Books / Natya Darpana of Ramachandra and Gunachandra Hindi Translation Visvesvara Siddhanta Shiromani

1. Natya Darpana of Ramachandra and Gunachandra Hindi Translation Visvesvara Siddhanta Shiromani

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प्रधान सम्पादक

डॉ० नगेन्द्र

सम्पादक—डॉ० दशरथ प्रोक्का

डॉ० सत्यदेव चौघरी

हिन्दी

नाट्यदर्पण

भाष्यकार

प्राचार्य विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि

हिन्दी विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

Page 2

हिन्दी

नाट्यदर्पण

किन्दी विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

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हिन्दी

नाट्यदर्पण

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मुद्राकस्य कराघाते: किन्ना चैनम्म् भारती । क शाम्बुजामृतस्पर्श: सन्त: ! सञ्जीवयन्तु ताम् ॥

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हिन्दी

नाट्यदर्पण

श्री रामचन्द्र-गुरूचन्द्र-विराचित

नाट्यदर्पण की हिन्दी व्याख्या

...

प्रधान सम्पादक

डॉ॰ नगेन्द्र

सम्पादक

डॉ॰ दशरथ श्रोत्रा

डॉ॰ सत्यदेव चौधरी


भूमिका-लेखक तथा व्याख्याकार

वृन्दावनस्थ गुरुकुल विश्वविद्यालयके ग्रनुसन्धान-सच्वालक

दिल्ली विश्वविद्यालय हिन्दी ग्रनुसन्धान परिषद्के

सम्मान्य सदस्य

श्राचार्यं विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमरिण


प्रकाशक

हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

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प्रकाशक :

हिन्दी विभाग,

दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

प्रथम संस्करण

१९६१

मूल्य : २२ रुपये

मुदक :

युनिर्वसिटी प्रेस,

दिल्ली विश्वविद्यालय

दिल्ली-६

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विषयानुक्रम

विषय

विषयानुक्रम

पृष्ठ

भूमिका

[प्राचार्य विश्वेश्वर]

...

१-५२

सम्पादकीय—

(क) नाट्यदर्पण में रूपकेतर काव्यशास्त्रीय प्रसंग

[डॉ० सत्यदेव चौधरी]

...

५३-६७

(ख) नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों में नाट्यदर्पण का स्थान

[डॉ० दशरथ श्रोत्रा]

...

६८-७७

प्रथम विवेक

वृत्तिभाग का मंथनाचरण

...

वृत्तिभाग की ग्रंथरचना

...

नाट्य-रचना की दुष्करता

...

रस-कवियों की प्रशंसा

...

शब्द-कवियों की निन्दा

...

नीरसवार्ताओं की निन्दा

...

कवियों के लिए व्यवहार-ज्ञान की उपयोगिता

...

'विदग्धता के साथ कवित्व आवश्यक

...

काव्यपहरण की निन्दा

...

१९

त्रिविध काव्य-संवाद

...

मूलग्रन्थ का मंथनाचरण

...

मंथन-श्लोक की दूसरी व्याख्या

...

११

प्रतिपाद्य विषय

...

१३

रूपकों के भेद

...

१४

(१) नाटक का लक्षण

...

१७

वर्तमान चरित्रों के ग्राभिनय का निषेध

...

१९

नाटकों में देवताओं के नायकत्व का खण्डन

...

२०

नायिका दिव्य भी हो सकती है

...

२१

नायक के चार भेद

...

२५

स्वभाव-व्यवस्था

...

२६

चरित के दो भेद

...

२९

भावाभिव्यक्ति के नाटकीय प्रकार

...

३२

नाटकरचना-विषयक विशेष बातें

...

३६

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विषय

कथाभाग की रचना की शिक्षा

... ३५

नाटक में परित्याज्य

... ३९

प्रहसन-लक्षण

... ४०

नाटकों की ग्रंथ-संख्या का विषय

... ४५

ग्रंथों में प्रदर्शनीय तत्व

... ४६

विष्कंभकादि-प्रयोग

... ५०

विष्कंभक-लक्षण

... ५२

प्रवेशक-लक्षण

... ५६

प्रहसनास्य तथा चूलिका-लक्षण

... ५९

प्रहसनावतार-लक्षण

... ६०

विष्कंभकादि की विषय-व्यवस्था

... ६१

उपाय-व्याख्या

... ६२

बीज

... ६३

पताका-निरूपण

... ६५

पताका और प्रकरी

... ६५

पताका और प्रकरी का दूसरा भेद

... ६७

पताका अनिवार्य नहीं

... ६९

पताका और पताका-स्थान

... ६९

पताका-निरूपण

... ७०

पताका-स्थान

... ७१

प्रकरी-लक्षण

... ७६

बिन्दु-लक्षण

७७

कार्य की व्याख्या

... ५०

उपायों की मुख्यता के नियामक हेतु

... ८१

पांच दशाओं का निरूपण

... ८४

(१) आरम्भावस्था

... ८४

(२) प्रयत्नावस्था

... ८७

(३) प्राप्त्याशावस्था

... ८८

(४) नियताप्त-ग्रावस्था

... ८९

(५) फलागम-ग्रावस्था

... ९१

संधि-निरूपण

... ९४

(१) मुख

... ९४

(२) प्रतिमुख

... ९६

(३) गर्भ

... ९७

(४) विमर्श

... ९९

(५) निर्वहण

... ९९

Page 10

विषय

( ख )

पृष्ठ

(६) निर्वहण सन्धि का द्वितीय लक्षण

... १०३

मुखसन्धि के द्वादश अङ्ग

(१) उपक्षेप

... १०५

(२) परिकर

... १०७

(३) परिन्यास

... १०९

(४) समाध्यान

... १११

(५) उद्भेद

... ११३

(६) करण

... ११४

(७) विलोमन

... ११५

(८) भेदन

... ११६

(९) प्राप्ति

... ११७

(१०) युक्ति

... ११९

(११) विधान

... १२०

(१२) परिभावना

... १२२

प्रतिमुख सन्धि के तेरह अङ्ग

(१) विलास

... १२४

(२) द्वृदन

... १२७

(३) रोष

... १२५

(४) सान्त्वन

... १३०

(५) वर्णसंहार

... १३१

(६) नर्म

... १३३

(७) नर्मयुक्ति

... १३४

(८) ताप

... १३६

(९) पुष्प

... १३५

(१०) प्रगमन

... १४०

(११) वज्र

... १४१

(१२) उपन्यास

... १४३

(१३) अनुसन्धान

... १४४

गर्भ सन्धि के तेरह अङ्ग

(१) संग्रह

... १४५

(२) रूप

... १४७

(३) श्रनुमान

... १४५

(४) प्रार्थना

... १४९

(५) उदाहति

... १५०

(६) क्रम

... १५१

(७) उद्वेग

... १५२

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विषय

(८) विद्रव ... १५४

(९) प्राक्षेप ... १५५

(१०) प्रहर्षण ... १५६

(११) मार्ग ... १५७

(१२) प्रसृत्याहরণ ... १५९

(१३) तोटक ... १६०

ग्राम्य सन्धि के तेरह भेद

(१) द्वय ... १६१

(२) प्रसंग ... १६२

(३) सम्प्रेक्ष्य ... १६३

(४) श्रप्रवाद ... १६४

(५) ख्यादन ... १६५

(६) च्युति ... १६९

(७) खेद ... १६७

(८) विरोध ... १६८

(९) संरम्भ ... १७१

(१०) शक्ति ... १७२

(११) प्ररोचना ... १७४

(१२) ग्रादान ... १७७

(१३) व्यवसाय ... १७७

निवृत्त सन्धि के चौदह भेद ... १७५

(१) सन्धि ... १७५

(२) निरोध ... १७९

(३) ग्रहण ... १८०

(४) निर्णय ... १८१

(५) परिमाष ... १८२

(६) उपास्ति ... १८३

(७) कृति ... १८४

(८) श्रानन्द ... १८६

(९) समय ... १८७

(१०) परिसंहन ... १८७

(११) भाषण ... १९०

(१२) पूर्वभाव ... १९१

(१३) काव्यसंधार ... १९३

(१४) प्रशस्ति ... १९४

ग्रंथ श्राद्धों के मंत का कथन ... १९५

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विषय

द्वितीय विवेक

विवेक सज्जिति

२. प्रकरणा का लक्षणा

... २०७

प्रकरणा भेद

... २०७

ग्रकलप्य स्वरूप

... २११

उत्सर्ग का प्रतिदेश

... २११

३. नाटिका का लक्षणा

... २१२

नाटिका में कत्तृ व्य का उपदेश

... २१५

नाटिका में करने योग्य ग्रन्थ बात

... २१६

४. प्रकरणी का लक्षणा

... २१७

५. व्यायोग का निरूपण

... २१५

सन्धि तथा प्रवस्थाओं की न्यूनता का उपपादन

... २१५

६. समवकार का निरूपण

... २२१

समवकार में किये जाने वाले ग्रन्थ कार्यों का उपदेश

... २२३

मुखसन्ध्यारदि की व्याख्या

... २२५

७. भाषा का लक्षणा

... २२६

कत्तृ व्य के प्रदर्शंन द्वारा नायक का वर्णन

... २३०

८. प्रहसन का लक्षणा

... २३०

गुद्ध प्रहसन

... २३१

सङीर्गां

... २३२

९. डिम का लक्षणा

... २३३

रसों की सुख-दुःखात्मकता

... २३४

डिम में करने योग्य ग्रन्थ बातों का तथा नायक का निर्देश

... २३४

१०. उत्सृष्टिकाङ्क्ष का निरूपण

... २३६

उत्सृष्टिकाङ्क्ष में करने योग्य ग्रन्थ बातों का निर्देश

... २३५

११. ईहामृग का लक्षणा

... २३५

ईहामृग में करने योग्य ग्रन्थ बातें

... २४०

१२. वीथी का लक्षणा

... २४०

वीथी के तरह ग्रक्ङ

... २४२

(१) व्यवहार

... २४२

(२) प्रचलिबल

... २४६

(३) गण्ड

... २४९

(४) प्रपञ्च

... २५२

(५) त्रिगत

... २५४

(६) छल

... २५७

(७) असत्प्रलाप

... २५६

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विषय

(८) वाक्केली ... २६१

(९) नालिका ... २६२

(१०) मुदव ... २६३

(११) उद्धातयक ... २६६

(१२) श्रावलगित ... २६७

(१३) प्रवासनिदत ... २६९

व्यायोग श्रादि अन्य रूपकों के सामान्य, नाटक-लक्षणा ... २७०

तृतीय विवेक

वृत्ति-निरुपण ... २७३

भारती वृत्ति का निरुपण ... २७५

श्रामुख का लक्षण ... २७७

श्रामुख के श्रागम्भूत पात्रप्रवेश के नियम ... २८१

प्ररोचना-निरुपण ... २८३

सात्वती वृत्ति का निरुपण ... २८५

कैशिकी वृत्ति का निरुपण ... २८७

श्रारभटी वृत्ति का निरुपण ... २८९

रस-निरुपण ... २९०

रस का श्राश्रय ... २९३

ग्रनुमितिवाद ... २९४

नट में ग्रनुभावों की स्थिति ... २९४

ग्रनुभाव ग्रादि संज्ञाओं का विषय ... ३०३

रसभेदों का वर्णन ... ३०५

(१) श्रृङ्गार सहित शृङ्गार रस का निरुपण ... ३०६

(२) शृङ्गार के विभाव तथा ग्रनुभावों का वर्णन ... ३०९

(३) हास्य-रस ... ३११

(४) हास्य के भेद ... ३१२

(५) करुण रस ... ३१३

(६) रौद्र रस ... ३१३

(७) वीर रस ... ३१४

(८) भयानक रस ... ३१५

(९) बीभत्स रस ... ३१६

(१०) श्रद्भुत रस ... ३१६

(११) शान्त रस ... ३१७

काव्य में रस का समावेश करने में विशेष सावधानी ... ३१८

विरुद्ध रसों का विरोध श्रौर उसका परिहार ... ३२०

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विषय

रस-दोष

रसों के स्थायी भाव

व्यभिचारिभाव

(१) निर्वेद

(२) ग्लानि

(३) शङ्का

(४) श्रम

(५) प्रसूया

(६) मद

(७) श्रान्ति

(८) चिन्ता

(९) चपलता

(१०) आवेग

(११) मति

(१२) व्याधि

(१३) स्मृति

(१४) धृति

(१५) ग्रमर्ष

(१६) मरषा

(१७) मोह

(१८) निद्रा

(१९) सुप्त

(२०) उग्रता

(२१) हर्ष

(२२) विषाद

(२३) उन्माद

(२४) दैन्य

(२५) व्रीडा

(२६) त्रास

(२७) तर्क

(२८) गर्व

(२९) प्रोन्मुखता

(३०) श्रवहिथ्या

(३१) जाडच

(३२) श्रालस्य

(३३) विवोध

पृष्ठ

३२४

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३३०

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३४३

३४३

३४४

३४४

३४५

३४६

३४७

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विषय

रसादिकों में पारस्परिक कार्य-कारणभाव

... ३४७

अनुभाव

(१) वेपथु

... ३४८

(२) स्तम्भ

... ३४८

(३) रोमांच

... ३४८

(४) स्वरमेद

... ३४९

(५) अश्रु

... ३४९

(६) मूर्च्छा

... ३५०

(७) स्वेद

... ३५०

(८) विवर्णता

... ३५१

ग्राभिनय

... ३५१

(१) वाचिक

... ३५२

(२) आंगिक

... ३५४

(३) सात्विक

... ३५५

(४) ग्राह्यायं चतुर्थ विवेक

... ३५५

नान्दी

... ३५६

ध्रुवा का लक्षण

... ३६४

(१) प्रावेशिकी ध्रुवा

... ३६५

(२) नैष्क्रामिकी ध्रुवा

... ३६६

(३) आक्षेपिकी ध्रुवा

... ३६७

(४) प्रासादिकी ध्रुवा

... ३६७

(५) ग्रांतरी ध्रुवा

... ३६७

नाट्य के पात्रों की प्रकृति के भेद

... ३६९

(१) उत्तम प्रकृति-पुरुष

... ३७०

(२) मध्यम प्रकृति-पुरुष

... ३७०

(३) नीच प्रकृति-पुरुष

... ३७०

(४) उत्तमा-स्त्री

... ३७१

(५) मध्यमा-स्त्री

... ३७१

(६) नीच-स्त्री

... ३७१

नीच प्रकृति वाले नायक

... ३७२

मुख्य नायक का लक्षण

... ३७२

मुख्य नायक के गुण

... ३७२

(१) तेज

... ३७३

(२) विलास

... ३७३

(३) माधुर्य

... ३७३

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विषय

(८) शोभा ... ३७२

(९) स्थैर्यं ... ३७४

(६) गाम्भीर्यं ... ३७४

(७) श्रौद्रयं ... ३७४

(५) ललित ... ३७४

गौर नायक ... ३७४

प्रतिनायक ... ३७५

विदूषक श्रादि की प्रकृति ... ३७६

धैरोदात्त श्रादि नायकों में से प्रत्येक के श्रलग श्रलग विदूषक ... ३७६

धैरोदात्त श्रादि के सहायक ... ३७३

ग्रन्थःपुर के उपयोगी परिचारक-वर्गों का वर्णन ... ३७८

नायिका का लक्षण ... ३७८

नायिकाग्रों के विशेष भेद ... ३७९

नायिकाग्रों के तीन भेद ... ३५०

(१) मुग्धा ... ३५०

(२) मध्या ... ३५०

(३) प्रगल्भा ... ३५१

नायिकाग्रों के प्रसिद्ध भेद ... ३५१

(१) प्रोषितपतिका ... ३५१

(२) विप्रलब्धा ... ३५१

(३) खण्डिता ... ३५२

(४) कलहान्तरिता ... ३५२

(५) विरहोत्कण्ठिता ... ३५२

(६) वासकसज्जा ... ३५३

(७) स्वाधीनभर्तृका ... ३५३

(५) प्रभिसारिका ... ३५४

स्त्रियों के यौवन में होने वाले धर्म ... ३५४

तीन श्रांगिक श्रलंकार ... ३५४

(१) भाव ... ३५५

(२) हाव ... ३५६

(३) हेला ... ३५६

दस स्वाभाविक धर्म ... ३५७

(१) विभ्रम ... ३५७

(२) विलास ... ३५७

(३) विच्छित्ति ... ३५७

(४) लीला ... ३५५

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विषय

(५) विभवोक ... ३५५

(६) विहृत ... ३५५

(७) ललित ... ३५९

(८) कुडुमित ... ३५९

(९) मोह्र्रायित ... ३५९

(१०) किलकिञ्चित ... ३५९

प्रायनज अलङ्कार ... ३५०

(१) शोभा ... ३५०

(२) कान्ति ... ३५०

(३) दीप्ति ... ३५०

(४) माधुर्य ... ३५१

(५) औदार्य ... ३५१

(६) धैर्य ... ३५१

(७) प्रगल्भता ... ३५१

नायिकाओं का नायकों के साथ सम्बन्ध ... ३५१

नायिकाओं की सहायिकाएँ ... ३५२

भाषा-विधान ... ३५२

प्राकृत-पाठ्य ... ३५३

बोलने के विषय में ग्रन्थ प्रकार ... ३५४

भाषा-विषय के ग्रन्थ प्रकार ... ३५४

रूपकों में नाम श्रादि का व्यवहार ... ३५५

इसी विषय में कुछ ग्रन्थ ज्ञातव्य ... ३५७

कल्पित किये जाने वाले नामों की कल्पना करने के प्रकार ... ४०७

ग्रन्थ रूपक ... ४०३

(१) सट्टक ... ४०४

(२) श्रीगदित ... ४०४

(३) दुर्मिलिता ... ४०४

(४) प्रस्ताव ... ४०४

(५) गोष्ठी ... ४०६

(६) हल्लीसक ... ४०६

(७) शाम्यांक ... ४०६

(८) प्रेक्षणक ... ४०६

(९) रासक ... ४०७

(१०) नाट्य-रासक ... ४०७

(११) काव्य ... ४०५

(१२) भाष्य ... ४०५

(१३) भाषिका ... ४०५

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विषय

( ज )

पृष्ठ

परिशिष्ट

...

१-२५

(१) नाट्यदर्पण (मूल)

(२) नाट्यदर्पण के विवरण में निर्दिष्ट ग्रन्थकारों के नाम

(३) नाट्यदर्पण के विवरण में निर्दिष्ट नाट्यादि ग्रन्थों के नाम

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भूमिका

ग्रन्थकार का देश—

प्रस्तुत ग्रन्थ ‘नाटघदर्पण’ के रचयिता रामचन्द्र गुणाचन्द्र पश्चिम भारत में स्थित गुजरात देश के निवासी थे । संस्कृत साहित्य के विशाल मण्डार को इतना गौरवमय एवं समृद्ध बनाने में [शारदा देश] काश्मीर के बाद गुजरात का विशेष महत्वपूर्ण योगदान रहा है । गुजरात में ग्राणहिल-पट्टन का प्रसिद्ध राज्य विद्वानों का प्रमुख श्राश्रय-स्थान श्रौर भारतीय वाड्.मय की सेवा एवं समृद्धि में सबसे श्रग्रगण्य राज्य था । इस राज्य की स्थापना विक्रम सं० ४०२ [ई० सन् ७४६] में हुई थी । ‘ग्राणहिल-गोपाल’ नामक कुशल शिल्पी ने इस स्थान की परीक्षा करके ‘चालुक्यकुल’ वंश के तत्कालीन राजा ‘मोती सम वछेराय’ को इस स्थान पर उत्तम ‘पत्तन’ बसाने का परामर्श दिया था । तदनुसार ‘मोती सम वछेराय’ ने इस स्थान पर श्रपनी राजधानी का निर्माण कराया श्रौर ‘ग्राणहिल-गोपाल’ के नाम पर उसका नाम ‘ग्राणहिल-पट्टण’ रखा । यह ‘ग्राणहिल-पट्टण’ ग्रामे चलकर भारत का एक प्रमुख राज्य बना श्रौर उसने संस्कृत-साहित्य को समृद्ध बनाने में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान किया ।

काश्मीर के समान ‘ग्राणहिल-पट्टण’ का राज्य भी शैव-राज्य था । उसके राजा प्रायः शैव सम्प्रदाय ‘के’ अनुयायी थे । किन्तु साहित्य-समृद्धि के क्षेत्र में वहाँ जैनों का विशेष महत्वपूर्ण भाग रहा है । ११वीं शताब्दी से लेकर १३वीं शताब्दियों तक प्रायः दो सौ वर्ष पर्यन्त ‘ग्राणहिल-पट्टण’ का प्रभुत्व श्रपने चरमोत्कर्ष पर रहा । इस बीच में (१) भीमदेव [१०२१-६४ ई०] (२) करणदेव [१०६४ से ७४ ई०], राजा के समय ‘ग्राणहिल-पट्टण’ ‘शैव’ विद्वानों का अत्यन्त प्रिय केन्द्र बन गया था । शैवाचार्य ज्ञानदेव, सोमेंश्वर पुरोहित, सुराचार्य, श्रौर मध्यदेश के श्रीधर तथा श्रीपति श्रादि शैव-धर्म के श्रनेक प्रसिद्ध विद्वान् ‘ग्राणहिल-पट्टण’ की राजसभा के रत्नों के रूप में उसे सुशोभित कर रहे थे । राजा भीमदेव के ‘सांख्य-विग्राहक’ दामोदर पण्डित ने उस समय श्रपनी विद्वत्ता के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध थे । उनके प्रभाव से ही उस समय ‘ग्राणहिल-पट्टण’ विद्वानों के श्राकर्षण का केन्द्र बन गया था । यों तो ‘ग्राणहिल-पट्टण’ का राज्य शैव राज्य था । उसके राजा श्रौर ‘सांख्य-विग्राहक’ दामोदर पण्डित दोनों शैव सम्प्रदाय के अनुयायी थे, किन्तु उनके यहाँ सभी धार्मिक विद्वानों का समान रूप से स्वागत होता था । एक श्रौर जहाँ शैवाचार्य ज्ञानदेव सारिखे शैव विद्वान् उनकी सभा को सुशोभित करते थे उन्हीं के साथ भडौंच [भृगुकच्छ] के कोलकवि ‘धर्म तत्वो-प्लव’ की युक्तियों के बल पर सभा में वाद-विवाद करते थे । उसी सभा में जैनाचार्य शान्त-सूरि इनकी सभा के पण्डित थे जो ‘बौद्ध तर्क’ से उत्पन्न दुरुह प्रमेयों’ की शिक्षा एवं तर्क बुद्धि के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध थे । पट्टण का राजदार जैसे सभी धर्मों श्रौर सम्प्रदायों के विद्वानों के लिए समान रूप से श्राकर्षण का केन्द्र था इसी प्रकार सभी देशों एवं राज्यों के विद्वानों के लिए भी वह श्राकर्षण का केन्द्र था । ‘करसुन्दरी नाटिका’ के कर्ता काश्मीरी पण्डित बिल्हण श्रौर नवाहृट्टा टीकाकार श्रीजयदेव-सूरि ने करणदेव के शासन काल में ‘ग्राणहिल-पट्टण’ की राजसभा को सुशोभित किया था । प्रस्तुत ग्रन्थ ‘नाटघ-दर्पण’ के रचयिता श्री रामचन्द्र गुणाचन्द्र भी इसी विद्वज्जन-सेवित एवं प्रगतिशील राज्य की विभूति थे ।

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ग्रन्थकार के गुरु आचार्य हेमचन्द्र—

प्रस्तुत ग्रन्थ ‘नाटचदर्पण’ के निर्माता रामचन्द्र ने अपने नाटकों की प्रस्तावना में सूत्रधार के द्वारा अपने गुरु आचार्य हेमचन्द्र का शिष्य बतलाते हुए अपना परिचय दिया है। जैसे—

“सूत्र० — इदत: श्रीमदाचार्यहेमचन्द्रस्य शिष्येण रामचन्द्रेण विरचितं नलविलास-

मिधानमाख्यं रूपकमभिनेतुमादेश: |”

[नलविलासस्य ग्रन्थे]

“सूत्र० — श्रीसीद्धहेमाभिधान—शब्दानुशासनवेघस: श्रीमदाचार्यहेमचन्द्रस्य शिष्येण

रामचन्द्रेण विरचितं सत्यहरिश्चन्द्राभिधानमादिर्पकमभिनीय सभाजनमनुरञ्ज-

यिष्याम: |”

[सत्यहरिश्चन्द्रस्य प्रस्तावनायाम]

सूत्र० — श्रीमदाचार्यहेमचन्द्रशिष्यस्य प्रबन्धशतकर्तुं मंहाकवे रामचन्द्रस्य भूयांस:

प्रबन्धा: |”

[निबन्धभूतव्यायोगस्य प्रस्तावनायाम]

इस प्रकार अपने अनेक ग्रन्थों में नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र ने अपने आपको आचार्य हेमचन्द्र का शिष्य घोषित किया है। इस ‘नाटचदर्पण’ की विवृति के ग्रन्थ में भी—

“शब्द—प्रामाण्य—साहित्य—छन्दालङ्कर्मविधायिनाम् |

श्रीहेमचन्द्रपादानां प्रसादाय नमो नम: ||”

लिखकर ग्रन्थकार ने अपने गुरु श्री आचार्य हेमचन्द्र को नमस्कार करते हुए उनके प्रति अपनी श्रद्धा का प्रदर्शन किया है।

नाटचदर्पण—कार रामचन्द्र के गुरु, ये आचार्य हेमचन्द्र, जैन धर्म के ग्रन्थुयायी और बहुत बड़े विद्वान् थे। जैन धर्म के शास्त्रीय तत्वों के प्रगट—ज्ञाता एवं व्याख्याता होने के अतिरिक्त वे व्याकरण, न्याय, साहित्य आदि शास्त्रों के भी प्रकाण्ड पण्डित थे। इनका जन्म सन् १०९० में गुजरात के अन्तर्गत ‘धनुका’ ग्राम के एक वैद्य परिवार में हुग्रा था। इनके पिता का नाम ‘चर्चिभ’ (ग्रथवा वच्च) और माता का नाम ‘चाहिणी’ (ग्रथवा पाहिणी) था। हेमचन्द्र का बाल्यावस्था का नाम ‘चङ़देव’ था। इन्होंने ग्राठ वर्ष की ग्रवस्था में जैन धर्म में दीक्षित होने पर इनका नाम बदल कर ‘सोमचन्द्र’ प्रसिद्ध हुग्रा। और फिर २१ वर्ष की ग्रवस्था में ‘सूरी’ पद प्राप्त करने से उनका नाम ‘हेमचन्द्र’ प्रसिद्ध हुग्रा। कहते हैं २१ वर्ष की ग्रवस्था में जब इनको ‘सूरी’ पद प्राप्त हुग्रा तब इनके शरीर का वर्ण हेम (सुवर्ण) के समान तथा मुख की कान्ति चन्द्रमा के समान थी, इसलिए इनका नाम हेमचन्द्र रखा गया। ‘सोमप्रभसूरी’ विरचित ‘कुमारपाल—प्रतिबोध’ की कथा के ग्रनुसार ग्राचार्य हेमचन्द्र के सूरिपद की प्राप्ति का महोत्सव नागौर (मारवाड़) में बड़े समारोह के साथ मनाया गया। इस महोत्सव पर होने वाले व्यय का सारा भार नागौर निवासी श्री ग्राचार्य हेमचन्द्र के भक्त व्यापारी ‘धनद’ ने अपने ऊपर लिया था।

‘सोमप्रभसूरि’ के ग्रनुसार ‘धनुका’ के एक वैद्यकुल में उत्पन्न यह ‘चङ़देव’ बालक ‘पूरणंतल—गच्छ’ के निवासी ‘श्री देवचन्द्र सूरि’ के सम्पर्क एवं प्रभाव से ही श्रमरण—सम्प्रदाय में प्रवृष्ट हुग्रा। बालक चङ़देव की ग्रायु ग्राठ वर्ष की ही थी। ‘देवचन्द्र सूरि’ विहार करते हुए उन्हीं दिनों ‘चङ़देव’ के ग्राम ‘धनुका’ में पहुंचे। वहाँ प्रतिष्ठित दिन ‘सूरि’ की प्रवचन (देशनां)

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होता था। इन प्रवचनों का बालक चन्द्रदेव के हृदय पर बड़ा प्रभाव पड़ता था। एक देराना (प्रवचन) पूरी होने पर यह वशीकु-मार चन्द्रदेव श्रात्यान्त विनयपूर्वक श्राचार्य के सामने उपस्थित हुश्रा। बालक के मामा ‘नेमि’ ने श्राचार्यें से बालक का परिचय कराया। श्रौर बालक ‘चन्द्रदेव’ ने उनसे प्रार्थना की किः—‘सुचारुरत्न रुपी जलयान द्वारा इस संसार सागर से पार लगाइए।’ देवचन्द्र-सुरि ने बालक की योग्यता श्रौर उत्कट इच्छा को देख कर उसके मामा ‘नेमि’ से कहा कि इसके पिता ‘च्च’ को प्रेरणा करो कि वह इसे व्रत ग्रहण की श्राज्ञा दे दे; तब हम इस बालक को प्राप्त कर निःशेष शास्त्र परामार्थ का प्रवगाहन करावावेंगे। पश्चात् यह लोक में तीर्यंकर जैसा उपकारक होगा’। श्रमन्त में सम्भवतः १०८५ ई० में श्राठ वर्ष की श्रावु में बालक ‘चन्द्रदेव’ ने श्राचार्य देवचन्द्र सूरि से जैन धर्म की दीक्षा ग्रहणा की। उस समय उस ‘सोहमुह’ सौम्यमुख का नाम ‘सोमचन्द्र’ रखा गया। २१ वर्ष की श्रावु में ११११ ई० में ‘सूरि’ पद प्राप्त करने पर उनका नाम ‘सोमचन्द्र’ से बदल कर हेमचन्द्र हो गया।

यह नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र के गुरु श्राचार्य हेमचन्द्र के प्रारम्भिक जीवन की कहानी है। श्राचार्य हेमचन्द्र के गौरव का यथेष्ट परिचय इससे मिलता है। ‘होनहार बिरवान के होत चीकने पात’ की लोकोक्ति के श्रनुसार श्राचार्य हेमचन्द्र के गौरव के लाक्षण उनकी बाल्यावस्था में ही प्रकट होने लगे थे। उनका जीवन क्रमशः विकासित होता हुश्रा जैन धर्म के एक महान श्राचार्य एवं संस्कृत-साहित्य के श्रपूर्व विद्वान् के रूप में लोकप्रतिष्ठा के बरम-शिखर पर पहुंच गया था।

हेमचन्द्र का राजसम्बन्ध—

जैसा कि पहले कहा जा चुका है श्राचार्य हेमचन्द्र का जन्म गुजरात में सम्वत १०६० में हुश्रा था। श्रौर १०९६ में उन्होंने श्राचार्य देवचन्द्र सूरि से जैन धर्म की दीक्षा ग्रहणा की। गुजरात में इस समय जयसिंह सिद्दराज का राज्य चल रहा था। जयसिंह सिद्दराज का शासनकाल १०९३ से ११४३ ई० तक रहा। इसके बाद ११४३ से ११७३ तक लगभग ३० वर्ष कुमारपाल ने ‘प्रागहिल-पट्टन’ की गद्दी पर राज्य किया। इन दोनों राज्यों के यहाँ श्राचार्य हेमचन्द्र को बड़ा गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त था। जयसिंह सिद्दराज लगभग उनके समवयस्क थे, श्रतएव उनका सदैव मित्रवत् व्यवहार रहता था। कुमारपाल शिष्य के समामत नत पर, सदा श्रद्धा रखते थे। जयसिंह-सिद्दराज के शासन में गुर्जर श्रौर मालवा राज्यों में लम्बा युद्ध चलता रहा। श्रमन्त में ११३६ ई० में मालवा राज्य के ऊपर गुर्जर राज्य को विजय प्राप्त हुई। इस विजयप्राप्ति के श्रवसर पर गुर्जर देश की प्रजा ने श्रपने राजा जयसिंह सिद्दराज का बड़े उत्साह एवं समारोह के साथ स्वागत किया। इस स्वागत-समारोह के श्रवसर पर राजा जयसिंह सिद्दराज का श्राचार्य हेमचन्द्र के साथ प्रथम परिचय हुश्रा था। यह परिचय उत्तरोत्तर प्रगढ़ मैत्री के रूप में विकसित होता गया। जयसिंह-सिद्दराज के विजय-महोत्सव के श्रवसर पर सभी सम्प्रदायों के प्रतिनिधियों ने उनका स्वागत किया था। इसी प्रसंग में जैन धर्म के प्रतिनिधि के रूप में श्राचार्य हेमचन्द्र ने उनका स्वागत किया था।

सूमि कमलुधोः स्वगोमियरसैराश्चित् रत्नाकरः! मुक्ता स्वस्तिकमातृयुचवभुमुष्टप्त त्वं पूरांकुम्भो भव। श्रृस्वा कलप्तरोर्दलनि सरल दिग्वा रक्षास्तोरग- न्याधत्त, स्वकरीरविजित्य जगतीं तन्वतेति सिद्वार्थप।।

(प्रबन्धचरित पु ३००)

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इस प्रथम राजपरिचय के समय श्राचार्य हेमचन्द्र की श्रायु ४६ वर्ष के लगभग थी । किसी अन्य श्रवसर पर राजा जयसिंह सिद्धराज 'ग्रन्थिल-पट्टन' के राजमार्ग पर हाथी पर चढ़े हुए जा रहे थे । दूसरी ओर से श्राचार्य हेमचन्द्र सूरी पैदल श्रा रहे थे । मार्ग सकरा था । राजा जयसिंह सिद्धराज ने हाथी हकवा दिया । इस पर श्राचार्य हेमचन्द्र ने उनको एक श्रोर से निःशंक हाथी निकाल ले जाने का सुझाव देते हुए तत्काल बना कर निम्न श्लोक पढ़ा—

"कारय प्रसरे सिद्ध ! हस्तिराजमहाध्वतम् । त्रस्यन्तु दिग्गजा: किन्ते श्वेतवैयोद्योत यतः ॥"

हेमचन्द्राचार्य की साहित्यसेवा—

उपयुक्त विवरण के श्रनुसार सन् ११३६ में मालव-विजयोत्सव के समारोह के श्रवसर पर श्राचार्य हेमचन्द्र का 'ग्रन्थिल-पट्टन' के श्रधिश्वर जयसिंह सिद्धराज के साथ प्रथम परिचय हुग्रा । उसके बाद सन् ११४६ में जयसिंह की समाप्ति हो गई । इस प्रकार सात वर्ष तक इन दोनों का साथ रहा । इन सात वर्षों के थोड़े से काल में राजा जयसिंह के प्रोत्साहन श्रौर प्रेरणा से, इन्होंने बहुत बड़े श्रौर बहुत महत्वपूर्ण साहित्य की रचना की है । व्याकरण, न्याय, साहित्य, छन्दःशास्त्र ग्र्रादि सभी विषयों पर उनके प्रौढ़ एवं श्रद्वितीय उच्च कोटि के ग्रन्थ पाए जाते हैं :

१ सिद्ध-हेमशब्दानुशासन, २ काव्यानुशासन, ३ छन्दोऽनुशासन, ४ वादानुशासन, ५ धातुपारायण, ६ द्वयाश्रय महाकाव्य, ७ देशीनाममालाविभूषण चिन्तामरिण, ८ ग्रनेकार्थ संग्रह निघण्टु, ९ सप्त सन्धान महाकाव्य, १० त्रिषष्टशलाकापुरुष चरित, ११ परिशिष्ट-पर्व, १२ योगशास्त्र, १३ वीतराग स्तोत्र, १४ द्रान्त्रिशिका द्वयस्तोत्र, १५ प्रमाणमीमांसा ग्र्रादि उनके लिखे हुए ग्रन्थों की सूची बहुत लम्बी है । श्रौर इनके प्रतिपाद्य विषयों का क्षेत्र बड़ा व्यापक है । इतने व्यापक श्रौर विविध विषयों पर इतनी उच्चकोटि के ग्रन्थ लिख कर उन्होंने सचमुच श्रपने श्राचार्यत्व को चरितार्थ किया श्रौर संस्कृत साहित्य की महती सेवा की है ।

ग्राचार्य हेमचन्द्र के ये सभी ग्रन्थ श्रद्वितीय महत्त्वपूर्ण हैं । किन्तु इनमें 'सिद्धहेमशब्दानुशासनम्' का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है । यह व्याकरण-शास्त्र का ग्रन्थ है यह बात उसके 'शब्दानुशासन' नाम से ही प्रतीत होती है, किन्तु उसके नामकरण में सिद्धहेम पद जोड़ कर श्राचार्य हेमचन्द्र ने श्रपनी श्रौर राजा जयसिंह सिद्धराज की मित्रता को स्मरर कर दिया है । इस नामकरण में 'सिद्ध' पद राजा 'जयसिंह सिद्धराज' का बोधक है श्रौर 'हेम' पद श्राचार्य हेमचन्द्र के नाम का सूचक है । सिद्धराज जयसिंह की प्रेरणा से श्राचार्य हेमचन्द्र ने इस शब्दानुशासन की रचना की है इस बात को श्राचार्य हेमचन्द्र ने इस नामकरण द्वारा सूचित किया है । उनका 'त्रिषष्टशलाकापुरुषचरित' एक विशाल पुराण ग्रन्थ है । श्रौर उनका 'परिशिष्ट-पर्व' भारत के प्राचीन इतिहास के ग्रनुसन्धान-कायों में उपयोगी हो सकता है । संस्कृत श्रौर प्राकृत दोनों भाषाग्रों में लिखा गया 'द्वयाश्रय महाकाव्य' एक उत्कृष्ट महाकाव्य है । 'प्रमाण मीमांसा' उनका दर्शन ग्रन्थ है । इसमें जैन दर्शन के ग्रनुसार प्रमाणों का विवेचन किया गया है । यह ग्रन्थ श्रापूर्णतया ही उपलब्ध होता है । यह ग्रन्थ सूत्र रूप में लिखा गया है । सूत्रों के ऊपर उनकी श्रपनी ही बनाई हुई स्वोपज्ञ व्युत्ति भी पाई जाती है । 'योगशास्त्र' में जैन दर्शन के साथ योग-प्रक्रिया का समन्वय करने का यत्न किया गया है । श्राचार्य हेमचन्द्र ने सभी विषयों पर ग्रन्थ लिख कर श्रपने ग्रन्थकारित्व के संस्कृत श्रध्ययन के लिए एक स्वतन्त्र ग्रन्थ-माला की रचना कर दी है । उनके ग्रन्थकारित्व की विशेषताएँ को पढ़ने पढ़ाने के लिए सभी प्रसिद्ध विषयों पर श्रपने स्वतन्त्र ग्रन्थ मिल

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सकते हैं । इस प्रकार उन्होंने संस्कृत विद्या के प्राध्ययन के निमित्त जैन धर्मं एवं गुजरात प्रदेश दोनों को स्वावलम्बी बना दिया है ।

ग्रन्थिम भांकी—

ग्राचार्य हेमचन्द्र एक महान् साधुपुरुष ग्रोर संस्कृत के प्रकांड विद्वान् थे । उनका अधिकांश समय ग्रंथरचन, ग्रंथ्ययन, ग्रध्यापन एवं साहित्यिक कार्यों में व्यतीत होता था । राजा जयसिंह के साथ ग्रोर उनके बाद जयसिंह के उत्तराधिकारी कुमारपाल के साथ यद्यपि उनका घनिष्ट सम्बन्ध था, किन्तु वे श्रमणों की नाई ग्रलग अपने विहार में रहते थे । ग्राचार्यक्ता होने पर सिद्धराज जयसिंह ग्रोर कुमारपाल उनके स्थान पर जाकर ही उनसे ग्राचार्यक परामर्श प्राप्त करते थे । फिर भी राज-सम्पर्क बड़ी बुरी बला है । ग्राचार्य हेमचन्द्र को इस राज-सम्पर्क का बड़ा दुरा फल भोगना पड़ा ।

राजा जयसिंह सिद्धराज के साथ ग्राचार्य हेमचन्द्र का प्रथम परिचय ११२६६ में मालवविजयोत्सव के समारोह के ग्रनवसर पर हुग्रा था । उस समय उनकी ग्रवस्था ४६ वर्ष की थी । उसके बाद ७ वर्ष तक राजा जयसिंह सिद्धराज के साथ उनका सम्बन्ध रहा । उसके बाद उनके उत्तराधिकारी ‘ग्रन्हिल-पट्टन’ के राजा कुमारपाल के साथ ३० वर्ष तक उनका सम्बन्ध रहा । इस प्रकार ४६ वर्ष की ग्रायु में राज-सम्पर्क में ग्राकर १७ वर्ष तक निरंतर राज-सम्पर्क में रहे, ग्रोर ८३ वर्ष की ग्रायु में उनका देहावसान हुग्रा । उनके देहावसान की घटना बड़ी करुण है ।

‘ग्रन्हिल-पट्टन’ के राजा ग्रोर ग्राचार्य हेमचन्द्र के शिष्य कुमारपाल के कोई पुत्र नहीं था । एक पुत्री थी ग्रोर उसका लड़का प्रतापमल्ल था । ३० वर्ष राज्य करने के बाद राजा कुमारपाल वृद्ध हो गए थे, ग्रोर उन्हें राज्य के उत्तराधिकारी का निर्णय करने की चिन्ता हुई । उनके निकट सम्बन्धियों में एक तो यही उनका दौहित्र प्रतापमल्ल था ग्रोर दूसरा उनका भाई प्रजपाल था । इन्हीं दो में से किसी को ‘ग्रन्हिल पट्टन’ की राजगद्दी का उत्तराधिकारी बनाया जा सकता था । इन दोनों में किसको राज-सिंहासन देना उचित होगा इस विषय में परामर्श करने के लिए वृद्ध राजा कुमारपाल ग्राचार्य हेमचन्द्र से परामर्श करने के लिए उनके स्थान पर गए । राजा के साथ उनका प्रिय एक जैन व्यापारी ‘वहडच-ग्राहड’ भी था । राजा जयसिंह सिद्धराज के साथ ग्राचार्य हेमचन्द्र का सम्पर्क केवल सात वर्ष ही रहा था । इसलिए जयसिंह चौव धर्म के ही ग्रनुयायी बने रहे, किन्तु कुमारपाल ग्राचार्य हेमचन्द्र के उपदेशों को सुन कर जैन बन गए थे । उनका दौहित्र प्रतापमल्ल भी जैन था । इसलिए ग्राचार्य हेमचन्द्र ने राजा कुमारपाल को यह परामर्श दिया कि धर्म के स्थायें के लिए प्रतापमल्ल को गद्दी देना श्रच्छा रहेगा । किन्तु राजा के जैन मित्र ‘वहडच-ग्राहड’ की यह सम्मति थी कि—“कुछ भी हो, पर ग्रपना काम का” इस कहावत के ग्रनुसार ‘प्रजपाल’ को गद्दी देना ठीक होगा । ग्रन्त में परिस्थितियों से विवश होकर ग्रजपाल को ही राज्य का उत्तराधिकारी बनाया गया ।

ग्राचार्य हेमचन्द्र के यहाँ जिस समय राजा कुमारपाल राज्य के उत्तराधिकारी के विषय में परामर्श कर रहे थे उस समय ग्राचार्य की एक विद्यार्थी बालचन्द्र भी वहाँ उपस्थित था । उस बालक बालचन्द्र के द्वारा ग्रजपाल को किसी तरह यह बात मालूम हो गई कि ग्राचार्य हेमचन्द्र ने उसको गद्दी दिए जाने का विरोध किया है । इस बात को सुन कर उसे बड़ा क्षोम हुग्रा ग्रोर वह ग्राचार्य हेमचन्द्र तथा उनके कृपापात्र एवं साथियों का शत्रु बन गया ।

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हेमचन्द्र की ग्रवस्था उस समय ५३ वर्ष की हो चुकी थी श्रौर उसके बाद बहुत शीघ्र ही उनका देहावसान हो गया । पता नहीं यह उसके किसी पड्यन्त्र का परिणाम था या यह स्वाभाविक मृत्यु थी । यद्यपि ग्रन्थों में तो इसका उल्लेख नहीं मिलता है फिर भी ब्रजयपाल की प्रकृति को देखते हुए यह श्राश्चर्य नहीं है कि उसने किसी पड्यन्त्र द्वारा ग्राचार्य हेमचन्द्र को समाप्त करा दिया हो । क्योंकि ग्राचार्य के निधन के बाद ३२वें दिन ही ब्रजयपाल ने विष देकर कुमारपाल को समाप्त कर दिया श्रौर स्वयं राज्यासिंहासन पर ग्रधिकार कर लिया । इस घटना का उल्लेख ग्रन्थों में ग्रनेक ग्रन्थों में पाया जाता है । सन् १३४६ में लिखे गए राजशेखर सूरि के 'प्रबन्धकोश' में इस घटना का उल्लेख इस प्रकार किया गया है—

"एवं ब्रजति काले राजा कुमारपालदेव: श्री हेमशब बुद्धी जाजो । श्री हेमसूरिगच्छे-विरोध । रामचन्द्र-हेमचन्द्रादिवृन्देमकेत । एकतो बालचन्द्र: तस्य च बालचन्द्रस्य राजग्रन्थावुच्चयेन ब्रजयपालेन सह मैत्री । एकदा प्रस्तावे राज्ञो गुरुभिः श्राभाष्य च राज्ञो मन्त्रारम्भः । राजा पृच्छति—भगवन् ! ब्रहमपुत्रः, कमहं स्वपदे रोप्यामि ? गुरवो बृंवन्ति प्रतापमल्लं दोहितृं राजानं गुरु धमंश्रेष्ठंय, ब्रजयपालात्तु त्वस्थापितधर्मंक्षयौं भावी । श्रग्रान्तरे श्राभट: प्राह—भगवन् ! याहशस्ताहः, श्रात्मीयो भव्यः पुनः श्रीहेमः—ब्रजयपालं राजं मा कुर्या: सर्वंश्रेव । एवं मन्त्रं कृत्वा उपस्थितस्यः । स श्र मंत्रो बालचन्द्रेश श्रुतः, ब्रजयपालाय च कथितः । श्रतो हेमच्छीय-रामचन्द्रादिशु श्रेष्ठ:, श्राभटे तु प्रीतिः हेमसूरेः: स्वर्गसंमनं जातम् । ततः तो दिनद्वाविंशता राजा कुमारपालोडजयपालवत्तविवशेण परलोकमगमंस्तु । ब्रजयपालो राज्ये निषण्णः । श्री हेम-देवाश्रारामचन्द्रादिशिष्यैः श्राप त्तलोलहवित्रासनपातनया मारयं ऋतम् । राजविद्हारारां बहूनां पातनम् । लघुकुल्लकानाह्लाद्य प्रातः प्रातमुं गयां कथं मम्यस्यति । पूर्वंभते चैत्यपरिपाटीं काक्षुं रित्युपाहसता बालचन्द्रोडपि स्वर्गोत्रुयाकाकार इति ब्रह्मद्र ब्राह्मणैरमन्त्रितः । श्रीमालवासिन् गत्बा मृतः । पार्श्व पच्यते हि सद्यः ।"

ग्राचार्य हेमचन्द्र के शिष्य—

प्रस्तुत ग्रन्थ नाटघदर्पण के निर्माता रामचन्द्र उक्त गुजरात की महाविभूति ग्राचार्य हेमचन्द्र के प्रमुख शिष्य थे । राजा जयसिंहु सिद्धराज के समय में ही ग्राचार्य हेमचन्द्र ने उन्हें ग्रहणपट्ट शिष्य घोषित कर दिया था । सन् १२७७ (सं० १३३४) में लिखे गए प्रभाचन्द्रसूरि के 'प्रभावक चरित' में रामचन्द्र के पट्टधर शिष्य होने का उल्लेख निम्न प्रकार किया गया है ।

"राज्ञा श्रीसिद्धराजेन, ग्रनयदनुयुजे प्रभुः । भवता कोडपि पट्टस्य योग्यः शिष्यो गुणोत्तरकः ॥ तस्मात्कं दर्शयत चित्तोल्कर्षण, मामिव । ग्रपनत मनुकम्पाहं पूर्वं त्वां मा स्म शोचयन् ॥ ब्राह श्रीहेमचन्द्रच न कोडप्येव हि चिन्तकः । श्राद्योऽन्यस्मादिलपाल: सप्तप्तारामभोजचन्द्रमा ॥ संज्ञानामहिमस्त्रैयं मुनिनां किं न जायते । कल्पद्रुमसमये राज्ञि स्वयमिहशि कृतस्थितो ॥ ग्रस्थ्यमुख्यायायो रामचन्द्रायः कृतिशेखरः । प्राप्तपदरेकः सद्भिः शविकल्पनिधिः ॥ ग्रन्थदायोदयसन्तेमो; क्षितिपतस्य स्वरुतिं च सः । ग्रनुक्तमुक्ता लघयिन्या व्यघातत ॥"

