके बाद जबकिं विजयका थोड़ा-सा हो काम रप रह गया था ऐसे समय साहस हो जिसको प्रिय है इस प्रकारके भीमसेनने केवल [अपनी प्रतिज्ञा रुप] धारोंमें हम लब्रो सरापमें डाल दिया है। [अर्थात यदि आज दुर्योधनका मला नहीँ तम् कलत है को भीमसेन अपनी प्रतिज्ञाके अनुरुसार अपना प्राप्त तमाप करत देंगे। उस दशामें ह्म सबी मो पहों म्रति होगो]। यह्ह [विमर्श] भीमके धधिक कारए कामकें विगड जानेबर उतपन हुया है। इसाती कोय-जन्य प्रतिज्ञाते उत्पस्य पितन स्प किमानें है। इस प्रकार ग्रनेक प्रकारके हेतुभ्रोते 'विमर्श' उत्पन होता है॥१३९॥

मोज्ज्ञो विकृति ध्ययीत उद्भवति सहमक्षण, पत्सोमनस्का पार्श्व। मुख [उद्रि] भ्रू हपां मारम्म प्रांदि प्रयत्नारम्मे सहित जो विद्धमान हों।

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स्वरव्याभिरुद: प्रारम्भादिविभयेरन्ते। नान? विधिग्रा भावाः स्थायी-स्थायिभावारिमारिवराः, स्थथवा भावयमित पर्ने साधयन्नि भावाः, उपायो विन्दु-वसाम-प्रयत्न-कार्यामिय यत्रः सुवप्राप्ती न फले रति-द्दाम-उस्साह-चिन्तया-स्थायिभावपादुर्यं, भृति गयं। श्रृङ्गारमुख्य-मदादि-नर्या भिचारिविभावाहुल्यं च मुगाद्री नाम। तुगरधानौ तु फलं शोक-भय-जुगुप्सा-स्थायिभावादुर्यं, ज्ञातस्योपयादि-न्यभिचारिविभावादुर्यं च दृष्टदशम्। मुगाद्रियो मुग-प्रतिमुग-मुखे-विमर्शदृशाः। फलैर नुगमाद्येन नायक-प्राप्त-नाय र-नायिरा-रमादिर्यापाराः, मथ्यगौचित्येन मुज्यन्त मथदर्थरन्ते याविमन प्रभानृत्यो म फलागमावस्थया परिणिद्ध्यत्नो नियंहूयामनिभ। ध्रुवामनि प्रारम्भाय वित्तौौौौविर्वार्न मदपककेधरस्यावरमभावमालू। सभा रसाभिनयामेंव-जागति स्रवेरानं प्रभुर्याममाधेरिति।

फेरिन तु मुगाद्रिः मन्भयोः, स्वभावशारिष यत्र गुरणपुष्ट-मुख्य यदोवनः पुनः-फिरतत्यत्ते मे नियंदृयामनिभमादृः। यथा मधुरद्रिरश्रन्टे परणेडके। देखः-वितनावस्था' पदरा प्रयं दृप्ते। प्रागे मातिवान्ने 'नानाभावा' पदरा पदं भवते है। नाना प्रकारे [एवं नानात्वेन भेदानाम्] मावान् 'अभिप्राय' पर्यायौ विभाव भाव पर्यातु रूपायि, स्थायिभावार्त लपरा तार्तिर्य [स्थायि भाव] मवया। 'अभिप्राय' पर्यायौ पर्यन्तु [एवं पर्यायों] परते है [एतत् कुयात्वेन भेदानाम्] ये 'भाव' [भताने] है। [और ये] कि तु, वनार्त्रि, म्रकर्या मथा पदं यत्र मावि जाये पाये हुया 'नानाभावा' पदरा पदिम्राप्त ? गुन-ग्राहिन यत्र [यत्र ग्रहो नायग] न रति, रमा, जुगुप्सा, विस्मय मादि र्वायिभावोना वायंय यनत् ? पुष्टि, नाशं, वेरुसर, मर पारि स्थायिभावाचोंरा वार्तप मुगाद्रिर [रसिप्रपों] मे हनता है। जोर यु न.राय यत्र म [पाये मरने] ये मोल, शोक, भय, जुगुप्सा श्रन्य र्वायिभावोर्तार्त्र क्या मवात मया मरस्य, मवात वेदना, मादि र्वानिमार्चोना वात्त्रप [शोक हैँगा] महभारा वार्तिनः [नाटक है रँगा] मवने माप पर्यायौ मुनरिफरं मारते। म्रथ, मायव, ममि-मार्त्र, मातेर 'मुगाद्रि' पर्यायौ यवन सेती [नान्दी तथा] कतिप यत्र मर्तिन्त्र माप मरत्वाों पुर म्रय फिन्दु-म्रन म्रय मरने ?। कतिप क्य वदरपाने मेरर मधिकारिनानं [य यन [सिप्रति-मिप्रवर्तं वततत ?].

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उपच्तेपादीनि करणपरहितानि युक्तिसहितानि पट्टब्रह्मादिषु भवन्ति । विलोभनादीनि तु सर्वसन्धिष्वपि भवन्ति । संविधानकवशात्तु तदर्थैर्यानयत्रापि सम्भवात्तु । वाहुल्यनियमध्यानापेक्षया त्वत्रोपादानम् । एवमनयसनिधर्ष्वापि श्रेयम् । भेदस्तु मवेसनिधषड्वन्ते, प्रवेशक-विटङ्काभकान्ते च ब्रह्मण्य निवन्धनीय । पात्रभेदरुपपत्तवात्तु तस्य । उपच्तेप-परिकर-परिन्यास-संभयोगडपराङ्गानि वस्तानुरूप्यादुद्देशकमातिक्रमेऽपि निवध्यन्ते । ग्रामुखस्य च नटयुत्तस्चेन इत्युक्तानुरसात्तदनन्तरमङ्गानां निवन्ध । द्वादशाङ्गमिति सन्धिः । संविधानपरङ्गान्यद्धानि सन्धरुपरस्य ब्राझिनोडवयवत्वेन निष्पादकत्वात्

नहीं है । उस करणको हटाकर उसके स्थानपर युक्तिको जोड देनेपर जो उपक्षेप ग्रादि श्रृङ्ग बनते हैं उनका मुख्यसन्धिमें होना अनिवार्यं है इस बातको श्रागले श्रनुच्छेदमें कहते हैं— करणको छोड़कर और युक्तिको मिलाकर उपक्षेपादि छः [अर्थात् (१) उपक्षेप, (२) परिकर, (३) परिन्यास, (४) समाधन, (५) उद्भेद तथा (६) युक्ति ये छः श्रृङ्ग] यहां [प्रर्थात् मुख्यसन्धिमें] श्रवश्य होते हैं । विलोभनादि [रूप छः श्रृङ्ग] तो सब ही सन्धियोंमें होते हैं । क्योंकि रचनाके श्रनुसार उनका कार्यं ‘श्रङ्गयत्न’ [प्रर्थात् श्रङ्ग सन्धियोंमें] भी हो सकता है । [सब सन्धियोंमें सम्भव होनेपर भी] यहां [प्रर्थात् मुख्यसन्धिमें] उन [विलोभनादि श्रृङ्गों] का प्रयोग वाहुल्यके कारणसे [प्रर्थात् मुलसन्धिमें विलोभनादि श्रृङ्गों] का प्रयोग अधिकतर होनेके कारण किया गया है । इसी प्रकार अन्य सन्धियों [के श्रृङ्गों] का भी [उस-उस सन्धिमें] प्रयोग हो सकता है । किन्तु श्राधिकतर प्रयोग उस-उस सन्धिमें ही होता है, इसलिए उनका पह्लेख उस-उस सन्धिमें विशेष रूपसे किया गया है । भेद [नामक श्राठवां श्रृङ्ग] को सब सन्धियोंमें, श्रृङ्गके श्रतएव, प्रवेशक तथा विटङ्काभको के श्रतएव श्रवश्य प्रयुक्त करना चाहिए । क्योंकि वह पात्र-परिवर्तन रूप हेतु होता है । उपक्षेप, परिकर तथा परिन्यास [इन तीन श्रृङ्गों] को छोड़कर अन्य श्रन्य श्रृङ्ग तो क्याचत्सुक्रां भात्रप्रक्लताके होनेसे क्यावस्तुक भाग न होनेके कारण [जिसके बीचमें श्रृङ्गोंका प्रयोग न करके] उसके बाद श्रृङ्गोंका प्रयोग किया जाता है । ‘द्वादशाङ्ग’ इससे श्रारह श्रृङ्गवाला सन्ध गृहीत होता है । सन्धप श्रवयवकोके श्रवयव रूपसे निर्माण करनेवाले होनेके कारण [उपक्षेपादि श्रृङ्ग] रचना [संविधानक] के श्रङ्ग कहलाते हैं । ऊपर जो हमने यह दिसलाया था कि मुलसन्धिके वाहर श्रृङ्ग, प्रतिमुख, गर्भं तथा विमर्शसन्धियोंमेंसे प्रत्येक में तेरह तेरह श्रृङ्ग तथा निर्वहणसन्धिमें चौदह श्रृङ्ग माने गए हैं । यह श्रृङ्गमेंशया केवल उन-उन सन्धियोंमें बतलाए गए श्रृङ्गोंकी दृष्टिसे ही रही गई है । किन्तु उन सन्धियोंमें, कहे हुए श्रतिरिक्त मन्य मुख्यावयवों श्रतिरिक्त अन्य श्रङ्गोंका प्रयोग भी हो सकता है । उनको मिला देनेपर यह सङ्ख्या वाला नियम नहीं रहता है । इसीलिए श्रागले श्रनुच्छेदमें लिखते हैं—

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कारिका ४१-४२, सूत्र ४५ ] प्रथमो विचेकः

ग्रदृसंख्यानियमस्तव सन्धिपूर्वातादृशापेक्षया । सङ्ख्यान्तरद्धानुपवेशो तु न प्राचीनेरकुन्तवात्, मधुरितमेर्गिरा हुलस्य च चमत्कारकारितया दृशर्माभिने कृतः । 'ग्रय वम्' इति सुप्तसन्धिः सर्वरूपकेष्ववश्यं भवति । निर्वहणस्यप्येवम् । प्रारम्भनिर्वहयोरवश्यम्भावित्वात् । प्रतिमुखसुप्तादृशन्तु व्यायोगादिपु यथालचया भवन्ति, न भवन्ति च ।

ग्रदृशानि च दृश्यविस्तरकारितयादवश्यं निधानधर्मीयानि । ग्रपरथा 'रामस्य पत्नीरावणेन वनान्तरादपहता । रामेय च जटायुप ममुपलभय, सुमीचं सहाय वानराधिराजयप्रतिपादनार्घिगम्य, समुद्रसेतुबन्धमाधाय, निहत्य च रावसं प्रत्यानीत इत्यग्र प्रारम्भाभावस्थास्विन्धनीये: पञ्चभिरपि सन्धिभिर्योजायुपाययुत्तै-निषेधे रूपके वृत्तसङ्घेप- स्यांत । तथा च न चमत्कारः । किं चारक्ख मरपि वृत्त 'ग्रदृश्वैचिच्येप निध्यमाने परां रकितमावहति । काये्वरशाचच पुतहृचमानमपि वृत्त' ग्रदृश भत्नया नियद्धमुनरुक्कमिवाभाति । ग्रय.रालाकाफलपा च ग्रदृश्नमभवद् य वृत्तस्य न भवति । प्रत्येकशशचाज्ञानां प्रयोजने यथावसरं लचयै दर्शयिय्याम ।।४१-४५ ।।

ग्रदृशोंकी सङ्ख्याका नियम [उन-उन] सन्धियोंमें गृहीत ग्रदृशोंकी दृष्टिसे हो होता है । ग्रोर सन्धियोंके ग्रदृशोंका ग्रनुप्रवेश हो जानेपर तो यह सङ्ख्या-नियम नहीं रहता है । ग्रोर प्रत्येक सन्धिमें [कुछ ग्रदृशोंका] एक-दूसरेसेमें ग्रनन्तभाव करके ग्रदृशोंकी सङ्ख्याका सक्षेप सम्भव होनेपर भी प्राचीन ग्राचार्योंके द्वारा न किए जानेके कारण तथा मलिन-मोलियोंके ग्राहुल्यक चमत्कारजनक होनेके कारण हमने नहीं किया है । 'ग्रय वम्' इस [पद]से [यह सूचित किया समस्त रूपकोंमें प्रवृत्तय होता है । इसी प्रकार निर्वहणासङ्घि भी [रूपकके समस्त भेदोंमें प्रवृत्तय होता] है । [प्रत्येक रूपकमे मुखसन्धि तथा निर्वहणासङ्घिका होना ग्रपरिहार्य है] । प्रतिमुख ग्रादि [ग्रन्य सन्धियोंका सर्व रूपक भेदोंमें होना] ग्रपरिहार्य नहीं है । ग्रन्थ प्रतिमुख ग्रादि [ग्रन्य सन्धियों] तो लचणोंके ग्रनुसार होते हैं । [प्रत्येक सन्धिमें विलसत] ग्रदृशोंके, कयावस्तुके विस्तारकारारी होनेसे ग्रदृशोंकी रचना [रूपकमें] दर्शनीय होती है ।

[रूपकमें] प्रयत्नया [रूपककी कयावस्तु बहुत सक्षेपमें समर्पित हो जानेकी चाहिए । ग्रतनया [रूपकके] प्रयोजनेके चमत्कार-शून्य हो जावेगी । जैसे] (१) रामकी पत्नियोंको रावरणने हरण कर लिया । (२) रामचन्द्रने जटायुसे [इस समाचारकरे] जानकर, (३) वानरोंद्वारे श्राधिराजपदको प्रदान करनेके द्वारा सुग्रीवको श्रपना सहायक बनाकर, (४) समुद्रपर सेतुबन्ध बनाकर ग्रोर रावणको मारकर, (५) उसे लोटा लिया इस [रामायणकी कथा]में प्रारम्भग्रादि प्रवस्यान्तोंके द्वारा [प्रस्तुत तथा योजान्त उपायोंसे युक्त पञ्चमी सन्धियोंके के प्रयोग] से [युवत] रूपककी रचना करनेपर [भी] कयावस्तुका [प्रस्तुत] सक्षेप हो जाता है । इसलिए उसमें कोई चमत्कार नहीं रहता है । [इसमें] विपरीत प्ररक्षक [नोट्स] कयावस्तु भी विभिन्न ग्रदृश्यों द्वारा [विस्तारपूर्वक] होनेपर प्रत्येक ग्रन्थकारके मनोरञ्जक बन जाते हैं । ग्रोर कयाभाग पुनरवन होनेपर भी ग्रदृशोंके शैलोसे नियद्ध होनेपर पुनरुक्त-सी प्रतीत नहीं

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ग्राखेटो मुनिकन्यका कुलपतिः कीरः श्रृगालोडध्वगा:, विप्रो म्लेच्छपतिमंनुध्यमशरं लम्वस्तनी मान्त्रिकः । उद्धतः पुङ्गो वियचचरवधूगोमायुनादः फणीन्द्रः, सर्वं सत्वपरीक्ष्यगोत्रसुकरसेरसमााभिरेतत् क्रतम् ॥ श्राखेट इत्यादिना मृगसनिधानिवद्‌धा:, कीर इत्यादिना प्रतिमृगसनिधभाविनः, श्रृगाल इत्यादिना गर्भेसनिधप्रथिता:, मनुष्येत्यादिना च विमर्शसनिधसूचिता:, यथासंघं प्रारम्भाभ्रवस्थानुगता: फलवन्तोऽर्था निवह‌एसमन्ववेक्यत|SSपादनार्थं सन्देepत: पुनरुपात्ता इति ॥४८॥

कुन्तल श्लोक फार्सिलके साथ राजा हरिश्चन्द्र घोड़ेपर चढे हुए वराहका शिकार करते हुए प्रवृत्त होते हैं, इसी मृगया-प्रसंगमें एक तपोवनके समीपमें राजाके वायसे एक गृध्रियो हरिणी को हरखा हो जावी है । यह हरिणी श्रीरामके कुलपतिकी वन्याकी पालतू हरिणी थी । राजा ने उस हरिणीके वधसे बडा दुःख होता है । वे अपने साथियोंके साथ श्रीरामके आश्रममें प्रवेश करते हैं । वहाँ कुलपति उनका स्वागत करते हैं । किन्तु इसी बीचमें कुलपतिको मालूम होता है कि उनकी कन्या श्वपनो प्रिय हरिणीके मारे जानेके कारण ग्रानदान करके मरनेके लिए तैयार हो रही है । श्लोक उसके साथ उसकी माता भी ग्रानदान करने जा रही है । कन्याका नाम वचना श्लोक उसकी माताका नाम निश्चिता है । वन्या श्लोक पत्नीके ग्रानदान तथा हरिणी के वधका समाचार जानकर कुलपति श्रप्रसन्नत् क्रुद्ध हो उठते हैं, श्लोक राजाको बहुत खरी-खोटी सुनाते हैं । अनन्तर वे कहने हैं कि यह राजा श्रपना सर्वस्व दान करनेपर ही इस पापसे मुक्त हो सकता है । श्लोक राजा उसी समय श्रपना सर्वस्व दान कर देते हैं । यह मुख-सन्धि का कथाभाग है । श्रागे की राजा हरिश्चन्द्रके श्रपने बेचने श्रादिके कथा! श्रगले श्रद्धोंमें चलती है, उस सारले कथाभाग का स्पर्श करनेवाले शब्दों द्वारा कथाशवा निदर्शं श्रगले श्लोकमें 'ग्राखेटो मुनिकन्यका कुलपति:' शब्द्दोस किया गया है । इसी प्रकार श्लोकमें श्रागे हुए कीर श्रृगालो, श्रध्वगा श्रादि प्रत्येक शब्द नाटकके श्रगले श्रद्धोंमें वाच्येक कथानक तथा विशिष्ट पात्रोंसे सम्वन्ध रखते हैं । इन शब्दोंके द्वारा मारे नाटकके कथाभागकी सङ्केतमें बडी सुन्दरताके साथ एक तरहसे पुनरावृत्ति कर दी गई है । इसलिए यह दुसरे लक्षणके श्रनुसार निवह‌एसमन्वका उदाहरण है । श्लोकका श्रयं निम्न प्रकार है— (१) वह शिकारी, मुनिको पुत्री, कुलपति, (२) वह तोता श्रौर श्रृगाल, (३) वह पथिकका, श्राह्मण श्रौर म्लेच्छुराज, (४) वह मनुष्यका मरण, लम्वस्तनी, मान्त्रिक, उद्धत पुङ्गव, पक्षियोका शब्द, श्रृगालोंकी श्रावाज, श्रौर सर्पं यह सब प्राप्ती [हरिश्चन्द्रककी] रसतिकी परीक्षाके लिए हमने हो किया था । [इसमें] श्राखेट इत्यादिसे मृगसनिधमें निवद्ध [प्रयं], कीर इत्यादिसे प्रतिमृग स‌ंधमें निवद्ध [ग्रथं], श्रृगाल इत्यादिसे गर्भ स‌ंधमें गृहीत [प्रयं] श्रौर मनुष्य इत्यादिसे विमर्श स‌ंधमें वाच्यत [प्रयं] क्रमशः प्रारम्भ श्रादि श्रवस्थाप्राप्ति युक्त फलवान् ग्रथं एकवाक्यतासम्पादनके लिए 'निवह‌एसनिधमें सन्देसेपसे फिर कहे गए हैं । [इसलिए निवह‌एसमन्वके दुसरे लक्षणके श्रनुसार यह उसका तदाहारएा है] ॥४८॥

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उपलेपः परिकरः परिन्यामः समाधानिति: । उद्भेदः करणं चैतान्यत्रैवाथ विलोभनम् ॥४१॥ भेदनं प्रापणं युक्ति-विधानं परिभावना ।

ग्रथ 'दिङ्नाट्यम्' इत्यन्र श्रद्ध-शाब्दोपात्तानि उपदेष्टपादीनि श्रज्ञानि विपक्च-चितुं ग्रथमं (९) सुप्रसनिधगतानुयुदिशति— उपलेप, (२) परिकर, (३) परिन्याम, (४) समाधान, (४) उद्भेद, (६) करण, ये [६ ग्रन्थ] इसमे ही [प्रथमतः सुप्रसनिध्यमे] होते हैं [प्रन्य सन्धियोंमें नहीं होते हैं] ।

सर्च्यानिध्यमूनि स्तुच्;, द्वादशाख्र मुचं श्रुवम् ॥४२॥ 'ग्रत्रैव' इति उपचेपादीनि करणान्तानि मुरसन्ध्याच्चैव भरन्ति । तत्रापि उदरे श-परिकर-परिरयामानां यथोद्देशक्रमममादावेव, समाधानस्य तु रचनावशान्म-धैकदेश एव, उद्भेद-करणयोस्तु उपान्त्ये निवेश्यम् ।

सुरसन्धिधके द्वादश ग्रज्ञ— पांचवों कारिकामें ग्रन्थकारने नाटकके लक्षण करते समय इनमे पञ्च-सन्धियोकों सर्चा की थी । उन पञ्च-सन्धियोंका विवेचन यहां तक समाप्त हो गया । श्रव आगे उन्ही सन्धियोंके ग्रज्ञोका विवरण करते हैं । इन ग्रज्ञोंकी संख्या प्रत्येक सन्धिमें भलग-भलग निश्चित की गई है । मुरसन्धिमें १२ ग्रज्ञ होते हैं । प्रत्येकसन्धि, मुखसन्धि तथा विसन्धि सन्धि इन तीनों सन्धियोंमें तेरह तेरह तथा निर्वहृङ्गा सन्धिमें १४ ग्रज्ञ माने गए हैं । इस प्रकार पांचों सन्धियोंमें कुल मिलाकर ग्रज्ञोंकी संख्या वेइसठ हो जाती है । श्रग्रे ग्रन्थकार क्रमशः पांचों सन्धियोंके इन मेठ ग्रज्ञोंका वर्णन करेंगे । उनमें सबसे पहले मुखससन्धिके बारह भेदोंका उल्लेख [प्रथमतः नाममात्रसे कथन] करते हैं—

[सूत्र ४५]—(९) उपसेप, (२) परिकर, (३) परिन्यास, (४) समाधान, (४) उद्भेद, (६) करण, ये [६ ग्रन्थ] इसमे ही [प्रथमतः मुखसन्ध्यमे] होते हैं [प्रन्य सन्धियोंमें नहीं होते हैं] । [सूत्र ४६]—श्रोर (७) विलोभन, (=) भेदन, (६) प्रापण, (१०) युक्तित, (११) विधान तथा (१२) परिभावना ये [सात ग्रज्ञ] सब सन्धियोंमें हो सकते हैं ।

[इस प्रकार] बारह ग्रज्ञोंवाला मुरसन्धि [उपसेपको समस्त भेदोंमें 'ग्रत्रेव' अर्थात्] उपपेवलके समस्त भेदोंमें 'ध्रुव' शब्दका प्रयोग होता है । 'ग्रत्रेव' हसका प्रभिप्राय यह है कि उपसेपसे लेकर करण पर्यन्त [६ ग्रज्ञ] मुख-सनिषमे हो होते हैं [ग्रन्य सन्धियोंमें नहीं होते हैं] । उनमें भी उपसेप, परिकर तथा परिन्यास [इन तीनों ग्रज्ञों] का इत [उद्घेशके] क्रमसे [सन्धिके] प्रारम्म्भमें ही सन्निवेश किया जाता है । समाधानका रचनाके ग्रनुसार मध्यकमें [किसी] एक भागमें ही तथा उद्भेद एवं करणका [मुखसन्धिके] ग्राप' ग्रन्थमें [उपान्त्ये] ही सन्निवेश किया जाता है ।

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द्वोपादन्यसमार्दपि मध्यादपि जलनिधेरोदशोदध्नन्तत् । श्रानीयमटति घट्टयति विधिरभिमतं तमभिसुरभीमूतः ॥

होता है । प्रोर श्रृङ्गोसे सम्बद्ध [श्रप्रस्त श्रृङ्गोकी शृङ्गोसे निवद्ध] क्यावस्तु लोहेको शलाकाके समान [एकदम सोधा प्रप्ररिवर्त्तनोय] नहीं रहता है [उसमें लचकीलापन श्रा जाता है जिससे कवि सौन्दर्यान्वितके लिए उसे श्रावश्यकतानुसार मोड़माड़ सकता है ।] प्रयेषक श्रृङ्गका श्रलग-प्रलग प्रपोजन उनके लक्ष्यमें यथावसर दिखलावेंगे । इस श्रनुच्छेदमें ग्रन्थकारने पात्र सङ्घियोमें कहे जानेवाले श्रृङ्गोकी उपयुक्तताके विषय में सामान्यरूपसे प्रकाश डाला है । उसके श्रनुसार श्रृङ्गोसे प्रयोजन क्यावस्तुमें चमत्कार को उत्पन्न करना है । श्रृङ्गोके प्रयोगके बिना श्रप्रयत्न सरस क्यावस्तु भी नीरस बन जाती है । श्रोर श्रृङ्गोके योजित प्रयोगके द्वारा नीरस क्यावस्तुमें भी चमत्कार उत्पन्न किया जा सकता है । इसलिए ग्रन्थकारते स्पष्टोमें श्रृङ्गोके प्रयोगको 'उपरिहायं माना है । उन्होंने द्वारा कयाका विस्तार प्रोर लचकीलापन श्राता है । प्रोर पुनर्हनित श्रादि दोषोंका परिहार होता है । ग्रत एवं श्रृङ्गोका प्रयोग श्रप्रयत्न श्रावश्यक है ॥४१-४२॥

इत्यादिना योगन्धरायसोन वत्सराजस्य रत्नावलीप्राप्तिहेतुतः स्वनयापारानुचूलदेवो बीजमुसमम् ।

इन दो कारिकाग्रोमें मुखसन्धिके श्रृङ्गोका उद्देर श्रथन्त नाममानसे कथन करनेके बाद मव ग्रन्थकार मुखसन्धिके वरोह श्रृङ्गोका श्रलग-श्रलग-प्रलग लक्षणादि ग्रागे करेंगे । इनमें सबसे पहिले उपक्षेप हप प्रथम श्रृङ्गका लक्षण करते हैं— (१) उपच्तेप—

[उपक्षेप हप प्रथम श्रृङ्गके द्वारा] समस्त काव्यकला ग्रथ्य श्रोर प्रधान रस हप प्रयोजन सङ्क्षेपमें [बीज रूपसे] उपक्षित किया जाता है, इसलिए 'उपक्षिप्तेज्जेन इति उप-क्षेप' इस व्युत्पत्तिके श्रनुसार] सबसे पहिले 'उपक्षेप' का लक्षण करते हैं— [सूत्र ५०]—[क्यावस्तुके] बीजका वपन करना 'उपक्षेप' [कहलाता] है । [प्राणे सलकर] विस्तृत होनेवाले क्यावस्तुका मूलभूत भाग [धान्यके] बीजके समान [होनेसे] 'बीज' [कहलाता] है । उसको डालना श्रर्थात् बोना [जिस श्रृङ्गके द्वारा किया जाता है वह] 'उपक्षेप' [कहलाता] है। जैसे रत्नावलीमें नेपथ्यमें [बीजका 'उपक्षेप' इस प्रकार किया गया है]—

दूसरे दृपते भी, समुद्रके बीचसे भी प्रोर विदिशाके घोरसे भी श्रत्नकूल हमें वैव प्रभिमत वत्सरुको लाकर मिला देता है । इत्यादि [कपन] के द्वारा [वत्सराज उदयनके मन्त्री] योगन्धरायणने वत्सराज [उदयने] को रत्नावली [नापिका] भी प्राप्त करानेवाले श्रपने श्रनुपारके श्रत्नकूल देश रूप

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उपकिप्रस्यार्थस्य मुख्य विशेषवचनैरल्पं विस्तारस्य 'परिकर:' । यथा वेप्सी-संहारे भीमसेनः सहदेवमाह—

(२) परिकर 'परिकर' [नामक मुख्यार्थके दूसरे प्रधानको कहते हैं]--[बोज रूपमें उपकिप्त प्रयंकका] स्वल्प विस्तार 'परिकर' [नामक, मूलसंघिकाका कहलाता] है । [बोज रूपसे] उपकिप्त प्रयंकका [स्वल्पप्रयासः प्रथ्यांत] भलो प्रकारसे विशेष वचनों द्वारा तनिक-सा विस्तार करना 'परिकर' [कहलाता] है । जैसे वेङ्गसंहारमें भीमसेन सहदेव से कहते हैं—

प्रवृदं यद्यपि समु खलु शिशोरेव कुम्भि:, न तत्रार्या हेतुरभवति न किरीटी न च युयाम् । जरासन्धस्योरःस्थलमिव विश्रुतं पुनरपि, कृतधा भीमः सन्धिं विघटयति युयं घटयत ॥ इति ।

"मेरा कौतुकि साय बचपनसे ही जो बहर बन गया है उसमें न भार्पे [प्रथ्यांत युवस्थिर] कहलें हैं न भज्जने धीरें न तुम्हें देखो [प्रथ्यांत नकुल और सहदेव हो कहलते हैं] । जोधके कारण भीमसेन [प्रथ्यांत में स्वयं] जरासंधके उरस्स्थलके समान परिपक्व संधिको भी भन्न करने जा रहा है तुम लोग उसे [मले ही] जोड़ते रहो ।"

उपक्लिप्तस्य, विस्तार्यार्थस्य विशेषेपे निर्श्रयः सिद्धतया हृदये डवगथ्यापन्न परितो न्यसते 'परिन्यास:' । यथा राववाश्युदये—

(३) परिन्यास— [वृत्त ५२]--[उपकिप्त और तनिक विस्तारित प्रयंक] विशेष रूपसे निश्चित पर्यांत सिद्ध मनाकर हृदयमें पारण करना [परितः] पूरां रूपसे [हृदये] स्थापिन करना ['परितो न्यसनं परिन्यास:' इस विग्रहके श्रनुसार] 'परिन्यास' [कहललाता] है । जैसे 'राववाश्युदय'में--

"मतिसागर:-देव मा श्रद्दिघ्ठाः । प्रयोऽपि हि किं विपरियन्ति मुनि-भापितानि ?"

"मतिसागर:-हे राजन् ! देव झूठा न कहो । क्या मुनियोंकि वचन कभी गलत हो सकते हैं ?"

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जनकः—तत् किं भुजदण्डविक्रमाक्रान्तभारतत्रयपण्डितयस्य तस्यापि पराजय सम्भाव्यते ?

जनक—तो क्या अपने भुजदण्डके विक्रमके हो जिसने भारतके तीन पण्डितोंको माक्रान्त कर लिया है उस [रावण] की भी कभी पराजय हो सकती है ?

मतिसागरः—[स्वगतम्] ग्रहो दुरात्मनो रात्रिसस्याज्ञैश्वर्यं, यदयं रहोऽपि हैरसतरामियानमुचचारयन् विभेति । [प्रकाराम्] देव सम्भाव्यत इति किंमुख्यते ? एव कि नामिधीयते देवेन !" इति ।

मतिसागर—[अपने मनमें 'स्वगत' कहते हैं] ग्रहो दुष्ट राक्षसराजके ऐश्वर्यंका क्या प्रभाव है कि ये महाराज एवरतके भी उसका नाम लेनेमे डरते हैं । [प्रकाराम] हे राजन् [उसको पराजय] सम्भव है ऐसा क्यों कहते हैं, सिद्ध हो है ऐसा श्राप कयो नहीं कहते हैं । इसमे [विस्तारित श्रर्थका 'विनियोेपनिश्चय'. प्रयात् सिद्धतया कथन होनेसे यह 'परिण्यास' नामक तीसरे श्रर्थका उदाहरणहै] ।

यथा वा वेङ्कीसंहारे— "चक्रे चक्रभृतां मित-चण्डगदाभिघात-- सञ्चूर्णिततोरयुगलस्य सुयोधनस्य । स्थानापविद्ध-घनशोषितशोणितशोषा- रुत्तांसविच्छुर्याति कचांसतव देवी भीमः !!" इति ।

यथा वास्मदुपज्ञे रोहिणीमृगाङ्काभिधाने प्रकरणे प्रथमाङ्के मृगाङ्कं प्रति— "वसन्तः—कुमार मा शङ्किष्ठा— उन्मत्तप्रेमसरोम्भादारभन्ते यदृच्छया । तत्र प्रत्युद्भमायातु* ब्रह्मापि सलु कातरः !!" एवं विनियोेपितया न विश्चीयते, आविसंहिततया न निश्चीयते इति त्र्याख्या-मप्येपां उद्घेशक्रमेऽपि नियम्य ।

है देवी ! श्रापकी चञ्चल भुजदण्डोंसे घुमाई हुई भयङ्कर गदाके प्रहारसे तोड़े हुए दुर्योधन को दोनों जङ्घाश्रोंके गाढ़े जमे हुए प्रघुर रक्तसे रञ्जित हुए हाथोंसे ही यह भीम कुमार आपके बालोको वाँधे । इसमे [विस्तारित श्रर्थका सिद्धवत् कथन होनेसे यह 'परिन्यास' का उदाहरण है] । प्रति वसन्त [कहता है]— वसत—कुमार ! श्राप [किसी प्रकारको] शङ्का न करें । उन्मत्त प्रेमके श्रावेगमे स्त्रियों जो [प्रत्यय-व्यापार] श्रारम्भ करती हैं उसमे विध्न डालनेका साहस श्राप भी नही कर सकता है । [सकिस् रूपमे बोधने समास] उपकिस् किए बिना श्रर्थका विस्तारे नहीं किया जा सकता है और विस्तारे किए बिना निश्चय नहीं किया जा सकता है इस लिए [उपक्षेप परिकर तथा परिन्यास] इन तीनों [श्रेढ़ों] का उद्देघेशक्रमसे [प्रर्याप्त इसी क्रमसे] सक्रिेवन करना चाहिए ।

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पुनर्न्यासः समाधितिः ॥४३॥

सञ्चिप्योपहितस्य वीजस्य स्पष्टताप्रतिपादनार्थ पुनर्न्यस्मै भवितव्यमेवैचित्र्यं, सम्यक् श्रासमन्वतात् धान पोष्य 'समाधितिः' । यथा वेप्टिसदारे--"नेपथ्ये--हे हुपद, विराट, वृष्णे, श्रन्धक श्रौर सहदेव श्रादि हमारे क्षत्रोहये सेनाके सेनापतियो ! श्रौर कोरवोंकी सेनाके प्रधानाधिकारियो ! [प्राप सब लोग कान खोलकर] सुनलो कि-- [वारह थयं वनवास तथा एक थयंके श्रज्ञातवासका जो व्रत हम पाण्डवोंने लिया है वह कहाँ भङ्ग न हो जाय इस प्रकार] सत्यव्रतके भङ्गसे डरनेवाले [युधिष्ठिर] ने [ग्रब तक श्रपनो] जिस [क्रोधाग्नि] को यत्नपूर्वक दबाए रखा था श्रौर श्रा तनस्वभाव वाले [युधि- ष्ठिर] ने कुलकी शान्तिके कार्मनासे जिसकी भूलनेका भी यत्न किया, यत्नकी मर्यादायोंसे उत्पन्न श्रौर द्वैपदीके केशा तथा वस्त्रोंके पाँचे जानसे मरपथु [दु दास्वन] के द्वारा उद्दीप्त किया हुश्रा युधिष्ठिरके हृदयमें यह भयानक क्रोधाग्नि प्राज कुलकुल रूप वममें [उसको भस्म कर देनेके लिए] प्रदीप्त हो रहा है । इसने 'स्वस्था भवन्तु ममि जोर्वात धार्तराष्ट्र' 'मैरे जोवित रहते कौरव कहाँ स्वस्थ हो सकते हैं' [अ्रयवा कोरव स्वगंगो भवतु] इस रूपमें [जिस वोजका प्राधान किया गया था वह इस समय प्रधान नायक [युधिष्ठिर] गत रूपसे पूरों रूपसे परिपुष्ट हो गया है । [इस लिए यह 'परिन्यास' का उदाहरण है] ॥४३॥

ससोपमे उपक्लिष्ट वीजकथा दुवार्था [श्रधिक स्पष्ट रूपसे] प्राधान 'समाधान' [कहलाता] है ॥ ४३ ॥

उपक्लेश रूप प्रयत्न श्रद्धुमे] सक्लेशसे उपक्लिष्ट वोजको श्रौर श्रधिक रूप श्रपसे प्रति- पादन करनेके लिए किरसे कयन करना श्रर्थात् विविध त्रिभावपुष्टश्लोके [दुवार्थ] कथन करना, 'सम्प्राय' भली प्रकार प्रतिपादते श्रौर 'श्रह समन्वतात्' पूरों रूपसे स्वापित करना [इस प्रकारके श्रनुसार] 'समाधान' [समाधिति कहलाता] है । जैसे वेष्टिसहारमें--"नेपथ्ये--हे हुपद, विराट, वृष्णे, श्रन्धक श्रौर सहदेव श्रादि हमारी क्षत्रोहये सेनाके सेनापतियो ! श्रौर कोरवोंकी सेनाके प्रधानाधिकारियो ! [प्राप सब लोग कान खोलकर] सुनलो कि-- [वारह थयं वनवास तथा एक थयंके श्रज्ञातवासका जो व्रत हम पाण्डवोंने लिया है वह कहाँ भङ्ग न हो जाय इस प्रकार] सत्यव्रतके भङ्गसे डरनेवाले [युधिष्ठिर] ने [ग्रब तक श्रपनो] जिस [क्रोधाग्नि] को यत्नपूर्वक दबाए रखा था श्रौर श्रा तनस्वभाव वाले [युधि- ष्ठिर] ने कुलकी शान्तिके कार्मनासे जिसकी भूलनेका भी यत्न किया, यत्नकी मर्यादायोंसे उत्पन्न श्रौर द्वैपदीके केशा तथा वस्त्रोंके पाँचे जानसे मरपथु [दु दास्वन] के द्वारा उद्दीप्त किया हुश्रा युधिष्ठिरके हृदयमें यह भयानक क्रोधाग्नि प्राज कुलकुल रूप वममें [उसको भस्म कर देनेके लिए] प्रदीप्त हो रहा है । इसने 'स्वस्था भवन्तु ममि जोर्वात धार्तराष्ट्र' 'मैरे जोवित रहते कौरव कहाँ स्वस्थ हो सकते हैं' [अ्रयवा कोरव स्वगंगो भवतु] इस रूपमें [जिस वोजका प्राधान किया गया था वह इस समय प्रधान नायक [युधिष्ठिर] गत रूपसे पूरों रूपसे परिपुष्ट हो गया है । [इस लिए यह 'परिन्यास' का उदाहरण है] ॥४३॥

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इति द्रौपद्याभिहितो भीमः प्रत्याह-- "आर्य किमर्थ्यलोकारवासनाभि-? भूयः परिभवचिन्तान्तलज्जाविधुरतिसाननम् । रत्नि.शोपितकौरवं न पर्यसि वृकोदरम्॥"

इति कुरुनिधनारम्भप्रस्तुतभेदवचनमुद्भेदः । इति । अत्र ये तं गदाभेदनमुद्भेदनमानमन्ति । यथा रत्नावल्यों वत्सराजस्य कुमारायुश्च-व्यपदेश-निगूढस्य 'ग्रस्तापास्त' इत्यादिना वैतालिकवचनसां गार्तिकां प्रत्युद्भेदः ।

यथा वा राघवाभुदये-- "सीता--[ समन्तादवलोक्य राम च सर्वगुणं तिर्यगप्यर्थे स्वगतम्‌] कथमय- मनद्रोडयत्कण्ठमास्थाय चापारोपण दृप्टुमायात । प्रसिद्ध भगवन्नद्ध ! प्रसोद । तथा कुर्यां यथा राम एव चापारोप्याय प्रभवति । लवङ्गका--[ श्रगुल्या रामं दर्शयित्वा ] जं भर्तृदारिका इयं तं कालं मनोरथगोचरं कृतवती, तं साम्प्रतं हस्तिगोचरं करोतु । इति सखीतम्‌ ]

द्रौपदीके इस प्रकार कहनेपर भीमने उत्तर दिया कि-- "ग्ररे ग्रप्रव भी ग्रोर शत्या श्राइावान देनेसे क्या लाभ [में तो यही कहता हूँ कि]-- तिरस्कार सहते करनेकी लज्जाके कारएा मलिनमुख भीमको तुम श्रप्र कौरवोंका नाश किए बिना दुबारा नहीं देखोगी [प्रत्युत ग्रत्र मे कौरवेका समूल नाश करनेके बाद हो दुबारा तुम्हारे पास श्राऊँगा । उससे पहले नहीं] ।" इसमें कौरवोंके विनाशके श्रारम्भ रूप बीजकाका 'उद्भेद' [स्वल्पप्ररोह] है । इस प्रकार ग्रन्थकारने मुखरसन्धके 'उद्भेद' नामक पञ्चम ग्रङ्गका लक्षण प्रस्तुत किया । किन्तु ग्रन्थ व्याख्याकार 'उद्भेद' का लक्षण ग्रन्य प्रकारसे करते हैं । उनके मतभे किसी गूढ प्रयत्नका प्रकट होना 'उद्भेद' कहलाता है । हम मतभेद श्रागे दिखलाते है ।

दूसरे [ग्राचार्य] तो [किसी] गूढ [रहस्य] के प्रकट होनेको 'उद्भेदन' कहते हैं । जैसे रत्नावलोमें 'ग्रनङ्ग पूजनके प्रसङ्गपर] कुमारायुधकें नामसे छिपे हुए वत्सराज [उदयन] वा 'ग्रस्तापास्त' इत्यादि [इलोक] से वैतालिकके वचनसे सङ्गतिके प्रति [उदयनके रूपमे वत्सराजका] प्रकट होना [उद्भेद कहा जा सकता है] ।

यथा जैसे राघवाभ्युदयमे-- "सीता--[ चारों ग्रोर देखकर प्रोर रामचन्द्रकी ग्रोर विशेष दृष्टसे देखती हुई ग्रपने मनमें स्वगत कहती है] प्रचद्धा यह [ग्रनङ्ग] कामदेव भी नारीके धारएा करके धनुपके ग्रारो- पएाको देखनेके लिए ग्रा गया है । कृपा करो, भगवान् कामदेव ! कृपा करो, जिससे रामचन्द्र ही धनुपके चढ़ानेमें समर्थ हो सकें [प्रन्य कोई समर्थ न हो सकें] । तवदूका--[ श्रङ्गुलीसे रामको दिखलातो हुई] है स्वयमुपुत्री ! जिनको ग्राप ग्रप्र तक मनोरथका विषय बनाए हुए ग्रों उनको ग्रब हष्टिका विषय बना सो [प्रस्तुत देख सो] ।

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इत्यननुज्ञात्य निगूढस्य रामस्य लङ्कादिकावचस उद्भेदः ॥

(६) ग्रथ करणम्— [सूत्र ४५]—करणं प्रस्तुतक्रिया । स्वमतम्‌ रानुगुणस्यार्थस्य प्रारम्भः करणम्‌ । तथा वेगादिसंहारे— "सहदेवः—ह्रायं वच्छामो वयं गुरुजनानुज्ञाता विक्रमानुरूपमाचरितुम्‌ । भीमः—एते च वयमुचिता एवं चायेष्याज्ञाननुष्टातुम्‌ ।" इत्यनेन श्रानन्तराल्लिप्रस्तुत्यमान-संप्रामारम्भस्यात 'करणम्‌' । यथा वा यादवाभ्युदये द्वितीयाल्लोपाल्ल्ये— "कंसः—[ मधुरादम्‌ ] साधु भ्रमात्य साधु । श्रयमेव संप्रहोपायो नान्यः । तनू तर्हि ब्रज त्वं सामग्रोकरणाय ।" इत्यनेन श्रानन्तराल्लिप्रस्तुत्यमान-मल्लरङ्गभूमिप्रारम्भात्‌ करणार्मिति । श्रन्ये तु विपदां शमनं करणामाहुः । शमनं चाशीवोद्दवशेन श्रन्यथा वा । सीता—[ श्रादर-पूर्वक श्रासन देनें ] श्रद्यक्षो में रामचन्द्रजीका हृदय कामदेव समक्षे रही यों !

इस प्रकार कामदेवके भ्रममें दृषे हुए रामचन्द्रका लङ्कादिके वचनोंसे [सीताके प्रति प्रकट होना] उद्भेद है । उद्भेदके दूसरे लक्षणके श्रनुसार ये दो उदाहरण यहाँ प्रस्तुत किए गए हैं । (६) करण— श्रथ करण [नामक मुखसन्धिके पाँच भेदोंका लक्षण करते हैं]— [सूत्र ४५]—प्रस्तुत [कार्यका प्रारम्भ] करण [कहलाता] है । ग्रथवस्तुके ग्रनुकूल ग्रर्थका प्रारम्भ करना 'करण' [कहलाता] है । जिसमें वेगादिसंहारमे-- "सहदेव—हे प्रायं हम गुरुजनोंकी श्रनुमतिसे श्रपने पराक्रमके श्रनुसार [युद्ध] करनेके लिए जा रहे हैं । भीम—ग्रोर ये हम भी प्रायंको प्राज्ञाका पालन करनेके लिए तंयार हो हैं ।" इस [वाक्य] से श्रागले ग्रन्थमें प्रस्तुत किए जाने वाले संग्रामका प्रारम्भ करनेसे ग्रह 'करण' [का उदाहरण] है ।

प्रथवा जैसे यादवाभ्युदयमें द्वितीय पड्र्के प्राप्तः ग्रन्थमे [उपान्त्ये]— "कंस—[प्रताप होकर] निवारित मगधवर निषावार, यही [कुलाके] पकडनेका उपाय है दूसरा नही । इस लिए सामप्रो संयार करनेके लिए जाग्रो ।" इस [कथन] से श्रागले ग्रन्थमें प्रस्तुत किए जानेवाले मल्लयुद्धा भ्रारम्भ करानेके मार्तिमें करना [नामक मुखसन्धि] पञ्चम भेद है । ग्रन्य [प्राचार्यं] तो विपत्तियोंके शमनको 'करण' बहते हैं । वह शमन प्राशीर्वादशेन हपमें ग्रथवा अन्य प्रकारसे हो सकता है ।

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यथा वेङ्गीं सद्दारे भीमं प्रति त्रोपदी— 'जं असुरसमराभिसुज्झस हरिअओ मझ्झलं, तं तुम्हायं भोइउ । इति । [यदसुरसमराभिसुरस्य हरेःमेझलं, तद् युष्माकं भवतु । इति संस्कतम् ]।

(७) अथ विलोभनम— [सूत्र ४६]—विलोभनं स्तुतिरगाधर्थम् स्तुतेरु गुणावदेक्तान्त र्लाघात । प्रस्तुतं कृत्यं गाथ्य—ग्रामभिलापार्थरोधरस्य विलोभनम । यथा वेङ्गीसद्दारे 'वच्छदसुज्झ' इत्यादि श्लोकानन्तरं— 'त्रोपदी—नाथ ! कि दुक्करं तवय परिकुवित्तेण ? ता असुग्गियहंतु एदं वच्चासिद्ध देवदाउ । [नाथ ! कि दुक्करं त्वया परिकुपितेन ? तद् असुगृहीतन्तु एतद् वचोऽसिर्तं देवता: । इति संस्कतम् ] इत्यत्नेन सुयोधनवधस्य गुरुकवत्त्वस्यापनाद् भीमस्य गाढ्येपड विलोभनम । इदं च परिन्यासानन्तरमेव निधध्यते । मन्धान्तरसाधारण्याय चोक्तं कमेसोरेहि जैसें 'वेङ्गीसहार' मे भामिक प्रति द्रोपदी [कहती है]— ग्रामुरोसे मुद्दके लिए जाते हुए विष्णुको जो मझ्झल प्राप्त हुचा था वह तुम्हको भो [प्राप्त] हो ।

(७) विलोभन— विलोभन—श्रव विलोभन [नामक सततम ग्राद्धको कहते हैं]— [सूत्र ४६]—स्तुति के द्वारा [वस्तुके प्रति] श्राभिलाप विलोभन [कहलाता] है ।

स्तुति के द्वारा यह [वस्तु] गुरणवान है इस प्रकारकी प्रशंसाके कारण प्रस्तुत कार्य के विषयनमें श्राभिलाषका श्रादर हो जानर 'विलोभन' [कहलाता] है । जैसे 'वेङ्गीसहार' मे 'वच्छदभुज्झभामित' हरपाआइ सलोकके बाद द्रोपदी [कहती है]— 'हे नाथ श्रापके प्रतिकुपित होनेआर वया कुरकर है ? [प्रर्यांत सब कुछ सहज साध्य है] । इसलिए देयताआए तुम्हारे इस निश्चयको ग्रहणुग्रहीत करें ।'

इससे सुयोधनके वधकी गुरुत्वताकी सूचना करके भीमसेनके [उसके प्रति] श्राभिलाप को पुष्ट करना विलोभन' है ? इसका सन्निवेश [मुखसंधिके चतुर्यं ग्राद्ध] 'परिन्यास' के मन्तनर [पञ्चम ग्राद्धके रूपमे] ही होता है । [परन्तु उद्भेषालो कारिकामें इसे परिन्यासके बाद नहीं रखा है । ६ मझ्झोके बाद सातवें ग्रागेके रूपमे रखा गया है । इसका यह कारन है कि ] ग्रन्थ संधियोंमे भी होनेके कारन उक्त कमसे [ ग्रर्थात ग्रन्थ संधियोंमे होनेवाले ग्राद्धोंके श्रारंभमे ] कथन किया गया है ।

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भेदनं पात्रनिर्गमः ॥४४॥

[सूत्र ४७]—भेदनं पात्रनिर्गमः ॥४४॥ रङ्गप्रविष्टाना पात्राणां निर्गमो रङ्गान्नि.सरस्या येन तद् भेदनम् । पात्राणां यथारव प्रयोजनवशादितरथ्च इत्थश्च गन्तुमन्थार्थोडस्यभिप्राय उच्यमो वा रङ्गान्ति गम्भापादच्यते भेदनमुच्यते । यथा ‘वेस्सन्तरे’ भीमो द्वौपद्या सप्रेमाभिप्रेरितोऽन्या शरीरानपेक्षे पराक्रमे निपिद्ध प्रत्याह— "भीम—सुखत्रिये— घन्योड—यास्फालभिन्न—द्विपकधिर—वसा—स!न्ट्रमसितक पद्दे, मग्ननाला स्यन्दनासुंपरिकृतपदन्यान्सविक्रान्तपत्तौ । स्फीतास्रुंरपानगोठी रसदशिराशिवातूयं नृत्यत्कब—से, सग्रामैकार्जोवान्त पर्यसि विचरितुं पवित्ता पास्डुपुत्रा ॥" इति॥ प्रतेन हि सग्रामविचारोऽपि पाण्डवानां पावित्यमध्यापनेन सग्रामावत्त्तरस्याभि-प्राय सहदेवस्य, धार्त्तमनस्च सघातभेदनार्य एतोपदर्शित इति भेदोऽन्नम् । इसीको ने कराके करावके ग्रनन्तरे उसकी गीता का कराई है । इसकी कारिका यह है कि करणके तकके ६ ग्राज्ञ केवल मुखसन्धिके ही होते हैं । ग्रागे गिनाए गए शेष ग्राज्ञ मुखसन्धिके ग्रातिरिक्त ग्राज्ञ सर्व धयोंमें भी होते हैं । यह बात पीछे कह चुके हैं । यह विलोभन ग्राज्ञ वाद न रखकर ग्राज्ञ सर्व धयों में भी होनेवाले ग्राज्ञके साथ रखा गया है । (७) भेदन-- प्रव भेदन [नामक मुखसन्धके प्रथम ग्रप्रका तक्षका करते हैं]— [सूत्र ४७]—पात्रोक्ष [रङ्गभूमिसे] बाहर जाना ‘भेदन’ [कहलाता] है ४४। रङ्गभूमिमे प्रविट्ट हुए पात्रोंका निर्गम श्रथवा रङ्गभूमिसे बाहर जाना जिससे होता है वह ‘भेदन’ कहलाता है । किसी प्रयोजनवश पात्रोंका इधर-उधर जानेका ग्रभिप्राय या उद्योग भी रङ्गभूमिसे निर्गमका हेतु होनेसे ‘भेदन’ कहलाता है । जैसे ‘वेस्सन्तरे’ मे—युद्धमें प्रवीणको प्रासाद्न्न करनेवाले द्वौपदीके द्वारा शरीरचिन्ताको छोड़कर पराक्रम करनेके लिए मनः किए जानेपर भीमसेन कहते हैं— "भीम—हे सुखत्रिये ! एक द्वारके साथ सघयमें षट् हुए गोर हाप्पियोसे य एत्स [वचो] से भरे हुए सिरोंकी पोचडमे हूए स्योंकि ऊपर होकर पदाति सैन्य जिसमें पराक्रम दिखता रहे हैं, गरम-गरम लधिरके पानकी गोठीमें प्रमत्त व्यानिका वाघ [त्रयं] जिसमें बज रहा है ग्रोर [पञ्चय पर्यात सिर कटे हुए] रुधिर जिसमें नाच रहे हैं इस प्रकारके ग्रनोले सप्राम साजरके जलके भीतर घुसकर विचरनेमें पाण्डव लोग निपुण हैं । [इसलिए इस विषयमें तुम किसी प्रकारकी चिन्ता मत करो] ।"

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ज्ञान्ये तु भेदः प्रोक्तसाहनमहतु । यथा 'देवीमहारे'—

[नाट्य मा रतु याझसेनोर्परिभवोद्रिपतकोपा ज्ञानपेचितशरोरा परिरक्षामिसंध, यत्रे ग्रपमत्सरचररप्योऽद्रिरुत्साह मुग्रीयाति । [नाट्य मा रतु याझसेनोर्परिभवोद्रिपतकोपा ज्ञानपेचितशरोरा परिरक्षामिसंध, यत्रे ग्रपमत्सरचररप्योऽद्रिरुत्साह मुग्रीयाति । 'भोम —श्रयि मुन्तनिये । 'भ्र योत्स्यामफलभित्न —' इत्यादिना विषयप्पाथा द्रोपसा श्रोत्साहनवीजानुगुप्रयेनैक प्रो्त्साहना्द्र भेद इति । ज्ञान्ये तु सह्तानां प्रतिपच्त्राग्रा बीजफ्लोत्पत्तिनिरोधनानां विश्लेष्म भेदरुपमुपाय 'भेदनं म्रच्यते इति ॥४३॥

(द) श्रथ प्राप्तसाम्—

[श्रत ४३]--प्रापण सुत्रसम्प्राप्तिः सुग्न्रय सुत्रहेतुश्र स्म्रग्रादेवप्पादान्त्र प्राप्तसाम् । यथा देवोमहारे— 'कडचुको—[प्रविश्रय] कुमार पञ्चवपात्रुपपात्रमर्पिंतेन कुरुराजेन सत्यमितुमारच । तत्र स मह्हात्मा दर्शितविश्र्कपतेज सम्पात मूर्त्तिमवधूय कुरुमनमसम्मतेनमन्विते श्रमनुप्राप्त । श्रतो देव कुमारभविलस्मिवत ग्रभिप्रायक्रो प्रदर्शित किया है इसलिए यह भेदन' नामक श्रृङ्ग है । ग्रय [प्राचाय] तो प्रो्त्साहनको 'भेद' रहता है । जैसे वेप्सीसहारमे— 'द्रोपदी नाथ याजसेनोवे ग्रपमानसे उज्जीप्तको्रेष होकर कहाँ ग्रपने द्वारोँ श्रोरेसे ग्रसावधान होकर युद्धभूमिमे न घूमने लगना । क्योंकि शत्रु सेनामे सावधान होकर हो जाना चाहिए ऐसा मुन्ते हैं । भोम—हे मुक्षत्रिये' ! तुम डरतो कयो हो] 'भ्र योत्स्याम्पास्फाल' [इत्यादि पिच्छले इलोक्षमे कहे हुए सग्रामके भीतर विचररसा करके पाण्डव लोग बहुत निपुरे हैं । इसलिए तुम चित्ता म करो] । इत्यादि [कथन] से, विप्रकृप्र मनवालो द्रोपदीको क्रोध तथा उत्साहके बीजवेऽ म्रनुरूप ही प्रो्त्साहन [किए जानेसे यह भेद' [नामक श्रृङ्ग] है । ग्रय [प्राचाय] तो बीजको फलोत्पत्तिका श्रवरोध करनेवाले सहत न्रायुग्रोके फोडने याले भद्रप उपायक्रो हो 'भेदन [नामक स ध्रृङ्ग] मानते हैं ॥४४॥

(द) प्राप्तप्रे—

ग्रत्र प्राप्तप्रे [नामक, मुखर्सा धके नवम श्रृङ्गका लक्षण करते हैं]— [श्रत ४५]—सुखको सम्राप्ति प्राप्तप्रे [नामक श्रृङ्ग कहलाती] है । सुख तथा सुखको कार्ताकी भली प्रक्रार ग्राचेष्ट्रएसे होनेवाली प्राप्तिक्रो प्राप्तप्रे' [नामक स्रङयम्न कहा जाता] है । जैसे वेप्सीमहारमे— 'कडचुको—[प्रविश्रय होकर] कुमार पाण्डवोने प्रति पक्षपातके श्ररुण हृद होकर कृुराजने इन भगवान् वासुदेवको पकडना चाहर । तत्र वे मह्हात्मा ग्रपने विश्र्कपके प्रदर्शित

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त्रस्तोऽसि नष्टद्यति ।

श्रयं ह्यर्थो भीमसेनस्य कुरुभिः सह मन्यभेदमापाद्यंश्चान्तः सुरयतीति । तथा भणितिवैचित्र्यार्थमपि कवय पकरिमन्नपि सन्धावावतंयाश्चत् । यथा देश-संहारे इदमेवाक्य पुनर्निबन्धम । तथाहि—

"चेटो—[दौपदीमहत्य मान्तरम्] भर्त्सिता ! परिकुपितो विश्व कुमारो लक्ष्यतेऽद्य । [भर्त्सिता ! परिकुपित इष कुमारो लक्ष्यते । इति संस्कृतम्] । दौपदी—एवं तावद्वरधीरखा वि मेमा समामासेधि । तद इष घ्येेव उर्वाचि- सित्रि सुखामो दाव नाधरम वर्वासदं । [एवं तावद्वरधीरखापि मामेपा ममारखामर्याति । तदत्रैवोपरपतिशय श्रशुमः तावन् नाथस्य धयवमिततम । इति संस्कृतम्] । भीमः—मधनमि कौरवशातं समरे न कोपाद्रु, दुःशासनस्य रधिरं न पिवास्युरसत् । सच्चूणीर्याभि गदया न सुयोधनोऽपि, सन्धिं करोतु भवतां नृपतिः प्रसीदतु ॥ दौपदी—[सहर्षं] श्रुतमुपरं डोळिसं वयसां, ता पुष्पो वि भगा । [श्रुतपूर्वं डौङ्ग वचनम् । तत् पुनरपि भगा । इति संस्कृतम्] ।"

"चेटी—[द्रौपदीको लज्जित करके प्राणान्तपूर्वकं कहती है] हे स्वामिन् ! कुमार [भीमसेन] क्रुपितसे दिखाई देते हैं । दौपदी—यदि यह बात है तो [मेरे प्रति उनकी] यह उपेक्षा भी मुझे सान्त्वना प्रदान करती है । इसलिए हम दोनों यहीं बैठकर नायकके निश्चयको सुनें । भीम—यदि द्राव [सहदेव स्रादि] के राजा साहब [युधिष्ठिर] किसी शत्रुं पर [कौरवों के साथ] सन्धि कर लें तो क्या मैं क्रुद्ध होकर युयुध भभिममें सौ कौरवोंका नाश नहीं कहूंगा । श्रथवा दुःशासनकी धातोंका रक्त पीना छोड़ दूंगा । या गदासे दुर्योधनको जंघाप्रोंको चूर्ण नहीं करूंगा । [प्रर्थात् युधिष्ठिर भले ही कौरवोंके साथ सन्धि कर लें, पर मैंने तो जो कुछ प्रतिज्ञा कर ली है उसका पूरा करके ही रहूंगा । सन्धिके कारण मैं अपनी प्रतिज्ञाको कभी भी न छोडूंगा] । दौपदी—[सहर्ष] इस प्रकार [प्रानन्ददायक] वचन पहिले कभी नहीं सुना था इसलिए [इसको] फिर-फिर कहिए ।"

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इति द्रौपद्या श्राभिप्रेतार्थैरामर्शिरति ॥

(१०) श्रथ युक्ति -- [सूत्र ४५]--युक्तिः कृत्यविचारस्मा । विचारस्मा गुरुशिष्योः परस्परं कार्यपर्यालोचनम् । यथोदातराघवे-- "लच्मण -- कि लोभेन विलोहितो म भरतो येनैवदेव कृतं, मात्रा स्त्रीलजुता गता किमथवा मातेव मे मध्यमा ? सिद्ध्येतन्मम चिन्तितं द्वितयमध्यार्यानुजौडसो गुरु, माता तातकलत्रसहित्यनुचित मञ्चे विधात्रा कृतम् ।" इत्य च युक्ति स्थानान्तरभाविन्यपि तापसवशमराजे उपद्रेप परिकरान्तरे निष्पाद्याऽऽटतेति । राघवाभ्युदये तथैवास्माभिरर्थेऽभिप्रेथिता । तत्र हि -- "मतिमागर -यत्पुरा भट्टारकेऽपि मार्गयुद्धिना विभीपणाय क्थित यथा-- इसे द्रौपदी के श्रभिप्रेत श्रर्थ की प्राप्ति कही है [इसलिए यह 'प्राप्त' नामक सन्ध्यङ्ग का उदाहरण है] । (१०) युक्ति -- प्रथ युक्ति [नामक, मूलसन्ध्यङ्गे दशम श्रङ्ग का लक्षण करते हैं] -- [सूत्र ४५]--कार्यंका विचार करना युक्ति [नामक दशम श्रङ्ग कहलाता] है । कार्यंका विचारस्मा श्रर्थात् पुरव-दोषों के विवेचन द्वारा कार्यंका पर्यालोचन करना । जैसे 'उदात्तराघव' में -- "लच्मण [कहते हैं]-- वथा वह भरत [राज्यके] लोभसे पराभूत हो गए जिससे [रामको वनवास दिलाने का] यह कार्यं किया है । प्रथवा वया मेरी मातृ [कैकेयी] ही सनान लघुता को प्राप्त हो गई थीं । [जिसके कारण उन्होंने यह नीच कार्यं करवाया] । प्रथवा मेरी सोचो हुई ये दोनों ही बातें सिद्ध हैं क्योकि ये मेरे बड़े भाई [गुरु श्रर्थात् भरत] श्रापंगे [प्रथांत् सीतचंद्र इव] श्रनुज हैं । [प्रयोंतु रामचंद्रजी के प्रति] श्रनुरक्त होने के कारण कभी ऐसा श्रनुचित कार्यं नहीं कर सकते हैं] । मेरी माता [कैकेयी] पिताजी की पत्नो हैं [इस लिए ये कभी इस गर्हित परपंको नहीं घर सकतीं हैं । द्वास लिए इन दोनों के विषय में सोचता श्रनुचित है । तय फिर यह कार्यं हुग्रा कैसे, इसका समाधान करते हैं कि] मालूम होता है कि यह श्रनुचित कार्यं देवने हो किया है ।' इस प्रकार कार्यंका विचारसाहप होन से यह 'युक्तित' नामक श्रङ्ग का उदाहरण है । यह युक्ति [नामक दशम मूलसन्ध्यङ्गे] श्रन्य स्थान पर होनेवाली [प्रथांत् दशम स्थान पर पठित] होन पर भी 'तापसवत्सराजचरित' में उपक्शेप' तथा 'परिकर' के वीच में [द्वितीय स्थान पर] निवेश किया हुग्रा देखा जाता है । इसलिए 'राघवाभ्युदय' में हमने भी उसी प्रकार [उपक्शेप तथा परिकरके वीच में] पतित कर विया है । वहाँपर -- "मतिसागर--स्वामी से सागरबुद्धिने जो पहले सभी विभीपणों से कहा था कि --

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सीतानिमित्तको दशरथितो रावणवधः

'सीतानिमित्तको दशरथितो रावणवधः' इति। तस्यार्थेऽस्य तदेतच्चापारोप्यं वीजमुपस्थि(स्ति)तम् । कथितं च मे करटकनाम्ना लङ्का(च्छा)रिएण घरेप्था—'भूमिगडल(लो)विमृश्य तन्नूनमसौ पश्चार्द्धार सीतामपहरिष्यति ।' इति ।

(११) अथ विधानम्— [सूत्र ६०]—विधाने सुख-दुःखसन्धिः दृश्योः सुख-दुःखयोरेकत्र ग्रनैकत्र वा पात्रे प्राप्तिः । एकरयैव च सुरस्य दुुःखप्रस्य वा प्राप्तिः, विधानम् । एकत्रपात्रे सुरद-दुःखयोः प्राप्तिर्येथा—मालतीमाधव—

यद्विरमस्यितमित्रमसुमतिमतां यमभावम्, श्रानन्दमन्दमसृणुबलचनादिविाभूत् । तत्सन्धिषु तदशुना हृदयं मदोयं, श्रान्नारतुरमिवर्त्तामिव व्यथामनुभासते ॥

इत्यनेन सानुरागमालत्यवलोकनान्माधवस्य सुर-दुःखप्राप्तिः । ग्रनैकत्र यथा तापमवसराजे काञ्चनमालया द्वातिगृद्वातं|विशेषापदेशात वामवदस्तोया वियोगदुःखदपे ते राज्ञा रिङ्गमचाड—

'सीताके कारण राजा दशरथ पुत्रके द्वारा रावणका वध होगा' । उस वाक्यका वीजरूप यह चापारोपण [का प्रसङ्ग] था गया है । प्रौर लङ्काभी विचरसा करनेबाले करटक नामक गुप्तचर ने मुझसे कहा भो है कि--'भूमण्डलके [ग्रन्थ सब राजाग्रोके] समान रावण भी सीताको चाहता हो है किन्तु श्रपनो भुजाम्रो के वपंकें कराए चापारोपणसे नहीं ग्राया है' । [कुछ सोच-कर] तो निश्चय हो यह वादको सीताका ग्रपहरण करेगो । यह [भी कायकिं विचारणा रूप होनेसे युक्ति नामक ग्राङ्ककका उदाहररसा है] ।

(१९) विधान प्रव विधान [नामक, मुखसन्धिके ग्यारहहवें ग्राङ्ककका लक्षण करते हैं]— [सूत्र ६०]—सुख-दुःखयोः प्राप्तिः 'विधान' [कथलाति] है । सुख तथा दुुःख योनोको एक पात्रमे ग्रथवा ग्रनेक पात्रोंमे प्राप्ति । ग्रथवा एक हो पात्रमे सुख ग्रोर दुुःखमेसे किसी एकको हो प्राप्ति [दोनों हो] विधान [नामक ग्राङ्कके भीतर समाविष्ट हो जाते] है । एक हो पात्रमे सुख-दुःख दोनोको प्राप्ति [का उदाहरण] जैसे 'मालतीमाधव' मे

माधव---जो [मेरा हृदय मालतीकी उपस्थितिमे] विस्मयसे कुठित, ग्रन्य समस्त भावोसे शून्य, प्रमृतमे डुबको लगानेसे ग्रानन्द निमग्न सा हो रहा था वही मेरा हृदय इस समय [मालतीके वियोगकालमे] ग्राङ्कारोसे जला हुग्रा सा वेदनासय हो रहा हैं । इसे ग्रनुरक्ता मालतीको देखकर माधवको सुख ग्रोर [उसके वियोगमे] दुुःखको प्राप्ति [एक हो पात्रमे पाई जाती है]। भिन्न-भिन्न पात्रोने [सुख ग्रोर दुुःखको प्राप्तिका उदाहरण] जैसे 'तापसवत्सराज' मे

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"हस्तिन् प्रेमभरालसां मथित सुहृचिन्त्यस्य लज्जावती, कालरात्रमिहासहेस्यविरत' प्रयत्नपैयन्ती मनः । जाता देवि तदा । ममापनतयने हेतुतत्त्वमेवाधुना किं सन्देशववीभवत्कुनगृहोत्सवेठ।धिकं ताम्यसि ॥"

ग्रन्थ च वासवदत्ताया प्रवासाभ्युपगमाद् हि तम् । वत्सराजस्य चरितविदित-प्रवासवृत्तान्तस्य सुरतम् । एकस्य सुवचस्य प्राप्तिर्यथा रत्नावल्याम्— "क न्वायमालो पइट्टावेइ ग्रासोयमूले भयवंतं पचजुअन्त । [इत्युपक्रमे] [काञ्चनमाले प्रतिष्ठापयाशोकमूले भगवान्त प्रहसन्नम् । इति संस्कृतम् ] राजा—कुसुमसुकुमारमूर्तिर्दृढतसी नियमेन तनुंतरं मध्यम् । श्राभास्सि मकरकेतों पार्ववेस्या चापपष्टिकं च ॥ इत्यार्षम्, 'वासवदत्ता राजानं पूजयति' इति यावत् । एकस्य हु तस्सय यथासमुद्दपण्णे निमें भोम-न्नामित्त ण्वायोएं—

"भीम -- ग्रन्या यौँ वञ्जुप् । शठग्रतञ्जुपो येडम्माकमत्थ हिप्, ते नन्दिनि मर्दे वहुंन्ति महतीं रचेइन्ति च श्लाघयताम् ।

"मेरो प्रोद् वार-वार प्रेमभङ्गे हृदि डालती हुई, लज्जायुक्त, श्रोर 'मे श्रधिक वितस्सक्को सहन नहीं कर सकतो हूं । इस प्रकार [प्रवास] मन समर्पित करती हुई, हे देवि ! उस समय तुम हो मेरे हटानेका कारस बनो तो फिर सदेसासे पितृगृहकी उत्कण्ठाके नवीन हो जानेसे इस समय कयो दुक्खो हो रही हो ?" यहां वासवदत्ताके प्रवास स्वीकास करनेके कारस हु खल है । मोर प्रवासतका वृत्तांत न विदित होनेके कारस वत्सराजको मूल है । [इस प्रकार भिन्न-भिन्न पात्रोंमें अलग-अलग मुल्क- हु लको प्रासिल्व विधांनका यह उदाहरणहै]। एक मुल्को प्रासिस [का उदाहरण] जैसे रत्नावलोमें— "काञ्चनमाले । त्रिभुवनं नाव भगवान् कामदेवं [प्रभुमन्] करो स्थापियत करो । [इसके प्रसङ्गमें]—

राजा—कुसुमोकें समान सुकुमार देहवाली श्रोद् वत पालनके कारस प्रोद् भो श्रधिक खीसो मध्यसे मुक्त तुम्ह मककेत्तु [कामदेव] के पास रखो हुंई चापपष्टिके समान प्रतीत होती हो [दोभित होती हो] ।

यहांसे लेकर 'वासवदत्ता राजाकी पूजा करती है' यहां तक केवल हु लक्रो प्रासिस का वृत्तान्त होनेसे यह विधान नानक ग्रन्थका उदाहरणहै ]। कैवल हु लक्रो प्रासिद [ का उदाहरण ] जैसे हमारे बनाये 'निमें भोमसेन' नामक ध्यायोगनमे [भोम कहते हैं]—

भोम—केयल ग्रन्थयपर श्राहुड, दुष्टताका वत् धारस किए हुये, यहां हमारे जो वत् हैं, हे मातुन् ! यहां धारसस किया मिरहे हैं मोर भत् लज्जा प्रणाम कर रहे हैं । मोर [हम] जो न्यायका प्रवतस्सन कर रहे हैं प्रोद् भत्यन्त सारसताको धारस

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ये तु न्यायपथाः परार्जितवधरास्मे पश्यतांसी वयं नीचेः कर्मकृतः पराभववृतास्तमार्च चर्त्तामहे ॥

मुखसंभके 'प्रापण' नामक ग्रह्णकी चर्चा ऊपर को जा चुकी है। उसमें भी 'प्रापण मुखसम्प्राप्तिन:' मुख-सम्प्राप्तिवाले होने उसका लक्षण वतलाया गया था। यहाँ 'विधान' ग्रह्णमें मुखप्राप्तिकों विधान प्रह्णका लक्षण वतलाया है। तब इन दोनोंमें परस्पर क्या भेद है यह प्रश्न उपस्थित हो सकता है। इस लिए ग्रन्थकारने श्रागली पंक्तिमें इन दोनोंके भेदको इस प्रकार प्रदर्शित किया है कि—

सुप्रसय सुखहेतुश्च श्राव्येप्सितस्वप्ना'ग्राप्तिः । सन्निहितसुखास्वादकं चैकपात्रगतसुखरां च विषयान्मिति भेदः ॥ (१२) व्यध परिभावना— [सूत्र ६१]—विस्मयः परिभावना ॥ ४५ ॥

मुख प्रौर सुखके कारकसका ग्रन्थवैपया जिसमें किया जाय वह 'प्राप्ति' [प्राप्तं प्राप्तव्य नामक ग्रह्ण] है । प्रौर [प्रतिवेश्य रूप नहींं किन्तु] सन्निहित सुख स्वहूप तथा एक पात्र गत सुख होने पर भी वह हमें देखो [रसास्वादन प्रादिक] नीचें पलटकर कर रहे हैं श्रोर तिरस्कार प्राप्त कर रहे हैं।

जिज्ञासातिशयेन किमेनार्द्रति काँतुकानुरागधो विस्मयः, परिभावना ! यथा नागानन्दे— "[मतयवतीं दृष्ट्वा] नायकः— स्वर्गेस्थो यदि तर्हि कृतार्थमभव चचुःसद्मं हरे,; नागी चेत् रसातलं शाश्वतीभता शून्यं सुवेष्टक्या: सिथते । जातिन्ः सकलाऽयजातिजयिनी विद्याधरी चेदिव', ग्यात्न सिद्धान्वयजा यदि त्रिभुवने मिद्धा: प्रमिद्वार्क्षितः ॥"

(१२) परिभावना— प्रब परिभावना [नामक, मुखसंभ्रान्तयके बाह्यह्नं ग्रह्णका लक्षण करते हैं]— [सूत्र ६१]—विस्मय [का नाम] 'परिभावना' है।

जैसे नागानन्दमें— "[मतयवतीको देखकर] नायक [जो मूर्छितवहन कहलता है कि]— यदि यह स्वर्गकी रस्न्री है तो इनके सहलो नेत्र कृतार्थ होी गए [समभो], यदि यह नाग जातिकी स्त्रीं है तो इसके मुखके विद्यमान रहते पाताललोक चन्द्रमा से शून्य नहीं [कहा जा सकता] है। यदि यह विद्याधरी है तो निश्चय हो हमारी [विद्याधर] जाति ग्रन्य जातियोंसे श्रेष्ठ है । श्रोर यदि यह सिद्धवंशमें उत्पन्न हुँई है तो अब मिद्ध लोग त्रिभुवन में प्रसिद्ध हो जावेंगे [यह समझो] ।

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सा स्वर्गानोेकलतनाजनवशङ्किता वा, द्विकया पयोऽधिगुद्दितु प्रतियातना वा । शिल्पप्रियांमथ विधे पदमन्वितं वा, विश्वत्रधीननयनमझुटतनाप्लु वा ॥ ४५ ॥ नताऽतिसुप्रसन्नदेहदर्शानान्ति ॥ ४५ ॥

प्रथमा जैसे रोहिषीमृगाढ नामक प्रकरणएे प्रथम भेडूके--"मृगाढ़ {मोत्करण्ठम}-- वह [रोहिषी] रया स्वर्गानोेकनी त्रिनयोंकी [वराइका] विशिष्ट करनेवाली लेशनी [या 'वरांका' कस्तूरी] है । प्राथवा सापरकी पुत्री लक्मीकी दित्य प्रतिकृति [प्रतियातना तथोक्त] है । प्राथवार {विधातऐे} रचना कौतलकी चरण सीमा है । प्रयथना तीनों लोकोके [समस्त प्राणियोंके] मेधोंकी रचनाका फल है" इसमें रोहिषीके सोन्दर्योऽतिदायकें पारएे उदपत्तन विस्मयकरी मृगाढ़ून प्रकट किया है । इमलिए यह मुलप्रनियके 'परिभावना' नामक बारहवें ग्रज्ञ्बा उदाहरर्या है । इस प्रकार यहाँ तथां ग्रन्थकारन मुलसन्धियने बारह श्रद्धोंकेे लक्श्रण तथां उदाहरण दिवस्ताकर उरुम् विस्तातरपूरवक विवेचन कर दिया है । इमलिए श्राव् इसतां उपसहार करते हुए भमती पनित निस्वत है--

[२] श्रथ प्रतिमुखसन्ध्याऽनुदिशति--[सूत्र ६२]-- विलासो भृङनं रोधः सान्त्वनं वर्षेसंहृति: । नर्म नर्मच्युतिस्ताप: स्युरेतानि यथारुचि ॥४६॥ पुष्पं प्रगमनं वज्रोपन्यासोपसंश्रयम् । पश्यावश्रयमथाऽऽडानि प्रतिमुखे त्रयोदश ॥४७॥

ये बारह मुखससन्धि श्रद्ध होते हैं ॥४५॥ [२] प्रतिमुखससन्धि-भेे तेरह श्रद्ध-- श्रब इसके श्रागे प्रतिमुखसन्धिने [तेरह] श्रद्धोंका उद्देेश [नाममात्रेए कयन] करते हैं--[सूत्र ६२]--(१) विलास, (२) भृङन, (३) रोध, (४) सान्त्वन, (५) वर्षांसहार, (६) नर्म, (७) नर्मच्युतित श्रोर (८) ताप ये [प्राठ श्रद्ध प्रतिमुखससन्धि-भे] यथारुचि रचे जा सकते हैं । [प्रथयान्त उनका रचा जाना प्रपरिहारयं नहीं है । कयादसुतकी उपयोगिताके अनु- सार उनको रचा जा सकता है प्रोद नहीं भी रचा जा सकता है] ॥ ४६ ॥ [सूत्र ६२]--(९) पुष्प, (१०) प्रगमन (११) वज्र, (१२)उपन्यास श्रोर (१३) उप संश्र्रय मे पांच [मद्ध प्रतिमुखससन्धियंमे] प्रावश्यक हैं । इस प्रकार प्रतिमुखससन्धि-भे कुल तेरह श्रद्ध होते हैं ॥४७॥

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यथारुचि इति युक्तवैचित्र्यानुरोधेनात्र भवन्ति, न भवन्ति च । पुष्पादीनि पुनः पन्नगावृतयं प्रतिमुखसंन्ध्यो भवन्त्येव । प्रयोदशाङ्गयेतान्ति त्रितिमुख एव मुखरां निर्वन्धमरहन्ति । उद्देशक्रमश्च निर्वन्धेपु नापेक्ष्यतमीय इति ॥४६-४७॥

(१) श्राठ विलास:-[सूत्र ६३]—विलासो नृ-स्त्रियोररीहा, नृ-स्त्रियोरिति परस्परमोहो रत्याभिलापः । यथाभिज्ञानशाकुन्तले मुखसंध्यावुपलवध्यायां नारायणीयां प्रातिमुखे तादृपयो राज्ञो विलासः । तत्र हि राजा श्राह— 'कार्म प्रिया न सुलभा मनस्तु तद्रावदर्शनार्वासि ! श्राकृतार्थोडपि मनसिजे रतिमुखयमार्थना कुरते ॥ [स्मितं कुरवा] एवमामाभिप्रायसम्भावितेष्टजन्तानाचततय्यांतः प्रार्थेयितया विप्रलभ्यने । कुतः— 'यथारुचि' इसका यह श्रभिप्राय है कि काव्यरुचि की विचित्रता के अनुसार [मि श्राठ श्रादि प्रतिमुखसंन्ध्यो] होते भी हो हैं श्रोर नहीं भी हो सकते हैं । [प्रथार्तात् उनकी स्थिति ग्रप्रतीत नहीं होती है] । न तो पुएप प्रतिपादि पांच [श्रृङ्ग] को प्रतिमुखसंधियो में प्रवृत्ति होते ही है । ये तेरहो श्राठ प्रतिमुखसंधियो में हि संनिविष्ट होते हैं [प्रथ तः सङ्घयो में प्रमुख न हो होते हैं] । इनकी रचना में उद्दशक्रम गृपेक्षित नहीं होता है । [प्रथार्तात् जिस क्रम से यहां गिनाए गए हैं उसी क्रम से इनकी रचना हो यह श्रावश्यक नहीं है] ॥४६-४७॥ इस प्रकार ४६-४७ दो कारिकाओं में प्रतिमुख सन्धि के तेरह श्राठों के नाम गिनाकर तथा उनमे से पांच की श्रनिवार्यं स्थिति एवं श्राठों की ऐच्छिक स्थिति का उल्लेख करके प्रवृत्त उनके लक्शए श्रादि कमशः वारम्भ करोगे । इनमें सबसे प्रयम श्राठ 'विलास' है । इसलिए सदसे पहले उसी का लक्शए वरते हैं । (१) विलास— श्राठ [प्रतिमुखसंधि के श्राठों में से प्रथम श्राठ] 'विलास' [का लक्शरां करते हैं]— [सूत्र ६३]—स्त्री ग्रोर पुरुष की [परस्पर सम्मिलन की] इच्छा 'विलास' [नामक, प्रतिमुखसंधिका प्रथम श्राठ कहलाता] है । पुरुष तथा स्त्री को परस्पर [सम्मिलन की] इच्छा प्रथार्तात् रतिको कामना [विलास नामक श्राठ के रूप में कहो जाती] है । जैसे श्रभिज्ञानशाकुन्तल में मुलसंघियो [प्रथम श्राठ में नायिका] शकुन्तला के प्राप्त हो जाने पर प्रतिमुखसंधियो [द्वितीय श्राठ में] उसके विपय में राजा का [रति विभाव श्राठ विलास । उसमें राजा [दुष्यन्त पुत्रने इस श्रभिलाष को धपक्त करते हुए] कहते हैं— 'प्रिया [नाकुन्तला इस समय] भले हो प्राप्त न हो किन्तु मेरा मन तो उसके भाव को देखकर विश्रबस्त है [कि वह मुभे प्रेम करती है इसलिए जल्दी या देर से वह मुबको धवश्य प्राप्त होगो] । यद्यपि कामदेव के हेतुग्राथ न होने पर भी [प्रथार्त्त सम्भोगाभिलाष के पूसां न होने पर भी] दोनो श्रोर का प्रेम स्वपे रति [एक श्रपूर्व ग्रानन्द] को प्रदान करता है ।

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स्तिमिते वाचि तमः यतस्तोऽपि नयने यत्नात्प्रेरयन्न्त्या स्रिया, यातं यच्च नितम्नयोरग्निरुतया मदनविलासाविलेऽपि । मा गा इत्युपरुद्धया यदृपि तनुसासूयमुक्ता सखी, सर्वे किल तनुमत्परायणमहः कामं श्वता परस्यति ॥

"द्रमय-ती—[राजानमवलोक्य सवगलम्] कहूँमेस सतय भयन् पचवासों ? श्रथवा वरायसम श्रपगारस कुने ईदिसो श्रगसोहगप्प भारो ? ता कदृत्तो दमयन्तीए श्रंगचिनिमे !" इति । [कथमेप नय भगवांन् पश्यग्रासु ? श्रथवा वरामस्यानुरूप्य कुत इदृशोदर-सौभाग्यप्रागभार ? तत्कृतार्था दमन्त्या श्रग्रचिनिमा । इति सरकृतम्] । यथा वास्मदुपदने कौमुदीमित्रासु-दनार्निन् प्रकारगे तृतीयेडपे—"मित्रार्न —प्रिये ! वक्त्रे शीतभिर्व्यचासि च मुखा हस्तिश्च कादम्बरी, विभ्राष्ठ पुनरपि कौतुबर्मापे मूर्तिश्च लदमीरप । इदृजनकौ चित्तवृत्तिकौ कलपना फेरफ प्रमा जने स्वप्ने श्रपनस्ता घोलो देते है । ययाकि [अपने मनकी भावनाके श्रनुसार वे यह समभने लगते हैं । (कि]—[उसके प्रभवाग्ने] दूसरो प्रोर हृष्ट डालेते हुए भो जो मधुरताक साथ देला [वह शापद मेरी ओर हो देखा था] नितधोंकि भारनेको भाराए जो विलासपुष्ट घोरे घोरे गमन किया प्रोर [सखीके द्वार] जाके नहिं इस प्रकार रोके जानपर जो नाराज होकर [उस सली फो] फटकारत था कहा था वह सब मेरे हो काराए था । प्राइचप है कि काम [वा कामो पुष्टप अपने प्रप पश्रके सारे कायोंमे अपना तस्स्व] हो देखता है । इत्यादिसे राजा [नुप्तत] की रतिको इच्छा [प्रवृत्त को गई है । भ्रत यह प्रति मुख्यस्सी घके विलास नामक प्रयम भ्रङ्गका उदाहरणप है । श्रथवा जैसे नवलविलासके तृतीय भ्रङ्गे—दमय-ती—[राजाको देखकर स्वगत अपने मनमे कहती है]—श्रच्च्छा यह तो स्वयम् भगयानु कामदेव [प्रा गए] हैं । श्रयवा [वह कामदेव तो शरीर रहित भ्रङ्ग है] उस विचारे ग्रनङ्कके पास इतने देहसौभाग्यकी सम्पत्ति कहा हो सकती है । [इर्सलिए यह कामदेव मही है] इत्यादि [निःचय हो ये राजा नल हैं] तथ तो दमयतोकार [प्रर्थात् मेरी] प्रज्ञ—सौदप कताप हो गया । इंगम राजा नलके प्रति दमयतोल्नो रतिका प्रदशन होनेऽरे यह भी विलास नामक प्रतिमुख्यस्सी घके प्रयम भ्रङ्गका उदाहररप है । श्रयवा जैसे हमारे बनाये हुए कौमुदी-मित्रार्न-नद नामक प्रकारगे तृतीय भ्रङ्गे—मित्रार्न—प्रिये ! [तुम्हारा] मुख च द्रमा [तुम्हारी] वागो प्रमृत [तुम्हारी] दृष्टि कादम्बरी [मदिरा] [तुम्हारा] प्रप्ररोष्ठ कौतुभर्मपि प्रोर तुम्हारी मूति लदमी रप है । [इस

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वीरादिरसप्रधानेष्वर्थफलेपु रूपेपु पुनरत्साहादिसम्प्रद्रुच्यो न स्रियोररीद्धृत्यापारो विलास. यस्तु चेङ्गीसंचारे भानुमत्या सह दुर्योधनस्य दर्शितो रत्य-मिलापहपो विलासः, स नायकस्य तादृशेऽवसरेऽनुचितः. यदाह— सन्धि-सन्ध्याद्वचर्नं रसवन्धडयपेक्षया । न तु केवलशास्त्रार्थेरिस्थितिसम्पादने च्छया ॥इति॥

(२) स्थूल ध्वननम्— [श्लोक ६४]—भननं साम्नयनादरः । साम्नि न्नतुनये श्रानादरौौ मनागनाहहति । नग्जोल्पार्थस्वान् । यथा पार्थिविजये चित्रसेनैन मंयते दुर्योधने सति— युद्धिष्ठरः—“वतं भौमसेन ! श्र्रायं” से कहाॅलः शूररासां मिन्नानां यत्र वनधुपु । श्रापदूगतपरित्रायाम्, श्रपूर्वींङडनुनयक्रमः ॥ नहों म्रपितु प्रकृत रसके श्रनुरूप स्त्री-पुरुपकी इच्छा यह श्र्रयं करना चाहिए । वीररस-प्रधान नाटकमें 'विलास' ग्र्रद्भुत वोररसके श्रनुरूप स्त्री-पुरुपकी इच्छाका वर्णन कर वीररसको समुप्त्र करना चाहिए । भौर उदीके श्रनुरूप श्रन्य ग्रद्भुताश्रों भी रचना करनी चाहिए । भट्ट्नारायणने इस सिद्धान्तको मही समभा है, इसीलिए वे इस प्रकारकी भूल मर बैठे हैं । इसी बातको यथकार श्रागे श्रनुच्छेदमें निम्न प्रकार लिखते हैं— वीर श्रादि रसप्रधान ग्रर्थवाले स्पप्कोंमें तो उत्साह श्रादिका पोपण करनेवाला स्त्री-पुरुपकी इच्छा हप व्पापार विलास [पदसे गृहीीत] होता है । इसलिए 'चेङ्गीसहार' मे जो सुप्रोधनके साथ भानुमतीका रत्प्रविलाप दिखलाया है वह उस प्रकारके [गु ह्यद्र्वो] तै॰यारी करने योग्य] समयमें नायपकके लिए ग्रनुवित है । जैसाकि [ध्वन्याालोककारमें] कहा है कि— सधि तथा सपिर्योंके ग्रद्भुतोंकी रचना रसप्रयोगके श्रनुसार करनी चाहिए । केवल शास्त्रकी मर्यादाकी रक्षाकी इच्छासे ही नहीं करनी चाहिए । इस वचनमें एैसा भ्रम हो सकता है कि शास्त्र-स्थिति म्रोर रस-स्थितिमें विरोध हो सकता है । वेङ्गेमहकारने शास्त्र-स्थितिको पालुन करनेवाली इच्छासे ही दुर्योधन क्रोर भानुमतीके रत्प्रविलापका नग्नं प्रतिमुखसन्धिके विलास ग्रद्भुतमें किया है । किन्तु यहाँ ग्रन्थकारने यह दिखलाया है कि वेङ्गीसहारकारने शास्त्र-स्थितिको हो नहीं समभा है । उन्होंने जो रत्य-मिलापका वर्णन किया है वह दार्स्त्रीय मर्य्यादाके श्रनुरूप नहीँ प्रतिपूल किया गया है ।

(२) ध्वनन साम्नयनादरः । साम्निन्नतुनये श्रानादरौौ मनागनाहहति । नग्जोल्पार्थस्वान् । यथा पार्थिविजये चित्रसेनैन मंयते दुर्योधने सति— युद्धिष्ठरः—“वतं भौमसेन ! श्र्रायं” से कहाॅलः शूररासां मिन्नानां यत्र वनधुपु । श्रापदूगतपरित्रायाम्, श्रपूर्वींङडनुनयक्रमः ॥

(२) ध्वनन [नामक प्रतिमुखसन्धिके द्विसन्धि प्रयुक्त लक्षण करते हैं]— [श्लोक ६४]—शति-वचनोका धानादर करना ध्वनन [कहलाता] है । साम श्र्रप्रयौत प्रनुनय [वचनों] मे श्रानादर प्रयौत खो-सी श्रानास्या [ध्वनन पह्लाता है ।] नजुके श्रप्रतिपादंक होनेसे [नाटकनाहहति मह श्र्रयं किया है] । जैसे 'पार्थिविजय' मे चित्रसेनके द्वारा दुर्योधनके पकड़ लिए जातेपर — युद्धिष्ठर [कहते हैं]—है वतस भौमसेन ! यह वह समय [ग्रा गया] है जवकि श्रपने दयुप्रोंसे नाराज हुए दुरोेका प्राप्तसिमे पड़े

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भोमसेनोडपि दुर्योधने प्रति युद्धपि्ठिरस्याऽनुनयमगृह्णतादृक् । "कोडयमनेकविधापकारकारिता: कोरयाऽनुदिश्याऽयं स्वार्थभाज: ?" ह्यात् । केचित् धूननमरतिमाहुः । तच्च रोघेनैव संगृहीतामिति ।

(३) श्रथ रोदयः— [सूत्र ६५]—रोघोडन्तः— श्यांतः सेदो यमनमिष्टरोधाद् रोधः । यथा देवोचन्द्रगुप्तम् — राजा [चन्द्रगुप्तमाह]— त्वदृदृ.रस्यानुपनेतुं मा शतांशोऽनापि न च्यमा । धुवदेवो—[सूचधारीमाह]— हुञ्जे इयं' सा दैंदेशी श्यार्यपुत्रस्य करुणा|पराधीनीया । [हुञ्जे ! डयं' सा दैंदेशी श्यार्यपुत्रस्य करुणा|पराधीनीया । इति संस्कृतम्] सूचधारी—देवी पंडति चंद्रमंडलाढ् वि चुल्लीड कि एउ व रिसिह ! [देवी ! पतन्तिस चन्द्रमएहलाम्हि पि उल्का । किंमत्त्र धुमे: । इति संस्कृतम्] राज्ञा—त्वद्युपरोपितप्रेम्णा त्वदर्थे यशसा सह । परित्यक्ता मया देवो जनोऽपि मे ?" ह्याए [बघुमो] की रक्षा करने सोंप [उनको मनानेवा] कोई श्रपूर्व श्रनुनय प्रकार [प्रदर्शित किया जात] है ।" [ युद्धपि्ठिरके द्वारा इस प्रकार दुर्योधनको श्युननेके लिए प्रेरित किए जाने पर ] भीमसेन भी दुर्योंपनके प्रति युद्धपि्ठिरके श्रनुतयको श्रस्वीकार करते हुए कहते हैं— श्रनेक प्रकारसे श्रपकार करनेवाले कोरयोंने प्रति श्रापकी यह दया कैंसी है ?" इसमें भीमसेन युद्धपि्ठिरके शान्ति|वचन या श्राज्ञुनयका तनिक श्रनादरसा करते हैं । मत. यह 'धूनन' नाऽयक श्रद्न का उदाहरण है । कोई [ग्राचायं] 'श्ररति [सिद या दु ख]' को 'धूनन' कहते हैं : [किन्तु यह उचित नहीं है । श्ययोंकि] वह तो रोष [नामक प्रागले श्रद्न] में ही संगृहीत हो जाता है ।

(३) रोघ— श्रव रोघ [नामक प्रतिमुखसधिको तृतीय श्रद्नका लक्षण करते हैं]— [सूत्र ६५]—श्ररति [का नाम] 'रोघ' है । श्ररति श्रय्यात् सेव यम दु ख [प्रकट करना] हष्टके भवरोघके कारसा है । जैसे देवोचन्द्रगुप्तमे राजा [चन्द्रगुप्तसे कहता है]— "वह तुम्हारे दु खको दूारनेमे भी दूर करनेमे समयं नहीं है । प्र|यदेवो—[सूचधारोसे कहती है]— हुञ्जे ! श्रापंपुत्रकी यह कैंसी करुणा|पराधीनता है। सूचधारी—देवि ! चंद्रमंडलसे भी उल्कापात होता है । इसमें हम क्या करें ? राज्ञा—तुममे श्रपने प्रेमको रिझार करनेवाले मैंने तुम्हारे लिए यशके साथ-साथ देवो का भो परित्याग कर दिया । श्रोर यह [प्रजा] जन तो मेरे [प्रजा] जन हो हैं [इनके प्रति- स्पागको तो बात हो क्या है] ।

(३) रोघ— श्रव रोघ [नामक प्रतिमुखसधिको तृतीय श्रद्नका लक्षण करते हैं]— [सूत्र ६५]—श्ररति [का नाम] 'रोघ' है । श्ररति श्रय्यात् सेव यम दु ख [प्रकट करना] हष्टके भवरोघके कारसा है । जैसे देवोचन्द्रगुप्तमे राजा [चन्द्रगुप्तसे कहता है]— "वह तुम्हारे दु खको दूारनेमे भी दूर करनेमे समयं नहीं है । प्र|यदेवो—[सूचधारोसे कहती है]— हुञ्जे ! श्रापंपुत्रकी यह कैंसी करुणा|पराधीनता है। सूचधारी—देवि ! चंद्रमंडलसे भी उल्कापात होता है । इसमें हम क्या करें ? राज्ञा—तुममे श्रपने प्रेमको रिझार करनेवाले मैंने तुम्हारे लिए यशके साथ-साथ देवो का भो परित्याग कर दिया । श्रोर यह [प्रजा] जन तो मेरे [प्रजा] जन हो हैं [इनके प्रति- स्पागको तो बात हो क्या है] ।

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भ्रुवेदेवी— श्राह पि जीविंयं परिण्चयंती पद्ममयर म्येव तुम्हें परिचकऽमं ।

[श्रहरमपिं जीवित परित्यजन्ती प्रथममतरमेव त्वां परित्यद्यागाम । इति संस्कृतम् ]

ग्रत्र स्त्रीवेऽप्निह्नु ते च-च्रगुप्ते प्रियवचने स्त्रीप्रत्ययान् भ्रुवेन्देवा गुरुमन्यु-

मन्तापङ्ङपस्य च्यमनसय मम्प्राप्ति ।

यथा वा सत्यहरिश्चत्ते—

"राजा—देवि ! श्रवणङ्ङररव मद्रचत्तनम । श्रग्रैव तिष्ठ । श्रशिचत्तपादचारो

न शङ्क्यति भवती कङ्ङमितुं दभोङ्कुरविधुरासु वनवसुन्धरासु ।

सुतारा—जं मोदु त मोदु । श्राहं गमिस्स ।

[यद् भवत्ति तद्ध भवतु । श्राहं गमिद्यामि । इति संस्कृतम् ]

राजा—[कुलपति प्राणि] भगवान !

त्यजन् हेम्नेओ लङ्क चतुम्र्रधिकाङ्घ्री च वसु ग,

सुधाम्रोभिः स्नानार्ङ्ङपि मर्रधिकां प्रीतिमभजम ।

सवरम्मामेता तु प्रवसनपरा वीर्य दरिस्सा,

इदानीं मन्येऽहं चवलङनललीठ चपुरट । इति ।

भ्रुवदेवी—में भी श्रापने जीवनका परित्याग करती हुई उससे पहिले हो तुम्हों छोड़ गयी ।

यहां चन्द्रगुप्तके रनों वेपध्ने द्रिप्पे होनेसे भ्रुवदेवीको [उसमें वास्तविक ] स्त्री होनेके

विरवासके कारसा [ग्रपनें ग्रनप स्त्रीके प्रति राजाकी श्रासक्तिको देखकर ] श्रत्यत्त दुःख प्रोञ्र

सताप हृप व्पसनकी प्राप्ति हो रही है [इस लिए रोध नामक श्रङ्गका उदाहरण है] ।

भ्रुव स्वामिनोगे मगध नरेओ रामगुप्त की पत्नो हैं । रामगुप्त बहा कापुरुप है ।

द्वावासे वह श्रपनी प्रियतमाको दानुको देनेके लिए तैमार हो गया था । चन्द्रगुप्त हम ग्रपमान्

वो सहन नहीं कर सका । उसने स्त्र्रीका वेप धारऽकरके दातृकुके पास जाकर ग्रपमानभी

बदला लेनेओ निश्चय किया । इत चन्द्रगुप्त स्त्री वेपमें उपस्थित उसो चन्द्रगुप्तके माथ राजा

रामगुप्तवा वातोला[प] हो रट्टा है । भ्रुव स्वामिनोगे यह रहस्य पता नहीं है ।

इसलिए वह स्त्री वेपधारी चन्द्रगुप्तयो दूसरोओ स्त्री समभकर हु खी हो रहो हो । इध्मिलाए हमे रोधके उदा-

हरए हपम प्रस्तुत किया गया है ।

प्रत्यया जैसे 'सत्यहरिश्चत्ते' मे—

राजा—देवि ! मेरो वात मान जाओो । तुम यहां रहो । [प्राज तक ] कभो पंवदल न

चलनेके कारसा तुम कुच प्रकुरोंसे भरो हुई वनभूमियोमे नहीं चल सकोगी ।

सुतारा—चाहे जो हो में तो [श्रवश्य] चलूंगी ।

राजा—[कुलपतिके प्रति] भगवान !

साखों स्वर्गो-पुत्राम्रो, श्रग्रोर चारों तमुद्र हप काठचोको धारऽइ धरनेवाली यमु घरां

का परित्याग करते हुए मेने सुधा-सलिलसे स्नान करनेकी ग्रपेक्षा भी श्रधिक ग्रानन्दका ग्रनुभव

किया था । किन्तु वच्चेके सहित इस प्रियतमकी [वनमे पंडल] चलतेको उघ्घत देखकर

इस समय मुझे ऐसा लग रहा है मानो मेरा यह सारा दारोर श्रङ्गाग्मे ग्रालिङ्गित हो रहा है ।

इम द्नोकम राजा हरिश्चन्द्र जब श्रपना राज पाट सब कुछु दवर नां रहेहैं उम

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सान्त्वनं साम कुदृश्यानुकूलम् । यथा रामाभ्युदये द्वितीयेऽङ्केऽस्मिन्‌ मारोचः—नायमनुग्राह्यवचसामवसर्‌ । परिषदं विज्ञाप्यते—दारार्पां व्रतिनां च रक्षापविधी वीरोरुयोध्यानुरजं, वीरार्पां रक्षार्थं दूतोपायैरशेषैरसंभ्रम् । वधो यदो वीर्यवान्‌ तस्यास्त्रविदिततेजस॑ कुञ्जाने न्यक्कार श्रापि कृत॑, कुष्ट सज्जरदुर्मंदस्य भवतः स्याच्चन्द्रहासोऽयसि॑ ॥ रावणः—श्रृणु। प्रतिपक्ष-पक्षपातिनं युज्ं रात्रिसापमदं निब बहुना—तवैच सधिरार्भुभि जतखठोरकरयसुते, रिपुसुतुविभवो मम प्रशममेतु क्रोधानलः । सुरेन्द्रपशिरः— स्थलीदलनदृप्टमुक्ताफल , स्वसु परिभवचोचित पुत्रसौं विधास्यत्यसि ।। (इति खङ्गमाकर्षति ।)

समय रानी सीतारा मोर पुत्रको भी साथ चलनेके लिए उद्यत देखकर जिस सु मोर सडुड़ में पड़ गए थे उसक चित्रण किया गया है । इस लिए यह प्रतिबिम्बसन्धिके 'रोध' नामक तृतीय श्रृङ्गको उदाहरण है । 'रोध' का लक्षण 'व्राति' है । श्रर्थात् वेद या व्रत, दुश्च, सङ्कट को रोध कहा गया है । (४) सान्त्वन— प्रब 'सान्त्वन' [नामक प्रतिमुख-सन्धिके चतुर्थं श्रङ्गका लक्षण करते हैं]— [सूत्र ६६]—सान्ति वचन [का नाम] 'सान्त्वन' है । कुदृशको मनाना [साम कहलाता है] जैसे रामाभ्युदयमे द्वितीय श्रङ्कमे— 'मारोच—यह खुशामद करनेका प्रवसर नहीं है । [में तो] स्पष्ट रूपसे बतलाए देता हूँ कि— जिस जोर [रामचन्द्र] ने स्त्रो [सीता] मोर तपस्वियोंकी रक्षाकी मोह छोड़े धर्म [लक्ष्मण] को सौंपकर शर, दूषणा शोर त्रिशिरा श्रादि शोरोंका मकैले हो वध कर डाला था । उसकी पत्नोके श्रप्रमान या मारनेके लिए निकला हुमा तुम्हारा चन्द्रहास नामक खड्ग भी कुष्ठित हो जायगा । रावण—मेरे शत्रुके पक्षपाती नोच दुष्ट राक्षस प्रधान वया कहो— [राक्षसो मारनेकी बात तो जाने दे पहले] तेरे ही बटोर कठोर कण्ठमे निकले हुए रधिर जलसे [तेरे द्वारा की गई] शपथी स्तुतिसे उत्पन्न मेरा क्रोधानल शात हो ले । देवताग्रोके हाथो [परिघात] के गडस्थलके विदारतेके कारख [जिसमे पुत्रताफल लग गए हैं] इस प्रकारकी [मेरी] यह तलवार, बहिन [शूर्पणखा] के प्रतपमानके अनुरूप [रामचन्द्रके वध रूप कार्य हो] वधिको करेगी [श्रथांत् पहले तुम्ह मारोचको, जो श्रम की स्तुति कर रहा है समझत कर लूं तब फिर रावणके मारनेका कार्य बादमे करूंगा] । ऐसा कहकर [रावण मारोचके मारनेके लिए ग्रपनो] तलवारको घोंचता है ।

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पादयोर्निपत्प प्रमीन्तु प्रसीदतु महाराज ! नेदं मनुरूपं स्वामिन् । लोकप्रत्ययोत्कृष्टप्रकुपापमेमरस्य ते । ईदृशाखव्द्रासस्य भूतयेवचनुचिनं नमः ॥

देव ! प्रमोद होइए, प्रसन्न होइए महाराज, प्रसन्न होइए । यह कार्य आपके अनुरूप नहीं है । लोंकों में प्रतीति कराने के लिये अत्यन्त कोप प्रकट करने वाले आप के चन्द्रहास तलवार वा भूतोंपर प्रहार उचित नहीं है । देव ! प्रसन्न हों । आपके द्वारा यह [मारिचने] किया है विरोधी होकर नहीं । इस प्रकार मारिचके प्रति क्रुद्ध हुए रावणके प्रति प्रहस्तका 'प्रगल्भ प्रह्न' वच्‍र' का प्रयोग किया गया है । [प्रत्यक्ष निन्द्‌वरचनका प्रयोग वज्र कहलाता है] । सो इस प्रसंगमे क्रुद्धके द्वारा भयानक तुम्हारी च'द्रहास [नामक] तलवार भी कुण्ठित हो जायगी इस [मारिच के कथन] के प्रत्यय हो निप्‌टुर होने से [यह 'वज्र' का भी उदाहरण है ।

[सूत्र ६७]—पात्रौघो वर्षसह्हति ॥४८॥

प्रथक्‌ स्थितानां पात्राणामपि कार्यार्थं मिलनम् । वयस्सन्ते यत्‌ तत्र वर्षा, तेषां नायक प्रतिनायक नायिका महाशयादिपात्राणां सहितिदर्शनं करणम् । यथा रत्नावल्याम्— राणा—राणा सुमज्जते ! करामो, क्वामी [हरयत स्मारभम्]— हम प्रकार यहाँ तक रावणके कोपको बढ़ाते गये हैं । इसने क्रोधमें आकर भापमें प्रकट मारीचके प्रति रावणके इस कोपको शान्त करनेका यत्न करते हुए कहा है— प्रहस्त—[पंशोने मिरक्तर] प्रसन्न हों महाराज, प्रसन्न होइए ! यह कार्य आपके अनुरूप नहीं है । देव ! लोंकों में प्रतीति कराने के लिये अत्यन्त कोप प्रकट करनेवालों में श्रेष्ठ आपके चन्द्रहास [तलवार] वा भूत्योंपर प्रहार उचित नहीं है । देव ! प्रसन्न हों । प्रमोद के द्वारा यह [मार्पावाका] प्रतिक्रमण [मारिचने] किया है विरोधी होकर नहीं । इस प्रकार मारिचके प्रति क्रुद्ध हुए रावणके प्रति प्रहस्तका 'प्रगल्भ प्रह्न' वच्‍र' का प्रयोग किया गया है । [प्रत्यक्ष निन्द्‌वरचनका प्रयोग वज्र कहलाता है] । सो इस प्रसंगमे क्रुद्धके द्वारा भयानक तुम्हारी च'द्रहास [नामक] तलवार भी कुण्ठित हो जायगी इस [मारिच के कथन] के प्रत्यय हो निप्‌टुर होने से [यह 'वज्र' का भी उदाहरण है ।

(y) वर्षांसर्हति—प्रव वर्षांसर्हति' [नामक प्रतिमुखसंधि रस पटचम प्रह्णका सख्खाहे करते हैं]— [सूत्र ६७]—[प्रनेक] पात्रोंका समुदाय [इकट्ठा हो जाना] वर्षांसर्हति [नाम प्रह्ण बहुसाता] है ।

प्रलग्न—प्रलग्न स्थित पात्रों का ग्रोप प्रयत्न् किसाँ कार्यकेलिये एव साय समिलित [वयेसह्हति कहलाता है] । जिनकता यत्नान किया जाय वे [पात्र] वय्र हैं । उन 'वययों' के साथ नायक प्रतिनायक नायिका सहाय प्रादि पात्रोंका सहित प्रयत्न् दृष्‌टृा होना [वयंसह्हति कहलाता] है । ये जैसे रत्नावली— राणा—सुसगते वह चहा है, चहाँ है । [पहले लेखक]—

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श्रोरेषा पारिजातस्य पारिजातस्य पल्लवः । कुतोऽन्यथा स्वदयेऽपि ग्वेदवृक्षस्यामृतद्रवम् ॥ इति यावत् । शत्रु राज-सामरिक-विदूपक-मुसज्जततानामेकत्र योजनम् । अन्ये तु वर्णानां ब्रह्मादीनां यथासम्भवं द्वयोक्ययोरपि चतुर्णां वा एकत्र मिलनं वर्णसंहारमाचचते । यथा वीरचरिते ऋतवीयेऽङ्के—परिपीडितमपिर्णामेप वृदो यघाजितु सह नृपतिभिरन्यैलोमपादश्र वृद्ध । श्रमरविरततयो यो ब्रह्मवादी पुराणः प्रभुरपि जनकानामद्रहो याचकसते ॥ इति । एके तु वर्णिताथैतिरसकारं वर्णसंहारममनन्ति । उदाहरणान्त च यथा वेणीसंहारेऽङ्के रचुकिना रथकेतनपतने नियेदिते भानुमती—“अन्तरीयतु द्वाव एतौ समस्तयभंयायां वेयङ्कुणि-मङ्गलवृन्दोसेन । इति” [अन्तरीयतां तावदेतत् ममस्त्रब्रह्यायानां वेदृड्वनिमंगलोद्योगोपेक्षण । इति संरकुतम्]

यह [साक्षात्] लक्ष्मी है ग्रोर इसका हाथ पारिजातका पल्लव है । अतएव [इसे] स्वेदवृक्षके वहानेते प्रभृतद्रव कैसे टपक रहा है । इस [सारे प्रसङ्ग] मे राजा, सामरिका, विदूपक तथा मुसगता [प्राति प्रवेश पात्रों] का एक साथ सम्मिलन हो गया है [मत यह वर्णसंहृति नामक भगका उदाहरण है] । अन्य [व्याख्याकार] तो ब्रह्मादि आठ प्राणत बाह्यादिका यथासम्भव दो—तीन या चार [वर्णों] के एक साथ इकट्ठे होनेको ‘वर्णसंहृति’ कहते हैं । जैसे महावीरचरितके तृतीय श्रङ्के—सीता-स्वयम्वरमे रामचन्द्रजीके द्वारा धनुप तोड़ दिए जानेके बाद परशुरामजीके म्रा जानेपर उनके साथ सघंर्षका प्रसङ्ग चल रहा है । परशुरामजी रामचन्द्रपर शरयन्त ग्रम्रप्रसन्न हैं ग्रोर उनको मार देनेका भाव दिखला रहे हैं । उस समय धन्य सब लोग इकट्ठे होकर परशुरामजीको मनानेके यत्न कर रहे है । इसी प्रसङ्गमे यह श्लोक यहाँ उद्धृत किया गया है । उसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, भूदेव, श्रब्रक वर्णोंकि प्रयोजनवश एकत्र हो जानेसे यह वर्णसंहारका उदाहरण है । श्लोकका मय निम्न प्रवाद है——यह ऋषियोका समुदाय, यह [भरतके माताके वेकद देशके राजा] वृद्ध शुषाजित, ग्रोर अन्य रजोग्रेते साथ ये वृद्र लोमपाद तपा निरन्तर यत्न करने थाने एवं पुराने ब्रह्मवादी जनकोंने राजा [सौधन्वज] ये सब श्रापके श्रमिरोघी होकर श्रापसे याचना कर रहे हैं [मतः ग्रापकी वार प्राप्त रामचन्द्रको धमा करें] । अन्य लोग याज्ञिक प्रयोके 'तिरस्कारस्थ' 'वर्णसंहार' मानते हैं । ग्रोर उसके उदाहरण स्वपे वेणीसंहार [के तृतीय श्रङ्क] मे कटचुकीके द्वारा [दुर्योधनके] मुखसे घजा मे पतन [वप महानुन] की सूचना मिलतेपर भानुमती मुखे निम्न यचनोको उदाहरण स्वपे प्रस्तुत करते हैं—भानुमती—इस [महानुन] मे समस्त बाह्यायां [द्वारा किए जाने वाले] यज्ञ-स्वानी के. घोर द्वारा दमन कर दो ॥४७॥

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कीडायै हसनं नमे

इस प्रकार यहाँ तक प्रतिमुख-संधिखे पाँच भ्रङ्गोंका वर्णन हो गया । अब आगे प्रतिमुख-संधिखे छठे भ्रङ्ग 'नमे' का वर्णन प्रारम्भ करते हैं ।

विदूषकः--[क्यों इतना ससम्भ्रमं राजानं हस्ते गृहीत्वा] भो वयस्य ! पलायम् । एतरहिमं लकुचपादपे किं पि महाभूतं परिवसति । यदि मे न पत्न्यसि तु । श्रृङ्गारो भावय मार्य दर्शनीयोऽसि ।

जैसे रत्नावली में— विदूपक—[कात लगाकर सुनते हुए घबर भयके मारे राजाका हाथ पकड़कर चिदूपक राजासे कहता है कि—] हे मित्र, चलो महाभूति भाग चलें क्योंकि इस लकुचके पेड़पर कोई भयंकर महाभूत रहता है । यदि तुम मेरे ऊपर विश्वास नहीं करते हो तो अपने-आप आगे बढ़कर सुन लो [देखो इसपर सूत बोल रहा है कि नहीं] ।

राजा--[वारएय] वयस्य सारिकेयम् । इति ।

राजा—[मुसकरा] प्रिये मित्र ! यह तो मन्ना [झोल रहा] [भूत कहा] है । यहाँ विदूपकका वचन मनोरञ्जन मात्रके लिए है । इसलिए यह 'नमे' का हास्य मजाक का उदाहरण है ।

तथा— 'भो मा पादिहिच्चराहरमुद्रहह । एत देह्रह वक्खपासुट्टइसं जा । वसा आलिहिद्दा, मा करइअग्गा देसग्पीआ या । इद देवाय ठयासुयार्ज्यामि या एसाद्डलिखिता मा कन्यका दर्शनीया च । इति संस्कृतम् ।'

रत्नावली में इसो प्रकारका एवं प्रौर उदाहरण देते हैं— चिदूपक—भद्रे मित्र, पादविच्चराहर मुद्रयतः । एतद देवरह वकपाश्चरुतमसं न । वयस्य यच्चेव स्वरहितं श्रोन्तव्यम् । श्रस्तव्यवकाशे न कुतूहलस्य ।'

राजा—वयस्य यच्चेव स्वरहितं श्रोन्तव्यम् । श्रस्तव्यवकाशे न कुतूहलस्य ।

राजा—यदि ऐसी बात है तो तनिक सावधान होकर सुनना चाहिए [कि यह क्या कहती है] । क्योंकि इस कन्याके लिए] हमे चतुस्कता होना स्वाभाविक है ।

मुसदत्ता--सहि जस्स कए सुवं श्रागदा सो श्रयं पुरदो चिह्हदि । मति यस्य कृते त्वमागता सोऽयं पुरतस्तिष्ठति । इति संस्कृतम् ।

मुसदत्ता--मबि ! जिसके लिए तुम प्राई हो वह सामने हो उपस्थित है ।

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सागरिका-- [ सामूयम् ] सुसंगते ! कस्स कपे ग्राहं श्रायग्गा ? [ सुसंगते ! कस्य कृते श्रायमागता ? इति संस्कृतम् ] । सुसगत्ता-- श्रायि श्रायपसकिदे ! यां चित्तफलहयस्स, ता णिअहि पेहं ।" इति । [ श्रयि श्रात्मश्रद्धिते ! नतु चित्तफलकस्य । तद् गृह्हाणेमम् । इति संस्कृतम् ] । तथा विदूपक-- सुमझतयां राज सागरिका कीहाथें हासोक्किय । । श्रनेकशोेऽत्थ- कमवाइं निविद्ध श्रहति इति निदेशो हेतुम् । यथा वा नलविलासे-- " विदूपकः-- [ तम्यस्तनो विलोक्य समयकम्पम् ] भो राजन् ! श्राहं पदा डव्वाखा उद्दिस्सम् । [ मो राजन् ! ग्राह्मेतस्मान् स्थानादुत्थायामि । इति संस्कृतम् ] । राजा-- क्रिमिति । विदूपकः-- जइ एसो थूलमहिप्पी कड्ढिदृट नञ्चार्घेती ममोवरि पड़ेइ, ता धुवं मं मारेइ ॥ [ यद्येपां स्थूलमहिप्पी कड्ढितट नर्तयथती ममोपरि पतेइ, तथा धुवं मां मारयेल् । इति संस्कृतम् ]"

तथा-- " राजा-- लम्वस्ताचिन् इदमामनमास्यताम् । विदूपकः-- मोदी लवस्थ्यपीए हुड्ढल सु पेए श्रासस्स । ता तुमए सावड्ढायां उवविसिदृट्ठ । [ भवति ! लम्वस्तनस्यै हुयंतं श्रलयेतदामनम । तत् त्वया सावधान- योपवेष्टव्यम् । इति संस्कृतम् ]" सागरिका-- [ श्रोश्रे पुंवंकं ] मुसदृत्ते ! मे किसके लिए प्राई हैं । मुसदत्ता-- घर म्रपने ग्राप वाद्दा कर सेने वाली, चित्तफलके लिए [ प्राई हो न ] इतः [ विम् ] को पकड़ो [ यह तुम्हारे सामने होए रखा है ] ।" ये सब विदूपक तथा मुसदत्ताकी [ क्रत्नाः ] राजा तथा सागरिकाके मनोरञ्जनके लिए हार्योक्तियां हैं [ भताः 'तथा' नामक' ग्रन्थके उदाहरण हैं ] एक होए ग्रन्थ मनेक चार भी प्रयोक्ता विया जा सकता है । इसके लिए तोन उदाहरणां दिए हैं । जैसे भनविलासमें-- विदूपक-- [ लम्वस्तनोको देखकर भयसे कांपते हुए ] हे राजन् ! मे तो इस स्थानसे उठता हूं । राजा-- अवयों किसलिए [ उठते हो ] ? विदूपक-- मोदि यह मोटी भेंस कमर नवालो हृढ़ मेरे ऊपर गिर पड़ी तो मुझको मार होए डालेगी ।"

तथा-- " राजा-- हे लम्वस्तनिन् ! इस प्रासन [ तों ] पर बेठो । विदूपक-- भगवति ! लम्वस्तनोभे लिए यह प्रासन कुप्यन है हततलिए तुम इसपर साव- धान होइर् बेठना ।" ये सब हार्योक्तियं नमे नामक ग्रन्थों उदाहरणां रूपमें प्रयुक्त मोए हैं ।

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विदूषक-भो ! किं स्रइदुच्छला सि । लम्वस्तनो-मतिमतिदुर्विलासी । इति सस्कृतम् । विदूषक-मो कलहसा कित्तिएहि गोयेइहि मुदेइहि एसां सइ सपत्ता ? [मो कलहम ! किरणदि गोइभि मुं तेरेआ पाइ समप्पाआ । इति सस्कृतम् ] । [कलहसो विहस्सइओमुपरिस्स्थति ।" इति ॥

(o) स्रथ नर्मोक्ति-[सूत्र ६६]-दोआपाअचों तु तयुति: । दोपायुरे दोपाच्छादनाय यत् पुनहंसन हास्यहेतुरुच्यते सा तस्य नर्मोक्तिः श्रोतॄन् नर्मोचुति । यथा रत्नावलियाम्- "विदूषक-भो ! स्रइञ्ज वि एमआ चउहुच्छेइ विसयं भंभओ फ.डआउ पडिउ पपत्ता ! [भो ! स्रगाढयेआ चतुव्वदीए ग्राल्लाए रुच परठिउ णअत्ता । टाल सस्कृतम्]। राणा-चअय चिमलअ चेतसा भया नारधाइतम । तत्थ कि मनयोक्तम ? विदूषक-भो । तं एआह पडहं- दुल्लहजणा गुरुआण्रो लड्जा । गरुअडे परअवसो श्रात्मा । [भो ! इदमेतया पठितम्-- दुल्लंभणाणुगुरागो लज्जा गुरूवो परवशो श्रात्मा । प्रियसहि ! विप्पम प्रेम मरइ श्ररइ णु चरमेत्तम् ॥ इति सस्कृतम्] ।

'विदूषक-भगवति ! [कहिए] प्राप्त दुब्बल कंसे हो रही हैं ? लम्बस्तानी-मागंको थकावट्टमे । विदूषक-ग्ररे कलहस [रास्तेत्थे] कितनी गोअं मार कर ये यहां तक ग्राई हैं । [कलहंस हस्सते हुए मुंञ नीचा कर लेता है ।]" यह् सब हास्य परक वचन हैं । इसलिए यह् भी नर्मोक्ति का उदाहरण है ।

(o) नर्मोक्ति- ग्रथ 'नर्मोक्ति' [नामक प्रतिमुख सन्धि के सप्तम प्राग का लक्षण करते हैं]— [सूत्र ६६]-दोआपके चिनामके लिए [हास्य वचनों का प्रयोग होने पर तयुक्ति प्रप्ति] नर्मोक्ति [नामक ग्रङ्ग माना जाता] है । जैसे रत्नावलो में-- विदूषक-ग्ररे यह [सारिक] तो ग्रथ् भी चतुव्वदीए ग्राल्लाएकं समान ग्रचाअप्रोंवा पाठ करे जा रही है । राजा-हे मित्र मेरा ध्यान दूसरी ग्रोर था, में समभा नहीं कि इसने क्या कहा । विदूषक-ग्ररे इसने यह कहा है कि— दुलंम्भ जनके साथ प्रेम हो गया है । भारी लज्जा हो रही है कि कतिन श्रात्मा भी परवश्रा है । प्रिय सखि ! प्रेम बड़ा कठिन है प्रभ सो केवल मरइ श्ररइ ही एक शरसइ है ।

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राजा—भो महानुभावा ! कोऽन्यो त्वां हृचामभिलं ? शात्र मोहयेदोपं च्छादयितुं यद् विद्रूपकेषोक्तं तद् राज्ञो हाम्यहेतुत्वान्न मे- च्युतः । श्रृण्ये तु नर्मज्ञां धृतिं नर्मेयु तिमाहुः । यथा रत्नावल्याम्— मुसंगता—सखि ! श्रदधिष्वन्ना दापये सि तुयं जा एवं भतृहेस्तावलंबिया वि कोपं न मुंचामि । [मखि ! श्रदधिष्वन्नी इदानीन्त्वमसि या एवं भर्तृहेस्तावलमिवतांपि कोऽप न मुच्यामि । इतति संस्कृतम् ]। सागरिका—[सभूभंगमोवद्रिद्रशय] मुसंगते ! इथाणि किप न विरमसि ।'' इतति । मुसंगते ! इदानोमपि न विरमसि । इतति संस्कृतम् ]। एते च नर्म—नर्मज्ञुती श्रद्धे कामप्रधानेध्वेव रूपपे पु निर्बंधमर्हतः । केशिक- प्राधान्येन तेपां हार्योच्चतत्वादिति । ( = ) श्रथ ताप:—

राजा—हे महानुभावा [तुमको छोड़कर] और कौन इन ऋचाओंको समभ सकता है । यहां [ग्रन्थों] में स्त्रियोंके दोषको छिपानेकेलिये विद्रूपकने जो—कुत्र्य कहा है वह राजाके हास्यक हेतु होता है । [इसलिए नर्मयुक्तिति ग्रंगका उदाहरणरपा है] । अन्य लोग तो नमं [मजाक] से उत्पन्न धृति [ग्रानन्द] को नर्मेयुति कहुलते हैं । जैसे रत्नावलीमें— मुसंगता—सखि ! तुम बड़े दक्षिण्य—रहित हो जो स्वामीके इस प्रकार हाय पकड़ने पर भी क्रोध नहीं छोड़ती हो । सागरिका—[भौहें टेढ़ी फरकं तनिक हॅसकर] मुसंगते ! तू क्रच भी नहीं मानती है । यह नर्मयुक्तित का उदाहररपा है । बयोंकि इसमे मुसंगताके हास्यवचनसे सागरिक जिनो एक प्रकारके विशेष ग्रानन्द या धैर्यंकी प्राप्ति हो रही है । इसलिए जो लोग नर्मंजा यृतिको 'नर्मयुक्ति' कहते हैं उनकी हष्टि से यह नर्मयुक्तित का उदाहरणरपा होता है । ये नर्मं तथा नर्मज्ञुती नामक दोनों ग्रंग काम-प्रधान स्पकोंमें हो तिबद्ध किए जा सकते हैं । वयोंकि उन [काम-प्रधान स्पकों] के केशिको—प्रधान होनेसे उनमे हार्यप उचित हो सकता है । ( = ) ताप— ग्रथ 'ताप' [नामक प्रतिमुखसंधिके ग्रप्रथम ग्रंगका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र ७०]—ग्रपायदर्शनम् ताप: यथा पार्थोंचजयमे— "कञ्चुकि—भो भो लोकपालाः परित्रायध्वम् ।

[सूत्र ७०]—किसी हत्जनके [ग्रपाय ग्रथवा] विनाशका दर्शन [तापजनक होनेसे] 'ताप' [कहलाता] है । जैसे पार्थोंविजयमे— कञ्चुकी—हे हे लोकपालो ! रक्षा करो ।

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उपप चचू भरतराजकुलस्य साध्वी, दुयोंधनस्य महिपी प्रियसख्खरसा । विसृत्त्य पाञ्चालसुतराष्ट्र पितामहादीन्, गन्धर्ववीरपतशुभि परिभूयते स्म ॥

युधि॑ष्ठर --[ शुत्वा दुर्योधनान्त पुरे मदत्नोमपायशमामाविरकुचैनाह ] वत्स । स्वगात्रिवारिभराविपक्वार्तिनि॒भृ॑शो॒द॒न । श्रुत्वाथिद्यो॑न्ति॒ त॒ चापम् । [इति चापारोपसमनिनयन सम्भ्रमादुरुत्तिष्ठति] इति । के॑ व॒त्तु॒ स्थानेडस्य श्रुतुनयालस्यो प्रे॒क्ष्य-निग्र॑ह॒र॒प 'शम॒नं' प॒र॑न्ति । यथा पार्थ॑विज॒ये--

"भीम-श्र्रा क व॒प म॒र॑य मि॒थि॑ते भरतकुल परिव॒र्वा॒त । श्र॒त॒ प॒र॒ न मर्य- या॒मि" इति । श्र॒त॑ 'श्र्रा॒य व॒त्स । स्वगोत्र' इ॒त्यादि पूर्व॑द॒शि॑ते॒न यु॑धि॑ठ॒र॑स॒र॑भे॒षा भीम स्यानुनयप॒ह॑स॒मू । श्रार॒त॒नि॑म॒हो॒ य॒था वि॒प॒स्स॒हा॒रे--

यह भारतव॑र्ष॒ के राजकुलका सा॒ध्वी था, गौर गान्धारी सुपुत्रव॑लि॒का रा॒नी पा॒ण्‌डु धृतराष्ट्र द्रो॒र्‌ पितामह [भीम्] ग्रादि॒को भुलाकर [प्र॒र्य॑न्त उनको श॒क्ति प्रा॒द॒को श्रो॒र ध्या॒न न दे॒कर] दुष्ट ग॒न्ध॑र्व चो॒रो॒ द्वा॒रा ग्रपमा॑नित को जा रहा है ।

युधि॑ष्ठर--[ सुन॒कर प्रोर दुर्योधनके ग्र॒न्त पु॒र॒मे॒ किस॒ी भारो विनाश॑को ताक॒ समभ॑व॒र कह॑ते है कि ] हे व॒त्स [भीम्] ! ग्र॒पने व॑श॒के ग्रपमा॑नका कठोर ग्र॒प्रि॒य श॒ब्द [सुनाई दे रहा] है । तुम ग्र॒व॒ तक स्थिर ब॑ठे हुए हो, को॒न, य॒हाँ को॒न है ? धनु॒प धनु॒ष [जल्दी धनुष सा॒म्रो] इस प्र॒का॒र [क॒ह॑ते हुए भीम] धनुप च॒ढ़ा॑नेका प्र॒भि॑न॒य करते हुए ज॒ल्दी॑से उठते हैं । इस॒मे दुर्योधनके म॒त पु॒र॒म होनेवा॑ले विनाश॑को देख॒कर युधि॑ष्ठरको य॒प्र॑ता॒ना॒ य॒थान दिया गया है । श्र॒त॒ यह ता॒प नाम॒क भ्रा॒द॑र॒ण॒ है । कु॒छ लोग इस ['ताप नाम॒क श्राग] के स्थानपर श्र॒तु॑न॒य॒के प्र॒हे॒ष॒ श्रो॒र श्र॒र॑ति॒के निग्र॑ह रूप दा॒म॑ते हैं [प्र॒ति॑मु॒ख सा॒धिक ग्र॒प्र॑मू॒] पढ़ते हैं । इस॒का प्र॒भि॑प्रा॒य यह है कि वे लोग 'ताप तो प्र॒ति॑मु॒ख सा॒धिक' ध्या॒न न मान॑व॒र शा॒म् को उस॒ना॒ ग्र॒ह्‌न मान॑ते हैं । श्रो॒र इस नाम॑न॒सी ध्या॑ह॒या दो प्रका॑र॒वी चर॑ते हैं । श्रो॒म श्र॒तु॑न॒य॒ प्र॒हे॒ष॒, श्रो॒र दू॒स॒रो श्र॒र॑ति॒ निग्र॑ह, इन दोनो॑को वे 'शा॒मन्' बहते हैं ।

ज॒न्ते पार्थ॑विज॒ये [श्र॒तु॑न॒प्र॒हे॒ष॒का उ॒दाह॒र॒ण]--

"भीम-श्रा॒रे म॒ह को॒न है जो म॒रे रह॑ते भरतकुलका ग्रपमा॑न करना चा॒ह॑ता है । इससे प्र॒धिक में सहन नहि॒ों करूंगा ।

इस [उ॒दाह॒र॒ण] मे 'हे व॒त्स ! ग्र॒पने गो॒त्र॒के परा॒भ॑वका सा॒ ग्र॒प्रि॒य श॒ब्द सुनाई दे रहा है' इ॒त्यादि पूर्व॑द॒शि॑त [वा॒प्य॑म दिखलाए हुए ] युधि॑ष्ठरके क्रो॒ध॒शो देख॒कर भीम ग्र॒तु॑न॒य॒का प्र॒हे॒ष॒ रूप सा॒मन॒के प्र॒थ॒म भे॒द॒र उ॒दाह॒र॒ण है ।

श्र॒र॑ति निग्र॑ह [सा॒मन॒के दू॒स॒रे भे॒द॒र उ॒दाह॒र॒ण] ज॒न्ते पा॒यंविज॒ये--

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"सस्सो--जइ एवं ता कहेइहिं जेअ म्हे पडिट्ठावयतिओ वस्साए देवदासे सकित्तएण दुइवाइपरिगहेहिं पडिहणिस्सामो !"

[यदैव तत्र कथयेत् वचः प्रतिष्ठापयन्त्यः. प्रशस्यया देवतया सकीर्त्तनेन दूवोःपरिग्रहेपु प्रतिह्नियन्त्याम् । इति सङ्कृतम् ]। पुनः स्वावसरेः

"भानुमती--[श्रग्घंपात्र गृहीत्वा सूर्याभिमुखं स्थित्वा] भयवश्श्र म्वरमहो-मरेकसहस्सवत्त ! दिसावहुमपडंक कुं कुमविसेसय ! सयमभूवणयणापडंकव ! उज्ज इह सिधिणयदंसणो ज किंचि श्रच्चादिहिं, तं भयवण्हो पसायामेगे सभावुणाे श्रघ्घयउत्तस्स कुमलपरिआाम भोतु ति !"

[भगवन् ! श्रम्वरमहासरंकसहस्सपत्त ! दिग्वधूमरुगमडलकु कुम विशेषक । सकनभुवणररत्नप्रदीप ! श्रघ्घोहि स्वपनदर्शनेन यत्न किंचिद्र्याहित, तत्थ भगवत्प्रसादेमे मद्धातुरार्यपुत्रस्य कुशलतपरिणाम भवतु !" इति सङ्कृतम् ]। श्रघ्घ तु स्वप्नोद्बोधनूता या श्रघ्घतेनिग्रह । इति ।

(६) अथ पुष्पम्—

[सूत्र ७९]—पुष्प वाच्यं विशेषयति ॥ ७९ ॥ पूर्वं स्वयमन्वेतेन वा केर्नचित् प्रयुक्तं वचनमपेद्य यद् विशेषयुक्तं वचनं प्रयुज्यते तेन अन्येन वा, तत् पूर्वसमाद्रिशेपवत्। तच्च वाक्यं पुष्पमिव पुष्पम् । केश-रचनाया पुष्पमिव पुष्पंवाक्यालंकारारितवान् । यथा 'विलत्थदुय्योंधने'—

"तथो--यदि ऐसी बात है तो कहो, जिससे हम लोग प्रतिष्ठापना, प्रज्ञाता, देवताम्रोके सकोर्त्तन तथा द्वार्विदिके प्रहूषषेके द्वारा [उस तु स्वपन] का प्रतिबिंधान करें । वेओमहारके दितीय मडंकमे भानुमतीके मुखसे तु स्वप्नहो वात सुनकर उसकी सद्धी उस श्रमरतिके दामनको चर्चा करत रही है । ग्रत यह श्रमरति निग्रहणका उदाहरण है । भानुमती द्वारा किए जानेवाले श्रमरति-निग्रहका उल्लेख करते हैं !

फिर अपनी भवसर--

"भानुमती—[श्रग्घंपात्र लेकर ग्रोर सूर्यके सामने खड़े होकर] हे भगवान् ! द्वाकादश रूप महासरोवरके श्रद्वितीय कमल ! दिग्वधूके मुख-मण्डलके कुमुम-विंचु ! ग्रोर समस्त भुवनोंके [प्रकाशित करनेवाले] रत्नदीप ! ग्राज स्वप्न-दर्शानमे जो कुछ महाभव्य [अत्याहित महाभूति ] उपस्थित हुंआ वह श्रापको प्रसाद करनेसे, भाइयो सहित ग्रार्यपुत्रके लिए कुशाल परिणामका जनक हो । इसमे तु स्वप्नसे उत्पन्न श्रमरतिके निग्रह [स्वयं भानुमती कर रही है । ग्रत दामनका उदाहरण है] ।

(६) पुष्प—

प्रव 'पुष्प' [नायक प्रतिमुखसंधिके नवम भ्रगका लक्षण करते हैं]— [सूत्र ७९]—विशेषवाते वाच्य वावय 'पुष्प' [नायक भ्रग होता है]— पहिले स्वय हो, अथवा किसो दूसरेके द्वारा कहे गए वावयोको अपेक्षासे जो विशेषता- pुक्त वचन [वादको] जसोके द्वारा भयवा प्रत्त [वत्तॆ] के द्वारा प्रयुक्त किया जाता है । पूर्वं

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पतनू ते हृदयं सुप्रशामि याति वा साक्षी तवैवात्मजः । ममप्रत्येव तु गोमुखे रक्तभवन् तनु तावदारमर्थिताम् ॥ एतत् पूर्वेमुखे युधे म गहुभितम्रसतो डनन्तरम् । यावन्तो वयमाश्रयप्रभविनम्तावन्त एवाज्ञुना ॥ श्रनुत्तराधे विशेषवद्धाकथाम् ।

यथा वा मत्यहुरिशानद्रे 'वसुमूति:- [मरोपं राजानं प्रति]— न नाम रुधिरं चित्ति-सुत-नृत्तग्रामि यतिथा, तदस्मै यद्युक्ता तद्विध निर्भरं भव्मनि हुत्तम् । विधाय वच्यमाने विमृश विमृशायावि नृपते ! तपोऽध्ययनाद्धनैः' किसपि नियतं दैवर्तमदमम् ॥ कुलपतिः-[मोपद्ररामम्] शृणु सुवगर ! सचीववापरम ! चिरादृत यथार्थममिमित- याननि ! दुस्स्तर तप करकलिनम्वरगापवर्गशर्मपो मर्त्यावपदेगेन दैवतान्येव मुनयः । वाचस्पते श्रपेक्षा विनेयता मुक्त्वा यह वाचस्प वुष्टपचे समान [होनेसे] 'पुष्ट' कहा जाता है । पुष्ट जिस प्रकार वाक्यरचनाओमे प्रतिप्रतीत होता है उसी प्रकार [विनेयवन् उत्तर वाक्य] पूर्व-सादृपमया शोभा-पौषक होता है । जैसे 'विलसदुरुमोप्ति' में— 'भीरम् [दुर्योंधनमे वह रहे है]— यह मे तुम्हारे हृदयक्ता सपनां करणं [तुम्हारी नपथ स्वाकार यह रहा हूँ ] प्रयवा तुम्हारा हो पुनर इसथा साक्षी हो सक्ता है । कि प्रभो गौंपांको पकडते समय जो-कुब हृपा उछले पहिले पुन सो । पहिले [द्रकके श्रारम्भ होते समय] नाटश्र उठाए हुए [हम] वृत्ततो लोमोने उम परतेले [प्रजुमं] को देखा था या और उतसे याद [जब मुहमे गमों म्रणई तो] हम मोह जितने हो [उतने हतप] पुन करमेकी हच्ता करनेवाले पे [जुनमेने प्रदोषके साथ पुन करमेके लिए प्ररुत] उतने हो पर्मन हिरसाई देते पे । इसमे [इसोप्रथा] उत्तराद्र [पुवादिं व विनेयक होनेमे] विनेयवचन' है ।

प्रथमो विवेकः ।

'असुमूति [कोपमें प्राप्त राजाने प्रति कहते है]— मन्त्राणियोंके पास सेना, शीलपयो, पुष्ट, रनप्रादि महो होने चहिए । तस्मिन् प्राप्ते तु [मुत्रनि साथ] जो कुष [मपन राज्य पोत स्वयां प्राप्त] दिवा है वत सब भम्मने वामो पायुमिते समान वपयं है । इत्तसके [मेरी प्राप्ति नहो है कि हम] प्यामोक्तले तोहतर [कि पर शेरइ महाभा ] हे राजन् ! पाप पद मो दिवचार होनेगा [इमं चरितमे मन परितः] पर तो तपस्योने देवमे द्वापा दया [इरमप हो मोहे देवनर है [मे पार्थी परेष्टा मेनेदृशंया पाप पद मोन होने का ] । कुलपतिः-[उपहार करते हुए] पदे वाचाम ! नीच मन्नो ! ऋतुन केर वाद भूने टोळ वान करो है । हुस्तर तपस्यां हपंने द्वात सबं मोत परतपां मुचपो प्राप्य कातेषाने मुनिप्रस [सप्तपुब] देवनार जो होने है ।

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स्त्र वसुभूतिवाक्यादुतरवार्य समर्यंकत्वेन विशेपवर्द्धति ॥ ४५ ॥

(१०) स्त्रय प्रगमनम्--[सूत्र ७२]—प्रगमः प्रतिवाक्-श्रेष्णः प्रश्नप्रतिपनिथनी वाक् प्रतिवाक् । तस्या: श्रेष्णः । स्त्रय प्रतिपत्तो द्वे प्रतिवचने, उत्कर्षंतो वहून्स्यपि । यथा वेष्टीसंधारे—'भावुमती—श्रायपुत्र ! श्राद्धद्रव्यं मे मेभा बाध्यते । ततो श्राद्धुमन्नहुं श्राद्धजउत्तो । [श्रार्यपुत्र ! श्रातिमात्रं मां शंका बाधते । तदनु मन्यतामामार्यपुत्र । इति संस्कतम्] राजा—श्रार्यि देवि ! कि नो द्यावपृथिव्योः प्रक म्पितसुवामचौहिर्षीणां फल, कि द्रोपैणि किंमराराजाविशिखैरेवं यद्‌ बलार्म्यास ! भोः ! श्रातिशयत्न्य मे भुजवननृपायासुपयापाश्रिता, तवं दुर्योंधनकेसरैरंद्रुगुह्हिषी शंकास्पदं किं तव ॥ इंसमे वसुभूतिके वाक्यके वादक [कुलपति]का वाक्य [पूर्वं वाक्यके श्रयं] समर्यंक होनेसे 'विशेपवर्द्धन' है । [इसलिए यह भी मुख्य नामिक 'प्रगम' का उदाहरण है ।] पहले उदाहरणमें पूर्वं वाक्य तथा उत्तर वाक्य दोनोंके वक्ता भिन्न थे । इसमें दोनों के वक्ता अलग अलग है यह भेद है । (१०) प्रगमन— ग्रथ 'प्रगमन' [नामक प्रतिमुख संधि के दशम अंगका लक्षण करते हैं]— [सूत्र ७२]—प्रश्नोत्तर परम्परा [का नाम] 'प्रगम' है । प्रश्नकी विरोधिनी [श्रर्थात् प्रश्नको समापक करने वाली उत्तर रूप] वारणी 'प्रतिवाक्' [कहलाती] है । उसकी श्रेषी [श्रर्थात् परम्परा प्रतिवाक्-श्रेषी] हुई । उसको प्रगमन श्रज्ञे के नामसे कहते हैं । उस परम्परामें कम-से-कम दो प्रतिवचन हों । श्रधिक तो बहुत भी हो सकते हैं । [उसका उदाहरण] जैसे वेष्टीसंधारमे—'भावुमती—श्रार्यपुत्र ! [स्वप्न दर्शनेके कारण] मुझे [प्रानिष्टकी] शंका बहुत सत्ते है । श्रतएव ग्राप मुझे [वस्तुम्र्र्रवसादि द्वार, उस शंकापंक: प्रतीकार्शन, करानेके लिए] श्रानुमति प्रदान करें । राजा—श्रार्यि देवि ! [यदि तनिकसे श्रगुभ स्वप्नके दोष जानतसे तुम इस प्रकार डर जाती हो तो [फिर] चारों दिशाआंमें व्याप्त, भौर पृथिवीको कम्पित कर सकने वाली हमारी प्रक्षौहिणी सेनाओं का क्या फल है ? यदि तुम इस प्रकार मु खो हो रही हो तो [हमारे महारथी श्राचार्य] द्रोण [के रहने] से क्या लाभ हुग्रा ? श्रौर श्रमराराज [इन्द्र] के [राष्ट्रिशालिन्] बालोका क्या उपयोग हुग्रा ? [प्रर्थात् इन लोगोंके रहते हुग्रा भी श्रानिष्ट सम्भव नहीं है इसलिए तुमको घबराने की तनिक भी श्रावश्यकता नहीं है ।] हे भोः ! तुम मेरे सो भाइयों के मुज-सम्मूर्हको छत्राम बेठी हुई दुर्योंधन रूप भृंगाराजकी पत्नो हो, तुम्हारे लिए डरनेका क्या कारण हो सकता है । [इसलिए तुम बिल्कुल मत डरो । हमारा कोई श्रानिष्ट नहीं होगा]

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ननु प्रत्ययकरकेशम् ।

[सूत्र ७३]—ननु प्रत्ययकरकेशम् । यत्रनिःश्रुतचाप प्रत्ययतारकं वार्त्र्य यन्न च पूर्वप्रयुक्तप्रत्यस्याऽऽयव्याश्रु श्रुस्थानय वा प्रधमकं तद् वच्यमिव वच्यमू । यथा चेल्लोमधारे—

भानुमती—हे श्रायंपुत्र [सचमुच ही] आपके समीप रहने पर मेरे लिए कोई बांधा [का स्थान] नहीं है । दसमे दुरोधन तथा मानुमतीके प्रधनोसरके रूपमे प्रतिवाक्-प्रहेलिका दिखाई गई है । इसीलिए यह 'प्रथम' नामक श्रृङ्गारका उदाहररग है । प्रथया जैसे नटविलासमे ततीय प्रखममे—

"दमयन्ती—[सुजमवलमिते राज्ञति क्रमाद्-] जइ एवं मुंच मे पाणि । [यदेवं मुंच मे पाणिम् । इति संस्कृतम् ] । राजा—कथमपरोऽपि करो मुच्यते ? दमयन्ती—[किमेतेऽनपराधः । इति मंसकृतम्] । राजा—पनेन मत्यतिदुर्तिमालिलय श्रहंमियति विरहानले पातितः । दमयन्ती—[रिरमवइ] जइ एवं ता श्रहं वि ते पाणि गहिरुसं । तच पाणि-लिहिदेन पड़ेगा श्रहं वि पत्थसरोरा जादा । इति संस्कृतम् ] ।

दमयन्ती—यदि ऐसे वात है तो मेरा हाय छोड़ दो । राजा—मपराधो हो से छोड़ो जा सकता है ? दमयन्ती—इमने वदी अपराध किया है ? राजा—इमने मेरी तरवीच मनाकर मुझें इस प्रकारके विरहानलमे डाल दिया है । दमयन्ती—तो किर में भी तुम्हाराग हाय पकड़ गी । मुझ्हारे हापने द्वारा मिले नगए पटंक वारइ मेरी मातृकको यह हामन हो गई है । दगमे नल दमयन्तीकेो उतर-प्रत्युत्तरको परचरा होनेसे यह भी 'प्रथम' पद्मका उदा-हुरण है ।

(९) 'वस्य' पद 'वस्य' [नामक प्रतिमुख सा.-पदे प्यारहये प्रगल्भा लससा क्रियदि कहते है]—प्रत्ययस रूपमे वच्यस [प्रतीत होने यानल वचन] 'वस्य' [वहसाना] है । जो वास्य वटोर ट्रोनेए वत्था रखट अपने हो दसा है भोर वूयं वह हुए वास्य प्रयय्या [वचं दिए क्रा] । प्रासंधा [विताना कर देता है] वह वस्येरे गमान [बटोर भोर वास्यं विश्रग्रत] होनेमे 'वस्य' [वहमतता] है । जेमे चेलोमधारमे—

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अरवरथामो-[कर्णपुमुदिश्य] रे रे राधागर्भेभारभूत सूतापसन् ! कथमारप न निपिद्धो हुयसिना भोक्सा चा, दुपदतनयपाणिस्थितेन पित्रा ममाधि ! तव शुजझलदर्पाघ्मायमानस्य चामः, शिरसि चरस्य एव नयस्यते वारयेनम् !!

यथा वा कृत्यारावस्या द्वितीयेऽङ्के— "रावस—विदेहराजपुत्रि ! विक्रमे मया लोका;, त्वया रूपेण निजिता:! । सद्रह्यचारीस्मतो भजमानं भजस्व माम् !!" सीता—हन्तास ! ऋप्पा दाव तए न निजिजदो, का गयप्पा लोएसु !" [हताश श्रात्मा तावत् त्वया न निजितः, का गर्वेणा लोकेषु ! इति संस्कृतम् ] यथा वा रघुविलासे— "रामः—[विराधवेशं रावसं प्रति सादरेऽपम्]— युद्धश्रदर्शनाथ: सकृत्कुमारोदारोशान्तामर्षातिशायैः । देवीमध्यनलम्भविष्पाव इमे त्रातुं पृपत्का यत्ने । मथनन्त: पृथुपु'व पत्रपवननैर्द्युभिर्मलमाल्यश्रियं निर्भिद्य: कथमिद्रकोशघनां पौरुष्यवकेष्टाटवीम् !!"

"प्रसवत्थामा—[करांको लक्ष्य करके] श्ररे राघवोके गभेंके भारभूत नोच सुत ! [यह ठीक है कि] दु खो श्रध्यवचा [तेरे कहनेके श्रनुसार] भोऊं मेरे उन बिना [द्रोणाचायं] ने किसो कारणसे प्राण द्रुपदतनय [द्रौपदी] के [अपना शिरको काटनेके लिए उद्यत] हाथको नहीं रोका, [उसे जाने दे] पर ते भुजबलके दर्पसे फूलेने वले तेरे सिरपर यह मैं अपना दाया पैर रखता हूँ [तेरे भोतर सामपं हो तो] इसको रोक [के दिखला] । यह वज्जके समान प्रत्यक्ष-करकंस वचन 'वज्ज' नामक ग्रन्थका उदाहरसा है । यथा वज्जके 'कृत्यारावस्या' के द्वितीय श्रङ्कमें— रावस—हे जानकि ! मेने श्रपने पराक्रमसे, श्रौर तुमने श्रपने रूपसे लोकोंको जीत लिया है [इसलिए हं- दोनो सहाघ्यायो हैं] इसलिए श्रपने चाहने वाले अपने सद्रह्यचारो [महाघ्यायो शुभ रावस] को [तुम भी] प्रेम करो । सीता—श्ररे नोच ! तूने तो श्रपने [प्रातमा] श्रापको हो नहींं जीत पाया है, लोगों [के जीतने] की तो बात ही कहाँ हैं ? इस प्रत्यक्ष-करकंस वाक्यसे रावसाका वचन [प्रध्वस्त] कट जाता है । [इसलिए यह 'वज्ज' नामक ग्रन्थके दूसरे भेदका उदाहरसा है] । यथा वज्जके रघुविलासमे [कार्य-विध्वंस रूप वज्जके तत्सय भेदका उदाहरण]— [विराधवेश-धारी रावसाके प्रति राम कहते हैं]— युद्रको श्रद्धासे भरे हुए पक्के फर्ं वाले पहाडकी तट्री रूप झारे [पर चिसने]

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वैनतेयः—[रामं प्रति] श्रजितेन्द्रियः मुनु दुारात्मा रक्षसो न जामर्यति कनितमौभायमारागः पररारागामू । तद्वियमार्यों वैदेही न क्वचिदर्पि गोपयितुमुमुर्चिता ॥ इति । श्रनेन वैनतेयवचनं प्रकाशयति ।

यथा वात्रेव—वैनतेय। जैसे हनुमानरायके—मीतें श्राज्ञा लंघनां पुष्टकर्म । मीता—हृदाम ! श्रचि मरीसस न पुग्म् श्रारािर्हम् । [हतारा ! श्रपि मविष्यामि न पुनरारोच्यामि । इति मस्तकम्]। रावण —श्रा ! कि बहुना यावत् करेग्ं हत्पीडितमुस्थियान्मुस्नदाय चन्द्र-किरणमुतिचन्दहासेन त्वत्पुरोः मटटूशिरः-कमलोपद्रार श्यारक्ष्यते । मर्मािगे॑ शिरवाय तोचेत् । से तोत्र पार वाले यदि मेरे ये वारे देयो [सीतार] को रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हो सकें तो श्रपने दोपं मुझ पत्रोंको हवासे [रावणके] केलोंको शोभा करे नष्ट करते हुए श्रपयन्त कठोर एवं सापन रावणके सिरोंके भण्उशे ये झारे फॅसे काटेंगे । प्रयवर जैसें यहां [रमणिर्लतामें] हो [इसके एक श्रोर उदाहरणे]—[प्रजितेन्द्रिय] वैनतेय—[रामके प्रति] दुष्ट रावण यदि कामी है वह दूसरोंके सुन्दर स्त्रियोंको सहन महों करता है । इसलिये इन पार्मा वंदेहीके रं्रों दीपाकर रखना ही उचित है ! सकमए - तो किर हमारा या चन्द्रहास नहीं प्राप्तु । सूयंहास [लङ्का] मो यहु दुष्ट प्रोर [प्रजितेन्द्रिय द्वाप श्रपने] वशमें न रहने वाता है : यह पापी गुरुपां को शपमा महों करता है । इसलिये इन पार्मा वंदेहोंको कहीं दिखानेको श्रावश्यकता नहीं है । इस [सक्रमए-्यचन] से वैनतेपें वचनपर घट हो जाता है ।

( ९० ) श्रथोपःयाम :— [सूत्र ७४]—उपपंचिरुपन्यासः— कश्चिदर्थं चिनातु’ या उपपत्तिर्युंक्ति म उपन्यास । यथा कृत्रिमारादपो—मीते श्राज्ञा लंघनां पुष्टकर्म ।

( ९० ) उपन्यास — प्रथ 'उपन्यास' नामक प्रतिमुग सरिपथे १२वें प्रतिप्रसङ्गाए प्राथि करते है]— [सूत्र ७४]—[जिसी वपंके तिर] युक्तिश्श्रो प्रस्तुत करतां "उपन्यास" [कहमाता है] । जिसी वायंको करतने लिाए जो युक्ति वह 'उप-्यास' है । जैसे हनमारायके— रावण—हे मीते ! पुरुषे [विमानपर घट जास्मो । मीता—हरे मेच, मे मर भने हो जाऊं पर चहूँ मो नहीं ! तद्वय—प्रथमा, पतिनि हतनेनें प्राप्यप्रपनना महों—सो मे षोरगे मुगुने पत्र वर घं इरलोंके समान पुत्रि वामो तनदालशे निरागमकर तेरें तामने इन वद्यो॑ [तपस्यो कुच्यार्तिनों] ने नयों—नयों वपंमों [हे चार चरा] । उपहार लेना श्रापम्भ करता हूँ । भया चाहो तो चढ़ श्राओ !

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सीता--वरं श्रत्तणो समीरसम श्रच्याहितं, न उयं तवेधसायं । इय श्राधरह्हामी मन्द्भागिन्मी । हां श्रच्जपुत्त ! [इति कदता श्यारोहं नाटयति] इति ।

[वरमातमनः शारीरस्य श्रत्याहितं, न पुनस्तपोधनानां । इयमविरोद्वामी मन्दभागिनी । हां श्यार्यपुत्र ! इति मन्स्त्रतम] यथा चा रघुविलासे—विराधवधे रावणः—[रामं प्रति] श्यागतस्त्वो यूं, महां पतनराशिलक्षितविपत्कुहरो वनेचरदेसोयः । प्रभूशान्तरायं च मम्पराय च रावग्रपमुरेस्यो रच्योभ्यम्भाव्यग्यां भवतातं । वध्वागुरानिर्यांच्त्रतमनसश्र कुत एव येधशुमतलम्भविष्यचः । तदियमार्या वैदेही किंपि वनकुहरमलयुरुता्मू ।" इयमपत्नाराथिना रावशोन मीतामेकाकिनी सतुं युक्तितर्दिशिता । इति ।

श्रथानुसंपेषाम्— [सूत्र ७५]—नष्टे्टेहा डनुसर्पेषाम् ॥ ४० ॥ पूर्वेमुपलच्धस्य पुनरन्तरितस्य इति्वृत्तवशादभिलपतस्याथस्य ईदृशं श्रन्वेषणां श्रनुसंपेषाम् ! यथा पार्थिविजये द्वितीयेडदे द्रौपदी युधिष्ठिरसहिथ्याथ— “द्रौपदी—महाराज इमादि य्येव दिवसर्परिपततस्याग्र्याहि किय्योमदपार्भवुचेयदुकवस्स मे हिययस्स पम्हुट्टो विय श्रणुअदुस्सासयोन श्रत्तणो के संगहावमाणुतंतो । सोता—ग्रपने श्यारोरको भयमे डाल देना श्रचछा है किन्तु तपस्वियोंको [सकटमें डालना उचित] महं । श्रचछ्या मदभागिनो चढती हूं । हा श्यार्यपुत्र ! [ऐसा कहकर रोती हुई वैदेही पुत्रक विमानपर] श्रारोहणका श्रभिनय करती है ।" प्रयवा जैसे रघुविलासमे—[उपन्यासका दूसरा उदाहरणहै]— “विराध वेपधारो रावणो [रामने प्रति कहता है] प्राप्त लोग [बाहरसे] ग्राए हुए हैं । श्योर मे इस वनको कुहरोंको द्राथना हुंता लगभग वनचर हूं । इसलिए मे रावशो प्राप्त राक्षसो के द्वारा [ग्रापके मार्गमे] श्रनेक विघ्नों तथा श्यापदोंकी संभावना करता हूं । [उस समय] स्त्री के भभटनमे श्रापका मन उलभ होनसे श्राप उनके साथ लडनेमे कैसे सफल हो सकेंगे । इसलिए इन श्रार्या वैदेहोको वनकी किसी गुफामे रख दीजिए । सोताके ग्रप्रहराके चाहनेपर रावणाने सीताको ग्रप्रेकला करनेके लिए यह युक्ति दिखलाई है [श्रतं यह भी 'उपन्यास' श्रद्रकका उदाहरणहै] ।

(१३) धनुसंपेषाम्— श्रव 'धनुसंपेष' [नामक प्रतिबिम्बसधिको तेरहवों श्रद्रकका लक्षण प्राप्त कह्ते हैं]— [सूत्र ७८]—विस्मृत हुए इष्ट श्रर्यंका पुनः धनुसंधान [प्रनुसंपेषा] कहलाता है । यथोः पहिले [एक बारके श्रभुव द्वारां] प्राप्त हुए, फिर [किसी कारणसे] विस्मृति द्वारा लुप्त हुए, श्रभिलपित श्रर्थका क्याप्रसंगके वशसे फिर दुबारा धनुसंधान [या स्मृति] धनुसंपेषा [नामक श्रद्रक्‌ कहलाता] है । जैसे पायंविजयके द्वितीय श्रद्रकमे द्रौपदी युधिष्ठिरसे कहती है—

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अथ प्राग्मुभवादृशं नृपं निष्प्रतीकारमातदर्थणात् प्रभृते नष्टमति नु वसी पुनस्तमनुस्मरतीति ॥ ४० ॥

(९) अथ समदः

पत्तानि पतिमवसादयन् माति त्रयोदशेति ॥ [३] अथ गर्भे वनस्पतेरंगानि वयस्यातु मुखुदिशति—

[सूत्र ७६]—संग्रहे हृपमनुसमा प्रार्थनोत्ताह्हन्ति क्रमः ।

उद्रे गो विप्लवरचेतदु मुखत: कार्यमष्टक्रम् ॥४५ १॥ श्रालेऽपोडधिकिलं मार्गो सत्पाहकष-तोटके । परचैतानी प्रधानानि गर्भेडद्धानि त्रयोदशा ॥४५ २॥

'गुणत्' इति गुणवाचिन्, गुणवाचकमारमपेद्य वा । तेन प्रकृतोद्भेददर्शनार्थं समृद्धोडवधय निवर्तनीय । श्रालेखपात्रे तु मुख्यानीति ॥४५ १-२॥

माम-दाने दृशड-भेदयोः पलचणम् । श्रादिशाच्चेन मायेन्त्रजालादि संम्रह: ।

हे महाराज ! इन्हीं दिनोंके परिवर्तनोंको गिनते हुए में, हृदयमें गांठ सी डाल देने वाले [पाप या वार-वार रगड़ने तारनेके किसी स्थानपर जो हड्डी नोंठ-सी बन जाती है उसको किया कहते हैं] दु खासनके द्वारा किए गए अपने वातोंके लोच जानेसे पापमानके पुत्तातको भूल गई थी ।

ये प्रतिमुखसंधिके तेरह भेद हैं ॥

(२) गर्भसंधिके तेरह भेद—

पच गर्भसंधौ पगोंडे व्याहाहया करानेके लिए उनमें माम गिनाते हैं ।

[मूत्र ७८]—१. सग्रह, २ वृप, ३ पतुमा, ४ प्राभंता, ५ उदात्तत, ६ वम, ७. उरेजं, ८ मार एवं ९. विलतय । ये पाठ [पच] गौण सद्मे [वा द्वीप प्रपोजयप्रमा प्रभुल्] धरने चाहिएँ ।

५. पार्श्वव, १०. मप्रवक्त, ११ मातृ १२ प्रगरपाहरेण घोर १३ सोतक । ये पाँच पच गर्भसंधौँ प्रपात [पच] हैं ॥ इस प्रकार [गर्भसंधिप्र] तेरह पद [होते] हैं ।

(९) संमई—

[सूत्र ७९]—[सबसे पहिले] 'सप्तर' नामक गर्मसंधिप्र पताका सथापत कराने [—

साम वान पार्टि [बे प्रयोक्ते] 'सप्तर' [वहा जाता] है । जिसमें रसात्मकमंद—

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"राजा—वयस्या न बलु किश्चित् त्वयि न सम्भाव्यते |" इति साम । सेकेतात्विवातां शुश्रुवा कटुतरचित्रयां तु दानम् । [भेदो] यथा रघुविलासे पञ्चमेऽङ्के क्रमात् पवनवेगो राक्षमः प्राप्त— "राक्षम्—प्रतीहारं देवः । रावण—गृद्वाण प्रमादमू । [पुनः प्रतीहारं प्रति] वरादरतुष्ट ! समादिश कुमारं कुम्भकर्णं यथा पवनं किं किङ्करैराड्ये त्वरितमरभिपत्न ।"

वप दौत्यार्थं मारुतस्यो यान्ति नयस्य द्वोभाथे इन्तनो इनसुर्ात्पतुः सुम्रोवाद भेदः प्रयुक्तः । यथा चात्रैव चतुर्थेऽङ्केऽपि रावणः— "यायावरेषु क्रिमिनेन वनेवरोष, मां स्थावरं वरमुपास्व कुरङ्ककानन । किं वा स्तुवे तव पुरश्रुररिम्यतीनां, वेदघ्यसौरभवती भवती प्रकाशम् ॥ मीता—को वा जाजावरो को वा थावरं निति विद्वेषां लक्मप्रसूतारायपत्कर्ई चाविकरिष्यते । [को वा यायावरः को वा स्थावरं हिते विवेकी लक्ष्मणानुजः] पदत्तिराविचरिष्यति । इति संस्कृतम् ]।

"राजा—हे मित्र ! तुम्हारे लिए कोई बात प्रसंभवय नहीं है !" यह साम है । [उसके बाद उमी द्वितोयाङ्गमे] सेकेतातिको बात सुनकर सटकळर देना, दान [प्राप्त प्रयोग] है ।

[भेद—प्रयोगका उदाहरण] जैते रघुविलासमें पञ्चमाङ्कमे [वार्तालापके] कमसे हनुमान के पिता [पवनका वेग धाररप किए हुए [मायावो] राक्षस कहलता है— "राक्षस—हे महाराज ! श्राप प्रसन्न हों । रावण—[हमारे] प्रमादको हरण करे । [फिर प्रतीहारे] हे वरादरतुष्ट ! कुमार कुम्भकर्णांको [मेरी श्रोरसे] प्राज्ञा दो कि पवनकुमारको शोध [जाकर] किक्किन्यांके राज्यपर श्रभिपिक्त करे ।" इसमें [राकी श्रोरसे] नून वन कर माए हुए श्रृङ्गदके खोभके लिए हनुमानके पिता

"रावण—हे युग्मके समान नेत्रो वाली सीते । सर्वदा मारे—मारे फिरने वाले [प्रतिप्रयेन याति इति पायावरः] इस [रामचन्द्रके पास रहने] से क्या लाभ है । सदां स्थिर [एक स्थान पर] रहने वाले मुखको श्रपनां वर बना लो । तुम्हारे सामने में [ग्रपनो] या चडाई करूं, मोता—कोन मारा—मारा फिरने वाला या कोन स्यिर रहै वाला है । इस बातो तो लक्मरके बाणोको पक्कि ही प्रकट करेगो । रावण—[क्रोधपूर्वक तलवारको पकड़ता हुश्रा]

[पवनकुमार] का सुप्रोवसे यह बनावटी भेद दिस्ललाया गया है । श्रयवा जैसे यहाँ [श्रयात् रघुविलासमे हो] चतुर्थं श्रद्धकमे रावण [कहता है]—

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प्रेमावनद्धहृदयः स मे लक्षेश्वरः सुहृदति ! मोढा । सोढा न चन्द्रहासः पुनरयमुल्लुपेठयत्नानाम । एष सीताज्जोभार्यो राजभिः दण्डः प्रहृतः । मायाप्रयोगान्तरेपु कृत कलङ्कमपामुप्रीडयानन-ग वयसी घटनाफलिषु निवसति ।

(१) श्रृङ्गार रूपम् — [सूत्र ७८]—रूपं नानार्थसंग्रहः । नानाहुपपायामथ्योनां संशयोद्भवधारणां रूपामिव रूपं । भ्रानियते ५ प्रकारो रूपमुख्यते । मुखसन्ध्यंगादृ युक्तंते कृत्यविचाररूपत्वेन नियतारायाश्रय भेदः । यथा कृत्यारावप्ये रामो जटायु: उपमप्रत्यभिजानन्नाह— "मिररयम्मररन्नेप्राय निलयं नपद्यः; कतरिपुरमुरेशोः शान्तिसो वेनतेयः । श्रपरिमितु मनो मे न · पिता तुः प्रापभूतः, किमुत यत स एप व्यपेतामुरज्झितायु: ।" इति । श्रन्ये तुधीयते—'रूपं चित्रकवचु वाक्यम' इति । हे सुन्दर वांनों वालो सती ! प्रेममे श्रावद्ध हृदय होनेके कारणा संदेशेवर [प्रर्थात् में रावण] तो सब सुध [प्रत्यात् तुम्हारी उचित-ग्रनुचित सच बातें] सह लेता किन्तु [वह ध्यान रसो कि] तुष्टेरों [प्रर्थात् राम दशरथके] भ्रातरसोको यह तत्सम्बार सहन नहीं फरेगी ।" सीताको डरानेके लिये रावणने यह दण्डका प्रयोग किया है । प्रौर इसो [रघुविलासमे] में लङ्काके सुप्रोच प्रादिके बनावटो प्रानमन प्रोर सीता रावणके धनावटो सन्मिलनके वाक्यों द्वारा मायाका प्रयोग किया गया है । (२) रूप— ग्रब 'रूप' [नामक प्रभंसनचकके द्रितीय प्रभङ्गका लक्षणा प्रादि कहते हैं]— अनेक प्रकारके प्रयोंका संश्रय [वर्णन करना] 'रूप' [महलातात] है । अनेक प्रकारके प्रयोगो [एक जगह] सन्निप्रयुक्त [किसी एकत्र] निर्देश्य न कर सक्ना रूप [प्रर्थात् प्रनियतार:] के समान होनेसे 'रूप' [महलातात] है । प्रनियत श्राकारको 'रूप' कहते जाना है । भ्रायंके [नियतार-रूप प्रोर नियत धाकार, कहते 'मूर्त्त' [नामक] सुर-तनियेंः प्रभूढोे [नियत प्रकार होनेके । फलरूप] इस [प्रभंसन-प्रकरणे 'रूप' नामक श्रप] का भेद [स्पष्ट] है । इत 'रूप' नामक मेङ्गडो उदाहरणहे] जैसे कृत्याराधनमे [रावणके द्वारा मारे गए] जटायुको न पहिचान सकने पर राम कहते हैं— क्या प्राज देवराज इन्द्रने इस पर्वतके पेड़ वाट उखाड़ हैं ? प्रथवा देवोंके शत्रु राहरपो मरट कर डाला दिया है। मेरे मनमें एक शोर मान भी मानों है कि प्रयवा दे पसारे पिताजोका प्राप्यभूत [निष्ट मित्र] मरे हुए जटायु है । इनमें मुनि श्रटारुके देवसर नामा प्रतापसे प्रपोंकि माय दिसलाया गया है रसनिप्रे पह 'रूप' नामक प्रभङ्गो उदाहरणहै ।

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यथा रत्नावलय राजा समाददे- 'प्रणयविश्रब्धा हृद्य्टिं वक्ले ददाति न शक्तितः, वदत्यति पनं कठ्ठारलेपे रसान्न पर्योघरः । वदति बहुशः सक्ल्यामिति प्रयत्नाधुृतप्यधः, समयतितरां मवेततथा तथापि हि कामिनी ॥

कथं चित्रयति वसन्तक ? कि मयु चित्रितं स्वपादचिह्नान्तो दर्शयति । इत्यनेन रत्नावलीममागमप्राप्त्यामुपेयेनैव देवेशं मया वितयं दृपमिति । ज्ञाप्ये तु—'चित्रार्थ स्वपरं वच ' इति परान्त । यथा वेश्योत्तमहारे सुन्दरकेन चित्रमप्यवर्णेनमिति ।

[सूत्र ७८]—अनुमानिर्नचयो लिंगात् । लिंगाद्दतेर्‌तोर्निश्वयकुरय लिंगिनो निश्वयोडनुमानम् । निश्वयरूपत्वपत्तेन च उद्दे- कपाया युक्तेऽभिष्यते । यथा भामकृतो स्वप्नवासवदत्ते शोकालिकामङडपाशालातलमद- लोकिये वत्सराजे —

[उसका उदाहरण] जैसे रत्नावलीमें कमलसे राजा कहता है— भयभीत होनेके कारण मुँहकी प्रोट प्रेमपूर्वक [निम्नोक्त होकर] नेभल नहीं पाती है गले मे श्रालिङ्गन करती हुई भी भो ग्रानन्दसमन होकर जोरसे इतनोको नहीं चिपटाती है । प्रयत्नपूर्वक पकड़ने पर भी बार-बार मैं जाता हूँ यह कहती है । किर मो सकेतयत्न म्राई हुई कामिनी श्राप्यन्त प्रदान-व प्रदान करती है । वसन्तक [विदूपक न जानो] देर क्यो कर रहा है [अभी तक श्रामा नहीं] ? कहाँ यह समाचार देवो [वासवदत्ता] को मालूम तो नहीं हो गया ?" इस [कथन] से रत्नावलोके साथ समागमपक्षके श्रनुमान्ही देखे [वात्स्यवदत्ता] को शक्का से वितर्क होनेके कारण कप [प्रश्नका यह उत्तररुपा] है । ग्रन्य [ग्राचायं] तो-- 'विचित्र ग्रन्यं वाला रूप [कहलाता] है ?' यह ['रूप' का लक्षण] बतलाते हैं [पठन्ति] ! जैसे वेशोत्तमाहारे [पचरम श्रदूदवे] मुग्वदरके सप्रामका विचित्र रूपसे वरोंन करता है [वह 'रूप' नामक ग्राङ्कका उदाहरण है] ।

(३) श्रनुमान— ग्रन्थ 'अनुमान' [नामक गर्भसन्धिके तृतीय श्राङ्कका लक्षण श्रागे कहते हैं]—

[सूत्र ७८]—लिङ्गे श्रर्थात् हेतुके द्वारा उससे श्रविनाभूत [नित्य सम्बन्ध] लिङ्गी [प्रयोजक साध्य] का निश्चय करना 'अनुमान' [कहलाता] है । निश्चित रूप होनेके कारण रूप 'पुष्टि' [नामक मुखसन्धिक श्राङ्क] से इसका भेद है । जैसे भास-विरचित स्वप्न वासवदत्तमे शोकालिका-मण्डपके मिलातलको देखकर वत्स-

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पादाक्रान्तानि पुष्पाणि सोद्भम चेद् शिलातलम् । नूतं काचिद्वसीनां मां हष्‌टवा सहसा गता हि ॥ पूर्वोद्रं लिङ्गम् । उत्तरार्द्रेमनुमानम् । यथा वा यादवाभयुदये पद्‌ठे गर्भाङ्के हरेः सममवलोक्य कृता: - "स्रग्वीर्यां मग्नीरसि हशोरसन्नच्‍छटा याम्, देव स्मरोडपि नियतं वितताभिलाष: । एतत्-समागममहोत्सववद्धतुष्णामू-श्राह्नित मामवरथा विशिष्‍टै। कथम् स: ॥" इति

(४) स्वाथ प्रार्थना - [सूत्र ८०]--प्रार्थना भावयाचनम् ॥४५३॥ भावानां साधयफलोचिनीनां रति-द्वेषै:-उत्सवादीनां याचनं प्रार्थना । यथा देवीचन्द्रगुप्ते चतुर्थेऽङ्के चन्द्रगुप्तः- "प्रिये मायवसने ! त्वमिदानीं मे वन्यमालापय । करष्ठे कित्ररक्षित ! बाहुलतिकापाश समाससृतां, हारसि स्तनचुम्बनच्‍योऽस्म वलाद् वधनातु पाणिग्रहम् । पान्तौ त्वदृश्यतमध्यमलप्रणयिनी) सङ्‌दानयेमे रतला, च त्वदृढ-गुणबद्धमेव हृदयं चन्ध पुनर्नेहति ॥" "फूल पैरोंसे कुचले हुए हैं और यह शिलातल गमं हो रहा है । [इससे प्रतीत होता है कि] निश्‍चय हो यहां कोई [स्त्री] बैठी हुई थी जो मुझको देखकर सहसा चली गई है ।" इसमें पूर्वाद्रं [भाग] लिङ्ग है, और उत्तराद्रं [भाग] अनुमान है । जैसे यादवा्भयुदयके चतुर्थ [अङ्‌के] गर्भाङ्‌के हरेः [कृष्णके] समम [सहित] अवलोक्य [देखकर] की गई हैं- "नेत्रोंके लिए श्रमुत्के समान [प्रातःकाल-द्योतिनो] इस मृगनयनोके विपयमें निश्‍चय हो कामदेवका उत्कट प्रभिताप है । प्राणप्रिया इसके समागमके महोत्सवके लिए उत्सुक मुझको [आपतार पतिहतहृदया प्राणक समानकर] यह प्रिया वासनोसे क्या मारा रहो है ?" इसमें कामदेवके द्वारा [प्रयुक्त] लिङ्गसे कामदेवके तादृशके प्रति प्रभिलाष निप्‍कर्ष अनुमान किए जानेमें यह् 'अनुमान' ह्य मत्नवा उदाहरण है ।

स्वय प्रार्थनां [नामक आभसनिध्येन] चतुर्यं प्रपञ्च लक्षणप्रादि करते हैं]--[मूल ८०]—भावोंगे याचनां प्रार्थनां [कहलाती] है । साध्य फलके प्रनुरूप रति ह्य, उत्सव आदिं भावोंगे याचनां प्रार्थना [कहलाती] है । जैसे देवीचन्द्रगुप्‍ते चतुर्यं पद्मके चन्द्रगुप्‍त: - "प्रिये माधवसने ! तुध प्रय मेरे पङ्‌क्तिको पाता [पद्यने पत्‍नोंके इस प्रकार] दो- हे किन्ररक्षित ! बाहुलतिका पाशा समाससृतां, हारसि स्तनचुम्बनच्‍योऽस्म वलाद् वधनातु पाणिग्रहम् । पान्तौ त्वदृश्यतमध्यमलप्रणयिनी) सङ्‌दानयेमे रतला, च त्वदृढ-गुणबद्धमेव हृदयं चन्ध पुनर्नेहति ॥"

(५) प्रार्थना - स्वय प्रार्थनां [नामक आभसनिध्येन] चतुर्यं प्रपञ्च लक्षणप्रादि करते हैं]--[मूल ८०]—भावोंगे याचनां प्रार्थनां [कहलाती] है । साध्य फलके प्रनुरूप रति ह्य, उत्सव आदिं भावोंगे याचनां प्रार्थना [कहलाती] है । जैसे देवीचन्द्रगुप्‍ते चतुर्यं पद्मके चन्द्रगुप्‍त: - "प्रिये माधवसने ! तुध प्रय मेरे पङ्‌क्तिको पाता [पद्यने पत्‍नोंके इस प्रकार] दो- हे किन्ररक्षित ! मेरी बाहुलतिकाको पाश [मृदुल] बाँधे [प्रेमी] ! हे स्तनोंको चुचुनेवाले [चुम्बन करनेवाले] ! मुझको बलात् वधूके साथ पाणिग्रहण [विवाह] कराओ । हे त्वदृश [तुम्हारे समान] न देखने योग्य मध्य [कमर] वाली प्रणयिनी [प्रेमिका] को सङ्‌ग [मेल] करानेमें तत्पर रतिरूपी रत्नालंकारयुक्त [रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित] हे त्वदृढ [तुम्हारेसे दृढ़] गुणोंसे बँधे हुए ही हृदयको बन्ध [मेल] पुनः न करनेवाले [विच्छेद न करनेवाले] !"

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श्रात्र रते प्रार्थेना ।

तथा कृत्यारावयो चतुर्थेऽङ्के सीताहरण-भावृदुःखार्च दुःखितो विपन्नवेपणो लदमणः--"तद्रपि नामायम'मदृश्यतान्तस्य प्रतिज्ञामुपचीयमान-नायकृत्यसन्निभाजोस-श्राम्भुदयावसानः मंहारो नाटकस्येन भवेत् ।" श्रात्राम्भुदयात्मक उत्कृष्टो लदमणोऽर्थकृत् । केचिदमर्थनामात्रं प्रार्थनामाहुः । यथा रघुविलासे कृतकृत्यनुरूपतिप्ठवेपो

राक्षसः [रावणां प्रति]— "यदि भम्तं चिपिनं धनुर्धरकलादचो यदि च्चो ह्रतः, शिच्चां लङ्घयतः च्वपाचरपते यन्मूर्च्छितदत्तं पदम् । यदि वेध्मनि परःशाताकि शिशुना हुयैप्पान कापेयतः, तनू चन्तव्यमशेपमेव पुरतरते देव ! वद्धोडरालिः ॥ इति । केचित्तु प्राक्तनभिदं चाङ्ग* न मन्यन्ते ॥ ४३ ॥

इसमें राक्षसो प्रार्थना है । और कृत्यारावयोके चतुर्थे श्रङ्कमे सीताहरण तथा भाईके दुःखसे दुःखित [सीताके] श्रन्वेषणमें श्रत्रसफल लचमणके [कहते हैं]— "फिर भी वया प्रतिज्ञा बद्धने वालो विपत्तियोसे युक्त नायक वानें नाटकके उपसंहार के समान हमारा भो श्राम्भुदयसे पर्यवसान होगा ।" यहाँ लचमणने प्रभुमुदयात्मक उत्कर्षपंकको कामना-प्रार्थना की है । [प्रतः यह 'प्रार्थना' नामक धंगका उदाहरणरूप है ।] कुछ लोग 'प्रभ्यर्थनामाात्र [प्रर्थात् प्रत्येक प्रकारको याचना] को 'प्रार्थना' कहते हैं । जैसे रघुविलासमें हनुमानके प्रति [प्रर्थात् पवनकुमार] को बनावटी देव धारणा करनेवाला राक्षस [रावणके प्रति कहता है]— [मेरे पुत्र हनुमानने लंकामें श्राकर] जो उद्यान उजाड़ा, और धनुर्धरोंकी कलामें दक्ष ग्रक्षकुमारोंको मारा, और शिक्षाका उल्लङ्घन करनेवाले राक्षसराजके सिरपर जो पैर रखा, tथा वानरभावके कारण [कापेयतः] मेरे वच्चने जो सैकड़ों घर जला डाले, है देव ! उस सदको क्षमा करें । मैं [उसका पिता] श्रापके सामने यह मैं हाय जोड़ता हूँ । इसमें पवनकुमारकी वेय धारणा किए हुए मारणो राचस, जो रावणसे हनुमानको धमा करनेकी याचना कर रहा है उसको भो 'प्रार्थना' श्रज्ञा कहा जा सकता है [प्रर्थात् श्रानुमानको] और इसको [प्रर्थात् प्रार्थनां]

(y) उदाहरण— [दृष्ट ७२]—उदाहृतिः भवत्कृपः ।

कोई [प्राचार्य] इससे पहिले [प्रर्थात् श्रानुमानको] और इसको [प्रर्थात् प्रार्थनां] को प्रंग नहीं मानते हैं । (y) उदाहृतिः— श्रब 'उदाहृति' [नामक गर्भसंधिके पञ्चम श्रंगका तच्त्वा स्मादि करते हैं]— [सूत्र ७१]—[किसोचे] समुत्कपं [का वर्णन] 'उदाहृति' [कहलाता] है—

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लोकप्रसिद्धवस्तुप्रेक्ष्या यः समुत्कर्षः समुत्कर्षोऽस्य म चर्वणोदरस्य दुराशयति। यथा रत्नावलौ— "राजा—ग्रहो महाराजचरितम्— मनः कृच्छ्रैव चलं दुलंच्चं च तथापि मे। कामेनेऽं कर्थ विद्धं ममं सर्वे: शिलीमुखैः॥" छात्रेतेतरधनिवास्यो मन्थथ्य युगपत् मर्वे: शारे: स्वभावचपल-दुलंच्चमनोवृत्तेन समुत्कर्षः।

(६) श्राथ क्रम:— [मत्र ८२]—क्रमो भावस्य निश्चित्यः। भावस्य पराभिप्रायस्य, श्राथवा भाव्यमानस्यार्थस्य उद्‌-प्रतिमादिवशा-त्रिप्रथयो यथावस्थिततत्संपत्स्थचया: 'क्रम'। बुद्धिग्रतत्र ऋमते, न प्रतिहन्यते करथर्थः। यथा देवोचन्द्रगुप्ते— "चन्द्रगुतः—[प्रयदेवी ह्रप्टवा स्वगतमाह] इयमपि देवो नितष्ठाति। यैपा— सम्पां चार निकारिगां च कररतां शोभेन नीता दशां, तत्कीलोपगतेन राहुशिरसा गुढत्वे चान्द्रा कलाः। परंषु: कल्मोऽनोचितेन चरितेत्तानेन पुंस: सतः, लडज्ज-कौप-विपाद-भीर्यररमिभ: चेरीकृता ताम्यति॥" लोकप्रतिद्ह [सामान्य] वस्तुमोको [वस्तुतुका] जो समुत्कर्षपं है वह उत्कर्षपं का प्राहुरतप [करनेवाला] होनेमे 'उदादृतित' [महतात] है। जैसे रत्नावलीमें— "राजा—ग्रहे! ग्रहो! वड़े प्रादचर्यको बात है कि— मन तो स्वभावत: हो चचल प्रौर न दिसलाई देनेवाला है। किर भी षापदेवने मेरे उग मनको एक साथ ही ग्रपने सारे यारोंसे विद्ध कर दिया है।" यहाँ स्वभावत चचल प्रौर न दिसलाई देनेवाले मनको एक साथ हो सारे यारोंसे वेध देनेवाले कारण ग्रह-प्रप घनर्थपरिरोभं द्वारेक्षा कामदेवनेसा उद्कर्पं [वर्गित होनेवाले यह 'समुत्कर्ष' नामक ग्रभ्था उदाहरणा] है।

[मत्र ८२]—क्रमो भावस्य निश्चित्यः। भावस्य पराभिप्रायस्य, श्राथवा भाव्यमानस्यार्थस्य उद्‌-प्रतिमादिवशा-त्रिप्रथयो यथावस्थिततत्संपत्स्थचया: 'क्रम'। बुद्धिग्रतत्र ऋमते, न प्रतिहन्यते करथर्थः। यथा देवोचन्द्रगुप्ते— "चन्द्रगुतः—[प्रयदेवी ह्रप्टवा स्वगतमाह] इयमपि देवो नितष्ठाति। यैपा— सम्पां चार निकारिगां च कररतां शोभेन नीता दशां, तत्कीलोपगतेन राहुशिरसा गुढत्वे चान्द्रा कलाः। परंषु: कल्मोऽनोचितेन चरितेत्तानेन पुंस: सतः, लडज्ज-कौप-विपाद-भीर्यररमिभ: चेरीकृता ताम्यति॥"

(६) ग्र्रम— प्राय 'ग्र्रम' [नामक ग्रंभस्त्रिप्रे परतु श्रंगगात्र लक्श्रया घरते मु]— [मत्र ८२]—भावना निश्चित्य 'ग्र्रम' [करताता] है— भाव प्रयचांनू दुसारधे: प्रभिप्रायक्ता, श्राथवा कहा, प्रभिशा प्रादिने द्वारा भाष्यमान [विवार प्रादिने निम्ररत] क्रपंके प्रयावसिप्रन रूप सारिरक्त निरदप्र 'ग्र्रम' [करताता] है। उमके- विपपमें मुग्ध यमतत परती हैं [चलती है ।] प्रतित्न नहीं होनेमे [इतनिए उमशों 'ग्र्रम' परते हैं]। जैसे देखो चन्द्रगुतमे— "चन्द्रगुप्त - [प्रयदेवी प्रोर देखकर] पर देवो भी बंटो हो मो-- सम्पतत पाए हुरे राक्रुके शिरके द्वारा च्यवस्थितरू हूई चन्द्रमा््र की कलाः कतारो समातत दोन- दे। षारलत मत्प होने पर मो हु मरतारिप्रो करतत प्रवृत्तालो प्राप्, पतितं पुरत्त हुंने पर मो नतु'ग्रो-जैसे हुम प्राचरगाते तरता। शोप, क्रिवार, मप परनिमें परन हु मनी हो नरो है।

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श्रृङ्ग धुवदेवेऽन्याभिप्रायस्य चन्द्रगुप्तेन निश्चयः । तथा रत्नावल्याम्—

द्वयोरेकतरालापं कर्थात कथामपि वयाम् । सत्रूपं सभेरासु प्रकटयति वैलक्ष्यमधिकं, प्रिया प्रायेयवार्ते हृदयेनिहितात्कविघुरा ॥ यहाँ धुवदेवके अभिप्रायक चन्द्रगुप्तके द्वारा निश्चय [होनेसे 'क्रम' का उदाहरणरूप] है । इसी प्रकार रत्नावल्यों— "सब लोगोको [मेरे रत्नसराजके प्रति प्रेम] विदित हो गया है ऐसा समझ कर [साग-रिका] सबके मुँख द्विपाती है, [कहकर] दो जनोकी बात करते देखकर यह समभनी है कि ये लोग मेरे विपयमें ही बात कर रहे हैं । सखियोंने मुसकरानेपर और भी अधिक दार्मा जाही है । इस प्रकार प्रिया [सागरिका] प्रायः हृदयमें बैठे हुए भयसे पोडित रहती है ।" इसमें राजाने भास्समान साररिकाके स्वरूप तथा हावस्यका निरूपण किया है [इस लिए यह भी 'क्रम' नामक प्रजका उदाहरण है] ।

श्रृङ्ग राज्ञा भास्यमानायाः साररिकाया: स्वरूपपचारथानिरूप्योऽयं कृतः । श्रृङ्गये तु—'क्रम: सक्रान्तदयमानात्नि:' इत्याद्याहुः । यथा रत्नावल्याम्— वरमरजर्य साररिकासमागममभलपतो विदृक्षवे पोपवन्तं योजनत्नु । श्रृङ्गये तु भवितव्यर्थे सत्स्वोपलब्धिषु क्रममिच्छन्ति । यथा वेणीसंहारेऽ— 'कृप.—राजन् दुयोधन ! महान् कलु द्रोणपुत्रेण बोद्धुमध्यवसितः समरभार । भवता च कृतपरिरोध्यमुच्यते' लोकत्रयमपि समरथे । किं पुनरेतद् युद्धावलम् ।' इति ।

अन्य लोग तो—'सकिनयमान श्रयङ्करी प्राप्तिको 'क्रम' कहते हैं । जि‌के रतनावलीमें— "सागरिकाके समागमको चाहते वाले रत्नराजको उपवनमें विदृपकके द्वारा [सागरिकाके साथ] मिला देना ।" अन्य लोग श्रागे होने वाले श्रर्थके जाननेको 'कम' कहते हैं । जैसे वेणीसंहारमें— "कृप—हे राजन् दुर्योधन ! महान् कलु द्रोणपुत्र [अभिमन्यु] ने महाभारतको पहन्या करनेके निश्चय किया है । आपके द्वारा [सेनापति पदपर] अभिषिक्त किए जानेपर वह तीनों लोकोंका नाश करनेमें भी समय हो सकता है । इस युद्धस्थितरकी सेनाकी तो बात ही क्या है ।"

(५) अध्योद्रेगः— [सूत्र ४३]—उद्देगो भयः । चौर नृप-श्रृङ्गार-नायिकादिष्वयो भयोत्पेगः । यथा श्रामात्यशङ्कुकादवरचिते चित्रोत्पलावलम्बितके प्रकटयते पञ्चमेडङ्के—

स्वप्न 'उद्देग' [नामक वृत्त्यनुसन्धिके] सदृश प्रङ्कका तटस्थ आदि करते हैं]— [सूत्र ४३]—भप [का नाम] 'उद्देग' है । चौर, राजा, शृङ्गार शृङ्गार नायिका श्रादिसे भय 'उद्देग' [कहलाता] है । जैसे श्रामात्य शङ्कुकाद्वारा रचित चित्रोत्पलावलम्बितक नाटकके पञ्चम अङ्कमें—

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[नेपथ्ये सचीकारम्] शिञ्जितेऽघे ले गिरिडेऽघे वेपेधे ले वेपेधे । [सर्वे सभयमुख- लोकयन्नि] ।

[गूढीभूत रे गूढीभूत वेपध्वं रे वेपध्वम् । इति संस्कृतम्] । स्थविर :-हा चिक्कलड़न्, दरसयः सम्पर्तन्ति । किमत्र शठ्यां प्रपघेर्महि ।" नायिका-सरसी-स्थविरादीनां राजगृहमध्ये न विद्रुतानां वधुभ्यो भयम्॥ तथा मृदुकुम्यां साथंवाहचौरुदत्तस्य चौराभिशापड्ढ निपुणं सयम् । तथा चेटीसंहारं पञ्चमेडक्ने [नेपथ्ये कतकलानन्तरम्]— "भो भो दुर्योधनानुजीविनः कौटवभटा: किस्मिरमस्मद् भयान्वयथायथं मध्य- रन्ति भवन्तः ।

धृतराष्ट्र :-[मार्शक्रम्] सख्य ! ज्ञायतां किमेतद्विति । मङ्ङय :-[उत्थाय नेपथ्याभिमुखमवलोक्य] तात ! महाराज ! प्राप्तावेकरथाहं पुङ्खान्तो त्वामितस्ततः ।

धृतराष्ट्र :-[मार्शक्रम्] सख्य ! ज्ञायतां किमेतद्विति । मङ्ङय :-[उत्थाय नेपथ्याभिमुखमवलोक्य] तात ! महाराज ! प्राप्तावेकरथाहं पुङ्खान्तो त्वामितस्ततः । मर्दे-(मार्शक्रम् ) मङ्ङय मङ्ङय— सख्य:-स म कंसारि: स च करो युक्करमो युक्कोदर: ॥ गान्धारी—जातु कि संबन्ध श्रवत्कत्वयं इति । [जातु कि मार्मप्रतिमवलभयन्तम् । इति संस्कृतम्]

मङ्गुक विरचित 'चित्रोत्पलावलिब्धतक' नामक प्रकारेऽक्ने पत्नामांकफने— "[नेपथ्ये] छोतकार करते हुए] पकड़ो रे पकड़ो, वायो रे वायो । [सक लोम भयभीत होकर देखेने लगते हैं] ।

वृद्ध - हाथ डालू मया रहे हैं । यहां कीसी धारया मे जालू ।" इसमे राजगृहके भय हो जानेसे भागे हुए नायिका, लागो तथा स्थविर प्राप्ति को डाकुम्रो से मय [मालत हूमा है म्रत् । यह 'चेट्डन्' नामक ग्रज्झका उदाहरण] है । इसो प्रकार मुचुकुन्दटिकने सार्यवाद चारदत्तक्शो चौयंइ प्रभिशापमे उतपन्न राजातो भय [उद्ग्रहण उदाहरण है] । इसो प्रकार चेटीसंहारमे पञ्चम ग्रज्झमे—

"[निपच्ये कोनाहुलके अनन्तर] घरे रे धुर्योण्हणं भतुपायो मीरय योरो ! हमारे भयके मारे तुम डपर-डपर क्यों भाग रहे हो ?

धतराष्ट्र—[समाल मोडर] सख्य ! देखो तो क्या बात है । सख्यम्—[उठ वर म्रोत नेपथ्याकी ओर देन म्रर] तात महाराज । प्राप्तावो इपर-उपर पूढने हुए एक रथपर बेठे हुए दोनो म्राप म्राय हैं । तब लोग—[भयमोत हूकर] कोन कोन ? सख्यम्—म्रह म्रलंक नभु [म्रथुंन] पौर वह भेसियादे समान मंञ्च माना भोम । गान्धारी—परे वेञा । म्रह रत्नभय [जा उदाहणर] ह । इसो प्रकार रत्नावलिमे—

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सागरिका—वरं दापिं ग्रहं सयं प्येयं शयताशयं उद्धवधैय उदरदा । न उणा जाणिदसकेहंतुत्ताए देवीए मुसंगद्रा विय परिभूद म्हि । ता जाइ इध असोए गदुअस्स जहास्मीहिं करिस्स ।"

[वरमिदानीमहं स्वयमेवात्मानमुद्धृत्योपरता । न पुनर्जातसंकेतकृतान्तया देव्या मुसंगतेव परिभूतास्मि । तदू यावदत्राशोके गरवा यथासमीहितं करिध्ये ! इति संस्कृतम् ।]

भय-त्रासकारिदो वसुनो या शंकाडपायकाररकत्वसम्भावना सा द्व्रति श्लथीभवति हृदयमनयेऽति 'द्रवः' । उपनतं भयमुद्रेगः । तत्सम्भावना तु विद्रवः । यथा कृत्यारावरो पठड्डे शांतिगुहे रावरो--"[नेपथ्ये] हा अज्जउत्त ! परित्तायाहि परित्तायाहु । [हा श्वार्यपुत्र ! परित्रायस्व, परित्रायध्वम् । इति संस्कृतम् ।] प्रतिहारो—[श्रुत्वा सेसम्म्रहेसुत्तमगितं] भम्मो भोअद्दीओ चित्तिकदिआहि । [प्रकाशम्] भट्टा श्वांतेउद्देरे महंतो कलय कलो सुउप्पीआदि । [अहो भ्रातः ! एवाकर्णयतु । भर्त्ता ! अन्तःपुरे महान् कलकलः श्रूयते । इति संस्कृतम् ।]

रावणः--"ज्ञायतां मिलितन् !" इति । सागरिका—प्रच्छा हो कि प्रव मे श्वय ग्रापने-ग्राप फांतो लगा कर मर जाऊं ताकि संकेत [मिलन] के समाचारको जान जाने वाली रानो [वासवदत्ता] के द्वारा मुसंगताके समान ग्रममानित न होना पडे । इसलिए इस द्रवणोशके पास जाकर अपनी इच्छाओ पूर्ति करतो हूं । यह नायिकासे भय [का उदाहरण] है ।

[सूत्र ८४]—द्रवः . शंका

(५) ग्रथ विद्रव :-- प्रव 'विद्रव' [नामक ग्रमसंश्रितने प्रथम प्रत्तुत्व लक्षण ग्रादि करते है]—[सूत्र ८४]—शंका 'द्रव' [नामसे कही जाते] है । भय या त्रास उत्पन्न करने यालो वसुतुने जो सका ग्रथांत विनाश या ग्रनिष्ट करने को सम्भावना, यह, जिससे हृदय द्रवित मर्यात् निष्प्रत होता है [इस हुत्पत्तिश्रदे भनुसार] 'द्रव' [बहलाती] है । [ग्रागे 'उद्रेग' नामक पूर्वोक्त ग्रद्रुतसे इस 'द्रव' का भेद दिखलाते है] । प्रा जाने वाला भय 'उद्रेग' [महलाता] है । [ग्रागे ग्राने याले भयसे] सम्भावना 'द्रव' [नामने पही जाती] है । [यह 'उद्रेग' तथा 'द्रव' इन दोनों प्रद्रुतोका भेद है] । जैसे शत्रुप्रारायरामें पठडकमे रावणपक्षातिगृहे येऽते होनेऽपर --"[नेपस्थ्ये] हा ग्रापंबुध्र ! बचामो बचामो ! प्रतिहारो—[श्रुत्वा भयभीत होकर] अपने मनोग्गो मरे यह तो स्वामिनो हो पित्ता महो है । [प्रकाशमे] हे स्वामिन् ! ग्रांत पुरमें घोर कोलाहल सुनाई दे रहा हूं: रावण [श्रास्त्र] हेनो घर चला यात है ।

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श्रत्न रावणस्य शक । ये त्वत्र शं नां ग्रामस्थप ससभ्रमसमगमाहु तत्तु चित्रव-उद्भेगंभ्या गतार्थोर्मात । (६) ग्रथाद्देप - [श्रत्न २४]--ग्रालेपो जीवप्रकाशनम् ॥ ४५ ॥

प्राप्तव्याशावस्थाविनिद्रस्थ चोजस्य मुग्धार्योपाव्यभ्य प्रकाशान प्रकाशपेताविर्मात्न ग्रालेप । यथा वेपथुसहारे तन "दत्तात्रेयेन पार्थाद्भयमपि न संरक्षितं मित्रुराज , न तु शासनेऽस्मिन् हरिष इव कृतं भीमसेननेन क्मै । तु माध्यामपरीगा लघुमिव ममरे पूरचिस्वां प्रतिज्ञा, नाह मन्ये मकाम कुरुकुलावसुरं देवमेसावताप ॥" श्रत्न पार्टद्वाना राइप्रातिपकाचार्योपायस्वो-मुर्याविष्टनं कृ्तम । यहां रावणावो [भयको] शक है [इसलिए यह 'विद्रव' नामक ग्रालेप उदाहरऐ] है! जो लोग यहां ग्रास रूप दाक्ष्योे ससभ्रम [पभेर्सा धका १४वा] ग्राल्न पहते हैं [यह उचित नहीं है बकोकि] यह 'विद्रव' ग्रालवा 'उद्रेग' के हो ग्रतंगत हो जाता है । इसे प्रभिप्राय यह है कि किन्ही ग्राचायोंने गमंननियके इन तिरह ग्राल्नोेभे प्रति-रक्त 'समभ्रम' को भी गमंननियच चौदहवां प्रग माना है । किन्तु ग्रचायने उनके इस मतसे महमत नहीं है । 'समभ्रम' को गभंननियवा ग्रप्र मानेमें घानोर उपका मधाग, ग्रात्न रूप दाक्ष्यो मो 'साम-ग्रन' कहने हं इस प्रवार किया गया है । ग्रनयवारा बचना मह है कि यदि ग्राग परमाप्त भयको 'समभ्रम माना जाय तह तो उद्रगा मी' इस लभगा वान उद्रगेमें ग्रनतगंत हो जाता है । ग्रोर यदि दाक्ष्योने 'ससभ्रम म्ह्रा जाय तह वह 'विद्रव नाह' इस लधाय वान 'विद्रव' ध्ये ग्रनतगत हो जाता है । इन दानास ग्रतिरिक्त उगनत ग्रनग कोई ग्रनतन न्हीं वनता है । श्रत सभभ्रम का ग्रलगा चौदहवा ग्रल्न मानना उद्दक्त नहो है ।

(६) श्राद्देप - ग्रथ ग्रालेपे' [नामर गभंसोयने नवम ग्रल्ननें लधारा ग्रालि कहते ह]— [सूत २४] योजने प्रकाशान [करने] वो 'प्रकाशप पहते हं । ४५ । [गभंसनिथने पतंगात] प्राप्तव्याशावी ग्रवस्योने निवृद, मुग्धक्नामेंने उपायभूत जीवश्र प्रकाशन प्रयांत्न प्रकाशपेत प्रच्चेपो प्रकाशकर्मे प्रादिर्शोभत्न 'श्रालेंप' [पहुनाता] है ।

जने येओसिहार दोपाचायने ने प्रभद-दान थरहें मो ग्रभंनतने हिद्पुराज [यदरथ] को रक्षा नरों वर पाई । दतु तु शासनेऽपि विदपमने भी [तिहासहस] भीमसेननेने हुरिराजं तमान पूर समें कर जालता [प्रयांत्न म्ह जिम प्रवार हुरिराषत । प्रयायाद्न हो मार खानारा है इतो प्रवार भीमसेनने दु-नामनशोे समात्न कर [दिया] । इस प्रवार नातकों [प्रयांत्न पातवो] नं तु माध्य प्रतिनितामों को मो पुरुषभुमिने भटपट्न पूर करकें भी मुग्ध न्तर प्रनीन हाता है कि गुरुकुल्ना विरोथां दंश पभो दूंस मनोतरप नहीं होरे समा है [पभो पर जुन्ह ग्रोर मो गेक दिगंतरेग] । यहां पार्टद्वोनेि राइग्र प्राप्त रुप दाक्ष्योने उपाग [दानुनें ग्रभुन पुथनोने् यप] का मुग्य रपो प्रमत्न [ किया गय ] है [ अन पर प्र"लेप' नामक नवम ग्रल्ननें उदाहरऐ है ।

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अथवा वीजस्य हृदयभूमौर्मिनगूढत्वाद्भिप्रायस्य वहिष्करणमात्रदेपः । यथा रत्नावलयां वासवदत्तायामेव सागरिकेति राज्ञा विदूषकेन च परिगृहीतायां वदुक्वितपु-

अथवा बीज के हृदय भूमि में गुप्त रहने के कारण अभिप्राय का बाहर प्रकट करना 'प्राक्षेप' [कहलाता] है । जैसे रत्नावली में राजा तथा विदूषक के द्वारा वासवदत्ता को ही सागरिका समझ लेने पर उनको उत्तियों में [राजा कहता है]—

"प्रिये सागरिके ! शोभांशुमुर्खमुपलले तव दृशौ पन्नगानुकारौ करौ, रम्भागभ्रेनिर्मं तवोदयुज्ले बाहू मुआलोफसौ । इत्याह्दकरौपलालोक्र ! रम्भसा निं शंकोमालिङ्गच्य मां, अझानिन त्वमनङ्गतारपविघुराएयेऽहं हि निर्वापयः ॥"

"प्रिये सागरিকে ! तुम्हारा सुरत चन्द्रमा [के समान], तुम्हारे नेत्र नील-कमल रूप, तुम्हारे हाथ कदलके सहश, तुम्हारो दोनों जाँघे कदलोके भोतरी भागके समान, तुम्हारी बाहुएं मृणालके तुल्य हैं । इस प्रकार सादृश्योसे आह्लादकारिल [ हे प्रिये ] ! शायदो, शायदो जल्दीसे निःशङ्क भालिङ्गन द्वारा कामोन्मादसे सन्तप्त हुए मेरे प्राणोंको शान्त करो ।" इत्यादिमे राजा द्वारा अपने अभिप्रायका प्रकाशन किया गया है ।

(१०) श्रथाधिबलम— [सूत्र ८६]—अथिप्रबलं बलाधिष्यम् । परस्परवश्वानप्रवृत्तयोरेष युद्विसाहाय्यादिवलाधिमे चेत यत्कर्मे इतरेमभि- सन्धातुं समर्थं तत्कर्म बलविपये ऽधिकवलयोगादधिबलम् ।

अथ [गम्भंसङ्के] 'प्राधिबल' [नामक दशम प्रभेद् निहपाए करते हैं]— [सूत्र ८६]—वलके प्राधिवलको 'प्राधिबल' कहते हैं । एक दूसरेको घोरा देनेमे लगे हुए दो शत्रुतियोमे बुद्धि प्रयया महायको प्राप्तिके वलके श्राधिवलके कारनए जिसका कमं दूसरेकी पोस्ता देनेमे समरथं हो जाता है उसका वह कार्य वलाधिके विषयमे प्राधिक्त बल समपन्न होनेमे 'प्रापिबल' [नामक पदं कहलाता थे] ।

यथा रत्नावलयाम् "किं पद्मस्य रुचि न हन्ति नयनानन्दं विधत्ते न वा, वृद्धिं वा भयपकतनेन नय कुर्वन् नालोकमात्रेण किं ? वक्त्रेणदौ तव सत्यं यदपपरं शीतांशुरम्भोजदातो, दर्पः समादमतेन चोदिह तद्रथस्येये विम्वाधरे ॥"

जैसे रत्नावलीमे— "क्या [तुम्हारा मुख] पद्मके [सूर्यके उदय होनेपर उसके प्रति आकर्षण शक्ति] को नष्ट नहीं करता है ? प्रपवा [क्या यह] नेत्रोंको आनन्द प्रदान नहीं करता है ? प्रथवा वृद्धिको नहीं बढाता है ? अथवा भय उत्पन्न करनेसे लोगोंको नत नहीं करता है ? प्रयवा [क्या यह] अपने अलोकमात्रसे ही कामको नहीं वडाता है ? प्रपवा दर्पणमात्रसे ही [ चन्द्रमा और कमल ] कामको नहों वडाता है ? जो यह दूसरा [ चन्द्रमा और कमल ] वक्त्रेणदौ तव सत्यं यदपपरं शीतांशुरम्भोजदातो, दर्पः समादमतेन चोदिह तद्रथस्येये विम्वाधरे ॥"

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इति पाठान्तरं। राजा वासवदत्ताया मुपोद्घाटने प्रय्याभिज्ञानम्। श्रृणु सारिकावचो धारयंत्यो विदूषकयुद्धिदौर्वल्याद् वासवदत्ता राजानमभिसंधत्ते। कपटस्यान्थाभावमन्ये श्राधवलमाहुः। यथा रत्नावल्याम्— "राजा—एवमपि प्रत्युदाहरत्यलोकः किश्चिद्धिदानीं पश्यामि— श्राताश्रातामपनयामि चित्तं ममः, नाद्रियतां चरणयोस्तवैव देहि। मुखेन कोपोपरागजनितां तु मुग्धेन्तुभिस्वे इत्थं चमो यदि परं करुणां मथि स्यान्॥" इति। श्रृणु वामवदत्तां प्रति राज्ञो वच्मानं विपुलं जातम्। एके तु मोपातम्भं वाक्यमधिक्रमिच्छन्ति। यथा वेङ्कीमहारे पञ्चमेऽङ्के धृतराष्ट्रमुद्दिश्य "भोमसेनः—श्रानमित्राणी मथ्युनाः। कृत्रा केशेपु कल्पना नृपसद्मसि वधूः। पाण्डवांस्तु नृपयः सख्यं ते क्रोधवहोऽगुराशलभकुन्तावधृतया येन दग्धाः।"

चन्द्रमा (पक्षान्तरमें) उदय हो रहा है; मदि (उसको) श्रमशता और हो (मोर उसौके कारण तुमहारे मुखके सामने उदय होनेक भ्रमसाहस कर रहा हो तो) यह (प्रमुख) मो तो तुम्हारे प्रभार-वैश्रम्यमें विद्धमान हो है। इस पाठके वाद श्राजाके द्वारा (सारिकाकी सम्भी श्रृदृ्टी) वासवदत्ताके मुखको खोलनेपर वासवदत्ताका पहिचानना। यहां सारिकाके येथ धारयत् किए हुए मालयवस्ता विदूपरक मृर्ंतरा (बुद्धिदौर्वल्यात्) से राजाको घोसेमें डाल देती है। दूसरे लोग कपटस्य अन्धभावमन्ये श्राधवलमाहुः [ अर्थात् परवर्त्तन ] को ‘प्रधिमत्’ कहते हैं। जैसे रत्नावल्योमें [इस उपरथावाली घटनाके बाद हो]— "राजा—इस प्रकार श्रपराधके प्रत्यक्ष देख् लिए जानेपर भी बुद्ध प्रायंना करनां चाहता हूं [मोर रह प्रार्थना यह है कि]— हे देवि ! [जिसने सारिकाके मुख हर इस अपराधके कारण] मचित में श्राशा द्वार। सम्पादितकी है तुमहारे चरणोंधेर रक्तताको मापने सिरसे दूर कर ही रहा हूं [पर्याप्त तुमहारे चरणोंपर मिर रखकर मापने इस अपराधको समा मांग रहा हूं किन्तु] यदि मेरे ऊपर मथयन्त दया हो जाय तो कोपके बारसा उस्पन्न हुइ मुख-श्री चन्द्रमाथो रक्ततायो भी (जुम्बनावि द्वारा) दूर करनेमें समथर्ं हो सकता हूं" यहां वासवदत्ताके प्रति [शुभामद द्वारा] धोक्षा देनेका राजाष प्रयत्न विफल हो गया। [मर्थात् वासवदत्ता उसको बातोंसे प्रसन्न नहीं हुइ]। कुछ लोग चपातलम्भ मुग्न यथायको 'प्रधिमत्' कहते हैं। जैसे वेङ्कीमहारे पञ्चमेङ्के पञ्चमेऽङ्के धृतराष्ट्रको लध्यमें रक्षक भोमसेन [कहते हैं कि]— भोमसेन—पग हु म वतनीषो प्रारन्धपचता नहीं है। नित्य रामायणीते पापरथांनि मय्य् कोपोदोभिः, मालोथो मुखहरत् काल हभामें पापेतर पा

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मार्गस्त्वर्थसंश्रनम् ।

[सू० २०७]—मार्गस्त्वर्थसंश्रनम् । परमार्थेsय वचनं सामर्थ्येनोच्यमानं प्रकृतार्थेन यत् सस्वध्यते तन्मार्गः । यथा मुद्राराक्षसे— "राजा—[प्रविश्य स्वगतमाह] राजयं हि नाम राजधर्मो नृपतिदु स्रितस्य नृपतेःमे हृदयश्रीतिरथानम् । कुत — परार्थानुप्ठाने जडयति नृपः स्वार्थपरतां, परित्यक्तस्वार्थी नियतमयथार्थं तितिपति । परार्थैषणे स्वार्थानभिमततरो हन्त वलवान्, परायतते प्रीते कर्थामच रमते चेत् पुंस्प ॥ तपि च दुराराध्य लचमीराज्ञां बद्धो राजभिः । कुत — तितिक्षामुद्धिजते मूर्खः परिभ्रमत्रामात्रं मन्त्रिपुष्टने, मूर्खे दृष्टि न गत्वाऽऽति प्रप्राञ्चिता मतयेन्त्रचिह्नरर्र्वाप । शूरेभ्यो डम्यधिकं विभेत्युपहमतयेगानतभीकर हो, श्रीलक्ष्म्यप्रमरेघ वेशव्रनिता तु सोपचार्या भुषम् ।" इति ।

सच समाचार प्राप्तिको] इसलिए सुना रहा हूं कि हे तान ! पुत्रे मोर पौत्रोंके द्वारा किए जाने वाले किसी भी बड़े कार्यमें श्राप हो साक्षी हो सकते हैं [इसलिए यह सच समाचार श्राप्तिको सुनाया है] श्रापने भुजबलकी प्रसारकेलिए श्रथवा प्रभिमानवश होकर नहीं [सुनाया है] । भोमसेवि यह सोपातस्भ वचन इस लऋणसे 'श्रधिवल' श्राह्णका उदाहररष होता है ।

(१२) मार्ग— श्रन 'मार्ग' [नामक सन्ध्यंश] स्वार्थहेतुकं श्रप्रकार निष्प्रयोजन करता है— [सू० ६६]—तत्प्रायोक्तृकं वचनं कृतं तात 'मार्ग' [कथनात्सर] है । वास्तविक वातका साकाश्र्य स्वपसे यत्न होनेपर भी प्रकृत प्रकारके साथ [उसके विरोध रूपसे] सम्वद्ध होनेपर 'मार्ग' [नामक श्रप्र कथनातात] है । जैसे मुद्राराक्षसमें— "राजा—[प्रविष्ट होकर स्वगत कहते हैं] राजधर्मका पालन करसेले द्वारक राजाके [पदि राजा श्रपने स्वार्थीको प्राप्तनता देता है तो] स्वार्थपरता राजाओंको दूसरोकं कायं करनेसे रोकती है । [पदि दूसरके लिए] श्रपने स्वार्थीको छोड़ देता है तो निश्चितरूपसे [वह] श्रयथार्थ होता है । [प्रपयायं] राजा नहीं रहता है । श्रोर यदि स्वार्थीको प्रपेक्षा परार्थीताको प्राप्तनना दो तो श्राप तो दूसरके श्रधीन हो जानेपर श्रनवश्रत [राजा] भी प्राप्तनदर्शक भोग फंसे कर सकता है । प्रोर जितेइन्द्रिय राजारमिको द्वारा भी लल्मीकी प्राप्तनना यहो कठिन है । कयोति— [प्रपयत्न] लोभाके वशीभूत [हो जाने] से [श्रापो] पद्मासनित होकर भी नष्ट किए जाते हैं। [दूसरोकं द्वारा] परमादिन होनेपर श्रापते नहीं दिखती है । श्रुतोंसे हित करतो है, श्रोर पमि विद्वानोंके पास भी नहीं रहतीं है । नृोंमें भी मद्धा हरती है, श्रोर घरापन्त भोरपोंका भी उपहास

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यथा वा रघुविनासे चतुर्थेऽङ्के—रावणः—[मविगाढम्] "लोकेश्वरं त्रिदशशार्पदृशे विराजो, राघवतु, कामनचरे जनकतनुमजायाः। सौन्दर्य-चिक्रम-कला-विभवानपेक्षः प्रेम्णां विचारविमुखः मलयु कोऽपि पन्थाः ॥"

एतत् तत्रचार्थकथनं मामान्येनोक्तर्मपि प्रकृतेऽत्न महावध्यत इति। (८) यथा रत्नावलीदर्पणप्रस्तुतेऽत्र श्लोकः—ग्रामस्यादर्शयां स्त्री स्वमात्रविग्लासिनीयत्र यत्रोपवीतवद्धां गुटिकां विदूषक • । "विदूपकः—[प्रविश्य मस्मयप्रसाद] परितायते परित्रायते भवं । [ परित्रायतां परित्रायनां भवान् । इति मंस्कुत्रतम् । ] राजा—किमेतत् ? विदूषकः—भो ! मपेक्ष्य मित्र मदृशो । [भो ! मपेक्ष्याग्निम नश् । इति मंस्कुत्रतम् । ] मर्वे विदूपक हरत्कवा चिपण्णा: । राजा—कच भवान् परिभ्रात:? विदूपकः—देवं पेक्किस्सं लि श्राचारपुरखम्म कारणा परदवग्गा णडु हिद्द । तहि च ग्रामादर्शयथवगम्म परमारिदे ग्रामाद्दथ्ये कोऽरइविलिगदेसु मप्पहपेक्खु कालेसु हिदु लंभिदं । डमालि दुक्खेसु ठाडावण्णाण । भरतो है । द्रत प्रकार तरप-प्रस्तार प्रोदिते यस्माकं समान सर्वो चड़ी भणिताने वदानं प्रातो है । महां तत्वार्थंक प्रकृतो सम्बद्ध रूपमे यवन् क्रिया जवा है द्रसलिए यह 'मागं' नामक पंगका उदाहरता है । ययथा जैसे रपुत्रिलालसके चतुयं प्रन्थुने रावण विप्राद-पूर्वक [बहता है]—देवतामुखे भो दंपंश अपहरतां करनेवाले सदृशं प्रपोद्धवर् [मुख रावण] में प्रति सीतामा यैराग्य है [प्रपातु मुख रावणको तो नहीं घातती है] प्रोर धन-यनं भत्करणेवाले [रामचन्द्र] के प्रति राग है : नित्यचय होइ प्रेमत्रा मांगे सोऽदयं, विक्रम, कला प्रोर यंभयको उपेक्षा करनेवाला भोर प्रविचारविहोन होता होता है । मह यद्यपि वातत्क थयन सामान्य हवमें उक्त होनेपर भो प्रकृतत्रे सम्वद्ध है।

(९) यमरथादर्शक—प्रथ यत्रस्यादर्शय [मामरे मंस्तं-पहें प्यारहं पज्जत्त नि(दवखा जत्ते है । [मूल =9]—द्रस 'यत्रस्यादर्शय' [हरसन्तार] है । जं मात्तिविराजिनीयं यन्रोपवीतंमे प्रगुडेतेऽपि चिरूपक [मापर पयत्ताने हुं करता है—] मचाइए पाप मुम्हे मचाइए । मजा—घरे घर वय्या हुवा ? विदूषक—घरे सांपने चा तिसा है । [मय दिस्सुमरहो) देन्तसर निम्म हो जाणे है]। राना—कुम महा! घूम वरे थे? पिदूषक् - कुम्हारे वय्य मा रह्या पा द्रस्माणि पाश्शार्तपं वुल्ल मेनेसु जिण । प्रमहयणंमे मया पा । वया ! मन्तोरह मरत्ताने नेतेऽह [निअ राव मन्तावने हो] कालार समाण मोत्तने पार विआ दे सो ताण [भो] है ।

यथ यत्रस्यादर्शय [मामरे मंस्तं-पहें प्यारहं पज्जत्त नि(दवखा जत्ते है । [मूल =9]—द्रस 'यत्रस्यादर्शय' [हरसन्तार] है । जं मात्तिविराजिनीयं यन्रोपवीतंमे प्रगुडेतेऽपि चिरूपक [मापर पयत्ताने हुं करता है—] मचाइए पाप मुम्हे मचाइए । मजा—घरे घर वय्या हुवा ? विदूषक—घरे सांपने चा तिसा है । [मय दिस्सुमरहो) देन्तसर निम्म हो जाणे है]। राना—कुम महा! घूम वरे थे? पिदूषक् - कुम्हारे वय्य मा रह्या पा द्रस्माणि पाश्शार्तपं वुल्ल मेनेसु जिण । प्रमहयणंमे मया पा । वया ! मन्तोरह मरत्ताने नेतेऽह [निअ राव मन्तावने हो] कालार समाण मोत्तने पार विआ दे सो ताण [भो] है ।

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देवं प्रेक्ष्यषे इत्याचारपुष्पस्य कारणात् प्रमदवनं गतोडस्मि । तत्र चाशो- कस्तवकस्य प्रसारिते हस्नाग्रे कोटराविनिर्गतेन सर्पेणुपेया कालेनासिम लब्ध । ईभौ दंष्ट्राग्रयौ ।

स्वत्र राजप्रसादपरीक्षार्थं विरूपणेऽपि केनतभीषटव न्नतस्य स्रसत्या सर्पदंशता प्रकाशितेति ।

क्रोध-हृपोदिसम्भृतावेशगर्भितं वचनं तोटकयति भर्त्ति हृद्यमिति तोटकम् । यथा रामाभुदये चतुर्थेडडके—

"इदंद्रजित्—तात ! विमिदमनुचितमाररध तातेग्, यदयमकारड एव कुम्भ- कर्णः प्रतियोध्यते ! किमत्र न कर्षिन् ऋद्रतापसोपपदान्य सम्भाविततातेग् ! श्राप च- रज्जोवोरा हढोर प्रतिफलनदलताकालदण्डप्रचण्डा, दोर्देएडकाएडकएडोविपमजिकपाएडाग्रासितदशेएधरेग्ात्रा । यावत् कामं न नाम स्मृतिपथमपथप्रस्थितेनेन्द्रानुसारो, स्ववर्गनिक्लिष्टेष्टं यथेमहोऽपि तं त्रिसृतां मघवाद ॥

एतत् क्रोधा दावेभ वचनम् । यथा वा रघुविलासे चतुर्थेऽडके रावण —

इसमें राजाके प्रेमकी परीक्षा लेनेके लिये विदूषकने ऐतिहासिक क्रोधके चिह्नोंको भूत- मूठ सर्पदंशके रूपमें प्रकाशित किया है [ग्रत्न यह 'प्रसङ्याहररप' का उदाहरण है] ।

(१३) तोटक— ग्रव तोटक [नामक गर्भसन्धिके तेरहवें ग्रङ्कका निर्देश करते हैं] —

[किसी विशेष भावसे] गर्भित वचन 'तोटक [कहलाता] है ।

क्रोध, हृपं, प्रादिसे उत्पन्न क्रावेग युक्त वचन, हृदयका तोटन श्रथवा भेदन करता है इसलिये 'तोटक' [कहलाता] है ।

"इदंद्रजित्—हे तात !"

जैसे रामाभुदयमें चतुर्थं ग्रङ्कमें— 'अपने यह मया श्रनुचित धाम प्रारम्भ मर दिया कि बिना वात के ही कुम्भकर्णों जाग रहे हैं । क्या आपने यहाँ किसी शत्रुमे शुद्र तपसाका उपमवं गरमानेके लिए ह मयं नहीं समभा शत्र— जिनके पुष्ट वक्ष स्थलोपर पड़कर वाससथ्य दण्ड भी तण्ढ लण्ढ हो जाता है इस प्रवारके प्रचण्ड, श्रोभुजदण्डोंमें श्रधानक उठी हुइ शुजलोके लिये शुजलाब्द जो पर्वतोंको भी हिला डरते हैं इस प्रकारके [दत्तिरपाली] राक्षस योरोंकि श्रोश्रापका ध्यान नहीं गया तो शोई वात नहीं है, कि तु [समयप्रस्थित प्रयात] भागते हुए हनुम्रा भी पोत्पा करने वाले श्रोश्रांगसोक्तं रहते दाले जिसको भयभीत होकर देगते हैं इस प्रकारके मेपनाथ हो श्राप संते भूत गए [जो दूता श्रमहकारों जागते लये] ?

यह [मेघनाद] प्रोषरे क्रारएा प्रावेगमप वचन है ।

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वक्रमाषि दे ! ईषत गायत तारतारं, नेत्राऽऽपि ! चुम्वत विहस्य च करोषि पालीः । दोर्घेक्षितयः ! कुरुत क्रषहवदंशं च, श्रीराषां नतु विदेहसुता रिरंसु: ॥

[४] विधामर्शसम्प्रयोगेनाप्ति ह्याप्त्यादिप्रतिपादनम्— [सूत्र ८०]—स्ववक प्रसंगः सम्फेटरोडपवादस्यादनं मृति: । सेदो निरोधः संग्रामो भत्नेयुरुपपत्तो नयः ॥ शक्ति-प्ररोचना-दान-व्यवसायास्तु मुख्यत:॥ नयोदेशांगान्यामर्शे द्वयार्दीनी नव प्रयोगनमपेद्यं गौष्ठतया रध्यन्ते । शस्त्यार्दीनी चरवार्दि पुनः प्राथान्येन्। (१) अथ द्वय— [सूत्र ८१]—ह्यः पुष्टचत्निकरः ।।४९।।

ह्यः पुष्टचत्निकरः ॥४९॥

वस्तिक्रमो मार्गान्चालनम् । यथा वस्तावल्यान् मंत्रिहितन् भतांरमचगरुष्य विदूपनस्य सारिकायाश्च रामवहततया वचनयर्निमित्तम् ॥७५॥

रावण—घरे [मेरे द्वार] मुत्तो ! तुम लोग [प्रमत्त होकर भूय] तेसो मोर नाम्रो । हे नेत्रो ! तुम प्रसन्ननाने [फँल-फँल कर] नानोंक जुन्दन करो [नानों तक फँत जाम्रो] । हे भुझवल्लियो ! तुम खूब नाचो कयोंकि आज बंदेहेो रावणके साय रमाए करना चाहते है ।" यह [रावणका] हुपंसे प्रवोधगमय वचन है । ये गमंस्तःथके तेरह मड्द हुए ॥७५॥

[४] गामरां सनिघंने तेरह मड्द— पर ! गामरां सनिघंने मड्दोंभो व्याथ्या करनेके लिए उनके नाम गिनाते है—

[सूत्र ८६]—१ ह्यः, २ प्रसंग, ३ संफेट, ४ मपवाद, ५ दादान, ६ मृति, ७ सेद, = निरोध, मोर ९ सरंभ ये नौ [विमर्शान्तःपक्षे] गिन्त्र पड्त्र है ॥८६॥ [सूत्र ८७]—१० मक्ति, ११ प्ररोचना, १२ दान मोर १३ व्यवसाय ये चार मुख्य पत्त्र हैं । इस प्रकार गामरां सनिघंने तेरह मड्द होते है । ह्यः पादि गो परम प्रयोगनें च्यारुमार गोष्ट्र दरमे निपड्त् किए जाते है, मोर मक्ति पादि चार मुख्य हपने निनयड होते है ।

(१) पद्य 'ह्यः' [नामक विमर्शान्तःपक्षे] प्रद्यम पत्तृक्त् निष्परा करते थे— [सूत्र ८०]—पूर्वयोंदो मक्तिप्रद्म वरना 'ह्यः' [हरणाना] है । वस्तिक्रम मर्पात्न मांगे हट जाना । जंने रावणनेंमे तामने उपचियत भर्जा [क्ताराम उरवन् ] हेो उवेदित होकरने मागघदतांनं द्वारा विदूपक तथा मार्गनिदर्शक्यो वपयाना ॥७०॥

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प्रसंगो महतां कीर्त्तिः संशयद्रनम् । यथा वेधीसंहारेऽपठेऽङ्के—युधि ष्ठिरः—[मुखं प्रद्याल्य उपस्पृश्य च] वप तावद्लाज्जलि गौड्रे याय गुरवे प्रतिपत्समहाय शोभनत्वने । श्रेयसापि पितृसोममहाय विचार्यतां चिरं । [समया] तातस्य श्रयुनाऽऽसर । श्रेयसापि तत्क्षभवते स्वर्गस्यितताय गुरवे सुपुत्रीतम्नाम्ने पित्रे देवाय पाण्डवे ।

(२) स्थाय प्रसंग :--[सूत्र ६२]—प्रसंगो महतां कीर्त्तिः करते हैं श्रथ्यादि कयन करना । जैसे वेधीसंहारके छठे श्रङ्कमें—"युधि ष्ठिर—[द्रोपदी के प्रति]—स कीचकनिपीडितोऽक हिडिम्बश्रकर्मोरहः, मद्रान्धगमगधाधिपद्विरदसनिधिभंगाशनि । गदा-परिघशोभिता सुजुगुप्से तेनाऽऽन्वतः । प्रियसखव ममानुजोऽसि नगुरुर्यतोऽसत किल ।।" छत्रे मोहातिपास्वेन रौद्रसेन स्थलीकृतिभीमवेधक्यनौतु युधिष्ठिरस्याशु शोकः ।

(२) स्थाय प्रसंग [नामक विमर्शो सन्चिके द्वितीय श्राङ्कका निहपारा करते हैं]—महान् [पूर्वज] लोगोका कीर्त्तन करना ‘प्रसंग’ [नामक श्राङ्ग कहलाता] है । ‘युधि ष्ठिर—मुको धोकर शौर ग्राचमन करके [ग्रपने पूर्वजोंको जलाञ्जलि देते हुए कहते हैं]—प्रभो ! उनका कीर्त्तन करते हुए कहते हैं] सबसे पहले यह जलाञ्जलि मंगस्तनय पूज्य प्रपितामह शान्तनुकेलिए है । यह दूसरी जलाञ्जलि पितामह विचित्रवीर्यकेलिये है । [रोते हुए] प्रभव पिताजौकी वारो वारोती है । श्रध्या यह [तीसरी जलाञ्जलि] स्वर्गालोकवासी पूज्य शोर गुरुहितनाम्ने पिता पाण्डुकेलिए है ।

इस वचनमे जलाञ्जलि देते समय युधिष्ठिर द्वारा ग्रपने पूर्वज महानुपुरोके नामो का कीर्तन किया गया है मत यह ‘प्रसंग’ नामक ग्राङ्गो संधिके दितीय श्राङ्कका उदाहरण है । कोई लोग श्रप्रस्तुत श्रथयके कथनको ‘प्रसंग’ मानते हैं । जैसे वेधीसंहारके छठे श्रङ्कमे—"युधि ष्ठिर—[द्रोपदीके प्रति]—कीचकको मारने वाले, शकुनि, हिडिम्ब श्रोह कर्णीर [प्राणि राक्षसोंकर] नाम धरने धाता, मदमत्त मगधराज [जरासंध] हय हयायों सन्धियोभे भनत करने धाता, वध्य श्रोह गदा तथा परिघ [नामक ग्रस्तो] से दोभित उन [शत्रुपूर्व दाक्ति शालियो] मुजाम्रोते मुक्त, तुम्हारा प्रिय, मेरा छोटा भाई श्रोह भ्रजुन नकर ज्येष्ठ भ्राता । [ध्यात्यभ् भीमसेन, धनुर्जयो महाराजे मही बेनावटां तपस्वी [द्वयोधनह पशुपातो] ताकस्तने भूत-मूत श्रोह मोने यात बहुशर युधि ष्ठिरस्यो मप्रासङ्कि शोकमे डाल दिया है [मत यह प्रसंग नामक श्रङ्ग !

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सम्फेटः क्रोधजं वचः।

(३) प्रथ सम्फेट:- [सूत्र ८२]—सम्फेटः क्रोधजं वचः । परस्परं क्रोधजनमोत्तर-प्रत्युत्तररूपः संलापः सम्फेट । यथा चेषीसंधारे— "भीमः—भो कौन्तवराज ! कृतं चनघुनाशदर्शनं मन्युन । मेने चिपादं कृथा: पर्याप्तः पाञ्चवः समराय श्वश्रुमसद्राय इति । पञ्चानां मन्यसे डरमाकं यं सुयोधनः सुयोधनः ! दंशितस्याततशस्त्रस्य तेन तेऽदातु रणोत्सव ॥ इत्यर्थः श्रुत्वा श्वसूयादिमचां निद्धृष्य कुमारे दृष्टि उत्क्षिप्तवान धार्तराष्ट्र- कर्णो—दुःशासनगदातां तुल्यावेव युवां मम । श्रम्रियोडपि प्रियो योद्धुं त्वमेव प्रियसाहसः ॥" इत्येतद् भीम-दुर्योधनयोः परस्परं रोभापन्नम् । यथा वा यादवाभ्युदये सममेऽडके— "वलभद्रः—[स्वगतम्] कथमुपहसति नारद । भवतु [प्रकाशम्]— वृद्धोऽतस्य नृपस्य तस्य नियतं को नाम मज्ञो युधि, व्यपन्ने किल कामभ्रश्य विक्रमस्यः पततां सुनिच्छुरतः ।

श्रोधपूर्वं भवता 'सम्फेट' [कहलाता] है ।

(३) प्रथ सम्फेट [नामक विमर्शों धिके तृतीय प्रट्क्का लक्षण प्राचीन कहते हैं]— [सूत्र ८२]—श्रोधपूर्वं भवता 'सम्फेट' [कहलाता] है । जैसे वेङ्गीसंहारे— "भीम—हे कौन्तवराज [दुर्योधन] ! वनघुनोके नाशको देखकर दुःख होनेकी प्राप्त- यकता नहीं है । तुम यत्न दुःख मत करो कि पाण्डव लोग युद्ध करनेके लिये [पर्याप्त] बहुत से हैं शत्रोर में प्रकटला हूँ । हम पाञ्चालोंमें जिसके साथ युद्ध करना तुम सहज समभो कवचादि धारसा करके शत्रोर राष्ट्र लेकेर डसके साथ तुम युद्धका श्रानन्द ले सकते हो । ऐसा सुनकर [भीम तथा दुर्योधन] दोनों कुमारोंको शत्रोर घ्रुमापन्नवंक देखकर दुर्योंधन कहता है कि— [श्रर्जुनने कसांकका शत्रोर तुमने दु श्रासनका वध किया है । ये दोनों हो मेरे प्रिय ये इसलिए] कर्णो शत्रोर दु शासनका वध करनेवाले होनेके कारसा तुम दोनों हो मेरे लिए एक- जैसे [प्रतिप्रिय] हो, फिर भो, श्रमप्रिय होनेपर भी साहसो तुम हो युद्धके लिए मुझे प्रिय मालूम पड़ते हो ।" यह भीम तथा दुर्योधनका एक-दूसरेके प्रति रोप-भापन्न है [मतः यह 'सम्फेट'नामक पड़्र्सा उदाहरणपा है] । प्रथवा जैसे यादवाभ्युदये सक्कम डके— वलभद्र—[अपने मनमें] वृद्धा नारद हमारी हँसो उड़वा रहे हैं । [प्रकाशम्]— तुम्हारे चौंथने हंसाने नम रावणके साथ युद्ध करनेवाला प्रतिपक्षी होने हो । सबको है जिसका पक्ष स्वयम् नारद मुनि ते रहे हैं [यह स्वपक्ष्योक्ति है] फिर भो फलस्वा विनाश करनेमें

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कंसध्वंसकृतश्रमो मधुरिपोर्वाहू तथाप्याह्वये, त्वामस्थामलवात्तुरुपमचिरादाधास्यत: किंचन ॥ नारद: [सरोपविभव]--कंसांसभित्तिमदमर्दनेकोलितचेतसो-श्रीकृष्णकुलितिज्जगत्संगपिशोंगवातु: । सम्पूरोच्यष्यति हरिरूपगदहृत्संप्रामद्रोहद्मसौ मगधाधिनाथ ॥ इति ।

(४) श्रथापवाद:-[सूत्र ६४]--ग्रपवाद: परीवाद: । परीवाद: स्वपरदोषप्रकाशनम् । यथा पुत्रपौत्रतृतीके पञ्चमेऽपि—'नालज्ञा:--मार्जिता हि नालज्ञस्य मुससममघुर: कालपाश: ! तथाहि—हन्त। पुत्रो हतो भ्राता हतो मार्जितया पिता । तथाप्येतां स्वगोत्रोत्थां निन्दामि च पिच्छामि च ॥' इति । परिश्रम कर चुकेवाले मघुरिपु कुष्टकके दोनो वाहु दुबंल या प्रवबल जो कुछ हैं उसके अनुहप युद्रमें कुछ न कुछ शोभ्रा हो विदलावेंगे । नारद [क्रोधपूरंक]--कंसके स्कन्धोकी भित्तिका मदन करनेंमें चतुर, चमकी चिनगारीयोके ससर्गसे [सद्यदापते] पोष्तबाहु [प्रथ्यात कृपणकका सुदर्शन चक्र भो जिसकें हार्योमे हेंवतल चिनगारियों उत्पन्न कर सकता है यह ग्राधिक उसका कुछ विगाड नहीं सकता इस प्रकारका] यह मगधराज, कृपणकी भो प्रवबल युद्र-कामनाको पूरां कर देगा । यह नारद तथा बलभद्रके रोष-चावय एक-दूसरेके प्रति कहे गये हैं प्रतएव यह भो 'सरफेट'का दूसरा उदाहररण है । (५) श्रव ग्रपवाद [विमर्शांसंधके चतुयं श्रद्धाके निलुपरां करते हैं]--[किसोको] निन्दा करना 'ग्रपवाद' [कहतलात] है । [सूत्र ६३]--[किसोको] निन्दा करना ग्रर्थात् ग्रपनें या दूसरेके दोपका प्रकट करना । जैसे पुत्रपौत्रतृतीकके पञ्चमे श्रद्धुने—'ग्राहारा--मार्जिता [ग्रथ्यात शाकर मिलां हुग्रा दही] ग्राहारके लिए मुखमे मधुर लगने वाला कालपान्न है ! इसलिए इस मार्जिता [शाकर मिले हुए दही] ने यथापि ग्रपनें पुत्र [श्रुत] भो मार डाला [प्रथ्यात दही से घो उत्पन्न होता है इसलिए घो दहीका पुत्र है । किन्तु जब दहीको शाकर मिलाकर खानेके काममें लिया जाप तो उससे घो निसल सकता है इसलिए 'मार्जिता' मिलाकर खानेके काममें ले लिया जाप तो उससे घो निसल सकता है इसलिए 'मार्जिता' देकर मिले दहीने ग्रपनें पुत्रचो नष्ट कर दिया यह कहा है] भ्राता [वत्स मट्ठे] को भो मार डाला है भोर पिता [दध्ं] को भो नष्ट कर दिया है फिर भो ग्रपनें स्वादका नाशा करने घासी इस 'मार्जिता' को सिनर करनां हुग्रा भो मैं उसको घो नहां हूँ । इसम मार्जिता शाकर मिले दहीोकी निन्दा होनेसे यह 'ग्रपवाद' नामकं ग्रद्धा उदाहृत है ।

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ग्रन्थ स्वदोपोद्धाटनमुख। तथा रघुविलासे सप्तमेऽङ्के रावणः प्रति मारीचः— "परशुराम न्यायतेजोभि: शूर ! कौलिनहृदयिनम् । ग्रनोतिन-धूमरी हन्ति यशश्चूताममञ्जरी: ॥" ग्रन्थ परदोपोद्धाटनमिति ।

(y) ग्रन्थ छादनम्— [श्लोक ८५]—छादनं मन्युमर्जनम् ॥५५॥ मन्युरपमानो येन मार्ज्यते तत् छादनम् । यथा रत्नावल्याम्— "सागरिका—विट्टलया पञ्जरतिदो भयवं हुयासङ्गा झाड्ज करिसदि मे सयलदुक्खवससाय त्ति ! [विट्ठलया प्रञ्जलितो भगवान् हुताशनोडव करिष्यति मे मणलहु.स्वाच्छान- मिति । इति संक्षुवम्]" ग्रन्थे तु—कार्योर्थेमहत्यस्याथेयं सहतं छादनमामन्वित् । यथा श्रीशुक्ति- वासकुमारिविरचिते ग्रनङ्गसेना—हरिनन्दिनि प्रकारण नवमेऽङ्के, राजपुत्रचन्द्र- केतुनादूतं कपोलकलायुपगतं नायिकया माधवया नायकेन श्रपितम् । नायकेन हरिनन्दिना पुष्टपलम्नामतं नालस्यां राजवचनतामोचयितुं तन्माथैर्दतिसृष्टम् ।

इसमें [वक्ताने] अपने दोषका [प्रश्यात् निन्दा करते हुए भी पोनेष्ट] उद्भावन किया है । और रघुविलासके सातवें प्रङ्कमें रावणके प्रति मारीच [कहता है]— "हे शूर [रावण] ! नायकके तेजोंके द्वारा ग्रप्रथा हवी दूदिन [मेघाच्छन्न तु दूदिनम्] का नाश करो [ग्रप्रयत्न सीताको मुक्त करनेके ग्रपने उपायका परिज्ञय देकर तुम्हारा जो ग्रपयश सीताहरके कारकप हो रहा है उसको दूर करो] ग्रनोतिकी धूमरी मन्त्रो रूप ग्राघककी उत्तम मञ्जरी नाश कर देती है । [इसलिए ग्रनोतिके मार्गको छोड़ दो] । इसमें [वक्ता] दूसरेके दोषका उद्भावन [कर रहा] है । (v) ग्रन्थ छादन [नायक विमर्श में ग्रभिनेता ग्रभिनयके पश्चात् ग्रभिनीत ग्रङ्कका निहपात करते हैं]— [श्लोक ८६]—ग्रप्रथमानका परिमार्जन्त 'छादन' [कहलाता] है ॥५६॥ मन्यु ग्रप्रयात् ग्रप्रथमानका मार्जन जिसने द्वारा किया जाय वह 'छादन' [नामक श्रङ्ग बहुत्सात] है !

जैसे रत्नावली में— "सागरिक—सोभायग्गिसे प्रज्जलित हुंमा ग्रासिन् प्राज मेरे सारे दु खोंको समास कर देगा ।" ग्रन्थ लोग तो विशेष प्रयोजनके वशारए ग्रप्रसङ्गह् ग्रप्रयंको भी सह लेनकी 'छादन' मानते हैं ! जैसे—श्री मुक्तिवासकुमारके बनाए हुए 'ग्रनङ्गसेना हरिनन्दो' नामक प्रकरणके नवम ग्रङ्कमें, राजपुत्र चन्द्रकेतुके द्वारा दिए हुए नानोके ग्रप्रतीकारके जोडेकी नायिका माधवोने नामकरण करने पराम मेजा था । नायक हरिनन्दोने पुष्टपलक नामक ग्रप्रतीकारको राजवचनतसे मुक्त करानेके लिए उसे उसकी [पुत्रकलन काङ्गरेकी] मालाको दान कर दिया । उस [कृत्याभिरए

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तत्प्रस्यभिज्ञाय च स ब्राह्मणः, पौर्खेपुर प्रकाशितचौर्यो राज्ञाज्ञया वध्यस्थानं नेतुमारब्धः। तन्मात्रां चागत्य हरिनिन्दने निर्वेदिततम्। हरिनिन्दनं च ब्राह्मणरत्नायै चौर्यमार्गनोड्डीनकृत्य श्वशुरो विषोद्गमिति। श्वशुरो विषोद्गमिति। श्वन्ये त्वस्य स्थाने नष्टतनमवमाननमुपमाहु। यथा रामाभ्युदये सीताया परिव्यागेनावमानं नष्टतनम्।

का उपयोग किए जानेपर उस] को पहिचान कर नगरवासियोंने चोरोंकर आरोप घोपित कर राजाकी आज्ञासे ब्राह्मणको वध्य स्थानकी ओर ले जाया जाने लगा। तब ब्राह्मणकी माताने श्राकर हरिनिन्दोसे कहा। हरिनिन्दोने ब्राह्मणरत्नाके रक्षाके लिए स्वयं चोरी करनेके अपराधको स्वीकार कर श्रपभ्रंशको सहन किया। यह 'श्रादर्श' नामक ग्रन्थका उदाहररए है। ग्रन्थके लोग इस [ग्रादर्शे] के स्थानपर 'ग्रवमान' रूप 'छलन' [प्रकृत] को मानते हैं [ग्रादर्शको ग्राग नहीं मानते हैं]। जिसमें राम ग्रभ्युदये सीताके परिव्यागेने किए गए 'ग्रवमान'को 'छलन' नामक ग्रङ्ग कहते हैं।

"युधि ष्ठिर:-[ शत्रुश्रेणि मुज्चन चार्वङ्गमाह]-- सर्वथा कथय ब्रह्मन् संदेशेपाद् विस्तरेए वा। वत्स त्वं किंरपि श्रोनुमेतद् दत्तमुरो मया ॥

"युधिष्ठिर--[रोते हुए चारोंभ्राता कहते हैं] -- हे ब्रह्मन्! संक्षेपसे या विस्तारसे जंसे चाहें ग्राप कहिए। वत्स [बेटा] के किसी भी रामाचारको सुननेके लिए मैंने हृदय तैयार कर लिया है।

राक्षस:-श्रूयताम्--तरिमल कौरव-पार्थयोगुरुगदाघोरध्वनौ संयुगे। द्रौपदी--[लघुसंधान] श्रथि तदो किं ? [श्रथि ततः किं ? इति संक्षिप्तम्]। राक्षस--[ श्रात्ममातम्] कथं पुनरतया लघया संज्ञा। श्रथ महरामस्यस्याः प्राप्तवान्। [प्रकाशम्]--सीरी तत्स्थामागात्सचिरमभूत्तस्याग्रतः संभार। कङ्कुकी--नूनं तस्क्रोनोट्र कङ्क्रिनपचारो भविष्यति।

राक्षस--[रयागत] श्रच्द्य यह तो फिर होनमें ग्रा गई। प्रभो इसके प्राप्तोंका ग्राप- हरता हूँ। [प्रकाशरूप कहते हैं]--उसी समय चलरामजी वहीं ग्रा गए और उन्होंने सामने बहुत देर तक [भोम तथा दुर्योधनक] युद्ध होता रहा। कङ्कपक्षी--निःसन्देह ही उसने द्वारा किया गया कोई मनिट्र हसमें उपरिगत होना।

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ग्रालस्यं प्रयशिष्यतां तु हृदिनासंध्या रद्रः सकृतो यामासान्न हुताश्चमः प्रतिकृतं दुःशासनार्चि गतः । इति श्रात्र तवसेन वयामाश्चः ऋतुः ॥४७॥

(६) श्रात्र शुति:— [पृष्ठ ६६]—तिरस्कारो शुति: यथा कृत्यारावेशो मनोदर्शी प्रति श्रंगद:— "मा ग्रामिनिष्ठ पुनर्नैज लघ्वामिनो गर्वा पुनः श्रीयतां, यच्रात्ते भुवशैलेः पितमहेो विद्रावखो रावणः । मदूदाहुद्रद्यपक्शान्तरगता मूढे किसाकनन्द्मि, मिहर्यान्कमुपागतातमिव मुगोो कस्चां परित्रास्यते ॥" तर्जनोद्रेजने शुति केचिदिन्द्धन्वित । श्रापरे तु तर्जनार्पणो शुति मन्यन्ते । तदेतन्मतद्वयमध्येऽभेदानं मग्रहीतममेव मन्यस्तपि मालानुपारम्पर्येण वानर- पक्षं वास्यं सृ तिरेव ।

(७) ग्रथ रेख.— [पृष्ठ ६७]—रोषः श्रमः क्राय-मनोद्रवः । यथा विक्रमोर्वशीये पुण्डरीक:— राक्षम - वलरामजीने अपने प्रिय निल्यम् [दुर्योधन] का पक्ष लेकर चुपचाप बैठा ऐसा संशेत किया जिसकाो प्राप्त कर कुत्रराज [दुर्योंधन] मे दुःशासनखो मारने थाने [भोमसेन] से दुरासनरे [दुपदरा] यदलर से लिया [श्रथ्यन्त्र भीमसेनखो मार डाला] । यहाँ तपस [सेयधारी रावण] मे वयामोश उत्पन्न कर दिया है ।

(८) धव 'धृति' [नामक श्रग्रामें सनिप्रये धृतेः श्रभ्रया निस्पत्या करते हैं]— [पन्न ६५]—तिरस्कार करना 'धृति' [श्रहंकार] है— जैसे क्रुराचारावेशले मे मनोदरोके प्रति श्रंगदः [करता है]— "मत जाम्रो, ठहरूो, मद्दा किर चले, तनिक इधर हट कर तो हो जाम्रो, जर्हाँ पर भुनाचोचे पराक्रममेें प्रभिमानितेो पूर यह [रामचोजो] भयभीत होनें याम्रा रावण [निश] है । घरो मूखों ! मेने दोनेो भुनाम्रों पझरमेें पड़ो हुँई तू [चिल्ला निग् लिए रहाँ है । इतह्मे पज्ञेमें फंसेो हुं हरिक्रोरे समाल प्रय कौन गुहखोरे वचा सकता है ?" कोई लोग दारनेम्रयदाने [तर्जन उचैःजनेन] यो 'धृति' कहते हैं । क्रूसरे लोग द्वारने पोश टनेलो 'धृति' करने हैं । इन दोनोो मतोंमेें प्रवंधा नेद न होनेमे [इनोो धनि सझान्ने मोनेर] मपर रो गया है । दमोो प्रकार तारतम्य या परम्परामेने दचय ग्रपन-गरक वाशय भी 'चृति' हो मानें जाने हैं ।

(८) रेख प्रव 'रेख' [नामक ग्रग्रामें सनिप्रये नामस यथ्था मर्हाक चास्रि करने हैं] [पन्न ६५]—श्रारोश्या मातृ'भार धम नः' [एष्यमातः] है । जैसे क्रोधोद्रेकोमें पुष्टरचा [करने है]—

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"अ्रहो श्रान्तोऽसि" भवतु श्यास्तावद् गिरिनद्यास्तीरे स्थितस्तरगवान् सेविष्टे ।" इत्यादि । श्रात्र कार्यिक । तथा रघुविलासे सप्तमेऽङ्के रावण —[सखेदम्]— "हु स राक्ष स जितो जितो श्रृत-श्रुत कैलासशैलोऽप्यरे ! कार्तिक कातरविमुख जगत् 'प्रतिभट्नप्रतापतिमिरैकभूभि ! यारुथा प्रति वन्युव-धनकथा लकापतेर्जीवित, कर्ंषु प्रथते किमन्तमनया नीतं न विस्फुरितम् ।"

श्रात्र मानस । तथा कृत्यारावणो लङ्कमे — "मार्गोः कण्टकिन प्रतनसिकतापांशूकरा लघिचर, ज्ञाता त्रिजगतां निकामपरुषा स्थूलोपला भूमयः । भान्तं ह्रेमयुगेऽद्रिनादजलनितत्रासै समं दनितंभि ? पीतं च द्विपदानरोजिकलतुपङ्यासगतिक्त पयः ।।" श्रात्रोभयज । यथोक्तं श्रमोऽत्रेऽपि गवितकदर्थयो व्यमिचारिमध्ये लच्योभ्यन्ते, तथा च रसादिरूपपुष्टस्यैव सङीगावसरै लच्यन्ते । इति । (५) श्रथ विरोध —

[मत्र ६६]—विरोध: प्रस्तुतत्ज्यानि:

"ग्रारे बडा धक गया हूँ । श्रप्रत्न चलो इस पहाडी नदीके किनारे बैठकर तरङ्गों वायुक्र सेवन करूँ !" इत्यादि । इसमें सारीरिक [श्रम दिखलाया गया है] ! ग्रोर रघुविलासके सप्तम प्रदृशे रावण [विदूषक कहता है]— "हु उस इधरको तो बार-बार जीता था । ग्ररे ! उस कनकत प्रवंतको भी बार-बार उठाया हो था । ग्रोर प्रत्येक भुजमे तलवार पकडकर इस पारे जगत्कोे एक चार घावान् किया हो है किन्तु ग्राज रावणके जोते-जी उसके वधुप्रोंको परडनेका जो यह प्रस्तु ग्रारंभ हुग्रा है ग्रोर कालनेमि पहुंच रहा है । उसने क्या उस मारे दर्पका नाश नही कर दिया है । इसमें [रावणेहं] मानसिक [श्रदिका पर्यंन्त है] । ग्रोर कृत्यारावणो लङ्कमे [कहते हैं]— "वारो ग्रोर जलतो हुइ वातू तथा धूल कुश्रा-करकटसे भरे हृए मार्गोंम चलनार पडा । पहाडोंकि प्रत्यंत कठोर ग्रोर बडे-बडे परयरोसे भरी हुइ भृमियोंको पार करता पडा । मत तहोंके गर्जनसे भयभीत हुएहुयिप्रोंके साथ वनमें घूमना पडा ग्रोर हृदयों मदरे कवुप्ति सम्पर्के कारस्र तिक्त पानी पीना पडा ।" इसमें [सारोरिक ग्रोर मानसिक] दोनों प्रस्तुतस्र [श्रद पाया जाता है] । यथोक्तं धम उड्रेग विलर्तं प्रादिते लचाय व्यभिचारिभावोंके प्रसंगमे किए जावेंगे फिर भी रसादि चिनेय पुष्टिंने लिए सटीपयोंके ग्रत्नोंते प्रस्तुतने यहीं ने उनके तसार मर दिए गए हैं । ( ६ ) श्रथ विरोध [नामक विमर्शंने] परे प्रस्तुत प्रकरणा लक्ष्य श्रादि करते है—

[श्रत्र ६७]—प्रस्तुत पर्यंको हानि 'विरोध' [भरताना] है ।

१ प्रतिभट !

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प्रस्तुतस्य कार्यस्य यानि श्रात्ययो विरोघ इव 'विरोध' । यथा कृत्यारावणयोः सप्तमेड्के—

प्रस्तुत कार्य में जो हानि पर्याप्त नाश विरोधं समान होनेसे 'विरोध' [अर्थात्] है । जैसे कृत्यारावणके सप्तम अङ्कमें—

"कञ्चुकी—[लक्ष्मण तथा विभीषणके प्रति] कुमार ! एतत् । उभौ—किम् । कञ्चुकी—श्रृणु एवम् । उभौ—श्रृणु । कञ्चुकी—कः मति: ? श्रृणुताम् । आaryā स्तनु सीता रावणाज्ञया किकरो—पतौ भर्तुं मां याशिरिटोचव्लोक्य सप्तोभिरावृत्यमानापि निःकृतप्रयोजना 'नाहं—रमान्क्लेशयामि' इत्युक्त्वा— सर्वे—किं कृतवती ? कञ्चुकी—यत् न गम्यते चक्षुः। शशिन इव कला निशागवसान' कमलवनोदरमृदुसुके व हसौ । पतिमरपरासेन राजपुत्री श्वशुरितकुरालश्लाघि विçेश वह्निम ॥"

'कञ्चुकी—[लक्ष्मण तथा विभीषणके प्रति कहता है]—कुमार ' यह । दोनो—क्या ? कञ्चुकी—श्रृणो [सुनो] । उभौ—श्रृणु [सुनो] । कञ्चुकी—कः मति: [क्या बात है] ? श्रृणुताम् [सुनो] । आaryā स्तनु सीता रावणाज्ञया किकरो—पतौ भर्तुं मां याशिरिटोचव्लोक्य सप्तोभिरावृत्यमानापि निःकृतप्रयोजना 'नाहं—रमान्क्लेशयामि' इत्युक्त्वा— सर्वे—किं कृतवती ? कञ्चुकी—यत् न गम्यते चक्षुः। शशिन इव कला निशागवसान' कमलवनोदरमृदुसुके व हसौ । पतिमरपरासेन राजपुत्री श्वशुरितकुरालश्लाघि विçेश वह्निम ॥' श्रात्र सोतप्रत्ययानयस्य प्रस्तुतस्य विरोध । श्रातृभ्यो तु शत्रो—द्विषतोः स मित्रायते । द्विष्रद् द्विषन्तं तु पठान्ति । न तु द्विषो वन्ध—नध्याधवसायादि । यथा दुष्यन्तरामे—

प्रस्तुत कार्यंकी हानि पर्याप्त नाश विरोधं समान होनेसे 'विरोध' [अर्थात्] है । जैसे कृत्यारावणके सप्तम अङ्कमें—

'कञ्चुकी—[लक्ष्मण तथा विभीषणके प्रति कहता है]—कुमार ' यह । दोनो—क्या ? कञ्चुकी—ग्रारे यह । दोनो—ग्रार्य । कहिए—कहिए [क्या बात है] । कञ्चुकी—क्या करें । श्रद्धया शुनो । प्रार्थ्य सीतानने रावणेभ्यो ध्यात्वातो नोकर द्वारा सारे गए [स्वामी] रामचन्द्रके [कटे हुए] वनायटी सिरको देखकर, ससीमोक्षे द्वारा प्राणघातन दिए जानेपर भी 'प्राय [मेरे] जोनेवर प्रयोजन सामने हो गया ऐसा कहकर—

सच सोभ—क्या किया ? कञ्चुकी—जिसको कहा नहीं जा सकता है । 'रात्रिशो समासुप्त चçद्रमाकों बलात्के [तमाप्त हो जानेसे] हतमान, उत्सुता होसोले रमस वनोद्रे भोत्कर [समा जाते] ये समान, पतिमरे मरायेवे तमसे राजपुत्री सीता भयकर उवालें जिनमेले निःस रहें हैं इस प्रकारभी ध्यातिनमें प्रवृत्त हो गई ।" 'विरोध' नामक प्रथम भङ्गका उदाहरण है ।

इसमें दोनो पत्नि] को नहीं मानते हैं [उनके द्वारा पर] 'विद्व' तथा 'विकलन' [पत्तों] को मानने हैं । जिनमें वच नायमा व 'पनने निर्वचनो 'विवक्ष' करते हैं । जैसे 'पुरनाराम' में—

२ दिनावसान ।

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"येनावृत्य मुखानि साम पठतामस्तनमायासितं, वाल्याद् येन हतताञ्चसूत्रवलयप्रत्यर्पितं कीडितम् । युष्माकं हृदयं स एप विश्रपेवारापूर्विसंस्थलो, मूर्छाॅवोरतम प्रवेशाविवशो वध्वा लवोनीयते ॥" इति ।

वधादयवसायस्तु मृच्छकटिकायां चारहदत्तावपय । तथा रत्नावलयाम्— "परिजनेवदत्सा। श्रूयताम् ! यां तु श्रुत्वा श्रवणौ करिष्यो भवाभि पेतां मप् निर्याय हृदयाद् सपदा सारिकया विचरर्जति । इति । [आर्यपुत्र ! ननु रल्वारम्भ कार खालू भणाम्येपा मम निश्चितहृदयया: सम्पत्त् सारिकया विपचते । इति संस्कृतम ] ।" शत्रु साररिकाया बन्धवधाग्निर्भाविद्रवः । तथा वेणीसंहारे— "युरिःषिट्ठर —क कोड्र । सनिपत्थं धनुरुपनयीतताम् । कथं न कञ्चिन् परि- जन् । भवतु वा, बाहुयुद्धमम्भावनाविहतंसेन् दुरात्मानं गृआधमालिङ्ङय दर्वालितं- दवलननर्मामिपतामि !" इति । शत्रु सम्भ्रमात्मको विद्रव । इति । शौर्येकुल्त विद्यारूपमौभाङ्यादिसम्भवमात्मविकसनस्थ नु विचलनम् । यथा वेणीसंहारे पञ्चमेऽङ्के— "ताथ ! प्रभो !

"जिस [लव] ने सामवेदका पाठ करते हुए [ऋत्विज्जनरियोका] मुख बन्द करके उनकेो बडा तग किया । जिसने बचपनके कारए उनके श्रकसूत्र शौर वलय ब्रादिको धोअनकर फिर देकर कीडाएं कीं, तुम्हारे हृदयके समान [प्रत्यन्त प्रिय] बानोसे जिसका कन्धा भग हुंआ है श्रोर मूर्छाॅवोते गहन श्रप्रधकारमे पहुँ जानने कारएा विवश उस लवको [तुम्हारे सैनिक] वांधकर लिए जा रहे हैं ।" [यह वगधनाध्यवसायका उदाहररसा है] यधके श्रध्यवसायस्रा [उदाहरण] जैसे 'मृच्छ- कटिक'मे चारहदत्तके विपयमे [पाया जाता है] । शौर जैसे 'रत्नावलो'मे— निदंयाफी सम्पत्ति सारारिका [इस ग्रन्थमे जलकर] मरियो जा रहो है । इसमे साररिकाके बन्ध तथा वध प्रादि [दोनो] के होनेके कारएा 'विद्रव' [मझ पाया जाना] है । श्रोरे 'वेणीसहार'मे —

"युरिःषिट्ठर —ग्ररे ! यहां श्लोक है ? तूरोपर सहित धनुप साम्रो । ग्ररे, कोई तो गर नहीं जान पडता है । ग्रन्था रहनने दो ! वाहुयुद्धस्नो सम्भावनायें कारएा [ग्रस्त्रमे रहित] शाली हाथ वाले इसका जोरसे पकडकर प्रद्ववलित ब्राङ्गिमे हूदा पडता हूँ !" इसमे सम्भ्रम रूप 'विद्रव' है । श्रोर 'वेणीसहार'के पञ्चम पड्र्को— 'हे सात ! हे मत्त !

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सकलरिपुजयाशा यत्र वद्रा मुहैस्ते, तृणामिव परिभूती यस्य गर्वेण लोकः । रणशिरसि नितान्ता तस्य राधासुतस्य, प्रणमति चरणयोर्वा मध्यमः पाण्डवोऽयम् ॥ श्रपि-च तात ! नृणां तव शेपशौर्यः जीबो दःशासनमुखः । भक्तवामुपोधनस्योक्त भीमोऽयं शिरसार्चति ॥" इति । अत्र स्वगुणाविष्करमात्रं विच्चलनमिति ।

(द) अथ संरम्भः— [सूत्र ६६]—संरम्भः शक्तितर्कीतनम् ॥५६॥ संरम्धानामुत्तर-प्रत्युत्तरेया श्रात्मशक्तिभाप्रं संरम्भः । यथा चेष्टीसंदारे दुर्योधनं प्रति कमाद— "भीमः—अन्यच्च मूढ ! शोकं स्त्रीवध्रनममलिलैतन् परित्याजितोदसि, जातु वेगःस्थलविधट्टने यत् साधीकृतोदसि । ग्रासीदतन् तत् कुनुपतेः कारगां जीवितस्य, मुढे युम्मन्‌कुलकमलिनी-कुज्जारे भीमसेन ! ॥ तुम्हारे पुत्रोंने जिनके ऊपर तारे शत्रुपोंको विजय करनेकी प्राप्ता लगाई हुई थी, मोच जिनके प्रतिभानके वारगा सारे संसारको तूफके समान तिरस्कृत किया था, उस राजा- मुत [दुर्योधन] को युध्वभूमिमें मारनेवाला यह मध्यम पाण्डव [भ्रजुन] आपके दोनोँके चरणोँमें प्रणाम करता है । हे तात ! और भी [तुन]— समस्त शत्रुजोको नाथ कर डालनेवाला, दुर्योधनके रस्तसे मच हुश्रा एवं कुपोयनक्री जंपामोंको तोड़कर यह भीम [भी] प्राप्तको तिरसे नमस्‍कार करता है !" इसमें अपने गुरुलोंके प्रशंठ करनेके वारगे यह 'विच्चलन' [भ्रट्ठता उदाहररास] है । (६)—अथ संरम्भ [नामक] ग्राह्मादोँका नयम ग्रहण्‍ये लक्शग्गा प्रदान करते हैँ]— [सूत्र ६७] [अपनी] नातिसवा यचन करना 'सरम्भ' [नामक ग्रद्भुत रस् बहलाता] है ५६। प्रावेश भरे दो जनोँका उमर-प्रत्युत्तर द्वारा ग्रपनोँ-ग्रपनो दाशितक्गा यचन करम 'सरम्भ' [बहलाता] है । जैसे 'चेष्टीसंदार' में दुर्योधनने प्रति भीम वचनोँ [करते हैँ]— "मूढ ! और भी [तुम]— नित्योदसि समान [अपने रस्र्धच्योँका नाम देनेबार] तुम्हें जो दनाया गया, और भार्ई [दु नासन] की दातोसे पार्चे [और उसका रस्र्धनान करमे] में जो तुम्हचो साधी वनाया गया । तेरे कुल रप कमलिनोँ के लिए हयोत्पे समान [विनारार] भीमगेनतं द्रन्द होनेपर भी तेरे पच्य तत् मोहित रहनेबार्गा था [पनप्या तुम्हें न जाने वद्शा मार द्विया जाता] !

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राजा—दुरात्मन् ! भरतकुलापसद ! पाण्डवपसो ! नाहं भवानीव विकर्ष्य-नाप्रगल्भः । किन्तु दृदयन्ति न चिरान्न सुप्ता वान्धवास्त्वां रणाझयैः । मद्गदाभिन्नवक्त्रोऽसिथ्चेनीकाभीमभूपसङ्गमे ॥

अत्र संरोधस्योक्तिहेतुत्वं दर्शयति । यथा चण्डीसहचर युधिष्ठिर:—"नूनं तेनापि वोरेपु प्रतिज्ञाभङभीरुपा । वध्यतां केशपाशस्ते स चास्याकार्पणात्मसः ॥" इति ॥ सम्फेटे क्रोधेन मापनामात्रं संत्रम्भे तु चलकीर्तीनमित्यनयोर्भेद इति ॥४३॥ (१०) ग्रथ शक्ति:---[सूत्र १००]—क्रुद्धप्रसादनं शक्ति: कुद्धस्य प्रसादनं श्रुतकुल्तनं बुद्धि-निभवादिशक्तिकार्यैवेन सा शक्ति: । यद्वा कुद्धस्य द्विपतः प्रकर्षेण साधनं विनाशानं शक्ति: । यथा रत्नवल्याम्—

राजा—म्ररे नोच ! भरतकुलतिलक ! पाण्डवपसू ! मैं तेरे समान आत्मललापामे निपुण तो नहीं हूं किन्तु—तेरे बान्धव लोग शीतल हो, मेरी गदासे दूढो हुई छातियोंको प्रस्तिघ्यौंको मातासे भयंकर भूपतियोंसे युक्त तुम्हको युदभूमिमें सोता हुंआ देखेंगे ! इत्यादिमें [संरध्योके शक्त्यतीनके कारने 'संरम्भ' का उदाहरण है]। क्रोधावेशके मिना भी [द्रुतित-स्यापन] ऐसा जाता है । जैसे वेरीतसंहारमें—"युधि-प्ठिर—प्रतिज्ञासे भङ्ग होनेके भयसे वह [भीमसेन] ग्राम तुम्हारे सेनापति को मोर जिसने उसका माखंड किया था उन दोनोंको [कर्णदुः] बांधे तथा मारेगा । [इसमें 'वध्यता' पद वघायंक तथा क्यनायंक दोनों धातुप्रोमें समान रूपमें हो यनता है । यतः उसके दोनों अयं लगते हैं]। यह वचन युधिष्ठिरने क्रोधावेशके बिना ही कहा है । अतः दूसरे प्रकारके 'सरम्भ' पदका उदाहरणरूप है । प्रामे हसौ प्रकार्मे संधिंके 'सरपेंट' नामक तृतीय पदमें गाप इस 'सरम्भ' नामक नवम पदकृत निद दिरसाने हैं । 'सम्पेंट' [पद्म] में केबल कोधसे भायपा मात्र होता है मोर 'संतरम्भ' मे मातिरता गोतंन होता है यह इन दोनोंका मेद है ॥४३॥

(१०) पद 'नक्ति' [नामक प्रमदां सानिप्रके दनाम पदस्याश्र मदृशा मादि करते हैं]—[सूत्र १००] गुदशो प्रसन्न करना 'नक्ति' [हरसाता] है । पदशो प्राप्तु कराना, प्रयूक्त कराना, गुदि या वंभव मादि मातिशता यांप होनेसे वह [बुद्ध प्राप्तारम] 'नक्ति' [हरसाता] है । पदवया गुद्दो हुए नम्र [प्रसादन प्रयांन् प्रस्थेल साधन] प्रसन्न विनाशं 'नक्ति' [हरसाता] है : [पदं प्रसारसा उदाहरण] जंसी रसनायसीमे —राजा--

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सदयाज्ञे रापथे: प्रियेषु वचसि चित्तानुवृत्या भवर्तु; चैलदयेषु पारेषु पारिपतनेपां कियै: सदैनां मुद्रु: । प्रत्यासत्तिमुपागता मम तथा देवी रदस्या यथा, प्रत्यालयेव तथैव वाङ्पसिलिलै: कोपोदपनीतो यथा ॥

यह प्रथम प्रकरणके प्रसादन रूप निबद्धका उदाहरण है। दूसरे सखाके मनुसार मोर जंसे 'हरयारावणो' के सहायकके पूर्वाद्रमें—

कटुं मे: कषायं-रामेपु प्रतयेनेब मद्रामरन्येन लीलया । पातितोडयं दशशिरा: श्टद्वानिरप पर्वत: ॥ इति । शत्रु विरोधिनो रावणस्य विराशानमिति । एके तु विरोधप्रशमनं शक्तिमामनन्ति । यथोत्तरर्चरिते—

'मेरे! यह तु सखी यात है कि—प्रसयके समान महा-शक्तिशाली रामचन्द्रने भुशुण्डीमें युक्त पत्थरोंने समान इत दत्न निरोंधले रावणाको मनायाल हुं गिरा दिया ।' इसमें विरोधी रावणाका विनाश कहा गया है [मत: यह दूसरे सखाके मनुसार नारत नामक प्रझका उदाहरण है]।

तव:--विरोधो विश्रान्त: प्रमरति रसको निर्द्रुतिरघनं;, तदौदत्य कवापि ह्रजति विनय: प्रह्हयति माम् । मगितर्यदिमन् हप्टे किरपि परचाननरिस यद्वा च, महार्घस्तीथीनामिव हि मदतां कोडर्यतिशय: ॥ इति ।

कुध सोंपे विरोधके प्रशमलो 'शान्ति' कहते हैं । जैसे 'उत्तरचरित'में—[रामचन्द्रजीके प्रजारनेसो चरणोंमेंतुके ताय होनेवाले युदमें हम दोनों परस्पर हो रहा है । वह उद्वेगतता [जो मेरे प्रभु भोनेर थी] न जानो कहूं गहनो गर्द, मोर विनय मुझे [जसके सामने] विनत्र बना रही है । इसको देखकर म गुरमत हो परवश-सा हो गया हूं प्रवेवल सैौचोंके समान महतुरुपारो कुध सोनिवचनीय प्रणाम होता है । इसमें यह [विरोध-विश्रान्ति] भी दत्ती [कुध-प्रणामन] में पतत्यभू त हो जाना है । प्रसादन

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प्रकृताभिप्रायं विरुद्धाविरुद्धवरप्रहेतुरभिप्रायो भावान्तरमज्ञः प्रयोक्तुं मन्यते । यथा तपस्वत्सराजे पठ्ठेडङ्के—योगन्धरायास्य वासवदत्तां मरस्याऽध्यवसायात्रिवर्त्तेयितुं भावः । तद्विद्वा चित्ताविरचनक्रिया व्यभिप्रायान्तरात् कृतेऽति भावान्तरम् । सत्र हि—

इसके ध्यान पर श्राद्ध मानते हैं । जैसे तपस्वत्सराजके पठ्ठ अङ्कमें योगन्धरायासका वासवदत्तां मरस्याऽध्यवसायात्रिवर्त्तेयितुं भावः है । किन्तु उसके विपरीत चित्ता वनानेकी क्रिया दूसरे व्यभिप्रायसे कराई है । इसलिए वह भावान्तर [भ्र्र] का उदाहरण है । जैसे कि—

"योगन्धरायास्य—हे भद्र विनीतक ! रचय चित्ताम् ।" इति । अथ्ये तु शक्ते: स्थातुं श्राज्ञां पठन्ति । युक्तायुक्तमविचार्य क्रोधाद् यदज्ञानं सा आज्ञा । यथा कृत्यारावप्से त्रिजटया दारुणिकमिधानारकृत्स्थो दृष्ट--त्रिजटा—दारुणिके ! किं त्वं भणसि । [दारुणिके ! कि त्वं भणसि । इति संस्कृतम्] । दारुणिका—श्रभ्ये त्रियडे ! श्रवि नाम श्रप्रतिहतता श्राज्ञा मम शरीरे निवेशडइ त उप ईदिसं व्यकडञ्ज करइइस्स । [श्रहय त्रिजडे ! श्रवि नाम श्रप्रतिहत्ता श्राज्ञा मम सरोरो निव-डिसइ तु उप ईइसि व्यकञ्ज करइइस्स । इति संस्कृतम्] । त्रिजटा—तहा वि तुम्हं दारुणिकेहि त्ति बुच्चइसि । [तथाऽपि त्वां दारुणिका इत्युरुच्यसे । इति संस्कृतम्] (पुनः क्रमान्नेपथ्ये—)

वहाँ [योगन्ध रूपसे कहते हैं] "योगन्धरायास्य—हे भद्र विनीतक ! चित्ता बना दो । यह [योगन्धरायास्यका] वचन उनके प्रकृत व्यभिप्रायके विपरीत होनेसे भावान्तरक उदाहरराक है ] । अन्य लोग धैर्य्ये स्यानपर श्राज्ञा [नमक श्रद्ध] को रखते हैं । उचित-अनुचितका विचार किए बिना क्रोधसे जो प्राज्ञा दे देना है उसको प्राज्ञा [प] कहते हैं । जैसे कृत्या-रावणमें प्रिजटा दारुणिका नामको राक्षसीसे पू्छती है ।

त्रिजटा—हे दारुणिके ! तुम वयइँ रहहो हो ? दारुणिका—हे मय्र्ये त्रिजडे ! [रावणएवि] श्रप्रतिहुत धाज्ञा मेरे शरीरपर भसइ होइ गिरे पड्इ गो । त्रिजटा—किं भो लोग तुम्हेो दारुणिका [नामसो] कट्टइ हैं । कर कमसइ नेउस्स्यमं—

त्रिजटा—हे दारुणिके ! तुम यहाँ क्या कर रहे हो ? दारुणिका—हे मेरी त्रिजडे ! [रावणके] अप्रतिहत धाज्ञा मेरे शरीरपर भसइ होइ गिरे पड़ गी । त्रिजटा—किं भो लोग तुम्हेो दारुणिका [नामसो] कट्टइ हैं । कर कमसइ नेउस्स्यमं—

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हा त्रिजटे ! एस दे पियसहो सीतां भतुऽपो मायासिवडसगुप्तत्तोसमरए-निन्द्लया श्रामिग पविसिउणामो । [हा त्रिजटे एस दे त्रियमग्गी सीता भतुं मायाशिरोऽश्रेनोऽपतिमरएणिस चरिआ श्रामिग प्रवेष्टुं कामो]

हा त्रिजटे ! तुम्हारो यह प्रिय सखी सीता स्वामो [रामचन्द्रके] बनावटो शिरको देनेलेने षारऽ देनेऽ के निश्चय मनेके प्रगटिने प्रविट होना चाहती है । त्रिजटा--प्रभो में प्रभानिगो मरतो । भगवان् करे इस समय स्वामो [रावण] धो प्राप्तापूअं न हो सके । इस [सवाद] से प्रतीत होता है कि रावणने दारुणिसामो सीतालो मार डालनेऽ को प्राप्ता दो थो । [इसलिए यह 'प्राप्ता' नामक प्रङ्कका उदाहरण है । वयोकि वह प्राप्ता क्रोधवेनामे हो दो गई है । सभो सङ्घिपोमे [प्रङेकि विपयेमो] भ्रूय श्राव्य [सङ्ङेत प्रस्तुत करनेवाले] मत बुद्दो द्वारा कल्पित होनेलेने श्रोर वयाअं दालोऽ के भेदसे उपन्न वेचित्यऽपे मनोरञ्जक होनेलेने षासर प्रमाणभूत [मान्य] होऽ हे । इसलए सभो सङ्घिपोमे भ्रद्दोधो षासता मे ऽत उदाहृताऽपरसम्भना षारिए । [पर्याप्त उषो प्रकारके मय भद्द नो हो सकोते हैं । यह सङ्घ्या निश्चितनहीं है यह सम्भना चाइए] । प्रव 'प्ररोचना' [नामक विमर्शसपिके] दसम प्रङ्ङुषे लक्शए प्राप्त करते हैं]—

भारमिद्ध: प्ररोचना । निर्हेउअमण्णहो भाविनोऽथ्सऽसि मिद्ध विद्धवेनोऽपक्रमसो प्रकर्षेण रोच्यते दोप्यते ऽनया रूपकार्ं इति प्ररोचना । यथा वेङ्गीमद्धारे— पाञ्चालक —['ग्रह्ह ण देवे ण चक्कपाणिणा' इऽसुप्त्रम्मि] कतां मण्देइत्त— पूर्वे ऽन्तां सलिलेन रत्नकलशा राष्टाभिपेक्ं तेऽतिनीयमानत्चिरोऽसिमते च कवरौकण्हे करोतु दार्ं ।

प्राने होनेवाली सिद्वि क्रा कयन] प्ररोचता' [वहतानो] है । निवंधल सपिमे प्राने होनेवाले प्रयं तिद्ध प्रयं पा उताको सिद्व हो मानकर अपन करना जतार्ं द्आरा स्पश्ट करि विप्प प्रकर्षसे प्रकाङ्कित पा दीस होता है [इस षुप्पतिरे पनु-णार] 'प्ररोचना' [वहतानो] है । जंने देओसार्ं'म— पाञ्चालक —[सह्झे देव च्चयावालि 'ण्णा' ने पार्ंगे सेअर] सद्देइवो होइ मावण्यवता मर्हो है [इस मए]—

सर्वमनि-ऽपवप मतान्तराणि बुद्धोक्तानन् भणितातभेदाद् वैचिच्यऽपय रक्ख-तवाचच प्रमाणान्गेव । श्रुत एव सर्वेमनि-ऽपवप्यगसरयाकरणमुदाहरसापर्र्आमति मन्तव्यऽमिति ।

सभो मतान्तराणी बुद्दोक्तानन् भणितातभेदाद् वैचिच्यऽपे मनोरञ्जक होनेले षासर प्रमाण मान्य हो । श्रुत एव सर्वेमनि-ऽपवप्यगसरयाकरणमुदाहरसापर्र्आमति मन्तव्यऽमिति ।

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रामे शातकुठारभासुरकरे चत्रहृमोक्षेच्छया दिनि न्क्रोधान्वये च वृकोदरे परिपतत्याजौ कुतः संशयः॥ शत्रु युधिष्ठिरराज्याभियेसु तस्य द्रोपदीके शसंयमनस्य च भाविनोऽपि सिद्ध-स्त्वेन कलपनमू।

ग्राप [प्रप्राप्त युद्धिष्ठर] अपने राज्याभियेकके लिए प्राप्त रत्नोंके कलशोको जलसे भरवाये, और द्रोपदीके बहुत दिनोंसे भूले हुए केशपाशको वांधनेका उत्साह करे। क्योंकि तीक्ष्ण कुठारसे दोष करवाले क्षत्रिय रूप वृक्षोंको फाटनेवाले परशुराम और क्रोधाग्र भूमिके संग्राममें ग्रा जाने पर [विजयमे] क्या सन्देह है ? इस [प्रस्तुतलफके कयन] मे ग्रागे होनेवाले युद्धिष्ठरके राज्याभिषेक तथा द्रोपदीके केशावंधन हप प्रशंको सिद्ध-सा मान लिया गया है। [प्रतएव यह 'प्ररोचना' नामक ग्रदृश्य उदाहररप है] ।

यथा वा राघवाभ्युदये सप्तमेडङ्के—सीताया वदनं विकाशमयता रामस्य शोकार्त्तलः शान्तिं याहु सगीतयश्रनभुजेर्न्न त्यन्तु शाखामृगाः । सन्धानाय विभीपषा: प्रयततां लङ्काधिपत्याश्रियः सौमित्रेर्देशकटाक्ष-कटहरविपन्नं धालः कियाश्चित्कथ्यताम् ॥ इति ।

ग्रथवा जैसे राघवाभ्युदयके सप्तम ग्रङ्के—सीताका मुख प्रसन्नतासे खिल उठे, रामचंद्रजीको शोकार्त हृदय शांत हो जाय, वानर लोग गीत गाते हुए और हाथ हिलाते हुए नाचें, और विभोषषा लङ्काके राज्यलक्ष्मीको प्राप्त करने का प्रयत्न प्रारम्भ कर दें, लक्ष्मणके मनको काटनेमें कितनी देर लगनी है [तनिक देरमे काट डालेगे] । इधरमे ग्रागे होनेवाली बातोंको मिलादवं वर्यैन किया गया है। इसलिए यह 'प्ररोचना' ग्रदृश्य उदाहररप है।

ग्रनये तु सत्कारादेशन् 'प्ररोचनामाहुः । यथा वेङ्गीसंधारे—युधिष्ठिरः-[ प्रप्रवरबलोकीयन ] भद्र उत्कृष्टतां सहदेवः क्रतुद्वस्य वृकोदरस्याप्रयुगे पित्रां दारुण्यां प्रतिज्ञामुपलभ्य प्रणपद्रस्य मानिनः कोरवरनाथस्य पदवीमवेदितुमन्तिनिपुणमतयः, तेऽपु तेऽपु स्थानेपु परामवेदिनश्वारा, मन्त्रिणः माचवाश्र भक्तिमन्तः पदुपदहृदयक्तधरोपपाः सुयोधनसन्धारचेदितुः प्रतिश्रुतधन-पूनां-प्रणयुपक्रियाः सद्ध्वरन्तु समन्ततः पद्न्न कमिति । धन-पूनाप्रतिश्रवणप्रचोदिता: प्रस्तुपकारे वर्त्तिष्यन्ते दुुर्योधन-प्रतिदानम्भ्रवर्त्तिनः ॥ इति ।

ग्रन्य लोग सत्कारकी ग्राज्ञा 'प्ररोचना' कहते हैं । जैसे 'वेङ्गीसंधार' में—युधिष्ठिर भद्र और सहदेवसे कहो कि ऋषुल भोमकी मासो न होनेवाली [प्रप्राप्त ग्राज हो पूरो होनेवाली दुुर्योधनके यपकी] प्रतिज्ञाश्रो सुनकर द्विप गए हुए प्रतिमानी कोरवराजके स्यानशय पता लगानेके लिए उन-उन स्यानोपर अपने और भक्तिमान् मत्रिय, और तोप परिह मारा द्वारा स्पष्ट हपसे घोपणा पन पूना ग्रादि पुरसकारकी भूचना प्राप्त, दुुर्योधनके गमनापन्न [के हपानो] वो

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ग्रन्थे त्वस्य स्थाने युक्तिं पठन्ति। युक्तिं च सविच्छेदरोध्नः। यथा पुत्रद्वीतके—

"समुद्रदत्तः— भर्सां तवादर्शामति कष्टदंशाविकद्धं, पुत्ररतवैप कृत इत्यनुदारतैपा । शस्त्रं पुरः परत्वति किं करुणाग्नि हन्त, व्यक्तं विरौमि यद्fि सांयुपस्स्यते माम्॥" इति ।

[श्लोक १०१]—फलसामग्रीपमादानम् । मुख्यफलस्य दर्शोनमादानम् । यथा नागानन्दे--

[नाटकसुधांशु] गरुड— नागानां रक्षिता भाति गुरुत्रेप यथा मम । तथा सपरिशनाकान्चा व्यक्fतमथापयनेऽप्यति ॥ श्र्च नागरक्चालिन्यपि मुख्यफलतय सामोंप्यनिच्चन्ध ऋति ।

[श्लोक १०२]—व्यवसायोऽस्येह हेतुतुपकू ॥ ६० ॥

जाननेवाले लोगोको समन्त-पडचकके चारों ओर भेज दें । बदलेमें घन पूजां आदिके प्राश्वासान से प्रेरित होकर दुर्योंधानको पवद्वानेके [लिए] समाचार देनेको तंयार हो जायेंगे । इसमें दुर्योंधनवा पता लगानेवालेोंको ससंकार धन श्रादिके प्रलोभन देनेंवा जो वचन द्रिया गया है वही 'प्ररोचना' है । अन्र्प लोग तो इस [प्ररोचना] के स्थानपर युक्ति [प्रज्ञ] को पढते हैं । जैसे पुथपदूतिक में समुद्रदत्त [कहता है]— "मैं तुम्हारा स्वामी हूँ मह [कहता इस] कष्टदनाके विपरीत है । यह तुम्हारा पुत्र है [यह बहुा जाम] तो किर महं समुद्रररता वमों ? दार्श्रका प्रहस्र होनेंयालारा है पव सया कहं, यद स्पष्ट र्स्पते रोतां-चैन्तस्तक हू तो वह शुभंकरो जानि लंगो ।" (१२) ग्रथ 'प्रवादान' [नामक विमर्शोंपाधिये बारहवें प्रश्नवा लसशर्े प्रादि सरते हैं] [श्लोक १०१] शत्कार समीप होगयत्रा 'प्रदान' अहुलात्न है । मुख्य फलवधा [तमोष] दोलना 'प्रदान' महसान्ना है । जंगे नागानन्दमें नायवचो सतम्प मरके गरुड [मरते हैं]— "नागोंने रक्षाक ये [जीवितवहुत] मेरे मुखने प्रतोत होते हैं हर्गनिें ग्रप सर्पोंशो शाने ' [मेरी] हृद्य्ा निच्चय होइ समाप्र्त होि जायगो ।" इसमें नागोंशो रक्ष श्रप मुख्य कयवन्धे तमोप्रपश्ष वरांन् [मि्रा गपा है । [पन ग्रय पर 'प्रदान' नामश इस पप्र उदाररए ऋ] । (१३) ग्रथ 'व्यवसाय' [ नामक विमर्शोंपप्के तेरहवें पन्र्श्रा महाश्रा प्रादि सरने

[श्लोक १०२]—प्रप्तनोऽपि पृथगे हेतुश्र योग 'व्यवसाय' [महसात्ना] ₹ १५०१

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‘युगिति' योजन युक् । श्रर्थेनोयफलस्य हेतुस्तद्योगो व्यवसांय । यथा रत्नावल्याम्—

‘युक्' श्रर्थात् योजना । [ग्रर्थनियत फलका जो हेतु उसका योग 'घ्यवसाय' [कहलाता] है । जैसे रत्नावलीमे—ऐन्द्रजालिकके प्रवेशसे लेकर मेरा एक खेल ग्रापकी ग्रदृश्य देखना चाहिये यहां तक [ग्रर्थात्‌ नोय फलका योग होनेसे व्यवसाय ग्रदृकका उदाहरणहै] । इसमें योगधरायने [उदयन तथा वासवदत्ता] सम्बन्ध करानेके] जो निश्चित किया था उसके सम्पादक हेतुका समागम हो रहा है [प्रत एवं यह व्यवसाय नामक ग्रदृकका उदाहरणहै] ।

‘पे-न्दूजातिकप्रवेशादारम्य—‘एको उज्ज खेडेस्सो तए णवरस्स पेक्खिसदव्वो' [एक पुन खेलकस्तव्यावश्यकं प्रेक्षितव्यं ] इति यावत् । श्रत्र हि योजनधरायणेन यद्-गोखूतं तत्रिप्रपातकहेतुस्समागमः ।

‘प्रे-न्दूजातिकप्रवेशादारम्य—‘एको उज्ज खेडेस्सो तए णवरस्स पेक्खिसदव्वो' [एक पुन खेलकस्तव्यावश्यकं प्रेक्षितव्यं ] इति यावत् । श्रत्र हि योजनधरायणेन यद्-गोखूतं तत्रिप्रपातकहेतुस्समागमः ।

श्रन्ये तु 'व्यवसायः प्रवृत्त्याद्युक्तिः' हन्ति परन्तु । यथा वेसीसहारे—चतुर्थो न 'व्यवसायः' हन्ति परन्तु । यथा वेसीसहारे—

श्रन्ये तु 'व्यवसायः प्रवृत्त्याद्युक्तिः' हन्ति परन्तु । यथा वेसीसहारे—नृत्ते तेनाच वीररसे प्रतिज्ञाभगभीरस्य । वध्यते केशपाशरस्ते स चार्याकार्ष्यगाढतम् ॥ इति ।

एतच्च ‘सरम्भ शक्तिक्रीडनम्' इत्यनेनैव सङ्गृहीतर्मात । केचिदन्यतमाझानड्ढीकारेग द्वादशाझमेवैत् सर्वार्थमन्धूयत । पच गर्भे-सन्धिमपेति ।

एतच्च ‘सरम्भ शक्तिक्रीडनम्' इत्यनेनैव सङ्गृहीतर्मात । केचिदन्यतमाझानड्ढीकारेग द्वादशाझमेवैत् सर्वार्थमन्धूयत । पच गर्भे-सन्धिमपेति ।

एतान्‌यवमर्शसङ्‌घेस्त्रयोदशाझान्ति । श्रथ निर्वहणासङ्‌घेष्टान्‌ लचयितुमुदिशति—

एतान्‌यवमर्शसङ्‌घेस्त्रयोदशाझान्ति । श्रथ निर्वहणासङ्‌घेष्टान्‌ लचयितुमुदिशति—

[सूत्र १०३]—सन्धि-निरोधो ग्रन्थं निर्सयः परिभाप्याम् ।

[सूत्र १०३]—सन्धि-निरोधो ग्रन्थं निर्सयः परिभाप्याम् ।

उपास्ते: कृतान्तानन्द: समय: पारिप्लुतम् गोपेत् ।

उपास्ते: कृतान्तानन्द: समय: पारिप्लुतम् गोपेत् ।

‘युक्' श्रर्थात् योजना । [ग्रर्थनियत फलका जो हेतु उसका योग 'घ्यवसाय' [कहलाता] है । जैसे रत्नावलोमे—ऐन्द्रजालिकके प्रवेशसे लेकर मेरा एक खेल ग्रापकी ग्रदृश्य देखना चाहिये यहां तक [ग्रर्थान्नोय फलका योग होनेसे व्यवसाय ग्रदृकका उदाहरणहै] । इसमें योगधरायने [उदयन तथा वासवदत्ता] सम्बन्ध करानेके] जो निश्चित किया था उसके सम्पादक हेतुका समागम हो रहा है [प्रत एवं यह व्यवसाय नामक ग्रदृकका उदाहरणहै] ।

प्रतिज्ञा भङ्‌ञ न होने पावे इस भयसे वह घोर [भोमसेन] निश्चय हो ग्राज तुम्हारे केशापकको वांचेंगा ग्रोर जिस [दुर्नाशन] ने इसको सॉंचा था उसको मारेगा ।

यहां ‘वध्यते’ यह पद वधायंक तथा वध्यायंक दोनो धातुप्रोसे समान रूपमें हो बनता है इसलिये उसका एत पक्षमें बांधना ग्रोर दूसरे पक्षमें मारना दोनो हो ग्रर्थ होते हैं ।

कुच लोग व्यवसाय का ‘व्यवसाय स्वरसमुपचित' ऐसा लक्षण करते हैं] कि तु यह ‘दपितका कयन करना सरम्भ [प्रदृक बहलाता] है'' इस [सरम्भ ग्रदृक] के भीतर हो ग्रा जाता है [प्रत व्यवसायका यह लक्षण उचित नहीं है] ।

युद्ध लोग [विमर्शासपिं तेरह ग्रदृक्नोमिसे] जिसो ग्रदृक्नो न मानकर इस सदपिंे वारह ग्रदृक् हो मानते हैं । इसो प्रकार गर्मसपिंमे भी [वारह ग्रदृक् हो मानते हैं] ।

ये प्रवमर्शासपिं तेरह प्रदृक् हैं—

पच निर्वहणात्पसि मे पट्टेति शकाता वरणेहेलिए जुत्ते नाम पित्ते—

[सूत्र १०३ च]— (१) मथि (२) निरोध, (३) ग्रपन, (४) निस्सप (x) वध, (६) उपागम, (७) वृति, (c) ग्रानन्द, (६) समय, (१०) परिप्लुत १३१

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भापसं काव्यसहार-पूर्वाभाव-प्रशस्ततय । चतुर्देशाख्यो निर्वाहः, विशेषानुपादानात् सर्वोऽप्यप्येत्तानि प्रयातानि ॥६३॥

(१) ग्रथ सन्धिः— [सूत्र १०४] —सन्धिर्जंफफलागमः ॥६२॥ मुग्धसैन्यो न्यस्ततरीय प्रतीम्भविस्मयौ विपयीकृतरत्थ बीजस्योद्घाटनस्नुह्योचि-विकारैः फले फलागंभावरथायामगमनं ढौंकनं सन्धिः । यथा रत्नावरस्याम-वसुभूति — [ग्रन्थविद्रवानन्तरं सांगारिकां निर्वृत्तिं ] वाभ्रणय ! मुसदर्शनीयं राजपुण्यां । वाभ्रणयः—ममाप्येचमेव मनसि । इति । ग्रथ सुरसे यदपुं बीजं तत्रिक्रटोभूतमिति । इदमद्भुतमवश्यं नियन्धनतीयम् ॥६३॥

नष्टस्य कार्यंभ्य युक्तये यदृच्छेपयं तन्निरुद्धचरत्वपयस्वान्निरोधः । यथा दृश्यालित-रामे लङ्घनेच चद्धवा द्वानीनो लवो यथार्थे सीताप्रतिकृतिमुपचकल्पिप्तां रामसदृशं हृ्ट्र्वा स्वगतमाह—

(२) ग्रथ निरोधः— [सूत्र १०५] —निरोधः कार्यमीमांसा । नष्टस्य कार्येभ्य युक्तये यदृच्छेपयं तन्निरुद्धचरत्पयस्वान्निरोधः । यथा दृश्यालित-रामे लङ्घनेच चद्धवा द्वानीनो लवो यथार्थे सीताप्रतिकृतिमुपचकल्पिप्तां रामसदृशं हृ्ट्र्वा स्वगतमाह— [श्लोक १०३ ख] —(११) भापता, (१२) वध्योपसंहार, (१३) पूर्वभाव तथा (१४) पतनाता, निर्वहणात् [सन्धि] के ये चौदह भेद होते हैं । [प्रन्य सन्धियोधेे समान इनमे जोए मोर मुख्यका] भेद न किए जानतसे ये सभी मुख्य मेद्ध हैं [इनमे कोई भी मेद्ध जोए नहीं है] । ६१ ।

(१) पद 'सन्धि' [नामक निर्वहणासपद्ये प्रयम म्रद्धस्य लभाए म्रादि करते हैं] — [सूत्र १०४] — योजनां फले रूप तक पहुँचना 'सन्धि' [नामक म्रद्ध महसाता] है ।६२। मुखसैन्यो मे प्रारोपित प्रारंभारवस्थां योजनारूपक, उद्यघाटन मोर मुखय म्रादि विस्तारोँ द्वारा फल पर्यात्नु फल प्राप्तिके प्रयस्रयामें म्रप्त जानां प्रयात्नु पहुँच जानां 'सन्धि' [नामक म्रद] महसाता] है । जैसे रत्नावलिसं— वसुमूति — [मिन्दाहुए उपरथावहके याद तारारिकानो देवश्वर] है वाभ्रणय ! मथ याध्रध्य—मेरे मन मे भी यहॉ बात है । यहाँ मुखस्रधिमे जिस [सांगारिक प्राप्ति रूप] योजनां वपन किया गया पा व [प्राप्तिहे प्रयत्नत] निष्ट पहुँच गया है । इस म्रद्र्शो रचना म्रवश्यं हो म्रपनो श्रातिए ।६३।

(२) पद 'निरोध' [नामक निर्वहुणासपद्ये हितीय म्रकार लभाए म्रादि मरते हैं] — [सूत्र १०५] —शामकां विचार करना 'निरोध' [महसाता] है । जसेंे हृश्यालितराममे [परमपेष्टपतरां पोड़ा पछतनेरें मारण] लवोने 'निरोध' [महसाता] है । जसेंे हृश्यालितराममे [परमपेष्टपतरां पोड़ा पछतनेरें मारण] लवोने चन्द्रवासहित सीताकी प्रतिकृतिको देखकर अपने मनमें कहा—

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लद:-ञ्रथ्ये कर्थापि मस्वा राजद्वारमागता । [रत्थाय सदसोपसृत्यार्ङ्गालि बङ्खवा] ञ्रमुत्र ! श्रीभिवाद्ये । [निरुच्य] कर्थमित्यं काङ्क्षानमयी । [श्रपसृत्योर्पाविशतु, सर्वे परस्परमवलोकयन्ति] । राम:- [टङ्कवा] वत्स ! किमित्यं तव माता । लव:-राजन् ! ज्ञायते मैवेयमरहज्जनन्या, किन्त्वेषा देवी भूपालोडवलाल । [रामः सर्वेषां हृदये गृहोत्क्वा समीपे उपविशत्यन्ति] । लद्मणः--[सास्रम्] ञ्रायुध्मन् ! किन्नामधेया सा देवर्र्ङ्गा प्रियस्य जननो । लव:-तां खतु मातामहो ञ्रस्माकमभिधत्ते सीतेति । लद्मणः-[सवार्पं] रामस्य पादयोर्निपत्य] ञ्रार्य ! द्वितीयां वर्धसे, सपुत्रा जीवत्यार्या ।

ञ्रत्र नपृथ सोताजीवनकार्यस्य युक्त्या मोमांसतेति । (३) ञ्रथ प्रथनमू-- [दश १०६]--प्रथनं कार्यदर्शोनम् । कार्यं मुख्यफलतम् । मध्यतस्ते समक्षध्यते ड्यापारेऽपि मुख्यफलतनेनैति प्रथनम् । यथा वेधीसंहारो-- "भोमसेन:--पाञ्चालि ! न खतु मथि जीवति संहृतस्य हु:शासनविनुलिता वेधिरास्मपाणिनि । तिष्ठतु तिष्ठतु रयमेवाहं संहरामि" इति । "लव--ञ्रारे, ये माताजी राजाके द्वारपर कैसे आई ? [उठकर मोर सहसा पास जाकर मोर हाँथ जोडकर] हे माताजो ! नमत्सते ! [डलकर] झ्रारे यह तो सोनेको है । [हटकर बैठ जाता है] । लव लोग एक-दूसरेको देखने लगते हैं । राम--[डेसकर] हे वत्स ! वया ये तुम्हारी माताजी हैं । लव--हे राजन् ! ऐसा मालूम होता है कि ये हमारी ये माता ही हैं । किन्तु यह देवी तो भूपाल पारण किए डए है । [रामचन्द्र रोते हुए हाँथ पकडकर सबको पास बिठालते हैं] लद्मण--[रोते हुए] ञ्रायुष्मन् ! तुम्हारी माताजोका क्या नाम है ? लव--उनको हमारे माताजी सोता कहते हैं । लद्मण--[रोते हुए रामचन्द्रके पेरोपर गिरकर] ञ्रार्य, भाग्यसे प्राप्तको वृद्धि है ! ञ्रार्या [सीता] पुत्र सहित जोवित हैं" यहों सोताके जीवनरुप विनष्ट हुए कार्यको मुक्ति द्वारा मोमांसा की है । [प्रतः यह निरोध नामक प्रदर्शका उदाहरण है] ।

(१) प्रय 'प्रथन' [नामक निर्देशहरया संपीके तुसोय पत्नुका सधारा प्रदान करते हैं]-- [पुन १०६]--कार्ङ्का दिखलाई देना 'प्रथन' [ञ्रहुल्लरात] है । कार्यं श्रर्थवत् मुख्य फल न: जिस व्यापारके द्वारा मुख्य फल प्राप्त मार्पात्रु सभश्र होता है वह प्रपन' [पडरु] है । यंञ्चे वेधीसंहारमें-- "भोमसेन:--हे पाञ्चालि ! मेरे जोवित रहते हु:शासनके द्वारा वेधिरास्मपाणिनि । तिष्ठतु तिष्ठतु रयमेवाहं संहरामि" इति । "लव--ञ्रारे, ये माताजी राजाके द्वारपर कैसे आई ? [उठकर मोर सहसा पास जाकर मोर हाँथ जोडकर] हे माताजो ! नमत्सते ! [डलकर] झ्रारे यह तो सोनेको है । [हटकर बैठ जाता है] । लव लोग एक-दूसरेको देखने लगते हैं । राम--[डेसकर] हे वत्स ! वया ये तुम्हारी माताजी हैं । लव--हे राजन् ! ऐसा मालूम होता है कि ये हमारी ये माता ही हैं । किन्तु यह देवी तो भूपाल पारण किए डए है । [रामचन्द्र रोते हुए हाँथ पकडकर सबको पास बिठालते हैं] लद्मण--[रोते हुए] ञ्रायुष्मन् ! तुम्हारी माताजोका क्या नाम है ? लव--उनको हमारे माताजी सोता कहते हैं । लद्मण--[रोते हुए रामचन्द्रके पेरोपर गिरकर] ञ्रार्य, भाग्यसे प्राप्तको वृद्धि है ! ञ्रार्या [सीता] पुत्र सहित जोवित हैं" यहों सोताके जीवनरुप विनष्ट हुए कार्यको मुक्ति द्वारा मोमांसा की है । [प्रतः यह निरोध नामक प्रदर्शका उदाहरण है] ।

"भोमसेन:--हे पाञ्चालि ! मेरे जोवित रहते हु:शासनके द्वारा म्यों वे नारी अपने हाँथसे मत मारना । ठहरो-ठहरो, मैं स्वयं प्रभो कांपता हूँ ।"

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व्यत्र द्रोपदीकेरासंयमनकार्येसय कया पारेरष प्रथनार्मति।

(४) अथ निर्णय— [सूत्र १०७]—निर्णयोऽनुभवस्याति: । दृश्येऽर्थे सन्निद्दशान श्रप्रतिपन्नमन्न वा प्रति यदनुभवस्याऽशुभतस्मार्थेसय निर्णया|र्थं कथन तन्न दृश्यार्थेनिर्यायात निर्णीय । यथा यादृशाख्युदये समुद्रविजय प्रति—“वसुदेव—[सम्र्रतीदम् ] देव ! मया कमप्रातिभयेन कृत्स्नं गोकुलं गोपयतां यो महान क्लेशोऽनुभूतस्तस्य फलमिडानीमभूव् । किन्तु लोकपरिज्ञानभयेन यन्मया देवपादानार्माप न विदितं तत्र देवेन हरतक्यम् ।" अत्र वसुदेवेन सनुभूत कुष्णगोपनक्लेश समुद्रविजयो बोधित । यथा वा पुष्टिद्दितिये प्रमरषे—‘किन्त्वाननद्यो वातर’ इति समुद्रदत्तेन पुष्ट सेनापति 'विशारदनद्रो दुर्ग वातर' इत्यादि । समुद्रदत्त श्रुत्वा पूर्वानुभूतं नन्दयन्न्वीसमा|गमं समरन्नाह—‘तद्व किल नन्द-यन्न्यां प्रविष्टेन मया क्थित यथा— ओं तौ प्रतिदर्शयेते चारुचन्द्रमसमप्रभौ। कथ्यतौ कल्याणगमानौ उभौ तिरयपुरन्दरौ॥ तद्राघाताद्द शराम जन्मनस्तस्मृति ज्योतिः शाश्वतसमयावृटो यदू हृवते तदुप-पन्नमेवेति।

इसमें द्रोपदीके रास संयमन एक रूपक व्यापार द्वारा प्रयत्न किया है । (४) अथ निर्णय—[लामक निर्धृएऽपिधे चतुर्य श्राभ्रक्षा ललख भावि दरते है]—प्रथुभवका कथन करना 'निर्णय' [महुसाता] है । जानने योग्म प्रपंके विवपमें सदेहगुक्त पा भमानयुक्त द्रविखतेरे प्रति जो निर्णयंपदे तिर श्रनुभूत प्रयवा कयन करना है यह, जोय प्रयंक निर्णयं करनेवाला हानेगे 'निर्णय' [महुसाता] है । जैसे यादृशारमुद्रयमे समुद्रविजयपे प्रति यशुदेव कह्ते है— 'वसुदेव—[मान वक साच] इय कशक भयंक कारए कुष्णके गोहुलस्मे द्रषावेर रस्सने मे सेने जो वष्ट उठाए उनसे पन्न प्राप्त हो गवा । किन्तु लोकोंगेरे माख्म हो जानेके भप मे जो मेने प्रापषो भी मनों बतलाया दासे तिएँ आप हामा करो !" यहां चसुदेवेने प्रपने श्रनुभूत कुष्णापे द्रिषानेरे कनेनासो समुद्रदिजयपो चूचना दो । प्रयवा जाते पुष्टिद्दितिक [नरमद] प्रकारषपुमे—'यह बालक विश नकग्रमें उतपन्न हुमा है ' इस प्रकार समुद्रदत्तके द्वारा पूर्दे जानेपर सेनापति— यह बालक दिणाम्या नकत्रमेश? है 'यह कह्ते है । दासो सुनकर सामुद्रदत्त पूर्ध्वानुभूत नद्यपनोश समाराग्मो समरला कहते हए कहते है कि ' उतर समय नद्यतीरे द्वारा पूर्दे जानेपर मेने उमसे बहा धा कि— चन्र्रमाे समान मुग्डर व्रति वाने कोर प्रतिछ मुग्डर नामवाले मे सेनों निप्प कोर पुनबंगूने समान रिन्मार्ई देन हैँ । उमकेे ध्यानपे रसनेमे वेआकिंनास्त्रिक वोधिने जो यह् कहते है कि इनके श्रभिनयमे्र ह्नम है तो ढोर हो है !'

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परिभापा स्वनिन्दनम् ॥ ६३ ॥

(५) अथ परिभापा— [सूत्र १०८]—परिभापा स्वनिन्दनम् ॥ ६३ ॥ स्वापराधोद्घटन परिभापा । यथा तापसवत्सराजचरिते वासवदत्तां प्रति— "राजा— [ सास्नम् ] देवि ! किं ब्रवीमि— यथा तथा धृतप्राप्तु नि स्नेह निरपत्रपम् । व्याजेन धामतर्वपिश्या इह शाप्यतनघातना समम् ॥" यथा वा नलविलासे दमयन्ती प्रति नल.— "न श्रेम निहितं चित्ते न चाचार: सता स्मृतः । त्यजतां त्वां वने देवि ! मया दारुणमहितम् ॥" यथा वा राघवाभ्युदये रामः [ स्वगतम् ] "वेदेहि हतवांस्तदेव महत् । सख्ये विपहा क्लमान्, चकोपाटिततनन्धरो दशमुखः । कीनाशादासीकृतः । प्राणान् यद्विरहेह्यपह विहृतवांस्तेन त्रपापंसुरम्, चक्रं दर्शयितुं तथापि न पुरस्तस्या विलचञ्चलम् ॥" एपु वत्सराज-नल-रामचन्द्राणां स्वापराधोद्घटनमिति । पतदङ्गेरपञ्चकत्वादवश्यं निन्दनधनोयम् ।

(५) प्रव 'परिभापा' [नामक निवंधनए सधिगे पछचम प्रझ्कका लक्शण प्रादि कहते है]—अपने निन्दा करना 'परिभापा' [हकलतात है] । ६३ । [सूत्र १०८]—अपने अपराधको प्रकाशित करना 'परिभापा' [पद्न कहलाताहै] है । जैसे तापसवत्सराज चरितमे वासवदत्तामें प्रति [राजा उदयन कहते हैं]— "राजा—[रोते हृए] देवि ? मया कहती हो— सनेहरहित मोर निर्लज्ज, जैसे—तैसे अपने प्राणों धाराए करनेयाले मुम्क्को तुम अपनी मानामृतको वरसानेबालो हकिसे म्रतपृहोत करो !" प्रयवा जैसे मलविलासमे नल दमयतोके प्रति [म्हते हैं]— "हने [तुम्हे] वनमे सती धाईकर जाते समय] मे तुम्हारे म्नेमे विचार [क्या मोर न सज्जतन-मुर्होके प्राचारका । हे देवि ! तुम्हको वनमे छोड़कर मेने म्रतत निष्पुरताका वायं किया था ।" प्रयवा जैसे रामाभ्युदये राम [स्वगत कहते हैं]— "हस [रायरस] मे वंदेहोक म्रपहरए किया था इसतिएमुदमे नाना प्रकारवे वनेघोंडो उठाइर सकने मले काटकर उत रावणको पमराजक्ष दास वनः दिया । कित्तु तुम्हारे दियो मे भो जो मे प्राण पाराए किए रहा हस लजजाने कारए मे अपने म्रासिन मुक्तके मुहारो मामने दिसता नहीं पाता हूँ ।" इन [तीनों उदाहरओं] मे [कमशः] वत्सराज, नल घोर रामचद्र अपने अपने प्राप्तार्यों को प्रकाशित करते है [इस्सलिए मे 'परिभापार' नामक प्रझक्नका उदाहरए है] । म्नारशक होने के कारए इस पद्नकी रचना प्कत्प हो करनी सोइए । कुछ मोन 'आपमे च्यातचोतरा परिभापला' म्हते है । इसमे मो पहो [वरातात

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वचः तु 'परिभाषा मिथो जल्पः ' इति पठन्ति । न्यग्रोधोदरशर्मवति ॥६३॥

(५) 'न्यग्रोधोदरशर्मा' [सूत्र १०८]—सेयोपास्तिः । सेवा पर—प्रस्तुतिहेतुतुल्योपचारः । यथा चेष्टीसंहारेभूमौ—[द्रोपदीमपुष्कलौ] द्वौ पाण्चालतनये ! दित्तश्रिया वधूस्ने रिपुकुल—च्यनेन, भीमेन द्रोप्यया· प्रसादिततत्क्षात् पर्युपासित । यथा वा रघुविलासे—"राम [सविनय सीता प्रति]—प्राणान् यावद्रहेऽस्म्यहं चिरु तववान् देवि ! प्रियप्राप्त—मतन् छन्तुं तद्वशमोपमेप समयं समेराद्रिः ! नैव ऋधाम् । सौमित्रे किपभर्तुंरस्य च मनः प्रीतये तर्दौह प्रिये, हरत्सकन्धमलकुरुत्व नतु ते पूर्णा प्रतिज्ञाविधिः " इत्यादि । अत्र रामभद्रः माताप्रसक्तिहेतुतुल्योपचारः । अत्रापे रसस्य स्थाने निप्रेभहिताचारस्यैवान्तिता प्रसङ्गात् प्रसादमज्ञमाहुः । यथा तावमचमराजे गृहीतोपप्चालाधिपति रमवदन्त योगन्धरायणया च प्रति—

नल तथा रामचन्द्र तीसोंकी उत्तियाँ] उदाहररहा है । ६३ ।

(६) प्रयः 'पर्युपास्ति' [नामक निबन्धकारासधिको पछ पढ्यथा तक्तथा प्राप्ति वहते हैं]—[सूत्र १०८]—सेवा [का हो नाम] 'उपास्ति' [उपासना] है । सेवा का पर्याप्त दूसरेकी प्रसन्न करनेबाला व्यापार [उपासना का मतलब आता है] जैसे चेष्टीसंहारमे—'भूमौ—[द्रोपदोके पास जाकर] है देवि पाछ्चालतनये ! सौभाग्यसे शत्रुहुत्वे ननातः तुम्हारी वृद्धि हो रहो है १'

इसके द्वारा भूमौने द्रोपदीको प्रसन्न करनेमें पुष्ट पर्याप्तत [का उदाहररहा है १ भयथा जैसे रघुविलासमे—"राम [विनयपूर्वक सीताके प्रति]—हे देवि ! तुम्हारे विरहने मो अपने जीवनका प्रभो में जो प्राप्त पाररहा किए रहहा उग सद्यो कमा करो । हे समेराद्रिः ! यह समय क्षोभ्यत नाहों है । लङ्क्मार मोर इस वानररान [सुग्रीव] ने मनक प्रासन्न करमेके लिए प्राप्तो हृदयो पीठको मलहूत करे । तुम्हरो प्रतिज्ञा नो घ्यपि समाप्त हो गुरो है १"

पह! सीताके प्रसन्न करनेबासा रामकत व्यायार है [प्रन घर भी उपासित ' तामल मण्णर उदाहररहा है] ।

प्रन्थ लोग तो द्रस [उपासित] के स्वानपर प्रिय सपर हितसें किए जानेके बारस [जोनेराती ममको] प्रसन्नतया हित प्रासाद' हो मुन् कहते हैं । जैसे तारतम्यसाराजमे पाछ्चालत-विपत्निते पनु किए जानेके बार रमवदन्त घोर योगपरायणसुत्प्रे प्रति—

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"राजा—साधु सचिवाग्रेसर! साधु:— श्लाघ्या धीरिपसास्य रावणवंशो यात. सुरासुरां प्रति:, सर्वे वेत्स्युशना 'रसातलमहारालान्यकारे वल्ति । इत्यस्माननपेदय वैरिविजयप्राप्तौजसो के वयं, स्तोतार. स्वयमेव वेतु युवयोर्लोकस्तयोर्‌शान्तरो भृशं !!" श्रुत्वा वत्सराजस्यामिषाभ्यां प्रियहितौ चरतौ सज्जनतां प्रसन्नतारतिन् ।

राजा—साधु [शाबाश] सचिवोंमें अग्रग्रण्य साधु [शाबाश]— वृहस्पतिको बुद्धि बडो इलाघनीय मानो जाता है । किंतु [वे जिन इन्द्रके मन्त्री हैं वह] इन्द्र [अपने राज्य] रावणके वशमें फंस गया । [लोग कहते हैं] शुक्राचार्य सब-कुछ जानते हैं किन्तु [दे जिनके मन्त्री हैं वह] बलि पातालके महाराज्यकालमें पड़ा है । इसलिए हमारी अपेक्षा के बिना ही वैंरो [पातालराज] पर विजय प्राप्त कर लेनके कारन ऋषिरिमित पराक्रमशील प्राप दोनोकी प्रकासा करनेवाला में कौन होता हूँ, संसार स्यय हो तुम्हारा क्रोर उन दोनो [प्रथ्यात वृहस्पति तथा शुक्राचार्यं] के प्रतरको समकले [ पर्यात तुम दोनोकी प्रतिभा वृहस्पति तथा उक्तना से कहों अधिक है इसमें कोई सन्देह्‌ नहींहै ] इसमे [रमणवान् तथा यौंगघरायण] दोनो‌ओं प्रमात्योके द्वारा किए गए [वैरिविजय तथा सांगारिकवो समोोजन रूप] प्रय तथा हितके कारण वत्सराजको प्रसन्नता [को वैं] है [भत यह प्रसाद रूप मृग्जका उदहरणहै] :

[सूत्र १९०]—कृति: देमम् । लड्यस्य परिपालन' देम: । यथा रत्नावल्याम्---- "वासवदत्ता—ग्राघयक्त दूरे से ग्यादिउल । ता तधा करेसि जधां बधुश्राएं न सुमरेइ । [ग्रार्यपुत्र दूरेस्थां ज्ञातिझुलम् । तत् तथा कुय्रो यथा चन‌घुज्झनं न स्मरति । इति संस्कृतम् ]।" अ्रनेन लड्याया रत्नावल्या: स्थिरोकरसाम् । अ्रन्ये पुनरस्म्य स्थाने प्राप्तस्य प्रातिकूल्यशमन युतिमाहुः । यथा मुन्द्राराक्तसे— "चाणक्य—प्रभातय राज्ञः । ग्रपीद्यते चन्द्रनदासस्य जीवितम् ?

(७) प्रम 'कृति' [नामक निबंधकासंपिके सप्तम भ्रशके लशणां प्रमादि कहते हैं]— [सूत्र १९०]—देमको कृति कहते हैं । प्राप्तको रक्षा करना 'देम' [कहलाता] है । जैसे रत्नावलीमे— "वासवदत्ता—ग्रायंपुत्र ! इस [सागरिका] ये घरने लोग [माता पिता] यहीं दूर रहते हैं ।इसलिए प्राप ऐसा यत्न करें जिससे इसको यथुजनोंकी याद न आये ।" इस [चपन] से प्राप रत्नावलीषो स्थिर किया जा रहा है । [प्रत यह सशक्त्यार-पालन रूप 'देम' मृग्जका उदाहृतहै] : अन्य लोग तो इस [लशण-परिपालन रूप देम] के स्थानपर प्राप्तके प्रतिकूलताको शमन रूप युतिमें [पक] मानते हैं । जैसे मुन्द्राराक्तसमें— "चाणक्य—प्रभातय रकस्र ! भया प्राप चंदनदासके जीवन [को चरसा] नो चाहते हैं ?