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इन श्लोकों में राजा जयसिंह सिद्धराज और ग्राचार्य हेमचन्द्र का संवाद वर्णित है। एक बार राजा सिद्धराज जयसिंह ने ग्राचार्यं हेमचन्द्र से पूछा कि— हे भगवन् ! ग्रापका उत्तराधिकारी योग्य शिष्य कौन है। हमें भी उसका दर्शन कराने की कृपा करें । राजा जयसिंह के कोई पुत्र नहीं था । इसलिए उसने कहा कि हे ग्राचार्यं कहीं ऐसा न हो कि मेरी तरह ग्रापके विषय में भी शोक का ग्रावसर ग्राए कि ग्रापका कोई योग्य शिष्य नहीं था। इसलिए ग्रापने पट्टशिष्य उत्तराधिकारी का निश्चय कर लीजिए । ग्रौर इस पर ग्राचार्यं हेमचन्द्र ने रामचन्द्र को ग्रापना उत्तराधिकारी पट्टशिष्य बतलाया ग्रौर कहा इसे किसी समय ग्रापको दिखला भी चुका हूँ । उस समय उसने ग्रर्थात् रामचन्द्र ने ग्रापकी ग्रपूर्वं ढंग से स्तुति भी की थी । इस स्तुति का वर्णन उसी 'प्रभावक चरित' में निम्न प्रकार किया गया है—

तथाहि—

मात्रयाप्यधिकं कञ्चिन्म सहेन्न जिगीषवः । इतीव त्वं धरानाथ ! धाराधिपमपाकुरुता: ॥

ग्रर्थात् हे राजन् ! विजयेच्छु लोग (मात्रयाप्यधिकं) ग्रपने से तनिक भी बड़े को सहन नहीं करते हैं, इसलिए धरानाथ ! ग्राप उस धारानाथ ग्रर्थात् मालवराज का नाश कर डालें । इस इलोक में धरानाथ तथा धारानाथ शब्दों के प्रयोग में चमत्कार है। इस शब्दों की मात्राग्रों की गराना की जाय तो 'धरानाथ' की ग्रपेक्षा 'धारानाथ' में एक मात्रा ग्रधिक है । कवि ने धरानाथ सम्बोधन 'गुर्जराधीश जयसिंह सिहाराज' के लिए किया है ग्रौर 'धारानाथ' पद से मालवराज की ग्रोर संकेत किया है । वह मात्रया ग्रधिक है । इसलिए इसको नष्ट करने की बात कवि ने कही है । इस उक्ति में कुछ कविजनोचित ग्रपूर्वं चमत्कार है । इसीलिए ग्राचार्यं हेमचन्द्र ने उसे 'ग्रनुक्तामपि विदित्वा' एकदम ग्रपूर्वं कहा है । ग्रौर इसीलिए उसको सुन कर राजा का सिर झूमने लगा । जैसा कि ग्रागले इलोक में कहा है—

विरोषूननपवं च भूपालोडन्र हृशं दधौ । रामे, वामतराचारो विदुरां महिमसृण्शायम् ॥

इस प्रकार के वर्णनों से विदित होता है कि ग्राचार्यं हेमचन्द्र ने राजा जयसिंह सिद्धराज के सामने ही ग्रर्थात् ग्रपनी मृत्यु से लगभग ४०-४२ वर्ष पूर्वं ही रामचन्द्र को ग्रपना पट्टशिष्य उत्तराधिकारी एवं प्रमुख शिष्य घोषित कर दिया था । रामचन्द्र के प्रतिरिक्त १ महेन्द्रसूरि, २ गुणचन्द्र सूरि, ३ वर्धमानगणि, ४ देवचन्द्र मुनि, ५ यशश्चन्द्र ६ उदयचन्द्र तथा ७ बालचन्द्र ये ७ उनके सहपाठी तथा ग्राचार्यं हेमचन्द्र के विशेष कृपापात्र शिष्य थे ।

१. महेन्द्रसूरि—इन में से महेन्द्रसूरिने ग्राचार्यं हेमचन्द्र के 'प्रनर्थसंघ्रह' नामक ग्रन्थ के ऊपर 'हैमानेकार्थ संग्रह टीका' लिखी थी । जैसा कि उनके निम्न् इलोक से प्रतीत होता है—

श्रीहेमसूरिवर्यस्य श्रीमन्महेन्द्रसूरिरखा । भक्तिनिष्ठेन टीकेयं तन्नाम्नैव प्रतिष्ठिता ॥

२-३. ग्रन्यकाल के सहाय्यायी सुरचन्द्रगणि तथा वर्धमानगणि—वि०सं० १२४१ (सन् १२७४ ई०) में सोमप्रभाचार्यं ने 'कुमारपाल प्रतिबोध' काव्य-ग्रन्थ की रचना की थी । सोमप्रभ

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ने ग्रंथना यह कार्य हेमचन्द्र के शिष्य गुरुराचन्द्रगरिणे तथा वर्धमानगरिणे को सुनाया था, इस प्रकार का उल्लेख उन्होंने स्वयं इस प्रकार किया है—

शशिजलधिसंयुक्तवर्षे गुरुचिमासे रविदिने सिताष्टम्यां । जिनधर्मप्रतिबोधः कल्याणोदयं गुरुराचन्द्रपुure ॥ हेमसूरिपदपंकजहंसैः महेन्द्रमुनिपैः श्रुतमेतत् । वर्धमान-गुरु-चन्द्रगणिभ्यां साकमाकलितशास्त्रवरहसैः ॥

इन श्लोकों में वर्धमान तथा गुरुराचन्द्र दोनों के नामों का उल्लेख साथ-साथ किया है और उन्हें आचार्य हेमचन्द्र का शिष्य बतलाया है। इससे ये दोनों भी नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र के सहपाठी सिद्ध होते हैं। इनमें से गुरुराचन्द्र तो वे हैं जिन्होंने रामचन्द्र के साथ मिलकर इस प्रस्तुत ग्रन्थ 'नाट्यदर्पण' और उसकी स्वोपज्ञवृत्ति की रचना की है। वर्धमानगरिणे ने भी 'कुमार विहार-प्रशस्ति' नामक ग्रन्थ की व्याख्या की है। उसका परिचय निम्न लेख से मिलता है—

श्रीहेमचन्द्रसूरिविष्येऽपि वर्धमानगरिणा कुमारविहारप्रशस्तो, काव्येऽडपि चिन्मनः पदर्थे कृतेऽपि कोतुकात् पोषशोत्तरं शतं व्याख्यानं चक्रे ॥

४-५. देवचन्द्रमुनि तथा यशश्चन्द्रगरिणे— ये दोनों भी नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र के सहपाठी थे। इनमें से देवचन्द्रमुनि ने 'चन्द्रलेख विजय' नामक 'प्रकरण' (रूपक भेद) की रचना की है, और यशश्चन्द्रगरिणे का नाम मेघदूत सूरि द्वारा विरचित 'प्रबन्ध-चिन्तामणि' में आचार्य हेमचन्द्र के शिष्य रूप में पाया जाता है।

६. उदयचन्द्र— इनके नाम का उल्लेख आचार्य हेमचन्द्र-विरचित शब्दानुशासन की न्यास टीका के लेखक कनकप्रभ ने निम्न प्रकार किया है—

भूपालमौलिमणिकिरण-मालालालितशासनः । दर्शनशट्कननिस्तन्रोहहेमचन्द्रो मुनेश्वरः ॥ तेषामुदयचन्द्रोऽस्ति शिष्यः संख्यावर्त्तां वरः । यावज्ज्जीवमभूूत यस्य, व्याख्या ज्ञानामृतप्रपा ॥ तस्योपदेशाद् देवेन्द्रसूरि शिष्यलवो व्यघात् । न्याससारसमुद्धरन् मनीषी कनकप्रभः ॥

७. बालचन्द्र— रामचन्द्र के सहपाठियों में बालचन्द्र जी का भी विशेष स्थान है। इसके नाम की चर्चा हम आचार्य हेमचन्द्र की ग्रन्थिम श्रृङ्खी के प्रसङ्ग में कर चुके हैं। राजा कुमारपाल की मृत्यु का कारण यही था, और आश्चर्य नहीं कि आचार्य हेमचन्द्र की मृत्यु भी इसी कारण हुई हो।

कवि कटारमल्ल की उपाधि— कवि रामचन्द्र का जन्म कब और कहाँ हुश्रा इसका ठीक निर्णय करने का कोई साधन उपलब्ध नहीं है । सन् ११३६ में आचार्य हेमचन्द्र को, जयसिंह सिद्धराज के साथ परिचय होने के समय वे आचार्य हेमचन्द्र के विद्यार्थियों में थे। यह बात पूर्वोक्त श्लोकों के आधार पर कही जा सकती है, और इससे यह परिणाम भी निकाला जा सकता है कि उनका जन्म गुजरात में 'प्रबन्ध-हिल-पट्टन' के ग्रास-पास ही कहीं हुश्रा होगा । तभी उन्हें आचार्य हेमचन्द्र के शिष्यत्व को सौभाग्य का श्रवसर सरलता से मिल गया ।

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ग्रन्थावारं हेमचन्द्र के द्वारा रामचन्द्र का परिचय राजा जयसिंह सिद्वराज के साथ भी हो गया था । एक बार ग्रीष्म ऋतु की प्रचण्डता की चर्चा के प्रसंग में राजा जयसिंह सिद्वराज ने अपने पारिषदों से पूछा कि गर्मी में दिन लम्बे क्यों हो जाते है ? कथम् ग्रीष्मे दिवसा: सुविस्तरा: ? लोगों ने विभिन्न प्रकार के उत्तर दिए । उस समय रामचन्द्र भी सभा में उपस्थित थे । राजा ने उनका भी अभिप्राय जानना चाहा । रामचन्द्र ने उनके प्रशन का उत्तर दिया । वह उत्तर उस समय की सामन्ती परम्परा के अनुरूप शौर कवि रामचन्द्र की कवित्व-प्रतिभा के अनुरुप था । रामचन्द्र ने राजा के प्रशन का उत्तर निम्न श्लोक द्वारा प्रस्तुत किया ।

देव ! श्रीगिरिदुर्गमल्ल ! भवतो दिग्जयत्रयात्रोत्सवे, भावद्वीरतरुणी निष्णुरभुरकुण्डलै: क्ष्मामण्डलात् । वातोदूतवरोजमिलत्सुरसरिरिसज्जातपड्क्कूस्थली— दूर्वाचुम्बनचञ्चुरारवि हयासते नातिवृदं दिनम् ॥

इस श्लोक में राजा के प्रताप का वर्णन है । राजा जयसिंह सिद्वराज जब दिन विजय करने निकलते हैं तब उनके सैनिकों के घोड़ों के खुरों से उड़ाई गई भूमि ग्राकाश गंगा पर जाती है और उस पर धुब उड़ ग्राती है । सूर्य का रथ जब ग्राकाश गंगा पर पहुंचता है तो सूर्य के घोड़े उस हरी-हरी धुब को देख कर उसे खाने के लिए रुक जाते हैं । इसलिए उनके अपने लक्ष्य स्थान पर पहुंचने में विलम्ब हो जाता है । इसी कारण दिन बड़ा हो जाता है । उत्तर को सुन कर राजा बहुत प्रसन्न हुए । विशेषकर इसलिए कि यह श्लोक कवि का तुरन्त बनाया हुआ श्लोक था और उससे कवि की कल्पना-शक्ति का परिचय मिलता था ।

इसी प्रकार किसी अन्य अवसर पर राजा जयसिंह सिद्वराज ने रामचन्द्र से कहा कि— 'सद्योनगरं वर्णयन् पट्टणाभिषानम्' 'प्राहिल-पट्टण' नगर का वर्णन ग्रभी करो । रामचन्द्र ने तनिक सी देर में ही 'प्राहिल-पट्टण' नगर के वर्णन में निम्न श्लोक बना कर राजा के सामने प्रस्तुत कर दिया—

एतस्यास्य परस्य पो रवनिताचातुर्य्यनतिजिता मन्दे नाथ ! सरस्वती जड़तया नीरं वहन्ती स्थिता । कीर्तिस्तम्भमिथोच्चदण्डनरुचिरामुक्तसुजद्वाहवली— तन्त्रीका गुरुसिद्धश्रुपतिसरस्तुम्बी निजां कच्छपीम् ॥

इस श्लोक का भाव यह है कि इस 'प्राहिल-पट्टण' की निवासिनी स्त्रियों की चतुराई से पराजित होकर सरस्वती बिल्कुल मूर्ख बन कर उनके सामने 'पानी भरने लगी ।' इसलिए अपनी वीणा की कच्छपी [नीचे वाले भाग] को सिद्वराज भूपाल के तालाब की कच्छपी के रूप में नीचे छोड़ दिया और वीणादण्ड को राजा के कीर्ति-स्तम्भ के रूप में धारण किए हुए घूम रही है ।

या तो दोनों श्लोकों में कुछ गड़बड़ी है किन्तु 'सद्योनिर्मित' होने के कारण वे काफी श्रच्‍छे श्लोक हैं । रामचन्द्र की इस प्रकार की प्रतिभा का परिचय राजा जयसिंह सिद्वराज को ग्रनेक बार प्राप्त हो चुका था । इसलिए राजा ने प्रसन्न होकर 'कवि-कटारमल्ल' की उपाधि रामचन्द्र को प्रदान की ।

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एक बार काशी से विश्वेश्वर नामक कवि पण्डित श्राहिल-पट्टन आए । यह राजा कुमारपाल के समय की बात है। वे कविवर श्राचार्य हेमचन्द्र की सभा में पहुँचे । उस समय राजा कुमारपाल भी श्राचार्य हेमचन्द्र के पास बैठे हुए थे । विश्वेश्वर पण्डित ने सभा में पहुँचते ही श्राचार्य हेमचन्द्र को श्राशीर्‌वाद देते हुए निम्न श्लोकादि को पढ़ा—

पातु वो हेम ! गोपाल: कम्बलं दण्डमुदाहृतम् ।

श्लोकादि का श्रर्थ था कि हे हेमचन्द्र ! दण्ड शौर कम्बल धारण किए हुए गोपाल कृष्ण तुम्हारी रक्षा करें । कवि विश्वेश्वर ने श्रपनी धार्मिक भावना के श्रनुसार कृष्ण के द्वारा उनकी रक्षा की बात कही थी । पर श्राचार्य हेमचन्द्र शौर उनके श्रास-पास की सारी मण्डली तो जैन मतावलम्बनी थी । उसे तो 'कृष्ण तुम्हारी रक्षा करें, यह बात कुछ रुचिकर नहीं मालूम पड़ी । उसके स्थान पर यदि 'जिन तुम्हारी रक्षा करें' यह बात कही जाती तो उन्हें श्रच्छा लगता । उस समय कवि रामचन्द्र भी वहीं बैठे थे । उन्हें कृष्ण का यह 'रक्षा करने का गौरव' पसन्द नहीं श्राया । इसलिए उन्होंने तुरन्त ही यथो श्लोक श्राधे श्लोक की पूर्ति निम्न प्रकार करके सुनादी—

पाददर्शनपशुप्रामं चारयन्तं जैनगोचरे ॥

पहिले श्लोकादि में दण्ड शौर कम्बलधारारी गोपाल के रूप में कृष्ण को उपरिस्थत किया था । रामचन्द्र के श्लोकादि में यह कहा गया है कि हाथ में लाठी लिए हुए शौर कंठे पर कमरिया डाले हुए वह गोपाल 'जैन गोचरे' जैनों के यहां पादर्शन रूप पशुप्रों को चरा रहा है । विश्वेश्वर कवि के हृदय में श्राशीर्‌वाद देते समय कृष्ण के प्रति जितना श्रभिमान व्यक्त हो रहा था, रामचन्द्र के श्लोकादि ने उतनी बुरी तरह कृष्ण की हीनता को प्रकाशित किया है । इस प्रकार यह श्लोक धार्मिक संघर्ष का सुन्दर उदाहरण बन गया है । सहृदय लोगों ने उस समय भी इस का रसास्वादन किया होगा । श्रोर श्राजकके सहृदयों को भी उसमें एक तीसरा ही सही पर विशेष रसास्वादन मिलेगा—

“पातु वो हेम ! गोपाल: कम्बलं दण्डमुदाहृतम् । पाददर्शनपशुप्रामं चारयन्तं जैनगोचरे ॥”

इस घटना का यह विवरण मेरुतुङ्ग रचित 'प्रबन्धचिन्तामरिण' [पृ० २२६-२७] के श्राधार पर दिया गया है । चरित्रसुन्दरगणि ने 'कुमारपालचरित महाकाव्य' में इसी प्रकार की घटना का उल्लेख निम्न प्रकार किया है ।

पच्च्चलक्षणाई द्रव्यारां दस चोच्चैस्तुरग्ज्जमान् । विश्वेश्वराय कवये तुष्ट: श्री कुमारो ददौ ॥ सार्थं नृपतिना सोड्य विशेश्वरकविर्ययो: । श्री हेमसूरिरिशालायां विद्धद्गोष्ठीरसेरित: ॥ ग्रालोक्य संसदं सूरेः सुरेैरिसूरिजनोत्तमात् । स ब्रह्मपरिषतुल्यामेन मेन केवीश्वर: ॥ सूरि-शिष्यपरীক্ষायै द्वे समस्ये समार्पयत् । 'व्यासिद्धदेवि'ति प्रसिद्धाड्ढया 'श्रुतज्ञानेऽति' चापरा ॥ तामाच्च निरवयवपदरचनाहृदा कपदी महा— द्माल्य: पूर्वमपूरयद गुरुतरप्रज्ञाप्रकोत्पदूर: ।

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कुवंस्तन्मनसीति विस्मयभरं श्रीसूरिशिष्यः क्षणाद् । ग्रन्थ्यां मात्यमोदनिन्दुर् मतिमतां श्रीरामचन्द्रोदयाध्वत् ॥

यह वर्णन, पूर्व वर्णन से भिन्न प्रकार का है । इसके ग्रनुसार विश्वेश्वर कवि का पहिले राजा कुमारपाल ने अपनी सभा में सत्कार किया । उसके बाद कवि राजा कुमारपाल के साथ आचार्य हेमचन्द्र की शाला में गए हैं। वहां उन्होंने आचार्य के शिष्यों की परीक्षा के लिए दो समस्याएं पूर्ति करने के लिए रखीं । इनमें से एक समस्या 'व्यापि तमः' थी श्रोर दूसरी 'श्रुज्झाग्रेण' थी । इनमें पहली समस्या की पूर्ति पहिले राजा के महामात्य 'कर्पूर' ने की । उसके बाद दूसरी समस्या की पूर्ति हेमचन्द्र सूरी के शिष्य रामचन्द्र ने की । इन दोनों के समस्या-पूर्ति श्लोकों को ग्रन्थकार ने इस प्रकार प्रस्तुत किया है—

नेतस्याः प्रसुतिद्येन सरले ! शक्ये पिश्वातुं हशो सर्वत्रापि च लक्ष्यते मुखशशिज्योत्स्नाविततां निशाम् । इत्थं मध्यगता सखीभिरमितो हग्मीलनाव् केलिपु, व्याषिद्धा, नयने मुखं च रुदती स्वे गहंते कन्यका ॥

यह महामात्य द्वारा की गई 'व्यापि तमः' समस्या की पूर्ति है । रामचन्द्र द्वारा की गई दूसरी समस्या की पूर्ति निम्न प्रकार है—

हयं नो गोगुरुत्वेनदुर्‌दुर्‌विपत्सस्यामृतं तत्क्षरे तेन व्यापशरातुरां मम प्रियामेनां समुज्ज्जीवय । इत्थुक्ते मृगलोच्ननस्य हरिणो काहृण्यमाजलपतः श्रुज्झाग्रेण मृगस्य पदय पतितं नेत्राम्बु भूमण्डले ॥

इनमें से प्रथम श्लोक में कन्याओं की ग्रांलमिचोनी की क्रिडा का वर्णन है । ग्रांख-मिचौनी खेलने वाली लड़कियों में एक लड़की की ग्रांखें बहुत बड़ी बडी हैं । इतनी बड़ी कि 'प्रसुतिद्येन' दोनों हाथों से 'पिश्वातुं न' छाके वे ढकते में नहीं आतीं है । उससे ग्रांख मिचौनी करते खेली जाय । उस लड़की में दूसरा दोष यह भी था कि वह कहीं भी जाकर छिपो, पर उसके सौन्दर्य की कान्ति चारों ग्रोर फैल जाने से वह छिपी नहीं रह सकती है । इन दोनों कारणों से उस कन्या को 'हग्मीलन केलि' से निकाल दिया गया—'व्याषिद्धा' श्रोर वह बेचारी अपने मुख तथा नेत्रों को कोस-कोस कर रोने लगी ।

दूसरे श्लोक में कोई मृग 'श्रुज्झाग्रेण' चन्द्रमा में बैठे हुए मृग को स्पर्श करते हुए उससे प्रार्थना कर रहा है कि तुम हमारे वंश के बड़े-बूढ़े गुरु हो, चन्द्रमा तुम्हारा स्वामी है । उससे श्रमृत भरे हाथ के द्वारा व्याध के बाण से मृतकल्प मेरी प्रिया हरनी को पुनर्जीवित करादो । इस प्रकार कहते हुए करुणामयी प्रार्थना करने वाले मृग की ग्रांखों से ग्रांसू टपकाने लगे । इस प्रकार श्रापनी दी हुई दोनों समस्याओं की तत्काल प्रस्तुतु की गई इन दोनों सुन्दर पूर्तियों को सुन कर विश्वेश्वर पण्डित ग्रत्यान्त प्रसन्न हुए ।

स जहार निजाथन ते निपीयाशु पूरिते । ग्रहो ! जानाति विश्वेडस्मिन् कविरेव कवेः श्रमद ॥

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कवि रामचन्द्र का प्रामाणिक परिचय—

नाटघ दर्पणकार रामचन्द्र का यह परिचय हमने ग्रन्थ लोगों के ग्रन्थों में वर्णित सामग्री के आधार पर दिया था । ग्रन्थ प्रागे उनकी स्वयं दी हुई सामग्री के आधार पर उनका कुछ परिचय प्रस्तुत किया जाता है । नाटघरचना के नियमों के अनुसार नाटक की प्रस्तावना में सूत्रधार के मुख से प्रत्येक नाटककार अपने सम्बन्ध में कुछ परिचय देता है :

रज्जु प्रसाध मधुरः इलोकः काव्यार्थसूचकः । रूपकस्य कवेरार्यां गोत्राऽऽदि स कीर्त्यते ॥ साहि०द०पं० ६-२५ ।

इस नियम के अनुसार प्रत्येक नाटक के प्रारम्भ में कवि रामचन्द्र ने ग्रपना परिचय दिया है, परन्तु परिचय में उन्होंने अपने गोत्रस्थान ग्रादि का कहीं कोई उल्लेख नहीं किया है । ग्रपने सभी नाटकों में उन्होंने केवल ग्राचार्य हेमचन्द्र सूरि के शिष्य-रूप में ही ग्रपना परिचय कराया है । इस लिए उनके ठीक जन्म स्थान, पितृनाम ग्रोर कुल-गोत्रादि का कोई परिचय हमको नहीं मिलता है । फिर भी उनके ग्रपने व्यक्तित्व के परिचय कराने के लिए उनकी स्वलिखित पर्याप्त सामग्री मिलती है । ग्रपने विषय में सबसे लम्बा परिचय उन्होंने कदाचित् ‘रघुविलास’ की प्रस्तावना में दिया है । वह परिचय निम्न प्रकार है—

मारिष ! सिद्धहेमचन्द्राभिधानशब्दानुशासनविधानवेत्ता श्रीमदाचार्यहेमचन्द्रदय शिष्यं रामचन्द्रमभिजानासि ?

चन्द्र ०—[साक्षेपम्]— पटच्चप्रबन्धमिश्रपद्ममुखानकेन विद्वन्मनः सदसि नृत्यति यस्य कीर्तिः । विद्यातुरयीयराममचुमत्कृतकाव्यतनुं कस्तं न वेद सुधृतिं किल रामचन्द्रम् ?

किन्तु दृव्यालङ्करणाम प्रबन्धगोडनमिनेयत्वेन तावदास्ताम् । श्रपरेऽपि राघवाश्रययादवाश्रययादवभूमय-नलविलास-रघुविलासान् चतुर्णां रमणीयतम-सन्ध्योःइन्दुविशेषणां पुनर्मध्ये कुतः प्रजानामतुरागः ?

[रघुविलास-प्रस्तावनायाम]

यह उद्धरण ‘रघुविलास’ की प्रस्तावना से लिया गया है । इसमें कवि रामचन्द्र ने ग्रपने पाँच ग्रन्थों का उल्लेख किया है । इनमें से प्रथम ‘द्रव्यालङ्कार’ ग्रन्थ न्यायशास्त्र से सम्बन्ध रखने वाला ग्रन्थ है ग्रोर दोष चारों उनके प्रसिद्ध नाटक हैं । पाँच ग्रन्थों के उल्लेख से यह प्रतीत होता है कि ‘रघुविलास’ की रचनाकाल तक वे इसको मिला कर पाँच ग्रन्थों की रचना कर चुके थे । ग्रोर उनके कारगा उनकी पर्याप्त ख्याति हो गई थी । इस परिचय में उन्होंने ग्रपने को ‘विद्यातुरयी चरम’ कहा है । साधाररगा ‘त्रयीविद्या’ पद से वेदविद्या का ग्रहण होता है । किन्तु रामचन्द्र जैन विद्वान् थे इसलिए वेद विद्या से उनका कोई सम्बन्ध नहीं था । उन्होंने जो ‘विद्यातुरयी’ का प्रयोग किया है ‘उससे न्याय, व्याकरगा तथा साहित्य विद्या का ग्रहण होता है । रामचन्द्र का इन तीनों शास्त्रों के ऊपर पूर्णं ग्रधिकार था, इसी लिए उन्होंने यहाँ ग्रपने को ‘विद्यातुरयीयचराम’ तीनों विद्याओं में निपुरा कह कर ग्रपना परिचय दिया है । ‘नाट्यदर्पण-विवृति’ के ग्रन्थ में—

"शब्दलक्ष्म-प्रणालक्ष्म-काव्यलक्ष्म-कृतश्रमः । वाग्विलासित्रमार्गौ नो, प्रवाहू उदधौ जडः ॥"

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लिख कर उन्होंने फिर अपने को इन तीनों विद्याओं का पण्डित सूचित किया है। अपना ही नहीं अपने श्राचायँ हेमचन्द्र का भी इन तीन शास्त्रों का ही पाण्डित्य ‘नाटघदर्पण-विवृति’ के ग्रन्थ में उन्होंने इस प्रकार वर्णन किया है—

"शब्द-प्रामाण्य-साहित्य-छन्दो-लक्षण विधयिनाम् । श्रीहेमचन्द्रपादानां, प्रसादाय नमो नमः"

‘नाटघदर्पण विवृति’ के प्रारम्भ में भी कहते हैं—

"प्रारंरप: कवितयैव विद्यानां, लावण्यमिव योषिताम् । त्रिविधवेदिनोऽप्यस्मै, ततो नित्यं कृतस्मृतिः"

इस इलोक से उन्होंने अपने को ‘त्रिविधवेदिन:’ कह कर अपना परिचय दिया है । ‘सिद्धहेम-शब्दानुशासन’ के ऊपर ‘न्यास’ टीका लिख कर उन्होंने अपने व्याकरणशास्त्र के पाण्डित्य को चरितार्थ कर दिया है । अपने ‘द्रव्यालंकार विवृति’ ग्रन्थ द्वारा न्यायशास्त्र के पारंगुत्व को, और नाटघदर्पण एवं अनेक नाटकों की रचना द्वारा अपने साहित्यशास्त्र निष्णातत्व को चरितार्थ कर दिखाया । उनके ग्रन्थों के पढ़ने से स्पष्ट ही प्रतीत होता है कि वे इन सब शास्त्रों के प्रपूर्व विद्वान् थे । इसलिए उनका ‘त्रिविधवेदित्व’ का प्रसंगानुरूप यथार्थ ही था ।

२. नाटघदर्पाकार रामचन्द्र ने अपने नाटकों में अपनी स्वतन्त्रय-प्रियता पर बड़ा बल दिया है । उनकी काव्यरचना बिल्कुल स्वतन्त्र है । किसी अन्य कवि की कविता आदि का उन्होंने तनिक भी श्राश्रय नहीं लिया है । इस बात को प्रदर्शित करते हुए नलविलास की प्रस्तावना में लिखा है कि—

"नटः [विमुश्य] भाव ! श्रियं कवि: स्वयमुत्पादक उताहो परोपजीवक:?सूत्रधार:—ग्रन्थार्थे तेनैव कविना दतमुत्सरस्—

जन: प्राप्तप्रतीतं पदमथ पदार्थ घटयतः पराध्वाध्वन्यनु नः कथयतु गिरां वत्स निरियम् ।

ग्रामवास्यायामप्यविकलविकासिनि कुमुदा—नित्यं लोकचन्द्रव्यतिकर विकार्शिनि वर्दति ।

ऐसा प्रतीत होता है कि किसी आलोचक ने रामचन्द्र को गतानुगतिक श्रर्थात् पुरानी बातों का ही वर्णन एवं अनुगमन करने वाला कह दिया था । उसका विरोध करते हुए इस इलोक में उन्होंने यह दिखलाया है कि ‘हम तो सदा अपनी बुद्धि में प्रष्प्टित नवीन पदार्थों की रचना करते हैं, फिर भी यदि हमें लोग दूसरों का अनुगमन करने वाला कहते हैं तो कहने दो । ऐसा तो संसार में कहा ही जाता है । देखो न ! संसार कुमदों को चन्द्रमा के सम्पर्क से ही खिलने वाला कहता है । पर वे कुमुद तो ग्रामवास्या के दिन चन्द्रमा के न होने पर भी खिलते हैं । इसलिए लोगों की बात विश्वास के योग्य नहीं है ।

"ग्रपि च शपथप्रत्ययपदपदार्थसम्बन्धेपु प्रीतिमादधानं जनमवलोक्य जातखेदेन तेनैव चास्मिहितम् —

स्पृहां लोक: काव्ये वहति जरठ: कुण्ठतत्मै: वचोऽभिव्याच्येत प्रकृतिकुटिलेन स्फुटिते ।

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वयं वीथीं गादुं कथमपि न शक्ताः पुनरिमां—

मियं चिन्ता चेतःस्थलयति नित्यं किमपि नः ।

पुरानी ढौली के जिन यमकादि प्रधान और चित्रकाव्यों का श्रायं भी समभाना कठिन होता है, इस प्रकार के काव्यों में लोगों की विशेष रुचि से लिखित होकर रामचन्द्र ने यह श्लोक लिखा है। उसका भाव यह है कि हम इस प्रकार के स्वभावतः दुष्कर श्रोर निकृष्ट रचनाशैली का प्रवालम्भन करते में श्रमसर्थ हैं। तो लोग हमारे काव्य को पसंद करेंगे या कि नहीं यही चिन्ता हमें सता रही है। प्रर्थात् रामचन्द्र ने पुरानी ढौली का प्रवालम्भन करके ही श्रपने नाटकों की रचना नहीं की है। इसलिए गतानुगतिक केवल पुरानी लकीर के फ़कीर नहीं हैं—

लोक लोक गाड़ी चले लीकहि चलि कपूत ।

तीन लीक पर न चलें शायर शोर सपूत ॥

कवि रामचन्द्र तो शायर भी है श्रोर सपूत भी, इसलिए पुरानी लीक पर चलने वाले कैसे हो सकते हैं। उनकी रचनाशैली चित्रकाव्य की कठिन शैली से सर्वथा भिन्न सरल श्रोर सुबोध शैली है। इसीलिए उनकी रचना विशेष रूप से रसवती बन पड़ी है। इसी बात को उन्होंने निम्न श्लोक में दिखलाया है—

प्रबन्धबन्धान्तरु नवभ्राजितवैदग्ध्यमदान्तरान् ।

कवीन्‍द्रान् निस्तन्राः कान्त ननु मुरारिप्रभृतेः ।

श्रहते रामान्नायः किमुत परकोटी घटयितुं

रसान् नाटकप्रान्ते पदुररतिच वितर्कों मनसि नः ।

प्रर्थात् नवीन कल्पना श्रोर उक्तियों से मधुर काव्यों की रचना करने वाले मुरारि श्रादि व जाने कितने कवि हुए। किन्तु नाटक के प्रारंभ से लेकर चरमोत्कर्ष तक पहुँचाने में समर्थ, रचना को प्रस्तुत करने वाला तो रामचन्द्र के प्रतिरिक्त कोई दूसरा कवि दिखाई नहीं देता है।

यह तो रामचन्द्र ने श्रपनी स्वतन्त्र रचनाशैली का प्रतिपादन किया है। किन्तु दूसरे कवियों के पद-पदार्थों का प्रापहरा करने वाले कवियों की उन्होंने बड़ी कटु श्रालोचना की है। उनकी श्रनेक कृतियों में इस ग्रापहरण-प्रवृत्ति की निन्दा पायी जाती है। उनमें से कुछ उदाहरण निम्न प्रकार हैं—

प्रकृतित्वं परस्तात्तव कलदृशः पाठशालिनाम् ।

प्रग्यकाव्ये कविरवं तु कलङ्कस्यापि चूलिका ।

[नाटकदर्पण-विवृति १-११]

यह श्लोक नाटकदर्पण विवृति के श्रादि में लिखा है। इसी प्रकार इस विवृति के ग्रन्थ में भी उन्होंने लिखा है—

प्ररोपनीतशब्दार्था: स्वनाम्ना कृतकोतयं: ।

निबद्धारोहशून्ता तेन, को नो क्लेशमवेक्ष्यति ?

ग्राजकल तो लोग दूसरों के शब्द श्रथों को लेकर श्रपने नाम से प्रसिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। तब हम दोनों प्रर्थात् नाटकदर्पणकार रामचन्द्र श्रोर गुणचन्द्र के उस कष्ट को, जो उन्होंने इस ग्रन्थ तथा ग्रन्थ ग्रन्थों की रचना में उठाया है कौन समझ सकेगा ?

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‘कौमुदी मित्रारानन्द’ की प्रस्तावना में भी उन्होंने इसी भाव को निम्न प्रकार लिखा है—

परोपनीतशब्दार्था: स्वनाम्ना कृतकोतिंय: ।

निबद्धारोडधुनैव तेन विश्वंभरस्तेऽपु वः सताम् ॥

कवि रामचन्द्र न केवल काव्य-रचना के क्षेत्र में श्रपितु जीवन के सभी क्षेत्रों में स्वतं्रता के उपासक हैं । उन्होंने इस स्वतंञ्रताप्रियता का परिचय ग्रन्थ के विभिन्न स्थलों पर दिया है । कुछ उदाहरण निम्न प्रकार है—

काव्यं चेत् सरसं किमर्थममृतं, वक्त्रं कुरंगीदृशां

चेत् कम्पद्पविण्डुगण्डफलकं राकाशशा:कून् किम् ?

स्वातंञ्र्य यदि जीवितावधि मृधा शव्रू भूवोऽपि वैमव

वैदर्भी यदि बधयीवंनभरा प्रीत्यै सरस्याडपि किम् ?॥

[नलविलास २-२]

इसके तीसरे चरण में उन्होंने पूर्ं स्वतंञ्रता के सामने स्वर्ग श्रोइ तीनों लोकों के वैभव को तुच्छ बतलाया है, नलविलास के छठे श्रप्रक में उन्होंने फिर इस स्वतंञ्रच्य की चर्चा की है—

मनुबर्ते न यदृच्छया कुरूं नादेयति तस्मै सः ।

न स्वतंत्रो व्यथां वेत्ति परतंत्रस्य देहिन:॥

[नलविलास ६-७]

‘जिनस्तोत्र’ के ग्रन्थ में उन्होंने स्वतंञ्रय-महिमा का बड़ा सुन्दर वर्णनन किया है—

‘स्वतंत्रो देव ! श्रूयासं सारमेयोडपि वर्मनि ।

मा स्म भुवं परायत्तस्त्रिलोकस्यापि नायक: ॥

हे देव ! मैं चाहता हूं कि मैं स्वतंत्र रहूं । भले ही गली का कुत्ता बन कर रहूं । पराधीन हो कर मैं तीनों लोकों का राजा भी बनना नहीं चाहता हूं ।

यह स्वतंञ्रय-प्रियता का चरम रूप है । सत्यहरिश्चन्द्र की प्रस्तावना में भी उन्होंने लिखा है—

सूक्तयो रामचन्द्रस्य, वसन्त:, कलगतय: ।

स्वातंञ्र्यं, इष्टयोगशच पंचतै हर्षसूचकतय: ॥

१ रामचन्द्र की सूक्तियां, २ वसन्त, ३ सुन्दर गान, ४ स्वतंञ्रता श्रोइ ५ इष्ट का योग

ये पांचों वस्तुएं श्रानन्द एवं सुख की सृष्टि करने वालो हैं ।

"प्राप्य स्वतंञ्र्यलक्ष्मीं मुदमथ बहुतां शाश्वतीं यादवेंद्र:"

[यादवाभ्युदय]

"प्राप्य स्वतंञ्र्यलक्ष्मीं मनुबवतु मुदं शाश्वतीं भीमसेन: ।"

[निभंय भीमयोग]

"ब्रजातगरुणा: समा: परमतां स्वतंत्रो भव ।"

[नलविलास, तथा सत्यहरिश्चन्द्र]

"श्रासाद्य यशोलक्ष्मीं परां स्वतंञ्रचरं भूया:"

[कौमुदी मित्रारानन्द]

"स्वातंञ्यप्रसवां यदीच्छसि चिरं सर्वार्थसिद्धिं हृदि"

[द्रव्यालङ्कारान्ते]

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कवि रामचन्द्र के ग्रन्थ—

प्रस्तुत नाटचदर्पण ग्रन्थ के लेखक रामचन्द्र की ‘प्रबन्धशतकर्ता’ के रूप में विशेष रूप से प्रसिद्धि है। उन्होंने स्वयं ग्रनेक ग्रन्थों में अपने को सौ ग्रन्थों का निर्माता ‘प्रबन्धशतकर्ता’ बतलाया है। ‘कोमुदीमित्रानन्द’ की प्रस्तावना में ‘प्रबन्धशतविधाननिप्प्यापतिबुद्धिना’ इत्यादि द्वारा स्पष्ट रूप से अपने को १०० ग्रन्थों का निर्माता बतलाया है। इसी प्रकार ‘निर्भयंभीमव्यायोग’ की प्रस्तावना में ‘प्रबन्धशतकर्तृं महाकवे रामचन्द्रस्य’ इन शब्दों में अपने को प्रबन्धशतकर्ता घोषित किया है। किन्तु दुर्भाग्य से उनके सब ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। छोटे-बड़े ‘स्तव’ ग्रादि तक को मिलाकर इस समय तक उनकी केवल ३९ कृतियां उपलब्ध हुई हैं। उनमें से हमारे ज्ञान में केवल छः ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं, जिनके नाम निम्न प्रकार है—

१. नाटचदर्पण [बड़ोदा से प्रकाशित]

२. नलविलास नाटक [बड़ोदा से प्रकाशित]

३. कोमुदीमित्रानन्द [ग्रानन्द सभा भावानगर से प्रकाशित]

४. निर्भयंभीमव्यायोग [यशो जैन ग्रन्थमाला से प्रकाशित]

५. सत्यभामाहृदयचन्द्रनाटक [निरणय सागर बम्बई से प्रकाशित]

६. कुमारविहारशतक [मा० ग्रा० सभा से प्रकाशित]

हमारे ज्ञान में इन छः प्रकाशित ग्रन्थों के प्रतिरिक्त रामचन्द्र के नाम से निम्न सात अप्रकाशित ग्रन्थ और मिलते हैं जिनका उल्लेख नाटचदर्पण में पाया जाता है—

७. मल्लिकामकरन्दप्रकरणम् [ना० द० में उद्धृत]

८. यादवाभ्युदयं नाटकम् [ना० द० में उद्धृत]

९. रघुविलास-नाटकम् [ना० द० में उद्धृत]

१०. राघवाभ्युदय-नाटकम् [ना० द० में उद्धृत]

११. रोहिणीमृगाङ्क-प्रकरणम् [ना० द० में उद्धृत]

१२. वनमालानाटिका [ना० द० में उद्धृत]

१३. सुधालकश: [ना० द० में उद्धृत]

१४. द्वयाश्रयकाव्य [रघुविलास प्रस्तावना में उद्धृत]

१५. यदुविलास [रघुविलास प्रस्तावना में उद्धृत]

इनके अतिरिक्त कवि रामचन्द्र के निम्न ग्रन्थ और उपलब्ध होते हैं। वे सब छोटे-छोटे स्तव रूप हैं—

१६. युगादिदेवद्वात्रिशिका

१७. व्यक्तिरेकद्वात्रिशिका

१८. प्रसादद्वात्रिशिका

१९. श्रादिदेवस्तव:

२०. मुनिसुव्रतदेवस्तव:

२१. नेमिस्तव:

२२. जिनस्तोत्राष्टक

२३. हैमवृद्बुद्दवृत्तिन्यास:

२४-३६ तक सोलह साधारण जिन स्तव

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ग्रन्थता का ग्राभिशाप —

रामचन्द्र के जीवन का ग्रन्थिम भाग दु:खमय ही रहा। इसका कारण उनका ग्रन्थ हो जाना था। 'प्रभावक-चरित' के अनुसार तो 'प्रभावक-चरित' के राजा जयरसिंह सिद्धराज के समय में ही उनकी दाहिनी ग्रांख नष्ट हो गई थी। इस बात का वर्णन प्रभावक-चरित में निम्न प्रकार किया गया है—

"उपाध्यायश्रिततस्यास्य महापीडापुर:सरम् । व्यनशाद् दक्षिरां चक्षु: कर्मप्रामाण्यमालोच्य ते शीतिसूत्रचेतस: । स्थितास्तत्र चतुर्मासीनमासीनास्तपसि स्थिरे ॥"

अर्थात् कभी चतुर्मास के व्रवसर पर कवि रामचन्द्र की ग्रांख दुखने ग्राई श्रोर प्रत्यन्त पीड़ा देने के बाद उनकी दाहिनी ग्रांख जाती रही। रामचन्द्र ने उसे ग्रपने कर्मों का दोष कह कर सन्तोष किया। श्रोर पूर्ववत् तपोज्नुष्ठान करते हुए चातुर्मास्य को वहीं पूर्ण किया। ऐसा प्रतीत होता है कि यह घटना उनके मुख्य १५-१६ ग्रन्थों के रचना-काल के बाद हुई है। श्रोर उसने उनकी कार्य-पद्धति एवं प्रवृत्ति को ही बदल दिया है। इस दुर्घटना के बाद वे ग्रन्य ग्रन्थों को छोड़ कर केवल स्तवों की रचना में लग गए। हमारे इस ग्रनुमान का कारण यह है कि उनके स्तवों में अनेक जगह दृष्टि-दान की प्रार्थना पाई जाती है। 'नित्यस्तव' के ग्रन्थ में उन्होंने लिखा है—

नेमे ! निवेधि निशितासिलताभिराम ! चन्द्रावदातमहर्सं मयि देव ! हष्टिम् । सद्यस्तमांसि विततान्यपि यान्तु नाश- मुज्जूमभतां सपदि शाश्वतिक: प्रकाश: ॥

इसमें स्पष्टत: दृष्टिदान की प्रार्थना की गई है। 'घोड़े श्रोर घोड़ीशिका' के ग्रन्थ में भी कुछ इसी प्रकार की प्रार्थना निम्न श्लोक में की गई है।

स्वामिन् तम:फलकलकपतरोटतराम ! चन्द्रावदात चरिताश्चितविश्वचक्र ! शक्रस्तुतां त्रिसरसीरहृ ! दु:स्थसार्थ, देव ! प्रसाद करुणां गुरु देहि दृष्टिम् ॥

ऊपर हमने 'प्रभावक चरित' के जो श्लोक उद्धृत किए थे वच्यपि 'व्यनशाद् दक्षिरां चक्षु:' केवल दक्शिरा चक्षु के नाश की बात कही गई थी किन्तु वस्तुत: उनकी एक ही चक्षु नष्ट हुई थी ग्रपितु वे दोनों नेत्रों से विहीन ग्रन्थे हो गए थे। इसीलिए इन सब श्लोकों में उन्होंने दृष्टिदान की प्रार्थना की है। 'व्यतिरेकदर्शत्रिशिका' के ग्रन्थ में तो उन्होंने ग्रपने 'विधिनतान्ध्य' अर्थात् दैवात् प्राप्त हुई ग्रन्थता का उल्लेख किया है। श्रोर इसके साथ ही 'गलत्नुता' ग्रर्थात् वार्धक्य का भी संकेत करते हुए लिखा है—

जगति पूर्वविघ्नविनियोगर्ज विधिनतान्ध्य-गलन्तुतार्डविकम् । सकलमेव बिलुम्पति य: क्षरात् प्रभिनव: शिवसुष्टिकर: सताम् ॥

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इदर्थंकारमकारसंयुतं विश्र्वस्य पार्श्वं जिनं तं स्तोत्रुस्तुतिज्ञगद्विलक्षणगुणप्राग्राभिरामाकृतिम् । यः कश्चिद् विकचीवसूवृतमे भाग्यातिरेकस्ततः तल्लोकस्थितिरिकृतिमुक्तितिमपेप्रेमप्रमोदोत्सवः ॥

इन दोनों श्लोकों में से प्रथम श्लोक में ग्रन्थकार ने पार्श्वदेव की स्तुति की है और उनके मनुष्यह से ‘विधिनतनुः’ और ‘गलतनुः’ के नाश की ग्राशा प्रकट की है। दूसरे श्लोक में भी उन्हीं पार्श्वनाथ की स्तुति करते हुए इसप्रकार अपने ‘भाग्यातिरेक’ के ‘विकचीभवन’ की चर्चा की है। यों भ्रष्टता जीवन का प्रभिशाप है। किन्तु उसमें बाह्य वृत्तियों का निरोध होकर मनुष्य की वृत्तियां स्वयं भ्रष्टमुखी बन जाती है और उसके भीतर भगवान् के प्रति प्रेम का उदय हो जाता है यह श्रच्छी बात है। इस दूसरे श्लोक में रामचन्द्र ने अपने उसी ‘भाग्यातिरेक’ के ‘विकचीभवन’ को ‘प्रमोदोत्सव’ कह कर ग्रपना सन्तोष व्यक्त किया है।

ग्रन्थकार के जीवन की प्रान्तिम झांकी—

ग्राचार्य हेमचन्द्र के जीवन की ग्रान्तिम झांकी हम देख चुके हैं। जिस समय ‘ग्रनाहिलपट्टन’ के राजा कुमारपाल ग्रपने उत्तराधिकारी के नियुन्यां के सम्बन्ध में परामर्शां करने के लिए ग्राचार्य हेमचन्द्र के ग्रावास-स्थान पर परामर्शां कर रहे थे, उस समय ग्राचार्यं के ग्रन्यान्य शिष्यों के साथ रामचन्द्र भी उपस्थित थे। उस समय ब्रजयपाल को राज्य का उत्तराधिकारी बनाने का परामर्श प्राचार्य हेमचन्द्र की ग्रोर से दिया गया था उसमें रामचन्द्र का विशेष हाथ था। ग्राचार्य हेमचन्द्र के शिष्यों में रामचन्द्र का प्रतिद्वन्द्वी ग्रौर मन ही मन उनसे द्वेष रखने वाला उसका सहपाठी बालचन्द्र भी था। उसने ही ब्रजयपाल के पास जाकर रामचन्द्र की चुगली करके ब्रजयपाल को रामचन्द्र का शत्रु बना दिया था। इसलिए जैसा कि हम पहिले पढ़ चुके हैं जब ब्रजयपाल राजा बना तो उसने रामचन्द्र को बुला कर गर्म लोहे की चादर के ऊपर बिठा कर उनको मरवा डाला। रामचन्द्र की इस नृशंस हत्या के पूर्व ब्रजयपाल ने कहा था कि—

महावीढं सचराचरं येन शिरसि धत्ता: पादा: । तस्यास्तमनं दिनेशवरस्य भवति चिराय चिराय ॥ [महापीठस्थ्य सचराचरस्य येन शिरसि धृत्ता: पादा: । तस्यास्तमनं दिनेशवरस्य भवति चिराय चिराय ॥]

प्रर्थात् जो सारे चराचर जगतू के सिर पर पैर रखकर चलता है उस दिनेशवर सूर्य का ग्रस्त में चिरकाल के लिए भ्रस्त हो जाता है। इसी प्रकार ब्राज हमारे सिर पर पैर रखने का यत्न करने वाले इस रामचन्द्र का ग्रन्थ हो रहा है।

रामचन्द्र के सहकारी गुरचन्द्र—

प्रस्तुत ‘नाट्यदर्पण’ ग्रन्थ की रचना में रामचन्द्र के साथ गुरचन्द्र का भी नाम ग्राता है। ग्रर्थात् इस ग्रन्थ की रचना रामचन्द्र गुरचन्द्र दोनों ने मिल कर की है। इनमें से रामचन्द्र के जीवन का वृत्तान्त ऊपर दिया गया है। किन्तु गुरचन्द्र के विषय में कुछ ग्रधिक परिचय नहीं मिलता है। केवल इतना विदित होता है कि ये रामचन्द्र के सहपाठी घनिष्ट मित्र ग्रोर ग्राचार्य हेमचन्द्र के शिष्य थे। इन्होंने ग्रपने तीसरे साथी वर्धमानगरि के साथ सोमप्रभाचार्य रचित ‘कुमारपाल प्रतिबोध’ का श्रवण किया था। इस बात का उल्लेख करने वाले दो श्लोक हम पृष्ठ