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राक्षस —भो विप्रगुप्त ! कुत सन्देह । चारणकय —ग्रगहोताशास्त्रेऽ भवता नानुग्रुहीतेऽग्रुपल इत्यत सन्देह । तथ्यदि सत्यमेव चन्द्रनन्दासस्य जीवितमिद्यते गृहीतामिद शास्त्रम् ।

राक्षस—हे विप्रगुप्त ! मा मैवम् । ग्रग्रोच्रया वयमस्य विगेपतस्तवया गृहीतस्य ग्रग्रहस्य । पुनरेव प्रणभृत्य राक्षस श्चारणकस्य ग्राह— चारणकय —किमनेन ? भवत शास्त्रप्रहणमतरेषा न चन्द्रनन्दासस्य जीवित- मस्ति ।

राक्षस —नम सर्वकार्यप्रतिपच्चिहेतवे सुहृदनेहाय । न वा गति । एप गृहीामि ।

एतल्लक्षण्य राक्षसर्य सश्चिद्यमग्रहणवामताप्रशमनादू पुति । ग्रपरें तु कोधादे प्राप्ततस्य श्रमन युतिमानन्ति । यथा चैक्षीसहारे— "भोमसेन —राजपुत्र ! श्वल मामवलोक्य रासेन — कृपा येनासि राज्ञा मदसि नृपशुना तेन दु शमनेन । सत्यान्नेयेस्तानि तस्य नृपुश्र मम करयो पीतशेषपयसृदृश ।

राक्षस—हे विप्रगुप्त ! [इसमें] क्या सन्देह है ? चारणकय —शास्त्रज्ञो [मतिप्रद घरे] गृह्यतां करके प्राप्त गुप्त [चन्द्रगुप्त] को भनुग्रहीत नहों कर रहे हैं इसलिए सवेह है । इसलिए यदि सचमुच हो चन्द्रनन्दासके जोवनको [बचाना] चाहते हैं तो इस शास्त्र [मतिप्रद] को स्वीकार करो ।

राक्षस—हे विप्रगुप्त ! न न, ऐसी बात मत करो । हम इसके योग्य नहीं हैं । और विशेपकर तुम्हारे द्वारा ग्रग्रहण किए [शास्त्र या मतिप्रद] के प्रग्रहणमे [हम निस्कुल हो प्रयोप्र है] । फिर अनेक प्रकारमे राक्षसकी मृत्यत् प्रन्रासत् करके चारणकय कहता है— चारणकय—इस सबमे क्या लाभ ? [सीधो सो बात यह है कि] तुम्हारे शास्त्र प्रग्रह [मतिप्रदको स्वीकार] किए बिना चन्द्रनन्दासका जीवन नहों [बच सकता] है ।

राक्षस —[मित्रको रक्षासे लिए ग्रनिट कास्में भी स्वीकार हो करना पड़ता है इसलिए] सव कायोंको स्वीकार करनेके हेतुभूत मित्रस्नेहको नमस्कार है । मोर कोई ममां नहीं है । इसलए इस [मतिप्रद] को स्वीकार करता हूँ ।

यह प्राप्त हुए राक्षसने सच्चिव पदक स्वीकार करनेमे विरोधश्वा दामन है इसलिए पुनि प्राप्त होने तो प्राप्त होनेवाले दोप ग्रादिखे दामनशो 'प्रुति' वहते हैं । जैसे येएसहारमे— "भोमसेन—हे देवि ! गुम्रशो देवश्वर् करो मत । जिस नरश्रेष्ठ दु द्रासनने राज्ञाम्रोंसे सभावे चौध गुम्रशो [वसत परशर] चौक था, उसने, पोतने वच हुए मोर हव्योने, नते या दया रहोो लुहार देखो ! मोर हे विप्र ! मेरो पराते मिसदो जमाए तोड दानो नहो हैं जत अप्रतार्शे दोन्वोंके दाना [दुर्गौचन ] से

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कान्ते राज्ञा गुरुणा मतिसरस्समिद्ध मद्दूगवाचस्पितोरोः, श्रज्जैर्न्ने स्त्र्र्ड निपिष्ट तथ परिभवजस्यालस्यास्तु शान्त्यै ॥ श्रत्र भीमेन द्वौपद्या क्रोधोपशम् । तथा रत्नावल्याम् - "देव श्रुयताम् । इयं सिंहलेश्वरदुहिता सिद्धेनादिश्र । योडस्या पार्श्वे महीष्यति स सर्वभौमो राजा भविष्यति" इत्यादेरारम्य - परिज्ञाताया स्वभर्त्रा या: समर्पिति करष्यीए देवीं प्रमाद्यम् । श्रत्रेन स्वाजन्यावगमात् वासवदत्ताया: सागरिकां प्रति ईर्ष्यो-कोपच शमनमिति ।

(त) श्रथानन्द - [सूत्र १११]—श्रानन्दो वाचिछतागमः । प्रकारशातैर्वींविच्छतस्यार्थस्य समाश्रयेन श्रागम प्राप्ति , श्रानन्दहेतुत्वात् श्रानन्दः । यथा रत्नावल्यामू - "वासवदत्ता—[राज्ञा न्सुपेत्य] श्रज्जसुत पडिन्द्र पेठ । [ श्रानयपुत्र !] प्रतोच्छ्छितोऽतिम् । इति मरूषितम् । राजा—[हम्तौ प्रमाद्य] को देष्यत: प्रसादं न वहु मन्यते ? विदूषक — ही हो मो जयहु भव । रे पुहब्बी इदार्णि इत्य्थे भूद ब्बेव विय-विलकुल लाजे रक्तको मैंने अपने प्रत्येक श्रागमे मला हु श्रा है उससे तुम्हारे श्रापमानसे जन्य ताप को माति होगो ।" इसमे भीम के द्वारा द्रौपदीके क्रोधका शमन है [प्रत धृति का उदाहरण है] । भौर रत्नावलोमे - "हे देव ! सुनिए । इस सिंहलेश्वरकी पुत्रीके विषयमे सिद्वने कहा या कि जो कोई इसका पासग्रहण करेगा वह सर्वभौम राजा बनेगा ।" यहाँसे लेकर-- "श्रव पहिछाती हुइ श्रपनो बहिनके विषयमे क्या करना चाहिए इस विषय मे प्राप्त होइ प्रमाए है ।" यहाँ तक । इस [प्रसग] से [रत्नावलीमे] अपनी बहिन जानकर सागरिकके प्रति वासवदत्तादे ईर्ष्या तथा क्रोधका शमन पाया जाता है [इसलिए यह धृति का उदाहरण है] ।

(द) श्रव श्रानन्द [नामक निवर्हणासपिके श्रष्ट श्रागमका तात्पर्य श्रागदि करते हैं]— [सूत्र १११]—वाडिश्रुत श्रयंको प्राप्ति 'श्रानन्द' [नामक श्रागम कहलाता] है ! संस्कडों प्रकारोसे वाछित श्रयं प्राप्ति चाहे हूए श्रयंका सम्पूर्ण हपने श्रागम श्रर्थात प्राप्त श्रानन्दका श्रागार होंनेसे 'श्रानन्द' (कहलाता) है । जैसे रत्नावलीमे - "वासवदत्ता—[राजके पास जाकर] श्रागयपुत्र ! इस [रत्नावलो] को ग्रहण कीजिए । राजा—[हाथ पसाकर] देयोके प्रसादश्र मोन श्रादर नहों करता है ? [इसलिए में देखोश्र प्रसाद सम्हाकर रत्नावलीको स्वीकार करता हूँ] । विदूषक — ही हो मो घरे श्रापको विजय हो । [ज्योतिषिविद्योके श्रनुसार रत्नावलो

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वयस्सस इति ।

[टीकाटीका भी मो । जयतु भगवान् नतु पृथिवीदानीन हरते भूतैव प्रियवयस्सस्य । इति संस्कृतपम् । ]"

समयो दु:खनिर्गोस: ।

दु:खनिग्रेमयुक्त: काल: समय । यथा मृत्युकृतस्वां चारुदत्तं, पालकस्य राज्यश्राज्ञया यद्यतंवेन चारडालगोचरगत, तन्नैषग्रामत्रराज्यस्य श्रायेकस्याज्ञया शाबैलिक ग्राह— "शाबैलिक --ग्रपयात श्रपयात जाल्मा:। [ दृश्ट्वा चा सहपेमू] प्रियते चारुदत्त- सहु वसन्तसेनया । सम्पूर्षा: खल्वस्मत् स्वामिनो मनोरथा । दित्सया भो ! वयसनमद्दारोवारदगाधा- दुस्तरां मुगवृत्तया मुशीलवत्या । त्वामेव प्रियतमभय युतं समीच्ये, इयेत्तनालङ्" शशिनमिवोपरागमुक्तम्!" अत्र चारुदत्तस्य दु.खापगम इति ।

ग्रदुतासि: परिग्रहणम् ॥६४॥

का परिग्रह्हुआ कर लेनेके कारण] ग्रथ्य समभो कि सारी पृथिवी ही प्रिय वयससके हूयमें ग्रा गई । इसमें सांगारिका रूप वाथिद्युत प्रयंककी प्राप्ति हो जानेके राजाको प्रत्यत ग्रानन्द हुग्रा । इस प्रकार यह ग्रानन्द नामक ग्रर्थका उदाहरण है । (६) ग्रथ्य 'समय' [नामक निर्वहृंग्रातधिको नवम ग्रग्रका लक्शए प्रदर्शित करते हैं]— दु ख [के दिनों] का निकल जाना 'समय [म्हलता] है । दु.खके निकल जानेवाला काल 'समय' [नामक ग्रप्र म्हलाता] है । जैसे मृत्युकर्टिकमे राजा पालकको ग्राज्ञासे वध क्रिये जाने योग्य चारुदत्तके ध्यानालोभे ग्राह्यमें पहुँच जानेकपर [राहसा हुर्द्ध राज्यन्र्रातिमे 'पालक' को हु्टाकर 'ग्रार्यंक' के राजा वन जाने पर] उसी समय राजयके ऐश्वर्ये [प्रयांतु राजांसहासन को] प्राप्त करनेयाले 'ग्रार्यंक' को प्राप्तार्से 'शाबैलिक' कहता है— "ग्रार्यंकित --हुटोे चापडालो हुटो । [दिलाकर हव्यपुत्रंक] सौभाग्यसे वसतसेनाके सहित चारदत्त जोडित हैं । ग्रथ्य हमारे श्यामिको सब मनोरथ पूर्तिं हो गए । सौभाग्यवश्ा गुएो से परिपूर्णां तथा मुंदर द्रोत स्वभाववाति [प्रयानी प्रियसमा वसत- सेना] ने सहित [प्राप्त चारदत्त] ग्रपार दु खसागरको पार हर चुके हैं ग्रथ्य में पहॅॅचेसे मुक्त पदिकापुक्त चरमाके समान तुमको [मो घपनो] प्रियतमासे युक्त देखना चाहतां हूँ ।" यहां चारदत्तके दु खसी समाप्त हो जानेये [यह 'समय' ग्रप्रका उदाहरए है] । (१०) ग्रथ्य 'परिग्रहृन' [नामक निर्वहृंग्रातधिको दसाम ग्रग्रका लक्शए प्रदर्शित करते हैं] ।

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विस्मयस्थायिभाववत्कस्य श्रद्धादुतररसस्य प्राप्तिरूपगूहनम् । यथा रामाभ्युदये रामेण प्रत्याख्याताता सीता क्चलनं प्रविष्टा । तदनन्तरं—नेपथ्ये कलकलः—धूममध्ये वितानीकृतमुपरि शिवादेभिरंशैरसंलिलिङ्गमैः, विभ्रद् भ्राजिष्णु रत्नं तत्सुरत्नं तथा चमे चामरं च । नभस्तेजः प्रवातैर्विरहितमलिनतां कालयन्रहूभाजो, दृश्याः सर्वचिराविभ्रवन्ति विफलतनु वाच्छ्वान्तनत्कसय ॥

विस्मय जिसका स्थायिभाव है इस प्रकारके श्रद्धोद्रुत रसकी प्राप्ति 'परिप्रेहन' [कहलात] है । जैसे रामाभ्युदयमें रामके द्वारा [प्रत्याख्यातान ग्रर्थात्] ग्रस्वीकार कर दिए जानेके बाद सीता ग्रभिनयमें प्रवष्ट हो जाती है ? उसके बाद—"नेपथ्ये कोलाहल [प्रोर उसके साथ निम्न वचन सुनाई देते हैं]—प्राकारादिको छुम्बन करनेवाली ज्वालाग्रप वाहुप्रोंसे भूमसमूहोंको वितान बनाकर, छातो पर चमकते हुए रत्नोंको तथा मृगचर्मोंको धारणा किए हुए ग्रपने तेज सपुदायके द्वारा सीतादेवोके विरहको मलिनताको दूर करते हुए से गोदमें बैठी हुई सीतादेवोकी विरहजप मलिनताको दूर करते हुए बह्निदेय कालकके मनोरथको विफल करफे [सीता सहित] प्रकट हो रहे हैं । उसके बाद सीताके लिए हुए, पत्तोसेपत्त वन्हिदेव प्रवष्ट होते हैं । सवँ लोग देखकर भ्रातरपूर्वंक खड़े होकर—ग्राद्रचयं है, प्रातचयं है । भगवान् ग्रभिनदेवको नमस्कार है ! यह बहकर प्रशंसा करते हैं " यहाँ ग्रभिनयमें प्रवष्ट हुई सीताको फिर जोवित हो जानसे श्रद्धोद्रुत रसकी प्राप्ति है [प्रत यह 'परिप्रेहन' नामक ग्रथ का उदाहरण है] ।

यथा वा रघुविलासे—"मध्ये डम्मोचि ऋभूव विश्रान्तिमुजं रचो दशास्यं पुनः-रत्नं पाताल-मह्ही-त्रिविष्टपभटान्स्रचक्राम देविक्रमैः । मत्योर्मत्सया पुनर्मृग्यालतुलया चिन्द्रैदै करेठार्वो, वैराग्यस्य च विस्मयस्य च पदं रामायणे ववते ॥"

"दोत्त भुजाओं प्रोद्रत दिशों वाता राक्षत [राक्षसों] समूहके चौचमें या किन्हु उत्तने भुनामोंके वलसे पाताल, पृथिवी प्रोत्र स्वर्ग सबको प्राक्रात कर लिया था । फिर एक मतुपने उसके रगोंके समूहाप वो ग्रहंतत्स्थे समान [प्रत्यायास हो] कर डाला : इस प्रकार रामायणे [तसारके वल वेभव ग्रादि मो स्यभंतातो दिलालानेके कारनाय] यत्राप्र प्रोत्र विस्मय स्थार है ।" [यहाँ भी श्रद्धोद्रुत रसका यरंत होनेसे 'परिप्रेहन' ग्रथ माना जाता है] ।

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पुरःपदृत्तिके तु निर्षयचर्जितान्ति सन्ध्यादीन्यङ्गानि परिगृह्यमान्तान् पकारिस्नेव श्लोकेन्दृश्यन्ते । तथाहि—

"समुद्रदत्त—स्वप्नोडयं । सेनापति —न हि ! समुद्रदत्त—विश्रमो नु मनसि ? [१ सन्दिग्ध] सेनापति—शान्तम् ! समुद्रदत्त—तदेवात्र त्रपा ! [२ निरोध] सेनापति—जाता ते ! [३ प्रयत्नम्] समुद्रदत्त—कथमझद्वलतनया ? [४ परिभावणम्] सेनापति—पुत्ररत्नाय ! समुद्रदत्त—मृपा ! [५ मृति] सेनापति—श्वालम्बाय न एष चेति नियतं सम्भन्धमेतद्गणम् । [६ प्रसाद] समुद्रदत्त—केनैतद् घटितं विमनाः [६ शान्तद] सेनापति—विधिना । [५ समय] समुद्रदत्त—[सुतरूप दृष्ट्वा] मर्व समायुञ्यते । [६ परिग्रहम्] इति । १२७।

पुरःपदृत्तिकमे तो [निवंहएत्प्रथिके प्राय तक वार्तित इन दश भ्रद्रमिले] एक निरांप मो घोडकर सहिते लेकर परिग्रह्म पर्यंत [ मो भ्रद्र ] एक ही श्लोकेमे दिखाई देते हैं । जैसे—

'समुद्रदत्त—क्या यह स्वप्न है ? सेनापति—नहीं ! समुद्रदत्त—तो क्या मनस्स भ्रम है ? [यहाँ तक सधि नामक प्रथम भ्रद्र ह्मा] सेनापति—नहीं—नहीं [नातम्] । समुद्रदत्त—तो क्या यह सज्जा है ? [यह निरोध नामक द्वितीय भ्रद्र ह्मा] सेनापति—यह प्रापको स्मो है । [यह प्रयत्न नामक तृतीय भ्रद्र ह्मा] समुद्रदत्त—तो हमारी मोंदया होती सुच्चा कैसे है ? [यह परिभावण नामक चतुय भ्रद्र ह्मा] सेनापति—यह प्रापस्त युत्न है । समुद्रदत्त—भूत ! [यह पांचवां मृति नामक भ्रद्र ह्मा] सेनापति—[इस पुत्रश्ने] प्रहरुण करनेके लिए यह निश्चय हो इसकै साथ अपने तत्वय मो नहो जानता है । [वह द्दारा प्रसाद भ्रद्र ह्मा] समुद्रदत्त—इस द्दूटे सम्वन्धको जिसने जोड दिया ? [यह सातवां सानद भ्रद्र है] सेनान्नति—दैवने । [यह आठवां भप समय ह्मा] समुद्रदत्त—पुत्रने रूपो देत्न्नर्। सब कुछ हो सकता है । [यह परिग्रह्न नामर नवम भ्रद्र ह्मा]

इस प्रकार पर्स हो इसोने निवंहएत् सदिसे मो प्रमोंच इस्टा समोरेद्य इस श्लोकेमे दिखमाया गया है । इसोर्से हमें इन सवायादो इस प्रकार लितने जावग—

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अथ भापणामू—

[सूत्र ११३]—भापणं सामदानोक्ति: । साम्नो वचनं दानतश्र वचनम् । स्वाभ्यामुपलतग्नापरस्वात् प्रियं हित च गृह्यते ।

"यथा मृत्करकञ्चामू—म्रार्यङ्कराजाज्ञया शार्वेलिकश्राहदतमाह— त्वयि ये समाह्यो गतिरते शरणं पुरा । पशुवद् विततते यद्ने हतस्ते न चाप पालक ॥ चारुदत्त —शार्वेलिक ! किं योडसौ राज्ञा पालवेेन घोपितवातीय निप्कायस कूटागारे वन्धने बद्ध म्रार्येनामा त्वया मोचित:? शार्वेलिक —सत्यम्! सिंहासनाधिरोहेे म्रनुष्टिततमाग्रे च तेन तव सुहृत् राज्ञा म्रार्यकेनाडुज्झयिनो मे च वेलावृते तुम्ह्य राज्यमतिसृष्टम् । तत् प्रातिभाण्यतां प्रथम सुहत् प्रणय ! [पुनयेसन्तसेनामाह] म्रार्ये वसन्तसेने ! राजा तवोपरि तुष्टे भवती बघूशब्देन म्रनुप्रहाति । वसन्तसेना—म्रनुज्झ सत्वालिय कयथ मिह । [म्रार्ये शार्वेलिक ! कुतार्थोऽस्मि ! इति सखीकतम् ]।

[पुनश्शाहदतमाह—म्रार्ये ! किमस्य मिच्छो क्रियताम्? रत्नोदय, न हि, विच्छ्रमो तु मनस, श्लाघ्य, तदेवात्रपा जाया ते, कथञ्कबालतनया, पुत्रस्तथाय, म्रपा । म्रालतथ्याय न एप वेत्ति नियत समन्यानधमेतदूगतम केनैतद् घटितं [विसन्धि], विधिना, सर्वे समायुज्यते ॥१६४॥

(१) प्रव 'भापण' [नामक निवंधनएपाधके गयारहवें भ्रङ्कका लडखा म्रादि करते हैं]—

[सूत्र ११४] साम-दानके वचन 'भापण' [कहलाते] हैं । सामपकां वचन प्रोर देते हुए [दोनों] का वचन [भापण कहलाता है] । इनके उपलक्षणामात्र होनेसे इनसे प्रिय तथा हित [वचनका प्रहारए होता है । जैसे मृदृककरकटिकमे प्रायंक राजाको प्रातसे शार्वेलिक चारुदत्तसे कहता है—

' वो सुहृदृते स्वप् रलङ्कार [राज म्रवसनेले पहिलेसें रिधुमेंके पिलर] सुपहृदृते शरएगे प्राया पा उस [प्रायंक] ने [पहिले राजा] पालकको विस्तृत यनमे पशुने समान मार डाला !

चारुदत्त—दार्वलिक ! क्या जिसको राजा पालकने प्रहणोर्ं की वस्ती से सकार बिना कारए हो सहलानमे कंद कर दिया पा उस म्रार्यंस्को तुमने छुड़व दिया ? दार्वलिक—हों [ठीक है] । प्रोर सिंहासन पर बठनेनेर् साय हो तुम्हारे जत मित्र राजा म्रार्यंस्कने उज्झयिनो मे वेलाके किनारे तुम्हें राज्य प्रदान किया है । इसलिए मित्रकी ह प्रथम हृद्याश्रो स्वीकार करो ।

[फिर वसन्तसेनाे कहता है] म्रार्ये वसतमेंने ! राजा तुम्हारे ऊपर प्रमत होतए भुमको वघू पद [पर्यन्त शारदतको यणू पद] से सम्योचित करते हैं । वातवदत्ता—म्रापं दार्वलिक ! में म्रनुगृहीत हूँ ।

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चामरदत्सभित्रो ! किं तव वहुमतं ?

भित्सु—श्रपि तुचतया पेक्क्रियते पठ्यते वहुमतं मंयुत्ते । [श्रनिःश्रयः प्रेयस्य प्रनृत्यस्य वहुमानः संश्रृतः ।] चामरदत्त—सत्ये दृढ़ान्तरस्य निश्रयः । तनू पृथिन्यां मचेतिहारेपु गुनपतिः क्रियताम् । शार्ङ्गिलिः—परमेश्वम् । चामरदत्त—प्रियं नः । चमन्तसेना—मंपदं उज्जीवितुं हि । [मा श्रप्रतां जीवितारिम । इहाति मंस्कृतम् ] । शार्ङ्गिलिः—स्थावरकर्य किं क्रियताम् ? चामरदत्त—सुभृत्योडियं मदामोदरतु । शार्ङ्गिलिः—पर्व, यथा श्राद्धं श्रायः । श्रग्र मांत्ता दानेन श्रन्येयस्य प्रियाधित्वेन कृत । श्रनयोः—गृथमाश्रुकृतानि मध्ययन्ते । इह्रत्प्रक्नमवशये नियन्धनीर्यामति ।

(१२) श्रथ पूर्वभाव— [वृत्त ११३४]—प्राग्भावः कृत्यदर्शनेन । यथा रत्नावलम्बनं— “योगिनव रायालु—पर्व विद्वाय भणिडया: सम्र्रान्ति करर्ाोये देवों प्रमाणं ।”

[शार्ङ्गिलिः]—[किं चामरदत्तने कहा है] पाय ! इस भिसुत्रा वरा किया जाय ? चादवत—हे भिश्रो ! कर्हिए प्राप मना चाहते हैं ? भित्सु—[मततारकः] प्रतिनिातारो देतबरे मुम्हे यंत्रालप होइ श्रप्या है । चादवत—हे मित्र ! इसवा यह निश्र्चय हैह । इमलिअ पृियकेरे माघ विरारोहत इनश्रो गुनरपत्ति बना बोः शार्ङ्गिलिः—यह टोक है ऐेसइ हो होसी । वार्त्तक—वहा हेमे मिले है । वसंतसेना—पहव में जोहित हर्ह [पय मेरे जानमें जान पर्हि] । शार्ङ्गिलिः—सपावरकर्या पवर किया जाय ? वार्त्तक—इम उसम मेघकरो रामताने मुर्‌ कर देः शार्ङ्गिलिः—जेताल पायं करते हैं यंत्रा हो होसी । हतने रामने, राने घोट पाय प्रचारोने किय उलिस्साह । इन कोनेइर प्रगप पनन रयन भो किया जाइह । इह वंमारे भो पदपदप यि निश्र्च वरना चारिअ ।

(१३) वच 'पुष्पभाख' [मातृ निश्र्चलार्घिदं वात्सल्ये पत्न्न्न्न महता मातिफ कर्हने ?]— [वृत्त ११४]—श्रायं [पर्वाज्ञा मुनयः कतुं] ता शनान् इह्हनस वा युगतां । श्रनात्र [पत पुष्पभाव ग्रनुमानि] है । जेमे रामाश्र्मी में

"पुष्पभाखालु—ता महके नाकरत नइ पल्को करिहें तिल हतनाहि श्रायं यनो प्राप ह ।

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वासवदत्ता--कुंडु येय किं भण्णासि पड़िवाइद्देि से रयणामालं ति । [सुटु मेव किन्त भण्णासि प्रतिपादयामि रत्नावलीमिति । इति संस्कृतम् ] १"

ष्ठान 'वत्सराजाय रत्नावली दीयताम्' इति कार्यस्य योऽयंगंधरायस्याभिप्रा- नुपविष्टस्य वासवदत्तया दर्शनीयम् । यथा वा यादवाभ्युदये- "युधिष्ठिर:-- देव ! कृष्णोदयं भारतार्थेचकवर्ती नवगे वासुदेव इति सुन्रथ: र'सन्ति । मसुद्रविजय:--जानी भारतार्थेराज्ये कृष्णार्मभिषेकतुं मामुत्साहयति महाराज: । युधिष्ठिर:--एतदेव देवस्य जरासंधचधप्रयासफलम् ।" इति । ष्ठान युधिष्ठिराभिमतं कृष्णाराज्याभिपेककार्यं समुद्रविजयेन दर्शितम् । मुखसंध्याद्युक्तकाव्यसहशावाक्यदर्शनं पूर्ववाक्यं ष्ठानमस्य स्थाने केचिदामनन्ति । यथा मुद्राराक्षसे-- "चारणक्य: [पुरुषं प्रति]--इदं च वाक्यंलयो विजयां दुर्गपालः । ष्ठामात्यराक्षस-दर्शनप्रीतो देवशचन्द्रगुप्तः समाझापतिः, विना हस्तिश्र्यः क्रियतां सर्ववचनधनमोत्त इति । अथवा ष्ठामात्यराक्षसे नेतरी किं हस्तिभिः प्रयोजनम् ?

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विना वाक्यार्थपोताभ्यां मुन्यतां सन्धिवन्धनम् । पूर्वंप्रविष्टेन मया केवलं यद्यते शिरः ॥

अत्र मुखे यदुपचितम्—‘यद्य को नेदानीं शिरगां मे’ इति तदेव भण्यन्तरेषा उपन्यासतामति । उद्देशोक्तसङ्झातः सङ्घान्तरेष यल्लचणाविधानं सर्वत्र तदुक्तमेवतुरोधादिति । (१२) यथ वाक्यार्थसंदोहार.—

ईप्सितं दातुमभिलापो वरेण्डा । तज्जनितो ‘भूयः किते प्रियसुपमरोम’ इति प्रहृत इत्यर्थे । म च प्रहोतरि स्वप्रतीकारत्वात्, प्रतीच्छतु च सम्पादयितुभूयोमोमिच्छां दर्शयितुं निवध्यते । तत्र सति सर्वेऽसिमन् नेवेष्टत्ते सम्पन्ने प्रहुतुं काव्ययथा ‘कृतयारावषे’ सीतारतये रामरय प्रिये हिते च महति कर्मणि ऋतुंरडवश्रमन्तुध्यान् श्रमनिराह—

वाक्य अर्थ पोत [अर्थात्] जो छोड़कर अन्य सबके यत्नोंको छोड़ दिया जाय । प्रतिक्रियाओं हो जानेके कारण वेष्टन में प्रवृत्ति अपनी छोटी को यौवनता हूँ । इसमें मुखसंधि जो यह जो कहा पा कि ‘बघने योग्य कौन व्यक्ति मेरी दिलाशो बघने नहीं देना चाहते है’ उसको प्रकारान्तरसे फिट कहा गया है [दसलिए यह पूर्वभावाश्य रूप मृदृकृचा उदाहररहै] । निर्वहण-संधि वे चौदह भेदोने नाम गिनाते समय पूर्वंभाव नामसे वारहवें प्रगणा किया गया था । ‘प्रागभाव’ नामके किसी पगबा उक्तेभ उदेश-कारिकाभोम तर्हों किया गया था । जिन्तु यहां सधांगे करने समय ‘पूर्वभाव’ था तधांगे न करवे ‘प्रागभाव’ का तधांगे किया गया है । यह ‘प्रागमाव’ ‘पूर्वभाव’ वा ही दूसरा नम है । इसोकम ‘पूर्वभाव’ सदृशका प्रयोग दृढ़तरी हद्विते ठीह’ नहीं बैठता था इसलिए प्रभकरणे उनके स्थामपर ‘प्रागभाव’ नामदेन प्रयोग वर दिया है । इनमा बातोंमे प्रवृत्तार प्रगीता पाकमे निपुण है— उद्देशा [मूल] को मझाओ छोड़कर प्रगय नामके सदृशाका क्यन वरना तंत्र दूंदहे प्रभुरोभो दिया गया है । (१३) पद ‘रसयाहाट’ नामर निसंहरूपसपिकेतेरहवें पगत्नवा तधांगे पारि रहते हैं—

[सूत्र ११८] वर [प्रदान करते] को इष्टदा साध्यका उपमहात [करताना] है ।

परोष्ट वरनेले प्रधान मतनेला परभिताप यरेप्सा [हरसाना] है । जसको उस्मत्र ‘तुहारां मोत कोनता मिप कायं वर” इस प्रकाररा मृण [काव्यमहात हरसाना है] पर भिनाय है । वह (१) गुरूने द्वारा पहलला न वरनेरेल मोत (२) प्रभवा रसोहार वरने पर केनेवालेको मोत परिप्ृ इष्टकरो हिरानातेरें लिए [हो करतार्लों] निछु किया जायगा है । उस [वर प्रदानके] होतेभे वर तिस्मिन् भामनयोपोः पूसां हो जानेंगे काप हरो समास हो प्राणा है तेमोभू [हरसा] नाद्यमहात [रहा वाचा] है ।

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"ग्रनिः—चत्स ! उच्यतां किं ते भूयः प्रियसुपकरोऽसि ? रामः—भगवन् ! श्रुतः परमपि प्रियमसिर्त ? इति" "युद्धिष्ठिर—देव ! हिमतेः परं प्राथ्यंते यदूनाम ? समुद्रविजयः—[ श्राश्चर्यम् ] किंमत परमपि प्रार्थनीय मसिर्त ? प्राप्तो घोपभृतां विधृत्या महर्षिजित्, कंसः स्त्रियं लभिमतः, सम्रत्येव चिनिर्मितं मगधभूभर्तुः कवन्यं वपुः । प्राप्ताक्रान्तमजायतार्धभर्त्स तद्ध बुद्धिं न किं परं ? श्रेयोडस्मादपि पार्डवेश ! पुनरम्याश्वासमहे यद्वयम् ॥"

ग्रन्थकारने यहाँ स्वीकृत न करनेके रूपमें 'काव्यसहार'की रचना की गई है । श्रथवा जैसे यदुवंश्यम्— "युद्धिष्ठिर—देव ! पितुर्वधियोकेलिए इससे अधिक ग्रौर क्या चाहते हैं ? समुद्रविजय—[ग्राश्र्चर्यवत्-सहित] क्या इससे भी श्राधिक प्रार्थनीय हो सकता है ? ब्रह्मोरोके यहाँ रखकर कृपएकी रक्षा कर लो, कंसका नाश कर दिया ग्रौर ग्रभी मगधराज [जरासंध] के द्वाराारको [सिर कादकर] कवच [घड़मात्र] बना दिया, ग्राधा भारत देश ग्रपने ग्रधीन हो गया, तो हे पाण्डववराज ! बतलाइए कि इससे श्रधिक ग्रौर क्या करवाया जा सकता है जिसका हम कामना करें ?" इन दोनो [उदाहरओं] मे वरके स्वीकृत न करनेमे 'काव्यसहार' हमारा है ।

"रानो—तुम्हारो कुलके श्रनुरूप इस प्रकारको शील सस्पत्तिसे प्रतस्त्र हुए मेरे हृदयमे उपयुक्त विधिवशात् यह श्रवसर प्राप्त हुग्रा है इसलिए मेरे हो प्रिय कार्यको करती हुग्रा जो तुम्हारो इच्छा हो वह वर मांग लो !

"रानो—तुम्हारे कुलके अनुरूप इस प्रकारकी शील संपत्तिसे प्रसन्न हुए मेरे हृदयमें उपयुक्त विधिवशात् यह श्रवसर प्राप्त हुग्रा है इसलिए मेरे हो प्रिय कार्यको करती हुई जो तुम्हारी इच्छा हो वह वर मांग लो !"

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प्रशस्तिः शुभशंसना ॥ ६५ ॥

सूत्र ११६—प्रशस्तिः शुभशंसना ।। ६५ ।। जगतः कल्याणशंसना प्रशस्तिः । तद्वा नायकतदंगयोर्वा पृथक्‌ । यथा कल्याणवचने— "रामः—तथापि दर्शयतु— यथायं मम सम्पूर्णैः श्रिनिततार्थैः मनोरथः । एवमभ्यागतो रघ्घ्घ्ङः सर्वैः पापैः प्रमुच्यताम्‌ ॥" ग्रथि च— नायिका—इस प्रकार देवोंके प्रसादसे ग्रधिक ग्रोट कुशल नहीं हो सकता है जिसक— में यत्न करूँ । फिर भी देवोंके प्रसादसे किसको तुष्टि होती है ? इसलिए [में यह वर माँगती हूँ कि] देवो प्रियदर्शंताखो मुझे प्रसाद रूपमें प्रदान करें । रानी—प्रचुर दे वो । नायिका—बड़ी कृपा है । [अपने मनमें] ग्रथ प्रियदर्शंताखो दासोभावको दूर करके [उसके साथ उसको] इचछा, गौरव ग्रोर स्नेहको ग्रनुरूप [इसके साथ] ग्रपवहार करूंगी । इसमें वरको स्वीकार किया गया है । हम [कात्ससंहार रूप] पद्मको [पाते] प्रशस्ति [नामक पद] से प्रयिनाभूत होतनेके लिये प्रयत्न पयित करना चाहिए । (१४) ग्रथ 'प्रशसित' [नामक नियंहलासपिरें चौथरे पद्मन्या तस्ला प्राथि नरते हैं]— [सूत्र ११६]—कल्याणको वामना प्रशस्ति [वरमालो] है । सतारके वलमालकी वामना 'प्रशसित' [बहुतानो] है । उसको नायक प्रयवा कोर्द पद्म्य [पात्र] पड़ता है । जैसे तरवारावलमे— "राम—फिर भी यह हो कि मित प्रथार विचाग्ति ग्रपंने विपममें मेरा यह मनोरथ पूरां हृम इसां प्रकार [नास्मावतोहिनरूप] माप हुए सब तामाजिक समं प्रथारक हु मा [पापः] में मुक्त हुं मोक्षे ग्रोर भी—

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निरीतस्य प्रजा: सन्तु सन्त: सन्तु चिरायुप: । प्रथन्तां न्वय: काव्योऽपि सम्यग् नन्दन्तु मातर: ॥

यथा वा यादवेन्द्रगिरये--"युधि षिट्ठर:—तथापि किर्मपि त्रोमो वयमू—कल्याणे भूतेऽपि रच: प्रसरतु, विपद: ग्रत्तयं यान्तु सर्वा:; सन्ते श्रेयो भजन्तामपचयमयत्ता दुर्जनातिदुर्जनानाम् । धर्मे पुष्टातु वृद्धि सकलयतुमतां कैरवव रसचन्द्र, प्राप्त्य स्वातन्त्र्यलदर्मी मुदमथ वहतां शाश्वती यादवेन्द्र: ॥" इय चावश्यं निवन्धनेया । तथा इतिवृत्तान्तभूता चेयम् । तेनास्या पृथग्गणने चतु:पञ्चररपि श्रद्धासंध्या भवति । सन्धि-निरोध प्रयत्न - पूर्वभाव - काव्यसंहार - प्रशस्तिस्तद्योग्यां गतोपसन्धयवपि कार्यवशातो निवन्ध: । छात्राणां च स्वेन्तुया नियोग: । एतस्मिन् निर्वहण-संधेस्तुर्देशादर्शान्ति । सर्वेषां संधीतां चांगानि इतिवृत्ताविच्छेदार्थमुपादीयन्ते । इतिवृत्तस्याप्यविच्छेदेऽर्थरुपादर्थे । इतिवृत्तस्याप्यविच्छेदेऽर्थरुपापत्तथे । विच्छेदे हि शाखादेश्चारुत्वात्तत्कथयो रसपुष्टयर्थे । विच्छेदे हि शाखादेश्चारुत्वात्तत्कथयो रसपुष्टयर्थे । प्रथयतां नंतरानपेक्षं यतदंगमुख्यमभते, तदकेपनिर्वद्ध सहृदयाना विधानैकताताचेनम कवे.

प्रजापते [प्रतिवृदिरनावृत्ति: रूपकता मालभा. मुन्त: । प्रत्यासन्नैच राजान: पडेत ईतिय. स्मृता. ॥ इन दृश् प्रकार की] इंतियोसे रहित हो, सज्जन लोग चिरायु हों और कविगण अपने काव्योंको प्रसिद्धि हो, तथा माताएँ पूरुपसे श्रानन्दित हो । [यह जगतकी कल्याण कामना प्रशस्ति कहलाती है] ।

युधिष्ठिर-

"युधिष्ठिर—फिर भी हम कुछ कहते हैं कि—श्रृणुच स्व" [सव लोको] मे कल्याणेका प्रसार हो, सारी विपत्तियोंका विनाश हो, सज्जन पुरुपोकी प्रशंसा हो, भोर दुर्जनोकी दुर्गतिका हास हो, धर्मं वृद्धिको प्राप्त हो, सब यादवोके मनोहर केशवोको श्राह्लादित करनेवाले चदृके समान यादवचन्द्र स्वत:अन्य लक्मोको प्राप्त कर चिरस्थायी हो श्रानन्दको प्राप्त हों ।"

इस [प्रशस्ति नामक सन्धि] की रचना अवश्यम हो करनी चाहिए । और यह कयावस्तु के ग्रनतर्गत भी होनी है इसलिए इसकी गिनती न करनेपर [ पूर्वोक्त ६ सन्धोके स्थानपर केवल ] ग्रह्नो की संख्या केवल चौंसठ रह जाती है । [निवंहरुयासंधिके] १ श्रधि, २ निरोध, ३ प्रयत्न, ४ पूर्वभाव, ५ काव्यसहार श्रोर ६ प्रशस्ति, इन [ दृश् ग्रह्नोको] छोड़कर ग्रंथ्य ग्रह्नोका कार्यवशसे ग्रोप संधियोंमे भी प्रयोग हो सकता है । और यहाँ [प्रयात्न निवंहरुय सधिमे] भी ग्रपनो इच्याको श्रनुसार प्रयोग हो सकता है । ये चौदह निवंहरुयासंधिके ग्रह्न हैं ।

सभी संधियोंके ग्रह्न काव्याभिप्रायके प्रविच्छेदके लिए हो निवद्ध किए जाते हैं । और कयावस्तुका प्रविच्छेद रसकी परिपुष्टि के लिए होता है । [कथावस्तुका] विच्छेद हो जानेपर तो स्थायिभाव प्रादिका भी विच्छेद हो जानसे रसका ग्रास्वादन कैसे हो सकेगा? इसलिए

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हृदयमानन्दयति। श्रृङ्गारादिन च स्थायीविभावानुभावव्यभिचारिरूपाभिः इष्टज्यायानि । शृङ्गारादौ च स्वमनःस्थौ सन्ध्यन्तरे च योगतया निवेश्य । योग्यता च रसनिवेशैकव्यवसायिन प्रत्नधकरणो विदग्ध, न पुनः शृङ्गाराद्यप्रधानवाच्यव्यमात्रोनमदृष्टव्यो मुक्तकवय ।

तेन एकस्यां रसपोषकत्वादेकरस्मिन्नपि सन्धौ द्वित्रवां निवेश्यते । यथा चेष्टसहारे सम्पुट-वेष्टनौ पुनःपुनर्दर्शितौ चौर-रोहितरागुणीभूयत । रत्नावलौ च विलास पुनःपुनरुक्त शृङ्गारमूज्वलास्वर्यति । अतः परमपि निवन्धस्तु वैरसयमचदूतीति ।

तथागद्येयन माध्ये यत् एकनैव सिद्ध्यति तदेकमेव निवेश्यते । यथा श्री-भोमदेवसूत्रे वसन्ततिलकौ प्रतिमानिरुद्धे परिकरार्यस्य उपेतेऽपेश्च गततवान् न तन्त्रिनन्ध ।

एतमगत्येऽपि । यथा भोजदलविरचिते राधावल्दलमे रासवदे परिकर-परिन्यासयोरेकपद्येऽपेश्च गतत्नात्र तन्त्रिनन्ध । न च परस्परान्तमोये चतुर्ग्रोडपि काव्ये मन्त्र्यभवति ।

रसादे विभावने हि सन्ध्यन्तरे हि रसाद् कपिर्द प्रायः प्रधानो भवेद् हि पूल्यामिकादि कपि से] जो पद्य उद्भूत होतु है उपरको रचना होइ सहृदयोंको आनन्द प्रदान करती है [कुतः कविमत्प्रयनपूर्वक सन्निविष्ट पद्योंकी रचना उस प्रकार ग्राह्यादद्वायिनी नहीं होती है] । पद्य स्वविभाव, विभाव, अनुभाव, व्यभिचारिभाव आदि रूप होते हैं । इनका अपना सन्नियमें [अर्थात् जिस रस-पमें उनके नाम गिनाए गए हैं उस-उस सन्नियमें] तय्य भ्रय सन्नियोंमें योगमतायें करता हो सन्चितेरा किया जाता है, और उनकी योगताको बेचल रसना सन्निगेर परानेमे सत्पर प्रयत्न काव्योंकि निर्माणा रवि हो ममभने हैं । बेचन रसाद् और काव्यकी रचना वेंचित्र्यसे हो उन्मत हो जातेवाले मुक्तक [निर्मात] और नहीं समपक रसते हैं ।

इसलित् [प्रर्थान्न योग्यता दे प्राप्तारपर होइ] रसकर परिपोषक होनेपर पद्य हो पद्य एक हो सन्नियोंमें दे या तोन बार भो निवेश किया जाता है । जैसे चेष्टोसहारेमें सम्पुट तमा विद्रव पद्यके बार यार प्रदर्शित किए जाकर धौर तथा रौद्र रसवदे पुष्ट कर रहे हैं । कोर रत्नावलोमें विलास नामक पद्य बार यार निवेश होकर शृङ्गाररसयो वत्पुष्ट करता है ।

द्वारे [विपरोत] जय यो पद्योः द्वाराः साटप कायं एव हो पद्ये द्वाराः हो सप्ततारचनामे [मुगमविरहे] परिकर [पकरे] मे काव्यको उपगेव [प्राग] द्वार हो निन्द्ध हो जानेते उत [परिकर] को पताक रचना नहों को गई है ।

इसो प्रकार तोन धमाको द्वाराः [साटप वायं जय तत् हो पदर द्वार गिड हो रचना है सब जत् परस्पर् प्रतिनिरक्त दोष हो प्रबन्धो रचना नहों को जानने है]। यत्रे भोजद्र विरचितरोपादिप्रबन्धे नासम्भर् ततींस्तन्मे परिकर तथा परिन्दाम [इन दो पर्यो] मे उपनोदके द्वारोः

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श्रान्तस्तरे च केचिदेकविश्रान्ति सन्ध्यान्तराप्नि स्मरन्ति-- साम मेढ़स्तथा दण्डो दान च वध एव च । प्रत्युपन्नमतिस्त्वं च गोत्रस्खालितमेव च ॥ साहसं च भयं चैव मोहो क्रोध एव च । श्रोज सत्वरत्वं श्रान्तिस्थया हेत्वधारणाम् ॥ दूतो लेलस्तथा स्वप्नश्चिन्तं मद इति स्मृत । इति । एपु च केपाचित् सामाधीना स्तयमंगहरुपतवान्, केपाचिन्मर्यासादीना न्र्याभि- चारिकुपरुपवान्, दूत-लेपादीनामितिवृत्ततत्पवान्, श्रन्येपापुष्पत्तनेऽन्तर्भावाच्च न पुथग् लक्श्यते--प्रयासं । तथाहि गर्बमन्धोः साम-दानादिरुपसमग्रोहक्रम् । मत्यादयो व्यभिचारिपु लक्श्यिष्यन्ते । दूत-लेपादीनामितिवृत्ततत्पता हश्यते । तथा उद्दात्त राघवे हेत्वधारणात्मा उपक्शेप । प्रतिमानिरुद्धे स्वपनहरप । रामाभ्युदये भयात्मा । वेणीसंहारे क्रोधात्मा । एवंनयेपल्यक्शोेधनतर्माव कीर्तनीय इति ॥६५॥

स्वोपज्ञतादृशदर्पणाविवृतो नाटकनिर्याय प्रथमो विचारः ॥ १ ॥ गतापे हो जानलेसे उन दोनों की रचना नहीं की गई है । इस प्रकार एक दूसरंके भांतर भिन्नकी समावेश हो जाननेपर [ कभी कभी ] केबल चार पदार्थोंका भी [ कोई ] सन्धि हो जाता है । श्राय श्राचार्योंके मतका सङ्ग्रह-- इस प्रसङ्गमें [हमारे प्रतिपादित पाँच सधियोंके अतिरिक्त ] कुछ लोग २१ सधियाँ गौर मानते हैं । [जिनके नाम निम्न प्रकार हैं]— १ साम, २ भेद, ३ दण्ड, ४ दान, ५ वध, ६ प्रत्युपन्नमतित्व, ७ गोत्रस्खालित ८ साहसं, ९ भय, १० मोह श्रथवा रुद्धि, ११ शापा, १२ क्रोध, १३ श्रोज, १४ सत्वरत्व, १५ श्रान्ति, १६ हेत्वधारण, १७ दूत, १८ लेल, १९ स्वप्न, २० चिन्ता तथा २१ मद । [इन २१ सधियोंको भी कुछ लोग मानते हैं] किन्तु इनमेंसे साम श्रादि कुछके स्वरुप लगे होनेसे, मोह श्रादि किन्हीं दूती लेल श्रादिके क्याभाववशु हप होनेसे श्रौर श्राचार्योंके उपक्शेप में श्रादि हप होनेसे उनके श्रलग लक्शण करनेका प्राप्त हमनं नहीं किया है । जैसेकि गाम्भसन्धिमें साम, दान रूप सग्रह नामक द्वाप श्राया है । नति ग्रादिके लक्शण व्यभिचारिभावोंमें किए जायेंगे । दूती लेल श्रादि कच्हा भाग हप हो होते हैं । ग्रौर उदात्त राघवसे उपक्शेप [प्राग] हेत्वधारणा रूप है । रामाभ्युदयमें [उपक्शेप] भय रूप है । वेणीसंहारमें क्रोधहरप [उपक्शेप] है । [प्रत- एव इन श्रनेक सधियोंके उपक्शेमें श्रतन्मूलत हो जानलेसे उनको भी श्रलग कहनेको श्रावश्यकता नहीं है] इसो प्रकार श्रग्राप्य श्राचार्योंमें भी [इन २१ सधियोंका] श्रन्तर्भाव सम्भव लेना चाहिते ।

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अथ द्वितीयो विवेकः

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ग्रथ द्वितीयो विचेकः

ग्रथ 'नाटक' प्रकरणस्य च' इतस्ततो नाटक' लक्षणीयग्र प्रकरणं लक्षणयते— ग्रथ नाटकदर्पण-दीपिकाया द्वितीयो विचेक । विवेक-सह्तति

प्रथम विवेकके प्रारम्भमे तीसरी तथा चौथी बारिकामे प्रयोजनवारह प्रकार के रूपकोंका उद्देश्य पर्याप्त नाममात्रसे वर्णन किया था । उसमें सबसे पहिला स्थान 'नाटक' था । और उसके बाद दूसरा स्थान 'प्रकरण' का था । इसलिए प्रथम विवेकके दो भागमे नाटकके लक्षण आदिका विस्तारपूर्वक विवेचन किया था । मुख्यत:हपसे नाटकका ही विवेचन होनेसे प्रयम विवेकका नाम ग्रन्थकारने 'नाटक निर्णयं' रखा है । रूपकोंमें नाटक ही सबसे मुख्य है इसलिए उसक लक्षण आदि विस्तारपूर्वक विवेचन करनेमें एक पूरा विवेक' (प्रकरण) लगाया गया है । अब इस द्वितीय विवेकमें प्रकरण आदिक दो प्रकारके रूपक-भेदोंका विवेचन किया जाएगा । इसलिए ग्रन्थकारने इस 'विवेक' का नाम 'प्रकरणादेरूपकनिर्यंय' रखा है । इन दोप एवंादश रूपकोंमें प्रथम भोर मुख्य स्थान 'प्रकरण' का है । इसनिए इस विवेचनमे प्रारम्भ प्रकरणके निरूपणसे हो करते हैं ।

सूत्र ११७] 'नाटक प्रकरणं च' इस [रूपक भेदोंका उद्देश्य पर्याप्त नाममात्रसे करने वालो बारिकामें गिनाए हुए रूपकभेदों] मेंसे [प्रथम विवेकमें प्रथम रूपक भेद] नाटकका सदसद्‌ करने [द्वितीय रूपक भेद] अब 'प्रकरण' का तस्सल्‌ करते हैं—

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वरिग-विप्र-सचिवस्वाम्यसज्जीरात् । मन्दगोत्राद्वनं दिव्यानाश्रितं मध्यचेष्टिततम् ॥ १[६६]॥ दास-श्रेष्ठि-विटैर्युक्तं बलेशाढ्यं तच्च सप्तधा । कल्प्येत - फल-वस्तुनोर्मेक-द्वि-त्रि-विधानतः ॥२ [६७]॥

होता है । वणिक्, विप्र श्रयथा सचिवमेसे कोई_भी 'प्रकररां' का नायक हो सकता है । किन्तु एक 'प्रकररां' मे इनमेसे एक हो नायक होगा । इन तीनोमेसे 'सचिव' पदका श्रयं 'राज्यचिन्तक' किय। गया है । राज्यचिन्तकर्मे मुख्य रूपसे 'ग्र्रमात्य' श्राता है किन्तु मुख्य प्र्रमात्यके श्रधीन हो सेनाविभाग भी रहता है श्रोर सेनापति मो राज्यकी चिन्ता करने वाला प्रमुख श्रधिकारी है इसलिए उसका भी ग्रहण। इस पदसे किया जा सकता है । इस प्रकार सेनापति तथा श्र्रमात्य दोनोका ग्रहण 'सचिव' पदसे होता है । इनमेसे सेनापति तथा श्र्रमात्य ये दोनो धीरोदात्त नायक माने जाते है । श्रोर विप्र तथा वणिक् ये दोनो धीरप्रशान्त नायक माने जाते हैं । श्रथांत 'प्रवरसां' मे मुख्य रूपसे धीरोदात्त तथा धीरप्रशान्त नायक हो होते हैं । धीरोदात्त श्रादि नही । कोई-कोई प्राचीन ग्रन्थकार्यं श्र्रमात्यको धीर-प्रशान्त नायक मानते हैं । श्रोर 'प्रकररां' को धीरप्रशान्त-नायक वाला रूपक मानते हैं । किन्तु ग्रन्थकार इस सिद्धांतसे सहमत नही है । उनके मतमे श्र्रमात्य धीरोदात्तनायक होता है । विप्र श्रोर वणिक् धीरप्रशान्त नायक होते हैं । इसलिए 'प्रकररां' का नायक धीरोदांत भी हो सकत। है श्रोर धीरप्रशान्त भी । 'नाटक' श्रोर 'प्रकररण' का तीसरा भेद यह है कि 'नाटक' मे दिव्य पात्र भी नायकके सहयोगी-रूपमे उपस्थित हो सकतें हैं । किन्तु 'प्रकररण' मे दिव्य पात्रोका प्रवेश नही हो सकत। है । नाटक 'दिव्याद्भुतम्' श्रोर 'प्रकररण' 'दिव्यानाश्रितम्' है । श्रपांत 'नाटक' मे श्रंग-रूपम्, नायकके सहयोगी रूपमे, दिव्य पात्रोका उपयोग हो सकता है । प्रकररां' मे नही । इसका मुख्य कारन 'प्रकररां' का 'वस्त्वाद्दयम्' वलादि-प्रधान होना है । दिव्य पात्र मुख-प्रधान होते हैं । श्रोर 'प्रकररण' मे व पात्रोकी प्रधानता नही मानी गयी है । 'नाटक' श्रोर 'प्रकररण' के इन मुख्य भेदोको ध्यानमे रखते हुए हो ग्रन्थकार दो कारिकाओमे 'प्रकरण' वा लक्षण इस प्रकार प्रस्तुत करतें हैं— वरिगक्, विप्र तथा सचिव इनमेसे प्रत्येक प्रत्येक किसी एक नायक से युक्त, मृद [मध्यम] कुलको नायिका वाला, दिव्य पात्रोका श्रादर न लेनेबाला, मृद चेष्टासे युक्त —॥ १[६६]॥ दास, श्र्रेष्ठी श्रोर विटोसे परिपूर्ण, एष बलादि-प्रधान [वलश्रेष्ठ] 'प्रकररां' [महासात्त्व] है । श्रोर यह नेता, पल, तथा धरतुयोमेसे एक-को प्रयत्न करनेवाले विप्रान मे प्रयुत्सार ग्राप्त प्रकातंक होता है ॥ २ [६७] ॥ इस ६७ वो कारिकामे धनमे प्रयकारने नेता, पल तथा वम्नुके वलिप्त होनेके वाधारपर 'प्रकररां' के सात भेद दिग्मात हैं । नायपात, फल तथा धरतु इन तोनोके वलिप्त होनेक' श्राधारपर 'प्रकररण' मे जो सात भेद वनाये गये हैं, उनमे एक, दो, या तोनोकी वलयना होनेक' वारण लोन भेद होते हैं । तोनोमेसे किसी एकके वलिन्त होनेके वारण तीन भेद हाते है । किर दो-दो मे वलिन्त होनेपर भी तोन एक वनते 1 प्रकरण भेद ह । श्रोर

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प्रकरङ्गे कियते कल्प्यते नेता फलं वस्तु वा समस्तव्यस्ततया द्वेधा इति 'प्रकरङ्गम्' । प्रसिद्धत्वान् लधयमनूद्य लङ्घ्यते विधीयते । वार्ताजः क्रय-विक्रयसङ्कृतः । विप्राः पठ-कर्मोपाः । सचिवो राज्यचिन्तकः । श्रयं वशीक-विप्रयोगर्मध्यपात्यपि धीरोदात्त-धीर-प्रशान्ती भकरङ्गे नेतारौ भवत इति-प्रतिपादनार्थं पृथङुपातः । यस्यमत्यं नेतारमभ्यु-पगम्य धीरप्रशान्तनायकमिति 'भकरङ्ग' विशेषोऽस्ति स शृङ्गार-वन्ध्यः ।

सातर्वां भेद उस तीनोंके कल्पित होनेपर बनेगा । इस प्रकार 'प्रकरण' के सात भेद हो जाते हैं । इसको और अधिक स्पष्ट करनेके लिए इन भेदोंको निम्न प्रकार दिखलाया जा सकता है : एकके कल्पित होनेपर तीन भेद : १. केवल नायकके कल्पित होनेपर प्रथम भेद । २. केवल फलके कल्पित होनेपर द्वितीय भेद । ३. केवल प्रार्य्यन-वस्तुके कल्पित होनेपर तृतीय भेद । दो-दो के कल्पित होनेपर तीन भेद : ४. नायक और फलके कल्पित होनेपर चतुर्थ भेद । ५. नायक और वस्तुके कल्पित होनेपर पंचम भेद । ६. फल और वस्तुके कल्पित होनेपर षष्ठ भेद । तीनोंके कल्पित होनेपर एक भेद : नायक, फल, तथा वस्तु तीनोंके कल्पित होनेपर सप्तम भेद । इस प्रकार 'प्रकरण' के सात भेद दिखलाए माने गए हैं । इनमेंसे जहाँ नायक, फल, तथा प्रारब्धान-वस्तु तीनों कल्पित होते हैं वह 'प्रकरण' सर्वथा कल्पित होता है । जहाँ एक या दोके कल्पना की जाती है वहाँ दो या एक भाग इतिवृत्ताश्रित होते हैं यह समझना चाहिए । कवि जिस भागकी कल्पना करता है वहाँ 'प्रकरण' का मुख्य भाग होता है 'प्रकরণ' का चमत्कार उसी भागमें निहित होता है । 'प्रकरण' के इसी कल्पनाको प्रधान-तांबे दिखलानेकेलिए प्रायःकार 'प्रकरण' पदका निर्वचन करते हुए इस प्रकारोपयोगी अर्थका अन्वय प्रारम्भ करते हैं— जिसमे नायक, फल, श्रप्राप्त वस्तुका विधानवशतु कल्पना कृतप्राप्ति फलना [एक-दूसरे] पर्याप्त [महसाते] हैं । [यह 'प्रकरण' 'नाटक' का नियंचन होता है । उससे हो 'प्रकरण' की कल्पना-प्रधानता सूचित होता है] । सदृश [पर्याप्त 'प्रकरण'] के प्रसिद्ध होनेसे [भरतादिकोंने धारम्भ मे सबसे पहले प्रयुक्त 'प्रकरण' इस पदसे] उसका अनुवाद करके [वार्ताजप्रोत् द्वेप भाग मे] सदृश किया गया है । [पहने लक्षणाभागमें पाए हुए यथार्थ प्राधि पदोंको स्पष्ट करते हैं] १ प्रय्यपन २ मप्राप्ति ३ पठन, ४ याचन, ५ दान और ६ प्रतिग्रह पर्यन्त्र जान लेना है] । धीरोदात्त [करनेवाले 'वीर'] [महसाते] हैं । राज्यको [वनता करनेवाला 'सचिव' [कहलाता] है । यह [सचिव] वशीकरण विप्रयोग [पर्यन्त] हो जाननेपर भी [पर्याप्त धीर शांत] होना है और देखिए । वे इनों गुरगों न होने हैं । इसलिये यथाकथित या विप्रकीर्तने हो सचिव होना है मन उन शोंके मत्यपाती होनेपर भी], धोरोदात्त [सचिव] प्रयत्नान्त [विप्र]

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यदिाहु - 'सेनापतिरमात्यश्च धीरोदात्तौ प्रकृतितौ' इति । 'विप्रसंकरात्' इति व्याक्तिभेदेन वृत्तिभेदो नेतारः । न पुनरेकस्यामेव प्रकृताव्यकत्तौ समयकारादिवत् क्रियोदपि ।

‘प्रकरङ्ग’ के नेता होते हैं इस बात के प्रतिपादन के लिये प्रथक् कहा गया है । जो ‘ग्रामात्य’ को नायक मानकर धीरप्रशान्त-नायक वाला रूपक ‘प्रकरङ्ग’ होता है इस प्रकार ['प्रकरङ्ग' को] विशेषित करते हैं वे वृद्ध-सम्प्रदायक को नहीं समभते हैं । [प्रथात् ये प्राचीन प्राचार्यों को परम्पराके विपरीत बात करते हैं । यद्यपि प्राचीन प्राचार्यों के मतानुसार ग्रामात्य या सचिव धीरप्रशान्त नहीं [प्राप्तु धीरोदात्त नायक होता] है ।” जैसा कि कहा भी है— सेनापति और ग्रामात्य धीरोदात्त [नायक] माने जाते हैं । इस ग्रन्थके दूसरे में ‘विप्रा पट्कर्माणः ।’ यह जो लिखा गया है वह मनु श्रादि स्मृति-कारोंकी वयवस्थाके श्राधारपर लिखा गया है । ‘मनु स्मृति’ मे लिखा है कि छः वर्गों में निम्न प्रकार बताए गए हैं— अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानं प्रतिग्रहश्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् ॥ मनु आगे कारिकाग्रे ग्राए हुए ‘ग्रसकरात्’ पदकी व्याख्या करते हैं । उसका प्राशय यह है कि यद्यपि ‘प्रकरङ्ग’ में विप्र, ग्रामात्य तथा वधिक् तीनों नायक हो सकते हैं किन्तु उनका सङ्कर नहीं होना चाहिए । प्रथात् एक ‘प्रकरङ्ग’ में इनमें से एक ही नायक होना चाहिए । एक ही ‘प्रकरङ्ग’ में तीनों नायक नहीं हो सकते हैं । ‘समवकार’ ग्रादि में तो एक हो सकते हैं; यह बात ग्रन्थकारने ‘ग्रसकरात्’ पदसे सूचित की है । इसी वातको प्रागे पञ्चितमे लिखते हैं— ‘ग्रसकरात्’ हस्स [पद] से [यह सूचित किया है कि ‘प्रकरङ्ग’ में] व्यक्तिभेदसे [प्रथात् भिन्न-भिन्न] वृत्तिके श्राधि नायक हो सकते हैं । ‘समवकारादि के समान एक हो ‘प्रकरङ्ग’ [रूप व्यक्तिन] में तीनों [नायक] नहीं [हो सकते हैं] ।

अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानं प्रतिग्रहश्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् ॥

'ग्रसकरात्' हस्स [पद] से [यह सूचित किया है कि ‘प्रकरङ्ग’ में] व्यक्तिभेदसे [प्रथात् भिन्न-भिन्न] वृत्तिके श्राधि नायक हो सकते हैं । 'समवकारादि के समान एक हो 'प्रकरङ्ग' [रूप व्यक्तिन] में तीनों [नायक] नहीं [हो सकते हैं] ।

ग्रागे कारिकाग्रे ग्राए हुए ‘ग्रसकरात्’ पदकी व्याख्या करते हैं । उसका प्राशय यह है कि यद्यपि ‘प्रकरङ्ग’ में विप्र, ग्रामात्य तथा वधिक् तीनों नायक हो सकते हैं किन्तु उनका सङ्कर नहीं होना चाहिए । प्रथात् एक ‘प्रकरङ्ग’ में इनमें से एक ही नायक होना चाहिए । एक ही ‘प्रकरङ्ग’ में तीनों नायक नहीं हो सकते हैं । ‘समवकार’ ग्रादि में तो एक हो नायक हो सकते हैं; यह बात ग्रन्थकारने ‘ग्रसकरात्’ पदसे सूचित की है । इसी वातको प्रागे पञ्चितमे लिखते हैं—

'नादिरा कुनजा मकानिल, चेरेया मचानिपि, द्वय वच्चानि' मत्तो २० ६-२०६ ।

व्याख्या की गई है । पहले व्याख्यामे 'मद्द' पदको 'गोत्र' पदका विनियोग मान कर 'मन्द गोत्रादिजननम्' पदका व्याख्या करते हैं । इस पदके दो प्रथकारों गोत्रा ग्रर्थात् नीचकुलोत्पन्ना वेश्यादि 'प्रकरङ्ग' वी नायिका होती है यह ग्रथं किया है । ग्रोर दूमरी व्याख्याम पहले 'गोत्र' पदका 'ग्रागना' पदके साथ समास करते, फिर 'मन्द' पद गोत्राग्ना' पदका विनियोगा बनाया है । इस प्रक्रियासे 'मन्दा' ग्रथात् निष्ठुर प्राचारगा वाली 'गोत्राग्ना' ग्रथवा 'स्वकुलोत्पन्ना' ग्रथात् नायकके समान गोत्रवाली नायिका 'प्रकरङ्ग' म होती है यह ग्रथं किया है । प्रथात् प्रकरङ्ग में वही नोनकुलजा वेश्या ग्रादि ग्रोर महनी दोनो प्रकारकी नायिकाएँ होती हैं । द्रसीलिए माहिल्यदर्पणकार 'नादिरा कुनजा मकानिल, चेरेया मचानिपि, द्वय वच्चानि' मत्तो २० ६-२०६ ।

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द्वितीयो निर्वेकः

'मन्दगोत्रा' मन्दगुला, श्रगणां नायिका यत्र। यद्वा 'मन्दा' मन्दगुत्ता, गोत्रागता यत्र। श्रुतं प्रयातं नायिकयाीचिरेण नायकेरडपि मन्दगोत्रं यत्र। पूर्वं च पुत्रपदूतिकं श्रशोकदत्तादिशब्दैरप्यनेन समुद्रदत्तस्य नन्दनयन्त्यां या चुलीकशकोपविष्टा, मा न दोषाय। परपुरुषसम्भाषनया निर्वहृं यावदनोपयोगात्। श्रपरथा उत्तमप्रकृतिना श्रशुरुरे वध्या', पुत्रे दूरे स्थितं निर्वासन', निर्गोसितायाश्च शनरसेनापतिगृहे-वस्थानेन मनोचिततमव।

'मन्दगोत्रा' प्रयोतु मध्यम कुलकुला 'श्रगणां' अर्थात् नगिका जिसमें हो। प्रयवा 'मन्दा' प्रयोत् मध्यम माचरर्या वातो गोत्रागता न। प्रयोत् कुलजा नायिका जिसमें हो [वह 'प्रकरा' कहलाती है]। इसीकेलिए नायिकाको श्रनुरुपताके कारएा नायक भी मध्यम कुल का हो होता है। इसकलिए 'पुत्रदूतिक' मे 'प्रशोकदत्त' श्रादिके नायकको सुन कर 'समुद्रदत्त'की 'नन्दयन्ती' के चरित्रके विपयमें जो नका वर्णन की गई है वह दोषायापक नहीं है। सयोगि कि यहाँ निर्वहृं सनिप पयं.त परपुरुष [के साथ 'ननदयन्ती' के सम्बन्ध] की सम्भावनावकर उपयोग [दिखलाइ देता] है। श्रनन्या उत्तमप्रकृति वाले लोगोंने पुत्रके बाहर दूर गए होने पर दरदुरके द्वारा पुत्रवधूको। घरसे निष्कासन, श्रोर निन्दित किए जानेपर [पुत्रवधू का] श्रवरमेनापितने घरमें रहना [जो कि इस 'परपुरुष' प्रकारा] में दिखलाया गया है वह] प्रतुत्थित हो हो जाएगा [उसकी सर्पति तब हो लगती है जब उसके नायक तथा नायिका श्रादिको उत्तम प्रकृतिका न मान कर मध्यम-प्रकृति माना जाए]॥

इसका श्रभिप्राय यह है कि उत्तम प्रकृतिकी नायिकाके प्रति यभो परपुरुष-मदननध वी मता श्र्रादि नही वी जा सकती है। 'पुत्रदूतिक' वो नायिका 'ननदयन्ती' ने प्रति उसने दरदुरके परपुरुष सदनननधवी दूाा उत्पन्न हो गई थी इसलिए उसने पुत्रवधूको घर से निन्दित दिया था। इसपर यह शका होती है कि जँसे 'पुत्रदूतिक' की नायिकाके चरिन के चरित्रके विपयमें शाव? हो गई थी इसी प्रकार 'वेशोसहार' में हुयोंधनको भी श्रपनी पत्नी भानुमती के चरित्रके विपयमं शवाा हो गई थी। तो क्या भानुमती श्रोर हुयोंधनको गनना भी मध्यम प्रकृतिके नायक नायिकाम की जानी चहिए? ग्रशवा उनका उत्तम वर्गके नायकनायिकाओंमें गिनना चाहिए। इस दोनोका ध्याकार यहह समपादान करते हैं कि 'वेशोसहार' में जो भानुमतीके प्रति शावाथा वरूप किया गया है वह श्रनुत्थित है। ये दोनो उत्तम प्रकृतिके नायक-ननायका है। श्रत एवं भानुमतीके चरित्रके प्रति शावाका वर्ग नाटककारको नहों करना चहिए था॥

वेशीसहारवे द्वितीय श्रङ्कम इस घटनाका उल्लेख किया गया है। हुयोंधनकी रानी भानुमतीने युध्दके प्रारम्भ होनेके पूर्व एक दिन रातको एक बहूत बुरा स्वप्न देखा था। उसनेी दान्तकी व्यवस्थाकरानेकेलिए वह एकान्तमें श्रपनी सखियोंोके उस स्वप्न को सुनाइ रही है। इसी वीचमें हुयोंधन उस स्थानपर पहुँच जाता है श्रोर छिपकर उनकी बात सुनने लगता है। स्वप्न म भानुमतीने यह देखा था कि किसी नेवलेने सो शाँपो को मार डाला है। यह दो सत्या कौरवोंके साथ सम्वद्ध हो जाती है इसलिए उसे सो भाइयो सहित हुयोंधनके श्रानिष्टकी शंका हो गई थी। इसी स्वप्नकी यह समाधन [मुनाना रहो हूँ]। उसे नेवलेके लिए 'नकुल' शदद्मा प्रयोग किया गया है। इसको मुन कर हुयोंधनको मात्र्रीवध

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उत्तमप्रकृतीनां राज्ञां तु कुलस्त्रियं व्यलीकसम्भावना दुर्योधनस्यैव भानुमत्या- मनुचितैव । वयसि गमात्य विप्रलम्भ ऋतुवर्गीपत्लयवैवोत्तमा:, न राजपेचया । पतदर्थमेव च मन्त्रशब्देन गोत्रं विशोपितम् । प्रकृतो हि नायको व्युत्पाद्यश्च मध्यमप्रकृतिरेव ।

नकुलके साथ भानुमतीके श्रानुरचित सम्बन्धकी श्राशङ्का हो गई है । उस प्रसङ्गके शब्द जिन्होंने दुर्योधनके मनमें इस प्रकारको शङ्काको उत्पन्न किया निम्न प्रकार है— "भानुमती—ततोडहं तस्यातिशयितदिव्यरूपपुञ्जो नकुलस्य दर्शनेनोत्सुका जाता हतहृदया च । सदृशमिलत्वा तदासनस्थां नत्तामंडलं प्रवेप्टुमारच्य । दुर्योधन:—[सवैलदयात्मकगतम््] किं नामातिशयितदिव्यरूपपुञ्जो नकुलस्य दर्शनेनोत्सुका जाता हतहृदया च । तत्किमनया पापया मातृसुतानुरक्तया वयमेव विप्रलब्धा: । [सोत्प्रेत्ताम् इयमस्मन्् २-९ इति पठित्या] मूढ दुर्योधन ! कुलटाविप्र- लभ्यमात्रमानं वहुमन्यमानोडुना किं वध्ययसि । [किं काष्ठे २-६ इति पठित्या] दिशोऽ- वलोक्य] श्राहो पतदर्थमेवास्मा: प्रातरुत्थ विविक्तस्थाने मिलाप: सखीजनकथासु च पत्पपात । दुर्योधनस्तु मोहाविवशात्वकीहृदयसार: क्वापि परिश्रान्तः । श्राह: पापे ! मत्पार्श्वगतापमुले— तद् भीमत्वं तव मम पुर: साहसानौदर्शनि, र्लाञ्चा सामद्रपुपि विनयव्युक्तमेडन्येप राग: । तच्च्यौदायं मयि जडमती चापलं कोऽपि पन्था:, स्याद् तस्मिन् चित्तमसि कुले डजन्यकोलोनमेतत् ॥ २-९८ सखी—ततस्तत: ? भानुमती—तत: सौदिपे मामनुसरन्नेव लत्तागृहं प्रविप्ट: । उभे—ततस्तत: ? भानुमती—ततस्तेन सप्रगल्भप्रसरारितकरेऽपहृतं मे स्तनांशुकम् । उभे—ततस्तत: ? भानुमती—तत् श्रायपुत्रस्य प्रभातमगलनूर्यैरर्वामिश्रेऽपि वारिवल्लासीनोज्ज्वल- संगीनृतवेगा पतितरोगप्रसरप्रसृतिम् । इस प्रकारसे भानुमतीके स्वप्न-दर्शनके वृत्तान्तवा जो वचाँन किया गया है उससे दुर्योधनको भानुमतीके प्रति विपयमें शङ्का हो जाना स्वाभाविक या । किन्तु मन्तमें जय उसका यह मालूम हुग्रा कि यह स्वप्ना वर्ाान है तब स्वप्न ही उसकी शङ्का का निवाररा भी हो गया । किन्तु ग्रन्थकारका कहना यह है कि उस उत्तम प्रकृतिके नायक- नामिप्रसङ्गे विप्रलम्भे इस प्रकारकी शङ्काका होना भी उचित नहीं है । इसलिए कविका यह वर्ाान मनुचित है । हमी बातको वे ग्रागे दिखलते हैं— उत्तम प्रकृतिके राजाओंमें सो, कुसत्नियोंके प्रति भानुमतीके विपयमें दुर्योधन द्वारा जो दूषित सम्भान, दुरचरित्रप्रताकी सम्भावना [श्र वर्णन] भी मनुचित हो है । [प्रत एष 'व्यलीकसहार' इत्यादि यह प्रसङ्ग मनुचित हो है] ।

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दिव्यानाश्रितम् इति दिव्यैराश्रितम् । नाटके हि श्रृङ्गारवेन दिव्यो भवति । प्रकृतयो तु तथाभावोऽपि नेप्टः । तभ्य सुरसवाहुल्येनाल्पदु.स्वान्त । श्रपरथा दिव्यत्वमेव हीयते । मध्ये सतोत्तम-हीनप्रकृतियोग्य नेप्टितं विहार-व्याहार-वेप-सम्भोगादिको व्यापारो यत्र । तेन कल्पितमृत्तवेष्ट्यभ्य न राजोचितान्त पुरानिसम्भोग । कञ्चुकि-प्रभृतिसृत्सवर्यो वा । न चाघमपात्रसम्भोगादिवो निवन्धनीय । तथा च वेश्यायां नायिकायां विनिग्रहादिनापि नेप्टित निवध्यते । यथा विशारदेनोक्तं 'देवोचन्द्रद्रुप्ते' मायसेनां समुद्दिश्य कुमारचन्द्रगुप्तयोगिनि— श्रानन्दाश्रुजलं सितोत्पलमृगोरावधनना नेत्रयोर्य, प्रत्यङ्गेपु वरानने पुलकितु म्वेदं समातन्वता । कुर्वाणेन नितम्बयोरपचयं सम्पूर्णोपरप्स्यो, केनाप्यङ्गपुरातादृङ् धोनिवसनम्र्यस्थतवोतच्य यासितः ॥ इति ॥

प्रपेक्षाके नहीँ । इसके लिए भी 'मन्द' श्रर्थसे 'गोत्र'को विरोषित किया है । श्रर्थात् 'मन्दगोत्राद्ननं' पदमें जो 'मन्द' पदके 'गोत्र' पदका विरोषण वनाया गया है उसका यह प्राभिप्राय है कि वधिक् ग्रन्थ ग्रादि, राजाको प्रपेक्षाके मन्द गोत्र वाले हो होते हैं । 'प्रकरए'मे नायक श्रोर [ग्रुत्पाद्य, श्रर्थात् जिनकी शिक्षाके लिए 'प्रकरए' की रचना की गई है वे] सामाजिक दोनो मध्यम श्र्रेश्रोके ही होते हैं । नाटके हि श्रृङ्गारवेन दिव्यो भवति इसका यह श्रयं है कि दिव्यपात्रोंसे रहित । 'नाटक'मे तो श्रवसे नायकके सहायक रूपमें] दिव्य पात्र [उपस्थित] होता है किन्तु 'प्रकरए'मे तो उस प्रकरकी [श्रर्थात् नायकके श्रागयपात्रे] स्थिति भो इष्ट नहीँ है । उस [दिव्यपात्र] के मुलप्रधान होनेके श्रोर प्रस्तप्तु लययुक्त होनेके कारए [वेशालाघ्य प्रयायात् दु.खप्रधान 'प्रकरए'मे उनकी स्थिति सगत नहीँ वनती है] । ग्रपन्या [ग्रर्थात् यदि दिव्य पात्रोंको मुलप्रधान श्रोर प्रस्तुत दु खाला न माना जाय तो उनको] दिव्यता ही नष्ट हो जावेगी । श्रागे कारिकामे ग्राए हुए 'मन्दचेप्टितम्' पदकी व्याख्या करते हैं— ग्रर्थात् सवोत्तम श्रर्थवा सवसे निकृष्ट प्रकृतिके प्रयोग, चेष्टित ग्रर्थात् विहार, व्याहार ग्रर्थात् भापए, वेप ग्रोर सम्भोगादि व्यापार जिसमे हो [वह मध्यचेष्टित 'प्रकरए' होता है] । इसलिए ग्राग्यान-कस्तुकके कल्पित होनेपर भी उसमे राजप्रोके समान ग्रनत.पुर ग्रादिका भोग, कडचुकी प्रभृति वृत्सवर्यो, ग्रप्रथवा प्रधानपात्रोका-सत् सम्भोगादिक वर्जन नहीँ करना चाहिए । [ग्रपितु सव कुछ मध्य स्रिवतिके श्रनुरूप हो होना चाहिए ] । इसीलिए वेधया के नायिका होनेपर शिष्टता-रहित वारोेका भी वर्जन हो जाता है । जैसे विशारदेवके बनाए हुए 'देवोचन्द्रगुप्त'मे मागयसेना [वेधया] को लक्ष्यमें रखकर कुमार चन्द्रगुप्तने [शिष्टताके रहित निम्नलिखित] उक्ति है—

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व्युत्पत्तिरोडपि च प्रकारेऽपि मध्यमप्रकृतिरेव । नेता चरितस्यापि तथाभूतत्वादिति ॥ दास-श्रेष्ठी-विटैर्यत्नुं' इति । 'दासो' जीवितावाधि वेतनक्रीतो, वल्यानू' प्रभृति पोपितो वा । 'श्रेष्ठी' वणिक्प्रधानम् । 'विटो' धूर्तः । तत्र कड्चुकिस्थाने दास । श्रमात्य-स्थाने श्रेष्ठी । विदूपकस्थाने विट । उपलब्धयं चैतत्त्, तेनापरमपि चाटुकार-सहाय-शतान्तर्गतफलत्वादिति एलावल्लभणम् । 'कले शालयं' इति दु खाद्यम् । स्वपाय-शतान्तर्गतफलस्वादिति एल्लभणम् । तत्प्रचेतित, उत्कलदयं 'प्रकरां' सप्तभेदम् । 'डनो' नायक । 'कलं' मुख्यसाध्यम् । 'वस्तु' फलसाधकं उपाया । एलत्प्रकारैक-द्वि-त्रिविधानेन सप्तभेदं 'प्रकरा' । तत्र नेता प्रकल्पने तदिवरयोश्चाल्पने एको भंगः । एवमेककल्पविधानेन त्रयो भंगा । तथा नायक-फलयो, नायक-वस्तुनो; फलवस्तुनोर्वा कल्पने श्रेप्सयैकस्य चाकलपने त्रयो द्विकभंगा । एको भंगः । एवं सर्वमेलनेन सप्तधा प्रकारेरामिति ॥ १-२ [६६-६७] ॥

यह कुमारचन्द्रगुप्तका वचन विनय-रहित या शिष्टता-रहित है । उत्तम प्रकृतिके पात्रों में इस प्रकारके वचनोका प्रयोग युक्त नहीं होता है । किन्तु यहाँ वेध्या माधवसेनाके नायिका होनेके कारएा इस प्रकारके वचनके प्रयोगकी सगति दिखाई जा सकती है । यह ग्रंथकारका अभिप्राय है । नायकके चरित्रों में जो [उस प्रकारके प्रयत्नात] मध्यम-प्रकृतिके होनेके कारएा 'प्रकरए' रसमें [व्युत्पत्त्यादि सामान्जिक जो मध्यम प्रकृतिके ही होते हैं] श्रागे कारिकामें ग्राए हुए 'दास-श्रेष्ठी-विटैर्यत्नुं' तककी व्याख्या करते हैं— 'दास-श्रेष्ठी-विटेर्यत्नुं' [इतका यह ग्रभिप्राय है कि] जीवन-पर्यन्तके लिए वेतनसे क्रय किया हुग्रा प्रथवा बचपनसे पाला हुग्रा 'दास' होता है । वएिकका प्रधान, प्रयवा वणिग्जनका प्रधान 'श्रेष्ठी' कहलाता है । 'विट' [का श्रर्थ] घूर्त है । उनमेंसे [नाटकके] कड्चुकीके स्थानपर 'दास' [को सम्भाना चाहिए] । श्रमात्यके स्थानपर श्रेष्ठी श्रोर विदूषकके स्थानपर विट [का उपयोग] होता है । 'दास-श्रेष्ठी-विटेर्यत्नुं' तक यह [वचन] उपलब्धयं हप है । इसलिए वएिकु श्रादि [नायकके] चरित्रकेके प्रतिमार चाटुकार [चापलूस] सहाय-शतान्तर्गतफलत्वादि धन्य [पात्रों] का भी वर्णन करना चाहिए । 'कले शालयं' इसका 'दु खाद्यम्' यह प्रयं है । [फलेशाद्यं' इसका 'दु.क.त.ग्रधान' यह प्रयं है । यपोक्ति उसका फल सकंडी कष्ट भोगनेके बाद प्राप्त होता है । [इसलिए 'प्रकरए' दु स्वप्रधान रूपक होता है] । यहाँ तक [प्रर्याप्त ६७वीं कारिकाके पूर्वार्ध' भाग तक प्रकरएका] लक्षएा कहा है [ग्रागे उसके भेद दिखलाते हैं] । श्रागे ६७वीं कारिकाके उत्तरार्ध भागकी व्याख्या करते हैं । इसमें 'कल्यान-पल-वस्तुना' इस पदमें 'कल्यान' दं' पदच्येद 'कल्प+डन' यह किया जाता चाहिए । इस प्रकार पदच्येद करके हो उसका प्रयं श्रागे दिखलाते हैं— 'प्रकारए' सात प्रकारका होता है । 'डन' [नामका प्रयं] नायक है । फल [नामका प्रयं] मुख्य साध्य है । श्रोर नकके साधक उपाय 'वस्तु' [कथनते] हैं । उनमेंसे एक [प्रकारए] में 'प्रकरा' हू प्रकारका होता है । 'डन' नायकके विधानसे 'प्रकरा' में सात 'भंग' होते हैं ।

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श्रथ नायिकायोगद्वारेपा भेदसंख्यानमप्याह— [सूत्र ११५]—कुलस्त्रो गृहवात्तोयं पण्यस्त्रो तु विपयये । विटे पत्यौ द्वयं तस्मादेकांश्रशतिधाडप्यद: ॥ ॥ [३]६५॥

गृहवात्तोयं गाढ़स्थ्योचितपुरुपार्थसाधके वृत्ते कुलजैव स्त्री नायिकात्वेन वरीगादौना निवन्धनीया । यथा ‘पुष्पदूषितक' । विपयये तु गाढ़स्थ्योचितपुरुपार्थविरहेऽशैवै नायिकात्वेन निवन्धनीया । यथा ‘तरङ्गदत्ते' । उभययोगस्य विट एव विधानदनयोरप्यवधारणाम् । विटे गीत-नृत्य-वाद्याविचक्षणे चूत-पान-वेश्यादिपु प्रसक्ते कला-कुशले मृलदेववाडौ पत्या नायकत्वेन' विराजिते वेश्या कुलस्त्री चेति द्वयं तदुचितगाढ़-स्थ्यपुरुपार्थोपेतचया निवन्धनीयम् । श्रथस्य तु विटत्वादेव पतयस्त्रीप्रधानम् । कुलस्त्री तु पित्रृ-पितामहादिगुरोरोधादू गोप्यम् । विटस्य पतित्वानुरादादू वरीगादन्तर्भूतोऽपि 'प्रकारणो' विटो नेता लभ्यते । वेश्या-कुलजाभ्यां संकीर्णोत्पाद्यं भेदोऽखुद्द । पूर्वों तु शुद्धौ स्त्रीसंकराभावान् । शुद्धभेदयोरपि विट: सहायक एक । संकीर्ण तु बहव । केचित्तु तु वरीगनेतृकमरिपु धूर्तसंकुलतायनस्न्नकटाकादिक संकीर्ण मन्यन्ते ।

भेद हो जाते हैं । उनमेंसे नायकके कलिप्त, श्रकलिप्त, श्रोर वस्तु इन दो [प्रकार— फल श्रोर वस्तु] के कलिप्त न होनेपर एक भेद होता है । इसी प्रकार कल श्रोर वस्तुतुमे भी [एकके कलिप्त श्रोर शेष दोके कलिप्त न होनेपर एक एक भेद होता है] । इस प्रकार एककी कल्पनाके विधानसे तीन भेद बनते हैं । इसी प्रकार (१) नायक श्रोत फल, (२) नायक श्रोर वस्तु तथा (३) फल श्रोर वस्तु इन दो-दो के कलिप्त, श्रोर शेष एकके अकलिप्त होनेपर दो-तीन वाले तीन भेद होते हैं । नायक, फल श्रोर वस्तु तीनोंके एक साथ कलिप्त होनेपर एक भेद बनता है । इस प्रकार सबको मिलाकर ‘प्रकारणो' के सात भेद हो जाते हैं ॥ [१-२] ६६-६७ ॥

इस प्रकार ६७ वाँ कारिकाके उत्तरार्धमें नायक श्रादिके कलिप्त होनेके श्राधारपर 'प्रकरण' के सात भेद दिखलाए हैं । श्रागे कुलस्त्री, वेश्या तथा दोनों प्रकारकी नायिकाग्रों के वर्गीभत होनेपर इन सातों प्रकारके 'प्रकारणो' के तीन-तीन भेद श्रोर भी बन सकते हैं । इसलिए 'प्रकारणो' के २१ भेद हो जाते हैं । इन भेदोंको प्रागे कारिकामें दिखलाते हैं— श्रग्र नायिकाके भेदोके द्वारा ['प्रकारणो' के] भेदोंकी सत्यामो भो कहते हैं—

[सूत्र ११६]—गृहस्थोचित वृत्तमे कुलस्त्री, इसके विपरीत वृत्तमे वेश्या श्रोर विट [पतिं के, पति [रूपमे यंमिलत] होनेपर [कुलस्त्री श्रोर वेश्या] दोनों [नायिकाएं हो सकती हैं ।

[नायकको] कुलजा स्त्रो हो नायिका हुपमे रवनो चाहिए । जैसे 'पुष्पदूषितक' मे । इसके विपरीत प्रयुक्त गृहस्थ्य धर्मके उचिव पुरुषार्थका ध्यागात् न होनेपर वेश्याको ही नायिका हुपमे प्रस्तुत करना चाहिए । जैसे 'तरङ्गदत्त' में । [कुलजा श्रोर वेश्या] दोनोंके योग कर विटके साथ ही [पर्याप्त विटके पति होनेपर] हो त्रियन होनेके इन [कुलजा सया

१ विपयते ।

१ विपयते ।

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एपु च वेदेपु नायकवृत्तानुरूप एव व्युत्पाद्यः। व्यत्र हि वसंगमात्यविग्राहु-चिता त्रिवर्गप्राप्तिः। तदर्थे रूपैर्यैर्योदित, न्यापदि मूढता, कुलस्त्रीकृतं, वेश्यासुसम्भोग-चातुर्यं, विट-द्यूतयोः स्वरूपं, नायिकारागपरागलिगानि, हृदयप्रहरणप्रयोगरच, नायक-योरपरागकरपानि, चतुरोत्तममध्यमप्रकृतेर्नायिका-याश्च स्वरूपम्, सामाजिकप्रयोगरच व्युत्पाद्यनामुपदिश्यते। 'तसमादिति' यतः शुद्ध-संकीर्णप्रभेदत्रयं सप्तभेदैर् 'प्रकररैः', 'तरमादिकोविदग्धविनिबध्य' इत्यादि 'प्रकररैः'। चतुर्दश शुद्धाः, सप्त संकीर्णा प्रकरणभेदा। नायिकायाः। कलिप्ताकलिप्ततत्त्वेनान्येऽपि भेदाः संभवन्ति। परमतङ्गल्वादुपेत्स्यः॥ [३] ६५ ॥

वेश्यादि दोनोकाभी श्रावणारा है [प्रथमतः गृहवार्त्तामें केवल कुलजा ही, श्रौर उससे भिन्नमें केवल वेश्याही नायिका हो सकती है इस प्रकारका नियम] है। 'विट' श्रर्थात् गीत-नृत्य श्रादि वाद्यमें निपुरा धूत, पान श्रादि वेश्यादिके सेवनमें तत्पर कला-कुलाल मूलदेवादि जैसे पतियोके नायक हुपमें विरक्षित होनेपर वेश्या श्रौर कुलजा दोनो ध्रपनेअपने योग्य गृहस्थोचित पुरपार्थकौ [श्रौर उदात्ते भिन्न पुरपार्थकौ] श्रपेक्षासे [नायिकाके हुपमें] वेश्या श्रौर कुलजा दोनोकी रचना करनी चाहिये। इस [विट रूप पति] के धूर्त्त होनेके कारण ही वेश्या प्रधान है श्रौर कुलस्त्री तो पिता पितामह श्रादिके धनुरोधसे [रक्षी हुई होनेके कारण] गौण होती है। त्रिदंशके पति रूपमें कत्पन करनेसे वेश्याग्र श्रान्तर्गत होने पर भी विट नायक हो सकता है यह बात निकलती है। [प्रर्थात् विट 'प्रकरर:' का नेता तो हो सकता है किन्तु वह पूर्वोक्त वरिंगग् श्रप्रामाण्य या विप्रोमसे ही कोई होगा। उससे भतग्न नहीं] । वेश्या तथा कुलजा [दोनो प्रकारकी नायिकाम्रो] से संकीर्ण होनेके कारण यह भेद शुद्ध भेद है। पहले दोनो [प्रथमत् जिसमें केवल कुलजा प्रथवा केवल वेश्या ही नायिका हो] स्मीकरे सकर न होनेके कारण शुद्ध भेद हैं। शुद्ध भेदोंमें भी सहायकौके सहित एक विट होता है। सकीर्णोमें तो अनेक होते हैं। कोई लोग वदिक् जिसका नायक है इस प्रकार के 'प्रकरर:' को भी श्रोतोंकि व्याप्त होनेके कारण संकीर्ण मानते हैं। जैसे शूद्रककृत 'मृच्छकटिक' श्रादि । इन भेदोंमें नायकके वृत्तके श्रनुसार हो समाजिक [श्रोतॄ] होते हैं। इसमें वधक्, श्रप्रामाण्य, विप्र श्रादिके उचित [जिसमें श्रर्थ काम रूप] १ त्रिवर्गकी प्राप्ति, २ उसके प्राप्त करनेकेलिए प्रपेक्षित निश्ररता, प्रज्ञा प्रादि, ३ श्रप्राप्तिकालमें मुग्धता, ४ कुल-स्त्रियोक गुप्तचार, ५ वेश्याद्रोंके भली प्रकार सम्भोगादि चातुर्य्यं, ६ विट तथा द्यूतकके स्वहुप नायिकाके श्रागपरागके लिंग, ८ हृदयको यशमें करनेके प्रयोग, १० नायकनायिक दोनोके परस्पर श्रपरागके कारण, ११ चतुर उत्तम मध्यम प्रकृतिके नायक, तथा १२ सामाजिक उपयोके प्रयोग कर उपदेश सामाजिकोको दिया जाता है। 'तरमादि' इससे [यह प्रभिप्राय है कि] श्रोताओं सात भेदौले मुक्त 'प्रकरर:' [एक केवल कुल स्त्रियोंके नायिका] होनेपर श्रौर दूसरा देवतल पणश्रोंके नायिका होनेपर] जो शुद्ध श्रौर एक सकीर्ण [प्रर्थात् जिसमें दोनो प्रकारकी नायिकाएं हों] होते हैं। इसलिए वह 'प्रकरर:' १×३= ३ प्रकारका हो सकता है। उनमेंसे चौदह शुद्ध श्रौर सात संकीर्ण भेद होंगे। नायि-

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श्रथाकल्प्यविरूपम्¹ निरूपयति-- [सूत्र ११६]—श्रथाकल्प्यं पुरा चलृप्तं यद्वाड्नापंमसद्गुरूणाम् ।

श्रत 'प्रकरसो' श्रकल्प्यं श्रुत्पादि यत् तु । पूर्वकविवृत्तकथ्यादौ क्लृप्तं सन् समुद्रदत्ततनुचेष्टादिवद् माहाम् । श्रथवचा यदन्राकल्प्य स तु पूर्वविप्रसिद्धतशादिव्यतिरिक्त-श्रुत्कथादिवोपनिवद्ध मूलदेवचरित्रादिवोदितदशपोदयम् । 'श्रसद्गुरूणाम्' इति यदन्रो- कल्प्यं पूर्वकविकलिप्तं वृत्तकथाश्रुपनिवद्धं वा चरित्रमपि तदसद्गुरूणां, पूर्वकविकल्पितये वृत्तकथादौ न्यासन्तो गुरूणाम् । रसपुष्टिरहितयो भासितिविरशेपादयो यत्र । यदप्यत्र प्रारक्तनं निर्द्धयते तदपि कविना रसपुष्टिरहितरधिकावापो विधेय इत्यर्थ । श्रत पञ्चार्पस्य वर्जनम् । तत्र हामूलगुरूणावपे श्राद्धलोकस्य जुगुप्सा स्यादिति ॥

कामपेके कलिप्त श्रौर श्रकलिप्त होनेसे श्रौर भी श्राधिक भेद हो सकते हैं । परन्तु [लक्ष्यग्रन्थोंमें] न पाए जानेसे उनका यहां वर्णन नहीं किया है [उनकी उपेक्षा कर दी है] ॥ [३]६५ ॥ ग्रथ 'प्रकल्प्य' [प्रकल्पति जिसमें नायिकादिकी कल्पना नहीं की जाती है उन] स्वश्रपकों कहते हैं— [सूत्र ११६]—जिसकी कल्पना पहिले [ग्रन्थ काव्योंमें] को जा चुकी है श्रयवा अन्य प्रन्थोंमें वर्णित किन्तु [प्रसद्गुरूणाम् प्रयांतु] नवीन गुणोंसे युक्त [नायकादि यहां 'प्रकरस' में] प्रकल्पित हो सकते हैं ।

यहां श्रथांत 'प्रकरस' में जो श्रकलिप्त प्रयांतु [कविके द्वारा स्वयम्] श्रुत्पादित होता है वह पूर्वं कवियोंके वनाए काव्योंमें कलिप्त समुद्रदत्तादिके चरित्रके समान [यहां 'प्रकरस' में] ग्रहण किया जाता है । श्रयवा जो यहां प्रकलिप्त होता है वह पूर्ववर्ती ऋषि-प्रसूत वात्स्यायनादिसे भिन्न वृहत्कथादिमें [श्रनापं प्रन्थों] में उपनिवद्ध मूलदेवचरित्र श्रादिके समान उपादेय होता है । [किन्तु विशेषता यह होती है कि यह] 'प्रसद्गुरूणाम्' श्रथांत् पूर्वकवि-कलिप्त चरित्र यहां [प्रकरसमें] प्रकटित रूपमें लिया जाता है वह भी, उसमें जो गुण वहां [पूर्व कविके पात्रमें] नहीं होते हैं उस प्रकारके श्रपूर्वं गुणों से मुक्त होता है । श्रथांत् पूर्वं कवियोंके काव्योंमें श्रौर वृहत्कथादिमें जो गुण उसमें नहीं दिखलाई गए हैं इस प्रकारके श्रपूर्वं वचने-विरोपादि रूप गुण जिसमें हों इस प्रकारकर 'प्रकरस' होना चाहिए] इसमें जो कुछ पुरानी बात कही जाए उसमें भी रस की परिपुष्टिकेलिए कविको नई बात श्रौर बढ़ा देने चाहिए । यह श्रभिप्राय है । इसीलिए यहां [प्रनापं पदसे] श्रार्य [चरित्रों] में नवीन गुणों वसांन होनेपर श्राद्धालु लोगोंको श्रद्धा हो जाएगी । [इस प्रकार 'प्रकरस' के तात्पर्यमें नाटकके भिन्न] श्रप्रकाश्यभूत कार्योंको कह कर श्रथ नाटकके समान हो जो-जो बातें 'प्रकरस' में भी पाई जाती है उन] तत्संग्रभूत [सामान्य वानों] कर 'प्रकरस' में प्रतिनिदेश करते हैं—

१ क्लपस्विह्नप ।

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[सूत्र १२०]—शेषं नाटकवत् सर्व केशिकोपूरांतां विना ॥ [४] ६५॥

[सूत्र १२०]—केशिकोकी पूरांताको छोड़कर शेष सब नाटके समान 'प्रकरण' मे भो होता है । [४] ६५ ।

उक्ताद् वशीक-विप्र-सचिव-स्वाम्यादिकाललक्षणाच्छेपं चापरमभिनेयप्रवनधो-चित्रं फल-च्छद्-उपाय-दर्शा-संधि-संध्यंग-प्रवेशक-विष्कंभक-श्रृंगावतार-श्रृंगकसुत-चूली-कावृत्तिभेद-रसादिके यथा नाटके लक्ष्यतं तथात्रापि सर्वमौचित्यानतिक्रमेण योज्यम् । वृत्तिचमत्कृत्यस्यानिदेशेऽपि केशिकीवाहुल्यं न निवनधनोयम् । कलेशप्राचुर्येऽपि शृङ्गार-हास्ययोर्लपत्वात् । यथा मृच्छकटी-पुष्पदूषितक-तरंगदत्तादिपु । यत्पुनः-भवभूति-मालतीमाधवे केशिकीवाहुल्यमुपनिबंधं, तन्न वृद्धाभिप्रायमनुरुध्यतेति ।

[प्रकरणके लक्षणमे विशेष रूपसे कहे हुए] वशीक, विप्र, सचिव, स्वामी आदि [पात्रों] के लक्षणोंसे अतिरिक्त अन्य अभिनेय प्रवन्धों में चित्र फल, छद्, उपाय, दर्शा, संधि, संध्यंग, प्रवेशक, विष्कम्भक, शृंगावतार, शृंगकसुत, चूली, कावृत्ति भेद और रसादिक जैसे नाटकोंमें लक्षित हैं वैसे ही यहाँभी [प्रकरणमें भी] सब [उक्त तत्व] औचित्यके अतिक्रमणसे रहित होकर योजित करने चाहिए । वृत्ति और चमत्कृतिको अनिर्देश करनेपर भी केशिकी वृत्तिकी बाहुल्यता इसमें [प्रकरणमें] नही होनी चाहिए । क्लेशकी प्रचुरतामें भी शृंगार और हास्य रसकी लपलपाहट होनी चाहिए । जैसे मृच्छकटिका, पुष्पदूषितक और तरंगदत्ता आदि [प्रकरणों] में [होता है] । जो पुनः भवभूति और मालतीमाधव में केशिकी वृत्तिकी बाहुल्यता उपनिबद्ध की गई है वह वृद्ध [पुराने] अभिप्रायको [मतको] अनुसरण नहीं करती है ।

तदयं संक्षेपः—यस्य पूर्वंप्रसिद्ध एवार्थे कुलोचितलं व्यसनिप्रसृतशास्त्रप्रसिद्ध-चरितेन नाटकेन राजादिरुत्कतामपृकृतिवियु तत्पादते । यस्य पुनरुत्कायोऽर्थे कुतोचितलमसौ चरितैरादिरिमे ध्यमप्रकृति: 'प्रकरएन्' । दुमेंधसां हि न्याय्ये वत्में न हि श्रृङ्गार्यर्थ कवयोड-भिनेयप्रवनधान् प्रधानन्तीति ॥ [४] ६५ ॥

इसका सारांश यह है कि-जिनकी पूर्वप्रसिद्ध चरित [प्रतिपादन] में ही अभिरुचि होती है उन राजादि उत्कट प्रकृतिके लोगोको मुनियोके बनाए हुए शास्त्रादिमें प्रसिद्ध चरित वाले नाटकादिके द्वारा ही श्युत्पत्ति कराई जाती है । और जिनकरे [नाटकादिके] कविपन में अभिरुचि होती है उन मघ्यम प्रकृति वाले यथिक् प्रादिमोंकि 'प्रकरण' के द्वारा [श्युत्पत्ति कराई जाती है] । क्योंकि मनदबुद्धियोंको उचित मार्गमें प्रष्त करानेकेलिए हो कविजन अभिनेय प्रवन्धोंकी रचना करते है ।

अथ प्रकरणानन्तरोहृष्टां नाटिकां लचयितुमाह—

तीतीय कल्पक भेद 'नाटिका' का लक्षण—

१. तन्र । २ वंशपात्रे ।

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चतुरंका बहुस्त्रोका नृपेशी स्त्रो-मही-फला । कल्प्यार्थी केशिकोमुख्यैः पूर्वरूपद्धयोतितता ॥ [४] ७०॥

[सूत्र १२२१]—चार अंकों वाली, अनेक स्त्रियों [पात्रों], राजा रूप नायक, और स्त्री [प्रथमा पृथिवी या को प्राशित रूप] फल वाली, कल्पित अर्थ [प्रधान], केशिकी वृत्ति, पूर्वंकपित दोनों रूपकों [प्रर्यांतः 'नाटक' गौर 'प्रकरस''] से उत्पन्न, 'नाटिका' होती है । [यह 'नाटिका'का लक्षण हुग्रा] । [४] ७० ॥

[सूत्र १२२१ ख ]—कन्या गौर देव्यों [दो प्रक्रारकी इसकी मांनिकाएं होती हैं उन दोनों] के [भेद] श्रप्रप्रसिद्ध तथा प्रसिद्ध होनेसे [दो-दो भेद हो जाते हैं । इस प्रकार कुल मिला-कर] 'नाटिका'के चार भेद होते हैं ।

['नाटक' में साधाररपात 'कार्य' की पांच 'वृत्त्यसथाएं' वतलाई गई हैं गौर उनमें से प्रत्येक 'वस्तुप्रया' का वयांन एक-एक ग्रंथकमे पूरार होनेके कारण 'नाटक' में कम-से-कम पांच ग्रंक ग्रावश्यक माने गए हैं किन्तु 'नाटिका' में चार ही ग्रंक बतलाए हैं । इसलिये उपपादन करते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं कि—

'चतुरंक' इससे तात्पर्य यह है कि इसके तोन श्रंकोंमें एक ग्रंक तोन श्रन्य किये गये एक वृत्त्यसथाका प्रधानभूत ग्रन्य प्रवस्यमें समावेश कर एक साथ दो वृत्त्यस्थामोंकी समासि वाला एक [घोघ्र] ग्रंक, इस प्रकार चार ग्रंक होते हैं । 'नाटिका' में क्यार्वरसु कम होनेके कारण क्यावस्तुके सभेपकेलिये हो एक वृत्त्यस्थाका [किसी दूसरी वृत्त्यस्थामें] समावेशा कहा गया है ।

[नाटिकामें] केशिकीकी प्रधानताके कारण 'श्रृंगाररस' की मुक्तता होनेसे बहुत [नाटिकामें] श्रृंगार [प्राधान्य] होता है । इसो कारण [वे निन्रयां] ललित ग्रभिनय ग्रादि होती हैं । [नाटिकाकों] निन्न्रयां देवो, दूती, सकी, चेटी, गौर कन्या ग्रादि होती हैं । ['नृपेशा' में] नृप [नायक] से गौरस्सलित राजा, [का प्रहरण होता है] वह जिसमें स्त्रामी ग्रप्रयत्न नायक हो [वह व्यवहार राजाके योग्य ही होता है । क्योकि सारा व्यवहार नायकके प्रति ही उचिंत होता है । 'स्त्रो-मही-फला' इससे [यह वात सूचित की है कि] श्रृंगारमें पूर सर राजयप्राप्ति

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तेन द्वाप्यत्नोत्पातौ ।

'कैशिकी' वृत्त्यमापालकत्वात्, सा 'मुख्या' प्रधान यस्याम् । मुख्यत्वं च गेय-वृत्त्यपेक्षया वाहुल्यम् । तत् एव गीत-नृत-नाट्य-हास्यादीनां सङ्झाराज्ञां प्राधुर्यम् । पूर्वस्मपद्रय 'नाटक' 'प्रकरा' च । तस्मादुस्थितमुत्थान यम्याम् । कैशिक्याः प्राधान्यान्न च यन् नोभयायं कामफलं 'नाटक', 'प्रकरा' च किश्चित्, तदिह ग्राह्यम् । छन्यानुपतत्व-भावान् । नतद्र्योत्थितत्वेन चावस्थासन्धिसंन्ध्यङ्ग-बीज-विन्दु-पताकाप्रस्थानक-श्रङ्क-प्रवेशक-चिपक्रमभक-इतिवृत्तभेदादीनि,उभयभेदसाधारण्यानि लभ्यन्ते । तन 'नृपेश' इति नाटकधर्म । तत एव नायकोडकलिपत । 'कलत्र्यार्थी' इति प्रकारणधर्म । पतावलत्नयाम् ॥ [ ४ ] ७० ॥

'प्रल्याति-नद्यांतित' इति ।

इह नाटिकया नायिकया द्वय कन्या देवी चेति युगपन । अपरिस्पिता कन्या । छन्त पुरसंगीतकभेदभिन्ना । परिस्पिता तु देवी । तयो ध्युत्पत्ति तथा । 'श्रयेथे' श्रननेति प्रयं' इस प्रकारको करण परक ध्युत्पत्ति हो सकती है । इसलिये करण श्रौर करण-परक [द्विविध] ध्युत्पत्तियोंके कारण फल श्रौर उपाय दोनो 'प्रयं' होते हैं । 'प्रथ्यात् करणं ध्युत्पत्तिके श्रनुसार फलको 'प्रयं' कहा जाता है श्रौर करण ध्युत्पत्तिके श्रनुसार 'उपाय' को 'प्रयं' कहा जा सकता है । इसलिये [नाटिकामें फल श्रौर उपाय] ये दोनों कल्पित होते हैं । [यह श्रभिप्राय है] ।

'कैशिकी' का लक्षण ग्रभिप्राय किया जायगा ।

वह जिसमें मुख्य श्रथांत् प्रधान हो [यह 'कैशिकोमुख्या' का प्रयं है] । प्रयं [भारती श्रारभटी श्रौर सात्वती] वृत्तियोंकी श्रपेक्षा [कैशिकीका] बाहुल्य हो [उसकी] मुख्यता है । इसीलिए [नाटिकामें] गीत, नृत्य वाद्य श्रौर हास्य श्रादि श्रङ्गारके श्रागोको प्रवर्तता रहती है । पहिले कहे हुए जो दृश्यकावेद प्रार्थान्त नाटक श्रौर प्रकरण उनसे जिसकी उत्पत्ति होती है [वह नाटिका होती है यह 'पूर्वस्म-द्योत्यितता' पदका प्रयं है] । कैशिकीको प्रधानतता होनेके कारण जो कोई नाटक प्रयवा प्रकरण स्त्री बहुत श्रौर कामफल वाला हो उसका ही [नाटिकाकी प्रकृतिको रूपमें] पहचरण चाहिए । प्रयं [नाटक या प्रकरण] के [नाटिकाके स्वहपके] श्रतभूत न होनेसे [अन्य प्रकार के नाटकादिको] नाटिकाको प्रकृति नहीं माना जा सकता है । इन [नाटक तथा प्रकरण] दोनोंसे उत्पन्न होनेके कारण प्रस्त्या, सन्धि सन्ध्यङ्ग, बीज, विन्दु पताका, प्रकरी, पताकाप्रस्थानक, श्रङ्क, प्रवेशक, विलासक, श्रौर कावस्तुका भेद श्रादि 'नाटक' तथा 'प्रकरण' दोनोंसे मिलते-जुलते हो [नाटिकामें] लिए जाते हैं । नाटिकामें 'नृपेशा' [प्रयात राजा नायक होता है] यह नाटकका धर्म है । इसीलिए नायक कल्पित नहीं होता है । श्रौर 'कलत्र्यार्थी' यह 'प्रकरण' का धर्म है ।

यह नाटकका धर्मं है । इसीलिए नायक कल्पित नहीं होता है । श्रौर 'कलत्र्यार्थी' यह 'प्रकरण' का धर्म है ।

ग्रोर 'कलत्र्यार्थी' यह 'प्रकरण' का धर्म है । ['प्रयं' द्वारा से ध्युत्पत्तिभेद द्वारा फल ग्रौर उपाय दोनोका पहचरण होता है यह वात ग्रभी वह चुके हैं । इस कारण नाटिकामें फल ग्रौर उपाय दोनो कल्पित होते हैं । यह 'कलत्र्यार्थी' पदका श्रभिप्राय है । इस प्रकार नाटिकामें 'नाटक' तथा 'प्रकरण' दोनोंधर्म पाए जाते हैं इसलिए नाटिकाको 'पूर्वस्मपद्रयोत्यितता' कहा है] । इतना हो [नाटिका-लक्षण] है । [भागो उसके भेद कहे हैं । लक्षणभाग यहाँ समाप्त हो गया है ] ॥ [५] ७० ॥

'प्रल्याति-न्यातित' इसरा यह श्रभिप्राय है कि—इस नाटिकामें कन्या ग्रौर देवी दोनों एक साथ नार्विपचाएं होती हैं ।

परपरिस्पोता [ग्रपेो] 'कन्या' होती है । ग्रोर वह मत पुरषे

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प्रत्येकं प्रसिद्ध-प्रप्रसिद्धिभ्यां चतुर्भेदैद्वात्रिंशट्कापि चतुर्विधा। तत्रैकद्व्यप्रसिद्धा कन्या प्रसिद्धा इत्येक। देव्यप्रसिद्धा कन्यकाप्यप्रसिद्धेति द्वितीया। देवी प्रसिद्धा कन्यापि प्रसिद्धेति चतुर्थी। उभयोः प्रसिद्धत्वेऽपि च कलिप्रार्थस्वं नाटिकायाः। श्रृङ्यथासंविधाननरचनान्नाट्यति नर्त्तैयति व्युत्पन्नमनांसीति व्यधि, गौरादेराधिकृतिगणत्वान्च इत्यां 'नाडी'। श्रृङ्प्रकृत्यादिल्पार्थों 'कपि' नाटिका इत्यपि। नटीप्रधानत्वान्मुखमोरीतिशयेत्यनुच्चैः संलिप्तसंलिप्तेन्द्रशः। यद्‌ग्रथप्रकरयामपोति॥

ग्रथ 'नाटिकागतं कर्त्तव्यमुपपादिशति- [सूत्र १२२]—ग्रत्र मुख्याकृतो योगः पयैंत्ने नेतुरन्यथा॥ [६] ७१॥ प्रेमाद्री चतंतेडन्यस्यां नेता मुख्याभिशंकितः। संगीत प्रादि भेदोंके द्वारा अनेक प्रकारकी होती है। विवाहित [जिसके 'देवो' होतों है] देवी' होतों है। उन देवींकों प्रसिद्धि तथा अप्रप्रसिद्धके द्वारा [अर्थात्‌ नायिका भेद] चार भेद होने हैं। उनमें (१) देवी अप्रसिद्ध हो प्रोर कन्या प्रसिद्ध हो यह पहला भेद ड्रम्मा। (२) देवी श्रप्रसिद्ध हो प्रोर कन्या भी श्रप्रसिद्ध हो यह दूसरा भेद ड्रम्मा। (३) देवी प्रसिद्ध हो किन्तु कन्या श्रप्रप्रसिद्ध हो यह तीसरा भेद ड्रम्मा। (४) देवी प्रसिद्ध हो प्रोर कन्या भी प्रसिद्ध हो पर चोथा भेद ड्रम्मा। [देवी प्रोर कन्या] दोनोंके प्रसिद्ध होनेपर भी [नाटिकामें यह चारित्र प्रादि रूप] सवैश्रेष्ठकी रचना [प्रसिद्ध ययोकी दृशेषा] कुतूहल ग्रन्थ हो प्रकार से वर देनेमे नाटिका 'हल्म्याथी' हो जाती है। [आगे नाटिका शब्दको व्युत्पत्ति दिलाते हैं।] यह शद्व मतंतने पातुसे बना है। उसके धनुसार [जो श्रमाजनों [परवायों] के मनोंको नवातों है [आह्लादित करतों है] इस विश्रमे प्रचुर-प्रत्पय वरने [विदग्धारादिमदृच श्रोभने] गौरादि गणोंके श्राधिकृति गर्ने होनेसे द्वितीय प्रत्यय होनेपर 'नाडी' [यह पद सिद्ध] होता है। [मह गाढ़े पद नाटिकार्ता पर्यावयाचक शद्व होतां है। नाडी पदसे प्रलपायंमे चतुर्थी तत्पुरुष होनेके कारणा यह शद्व भ्राप्तो कहलाते हैं]। फलप कयादित्व होनेके कारण प्रलपायंमे कृत्प्रत्यय होकर 'नाटिका' यह भी रूप बनता है। [नाटिका प्रोर नाडी पदोंमे जो श्रर्थोंसादृश्य प्रतिपादन करतें हैं] स्त्रीप्रधान होनेके कारण प्रोर सुकुमारायुक्त प्रतिपाद होनेके कारणा ह्योनोंगको समानें द्वारा निदेंश किया गया है। इसी प्रकार 'प्रकरगी' [इस पद] मे भी [स्रोलिंगमे वतच प्रथोग समासेे सेना चादिए]।

[ सूत्र १२३ ]—उम [नाटिकां] में अनंतमे [अर्थान्‌ त्रिवेoतरलतयैने] नायिका पूर्व नायिका द्वारा वन्च [रन्या] में माप योग दरसाया ज्ञाना चादिए। [प्रोर उभयें पूर्वं] माप प्रेमाद्तक होकर भो मुख्य नायिकासंघ हरता हुमा मा श्रन्य [परवायों माप प्रतिप्रधार] में मयुन श्रोतः।

उपरोक्त वरते हैं— [ सूत्र १२३ ]—उम [नाटिकां] में अनंतमे [अर्थान्‌ त्रिवेoतरलतयैने] नायिका पूर्व नायिका द्वारा वन्च [रन्या] में माप योग दरसाया ज्ञाना चादिए। [प्रोर उभयें पूर्वं] माप प्रेमाद्तक होकर भो मुख्य नायिकासंघ हरता हुमा मा श्रन्य [परवायों माप प्रतिप्रधार] में मयुन श्रोतः।

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‘श्रृङ्गार’ नाटिकायां ‘मुख्यां’ नृपवंशजातत्व-गाम्भीरत्व-परिपीतत्वादिभि: प्रथाने नायिका, तद्रशादनु:पुरसंगीतकसंवाद्येन श्रुति-दर्शनाभ्यां मासत्रया ‘श्रन्या’ ‘कन्या’ ‘योग.’ सम्भानध्यो नायकस्य ‘पर्यन्ते’ निर्वेधरसान्धौ दर्शयितव्य: ॥ [ ६ ] ७१ ॥

इस नाटिका में राजवंश में उत्पन्न होने के कारण, गाम्भीर्यत्व के कारण और परिपोषिता होने के कारण, मुख्य नायिका ही प्रधान होता है । उसके द्वारा भ्रान्त पुरुष के संगोत आदि के सम्बन्ध से श्रवण या दर्शन द्वारा प्राप्त दूसरी कन्या के साथ नायक का सम्बन्ध प्राप्त में पर्याप्त निवंहण संधि में दिखलाना चाहिए । मोर उसके [प्रर्याप्त निवंहण संधि में] पहिले तो नायक [अन्य कन्याओं के प्रति क्रमश:] प्रनुरागकी वृद्धि होनेपर भी मुख्य नायिकासे डरता हुमा-सा ही उपवन आदि में कन्यासे मिलता है ।

नेता च तल्लाभादर्र्वाक् प्रवर्धमानानुरागो मुख्यातश्रकितहृदय: कन्यायासुपवनादिपु संकेतस्थानेपु संघटते । कृतान्तररमपि दर्शयितव्यम्— [सूत्र १२३]—देवो दशापपराङ् मुग्धा समा धर्मा द्वयो: पुत्र: ॥[७] ७२॥ कोध-प्रसाद-प्रत्यूह-रति-च्छद्मादि भूरिश: । देवी दत्ता चतुरा निवन्धनीया । श्रपराङ् तु कन्या मुग्धा चतुर्येवर्जिता । धर्मा पुन: सत्रियवंशजातत्व-नय-विनय-लज्जा-माहत्य-गाम्भीर्यादय:, तुल्या द्वयो: देवी-कन्यायोर्निवन्धनीया ॥ [७] ७२ ॥ तथा कन्यागुरागपरिज्ञाने देव्या राजनि क्रोध: । राज्ञा च तस्या: प्रसादनम् । देव्या च राज्ञा कन्यागमागमे विध्न । राज-कन्ययो: परस्परं रति: । सर्वेपामन्योंन्र्य वधचनम् । श्रादि शब्दादान्यक्रपि श्रृङ्गारांगं भूयो भूयो निवन्धनीयमिति ।

प्रथद [नाटिकामें] करने योग्य श्रन्य बात भी दिखलाते हैं— [सूत्र १२३]—देवी को चतुरा रूप में, मोर [प्रन्य प्रयोज्य] कन्याको मुग्धा रूप में [दिखलाना चाहिए] । दोनों के [कुलजन्मादि] धर्म समान होने [चाहिए] । [मोर नाटिका को श्रनुरूप] कोध, प्रसाद, विनय, रति मोर छल आदि का प्रभूत-प्रयोग दिसलाना घ्रहिए । देवी दत्ता चतुरा रूप में प्रदर्शित करनी चाहिए । मोर दूसरी कन्या तो मुग्धा श्रर्थात् शालुपर्यंत [दिखलानी चाहिए] । सत्रियवंशजातत्व, नय, विनय, लज्जा, महत्व, गाम्भीर्य आदि धर्मो में दोनों देवी और कन्या समान रूपसे दिखलाने चाहिए । तथा कन्या में अनुरागके परिज्ञान होनेपर देवी के राजा में कोध । राजा के द्वारा उस कन्या का प्रसादनम् । देवी के द्वारा राजा के कन्यागमागम में विध्न उपस्थित करना, राजा-मोर-कन्यायों: परस्पर रति । सर्वेपामन्योंन्र्य वधचनम् । श्रादि शब्दादान्यक्रपि श्रृङ्गारांगं भूयो भूयो निवन्धनीयमिति ।

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एवं प्रकारस्यो किन्तु नेता प्रकारसोदितः ॥ [—] ७३ ॥

[सूत्र १२४]—एवं प्रकारस्यो किन्तु नेता प्रकारसोदितः ॥ [—] ७३ ॥ एवं नाटिकोक्त-चतुरङ्कत्वादिलक्षणानुसारेण 'प्रकरस्यो' ग्रथनीया । किन्तु नेता प्रकारसोदको वाच्योऽस्ति । तेन वाच्यादुचित एव वेप-संभोगादि सर्वोऽप्यत्र व्यवह्हारः । म्रयापि तज्जात्यनुरूपैश्च मलमपि महीलाभम्य वाच्यादेरुचितत्वान् स्त्रीप्राप्तिपुर-संप्राप्तिलाभादिके द्वव्यलाभादिके द्वैविध्यम् । कैशिकीवृत्तत्वं च नाटकधर्मः । प्रकारस्याल्पकेशिकत्वान् । मलप्रार्थत्वं वाच्यादिनायकत्वं च प्रकरणधर्मः । तथा नाटकप्रकरयोस्तित्वेऽपि नाटिका-प्रकर-श्रृङ्यो नाटकोक्तनायकातुसारेणैव नायिकानुपदेश । नायकानुसारित्याद् सर्वच्यवहाराज्ञाम् । प्रकरणेऽपि क्रियत इति 'प्रकरस्यो' । अल्पार्थे कपि 'प्रकरस्या' । अते च दृश्येऽपि सुरयेरुपकथ्यस्यकरत्निष्पन्नत्वात् संकीर्य्याभेदरूपे । एवमन्त्रेडपि मङ्करभेदा रूपकत्व-प्राधि-साङ्कर्य्येण सम्भवन्ति परस्परश्लाघ्यादरजन्मत्त्वाच न ते लच्यतेऽस्ति । नाटिकाया च रङ्गा, प्रकारस्यायान्तु वाच्याद्रीना विलासप्रधान धर्मार्थाविरोधे गूर्त्ते नाटकप्रकरस्योरिव च्युत्पत्तिम् ॥७३॥

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अथ पूर्वेदशा-संधीस्तु रूपकाश्रित्य लभ्यित्वा न्यूनदशा-संधीस्तु निसृज्यन्ते । तत्रापि मुख्यनायकप्रत्यासत्त्या प्रथमं ‘व्यायोग’ लभ्यते— [सूत्र १२४]—एकाहचरितैकांकौ गर्भोऽर्शो विवर्जितः । ग्रस्त्रोऽनिमित्तसंग्रामो नियुद्धस्पर्धनोद्यतः ॥ [५] ७४ ॥ स्वल्पयोविजनः व्यातवस्तुधोऽतरसाश्रयः । श्रादिव्यभूपतिस्वामी व्यायोगो नायिकां विना ॥ [१०] ७५ ॥

['प्रकरो' के समान हो 'प्रकरणो' का निर्वचन प्रायः दिखलाते हैं] जिसमें [प्रारम्भ्यमान-वस्तुरूप] अर्थ भली प्रकारसे किया प्रथित किया जाता है वह 'प्रकरणो' कहलाते हैं [यह 'प्रकरणो' शब्दका श्रवयववार्त हुआ] । श्रलंकार्यमें 'कल्प-प्रसाद' करके 'प्रकरिका' [पद भी बन जाता है] । [नाटिका और प्रकरण] ये दोनो हो [नाटक तथा प्रकरण रूप] मुख्य दो रूपकों के सकरसे उत्पन्न होनेके कारण सकीर्णभेद रूप हैं । इसी प्रकार दो रूपकी या तीन रूपकों के सकरसे उत्पन्न श्रन्य सकर भेद भी हो सकते हैं । किन्तु [लक्ष्य ग्रन्थोके रूपमें] न पाए जानसे और मनोरञ्जक न होनेसे हमने उनके लक्षण नहीं किए हैं । 'नाटक' और 'प्रकरो' के समान हो नाटिकामें राजाम्रोके और 'प्रकरिका' में वणिगादिके, धर्मं और श्रयंकं प्रविरोधी विलास-प्रधान वृत्तका वर्णन करना चाहिए ॥ [५] ७३ ॥

४. पञ्चमं रूपकभेद ‘व्यायोग’ का निरूपण इस प्रकार नाटक, प्रकरण, नाटिका और प्रहसनो इन्ही चार रूपकभेदोका निरूपण कर चुके हैं । अब पञ्चम भेद 'व्यायोग' के लक्षणका श्रवसर श्राता है । यहाँ तक जिन चार रूपकों भेदोका निरूपण किया गया है उन सबमें सम्पूर्ण दशा और सन्धियो- वा वयां पा । किन्तु यहाँसे ग्रागे जिन रूपकभेदोका वर्णन किया जाएगा उनमें दशा तथा सन्धि दोनो न्यून सद्भाव में रहेंगी । इसी भेदको दिखलाते हुए ग्रन्थकार ग्राने 'व्यायोग'- का लक्षण श्रादि करते हैं ।

पूर्वं दशाश्रो और सन्धियोंसे युक्त [१ नाटक, २ प्रकरण, ३ नाटिका और ४ प्रहसनो इन्ही चार] रूपकोंके लक्षण वर निरूपण करते हैं । उनमें से भी ['व्यायोग' में नाटकादि पूर्वोक्त चार रूपकभेदोके समान] मनुष्य नायकका सम्भवग होनेसे पहले 'व्यायोग' का निरूपण करते हैं— [सूत्र १२४ व]—एक दिनके श्रवसानको दिखलाने वाले और एक ही अंक से युक्त, गर्भं तथा विमर्श सन्धिपोंसे रहित स्त्रोसे भिन्न निमित्तसे संग्राम जिसमें दिखलाया गया हो, मल्लयुद्ध और स्पर्धांमें दीप्तः—

[सूत्र १२४ व]—एक दिनके श्रवसानको दिखलाने वाले और एक ही अंक से युक्त, गर्भं तथा विमर्श सन्धिपोंसे रहित स्त्रोसे भिन्न निमित्तसे संग्राम जिसमें दिखलाया गया हो, मल्लयुद्ध और स्पर्धांमें दीप्तः— [५] ७४ ।

[सूत्र १२४ व]—यहुत कम श्रो पायो वाला प्रसिद्ध शत्रु-वस्तु तथा शत्रु रसोसे सम्पन्न, मदीय [श्रेयता तथा राजा श्रादिते [भिन्न सेनापति प्रभृत्यादि रूप] नायकसे युक्त 'व्यायोग' [ह्रस्वतमा] है । किन्तु उसमें नाटिका नहीं होती है । [१०] ७८ ।

[सूत्र १२४ व]—एक दिनके श्रवसानको दिखलाने वाले ग्रौर एक ही अंक से युक्त, गर्भ तथा विमर्श सन्धिपोंसे रहित स्त्रोसे भिन्न निमित्तसे संग्राम जिसमें दिखलाया गया हो, मल्लयुद्ध ग्रौर स्पर्धांमें दीप्तः— [५] ७४ ।

एक दिनमें हो पायंश्चित समाप्यस्तो प्रवृत्तिं करने वाला, और जो श्रभि त्रिभूमि हो [वह रूपकभेद 'व्यायोग' कहलाता है । यह व्यायोगका मुख्य लक्षण है] । एक हो दिनके

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ध्वमोहामृगनायका श्रापि । धिमि-समयकारनायकास्तु चहुत्तरफलार्थितवेन प्राप्त्याशायुक्ता दीप्तरसतत्त्वेन च विनिपाताशङ्किनो निर्विमर्शका: । मायण-प्रहसनयोर्नायकस्याधमतवाद्, उत्सृष्टिकाङ्के शोकार्थित्वाद्, वीथ्यां चासहायत्वाच्च, सृधे पामल्पवृत्त्यार्च प्रारम्भानन्तरं फलागम एतत् यतते । नाटकार्टिनायकस्य तु प्रेक्षापेक्षारिक्ख-निर्तिसहेतुत्वान् हित-च्रहफलमतेत्न्यारम्भिल्येन विनिपातप्रणव्या:पाकरस्याच्च मत्रोपरस्थामन्र्भवेन् परचापि सन्ध्यो भवन्त्येव ।

वृत्तान्तत: वचयां होनेशे इसमें केबल एक हो मक होता है । दोप्तरश [रोद्र चोर श्रादि रसप्रधान] नायककेले युक्त होनेके कारण [हो] गर्म तथा प्रवसर संधियोंका निर्देश किया गया है । दोप्तरश वाळा [नायक] कालक्ेपको [प्रयास् कार्यंसिद्धिके बिलंबके] सहन नहीं कर सकता है [जलदबाज होता है] श्रोर काम किगाड़ जाननेके हरते [कालक्ेप किए बिना] प्रारम्भ श्रोर प्रयत्न [रूप दो प्रवस्थाप्रो] के श्रनन्तर हो फलको प्राप्त करनेवाला यत्न करता है । [इसलिए इसमें गर्मं तथा विमर्श संधियोंका श्रवसर नहीं श्राता है] । वृत्त्यार्चि प्रारम्भानन्तरं फलागमनियतंय इति नाटकार्टिनायकस्य तु प्रेक्षापेक्षारिक्ख-निर्तिसहेतुत्वान् । इसौ प्रकार 'ईहामृग' [नामक रूपकभेद] के नायक भी [कालक्ेपको सहन नहीं कर सकते हैं इसलिए उसमें भी गर्म श्रोर विमर्श संधियों नहीं होती हैं] । 'डिम' श्रोर 'समवकार' के नायक तो प्रचुर फलकी कामना वाले होनेसे 'प्राप्त्याशा' [प्रवस्थावाले 'गर्भ संधि] से युक्त तो होते हैं किन्तु दोप्तरश [जलदबाज] होनेसे विनिपात [कार्य विनाश] हो दाकासे पुष्ट होनेके कारण 'विमर्शसन्धि' रहित होते हैं । [इसलिए 'डिम', 'समवकार' श्रादि रूपकभेदों में 'गर्भंसन्धि' होता है किन्तु 'विमर्शसन्धि' नहीं होता है] । 'भाण' श्रोर 'प्रहसन' [नामक रूपकभेदों] के नायकके प्रथम होनेसे, श्रोर 'उत्सृष्टिकाकं' में शोकका प्राधान्य होनेसे, तथा 'वीथी' श्रादि [रूपकभेदों में नायकके] सहायक-विहीन होनेसे, श्रोर इन सभीके स्वल्पवृत्तवाला होनेसे प्रारम्भ [प्रवस्था] के बाद हो [बीच में यत्न, प्राप्त्याशा श्रादि तोन प्रवस्थाप्रो को छोड़कर] फलप्राप्ति [रूप पञ्चमावस्था] का वरण किया जाता है । नाटकार्टिके नायक तो विचारपूर्वक वरण करने वाले, कष्टसहिष्णु, हितकर श्रोर वृद्धिके वाते कार्यके प्रारम्भ होनेसे, श्रोर विनिपातके कारणों [प्रत्युदाहरण वाधाम्रों] से निराकरणत्मकमें समयं होनेसे [नाटकादिमें] सारी प्रवस्थाप्रोंका सम्भव होनेसे पाँचों सन्धि होते ही हैं ।

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अत्र च गर्भोंवमर्शोऽनिधप्रतिपेधे एतत्सन्धिपरिच्छेदिके प्राप्त्याशा- नियताप्ति- श्रवस्थे श्रापि प्रतिबिद्धे एव । एवमपरेप्यपि रूपकेपु तत्सन्धिनिपेधे तत्सन्धि- परिच्छेदिकावस्थापि निपिद्धैव दृप्टन्येति ।

श्रत्रनोति श्राद्यर्थैःसंप्राप्तसंयुतसतरच । यथां जामदग्न्यजये परशुरामेऽपि सहस्र- जुनयघ वृत्त । नियुद्धं वाहुयुद्धम् । सर्पधनं शौर्य-विद्या-कुल-धन-नुपादिकृत । संहृपे । ताभ्यामुदृतो दीप्त ।

प्रयोग नहीं होता है । इनमेसे 'प्रयोग' में 'गर्भं' और 'विमर्श' को छोड़कर केवल तीन सन्धियों और तीन श्रवस्थाओंका ही प्रयोग होता है । 'डिम', 'समवकार' श्रादिमें विमर्शं सन्धिको छोड़कर चार सन्धियों और चार श्रवस्थाओंका उपयोग होता है । 'भारा' तथा प्रहसन' 'उत्पष्टिकाक' तथा 'वीथी' इन चारोंमें केवल प्रादि और ग्रन्तको दो श्रवस्थायों और दो सन्धियोंका ही उपयोग होता है । बीच की तीन श्रवस्थायों तथा तीन सन्धियोंका उपयोग नहीं होता है । इन वारह प्रकारके रपक भेदोंकी सन्धि तथा श्रवस्थाओंके प्रयोगकी रष्टिसे स्थिति निम्न प्रकार बनती है—

रपक भेद प्रयुक्त वज्जित १ नोटक पाँचों श्रवस्थायां तथा सन्धियाँ केवल चार ग्रकों में २. प्रकरणा पाँचों श्रवस्थायां तथा सन्धियाँ केवल चार ग्रकों में ३ नाटिका पाँचों श्रवस्थायां तथा सन्धियाँ गर्भं, विमर्शं रहित ४. प्रकरणी पाँचों श्रवस्थायां तथा सन्धियाँ गर्भ, विमर्शं रहित ५. श्रव्यायोग तीन श्रवस्थायां तथा सन्धियाँ विमर्शं वज्जित ६ ईहामृगा तीन श्रवस्थायां तथा सन्धियाँ विमर्शं वज्जित ७ समवकार चार श्रवस्थायां तथा सन्धियाँ विमर्शं वज्जित ८ डिम चार श्रवस्थायां तथा सन्धियाँ विमर्शं वज्जित ९. भारा प्रादि ग्रन्त की दो सन्धि-श्रवस्था प्रतिमुख, गर्भं, विमर्शं रहित १० प्रहसन भाश्रयतू भाश्रयतू ११ उत्पष्टिकाक भाश्रयतू भाश्रयतू १२ वीथी भाश्रयतू भाश्रयतू

यहाँ [प्रर्याप्त ध्यायोगमें] गर्भं तथा विमर्शं सन्धिका निपेध होनेसे इन सन्धियों को ध्याप्त करने वाली 'प्राप्त्यादि' और 'नियताप्ति' रूप श्रवस्थायोंका भी निपेध सम्भवना चाहिए । इसीलिए अन्य रपकोंमें भी उस उस सन्धिका निपेध होनेपर उस उस सन्धि को ध्याप्त करने वाली श्रवस्थायों भी निपिद्ध हो सम्भवना चाहिए ।

'पत्न्यो' इत्पादिते स्त्रियों घ्रोड़कर ग्रन्य निमित्तसे सप्रयुक्त हो [यह मृच्हित कथा है] जैसे 'जामदग्न्यजन्म' [नामक ध्यायोगमें] परशुरामने सहस्राजुनका वध् किया है । 'नियुद्ध' वा पर्यं वाहुयुद्ध है । नवीं, विद्या कुल, धन और रुपादिके वारए होनेवाला सत्वं 'रपर्ध' [रस- साधन] है । उन दोनों [पर्थ्यां नियुद्ध तथा रपर्ध] से उद्भत पर्याप्त वोरस [प्रयायोग होता है] ।

१. मुखरबपि ।

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स्वल्पनीपाततं च वैशिकीराहितत्यात् । एतद्वेन पुरुषपात्रप्राप्तुल्य लभ्यते । स्यात प्रसिद्धं वस्तु नायकोपायलचयैः यस । दीप्ताना घोर-रोद्रादीनां रसानामाश्रयः । यत्न-प्रायः गद्य पद्य चोशोगुणानुक्कम् । तथा दिव्यभूपतिराजित सेनापत्यमत्यादि-दीप्तरसानायनसम्पन्न् । एवं विधस्य द्वादशनेतृ-नमाम्नासिपु । निवेशेषु श्चा समन्वाद् युध्यन्ते कार्याणि सरमन्वत्रेति 'व्यायोगः' । 'नायिका निताः' इत्यनेन नाटचिनाया-स्तदुचितस्य च दूत्यादे परिजनस्य निपेधः । तेन नायकप्रच्युद्भूतादरचेष्टयादयो भवन्त्येव । यत्र च मन्त्रिभिः सेनापत्यादीनां युद्धादिवहुलं वृत्तं व्युत्पाद्यतेति ॥ [६-१०] ०५३४ ॥

[सूत्र १२३६]—विज्ञेयः समवकारः । स्यातायों निर्विमशांकः । उदात्तदेव-दैत्येशो वोध्यपद्धो घोर-रोद्रान्न ॥[११]७६॥ - सगतैररवभी-रौंचार्यै त्रिगणोपपायैः पूर्वप्रसिद्धैरेक क्रियते निर्ध्यात डति 'समवकार' । यथार्थे इति वृत्तं यदिमप्रसिद्धनायक-उपाय-त्रिगणैक्लो निर्मशंसान्वियर्जितवच् । [व्यायोगमे] स्त्री पात्रोंको अल्पपनात् केन्दिकी रहित होनेके कारणा होता है । इससे पुरुष पात्रोंका श्राधिष्य सुचिनित होता है । जिसमे नायक तथा उपाय रूप वस्नु' रूपात श्रर्थ्यात प्रसिद्ध हो । घोर रौद्र श्रादि दोष्त रसोंका प्राथम्य हो । इसीलिए इसमें यथ घोर पद्य दोनों मोज गुपसे युक्त होने चाहिए । घोर [व्यायोग] दित्य [प्रथ्थात् देवता रूप नायक] घोर राजाओं [वप नायकें] से भीत्न, दोष्त रसोंके श्रनुरूप सेनापति प्रभात्यादि नायकवर्गसे युक्त होना चाहिए । मोद्रि लोग इसमे बारह प्रकारके नायक बतलाते हैं । [प्रागे व्यायोग' शब्द का निवचन कर उसका श्रथव्याख्यं दिसलाते हैं] जिसमे 'चिरोध' रूपसे श्रा समन्तात्' श्रर्थ्यात सथ घोरसे युक्त होते हैं वह श्रथ्यन्त कायंशलिए प्रयत्न करते हैं । वह 'व्यायोग' [बहुलाता] है [यह 'व्यायोग पदका श्रव्ययपार्य या निवंचन है] । 'नायिकां निताः' इस पदमे नाटचिका घोर उसके योग्य दूती श्रादि परिजनोका निपेध किया गया है । इसलिये नाथकवर्ग के सेवकादि के रूपमें चेेटे श्रादि होती हो हैं [जिनका निपेध नहीं सम्भवता चाहिए] । इस सबब फरित-ताय यह हुग्रा कि] इसमे [प्रथ्थ्यात् व्यायोगमे] सेनापति यमात्य श्रादित मुद्ध-नघात चरित्र प्रदर्शित करना चाहिए ॥ [६-१०] ७४-७५ ॥ ६ पष्ट रूपकभेद 'समवकार' का निष्पाए [ 'व्यायोग' नामक पष्टवन रूपकभेदके निट्पपनक बाद] द्वव समवकार' [नामक पष्ट रूपकभेद] यद ग्रवसर प्राप्त होनेसे उसका निष्पपार करते हैं— [सूत्र १२३६]—प्रसिद्ध श्रायातन वस्नुके प्रापारपर प्रतिपत, विमर्द्ध सम्भने रहित उदात्त प्रकृतिके देव दैत्य प्रादि नायकों वाता घोर यथा रौद्ररस प्रधान, योग्यो प्रगतेः मुक्त [वपकभेदेवन] समवकार' सम्भना चाहिए । [प्रथ्थात समवकार' मे तच्त्रयोमे इन सथ यातोंका समावेश होता है]

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'उदात्त' इति उदात्तत्वं महत्त्व-गाम्भीर्योचिते । देव-दैत्यानां हि धीरोदात्ततत्त्वं स्त्योपेतश्चैव, स्वजात्योपेतया तु धीरोदात्तवमपि। श्रुत च तत्सदृश-दैत्यभक्तिता इष्टदेवतादि-कर्मप्रभावादिकृतेऽपि महती प्रीति- यात्राजागरादि-प्रेक्षाकरुण-तदनुप्ठितोपायादिपु प्रवृत्तिश्च भवतीति देव-दैत्यौ नेतारौ । एवमन्येष्वपि श्रामण्यनैरुपे वाच्यम् । वीर्यज्ञाने व्याहारादीनां च वच्यमात्रानि तद्वान् । वीर-रोद्रवान् इत्यतिशायने मतु । तेनात्र 'त्रिशृङ्गारवल्लेदपि कीर-कोटि प्रधनानम् । देव-दैत्यानामुद्धततत्त्वेन श्रृङ्गारस्य छ्छायामात्रत्वेन नियन्तनादिति ॥ [१९] ७६ ॥

के पूर्वे-प्रसिद्ध उपायोके द्वारा जिसको किया श्रर्थात् बनाया जाता है वह 'समवकार' कहलाता है । [श्रर्थात् समवकार शब्द सम व उपसर्ग कॄ धातु से निष्पन्न होता है] । 'दपातर्थ्य' से [यह प्रभिप्राय है कि] बहुतक्या आदिमें प्रसिद्ध नायक, उपाय तथा त्रिवर्ग हप फलसे युक्त, तथा विमर्श-संशय-भसे रहित होना वाहिए । ['उदात्तदेव दैत्येशो' मे] 'उदात्त' इससे महत्त्व गाम्भीर्योदिको उदात्तत्व समभना वाहिए । देवों भोर दैत्योंका धीरोदत्तव मनुष्योको श्रपेक्षासे होता है । श्रपनी श्रपनी जाति को प्रपेक्षासे तो [देवो तथा दैत्यों दोनोमें] धीरोदात्तत्व भी होता है । यहाँ [संस्कारमे या समवकारमे] उनमें-होन देवों तथा दैत्योंके बलत्कम श्रप्रत-श्रपने इष्टदेव ग्रादिमें, उनके कर्म तथा प्रभाव श्रादिके कोतुंसे श्रत्पन्न प्रीति यात्रा, जागरण, [प्रेक्षकऋए प्रयत्न] दर्शंन मा भांकी बनान श्रादि भोर उनके द्वारा किए गए उपायोके श्रनुप्ठान श्रादिमें प्रवृत्ति होती है इसलिए देव भोर दैत्योंको यहाँ [प्रर्थात् समवकारमे] नायक माना गया है । इस प्रकार मनुष्योसे भिन्न नायकां वाले श्रृङ्गय लुपकनैमेकि विपयमें भी समभना चाहिए । 'वीर्यज्ञा- वाम्' इस पदमे निर्दिष्ट 'वीर्य' के 'व्याहारादि' श्रङ्ग जो श्रागे कहे जाने वाले हैं उनसे युक्त होना वाहिए । 'वीर-रोद्रवान्' इसमें प्रतिशायन प्रययमे मतु-प्रत्यय है । इसलिए [समव- कारमे प्रथलती ७७ वीं कारिकामें कहे हुए (१) धमंकलक, (२) प्रयंकलक, तथा (३) कामफलक] तोनों प्रकारके भृङ्गारके होनेपर भी, वीर भोर रौद्र प्रधान [रस] होते हैं । क्योकि देव भोर दैत्योके उद्धत होनेके कारन उनके श्रृङ्गारका [समककारमे] द्यावामात्र रूपसे हो वतेंन होता है । [इसलिए शृङ्गाररस जिससे प्रधान नहीं होता है । वीर या रौद्ररस हो समवकारमे प्रधान रस होते हैं] ॥ [१९] ७६ ॥

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श्रथ कुस्यान्तर्मुपदिशति— [सूत्र १२७]—श्रत्र द्वादश ने तारः फलं तेपा पृथक् पृथक् । श्रङ्कास्नयः त्रिभृङ्गाराः त्रिकपटाः त्रिविध्रवाः ॥ [१२]७४ ॥ पड्-गुस्संकमूर्त्ताः स्यु; निष्ठिततार्थाः स्वकायर्तः । महावाक्ये च संबद्धाः केमुद्दू हि-एकसन्धयः॥[१३]७५॥

'श्रत्र' समवकारे नायका द्वादश । तत्र' प्रत्यङ्गद्वादश । यदिव वा' श्रत्यङ्गं नायक- 'समवकार'को श्रङ्गली कारिकाम 'त्रिविध्रवा' तीन प्रकारके श्रृङ्गारोंमें युक्त कहा गया है । वैसे तो उसके प्रसङ्गमें श्रृङ्गारके शुद्धोभयश्रृङ्गार श्रोर विप्रलम्भश्रृङ्गार केबल ये दोनो हो भेद किए गए है । किन्तु यहाँ तोन प्रकारके श्रृङ्गारकी चर्चा की गई है । यहाँ श्रृङ्गार के ये तोन भेद कनककी दृष्टिसे किए गए हैं । (१) धर्मप्रधान श्रृङ्गार (२) श्रथप्रधान श्रृङ्गार (३) कामप्रधान श्रृङ्गार । इस प्रकार श्रृङ्गारके तीन भेद करके 'समवकार'को 'त्रिविध्रवा' कहा गया है । श्रृङ्गारके ये तीनों भेद 'समवकार'के तीनों श्रङ्कोंसे प्रत्यक्ष प्रकटम होने चाहिए । एक एक श्रङ्कम एक-एक भेदकानिवारण नही करना चाहिए यह बात भो ग्रन्थके वहाँगे । 'समवकार'के तोनों श्रङ्कोंकी रचनामें विपयम भी वह बात निहित करने निर्दिष्ट की गई है कि उनकी रचना इस प्रकारसे होनी चाहिए कि उनमेसे प्रत्येक अंश ग्रपनेभ परिपूर्ण हो । उसरो श्रपने श्रथंबो पूर्त्ताके लिए दूसरे श्रङ्कके सहयोगकी श्रावश्यकता न हो । इसके साथ ही ग्रन्थमें तीनों श्रङ्कोंकी एकवाक्यता या परस्पर सम्बन्ध भी प्रतीत हो सके । इसके लिए यह मान बतलाया गया है कि प्रथम श्रङ्कके प्रारम्भमें श्राश्रयके वाद तीनों श्रङ्कोंके उपदेशक दोश्रङ्का निवेश करना चाहिए । उसके बाद तोनों श्रङ्कोंको इस प्रकारसे बनावें कि उनका श्राश्रयानवस्तु उसो श्रङ्कमें समाप्त हो जाय । किन्तु ग्रन्थमें तृतीय श्रङ्कम फिर इस प्रकारकी रचना करनी चाहिए कि जिससे उसका श्राश्रयानभाग ग्रन्थमें परिपूर्ण हो किन्तु साथ ही तीनों श्रङ्कों श्राश्रयका परस्पर सम्बन्ध वन सके । इन्हीं सब बातोंको ७४ ७५ श्रग्रलो दो श्रव श्रागे [समवकारमे] विए जान वाले 'द्वादश नायका'का उपदेश करते है—

[सूत्र १२७ क]—इत [समवकार] मे बारह नायक होते है । उनका फल श्रलग- मलग होता है । तोन प्रकारके श्रृङ्गार, तोन प्रकारके कपट श्रोर तोन प्रकारके निर्द्धरने युक्त तोनों श्रङ्क होते है । [१२] ७४ ॥

[सूत्र १२७ ख]—[समवकारमे तीनों श्रङ कमरा ] घ मुहूर्त्त, मुहूर्त्त वाले [श्रर्थात इतने समयमे जिनका श्रभिनय हो सहे इस प्रकारके] । एक प्रयेंकाले, प्रोरे महायाथ्य [प्रथात स्वप्नमें परिपूर्ण होनेपर भो एकाक्षनायुक्त ग्रथांत परस्पर] मे सम्बद्ध, तथा कमरा दो एक प्रोरे एक सन्धि वाले होने चाहिए [श्रर्थात प्रथम प्रकरमे मुख् प्रतिमुख रूप दो सन्धियाँ, द्वितीय श्रकमें केवल एक गर्भसन्धि तथा तृतीय श्रकमें केवल एक निर्वहणत सन्धिको रचना होनी चाहिए] । [१३] ७५ ।

इस 'समवकार'मे बारह नायक होते है । उनमेसे प्रत्येक श्रङ्कमें बारह [नायक] होते १ प्रत्येक । २ प्रत्येक ।

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प्रतिनायकौ तत्सदृशावौ चेति चत्वारश्चतवार । तत्सर्वेषस्ल्यचा द्वादश द्वादश इति मध्यमा वृत्ति । तेन नायकेनाधिको न दोप । 'तेपाम' इति द्वादशाना नायकाना पृथग्मूतानि फलानि वध्यन्ते । यथा 'पयोऽधिमन्थने' हरि-वृत्रतिप्रतिना लब्ध्यादिलाभा । घृत एव सहायकौ श्रापि सुग्रीवाविनवनायकत्वेन व्यवदिश्रयन्ते । 'प्रय' इति नयोद्दा भर्रान्त शृङ्गारादिविशिष्टा न त्वकेक स्मन्नन्यके शृङ्गारादीनामेक-भावोदयात् । मुहूर्त्तो घटिकाद्वयम् । तत्र प्रथम पस्मुहूर्त्ते । द्वितीयो द्विसमूहूर्त्ते । तृतीय पस्मुहूर्त्ते । पृथे तु प्रत्येक यथोदितद्विगुण कालमानमाहु ।

हैं [यह एक मत है] । श्रायवा प्रत्येक लङ्गमे १ नायक २ प्रतिनायक, और उन दोनों के सहायक इस प्रकार चार-चार, ओर फिर [तीनों प्रकारोके चार चार नायकोको] सब मिलाकर बारह [नायक] होते हैं यह मध्यम मार्ग है । इसलिए किसी एक कम में श्रोर श्रधिक [नायको की संख्या] होनेपर भी दोष नहीं होता है । 'तेपाम' श्र्रात उन वारहों नायकोंके फल अलग अलग होते हैं । जैसे 'पयोऽधिमन्थन' मे विष्णु श्रोर बलि प्रादि [नायको] के लङ्गमो प्रादिको प्राप्ति श्रादि रूप [अलग अलग] फल [दिलाए गए] हैं । इसलिए [सब नायकोके अलग अलग फलोके द्वारा निष्पन धन होनेसे] सुप्रीव प्रादिकोके समान सहायक भो नायक रूपसे कहे जाते हैं । 'नय' तोन, इससे तीनो प्रकारके शृङ्गारोसे विशिष्ट तीन अंक होते हैं यह अभिप्राय है । न कि एक एक अंकमे एक-एक शृङ्गारादि होता है [इसका प्रयं यह हुग्रा कि 'समयकारके' प्रत्येक अंकमे तीनो प्रकारके शृङ्गार, वपट, श्रोर तीनों प्रकारके विद्धव दिखाए जाने चाहिए । एक-एक वाक्यसे एक एक प्रकारके शृङ्गार, वपट श्रोर विद्धवका प्रदर्शन नहीं करना चाहिए] । मुहूतर्त्त से दो घंटों [कालका प्रहर होता है] । उन ['समयकार'के तीन अङ्को]मेसे प्रथम [अंक] मे मुहूर्त्तका, द्वितीय [अंक] मे दो मुहूर्त्तका श्रोर तृतीय [अंक] एक मुहूसक्य होना चाहिए [पृथक् [चारिकामें प्राप्त हुए पयुयम्रत गुरुएल्ल मुख' इसका प्रयं है] । इसका श्राभिप्राय यह है कि इतने कालमे तीनों अङ्कोका प्रभिनयादि रूप अयं समाप्त हो जाना चाहिए । कोई [प्राश्रयाकार] तो प्रत्येक प्रकार इस कालते दुगना कालका परिमाण मानते हैं ।

'निश्चित्ततार्था' श्रकार्थेसाध्यफललय यकान्तरार्थोस्स्ववद्धेन त्वरितन्नेव परि-समाप्यार्था । महावाक्ये च परिपूर्षमप्रन्थार्थसाध्ये फले सम्वद्धा । सकलप्रन्थसाध्य-फलोपायमूतार्थोस्सयोद्दा इत्यर्थ ।

[कारिकामें प्राप्त हुए] 'निश्चिततार्था' इत्यादि से उस [अङ्ककी कालमे साध्य फलका दूसर अङ्कसे सम्बन्ध न होनेसे प्रयङ्गहो समाप्ति हो जाय यह प्रभिप्राय है । [प्रर्थात 'समयकार'के तीनो अङ्कोमेसे प्रत्येक अङ्कने 'प्रयासङ्गकी समाप्ति उसमे हो जानी चाहिए] फिर भो महान्-प्राश्रयमे [प्रयासङ्गों समूणं समयकारमे] पूण्ण प्रदर्श्येथे प्रयासे साध्य फलेमे परस्पर सम्वद्ध होने चाहिए । प्रयान्त्र समूण प्रयप्रकारसे साध्य फलम उपार्ज्जून प्रयय वाले तीनों पात्र होने चाहिए यह अभिप्राय है ।

इह तावन्मतान्तर सद्देपेपाकथयार्थोपपन्नेपक बीज निवन्वनीयम् । तदनन्तरसङ्कया व्यवान्तरव्यापार्येन्त परपरन्निच्छिन्नमायोध्यम् । तृतीयस्स्वस्सतथा

[यह प्रयोजनको मिलते लिए समयकारिक पात्रोंकी रचना इस प्रकारसे करनी चाहिए कि ] सबसे पहले 'बीज'मके मनन्तर सङ्केोपमे तीनों पात्रोंको प्रवेश कराने

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निवन्धनीयो यथा श्रवान्तरवार्थविविच्छिन्नः । सर्गाद्धार्यसम्प्रद्धार्थश्च भवति । एवं हि पूर्वापरानुसन्धानवचेयेधियो व्यवहरितार्थानुसन्धानावहितयुद्धयक्षत्र निरर्गसिद्धगुप्तपायव्युप्तस्थ्याडनुगृहोता भवन्ति ॥ श्रद्धान्तरार्यानुसन्धायो च परस्परासम्प्रद्धादृष्टचदत्त्र न विन्दुन्निरीक्ष्यते । 'कमाद' इति प्रथम-द्वितीय-तृतीयक्रमेषु श्रद्धा द्वि-एक-एकसन्धय् । तत्र प्रथमे द्वे मुखप्रतिमुखे, द्वितीये गर्भ*, तृतीये निर्वहणामिति ॥

याने वीजक* रचना करनी चाहिए । उसके बाद [प्रथम तथा द्वितीय] दोनों श्रद्धोंको [स्वयं में समाप्त हो जाने वाले] श्रवान्तर वाक्यार्थके रूपमें एवं दूसरेकी विविच्छिन्न रूपमें प्रवृत्त करना चाहिए । [उसके बाद] तृतीय श्रद्धकी रचना इस प्रकार करनी चाहिए कि [प्रथम और द्वितीय श्रद्ध हूप] श्रवान्तर वाक्यार्थके अर्थमें विच्छिन्न होनेपर भी सब श्रद्धोंमें अर्थसम्बद्ध प्रयं वाला हो जाय । इस प्रकार पूर्वापर श्रयंशपको प्रग्रहा करनेमें पूर्व च व्यवहित प्रयंक परिज्ञानके द्वारा श्रतुगृहीत होते हैं । यहां [समवकारमें श्रद्धोंके] परस्पर श्रसम्बद्ध होनेके कारण, दूसरे श्रद्धके श्रयोंको जोडनेवाले 'विन्दु' की रचना इसमें नहीं की जाती है । 'कमाद' [द्वि एक एकसन्धय् इस कारिका भागमें] ऋमसे, इससे प्रथम द्वितीय तृतीयके कमसे श्रद्ध् ऋमश दो एक ओर एक सन्धि वाले होते हैं । उनमेंसे प्रथम श्रद्धमें मूल और प्रथमुख[दो सन्धि], द्वितीयमें गर्भसंधि, प्रोर तृतीय [श्रद्धू] में निर्वहण सन्धि होता है । [इस प्रकार तीनों श्रद्धोंमें कमश दो एक और एक सन्धि होता है । इन तीनों प्रकारकी] सन्धि समवकारमें नहीं होते हैं । यह बात ७६वीं कारिकामें ही 'ननिविमर्श' पदसे कही जा चुका है ॥ [१२-१३] ७७-७८ ॥ इन दोनों कारिकाओंमें ७६वीं कारिकामें समवकारके तीनों श्रद्धोंको त्रिशृङ्गार, त्रिप्रट और त्रिविद्रवसे युक्त कहा गया था । विन्दु इन पदोंका अर्थ वहाँ स्पष्ट नहीं किया गया था । इसलिए अगली दो कारिकाओंमें इन तीनों श्रद्धोंके प्रयको स्पष्ट करनेका प्रयत्न किया गया है । इसम 'त्रिशृङ्गार' पदस धर्म, श्रयं और काम हेतुक तथा तत्कालक तीन प्रकारके वृद्धारोक, त्रिकपट पदसे वञ्चक, वञ्च्य और वञ्चकस्थ्य तथा दैवोदय तीन प्रकारके कपटोका, तथा जीव प्रजोद और उभयस्थे उभयोत्थ तीन प्रकारके विद्रवोंका प्रग्रह होता है । इसी वातको ग्रथ-

[सूत्र १२६]—श्रृङ्गारादिविधो धर्मकामार्थफलहेतुकः । वञ्चक-वञ्च्य-देवेश्यः; सम्भवी कपटविधि॥ [१४] ७६॥ जीवाजीवयोर्भयोत्थः स्याद् विद्रवक्षरमोषु तु । प्रत्येकमंकेषु चैकः ।। [१५] ५०॥

[पिशृङ्गार] तीन प्रकारका भृङ्गार होता है । [इसो प्रकार] वञ्चक, वञ्च्य और देवेश्य होने वाला कपट [मो] तीन प्रकारका होता है । [१४] ७६ ।

[सूत्र १२६ क]—धर्म काम और श्रयं जिसके ( १ ) फल तथा ( २ ) हेतु हैं वह

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धर्म-काम-श्रथोः फल हेतवश्र यस्य । तत्र पत्ती-संयोगरूपस्य श्रृङ्गारस्य परदारवर्जनादिको धर्मः फलम् । दानादिकस्तु धर्मः स्त्यादिलाभश्र हेतुः । काम-शृङ्गारशब्दाभ्यां स्त्री-पुंसयोः रतिः, तद्र्रे तुज्र स्त्री-पुंसादिग्रृ हाते । तत्र स्त्री-पुंसादिरूपपत्ती-शृङ्गारस्य रतिरूपस्य शृङ्गारस्य स्त्री-पुंसादिरूप कामो हेतुः । श्रन च कामशृङ्गारौ स्त्री पुरुषौ कन्या च ग्राह्या । न पुनः स्वदारौ देश्या वा । यथा शाकुन्तलाहल्या । स्वदाराधनौ हि धर्म-कामयोः फल-हेतुभावौ न श्रयोनौ । श्रथो राज्य-सुवर्ण-धन-धान्य-चतादि । तत्र पश्यादियोगिता, वेपाचितुः सुभगानां पुंसां चारिथफलं शृङ्गार । वेश्यादिपु च पुंसामर्थहेतुक शृङ्गार । देवादीना-मपि गन्धर्वादिरूपापां राज्याद्यर्थसमोक्षा भवत्येव । तदाराधकानां चार्थप्राप्तिः । श्रत्र च पत्ते कारयो कार्योपचाराद्देवानामर्थशृङ्गारो दृश्यते । श्रधवा श्रथ्थो श्रर्थेन श्रर्थनीयपरोक्कार-प्रतिज्ञानियोगादिकम् । तच्च देवादीना-मपि भवत्येवेति ।

[सूत्र १२६ ख]—जो व्रजोच श्रीर [जीवाजीव] उममसे उत्पन्न होने वाला विद्रव [भी] तो श्र प्रकटकारक होत है । इनमेंसे प्रत्येक श्रृङ्गारम एक एक [प्रथमतः एक श्रृङ्गार, एक कपट और एक विद्रव] को रचना करनी चाहिये । और [समवकारमे] ऋक्षरादिक वृत्त होना चाहिये । [१५] । धर्मं, काम श्रोर श्रथं जिसके फल [प्रथमान् साध्य] तथा हेतु [प्रयमान् साधक] हैं [वह धर्मं कामार्थफलहेतुक हुम्रा] । उनमेसे पत्नो-सयोग रूप श्रृङ्गारका परदारवर्जन रूप धर्मं फल होता है । श्रोर दानादि हप धर्म उस स्त्रो [स्वपत्नो] के लाभका हेतु होता है । [इस प्रकार स्वपत्नो-सयोग हप श्रृङ्गारका फल भी धर्म होता है, श्रोर उसका हेतु भी धर्म होता है] । काम श्रोर शृङ्गार हाब्दोसे स्त्रो-पुरुषकी रति [रूप फल] श्रोर उसके हेतु स्त्रो पुरुष हाते है । उनमेसे स्त्रो-पुरुष हप शृङ्गारकी रति रूप काम फल है । श्रोर रति हप शृङ्गारस्य स्त्रो-पुरपादि हप काम हेतु है । श्रोर इस काम-शृङ्गारमे 'स्त्रो' पदसे पर कन्या च ग्राह्या । न पुनः स्वदारौ देश्या वा । यथा शाकुन्तलाहल्या । स्वदाराधनौ हि धर्म-कामयोः फल-हेतुभावौ न श्रयोनौ । श्रथो राज्य-सुवर्ण-धन-धान्य-चतादि । तत्र पश्यादियोगिता, वेपाचितुः सुभगानां पुंसां चारिथफलं शृङ्गार । वेश्यादिपु च पुंसामर्थहेतुक शृङ्गार । देवादीना-मपि गन्धर्वादिरूपापां राज्याद्यर्थसमोक्षा भवत्येव । तदाराधकानां चार्थप्राप्तिः । श्रत्र च पत्ते कारयो कार्योपचाराद्देवानामर्थशृङ्गारो दृश्यते । श्रधवा श्रथ्थो श्रर्थेन श्रर्थनीयपरोक्कार-प्रतिज्ञानियोगादिकम् । तच्च देवादीना-मपि भवत्येवेति । [प्रर्थ-शुगार बादमे] 'प्रथं' से राज्य, सुवर्ण, धन, धान्य चस्रादि [का प्राप्त होना होता है] । यहाॅ वेश्यादिमों श्रोर जिन्हों सुन्दर पुरुषोका श्रथंकफल शृङ्गार होता है । श्रोर वेश्यादिके विपयमे पुरुषोका प्रथमहेतुक शृङ्गार होता है । [प्रयमान् चेश्यादिके शृङ्गारद्वारा प्रथं-काम फलको प्राप्त होते है । इसलिए उनका शृङ्गार प्रयंकफलक होता है । श्रोर पुरपोको प्रथमं द्वारा शृङ्गारश्री प्राप्त होता है । अत उनका चेश्या विपयक शृङ्गार प्रथमहेतुक नृगार होता है] । तनयवं पक्षादि रूप देवतामोंको भी राज्य प्राप्ति प्रयंथी हेतु होती है । श्रोर उन्हें पार्थ-द्रव्योंकी प्राप्ति होती है । इस पक्षमे कारयामे पार्थष उपकार मानकर देवतामोंद्वारा प्रयंषो द्रव्यो प्राप्त होते है । इस वक्षे परोपकार प्रतिमा निर्दाह मावि मंथ्रोप 'प्रथं' कहलाता है । श्रोर यह देवादिकों भी होता है । [इसलिए उनका शृङ्गार प्रथं शृङ्गार कहलाता है] । सत्य-सो प्रतोत होने वाला मिथ्या प्रवर्तित प्रपञ्च कपट [कहलाता] है । वर

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मिथ्याप्रकल्पित. सत्यानुसारो प्रपञ्च. कपट. स च यत्र वच्यनीय. सापराध. स वचनीयोऽथो वच्यनेच्छ्यां सन्यान् कपट. वच्यकृतुद्धर्माच्चे सापरावेऽपि वच्यश्रे वच्यनाया. सम्भवत्ययोगानु ते न वच्ये स्थ. कपटो वच्याकृताभावेन । श्रत यत्र तु वच्यापरार्ध विनाऽपि वच्यकृतुद्ययैव केवलया कपटो भवति स वच्यव सम्भवी । यत्र तु द्वयोरतुल्यफलाभिधानवतः साक्षात्कीयेन न्यायेन क उपचीयते डपराधीयंत म वच्यापराधाभावेन वच्यकृत्य च वच्यनयुद्ध ययोगेन च द्वयसम्भवीति ।

विद्रवन्नि गस्यन्ति जाता यस्मादिति विद्रवोऽर्थः 'विट' इति प्रकारचयुक्कः । तत्र जीवीयोऽथो हस्त्यादिज । श्रजीवीयोऽथ शास्त्रादिज जीवाजीवोऽथ नगरोपरोज । तत्र हस्त्यादेः शस्त्रादेशच व्यापातोद्दिति । धमोऽपु त शङ्कार-कपट-विद्रवार्न त्रिपु भेदेषु मध्ये पकरे भेदोद्देपु पृथक प्रथग निवर्त्तनधनीय । तत्र प्रथमेऽड्डे नन्यातमः कपट उपार्य विद्रो वो व्याप्तिसम्भावनाया, शङ्कार फलांशो । मयं द्वितीये तृतीये च । प्रथमे चादौ शङ्कार कामशङ्कार प्व ! शङ्कार फलांशो । मयं द्वितीय विवेकः । (१) जहां हेतुजन्य [पुलप] ग्रपराधा होती है और वह वच्यकोप्त कपट महलाता है । (२) घटकच [पुष्प] के अपराधी होनेपर भी वटचक वचक [मे वचन करनेवाले मुख] का अपराधी है इस बारए [वच्य-वचक] दोनो से उत्पन्न धतुर्य भेद नहीं होता हैं । यहां तक वच्यकोप्त कपटका वर्णन किया । श्रव श्रागं वच्यकोप्त कपटका वर्णन करते है— जहां वच्यच [जिसको धोखा दिया जा रहा है उस] के अपराधे बिना ही केवल वचकको [वंचना] वुद्धिसे ही कपट होता है वह वचककोप्त कपट महलाता है । [ग्रागो देवोऽथ शपरका लक्षण करते हैं] जहां तुल्य फल और तुल्य कारण [अभिधान] होनेपर भी काकतालीय न्वायेन एककी सिद्धि हो जाती है और एकका हास होता है वहां वच्यच श्रागो का श्रपराध न होने श्रोर वचकच [द्वितीचि वाते] में वचचनायुद्ध न होनेके बारए वह देवोऽथ कपट होता है ।

[ग्रागे द्वारिकां ग्राए हुए तीन प्रकारके विद्रयकोका वर्णन करते हैं] । जिससे लोग विद्रुत होते हैं श्रथवा भयभीत होते हैं उस धनर्थीको 'विद्रव' कहलाता है । वह तीन प्रकारका होता है । [१ जीवोऽथ, २ प्रजीवोऽथ ग्रोर ३ जीवाजीवोऽथ] । उनमेंसे हुस्तो श्रादिके द्वारा उपपन्न होने वाला [ग्रनर्थ] जीवीयोऽथ है । शस्त्रादिसे होने वाला प्रजीवोऽथ है । श्रोर नगरोपरोजन्य उद्य उत्पन्न जीवाजीवोऽथ है । उस [नगरोपरोजनय धनर्थ] में हुस्तो श्रादि दोनोका व्यापार होनेसे [उस प्रकारके धनर्थको जीवाजीवोऽथ धनर्थ कहाजाता है ।

[ग्रागे 'द्वारिकां' ग्राए हुए तीन प्रकारके 'विद्रयको' का वर्णन करते हैं] । जिससे लोग विद्रुत होते हैं श्रथवा भयभीत होते हैं उस धनर्थको 'विद्रव' कहलाता है । वह तीन प्रकारका होता है । [१ जीवोऽथ, २ प्रजीवोऽथ ग्रोर ३ जीवाजीवोऽथ] । उनमेंसे हुस्तो श्रादिके द्वारा उपपन्न होने वाला [ग्रनर्थ] जीवीयोऽथ है । शस्त्रादिसे होने वाला प्रजीवोऽथ है । श्रोर नगरोपरोजन्य उद्य उत्पन्न जीवाजीवोऽथ है । उस [नगरोपरोजनय धनर्थ] में हुस्तो श्रादि दोनोका व्यापार होनेसे [उस प्रकारके धनर्थको जीवाजीवोऽथ धनर्थ कहाजाता है । [धमोऽपु त] इससे शङ्कार, कपट ग्रोर विद्रयोकिं तीन-तीन भेदोमे एक-एक भेद श्रथवा भलग भलग निवद्ध करना चाहिए । उनमेसे प्रयम भदूमे [तोनो प्रकारके कपटोमेंसे]

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श्रारास्तु वीर-रौद्रे पु नियुद्धे प्रवाहवेपु च । वाचा मूर्खो स्त्रियश्चैव हास्य-शृङ्गार-भयादिपु ॥

कोई एक कपट उपाय [के रूप] में, [कार्य में] प्राप्ति की सम्भावना रूप में एक विद्रव, शौर फल रूप में [कोई एक] श्रृङ्गार दिखलाना चाहिए । इसी प्रकार द्वितीय तथा तृतीय श्रृङ्गारोपे [भी एक कपट उपाय रूप में, प्राप्ति की सम्भावना रूप में एक-एक प्रकार का विद्रव, शौर फल रूप में एक-एक प्रकार के श्रृङ्गार का वर्णन करना चाहिए । किंतु इस यात्र में विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए [कि] प्रयम श्रृङ्गार में काम-श्रृङ्गार ही रखा जाय । मनोरञ्जन में उस [काम-श्रृङ्गार] के साधक तत्व होने से उसका प्रयम ग्रहण किया जाता है । इसी प्रकार इसमें प्रहसन की रचना भी की जाती है । प्रथम में सगधरा वृत्ति [लम्बे पद्य हो समवकार में प्राप्त करने वाले] प्रादि वादव से श्रधिक प्रहसनर वाले शौर प्रोजो गरुपुब्ध श्रादृत्तनिप्रेरित वृत्ति [वृतों] का प्रहसन होता है । [भवप भ्रकसरोंवाले] गायनो प्रादि [ध्वनों] पर ग्रहण नहीं होता है । उस [गायनो श्रादि प्रहपाक्षर ध्वनों] के ग्रहण कराने से लब्ध माई होगी । [इसलिए स्वल्पाक्षर ध्वनियों का ग्रहण समवकार में नहीं करना चाहिए] । कोई लोग स्वल्पाक्षर गायनो प्रादि और प्राधंसम तथा विपम श्रादि ध्वनोक्षा इसमें ग्रहसन मानते हैं । इस [पचोंवी विवेच्य हप से नाम लेने] से यहां गयक का निषेध [निहित] नहीं है । पचोंगे श्रधिवेयका विधान करने के लिए है । [सगधरादिको] विधान होने से ।

वीर लोग शौर रौद्र रसों में, मल्लयुद्ध और पुढोंमें [मानन्द अनुभव करते हैं] और वाच्य मूर्ख स्त्रियाँ हास्य, शृङ्गार, भय श्रादि में [मानन्द अनुभव करते हैं] ।

समवकार में हाम्य सहित सङ्कीर्ण श्रृङ्गार, शौर देवो तथा प्रमुरो के वंश से मारण होने याता कपट, विद्रव तथा दिव्य प्रभाव से साध्य युद्वादिक [जो यत्न से पाया जाता] है । लोकिक युक्तियों से रहित [परन्तु लोकिक उपायों से सिद्ध न होने वाला] माय, इन्द्रजाल, उपप्लना कूदना [उचछेद प्रथवा मथ करने योग्य] नदूदूरे पुतले प्रादि गिराना प्रादि, जिसमें मुख्य रूप से किया जाता है इस प्रकार की मारभरी वृत्तियों से सम्पादित प्रहसन, कपट, विद्रव प्रादि सभी कुम्भ-मोतहोमयुक जनताको प्रसन्नत धानब प्रथादि प्रदान करते हैं । [इसलिए उनक्य वर्णन किया जाता है] । जैसा कि कहा भी है कि -

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अथ भागस्य क्रमप्राप्तो लक्षणावसरः॥

[सूत्र १२६]—भारा: प्रधानशृङ्गार-वीरो मुख-निवर्हणश्च । एकाड्यो दशालस्याढ्यः प्रायो लोकानुरञ्जकः ॥ [१६] २१॥

भृङ्गार या वीर रस प्रधान, मुख सन्धि तथा निर्वहण [दो ही सन्धियो] से युक्त, दश लास्याङ्गोसे पूरित, एक अङ्क वाला, श्रृङ्गार प्रायः सा चारणया जनोका मनोरञ्जन करनेवाला [रूपकभेद] 'भाणा' [कहलाता] है ॥ [१६] २१॥

भण्यते वयोमोक्त्या नायकेन स्वपरकृतं प्रकाशयतेडनेति 'भाणा' । शौर्य-सौभाग्य-वर्गानां चाहल्येनात्र वीरो$ङ्गारयोः प्राथान्त्यम् । श्रृङ्गाराङ्गत्वाद हास्यादिप्राङ्गतया वर्गान्तीय । तथा मुख-निवर्हणासन्धिसम्पूर्ण एकाह्निर्वर्तनीयतया$देशाढ । दश चात्र लास्याङ्गानि निवेश्यन्ते । तानि चैतानी यथात च— गेयपदं स्थितं पाल्यवमासीनं पुष्टपुङ्गडिका । प्रणटेदकं त्रिगुढं च सैन्यवाक्यं द्विगुढकम् ॥ उत्तमोत्तमकं चैक्षमुक्त-प्रत्युक्तमेव च । इति । प्राथेपा लोकम्य पुथङजनस्य विट-वेश्यादिदृष्टतात्ककलवाद रञ्जनात्मक । विट-धूर्त-कुट्टिन्यादिचेष्टितं राजपुत्रादीनामपि चातुर्योर्थै श्रेयमेवेति प्रायोभट्टैः स्मृतमिति ॥ [१६] २? ॥

जिसमे नायक [प्रायः किसी पात्रके रत्नभूमिमें उपस्थत न म होनेसे] प्रकाशात्मक द्वारा अपने शौर्य दूसरेके धुतको कहता या प्रकाशित करता है । वह ['भण्यते यन्रेति भाणा' इस व्युत्पत्तिके अनुसार] 'भाणा' कहलाता है । इसमें शौर्य या सौभाग्यक प्रधान वर्णन होनेके शृङ्गार वीर तथा शृङ्गारका प्राधान्य होता है । शृङ्गारका अङ्ग, होनेसे हास्यरसादिका भी इसमें प्रधान रूपसे वर्णन होना चाहिए । वीर एक ही दिनमे पूरित [होनेवाले कथाभागसे युक्त] होनेसे एक अङ्क वाला, तथा मुख शौर निर्वहण [दो ही] सन्धियोसे युक्त ['भाणा' होता है] । इसमें दश लास्याङ्गोसे पूरित [दस लास्याङ्ग] निपुण पात्र कहे गए हैं— १ गेयपद, २ स्थित, ३ पाल्य, ४ पुष्टपुङ्गडिका, ५. प्रणटेदक, ६ त्रिगुढ, ७ सङ्घय -नामक द्विगुढक, ८ उत्तमोत्तमक, ९ उक्त शौर १० प्रत्युक्त [ये दश लास्याङ्ग कहे गए हैं । इन सवका प्रयोग भाणामें होता है]।

[कारिकामे बताए हुए 'प्रायो लोकानुरञ्जक' इस भागको व्याख्या करते हैं] प्राथः लोकस्य पृथङजनस्य विट-वेश्यादि प्रादिके वृत्तेन युक्त साधाररया लोगोंके मनोरञ्जनका काररणा होता है [उच्च कोटिके लोगोंके मनोरञ्जनका काररणा नहीं होता है] । विट, धूर्त, कुट्टिनो प्रादिका चरित चातुर्यादिके निपुण होनेके लिए राजपुत्रादिको भी जानना चाहिए इसलिए [कारिकामे] 'प्राय' पदका प्रयोग किया गया है ॥ [१६] २? ॥

१. एक त्रिगुढ । २ द्विगुढक ।

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श्रथ कर्तृकृत्योपदेशेन नायकमुखश्राति—

[सूत्र १३०]—एको विटो वा धूर्तो वा वेश्यादेः स्वस्थः वा स्थितिम् । व्योमोक्त्या वर्णयेदत्र वृत्तिमर्थं च भारतो ॥ [१७]१३० ॥ एको द्वितीयपात्ररहितः । विटः पल्लवकः, धूर्तेश्चौरः चूतकारादिः, वेश्यादेः पण्यस्त्री-कुलटा-शम्बल्यादेः । स्वस्यात्मनो वा स्थितिं चरितं व्योमोक्त्या रङ्गप्रविष्टद्वितीयपात्रसम्बन्धिवचनानुयादेन वर्णयेदत्र विकारैः सामाजिकान् चरमयेत् । श्रथ भाव्ये । भारती चात्र वृत्तिः प्रभूततया प्रधानम् । वीर-शृङ्गारयोः प्रधानतया वेऽपि व्योमोक्त्या वाचिक एवात्राभिनयो न सात्त्विककाङ्काविति, न सात्वती कैशिकी वा प्रधानम् । श्रथ विटादीनां परवचयेनात्रकं वृत्तं प्रेक्षकाणामवज्चनीयत्वापादनार्थं व्युत्पाद्यते इति । श्रथ केचित् विटाकलिप्तं हेतुं, नायकं च विटमेव मन्यन्ते ॥ [१७] १३१ ॥

वैमुख्यकार्यं वीर्याढ्यः क्यात्मकौलीनदम्भवत् । हास्याद्भिः भारतोऽन्वयैश्च—वृत्ति प्रहसनं द्विधा ॥[१७] १३२॥

श्रथ [नायकके] फलसङ्के प्रदर्शित द्वारा नायकका वधान्त करते हैं—[सूत्र १३०]—एक विट या धूर्त [नामक] वेश्यादिके श्रथवा अपना स्त्रियोंतक 'ग्राकाशाभावित' के द्वारा इसमें वधान्त करता है और इसमें भारती वृत्ति भी प्रधानता होती है ॥ [१७]१३०॥ एक श्रथवा दूसरे पात्रसे रहित विट प्रयातः [पल्लवक श्रथवा] वेश्यासक्त ग्रोर पूतं चोर जुम्रारो श्रादि [ भाराका नायक होता है ]। वेश्यादि श्रयातः वाजारू ग्रोरात, कुलटा [धिनाल, व्यभिचारिणी स्त्रियो] मोर [शम्बली प्रयातः] कुत्रिनो, दूसर श्रादिके [चरितनो], श्रयवा श्रपनो स्थितिको चरितको रंगमे प्रवृत्त न होने वाले द्वितीय पात्रके वचनोन श्रथवा वधकारके [प्रथ्यात् रंगमे प्रस्तुतस्थित किसी श्रन्य पात्रके साथ चरितालापके रूपमे किए जाने वाले] श्राकाशाभावपितके द्वारा वधान्त करे, श्रोर श्रथ विकारों के द्वारा सामाजिकों उसे समभावे । 'श्रथ' इसमें प्रयातः भावोंमे । श्रोर प्रधमभावमे होनेसे इस [ भावे ] मे भारती वृत्ति प्रधान होती है । श्रोर प्रोर श्रृङ्गार रसोंकी प्रधानता होनेपर भी श्रोर ग्राकाश-भावित [के रूपमे श्रभित] होनेसे वार्चिक हो श्रभिनय होता है । सात्त्विक या प्राद्धिक नहीं । इसलिए सात्त्वती श्रथवा कैशिकी वृत्तिको प्रधानता [भावमे] नहीं होती है । इसमें विट श्रादि का दूसरोंको ठगने वाला चरित्र भो, प्रेक्षक ठगे न जा सकें इस प्रकारकी शिक्षा देनेकेलिए, दिखलाया जाता है । कुछ लोग इस [भावे] मे कथाभागोंके [सवंया] विट द्वारा कल्पन तथा नायक [सदृश] विट होन चाहिए ऐसा मानते हैं ॥[१७]=१३१॥ प्रहसनरूपक भेद—प्रहसनका लक्षण—प्रव प्रहसन वा [लक्षण करनेके] प्रवसर प्राप्त है—

[सूत्र १३१]—[पालनीयां प्रादिके प्रनि] उदासीनतरोऽपि उत्पन्न करानेवाला, योपोऽपि

मद्यांत पत्त, प्रतिह जनापवाद द्वार रिस्यार बक्खते युक्त, ग्रोर भारतांकै रमान [मुनि नियंहए रति: 1

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वैसुर्यं वहुमानाभावः कायं प्रयोजनं यम्य । प्रहसनेत हि पारषिडप्रभृतितोनां चरितं विडम्बाय त्रिमुखः पुरुपोऽपि भूयस्त्वात् वन्चकानुपमर्षति । वीथ्यपकृत् द्व्यहारादिभियैथायोगं मंयुकृतं च विधेयम्‌ । कौलीनं जनवादः सन् ग्यातं प्रसिद्धम्‌ । दम्भरच श्रातमन्यतथ्यसाधुत्वारोपारूप रयातोडच्र विधेयः । यथा शाक्यमानां स्त्रीसम्पर्कोऽपि गईप्यीयो न चौर्येण । पेतं दम्भोडपि । द्वायो रसो श्रृङ्गारः सुरतो यत्र । भाषावचच सन्धी सुरतनिर्वहणो । प्रकृतेः शृङ्गारद्युतिरन्वितो हास्यरसप्रविभन्यायेन न कैशिकी युक्तिः । निम्नपातगर्हित-प्रभृतिभिः श्रृङ्गारस्यैवचित्येनाभावान् केचिल्लहास्यविप्रलम्भमेव । श्वेत एष लास्याद्धान्तर्गत श्रलपान्येतेति । 'द्विधा' द्विप्रकारकं शुद्धं सड्घीयां चेति ॥ [१८] २७ ॥

ग्रन्थ नायककथनद्वारा शुद्धमाह— [सूत्र १३२]—निन्द्यपालण्ठि-विप्रादेरहिलोलासम्भर्पार्जितम्‌ । परिहासवचःप्रायं शुद्धमेकस्य चेष्टितम्‌ ॥[१८] २७॥ निन्द्या: शीलादिनागर्ह्यपीया:, पारषिडन शाक्य-भरित्तापसादय:, विप्रा रुप दो] सधियों [एक श्रेष्ठ, तथा [भारती] वृत्ति वाना हास्यप्रधान [स्पष्टोक्त] 'प्रहसन' [निन्द तथा मंकोलिं ऐकते] दो प्रकटारका होता है । [१६] २७ । [पालषिडयों श्रादिके प्रति] यंमुखप श्रर्याप्त आदरका प्रभाव [जिसका उत्पादन] कार्यं श्रर्थात प्रयोजन है । प्रहसनके द्वारा पालण्ठि आदिके चरितको समभकर, अनुरप उन ठगोंको पास किर नहीं जाता है [इसलिए प्रहसनफो पालण्ठियोंके प्रति वंच्छुपकारी कहा गया है] । ब्यवहारादि दोष्पपत्तोंसे युक्त [प्रहसनको] बनाना चाहिए । कौलीन अर्थात् लोकापवाद । वह जिसमे श्र्यात् श्रप्र्यात् प्रसिद्ध हो । शौर श्रपननेमे झूठे साधुत्वके प्रदर्शतं रुप दम्भफो इसमे प्रकटानित करना चाहिए । जैसे वीथीमें स्त्री-सम्पर्क निन्दनीय है चोरो नहीं [इस प्रकार का जनापवाद रुप कोलीन प्रसिद्ध है] । इस प्रकार [ग्रतथ्य साधुत्व प्रदर्शतं रुप] दम्भ भी होता है] । भाषाके समान मुख तथा निवंहरुण नामक दो हो सधि [इस प्रहसनमे भी होते हैं] । एक हो अंक, शौर भारती वृत्ति [भी भाषाके समनति हो] निबंध करना चाहिए । हास्य रसकी प्रधानता होनेपर भी इसमे मंनिको वृत्ति नहीं होती है । ययोकि निन्दनीय पाकण्ठी ग्रादिमे शृङ्गारको चित्यता न होनेके कारण उनमे केबल हास्य विप्रलम्भ हो होता है । इसलिए [प्रहसनमे शृङ्गारकी प्रधानता न होनेके कारन] इसमे थोड़े हो लास्यागोंका वपन होता है । वह दो प्रकटारका श्रर्थात शुद्ध शौर सड्घी दो प्रकटारका होता है ॥ [१८] २७॥

[सूत्र १३२]—निर्दा योग पालण्ठी दाक्ष्ष्यरा ग्रादि किसी एक का ग्रसलीलता तथा ग्रसत्यताले रहित परिहास वचनोंसे पूरां चेष्टित [जिसमे हो वह] शुद्ध प्रहसन कहलाता है । [१८] २७ ।

निन्दनीय श्रर्थात महिन्त वाच्चार वाले, पालण्ठी श्रर्थात वृद्ध मोर महाशय तपस्वो ग्रादि [प्रियकार जन हैं इसलिए उन्होंने बौद्ध तथा भगवत्तापस श्रथवा तापस ग्रादि

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जातिमात्रोपजीविनो द्विजन्मानः । श्राद्दादिकादन्यास्वाद्येरिविधस्य दुष्टस्यैकस्यैव कस्यचिच्चेप्सितं वृत्तं, श्रशलोलिनं ग्राम्येषु जुगुप्सा-म्रदर्शनहेतुना च, श्रसद्येन च ग्रीडाकारिणा रहितम् । परिहासप्रधानवचनवहुलं च । एतदर्थमिधायि रूपकर्माप चोपचाराद शुद्धं प्रहसनम् । द्वितीयवेश्या-दिनरितसादृश्यरहितवादिति ॥ [१६] न्या।

[सूत्र १३३]—सडूसीयशुद्धताकल्प-मात्रोचार-पारिच्छेदम् । बहूनां बन्धकी-चेट-वेश्यादीनां विचेष्टितम् ॥[२०]न्थ। वहूना चरितैः सडूसीयैःरथ्युल्यवैशेपलव्य-बहुतराचारपरिजनम् । उद्दतात्वं च सतामनुचिततया। चन्धकी स्वैरिणी, चेटो दास, वेश्या परयस्त्री । श्राद्दादिकान् शम्भली-शूद्रैः-गृद्ध-परेढ-पाखण्डि-विप्र-भुजग-चार-भाटादयो विडृततयैव-भापाचारा गृध्यन्ते । विगर्हणीयैः हास्यजतकं चेष्टितमनुष्टानम् । प्रकस्य चन्धक्योदे कस्माचिन् द्वारेण यत्रानेक एवंविध एवं प्रकारेण हास्यते तत् सडूसीयैश्चरितविपयतया न मद्रीयैःम् । शुद्धे तु पाक्षण्डादेरेकस्यैव चरित प्रहसते इति पूर्वस्माद् भेदः । दोनोंको निन्द्य पाखण्डी कहा है] विप्र [विद्यादि श्राह्मणोचित गुणोंसे रहित होनेपर भी] केवल जातिसे जोविकार-निर्वाह करने वाले द्विज । 'श्रादि' शब्दसे इस प्रकारके किसी अन्य एक दुष्टके जुगुप्सा [घृणा] श्रोर श्रदर्शन [न देखनेकी इच्छा] जनक ग्रालोलता [चञ्चलता] श्रयातु [प्राप्त होवे] ग्राम्यतासे [ग्रामीणतासे] ग्रीडाकार [लज्जित होने] से रहित [न्यापारक] वृत्तान्त [प्रहसनमें होना चाहिए] । परिहास प्रधान वचन [बहुत से] द्रधिक [अधिकांश] मस्रामें पाए जाते हैं । इस लिए इत [इस परिहास प्रधानवचन] को वहने वाला रूपक भी उपचारसे 'शुद्ध' 'प्रहसन' कहलाता है । वेश्यादि किसी द्वितीयके चरित का सडूीर न होनेसे [इस प्रकारका प्रहसन 'शुद्ध' कहलाता है ॥[१६]न्थ॥ [सूत्र १३३]—प्रत्यनुत उद्धत थेप, भावा, प्राचार श्रोर परिजनोसे युक्त, वेष्टमा तथा स्वैरिणी [व्यभिचारियो स्त्रो] श्रादि बहुतोंके चरित्रसे युक्त [प्रहसन] सडूसीयं [प्रहसन कहलाता] है । [२०] न्थ । बहुतोंके चरितसे व्याप्त होनेके कारण [इस प्रकारक प्रहसन] सकीर्णं [सडूसीय कहलाता] है । [वेष, भावा, प्राधार श्रादिका] उद्दतात्व [उद्दततापूर्ण चेष्टा] उस प्रकारके वेष श्रादिके सज्जनोचित न होनेके कारण [महा जाति] है । वन्धकी [प्रप्रसिद्ध स्वैरिणी] चेट [दास], वेश्या, वाराङ्गना [महा जाति] है । वन्धकी को प्राप्त स्वेच्छियो चेट प्रयान्तु वास, वेश्या, वाराङ्गनो । 'ग्रादि' शब्दसे शम्भली [दिनतल], धूर्त, वृद्ध, रँजुडा, पाखण्डी, श्राह्मणो, भुजग, [विद्यामोंदे सेवक], चार तथा भाट ग्रादि विकृत देव, भावा श्रोर प्राचार यानोका ग्रहण होता है । प्राये [विन्चेष्टित वचनों से] प्रयं मतते हैं] चिनेय रूपसे गहनोंय प्रयान्तु हारयजनक वेष्टित पर्याप्त व्याप्तार [प्रचुरतया] । वन्चयो प्राप्तिमेंसे किसी एकके द्वारा जहाँ इत प्रकारके प्रपञ्च लोगोन उपहास किया जाता है यह सडूसीयं चरितोंगा विपय होनेसे सडूसीयं [प्रहसन कहलाता] है । शुद्ध [प्रहसन] में तो पाक्षण्डि श्रादि किसी एकके हो चरितका उपहास किया जाता है यह [सडूसीयंच प्रहसानत] से भेद है ।

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ग्रन्थे तु-स्वभावशुद्ध-पारषडादेशैरित प्रहसते तनु सद्धीर्णचरितविपयत्वात् सद्धीर्णेमित्याहु: । सद्धीर्णमनेकाढ्यं वैचिदानुस्मरन्ति । श्रन च प्रथमेन श्लोकेऽनु सामान्यलक्षणाम् । द्वितीयेन शुद्धस्य, तृतीयेन च सद्धीर्णस्य लक्षणाम् । उभयत्र तु विट-चेट-प्रादि परिजनस्य भूयस्त्वमिति । प्रहसनेन च वाल-मत्री-मूर्खाद्या हास्य-प्रदर्शनैर नाट्येऽप्रोचना क्रियते । तत् सङ्घातनाट्यरचयैः गेयप्रकरपकैर्धर्मार्थकामेपु च्छुप्तोदन्ते । तथाहि वृत्तान्युत्सृज्य पारषडादिमपृथक्त्वृत्त शुद्ध, वन्धक्यादेश्र धूर्तादिमकुले सकीर्ण वृत्त त्याज्यतया व्युप्ताद्यते इति ॥ [२०] २५ ॥

ग्रन्थ में लोग तो—स्वभावशुद्ध [प्राय: पवित्र आचारवाले होनेपर भी पालण्डे प्रादि [प्रत्यन्त धार्मिकों के] ग्रन्थपाठी द्वारा हास्यादि] के चरितका जिसमें उपहास किया जाता है वह चरितका सद्धीर [शुद्ध चरितमें श्रव्युद्यता] का विपय होनेसे सद्धीर्ण [होता है यह कहते हैं । कुछ लोगोंकी कहना महै कि सद्धीर्ण [प्रहसन] ग्रन्थ अथवा वाला होता है । [और प्रहसनमें केवल एक शुद्ध होता है यह उन दोनोंका भेद है । प्रहसनके लक्षणमें ३४-३५ तक तीन इलोक ग्राए हैं] इनमेंसे प्रयम इलोकसे [प्रहसनका] सामान्य लक्षण, द्वितीयसे शुद्धका लक्षण, तथा तृतीय इलोकसे सद्धीर्ण [प्रहसन] का लक्षण किया गया है । [शुद्ध तथा सकोर्ण] दोनोंमें विट, चेट श्रादि परिजनोंका बाहुल्य रहता है । प्रहसनके द्वारा हास्य प्रदर्शन करके नाट्यके विपयमें श्रोताओंमें उत्साह उत्पन्न को जाता है । उससे नाटकके विपयमें रूचि होनेपर श्रोप रूपकमेदोंके द्वारा उनको ग्रन्थं, प्रयं ग्रोर काम को शिक्षा प्रदान को जाती है । श्रोर साथ हो श्राचारहीन पालण्डे प्रादि [किसी एक] वा शुद्ध वृत्त तथा पूर्तादिसे ध्याप्त बन्धकी प्रादिका सकोर्ण चरित त्याज्य रूपसे दिखलाया जाता है । [यह प्रहसनकी उपयोगिता है] ॥ [२०] २५ ॥

ड नवम रूपक भेद 'डिम' का लक्षण— [प्रहसनके लक्षणके बाद ग्रागे] प्रव 'डिम' के लक्शेका श्रवतार प्राप्त है—[प्रत 'डिम' का लक्षण करते हैं] [सूत्र १३४]—शान्त, श्रृङ्गार श्रोर हास्य रसे सहित विमर्श साॅ घ विहीन, प्रसिद्ध श्राश्रयात-वस्तु वाला, तथा रौद्ररस प्रधान, इन्द्रजाल एव युद्वादिसे परिपूर्ण चार प्रक्रों वाला [रूपकभेद] 'डिम' [कहलाता] है ॥ [२९] २६ ॥

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इह च करुण-रौद्र-भयानक-वीभत्साद्रचत्वारो रसा दु खात्मान । शृङ्गार-हास्य-वीर-प्रदुमुत-शान्ता पञ्च सुखात्मकाः । दिव्यानां च सुप्रनाहुल्येनाल्पदु खादन्यथा दिव्यत्वमेव न स्यादित्येपां तत्रभवाननुग्रहीतानामन्येपां च दु खात्मानो रसा श्रप्रयोज्या एव । समवकारादौ तु यद् रौद्रादिव्याप्तेन तद् दिव्यहेतुकस्वाभाविकसुरसावाधकत्व-ददुःखत्वमेव । मत्योचवज्ञादिसम्भवो हि रौद्र । स्वाभाविकक्रोधादिसम्भवो भयानक । मत्योचिशरीरश्चवलोकनाद् वीभत्सश्च दिव्यानामागन्तुक एव । करुणा पुनरिष्टनियोगप्रभवशोकप्रकर्षे हुपपत्तवान् स्वाभाविकसुरसपरिपन्थी सर्वदै पामवकर्षणीय एव । शान्तोडपि विपयासक्तिमत्स्यादिसम्भूयेय ।

अत्र च डिमे हास्य-शृङ्गारवरर्जनिमिन्द्रजालादियहुलत्वादुचितमेवेति । स्यात् रूपसे उपलब्ध होनेके कारण [ज्ञा त पदसे हो] करुणारसका भी निषेध किया गया है [यह समझना चाहिए] । [करुणरसके] दु खप्रकृत्यात्मक होनेसे । करुणारसकी दु खात्मकता के कथनके प्रसंगसे रसाके मु खात्मक तथा दु खात्मक हि्विध विभागको दिखलाते हैं— यहां करुणा, रौद्र, भयानक श्रो र वीभत्स ये चार रस दु खात्मक रस हैं । शृङ्गार, हास्य, वीर, श्रद्भुत श्रो र शान्त ये पांच रस सुखात्मक रस है । दिव्य पात्रोंमें सुखप्रधान होनेके कारण यदि उनमे दु खकी न्यूनता होनेसे, अन्यथा [अर्थात् यदि उनमे सुखकी प्रधानता न मानी जाय तो] उनमे दिव्यता ही नहीं बनेगी । इसलिए इन [देवताग्रों] श्रो र उनके प्रभवसे श्रनुग्रहीत [उनके भक्तगणों] के साथ दु खात्मक रसोंका प्रयोग नहीं करना चाहिए । इसपर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि [यदि दिव्य पात्रोंके साथ दु खप्रधान रसोंके प्रयोगका निषेध किया जाता है तो रौद्ररस-प्रधान समवकारमे दिव्य पात्रोंकी संगति कैसे लगेगी इस शंकाका उत्तर प्राप्त करते हैं कि] समवकारादिमे [दिव्य पात्रोंके होते हुए भी जो रौद्ररसका वर्णन कहा गया है वह [उन पात्रोंके] दिव्यता जन्य स्वाभाविक सुखका बाधक न होनेसे दोषावह क नहीं हो । [प्रागे विभिन्न रसोंके हेतुका तथा स्वहपक उपपादन प्रस्तुत करते हैं] मुख्य प्रतिप्रेके द्वारा जो जाने वाली प्रवृत्ति प्रधान रौद्र [उसका स्थायिभाव क्रोध] उत्पन्न होता है । आप्तसे श्रप्रधित [निम्नश्रेणीके पुरुष] के क्रोधादिसे भयानक [रसके स्थायी भाव भय] की उत्पत्ति होती है । श्रो र मनुष्यादिके प्रपञ्चविश्वरोर प्रादिविके प्रव्लोकनसे वीभत्स दु खात्मक रौद्र भयानक श्रो र वीभत्सरसोंका देवताग्रोंके साथ वर्णन प्राग्तुक हि होता है । [अर्थात् दु खात्मक रौद्र भयानक श्रो र वीभत्सरसोंके देवताग्रोंके साथ वर्णन वास्तविक रूपसे नहीं] । करुणारसका इन [देवताग्रोंके] साथ किसी भी रूपमे नहीं करना चाहिए [फिर भी प्रनुजनेसे— प्रयोगसे उत्पन्न दोषके प्रकटं रूप होनेके कारण [ज्ञा त पदसे हो] करुण रसका इन [देवताग्रों] के साथ कभी भी वर्णन नहीं करना चाहिए । इसी प्रकार [देवताग्रों] विपयासक्त प्रधान होनेके कारण उनमे दान्तरता भी प्रसभव हो है [अर्थात् देवताग्रोंने विरतिमे दान्तरतापू भी वहन नहीं करना चाहिए] ।

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पूर्वप्रसिद्धं वस्त्वतिवृत्तं नायकोपायफललताग्रमत्र । रौद्रे मुखेऽद्भी यत्र । गोपा रसा पुनरंगानि । श्रयसस्थाचतुष्टयविशिष्ट चतु संनिधत्ते चतुर्दिननिप्तनोयंविवृतत्वेन च चतुरङ्गवान् । श्रद्धावातारसपारचात्र श्रद्धा विवेया । नूलिकाक्षमुखयोरपि युद्धादिवर्साने निवन्यो भवत्येव । 'सेन्ट्र' इति सहेन्द्रजाल-रपाभ्या वर्तते । विध्यमानता चात्र सदर्थ । इन्द्रजालमम्ना शठ्ठ-हरादौता प्रकाशनम् । अन्यथापादनं वा । रणे समाम , बाहुद्र-नताक्कारपराभवादिकम् । डिमे डिम्ने डिम्न इति निवेश्य । डिम्ने मघातार्थ स्वादिति ॥

है । [लक्ष्याएमे ग्राए हुए स्पातवस्तुक ' पदका ग्रथं करते हैं कि] जिसमे नायक, फल, तथा उपाय रुप ग्रथें 'घस्तु' प्रय्यांत इतिृत्त स्पात प्रय्यांत पूर्वं प्रसिद्ध है । [ इस प्रकारका डिम होना चाहिए] । रोद्ररस जिसमे श्रृङ्गो प्रय्यांत प्रघानरस होते हैं । [विमर्शसंधि-रहित कहलाते गोप] चार संधियों वाला होनेके कारण चार ग्रथ-स्पायोसे युक्त, तथा चार दिनोमें सम्पादित कथा-भाग वाला होनेते चार अङ्कोसे युक्त [डिम को कहा गया है] । इसमे श्रृङ्गो रचना प्रकटतारके रुपमे करनी चाहिए [प्रकात-तारका लक्ष्याए 'सौदूावतारो यत्र पात्रं रडूांतरमसूचिनम्' यह २७वीं कारिकामे किया जा चुका है । इसके ग्रनुसार पूर्व श्रृङ्कके पात्रों द्वारा हो बिना किसी ग्रन्य सूचनाके नवीन श्रृङ्कका प्रारम्भ होता है उसके श्रृङ्कावतार कहते हैं । डिमके श्रृङ्कों रचना इसो प्रकारसे करनी चाहिए यहं प्रक्याकरा ग्राभिप्राय है । प्रय्यांत डिमके श्रृङ्कोमे प्रथम श्रृङ्कके पात्रों द्वारा हो द्वितीय श्रृङ्क ग्रादिक ग्रारम्भ होना चाहिए । प्रोत उसमे विक्रमभक प्रवेसक ग्रादि ग्रन्योपक्षेपकोका प्रयोग नहीं करना चाहिए] । नितु युद्धादिके वृत्तांतोमे चूतिृका तथा श्रृङ्कमुख दोनो [प्रन्योपक्षेपकें] का प्रयोग होता हो है । [विप्लमक प्रतिपेधक ग्रादिका प्रयोग नहीं होता है] । सेन्ट्रजालरपेए डिम 'इसलिए ग्रथं यहं है कि इन्द्रजाल ग्रोर युद्धसे युक्त हो । यहाँ 'सह' पदका ग्रथं विचामनता है । [प्रय्यांत सेन्ट्रजालमे सहायंक 'स' ग्राया है उससे इन्द्रजाल ग्रोर युद्धको डिममे विचामनता सूचित होती हे] । ग्रातिचामनता द्वार ग्रोर रपादिकों प्रकटानित करना 'इन्द्रजाल' [कहलाता] है । बाहुयुद्ध, वलात्कार पराभवदि रुप सप्राण योगसे [हपक्रमेदका नरम] डिम है । 'डिम' घातुके सप्तातायंका होनेसे [विप्लवादिप्रघान हपक्रमेद डिम कहलाता है । यह डिम शब्दका निर्वचन है । यह प्रन्यकाकरा ग्राभिप्राय है]

[सूत्र १३४]—ग्रत्रोल्कापात-निर्घाताश्चन्द्रसूर्योंपरक्त्या: । सुरासुरपिशाचाद्या: प्राय: पोड़श नायकाः॥

प्रव [डिमसे] करने योग्य ग्रन्य बातोंका, ग्रोर नायकका निर्देश करते हैं— [ग्रथ १३४]—इस [डिम] मे उल्कापात, भूूम्प चनद्रमा ग्रोर सूर्यके उपराग [ग्रर्थात महाए भयवा परिदेव] दिखलाए जाने चाहिए । [सूर्य तथा चनद्रमाक सारे ग्रोर कभी-कभी एक गोल घेरा दिखलाई देता है इसको परिदेव कहते हैं] मुर, ग्रसुर, पिशाच ग्रादि प्राप्त ।

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'श्रत्र' डिमे उल्कापातनिर्घातचन्द्रसूर्यपरिचेपाः । उपप्लवैः परत्वाच्चायं लेभ्य-किलिङ्ग-धर्म-शस्त्र-काष्ठकृतानि रूपाणि च प्रदर्श्यन्ते । 'शुरासुर' इत्यादिशब्दैर् यद्-राजसभुजगेन्द्रादिमहः । प्रायोऽमहारणात् न्यूनाधिकत्वेऽपि न दोषः । दिव्यानामुद्धतत्वाद् धोरोद्भता गते दृश्यते । स्वजात्यपेक्षयातु धोरोदात्तत्वमपि न विध्यते । एपां च परस्परविभिन्ना भावाः स्थायि-व्यभिचार्यौद्योगपि वर्षेणीया: । समवकारवत् तत्तद् देवताभक्तिरिति गद्यपद्यात्मकं नाट्यमुपनिबध्य ॥ [२३] त्त ॥

प्रकारके नायक होते हैं । [२२] त्त । इस[डिमे] उल्कापात, भूक्रम्प, सूर्यप्रभरा, चन्द्रोपराग प्रोर इनके उपलक्षरामात्र होनेसे [इनके सहश] लेभ्य [प्रायः लास्टर करने योग्य दृश्यसे बनी हुई] श्रयवा किलिङ्ग [श्रयोत् हरो चढाई श्रथवा प्रबलने नकतेमे ऋतुो हुई] ननतस्, व्रभ्रस तथा काटसे बनी हुई प्रतिनामों श्रादि [रूपों] को दिखलाया जाता है । [कारिकामें ग्राए हुए सुरासुरपिाच्चा पदमे] 'ग्राय्' [रूपों] द्वाब्दसे यक्ष, राक्षस, भुजगेन्द्र, श्रादिका प्रहार करना चािहए । ['प्रायः पोडशनायका' मे] 'प्राय.' पदसे यह सूचित होता है कि कभी-कभी इससे श्रधिक या कम होनेपर भी दोष नहीं है । [प्रयांत् साधारणात् डिममें सोलह नायक होते हैं, किन्तु कभी-कभी इस संख्यामे न्यूनाधिक हो जानेपर भी कोई दोष नहीं होता है।] दिव्यजनोंके उद्धत होनेसे ये [डिमके सोलहों नायक] धोरोद्भत समभने चािहए । [महुधोंकी श्रपेक्षासे हो ये धोरोद्भत कहे गए हैं] श्रपनी जातिको श्रपेक्षासे तो इनका धोरोदात्तत्व भी विद्ध नहीं है [श्रयात् श्रपनी जातिकी श्रपेक्षासे तो वे धोरोदात्त भी कहे जा सकते हैं] । इन [सोलहो नायकांके] स्वाभिप्रभाव ध्यभिचारिभाव श्रादि भी व्रस्पर श्ृष्ठत्-श्रष्ठम् हो चर्याांत करने चािहए । समवकारके समान उन-उन देवताम्रोंक भक्तिके प्रति उपकारो [ग्रातनवैदिक] होनसे [डिमे भी] दिव्य नायक होते हैं ग्रोर दिव् चरितके श्रतुग्रहणका परिज्ञान [रूप उसका फल] समभना चािहए । इसी प्रकार 'ईहामृग' मे भी [दिव्य नायकांकी स्वातिक समर्याांत समभवन चािहए] :

[सूत्र १३६]—उत्सृष्टिकाङ्कः पुंरस्वामी ख्यातयुद्धोत्यवृत्तवान् । भार्गवस्तद्वृत्तिसन्ध्यद्धरो वागुद्धः करुणाद्भुतः ॥ [२३] त्त॥

समवकारमे तीन ग्रंृङ्गोमें श्राठरह नायक दिखलाए थे । प्रत्येक ग्रंृङ्गमे नायक, प्रत्येक नायक ग्रोर उसके दो सहायक इस प्रकार चार नायकांके होने से तीन ग्रंृङ्गोके समवकारमें कुल मिलाकर वारह नायक माने ये । इसी प्रकार चार ग्रंृङ्गो वाले डिमके प्रत्येक ग्रंृङ्गमें चार-चार नायक होनेसे कुल मिलाकर सोलह नायक माने गए हैं । इन सवके विभाव ग्रनुभाव ग्रोर फल ग्रादि पुथक्-पृथक् ही हो व्यांांत करने चािहए । १०. दशरुपक भेद 'उत्सृष्टिकाङ्क' का लत्तय— ग्रथ कमसे प्राप्त उत्सृष्टिकाङ्कका निहुपया करते हैं— [सूत्र १३६] ['डिम' ग्रोर 'समवकार' में दिव्य नायक कहे गए थे उनके विपरीत] पुरुष नायक वाला; प्रतिद्ध युदसे जन्म [श्रयात् प्रतिद्ध युदोपाख्यानपर श्राधारित] क्यावस्तु

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उत्कृष्टोनमुखा समर्जनीनित यासा ता उत्कृष्टिका शोचनीय सत्रिय । ताभिरङ्किततवाद 'उत्कृष्टिकाद्द' । पुमासो मर्त्यो श्वान स्वामिनो, न दिध्या हु खातमय करपारसस्यात प्राभान्यात। दिव्याना च सुरनाहुल्येन तत्सम्चनध्यायोगान । ग़्यात भारतानो प्रसिद्ध यद् युद्ध तत्र सम्बन्धि, करपारसहुल यद् वृत्त तन, स्वय प्रसिद्ध वाड्मत्र निपन्धनीयम । भाषाप्रतिपादित मुखनिर्वहणस्यर्सावद्यम । परिदेवितसहुल्यानुसरया भारतो वृत्ति । एकाहनिरवशेषनीयचरितयादेकाहृरचात्र कर्तव्य । शौर्यादिमदादालिप्ताना परस्पर दोपोद्घाटन वाग्युद्ध, तद्नुल । मत्वर्थीयेनो भूस्न्यत्र नयानान । वाग्युद्ध चानुशोचनपरायरपानामिति रौद्रप्रवृतेन न करपाम्याज्जित्यव्याधात । करपो रसोड्डी प्रधान वाहुल्यनिपन्धनादन विधेय । गतयातमुखोत्तवृत्ते ध-न्वाविमद्भावेनेष्ट्रियोगादिप्राचुर्योदिति ॥ [ २३ ] स ॥

चाला भाषामे वह्हे हुए [मुख तथा निर्वहण ये रूप थे] संधियों [भारतो] वृत्ति तथा [पञ्च] ग्राद्धसे मुक्त, करपारस प्रधान वाग्युद्ध प्रदर्शक, [रपकभेद] उत्कृष्टिकाद्द [वह्हालात] है ॥ [२३] स ॥ इस 'कारिका' का व्यारया ग्रन्थारम्भ करनेसे पह्हले ग्रंथकार 'उत्कृष्टिकाद्दू' पदका निर्वाचन दिसलाते है— जिनसे सृष्टि पर्यन्त जीवन उत्कमाएोमूल है इस प्रकारको शोकग्रस्त चिन्रपि 'उत्कृष्टिका' [म्हलाती है] उनसे ग्रभिदूत [प्रत्यात् उनकी चर्चा करने चाला रपकभेद] 'उत्कृष्टिकाद्द' [म्हलाता] है । पु स्वामिनो' कहनेसे इसमें मुख्य प्रत्यात मत्व हो नायक होते है: द्व खातमक करपारसकी प्राधान्यता होनेके कारन [उत्कृष्टिकाद्द्मे] दिव्य नायक नहों होते हैं । यद्यपि दिव्यजनोंके मुखप्रधान होनेसे उनके साथ उस [द्व खातमक भरपारस] का सम्वन्ध नहीं होता है [प्रत इसमें दिव्य नायक नहीं होते हैं] । 'श्वात' 'ग्रात्नु' महाभारत ग्रादिमें प्रसिद्ध जो युद्ध, उससे होने चाले करपाररसे परिपूर्ण जो ग्रायान वस्तु ग्रथवा यात्मान ग्रादिमें प्रसिद्ध जो विद्वान या ग्रविचमान ग्रायान-वस्तु, उसभी रचना इसम करनी चाहिए । भारामें प्रतिपादित मुख तथा निर्वहण नामक दो सन्धि निलाप ग्रादिसे युक्त होनेसे भारती मुखय वृत्ति, तथा एक दिनमें समाप्त चरित वाता होनेसे एंव ग्राद्ध इसमें रचना चाहिए । शौर्य ग्रादिके मदसे मत्त जनोंका एक दुसरेपर दोपारोपण वाग्युद्ध [वह्हालात] है । उसका वाहुल्य [इस उत्कृष्टिकाद्द्में] होना है । यहाँ मत्वर्थीय प्ररपवके वाहुल्यपायमें विहित होनेसे [वाग्युद्ध का ग्रय वाग्युद्ध वहुल करना चाहिए]। शोर यह वाग्युद्ध ग्रनुशोचनपरायरप जनोंका है इसलिये [वाग्युद्ध मृद पदवाले होनेसे] रौद्र रस प्रवेश नहीं होता है । इसलिए करपारसकी प्राधान्यता ध्यानात भी नहीं होता है [प्रत्यात उक्तृष्टिकाद्दूमे शृङ्गारोचनपरायरप स्त्रियोंका वाग्युद्ध होनेपर भी उसमें रौद्ररस नहीं ग्रपितु करपारस हो ग्रधान रहता है] । इसमें ग्रधिकांशमे वर्णत करके पदपारस हो प्रधान रहता है एवं विपागारिका प्राचुर्य होनेके कारन [करपारस ही उत्कृष्टिकाद्दू ग्रधानरस होता है] ॥ [२३] स ॥

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निवेदयाचो भूम्नात्य योपितां परिदेवितम् । नरान्निवृत्यसंप्रामाद्विचेष्टाश्चिन्नरा विसंस्थुला: ॥[२४]६९॥

अत्र उत्त्रष्टिकाढूं ये असु श्रुतासु निर्वेदो जायंत, ता निवेदवाचो वाहुल्येन निर्वन्धनीयो। देवापालम्भे शत्रुमनिन्दादेरुपानुशोचनादिमकं परिदेवितं च योपिता वधूया वर्णनीयम् । पुमांसं सचोपरतोदतभहार-यथ-नन्ध-लाडनादिरूपसंघामा। पात्रवधेन नियोज्यो। भूमिनिपात विवर्तितो: शिरस्स्थाडन स्वकेशाग्रोटनादिका नानाप्रकारारेचेष्टा विसंस्थुला वर्णनीया। अत्र चोत्सृष्टिकाछे वक्तमानां मध्यममानां च बहुविधघ्यसनपातेन वैरसादितानां महाविपचापि स्वविपादितां स्तिरापां च पुनरग्नितितर्द्धयते इत्यविधादे चिंतस्थैयं च विधातुं स्त्रोपरिंदधितवहुलं वृत्तं व्युत्पादित इति ॥ [२४] ६९ ॥

ईहामृग: सर्वीशयदृशो दिव्येशो हृप्तमानव: । एकादशरपकस्तु ह्यग्रामुख्योऽपि नृपात्मवान् ॥ [२४] ६०॥

अत्र [उत्सृष्टिकाछूं] करने योग्य द्रव्य श्रातोका निर्देश करते हैं । इसमे मुख्य रपसे स्त्रियोंोंके विलाप तथा [स्त्तारकी प्रतित्यता हु श्रमयत्नादिके प्रतिपादन द्वारा] वैरायकी जनक बातोका वर्णन करना चाहिए । पुरुषों को संग्रामते निवृत्ति ग्रोर [शुप्ततन उरस्ताडन केशानोस्तादि रूप] नाना प्रकारकी दिश्शृ्ट चेष्टाएं प्रदर्शित करनी चाहिए ॥[२४] ६९ ॥ उत्सृष्टिकाछूं जिन [बालों] कें सुननेसे वीराग्य उत्पन्न होता है इस प्रकारको वीराग्यजनक बातों [निवद्ध करनी चाहिए । देवको उपालम्भ देना, श्रातद्रोहिन्दा, ग्रोर अनुशोचन रूप स्त्रियोंका विलाप, प्रघुर मानाभिमान वधैं, दन्ध, लाडन श्रादि रूप संग्राम च्यापारोंसे उपरत पात्रके रूपमे विसलाना चाहिए । भूमपर लोटना, द्दांतों पीसना, सिर फोडना, घाल नोचना, श्रादि नाना प्रकारको विस्शृ्ट्ट चेष्टाएं [स्त्रियोंोंको] दिसलानी चाहिए । इस उत्सृष्टिकाछूं नाना प्रकारकी यार्पातिद्योके ग्रा पड़नेसे, हु श्रोसे पोड़ित, किंतु महान् विपत्तिकालमें भो म घबड़ाने वाले, एैव स्थिर रहने वाले, उत्तम तथा मध्यमलोगोंको किर दुबारा उन्मत्त होतों है इसलिए [मनुष्यको हु श्रममें पड़ जानेपर भो] घबड़ाना नहीं चराहिए तथा चित्तको स्थिर रखना चाहिए इस बातको शिक्षा देनेके लिए [प्रथवा विपत्तिप्रसंग पुरुषोंमें यें तया उत्साह प्रदान करवनेके लिऐ] स्त्रियोंोंके विलापादिते पूर्‌षां क्या प्रकृत की जाती है ॥ [२४] ६० ॥ ११ एकादश रूप मेद 'ईहामृग' के लक्षण— अ्रत्र 'ईहामृग' के लक्षएं भ्रादि करनेका प्रवसर [प्राप्त] है—

वीर्यावस्था युतो, दिव्यो नायक, तथा ह्यसौ मानवोत्तम: । प्रयवा चार श्रद्धो वाला प्रस्तिद प्रयवा ग्रप्रसिद्ध कथापर श्राश्रित—[२४] ६० ।

ग्रंथ १३८—वीर्यावस्थायुक्त, दिव्य नायक, तथा ह्यसौ मानवोत्तमः, एक पढ़ प्रयवा चार श्रद्धो वाला प्रस्तिद प्रयवा ग्रप्रसिद्ध कथापर श्राश्रित—

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दिव्यस्त्रीहेतुसंग्रामो निर्विश्वास: सविडंबर: । स्वप्नहार-भेद-दण्ड: प्रायो द्वादशनायक: ॥ [२६] ६१ ॥

ईहा चेष्टा मुग्धयोरन्योन्यं श्रयेत इति ईहास्पृहा । सखी वीच्यते द्वयोर्हेतुर्द्विभर्वतंत । द्वयेशो दिव्यनायक । इत्थमुदिता मानराः सत्पुरुपप्राप्तिगग्यत्न । एकैक-प्रसुरत्ना चेत् । अतथे च वृत्तम्चेप्ट-गर्भितामोहुरोधिना श्लाघ्यवृत्तो । प्रभासकं । एकद्रयेऽप्यादर्शयेऽमेय चरितम । चतुर्दशने तु चतुर्दशिनिर्दशयम् । स्यातांग्यां प्रसिद्ध-प्रसिद्धौ यदिति वृत्तं तद्वान् । प्रशंमायां च मनुजंतं चतुर्दशने परस्परादर्शनद्विति-वृत्तं न तु ममयभारवधमम्यधम । दिव्यस्त्रीहेतु संग्रामो यत्र । श्रयत हि दिव्या नायिका मग्नियमानि च्छन्ती प्रतिनायकेऽपहरति । ततस्तन्निशम्य तत्रैव नायक-प्रतिनायकयोः संग्रामो निपतति । निर्गतो प्रियाम परस्मिन् प्रत्ययो यम्मान् । श्रयनेगार्थमपरंपराधातो विद्धुनर, तनुयुक्त । स्त्रीनिमित्तमपद्धार-भेद-दण्डा यत्र । तं च यथासम्भवं स्त्रीविषया श्रन्य-निपया वा । भेद सामदानादिना विरलंपोपपादम् । दृश्टो बन्धादि । प्रायोमदर्शनं नायिकानयनाधिकार्य्याधम् ॥ [२५-२६] ६०-६१ ॥

दिव्य स्त्रोके कारण जिसमें तपामक्ता प्रदान किया जाय, परस्पर विवाद रहित, परस्पर स्पर्धादि रूप [विद्वारो] से युक्त, द्विप्रोंके प्राहरक, भेद श्रोर दण्डका प्रकाश, ग्रोट प्राप्त यारह नायकको धाता [रक्षक भेद] ईहास्पृहा होता है ॥ [२५-२६] ६१ ॥

जिसमे 'रुष' के समान वेग हृयोशे लिए 'ईहा' प्रयात्न चेष्टा होती हे वह 'ईहास्पृहा' [पहलाता] है [यह 'ईहास्पृहा नामक निर्वचन ह्रुम] । यह ध्वाहारदि हप घोेष्टद्रोंसे युक्त होता है । दिव्य नापक तथा इस प्रयात्न उदित मानप्राथ जिसमें हो । एक श्रयवा चार प्रसकु याता हो । इसा विषयमें [प्रयात्न भ्रहोंकी सफलपाइ विषयम] कयाभाग के सक्षेप प्रयवा विस्तारका श्रनुसार करनेवासे ध्रविप्रों इच्छा हो प्रमाए है [कवि ग्राल्यान वरतुके सक्षप विस्तार श्रनुसार सत्प्रविप्रों इच्छा होने यागी] । एक ग्रद्रु होनेपर एक दिनमे समास होने माना हो चारदिन रसनेमें चाग्दिन होने यागी कया होनी चागिए । प्रसिद्ध प्रयवा श्रप्रतिद्ध जो यथा, उसपर ग्राधारित । इसमे प्रसासा प्रययं सत्पुरू प्रत्यय है । इसलिए चार ग्रद्रु होनेपर उनको कया परस्पर समृद्ध होनी चािहए, समयकारके समान प्रसस्बद्ध नहीं । ['समयकार' के तक्षणा मे उसका ग्रद्रुको स्वयं 'निष्टितार्थ' कहा था । 'ईहास्पृहा' के ग्रद्रु उससे भिन्न परस्पर समृद्ध होते हैं] ।

दिव्य स्त्र्रीके कारण जिसमें सग्राम हो । इसमे नायकको [प्रतिनायकको] न चाहने वाली दिव्य स्त्रीको प्रतिनायक [बलात्] प्रपहररप करता है । ग्रोर उसके कारण नायक तथा प्रतिनायककमे सग्राम दिसलाया जाता है । जिसमे दूसरेकी विश्वास न रहा हो । ग्राद्वेग, धनयं, परस्पर स्पर्धा श्रादि विडवर' [कहलाते] हैं । उनसे मुक्त स्त्र्रीके कारण जिसमें प्रयास श्रन्यके विषयमे प्रपहररप भेद श्रोर दण्ड होते हैं । वे प्रयासम्भव स्त्र्री के विपयमे यत्नया श्रन्यके विपयमे होते हैं । भेद प्रयात्न् साम या दानादिक द्वारा फूट डालना । दण्ड श्रप्रतिष्ठु बन्ध प्रादि । प्राप्' पदका प्रपहररप [सत्यपाके] मूनर्त्र ग्रोर प्रधिष्ठित्यके सूचित करनेके लिए है ॥ [२५-२६] ६०-६१ ॥

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अथ कृतयोरोपमुपदिशति— च्योजेनात्र रसाभावो बधानने शृङ्गारिसङ्गा । व्यायोगोक्ता रसा: सन्धि-वृत्तयोरनुचिता रति: ॥ [२७] ६२ ॥

बधानस्ने समरान्तरं भाविवधयोग्ये शरीरेरिङ्ग व्याजेन न पलायनादिना रसाभावो विधेय: । श्याम्तां साज्ञात नेष्ये रङ्गे न वर्गान्तराय: । रसा वीर-रौद्राद्या दीक्षा । सन्ध्ययो गर्भीयमर्शयर्जितास्त्रय: । वृत्तयश्च कैशिकीहीना तिस्र पथि 'सन्धि-वृत्तस्य:' इतीसरतरस्योगो द्वन्द्व: । शृङ्गारुचता रति रत्याभास: । स च प्रतिनायकस्य निप्रे-मस्त्रोपिपयत्वादिति ॥ [२७] ६२ ॥

[सूत्र १४०]—सर्वस्वामि-रसा वोयोस् त्वेकाङ्का दृश्ये कपात्त्रिका । मुखनिर्वाहिसन्धि: स्यात्, सर्वाङ्गोपोपयोगिनी ॥ [२८] ६३ ॥

अत्र [उत्सृष्टिकाङ्कदृशं] करने योग्य रूप बातोको कहते हैं— [सूत्र १३९]—इसमें बधानसने व्यक्तिके [पलायन श्रादिके] बहानेसे युद्धकी समाप्ति तथा व्यायोगमें कहे हुए [वीर रौद्रादि दोष] रस सन्धि एवं [कैशिकीको छोड़कर भारती, सात्वती, आरभटी प्रादि] तीन ही वृत्तियाँ होनी चाहिए । तथाव् व्यायोगमें कहे हुए [वीर रौद्रादि दोष] रस सन्धि एवं [कैशिकीको छोड़कर भारती, सात्वती, आरभटी प्रादि] तीन ही वृत्तियाँ होनी चाहिए [होनी चाहिए], तथा एवं श्रृङ्गारित रतिकी बघानं होना चाहिए ॥ [२७] ६२ ॥ बधानस्न म्रयान्त वादमें क्षोभ्र ही जिसकत्ला बघ होने चाला हो इस प्रकारके श्यारेवीं प्रयोत् व्यक्तिके पलायन श्रादिके बहानेसे बहानेसे इसमें युद्धकी समाप्ति दिखलानी चाझिए । श्यार्योत् साक्षात् [बघ दिखलाए जनेकी] की बात तो दूर रहो नेपथ्यमें भी बघवध वधसन्त नहीं करना चाझिए । [व्यायोगोक्त] रस श्र्यार्यात् श्योर रौद्रादि दोष रस [होने चाहिए] । गर्मों श्योर श्यद्-मुखनिर्वाहिसन्धिप्रोंको छोड़कर [मुख, प्रतिमुख तथा निर्वहणाद्रा रूप तीन] सन्धि [होने चाहिए] । श्योर कंशिकीकों छोडकर [भारती, सात्वती, श्यारभटी श्रादि] तीन ही वृत्तियाँ होनी चाझिए । 'सन्धि-वृत्तस्य' इस पदमे इतरतरस्योगमें द्वन्द्व समास है श्रृङ्गारित रति श्यार्यात् रत्याभास-चसन्त होना चाझिए श्योर वह् प्रतिनायकके मनोगुरक्त श्यो-रिपपक [रति प्रदर्शान] होनेसे होता है ॥[२७] ६२ ॥ द्वादश रूपक भेद 'वीथी'का लत्त्य— ग्रथ क्रमप्राप्त 'वीथी' का लक्षण करते हैं—

[सूत्र १४०]—[उत्तम, मध्यम श्र्रथम] सब प्रकारके नायकोंसे श्योर समस्त रसोंसे युक्त, एक श्रङ्क श्योर एक या दो पात्रों वाला, मुख तथा निर्वहणाद्र [रूप दो] सन्धियोंसे युक्त, [अपने श्रभिप्रेत श्रङ्को द्वारा नाटक श्रादि] समस्त रूपकोंकी उपकारिक्श्री 'वीथी' [कहलाती] है ।। [२८] ६३ ।।

['सर्वाङ्गोपोपयोगिनी] यह् बात नाटकादि सभी रूपकोंके विपयमें कही गई है । [प्रयोत् वाथोमें कहे जाननेवाले तरह श्रङ्क नाटक सहित सभी रूपकोंमें होते हैं। वृत्तप्रक्रमादिसंमितस्यादर्शविधानं वक्ष्यति—

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उत्तमाधममध्याभिर्-युक्ता प्रकृताभिसंध्रिधा । एकहायां द्विहायां वा सा द्वीथीत्यभिसंधिता ॥ इति ॥

इसमें कहे हुए प्रयोदशा ग्रन्थोंके नाटकादि सारे रूपकोंमें जाननेसे द्वीथीके समस्त होनेके कारण यह 'द्वीथी' कहलाती है । [उत्तम, मध्यम, अधम रूप सारे स्वामी ग्रन्थतु नायक [इसमें होते हैं] । प्रथृद्वारग्रादि सारे रस एक-एक करके पर्याप्तपने इसमें वत्पन्न किए जाते हैं । जैसी कि कहने वहा है— उत्तम, श्रथम श्रोर मध्यम तीनों प्रकारके पात्रोंसे युक्त एक पात्रके द्वारा सम्पादित [एक भेद] 'द्वीयो' कहलाती है । श्रांकुक जो प्रथम प्रकृतिके नायक नहीं मानना चाहते हैं । वे भारा, प्रहसन ग्रादि हास्यरसप्रधान [एककों] में विट श्रादि [प्रथम पात्रों] को नायक [वनाने] का प्रतिपादन करके इस्से श्रृङ्गार प वचन हो सकते हैं ? [प्रयातत श्रांकुक एक श्रोत्र तो यह कहते हैं कि प्रथम प्रकृतिका नायक नहीं होना चाहिए । दूसरो श्रोत्र भारा प्रहसन ग्रादिमें प्रथम प्रकृतिके विटादिको हो नायक वनानेका विधान करते हैं । ये दोनों बातें परस्पर विरोेध हैं इसलिये उनको कथन उपादेय नहीं हो सकता है । इसीलिए वहीं द्वीयों में प्रथम प्रकृतिके भी नायक होने की बात कहो गई है वह प्रयुचित नहीं है । 'एकाका' इस पदसे एक दिनमें समात होनेवाले श्राश्रयान-भागको हो इसमें यत्पन्न होना चाहिए यह दिखलाया है । उक्ति-प्रयुक्ति द्वारा वंचित्रयुक्त दो पात्रोंकि, प्रयया श्राकाराभिप्रतिका प्रवतलञ्च करने वाले एक हो पात्रसे युक्त 'बीचो' कवि ग्रपनी इच्छाके अनु सार वन सकता है । मुख तथा सन्धिहीनता नाटक दो ही संज्ञ्ञा इसमें होते हैं । वक्रोक्तिप्रादिसे युक्त प्रयोदशा द्वोयपद्धतोंके नाटकादि [समस्त] रूपकोंमें उपयुक्त होनेसे उन सबकी उपयोगिनी प्रयाप्त वंचित्र्यसम्पादिका [द्वोथी] होती है । इसीलिए सवके मन्तमें उसक। लेशरा किया गया है । सहृदयोंकी प्रकृत्तिके वक्रोक्तिप्रसङ्गमें मुक्त होनेके कारण हास्य तथा श्टृङ्गारको सूचनामात्र होनेसे इसको कश्चिद्वीरसहित होना जा सकता है । इसमें उत्तम, मध्यम तथा अधम नायकोंके । [मानी प्रपञ्चो] हचिके प्रयुक्तल] अनेक प्रकारके वश्नाति-भेदोंसे [सामाजिकको] मान

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स्थास्या श्रृङ्गार्यभिधीयन्ते— व्याहारोद्घिवलं गण्ड: प्रपञ्चास्त्रिगलं छतम् । ग्रसनप्रलापो वाक्केलो नालिका मृदवं मतम् ॥ [२६] ८४ ॥ उद्घात्याकवलगिते श्रथावस्पन्दितं स्मृतम् । भारतीयृत्तिषु वर्त्तोऽनि वोध्यड्र्गनि त्रयोदश ॥ [३०] ८५ ॥ गतानि त्रयोदश वीथ्यड्र्गानि विविधवक्रोक्त्यादिरुपतयाॅद् भारत्यां वृत्तौ वर्त्तनशीलानि । श्रृत पत्र वीथ्यप्रयेपमझानां श्रृङ्गीभूता भारतोवृत्त्येकदेशः ॥ [२६-३०] ८४-८५ ॥

(९) तत्र प्रथमं व्याहारः— [सूत्र १४२]—ग्रन्थार्था भाविहर्थैर्वा व्याहारो हस्तलेलागोः । ग्रन्थ्योऽर्थ: प्रयोजनं यस्या:, भाविनी वा भविष्यन्ती हस्तप्रेक्ष्यशितविपययोऽ्र्यो यस्या: सा । हस्ते लेशप्रधाना गो-ञ्योपी । विविधोऽर्थ श्राधीयतेऽन्येति व्याहारः । तत्रान्यार्थो यथा मालविकाग्निमित्रे हास्यप्रयोगावसाने मालविका निर्गन्तु- मिच्छति । [सूत्र १४३]—७. व्याहार, ८. प्रधिवल, ९. गण्ड, १०. प्रपञ्चस्त्रिगल, ११. छतम्, १२. ग्रसनप्रलाप, १३. वाक्केलो, १४. नालिका, १५. मृदवं, १६. उद्घात्यक, १७. श्रथावस्पन्दितं भारतीवृत्तिषु वर्त्तोऽनि होने वाले ये तेरह वोध्यङ्गोंके ग्रञ्ज्ञ हैं ॥ [२६-३०] ८४-८५ ॥ (९) व्याहार नामक प्रथम वोध्यङ्ग— उन [तेरह वोध्यङ्गों] मेंसे पहला 'व्याहार' है [उसका लक्षण निम्न प्रकार करते हैं]— [सूत्र १४२]—[कथित प्रयोजनसे] ग्रन्थ प्रयोजन वाली ग्रन्थाॅर्थ [कथनसे] या भविष्यक [प्रयोजन] प्रयोजनसे हस्तके लेशसे युक्त कहो गयी वाक्यो 'व्याहार' [कहलातीं] है । [सामान्य कथित प्रयोजनसे] ग्रन्थ ग्रर्थ, प्रर्थात प्रयोजन जिसका हो श्रयवा भाविनी प्रर्थात् भाविनो प्रर्थन्त् प्राङ्गे होने वाली हस्ति प्रयथन्त् दिखलाए जाने वाला द्रथ्यं जिसका विधय हो, इस प्रकार को, हस्तयके सम्पर्कसे युक्त वाक्यो, [व्याहार कहलातीं] है । [व्याहार शब्दका निर्वञ्चन दिखलाते हैं]—जिस [वाक्यो] के द्वारा विविध प्रयोकों ग्राहरशा किया जाता है वह व्याहार [कहलाती] है :

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"विदूषक-भोदि ! चिह दाव, विसुमरिदं खु वो किंचि तं ताव पुद्धिस्सं । [भवति ! तिप्पठ तावद विमृतं सतु च किंचिन्तन तावन् प्रद्यामि] । गीतदास-यत्ते ! तिप्पठ तावदुपेशविशुद्धी गमिप्यसि । [मालविका स्थिता] । धारिणी-गौतमवचसां पि श्रज्जो हियए पमाणीकरेदि । [गौतमवचनमरपि श्रायो हृदये प्रमाणीकरोति] । गीतदास-देवि मो भवेम । देवप्रत्ययान् सम्भावयते सूक्ष्मदर्शी गतिम् । पश्य-मन्दोदयमन्दतां याति संसर्गेऽपि विपश्चित् । पद्मश्चिह्नः फलस्येव निरुपध्वाऽविलं पद्य ॥ [विदूपकं विलोक्य] कि द्विक्षितमार्यस्य ? विदूषक-पठमे दाव पेक्खरगे पुण्णद । पच्छा जो मे कम्मभेदो लक्खिदो तं भइस्सं । [प्रथमं तावन् प्रेक्ष्याकान् पुण्णद, पश्चाद वो मया कम्मभेदो लक्षितम्तं भइप्यामि] । गीतदास-भगवति ! गुणो वा दोसो वा यथादृष्टमभिधीयताम् । परिणाजिका-यथा मे दृष्टं तथा सर्वमनुब्रवीमि । गीतदास-देवि करं मव्वते ? विदूषक-ग्राप जरस ठहरिए । ग्राप कुछ भूल गई हैं उसके विषय मे पूछता हं । गीतदास-[मालविका का नृत्य-शिक्षक गुरु है, वह कहता है] वत्ते । ठहर जाम्रो । [विदूपक जो कुछ पूछना चाहता है उसका उत्तर देकर] उपदेशकी शुद्धता हो जानेपर जाना । [मालविका हक जाती है] : धारिणी-[राजाको प्रधान रानी है वह मालविकाका अधिक देख रजाके सामने रहना पसन्द नहीं करती है इसलिए कहती है कि] या इस [गौतम] मूर्ख [विदूपक] के वचनको भो श्रायं अपने हृदयमे प्रमाण मानेंगे । [प्रत्यात इस भूलंकी बात ध्यान देने योग्य नही है] । गीतदास-देवि ! ऐसा मत कहिए । महाराजके सम्बन्धमे [परिणम विदूपकं भो ग्रयककी बारोकियंको समभ सकनेकी क्षमता हो सकती है । इसलिए] गौतम सूक्ष्मदर्शी हो सकता है । देखिए-- विद्यानुके ससगंसे मूलं भो विद्रत्ताखो प्राप्त कर सक्खता है । [जलकी] मलिनताखो दूर करने वाले [कतकवृक्षके] फलके ससगंसे जेसे मलिन जल भो शुद्ध हो जाता है । [विदूपक्श्रो देखकर] ग्राप क्या कहना चाहते हैं ? विदूपक-पहिले [जिसको इस नृत्यकी परिक्षामे निर्णायक नियत किया गया है उन] प्रेक्षक-महोदयसे पुछो, उसके बाद मेने जो कम्मो देखेरे है उसको बतसाऊंगा । गीतदास-[परिनाजिका] भगवति ! [इस मालविकाके नृत्यमे] गुणा या दोप जो भापने देखा हो उसे कहिए । परिणाजिका-जहां तक मे समभती हुं सह कुछ ठीक है । गीतदास-[राजासे] महाराजकी क्या सम्मति है ?

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राजा—अयमपि रचपतिं प्रति शाथिल्याभिमाना: संहृताः । गृदादासः—देव ! श्रयश नर्तव्यिताडसिमं । धारिणी—दिट्टया पंक्वगगाराधनेया [गृदादासमवलोक्य] श्राज्जो वडद्धादि । गृदादासः—देवीपरिरम्भो मे श्रृद्धहेतुः । [विदूपकं विलोक्य] वदेदानीं, यत्नु ते मनः करोमि । विदूपकः—पढमोगदेसदंसणो पढमं देंभणासत्त पूआ इच्छिदव्वा, सा तं लंधिदा । [प्रथमोपदेशदर्शनेन प्रथमं त्राधाप्याम्य पूजा एषन्या, सा त्वया लंघिता ] परित्राजिका—श्रहो ! प्रयोगाभ्यन्तरः प्रश्नः ! [सर्वे प्रहसन्ति मालवी सीमंत करोति] १३ इत्ययं नायकस्य विश्रबधानिकादर्शनार्थ प्रयुक्तो हास्यलेशकारितवाद् वचाहारः ।

राजा—हमारे भी अपने पक्षमें [प्रथमतः मालविकाकी प्रतिदिन्द्धिदेवे विपयमें] प्रभिमान नहीं रहा [मालविकाको जीत हुई है] । गृदादास—देव ! श्राज में नर्तव्यिता [सच्चा नृत्य-निदेशक कहलानेवाला प्राधिकारी] हूँ । [ब्योकि आप मेरे कार्य से सन्तुष्ट हुये हैं] । धारिणी—सुभाग्यसे प्रेक्षक [प्रथमतः निअापक] को प्रसन्न करके श्रापकी [वृद्धि] विजय हो रही है । गृदादास—ग्रापका सेवक होना हो मेरी वृद्धिका कारण है । [विदूपकको देखकर] श्रच्द्र, श्रब तुम्हारा मन क्या रहता है सो बताओ ? विदूपक—पहली बार उपदेशका प्रदर्शन करते समय [प्रथमतः अपनी कलाकी परोक्षा देते समय] पहिले श्रागे श्रावेवताकी पूजा करनी चाहिए सो श्रापने नहीं की है । परित्राजिका—श्रोहो ! प्रयोगकी वड़ी वारोकोका प्रश्न है । [सब लोग हँसने लगते हैं । मालवीका मुस्कराती है ]" यह नायक [राजा] को विश्रब्ध रूपसे [प्रधिक काल तक] मायिका को दिखलाने [हप ग्रन्थार्थ] के लिए [विदूपक द्वारा] तात्कालिक हास्यकारो [वचन महर या] वयाहार [का उदाहररण] है ।

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राजा—उद्भामोत्तकतकिं विपाटहुरनचि प्रारचधजम्मभां ल्ख्यादायासं श्वसनोद्गमेरविरलैरातन्वतीभारमन । "श्रचोध्यानलतामिमां समदनां नारीमिवान्यां ध्रुवं पश्यन् कोपविगलचुति मुखं देव्या करिष्याम्यहं ॥" श्रच राज्ञा वासवदत्तां प्रति भाव्यर्थदर्शनं हृाम्येनोक्तम् । श्रच ये तु वर्तमानप्रत्यर्थभावचकं हृामेनेशं वचो राज्ञामिझ्वान्ति ।

यथा मृच्छकटक्या विदूषको गासीकायो वसत्सेनाया गृहं प्रविशन वसन्तसेनाया मातरं पृच्छति । "विदूषक —का एसा घंधुला ? [का एसा वंधुला ?] चेटी—एसा श्रजजुयापे जइएव्वो श्रत्तिया । [एपा आर्याया जननी श्रत्तिका] विदूषक —जइ मरेए सो सीयालसहस्ससगं पज्जत्तिआ । श्रथ कि एद पवेसिय' दुरसोहा निम्मविदा ? श्राढ़उ उक्संदवेप्प पवेसिदा ? वा श्रयं निम्न प्रकार है---- "प्रचुर उत्कलिकाभो [नारो पक्षमें प्रियतमिलनफी उचकंठाओ श्रौर स्ततापक्ष्मे कलियों] से परिपूर्णां, [नारो पक्षमें प्रियचयोगके कारनां श्रैर ततापक्ष्मे फूलोसे लदी होनेके कारनां] पवलकार्न-तवालो, जम्भायुक्त [श्रेर 'प्रारचधजम्मभा' मे 'जुम्भा' पदसे नारी पक्ष्मे जम्भाई तथा लतापक्ष्मे कुतुसोका विकास श्रर्य लेना चारहिए ] श्रैर निरंतर होनेवाले वायुके भोंकेंसे [नारो पक्ष्मे 'इवसनोद्गमेर' का श्रर्थ दीर्घं निःश्वास श्रैर लतापक्ष्मे इसके श्रर्य वायुके भोंके लेना साहिए] से अपने श्रापास [ नारो पक्ष्मे अपने हृदय तथा लतापक्ष्मे अपने कुसपन ] को प्रकटित फरतो हुई अन्य नारीके समान [तुल्य विशेषणोंवालो] इस उद्यानलताको देखता ह्र्मा श्राज में निश्चय हो देवो [महारानो] के मुखको क्रोधसे श्रारातवरोंयां कर दूंगा ।" इसमें राजाने वासवदत्ता के प्रति भावो श्रर्थका दरशन [श्रर्थात श्रागे होनेवाली घटना] को हृास्यके रूप्में कहा है । [वस्तुतः यह भ्रविष्यद् रूप 'ध्याहार' नामक बोध्यकका चर्-

हर्सप है ] । अन्य लोग तो घटनमान प्रत्यक्ष श्र्यंकें बोचक हास्यमय वचनको च्याहार कहते हैं । जैसे मृच्छकटिकमे वसन्तसेना केदारके घरमें प्रविष्ट होते समय वसन्तसेनाची माताको देखकर विदूषक पूछता है— ' विदूषक—यह [रगुला] रड्डो कौन है ? चेटी—यह आर्या [वसन्तसेना] की माता श्रत्तिका है । विदूषक—यदि [यह] मरे तो हजारों श्रृंगालोकेइए [मोजनार्थ] पर्याप्त है । श्रोर [यह तो वतनाग्रो कि] यथा इहसो [मकानके भोतर] प्रविष्ट करनेके बाद द्वारके द्वोमार्गो निर्माण करवाया था श्रय श्रयया उपरसे उठाकर भोतर लाये थे [यप्योति यह इतनी श्रधिक मोटी

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मिथः परस्परं जल्पे शक्त्य-प्रत्ययिके क्रियाभागो स्वपक्षस्य स्वाभ्युपगमस्य परस्परप्रज्ञोपजीवनवचनात्। स्थापनासुधटिततत्त्वं क्रियतां यत्नस्तदाधिवलसम्बन्ध्यपार्षद्चलम्॥

चेटी—ग्राम्य ! इतना ही [मोटा इनको] मत समझो। माताजी [प्राज्ञकत] चारुधिक [चौथे दिन प्राणेवाले ज्वर] से पोड़ित है [इसलिए दुवली हो गई है]। विदूषक—हे भगवन् चारुधिक ! [यदि श्रापकी कृपासे यह इतनी मोटी है तो फिर मुख ब्राह्मणके ऊपरभी कृपा कीजिए। यह वतंमान प्रत्यक्ष श्र्र्रयङ्कर बोधक हास्यकर वचन है। 'विदूषक—मेरे एक सखाको दूर करो। [यह बतात्रम्रो कि] मेरी ब्राह्मणपुत्री [प्रर्था मेरी पत्नोको] स्यूलकुट्टिन्री नामकी माता जो पाटलिपुत्रे रहती है वह क्या तुम हों, व्यर्थ कोई प्रोर है ? इत्यादि [भी वर्तमान प्रत्यक्ष प्र्रयं विप्रपक् हास्यकर वचन होनेसे इस प्रकारे व्याहारका उदाहरण है]

॥ [३१] ६६ ॥

(२) 'ग्र्राधिवल' नामक द्वितीय योग्यपद— प्रथ ग्राधिबल' [नामक द्वितीय विशिष्टपदका लक्षण ग्रादि करते हैं]— [सूत्र १४३]—परस्पर वार्तालापमें चलतूशक अपने पक्षकी स्थापना करना 'ग्राधिवल' [कहलाता] है। [३१] ६६ । 'मिथः' श्रर्थात परस्पर,'जल्पे' श्रर्थात् उक्ति प्रत्युक्तिके क्रमसे [कथनोपकथनके करतेत्पे] अपने पक्ष श्र्र्यात् श्रपने सिद्धान्तका परस्पर सुधटिका प्रथलसन कर जो ह्यापन ग्रर्थात पुष्टि- युक्ततत्वं सिद्ध किया जाता है यह ग्र्रधिकं वलका सम्वन्ध होनेसे 'ग्राधिबल' [कहलाता] है ।

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हा भ्रातलक्ष्मण ! परित्रायस्व मा परित्रायम् । इति श्रुत्वा शूर्पणखा मोहंसुपगता । तस्मा च भ्र्रातृभ्यां लक्ष्मणेन च्रार्य ! ममाश्वसिद्धि समार्गसिद्धि । शूर्पणखा-ग्राक्रन्दी दन्मील्य समरोेध] श्रा श्रायैय । श्रहो ! द्राश्रि सि तुम निम्ससो निग्रिध्यो य चिच्छु द्रा भादुसिप्रोहो, म्व ग्राम इक्ष्वाकुकुलसभवेया मह्हारक्तिप्ण भविय म्व तण नसिय ? रे भष्रामि म्रककन्दतो सत्रृ वि न उद्वेकपीरदि किं पुत्रे श्र्रजउत्तो ?

श्रथ श्रानायँ । श्रभ्राप तुं तिट्टस्सेव । श्रहो इदानींभासि तु न्रुशसो निर्ऋृृृनक्र तिप्ठतु तावदू भ्रातृम्नेह, कर्थ नाम इद्वाकुकुलसम्भवेन मह्हातात्रियेया भूतवैच त्वया व्यनसितं ? ननु भष्राभि म्र-्ममाक्रन्दन शत्रुरपि नोपेध्यत किं पुत्रार्यपुत्र । इति मन्ञ्त्रतम्]।

लक्ष्मण ! नतु त्वद्र्य म्र श्र्रार्येया स्थापित्रोग्भि । शूर्पणखा-कुमार ! गप मम श्र्रस्थो कदो हेभि । पर्थ म्र श्रहं परित्र्रिकिदा हेभि । ता म न्रधा श्र्रन्त न्र्रेय दे त्र्रशिप्ट श्रमिप्र्राप ल्क्र्खेभि । इत्यादि । कुमार ! गप ममार्थ कृतो भवति ! ग्य्य च्चाह परिरक्षित्ता भष्राभि ? तत्सर्ने-यान्न्यमेव टेडनिट्रमभिप्र्रायं लचयामि । इति संम्कृतम् ।

जैसे कृत्यारावलने प्रथम भ्रद्रुमे सीताक्षा देव धारसा किए हुए शूर्पणखाकु साथ सयादेमे [प्रथयात् सवादके श्रवसरपर] नेपथ्यस्मे-"हे भाई लक्ष्मण ! मुभे वचाग्रो वचाग्रो । [ऐसा सुनकर शूर्पणखा मूर्छित हो जाती है] श्रोर उसका मूर्छित होना जाननेपर सकल्मणा [कहते हैं]—ग्रापं ! घ्रप धारसा करो । शूर्पणखा—[ग्राहें खोलकर कोधपूर्वकु महंतो है] म्ररे ! तु म्रहं कू्र श्रोर निलज्ज [प्रतीत होते] हो । भाईके स्नेहको जात जाने भी दो, तो भी इक्ष्वाहुकुलमे उतपन महान् स्रातिप्र हा|कृ तु म्ने यह कंसे किय ? [ग्रव तक तुम गए क्यों नहीं ?] में बहतो हू कि इस प्रकारु विलरनेपर द्रायको भी उपेक्षा नहों की जा सकती है [दश्श्रृणो रक्षाके लिए भी तुरम्न जाना चाहिए] फिर ग्रापपुत्रको तो बात हो क्या है ? लक्ष्मण—ग्रापं ! ग्रापको हो रक्षाके लिए मु भ्राप [रामचंृद्र]ने नियुक्त किय है । शूर्पणखा—कुमार ! क्या इस प्रकार मेरा कम होगा । श्रोर क्यया इस प्रकार मेरी रक्षा होगो । इत्साए में तुमहारा कुछ श्रोर हो श्रनिट प्राभप्र्राप देतसि हूं । [जिसके कारए तुम भ्रमी तक नहों गए] ।

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"मयदेव ! मीतापहारमतितरा जुगुप्सतं लङ्कालोक । रामप-[मात्रेपम्] सीतापहारमतितरां जुगुप्सते लङ्कालोक ? मय-[मभयम्] प्रथ निम् । रामप-[सावहेलम्]— न्यविविक्तपथ प्रेम्णा वाञ्छानुरागजो जडो, वदतु व्रीडितामेदंतीवन्थो यथाप्रतिभं जनः । मम पुत्रिय सीता राज्य सुरगं विमव प्रिय, हृदयमसनो मित्रे मन्त्री रतिर्यथेतिमत्सरः ॥ [पुनः सवेतनं] ग्राह्यः । किन्तु कामस्य पारमरकृतेऽस्मिन् लङ्कालोकम्य प्रचारचातुरी-वैमुख्यमुद्रावयामि— नस्या प्रेम ममेन वाइमनसयोगतीर्योंऽमन्यस्य चेद्, चैन्देन्हा नयनैःकटलेहलचघामरोदहभूमोः भवेन् । कापेय परिरम्य स प्रह्टयन्तुलुहेठमूयं हठानन्, निद्रिन् कौतमतमादधीत, ऋतवान् वेधास्तु मा रावणः ॥

'मय-[रावणहे] देव ! लङ्कावासी लोग सीताके अपहरणकी अत्यन्त निन्दा करते हैं । रावरण--[क्रोधपूर्वक] ग्राह्य ! क्या लङ्कावासी लोग सीताके अपहरणकी अत्यन्त निन्दा करते हैं ? मय-[इरताहुए] श्रीर क्या । रावरण-[ग्रनादर पूर्वक]— प्रभुमागकों न समभनेवाले, प्रभुरागको पीडाका अनुभव करनेमें असमर्थ श्रीर प्रियजन को मेरीते रहित, मूर्ख लोग अपनी समभके अनुसार चाहे जो कहें । पर मेरे लिए तो यह सीता ही राज्य है, सुःख, चैनव, प्रिय, हृदय, प्राणा, मित्र, मन्त्री, धर्मं श्रीर श्रानन्द सब कुछ है । [फिर क्षदपूर्वक कहता है] ग्राह्य ! इन पारमर-प्रकृति वाले लङ्कावासियोंकी श्रविचार-शीलताको क्या कहूँ— यदि वारगी और मनको सोमाकों पार वर जाने वाले मेरे [प्रेमके] समान किसी श्रोरका केवल देनोसे श्रारब्धान करने योग्य ताकत्नकके अकुरको जमभूमिते सोताने [मेरा जैसा] प्रेम हो जाय तो वह निश्चय ही [उसको] जबरदस्ती पकडकर ग्रानन अतिरेक पूर्वक वानरता [वानरके समान काम-प्रवृत्ति] को प्रकट करता हुग्रा कुछ [प्रदभुत] काम व्यापार करने लगता । यह तो कहा कि विप्रतिपाते मुझे [व्रतघ्नत धैर्यशाली] रावरण बनाया है [कि मैंने अपने हृदयमे होने द्वोर उसके लिए इतना कष्ट उठानेपर भी श्री तक उसके साथ बलात्कार नहीं किया है] ।

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श्रमुद्य नतु रोदसीतिजयनिष्पादोप्सा सम्भ्रमय रससदना क इन नाम चेतसिडङ्गयम् ।

मय -[ग्रन्थकार्यों मन्दोदरी प्रति] वत्से । यथान्वितमभिधाने लड्ढ़ापतां किमतां परं विद्धापयामि । इति । 'केचितु 'ग्रन्योऽन्यनाक्याविक्योक्तिन गृप्नीयाज्जिञल भावेन' इति पटान्त । 'विदग्धयथाभेदादनन्वय मगदहीनतात्पत्ति' ॥ [३?] ६६ ॥

(३) ग्रथ गाढ -

[सूत्र १८४]—गणडोदकस्माद् यदन्यार्थे प्रस्तुतानुगतं वचः । ध्यान्याभिप्रायेणासुरमान प्रत्युक्तं प्रतिनचनतथाननुन्चारितमपी प्रतिनचनस्वप्तया ग्रमान्तेन यत् सम्भद्रं वचन, तद् दुश्शर्थगर्भेतत्नाद् दुःश्शोचितगरमेगाढ इन 'गाढ' । यथोत्तरचिरते—''राम -[सीतामवलोक्य]—इय गेहे लडमीरियममृत्नरर्तिनेयनयो—रमणमया रुपशोऽपुपि वहुलशचनद्ननरम् । श्रिये वाहु कष्ट शिरशरसम्मग्ना माकितनेनर् किमस्या न त्रेयो यदि परमसद्ग्नतु निरह ॥''

बलात् रमण करने लगे तो ध्यावार्घियोधने विजय करनेमें समर्थ भुझदण्ड चाले, उसके साथ पुध्द शृङ्गयाका रसिक कौन बाधक वन सकता है ? मय—[ग्रोर कोर्इ न मुन सके द्रात प्रचार्—ग्रपपायै—मन्दोदरीके प्रति वत्से] '[यह बात तो] लड्ढ़ापति ठोक हो कह रहे हैं तव मैं ग्रोर क्या कहूँ ?' यहां परस्पर सवादमें रावणाने युक्तिपूर्वके वलतें प्रवतताके साथ अपने पक्षकी स्थापन की है । प्रत यह 'श्रधिवल नामक द्वितीय वोधपदृकका उदाहरणया है । कोई लोग स्पर्धाके कारण एक दुसरेसे वढकर वातेंयपे कयनखपे 'प्रधिवल कहते हैँ । ग्रपमे भेद न होनेसे [ग्रपयान्त ग्रन्थत इसी पूर्व् लक्षण वाले श्रधिवलद्वे समान होनेसे] उसका भी ग्रतर्भाव इसी [पूर्वोक्त लक्षणमे] हो जाता है ॥ [३?] ६६ ॥

(३) गणड नामक तृतीय वोघपदृक्

३—प्रव गण्ड [नामक तृतीय वोघपदृक्ना लक्षणादि करते हैं]—[सूत्र १८४] ग्रन्थायंक होनेपर भी प्रस्तुततसे सम्भद्र हो जाने वाला जो वचन ग्रन्थ ग्राभिप्रायसे प्रवसमान वातर गया जो वचन प्रत्युत्तरके रूपमे उच्चारत म होनेपर भी, प्रकृतके साथ प्रत्युक्त स्वपन सदृशत हो जाता है वह, ग्रनिष्ट अर्थको ग्रपने भीतर लिए हुए होनेसे गन्डे खूनसे भरे हुए कोढके समान 'गण्ड' वहनाता है । जैसे उत्तर-रामचरितमे—''राम [सीताको देखकर]—यह [सीता] घरमे लस्स्मीके समान है यह नेत्रोंकि लिए श्रृमृततबो दानावापे समान [मृत्यु] है । इसका यह [सीतत्व] स्पर्धा द्वाराॅतमे प्रचुर चन्दन रससे लेपके समान है ।

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अथावधार्य प्रतीहारवचनमन्याभिनयाभिनयेन सनतरासंवचमा संघज्यसमानत्वाद् 'गडड:' । यथा वा बालिकावचिकतके—कंसः—रिपुसत्तायडु डग्रश्रृङ्गविकट. शैलेन्द्रकल्पो गृपः, समद्दीपसमुद्रजस्य पयस. शोभच्चमा पूतना । केशी वाजितनु खुरैरविघटयेदापन्न्मगान्मेदिनों, सायं वन्धुबिरेवमूर्जितगवलं कः कंसमास्कन्दति ।। [नेपथ्ये] जो शनन्नग्रो पासुक्खो शन्नेगा य वड्डिदच्चो महुप्पहवो । कहहो सो परउट्ठहो मारेइ न कोइ धारेइ ।। [योङ्नयत. प्रसूतोऽन्येन च वर्धितो मधुप्रभवः । कृच्छ्रात स परसुप्रे मारयति न कोऽपि न धारयति ]]

यह बहुत गलेमें जोतल ग्रोर चिचकना हार है । इसका कोईसा भाग प्रिय नहीं है ? [सब कुझ ही प्रिय है] । किन्तु यदि कुछ ग्रप्रिय है तो वह इसका वियोग है । [प्रविष्ट होकर] प्रतीहारी—देव ! उपस्थित है । राम—ग्ररे कौन ? [उपस्थित है] । प्रतीहारी—ग्रआपका ग्रासन परिचारक दुमुँह ! "इस [सवाद] मे ग्रनय प्रभिप्रायसे प्रयुक्त [प्रर्यांत दुमुँहबके प्रागमनकी सूचना देनेके श्रभिप्रायसे कहा गया] भी प्रतीहारोक्त वचन ['यदि परमसहायस्तु विरह.' इस] प्रस्तुत राम वचनके साथमे—ग्राथ ग्रहने ग्रथवा जैसे 'बालिकावचिकतक' मे --"कंस—बड़े बड़े सींगोसे भयङ्कर रिपु, महान् पर्वतके समान वृप, सातों द्वोपोंके समुद्रोंमे होनेवाले सारे जलको सोख जाननेमे समय पूतना, [ये सब मेरे सहायक हैं] । ग्रोर प्रदव—उपघारी केशव ग्रपने खुरोंसे पाताल तक भूमिको खोद डाल सकता है इस प्रकारके बन्युग्रो [सहायको] के कारण ग्रप्रत्यनत ग्राश्चर्यानोली कंसको कौन पराजित कर सकता है ? [नेपथ्ये] जो किसी दूसरेघे उत्पन्न हुग्रा ग्रोर किसी दूसरेघे पाला गया [प्रर्यांत देवकी—वसुदेव का पुत्र ग्रोर नन्दके द्वार पाला गया ऋद्धया] वह ग्रथयत्त बलशाली [परिपुष्ट, मघुसे उत्पन्न] माघव ऋद्धया मार रहा है ग्रोर कोई वचनानेवाला नहीं है ।" शैलेंद्रकल्पे [किस वंश]। पारखे द्वार पाहत वचनके साथ मिल जानेसे 'गडड' [नामक वंशघरका नतनक वचन ग्रंढ] का उदाहरण वन गया है । नेपथ्य—पठित ग्रनिटायं सूचक वचन ग्रंढ [का उदाहररगा वन गया] है ।

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इदं रंगमध्येप्रविष्ट्रात्रप्रठितेन वचसा नेपथ्यपाठितमनुसार्थसूचकं संयूज्यमानं चूलिकाग्रेऽद्। यथा वा सत्यहरिश्चन्द्रे—

इसे इसौंकम् मुह्यन्ते मूढे वचन्तं होतिवादे कौतुकं वियोगियो को मारे डालेनेवाले म्रथ्यांत् म्रथ्यन्त्त सन्तापदायकं वलरकवा वचान्त है । परन्तु प्रस्तुतमे कसको मारनेवाले कृष्णा के साथ मो वतका सम्बन्ध है । 'म्रथ्यन्त प्रसूत', 'म्रथ्येन वर्धित', 'परम्रृत' मादि सब पद कोकिलके वाचक भी होते हैं मौर कृण्णपरक भी । कोकिलका नाम 'परम्रृत' भी है । योंकि नोकिल म्रपने बच्चोंका पालन कौग्रोके द्वारा कराता है । कृण्या भी परम्रृत दूसरेके द्वारा पाले हुए हैं । 'कृण्या' तथा 'मधुम्रव' पद भी कोकिल पक्ष तथा कृण्या दोनोंमें समते हैं । यह कोकिल वियोगी जनो को सन्तापदायक् होता है । मुखय रूपसे यहां उसका हो उल्लेख है । निंतु भन्याथंक होनेपर भी वह वाक्य प्रस्तुत वसके वचनेने साथ मिल गम्या है । इसलिये यह गठनक सद्वाहरत हैन गम्या है ।

"राजा—कपिंजल ! पुरो गत्या विलोकय, श्रमश्रम। कियति दूरी ? ['यदादिशति देव इत्याभिधाय कपिंजलो निष्क्रान्त।] राजा ! [सविस्म]—

"राजा—कपिंजल जरा म्रागे बढ़कर देखो कि आश्रम कितनी दूर है ? [जो मान्त्रा, कहेकर कपिंजल बाहुर चला जाता है]। राजा—[विस्मयंक] भू—राहत्या करने वाले मुग्क्तो धिक्कार है । मेरे पापों जोखनेको धिक्कार है । सारे भूतमंडलके सोंको हरों द्वार सन्ताप देकर प्राप्त को गर्द मेरी इस हृद्मोको धिक्कार है । कृपासे प्राप्त हृदय याते मोर मोन पारसा करने वाले जो [मुनिगण] मनायास सुख प्रदान करनेवाते [हस्तारोपितशर्मंसि] शुभ कामोंमें प्रतिकलं लगे रहते हैं वे धन्य हैं । कुन्तल ! म्रब हम सदैव दरित्यागम कर [मुनिप्रत्त प्रहरणां करना] चाहते हैं । कपिंजल—[प्रविश्ट होनेर] देख ! समीप व्रार गया है उसको देखलिए । राजा—क्या ! सदैवस परित्यागोकरो [देव] ? कपिंजल—जो नहीं, मुनियोंके प्राथर्मो ।"

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प्रप्रक्ष्व सस्तवं ह्यस्य मिथो मिथ्यैकलाभकृत् । [३२]६७॥

(४) ग्रथ प्रप्रक्ष्व - [सूत्र १८४]—प्रप्रक्ष्व. सस्तवं ह्यास्य मियौ मिथ्यैकलाभकृत् ॥ [३२]६७॥ यथा रत्नावल्या राजा कदलीगृहं चित्रगता सागरिका पश्यन् मुसहत्तया दर्शने फलकं प्रविछाय तामाह— "राजा—सुमहत्कथंमिहस्थो भवत्या ज्ञात ? मुसहत्ता—भट्टा न चेत्पलं तव्र्व, समं चित्तफलकेऽस्नोऽ कुत्तोऽपे मम जायते, तां गडय देवोग निवेदयिषसि । [भतें । न श्रेयलं तव्र, समं चित्रफलकेन सर्वो वृत्तान्तो मया ज्ञात, तदू गत्वा देवो नैवेदयिष्यामि । इति संस्कतम्] । वसन्ततिलका—(प्रपनार्य) मो । सखी संभ्राव्यते । मुहुरा खु मसा गभदासी, तां किंचिद् डटय परिदोसेहि मे । [मो । सखी सम्भाष्यते । मुहुरा खलु म्पा गभेंदासी, तन् किंचिदू नवा परितोपय णनाम । । राजा—[सुमहत्कथाल्परत्न प्रमादनोयन] मुसंगत ! नीडामार्गमेवैतत् । तथापि नाकारयिष तया देवीं स्वेदवितया । इह न त पारितोपिमरम् । [इति कर्पाभररप ददाति] । मुसहत्ता—[प्रशुम्य सम्भ्रमितं] भट्टा पसादो मे कर्पाभररोत ।" इत्यादि । 'ग्रपन राज-सुमहत्कथयोमिथो 'देव्यै निवेदयिष्यामि' इति ह्यायम् । 'भट्टा पसादो' इति स्त्ररसहितमेकय राल्ल सागरिकासड म्लाभकरणाए प्रप्रक्ष्वोडसद्भूतवान । मुसहत्ताकपो भरसपलाभतु सुर्यसाध्य प्रत्यनुपयोगित्वान्न विवक्षित । मिलकर भावो ग्रनिटकता मूत्तथ हो गया है । इसलिए यह मो गण्यता उदाहरण है । इसने पूर्व पताका स्यानकरे रूपम मो हदवा वरगान् था चुका है । ४ ग्रथ प्रप्रक्ष्व [नामक चरुप योदपदृशक का लक्षण करते हैं]— [सूत्र १८४]—किसी एकको लाभ प्रदान करने वाला, स्तुति सहित मिथ्या हाम्य प्रप्रक्ष्व [कहलाता] है ॥ [३२] ६७ ॥ जसे रत्नावलोमें कदलीगृहमें सागरिकाके चित्रको देखते हुए राज्ञा मुसंगताको देख कर चित्रफलकको डककर [जैसे कहते हैं]— राजा—मुसंगते ! हम यहाँ वठे हैं यह तुम्हें कैसे मालूम हुमा ? मुसंगता—हे स्वामिन् । न केवल ग्राप ग्रापितु चित्रफलकके सहित समस्त वृत्तान्त मुभको मालूम हो गया है । सो में जाकर देवोसे कहूंगी । वस तक —[दूसरा न सुन पाए इस प्रकार—ग्रपनार्य—राजासे कहता है] ग्ररे ! सब कुछ हो सकता है । यह गभदासी बडी वाचाल है इसलिए इसे कुछ देखर स तुष्ट करो । राजा—[मुसंगताके बालकों सचारता हुम्रा] मुसंगते ! यह सब तो केवल हेल मात्र है फिर भो तुम देवोंको दयथ हो कष्ट मत देना । लो यह तुम्हारा पारितोबिक है । [यह बहुंकर कानोका श्राभूपस्ण देता है] । मुसंगता—[मुरकराती हुई प्रसन्नताम करके] हे स्वामिन् । यह कर्पाभररप मुर पुस्कार मे दे रहे हैं । इत्यादि । इसमें देवोसे जाकर निवेदन करू गो [यहांसे लेकर] भत । यह [कर्पाभररप मेरर]

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केचित् त्वसद्भूतंन पारदार्यादिनिन्द्यपुण्यादिना योजन्योडन्यतयो हास्यहेतुरतं प्रपञ्चयमाहुः । यथा— "रंगा चंडा दीक्खिदा धम्मदारा मज्झं मंसं सज्जिए पिज्जए वा । भिक्खा भोज्जं चम्मखंड च सेञ्जा कोले धम्मो करसि नो भादि रम्मो । [रसडा चएडा दीक्खिता धम्मदारा, मयं मांसं सयाचंतं पीयते वा । भिक्खा भोज्जं चर्मखंड च शय्या, कौलो धर्मः करसि नो भाति रम्यः ।।" इति संस्कृतम]

श्रन्थे तु द्वयोलाभं विना मिथ्यारूपं द्वारयं मस्तव्ययुक्तं प्रपञ्चयतेन मन्यन्ते ।

यथा प्रयोक्त्राभ्युदये— "तरंगदत्तकचेटी—श्रम्मो श्रयं खु मसो संचारिसं उवहासपत्तणं श्रथ्थभंडीरखो इण्हो स्सेवा रक्खद्धि । [श्रम्हो श्रयं खल्चेप संचरिअप्पहासपत्तणं श्रथ्थाभेएीरखो हत्थ पगारक्खति । इति संस्कृतम् ।]

विदूषक—उपासृत्य भोद्दी ! सागरं ते । [भवति ! स्वागतं ते] । चेटी—[भगवतं] परिहरासडरिसं दारिअं । [प्रकाशं] को दाअइ म्मोअ श्रम्हारं पुरस्कार है' [यहाँ तक] यह स्तुति सहित, राजा भोर मुसगतकार परस्पर हस्य है । एक श्रथ्थान्त्र राजाजो सागरिफाकी प्रासि हप लाअकं करारए है । भोर मिथ्या व्यवहार हप होनेसे प्रपञ्च है । मुसगताको कर्त्राभरएको प्रासि [प्रपञ्चके लक्षणमें कहे हुए 'एक्लाभिद्रुत' पदसे यहाँ] मुख्य साध्यके प्रति श्रनुपयुक्त होनेसे निवक्षित नहों है । कुछ लोग प्रसद्भूत परदाराराभिगमन श्रादिके नंपुण्यकं द्वारा जो एक-दूसरेको स्तुति हास्यका कारण है नाटकको कहते हैं । जैसे—

उत्कट [कामवेगा वालो] रडियं [जिस धर्ममें] दीक्षाप्राप्त धम्मदारा [सम्भोगी जातो] हैं, मयं भोर मांस [स्वेच्छया—पूर्वक] खाइज्ज—पिया जातो है । [जिस धर्ममें] भिक्खा हो भोजन है, भोर चमंकं हुकड़ा होइ शय्या है । ऐसा कौल [वाममार्गी सम्प्रदायका] धर्मं किसको मुग्वद्र [प्रत्यंगरा करने वाला] नहीं लगतो है ।

इसमें कौल धर्मके श्रनुरागी विम्मी माथीएं उपहास करइ त्ति उसमें परदाराभिगमन श्रादि दिसलाइकर उसकी हास्यकर स्तुति की गई है । तस्माद् यह दूसर श्रथ्थ श्रनुमार प्रपञ्चनं उदाहरण है ।

प्राय लोग तो दोनों [मेसे किसी] बे लाअके विदा होइ प्रसताधुअत मिथ्या हास्यके प्रपञ्च कहते हैं । जैसे प्रयोक्त्राभ्युदयमें— "तंरंगदत्तक चेटी—इण्हो संचरिअण्णोएल उपहासण्णादं हत्थ पगारक्खइ हो । विदूषक—[पास म्राकर] प्राप्तवरा स्वागंत है ।

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पेसङयारच्यो चेडउ त्ति ।

[परिहामयिप्यामि तावदेनम् । क इदानोमेपोडरमार्क प्रेपणमारकचेटक इति । विदूपक —ग्राहं घडदासीकए सामिगो । [ग्राह घडदासोना स्वामिक ]। चेटी—कि चेडउ त्ति भणिदे कुविदो तुम । [त्ति नेकहिंति भणित कुपितस्सवम्] विदूपक —को डाणि विसेसो घडदासीरए कुबदासीयं च ? [क इदानीं विशोपो घडदासोना कुभदासोना च]? चेटी—मा कुण्ण भट्टउत्तो त्ति भणिअम्स । [मा कुण्य, भर्तृपुत्र इतिभणिअन्यामि ]। विदूपक —भोदी ! तुवं पि मा कुण्ण ग्रज्जा इति भणिस्स । [भवति ! त्वमपि मा कुण्य, श्वार्या इति भणिष्यामि]। चेटी—ग्रहो!भट्टुकत्तस्स गदी । [ग्रहो भर्तृपुनस्स गति ]। विदूपक —सहो ! ग्रहिदुअा ग्रज्ज्जया ! [ग्रहो श्वतिस्पा श्वार्यका]" इति ॥ [३२] ६७ ॥

(य) श्रथ त्रिगतम्— [सूत्र १४६]—त्रिगत शाब्दसाम्येन भिन्नस्यार्थस्य योजनम् । भिन्नस्य प्रस्तुतादन्यास्य । त्रिगतमनेकार्थगत शब्दद्वयानेकार्थत्वान । तेन इह्यर्थ—

चेटो—[स्वगत] इससे तनिक सँदाक कर लूँ । [प्रकाश] यह हमारा प्रपञ्च कराने वाला कौन दास है । विदूपक—मैं, घटदासियोका स्वामी हूँ । [घटदासोका श्रथ ज मते दासी है] । चेटी—क्या चेट कहनेसे ग्राप नाराज हो गए ? विदूपक—घटदासो और कुंभदासोमें क्या भेद है ? चेटो—नाराज न हों 'ग्रव भर्तृ पुत्र' कहूंगी । विदूपक—ग्राप भो नाराज न हो श्राप्या कहा कहूँगा । चेटो—ग्रोहो भट्टुपुत्रो चाल [कसी सुंदर है] ! विदूपक—ग्रहहो ग्राप्याका रुप कसा सुंदर है ! दोनोंमेंसे किसीको भी लामके बिना यह मिल्या सस्तवयुक्त हास्य वचन है । यह दूसरे मतसे प्रपञ्चन नामक वीर्ययज्झका उदाहरण है ॥[३२]६७॥

५ त्रिगतनामक पञ्चम वीर्ययज्झ— प्रब त्रिगत [का लक्षण श्रादि करते हैं]— [सूत्र १४६]— शाब्दको समानताके करणं [प्रनेकायक शाब्दको प्रस्तुत प्रयते] भिन्न प्रयं निकस्सना 'त्रिगत' [कहलाता] है ।

शब्दको समानताके कारण [प्रयायैक शब्दोसे] ग्रप्रय को योजना 'त्रिगत' [कहलाता] है । जैसे 'देवीचतुर्गुप्त के द्वितीय श्रकमें प्रजाप्रोके श्रादिवासके लिए राजा राम

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राजा—प्रतिष्ठोकितपुत्र न मन्यथाः त्वां परित्यक्तुमुत्सहः । प्रत्यभिज्ञायनिभूषासमलंकृतोऽसि नन्द, रूपप्रियं च त्वं योग्ननयोग्यरूपम् । महितं च मदनुपमामनुध्यमानो देवों त्यजामीं चलनांवतद्वि मेऽनुरागः ॥

गुप्तके द्वारा भूदेवीको नाकराजके दे देना स्वोकार कर लेनेपर भूदेवोकर देव धारए करने गुप्तके अपने लिए जाने वाले कुमार चन्द्रगुप्तको लक्ष्य करके कहते हैं — राजा —प्रतिष्ठा—वचनोंके प्रवतारपर में [पत्यादि] देवेश्रि परित्याग करने जा रहा हूँ किन्तु अभिनव यौवनसे रमणीय तुम्हारी यह देह, यौवनश्री मनुष्य इस हृप सोन्दर्यं और अपने प्रति अनुगम प्रेमको देखकर तुम्हारे प्रति मेरा প্রবল मदनुराग है । भूदेवो—[च.द्रगुप्तो दूसरो हध्रो समफ कर] यदि इसकें प्रेमकी अपेक्षा है तो [इसका श्रयं यह है कि श्रपने प्रति मदन्रय मदनुराग रलने घालो] मुख मगर्भागिनोका परित्याग कर रहे हैं । राजा—मोर तुम्हारे कारण [प्रय्त् तुम देखोको रक्षा कर हो लोभे ऐसा मानकर दूसरे पक्षमे तुम्हारे प्रेमके वशीभूत होकर] में तुम्हके समान देवोका परित्याग कर रहा हूँ । [पर्य्त् नाकराजको देखोके दे देनेको स्वोकार कर रहा हूँ] । भूदेवी — [ग्रापके इस परित्यागमे कित होकर] मे भी श्रपने जीवनक परित्याग करके ग्रापमुग्नको पहिले हो छोड़ दूंगी । राजा— [ चद्रगुप्तके प्रति] तुम्हारे बिना मेरा यह राॅज्य ध्यय है । भूदेवी—मेरे लिए भी मवन यह जोवनलोक नि‘फल है । उसे में तर्लतलसे परित्याग कर सकूँगी । राजा—कितु देवो मेरो विवाहिता पत्नी है इसलिए उनके प्रति मुझे दया आता है ।

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राजा—उदेति देवों प्रति मे दयालुता । ध्रुवदेवी—इत्येव श्रज्जत्त ! ईदृशी दयालुता, जं श्रागवद्रों जनेां श्रनुगदो एवं परित्यज्यते । [इयमार्यपुत्र ! ईदृशी दयालुता यदनपरद्रो जनोडनुगत एवं परित्यज्यते] । राजा—त्वयि रिक्त मतेऽनुनयत्न मन्त्र ॥ ध्रुवदेवो—श्रद्यैव मद्भागा परित्यज्ये । [श्रत एव मन्त्रभागा परित्यज्ये] । राजा—त्वय्युपारेपितप्रेम्णा तदर्थे यशामा सह । परित्यक्ना मया देवो जनोडय जन एव मे ॥ ध्रुवदेवी—हजे ! इय सा श्रार्यपुत्रस्य कम्पनता । [हजे ! इय सा श्रार्यपुत्रस्य कम्पनता] । सूत्रधारो—देवि ! पडति चन्द्रमण्डलात् कुडलोत्प्रो, कि मेऽथ करीयंदि । [देवि ! पतन्ति चन्द्रमण्डलाद्युलका, किमत्र क्रियते] ? राजा—देवोनियोगदुस्तरास्त्वमस्मान् रमेद्यिष्यसि । ध्रुवदेवी—वियोगदुःख पि दे श्रक्ररङ्गस् श्र्यार्तिथ व्येच ? [वियोगदु समर्पि टेकडरङ्गस्यार्तिथव्येच] ? राजा—त्वददु रक्ष्यापनेतु सा शतशोऽनापि न घमा ॥" इति । पतत् स्त्रीविपधारचन्द्रग्रस्तवोधनार्थमिभिहितमपि विशेषणासाम्येन देव्या स्त्रीविपय प्रतिपन्नमिति भिन्नार्थयोजनम् । एवं श्र्यर्थमपि श्लिपादिवशादुदाहार्यम् ।

राजा—देवताओं के प्रति मुझमें दया उत्पन्न होती है । ध्रुवदेवी—इत्येव श्रज्जत्त ! ईदृशी दयालुता, जं श्रागवद्रों जनेां श्रनुगदो एवं परित्यज्यते । यह [ग्रापको] ऐसी दयालुता है कि अपने प्रति श्रनुरक्त लोगों को छोड़ देते हैं । राजा—त्वयि रिक्त मतेऽनुनयत्न मन्त्र ॥ जब तुम रिक्त हो जाओ तब अनुनय करनेका यत्न करना चाहिये । ध्रुवदेवो—श्रद्यैव मद्भागा परित्यज्ये । [श्रत एव मन्त्रभागा परित्यज्ये] । मुझे अपना भाग त्यागना ही चाहिये । राजा—त्वय्युपारेपितप्रेम्णा तदर्थे यशामा सह । परित्यक्ना मया देवो जनोडय जन एव मे ॥ मैंने देवताओंपर प्रेम स्थापित किया था, सो उसीके लिये मैंने यशकी कामना की थी । अब तुम्हारे त्याग करनेपर यही लोग मेरे लिये देवता हो गये हैं । ध्रुवदेवी—हजे ! इय सा श्रार्यपुत्रस्य कम्पनता । [हजे ! इय सा श्रार्यपुत्रस्य कम्पनता] । हाय ! यह तो श्रापका डरना ही है । सूत्रधारो—देवि ! पडति चन्द्रमण्डलात् कुडलोत्प्रो, कि मेऽथ करीयंदि । [देवि ! पतन्ति चन्द्रमण्डलाद्युलका, किमत्र क्रियते] ? हे देवी ! चन्द्रमण्डलसे उल्का गिर रही हैं, इसमें क्या किया जाय ? राजा—देवोनियोगदुस्तरास्त्वमस्मान् रमेद्यिष्यसि । हे देवियोंके वियोगसे दुःखी होनेवाले ! तुम हमलोगोंको रमाने की इच्छा करोगे । ध्रुवदेवी—वियोगदुःख पि दे श्रक्ररङ्गस् श्र्यार्तिथ व्येच ? [वियोगदु समर्पि टेकडरङ्गस्यार्तिथव्येच] ? वियोगके दुःखमें भी क्या रंगभूमिमें श्रानेवाले श्रार्थीको तुम रखोगे ? राजा—त्वददु रक्ष्यापनेतु सा शतशोऽनापि न घमा ॥" इति । पतत् स्त्रीविपधारचन्द्रग्रस्तवोधनार्थमिभिहितमपि विशेषणासाम्येन देव्या स्त्रीविपय प्रतिपन्नमिति भिन्नार्थयोजनम् । इस प्रकार स्त्रीविपयक चन्द्रग्रहके वेधनके लिये जो यह श्लोक कहा गया है वह भी विशेषणोंके साम्यसे देवीके विषयमें ही घटित हो जाता है, इसलिये यहाँ भिन्न अर्थकी योजना करनी चाहिये । एवं श्र्यर्थमपि श्लिपादिवशादुदाहार्यम् । इसी प्रकार और भी कहीं कहीं श्लेषादिके वशसे ऐसे उदाहरण दिये जा सकते हैं ।

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श्रथवा श्रुतिसारुप्येनैव श्रुतनृपतया सत् प्रतिवचनतया भिन्नार्थेम्यो योजनम् ।

(६) व्यथ च्छलम्— [सूत्र १४७]—वचोऽन्याथ च्छलं हस्य-वचना-रोपकाररम् ॥[३३]ह=॥ प्रयोंसे समवद्ध ]त्रिगतम् ] का उदाहरणा समक्ष लेना चाहिए ।

यथा विक्रमोर्वश्याम्— सर्वाङ्गतिभृतां नाथ ! दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी । रामा रम्ये वनान्तेऽस्मिन् तया विरहिता भया ॥ श्रेणी श्रेणी महाभूत प्रतिशङ्कदनतद्वातिरम् । यद्वा शकुनोऽयकृतध्वनिमात्रं, तन्मास्येनानेकार्थयोजनं 'त्रिगतम्' । यथा इन्दु-लेपार्यां वीथ्याम्— "राजा—वयस्य— कि नु कलईंसनादो मधुरो ? मधुपायिनो नु मञ्जीर ? हृदयगृहदेवतायामस्या नु सत्पुरश्चररए ? ॥इति॥"

प्रयवा प्रकृत रूपसे द्रुत एक हो वचनको शब्दको समानतासे उत्तरक हेतु लगानिस भिन्नार्थमे योजना ['त्रिगत' कहलाती] है । जैसे विक्रमोर्वश्यो में— हे नाथ ! इस सुन्दर वन भागम देखा है । इसमे प्रकृत वानम मया विरहिता हवया दृष्टा यह अन्वय होना है । और उत्तर-पक्ष म 'तया विरहिता मया दृष्टा' यह अन्वय होना है । इसी प्रकार 'गवाङ्गतिभृता नाथ' मं ग्रथं दोना पक्षाम भिन्न हा जानता है । प्रकृत पक्षम क्षितिभृत् का ग्रय पर्वंत और उत्तर पक्षम क्षितिभृन् का ग्रय राजा होता है । प्रयवा हास्यसे ग्रथकृत घवनिमात्र [लेना चाहिए ] । उसकी समानतासे ग्रनेकायको योजना 'त्रिगत' [नामक वीथ्यपथ् कहलाता] है । जसे इन्दुलेपार्य [नामय] वोयोमे— राजा—हे मित्र ! क्या कलईंसक नाद या मधुपोंका मञ्जीर मधुर है प्रयवा मेरे हृदयगृहमिदरफी उस देवताय नुपुर [की ध्वनिसे मुखर] घररए [अधिक मधुर ह ] ?

(६) च्छल नामक च्छटा वीथ्यंग मस 'छल' [नामक ग्रथ पर वीपथडया तश्रए करते ह] । [सूत्र १४७]—दूसरे के लिए प्रभुक्त, हाम्य वचना या रोपवने जनर वचनका प्रयोग 'छल' [कहलाता] है । [३३] ह= ।

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प्रयोजनान्तरेपा प्रयुक्तं यद्वचनमनन्यस्य, श्वानयस्य हास्य-वच्‍नानरोपकारस्य तद्‌-व्‍चनाहेतुत्वाच्छलम् । यथा— "कस्स व न होइ रोसो दड्ढण पियाए सव्वग्गां ग्राहरं सभामरपउसग्घाइरि वारियवामे सह्हुसु इअइहं ॥ {कस्य वा न भवति रोपो द्रु‍षा क्रियायाः सुभ्रामंधरम् । सभामरपद्माक्रान्तायां वारितायां सहस्रदानीनाम् ॥ इति संसकृतम् ।}"

एतदेव सख्याद्‌भर्तृप्रत्ययान्तप्रयोजननोकतं विदग्धाजनतनय हास्यं श्वशुरादेवेंवचनां सपल्न्या रोपं जनयतीति ॥ [३३] ६५ ॥ (७) श्रासतप्रलाप।— [सूत्र १४८]—ग्रसत्तप्रलापस्तत्वेन हितं यन्नावगम्यते । परमार्थतो हितसूपकारपर्यवसायि यद्वचनं श्रविवेचकत्व-मौख्‍योभयां तस्‍वेन हितत्वेन नैवायुघ्यते श्रविवेचकैर्मूखैशच, तन् तु प्रतीपं ग्रसतो ग्रसाधुभूतस्य प्रलपनमससप्रलापः । तत्राविवेचकं प्रति यथा रामाभ्युदये द्वितीयेऽङ्के— "रावणः ।—प्रायशः श्रुतमेव भवद्भिर्यथा कलत्रमात्रसाधनोडसौ तापसगतदपहार एव तावन्निरूप्यताम् । न च कलत्रापहर्त्तव्यते पुरुषाभ्यां परिभवथानर्मास्ति । तत्र मारीचेन साहाय्यं क्रियमाणमिच्छामि ।

ग्रन्थ प्रयोजनसे प्रयुक्त किया गया दूसरे श्‍यक्तिका जो वचन दूसरके लिये हास्यं वच्‍नना प्रथवा रोपकार कारण हो वह वचननाका हेतु होनेसे 'छल' कहलाता है । जैसे— अपनी प्रियाके प्रधानमे [ दनतखतका ] धाव देखकर किसीको क्रोध नहीं आता है? इसीलिए मदा करनेपर भो न मानने वाले, और भ्रमर-नयुत्त कमलको सूंघने वालो धाव [भ्रमरके काट लेनेसे बने क्रोधके] अपराधके कारण अपने पतिके क्रोध को] भोग । यह वचन सखीने [नायिका रक्षाके लिये उसक] स्वामीको [यह] विर्दवास दिलाने के लिये [कि इसके परपुरुष-गमनादि-मूळक क्रोध नहीँ हमारा है] कहा जानेपर भी विदग्ध लोगोमें हास्य, श्वशुरादिको वडच्‍नना तया सपल्‍नोमें रोप उत्पन्न करता है ॥ [३३] ६५ ॥ (७) श्रासतप्रलाप नामक सातवों यीथ्यङ्ग :-- ग्रव श्रासतप्रलाप [नामक सप्तम योध्यङ्कका लक्षणादि कहते हैं] ।

[सूत्र १४८]—जिस हितकारी वचनको यथायंँ त्‍यपने पहिले नहीं किया जाता है यह 'परसप्रलाप' है । तात्पर्य्यमे हितकारो पर्य्याय् लाब पहुँचनेवाला होनेपर भी [जिसने पातेक] प्‍विवेक्‍त्‍व प्रयथा मूख‍ंतानो कारण हितकारी ह्‍यपसे प्रह्‍लु नहीं किया जाता है । यह उन दोनोः प्रति न धसत् प्र्‍यातोँ प्रहितकर मलापके समान होनेमे 'प्रसत्तप्रलाप' [नातासत] है । तत्समेग्रो प्रविवेचकके प्रति [प्रसत्तप्रलापका उदाहरण] जैसे रामाभ्युदयके द्वितीयाङ्कमे— रावण—तुमने यह तो सुना हो है कि उस तापसके पास केवल एक स्त्रो

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मारोचः-स्वामिन् ! जीवतो रामस्य परिभव इत्यशङ्क्यमेतन् । न ग्लः तापस डति तवचण्णातुमर्हति देवः । अन्यदेव वसवस्तरं निमिपि तनु । रावरणः-[समोेधम्] आहः किं नाम वसवस्तरं तनु ? मूढ ! युक्त्येव शत्रवन्थोः परिभवममं जीवतः कुतोऽपि च्छन्न, मायासाह्वायके तवं निपुणोतर इति प्रार्थ्ये नास्मर्थे । यथान्यत्त तथ वच्म्रग्रहणतिस्संहितस्फार केयरवाजः, मज्जास्तैलोकोलतद्मीहढहरषामद्धा याहवे रावणस्य ॥

हो है । इसलिए उसका प्रपञ्चरचा ही सबसे पहले करना चाहिए । स्त्रियोंके प्रपञ्चरचासे प्रधिक पुरुषके लिए प्रपमानका दूसरा स्थान नहीं है । इसमें मारोच सहायता करे ऐसा मैं चाहता हूँ । मारोच--स्वामिन् ! रामके जोते रहते उसका प्रपमान हो सके यह प्रसङ्गभव है । वह कोई साधारसा तापस है यह समभकर उसकी प्रवञ्चना नहीं करनी चाहिए । वह क्रुद्ध हो तो द्रोण है । रावरणः-[सक्रोध होकर] अरे यह कोनसी दूसरी चीज है ? मूढ़--उस नीच क्षत्रियके जीते रहते हो मुक्तिसे उसका प्रपमान करनेके लिए हो, तू घोरा देनेमें प्रधिक चतुर है ऐसा समभकर तुमसे कहा था, मे भ्रातृमय हूं ऐसा मह समभना । प्रोर वह जो क्रुद्ध प्रोर है उसके लिए वञ्चकें प्रहारोसे विरने हुए वाग्वन्धनोको घाररूा करने चाले प्रोर तीनों लोकोंके लळ्मीको वत्सात हरसाकर सशक्तने समयं, मेरे [रावरणके] वाथ संयत हैं । यहां मारोचका वचन वाततन्में हितकर होनेपर भी रावरणाने [हितकर] नहीं समभा ।

मूढ़के प्रति--जैसे भोमट [काक्ष] विरचित मनोरमावत्सराजमे वत्सराजकी उन्नति की कामना करने वाले [मग्रो] मञ्ञानात पाञ्चालतराजश्शे नाम करानेकेलिए उसके वनाबटोो भूप वनाकर उसकेो विश्वास दिलानेके लिए वत्सराजने [सावासक वनने स्थित होनेके समय] भ्रात पुरमे प्राण त्यागकर योगान्वरायएप्रादिसे कहृते हैं-- कौशाम्ब्योमे मेरे हायपे हो समभो । प्रत्यंत द्रवितमाली होनेके कारस [जसपर नोतिये हो विजय प्राप्त करनो होतो ऐसा मानकर] मेने पाञ्चालराजके [ननायतों रूपमे] अपने स्वाथों र्सपने स्वोेधार किया है । प्रार्थनें के प्रभु [उदपन] न मानुम कहाँ हैं । तामुशे मेनाको भ्रममे डालने वाले मेने हर लावारिश [वन] को माग लगा दो है, प्रय [इस साका-? महंंति ।

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एतच्च परमार्थेत् पाँचालोच्छेदपरं यौगन्धरायणावबुद्धम् । वासवदत्तया सम्भ्रमकनाम्ना यौगन्धरायेणानुचरिते च मौल्यांन्नावगतम् ।। यथा वा व्यसनिता राजपुत्रेण किं सुयामिति पृष्टे मन्त्रिपुत्रेऽन्यते— 'सर्वदा योध्दविजयी सुरासेवनतत्परः । तस्यार्थानां सुखानां च समृद्धिः करगामिनी ।।' एतदपि मुखेनेव मन्त्रिभिः पार्श्वकोविदजय-मद्यपानरूपे गुह्यते, न हि वैनतेयविजय-

पाड्वालराजके नाटकके लिए यह [रमणीयात्नका प्रयोग है] इस बातको यौगन्धरायणने समभ लिया किन्तु वासवदत्ता तथा यौगन्धरायणके सम्भ्रम नामक मन्त्रित्तरने मुख्तात्पर्या समभा ।। प्रथवा [उसी मनोरमावरसराजमे] व्यसनो राजपुत्रके द्वारा मुग्ध क्या है यह पूहे जाने पर मन्त्रिपुन कहता है— जो सर्वदा योध्दाविजय प्राप्त करने वाला है और देवताराधनो सेवामें तत्पर रहता है उसके लिए प्रयत्न प्रेरित मुपको समृद्धि हस्तगत रहती है ।

दैवताराधनरुपे हितांशे इति । अन्ये तु चालोत्कर्षितादीनामसम्बद्धकथाप्रायमसत्यम्लापिमिच्छन्ति । यथा— 'एकं त्रीणि नवाष्ट सप्त पडिति व्यालुप्तरस्स्थाकमा., वाचः क्रौंचरिपोः शिशुत्वनिकला: श्रेयांसि पुम्प्रलु वः ।।' यथा वा रघुविलासे सीताविरहहतो रामः - 'अ्रररये मां त्वक्तवा हरिणा ! हरिणाक्षी कव नु गता, पराभूतो हि रावण कथयसि न चेन्तमा स्म कथय ! ध्वरे क्रोडाकीर ! स्वमपि वहसे कामपि रुपं, यदेव तूष्णीकभानुसरसो वाच्यं च इव ।। इति ।

देवोको ग्राम लोग वचा लो [इस बातका समाचार देनेके लिए मैं] कमण्वान् स्वयं प्राया हूँ । [यह इस श्लोकका निर्वसित थाॅं है किन्तु यमनो राजपुन] अपने प्रिय श्राशमें [प्रसक्विजयी पदसे] छूतको विजय, तथा [मुरासेवन पदसे] मद्यन-सेवन प्रयं को लेता है । इन्द्रियविजय मोर देवताराधन रूप हिताशको नहीँ । दूसरे लोग तो [प्रसम्बद्ध कयापुत्रन बालकोंकी उत्कष्टा प्रादिके वचांनको मसत्यप्रलाप मानते हैं । जैसे— 'एकं त्रीणि नवाष्ट सप्त पडिति व्यालुप्तरस्स्थाकमा., वाचः क्रौंचरिपोः शिशुत्वनिकला: श्रेयांसि पुम्प्रलु वः ।।' यथा वा रघुविलासे सीताविरहहतो रामः - हे हरिणा ! हरिणाक्षी [सीता] यनमें मुभको छोडकर कहाॅं चली गई है ? क्या तुम मुभको देखकर डर जानसे नहीॅं मह रहे हो, यदि ऐसी बात हो तो डरो मत, बतला दो । पारे क्रोडाके तोते ! स्वमपि वहसे कामपि रुपं,

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प्रशनोत्तरं तु वाक्केलो हास्या वाक्-प्रतिवागपि ॥ [३८] ६५॥

(४) श्रथ वाक्केलो— [सूत्र १४५]—प्रशनोत्तरं तु वाक्केलो हास्या वाक्-प्रतिवागपि । प्रश्नस्य प्रश्नयोः। प्रश्नानां योत्करं प्रश्नोत्तरम्। सहासा छेकोक्तिप्रत्युक्तिर्था । द्वयमव्येतदू वचनभ्रिडारुत्पत्या वाक्केलो । यथा— "नदीना मवावगमे को शोभा भवते ? ॥ वाग्यान्तरा विजेतव्या के नाम कृत्रिमाड़यः ? ॥" श्रथ 'ग्ररय' इति वाक्य रसाभावयोः, श्रपरत्र शत्रय इति एवं प्रतिवचनम् । एवं वहनाभपि दृश्यलयम्। फलत्प्रशनोत्तरम्। छेकोक्तिप्रत्युक्तिरयथा— "कोऽयं द्वारि ? हरिः, प्रयाहु पवनं शनैरमुग्यात्र कि, कुप्योडहं दृश्यते, विभेमि सुस्तरां कृप्याण पुनर्योनि ताम् । मुग्येऽहं मधुसूदनो, ब्रज लतां तामेव तन्वीमलां, मिथ्या सूचयसीत्युपेत्य धनिकां होतो हृदि पातु च ॥" (५) वाक्केलो नामक वृत्तम् वीध्यक्— श्रथ 'वाक्केलो' [नाटकादि करते हैं]— [सूत्र १४५]—प्रशनोत्तर प्रथया हारयपूरां उत्तर-प्रत्युक्तर 'वाक्केलो' षहुलातो है [३४] ६५ । एक प्रशनका, दो प्रशनोका, प्रयवा बहुत प्रशनोंका उत्तर [यहाँ पर] प्रशनोत्तर [बहु-लाता] है। प्रयवा हास्ययुक्त, चातुयंपूरां, छकित-प्रत्युक्ति [ये दोनोंहो वचनोंको क्रोडा रूप होने से वाक्केलो है]। जैसे— वरसातके वाद नदीयोकि फँसते शोभा होती है ? और किन वाघ्रा तथा मान्तरोंके विजय करना चाहिए ? [ये दो प्रशन हैं । इन दोनों प्रशनोंका एक हो उत्तर देते हैं कि] 'परव' । इसमें एक पक्षमें [प्रथान्तर प्रथम प्रशनके उत्तरमें] 'प्ररय' का प्रयं रसका प्रभाव प्रयांतं वेगाभाव और दूसरे पक्षमें 'नात्र' यह [दोनों प्रशनोंका] एक हो उत्तर है । इसी प्रकार बहुत प्रशनोंका हो सकता है। यह प्रशनोत्तर [वप वाक्यविन्यासकी दृष्टि उदाहरण है]। चातुयंपूरां छकित-प्रत्युक्ति [का उदाहरण] जैसे— मेरे दरवारोंपर यह कौन है ? [यह घनिका राधिका प्रशन है । इसका उत्तर है] हरिः [प्रयांत में हूँ] 'हरिः' नामपर प्रयं क्रूधा हो जाता है और वानर भो । हृपपने तो हरिः साधसे हृप्टा प्रयं मेकर घपना परिचय दिया। या । किन्तु राधाने उत्क्षा वानर पर्य सेकर कृप्या को उत्तर दिया। कि यदि तुम वानर होते] उपवनमें चले जाओ । यहीं यनद्रवया क्या काम ? [इस पर कृप्या किर] है प्रिये ! में [ध्रवर नहीं भ्रमितु] हूं । [इस पर राधा उक्ता कलार बनकर प्रयांत लगूर प्रयं सेकर वहने है कि] वाने वंदरोंमे तो मैं बहुत डरतो हूँ । [इस पर हरल किर मपूदन नामसे घपना परिचय देते हैं] परो भोली प्रिये ! में [सपुर नहीं] मधुसूदन हूं ।

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केचित्तु साकांक्षस्य वाक्यस्य विनिरवर्त्तनं वाक्केलीसंधीयते । यथोत्तरचरिते— "त्वं जीवितं त्वमसि मे हृदयं धिनीयं, त्वं कौमुदी नयनयोरसृतं त्वमज्जे । इत्यादिमिः प्रियतैरतनुरूच्या सुग्धां, तामेव शान्तमथवा किमत: परेषाम् ॥" [३७] &c ॥

(६) श्रथ नालिका— [सूत्र १४०]—हास्यामप वक्ष्यणा नाली— परविप्रतारणैकाथि यदुत्तंर हास्य ह्वाम्यनिमित्तं निगृद्यार्थेत्वाद् भवति सा नाली व्याजरूपा प्रयालिका । यथा रत्नावल्यां सागरिका चित्रफलककार्येमागता कदर्थलोग्रुढे वत्सराजं राप्ट्रा वहिः । स्थिता मुसज्जतयोच्यते— "मुसज्जता—सहि जस कप तुवं श्रागदा सो पत्थ यीयेव चिद्धदि । सागरिका—[सकोपमिव] साहि कम्स ? [सपि कस्म] ? मुसज्जता—[सहासम] श्रियं श्रप्रसकिदं मोह पडुस्सहूसंव चित्तमलद्वारत् ।

अर्थ लगाकर कहती हैं कि तो फिर उसी कोमल सताके पास जाओो मुझे कयो धोखा देते हो । इस प्रकार धनीका [राधा के पास जाकर लज्जित हुए कृत्या तुम्हारो रक्षा करें । कोई लोग साकांक्ष [अप्रपरिसमाप्त] वाक्य वाचस्पत् करत लेते [प्रत्याद् कहते-कहते] को रोक लेनेकी आबकैलो कहते हैं । जैसे उत्तरचरितमें— तुम [अर्थात् सखा] मेरो प्रारतारकस्प हो, तुम हो मेरा दूसरा हृदय हो, तुम नेयोके लिए कौमुदीश्वप ग्रोर अंगोके लिए प्रभृतहस्प हो । इस प्रकारके सेक्डो प्रिय वचनोंसे यत भोले [सीता] को द्वादवस्तन देकर श्रब उसको [तुमने घरसे निकाल दिया । इस वातको वासनती श्रापे कहती चाहती है, किन्तु उसको बीचमें हो रोक दतो है] । अथवा चुप रहो इसक श्रापे कहनेसे क्या लाभ ? ॥ ६५ ॥ [३४]

(६) नालिकानामक नवम वीद्यध्य— ग्रथ 'नालिका' [नामक नवम वोध्यध्यका सक्षर करते हैं]— (सूत्र १४०) मज़ाक करनेके लिए घोखा देना 'नाली' [कहतलातर] है । घोखा देने वाना जो उत्तर हामके लिए श्रव्यन्त् मूदर्यं होतनेमें हास्यक! जनक होता

है वह नाली अर्थात् महामला हप [हास्यपात्र] प्रधालिका । होनने 'नालो' कहलातात है । जैसे रतनावलोमें चित्रफलकके सिनेकी लए आई हुई सागरिका वदलोग्रुढे वत्सराज उदयनमे बंठा देपकर बाहर रक्खा जाता है । तथा मुसज्जता उससे कहती है— मुसज्जता—हे सखि ! जिमते लए तुम पाई थी मझे रिपत है । सागरिका—[क्रुध होतो हुर्ड सो] है सखि ! जिमके लए [मे आई यों] ? मुसज्जता—[हसते] परा चपन छोड़ो मेरो चित्त मलद्वारत पर चित्र-शानरके लए ।

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[यथि आत्मशक्तिते नतु पृथस्तमभूस्सवे चित्रफलकम्य]। केचितु तु द्वार्यहुतुनोपतां निगूढार्थरूपा प्रहेलिका नाली मन्यन्ते । यथा 'शालिकायचित्रके' पारिपाश्विक - "तपनीयौज्ज्वलकरकं कुवलयारुचि भानुमान्माकाशे । तेजोमयं दिनकराद्द्वितीयमाचच्ते मे भूमम् ॥"

अत्र निगूढोऽर्थोऽस्ति । सूत्रधारेरप्यस्मिन्नव श्लोक 'द्वितीयमन्नं मुनि पश्य'इति चतुर्थपादान्वयाद्यकारेण व्याख्यात इति । (१०) ग्रंथ मृदवम— [सूत्र १४१]—व्यतययो गुपा-दोषयो: । मृदवम् गुपानां लोपत, दोपाणां च गुपत्वं येनोत्तरेण व्यतययो निपर्यांस क्रियते, तन्मृदया परपचमर्दनेन स्वपचमवति रच्ततीति मृदवम् । गुखम्य दोपवीकरपया यथा वेधीसंहारेऽ द्वितीयेडडे— "जयद्रथमाता - जाल ! ते रु वंधुवधामरिसुदरीनिदको वा समरे श्रापवेधिग्नय- सरीरा परिकसिमिति । [जाति । ते देतु नेमधुनेवधामपाहिपतको समरेऽनवपक्चरारार परित्रमियान्वित। इति समास्रतम् ।]

बुद्ध लोग हास्यके रङ्गमे प्राप्त होने वाली निगूढार्थयं वाली 'प्रहेलिका' को 'नाली' वतलाते हैं । जैसे शालिकायचित्रतकने पारिपाश्विक [कहता है] । सोनेके समान चमकते हुए करों [किरणो और दूसरे पक्षमे हायों] चाले, प्रकारमे घमकते हुए भोर द्वियियो-मण्डलपर रचि न रखने वाले, सूर्येन्दो छोडकर तेजोमय किसी अन्य भूत [प्राणी] को मुभे बतलाओ । यहां नारद रूप म्रय है हूपा हुंआ है । सूरनधाराने [सूर्यसे भिन्न तेजोमय] 'इन मुनिको देलो' इस प्रकार चतुर्थं पादको बदलकर [अर्थात 'द्वितीयमाचच्ते मे भूमम्' के स्यानपर द्वितीय- मेन मृज्जान पश्य' ऐसा पाठ करके] बतलाया है ।

(१०) मृदव नामक दशम वीर्यद्ध— मतव मृदव' [नामव द्वाम योध्यज्जूकका तक्षयादि कहते हैं]— [सूत्र १४१]—गुपा शौर दोपको बदल देना [अर्थात गुपेको दोप, प्रोर दोपको गुप बना देना] 'मृदव' कहलाता है । जिस उरारसे गुपोंक दोपव शौर दोपोंक गुपात्व इस प्रकारक परिवर्तन हो जाता है यह मृदश पर्यात् दूवरे पक्षने मर्दन द्वारा अपने पक्षकी रक्षा [प्रवान] करनेके कारा 'मृदव' कहलाता है । गुपेको दोप बना देने [रूप 'मृदव' का उद्दाहर] जैसे वेधीसंहारके द्वितीय अकमे— जयद्रथशो माता - मरे बेटा ! वनु [अभिमन्यु] के वधके कारा अथवा तुदु ऋद्ध हैए थे [पाण्डव लोग] अपने शरीरव मोह छोडकर [मृन्मूमिमे] विचरत करों [इसालिए उनसे सावधान होकर लडना वाहिए] ।

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हस्ताकृष्टविलोलकेशवसना हु शासनेऽनिञ्जया, पांचाली मम राजचक्रपुरतो गौर्गौरिरिति व्याहृता । तस्मिन्नम्व स किं न गाण्डिववरः' नासीन्त पथानन्ददो, यून्त क्षत्रियवरश्रस्य कृत्रिन क्रोधास्पदं किं न तन् ।?

राजा—[ सोपहासम् ] एवमेतत् । सर्वजनप्रसिद्धसेवसम्पितवं पारडवानाम् । पर्य— द्रग् धनुर्धरस्ववादयो गुप्ता दोपीकृता । "राजा—देवि ! उपालम्भ्यसे स्वाभ्यन्तर परिजनापराधेन । द्रौपदी—कहं विय ? राजा —वक्त्रेन्दु रिमतममातनोदधिगते दृशौ विकासश्रियं, वाहु कनककोरकाण्यविभृतां प्राप्ता गिरो गौरवम् । किं नाऽऽननि तन्वतिथेयमसृजन् स्वस्यापतेयौचितं, सम्प्राप्ते मयि नैतदुञ्मति लुचद्ध्रुन्दं पुनः स्तनद्वयाम् ॥" क्षत्र स्तनयता स्तनगुप्तो दोपीकृत । राजा—[उपहास करता हुम्रा] प्रच्छा यह बात । [पाण्डवोंके कोपसे हमें डरता चाहिए] किन्तु पाण्डवोंका कोप तो सब लोग जानते हैं [कि वे कोप करके भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं] । देवो— मेरी प्राज्ञासे हु दासके द्वारा राजभोंको सभाके वीचमें द्रोपदीके वेष्टा प्रौर वस्त्रों हायसे खींचे जानेपर [में तुम्हारे गो हूं मेरी रक्षा करो इस प्रकार एक बार] द्रोपदीने गो-गो [ये दोनोंतक शबब्द] कहलवाने लिए [द्रोपदी गो-गो कहकर विलसाती रही] उत समय कथम् पाण्डवस्यारे प्राज्ञुन नह्हीं था ? प्रयतवा क्षत्रियवधाने उत्पन्न हुए मनस्वी युयुत्सुके लिए क्या वह [अपने पतिवत्सला गोमा घोर पतिता] लज्जिता जनक नह्हीं था ? यहाँ[प्राज्ञुन् होने] धनुर्धरस्य प्रायि गुणोंको दोप बना द्विया है । प्रयवा जैसे नलविलासमे— राजा —अपने भीतरी परिजनोंके अपराधके कारण तुमको उत्पाहुना मित रहा है । दमयन्ती—कंसे ? राजा —[मेरे प्रानेपत् तुम्हारा] मुपचन्द्र मुखर्राने तथा, दोनों नेत्र [विशालक प्राप्त हो गए] निल उठे, वाहुम्रोमें रोमाञ्च हो गया भ्रौर वाणी मेरी हो गई । इस प्रकार चया तुम्हारे मद्रोंने अपनी मद्रनो दासताने धनुरत मेरे। भ्रातिप्य या स्वागत नहीं [किया ? [प्रयात् मेरे प्रानेपत् तुम्हारे म्रद्र सारे मद्रोंमें मेरा स्वागत किया] [किनु मेरे प्राते पर मो यह तुम्हारा स्तन पुत्पल मद्रोंमें पत्पन] पर्यातं कटोरता [पोत दूधरे पत्तमें भ्रटल] मो महीं दोती रही हूं । यहाँ स्तनयता [कटोरता] स्तनोका गुणा है किन्तु उसको दोप बना द्विया है ।

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श्रपि चारमतुपद्रे 'सुधाकरो'— 'लक्ष्मीं गृहीत्वा भूत्वा श्रपत्तनिजायां सा पुत्रोऽभवत् । तत्तो पठेद् विजनं श्राजमदुहंकर सक्न्नो ॥'

[लक्ष्मी को ग्रहण करके वह श्रपने श्रापत्काल में उसके पुत्र हो गया । इसलिये विद्या न पढ़े हुए वह श्रोत्र बड़ा भूपति है । यहां विद्या रूप गुप्तोंको देवोंने निवेदित् वज्रपूत होकर दोप बना दिया है । दोशको गुप्त बना देना जैसे वेघीसहारम ऋचुकोंके साथ विवादसे— दुर्योधन—सूतमुख कन्यापि- गुप्त साधानं महान्तरप श्रयमन्येन वा कृत । करोति महत्तीं प्रीतिमपकारोऽपकारिषाम् ॥ येनाच त्रोषकरो जयद्रथादिनिहतं श्रभिमन्यु सुपथुतुयोन्त्र, यसितमिव 'मश्चेतसा ।' श्रत्र तत्रधर्मं स्वकृतां श्रभिमन्यु निहत इत्यच दोप, स्त्रप्रीतिहेतुत्वेन गुप्तीकृतत । यथा वा नलविलासे— 'सर्वेपामपि सन्ति वेधमसु मृत कान्ता कुरङ्गीत्शो, नाप्यर्थी परद्रोहविलासिननसा नो जनो यापयन् । श्राझा कारितवान् प्रजापतिरपि स्त्रां पद्भिगापास्तत्, कामात् कय जनो न प्राजेन् परहिता पण्याङ्गना स्मृतं चेत् ॥'

और जैसे हमारे बनाये हुए सुधाकलशमे भो— लक्ष्मी गृहस्थोंका भूषण है भोर विद्या न पढ़ हुएका वह श्रोत्र भो बड़ा भूपति है । इसलिए प्राज्ञं दुह ख देनेवाली विद्याको [सकरा वह कानूनवाला गदहा] मूक हो पड़गा । यहां विद्या रुप गुप्तोंको भो देवोंने निवेदित वज्रपूत होकर दोप बना दिया है । दोषको गुप्त बना देना जैसे वेघीसहारम ऋचुकोंके साथ विवादसे— दुर्योंपन—यह कित्सा कथन बड़ा सुंदर है कि— ग्रपकाशं ग्रपकारियों नत्नप्रोंके प्रति गुप्त हपसे श्रयवा साक्षात हपसे छोटा या बड़ा हप या दूसरेके द्वारा किया जाने परलर श्रपकार भो प्रीतिदायक होता है । इसलिए श्राज्ञ श्रोत्रे किए जयद्रथ श्रादि [सात महारथियों] के द्वारा श्रभिमन्युके मारे जानेका समाचार सुनकर हमारा चित्त प्रसन्न हो उठा है । यहां शस्त्र धमका परित्यागकरके [सात महारथियोंने मिलकर] श्रभिमन्युको मार दिया यह [पमविरुद्ध होमेते] दोप होनेपर भी श्रपनेलिए ग्रानंददायक होनेसे गुप्त बना दिया गया है । जैसे नलविलासमे— सब लोगोंके घरमे तो गुप्तनयनों [मुंदरे] स्त्रियं कहांसे हो सकतो हैं श्रोत यापकारो राजा दूसरोकों हित्योंको विगाडनेवाले लोगोंको दण्ड देता है । भोर कामदेवने हप प्रजापतिसे भो अपनी ग्राझा पालन करवक लो [प्र्यात् प्रजापति सहन भो जय कामपर विजय प्राप्त न कर सके तव सामान्च मचुक्य कामपर विजय प्राप्त कर सक्गा यह तो प्रसंभव हो है । ऐसी दशर्में मर्द वदपाए न हों तो कामात-जन [अपनी तुष्टि के लिये] यहां जाय ?

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श्रत्रं पश्यस्वीतंवं दोषैः श्रद्धारुपैर्‌यथं गुणीकृतः । श्रापि च यथा ‘शुभाश्रये’—तथा नमो निगुर्णसेहरागां गुणीसलहिज्जन्मसायं । नित्यगुणविहूलत्तभवा सिविसो वि न जाए श्रइइउ ॥ [ तेम्यो नमो निगुर्णशिरोहरेम्यो गुणिश्लाघ्यममानजन्मभ्यः । निजगुणाविफलत्भवचा: स्वप्नेऽपि न येपामरतयः ॥ इति संस्कृतम्‌ ]

श्रत्रं निर्वेदाद् गुणीभिनिर्गुणौऽतवं दोपोडपि गुणीकृतः । उभयमेकत्र यथा—"मनतः सच्चरितोदयवयसनिन । प्रादुर्भवेवचनत्रयीः, सर्वत्रैव जनापवादचकितास्तिप्ठन्ति दु:खं सदा । श्रद्धयुत्पत्त्रमति । कृतेन न सत्ता नैवासता व्याकुलो, युक्तायुक्तविवेकशून्यहृदयो धन्यो जनः प्राकृतः ॥ श्रत्र सत्त्वं गुणौजपि दोपीकृत । प्राकृतत्वं हु दोपोडपि गुणीकृत इति । (११) श्रथोद्घातव्याख्यम्—

[सूत्र ९४९]—परस्परं स्यादुद्घात्यं गूढभावपराम्‌ ॥ [३५] ९०० ॥ प्रच्छक्‌-प्रतिवक्‍त्रोर्नयोर्न्यं गूढार्थमुक्ति-प्रयुक्तं यातमर्कं भापरां उद्दघाते प्रश्नातमके साधु उद्दघात्यम्‌ । यदा प्रश्ना विवादितोत्तरदानसमर्थे: किन्तु यन्नमसाभिप्रेतं तद् युक्तमयुक्तं वेत्यभिसन्ध्याय पृच्छति, प्रतिवक्ता चोचितमभिधत्ते तदा उद्दघात्य-मित्यर्थे ।

यहां ‘घेघ्यात्व’ रूप दोष भी श्रद्धारककी पुष्टिकेलिए गुप्त बना दिया गया है । प्रोर भी जैसे शुठाकलशमे—गुणिजन भी जिनके जन्मकी प्रशंसा करते हैं उन निगुर्णशिरोमणियोंको नमस्कार है । यपोंकि श्रपने गुप्तके विफल हो जानेपर हु:ख उनको स्वप्नमे भी नहीं होता है । यहां गुप्ताङ्गोने वाचक मारणै निगुपालव रूप दापकको भी गुप्त बना दिया है । [दोपको गुप्त बना देना श्रोर गुप्तको दोप बना देना इन] दोनोका एकसाय उदाहरणहैसे—उत्सम कार्योंके करनेके श्रभिप्रातो सज्जन पुरुप लोकापवादके भयसे वन्य्राप्रस्त ग्रोर सदा कष्टमे रहते हैं । किन्तु उचित-अनुचितके विचारसे रहित, इसलिए थो हृद्‌ भलाई-युराईसे व्याकुल न होने वाले मूर्खं साधारण लोग धन्य हैं । यहां सज्जनता रूप गुप्तको भी दोप बना दिया गया है प्रोर मूर्खता रूप दोपको भी गुप्त बना दिया गया है ।

(११) उद्दघात्यक नाम ग्यारहवॉँ यौध्द्यद्ध—जथ ‘उद्दघात्यक’ था [वा लक्‍षण ग्रादि करते हैं]—[सूत्र ९४ ९]—परस्पर गूढभावपराम्‌को ‘उद्घात्यक’ कहते हैं । ९०० ॥

प्रश्नकर्ता ग्रोर उत्तर देने वाले दानिकों के बीच परस्पर गूढभावयुक्त उत्तर-प्रत्युत्तर हप भाषया प्रश्नास्मक उद्दघातमे साधु होनेसे ‘उद्घात्यक’ ह्रनुसांता है । जब पूर्वदत्तने याता स्वर्यं विधक्षित उत्तर देनेमे असमयं होनेपर भी, जो मेरा श्रभिप्रेत प्रयं है वह उचित है या ग्रनुचित यह प्रश्न.