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पर उद्धृत कर चुके हैं । उनमें 'वर्धमान-गुणाचन्द्रगिरिभ्यां' पद में गुणाचन्द्रगिरिभ पद से इन्हीं नाट्यदर्पण विवृतिकार गुणाचन्द्र का ही संकेत किया गया है । इन गुणाचन्द्र ने रामचन्द्र के साथ मिलकर दो ग्रन्थों की रचना की है । एक तो यही प्रस्तुत 'नाट्यदर्पण' ग्रन्थ और दूसरा इसी प्रकार का 'द्रव्यालङ्कारवृत्ति' ग्रन्थ है । ये दोनों ग्रन्थ रामचन्द्र तथा गुणाचन्द्र की सम्मिलित कृतियाँ हैं । इन सम्मिलित दो कृतियों के अतिरिक्त रामचन्द्र की तो ३७ स्वतन्त्र कृतियाँ और पाई जाती हैं किन्तु गुणाचन्द्र की और कोई कृति नहीं पाई जाती है । गुणाचन्द्र के विषय में इतना ही वरर्णन उपलब्ध होता है ।

वो नाटचदर्पण—

प्रस्तुत नाट्यदर्पण ग्रन्थ रामचन्द्र-गुणाचन्द्र का बनाया हुआ है । यह चार 'विवेकों' में विभक्त है । मूल ग्रन्थ कारिका रूप में लिखा गया है । उसके ऊपर ग्रन्थकारों ने स्वयं ही विवृत्ति लिखी है । ग्रन्थ में कुल २०७ कारिकाएँ हैं । 'रघुनाथ' ने 'विक्रमोर्वशीय' की टीकायें और 'भट्टु-मलिक' ने 'भट्टिकाव्य' की टीका में 'नाट्यदर्पण' का उल्लेख किया है । किन्तु वह नाट्यदर्पण प्रकृत ग्रन्थ से बिल्कुल भिन्न ग्रन्थ प्रतीत होता है । इस अनुमान का कारण यह है कि भट्ट मलिक ने 'भट्टिकाव्य' [१४-२] की टीका में नाटचदर्पण से 'शुद्धताश्रयी मध्यपुषिरा काहला मतेऽति नाट्यदर्पणे' लिखकर नाटचदर्पण का इलोक उद्धृत किया है किन्तु यह इलोक प्रस्तुत नाटचदर्पण में नहीं पाया जाता । यही नहीं ग्रन्थितु प्रस्तुत नाट्यदर्पण में ऐसा कोई प्रकरण नहीं है जिसमें इस इलोक की खपत हो सकती हो । इस इलोक में 'काहुला' नामक वाद्य का लक्षण किया गया है किन्तु प्रस्तुत नाटचदर्पण में वाद्य की चर्चा करने वाला कोई भी प्रकरण नहीं ग्राया है । तब यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि भट्टिकाव्य [सर्ग १४-२] में उद्धृत इलोक रामचन्द्र-गुणाचन्द्र कृत नाटचदर्पण से भिन्न किसी ग्रन्थ ही नाटचदर्पण से उद्धृत किया गया है ।

इसी प्रकार रघुनाथ ने विक्रमोर्वशीय टीका में नाटचदर्पण का एक उद्धरण निम्न प्रकार दिया है—

प्रज्ञ च समासोक्त्या पूर्वोक्तप्रकारेण कार्यार्थप्रकाशनात् । पत्नावली समास्येयं नान्दी । तथाचोक्तं नाट्यदर्पणकृता—

तस्यां बीजस्य विन्यासो ह्यभिनेयस्य वस्तुनः । इलोकेऽपि वा समासोक्त्या नाम्ना पत्नावली तु सा ॥ [विक्रमोर्वशीय पृ० ७ नि० सागर]

इस इलोक में नान्दी के 'पत्रावली' नामक विशेष भेद का लक्षण दिया गया है किन्तु प्रस्तुत नाटचदर्पण में यह नहीं पाया जाता । इससे यह प्रतीत होता है कि रामचन्द्र गुणाचन्द्र कृत प्रस्तुत नाट्य दर्पण के अतिरिक्त कोई और भी नाट्य दर्पण रहा होगा जिससे कि उक्त इलोक उद्धृत किए गए होंगे ।

नाट्यशास्त्र और नाटय दर्पण—

प्रस्तुत नाट्य दर्पण ग्रन्थ का मूल ग्राह्यार भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र है । पर नाट्य-शास्त्र एक बड़ा विस्तीर्ण ग्रन्थ है । उसे समस्त ललित कलाओं का विश्वकोश कहा जा सकता है । नाटच दर्पण का क्षेत्र उसकी ग्रपेक्षा बहुत छोटा है । नाट्यशास्त्र के १९वें ग्रध्याय में दशरूपकों का वर्णन किया गया है । मुख्यतः उसी के ग्राधार पर रामचन्द्र-गुणाचन्द्र ने अपने इस ग्रन्थ की

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रचना की है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र के पहिले इसी प्रकार के 'दशरूपक' नामक एक ग्रन्थ की रचना 'धनञ्जय' कर चुके थे। प्रस्तुत ग्रन्थ उसी की प्रतिद्वन्द्विता में लिखा गया प्रतीत होता है। इसकी पृष्ठभूमि में राजनीति की प्रतिस्पर्धा की प्रेरणा रही हो तो भी कुछ आश्चर्य नहीं है। दशरूपककार धनञ्जय मालव नरेश मुज की सभा पण्डित थे। रामचन्द्र-गुणचन्द्र गुर्जरेश्वर के पण्डित थे। गुजरात और मालवा राज्यों का सदा संघर्ष रहता था। उनमें दीर्घकाल तक युद्ध भी चलते रहे थे। इसलिए गौरव-प्राप्ति के हर क्षेत्र में दोनों राज्यों की प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। इसी प्रतिस्पर्धा के कारण मालवाधीश के श्राश्रय में निमित 'दशरूपक' की प्रतिस्पर्धा में इस नाट्यदर्पण की रचना हुई है, यह सर्वथा सम्भावित है। हम ग्रन्थे यह देखेंगे कि नाट्यदर्पणकार ने प्रायः १३ स्थलों पर दशरूपककार के मत का उल्लेख किया है। किन्तु एक भी स्थान पर उनका नामतः निर्देश नहीं किया है। 'अन्ये', 'केचित्' श्रादि सर्वनाम-शब्दों से पूर्वपक्ष प्रस्तुत कर उसका खण्डन किया है। पर उस दशरूपक वाले प्रकरण को प्रारम्भ करने के पहिले हम भरत के नाट्यशास्त्र और नाट्यदर्पण के विषय में कुछ विचार कर लेना चाहते हैं। नाट्यदर्पण की रचना यद्यपि भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के श्राधार पर की गई है किन्तु रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने अपने स्थलों पर भरतमुनि से अपना मत भेद प्रकट किया है। इस प्रकार के दो उदाहरणा हम नीचे देते हैं—

१. तृतीय विवेक में 'प्ररोचना' का वर्णन करते हुए नाट्यदर्पणकार ने लिखा है कि—

प्रास्य च पूर्वरङ्गस्य प्रयाहारादीन्यासारितान्तानि नवान्तर्जवनिकं, गीतकादीनि प्ररोचनान्तानि च दश बहिर्जवनिकान्तानि प्रयोज्यानि 'पूर्वरङ्ग:' लक्ष्यतां । ग्रामाभिमुख स्वतोलोकप्रसिद्धत्वात्, तन्न्यासक्रमस्य निष्फलत्वात्, विविधदेवतापरितोषरूपस्य तत्फलस्य च श्रद्धालुप्रतारसमाप्त्यादुपक्षितानि । प्ररोचना तु पूर्वरङ्गोक्तदपि नाट्ये प्रवृत्ती प्रधानमुख्यमिति लक्ष्यते।

इसमें 'पूर्वरङ्ग:' पद से भरत मुनि का संकेत किया गया है। भरत मुनि ने पूर्वरङ्ग के १६ अङ्गों का विधान किया है। जिनमें से ७ जवनिका के भीतर और दश जवनिका के बाहर किए जाते हैं। नाट्यदर्पणकार ने इनमें से केवल एक अङ्ग 'प्ररोचना' को लिया है, शेष १५ अङ्गों को छोड़ दिया है। उनके छोड़ देने के तीन कारण यहां दिखलाए हैं :

१. स्वतो लोकप्रसिद्धत्वात्, २. तन्न्यासक्रमस्य निष्फलत्वात् और ३. विविधदेवतापरितोषरूपस्य तत्फलस्य च श्रद्धालुप्रतारसमाप्त्यादुपक्षितानि ।

२. इस स्थल पर नाट्यदर्पणकार ने भरत मुनि से अपना मतभेद प्रकट किया है। इसी प्रकार का एक और स्थल भारती वृत्ति के विवेचन में ग्राया है। वृत्तियों के निरूपण के प्रसङ्ग में नाट्यशास्त्र के २०वें अध्याय में निम्न श्लोक ग्राया है—

रोद्रे भयानके चैव वीभत्सयेऽथवा बुधः । बीभत्से करुणे चैव भारती समपृक्रीर्तिता ॥ [नाट्यशास्त्र २०-६४]

इसके अनुसार केवल बीभत्स तथा करुणा रसों में 'भारती वृत्ति' का प्रयोग भरतमुनि को अभिप्रेत प्रतीत होता है। किन्तु उसी २०वें अध्याय में इसके पूर्व ४७वां श्लोक निम्न प्रकार ग्राया है—

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श्रेयोऽस्त्वस्मभ्यं विज्ञेयाश्चत्वारोडङ्गास्समाम्न्रातः । प्ररोचनामुखं चैव वृत्ती प्रहसनं तथैव ॥ [नाट्यशास्त्र ४-४७ ]

इस श्लोक में प्ररोचना, प्रामुख ग्रादि को उस भारती वृत्ति का भेद बतलाया गया है । प्ररोचना, ग्रामुख ग्रादि का तो बीभत्स तथा करुण के अतिरिक्त ग्रन्य रसों से भी सम्बन्ध है । इसलिए भरतमुनि ने इन वृत्तियों में विरोध प्रतीय होता है । इसकी समीक्षा करते हुए नाट्य- दर्पणकार ने लिखा है कि—

‘ये तु भारत्या बीभत्स-कथनेऽपि प्रपञ्च्रः; तैः सवँरसवोथी-प्रधानश्रृङ्गारवीररमाथ- प्रधानहास्यप्रहसनानि स्वयमेव भारत्यामेव वृत्तौ नियंत्रितानी नावेक्षितानि ।’

'ये तु' से यहां भरतमुनि का ग्रहण है । जिन भरतमुनि ने भारती वृत्ति में बीभत्स तथा करुण रस का समावेश माना है, उन्होंने स्वयं ही सर्वरससावीथी, श्रृङ्गार श्रृङ्गार या वीर रस जिसमें मुख्य है इस प्रकार के भाष्य तथा हास्यरस जिसमें प्रधान रहता है उन प्रहसनों की भारती वृत्ति में रचना का जो निश्चय पहिले किया है, उसकी उपेक्षा कर दी है । वस्तुतः उनके इस कथन में 'वदतो- व्याघात' दोष ग्राता है । इस प्रकार हम देखते हैं कि जहां श्रावश्यकता पड़ी है वहां नाट्यदर्पण- कार ने भरतमुनि की ग्रालोचना भी की है ।

नाट्यदर्पण ग्रौर दशरूपक—

नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने ग्रपने इस ग्रन्थ में प्रायः १३ बार 'अन्ये' 'केचित्' ग्रादि शब्दों से ग्रपने पूर्ववर्ती नाट्यशास्त्रकार धनञ्जय के दशरूपक का उल्लेख किया है । इनमें से दो स्थानों पर तो उनके मत की ग्रालोचना करते हुए उन्हें 'न मुनिसमयाऽध्यवसायिनः' ग्रौर 'वृद्धसम्प्रदायवह्यः' श्रर्थात् भरत मुनि के ग्रभिप्राय को न समझने वाला कहा है । वस्तुतः ११ स्थलों पर मुखसन्धि ग्रादि के श्रङ्गों के विविध लक्षणों में ग्रपने लक्षणों से दशरूपक में दिखाए गए लक्षणों में जो भेद पाया जाता है उसका प्रदर्शन कराया है । जिन दो स्थलों पर रामचन्द्र- गुणचन्द्र ने धनञ्जय को 'न मुनिसमयाऽध्यवसायिनः' भरत मुनि के मत को न समझने वाला बतलाया है उनमें से एक स्थल नाटक-लक्षणों के ग्रवसर पर ग्रौर दूसरा प्रकारण-लक्षणों के ग्रवसर पर ग्राया है ।

१. नाटक के लक्षणों में नाट्यदर्पणकार ने 'व्यात्ताऽऽयराजचरितं' [कारिका ४] यह एक विशेषण दिया है । इसके श्रनुसार किसी इतिहास-प्रसिद्ध पूर्ववर्ती राजा के चरित का श्रवलम्बन करके ही नाटक की रचना करनी चाहिए । श्रर्थात् इतिहास-प्रसिद्ध पूर्वकालीन राजा ही नाटक का नायक हो सकता है । इसके बाद ग्रगली छठी कारिका में धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित तथा वीरप्रशान्त ये चार प्रकार के नायक-स्वभाव बतला कर प्रत्येक के उत्तम, मध्यम दो भेद किए हैं । इस प्रकार स्वभावभेद के ग्राधार पर नायक के ६ भेद हो जाते हैं । इससे ग्रगली सातवीं कारिका में यह दिखलाया है कि 'धीरोदात्ता देवाः' देवता लोग धीरोदत्त स्वभाव के होते हैं । 'धीरोदात्ता: सैन्येशमन्त्रिणः' सेनापति तथा मन्त्री धीरोदत्त स्वभाव के होते हैं । 'धीरोद्धता वीराङ्कवीरा:' वीराङ्क तथा वीर धीरोद्धत स्वभाव के होते हैं । ग्रौर 'ग्रन्तं मे 'राजानस्तु चतुर्विधाः' राजा चारों प्रकार के स्वभाव वाले होते हैं, यह कहा है । इसके श्रनुसार नाटक का नायक चारों प्रकार के स्वभाव वाला हो सकता है ।

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दशारूपकार ने जो नाटक का लक्षण किया है उसमें 'धीररोदात्तः प्रतापवान्' [३-२२] नायक का धीरोदात्त होना श्रावश्यक बतलाया है । श्रथंति दशारूपकार के श्रनुसार नाटक का नायक केवल धीरोदात्त ही हो सकता है अन्य नहीं । इस विषय पर नाट्यदर्पणकार का दशरुपकार से मत भेद है। नाट्यदर्पणकार धीरललित श्रादि को भी नाटक का नायक मानते हैं । दशारूपकार केवल धीरोदात्त को ही मानते हैं । धीरललित श्रादि को नहीं मानते । इसी कारण रामचन्द्र-गुणाचन्द्र ने दशारूपक का खण्डन करते हुए लिखा है—

'[राजानं इति] बहुवचनत्वाद् व्यक्तिभेदेन चतुःस्वभावो नाटकस्य नेता । न पुनरेकस्य व्यक्तौ, एकत्र प्राधान्येन स्वभावचतुष्टयस्य वर्णंपितुमशक्यत्वादिति । प्रधाननायकस्य चायं नियमः । गौणनेतॄणां तु स्वभावान्तरमपि पूर्वस्वभावस्यैवगेन निबध्यते । ये तु नाटकस्य नेतारं धीरोदात्तमेव प्रतिजानते, न ते मुनिसमयाद्‌व्यवगाहिनः । नाटकेsपु धीरललितादीनामपि नायकानां दर्शनेनात्, कविसमयबाह्याश्च ।'

[नाट्यदर्पण १-७] इस उदाहरण में नाट्यदर्पणकार ने केवल धीरोदात्त को नाटक का नायक मानने से भरतमुनि के मत को न समभने वाला कहा है । भरत मुनि ने जो नाटक का लक्षण किया है वह निम्न प्रकार है—

प्रख्यातवस्तुविषयं प्रख्यातोदात्तनायकं चैव । राजवंशयचरितं तथैव दिव्याश्रयोपेतम् ॥ नानावृत्तिसमुत्थितसंरम्भविलासादिभिर्युतं चैव । श्रङ्गप्रवेशकाद्यं भरत हि तन्नाटकं नाम ॥

[नाट्यशास्त्र ग्रं० १९, १०-११] भरतमुनि के इस नाटक लक्षण में स्पष्ट रूप से 'प्रख्यातोदात्तनायकं' पद से नाटक में उदात्त नायक का प्रतिपादन किया है । इसी के श्राधार पर धनञ्जय ने 'दशारूपक' में 'धीररोदात्तः प्रतापवान्' श्रादि लिखा है । किन्तु रामचन्द्र उसे भरतमुनि के मत को न समभने वाली बात कहते हैं । यह बात कुछ श्रटपटी सी प्रतीत होती है । नाट्यशास्त्र के वर्तमान संस्करओं में उपलब्ध पाठ के श्रनुसार तो दशारूपक का मत भरत का श्रनुगामी ही है । विरोधी नहीं । सम्भव है रामचन्द्र-गुणाचन्द्र के पास नाट्यशास्त्र का जो संस्करण रहा हो उसमें कुछ श्रन्य प्रकार का पाठ पाया जाता हो । यदि उस पाठ को जिसक श्राधार पर वे दशारूपकार को भरतमुनि के मतको न समभने वाला कह रहे हैं, यहीं दे दिया होता तो बात श्रधिक स्पष्ट हो जाती, उसके बिना नाट्यदर्पणकार की बात स्पष्ट रह जाती है । परन्तु इस विषय में नाट्यदर्पणकार ने दूसरी बात यह भी लिखी है कि—'नाटकेsपु धीरललितादीनामपि नायकानां दर्शनेनात् कविसमयबाह्याश्च' ।

श्रथंति नाटकों में धीर ललित श्रादि नायक भी पाए जाते हैं, श्रतः दशारूपकार का मत कवि सम्प्रदाय के विपरीत भी है । यह बात कुछ श्रधिक स्पष्ट है ।

(२) नाट्यदर्पणकार द्वारा की गई दशारूपक की श्रालोचना का दूसरा प्रसङ्ग 'प्रकरण' के लक्षण में श्राया है । 'प्रकरण' का लक्षण 'दशारूपक' में निम्न प्रकार किया गया है— ग्रथ प्रकरणो वृत्तमुत्पन्नं लोकसंश्रयम् । ग्रामात्य-विप्र-वणिजामेकं कुयाद्च नायकम् ॥

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धीरप्रशान्तं सापायं धमंकामार्थं तत्परम् । शेषं नाटकवत्, सन्धि-प्रवेशकरसादिकम् ॥

[दशरूपक ३-३९, ४०]

इस लक्षण के अनुसरर 'प्रकररण' में धीरप्रशान्त स्वभाव वाले ब्रामात्य, विप्र या वाणिक में से किसी एक को नायक बनाना चाहिए यह ग्रंथ निकलता है । किन्तु नाट्यदर्पणाकार इस बात से सहमत नहीं हैं। उनके मत में ब्रामात्य के साथ धीरप्रशान्त विशेषरण संगत नहीं होता है । प्रथम विवेक की सातवीं कारिका में वे पहले ही लिख चुके हैं कि 'धीररोदात्त' सैन्येश-

मत्रितः:' सेनापति धीर श्रमात्य धीररोदात्त ही होते है । अर्थात् श्रमात्य सदा धोरोदात्त होना चाहिए । 'धीरशान्ता वणिकविप्र:' वणिक् श्रोor विप्र तो धीरशान्त होते हैं, किन्तु श्रमात्य धीरप्रशान्त नहीं धीररोदात्त होता है । इसलिए दशरूपककार ने जो श्रमात्य को 'प्रकररण' का नायक मान कर 'धीरशान्त' उसका विशेषरण दिया है वह उचित नहीं है । इसी बात को नाट्य-दर्पण कार ने निम्न प्रकार लिखा है—

"सचिवो राज्यचिन्तकः । श्रर्थं वणिग्-विप्रियोः सम्पात्यपि धीरोदात्त-धीरप्रशान्ती प्रकररणे नेतारौ मततः इति प्रतिपादनार्थं पुथगुरातः । यस्त्वमात्यं नेतारमस्मुपगम्य धीरप्रशान्त- नायकमिति प्रकररणं विशेषयति, स वृद्धसम्प्रदायवन्धः: ।"

[नाट्यदर्पण २-१]

सचिव श्रर्थात् श्रमात्य राज्य का चिन्तक श्रर्थात् प्रबन्ध करने वाला होता है । यद्यपि विप्र तथा वणिक् के भीतर ही इस श्रमात्य का भी श्रन्तर्भाव हो सकता है श्रर्थात् विप्र या वणिक् में से ही कोई श्रमात्य होता है । इसलिए यदि उसका श्रलग ग्रहण न किया जाता तो भी काम चल सकता था । फिर भी उसका श्रलग ग्रहण इसलिए किया गया है कि श्रमात्य धीरोदात्त होता है श्रोर वणिक् विप्र दोनों धीरप्रशान्त होते हैं । इसलिए श्रमात्य के पुथक् ग्रहण से यह प्रभिप्राय निकला कि प्रकररण में धीरोदात्त तथा धीरप्रशान्त दोनों प्रकार के नायक हो सकते हैं । इस दशा में दशरूपककार ने 'प्रकररण' में श्रमात्य को नायक मानते हुए भी जो 'धीरप्रशान्त' विशेषरण द्वारा 'प्रकररण' में 'धीरप्रशान्त' के ही नायक होने का प्रतिपादन किया है, वह उचित नहीं है ।

इन दो स्थलों पर तो नाट्यदर्पणाकार ने दशरूपककार के मत की श्रालोचना की है । किन्तु इनके श्रतिरिक्त प्रायः ११ स्थल ऐसे हैं जिनमें मुख सन्धि श्रादि के ग्रह्णों के लक्षणों में नाट्यदर्पण तथा दशरूपक में भेद पाया जाता है । नाट्यदर्पणाकार ने ऐसे स्थलों पर श्रपना लक्षण देने के बाद 'श्रनये' श्रादि पदों से दशरूपक के लक्षण भी दिखा दिए हैं । इन ११ स्थलों को हम नीचे दे रहे हैं ।

१. मुख सन्धि के पञ्चम ग्रह्ण 'उद्भेद' का लक्षण नाट्यदर्पण में 'स्वल्पप्ररोह- उद्भेद:' किया गया है [का० १-४३] । दशरूपक में उसके स्थान पर 'उद्भेदो गूढमेदनम्' [दश० १-२९] किया गया है । नाट्यदर्पण की विवृति में इसी का उल्लेख 'श्रनये तु गूढमेदन- महाशयमानत्ति' इस प्रकार किया गया है ।

२. नाट्यदर्पण में मुख सन्धि का ग्राठवां ग्रह्ण भेदन माना गया है । उसका लक्षण 'भेदनं पात्रनिगमः:' [का० १-४४] किया गया है । दशरूपक में उसका लक्षण 'भेदः प्रोत्साहन- मता' [का० १-२६] इस प्रकार किया गया है । नाट्यदर्पणकार ने 'श्रनये तु भेदं प्रोत्साहनमाहः:'

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लिख कर इसी भेद को दर्शाया है। इसी प्रसंग में नाट्यदर्पणकार ने 'ग्रन्थे तु संहतानां प्रतिपक्षार्यां वोजफलोंपत्तिनिरोधकानां विशेषलेख भेदष्पमुपायं भेदनं मन्यन्ते' इस रूप में भेद के तृतीय लक्षण का भी उल्लेख किया है।

मुख सन्धि के इन दो ग्रन्थों के लक्षणों के विषय में रामचन्द्र तथा धनञ्जय का मतभेद है। प्रागे 'प्रतिमुख सन्धि' के ग्रन्थों के विषय में दोनों का मतभेद दिखलाते हैं।

२. 'प्रतिमुख सन्धि' का पाँचवाँ ग्रन्थ 'विलाससन्धि' है। उसका लक्षण नाट्यदर्पण में 'वात्रीचो वर्यंसंहार:' [का० १४६] किया गया है। दशरूपक में उसके स्थान पर 'चारुवेर्ण्योपगमनं वर्यांसंहार इष्यते' [१-३५] यह लक्षण किया है। नाट्यदर्पणकार ने इसी भेद को 'ग्रन्थे तु वर्यांनां ग्राह्यणादीनां द्व्योस्त्रयाश्चतुर्यो वा एकत्र मीलनं वर्यांसंहारमाचक्षते' इस प्रकार दिखलाया है।

४. 'प्रतिमुख सन्धि' का सातवाँ ग्रन्थ 'नर्मघृति' है। इसका लक्षण नाट्यदर्पण में 'दोशावृती तु तदूभयुति:' [का० ४७] किया है। दशरूपक में उसके स्थान पर 'परिहासवचो नर्म, घृतिस्तज्जा युतिमन्तरा' [का० १-१३२] यह लक्षण किया गया है। नाट्यदर्पणकार ने 'ग्रन्थे तु नर्मज्ञा घृतिस्तु युतिमात्र:' इन शब्दों में इस भेद को दिखलाया है।

५. 'मुखं सन्धि' का तीसरा ग्रन्थ 'रूप' है। उसका लक्षण 'नाट्यदर्पणकार ने 'रूपं नानार्थसंश्रय:' किया है। दशरूपक में 'रूपं वितर्कवद् वाक्यम्' वाक्य में यह 'रूप' का लक्षण किया गया है। नाट्यदर्पणकार ने 'ग्रन्थे त्वधीयते रूपं वितर्कवद् वाक्यम् इति' [पृष्ट १४७] इस रूप में इस भेद को प्रदर्शित किया है। इसी प्रसंग में 'ग्रन्थे तु चित्रार्थ रूपकं वच:' [पृष्ट १४८] इन शब्दों में किसी तीसरे लक्षण का भी उल्लेख किया है।

६. 'मुखं सन्धि' का छठा ग्रन्थ 'क्रम' है। नाट्यदर्पण में उसका लक्षण 'क्रमो भावस्य निर्य:' [का० १-५४] किया गया है। दशरूपक में 'क्रम: संचिन्त्यममानाप्ति:' [१-३६] यह क्रम का लक्षण किया गया है। नाट्यदर्पणकार ने 'क्रम: संचिन्त्यममानाप्ति:' इत्यादि: लिखकर इस भेद को दिखलाया है। 'ग्रन्थे तु भविष्पदर्थतश्चोपलक्षित क्रमिमिच्छन्ति' इन शब्दों में 'क्रम' का तीसरा लक्षण भी नाट्यदर्पणकार ने दिखलाया है।

७. 'मुखं सन्धि' का पाँचवाँ ग्रन्थ 'छादन' है। नाट्यदर्पण में उसका लक्षण 'छादनं मन्तुमार्जनम्' [का० १-५२] किया गया है। दशरूपक में 'छादन' के स्थान 'छलनं' ग्रन्थ पाया गया है। नाट्यदर्पणकार ने इसका उल्लेख 'ग्रन्थे त्वस्य स्थाने छलनं द्वामाननरूपमाह:' इन शब्दों में किया है। इसके प्रतिरिक्त (१) 'ग्रन्थे तु कार्यमसहास्याप्यर्थस्य सहनं छादनमिच्छन्ति' (२) 'ग्रपरे तु छलनं सम्मोहनिमिच्छन्ति' इस रूप में छादन ग्रन्थ के विषय में दो मतों का उल्लेख [पृ० १६६] और किया है।

८. 'मुखं सन्धि' का छठा ग्रन्थ 'घृति' है। नाट्यदर्पण में उसका लक्षण 'तिरस्कारो धृति:' [का० ५९] किया गया है। दशरूपक में 'तर्जनोदेजने धृति:' [१-४६] इस प्रकार 'घृति' का लक्षण किया है। इस ग्रन्थर का उल्लेख करते हुए नाट्यदर्पण में लिखा है— 'तर्जनोदेजनं धृति: केचिदिच्छन्ति' इसके साथ ही 'ग्रपरे तु तर्जनार्थपरो धृति मन्यन्ते' इस रूप में 'घृति' के तीसरे लक्षण का भी उल्लेख नाट्यदर्पणकार ने किया है।

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९. 'प्रवमर्य सन्धि' का दसवाँ भेद 'शक्ति' है। उसका लक्षण नाट्य दर्पण में 'कृद्-प्रसादनं शक्ति:' [का० ६०] श्लोर दशरूपक में 'विरोधशमनं शक्ति:' [१-४६] किया गया है। नाट्यदर्पणकार ने 'एके तु विरोध शमनं शक्तिमिच्छन्ति' लिख कर इस भेद का उल्लेख किया है।

१०. प्रवमर्य सन्धि का १३वाँ भेद 'व्यवसाय' है। नाट्यदर्पण में उसका लक्षण 'व्यवसायोदध्यहेतुक:' [का० ६०] श्लोर दशरूपक में 'व्यवसाय: स्वबुद्धयुक्त:' [का० १-५७] किया है। नाट्यदर्पणकार ने 'श्रयते तु व्यवसाय: स्वबुद्धयुक्त:' इति पठन्ति' लिख कर इस भेद का प्रदर्शन किया है।

११. 'निर्वहण सन्धि' का पाँचवाँ भेद 'परिभाषण' है। नाट्यदर्पण में उसका लक्षण 'परिभाषास्वनिन्दनम' [का० १-६३] श्लोर दशरूपक में 'परिभाषा मिथोजल्प:' [१-५२] किया गया है। नाट्यदर्पणकार ने इस भेद को 'एके तु परिभाषा मिथोजल्प: इति पठन्ति' लिख कर इस भेद का उल्लेख किया है।

रामचन्द्र गुरूअचन्द्र —

रामचन्द्र-गुरूअचन्द्र के पूर्ववर्ती नाट्यलक्षणकारों में दशरूपककार धनञ्जय [संम ९७४-९९५] के बाद दूसरा नाम 'नाटकलक्षयारत्नकोष' के निर्माता 'सागरनन्दी' का आता है। ये दोनों सम्मट के उत्तरवर्ती ग्राचायँ हैं। सागरनन्दी ने धनञ्जय से लगभग १०० वर्ष बाद ग्रन्थ 'नाटकलक्षयारत्नकोष' नामक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना की। इनका असली नाम तो केवल 'सागर' था किन्तु नन्दवंश में उत्पन्न होने के कारण वे 'सागरनन्दी' नाम से ही प्रसिद्ध हैं। इनका 'नाटकलक्षयारत्नकोष' ग्रन्थ, जैसा कि उसके नाम से ही स्पष्ट है, नाट्यशास्त्र-विषयक ग्रन्थ है। रामचन्द्र-गुरूअचन्द्र को सम्भवतः इस ग्रन्थ का भी पूरा परिचय प्राप्त था। धनञ्जय के समान सागरनन्दी से भी रामचन्द्र-गुरूअचन्द्र का ग्रनेक स्थलों पर मत भेद पाया जाता है। नाट्यदर्पण में जिस प्रकार नाटक की पाँचों सन्धियों के विविध भेदों के लक्षण करते समय जहाँ कहीं दशरूपक के लक्षण से भेद ग्राया है वहाँ 'प्रायै:' ग्रादि शब्दों से दशरूपक के लक्षण को भी उदृत कर दिया है। इसी प्रकार १३वें रूपक भेद 'वीथी' के ग्रदों का विवेचन करते हुए जहाँ उनके लक्षण से भिन्न ग्रन्य लक्षण भी पाए जाते हैं, वहाँ 'अन्यै:' ग्रादि शब्दों में उन लक्षणों का उल्लेख कर दिया है। यह उल्लेख दशरूपक से सम्भद प्रतीत नहीं होता है। क्योंकि दशरूपक में 'वीथी' के भदों का विवेचन ही नहीं किया गया है। दशरूपककार ने तृतीय प्रकाश के ग्रन्थ में केवल ६५, ६७ दो कारिकाओं में 'वीथी' का लक्षण मात्र कर दिया है। उसके ग्रदों का विवेचन नहीं किया है। नाट्यदर्पणकार ने 'वीथी' के लक्षण के प्रतिरिक्त उसके १३ ग्रदों का उदाहरण सहित विस्तृत विवेचन किया है। ग्रन्थ में उसमें अपने से भिन्न ग्रन्य लक्षणों का भी उल्लेख किया है। ये लक्षण दशरूपक के नहीं है इसलिए ऐसा ग्रनुमान है कि सम्भवतः ये 'नाटकलक्षयारत्नकोष' से दिए गए हैं।

रामचन्द्र ग्रोर सम्मट् —

१. काव्यप्रकाशकार सम्मट रामचन्द्र-गुरूअचन्द्र के पूर्ववर्ती ग्राचायँ हैं। पर उन्होंने ने तो नाट्यलक्षणों समन्धी कोई ग्रन्थ लिखा है ग्रोर काव्यप्रकाश में ही नाटक-सम्बन्धी किसी विषय की विवेचना की है, इसलिए नाट्यदर्पण का सम्मट के साथ कोई विशेष सम्बन्ध प्रतीत नहीं होता है ! किन्तु रसदोषों का विवेचन दोनों ने किया है। इसलिए इस ग्रंश में दोनों का

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सम्बन्ध है। इस प्रसङ्ग में एक स्थल पर नाट्यदर्पणकार ने काव्यप्रकाशकार के मत का खण्डन किया है। 'रस-दोषों में श्रृङ्गार अर्थात् श्रृङ्गार रस का अधिक विस्तार करना दोष माना गया है। काव्यप्रकाश में इसे 'श्रृङ्गारस्यातिविस्तृति:' [सप्तम उल्लास सूत्र ४२, का० ६१ से] नाम से कहा गया है। नाट्यदर्पण में इसे 'श्रृङ्गारोक्तिः' [का० ३-२३] नाम से कहा गया है। काव्यप्रकाशकार ने 'श्रृङ्गारस्य प्रधानत्वं, ग्रति विस्तारेण वर्णनं यथा हयग्रीववधे हयग्रीवस्य' [पृ० ३६२ ज्ञानमण्डल संस्करण] लिख कर प्रतिनायक रूप हयग्रीव के प्रति विस्तृत वर्णन को इसके उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया है। किन्तु नाट्यदर्पणकार इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं। उन्होंने इसका खण्डन करते हुए इसे 'वृत्तदोष' ग्रर्थात् कथा-भाग का दोष मात्र कहा है, रसदोष नहीं। रस की दृष्टि से तो उनके मत में यह दोष न होकर गुण ही है। प्रतिपक्षी का ग्रत्यान्त उत्कर्ष दिखला कर नायक द्वारा उसका वध कराने में तो नायक का उत्कर्ष बढ़ता ही है, इसलिए उस दृष्टि से यह दोष नहीं ग्रभिनतु गुण ही है, यह नाट्यदर्पणकार का अभिमत है। ग्रपने इस मत का प्रतिपादन उन्होंने इस प्रकार किया है—

"केचिदत्र हयग्रीववधे हयग्रीववर्णनमुदाहरणन्ति। स पुनर्वं तदोषो वृत्तनायकस्याल्पवर्णनाद् । तत्र हि वीरो रसः, स विशेषतो वध्यस्य शौर्य-विभूतितथावस्थानां भूयस्त्व इति ।" [ना० द० ३-२३]

इसके स्थान पर उन्होंने कृत्यारावण का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखा है—

"श्रथार्ज्जुनम् ।" ग्रग्रतः श्रृङ्गाररसरपोषकतया ग्रतिविरुद्धस्योग्यं 'विस्तरेएवकृतवं दोषः । यथा कृत्यारावणस्ये जटायुब्ध-लक्ष्मणाक्षिर्मेद-सीताविपत्तिश्रवरस्योपेतु रामस्य मुहुर्मुहुः करुणाधिवयम् ।" [ना० द० ३-२३]

२. 'प्रतिकूल-विभावादिग्रहः' नाम का दूसरा रस-दोष है। काव्यप्रकाश में इसका उदाहरण निम्न प्रकार दिया गया है—

"प्रसादे वत्सस्य, प्रकटयमुदं, सत्यजित् रुषं प्रिये युष्मत्स्याज्जृम्भण्यजृम्भणीयमृतमिव तं सिञ्चतु वचः । निधानं सौख्यानां सखरमभिलाषं स्थापय पुरं न मुचे प्रत्येतुं प्रभवति गतः कालहरिणः ॥ [का० पृ० ३६०]

ग्रर्थात् इस श्लोक में शृङ्गार रस के प्रतिकूल शान्त रस का तथा उसके ग्रनियतव्यापकत्नमक निदर्शनरूप व्यभिचारिभाव का ग्रहण होने से यहां 'प्रतिकूलविमावादि परिग्रह रूप' रस दोष होता है। नाट्यदर्पणकारने इस उदाहरण को किसी प्रकार की ग्रालोचना न करते हुए भी इसका दूसरा उदाहरण निम्न प्रकार दिया है—

"त्यजत मानमलं बत विग्रहैः पुनरेत गमेत चतुरं वयः । परभृताभिरितीव निवेदिते, स्मरमते रमते स्म वधूजनः ॥ ग्रन्र ग्रशृङ्गारप्रतिकूलस्य शान्तस्य ग्रनियतता प्रकाशनरूपो विभावो निवद्धः ।" [ना० द० ३-२३]

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इन दोनों में केवल इलोक का ग्रान्तर है, भाव दोनों उदाहरणों का बिल्कुल एक ही है। इसके अतिरिक्त 'ग्रकाण्डे प्रथनं, ग्रकाण्डे श्रृङ्ग: दीप्तिः पुनःपुनः तथा ग्रािङ्गरोडनुसन्धानम्, इन चारों रस-दोषों के उदाहरण काव्यप्रकाश तथा, नाट्यदर्पणे में बिल्कुल एक ही दिए हैं।

३. रस-दोषों के निरूपण के प्रसङ्ग में काव्यप्रकाश में 'व्यभिचारि-रस-स्थायिभावानो शब्दवाच्यता' को सबसे पहला रस-दोष कहा गया है । अर्थात् मम्मट के ग्रनुसार व्यभिचारिभाव ग्रथवा रस ग्रथवा स्थायिभावों को ग्रपने वाचक शब्द द्वारा कथन नहीं करना चाहिए । उनका स्वशब्द से कथन करने पर रसाभिव्यक्ति का ग्रपकर्षक होने से दोषाधायक होता है। किन्तु नाट्यदर्पणकार इस बात से सहमत नहीं हैं। इसलिए इस विषय में मम्मट का खण्डन करते हुए उन्होंने लिखा है—

"केचितु व्यभिचारि-रस-स्थायिनां स्वशब्दवाच्यत्वं रसदोषमाहुः। तदयुक्तम्। व्यभिचार्यादीनां स्ववाचकपदप्रयोगेऽपि विभावपूष्ठे:—

दूरादुस्मुकमाते विवलितं सम्भाव्यविभ्रि स्फारितं, संक्षिप्यस्यतया च गृहीत्ववसने किञ्चाञ्चितत्फूलताम् । मानिन्याश्चर्यानिपातव्यतिकरे वाष्पाम्बुपूरैरेक्ष्यां, न्यक्कृत्यतमहो ! परिपुञ्चतरं जाताग्रिम प्रेयसि ॥

इसमें उत्सुक, विवलित श्रादि व्यभिचारिभावों का स्वशब्द से कथन होने पर भी रस की परिपुष्टि हो रही है, इस लिए विभावादि का स्वशब्द से ग्रहण दोष नहीं है। यह नाट्यदर्पणकार का श्रमिप्राय है।

४. इसी प्रकार 'कष्टकल्पनया व्यक्तिरनुभावविभावयोः' [का० प्र० कारिका ६०, पृ० ३४७] को दूसरा रसदोष माना गया है। पर नाट्यदर्पणकार का मत इस विषय में भी मम्मट से भिन्न है। ग्रपने मत को व्यक्त करते हुए उन्होंने लिखा है—

"एवमुबयेरस साधारण्यविभावपदानां कष्टेन नियतविभावाभिनयत्वादिगमोदपि सन्दिग्धत्वलक्ष्यो वाक्यदोष एव । यथा—

परिहरति मति रञ्जन लुनीते, सकलनितरां परिवर्तते च मयः ! इति वत विषमा दशा स्वदेहं, परिभवति प्रसमं किमत्र कुरुमं: ॥ ननु रतिपरिहारादीनां विभावानां कथनादावपि सम्भवात् शृङ्गारं प्रति भावत्व-सन्देह इति "

[ना० द० ३-२३ ]

इस प्रकार मम्मट ने काव्य प्रकाश में जिन ग्राठ प्रकार के रसदोषों का वर्णन किया था, नाट्यदर्पणकार ने उनमें से तीन का बिल्कुल खण्डन कर दिया, ग्रोर चार को ज्य्यों का रूप्यों ग्रहण कर लिया है, ग्रोर एक को उदाहरण में परिवर्तन करते हुए स्वीकार कर लिया है।

रामचन्द्र गौर प्रभिनवगुप्त—

नाट्यशास्त्र पर 'ग्रभिनवभारती' नामक विवृति के निर्माता ग्रभिनवगुप्त भी नाट्य-शास्त्रकार के परवर्ती श्राचार्य हैं। रस-निरूपण के प्रसङ्ग में नाट्यदर्पणकार ने उनके मत के ग्राधार पर ग्रपने मत की स्थापना की है। किन्तु उसमें भी उन्होंने ग्रभिनवगुप्त की ग्रपेक्षा कुछ नूतनता उत्पन्न कर दी है।

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उत्तरवर्ती सभी आचार्यों ने रस को प्रायः ब्रह्मानन्दसहोदर और परमानन्द-स्वरूप माना है। करुण, शृंगार, भयानक तथा बीभत्स जैसे रसों को भी सुखात्मक रस माना गया है। साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ ने सभी रसों की ऐकान्तिक सुखात्मकता का प्रतिपादन करते हुए लिखा है—

करुणादावपि रसे जायते यत् परं सुखम् । सचेतसामनुभवः प्रमाणां तत् केवलम् ॥

किन्तु तेषु यदा दुःखं न किञ्चिदपि स्यात् तद्नुमुखः । तथा रामायणादीनां प्रवृत्ता दुःखहेतुता ॥ [साहित्यदर्पण परि० ३, ४-५]

विश्वनाथ प्रादि के इस सुखात्मकतावाद के विपरीत अभिनवगुप्त ने प्रत्येक रस को सुखदुःखोभयात्मक रस माना है। अर्थात् उनके मत में प्रत्येक रस में सुख की प्रधानता होते हुए भी दुःख का स्पर्श रहता है। उन्होंने लिखा है—

इत्यनन्दरूपता सर्वरसानाम्। किन्तूपरज्झकविषयवशात् तेषामपि कटुकितारसस्पर्शोऽस्ति वीरस्येव । स हि कथितसहिष्णुत्वादिप्राप्तौ एव ॥ [हिन्दी अभिनवभारती पृ० ४७८]

इनमें भी शृंगार, हास्य, वीर तथा अद्भुत इन चार रसों में सुख की प्रधानता के साथ दुःख का अनुवेध रहता है। इसके विपरीत रौद्र, भयानक, करुण तथा बीभत्स इन चार रसों में दुःख की प्रधानता के साथ सुख का अनुवेध माना है। केवल शान्त रस को ही उन्होंने नितान्त सुख रूप माना है। अभिनवभारती के प्रथम अध्याय में इस विषय का विस्तारपूर्वक विवेचन करते हुए अभिनवगुप्त ने लिखा है—

"स च सुख-दुःखरूपेण विचित्रेऽपि समनुगतो न तु तदेकात्मा । तथाहि—रति-हास-उत्साह-विस्मयानां सुखस्वभावत्वम् । तत्र तु चिरकालव्यापिप्रबन्धानुसन्धानरूपपतितेन विषयेण मुख्य-प्राप्त्यतया तद्विषयांशावलम्बनेन ग्रहणायम्भवताद् दुःखानुवेधो रते:। हास्य सानुसन्धानस्य विष्टपत्स-हासत्कालिकोडलपदः खानुवेधः सुखानुगतः । उत्साहस्य तर्कालिक-दुःखायास-निमज्जनरूपानुप-सन्धानानुजृम्भणोपारूढरूढिरसङ्कालभासुखसमाचिकीर्षमाणः सुखरूपता । विस्मयस्य निरनुसन्धानतदितुल्यसुखरूपता ।

तत्र कोष-क्रोध-लोक-जुगुप्सादीनां दुःखस्वभावता । तत्र विरक्तालुब्धानुसन्धानप्राप्तौ विषयत्वा-रम्भान्तिकनाशाभावना तदाकाङ्क्षाप्राप्त्यतया सुखदुःखानुवेधवान् क्रोधः । निरनुसन्धानत्कालिकदुःख-प्राप्त्यतया तद्विषयांशोल्लेक्ष्यमात्रसद्भावनाशः प्राक्तन-सुखस्मरणानुविद्धः सर्वथैव दुःखरूपः शोकः । उत्पाद्यमानदुःखानुसन्धानजो वितविषयात् पलायनपरायणरूपा निषिद्धभावनकिसुखानुविद्धा जुगुप्सा । समस्यत्पदुःख-सहचय स्मरस्यप्राप्तितः सम्भाविततदुपमबहुलसुखमयो निर्वेदः । [हिन्दी अभिनवभारती पृ० २२१-२२४]

इन तीनों श्रृङ्गच्छेदों में अभिनवगुप्त ने शृङ्गार, हास्य, वीर तथा अद्भुत रसों में सुख की प्रधानता के साथ-साथ दुःखानुवेध को, तथा रौद्र, भयानक, करुण तथा बीभत्स रसों में दुःख की प्रधानता के साथ सुखानुवेध की चर्चा करते हुए अन्तमें निर्वेद को नितान्त सुखमय ठहराया है।

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रसों के विषय में नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र का मत पूर्वोक्त दोनों मतों से भिन्न प्रकार का है। उसे हम विमज्यवादी मत कह सकते हैं। विश्वनाथ श्रोदी ने सभी रसों को सुखात्मक रस माना है। प्रभिनवगुप्त ने सभी रसों को उभयात्मक रस माना है। किन्तु नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने न सभी रसों को सुखात्मक रस माना है, श्रोद्र न सभी रसों में सुख-दुःख दोनों का समावेश माना है। उन्होंने रसों को अलग-अलग दो भागों में विभक्त कर दिया है। जिनमें से शृङ्गार, हास्य, वीर, श्रद्भुत तथा शान्त इन पांच को सर्वथा सुखात्मक श्रोद्र करुणा, रौद्र, भयानक तथा वीभत्स इन चार को सर्वथा दुःखात्मक रस बताया। अपने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन नाट्यदर्पणे में उन्होंने निम्न प्रकार से किया है—

"तत्रेष्टिविभादिप्रथितरसस्स्वरूपसम्पत्त्या: शृङ्गारहास्यवीरश्रद्भुतशान्ता: परं सुखात्मान:। पुनर्निष्टविभावाद्युपनिषातमान: करुणारौद्रवीभत्सभयानका: चतवारो दुःखात्मान:।

यदि पुनः संवरसानां सुखात्मकत्वमुच्यते, तद्प्रतीतिबाधितम्। श्रास्तां नाम मुख्यविभावोपचितः, कार्याभिनयोद्बोनीत-विभावोपचितोऽपि भयानको वीभत्सः, कद्र्व्यो रौद्रो वा रसास्त्वनुभय्येया कामी क्लेशदायमुपनयति। न नाम सुखास्वाददुष्टोऽपि घटते॥ [नाट्यदर्पण ३-७]

३. इस उदाहरण में रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने स्पष्ट रूप से पांच रसों को सुखात्मक तथा चार रसों को दुःखात्मक कह कर रसों को दो भागों में विभक्त कर दिया है। मतः उनका मत विमज्यवादी मत कहा जा सकता है।

१. दूसरा प्रश्न जहाँ यह रामचन्द्र-गुणचन्द्र प्रभिनवगुप्त के साथ हैं, शान्तरस का प्रकार है।

शृङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानका:। वीभत्साद्भुतसंज्ञो चैतेष्षो नाट्ये रसाः स्मृताः॥ [नाट्यशास्त्र -१५]

इस भरतवचन के प्राधार पर अनेक विद्वानों नाटक में केवल श्राठ रसों की स्थिति मानते हैं। किन्तु प्रभिनवगुप्त श्रोदी ग्रनेक विद्वान् शान्तरस को भी नवम रस मानते हैं। उनके श्रनुसार इस भरत-वचन के उत्तरार्ध का पाठ 'वीभत्साद्भुतशान्ताश्च नव नाट्ये रसाः स्मृताः' इस प्रकार का है। प्रभिनवगुप्त के नाट्यशास्त्र ने छठे श्रध्याय पर 'श्रभिनवभारती' व्याख्या लिखते हुए उसके ग्रन्थ में बहुत विस्तार के साथ शान्तरस का विवेचन किया है। उनके पूर्व नाट्यशास्त्र के दूसरे व्याख्याता उद्भट ने भी शान्तरस को नाट्यरस माना है, श्रोद्र उक्त भरत वचन के पाठान्तर के श्रनुसार नवरसों का प्रतिपादन करते हुए लिखा है कि—

शृङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानका:। वीभत्साद्भुतशान्ताश्च नव नाट्ये रसाः स्मृताः॥ [उद्भट काव्यालं ४-५]

उद्भट ने भी शान्त रस को माना है। बल्कि उन्होंने एक प्रेयान् रस को श्रोद्र जोड़ कर रसों की संख्या दश कर दी है। उनका श्लोक निम्न प्रकार है—

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( ३० )

शृङ्गार-वीर-करुणादि-बीभत्स।भयानकाद्भुतसुता हास्यः । रोद्रः शान्तः प्रेयानिति मन्तव्याः रसाः सद्वे ॥

[स््र्ट काव्यालङ्कार १२-९]

प्राथ रसों को मान कर शान्तरस का खंडन करने वालों में दशरूपककार घनश्याम मोर उनके टीकाकार धनिक का नाम विशेष रूप से उल्लेख-योग्य है । घनश्याम ने लिखा है—

शाममपि केचिद्चित् प्राहुः पुष्टिंनितनेपु नेष्यते । निर्वेदादिरतस्तत्राप्यादस्थायी स्वदते कथम् । वैरस्यायंव तत्वोषस्तेनाष्टौ स्थायिनो मवाः ॥

[दशरूपक ४, ३५-३६]

इसकी व्याख्या करते हुए धनिक ने लिखा है—

"इह शान्तरसं प्रति वादिनामनेकरिषा विप्रतिपत्तयः । तस्याचार्यैर् विभावादिप्रतिपादनाल्लक्षणलाङ्कारकृतौ । अन्ये तु वस्तुतस्तस्यामावं वरन्त्यनन्ति । ग्रनादिकालप्रवाहात्परागधे पयोरुच्यते । मञ्जयत्वात् । अन्ये तु चोरबीभत्सादावन्तर्भावं वरन्त्यनन्ति । एवं बदन्तः शाममपि नेच्छन्ति । यथा तथा ब्रस्तु । सर्वथा नाटकादौ प्रभिनयात्मनि स्थायित्ववममाभिः शामस्य निविध्यते । तस्य समस्तव्यापारप्रविलयरूपस्य प्रभिनययोगात् ।

[दशरूपक ४, ३४-३६]

दशरूपककार के शान्तरस के विरोधी होने पर भी नाट्यशास्त्र के प्रमुख व्याख्याता उद्डट, भट्टनायक, अभिनवगुप्त ग्रादि ने शान्तरस की सत्ता स्वीकार की है और उसे नाट्यरस माना है इसलिए उसका निषेध करना उचित नहीं है । नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र भी इस विषय में अभिनवगुप्त के साथ है । रस के भेद करते हुए उन्होंने लिखा है—

शृङ्गार-हास्य-करुणादि, रौद्र-वीर-भयानकाः । बीभत्साद्भुत-त-शान्ताश्च, रसाः सन्ति नव स्मृताः ॥

[नाट्यदर्पण ३, ९]

(३) शान्तरस की सिथति के बाद तीसरा प्रश्न शान्तरस के स्थायिभाव का है । शान्तरस का स्थायिभाव क्या है ? इस विषय में अनेक मत पाए जाते हैं । मम्मट ने 'निर्वेद' को शान्तरस का स्थायिभाव बतलाते हुए 'निर्वेदस्थायिभावोऽस्ति शान्तोऽपि नवमो रसः ।' [काव्य प्र० सूत्र ४०, का० ३५] । भरतमुनि ने व्यभिचारिभावों की गणना कराते समय 'निर्वेद' को सबसे पहिला व्यभिचारी भाव गिनाया है । तब उसे शान्तरस का स्थायिभाव कैसे कहा जा सकता है ?