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यथा 'पाण्डवाभ्रदे' सूत्रधार-पारिपाश्विकयोः प्रश्नोक्तिः— "का भूपा वलिनां चमा परिभव. को यः स्वकुलेऽपि कृतः, किं दुःखं परसंश्रयो जगति कः श्लाघ्यो यः श्राश्रीयते । को मृत्युर्न यसं शुचं जशृत्ति के यैरर्जिता शत्रवः, कैर्विज्ञातमिदं विराटनगरच्छन्नस्थितं ते पार्थिवे ॥" इति ॥ [३४] १०० ॥

(१२) श्रथावलगितम्— [सूत्र १४२]—तच्चावलगितं सिद्धः कार्यस्यान्यमिपेक्षया । विरचितप्रयोगतयानेककार्यकरत्वाच्चायेजन सम्पत्तियुक्त तदन्यकार्यान्तलग्नादवल- गितम्। यथोत्तरचरितं समुद्भववनविधारदौहद्दायाः सीताया दोहदकार्यामिपेक्षया जनापवादादरक्ष्ये त्याग। केचिन् तु पात्रान्तरे स्वक्यापारं निदिश्य यत् कार्यान्तरकरसं तदवलगित- मित्याहुः। यथा कृत्यारावस्थासमुद्भे— "सूत्रधार.—[ निःश्वस्य ] श्वास्यन् ! नतु कवीमि— चित् इस श्रभिप्रायते [दूसरे से ] पूछना है, और उत्तर देने वाला उक्त उत्तर देता है यह 'उद्घात्यक' होता है । जैसे पाण्डवाभ्रदमे मूत्रधार और पारिपाश्विकके उक्त-प्रत्युक्ति [निम्न प्रकार] है— वतयावोंका भूपए क्या था ? [यह सूत्रधारका प्रश्न है]। समा [वलवानोंका भूपए है यह उत्तर]। ग्रपमान कोनसा है ? [यह प्रश्न है] जो अपने कुलके लोगों द्वारा किया जाय वहो . ग्रपमान है [यह उत्तर हुमा]। दुःख क्या है ? [यह प्रश्न है]। दूसरोंका भाश्रय लेना [दुःख है यह उत्तर हुमा]। संसारमें प्रशंसनीय कोन है ? [यह प्रश्न है] जिसका लोग भाश्रय लेते है [यहो इलाध्य है यह उत्तर हुमा]। मृत्यु क्या है ? [यह प्रश्न है]। द्रवन [हो मृत्यु है यह उत्तर हुमा]। द्रोकसे कोन बचता है ? [यह प्रश्न है । जिन्होंने मातृमोपर विजय प्राप्त कर लीं [वे हो दुःखसे पार हो जाते हैं यह उत्तर हुमा]। इस सबको किसने समभ लिया है ? [यह प्रश्न है]। विराटके नगरमें छिपकर रहने वाले पाण्डवोंने [इन सब तरहसे समभ लिया है यह उत्तर है] ।

(१३) श्रवलगित नामक वारहवाँ बीजगद्र — ग्रथ प्रवलगित [का लक्षणादि करते हैं]— [सूत्र १४२]—जहाँ ग्रन्थ कार्यंके बहानेसे कार्यकी सिद्धि हो उसको 'प्रवतलगित' कहते हैं । कायंकं प्रवतलग्नयन करनेसे 'प्रवतलगित' कहनाता है। जैसे उत्तररामचरितमे सीताशे मनमें घनविहारकी इच्छा उत्पन्न होनेपर सीताके इच्धा [दोहद] रूप कार्यंके महानेसे जनापवादके हरससे सोताको वनमे छोड़ देना [प्रवतलगितका उदाहरण है] । कुछ लोग अपने कार्यको दूसरे पात्रके ऊपर डालकर ग्रन्थ वायेंमें लग जानेसे 'प्रवर्तलगित' कहते हैं । जैसे कृत्यारावस्थासमुद्भे— सूत्रधार—[निःश्वास लेकर] प्राण श्वास्यन् ! मैं तो यह करता हूँ कि

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वाक्प्रपञ्चैकसारेण निर्विशेषोपालपद्धतिना । स्वामिनेव नटत्पेन निर्विशेषा: सर्वेऽथा वयम् ॥ तद् गच्छतु भवती पुत्रं मित्रं वा कमपि पुरस्कृत्य कमागतामिमां कुज्जीविकामनुवर्तयितुम् ।"

तत: क्रमादाह— "परिग्रहैकमात्राद् गृहसंसारसागरान् । तरमहं वन्युस्नेहमहावर्त्मदिदमुत्तीर्य गम्यते ॥" छात्र स्वजीविकां द्वारेण निश्चित्य परलोकहेतुककार्यकरगां स्वयमाश्रितम् । अ्यपरे तु प्रस्तुतेऽन्यस्मिन् कार्ये यदन्यत् स्वयमेव सिद्धं यति तदवलगितम् ! यथा छलितरामे— "राम:—लक्ष्मण ! तातविग्रयुक्तामयोध्यां विमानस्थयो नाहं प्रवेष्टुं शक्नोमि । तदवतीर्य गच्छामि । कोडपि सिंहासनस्याध: स्थित: पादुकयो: पुर: । जटावान् च वलयी चामरीव विराजते ॥ छात्र भरतदर्शनकार्योत्तरसयैवमेव सिद्धिरिति । (१३) अथावस्पन्दितम— [सूत्र १४३]—स्वेच्छोक्तस्यान्यथाल्यानं यदवस्पन्दितं तु तत् ॥[३६] १०१॥

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म्वेच्छद्या वर्षैनाभिप्रायमात्रेऽपि उत्तम्यान्यथारयानं यदवसन्निदतं ग्रन्थ्यार्थकथनरूपं यत् । तदवसन्निदतम् । चछु.मप.द.दिवतत् ग्रान्तर्गतसूचनीयसम्भवान् । यथा वेषो-संहारेः

अन्य प्रकारसे कथन करना 'श्रवसन्निदत' कहलाता है । [३६]१०१ । स्वेच्छासे श्रथात् साघारस दर्पणके प्रभिप्रायेसे कहे हुएका एक ग्रथ्य प्रकारसे कथन करना श्रथात् अन्य श्रथ्यंका कथन जो होता है वह ग्रन्थके फँडकनेसे ग्रान्तर्गत प्रभिप्रायके सूचनके समान होनेसे 'प्रवसन्निदत' कहलाता है । जैसे वेषो-संहारमे—

"सत्पक्षा मघुरङ्गिरः प्रमाधितताशा मनोद्भुतारम्भः । निपतन्ति धातराष्ट्राः कालवशान्मेदिनीस्पृशः ॥"

दारराष्ट्रानके प्रभिप्रायेसे सूचनधारने 'सत्पक्षा' श्रादि इलोक पढा है । उसमें 'धातराष्ट्र.' पद हंसोंके लिये प्रयाप् है । किन्तु उससे कोरवोंके पतन रूप अन्य श्रथ्यंकी भी प्रतीति होती है । यद्यपि सूत्रधारने इस श्रभिप्रायेसे नहीं कहा है । किन्तु पारिपार्श्विकने कोरवोंके नाश-रूप ग्रन्थलात्यंमें उसको ध्वन्या कर ली है । ग्रतएव यह 'ग्रवसन्निदत' नामक वृथ्यज़कका उदाहरण है ।

"भीता-जात् ! पद्भाप तुचमेहि श्वसृज्भाग् । मंतकव् । सेऽच श्व राया विप्रेप्सितपतिमिलइइय ।

मुन्दर पक्ष वाले [हस शौर दुरोन्धनके पक्षमे 'सत्पक्षा'का श्रयं भोक्तम्, द्वेष श्रादि उत्तम पुरष जिसके पक्षमे हैं इस प्रकारके कोरव यह होगा] जिन [हंसों] ने [अपनी दिसाप्रोंको प्रलकृत कर दिया है [ग्रोर कोरवोंके पक्षमे रजिन्होने सारी दिसाप्रोंको ग्रपने वशमे कर लिया है ।] पदकं कदर्थनाही उद्धत श्रारम्भ [ध्यापार] करने वाले धातंराष्ट्र [प्रथात हस श्रोद कौरव दोनों] काल [हसपक्षमे शारद.तु रूप काल, तथा कौरव पक्षमें मृत्य्ु रूपकाल] के वशोभूत होकर पृथिवीपर गिर रहे हैं । [पतनितका श्रयं हस पक्षमे उतरना श्रोद कौरव पक्षमे गिरसना है । हंस शारद ऋतुमें पृथिवीपर उतरते हैं ।]

[जात ! प्रभाते युवाभ्यामयोध्यायां गन्तऽयम् । म च राजा विनयेन प्रऐन्तऽयम् ]

यहां सूत्रधारने शारद ऋतुके वशानके लिये स्वेच्छया हंसका वध्यांत किया है । इसको पारिपार्श्विकने दुर्योंधन श्रादि धृतराष्ट्रके पुत्रोंके ग्रपघतल-परक श्रयंमे ग्रथ्य प्रकारसे समभ लिया है । [इसलिए यह 'ग्रवसन्निदत' का उदाहरण है] ।

यथा च द्विलितरामे— "सोता—हे पुथो ! कत् सबेरे तुम दोनोँ प्रपोद्यो जाता, ग्रोर उस राजाको विनय-पूर्वंक प्रयाम करतस ? [जात ! वयँ हि दोनोँ राजऽसि । सेवक वयँ जाताः श्रस्मि ? [जिन्ह हतको विनयपूर्वंक नमस्कार वयोन करें ? ]

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मत्तानि च प्रयोदश-वीथ्याद्यानि सर्वरङ्गपकाणां सर्वसन्धिषु च विभजनीयानि । सर्वसन्धिसाधारण्यादामुखे च सन्ध्यङ्गं भय पृथक्मुक्तान्नीलैः ॥[३६]१०१॥

सीता—वह तुम्हारे पिता हैं । तथा—क्या रघुपति हम दोनोंके पिता ? सीता—[सासदूस्] केवल तुम्हारे हो नहीं सारी पृथिवीके [वह पिता हैं] । इन तेरह वचनोंको सारे रूपकोंके सव सन्धियोंमें दिखलाना चाहिए । सब सधियोंमें साधारण होनेसे, मोर प्रथममें भो निवद्ध होनेसे इनको सन्ध्यङ्गोंसे अलग कहा गया है ॥[३६]१०१॥

स्वां स्वां वैशेषिकीं हितवा सन्धिं-वृत्त्यादिकं स्थितिम् । सामान्या नाटकस्याने विज्ञेया रूपकान्तरे॥[३७]१०२॥

प्राय व्यायोग आदि प्राय रूपकोमें सामान्य, नाटक लक्षणका प्रतिदेश करते हुए [प.यकार] कहते हैं— 'वैशेषिकीं' पर्यात् प्रकारारए । 'सन्धिं-वृत्त्यादिकाम्' इसमें प्रायाद् नाटकसे भद्र-पारिमाण, रस मोर नायक प्रादिका प्रहण करना चाहिए । 'ग्रन्या' इस पदसे पात्रोक्तिवंविप्र, पद्यूपाय, दशा, सन्ध्यङ्ग, शकलए तथा नायकादि प्रकृतितर? प्रोचित्य प्रादि रूप रिथति रुपकान्तरेभो मातकके प्रतिपादित [स्थितिलिङ्‌ सम्भे लेनी चाहिए । प्रकरणएमे तो नाटक की समानताका कहो हो जाना घुणा है । मोर नाटिका तथा प्रकरणोने प्रतमंत होनेमे [जन दोनोंके [विपयोमे] अलग कुछ रहनेशो प्राप्यपक्षता नहों रहती है । इस प्रकार सप विषय स्पष्ट हो जाता है ॥[३७]१०२॥

इति रामचन्द्र-गुणचन्द्रनिरचिताया स्वप्रणीत-नाट्यदर्पणाविवृत्तौ प्रकरणप्रकरानिरूपणं द्वितीयो विवेकः समाप्तः ॥

भो रामचन्द्र गुणचन्द्र विरचित स्वप्रणीत नाट्यदर्पणको विवृत्तौ प्रकरणादि, षष्ठन रपकानिरूपणं नामक द्वितीयो विवेकः समाप्तः ॥

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अथ तृतीयो विवेकः

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अथ तृतीयो विवेकः

अथ रूपकोद्देशोक्तिह्रिया. नंमप्राप्ता वृत्तयः. प्रपञ्च्यन्ते— [सूत्र १४५]—भारतो सात्वती कैशिकीभारती च वृत्तयः । रस-भावाभिनयगतचतुष्टयो नाट्यमातृकः ॥ [९]१०३॥ पुंरपार्थसाधको विचित्रों व्यापारो वृत्ति । रस-भावाभिनयैर्व्यक्तमात्रा । तास्त्रयश्च वैन्त । रस-भावाभिनयसम्भिन्नो हि सर्वो नाट्ये व्यापार. । 'चततत्र' इति चतुर्भेष्चतुर्थमन्यन्न चेश्राप्याधानव्यवस्थया, श्रवपरथाडनेनलव्यापारसमवलितमेकमेव वृत्तितत्त्वम् । न नाम प्रवन्धेपु व्यापारान्तरासंवलित कोऽप्येकस्यां वृत्ताव् कायिको वाचिको मानसो वा व्यापारो लद्यते । कायिको हि व्यापारुत्पयो मानसैरौचिवेश्च व्यापारैः सम्भाव्यन्ते । श्राव्योऽलिसितं मनः प्रत्ययं विना रक्ष्यमाणः कायैव्यापारपरिस्पन्देऽस्याभावान् । वाचिकयो मानसय्च कायपरिस्पन्दाविनाभाविन्यौ हि । तल्लवादिव्यापाराभावे ग्रथ नाट्यदर्पणपादीयिकायां तृतीयो विवेकः

वृत्तिनिरूपण—

[प्रथम द्वितीय विवेके स्पष्कके समस्त भेदोंके लक्शणादि कर चुकनेके वाद] प्रव स्पकोंका उद्देस [प्रथमतः नाम-परिगणन] करानेवाले [प्रथान्त् ३८] इलोकोंमें [संव्युतस्स' तथा 'निवृतस' श्राद्दोंके प्रयोग द्वारा] कही हुई वृत्तियों [को ध्यास्याय्र] कर प्रवसर प्राप्त होनेसे वृत्तियोंका निरूपण [मारम्म] करते हैं । [सूत्र १४५]—रस, भाव, प्रभिनय विपयक भारतो, [सात्वती, केशिकी श्रोर श्रार-भटी] भनुने चार प्रकारको वृत्तियाँ नाट्यशास्त्रको माता [के सदृश] होतीहैं । [९]१०३। पुरुपायंक साधक नाना प्रकासेक ध्यापारको 'वृत्ति' कहते हैं । रस, भाव श्रोर प्रभि-नय [को लक्शयादि] प्रागे कहेंगे । [भारतौ श्रादि वृत्तियाँ] तनय [प्रथमत् रसभावादिदशमप] होनेसे उनका प्रतुगमन करती है । [इसलिए इस कारिकामे उनके विशेपरूपमें 'रसभावाभि-नयगा' इस विशेषणपदका प्रयोग किया गया है । इसका यह श्रभिप्राय है कि] नाटचमे सारा हो ध्यापार रस, भाव श्रोर प्रभिनयसे युक्त होता है ।।[कारिकामें प्राए हुए] 'चततत्र' इस पद्से कहा हुग्रा चतुर्भेदत्वक किसी एक ध्यापारराशिकी प्रधानताको विवक्षासे कहा गया है प्रथन्या [वास्तवमे तो] ग्रनेक ध्यापारोंसे मिलकर हुग्रा वृत्ति-तच्व [प्रथमतः ध्यापार] एक हो होना है । क्योंकि नाटकादि [रूप प्रवन्धों]मे [कायिक, वाचिक श्रोर मानसिक ध्यापारोंमेसे] कोई भी ध्यापार ग्रनन्य ध्यापारोंके योगके बिना नहीं होता है । कायिक ध्यापार मानसिक तथा वाचिक ध्यापारोसे मिलित होते हैं । क्योंकि शबद्द द्वारा निर्दिष्ट मानसिक ज्ञानके बिना कोई सुन्दर कायिक ध्यापार सम्भव नहीं है श्रोर मानसिक तथा वाचिक ध्यापार तो कायिक ध्यापारके विना हो हो नहीं सकते हैं । क्योंकि ताचु श्रादिके ध्यापारके बिना श्रदृकका

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वचनानुच्चारस्पात् प्रायोऽदिरूपकायपरिस्पन्दाभावे मनोवृत्त्युपलत्तयाच्च । मन-शून्यरच व्यापारः काव्यिको वाचिको वाग्जखकत्यादिनियनघनीयनैव । निदृपकोऽपि हास्यार्थं बुद्धिपूर्वकमेव विसंस्थूलं विचेष्टते । श्रत संकीर्णैस्त्वेगेपे श्रंश्रामाधान्यापत्तया वृत्तयश्चतसः ।

उच्चारस्प नहीं हो सकता है । प्रोर प्रादि रूप काविक व्यापारके प्रभावसे मनोवृत्त्यापारोंका भी परिज्ञान नहीं हो सकता है । [इसलिए मानसिक तथा वाचिक व्यापार दोनों काविक व्यापारके साथ मिथित होते हैं । प्रकटले नहीं हो सकते हैं । इसौ प्रकार] मनोवृत्त्यापारसे रहित काविक पा वाचिक व्यापार तो रस [ग्रानन्द] होनसे [नाटकादिमें] वर्णन करनेके योग्य नहीं होता है । विदूपक भी हास्यके लिए बुद्धिपूर्वक हो चेष्टाएं करता है । इसलिए [काविक, वाचिक ग्रोर मानसिक व्यापार रूप भरतौ श्रादि चारों वृत्तियोंके परस्पर] संयोग होनेपर भी [उस उत्त] श्राद्रको प्रधानताकी दृष्टिसे चार प्रकारको वृत्तियां [कही गई] हैं ।

नाट्यस्य श्याभिनेयकाव्यस्य मातर इव मातर । श्रास्यो हि वर्णनीयत्वेन कवि-हृदये व्यवस्थितास्तस्य काव्यमुत्पद्यते । 'नाट्य' इति च प्रस्तुतवचमुं । तेनाभिनेयेपि काव्ये वृत्तयो भवन्त्येव । न हि व्यापारशून्यं किश्चित्काव्यमनीयरस्ति । रज्यादानन्तरं च नाटचमिति रज्यस्य व्यापारशून्यत्वेनाभुक्तिल्वेडपि न करिचद् दोप । मुच्यतेरौ व्यापाराभावेन श्रृस्यभावेडपि न नाटचस्य वृत्तिमयत्वहानि । वाच्यल्यापत्तया वृत्तिमयत्वस्याभिमतत्वादिति ॥ [९] १०३ ॥

[ग्रागे कारिकामें ग्राए हुए 'नाटचमातर' पदका ग्रर्थ करते हैं] नाटचकी म्रप्रयात् धभिनेय काव्यको माता [जननी] होनेसे [वृत्तियां नाटचको] माता [कहलाती] है । क्योंकि कविके हृदयमें ये [भरतौ श्रादि वृत्तियां] ग्रनून रूपसे स्थित [काविक-वाचिक-मानसिक व्यापार रूप] इन [भरतौ श्रादि चारों वृत्तियों] से हो काव्यकी उत्पत्ति होती है [प्रथात् कवि अपने काव्यमें काविक, वाचिक ग्रोर मानसिक व्यापारोंका हो वर्णन करता है । यह त्रिविध व्यापार हो काव्यका जनक होता है प्रोर भरतौ प्रादि वृत्तियां काविक वाचिक, मानसिक व्यापार रूप हो हैं । इसलिए काव्यकी जननताके होनेसे उनका काव्यकी माता कहा गया है । 'नाटचमातर' इसमे] 'नाटच' यह पद प्रकारान्तर हेतुसे प्रयुक्त है । [अर्थात् इस समय नाटकका निष्पप्ति किया जा रहा है इसलिए यहा 'नाटचमातर' कहा गया है । घ्येसे ये वृतियां हैवस नाटच प्रथांत् प्रभिनेय काव्यको हो माता हैं । क्योंकि यध्य-वाच्योमे भी काविक, वाचिक ग्रोर मानसिक व्यापारोंका हो वर्णन होता है] इसलिए ग्रभि-नेय [ग्रथांत् स्थध्य] काव्यमें भी [भरतौ श्रादि] वृत्तियां होती हो हैं । क्योंकि व्यापार-रहित किसी ग्रथंका काव्य होना शक्य नहीं होता । [नाटकमें] रसोंके ग्रनन्तरं च नाटच होता है इस कथनसे व्यापार-रहित रसके ग्रभुक्तिल्व होनेपर भी कोई दोप नहीं है । मुख्यतः दो ग्रौ व्यापारके प्रभाव होनेपर भी नाटचके श्रृस्यभाव होनेपर भी नाटचके वृत्तिमयत्वकी हानि नहीं होती है । क्योंकि वाच्यलयापत्तया वृत्तिमयत्व-स्याभिमतत्वादिति ।

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प्रायः संस्कृतनिःशेपरसाढचा वाचि भारतो ॥[२]१०८॥ सर्वरूपकेपु श्रामितेयानमिनेयेपु गमनशीलाः प्रायस्तन्मयत्वाद् वर्णनीयाः । श्यामरूष्णवचनयोरस्थितिः सप्तभिः स्त्रियो भवेत् । प्रायो बाहुलेयेन सङ्केतनम्‌ पररसैरच बीप्सा । वृत्तिमप हो माना जाता है । यह प्रन्थकारका श्रभिप्राय है] ॥ [९] १०३ ॥

इस प्रकार रिद्धली कारिकामें वृत्तियोंका सामान्य लक्षणा करनेके बाद ग्रब ग्रागे भारती ग्रादि चारो वृत्तियोंमेंसे एक एक वृत्तिका लक्षणा करेगे । पिछली कारिकामें यह कहा गया कि चारो वृत्तियां कायिक, वाचिक तथा मानसिक व्यापार-रूप है इसो दृष्टिसे ग्रागे इन चारोंके लक्षणा करेगे । इस इनमेंसे भारती वृत्ति वाचिक व्यापार-रूप ग्रोर सात्त्वती वृत्ति मानसिक व्यापार रूप होती है । शेप कैशिकी तथा भारभटी दोनों वृत्तियां कायिक व्यापार-रूप होतीं है । काव्य ग्रोर नाट्यमें वाचिक व्यापारकी प्रधानता होनेके कारणा सबसे पहले वाचिक-व्यापार रूप भारतीवृत्तिका लक्षणा निम्न प्रकार से करते है — [सूत्र १४६]—समस्त रूपकोंमें रहने वाली, ग्राह्युत तथा प्ररोचनासे युक्त [प्रायंत नाट्य के प्रारंभिक भागोंमें विशेष हपसे उपसिथित] समग्रासां रसोत्के परिपूरां, तथा प्राप्य संस्कृत [भावा] का ग्राविर्भावन करने वाली, वाग्यापार-प्रधान वृत्ति ‘भारती’ [वृत्ति कहलाती] है । [२] १०८ [कारिकामें ग्राए हूए ‘सर्वरूपकगामिनो’ पदका ग्रभिप्राय यह है कि यह भारती वृत्ति] श्रामिनेपु ग्रोर ग्रनभिनेयपु [प्रायांत दृश्यक-काव्य ग्रोर श्रव्यकाव्य] सब प्रकारके कायोंमें [विधमान रहने वाली] है । क्योंकि सारा वाङ्मय प्रायः उससे मुख्त [भारतीयृत्तिमप] होता है । [‘ग्रामूल प्ररोचनोहिताः’ इति प्रयं करते हैं कि] ग्राह्युत तथा प्ररोचना [वप कथय या नाट्य भागों] का उद्य जिससे होता है । [ग्रामूल ग्रोर प्ररोचना विससे कहते हैं यह प्रदान यहां उपसिथित होता है । इसका लक्षणा प्रथमतो दो कारिकाग्रोंमें करेगे] । प्रायः श्रयात् प्रतिप्रकृतर्‌ सात्त्विक भावा ग्रोर सम रसोंमें मुख्त [भारती वृत्ति होती है] । भारतीयृत्तिपे इस लक्षणामें मुख्यतस्पतः ग्राह्युत तथा प्ररोचना भागोंमें भारतीवृत्ति का निर्देश दिया गया है ग्रोर उसके प्राप्य गमृतभाय तथा सब रसोंमें मुख्त कहा गया है । ‘ग्राम्य’ दशब्द जो प्रयोग किया गया है उसकी प्रत्यक्कार मह‌ दशब्दया भरते है कि यद्यपि भारतीवृत्ति में मुख्य स्थान ग्राह्युत तथा प्ररोचना भागोंको माना गया है किन्तु इनमें भिन्न व्यापार हो प्रयोग होता है किन्तु वह एकम्र ममिनिवायं नहीं है । वाचिक-रभी गसृतभये भिन्न मोचनमायका भी भारतीवृत्तिमें प्रवसम्पन किया जा सकता है । इसो वानलो प्रंयकार

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प्ररोचना-ग्रामुखयोरन्यात्रापि च रूपकैकदेशे प्राकृतादिपाठेन भारतीदर्शनेनां प्रायोग्रहृयं श्रर्थ्यत। सर्वैस्त्रकृभावित्याद् रसानां च वाग्जन्यत्वाद् सर्वरसात्मकत्वम्। ये तु भारतीं वीभत्स-करुणौ पत्नात्रासते सर्वरसप्रधानवीथी-हास्यप्रधानप्रहसनानि स्वयमेव भारत्यामेव वृत्तौ नियन्नितानि नावेदितानि ।

'प्ररोचना' और 'ग्रामुख' [भागों] से ग्रनयत्र भो रूपकोंके किसो एकदेशमे [भारतो वृत्तिके देखेजानेते] और [सर्वकृतभावादिको छोड़ कर] प्रकृत प्रादि [भाष] के पाठसे भो भारतोवृत्तिके देखे जाननेसे [कारिकामें किया गया] 'प्रायः' शबदका प्रयोग सायंक है । रतोंके सव रूपकोंमें व्यापक होने ग्रोर वागी द्वारा व्यक्त होनसे [वागव्यापारप्रधाना भारती वृत्ति] सर्व-रसात्मक होती है । जो [दशरूपककार धनञ्जय] भारतीवृत्तिमें [सब रस न मान कर] केवल वीभत्स और करुण रस मानते हैं उनहोने स्वय [अपने ग्राप] हो भारतीवृत्तिमें नियन्नित सर्व-रसप्रधान [वीथी] शृङ्गार और वीररस प्रधान [भाणा], तथा हास्यरस-प्रधान [प्रहसन कमल] वीथी भाणा तथा प्रहसनो की ग्रोर ध्यान नही दिया है [इसलिए वे भारतीवृत्तिमें केवल वीभत्स और करुणरसको हो मानते हैं । किन्तु उनका यह सिद्धांत ठीक नही है] । इसका श्रभिप्राय यह है कि धनञ्जय जो केवल वीभत्स तथा करुणरसमें भारतोवृत्तिका प्रयोग मानते हैं उन्होने भो वीथी, भाणा तथा प्रहसनके लक्षणों में भारतीवृत्तिको समावेश माना है । सूत्र १४० में 'वीथी' का लक्षण करते हुए 'सर्वस्वाग्यामरस चोथीस्त्र लिखकर प्रकृत धन्यकर्त्तन वोधीमें समस्त रसोंके रखनेंकर विधान किया है । १४१ वें सूत्रमें वीथीके वैरह प्रयोगका वर्णन करते हुए किर 'भारतोवृत्तवतो न वोधव्यानी प्रयोका' लिखकर वोधीमें 'भारती' वृत्तिका समावेश किया है । इस प्रकार वीथीमें समस्त रसोंके साथ भारतीवृत्तिका प्रयोग माना जाता है । इसके प्रतिरिक्त ११६वें सूत्रमें 'भाण-प्रधानभृङ्गार-वीरो' लिखकर भानमे शृङ्गार तथा वीररसकी प्रधानताका प्रतिपादन किया गया है । और उसके साथ हो १३०वें सूत्रमें 'वृत्ति मुंख्या च भारती' लिखकर भानमें भारतीवृत्तिहो मुख्यत। प्रतिपादन की है । इसलिए वीर तथा शृङ्गारके साथ भारतीवृत्तिका सम्बन्ध भावके लशणमें प्रतिपादन दिया है । किर सूत्र १३१ वें 'हास्यादि़ माणस्यङ्गयृदृत्ति प्रहसन द्विपा' इस प्रहसनके लशरामें हास्यरसको प्रहसनका प्रधानरस तथा भानके समान सन्धि, अङ्क तथा वृत्तियोंक। प्रतिपादन कर प्रहसनमें भो भारतीवृत्तिको प्रथमानता निर्दिष्टकी है । इसलिए हास्यरसके साथ भो भारतीवृत्तिका समावेश पाया जाता है । इसका प्रयय यह हुग्रा कि भारतीवृत्तिका सम्बन्ध प्रहसनके लशराके ग्रनुसार हास्यरसके साथ, भानके लशणके ग्रनुसार वीर और शृङ्गार रसोंके साथ, और वीथीके लशएने ग्रनुसार सभी रसोंके साथ होता है । वीथी, भाणा और प्रहसनके ये लशण सर्वसममत लशराए हैं । जो दशारूपककार धनञ्जय प्रादि भारतीवृत्तिका सङ्क्षप केवल वीभत्स और करुण रससे वतलाते हैं, वे भो वीथी भाणा और प्रहसनके हवो प्रकारके लशराकोंके ग्रनुसार उन्होने भो वीथी, भाणा तथा प्रहसनोँ भा।तीवृत्तिमें नियन्नित कर दिया है । किर भो वे भारतीवृत्तिका सम्बन्ध केवल वीभत्स और करुण रसते यतलाते है । यह बात उनके अपनेहो कथनके विपरीत हो जाती है । इसो वातको पुञ्जीकाने महाँ 'ते' वीथी, भाणा, प्रहसनानि स्वयमेव भारतस्व वृत्तो नियन्नितानि नावेदितानि' इस रूपमें लिखा है ।

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वाचिर्वागव्यापारविपये धाव्यापारातिमकेल्स्यर्थे। भारतौ वागव्यापारविपय एतद्ययोगगव्यवच्छेदः। तेन वाचिकाभिनयातिमका सात्वत्यपि भवति। वृत्त्यन्तराणि तु सर्वथाभिनयविपयाणि। भारतीरूपत्वाद् व्यावारस्य भारतीरिति॥ [२] १०४॥। श्रथ भारतीसम्भवमासुरकं लच्यत

इस स्थलका पाठ कुछ भ्रष्टप्राय है। पूर्वं संस्करशोधमे 'सर्वावयवप्रधानभूजङ्गारवीरभासाप्रधानहास्यप्रहसनानि' इस प्रकारका पाठ धरया था। उसकी कोई सङ्ङति नहीं लगती है। इसमे 'सर्वरसप्रधानवीर-शृङ्गारवीरप्रधानभासा-हास्यप्रधानप्रहसनानि' इस प्रकार पाठ होना चाहिए था, अतः हमने यही पाठ मूल मे दिया है। 'वाचि' प्रयात्न वागव्यापारके विपयमें होने वाली प्रयात्न वागव्यापारात्मक वृत्ति 'भारती' ही होती है। भारती वागव्यापारके विपयमे ही होती है यह प्रयोग-व्यवच्छेद [का नियम] है। [इसका अभिप्राय यह है कि भारती वृत्ति वागव्यापारके विपयमें ही होती है। प्रयत्नप्रयत्न नहीं। इसका यह अर्थ नहीं है कि केवल भारती वृत्ति ही वागव्यापार-विपयक होती है, प्रयत्न वृत्तियोका वागव्यापारसे सम्बन्ध नहीं हो सकता है।] इसलिए सात्वती वृत्ति भी वागव्यापार-विषयक हो होती हैं। भारती तथा सात्वती वृत्तिको छोड़कर] अन्य वृत्तियां तो सर्वथा [कायिक वाचिकरूप] होनेसे [पूर्वांतरपर] ध्यावारक [प्रयात्न वार्चिकरूप] होनेसे [इस युक्तिका नाम] 'भारती' [रखा गया] है। इस कारिकाकी व्याख्यामे 'भारती वागव्यापारविपय एव इत्थयोगगव्यवच्छेदः' यह वाक्य धराया है। इसे विशेष रूपसे समझनेकी आवइयकता है। 'एव' पदके प्रयोग-व्यवच्छेद, प्रयत्नप्रयोग-व्यवच्छेद-व्यवच्छेद ये तोन अर्थ माने गये है। 'पार्थ एव धनुर्धरः' प्रकारि वाक्योमे जब 'एव' पद विशेषके साथ सगत होता है तब वह 'विशेष्यसंगतस्तद्व-वकारोऽन्ययोगव्यवच्छेदकः' इस नियमके अनुसार 'पार्थ एव धनुर्धरः। नाम्यः' यह उसका अर्थ होता है। इससे विपरीत जब 'पार्थों धनुर्धर एव' इस रूपमे उसका सम्बन्ध विशेषके साथ होता है तो 'विशेष्यसमतत्संबंधारो प्रयोग-व्यवच्छेदकः' इस नियमके अनुसार उसका अर्थ प्रयोग-व्यवच्छेद होता है। अर्थात् पार्थमें धनुर्धरत्व तथा अन्यत्र 'एव' मे अन्ययोगके साथ संगत होनेसे एवकार प्रयोग व्यवच्छेदक है।।[२] १०४।।

सूत्रधारस्य वक्रोक्त-स्पष्टोक्तयंत तदामुखम् ॥[३]१०५॥ पारिपाश्विक एवं विदूषकपेक्षधारी विदूषकः।

प्रब भारती [वृत्ति] निर्मित [प्रचवा भारतों वृत्तिं निर्मातुं] प्रायुक्ता सक्षते करते हैं— [सूत्र १४७]—सूत्रधारका विदूपक, नटी एवं प्रचवा पारिपाश्विकके साथ स्पष्ट हपने प्रयवा वक मार्गंसे, भतूत [धर्मान्तु नायकादिकवि मुख्यपात्रे प्रवेश] मर सर्पादन करनेचास्ले जो वार्तालाप होता है वह 'प्रस्तावना' [हललाता] है। [नटका मुख्य सहायक] पारिपाश्विक हो विदूषककल द्वेप धारए कर सेनसे यहू!

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मार्पे. पारिपार्श्विकः । विदूषक-नटी-मापेंव्यस्तेः समस्तैर्वा सह सूत्रधारस्य रङ्कसूत्रप्रणाकतुः, सूत्रधारगुणानुकाररय वा नाट्यचाथापनाकतुः स्थापकः सय, प्रभृतरय काव्यार्थस्यात्रेपि उपस्थापकं भापरां वकोक्ततै। साक्षादू विवक्षितार्थस्याप्रतिपादकैः, स्पष्टैक्तै साक्षादू विवक्षितार्थस्य प्रतिपादकैश्च यत् स्वस्याभिप्रायोत्कीर्तनं तदामुखम् । 'ग्राम् मर्योदायाम' तेन मुखसन्धियं प्राप्य निवर्तते । 'ईपनदर्थे वा' तत् ईपनसुरं मुखसन्धिसूचकवादासम्भ । प्रकथनाभङ्गदौ नाट्येतदुच्यते । ईदं तावदामुखं नाटच्याद् यथाभूमूतम् । तत्र कदाचिदसं रङ्कसूत्रयितचैव ग्राह्यमुसार्थ-मनुतिष्ठति, तथा च इष्यते—'नान्यान्ते सूत्रधारः' । 'नान्यान्ते' इत्यवयवेऽ समुदायोप-

विदूषक कहा गया है । [वैसे नायक राजा प्रादिका सहायक विदूषक होता है उस विदूषकल पहां ग्रहण नहीं सम्भना चाहिए] । प्रस्तुतु सूत्रधारका सहायक, जो पारिपाश्विक भी कहलाता है वही नाटकादिके प्रारम्भमे मुख्यपात्रका रङ्कमञ्चपर प्रवेश करानेके लिए विदूषकक वेष धारकर के सूत्रधारके साथ धात्तालाप करता है । उसो पारिपाश्विककेलए यहां विदूषक शब्दका प्रयोग हुन्आ है यह ग्रन्थकारका प्रभिप्राय है । मार्पका प्रयंत भो] पारिपाश्विक [प्रयांत सुनधार या नटका मुख्य सहायक] है । [यहां पारिपाश्विक अपने मुखय हपमें प्रभिप्रेत है । पहिले जिसको विदूषक हुन्पसे उपस्थति बतलाई थो] । विदूषक नटी और पारिपाश्विकोंके साथ श्रलङ्ग-श्रलङ्ग धारयवा एक साथ सूत्रधार प्रय्यत्न रङ्कको ग्राभोयोजना करनेवाले [प्रधाननट] कर, धारयवा नाट्यायंकी स्यरपना करने वाले और सुनधारहो गुप्तोल प्रभुकरशा करने वाले [किन्तु सूत्रधारसे भिन्न] 'स्वापक'का प्रस्तुत काव्यार्थको उपस्थित करानेवाला जो भापरां, वकोक्योसे प्रभ्यत्न साक्षात् रुपसे विवक्षित ग्रयंका प्रतिपादन न करने वाले [वचनोसे], अथवा स्पष्टोक्तियोसे प्रभ्यत्न साक्षात् हपसे विवसित ग्रयंका प्रतिपादन म करने वाले वाश्योसे जो [भापरां प्रभ्यत्न] अपने प्रभिप्रायका कथन करता है वह 'ग्रामुख' कहलातां है । [ग्रामुख शब्दमे ग्राङ् उपसगं है । उसके दो प्रभयां होते हैं · एक मर्यादां और दूसरां प्रभिनिबिध । ये दोनों शबद सोमा ग्रयंके घाचक हैं । उनमे मेद यह है कि जो सोमा बतलाई जातो है वह यद्य सोमत होने वाले भागके ग्रनन्दर हो समाविष्ट होती है तो उसे 'प्रभिनिधि' कहते हैं । और यदि उस तक हो, ग्रयं उसको बाहर छोड़कर उसके पहिले-पहिले सोमा मानो जातो है तो उसको 'मर्याद' कहते हैं । जैसे यहां ग्रामुखकी सोमा मुखसन्धि पर्यन्त कही है । उसमे मुख-सन्चिकां मी ग्रामुखके भीतर माना जाय तो आङ् अभिविधयंक और यद्य मुखसन्धिको ग्रामुखमे प्रसङ्ग रखना प्रभिप्रेत है तो 'ग्राड्' का ग्रयं मर्यादां होगा] । यह ग्राड मर्याद ग्रयमे है इसलिए [ग्रामुख] मुखसन्धि तक पहुंचकर [प्रय्यत्न मुखसन्धिोसे प्रारम्भ होनेसे पहिले] समाप्त हो जातां है । ग्रथवा [यहां ग्राड्] 'ईपत्' प्रय्यमे है इसलिए ईपनमुख [प्रय्यत्न छोटां मुख प्रभ्यत्न] मुखसन्धिकां सूचक होनेसे प्रारम्भ [ग्रामुख बहलातां है] । इसीलो

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चारान् पूर्वरङ्गान्त इति दृश्यते । नान्दी हि पूर्वरङ्गस्याङ्गम् । श्रावृ च पत्ते श्रामुखर्थस्प सूत्रधाराविपयत्वान्मुखप्रसङ्ग्ये । प्रभृति कवेच्योपचार ।

है । यहां 'नान्द्यन्ते' इस पदमें क्रियापदमें समुदायका उपचार होनेसे [नान्दी पद समस्त पूर्वरङ्गका बोधक है यह सम्भवना चाहिये] । क्योंकि नान्दी पूर्वरङ्गका अङ्ग है । [किन्तु यहां उस श्रङ्ग या प्रधानवचक 'नान्द्य' पदमें जिसका यहां श्रङ्ग या प्रधानवचक है उस नान्दी-श्रङ्गसमस्त पूर्वरङ्गका ग्रहण होता है । अर्थात् समस्त पूर्वरङ्गका विधान समाप्त हो जानपर सूत्रधार प्रवृत्त होकर मुख्य नाटकके मातृकके प्रवृत्तिकी प्रस्तुतवना प्रारम्भ करता है] इस पक्षमें मुख्यका [प्रतिपाद्य] प्रयं सूत्रधारसे सम्बन्ध रखता है, इसलिए मुखसङ्गसे पहिले-पहिले [ प्रयवा मुखसन्धिके प्रारम्भ होनेसे पूर्वं तक जो किञ्चिद् व्यापार होता है वह सङ्घ] कविकृतव्यापार होता है ।

इसका प्राभिप्राय यह है कि मुखसन्धि, मुख्य नाटकवो मुखं है, इसलिए मुखसन्धिसे मुख्य नाटकवा प्रारम्भ होता है । उस मुख्य नाटक वाले भागमें जितना व्यापार होता है वह कविके द्वारा वाचित होनेपर भी कविका व्यापार नहीं होता है । अपितु जिन पात्रोंके द्वारा उसका कथन होता है उन पात्रोंके द्वारा व्यापार होता है । कवि केवल उस व्यापारको सुनानेके निमित्त वनता है । किन्तु मुखसन्धि या मुख्य नाटकवो प्रारम्भ होनेसे पहिले 'प्रामुख' तक या जो व्यापार होता है वह सब कविकृतव्यापार होता है । काव्यशास्त्रके सङ्ग्रहप्रन्थोंमें श्रुतिनिर्मेदोके निरूपणप्रसङ्गमे 'कविप्रोदित्सितः' और 'कविनिबद्धवस्तुप्रोदित्सित-' दो वृत्त्यङ्गोंको माना-मलाग माना है । यद्यपि कविनिबद्ध वस्तुनो चित्त कविके द्वारा हो निर्वद्ध होनेते कविप्रोदित्सितमें आ सकती है । किन्तु स्वय कविकी वक्तिर्मे कविनिबद्ध वस्तु व्यापाररहते मुखं प्रणयन मानकर 'प्रामुख' तकमे व्यापारको कवि व्यापार कहा है । उमके भागे मुख्य नाटकके भीतर होनेवाला सारा व्यापार कविके द्वारा वाङ्मित होनेपर भी कवि-व्यापार नहीं अपितु वाच्य-निबद्ध पानो या वस्तुके व्यापार है । यत् प्रन्थकारका प्राभिप्राय है ।

'प्रायोगिक' के हम समुद्धरणके समर्थनार्थं यह कहना है कि नटी, कवि, पारिपार्श्विक आदि प्रयोक्ता प्रयोग किया है । नाटकका ग्रभिनय करनेवाले नटवर्गा प्रधान आयं मुख्यके मार [मुख]का सङ्झानन करता है । इसनिए उसके 'मुखपार' कहा जाना है । इस वाक्यमे सूत्रधारके दो प्रदान सहायंक होने है । एक नटी और दूसरे पारिपार्श्विक । नगे मुखपारकी स्त्री है जो उमके वाक्यमे उगके प्रभुख महायिका होती है । जब नटीमें जो मुखपारका प्रधान महायिका होता है वह 'पारिपार्श्विक' कहलाता है । मुखपार सातोंका बरते समय नटीने 'वाच्य' कहकर पारिपार्श्विकके 'वाच' कहकर सम्बोधन करता है । यह मुखपार, नटी तथा पारिपार्श्विक तथा 'वाच' पदक प्रयोग भी किया गया है । वैसे नाटकमे राजा प्रदित्ति मुख्य नायिका प्रथान महायिका होती है । उसका नायक कतक, और नट नटीके द्वारा मनोरञ्जन करना शोभा है । परन्तु काव्यप्रवन्ध मो विटपात्र नाम निरम्य मया है यह उम मुख्य विनीतत्वा प्रायन मही है ।

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कर्दाचित्तु सनानदीकं रङ्ङमञुष्ठाय विश्रान्ते सूत्रधारे, ततुल्यगुणशाकृति स्थापक श्रामुत्समनुतिष्ठति। तथा चानङ्गवत्या नाटिकायां दृश्यते—‘पूर्वरङ्गारम्भे स्थापकः’ इति। श्रत्र च पदे श्रामुरङ्गमञुठानेऽपि कवेः प्रयोगः। ‘वकोक्तिः’ इति च वीथ्यङ्गानामेव-विधरूपाणां व्याहारादीनां सद्भावमाहेति। स्पष्टोक्तिस्त्वेवं यथा—‘नागानन्दे नाट्यतद्ये क्रिमित्यकरणमेव म्यते ?’ इति ॥[३]१०४॥

मुखधारकका मुख सहायक या पारिपाश्विक भी मझो विदूषकत्न या वेप धारय करवे उचौके समान कायं करता हुमा सामने म्राता है इसके लिए हो यहाँ विदूपक शब्दका प्रयोग किया गया है।

भव एक शब्द म्रोर रह जाता है ‘स्थापक’ । मुखधारके समान हो वेप तथा कायंकं करने वाला उसका कोई सहायक स्थापकके रूपमें नाटककी प्रस्तुति करता है उसका ‘स्थापक’ कहते हैं । मुख्य नाटकके प्रारम्भ होनेसे पहिले अनेक प्रकारकी तैयारी करनी होती है । उसमें पूर्वरङ्ग कहा गया है । पूर्वरङ्गके १४ म्रङ्ग भरतनाट्यशास्त्रमें कहे गए हैं । इन्हीमें नान्दी पाठ भी एक म्रङ्ग है । प्रायः नाटकोंने म्रारम्भमें सबसे पहले ‘नान्दी के श्लोक लिखे मिलते हैं । शककविके नाटकोंने उन नान्दी श्लोकोंका उल्लेख मही रहता है । नान्दी वाली इलोक नाटकमें लिखे गए हो म्रथवा न लिखे गए हो। किन्तु उनका पाठ किया प्रवश्य जाता है । नान्दी पाठ तकका सारा पूर्वरङ्गका कायं निश्चित रुपस सूत्रधार हो करता है । उसके बाद श्रामुख या प्रस्तावनाका श्रवसर म्राता है । इस प्रस्तावनाके विषयमें दो प्रकारकी व्यवस्था पाई जाती है । कहीं तो सूत्रधार स्वय ही प्रस्तावनाका कायं भी वरता है । श्रन्यत्र प्रस्तावना या म्रामुख द्वारा स्वय हो मुख्य पात्रोंका प्रवेश करवाकर सूत्रधार रङ्गमञ्चसे बाहर जाता है । किन्तु दूसरे प्रकारकी यह व्यवस्था भी पाई जाती है कि नान्दीपाठ तकका कायं सूत्रधार स्वय करता है । नान्दीपाठके समय सारा नटवर्ग उपस्थित रहता है । प्रभिनय करनेवाले सारे नट मिलकर प्रायःन्या म्रादि करते हैं । उससमय सूत्रधार भी म्रवश्य उपस्थित रहता है । किन्तु उसके बाद सूत्रधार स्वय निवृत हो जाता है । उसके स्थानपर उसके सदृश दूसरा व्यक्ति म्राकर प्रस्तावना या म्रामुखका कायं करता है उसक। ‘स्थापक’ कहते हैं । इसे वक्ताको म्रनन्तर मागे लिखते है—

कभी तो नान्दी सहित पूर्वरङ्गको समाप्त करके सूत्रधारके विराम कर लेनेपर उसके तुल्य गुएो म्रोर श्राकृतिवाला स्थापक [प्रवक्ता] ‘ग्रामुख’का सम्पादन करता है । जैसे कि ‘श्रानङ्गवती’ नाटिकामें पूर्वरङ्गके बाद स्थापक [प्रविष्ट होता है यह लिखा है] । इस पक्षमें म्रामुखके म्रनुष्ठानमें भी कविकका व्यापार होता है । रामका म्रनुकरएा करनेवाले नटके [प्रवक्ताके] समान सूत्रधारकका म्रनुकरएा करनेवाले स्थापकका भी प्रवेश कविके द्वारा हो कराए जानेक कारण ‘ग्रामुख’ भी कविकका व्यापार होता है, लक्षणमें दिए हुए] ‘वकोक्तिः’ इस पदसे इस प्रकारके [प्रञ्चातु म्रथो द्वितीय विवेकके म्रङ्गतमें कहे हुए] व्याहारादि रुप वोथ्यङ्गोंको सत्ता [ग्रामुखमें] सूचित की है । स्पष्टोक्ति तो इस प्रकार होती है जैसे कि ‘नागानन्दे

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वाक्यार्थसमयाह्वानंभावोक्तः पात्रसंक्रमः । समयः कालः । ग्राह्यं सज्जा । गते सूत्रधारस्थापनाभ्यामुखस्तेहस्तुभूते पात्रस्थे मुख्यनायकादिभूमिकाधारिषु नटादिलोकस्य समम् प्रवेशः । वाक्यार्थयोः-ग्रहनमात्रया पात्रप्रवेशहस्तव्यम् । समयह्नयोस्सु मुख्यस्यैवेह तु भूते

[सूत्र १५६]—वाक्यार्थसमयाह्वानंभावोक्तः पात्रसंक्रमः । समयः कालः । ग्राह्यं सज्जा । गते सूत्रधारस्थापनाभ्यामुखस्तेहस्तुभूते पात्रस्थे मुख्यनायकादिभूमिकाधारिषु नटादिलोकस्य समम् प्रवेशः । वाक्यार्थयोः-ग्रहनमात्रया पात्रप्रवेशहस्तव्यम् । समयह्नयोस्सु मुख्यस्यैवेह तु भूते याम्येन यथा हरिश्चन्द्रे—

स्तवैकताननृत्येन प्रतिज्ञातार्थकारिष्याम् । प्रभविष्यन्तं देरोडपि किं पुनः प्राप्तवतो जनः ॥

"स्तवैकताननृत्येन प्रतिज्ञातार्थकारिष्याम् । प्रभविष्यन्तं देरोडपि किं पुनः प्राप्तवतो जनः ॥"

नन्वन्तु पाप्डुतनया सह माधवेन ! रक्तप्रसावितभूयः सततिमद्वाश्च सन्ध्या भगन्तु कुरुराजमुता सभृत्या ॥"

"निवेशवैरवदहना प्रशामादरीयां, नन्वन्तु पाप्डुतनया सह माधवेन ! रक्तप्रसावितभूयः सततिमद्वाश्च सन्ध्या भगन्तु कुरुराजमुता सभृत्या ॥"

ग्रामुरके ग्रहृभूत पात्रप्रवेशके नियम— ग्रथ आमुखके ग्रहृभूत नाध्यके पात्रोंके प्रवेशके विधिको कहते हैं— [सूत्र १५७]—[भाव प्रयोग] सूत्रधार प्रयथा रसापकर्षे द्वारा कहे हुए वाक्य [प्रयवा उसके] प्रय्यः, [प्रयवा] काल, [प्रयवर] नामके द्वारा [नाट्यसे मुख्य] पात्रका प्रवेश होता है [या कराना चाहिए] ।

समय प्रयोग्तः काल । प्राह्वान प्रय्यत्न सत्ता [नाम] । सूत्रधार अथवा स्वापकके द्वारा कहे गए इन [वाक्य, प्रय्यं, समय तथा नाम] के द्वारा पात्र धारयान मुख्य नायक आदि के रूप को धारकर करनेवाले नटादिक सकलम् प्रयर्थतः प्रवेश होता है । वाक्य तथा प्रय्यंके अनुवाद द्वारा पात्रप्रवेशवाले प्रति हेतुत्व होता है प्रौर काल तथा नामक, सूचक होनेसे ।

वाक्यादि के द्वारा [प्रवेश] करने हरिश्चन्द्रमें— ‘एकमान सांस्कृतिक मुसियालों, प्रौर प्रतिज्ञात प्रयवको पूरां करनेबाले [क प्रयय] का भगवान श्री वाचक नहीं हो तक्ता है, तद् साधारसा मनुर्यों [के वाचक वन मक्तने] की तो बात हो क्या है ?'

[प्रामुख्यमें सूत्रधार पाङतत] इसौ यास्यको प्राप्तत ह्रः। [प्रधान पात्र] हरिश्चन्द्र प्रवेश करता है ।

पथंके द्वारा [प्रवेशकल उदाहरण] जो वेष्टोऽहारम— "नानुजोः नट हो जाने जिनका वर रूप धरिन नाट्ट हो गया है इस प्रकारके पोष्य सोम इष्टकहटे साथ प्राणभृत मनाएं; प्रौर रत्तस्य भूतिकां गुनोभित करनेवाले [प्रयया रत्नेश्य विपक्नदेश्य प्रभार्पिता वत्तां भृण्व्यै, से रक्तरत्नादिनिभूष ] धपन [प्रप सेवकोंगे] भूमि प्रदान करनेवाते, तथा जिनक विप्रह प्रयान्ति द्वारा धाविस हो गये हैं [प्रयवा त्रिगुणन विग्रह पर्यन्त पुनः समास कर द्विया है] इस प्रकारके कोरत लोग अपने भृग्पोंके महिल स्वगं सिप्प [पपका स्वरुप जोर] हो ॥"

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इत्थं वाक्यस्य द्वन्द्वसः प्रथितस्य चतुर्थपादेन 'स्वस्या भवन्ति भयि जीवति धार्तराष्ट्राः' इत्यनेनार्थं गृहीत्वा भीमः। समक्षेन यथा द्वितरामे—

धूर्त रूपमें प्रविष्ट इस वाक्यके चौथे चरणके प्रयंको लेकर 'स्वस्या भवन्तु भयि जीवति धार्तराष्ट्राः' मेरे जीते रहते कौरवगण कभी स्वस्थ बेठ सकते हैं ? यह कहते हुए भीष्मका प्रवेश होता है।

"कृपासादितप्रकटनिर्मलचन्द्रहासः, प्राप्तः शरत्समय एव विशुद्धकान्तिः। उत्कर्ष गाढतमसं घनकालमुखं, रामो दशास्यमिव सम्मृज्यतनुजीवः ॥"

समय [के वरोंसे] [मुख्यपात्रका प्रवेश] जैसे धूलितराममें— इस लोकमें दारतकालके वरोंके द्वारा रामचन्द्रका प्रवेश कराया गया है। इलोकमें कहे हुए विरोधसे दारस्काल और रामचन्द्र दोनों पक्षोंमें लगेंगे। प्रथम चरणमें 'चन्द्रहास' शब्द दिलष्ट है। दारतकाल पक्षमें उसका अर्थ चन्द्रमाका हास यह होता है। और रामचन्द्र के पक्षमें चन्द्रहासका अर्थ तलवार होता है। चतुर्थ चरणमें 'सशृङ्गतनुजजीव' मे सारतपक्षमें 'नुजजीव' पुष्पविरोधकका नाम है, और रामचन्द्रपक्षमें उसका अर्थ दूष्य प्राणति लक्ष्मणके जीवनको बचा लेनेवाला है। तृतीय चरणमें 'घनकालमुखं' मे दारतपक्षमें धनकालका अर्थ वर्पाकाल है और रामचन्द्र-पक्षमें उसका अर्थ रावण है। इसलोकका अर्थ निम्न प्रकार है—

"[नेघोके बाहर] प्रकाशित निर्मल चन्द्रमाके हासको प्राप्त करने वाला, [रामपक्षमें नेघोंके तलवारको हस्ममें लिए हुए] विशुद्ध कान्ति वाला, यह शरतसमय, गाढ ग्रन्थकारघुत [रामपक्षके महान् ऋणभररामरसे युक्त] सदृशर ऋणप्रगल [रामपक्षमें वर्णकान्तके समान उग्र] को विनष्ट करके वायुपुत्र पुष्पको मारता हुमा इस प्रकार ग्रा गया है जैसे निर्मल नक्षों तलवारको लिए हुए विशुद्धकान्ति और धनुर्धारी लक्ष्मणके जीवनको रक्षा कर लेने वाले रामचन्द्र भयंकर रावणको मारकर ग्राए हो।"

इसमें [शरतसमय तथा रामचन्द्र दोनों पदोंमें लगने वाले] समान विरोधोंसे और राम शत्रुका कम्पन करनेसे रामचन्द्रके प्रवेशकी सूचना मिलती है।

"[प्रामुख्यमें सूत्रधार नटीसे कहता है] तुम्हारे मनोहर गीतरागसे ग्रह में ऐसे हरषकर लिया गया है जैसे मनोहर और अत्यन्त वेगवान् इस भृगके द्वारा यह राजा दुष्यन्त [हरषकर] लिया गया है।"

[ग्राह्वान प्रयात्] नामसे [पात्रप्रवेशकी सूचनाका उदाहरऋण] जैसे 'प्रविभानशा[दु-न्तल, मे—

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अत्र नाट्य-ग्रासुखयोः सम्भन्धवचनार्थं कविनां भाविप्रवेशस्य पात्रस्य युक्त्या नामग्रहणम् । पूर्वत्र समानविशेषपदवाक्यामागतमित्यनयोर्विशेष इति ।

इस [उदाहरण] में नाट्य तथा ग्रासुखका सम्बन्ध जोड़नेके लिए कविने आगे होनेवाले पात्रके प्रवेेशके लिए युक्तिपूर्वक [इत्यादितके] नामका ग्रहण किया है [प्रतिपाद्य वस्तुके विषयमें पहले 'ग्रासादित प्रकट निर्मंसचेष्टाद्रहस' प्रादि उदाहरण में] तो समान विशेषज्ञोंके बलसे नाम प्राप्त हो जाता है [मुख्यरूपसे हृद्यतककेि नाम हो कयन है] यह इन दोनो उदाहरणोंका भेद है !

एतच्च नाट्यपात्रप्रवेशप्रकाराणामन्यतमं एककरचमत्कारी निवन्धनीयः । शन्यथा पात्रप्रवेशारंभथवाहुल्येन प्रस्तुतार्थविध्यातः स्यादिति । शान्त्यापारवाडुल्याच्च भारतस्यंशभूतत्वमस्य । एवं प्रकारोचनाया पूर्वरङ्कडाभताया रूपीति । पात्रप्रवेशस्य पूर्वो भाग ग्रासमुखम् । उत्तर पुनर्नोद्यमिति ॥

पात्रप्रवेशके इस [चार] प्रकारोंमें से किसी एक हो चमत्कार-जनक प्रकाशकका अवलम्बन करना चाहिए । अन्यथा [सब प्रकारोंका ग्रालम्बन करनेपर तो] पात्रप्रवेशका विपयक ग्रन्थका विस्तार हो जाननेसे प्रस्तुत विषयमें विदग्ध पड़ेगा । इसे [ग्रासमुख] में रसाद्-व्यापारकी बहुत होनेसे भारतीया वृत्तिका अंशभूत है । इसी प्रकार पूर्वरङ्ककी 'प्रङ्कभूत' प्ररोचनामें भी [रसद्-व्यापारके बहुत होनेसे भारतीया वृत्तिका अंशभूत] है । [मुख्य] पात्रिक प्रवेशके पहलेका भाग 'ग्रामुख' [कहलाता] है और [पात्रप्रवेशके] बादका भाग नाट्य [कहलाता] है ।

अथ प्ररोचनां व्याचष्टे— [सूत्र १४५]—पूर्वरङ्के गुरुग्रस्तुत्या सम्यौन्मुख्यं प्ररोचना ।।[४]१०६।। पूर्वं नाट्यार्थं प्रथमं, गीत-ताल-वाध्य-नृत्यादि नाट्यादिकं च पाट्यं व्यम्तं समस्तं च प्रयुज्यते यत्र रङ्के सा पूर्वरङ्कः । अस्य च पूर्वरङ्कस्य प्रयाहारादीनि व्यासामितान्तानि नव धन्तर्जननिकं, गीतकाविनि प्ररोचनान्तानि च दश वहिज्जननिकं स्राज्ञानि प्रयोज्यान्ति पूर्वींचायोल्लक्षितानि । ग्रसमभिसृतु स्वतोलोक-

प्राय [भारतीय वृत्तिसे संयुक्त] 'प्ररोचना' को व्याख्या करते हैं— को [नाट्य दर्शानकेलिए] उन्मुख करना 'प्ररोचना' [कहलाता] है । [४] १०६ । पहले कारिकामें ग्राए हुए पूर्वरङ्क शब्दका निर्वचन दिखलाते हैं] नाट्यपके पहले गीत, वाध्य, नृत्य नाट्यादि ग्रोर पाट्यका भतलग मसंग प्रयवा मिलाकर जिस [भाग] मे रंग रङ्कजनाके काराभूत नाट्यश्शलातमें प्रयोग किया जाता है वह पूर्वरङ्क कहलाता है । इस पूर्वरङ्कके 'प्रत्याहार' से लेकर 'ग्रासारित' पर्यन्त नौ जवनितमोंसे भोत, ग्रोर गीतक्षादिसे लेकर प्ररोचनापर्यन्त दस जवनितमोंसे युक्त जो स्वात लोक-

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प्रसिद्धतत्वात्, तन्न्यासक्रमस्य निष्फलत्वात्, विविधदेवतापरितोपपरुष्य तत्फलस्य च श्रद्धालुप्रतारस्यामात्रत्वादुपेक्षितानि । प्ररोचना तु पूर्वरद्रांगभूतापि नाट्ये प्रवृत्तौ प्रधानमिति लभ्यते ।

निष्फल होनेके कारण, और ३ विविध देवताओंको प्रसन्न करने हेतु उनके फलके केवल श्रद्धालुभोंको धोखा देने मात्र चालता होनसे, उनको उपेक्षा कर दो है । [पूर्वरङ्गके उन १६ अङ्गोंमेंसे] 'प्ररोचना' तो पूर्वरङ्गका अङ्ग होनेपर भी नाट्यमें प्रवृत्ति करानेमें मुख्य है इसलिए उसका लक्षण [हम भी] कर रहे हैं ।

तत्र पूर्वरङ्गे रूपसूक्त्या प्रस्तुतप्रवन्धार्थस्य प्रीत्यादिहेतुत्वप्रशंसनेन सामाजिकानां श्रवणावलोकनोत्साहोत्पादनं प्रकृतोद्रर्थः प्रकुप्येऽपि रोच्यते उपादेयतया ध्रियतेऽनयेति प्ररोचना । यथा धीरस्निग्धविरहाचते श्रामिनवराघवे— 'स्थापकः —[सहपं] श्रृणो ! चित्रस्य स्मृतम् । व्यस्येव राघवसहोदरकथापवित्रं, काव्यं प्रवन्धघटनाप्रयितप्रथिम्न । भट्टेन्दुराजचररङ्काजमधुरुतस्य, धीरस्य नाटकममनन্যসमानसारम् ।'

उस पूर्वरङ्ग [के १६ अङ्गो] मे, गुणोंकी स्तुति द्वारा प्रस्तुत प्रवन्धके श्रयंकी आनन्द स्वादिके जनक रूपसे प्रकाशा करके सामाजिकोंमें उसके देखनेका उत्साह उत्पन्न करनेकेलिए प्रकृत अर्थ [प्रस्तुत काव्यका विषय] जिसक द्वारा [प्रकुप्येऽपि रोच्यते] अत्यन्त रोचक बनाया जाता है अर्थात् उपादेय जैसे क्षीरस्वामि विरचित अभिनवराघवमे— 'स्थापक—[सहपं] श्रृणो ! बडो हो देर बाद याद श्राई— रामचन्द्रकी परमोत्तम कथा से पवित्र, और नाटक रचनेमे प्रसिद्ध सामर्थ्य वाले, भट्ट इन्दुराजके चररङ्कमलके बडुचरोक, क्षीरस्वामिको प्रहतिलोय महत्त्व वासा [अभिनव राघव नामक] नाटक तो विध्यमान है हो [फिर किस बातको है । सामाजिकोंको प्रसन्न करनेके लिए प्राज हम लोग उसी श्रद्धितीय नाटककर ग्राभिनय प्रस्तुत कर सकते है] ।'

यथा वा रघुविलासे— 'सीतां काननतो जहार विहितवधाज पुरा रावण— स्तं व्यपाध रघोन तां पुनरयो राम. समानीतवान । निष्फल होनेके कारण, प्रर ३ विविध देवताभोंको प्रसन्न करने हेतु उनके फलके केवल;

इसमें रामचन्द्रके चरित्र और क्षीरस्वामिको नाटक रचना-सामर्थ्यादिकी प्रशंसा द्वारा सामाजिकोंमें नाटक-दर्शनका उत्साह उत्पन्न करनेका प्रयत्न किया गया है । इसलिए यह पूर्वरङ्ग प्रयवा जैसे रघुविलासमें— 'पूर्वंकाले हृल करके रावण सीताको वनसे हरप कर ले गया था। तुमको मारकर रामचन्द्र फिर उसको छुड़ाकर लाए थे । कवियोंकी सूक्तित रूप मोदितकार मचियोंके [उत्पादक

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यथा वा नलविलासे--कवि: कार्ये राम:सरसवचसामेक्यसति-नेलस्येदं हृदयं किंपि चरितं धीरललितम्‌ । समाधत्ते नायको निलिलननतसुधापयोधरौ, प्रसन्न: सभ्यां कटाक्षै: ! भगवान्‌ नय स विधि: ॥ इयं प्ररोचना पूर्वरङ्गात्‌ प्रथमं परचर्चा निवबध्यते । निवन्धे चाम्या नावश्य-म्भावनियम इति ॥ [४] १९६ ॥

इसमें क्या भागको प्रथांसा द्वारा उस कथाके प्राधारपर विरचित 'रघुविलास' नाटकके देखनेके लिये सामाजिकोंको प्रोत्साहित करनेको यत्न किया गया है । जैसे नलविलासमें--[इस नलविलास नामक नाटकका [निर्माता] सरस वचनोंका निधान रामचन्द्र इस काव्यका [निर्माता] कवि है, नलका मनोहर धीरललित प्रौढ़ प्रभूतचरित्र [इस काव्यका वत्पं विषय] है, श्रोत्र समेत नाट्यकलाभिमें निपुण मुनीश्वरोंको नाटच करनेकी प्रेरणा मिले है, [इससे सिद्‌ध होता है कि] हे सुन्दर कवि वातो [प्रायं] ! म्राज भगवान्‌ सम्योंके ऊपर प्रसन्न हो रहे हैं । इसमें प्रथ्यकारने अपने बनाये हुए नलविलासकी 'प्ररोचना'को उद्दृत किया है । इस प्ररोचना भागमें कविने श्री प्रसाद को गई है । नाटकके प्राधारभूत पाठ्यनान-वस्तु, प्रौढ़ नाटकके ग्राभनिय करने वाले नटवर्ग भी प्रसांसा को गई है । इन सबकी प्रसांसा द्वारा सामाजिको में इस नाटकके देखनेके लिये उत्साह एवं श्राभिरोच उत्पन्न करनेको यत्न किया गया है । इसलिये यह भी प्ररोचनाका उदाहररए है । यह प्ररोचचना पूर्वरङ्गके पहिले प्रौढ़ पोढ़े [दोनों रूपोंमें] निवद्ध की जा सकती है । प्रौर इसके रखे जानेवा कोई प्रावश्यक नियम नहीं है । [प्रयोत्‌ यह प्रावश्यक नहीं है कि प्रत्येक नाटकमे प्ररोचना प्रदर्शय ही रहो जाय । कवि इस विषयमे स्वतन्त्र है । यह चाहे तो प्ररोचना रहे चाहे न रहे । यह प्रथ्यकारका श्रभिप्राय है कि फिर भी प्रधिकांश नाटकोंमें 'प्ररोचना' पाई ही जाती है ॥ १९६ ॥ [४] ।

सात्वतो सात्व-वाग्‌गद्राभिनेयं कर्म मानसम्म्‌ । साजंवाधयं-मुद्र-धैयै-रोद्र-वीर-शृङ्गारभुतम्‌ ॥ [४] १०७ ॥

कर्मके समान [रामायएको] इस सुन्दर कवारत्नको नमस्कार है । मानसिक, वाचिक तथा कायिक प्रभिनयोंसे सूचित, प्राजंव, बाट-श्रङ्गपटकोर, [श्रापच] हाव श्रोर धैयेसे युक्त, तथा रोद्र, वीर, शान्त एवं श्टङ्गार रसों सम्बद्ध मानस व्यापार 'मानवतो' वृत्ति कहलाती है । [४] १०७ ।

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मनः सत्त्वं प्रकाश, तच्चनामिति तत् सत्त्वं मनः, तनु भवति सात्वती । सत्त्व-शब्देन वाह्यस्य क्रोच्यम् । सत्त्व-योगाद् भिनेय सत्त्व-योगाद् भिनयैर्-व्याप्तम् । सत्त्वाभिनयवर्गाभिनय-युक्तं मानस कर्म सात्वतीत्यर्थे । अभिनयत्रयाभिधानेऽपि मानसत्वापारस्य सत्त्वप्रधानत्वान् सत्त्वाभिनय एवात्र प्रधानमितरौ गौणौ । घ्रात एतत् सत्त्वेश्वरः प्रथममुपादत्त । श्राज्ञेवमकोटिल्यम् । श्राधर्यो वाचा न्यक्कार । मुद्-हर्षौ धेयौ व्यसने डस्य प्रकाशात्यम् । एतै रौद्रादिमिश्र सह वर्त्तमानो मनोऽव्यापारः सात्वती । श्राज्ञवस्योपादानाद् कपटाभाव । श्राधर्यस्यापनात् क्रुद्धपुरुपसद्भाव । मुद्रातिपादना-च्लोक-करुणानिर्वेदाभाव । धैर्याभिधानात् रत्यादिसङ्घमोनुसम्या भावश्रानिमितो भरति । रौद्ररसयोगेऽपि केपाश्चित् सत्त्वप्रकाररूप दर्शयत एवते रौद्रोपादानम् । वीर-रसाद् युद्ध-दान-दयादिरूप, सत्त्वनाहुल्याद् गृद्यते । 'शम' इति च शम-स्थायी-भावः शान्तो रसो दृश्यते । श्रतिपीडनवर्गाज्जस्य सत्त्ववैक्लिन्यदर्शनम् । श्रद्-शुचोः स्मृत्य-सत्त्वानुरोधेन सात्त्विकानां दृश्यत एवेति । इह च मानस कर्म विचित्राभिगम्भीर-किञ्चिद् प्रारध्यकार्यापरित्यागान्, कार्यान्तरपरिभ्रमेपा, सग्रामाय परोत्साहनेन, सामादि-प्रयोग-दैन्यादिना श्ररिसन्धानभेदजननेनान्यैष चहुभिः प्रकारैर्-लेभ्यते इति ॥ [४] १०५॥

सत् अर्थात् सत्त्व या प्रकार [का नाम है] वह जिसमें रहता है वह मन सत्त्व हुया । उसमें रहनेवाला [मानस व्यापार रूप] सात्वती वृत्ति होती है । सत्ता शब्द होनेसे बहुत करके [सात्वता शब्दसे] स्त्रोलीङ्ग [वाचक दोष प्राप्त हुया है] । 'सत्त्वयोगाभिनेय' [शब्द] मानस वाचिक तथा कायिक प्रभिनयके द्वारा व्याप्त [व्यापार है] । मानसिक श्रभिनय वाचिक प्रभिनय श्रोत्र कायिक प्रभिनयसे युक्त मानसिक व्यापार 'सात्वती' वृत्ति [कहलाता] है, यह प्रभिप्राय है । [मानसिक, वाचिक तथा कायिक ] तोनों प्रकारके श्रभिनयोंके कहे जानेपर भी मानस व्यापारके ही सत्त्व-प्रधान होनेसे इन [तीनों] में सत्त्वाभिनय हो प्रधान है श्रोत्र दोप दोनों गौण हैं । इसीलिए सत्त्व शब्दका सबसे पहले ग्रहण किया गया है । [कारिका में ग्राए हुए 'श्राज्ञ' श्रादि शब्दोंका श्रर्थ करते हैं] 'श्राज्ञ' श्रादि शब्दोंका श्रर्थ कुडिलताके प्रभाव ग्राघ्य' अर्थात वशौके द्वारा तिरस्कार [डाँट फटकार] । 'मत्' म्रर्थात हर्ष । 'धैर्य' श्रर्थात विपत्तिकालमें भी न घबराना । इसको श्रोत्र रौद्रादिसे मुक्त मानस व्यापार 'सात्वती' वृत्ति [कहलाता] है । श्राज्ञवके ग्रहणासे इसमें कपटका प्रभाव [सूचित होता है] । श्राधर्यके कथनसे उद्दत पुरुपका सद्भाव [सूचित होता है] । हृपंका प्रतिपादन होनेसे शोक, करुणा निर्वेदका प्रभाव [सूचित होता है] । 'धैर्य' के कथनसे रत्यादि सङ्घमोके प्रति श्रोत्र पुरुषका श्रभाव सूचित होता है ।

रौद्ररसका योग होनेपर भी किन्हीं किन्हींमें प्रकार रूप सत्त्व दिखाई देता है । इस लिए रौद्रका ग्रहण किया है । श्रोत्र इस [सात्वती वृत्ति] में घोरतसे युद्धवीर दानवीर दयावीर श्रादिका ग्रहण सत्त्व प्रधान होनेसे होता है । 'शम' पदसे शम जिसका स्थायिभाव है उस शान्त रस दिखाई देता है । श्रतिपीङनवर्गाज्जस्य सत्त्ववैक्लिन्यदर्शनम् । श्रद्-शुचोः स्मृत्य-सत्त्वानुरोधेन सात्त्विकानां दृश्यत एवेति । इह च मानस कर्म विचित्राभिगम्भीर-किञ्चिद् प्रारध्यकार्यापरित्यागान्, कार्यान्तरपरिभ्रमेपा, सग्रामाय परोत्साहनेन, सामादि-प्रयोग-दैन्यादिना श्ररिसन्धानभेदजननेनान्यैष चहुभिः प्रकारैर्-लेभ्यते इति ॥ [४] १०५॥

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अथ कैशिकी— हास्य-शृङ्गार-नृत्य-नम्भिविधात्मिकां । स्त्रीपां लच्यपं' । तलप्रधानस्थान् तासामियं कैशिकी । हास्य-शृङ्गाराभ्यां स्त्रियोहुल्य-विधिपूजारोहेश्व-कामावयहाराख्या मद्रावलोक । नाट्यो नृतनाट्यंवादित्रैश्च ॥ ध्रमास्य दृष्टजनावर्जनलुपो यागाद्-वेप चेष्टाभि परिवाह्यो नर्म । वाचा यथा—

[सूत्र १६१]—कैशिकी हास्य-शृङ्गार-नृत्यादि नानाभेदोंसे युक्त होती है । 'स्तनकेशमत्तत्वे हि स्त्रीपां लच्यपं' । तलप्रधानस्थान् तासामियं कैशिकी । हास्य और शृङ्गारसे युक्त होनेके कारणसे स्त्रियोंकी 'कैशिकी' कही जाती है । उसमें हास्य और शृङ्गार दोनोंकी प्रधानता, नाना प्रकारके वेप चेष्टा और वादित्रोंके द्वारा किया जानेवाला 'नृतनाट्य' कहलाता है । 'नाट्य' से नृत्य, गीत, याधवक प्रहसन होता है । दृष्टजनको प्राकट करना इसका [ग्राम्य] परिहास नमं [कहलाता] है । वाणीके द्वारा [नमंश उदाहर-]

"पत्यु शिरश्छेदनक्लामेन स्म्प्रेति सत्या परिहासपूर्वेम् । सा रञ्जयित्वा चरसो कताशोर्मोल्येन तां निर्वचनं जगाद ॥" 'राजा—[ विदूषक ] विदूषकराज ! नि शोपवेश्याचमत्कर्त्तिविनिमेनां लम्यस्तनीमुपरूलोक । शुच्-पुष्पप्रागल्भ्यलभ्याय वेश्यापय्याय मञ्जलम् । यत्र प्रतीपं शास्त्रस्य, कामादर्थप्रसूतयः ॥"

अब कैशिकी [वृत्तिका लक्षणा करते हैं]— [सूत्र १६१]—हास्य, शृङ्गार [ नृत्य, गीत आदिक रूप ] नाट्य तथा [ नमं प्रयात् ] निष्ठ परिहास आदिके भेदोंसे युक्त कैशिकी [वृत्ति] होती है । प्रतिशय युक्त होना [ जिनके हो वे त्रिप्रकार कैशिकी हृदि [ प्रयात् कैशिकी वृत्तिकी उत्पत्ति कैशा शब्दसे हुई है । तबके कैशिकोंसे युक्त होनेके कारणसे स्त्रियोंको 'कैशिका' कहा जाता है] यद्यपि 'स्तनकेशयततो स्त्रयो' यह श्लोका लश्षण है । उनका प्रायान्त्य होनसे उनको यह वृत्ति 'कैशिकी' कहलाती है । उसमें हास्य और शृङ्गार शब्दोंसे स्त्रियोंकी अधिकता, नाना प्रकारके वेप विग्यास, तथा काव्यवहारोंको उद्भासित सूचित को है । 'नाट्य' से नृत्य, गीत,

"द्वरोंमे महावर लगा घुननेपत् मलोके द्वारा परिहासपूर्वक् इस [चरण] से पलि [निवृ] मे सिरपर हिरणि [सपत्नो रूप] चन्द्रवलाका स्पश्ना करनां इस प्रकार म्रशोभां किएजाने पर बिना उत्तर दिए हुए हो उनने [प्रयांत् पार्वतीने] उस [सखी] को मारके मार दिया ।" 'राजा—[हेसकर] हे विहद्धराज ! [मग्नित्रन शुचदेव] समस्त येश्याप्रोक्ी छतव्र्यनिसी इस सम्वर्त्तनोकी प्रणासा तो करो । शुच्-पुष्प संभार्टे प्राप्त होनेवाले वेश्याप्यापारक भला हो जिसमें शास्त्रोय विधानसे विपरीत, कामसे अर्थप्रसूति होती है [ शास्त्रमें तो धर्मसे कामकी प्राप्ति

होती है] न छोडनेसे, नए कायोंका [भो] स्वोकार कर लेनेसे, सप्रामादिके लिए दूसरॉौेक उत्साहित करनेसे, साम प्रादिके प्रयोग आदिवादिवशा नाय-समुदायमें भेद डालनेसे और इसो प्रकारके अन्य बहुतसे प्रकारोंते लक्षित हो सकता है ॥[४]१०७॥

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तैयेया यथा—नागानन्दे विदूपक-शोण्टरलयतिकरे । चेष्टानर्म यथा मालविकाग्निमित्रे—निपुणिका विदूपकस्योपहति सर्पविभ्रमकारि दृश्यदकाष्ठं पातयति । इति ।

एतदर्थ कचिन्निमित्तं, कचिद्वास्यानं, कचित् श्रृङ्गारहास्यं, कचिद् भयहास्यं, कचित् सापराध्रिय-प्रतिभेदनात्, कचित् पूर्वेनायिकाप्रतिभयात्, इत्यादिनेकधा दृश्यम् । श्रृङ्गाररसेन रत्यादिर्यो मानसो, तत्रायेन नर्मभेदैश्च वाचिको, नाट्येन काविकरच व्यापार सगृहीत इति व्यापारत्रयसद्भूारामिकेयमिति ॥ [सूत्र १६२]—ग्रारभस्यनृत्-हस्त-छल-दोत्तरसान्विता ।

[६]१०५॥ श्रारभटी प्रतोदकृत तुल्या भटा उद्दतता पुरसा श्रारभटा । ते सन्त्यस्यामिति 'ज्योत्स्नादित्यादृशा' श्रारभटी । श्रनृतमसत्यम् । हस्तयुद्धमनेकभकारम् । छलय वञ्चनो-हेतु प्रयोग । श्रनृत इन्द्रजाल-पुस्तप्रयोग-हस्त-भेदादिग्रह । द्वेषा रसा रौद्रादय कहे गये हैं किन्तु वेश्या-व्यापारमें इसके विपरीत कामसे श्रारम्भको प्राप्ति वेश्याग्रहोंको वेधके द्वारा [परिहास रूप नमका उदाहरण] जैसे नागानन्दमें विदूपक शोर लेखर के सम्पर्कमें [हुआ है] । चेष्टाके द्वारा परिहासका [उदाहरण] जैसे मालविकाग्निमित्रमें—निपुणिका विदूपके ऊपर सर्पकी भ्रान्ति उत्पन्न करने वाले लकडोके [टेढे मेढे] डण्डेको डाल देती है । यह [परिहास या नम] कहों माननके कारण, कहों हास्यके कारण, कहों भयजनक हास्यके लिए कहों श्रपराधी प्रियके प्रतिभेदनके कारण, प्रोत्र कहों पूर्वं नायिकाके भयके कारण, इस प्रकार श्रनेक तरहका होता है । यहां [कारिकामे आए हुए] 'श्रोर परिहासके [पूर्वोक्त] भेदोंसे वाचिक-व्यापारकर, तथा 'नाटच्य' [पद] से कारिक ध्यागार का सग्रह होता है । इसलिए यह [कारिको वृत्ति] तीनों प्रकारके व्यापारोंके सदृश रूप है ।

यहां [कारिकामे आए हुए] 'श्रोर परिहासके [पूर्वोक्त] भेदोंसे वाचिक-व्यापारकर, तथा 'नाटच्य' [पद] से कारिक ध्यागार का सग्रह होता है । इसलिए यह [कारिको वृत्ति] तीनों प्रकारके व्यापारोंके सदृश रूप है । ४ श्रारभटी वृत्तिका निरूपण—प्रवृत्त श्रारभटी [वृत्तिका लक्षण करते हैं]—युक्त [वृत्ति] श्रारभटी [वृत्ति कहलाती] है ।

[६]१०५। 'आर' श्रथान्त् चाबुकके समान, जो भट प्रयथान्त् उद्दत पुऱष, वे 'आरभट' हुए । वे जिनमे प्रचुर मात्रामें हो वह [आरभट शब्दसे] ज्योत्स्नादि गरूप्रतित मानकर गुण-प्रतिषय करनेवपार श्रारभटी [वृत्ति कहलाती] है । [लक्षणमे प्राए हुए श्रनृतादि शब्दोंका ग्रहण करते हैं] श्रनृत श्रार्थात् प्रसत्य भावना । हस्तयुद्ध अनेक प्रकारका हो सकता है । छला देतेकेलए किए जाने वाला प्रयोय च्छल कहलाता है । इसके द्वारा इन्द्रजाल [पुतली श्रादिकि निर्मित] पुतली श्रादिका

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श्रोद्धत्यावेगादिहेतथः । श्रद्वानृतादिरिभिविधिचित्रे नपथ्य किलिक्खहस्तिप्रयोग-मायाशिरो-वर्शनादिकं, भय-हर्षोतिशयाकुलितपात्रप्रवेशः । पूर्वनायकावस्थाया: परित्यागेन नायकावस्थान्तरमहो श्रवस्कन्द-श्रृङ्गादिकृतविविधस्वादिकं, विविधस्थायी-व्यभिचारिभावयुक्तं प्रसङ्गागतकार्योदिकं चाहयुद्ध-शस्त्रप्रहारादिकं च सङ्गृह्णाति । श्रत एतेयं सर्गा-दिनियतिका सुतङ्गणापरार्धनिमित्ता च ॥

तत्र विचित्रं नेपथ्यं वेषीसंहारो श्रश्वत्थाम्न । सङ्केतनचारितं किलिक्खहस्ति-प्रयोग । मायाशिरोदर्शनं रामाभ्युदये । वलीमुखेन पात्रप्रवेशो रत्नावल्याम् । हर्षेण यामनचेष्टया: प्रवेश- सत्यहरिश्चन्द्रे । वालिनेत्रत्यागेन सुग्रीवततन्त्रतरघंरराम । परशु-रामस्योदात्यावस्थाल्यागेन शान्तावस्थान्तरमहोराम । विचित्रभाषं कार्यान्तरं श्रुत्यारावयेऽपि । तथा हि श्रृङ्गदेनार्ज्जभिद्रूयमाप्यां मन्त्रोदयां भयम् । श्रृङ्गदस्योत्साहः । श्रश्वपेऽपि रावणादर्शनेन 'गतेनापि सुरार्ज्जित:' इत्यादि वचतो हासः । 'यस्तातेन निगृह्य बालक इव प्रतिष्यि कत्तान्तर' इति च जल्पतो जुगुप्सा-हास-विस्मया । रावणस्य रति-क्रोधौ । नियुद्धादि तु रामायणीयेपु हन्र्ज्जिलदशमस्योयोरिति ॥[६]१०२॥

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स्थायिभावः श्रृङ्गाराद्भिर्विभावव्यभिचारिभिः । स्पष्टानुभावनिर्देशेयः सुखदुःखात्मको रसः ॥[७]१०७॥

प्रतिपाद्यमदय-न्यायशर्मकेप बहल्यपि व्यवभिचारिष्वनुयायितयावशयं तिष्ठतीति स्थायी । यद्वा तद्नाव एव भावान् श्रभावे चाभावात् रत्यादिल्यैर्विभावैरग्लान्यादिकं प्रत्यवयं स्थायी । उपचयैः प्राप्य रसंलक्ष्यं रत्यादिभिर्व्यक्तीति भावः । विभावैश्चैतन्योद्भिरालम्बनोद्दीपनहुपैश्च भों हेतुभिः सत एवाविभावाद्, व्यभिचारिभिरग्लान्यादिद्भी रसिकमनः-शरीरवृत्तिभिः परिपोषणाच्च श्रृङ्गोत्कर्षः । स्त्रीकृतसाज्ञाकारित्वानु-भूयमानावस्थो, यथासम्भवं सुख-दुःख सत्वभावो रस्यते ग्राह्यायते इति रस । तत्स्वष्टविभावादिभिरथितस्वरूपसम्पत्तसयः सुखात्मक । अथपरे पुनरनिष्टविभावाद्युपनीततात्कमान करुणाद्रौद्र-वीभत्स भयानकादिव्वारो दुःखात्मकः । इतने नाटकादिमे तद्रूपो मेघनादके निबद्ध श्रादि [के उदाहरण हैं] ॥[६] १०५॥

[इस प्रकार भारती ग्रादि चारों वृत्तियोंके लक्षण हो जानेके बाद] प्रवृत्तिके [सामान्य] लक्षणमे श्राए हुए 'रस-भावाभिनयगा.' इस पदमेसे सबसे पहिले रसका वर्णन प्रारम्भ करते हैं— [सूत्र १६३]---विभाव तथा व्यभिचारिभाव ग्रादिके द्वारा परिपोषको प्राप्त होनेवाला, स्पष्ट ग्रनुभावोंद्वारा प्रतीत होनेवाला, स्थायिभाव [रूप हो] सुख-दुःखात्मक [प्रथवा स्पष्ट ग्रनुभावोंके द्वारा केवल सुखात्मक ग्रथवा केवल दुःखात्मक न होकर उभयात्मक] रस होता है । [७] १०७ [यह ग्रन्थकारने रसका लक्षण किया है । प्रवृत्त उसमे ग्राए हुए स्थायिभावादिकों प्रत्यक्षया उदय तथा ग्रस्त होनेवाले ग्रनेक व्यभिचारिभावोंमें जो कतिपय श्वेतरहित स्वरूप दिललाते हैं] प्रतिक्षया उदय तथा ग्रस्त होनेवाले ग्रनेक व्यभिचारिभावोंमें [कलाकारी] है । ग्रश्वत्थामा उस [स्थायिभाव] की विद्यमान रहता है यह स्थायिभाव [कहलाता] है । [यह स्थायिभाव] की विद्यमानतामें ही होने ग्रौर उसकी प्रव्यभिचारतामें [व्यभिचारिभावोंके] न होनेसे, व्यभिचारिभाव गलानि ग्रादिके प्रति, रस्यादि प्रवृत्त स्थायिभाव होता है । [यह स्थायी भाव ग्रादि हेतुम्रा प्रवृत्त ग्रागे श्रस्थायीके ग्रंगे जुड़े हुए भाव दारकका ग्रयं हुग्रा प्रवृत्त श्रागे स्थायीके ग्रंगे जुड़े हुए भाव दारकका ग्रयं हुग्रा] परिपोषको प्राप्त करके रत्यादि, रसलक्ष्य हो जाता है इसलिये ['भवतोति भाव इस धातुपतिके श्रनुसार रत्यादि] 'भाव' [कहलाता] है । विभावों ग्रथवा ललना ग्रोर उद्यान ग्रादि [स्थ] ग्रालम्बन तथा उद्दीपन विभावस्प हेतुभ्रोंके द्वारा पूर्वंसे ही विद्यमान [रत्यादि स्थायिभाव] का प्राविर्भाव होनेसे, ग्रौर रसिकोंके मनमें विद्यमान स्त्रान्ति ग्रादि व्यभिचारिभावोंके द्वारा परिपुष्ट होनेके कारण, युत्कथकों प्राप्त [प्रपत्ति] साक्षात्कारात्मक भनुभूयमानतस्याको प्राप्त होनेवाला, यथासम्भव सुख-दुःखोभयात्मक [स्थायीभाव 'रसते हति रस'] इस व्युत्पत्तिसे] रसत्वको प्राप्त होता है। [रसके इस लक्षणमें रसको सुख-दुःखात्मक प्रथांत उभयात्मक माना है । उन दोनों प्रकारके रसोंका विभाग ग्रागे दिखलाते हैं] उनमेंसे इष्ट विभावादिके द्वारा स्वरूपसम्पतिको

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यन पुनः सर्वरसांमुख-दुर्मात्सकत्वमुख्यते तत्त प्रतीतिराघितम । शास्त्रां नाम मुस्तरविभावोपराचिता; कार्यााभिनयोपनीतविभावोपराचितोऽपि भयानको धीमत्सः करुणो रौद्रे वा रसास्वादवतां नारायणोऽपि क्लेशादशामुपनयति। शृङ्गारव भयानकादिभिरुद्रिजते ममाज । न नाम सुगम्यादुदुद्रेगो घटते ।

प्रकट किये जाने वाले श्रृङ्गार, हास्य, वीर, श्रद्भुत और शान्त [ये पांच] सुखप्रधान रस हैं । और शृङ्गार से भिन्न विभावादिके द्वारा स्वाद लाभ करने वाले करुण, रौद्र, वीभत्स और भयानक ये चार दुःखात्मक रस हैं ।

यन पुनरेभिरुद चमत्कारो दृश्यते स रसाम्यादविरामे सति यथावस्थितवस्तुप्रदर्शनकवि-नटसङ्कीर्तन । विम्बप्रतिबिम्बयन्ते हि शिरश्छेदकाप्रणापि प्रद्युम्नकुसुमेन वैरिणा शौर्येऽीरमानिनः । श्येनकण्ठे च सर्वाङ्गह्नादकेन कविनटशक्तिजन्मना चमत्कारेण विमलङ्गया परमानन्दरूपसां दुःखात्मकेष्वपि सुखेघसः प्रतिजानते ।

[कुछ आचार्यों के द्वारा] जो सब रसोंको मुखात्नक बतलाया जाता है वह भ्रान्तोत्पादक है । मुख्य [प्रयात अर्थात वास्तविक] विभावोंसे उत्पन्न [करुणा आदि] दुःखात्मकताकी वात हो जाने दे, काव्यके प्रभिनयसे प्राप्त [वनावटी] विभाव श्रादिसे उत्पन्न हृद्ग्रा भी भयानक, वीभत्स, करुणा ग्रादि रौद्ररस श्रास्वादन करने वालोंकी ममाजिकोकी घबराहट होता है । [यदि सब रस मुखात्मक हो होते तो] मूलास्वादसे किसीको उद्वेग नहीं होता है ।

प्रहदास्यादलौल्येन प्रेक्षकाः श्रृङ्गारपु प्रवर्तन्ते । कयमस्तु सुरस-दुःखात्मकमनुसारानुरञ्जयेषु रामादिचरितं निवन्धनन्त मुरस-दुःखात्मकमानुविद्धमेव मन्थान्ति। पानकमधुरमिव च तिक्तरास्वादेन दुःखास्वादेन सुन्तरां सुप्तानि स्वादन्ते हृदि । अप च भीतायाः हर्याः, त्रोपथ्या।

ग्रोर जो इन [करुणाादरसों] से भी सहृदयवर्गोमें चमत्कार दृप्तिलाता है वह रसास्वादके समाप्त होनेके बाद यथास्थित्य जसके-तैसे पदाथोंको दिसलाने वाले कवि और नटजनोके चेष्टोंके बलपर [एक ही प्रहारसे] सिरकाट डालने वाले, प्रहार-कुशल वीर [के सौन्दर्यको देखकर, उस] से भी विस्मय [ग्रोर तज्जन्य चमत्कार] वहे श्रानुभव करते हैं । समस्तां श्रङ्गोंको श्रानन्द प्रदान करने वाले [सव इन्द्रियोंके श्राह्लादक], कवि ग्रोर नटजनोंकी दाक्षित [कौशल] से उत्पन्न चमत्कारके द्वारा घोलेमें श्राकर कुन्दिमान लोग भी दुःखात्मक करुणाादि रसोंमें भी परमानन्द हपता सम्भने लगते हैं । और इसका ग्रास्वादन करनेके लोभसे सवरने न कर सकनेके कारण प्रेक्षक मामा-जिक भी इन [के ग्रास्वादन] में प्रयुक्त होते हैं ।

कविजन तो मुख-दुःख खात्नक ससारके श्रनुरूप हो [कार्य नाटक श्रादिको] रचना करते हैं समस्त मुख-दुःख खात्नक रसोंसे युक्त हो [कार्य नाटक ग्रादि] रचना करते हैं । पने चा माधुयं जैसे [उसमें पड़ी हुई मिर्चे] तो वे ग्रास्वादनमें ग्रोर श्रास्वादिक प्रचच्य प्रतीत होता है इसो प्रकार [करुणाादि दुःखप्रधान रसोंमें] हु श्रादे [तो वे] श्रास्वादिकों मिलकर मुलाकी ग्रानुन्रीत ग्रोर श्रास्वादिक श्रानन्ददायिनी वन जाते हैं । ग्रोर [नाटकादिमें] सौतसके हर्ष, द्रौपदीके वेसा एव वस्नोंके खोचे जाने, हुरिचन्द्रककी चाण्डालके

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लक्ष्मणास्य शक्तिभेदन, मालत्यो व्यापादनारम्भरागामित्याद्याभिनेयमानं पश्यतां सहृदयानां को नाम सुखास्वादः ? तथानुरागगताश्रु कम्पादय परिदेवितानुकरणादिस्वान्। 'साचद् द्रु खात्मका एव। यदि चानुरागोऽसुरसात्मानं स्रुजुने समयानुकार्यां स्यात्। विपरीतत्वेन भाषणादिति । शोकोपशमदैन्याश्रुता कुर्यो वाष्पसम्बन्धिनीयमाने वा सुखास्वाद मोदपि परमार्थतो द्रु खात्मक एव। द्रु खी हि द्रु खितान्वितया सुरससम्भिमन्यते । प्रमोदवार्तया तु लाम्यतीति करुणादयो द्रु खात्मान एवेति । विप्रलम्भशृङ्गारस्तु व्याहारिकार्थत्वाद् द्रु खपोषपि सम्भोगसम्भावनागर्भंयात् सुखात्मक ।

यहां दास्ता, रोहिताश्ववधे मरण, लक्ष्मणके शक्तिभेदन, मालतीके मारनेके उपक्रम आदि के प्रभिनयको देखने वाले सहृदयोंको सुखास्वाद फंसने हो सक्ता है ? [इसलिए करुणादि रसोंको सुखात्मक मानना उचित नहीं है । इसको वातके समर्थनकेलिये आगे भी युक्ति देते हैं] । शृङ्गार प्रभुकायंगत [प्रत्यक्ष रामचन्द्र आदिके वास्तविक जीवनमें सीतादियोगके समय] करुणादि विलापादियुक्त होनेके वाराआ निश्चिन्त रूपसे द्रु खात्मक हो होते हैं । यदि उनका प्रभुकरणए [रूप नाटकादि] में सुखात्मक माना जाय तो वह समयक् प्रभुकरणए नहीं हो सक्ता है । [वास्तविक द्रु खात्मक प्रतीतसे] विपरीत रूपमें [नाटकादिमें] प्रतीत होनेसे [नाट्यादिमें रामके दुःखका यथार्थं प्रभुकरए नहीं बनेगा ! इस वाराआ भी करुणादिको द्रु खात्मक ही मानना पड़ेगा] । कभी कभी किसी हृदयके विनाशके समय उसको सान्त्वना देनेकेलिये लोग किसी प्रभके इसी प्रकारके द्रु शकं वातांन आदिक करते हैं । और उस प्रकारके दूसरेके द्रु शकं सुनकर या देखकर द्रु खित व्यक्ति को तुच्छ सान्त्वना और अपने कष्टको सहनेका वल मिलता है परन्तु वह सुख नही है । वह द्रु खास्वाद हो है । द्रु खो व्यक्तिके सामने दूसरोंने उसी प्रकारके दुःखके वर्णनसे तो उसको सान्त्वना मिलती है । किन्तु यदि उस हृदयके समय उसके सामने नाच-रंग आदिक आनन्द वार्ताकी चर्चा की जाय तो वह उसको बुरो मालूम होती है । इसलिए करुणादि रस सुखात्मक ही है इस वातको आगे ग्रन्थकार इस प्रकार लिखते हैं— और हृदयके विनाशसे द्रु खियोके सामने करुणादिका वरणांन किए जाने अथवा प्रभिनय किए जानेपर जो सुखास्वाद होता है वह हो तो वास्तवमें द्रु खास्वाद हो होता है । द्रु खो व्यक्तित दूभरके द्रु खो व्यक्तिके द्रव वार्त्सि सुख सा [सान्त्वना सी] प्रभुकव करता है । और प्रभवेकी वात्सति [उस समय] उद्विग्न होता है । इसलिए भी करुण आदि रस दुखात्मक हो होते हैं [उनको सुखात्मक रस नही माना जा सक्ता है] । विप्रलम्भ शृङ्गार तो [हृदयके] दाहादि [द्वारा विनाशको प्राप्ति] से जंय होनेके करणए द्रु खम् होनेपर भी उसमें पुनर्मिलन [सम्भोग] की सम्भावना वनी रहनेसे सुखात्मक [कचा गया] है ।

इस प्रकरणमें ग्रन्थकारने करुण तथा विप्रलम्भ शृङ्गारका भेद दिखलाया है । मस्तृए १ तालिकायंत्वात् । १३ स्मृतिं ।

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रसश्च मुख्यलोकगतप्रेक्षकगतकाव्यस्य श्रोतृ-श्रानुसन्धायकदृश्यगतो वेति । 'स्पष्टा' इति स्पष्टा सम्यग् निरीक्षिता । श्रसन्दिग्धं हि लिङ्ग'भवति । श्रनुभावयन्निति

रसोके दो खातमक भेद विप्रलम्भ श्रृङ्गारको मुख्यातमक रस माना है । इस भेदको कारण यह है कि विप्रलम्भ श्रृङ्गारमे पुनर्मिलनकी सम्भावना बनी रहती है । किन्तु वियोगमे पुनर्मिलनकी सम्भावना नहीं रहती है । रामचन्द्रके जीवनमे सीता हरएकके बादल प्राय विप्रलम्भ श्रृङ्गार का प्रसंग है भोर सातान्तिकशोकके बादलकी प्रासंगिकता है । इसी भेदको महाकवि भवभूतिने उत्तर रामचरितमे इस प्रकार दिखलाया है— उपायानां भावान्विरलविनोदव्यतिकरैः, विमदैर्द्वारार्पाम् जनितजगद्वादमुतरः ! वियोगो मुखधाच्च स सदृ निपुग्धातावधिरमूतू, करुणार्प्पी सह्यो निरवधिरयं तु प्रविलयः ॥ करुणा तथा विप्रलम्भ दोनोंमे प्रियजनका वियोग होता है । उस वियोगमे दोनों जगह हृदय व्यक्त हृदन विलाप आदिक करता है । पर इन दोनोंका भेद कराने वाली सीमारेग्वा मृत्यृ है । मृत्युके पहल वियोग विप्रलम्भका क्षेत्र है भोर मृत्युके बादल वियोग करणाका क्षेत्र है । विप्रलम्भश्रृङ्गारमे पति-पत्नीका वियोग होता है, पर किसी मरस्यु नहीं होता है । इसलिए उस वियोगको प्रवस्थामे किया जाने वाला हृदन भोर विलापादि सब विप्रलम्भश्रृङ्गारकी सीमामे ग्रातत है । किन्तु जहाँ किसी एककी मृत्यृ हो जानेके बाद उस प्रवस्थाका हृदन भोर विलाप पाया जाता है यह सब करणाकी सीमान्त्र ग्राता है । करणारम्भी सीमाका निर्यारण करने वाला यह मृत्यृ कभ्भी वास्तविक भी होता है मोर कभ्भी प्रवास्तविक भी हो सकता है । प्रवास्तविक मृत्यृका प्रभिप्राय यह है कि वास्तवमे मृत्यृ तो नहीं हुई है किन्तु किसी कारणसे पति पत्नो दोनोंमेंसे किसी एकने अपने दूसरे साथी को मृत्यृ समभ लिया है । जैसे कि रामचन्द्रने सीताको वनमे भिजवाने के बाद यह समभ लिया है कि 'काव्यादर्शवल्लतिका मित्य विश्वास्यत' सौताके हारोको निश्र्चय हो जगलके मासमक्षी सिंहादि प्राणियो खा गए हैं । यद्यपि सीता मरी नहीं है किन्तु रामचन्द्रने उसको मरा समभ लिया है । फलत उत्तररामचरितमे किया गया । रामचन्द्रका शोक विलाप करणारसका विषय, भोर उत्तररामचरितको भरतारस प्रधान नाटक माना जाता है । इसीलिए उत्तररामचरितमे सीताके इस वियोगको 'निरवधिरयं तु प्रविलयः' कहा गया है ।

मौट रस [मुख्य सोकत पर्यन्त] ग्रनुकायंगत [प्रतीत रामादिगत] होता है प्रथया सम्वाजकगत होता है [प्रर्थात मुख्य रपसे नटपने रस नहीं रहता है] भोर काव्यमे [काव्यश्रये] श्रोता प्रेक्षक निमित्तौ [श्रनुसन्ध्यौ] पदकौ ध्यान्या करते हैं ] 'स्पष्टा' इससे स्पष्ट पर्यात् भतिप्रकारसे निरीक्षित

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परस्थानेपि रसानवयो वयन्तीति श्रानुभावा। स्तम्भ-स्वेद-प्रश्रु-रोमान्च-भ्रूलेप-ग्रादयः । सैयर्थासम्भवं सत्तया निश्चितेयः । इह तावत् सर्वेलोकप्रसिद्धा परस्थस्य रसस्य प्रतीपत्तिः । सा च न प्रत्यक्षा चेतो-धर्मैरुपमतीनिद्रयत्वात् । तस्मात् परोक्षैव । परोक्षैव च प्रतीपत्तिरिनाभूताद् वस्त्वन्तरान् । छत्रं च रसेन्यास्य वस्त्वन्तरस्यासम्भवात् कार्यमेवाविनाछतम् ।

[श्रानुभावोंके द्वारा रसका निश्चय होता है] । क्योंकि प्रसिद्धिग्र हो निल्न [ग्रनुमावक] होती है । [जैसे इधर पवने ग्राए हुए 'ग्रनुभाव' पदकी ग्रुप्तत्ति दिखलाते हैं] श्रनुभव कराते हैं श्रप्राप्त दूररमे रहने वाले रसोंको स्पष्ट करते हैं इसलिए ['ग्रनुभाव्यन्वित इति श्रनुभावा:'] इस श्रुप्तत्तिके श्रनुसार] स्तम्भ, स्वेद, प्रश्रु, रोमान्च, भ्रूलेप ग्रादि 'ग्रनुभाव' [कहलाते] हैं । उनके द्वारा यथासम्भव सदृशपने निश्चय किया जानेबाला [रसग्रादि स्थायीग्रादि रस महसूसता है] । यहां [काव्य नाटक ग्रादिमे] दूसरे [रामादिमे] मे रहने घाले रसकी प्रतीति सारे लोक मे प्रसिद्ध है । [वह ग्रनत कराएवाने होता है ।] ग्रोर ग्रनत-कराएवानेके ग्रोंकि इन्द्रियग्राह्य न होनेसे प्रत्यक्ष नहीं कहे जा सकते है । इसलिए परोक्ष रूप हो हे । ग्रोर परोक्ष प्रतीति उससे ग्रविनाभूत [प्रर्थात् जिसके विना वह प्रतीति नही बन सकती इस प्रकारके [छाद्र या लिन्द श्रादि] ग्रर्थात् तदुपलक्षण द्वारा होती है । ग्रोर रसमे [इस प्रकारके] छाद्र वस्तुसम्भव न होनेसे उसका कार्य [प्रर्थात ग्रनुभाव ग्रादि] हो [रसके] ग्रविनाभूत है । इसतिए उन्हीं द्वारा रसकी प्रतीति होती है] । इस पक्तिमे ग्रथकारने यह कहा था कि ग्रनुभावादि वायं ही रसके श्रविनाभूत या ग्रान्तरीयक होते हैं इसलिए उनके द्वारा हो रसकी प्रतीति होती है । इसपर यह शंका उपस्थित की जा सकती है कि ग्रनुभावादिको रसका नान्तरीयक या ग्रविनाभूत नहीें कहा जा सकता है । इसका कारण यह है कि रसका ग्रविनाभूत केवल उनका कहा जा सम्ता है जो रसके बिना हो ही न सकें । स्तम्भ स्वेदादि ग्रनुभावोकी वह स्थिति नही है । वे तो रसके बिना भी हो सकते हैं । जैसे श्रमी ग्रुपर कहा जा चुका है कि यदि रस या तो मुख्य लोक ग्रथवा रामादिमे रहता है ग्रथवा प्रेक्षक सामाजिकमे रहता है नटमें रस मुख्य रूपसे नही रहता है । किन्तु रसका ग्रभभाव होनेपर भी नटमें स्तम्भ-स्वेदादि ग्रनुभाव पाए जाते हैं । इसीलए वे रसके ग्रविनर-भूत या नान्तरीयक नही है । तब उनसे रसकी प्रतीति कैसे हो सकती है?

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परगतविभावाद्यनुसृत्याभ्यां च पररञ्जनार्थं प्रवृत्तस्य नटस्य रसाभिव्येडपि स्तम्भस्वेदादयो भवन्तीति, नैपां रसानन्तरीयकत्वमाश्रयड्नीयम् । तेषां परगतरसजनकत्वेनाकार्यत्वात् । नटगता हि स्तम्भादयः प्रेक्षकगतरसानां कारएम् । प्रेक्षकगतस्तु कार्योऽपि परोक्षं चार्थं जुसूक्षना परोचार्थानन्तरीयके लिङ्गस्वरुपे निपुण्येन प्रतिपत्तव्यम् ।

उपपादन किया है । यह सिद्धांत ग्रन्थ सिद्धांतों से विलक्षण है । ग्रन्थ सिद्धांतों में रसकी साक्षात्कारात्मक ब्रह्मानन्द सहोदर माना गया है । परन्तु यहाँ रसकी परोक्षात्मक और परस्य प्रतीतिकी उपपादन किया गया है । पत्तियो वा ग्रन्थं निम्न प्रकार है— दूसरोंके मनोरंजनकेलिए, दूसरोंमें [प्रथ्यात् ग्रनुकायं राम ग्रादिमें] रहनेवाले विभावके ग्रनुकरएमें प्रवृत्त होनेवाले नटमें रसका प्रभाव होनेपरभी स्तम्भ स्वेदादि [ग्रनुभाव] होते हैं इससे उनके रसके ग्रनुभावूत न होनेकी शङ्का नहीं करनी चाहिए । क्योंकि वे [प्रथ्यात् नटगत स्तम्भ स्वेदादि ग्रनुभाव] परगत [प्रथ्यात् सामाजिकमें रहनेवाले] रसके जनक होनेसे [रसके] कार्यं नहीं होते हैं । नटगत स्तम्भ ग्रादि सामाजिकगत रसोंके कारण होते हैं । सामान्यगत [स्तम्भ ग्रादि के [रस के] कार्य होते हैं ।

ग्रन्थकारोंने यहाँ यचपि नामत किसीके मतका उल्लेख नहों किया है किन्तु उनके इस लेखसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि इस विषयमें शकुकके ग्रनुमितिवादका ग्रनुसरण कर रहे हैं । परन्तु इनका ग्रनुमितिवाद भी भरत सूत्रके व्यार्यातात ग्राचार्य शकुकके ग्रनुमितिवादसे कुछ मिन्न-सा है । शंकुकके मतमें नटगत ग्रनुभावादिसे रसकी ग्रनुमिति मानी गई है । परन्तु यहाँ सामाजिकगत ग्रनुभावादिके द्वारा उसको ग्रनुमितिका प्रतिपादन किया गया है । परोक्ष प्रयंको जाननेकी हच्दय रखने घालिको परोक्ष प्रयंकके ग्रनिनाभूत लिगके स्वरुपके समकनेमें निपुण ज्ञाता होना चहिए ॥

इस पंक्ति का ग्रभिप्राय यह है कि परस्य रसका ग्रनुमान करने वालो व्यक्ति इस विषयको भली प्रकार समभता है कि शकुकके प्रकारिने ग्रनुमानके भनुभाव भनुकूल प्रकारको मन स्थिति में होते हैं । तभी वह सामाजिक या प्रेक्षकगत विशेष प्रकारके ग्रनुभावोंको देखकर उसमें ग्रट्टार वीर ग्रादि विशेष रसोंका ग्रनुमान कर सकता है । इस प्रकार ग्रन्थकारने यहाँ परगत रसके ग्रनुमानका प्रकार दिखलां दिया । किन्तु प्रेक्षकगत ग्रनुभावादिसे रसकी प्रतीति जिसमे होती है यह ग्रथन ग्रनुपस्थित रह जाता है । सभी प्रेक्षकोंमें एक-दूसरेमें रहने वाले रसकी परोक्षा प्रतीति होते है यह एक समाधान इस ग्रथनका हो सकता है । किन्तु वह कुछ उचित प्रतीत नहों होता है । रसकी प्रतीति सामाजिकको साक्षात्कारात्मक होती है तभी उसक ग्रनुमान करना वन सकता है । परोक्षा ज्ञानको ग्रनुमान नहों कहा जा सकता है । भत ग्रन्थ सिद्धांत मुलत:संगत मही है ।

दूसरा समाधान, नटमें ग्रनुभावोंकी स्थिति— ग्रनुभावोंके द्वारा रसकी प्रतीति होती है । इस सिद्धांतके विषयमें यह कहा नटगत ग्रनुभावोंसे रसोंका ग्रनुमान होता है ग्रथवा कि ग्रनुभावोंको रसोंका ग्रनिनाभूत या ग्रनन्तरीयक नहों कहा जा सकता है । क्योंकि

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नटेरपि च रसं गमयन्न्येव यथा रसकार्या भवन्ति । न च नटस्य रसो न भवतीत्येकान्त । पश्यस्त्रियो हि धनलोभेन पररत्थं रतादि विपन्न्यनल्प कदाचित् स्वयमपि परां रतिमनुभवन्ति । गायनाश्च परं रुजयन्तः कदाचित् स्वयमपि रुजन्ते । एवं नटोडपि रामादिगत विप्रलम्भाद्यनुकुर्वाणे कदाचित् स्वयमपि तन्मयीभावमुपयात्येवेति तद्गता श्रृपि रोमान्चादयस्तत्र रसं गमयेयुरेव । श्रृत एव ‘स्पष्टानुभाव’ इत्युक्तम् ।

रोमान्चादयश्च ये स्त्री-पुं-सनट-काव्यस्थास्ते परेपां रसजनकत्वाद् विभाव-मध्यवर्तिन । प्रेक्षक-श्रोतृ-चतुरसन्धातृादिस्थितास्तु रसस्य कार्योपरिसन्तो व्यवस्थापकाः । यत्र विभावा परमार्थेन सन्तः प्रतिनियतविभयमेव स्थानियन रसत्वमापादयन्ति, तत्र नियतविभयोल्लेपि रसास्वादप्रसङ्ग । युवा हि रागवती युवतिमवलम्ब्य तद्विपय-मेय रतिं शृङ्गारतयास्वादयन्ति । नटने रसके न होनेपर भी श्रृङ्गार भाव उत्पन्न होते हैं । तब जिन श्रृङ्गार भावोंसे रसके साथ व्याप्ति या श्रविनाभाव हो नही है उनके रसकी प्रतीति या अनुमिति कैसे हो सकती है ? इस शङ्काका एक समाधान ग्रन्थकारने यह दिया कि नटनत श्रृङ्गारादिवोसे रसकी प्रतीति नहीं होती है श्रृपित प्रेक्षकगत कार्यभूत श्रृङ्गारादिवोसे रसकी प्रतीति होती है । श्रृणु इसी विषयमे दूसरा समाधान यह दे रहे हैं कि नटने रस नही होता है, यह बात भी नही है । नटने भी रस हो सकता है । इसलएि नटनत श्रृङ्गार भाव भी रसके श्रविनाभूत है । हमी वानसे ग्रन्थकार ग्रन्थी पक्तियोंमे निम्न प्रकार लिखते हैं— [नटने रहने वाले श्रृङ्गारादि] जव [नटनत] रसके कार्य [प्रर्यात नटनत रससे उत्पन्न] होते हैं तब ये नटने भी रसका ग्रनुमान कराते हैं । श्रोर नटने रस होता हो नही है यह कोई नियम नही है । देखिएँ जो धनके लोभी होते दुसरोंको [भोगके लिए] रति ग्रादिक प्रवसर देतेो हैं कभी स्वय भी प्ररयन्त प्राणानदका ग्रनुभव करते हैं । श्रोर गाने वाले दुसरोंके मनोरजनके लिए गाते हुए कभी स्वप भी प्राणानद मभ्न हो जाते हैं । इसो प्रकार नट भी रामादिगत विप्रलम्भश्रृङ्गारका श्रनुकरण करते हुए कभी स्वप भी तन्मयोभावो प्राप्त हो जाते हैं । इसलएि उसमे रहने वाले रोमान्च ग्रादि [ग्रनुभाव] भी [उसके भीतर रहने वाले] रसका ग्रनुमान कराते हैं । इसोलएि [कारिकामे] ‘स्पष्टानुभावतचेप्ट.’ यह वहर पाया है । [प्रर्यात प्रेक्षकगे या नटने जहाँ भी रसके कार्यभूत ग्रनुभवय स्पष्ट रूपसे प्रतीत हो वहाँ वे रसका ग्रनुमान करा सकते हैं] । [लोके] स्त्री, पुरुष, नट, तथथा कार्यमे रित जो रोमान्च श्रादि [ग्रनुभाव] होते हैं वे प्रथ्योेम [रितने] रसके जनक होनेसे [रसके कारगभूत] विभावो [मिने जाते] हैं । [इतके विपरीत नाटकादि हस्य-करुणाद्यपे] प्रेक्षक [रस्य-करुणाद्यपे] रोता तथा [उन होनेो] ग्रनुसन्पाता [प्रर्यात निर्मित रसवि]मे रित [रोमान्चादि] तो रसके कार्य हप होनेसे [रसके व्याप्रापक होते है] । जहाँ [समस्त सोकेम] वासनिव रूपमे रित विभाव [सोताराम ग्रादि] निन्वित व्यक्तिविशेषमे [रति ग्रादि रस] स्मृतिभावो रससप्ताताको प्राप्त कराते हैं वहाँ रसास्वाद निपत व्यक्तिद्रिेपमे होता है । जैसे कि [लोेम शोर्] युवक यनितो युवतिषो सेतर

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यत्र तु परानुरक्तांsनुरक्तामवलम्य सामान्यविपयां रतिहेतुमुपैति, तत्र न नियतविपय शृङ्गाररसास्वादः । विभावानां सामान्यविपये स्थाय्याविर्भावकत्वात् । वन्युशोकातां च रुदतीं स्त्रियमवलोक्य सामान्यविपय एव करुणरसास्वादः । एवमन्येऽपि रसेपु विशेष-सामान्य-विपयत्वं दृश्यम् ।

उसके विपयमें अपनी रतिको शृङ्गाररसके रूपमें ग्रास्वादन करता है । [इसी प्रकार लोकमें वास्तविक रूपसे विद्यमान स्त्री-पुरुषादि हृदय विभावमें नियत विशेषसे सम्बन्ध रूपमें ही रसास्वादको अनुभूति होती है । यहां रसकी प्रतीति विशेष-विपयक ग्रोच लौकिकी हृदि । आगे सामान्य-विपयक रसकी प्रतीतिकी अलौकिकता का उपपादन करते हैं] ।

जहांँ [लोकमें वास्तविक रूपसे त्रियत, पर] अन्यस्मै अनুরक्त धनिताकां [अर्थात् परकीयां नामिका] को लेकर [अनेक व्यक्तितयोंमें] सामान्य विपयक रति परिपोषण होता है वहांँ नियत व्यपितविलोपसे सम्बन्ध रूपमें शृङ्गाररसका ग्रास्वाद नहीं होता है । [अर्थात् एक स्त्रो के अनेक ध्यवितयोंको सामान्यरूपसे शृङ्गारानुरक्ति होती है] ।

यथेँकि [ऐसे उदाहरणोंमें स्त्री आदिक रूप] विभावोसे सामान्य रूपसे [अनेक व्यक्ति विपयक रतिकी प्रादि] स्थायिभाव का प्राविर्भाव होनेसे [सामान्य-विपयक हो रसास्वाद होता है] । इसो प्रकार अपने किसी प्रिय वनधुके वियोगसे पीडित युवतियों रोते हुए देखकर [देखने वाले अनेक व्यक्तियोंको] सामान्य विपयक हो करुणरसका ग्रास्वाद होता है ।

[इस प्रकार इन दो उदाहरणोंके द्वारा प्रकारने यह दिखलाया है कि शृङ्गार ग्रोर करुण दोनों रसोंकी सामान्य-विपयक तथा विशेष-विपयक दोनों प्रकारकी स्थिति होती है । यहॉं बात अन्य रसोंके विपयमें भो समभनी चाहिए । इसीलिए ग्रन्थ रसोंमें भो सामान्य-विपयत्व ग्रोर विशेष-विपयत्व समभ लेना चाहिए ।

यह जो रसोंका सामान्य-विपयत्व तथा विशेषोप-विपयत्व दिखलाया है वह वास्तविक रूपसे विद्यमान 'परमार्ये¨न्त सन्त' विभावादिके द्वारा उत्पन्न रसोंके विपयमें वह गया है । 'परमार्यंसत्ता' वास्तविक रूपमें विद्यमान विभावादिकी सिथति लोकमें ही होती है, नाटक ग्रादिमें नहीँ ।

इसलिए यह सामान्य ग्रोर विशेषाद् द्विविध रसोंकी सिथति भी लोकमें हो हो सकती है । काव्य ग्रोर नाटकमें साधारणीकरण व्यापार द्वारा सामान्य रूपसे अनेक व्यक्तियोंमें रसकी अनुभूति होती है । इस वातको अगले प्रकरणमें दिखला रहे हैं ।

जिन्तु यहांँ एक बात विशेषरूपसे ध्यान देने योग्य है ग्रोर वह यह वात है कि अन्य भावायिते रसको अलौकिक माना है । लोकमें होने वाली स्त्री-पुरुषकी परस्पर रतिकी अन्य भावायोंते रम नहीँ माना है ।

वास्तव नाटकमें होने वाले विभावादिखी ही उन लोगोंने विभावादि ठहरते है । उनके मतमें विभावादि रस्ब भी लोकके नहीँ साध्य नाटकके क्षेत्रमें हो सीमित है ।

यहॉं ग्रन्थकारने लौकिक स्त्री-पुरुष आदिकों भो 'विभावादि' तद्बोसे ग्रोर चनम्री रति ग्रादिको भो 'रस' तद्बोसे निर्दिष्ट किया है । इसलिए उन्होंने सामान्य-विपयक ग्रोर विशेष-विपयक द्विविध रसोंकी सिथति मानी है ।

जनका यह सिद्वान्त इस प्रकार सौलिक रसादिविपयक विवेचना करनेके बाद प्रस्तुतकार ग्रन्थमें वाध्य-नाटकगत रसोंकी विवेचना करते हुए लिखते हैं—

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ये पुनः परमार्थसन्तोडपि काव्याभिनयाभ्यां सन्त इवोपेता विभावारते श्रोतृ-श्रतुसन्धातृ-प्रेक्कारां सामान्यविपयमेव स्थायिनं रसतन्मात्रपादयन्ति । श्रतृ च विपयविभागनपेक्षी रसास्वादप्रत्ययः । न हि रामस्य सीतायां श्रृङ्गारेऽनुरक्तिर्ययोः सामजिकस्य सीताविपयः श्रृङ्गारः समुल्लसति । अपि तु सामान्यस्त्रीविपयः नियतविपयस्मरणादिना स्थायिनः । प्रतिनियतविपयतया तु प्रतिनियतविपय एव रसास्वादः तथा अपरमार्थसन्तः । श्राभिनयकाव्यार्थयोः च विभागयोः बहुलसाधारण्य-स्वादू य एकस्य रसास्वादः सोऽन्यप्रतिद्वोपातः, इत्ययोगव्यवच्छेदेन न पुनरन्ययोगव्यवच्छेदेन ।

ग्रोर वास्तविक हृपमें न होनेपर भी काव्य या श्रभिनय [नाटक] के द्वारा विद्धमानसे प्रतीत होनेवाले जो विभावादि हैं ये [काव्यके] श्रोता, श्रतुसन्धाता [श्रर्थात् निर्माता] तथा प्रेक्षक [तीनोंमें] सामान्य विपयक स्थायिभावको ही रसत्वताको प्राप्त कराते हैं । यहां [प्रर्थात् काव्यनाटकमें] विपय-विभागकी ग्रपेक्षा न करनेवाला रसास्वाद होता है । [प्रर्थात् काव्यनाटक ग्रादिमें सामान्य-विपयक ग्रोर विशेष-विपयक दो प्रकारका रसोद्बोध नहीं होता है ] । रामके सीता-विपयक श्रृङ्गारका ग्रनुकररण होनेपर सामाजिकमें सीता विपयक [प्रर्थात् विशिष्ट विप्रेपसे सम्बद्ध] श्रृङ्गारानुरक्ति नहीं होती है ग्रप्रतु सामान्य स्त्री-विपयक [श्रृङ्गारकी ग्रनुभूति होती है । लोकमें नियत विपयके विद्यमान न होनेपर भी नियत विपयके स्मरररादि से नियत-विपयक [प्रर्थात् उस स्मररामाश्रित व्यक्ति-विशेषसे सम्बद्ध] ही रसास्वाद होता है । ग्रर्थात् लोकमें ग्रविमावादिको वास्तविक हूपसे विद्यमान ग्रोर वास्तविक हृपते प्रविशमान होनेपर नहों स्मररामाश्रित, दो हूपोंमें हिप्रति हो सकती है । ग्रोर जनसे विशेष-विपयक ग्रर्थात् विशेष-व्यक्तिसे सम्बद्ध हूपसे भी रसानुभूति हो सकती है । किन्तु काव्य ग्रोर नाट्य में विभावादि वास्तविक हृपमें विद्धमान नही होते हैं । केवल काव्य तथा श्रभिनयके द्वारा सर्मापित होते हैं । इसलिए उनसे विशेष-विपयक रसानुभूति न होकर सामान्य-विपयक रसा-नुभूति हो होती है । इस यातको ग्रागे पवितयको इस प्रकार लिखते हैं—

ग्रोर वास्तविक प्रवितमान किन्तु [केवल] काव्य तथा प्राभिनयके द्वारा सर्मापित विभावोंके ग्रनेक पुढवाले लिए सामान्य हेतुनेस [बहुसाधारण्यस्वादात्] जो [उन बहुतक सामाजिकोंमेंसे] एकका रसास्वाद है वह ग्रन्यक प्रतिश्रेपक हृप [प्रर्थात् ग्रन्योंकी रसानुभूतिमें बाधक] न होने से[उस विशेष सामाजिकमें] ग्रनयोगव्यवच्छेदसे [प्रर्थात् प्रवधिमें] रहता है, ग्रनयोगव्यवच्छेदक से[उस ग्रन्ययोग-व्यवच्छेदक

यहां 'य एकस्य रसास्वादः सोऽन्यप्रतिद्वोपातः इत्ययोगव्यवच्छेदेन न पुनरन्ययोगव्यवच्छेदेन' यह सारी पक्ति तानिक विद्वन् पक्ति है । पक्तिने ध्यारम्मे 'तथा परमार्थसता' पद भी सदिग्ध-सा या भ्रमात्मक हो सकना है । उसमें 'तथा' के ग्रगे 'परमार्थंसतां' इस प्रकाररसा पदच्छेद करना चाहिए । क्योंकि योंके काव्य नाटक ग्रादिमें जो विभावादि होते हैं ये 'परमार्थंसत्' वास्तविक हृपमें विद्यमान नही होते हैं । इस-

स्वादः सोऽन्यप्रतिद्वोपातमा, इत्ययोगव्यवच्छेदेन न पुनरन्ययोगव्यवच्छेदेन ।

लिए यहां 'तथा ग्रपरमार्थंसतां' यही पदच्छेद करना उचित है । इसकें ग्राद 'य एकस्य रसा-स्वादः सोऽन्यप्रतिद्वोपातमा' इस प्रकारके पाठ पूर्व सहृदयमें द्वृपा या पूर्व पाठानुरूप ही ९. परमार्थसंतां ।

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श्रत च रत्यादेरविभावैरविभूतस्य पोपकारिरपो व्यभिचारिपो रसिकगता एव प्राध्या। यदाहि विभावैः रत्यादिभः, कार्यनाटचगतैर्यों श्रृङ्गारय रत्यदयो रसोन्मुखत्वेनोन्मील्यन्ते, तदा यथायोगं व्यभिचारिरपोडप हत्न प्रादुःपान्ति। न हि रस्यान्निद्यन्तां शृङ्गारो, धृति हास्यो, विपादं करुणो, श्रमपं रौद्रे, हर्षं वीरः, त्रासं भयानकः, शोकं वीभत्सः, श्रोत्सुक्यमद्भुतो, निर्वेदं शान्तः सहचारिर्यो विन प्रादुर्भवति। व्यन्वयतचेतसो विरक्चेतसो वा, वाक्यार्थावबोधे वार्तान्तरादर्शनेऽपि चिन्ताद्यभावे रसाभासात्। सौम्यादाशुभावाच्च कवचिदनुपलञ्च्योऽपि न दोषः। प्रादुर्भूतस्य व्यभिचारिपो रसोन्मुखं स्थायितं पोपयन्तो रसत्वमापादयन्ति। श्रत एव रसत्वोन्मुखानां स्थायिनां व्यभिचारिणः सहचारिणो, विभावस्तु प्राभाविनः।

है। जिसकी चित्तवृत्ति हो वह व्यक्ति उस चित्तवृत्तिका आधार हृदय [ चित्तवृत्ति-विशेष हो रस है। [इसकेलिए इस प्रतीतमें उसके श्राधारभूत रसिकता सम्बन्ध प्रवश रहता है। यह प्रथकारका प्रभिप्राय है]। और यहां विभावोदे प्राविभूत होने वाले रति आदि [स्थायिभाव] को पुष्ट करने वाले व्यभिचारिभाव रसिकमत हो लेने चाहिए। [नटगत पा भरुकायंगत व्यभिचारियो सामाजिकगत रत्यादिको पुष्टि नहीं होता है। यह अभिप्राय है]। जब [लोकमें] स्त्री प्रादि विभावोंसे, श्रथवा काव्य नाटकमगत विभावोंसे दूसरोंको रत्यादिका रसोन्मुख हपसे उन्मोत्तन होता है तब [उन सामाजिकों] के भीतर प्रयोजित व्यभिचारिभावोंका भी प्राधान्य होता है। क्योंकि स्त्रो प्रादिको चित्ता [ हप व्यभिचारिभाव ] के बिना भृङ्गाररस, धृति [ हप व्यभिचारिभाव ] के बिना हास्य, विपाद [ हप व्यभिचारिभाव ] के बिना करणो, अमर्षके [ हप सहचारी ] के बिना रौद्र, हर्षके [ हप सहचारी ] के बिना वीर, त्रास [ हप सहचारी ] के बिना भयानक, शंका [ हप सहचारी ] के बिना वीभत्स, श्रोत्सुक्य [ हप सहचारी ] के बिना प्रद्भुत, निर्वेद [ हप सहचारी ] के बिना शान्तका प्रादुर्भाव नहीं हो सकता। क्योंकि जितनेकी दुसरी ओर तद्गो होनेपर मथवा विरक्तचित्तको चिन्तादि [सहचारियों] के प्रभावमें [काव्य नाटकके] साध्योंके प्रयंक जान होने पर श्रथवा हृदयमें स्त्री प्रादिको दर्शान होनेपर भी भृङ्गार रसकी प्रतिपत्ति या ज्ञान नहीं होती है। [फिर भी यदि चित्तकी विना भी रसकी प्रतिपत्ति हो तो वह महो सम्भवना चरितार्थ है] सुतरां होनेसे कारण श्रथवा [जन सहचारियोंकी द्रविति होनेपर भय] उनके न द्रलटाई देनेके कारण उसमें कोई दोष नहीं पाता है। [इस प्रकार लोकोक् स्त्रो प्रादि विभायों प्रययवा काव्य नाटकमगत विभावोंसे रसिकोंमें] प्रादुर्भूत होने वाले व्यभिचारिभाव रसोन्मुख स्थायिभावको पुष्ट करते हुए [उसको] रसत्व प्राप्त कराते हैं। इसलिए व्यभिचारिभाव रसोन्मुख स्थायिभावोंके सहचारी [हेलसादे] हैं। और विभाव तो [स्थायिभावोंके] पूर्ववर्ती [प्रथमतः प्रथवा हेतु म्रनुमाते] हैं।

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ये पुत्रः स्यादिगता: काव्याभिनयोपेतरहिताश्च व्यभिचारिभिरड्गनुभावा वा ते परस्मिन् रसेऽनुपपत्तेन स्थायित्वमुन्तीलयन्ति । ते विभावा एव जनकत्वात्‌ । व्यभिचारिभिर-अनुभावव्यपदेशः पुनरतिपां स्याद्विप्रलम्भया, व्र्यभिचार्यानुकथोपेतया च ।

ग्रन्थकारे लिखते हैं— प्रेक्षक [लोकसमें] जो स्त्री प्रादिमें रहने वाले श्रृंगार [काव्य तथा नाटकमें] काव्य तथा प्रभिनयके द्वारा संचार्पित व्यभिचारिभाव श्रृंगार श्रनुभाव होते हैं वे दूसरॉके भीतर [प्रथमतः सामाजिकोंके हृदयमें] स्यायिभावको रसोन्मुख बनाते हैं । इसलिए [रसनुभूतिके] कारण रस्प सामाजिकों हृदयमें होनेसे विभाव हो कहलाते हैं । उनके लिए व्यभिचारिभाव या श्रनुभाव द्वारक प्रयोग [सामाजिकको हृदयिसे नहीं होता है अपितु लोकसमें केवल] स्त्री प्रादिके श्रृंगारसे प्रेक्षक [काव्य नाटकमें] व्र्यभिचार्य प्रभुकाव्येकी प्रपेक्षासे हो होता है । [अर्थात् प्रभुकाव्य रामादिमें श्रृंगार या नटमें श्रृंगार लोकमें स्त्री वादि निष्ठ जो प्रभनुभाव या व्यभिचारिभाव होते हैं वे उन लोगोंको हृदयिसे तो श्रनुभाव या व्यभिचारिभाव कहे जा सकते हैं किन्तु सामाजिकों हृदयिसे वे सब रसके कारण रस्प होनेसे विभाव हो कहे जाते हैं । स्यायिभावोंकि पुष्टिके लिए यहीं जिन श्रनुभावों तथा व्यभिचारिभावोंका ग्रहण किया गया है वे रसिकनत श्रप्रत्यक्ष सामाजिकगत श्रनुभाव तथा व्यभिचारिमय हो हो सकते हैं ।

ग्रोर [भारतभुनिने] जो 'विभाव,' श्रनुभाव तथा व्यभिचारिभावोंके संपोपसे रसकी निष्पति होती है" यह कहा है यहाँ भी श्रनुभाव प्रोर व्यभिचारिभाव [लोकमें] स्त्री प्रादि विभावके श्रनुकूल प्रभुकाव्यकी प्रपेक्षासे ह्री समपने वाहिए ।

इस प्रकरणके समर्थनमें मतमे रसकी प्रतीति या रसनुभूतिके प्रकार वार होते हैं । लोकमें (१) स्त्री प्रादि विभावोंमे भी रसकी प्रतीति होती है ग्रोर (२) उनके देखने वाले प्रेक्षकको भी । स्त्री प्रादिकी रसनुभूति स्वगत ग्रोर प्रत्यक्षात्मक होती है । प्रेक्षककी रसप्रतीति परमत ग्रोर परोक्षात्मक होता है । नाटकमें (३) नटके स्वगत प्रत्यक्षात्मक, रसप्रतीति ग्रोर (४) प्रेक्षकके उस नटमें या परगत रसकी परोक्षात्मक प्रतीति होती है । इसौ वातको ग्रागे श्रनुवृद्वेद में निम्न प्रकार बतलते हैं—

इस प्रकरण (१) [लोकस्य] लोकेस्य [प्रथावत् लौकिक रूपेण रिथत पुरुषस्य], (२) [नटस्य पर्याय्त्] नटको, (३) काव्य [तथा नाटक रसों] के धोता, तथा (x) श्रनुमन्याता [प्रथावत् कर्त्ता] को एवं (x) प्रेक्षक [सामाजिक] भी [इन पांचोंको दो माओंमें विभक्त करने पर पहिले चारको एक कोटिमें रखतेसे उन द्वाराेकि एक व्र्यंग्यो स्वतः प्रत्यक्ष रूपपै तथा पांचवो प्रेक्षक श्रप्रत्यक्ष रूपसे रसकी प्रतीति होती है । इसौ वातको यहाँ 'स्व परपो प्रनदर्श-परोरसाग्या' शब्दसे कहा है । स्व तथा परोक्ष [प्रत्यक्ष] प्रतपसे तथा परोक्ष रूपसे मुख-बुस्सादिमर रस प्रतीत होता है । इसमैसे भी [लोकमें] मंचत पुरुष ग्रोरे

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रसजन्या: तत्र स्पष्टरूपा: । ग्रन्थग्रन्थ तु प्रेक्षकादौ ध्यामलेनैव रूपेण । विभावानामपरार्थेसतामेव काव्यादिना दर्शनेनात्। श्रत एव व्यभिचारिभिरडनुभावैरच रसास्सारेरपस्पष्टा एव । श्रत एव प्रेक्षकादिगतो रसो लोकोत्तरोत्युच्यते । काव्यस्य च रसविभावको विभावैरस्वात् सरसत्सम् । न पुन: काव्यमेव रस:, काव्ये श्राधारे वा रस: । श्रितोऽत्कर्पो हि चेतोऽधित्तिरूप: स्थायी भावो रस: । स चाचेतनस्य काव्यस्यात्मा श्राधेयो वा कथम् र्यात्? तत्र. काव्यार्थे प्रतिपत्तेरनन्तरं प्रतिपत्तॄणां रसाविर्भाव: ।

पुस्तकमें विभावोंके वास्तविक होनेसे रसकी स्पष्टरूपसे प्रतीति होती है । इसलिए उनमें रसके लोपनेवाले [रसके कारणभूत] श्रनुभाव तथा व्यभिचारिभाव स्पष्टरूप होते हैं । श्रनुभवप्रतीक आदिने [ध्यानादि श्रनुभाव] । स्पष्टरूप होनेसे [श्रनुभाव व्यभिचारिभाव होते हैं] । काव्यादिके द्वारा वास्तविकमें प्रवृत्तिवान् विभावादिके हो उपस्थित किए जानेसे [जनके द्वारा होनेवाली रसप्रतीति भी स्पष्ट हो होती है] । इसीलिए [प्रेक्षकादिमें] व्यभिचारिभाव तथा श्रनुभाव भी रसके श्रनुसार स्पष्ट हो होते हैं । श्रत एव प्रेक्षक आदिमें रहने वाला रस [प्रस्तुत विभावोंसे उत्पन्न श्रोत्र स्पष्ट श्रनुभाव व्यभिचारिभाव युक्त होनेसे] लोकोत्तर कहलाता है । रसके श्राविर्भाव करानेवाले विभावादिके युक्त होनेसे काव्यको सरस माना जाता है । न तो काव्य ही रस है श्रोत्र न काव्य रूप प्राधान्यमें रस रहता है । [इसलिए काव्यकी सरसता का उपपादन रसके श्राविर्भावक् विभावादिके उसमें विद्यमान होनेके कारणसे ही किया जा सकता है] । परिपुष्ट हृदया विततवृत्ति रूप स्थायीभाव हो रस [कहलाता] है । यह प्रवेतन काव्यकका श्रात्मा या श्राधेय नहीं हो सकता है । इसलिए काव्यके श्यादृशोंने [प्रेक्षक या ध्वनिता] के भीतर रसका श्राविर्भाव होता है । श्रोत्र श्रनुभव करतेवाले [प्रेक्षकादि] अपने हृदयमें रहने वाले मूलके: समान, रसका श्रास्वादन करते हैं । मोदक द्वादिके समान बाहर रहने वाले रसका पहुँचना नहीं होता । मोदक ग्रादिका श्रास्वादन जिस प्रकारका होता है श्रोत्र रसका ज्ञान प्रौर तरहका । बाहर रहने वाले रसके ज्ञानमात्रसे रसास्वादका उपपादन नहीं हो सकता है [प्रर्थात् यदि मोदकादिके समान रसको यहृदस्य बाहर रहनेवाला मान लिया जाय तो उसको ग्रहण करनेवाला मान लिया जाय तो उसकी ग्रहणी योग्यतावाली ] । इसीलिए चाह्रो रसका श्रनुभव नहीं होता है । परिपुष्ट श्रनुभव करने वालेके हृदयमें भीतर रहनेवाले मूलादिके समान हो रसका श्रास्वादन होता है । बयोंकि भयानक तथा वद्रुणा विभावोंका वर्णन करने वाले काव्यके प्रयत्नसे ज्ञात [सामाजिक] के चित्त परिप्लवे रूपमें स्थित भय तथा शोक [स्वविभाव] भयानक तथा करुणा रसके रूपमें परिणत हो जाते हैं । यदि तो सामाजिकका स्थायीभाव हो रस रूप में मान लिया जाय तो वह बाहर रहनेवाले रसों प्रतीत मो नहीं हो सकते हैं । प्रयोंकि काव्य या नटमें या हृदय में ग्रन्यत्र रस

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कारिकायां नटेन नृत्यं या रसस्यासत्त्यै कृतम् । श्रासतश्चापि प्रलयेऽपि श्रद्धदयस्थापि प्रतीति स्थात् । ततों विभावप्रतिपादककाव्यप्रतिपत्तेरन्तरं प्रतिपत्तुरेव स्थायी रसो भवति । वृद्धैरुक्तं च काव्यं रसवदिति ॥ [५] १०६ ॥

ग्रन्थकार कहते हैं—काव्य-प्रतिपाद्य सहचारी स्थायिभावों का काव्यवर्मन । श्रनुभावो विभावस्तु व्यभिचारी च कीर्त्यते ॥[५]११०॥ स्थायिना श्रादिरादिशब्दो रसभावाना च यथासम्भवं ये लोकसिद्धा कार्य-हेतुभाविनः, ते काव्यवर्मन निबमिनेयान्निभिनेयभेदाभिन्ने यथासंक्ष्य ग्रनुभाव-विभाव-सहचारिरण, व्यभिचारिसङ्ज्ञामि कीर्त्यन्ते । काव्यसंस्कारविरसकृतात्मभि कदाचिल्लोकेऽप्येवं व्यव- ह्रियते । ततः श्रानु लिङ्गनिदर्शयातां पथाद् भ्रान्ति गमयन्ति तिलकादि रसमित्यनुभावाः, सम्भावय । वासनात्मतया स्थितं स्थायिनं रसत्वेन भवन्तं विभावयन्ति श्राविर्भावना-विशेषेण प्रयोजयन्ति इति श्रालम्बनोद्दीपनरूपा ललनोद्यानादयो विभावा । रसेनुरपं स्थायिनं प्रति विशेषेणाभिमुखयेन चरन्ति वर्तन्ते इति व्यभिचारिणः । श्राभिमुख्यं रहता हि नहिं है । [तो फिर उसकी प्रतीति हो कैसे हो सकेगी ?] श्रोर [सामाजिकके भीतर] ग्रनुभवमान [रस]कई प्रतीति ग्रानेपर तो ग्रासहृदयोंभी होने लगेगा । इसलिए विभावादिके प्रतिपादक काव्यको समभनेके बाद प्रतिपत्तॄता सामाजिकके भीतर रहने वाला स्थायिभाव ही रस वन जाता है । श्रोर उसका कारण होनेसे काव्य रसस्फ़त कहलाता है ॥ [५] १०६ ॥ ग्रोर उसके भेदोंकि कयनका प्रकार काव्यके प्रवसर होनेपर भी प्रकरणमें पाए हुए श्रनुभाव ग्रादि सताधोका विपय बतलाते हैं [प्रतीतौ ग्रनुभाव आदिक लक्षण करते हैं] । स्थायिभाव प्रादिके [लोकसिद्ध] कार्यं, कारण ग्रोर सहचारियोंको काव्यमार्गमें क्रमशः ग्रनुभाव, विभाव तथा व्यभिचारिभाव कहा जाता है ।[च]११० रत्यादिदर्शादिविपया भाव ग्रादि लक्षणके श्रनुसार देयादि-विभक रति-शृङ्गार] भावोंके जो लोकसिद्ध यथासम्भव कार्यं, कारण ग्रोर सहकारी होते हैं वे ग्रभिनेय ग्रोर ग्रनभिनेय दोनों प्रकारके काव्यमार्गमें क्रमशः ग्रनुभाव, विभाव तथा व्यभिचारिभाव नामोंसे कहे जाते हैं, ग्रोर काव्यसंस्कारसे प्रभावित लोगोंद्वारा श्रभी कभभी सोरह्म भी इस्सी प्रकार [ग्रनुत भाव ग्रादि नामोंसे] कहे जाते हैं । [मागे इन तीन दार्शोंको ग्रथक् ग्रथक् प्रवयवर्थ दिखलाते हैं] उनमेंसे 'प्रथु' श्रव्यात् तिङन्तके वाद [रसको] भावित यानना रूपसे स्थित, रसात्मकको प्राप्त होनेवाले, [रत्यादि] रूपायिभावों विनेष्ट रूपसे प्राविभूत करते हैं पर्यात् विशेष रूपसे प्राविभूत करते हैं ये ललना ग्रोर उद्यानादिरूप [रसके कारण] 'विभाव' कहलाते हैं । [पाँचों व्यभिचारिभाव-

ग्रन्थकार कहते हैं—काव्य-प्रतिपाद्य सहचारी स्थायिभावों का काव्यवर्मन । श्रनुभावो विभावस्तु व्यभिचारी च कीर्त्यते ॥[५]११०॥

श्रनुभावो विभावस्तु व्यभिचारी च कीर्त्यते ॥[५]११०॥

स्थायिना श्रादिरादिशब्दो रसभावाना च यथासम्भवं ये लोकसिद्धा कार्य-हेतुभाविनः, ते काव्यवर्मन निबमिनेयान्निभिनेयभेदाभिन्ने यथासंक्ष्य ग्रनुभाव-विभाव-सहचारिरण, व्यभिचारिसङ्ज्ञामि कीर्त्यन्ते ।

काव्यसंस्कारविरसकृतात्मभि कदाचिल्लोकेऽप्येवं व्यव- ह्रियते । ततः श्रानु लिङ्गनिदर्शयातां पथाद् भ्रान्ति गमयन्ति तिलकादि रसमित्यनुभावाः, सम्भावय ।

वासनात्मतया स्थितं स्थायिनं रसत्वेन भवन्तं विभावयन्ति श्राविर्भावना-विशेषेण प्रयोजयन्ति इति श्रालम्बनोद्दीपनरूपा ललनोद्यानादयो विभावा ।

रसेनुरपं स्थायिनं प्रति विशेषेणाभिमुखयेन चरन्ति वर्तन्ते इति व्यभिचारिणः । श्राभिमुख्यं रहता हि नहिं है ।

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च पोपकत्वम् । यद्वा व्यभिचरान्ति स्थायिनि सत्यापि केडपि कदापि न भवन्तीति व्यभिचारिणः; स्वविभावव्यभिचारिणः। भावे भावात्, श्रभावेऽभावाच्च ! रसायनमुपयुक्तवतो हि श्रालानि-श्रालस्य-श्रमप्रभृतयो न भवन्त्येव ।

एते चानुभावादयः स्थायिनं प्रति कार्य-कारण-सहचारीरूपतयैव प्रधानम् । स्थायी तु प्रकम्पप्राप्त्या एतां प्रच्छादयितुं प्रधानम् । तथा व्याध्यादेर्विभावस्य क्रोध-निवंचन करते हैं] स्थायिभावके विद्यमान होनेपर भी कभी कोई [व्यभिचारिभाव] नहीं होता है इसलिए [रसाभिमावके साथ अनुगत [प्रथांत] व्यभिचारी होनेसे व्यभिचारिभाव [कहलाते हैं] परन्तु अपने विभावके होनेपर भी न होनेसे और [अपने विभावदि रूप करारपैके] न होनेपर भी होनेसे [मे] अपने विभावके व्यभिचारिभाव [कहलाते] हैं। क्योंकि रसायनका उपयोग करनेवालोको श्रालानि, श्रालस्य, थकावट आदि नहीं होते हैं [इसलिए जो अपने कारण के होनेपर प्रवृत्त होता है और उसके न होनेपर नहीं हो होता है वह ‘प्रत्यभिचारी’ कह लाता है । श्रोर जो कारणके न होनेपर भी हो या कारणके होनेपर भी न हो वह ‘व्यभिचारी’ कहलाता है ।

तत्र स्थायिनो रत्यादयः। संविदात्मकत्वादजडा एव । धैय्यादीनां स्वेदादीनां शानुभावानां वनितादीनां प्रवर्तकदीनां च विभावानां, निर्वेदादीनां व्याध्यादीनां च व्यभिचारिषुं यथासंख्यं संविदात्मकत्व-शरीरधर्मत्वादीनां जडाजडात्मकत्वम् ।

उनमेंसे रह्यादिरूप स्थायिभाव ज्ञानस्वरूप होनेसे चेतनात्मक हो होते हैं । धैर्यादि [उप मानस] ग्रनुभाव ज्ञानरूप होनेसे प्राजड तथा स्वेदादि [रूप तारोरिक] ग्रनुभाव जड़ात्मक होते हैं । वनितादि [विभाव्य चेतन रूप] तथा पर्वतादि विभाव [प्रवर्तक रूप होते हैं] श्रोर निर्वेदादि [व्यभिचारिभाव ज्ञान रूप होनेसे अजड़] तथा व्याध्यादि रूप व्यभिचारिभाव [शारीरधर्म में होनेसे जड़ात्मक होते हैं । श्रत ये कमशः ] ज्ञानरूप [प्राजड] तथा शारीरधर्मादि [जड़ इस प्रकार] जड़ श्रजड़ चेतन उभयल्म होते हैं ।

इस श्रनुच्छेदमें ग्रन्थकारने स्थायिभावोंको केवल चेतनस्वरूप तथा ग्रनुभाव, विभाव एव व्यभिचारभावोंको चेतन उभयविभ मना है । स्पायिभावोंको चेतनस्वरूप मानने का यह हेतु दिया है कि वे ज्ञानात्मक होते हैं । वेदान्तादि शास्त्रोंके मतुसार ज्ञानात्मकता हो चेतनाका स्वरूप है । स्थायिभाव ज्ञानात्मक ‘सविषय' होनेसे चेतन स्वरूप हो है यह ग्रन्थकारण है । न्याय सिद्वान्तमें ज्ञान चेतन आत्माका गुण है । स्वय चेतन नही है । नैयायिक मतमें गुण श्रोर गुणी ग्रात्मक भेद मानते हैं । किन्तु वेदान्ती गुण-गुणीका भेद नही मानते हैं । इसलिए उनके मतमें ज्ञान चेतनका रूप हो है । इस सिद्धान्तको लेकर ग्रन्थकारने यहां स्थायिभावोंको ज्ञानस्वरूप होनेसे चेतन हो माना है । श्रोर ग्रनुभाव, विभाव व व्यभिचारिभावोंमेंसे कुछ ज्ञानरूप भी होते हैं तथा कुछ शारीरधर्मादि रूप भी होते हैं इसलिए उनको जड़ श्रजड़ात्मक उभयल्म माना है । श्रागे स्पायिभावोंकी प्रथानता तथा ग्रनुभावादि विभावादिके प्रति वायं, कारण तथा सहचारी रूप होनेसे प्रधान माने जाते हैं—

ये चानुभावाद्यः स्थायिभावाद्ये प्रति वायं, कारण तथा सहचारी रूप होनेते प्रधान माने जाते हैं । स्पायिभाव प्रथपंको प्राप्त होकर इन [ग्रनुभावादि] श्र प्रच्छादय* होने जाने

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भयाविभोरकत्वात् श्रम-चिन्तादेरच व्यभिचारिणो भयोत्पादकत्वादुपोढकत्वात् स्तम्भ-वेपथु-स्वेदादेश्चानुभावस्य शृङ्गार भयानकादिजत्वात् क्यन्विदर्प न पार्थक्ये नियमः । सामप्रोपपत्ततस्य तु नियम इति साम्प्री एवैपामाविभाविका पोपिका ज्ञापिका चेति ॥[५]१९०॥

श्रृङ्गार-हास्य-करुणाः रौद्र-वीर-भयानकाः । बीभत्साद्भुत-शान्ताश्च रसाः सन्त्रि नव स्मृताः ॥ ॥[६]१९१॥ तत्र कामस्य सर्वजातिसुलभतया श्रृङ्गारान्तपरिचिततया च भयानकं प्रति हेतुत्वात् पूर्वं शृङ्गारात् गमित्यं ह्रास्य । ततो हास्यविरोधितया करुणा । कामस्य चार्थजन्यत् ततोडर्थप्रधानो रौद्रः । कामादर्थयोक्श धर्मजन्यतवान् ततो धर्मप्रधानो वीर । श्रस्य च भीताभयप्रदानासत्त्यात् तत् ततो भयानक । भीतस्य च मार्स्वकेर्जु गुप्तनिय-

श्रृङ्गार-हास्य-करुणाः रौद्र-वीर-भयानकाः । बीभत्साद्भुत-शान्ताश्च रसाः सन्त्रि नव स्मृताः ॥ ॥[६]१९१॥

प्रधान माना जाता है । (१) व्याभ्रादि विभागोके [ रौद्र रसके स्यायिभाव ] क्रोध, तथा [भयानक रसके स्यायिभाव ] भय क्रोध [ वीररसके स्यायिभाव ] उत्साहादि दोनोंका पोषक होनेके वारणा, (३) [दसो प्रकार] स्तम्भ, वेपथु श्रादि अनुभावोंके श्रृङ्गार तथा भय-नक दोनोसे जन्य होनेके वारण, (३) [दसो प्रकार] प्रलय-प्रलय [रसोद्रे विभाव प्रभुभाव तथा व्यभिचारिभावों के निश्चित रपसे श्रलग ] होनेवाला कोई नियम नहिं है । [दिसो विशेष रसकेी] सामग्रोमे प्रा जानेपर तो नियम है । इसातिये सामप्री हो इन्हें उत्पन्न करनेवाली, पोपण करनेवालो क्रोर घ्रापण व्रानेयाली होती है । [यह समभना वाहिए] ॥[=]१९०॥

[सूत्र १६४]—१ शृङ्गार, २ हास्य, ३ करुणा, ४ रौद्र, ५ वीर, ६ भयानक, ७ बीभत्स, व् अद्भुत श्रौर ε शान्त मे नौ रस सहृदयोंने माने हैँ ॥[६]१९१॥ उनमेसे कामने सब जातियोमे सुलभ, क्रोर भ्रत्यन्त परिचित होनेसे तथा सवॅसे प्रति उसकी मनोहरता होतो है इस कारए सबके पटले उसका प्रहण किया गया है । शृङ्गारकका श्रनुगामी होनेके वारण उसे बाद हास्य [कहा] है । हास्यसे विरोषी होनेसे उस [हास्य] के बाद करण रसा गया है । [इस प्रकार हास्य क्रोर कहलाना शृङ्गारके समन्वय दिसलाते हैँ]। कामसे श्रयं जन्य होनेसे उस [करुण] के बाद परमंप्रधान रौद्र [रसा गया है] वीर काम क्रोर धर्म दोनोंके परस्परज्य होनेके कारए उस [रौद्ररत] के बाद परमंप्रधान वीररस रसा गया है । यह वीर रस मुख्य रपसे भयानकोंगे प्रधान करनेबाला होता है इसालिए [भयसे साप सम्वन्ध होनेसे] उसके बाद भयानक्शा पह्ला किया गया है । सात्विक भूतिके लोग नपुंसको निन्दा करते हैँ इसालिए [भयसे गुप्तसारे साप सम्बन्ध होनेसे] बीभत्स रस रसा गया हैँ । बीभत्स विसमपके द्वारा नान होने जाता है इसालिए [बीभत्ससारे विसमपॅके साप सम्नय होनेसे] उससे बाद [विसमप स्यायिभाव वाला] अद्भुत रस रसा गया हैँ । परमंप्रधान मूल धारए धाम

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त्वात्‌ ततः वीभत्सः । वीभत्सस्य च विस्मयेनापनीयमानत्वात्‌ तनोद्वेगः । धर्मेषु च शममूलत्वात्‌ तदन्ते शमः । इति । एते श्रृङ्गारादयो नवैव रसा रक्षणाविशेषेपु पुरुषप्रयोगाधिक्षेप च सदृशः पूर्वोचार्यैरुपदिष्टाः । सम्भवन्ति त्वपरेपि । यथा—गद्येऽस्थायी लौल्यम्‌ । श्राव्येऽस्थायी स्नेहः । श्रासक्तिस्थायी व्यसनम्‌ । रतिस्थायी दुःखम्‌ । सन्तोपस्थायी सुखामिल्यादि । केचिदेपां पूर्वेष्यनन्तर्भावमहुरिति ॥[६]१६६॥

[सूत्र १६६]——सम्भोग-विप्रलम्भात्मा श्रृङ्गारः प्रथमो बहुः । मान-प्रवास-शापेच्छा-विरहैः पश्चाद्भावप्रकारः ॥[१०]११२॥ विलासिनोरन्योन्यानुरक्तवतिनो प्रेमपर्यवद्‌ दर्शन-स्पर्शनादिः, स सम्भोगः । परस्परानुरक्तयोरपि विलासिनोः पारतन्त्र्यादेरघटनं चित्तविलेपो वा विप्रलम्भः । एतौ द्वाव्यवस्थाविशेषेपां श्रात्मा स्वभावो यस्मिन्‌ श्रवस्थातो-दर्शादियानुयायिनं श्रात्म-वृत्तान्तकरत्वादित्रकरपपस्य श्रृङ्गारस्य । तेन श्रृङ्गारस्य नेमौ भेदौ गोत्वस्येव शावलेय-चाहुलेयौ, श्रापितु सम्भोगेडपि विप्रलम्भसम्भावनासद्भावात्‌, विप्रलम्भेऽपि मतसा सम्भोगानुवेधाद्‌ उभयसंकलितस्वभावः श्रृङ्गारः । उत्कटत्वाच्चैकदेशेऽपि सम्भोग-श्रृङ्गारो विप्रलम्भश्रृङ्गार इति चोपचारेऽपोच्यते । श्रवस्थादेशमीयन्निवन्धने च सातिशयैरचमत्कार । यथा— हे इसलिए सबसे श्रेष्ठतम में द्वाम [ श्रात्मभाव चाला श्रान्तरस ] रखा गया है । विशेषरूपसे मनोरञ्जक तथा पुष्टपार्थीकि सिद्धिमें उपयोगी होनेके कारण श्रृङ्गार श्रादि ये नौ रस ही पूर्ववर्ती सहृदय श्राचार्योंने निर्दिष्ट किए हैं । किन्तु इनसे भिन्न प्रोर रस भी हो सकते हैं । जैसे तृष्णा रूप स्थायिभाववाला लोभ्य, श्राद्रतारूप स्थायिभाववाला स्नेह, श्रासक्तिरूप स्थायिभाववाला ध्यसन, रतिरूप स्थायिभाववाला दुःख श्रोर संतोप रूप स्थायिभाव वाला सुख इत्यादि [अन्य रस भी हो सकते हैं] । कुछ लोग [इनको रस तो मानते हैं किन्तु] इनका श्रन्तर्भाव पूर्वोक्त नौ रसोंमें हो कर लेते हैं ॥[६]१११॥ [प्रन १६५]——सम्भोग श्रोर विप्रलम्भात्मक दो प्रक्रारका श्रृङ्गाररस होता है । उनमें पहला [प्रर्थात्‌ सम्भोग श्रृङ्गार] श्रनन्त प्रकारका [महः] होता है । दूसरा [विप्रलम्भ श्रृङ्गार] १. मान, २. प्रवास, ३. शाप, ४. ईर्ष्या तथा ५. विरह रूप पाँच प्रकारका होता है ॥[१०]१११॥ एक-दूसरेके मनकूल पडनेवाले श्रोर एक-दूसरेको प्रेम करने वाले [स्त्री-पुरुष रूप] दो विलासियोंोंके जो परस्पर दर्शन स्पर्शन श्रादि है वह सम्भोग [श्रृङ्गार बहुस्तात] है । परस्पर श्रनुरक्त होनेपर भी परतन्त्रता श्रादिके कारण [स्त्री-पुरुष रूप] दोनों विलासियोंों परस्पर मिलन न हो सकना प्रयवा चित्तका विलेप हो जाना विप्रलम्भ श्रृङ्गार [बहुस्ताता] है । ये दोनों प्रवस्थ्या विशेषेपां जिस रसमें स्वाभाविक है वह ['सम्भोग-विप्रलम्भश्रात्मा' है] । यह इस श्रादर्शका श्रयं है । गोप्रोभे जितकवर्गो गोत्र वाहको [नातिसंकीर्ण गोत्र बहुव्यापकवर्गो] भेदोंके समान ये [सम्भोग तथा विप्रलम्भ] दोनों पृथक्‌-पृथक्‌ भेद नnों हैं । श्रपितु सम्भोगमें भी विप्रलम्भकी

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एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया वीतौत्सुक्यताम्यतो- रन्योन्य दृश्यतितेष्पयनुनये सख्यत्सुोगीरवम् । तल्पत्योः शनकैरपागरलनामिश्रीभावचिनुपो-र्भेदस्तो मानकलि सहासरमसव्यादृतरुष्टमहान् ॥

शत्र इष्याविप्रलम्भ-मम्भोगयोरविभ्रान्ताविदित्ता सातिशाया चमत्कृति । प्रथम सम्भोगाश्रये वह्न । परस्परावलोकन-चुम्बनादौ च त्रेप्सितक्रियादिभिरन्तरङ्गननप्रकार । यथा- "किम्पि किर्माप मन्त्रमासक्तियोगा-द्विरलितकोपोलं जल्पतोरस्मैः । व्यशिथलपरिरम्भव्याकुलेऽकदोषो-रविदितगतया मा रत्रिरेव व्वरंसोत् ॥" अपरो विप्रलम्भ । इष्याप्रणयभयाभ्यां वैमनस्य मान । यथा- "यातं द्वारवर्ती तदा मधुरिपौ तद्वत्सभम्पानलां, कालिन्दीटटमृदङ्वजुल्ललितामालिङ्ग सोत्कटस्थया । सम्भावना यत्ने रहते शत्रोर विप्रलम्भ में श्री मनसे सम्भोगका [इच्छालक] सम्बन्ध विद्वान रहते भृङ्गाररस उभयात्मक होता है । किन्तु [किसी एक श्रङ्गरसे] प्रयान्तान्तके कारक सम्भोग या वियोग, विप्रलम्भ श्रृङ्गार इस प्रकार कहा जाता है । दोनों श्रवस्थाश्रोमें सम्मिश्रभाव यथान होनेभर विशेष चमत्कार होता है । जैसे- "हठे होनेके कारक एक ही फलकपर लेटे होनेपर भी चुपचाप हुो होते हुए भी और मनमें एक दूसेरे मनाने की हट्टा होते हुए भी अपने अपने गोरक्षकी 'रक्षा करमेने लगे हुए दम्पतियोंके धोरेसे द्रांके घुमाकर देखते समय ग्राखने ग्रांख मिल जापर उनका प्रसाद-बलह स्वप्न हो समास हो गया प्रथोर [दोनोंने] हँसते हुए वेङ्गते एक-दूसरेको [कष्टप्रह] प्राणलमान कर लिया ।" इसमें इष्याप्रणयभय शत्र सम्भोग दोनोंको [एक साथ निभृततन मन] विनाशक श्रङ्गार अत्यन्त चमत्कारयुक्त प्रतोति होती है ! पहला सम्भोग नामक भृङ्गार बहुत प्रकारका होता है । श्रथात् एक दूसेरे भ्रवलोकन, शयन, दम्पतिभरिरम्भव्याकुलत प्रादि भेदसे ग्रनत प्रकारका होता है । जैसे- व्यशिथलपरिरम्भव्याकुलेऽकदोषो-रविदितगतया मा रत्रिरेव व्वरंसोत् ॥ यह उत्तररामचरितका श्लोक है । इसम सम्भोग शृङ्गारने मन स्वोपा प्रदान कराया गया है ।

दूसरा विप्रलम्भ श्रृङ्गार [ पांच प्रकारका होता है यह बात कही जा चुकी है । उन पांच भरोंमें इष्यादि प्रयवा प्रत्येक वस्थाहक भेदसे होनेवाली वृत्तिमेदका उल्लेख है ।

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तदृ गीतं गुरुवापगद्गदगलगत्तारस्वरं राधया, येनान्तर्ज्वलचारिमिज्जलचरै रुप्तकसृक्क्ज्जतं । सन्नीहितदेशास्यापि रूपान्तरापादनं शापः । यथा कादम्बर्या महाश्वेतया वशम्पायनस्य शुक्रुपापादनम् ।

"जूझते पियड जलंजहु जाह विरलंगली चीरं पहिच्छियो । पाचारिलया वि तह तह धारं तसुत्रं पि तसुपड । पिवति जलं यथा यथा विरलांगुलिच्छिरं पथिक-प्रपापालिकापि तथा तथा धारां तनुकारपि तनयति ।" इति संस्कृतम् ।

"तस्थाइ संचारंतं नियच्छिदुं" पाडवेयसियजुयारं । कम्मियरोकम्मं पि हु धरावड्ढूआ सयं कुणइ । "स्थ्यायां संचरन्तं दृष्टा प्रतिबेशिकयुवानं ! कम्मकरोफर्मापि खलु धनपतिदुहिता स्वयं कुरते ।" इति संस्कृतम् ।

तब कृष्णाजी के द्वारका छले जानेपर विरहाकुल दूई राधानें उन [कुप्यां] के द्वार भोका दिए जाने के कारन भुक्की हुयी यमुनाके किनारे की वेतसलतायो पकडकर वडें-वडें श्वास ढरकाते हुअं प्रोद भरे हुअ गलेंसें उच्च स्वरसें इस प्रकार रुदन किया कि जिसको सुनकर [यमुनाके] जलकें भीतर रहनेंवाले जतजंतु भी रोदन उठाकर रोने लगे । मह [प्रणपभंगजन्य मानसहप विप्रलम्भ-शृगारको उदाहरण है] । [विप्रलम्भका दूसरां भेद मा कारनए शाप है । जसकं तसार करतें हैं ] समोसाथ रहनेयाले का मो धन्य हप करा देना शाप कहलाता है । जसें कादम्बरो महाश्वेतारें द्वारा यन्दामपायकों मुक्-रूपमे वना देना [शापका उदाहरण है] । माता-पिता मोदिक परतंग्य होनियर कारनए [इसें समय जिनकां मिलनें नाहो रहां है] प्रापे जिनका प्रयम मिलन होनेयालता है उनको परस्पर मिलनशे इच्छा परिपाक (बहलाती) है [जसके कारनए दो प्रेमियोंका जो मिलनश अभिलाष है वह प्रबिसायजन्य विप्रसभ कहलाता है] । जसें--

"[वारे पितानेवसोल्हे पासु देर तहु रहनेयले लिए] जबर देस्ते हुअ पदिक प्रणालिं पर्गुनियांबो विरत् अर्याति मोसकरहे जसें-जसें पामी पो रहा है । उस्तो प्रकार प्यार्जुवालो पहेलेमें हो पतनो धाराकें प्रोद मो धरिण पत्तसो वरसो जाती है [पर्थान पानो पोनेबातें पविक प्रोद पितानेवासो प्रपापातिका दोनों हो प्रविसणे पविक कासतह एद-दूसरेरे पात रहना चाहते हैं] ।"

तस्थया जस्से हुमारें [पत्ताये हुअ] सुवास्समे [प्रबिसायजन्य उदाहरन] -- "पच्चोसो पुवरकह सलोए पेम्मत! हप्पा देसकर धणपोतिहो पुत्ते मोस्सानाह करेन मो कामोंहो मो अपनेप्पाय कर रहो है [जिसते उस पुवरकहो देसनेर पपासात निस सके] ।"

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सम्भूतभोगयोरमीलनाचाभावेऽपि कार्यान्तरव्यापृततया श्रृङ्गारसर्पेऽं विरहः ।

हृदय में स्त्री-पुंसो परस्परं मुख्यविभावौ । तयोश्चोत्तमप्रकृतियोरपयोगी काव्यं च सरससमभिनेयानभिनेयभेदभिन्नम् । गीतं च वाद्यनृत्यादिपि गृद्यते । मतङ्गो वसन्ततिलाके मालावृत्ते विलेपन-साम्ब्रान्-विशिष्टभवनादि लच्यत इह शृङ्गारे स्त्री-पुं सौ परस्परं मुख्यविभावौ । तयोश्चोत्तमप्रकृतियोरपयोगी काव्यं च सरससमभिनेयानभिनेयभेदभिन्नम् । गीतं च वाद्यनृत्यादिपि गृद्यते । मतङ्गो वसन्ततिलाके मालावृत्ते विलेपन-साम्ब्रान्-विशिष्टभवनादि लच्यत इ

"ग्रन्यत्र द्रजतीति किम् सत्यु कथा नाय्यस्य तारक सुहृन्, यो मा नेच्छति नागतरच हृदयं कोऽयं विधे । प्रकृतं ? इत्थमपेतरकरुणा-कविलतस्वान्तां निशान्तान्तरे, वेलां वृत्तावर्तनव्यतिकरा नायिकेति निद्रा निशां" इति ॥ [१०] ११२ ॥

जिनका सम्मिलन पहिले हो चुका है इस प्रकारके प्रेमियोंके मातृ वियोगके प्रति-विप्रलम्भके विना भी ग्रन्थ कार्योंके परस्पर मिलन न हो सकना विरह [ वह्नलाता ] है । जैसे--"[मेरे पति] कहूं मोर चित्त जाइ ऐसा तो सोचना भो प्रसंगत है, मोर चित्त कोइ ऐसा मित्र भो नहीं है जो मुझे न चाहता हो [परन्तु किसी मित्रने उनमधे रोषकर मुझें वच दिया हो ऐसेौ यातभो नहिं हो सकति है] किन्तु किरभी प्रभातत्र प्रापे नहिं, हाय, भगवान् ! यह मया खेल करत रहे हैं [जो वे प्रभातक नहिं पाए] इस प्रचारही ग्रनेष भीपरी वत्पनाग्रोंमें क्रयो हृदय वाला रातको करवट बदलतो हुइ पड़ो है मोर उसक्रो नींद नहिं आ रहो है ।"

अथोभयात्मकनोऽपि श्रृङ्गारस्य विभावानुभावौ प्रतिपादयति— [सूत्र १६७]—स्त्री-पुं स-काव्य-गीततुं -माल्य-वेष्ट-केलिजः । स्त्राभिनेयः स चोत्साह-चाटु-तापाथु-म्युभिः ॥ [१९] ११३ ॥

प्राय [सम्भोग मोर विप्रलम्भे रूप] दोनों प्रकारने 'श्रृङ्गारने' विभाव तथा प्रभुभावोंने वयैग्न करते हैं । [सूत्र १६७]—रमो पुऱस [भुगारके पुऱस विभाव हैं] बाधप, गीत, ऋतु, मालप, वेप पुस वसन्तु सया [वन-विहार जलक्रीडा आदि रूप] केलियोत [श्रृगार] उस्पन्न होता है । पे साब श्रुगारसे केतस्से विभाव हहु १ मातक्मे] उस्साह [एत-दूसरेके] साहुनारिता, सताप, रत्न तथा मान मालिदिने द्वारा उत्कट प्रभिनप करनर चहिए ।

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विशिष्टवस्त्वाभ्ररस्यादि नेपथ्यम्। इष्टे विदृपक-चन्द्रोदय-चक्रवाक-हंसालेख्यादि । यद्वा नयन-यदन-प्रसाद-स्मित-मनोझाविकार-चेष्टोक्त्यादयो ग्लान्यालस्य-श्रमाद्यरचेष्टा । एवंविधा हि विकारा परस्पर ऋृी पुः सयोरिष्ठा भवन्ति । केलि-युयुत्सापचय-उपवन-गमन-जलक्रीडादयश्चेष्टाविशेषा । एवंमन्येडप्युपलस्सादेव विधा विभावा दृश्य'या । एष्यो यथायोगमुभयात्मापि जायते रतिस्थायी श्टगार ।

नेपथ्यका प्रहण करना चाहिए। 'इष्ट' पदसे विदूपक चन्द्रोदय, चक्रवाक, हंस प्रौर मालेख्य [ चित्र ] ग्रादिको भी लेना चाहिए । प्रयवा [ इष्ट पदसे ] नेत्रों ग्रोर चेहरेकी प्रसन्नता मुस्कराहट, सुंदर आाविकार, सुमनोहर वकोतियाँ ग्रादि और ग्लानि, श्रालस्य श्राम प्रादि चेष्टा लेनी चाहिए । [यथोक्त] इस प्रकारके विकार स्त्री-पुरुषोंको परस्पर इष्ट होते हैं । [वेलियौं] से पुुपावचय, चनदिहार, जलक्रीडा ग्रादि चेष्टाग्रोका प्रहण होता है । [इन सदके] उपलब्ध लक्षण हुप होनेसे इसो प्रकारके ग्रन्य विभाव भी से लेने चाहिए । इनके द्वारा यथायोग्य [ सम्भोग तया] विप्रलम्भ हुप] दोनों प्रकारका रतिस्थायिभाववाला श्रृगार उत्पन्न होता है ।

स च श्टगारो लब्धसच्त्वक स्त्रभावभिनेयो वाचिकु-सात्त्विक-ग्राहार्य-भिनयैरन्वे टेन सामाजिकोऽसाचाचर्येऽप्यागोचर उत्साहादिभि कर्तिष्य । उत्साहो नयन-यदनप्रसादकारी चित्तो ल्लास । श्रय च स्थाय्यपि वीरस्य श्राग्नुत्कत्वाद श्रतुभाव । एवं रसान्तर प्रति व्यभिचारित्वमपि स्थायिना सहचारितया भवत्येव । श्रस्य च स्थायित्वभावाभिनय-द्वारेगाप्यभिनयहेतुत्वम् । एव रत्यादावपि वाच्यम् । तापोऽभिमताप्राप्तौ काय-मनो-पीडा । मन्युर्यप्यप्राप्तिप्राप्तावभगाभ्या चित्तोद्वेग । उत्साह-चाडुभ्या नयनचातुर्य-भ्रू-लीला-परस्यागविकारादि सम्भोगेऽश्र गा रस्यानुभाव सूचित । ताप-श्टृगार-मन्युाभि पुनः पुनः परिदेवनादिविंप्रलम्भेऽभ्र गा रस्यानुभावो लक्षित । तत्र सम्भोगे सुरस्मया दृृत्यादयो व्यभिचारिण । विप्रलम्भे त्वालस्योयोग्य-जुगुप्सावर्जो निर्वेदादयो दु रस्मया इति ॥[१९]१९३॥

उस उत्पन्न श्रृगारके उत्साह ग्रादिके द्वारा ग्रभिनय करने चाहिए । अर्थात् याविक [शारीरिंक], सात्त्विक तया वाह्यादिपरक [ग्राहार्य] ग्रभिनयसे नटके द्वारा सामाजिकोऽसाधारण [मानसिक], प्रागिक तया चेष्टादिपरक [ग्राहार्य] ग्रभिनयोस नटके द्वारा सामा जिकों चित्तमें विप्रलव्ध किया जाना चाहिए । नेत्रों ग्रोर चेहरेको प्रफुल्लित करनेवाली चित्तकी प्रसन्नता उत्साह [कहलाता] है । यह [उत्साह] वोररसका स्थायिभाव होनेपर भी यहाँ श्रृगाररसमें ग्रागन्तुक ग्रोर ग्रतुभाव होता है । इसौ प्रकार [ग्रन्य] स्थायिभावों में भी [ प्रय च रसोंमें प्रति हेतुत्व होता है । इसी प्रकार [ग्रन्य] रसोंमें प्रति व्यभिचारित्व भी होता है । इस [उत्साह] द्वारा यथायोग्य [ सम्भोग हप] ग्रोर विप्रलम्भ हप] दोनों प्रकारका रतिस्थायिभाववाला श्रृगार उत्पन्न होता है ।

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विकृताचार-जल्पांगाकल्पविस्मापनोद्धवः । हास्योदस्याभिनयो नासास्पन्दाश्रुजठरग्रहैः ॥१२॥१९४॥

[कारिकामे आए हुए पदोंके प्रगले] ताप, प्रभु तथा मनुष्य पदोंके द्वारा विप्रलम्भ श्रृंगारके परिदेवन आदि रूप अनुभावोंको सूचित किया गया है । उनमेंसे स्मितोक्ति-ग्राम्यादि गुप्त रूप धृत्यादि व्यभिचारिभाव होते हैं । और विस्मितस्मितं गुरुमुखे भ्रालस्य, उपहास्यो हृदयकुण्डल-प्रहसित निवेदादि [व्यभिचारिभाव होते हैं] ॥१९३॥ प्रवृत्त हुए हास्यरसका निष्पत्तिके करते हैं— [पृथ् १६६]—विकृत आचारस्य, वातचीत, चेष्ट-विन्यास मोर [नाक बजाना, मगल सिकोड़ने प्रभु मोर वेष्ट वकड़ने प्रादिके द्वारा] इसका अभिनय किया जाता है ।[१२]१९४।

विकृतं ध्र्यादि प्रकृति [ स्वभाव ] देश, काल, प्राप्तु मोर प्रकृत्या प्राप्तिके विपरोत विरूप ध्यापार [कर किय। ज्ञात], ध्र्यादि [दूसरा] तज्जातव [संघातन] यद नियंतता मादि रूप होता है । [कारिकामे विनाए गए विकृताचार प्रादिके] उपलब्धाए रूप होनेसे [जनसे भिन्न] मनुचित पष्टता लालच आदि मोर ममं भावोंको दर्शनान, दूसरोंने मज़ाक बनाना, मोर [विरोष प्रकारसे] देखने आविष्ट भो पहरता होता है । [कारिकामें आए हुए 'विस्मापन' पदसे मगल मोर माश्चर्यका बजन, मदन, विस्मय भोर मोहोंका मटबाना मोर दूसरेकी बोतलोका मनुकरण करना प्रादि रूप ध्यापारका पता चलता है । अपनेमें ममवा जिसो दूसरमें स्थित इन [विकृताचार प्रादिके देखने] से हाम्यरमायिभाव बाले हाम्यरसकी उत्पत्ति होती है : [कारिकामें गए हुए नासास्पन्दके 'नासा' शब्दमें मान मोर मोट प्रादि [के चेष्टने] का भो पहरता होता है । स्मित' पदमें [स्मितोने] मिकोरने मोर फँसाने पदहनेसे तात्पयं होता है । [कारिकार्त्र] 'जठरपर' शब्दसे [वेट पहननेसे] साथ हो] पार्श्वम्पह हप वोटनत, मुत्ररान प्रादिक भी मग्रह होता है । 'अश्रुजल' [अश्रुपातकोवन] हप, उत्साह, विरमय प्रादि इस [हास्यरस] में व्यभिचारिभाव होते हैं ॥[१२]१९४॥

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व्रथास्य हसितोपहासरच मध्ये ज्येष्ठे स्मितं हसः । व्रपहासोदतिहासरच नोचे प्रयोक्तव्ये रसःः ॥ १३ ॥ १९४ ॥

अत्र हसनं मधुरस्वरम् । सास्याराग-समयप्राप्तं च विहसितम् । सांसशिर कम्प-मुपहसितम् । इतौ भेदौ मध्यमप्रकृतौ । आलक्षितद्रिजं स्मितम् । किक्किळिहसितद्यन्तं हसितम् । इतमौ भेदौ उत्तमप्रकृतौ । अत्यवसरप्राप्तं साश्रुनेत्रमुपकम्पितांस-शिरस्र्राप-हसितम् । करुणाप्रकृतपारवं किक्किटस्वरमुद्रितं चातिहासितम् । अथमू भेदावधमप्रकृतौ । एवं पठेते ह्रास्यभेदाः । अथयं च हास्यो रसः प्रयोक्तव्यो नायुल्येनाधमप्रकृतौ पामरग्राये भवति । स्वर्गोपीपेक्षया च क्रिया: प्राधान्न्येन् अपि पुरुषापेक्ष्याधमतैवति तस्यामपि । एवं करुणा-भयानक-वीभत्स-श्रृदासुता श्रप्यधमप्रकृतौ भूस्वस्तमनुभवन्ति । पामरप्रायः सर्वे: प्रकपेते हसति, शोचति, विभेति, परनिन्दामाद्रियते, स्वल्पेनापि सुभापितेन सर्वत्र विस्मयते इति ॥ १३ ॥ १९४ ॥

अत्र ग्राये इस [हास्यरसके] भेदोंको दिखलाते हैं— मध्यम [प्रकृतिके पात्रों] में 'हास' और उपहास [रूप दो भेद पाए जाते हैं], उत्तम [श्रेष्ठ प्रकृतिके पात्रों] में स्मित और हास [रूप दो हास्य भेद पाए जाते हैं] और नीच [प्रकृतिके पात्रों] में प्रपहास तथा प्रतिहास [रूप दो हास्य-भेद पाए जाते हैं] । और यह हास्यरस प्रायः प्रथम पात्रोंमें पाया जाता है ॥ १३ ॥ १९४ ॥ हास्यके जो छः भेद कारिकामें दिखलाए हैं उनमेसे समुचित श्रवसरपर जिसमें गाल लाल हो जाऐं इस प्रकारका मधुर स्वरसे हैँसना 'विहसित' [कहलाता] है । कदे सिर जिसमें हिलने लगों [इस प्रकारका हैँसना] 'उपहसित' कहलाता है । ये [विहसित और उपहसित रूप] दोनों भेद मध्यम प्रकृति [के पात्रों] में होते हैं । जिसमें दांत दिखाई न दें इस प्रकारका हास्य 'स्मित' [मुस्कराना] कहलाता है । और जिसमें दांत योरें-योरें दिखाई देने तकँ [इस प्रकारका हास्य] 'हसित' [कहलाता] है । [स्मित और हसित] ये दोनों भेद उत्तम प्रकृति [के पात्रों] में होते हैं । बिना श्रवसरके जिसमें श्रवसान ग्रासु या जाएँ कदे सिर हिलने लगों, इस प्रकारका हैँसना 'मपहसित' कहलाता है । और ह्रास्योँके बगलोँको थामकर जोर-जोरसे हँतना 'प्रतिहास' कहलाता है । [अपहसित और अतिहास] ये दोनोँ भेद श्रथम प्रकृति [के पात्रों] में होते हैं । इस प्रकार हास्यके छः भेद हो जाते हैं । यह हास्यरस प्रधिकतर प्रथम प्रकृतिके नीच पुरुषोंमें होता है । ध्रपने वर्गकी श्रपेक्षा [किसी विदूषक] स्त्रोकी उत्तमता [प्रथानता] होनेपर भी पुरुषोंकी श्रपेक्षा स्त्रियों [स्त्रियाँ] में भी प्रथमता हो होती है इसलिए उन [स्त्रियों] में भी हास्यरस प्रधिकतर पाया जाता है । इसी प्रकार करुणा, भयानक, प्रद्भुत तथा योभत्स रस भी प्रधिकतर प्रथम प्रकृति [प्रपञ्चल नीच पात्रों]में होते हैं । इसलिए नीच प्रकृति वाले सब लोग प्रायः जोरसे हैँसते, प्रायिक रोते फरते, अधिक डरते और अधिकतर डमरों को तिरस्कार करते हैं तथा निन्दा भी सुभापितको सुनकर स्वाइचर्य करने लगते हैं ॥ १३ ॥ १९४ ॥

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मृत्यु-बन्ध-धनभ्रंश-शाप-दु:ख-सम्भवा: । करुणोद्भिलयस्तस्य वाप्प-चैवर्ण्य-निन्दनै: ॥११६॥

अथ शोक:— [सूत्र १७०]—मृत्यु, बन्धन, धन की हानि, शाप, व्यसन तथा सङ्कट आदि से करुणा रस की उत्पत्ति होती है । प्राणियों के विभावादि से शोकस्थायी करुण रस सम्भवति । श्वास, मुर्छा, शोप, स्मृतिलोप, सङ्कल्पनादि योगानुभावा सूचिता । निन्दनमालम्बनो देवस्यान्यस्य चोपलम्भ । श्रवणेन रदित-प्रलापिता-उरस्ता-डनादि गृह्यन्ते । व्यभिचारिणस्तस्य निर्वेद-ग्लानि-चिन्ता श्रौत्सुक्य मोह श्रम भय विषाद दैन्य-व्याधि जड़ता डनमाद श्रापन्मार श्रालस्य मरता-स्तम्भ वेपथु चैवर्ष्य श्वशु मरभेदादय इति ॥ [१४] ११६ ॥

प्रहारास्तस्य-मात्सर्यं-द्रोहाधर्षापनीतिज । रौद्रस चारिभावेतव्यो घातदन्तोष्ठपोडने ।। [१४]॥१९७॥

अथ रौद्र:— [सूत्र १७१]—प्रहार, असूया, मत्सर तथा द्रोह, अधिक्षेप, अपनय आदि से रौद्र रस की उत्पत्ति होती है । श्रवणेन गृहभृत्या-घुपमर्दनम्य ग्रह । श्रस्त्येन यध-वन्धाद्यमिधायकवाक्यैरप्यस्यस्य प्रद्द । गुप्तेऽप्यसूया परमविदारयतो निद्रारयतश्च शस्त्रादिन्यापारस्य म्रद्वार । श्रस्त्येन गृहभृत्या-मान्तर्यम् । द्रोहो जिगासा । मवादिसिलीकार-विद्या-कर्म-देशन्त्यादिनिन्दा-राज्य-

[किसी विपत्तिने] मरणं, व्यथनं, धननाशं, द्राप लया विपत्ति प्राप्त [को देने] से उद्वेगत उत्सन्न होता है । प्राणियों [चेष्टाओं] द्वारा इसता अभिनय किया जाता है । [१३] १९५ ।

अय प्राये करुणा [रसका निष्पष्य करते हैं]— [किसी विपत्तिने] मरणं, व्यथनं, धननाशं, द्राप लया विपत्ति प्राप्त [को देने] से उद्वेगत उत्सन्न होता है । प्राणियों [चेष्टाओं] द्वारा इसता अभिनय किया जाता है । [१३] १९५ । प्रियजनके विपत्तिको कराने वालो द्रव्य प्रभाव वाले स्वपितस्य प्रमादनता 'शाप' कहलाता है । धनस्य [का नाम] 'विपत्तन' है । इससे देह-नाशने होने वाले विनाश-समुदाचार पहुए होता है । इन विभावोंके द्वारा शोक सद स्वादिभाव आता मचूकरस उद्वेगन होता है । प्राणि [चेष्टाओं] विकारेसा निदानास, मुख मूर्छादि लुम्पति लोभ, हारोकि । निवृत्तिका वार्ति चेष्टाओं प्रविष्ट होते हैं । इससे रोने म्रताप करने और दातों पीटनेका भी सग्रह होता है । निर्वेद, ग्लानि, चिन्ता, श्रोत्सुक्य मोह, श्रम भय विवाद दैन्य, व्याधि जड़ता, डन्माद धपस्मार श्रालस्य, मरता, स्तम्भ वेपथु, वंवर्ष्य, श्रपु स्वरमेद पारि इसने व्यभिचारभाव होते हैं॥[१४]१९५॥

रौद्रत [व सतापादि करते हैं]— प्रहार, असूया, मात्सर्ये द्रोह आपपचय तथा पत्नोतिर्ने रौद्रत होता है क्रोध मारनेसे, दांत तथा ओठोंके चबानेसे द्वारा इसता पामिनय क्रिया जाता है । [१४] १९७ ।

अव माने रौद्रत [व सतापादि करते हैं]— प्रहार, असूया, मात्सर्ये द्रोह आपपचय तथा पत्नोतिर्ने रौद्रत होता है क्रोध मारनेसे, दांत तथा ओठोंके चबानेसे द्वारा इसता पामिनय क्रिया जाता है । [१४] १९७ । है क्रोध मारनेव, दांत सया ओठोंके चबानेसे द्वारा इसता पामिनय क्रिया जाता है । [१४] १९७ । द्वारेके काट देने वास्ता या मे हटाने वास्ता निश्चय पार 'प्रहार' नममाता है । उसमे पर घोर मुख प्राप्रदरे उपमहतनका मी वहम होना है । 'मत्सर्य' परने कप, वप परहित करने वाले कटाक्ष मारनेकी पारिके सदृश होता है । पुलोवे मत्स्त्रकी [मत्सरान्तकार] 'मात्सर्य' प्कूमाता है । मारनेकी द्वृ्ट्टा 'क्रोध' [वरमाथी] है । तिरस्कीं मालिन पम्पार,

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सर्वैस्वापहरसादिराद्यर्थः । श्रन्यायोडपनोति: । श्रनेनौद्धत्यं सूच्यताम् । एतेभ्यो विभावेभ्यः क्रोधस्थायी रौद्रे रसो जायते । यातेन छेदन-मेदन-धिराकरप्सादिरतुभावो गृह्यते । दन्तौष्ठपीडनेन गर्दौष्ठस्फुरण-हस्ताप्रनिपेपणाद्यनुभाववुन्दं सूच्यते । व्यभिचारिपश्चास्य मोह-उत्साह-ग्रावेग-श्रमर्प-चापल-श्रोग्र्य-स्वेद-वेपथु-रोमाञ्चादय इति । स्थायिनोऽपि चोत्साहादयो रसान्तरं प्रति व्यभिचारिणः स्वीकुर्वन्ति । स्तम्भ-स्वेदादयश्च न रसकार्यो व्यभिचारिणः, किन्तु स्याभिचार्यो इति ॥ [१५] १७२ ॥

[सूत्र १७२]—पराक्रम-बल-न्याय-यशःसत्कविनिश्चयः । वोरोजभिनयनं तस्य धैर्य-रोमाञ्च-दानलताः ॥ [१६] १७३ ॥ पराक्रम-परकीयमैदलायाक्रमग्सामर्थ्यम् । वलं हर्षश्व-रथ-पदाति-धन-धान्य-मन्त्र्यादिसम्पत् । श्रारोरिकी शक्तिर्या । न्याय. सामादीनां सम्यक् प्रयोग । श्रनेनेन्द्रियजययो गृह्यते । यशः सावरण्ट्रिकी शौर्योदिगुणैरयाति । श्रनेन शत्रुत्रिवपये सन्तापकर्तुं त्वप्रसिद्धिरूपः प्रतापो गृह्यते । तत्पं याथात्म्यं तस्य विनिश्चय । पवंवादिमिर्वि-भावैर्हत्साहादिस्थायी वीररसः सम्भवति । स चानेकधा, युद्ध-धर्मे-दान-गुष-प्रतापावर्जन-विद्या, कर्म, देश, जाति आदिको निन्दा प्रोर राज्य या सर्वंस्वका प्रपहररू प्रादि प्राप्यं [कथलाता] है । ग्रन्थायका नाम ‘ग्रपनोति:’ है । इसके द्वारा क्रोधत्यको भो सूचित किया है । इन विभावोंसे क्रोध रूप स्थायिभाव वाळा रौद्ररस उत्पन्न होता है ‘घातेन’ पदसे छेदन-मेदन-धिराकरप्साादिरतुभावोका ग्रहण होता है । दांतोके पीसने ग्रोर म्रौंठ घवानेक्रो गतों प्रोर म्रोष्ठोके फड़कने, हायके म्रप्र भागके मसलने, ग्रादि ग्रनुभाव-समुदायका ग्रहण होता है । इस [रौद्ररस] के व्यभिचारिभाव मोह, उत्साह, ग्रावेग, श्रमर्प, चपलता, उप्रता, स्वेद, वेपथु

मे व्यभिचारो वन जाते हैं । स्तम्भ ग्रोर स्वेदादि रसके कार्यरूप होनेसे [यहाँ] व्यभिचारिभाव नहीं कहलाते हैं ग्रभितु स्थायिभावके कार्यं होनेसे व्यभिचारिभाव कहलाते हैं ॥ [१५] १७२ ॥ परा वोररसत [का लक्षण ग्रादि करते हैं]— [सूत्र १७२]—पराक्रम, वल, न्याय, यश, ग्रोर तरवविनिश्चय ग्रादिसे वोररस होता है, ग्रोर घैर्य, रोमाञ्च तथा दानके द्वारा उसका ग्रभिनय किया जाता है । [१६] १७३ । दूसरेके राज्य ग्रादिलर ग्राक्रमएकी सामर्थ्यं पराक्रम [कहलाता] है । हायी, घोड़े, रथ, पदाति, धन-धान्य ग्रोर मन्श्यादिको सम्पत्ति वल [पदसे ग्रभिप्रेत] है । ग्रप्रसका दारो-

रिक शक्ति [वल कहलाती है] । सामादि [उपायों] का समुचित प्रयोग ‘न्याय’ [कहलाता] है । इसके द्वारा इन्द्रियजयका ग्रहण होता है । शोर्योदिर्गुगोंसे यश [सारवैद्रिकी शक्तिका कथन] है । इसके द्वारा शत्रुम्रोंके म्रोर सन्ताप करनेकी प्रतिसिद्ध रूप प्रतापका [भो] ग्रहण होता है । तत्सं याथात्म्यं तत्सविनिश्चय [तत्त्वविनिर्णय कहलाता है] । इस प्रकारके विभावोंसे उत्साहादि स्थायिभाववाला वोररस उत्पन्न होता है । ग्रोर युद्ध, धर्मे, दान, गुष, प्रतापावर्जन-विद्या, कर्म, देश, जाति ग्रादिको निन्दा ग्रोर राज्य या सर्वंस्वका प्रपहररू ग्रादि ग्राप्यं [कथलाता] है ।

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श्रायं पाथिविमेदातु । ध्येयं महत्यपि परसैन्ये विपदि वा सकारयम् । श्रानेन सैन्यो-तेजन-पराचोपान्द्रसनुभावस्य ग्रहः । दानेन प्रभोद-माध्यस्थ्य-शान्तचेष्टादे । व्यभिचा-रैरचास्य धृति-मतिनिर्वेद-श्रावेग-श्रमप्रथ-नमृति-रोमाञ्चादय । वीररसे च युद्ध-दिभावेऽपि न रौद्रस्त्वम्, उत्साह-न्वायमध्यात्वात् । रौद्रे तु मोह-श्राहत्दार-च्यपन्याय-प्राधान्यसहित्यनयोः सादृश्यमिति ॥ [१६] ११५ ॥

प्रबन्ध भयानक [उसका व्याख्यान करते हैं]— [सूत्र १७३]—पताका, कीर्ति, भयोत्पादक [विनाश के उत्पादक], युद्ध [माथि], निर्जन स्पान, मोर घोर आकू मादि तथा [गुद मादिके] दोपोंसे भयानकरससकत् उत्पन्न हेता है । स्तम्भ-रोमाञ्च तथा कम्पनके द्वारा उसका प्रभिनय करना चाहहिए । [१७] ११६ ।

[सूत्र १७३]—पताका-कीर्त्ति-रौद्रप्राजि-शून्य-तस्कर-दोपजः । भयानकोऽभिनेतव्यः स्तम्भ-रोमाञ्च-कम्पने ॥

स्वर तथा आकारकी विकृति द्वारा भयोत्पादक विनाश उत्पादक रौद्र [पदसे गृहीत] होते हैं । यह [रौद्ररस] रसप्त बघनकर भी उपलक्षण [प्रारक] है । निर्जन घर या परनयादि वेलने या सुननेसे भयसस्प स्वरविभाव वाते भयानक रसकी उत्पत्ति होती है । अगोको हितने-हसनेका प्रयाय 'स्तम्भ' रहलाता है । रसयपंर प्राहार हितना कम्पन रहलाता है । इसकये द्वारा तरोर, मुल या हसितका विकार, मुखेसा म्रुत जाना, विकृतनार प्रोद मुर्दा आादि धनुभावो-ना [ओ] प्रकट होता है । कदन, मोह, शोक, चिन्ता, त्रास, अपस्मार, मरणा, स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, कम्पन, स्वरभेद, दैन्य, श्रावेग, चपलता, ग्राम-व्यपस्मार-मरगा-स्तम्भ-स्वेद-रोमाञ्च-दैनपथु-स्वरभेद-वैनस्पन्दिय इति ॥ [१७] ११६ ॥

रौद्रा स्वराकारवैक्रत्येन भीपणा पिशाचोल्कादय । श्राजि राष्ट्राघात । श्रयं चोपलक्षणं वघ-वन्धयो । शून्यं निर्जन गेहाद्य । दोपो गुमुपादेरपराध । एभ्यो रस-श्रुतेभ्यरिचन्यानाने भयो भयस्थायी भयानको रसो जायते । गात्रस्याचलनं स्तम्भः । कम्पनं करचरणादीनां प्रवेपनम् । प्रभिगात्र-मुखर-नष्टविचार-गलशोष-वैनस्पद्य-मूर्च्छा दरवणानुभावा संगृहयन्ते । व्यभिचारैरचास्य शद्धा-मोह-दैन्य-श्रावेग-चपलता-ग्राम-व्यपस्मार-मरगा-स्तम्भ-स्वेद-रोमाञ्च-दैनपथु-स्वरभेद-वैनस्पन्दिय इति ॥ [१७] ११६ ॥

होनेपर भी न पदवडाना 'धैर्यं' कहलाता है । इसके द्वारा [अपनो] सेना को उत्सोजित करने मोर दूसरेकी ध्याक्षेप मादि मद्नुभावोंकत् प्रहप होता है । 'दान पदते प्रमोद मध्यस्थता मोर सात चेष्टादिका पहृप होता है । इस [रौद्रसके व्यभिचारभाव श्चित, मति, गर्व, प्रावेग, प्रमय, उपता, स्मृति तथा रोमाञ्च मादि होते हैं । रौद्ररसमें युद्धादिके होनेपर भी रौद्रस्य नहाँ माता है । जवोंकि उसमें उत्साह तथा न्यायको प्रधानता रहती है । रौद्ररसमें तो मोह महद्वार मौर अन्याय मादिको प्रथानता रहती है इसलिए [वीर मौर रौद्र] ये दोनो एक साप नहों रह सकते हैं ॥ [१६] ११५ ॥

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वीभत्सोद्भवयश्चास्य निष्ठे वोद्वेग-निन्दनम् ।

जुगुप्सनीयरूप-कुथिततत्त्व-दुर्गन्धितत्त्व-कर्कशतत्त्वादिमिरमज्ज्ञा । हृदयादयो रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-शब्दलचपा विपया । परन्तु विपच्त्तरय श्लाघा भवति । एष्यो हृश्रुतिभ्यो विभावाभ्यो जुगुप्सास्थायि विभत्सो रसः समुद्भवति । परश्लाघाभ्यां हि विशेषतः द्वौपदर्शनैन जुगुप्सते । निष्ठे कफन्तिरसनमू । उद्देगो गात्रधूननम् । निन्दनं द्वौपोद्वचनम् । ए भ्रूविकारसदृशोचन-मुखविकृणान-नासाकृएप्रमिच्छादन-दन्तलेखादिरनुमावः सूच्यते । व्यभिचारिरपचास्य व्याधि-मोह-श्रावेग-श्रपस्मार-मरषादयः इति ॥

दिव्येन्द्रजाल-रसप्यार्थ-दर्शनाभोगस्तथिद्धितः । श्रद्धाभुतः, सोंद्रभिनेतव्यः इलाघा-रोमाञ्च-हर्षंतः ॥

दिव्याः शकादयः । इन्द्रजालं मन्त्र-दिव्य-हरतयुक्त्यादिना चमत्कृत्यप्रदर्शनम् । रस्म्यः सातिशयेन हृद्योर्थः शिल्पकर्म-रूप-दाक्ष्य-गन्ध-रस-स्पर्श-नृत्यगीतादिकः, तस्य दर्शोनं सात्त्विकारः । च्युत्पत्तेन स्वयम कीर्तितं श्रवणं च गृह्यते । श्राभीष्टसत्य-प्रवृत्तौ हृदये श्रद्धा भवति । सोंद्रभिनेतव्य इति इलाघा-रोमाञ्च-हर्षादि ।

अथ वीभत्स [रसका वर्णन करते हैं]— घृणित रूप श्रादि तथा श्रात्मकी प्रसंसा प्राप्तिसे उत्पन्न वीभत्सरस होता है । यूकने, नाक-भौं सिकोड़ने और निन्दाके द्वारा इसका अभिनय किया जाता है । [१५]१२०। जुगुप्सनीय मलिनता सड़ांध, दुर्गन्ध श्रादि मर्कशता प्राप्तिके कारणसे प्रशंसा [प्रशं] 'जुगुप्सनीय' कहलाते हैं । रूप, रस, गन्ध, स्पर्श श्रादि रूप से विप्रकृष्ट [दूर] की प्राप्ति ['परदलाघा' पदसे] परिभाषित है । इन विभावोंके देखने या सुननेसे जुगुप्सास्थायी भाव विभावित होता है । आत्मकी प्रशंसामें विद्वेष रूपसे दोषोंको देखकर उससे घृणा करता है । 'निष्ठेव' पदका श्रथ्यं फड़कना [मुंह पसारना] है । हार्पादि प्रादिका चलाना उद्देग [का सूचक] है । निन्दा श्रर्थात दोष निष्ठलना । इससे भ्रूवों के सिकोड़ने, मुलके विचकाने नाक-कान प्राप्तिके बन्द करते भ्रोर जो मिचलाने, श्रावि अनुभावोंका प्रादुर्भाव होता है । व्याधि, मोह, श्रावेग, श्रपस्मार, मरष आदि इसके स्रभिचारीभाव है ॥ [१५] १२० ॥

अथ प्रदभुत [रसका निरूपण करते हैं]— देवताओं, ऋषिप्रेरणा इन्द्रजाल, सुन्दर वस्तु प्राप्तिके देखने तथा भ्रमोट प्राप्तों [प्राक्तिमक] सिदिसे उत्पन्न होने वाला प्रद्मुत रस होता है । प्राज्ञान रोमाञ्च तथा हर्षों डरा उसका प्रथिनय करना चाहिए ॥ [१५] १२१ ॥

दिव्य प्रप्राप्त हन्त्रादि देवता । मन्त्र प्रप्रवा दिसो दिव्य अपवा हापच्रे प्रातातं प्राप्तिके हेतु । प्रदभुतं यातुको दिसस्य देवः 'हन्त्रजाल' कहलाता है । तस्य श्रर्थात प्राप्तं गुन्तर लगने वाला प्रदभुत रस होता है ।

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नतमीप्सितम् । तस्य सिद्धः प्राप्तिनि:स्पत्तित: । एवमादिस्यो विभावेभ्यो विस्मयस्थायी श्रदभुतो रसो भवति । हृदये स्वानुभावा: सूच्यन्ते । एवं नयनविसतार-गात्रोल्लसन-श्रनिमिपप्रेक्ष्य-नेहोंजगुलिभ्रमरमद-नादरगद्-वचन-चेपथु स्वेदादेरनुभावस्य ग्रहः । व्यभिचारिराश्चास्य श्रावेग-जडता-सम्भ्रम-स्तम्भ-श्रश्रु मदरद्-रोमाञ्चादय इति ॥ [१६] १२१ ॥ श्रथ शान्तः -

प्रश्न नात: [रसरूप निष्पत्ति करते हैं]— [जन्म-मरणादि [प संसार] मे भय, वंराग्य, [प्रातमा-परमात्मा धारि] तरयों घोर वाराग्यादिके चिन्तनसे उत्पन्न होने घाला शान्तरम होता है । शोर समा, ध्यान तथा उपकार के द्वारा इसकी अभिनय किया जाता है । [२०] १२२ ॥ देय मनुष्य नारक या तिर्यच् [पशु-पक्षी] आदि रूपमे घूमना [प्रतिपाल् वार-वार जन्म पाता करना] 'संसार' कहलाता है । उससे भय [आन्तरशका काररण होता है ।] विपयोते दिमुगता 'वैराग्य' कहलाता है । तरव अर्थात जीव घोर प्रजीव पाप घोर पुण्य पादि रूप, तथा मोक्षके उपायोंक प्रतिपादक शास्त्रका विचार करना, [चित्तमें बार-बार साना], हरा प्रकारसे विभार्योसे काम, क्रोध, मोह, अभिमान, माया धादिके सदनुप्तो रहित विपयोन्मुखता रौंतत प्रविलष्ट चित्तदृति रूप धामरस्यादि विभाव षाला शान्तरम उत्पन्न होता है । रौट-परबार [मर्जेन], मघ, धन्य प्राप्तिके सह लेना 'समा' कहलाती है । जोव-प्रजीव पादि मयोंसे विचार करना 'ध्यान' कहलाता है । इसतसे अपने इष्टदेवतासे सार्द्ध मनु भाव गृहीत होते हैं । 'उपकार' वबने सेत्रों, मुदिता [प्रमोद] भरुचा, घोर उपेक्षा [मामरस्य] पोर धनुमोद गृहीत होते हैं । निवेद, धृति, ग्लानि, स्मृति धादि सेनें स्वानुभाव कहलाते हैं। [नगरो [वात्सल्यो] ने हृद [शान्तरम] को हर्षो माना है। उक्तसे मत्तके

[सूत्र १७६]—संसरभय-वैराग्य-तत्व-शास्त्र-विमर्शान्तः । शान्तोऽभिनयनं तस्य क्षमा-ध्यानोपकारतः ॥[२०]१२२॥

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निश्चलदृष्टिप्रसादय । सूचिताः । उपकारोचैः मैत्री प्रमोदकारुण्यमाधुर्यस्थ्यादयोऽनुभावा गृह्यन्ते । व्यभिचारिणश्चासाव निर्वेदमतिस्मृतिधृत्यादयः । श्रायं च कैश्चिन्नोक्त, तेऽपि सकलक्लेशविमोक्ष्यमोक्षपुरुपार्थपराड्मुखतत्त्वमेव दूरपरामिति ॥ [२०] १२२॥

[सूत्र १७७]—श्रर्थ-शाब्दवपुः काव्यं रसैः प्रार्ङ्गोऽवसर्पिति । सकल क्लेशोंके छुड़ाने वाले मोक्ष रूप पुरुपार्थसे पराङ्मुख होना ही दूषित है । [इसलिए उन कर मत उदित नहीं है] । इसका श्रभिप्राय यह है कि मोक्ष-प्राप्तिके लिये शांतरसकी स्थिति श्रावश्यक है । जो लोग शांतरसको नहीं मानना चाहते हैं उनके मतमें मोक्षकी सिद्धिका मार्ग हो खन्ड हो जाता है । फिर मोक्षकी सिद्धि किस प्रकार होगी । इसलिए सकल पुरुपार्थके शिरोमणिभूत मोक्ष पुरुपार्थकी सिद्धिके एकमात्र हेतुभूत शांतरसका मानना अनिवार्य है यह प्रत्यककारका प्रभिप्राय है । ] ॥ [२०] १२२ ॥ श्रव काव्यो [ की रचना ] में [ कवियोंोंके ] रसक समायेक्ष करनेमें विशेष रूपसे सावधान रहना चाहिए इस बातको [प्रगलो कारिकामें] कहते हैं— [सूत्र १७७]—शब्द प्रोर श्रर्थं रूप द्वारोर् वाला काव्य, रस जब प्राप्तोंसेही चलता है इसलिए श्रपनेको कवि समभने वाले [मुकवियोंों] का रसोंके प्रति श्रनायास प्रेम होता है । [२१] १२३ ।

श्राभिनेया तथा श्राननीय श्रेद्यैः वाले काव्यका शरीर शब्द श्रोर श्रर्थ है । श्रोर रस सनकार प्राप्तु है । [विभावोंके समायेक्ष रूप श्रादानोंने ] प्राप्त जन [रसोंमें] के हृदयोंमें प्रवेश पाता है [विसर्पिति] । इस कारण श्रपनेको कवि समभने वाले मुकवियोंोंका रसोंमें प्रघान रूपसे प्रेम होता है । [मुख्य रूपसे] रसको ग्राभिमुख्य्त करने वाले प्रयत्नों हो प्राप्त होने वाले मलकारोंभी रचना करनी चाहिए । [प्रसकारोंपे रचनाके लिए प्रयत्नसे कवि नहीं करते हैं । रसोंके सान्निध्यने जो यत्न करते हैं उसको स्वाभाविक रूपसे मलकार भी उनकें मल्योंमें श्रा जाते हैं] श्रोर ये वितमें चमत्कार उत्पन्न करते हैं । इस वातसे सूचन करनेके लिए [कारिकामें] 'प्रभ्रतां' पदका पहुला किया है ।

हे मारिनि प्रिये ! तुम्हारे गालोंपरकी पनालो [चन्दनादिके द्वारा बनाई गई सोन्दर्यापादक रेखाएं, नटराज हो जानेकें मारण गालोंकि ऊपर रेखाए] हायोंों से मिट गई [हिन्तु तुमने हमें उनके द्रोप्सा प्रयसर नहीं दिया] मृतेः समान मुग्धर तुम्हारे

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मुहुः काठे लग्नस्तरलयति वाप्पः स्तनतटं, प्रियो मन्युर्जातस्ततव निरनुरोधे न तु वयम् ॥

यथा राघवाभ्युदये - "तल्लावण्यमनन्यन्यृत्तिवचसां तत् कौशलं पेशलं, तत् सौभाग्यमभाज्यमत्यर्थमयीमुरः सद् यौवनं पावनम् । एकैक त्रिप्रसक्तोऽपि महान् समासो निध्याभयान्नित्यं विना, व्ययं सा हृदि सर्वमेव मधुन्ते व्यालोलनेत्रोत्पला ॥" यथा वासमदुपद्रे मलयकामकरन्दे प्रकरणे मकरन्दः- "ग्रास्यं हास्यकरं शशाङ्क्यरसा विंम्यायारः सोदरः, प्रीयुपस्थ यच्चिन्ति मन्यमथमहंराजस्य तेजांसि च । ह्रष्टिविटपचारिन्द्रका म्रनतटी लद्मीनटीना टस्यभूः, श्रोचित्रचारणा विलासकरसां तस्याः प्रशस्त्यावधे ॥" यथा वासमदुपज्ञायां वनमालाया नाटिकायाम्- "राजा-[दमयन्ती प्रति]- "हृष्टिः कर्थ जरठप्रगल्भपाटलतेयं कम्पः किमेप पदमोष्ठदले च्युतव्य । नारदरईहरसप्रवशा प्रियसख्य वचत्रसख्युंकुमत्सुकृतैरपि मा कुतोद्यम् ॥" एपु रसप्रयत्नेनैव शब्दार्थालङ्कारलाभः ॥ [२९] १२३ ॥

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न तथ्यार्थशब्दोत्प्रेक्षा: इत्थाद्या: काव्ये यथा रस: । विपाकक्रममप्यात्रं उद्वेजयति नोरससु ॥[२२]१२४॥

न हि नवनवर्थ्युत्पन्नशब्दगर्थनमेव काव्यं, तर्क-ऋयकरथयोरपि तथाभावप्रसंगात् । किन्तु विचित्तरसपरिवृशब्दार्थनिवेशः । विपाकवमनरीयमपि सशिकारफलं विरसमुद्रे गमावहति । श्रतः: शब्दार्थमात्रशरीराः: शुष्ककवयो यसकरलेपादीनामेव निवन्धमर्हन्ति । न तु रसैकशरराऽस्य नाट्यस्येति ॥ १२४ ॥

एकस्वैरियोस्तुल्यशक्तियोरगे विरुद्धता । एकस्मिन्नाश्रये नायकादौ तसिमन्नेव प्रक्रमे परस्परविरुद्धयो रसयोरविरुद्धता, न तु मिन्ने । यथाड्जुनचरिते—

इनमें रसके लिए किन्ते गए प्रयत्नसे हो [स्वाभाविक रूपसे] शब्दालङ्कार तथा अर्थालङ्कारों समावेश हो गया है [उनके लानेके लिए कविने यत्नकु प्रयत्न नहीं किया है ।] इसी यातको पुष्ट करते [हुए भामह कहते] हैं—

कार्यं न शब्दा तथा लयंकरी कल्पना उत्कनो प्रसन्ननीयो न होती है जितने रसकी स्थिति । जैसे पंक जाननेके कारणा मुग्वदर लगने वाला ध्यामका फलभो रस-रहित होनेपर बुरा मालूम होता है ॥[२२] १२४ ।

नए-नए श्रयोंको प्रकाशित करने वाले शबदोंकी रचना कर देना मान हो काव्य नहीं कहलाता है । क्योकि न्याय तथा व्याकरणादिमें भो यह [नए-नए श्रयोंके प्रकाशक शब्दोंकी रचना] हो सकता है । किन्तु [विचित्र] घनलकारजनक, रससे युक्त शब्द प्रोत प्रयंकासहित-वेश [हो काव्य कहलाने योग्य होता है] । जैसे परिपाक हो जाननेके कारण मुग्वदर दिखाई देने वाला भो ग्रामक फल रसशून्य होने पर बुरा लगता है । इसलिए केबल शब्द तथा श्रयं का श्रवलम्बन करने वाले शुल्क कवि यमक भ्रनुप्रास श्रादिको हो रचना कर सकते हैं, रसप्रधान नाटककी [रचना] नहीं कर सकते हैं ॥ [२२] १२४ ॥

श्रव विरुद्ध रसोंक्ता विरोध [उपस्थित] होनेपर उसके परिहारके मार्ग [प्रतिपादन] को बतलाते हैं—

[सूत्र १७६]—एक ही स्यानपर वो स्वतन्त्र प्रोत तुल्यशक्तिक वाले रसोंमें विरोध होता है । [प्रथार्त (१)भिन्न श्राश्रयोंमें रहने वाले श्रथवा (२) स्वतन्त्र न रहने वाले, श्रथवा (३) तुल्य बल न रहने वाले रसोंमें विरोध नहीं होता है । श्रत: एव (१) दो विरोधी रसोंमें श्राश्रयभेदसे, (२) एकको दूसरेके अङ्ग बना देनेपर, श्रथवा (३) दोनोंके किसी तीसरे प्राश्रयके रसका अङ्ग बना देनेसे प्रोत गौरव रूपसे वर्णन करनेपर विरोध नहीं रहता है । यही उनके विरोध-परिहारके मागं हैं ।

एक हो श्राश्रय श्रथवा नायकादिमें द्वौ उतो प्रसंगमें परस्पर विरोधी रसोंका विरोध होता है । भिन्न श्राश्रयोंमें श्रथवा भिन्न प्रसंगोंमें [उसो नाटकमे विरुद्ध रसका वर्णन] होने पर विरोध नहीं होता है । जैसे प्रभु नचरितमें—

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समुत्थिते धनुर्ध्वनौ भयावहे कीर्तितिनः । महातुपप्लवोड्भवत्पुरे पुरन्दरद्विपाम् ॥

यथा च— "दन्तत्कतानि करजैश्च विपाटितानि, प्रौढोभयैरसान्द्रपुलकैर् भयत. शरीर । दत्तानि रक्तमनसा मृगराजयद्वया जातस्य हेर्मुनिनभिरप्यवलोकितानि ॥" शत्रु तस्मिन्नेव प्रकमे मुनि-कामुकयोर्भिनन्नयोर् शृङ्गार शान्तौ विरुद्धाविति । तथा स्वैरियोः स्वातन्त्र्योः मतोर्थिकद्रयो रसयोर्विमृद्धता, न तु परतन्त्र- ग्वतन्त्रयोः, मुख्यस्यायत्तयोर्व यथा— "कुरङ्क ! कुचाघातक्रोडासुखेन विजुग्यसे, वकुलाविटपिन् ! स्मर्तव्यं ते मुखासवसेवनम् । चरराघटनाश्रुल्यो यास्यस्यशोक ! म शोक्तां, इति निःपरतयाोगे यस्तु द्विपां जगद्। स्त्रियः ॥" मृगयांकेभयावह धनुष्के ध्वनिके उदय होनेपर इन्द्रके शत्रुत्रोंके नगरमें घड़ी मथरराहट फेंल गई । इसमें [वीर तथा भयानक दो रसोंका वर्णन है । ये दोनों रस एकाधयपमें होनेपर विरोधी माने जाते हैं । यहाँ इन दोनोंके प्राधप्यक भेद कर दिया गया है । इसलिए उनमें विरोध नहीं रहता है] । नायक [प्रजुम्न] मे वीर रस है और नायुपोंमें भयानक रस है [इस- लिए पारस्परिक विरोध हो जानेसे उनमें [विरोध नहीं रहा] । प्रथवा जैसे— रक्तपानकी इच्घा करने वाले [दूसरे पक्ष्मे भयानुरागपूर्वकं मन घातको] मृगराजने यशु [सिंहने दूसरे पदमें जिसी राजाके पतनो] ने प्राप्तके रोमाञ्चयुक्त द्वारीकें ऊपर जो दन्त- महोर मोर नखासो विपाटितके चिह्न बनापए हैं उनमें युगपत् नो शृङ्गार होकर विप्रल- हम भी इन दन्तकत्कत नखाक्षतोंसे विभूषित होते इस इन्द्रके] देह । यहाँ उसी प्रसङ्गमें मुनि और कामुक दो भिन्न प्राधप्योंपे रहने वाले शांत और शृङ्गार रसोंका विरोध नहीं है । इसी प्रकार [दो विरोधी रसोंके] स्वतन्त्र रूपसे [योजित] होनेपर हो विरोध होता है एकके परतन्त्र और दूसरेके स्वतन्त्र होनेपर प्रथवा दोनोंके किसी तीसरे मुरपप रसके अधीन होनेपर [जनका विरोध] नहीं होता है । जैसे— हे कुरङ्क ! [इस विरोध, हमारे पहांसी चले जानेपर] तुम [हमारे द्वारा प्राप्त होने वाले] कुचाघातके सुखसे वद्वित हो जाओगे । हे बकुल ! [मोतपोके दूसरें] तुम्हें [हमारे द्वारा प्राप्त होने याने] मुखके कुल्ले द्वारा सेवनकी याद भापा करेगो । हे मशोक ! हमारे घरसक प्रकारके [विरहजनित] शोको यास्यस्यशोक ! म शोक्तां, महर्षि वात्स्यायन ने संशोधित कर सोमानक्य हो जाओगे । जिसकें [जोशों हृदय नसों] रद्रपोंको स्त्रिप्रो इस प्रकार [दन पृथकों समर्पित करे] भरती यों !

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शृङ्गारोदोपनविभावैः कुरङ्कादिभिरुद्दीप्यमानः शृङ्गारो विशेपतः करुणां स्वतन्त्र- मङ्गिनं द्विप्रत्रीर्यां पोपयति । यथा वा—

इसमें कुशबक ग्रादि रूप उद्दीपन विभावोंके द्वारा उद्दीप्त किया जाने वाला शृङ्गार स्रियोंका शृङ्गार रस उनके भीतर रहनेवाले प्रधान शौर स्वतन्त्र करुण रसको पुष्ट करता है ।

"श्रयं स रशनोत्कर्षी पीडस्तनविमर्दनः । नाभ्युमृज्यचनस्पर्शी नीवीविस्रम्भसंस्तः करः ॥ छाया भृङ्गारश्रवसः समरवि पतितत्राहृदर्शनैस्तद्विश्रयाणां शृङ्गारः स्मयमाप । करुणां पोपयति ।

हमारी रसना [प्रयासों] तगड़ियोंको हटाने वाला, स्तनोंका पीड़ित करनेवाला तथा नाभि जंघाओं शोर नितम्बोंका स्पर्शन करने चात्ता तथा मारेके खेलने चाला [हमारे प्रियतम भृङ्गारश्रवाक] यह वही [प्रानन्ददायक] हाथ है । इसमें समरभूमिमें पड़े हुए भृङ्गारश्रवाके हृद्यको देखकर उसको पत्नियोंका स्मयंभाष शृङ्गार रस [भृङ्गारश्रवाकी मृत्यु के बाद वर्त्तमान] करुण रसका परिपोषण कर रहा है ।

मुखप्रेक्षितपारतन्रन्यदु:खाभिघातेन स्वात्मपुष्टिमलभमानयोर्नृपसमोपस्थित-ग्रातता- चिद्ययवत् कुतः करुणा-शृङ्गारयोःग्रोत्यात्-यातकभावः इति ?

[किसी तीसरे] मुख्य रसके श्रधान रहनेवाले [दो विरोधी रसोंके श्राविर्भावके] सदाहारूप । जैसे—

शिवाजके द्वारा किए गए त्रिपुरदाहके समय त्रिपुरकी स्त्रियोंकी हृदयदाहका वर्णन करते हुए कविने इस श्लोकमें शृङ्गिनका कामोद्दीपन सादृश्य इस प्रकार दिखलाया है—

शिवाजीके द्वारा किए गए त्रिपुरदाहके समय त्रिपुरकी स्रियोंकी हृदयदाहका वर्णन करते हुए कविने इस श्लोकमें शृङ्गारका कामोद्दीपन सादृश्य इस प्रकार दिखलाया है—

"दिप्तो हस्तावलग्नः प्रसभममिहितोद्याददानोंडशुकान्तं, गुल्मन् केशोपपाश्चररगानिपतितो नेक्षितः सम्भ्रमेष । श्यालिङ्गन यौडवधूतस्निप्रुरयुवतिभिः साधुनेत्रोत्पलाभिः, कामीवाद्रोंपराथः स दहतु दुरितं शान्भवो वः शराग्निः ॥"

[प्रार्चीपराच] कामोके समान स्त्रियोंका] हाय पकड़नेपर भट्क दिया गया, बलात् हटा दिए जानेपर भी वस्त्रोंको ग्रहण करनेवाला, केशोंको छूते समय दूर हटा दिया गया, परन्तु [ग्रस्त्रिन पछमें] भयके कारण [ग्रोर कामो पछमें समग्र मस्र्यात् ग्रादरपूर्वक] न देखा गया, शोर [परस्त्रियों गमन श्रादि हप तुरन्त किए हुए शत्रपराधके कारख] ताजे शत्रपराध वाले शत्रुके समान प्रार्चीभरे हुए निपुरको युवतियोंने श्राचलग्न करते हुए जिस [श्रभिन] को भट्क दिया है इस प्रकारका द्विजातिके वाराका श्रमिन तुम्हारे दुःखों पापों को नाश करे ।

इसमें करण शोर शृङ्गार [दोनों परस्पर विरोधी रस] त्रिपुरारि [शिवजी] के प्रताप—

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तथा एकाश्रययोरपि तुल्यवलयोविरोधो, न तु हीनाधिकवलयोः। यथा पुस्त-रथः प्राप्त-

तथापि एकाश्रय के दो भंग हैं । इसलिए परस्पर विरोधी होनेपर भी दूसरे [प्रधानभूत नायकके प्रतापाति-

"क्वाकार्यं शशलदमसृक्षः कच च कुलं भुयोडपि हर्षयेत सा, दोषार्णां प्रशममाय न श्रुतमही कोपेडपि कान्तं सुखयम् । किं वध्यन्त्यपकल्मपः कृतथियः म्रप्नेडपि सा दुर्लभा, नेत्थं ! स्वार्थेनुपैहि कः स्वलु युवा वन्योडपरेर् भवितुम् ॥"

[तथापि यहाँ इन दोनों रसों

ग्रन्थ शृङ्गार-शांतयोरै्न परस्परमऋजुभावोऽप्योपपत्तवान् । वृत्तींस्तयोर्-

दो प्रकार एक हो [नायक प्रादि रूप] प्राप्तव्यमें रहने पर भी शोभनोके तुल्य बल होनेपर ही विरोध होता है । हृदयं प्रोर प्रवल होनेपर नहीं । जंमे [विक्रमोर्वशीयोंमें] पुस्-

भावान्तर् शृङ्गारभानोडपि नास्ति, किन्तु स्वतन्त्रो । तथापि न विरोधः, शांतस्यागन्तुकत्वेन श्रृङ्गारपर्यन्तेऽपि शांतारे विश्रान्तिः । प्रकृतमन्यत्राप्युदाहार्यम् ।

रथ कहता है- (१) वहाँ यह भ्रमुचित धाम प्रोर वहाँ [हमारा उज्जवल] चन्द्रवत् [तनुं] । (२) क्या वह फिर कभी दर्शनको मिलेगो [प्राप्तमुष्य] । (३) [मरे] मेंने तो देवोपर विजय प्राप्तके लिये हो नाग्नोधा म्रप्यमन किया है [फिर इस कुमारपर क्यों जां रहा हूँ] [मतति] ।

(४) [सोहे] श्रोपधे [नाराज होनेपर] भी उत्कटा [नयन-सलात] मुख कितना सुंदर लगता है । [हस्तरए] । (५) [मते मते इस् वचयहारीको देखकर] विद्वन्् एवं चमत्कार मोद मुरन्दर चया कहेंगे [संबर] ।

(६) यह तो । मम्च र्वतनमे भी हुर्संभ हो गर्ई । [हृद्यम्] (७) अरे मन तनिक् प्रोरज रसतो । [पंपः] (८) न जाने मोत सोमार्पदालों युवश् उतारे पपपरामृतसर पान करेगा [विलास] ।

इसमें तांत प्रोर शृंगार रसोंका पोप्य-पोपकभाव न होनेसे [पर्याप्तु गुप्-प्राप्तान्मय] महों है । प्रोर विगतेऽपि रसः [रस] के न होनेने [दोनोंक सोभरेके प्रति] पगमाद्य मो मरों है । किन्तु शोभनो हृदयत्र रसां है । कित् भी यहाँ शांत रसमें भामगुर् पडनेमें युबंस् . [तथा शृंगारोके म्रदुत होनेने [वारित म्रवत] होनेने [उन देवोपर्] विरोध नहों # । इसलिये म्रों इनतने शृंगार रसमैं हो विराजित होतो है । हमीं प्रकार पनप जराहरता भी तमस्र मेलै प्राप्तः ।

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विरुद्धेन रसान्तरेण व्यपवधानेऽथवा नागानन्दे—'रागस्पारपद्मित्यवैम न हि मे ध्वंससीति न प्रत्ययः ।' इत्यादिनोक्तेस्तदपि शांतो रसस्तस्य विरुद्धो मत्यवतोविपयः श्रृङ्गारः—'ग्रहो गीतमहो वादित्रम्' इत्यादिना श्रद्धासुतमन्यत्र कृत्या निबद्धः । एवमन्ये-व्युद्वाहार्यमिति ।

विरुद्ध रसके द्वारा व्यवधान होनेपर—जैसे नागानन्दमें—'इस प्रकार रागके वशीभूत होनेसे मेरा नाश नहीं होगा—ऐसा मुझे विश्वास नहीं है ।' इत्यादि प्रकारसे शांत रसके विपरीत श्रृंगार रसका वर्णन किया है—'ग्रह, गीत तथा वादित्र' इत्यादि प्रकारसे अन्यत्र श्रद्धासुतमें उसका वर्णन किया है । इसी प्रकार अन्य रसोंमें भी समझना चाहिए ।

विभाव-व्यभिचारिभिः तु रसांतरोद्भवेन विरोधः परिहारश्च द्रश्यः । श्रथ रसदोपान्ताह—[सूत्र १५०]—दोपोऽनौचित्यमडौप्रच शृङ्गारोपोत्कर्षोत्कर्षोभिव ।। [२३] १२४ ।।

[सूत्र १५०]—दोषोंके [अनौचित्यके] बढ़नेपर तथा श्रृंगार रसके उत्कर्षके बढ़नेपर ।

(श्र) सहृदयानां विचिकित्साहेतु कर्मानौचित्यं तत्त्वानेकधा । (क ?) तत् कर्वाचित् प्रतिकूलविभाव-मात्रानुगन्धो यथा—'स्यजत मानमलं वत विग्रहैः पुनरेकि गर्तं चलुरं वयः । परभृताभिरितीव निवेदिते स्मरमते स्म रतं वधूजनः ।।'

(श्र) सहृदयोंमें संदेह उत्पन्न करनेवाला कर्मका अनौचित्य अनेक प्रकारका होता है । (क ?) जैसे—'कोकिलोंके [कुहू शब्द द्वारा] मानो इस प्रकारकी सूचना देनेपर कि प्रियतमके साथ विरोध करके तुम व्यर्थ ही युवावस्थाको खो रही हो, वधूजनोंको कामदेव स्मरण कराता है ।'

प्रत्यवधानसे दोषोंमें होत्प्रेपर—हो विरोष होता है । [दोनोंके] अविरोधी अन्य रसके व्यवधान होनेपर विरोध नहीं होता है । जैसे नागानन्दमें—हि मित्र मातृकेय ! यह यौवन विपय-वासनाका घर है यह बात मैं जानता हूँ और यह सदा रहनेवाला नहीं है यह बात भी मुझे मालूम है [प्रथमांक इलोक संख्या ४] । इत्यादि [मुखसंधिके] उपक्षेप [नामक अंग] से लेकर द्वांत रस [भयानक हो गया है] उसका विरोधी मालती धनुराग [प्रथमांकके १४ वें इलोकके पूर्व कहे गए] 'ग्रहो गीतं महो वादितम्' इत्यादि [विपय] से बोधमें प्रदर्शित रसका समावेश करके [व्यवधानसे] दोषोंमें किया गया है । [इसलिए यहाँ द्वांत तथा श्रृंगार रसोंका विरोध नहीं रहता है] । इसी प्रकार श्रव्य रसोंमें भी सम्यक् लेना चाहिए ।

[विरोधी रसों] के विभावों तथा व्यभिचारिभावोंमें रसके [विरोध-प्रतिरोधकी व्याप्ति] अनुमानसे हो सकती है विरोध तथा उसका परिहार सम्यक् लेना चाहिए ।

[सूत्र १५०]—(क) [रसोंके] अनौचित्य, (ख) श्रृंगारकी उदात्त [पर्याप्त सप्रधानमूत रसका प्रधानरसीकी श्रपेक्षा विस्तारपूर्वंक करणं] (ग) [मुख्य रसीकी] पुष्टिका प्रभाव, (घ) [मुख्य रसकी भी श्रभाव्यक्तासे] अधिक विस्तार (ङ) [अंगभूत श्रयंत्त] प्रधान रसकी भूलना देना

[सूत्र १५०]—(क) रसोंका अनौचित्य, (ख) श्रृंगारकी उदात्तता [अर्थात् सप्रधानमूत रसका प्रधान रसकी अपेक्षा विस्तारपूर्वंक करना] (ग) [मुख्य रसकी] पुष्टिका प्रभाव, (घ) [मुख्य रसकी भी श्रभाव्यक्तासे] अधिक विस्तार (ङ) [अंगभूत श्रयंत्त] प्रधान रसको भूलना देना

[ये पांच प्रकारके रसके] दोप होते हैं । (क) सहृदयोंके मनमें डर या भेद [उत्पन्न] करनेवाला कर्मं अनौचित्य कहलाता है । और वह अनेक प्रकारका हो सकता है । (क ?) प्रतिकूल विभावादिके वरणोंका रूप होता है । जैसे—

इस मानको छोड़ दो, [प्रणिक काल तक] प्रयत्न-क्लेश करना उचित नहीं है । यह [यौवनके] मदसे भरा हुआ मतवाला होकर कोकिलोंके [कुहू राव द्वारा] मानो इस प्रकारकी सूचना देनेपर यशोदा कामोत्तुक पतियोंको

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श्रृङ्गारप्रतिकूलस्य शातस्यानित्यताप्रकाशाहपो विभावो निर्द्ध। (क २) कवचिद्रकाशे प्रथनम्। यथा वेशीसहायौ धीरोरदत्परतनेरपि हृद्योऽवस्म्य भोज्ज-म्रदुरमहावीरलत्क्षयकारिणौ प्रवृत्ते समरसंतम्भे भानुमती प्रातः श्रृङ्गारवर्ज्जानम्। (क ३) श्रगचिद्रकाशे विन्द्येन्द्रो यथा वीररचिन्ते राघव-भर्गावयोर्धोराविरहृदे (क ४) कवचिद्रुतमधे-मध्यमाना प्रकृतानुपन्येथा वेधानम्। यथा—उत्तमानां हास्य-शृङ्गार-करुणाद्भयानक-श्रद्भुतप्रकर्य ।

साथ रसके करने वालीं। (क १) इसे श्रृङ्गार रसके प्रतिकूल श्रनित्यता प्रकाशन रूप नाटत रसके विभावोँ परिगन [मुख्य श्रृङ्गार रसके] विपरीत है। (क २) वहाँ वेमोँके विरतार कर देना [भी रस दोष होता है] जैसे वेशीसहार [के नितीयाअदृश्य]मेँ घोरोदत मृृकितके [नायक] होनेपर भी भोज्ज प्रादि सात्वों योरीँका नाटत हर डालने जाते [भयङ्कर] मुद्रसेँ प्रारम्म होनेपर भी भानुमतीके प्रति श्रृङ्गारता संगतन [परिगन प्रयत्न हप रसदोषका उदाहरण है]। (क ३) कहाँ प्रवसारमेँ बिना ही रसका विच्छेद [वर हेतु भी रसदोष होता है] जसौ—महावीरचरितमेँ रामचन्द्र तथा परशुरामजीके बीच योद्धतके पूएँ प्रयाहपर आ जानेपर [मृदृदा हृदय मैं] ‘कान खोलनेके लिए जा रहा हूँ’ यह रामचन्द्रका कथन [प्रकाशनमे रसका विच्छेदक होनेसे रसदोष है]।

(क ५) मध्यमाधमाना तु श्रभ्राम्य श्रृङ्गार, वीर-रोद्र-शातप्रकर्यश्च । (क ६) उत्तमेप्यपि दृश्येपु संभोगस्थ गारवर्ज्जान पित्रो संभोगवर्ज्जानभम यथा कुमारसम्भवे उमा-महेश्वरयोः । (क ७) श्रद्रदृश्येपुत्तमेऽपि सत्य फलद्रक्रोशेन-नृपातलगमन-समुद्रलङ्घनादिगुणसाह-वर्ज्जानम्।

(क ४) वहाँ उत्तम मध्यम तथा मध्यम प्रकरितयोँ [श्रेष्ठ पात्रोँ] के विपरीत हृदये योभत्स रसके भयानक और प्रद्भुत रसका परिपन्थी वरान्त [प्रकृतित विपयं नामक रसदोष है] जैसे उत्तम [प्रकरित पानोँ]के वेधान्त हास्य शृङ्गार करुणा और भयानक और प्रद्भुत रसोँका पर्य्यनिक वरान्त [परनिन्दा है] (क ५) मध्यम सथा वधम [प्रकरितके नायपादि] मे [ताय पपान्त पर्य्यनित] शृङ्गार घोर, रोद्र और शान्तरके प्रकट वरान्त [चर्चित होनेमे ये दोनोँ प्रकतारके वरान्त मृ्ति विपयं नामक रस दोनोँमे घाते हैँ]। (क ६) उत्तम [प्रकरितयोँ] मे भी द्रश्य [पात्रोँ] के शृङ्गार रसके विरजन्ते सम्भान [होनेसे निन्दित] है। जैसे कुमारसम्भममे पार्वती घोर उमारता यरान्त]। (क ७) देवतार्च्चोँ डोकरर उत्तम मृकितियोँमे भी गुरुतम पन देने वाने दोप, रवगं पातालगमन, सम्रद्रलङ्घनादिके जस्साहना वलन [भी परनिन्दित होनेसे ये प्रदोष

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(क स) धीरोदात्त-धीरोद्धत-धीरललित-धीरशान्तेपु वीरोद्रभृङ्गारशान्तादिभरैस्तु विपरीतधर्मीं वा । मध्यमाधमेपु चैवु वीरोद्रसप्रकर्य वर्जनीयम् । (क ई) क्वचिदू वर्ज्ये-समासानोयथाप्रथनम् । तत्र दीप्तेपु रसेपु संयुक्तैर्मू धेनैर्वच यैः समासदैर्घ्येग्च न प्रायः । प्रसन्नो मसृणश्च वन्धः । श्रृङ्गार-हास्यकरुण-शान्तेपु मूर्ध्वस्थवर्गोऽप्चचमैर्ह र्वैच वचैः । श्रसमासेन मध्यमसमासेन च प्रायः प्रसन्नो वन्धः । सर्वेपु च प्रसिद्धैर् क्वचित्पदैर् ग्राम्यैः । पद्यैस्तैः पदावली ।

(क १०) क्वचिदुत्समस्य उत्तमनायिकायां व्यतोकसम्भावना । (क ११) क्वचिन्नायिकापादमहारादिना नायकस्य कोप । (क १२) क्वचिदू वयो-वेप-देशन-काला-श्रवस्था-व्यवहारादीनामन्थ्या वर्र्गेनम् । (क १३) एवमन्यदपि यमक-श्लेप-चित्रादिकं ऋतु-समुद्रादि-चन्द्रार्कोदया-स्तादिप्रकर्यवर्गेण च रसानुरनौचित्यं द्रष्टव्यमिति । (ख) श्रथाद्यौप्रचम् । श्रृङ्गस्य मुखररसपोपकतया श्रवयचभूतस्य श्रौम्र्य विस्मयोत्कटत्वं दोप । यथाः कृत्याराव्यो जटायुयवध-लमरणशक्तिमेद-सीताविपत्ति-वीर, रौद्र, भृङ्गार तथा शान्त रसोंका यथान्त न करना श्रथवा विपरीत घरैः [प्रकृति-विपयय नामक रस दोप होता है] श्रौर मध्यम तथा श्रधम प्रकृतियोंमें तो इन [घोरोदात्तादि] में वीरोद्र रसोके प्रकट्यंश वर्णान्त [भो श्रनुचित होनेसे प्रकृति-विपयय नामक रसदोषोंमें गिना जाता है] । (क ई) कहूँ वर्णान्त तथा समासोका [रसके विपरीत रूपमें] श्रत्यय प्रयोग [भो रसदोष में गिना जाता है] । जैसे [वीर रौद्रादि] दोत्त रसोमें संयुक्त श्रौर मृदुगण्या [प्रर्थात् ङ्खदुरवाचक मूर्धा-र, व, तथा टवर्ग] वर्णान्त तथा लम्बे-लम्बे समासोंसे सुन्दर श्रौर मनोहरिणी रचना बनती है । श्रौर शृङ्गार, हास्य, करुणा, तथा शान्त जैसे प्रदीप्त रसोंमें तो वगकें पद्राव म्रक्षर से युक्त हसक वर्णान्त श्रौर समास-रहित श्रथवा लघु श्रवयव ग्रलंकासके द्वारा सुन्दर तथा मनोहरिणी रचना होतो है । श्रौर सभी रसोंमें प्रसिद्ध ग्रप्रदृष्ट ग्राम्यतारहित तथा पुष्टार्थक पदोका विन्यास होना चाहिए । [इसके विपरीत होनेपर दोप हो जाता है] । (क १०) कहूँ उत्सम [प्रकृति] के [नायक] को उत्तम नायिकाके प्रति व्यभिचार-सम्भावना [ भो श्रनौचित्य माना जाता है क्योंकि उत्तम प्रकृतिको नायिकामें इस प्रकारके दोषको सम्भावना भो नहीं करनी चाहिए] । (क ११) कहूँ नायिकाके पादप्रहारादिसे नायकके कोधका वर्णान्त [ग्रनौचित्यके हैं] । (क १२) कहूँ वयु, वेप, देश, काल, श्रवस्था तथा व्यवहारादिका ग्रनयया-वर्गेनम् [भो ग्रनौचित्य माना जाता है] । (क १३) यमक, श्लेष, चित्र, कृतु, समुद्रादि, सूर्यं तथा चन्द्रके उदयास्तादिके जो कि रसके श्रग नहीं हैं उन [रसके ग्रनुरूप] के प्रकट्यंशका वर्णान्त [प्रर्थात् श्रत्यधिक विस्तारके साथ वर्णान्त] मनौचित्य सम्भवना चाहिए । (घ) श्रव [प्रद्योत्रक] उपरत [दोषका निरूपण करते हैं] प्रघ्न प्रयाप्त मुख्य रसके योग्य होनेसे भ्रवयव रसभिन्न उपरता भासोत् भयानक विस्तारके । जैसे कृत्याराव्यमें जटायुके वध, लक्ष्मएके शक्तिभेद, सीताकी विपत्तिको मुनने

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श्रवणोपु रामस्य सुहृद्मुदाहरन् करुणाधिकार्यम्। श्रृङ्गारोतो हि रसो न धाराधिरोहर्मर्हति, श्रान्त्याधर्ज्जिन वीररस तिरोधधीत। केचिदन्न हयग्रीवस्य हयग्रीवकवेः श्रानुमुदाहरन्ति। स पुनःकृत्स्नदोपो वृत्तनायकस्थालवर्णनात्। तत्र हि वीरों रसः स विशेपतो वध्यस्य शौर्यविभूत्यतिशयवर्णान्तेन भूत्यत इति।

(न) ‘अ्रपोप’ इलति धाराधिरोहर्मर्हति श्रपापो दोप इत्यर्थः— "वीरस्तु त्रिपया, जुगुप्सिततम कायो, वघ्यो मत्वर, प्रायो वन्धुमिरसवननोच पथिककैयोंगो नियोगवह । हातव्योदयमसम्भचाय विरस मन्सार इत्याल्नक, सर्वस्थापि हि वाचि, चेतसि पुन क्यापि पुन्यातमन ॥" श्रत्र कविना ‘यान्चि’ दृ्टान्तपद्मनता विपयग्रीमत्सत्वार्चिना शान्तजनन प्रति मन्दत्सुमुक्तम्। यन्थथा सर्वस्थ चेतस्थापि स्यान्। श्रपोपरचागिनो श्रृङ्गागिभाग्रन्न तस्य वा मुक्तकोपात्तम्य । श्रृङ्गारमूतस्यापोप पुनदोप ग्वति । (व) ‘प्रत्युक्ति’ डलनि धाराधिष्ठडस्यापि रसस्य नेरन्त्येऽपि पुन पुन उदीप्ति पर रामचन्द्रके वार वार इलति [विलयापत्ति] का श्रध्रिकु [इस श्रप्रिकु नमकं रसदोषक्न] उदे हरषा है] । श्रद्धभ्रत [ग्रमप्रान] रसक श्रश्रय त विरातार नहीं होना च्चाहिए । ग्रपयवा वह प्रधान श्रृृत वीररसको दवा देगा । कुछ लोग हयग्रीप घण मे हयग्रीवके वसानको इसका उदाहरण बतलाते हैं । किํतु [हमारी सम्मतिमे तो] वह वृत्तदोप है [रसदोप नहीं है] । श्योकि जिस युत [प्रथया्त कया भान] के नाटकका दर्शन श्रम [श्रोर प्रतिनायक हयग्रीवका पतन प्रधिक हो गया है । ग्रतएव यह वृत्तदोप है रसदोपमे उसका उदाहरण नहीं देना च्चाहिए]। उसमे वीररस [मुख्य रस] है श्रोर वघ्य [हयग्रीव] के श्रौत तथा विभूति प्रादिके प्रतिपाद वणर्नते वह ‘ग्रोधित [परिपुष्ट] हो होता है [ग्रत उसमे रसदोप नहीं माना जा सकता है । यह वृत्तदोप ग्रथया्त कयाभागका दोप है] । (म) श्रपोप धर्म्यात [मुख्य रसकत] प्रवाहुपर न ग्राना [ग्रपोप नामक रसदोप होता है]। जैसे—

विपय श्रप्रय्त वोधित है पह शारीर [मल-मूत्र श्रादिको श्ञान होनेसे] पर्याप्त गृपित है पाय विनष्ट होने वाली है श्रोर वघ्य वाञ्छितोके माथ मिलते रास्तेमे मिलनें वात पपिक्र के समान ग्रतएव डियोगम पतयस्थित होनेवाला हो होता है [ग्रसभप्राय पतन] पुनर्जन्मे घघमेधे लिए [मुक्तिको प्राप्तिेलिए] इस वीररस तत्सारको त्याग देना च्चाहिए । इस्यादि [श्ररायण्णर यार्त्र] सय लोगोके देखल यचनोमें रहते है मनमे तो किसी गुप्तमार्ग हो यार्त्र जाते है । इतने यान्च [वायोमे हो] होती है मनमे नहीं] ऐता कहकर कविने त्रिपयालो योमस्तता ग्रादिको नातरस्की उपत्सिते प्रति भदतता सूचित की है । च्रपपया [यदि इनमे प्रव्लता होती तो] सबवने मनमे धो [जिनके श्रियत्ति] होती [इसलिए यहाँ रसक श्रपरिपोप रप रसदोप है]। यह च्रपरिपोप (१) ग्रप्रान रसका ग्रपया (२) मुक्तनोमें रघन न रप्ता श्रोलितथा होना है । सगभ्रत [प्रप्रान रस] न श्रपरिपोप दोप नहों होता है । (य) प्रत्युक्ति ग्रर्थान् रसके प्रवाहपर परुच जाननेपर भी पसन वार-चार जुड़े

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दोषो यथा कुमारसम्भवे रतिम्रलापेपु । लब्धपरिपोपो हि रसः पुनः पुनः परामृश्यमानो मालतीमाल्यामिव म्लायति । श्रुत एवं प्रकारेऽप्राप्तरसविशिष्टस्थानं कवीनामल्पीयानेव वाङ्गिलास इति ।

(ङ) 'ग्राङ्गिभित्' इति । बहुरसे प्रवन्ध्ये श्रावयवभूतरसापेक्षया ग्राङ्गिनोऽस्यव-भूतस्य रसस्य 'भिद्' श्रानुसन्धानं दोषः । श्रानुसन्धानं हि सर्वेऽपं रसोपमस्य । स्मृत्यभावे पुनरपि दोषः । दध्या रसनाभ्यां चतुप्रपात् यथाश्रव्यगामित्वात् सांगरिकाविमृष्टतां निनीर्त्ति । ग्राङ्गोग्यादयरच दोषः परमार्थतो ग्रन्थोचित्यान्तःपातिनोडपि सहदयानामनौ-चित्यव्युत्पादनार्थमुदाहृतोऽपातः । केचित् स्थायिभिचारि-रस-स्थायिनां स्वशब्दवाच्यत्वं रसदोपमाहः तदयुक्तम् । न्यभिचार्यादीनां स्वाच्छब्दप्रयोगेऽपि विभावपुष्ट्रे— "दूराहुसुकमागते विचलितं सम्भापिते स्फारिते, संशिल्पत्यधरं गृहीतवसने किम्बाऽऽक्षितभ्रूवल्लम्‌ ।" पुन [करनेका प्रयत्न] करन्ना 'प्रधान रसका श्रादि-चिस्तार 'प्रत्युक्ति' नामक रसदोष कहलाता है]। जैसे कुमारसम्भवमें रतिके विलापोंमें [बार-बार कद्रण रसको उद्दीप्त करनेका यत्न किया गया है । इसलिए वह दोष है । क्योंकि] रसका परिपोष मो जाननेके बाद उसका बारम्बार स्पर्शं करनेसे वह [बार-बार दूनी गई] मालतीकी मालाके समान कोमल हो जाता है । इसलिए प्रकार-प्राप्त रसविशिष्ट कवियोंका वाड्‌.गिलास थोड़ा हो होता है । [प्रर्थात् उत्तम कवि रसका पूर्ण परिपोष हो जानेके बाद रसका ग्रानुवत्यिक विस्तार नहीं करते हैं] । (ङ) 'ग्राङ्गिभिद' ग्रर्थात् ग्रनेक रसों वाले प्रवन्ध [काव्य नाटकादि] में प्रवयवभूत [प्रप्रधान] रसकी श्रपेक्षासे श्रृङ्गी [अर्थात् प्रधान] श्रावयवभूत [प्रधान] रसका भेदन श्रर्थात् विस्मरण [ग्रानुसन्धान, ग्राङ्गिभिद नामक रस] दोष होता है । क्योंकि [हर समय मुख्य] रसका ध्यान रखना हो उसके परिपोषकेका प्रयास है । जिसको भुला देनेपर तो उसका परिपोष हो नहीं बनता है । [इसलिए प्रधान रसको भुला देना रसका परिपोष-जनक 'ग्राङ्गिभिद' नामक दोष कहलाता है ] जैसे रसनावलौके चतुयं श्रृङ्गारप्राय जाननेपर [नाटककी प्रवृत्ति नाटिका] सागरिका विस्मृत हो गई है । ग्रतएव इस [विस्मरण-] में 'ग्राङ्गिभित्' नामक रसदोष माना जाता है । [उक्त ५ रस दोषोंमें से प्रथम ग्रनौचित्यको छोड़कर] ग्राङ्गीको उप्रता श्रादि [शेष चारों] दोष वास्तवमें तो ग्रनौचित्य [रूप प्रथम दोष] के भीतर हो ग्रा जाते हैं फिर भी सहृदयोंको ग्रनौचित्य [के विविध प्रकारों] का परिज्ञान करानेकेलिए हो यहाँ दिखलाए गए हैं । कुछ लोग स्थायिभाव, रस, तथा स्थायिभावोंके नामतः प्रहृत [स्वादबद्वाच्यतया] को भी रसदोष मानते हैं । [हमारी ध्रर्थात् प्रन्यकर्त्ता रामचन्द्र गुप्तचन्द्रकी सम्मतिमें] यह उचित नहीं है । स्थायिभिचारिभाव श्रादिके वाचक श्रपने पदों [नामो] का प्रयोग होनेपर भी विभाव प्रादिकों पुष्टि होनेंपर [रसकी ग्रनुप्राणित होतो हो है । उसमें कोई वाधा नहीं होती है । इसलिए स्थायिभावादिकों स्वशब्द-वाच्यता कोई दोष नहीं है । जैसे इस प्रकारके उदाहरणएक रूपमें प्रन्यकर्त्ता गुप्तचन्द्र दलोक उद्दृत करते हैं—

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मानिन्याश्चररपानतिन्यतिफरे वाप्पाम्रुपूर्णेक्षणां, चञ्जुब्जामहसो प्रपक्वरचतुरं जातागासि श्रेयसि ॥ इत्यादौ रसोत्पत्तेर्दीप एवायम् । तस्माद्युत्पत्तिनोचित्थावचने क्कितरेवेयम् । एवंमुभयरससावचारणाविभावपदानां कद्वेने नियतविभावाभिधायितयाधिगमोऽपि सन्निगधतवलच्चणो वाक्यदोप एव । यथा— "परिह्ह्रति मति मतिं लुनोति स्वलचितरां परिवर्तते न क भयः । इति वत विपमा दशा स्वदेहं परिभवति प्रसभं किमत्र कुर्मे ॥"

जाने वाले, उसके साथ रुदनेवाले [मतिमन्तलते] कटे हुए, प्राणान्तक होने से सन्तप्त [कोपकषाये] मपराधो होनेपर नाना प्रकारकी प्रपञ्च-रचनासे चतुर हो माए है यह प्रादचर्यकी बात है । इत्यादिमे [उत्सुकता श्रादि हृप ध्यभिचारिभावोके स्वदेहद्वाच्य पर्याप्त नामतः गृहीत होनेपर भो] रसको उत्पत्ति होनेसे यह [व्यभिचारिभावादिको स्वदेहद्वाव्यमन] दोष नहीं होता है । इसलिए प्राविद्वानोंके द्वारा कवित होनेसे यह [स्वदविभावादिको स्वदेहद्वाच्यताको दोष ठहराने वालो] उक्ति ठीक उचित नहीं है [प्रयंत्त स्वभिचारि भावादिको स्वदेहद्वावयता को दोष नहीं मानना चाहिए] ।

श्रथ मतिपरिहारादीनां विभावानां करणादारपि सम्भवान् 'श्रृङ्गारं प्रति भाव-त्वसन्देह इति ॥ [२३] १२५ ॥ श्रथ युक्तिलचयो रसानन्तरमु हितानां भावानामवसरसत्त्व्राथि रसानुरोधेन प्रथमं स्थायिन उच्चयन्ते ।

इसो प्रकार दो रसोंमे समान रूपसे पाए जाने वाले विमावादि वाच्य पदोंसे किसो एक निपतरक 'विभावादिको' [ठहराने] प्रतोति भो [जिसको सम्मुख प्रादुर्भाव] रसदोषो हो है । [इस नाटकासो] चहो बेघचनी हो रो हो है, इसकी युक्ति ठहराने महो है, मार-मार गिर पड़तो है, घोर मिरो करवटें बदल रहो है । इस प्रकार इसके बेहोश करी विपम प्रवतपा हो रो हो है इसकत चपत उपाप बताना धाहिए ।

[सूत्र १८९]—रति-हासश्च-शोकश्च क्रोधोत्साहौ भयं तथा । जुगुप्सा-विस्मय-शमा रसानां स्थायिनः क्रमात् ॥ [२४] १२६ ॥

इसमें रतित्या परिहतरा श्रादि हृप विभाव[नु गारमं लो होते हो] हैं [जैसे प्रतिरिक्त ] यहसादिमे भो हो सकते हैं इसलिए उनके नु गारमे प्रति भात्र होनेमे समदेह ह [इसे पर्य सो रसदोष मानते हैं] । वन्तु पदकारने मतमे वह वावयदोष है [रसदोष महो] ॥ [२३]१२४ ॥ यह युक्तिलचयो रसारमे रसोंके बाद कहे हुए मावोंके प्रतिष्ठित होने है स्वपिमारोच कत्पते हैं :

[सूत्र १८२]—रौम, हाम, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा, विस्मय च शमा । मो र'गारादि पुथक् मो] रसेभि कमन रपाविमाव यो । [२४] १२६ ।

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स्त्री-पुंसयोरास्थायिनोऽपरपर्यायोऽन्योन्यमविच्छवं गो 'रति:' । एपा च कामावस्थाचुवतिन्या श्रभिलापमात्रसाराया व्यभिचारिप्या:, देवतादिपु वन्युपु मनोहररसुपु च प्रीतिलुपायारच रतेर्विलासौच । रञ्जनोन्मादानुविद्धशृङ्गततस्य विकारो 'हास:' । निर्वेदानुविद्धं दुःखं 'शोक:' । ध्यापचिकीर्षाजुगुप्साहेतु: परितापोपेशः 'क्रोध:' । धर्म-दयानुबन्धिनः सुखसं 'हर्ष:' । युद्वादिकमैप्यानालस्यं 'उत्साह:' । वैक्लव्यं 'भयम्' । कुत्सितत्वाध्यवसायो 'जुगुप्सा' । उत्कृष्टत्वाध्यवसायो 'विस्मय:' । नि स्पृहत्वं 'शम:' । रसानां स्थैग्यारादीनां स्थायिनः परिपोषणकारकाणि । 'क्रमात्' इति रसोदयश्रुतेप । तेनामी रसान्तरालस्था व्यभिचारिरिपयोऽनुभावाश्च मवन्ति । तत्रैषामागमनुकूलवेन स्थायित्वाभावात् । सहभावितयेन पोपकत्वे व्यभिचारिता । कार्यस्य त्वनुभावता । तथैषां विभावा अनभभावाश्च ये शृङ्गारादिपु रसेपु क्तास्त एवति न पृथक् उच्चन्ते ॥ [२४] १२६ ॥

स्त्री पुरुष का एक-दूसरेके प्रति प्रेम, जिसका दूसरे हाव-भावों में 'ग्रस्थायिभाव' भी कहते हैं, 'रति' कहलाता है । यह [रति] कामावस्थाओं में रहनेवाली शृङ्गारावस्थामक रतिसे, तथा देवतादिके प्रति [ प्रेम ], वन्युप्रों के प्रति प्रेम, और मनोहर वस्तुओंोंके प्रति प्रीति रूप रतिसे भिन्न प्रकारकी होती है । मनको प्रसन्नतता और उन्माद ग्रादिसे उत्पन्न चित्तका विकास 'हास' बहलाता है । निर्वेदसे युक्त हुं दुःख 'शोक' कहा जाता है । [दूसरेके] श्रप्रकार करने तथा [दूसरेसे] घृणा करनेके हेतुजश्रृृत्त संतापका श्रावेग 'क्रोध' कहलाता है । धर्म, दान और युद्धादि कायौंके प्रति ग्रास्थाका प्रभाव 'उत्साह' कहलाता है । निश्र्चय 'विस्मय' कहा जाता है । [ किसी वस्तुकी प्राप्ति ग्रादिको ] इच्छाका प्रभाव 'श्रम' कहलाता है । रसोंके श्रृङ्गारादिक स्थायिभावोंके [रत्यादि परिपाकके जनक] परिपोषणकारक होते हैं । 'क्रमसे' [यह जो कारिकामें कहा है] इससे रसोंके नाम 'कोत्स्संक्रमसे इन [स्थायिभावों] को समर्पण करना चाहिए । इसलिए [ये रत्यादि जिस रसके स्थायिभाव माने गए हैं] उससे भिन्न रसोंमें ये व्यभिचारिभाव तथा ग्रनुभाव रूप भो हो सकते हैं । उन [दूसरे रसों] में इन [रत्यादि] के श्रागन्तुक होनेसे स्थायिभावत्व [इनमें] नहीं बनता है । [रत्यादिके] सहचारो रूपसे रस-पोषक होनेपर उनको व्यभिचारिभाव कहा जाता है । और कार्यरूप होनेपर उनको ग्रनुभाव कहा जाता है । इन [रत्यादि] के विभाव और ग्रनुभाव भी शृङ्गारादि रसोंमें जो कहे जा चुके हैं वे ही रसादि स्थायिभावोंके बाद श्रगते इन कारिकाओंमें व्यभिचारिभाव दिखलाते हैं—

[सू० १८२]—निर्वेद-ग्लानि-यपस्मार-शङ्का-डसूया-मद-श्रमः । चिन्ता-चापलमवेगो मति-व्याधि:स्मृति-धृति: ॥ [२४] १२७ ॥

१. निर्वेद, २. ग्लानि, ३. प्रपस्मार, ४. शङ्का, ५. प्रसूया, ६. मद, ७. श्रम, ८. चिन्ता, ९. चापलता, १०. श्रावेग, ११. स्यायि, १२. मति, १३ स्मृति, १४. धृति ।

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तृतीयोऽधिकारः

श्रमप्यो मरस्यां मोहो निद्रा सुप्तोग्र-द्वेष्यः । विपादोन्माद-दैन्याभ्यां वीड़ा त्रासो वितर्कःराम् ॥ [२६] १२८ ॥

'त्रयद्वित्राशन' इति द्वन्वाद्यनादिमात्रकम् । अन्येऽपि पुनः सम्भवन्ति । यथा छद्म-रहस्या मैत्री मुदिता श्रद्धा-दया-उपेक्षा रति सन्तोष ऋमा मादव - ध्वाडव - दाक्षिण्यादयः, तथा स्थायिनोऽनुभावाश्चेति । 'यथायोगम्' इति रसाश्चित्यान्नातिक्रमेण । तेन केचित् साधारखा, केचित् पुनरसाधारखा । इत्थंन यथारसं निर्हेतुमेेति ।

गर्वोऽत्सुद्यावहिल्यानि जाड्यालस्य-विवोधनम् । व्याधि-निद्रा-श्वास मथायोगैर रसान् विचिन्तयति ॥ [२७] १२६ ॥

(१) स्थायीपां प्रत्येकशः स्वरूपप्रतिपादकं लड्षरामुख्यते— [सूत्र १४३]—निवेंदस्तत्त्वधीर कलेशैरवरस्यान् इवासतात्प्रकृत् । क्लेशान् दारिद्रच-व्याध्याद्यपमानतया भ्रमान्कोश ताडनाभ्रनिःसृतो परिविभूतिदर्श-

१५ अमर्षं, १६ मरसं, १७ मोह, १८ निद्रा, १६ सुप्ति, २० हर्षं, २१. उप्ता, २२ विषाद, २३ उन्माद, २४. दैन्य, २५ व्रीडा, २६ त्रास, २७. वितर्क । २८ गर्व, २६ शोकसुद्य, ३० प्रवहिरया [ प्राहार-नोपन ], ३१. जड़ता, ३२. मालस्य, और ३३ विवोध—ये सातों क्रोधितव्यश्रे [प्रत्यनीक] रसोंके स्वाभिप्रारभाव होते हैं । [२४-२७] १२७-१२६ ।

सातों कहनेसे यहाँ [ तीन और ] हत [समाससे सातों सहपात्र] अनुवादमात्र किया गया है । किन्तु इनके प्रतिसरिक् प्रयत्न [स्वाभिप्रारभाव] भी हो सकते हैं । जैसे—भूख, प्यास, मेह, मुदिता, श्रद्धा, दया, उपेक्षा, रति, सन्तोप, क्षमा, धृतिा, तितिक्षा, दाक्षिप्य आदि । और स्वाभिप्रारभाव तथा अनुवाद [अनुकार्य भाव हो तथ्यते हैं । ये सब हत ३३ सत्याया केचत् पूर्वक्चपित सत्यायाः अनुवादमात्र है । 'पत्यनीकपु' इतकत् स्वाभिप्राय पत्त्र है कि रसोंके क्रोधितव्यश्रे प्रत्यनीक [इनमेंसे कौन कहा वित रसमें स्वाभिप्रारभाव है इसलए । निसोंय करना चहिए । इसलए कुठ [स्वाभिप्रारभाव पनेर रसोंमें तमान रखसे विछमान रहनेचे करण] सापारखा होते हैं और कुठ [ निर्विचन रूपसे जिसो रसमें हो रहनेचे करण] पतापारखा होते हैं । इस वातन निोंय रसोंके प्रतद्रुमें करेे पुे हैं ॥ [२४-२७] १२७-१२६ ॥

(१) यद्यपि इनके स्वस्परे प्रतिशादृश महद् रटते है— [सूत्र १४३]—सह्यसाम [ परक वितत्सृति ] ता नाम 'निवेद' है । यह बनेरोगी रसपन विरक्तानां कररुते होता है और द्वाग तथा तापकर गारसा होता है । जैसे—दरिद्रा, दैन्यावि, व्याधि, हर्मी, भ्रम, वटकसार [पापोद]. मार, हरविनोग, दूसरोंदे दैन्यवं स्तान पारदि । हरवसानारि तय विभागोऽ जो पररप वर 'निवेद

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नादयः । तत्त्वज्ञानादिभिरविभावैरैद् वैरस्स्य स निर्वेदः । स च नि:श्वास-सन्तापयो-रुपलत्तणयात्वादन्येपां च चिन्तार्थै-वैचर्यै-दैन्यादीनांनुभावानां कारक इति । श्रयं च रसेप्वनियतत्व्यात् कादाचित्कत्वाच्च व्यभिचारी न स्थायी । एवमन्येप्वपि वाच्यम् । मम्मदस्तु व्यभिचारिकथनप्रस्तावे निर्वेदस्य शान्तरसं प्रति स्थाप्यितां, ‘प्रतिकूल-विभावादिपरिग्रहः’ इत्यत्र तु तमेव प्रति व्यभिचारितां च, द्वुवाचः स्ववचनविरोधेन प्रतिहत्न इति ।

( २ ) ग्रन्थ ग्लानि:-[सूत्र० १८४]—ग्लानि: पीडा जराड्ययासे:;, श्रान्तिक्तः कार्यं-यासो’ व्यायामाध्वगत्वि-गुरसादिभि: कार्यक्लेशः: पीडा-जराड्ययासैरुपलत्तणयादन्येष् । निद्रोच्छेदेमनस्तापादिभिरविभावैरैद्यशक्तिः सामध्य्र्यभावः सा ‘ग्लानि:’ । कार्य्यं काय-दीक्षातुभावान् भजत इति ॥ [२५] १३० ॥ कहलाता है । और वह निश्वास श्रोर सन्तापादि, तथा उनके उपलक्ष्यरूप होनेसे चिन्ता, श्रधु-विवशंता देनेवाली होनेसे श्रग्रंथ श्रनुभावका भी जनक होता है । यह [निर्वेद] रसोंमें निपत न होनेसे श्रग्र कादाचित्क होनेसे व्यभिचारिभाव होता है । इसौ प्रकार श्रन्य [व्यभिचारिभावों] में भी [ग्रनिपतत्व ग्रोर कादाचित्कत्व होनेके कारणे] उनका व्यभिचारिभावत्व सम्भना चराहिए । [ काव्यप्रकाशनाकार ] मम्मटने तो व्यभिचारिभावोंके निरूपणके प्रसङ्गमें निर्वेदको शान्तरस्का स्थायिभाव कहा है श्रोर ‘प्रतिकूलविभावादिग्रहे’ रूप रस वेधके प्रसङ्गमें उसी [शान्तरस] के प्रति [निर्वेद] के व्यभिचारिभावत्वका प्रतिपादन करके स्वयम् हो श्रपने कयनका खण्डन कर लिया है । इसका श्रभिप्राय यह हु्र्मा कि निर्वेद स्थायिभाव नही होता है । सदा व्यभिचारिभाव होता है । मम्मटने जो व्यभिचारिभावोंके निरूपणके प्रसङ्गमें निर्वेदकेी स्थायिभाव माना है वह ग्रनुचित है । श्रोर श्रग्र श्रागे श्रपने कयनसे हो यह सिद्ध हो जाता है कि निर्वेद शान्त-रसका स्थायिभाव नही श्रपितु केवल व्यभिचारिभाव है । उस दशामें शान्तरस्का स्थायिभाव ‘धाम’ होगा । इसलिये यहांँ ग्रन्थकारने श्रापको हो शान्तरस्का स्थायिभाव माना है ॥

पीडका नाम ग्लानि है। वह यार्ढ़चय श्रोर थक् ग्रादि विभावों [कारणों] से उत्पन्न होतो है श्रोर क्रूरता तथा क्लम ग्रादि[ग्रनुभावों]को उत्पन्न करनेवाली होती हैं ॥[२५]१३०॥

( २ ) [सूत्र १२४]—ग्रब ग्लानि [का लक्षण करते हैं]— पीडाका नाम ग्लानि है। वह यार्ढ़चय श्रोर थक् ग्रादि विभावों [कारणों] से उत्पन्न होतो है श्रोर क्रूरता तथा क्लम ग्रादि[ग्रनुभावों]को उत्पन्न करनेवाली होती हैं ॥[२५]१३०॥

  • व्याधि, श्रमन, विरेचन, भूख, प्यास्त ग्रादिके द्वारा ग्रनेक प्रकारसे शारीरिक, मानसिक दुःसका नाम ‘पीडा’ है । व्यायाम, मार्गगमन श्रोर गुरुतादिसे होनेवाला शारीरिक क्लेदा ‘ग्रायास’ [कहलाता]है । पीडा, यार्ढ़चय ग्रोर ग्रायासादिसे तथा उनके उपलक्ष्यरूप होनेसे निद्रा न माने, मानसिक सन्ताप ग्रादि ग्रन्य विभावोंसे जो श्रान्तिक होती है वह ‘ग्लानि’ कहलातो है । क्रूरता परर्थात् शारीरिक दुर्बलता । [ग्रोर वह कम्पादि जनक होती है] ।

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निन्द्यं चैष्ठितः । 'महा' परममहृदपशीलता पिशाचाद्या । धातुवैपम्य दोप । यहुवचनादुचिछष्टशून्यस्थानसेवनाश्रुचिसम्पर्कैर्द्वै चैष्ठितं ऋृत्याकृत्याविवेचकत्व सेोडपस्मार । निन्द्य विगर्हितं सहसा भूमिपतन-फेनमोक्ष नि: श्वसन धावन्न प्रवेशन स्तम्भ स्वेदादिक चेष्टा कमरोति ॥

(३) ग्रथ ग्रपस्मार - [सू० १८४]—चैकल्यं ग्रह-दोपेश्योडपस्मारो निन्द्यचेष्टितः । 'महा' अर्थात परम महृदय अपशीलता पिशाचादि रूप । धातुवैपम्य दोष । बहुत वचनादि उच्छिष्ट शून्य स्थान सेवन, आशुचि सम्पर्क आदि से चैकल्य, कृत्याकृत्य का विवेचकत्व 'सेोडपस्मार' कहलाता हो ओर वह [ भूमिपतन प्रादि रूप ] निन्दित सहसा भूमि पर गिर पड़ना, फेन गिराना, लगना, ज़ोर से हवास लेना लगना, दौड़ना, कंपना, कड़ा पड़ जाना और पसीना पाने लगना आदि चेष्टाएं इसमें होती हैं ॥

॥ [२५] १३१ ॥ dौर्तात्म्यकमकार्यकरेपु । उपलक्ष्यापल्यान्चास्य साधरस्यादयोऽपि विभावा ग्राह्या । दोलन चौभ-सन्देहाभ्यामनवस्थितत्व चेतस । श्वासिरोद्दान मुहुर्विलोकन-श्वासगुण्ठनमुखौष्ठ-कप्ठशोष-जिह्वापसिलंहन-बेपथु चलहोऽत्स्वादयोऽनुभावा गृह्यन्ते इति ॥ [२५] १३१ ॥

(४) ग्रथ शङ्का--[सू० १८६]—शङ्का स्व-परदौरात्म्याद् दोलनं श्यास्तादियुक्औदौर्तात्म्यकमकार्यकरेपु । उपलक्ष्यापल्यान्चास्य साधरस्यादयोऽपि विभावा ग्राह्या । दोलन चौभ-सन्देहाभ्यामनवस्थितत्व चेतस । श्वादिरोद्दान मुहुर्विलोकन-श्वासगुण्ठन-मुखौष्ठ-कप्ठशोष-जिह्वापसिलंहन-बेपथु चलहोऽत्स्वादयोऽनुभावा गृह्यन्ते इति ॥ [२५] १३१ ॥

कायं स्फुरति कलुपैरुपलक्ष्यैरहं हेतुस्नेह प्रादुर्भाव न निकलना, पैर-पैरि उठना, विवशान्त मोर मनुस्साह प्रादि प्रनुभावोंको भी वोधित करते हैं ॥१३०॥

(x) ग्रथाशङ्का—कायं स्फुरति कलुपैरुपलक्ष्यैरहं हेतुस्नेह प्रादुर्भाव न निकलना, पैर-पैरि उठना, विवशान्त मोर मनुस्साह प्रादि प्रनुभावोंको भी वोधित करते हैं ॥१३०॥

[प्रम्थ १८४] [ पिशाचादि हप ] यहां तथा [ग्रात-विपत्तादि रुप] वियोंकी विपमतासे उत्पन वेचैनो 'अपस्मार' कहलाता हो ओर वह [ भूमिपतन प्रादि हप ] गर्हित द्यापारोसे युक्त होता है ।

(३) ग्रन प्रवस्मार का लक्षण करते हैं— [सूत्र्य १८४] [ पिशाचादि हप ] यहां तथा [ग्रात-विपत्तादि रुप] वियोंकी विपमतासे उत्पन वेचैनो 'अपस्मार' कहलाता हो ओर वह [ भूमिपतन प्रादि हप ] गर्हित द्यापारोसे युक्त होता है ।

दूसरोको पकड़ लेनेबाले पिशाचादि 'ग्रह' कहलाते हैं । घात, पित्त, कफ हप घातुप्रकोप रहने, और गन्दे पदाथोंसि सम्पर्क रतनेसे जो विकलता प्रयाप्त् कतस्य मोर अतद्व्यका निश्चय न कर सकना वह 'अपस्मार' कहलाता है । 'निन्द्य' अर्थात गर्हित सहसा भूमिपर गिर पड़ना, फेन गिराना लगना, ज़ोरसे हवास लेना लगना, दौड़ना, कंपना, कड़ा पड़ जाना और पसीना पाने लगना आदि चेष्टाएं इसमें होती हैं ॥

दूसरोको पकड़ लेनेबाले पिशाचादि 'ग्रह' कहलाते हैं । घात, पित्त, कफ हप घातुप्रकोप रहने, और गन्दे पदाथोंसि सम्पर्क रतनेसे जो विकलता प्रयाप्त् कतस्य मोर अतद्व्यका निश्चय न कर सकना वह 'अपस्मार' कहलाता है । 'निन्द्य' अर्थात गर्हित सहसा भूमिपर गिर पड़ना, फेन गिराना लगना, ज़ोरसे हवास लेना लगना, दौड़ना, कंपना, कड़ा पड़ जाना और पसीना पाने लगना आदि चेष्टाएं इसमें होती हैं ॥

॥ [२५] १३१ ॥ 'दौर्तात्म्य' धर्मात् धर्मुचित कायौंष्ठ करना [दौरात्म्य पदने] उपलक्ष्य हप होनेसे [सपौष्मिे उत्पन्न दाहोमें रजु प्रादि हप] साहचय प्रादि विभावार्जोंसि प्रहण करमापाहिये । डु स तथा सदेहने वारण मनशो परिवरता 'दोलन' हरताती है । प्रादि नादसे बार-बार वैसना, मुंह डक सेना, मूल, पोठ वठ्ठर मूल जानर, जोंभ चहानर, यदनर, पचस होड़ आदि दयम्य प्रनुभावोंका भी पहिलय होता है ॥ [२५] १३१ ॥

(४) ग्रय 'शङ्का' [हप शङ्कारभाववरा सदशाए करते हैं]—अपने या दूसरेके दुष्कमौंसे [मनहर] मम्पन्न दाहू क हरताती है । मोर वह द्यमाता मादिको उत्पन मनेवाला होता है ॥ [२५] १३१ ॥ 'दौर्तात्म्य' धर्मात् धर्मुचित कायौंष्ठ करना [दौरात्म्य पदने] उपलक्ष्य हप होनेसे [सपौष्मिे उत्पन्न दाहोमें रजु प्रादि हप] साहचय प्रादि विभावार्जोंसि प्रहण करमापाहिये । डु स तथा सदेहने वारण मनशो परिवरता 'दोलन' हरताती है । प्रादि नादसे बार-बार वैसना, मुंह डक सेना, मूल, पोठ वठ्ठर मूल जानर, जोंभ चहानर, यदनर, पचस होड़ आदि दयम्य प्रनुभावोंका भी पहिलय होता है ॥ [२५] १३१ ॥

(x) ग्रय 'आशङ्का' [का सङ्केत करते हैं]—

(x) ग्रय 'आशङ्का' [का सङ्केत करते हैं]—

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द्वेपादे: सद्गुरूपक्षान्तरस्था या दोपदर्शिनी । श्रादिशब्दादापराध-गर्व-परसौभाग्य-प्रश्रवर्ग-विद्या-शीलादर्शानुदिमह: । सद्गुप्ता ज्ञान-क्रियादयो विशिष्टधर्मी। एपा च दोपान् वच्यक्त्वादीनसतः सतो वा दर्शयति। उपलच्यपात्रं श्रू मंग-श्रवण्णा-गुप्तानिहव-मन्यु-क्रोधाद्योऽनुभावा गृह्यन्त इति ।

(६) श्रथ मद:- द्वेपादि के कारन [किसी दूसरे के] सद्गुरुओं को सहन न कर सकना 'प्रसूया' कहलाता है और यह [सदा दूसरेके] दोपोंको देखने वाली होती है । श्रादि शब्द से अपराध, गर्व, दूसरोंके सौभाग्य, या विद्या, या शीलके दर्शानका प्रहरए होता है । सद्गुप्ता श्रर्थात् ज्ञान, क्रिया श्रादि विशिष्ट धर्म । यह [प्रसूया] विद्वान या श्रविद्वान दोनोंको देखने वाली होती है । [दोपदर्शिनी पदके] उपलच्य रूप होने से श्रभिमान, गुप्तोंका द्विपाना, मन्यु तथा क्रोध, श्रादि [अनूयाके] अनुभवों का भी प्रहरए होता है ।

ज्येष्टादे मुन्मदो मद्याद्, निद्रा-हास्याद्रु कृतं रमाद् ज्येष्ट उत्तमः । श्रादिशब्दादान्तर्मध्यमाधमौ गृह्यते । निद्रया रिमत-मद्गुरास्यराग-रोमहरप-रीपद्र याकुलवचन-सुकुमारगत्यादय:, हास्येन स्खलन-चूर्णन-चाहुप्र सन-कुटिल-गमनादय:, श्रश्रुषा च निप्ठीवन-जिह्वास्खलन-स्मृतिनाश-मतिर्भ्र श-छोर्दित-दिक्का-कफादयो गृह्यन्ते । 'क्रमात्' इति उत्तमादौ यथासंख्यं निद्रादियोगानुभावा: । नाट्ये च रचयन्नानिमित्तमापातनरपि क्वचिदभिनीयते । तत्र च मदो व्यभिचारी सम्भवति । यत्र पुन: पात्रं पीतमद्यमेव प्रविशति, तस्य त्रासादिना मदोऽपनेयोऽन्यथा कार्योऽन्याधात: स्यादिति ॥ [३०] १३२२ ॥

(६) श्रथ मद व्यभिचारिभावका लचरण करते हैं— ज्येष्ट आदि [अथवा उत्तम, मध्यम या अधम प्रादि] में मद-मद्य [अथवा निद्रा, हास्य तथा रोदन] को उत्पन्न करनेवाला श्रानन्द 'मद' कहलाता है ॥[३०]१३२२॥ निद्रा पदसे मुसकराहट, चेहरपर हल्की लातिमा, रोमांच हो जाना, श्रत-व्यस्त वचन ग्रोर सुकुमार गति श्रादि, 'हास्य' पदसे गिरना चक्कर खाना, हाय दैले हो जाना ग्रोर लडख-डाना श्रादि, तथा 'प्रथ्रु' पदसे यूंकना, जीभ चटकारना, स्मृतिनाश, मतिर्भ्र श, वमन, हिचकी, श्रफ श्रादिका प्रहरए भी होता है । 'रमाद्' इससे यह प्रभिप्राय है कि उत्तम श्रादि में क्रमदत: निद्रा श्रादि प्रनुभाव होते हैं । [प्रर्थात् मदसे उत्तममें निद्रा, मध्यममें हास्य तथा अधममें रोदन होता है] । स्वामिके मनोरंजनके लिए कभी मद्यपानका भी ग्रभिनय किया जाता है । उनमें मद व्यभिचारिभाव होता है । जो पात्र मद्यपान किए हुए हो श्रभिनेय करने के लिए भाता है उसकी मद तथा व्यादि द्वारा दूर कर देना चाहिऐ नहीं तो [ध्रुवमानय] कार्य में विघ्न पड़ेगा ॥ [३०] १३२२ ॥

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श्रमो रसादिभिः सादः स्वेद-श्वासादिकरराग् । द्वितीयादिशब्दानुसुखविकूजन-विजृम्भणादि-श्रृंगारहास्य-नृत्यपदोत्थेपादेरनुभावस्य प्रहृद् इति ॥

(व) प्रच श्रमः—रमण करते प्रादुर्भावको कारण उत्पन्न चकावट ‘श्रम’ पहचाना है । प्रोर वह स्वेद तथा श्वासादिका कारण होता है । ‘रसादिमें’ ‘प्रादि’ शब्‍दसे मार्गंगामन् प्रोर व्यापक प्रादि विभागोंका पहरण होता है । ‘सादः’ पर्याप्तं भारोरदिका शोपः । [श्वासादिकरराग् में प्राए हुए] दूसरे ‘राग’ शब्‍दसे तिरकुच्‍ना, जम्‍माई, मद्धोंकी मलिनता, घोरेघोर पलट उठाना प्रादि धनुभावोंका प्रहृण होता है ।

ग्राधिश्विन्ता प्रियानाप्तेः शून्यता-श्वास-कायंस्युकृं श्राधिमोनसौ पीडा । प्रियस्येहस्यग्राप्तिः श्रप्रियामाप्तिर्यं प्रियानाप्तिः । शून्यता विरलेन्द्रियता । उपलच्यगुत्वादेकाम्रस्थिच्च समृद्धादयोडन्यनुभावा इति ॥ [३९] १३३ ॥

(ख) प्रच चिन्ता [नपुंसक द्वभिचारिभावरका लक्षण करते हैं]—इधर यस्तुकी प्राप्ति न होने [पपत्ना पतिनिष्ठो प्राप्त होने] से उत्पन्न मानसिको ‘चिन्ता’ कह्‌ते हैं । वह इन्द्रियोंकी विकलता, श्वास जोर शून्यता प्रादिको जननो होती है । [३९] १३३ ॥ ‘ग्राधिम्’ पर्याप्तं मानसिक पौडा । प्रिप्र पर्याप्त इधरस्य प्रभाप्ति प्रस्या प्रियस्यो प्राप्ति सखएमृत होनेसे वह उससे टटको लगाना, याद च्राना प्रादि धनुभावों‍को मो पहृण्‌ होता है ॥ [३९] १३३ ॥

चापलं साहसं राग-द्वेषौ चादे: स्वैरितादिमत् । साहसमविमृश्यकारिता । श्रादिशब्दाज्जाड्यादेरहः: । स्वैरितवं स्वच्छन्द-चारः । श्रादिशब्दाद्वाक्-चापल्य-तर्जन-क्रोध-निन्दादेरनुभावस्य प्रहृद् इति ।

(ग) प्रच चापलम् [नपुंसक द्वभिचारिभावरका त्‌यरूप करते हैं]—रागद्वेषादि‌के [प्रतिरेकेने] व्‍नराल पिना दिक्‍षानो जो वायं वरने सगमा है वह [वकिृदृपचारिता वप् साहस] ‘चपनता’ क‌हताता है । प्रोर वह स्वैरपचारिता पारित्रो जननो होतेो है । ‘साहस’ शब्‍दत्‌ जिन्‍ मोसे-जापमें वलमू क‌र्ता । [परेसे] ‘पादि’ शब्‍दसे जडो‌ता शादि‍से भरनूा होता है । स्वच्‍छन्द प्रचाररत ‘स्वैर्तिता’ है । [पतोरे] ‘पादि’ शब्‍दसे व‌ठोर प्रादिरा भरनूा होता है ।

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ग्रावेगः सङ्घ्रमोदतक्यात् विकर्ताजडू-मनो-गिराम् ।

(१०) ग्रथ ग्रावेग [रूप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—[सूत्र १८२]—ग्रावेगः सङ्घ्रमोदतक्यात् विकर्ताजडू-मनो-गिराम् ॥ [३२] १३४ ॥ सम्भ्रमः सञ्चोभः । श्रतकयं श्राचिन्तितोपनतिमिष्टमनिष्टं वा । तत्रेष्टं देवता-गुरु-मान्य-चललाभ-सम्भृत्याशा-इष्टप्राप्तौ । श्रनिष्टनिभकस्मात्प्राप्तौ-घात-चर्ष-कड्वर-चोर-सर्पामनोज्झाश्रवादर्शादौ । तत्राभ्युस्थान-पुलकालीङ्गनवस्तादिप्रदानदयः प्रिया:, सर्वाङ्गसस्ततामुदवैवर्ण्यैष्यं-परिढौभाव-प्रहावन-श्राकुलनेत्रता- त्वरितापसरणं - परचादव-लोकन-शस्त्रादिग्रहणाद्-उचैःपतन-कम्प-स्खेद-स्तम्भादयो श्रप्रियाश्चाङ्गिका । हृदयं-विस्मयाद्-दयः प्रिया:, शङ्का-विपाद-भयादयोऽप्रियाश्च मानसाः । स्मृति-चाछुकाराशंसावाक्याद्-दयः प्रिया:, क्रन्दन-परिदेवन-श्रसम्भ्रान्तध्वनिवचनादयश्चाप्रिया याचिका विकारा यथायोगं प्रियाप्रियात्कयैवस्तुजावेगस्यानुभावा: । सर्वेष्वप्येते विकारा उत्तमस्य स्थेयाजु-विद्धा:, नीचस्य तु चापलानुविद्धा इति ॥ [३२] १३४ ॥

प्रतिभानं मति: शास्त्र-तर्काद् श्रांतिच्छेदादिकृत् ।

(११) ग्रथ मति [रूप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—[सूत्र १८३]—प्रतिभानं मति: शास्त्र-तर्काद् श्रांतिच्छेदादिकृत् । वचन, मार-पीट करने श्रोर वध-बन्धन श्रादिका प्रहार होता है । (१०) ग्रथ ग्रावेग [रूप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—[सूत्र १८२]—ग्रकस्मात् उपस्थित हो जाने वाले [इष्ट या श्रनिष्ट] से उत्पन्न क्रोध 'ग्रावेग' कहलाता है । ग्रोर क्षोभ, मन तथा वाग्भोंमें विकारका जनक होता है । [३२]१३४ 'सम्भ्रम' श्रर्थात् संक्षोभ । 'प्रतवयं' श्रर्थात् जिसकी सोचा भी नहीं था इस प्रकारके इष्ट या ग्रनिष्टका प्रकस्मात् उपस्थित हो जाता । उसमें [प्रतवर्गोंपनत] 'इष्ट' से देवता, गुरु, मान्य, प्रिय श्रथवा सम्पत्तिकी प्राप्तिका सुनना श्रादि [ग्रुहीत होता है] । 'ग्रनिष्ट'से प्राग लग जाना, भूकम्प श्रादिका उत्पात, ग्रांधी-पानो, हाहा:, चोर, सॉप ग्रोर श्रप्रत्यचिकार दृष्टिका [प्रसिद्धकार दृश्यका] देखना श्रादि [ग्रुहीत होता है] । उनमें भी श्राभ्युत्थान रोमाञ्च, ग्रालिङ्गन ग्रोर वस्त्र-प्रदान श्रादि प्रिय, ग्रोर सारे ग्रङ्गोंका स्तम्भित होना, मुंह वोलना हो जाना, पिण्डीभाव, दोड़ना, नेत्रोंमें घबराहट देखना, जल्दीसे हट जाना, लोट-लोटकर पीटे देखना, शस्त्रादि उठाना ग्रथिदोपर गिर जाना, कम्पन, स्खेद ग्रोर हारोकी निश्चित्यता श्रादि श्रप्रिय ग्रङ्गिक [ग्रनुभाव] होते हैं । हृदय-विस्मय श्रादि प्रिय, शङ्का, विपाद, भय श्रादि श्रप्रिय मानसिक [ग्रनुभव] होते हैं । प्रशंसा, चापलूसी श्रुभगाकाङ्क्षाके वावय ग्रादि प्रिय, तथा ग्रोर श्रासम्बद्ध प्रलाप करना श्रादि वाचिक विकार, यथायोग्य प्रिय-ग्रप्रिय हप [प्रतवर्गों रोन-विलाप करना श्रर्थात्] द्रकस्मात् उपस्थित होने वाले वस्तुनोंसे उत्पन्न ग्रावेगके ग्रनुभाव होते हैं । ये सभी विकार उत्तम पुरुषोंमें धैर्यसे युक्त ग्रोर नीच [पात्रों] मे चपलतासे युक्त होते रहते हैं ॥ [३२] १३४ ॥ (११) ग्रथ मति [रूप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—[सूत्र १८३]—शास्त्र [के चिन्तन] तथा तर्कसे उत्पन्न होने वाली नयनवोंमें चञ्चलप्रभा 'मति' कहलाती है । ग्रोर वहु श्रुतमोच्छेदन श्रादिको जननो होती है ।

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नवनयोल्लेगमशालिनी प्रज्ञा प्रतिभानम् । शास्त्रं शास्त्रार्थविपयं चिन्तनम् । तर्को विधि-निपेधविषयौ सम्मवानाप्रत्ययौ ग्रहन्य-अत्यतिरेकप्रत्ययौ वा । भ्रान्ति-संशयो विपर्ययो वा ! श्रादिशब्दादुपदेशादिमृद्र इति ॥

[सूत्र १८३]—दोपेष्योऽस्मिन्—मतिर्खलेपो व्याधि: स्तनित-कम्पवान् । दोषा: कषायात्-पित्त-स्न्निपातादय: । स्तनितमाततंस्वर । उपलसदृशान्मुगशोभ-निस्तरङ्गावदन-शीतामिलाप-विचित्रांगतां-संस्तापान्तयोऽप्युभाया [३३] १३४ ॥

(१३) ग्रंथ मृति: -- [सूत्र १८४]—दृष्टाभास: स्मृतिस्तुल्यहृदयादीयादेभ्रं न्नततिऋपा । दृष्टाभास: पूर्वं हृश्यमिति ज्ञानम् । तुल्यकृति । सदृशादर्शनम् । श्रादिशब्दानं मदश्रयणं-चिन्ता-संस्कार-रात्रिप्रचारद्भार्गान्तरोन्ट्रदृश् - प्रङ्गधात्-पुनःपुनः परिस्मरण-पर्यं दर्शान्तरप्रसङ्गादेविंभावस्य ग्रह: । अत्र न्तरेऽर्थे उभयोरुदयः स्मृत्य । उपलदृशान्तर-करण-कल्पना-ध्वनोरनादेशचिन्तानभ्यास्य क्रिया निपत्तिरयं स्या:, मा तथेति ॥

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श्रथ वृत्तिः — । [सूत्र १८६]—वृत्तिनिष्ठलाभादः सन्तुष्टिदेहपुष्टिकृत् ॥ [३४]

ज्ञाने विवेकज्ञानं बाहुश्रुत्यं वा । इष्टस्येप्सितस्य लाभः प्राप्तिः । आदिशब्दात् शौचादयः क्रियाः नेन्द्रियैर्निर्वर्त्यनिर्वर्त्यशक्त्यादिविभाव्यस्य ग्रहः । नेह्दपुष्टिप्रहेलनं गतानुगतचिन्तादीनामनुभावानामिति ॥ [३४] १३६ ॥

(१५) श्रथामर्षः — [सूत्र १८७]—क्षेपादः प्रतिकारेच्छाजामपोदस्मिन् कम्पनादयः । चेपस्तरस्कारः । श्रादिशब्दादपमानादेरविभावस्य ग्रहः । श्रपकारिषि स्वयमपकरषाभिलाषः प्रतिकारेच्छा । परस्यापकाराभावेऽपि परार्थकर्षाभिप्रायरूपः क्रोध इत्यंगोर्मेदः । श्रस्मिन्नमर्षे । श्रादिशब्दादघोमुखवचनतनप्रवेदोत्साहध्यानोपायनवेषातर्जनताडनादीनामनुभावानां ग्रह इति ॥

(१६) श्रथ मरषाम्— [सूत्र १८८]—स्वाध्युद्भवेन रुषाकूल्यो मरषो विकलानन्द्रथम् ॥ [३५]

१३७ ॥ (१४) प्रवृत्त [हप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]— [सूत्र १४६]—जानं प्रयथा इष्टप्राप्तौ श्रादिसे उपपन्न सन्तोष 'वृत्ति' है । और वह सारे शरीर की पुष्टि आदिका करने वाला होता है । ज्ञाने श्रर्थात् विवेकज्ञान श्रथवा बहुश्रुतता । इष्ट श्रर्थात् मनचाहो वस्तुकी सार्थ प्राप्त होना । श्रादि शब्दसे शौचादि क्रियाओं [विभाव] वा ग्रहण होता है । देहपुष्टि शब्द, नीतो वातकका शोक न करने श्रादि ग्रनुभावोंका भी उल्लेख है ॥ [३४] १३६ ॥ (१५) प्रव ग्रामर्ष [हप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]— [सूत्र १४७]—तिरस्कार श्रादिके कारण उत्पन्न बल्लता सेनेहो इच्द्रा 'ग्रामर्ष' है । इसमे कम्पन श्रादि [श्रनुभाव] होते हैं । क्षेप श्रर्थात् तिरस्कार । श्रादि शब्दसे श्रपमानादि विभावोंका ग्रहण होता है । श्रप-कारोके प्रति स्वयम् उसका श्रपकार करनेकी इच्द्रा 'प्रतिकारेच्छा' कहलाती है । दूसरेके द्वारा श्रपकार न किए जानेपर भी दोसरेकी हानि पहुॅचानेके श्रभिप्रायकोध' कहलाता है । यह इन उत्साह, ध्यान, उपाय खोजने, फटकारने, पीटने श्रादि ग्रनुभावोंका भी ग्रहण होता है । (१६) प्रव मरष [हप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]— [सूत्र १४८]—स्वाध्युद्भवसे श्रादिके कारण मरनेकी इच्द्दा करमा 'मरष' कहलाता है [प्रर्थात् यहां मरष शब्दसे प्राप्त निकल जाने हप वास्तविक मरनाका प्रहण नहीं होता है । क्योकि नाटकोंमे वास्तविक मरनाका दिखलाना निपिद्ध माना गया है ] । श्रोर वह इन्द्रियको विकल करने वाला होता है । [३५] १३७ ।

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व्याध्यादयो वात-पित्त-श्लेष्मवैषम्य-ज्वर-विच्चार्चिका-पिटकादयः। शाद्वात् शास्त्राभियात-विप्पान - श्राहिदंश-रवापद-नृज- सुरगाङ्गाक्रमशा-वाह्ननोच्चस्थान- पतनादेर्विभावास्य ग्रहः॥

स्वाधि शर्य्यात् वात, पित्त कफके वैषम्यसे उत्पन्न ज्वर विचार्चका खाज श्रोद फोड़ा-फुन्सी प्रादि । श्रादि शब्दसे शस्त्रप्रहार, विप्पान, सांपके काटने, हिल जन्तुओं, हरपरे, घोड़े प्रादिके श्राश्रय, सवारो अथवा कञ्चे स्वामित्तसे गिरने प्रादि विभावोंका पहचप होता है। यास्तवमें तो मरनेकी इच्छा भी कोई नहीं करता है इसलिये मृत्युुसंकल्प पदसे यहाँ, यह भावत्ति ऐसो है जिससार प्रतिकार् प्रसंभव है इसलिये प्रवरय हो मर जाऊँगा इस प्रकार निरचय [मृत्युुसकल्प पदसे गृहीत होता है]। विद्वल प्रय्यांत् अपने विपयपो पहलू करणेमे प्रसभपं हृद्र्यांि जिसमें हो जाती हैं [वह मृत्युसंकल्प विद्वलेनिद्रिय मरणार रूप हृपा]। उसके उपलत्ताप हप होनेसे विद्वल चेष्टाओ, हिचकरे, दचात्, परिजनोंकि न रेवनें, धरपटत् शबदोंका उच्च्चारण, चेहरेको बोवनत्ता, संहत्ता पृथिवीपर गिर पड़ने, वोंदने सगानें, फड़कने, क्रूंदना, फेन ढालने, जड़ता, हार्य क्रोध श्रादिक दूषणों-फूटनेकि चिन्तास न हतके म्रप्तिके संचालन श्रादि मनुभावोंका ग्रहण होता है। प्रार्च वन्द हो जाना रूप [वास्तविक] मरप्प तो नाटकमें नहीं दिसलानार चरिताए । इसलिये उसके विभाव श्रोद मनुभावोंकि सवहपोंको यहाँ प्रतिपादन नहीं किया है॥

(९७) अथ मोहः— [सूत्र १८६]—प्रचंतल्यं प्रहारादेमोंहो,व्याधिर्व्वारानादयः। 'प्रचेतनस्य' प्रयुक्तिनियुक्तिज्ञानाभावो नतु मर्वेथा गनचेतनस्वम्। 'प्रहारो' ममे-प्रयमिप्यात्। श्यादिशब्दान् तीनवेदना-श्रशक्यप्रतिकार-चौर-राज-श्रादि शाद्वात् श्रागन्त-देशाच्छुत्व-श्रग्न्युुदकाहुपघात-वैरिदर्शन-श्रवसादेदिविभावम्य ग्रहः। श्रत्र मोहः॥

(९७) अथ मोह [स्व प्रयिचारिभाव वा सत्तेज करते हैं]—प्रहार आदिसे उत्पन्न 'मोह' महसासा है। इसमें चेतर माना प्रादि होता है। प्रचंतनस्यका प्रय [जतंद्ध व प्रयतनेध्ये] प्रवृत्ति नियुक्तिके मानश ना हतना है। मचंया धनन्वयका प्रभाव [प्रचेतन नारदो विवक्षित नहीं है]। प्रहार प्रय्यांत् ममर्थसपर प्राप्त । श्रादिशब्दसे तीन वेदनां, जिनका प्रतिकार् श्रमंभव न हो उस प्रहारने घोर, राजा, मरण, ध्याम्र प्रादिक श्रागन्त, देशाच्छुत्व, श्रग्न्युुदकाहुपघात, वैरिदर्शन श्रोदके दिविभाव ग्रहण होता है। इसमें चेत्पान् मोहे । प्रादि शादसे चेतर साते

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इन्द्रियैः स्पर्शादीनां न तु मनः, तस्य निद्रायामपि व्यापारात् । 'श्रद्याप्रति'र्विपयसुखानुभावरति । आरद्रशृङ्गारालस्य-दौर्बल्यदौर्मात्राजागर्या-अतथाहारमेद-श्रम-क्लम-चिन्ता-रायालतादर्विभावस्य ग्रहः । मूर्द्धकमपनेन जृम्भण-यदनविकास-निःश्वास-नेत्रचूषणेन-श्रृङ्गभङ्ग-निद्राविमीलन-मत्क्रियांमोहदयोनुभावा उपलद्यन्ते इति ॥

(१६) अथ निद्रा—[स्वप्नाभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—यकावट आदि से उत्पन्न इन्द्रियोंके व्यापारका अभाव 'निद्रा' कहलाता है । उससे सिर हिलने लगता है । इन्द्रियोंसे र्वच्चा [जानने-निद्रायोंका] हो प्रभाव करना चाहिए । मनका नहों । वगोंकि उसका व्यापार तो निद्राकालमें भी होता रहता है । व्यापारका अभाव पर्याप्त [इन्द्रियोंका] विपयोंके प्रहणसे हट जाना । प्रातः हदयसे ग्रालस्य, दोपहर, रातमें जगने, ग्रधिक भोजन, सदके सेवन, परिश्रम, यकावट, चिन्ता, सोनेके स्वभाव ग्रादि [निद्राके विभागों अथवा] कारणोंका प्रभाव होना है । सिर हिलानेसे जम्हाई ग्राने, लम्बी निःस्वास छोड़ेने, श्राँखें घुमाने, अंगड़ाई ग्राने, ग्राँखें भपकने और सारी क्रियाग्रोंको भूत जाने ग्रादि अनुभवोंका ग्रहण होता है ॥

'सुप्तं निद्राप्रकरोद्यत्र स्वप्नायित-खमोहनं । 'प्रकृतो' गाढतमावस्था । स्वप्नमय तात्कालिकविपयज्ञानस्या श्रायितं प्रतीति-र्यतस्तत् । 'स्वप्नायितं' प्रलापितम् । स्वप्नां निद्रायां मनसोऽनवधानमस्ति' । श्रत्र तु तद्विप मोहनमुपरुध्यत इति मेदः । विभावस्तु निद्रालस्यादि ग्राह्यः ॥

(१६) अथ सुप्त [नाम स्वप्नाभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—प्रबल निद्राका ग्रहण 'सुप्त' [नामक स्वप्नाभिचारिभाव] कहलाता है । इस में वरणां [स्वप्नायित] और मन सहित सब इन्द्रियोंके विपयसे प्रतम्तल वमुख्य [मोहन] हो जाता है । [निद्राका] प्रकटं प्रयाल्त गाढतम अवस्था । स्वप्नकी प्रथ्यता उस समय [स्वप्नमें होने वाले] जानकी 'ग्रायिते' अर्थात् प्रतीति जिसमें हो उस वरणानिको 'स्वप्नायित' कहते हैं । 'स्व' श्रर्थात् मनके सहित [पाँचों कुल मिलाकर] दयों इन्द्रियोंका 'मोहन' श्रर्थात् विपयोंसे प्रतम्तल विमुगस्ता । निद्रामें मनकी वृत्ति रहती है यहाँ [सुप्तमें] तो वह भी बिल्कुल निठ्ठ हो जाती है । यह [निद्रा और सुप्त इन दोनोंका] मेद है । निद्रामें कहे हुए विभाव ही यहाँ [सुप्तके भी] कारण सममने चाहिए ॥

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दुष्टेऽपराधानैर्गृहीतस्यं श्रौप्रचं वन्ध-बन्धादिभिः ॥ [३७] १३९ ॥

'दुष्टे' हि द्रव्याद्रव्यादितव-यश्वक्रत्वादियुक्ते । श्रपचापराधानकृत्यकारित्वाद् द्वौर्मुख्य-चौयादिकृतपापद् विभावाच्च यद् राजादेः नैष्कं एवं निर्दयत्वं तदौप्रचम् । तस्य च वन्धन-बन्धास्याम् । श्रादिशब्दान् ताडन-निर्मेथन-म्वेदन-शिरः-कम्पादिभिरतुभावैः रभनेतव्यमिति ॥ [३७] १३६ ॥

हर्पः प्रसक्तिरित्यापेक्षेत्र स्वेदाद्भु-नदनदात् । 'प्रसक्तिः' श्रचेतोविभ्रम् । 'हर्ष' त्रियमंयोगामत्रियमंयोगानिर्वृति-देश-गुरु-राज-भर्तृ प्रसाद-भोजनानुबन्धाद् धन-पुत्रादिलाभ-पुत्रादिगत-हर्पं विपयोः भोगैरसम्प्राप्त । 'नदनदे' वाप्पद्वयेष्टस्य चान् । उपलब्धस्याम् पुलकः प्रियमाप्ता नेत्रमुग्रमप्रमादैर-सदेह- सुभावस्य हर्ष इति ।

हर्ष प्रसक्ति के कारण स्वेद आना, नेत्रों से जल आना । 'प्रसक्ति' चित्त का विभ्रम होना । 'हर्ष' प्रिय के मिलने से, अप्रिय के वियोग से निवृत्ति होने पर, देश, गुरु, राजा, भर्तृ के प्रसाद से, भोजन की प्राप्ति से, धन-पुत्र आदि के लाभ से, पुत्र आदि के प्रति हर्ष होना, विपरीत भोगों से अप्राप्त होना । 'नदनदे' आँखों में आँसू आना । उपलब्धस्याम् पुलक प्रिय की प्राप्ति होना, नेत्र मुग्ध होना, प्रमाद न होना, संदेह न होना, हर्ष का सुभाव होना ।

विवादस्तान्तरितस्ययानाप्तोनिदवासचिन्तनैः ॥ [३७] १४० ॥

(२०) पद उप्रता [यह व्यभिचारिभाव का लक्षण करते हैं]—वपराध के कारण दुष्ट पुरुष के प्रति यद् द्वेषादिक द्वारा जो निर्दयता [या प्रकारण है] वह 'उग्रता' कहलाती है। [३७] १३६ । दुष्ट अपराध करने वाले, भुट बोलने वाले, यद्वा धोखा देने वाले [के प्रति] अपराध के कारण द्वेषादिक द्वारा जो निर्दयता वारणों से जो रजा आदि को निठुरता पर्यन्त् निर्दयता, उससे 'उग्र' पद् जाता है। उमका श्रभिप्रय यद् तथा मन्त्रने द्वारा किया जाता है। यदि द्रवते मारने मटकाने पगों पर मोर सिर हिलाने घनुभावों से द्रारा उमका श्रभिप्रय होता है ॥ [३७] १३६ ॥

दैन्यं प्रासिन्में वार्तम [मनसः] प्रमादस्त ह्वयं रोदित । एष मे स्वेद-, वमथु-, राजा प्रमदा स्वेद्योऽत्र पार्श्वे, मोक्षणे, च सम्प्राप्तौ, वन, वन, वुधाऽऽर्थे प्रातः, पुष्टाऽऽर्थे म्रदनद् विपरीते उपनोगे धोः उत्कट पादि [या प्रयम् योनि ?] । पत्युघोने तया भयद् मुखको वान्तो 'नदनदे' वमथामो हि । उमते उनत्कण्ठ ह्वप रोदने रोमच, श्विप भावत्र, स्तनो चोर गुल्मके प्रगत्नया पार्श्वे पुभावोऽस्य पच मों योनि है ।

(२१) पद 'दैन्यं' [व्यभिचारिभाव का सदलय करते हैं]—दैन्यो प्रासिन्में हार्तम [मनसः] प्रमादस्त ह्वयं रोदित है । इसमे स्वेद, वमथु, राजा प्रमदा स्वेद्योऽत्र पार्श्वे, मोक्षणे, च सम्प्राप्तौ, वन, वन, वुधाऽऽर्थे प्रातः, पुष्टाऽऽर्थे म्रदनद् विपरीते उपनोगे धोः उत्कट पादि । पत्युघोने तया भयद् मुखको वान्तो 'नदनदे' वमथामो हि । उमते उनत्कण्ठ ह्वप रोदने रोमच, श्विप भावत्र, स्तनो चोर गुल्मके प्रगत्नया पार्श्वे पुभावोऽस्य पच मों योनि है ।

नि र्वाण मया विवादेन [विमुख] धनुस्मार्त 'विपाद' यथामति ।

(२२) पद विवाद [का समाधान करते हैं]—नि र्वाण मया विवादेन [विमुख] धनुस्मार्त 'विपाद' यथामति ।

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इन्द्रियाव्यापृतिनिद्रा, त्वेदादेशं दृङ्कम्पनी ॥

इन्द्र्रियाभि: म्पर्शानादीनि, न तु मनः, तस्य निद्रायामपि व्यापारात् । ‘ग्रथ्या-प्रति’ विपयग्रहणोपरति । श्रादेशादनादारस्य-श्रौत्सल्य-सात्निजागरणस्य अत्याहार-मद-श्रम-स्वप्नम्-चिन्ता-शयालतादेरिवभावस्य ग्रहः । मूर्छा-ड्कम्पनेन जृम्भा-ददनापिकास-नि: श्वास-नेत्रवूरणेन-अतिभयात्-श्रान्तिमीलन- सर्वक्रियासम्मोहादयोद्भवा उपलद्यन्तेति ॥

सुप्तं निद्राप्रकर्पोडत्र स्वप्नायित-समोहने । ‘प्रकर्पो’ गाढतमावस्था । म्रपनस्य तात्कालिकाविपयज्ञानमपि ग्राह्यित प्रतोति-यं तस्मात् ‘स्वप्नायितं’ प्रलो(पितम् । स्वाना मनः पठानामिन्द्रियार्थां मोहनमतिशयेन रिपयवैमुख्यम् । निद्राया मनसोऽवधानमत्ति’ । अत्र तु तदप मनागुपरुध्यत इति भेदः । विभावैर निद्राग्रान्तौ ग्राह्यौ भावा ॥

(१६) अथ सुप्तं--[नाम व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—प्रवल निद्राका प्राना ‘सुप्त’ [नामक व्यभिचारिभाव] कहलाता है । इस में ध्यरौना [स्वप्नायित] और गहरी निद्रा [समोहन] हो जाता है । ‘प्रकर्ष’ अत्यन्त गाढ़ अवस्था । म्रपनस्य तात्कालिक विषय ज्ञानमपि ग्राह्यितप्रतीति-यंतस्मात् स्वप्नायितं प्रलोपितम् । स्वप्नायितम् = स्वप्न में होने वाले । जानकी ‘ग्राह्यित’ प्रयोत् प्रतीति जिसमें हो उस वरौना को ‘स्वप्नायित’ कहते हैं । ‘स्व’ प्रयोत् मनके सहित [पाँचों कुल मिलाकर] छहो इन्द्रियों का ‘मोहन’ अर्थात् विपयों से विमुखता । निद्रायै मनसोऽवधानमत्ति’ । अत्र तु तदपि मनागुपरुध्यत इति भेदः । विभावैर निद्राग्रान्तौ ग्राह्यौ भावा ॥

(१६) अथ निद्रा [नाम व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—धकावट आदि से उत्पन्न इन्द्रियोंके व्यापाररम्भ प्रभाव ‘निद्रा’ कहुलाता है । उसमें सिर हिलने लगता है । इन्द्रियोंसे स्वस्र प्राणि [जानेइन्द्रियोंका ही ग्रहण करना चाहिए ] मनका नहीं । क्योंकि उसका व्यापार तो निद्राकालमें भी होता रहता है । व्यापारका प्रभाव इन्द्रियोंका [इन्द्रियोंका] विपयोंके ग्रहणसे हट जाना । श्रादि द्वारद्वसे ग्रातस्य, श्रोव्लय, रातमें जगने, अधिक भोजन, मदके सेवन, परिश्रम, यकावट, चिन्ता, सोनेके स्वभाव आदि [निद्राके विभावो अर्थात्] कारणोंका ग्रहण होता है । सिर हिलानेसे जडता प्राने, लम्बी नि:श्वास छोड़ने, आँखें पुमाने, अमदाई आने, आँखें अघपने और सारी क्रियाओंको भूल जाने आदि अनुभावा-का ग्रहण होता है ॥

(१६) अथ सुप्त [नाम व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]--प्रवल निद्राका प्राना ‘सुप्त’ [नामक व्यभिचारिभाव] कहलाता है । इस में ध्यरौना [स्वप्नायित] और गहरी निद्रा [समोहन] हो जाता है । [निद्राके] प्रकपं [अत्यन्त] गाढतम अवस्या । स्वप्नकी प्रथोत् उस समय [स्वप्नमें होने वाले] जानकी ‘ग्राह्यित’ प्रयोत् प्रतीति जिसमें हो उस वरौनें को ‘स्वप्नायित’ कहते हैं । ‘स्व’ प्रयोत् मनके सहित [पाँचों कुल मिलाकर] छहो इन्द्रियों का ‘मोहन’ अर्थात् विपयों से विमुलता । निद्रायै मनसोऽवधानमत्ति’ । यहाँ [सुप्ति में] तो वह भी बिल्कुल निरुद्ध हो जाती है । यह [निद्रा और सुप्ति इन दोनों का] भेद है : निद्रामे कहे द्वए विभाव हो यहाँ [सुप्ति में] भी कारण] समझने चाहिए ॥

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आपदो' दौर्गत्य-न्यक्कारादेः । स्वान्तनीचत्वं मनः कल्मष्यम् । कापथ्यं यदनवस्त्रमालिन्यादैश्चाशु लुभावैरभिनेतव्यंमिति ॥ [३६] १४९ ॥

[सूत्र २०७]—वीडारुताप-पर्वादिरधाष्टच" शास्त्रगोपकस्म । श्रकृत्यकरपादनु पश्यात् तापो मानमो विवेकः । गुरुम्मातापित्रादि । श्रादिशब्दान् प्रतिश्रातानिर्व्यूहेऽ-मुखदयतिक्रम-श्रवणज्ञान-ग्रामस्तवादिविंभावय भ्रहः । श्रध्यर्धं यमवैयात्यम् । गात्रगोपनेनोपलत्त्यपाद् श्रधोमुखैर्वचिन्तननगत्रनिम्तोदन-भूविलेकनवच्रांगुलीयस्पर्शनादेरनुभावस्य भ्रह इति ॥

॥ [४०] १४२ ॥ घोराच्चकितता त्रासः काय-सडू़ोच- कम्पते: ।

[सूत्र २०८]—घोराच्चकितता त्रासः काय-सडू़ोच-कम्पते: । 'घोर' भीप्सां निचिताशानिपात-मद्दामेभरवचनाद्-मद्दारोदितमुख-श्रवदर्शनादि । 'चकितता' उद्वेगकारी च मत्वकारः । स्वार्थसमभावनात् सत्त्वभ्रंशो भयमित्यनुयोगोमेंह । बहुवचनान् सम्भ्रमोमााञ्-मूर्छादि-नगद्गदवचनादिभिरच्यायमनुभावैरभिनी यते डति ॥

प्रापत्तिसे प्रथात् दुर्गति या वपमान ब्रादिके करूप, अपने मनकी नोचता पर्यात विकसता । ऋष्पसाता प्रथात् मुक्तिका काला पर जाना । श्रवगुणटन प्रथ्यात् सिर मौर नरोनमा डक सेना । महुवचनसे धारोर्का [जुति ब्रादि हप] सरकारखा प्रभाव, गौरवको भूलर देना मौर वस्रोंकी मलिनता पारदि अनुभावोके द्वारा उसका ध्यभिनय होता है ॥[३५]८१॥

(२५) प्रव श्रो [का तात्पया करते हैं]— [सूत्र २०७]—पश्चात्ताप प्रयवा माता-पिता प्रादि गुरुजनो [को उपसियत] के बारसा पछताका न करना 'व्रीडा' कहलाता है मोर उससे मुख धारोरादिको दियाता है । पतिचित बैरोक् करनेसे कारसा बोधिका होनेवाला ताप प्रयोतें मानसस्तान् [अनुताप बलताता है] । माता-पिता आदि गुरू है । प्रादि साबसे प्रतिमाको पूरा न मर सइने, गुरपो को मयोंदाका उल्लघन, धर्ममान घोर चपरिचय पारदि विभावोंका पहचाना होता है । मपार्तप्यं धर्मांत् उद्वेगतताका पभाव । मात्रगोपनके उपलत्त्याल होनेसे, उससे मिर भुकावर लोचने, नायून घवाने, भूमि कुरेदने, कपड़े या पगूंडो प्रादिके द्रने प्रादि धनुभावोंका पहचाना होता है ।

॥[४०]१४२॥

(२६) मय ग्रास [का निष्कर्ष करते हैं]— [सून २०८]—भयवर चिन्तनो देहस्कर श्चित हो जाना 'ग्रास' कहलाता है । नरोन मे शिलोने मोर घोर च्वानेके द्वारा [उसका ग्रभिनय किया जाता है] ॥[४०]८२॥ भयकर गर्जन, किन्तों गिरना, मरतामयवर दसद ग्रस्पन्न भोषणका प्रयोग होतांन पारदि 'घोर' पदने के जाते हैं । भयमेे उत्पन्न करनेवाला पारचयं 'चकित्ता' कहलाता है । जिस घोर देखनेसाइस् नाम होता है । घोर] वनचरा हनिक। मतभावनामा मानसिर वस्चर माता 'भय' होना है । मह भय घोर मागार मेद है । बहुवचनो सम्भ्रम, गेपाचं, मुच्र्चा,

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‘तान्ति’ रत्साहाकान्तश्चित्तसन्तापः । ‘इष्टं’ प्रारब्धनिवृदहृदये प्रतिदूल- त्वादि । तस्यानुप्तिरलाभो विपरीतलाभो वा । चिन्तनमुपायानाम् । चहुवचनान- सहायान्वेपथु-चैमनस्यादिर्मिः श्रध्यमोत्तमगतैर्मुखरशोप-निद्रा-ध्यान-जड- हारपारतेह्वादिभि- स्वधर्मगतैरुनुभावैर्विभननयता इति ॥ [३५] १४० ॥

(२३) ग्रथोनुवाद:— [सूत्र २०५]—मनोविप्लुतिरुन्मादो ग्राहदोपऱयुक्तकृत । विप्लुतिविसंस्थुलता, कयचिदग्र्यविश्रान्तिरारित यावत् । ग्रह-दोपौ ग्र्रपस्मारं व्याख्यातौ । ग्रयुक्तमनुचितं गीत-नृत्य-पटितोस्थित-शयित-प्रधावित-नदित-ग्राकुष्ट- श्रसम्वद्धप्रलापन - ग्रनिमित्तहसित-भस्मपांसुस्ववधूलन- निर्माणीय - वीरघटवकच्रशरावा- भरखोपभोगादि । ग्रयं चोत्स्मय वि- प्रलम्भे, श्रधमस्य करणो व्यभिचारी । ग्रपस्मारस्थु वीभत्स-भयानकयोः । म च मनोवैकल्यम्, ग्रयन्तु मनोज्ञवस्थितारिरित भेद इति ।

(३४) ग्रथ दैन्यम्— [सूत्र २०६]—ग्रापद: स्वान्तनोचत्वं दैन्यं कार्ण्यविरुण्ठने ॥ [३६] १४१ ॥

(२४) ग्रब दैन्य [नामक व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]— [सूत्र २०६]—ग्रापदियोक कारण मनकी विकलता ‘दैन्य’ कहलाता है । [निरेक्षो] कृशता ग्रोर दैन्यके द्वारा उसका ग्रभिनय किया जाता है ।

तान्ति श्रर्थात् प्रनुत्साहसे मुक्त चित्तका सन्ताप । इष्ट प्रय्थान्त प्रारब्ध किए हुए कार्यके समापिि भाग्यको ग्रप्रतिदूलता ग्रादि । उसका प्राप्त न होना ग्रथवा विपरीत [प्रत्यनिष्ट] को प्राप्ति । चिन्तन प्रय्थान्त उपायोंके चिन्तनद्वारा [जिसका ग्रभिनय होता है । ‘चिन्तने’: पदमें] बहुवचनके प्रयोगसे सहायकोंकी शोज ग्रोर बैनमस्य ग्रादि मध्यम तथा उत्तम पात्रगत [ग्रनुभावों के द्वारा तथा ग्रभिनयके द्वारा] ग्रोर मुखरशोप-निद्रा-ध्यान, जड-हारपारतेह्वादिभि- स्वधर्मगतैरुनुभावैर्विभननयता इति ॥ [३५] १४० ॥

(२३) ग्रब उन्मादका [लक्षण करते हैं]— [भूत-विश्रावादि हप] प्रह तथा [चात पित्तादि हप] दोषोंके कारणा मनका वपभ्रष्ट हो जाना ‘उन्माद’ कहलाता है ग्रोर उसमें ग्रनुचित कार्य करने लगाता है । [सूत्र २०५]—‘विप्लुति’ ग्रर्थान्त ग्रस्थिरता, कहीं भी चित्तका न लगना । ग्रह तथा दोप दोनोंकी व्याख्या प्रपस्मारमें को जा चुकी है । प्रमुक्त प्रय्थान्त ग्रनुचित गाना, नाचना, पढ्ना, उठना, भागना, रोना, चिल्लाना, ग्रसम्बद्ध वकवाद करना, बिना बातके हँसना, राख या धूल फेंकना, देवताओंकी वत्सलग्रों [निर्माणीय] पोपल ग्रादिके झुर्मुटोपर टाँगें हुए घडे, [वीरघट] करवाँ, सफोरे ग्रादि ग्रोर ग्राभरश्राविका उपभोगादि । यह [उन्माद] उत्तमवे विप्रलम्भने ग्रोर ग्रधमके कथनमें व्यभिचारिभाव होता है । ग्रोर ग्रपस्मार वीभत्स तथा भयानक रसोंमें [व्यभिचारिभाव] होता है । [यह उन्माद तथा ग्रपस्मारका एक भेद है । उनका दूसरा भेद यह भी है कि] वह [प्रत्यनिष्ट ग्रपस्मार] मनको विकलतामय होता है ग्रोर यह [उन्माद] मनकी ग्रस्थिरतास्प होता है यह इन [उन्माद तथा ग्रपस्मार] का [दूसरा] भेद है ।

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धाष्टर्यपदोर्विक्रियारोधोद्वहिस्थाद्यन्त क्रियांतरस्म ।

'धाष्टर्यन' प्रागल्भ्यम् । श्रादर्शान्ताद् भय-लज्जा-मौरव-कुटिलाशयस्यादेर्विभावस्य ग्रहृ । मयात्तुगतत्वव्यापनार्थं धाष्टर्यं प्रथममुपात्तम् । मभयादिरपि ह्यप्रगल्भो न शक्नोत्याकारं संवरितुम् । 'विक्रिया' भ्रूविकार - मुसरागादिका, तस्या रोधः संबरणम् । रोधकारकतयैवोपचाराद्विसतविशेपोडपि रोधः । न यदृश्या चित्तवृत्तिरिति प्रपोदरादित्वाद् 'ग्रहवहिस्था' । श्रथावहित्थायां प्रस्तुतक्रियातोडन्यकथनावलोकनकया-भङ्कृततन्थयैर्यादिकं क्रियांतरमिति ।

जाडयमिशादितः कार्याज्ञानं मौनानिमेपादिपः ।

ग्राभिमुख्य श्रोत्सुक्य पहुलाता है । स्मरसप इष्टव श्रभिप्रेत है । 'स्मरत्प्राधात' मे 'पार्थ' नादसे सुन्दर वस्तुके देखनेकी हृदय, प्रेम मोर लोभादि विभावों [कारणों] व प्रहप होता है । स्वराका प्रभिप्राय मन, वाणी तथा हारोर मोर हसितकी चेष्टता है । ग्रादि साव्वसे नामको भूल जाने, सम्वी दयास घेउने, ग्रसम्पद्ध वात करने, स्वेद, मोर हृदयको जलन ग्रादि अनुभावोंदो प्रहण होता है ।

स्थपता प्रादिसे उत्पन्न विभावरपो दिपानेके यत्न 'प्रवाहित्या' कहलाता है । इसमें [पदार्थ-विकृतिषो दिपानेके लिए] दूसरी क्रिया जो जाती है ।

स्थपता यर्मात् प्रागल्मता प्रादि दावतेसे भय, लज्जा, मौरव, कुडिलाभिप्राय ग्रादि कारकों [विभावों] व पहुली होती है । [ग्राधिक्यके] सबव घनुल्लूव होनेके कारण सबव पहले स्थपता या प्रहण किया है । सभव प्रादि द्यक्षित मो पद् प्रागल्म न हो तो व पारखको दिपानेमें समपं नहीं हो सकता । विक्रिया पर्याप्त मोहोका टेढ़ा होना या मुगता लास मादि हो जानां मादि, उसका रोप पर्यन्त दिपाना । [वाहर शिकारको] दिपानेसे मकारा होनेते उस प्रभिप्रायको 'चितवृत्ति-विशेपको मो 'रोप' कह सकते हैं । बाहर प्रकटानित म होने वाली चित्-वृत्ति 'न वहित्या' होनेते 'प्रवाहित्या' पहुताती रे [वह प्रवाहित्या पदवर निर्वचन है] 'प्रोदारादिगमां' पढित नियमसे इसकं सिद्ध होती है । इसमं चरमप्री प्रवाहित्याम प्रस्तुन क्रियात भिन्न पवन, प्रयत्नोन, मात समासत कर देना, मनावटी सिपरता दिम्सलाना मादि दूसरी क्रियाएँ जो जाती हैँ ।