यह शंका हो सकती है इस बात को मन में रख कर काव्यप्रकाशकार मम्मट ने उसका समाधान करने का यत्न किया है । उनका कहना है कि 'निर्वेद' स्वरूपतः शमज्‍ल रूप है । उसको व्यभिचारिभावों की गणना में सबसे पहिले नहीं गिनना चाहिए था । किन्तु भरत मुनि ने उस ग्रमाज्‍लिक भावों की गणना में सबसे पहिले गिनना चाहिए था। किन्तु भरत मुनि ने उस ग्रमाज्‍लिक भावों की गणना में सबसे पहिले गिनना चाहिए था। किन्तु भरत मुनि ने उस श्रमा‍ज्जलिक

'निर्वेद' का जो सबसे पहिले ग्रहण किया है, वह इसलिए किया है कि 'निर्वेद' एक ऐसा भाव है जो व्यभिचारिभावों में परिगणित होने पर शान्तरस का स्थायिभाव है । उसकी स्थायिता की सूचना के लिए' ही भरत मुनि ने 'निर्वेद' का ग्रहण सबसे पहिले किया है । मम्मट ने ग्रपने इस प्रसप्राय को निम्न प्रकार से प्रकट किया—

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निर्वेदस्यामज्जलप्रायस्य प्रथममनुप्रादेयत्वेडपि उपादानं व्यभिचारित्वेडपि स्थायिता-डभिधानार्थम् ।

[काव्य प्रकाश ज्ञानमण्डल पृ० १३२५]

सज्जनतरत्नाकर में भी इसी युक्तिक्रम से निर्वेद को शान्त रस का स्थायिभाव सिद्ध करते हुए लिखा है—

रत्नेशु स्थायिनः, प्राप्ते समये व्यभिचारिरणाम् । श्रमामज्जलमपि ब्रुवते पूर्वं निर्वेदमेव यतु ॥ मुनिमतेऽनेडस्य तन्नूनं स्थायिता-व्यभिचारिते । पूर्वापरान्वयो हेतुर्मध्यस्थस्यानुप्रेक्षणातः ॥

[सज्जनतरत्नाकर १३२५-१३१६]

नाट्यदर्पणकार इस बात को नहीं मानते हैं । उनके मत में ‘निर्वेद’ केवल व्यभिचारी-भाव है, स्थायिभाव नहीं है । इसलिए उसे शान्तरस का स्थायिभाव नहीं कहा जा सकता है। उन्होंने लिखा है—

“प्रयं च [निर्वेदः] रसेष्टवियतत्वात् कादाचित्कत्वाच्च व्यभिचारी, न स्थायी ।”

[नाट्यदर्पण ६-२७]

अभिनवगुप्त ने भी निर्वेद को शान्तरस का स्थायिभाव नहीं माना है । उन्होंने विस्तार पूर्वक इसका खण्डन करते हुए अभिनवभारती में पृ० ६१३-६१७ तक इसका विवेचन किया है । उसके ग्रन्थ में लिखा है कि—

“ततइव तत्त्वज्ञानमेवदं तत्त्वज्ञानमालया परिपोष्यमार्भिति न निर्वेदः स्थायी, किन्तु तत्त्वज्ञानमेव स्थायीत भवेत् ।”

[अभिनवभारती पृ० ६१७]

इससे यहु स्पष्ट है कि युक्ति-क्रम के मिन्न होने पर भी निर्वेद शान्तरस का स्थायिभाव नहीं है इस विषय में नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र अभिनव गुप्त के साथ हैं ।

नाटघ दर्पण का विषय—

रामचन्द्र गुणेचन्द्र ने अपने ‘नाट्यदर्पण’ ग्रन्थ की रचना यद्यपि भरत मुनि के नाट्य-शास्त्र के आधार पर की है किन्तु इन दोनों में बहुत ग्रन्थर है । नाटघ शास्त्र ३६ अध्यायों का एक विशाल विश्वकोष है जिसमें प्रायः सभी ललित कलाओं का उल्लेख पाया जाता है । उसके सामने ‘नाटघदर्पण’ बहुत छोटा सा ग्रन्थ है । इसमें नाट्यशास्त्र के केवल १९वें अध्याय में

वर्णित विषय का ही प्रतिपादन किया गया है । नाटच शास्त्र के १९वें अध्याय का ‘दशरूपक-निरूपणाध्याय’ है । इसमें १ नाटक, २ प्रकरण, ३ व्यायोग, ४ समवकार, ५ भाण, ६ प्रहसन, ७ डिम, ८ व्यायोग और १० वीथी इन दस प्रकार के रूपकों का वर्णन किया गया है । इसीलिए इस ग्रध्याय को ‘दशारूपक-निरूपणाध्याय’ कहते हैं । इसी ग्रध्याय के आधार पर धनञ्जय ने ‘दशारूपक’ की रचना की थी और उसी के आधार पर रामचन्द्र गुणचन्द्र ने ‘नाट्यदर्पण’

की रचना की है।

नाट्यशास्त्र के १९वें अध्याय का नाम ‘दशरूपकाध्याय’ है, किन्तु उसमें पूर्वोक्त दश शुद्ध रूपकों के निरूपण के साथ उनके संकर से जन्म्य दो रूपकों का भी वर्णन किया है । ये

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भेद नाटक तथा प्रकरण इन दोनों के मिश्रण से बनते हैं। भारत मुनि ने इनका विधान निम्न श्लोक में किया है—

प्रनयोत्सवबन्धयोगादेको भेद: प्रयोक्तृभिन्नेय: । प्रथ्यातस्वतररो वा नाटीसंज्ञाश्रिते काव्ये ॥

[नाट्यशास्त्र १५, ५७]

श्लोक का अर्थ कुछ स्पष्ट सा है किन्तु इसका यह अभिप्राय प्रतीत होता है कि नाटक तथा प्रकरण इन दोनों के योग से एक नाटिका या नाटी नाम से प्रसिद्ध भेद सम्भवना चाहिए। अथवा दूसरा प्रकरणीय नामक सुप्रसिद्ध भेद सम्भवना चाहिए। ये दोनों 'नाटी' नाम से कहे जाते हैं।

इस श्लोक की प्रस्पष्टता के कारण कुछ लोग 'नाटिका' तथा 'प्रकरणी' दो संकीर्ण भेद मानते हैं और कुछ लोग दोनों के सदृश एक सदृशरूढ़ भेद मानते हैं और उसे 'नाटी' या नाटिका नाम से कहते हैं। दशारूपकार धनञ्जय 'नाटिका' रूप केवल एक सदृशरूढ़ भेद मानते हैं और 'नाट्यदर्पणकार' 'नाटिका' तथा 'प्रकरणी' रूप दो सदृशरूढ़ भेद मानते हैं। दशरूपक की व्याख्या करने वाले धनिक ने दो भेद मानने का खण्डन किया है। उन्होंने लिखा है—

"मत्र केचित्—

प्रनयोत्सवबन्धयोगादेको भेद: प्रयोक्तृभिन्नेय: । प्रथ्यातस्वतररो वा नाटीसंज्ञाश्रिते काव्ये ॥

"इत्यमुं भरतीयं श्लोकं, 'एको भेद: प्रथ्यातो नाटिकाख्य:, इतरस्तुप्रथ्यातः प्रकरणीसंज्ञो, नाटीसंज्ञयैव काव्ये श्राश्रिते' इति व्याचक्षते । प्रकरणीकामपि मन्यन्ते । तदसत् । उद्दे-लक्षयोरनभिधानात् । सामान्यलक्षणैर्वा भेदाभावात् । वस्तु-रस-नायकानां प्रकरणाभेदात् प्रकरणिकाया: । ग्रहतोडनुदिष्टया नाटिकाया यन्मुनिना लक्षणं कृतं तत्रायंप्रकारः—ग्रुद्रलक्षण-सदृशरादेव तल्लक्षणे सिद्दे लक्षणाकरं सदृशरानानां नाटिकैक कर्तव्येति नियमार्थं विज्ञायते ।"

[दशरूपक ३-४३वीं टीका]

इसका अभिप्राय यह है कि 'प्रनयोत्सव बन्धयोगात्' इत्यादि भरतमुनि के श्लोक के श्राधार पर कुछ लोग नाटिका श्रोर प्रकरणी दो सदृशरूढ़ भेद मानते हैं। किन्तु उनकी यह मान्यता श्रनुचित है। इसके चार कारण हैं। १. नाटिका तथा प्रकरणी नाम से दो श्रलग-श्रलग भेदों का न उल्लेख श्रर्थात् नाममात्र से कथन किया गया है श्रोर न लक्षण है। २. यदि नाटिका तथा प्रकरणी दोनों का लक्षण एक सी हो माना जाय तो उनमें भेद नहीं रहता है। इधर प्रकरणी को श्रलग भेद मानने वाले उसका जो लक्षण करते हैं उसके श्रनुसार 'प्रकरणी' की वस्तु, रस श्रोर नायक सब 'प्रकरण' के समान होते हैं इसलिए उसे 'प्रकरण' से श्रलग मानना श्रसंगत हो जाता है। इसलिए प्रारम्भ में कवित 'उद्दिष्ट' न होने पर भी भरतमुनि ने 'नाटिका' का जो लक्षण किया है उसका यह श्रभिप्राय है कि सदृशभेदों में से केवल एक 'नाटिका' की रचना करनी चाहिए।

धनिक द्वारा किए इस उक्त विरोध के बाद भी रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने 'प्रकरणी' को 'नाटिका' मित्र श्रुपक भेद मान कर उसका लक्षण किया है—

"एवं प्रकरणी किन्तु नेता प्रकरणोदित: ।"

श्रर्थात् नाटिका के समान चतुरङ्ग आदि धर्मों से युक्त 'प्रकरणी' होती है। किन्तु इस में भेद यह है कि नाटकोक्त राजादि नायक के स्थान पर प्रकरणोक्त वणिग् श्रादि नायक होता

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है। इन नायक-भेदों के कारण ही उसके नाम का भेद हो जाता है। ‘नायिकानुसारस्थित्वात् सर्वव्यवहारगताम्’ क्योंकि सारे व्यवहार नायक के अनुरूप ही होते हैं। इसलिए प्रकरणोक्त नायक होने के कारण चतुरङ्ग श्रादि धर्मों से युक्त रूप भेद को ‘प्रकरणी’ कहते हैं। यह प्रन्थकार का अभिप्राय है। इस प्रकार नाटघदर्पणे में १० मुख्य रूपक तथा नाटिका एवं प्रकरणी रूप दो सद्धीर्यां भेदों को मिलाकर कुल १२ प्रकार के रूपकों का वर्णन किया गया है।

दशरूपककार धनञ्जय ने दस प्रकार के मुख्य रूपकों के साथ ‘नाटिका’ रूप एक सद्धीर्यां भेद को मिला कर ११ रूपकों का निरूपण किया है। फिर भी उन्होंने अपने ग्रन्थ का नाम ‘दशरूपक’ ही रखा है। इसका कारण कुछ तो भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में १८वें श्रध्याय के लिए प्रयुक्त होने वाला ‘दशरूपकनिरूपणाङ्गय’ नाम है। उसमें भी नाटिका सहित ११ भेदों का निरूपण होने पर भी उसका नाम ‘दशरूपकनिरूपणाङ्गय’ रखा गया है। उसीके श्रनुकरण पर धनञ्जय ने भी अपने ग्रन्थ का नाम ‘दशरूपक’ रखा है। इसके साथ धार्मिक भावना के श्रनुसार विष्णु के दस श्रवतारों के साथ भरतमुनि के दशरूपकों का सम्बन्ध जोड़ना भी इसका एक कारण है।

“दशरूपककारेण यस्य माचान्ति भावकाः। नमः सर्वविदे तस्मै विष्णवे भरताय च ॥”

[दशरूपक १, २]

जिस प्रकार यहां धनञ्जय ने रूपकों की दश संख्या का अपने इष्ट देव विष्णु [धनञ्जय के पिता का नाम भी विष्णु ही था] के दस प्रवतारों के साथ सम्बन्ध जोड़ कर अपनी धार्मिक भावुकता का परिचय दिया है, इसी प्रकार नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने रूपकों की द्वादश संख्या का अपने धर्म में प्रतिपादित श्राचार से लेकर हस्तिवाद-पर्यन्त द्वादश श्रज्ञों के साथ सम्बन्ध जोड़ कर ही अपना मङ्गलाचरण श्लोक लिखा है—

“चतुरङ्गंफलां नित्यं, जैननीं वाचमुपास्महे। रूपाङ्गादर्शभिविषयं यया न्याय्ये धृतं पथि ॥”

[नाट्यदर्पण १-१]

इस प्रकार दस के स्थान पर १२ रूपक भेदों का निरूपण नाट्यदर्पणका प्रतिपाद्य विषय है। इस विषय का प्रतिपादन करने के लिए ग्रन्थकार ने अपने ग्रन्थ को चार भागों में विभक्त किया है। उन्हें ‘विवेक’ नाम से निर्दिष्ट किया है। प्रथम विवेक में उन्होंने केवल नाटक का निरूपण किया है। द्वितीय विवेक में ‘प्रकरणी’ श्रादि शेष ११ रूपक भेदों का निरूपण किया है। इस प्रकार अपने मुख्य प्रतिपाद्य विषय श्रर्थात् द्वादश रूपकों के लक्षणों का प्रतिपादन उन्होंने दो विवेकों में ही कर दिया है। उसके बाद तृतीय विवेक में नाटघ से सम्बद्ध वृत्ति, रस, भाव श्रौर श्रभिनय श्रादि का विवेचन किया है, श्रौर चतुर्थ विवेक में कुछ ऐसी बातों की चर्चा की है जो सारे रूपकों में समान रूप से उपयोग में आने वाली हैं। इसलिए इस विवेक का नाम ‘सर्वरूपकसाधारणलक्षणनिर्णयः’ रखा गया है।

दशरूपककार धनञ्जय ने नाटक के प्रतिरिक्त श्रन्य रूपक-भेदों के निरूपण में बहुत संक्षेप से काम लिया है। श्रधिकांश रूपकों का निरूपण उन्होंने दो चार श्लोकों में ही सम त्न कर दिया है। नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने नाटक के समान श्रन्य रूपक भेदों का निरूपण भी प्रयाप्त विस्तार के साथ किया है। इसलिए उनका निरूपण धनञ्जय की श्रपेक्षा श्रधिक स्पष्ट श्रौर उपयोगी बन पड़ा है।

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नाट्यदर्पण के उदाहरण—

नाट्यदर्पण का विषय-प्रतिपादन जैसे दशरूपक की अपेक्षा अधिक विशद और विस्तृत है, इसी प्रकार उसके उदाहरणों का क्षेत्र भी दशरूपक की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक है। रामचन्द्र-गुणाचन्द्र ने अपने प्रतिपाद्य विषय के स्पष्टीकरण के लिये इस ग्रन्थ में जो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं वे प्रायः ६३ नाटकों से लिए गए हैं। इन ६३ नाटकों की सूची बहुत लम्बी है। दशरूपक में यह बात कहाँ है? इन ६३ नाटकों में ११ नाटक तो स्वयं रामचन्द्र के अपने बनाए हुए नाटक हैं।

भवभूति के (१२) उत्तर रामचरित (१३) महावीर चरित और (१८) मालती माधव तीनों नाटकों इस सूची में उपस्थित हैं। इसी प्रकार कालिदास के (१४) प्रभिज्ञान शाकुन्तल, (१५) विक्रमोर्वशीय तथा (१७) मालविकाग्निमित्र इन तीनों नाटकों के उदाहरण इसमें प्रस्तुत किए गए हैं। यह बात विशेष रूप से उल्लेख योग्य है कि इसमें ‘मालविकाग्निमित्र’ का नाम सर्वत्र ‘मालतिका ग्निमित्र’ दिया गया है। विशाखदेव कृत (१५) मुद्राराक्षस नाटक के साथ उनके (१६) देवीचन्द्र गुप्त नाटक के उदाहरण भी इसमें दिए गए हैं। मुरारिकवि के (२०) अनर्घराघव, श्रीहर्ष के (२१) नागानन्द, और (२२) रत्नावली, (२३) नन्दिकेश्वरविजय के वेङ्कीसहार के उदाहरण भी दिए गए हैं।

(२५) भास के स्वप्नवासवदत्तम् तथा (२६) दरिद्रचारुदत्तम् नाटकों का उल्लेख भी इसमें ग्राया है। इसमें विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि भास के स्वप्नवासवदत्तम् से ‘पादाक्रान्तानि पुष्पारिण’ इत्यादि एक ही इलोक [काव्य ५३ में उदाहरण रूप में] दिया गया है किन्तु वह इलोक ‘स्वप्नवासवदत्तम्’ के वर्तमान मुद्रित संस्करणों में नहीं पाया जाता है। और भास के ‘चारुदत्त’ का यहाँ ‘दरिद्रचारुदत्त’ नाम से उल्लेख किया गया है। (२७) कुन्दमाला नाटक के उदाहरण भी ग्राए हैं। रामचन्द्र-गुणाचन्द्र ने उसे ‘वीर नाटक’ की रचना बतलाया है जब कि वर्तमान उपलब्ध ‘कुन्दमाला’ नाटक दिङ्नाग की कृति है। सम्भव है दिङ्नाग का ही दूसरा नाम ‘वीर नाटक’ हो।

ग्रामात्य शंकुक के (२८) ‘चित्रोपलावलिमित्रतम्’ नाटक के उदाहरण भी इसमें दिए हैं। पता नहीं यह शंकुक भरत के व्याख्याकार शंकुक है या कोई और दूसरे। वाणभट्ट की (२९) कादम्बरी, (३०) कालिदास के कुमारसम्भव, माघ काव्य की (३१) बुढ़श्रृङ्खला, व्यास के (३२) महाभारत और भर्तृमेध के (३३) हयग्रीववध के उदाहरण भी दिए गए हैं। ये ३३ ग्रन्थ तो प्रायः प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। किन्तु इनके प्रतिरिक्त प्रायः ३० ऐसे ग्रन्थों के उदाहरण भी रामचन्द्र-गुणाचन्द्र ने अपने इस नाट्यदर्पण में प्रस्तुत किए हैं जो प्रत्यन्त अप्रसिद्ध हैं, और अब तक प्रकाशित नहीं हुए हैं।

अत: हम इनका सामान्य परिचय नीचे दे रहे हैं।

नाट्यदर्पण में उद्धृत ग्रन्थों—

१. ग्रन्थप्रकृति नाटिका—नाट्यदर्पण के तृतीय ग्रन्थनिरूपण के प्रारम्भ में तीसरी कारिका की व्याख्या में पूर्ववर्त्ती के ग्रन्थ में ‘स्थापक’ द्वारा ‘ग्रामुख’ के ग्रन्थान्तर्गत उदाहरण के लिए "तथा च ‘ग्रन्थप्रकृत्यः’ नाटिकायां ह्रयते ‘पूर्ववर्त्तज्ञाने स्थापक’ इति" इस रूप में ग्रन्थप्रकृति नाटिका’ का उल्लेख केवल एक बार दिया गया है। और कहीं भी इसका उल्लेख नहीं मिलता है। इसका निर्माण किसने और कब किया इसका परिचय प्राप्त होना सम्भव नहीं है। ग्रन्थ के श्लोक्य होने से उसकी कयावस्तु का भी पता नहीं चल सकता है।

भोज के ‘शृङ्गारप्रकाश’ [११-१४७], हेमचन्द्र के ‘काव्यानुशासन’ [४,३३५] तथा शारदातनय के ‘भावप्रकाशन’ [पृ० २६७ प्रधि ९] में ‘ग्रन्थप्रकृति’ का उल्लेख निम्न प्रकार मिलता है—

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"शुद्रकथा मत्तलिल्का येह महाराष्ट्रमाषया भवति । गोरोचनेव कार्या सानज्जवतीव वा कविभिः ॥"

[सृंगारप्रकाश ११-१४७]

"प्रेतमहाराष्ट्रमाषायां शुद्रकथा गोरोचनानज्ज्वत्यादिवत् मत्तलिल्का । शुद्रकथा मत्तलिल्का प्रेत महाराष्ट्रमाषया भवति । गोरोचनेव कार्या सानज्जवती वाकंचेटी [कविभिः] भिः ॥"

[काव्यानुशासन सविवेक नि० सा० पृष्ट ३२३६]

"शुद्रकथा मत्तलिल्का येह महाराष्ट्रमाषया भवति । गोरोचनेव कार्याडनज्जवती भावरसविष्ठा ॥"

[भावप्रकाशन पृ० २६७, श्लो० ६]

इन तीनों ग्रन्थों में जिस 'ज्ञानंगवती' का उल्लेख मिलता है वह नाट्यदर्पणे में उदृत 'ज्ञानंगवती' नाटिका से भिन्न कोई और ही चीज है । क्योंकि 'नाट्यदर्पण' की 'ज्ञानंगवती नाटिका' जैमा कि उसके 'पूर्वरंगान्ते स्थापक:' इस उद्धरण से प्रतीत होता है । संस्कृत भाषा में लिखी गई नाटिका है, और 'सृंगारप्रकाश' ग्रादि तीनों ग्रन्थों में उल्लिखित 'गोगेचन ज्ञानंगवती' महाराष्ट्र की प्रेत भाषा में लिखी हुई कोई शुद्र कथा है जिसे महाराष्ट्र भाषा में 'मत्तुल्ली' कहते हैं । इस लिए 'नाटचदर्पणा' की ज्ञानंगवती नाटिका' उससे बिल्कुल भिन्न है ।

क्षेमेन्द्र की 'बृहरकथामंजरी' [५-१६-१७] में एक ज्ञानंगवती के चरित का उल्लेख मिलता है । सम्भव है कि 'न' 'ख्यवर्पणा' वाली 'ज्ञानंगवती नाटिका' की रचना इसी कथा के आधार पर की गई हो, और जैसे उदयन-वासवदत्ता की कथा के आधार पर अनेक नाटकों की रचना हुई है । इसी प्रकार 'ज्ञानंगवती' की यह कथा भी महाराष्ट्र की प्रेत भाषा में शुद्र कथा के रूप में प्रविष्ट हुई हो । इन सबके होने पर भी 'नाटचदर्पण' की 'ज्ञानंगवती नाटिका' के कर्ता ग्रादि का विषय बिल्कुल ग्रन्थकार में रहता है ।

२. ज्ञानंगसेनाहरिणीप्रकरणम्—'नाट्यदर्पण' के प्रथम विवेक में 'श्रमशं संशय' के पूर्व कई संग 'छादन' के निरूपण में ग्रन्थकार ने—

"यथा श्री शुक्किवासकुमारविरचिते ज्ञानंगसेना-हरीनिन्दिान प्रकरणे नवमेङ्के राजपुत्र चन्द्रकेतुना दत्त' कर्गालड्कारयुगलं नायिकया साधव्या नायकस्य प्रेषितम् ।"

इत्यादि रूप में 'ज्ञानंगसेना-हरिन्द्रिप्रकरणाम्' का उल्लेख किया है, और उसे 'शुक्किवास कुमार' की कृति बतलाया है । किन्तु ये 'शुक्किवासकुमार' कौन हैं ? इसका कुछ पता नहीं चलता है । इसलिए उनके काल ग्रादि का निश्चय नहीं किया जा सकता है ।

३. प्रभिनवराघव—नाट्यदर्पण के तृतीय विवेक में 'प्ररोचना' के लक्षण के प्रसंग में ग्रन्थकार ने निम्न प्रकार से केवल एक बार इस नाटक का उल्लेख किया है—

"यथा क्षीरस्वामिविरचितेऽभिनवराघवे— (संध्याभ्र) श्रेयो विगतस्मृतिस्तु । ग्रस्त्येव राघवमहीनकथा पवित्रं, काव्यप्रबन्धघटना प्रथितप्रधिम्नः । भट्ट नृुराज-चरणाङजमधुव्रतस्य, क्षीरस्य नाटकमवन्यसमांसारस्य ॥"

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यह नाटक तो नहीं मिलता है, किन्तु इस श्लोक में उसके कर्ता प्रादि का पर्याप्त परिचय दे दिया गया है। इसके श्रनुसार 'ग्रभिनवराघव' के निर्माता क्षीरस्वामी, भट्टेन्द्रुराज के शिष्य हैं। ये भट्टेन्द्रुराज ग्रभिनवगुप्त के भी गुरु हैं। ध्वन्यालोक की 'लोचन' टीका में ग्रभि- नवगुप्त ने इनका उल्लेख निम्न प्रकार किया है—

भट्टेन्द्रुराजचररणाजकृताधिवास, हृदयश्रुतोऽभिनवगुप्तपदामिभोजोभूमि । yत्न क्रियते ननु राजन् सुप्तायामि काव्या— लोकं सुलोचन-नियोजनया जनस्य ॥

यथाड्लोकलोचनेनैव भट्टेन्दुराजस्य १'

ध्वन्यालोकलोचन पृ० ४३, ११६]

इससे प्रतीत होता है कि ग्रभिनवराघव के निर्माता क्षीर स्वामी कदाचित् ग्रभिनवगुप्त के सहपाठी हैं। 'नाट्यदर्पण' के अतिरिक्त (१) कल्हण कृत राजतरंगिणी, [तरंग ४, इलोक ४८९], (२) ग्रमरकोष के व्याख्याता क्षीरस्वामी, (३) हेमचन्द्राचार्यकृत 'सिद्धहेमशब्दानुशासन [पृ० १, पृ० ४४], तथा हेमचन्द्र की ही 'ग्रभिधानचिन्तामणि' की 'सुभाषितरत्नमालाविवृति [पृ० ३६०, ४६१] में भी क्षीरस्वामी के नाम का उल्लेख पाया जाता है। ये सब क्षीरस्वामी एक ही व्यक्ति रहें होंगे। उस दशा में क्षीरस्वामी ने ग्रभिनवगुप्त के काल में ही रामचन्द्र के चरित को लेकर ग्रपने इस 'ग्रभिनवराघवम्' नाटक की रचना की होगी। पर यह इस समय उपलब्ध नहीं हो रहा है।

(४) ग्रभ्रुनचरितम्—नाट्यदर्पण के तृतीय विवेक में विरुद्ध रसों के विरोध या प्रविरोध की व्यवस्था के प्रकरण [का० ११-२३] में 'ग्रभ्रुनचरित' का एक श्लोक केवल एक वार निम्न प्रकार उद्दृत किया गया है—

यथा ग्रभ्रुनचरिते—

समुन्नतिते धनुर्धन्विनो भयावहे किरोटिनः । महानुपप्लवोदधिमवत् पूरे पुरन्दरद्विषाम् ॥

'ग्रभ्रुनचरित' के लेखक का यहां नाट्यदर्पणकार ने कोई उल्लेख नहीं किया है किन्तु इसके निर्माता 'ध्वन्यालोकार ग्रानन्दवर्धन' हैं। यह 'ग्रानन्दवर्धन' का लिखा एक महाकाव्य है। ग्रानन्दवर्धन ने ग्रपने ध्वन्यालोक में दो वार इसका उल्लेख निम्न प्रकार किया है—

"वि रसविषये हि भयातिशयवतां नायकस्य भयपराक्रमादिसम्पन्न सुन्दरामुपोदितान् । यथा मद्दीपे ग्रभ्रुनचरिते ग्रभ्रुनस्य पातालावतरखाप्रसङ्गे वैशचे न प्रदर्शितम् ।"

ग्रानन्दवर्धन का यह ग्रभ्रुनचरित नाटक नहीं ग्रपितु महाकाव्य है इस बात का उल्लेख भी उन्होंने स्वयम् ही किया है—

"यथा चब मदीय एव ग्रभ्रुन चरिते महाकाव्ये × × ×"

रुद्रट के काव्यालङ्कार की टीका में 'नमि साधु' ने 'ग्रभ्रुनचगितं' ग्रानन्दवर्धनाचार्य-कृतं प्राकृतकाव्यमप्यमू' लिख कर 'ग्रभ्रुनचरित' को प्राकृत काव्य बतलाया है। किन्तु उनका

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यह कथन ठीक नहीं है। जो इलोक यहां माधवदर्पणाकार ने उद्धृत किया है वह संस्कृत का पद्य है, इसलिए यह स्पष्ट है कि श्रजुन नचरित श्रानन्दवर्धनाचार्य का संस्कृत महाकाव्य है। नमिसाधु ने बिना देखे ही श्रनुमान से उसे प्राकृत काव्य कह दिया है। यह काव्य इस समय उपलब्ध नहीं है, इसलिए उसका नाम श्रप्रसिद्ध ग्रन्थों की सूची में दिया है।

(५) इन्दुलेखानाटिका—नाट्यदर्पण के प्रथम विवेक में 'निर्वहण संधि' के काव्य-संहार नामक श्रृङ्ग के निरूपण के प्रसङ्ग में [कारिका ६१] ग्रन्थकार ने इन्दुलेखा नाटिका का एक प्राकृत भाग उद्धृत किया है [ना० द० ११६५]। किन्तु इस नाटिका का कर्ता कौन है ? इसका कोई परिचय ग्रभी तक उपलब्ध नहीं हुग्रा था।

(६) इन्दुलेखावीथी—नाट्यदर्पण के द्वितीय विवेक में 'वीथी' के पांचवें श्रृङ्ग त्रिगत [का० ३२३] के निरूपण के प्रसङ्ग में—

× 'यर्थो इन्दुलेखावीथीति—

किं तु कलहंसनादो, मधुरो मधुपायिनां तु भङ्कारः ?

हृदयश्रीहयपेतविलासस्त्वं ननु सन्नुपचञ्चुरः ॥ इति"

यह एक इलोक उद्धृत किया है। महाराज भोज के 'शृङ्गार प्रकाश' [११२-११८५] तथा श्रीवरदातनय के 'भावप्रकाशन' [श्लो ८, पृ० २३१] में भी यही पद्य इसी नाम से उद्धृत किया गया है। किन्तु 'भावप्रकाशन' में 'हृदयगतदेवताया:' के स्थान पर 'हृदयगतवेदनाया:' पाठ दिया गया है। नाट्यदर्पण तथा शृङ्गारप्रकाश का पाठ एक ही है, श्रौर श्राधक श्रच्छा पाठ है। जैसा कि नाम से ही प्रकट है 'इन्दुलेखा नाटिका' तथा 'इन्दुलेखा वीथी' एक ही कथानक पर लिखे हुए दो श्रलग ग्रन्थ हैं, किन्तु दोनों में से किसी के भी कर्ता का पता नहीं मिलता है।

(७) उदयनचरितम्—नाट्यदर्पण के तृतीय विवेक में श्रारारटी वृत्ति के निरूपण में 'छद्म' के उदाहरण रूप में 'उदयनचरिते किलिङ्गहस्तप्रयोग:' (पृ० १४०)इस रूप में 'उदयनचरित' का उल्लेख किया है। 'हरतूर्पक' की 'श्रवलोक' टीका में [२१ ४७५], श्रौर साहिल्यदर्पण [६-१३४]

में भी इसी रूप में उदयनचरित्र का उल्लेख किया गया है। वैसे उदयन की कथा संस्कृत साहित्य में श्रत्यन्त प्रसिद्ध श्रौर बड़ी व्यापक कथा है। मूलतः उदयन का चरित बृहत्कथा से लिया गया है, श्रौर उसके श्राधार पर श्रनेक नाटकों की रचना हुई है। सम्भव है उसके श्राधार पर 'उदयन चरित' नामक किसी नाटक की रचना हुई हो। पर वह न उपलब्ध है श्रौर न उनके कर्ता का कोई पता चलता है। यहां जिस रूप में उसका उल्लेख हुग्रा है उसके किसी विशेष नाटक के रूप में नहीं, श्रपितु सामान्य रूप से उदयन-कथात्मक उदयनचरित का ग्रहण करने से भी काम चल सकता है। वैसे भामह के काव्यलङ्कार में 'विजिगीषुपुत्रनयस्य वृद्धदर्शनम्' [४-३६], कालिदास के मेघदूत में 'प्राप्तावन्तीमुदयनकथाप्रौढगर्वोद्वहद्भिः,' श्राचार्य हरिभद्रसूरि के 'ग्रावश्यक सूत्रवृत्ति' में [पृ० ६७६-६७७, ६७३, ६७५], ग्राचार्य हेमचन्द्र विरचित 'त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरिते' [पर्व० १० स ११ १९४-२६५], सोमप्रभ के 'कुमारपालप्रतिबोध' [पृ० ५०-५२]

ग्रादि जैन-ग्रन्थों में भी समान रूप से उदयन की कथा का उल्लेख मिलता है। यह बात इस कथा की श्रत्यन्त लोकप्रियता की सूचक है।

(८) उदात्तराघवम्—नाट्यदर्पण में 'उदात्तराघवम्' नाटक का उल्लेख तीन बार किया गया है। पहली बार प्रथम विवेक की ४५ वीं कारिका की व्याख्या में, दूसरी बार

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प्रथम विवेक की बिल्कुल समाधि पर प्रो॑र तीसरी वार चतुर्थ विवेक की द्वितीय कारिका की व्याख्या में। दशरथक' के प्रथ लो-काकार ने तृतीय प्रकाश की २५वीं कारिका की व्याख्या में 'यथा छद्मना बालिकघो मायुराजेन उदात्तराघवे परित्यक्यः;' इस रूप में उदात्तराघव का उल्लेख करते हुए उसे मायुराज की कृति बताया है। 'वक्रोक्तिजीवित-कार' कुन्तक ने भी 'यथा उदात्त-राघवे कविना वैदर्भ्यवृत्तेन मारीयमुग-मारणीय प्रयातस्य लक्षणस्य परिवृत्त्यार्थ सीतया कातर-स्वेन रामः प्रेरित इत्युपनिबद्धम' इस रूप में 'उदात्तराघव' का उल्लेख किया है। इन दोनों उल्लेखों से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि इस 'उदात्तराघव' के कवि ने रामचरित को उदात्त बनाने के लिए उसकी काव्यवस्तु में नये संशोधन किए हैं। इसीलिए कुन्तक ने लिखा भी है कि—

"यथा (एकस्यामेव दशरथिकयायां) रामाभ्युदय-उदात्तराघव-धीरचरित-वालरामायण-कृत्यारावण-मायापुष्पिकप्रभृत्यः। ते हि प्रबन्धप्रबन्धासतेन्व कथा मार्गेण निरर्गलसासारागरं-सम्पदा प्रतिपदं प्रतिवाक्यं प्रतिप्रकर्यं च प्रकाशमानशोभया हर्षातिरेकमनेकशोभ्यास्वादमानः समुल्पदायन्ति सहृदयानाम्" [वक्रोक्ति जीवित पृ० ४३६]

'दशरूपकावलोक' में [३-५६, २-३१, ४-२३, २८] उदात्तराघव के तीन श्लोक भी उद्धृत किए गए हैं। विश्वनाथ ने साहित्य दर्पण [परि० ६, इलोक २७, ५०, १४४] में इसके श्लोक उद्धरण किए हैं। भोजदेव के 'शृङ्गारप्रकाश' [पृ० १२], सरस्वती कण्ठाभरण [पृ० ६४५], हेमचन्द्राचार्य के 'काव्यानुशासन' की स्वोपज्ञ प्रालन्धारचिह्नटीकावृत्ति [पृ० १५०] में भी इसके उदाहरण दिए गए हैं। इससे यह नाटक प्रत्यन्त लोकप्रिय रहा प्रतीत होता है। राजशेखर ने 'मायुराज' को कल्चुरि वंश का कवि कहा है। ऐसा जल्हण-संग्रहीत 'सूक्तिमुक्तावली' के निम्न लेख से प्रतीत होता है—

"राजशेखर— मायुराजसमो जातो नान्यः कल्चुरिकवेः । उदन्वतः समुत्ससुः कति वा तुहिनांशवः ॥ [जल्हण-संग्रहीत सूक्तिमुक्तावली ४५]

इस प्रकार बहुप्रसिद्ध, बहुचर्चित यह उदात्तराघव नाटक निश्चित होi प्रस्त्यन्त उच्चकोटि का नाटक रहा होगा, किन्तु दुर्भाग्य से इस समय वह उपलब्ध नहीं हो रहा है।

(९) कृत्यारावणम्—'नाट्यदर्पण'कार ने कृत्यारावण के १३ उदाहरण इस ग्रन्थ में दिए हैं। इसके 'ग्राम्यमुख' में से 'प्रवलगित' का उदाहरण [२-३६], प्रथम ग्रद्ध से 'प्रधिबल' का उदाहरण [२-९१], द्वितीय ग्रद्ध से 'वक्रोक्ति' का उदाहरण [१-५०], चतुर्थ ग्रद्ध से 'प्रार्थना' का उदाहरण [१-१३३], षष्ट ग्रद्ध से 'विद्रव' का उदाहरण [१-१५४], और सप्तम ग्रद्ध से 'विरोध' और 'वाक्य' के उदाहरण में [१-१५५, ६०] ७ उदाहरण तो ग्रन्थ-निर्देश पूर्वक उद्धृत किए हैं। इनके अतिरिक्त रूप, वृत्ति, क्षेप, श्राव्य, श्रावण्टि-वृत्ति, शृङ्गीभयम् इन ६ के उदाहरण

प्रद्योल्लेख के बिना दिए हैं। इस प्रकार केवल 'नाटकदर्पण' में १३ बार 'कृत्यारावण' नाटक का उल्लेख हुग्रा है। इसके प्रतिरिक्त श्रभिनवगुप्त की श्रभिनवभारती [ग्र० १५ पृ० ४१०, प्र० ५० पृ० १०४-१०५, ग्र० २२ पृ० १७६ ख० २, पृ० ४४४, ५२३, ५२४ ख० ३ पृ० १३, ४०] में ८ जगह भोजदेव के 'शृङ्गारप्रकाश' में पृ० १२, १५७, १५९, २०० तीन जगह, हेमचन्द्राचार्य के 'काव्यानुशासन-विवेक' में एक जगह [प्र० ६, पृ० २७९]। श्रारारदानय के 'भाव-

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प्रकारान्तर' में [ग्र० २३५, २४१] दो जगह, प्रौर साहित्यदर्पण [परि० ६, इलोक १३७] में भी इसका उल्लेख पाया जाता है। कुंतक ने भी वक्रोक्तिजीवित में इसका उल्लेख किया है। किन्तु 'दशरूपकावलोक' में इसका एक बार भी उल्लेख नहीं मिला यह ग्रन्थकार्य की बात है। इतना प्रसिद्ध यह नाटक भी भाज उपलब्ध नहीं हो रहा है, यह भी आश्चर्य की बात है।

(१०) कौशालिकानाटिका--नाट्यदर्पण के प्रथम विवेक की दसवीं कारिका की व्याख्या के प्रसंग में केवल एक बार 'कौशालिकानाटिका' का उल्लेख प्राया है। इस उल्लेख से यह प्रतीत होता है कि यह नाटिका वत्सराज उदयन के चरित्र को लेकर लिखी गई थी। नाट्यदर्पण में लिखा है--"यथा भट्ट श्रीभवनुन (?) चूडामणिरचिता कौशालिकायां नाटिकायां कौशालिकाप्राप्ति-मधिकृत्य प्रवृत्तस्य वत्सराजस्य न प्रारब्धकम्" । इस नाटिका का ग्रन्थकार कोई उल्लेख नहीं मिलता है, ग्रोर न यह नाटिका ही उपलब्ध होती है।

(११) चित्रोत्पलावलिमितक प्रकरण--नाट्यदर्पण के प्रथम विवेक में गर्भसंधि के सातवें भङ्ग 'उद्भेद' के उदाहरण के प्रसंग में ग्रन्थकारने-- "यथा प्रमात्यशङ्कुकविरचिते चित्रोत्पलावलिमितके प्रकरणे पञ्चमेऽङ्के नेपथ्ये सचिवःकारम्--"

इत्यादि रीति में 'चित्रोत्पलावलिमितक' प्रकरण को प्रमात्य शंकुक की कृति घोषित किया है। शंकुक का नाम तो साहित्यशास्त्र के इतिहास में अत्यन्त प्रसिद्ध है। काव्यप्रकाशकार ने रस-निरूपण के प्रसंग में चतुर्थ उल्लास में, ग्रभिनवगुप्त ने 'ग्रभिनवभारती' में अनेक बार शंकुक का नाम उल्लेख किया है। किन्तु सब जगह उनके मत का खण्डन ही किया गया है। उदाहरणार्थ-- तेन शङ्कुकादिभिः × × वृथैव बहु त्रमुपन्यस्तम् । [ग्र० २ पृ० ६७] शङ्कुकस्वाह × × एतदप्यसत् । [ग्र० ६, २७४] यथवत्र शङ्कुकेनोक्त × × तदसत् [ग्र० ६, २६२] इति श्रोशङ्कुकम् । एतच्च पूर्वापरविसंवादि श्रुत्यादिविरुद्धमतमस्य [प्रध्या० ६, २७३]

इसी प्रकार यहां नाट्यदर्पण में द्वितीय विवेक के 'वीथी' निरूपण के प्रसंग में उनके मत की अनुगादेयता का प्रतिपादन करते हुए ग्रन्थकार ने लिखा है-- "शङ्कुकस्तु प्रधानप्रकृतिनायकत्वमनिच्छन् प्रहसन-भाणादौ हास्यरसप्रधाने विटादे-नायकत्वं प्रतिपादयन् कथमुपादेयः स्यादिति ।"

[नाट्यदर्पण २-२५ ] राजतरंगिणी [त० ४, ७०५] में-- कविकुलधमनः सिन्धुः शशांकः शङ्कुकाभिधः । यमुदयशिखरोत् काव्यं भुवनाश्रयदयाभिधम् ॥

इत्यादि पद्य द्वारा शंकुक को 'भुवनाश्रयदयासम्' नामक काव्य का निर्माता बतलाया है। वल्लभदेव-संग्रहीत 'सुभाषितावली' में [५२८६, ५३९, ५४५, ६५०, ६७३, ६७४, ६०५, १२३३, १२३४, ३१२७, ३३७९ संख्या के] कई पद्य शंकुक के नाम से उद्धृत किए गए हैं। नाट्यशास्त्र के व्याख्याताओं के हर में उनकी विशेष प्रसिद्धि है। हेमचन्द्राचार्य के काव्यानुशासन [ग्र० २ पृ० ५७ वि०] प्रोर शारदातनय के 'भावप्रकाशन' [ग्र० र् पृ० २५२], में भी शंकुक का उल्लेख किया

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गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये शंकुक ही इस 'विच्छेदोपालम्भितक' प्रकरण के निर्माता होंगे। किन्तु वे किसके शिष्यप्रामात्य थे इसका पता नहीं चल रहा है। यह ग्रन्थ भी उपलब्ध नहीं है।

(१२) छलितरामम्—नाट्यदर्पणकार ने चार स्थानों पर 'छलितराम' नाटक के नाम का उल्लेख करते हुए उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। कुन्तक के वक्रोक्तिजीवित में भी 'छलितराम' का उल्लेख पाया जाता है। धनिक के 'दशरूपकावलोक' में [१-४१, ३-१३, १७] तीन स्थलों पर, मोज के 'शृङ्गारप्रकाश' [प्र० ११, पृ० १२३], तथा सरस्वतीकण्ठाभरण [पृ० ३७७, ६४५] तथा विश्वनाथ के साहित्यदर्पण [परि० ६ पृ० २६१] में भी इसका उल्लेख पाया जाता है। किन्तु न तो इसके कर्त्ता का पता चलता है और न यह ग्रन्थ ही उपलब्ध होता है।

(१३) जामदग्न्यजयः—नाट्यदर्पण के द्वितीय विवेक में 'व्यायोग' के लक्षण के प्रसङ्ग में 'ग्रस्त्रीनिमित्त संग्राम:' जिसमें स्त्री की प्राप्ति के लिए संग्राम न हो वह व्यायोग होता है। इसका उदाहरण दिलवाने के लिए—'ग्रस्त्रीति संग्रामसंयुक्तस्त्रुच । यथा—'जामदग्न्यजये परशुरामेण सहसा नष्ट्य वचः ऋतुः!' इस रूप में इस 'जामदग्न्यजय' व्यायोग का उल्लेख किया है। 'दशरूपक के मूल में श्लोक 'ग्रंथावलोक' टीका में भी व्यायोग के लक्षण के प्रसङ्ग में 'ग्रस्त्रीनिमीत्तसंग्रामो' जामदग्न्यजय इत्यादि लिख कर इसका निर्देश इसी रूप में किया गया है। किन्तु इसकी रचना किसने कब की इसका कोई पता नहीं लगा है। यह ग्रन्थ भी इस समय उपलब्ध नहीं हो रहा है।

(१४) तरङ्गवत्‍तम्—नाट्यदर्पण के द्वितीय विवेक में 'प्रकरण' के निरूपण प्रसङ्ग में क० ३ तथा ४ की व्याख्या में दो जगह 'तरङ्गवत्‍त' प्रकरण का उल्लेख किया गया है। धनिक के 'दशरूपकावलोक' [३-३५], शारदातनय के 'भावप्रकाशन' [प्रदीप०५, पृ० २४३], और विश्वनाथ के साहित्यदर्पण [परि० ६ पृ० २२६] में भी इसका उल्लेख पाया जाता है। किन्तु इसका कर्त्ता कौन है इस विषय में कोई पता नहीं चलता है, और न यह ग्रन्थ मिलता है।

(१५) देवीचन्द्रगुप्तम्—'नाट्यदर्पण' में सात वार देवीचन्द्रगुप्त नाटक का उल्लेख आया है और उसे 'मुद्राराक्षसकार' विशाखदेव या विशाखदत्त की कृति बतलाया गया है। इन उदाहरणों से इस नाटक की कथावस्तु प्रायः स्पष्ट हो जाती है। राजा रामगुप्त ने प्रबल शकाराज के मांगने पर अपनी रानी ध्रुवदेवी को शकाराज को समर्पित कर देना स्वीकार कर लिया। बाद को रामगुप्त के भाई चन्द्रगुप्त ध्रुवदेवी के वेश में शकाराज के शिविर में गया और वहां पहुंच कर चन्द्रगुप्त ने शकाराज का वध कर डाला, यह इस नाटक की कथा है। इस कथा का उल्लेख 'हर्षचरित' में पाया जाता है—

"शकानामाचार्यः शकारिपतिः चन्द्रगुप्ताभ्रातृजां ध्रुवदेवीं प्रार्थयमानः, चन्द्रगुप्तेन ध्रुवदेवीवेषधारिणपरिवृत्तेन रहस्य व्यापादित इति" [हर्षचरित उ० ५ पृ० २७०]

'काव्यमीमांसा' में भी इस कथा का उल्लेख प्राता है— दत्वा रुद्रगतिः क्षाधिपतये देवीं ध्रुवस्वामिनीं yस्मात्‍ खण्डितसाहसो निववते श्रीरामगुप्तो नृपः । [काव्यमीमांसा प्र० ९ पृ० ४७]