जाडयमिशादितः कार्याज्ञानं मौनानिमेपादिपः ।

'जाडच' मिथादि [प्रज्ञान् इत्यादिपूर्वसहितं] प्रसन्नकायैः कारणैः मुन् गुलता 'बाह्य' पहुलाता है । मीन मोर टकटको सपाकर देखनेने द्वारा [उसका प्रभिनय क्रिया जाता है] ।

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वादो विप्रतिपत्तिमत्त्वात् । श्रादिमहत्त्वान् सन्देहवादकवलोद्भूतपचान्तनेतृत्वात्प्रत्यय: म तर्कः । श्रादिम्य श्रू-शिरोऽधिक् न्यादेर्नैतक इति ॥

(२५) श्रथ तर्कः— [सूत्र २०८]—एकसम्भावनं तर्को वादादेरड्‌नर्तकः । 'वादो' विप्रतिपत्तिमत्त्वात् । श्रादिमहत्त्वान् सन्देहवादकवलोद्भूतपचान्तनेतृत्वात्प्रत्यय: म तर्कः । श्रादिम्य श्रू-शिरोऽधिक् न्यादेर्नैतक इति ॥ [४९] १४३ ॥

प्रतिपन्याधिषवधेरैर्वो विद्यादेरनन्यरीढया ॥ [४९] १४३ ॥

(२५) श्रथ गवं.— [सूत्र २१०]—प्रतिपन्याधिषवधैर्वो विद्यादेरनन्यरीढया ॥ [४९] १४३ ॥ 'ग्राधिकर्यधी.' पटजुगुस्साक्रान्त म्रस्मिन् वहुमानः । श्रादिशब्दाज्जाति-कुल-लाभ-युद्धि-चलमभ्य-यौवने श्र्योन्देरविभाव्यम्य मह्‌ । 'रीढा' श्रवज्ञा । तया । उपलक्षणानि पारदप्य-ग्रसुया-ग्राधर्पणा-ग्रनत्तरडान - ग्रद्धालोकन- उपहासन - घलद्कारव्यत्यासादि-भिश्वानुभावैरभिनेतव्य इति ॥

इत्थं विशिष्टस्योत्त्सुक्यं स्मरस्याद्यात् त्वरादिमि: । मद्गदवचन श्रादिके द्वारा भो इस्तथा श्रभिनय किया जाता है ॥[४०]१४३॥

(२६) श्रथौत्सुक्यम— [सूत्र २११]—इत्थं विशिष्टस्योत्त्सुक्यं स्मरस्याद्यात् त्वरादिमि: । मद्गदवचन श्रादिके द्वारा भो इस्तथा श्रभिनय किया जाता है ॥[४०]१४३॥ (२७) प्रभव तर्क [व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]— [सूत्र २०८]—वाद श्रादिके द्वारा एक पक्षकी सम्भावना 'तर्क' कहलाता है । इससे श्रगोका नचाना [रप पतुभाव उत्र्पन्न होता है] : वाद प्रर्थात् सत्मेथेद [विप्रतिपत्ति] । इससे [तर्क होता है] । श्रादि शबदसे सन्देहके निवारक [प्रबल प्रमाण] के बलसे उत्पन्न द्वूसरे पक्षके श्रभावका ज्ञान ग्रोर विशेष प्रतीतिकी हच्‌या प्रादि विभावोसे कोइ एक पक्षकी सम्भावना, श्रप्रथात् यह बात ऐसी होनी चराहिए इस प्रकारको प्रतीति, वही 'तर्क' कहलाता है । प्रथ प्रर्थात् मौह, सिर या श्रगुलि श्रादिका नचाने वाला होता है ।

विद्यादि के कारन ग्रन्योफो श्रथज्ञा फरके ग्रपनेफो बढा समभनार 'गवं' कहलाता है । [४९] १४३ । 'ग्राधिकयर्धो' ग्रर्थात् [प्रन्यके प्रति] घृणापोके सहित ग्रपने ग्रप्रको बढा समभना । [विद्यादे. में प्रभुवत] श्रादिनरदसे जाति, कुल, लाभ, वृद्धि, [विसोको] चलमती यौवन, पारदप्य, ग्रसुया, रोष न जमाने [घदयस्] उत्तर न देने, [ग्रपने] ग्रोंको न देखने, [दूसरेfा] उपहास करने ग्रोर ग्रलकारोका भिन्न स्थानोपर प्रयोग करने श्रादि ग्रनुभावोके द्वारा उसका ग्रभिनय किया जाता है ॥ [४९] १४३ ॥

इत्सक स्मरस्याद्य कारन इत्तफे प्रति क्रोधतफ क्रादिसे ग्राभमुख प्रवृत होना 'ग्रोत्सुक्य' कहसाता है ।

(२६) श्रोस्तसुक्य [कार लक्षण करते हैं]— [सूत्र २११]—इत्थं विशिष्टस्योत्त्सुक्यं स्मरस्याद्यात् त्वरादिमि: ।

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निद्राच्छेदो विवोधइच शब्दादेरद्भुतभयानकः । व्यादर्शाद्भुत् स्पर्शः स्वप्नान्त-ग्राहारपरिणामादेरविभावस्य मः । उपलभ्यपातजम्म-श्रान्तिविमर्दन शयनमोचकाः भुजाच्छेप शृङ्गुलित्रोतनादिरनुमावो द्रष्टव्यः । पर्यन्ते चकारः सर्वेऽप्यविचारिसमुच्चयार्थः इति ।

(३३) अब विभाव (का लक्षण करते हैं)— [सूत्र २१५]—शब्द ग्रादिके कारण होने से शाला निद्राभङ्ग ‘विवोध’ महसूसता है और उसमे श्रगडाई आदि [घनुभाव] होते हैं । ग्रादि द्वादशते पूने, स्वप्नकी समाप्ति, भोजनका परिपाक हो जाने ग्रादि [विभावों] कारणोंका ग्रहण होता है । [ग्रतभयानक पदके] उपलक्षण रूप होनेसे जम्भाई, ग्राँखें मलना, खिझ सो जाने, खाट परसे उठ बेठने, हाथ फैलाने, श्रनुलियाँ चटकाने आदि धनुभावोंको समभना चाहिए । [विभोषके ध्यारैनके साथ ध्वभिचारिभावोंका वर्णन समाप्त होता है । इसीलिए ‘विवोधदच’ इस पदमे प्रयुक्त हुश्रा] अतमे प्रयुक्त चकार ध्यभिचारिसवये समुचयकेलिये प्रवृत्त हुग्रा है [प्रथमतः यहाँ तक सारे ध्यभिचारिभावोंका वर्णन समाप्त हो गया इस श्लोकका मूचक है] । प्रव इन रसाविमेमे किन्हीं परस्पर एक दूसरेके प्रति कार्य कारण

केपाज्चित्त तु रसादीनामन्योन्यं हेतुकायंस तु ॥ [४८] ९४६ ॥ व्यादर्शाद्भुताद् व्यभिचारिस्थाम् । यथा वीराद्दभुत् । महापुरुपोत्पत्ताहो हि जगद्विस्मय फलं साचादनुसन्धत्ते । तथा दौपदीस्वयम्वरादौ वीराच्च भयानकोद्भवि । रौद्राच्च वध-रन्यादिफलानन्तरं करुणो भयानकः । तथा सर्वरसेभ्योऽनन्तरं सवें सजातीय-रसाभवन्ति । यथा शृङ्गारात् हास्यो वा शृङ्गारः, हसनन्त हास्यो वा हास्यम् । इत्येव सर्वरसेषु हेतुत्वं मलमायो वाच्यः । सर्वरसानों चाभासा ध्यानोचित्यप्रवृत्ततया हास्यरसेन कार-

भावक कषन करते हैं— [सूत्र २१६]—रसादिकोंमें किन्होंका परस्पर एक-दूसरेके प्रति कायँ-कारणभाव होता है । प्रादि द्वादशते व्यभिचारियोंका ग्रहण होता है । [रसोंके परस्पर कायँ-कारणभावका उदाहरण देते हैं] जैसे वीररससे श्रद्भुत रस [जन्म होता है] । महापुरुषोंका उत्साह [जो वीररसका स्थायिभाव होता है] साक्षात् रूपसे जगत्के विस्मय रुप फलको [प्रथातः मद्भुत रसके स्थायिभावको] उत्पन्न करता है । वीर रौद्रौपदीके स्वयंवरादिमें [जुन नंे पराक्रमको देखकर] वीरसे श्रद्भुतरसकी उत्पत्ति होती है । प्रोर रौद्ररससे उसके वध या रण कळ फलोको देखकर करुणो भयानक रसोंकी उत्पत्ति होती है । इस प्रकार सब रसोंसे उनके बाद होनेवाले सजातीय रस जन्म लेते हैं । जंमे शृङ्गारसे हास्य होता है [इत्यरेसे] शृङ्गार, हँसनेसे हास्य [इत्यरेसे] हास्य होता है । इस प्रकार सर्व रसोंमें कायँ-कारणभाव समभना चाहिए । [प्रनौचित्यसे प्रवृत्त होनेवाले रस, रसाभास

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श्रादर्शदान सौहित्य-स्वभाव-व्याधि-निमित्तोद्भविर्विभावै: नटी-नीचानामनुययम्‌ रूपमालस्यं भवति । श्रमस्य व्यभिचारितवेपि अन्यव्यभिचारिणां प्रति विभावत्वे न दोष: । नयमिचारिता तु परस्परं व्यभिचारिषां स्थायिरसप्रज्ञाद् दुष्टत्वैव । एवं ह्यभिचारिषां श्रनुभावत्वमाप भवत्येव । जृम्भितत्सं, श्रादिशद्दाद व्यासितेनाहारवर्जितपुरुपार्थोनारम्भादिभिरन्वितदभिनेतव्यम् । श्रतिमोदपि हृदयस्थमाहारं करोत्येव वेधि ॥ [४३] १४५ ॥

इष्ट प्रियतम्‌ पात्र, जिसको देखकर श्रोता भी इष्ट पात्रसे प्रेम करने लगता है। आवि इष्ट प्रियात्‌ पात्र, जिसको देखकर श्रोता व्याधि आदि कारणो (विभावो) का भी पहचाना होता है। कार्यं का ज्ञान न होना प्रयथात्‌ प्रांकसे देखते हुए भी श्रोत कानोसे सुनते रहनेपर भी, अब क्या करना चाहिए इसका निश्चय न कर सकना । यह (जाड्य) न विकलता रूप है न प्रचंततय रूप इसलिये (वैकल्य रूप] प्रप्रसन्नर तथा [प्रचंततय रूप] मोह दोनोसे भिन्न है । मोन प्रयाथत्‌ चुप रहना । श्रनिमेपण प्रयाथत्‌ टकटकाकर देखना । बहुवचनसे परवशता आदि भनुभावोके द्वारा इसका प्रभिनय किया जाता है । (३२) ग्रब ग्रालस्य [व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]-- [सूत्र २९४]—श्रम ग्रादिके कारण कायंमे उत्साहका न होना 'ग्रालस्य' कहलाता है । जंभाई श्रादिके द्वारा उसका प्रभिनय किया जाता है । [४३] १४५ । [जृम्भितादिभि: प्रगुप्यते] प्रादि दोनोसे पेट भरा होनेसे, [ग्रालस्यका] स्वभाव, रोग, या गर्मे श्रादि कारऱोसे श्रोत्र नोचोंको उठानमहोनता ग्रालस्य कहलाता है । श्रमके व्यभिचारिभाव होनेपर जो हुसेके व्यभिचारिभावके प्रति विभाव [कारण] होनेमे कोई दोष नहीं है । व्यभिचारिभावोकी परस्पर व्यभिचारिता [उन्हेसे एकके] स्थायिभाव बन जानेके कारण दूषित हो है । [प्रयाथत्‌ व्यभिचारिभाव तो किसी स्थायिभावका हो होता है ! यदि एक व्यभिदारिभावको दूसरेका व्यभिचारिभाव माना जाय तो पहला व्यभिचारी, व्यभिचारिभावोके व्यभिचारिभाव माना जायगा । इसलिए किसी व्यभिचारिभावको दूसरे व्यमिचारोका व्यभिचारिभाव नहीं माना जा सकता है] हां उनको विभाव श्रोद्र प्रनुभाव माना जा सकता है । इसी प्रकार व्यभिचारिभाव श्रनुभाव भी हो सकते हैं । जृम्भित श्रादिसे श्रोत्र प्रादि इन्द्रसे बैठे-बैठे सानेके प्रतिर्वत कोई काम न करने प्रादि श्रनुभावोके द्वारा उसका प्रभिनय किया जाता है । ग्रालस्य भी भाजन तथा अवलेखन आदि क्रिया द्वारा है । [४३] १४५ ।

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अथ ते प्रत्येकशो लध्यन्ते । तत्र (१) वेपथु-

[सूत्र २१८]—भयादेवेप्युगात्रस्पन्दो वागादिविक्रिया: ।

ग्रादिश्रद्दाद् रोग-दर्पं शीत-रोष-प्रियम्पर्शादेः सभावस्य ग्रहः । स्पन्दः किश्चित्-चचलनम् । वागादेरादिरा-नाद् गति-चेष्टादेरित्रिया यम्मान इत्यनुभावकथनम् ॥

(२) स्तम्भ -

[सूत्र २१९]—यत्नेऽप्यकृताक्रिया स्तम्भो हृदादेः, हृा! विपादवात्र ॥

यद्यपि हृदय आदि अंगों में क्रिया न होना 'स्तम्भ' महसूस होता है । यदि दारुने विस्मय भय मद रोगादि विभावरों से हृदय आदि में क्रिया न होना स्तम्भ । ग्रादि-रोगाद् विस्मय भय- मद-रोगादेविमात्रस्य ग्रह इति ॥ [४६] ९४८ ॥

(३) श्रथ रोमाञ्च —

[सूत्र २२०]—रोमाश्चः । प्रिय-हर्ष-चादे-गेम-हर्योः ड्क्डू मार्जने ।

ग्रादिश्रद्दाद् व्याधि-शीत ग्रोत्रे स्पर्शादेः सभावस्य ग्रहः । यदु-रचनाद् हृन्मेदुर-ममुग् नेत्राऽपि कास दन्तरोष्ठाच्छादनादिविरभिनेतॄय ॥

यह [रोमाञ्च] प्रिय हर्ष आदि से तथा शीत स्पर्श से होता है । ग्रह्णेच्छनादि नेत्रों में भी कास [खाँसी] दाँतों से ओष्ठ को आच्छादित करने आदि से भी रोमाञ्च होता है ॥ [४६] ९४७ ॥

(१) वेपथु [का लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २१८]—भय ग्रादिं कारयन् वेगेरकात किं-चिद् वि-चालित हो जाना 'वेपथु' कहलाता है । ग्रादि दारकते रोग हृपं शीत कोष, प्रियके स्पर्श ग्रादि विभावों का ग्रहण होता है । यद्यपि ग्रादिं सनिकषा हृद जाया । 'वागादे' इसमे ग्रादि दारकते गति ग्रोर चेष्ट ग्रादिमें जितने विकार ग्रा जाता है । यह [वेपथु] प्रनुभावका ग्रयन किया है ।

(२) स्तम्भ [का लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २१९]—यद्यं ग्रादिदें कारयन् मन करनवैर् भी पद्धोंका क्रियाल म होना 'स्तम्भ' महसूसता है । ग्रोर उसमें 'हृदय' ग्रादि ग्रंगोंमें क्रिया न होना विपादवात्र होता है । [४६] ९४८ । यदि दारने विस्मय भय मद ग्रोर रोगादि विभावों

(३) श्रथ रोमाञ्च [का तहस़ा करत हैं]—

[सूत्र २२०]—प्रयमके देहन्ने प्रादिसे उदग्रम होनेवाला रोमहर्ष 'रोमाश्च' कहलातः है । पनदार् तहमानेकेग्राता उचतर् प्रभिनतय किया जासता है ।

पारद दारने स्वापि शीत कोष स्पन ग्रादि विभावोंका ग्रहण होत है । ग्रह्नेच्छनादि नेत्रोंफ. कुन जानने, ग्रासोंद् निद्र ग्राने से ग्रोर द तयोःलार्ने बजाने पारद प्रनुभावोद्दाल नतार-परभिनय करना काहिए ।

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लोकोत्तराश्रि चरितानि न लोकेऽपि मस्सन्न्यते यदि किमद्ध वदाम नाम ? यत् तत्र ह्य हास्यमुगतत्समुच्य तेन, पारसीयपपडिागिठ करे न विजाह्मसीति ॥ व्यभिचारिभावैरपि उत्पाद्योत्पादकभावो यथा ध्याधेनि वेहद', चिन्ताविव्हो धाम्यां स्मृति:, श्रमादालस्यमित्यादि । व्यमिचाराभानानद्भयनेचित्यप्रकृतस्वाद हास्यो भवतीति ॥ [४५] १४५ ॥

हास्याभासे हास्यो भवति यथा— जसे रावणका [सीताको भ्रानुरक्त होनेके कारन] प्रविष्ट शृङ्गाराभास, सहदयके वीतराग होनेके कारन हास्य उत्पन्न करता है । [अ्रन्य रसाभासोसे हो नहों श्रपितु] हास्याभाससे भी हास्य-रस उत्पन्न होता है । जैसे— [रावणके] लोकोत्तर चरितोंको यदि यह लोक उचित नहीँ सम्भता है तो हम क्या कह सकते हैं । किन्तु [प्रतचित कमं करने भी वेङामोंकी तरह] जो वह शृङ्गार करता हुंभा हॅसाता है उसको देखकर हेता कौंन है जो कोर्ई पकड़कर नहोँ हॅसता है । हॅंसते-हॅंसते किस को कोखमें दर्द नहों होने लगता है] । व्यभिचारिभावोमें भी परस्पर उत्पाद्य-उत्पादकभाव होता है । जैसे ध्याधिसे निर्वेद से प्रवृत्त होनेवाले व्यभिचारिभावसे भी हास्यरसकी उत्पत्ति होती है ॥ [४५] १४६॥ ग्रन्थ रसोंके, स्थायिभावो ग्रोर व्यभिचारिभावोंके [तीनोके] कार्यभूत ग्रनुभावोंका प्रतिपादन करते हैं--

[सूत्र २१७]—वेपथुः-स्तम्भ-रोमाञ्चः स्वरभेदोदस्व-मूर्च्छानम् । स्वेदो वैवर्ण्यमित्याद्या ग्रनुभावा रसादिजाः ॥ [४५] १४७॥

कंप, स्तम्भ, रोमाञ्च, स्वरमेद, श्रमपू, पुष्टि, स्वेद, विवर्णता इत्यादि रसादिसे उत्पन्न होनेवाले ग्रनुभाव होते हैं । [४५] १४७ । प्राध दादसे प्रसन्नता, उच्छ्वास, निद्रावास, रोमा-चिल्लाना, [उल्लुकसन] घाल मोचना, भूमि खोदना, सोतना पोटना, नाकून चबाना, श्रृति कटाक्ष, इधर-उधर या नोचे देखना, प्रनासो करना, हँसना, दीन, चापलूसी ग्रोर शुल्कफा साल पड़ जाना आदि [स्थायिभाव इत्यादि रसादिसे भी ग्रनुभाव

[मूल २१७]—कम्प स्तम्भ, रोमाञ्च, स्वरमेद, श्रमपू, पुष्टि, स्वेद, विवर्णता इत्यादि रसादिसे उत्पन्न होनेवाले ग्रनुभाव होते हैं । [४५] १४७ । प्राध दादसे प्रसन्नता, उचछ्वास, निद्रावास, रोमा-चिल्लाना, [उल्लुकसन] घाल मोचना, भूमि खोदना, सोतना पोटना, नाकून चवाना, श्रृति कटाक्ष, इधर-उधर या नोचे देखना, प्रनासो करना, हँसना, दीन, चापलूसी ग्रोर शुल्कफा साल पड़ जाना आदि [स्थायिभाव इत्यादि रसादिसे भी ग्रनुभाव हो सकते हैं] । वहाँ स्थायिभाव तथा व्यभिचारिभाव भी [ग्रनुभाव हो सकते हैं] ।

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स्वेदो रोमजलत्वात् श्रमादेर्व्यंजनप्रहः ।

स्वेदो रोमजललावः श्रमादेर्व्यंजनप्रहः । ध्यादिशब्दाद् भय हर्षलज्जा रोग ताप-श्राद्ध-हु व धर्मे ध्यायामादेर्विभावस्य प्रहः । बहुवचनाद् याताभिलाष-स्वेदापनयनादिभिरष्यभिनेतव्य इति ।

ध्यायाविकारो दैवण्यं क्षेपादेरोदडनिरोक्षरैः ॥ [४६] १४२॥

ध्याया शोभा तस्या विकारो विग्रहस्तवम् । क्षेपान्तरस्कार । ध्यादिशब्दान् मन्ताप भय क्रोध व्याधि शीत-श्रम-तीक्ष्णाशुकरादेर्विभावस्य प्रहः । बहुवचनान् नट-निस्तोदन-तीक्ष्णादिभिरप्यभिनेतव्यभिति ॥ [४६] १४२॥

वाचिकोजभिनयो वाचा पथाभावमुखक्रिया ।

अथ रसभावानन्तरोद्भवस्यामिनस्यावसर । स च याचित् स्वाद्धिक मान्तिक आहार्येभेदैश्चतुर्द्धा । तत्र प्रथमं वाचिकं लत्क्रयति— वागनुकरणा प्रयोजन हेतरस्येति 'प्रयोजनम्' [हेम० ६४१३७] इनि 'इकङि' धातोः 'कृतिन्' प्रत्ययः ।

श्रम प्राद्धिके कारकः उत्प न होनेवाला रोमजलका स्त्राव 'स्वेद' कहलाता है । प्रौर पक्षा हेतुमे लेने आदिके द्वारा उससत्व प्राभिनय किया जाता है । प्राथि द्वादसे भय हर्ष, लज्जा रोग, स ताप, प्रहः, हु, ध्यायाम प्राथि कारकों [विभावों] कत् पहचाना होता है । बहुवचनसे हावाकी इच्छा, पसोना पोछना प्राथि प्राथुभावोंके द्वारा भो उसका प्राभनिय किया जाता है ।

प्रथम प्राभनिय कारकः उप्पन्न होनेवाला मुल्तको काक्तिका विकार 'वैवर्ण्यं' कहुलाता है । डथार उघर देखाने प्राथिके द्वारा उसका प्राभिनय किया जाता है ।

ध्याया प्रयांत् [मुखक] शोभा ।

ध्याया प्रयांत् [मुखक] शोभा । उसका विकार प्रयांत् विग्रह जाना । क्षेप प्रयांत् तिरस्कार । प्राथि द्वादसे सत्त्वाप, भय, क्रोध, रोग, शीत, यथावत् शोभर चूप प्राथि विभावों का पहचाना होता है । बहुवचनसे नाखून चबाने प्रोर लज्जा प्राथिके द्वारा भो हत्स्थ प्राभनिय किया जातत । यह सूचित किया है ॥ [४६] १४१ ॥

प्रथ रस प्रौर भावोंके घनतर कहे गए प्राभनिय [के निहपणें] का प्रसत्सर मातत् है । यह [प्राभनदो] वाचिक प्राङि्ण सार्त्रिक प्रौर प्राहार्य [प्रत्युत चेष्टार्दि रूप] द्वार प्रकातको होता है । उनमेंसे सवने पहलें वाचिक [प्राभनिय] कत् लसक्रर् करते हैं— [वचत्के] भावके प्रनुसत्र [उसको] वागनुकरण प्राथिक [प्राभनिय] कहुलाता है ।

मनकत्र को जानने वालो वावी [ञ प्रनुकरणे] जिससप् 'प्रयोजन' हेतु है । यह हेम 'प्रयोजनं हेतु गम्ये' इस सूत्रसे 'णक्' प्रत्यय होकर 'वाचिक' पद वनतत्

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स्वरान्यत्वमुपचयापचयाभ्यां भेदः । श्रादिशब्दाद् भय जरा-दर्पे-क्रोध-रागरौद्रादेःविभावस्य ग्रहः । उपलद्भाद् ग्रीडा-निवेदादयोऽप्यनुभावा दृश्यन्ते इति ।

(४) अथ स्वरभेद:-[सूत्र २२१]—स्वरसेवः स्वरान्त्यं मदादेर्हर्ष-हास्यकृत् ।। [४७] १४६ ।। प्रोद वह हर्ष तथा हास्यको उत्पन्न करनेवाला होता है । [स्वरको] ग्रन्यता श्रप्यात् उसके तीव्र या मन्द हो जाननेसे होनेवाला भेद । श्रादि शब्दसे भय, बुदापा, हर्ष, क्रोध, राग प्रोद हर्षता श्रादि विभावोंका प्रहण होता है । उपलभ्य हप होनेसे क्रोड़ा तथा निवेद आदि प्रनुभाव भी समभ लेने चाहिएँ ।। [४७]१४६।।

श्रायाशब्दादनिमेषप्रेक्षा- श्रानन्द-श्रमर्ष-धूम श्राक्ष्णन-जृम्भण-भय-पीडा हस्त्यादेःविभावस्य ग्रहः । नासया: स्पन्दः श्लेष्मस्रवणम् । बहुवचनादनिष्टीवन गद्गदस्वरादेरतुभावस्य ग्रह इति ।

(x) श्रथ प्रथाश्रु— [सूत्र २२२]—श्रथाश्रु नेत्राम्बु शोकार्द्रान्नासास्पन्ददाक्षिलक्षरौः । देरिंविभावस्य ग्रहः । नासया: स्पन्दः श्लेष्मस्रवणम् । बहुवचनादनिष्टीवन गद्गदस्वरादेरतुभावस्य ग्रह इति ।। [४८] १४८ ।। नपुने फड़यने प्रोद श्रालोंके पोंछनेकेदौरा [उसका ग्रभिनय करना चाहिए] । प्राधा शब्दसे टकटकी लगाकर देखना, श्रानन्द, क्रोध, धुग्राँ, श्राक्षेप, जृम्भाई, भय, पीडा, हस्त्य ग्रादि विभावोंका ग्रहण होता है । नासिका स्पन्दन श्रर्थात् उससे इलेप्माका प्रवाहित होना । बहुवचनसे यूकने प्रोद गद्गद स्वर श्रादि प्रनुभावोंका भी ग्रहण होता है ।

श्राद्याशब्दाद् मदादेर्विभावस्य ग्रहः । स्वग्लानिरिन्द्रियेषामभिभव । उपलत्तयात् स्वेद-स्वरासादयोऽप्यनुभावा इति ।

(६) श्रथ मूर्च्छनम्— [सूत्र २२३]—मूर्च्छनं घात-कोपाद्यैः स्वग्लानिरिभूः मिपातकृत् ।। [४८] १५० ।। घासमयं हो जाना । उपलक्ष्य होनेके कारण स्वेद और स्वरासाद श्रादि ग्रनुभावोंका भी ग्रहण होता है ।। [४८]१५० ।।

स्वरान्यत्वमुपचयापचयाभ्यां भेदः । श्रादिशब्दाद् भय जरा-दर्पे-क्रोध-रागरौद्रादेःविभावस्य ग्रहः । उपलद्भाद् ग्रीडा-निवेदादयोऽप्यनुभावा दृश्यन्ते इति ।

(४) अथ स्वरभेद:-[सूत्र २२१]—स्वरसेवः स्वरान्त्यं मदादेर्हर्ष-हास्यकृत् ।। [४७] १४६ ।। प्रोद वह हर्ष तथा हास्यको उत्पन्न करनेवाला होता है । [स्वरको] ग्रन्यता श्रप्यात् उसके तीव्र या मन्द हो जाननेसे होनेवाला भेद । श्रादि शब्दसे भय, बुदापा, हर्ष, क्रोध, राग प्रोद हर्षता श्रादि विभावोंका प्रहण होता है । उपलभ्य हप होनेसे क्रोड़ा तथा निवेद आदि प्रनुभाव भी समभ लेने चाहिएँ ।। [४७]१४६।।

श्रथाश्रु नेत्राम्बु शोकार्द्रान्नासास्पन्ददाक्षिलक्षरौः । देरिंविभावस्य ग्रहः । नासया: स्पन्दः श्लेष्मस्रवणम् । बहुवचनादनिष्टीवन गद्गदस्वरादेरतुभावस्य ग्रह इति ।

(x) श्रथ प्रथाश्रु— [सूत्र २२२]—श्रथाश्रु नेत्राम्बु शोकार्द्रान्नासास्पन्ददाक्षिलक्षरौः । देरिंविभावस्य ग्रहः । नासया: स्पन्दः श्लेष्मस्रवणम् । बहुवचनादनिष्टीवन गद्गदस्वरादेरतुभावस्य ग्रह इति ।। [४८] १४८ ।। नपुने फड़यने प्रोद श्रालोंके पोंछनेकेदौरा [उसका ग्रभिनय करना चाहिए] । प्राधा शब्दसे टकटकी लगाकर देखना, श्रानन्द, क्रोध, धुग्राँ, श्राक्षेप, जृम्भाई, भय, पीडा, हस्त्य ग्रादि विभावोंका ग्रहण होता है । नासिका स्पन्दन श्रर्थात् उससे इलेप्माका प्रवाहित होना । बहुवचनसे यूकने प्रोद गद्गद स्वर श्रादि प्रनुभावोंका भी ग्रहण होता है ।

मूर्च्छनं घात-कोपाद्यैः स्वग्लानिरिभूः मिपातकृत् ।

(६) श्रथ मूर्च्छनम्— [सूत्र २२३]—मूर्च्छनं घात-कोपाद्यैः स्वग्लानिरिभूः मिपातकृत् ।। [४८] १५० ।। घासमयं हो जाना । उपलक्ष्य होनेके कारण स्वेद और स्वरासाद श्रादि ग्रनुभावोंका भी ग्रहण होता है ।। [४८]१५० ।।

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देशकालभेदेनातथाभूतेऽप्यभिनेयचतुष्ट्वान्नादनान् तथाभूतैरपि नटैः पु रामादीनध्यवस्यति । श्रत एतत् तासु तासु सुख-दु ख-परिहासु रामाद्यवस्थासु तन्मयीभवति । श्रपरे तेऽपु तु नामसदृशगीतकाभिनयेऽपु रामाद्यध्यवसायैस्तुपु उपदेशापरमेत दिति मन्यमानाः देयरूपादेन-हानोपादानैकतानचेतसो जायन्ते ।

देशन-काल के भेद से यथार्थ न होने पर भी अभिनय के चार प्रकार होने से नटों का अभिनय देखकर दर्शक लोग उनमें तन्मय हो जाते हैं । कभी वे रामादि की सुख-दुःख आदि अवस्थाओं में तन्मय होते हैं । दूसरे नट नामसदृश गीत और अभिनय द्वारा रामादि का अभिनय करते हुए भी केवल उपदेश देने के लिए ही ऐसा मानकर हेय का त्याग और उपादेय का ग्रहण करने में तत्पर होकर अभिनय करते हैं ।

अथवा इह तावत् इत्यमाकृति , इत्ये गतिः , इत्यर्थ जल्पित, इत्येवमादि ललित इत्येवमादिषु रामादिलीलासु श्रेयांसि कोलदर्शनानि ज्ञानम् निधत्ते केवयो नाटके नियधन्ति । तत्र चार्थे मुनिदर्शनविश्वासान्नटस्य साध्वादु दर्शनमेव । श्रपि च कदाचिन्मासदशो यत्स्वरूपे भ्राम्यन्ति न पुनर्जानन्तश । तत्र मुनि ज्ञानदर्शितं श्रर्थ दर्शना द्यधिकतरमवगत वस्तुत प्वानुकृत्यंषो दुर्विभागधवुद्धिभि कथ द्वारमपाक्रियते वराकैर नट ? प्रेक्षाकारे तु हेत्यसति च स्वदर्शने नटेऽपु रामाद्यध्यवसाय एतत् ग्रान्यथा तु कृत्रिममेतदिति जानन्तो न रामादिसुख-दु खेपु तन्मयीभावेयु । उन्मपन्न्ति च भान्तरपि श्रृकारादय । कामिनीवैरिचौरादीननभिप्रयत पुंस कथमन्यथा रसप्ररोहोरोहिरस्त्र्न स्तम्भादियोजतुभावा प्रादुर्मवे शरिते ।

इस प्रकार के रूप, गति, कथोपकथनादि के द्वारा नाटक में रामादि की लीलाओं में कल्याणकारी तत्वों का ज्ञान कराया जाता है । उस कल्याणकारी तत्व में मुनियों के दर्शन पर विश्वास होने के कारण नट का अभिनय ही काफी होता है । कभी-कभी नट के द्वारा वास्तविक स्वरूप में भ्रम हो जाता है किन्तु पुनः पहचान भी हो जाती है । मुनियों के द्वारा बतलाये गये ज्ञान से यथार्थ वस्तु का ज्ञान हो जाने पर भी दुर्बुद्धि दर्शकों के द्वारा उसका यथार्थ रूप से ग्रहण नहीं किया जाता है, बेचारे नट क्या करें ? दर्शकों में यदि तन्मयता न हो तो वे नटों के द्वारा रामादि के अभिनय को कृत्रिम ही मानते हैं और रामादि के सुख-दुःख में तन्मय नहीं होते हैं । इसी प्रकार अन्य दर्शक भी शृंगारादि रसों में तन्मय नहीं होते हैं । नायिका, वैरी, चोरादि के प्रति पुरुषों का अनुराग न होने पर भी स्तम्भ, रोह आदि अनुभावों के द्वारा रस की प्रतीति कैसे हो सकती है ?

मनोहर सगीतको सुनने आदिके कारण वह होकर, स्वहप देश श्रोर कालका भेद होनेसे उस प्रकारके [प्रभातादि रूप] न होनेपर भो [वार्चिक, यौगिक, शाब्दिक तथा प्राभाकर रूप] चारा प्रकारके श्रभिनयके द्वारा [नटके] स्वहपका श्रवधारण करनेसे उस प्रकारके [अर्थात रामादि रूप] बने हुए नटोंमें रामादि का निश्चय कर लेते हैं । इसीलिए उस प्रकारकी मूल तु लमयो राम श्रादिको ह्रवस्थाप्रो मे तन्मय तो हो जाता है ।

दूसरे लोग [यह कहते हैं कि नटमें] राम ग्रादिका निश्चय कराने वाले नकेल संगीत श्रोर श्रभिनय श्रादि हेतुओंके उपस्थित होनेपर यह [प्रभिनय रामादि सव सामप्रौ मनोरञ्जनके साथ साथ कतथक] उपदेश देने के लिए है ऐसा मानकर हेय तथा उपादेयके परित्याग ग्रथया ग्रहणने हो तत्पर हो जाते हैं ।

ग्रपधा [तीसर मत यह है कि राम ग्रादि] प्रयुक्ताय पुरपोको इस प्रकारको ग्राकृति इस प्रकारको गति इस प्रकारकी वात बौत श्रोर इस प्रकारका क्रोधादिको वावस्था यो । इस प्रकार रामादिके सम्पूर्ण चरित्रको श्रृंखियोंके त्रिकालदर्शी ज्ञानीके द्वारा निश्चय करके हो कविगण नाटकमें उसकी रचना करते हैं और उसके विपयमें मुनिजनोंके विशयासके कारन नटका [राम रूपमें इदान] साक्षात [रामका हो] दर्शन है ।

घोर दूसरी बात यह भी है कि इन चरम-चक्षुप्रोते देखने वाले लोग [मुनिगण भ्रात] नहीं [हो सकते हैं] । इसलिए मुनियों [कै सहना कवियों] के ज्ञान द्वारा प्रदर्शित [प्रय] वास्तविक देखे हुए प्रदर्शने भी प्रपिक सच्चो तरहसे प्रवगत प्रयंकको वास्तविक रूपमें धनुकरण करने वाले विचारे नटको ग्रलपबुद्धि [यह धनुकरणए नहीं है इस प्रकार] निराकरणए कैसे कर सकते हैं ? प्रक्षकों ने [प्रयुकायको] देखा हो या न देखा हो किन्तु उनके [रामादिका श्रभिनय करते समय] नटोंम राम ग्रादि [के तवास्य] का निश्चय होता है । प्रयप्या यह बनावटो [राम] है इस प्रकारका ज्ञान होने पर रामादिके सुख-दुःख तो वे तन्मयको प्राप्त नहों कर सकते हैं । [इस प्रकार नटमें रामादि सुखदुःखादिको ग्राहे घम हो बयों न ग्रावादि किन्तु उससे समाजिकमें शृङ्गारादिको प्रतीति

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वाचिक ॥सामाजिकानांमिमुरुच्येन सात्विकारेऽपि नीयते प्राप्यते ऽर्थोऽभिनय। वाचा संस्कृतप्राकृतादीनां सार्थिकानामनर्थिकानां वा। यथाभावं क्रोध श्राद्धारजुगुप्सा उत्साह विस्मय हास-रति-शोक - सुरत दु ख-मोह लोभ माया क्रसूया शद्धोद्दीनां, वेपथु स्तम्भ रोमाञ्च मूर्च्छा वैवर्ण्य प्रसादादीनां वा भावानमनतिक्रमेण। तथा च काव्य 'सङोोध' 'सावेग' इत्यादीन्यनुकार्य भावप्रकाशकानि क्रियाविशेषाणांनुविधेयानि। तेन काव्योक्तमपेक्ष्य यथाभावं श्रनुवेधतोडनुवाद एव न वाचिकोडपि नतत इति। श्रनुक्रिया च वागादीनां तदध्यवसायवशान न पुनर्व्यस्तु। रामादेरनुकार्यस्य नटेन प्रेक्षकैर्वा स्वयमद्धप्रतिपादन। श्रनुकर्ता हनुकार्यमदग्रा नटुकर्तु मलम। प्रेक्षकोडपि चाद्यग्रानुकार्यों नानुकर्तृ रकुर्तृ त्वमनुमन्यते। तदयं नटो रामादिर्चरित कविनिरद्धम्र-धित्य ध्रत्यन्तराभ्यासवशात स्वयं हृद्यमनुमन्यमानो ऽतुकरोऽपि इत्यध्यवस्यति। परमार्थस्तु लोकव्यवहारमेवानुवर्तते। प्रेक्षकोडपि हि, रमे ऽपि रब्धे रोदिति, न तु हसति। विप्रलम्भोऽपि च हसति हसतिं, न तु रोदितीत्यादि।

है। [प्रेक्षकों में अभिनय का निर्वाचन करते हैं।]। श्राभिमुख्य से श्राभिनय साक्षात्कारात्मक रूप से [ग्रानन्वित होता] ग्रहण जिसको वह [ग्रभिनेय] ग्रहण कहलाता है। वचननोका अर्थात संस्कृत ग्रथवा प्राकृत ग्रादि माषा में यथेच्छा [वचननो] क्रोध प्रहङ्कार, जुगुप्सा, उत्साह, विस्मय, हास्य, रति, भय, शोक, सुरत-दु ख, मोह-सोभ माया, क्रसूया, शङ्का ग्रादि [भावो] ग्रथवा कम्प, स्तम्भ, रोमाञ्च, मूर्च्छा, वैवर्ण्यं तथा प्रसन्नता ग्रादि रूप भावोंका ग्रनतिक्रम किए बिना [ग्रभिनय करना 'प्याभावम्रनुकीर्ति' कहलाती है]। इसीलिए काव्यों में 'सङोोध' सक्रोश' इत्यादि ग्रनुकार्यों भावके प्रकाराश पदोंका प्रयोग करते हैं। इसलिए एकके द्वारा कहे गये, दूसरेके द्वारा यथोचित भावस्थ ग्रनुकरण किए बिना जो [ग्रनुवाद करना] वचन करना है वह केवल 'ग्रनुवाद' कहलाता है उसकी वाचिक ग्रभिनय नहीं कहा जाता है। यपोति वाचिक प्रभिनयमें प्यायमावमुक्रिया भावोंका ग्रनुकरण भावप्रक है। पोत यासो प्रादिका ग्रनुकरण [यह रामादि वचन है]इस प्रकार निश्चित्पक वार्ता होता है पारत्वक रूपसे नहीं। यपोति नटने प्रमावा प्रेक्षकोंने वितने भी ग्रनुकयं रामादिको स्वयम नहीं देखा है। ग्रनुकरण करने वाला [नट] ग्रनुकायं [रामादि]हो देखे बिना उसके ग्रनुकरण करनेमे समय न हो सकता है। पोत प्रेक्षाग भी ग्रनुकायंको देखे बिना ग्रनुकरण करने वालेको ग्रनुकर्ता नहीं मान सकता है। इस्सलिए यह नट कविके द्वारा निश्चित राम ग्रादि के चरितको पद पदकर धारणत भ्रमाप्तसे द्वारा स्वय देता। जाता मान मर 'में [इस समय] उसको ग्रनुकरण कर रहा हूँ' ऐता निद्रय करता है [इसी प्रयय मायने कारक उसके ध्यापारो ग्रनुकरण कहाता है]। वस्तुत्वमे तो यह [रामने व्यापार या नहीं प्रवित] लोक-व्यवहारक हो ग्रनुकरण करता है। यपोति स्वयं प्रस्तुत होनेपर भी रामने रोनेपर रोता है हँसता नहीं है। पोत स्वप्न कुत्रो होनेपर भी [राम ग्रादिन] हँसने पर हँसता है, रोता नहीं है। इस्रादि पोत ग्रङ्कर भो [नटने विपयमें] राम ग्रादि का स्वर-स्मेतनो सममने तमा शरपन्न

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हृदये कान्ताभयानकादयः पटत्रिशानम् । नेत्रतारकयोर्भ्रमराः चलनादयो हृदयक्रियाभेदाः समसन्न्यादयो दर्शन्मकाराश्च । श्रवणपुटयोरन्वेप निमेपादयो हृदयोद्दिप्त पतनादयः सप्त । नासिकाया नतामनतादयः पड । गण्डयोः स्वाम

उनका उल्लेख नाट्यशास्त्रम् में इस प्रकार किया गया है— मुखरजेडमिनये विषमा नानाभावरसाश्रये । शिरसि प्रथमं कर्मे गदतो मे निवोधत ॥ ८४ ॥ स्वाकम्पित कम्पित च धुतं विधुतमेव च । परावृत्तमायूतं श्रावधूतं तथाचितम् ॥ ८५ ॥ निह्ह्वित परावृत्तमुल्लिप्त चाप्यधोगतम । लोलित चेति विधेय ऋजोदशविधः शिरः ॥ ८६ ॥ हृदिके कम्पता, मदनकर भावि द्रुतादिके प्रकार होते है : रौद्र वीरादि च वीभत्सो विधेयो रसदर्शय ॥ ८७ ॥ स्तिग्धा हर्षा च दीना च मुग्धा दीप्ता भयान्विता । जुगुप्सिता विस्मिता च स्थायिभावेपु दृश्य ॥ ८८ ॥ शून्या च मलिना चैव श्राता लज्जान्विता तथा । कु चित्ता चाभिनता च जिह्वा सललिता तथा ॥ ८९ ॥ वितर्ककिन्ताधिमुलता विश्राता विलुप्ता तथा ॥ ९० ॥ स्वाङ्के करा विकोशा च नतता च मदीरा तथा । पटत्रिशदृश्ययो होतास्तासु नाम प्रतिपदितम् ॥ ९१ ॥ नेत्र प्रोर तारकके भ्रमरा, चलन आदिके बहुतसे क्रियाभेद होते है । सम प्रोर चक्र [साचो] आदिके दर्शानके प्रकार है । इस सम प्रादि दर्शन प्रकारोका वर्णन करते हुए भरतमुनिने लिखा है— आयानैव प्रवर्त्यामि प्रकारान् दर्शानस्य तु । समं साच्यनुवृत्ते च हासोल्लसित बिलोकिते । प्रलोकितोल्लोकिते चाप्यवलोकितमेव च ॥ ९२ ॥ < ॥ [पक्ष] नेत्रपुटोंके उन्मेप निमेप आदिके बहुतसे भेद होते है । भरतमुनिने इन नेत्रपुटोंके अभिनय भेदाका निरूपण निम्न प्रकार किया है— तारागतस्यनुगत पुटकर्म निरोघत । उन्मेपश्च निमेपश्च प्रस्तुत श्रुचित समं । विर्तितं ससंरित पिहितं सचिलादितम् ॥ ९३ ॥ भौंहोंको उठाना गिराना आदिके सात [अभिनय] प्रकार होते है ।। नासिकाके नत

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कर्मेपोडनुकायैश्चेष्टाया न्रृत्ते । शिरो-हस्त-वचः-कटी-पार्श्व-पादादिभिः, उपान्त्र-नेत्र-भ्रू-पद्म-श्रवण-कपोल-चिबुकादिभिः । साक्षाद् भावनं परोक्षस्यापि सामाजिकेष्य: साक्षादिव करणमाझिक: । श्रद्धान्ति प्रयोजने हेतवो यस्मेत्याझिक: । 'यथा-भावं हि श्रङ्गारादि स्मर्यते । तेन रामादि नुकार्यस्य ये क्रोध-उत्साह-श्रावेग-वैमनस्य-हर्ष-नैवेदर्ये-श्रास्यराग-भ्रू-कुटिलादयश्चेष्टाविमिश्रा भावाः, तैरन्सूयतस्य कर्मणः: साक्षादिव भावनं न तु केवलस्यैवति ।

होती हो है । क्योंकि ] श्रान्तिसे भी भृङ्गारादिको उत्पत्ति हो सकतो है । अथवा रसान्तर्गत क्रामिनों, वधिरो चोर श्रादिको देखने बालोंके भोतर रसके चरम सोमान्तर पहुँच जानेकर [रसोके श्रनुकूल] सत्नभ्रादि श्रनुभाव कैसे होते हैं ? प्रथम श्राझिक [श्रभिनयका वर्णन करते हैं]— [सूत्र २२७]—अङ्गों प्रोर उपाङ्गोंके द्वारा कायोंका साधारकर कराना श्राझिक [प्रभिनय कहलाता] है । [पृ०] १४२ । कायोंका श्रभिनय [रामादि] को वेष्टाका । अङ्गोंके द्वारा श्रर्थात् सिर हाय दारी कमर पार्श्व प्रोर पद श्रादि रूप [मुख्य अङ्गों] के द्वारा । प्रोर उपाङ्गों पर्य्याप्त नेत्र भोंह, पलक, श्रपर, कपोल, ठोड़ी श्रादि [गौण] उपाङ्गोंके द्वारा । साक्षात् भावन पर्य्याप्त परोक्ष प्रयत्नों भी सामाजिकोके लिये साक्षात्-सा बना देना । प्राझिक [प्रभिनय] है । श्रद्न जिसका प्रपोजत [प्रधान] हेतु है वह श्राझिक है [पह आझिक कर्मका नियन्चन करता] । इस करिकाके पूर्वार्धमें पठित 'यथाभायनुरुचिया' मेंते] 'यथाभावं' यहु भाग यहाँ [प्राझिकके लक्षणमें] भी संगत होता है; इसलिए रामादि प्रतुकायंके जो क्रोध, उत्साह, श्रावेग, वैंमनस्य, हर्ष, चैन्यर्ये, श्रास्यराग प्रोर भ्रू-कुटिल श्रादिसे युक्त चेष्टाओंसे मिश्रित भाव है उनसे साङ्गारकरने [होता व्यापारदयक है], केवल [श्रावश्यकतारहिल कर्म] नहाँ । इस प्रकार श्राझिक प्रभिनयका लक्षण करनके याद प्रव प्रचार भरत मुनिने नाट्य-शास्त्रके प्रारम्भपर ग्राझिक प्रभिनयका संक्षिप्त विवेचन करते हैं । भरतमुनिरेे: नाट्यशास्त्र के षष्ठं पटलमें इन श्राझिक प्रभिनयों विलेष वरने विस्तार किया गया है उसोके सरथेत करते हुए पञ्चकार प्रागे प्रतिपादन करते हैं । 'तत्र शिरो हस्त्र: पार्श्वंकटीपादत: पङ्गानि । नेत्र-भ्रू-नासाधर-कपोल-चिबुकनुपाङ्गानि ॥ ८-४६ ॥ उनमेंसे गिरके कर्मपत पाङ्गस्यित प्राङ्ग हेरु प्रकार [के प्रभिनय होते] हैं । हस रस-पदोंसे तिरं श्रेरहु प्रकारके पाङ्गोंमें पङ्गत दश! तच्त्वार्श्रे किता है ।

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श्रृङ्गारादिग्रभावस्याद-श्रान्तिक-प्राभिनयम् । मनयोः पौड्येवम् ।

इन दोनों भ्रमों का निरूपण करने के बाद भगनमुनि ने मोहद् प्रकारों का वर्णन किया है जो निम्न प्रकार है—

श्रान्तिकंता ह्यप्रसक्ता पार्व्वंक्रान्ता तर्ध्र च । कुत्स्य ज्ञातुं शक्ता च तथा नृत्यपुरसादिका ॥ ९८ ॥

डोलापगा तथाऽजिना श्रान्तिद्दौघृतमजिने । विश्रुद्धिम्राता ह्रालाना न भुशङ्गगामिन्मा तथा ॥ ९९ ॥

मुग्धता न रसाढा च भ्रमरी चेति पौडश । श्रान्तिकाद्यं स्मृतं श्रेयो वेत्ता तत्त्वं न तिरोधत्त ॥ ९३ ॥

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३४६ ]

नाट्यदर्पणम् [ क० १५, सू० २९७

फुल्लादयः पद्ट्। श्रृङ्गारस्य विवर्तन-कम्पादयः पद्ट्। चिबुकस्य कुट्टन-तिरोरणादयो वहवः। प्रीवायाः समा नतादयो नव। हस्तयोः पताक-त्रिपताकादयश्चतुःपद्ट्र । वक्षस श्राभुगन-निर्ॐनादयः पद्ट्र । पार्श्वयोर्नत-समुन्नतादय। पद्ट्र । उदरस्य द्वाम सलिल-पृथग्लङ्घनादयः। कण्ठस्यारिलन्नानिघृत्तादयः पद्ट्र ! ऊर्वोः कम्पन-वलनादयः पद्ट्र । जघयोरावर्तित-नतादयः पद्ट्र । पादयोरुद्घाटित-समादयः पद्ट्र ! तथैकपादप्रचार-रपाः। समपाद-निश्रयतावर्तितादयो ह्यष्टौः। श्रातिक्रान्त-श्रप्रकान्तादयः पौडश। श्राकाशिकस्यच 'चार्यः'। सिथरहरसत-पर्यस्तकादयो श्रद्धहाराः द्वात्रिशत्॥

पिचक जाना, या फूल जाना श्रादि घः, मृदरकफे फड़कना, कंपना श्रादि छ, ठोड़ीके कुड्, खण्‌डन श्रादि बहुतसे [प्रभिनय प्रकार होते हैं]। गर्दनके समा, नता श्रादि नौ, हाथोंके पताका, त्रिपताकादि ४८ प्रकार होते हैं । छातोके श्राभुगन, निभुं श्रादि पांच, पादयोंके नत, समुन्नत श्रादि पांच, उररफे दुर्यंत, लातो श्रोर भरा श्रादि तीन, वसकेके दिःने श्रनिमृत्त श्रादि पांच, जांघों के कम्पन, लपेटना श्रादि पांच, जघघोंके श्रावर्तित नत श्रादि पांच [प्रभिनय प्रकार होते हैं] । पंरोक उद्घाटित, सम श्रादि द [प्रभिनय प्रकार होते हैं] । म्रोर एक पंरस चंलने रूप समपाद, स्थित, श्रावर्तित श्रादि मोलह प्रकारको अभिनय को जानने वालो 'चारो' तथा प्रतिक्रांत श्रप्रकांत श्रादि पौडश प्रकारको अभिनयके श्राकारोच 'चारो' एक स्थिर हसंत पर्यस्तक श्रादि वत्तोस प्रकारके श्रद्धहार [ये सब ग्राद्धिक प्रभिनयके प्रसंगंत श्राते हैं] ।

इसमें ग्रन्थकारने जिन 'चारो', 'श्रद्धहार' श्रादि ग्राङ्गिक श्रभिनय भेदोका उल्लेख किया है उनका वर्णन नाट्यशास्त्रके दशम श्रध्यायमे विस्तरारपूर्वक दिया गया है । उसमें 'चारो'का लक्षण निम्न प्रकार किया है—

एकः पादप्रचारो यः। सा चारीत्यभिसंज्ञिता ।। द्विपादक्रमभं यत्तु करसं नाम तद्‌वचेत् ॥ ९०-३ ॥

श्रथात एक पंरकेद्वारा चलनेका नाम 'चारो' श्रोर दोनो पंरोक परिक्रमां करनेको 'करसण' कहते है । नाटकमें 'चारो'के महत्ववर्ण प्रदान करते हुए भरतमुनिने लिखा है—

चारोभिः प्रसृतं नृत्यं चारोभिरचाष्टितं तथा । चारोभि श्रात्नमोक्षैश्व चार्यों युद्ये च कीर्तिताः ॥ ५ ॥ यदेतत् प्रसृतं नाट्यं तच्चाराभिव्येव संस्थितम् । न हि चायोर्विना किंचित्‌नृत्येऽपि सम्भवर्तते ॥ ८ ॥

नाट्यमें चारोके महत्ववर्ण प्रतिपादन करनेके बाद भरतमुनिने श्राङ्गिक सोलह प्रकारको चायियोंके नाम गिनाकर उनके लक्षण विस्तारपूर्वक दिखलाए हैं । इन सबको देखना चाहे तो नाट्यशास्त्रके दशम श्रध्यायमें देखना चाहिए । यहाँ ग्रन्थकारने उनके नामोका संकेतमात्र किया है । वे नाम निम्न प्रकार गिनाए गए हैं—

समपादा स्थितावस्था शकटास्या तथैव च । श्राङ्ग्याधिका चापगतिविच्चलना च तथा परा ॥ ८ ॥ पादकोशावृत्ता वृद्धा। उरुद्वयस्ता तथाकिता । उत्सन्निताथ जनिता स्वनिद्रिता चाप्यनिद्रिता ॥ ९ ॥

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अथाहार्य-चेष्टादानुक्रियाड्ढहार्यो बाह्यवस्तुनिमित्तकः॥

वेषे श्वेतादि। श्रादिदशब्दाद् रस-गन्ध-ग्राकल्प-ग्रायुध-वाहन-ग्राग्राधिकार्य-देशनदी-नगर-वन-पचि-विभद चतुष्पद-अपद प्रासाद-पर्वतादेरग्रे। बाह्य शरीरव्यतिरिक्त भरम धातु-जतु राग-हरिताल मपी-मृत्तिका वस्त्र येषु द्रलादिकं निमित्तमर्पयति। वाचिकादयस्तु शरीरनिमित्तता इति भेदः। श्रय च देश-काल कुल प्रकृति दशा-सीतव एवप्रसक्ता नाम सद्र है। यह सत्य जिसका प्रयोजन प्रभिन्न हेतु है वह सात्विक [अभिनय] होता है। मनको स्थिरता न होनेपर नट स्वरभेदादिके प्रदानको प्रदर्शंन सात्विक प्रभिनय कहलाता है। ग्रादि दशब्दसे कम्पन, स्तम्भ, रोमाञ्च, स्वेद, विवर्त्तता, ग्रास्रु नि दवास, उच्च्छूवाम, स ताप, वात्य , जृम्भाई, कुनाता, स्वूसता, उल्लुकसान, ग्राकारगोपन [प्रवहिर्य] सात्वयानता, लार गिराना / पा फेन गिराना, शारोरका धिपित कर देना श्रोर हिचकी ग्रादिका प्रहर्ष होता है। इन सबका यह प्रभिनय शब्दमुकारसा हप न होनेसे वाचिक नहीं कहा जा सकता है ग्रोर अङ्गोपाङ्गोंसे साध्य स्पष्ट चेष्टारूप न होनेसे ग्राङ्गिक भी नहीं कहा जा सकता है। [इसलिए यह तीसरे प्रकारका सात्विक प्रभिनय कहलाता है]। स्वरभेद ग्रादि मनुभावोंका प्रदान रस तथा उत्तम मध्यम प्रधान रसोंमें पात्रोंके हृदयार किसको जाना चाहिए।

[सूत्र २२६]—बाहु यस्तुमोहे द्वारा किया जाने वाला वेषं पारिक्रया प्रभुक्तरसा यरां प्रयाति श्वेतादि।

ग्रादि द्रव्दसे रस, गन्ध, वेष [ग्राकल्प] नाट्र, नाहन, ग्राग्रोप्ठि वपिकता देह, नदी नगर, वनपच्ची, द्विपद चतुष्पद, पदरहित [सर्व ग्रादि] प्रासाद ग्रोर वयस्त प्रादिक्का पहरण होता है। वाहू पर्याप्त नारोरेते भिन्न मथम धातु तनल ग्रादिक राग, हरिताल, स्वाहो, मिट्टी, यनद्र, यौंमुरो ग्रोर पन्याादि जितासं निमित्त पर्याप्त प्रयोजक है [वहु साद्र पाहायं प्रभिनय कहलाता है]। ग्रोर वाचिक ग्रादि [पहले नहे हुए तोनों प्रकारके प्रभिनय] तो तारोर निमित्तक होते हैं यह [जन तोनोंगे हृम वाहायं प्रभिनय कर] मेने है। देश, काल, प्रकृति, दशा, सीतव प्रभृति प्रादिक म्रादिक प्रभिनयने भरना काहिए।

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च । विदूपकस्य श्रासम्यद्वदेहनतौ । जले पादविलकंपवती, प्रतरणे जठर-सायंकार्वाहुभ्यां जलविप्लावनवती च । जलहियमागस्य विसंस्थुलाल्ज-केश-असनवती । श्रन्यकारगतोऽपि श्राकृष्यमाणमन्दपदा पुरःप्रसारितविलोलहस्ता च । श्रारोहेऽपे उध्यांवलोकनपरा, विपरीता त्वरारोहेऽपे । श्राकाशान्यतो विसृष्टलांगकेश-श्रशुका । इत्याद्यनेको गतिप्रकार इति । तथा रूपस्य शिरसि हस्तौ कृत्वा किश्चित्क्रिदास्यचालनानिमिप्रे चक्षुराभ्यां, शह्दस्य शिरसा पार्श्वेननतं, स्पर्शस्य नेत्राकुज्चननं, रस-गन्धयोश्चेकोच्छ्वासेनाभिनयः । सर्वोऽपि चाभिनय इष्टो, मध्योदनिष्ठेचेऽति त्रिनिग्रहः । तत्प्रेक्ष्यः सौमुख्य-पुलक-गात्र-नेत्रविकासादिना क्रियते । मध्यो माध्यम्येन । श्रानिष्टः शिरःपरावर्तन-नेत्र-नासाविकोचनादिति । चतुर्विधश्चात्र मुग्धरागः, प्रसन्नः, स्वाभाविको, रकः, ध्यामरश्चेति रसौचित्यानतिक्रमेण भवति । यदपि मर्वशरीरसाध्यं भूपातादिकं तदप्यादिक एव । श्रद्धोपाक्त्तरपरावान्द्रीरस्येति ॥ [४०] १४२ ॥

होती है । विदूपककी गति भ्रमयुक्त बातोंको देखते हुए होती है । यानी वे पैंरोंको घुमाते हुए, तैरते समय पेट, हाथ, शरीर तथा बाहुप्रोंसे जलको चोरते हुए, और जलमें बैठते हुए एककी पतन-व्यस्त हथधर्, केश तथा वस्त्रोंसे युक्त गति होती है । धन्यो प्रोर पनधारमें चलने बालों की पोरे-घोरे पैंरोंको वचेष्टते हुए प्रोर प्रायोकी प्रोर फंले हुए हाथको हिलाते हुए [ गति होती है] । ऊपर चढ़ते समय उपरकी प्रोर देखते हुए और उतरते समय उसके विपरीत [प्रर्थात नीचेकी प्रोर देखते हुए गति होती है] । प्रकाराने दोनों पंर एकते किए प्रपवदा वाहनोंके द्वार प्रथवा पंखोंके द्वार [गति होती है] । प्रकाराकों छोड़कर धन्यश्र प्रसत्न-व्यस्त केश वत्त्रादिसे युक्त मनेक प्रकारका गमनविचि कहा गया है । प्रोर रूप [के दर्शन] का [प्रभिनय] सिरके ऊपर हाथ रखकर तनिक सिर हिलाते हुए टकटकी लगाकर देखते हुए नेत्रोंसे, शब् [के प्रवसरु] का [प्रभिनय] एक प्रकार सिर भुकाकर सुननेसे, विदोप प्रकारके स्पष्टोकार [प्रभिनय] प्रांखें बन्द कर लेनेसे, प्रोर रस तथा गन्धका एक लघ्वे सांस लेनेके द्वारा होता है । सभी प्रभिनय हस्त, मध्यम तथा प्रानिष्ट विकास प्रादिके द्वारा [प्रदर्शित] किया जाता है । मध्य प्रभिनय मधमस्थताके द्वारा प्रोर प्रनिष्ट [का प्रदर्शान] मुंह फेर लेने प्रोर नेत्र एवं नासिके सिकोड़नेके द्वारा किया जाता है । इस प्रभिनयमे प्रसन्न, स्वाभाविक रकः, लाल तथा काला चार प्रकारका मुग्धराग होता है । जो रसके प्रोचित्यके मनुसार होता है । प्रोर श्रिविपर गिर पड़ना प्रादि जो सारे शरीरसे साध्य व्यापार है वह भो धारोरके हो ग्रद्भोपाग रूप होनेसे प्राभिक प्रभिनयके मन्तगंत हो होता है ॥ [४०] १४२ ॥

[सूत्र २२८]—सात्त्विक: स्वरभेदादेरनुभावास्य दर्शनम् ।

[सूत्र २२८]—स्वरभेदादि अनुभावोंका प्रदर्शन सात्त्विक [प्रभिनय] कहलाता है ।

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ग्रथ चतुर्थो विवेकः

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पुंस्व-पश्डत्वादौचित्यानुसारतेो विधेय इति। यस्तु पश्चमोऽभिनयस्त्राभिनय प्रोक्क्त. सोज्ज्वलड़ोपाङ्कर्मविशोपकृत्प्रतिपादांङ्गिकग्वान्तर्मेवति ॥ श्रीभिनयद्वय-त्रय-चतुष्टयसन्निपातरूप: सामान्याभिनय: पूर्वोचितार्वलचयै-नैव चारितार्थ इति ॥ [५१] १४३ ॥

हति श्रीरामचन्द्र-गुणचन्द्रनिबन्धनविचारोभां स्वोपज्ञनाटकसूत्रपाठविकल्पवृत्ती-रस भाव-अभिनयविचारसूत्तीयो विवेक: ॥ ३ ॥ और जो पांचवें प्रकारका चित्राभिनय [नाट्यशास्त्रमें] कहा गया है वह भी अङ्गों तथा उपाङ्गोंके विशेष कमं-रूप होनेसे आङ्गिक प्रभिनयके भेदतर ही आ जाता है । दो, तीन या चार प्रभिनयोंका सन्निपात रूप जो सामान्याभिनय [नाट्यशास्त्रमें] कहा गया है वह भी वाचिक प्रातिके लक्षणोंके अन्तगंत ही हो जाता है । [५१]१४३ ॥ श्री रामचन्द्र-गुणचन्द्र विरचित स्वनिबन्ध नाट्यदर्पणको वृत्तिमें वृत्ति-रस-भाव-अभिनय-विचार नामक तृतीय विवेक समाप्त हुश्रा ॥३॥

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नृतः परं सर्वरूपकोपयोगि किश्चित्किच्यते— [सूत्र २३०]—देव-भूप-सभा-भर्तृ मुख्यानां मङ्गलाभिधा । नित्या रूपमुखे नान्दी पदं पड्‌भिरथाभिः ॥

[१] १५४ ॥ 'मुख्य' पदका प्रयोग सरस्वती-काव्यप्रभृति तीनों उपलक्षणार्थक है । 'मङ्गलाभिधा' सदृशस्तुगुप्तोक्तीनं, श्राशीर्‌वचनं वा । 'नित्या' एवं विग्रहरूपैष्ठ । थापरैरपां तु पाठ्यानामुत्थापन-दीना पूर्वरङ्गाझानां प्रयोगशादन्थात्तथर्माप भवति । श्रवश्यम्भावाद्वा नित्यत्वम् । शेषाणां हि रङ्गाझानां नाचरथभावः । श्रहरहः प्रयोज्यत्वाद्वा नित्यत्वम् । यावद्धि रूपकस्यामनुष्ठानवेदपि नान्दी प्रयुक्तव्येव । 'रूपकस्य' नाटकोक्तः; 'मुख्य' प्रारम्भे, नान्दी । प्रयोगस्थानकथनमेतत् । नान्दीतर्य च मङ्गलाभिधाया प्रयूहापसारगोत्र समृद्धिजनकत्वात् । 'पदानि' वाक्यानि । केचित्तु पूर्ववाक्यापेक्षयावान्तरावाक्यानि 'पदानि' इत्याहुः । तथा च भरतमुनिरनिन्दी पठति—

प्रयाग नाट्यपदर्पणादोपिकां चतुर्थों विवेक ग्रब सब प्रकारके रूपकोंमें उपयोगी कुछ बातें कहतें हैं— [सूत्र २३०]—देवताद्रोही, राजाद्रोही, सभाद्रोही तथा स्वामिद्रोही मङ्गल-कामना रूप, श्रथ पदोंसे युक्त श्रथवा मङ्गल पदोंसे युक्त 'नान्दी' प्रत्येक रूपकके प्रारम्भमें नितय होनी चाहिए । [१] १५४ । 'मुख्य' पदका प्रयोग सरस्वतो घोर कवि प्रादिका उपलक्षण है । 'मङ्गलाभिधा' श्रथ्याद्विविधमान सदृशगुणोंका कथन, अथवा श्राशीर्‌वचन । 'नित्या' श्रथ्यादि (१) सब इसी प्रकारको प्रकारको [मङ्गलाभिधा रूप] होते हैं । पूर्वरङ्गके, पढ़े जाने वाले 'उत्थापन' श्रादि प्रयोग अङ्गोंमें तो प्रयोगके भेदसे परिभाषित भी हो जाता है । [किन्तु नान्दीका सभी रूपकोंमें एक हो स्वरूप रहता है । यह 'नित्या' पदका प्रभिप्राय है] । (२) श्रथवा [सब रूपकोंमें नान्दोक्त] मङ्गलाभिधा होनेसे नित्यत्व कहा है । रंगके अन्य अङ्गोंका होना श्रावश्यक नहीं है । श्रथवा (३) प्रतिदिन प्रयोग किए जानेके कारणस नान्दीका नित्यत्व कहा है । जब तक रूपकोंका श्राभिनय रहेगा तब तक इस नान्दीका प्रयोग किया जाता चाहिए । [यह 'नित्या' पदका श्रभिप्राय है] । 'रूपक' श्रथ्यात् नाटकादिके 'मुख' पर्यायव प्रारम्भमें नान्दी होती है । यह प्रयोगके स्थापनका कथन किया गया है । विधानोंके विनाश द्वारा समृद्धिजनक होनेके कारण मङ्गल-कामना मङ्गलाचरणके 'नान्दी' कहा गया है । 'पद' श्रथ्यात् वाक्यके श्रथवा कुछ लोग पूरां वाक्यके श्रवान्तर सङ्घट-वाक्योंको 'पद' कहते हैं । जैसा कि [प्रयोगान्तर लण्ड धारियोंको पद मानकर] भरतमुनिने [नाट्यशास्त्र प्र०४,११०-११३ में] इस प्रकार नान्दीका पाठ दिखलाया है ।

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कृत्यारम्भस्त्वयि लाञ्छन ! अत एव कवयो रूपकारमभे 'नान्द्यन्ते सूत्रधार' इति परन्नि । यत्र तु कविकृता नान्दी न इष्यते वत्रापि रङ्गसूत्रग्रहणं द्वारतां गृद्यते । नान्दी-पाठकारस्य सूत्रधार-स्थापक-परिपाश्र्विकादि इति । १४४ ।

[सूत्र २३१]—प्रवेश-निष्क्रमाक्षेप-प्रसादान्तरसङ्झूत्तम् । चित्रार्थं रूपकं गेयं पश्चाद् स्यात् कविभ्रुवा ॥ [२] १४५ ॥ 'रूपकं कविभ्रु वा' इति सम्बन्धः । प्रविशतः पात्रस्य रस-भाव प्रकृति श्रवस्था-दिकं प्रवेशार्धदर्शनोच्यते । तदनुसारेण श्लेष-सामासोक्त्यादिलक्षणं यद् रूपकं गीयते सा, 'प्रवेश:' प्रयोजनमस्या इति 'डिमक्रिया' प्राचेशिकी । (१) यथा श्रनर्घरागवे- (क)—'दिपय्यरफिरयाक्केरो पियायरों को वि जीव लोयस्स । कमलेमउल्किकाली-कय-महुस्सर-कड्डुरस्सवियहट्टो ॥'

[वृत्ति १४५]—[पाठ्यंके] प्रवेश, निष्क्रम, [रसाम्तरके] प्राप्तेष, [प्रस्तुत रसके] दृश्यतेऽवधारणं प्रेक्ष [ मडोके किसो चित्र म्र्पणात् ] मृटि [श्रे छिपनरेके लिए इन सम] के साथ सम्भद जो पद [श्रपंक] गाए जाते हैं वे 'ध्रुवा' कहलाते हैं श्रोर वह [प्रयोजित प्रवेश निष्क्रमादि पाँचके साथ सम्भद होनेसे] 'विध्रुवा' पाँच प्रकारकी होती है । [२] १४५ ।

[कारिकाम]—एवं कविभ्रुवा इन प्रकारके प्रयोग करनो चाहिए । [श्रपंकं भर्यंत गेय पदोंको ध्रुवा कहते हैं यह प्राशयग्राह है] । उसका प्रयोजन पात्रोंके प्रवेश निष्क्रम आदि पाँच प्रकारको वहो गई है । उन्मेंसे पहिले पात्रोंके प्रवेशनेसे सम्भद प्राप्तेश्रो ध्रुवा दिसलाते हैं] पापे प्रस्तुत होने वाले पात्रंक रस, भाव, प्रकृति, प्रवस्या आदिको यहाँ 'प्रवेश' नादसे कहा गया है । उसके श्रनुसार लदेय समा-सौकिक धादिके द्वारा जिस [श्रपक अर्यांत] गेय पदसों गान किया जाता है वह प्रवेश जिसको प्रायनिकी [पच तिद्ध होता है] । (१) प्रावेशिश्री ध्रुवा— [प्रयोताकी प्राशा अनुसार] जैसे म्रद्मरारायवमे— (क) सम्वेदवका दित्ये समुवाद जो कमल-मलिन्दि श्रोंश्रो गोरणने श्रोरोश्न प्रालयंल करनेने विद्हप है, समस्त जोवन्तोरक्‌लिए मृत्य पपुंषं पानगरसायक है ।

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"नमोडस्तु सर्वदेवेभ्यो द्विजातिभ्यश्च वै नमः । जितं सोमेन वै राज्ञा शिवं गो ब्राह्मणाय च ॥ ऋद्धोत्तरं तथैवाम्नु हृता श्रद्धाद्विपस्थथा ! प्रशास्त्वभि महाराजः पृथिवीं च ससागराम् ॥ राष्ट्रं प्रवर्धतां चैव रक्ष्यम्याशा समृद्धतु ! प्रजाफलतु महान् धर्मो भवतु श्रभ्यापितं ॥ कार्यकार्तु यशश्चापि धर्मश्चापि प्रवर्धताम् । इज्यया चनया नित्यं प्रीयन्तां देवता इति ॥"

ना० ऋ० ५, १९०-१९३ ॥ शत्रु द्वादशवान्तराशीर्योक्रियानि। पद्यभिरिति 'ऋकम्', श्लोकभिरिति चतुरसं रक्षामपेदय मध्यमनास्या निवेशरा। त्र्यमरड्ढे चौथतमा द्वादशाभि, श्रधमा त्रिभिः पदै- नान्दी । चतुरमरड्ढे पुनरुतमा पोडशभिः, श्रधमा चतुर्भिरिति । नान्दी च पूर्वरड्ङा- ज्ञानां द्वादश मड्ङं सकलपूर्वरङ्ङाभोपलक्षितका ! तेन 'नान्यान्ते सूत्रधारः' इत्यम्य । सकल- पूर्वरङ्गानि तु केपाञ्चिल्लोकप्रसिद्धानां, केपाञ्चिदनिष्टफलवतां, केपाञ्चिदनवश्यकभ्या चित्रान्न च लघयत्नः । नान्ती त्ववश्यकसूभाषितानां, मंगलाभिधानपूर्वकृतान्च शुभ समस्त देवताभ्योको ग्रांर द्विजातियोको हमारा नमस्कार है ! सोम रूप राजा [प्रथवा प्रकरामान चन्द्रमा] को विजय हो तथा गोत्रों एव माल्यादिकोका कल्याण हो । इसो प्रकार द्वाहोंकी वृद्धि यह ब्रह्मविद्याकी वृद्धि हो । तथा ब्रह्मादि विप्रोंका चिनाना हो । और महाराज सागरों सहित इस पृथिवीका शासन करें । राष्ट्रकी समृद्धि हो पोत्र रंगशालामोदिको प्रासा पूरें हो । नाट्यको व्यवस्या कराने वाले [राजा आदिको] महान् घमकी प्राप्त हो और [उनके द्वारा] वेदोंका पाठ होता रहे । तथा काव्यको रचना करने वाले [कवियो] को यशको प्राप्त हो, उनके धर्मकी सदा वृद्धि होती रहे । तथा इस यज्ञके द्वारा सदेव देवगण प्रसन्न होते रहे । इसमें प्रासोत्यांनातक बारह प्रवान्तर वाच्य हैं । [कारिकामें] 'पडभि' इस पदसे त्रिभुजात्मक रङ्को लक्ष्यमें रखकर मध्यम नान्दीको निर्देश किया गया है और 'पष्टाभि' पदसे चतुरस मण्डपको ध्यानमें रखकर मद्धम नान्दीका निर्देश किया गया है । त्रिभुजात्मक मण्डपमें उत्तम नान्दो बारह पदोंकी [मध्यम ६ पदोको] और प्रथम [नान्दी] तीन पदोंकी होती है । और चतुरस मण्डपमें उत्तम [नान्दी] सोलह पदोको [मध्यम आठ पदोंको] तथा प्रथम [नान्दी] चार पदोंको होता है । नान्दी, पूर्वरङ्गके सारे अङ्गोंकी उपलब्धा रूप है । इसलिये 'नान्यान्ते सूत्रधारः' [यह जो नाटकोंमें [मिक्षा काता है] इसको शौ उपलक्षित है । [पूर्वरङ्गके अङ्गोंमेंसे] कुछ लोकप्रसिद्ध होनेसे, कुछके निष्टफल होनेसे और किन्हींके श्रावश्यक न होनेसे होनेसे पूर्वरङ्गके समस्त अङ्गोंको सक्षया हमने यहां नहीं किया है। नान्दीका होना तो श्रावश्यक है इसलिये, और प्रत्येक शुभ काव्यमें मगलाचरए करना ही चाहिये' इसलिए नान्दीपक्षया किया है । इसीलिए [अपानू प्रत्येक शुभकाव्यके प्रारम्भमें मगलाचरणको श्रावश्यक होनेके कारण जो सोम नान्दीको को नाटकका अंग नहीं मानते हैं थे] कविराज [भो] नाटकके प्रारम्भमें 'नान्यान्ते सूत्रधार'

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कुर्यारम्भस्येति लद्षिना! अतः प्रय यद्वयो रपकारस्ये 'नान्वन्ते सूत्रधार' इति पठन्ति । यत्र तु कविक्रता नान्दी न हम्यतं तत्रापि रङ्गसङ्घाकर्तृकता दृश्यते । नान्दी-पाठकारच सूत्रधार स्थापक पारिपार्श्विका इति ।

[सूत्र २३९]--प्रवेश-निष्क्रमाक्षेप-प्रसादान्तरसङ्झतं । चित्रार्य रुपकं गेयं पञ्चधा स्वातृ कविक्रुवा ।। [२] १५५ ।। 'रुपकं कविक्रुवा' इति समन्वयः । प्रविभान पात्रस्य रस-भाव प्रकृति व्यवस्या-दिकं प्रवेशादिदर्शनेोच्यते । तदनुसारेण श्लेष-समासोक्त्यादिलेकृतां यदृ रुपकं गीयते सा, 'प्रवेश' प्रयोजनमम्या इति 'डेकऽपि' प्रावेशिकी । (९) यथा व्यासङ्घराघवे-- (क)--"दिग्पयरकिरगुक्केरो पियायरों मि वि जीवोएस्स । कमलमउलं कव्वालो-कय-महुअर-कडइआवियहडो ॥ [परन्तु नान्दी समाप्त होने के बाद सूत्रधार प्रविष्ट होता है] इस प्रकार लिखते हैं । [साम शादि के नाटकमें] जहाँ कवि द्वारा की गई नान्दी उपलब्ध नहीं होती है वहाँ भी रङ्ककी स्थाद्यस्या कराने वाले सूत्रधारकी श्लोकेसे की गई नान्दी समभ लेनी चाहिए । नान्दी-पाठ करने वाले घुनयार, स्थापक तथा पारिपाश्विक ये तीन होते हैं ॥ [९] १५४ ।। प्रन 'ध्र व थ' का लक्शए करते हैं--। [सूत्र १८१]--[पाथ्योके] प्रवेशे, निष्क्रमए, [रसान्तरके] प्राक्षेप, [प्रस्तुत रसके] उदयलीककरता मोर [नटोंके किसी चिद्र प्रर्यत् ] मुटि [को चिकित्सने के लिए इन सब] के साथ समबद्ध जो पद [हपक] गाए जाते हैं वे 'ध्रुवा' कहलाते हैं मोर यह [प्रवेशोत प्रवेश निष्पनसरा म्रादि पाँचके साथ समबद्ध होनेसे] 'कविध्रुवा' पांच प्रकारकी होती है । [२] १४५ ।

[कारिकाके] 'एवंक कविध्रुवा' इस प्रकारका गत्यय करना चाहिए । [लेउप प्रथान् गेय पदोंकी ध्रुवा कहते हैं यह प्रभिधाय है] । उसके प्रयोजन पाठोंक प्रवेश निलकमलू म्रादि पाँच प्रकारका होता है इसलिए ध्रुवा भी पांच प्रकारकी कही गई है । उनमेसे पहुतें पाथ्योंके प्रवेशसे समबद्ध प्रवेशिकी ध्रुवा दिललाते हैं] प्रागे प्रविष्ट होने वाले पाथ्यके रस, माव, प्रकर्ति, प्रवेशा प्रादिको यहाँ 'प्रवेश' शाब्दसे कहा गया है । उसके मनुसार इत्थेप समा-सोक्ति प्रादिके द्वारा जिस [एक अर्थात्] गेय पदक गान किया जाता है वह प्रवेशा जिसक प्रयोजन है इस प्रयमें [प्राचयं हेमचन्द्रकृत शाकार्श्वके मनुसार] 'हेकणं प्रययप करने पर' प्रावेशिको [पद सिद्ध होता हैं] । (९) प्रवेशिकी ध्रुवा-- [प्रवेशिको ध्रुबाका उदाहरण] जैसे प्रनघराघवमे-- (क) "फिराए समुंदाप जो कमल-कलिकार्मोदी तोवसे मोरोंक पाइचंत करणेमे विराछ हैं, समस्त जोक्लोककेलिए कुतूहल मातंगदायक है ।

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[दिनकरकिरणोत्कर प्रियाकर फोडपि जीवलोकस्य । कमलमुकुलांकपालीकृतमधुकरकर्यैपविदग्धः ॥ इति संस्कृतम् ]"

इयं स्वार्थमरत्नार्थं रामाकर्पैपायागन्छतो विरहमित्रस्य श्रादित्योदयवर्गान्वयाजेन प्रवेशसूचिका । (ख) यथा वा देवीनन्दनसुप्ते पञ्चवमेडके— "मस्तो सियकरवित्यरेफपांसुसिकससवेरितमरौही । नियविहवरेषा चन्द्रो गयरां गहं लंघितं विसइ ॥ [ एप सितकरविसतरप्रयाशिताशोपवैरितिमिरोच' । निजविभववरेषा चन्द्रो गगनं महं लंघयितु' विराति ॥ इति संस्कृतम् ]" इयं स्वापयशङ्किन्' धृतकोनमत्तस्य कुमारचन्द्रनुप्तस्य चन्द्रोदयवर्गैनैन प्रवेशप्रतिपादिकेति ।

(२) श्रादित्ये ग्रादूभध्ये वा सनिमित्त रज्जात् पात्रस्य बहिर्नि सरसां निष्क्कम । सत्वप्रयोजना । श्रादित्योदयादेराक्षेप्तिगम्यैपवाद् 'इकडपि' उभयपदघृष्टो नैष्कामिकी !

यथा देवीनन्दनग्रुप्ते पञ्चममंकान्ते— "बहुविह-अन्जविसेसं घडगिडं निपअहवेइ मयण्णदो । निक्खलइ खुद्दवित्तउ रत्ताहुतं मणओ रिअप्पो ॥ [चहुविवककार्यविशोपमतिग्रहेँ निह्हुते मदनात । जुब्याचित्तो रक्ताचित्तमना रिपो ॥ इति संस्कृतम् ]"

यह सूर्योदय-वर्णनके बहाने से अपने द्राथ्यमकी रक्षाके लिए रामचन्द्रको सिवा जानेकै वद्देश्यसे प्रान्तेवाले विरहमित्रके प्रवेशकी सूचना [प्रवेशकी ध्रुवा] है ।

(ल) प्रथवा जंते देवी चन्द्रगुप्तके पञ्चम मडके—

अपनी शुभ किरियाके विस्तारदार! मथु हृप समस्त शान्तकार-समुदायकको नाश कर देने वाले चन्द्रमा अपने प्रभुत्व [ज्योत्स्नारूप ] वलवलने [प्रकाश] प्रहारके उल्लसन करती है ।

यह चन्द्रोदयके वर्गान्वयसे अपने विनाशकी धाक करनेवाले बनावटो हपते उन्मत्त बने हुए कुमार चन्द्रगुप्त के प्रवेशकी सूचना [प्रवेशिकी ध्रुवा] है ।

(२) नैष्कामिकी ध्रुवा—

(२) ग्राद्धुके ग्रनतमे ग्रद्वया ग्राद्धुके बीचमे कारऐणर पात्रका रंगते बाहर जाना निष्क्रमणे कहलाता है । यह जिसकका प्रयोजन हो, यह [नैष्कामिकी ध्रुवा] होती है । यह निष्कामिकी पद] मतुप्रातिकरादिप्रप्तको प्राक्तिनिगर मानकर [हेमचन्द्र प्यातकरऐके मतानुसार] ईकणु प्रतिपम करानेपर सया उभयपद-नृत्ती करके 'नैष्कामिको' [पद सि(द्ध होता है] ।

यथा देवीनन्दनग्रुप्तके पञ्चम मडके प्रान्तमे—

नाना प्रकारके मद्यपान करते ग्रत्पन्न विडो़प कायोंको कासके प्रायोग्से द्रियन चाहते है भोर शान्त्रके रक्तपानके लिए उस्मुक शुपचित्तवत्ता [कुमार चन्द्रुप्त रक्झुमित्तो] बाहर आता है ।

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इत्यमुनन्मत्तम्य चन्द्रगुमस्य मदनविकारगोपनपरस्य मनाक् शस्त्र्रभीतस्य राजकुलगमनाथं निपतितसूचिकेतौ !

यह मदन-विकारको चिपानेकेलिये उन्मत्त श्योर हुड माथुसे भयभीत सग्रुप्तके राज-भवनमें जानेकीलिए [रक्तपंकमें] निपतित शूचिका [कीटकी] सूचना है ।

(३) श्रादेपिकी ध्रुवा--प्रस्तुतरसोल्लंघनेन रसान्तरोद्भावनमात्रेप: । तत्रयोदना श्रादेपिकी । ययोदात्तरायवे रामस्य प्रस्तुतशृङ्गारोल्लंघनेन-- "श्रोर रे तापस ! स्थिरीमव, स्ववेदान्ती गम्यते ? स्वसुरं सभ पराभवप्रसव एकदत्तव्रव्यय । रामपृतिवियन्धयोदलनयातसन्निहित: सखे ह विदलतीमवतनुसमुच्च्वललच्योभित- च्छटा च सुरितयचछम प्रसामेतु कोपानल:॥" इत्यादि नेपाल्यवाक्याकरोन वीररसालेप ।

(३) श्रादेपिकी ध्रुवा—प्रस्तुत रसको हटाकर अन्य रसका उत्पन्न करना 'श्रादेप' कहलाता है । वह जिसका प्रयोजन है वह 'आशेपिकी' हुई । जैसे 'उदात्तराघव' में—रामचन्द्रके प्रस्तुत शृङ्गाररसको हटाकर [निम्न श्लोक द्वारा श्योररसका प्रासेव कराया गया है]— हे दुष्ट तापस ! ठहर जा, खड़ा रह, प्रचञ्च जाता कहाँ है ? मेरी वहिन [सीता] के धर्मपमानमें उत्पन्न, एक [प्रतिहिं प्रियं] मलेराफो देनेवाला शत्रु-नृपत्ति प्राप्ति वनपुत्रोंके चिनारा रूप वायुपसे प्रज्वलित किया हुआ म्र्रा क्रोधानल प्राज धृयाँ किए जाते हुए तेरे धीरसे निकलनेवाले रक्तप्रवाहसे जिसका वस स्वल्प व्याप्न हो रहा है इस प्रकारका बनकर ही शान्त होगा । इत्यादि नेपाल्यागत [ रावणके ] वाक्यको सुननेसे श्योररसका प्रासेव होता है ।

(४) प्रासादिकी ध्रुवा—विभावोके उन्मोलन द्वारा प्रस्तुत रसका निर्माणलीकरणं 'प्रसाद' कहलाता है । प्रयत्न प्रविट्ट हुए पात्रकी चित्तवृत्तिको सामाजिकोंके सामने प्रकट करना 'प्रसाद' माना जाता है । वाद इस [प्रासादिकी ध्रुवा] का प्रयोग प्रवन्ध करना चाहिए यह वृद्धजनोंकी परम्परा है ।

(४) प्रासादिकी ध्रुवा—विभावोंके उन्मोलन द्वारा प्रस्तुत रसका निर्माणलीकरएा 'प्रसाद' कहलाता है । प्रयचा प्रविट्ट हुए पात्रकी चित्तवृत्तिको सामाजिकोंके सामने प्रकट करना 'प्रसाद' माना जाता है । वाद इस [प्रासादिकी ध्रुवा] का प्रयोग प्रवन्ध करना चाहिए यह वृद्धजनोंकी परम्परा है ।

(x) 'श्रान्तरी' द्विधा', तत्र मया 'श्रान्तरी' । श्रानुकृतुं यंथा श्रान्तराशंकित एवं घन-विधायको हेतु:, उद्धतप्रयोगस्त्रियादि: मूर्छान्धकारादिसंभावनासु, चक्षुरन्धद्वारा

(x) श्रान्तरी ध्रुवा—अन्तर पर्याप्त मुट्टि [दृष्टि] । उस [दृष्टि या मुट्टि] के होनेनेपर प्रयुक्त्तकी जाने वाली [प्रेक्षा] 'श्रान्तरी' [ध्यान्तराशंकिती] है । [इसका भीप्राय यह है] जय प्रयुक्त्तरण करने वाले [नट] को (१) जिसका दाका भी नहीं हो मकतीी पो इस प्रकारके पार्श्विमक व

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प्रच्युतिः, तदा तद्स्वरूपावकारादित्सया इयं गीयते । तस्यां च प्राच्येनं भावि वा रसस्वरूपमनुवर्त्यम् । चित्राच्छादनमात्रप्रयोजनत्वाच्चास्या न सार्थकपदन्यसनुपयोगीति शुष्काश्चाद्याप्येचास्यां नियध्यन्ते ॥ 'संगतं' प्रवेशायनुरूपार्थम् । 'चित्रो' नानाप्रकारः, सरः-काननादि-दिवसरात्रिसन्ध्यादि:, उत्तम-मध्यमाधमप्रकृतिः गज-याजि-सिंहादिभावो रत्यादिकरचार्यो यत्र । अर्थश्च तथा निबन्धनीयो यथा 'उपश्रुति-शकुन-न्यायेन' प्रत्ययेन प्रस्तुतोपयोगी भवति! 'रूपकं' नियतमात्रात्मकं छन्दः । 'गेयं' स्वरताललैर्गानान्तम् ।

विनाशा प्रादिके कारण का प्राघात लगता है तब, प्रथमा (२) किसी उदात्त प्रयोगके कारण मूर्छित या चकित हो जानेपर, प्रयवा (३) वस्तु, प्राभरण प्रादिके गिर जानेपर उस [मूर्छित, भ्रान्तर या चित्रित] के छिपानेकेलिए प्रवसर प्रदान करनेकी दृष्टिसे इस [आन्तरो ध्रुवा] का गान किया जाता है । [जिससे प्रेक्षकोंका ध्यान उस गानकी ओर वलात् जाता है और नटको उस मूर्छिको पूरा करने और संभल जानेक्ला प्रवसर मिल जाता है] । इतने पूर्ववर्ती प्रयवा मागे धाननेवाले रसके स्वहपका अनुगमन आवश्यक होता है । केवल चित्रोंका प्राधान्यन करनो ही इसका प्रयोजन होता है इसलिए इसमें सार्थक पदके पाठ प्रादि ही उपयोगी नहीं है [ और सार्थक गेय पद इस समय वकस्मात् बनाए भी नहीं जा सकते हैं ] इसलिए केवल [ सार्थक या निरर्थक जैसे भी बन जायें ] शुष्क ध्रुवकरमात्रका इसमें जोड-तोड किया जाता है । [उन्हींके गानसे सामाधिकीका चित्त बँटा॑कर नटको अपनी मूर्छिको छिपाने तथा संभलनेकेलिा प्रवसर मिल जाता है] ।

प्रवेश, निष्क्रम, प्राक्षेप, प्रसाद और अनतर इन पाँचोंके साथ 'संगत' ध्रुवाप्रकार [ प्रय्यति ] तालाब, वन प्रादि प्रयवा दिन, रात व सन्ध्यादि प्रयवा उत्तम, मध्यम व प्रथम प्रकृति प्रयवा हस्ती, सिंह प्रादि पदार्थ और रत्यादि रप प्रथं जिस [ गेय पद ] में हों [ वह 'चित्रा'्य' गेय पद 'ध्रुवा' कहलाता है ] । इस ध्र्ययकी रचना इस ढंगसे करनी चाहिए कि जिससे वह 'उपश्रुतिशकुनन्याय' ये अपने [स्वाभाविक] ज्ञानमात्रसे प्रकटमें उपयोगी हो सके ।

इसमें 'उपश्रुति-शकुन-न्याय' शब्दका प्रयोग किया गया है । इसका प्रभिप्राय यह है कि परम्परागत संस्कारोंके अनुसार यथापर जाते समय यदि मीलकण्ठ प्रादि किसी विरोधी पशुका दर्शन या उसकी ध्वनिका श्रवण प्रभा जैसे भरे घट प्रादिका दर्शन हो जाय तो वह कार्यसिद्धिके लिए शुभ दाकुन माना जाता है । यद्यपि जलसे भरे घड़े को ले जानेकालनेका, प्रयवा पसीके शब्द करनेवालेकेलिए शकुन करना नहीं होता । उसका प्रयोजन कुछ और ही होता है । किन्तु इन पदोंके दशांन प्रयवा दाकुनके श्रवणमात्र श्रव्यसामान्र पदवा ज्ञानमात्रसे उनका प्रकृतमें उपयोग हो सके । यह 'उपश्रुतिशकुनन्याय' का समप्राय है ।

नियत मात्रा और नियत भ्रसरों वाला गीत यहाँ 'रूपक' [ पदसे प्रभिप्रेत ] है । स्वर और तालसे गाने योग्य 'गेय' कहलाता है । [ध्रुवा] पाँच प्रकारकी ध्रुवाप्रकारु प्रवेश [ प्रवेश

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ध्रुवाप्रकारा उपयोगनाहल्यापेद्ध चैषत । अपरे च ध्रुवाप्रकारा सन्ति, श्रङ्गोपयोगिल्यवतु न लक्षिता । 'कविग्रहा' इति कने प्रवन्धकतॄरियं पद्धविधा ध्रुवा । ध्रुवेन रङ्गमध्ये वर्तिनीनां ध्रुवाश्रया रङ्गविध्यनन्तरं नाट्याचार्यंकल्पितानां गानध्रुवाश्रा च व्युदास इति ॥[३]१४५॥

अथ नाट्यपात्राश्रया प्रकृतिभेदानाह--[सूत्र २३२]—उत्तमा मध्यमा नीचां प्रकृतिं त्रिन्योस्त्रिधा । एकैकापि त्रिधा स्व-स्वगुणाना तारतम्यतः ॥ [३] १४६ ॥ 'उत्कृष्टेडयं' इत्यवयय उककृ्टेडयें । तत्त प्रकृष्टयेन 'तमपि' उत्तमा । प्रकृपेक्षं क्रियन्ते वाङ्गार्चेष्टा अस्या इति । प्रकृतिजन्ममहसुरवं शुभाशुभं शीलम् । 'नियति' तिरोऽपि प्रकृतय स्वस्थाने उत्तमा मध्यमा नीचाश्रयेऽति । 'गुणा' प्रत्येकं प्रकृतिपु वृत्यमागा । प्रकृष्टमय कविच्विदाधिक्षया बहुत्वभाविनोऽस्तरपु तमपु-प्रत्यययोगरुचितिगतर-तमौ इति तयोरभिप्र 'तारतम्यम्' । सामान्य-कविच्चिदाधिक्षया-सातिशयाधिक्यलदण्णारस्थान्र्रययो गित्यमिति ॥ [३] १४६ ॥ निष्ठकं, आस्वेप, प्रसाद धीर प्रत्तर] प्रादिसे पांच प्रकारको होती है । [इन पांच प्रकारोंके] उपयोगके वाहुल्यक हष्टिसे यह [पांच भेदोंका] कहा गया है । [वैसे तो इन पांचके प्रतिरिक्त] और भी ध्रुवाएं होती हैं । इसलिए 'कविग्रहा' कहा है इसका प्रतिभिप्राय यह है कि कविग्रहवावोंके प्रतिरिक्त [अन्य] प्रयुक्ततांकी [प्रत्यात प्रयकर्त्तृके द्वारा प्रयुक्त] ये पांच प्रकारको 'ध्रुवा' होती हैं । इससे पूर्वं रङ्गके मध्यमे होनेवाली प्रोद्र्वार्ङ्गिक कल्पित गानकी ध्रुवाओंका निराकरण किया गया है । [प्रत्यात ये पांच प्रकार देवत 'कविग्रधा' मे होते है । अन्य भ्रुवाओंसे इन भेदोंका कोई सम्बन्ध नहीं है ।] ॥ [२] १४५ ॥

एकाैकापि त्रिधा स्व-स्वगुणाना तारतम्यतः ॥ [३] १४६ ॥

ग्रथ नाटचके पात्रोंकि प्रकृतिका भेदोंका बतलाते हैं--[श्लोक २३२]—[निष्ठक] स्त्री, धीर, पुऱष [पात्रों] की उत्तम, मध्यम तथा प्रथम तीन प्रकृत्तियां होती हैं । प्रोद्र अपने अपने गुणोंकि तारतम्यसे उनमेंसे प्रत्येक [प्रकृति] के फिर तीन तीन भेद हो सकते हैं । [३] १४६ ।

[उत्तम पदका निर्वचन करते हैं । इस उत्तम पदसे] 'उत्' यह अप्यय उत्तम रसमें है । उससे प्रकट श्रायमें तमप् प्रत्यय होकर 'उत्तमा' पद बनता है । इसका प्राभिप्राय यह है कि [जिसकी वाङ्ग चेष्टाएं उत्तम रसको जाती हैं[वह उत्तम प्रकृति कहलाती है] जिससे प्राप्त होनेवाले भले घुरे स्वभावको प्रकृति' कहते हैं । 'पुर्वंकापि त्रिया' इस व्यासपर दुबारा श्रयुक्त हु] त्रिया' इससे [यह सूचित किया जाता है कि पहली बार जो उत्तम मध्यम व अधम तीन प्रकृत्तिकी कथा गई यों वे] तीनों प्रकृत्तियों प्रकृतिपु घ्रपने र्पानमें भी उत्तम, मध्यम तथा नीच [भेदोंसे] तीन प्रकार हो सकती हैं । [यह वाक्यरचनां तारतम्यत में महे हु] 'गुणा' प्रत्येक [उत्तम, मध्यम व प्रथम प्रादि] प्रकृतियोंोंके पालने वाले हैं ।

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शरण्यो दक्षिणः पुंसां गुणानाम्— [सूत्र २३३]—शरण्यो दक्षिणगस्त्यागी लोक-शास्त्रविचक्षणः । ग्राम्भीय-धैर्य-शौण्डीर्य-न्यायवानुत्तमः पुंसाम् ॥ [४] १४७ ॥

शरणागमनादिगुणैर्युतः । तत्र साधु । 'दीक्षया' 'श्रुतत्' । 'शौर्य' सद्देतानात्र लोकव्यवहार उच्यते । तत्र 'विचक्षणः' । प्वामाद्योऽन्यैडप्युतमपुरुपगुणा दृश्या इति ॥ [४] १४७ ॥

अथ मध्यमप्रकृति— [सूत्र २३४]—मध्यो मध्यगुणः । 'मध्या' नाप्युत्तमश्रा नाप्यकनिष्ठा 'गुणा' लोकव्यवहार-चातुर्य-कला-विचक्षण-त्वादयो धर्मा य्रस्येयति ।

[प्रस्तुत 'तारतम्य' शब्दका प्रयोग करते हैं] 'प्रकृत्' [पद] से कुछ प्राधान्य ग्रोर बहुत श्रध्यमे होनेवाले 'तरप्-तमप्' दोनो प्रत्ययोंके प्रतुकरएा रूपमें 'तर-तम' [प्रत्ययां] हैं । उन [तर-तम] का भाव 'तारतम्य' हुग्रा । [उसका प्रयोग यह है कि] सामान्य, उससे कुछ प्राधिक ग्रोर उससे भी विशेष क्रधिक रूप तीन प्रकारोंसे युक्त [भाव 'तारतम्य' कहलाता है] ॥[३]१४६॥ प्रस्तुत ग्राहे उत्तम प्रकृतिवाले पुङषके गुएोंको कहते हैं— [सूत्र २३३]—शरए्याोंके रक्षणामें साधु, श्रनुकूल, त्यागी, लोकव्यवहार तथा शास्त्रो में निपुएा, गम्भीरता, घीरता, पराक्रम भोर न्याय-विचारसे युक्त पुरुष 'उत्तम' पुरुष कहलाता है । [४] १४७ ।

अथ नीचप्रकृति— [सूत्र २३५]—नीचः पापीयान् पिशुनोऽलसः । कृतघ्नश्च कलहप्रियः स्त्रीजितोऽक्षवाग्जडः ॥ [५] १४८ ॥

अब ग्राहे मध्यम प्रकृति [के पुरुषके गुएोंको कहते हैं]— [सूत्र २३४]—मध्यम गुएांवाला [पुरुष] मध्यम प्रकृति कहलाता है । 'मध्यम' प्रयोत न तो प्राधिक उत्कृष्ट ग्रोर न ही प्राधिक निकृष्ट 'गुए' प्रयोत लोक-व्यवहारकी निपुएाता, चतुरता, विद्धत्ता ग्रादि धर्मो जिसके हो [यह मध्यम प्रकृतिका पुरुष कहलाता है] ।

नीच प्रकृतिवाला पुरुष प्रतिभत्नत पाप करने वाला, पिशुन, कलहप्रिय, स्त्रीजित, हद्रो-मिरत ग्रोर हस योवनेबाला होता है । [५] १४८ ।

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लज्जावती मृदुधीरागभीरास्मितहासिनी । विनीता कुलजा दक्ष वत्सला योपिदुत्तमा ॥

इस प्रकार यहाँ तक उत्तम, मध्यम व प्रथम तीनो प्रकृतिवाले पुरुष तथा स्त्रियो प्रकृतियोंके स्त्रियोकें गुणा कहे गए हैं । अब आगे मध्यमा तथा नीचा [स्त्रियोकें लकषणा कहते हैं]—

नरवचनमध्यमा-नीचे— मध्यम-नीचपुरुपवचनमध्यमा-नीचे त्रियौ योध्रये । एपा नृ-त्रियोक्रिया प्रकृति-रुपा विरुपा रुपासुरूपपिसी चेष्टि पुनस्त्रिप्रकारा । तत्सानुरुपा पुंसः पौंस्न, स्त्रियास्तु नैपो वयोडवस्थाडनुरुपो भाव । विरुपा तु वालोचितभावस्य स्थिरोचेष्ट, स्थविरोचित-तस्य तु यौवन दर्शयन् । स्त्रुपानुरूपपिसी पुरुषोडपि स्त्रीरूपेष्टा भव्या, स्त्रिया पुंरूपया च स्त्री-पुं'सभावदर्शनमिति ॥

'विप्रुन' पर्यात 'चुगतखोर' । 'क्लीबो' पर्यात 'शक्ति रहित' [क]१५६।। प्रथम प्राणों उतम स्त्री [के गुनों] को कहते हैं— लज्जावती, मृदु, धीर, गंभीर, मंद मुस्कानेशाली, विनीत, कुलजा, दक्ष, वत्सला योपिदुत्तमा है ।[ख]१५६।।

इस प्रकार यहाँ तक उत्तम, मध्यम तथा प्रथम प्रकृतिके पुरुष तथा स्त्रियोके नखशिख दिसलाकर आगे मध्यम तथा प्रथम प्रकृतिके पात्रोंको भी नाट्यमें नायक वनमा जा मक्ता है दस वातोंको जि[ह]सते हैं । प्रथम विवेकने केवल उत्तम प्रकृति वालो नायकोंको वनाए जाने| विधान किया था । उससे भिन्नाक्षपने यहाँ मध्यम तथा नीच प्रकृतिके नायकोंको वनानेकी भी विधान किया जा रहा है ।

मध्यम तथा नीच पुरुषोंके समान मध्यमा तथा नीच स्त्रियाँ [होनी हैं]। पुरुष तथा स्त्रियपोंको यह [उत्तम, मध्यम तथा प्रथम रूप] तीन प्रकारको होती है । उनमेंसे पुरुषका अनुरूप भाव 'पुनरुपा' [प्रकृति] कहलाता है । धीर वालोचित भावका वृद्धकेद्वारा प्रयवा बनाकर प्रयवा स्त्री भी पुरुष वनकर [कमर] स्त्रीभाव तथा पुरुषभावको प्रदर्शान करते हैं वह 'ह्युपानुरुपपिसी' प्रकृति कहलाती है ।

मध्यमम तथा नीच पुरुषोंके समान मध्यमा तथा नीच स्त्रियाँ [होनी हैं]। पुरुष तथा स्त्रियपोंको यह [उत्तम, मध्यम तथा प्रथम रूप] तीन प्रकारको होती है ।

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ग्रथ प्रवन्ध्येपु नीचप्रकृतिकमपि नायकमाह—

कथावस्तु, तस्य वशे सामर्थ्यं हृदनीयत्वादि तस्माद् भाषा-प्रहसनयोः, कस्याश्चिद् वृत्त्यां च नीचोडपि नायकः । प्रथमविवेके मध्यमोत्तमयोरनायकत्वमुक्तं तद्पवादोड्यमिति ।

[सूत्र २३८]—नीचोडपिेश: कथावशात् ।

[सूत्र २३६]—प्रधानफलसम्पन्नोऽव्यसनो मुख्यनायकः ।

व्यसनं स्वव्याघातकृतः, विपद्रा ॥ [७] १६० ॥

[सूत्र २३६]—प्रधानफलसम्पन्नोऽव्यसनो मुख्यनायकः । ॥[७]१६०॥

अथ सर्वश्रपकेषु सुप्रयनायकं लचयति—विपत्तौ स्वव्याघातकृतः, विपद्रा ।

[सूत्र २४०]—तेजो विलासो माधुर्यं शोभा स्थैयं गभीरता ।

श्रौदयं ललितं चाष्टौ गुणा नेतॄन् सत्क्वजा: ॥ ॥ [५] १६१ ॥

[सूत्र २४०]—तेजो विलासो माधुर्यं शोभा स्थैयं गम्भीरता । श्रौदयं ललितं चाष्टौ गुणा नेतॄन् सत्क्वजा: ॥ ॥ [५] १६१ ॥

'ग्रग्रे' इत्युक्तपरिगणनम् । न तु संख्यानियमोऽङ्गेयेपामपि सम्भवान् । सर्वं विपुलाश्रयत्वान्मू ॥ [५] १५२ ॥

ग्रथ यथागे ग्रवन्थकाव्योमें नीच प्रकृतियाले नापकों [मे हो सकने] कर भी प्रतिपादन करते हैं—

[सूत्र २३५]—कयाके ग्रनुसार कहों नीच भी नायक हो सकत है ।

कया ग्रर्थात् ग्राथ्यमान-वस्तु । उसके यथासे ग्रर्थात् सामर्थ्यसे ग्रर्थात् हृदनीयत्व ग्रादि को दृष्टिसे । इसलिए 'ग्राश्र' ग्रोर 'प्रहसन'पे तथा किसी 'वीथी'मे नीच भी नायक हो सकत है । प्रथम विवेकमे [केवल्] मध्यम तथा उत्तमके नायकत्वका कथन किया था यह उसका ग्रपवाद है ।

[सूत्र २३६]—[श्रपक्]े प्रधान फलको प्राप्त करनेवाले [विपदासक्तिरित्यादि-हानि रुप विपत्ति] व्यसनसे रहित मुख्य नायक होत है ।[७]१६०।

व्यसनका ग्रथं स्वग्राविके प्रति ग्रासक्ति ग्रथवा [प्राराहानि ग्रादि रुप] विपत्ति है ॥[७]१६०॥

[सूत्र २४०]—ग्रथ इत [मुख्य नायक] के गुणे को गिनाते हैं—

[सूत्र २४०]—तेजो विलासो माधुर्यं शोभा स्थैयं गम्भीरता । श्रौदयं ललितं चाष्टौ गुणा नेतॄन् सत्क्वजा: ॥ ॥ [५] १६१ ॥

१. तेज, २. विलास, ३. माधुर्य, ४. शोभा, ५. सिथरता, ६. गभीरता, ७. उदारता, ८. ललित ये ग्राठ गुणे रहते हैं ।[५]१६१। 'ग्रग्रे' इस पदसे [कारिकामे] कहे हुए [ग्राठ गुणे] की गणना दिखलाई है । यह संस्थाका नियम नहीं है [प्रयत्न् ग्राठ हो गुणे मुख्य नायकमे होते हैं यह 'ग्रग्रे' पदका ग्रभिप्राय नहीं है । कयोंकि इनके प्रतिरिक्त] ग्रन्य गुणे भी नायकमे हो सकते हैं । ['सर्व-विपुलाश्रयत्वान्मू' पदमे] 'सर्व' ग्रब्दसे विपुलाश्रयत्वकी प्राप्ते होति है ॥[५]१५२॥

(१) ग्रथ ग्रागे इन [ग्राठ गुणे] मेसे प्रत्येकके भलग-भलग लक्शणे कहते हैं—

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नेपादेरसहिप्सु त्वं तेजः प्रापातयेडपि च । चेपस्सितरस्कार । प्रादिशन्नाद् वैन्यारक्रादिमह्द ।

(१) ग्रथ निलास - प्राप्तनाशके सकटको स्वीकार करके भी प्रपमान प्रानिको सहन न करना 'तेज' पहललाता है । 'सह्य' अर्थात् तिरस्कार । प्राप्ति दबदसे दैन्य प्रोर प्राप्ता प्रादिका प्रहुए होता है । 'प्रापातयेडपि च' इसका ग्रपने प्राप्तोके विनाशको भी स्वीकार करके यह प्रभिप्राय है । इसलए 'प्रसहित्सुत्व' का ग्रंथ सहन न करना क्षमा न करमा है । देश, काल, प्रवस्या प्रादि की ग्रपेक्षासे उस समय सहन करके बादमें उसका बदला लेना [निर्हातन, प्रसहिसुत्व दब्द का ग्रथं] नहीं है ।

विलासो वुशवद् यातं धीराः हृद् स्सिमितं वचः । 'शुपो' मद्दोक्त ! धीरत्वमुदात्तत्वमार्मति ॥ [६] १६२ ॥

(२) ग्रथ विलास [गुणक लक्षण करते हैं]- यपके स्मिति यति, घोर हसित और मुस्कराते भए ख्यात करना यद 'विलास' गुणका लकषन है । [६] १६२ ।

माधुपं विकृति: स्तुत्या क्षोभहेतोर् महत्स्यापि ! प्रसुताद् रूपाद् स्त्यान्तरं 'विकृति' । 'भनुत्या' रोमाञ्च-परिरवद्नध-जमधु-वेशसामारचन-श्रमावलोकनादिवान । 'चोभ' मद्दनचलनमिति ।

(३) ग्रथ ग्रांगे माधुर्य [गुणाथ लकषन करते हैं]- क्रोध ग्रानेक महान् वारसा उपस्थित होनेपर भी हलच्ी सो विकृति माधुपं [ऋपे कहलाती] है । प्रस्तुत वतमान रूपसे भिन्न श्वरूपकी प्राप्ति 'विकृति' कहलाती है । हत्से-से [स्तुत्या अर्थात्] रोमाञ्च, कमर क्सन, मूचोपर ताव देना प्रोर नमश्रो प्रोर देवनार भारदन [हसने-

शोभा चिह्नं घृणा-सपर्द्धा-दाक्ष्य-शौर्योद्यमोन्नये ॥ [१०] १६३ ॥

सो दि्वतक्त प्रकान्ना मापुमं ग्रपे कहलाता है । 'शोभ' पर्यात सततम विचर्ातत हो जाना । (४) ग्रथ 'शोभा' [गुणक लकषण करते हैं]- घृणा, रपर्द्धा, दक्षता, शौर्यं तथा उद्योगमं वियमान होनेपे प्रस्तमान करनेक चिह्न शोभ [गुण] कहलाता है ॥ [१०] १६३ ॥

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‘चिह्न’ घृणादे. सत्तानिश्चयहेतुः शरीरविकारः। ‘घृणा’ नीचार्थजुगुप्सनम्। ‘स्पद्र्रा’ श्राधिकेन सह साम्याधिक्याभिलापः। ‘उद्यम’ उत्साहः। अपामुन्‍नय. सत्तानिश्चय इति ॥ [१०] १६३ ॥

(द) ग्रथ स्थैयंम्— [सूत्र २४५]—विष्टनेष्ट्यचलनं स्थैयं प्रारब्धादासुभादपि । ‘विष्टन.’ प्रत्यूह. । ‘श्रचलन’ धैर्य्यम्। श्रासुभोमिष्‍ परलोकानुचितामिति ॥ (ङ) ग्रथ गाम्भीर्यम्— [सूत्र २४६]—गाम्भीर्य्यं सहजा मूर्तिः कोप-हर्षादिगोपनी ॥ [११] १६४ ॥ ‘सहजा’ सुतरां-रहष्‍टविकारादिरहिता। ‘मूर्ति:’ देहस्वभावः। ‘ग्रोपी’ प्रच्‍छादयति ॥ (च) ग्रथौदार्य्यम्— [सूत्र २४७]—श्रौदार्य्य शत्रु-मित्रारां प्रारितेनात्म्युपग्रहः । यहुवचनान्मध्यस्थानं गृह्यते। ‘ग्रपि’-शब्देन दान-प्रियभाप्पादिमग्रहः। ‘उपग्रह’ उपकार इति ॥ (छ) ग्रव् ग्रागे स्थैयं [गुणका लक्शण करते हैं]— [सूत्र २४५]—विष्टनोके उपस्थित होने पर भी मोर प्रभुभ प्रारब्धसे भी [अपने विष्टन’ श्रर्थात् प्रत्यूह चारा। ‘प्रचलन’ प्रर्थात् हृढ़ रहना। ‘श्रासुभ’ का ग्रर्थ यहाँ परलोकके श्रयोग्‍प [कर्म श्रादि] है। (ज) अव् ग्रागे गम्भीर्य्यं [गुणका लक्शण करते हैं]— [सूत्र २४६]—लोघ मोर हर्ष ग्रादिको प्रकट न होने देनेवाली स्वाभाविक देह-निर्यात का नाम गाम्भीर्य्य है ॥ [११] १६४ ॥ सहजा श्रर्थात् [क्रोधादिके ग्रानेपर भी] मुखकी लालिमा म्रोर हष्‍टिके विकार ग्रादि से रहित। ‘मूर्ति’ प्रर्थात् देहका स्वभाव। ‘ग्रोपी’ शब्दसे [कोप म्रोर हर्षके साथ] भय-शोकादिकम्रहः। ‘गोपनी’ प्रर्थात् प्रच्‍छादन करने वालो [प्रष्ट न होने देने वालो] (झ) ग्रव् ग्रामे श्रौदार्य्य [गुणका लक्शण करते हैं]— [सूत्र २४७]—अपने प्राणे देखकर भी शत्रु या मित्रका उपकार करना ‘श्रौदार्य्य’ कहलाता है। यहुवचनमे [नात्म प्रोक्त मित्रोक साप] मध्यपक्षोका भी ग्रहण होता है। ‘प्रारित’ शब्देन स्वजनीहितत्यय दानमुपयत. । ‘ग्रपि’-शब्देन

दान-प्रियभाप्पादिमग्रहः। ‘उपग्रह’ उपकार इति । ‘चिह्न’ प्रार्थन्तु धरात. प्राविको विट्‌ष्‌ठमानताका निश्चितायक हेतुभूत शारीरिक विकार । नीच प्रथंको जुगुप्सा [घृणा] होने ‘घृणा’ है प्रधिक हुए बालेकी वरावरी करना या उससे प्रधिक बतलने की इच्छा ‘स्पद्धा’ [फहलाती] है। ‘उद्यम’ का श्रर्थ उत्साह है। इनका ‘उन्‍नयन’ श्रर्थात् सत्ता का निश्चय [जिस चिह्न‌के द्वारा होता है उसको ‘सोभा’ गुण कहते हैं] ॥ [१०] १६३ ॥

‘विष्टन्.’ प्रत्यूह. । ‘श्रचलन’ धैर्य्यम्। श्रासुभोमिष्‍ परलोकानुचितामिति ॥

‘चिह्न’ घृणादे. सत्तानिश्चयहेतुः शरीरविकारः। ‘घृणा’ नीचार्थजुगुप्सनम्। ‘स्पद्र्रा’ श्राधिकेन सह साम्याधिक्याभिलापः। ‘उद्यम’ उत्साहः। अपामुन्‍नय. सत्तानिश्चय इति ॥ [१०] १६३ ॥ (द) ग्रथ स्थैयंम्— [सूत्र २४५]—विष्टनेष्ट्यचलनं स्थैयं प्रारब्धादासुभादपि ।

‘सहजा’ सुतरां-रहष्‍टविकारादिरहिता। ‘मूर्ति:’ देहस्वभावः। ‘ग्रोपी’ प्रच्‍छादयति ॥

(ङ) ग्रथ गाम्भीर्यम्— [सूत्र २४६]—गाम्भीर्य्यं सहजा मूर्तिः कोप-हर्षादिगोपनी ॥ [११] १६४ ॥

यहुवचनान्मध्यस्थानं गृह्यते। ‘ग्रपि’-शब्देन दान-प्रियभाप्पादिमग्रहः। ‘उपग्रह’ उपकार इति ॥

(च) ग्रथौदार्य्यम्— [सूत्र २४७]—श्रौदार्य्य शत्रु-मित्रारां प्रारितेनात्म्युपग्रहः ।

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श्रय ललितम्—शृङ्गाररिचेष्टा ललितं निर्विकाराः स्वभावजाः ॥

'शृङ्गारस्य' शृङ्गारजनिता । चेष्टा 'तिर्यगमलोकन-चक्षोःस्थभावापन्न-शरीर-सम्भ्रमार्द्रिका । 'निर्विकार.' गहनार्थहिता । 'स्वभावजा' शृङ्गारप्रवृत्तिजाडति ॥

अथ सुरसनेतारसुक्त्वा गोगणमाह—प्र मुदितो नायकः किश्रिद्दूनवृत्तोडप्रचचायिकात् । 'अमुदित्यस्य' प्रधानम्लानापच्चयाडवान्तरफलभाजनत्वात् । 'नायकस्य' बहुत्तर-वृत्तस्यापकर्षवान् मुख्यनेतृमहायोग्यतयाञ्च । 'किश्रिद्दूनम्' म्लपनयूनं वृत्त शौर्य-स्याग-बुद्धि-यादृकं यस्मात् । श्रय च पताकाप्रकरोल्त्पो नायको उत्तम्य इति ॥

अब नायकके भेद कहते हैं—जो नायक किञ्चित् दीन वृत्तिवाला होता है वह 'प्रमुदित' कहलाता है । जिसकी वृत्ति पर्याप्त दैन्य-रोग आदि बुद्धि आदिक [मुख्य नायककी प्रवेक्षा २४६ तथा ३२२ में प्रथम त्रिवेकेने कहे ह्र] पताका' तथा प्रकृति' नायक सम्भने चाहिए ।

[सूत्र २५०]—लोभो धोरोदधतः पापो, व्यसनो प्रतिनायकः ॥

मुख्यनायकस्य प्रतिपक्षी नायक 'प्रतिनायक' । यथा राम-रावणयोः 'व्यसन-दुर्योधनौ इमौ ॥

(५) श्रव ललित [निपुणता लश्षण श्रागे करते हैं]—[निद्रात] विकारोसे रहित स्वाभाविक शृङ्गार चेष्टाः सत्त्त कहलातो हैं ॥

'शृगारस्यो' पर्यात शृगारमे उत्पन्न होने वाली । चेष्टा' प्रधाल तिरधो नश्रसे देवनत चकोधितप्तोसे भापरा, तथा वारीरको सजाना ग्रादि । 'निर्विकार' पर्यात धभुद्ररततासे रहित । 'स्वभावजा' पर्यात बिना सोच कंर को हुई ह्र ।

[सूत्र २४६]—मुख्य नायककी प्रपेक्षा कुग्य कम वृत्त [क्लेश कदाचन] वाला मुख्य नायक कललाता है ।

प्रयान फलकी प्रपेक्षा प्रयान्तर ममुरप फलकका पात्र होनेसे इसे 'प्रमुख्य' कहा गया है । और बहुत यत्न कधा जानेसे ध्यपकर्ष होने तथा नायकके सहायक रूपं होनेसे उत्कृष्ट 'नायकत्व' होता है । जिसकी वृत्ति पर्याप्त दैन्य स्याग और बुद्धि आदिक [मुख्य नायककी प्रवेक्षा] 'किश्रिद्दूनम् पर्यात श्रम हैं । और यह [प्रमुरय नायक कारिका २६ तथा ३२ में प्रथम त्रिवेकेने कहे ह्र] पताका' तथा प्रकृति' नायक सम्भने च्चाहिए ।

[सूत्र २५०]—प्रतिनायकः लोभो, धोरोदधतः, पापो चौर व्यसनी होता है ।

मुख्य नायकका विरोधी नायक 'प्रतिनायक' बहलाता है । जंमे राम और प्रतिप्रतिष्ठिरयो विरोधी रावण और दुर्योधन ग्रादि ॥

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अ्रथ विदूपकादीनां प्रकृति केपाश्रिललक्षणं चाह— नीचो विदूपक-कलोभ-शकार-विट-विडूषा: । हास्यापाये नृपे क्ष्माल: शकाररस्त्वेकविद् विट: ॥

'कलोभो' नपुंसक । एषां नीचत्वं नैसर्गिकम् । स्वामिचित्तानुरोधादीपाधिकं तु मध्यमत्समपी । तत्राशो विदूपकेऽपि हास्यनिमित्तं भवति । हास्यं चास्य श्रेणी-नपुंसक-विटो- विकारान् श्रेढा । तत्रांगहास्यं श्लेषत:-रूष-दन्तुर-विकृताननतस्यादिना । नेपथ्यहास्य- मत्यायताम्रतरतोैलोकित-विलोक्षित-गमनादिना । वचोहास्यमसम्बद्धानर्थेकाकलील- भापणादिना भवति । 'नृपे' नृपस्य सम्चन्धी 'भ्याल' पल्तीश्राता । नीचत्वादेव चायं होतजाति । 'हास्याय' इति स्वार्थे षष्ठी । राजपुत्रादीनपश्याल शकार, कित्थिं विकृतहास्यहेतु परिचारक मव । एकं राजोपयोगि किश्चित् गीतादिपु मध्ये वेति इति एकविद्, विटो झेप इति ॥

अ्रथ धीरोरद्रतादीनां नेतॄणां प्रत्येकं विभिन्नान् विदूपकानाह— सिन्धा धीरोरोद्रतादीनां यथौचित्यं वियोगिनाम् । लिगो द्विजो राजजीवी शिल्प्यरुचते विदूपक: ॥

अ्रत्र प्रागे विदूपक श्रादिवी प्रकृति प्रोर उनमेसे किन्हींने लक्षण कहेते हैं— विदूपक नपुसक शकार विट प्रोर भूष श्रादि नीच [पात्र होते हैं] उनमेसे पहला [प्रयात् विदूपक'] हास्यके [उत्पन्न करने] केलिये होता है । राजाका [नीच जातीय] सातो 'शकार' कहलाता है । [राजाके उपभोगी कृत्य गोतादि] किसों एक वातको जानने वाला 'विट' कहलाता है । 'कलोभ' श्रर्थात् नपु सक । इसका नीचत्व स्वाभाविक होता है । किन्तु स्वामीके दितके प्रभुसार प्रौपाधिक हपसे मध्यमतव मो हो सकता है । उनमेसे पहला प्रयोत् विदूपक [अपने लिये] हास्यजनक होता है । इसका हास्य (१) प्रा, (२) वेष भपा तथा (३) वचनोसे [सबके लिये] होता है । इसका हास्य तोन प्रकारका होता है । जंसे गजापन, लगड़ापन, बाहर मिलकते हुए या ऊपर बेठे हुए दोनो प्रोर विकृत मुख प्रादिसे प्रज्न-हास्य होता है । प्रतन्त्रत मो-चौड़े प्रतत्रोसे उपर तकने, इधर उधर देखने प्रोर ममन प्रादिके द्वारा नेपथ्यहास्य होता है । प्रोर प्रसबद्ध प्रतथंक तथा अलौक्ल भापण प्रादिके द्वारा वचन मूलक हास्य उत्पन होता है । 'च्रपे' प्रर्थात राजाक सम्चन्धी । 'भ्याल' श्रर्थात पत्नोका भाई । नीच [पात्रोमें परिगणित] होनेसे राजाके राजपुत्र श्रादि [उत्तमजातीय] सारे साते 'शकार' नहीं होते है क्रपितु विकृति हास्यके कारआभूत [नीचजातीयम] परिचारक [ हपसे श्राता ] हु । 'शकार' कहलाता है । विटके तक्षणमे प्राए हुए 'एकविद्' पदका श्रर्थ करते हैं । गीतादिमेसे राजाके उपभोगो किसो एक को जानता है इसलिये 'एकविद्' विट कहलाता है ॥

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निगद्याः' मुद्दृदः । 'ग्रादि' शब्वादात् घोरोदात्त-घोरललित-धीरप्रशान्ता गृह्यन्ते । तत्र 'वियोगिनां' विप्रलम्भश्रृङ्गारवतां शृङ्गारचर्यावस्थितिक्रमेण लिङ्गाद्यो ययासंभयं मन्त्रे विप्रलम्भे, विप्रहर्ष संविग्नता च विप्रेप्सा दृश्यन्ते विनाशाय । विप्रलम्भं तु विनोदनानेव विस्मारयन्ति । उक्तं 'विदूपकः' । उचितरच लिङ्गी दिव्यतानां, ब्राह्मणस्य शिष्यः, राज्ञां तु शिष्यवर्गस्थः । पच वसिगणादेरपेति ॥ [१४] १६८ ॥ श्रथैवासेध धोरोदात्तादीनां महाशयानां—

इसमें कुछ अथवा तथा काम [जो सिद्धि] में सहायक होते हैं । मुख तथा [जो तिद्धि] में सहायक होते हैं घोर धीरललित [नायक] सहायपत्तसिद्धि ही होता है । सहायकोंका व्यापार नायकत्व हो व्यापार माना जाता है । क्योंकि [धोरललित] नायक इसौ [सहायपत्तसिद्धि नायकके द्वोहर] घोरोदत्त ग्रादि [नैप तीन प्रकारक नामक] तो (१) स्वापत्तसिद्धि, (२) अन्यापत्तसिद्धि घोर (३) उभयापत्तसिद्धि

[सूत्र २४२]—युवराज-सेनापति-पुत्रोधः-सचिवादपः । सहायौ एतदायत्तकर्मे तल्लितः पुनः ॥ [१६] १६८॥

'ग्रादि' शब्दादाटविक-सामन्तादिगतवापरादनयस्च गृह्यन्ते । पते च केचिदर्थकामयोः मदायाः । केचित् धर्मेस्सहायाः । तथा सदायायत्तसिद्धिरेव धीरललितः । महानत्यापारस्य नायकरूप्यापार मथ, पताकृत् पताकान्नायकत्व ! घोरोदात्ताद्यस्तु म्रग्रन्थ-उपयसिद्धयः उक्तः ॥ [१६] १६८॥

[सूत्र २४२]—धोरोदत्त आदि नायकोंने [निगद्याः अर्थात्] मित्र शत्रु वियोगियोंके शृङ्गार्यके अनुसार लिङ्गी [ग्रप्रित नायकवाले या संशयसी ग्रादि] ब्राह्मण राजजीवी तथा शिष्य आदि विदूपक होते हैं । [१४] १६८ ।

'निगद्य' पर्यात् मित्र । [घोरोदत्त पदके साथ जुड़े हुए] 'ग्रादि' शब्दसे घोरोदात्त, घोरललित तथा घोरप्रशांत नायकको भी पहुआ होता है । इनके 'वियोगी' पर्यात् विप्रलम्भश्रृङगारयुक्त होनेपर शृङ्गारसम्भव लिङ्गी ग्रादि [विदूपक] उचितयके अनुसार होते हैं । [मागे विदूपक शादका निर्वचन दिलाते हैं] संशको विप्रहर्षपादनसें द्वारा तथा विप्रहुको संज्ञ-जनन द्वारा विप्रेप रपसे द्वेष्य ग्रथ्यांत विनष्ट करते हैं भोर विप्रलसभर्से मनोरंजन प्रदान करनेवाले [या संशयातो], ब्राह्मणके लिए शिष्य, घोर राजाके लिए निप्यको द्वोकर थेप तीनों विदूपक उचित हैं । इसौ प्रकार शृङ्गं ग्रादि भी [ग्रोचित्यायुसार विदूपक समभ -लेते चाहिए] ॥ [१६] १६८ ॥

[सूत्र २४३]—युवराज, सेनापति, पुरोधित प्रौर सचिव ग्रादि [इन घोरोदत्त ग्रादि नायकोंने] सहाय्यक होते हैं । भोर घोरललित [नायक] तो इन [सहायकों] मे ग्रापत्-सिद्धि वाला ही होता है । [अर्थात् स्वयम् कामं नहीं करता है ; सहायकोंद्वारा ही घोरललित नायकके सारे कामोंका सम्पादन होता है] ॥ [१७] १६८ ।

नायकके सारे कामोंका सम्पादन होता है] ॥ [१७] १६८ ।

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श्रथ शुद्धान्तोचितं परिवारमाह-- [सू० २५४]—शुद्धान्ते कारुको द्वाःस्थः कंचुकी शुभकर्मसु । वर्षपरस्तु रक्षाप्यां, निर्मुंण्डः प्रेप्सु सित्रया: ॥

[१७] १७० ॥ [१८] १७१ ॥ शुद्धान्तमन्तःपुरं, तस्मिन्नाचारवान् श्रायों होनसत्वः पुमान् ‘कारकः’ । स द्वारपालो दचो नपुंसकः । ‘कंचुकी’ श्रद्रुप्यजातिः स्त्रीभवभावः । तुच्छसत्वो विनीतस्त्रच ‘वपंचरः’ । श्रतितिनि.सत्त्वोऽकरकरच निमुंण्डः । स च म्त्रीषु नास्यादीनो प्रेप्सकारकः । ‘रक्षा’ भूत्याड़िकर्म । ‘स्वस्ति’मेङ्गलवाचनम् । ‘चित्र’ पत्र-वल्लत्यादि । श्रादि'शब्दाद् गन्ध-गुप-शिल्प-शाख्या श्रामनन-च्छत्र-मरइडन मेङ्गलत.श्राक्रीड इत्यनविग्र इति ॥ [१५१८] १७०-१७१ ॥ अथ नायिकां लक्षयति—

[सू० २५५]—नायिका कुलजा दिव्या क्षत्रिया प्रणयकामिनी । श्रन्तिमा ललितोदात्ता पूर्वोदात्ता त्रिधा परे ॥

[१६] १७२ ॥ [तीन प्रकारके] होते हैं ।। [१७] १६६ ॥ श्रथ श्रागे अतःपुरके उपयोगी परिवारकर-चर्ग का वर्णन करते हैं [सूत्र २५४]—ग्रन्तःपुरमें (१) कारक, द्वारपाल, कंचुकी शुभकर्ममें, (२) रक्षामें वर्षपंर, (३) रित्रयोस् प्रेप्स प्रामदिने निर्मुंण्ड, [पे कार्यकर्ता होते हैं ये पुरुष] । [१७] १७० । कार्यको सूचकान देनेमें प्रतीहारो, अभभूत श्रादि देने श्रोर स्वस्तिवाचनमें मेहरतरावो, पूर्वं-परगंपर विंधिके पालनमै शुद्रा श्रोर चित्रादि रचनामें शिल्पकारिका [ने चित्र्या कार्यकरों होती हैं] ।। [१६] १७१ ।। शुद्धान्तका श्रध्यक्ष श्रंगनःपुर है । उसमें सदाचार्यो, श्रेष्ठ श्रोर पोवहोन पुऱप 'कारक' [विशेष कर्ता] होना चाहिए । द्वारपाल चतुर नपुंसंक होना चहिए । उत्तम जाति का श्रोर स्त्रोस्वभाव वाला [पुंलिङ्ग] कंचुकी होना चािहए । यून पोढप वाला श्रोर विनीत [पुरुष] वपंचर [ग्रंन्त पुर-रक्षक] होना चािहए । प्रत्यंत पोढवहोन श्रोर प्रकमेङ्ग्य निमुंण्ड [होता है] । वह दासी श्रादि सित्रयोकों इधर-उधर भेजनेवाला होता है मे [कारिकाके रक्षा- स्वस्त्योमंहत्तरा भाप में प्रयुक्त] 'रक्षा' पद श्रभभूत श्रादि देनेके प्रयसे प्रयुक्त है । स्वस्तित प्रथातं मगल वाचन । चित्र प्रथांतु पत्रवल्लत्यादि श्रादि [कोी रचना] । श्रादि शब्दसे गन्ध पुष्प, शिल्प-दस्म्पा ग्रासन छत्र, मण्डन संचारह्न, खिलोना श्रोर पदे श्रादिका प्रहण होता है ।। १७०-१७१ ।! श्रथ श्रागे नायिकाके लक्शणको कहते हैं— [सूत्र २५५] कुलजा दिव्या क्षत्रिया श्रोर वेदपा [चार प्रकारकी] नायिका होती है । उनमें श्रन्तिम [प्रथांत् वेदया नायिका] ललितोदात्त [हो] होती है । श्रोर पहली [प्रपांत

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श्रान्तमा' इति पञ्चकामिन्यो ललितोदात्तया यथांनवीया कामार्थप्रचोदनान् । 'पूर्वा' कुलजा पुनर्मदात्ता, नय-विनय-गुरुभक्तियादिवक्षतत्यान् । 'पर' द्वाव्यामनये । तत्र धैर्यं-लोकहितं-नात्यन्वयेन त्रिप्रकारं। दिव्योत्तमजानित्वाभ्यां, कामार्थनिष्ठत्वाच्च । शान्तस्येभरत्नु भोगभूमिजत्वेन दिव्याना दिव्यासाहचर्येणोपपत्तत्वाच्च नायिकास्त्र तु गृहेते इति ॥ ८६ ॥ ९५२ ॥

'कुलजा' त्रिप्र-नृपादिगृहुलसम्भूता । 'श्रान्तमा' इति पञ्चकामिन्यो ललितोदात्तया यथांनवीया कामार्थप्रचोदनान् । 'पूर्वा' कुलजा पुनर्मदात्ता, नय-विनय-गुरुभक्तियादिवक्षतत्यान् । 'पर' द्वाव्यामनये । तत्र धैर्यं-लोकहितं-नात्यन्वयेन त्रिप्रकारं। दिव्योत्तमजानित्वाभ्यां, कामार्थनिष्ठत्वाच्च । शान्तस्येभरत्नु भोगभूमिजत्वेन दिव्याना दिव्यासाहचर्येणोपपत्तत्वाच्च नायिकास्त्र तु गृहेते इति ॥ ८६ ॥ ९५२ ॥

[सूत्र २४६]—रागिण्येवाप्रहसने नृपे दिव्ये च न प्रभो । गरिका यवापि दिव्या तु भवेदेपा महीभुजः ॥ [२०] ९७३ ॥

प्रहसनेऽर्जिते स्पष्चे गरिका नायिका मर्गएदेय विधेया । यथा मृच्छकटिकदौयां चाहुदत्तस्य वसन्तसेना । प्रहमने तु दृश्यनिरीक्षितं शृङ्गारतापि । नृप-दिव्यनायक- कियेाच गरिका न नायिका नियन्तनीया । यथा मृगांकिका यदृद दिव्या भवति, तदा राज्ञा 'वयापि' इति, वस्तानुरोधान्नायिकात्वं भर्यति । यथोवंशो मृच्छकटे । 'नृपे दिव्ये च न प्रभो' इत्यम्यापरादौड्यसति ॥ [२०] ९७३ ॥

कुलजा पर्याात् यास्यते वाऽथिलक् प्रादिमे कुलसे उत्पन्न हुइ [सत्रिप्रा नापिका वसता विनाई है] इसलिए कुलजाओं श्याल्यामें सत्रिप्रकार प्रहरू न करने वाहिए या चंडय कुलोत्रन्नाता हो यसंत्त [निप्करा नापिक तशरेंमें सलितोदात्ता हो यरांन करनी वाहिए । पूर्वा पर्याात पहिली कुलजा नापिका नीति विनय गोर गुढ़पों [माता पिता प्रादि] मे भप्रसे युक्त होनेंने कारगा उदात्ता हो [यरोंनोय होती है] 'वरे' पर्यांन [वेद्या तया कुनजा] इन दोनोंसे भित्र [दिध्या तया सलिता रुप] दोप दोनों प्रकारको नारिपकाएँ घोर, सलितरा तथा उदात्ता रुप होनेंने तीन प्रकारको होती है । रिष्य तथा उत्तम जोनिवालो होनेने घोर काम तथा पर्याान्तिल होनेंने [दिध्या तया सलितदा नापिकाएँ घोरा, सलितरा तथा उदात्ता] तीन प्रकारको होती हैं । दिव्य नापिकाओंके भोग-

कुलजा पर्याात् यास्यते वाऽथिलक् प्रादिमे कुलसे उत्पन्न हुइ [सत्रिप्रा नापिका वसता विनाई है] इसलिए कुलजाओं श्याल्यामें सत्रिप्रकार प्रहरू न करने वाहिए या चंडय कुलोत्रन्नाता हो यसंत्त [निप्करा नापिक तशरेंमें सलितोदात्ता हो यरांन करनी वाहिए । पूर्वा पर्याात पहिली कुलजा नापिका नीति विनय गोर गुढ़पों [माता पिता प्रादि] मे भप्रसे युक्त होनेंने कारगा उदात्ता हो [यरोंनोय होती है] 'वरे' पर्यांन [वेद्या तया कुनजा] इन दोनोंसे भित्र [दिध्या तया सलिता रुप] दोप दोनों प्रकारको नारिपकाएँ घोर, सलितरा तथा उदात्ता रुप होनेंने तीन प्रकारको होती है । रिष्य तथा उत्तम जोनिवालो होनेने घोर काम तथा पर्याान्तिल होनेंने [दिध्या तया सलितदा नापिकाएँ घोरा, सलितरा तथा उदात्ता] तीन प्रकारको होती हैं । दिव्य नापिकाओंके भोग-

[सूत्र २४६] अब इन [नापिकाआो] मे विशेष भेदको कहते हैं—प्रहसनसे भिम्र रुपकोंमें नत्सिका नापिका पतुरागिणी हो । निबद्ध करनी चाहिए । [प्रहसनमें मधुरराप रहित गरिका नापिका भी हो सबतो है] । राज्ञ प्रोर दिध्य नायककोे साय गणिका नापिकाका वरांत नहीं करना चाहिए । कहीं-कहीं यह गणिका नापिका यदि दिष्य हो तो उसका राजांक सात् सम्भोग्य वर्णन हो सकता है । [२०] ९७३ ।

प्रहसनसे भिम्र रुपकोंमें पत्निका नापिक: पतुरागिणी हो दिसलानी चाहिए । इसे मुच्द्रकटिकमें चारुदत्तकी यसमतसेना [पतुरागिणी नापिका है] । प्रहसनमें तो हारम [जनन]

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मुगधा मध्या प्रगल्भमेति त्रिविधा: स्पुरिमा: पुनः ।

इमा: कुलजादय इति । ग्रथ मुगधा—

मुगधा वामा रते स्वल्पमानः रोहिद्वयम्‌-लग्नरा ॥ [२९] १७४ ॥

रतं सुरतं, तत्र विपरीता ग्रनभिळत्स्वान्‌। रक्त ग‌वेषदीप्यो:‌कोपा । रोहत प्रवर्धमानं वयो यौवनं स्मरश्व यग्या इति ॥ [२९] १७४ ॥

मध्या मध्यवयः-काम-माता मूर्छोत्कतमोहना ।

मध्या ग्रनाधिहृदयद‌वयः-काम-माता यस्या: । मूर्छो‌अन्तं श्र‌चैतन्यपर्यं‌वर्सा‌ाय मोहनं सुरतं किंचिदभिलाष्या: । एपा च धीरा श्रधीरा धीराधीरा चैति त्रिधा । तत्र धीरा हतागसि प्रिये सेतो‌अंस‌व‌को‌क्तिपरा । अधीरा साश्रुपरंपरां‌व‌सी । धीराधीरा शास्त्रश्रासं परुष‌व‌क्रो‌क्तिवादिनीति ।

के कारसा ग्रनुरागहीन [नायिका न‌अ‌यिका] भो हो सकती है । राजा ग्रोर दिसप न‌अ‌यिकों के साथ गणिका न‌अ‌यिकाध‌अर वस‌अ‌न नही करना चाहिए । किन्तु यह गणिका यदि दिसप हो तो 'वच‌अ‌वि' इस क‌वने से क‌य‌अ‌वस‌्तु‌के भ‌नुरु‌ओ‌स्ते क‌भ‌नी राजाकी न‌अ‌यिका भो हो सकता है । जैसे उज्ज‌अ‌न्ती पुष्टर‌व‌अ‌की [न‌अ‌यिका है] । ‘न‌उपे दिस्से च व न प्रभो’ राजा ग्रोर दिसप न‌अ‌य‌वन‌के ह‌अ‌य गणिकाके वस‌अ‌न नहीं करना च‌अ‌हित‌ । इ‌अर [प‌उर्व‌क्त निष‌म] क‌अल यह ग्र‌थ वाद है जिसमे दिसप गणिकाकी राज‌अ‌को न‌अ‌यिका रूपमे वस‌अ‌न कर‌म‌नेकी प्रनु‌म‌ति वी गई है ॥ [२०] १७३ ॥

प्रव इन [न‌अ‌यिकाद्र‌मे] के तीन भेद बतलाते हैं—

[कुलजा विस्या अभिरया ग्रोर म‌धि कार] ये [चारो न‌अ‌यिकाए] किर मुगधा मध्या ग्रोर प्रगल्भा [मे‌व‌स्ते] तीन प्रक‌अरकी होती है ।

वे श्र‌प‌ने कुलजा ध‌अ‌वि [चारो न‌अ‌यिकाए इनमेसे प्रत‌येकके तीन-तीन भेद होते है । कुल मिल‌अ‌कर व‌अरह भेद हो जाते हैं] ।

प्रव मुगधा [न‌अ‌यिकाका ल‌क्षन‌ करते हैं]—

[सूत्र २५५]—'यौवन ग्रोर कामके उठ‌अ‌व‌पर दिय‌अ‌त' स्वलप मान व‌अ‌ल‌सी स‌थ‌अ या मुगत-उप‌अ‌व‌र‌मे प्रत‌िकूल न‌अ‌यिका 'मुगधा' न‌अ‌यिका कहल‌अ‌ती है [२९] १७५ ।

प्रथ श्र‌अ‌ते मध्या [न‌अ‌यिकाका ल‌क्षन‌ करते हैं]—

[सूत्र २५६]—मध्यम श्र‌अ‌यु, मध्यम क‌अ‌म ग्रोर मध्यम मान व‌अ‌ल‌सी त‌थ‌! सुरतक‌अल‌मे [प्र‌अ‌न‌व‌अ‌ति‌रे‌क‌से] मूर्छा प‌यं‌त प‌हु‌च‌ ज‌अ‌नेव‌अ‌ली मध्या न‌अ‌यिका होती है ।

मध्यम स‌म‌प‌अ‌न्त स‌प्रेअत, जिसकी श्र‌अ‌यु, क‌अ‌म तथा मान [स‌प्रेअत] होते है [वह मध्या न‌अ‌यिका कहल‌अ‌ती है] । मूर्छ‌अ‌न्त‌ श्र‌अ‌य‌चैतन्य प‌यं‌त जिसक‌अ 'मोहन' म‌अ‌प‌अ‌त सुरत-स‌म‌प‌अ‌र होता है । स‌य‌ओ‌कि वह [मुरत‌अ‌न‌अ‌द‌से] कुछ परि‌चि‌त हो चुकी है । ग्रोर यह मो‌ह‌रा, श्र‌ध‌प‌अ‌रा तथा धीर‌अ‌ध‌प‌अ‌रा भे‌द‌से तीन प्रक‌अरकी होती है । उनमेसे प्रिय‌के [प्र‌अ‌यन्त्र‌-सक‌र‌ग्रहण‌] स‌पर‌अ‌प-युक्त‌

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प्रथ प्रगल्भा—प्रगल्भेर्द्धवयोर्नन्यु-फामा स्पर्शोऽप्यचेतनः ॥

इदं दीप्ता वयो-मन्यु-कामा यथा। प्रियेऽपि स्पृष्टापि प्रकृष्टामत्वादेपा चैतन्यं मुञ्चति। अप्यापि मध्यावस्थां त्रिप्रकार। तत्र धीरा अतिक्रोधाद् द्वये सावदित्यादगा कुनोदामान्या च रतं। श्रथोरा मन्त्रजेन-नाडनपरा। घोराधीरा सौत्राममक्रकोक्ति-परेऽति ॥

प्रथ प्रकारान्तरेपा नायिकानां प्रमिद्धान भेदानाह—कार्यतः प्रोपिते पत्यावभूषा प्रोपितप्रिया । कार्यं धनार्जन-राजप्रयोजनादि, तरमाद् देशान्तरं गते प्रिये, प्रभूषा केश-मममार्जनादिभूपाराहितेति ॥

कार्यवश प्रियके चाहर चले जानेपर धीरोरकी सजावट न करनेवाली प्रोपितपतिका नायिका कहलाती है । कार्यवशात् धनोपार्जन प्रभवश राज्ञां प्रयोजनेऽपि, तस्माद् देशान्तरं को चले जानेवश भूषारहिता प्रथ्वति केशप्रसाधन प्रभृति रूप भूपाले रहिता 'प्रोपितपतिका' कहलाती है ।

प्रथ विप्रलब्धा—विप्रलब्धा ससंकेते प्रेष्य दूतीमनागते ॥

होनेवश व्यग्रपरा ताने देने वाली होती है । श्रथोरा रोते हुए कटोर वचन कहने वाली होती है । घोर घोरापोरा रोते दृपे वथाव श्रोर कटोर ताने सुनाती है । पूर्वां स्पृष्टे द्वौत श्रायु काम तथा मान वाली घोर [प्रिये] स्पर्शन-मानप्रदे [प्रानन्दातिरेक से] मूर्छित हो जाने वाली [नायिका] प्रगलभा नायिका कहलाती है । इदं श्रयान्तु द्वौत प्रायु, मान तथा काम जिसकें हैं वह [इदवयो मन्यु-काम दृपो] । श्रत्यन्त उपर काम-वासनाते युक्त होनेके वारशा मह [प्रगलभा नायिकां] प्रियतमके स्पर्शामात्रसे भी होनेअवशास मूल जाती है । यह भी मप्याकी तरह [घोरा-प्रघोरा घोर घोराधोरा भेदते] तीन प्रकारकी होती है । उनमेंसे घोरा प्रियके अपराधी होनेपर अपराधको द्विपाते हुए [प्रियके प्रति] श्रादर प्रदर्शित करती है, किन्तु सुरत-व्यापारमें उदासीन हो जाती है । श्रधोरा [प्रियको] डाँट-फटकार करती घोर मार तक लगाती है । घोराधोरा व्यग्रपरा ताने सुनाती है [२२] ॥

प्रथ नायिकाप्रकॄ ग्रन्थ प्रकारसे प्रसिद्ध भेदोंको कहते—कार्येण प्रियके चाहर चले जानेपर धीरोरकी सजावट न करनेवाली प्रोपितपतिका नायिका कहलाती है । कार्यं श्रर्थात् धनोपार्जन प्रभवश राज्ञां प्रयोजनेऽपि, तस्माद् देशान्तरं को चले जानेवश भूषारहिता प्रथ्वति केशप्रसाधन प्रभृति रूप भूपाले रहिता 'प्रोपितपतिका' कहलाती है । प्रथ विप्रलब्धा [नायिकां साय मिलनेष्टा] सकेत करके प्रोर दूतोंको भेज कर भी [प्रियके] न आनेपर [नायिका] 'विप्रलश्धा-नायिका' कहलाती है ॥

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पत्याविंत सर्वेपु स्वोभेदेपु स्मरणीयम्। तेन कार्यंत: कृतसंकते दूती या प्रेष्यतागते पत्या विप्रलब्धा'इति सम्बन्धः ॥ [२३] १७६ ॥

[सूत्रं २६३]—खण्डिता खण्डयत्पतन्यासक्तया वासकसज्जोपि या। अपरस्य यत्प्रसादाच्चित्तं वासकरं कुर्वीत प्रिये त्वसूयावती खण्डिता। विप्रलब्धया नायिकयासिकतारितयस्य भेद: इति । अथ फलहान्तरिता— [सूत्र २६४]—ईप्स्यांफलहनि निष्क्रान्ते कलहान्तरितांतभाक् ॥ [२४] १७७ ॥ ईप्स्यांफलहेन तस्मीं प्राप्ते निष्कान्ते तन्मविधमनुभवति प्रिये पीड्यावती फलहान्तरितेति । श्रनेष्यां या कलहपूर्वकं परस्परमसंयोगाभिलाष: । पूर्वं तु नायिका समागमार्थिनी कलहान्भावात्, किन्तु श्रन्यासंगिनि प्रिये ईप्स्यामात्रवतीति विशेष इति ॥ [२४] १७७ ॥ अथ विरहोत्कण्ठता— [सूत्र २६५]—विलम्बयत्यपदेशेपि विरहोत्कण्ठितोत्सुका । 'वर्यो' यह पद सच विषयों [प्रयात्न सत् नायिकाग्रों] के साथ सम्भ लेता चाहिए । इसलिये कार्यंवश [मिलनेका] संकत करके भी दो दूतोंको भेज करके नो कार्यवश पतिका न भा सकने पर विप्रलब्धा नायिका होता है यह सबन्ध है ॥ [२३] १७६ । प्रवृत्त नायिका [नायिकाका लक्षण करते हैं]— [सूत्र २६३]—खण्डिता नायिका [पतिका] प्रथम स्त्रीके प्रति प्रसक्तिके कारण इप्स्यापुरत होकर [मन्य स्त्रीके पास जाते समय उसके] वस्त्रों को खण्डित कर देती है । प्रन्य स्त्रीके प्रति प्रसक्तिके कारण सुन्दर वस्त्र धारण करते समय पतिके प्रति प्रसुप्तावतो नायिका 'खण्डिता' कहलाती है। विप्रलब्धा नायिका मे [उसके पतिमे दूसरे स्त्रीके प्रति प्रासक्ति न होने] हेतुके प्रति प्रासक्ति नहोता है यह [सौन्दन्या तथा विप्रलब्ध्या] भेद है । प्रवृत्त कलहान्तरिता [नायिकाकां लक्षण करते हैं]— [सूत्र २६४]—ईप्स्यांफलहने, कारणात् पतिके बाहर घले जानेपर तु खी होने वासो ईप्स्यां कलहेतु कारण उत [स्त्री] के पातते प्रियनके निघल जाते पर पोछा मनुभव करने वालो नायिका कलहान्तरिता' होता है । इसमे ईप्स्यां के मारण प्राप्त मे मिलनने मी इच्धा नही होती है । पहिले [विप्रलम्भा] नायिका तो कलह न होने के वारण समागम के लिये इच्धुर है, किन्तु धन्य के साथ सम्भोग रतने याने प्रिय के विप्रलम्भ मे बेचत ईप्स्या वाती है यह भेद है । [२४] १७७।। प्रवृत्त विरहोत्कण्ठिता [नायिकाक्षा लक्षण करते हैं]— [सूत्र २६५]—विरहोक्तण्ठिता [नायिकाक्षा लक्षण करते हैं]— विरहोक्तण्ठिता स्वप्न होइ परागम म होतेऽपि [पारय कुरेते] दिनस्य करणेर उसुका [नायिका] विरहोत्कण्ठित वयस्या ह ।

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श्रनुनागरीक्यामंगाविना प्रभुतस्त्रोहुनापराधाभोवेडपि श्रत्रान्तुकामेउपि त्रिलम्य गुहाश्रो पत्या नायकोत्सुकं सती विरहोक्तिसंठता । श्रत्र प्रियागमनर्माचिरं तद्वश्यम्भावि, परस्परं कलहाश्रयं साम्यतीति मर्यादयो भिन्नेयमिति ॥

[सूत्र २६६]—दृष्ट वासकसज्जात्पन्नान्यलंकृतिपरंपत्ति ॥

प्रियेएप सह राज्यादिवसर्न वामकः । तन्रोचिते उद्यमपरा । 'अप्यति' विरचितकालागमनयति प्रिये स्वमरणवती नायिका वासकसज्जा । पूर्वासु सयोगसु विप्रलम्भशृङ्गारो डतर तु प्रभोगशृङ्गार इति भेदः ॥ [२५] १७८ ॥

प्रस्तुत श्लोका मेंपराध न होनेपर भी दूसरी स्त्रीके पास होने प्रादिके कारण पतिके विलस्य करनेपर नायिकाके मिलनके लिए उत्कंठा नायिका 'विरहोक्तिसंठता नायिका' कहलाती है । उसमें प्रियका ध्यानम्न गोत्र हो प्रवासय होने वाना प्रोत परस्पर कलहु नहीं है । इसालिए यह पूर्वकी सब नायिकाओं्से भिन्न है । पतिं प्राप्ये वासकसज्जा [नायिकाका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २६६]—पतिंके प्राप्ये प्रियाया होनेपर प्रस्तुत होकर प्राप्तेकी सजानेमें लगी हुई नायिका 'वासकसज्जा' कहलाती है । [२५] १७८ ।

पहले कही हुई 'प्रोषितपतिका' से लेकर 'विरहोक्तिसंठता' तक पाँच] सब नायिकाधोंर्मे विप्रलम्भ शृंगार है । 'एतत् [उक्तो वासकसज्जा] मे समोग भुंगार है यह इसका अन्य सब नायिकाओं्से भेद है ॥ [२५] १७८ ॥

श्रत्र पाए स्वाधीनभर्तृका—

[सूत्र २६७]—[पतिंके] अपने वशमें जोर सत्रा समोभवर्ती होनेपर पतिनेके गुनदर समभने वाली नायिका 'स्वाधीनभर्तृका' कहलाती है ।

सुभगमातमानं मन्यते या नायिका सा वशये श्रासनने च पत्या पतनीयकृप-योवनार्तिप्रहदयस्वान स्वाधीनभर्तृका । श्रासनर्नवर्तिप्रियतमत्पेन पूर्वास्या भिन्नेयमिति ॥

जो नायिका अपनेको हुनंदर समभती है वह पतिंके अपने वशमें होनेपर उसहें वह यौवन प्रदानिके हुयपके वशीभूत हो जानेसे 'स्वाधीनभर्तृका' कहलाती है । विप्रके समीप उपस्थित होनेके कारण यह पूर्वकी नायिकाओं्मे भिन्न है ।

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सरन्ती स्वयंत्स्य पार्श्वे, मारयन्ती वा तं प्रियमात्मसंभिपे। रिरंसु: सुरतार्थिनीनायिका श्रीमसारिका। प्रियसन्निकर्षे गमनोभवेन् मदा इति॥

अथाभिसारिका-- [सूत्र २६४]—सरन्ती सारयन्तो वा रिरंसुरभिसारिका ॥ [२६] १७८॥ अथ स्त्रियां यौवनस्थान धर्मानाह— [सूत्र २६५]—भावाद्यै योवनेऽस्त्रीरामलड्कारास्त्रथोद्भ्रजा: । दशा स्वाभाविकाश्चैते क्रियारूपास्त्रयोदश ॥[२७]१८०॥ सति भोगे गुरुषा: सप्तायतनजाश्च स्वभावजा: । नावश्यम्भाविनोड्भयैपा, विविधा: स्त्रियोभु मुख्यत: ॥[२८] १८१ ॥ मौनेन नतभाननतियां च, चकिताचां च भाव-हावाद्योद्भासरा। कटाक्षनेपथ्यदिवदृशौ चपुष्विमूपाहेतव: प्रादुर्भेवन्ति। वाल्येडपि क्रिचिदुन्मीलनिति। वार्धकेऽपि तु प्राचुर्येण नश्रयन्ति। एते च यौचने स्त्रियां प्राधान्यतोऽलङ्कारा:। पुंसां तु त्साहाद्यो मुख्यतो

प्रब धागे 'श्रभिसारिफा' [नायिकाके लकषए मरते हैं]— [सूत्र २६४]—रमण करनेई इच्छाद्से स्वय [प्रियकें पास] जाने वाली नायिका अभिसारिका कहलाती है । [२६] १७८ । 'सरन्ती' प्रयात् स्वय उसके पास जाती हुई प्रयवा 'सारयन्तो' प्रयातं उस प्रियको अपने पास बुलाने वाली । रिरंसुं श्रभिप्राय्तुं सुरताभिलाषिणी नायिका स्वय प्रियके पास उपस्थित रहती है] यह [स्वाधीनभर्तृक] भेद है ॥ [२६] १७८ ॥ अथ प्रागे द्रिप्रोके [प्रयात नायिकाग्रोके] यौवनमे होने याते धमोशो कहते हैं— [सूत्र २६५]—यौनकालेने द्रिप्रयोंके भाव आदि लोन आदिक और दश स्वाभाविक विकार होते हैं । ये तेरहों [मलद्वार द्रथप न होकर ] [क्रिया-हप होते हैं । [२७] १८० । [प्रिफका] समभोग होनेपर [विना प्रयत्नके उपन्न होने याते सात स्वाभाविक गुरू होने हैं जो [१३+७=२०] गूढ़ मुख्य हपोने द्रिप्रयोंमे रहते हैं । [२८] १८१ । यौवनमें उत्तम प्रकृतिन याले [तुस्यो] और द्रिप्रयोंमे भाव-हाव आदि मलद्वार पटर-

नेभूर धाभिषे समान धारोरकी शोभांक जनकप उत्पन्न हो जाते हैं । काल्पायारपामें भी युदृ- प्तु वद्रित होते हैं, और पुथादारवयांने मलिफार्ना प्राप: नष्ट हो जाते हैं । यौवनमें ये द्रिप्रयोंक मुख्य हपसे धसद्वार होते हैं । पुरषोंने तो उर्साहादिि मुख्य हपने पसद्वार होते है : हसोलिए उद्तादि नायिकोंके साम पोरसद् विदोएपा मत्रू गया हु । पुरषोंने भावादि

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भावो वर्गाविवेशिष्ठं चित्तं रत्युक्तमत्वयोः ।

भावो वर्गाविवेशिष्ठं चित्तं रत्युक्तमत्वयोः । वाचां, वादिराद्दान कर-पादादीनां वैशिष्ट्यं हृशो विकार। अंतरंगतरतिभावमय पामरनायिकावैदग्धयेन उत्तमप्रकृतिकत्वस्य च निश्चितयहेतुभवोऽति हि तथाभूतं वागादिवैचिच्यसुपलभ्य उद्गुज्जोद्यमन्त कामप्रदीपोयगा डति, उत्तमप्रकृतित्वाच नायिकेयोमिति सहृदयस्य निश्चित डति ॥

यान्ति सहृदयस्य निश्चय डति ॥

[प्रलड्दार] उत्साहादि [पुंयोगात अलङ्कारो] से प्राच्यादिक हो होते हैं। इसलिए [पुंयोगमें] उनको गोए कहा गया है। भाव भादिको कोस सहृया यहां गिनाए गए [कोस] भावोंर्हि हदृशे हो हैं। वैसे तो यौवनमे स्त्रियोके प्रलड्दारोकी संभावना प्रसक्त होती है। उन [कोस प्रलड्दारों] मे [सात्व-हाव प्रौढ हेला ये] पहले तीन यौवनोदयसे युक्त शरीरोमे प्रियके देखने ग्रहपवा वस्न-माल्य आदिके विना बाह्य साधनोके बिना केवल शारीरमात्रते उत्पन्न होते है [दसोइए इनको अगज कहा गया है]। प्रोर उनमे प्रथले दस स्वयं अपने रतिच्छव भावसे प्रियक्त उपभोग होने पर न होनेपर उत्त्पन्न होते हैं। ये दस [प्रलड्दार] कहों एक, कहों दो, या कहों तीन प्रादि रुपसे भी उपन्न हो सकते हैं। इसलिए वे प्रवृत्त्यमभावो नहों होते हैं। प्रोर अंगज तथा स्वाभाविक दोनो प्रकारके प्रलड्दार प्रियवल्के प्रथलाद् रत्यादिके वेष्टनक होते हैं। [प्रगज तथा स्वाभाविक दोनो प्रकारके प्रलड्दारोको] मिलावड तेरह सख्या होती है। उनके बाद सात [प्रलड्दार] पुथुपकका चुपभोग हो जानेके बाद [स्त्रियोके भीतर] यत्न क्रथभान मोतररो वयपात्रके विना हो वेह यथंके रुपमे प्रकट होते हैं। पहेले [तेरह] तो चेष्टात्मक होते है। [पर ये सात चेष्टात्मक नहों ग्राप्तु देह धर्मलुप होते हैं यह इनका भेद है]। इर्द्रादसे यत्न मननसे देह-चेष्टा होती है। इसलिए [विह-चेष्टात्मक पहेले तेरह प्रलड्दार यप्त] होते हैं ॥ [३५-२६] १५०-१५१ ॥

रति प्रोर उत्तमत्क्की सूचक वाचो अथिको विरोषतताको 'भाव' कहतेहैं ।

[सूत्र २७०]—ध्यान्नोकर प्रोथ प्रादि नाददते हार्य-पार ग्रादिका संतिष्ठ य पर्थ्यन मनोहर विकार, मातर रहन वाले रति-भावका ग्रोर पामर नायिकादि मिलते उत्तम प्रकृतित्वके निर्देशायक चित्त, 'भाव' कहुसलाता है। उस प्रकारके वाचो प्रादिके दैण्ट्यको वेधकट डसके भीतर काम-प्रदीप प्रथलित हो गया है। डस प्रकारका प्रोथ यह नायिका उत्तन

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नेत्रयोः, श्रादिरादावद्भ्रू-चिबुक-ग्रीवादेश्च सातिशयो विकारः सृङ्गारोचित उद्भिदिवोद्भिदो विधान्तर्मतश्चिन्तनासन्ततौ हाव इति ॥ [२६] १८२ ॥

प्रब प्रागे 'हाव' (का लक्षण करते हैं]— [सूत्र २७१]—सृङ्गारयुक्त किन्तु निरन्तर न रहनेवाला नेत्रादिकका विकार 'हाव' कहलाता है । [२६]१८२। दोनों नेञोंका, और ग्राभ्रादि शिरसे भौंह, ठोड़ी, गर्दन आदिका सृङ्गारके अनुुरूप विशेष प्रकारका [विकार] उठ-उठकर विधांत हो जानेके कारण निरन्तर न विद्यमान रहनेवाला विकार 'हाव' कहलाता है ॥[२६] १८२॥ प्रब प्रागे 'हेला' (का लक्षण करते हैं]— [सूत्र २७२]—यौवनोचितपर उदित और निरन्तर रहनेवाला वहो नेञादिका विशेष प्रकारका विकार] 'हेला' कहलाता है । सृङ्गारके अनुरूप और निरन्तर विद्यमान रहनेवाला नेत्र आदिका, वहो विशेष प्रकारका विकार जिसो विशेष कारणसे [विभाव] के सम्बन्धके विना, प्रनियत-विपय [परपुंयोगम् भावादि] होते हुए भी सयबद्ध न होनेवाला] प्रबुज्ध सामान्य रतिभावसे समन्वित [वहो नेत्रादि का विशेष प्रकारका विकार] 'हेला' कहलाता है । इस [हेला] में यौवनोचित प्रकट होने प्राप्त हो जाता है । [भाव, हाव और हेला] ये तीनों प्रानिक विकार एक-दूसरेसे भी उद्दित होते हैं । जैसे कि कुमारोके मारोरमें प्रौढतम कुमारके भाव हाव हेलाको देखने या सुननेसे [उस कुमारके प्रति कचि या म्रदचि होनेके कारख] मनोरूप या विशप भावादिक उस्मन्न होते हैं । [ये परस्पर पमयोगम भावादि होते हैं ] किन्तु इनमेंसे भाव उत्तरवर्ती [हावादि] की अपेक्षा नहीं रखता ग्रोर हाव [अपने पूर्ववर्ती] भावकी प्रपेक्षा करता है [भावके बिना हाव उत्पन्न नहीं हो सकता है । प्रोर हावके बाद उत्पन्न होनेवाले] हेला हावकी प्रपेक्षा करता है [हाव के बिना उत्पन्न नहीं होते हैं । इन [हाव तथा हेला] दोनोंके पूर्वं-पूर्वके जबयं कप होनेवोे ।

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रागादिना विपर्य्यासः क्रियारामथ विप्र्रमः ॥

अ्रथेति श्रागिकानन्तरार्थे । राग. प्रियतमं प्रत्येव वहुमान । श्रादिशब्दादान्मदभावादिक । मदने मदनरुचिर्शृङ्गार । हृपं सौभाग्यगर्व । श्रनयर्था वचनीयोऽन्यथावचनं, हसनेनादातद्यये पादेनादानं, कटाक्षोभयस्य काठिन्य निवेशनं, इत्यादिकशृङ्गारविपर्य्यासो विप्र्रम । विशिष्टवभावलभे रतिप्रकर्षाद् देहाविकार स्वभावविका । श्रगजामु श्रथ शिलास --

विलासः प्रियहृष्ट्यादौ चारुत्वं गाधिकर्मसः ।

[सूत्र २७४]—विलास: प्रियहृष्ट्यादौ चारुत्वं गाधिकर्मसः । श्रादिशब्दान् सम्भाप्यादिग्रह । चारुत्वं ताकर्षालिक मानिशयो विगेप । श्रथ विनिद्रति --

प्रयंात् अपने पूर्ववर्ती भावके उलखयं हप होनेसे हाव, भावको प्रपेक्षा करता है श्रोर अपने पूर्ववर्त्ती हावके उत्कषं-हप होनेसे हेला हारवकी प्रपेक्षा करती है] । [इस प्रकार तोन प्रकारके श्रागिक धर्मोंको कह चुकनेके बाद] श्रव श्रागे स्वाभाविक [दस धर्मों] मेसे पहिले 'विभ्रम' को कहते हैं— रागादिके कारण क्रिया उलट-पुलट हो जाना 'विभ्रम' कहलाता है ।[३०]१८३। 'प्रय' इस द्वादशकका प्रयोजन श्रागिक [धर्मोंके वस्नुन्] के बाद यह है । राग प्रयांतु प्रियतम के प्रति ही श्रत्यन्त प्रादर । श्रादि दान्दसे मद, हावं श्रागिक श्रहसप होता है । मद प्रयांत् मद्यपानके कारन उत्पन्न विकारकी प्रसन्नतस । हृपं प्रयांतु अपने सौभाग्यक गवं । कुहु श्रोर कहनेके स्थान पर कुुहू श्रोर कह जाना, हावसे पकड़ने योग्यको मुरसे पकड़ना, कमरमें पहिनने योग्यको गलेमें डाल लेना [यह सब 'क्रियाराम विपर्य्य' 'विभ्रम' कहलाता है । विशेष करन [विभाव] के प्राप्त होनेपर रतिकं प्रकर्षसे देहमें विकार होने रसाभाविक है [इसलिए इनको स्वाभाविक धर्मं कहा गया है ] श्रोर श्रागिक विकार तो विशेष कारनके बना [नाट्यामात्रसे उत्पन्न] होते हैं यह [इन दोनों प्रकारों धर्मोंका मेद है ] ।।[३०]१८३।। प्रव माने 'विलास' [का सक्षण करते हैं]— [सूत्र २७४]—प्रियमें दर्शन श्रादिसे चारोर श्रोर कमोंमें विशेष मुखमार्त 'विलास' कहलाता है ।

प्रादि दान्दसे सम्भाप्यादि ग्रादिका ग्रहुण होता है । चारतय प्रधनु उस समय उत्पन्न होनेवाला विशेष प्रकारका सौःदर्य । वभं प्रप्रात लडना होना, यंठना, वसना श्रोर रैनना श्रादि वेष्टारें । मय प्राने 'विनिद्रति' [का सक्षण करते हैं]—

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वैपाल्पतैव विच्छित्तिः परां शोभां वितन्वती ।

स्वल्पाभ्याकल्पपरचना प्रकृतिसौभाग्यादिगुणयुक्तत्वात् परा शोभा स्रिया चित्न्यते विच्छित्तिरिति ॥ [३१] १८४ ॥

लीला दयितवागादेशः स्वे न्यासो बहुमानतः । प्रियतमप्रेमततिशयेन दयितवागादेशे सखीजनः स्वस्मिन् न्यासं सम्यक् करर्षं लीलयति ।

अ्रथ लीलालोला दयितवागादेशः स्वे न्यासो बहुमानतः । प्रियतमप्रेमततिशयेन दयितवागादेशे सखीजनः स्वस्मिन् न्यासं सम्यक् करर्षं लीलयति ।

विल्वोकैर्नादरो मान-दर्पौद्विट्टेडपि वस्तुनि ॥ [३२]१८४ ॥

मानश्चिततममुन्तति । दर्पं सौभाग्यगर्वं । इहं वस्तुमाल्यलङ्कारादिति ।

विहृतं जल्पकथालेऽपि मौने ही-द्याज-नौरध्यतः । जल्पकथालो भयपात्रोचित समय । मौनमभयपात्राम । व्याज छद्म । उपलक्षणात्

अ्रथ विहृतम्—विहृतं जल्पकथालेऽपि मौने ही-द्याज-नौरध्यतः । जल्पकथालो भयपात्रोचित समय । मौनमभयपात्राम । व्याज छद्म । उपलक्षणात्

अ्रथाधिक सौन्दर्यंको प्रदर्शित करनेबाला स्वल्प वेप पारकर हो विच्छित्ति कहलाती है ॥[३१]१८४॥

स्वल्प वेष पारकर हो विच्छित्ति कहलाती है । अल्प वेषादिके द्वारा उनको प्रकट सौभाग्यादि गुणोंसे मुक्त होनेके वास्ते परयन्त सौर्यं धो प्रकटानित करनेबाला योधाता भो वेप-विल्यास 'विच्छित्ति' कहलातो है ॥[३१]१८४॥

प्रियस्ये वचनं प्रादिको प्रवक्तुमुचितोऽपि सन्नपि स्वप्ने बोतर रचना लोलातो कहलातो है ।

प्रादि नायकसे वेप और स्वापार प्रादर्शं प्रहण होता है । प्रियतमको वारणी प्रादिको श्रृगाराभिसन्धिपूर्वक् अपनेने लगानार पर्यार्ं पर्यार्ं वनाना 'लीला' कहूलातो है ।

मान पर्याप्त विसर्पा च्चा होनो । हुयं पर्याप्त लोभाय्यन गर्वं । हर पर्यायं वस्य मान, पल्स्तार पार्ि ॥[३२]१८४॥

मान पर्याप्त विसर्पा च्चा होनो । हुयं पर्याप्त लोभाय्यन गर्वं । हर पर्यायं वस्य मान, पल्स्तार पार्ि ।

विल्वोक 'विल्वोक' महलातो है ।

मान स्वपया दपंके वारतार हर वस्युने प्रति भी पनातर हिवतानो 'विल्वोक' महलातो है ।

विहृतं 'विहृत' [ना महलता हरते है]—

सगता ममप्ता किसो वराने प्रस्यवार मुप्तनार्शे वागला शोभने है उप्लित समयपर भो न शोभनर 'विद्रूत' कहुसाता है ।

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ललितं गात्रसंचारः सुकुमारो निरर्थकः । गात्रस्य नेत्रहस्तादे, संचारो व्यापारः । सुकुमारे डनर्थकेऽर्थको द्रव्यं विनार्द्रनेपो, माहामूते इत्यादिल्यापृतिरित्येवं निष्प्रयोजनो ललितम् । सक्रयोजनस्तु व्यापारो विलासः, इत्यनयोर्मेद इति ॥ [३३]१८६॥

ग्रथ ललितम्— [सूत्र २७६]—ललितं गात्रसंचारः सुकुमारो निरर्थकः ॥[३३]१८६॥ गात्र प्रयवार नेत्र मुख हाय प्रादिका, संचार प्रर्थात् सञ्चालन-व्यापार । सुकुमार अर्थात् प्रररवन्त मनोहर । [जैसे] रस्यक विषयकमे न होनेपर भी हस्त निदानां, पकड़ने योग्य किसी वस्तुके न होनेपर भी हार्द प्रादिका चलाना । इस प्रकारर निष्प्रयोजन व्यापार 'ललित' कहलाता है । और समपोजन व्यापार 'विलास' कहलाता है । यह इन दोनोंमे भेद है ॥[३३]१८६॥

कचौष्ठादिप्रहे कोपो मुपा कुड्‌डुमितं मुदित । ग्राह्यादर्शदलात् स्तन-करादिमिः । प्रियतमेन कचादिपु ग्रहणमाप्याय प्रन्त - प्रभोदे डपि वयलीककोपकरं कुड्‌डुमितमिति ।

अथ भ्रामो 'कुड्‌डुमित' [का लभए करते हैं]— [सूत्र २८०]—[प्रिपतम द्वारा] केश, प्रोठ आदि पकड़े जानेपर [हृदयसे भीतर सो प्रसन्नताके होनेपर भी [बाहर] इम्पया कोध दिखलाना 'कुड्डुमित' कहलाता है । यदि ग्राह्यदसे स्तन, कर प्रादिके पकड़े जानेपर भी मोतर प्रसन्नताके होनेपर भी क्ठुमूठ मारकर होतां 'कुड्डुमित' कहलाता है ।

मोट्टायितं प्रियेःकादौ रागतो गात्रमोट्टनम् ।।[३४]१८७।। प्रियतमे दर्शने-श्रवणादिपु हर्षोत्पादिपु तद्विपयाभिलाषरमरणाद्यर्थमुदर्शनमप्यन्तं यो पिसर्छेष्टतमति ॥ [३४] १८७ ॥

अथ भ्रामो मोद्टायित [का लभए करते हैं]— [सूत्र २८१]—प्रिपतमके हृदय रागके मारसा [वियोग] अतोंके मर्दन यथम्गत स्त्रीका व्यापार 'मोद्टायित' मरलाता है ।[वियोग] अतोंके मर्दन यथम्गत स्त्रीका व्यापार 'मोद्टायित' कहलाता है ।

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मुहुः स्मितादश्रुकम्पादेः संकरः किलकिचितम् । श्रादिशब्दाद्दू भय-हासित-श्रम-रोप-गर्वे-दु खाभिलापादिग्रह् । गर्वाद् चार वार स्मिताद्दीना सकीयेतया योपिता यत्करण तनु किलकिचितम् । एने दश स्वाभाविक सुक्कायामसुक्काया च योपिति रतिभावोद्बोधाद् भवन्तीति यथातनजेपु सप्तसु शोभा प्रथम लभ्यते—

प्रथ ग्रथो ‘किलकिचित’ [का लक्षण करते हैं]— [सूत्र २८२]—बार-बार हॅसने, रोने प्रोर कम्पन श्रादिका समिश्रण ‘किलकिचित’ कहलाता है । ग्रादि शब्दसे भय, हास्य, श्रम, रोप, गर्व, दुःख ग्रोर ग्रभिलाप ग्रादिका ग्रग्रह होता है । गर्वके कारण स्त्रियोंके द्वारा हॅसने, रोने ग्रादिका जो बार-बार सकीर्ण रूपसे किया जाना है वह ‘किलकिचित’ कहलाता है [यह श्रमिप्राय है] । भवतरा तय ग्रभिव्यता दोनों प्रकार की स्त्रियोंमें रतिभावका उदय होनेपर ये दश स्वाभाविक धममें उदय होते हैं ।

[सूत्र २८३]—ग्रौज्ज्वल्यं यौवनादीनामथ शोभोपभोगतः । यौवनस्य, श्रादिशब्दाद् रूप-लावण्यादीनां च पुरुषेषोपभुज्यमानाना यदि ज्जलय छायाविशेष सा शोभा । श्रथेति स्वभावविकान्तर्योर्थ इति ॥ [३५] ८५ ॥

ग्रथ ग्रथो बिना पनके उत्पन्न होने वाले सात धमोंमेंसे पहले ‘शोभा’ का सझा करते हैं— [सूत्र २८३]—उपभोगके बाद यौवन ग्रादिको उज्जवलता 'शोभा' कहलाती है । भ्रथु—यौवनका ग्रादि नामसे रूप लावण्यग्रादिकी पुरुषके द्वारा भोगे जाने पर जो उज्जवलता अर्थात् सौन्दर्यविशेष उसका ‘शोभा’ कहते हैं [यह श्रमिप्राय है] । ['ग्रथ शोभोपभोगत', मे प्रथुश्रुत] ‘ग्रथ’ ग्रादि स्वाभाविक ग्रथनतपे ग्रथंका योपक है । [प्रथत पहले निहपे किए वस स्वभावविक धमोंके बार ‘शोभा’ का लक्षण किया जा रहा है ]" [३५] ८५ ॥

[सूत्र २८४]—सा कान्तिः । पूर्वसंश्रुगा दीप्तिः कान्तेसु विस्तारः । शोभैव रागावतारघना कान्तिः । कान्तिरेव चातिविस्तीर्णा दीप्तिः । यौवनादीनामौज्ज्वल्यस्य मन्त्र-मध्य-तीव्रावस्था क्रमेण शोभा-कान्ति-दीप्तय इत्यर्थे इति ।

ग्रथ ग्रथो ‘कान्ति’ ग्रोर ‘दीप्ति’ [दोनों का सझा करते हैं]— [सूत्र २८४]—पहले विस्तारको प्राप्त हो जानेपर वह शोभा हो ‘कान्ति’ महसातो है । ग्रोर ‘कान्ति’ का भी विशेष विस्तार ‘दीप्ति’ कहलाता है । शोभैव रागावतारघना कान्तिः । कान्तिरेव चातिविस्तीर्णा दीप्तिः । यौवनादीनामौज्ज्वल्यस्य मन्त्र-मध्य-तीव्रावस्था क्रमेण शोभा-कान्ति-दीप्तय इत्यर्थे इति ।

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सौम्यं तापेऽपि माधुर्यं, प्रोदायं सुचिताच्युतिः ॥ [३६] १८६ ॥

शोक-क्रोध-भय-श्रमर्ष-हर्षादिज मन्तापस्ताप । श्रापि शब्दाद् ग्रीटा-रत्यादिरेऽभ्यासस्थो उपाति । तापे डीप सङ्कुचिततया तिर्यगधिकरण श्रन्युतरपार्श्वगतं श्रोदायं । माधुर्यं व्याकारविकृति इत्यनयोर्विशेष इति ॥ [३६] १८६ ॥

[सूत्र २८६]—चेतोजविकल्यनं धैर्यं प्रागल्भ्यं कौशलं करते । श्रविकल्यनं श्रात्मसल्लज्चा-चपलालस्यां रहितं चेतेो धैर्यंमिति । कौशलं वैशारस्यं, रते मुरतक्रियायां यत्नू तनु प्रागल्भ्यम् । अत्रे यत्नमन्तरेषा पुरुषोपभोगनिष्फन्ना स्त्रीषा सप्त गुषा इति !

यथौचित्यं च नेत्रुसां नायिका:, कुलजादय: ॥ [३७] १८०

श्रौचित्यं प्रकारते यथेष्टा श्याचार-दूशकोलाग्रवरोध । सद्वेशैरमिषेध श्रचारोद्धतीनां नायकानां कुलजादयो नायिका नाटकेपु नियतन्धनীয়ा इति ॥ [३७] १८० ॥

श्रब श्रागे 'माधुर्यं' श्योर 'प्रोदायं' [दोनोंके लक्षण करते हैं]—[सूत्र २८५]—तापके होनेपर भी सौम्यता माधुर्यं कहलाता है । श्रोदायं उचित मार्गसे पतित न होना 'प्रोदायं' कहलाता है । [३६] १८५ ।

शोक, क्रोध, भय, श्रमर्ष श्रोर्ष्यादिके उत्पन्न होने वाला मन्ताप यहाँ 'ताप' [माना गया] है । 'श्राप' दस्सते सज्जन श्रोत रत्यादिके उत्पन्न भ्रातस्यतत्कार भी प्रहृत्या होता है । इस तापके होनेपर भो [सङ्कुचितताक बना रहना 'माधुर्यं' कहलाता है] । श्रोर तापके होनेपर भो विनय श्रादि रूप उचित वार्तोंका परिसमाप न करना 'प्रोदायं' कहलाता है । व्याकारमें विकार का उद्भवन्न न होना माधुर्य है । [ श्योर मनमें विकारक्षा उत्पन्न न होना प्रोदायं है ] यह इन दोनोंका भेद है ॥ [३६] १८६ ॥

श्रब श्रागे 'चयं' तथा 'प्रागल्भत' [दोनोंका लक्षण करते हैं]—[सूत्र २८६]—[प्रातमसाध्या श्योर चपलतासे रहित वित्तावस्थाका नाम 'चयं' है श्योर मुरत-श्रापारमें निपुणताका नाम प्रगल्भता कहो जाती है ।

प्रविशल्यन प्रयान्त प्राहकललाध्या और चपलतासे रहित वित्तावस्थाका नाम 'चयं' है । श्रोद 'रते' पर्यन्तु मुरत-श्रापारमें जो कौशल अर्थात् निपुणता यह 'प्रागल्भ्यं' कहलाता है । ये सात गुए पुरुषोपभोगके द्वारा 'स्त्रीषोमे चिना यरनके स्वप हो उत्पन्न हो जाते हैं ।

श्रब इस प्रकारके [ १० + ७ = १७ ] प्रकारोंसे युक्त नायिकाभोंका नायकोंके साथ सम्बन्ध दिसलाते हैं—[सूत्र २८७]—श्रोजिकासे धनुसार कुलजा मादि नायिकाएँ नायकके साथ विविध पुरुष करनी चाह्है । [३७] १८० ।

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अथासां नायिकानां सहायिन्य उच्यन्ते— [सूत्र २८५]—सहायिन्यस्तु धात्रेयो-लिंगिनी-प्रतिवेशिका: । शिल्पिनी चेटिका-सख्या गुत्ता दक्ष्षा मृदु-स्थिरा॥

धात्रेयी स्तन्यदायिनी । लिंगिनी परिव्राजिकादिलिलिङ्गवती । प्रतिवेशिका निकटवसथा । शिल्पिनी चित्रादिशिल्पकारिका । चेटिका दासी । सख्या समानगुणा मैत्र्यम्-पगता । एवमादिका प्रियघटने सहायिन्य । एताश्च ‘गुप्ता' रहस्यधारणासमर्था । द्विचा देश-काल-समयादिविद । मृद्वो घनहरृता । स्थिराश्चापलवर्जिता । एवमन्येऽपि यथ सामान्नेन भावाविधानमुख्यत—

[सूत्र २८६]—देवानीच-नृपाङ्गना पाठ: संस्कृतेनाथ जातुचिह्न । महिषी-मन्त्रिजाया-पण्यस्त्रीगामवध्वर्जालिगिनाम् ॥

[प्रोच्यत्प] का उल्ललख्य्यन किए बिना घोरोदात्त श्रादि नायकके साश्र कुलजा श्रादि नायिकाग्रो का नाटकादिमें घरान्ते करना चाहए ॥ [३५] १८० ॥ अथ इन नायिकाओंको सहायिकाओंको कहते हैं— [सूत्र २८५]—घाय, परिचारिका, पड़ोसिन, शिल्पिनी, दासी श्रैर सखी जो [गुप्ता प्रयात्] रहस्यको धारए करनेमें समर्थ, चतुर, ग्रहकाररहित ग्रैर चपलतारहित हो इनकी सहायिकाएँ होती हैं । [३५] १६१ । धात्रेयी श्रर्थात् दूघ पिलाने वाली धाय । लङ्गिनीस श्रर्थात परिव्राजिक्रा प्रादिके वेष्मों को धारए करने वाली । प्रतिवेशिका श्रर्थात समीप रहनें वाली पड़ोसिनी । शिल्पिनी श्रर्थात चित्रादि शिल्पको रचना करने वाली । चेटी श्रर्थात दासी । सखी श्रर्थात् समान गुणों वाली श्रैर नितान्तको प्राप्त स्त्री । इस प्रकार की दित्रियाें त्रिप्रके साथ मिलन करनमें सहायिका होती हैं । य सह गुप्ता श्रर्थात रहस्यको लिप्या सकनेमें समर्थ, दशा श्रर्थात देन, काल, श्राचार श्रादिको समभने वाली, मृदु श्रर्थात श्रहङ्काररहित श्रैर स्थिरा श्रर्थात चपलतारोहित होनो चहिएँ । इसौ प्रकारके प्रयम गुप्ता भी [सहायिकाप्रोच्ये] समभने चहिएँ ॥ [३५] १६१ ॥

अथ सामान्य रूपसे भावाविधानम्र्रो कहते हैं— [सूत्र २८६]—देवताओं श्रैर न-चोंको धोडकर प्रयाप्त उत्तम तथा मदमम गुरुपोके पाठ संस्कृतमे [होनाँ चाहिए] । ग्रोर कबी-कभी पटरानो, मन्त्रि पत्नोयेदवाथोद्र तया [तिनिन्द्रो पद्मे लङ्गिनीरच श्रर्थात पुष्ट तथा स्त्री हप दोनोँ प्रकारके लिनियोम्र्रो एष दोप हो जानने]े पुहय तथा स्त्री हप दोनोँ प्रकारके परिव्राजको द्भर्-रहित [प्रयात मुक्ति, मोक्ष श्रादि] द्वारा [भी संस्कृत का प्रयोग किया जाना चहिए] ।

देवताओं ग्रोर न-चोंको धोडकर प्रयाप्त उत्तम तथा मदमम गुरुपोके पाठ संस्कृतमे [होनाँ चाहिए] । ग्रोर कबी-कभी पटरानो, मन्त्रि पत्नोयेदवाथोद्र तया [तिनिन्द्रो पद्मे लङ्गिनीरच श्रर्थात पुष्ट तथा स्त्री हप दोनोँ प्रकारके लिनियोम्र्रो एष दोप हो जानने]े पुहय तथा स्त्री हप दोनोँ प्रकारके परिव्राजको द्भर्-रहित [प्रयात मुक्ति, मोक्ष श्रादि] द्वारा [भी संस्कृत का प्रयोग किया जाना चहिए] ।

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देवशब्देन मुरा सुर्यश्चैकशरोपाद् गृह्यन्ते । एपा च नीचविजितानामुत्तम-मध्यमनराशा च । स्त्रिगा प्रकृतसैव विधानात् पुरुपाखमेव संस्कृता भाषा । कदाचित् पुन कार्यवशात् कृत्राभिपेकया राज्ञा मत्रिगणा-पत्नयस्त्रियोलिगिना च एकरोपेण पुंस्त्रीरूपापन्न परित्राड्-मुनि-शिष्य-श्रोतृयादीनां संस्कृत त्रैधधुम् । लिगिनश्च दम्भं बिना ये गृहीतव्रतातस्तेपा संस्कृतम् । सामर्थ्यान्च व्याजलिगिना प्रकृतमिति लभ्यते ।

देव' द्वादशते एक दोपसे देव और देवो दोनोका पहचाना होता है । इनमे देव नोचोँको घोडकर न देव पुरषोँकी भाषा ससकृत होनी चाहिए । [स्त्रियोँकी प्रकृत भाषा होनी चाहिए] । कभी कभी कार्यवश पटलनी मत्रि पत्नोँके तथा लिगियोँसे एक दोप द्वारा श्री पुरुप रूप दोनोँ प्रकारे सन्यासियोँ मुनियोँ मोद तथा श्रोतृपादिको सस्कृत भाषा समभनी चाहिए । लिगसे नित होँने दम्भ रहित होँकर वत लिया है उनको सस्कृतका प्रयोग कराना चाहिए । इस मचनकी सामर्थ्यसे बनावटो परिजानक माचिके द्वारा प्रकृततक प्रयोग करना चाहिए यह नयमतता है । स्मोदि ये अपनेको दिवपानेके लिए भावानो यदस भी ले लेते है । उनमेसे कुछ विप्रह मादिके वाततोडे प्रवसरपर राजनीतिने [द्वारा सस्कृत भावकल करना चाहिए] न्याय विस्तार मादिके समय [मंनजाया मर्यादू] मन्त्रोको परनोके द्वारा [सस्कृत भावला कराना चाहिए] । वंद्यपादि [प्रदसंत] के लिए वंदया द्वारा पोत सव विचारोमें प्रवर्तितातपहै सिद्ध करनेके लिए परकराजित मादिने द्वारा कार्यादिसोँवने कारन सस्कृतका प्रयोग कराना चाहिए । देव सापारा हपमे प्राय कनह प्राकृततक हो प्रयोग समभना चाहिए । 'योपिताम्' इस पदसे महियो मादिमे प्राप्त[ या प्रयोग] प्राप्त होनेसे देवानीचतृपा' पदसे परिजातक आदिमे सस्कृत [के प्रयोगने ] हो प्राप्त होनेपर 'जातुचिन' इस पदको [प्रस्ताव]मालितनेतपे पर्यात प्राप्तशे निपच करनने लिए पहुआ किया गया है । इसतिए परत्रिजातक मादिमे पर्यातर प्रमततका प्रयोग होता है ।

प्राकृतेनोत्तमस्यापि द्वारिद्यैवयस्य मोहितः ॥ [सू० २८०]—वाल-पड्-प्रहप्त-मत्त-स्त्रोपप-योपिताम् ।

[सू० २८०]—वालकौँ, मप तशोँ प्रहपस्त, मत्त, स्त्रोप्रति वाने मोर वित्रमोँरा प्राप्ततक हो प्रयोग कराना चाहिए । मोर द्वारिदय प्रयवा वैदग्यादि मोहित उतम पुरपके हारा मो [प्राकत भावाचा हो प्रयोग कराना पाहहु] ।

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ग्रहैः शनैश्चरादिभिः, कदाचग्रहैर्वा प्रस्तुत द्विपिता महाप्रस्ताः। तयः पुरुषा। स्त्रीरूपाः स्त्रीप्रकृतयः पुरुषानामत्त्व-नीचप्रकृतित्कत्व-सुच्छस्वभावत्वादेः। प्राकृतेन पाठः। तथोत्तमप्रकृतेरपि धीरोदात्तादि-धीरिदैशैः श्वर्याद्भ्यां उपलब्धव्याद् धनश्रेशादिना च मूढमनसः प्राकृत पाठ इति ॥ [४०] १६३ ॥

प्रहादि के भापाका प्रयोग कराना चाहिए ]। स्त्रीरूप अर्थात् स्त्रियों-जैसे स्वभाववाले पुरुष [उनके द्वारा भी प्राकृतका ही प्रयोग कराना चाहिए]। बालकों आदिके पूर्व, नीच प्रकृति वाले तथा शुद्ध स्वभाववाले होने आदिके कारण प्राकृत भापाका पाठ कराया जाता है । और [कभी] उत्तम प्रकृति वाले ध्र्यादि घोरोदात्त आदिके [स्वभाव वाले पुरुषके] भी वीरद्रवता अथवा ऐश्वर्यादित्यादिसे मोहित हो जानपर घोर [इनके उपलक्षण हूप होनेसे घननामा आदिसे भी विमूढ़ मनस्क हो जानपर प्राकृत ही बुलवाना चाहिए ॥[४०]१६३॥

[सूत्र २५१]—प्रत्यन्तनीच-भूतादौ पैशाची मागधी च वाक् । शौरसेनी तु नीचस्य देशोदेेशे स्वदेशागीः ॥[४१]१६४॥

नोत [वाचके भावपा ] मे 'पैशाची' तथा मागधी [मंकोशं] भापा प्रयुक्त होता है । नीच [वाचके भावपा] में 'शौरसेनी' [प्राकृत भाषा] होती है । और एकसी वेषभूषावालेके अतिरिक्त अपने-अपने देशाकी भापाका हो प्रयोग कराना चाहिए । [४१] १६४ ।

[सूत्र २५२]—तिर्यग्जात्यन्तरादौ नामानुरूप्येणा संकथ्या । तिर्यग्जातेः पश्वादयो पशुप्रभृतौ। नानान्तरेषु भाषाभेदो-विप्र-चाणालादिषु। नान्ति प्रहेलं श्र्यत्यन्त शनैश्चर ग्रादिके प्रयवा कुर्यात् न्राप्रहोते जो दूपित हैं वे ग्रहप्रस्तुत हुए

अन्य प्रकाद भी बतलाते हैं— पशु-पक्षो ग्रादि गोचरपक्षे पतुसार [भापा न प्रयलक्ष्यन करे] यातचित हो होनेो चाहिए । तियंक् पर्वादि पनु घोर पशो । पन्य जातीमां पर्यात् यालिकू, विप्र, चाणाल््र ग्रादि ।

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चैकस्मिन्नपि देशेऽपि भवन्ति । श्रादिदेशाद्देशु ग्राम्य-नागर-क-श्रारण्य-विट-देश-कुलिकादि-मद्‌ । एवंविधपात्राणामासु कृत्येषु यस्य तिर्यंगादेयो भणितीति । प्रसिद्धा सा मातस्य सम्यग्‌ वसंन्तीयात । येन स एवंकार्य तिर्यंगादिरिति तादृश्‍योऽपि भवति । इयं च देशगीय्च प्रायोऽपप्रथंश्रे निपततीति ॥

मोटे वनमें रहने वाले तथा वृक्ष, देयकुसुमिका प्रारब्धा रूपक होते है । इस प्रकारके पात्रोंकी भाया अनुत्स्वपके अनुगुण पर यथेष्टं जिस तिर्यंगादिको जो भाया लोकमें प्रसिद्ध है उसको उसीके साप भली प्रकारसे प्रयोज करना चाहिए जिसमे वह वही तिर्यंगादि है यह बात ढो़क तरहसे प्रतीत हो सके । पर [ तिर्यंगादिको भाया] मोटे देह भाया बोनों प्रायः अपप्रथंनाने प्राप्त होते हैं ।

श्रथ भापादेरन्वयात्तदपि भवतीत्याह— [सूत्र २६३]—भापा-प्रकृति-वृत्तादेः कार्यतः क्वापि लंघनम्‌ ॥ [४२] १६५ ॥ भापाया म्लेस्कृत-प्राकृतादेर्यांच । प्रकृतेश्चतस्म-मध्यमाधमरूपायाः । वृत्तस्य व्याचारस्य, इतिर्वतस्य वा । श्रादिदेशाद्देशु धोरोदात्तवादिधर्माणां नेपथ्यादेर्यांच केनचिन्‌ प्रयोजनेन लंघनमिति कर्मे विधेय । एवं च यथार्थ कर्वाचित्‌ कचित्‌ प्रदर्शितमेव । म्रयम वाभ्यूहामिति ॥

प्राय प्रापे भाया प्रादिमें परिवर्त्तन भी हो सकता है यह बात दिखलाते हैं— [सूत्र २६३]—भाया, प्रकृति, वृत्त पर्य्यांत प्राचार या काव्यवस्तु प्रदिश्न भायंचना महों उतरापच भी किया जा सकता है । [४२] १६५ । भाया संस्कृत-प्राकृतादि, प्रकृति उत्तम मध्यम अधम रूप, वृत्त धीर-प्रशान्तादि वादिधर्मों नेपथ्यादि का किसी दिनेक प्रयोजनसे सच्नु किया जा सकता है हतत प्रकारतर [क्रम पर्य्यांत] धनश्य करना वार्हिए । इस कातप यहां नहों कहा है । प्रपया स्वप समभ्‌ सेना वार्हिए ॥ [४२] १६५ ॥

[सूत्र २६४]—ग्राप्येन ति श्राव्यत इति पत्नो लिंगिनो श्रात्सरसो दिजे: । श्रम्वापिप जेननो-वृद्धी पूज्यास्तु भवतत्यपि ॥ [४३] १९६ ॥

[सूत्र २६४]—ग्रात्सलोके द्वारः पत्नोः, वयोवयिज्रे: मोटे वात्सलयो 'वार्य' इस नातले न्ही जानी है । माता मोटे वयस्या म्रों [मार्या नातले तो चही हो जानी है किज्यु उक्ते श्रमर्यात] 'पत्नि' मो चही जानी है , पुत्रवत्स्यो [म्री कार्य्या नो चहों हुो] मानो है उसके परनितन 'भवती' इस पदने मो चरो जानी है । [४३] १९६ ।

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श्रात्राप्रजो धर्ममे मन्त्री नटो-सूत्रभूतौ मिथः । पुरोधः-सार्थवाहाभ्यां य पत्नी पत्या जनन् पतिः ॥ [४४] १६७ ॥

'श्रार्येशब्द' इत्यन्तो नृप-विवक्षितलिंग-संध्या-कारकः शक्तिस्वरूपमात्रेशे ब्रह्मादि-शुपर्वतः । तेन नानार्थ-लिंग-संध्या-कारकेऽपि प्रयुज्यते । एवमच्यापि द्रष्टव्यम् । पत्नी सधर्मेचारिणी । श्रमशापीति न केवल 'श्रार्यो' शब्देन किंतु 'श्रम्या' शब्देनापि जननी-शृद्धे उच्च्यते । पूज्या मान्या । सा चात्रे पद्भृदृक्षा सती, 'भवति' इति शब्देन 'श्रार्यी' शब्देन च वाच्या ।

श्राता श्रातृजेन श्रमजे ज्येष्ठो श्राता, श्रधमेष्ठनेः मंत्रो राज्ञः सचिवयो नटीसूत्रधारौ मिथः परस्परं नट्या सूत्रधारः सूत्रधारेण च नटी, पन्था च कथ्यो वृद्धः पतिः 'श्रार्यः' इति शब्द्यते इति संबंधः । 'श्रार्येति शब्द्यते पत्नी' इत्यनेनैव सिद्धेऽपि 'पुरोधः-सार्थवाहाभ्यां पत्नी' इति यौवनेऽपि 'श्रार्यो' इति वा नियंधनार्थमूद्यम् ॥ [४३-४४] १९६-१९७ ॥

[छोटे भाईको द्वारा] बड़े भाईको [ग्रार्यं शब्दसे भी कहा जाता है और उसके प्रतिरिकत] श्राता [भो कहा जाता है] नीच पात्रोंके द्वारा भन्र्रोको [कन्या श्रार्यं] तथा सूत्रधार परस्पर एक-दूसरेको [ग्रार्यं तथा श्रार्यी] और पुरोहित तथा सार्थवाहके साथ [यौवनस्थायं] पत्नो [ग्रार्या] तथा पत्नोके द्वारा वृद्ध पति [ग्रार्यं नाद्दस कहा जाता है ] ॥ [४४] १९७ ।

[आयेंति इस कारिकाभागमें] इति नाद्द जिसके श्रन्र्तमें दिया गया है इस प्रकारका प्रायं नाद्द लिंग, संख्या, कारक श्रादिसे रहित क्रियतके स्वरुपमात्रसे प्रहण किया गया है । इसलिए लिंग, संख्या तथा कारकोंमें उसका प्रयोग माना जाता है । इसो प्रकार श्रन्य नाद्दोंके विषयमें भी समझना चाहिए । 'स्ववत् ग्राम्या, भवती ग्राम्यादि क्रतद् भो नियत तत्स्या, नियत कारक द्वादिके प्रहण न होकर सामान्प रूपसे हो पदे गए हैं] । पत्नोकों 'ग्रार्या' इस नाद्दसे सतूत्रपात्रचारिणी है । 'ग्राम्यवि' इसमें जननी तथा वृद्धाके न केवल 'ग्रार्या' नाद्दसे हो नहीं 'ग्राम्या' नाद्दसे भी कहो जातो है । पूज्या प्रथचातं मान्य । वह कन्या थोड़े वृद्धा होनेपर पतिवु 'ग्राम्या' इस नाद्दके द्वारा तथा 'ग्रार्या' नाद्दके द्वारा सम्वोधित को जातो हैं ।

भाई प्रथचातं छोटे भाई द्वारा बड़े भाईको [ग्रार्यं नाद्दसे], तथा नीच पात्रोंके द्वारा मन्त्रो प्रथचातं राज्ञके सचिवको [ग्रार्यं कहा जाता है] तथा नटो और सूत्रधार एक-दूसरेकी परस्पर पर्याप्तु नटोकेद्वारा सूत्रधारको [ग्रार्यं] तथा सूत्रपार्श्वेद्वारा नटोको [ग्रार्या सम्वोधन किया जाता है] । पुरोहित तथा सार्थवाह रूप प्रयोक्ताओंके द्वारा पत्नो [ग्रार्या कहो जातो है] और पत्नोके द्वारा वृद्ध पति [ग्रार्यं रूप पदसे तम्योधित किया जाता है] । 'आयेंति नाद्द्यते पत्नः' द्वार १९६वीं कारिकाके प्रारन्थक भांग] से हो [पत्नोके लिए ग्रार्या नाद्दसे] प्रयुक्त [स्तद् होनेपर भो 'पुरोधः-सार्थवाहाभ्यां पत्नी' इसमें [जो पत्नोको ग्रार्या पदसे सम्वोधित किए जानेवाली घात बुबारा कहो गई है] यह [पुरोहित तथा सार्थवाहनेद्वारा] यौवनास्थायं भो पत्नोको 'ग्रार्या' कहकर हो सम्वोधित करना चाहिए इत मतव्यो मूपित करनेंके लिए यह म्रद्यो गई है ॥ [४३.४४] १९६-१९७ ॥

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महाराजो नृपः सर्वस्वार्यपुत्रेति यौवन्ते । पुंसा भद्रेति भोक्तव्येति प्रियेति दयितेतिवा ॥ १४५ ॥

[सूत्र २८५]—महाराजो नृपः सर्वस्वार्यपुत्रेति यौवन्ते । पुंसा भद्रेति भोक्‍तव्येति प्रियेति दयितेतिवा । यहाँ विपयमें प्राणि भोर भो रहते हैं—

पितृनपुंसविधायोगेऽपि सख्या देवद्यापि राजभिः । विदूषकेन भवतो राज्ञी-चेट्यो नृपत्नियः ॥ १४६ ॥

वाहीए] सम राजा मोर पन्या [सामान्य रूपसे राजा तथा] पति भो पत्नीकें द्वारा मोवन कालमें श्रायंपुत्र [नामसे सम्बोधित किया जाता है] । भोक्‍तव्या स्त्रीकेा पुहव [प्रथम परिचयके साय ] मत्रा [ कहकर ], भोर दयिता मर्यादू आभांदी या प्रिय, [महकर सम्वोधन करे] ।

भर्त्तिनो स्वामिनो देवोऽथयेव सर्वाः परिच्छदाः । वेश्याज्जुक्रेति वृद्धा तु सादृत्ता तुल्यास्त्रिया हला ॥ २०० ॥

पत्न्या' इति 'जरण्' इति चातुर्य्यतते । पत्न्या जरनृपो 'महाराज' इति । सर्व-मृ नृपोडन्यशच पतिभिर्न्न वलेमान 'ग्रायंपुत्र' इति पत्न्या कौर्त्त्यते । म्रायंपुत्र इति' हि श्वशुरेऽपि ब्यपदेशो यथेतस्म्य शृङ्गारोचितत्वाद्युपनार्थः । श्वशुरादन्यस्य तु 'श्वाय पुत्रो नास्ति ।

[सूत्र २८४]—पत्निके द्वारा वृद्ध] राजाको महाराज [कहकर सादृश्य प्रदान करना वाहिए] सम राजा मोर पन्या [सामान्य रूपसे राजा तथा] पति भो पत्नीकें द्वारा मोवन कालमें श्रायंपुत्र [नामसे सम्बोधित किया जाता है] । भोक्‍तव्या स्त्रीकेा पुहव [प्रथम परिचयके साय ] मत्रा [ कहकर ], भोर दयिता मर्यादू आभांदी या प्रिय, [महकर सम्वोधन करे] ।

पयवा [ दीपिता प्रथान्तं पपनो पत्नीको उसके ] पिता या पुत्रोंके नामनो जोडकर [रामचन्द्रमा माता श्रपवां सोमेनार्यायाशो पुथि इस रूपमें सादृश्य प्रदान किया जाता है] : राजामों के द्वारा मुल्या पर्यायान् पटतरान्त्रो [प्रियाएं प्रतिरितक्] देवी भो [महा जाता है] : विदूषकके द्वारा राज्ञी मोर चेटी [चोनोही भर्त्तनो पदपे सम्वोधित हिगा ज्ञाना आहिए] । [४५]१९८।

सारो राजिनोंको पतिजनोंके द्वारा भर्त्तिनो, स्वामिनो, देवो इस प्रकार सम्वोधन किया जाना वाहिए [इसमें 'नुपत्निय' पद १९६मे देखिये] पत्निके द्वारा वृद्ध राजाको महाराज [कहकर सादृश्य प्रदान करना वाहिए] । [४६]१९९।

योवतयतो] देवपाए [जिससे सेवकवर्ग] 'अनुजो' [वरकर सम्वोधन करते हैं] भोर उभो [वेतपय] मे वृद्ध होनेपर 'अस्ता' पदसे उसका सम्वोधित किया जाता है । भोर भरावर वाळी चित्रपां एक-दूसरेको 'हुला' महकर सम्वोधन करते है । [४७]२०० ।

'पत्न्या' मोर 'जरण्' मे शेषों पद [१९७ सम्वादालो भरितक्] म्रप्तुचि द्वारा पातले ह । क्रतिए पत्नीक द्वारा वृद्ध रामाको महाराज [कहकर सम्वोधित किया जाता है । महृ सामान्य रूपने माने राजापोंके [महाराजमें धनिरिक्] प्रापंपुत्र [भी वहर जाना ह] योवतनावरपदमें सादृश्य पतित्रो [पत्नो] प्रापंपुत्र पदमे करणी है । 'प्रापंपुत्र' पद माप हनुमुखे सथ्यपने बनाया ह [पोर मोवनराममें इस नाटकका प्रवेश] योवतरे म्रप्तारो.

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हंञे त्वनुत्तमे-प्रेष्ये भगवदिति देवता । तपःस्थ चाचर्यं-देव्यैव-बहुविद्याः सयौपपत्तः ॥ [४८] २०९ ॥

चित्त होनेकी सूचना देनेवाला है । यौवनकालको छोड़ अन्य समयमें केवल 'प्रियं' पदसे [पत्नी पतिव्रों सद्बोधित करते है] । भोगैक्य प्रयातु जिसके साथ पुरुप भोग करना चाहता है उस स्त्रीको प्रथम परिचयके समय पुरुप 'भद्रे' कहकर सम्बोधित करता है । प्रोत दयिता प्रथ्यन्तं प्रियं प्राप्नोति । अथवा दयिता पितापुत्रयोर्द्वयोरपि विधानात् तयोरेवतेन युज्यमानैः । शब्दैः 'मार्ड़रपुत्रि' 'सोमशर्मजन्नन्' इत्येवमादिभिः । पुरुपेप्टया-भाव्याः । मुख्यः कृताभिपेक दयिता पुनर्देवोति, व्यपिशब्दात् प्र्रियेत च राजभिवेदु वचनादन्येष्वेव पुंभिः तथा विद्‌ पकृतै राज्ञी राजपत्नी चेटी च 'भवति' इति वाच्याः । तथा सर्वोऽपि नृपत्नियो राजपत्न्यः परिजनेन भद्रिनि स्वामिनी देवी इति शब्दैः शाब्यन्ते । वेश्या पण्यस्त्री यौवनवती दृश्यते, युद्धया नामान्तरविधानात् । परिजनेन 'ग्राजुका' इति । सा इति वेश्या । युद्रा पुन 'भ्राता' इति । तुल्या समानकुल-शीलवयो-डवस्थादिका वनिता च समानया स्त्रिया'हला'इति वाच्याः इति ॥ [४५-४७]१८५-२००॥

उत्तम प्रकृतितसे रहित [प्रत एव प्रेम्या परपतिं हृतो ग्राहिने रूपमे प्रियंहे पास न भेजने योग्यं ] प्रोत प्रेष्यो दोनोको 'हंञे' शब्दसे सम्बोधित किया जाता है । [तरस्वती प्रादि ] देवता प्रोत तपस्विनो स्त्रियोको 'भगवतों' शब्दसे कहा जाता है । पून्य ओर महाभूत पुरुपो प्रोर उनरो पत्नियों इनोनोको भी भगवत् शब्दसे सम्बोधित करना वारिए ।

[इसो विषयमें प्रानो] प्रोर भी कहते हैं— [सूत्र २८६]—उत्तम प्रकृतितसे रहित [प्रत एव प्रेम्या परपतिं हृतो ग्राहिने रूपमे प्रियंहे पास न भेजने योग्यं ] प्रोत प्रेष्यो दोनोको 'हंञे' शब्दसे सम्बोधित किया जाता है । [तरस्वती प्रादि ] देवता प्रोत तपस्विनो स्त्रियोको 'भगवतों' शब्दसे कहा जाता है । पून्य ओर महाभूत पुरुपो प्रोर उनरो पत्नियों इनोनोको भी भगवत् शब्दसे सम्बोधित करना वारिए ।

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मान्यो नामान्तरे राजा लिंगिनाथ विदूपकः । वयस्योऽध्यधमर्मट्ट्री लोकेंद्रचेष्टित भूपति: ॥

नाट्यशास्त्रकारैराहता युक्ति: श्रेयःपरीक्षा मती अनुत्तमा, सा, श्रेष्ठया हेतो रचीयते । देवता सरस्वत्यादिका । तपस्या व्रताद्यशेषवती । मते च वयस्यते, न तु कंचनापि पतिमास्थिते । श्रन्यो: पूज्यतमा: । वहुविग्रा वहुश्रुता । मते श्रन्यादय: सयो- पितो भार्याप्येतद्वीर्या भगवच्च्छंदेनोभयते इत्यर्थ: । तथा मान्य: प्रमिदननामपरिहारेण नामान्तरे । प्रश्नमासूचिभि श्रात्मन् ! श्रेष्टन् ! वत्सराज ! मोमवंशांकिसकपये ! इत्यादिभिराभाषनीय: । प्राविकं चैतन । तेन साटकारादि-उद्यने महती शास्ति सो विपत्तामवकाश 'डति स्वानाम्नायाभाष्य ।

मान्यादनयम्तु मध्यम: । लिंगिना च 'गजन' शब्देन शाख्यत भूपति इत्युत्तरगा संबन्ध: । उपलब्धतापान 'कारच्य' इत्यशपत्यप्रस्त्यायान्तैरपि । विदूपकेऽपि पुनर्भूपति: 'वयस्य' शब्देन श्रपि शब्दान 'राजन्' शब्देन च । श्रधमेन्यच नीचप्रकृतिरिभमू: पति: भट्टिन-शब्देन लोकेन्द्रच उत्तम-मध्यम-श्रधमप्रकृतिभिरंजने: भूपातिंदेव शब्देन श्लाघते इति ॥

मान्य पुरुषोंके [ उनके प्रसत्तों नामोंको छोड़कर ] धन्य नामोंसे सर्वोपन बरनर चाहिये । राजाको परिवारक वादि 'राजन्' पदसे और विदूपक 'वयस्य' पदसे, प्रथम पुरुष 'भटृ' पदतो सथा तोमरख सोहंकेउ द्वारा 'देव' पदने समुचित रचा जाता है । [४५]२०३ : उत्तम प्रतितने रहित युततो जो [ दोनों आदिसे रूपक ] भेजने योगय ऋत्नो [प्रेष्य] दोनोंको हमने पदने सम्भोधित किया जाता है । देवता सरस्वती आदि । और तपस्या पर्याप्त निंगी विरोध पतथे प्रतुष्टानमें सगो हह । थे दोनों स्वतन्त्र हो जिसी पतितके वाधीन न हो तय [भगवन्त रचवके कहो जाते है] । प्रथमयोग्य वर्यात् धन्यस्त पूष्य, और महर्षिवर्गी मधान्त यद्यपि वृद्धौ 'नदीगणते' पतितयों रहित, पर्याप्त उनको पतने भो 'भगवन्त' समस्ते वाध्य होते है । यत प्रथमारव जाते है । जंगे पमाल्य, पेष्ट्र, वसुराज, वसुदानंदे मोदितप्रमील ! हरवार्दि [उपनामो] थे द्वारा सम्वोधित किया जाता नामन् । यह वयत प्राविक है [वर्षान माव । वर्षप- मर रग प्रकारके मामोंगे सम्वोधिन करवा चाहिये] इसालास चाटुकारिता पादि [ गुसामर वार्तालापने समस्त आतत्र उत्पन्न रसपमें विरक्ति मांस । पक्तर वहा पा सरता है' इस्पादि में अपने प्रहणड नाम द्वारा भो सम्वोधपन किया जा मरता है ।

मान्यो होत्स्सर यस्याचि मध्यम लोकोनो उत्तमे प्रमिद्ध नामों हहा थे तस्सो-पित वचनार वादर । मोदवने मिना सर्योचित दरोंको पापे करें । परिवारवर्ग पार्श्ववर्ती पार्त्ववोरे हहा मतरों समस्त वाने मर्यादिप्त कियत वाचा माव मतेन व होनेंव पोर पार्ति मलगारक म्रव माने मिति ।

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मित्रार्थीविचिदू राज्ञा कुमारो भर्तृदारकः । मुनि-श्राव्यौ भदन्तेति स्वप्रसिद्धचापरो व्रती ॥

सूत्रौ भर्तृदनुजेनासौ तेन माषः समः सखा । शिष्यात्‌मजानुजा: पुत्र-वत्सौ तातो जननपि ॥ [४१] २०४ ॥ सौम्यो भद्रमुखरुच्येति नीचो हृण्‌डे तु पामरः । येन कर्मादिना यस्तु ख्यातः स तदुपाधिकः ॥ [४२] २०५ ॥

वयस्य-सरसीयादयो मित्रार्थ्या । ताभिविधृपको राज्ञा सम्योध्य । सूत्रस्थाने च 'विदू' इत्येकदेशनिर्देशो न विरोधी । कुमारो युवराज कौमारेऽवस्थि वर्त्मानो जन्यो वा एप भर्तृ दारक इति, भर्तृ दारको वा 'कुमार' इत्यन्वितव्य । पञ्च कुमारीयपि पक्वोके द्वारा राजाको 'वयस्य' कहकर और प्रथम द्वयव्दसे 'राजनु' इस पदसे भी सम्बोधित किया जा सकता है । प्रथमों श्रथाति नीच प्रकृति वालोके द्वारा राजाको 'भटृ' शब्दसे सम्बोधित कियाजाता है । उस्त्तम, मध्यम तथा प्रथम प्रकृतिन्चे सामान्य लोगोंद्वे द्वारा राजादो 'देश' कहकर सम्बोधित किया जाता है ॥ [४५-४६] २०१ २०२ ॥ और भी [इसी विषयमे ग्रागे कहते हैं]—

राजा विदूषकको मित्र-वाचक पदोसे सम्बोधित करता है । स्वामीके पुत्रश्रो कुमार पदसे कहा जाता है । जैन तथा बौद्ध-भिक्षु 'भदन्त' पदसे सम्बोधित होते हैं । अन्य व्रती [तपस्वी] लोग अपने सम्प्रदायमे प्रसिद्ध नामोंते सम्बोधित होते हैं । [x०] २०३ ।

सूत्रधारको उसका प्रियवर 'भाव' शब्दमे पुकारता है । और वह प्रयात् मुख्यप्रधार उa [प्रयुचर]को 'मायं' कहकर सम्बोधित करता है । वराक्षर वालेक्रो 'राजा' कहकर और निप्प, पुत्र तथा द्वोटे भाईको क्रमारो पुच, वत्स तथा तात कहकर सम्बोधित कियाजाता है । सात द्वयव्दसे युध्द जनोको भी सम्बोधित किया जाता है ॥ [x१] २०४ ।

नीच पुथपको [मध्यम तथा उत्तम पुथयोंके द्वारा] सौम्य भद्रमुख कहकर और नीचक हो] हुडे कहकर सम्बोध्यित किया जाता है । और जिस नाम्रे द्वारा जिसने प्रसिद्धि है उस भायंशो करने वालो उa उस पदवे सम्बोधित किया जाना चहिः । [४२] २०x ।

वयस्य, सखा डत्यादि मित्र-वाचक पद हैं । उनसे द्वारा राजा विदूषकस्थो सम्बोधित करता है । [इन कारस्त्रामोंके] मूनहप होनेसे इसमें [विदूषक इस पूरे पदने स्वानपर ] 'विदू' इस [साथे] पदके प्रयोगमे कोई विरोध नहों आता है । कुमार प्रयात् कौमारास्थरपामे वतंमान युवराज । प्रपवा स्वामीके प्रिय पुत्र को 'भतृ दारक' कहा जाता है ।

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तथाहि । सुनिनिर्मितेऽन्यक, शाक्यो मोगतः, पत्तो भदन्तेति । स्थावरः पाशुपतादिग्रहती ससमयप्रसिद्धनामभिवान्य । यथा पाशुपतस्य भाव्यं 'भारवह्नि' इत्यादि सम्भाप्यम् ! तथा सूत्री सूत्रवारो श्रृणुतेन श्रुतुचरेपु कर्ता 'भाव'-शब्देन सम्भाव्यः । असौ इत्यनुग. सूत्रधारात् 'किंचिन्नीतगुषा' तेन मृत्रधारेषु 'मार्ष' इत्यभिधास्य । तथा समो चयो डवरस्थ-नुपादिना तुल्य , सेमनेन 'सगना' इति धार्यः । मित्राभिधायिना शब्देन सम्भाव्य इतरेधः । श्रृणोति च विधानेऽपि समस्त-प्रतिष्ठाप्यमानाः सम्भाव्यन्ते न निमिध्यते । श्रसम्भाव्ययोग्योऽव्यवच्छेदपलत्वात् सर्वस्यापि नामविधानस्य । तेन श्रार्यादिनामविधानेऽपि नान्यशब्देन कीर्तितेनिपेधः ।

भाव आदि का नाटक में प्रयोग करने के लिए यह उचित है कि उनका नाम निर्देश इस प्रकार किया जाय कि उनका ठीक ठीक बोध हो । जैसे 'मुनि' के लिए 'सुनिनिर्मित', 'शाक्य' के लिए 'मोगत', 'पत्त' के लिए 'भदन्त' शब्द का प्रयोग किया जाता है । इसी प्रकार 'स्थावर' के लिए 'पाशुपतादिग्रहती' शब्द का प्रयोग होता है । 'पाशुपत' के लिए 'भारवह्नि' शब्द का भी प्रयोग किया जा सकता है । इसी प्रकार सूत्रधार के लिए 'सूत्री', 'सूत्रवार' अथवा 'श्रुतुचरेषु कर्ता' शब्द का प्रयोग किया जाता है । 'भाव' शब्द से भी सूत्रधार का बोध होता है । 'सूत्रधार' के लिए 'किंचिन्नीतगुषा' शब्द का प्रयोग भी किया जाता है । इसी प्रकार 'मृत्रधर' के लिए 'मार्ष' शब्द का प्रयोग होता है । 'नृपादि' के लिए 'डवरस्थ', 'चयो' अथवा 'सगना' शब्द का भी प्रयोग किया जाता है । इसी प्रकार मित्र के लिए 'मित्राभिधायिन्' शब्द का प्रयोग होता है । इस प्रकार के शब्दों का विधान करने पर भी उनका ठीक ठीक बोध न हो तो अन्य शब्दों का भी प्रयोग किया जा सकता है । केवल इतना ध्यान रखना चाहिए कि शब्द ऐसे न हों जिनसे किसी प्रकार का व्यवच्छेद न हो । नाम निर्देश का यही प्रयोजन है कि जिससे किसी प्रकार का व्यवच्छेद न हो । इसीलिए नाम निर्देश करने में किसी प्रकार का विरोध नहीं है ।

'शिल्प्यामजातुजा' इति शिल्पयो दीक्षिलोऽध्यापितो वा । स्थामजः पुत्र । यतुजो लप्सीयान् भवता । तते गुरु-जनक-जेप्ट्रातुभि. यथार्भमयं पुत्रशब्देन वत्सशब्देन च सम्भाष्या । ततशब्देन पुनर्जरन्, श्रपि-शब्दात् शिल्प्यातमजातुजा च वीर्तनीयात् । तथा नीचमकृतीनर्मध्ये तस्माभ्यां 'सौम्य' इति 'भद्रसुत' इति च शब्दाने । पामरन्नीचैः पुनर्नीच एव 'हंसे'-शब्देन, उपलननादू 'श्ररे', 'हंहो' इत्यादिना च के पुत्र 'भतृ' दारक को 'कुमार' कहा जाता है । इसी प्रकार कुमारों के लिए भो 'भतृ' दारिक पदप्यो प्रमोः] तमभना चाहिये । मुति प्रयाति दिगम्बर, जैन कोर तात्र्य क्यात् योध-मिलु ! इन दोनोऽपो 'भर्त्तन्' इति पदसे सम्बोधित किया जाता है । पाशुपतादि पन्थ सम्प्रदायोंके साधु के पहिले तमारकर 'अस-मार्ग' आदि सम्बोधन कियार जाता है ।

शिष्य को 'शिल्प्यामजातुजा' कहकर सम्बोधित किया जा सकता है, यदि वह दीक्षित या पढ़ाया गया हो । 'स्थामजः पुत्र' भी पुत्र के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है । 'यतुजो लप्सीयान् भवता' भी पुत्र के लिए प्रयुक्त होता है । 'गुरु', 'जनक', 'ज्येष्ठातृ' आदि शब्दों का प्रयोग पुत्र के लिए किया जा सकता है । 'तत' शब्द से पुनः 'जरन्' का बोध होता है । 'अपि' शब्द से 'शिल्प्यातमजातुजा' का भी बोध होता है । नीच पुरुषों के लिए 'सौम्य', 'भद्रसुत' आदि शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है । नीच पुरुषों के लिए 'हंसे', 'अरे', 'हंहो' आदि शब्दों का भी प्रयोग होता है । 'भतृ दारक' के लिए 'कुमार' शब्द का प्रयोग किया जाता है । दिगम्बर, जैन आदि के लिए 'भर्तृ' शब्द का प्रयोग किया जाता है । पाशुपत आदि सम्प्रदायों के साधुओं के लिए 'अस-मार्ग' आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है ।

'द्विपारमजातुजा' इत्यमे त्रियं पर्यायं किल तत्सो रसः हो मपवा पदरस्य रु) । श्रामन पर्यायं पुथ , भोर भतर पर्याये रोदा भार्दे । इनहे [वमत] जुग, जिना भोर परे भाद्दें द्वारा 'गुरु' शबसे भोर 'वरत' शबसे मयोधिप्त कियाजाता है । 'ताम' द्वारा [फिरन, पुन भोर रेड़े मार्दें तो सम्योधिप्त कियाजो जाता है । फिर्युदयं पतिफलन] पुच जगोने मो सर्योधिप्त कियाजाता है । 'पारव' शबसे निपम, पुन लया इंने मार्दें मो 'ताम' मरने सर्योधिप्त किया जाता है ।

पुत्र के लिए 'द्विपारमजातुजा' शब्द का प्रयोग किया जाता है । 'पर्यायं' शब्द से पुत्र का बोध होता है । 'श्रामन', 'भतर' आदि शब्दों का प्रयोग पुत्र के लिए किया जाता है । 'गुरु', 'वरत' आदि शब्दों का प्रयोग भी पुत्र के लिए किया जाता है । 'ताम' शब्द से भी पुत्र का बोध होता है । 'पारव' शब्द से निपुण, पुनः लया आदि का बोध होता है ।

मोर सोप धहूत बाचेरो उलाप मपरा मादरम लोण 'तोय', भोर भरुत वहूवर गुरारते है । पारीरा पदर्थ न मारकर द्वारा शोभ परिकरहलो हूँ 'तोयं' शबसे भोर बसने दपनहसमें हप होनो' परे', 'डे' मारद तदोने मो गुराते है । 'कि' कृतन fनम पंय

माता के लिए 'सोप', 'धृत', 'वात्सल्य' आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है । 'तोय' शब्द का प्रयोग भी माता के लिए किया जाता है । माता के लिए 'भरुत' आदि शब्दों का भी प्रयोग होता है । पदार्थों के नाम पर भी माता का नामकरण किया जा सकता है । जैसे 'तोयं' शब्द का प्रयोग माता के लिए किया जाता है । 'परे', 'डे' आदि शब्दों का प्रयोग भी माता के लिए किया जाता है ।

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वाच्य । येनैति कर्म वार्त्ताय-रूप पाशुपाल्य-गीत-नृत्य-याच्चादन-चित्र-राजसेवा-शस्त्र-श्रमादिव्यापार । यथादर्शाद् जाति कुलादिग्रह । येन केनचित् कर्मोद्दिष्टा य-कथ्चित् प्रसिद्ध । तेन कर्मादिनोपाधिना शस्त्रप्रवृत्तिनिमित्तेन संकीर्त्तनीय । यथा गाधिक ताम्बूलिक, कुपील, पशुपालो, गोपालो, गान्धर्वश्चित्रकर, सेवक, वैच्य, क्षत्रियो, ब्राह्मण इत्यादि । तथा स्वयं वा यत् कल्प्यते तदपि कर्मादिनुरूपव्यपणैवैति ॥ [४३ ४४] २०४-२०५ ॥

अथ कल्पनीयानाम् कल्पनाप्रकारमाह— [सूत्र २८५]—चूरे विक्रमसंश्रुचि कल्प्यं नामाथ वाच्यजे । दत्तान्तं प्रापयशो विप्रे गोत्रकर्मानुरूपतः ॥ [४३] २०६ ॥ नृपस्न्रियाम् शुभं दत्ता-सेना स्तं परायोषिति । पुष्पादिवाचकं चेटचाम् चेटे मझलकीर्त्तनम् ॥ [४४] २०७ ॥

नृपस्न्रियाम् शुभं दत्ता-सेना स्तं परायोषिति । पुष्पादिवाचकं चेटचाम् चेटे मझलकीर्त्तनम् ॥ [४४] २०७ ॥

यथा अर्थात् धाणिज्य, कुवि, पशु पालन, गीत, नृत्य याच्चादन, चित्ररचना, राजसेवा, शस्त्र प्रोति श्रमादि व्यापारसे [जो प्रसिद्ध हो उसको उस उपाधिसे द्वारा सम्वोधित किया जाता है] आदि शद्दसे जाति, कुल आदिकर प्रहण होता है । जिस किसी कर्म आदिसे जो कोई प्रसिद्ध हो उसको उस कर्म सूचक उपाधि आदिके द्वारा अर्थात् उस उपाधिको नाम द्दारा प्रवृत्ति-निमित्त मानकर सम्वोधन करना चाहिए ; जैसे [इतर, कुबेल आदिका व्यापार करने वालेको] गाधिक, [पान बेचने वालेको] ताम्बूलिक, [सेती करनेवालेको] किसान, [कुत्ते पालन करने वालेको] शुपाल [गायोंका पालन करने वालेको] गोपाल [संगीतसे जोीवकोपार्जन करने वालो] गाधर्य, [चित्ररचनाद्वारा जोविका करने वालेको], चित्रकर [नौकरीपेशा] सेवक, वैच्य, क्षत्रिय, ब्राह्मण इत्यादि [ये सब कर्म-निमित्तक सद्बोधन-पद बहलाते हैं] । और जिन नामोंसे स्वयं कल्पना की जाए वे भी कर्मादिनुरूप व्यपणैवैति ॥ [४३-४४] २०३-२०५ ॥ जब आपे कल्पित किए जाने वाले नामोंकी कल्पना करमेके प्रकारको कहते हैं—

[सूत्र २८५]—चूरे विक्रमसंश्रुचि कल्प्यं नामाथ वाच्यजे । दत्तान्तं प्रापयशो विप्रे गोत्रकर्मानुरूपतः ॥ [४३] २०६ ॥

[सूत्र २८५]—शूर-वीरके लिए पराक्रम सूचक नामकी कल्पना करनी चाहिए । शरिलकृत नाम ऐसा रखना चाहिए जिसके अन्तमें दत्त प्राता हो और यशके अर्थमके जनुत्प रखना चाहिए । [४३] २०६ ।

राजाकी रानीका शुभ-मूचक नाम र्हिप्त करना चाहिए । श्रेयाग्रों नाम तैसे बनाने चाहिए जिनमें 'दत्ता' या 'सेना' पद प्राते हों । चेटोके नाम फल आदिके अपर रसाने चाहिए । और चेटक नाम किसो मंगल-यसुका सूचक र्हिप्त करना पारिते । [४४] २०७ ।

नूर श्मार्त्त पराक्रमप्रधान पुरुषद्वार्लोके दिवास पर्थात् पराद्धशे सद्चक्र नाम्शी कल्पना करनी चाहिए । जैसे भोमपराक्रम मरिमद्वन् आदि । यत्नियोोके लिष श्राप पर्वप्त्

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तदेवं नाटकादौ न वीध्यंतानि द्वादश रूपाणि सप्तपृथक् च लभ्यन्ते ॥

नाटकादि में ये बारह रूप अलग अलग नहीं प्राप्त होते हैं ।

अन्यत्रापि रूपकेषु दृश्यते । यथाहः-

अन्य रूपकों में दिखाई देते हैं । जैसे कहा है :-

वस्तुतः 'वस्तु' नामक जिस प्रकार के नामों की कल्पना करनी चाहिए । जैसे सुमुखवत्स, सागरदत्त इत्यादि । प्रार्थः- नायक का प्रमुख होने से [वस्तुतः नायक के अन्य प्रकार के नाम भी वनाये जा सकते हैं] जैसे यमनसती इत्यादि । याथार्थ्योके नाम, योनि प्रथोर कमंके ग्रहणुप्त कल्पना करनेे चाहिए । जैसे नारायणस्य, भार्गवस्य [ ये दोनों नाम गोत्र-परक हैं] जोर प्रार्थवाचक, सामक, अमिनि होग्रिय इत्यादि [ये तीनों नाम वंशी के आधार पर बनाए गए हैं] ।

राजाकों स्त्रोंके लिए शुभ अर्थात मंगलसूचक नाम कल्पित करना चाहिए । जैसे सुमुखस्य या विजयवती इत्यादि । पत्नोपवित प्रथ्यात् वेधयाके [तथा] दत्ता हिर्द या सेनाराम्नि जिसकें अंतमे इस प्रकार के नामकी कल्पना करनी चाहिए । जैसे देवदत्ता, वसन्तसेना इत्यादि [नाम भी वेदपारंगत स्त्रों के लिए रखे जा सकते हैं] । चेटो प्रप्रथित [जैसे] [तथोः वास दूतो भारिदेव प्रयमे सादृदेन देवर] भेजा जा सकें दूग प्रकार के [विधृतत सेवकत्ल] स्त्रों के लिए मालिनो, मत्तका इत्यादि युप्तवाचक, और माधि दारदते पुनरत्नित्ला, प्रियंगुमंजरी इत्यादि नामोभी भो कल्पना भो जा सकता है । और चेट अर्थात् चेटे जाने वाले योग्य पुरवधे सिएं मंगसू प्रथानू मगलजरू वधुनः जिस नाद्दिके मघन मृकित हो इस प्रकार के नाम रचिपत करना चाहिए । जैसे सिडापंर पारद नाम बनाने बारिकर । इसो प्रकार वरों के प्रयोजनमे अनुमार उत्तम, मध्यम तथा प्रथम पात्रोंके नाम रखेते चाहिए । [x३-x४] २०६-२०७] ॥

इस प्रकार नाटकादि में सेकर कोयो-वपंचेत् वाहरूप प्रधानं रूपकेषु त्रिमार्गयुंर् विचेष्टन परं तहू कर दिया गया है ।

इस वार्त्त नाटकों के लक्षणोंकि परिलिपिका] ग्रहण एवं मो पाठकों को कही गई हैं । ग्रंथ की

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विकृतभकप्रदेष्टकर्हितो यस्त्वेकभाव्यापया भरति । प्रप्रकृतसंस्कृतया स सट्रूको नाटिका ॥५५॥

[१] सट्रू— विकृतभक तथा प्रकृतभकसे रहित, प्राकृत-रहित केवल एक भावमें [अर्थात् सट्रूत भाव या वाचा प्राकृतसे रहित और केवल प्राकृत वाचा रहित] वनापया गया, नाटिकाओं में साहित्यदर्पणकारने सट्रूक का लक्षण निम्न प्रकार किया है— सट्रूः प्राकृतलोपपन्नः स्यात्प्रकृतप्रदेष्टकः । न च विप्रकृष्टोऽप्यग्रं प्रचुरश्चादिसुतो रसः ॥ २५५ ॥ श्रंकारो जनिकार्यः सुः स्यादन्यत्राटिकासम् । यथा कृपूरमंजरी । माहित्यदर्पणकारके अनुसार सटृटके सारा पाठ्य भाग केवल प्राकृत भावमें लिखा जाता है, नित्य नाट्यदर्पणकारके अनुसार संस्कृत या प्राकृत किसी भी एक भावमें लिखा जा सकता है। जो सट्रूक प्राकृत भावापन्न लिखा जाए वह संस्कृत भावापेक्ष रहित हो और जो संस्कृतमे लिखा जाए वह प्राकृत भावापेक्ष रहित हो । वह नाट्यदर्पणकारके प्राकृत-संस्कृतया ‘एकभावया भरति’ का अभिप्राय प्रतीत होता है ।

श्रीरत्न दानवशत्रोर्यस्मिन् कुलांगना पत्थुः । वध्र्यपत्ति कोयंर्धप्रभृति गुरूणांग्रतः सत्याः ॥ पत्या च विप्रलब्धा गात्रव्ये तं क्रमादुपालभते । ‘शृंगदित’मिति मनोरपिभिहदाहुतोदसी पदाभिनयः ॥ ॥५६॥

[२] शृंगदित— इसमें भी जहाँ दानवशत्रू के मर्यात निष्पन्नकी पत्नी सध्वीके समान कोई पतिव्रता रूपसे पतिके द्वार्व षड्यंत्र जाननेपर किसी गीतमें उसको उपालम्भ देती है उसका द्विष्ट नोने ‘शृंगदित’ कहा है । और वह [पदाभिनया ग्राभिप्राय न होकर केवल] पदाभिनयात्मक होता है ॥ ५६ ॥ साहित्यदर्पणकारने ‘शृंगदित’ का लक्षण निम्न प्रकार किया है— प्रस्यातसृत्यनेकाकं प्रस्यातोदात्तनायकम् । प्रसिद्धनाटचके गर्मे-विमर्शाभ्यां विवर्जितम् ॥ २५६ ॥ भारतीयचवहुलं श्रीतिहासदतेन संश्रुलम् । मतं शृंगदितं नाम विदग्धाभिनयप्रचकम् ॥ २५७ ॥ श्रीरासीनां शृंगदिते गायेन क्रचित्पठेद्वैप । एकैकौ भारतीया इति काव्येन प्रचचते ॥ २५८ ॥

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[३]—चौर्यरतप्रतिमेदं यन्तोरनुरागवशान्न चापि । यत्र ग्राम्यकथाभि कुर्वते किल दूरिकां रहसि ॥ मन्त्रयति च तद्विपयं न्यग्जातितवेन याचते च वसु । लब्ध्वापि लब्धुमिच्छति 'दुर्मिलिता' नाम सा भवति॥४७॥

[३] दुर्मिलिता-- जिसमें कोई दो एकतमें प्राप्त [प्रत्येक] कयामों द्वारा युवक श्रोत्रा युवतियोंके प्रेमका दर्शन प्रौर उनके चौर्यरतका प्रकाशन करती है; उसके विपमें सलाह करती हैं नीच जातिकी होनेसे धन मांगती है; धनके मिल जानेपर भी श्रोत्रा अधिक धन चाहते हैं उसको 'दुर्मिलित' नामक रूपक महा जाता है ॥ ४७ ॥ साहित्यदर्पणकारने 'दुर्मिलिता' ये स्थानपर दुर्मिलित नामावाला प्रयोग किया गया है श्रोत्रा उसको लक्ष्य निम्न प्रकार किया है-- दुर्मेल्ली चतुरङ्का स्यात् केशिकी भारती युना ॥ ३०३ ॥ नागर-नरा न्यूननायकभूषिता ॥ त्रिनालि प्रथमोद्भेदेऽस्या विटमीडामयो भवेत् । पंचनालिद्वितीयोऽपि चित्रपकलिलाश्रयान् ॥ ३०४ ॥ प्रेक्ष्यालिकमृतीया मुखु पीठमर्दनिलाम्बुजान् । चतुर्थी दरानोल स्वादक शृङ्गितनागर ॥ ३०y ॥

[४]—प्रथममनुराग-मान-प्रवास-शृङ्गारसश्रय यत् स्पात् । प्राकृत-वसन्ततिलकैरानपरमन्यद् वापि सोत्कण्ठम् ॥ श्रान्ते वीररसादीननिवद्धमेतच्चतुर्भिरपसारैः । प्रस्थानमिति बुचते प्रवासमुपलक्षयत् सुधियः ॥४८॥ नत्यनिदर्शनानि स्वपदान्यपमाराः ॥ ४८ ॥४९॥

[४] प्रस्थान-- प्रथम मनुराग मान, प्रवास, शृङ्गाररससे युक्त वथ्या श्रोत्रा वस तने वर्षों, प्रववा श्रोत्रा भी वधा उठा प्रदर्शक सामप्रोते परिपूर्वो, मन्तमें वीररस द्वारा निवद्ध किया गया श्रोत्रा चार [प्रथित नृत्य द्वारा दिव्य होनेवाले रसोंको] मे विरचित [उपस्थापनेदर्शी] विदग्ध नृत्यके द्वारा दिन्न होनेवाले [स्पष्ट होने] लज्ञोंकेो श्रयसार कहते हैं । 'प्रस्थाता व नदशा माहिष्यदपष्णातानर निम्ल प्रकार किया है-- प्रस्थाने नायकौ द्वावो होन म्यादुपनायक । द्वामो च नायिका वृत्ति केशरी भारती तया॥ ३० ॥ सुरापानममसायोगादृष्टार्थस्य महति । श्रङ्की दो स्यतालादिर्विलामो रहुलमथा ॥ ३? ॥

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गोष्ठे यत्र विहरतिरसेच्छितमिह फण्टभद्रिप: किंचित् । रिष्टासुरप्रमथनप्रभृति तदिच्छान्ति गोष्ठीति ॥ ५९ ॥

[४] गोष्ठी— जिसमे गोष्ठेमें विहार करनेवाले कृष्णके रिष्टासुरवध आदि जैसे किसी काव्यकला प्रवदर्शित किया जाय उसका 'गोष्ठी' कहते हैं । साहित्यदर्पणकारने 'गोष्ठी' का लक्षण निम्न प्रकार किया है— प्राकृतैर्नरिभि: पुंभिर्देशाभिजनलंकृता । नोदात्तवचना गोष्ठी कैशिकीप्रकृतिशालिनी ॥ ५७४ ॥ हीना गर्भविमर्शाभ्यां पच-पद् योपिदूषिता । स्त्रियां शृङ्गारसंयुक्ता स्यादेकाड्कनिरर्मिता ॥ ५७५ ॥

चर्मण्डलेन नृतं स्त्रियां हल्लोसकं तु तत् प्राहुः । तत्रैको नेता स्याद् गोपस्वोरामिव मुरारिः ॥ ६० ॥

[६] हल्लीसक— स्त्रियोंका जो मण्डलाकार बनाकर नाचना है उसको 'हल्लीसक' कहते हैं । गोपियोंके बीच कृष्णके समान उसमें एक नायक होता है । साहित्यदर्पणकारने हल्लीसकका लक्षण निम्न प्रकार किया है— हल्लीसकं तु एकैक: सप्ताष्टौ दश वा स्त्रिय: । वामुदैतै: पुरुषै: कैशिकीवृत्तिरुज्चयला ॥ मुख्यान्तिमौ तथा सन्धी बहुतालप्रयस्थिति: ॥ ६०७ ॥

यस्य पदाथाभिनयं ललितलयं सर्वास नर्तकी कुरते । तन्नर्तकं शाम्या लास्यच्दलितद्विपद्यादि ॥ ६१ ॥ किन्तरोऽभयं लास्यं कुत्रं शम्या । शृङ्गाररसरधानं लास्यम् । शृङ्गार-वीर-रौत्रादि-प्रधानं द्विपदाद्य: द्वन्नोभेदा: ।

[७] शम्या— सभामें नर्तकी ललित नयके साथ जिसके पदाथोंका अभिनय करता है उस नृत्यको 'शाम्या' कहते हैं । शृगाररस प्रधान नृतको 'लास्य' कहलाता है । शृगार, वीर रौद्र आदि प्रधान नृतको 'द्वनित' कहते हैं । 'द्विपदी' आदि [उन नृत्तोंमें गाये जानेवाले] छन्दोके भेद होते हैं ।

रथ्या-सभाज-चत्वर-मुरालयादौ प्रवर्त्यन्ते बहुधा: । पात्रविशेषयैयं तत् प्रेक्षैकं कामदहनादि ॥ ६२ ॥

[५] प्रेक्षराक— गल्लीमें, समाजमें, चौराहेपर ग्रथवा मठशाला आदि में बहुतसे विविध प्रकारके पात्रों के द्वारा जिसका प्रदर्शन किया जाय उस [नृत्यविशेष] को 'प्रेक्षराक' कहते हैं । जैसे काम- दहन आदि [प्रेक्षराकके उदाहरण हैं] ॥ ६२ ॥

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[५]—पोडश द्वादशाष्टौ वा यस्मिन्न नृत्यन्ति नायिका, । पिण्डीबन्धादिविन्यासः रासकं तदुदाहृतम् ॥ पिण्डनात्तु भयेत् पिण्डी गुम्फनाच्छृङ्खलाभवेत् । भेदनाद् भेदको जातो, लताजालापनोदतः ॥६३॥

[९०]—कामिनोऽभिमुखो वधुं इच्छेदितं मत तु नृत्यते । रागाद् वसन्तमासाद्य स ज्ञेयो नाट्यरासकः ॥६४॥

साहित्यदर्पणेएकारने 'प्रेक्ष्यरासकं' के स्थानपर 'प्रेक्ष्यरास' नामकः प्रयोग किया है और उसमें कहा है कि निम्न प्रकार किया है— गर्भावमर्शरहितं प्रेक्ष्यरासं द्वीननायकम् । ह्रस्वस्त्रीधैमेककम्बविप्रकम्ब- प्रवेशकम् ॥ २८६ ॥ नियुद्धसम्प्रकटयुते सर्वगुत्तिममाश्रितम् । नेपथ्ये गीयते नान्दी तथा तत्र प्ररोचना ॥ २८७ ॥

[५] रासक— जिसमें सोलह, बारह या आठ स्त्रियाँ [नायिकाएं] पंक्तिरोवन प्रकारिको रचना द्वारा नाचती हैं उसको 'रासक' कहा जाता है । [नाचने वालियों] एक साथ कृतहु हो जानेसे विन्दु बहते हैं । एवं—द्वितरते मुंप-कर [नाचन] भूसतला कहलाती है । [पूर्वं गुम्फिता] तताजालसो तोटकसर प्रसग हो जानेसे भेदक कहते हैं ॥ ६३ ॥

माहित्यदर्पणेएकारने 'रासक'का मदर्शन निम्न प्रकार किया है— रासकं पंचपात्रं स्यात् मुख्य-निर्वहणान्वितम् । भाव-विभावाभूयिष्ठं भारतीकेशिकीमुतम् ॥ २८५ ॥ अनुरागमेकांकं सरगीत्यानं कलान्विताम् । शिल्पग्रन्थान्तीयुतं स्यातन्नायिके मुखेननायकम् ॥ २८६ ॥ उदात्तभाविन्याससंकृतं चोत्तरोत्तरम् । ह्रद् प्रतिसूत्रसम्निब्धरमपि फेनकिं प्रचक्षते ॥ २८० ॥

[९०] नाट्य—रासक— वसन्त वादि[उत्सवों]के प्रारम्भपर नृत्योओं द्वारा रगारिके भावोंमें को रसास्वादन करानेमें जो परिष्कृत रूप द्वारा प्रदर्शित किया जाता है उसको 'नाट्य-रासक' कहा जाता है ॥ ६* ॥ नाट्यरासमेकांक यदुत्ताललयोमयति ॥ २८५ ॥ उदात्तनायकं तद्वन्मर्दकौपान्त्रनायकम् । नास्योद्दामो नत मुखरागो नारी शृङ्गारसनिज्जसा ॥९५॥ मुग्धनिवृच्हो मन्थी लाम्यांगानि दशार्द्धपि च । हेच्छित प्रतिमुखं सन्नियोजित मेन्द्रान्ति भेदकम् ॥ ९६ ॥

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ग्राक्षिप्तिकाथ-वर्गो मात्राध्वकौड्यप्यभग्नतांलच । पद्घतिकां छर्देनिफा यत्र स्वुस्वदिह काव्यमिति ॥६५॥

[१९] काव्य— जिसमें ग्राक्षिप्तिका, वर्ण, मात्रा, ध्रुव श्रोत्र न टूटनेवाला ताल, पद्धतिका श्रोत्र छर्देनिका जिसमें हो उसको 'काव्य' कहते हैं । ॥ ६५ ॥

हरि-हर-भानु-भवानो-स्कन्द-प्रमथाधिपस्तुतिनिबद्धः । उद्धत-करुणाप्रायः स्त्रीवर्जों वर्णानायुक्तः ॥ यदिच्च वृत्तवाचा शुद्धः सक्तोरपां च सकीर्यते । सर्वाभिभावाभिचित्रंश्च विचेष्टितैश्चित्रः ॥ ग्रापमुद्रतोड्य ललितो भार्गो ललितोद्भतंव सम्भवति । ग्रर्थनामुद्रतयाल्लालित्यादुभयसत्त्वाच्च ॥६२॥

[१२] भार्ग— विष्णु, महादेव, सूर्य, पायंती, स्कन्द श्रोत्र प्रमथाधिपको स्तुतिमें निवद्ध किया गया, उद्धत करुणाश्रंते युक्त, स्त्री पात्रोंसे रहित, यदि शुद्ध संस्कृत तथा प्राकृतके] संकर [द्वारा किए गए वर्णनं] से युक्त हो तो शुद्ध संस्कृत तथा प्राकृतके] संकर [द्वारा किए गए वर्णनं] से युक्त हो तो संकरीयं [भाषा कहलानेवाला] सब प्रकारके भापाओं श्रोत्र नाना प्रकारके व्यापारोसे विविम्र यह भार्गो उद्धत [रपें वाचं] शिल्पोके उद्धत ललिते तथा उभयात्मक होनेसे उद्धत, ललित तथा उभयात्मक होनेसे उद्धत, ललित तथा उभयसत्त्वोक्त [उसमें वाचित] विचेष्टितोसे चित्र यह भार्गो उद्धत [रपें वाचं] शिल्पोके उद्धत ललिते तथा उभयात्मक होनेसे उद्धत, ललित तथा उभयात्मक हो सकता है । ॥ ६२ ॥

यदि दुःखरसभिन्नेयं चित्रं चात्युद्भटं च सम्भवति । तद्भारके डभिन्नेयं युक्तमतुलैरचित्रालंक्च ॥ प्रायो हरिचरितयुक्तः श्रीकुत्कगायादिवर्गोऽमाश्रच । सकुमारत्वं प्रयोगाद भार्गो उपि हि भवति ॥६३॥ इत्यादि न॥ ६३ ॥

[१३] भाषिका— प्रधिकतर विष्णुके चरितसे युक्त दिश्रयों द्वारा गाया [छंद], वर्ण श्रोत्र मायाधोंकी रचना जिसमें को जप इस प्रकारका भारा भी सुकुमारताके प्रयोग के [दिखलानेके कारन] भाषिका कहलाता है ॥ ६३ । साहित्यदर्पणकारने भायां तथा भाषिकाके लक्शण निम्न प्रकार किए हैं— भाषिका श्लक्ष्णगानोपध्या सुर-निर्वहण्यान्विता । कैशिकी-भारतीयुक्तियुनेन काव्यविनिर्मिता ॥ ३०८ ॥ उद्भटानां चिका मत्वद्गुणग्राह्यहरष्ठकम । उपन्यासोड्य विन्यासो विनोघः साध्वर्स तथैव ॥ ३०८ ॥

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शब्दप्रकाशे साहित्ये धुरन्दोलद्र्मविवायिनाम् । श्रीहेमचन्द्रपादाना प्रामाण्य नमो नमः ॥ १ ॥

कवितेकी स्वतन्त्रता मात्रके नियमोंसे नियमित्त्याद्, युक्त्यैरमिविधिततत्त्वाच्च युक्ततावेच नीतिता-नीति । कविता स्वतन्त्रता तथा युक्तियोंसे यथेष्ट विचार करनेमें हो मनोरंजक होने तथा भरतमुनि [युद] द्वारा न कहे जानेवाले [इनको हमने मूल प्रयमें न विस्तारकर यहाँ] वृत्तिभागमें हो दिसलाया है ।

परोपनोतशाब्दार्था, स्वनान्मा कतरोर्य । निवद्धारोडधुनातन, को नौ क्लेशमवेक्ष्यति ॥ २ ॥

ध्याखररना न्याय, सांहित्य तयघ्‌द नास्त्र्येः सधसस प्रथोको रचना करनेवाले श्री पूरष प्राचांयें हेमचद्रजोको प्रसन्नताके लिये हम उन्को नमसवार करते हैं ॥ १ ॥ आआतस [कि प्रयकार प्राप्] दूसरोरो शाद्बोो मोर प्रचोको लेखर् अपने नामले [प्रव रचना दिसलाकर] कोनितका रपार्न्न करते हैं [इसी रकामे इस पृथ को रचनामे उठाए हम] हमारे शतेनको कोन समभती है ॥ २ ॥

न सूत्रग्रंथ्येराधिक्य न हीनत्व न क्रुष्टता । यावदर्थो गिरा सन्ति स्वयमन्तो विचेत्सितम् ॥ ३ ॥

[हमारे इस पवमें] म॑ सूत्रार्घ प्राधिरय है ओर न वृत्तिभागार्त् । न किको भरामें नमो है मोर न [पुष्टत पर्याप्त] अमरपद्तता है । विदांन् लोग स्वम हो देख लें कि इसमें जितना ग्रप बरना है उतने हो दाव्योंका प्रपोग किर्या गया है : [प्रनायारमप् कुदपभी नहों सिला गपा है मोर न अ्रपेक्षित वातने हो गपा है] ॥ ३ ॥

शब्दलदम-श्रमालदम-काव्यलदम-कृतश्रम । नामिलाससित्रमार्गो नौ प्रनाद्‌ड इव जाल्ल्र ज ॥ ४ ॥

स्पाफररत्नास्र्, न्यायनास्र्र मोर तार्किर्यनात्रम्मे यमकहो र्दानित रनेवासा हम दोनोंको वाक्योश प्रसाद नगाके पाराखे सततार्न लोर्म याराओं वाता है ॥ ४ ॥

रूपसद्रूप विद्नातुं यदीचछन्त यथामितम् । सन्तरत्नानी गृहीत्वा निर्मेल नाट्यदर्पणम् ॥ ५ ॥

हे सद्जन युद्योो पदि यथ हपकोों वारतावीर् रसहपनेो वेष्टना चाहते हो ता हम निमंल् नाट्यदर्पणको प्रहए कोरिलए । [इस निर्मल नाट्यदपलमें ह्रो हपरोों स्वरपोो यपाचं रग्न्त हो सकेंगे ।]

समर्पण्ण निवृत्तिरस्य संहार इति सप्तम । उपसंहार प्रतिगमः कर्मणां परिसंक्षयः ॥ ३९९ ॥

निर्वेशवाक्यवत्युपसंचिनिन्यास डति से मृत । भान्तिनिरशो विवेकोऽयं ग्यानिस्तध्यायार्यन् तु माधनसमम् ॥ ३९९ ॥

मोपालनभ्रण्च कोपीडयेध ममपण्सपम् । निदर्शनस्योेपन्यासो निवृत्तिरिति कथ्यते ॥ ३ ८ ॥

मद्दार इति च प्राहुयन् । कार्यस्य समाप्तनम् ॥

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इति श्री रामचन्द्र-गुरुचन्द्रविरचितायां स्वोपज्ञनाट्यदर्पणाविवृत्तौ सर्वरूपकसागारसङ्ग्रहनिर्ययो नाम चतुर्थों विवेकः

श्री रामचन्द्र-गुरुचन्द्र विरचित स्वनिरमित नाट्यदर्पणटीकां विवृत्तिमे सब रूपकोके समान विषयोका प्रतिपादन करनेवाला चतुर्थ विवेक समाप्त हुआ ॥

उत्तरप्रदेशास्थ 'पीलीभीत' मण्डलान्तर्गत 'मुक्तुल' ग्राम निवासिनो श्री त्रिवेणीलाल-राधाकृष्ण-महोदयपुत्रौ-तनुजौ तनुजा

वृन्दावनस्थ मुखकुलविदुषि विद्यालयाङ्गतविद्वेन, तनयपुत्रायम्पदमाधितिष्ठता, एम० ए० इत्युपाधिधारिणा 'विद्यामातृतत्परेण' धोमदाचार्यपुत्रविदुषेवरसिद्धान्तदिरोणमणिना

विरचितां 'नाट्यदर्पादर्पणिका' हिन्दी नाट्यालया समालता । समाप्तरचाय ग्रन्थ ।

समाप्त

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चतुर्भांफला निपुणो, जेको वाचमपास्यहे। रूपकेंद्रादिष्वभिविदग्धः यथा नायर्ये धृतवपुः॥ १ ॥

ग्रभिनेयस्य काव्यस्य, सूत्रधारेभृत कियत्। किपत्सौडपि प्रसिद्धस्य दृप्टलक्ष्म प्रसद्यमहे॥ २॥

नाटकं प्रकरणं च, नाटिका प्रकरणयण्म। व्यायोग समवकार भाषा प्रहसन डिम॥ ३॥

मदृकू ईहामृगो वीथो चर्वार सर्ववृत्तयः। त्रिवृत्तय परे स्वल्पो कौशिको परिवर्जनात॥ ४॥

स्वपाताद्धरजाच्चित, धनं कामार्थतत्फलम्। ताल्लूकोपाफ़डारमा च, हितवाक्यं तथा नाटकम्॥ ५॥

उद्भतोदात्त-ललित नात्तता धीर विदोपकथा। वण्पां सङ्कीर्णचार नेऋण्या मध्यमोत्तमा॥ ६॥

देवा धीरोदत्तता धीरोदात्ता सैयेग मनीषे। पोरणास्ता वलिग विप्रा, राजानस्तु चरुद्विया॥ ७॥

पोरोदतस्चलचप्ड दर्पीं दम्भो विकत्पन। पोरोदातोदितमभीर याधी सत्वो दामो स्थिरः॥ ८॥

गृद्धारो घोरल्लिष्ट, मलयसक्त मुखो मृदुः। घोरवातोद्गहृदार कृपाश्रुद्रविनयो मयी॥ ९॥

मुख्यार्थेन्टपल्न काव्यं मुखं प्रस्थान्तिकं वदेत्। सूच्य प्रयोगमपूस्म, उपेत्य तत्प्रत्युविपम॥ १०॥

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नोरसानुचितं सूच्यं, प्रयोज्यं चादिपयसं । ऋद्धं* तद्विनाभूतं, उपेद्यं तु खुयुस्सितम् ॥ ११ ॥

प्रयादा नाय्यमुख्येन, स्वगतं स्वाहुदि स्थितवम् । परावृत्य रहस्यार्थमाज्ञया च तत्पवारितम् ॥ १२ ॥

त्रिप्रकारान्तरोक्तेन, जल्पो वस्त्रजनान्तिकम् । भाषार्थोक्तिः स्वयंस्प्राप्तं प्रयुत्तरमपात्रकम् ॥ १३ ॥

स्वल्पपदं सगुर्वकं, द्रिलोट्टावान्तरं सुखम् । धिन्यु-सूपैडु-भारादि-वचनोंऽपि चिपपदं जितम् ॥ १४ ॥

एतद्वीरसमान्याद्वौ, मधुरवान्त रसौषिभिः । मलद्वितमलदार-भया-उज्ज्वलद् रसः ॥ १५ ॥

उत्तत्वाद् वस्यमाश्रित्याद्, भ्रूयाद् वाक्यं यथुच्यते । स तु वचो यथाश्रेये येन, न याति पुनरुक्तताम् ॥ १६ ॥

गोपुच्छ-केश-वलप्तौ, नाट्यवस्तूनि कल्पयेत् । उदात्ता रक्षकः श्लाघ्या, संस्थापनीयाः पुरः पुरः ॥ १७ ॥

अयुक्तं* च विरुद्धं च, नाट्यवस्य रसस्य च । दृष्टं यत् तद् परित्याज्यं, प्रकृत्यं यथावाज्छितं ॥ १८ ॥

अवस्पायै समास्वादिर्वा, द्वेन्दो वा कार्ययोगतः । प्रकृत् सविन्दुशंसायं, चतुर्थामो मूर्छन्ततः ॥ १९ ॥

प्रवृत्त्येकविरोधेन्, स्वल्पपात्रं सनिर्गम् । पञ्चाङ्गरसोपकथ्येन्, दशासङ्कलुप. प्रकल्प्यते ॥ २० ॥

अभिग्यात् प्रयत्नेन, नेपुथ्यो न कुत्राचित् । वन्धः पलायनं सङ्घे, योज्यो वा फललिप्सया ॥ २१ ॥

दूराद्वयानं पूरोधः; राज्यं देशादि विश्वस । रत् मृत्युः समीकाद्रि, वच्यो विश्वम्भकारिद्रिः ॥ २२ ॥

मद्वृनन्हेंप वृत्तस्य, त्रिकालस्पानुरञ्जना । सङ्क्षिप्य सस्कृतेःनोक्तिः, मद्वादौ मधयमेजने ॥ २३ ॥

शुद्धो विश्वस्मकथस्त्रः, सद्धृशो नोच मध्यमे: । शक्य संधानातो-त्कलवान् ॥ २४ ॥

एव प्रवेशको नोचैः, परार्थ्यो प्राकृतादिना । एवो प्रभूतकार्यन्तवात्, माटकादिचतुष्कल्ये ॥ २५ ॥

मध्वासाम्यगतानेनं, विधिना कृत्यपोजनं । वस्तुनः सूचनं चूलं, पात्रैरनेकप्सरस्स्थितिः ॥ २६ ॥

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शोङ्कावतारो भतृ-पुत्रे: प्रच्छन्नतरमसूचनम् । प्रायो सूच्ये बहुवचने, कमादलंघे तरे तु वे ॥ २७ ॥

वीजं पताका प्रकरी, विरुदु: कायं यथार्थत: । फलस्य हेतव: पश्चात्, चेतनाचेतनात्मक: ॥ २८ ॥

स्तोकोड्ट्ट: फलप्राप्तौ, हेतुर्वीजं प्ररोह्यपि । प्राविमर्शे पताकाचेतू, चेतन: स परमार्थत: ॥ २९ ॥

विनिश्चितार्थेपरम्पत्ति:, वृत्ते मन्योपकारिणी । पताकारूप्यकं तत्तु, चतुर्थी मण्डनं यच्चित् ॥ ३० ॥

सहसेप्टायंसाभ्रच, शिलष्टस्निग्धतिमिरा च वापू । दृढ़र्था वाप्रकटे शिलष्ट-स्पष्टप्रत्यभिज्ञारपि च ॥ ३१ ॥

प्रकरी चेत् शवचिद् भावो:, चेतनोऽन्यप्रयोजन: । हेत्वोद्देशेड्नुसन्धानां, बहुला विन्दुराफल्नातु ॥ ३२ ॥

साध्ये बीजसहकारी, कायें कार्येसतु मुख्यता । पताकादौ: प्रयत्नेनानुसन्धान: सूचनाड्दयम् ॥ ३३ ॥

आरामप्र-यत्न-प्राप्त्यार-नियमताश्चि-फलागम: । नेपथ्यं से प्रधाने स्थ:, पथ्रावस्थां घ्रूवं कमालु ॥ ३४ ॥

फलायोल्सुयमारम्भ:, प्रयत्नो व्याजुतो त्वरा । फलसम्भावना किश्चित्, प्राप्त्याशा हेतुमात्रत: ॥ ३५ ॥

नियमत्न्विप्रकायाना, साक्षात्क्यात् कार्यनियंय: । साक्षादिष्टायंधमूतित:, नायकद्रवय कलामत: ॥ ३६ ॥

मुख्यं प्रतिमुखं चैवेमसों-निवंर्हणान्यथो । सन्ध्यो मुख्यययुत्तां;?, पश्चाच्चावस्थाडनुगा: कमातु ॥३७॥

मुख्यं प्रघनवृत्तात:;, बीजोस्पति-रसाधय: । प्रतिमुखं कियल्लय-बीजोद्घाट-सभ्भवित: ॥३८॥

बीजस्योमुख्यवातु यर्मे:, लामालाभ-गवेषणे: । वृत्तसन्ध्य-विधानहमा, विमर्दो व्यसनादिमि: ॥ ३९ ॥

सवैंजविततादष्टया। नाना-भावा मुखादय: । फलसंयोगिजो प्रथमं, मुखो निवंर्हणेघ घ्रूवम् ॥ ४० ॥

उपक्षेप: परिकर:, परिन्यास: समाहृति । वृत्तान्तं करणं चैवान्यदेवापि विसोमनम् ॥ ४१ ॥

शेषं प्रपञ्चं यथोक्तं, विधानं पतिमात्रगा । सर्वंसंिचयद्मूर्ति स्मु:, द्वादशाङ्गं मुखं ध्रुवम् ॥ ४२ ॥

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वीजस्योदितिरपकर्षेप स्वलरव्यास: परिक्रिया । विनिरचय: परिक्रियास:, पुनर्नयास: समाहिति: ॥ ४३ ॥

स्वल्पप्ररोह उद्भेद:, करणां प्रस्तुतक्रिया । विलोमनं स्तुतिगर्थं, भेदतं पात्रनिग्रहम् ॥ ४४ ॥

प्राप्तानां मुखसंप्राप्ति:, युक्ति: कृत्यविचारणा । विपानं सुखदुःखादिति:, विस्मय: परिभावना ॥ ४५ ॥

विलासो धीरतं योध:, सात्वनं वच्यांसंहृति: । नमं नमस्यितास्ताप:, सुरेतानि यथार्थतः ॥ ४६ ॥

पुष्पं प्रगमनं वच्यम्, उपन्यासोपसं पञ्चमम् । पड्वावेष्टमप्यज्जानि, प्रतिमुखे नयोदय: ॥ ४७ ॥

विलासो न-स्त्रियोरोहः, धीरतां साम्येनादरः । रोषोर्धति: सात्वनं साम, पात्रौचो वच्यांसंहृति: ॥ ४८ ॥

कोपायें हसनं नम्य दोपायवृत्तो तु तद्वृति: । अपाङ्गदर्शनं तास:, पुष्टं वाक्यं विरोधपदत् ॥ ४९ ॥

प्रगमं: प्रतिबोध-श्रेपी:, वच्यं प्रत्यसकंकुसम् । उपपत्तिर्हन्यास:, नष्टेप्रेहेताजुनुसंपयाम् ॥ ५० ॥

सड्‌ग्रहो रूपमुखा, प्रार्थनोदार्हिति: कमः । उद्भेगो विद्रवश्चलद, मुग्वता। कार्यमष्टकम् ॥ ५१ ॥

आलेपोर्धिबल मार्गोंसत्याहारस-तोटकके । पंचेतानि प्रधानानि, गर्मोंड्रजानि नयोदय: ॥ ५२ ॥

सड्‌ग्रह: साम-दानादि:, रूपं नानार्थंसंसहय: । अनुमान निरचयो लिङ्गात्व, प्रार्थनता भावयाचनम् ॥ ५३ ॥

उदार्हित। समुत्कपं:, कमो 'भावस्य निश्रयंप: । उद्भेगो भोेद्रंच: शाड्‌वाड्डसेपो वीजप्रकाशनम् ॥ ५४ ॥

प्राधिबलं बलाधिकयं, मार्गोंसततवार्यांसनम । प्रसत्याहरसां ह्रद्यं, तोटकं गर्मितं वच: ॥ ५५ ॥

ह्रद्यं: प्रसड्‌:ः समेतोदपवादाल्लच्वादनं ध्रति: । क्षोभो विरोध: संश्रमभ: भवेदवगुप्ततो नव ॥ ५६ ॥

शक्ति-प्ररोचनारड्‌दान-दयवमादारस्तु मुख्यत: । नयोदयार्ज्जान्यमसां, द्व्रव: पुष्टचमत्कृतम् ॥ ५७ ॥

प्रसड्‌गे मुखता कावित:, संशट: क्रोधेज वच: । अपवाद: परौघावक:, स्वादनं मन्युमार्ज्जनम् ॥ ५८ ॥

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तिरस्कारो दृशोति क्षेद्, श्रम, काय-मनोभवः । विरोधः प्रस्तुतज्यानि, सरस्मः सात्कृतिकोऽन्तनम् ॥ ५९ ॥

कृदप्रसादन शक्ति भासिसिद्धि प्ररोचना । फलस्थमीप्स्यमादनं, व्यवसायोद्यप्येह्युपकृत् ॥ ६० ॥

सनिर्झरनिर्झरो ध्येय निरंतर परिवाप्यताम् । उपार्जित कृत्रिमानन्द, समये परिदृश्यतामय् ॥ ६१ ॥

भापापे काव्यसहार-पुबंभाव प्रदर्शतया । चतुर्दशाझो निर्वाहः, सनिर्झरींज फलागम ॥ ६२ ॥

निरोधः कायमोरसात, ग्रथन कार्येदर्शनय् । निरंतरोग्नुमद्वयातिः, परिमाया स्वनिदर्शनय् ॥ ६३ ॥

सेवोपास्तित कृति क्षेमप्य श्रानन्दो वार्च्छितारागम । समयो दुसनिर्झोसोद्युत्पत्ति परिगृहय्नमय् ॥ ६४ ॥

भापर्या साम दानोक्ति*, प्रारम्भाव कृत्यदर्शनय् । चरेष्टा काव्यसहार प्रदर्शित गुम्मस्सला ॥ ६५ ॥

इति श्रीरामचन्द्र गुणचन्द्रविरचिते नाट्यदर्पणपङ्क्तिसूत्रे नाटकनिर्णयो नाम प्रयमो विवेकः ॥ १ ॥

२ .

प्रथः प्रकारसाद्येकादशरुपनिर्णयो द्वितीयो विवेचक

प्रकरस्या वधिगु विघ्र सचिव-स्वाम्यस्सवरासु । मन्दोगोत्राझन दिव्यानुरचित मध्येच्चेपितम् ॥ १ ॥

दास श्रेष्ठ किटेयुङ्क, मल्लेशाढच तथ्च सप्तशा । मल्ल्येन कन वस्तूनाम, एक दि नि विधानात ॥ २ ॥

कुलस्त्री गुहेवर्त्तायां पणपस्त्री तु विषयंये । विटे परयो द्रय तस्माद् एकैकवितथाल्प्यत ॥ ३ ॥

प्रायवल्प्य पुरा क्लुप्त यदाज्ञानां स सद्गुखुम् । शेष नाटकवत सर्व, काविसङ्कोपांशवां विना ॥ ४ ॥

चतुरदुः वह्रस्त्रीका, नुपेरा स्त्रो महोप्लना । क्लप्यार्था केदिकी मुद्रा, पूर्वेदश्रदयोदितता ॥ ५ ॥

मह्य्याति रुपसहित कया-देय्सोनिटो चर्तविधा । यन मुख्पाद्रहतो योग, पयमंते नेदुष्टयपा ॥ ६ ॥

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प्रेमाद्रों वतंतेऽपस्या, नेता मुख्या|मिरसंकृतः । देवी दयादपरासुग्धा, समा धर्मा दृढयोः पुनः ॥ ७ ॥ कोध प्रसाद-प्रत्यहं-रतिच्छद्वादि मूरिखा । एव प्रकारणो किं तु, नेता प्रकारणो|दितः ॥ ५ ॥ एकाहचतंकादौ, धर्मापेक्षिविर्जितः । प्रस्तावो नातिसंडुपारो, नियुद्ध-स्पर्धनो|दितः ॥ ६ ॥ स्वल्पयोर्विज्जनद् रपात्-वस्तुदीप्तरसाथयम् । मदिव्यभूततिस्वामो, व्यायोगो नायिका विना ॥ १० ॥ विज्ञेयं समवकार, रूपातप्यों निविमर्शंक । उदात्तदेव-दैत्येशो, वीयद्धश्री वीर रौद्रवान् ॥ ११ ॥ पञ्च द्वादश नेातार, फल तेषा पुथकं पुथकं । भव्वास्नरयस्ख्यकारा, त्रिकपटास्वविद्रवा ॥ १२ ॥ पञ्चुपमेक्रमूर्त्तां स्तु, नित्तिरतप्या स्वकायंवत । महाकाव्ये च सम्बद्धा, कामाद् दृश्येक्कसन्थयम् ॥ १३ ॥ मुज्झारस्निविघो धमें-कार्मायंफलहेतुक । वृत्त्येक वृत्त्येक देवेश्य, सम्भवी कपटस्निधा ॥ १४ ॥ जीवाजीवो|मपोत्य स्पाद्, विद्रवस्नित्ररमेयु तु । प्रत्येकमद्वे प्वेकैक, पच च स्तगधरास्सदिकम् ॥ १५ ॥

माखः प्रधानस्झार-वीरो मुख|निर्वाहवान । एकाद्द्रो दशालास्याश्च, प्रायो लोका|नुरञ्जकः ॥ १६ ॥ एको विटो वा धूर्तो वा, वेश्यापस्से स्वस्प वा स्पतिमु । व्योमोक्त्या वरणयेदत्र, वृत्तिमुंख्या च मारती ॥ १७ ॥ चेमुख्यकार्यं धीयद्धि, स्पातकोत्कीन दम्मवत । हास्याद्दि माधु सच्छद्रू वृत्ति भ्रषपन किखा ॥ १८ ॥ निम्द्या-मास्निन्द चिप्रादे, मस्त्रली|डस्म्य-व्जितम् । परिहासवच-प्राय, शृद्धमेकस्य चेप्सितम् ॥ १९ ॥ सद्दीयंमुद्रताकल्प-मापाद्यचार परिच्छदम् । बहूना व-घकी चेट वेश्यापस्सदोना विचेप्सितम् ॥ २० ॥ प्रशान्त हास्य स्झार विगसं स्वातवस्नुक । रोद्रमुख्यश्चवतुरद्र्क, सेन्द्रजाल रस्सो डिमः ॥ २१ ॥ अन्योल्कावात निर्घाता, चन्द्र सूर्योंपरक्तय । मुरासुर विषावचया, प्रायः पोडश नायकाः ॥ २२ ॥

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चत्स्रिकादृष्टः पुःस्वामी, स्थातुमुद्योतोऽयवृत्तवान् । माषोऽकस्निग्धवृत्तपुष्टः, वायुपुष्टकरुणाक्षिकः ॥ २३ ॥

निर्यंदवाचो मूर्ध्नजाड्रः, योपिता परिदेवन्तम् । नरं निवृतसद्ग्रामात्, चेष्टारहितया द्विषद्गुला: ॥ २४ ॥

ईहामृगः स्ववीरपुष्टः, दिव्येशो हस्तमानवः । एकादशचतुरहस्तो वा स्थातुमुपोत्थितवृत्तवान् ॥ २५ ॥

दिव्यस्त्रीहेतुकृदग्रामः, निर्विश्वासः सर्वड्करः । स्त्रियोपहारभेददक्षः, प्रायो द्वादशानायकः ॥ २६ ॥

व्याजेनात्र चरिताम्बु, वधकासन्नेऽथरोपिकु । द्रयायोगोक्ता रसा संधिवृत्तयोदिताचिता रतिः ॥ २९ ॥

संधिव्रारमिरसारद्वेधी, स्त्रीकृतोऽप्यह्नेपारनिका । मुखनिर्वाहसंचिः स्यात्, सर्वसंध्योपयोगिनी ॥ २७ ॥

स्थाय्हारोद्भविलगण्ठः, प्रपञ्चैरिभिगत ध्वनिम् । श्रसन्नलापोऽपे वाक्कलेः, नालिका मुदव मतम् ॥ २८ ॥

उद्ग्राह्यपकावर्गिते, प्रयाचस्पन्दित स्पृतम् । भरतोक्तिसत्त्वोक्तिभि:, द्वेधयद्धानि प्रयोदय ॥ ३० ॥

कथयार्था मविच्छप्तिःचाः, स्थाय्हारो हास्यलेनगीः । मिथो जल्पे ह्यवलस्य, स्थापनादधिवल बलात् ॥ ३१ ॥

गण्ठोकस्मादृ यदन्यायं, प्रस्तुतानुगत वचः । प्रपञ्च सस्तक हेत्यं, मिथोऽमिप्रेक्लाभनृत् ॥ ३२ ॥

त्रिगत द्रान्दसम्बेन, मितस्यायंस्य योजनम् । वचोडन्यायं छल हेत्यं-वक्ननारोपकारसम् ॥ ३३ ॥

हसन्नलासवतेन, हित मनसायमत्यते । प्रयत्नोत्तर तु वाक्कलेः, हेत्या वाक् प्रतियागपि ॥ ३४ ॥

हास्याय वच्यना वालोः, ध्यतययो गुणो दोपयः । मुदव परस्पर स्पाढ़:, उद्वचाय ग्रह भापयाम ॥ ३५ ॥

तच्चावलग्नित सिद्धिः, कार्यस्यान्यमियेष या । स्वेच्छोक्तपादपाड्यायात्, पदवस्पन्दित तु तत ॥ ३६ ॥

स्वो स्वा वृत्तोपी हि त्वा, संधिस्थूल्यादिका स्थिति्म । सामान्यो नाटकस्याया, विदग्धया ह्युदान्तरे ॥ ३७ ॥

इति श्रीरामचन्द्र गुणचन्द्रद्विरचिते नाट्यदर्पणे प्रकरणाद्योऽभदर्शननिरूपणं नाम द्वितीयो विवेकः समाप्तः ॥ २ ॥

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भारती सव्वती केंणिक्कियारभटी च वृत्तयं। रस-भावाभिनयधा:, चतसो नाटय-मातर:॥ १ ॥

सव्वड्ढपकागामिन्यामुख-परोचणोहियता । प्राय: संस्कृतनिस्सोप-दसाहिया वाचि भारती॥ २॥

विदूवक-णट्टी-माणं, प्रसुतायेऽवि माणणाम् । सूत्रधारस्स वक्रोक्त-स्फुट्टोक्तियंव तदामुल्लं॥ ३॥

वादियारं-समयाहूणं, भावोक्तिं पात्रसड्क्कम । पूर्वरड्ङं गुपासुत्तं, सम्भोअणुययं प्ररोचना॥ ४॥

सात्वती सत्त्व-यागज्जाभिनेयं कम्मं मानसम्म । सज्जणवाधप्प-मुद्दघयं-रोद-वीर-णामसुतं॥ ५॥

केँणिको हास्स-णिज्जार-णाटयं-धम्मंभिदारइणका । मारभरूणअण-दण्ण-दोआ-तिरसाणिवता॥ ६॥

स्थायो भाव: स्थिरोकारं, विभाव-णुभावअरिभिः । स्पष्टाणुभावजिस्सेहिं, मुद्ध-दु:खात्मको रस:॥ ७॥

कार्येहंतु: सहकारी, स्याद्द्यादे: कायवंतम्मणि । अनुभावो विभावअ, व्याभिचारी च कीलयंते॥ ८॥

णिज्जार-हास-कलप्पा:, रोद-वीर-भयानकाः । वीभत्सादो-ण-रंताइच, रसाः सद्भिनंव स्मृताः॥ ९॥

सम्भोग-विप्रलम्भास्मा, श्रृङ्गार: प्रथमो वहु । मान-प्रवास-शोचेअ-द्विरहेः पच्दिसा ऽऽदपर:॥ १०॥

स्त्री-पुंस-काव्य-गीततुं-माल्य-वेपण्ट्रकेलिज: । अभिनेय: स चोत्तसाह-चाडु-तापाश्रु-मत्युभिः॥ ११॥

विकृतवाचार-जलपङ्कजलकत्थ-विस्मापनोद्दव: । हास्योऽस्स्वामिनयो णासा-स्पंदादथु-जठर-ग्रहेः॥ १२॥

मृत्यु-वन्ध-घनाह्ठा-ण-चाप-घण्टा-सम्भ्रम । करुणोऽभिनपसत्थं, वाद्द-वैक्कुञ्ज-णिरदने:॥ १४॥

अभिहिअसद्द-णिअत्तणस्सेहं-वयणविओकिअणिः । रोद्र: स चामिनेयस्स, घात-दन्तोद्घ-पोडणे:॥ १५॥

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पराक्रम-बल-नयैः-यसस्ततःविनिदवयैः । वीरौड्मिनयनौ तसप, धैयं-रोमाञ्च-दातत: ॥ १६ ॥

पताका-कोतिं-रोद्राजि-धुन्यैः-तस्करदोपजः । भयानकौड्मिनेतव्यः, स्तम्भ-रोमाषु-नमस्पत: ॥ १७ ॥

जुगुप्सनीय-रूपदिनि-नरद्वलाघा-समुद्धव । वीमत्सोग्मिनतश्चारुप, निष्ठेवोधेग-निर्दलनैः ॥ १५ ॥

दिव्येन्द्रजाल-रम्याभं-दर्शना-मौष्ठविस्फुरित । मृदू तः सौमिने तव्यः, ह्लादाढया-रोमाञ्च-दर्पंल ॥ १६ ॥

संसारमय-वैराग्य-तत्स्व-ज्ञान्त्रविमर्शने: । शान्तौड्मिनयनं तस्य, क्षमा-ध्यानोपकारात: ॥ २० ॥

ग्रथ्यं-शब्द-वपुः काव्यं, रसे: प्राङ्गाविसंपलि । प्रझ्झमा तेन सोहाद्रं, रसेपु कविमानिनाम् ॥ २१ ॥

न तथाड्यं-शादोत्प्रेकाः, इलाध्या: काव्ये यथा रस: । विपाके कनकप्रख्यं, उदयेज्जाति कोरसम् ॥ २२ ॥

एकत्र स्वैरिरोस्तुल्यं-वाक्ययोःपि विरद्वता । दोपोड्रोचिस्पमदृशोप्रचम, पापोपोड्मुक्तिरन्वितम् ॥ २३ ॥

रसहास्मिरच चोकृदच, क्रोधोनेसहो भयं लम । जुगुप्सा-विस्मय-शमा:, रसानां स्पायिन: क्रमात् ॥ २४ ॥

निवेद-शान्त्यपस्मार-दक्षःशुष्मा-मद-श्रमः । चिन्ता चापलमावेशः, मतिभ्रंशोभिः रमुतिग्धृंष्ट: ॥ २५ ॥

श्रृमयौ मरणां मोहः, निद्रा-सुप्तोग्रय-दुष्टयः । विपादोन्माद-दैन्यनि, प्रौढा मातो वितर्कंकाम ॥ २६ ॥

नवौं रसुवावहिरुचामि, जाड्यपलास्प-विवोधनमु । पर्यङ्गरद यपयोगं, रसाना च्यभिचारिणः ॥ २७ ॥

निवेदेहनतबधी-शनेवः, वैरसयं द्वावश-तापकृत । स्तान्तिः पीडा पराड्डयासे:, प्रायोक्तिः कार्ष्य-कर-माकृ ॥ २८ ॥

वैकलयं प्रदरौपिस्मारो निव्यच्येष्टितः । मद्रा स्वम्भर-दौर्लत्याद, दौलन हृयामलाड्डदियुक् ॥ २८ ॥

देपादे. सदुपालान्ति', प्रमुपा दोपदसांननी । ज्येष्ठारो मुं.मदो मचातु, निद्रा-हास्पाधुजुन् कमान् ॥ ३० ॥

श्रमे रतादिभिः साध, स्वेद-श्वामादि कारणम् । प्राशिशिक्षता प्रियानाप्ते;, धूंयता-द्वास-वार्धयुक् ॥ ३? ॥

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वापलं साहसं राग-द्वेषपादे स्वैरितया डिमत् । भावेगः सम्भ्रमोऽथकरुणाद्, विकृताज्ञ-मनो-गिरामृ ॥ ३२ ॥

प्रतिभानं मति: धाष्ट्यं-ताकौत् भान्तिश्चिह्नादिकृतू । दोपेन्योद्धु-मनः-श्लेषा;, ध्यापि: स्तानितंकम्पवान् ॥ ३३ ॥

हष्टामाष: स्मृतिसतुल्य-हष्पादेश्चं मतिक्रिया । धृतिनोऽनिष्टलाभादेश; सन्तुप्तिदेहपुप्तिकृतू ॥ ३४ ॥

क्षेपादेश: प्रतिकारे डामपोड:सिमन्त कम्पनादयः। व्याध्यादेशं श्वसद्रुप्तः मदहा विकलेन्द्रियत्वम् ॥ ३५ ॥

भ्रशं तन्यं प्रहारादेश: मोहो डनिद्रार्जुनादयः । द्विन्द्रियपाचपातिर्नितरा, क्षेदादेशो कैं कम्पनौ ॥ ३६ ॥

शुप्तं निद्राप्रकर्षोडपि, स्वप्नायितं-हमोहने । दुष्टेष्टपराधीनेषुं जपमु;, मोप्रचं वन्धादिमि: ॥ ३७ ॥

हपं: प्रसतिररष्टापते:; मनः स्वेदाथु-गद्गदा: । विपादस्त्वङ्गारष्ठस्वान्तसंताप-श्वास-श्वासतः ॥ ३८ ॥

मनोविप्लुतिरन्मादः, मदह्न-डोपंरयुक्तकृतू । प्राप्तपदः स्वान्तनीचैर्व, दैन्यं कार्पण्यौगुण्ठनं ॥ ३९ ॥

श्री-डाजुताप-युवादेश, म्रघाट्पयं गात्रगोपकम्प । घोराल्चंकतता म्लानः;, कायसडूच-कम्पितैः ॥ ४० ॥

एकस मभावनं तक्कः, वादादेरज्जुनतंकः । प्राप्तमन्याधिययधौगंवं; विधाड्डदेरल्यरोडया ॥ ४१ ॥

हष्टाभिमुख्यमो रषुख्यं, स्मरपाचातु त्वरार्जदिमिः । द्राश्चं यौदे विक्रिया रो डौडव हियाद्र क्रियां त्रमं ॥ ४२ ॥

जाड्यम प्टादितः कार्पण्यां मौनानिमेपषैः । कमोनुतसाहस श्यं;, थमाचाजुन्मि भतार्डौभिः ॥ ४३ ॥

निद्राच्छेदो विवादेशच, वादादेरज्जमज्जनान् । केपौचितं तु रसादीनाम, प्रयोनेन्य हेतु-कार्मवां ॥ ४४ ॥

वैपथु-स्तम्भ-रोमाञ्चा:, स्वरमेदोऽथ शु गुङ्ङनम् । स्वेदो वैवर्ण्य मित्याद्या;, मनुमावारसादिजा: ॥ ४५ ॥

मवादेवें पथुप्राति-स्पन्दो वागादि दिविक्रिय: । यत्नेऽप्यज्झाक्रिया स्तम्मः हपवेधा; विपादवान् ॥ ४६ ॥

रोमाञ्चः प्रमत्कषादेश; रोमहपोड:स भाजनं: । स्वर मेदः स्वरान्त्यं मदादिहेर्पं-हास्यकृतू ॥ ४७ ॥

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मस्तु नेत्राम्बु नो कान्त्या नासास्पन्दालिसूदयात् । मूर्छनं पातकोषाढचं, सग्लानिभून्मिपाततः ॥ ४५ ॥ स्वेदो रोमञ्जलतया च, प्रमादेभ्योऽनुप्रहः । ध्वानाविकारो वैवर्ण्यं, लुप्तरोदोऽन्तरोष्ठरः ॥ ४६ ॥ वाचिकोडभिनयैर्वाचा, यथाभावमनुक्रिया । मुखाङ्गैडनैः स्वभावेन, सात्त्विकः स्वरगेहदावैः ॥ ४७ ॥ अनुनावस्य दर्रानमू । वर्णाङ्गानुकार्याडहायं, वाच्यवस्तुनिमित्तकम् ॥ ४९ ॥

इति श्रीरामचन्द्र-गुणचन्द्रविरचिते नाट्यदर्पणेऽस्मिन् वृत्ति-रस-नायिकाभेद-विचारस्तृतीयो विवेकः ॥ ३ ॥

ग्रन्थ सर्वशपक-साधाररस-लक्षणनिर्णय: चतुर्थो विवेकः

देव-मुनि-समांभतं-गुह्यवतां मझलाभिधा । नित्या रूपमुने नान्दी, पदैः पद्मभरयाष्टिभिः ॥ १ ॥ प्रवेश-निष्क्रमाभोग-प्रसादान्तरसन्धवम् । विभार्य रूपकं गेय पञ्चभिः सन्ध्यते कविवृधैः ॥ २ ॥ उत्तमो मध्यमो नीचा, प्रकृतिस्त्रिविधोदिता । एकैकस्मिन् त्रिधा स्व-स्व-गुणाढ्या तारतम्यतः ॥ ३ ॥ तारस्थौ दक्षिणस्थापगे, लोकतास्वविवक्षया । ग्रामभेद्यैः-धैर्यैः-नौडयैः-न्यायवान् उत्तमः पुमान् ॥ ४ ॥ मध्यो मध्यमुखो नेतु, पारोयान्तु विमुनोडनतः । कृतधन कलहो कलहो लोलः, स्त्रोलोलो हृदयवाग् जडः ॥ ५ ॥ लज्जावतो भृदुर्धीरा, समभीरा सिमितकाक्षिणो । विनीता मूलजा दक्षा, वत्सला योपिदुत्तमा ॥ ६ ॥ नरवन्तमध्या नीचा, नीचोऽपि चोदिता । प्रभयनकनसम्पन्नोऽपि सन्नी मुख्यनायकः ॥ ७ ॥ तेजो विलासभो माधुर्ये, धीरो मृ स्पश्रयैर्गमोरता । मौद्र्यां सल्लित धैर्यो, धीरो नेष्टैर् सत्कविजा ॥ ८ ॥

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क्षेपादेरसहिप्पुल्त्वं, तेषां प्राणात्ययेऽपि च । विलासो नृपवद् यानं, घोरा ह्यस्मृतं वचः ॥ ९ ॥

माघुपं विकृतिः स्तुत्या, क्षोमहेतोर् महत्त्वपि । शोमा चिह्नं पूरास्पर्द्धादाक्ष्य-शोभोंधिमोदये ॥ १० ॥

विध्नेऽप्यचलनं स्त्रैण्यं प्रारणधात्सुभाषितम् । गाम्भीर्ये सहजा मूर्तिः, कोप-हर्षादि-गोपनं ॥ ११ ॥

प्रोदायं तनु-मात्राणां, प्राभितेना-व्युपग्रहः । स्पष्टोचारिते च्छन्दा, स्थितं, निर्विकारः स्वभावजः ॥ १२ ॥

प्रमुखयोर् नायकः किञ्चिद्-धून-नयुतोद्ग्रमनायकात् । लोमी घोरोदतः पापी, श्वसनो प्रतिनायकः ॥ १३ ॥

नो वा विदूषक-म्लेच्छ-शकार-विट-किदृशा । हास्यायाचो नृपे श्लालः, धकारस्वेकविटः ॥ १४ ॥

स्त्रिग्या घोरोदरादीनां, यथौचित्यं वियोजिताम् । लिङ्गो द्विजो राजवीरो, शिल्प्याश्रयते विदूषकः ॥ १५ ॥

युवराज-चमूपाथ-पुरोधः-सचिवादयः । सहायाः एतदायत्त-करमैव सलिल्तः पुनः ॥ १६ ॥

सुद्धार्ते कारको द्वास्पः, कञ्चुक्योऽपि शुचकर्मणि । वपुंवरस्तु रक्षायां, निमित्तं प्रेप्सवो स्त्रियः ॥ १७ ॥

कार्यार्थाने प्रतीहारो, रसा स्वयोमहत्तरः । पूर्वाश्रितविधो चृद्धा, चित्रादो शिल्पकारिका ॥ १८ ॥

नायिका कुलजा दिव्या, सात्रिया पण्यकार्मिनो । मन्त्रिणा ललितोदत्ता, पूर्वोक्तात्ता द्विचा परे ॥ १९ ॥

रागिण्येवाप्रहसने, नृपे दिव्ये च न प्रभो । परिणिका भवापि दिव्या तु, भवेदेवापि महीभुजः ॥ २० ॥

सुग्धा मध्या प्रगल्भेति, त्रिविधा स्वुरिमा पुनः । सुग्धा वामा रते स्वल्प-मान-रोहद्-वयः-समराः ॥ २१ ॥

मध्या मध्द्‌-वयः-कार्म-माना मूर्छान्तं-मोहनाः । प्रगल्भेष्ट-वयो-मन्यु-कामा स्पष्टीड्य्पचेतनाः ॥ २२ ॥

कार्यंतः प्रोपिते पत्या-वमूला प्रोपितप्रिया । विप्रलब्धा ससंदेहा, प्रेप्स्यो दूतीनमागते ॥ २३ ॥

स्वाधीनता स्वपतेःकुल्या, नायकस्योपस्मिता । ईर्ष्यापि-कलह्ह्‌-नित्यांतं, कलह्हान्तरितास्स्तिभाकू ॥ २४ ॥

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विलम्बयत्यदोवेगं विरहोक्तिःण्ठतोत्सुकम् । हस्तौ नासिकसङ्गाज्ञौ यत्कृतेपरिरम्भ्यति ॥ २५ ॥

मुखगतमानिनों दरयासने स्वाधीनमत्कुंआ । शयन्ती सारयन्ती वा रिरंसुरमिसारिरमा ॥ २ ॥

भावाद्या यौवने श्लेषाम् मलदृशारात्रिपोडनजा: । दक्ष स्वाभाविकास्चेष्टे स्रियाहपास्योदयः ॥ २७ ॥

सति मोपे गुणा सप्रायनजाश्च स्वभावजा । नावदयम्माविनोऽप्यंवा, विद्वति सीपु मुह्यपत ॥ २५ ॥

भावो वागादिविलक्षितः, चिह्हं रपुमत्तरदयो । नेत्रादिवृत्त हावः सभृङ्गारमसनतत्म् ॥ २९ ॥

तदेव सन्तस हेतुना, तारण्योदबोधकाङ्क्षिणी । रागादिना विपर्यस्त, क्रियारूपमय विभ्रम् ॥ ३० ॥

दिलास प्रियहृष्ट्मादे, नादरम नात्र कर्मङ्क्षो । वैपाल्पतेव दृग्विच्छित्ति, परा दोभा वितन्वती ॥ ३१ ॥

लीला दमितविवादे, स्वे न्यासो बहुमानतः । विद्वोकोडनादरो मान दर्पोद्दितेरेतदैव चस्तुनि ॥ ३२ ॥

चिह्नत जल्पकालेपि, मौन हि ध्याज-मोक्ष्यत । सलित गात्रसञ्चार, सुकुमारो निरयङ्क ॥ ३३ ॥

कचोष्ठादिप्रहे कोपः मृपा हुड्कृतमित मुरदि । मोट्टामित प्रियेष्टादो, रागतो गात्रमोटनम् ॥ ३४ ॥

मुद्रा स्मितातप्-कम्पादे सद्दुर क्लित (ल) क्रिचितम । मौजवहय मोवनादीनाम् प्रिय शोभोपमोगल ॥ ३५ ॥

सा कान्ति पूखंसम्मोगा, दीसति का तेस्नु विस्तार । सौम्य ताश्रेडपि मादप्यं, प्रोदयामुपचिताच्युतिः ॥ ३६ ॥

चेतोऽविकृतया घेएं प्रागत्म्य कौशल रते । यथोचित्य व नेत्रूषा, नाधिकरा कुलजादप ॥ ३७ ॥

सहाऽथि-यस्तु शान्तेऽपि लिङ्ग्ज्ञनो प्रातिवेधिका । शिल्पिनो चेष्टा सख्या, गुप्ता दक्षा मृदु स्थिरा ॥ ३५ ॥

देवानीचणूणां पाढ, ससृतेनाप जातुचित । महिपी मन्त्रजा-पण्यस्त्रीसामध्याजिलिङ्गिनाम ॥ ३९ ॥

वाल पुणड प्रहप्रस्ता मत्त श्रीहास-नोचिताम । प्राकृतेनोचमस्वापिपे, दारिद्रचं हवयमोहितः ॥ ४० ॥

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मत्पन्तनोचभूताशे, पितॄणां मागधी घ वाक् । मातॄसेनी तु नीचस्य, देतोदरेसो स्वदेशागो: ॥ ४१ ॥

तियंगू-जात्यन्तरादीनां, मानुष्य-प्रकृतौ-वृतादे:; कार्यंत यथार्हि सङ्कुन्ते ॥ ४२ ॥

पाम्योति धन्यत्ते पत्नी, लिङ्गिनी ग्राह्या(ह्य)णी द्विज(जै:) । भ्रम्वार्डपि जननो-वृद्धौ, पूज्या तु भवतोह्यपि ॥ ४३ ॥

भार्या(आड)प्रजोदधमेङ्ग्रो, मटी-सूत-म्रभृतो मिय: । पुरोध:-सार्थवाहाभ्यां, पत्नी पत्न्या जरन् पति: ॥ ४४ ॥

महाराजो नृप: सर्वस्वायं पुनरेति यौवने । पुंसां मद्रेति भोगक्या, प्रियेतिं दपिताडपचा ॥ ४५ ॥

पिता पुनाभिगयौगे(गै)मुं ध्यां देवेऽपि राजभिः । विदूपकेऽपि भवती, राज्ञी चेत्यो नृपस्त्रिय: ॥ ४६ ॥

मद्वित्नीस्वामिनो देवोऽ्येवं सर्वा: परिनिष्ठिता: ! नेतॄणामुनेतॄणां वृद्धा तु, साध्वी तुल्या स्थिरया हि सा ॥ ४७ ॥

हरुजे त्वनुतम-प्रेक्ष्ये, भगवदिति देवता । तप:स्था वाच्यं-देवपि-बहुविचा: संयोपिता: ॥ ४८ ॥

मान्यो मान्यस्तरे राजा, लिङ्गिनाड्यं विदूपकै: । वयस्योङ्यधमेङ्ग्रीतो, लोकेऽदेवेऽति भूपति: ॥ ४९ ॥

मित्राल्याभिबिड्डु राज्ञा, कुमारोऽमुत्र दारक: ! सुहृन-शाकवो मद्यतेति, स्वप्रसिद्धघटपरौ वति ॥ ५० ॥

सूत्री भावोज्नुनेत्सौ, तेम मार्पं सम: सखा । शिव्यास्तन्मजुषा: पुंस-वत्सो तातो जरत्नपि ॥ ५१ ॥

सौम्यो भद्रमुखर्वेति, नीचोच हुण्डे तु पामर: । थेन मर्ख(श्व)गिन्द्र(दृ)न् पश्लु, म्पहर: स रतुपरिप्लु(दृश:) ॥ ५२ ॥

पूरे विक्रमसंरूचि, कल्प्यं नामाऽथ वार्ङि(गि)जे । दत्तान्तं प्रायशो चिप्रे, गोत्र-कर्मानुरूप्यता ॥ ५३ ॥

नृपस्नित्रां धुरं दत्ता-सेनाडन्तं पश्योयिप्ति । पुण्यादिवाचकं चेष्ट्यां, चेते मज्ञू(ग्य)लकीर्त्तिनम ॥ ५४ ॥

इति श्री रामचन्द्रगुणचन्द्रविरचिते नाटकदर्पणाख्यसूत्रे सर्वरूपकसाधारसङ्कलितखण्डो नाम चतुर्थों विवेक: समाप्त: ॥४॥

२०७ पचाश्मर्क समाप्तं नाट्यदर्पणाख्यसूत्रम् ॥

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परिशिष्टम् [२]

नाट्यदर्पणविवरणेऽनिर्दिष्ट-प्राचीनग्रन्थप्रामुख्यो ।

[ भरङ्क्रमेण ]

प्राचीनग्रन्थाः

प्रभिनवगुप्तः

(नाट्यशास्त्रस्य प्रभिनवभारतीवृत्तिकारः)

ईदुराजभट्ट

(श्रीस्वामिग्रंथ)

कोटिल्य

(सट्ट्रादिलक्ष्मप्रणेता)

श्रीतस्वाभो

(मट्टेन्द्रनाथद्वयोर्भिनवराजपचनाटककारः)

भरतमुनि

(नाट्यशास्त्र निर्माता)

भवभूतिः

(कौशलिकावृत्तिकारः)

भद्रमूर्ति

(मालतीमाधवकर्त्ता)

मातङ्गः

(स्वप्नवासवदत्तकर्त्ता)

भोमट

(मतोत्तमा-वत्सराजकर्त्ता)

भोमदेव

(वसुनाभि जनकः)

भेज्जल

(राघाविप्रलम्भचम्पूचयिता)

मस्सटः

(काव्यप्रकाशकारः)

मुनिः (भरतमुनिः)

(नाट्यशास्त्रकर्त्ता)

वसुनाभिः

(श्रीभोमदेवसुतः, प्रतिमानिर्दशप्रणेता)

विसाखदेव

(दैवोचद्रुप्तरचम्पूचयिता)

वीरनाग

(कुन्दमालाकार्त्तः)

राघू क

(प्रभातः चित्रोत्पलावलम्बत्सप्रकरञकारः)

युक्तिवादकुमार

(मनोज्ञसेना हरिणी दप्रकरञकारः)

शूद्रक

(मृच्छकटिकारः)

हेमचन्द्र

(काव्य-प्रामाल्य-साहित्य-द्रश्रो-लक्ष्मविपालः, नाटकपदप्रपञ्चयुथः)

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परिशिष्टम् [३] नाट्यदर्पंएविरणेनिर्दिष्ट-नाट्यादिग्रन्थानाम-सूची । [वर्णक्रमेण] नाटचादिग्रन्थानाम

(९) ध्रनञ्जयो नाटिका २५०

(२) मनोज्ञसेना-हरिनन्दिप्रकाशम (शुक्तिवासकुमाररचितम) ९८४

(३) मणिम्येराघवम (मुरारिचितं नाटकम) ३८४

(४) श्रीमिजानदाकुत्सम (महाकविकालिदासकृतं नाटकम) १२४, २८२

(५) प्रभिनवराघवम (भट्टेन्द्रदुराजचित्रपक्षीरस्वामिरचितं नाटकम) २५४

(६) प्रभुं नचरितम (प्रानन्दघनरचितं महाकाव्यम) ३७०

(७) प्राचाराङ्गम (महेन्द्र-गाधरप्रणीतं सुतनुभ) ९०

(८) इन्दुलेखानाटिका ९८४

(९) इन्दुलेखावीथी २५७

(१०) उत्तरररितम उत्तररामचरितम (भवभूतिरचितं नाटकम) ९७३, ७४, ७६२

(११) उदयनचरितम २५८

(१२) उदात्तराघवम (माघुराजविरचितं नाटकम) ९९२

(१३) कामदम्बरी (वाणभट्टप्रणीता कथा) ३०५

(१४) कुन्दमाला (वैराग्यनिबन्धा) नाटकम ६१

(१५) कुमारसम्भवम (महाकविकालिदासकृतं महाकाव्यम) ३२४, ३२५

(१६) कृतयारावणम (नाटकम) १४२,१४३,१४७,१५०,१५४,१६७,१६५,१६६,१७३,१७४, १६२,१६४,१६७,१६७

(१७) कौमुदी-मित्रानन्दं प्रकाराम (स्वोपज्ञम) १२४

(१८) कीर्तिजिकानाटिका (भट्टन्थीभवजुनचूहाविरचिता) ३०

(१९) चन्द्रप्रभालावण्यमित्तकं प्रकरणम (ममार्यपादुक्क विरचितम) १४२

(२०) छलितरामम (नाटकम) १९६,१९६,२६६,२६६,२८२

(२१) जामदग्न्यजय: (व्यायोग:) २२०

(२२) तरणदत्तम (प्रकरणम) २०६, २१२

(२३) तापसवत्सराजम [नरेन्द्रवर्धनसुतानझ्नहरपोंपरनामश्रीमात्रराजरचित नाटकम] ७२,६७, ७५,१०७,१०८,१=२,१=३

(२४) दरिद्रचारुदत्त* रूपकम (भासरचितम) ९३

(२५) नलिताद: (महाकवि-भारवि-प्रणीत: भिदान:) १०

(२६) देवीचन्द्रगुप्तम (विद्याधरकेतु) नाटकम १२८,१४६,१४९,२०७,२२४

Page 528

(२७) द्रौपदीस्वयम्वरम्

(२८) नलविलास नाटकम् (स्वोक्तनम्)

४२,७२,८४,६७,८५,१२४,१७३,१७८,१८२,१७६,

७६८,७६४,७२४

(२९) नागानन्दम् (श्रीहर्पनिर्मित नाटकम्)

१२२ १०९,२५०,२६२

(३०) निर्भयसीमवद्यायोगः (स्वोक्त)

१२१

(३१) प्रयोधिमवतनम्

१२८

(३२) पाण्डवानन्दम्

७६७

(३३) पार्व्वविजयम् (त्रिलोचनकृत नाटकम्)

२२७,१३६,१३०,१८८

(३४) पुष्टपौरुषक प्रकरणम्

१६४,१०९,१६१

(३५) प्रतिमानिर्द्दम (भीमदेवमूरुतसुनाभृत नाटकम्)

१९०

(३६) प्रयोगामुदयम्

७८३

(३७) वालिवध्चरितकम् (नाटकम्)

२८०,२६३

(३८) वृहृत्कथा (गुणाढ्यरचिता)

२१८,२२१

(३९) भारतम् (व्यासप्रणीत काव्यम्)

(४०) मनोरमा वत्सराजम् (भीमटविरचित नाटकम्)

२४८

(४१) मल्लिकामकरन्द प्रकरणम् (स्वोपज्ञम्)

३१८

(४२) मालविकाग्निमित्रम् (नाटकम्)

६२,५२

(४३) मालतीमाधवम् (भवभूतिनिर्मित प्रकरणम्)

१४८,२५५

(४४) मालति (वि) कार्त्तिकिमित्र [कविकुलशिदासनिर्मित नाटकम्]

८०

(४५) मुद्राराक्षसम् (विशाखदेवविरचित नाटकम्)

६०,०४,१४५,१४७,१८२

(४६) मुचुकुण्डकथा प्रकरणम् (प्रस्तकविरचितम्)

१९०

(४७) यादवाभ्युदय नाटकम् (स्वोपज्ञम्)

६४,११४,१४९,१६३,१८१,१९३,१९७,१९५,

१६

(४८) रघुविलास नाटकम् (स्वोपज्ञम्)

१००,१८२,१८४,१८६,१८९,१८९,१६०,१६६,१६६,

१६३

(४९) रत्नावली [श्रीहर्पविरचित नाटिका]

१६,६०,६३,५७,८४,१०५,८२१,१७२,८३,८६,

१४४, १४५, १४१, १४२, १४३, १४५, १४७, १६४, १७०, १७३, १८१, १७७, १७२, १७४,

१८५, १८६

(५०) रामाभ्युदय नाटकम् (स्वोपज्ञम्)

७८,५३,८०,८७,१०८,११७,३८२

(५१) राधाविप्रलब्धम् रासकाख्यम् (मेजसविरचितम्)

१९०

(५२) रामाभ्युदयम् [यशोवर्मविरचित नाटकम्]

७३ १००,१३०,२६०,१८६,१०५,१८८,

१८१

(५३) रोहिणी मगदू प्रकरणम् (स्वोपज्ञम्)

८८०, १७३

(५४) वनमाला नाटिका (स्वोपज्ञा)

३१८

(५५) विक्रमोर्व्वसी नाटकम् [कविकुलशिरोमणिसूत्रितम्]

८६०, ३४०

(५६) विप्रलब्धप्रिया (नाटकम्)

१०८

(५७) विसदृशव्योंपनम् (नाटकम्)

८३५

Page 529

उन्नतप्रेमसंरम्माद्

१९०

एकास्मिन् धायने

३०७

एकं धोयं नवाष्ट

२६०

एतत्ते हृदयं स्पृशामि

१३६

एतेनापि सुरा जिता:

२५६

एतौ तौ प्रतिदर्शने

१५१

एपा वधूभंरतराज

१३९

एसो सिपकरविस्पर- (प्रा०)

३६६

कंसोऽभितिमदमदनं

१५७

कठे किन्तरकण्ठ

१४२

कपमपि न त्रिपिङ्गो

१४७

कपोले पयाली

३९५

कर्यो:-हुःखासनवघात्

८३

कर्त्ता धूतेच्छुनानां

५३

कलश्रमपि रसितुं

०५

कल्याणं मूभूंद: स्व:

१५५

कविः काव्ये राम:

२५४

कस्स व न होइ रोसो (प्रा०)

२५५

का भूपा बलिनां

२६०

कां प्रिया न सुलमा

१२७

कामिनोमिमूंवो मत्तु:

४०३

काव्यकतुंयंसस्चापि

३६७

किमपि किमपि मन्तं

३०७

कि तु कलहंसनादो

२४०

कि नो व्याप्तंदिशां

१८०

कि पदस्य रुचं

१४५

कि लोभेन दिलडित्त:

११८

कुरबक ! कुचाघात-

३२१

कुसुमसुकुमारमूर्ति-

१२१

कुप्टा केशयु कृष्णा

१४०

कुप्टा येन धिरोऽहेपु

८५

कुप्टा येनासि राज्ञां

१=४

कैकेयी वद पतित्रता

६६

कोपेन मिलितपत्रस्याभ:

२८५

कोष्यं द्वारि, ह्रि:

७६१

Page 530

कोशाम्बीं मम हस्त एव वशाकायं धारयिष्यामि सिसृक्षो हृस्तावलग्नहुदाग्नेरमृतोदपि स्पन्दय 'न्यायतेजोभि- गिरिरयममरेन्द्र राघ गुप्तः साक्षाद् महानल्प गेयपद स्मृतपाठ्यम्

गोष्ठे यत् तु विहृतः सत्कवद्भुजप्रहृत-चूडाततापकको रव्यः चोर्यंतरप्रतिभेद जो ग्रन्नो पसुम्रो (प्रा०) तपनीयोज्ज्वलकरकतुल्यावपि मन्तव्यपुष्टि सर्वासिम गोतिरगेपु तवैव रघिरारमुभि तस्मिन् कौश पार्थ्ययोः तथा नमो नियुया (प्रा०) तिक्तादुद्रविजते मृदो तौै भौतममहोदधौ स्यजत मानमल स्वजनं हेम्नो लख स्वजामि देशी नातो 'पपघुना स्वदशु खस्यापनेचु छा स्वद्रयान य त्वयुपारोपीतपे्रम्या। हू जोवित त्वमसि मे दत्तं हौक्षेन दन्तकसाने करजेइच दारादा पतिना च दिग्यरकिररपुक्केरो (प्रा०) दिष्टया मो ! हुङ्‌सूभिरमाल्य

७०६ [है०का० घाल० = च] वेङ्कटसहारे ९९० ,, प्र० ४ ७०८ २४० दासिकावडिचतके ,, प्र० २६३ राघवासुधये ७५२ प्राभ्जानशकुन्तले रामाभुदये प्र० २ ९३० वेङ्कटसहारे प्र० ६ ९५६ सुधाकरदत्ते ९४५ मुदारारामसे ९०७ वेङ्कटसहारे प्र० ६ ३२८ [रघुवंश ६,४७] सत्यहरीश्चन्द्रे ९२६ देवोचनद्रगुप्ते प्र० २ २४८ देवोचनद्रगुप्ते प्र० २ ९९० मृच्छकटयाम् २४६ देवोचनद्रगुप्ते प्र० २ २५७ उत्तर [राम] चरिते ९८४ वेङ्कटसहारे ३२९ [एषुचालोके व० ३ उद्धतम्] ९३० रामाभुदये प्र० २ ३६७ श्रुतध्यांराधवे ९=९ मृच्छकटयाम् माधव्युल्लके

Page 531

दुल्लहजण्णापुरम्ग्रो (प्रा०)

१३४ रत्नावल्याम्

दुतो लेस्सत्थया स्वप्न

१८५ [नाट्यशास्त्रे प्र० १९,१०३]

दूरादुत्सुकमागते

३२६ [श्रमहरातके ४६]

दृष्ट्र प्रेमभरालसा

१२१ तापसवत्सराजे

हृष्टि कथ जरठ-

३१६ वन्मालायाम्

देवीवियोगडु खात्ता-

२४६ देवीच द्रुप्ते म० २

द्रव्यान्ते न चिरन्तु

१७२ वेङीसहारे

दीपादंस्यसमादपि

६७,१०६ रत्नावल्याम्

धिग मा भूएविघातिन

२४९ सत्यहरिश्चन्द्रे

घूम्र्रात वितानो -

१५५ रामाभ्युदये

नदोना मेघविम्गमे

२६१ [प्रभिनवभा० म० १८ उ]

न नाम स्यु स्वरां--

१७६ सत्यहरिश्चन्द्रे

न प्रेम निहित चित्ते

१५२ नलविलासे

नमोडस्तु संवंदेवेस्यो

३६४ [नाट्यशास्त्रे प्र० ५,१०४]

नाकौराण दहकंधरी

१०० रघुविलासे म० ६

नागानना रक्षितात्रि

१०१ नागानन्दे

निरोतम प्रजा सन्तु

१६५ कृत्यारावणो

निर्वाणधेरदहत्ना

२५१ [वेङीसहारे म० १]

निहत्य दशकन्धर

६० राघवाभ्युदये म० ६

तं तेनाऽध्य वीरेए

१७२,१७५ वेङीसहारे

पच्चाना मयसेउस्माक

८३

पस्या च विप्रलब्धा

७०७

पत्यु शिरश्छ द्र्कलामनेन

२५७ [कुमारसम्भवे ७ १८]

परार्यानुब्धाने जडयति

८५ मुद्राराक्षसे

परिप्रहोचग्राहोयाद

२६५ कृत्यारावणो

परिपादीयमृव्याकुलमप

१३२ वीरचरिते म० ३

परिदरति रन्ति माति धुनोते

३२६ [काव्यप्रकाशे ७,३२६ उ०]

पादाक्र्तानि पुण्पार्ङि

१४६ स्वप्नवासवदत्ते

विपणनाद तु भवेत् विप्ण्डी

७०७

पुण्यप्रागल्यलस्माय

२५७ सत्यहरिश्चन्द्रे

पूयता सलिलेन

१०४ वेङीसहारे

प्रणयविसादां हृष्टि

१८५ रत्नावल्याम्

प्रत्यप्रयोगनिभूयषे

२४५ देवीच द्रुप्ते म० २

प्रत्याद्ययानरूप कृत

१०० रामाभ्युदये म० ४

प्रथमातुराग-

७०७

प्रवृत्तचक्र शोकात

४९ [वेटालपञ्चविंशतिरे मपि० ७, प्र० ३]

Page 532

प्रबुद्ध यद् वीर

१०६

प्राश्नान यद्विरहे ड्यपह

१=३

प्राप्तावेकरथारूढो

१४३

प्रायोर्हरिचरितयुतः

'७०५

प्रेमावनद्धहृदयः

१४७

बहनाद् कियुक्तेन ?

७३

बहुविलक्षणजविसेस (प्रा.०)

३६५

बोभत्ना दिपया

३२७

बहूत्तर तथैवास्तु

३६४

भरता तथाहूमिति

१०७

सूत्रो किल्वा द्वारोर

९२

सूर्य परिभवसन्ति

१२३

मधुरामि कौरवसात

१२६

मध्येऽपि मोघ वसून

१६६

मन प्रधृष्यैव चल

१४१

मन्त्रयिते च तादृशे

७०४

मन्दोद्धियमदता याति

७८३

मा गार्तिस्त्व पृनब्रूज

१६०

मार्गी कण्टकिनः

१६६

मित्र दर्शनमात्रतोऽपि

६३

यच्च पदार्थोऽमिनय

७०६

यव् सत्यनतसमभूभिरमनसा

९९३

यस्मातथा धृतप्राया

१५२

यथाऽयमप सम्पूर्णः

८८४

यदि चेप शुद्धवाचा

७०५

यद् दुष्करमभिनेय

७०६

यद् मग्न विपिन

१४०

यद् विस्मयसस्तमित

१२०

यनमण्डलेन नृत

७०५

यस्तावेन कियुर्या बालक हव

३५९

यते द्वारवतो सद्मा

३०७

याथादरेऽपि किमनेन

१४६

युवत्यञ्च सदृशवयाघो

२४६

युद्धमादभय

१७२

येनावृत्य मुल्लानि

१५०

रसोचिरा द्वारोर.-

१६०

Page 533

रङ्ग चढा दिनेश्वरा (प्रा०)

२४३

रत्नाढ़ सचरस्त (प्रा०)

३०५

रचयासमाजचतवर-

४०६

रम्पा चारतिकारिणी

१४१

रागस्वारदमित्यवैमि

३२४

राजो मानघनस्य

६५

रामेऽ प्रलयेनैव

१७२

राष्ट्र प्रवर्धता चैव

३६४

ऋष्टस्तताबुदुदप्र-

२५०

लक्ष्मीश्वरे त्रिदशादपहरे

१४५

लक्ष्मी गिरोऽपि भ्रूता (प्रा०)

२६४

लोकत्रयपथ्योदृकृत-

१३१

लोकोत्तराणि चरितानि

३८५

वक्त्रं धोतऋचिवंचास्ति

१२४

वक्त्रार्घ्य है ! हसत

१६१

वक्त्रेन्दु स्मितमातनोद-

२६८

दाकप्रपञ्चेकसरेखा

२६५

वार्ताऽपि नैव यदिहास्ति

१०१

विक्रमेऽपि मपो लोकाः

१४२

विना वाहनपोतास्या

१६३

विनयस्यामिनवोदये

४३

विरोधो विधान्त.

१७३

विष्कम्भकप्रवेशक

४०७

वृद्धोऽसत्य नृपस्य

१६३

वैदेहीं हुतवास्तदेव

८२,१=२

दाशिन इव कला

१६६

पोतायुकुं खमृत्पले

१४६

शूरास्तु वीररोद्रेपु

२२६ .

शोक स्त्रीव नयनसलिलं

१७१

श्रीरिव दानवशान्त्रो

४०७

श्रीरेपा पाङ्ङरप्यस्ख्या.

१३२

इलाध्यो धोविचपस्ख्य

१४७

पोडस द्वादशाव्दो वः

४०७

सकलरिपुजयाशा

१७१

सु कोऽचकनिपूदनो

१६२

हसपक्षा मधुरोगिरः

३३३

Page 534

मत्तेभकुम्भतटीनां सन्तः शृङ्गारितोदयेः । मधुमत्स्यैरिवाङ्गानां ममुस्त्वते पतत्स्यभिः ॥

मत्तया कचय ब्रह्नन् ! मदवदारम्भविजयो । सर्वैरामोदिभिः सन्ति मत्त्याजेः शपथैः समम् ॥

माम बेदम्भया दण्डो - या स्वङ्गालोकननना-माक्षीस च मयम् धुन्व मोहां कामनठो जहार मोत्सया धुन्त् ।

निगर्वं दोधितमन्यत- स्वनोज्ं नहि विधृतः । स्वङ्गस्त्रो यदि भनु स्वमुरन्म् परामव- हरः पुचो हत्नो भावात् ॥

हरिन्द्रनातुमसानो- हसाहप्टविभीषो- हुं नक्रम् म जिझो दिव्य मवस्यामो ॥

६४,२८१

२८६ [समरतत्कव० प्र० ३ व०]

१३० [वन्यालोके उ० ३,१२]

३२१

२५९

२५०

२५४

१०३

१८८ [नाटकास्ने प्र० १९,१०१]

१३३ रतिहीनो-मङ्गाल्हे प्र० x

१८८ [नाटकास्ने प्र० १८,१०२]

७८७

१०४

१२८

१५८

१२७

३५९

१८६

१०५

१८५

१८२