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इस कथा को लेकर देवीचन्द्रगुप्त नाटक की रचना हुई है। उसका उल्लेख भी अन्य जगह पाया जाता है। किन्तु यह ग्रन्थ इस समय उपलब्ध नहीं है।

मुद्राराक्षस तथा देवीचन्द्र गुप्त के अतिरिक्त ‘प्रभिसारिकवञ्चितक’ नामक एक और नाटक भी विशाखदेव ने बनाया था। इस बात का उल्लेख अभिनवभारती [ग्रं० २२ पृ० १६७, खण्ड ३ पृ० २१] तथा ‘श्रृंगारप्रकाश’ में मिलता है। यह नाटक वत्सराज उदयन के जीवन को लेकर लिखा गया था, यह बात भी निम्न उद्धरणों से विदित होती है—

"यथा विशाखदेवनिबद्धे प्रभिसारिकवञ्चितके वत्सेशस्य पद्मावती शवरीवेषाध्याचरण-रूपात् लीलाचेष्टितात् कामः प्रत्यानीतितः |"

"यथा श्रीविशाखदेवकृते प्रभिसारिकावञ्चितके वत्सराज: सम्मावितपुत्रवधायै पद्मावत्यै कुट्टिन्यस्तथा चाम्बष्ठयात्"

१६. प्रयोनिधिमथनम्—नाट्यदर्पण के द्वितीय विवेक में ‘समवकार’ के निरूपण प्रसंग में ‘ग्रन्थ द्वादश नेताओं: फलं तेषां पृथक् पृथक्’ [कारिका २-१२] के उदाहरण में ‘यथा प्रयोनिधि-मथने हरि-बलि-प्रसक्तिनां लक्षणादिलाभः’ इस रूप में ‘प्रयोधिमथन’ का उल्लेख होने से यह ‘समवकार’ प्रतीत होता है। ‘दशरूपक’ के समवकार निरूपण में भी ‘बहुवीररसः सर्वे यद्यदम्बो-घिमन्थने’ [३-६*] इस रूप में ‘प्रभोधिमथन’ का उल्लेख किया गया है। यह ‘प्रयोधिमथन’ का ही दूसरा नामान्तर है। भोजदेव के ‘श्रृंगारप्रकाश’ में [पृ० १११ पृ० १४८] तथा हेमचन्द्राचार्य के ‘काव्यानुशासन’ में [प्र० ५ पृ० ३३७] ग्रहप्रभंव भाषानिबद्धसन्धिबन्धमथनादि। का उल्लेख निम्न प्रकार मिलता है—

"योडरथ्शानिबदो मात्राछन्दोभिरभिमतोऽल्पधियाम्। वाच्यः स सन्धिवन्धः चतुरं खोक्तविषमयनादि"

ग्रहप्रभंव भाषानिबद्धसन्धिबन्धमथनादि ।

पता नहीं इसी ‘प्रभोधमथन’ को नाट्यदर्पण कार ने यहाँ ‘प्रयोधिमथन’ के नाम से निर्दिष्ट किया है, या यह कोई अन्य ग्रन्थ है। न यह ग्रन्थ मिलता है और न उसके कर्ता ग्रादि का पता चलता है।

१६. पाण्डवानन्दम्—नाट्यदर्पण के द्वितीय विवेक में ‘वीथी’ के ‘उद्घात्यक’ नामक ११वें अंग के उदाहरणों में पाण्डवानन्द का सूत्रधार तथा पारिपार्श्वक की उक्ति-प्रयुक्ति रूप ‘का भ्रूषा बलिना क्षमा’ इत्यादि एक इलोक उद्धृत किया गया है। उसकी प्रवर्त्तनिका में—‘यथा पाण्डवानन्दे सुत्रधार-परिपार्श्वकयोक्तिप्रयुक्त—’ इस रूप में ‘पाण्डवानन्द’ का उल्लेख किया गया है। ‘वीथी’ के प्रसंग में निर्दिष्ट होने के कारण यह ‘वीथी’ ऐसा ग्रनुमान होता है।

‘अभिनवभारती’ [ग्र० १६ पृ० ४५४] में भी ‘पाण्डवानन्द’ का यह पद्य उद्धृत हुग्रा है और शारदातनय के ‘भावप्रकाशन’ [पृ० २३०] में भी यह पद्य ‘पाण्डवानन्द’ से उद्धृत पाया जाता है। किन्तु इसका कर्त्ता कौन था इसका कुछ भी पता नहीं चलता है और न यह ग्रन्थ ही उपलब्ध होता है।

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१७. पार्थविजयम्—नाट्यदर्पण के प्रथम विवेक में प्रतिमुख सन्धि के ग्राठवें ग्रंग 'ताप' तथा 'ग्रनुमात्रा' के निरूपण के प्रसंग में 'यथा पार्थविजये' लिख कर तीन बार 'पार्थविजय' के उद्धरण दिए गए हैं। भोजराज के 'श्रृंगार प्रकाश' में भी [पृ० ११२, प्रा० वि० पृ० १४४, १४७ १४९] साम, दो रूप सन्ध्यंगो के उदाहरण रुा में 'पार्थविजय' के कुछ ग्रंश उदृत किए गये है।

"तत्र पूर्व मोडपि हीः यथा 'पार्थविजये' ग्रन्थवेः पराजितस्य बद्धस्य श्रजुनेन विक्रम्य मोचितस्य दुयोधनस्य ।"

"तत्र साम यथा 'पार्थविजये' भगवान् वासुदेवो द्वोस्तेन गतो दुर्योधनमाह" [श्रृंगारप्रकाश प्र० १२, प्रा० वि० पृ० १४७, १४८]

'सूक्तिमुक्तावली' में राजशेखर के नाम से निम्न पद्य उदृत हुग्रा है— कतुं त्रिलोचनादन्यः कः पार्थविजयं क्षमः । तदर्थं शाक्यते दृष्टुं लोचनद्वयितया कथम् ॥" [सूक्तिमुक्तावली पि० रि० २, ६३]

इस श्लोक से प्रतीत होता है कि इस 'पार्थविजय' के निर्माता त्रिलोचन कवि हैं। प्रसिद्ध दार्शनिक वाचस्पति मिश्र ने 'न्यायवार्तिक-तात्पर्यटीका' में 'त्रिलोचनगरुग्रन्थमार्ग- गमनोन्मुखः' लिख कर त्रिलोचन ग्रुपना गुरु घोषित किया है। इन्हीं त्रिलोचन कवि का बनाया हुग्रा यह 'पार्थविजय' नाटक था। किन्तु इस समय तक उपलब्ध या प्रकाशित नहीं हुग्रा है।

१८. पुष्पदूतिकम्—नाट्यदर्पण के प्रथम तथा द्वितीय विवेक में कुल मिला कर ग्राठ स्थानों पर 'पुष्पदूतिकम्' के नाम तथा उसके उद्धरण दिए गए हैं। 'वक्रोक्तिजीवित' का जो उद्धरण हम 'कृत्यारावण' के विवेचन के प्रसंग में पृष्ठ ३१ पर दे ग्राए हैं उसमें भी 'पुष्पदूतिक' का नाम ग्राया है। ग्रभिनवभारती [ग्र० १५ पृ० ४३२] तथा 'वशिष्ठकाव्यलोक' [प्र० ७, श्लोक ४५१] में 'पुष्पदूतिक' का उल्लेख पाया जाता है। इसमें समुद्रदत्त नामक वणिक् नायक ग्रोर कुलश्री रूप नन्दयन्ती न।यिका की कथा दी गई है। विविध ग्रन्थों में इसके उद्धरण मिलने पर यह ग्रन्थ ग्राज उपलब्ध या प्रकाशित नहीं है।

१९. प्रतिमानिरुद्धम्—नाट्यदर्पण के प्रथम विवेक के ग्रन्थ में—'श्री भीमदेव- सूनोर्वसुनागस्य कृतौ प्रतिमानिरुद्धे' इन शब्दों में 'प्रतिमानिरुद्ध' नाटक का निर्देश किया गया है। ग्रभिनवभारती [प्र० ११६, पृ० ३] में भी भीमदेव-सुत वसुनाग की कृति के रूप में 'प्रतिमानिरुद्ध' का निर्देश किया गया है। 'वक्रोक्तिजीवित' में केवल नाटक के नाम का उल्लेख पाया जाता है। बल्लभदेव-संगृहीत 'शुभाशितावली' में [श्लोक १२७४, १२८३, १३६३] तीन श्लोक वसुनाग कृत उदृत किए गए हैं। वे 'प्रतिमानिरुद्ध' के निर्माता वसुनाग के ही बनाए हुए प्रतीत होते हैं। यह नाटक भी इस समय उपलब्ध नहीं है।

२०. प्रयोगासमुदयम्—नाट्यदर्पण के द्वितीय विवेक में 'वीथी' के चतुर्थ ग्रंग 'प्रपंच' के निरूपण के प्रसंग में विदूषक ग्रोर चेटी का संवाद 'प्रयोगासमुदय' से उदृत किया गया है। इससे प्रतीत होता है कि यह 'वीथी' श्रेणी का रूपक है। भोजदेव के 'श्रृंगारप्रकाश'

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में श्री [पृ० १६, पृ० १६१] 'प्रयोगामृतदय' का ठीक यही ग्रंश उद्धृत हुग्रा है । परन्तु यह ग्रन्थ भी इस समय उपलब्ध नहीं है ।

२१. बालिकावंचितकम्—नलविलास में 'बालिकावंचितक' के उदाहरण दो बार दिए गए हैं । एक उदाहरण उसके ग्रন্থमुख से लिया गया है । उसमें 'वीथी' के नवम ग्रंग 'नाली' का प्रयोग निम्न प्रकार दिखलाया है—

"यथा बालिकावंचितके पारिपाश्विक:-

तपनोयोज्ज्वलकरकं, कुमलयारुणि भासमानमाकाशे ।

तेjomयं दिनकराद्र द्वितीयमाचक्षे मे भूतं ॥

ग्रत्र निगूढो नारदलक्ष्योऽर्थ:..... बलोके 'द्वितीयमेनं' 'गुर्नि पदय' इति ।

चतुर्थंपादान्यथाकारखेन व्याख्यात इति ॥"

[नाट्यदर्पण २-३५]

इसमें श्राकाश-माग से कृष्ण के पास जाते हुए नारद का वर्णन है । दूसरे स्थान पर—

"यथा वा बालिकावचि तके—

रिष्टस्तावदुदुप्रष्टुं द्विकट: शैलेन्द्रकल्पो वृक्ष:,

सप्तद्वीपसमुद्रस्थै: पयस: शोष्यमाणा पूरिता ।

केशी वाजितनु: खुरविघटनये दप्तनगान्मेदिनो,

सार्थं बन्धुमिरेतन्मूर्जितबलं कः कंसमास्कन्दति ॥"

[नाट्यदर्पण २-३२]

ग्रादि इलोक इस 'बालिकावचि तक' से उद्धृत किए गए हैं । इन उद्धरणों से प्रतीत होता है कि यह रूपक कृष्ण की कथा को लेकर लिखा गया है, ग्रोर उसमें 'बालिका' पद कदाचित् राधा के लिए प्रयुक्त हुग्रा होगा । दुर्भाग्य से यह रूपक भी उपलब्ध नहीं होता है ।

२२. मनोरमावत्सराजम्—नाट्यदर्पण के द्वितीय विवेक में 'वीथी' के 'ग्रासप्रलाप' नामक ग्रंग के निरुपण के प्रसंग में केवल एक वार इसका उल्लेख किया गया है । उसमें "यथा भीमट-विरचिते मनोरमावत्सराजे" इस रूप में इस रूपक का निर्देश किया गया है । जैसा कि इसके नाम से ही प्रकट है यह रूपक वत्सराज उदयन की कथा को लेकर लिखा गया है । उदयन के चरित को लेकर संस्कृत साहित्य में अनेक ग्रंथों की रचना हुई है । (१) वासवदत्ता, (२) वेणी-

वासवदत्ता, (३) स्वप्नवासवदत्ता, (४) प्रतिज्ञायौगंधरायण, (५) रत्नावली, (६) प्रियदर्शिका, (७) कौशालिका, (८) ग्रासमारिकाावचि तक, (९) तापसवत्सराज, (१०) उदयनचरित ग्रादि सभी ग्रंथ एक ही कथा को लेकर लिखे गए हैं । भीमट कवि का यह 'मनोरमावत्सराज' रूपक उसी श्रेणी में ग्राता है । इसके निर्माता भीमट के विषय में जल्हण-क संकलित 'सुक्तिमुक्तावली' में एक पद्य ग्राया है —

कलिङ्जरपतिशचक्रे भीमट: पञ्चनाटकीम् ।

प्राप्तप्रबन्धराजत्वं तेऽपि स्वप्नदशाननम् ॥

[सुक्तिमुक्तावली २-६३]

प्रर्थात् भीमट कवि कलिङ्जर के राजा थे । उन्होंने पांच नाटक बनाए थे जिनमें 'स्वप्न-दशानन' नामक सर्वश्रेष्ठ था । पिटर्सन ग्रादि के ग्रनुसार 'रावणीयार्जुन' के निर्माता भीम ग्रोर कलिङ्जरराज भीमट एक ही व्यक्ति हैं । खेद की बात है कि उनकी यह कृति भी ग्रभी तक प्रकाश में नहीं ग्राई है ।

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२३. मल्लिकाकामरन्दम्—यह रामचन्द्र का ग्रपन्थ बनाया 'प्रकरा' रूपक है । 'नाटघदर्पण' के तृतीय विवेक की २१वीं कारिका की व्याख्या में 'यथा वा ग्रस्मदुपज्ञे मल्लिकामकरन्दे प्रकरणे—

ग्रास्यं हास्यकरं शृङ्गारसास्रं, बिम्बवाधरः सोदरः । पीयूषस्य, वर्चासि मन्यमहाराजस्य तेजासि च । hस्त्रीविषयपचन्द्रिका, स्तनतटी लक्मीमतीनाटघमूः g्रोचिछ्याचररैर्विलासकररं तस्याः प्रस्र्यावघेः ॥

इस रूप में 'मल्लिकाकामरन्द' का उदाहरणश्रा केवल एक बार दिया गया है । श्राज से २०० वर्ष पहिले १७वीं शताब्दी में कान्तिविजयगिरि द्वारा तैयार किए गए सूचीपत्र में 'तथ्येव [प० रामचन्द्रस्य] मल्लिकाकामरन्दनाटकं' १५०० । [पुरातत्त्व पु० दे० ग्र० ४, ५२४-५२७]

इस रूप में मल्लिकाकामरन्द-को रामचन्द्र का नाटक बतलाया है । किन्तु यह ठीक नहीं है । क्योंकि ग्रन्थकार ने स्वयं उसे 'नाटक' के स्थान पर 'प्रकरण' कहा है । १५०० श्लोक ग्रथ्यन्त श्रनुद्धृत इसका परिमारा था, किन्तु यह ग्रन्थ श्रब तक श्रप्राप्य श्रोर श्रप्रकाशित है ।

२४. मायापुष्पक—'नाटघदर्परा' के प्रथम विवेक में 'बीज' का निरूपण करने वाली २६वीं कारिका की व्याख्या में—

"यथा मायापुष्पके शापः प्रविशत्य वचनक्रमेणैव— कंकेयी कव पितृत्वता भगवती कवैवन्ध्यं वान्ध्रिवं, धर्मात्मा कव रघुवंशः कव व गमितोडररां शजायानुजः । कव स्वच्छो भरतः कव वा पितृवघान्मात्राधिकं दह्यते कि कृत्वेति क्रुते मया दशरथेन्दवघे कुलस्य क्षयः ॥"

इस रूप में मायापुष्पक का उदाहरणश्रा प्रस्तुत किया है । इसी प्रकार श्रागे पता चलता है कि 'का० ३३' में फिर 'यथा मायापुष्पके' लिख कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया है ।

इन उदाहरणों से प्रतीत होता है कि यह नाटक है श्रोर रामचन्द्र की कथा को लेकर लिखा गया है । श्रभिनवभारती [ग्र० ११३ पृ० २१६, श्र० ११६ पृ० १७, श्र० २२२ पृ० १६७] में भी तीन बार इसका उल्लेख हुग्रा है, श्रोर कुंतक के 'वक्रोक्तिजीवित' का जो उदाहरण हम श्रभी 'कथ्याराक्षस'

की विवेचना (पृ० ३८) में दे ग्राए हैं उसमें भी 'मायापुष्पक' के नाम का उल्लेख है । किन्तु इस नाटक का कर्ता कौन है इसके विषय में कोई पता नहीं चलता है, श्रोर न यह नाटक श्रब तक प्रकाशित ही हुग्रा है ।

२५. यादवाभ्युदय—यह नाटक स्वयं नाटघदपंरााकार रामचन्द्र कवि का बनाया हुग्रा है । 'यथा वा ग्रस्मदुपज्ञ एव यादवाभ्युदये' लिख कर ग्रन्थकार ने श्रपने इस नाटक से सात स्थानों पर उदाहरण उद्धृत किए हैं । ग्रुम्थकार के परिचय के प्रसङ्ग में हमने उनके 'रघुविलास' नाटक के श्राग्रन्थ से जो उद्धररा दिया था

उसमें उनकी सर्वश्रेष्ठ पांच नाटकों में इस 'यादवामुदय नाटक' का भी नाम है । जैसा कि इसके नाम से ही प्रतीत होता है इसमें यहुवंशी कृष्ण के चरित्र का वर्णन है । कंस श्रोर जरासन्ध ग्रादि को मार कर ग्राज्ञ भारत पर कृष्ण के साम्राज्य का प्रदर्शन उसके काव्योपसंहार के निम्न श्लोक में दिखलाया है—

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श्रातो घोषपुत्राणां विगृह्य मद्रुजितु, कंसः क्षयं लम्भितः, समप्रत्येव विनिर्मितं मगधभूमितुः कवन्धं वधुः । पादाक्रान्तमजायतां दृभर्त तद् भूमिहि नः किं परं ? श्रेयोऽस्मादपि पाण्डवेश ! पुनरस्माश्रास्महे यद् वयम् ॥

[ नाट्यदर्पण १-६३ ]

यह नाटक यों तो स्वयं नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र की बनाई हुई है, किन्तु यहाँ तक ग्रनुपलब्ध और प्रकाशित है । श्रतः यहाँ उसका समावेश किया गया है ।

२६. रघुविलास—ग्रन्थकार के परिचय के प्रसंग में 'रघुविलास' का जो उद्धरण हम ऊपर दे चुके है उसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह 'रघुविलास' नाटक नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र की रचना कृति है, और वह उनके सर्वश्रेष्ठ पांच नाटकों में से एक है। नाट्यदर्पण में उन्होंने अपने इस नाटक के १४ उदाहरण दिए है। किन्तु दुर्भाग्य की बात है कि स्वयं नाट्यदर्पणकार का यह नाटक भी ग्राज तक ग्रनुपलब्ध तथा प्रकाशित नहीं हो सका है ।

२७. राघवाभ्युदय--'यादवाभ्युदय' के समान यह 'राघवाभ्युदय' नाटक भी नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र का ग्रपन्था बनाया हुआ हमारा नाटक है, और उनके सर्वोत्तम पांच नाटकों में गिनाया गया है । जैनसाहित्य संग्रह खं० १ ग्रं० २ की 'राघवाभ्युदय नाटकं' पं० रामचन्द्र कृतं १० ग्राद्धम्' इस टिप्पणी से प्रतीत होता है कि यह नाटक दस ग्राद्धों का बड़ा नाटक है । किन्तु अन्य कृतियों के समान ग्रब तक ग्रनुपलब्ध और प्रकाशित है।

२८. राघाविप्रलम्भम्--नाट्यदर्पण के प्रथम विवेक के ग्रंत में 'यथा भोज्जल- विरचते राघाविप्रलम्भे रासकाद्धे परिकर-परिणामयोः पक्षपातेऽपि गतवस्तुन तश्वबन्धः । एवं परस्परान्तर्भावि चतुरङ्गदीप कवापि सन्धिसन्धिर्भवति ।' इस रूप में ग्रन्थकार ने 'राघाविप्रलम्भ' को भोज्जल-कवि विरचित रासकाद्ध बताया है। इसका उल्लेख ग्रभिनवभारती में भी ग्राया है और वहां इसका एक श्लोक निम्न प्रकार उद्धृत किया गया है—

कल्पान्तैरपि नश्यन्ति न तु ते हि कलयन्ति येन । निर्हादो मुरजस्य मृदङ्गितरां वेष्टनस्वनपुरितः । वीर्यायाः कलयन्तु लयेन गमकानुग्राहिभिः मृदङ्गानां कर्षन्त्येषु तु कालकुठिततलया रसस्य रुद्धे ॥

[ग्रभिनवभारती दिल्ली संस्कररण पृ० २१४ ]

इसी पद्य को ग्रभिनवभारती के पंचमाध्याय में फिर 'भोज्जलनाम्ना निजरुपके उत्तम्' [प्र० १ पृ० २१४ प्र० ६] इस श्रवतरणिका के साथ उद्धृत किया है । 'शृङ्गारप्रकाश' में 'यथा रासकाद्धे' [प्र० ११, पृ० १६२] इन शब्दों में कदाचित इसी 'रासकाद्ध' का उल्लेख किया गया है ।

२९. रामाभ्युदय--नाट्यदर्पण में ग्रन्थकार के नाम का उल्लेख किए बिना ९ स्थानों पर 'रामाभ्युदय नाटक' के उदाहरण दिए गए है । इस नाटक के द्वितीयाङ्क से सीता के प्रति सुप्रीव की सन्देशोक्ति, मारोच, रावण और प्रहस्तका संवाद दिए गए है। चतुर्थ ग्रङ्क से सीता के ग्रभिन-प्रवेश ग्रादि 'परिप्रोहण' के उदाहरण में, सीता-परित्याग का ग्रभावमानन 'ढाल' के उदाहरण रूप में, माया-शिरोदेशन 'भारती' के उदाहरण में

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के लए के प्रवमर पर दिखलाए है। धन्यालोक [उद्योत ३, १३३] ध्वन्यालोकलोचन [उद्योत ३, १४८] शृङ्गार प्रकाश' [पृ० १२ १९६, २० ०], भावप्रकाशन' [पृ० ७, २०० २१२] ग्रादि में भी इस नाटक का उल्लेख पाया जाता है । ध्वन्यालोकलोचन [उद्योत ३. पृ० १४८] के उल्लेख से ही यह विदित होता है कि इस नाटक के कर्ता यशोवर्मा है। क्षेमेन्द्र के 'सुवृत्ततिलक' [२, ३९; ३, २१] तथा वल्लभदेव-संग्रहीत सुभाषितावली' [पृ० ६०४] में यशोवर्मा की कृतिस्प ये कुछ श्लोक उद्धृत किए गए है। वे सम्भवत इसी नाटक से लिए गए है । यशोवर्मा नाम के एक राजा कन्नौज में हुए है। उनका काश्मीरराज ललितादित्य से युद्ध हुमा था, और उम युद्ध में दशोवर्मा को पराजय का दुःख देखना पड़ा । उनके इस युद्ध का वसन 'राजतरंगिणी' में किया गया है—

कविवाक्पतिराजभवभूत्यादिसेवितः । जितो यथो यशोवर्मा तद्गुणैरस्तु तनूदरताम् ॥

[राजतरंगिणी त० ४, १४८]

'प्रबन्धभारती' श्रादि के निर्माता प्रभिनव गुप्त के लगभ २०० वर्ष पूर्व उनके पूर्वज कान्यकुब्जेश्वर यशोवर्मा के यहां रहते थे । इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद कामीर-नरेश बल्लदर्शनपूर्वक उनको अपने यहां लिवा ले गए थे । प्रभिनवगुप्त ने स्वर्यं अपने 'तन्त्रालोक' ग्रन्थ में इस घटना का वर्णन निम्न श्लोकों में किया है—

नित खवशास्त्रसदनं किल मध्यदेशः, तत्र स्मरजायत गुरुरास्यचिको द्विजन्मा । कोट्यधिकगुप्त इति नामनिर्कुतगोत्रः, शास्त्राविनीतविशदैकलोकोदयस्य गोत्रः ॥ तं जय ललितादित्यो राजा स्वर्क पुरमानयत् प्रणयादरमसात् काश्मीराख्यं हिमालयपृष्ठजम् ॥

[तन्त्रालोक, ग्र० २७]

इन यशोवर्मा के यहां विद्वानों का सग्रह था । कवि वाक्पतिराज, भवभूति श्रादि इन्हीं की राजसभा में रहते थे । सम्भव है इन्हीं यशोवर्मा ने इस 'रामाभ्युदय' नाटक की रचना की हो । यह नाटक भी अब तक उपलब्ध या प्रकाशित नहीं हुमा है ।

३०. रोहिणीमृगाङ्क— नाट्यदर्पण के प्रथम विवेक में 'मुखसन्धि' के 'परिण्यास' नामक तृतीय भङ्ग के निरूपण-प्रसङ्ग में—

'यथा वा प्रभमदुपगते रोहिणीमृगाङ्केऽभिधाने प्रकरणे मृगाङ्क' प्रति वसन्तः ।'

इस रूप में 'रोहिणीमृगाङ्क' नो नाट्यदर्पणकार ने स्वर्यं अपनी कृति घोपित किया है । ग्रन्थो फिर मुख सन्धि' के परिभाषना नामक १२ वें भङ्ग के उदाहररा रूप में भी 'रोहिणी- मृगाङ्क' प्रकरण से एक श्लोक उद्धृत किया है। पर यह 'प्रकरण' भी इस समय उपलब्ध नहीं है।

३१. वनमालानाटिका—'रोहिणी-मृगाङ्क' प्रकरण के समान 'वनमालानाटिका' भी स्वयं नाट्यदर्पणकार की कृति है । जैसा कि उन्होंने तृतीय विवेक में २१ वीं कारिका की व्याख्या में—'यथा वा प्रभमदुपगतया वनमालार्या नाटिकाया' धन शब्दों से व्यक्त किया है।

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'वृहत्रिप्पयो' ग्रोर उसके ग्राहार पर 'जैनप्रन्यावली' ग्रादि में [पृ० ३२६] इस वनमाला नाटिका को ग्रमरचन्द्र की कृति बतलाया है । किन्तु यह ठीक नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि रामचन्द्र के स्थान पर भूल से ग्रमरचन्द्र लिख दिया गया है। गयि-कान्तविजय के लिखे हुए 'प्राचीनग्रन्थ-सूचिपत्र' में तो 'प० रामचन्द्रकृत वनमालानाटिका श्लोक ५००' [पुरातत्व पु० २ पृ० ४, ४२४-४२६] इन शब्दों में 'वनमाला नाटिका' को रामचन्द्र की कृति ही बतलाया है। इस नाटिका का कवि केवल एक ही उदाहरण नाट्यदर्पण में दिया गया है, और वह राजा नल की दमयन्ती के प्रति उक्ति के रूप में है। इससे प्रतीत होता है कि उस नाटिका की रचना भी नल-दमयन्ती के चरित को लेकर की गई है। किन्तु यह नाटिका भी इस समय तक उपलब्ध या प्रकाशित नहीं हुई है।

(३२) विधिविलसितम्—नाट्यदर्पण के प्रथम विवेक में विमर्श संधि के लक्षण के प्रसंग [का० ३९] में 'विधिविलसितम्' का केवल एक उदाहरण निम्न प्रकार दिया है— 'डचुकी—हा धिक् कष्टम्, नैवोल्लसध्यै: प्राक्तनः कर्मविपाकः— वार्तादिप नैव यदि हास्ति स राजचन्द्रः: तेनोज्ज्वलता विधिविमोहितचेतनैः देवो ननो वितनोति न विमोक्षसामिमौषि:,, कतुं गता जगति सहृयमिति प्रवादः ॥'

इस उदाहरण की लक्षण के साथ योजन करते हुए नाट्यदर्पणकार ने लिखा है— "पत्र सूदाचारावलम्बिनी नले देवस्यक-दमन्यती-राज्यप्राप्तिविधनजो विमर्शः ।"

इस पंक्ति से स्पष्ट प्रतीत होता है कि नल-दमयन्ती के चरित्र को लेकर इस नाटक का रचना की गई थी। किन्तु इसका निर्माता कौन था इसका कुछ पता नहीं चलता। नाटक भी अब तक उपलब्ध तथा प्रकाशित नहीं हुग्रा है।

३३. विलक्बुधोजनम्—नाट्यदर्पण के प्रथम विवेक में 'प्रतिमुख-संधि के नवम भ्रंश 'पुष्ट' के उदाहरण [का० ४७] के श्लोक में— वाचा विलक्बुधोजनने—शीर्ष:— एन्त्ते हृदयं स्फुरति यदि वा साक्षी तर्व्वात्मजः;, सम्प्रत्येव तु गोग्रहे यदि भवतु तत् तावदान्त्यमान्तम् । एकः पूर्वमुदायुधः स बहुमिहँस्रस्ततो जन्तरं यान्तो वयमाहवप्रसक्तिनः तावन्त एवाजु नः ॥

इस एक उदाहरण के प्रतिरिक्त ग्रन्थ में कहीं भी 'विलक्बुधोजनम्' का नाम नहीं मिलता है। इस लिए यह नहीं कहा जा सकता है कि इसका कर्ता कौन है। यह नाटक ग्रब तक प्रकाशित भी नहीं हुग्रा है।

३४. सुषाकलशः—'नाट्यदर्पण' के द्वितीय विवेक में वीथी के 'मृदवम' नामक भ्रंश के निरुपण में 'यथा ग्रसदृशे सुषाकलशो' ग्रोर 'यथा सुषाकलशो' इन प्रवतरखिकाग्रों के साथ दो श्लोक उदाहरण रूप में प्रस्तुत किए हैं। ये दोनों ही श्लोक प्राकृत भाषा के हैं। इससे यह प्रतीत होता है कि यह 'सुषाकलश:' नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र की सुन्दर भाषामयी ग्रथवा प्राकृत-भाषा प्रधान कृति है। यह कोई नाटक या रूपक नहीं, प्रस्तुत् सुभाषित-संग्रह का ग्रन्थ है, यह बात जैन

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साहित्य संशोधक [बं० १ग्र० ।] के सुवाकालशः[अ]यसुभाषितकोष: पं० रामचन्द्रकृतः'इस लेख से प्रतीत होती है । पुरातत्व [पु० नं० ग्रं० ४, ४२४, ४२८] में 'पं० रामचन्द्रकृतः सुवाकालशः १३००' इस लेख से यह भी प्रतीत होता है कि इसमें १३०० श्लोक थे । इसमें प्राकृत श्लोकों की प्राधान्य थी । यह ग्रन्थ भी अब तक ग्रनुपलब्ध तथा ग्रनुपलब्ध है ।

३५. हृदप्रीतवन्धम्—'हृद्रीतबन्ध' संस्कृत साहित्य का अत्यन्त प्रसिद्ध ग्रन्थ है । इसके रचयिता भर्तृमेठ हैं । इनकी भी संस्कृत साहित्य में अत्यन्त प्रथांसा पाई जाती है । काव्यमीमांसा कार राजशेखर ने लिखा है—ग्रारम्भ में जो ग्रादि कवि वाल्मीकि थे, वे ही ग्रागले जन्म में भर्तृमेठ बने थे । उसके बाद भर्तृमेठ ने भवभूति के रूप में जन्म लिया ग्रोर ग्राज वे ही भर्तृमेठ 'राजशेखर' के रूप में उपस्थित हैं । इस प्रकार राजशेखर ने भर्तृमेठ के साथ-साथ अपनी भी प्रशंसा कर ली है । राजशेखर का श्लोक निम्न प्रकार है—

बसून् वल्मीकिभवः पुरा कविः, ततः प्रपेदे सुविभर्तृमेठताम् । तस्थितः पुनर्यो भवभूतिरेकया स वर्तते सम्प्रति राजशेखरः ॥

राजशेखर ने ही दूसरी जगह काव्यमीमांसा में यह लिखा है कि विदग्धा ग्रर्थात् उज्जयिनी नगरी में जाकर बड़े-बड़े महाकवियों की परोक्षा होती है कि कौन कितने पानी में है । उसमें जाकर ही कालिदास ग्रोर भर्तृमेठ की परोक्षा हुई । यहां जाकर ध्वनि, रूप, सूर ग्रोर भारवि का यश फैला, ग्रोर हरिश्चन्द्र तथा चन्द्रगुप्त की परोक्षा भी यहीं जाकर हुई । इन सब कवियों में कालिदास, भर्तृमेठ तथा भारवि तीन तो प्रसिद्ध कवि हैं ग्रेष ग्रत्यन्त ग्रप्रसिद्ध कवि हैं । फिर भी ग्रपने समय में उज्जयिनी में उसका ग्रपना कुछ विशेष गौरव रहा होगा ।' राजशेखर का यह श्लोक निम्न प्रकार है—

कालिदास-भर्तृमेठ-ग्रारामर-रूप-सूर-भारवेः । हरिचन्द्र-चन्द्रगुप्तौ परोक्षितविह विशालायाम् ॥

राजशेखर भर्तृमेठ के बड़े भक्त ग्रोर प्रशंसक थे । यह बात इन ऊपर उद्धृत दिए हुए दोनों श्लोकों से स्पष्ट प्रतीत होगी । जल्हण की संग्रृहीत 'सूक्तिमुक्तावली' में भी राजशेखर के नाम से एक पद्य मिलता है, जिसमें राजशेखर ने भर्तृमेठ की सूक्तियों की तुलना 'सुधा' अर्थात् हार्थी को हांकने वाले प्रकुश से ग्रोर कवियों की तुलना कुंजर से ग्रर्थात् हाथी से की है । राजशेखर का कहना है कि जैसे 'सुचि' के लगने पर हाथी का सिर घूमने लगता है इसी प्रकार भर्तृमेठ की सूक्तियों को पढ़ कर कविकुंजर ग्रर्थात् महाकवियों के सिर घूमने लगते हैं । ग्रपनी इस सुन्दर कल्पना को उन्होंने श्लोक में निम्न प्रकार व्यक्त किया है—

वकोकृत्या मेठराजस्य वह्नुत्या सुचिश्रितताम् । ग्रादिद् इव घुनन्ति सूरयः कविकुंजराः ॥

वांग्मयर-पद्धति में भी भर्तृमेठ के नाम का उल्लेख निम्न श्लोक में पाया जाता है— भासो रामिल-सोमिल्लो वररुचिः श्री साहसाङ्कः कविः मेठो सारवि-कालिदास-तनया स्कन्धः सुभाषितुच या ।

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दण्डी वाण-दीवाकरो गणापतिः कान्तश्च रत्नाकरः । सिद्धा यस्य सरस्वती रसवती के तस्य सर्वेऽपि ते ॥

[शृङ्गारपद्धति १५५]

कवि पद्मगुप्तने भी—जिनका दूसरा नाम परिमल भी था—'नवसाहसाङ्कचरित' नामक अपने ग्रन्थ में भर्तृमेठ का स्मररण बड़े श्रादर के साथ करते हुए उनकी प्रशंसा-सूचक निम्न दो इलोक लिखे हैं—

तत्त्वस्पृशाति कवयः पुराणाः श्री भर्तृमेठः प्रभुखा जायन्ति । निःश्वासवारासहशेन येषां वैदर्भमागेण गिरः प्रवृत्ताः ॥

[नवसाहसाङ्कचरित ५]

भर्तृमेठ सदृश कवि संसार में सर्वोत्कर्षवाली हैं जिनकी वाणी तलवार की धार के समान वैदर्भी रीति का श्रवलम्बन करके प्रवाहित होती रहती है । इस पद्य में भर्तृमेठ के काव्य में वैदर्भी रीति की प्रभानता सूचित करते हुए उसकी अत्यन्त प्रशंसा श्रोर उसके प्रति श्रादर भाव को प्रकट किया गया है ।

उन्हीं पद्मगुप्त ने भर्तृमेठ की प्रशंसा में दूसरा इलोक निम्न प्रकार लिखा है—

पूरनोद्विम्बादपि सुन्दराभि-, स्तेऽपि मदूरेः पुरतो यशांसि । ये भर्तृमेठादिकवीन्‍द्रसूक्ती-

व्यत्कोपदिष्टेन पथा प्रयान्ति ॥

[नवसाहसाङ्कचरित ६]

श्रथवा जो नवीन कविगण भर्तृमेठ जैसे कवीन्द्र की सूक्तियों द्वारा स्पष्ट रूप से उपदिष्ट मार्ग पर चलते हैं, श्रथवा भर्तृमेठ के समान वैदर्भी रीति का श्रवलम्बन करते हैं । उनको शीघ्र ही पूर्वजमा के चन्द्रमा से भी श्राधिक सुन्दर यश प्राप्त होता है ।

इस प्रकार हम देखते हैं कि न केवल राजशेखर ही भर्तृमेठ के प्रशंसक है, श्रपितु पद्मगुप्त भी उनके वैसे ही भक्त श्रोर प्रशंसक प्रतीत होते हैं । 'सूक्तिमुक्तावली' तथा 'शृङ्गारपद्धति' भी भर्तृमेठ का गुण-गान कर रही है ।

इन्हीं प्रसिद्ध कविराज भर्तृमेठ ने 'हयग्रीववध' नामक महाकाव्य की रचना की थी । 'उत्तररामचरिति' में ऐसी कथा दी हुई है कि भर्तृमेठ श्रपने काश्मीर के इतिहास 'राजतरङ्गिणी' में 'हयग्रीव वध' नामक नव-निर्मित महाकाव्य को लेकर काश्मीराधिपति मातृगुप्त के यहाँ गए ।

वहाँ उन्होंने श्रपना सारा महाकाव्य राजा को सुनाया, पर वहाँ उन्हें एक बार साधुवाद प्राप्त नहीं हुश्रा । तब उनको राजा की श्रर-सिकता श्रोर श्रपने कवित्व दोनों पर बड़ी श्रलानि हुई ।

वे श्रपनी पुस्तक-पत्रे बाँधने लगे तो राजा ने उठकर एक सोने का पात्र उसके नीचे लगा दिया कि कहीं इस काव्य का माधुर्य नीचे न बिखर जाय ।

भर्तृमेठ राजा के हृदय का भाव समभ कर श्रत्यन्त प्रसन्न हुए, श्रोर उन्होंने श्रनुभव किया कि मुझे मेरी रचना के श्रनुरूप श्रादर प्राप्त हो गया ।

इससे श्रपने को कृतकृत्य समभ कर बाद में राजा ने उनको जो घनादि दिया वह सब उनको श्रनावश्यक सा प्रतीत हुश्रा ।

राजतरङ्गिणीकार ने इस सुन्दर घटना का उल्लेख निम्न प्रकार किया है—

हयग्रीववधं श्रेष्ठतदग्रे दर्शयन्तं नबमम् । श्रास्मान्नित ततो नापितं साधु साध्विति वचः ॥

ग्रन्थं ग्रन्थितु तत्स्मिन पुस्तकं प्रस्तुते न्यषात् । लावण्यनिर्यातधिया तदग्रः स्वयं भाजनम् ॥

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ग्रन्थरत्नतया तस्य ताहश्या कृतसकृतिः । सतां मेठः कविमणे पुनरुक्तं श्रियोर्युगम् ॥ [राजतरंगिणी त० ३, २६०-२६२]

काव्यप्रकाश की ‘बालबोधिनी’ टीका में वामनाचार्य ने [पृ० ४४१] हयग्रीववध को नाटक बतलाया है। मैसूर से ‘राजकीय ग्रन्थमाला’ में प्रकाशित काव्यप्रकाश में भी ‘हयग्रीववध’ का नाटक रूप में ही उल्लेख किया गया है। इसी कारण हमने भी अपनी काव्य प्रकाश की टीका में नाटक रूप में ही उसका निर्देश कर दिया है। किन्तु ‘श्रृंगारप्रकाश’, ‘काव्यानुशासन’ ग्रादि प्राचीन ग्रन्थों से विदित होता है कि यह नाटक नहीं, ग्राप्तु ‘सर्गबन्ध’ महाकाव्य है। हेमचन्द्राचार्य के ‘काव्यानुशासन’ में [पृ० ३३७] ‘संस्कृतभाषानिबद्धसर्गबन्धं हयग्रीववधादि’ लिख कर ग्रन्थकार ने इसे स्पष्ट रूप से श्रव्य काव्य ही सूचित किया है। भोजदेव के ‘श्रृंगारप्रकाश’ में भी ‘हयग्रीववध’ का ग्रनेक स्थानों पर उल्लेख ग्राया है। वहाँ भी इसे महाकाव्य ही माना है। ‘श्रृंगारप्रकाश’ के कुछ स्थल, जिनमें ‘हयग्रीववध’ की चर्चा की गई है निम्न प्रकार हैं—

"हयग्रीववधादयो महादेवादीनामितिहासकचरितमवे यन्ति ।" [श्रृंगारप्रकाश प्र० १२, पृ० १६६]

"ग्रासीद दैत्यो हयग्रीव:......." [श्रृं० प्र० ११, पृ० १४६]

रात्रिकरिणां किरातगुज्‍यो—कुमारसम्भव-शिशुपालवध-हयग्रीववधादि ।" [श्रृंगारप्रकाश प्र० ११, पृ० ११२]

यस्मिन्नितिहासार्थानुपेतश्लाघानां पेशलानां कविः कुरते । स हयग्रीववधादिप्रबन्ध इव सगम्बन्धः स्यात् ॥" [श्रृंगारप्रकाश प्र० पृ० ११६]

कवि क्षेमेन्द्र ने ‘सुवृत्त तिलक’ [३, १६] में सर्गबन्ध महाकाव्य के श्रारम्भ में श्रतुष्टुप के प्रयोग का उदाहरण देते हुए हयग्रीववध का ‘ग्रासीत् दैत्यो हयग्रीवः’ इत्यादि पद्य उद्धृत किया है। इससे भी प्रतीत होता है कि ‘हयग्रीववध’ नाटक नहीं, काव्य है। श्री मल्लिक कवि ने ग्रपने ‘श्रीकृष्णचरित’ में श्रत्यान्त श्रद्धा के साथ भर्तृमेठ कवि का उल्लेख करते हुए लिखा—

मेठे स्वर्द्धिरदाधिरोहिहि, वंशं याते सुबन्धो विग्रेथे: शान्ते हन्ति श भारवौ, विषयटिते बाणो विवादस्पृशा: । वाग्देव्या विरमन्तु यत्र विधुरा द्राग् हयग्रीवचेष्टिते शिष्य: कञ्चन स प्रसादयति तं वह्नाग्निसदृशागिरा ॥

ऐसे महाकवि थे भर्तृमेठ, जिनका यशोगान संस्कृत साहित्य के ग्रनेक कवियों ने मुक्तकण्ठ से किया है। किन्तु काव्यप्रकाशकार मम्मट की दृष्टि में मेठकवि जँचे नहीं। उन्होंने दो तीन जगह मेठकवि का उल्लेख किया है पर वह प्रशंसा-वयंजक नहीं है। सबसे पहले काव्यप्रकाश के प्रथम उल्लास में उन्होंने सबसे निकृष्ट चित्र काव्य का जो उदाहरण दिया है वह हयग्रीववध में से खोज कर निकाला है—

विनिगर्तं मानदमास्मन्मनन्दराद भवत्युपश्रुत्त्य यहच्छ्यापि यम् । स-संश्रमेन्द्रद्रुतपातितार्ङ्गला निमोलिताक्षीव भियामरावती ॥

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यह श्लोक टीकाकारों के मतानुसार भट्टभेण्ठ के 'हयग्रीववध' से लिया गया है। श्लोक में कवि ने यह भाव प्रस्तुत किया है कि जिस समय हयग्रीव अपने प्रासाद से केवल घूमने के लिए ही निकलता था और उसका समाचार यदि इन्द्र को पता चल जाता था तो इन्द्र इतना भयभीत हो उठता था कि सैकड़ों नौकर-चाकरों के होते हुए भी भाग कर अपनी नगरी अमरावती का फाटक बन्द कर देता था, और उस फाटक के बन्द होने पर कवि यह उत्प्रेक्षा करता है कि मानो हयग्रीव के डर के कारणा अमरावती नायिकां अपनी शय्या पीठ दे रही है।

हयग्रीव के प्रभावातिशय का वर्णन कवि ने कितने सुन्दर ढंग से किया है। नगरी का द्वार बन्द करने के लिए इन्द्र की उत्तावली, अमरावती के भय से ग्रांख मींचने की उत्प्रेक्षा, इस पद्य में कुछ चमत्कार दिखला रही हैं। पर काव्यप्रकाशकार ने उसे प्रथम काव्य की कोटि में रखा है।

जैसा कि ऊपर पृष्ठ ५० पर उद्धृत श्रृंगारप्रकाश के उद्धरण से विदित होता है कि 'हयग्रीववध' में महादेव के ऐतिहासिक चरित का वर्णन किया गया है, हयग्रीव इसमें प्रतिनायक है। 'शिशुपालवध' आदि के समान इस काव्य का नामकरण भी नायक नहीं अपितु प्रतिनायक के नाम पर हुमा है। इसके नायक महादेव हैं। उनके द्वारा हयग्रीव का वध इसमें दिखलाया गया है। किन्तु उसके वध के पूर्व हयग्रीव के प्रतापातिशय का वर्णन बहुत विस्तार के साथ किया गया है। इसलिए काव्यप्रकाशकार ने रसदोषों के प्रसंग में 'ग्रंथस्याप्यतिविस्तृति:'

दोष के उदाहरण रूप में फिर 'हयग्रीववध' का ही उल्लेख किया है।

"ग्रंथस्याप्यतिविस्तरेण वर्णनं यथा हयग्रीववधे हयग्रीवस्य ।"

[काव्यप्रकाश, ज्ञानमण्डल सं० पृ० ३६२]

इन सब उल्लेखों से प्रतीत होता है कि काव्यप्रकाश मम्मट की दृष्टि में हयग्रीववध एक नितान्त निम्न श्रेणी की कृति है। हमारे प्रस्तुत नाटच दर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र मम्मट के इस विचार से सहमत नहीं हैं। मम्मट ने हयग्रीव के जिस प्रतिशय वर्णन को रस दोष माना है, रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने उसे दोष न मान कर रस का उत्तर्षाधायक गुण माना है। उनके मत में हयग्रीव के प्रतिशय वर्णन को यदि दोष ही कहा जाय तो वह 'वृत्तदोष' अर्थात् कथा का दोष हो सकता है, रस का दोष नहीं हैं। रस की दृष्टि में तो वह वर्णन वीररस का उत्तर्षाधायक ही है।

इसी प्रसंग में 'नाटचदर्पण' में केवल एक बार हयग्रीववध का उल्लेख नाट्यप्रपंचकार ने किया है। मम्मट ने जिसे 'ग्रंथस्याप्यतिविस्तृति' दोष कहा है उसे नाट्यदर्पणकार ने 'वृत्यारवणा' से जटायुबध, 'ब्रज्ञीग्य' नाम से निर्दिष्ट किया है। इसके उदाहरण रूप में उन्होंने 'कृत्यारवणा' से जटायुबध, लक्ष्मण-शक्तिमेद, सीताविपत्ति-श्वशुरा आदि से उत्पन्न वार-वार कथन रस के प्रतिशय को प्रस्तुत किया है, और उसके बाद काव्यप्रकाशकार के मत का खण्डन करते हुए उन्होंने लिखा है—

"केचिदच हयग्रीववधे हयग्रीववर्णनमुदाहरन्ति। स पुनव तदोषो वृत्तनायक-स्थायिप्रवर्णनात्। तत्र हि वीरो रसः, स विशेषतो वध्यस्य शौर्यवीर्यविमूत्यादिवर्णनेन भूष्यते ।"

[नाट्यदर्पण ३-१३]

अर्थात [काव्यप्रकाश कारकादि] कुछ लोग 'हयग्रीववध' में हयग्रीव के वर्णन को इस 'ब्रज्ञीग्य' के उदाहरण रूप में प्रस्तुत करते हैं, किन्तु वह वृत्त- अर्थात कथा भाग का दोष है, क्योंकि 'हयग्रीववध' में कम किया गया है। वह रस का दोष नहीं है। क्योंकि उस कथा के नायक का वर्णन उसमें कम किया गया है। वह रस का दोष नहीं है । क्योंकि उस कथा के नायक का वर्णन कम किया गया है। 'हयग्रीववध' का मुख्य रस वीर रस है, और वध्य के शौर्य, वीर्य, विभूति आदि के प्रतिशय वर्णन से उस मुख्य वीर रस का उत्तर्षाधान ही होता है, नापकर्ष नहीं । इसलिए हयग्रीव का प्रतिशय वर्णन रस दोष नहीं कहा जा सकता है। यह नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र की सम्मति है।

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भतृंमेठ अपनी रसवती रचना के लिए ही तो इतने प्रसिद्ध है। यदि वे मम्मट के अनुसार केवल ग्रन्थम चित्रकार्य के निर्माता होते तो क्या उन्हें इतनी प्रसिद्धि प्राप्त हो सकती है ? भ्रोर क्या राजशेखर जैसे मनस्वी कवि का सिर जो कि ग्रपने को वाल्मीकि का प्रवतार मानता है भतृंमेठ के सामने श्रद्धा से झुक सकता था । भ्रोर क्या उस नीरस ग्रन्थम काव्य को सुनकर ही 'ग्राविढा इत घुन्वन्ति मूद्रान् कविकुञ्जर:' की उक्ति चरितार्थ हो सकती थी ? ये सब उक्तियाँ भतृंमेठ की इस महती रचना की ग्रपूर्व रसवत्ता की परिचायिका हैं । मम्मट ऐसे ग्रालोचक हैं, जो अपनी 'दोषहष्टि' के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध या बदनाम है । ग्रपनी इसी 'दोष हष्टि' के कारण 'हयग्रीव वध' में उन्हें सर्वत्र दोष ही दोष दिखाई दिए हैं । पर राजशेखर,पचशुप्त, विल्हण ग्रादि ग्रन्य कवियों एवं ग्रालोचकों की हष्टि में भतृंमेठ एक 'रससिद्ध: कवेश्वर:' है । ऊपर 'राजतरंगिणी' से मतंगुप्त तथा भतृंमेठ की जिस कथा का उल्लेख किया गया है वह भी इसी बात की पुष्टि करती है । 'लावण्यनिर्यूधिया तदध: स्वर्णाभाजनम्' की बात भी तो हयग्रीववध की प्रतिशय रसवत्ता को ही सूचित कर रही है । बदौदा से प्रकाशित 'उदय सुन्दरी कथा' में उसके निर्माता कायस्थ कवि सोड्ढल ने भी तो भतृंमेठ की इस 'रससिद्धता की प्रंशसा करते हुए लिखा है—

'स कविचदालेखयकर: कविते: प्रसिद्धनाम्रा सुविभ भतृंमेठ: । रस्प्लवेऽपि स्कुरति प्रकाशं, वर्णोऽपु यस्योज्ज्वलता तथैव ॥'

इस प्रकार के बहुप्रसिद्ध,बहुचर्चित ग्रोर बड़े बड़े कवियों के श्रद्धाभाजन भतृंमेठ की एकमात्र कृति को ग्रन्थम काव्य की श्रेणी में रखना ग्रोर उससे रसदोषों का ग्रनुसन्धान करना मम्मट की केवल दोषहष्टि की विशेषता को ही प्रस्थापित करता है । भतृंमेठ तो ग्रब भी 'कविच्चिदालेखयकर: कविते:'—कविता के ग्रपूर्व चित्रकार हैं । जिसके चित्र में 'रस्प्लवेऽपि' रस का प्रवाह भरा होने पर भी, ग्रोर दूसरे पक्ष में पानी पड़ जाने पर भी 'स्कुरति प्रकाशं' प्रकाश में वर्णोऽपु यस्यो-ज्ज्वलता तथैव' बर्णों की, ग्रोर दूसरे पक्ष में चित्र के रंगों की चमक वैसी ही बनी रहती है तनिक भी मलिन नहीं हो पाती है ।

उपसंहार

यह ३५ नाटकों ग्रोर काव्यों का परिचय हमने यहां उपसिथत किया है । इन ग्रन्थों का उल्लेख संस्कृत साहित्य के ग्रनेकनेक ग्रन्थों में पाया जाता है । ग्र्राज से ५०० वर्ष पूर्वं १२वीं शाताब्दी में नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र के समय में ये ग्रन्थ उपलब्ध थे । ग्रन्थकार ने उनमें से ग्रनेक उद्धरणा स्वयं दिए हैं । परन्तु ग्र्राज तक ये ग्रन्था प्रकाशित नहीं हुए हैं । सम्भवतः उपलब्ध भी नहीं हुए हैं । ग्रन्थथा उनका प्रकाशन ग्रवश्य होता । इतने सुप्रसिद्ध एवं महस्वपूर्ण ग्रन्थों का इस ५०० वर्ष के बीच में सर्वथा लोप हो जाना ग्राश्चर्य की बात है, या फिर उनकी ग्रब तक उपलब्ध न होना हमारे प्रमाद की सूचक है । नाट्यदर्पणकार ने इन महस्वपूर्ण ग्रन्थों का नाम ग्रोर परिचय हमको दिया, इसके लिए हम उनके कृतज्ञ हैं । ग्रब इनकी खोज करना ग्रोर उनके प्रकाशन की व्यवस्था करना हमारा काम है । ग्राशा है विद्वज्जन इस दिशा में विशेष रूप से प्रयत्न करेंगे ताकि उनकी उपलब्धि सर्वसाधारणा को हो सके ।

बसन्त पञ्चमी, सं० २०१७ जनवरी १६५९

विद्वद्वेवर सिद्धान्तशिरोमरिण ग्राचार्य गुरुकुल विशवविद्यालय वृन्दावन

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सम्पादकीय

(क) नाट्यदर्पण में रूपकeter काव्यशास्त्रीय प्रसंग

नाट्यदर्पण ग्रन्थ का नाम के ग्रन्थरूप नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थ है, जिसे ग्रन्थकारों ने चार विवेकों में विभक्त किया है । इन्होंने रूपक के दश भेदों में नाटिका श्रौर प्रकरणी को जोड़कर इसके कुल बारह भेद स्वीकार किये हैं । इन जैन लेखकों ने इतनी संख्या शायद इसलिए गिनायी है कि 'जैनी' वाणियों के भी १२ रूप माने गये । ग्रन्थ के प्रथम विवेक में 'नाटक' नामक प्रथम रूपक-भेद का स्वरूप एवं विवेचन प्रस्तुत किया है श्रौर द्वितीय विवेक में 'प्रकरण' श्रादि बोस ग्यारह भेदों का । तृतीय विवेक में रसवृत्ति, रस, रस-दोष तथा प्रभिनय का विवेचन है तथा चतुर्थ विवेक में रूपकोपयोगी अन्य सामग्री का, जिसके अन्तर्गत नायक-नायिका भेद को भी स्थान मिला है । इस प्रकार इस ग्रन्थ में रूपक-सम्बन्धी प्रचलित सामग्री को एकत्र निरुपित, व्यवस्थित एवं विवेचित किया गया है । कलेबर की दृष्टि से सर्वाधिक स्थान ग्रन्थ के प्रमुख विषय रूपक को ही मिला है । इस दृष्टि से दूसरा स्थान रस का है श्रौर तीसरा स्थान नायक-नायिका भेद का । उन्त विषयों के श्रतिरिक्त इस ग्रन्थ में कतिपय अन्य विषयों पर भी प्रासंगिक रूप से प्रकाश पड़ गया है, जैसे—काव्यप्रयोजन, काव्यहेतु, कवित्व-नहिमा, श्रलंकार, वक्रोक्ति, श्रौचित्य, ग्रनौचित्य, दोष श्रादि । इस लेख में रूपक के श्रतिरिक्त प्रायः सभी प्रसंगों पर ग्रन्थकारों का हृष्टिकोण प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाएगा ।

१. काव्यप्रयोजन

इस ग्रन्थ में काव्यप्रयोजन-प्रसंग को स्वतन्त्र स्थान नहीं मिला । ग्रन्थ के निम्नोक्त मंगलाचरण—

चतुर्वर्गफलां नित्यां जैनीं वाचमुपास्महे । रूपद्दीपादिविवैव यत्र स्त्री पुम्प्रपंच्यते ॥

—में ग्रन्थकारों ने 'जैनी' वाणी की उपासना करते हुए इसे चतुर्वर्ग-फल-प्रदायिनी कहा है श्रौर अपनी वृत्ति में इस फल को श्रभिनेय वाक्य श्रर्थात् हृयकाव्य के साथ भी सम्बद्ध किया है । इस सम्बन्ध में उनका मतव्य इस प्रकार है :

१. हृश्य काव्य द्वारा धर्म, श्रर्थ श्रौर काम ये तीनों फल तो प्राप्त होते ही हैं, इससे मोक्ष-प्राप्ति भी होती है ।

२. मोक्ष-प्राप्ति का एक कारण तो यह है कि इससे सद्‌गृह्य को शिक्षा मिलती है कि रामादि के समान श्राचरण का ग्रहण करना चाहिए श्रौर रावणादि के समान श्राचरण का त्याग । दूसरा कारण यह है कि धर्म नामक पुरुषार्थ की स्वीकृति कर लेने पर इसके द्वारा परम्परा-रूप से मोक्ष-प्राप्ति भी सम्भव है । 'हाँ मोक्षप्राप्ति रूप फल धर्म की श्रपेक्षा गौण फल होता है ।'

१. श्रथाभिनेयवाक्यपरतया इलोकोडयं व्याख्यायते । यद्यपि साक्षाद् धर्मार्थकामफलान्येव नाटकादीनि तथापि 'रामवत् वर्त्तितव्यं न रावणवत्' इति हेयोपादेयहानोपादानपरतया, धर्मस्य च मोक्षहेतुतया मोक्षोडपि पारम्पर्येण फलम् । —हिन्दी नाटचदर्पण पृष्ठ ११

२. मोक्षस्तु धर्मकार्यत्वाद् गौणं फलम् । —वही, पृष्ठ २१

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३. 'जैनी' वाणी के ग्रनुरूप काव्य के द्वारा भी इन पुरुषार्थों में से रचयिता श्रयथवा पाठक को वही फल प्रधानता से प्राप्त होता है जो उसे श्राभीष्ट होता है श्रोर शेष फल उसे गौण रूप से मिलते हैं ।१

४. 'जैनी' वाणी से तात्पर्य काव्य-नाटक भी लिया जा सकता है, क्योंकि यह वाणी (रचना) भी 'जिनों' श्रर्थात् राग श्रादि के विजेताओं—काव्यनाटककारों—की होती है ।२

काव्यप्रयोजनों में पुरुषार्थचतुष्टय को सर्वप्रथम भामह ने स्थान दिया था श्रौर इनके उपरान्त रुद्रट श्रौर कुन्तक ने । भामिनपुराणकार ने मोक्ष को छोड़ कर शेष त्रिवर्ग को ही काव्य-प्रयोजन माना था । रामचन्द्र-गुणचन्द्र के उपरान्त विश्वनाथ ने भी पुरुषार्थ-चतुष्टय को काव्य-प्रयोजन के रूप में स्वीकार किया । इन चारों में से श्रर्थप्राप्ति ऐसा प्रयोजन है, जिस पर कोई विवाद नहीं किया जा सकता । 'धर्म' से तात्पर्य यदि 'वार्यंते इति धर्म:' श्रर्थात् शुभ कर्तव्य का पालन है, तो यह काव्य का साक्षात् प्रयोजन न होकर प्रकाशात प्रयोजन है । कर्तव्य वस्तुतः उस कर्म का नाम है जिसे हम दूसरों की प्रेरणा श्रथवा उपदेश द्वारा करते हैं तथा दूसरों के उपकार के लिए करते हैं, किन्तु काव्य-सर्जन ग्रन्थ:प्रेरणया न तो दूसरों की प्रेरणा श्रथवा उपदेश की श्रपेक्षा रखता है श्रौर न इसके द्वारा दूसरों का उपकार करना कवि का प्रमुख उद्देश्य होता है । श्रौर यदि 'धर्म' से तात्पर्य 'पुण्यफल-प्राप्ति' लिया जाए तो इसे श्राज के बुद्धि-वादी युग का मानव स्वीकार नहीं करेगा । ठीक यही स्थिति 'मोक्ष' नाम काव्यप्रयोजन की भी माननी चाहिए, क्योंकि सत्य श्रथकारों ने धर्म श्रौर मोक्ष को कार्य-कारण सम्बन्ध स्वीकार किया है । शेष रहता है एक पुरुषार्थ—'काम' श्रर्थात् श्राभीष्ट फल की प्राप्ति । 'काम' शब्द से यदि मानवीय रागात्मक भावों की इच्छापूर्ति यह श्रभिप्राय लिया जाए तो इसे प्रलौकिक श्रानन्द-प्राप्ति का पर्याय मान सकते हैं जिसे मम्मट ने 'सद्य:परनिर्वृति' नाम दिया है । वस्तुतः यही फल काव्य का प्रमुख श्रौर श्राभीष्ट प्रयोजन है । किन्तु नाट्यदर्पण में इसे स्पष्ट शब्दों में स्थान नहीं मिला ।

इस ग्रन्थ के इस प्रसंग में उपयुक्त एक विशेषता उल्लेखनीय है कि जो सहृदय जिस फल-प्राप्ति के लिए काव्य-निर्माण श्रथवा काव्य-पठन करता है उसे वही फल तो प्रमुख रूप से मिलता है श्रौर शेष फल गौण रूप से । निस्सन्देह उनकी यह धारणा श्रन्थ काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में देखने को नहीं मिलती । किन्तु 'याहश्री भावना यस्सु सिद्विभंवति ताहश्री' इस कथन पर भी श्राज का बुद्धिवादी मानव पूर्णास्था एवं विश्वास नहीं रखता । दूसरी उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इन्होंने काव्य-नाटक की रचना को भी 'जैनी' वाणी इसलिए कहा है कि यह राग श्रादि के विजेताओं की वाणी होती है । ग्रन्थकारों ने यद्यपि श्लेष के बल पर हरि पर ही यह खेंचतान करने का प्रयास किया है, किन्तु उनकी यह धारणा निस्सन्देह मान्य है । काव्य-नाटक प्रयोता इनके प्रभावान के समय सांसारिक राग-द्वेष, सुख-दुःख, लाभ-हानि श्रादि इनसे ऊपर उठ चुका होता है । चित्त की एकाग्रता के बिना वह कवि-कर्म भी नहीं कर सकता । समाधि की ग्रवस्था श्रथवा वेदान्तरसंस्पर्शवूनूयत्ता इस कर्म के लिए नितान्त श्रावश्यक है । तटस्था इस कर्म की ग्राह्याराशिला है । यही कारण है कि किसी उद्देश्य को लक्ष्य में रख कर रचित ग्रन्थ श्रथवा काव्य-नाटक वास्तविक 'काव्य' कहाने के श्रधिकारी नहीं होते । ऐसे काव्यों से साम्प्रदायिकता श्रथवा 'प्रापेगण्ड' के दुराग्रह की लपटें उठा करती हैं ।

१. इष्टलक्ष्यात्मकवाच्च फलस्य यो यस्स पुरुषार्थोऽभिष्टः स तस्य प्रबन्धम् । —वही, पृष्ठ ६

२. जिनानां रागादिजेतृणां लक्षणप्रयोजनापेक्षयैव 'जैनी' । —वही, पृष्ठ ११

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२. काव्यहेतु

संस्कृत काव्यशास्त्रियों में से जिन्होंने काव्यहेतुओं का निरूपण किया है उनमें से दण्डी वामन, रुद्रट, कुन्तक और मम्मट का नाम उल्लेख्य है। मम्मट ने पूर्ववर्ती काव्यशास्त्रियों का सारग्रहण करते हुए केवल तीन काव्यहेतु निर्दिष्ट किये थे—शक्ति, निपुणता और अभ्यास। उन्होंने स्पष्ट संकेत नहीं किया। धन्वारास्र में काव्यनाटच-निर्माण नाटचदर्पण के रचयिताओं ने इस ओर स्पष्ट संकेत किया। उनका कहना है कि 'जो कवि निर्धन से लेकर राजा तक की 'श्रोचिती' पर चलता-सा प्रकाश डालते हुए वे कहते हैं कि उनके सामान्य व्यवहार से ग्रविभूत न होते हुए भी काव्य-निर्माण की कामना करते हैं, वे विद्वज्जनों के उपहास के पात्र बनते हैं।

नारडाद् भूपांत यावदौचितीं न विदन्ति ये । सुहृदयन्ति कवित्वाय, खेलनं ते सुमेधसाम् ॥ ११३

तथा जो नाटककार न तो गीत, वाद्य, नृत्य प्रभृति जानते हैं, न लोकस्थिति से परिचित हैं, और न प्रवन्धों प्रभृति नाटकों का प्रभिनय ही कर सकते हैं वे भी नाटक-रचना करने के श्रधिकारी नहीं हैं —

न गीतवाद्यनृत्यता:, लोकस्थितिविविदो न ये । प्रभिनेतु च कवितुं प्रवन्धान्ति बहुधा: ॥ ११४

उपयुक्त दोनों पद्यों में दो काव्यहेतुओं की प्रकारान्तर से चर्चा हुई है : गीत, वाद्य, वृत्त (नृत्य) प्रभिनय प्रभृति का क्रियात्मक ज्ञान तथा रंक से राजा-पर्यन्त लोक-व्यवहार से परिचित। इन दोनों हेतुओं को रुद्रट और कुन्तक के शब्दों में प्रभ्रंश सीमा तक 'श्रौचित्य' कह सकते हैं और मम्मट के शब्दों में 'निपुणता'। पूर्वसीमा तक इसलिए नहीं कि इन श्राचार्यों ने 'श्रौचित्य' और 'निपुणता' के ग्रन्थर्गत लोक-व्यवहारज्ञान के अतिरिक्त काव्यग्रन्थों एवं काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों का पठन-पाठन भी सम्मिलित किया है। ग्रस्तु ! रामचन्द्रगुणचन्द्र के उपयुक्त कथन से यह न समझना चाहिए कि उन्हें केवल 'व्यवहार-ज्ञान' को ही काव्यहेतु मानना प्रभृष्ट होगा और शेष दो को, प्रतिभा और अभ्यास को, नहीं। जैसे कि ऊपर कहा ग्राखे है उनका उद्देश्य काव्यहेतुओं का निरूपण करना नहीं था, केवल कवित्व-महिमा प्रकारणमात्र में उन्होंने इस प्रसंग की चर्चा-मात्र कर दी है। निस्सन्देह शक्ति नहीं था, केवल कवित्व-महिमा प्रकारणमात्र ही उनका उद्देश्य था, और लोकज्ञान तथा इसके साथ साथ 'ग्रभ्यास' श्रथवा प्रतिभा काव्य-रचना का श्रनिवार्य हेतु है, श्रौर लोकज्ञान तथा इसके साथ साथ 'ग्रभ्यास'

प्रतिभासदृश हेतु:, श्रुप्तवच्यास्यासाभ्या संस्कार्या । —काव्यानुशासन (हेमचन्द्र), पृष्ट ६

३. कवित्व-महिमा

विद्वज्जनों को शास्त्रज्ञान के साथ कविकर्म में भी निपुण होना चाहिए, इस सम्बन्ध में इस ग्रन्थ में इन शब्दों में चर्चा की गयी है—जिस प्रकार लावण्य नारी का प्राप्त है उसी प्रकार कवित्व सफल विद्यार्थ्यों का प्राप्त है। यही कारण है कि तीनों वेदों के ज्ञाता विद्वानों में भी कवित्व-निर्माण की प्रतिभा रखते हैं। सत्य तो यह है कि कवित्व-निर्माण का प्रभाव ऐसा है जैसे कि नासिका के ऊपर कोढ़ का होता है, श्रथवा यह प्रभाव ऐसा है जैसे किसी मृगनयनी के शरीर पर कुष्ठों का प्रभाव हो। [प्रौर शायद इसी कलंक

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एवं प्रभाव से बचने के लिये] कई लोग ग्रन्थ कवियों के काव्यों द्वारा कवि बनना चाहते हैं । किन्तु यह प्रवृत्ति तो उत्तम कलंक की भी चूलिका प्रथ्यात् बड्ढंक है ।

उक्त प्रसंग से दो विषय हमारे सामने आते हैं—ग्रन्थ शास्त्रज्ञान के साथ-साथ कविकर्म का भी ग्रपेक्षित रहना तथा चौरकवि की निन्दा ।

ग्रन्थ शास्त्रज्ञान के साथ कविकर्म में भी नैपुण्य होना किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व में निस्सन्देह शोभाभिवृद्धि का कारण बन सकता है, पर इसके प्रभाव में किसी के व्यक्तित्व में न तो कलंक लगने की सम्भावना करना समुचित है; श्रोर न ही कवित्व को सकल विद्याओं का प्राण सम्भना । शास्त्रज्ञान बुद्धि एवं मस्तिष्क का व्यापार है श्रोर कवि-कर्म हृदय का ।

व्रतः शास्त्रीय चर्चा श्रोर कवित्व में एक दूसरे को पुट दे देने से इनमें किसी की भी यथावत् एवं सम्यक् रूप उपस्थिति नहीं होता । क्योंकि कवित्व में कल्पना एक श्रनिवार्य तत्व है श्रोर उधर शास्त्रीय चर्चा तथा कल्पना का पारस्परिक विरोध है । इस श्राधार पर निस्संकोच कहा जा सकता है कि शास्त्रवेत्ता को अपने सिद्धान्तों का निरूपण, प्रतिपादन श्रथवा सम्पादन करते समय कविकर्म की नितान्त श्रपेक्षा नहीं रहती ।

यदि कविकर्म से तात्पर्य 'पद्य-निर्माण' ले भी लिया जाए तो यह तात्पर्य संकुचित सीमित एवं एकदेशीय होने के कारण यथार्थ नहीं है, श्रोर न ही रामचन्द्र-गुणचन्द्र को सम्भवतः यही तात्पर्य श्रभीष्ट होगा ।

व्रतः कवित्व को सकल विद्याओं का 'प्राण' समकना श्रनुचित है । यदि कविकर्म से तात्पर्य 'पद्य-निर्माण' ले भी लिया जाए तो भी मुद्रया-यन्त्र के इस युग में हर शास्त्रीय ग्रन्थवा लोकिक चर्चा को पद्य-बद्ध रूप में प्रस्तुत करना हास्यास्पद एवं प्रवाञ्चनिजनक है ।

हां, यदि कोई शास्त्रवेत्ता कवि भी हो तो यह विशिष्टता जैसे कि ऊपर कहा ग्राए है उसके व्यक्तित्व में शोभा-बृद्धि का कारण बन जाएगी, किन्तु इसका प्रभाव उसके कलंक का कारण किसी भी रूप में नहीं है ।

चौरकवि की निन्दा जितनी की जाए थोड़ी है । दूसरों की रचना को ग्रपनी बताने वाला तो चोर है ही, किन्तु दूसरों का भावापहरण करके उसे ग्रपने शब्दों में प्रस्तुत करने वाला तो पहले प्रकार के चोर कवि की ग्रपेक्षा कहीं ग्रधिक दम्भी है,

व्रतः ग्रधिक ग्रपराधी श्रोर निन्दनीय राजशेखर के श्रोर कवियों में वाग्मट के कथन प्राप्यः उद्धृत किए जाते हैं । इस ग्रन्थ के हिंदी व्याख्याकार विश्वेश्वर ने राजशेखर के उद्धरण प्रस्तुत किये हैं (दे० पृष्ट ६) वाग्भट्ट ने चौरकवियों की भर्त्सना हुए कहा है :

ग्रन्थवरामपारावृत्त्या मङ्गभङ्गीभूयते । ग्रन्थाघ्यातः सतां मध्ये कविचौरो विभाव्यते ।। हर्षचरितम् ११६

१. प्राणः: कवित्वं विद्यानां लावण्यमिव योषिताम् । त्रैविद्यवेदिनोऽप्यस्मिन् सतो नित्यं हृतस्पृहाः ।। नासिकान्ते हि द्रयं दिवत्रं हयरोचिषा रसज्ञयोः । कुचाभोः कुचयोः श्लाघ्या काव्याभावो विपश्चितः ।। प्रकृतत्वं परस्तात्तु कलड्कः; पाठशालिनाम् । ग्रन्यकवयः: कवित्वं तु कलड्कस्यापि चूलिका ।।

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इस सम्बन्ध में विचारणीय यह है कि यदि यह स्वीकार किया जाता है कि ‘मौलिकता’ नाम का तत्व नितान्त दुर्लभ है, तो भावसाम्य के आधार पर किसी की भत्संना क्यों की जाए ? भावसाम्य का एक कारण तो मानव-मन का ऐक्य है । विभिन्न देश श्रौर काल में वर्तमान व्यक्तियों ने जो कि प्रत्येक दृष्टि से एक दूसरे से प्रभावित है एक ही प्रकार के विचार प्रकट किये हैं।

निस्सन्देह इस प्रकार की भावसाम्य को उपस्थित करने वाला व्यक्ति किसी भी रूप में अपराध तथा निन्दा का पात्र नहीं है। कभी कोई बात, कोई घटना श्रथवा कोई विचार पढ़-सुना जाने पर हमारे हृदय के किसी कोने पर जा पड़ता है श्रौर फिर कभी परिस्थितिवश जागृत होकर वाणी श्रथवा लेखनी द्वारा निःशृत हो जाता है श्रौर भाव-साम्य का कारण बन जाता है।

किन्तु इस प्रकार की साम्यता पर मानव का कोई प्रधिकारी नहीं है, क्योंकि न तो वह दूसरों के विचारों को श्रपने मन में संस्कार रूप में प्रस्फुट होने से रोक सकता है श्रौर न ही उन्हें प्रभिव्यक्त होने से । कभी हम दूसरों के विचारों को पढ़ श्रौर सुनकर उन्हें नवीन एवं व्यवस्थित रूप में प्रतिपादित करने के लिए लालायित हो उठते हैं श्रौर उन्हें निबन्ध, कविता, नाटक, कहानी उपन्यास श्रादि के रूप ढाल देते हैं ।

निस्सन्देह यह प्रक्रिया भी निन्दनीय नहीं है, क्योंकि इससे पूर्व भावों को नवीन दिशा मिलती है, हमारी कल्पना का संयोग पा कर ये भाव कहीं ग्रधिक स्पष्ट, विशद, ग्राह्य एवं प्रभावशाली बन जाते हैं ।

इस पुनर्राख्यान–प्रक्रिया को चाहें तो मौलिकता का नाम भी दे सकते हैं। पूर्वज्ञात भाव हमारी कल्पना का योग पाकर यदि नवीन रूप में प्रतिपादित हो जाएँ तो इसे ‘मौलिकता’ मान लेने में प्रधिक ग्रापत्ति भी नहीं होनी चाहिए ।

केबल शेप एक बात रह जाता है जो ग्रत्यन्त भर्सनीय है, वह है—दूसरे के भावों का बाह्य कलेवर बदल देना, दूसरे के शब्दों के स्थान पर श्रपने शब्दों श्रौर इस दम्भ की ग्राड़ में कवि श्रौर विचारक कहलाना ।

यह वृत्ति पूरंतः त्याज्य है ।

४. श्रलंकार

ग्रन्थ के मूल भाग में निम्नोक्त स्थलों पर श्रलंकार की चर्चा हुई है:

१. कथा श्रादि का मार्ग श्रलंकारों द्वारा कोमल होने के कारण सुखपूर्ण संचरणीय है, किन्तु नाटक का मार्ग रस की कलोलों से परिपूर्ण होने के कारण ग्रत्यन्त कठिन है ।

२. वह वाणी जो केवल श्रलंकार से युक्त होने पर भी रसप्रवाह से रहित होने के कारण कठोर होती है वह [मौका के] मन को उस प्रकार प्रफुल्लित नहीं करती जिस प्रकार हुबेंग [प्रथात् शृंगार रस न निकालने के कारण कठोर भग वाली] स्त्रियाँ [पुरुषों को ग्राह्लादित नहीं करतीं]

३. नाटक नामक रूपक में श्रलंकारों द्वारा रस का गलन श्रर्थात् स्कलन श्रथवा भंग नहीं होना चाहिए : श्रलंकारकथनं रसदूषकम् । ११३१

१. श्रलंकारम्रद्भिः पन्थाः कथा-ग्रादीनां सुखसंचरः । दु:संचरस्तु नाट्यस्य रसकल्लोलसंकुलः ।। ११३

२. इलेप-ग्रलंकार-भाजोऽपि रसानिस्यन्दन-वर्जनात् । दुर्भगा इव कामिन्यः प्रीणन्ति न मनो गिरः ।। ११७

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उक्त स्थलों के अतिरिक्त निम्नोक्त दो ग्रन्थ्य स्थलों में प्रलंकार की चर्चा साक्षात् न हो कर ग्रासाक्त रूप से हुई है :

१. जो कवि (नाटककार) नानाविध शब्द तथा अर्थ के लोल्य (चमत्कार) के कारएा रस रूप ग्रन्थ से पराङ्मुख हो जाते हैं वे विद्वान् होते हुए भी उत्तम कवियों की गरएा में नहीं आते ।¹

२. काव्य (नाटक) में गृहीत श्लोक शब्द की उत्प्रेक्षा (कल्पना) इतनी इलाध्य नहीं है जितना कि रस इलाध्य है । पका हुग्रा श्रमर सुन्दर भी ग्राम यदि रस-शून्य हो तो [भोक्ता के मन में] उसके प्रति उद्रेजना (चर्वा, प्ररुचि) उत्पन्न हो जाती है ।

इन दोनों स्थलों में शब्द श्रमर श्रथ के लोल्य (चमत्कार) श्रमर इनकी उत्प्रेक्षा (कल्पना) से ग्रन्थकारों का तात्पर्य शब्दालंकार श्रमर श्रथालंकार से ही है ।

ग्रन्थ के मूलभाग में ग्रन्थ्य भी ‘प्रलंकार’ शब्द का प्रयोग हुग्रा है, पर वहां इस शब्द से तात्पर्य है—नायिका के यौवनस्थ भाव, हाव श्रादि ३० धर्म जो तीन रूपों में विभक्त किये गये हैं ।³

किन्तु प्रस्तुत प्रकरण से इन प्रलंकारों का कोई सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि ये शब्दार्थ रूप काव्य-शरीर के शोभाकारक धर्म न होकर नायिका के व्यक्तित्व के शोभाकारक धर्म हैं ।

उपयुंक्त उद्धरएों में से प्रथम उद्धरएा में कथा की ग्रप्रेक्षा नाटक को इस श्राधार पर उत्कृष्ट माना गया है कि रस के बिना भी केवल प्रलंकार-प्रयोग के बल पर कथा का निर्माण हो सकता है किन्तु नाटक के लिए रस एक अनिवार्यं तत्त्व है । वस्तुतः यह धारएा संस्कृत के दशकुमारचरित, वासवदत्ता श्रादि कथा-ग्रन्थाधिका साहित्य को लक्ष्य में रखकर प्रस्तुत की गयी प्रतीत होती है, जिनमें प्रलंकारों का ग्रतिशय प्रयोग हुग्रा है । इसका एक कारएा पाठक की दृष्टि से था ग्रौर दूसरा कारएा कवि की दृष्टि से । यह साहित्य सामान्य स्तर से उच्च वर्ग के लिए निर्मित होता था । इनसे एक ग्रोर ये पाठक ग्रनुभाव, यमक, इलेष, परिसंख्या, विरोधाभास श्रादि से चमत्कृत होते नहीं ग्राते थे, ग्रौर उधर दूसरी ग्रोर ‘गद्य-काव्यों निकषः बदन्ति’ इस उक्ति के श्राधार पर गद्य-

कार की सिद्धि एवं प्रसिद्धि का ग्राधार अलंकार-प्रयोग द्वारा चमत्कार-प्रदर्शन समक्षा जाने लगा था । किन्तु उक्त धारएा वर्तमान कथा-साहित्य के लिए नितान्त उपयुक्त नहीं है । नाटक के समान इसके लिए भी रस-तत्त्व का समावेश नितान्त अनिवार्यं है, ग्रौर अलंकार की इसे भी विशेष ग्रप्रेक्षा नहीं रहती । इसी प्रकार अलंकार्यश्रौर मुक्तककाव्य कवियों ने भी रामचरित-गंगाचरए ने इसी प्रकार का ही ग्रन्तर निर्देश किया है जो कि युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता ।

१. नानार्थशब्दलोल्येन पराङ्मुखो ये रसामृतात् । विद्वांसस्ते कवीनांग्रह्मन् न पुनः कव्याम् ॥ ना० द० ११६

२. न तथार्थशब्दोत्प्रेक्षा: इलाघ्या: काव्ये यथा रसः । विपाकफलरम्याश्रं उद्देज्जयति नीरस्म् ॥ ना० द० ३१२२

३. ना० द० ४१७,२५

४. × × × × × । योग्यतां च रसनिवेशं काव्यवसासिनः प्रवन्धकवयो विदग्नित, न पुनः शव्दार्थप्रधान-बैचित्यमाश्रयन्ति मुक्तककवयः । हि० ना० द० पृष्ठ ११७

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( ५९ )

उक्त द्वितीय उद्धरण में रस शौर अलंकार के पारस्परिक सम्बन्ध पर प्रकाश डालते हुए प्रकारान्तर से अलंकार को रस की ग्रपेक्षा दो स्थितियों में श्रनुत्कृष्ट माना गया है :

(क) रस ही काव्य का श्रनिवार्य धर्म है, अलंकार नहीं, (ख) अलंकार का श्रनुचित प्रयोग रसास्वाद में बाधक बनता है ।

ये दोनों धारणाएं रस-सिद्धान्त के ही श्रनुकूल प्रस्तुत की गयीं हैं ।

अलंकारवादियों ने सभी काव्य-शोभाकर धर्मों को 'अलंकार' की संज्ञा देते हुए किसी विशेष काव्यांग को काव्य के श्रनिवार्यं तत्व के रूप में स्वीकृत नहीं किया था । उनकी दृष्टि में न केवल श्रनुप्रास एवं उपमा श्रादि ही अलंकार थे, ग्रपितु गुण, रीति, रस शौर ध्वनि, नाटचवृत्ति श्रादि ये सभी काव्यशोभाकर होने के कारण 'अलंकार' नाम से प्रभिहित किये गये थे । श्रतः उनके श्रनुसार यदि किसी काव्यांग को काव्य का श्रनिवार्यं तत्व स्वीीकृत करना चाहें तो उसका नाम 'अलंकार' ही होगा । चाहे वह श्रनुप्रास-उपमा श्रादि का वाचक हो, श्रथवा गुण, रीति, रस शौर ध्वनि का । किन्तु इधर रसवादियों ने केवल रस को ही काव्य की श्रात्मा ग्रथवा श्रनिवार्यं तत्व स्वीीकृत किया। तथा अलंकार को शब्दार्थ का श्राश्रयक धर्म मानते हुए प्रकारान्तर से इसे रस का भी उत्कर्षक मान लिया शौर वह भी नित्य रूप से नहीं । नितयरूप से अलंकार को रस का उत्कर्षक न मानने का कारण यह है कि यह शब्दार्थ का शोभावर्द्धक होते हुए भी कभी तो उत्कर्षक धर्मं न मानने का कारण यह है कि यह शब्दार्थ का शोभावर्द्धक होते हुए भी कभी तो उत्कर्षक होता है, कभी नहीं करता शौर कभी इसका श्रप्रकर्ष भी कर देता है—ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कटक-कुण्डल श्रादि कामिनी के शरीर के शोभावर्द्धक होते हुए उसकी मनःस्थिति के श्रनुसार कभी उसका उत्कर्षं करते हैं, कभी नहीं करते शौर कभी श्रप्रकर्ष भी करते हैं ।

रस शौर अलंकार के पारस्परिक सम्बन्ध निर्देश-प्रसंग में अलंकारवादियों का यह मन्तव्य भी उल्लेखनीय है कि वे रस, भाव श्रादि को श्रंगीभूत शौर श्रंगभूत दोनों रूपों में स्वीकार करते हुए इन्हें निम्न रूप से 'अलंकार' में ग्रन्थभूत करते थे—श्रंगीभूत रस को रसवत् अलंकार में, श्रंगभूत भाव को प्रेयस्वद् में, श्रंगभूत रसाभास एवं भावाभास को ऊर्जस्वीं में, श्रंगभूत भावशान्ति को समाहित में । इनके श्रतिरिक्त श्रंगभूत साचोदय, भावसन्धि शौर भावशवलता को इन्हीं नामों के ही अलंकारों में ग्रन्थभूत किया गया है । इसके श्रतिरिक्त उन्होंने श्रंगभूत रस, भाव श्रादि सब को द्वितीय उदात्त अलंकार ही में ग्रन्थभूत किया । किन्तु वस्तुतः रस, भाव श्रादि से जन्य चमत्कार नितान्त बाह्य न होकर नितान्त ग्रान्तरिक है । अलंकार की रचना श्रनिवार्यतः कवि के सायास शब्द-योजना पर श्राश्रित है शौर उसका चमत्कार नाद तथा श्रर्थ पर । किन्तु इधर रसपूरां काव्य की रचना के लिए शब्दयोजना श्रनिवार्यं तत्व नहीं है, शौर इसका श्रास्वाद नाद एवं श्रर्थ पर श्राश्रित न होकर व्यञ्जनार्थ पर श्राश्रित है । शब्दयोजना यदि अलंकृत न भी हो, तो भी सरस रचना व्यञ्जनार्थ के बल पर सहृदय के लिए श्रास्वाद-प्रदान की क्षमता रखती है । 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' इस सिद्धान्त के श्रनुसार यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि एक श्रो 'अलंकार' कविनिष्ठ है तो दूसरी श्रो 'रस' सहृदय-निष्ठ । मूलतः इन्हीं श्राधारों पर रसवादी श्रो 'अलंकार' कविनिष्ठ है तो दूसरी श्रो 'रस' सहृदय-निष्ठ । मूलतः इन्हीं श्राधारों पर रसवादी श्रो 'अलंकार' कविनिष्ठ है तो दूसरी श्रो 'रस' सहृदय-निष्ठ । मूलतः इन्हीं श्राधारों पर रसवादी रस को अलंकार में ग्रन्थभूत करने के विरुद्ध हैं । उन्होंने रस को काव्य की श्रात्मा के रूप में स्वीकार करते हुए अलंकार को श्रनिवार्य रूप में इसका उत्कर्षक धर्मं मान लिया । श्रतः उन्होंने

१. काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते ।

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प्रज्ञामूत रस, भाव श्रादि को इन्हीं नामों से हो प्रभिहित किया। हाँ, प्रज्ञामूत रस, श्रौर भाव को इन्होंने क्रमशः रसवत् श्रौर प्रेयस्वत् श्रलंकार नाम दिया, समास तथा भावाभास को ऊर्जा स्वीक श्रलंकार श्रोर भावशान्ति को समाहित श्रलंकार । इसके प्रत्येक भावोदय श्रादि तीनों को प्रज्ञारूप में वर्णित होने पर इन्हीं नामों के ही श्रलंकारों से प्रभिहित किया गया । यहां यह भी उल्लेखनीय है कि रसवत् श्रलंकारों को ग्रनुप्रास तथा उपमा श्रादि के समान चित्रकाव्य का श्रंग न मानकर गुणीभूतव्यंग्य के ‘ग्रप्रस्तुतप्रशंसा’ नामक भेद का एक श्रंग स्वीकार करके मम्मट ने प्रकारान्तर से यह भी संकेत किया कि ये श्रलंकार ग्रनुप्रास, उपमा श्रादि श्रलंकारों की ग्रपेक्षा उच्च भाव-भूमि पर श्रवस्थित हैं—क्योंकि इनमें वाच्यार्थ की ग्रपेक्षा व्यंग्यार्थ मले ही गौण हो, किन्तु ग्रनुप्रास, उपमा श्रादि के समान इनमें वाच्यार्थ की ग्रपेक्षा व्यंग्यार्थ की ग्रस्पष्टता नहीं होती । वस्तु !

रसवादी श्राचार्यों का श्रलंकार के प्रति यही दृष्टिकोण है, श्रोर इसी के ही श्राधार पर रामचन्द्रगुणचन्द्र की उक्त कथन में प्रकारान्तर से स्वीकृति है कि रस ही काव्य का श्रनिवार्य धर्म है, श्रलंकार नहीं ।

ग्रब रामचन्द्र-गुणचन्द्र की दूसरी धारणा को लें कि श्रलंकार का श्रनुचित प्रयोग रसास्वाद में बाधक बनता है । दूसरे शब्दों में, श्रलंकार का ग्रौचित्यपूर्ण प्रयोग हो रस का उत्कर्ष कर सकता है, ग्रनौचित्यपूर्ण प्रयोग नहीं । इस सम्बन्ध में वामन, भोजराज श्रौर क्षेमेन्द्र के निम्नोक्त कथन श्रवलोकनीय हैं :

ग्राभूषणों के श्रादर्श-प्रयोग के लिए केवल ऐसा श्रादर्श हो प्रधिकारी है जो हर प्रकार से सुपात्र हो । इस दृष्टि से न तो श्रचेतन शव श्रलंकारों का श्रधिकारी है, न किसी यति का शरीर श्रौर न किसी नारी का यौवनवत् वपु । इन्हें सजीव, स्वस्थ, सुन्दर शरीर पर भी श्राभूषणों का प्रयोग श्रौचित्य की ग्रपेक्षा रखता है—ग्रनंग की कालिमा बड़ी बड़ी श्राखों में ही शोभित होती है ग्रन्यत्र नहीं, मुक्ताहार उत्तम तीन पयोधरों पर सुजोभित होते हैं ग्रन्यत्र नहीं— दीर्घावपांग नयनयुगलं सूक्ष्मायतसूक्ष्मनासिकम् । तुङ्गभोगी प्रभवति कुचावचिता तं हारयष्टिः । स०क०स० १११६०

किन्तु इसके विपरीत कण्ठ में मेखला का, नितम्बफलक पर सुन्दर हार का, हाथों में नुपुरों का, चरणों में केयूरों का प्रयोग— कितना कुरूप, मझा श्रौर हास्यप्रद बनेगा यह कहने की श्रावश्यकता नहीं है १२

१. (क) तथा हि प्रवर्ततं शवशरीरं कुण्डलाद्युपेतमपि न भाति, ग्रलंकार्यस्याभावात् । (ख) यतिशरीरं कटकादियुक्तं हास्यावहं भवति, ग्रलंकारस्य ग्रनौचित्यात् । वपुरिव यौवनवत्यर्जुनाया: । का० सू० वृ० ३।१।२ (वृत्ति)

२. कण्ठे मेखलया नितम्बफलके तस्यै हारैष वा । पाणौ नूपुरबन्धनेन चरणे केयूरपाशोन वा ॥ श्रौचित्येन विना रच प्रतनुते, नालं कृतिनोऽलंकृतौः ॥ मृ० वि० च०, पृ० १

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उन तीन कथनों से स्पष्ट है कि ग्राभूषरों का प्रयोग जहाँ सजीव एवं सुन्दर शरीर की ग्रपेक्षा रखता है, वहाँ श्रोचिचत्य भी उसके लिए ग्रनिवार्य तत्व है । काव्यगत श्रलंकारों के शोभावह प्रयोग में भी इन्हीं दोनों तत्वों की ग्रनिवार्यता ग्रपेक्षित है—(१) श्रलंकारों का सरस काव्य में प्रयोग (२) सरस काव्य में भी श्रलंकारों का श्रोचित्यपूर्ण प्रयोग । एक श्रोद यति-शरीर ग्रथवा यौवनवन्ध्यवपु पर ग्राभूषरों का श्रवधारण एक कौतुहल-मात्र है, तो दूसरी श्रोद नीरस काव्य में भी श्रलंकार-प्रयोग की ग्रन्य नाम 'उक्तिवैचित्र्य-मात्र' है—चत्रु नु साधु रसस्य तत्र (ग्रलंकारा:) उक्तिवैचित्र्यमात्रपर्यवसानाः: जिस प्रकार हार्थों में नूपुरों का ग्रौर चरणों में केयूरों का बन्धन समुचित नहीं है, उसी प्रकार विप्रलम्भ श्रृंगार में भी यमक श्रादि का बन्धन समुचित नहीं है । तात्पर्य यह कि शौकिक ग्रोर काव्यगत दोनों प्रकार के श्रलंकारों का जीवन ग्रौर उनकी श्रलंकारितता उचित स्थानविन्यास पर ही ग्राश्रित है । फिर भी शरीर-सौन्दर्य की ग्रपेक्षा काव्य-सौन्दर्य ग्रधिक संशेदनशील है । उदाहरणार्थे रकार का ग्रनुप्रास विप्रलम्भ श्रृंगार के एक उदाहरण में रस का उपकार करता है तो टकार का ग्रनुप्रास उसी ही रस के दूसरे उदाहरण में रस का उपकार नहीं करता । तभी मम्मट को श्रलंकारों के विषय में लिखना पड़ा—श्रवचित्ते सनंतमपि नोपकुर्वन्ति । स्पष्ट है कि एक ही रस के दो उदाहरणों में कोमल वर्णों 'रकार' ग्रोर कठोर वर्णों 'टकार' की सघ्यता ग्रथवा प्रसघ्यता का उत्तरदायित्व श्रोचिचत्य के सद्भाव ग्रथवा प्रभाव पर निर्भर है ।

जहाँ तक शब्दालंकारों श्रोद ग्रर्थालंकारों के पारस्परिक तात्त्वमय का प्रश्न है, संस्कृत के काव्यशास्त्री शब्दालंकारों के प्रयोग के ग्रनौचिचत्य के विषय में ग्रपेक्षाकृत ग्रधिक प्राशंकित रहे हैं । यही कारण है कि दण्डी जैसे ग्रलंकारवादी भी ग्रनुप्रास ग्रोर यमक के प्रति ग्रपनी ग्रवहेलना प्रकट की है; ग्रौर हृदय जैसे ग्रलंकारप्रिय ग्राचार्य ने ग्रनुप्रास ग्रलंकार की स्वसम्पत मधुरा, प्रौढ़ा श्रादि पांच वृत्तियों के श्रोचित्यपूर्ण प्रयोग पर विशेष बल दिया है । ग्रनानन्दवर्धन ने ग्रनुप्रास-बन्ध के विषय में एक चेतावनी दो है कि 'श्रृंगार के सभी प्रभेदों में ग्रनुप्रास का बन्ध सदा एक सा प्रभिव्यंजक नहीं हुग्रा करता । ग्रतः कवि को इस ग्रलंकार के श्रोचित्यपूर्ण प्रयोग के लिए विशेष सावधानी बरतनी चाहिए । शृंगार विशेषतः विप्रलम्भ शृंगार में यमक का (शब्दश्लेष, चित्र ग्रादि का भी) प्रयोग कवि के प्रमाद का सूचक है । कुन्तक ग्रनुप्रासमयी रचना की प्रतिबद्धता

१. का० प्र०, ५ उल्लास, पृष्ठ ३०

२. (क) काव्यस्यालंमलंकारैः किं मिथ्याभोगितैरंगैः । यस्य जीवितमौचित्यं विचिन्त्यापि न हृद्यते ॥ प्रो०वि०च०पृ०४

(ख) उचितध्यानविन्यासालंकृतिरलंकृतिः । वही पृ० ६ ।

३. देखिए मम्मट द्वारा उद्धृत दोनों उदाहरण—

(क) ग्रपसारय घनसारम्..... ।

(ख) चित्ते विद्धदुरिळा टड्ढटादि"" (का० प्र० ५ म उल्लास)

४. का० द० १ । ४३,४४,६१ ।

५. का० प्र० २ । ३२ ।

६. (क) शृङ्गारस्यागिनी यत्र नादकरूपानुबन्धिनीम् । सर्वेष्वेवप्रबन्धेषु नानुप्रासः प्रकाशकः ॥ ध्व० २ । १४ ॥

(ख) ध्वन्यात्मभूतशृङ्गारे यमकादिनिबन्धनम् । शक्तावपि प्रमादित्वं विप्रलम्भे विशेषतः ॥ व० जी० ३ ।४ ।

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(संकुलता-पूर्ण वदनता) के पक्ष में नहीं है, और यदि ऐसी रचना हो भी जाए; तो उसे श्रानुकुमार नहीं बनाना चाहिए। भट्टलोल्लट (?) के मत में यमक श्रादि शब्दालंकार रस के प्रतिविरोधी हैं। इनका प्रयोग कवि के श्रभिमान का सूचक है, श्रभवा भेड़चाल के समान है।

इन सब श्रालंकार्यों के श्रनुरूप रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने भी श्रलंकार विशेषतः इलेष श्रलंकार को श्रपने उक्त कथन में रस के गलन श्रर्थात् भंग का कारण माना है।

हमने देखा कि शब्दालंकारों के श्रौचित्य को समभंग-समक्लृप्ते संस्कृत का श्रालंकार्य कहीं कहीं उनका विरोध श्रौर निषेध तक कर बैठा है । पर श्रलंकारों के प्रयोग का निषेध वह किसी श्रवस्था में करने को उद्यत नहीं हैं। वह इन्हें स्वस्थ रूप में देखना चाहता है । श्रलंकार का स्वस्थ रूप है—रस, भाव श्रादि का श्रृंग बन कर रहना । उसे यह रूप देने के लिए एक प्रबुद्ध कवि को विशेष प्रकार की समीक्षा की सदा श्रपेक्षा रखनी चाहिए । इसके प्रतिरिक्त श्रलंकारों का प्रयोग करते चले जाना कवि की स्वेच्छा पर भी निर्भर नहीं हैं । ये ध्वनि के उपकारक तभी समभे जाएंगे, जब ये रस में दत्तचित्त, प्रतिभावान् कवि के सामने हाय जोड़े चले श्राएं, 'प्रर्थतृ किसी प्रयत्न के बिना रचना में रसानुकूल समाविष्ट होकर स्वयं कवि को भी श्रालंचर्यचकित कर दें । निष्कर्ष यह कि श्रलंकारों के श्रौचित्यपूर्ण प्रयोग की कसौटी है—ग्रप्रयत्न-प्रयत्न-रूप से रसानुकूलता की प्राप्ति—

रसाक्षिप्ततया यस्य बन्धेऽलंकारयक्रियो भवेत् । अप्रयत्नप्रयत्नेनवर्त्यः सोऽलंकृतो ध्वनौ सतः ॥ ध्वन्या० २।११६।

और यदि शब्दालंकारों का भी, रसोपयोगी बन कर श्रप्रयत्न-प्रयत्न-रूप से, रचना में स्वतःसमावेश सम्भव होता, तो संस्कृत के श्रालंकार्यों ने श्रलंकारों के समान इन्हें भी निश्चित ही समान महत्व दे दिया होता ।

श्रलंकारों के श्रौचित्यपूर्ण प्रयोग करने के लिए श्राननदवर्धन ने निम्न साधनों में से किसी एक का श्राश्रय लेने की सम्मत्ति दी है—

(१) श्रंगीभूत रस के प्रति रूपक श्रादि श्रलंकारों का सदा श्रृंगरूप से विवक्षा करना ।

(२) श्रृंगरूप में श्रलंकारों की विवक्षा कभी न करना ।

(३-४) श्रवसर पर इनका ग्राह्य ग्रथवा त्याग करना ।

१. नातिनिबन्धविहिता, नात्यपेशलभूषिता । व० जी० २१४।

२. यमकानुलोमतविरतरचक्राविभिदो तिरसविरोषण्य-। श्रभिमानमात्रस्मेतदु गङुरिकावि प्रवाहो वा ॥ का० ग्रनु० (हेम) पृष्ठ

३. रसभावादितात्पर्य्यमाश्रिश्रय विनिवेदिताम् । श्रलंकृतिनां सर्वासामलंकतारहवसाधनम् ॥ ध्व० पू० ११२।

४. श्रलंकारान्तराल्पो—रससमाहितचेतसः प्रतिभावतः कवेरहस्रूविकथा परापतन्ति । (ध्वन्या० २।११६।'वृत्ति')

५. ध्वन्या० २।११५,११६।

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(४) श्रारम्भ करके उसे श्रन्त तक निभाने का प्रयत्न न करना ।

(६) यदि श्रनायास श्राधन्त निर्वाह हो भी जाए तो उसे श्रंगरूप में रसपोषक बनाने का यत्न करना ।

उपयुक्त साधनों में से प्रथम दो तो एक ही है । पांचवें साधन का तीसरे श्रोर चौथे में तथा छठे को पहल में श्रन्तर्भाव हो सकता है । इन सब का कुल मिलाकर उद्देश्य यह है कि रचना में श्रलंकारों को रस के श्रंग रूप में ही स्थान दिया जाए, प्रधान रूप में कभी नहीं, श्रोर ऐसा करने के लिए कवि समीक्षा-बुद्धिसे काम ले, तभी श्रथ्यालंकार श्रपनी यथार्थता को प्राप्त कर सकेंगे—

ध्वन्यात्मभूते शृङ्गारे समीक्ष्य विनिवेशयेत्‌ । रूपकादिरलंकारवर्गं इति यथार्थंताम्‌ ॥ का०प्र० २१७॥

४. गुण

रस श्रोर गुण के परस्पर-सम्बन्ध का निर्देश करते हुए एक स्थान पर ग्रन्थकार लिखते हैं कि 'व्यायोग' नामक रूपक में वीर, रौद्र श्रादि दीप्त रसों की स्थिति होती है ।

श्रतः इस में गद्य तथा पद्य दोनों श्रोजगुणयुक्त होने चाहिएँ—दीप्तानां वीररौद्रादीनां रसा- नामास्यप्‌ । श्रृतएवात्र गद्यं पद्यं चोज्ज्वलगुणयुक्तम्‌ । (हि० ना० द० पृष्ठ० २२१)

ग्रानन्दवर्धन तथा उनके ग्रनुयायियों के ग्रनुसार गुण का रस के साथ दोहरा सम्बन्ध होता है—एक सम्बन्ध प्रधान है श्रोर दूसरा गौण । प्रधान सम्बन्ध का श्राधार सहृदय की चित्तवृत्ति है, श्रोर गौण सम्बन्ध का प्राधार वर्णं, पद श्रोर ग्रथ्य है ।

श्रतः गुण प्रधानतः रस का धर्म है श्रोर गौणतः वर्णादि का ।

(१) रस के साथ गुण का प्रधान सम्बन्ध होता है । इसका यह तात्पर्य है कि शृंगार, करुण श्रादि कोमल रसों में चित्त की द्रुति होने के कारण माधुर्य गुण की स्वीकृति होगी, श्रोर वीर, रौद्र श्रादि कठोर रसों में चित्त की दीप्ति होने के कारण श्रोज गुण की । कोमल श्रथवा कठोर रसों में से किसी भी रस में यदि श्रथ्य का श्रर्थबोध स्वरित हो जाएगा तो वहाँ चित्त की व्याप्ति होने के कारण माधुर्य श्रथवा श्रोज के अतिरिक्त प्रसाद गुण की भी स्वीकृति की जाएगी ।

दूसरे शब्दों में, किसी सरस रचना में यदि स्वरित श्रर्थबोध न होगा तो वहाँ रस के श्रनुकूल माधुर्य श्रथवा श्रोज में किसी एक गुण की स्थिति मानी जाएगी, श्रोर यदि स्वरित श्रर्थबोध हो जाएगा तो वहाँ रस के श्रनुकूल माधुर्य श्रोर प्रसाद गुण, श्रथवा श्रोज श्रोर प्रसाद गुण दो-दो गुणों की स्थिति स्वीकृत होगी ।

इस प्रकार ये गुण सहृदय के चित्त की विभिन्न श्रवस्थाश्रों पर श्राधारित हैं । चित्त की द्रुति, दीप्ति श्रथवा व्याप्ति नामक श्रवस्थाएँ पहले होती हैं श्रोर रसाभिव्यक्ति इनके बाद होती है । ऐसा कभी नहीं हो सकता कि सहृदय का मन इन श्रवस्थाश्रों में से न गुजरे श्रोर रस का श्राभिव्यक्ति हो जाए ।

निष्कर्षतः चित्तवृत्ति रूप गुण श्रोर रस में पूर्वीपर-सम्बन्ध है तथा यह सम्बन्ध नित्य श्रथयात्‌ श्रनिवार्यं है ।

(२) गुण का रस के साथ गौण सम्बन्ध भी है । इसका तात्पर्य यह है कि शृंगार, करुण श्रादि

१. (क) ये रसस्याङ्गिनो धर्माः × × प्रचलस्थितयो गुणाः । (ख) गुरणवृत्त्या पुनस्तेषां वृत्ति: शब्दार्थयोर्मता । का०प्र० ६६६,७१

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श्रृंगारादि कोमल रसों में कोमल वर्णों का प्रयोग होना चाहिए तथा समस्त पदों का प्रयोग या तो न हो, यदि हो तो श्रृंगार हो जिसमें समस्त पद लघु हों। इसी प्रकार वीर, रौद्र श्रादि कठोर रसों में कठोर वर्णों का प्रयोग करना चाहिए, तथा सघन श्रृंगार श्रधिक समासों का प्रयोग होना चाहिए। उक्त वर्णों एवं पदों का प्रयोग कोमल रसों में माधुर्य गुण का श्रभिव्यंजक कहलाता है श्रृंगार कठोर रसों में श्रोज गुण का । इनके प्रतिरिक्त यदि किसी भी सरस रचना में श्रर्थ का श्रावबोध स्वरित हो जाएगा तो उसमें चाहे कैसे भी वर्णों श्रोर पदों का प्रयोग हो वहाँ माधुर्य श्रथवा श्रोज में से किसी एक गुण के साथ प्रसाद गुण की स्वीकृति भी की जाएगी। इस प्रकार ये गुण वर्ण श्रोर पद पर श्राश्रित हैं, रचना श्रर्थात् काव्य के बाह्य पक्ष पर श्राश्रित है, पूर्वोक्त गुणों के समान सहृदय की चित्तवृत्ति श्रर्थात् काव्य के श्रान्तरिक पक्ष पर श्राश्रित नहीं हैं। इसके प्रतिरिक्त पूर्वोक्त गुणों के समान इन गुणों का रस के साथ नित्य सम्बन्ध भी नहीं है। उदाहरणार्थ, श्रृंगार रस के किसी पद्य में यदि कोई श्रप्रौढ़ कवि दीर्घं-समासयुक्त श्रौर टवर्गादि से युक्त कठोर वर्णों-योजना का प्रयोग कर लेगा, तो उस स्थिति में भी उस पद्य में रसगत माधुर्य गुण की ही स्वीकृति होगी श्रोर वर्णप्रकिगत श्रोजगुण की। क्योंकि गुण की स्थिति रस पर श्राश्रित है न कि वर्णंयोजना पर । हाँ, इस पद्य में ‘वर्णों-प्रतिकूलता’ नामक दोष भी प्रवश्य माना जाएगा । किन्तु श्रादर्श स्थिति यही है कि श्रृंगार श्रादि रसों में माधुर्यंप्रभृति के श्रभिव्यंजक वर्ण प्रयुक्त किये जाने चाहिए श्रौर रौद्र श्रादि रसों में श्रोज गुण।

रामचन्द्र-गुणचन्द्र को अपने उपयुक्त कथन में यही श्रादर्श स्थिति श्रभिप्रेत है कि वीर-रौद्र श्रादि दीप्त रसों में रसगत श्रोज गुण तो स्वतःसिद्ध है ही, वहाँ वर्णादिगत भी श्रोज गुण ही होना चाहिए ।

६. वक्रोक्ति

प्रस्तुत ग्रन्थ में ‘वक्रोक्ति’ शब्द का प्रयोग जिन प्रसंगों में हुग्रा है, उनमें निम्नोक्त चार प्रसंग उल्लेखनीय है—वीथी, श्रृंगार रस, श्रात्मभू, श्रौर रसोदय । इनहीं प्रसंगों में वक्रोक्ति को न तो कुन्तक-सम्मत व्यापक श्रर्थ में प्रयुक्त किया गया है, तथा न शब्दालंकार रूप प्रचलित श्रर्थ में । इन प्रसंगों में इसका प्रयोग एक-समन श्रर्थ में न होकर तीन भिन्न श्रर्थों में हुग्रा है :

(१) ‘वीथी’-प्रसंग में वक्रोक्ति से तात्पर्य है—विवक्षा वैचित्र्य, श्रथवा शाब्दता । ग्रन्थकारों ने वीथी के लक्षणों में इसे नाटकादि द्वादश रूपकों की उपकारिका कहा है श्रौर इसकी कारण यह बताया है कि वीथी के व्याहार, श्रभिनय श्रादि १३ श्रंग नाटक श्रादि सभी रूपकों में उपयागी है, श्रौर इन श्रंगों के सम्बन्ध में उन्होंने कहा है, कि ये श्रनेक वक्रोक्तियों श्रर्थात्

वैचित्र्यतामों, विचित्रताओं श्रथवा शाब्दताम्रों से युक्त हैं—

सर्वोक्तां रूपकाणां नाटकादीनां वक्रोक्त्यादिसंकुला ।

त्रयोदशाङ्गप्रवेशेन उपयोगिनी वैचित्र्यकारिका ॥ हि० ना० द० पृष्ट २४१

इसी प्रसंग में ही श्रृंगार श्रौर हास्य को श्रनेक प्रकार की वक्रोक्तियों से युक्त कहा गया है । यहाँ भी ‘वक्रोक्ति’ का श्रर्थ विविधता ही है—

वक्रोक्तिसहसंकुलवचेन श्रृंगारहास्ययोः । सुवचनामृतात्पातैः कदलिी वृत्तिरोहित्यवम् ॥ —वही

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(२) इसी प्रकार शृंगार रस के निम्नोक्त प्रसंग में भी वक्रोक्ति से अभिप्राय है सुन्दर वार्तालाप, न कि कुन्कुत-सम्मत वक्रोक्ति —

प्रथमः सम्भोगाख्यो बहु: । परस्परावलोकन-चुम्बन-विचित्रविलास्यादिभिरेव तोड़नन्त-

—हि० ना० द० पृष्ट ९०७ प्रकार: ।

(३) श्रामुख-प्रसंग में 'वक्रोक्त' (वक्रोक्ति): शब्द का प्रयोग 'स्पष्ट वचन से विपरीत' श्रर्थ में हुग्रा है: "ग्रामुख में सूत्रधार दो प्रकार के वचनों का प्रयोग करता है—रूष्ट श्रौर वक्रोक्त ।" वक्रोक्त से तात्पर्य है साक्षात् विवक्षित श्रर्थ का श्रप्रतिपादक कथन—'वक्रोक्तिः साक्षाद् विवक्षित-थंस्यप्रतिपादिकः;' श्रर्थात् वह वचन जो स्पष्टतया न कहा जा कर घुमा-फिरा कर कहा जाए, जैसा कि संस्कृत-नाटकों के 'ग्रामुख' में प्रायः व्यवहृत होता है ।

(४) रसदोष-प्रसंग में 'वक्रोक्ति' शब्द का प्रयोग तो नहीं हुग्रा, 'प्रवक्रोक्ति' का हुग्रा है । यहां 'वक्रोक्ति' से प्रभिप्राय है—युक्त, उचित, मान्य, संगत श्रादि । रस, स्थायिभाव, व्यभि-चारिभाव, श्रादि की स्वशब्दवाच्यता का सर्वप्रथम संकेत उन्होंने किया था, तथा कुन्कुत, सम्मत श्रादि श्राचार्यों ने इसे एक दोष माना था, किन्तु रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने इस दोष-कल्पना को त्यक्त कहा है,' तथा इसे श्रयुक्तपर जनो की उक्ति के रूप में स्वीकार करते हुए इसे 'प्रवक्रोक्ति'

श्रर्थात् युक्त, ग्रनुचित, श्रग्रामान्य, श्रसंगत धारणा माना है: 'तस्माद् प्रभुरपक्रोक्तिस्वादवक्रोक्तिरेवेयम्' (हि० ना० द०)। उक्त धारणा प्रभुक्त है यह श्रयवा नहीं, यहां यह विचारणीय नहीं है । विचारणीय यह है कि या 'वक्रोक्ति' शब्द का श्रर्थ 'युक्त' श्रादि भी हो सकता है ? शब्द के वाच्यार्थ से तो इस श्रर्थ का बोध नहीं होता, हां यदि खींचतान की जाए तो वक्रोक्ति = काव्य का बाह्य साधन = काव्य का उपयुक्त श्रथवा युक्त, मान्य, उचित तत्त्व । श्रतः वक्रोक्ति का श्रर्थ हुग्रा युक्त श्रौर प्रवक्रोक्ति का श्रयुक्त । किन्तु इस धारणा से मनस्तुष्टि नहीं होती । सम्मत: यह पाठ ही प्रशुद्ध हो । श्रयवा 'वक्रोक्ति' शब्द का श्रर्थ काव्यत्व भी लिया जा सकता है, जिसके श्रतुरूप 'प्रवक्रोक्ति'

का श्रर्थ होगा—'काव्यत्व से बहिष्कृत' । ग्रस्तु ! यह शब्द यहां 'ग्रयुक्त' दोष से दूषित है ।

(२)

इसके प्रतिरिक्त इस ग्रन्थ में निम्नोक्त स्थल पर यद्यपि 'वकता' ग्रथवा 'वक्रोक्ति' शब्द का ब्यवहार नहीं किया गया, तथापि जिस धारणा को वहां प्रस्तुत किया गया है उसका मूल श्राधार वचन की वक्रता ही है । 'बीथी' नामक रूपक-भेद के १३ श्रंगों में से १० वां श्रंग है मुदवम्— जिसका लक्षण है जिसमें गुण श्रौर दोष का पारस्परिक ब्यवहार हो—'व्यस्थयो गुणदोषयोः मुदवम् ।' (हि० ना० द० पृष्ट २६३)। इस प्रकार 'मुदव' नामक बीथ्यंग के दो रूप हैं ।

गुणों का दोष बन जाना श्रौर दोषों का गुण बन जाना । प्रथम रूप के उदाहरण-स्वरूप नाट्यदर्पण में तीन उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं जिनमें गुण को दोष बताया गया है । इनमें से प्रथम दो उदाहरण लीजिए :

१. विशिष्टकुट्या सार्धं प्रस्तुततक्षैव शाखराम् । सूत्रधारस्य वक्रोक्तिः स्पष्टोक्तं यन्तु तदामुखम् ॥

२. केचित्तु व्यभिचारिरसस्थायिनां स्वशब्दवाच्यत्वं रसदोषमाहुः; तदयुक्तम् ।

हि० ना० द० पृष्ट ३२५

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(क) झूठ-सभा में बेचारी द्रौपदी 'गो: गो:' [ऋषभत्न में तुम्हारी 'गो' हैं, मुझे बचाओ, मुभे बचाओ] चिल्लाती रही किन्तु उस समय क्या घनुर्धारी अर्जुन वहाँ नहीं था जो उसे बचा सकता ? 'वैष्णाविहार' में दुर्योधन जयद्रथ की माता की चेतावनी की श्रवहेलना करते हुए बोले ।

(ख) [मेरे ग्राने पर] तुम्हारे मुखचन्द्र ने मुस्करा कर मेरा स्वागत किया, नेत्रों ने प्रफुल्लित होकर, बाहुओं ने रोमांचित होकर और वाणी ने गद्गद स्वर को धारणा करके, किन्तु तुम्हारे मुखचन्द्रों में कोई परिवर्तन नहीं ग्राया, वे वैसे के वैसे कठोर प्रयत्नु जड़ बने रहे,' 'नलविलास' में नल प्रातपतिका दमयन्ती से बोले ।

पहले पद्य में 'अर्जुन' का 'घनुर्धरत्व' और दूसरे पद्य में कुछचन्द्रों की 'कठोरता'—यद्यपि ये दोनों गुण हैं तथापि इन्हें दोष रूप में स्वीकार किया गया है । इन उदाहरणों से दो बातें स्पष्ट है । एक यह कि यहाँ 'गुण' शब्द काव्यगुणों का सूचक न होकर लौकिक गुणों का सूचक है, और दूसरी यह कि इस प्रकार की दोषता का प्राधार वचन की बकता है जिससे गुण दोष न बन कर और भी श्रधिक निखर जाता है तथा काव्य-सौन्दर्य का कारण बनता है ।

इसी प्रकार दोष के गुण बन जाने के सम्बन्ध में भी जो उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं उनमें सभी दोष काव्य-दोष के सूचक न होकर लौकिक दोषों के सूचक है तथा वे गुण रूप में वर्णित किए जाने पर भी ग्राह्य न बन कर त्याज्य बन गये हैं। इस वर्णन-प्रकार का मूल आधार वचन की वक्रता ही है । दो उदाहरण यहाँ दिये ।

(क) द्रोण, कर्ण, जयद्रथ श्रादि सात महारथियों द्वारा श्रभिमन्यु के वध का समाचार सुनकर दुर्योधन कह उठा कि शस्त्र पर किया गया श्रप्रकार भी नि:सन्देह शस्त्रान्त श्रानन्ददायक होता है ।

(ख) सब की पत्नियाँ सुन्दर नहीं होतीं, परनारीगामी पुरुष राज्यदण्ड का भागी बनता है, ××××, यदि दूसरों के हित में संलग्न वेश्यायें न हों तो बेचारे कामातुर जन कहाँ जायें ?

प्रथम पद्य में 'क्षात्रधर्म का परित्याग' रूप दोष गुण माना गया है, और द्वितीय पद्य में 'वेश्यागमन' रूप दोष भी गुण रूप में स्वीकार किया गया है । किन्तु इन दोनों पद्यों के वक्ताओं के प्रति न तो कवि की सहानुभूति है और न ही उसके प्रणयप सहृदय की । ग्रतः वचन-वक्रता के श्राधार पर ये दोनों लौकिक दोष और भी श्रधिक त्याज्य रूप में वर्णित हो गये हैं ।

७. ग्रौचित्य और ग्रनौचित्य

(क) ग्रौचित्य

इस ग्रन्थ में 'ग्रौचित्य' का प्रयोग निम्नोक्त चार स्थलों पर हुग्रा है—

(१) कवि [भीरोदयादि मुख्य पात्रों के लिए] अपनी इच्छा से किसी फल-विशेष का उत्कर्ष वर्णित नहीं करने लग जाता, श्रपितु 'श्रौचित्य' ग्रर्थात् उचितता को देखकर ही वह ऐसा करता है : "कविरपि न स्वेच्छया फलस्यो उत्कर्ष निबदुमर्हति किंतु श्रौचित्येन" (पृष्ठ ३०)

१-२ हिन्दी ना० द्व० पुष्ठ २६३-२६५ ।

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(२) जो वृत्त नायक ग्रथवा प्रकृत रस के प्रयुक्त ग्रथवा विरुद्ध हो उसे या तो छोड़ देता चाहिए, ग्रथवा उसकी ग्रन्यथाकल्पना कर लेनी चाहिए। (१११५) यहां 'ग्रन्यथा' शब्द से स्वयं ग्रन्थकारों का प्रभिप्राय है ग्रौचित्य ग्रथवा ग्रविरोष—ग्रन्यथेति ग्रौचित्येनाडविरोधेन वा। उदाहरणार्थ, नलविलास में नल जैसे घीरललित नायक द्वारा निरपराध पत्नी का त्याग यद्यपि ग्रनुत्थित है किन्तु कापालिक के प्रयोग से वह [उचितता-(ग्रौचित्य-) पूर्वक] निबद्ध हो गया है, श्रतः: यह प्रसंग ग्रानन्दवर्धनीय नहीं है। (पृ० १९)

(३) जिस प्रकार नाटक में ग्रभिनेय प्रबन्ध के लिए उपयुक्त फल, ग्रंक, उपाय, × × रस ग्रादि का प्रयोग किया जाता है उसी प्रकार प्रकरण में भी इन सब का प्रयोग ग्रौचित्य (उचितता) का उल्लंघन किये बिना करना चाहिए—"प्रभिनेयप्रबन्धोचितं फलाङ्का- पायँ'रसादिकं यथा नाटके लक्षितं तथाडडनुपि सर्वचौचित्याडनुगतं नाटिक्रमेणैव योज्यम्‌।" (पृ० २१२)

(घ) निवेंद ग्रादि तेरह संचारीभाव शृंगारादि रसों में यथायोग प्रयुक्त करने चाहिए : "निर्योत्साहादयः संचारिराश्रृंगारादि रसनां यथायोगं व्यवहारिणः"। यहां 'यथायोग' का तात्पर्य है—रसों के ग्रौचित्य (उचितता) का ग्रनुल्लंघन ग्रर्थात् इसका सम्यक् पालन—'यथायोगम्‌' इति रसौचित्य- नाटिक्रमेणैव । (हि० ना० द० पृष्ठ ३३१)

उक्त उदाहरणों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि 'ग्रौचित्य' शब्द का प्रयोग क्षेमेन्द्र-सम्मत ग्रौचित्य-सिद्धान्त के पारिभाषिक ग्रर्थ में न किया जाकर 'उचितता' ग्रर्थ में किया गया है, यद्यपि यह प्रलग बात है कि मूलतः जो कुछ क्षेमेन्द्र को ग्रभिष्ट है लगभग वही कुछ रामचन्द्र-गुणचन्द्र को भी ग्रभिष्ट है। क्षेमेन्द्र के शब्दों में 'उचितस्य च यो भावस्तदौचित्यं प्रचक्षते', किन्तु उन्होंने क्षेमेन्द्र के समान साक्षात् ग्रर्थवा ग्रासाक्षात् रूप में इसे 'काव्य को जीवित' स्वीकार नहीं किया।

(ख) ग्रनौचित्य— इस ग्रन्थ में कतिपय स्थलों पर 'ग्रनौचित्य' शब्द का भी प्रयोग हुग्रा है। एक स्थल पर यह पांच रसदोषों में से एक रसदोष है। पांच रसदोष हैं—ग्रनौचित्य, श्रृंग की उप्रता, ग्रप्रयुक्त ग्रौर ग्रतिभित्‌। इनमें से 'ग्रनौचित्य' नामक रसदोष का स्वरूप है—वह कर्म जो सहृदयों के मन में विचिकित्सा ग्रर्थात् शंका ग्रथवा सन्देह का कारण बने—सहृदयानां विचिकित्सा-हेतु कर्मानौचित्यम्‌। (पृष्ट ३२४)

ग्रागे चलकर इसी प्रसंग में ग्रनौचित्य को 'रसदोष' का पर्याय स्वीकार करते हुए ग्रन्थकारों ने कहा है कि यद्यपि ग्रंगों की उप्रता ग्रादि दोष चार रसदोष भी मूलतः 'ग्रनौचित्य' नामक दोष में ही ग्रन्तर्भूत हो सकते हैं, [प्रतः: इनका पृथक् निरूपण नहीं करना चाहिए], तथापि सहृदयों को ग्रनौचित्य ग्रर्थात् रसदोष का सम्यकू ज्ञान हो जाए, इसलिए ऐसा किया गया है— "शृंगोप्रादयश्च दोषाः परमार्थतोऽनौचित्यव्यातः। पातिनोऽपि सहृदयैर्नामौचित्यं यदुत्पादनार्थ- मुदाहृताः।" पृष्ठ (३२९)

उक्त दोनों स्थलों से भी यही ज्ञात होता है कि 'ग्रनौचित्य' शब्द क्षेमेन्द्र-सम्मत पारिभाषिक 'ग्रौचित्य' के प्रभावात्मक ग्रर्थ में प्रयुक्त न होकर रसदोष ग्रर्थ में ही स्वीकृत हुग्रा है।

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इसका कारण सम्भवतः ग्रानन्दवर्द्धन का यह कथन प्रतीत होता है कि ग्रनोचित्य के बिना रसभङ्ग का कोई ग्रन्य कारण नहीं होता—“ग्रनोचित्याद् ऋते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम् ।” (ध्वन्या० ३/१४ वृत्ति) ग्रानन्दवर्द्धन ने रसभङ्ग ग्रोर ग्रनोचित्य में परस्पर सम्बन्ध जोड़ा तो रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने इसे 'रसदोष' का ही समानार्थक मान लिया । इसी प्रसङ्ग में यह ज्ञातव्य है कि ग्रनोचित्य शब्द का दोष के ग्रर्थ में सम्भवतः सर्वप्रथम प्रयोग महिमभट्ट ने किया था तथा इसके ग्रनेक भेदों की भी चर्चा की थी, किन्तु वहाँ न तो इसे रसदोष के ग्रर्थ में प्रयुक्त किया गया है ग्रोर न ही इसके भेद चर्चा की थी। वहाँ तो इसे काव्य-दोष के सामान्य ग्रर्थ का ही वाचक माना गया है । (देखिए रसदोष ही०)। यहाँ तो इसे काव्य-दोष के सामान्य ग्रर्थ का ही वाचक माना गया है । व्यक्तिविवेक र० विमर्श)

हाँ, प्रस्तुत ग्रन्थ में निम्नोक्त स्थल पर 'ग्रनोचित्य' शब्द का प्रयोग क्षेमेन्द्र-सम्मत 'श्रोचित्य' के प्रभावात्मक रूप में भी उपस्थित किया गया है—“प्रहसन नामक रूपक केवल हास्य रस का ही विषय है । यह शृङ्गार रस का विषय नहीं हो सकता, क्योंकि [इस रूपक के मुख्य पात्रों] निन्दनीय पाखण्डी ग्रादि का शृङ्गार रस के रूप में निरूपण करना ग्रनोचित्य (श्रोचित्य के प्रभाव) का सूचक है—निन्द्यपाखण्डिप्रभृतां शृङ्गाराञ्चित्याभावात् केवलहास्यविषयत्वमेव । (पृष्ठ ३२१) उद्धर क्षेमेन्द्र भी रस के श्रोचित्य के विषय में श्रत्यन्त श्रग्रहशील हैं—

कुर्वन्तु सर्वाञ्जये व्याप्तिमौचित्यहरोचिरो रसः । सङ्गुसमास इवाशोकः करोत्यकुरितं मनः ॥ श्रोचित्यविचारचर्चा-१६

तथा वे रसों के पारस्परिक संयोग में ग्रनोचित्य को इष्टकर नहीं मानते— तेवां परस्पराश्रिते भावात् कुर्वान्चित्यविरक्षणाम् । ग्रनौचित्येन संस्पृष्टः कस्येष्टो रससंकरः ।। —वही, १६

ट. दोष

पीछे निर्देश कर ग्राये हैं कि इस ग्रन्थ में पांच रस-दोषों का निरूपण किया गया है । इस प्रसङ्ग के श्रतिरिक्त दोष पर ग्रन्यात्र विशिष्ट प्रकाश नहीं डाला गया है १ इस प्रसङ्ग में ग्रन्थकारों ने उक्त पांच रसदोषों के भेदोपभेदों का निरूपण किया है जिन्हें इनसे पूर्व मम्मट ने भी थोड़े-बहुत ग्रन्तर के साथ रेखांकित किया था । इस प्रसङ्ग की दो उल्लेखनीय विशेषताएँ हैं—(१) रसादि की स्वशब्दोक्ति को दोष न मानना, तथा (२) विभाव की कशकल्पना द्वारा व्यक्ति' को मम्मट के समान रसदोष न मानकर 'संदिग्ध' नामक वाक्यदोष मानना । ये दोनों स्थल विचारणीय हैं ।

(१) रसादि की स्वशब्दोक्ति का सर्वप्रथम उल्लेख उद्भट ने अपने 'काव्यालङ्कारसारसंग्रह' में रसबद् ग्रलङ्कार का लक्षण प्रस्तुत करते हुए इन शब्दों में किया था—

रसबद्विस्पष्टगुणारादिरसादवस्थाविभावाभिनयास्पदम् । स्वशब्दवाच्यविचारिविभावाभिनयास्पदम् ॥ का० सा० सं० ४१३

१. उदाहरणार्थ देखिए—हि० नाट्यशास्त्र पृ० २३२ ।

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इस कथन से उनका अभिप्राय यह है कि रसवत् अलंकार वहां होता है जहां शृंगार आदि स्पष्ट (प्रधान शृंगार की ग्रहणी) रूप से दिखाये गये हों तथा साथ ही स्थायिभाव, संचारिभाव, विभाव तथा अनुभाव शृंगार शांत ग्रनुभाव और सात्विक भाव [के विभिन्न प्रकारों] का स्वशब्द से ग्रास्पद (कथन) भी किया गया हो । इस अलंकार के उदाहरण-स्वरूप उन्होंने निम्नोक्त तीन पद्य प्रस्तुत किये थे—

इति भावयतस्तस्थ्य समस्तान् पावतेऽङ्गनान् । संभृतानल्पसंवलपः कन्दर्पः प्रबलोद्भवत् ॥ स्विच्छताडपि स मातृषु बभार पुलकोत्करम् । कदम्बकलिकाकृताशेषरप्ररोपम् क्षामौत्सुक्यवर्गाभिण्या विनतानिच्छलया क्षराम् । क्षयं प्रमोदलसया हृशदश्रुसिस्स्यमभूत् ॥

का० सा० सं० ४१२-४

यह उदाहरण रसवादियों के मत में रस का है और अलंकारवादियों के मत में रसवत् अलंकार का । उन दोनों का विभिन्न हृदयग्राहीया है इसे धारणा का उत्तरदायित्व है । किन्तु यहां विचारणीय विषय यह हृदयग्राहीया नहीं है, ग्रपितु यह है कि क्या किसी सरस वाक्य में रस ग्रादि की स्वशब्दोक्ति अनिवार्य है । उद्भट के टीकाकार प्रतिहारेदुराज ने उक्त पद्यों में विभावादि पांचों तत्वों की स्वशब्दोक्ति का निर्देश करते हुए लिखा है कि यहां कन्दर्प प्रभृत 'रति' नामक स्थायिभाव, शृंगार, चिन्ता, प्रमोद (हर्ष) नामक संचारिभाव, स्वेद और पुलक (रोमांच) नामक सात्विक-

भाव—ये सभी, तथा इनके अतिरिक्त पार्वती और 'तस्य' अर्थात् महादेव ये दोनों विभाव भी स्वशब्द द्वारा कथित हैं । (पृथ ५४) ग्रन्थः यहां उद्दट-सम्मत रसवत् अलंकार का उक्त लक्षण घटित हो जाता है । उद्भट और प्रतिहारेदुराज के इन वक्तव्यों से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि उक्त लक्षण के समय तक रसवत् अलंकार (प्रथवा रस) के उदाहरणों में विभावादि की स्वशब्दोक्ति अनिवार्यतः स्वीकार की जाती थी ।

उद्भट के उपरान्त ग्रानन्दवर्धन ने अपने रसदोष-प्रसंग में उक्त दोष का नामोल्लेख नहीं किया । हां, रस वाच्य पर प्राधान्य न होकर व्यंग्य पर प्राधान्य होता है—इस प्रसंग में उन्होंने प्रकारान्तर से इस दोष की चर्चा की है । इस सम्बन्ध में उनका कथन यह है कि किसी भी रचना में विभाव ग्रादि की परिपक्व सामग्री के प्रभाव में रस ग्रादि के नामोल्लेख-मात्र से रसानुभूति नहीं हो जाती— न हि केबलं शृङ्गारादिशब्दमात्रभाजं विभावादिप्रतिपादनरहिते काव्ये मनागपि रसवत्प्रतीयते—ध्वन्या० ११४ वृत्ति

ग्रागे चलकर कुन्तक ने उद्दट के उक्त कथन का उल्लेख करते हुए उसका खण्डन किया । उनके मत का सार यह है कि यदि रसचर्वणा का चमत्कार स्वीकार किया जाए तब तो छृत्पू (ग्रादि मिथ्या श्रादि) का नाम लेने मात्र से भी उनका ग्रास्वाद प्राप्त हो जाना चाहिए, किन्तु ऐसा होता नहीं है ।

१. यदपि कदिचित् 'स्वशब्ददशयिसंचारिभावाभिनयादपदम्' इत्यनेन पूर्वंसेव लक्षणं विशेषितम् । तत्र स्वशब्ददशयितवं रसानामपरिगतपूर्ववृत्तमसमाप्तम् ××××× यत् स्वशब्देरभिधीयमानाः श्रुतिपथमवतन्ते । चेतनानां चर्वरेचमत्कारं कुर्वंन्तीतनेन स्थायेन छृतपुरप्रभृतयः पदार्थाः स्वशब्देरभिधीयमानाः तदास्वादसम्पादयन्ति ×××× —हि० वक्रोक्तिजीवित पृष्ठ ३४३-३४४

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कुन्तक के उपरान्त मम्मट ने 'रस ग्रादि की स्वशब्दवाच्यता' को रसदोषों में परिगणित किया। उन्हें इस दोष की प्रेरणा ग्रानन्दवर्धन ग्रौर सम्मटवत् कुन्तक के उक्त प्रसंगों से मिली होगी। मम्मट के श्रनुकरण पर विश्वनाथ ने भी इस दोष की स्वीकृति की ग्रोर निम्नोक्त उदाहरण प्रस्तुत किये—

(क) तामवद्वीक्ष्य कुरंगाक्षीं रसो नः कोऽप्यजायत ।

(ख) चन्द्रमंडलमालोक्य शुत्रारे मग्नमन्तरम् ।

(ग) प्रजायत रतिसंत्सया: त्वद्य लोचनगोचरे ।

(घ) जाता लज्जावती मृग्या प्रियस्य परितुम्बने ।

इधर रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने सम्मतवत् मम्मट के इस प्रसंग से प्रेरणा प्राप्त कर उनसे ग्रसहृत्ति प्रकट करते हुए उक्त रूप में इस दोष की ग्रस्वीकृति की है। इस सम्बन्ध में हमारी विनम्र सम्मति यह है कि—

(क) जहां विभावादि-सामग्री श्रृंगार एवं श्रृंगारपरिपक्व रूप में प्रस्तुत की जाती है, श्रथवा इसका श्रभाव ही रहता है, वहां यदि रस, श्रृंगार, रति, लज्जा ग्रादि शब्दों द्वारा कथन को सरस बनाने की चेष्टा की जाए तो निस्संदेह ऐसे कथन न तो सरस कहे जाएंगे ग्रौर न काव्यत्व की किसी कोटि में ही वे ग्रन्तर्भूत होंगे। वे केवल सामान्य वार्तामात्र ही होंगे जैसे कि विश्वनाथ द्वारा प्रस्तुत उक्त चार वाक्य वाक्य

(ख) जहां विभावादि की सम्पूर्ण सामग्री का उपस्थापन सम्यक् रूप से किया जाए, श्रौर यदि वहां रस ग्रादि में से किसी एक का नाम-निर्देश भी ग्रभिप्रायास हो जाए तो इन सरस प्रसंगों में यह दोष प्रथम तो स्वीकृत नहीं करना चाहिए, श्रौर यदि स्वीकृत किया भी जाए तो उसे क्षत्य समकुना चाहिए, क्योंकि इससे रस-प्रतीति में कोई व्याघात उपस्थित नहीं होता। उदाहरणार्थ, रामचन्द्र-गुणचन्द्र प्रस्तुत पद्य' में मानिनी के नेत्रों का प्रपल्च-चातुर्यपूर्ण वरर्णन काव्यालंकारिकता का उत्पादक है, किन्तु केवल 'उत्सुकताम' नामक संचारीभाव के प्रयोग से इसमें रसदोष मानकर काव्यत्व की ग्रस्वीकृति ग्रथवा हीन-काव्यत्व की स्वीकृति करना समुचित नहीं है। इसी प्रकार एक ग्रौर उदाहरण तथा दूसरी ग्रोर स्वयं मम्मट द्वारा प्रस्तुत दो उदाहरण भी केवल वार्तामात्र न होकर काव्यचमत्कार के उत्पादन में समर्थ हैं, क्योंकि उस सहृदय को जो इस पारिभाषिक काव्य-दोष से नितान्त ग्रपरिचित है, इन शब्दों के प्रयोग के कारण उसके ग्रह्लाद में तनिक भी व्याघात नहीं पहुंचता।

(ग) काव्यप्रकाश के टीकाकारों ने इस प्रसंग में यह संकेत भी किया है कि स्थायी-भाव, संचारीभाव ग्रादि के प्रचलित नामों के स्थान पर यदि उनका पर्यायवाची शब्द रख दिया जाए तो वहां दोष नहीं रहता। उदाहरणार्थ—"श्रुतिगतैरतिसत्सया: कोऽप्यभूत्" में 'उत्साह' नामक स्थायिभाव का प्रयोग दोष का कारण है, पर यदि यह पाठ कर दिया जाए तो यह दोष न रहेगा—'प्रमोदस्तस्य कोऽप्यभूत्'। किन्तु यह धारणा भी समुचित नहीं है।

१. हि्दी नाट्यदर्पण पृष्ठ ३२६

२. (क) सव्रीडा दयितानेन......

(ख) तामनुज्ञयमंगल...... १ का० प्र० ७/३२१, ३२२

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मात्र ग्राहार है काव्यचमत्कार की ग्राह्यपत्ति । मम्मट-प्रस्तुत यह पद्य' इस ग्राहार पर भले ही सदोष हो, पर इस कारण कदापि सदोष नहीं मानना चाहिए कि इसमें 'उत्साह' शब्द का प्रयोग हुम्रा है, श्रथवा 'प्रमोद' शब्द रख देने से यह ग्राह्यपत्ति दूर हो जाएगी श्रौर यह सदोष न रहेगा ।

(घ) वस्तुतः इस दोष की स्वीकृति का मूल उद्देश्य व्यञ्जनार्थ की महत्ता स्पष्ट करना है । श्रत: यदि रस, स्थायिभाव श्रादि का प्रयोग न किया जाए तो यह श्रादर्श स्थिति है, विभावादि की परिपक्वता में इनका प्रयोग सदोष नहीं है तथा इनकी श्रपरिपक्वता में दोष है ।

श्रत: रामचन्द्र-गुणाचन्द्र की उक्त धारणा श्याशिक रूप से ग्राह्या है—पूर्वंतः नहीं ।

(२)

ग्रब दूसरे दोष को लें—'विभाव की कष्टकल्पना द्वारा व्यक्ति (प्रभिव्यक्ति)।' इस दोष का मम्मट तथा रामचन्द्र-गुणाचन्द्र ने निम्नोक्त उदाहरण प्रस्तुत किया है—

परिहरति रांत मर्त्य जुनोते स्वलतितरां परिवर्तंते तु भूयः । इति वत विषमा दशा स्वदेहं परिभवति प्रसभं किमत्र कुमः ॥

श्रर्थात् यह नायिका किसी प्रकार की हठ नहीं रखती, इसकी बुद्धि क्षीण हो गयी है, यह निरन्तर श्रर्थात् यह नायिका किसी प्रकार की हठ नहीं रखती, इसकी बुद्धि क्षीण हो गयी है, यह निरन्तर श्रर्थात् यह नायिका किसी प्रकार की हठ नहीं रखती, इसकी बुद्धि क्षीण हो गयी है, यह निरन्तर गिरती पड़ती है तथा बार बार करवटें बदलती है । इस प्रकार इसके देह की श्रवस्था श्रत्यन्त विषम है, इसका क्या उपाय किया जाए ?—इस कथन से यह सन्देह बना रहता है कि इस नायिका की यह दशा वियोग (रति) के कारण है श्रथवा शोक के कारण । श्रत: यह निश्चय-पूर्वक नहीं कह सकते कि यह उदाहरण विप्रलम्भ श्रृङ्गार रस का है श्रथवा करूणा रस का ।

मम्मट ने इसे 'विमावस्य कष्टकलनया व्यक्त' नामक रसदोष माना है श्रौर रामचन्द्र-गुणाचन्द्र ने 'सन्दिग्ध' नामक वाक्यदोष । नाट्यदर्पएा में रसदोषों के प्रतिरिक्त श्रन्य दोषों का निरूपएा नहीं किया गया । काव्यप्रकाश में वाक्यगत सन्दिग्ध का उदाहरण है—

कसिमन्नु कर्मणि सामर्थ्यमसय नोत्तपतेऽतराम् । ग्रह्ये साधुचरणस्तस्मिन् साधुरिबध्यतेsतिमि: ॥ का० प्र० ७/२०५

श्रर्थात्, इस पुरुप की शक्ति किस कार्य में प्रकट नहीं होती ? यह व्यक्ति तो 'साधुचर' है । श्रत: इसे नमस्कार कीजिए । 'साधुचर' से यह स्पष्टत: प्रकट नहीं होता कि वह 'साधुओं' में घूमता-फिरता है' श्रथवा 'पहले साधु रहा है ।' श्रत: यहां मम्मट के मत में वाक्यगत सन्देह है । निस्सन्देह उक्त 'परिहरति रांत'.........' पद्य में इस प्रकार का सन्देह नहीं है । यहां रस-विषयक सन्देह है वाक्य-विषयक नहीं ।

इसी प्रसंग में श्रथंगत सन्देह का उदाहरण भी द्रष्टव्य है—

माॅस्यंमुत्सार्य बिचार्य कार्यमार्यैः समयान्निबुधाहरन्तु । सेध्या; नितम्बा: किमु श्वारराममुत स्मरस्मेरविलासिनीनाम् ॥ का० प्र० ७/२६२

१. संप्रहारेऽपि हरराः प्रहारराहाम्परसपरम् । ठरागत्कारः श्वितिगक्तसाहस्तस्य कोप्यभूत् ॥ का० प्र० ७/३२४

२. का० प्र० ७/३२६, ना० द० ३/२३ वृत्ति ।

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अर्थात्, क्या पर्वतों के नितम्ब (प्रान्तर भाग) सेवनীয় है ? ग्रथवा विलासिनियों के नितम्ब—इस कयन में प्रकारणाभाव के कारण यह सन्देह बना रहता है कि यह उदाहरण शान्त रस का है ग्रथवा शृंगार रस का । "परिहरति रतिं..." पद्य तथा इस पद्य में समस्या एक ही है कि दो रसों में से इसे किस रस का उदाहरण माना जाए । किन्तु साथ ही दोनों पद्यों में ग्रन्थर है वह यह कि एक में इलेष के कारण सन्देह है ग्रोर दूसरे में इसके बिना । वस्तुतः ग्रन्थव्यत्ययतिरेक-सम्बन्ध के श्राधार पर 'सेव्या: नितम्बा:'..." कयन में ग्रथ्यदोषता की ग्रप्रेक्षा पददोषता ग्रधिक है, जैसे कि स्वयं मम्मट ने पदगत सन्देह का ऐसा ही उदाहरण प्रस्तुत किया है—"ग्राशी: परम्परां वन्धां कुरूष्व कृपां कुरु" इसमें 'वन्धाम्' को ग्रथ्य सन्दिग्ध है । क्या इसका ग्रथ्य 'वन्दनीया श्रथवा नमस्करगीया को' है, ग्रथवा वन्द्याम् (बन्ध्याम्) का ग्रथ्य 'बन्दीकृत महिला में है? किन्तु 'सेव्या:' नितम्बा:'..." में रस-विषयक सन्देह है जो कि 'इलेष' पर ग्राधारित है, ग्रोर 'ग्राशी: परम्परां वन्धाम्..." में इलेष तो है किन्तु यहां रस-विषयक सन्देह नहीं है । ग्रतः 'प्राधान्येन व्यपदेशा: भवन्ति' के ग्रनुसार प्रथम पद्य में रसदोष है ग्रोर द्वितीय पद्य में पददोष । 'इलेष' के सम्बन्ध में ग्राचार्यों की स्पष्ट धारणा है कि इसकी स्थिति तब माननी चाहिए जब यह स्वतन्त्र रूप में प्रयुक्त हो ।' इसकी परतन्त्र ग्रथवा गौण स्थिति में प्रघानता उस काव्य-तत्व की माननी चाहिए जिसका यह पोषक हो ।

उक्त विवेचन के ग्राधार पर हम कह सकते हैं कि 'सेव्या: नितम्बा:'... ग्रोर 'परिहरति रतिं...' इन दोनों पद्यों में सन्दिग्ध नामक रसदोष ही है । किन्तु एक ग्रन्थर के साथ—प्रथम में स्पष्ट सन्दिग्ध दोष है ग्रोर दूसरे में ग्रश्लिष्ट, पर दोनों में ही रसगत हों । क्योंकि दोष की दृष्टि से रस-निर्णय में सन्दिग्धता का बना रहना ही दोषों का प्रतिपादक है । 'परिहरति रति...' में 'विमाव को कष्टकल्पना द्वारा प्रभविष्यत्' नामक दोष की स्वीकृति इसलिए नहीं माननी चाहिए कि विभावादि तो रस-सिद्धि के लिए साधन हैं । इस पद्य में रस का निर्णय सन्दिग्ध रह जाने के कारण सन्दिग्ध दोष मानना चाहिए ग्रोर वह भी रसगत । निष्कर्षतः रामचन्द्र-गुणचन्द्र की यह धारणा कि यहां वाक्यगत सन्दिग्ध दोष है ग्रन्थतः मान्य है क्योंकि यहां सन्दिग्ध दोष रसगत ही है वाक्यगत नहीं ।

८. रस

नाटघदर्पण में ग्रन्थ काव्योपकारकों के समान रस पर भी केवल इस दृष्टि से प्रकाश डाला गया है कि इसका रूपक के साथ क्या सम्बन्ध है, कौन कौन से रस इसके विभिन्न भेदों ग्रथवा ग्रंगों के साथ सम्बद्ध है ग्रादि । उदाहरणार्थ—'भाजा' रूपक में शृंगार ग्रोर वीर रस की प्रवानता होती है, 'ग्रौट' में रौद्र रस की तथा 'वस्तुतत्त्व' में करुण रस की, ग्रोर 'वाथ' का सम्बन्ध सब रसों के साथ होता है, इत्यादि । 'भारती' नामक नाट्यवृत्ति सब रसों के साथ सम्बद्ध होती है, 'सात्वती' रौद्र, वीर, शान्त ग्रोर ग्रद्भुत रसों के साथ, 'कैशिकी' हास्य ग्रोर शृंगार रस के साथ, तथा 'ग्रारभटी' रौद्र ग्रादि दीप्त रसों के साथ । इसी प्रकार रूपकों में कौन कौन से रस परस्पर मित्र होते हैं तथा कौन से विरोधी ग्रोर विरोधी, रसों का परिहार किस प्रकार किया जाए, ग्रादि—इन बहुचर्चित विषयों पर भी इस ग्रन्थ में प्रकाश डाला गया है ।

१. इलेबस्य चोपमादिलकारविकल्पोद्भव विषय: इति । [का० प्र० ५ म उ०, इलेषप्रकरण]

२. हिन्दी नाटचदर्पण २/१५, २१, २३, २६

३. वही ३/२, ५, ६ ।

४. वही पृष्ठ ३२० ।

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( ७३ )

रूपक श्रौर रस के पारस्परिक सम्बन्ध-निर्देशक उपयुक्त स्थलों के श्रतिरिक्त इस ग्रन्थ में रस-विषयक कतिपय ग्रन्थ समस्याग्रों एवं प्रसंगों की भी चर्चा की गयी है, जैसे—

(१) रस की महत्ता।

(२) प्रचलित से इतर संचारिभावों तथा रसों का नाम-निर्देश ।

(३) नो रसों का क्रम-निर्देश ।

(४) श्रृङ्गार रस के दोनों भेदों का निरर्णायक ग्रहणार ।

(५) श्रद्भुत रस की महत्ता एवं स्थिति ।

(६) शान्त रस का स्थायिभाव ।

(७) ग्रभिनय श्रौर नट तथा प्रेक्षक ।

(८) रस की सुखदुःखात्मकता ।

ग्रब इन प्रसंगों का दिग्दर्शन एवं सामान्य विवेचन प्रस्तुत है ।

(१) रस की महत्ता

प्रस्तुत ग्रन्थ में ग्रनेक स्थलों पर यह निर्दिष्ट किया गया है कि रस नाटक में ग्रपनी विशिष्ट महत्ता रखता है । इनमें से कुछ स्थलों पर रस को काव्य के ग्रन्य उपकरयों—विशेषतः ग्रलंकार—की ग्रपेक्षा सर्वोत्तम उपकरया के रूप में स्वीकार किया गया है, जिनका उल्लेख पीछे यथास्थान किया जा चुका है । इस सम्बन्ध में ग्रन्य उल्लेखनीय स्थल इस प्रकार हैं—

(१) नाट्य का पन्थ रस की कलाओं से परिपूर्ण होता है ।१

(२) नाट्य का एक मात्र ग्राह्य रस हो है ।२

(३) (नाटच के) कथाभाग में विच्छेद न ग्राने देना रस की परिपुष्टि के लिए किया जाता है ।३

(४) 'प्रकरयां' नामक रूपक में पुरानी बातों में भी कवि को रस की परिपुष्टि के लिए नई बात ग्रौर बढ़ा देनी चाहिए।४

(५) कवि (नाटककार, प्रबन्धकार) की समग्र चेतना एकमात्र रस-विधान में ही संलग्न रहती है, वह रस-निवेश में सिद्धहस्त होता है ।५

उक्त स्थलों से स्पष्ट है कि ग्रन्थकारों को यह मानना ग्रभोष्ट है कि रस नाटक का ग्रनिवार्यं तत्व है तथा नाटककार का एकमात्र लक्ष्य इसी की ही पुष्टि एवं सिद्धि करना है । वस्तुतः

१. पन्थाः × × × नाटचस्य रसकलाजोलसंस्कुलः । हि० ना० द्व० पृष्ट ३

२. ग्राह्यार्थमात्रस्तत्रैवो यमकृतिलेवादीनामेव निर्वहणमहान्ति, न तु रसंस्काररस्य नाटचस्य । —वही, पृष्ट १२०

३. इतिवृत्तस्याविच्छेद्‌ रसपुष्ट्यर्थः । —वही पृष्ट १९६

४. यदपि श्रत्र प्राप्तानं निवद्धचाते तत्रापि कविना रसपुष्टिहेतुरोधकाव्यापि विषयः । —वही पृष्ठ २११

५. रसविधानकचेतसः कवे: × × × रसनिवेशैकव्यवसायिनः प्रकन्धकवयः × × × । —वही, पृष्ठ १९६-१९७

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नाटक श्रो रस के पारस्परिक सम्बन्ध की चर्चा भरत मुनि के समय से ही की जाती रही है। उन्होंने नाटच (नाटक) के लक्षणों में ग्रन्थ तर्हों के साथ रसतरव का भी समावेश किया है, नाटच के प्रधान श्रंगों में पाठच, गीत, प्रभिनयँ के प्रतिरिक्त रस की भी गरवाना की हैं, तथा नाटच में रस की ग्रनिवारयं स्थिति को प्रकारान्तर से स्वीकार किया है । इस सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि नाटचदर्पण में कथा श्रो र मुक्तक-काव्य की सिद्धि श्रलंकार-चमत्कार पर श्राधारित की गयी है श्रो र नाटक तथा श्रो र प्रबन्ध-काव्य की रस पर । किन्तु प्रथम धाररगा ग्रंशतः सत्य है, श्रो र दूसरी धाररगा के सम्बन्ध में इतना श्रो र ज्ञातव्य है कि प्रबन्धकाव्यों की ग्रपेक्षा नाटक में रस की पुष्टि अधिक संकुलता के साथ की जा सकती है, क्योंकि इस में विभावादि सामग्री ग्रपने यथावत् रूप में सन्निविष्ट रहती है।

इसी प्रसंग में यह भी उल्लेखनीय है कि रामचन्द्र-गुरणचन्द्र ने शब्दार्थ को काव्य का शरीर मानते हुए कहा है कि इस शरीर में प्राण-प्रतिष्ठा करने वाला रस ही है । यही कारण है कि कविजनों की प्रीति रस की प्रति ही होती है—

प्रशंसद्वयपुः कायं रसैः प्रार्योऽवसर्पति ।

ब्रह्मासतेन सोहार्द रसेऽपि कविमानिनाम्॥ ना० द० ३/२१

(१) प्रचलित से इतर रसों तथा संचारीभावों का नामनिर्देश—

इस ग्रन्थ में प्रचलित से इतर संचारीभावों तथा रसों का नाम-निर्देश किया गया है, किन्तु इनका स्वरूप प्रस्तुत नहीं किया गया । इनकी सूची इस प्रकार है—

संचारिभाव —क्षुत, तृष्णा, मैत्री, मुदिता, श्रद्धा, दया, उपेक्षा, रति, सन्तोष, क्षमा, मार्दव, ग्राजव, दक्षिरण्य ग्रादि ।

रस—श्रोल्य, स्नेह, व्यसन, दुःख, सुख ग्रादि । इन पाँचों के स्थायिभाव कमशः ये हैं—

गर्व (तृष्णा), प्रह्लादता, व्यासक्ति, घररति श्रो र सन्तोष । किन्तु कई श्राचार्य इनका ग्रन्थभाव प्रचलित रसों में मानते हैं ।

(३) नव रसों का क्रम

इस ग्रन्थ में शृंगार ग्रादि नो रसों की पूर्वापर-क्रम स्थिति के सम्बन्ध में निम्नोक्त संगतियाँ प्रस्तुत की गयी हैं जो कि प्रायः मनस्तोत्रक हैं । (१) सर्वप्रथम शृंगार रस की गरगना करनी चाहिए क्योंकि ‘काम’ सब प्राणियों में सुलभ तत्त्व है, तथा उसे ग्रत्यन्त परिचित रहता है, ब्रतः सब को मनोहर प्रतीत होता है । (२) शृंगार के उपरान्त हास्यरस की गरगना की जाती है, क्योंकि यह रस शृंगार का ब्रनुगामी (उससे उद्भूत एवं उसका पोषक) होता है । (३) इसके उपरान्त

१. बहुकुतरसम्मयं × × × ना० शा० १६/११५

२. जग्राह पाठचमुग्रवेदात् सामग्र्यो गीतमेव च ।

यजुर्वेदाभिनयान्नात् रसानार्थव्यंग्यादपि । वही १/१७

३. ये रसा इति पठचन्ते नाटचो नाटचविचक्षसः। वही ६/२

४. देखिए पृष्ठ ६

५, ६. हि्न्दी नाटचदर्परग पृष्ठ ३३१, ३०६

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करुण रस—क्योंकि यह हास्य रस का विरोधी श्रृंगार्ात उसके विपरीत होता है। (४) इसके उपरान्त रौद्र रस—क्योंकि यह रस श्रृंगार् श्रृंगार् की उत्पत्ति काम से होता है। (५) इसके उपरान्त वीर रस—क्योंकि यह रस धर्मप्रधान है श्रोर धर्म की उत्पत्ति काम श्रौर श्रृंगार् दोनों से होती है। (६) इसके उपरान्त भयानक रस—क्योंकि वीररस का मुख्य उद्देष्टव्य है मृत जनों को ग्रभय-प्रदान। (७) इसके उपरान्त बीभत्स रस—क्योंकि सात्त्विक जन भय के प्रति जुगुप्सा प्रकट करते हैं। (८) इसके उपरान्त श्रद्भुत रस—क्योंकि बीभत्स को विस्मय द्वारा दूर किया जा सकता है। (९) सब से श्रन्त में शान्त रस की गरगना की जाती है, क्योंकि शम सब धर्मों का मूल कारण है।

निष्कर्षतः: उक्त प्रसंग में 'काम' को प्रधान माना गया है, क्योंकि इसी पर ही धर्म श्रौर श्रृंगार् दोनों श्राधारित हैं, तथा इन तीनों के बल पर शृंगार श्रादि नौ रसों की पूर्वापर्-स्थिति निर्धारित की गयी है; तथा साथ ही प्रकारान्तर से शृंगार रस की प्रधानता भी सिद्ध की गयी है, क्योंकि श्रकेला शृंगार रस ही ऐसा है जो 'काम' से सम्बद्ध है। शृंगार के श्रतिरिक्त अन्य रस या तो श्रृंगार् श्रौर धर्म में से किसी एक श्रथवा दोनों पर श्रवलम्बित हैं। श्रथवा एक दूसरे रस पर। इस प्रकार से रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने ग्रन्थपुराणकार एवं भोजराज की एतद्विषयक प्रथाानुसार धारणा का अन्य रूप से समर्थन किया है कि शृंगार रस सर्वोपरि रस है।

(४) शृङ्गार रस के दोनों भेदों का निर्णायक श्राधार

शृंगार रस के दो प्रचलित भेदों के सम्बन्ध में ग्रन्थकारों का कहना है कि ये भेद गाय के चितकबरे श्रौर काले वरन् के समान नितान्त विभिन्न न होकर परस्पर संकुलित (मिश्रित) रहते हैं, क्योंकि एक श्रोर सम्भोग में विप्रलम्भ की सम्भावना बनी रहती है श्रोर दूसरी श्रोर विप्रलम्भ में मनोगत सम्भोग का भाव अनुस्यूत रहता है। किन्तु इस स्थिति में निर्णंाय उत्कटता के श्राधार पर किया जाता है। हाँ, यदि किसी पद्य में दोनों श्रवस्थाश्रो को प्रस्तुत किया जाता है तो वह मिलित (एक समान ग्राह्यादक) चित्ररण का स्थल प्रतिशय चमत्कार का द्योतक होता है—

श्रवस्थाद्वैतमनिबन्धने च सातिशयिचमत्कारः। (हि० ना० ८० पृष्ठ ३०६)

इनमें से प्रथम धारणा का श्राधार व्याकरणशास्त्र का यह प्रसिद्ध सिद्धान्त है कि 'प्राधान्येन व्यपदेशा: भवन्ति'। निस्सन्देह शृङ्गार के दोनों भेदों में इतर भेद का ग्रंश संविलित रहता है श्रौर उसका व्यपदेशक श्राधार है किसी एक तत्व का प्राधान्य। किन्तु दूसरी धारणा विचारणीय है। प्रथम तो ऐसे पद्यों का मिलना ग्रसम्भव है, जिन में सम्भोग श्रथवा विप्रलम्भ में से किसी एक रूप की प्रधानता लक्षित न होती हो, श्रौर दूसरे, पण्डितराज जगन्नाथ के शब्दों में संयोग श्रौर विप्रलम्भ का एकमात्र ग्राह्यादक ग्रन्थःकरण की वृत्ति-विशेष है; वाह्य वातावरण नहीं है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने इस प्रसंग में जो उदाहरण प्रस्तुत किया है, उसी से मिलता जुलता उदाहरण जगन्नाथ ने भी इसी प्रसंग में दिया है—

१, २. हि० ना० ८० पृष्ठ ३०५, ३०६

३. इमौ संयोगवियोगाख्यौ ग्राह्यादकृतिविशेषौ। —रसगंगाधर पृष्ठ ४१

४. 'एकस्मिन्न् श्यने पराङ्मुखतया वीतोत्तरं ताम्यतो' इत्यादि —हि० ना० ८० पृष्ठ ३०७

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ज्ञायिता सचिच्छेद्यैर्निबर्हैः सफलैकतुं मही मनोरथान् ।

ज्ञायिता ज्ञायतानाम्बुजं दरमीयलच्रयणानिरीक्षते ॥

[रसगंगाधर पृष्ठ ४१,१२]

इन दोनों उदाहरणों में ग्रन्थःवृत्ति के ग्राधार पर ग्रन्थतः सम्भोग श्रृंगार की ही स्वीकृति होगी, वियोग की भावना तो यहां उद्दीपक मात्र है ।

(१) प्रदर्शुत रस की महत्ता एवं स्थिति

नाट्यदर्पणे में प्रदर्शुत रस की चर्चा दो स्थलों पर की गयी है—एक 'परिगृहन' नामक निर्वंहण-संध्यंग के प्रसंग में और दूसरे 'नाटक' नामक रूपक के प्रसंग में ।

पहले प्रसंग में प्रदर्शुत रस का सामान्य सा स्वरूप-निदर्शन है—“प्रदर्शुत रस की प्राप्ति 'उपगृहन' (परिगृहन) कहलाती है । इसका स्थायिभाव 'विस्मय' है । उदाहरणार्थ, रामाभ्युदय नाटक में सीता-ज्वलन प्रकरण में सीता के लिए रघुनंदन का प्रवेश श्रादि ।” [ पृष्ठ १८५ ]

दूसरे प्रसंग में प्रदर्शुत रस की महत्ता एवं स्थिति पर प्रकाश डाला गया है—“नाटक नामक रूपक में एक रस ग्रंगीरूप में होना चाहिए, तथा अन्य रस ग्रंगरूप में । इसके ग्रन्थ में प्रदर्शुत रस होना चाहिए : 'एकाङ्गीरसमानुयायं प्रदर्शुतान्तम्‌' । 'प्रदर्शुतान्तम्‌' पद का विग्रह करते हुए ग्राचार्य कहते है कि "प्रदर्शुत एवं रसोज्ञते निर्वंहणो यत्र", ग्रंथात् नाटक के ग्रन्थ में—निर्वंहण संधि में—

श्रृंगार, वीर, रौद्र श्रादि रसों द्वारा स्त्रीरत्न, पृथ्वीवल्लभ, शत्रुक्षय रूप सम्पत्तियों की प्राप्ति होती है, और दूसरी श्रोर करुणा, भयानक तथा वीभत्स रसों द्वारा इन सब की ग्रप्राप्ति । किन्तु नाटक के ग्रन्थ में प्रदर्शुत रस द्वारा लोकोत्तर एवं ग्रासामान्य फलरूप प्राप्ति दिखानी चाहिए, क्योंकि प्रत्येक क्रिया का कोई न कोई फल तो अवश्य होता ही है, ग्रतः यदि नाटक में रसाधाररुप वस्तु रूप फल की कल्पना न की गयी तो फिर इसके निर्माण में परिश्रम करने से क्या लाभ ?"

( पृष्ठ ३७ )

इस कथन का श्रभिप्राय यह है कि श्रंगी रस चाहे कोई भी हो किन्तु उस रस से सम्बद्ध फल 'प्रदर्शुत' से मित्रित होना चाहिए । 'प्रदर्शुत' से यहां तात्पर्य है ऐसा फल जो एक श्रोर ग्रासामान्य हो, ग्रर्थात जो सामान्य परिस्थितियों में सुलभ न हो, ग्रर्थवा जिसके लिए नायक को लोकाचार से विलक्षण ग्राचरण करना पड़े; ग्रोर दूसरी श्रोर वह लोकोत्तर हो, ग्रर्थात् जिसकी प्राप्ति सामान्य जन के लिए प्रायः ग्रसम्भव सी होती हुई भी सबकी लालसा एवं कामना का विषय बनी रहे । उदाहरणार्थ, सामान्य लोकव्यवहार के समान केवल विवाह-सम्बन्ध द्वारा नायिका की प्राप्ति में प्रदर्शुत-रस का समावेश न होने के कारन यह नाटक का विषय नहीं हैं । हां, दुष्यन्त-शकुन्तला का प्रेम-प्रसंग नाटक का विषय बन सकता है, क्योंकि इसमें एक श्रोर लोकोत्तर से विलक्षण ग्राचरण किया गया है ग्रोर दूसरी श्रोर ग्रनिन्द्य सुन्दरी शकुन्तला रूप फलप्राप्ति प्रत्येक सहृदय की लालसा एवं कामना का विषय बन गयी है । इसी प्रकार 'शुद्धवीरार्जुन-संयोगिता स्वयंवर' भी ग्रासामान्य वरमाला-प्रसंग के समावेश के कारन नाटक का विषय बन सकता है । इसी प्रकार वीर रस के नाटकों में भी नैपोलियन का यह कथन भी कि "मैं गया, मैंने देखा ग्रोर मैंने जीत लिया" उसी स्थिति में नाटक

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का विषय बन सकता है जब कि या तो शत्रुपक्ष का कायांतपूरण पलायन भो साथ ही दिलाया जाए, या फिर यह दिखाया जाए कि शत्रुओं के रक्त की प्यासो तलवार ज्यों की त्यों खिंचो रह गयी और वह 'बेचारा' जनवूज्य शत्रु-नारी में हाथ मलता रह गया । किन्तु इस सबसे बढ़कर श्रादर्श स्थित राम-रावण युद्ध प्रसंग की माननी चाहिए जिसमें राम ने रावण पर श्राक्रमण करके उसकी सेना एवं सहयोगी वीर सम्बन्धियों का मूलोच्छेदन करके लंका-विजय के उपरान्त सीता का उद्धार किया।

इन सब प्रकरणों में श्रृंगार रस श्रृंगार या वीर रस स्वीकृत किये जाएंगे। यदि इनमें श्रन्थ रसों की झलक मिलेगी भी तो वे श्रृंगी के पोषक होने के कारण श्रृंगारूप में स्वीकृत रहेंगे । किन्तु श्रृंगी (पोष्य) रस के चमत्कार का मूल कारण ये श्रृंग (पोषक) रस नहीं है, श्रपितु 'प्रद्भुत' का समावेश ही है—यह रामचन्द्र-गुणचन्द्र का मूल श्रभिप्राय है, श्रौर शायद इसी श्रथवा इस प्रकार की धारणा से प्रेरित होकर धर्मदत्त नामक श्राचार्य ने निम्नलिखित कथन में 'प्रद्भुत रस की सर्वत्र (सब सरस रचनाओं में) स्वीकृति कर ली थी—

रसे सारः चमत्कारः सर्वत्राङ्ग्यनुभूयते । तच्चमत्कारसारत्वे सर्वत्राप्यद्भुतो रसः ॥

ग्रौर इसी श्राधार पर ही नारायण नामक श्राचार्य (ग्राचार्य विश्वनाथ के प्रपितामह) ने केवल प्रद्भुत रस को ही एकमात्र रस घोषित किया था—तस्माद अद्भुतमेवाह कविता नारायणो रसम् ।

निस्सन्देह रस में चमत्कार हो सारभूत तत्व है । चमत्कार को विश्वनाथ के शब्दों में विस्मय का श्रपर पर्याय भी कह सकते हैं, जिससे सहृदय के चित्त का विस्तार होता है :

'चमत्कारः चितविस्ताररूपो विस्मयापरपर्याय:'

ग्रौर इस चमत्कार ग्रथवा विस्मय को खोज़तान कर 'प्रद्भुत' का भी पर्याय मान लेने में कोई ग्रापत्ति नहीं होनी चाहिए, ग्रौर यही प्रद्भुत सभी रसों में एक ग्रनिवार्य तत्व भी है, क्योंकि इसके बिना रस की सिद्धि ही सम्भव नहीं हैं । किन्तु यह सब स्वीकार करते हुए भी—

(९) न तो रामचन्द्र-गुणाचन्द्र श्राचार्यों के समान इस 'प्रद्भुत' को 'प्रद्भुत रस' इस नाम से ग्रभिहित करना चाहिए, श्रौर

(२) न श्राचार्य नारायण के समान इस प्रद्भुत को ही एकमात्र रस स्वीकार करना चाहिए । क्योंकि उक्त स्वीकृति में यह 'चमत्कार' ग्रथवा 'प्रद्भुत' नामक तत्व रचना के मूल रस का केवल साधन मात्र होता है, साध्य नहीं होता, साध्य तो श्रृंगार श्रादि ग्रन्थ रस ही होते हैं । केवल इतना ही क्यों, यहां तक कि जिस रचना में प्रद्भुत रस साध्य रूप में रहेगा, वहां भी साधन रूप में ही इसकी स्थिति ग्रनिवार्यंत रहेगी । निष्कर्षतः इस प्रसंग में 'प्रद्भुत' शब्द काव्य-चमत्कार का ही पर्याय है, प्रद्भुत रस का नहीं ।

(६) शान्त रस का स्थायिभाव— रामचन्द्र-गुणाचन्द्र ने शान्त रस का स्थायिभाव निर्वेद न मानकर 'शम' माना है ।

इस सम्बन्ध में उनके निम्न कथन उल्लेखनीय हैं—

११२. साहित्यवर्पण ३१३ वृत्ति ।

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(१) निःस्पृहता (इच्छा के अभाव) को 'शम' कहते हैं—निःस्पृहः शमः । (पृष्ठ ३३०) काम, क्रोध, लोभ, मान, माया ग्रादि से रहित, विषयसंलग्रता से विमुक्त, श्रमिलष्ट चित्तवृत्ति रूप 'शम' नामक स्थायिभाव शान्त रस [के हेतु] में होता है : "काम-क्रोध-लोभ-मान-माया-ध्यानुपरक्त-परवशमुक्त-विरक्ततादिक्लिष्टचेतोरुपरमसमस्थायी शान्तो रसो भवति ।" (पृष्ठ ३१७)

(२) दरिद्रता, व्याधि, ग्रपमान, ईर्ष्या, भ्रम, ग्राक्रोश, ताड़न, इष्टवियोग, पर-विसूचितर्शन ग्रादि (सांसारिक) क्लेशों के कारण विरसता (वैराग्यभाव) तथा तत्वज्ञान को निर्वेद नामक संचारिभाव कहते हैं—निर्वेदस्तत्वभावः क्लेशविरसनं । (पृष्ठ ३३१)

(३) जन्म-मरण से युक्त संसार से, भय तथा वैराग्य से, जीव, ब्रजीव (परमात्मा ग्रोर प्रकृति), पाप-पुण्य ग्रादि तत्वों तथा मोक्ष के उपायों के प्रतिपादक शास्त्रों के विमर्शों से शान्त रस की उत्पत्ति होती है । (पृष्ठ २१७)

स्पष्टतः: उक्त कथनों में 'शम' को स्थायिभाव माना गया है ग्रोर 'निर्वेद' को संचारीभाव । रामचन्द्र-गुणचन्द्र से पूर्व मम्मट ने निर्वेद को स्थायिभाव भी माना था ग्रोर संचारीभाव भी, तथा 'निर्वेद' स्थायिभाव से शान्त रस की ग्रभिव्यक्ति स्वीकृत की थी । किन्तु इन ग्राचार्यों ने मम्मट के इस मन्तव्य को ग्रस्वीकृत करते हुए कहा है कि एक ही भाव को इन दोनों नामों से ग्रभिहित करना स्ववचनविरोध है । किन्तु वस्तुतः मम्मट ने तो वही ग्रभिमत है जो इन दोनों ग्राचार्यों को है । उन्होंने सभी स्थायिभावों तथा संचारीभावों की सूची प्रस्तुत करके इन्हें 'लक्षण नाम प्रकाश' समक् कर इनका लक्षण प्रस्तुत नहीं किया । किन्तु उनके शान्त रस के प्रद्योत उदाहरणों "ग्रहो वा हारे वा कुसुमशयने वा ह्रदि वा" से निस्सन्देह यही प्रतीत होता है कि निर्वेद नामक-स्थायिभाव तत्वज्ञान से उत्पन्न भाव है, न कि सांसारिक क्लेशों के कारण उत्पन्न वैराग्य भाव से । हाँ, यह दूसरा रूप इसे संचारीभाव की ही संज्ञा देगा, स्थायिभाव की नहीं ।

मम्मट की इसी धारणा को मम्मट के टीकाकारों ने भी समभ्क था ग्रोर स्पष्टतः: लिखा था— स्थायियो स्यात् विषयेऽपेक्ष तत्वज्ञानााद् भवेद् यदि । इष्टानिष्टवियोगान्तकृतस्तु व्यभिचार्यंस्तु का॰ प्र० (बालबोधिनी टीका) पृष्ठ ११६

किन्तु फिर भी, रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने निर्वेद ग्रोर शम का स्वतन्त्र मानकर-विचार की स्पष्टता में पूर्वं सहयोग दिया है, ग्रोर सम्भवतः: इनके ग्रन्थ से ग्रथवा इसी के ग्रनुरूप किसी

१. (क) निर्वेदस्य × × प्रयतमं × × उपदानं व्यभिचारिटवेऽपि स्थायिताभिधानार्यम् । का॰ प्र० ४।३४ निर्वेदस्थायिभावोऽस्ति शान्तोऽपि नवमो रसः । ४।३४

२. मम्मटस्तु व्यभिचारिकथनप्रस्तावे निर्वेदस्य शान्तरस प्रति स्थायितां, 'प्रतिकूलविमावादि-परिग्रहः' इत्यत्र तु तमेव प्रति व्यभिचारिता च बुबुक्षाः स्ववचनविरोधेन प्रतिहतः इति । —हि० ना० द० पृष्ठ ३३२ ।

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ग्रन्थ से प्रेरणा प्राप्त कर विश्वनाथ ने भी काव्यप्रकाश के समान 'निर्वेद' को दोनों रूपों में स्वीकृत न कर इन्हीं के श्रानुरूप शाम तथा निर्वेद दोनों भावों की अलग-अलग स्वीकृति की है। वस्तुतः स्वच्छ प्रतिपादन के लिए श्रावश्यक भी यही था।

(७) प्रभिनय ग्रौर नट तथा प्रेक्षक

'प्रभिनीयते' इति प्रभिनय:' प्रभिनय उसे कहते हैं जिसके द्वारा [ग्राभिनीत] ग्रन्थ (विषय) सामाजिकों के सम्मुख साक्षात् रूप से प्रस्तुत किया जाता है—सामाजिकानामाभिमुख्येन साक्षात्कारेषा नीयते ग्रभिनयेनैति प्रभिनयः

ग्रनुकर्ता (नट) अपने ग्रनुकरण द्वारा ग्रनुकार्य (रामादि) ग्रौर प्रेक्षक के बीच सम्बन्ध स्थापित करता है; उसके ग्रनुकरण के बल पर प्रेक्षक उसे ही ग्रनुकार्य समझने लगता है। किन्तु यह सब कैसे सम्भव होता है क्योंकि न तो ग्रनुकर्ता ने ग्रनुकार्य को देखा होता है, ग्रौर न प्रेक्षक ने। ग्रतः न तो ग्रनुकर्ता ग्रनुकार्य का [यथावत्] ग्रनुकरण कर सकता है ग्रौर न प्रेक्षक ग्रनुकर्ता के ग्रनुकरण को देखते हुए भी इसे [वास्तविक] ग्रनुकरण मान सकता है।

इस शंका के समाधान में रामचन्द्र-गुणचन्द्र के निम्न कथन उल्लेखनीय हैं :

१. प्रभिनेता कवि-प्रणीत रामादि के चरित को पढ़कर प्रयत्नपूर्वक ग्रभ्यास द्वारा ऐसा ग्रानुभव करने लगता है कि उसने ग्रनुकार्य को स्वयं देख लिया है ग्रौर पुनः यह श्रधयवसान करने लगता है कि मैं उसी का ही ग्रनुकरण कर रहा हूँ।

२. यहां एक शंका की जा सकती है कि कवि जन अपने नाटकों में राम ग्रादि ग्रनुकार्य की ग्रवस्था का चित्रण कैसे कर पाते हैं; जबकि उन्होंने भी तो राम को नहीं देखा होता। इसके उत्तर में कहा गया है कि "त्रिकालदर्शी ऋषिजनों से उन्हें यह ज्ञान मिलता है, जिसके ग्राधार पर वे अपने नाटकों का निर्माण करते हैं, तथा इनके ही ज्ञान पर पूर्ण विश्वास करने से प्रेक्षक भी नट को ग्रनुकार्य समझ लेता है।

३. यद्यपि नट को यह ज्ञात नहीं होता कि ग्रभुक ग्रवसर पर किस प्रकार का हास्य प्रयवा रोदन ग्रनुकार्य ने किया होगा, किन्तु वह वस्तुतः लोकव्यवहार का (लोक में विभिन्न ग्रवसरों पर हंसने ग्रौर रोने वाले व्यक्तियों का) ग्रनुकरण कर रहा होता है।

१. साहित्यदर्पण ३।१४२, १७५, २४५

२. रामादि ग्रनुकार्यस्य नटेन प्रेक्षकस्य हि ग्रनुकर्त्रा स्वयम् ग्रहष्टतया न तु कवुं मलम् । प्रेक्षकस्यापि चाह्टानुकार्यो नाटुकृतं रनुकृत् स्वमनुमन्यते। हि ना० र० पृष्ठ ३४२

३. तदयं नटो रामादेःचरितं कविविदग्धमथीय प्रत्ययं ग्राद्याभ्यासवशात् । स्वयम् हृष्टमनुसुम्यमानोडनु-करोमि इत्यधयवस्यति। —वही

४. इह तावद् इत्यमाकृतिरित्थं गति: × × × इत्येवमशेषमपि रामादिलक्षितम् ऋषिभिः कालदर्शिभिः ज्ञानेभिः निश्चितं कवयो नाटके निवन्ध्नन्ति । तत्र चायं मुनिज्ञानविश्वासात् नटस्य साक्षाद् दर्शनेनैव। —वही, पृष्ठ ३४३

५. परमार्थतस्तु लोकव्यवहारमेवाड्यमनुवर्तते। —वही

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४. उधर प्रेक्षक भी यद्यपि देश-काल के भेद के कारण नट को रामादि समझने में असमर्थ होता है, तो भी नट द्वारा उच्चरित रामादि के शब्द-सङ्केतों के श्रवण तथा अत्यन्त मनोरम संगीत श्रादि के वशीभूत होकर उस नट को रामादि समझने लगता है । जो [वाचिक श्रादि] चार प्रकार के श्रभिनय से ग्राह्यादित हो चुका होता है—उसका श्रवना वास्तविक रूप रामादि के रूप के नीचे ढँप गया होता है । ऐसी स्थिति में प्रेक्षक रामादि की सुख-दुःख रूप श्रवस्थाओं में लीन हो जाता है ।

१. इसके श्रतिरिक्त श्रानुकर्ता को श्रानुकार्य समझने का कारण श्रान्ति भी है, जिसके बल पर प्रेक्षक श्रृङ्गार श्रादि रसों का श्रास्वाद प्राप्त करता है : उन्मिषन्ति च भ्रान्तेरपि शृङ्गारादय: । क्योंकि इसी भ्रान्ति के ही कारण स्वप्न में भी कामिनी, वैरी श्रथवा चोर श्रादि को देख कर स्वप्नदृष्ट स्तम्भ श्रादि श्रनुभावों का श्रनुभव करते हैं।

उक्त कथनों का निष्कर्ष यह है कि कोई प्रेक्षक जब तक श्रानुकर्ता को कृत्रिम व्यक्ति समझ रहा होता है तब तक उसे रसास्वाद प्राप्त नहीं हो सकता । किन्तु जब वह उसे श्रानुकार्य समझने लगता है तभी उसे रसास्वाद की प्राप्ति होती है । उसे श्रानुकार्य समझ लेने का कारण है उसका श्रभिनय-कोशल तथा ग्रन्थ रंगमञ्चीय मनोहारी व्यवस्था । इन दोनों को नाट्यदर्पण के श्रनुसार 'भ्रान्ति' श्रथवा चकाचौंध भी कह सकते हैं । उधर श्रानुकर्ता का श्रभिनय-कोशल भी इसी श्रध্যবसान पर श्राधारित है कि वह अपने श्रापको श्रानुकार्य ही समझ ले । ग्रोर यह तभी सम्भव है जब एक श्रोर तो वह काव्यनिबद्ध नाटक को सुने । पुनः श्रभ्यास करता है श्रोर दूसरी श्रोर वह लौकिक व्यवहार से विभिन्न प्रकार के मनोभावों का प्रदर्शन सीखता है । जोर रहा कवि का प्रतिभा-प्रदर्शन कि उसे श्रानुकार्यों की विभिन्न मनोदशाओं का ज्ञान कैसे हो जाता है ? वह इसे ज्ञानचक्षुओं से देखने वाले ऋषियों से प्राप्त करता है ।

रामचन्द्र-गुणचन्द्र का उक्त विवेचन श्रधिकांशतः मान्य है । उनका श्रन्तिम कथन किंचित् शिथिल है । इसका श्रभिप्राय केवल यही लिया जा सकता है कि कविजन काव्य-नाटक के निर्माण के समय श्रपनी कल्पना का बल पर जो विवरण प्रस्तुत करते हैं वे शायद लगभग वैसे ही होंगे जैसे कि श्रानुकार्यों के साथ घटित हुए होंगे । जिसे ब्राज का ग्रालोचक कल्पना (इमेजिनेशन) कहता है उसे रामचन्द्र-गुणचन्द्र के शब्दों में 'ऋषियों की ज्ञानचक्षु' कह सकते हैं । स्वयं वाल्मीकि भी यदि राम के समय में रहे हों तो भी वे उनकी सर्व प्रकार की मनोदशाओं से ग्रवगत नहीं होंगे । ग्रतः उनकी ज्ञानचक्षु को 'कल्पना' का पर्याय मान सकते हैं । इसी प्रकार भास, कालिदास श्रादि नाटककारों ने ग्रन्य मुनियों के सम्पर्क द्वारा श्रानुकार्य व्यक्ति की मनोदशाओं का ज्ञान प्राप्त किया होगा—यह मानना भी न तो व्यवहार-संगत है श्रोर न बुद्धिसंगत ।

हमारे विचार में श्रानुकार्य की स्थिति के प्रबोध के लिए सर्वप्रमुख साधन है परम्परा—

१. प्रेक्षकस्य रामादिवंशकेतश्रवणादौ प्रतीतिहृदयसङ्गीतकाव्यादितश्च स्वरूपदेशकालभेदेन तु नत्थाभूतेऽपि श्रभिनयचतुष्टयादर्शनात् तथाभूतेन च नटेनु रामादीनध्यवस्यति । —वहीं, पृष्ठ ३५२-३५३

२. उन्मिषन्ति च भ्रान्तेरपि शृङ्गारादय: । कामिनी-वैरी-चौरादीन् प्राश्रित्य स्वप्नमपि भवति पुंसः । कथं तु रसप्ररोहदर्शनेनैवात्र स्तम्भाद्यनुभावः प्रादुर्भवेत्पुरिति । — वहीं, पृष्ठ ३५३

३. कृत्रिममेतद् इति जानन्तो (प्रेक्षकाः) न रामादिविषयकः सुखबुःखं तम्मयीबभूयुः । —वहीं

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गत ज्ञान ग्रथवा लोकानुश्रुति। इसी के ही बल पर कविजन राम के परम्परागत ग्रथवा लोकानुश्रुत रूप का चित्रण करते चले ग्राये हैं। यद्यपि ग्रपनी कल्पना के ग्राधार पर वे उनके चरित्र में इधर-उधर परिवर्तन भी कर देते हैं, तथापि उन के मूल रूप में, उनकी मूल भावना में, कोई ग्रन्तर नहीं ग्राता। वह ग्रपने ही देश-विशेष ग्रथवा काल-विशेष के व्यक्ति के रूप में ही चित्रित किये जाते हैं, ग्रन्य देश ग्रथवा काल के व्यक्ति के रूप में नहीं। इसी प्रकार नट भी यद्यपि नाटक में निर्दिष्ट नाटककार (ग्रथवा निर्देशक) के ‘स्वगत, प्रकट, सावेग, सकोप, सहर्ष ‘तारस्वरेण’ ग्रादि निर्देशों द्वारा ग्रभिनय-कौशल प्राप्त करता है, कितु किसी व्यक्ति-विशेष के ग्रभिनय के लिए उसे निर्देशक लोकपरम्परा द्वारा ही मिलता है। विरही राम, विरही यक्ष ग्रोर विरही पुष्पव के विरह-विलाप में क्या ग्रन्तर है यह ज्ञान उसे ग्रथवा उसके निर्देशक को केवल लोक-परम्परा द्वारा ही मिलता है। ठीक यही स्थिति प्रेक्षक की भी है। सीता के वियोग में ‘राम’ यदि रंगमंच पर विसूरने लगता है तो भारतीय परम्परा से ग्रभिज्ञ प्रेक्षक का ‘करुण’ रस हास्य-विनोद में परिवर्तित हो जाता है, किन्तु इस परम्परा से ग्रनभिज्ञ किसी विदेशी के रसास्वाद में कोई ग्रन्तर नहीं ग्राता। विसूरना भी करुण रस की ग्रभिव्यक्ति का कारण बन सकता है पर सामान्य ग्रनुकरण-प्रसंग में न कि राम जैसे धीरोदात्त नायक के प्रसंग में। इस रसाभंग ग्रथवा रसास्वाद का एक मात्र कारण है लोक-परम्परागत ज्ञान ग्रथवा लोकानुश्रुति। इसी कसौटी पर यदि कोई नट ग्रभिनय करता है तो प्रेक्षक उसे ग्रनुकरण समभकर रसास्वाद प्राप्त करता है।

८. रस की सुखदुःखात्मकता

इस ग्रन्थ का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रसंग वह है जिसमें रस को सुखदुःखात्मक कहा गया है—सुखदुःखात्मकको रसः। (३१७) इस कथन को स्पष्ट करते हुए ग्रन्थकारों का ग्रभिमत है कि जहां शृंगार, हास्य, वीर, ग्रद्भुत ग्रोर शान्त ये पांच रस सुवात्मक हैं, वहां करुण, रौद्र, बीभत्स ग्रोर भयानक ये चार रस दुःखात्मक हैं। प्रथम वर्ग के रस तो निर्विवाद रूप से सुवात्मक है ही, किन्तु द्वितीय वर्ग के रसों को भी यदि सुवात्मक मान लिया जाता है तो इसी पर रामचन्द्र-गुणेन्द्र को ग्रापत्ति है। इस सम्बन्ध में उन्होंने निम्नोक्त चार तर्क उपस्थित किये हैं :

१. उनका पहला तर्क यह है कि भयानक ग्रादि रस सहृदयों को किसी श्रवव्यंनिय क्लेशदशा तक पहुंचा देते हैं। इनसे सामाजिक उद्वेग प्राप्त करते हैं। सुखास्वाद से भी भला कहीं कोई उद्विग्न होता है ?२ सीता का हरण, द्रोपदी के वस्त्रों तथा केशों का करण, हरिश्चन्द्र की चाण्डाल के यहां दासता, रोहिताश्व की मृत्यु ग्रादि घटनाग्रों के ग्रभिनय को देखकर कौन ऐसा सहृदय है जो सुखास्वाद को प्राप्त करता हो ?३

१. हिन्दी नाटचदर्पण पृष्ट ३६०।

२. भयानको बीभत्सः करुणो रौद्रो वा रसास्वादवताम् ग्रनाघ्रेय्यं कामपि क्लेशदशामुपनयति। ग्रतएव भयानकादिमिरद्रिजते समाजः। न नाम सुखास्वादाद् उद्वेगो घटते ।

—वहीं, पृष्ठ २६१।

३. वही, पृष्ठ २६१-२६२ ।

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होती हैं, ब्रतः यदि उनके काव्य-नाटक गत ग्रनुकरण को सुखात्मक माना जाए तो वह ग्रनुकरण वास्तविक न होगा, क्योंकि वह लौकिक वस्तुस्थिति से विपरीत ही रहेगा ।

३. रस को सुखात्मक मानने वालों की शोर से यह कहा जा सकता है कि जैसे लोक में विरही एवं शोकाकुल जनों के सम्मुख कारुणिक प्रसंगों का वर्णन श्रथवा श्रभिनय करने से उन्हें सुख-सान्त्वना मिलती है, इसी प्रकार काव्य-नाटक गत करुणा, भयानक ग्रादि रस भी सुखात्मक हो हैं, श्रथवा नहीं हैं । किन्तु रामचन्द्र-नागचन्द्र का कथन है कि वस्तुतः ऐसे प्रसंगों में सुखात्मक हो हैं, दुःखात्मक नहीं हैं । क्योंकि यदि वह भी दुःखी जनों को जो सुखास्वाद मिलता प्रतीत होता है, मूलतः वह भी दुःखास्वाद ही है, क्योंकि यदि वही व्यक्ति दुःखपूर्ण वार्ताओं से सुख-सा ग्रनुभव प्रतीत करता है, तो प्रमोदपूर्ण वार्ताओं से [इतर जनों के समान] सुख का ग्रनुभव न कर विकलित ही होता है । ब्रतः चादियों का उक्त सहानुभूति-मूलक तर्कं मनस्तोषक एवं मान्य नहीं है । वस्तुतः करुणा ग्रादि रस दुःखात्मक ही हैं ।

४. यचापि भयानक, करुण ग्रादि रस दुःखात्मक ही हैं, फिर भी यदि इनसे सहृदय परम ग्रानन्द को प्राप्त करते हैं तो केवल-मात्र कवि एवं नट की कुशलता से चमत्कृत होकर ही ।

इस कथन से ग्रन्थकारों का तात्पर्य यह है कि कवि के व्यवस्थित एवं मार्मिक निरुपण को पढ़कर श्रथवा नट के सुन्दर एवं हृदयहारो श्रभिनय को देखकर हमें जो ग्रास्वाद प्राप्त होता है, उसकी लोलुपता ही सहृदय को भयानक, करुणा ग्रादि रसों से युक्त भी काव्य-नाटकों से ग्रानन्द प्राप्त कराती हैं तथा उन्हें बार बार पढ़ने-देखने की प्रेरणा कराती है, श्रथवा ये रस तो दुःखात्मक ही होते हैं । एक उदाहरण द्वारा अपने कथन की पुष्टि करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि जिस प्रकार लोक में वीर पुरुष अपने उस प्राणान्त-घातक शत्रु को भी देखकर ग्राश्चर्यचकित से रह जाते हैं जो प्रहार करने में ग्रभ्यस्त निपुण होता है,४ उसी प्रकार प्रेक्षक भी ग्रथवा नटके कौशल द्वारा चमत्कृत हो जाते हैं ।

उक्त तकों में से प्रथम तकं मन के उद्वेग को लक्ष्य में रख कर प्रस्तुत किया गया है शोर द्वितीय तकं लौकिक व्यवहार शोर काव्य-रचना की पारस्परिक ग्रन्विति को । तृतीय तकं लौकिक सहानुभूति एवं सान्त्वना से सम्बद्ध है शोर चतुर्थ तकं काव्यत्व एवं ग्रभिनय-जन्य बाह्य चमत्कार से । यदि गम्भीरतापूर्वक विचार करें तो इन चारों तकों' के मूल में एक ही ग्रान्त धारसा सन्निहित है कि लौकिक व्यहार शोर कवि-कृति में कोई ग्रन्तर नहीं हैं, ये दोनों एक ही धरातल पर अवस्थित हैं । यही कारण है कि पहले तकं में सहृदय को भी भयानक, करुणा ग्रादि रसों

कवयस्तु सुखदुःखात्मकसंसारानुरूपैष राविदरितं निवन्धनन्त । सुखदुःखात्मक-रसानुभिद्भिैव प्रधनन्ति ।

(ख) तथानुकार्यंगतैश्च करुणादयः परिदेवितानुकार्यंत्वात् तादृद् दुःखात्मक एव । यदि वाऽनुकरणे सुखात्मकः स्यात् न सम्यङ् प्रनुकरणं स्यात् । विपरीतत्वेन भासनाद् इति । —वही, पृष्ठ २६१-२६२ ।

२०. वही, पृष्ठ २६२ ।

३. प्रनैलैव च सर्वाङ्गलाञ्छितकेन कविनटशक्तिजन्मना चमत्कारेैणा विप्रलब्धाः परमानन्द-हप्तास्तु दुःखात्मकैरपि करुणादिभिरुमेषः प्रतिजानते । —वही, पृष्ठ २६१ ।

४. विस्मयन्ते हि शिरःश्छेदककारिरियाडपि प्रहारकुशलेन वीरीएण्टोरमादिनः । —वही

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द्वारा वैसा ही उद्रिग्न एवं विकलित समभ्क लिया गया है जैसा कि सामान्य व्यवहार में भयभीत प्रयत्न कहा।ग्राप्त व्यक्त्ति को। किन्तु वस्तुतः लौकिक रति, शोक ग्रादि भावों में तथा काव्यगत इन भावों में सदा ग्रनत्तर रहता है। लौकिक भाव एक देश, काल एवं व्यक्त्ति तक सीमित रहते हैं ग्रौर काव्य-गत भाव प्रत्येक प्रकार की सीमा से नितान्त विमुक्त होते हैं। इसी प्रकार दूसरे तर्क में उक्त धारणा के ही बल पर लौकिक घटनाग्रो श्रौर काव्य-गत घटनाग्रो को एक-समन समभ्क लिया गया है। किन्तु यह एक प्रामाण्य मन्तव्य है। दोनों में बहुविष तथा बहुहेतुक ग्रनत्तर रहता है। इनमें से एक ग्रनत्तर तो यह है कि काव्य में लौकिक घटनाग्रो के ग्रासमान केवल यथार्थ का चित्रण होकर यथार्थ के साथ कल्पना-तत्व का समिश्रण भी ग्रनिवार्यंतः रहता है। ग्रस्तु ! ग्रत्रः लोक ग्रौर काव्य की पारस्परिक ग्रनुकूलता को ग्राधार मानकर ग्रनुकार्य के ही ग्रनुरूप सहृदय के सुखदुःख का निरूपण करना मूलतः भ्रमपूर्ण है। श्रब तीसरे तर्क को लें। उधर लोक में पुत्र-वियोगादिविह्वल माता के शोक में, ग्रौर इधर रंगमंच पर देखकर ग्रथवा इसके चरित्र को पढ़कर शोक-विह्वल सहृदय के शोक में ग्रनत्तर है। उधर सान्त्वना से दुःख का हुलका होना, इसका कुछ कस्यो के लिए लुप्त हो जाना ग्रथवा इसका बढ़ जाना ग्रादि सभी स्थितियाँ सम्भव हैं, किन्तु इधर शोक स्थायिभाव से उद्रिग्न ग्राकुल [यदि इस स्थिति को यह नाम दें तो] सहृदय के लिए प्रथम तो सान्त्वना प्रदान का प्रश्न ही उपयुक्त नहीं होता, क्योंकि काव्य-नाटकोत्पन्न घटनाग्रो से इतर घटनाग्रो के साथ उसका कोई सम्बन्ध ही नहीं। ग्रौर यदि उसके समक्षु ऐसी घटनाएँ लायी भी जाती हैं तो उस समय वह सहृदय न होकर सांसारिक व्यक्त्ति-मात्र रह जाता है। चतुर्थ तर्क में सत्यता ग्रवश्य है, पर एकांगी। कवि के रचना-कौशल से ग्रौर विशेषतः नट के ग्रभिनय-कौशल से जन्य चमत्कार निरसनदेह सहृदय को ग्रभिभूत कर देता है। इस कथन की पुष्टि में एक प्रत्युदाहरण लीजिए कि किस प्रकार एक ग्रत्यन्त करुणोत्पादक एवं हृदयविदारक दृश्य भी एक ग्रनाड़ी नट के ग्रभ्सफल प्रदर्शन द्वारा करुणा के स्थान पर हंस्य का रूप धारण कर लेता है।

रसों को सुखात्मक ग्रौर दुःखात्मक स्वीकार करने वाले प्रथम ग्राचार्य रामचन्द्र-गुणचन्द्र नहीं हैं। इनसे पूर्व भी कुछ इस प्रकार के स्पष्ट कथन मिल जाते हैं। १ (क) तेन रसव्यभिचारिसुखदुःखजननशक्तियुक्ता विषयसमग्रा बाह्य च सुखदुःखात्मकावहा रसः। [प्रज्ञात ग्राचार्य] ग्रभिनवभारती, भा० १ पृष्ठ २७५ १. विशेष विवरण केलिए देखिए 'रससिद्धान्तः स्वरूप-विलेखनम्' (ग्राननन्द प्रकाश दीक्षित) पृष्ठ २०६-२३०

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(ख) रसस्य सुखदु.खात्मकतया तदुभयलक्षणैरत्वेनोपपत्तेः, ब्रतत्वे तदुभयजनकत्वात् । —रसकलिका (रुद्रट) नम्बर ग्राफ़ रस'ज पृष्ठ १५५

(ग) रसा हि सुखदु.खरूपाः । सा० प्र० २१ भाग पृष्ठ ३२६९

किन्तु इन कथनों से यद्यपि यह स्पष्ट प्रतीत नहीं होता कि उक्त ग्राचायँ सभी रसों को सुखात्मक ग्रोर दुःखात्मक स्वीकार करते हैं ये ग्रथवा कुछ को सुखात्मक ग्रोर कुछ को दुःखात्मक, किन्तु फिर भी सम्भावना यही है कि वे भी रामचन्द्र-गुणचन्द्र के समान शृङ्गार, हास्य ग्रादि को सुखात्मक मानते होंगे ग्रोर भयानक, करुण ग्रादि को दुःखात्मक । इन कथनों के प्रतिरिक्त ग्राचार्य वामन ने किसी ग्राचार्य के नाम पर ऐसा कथन भी उद्धृत किया है, जिससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि वह स्वयं ग्रथवा सम्भवतः कुछ अन्य ग्राचार्य भी करुण रस में सुख ग्रोर दुःख दोनों का समिश्रण मानते थे :

करुणाप्रेक्षणीयेयु सम्भवः:सुखदु.खयोः । यथानुभवतः सिद्धस्तथोभयोः:प्रसादयोः ॥ का० सू० वृ० ३।१।१६ वृत्ति

अर्थात् जिस प्रकार करुण रस के नाटकों में सुख ग्रोर दुःख का मिश्रण सहृदयजन के ग्रनुभव द्वारा सिद्ध है, उसी प्रकार ग्रोज ग्रोर प्रसाद का मिश्रण भी उनके ग्रनुभव द्वारा सिद्ध है । सुख ग्रोर दुःख के इस उदाहरण में कोई सन्देह नहीं है, किन्तु ऐसा पहले होता है ग्रथवा दुःख पहले—इस सम्बन्ध में मतभेद है । कुछ लोगों को पहले दुःख की स्थिति प्रतीत होगी, ग्रोर सुख की बाद में । दूसरे शब्दों में, सहृदय लोकोत्तर दुःख का ग्रनुभव करता हुग्रा भी ग्रानन्द का—लौकिक सुख का—ग्रनुभव करता है । कुछ इस प्रकार की धारणा की व्याख्या मधुसूदन सरस्वती ने सम्भवतः सर्वप्रथम मौलिक रूप से की है । उनके कथन का ग्रभिप्राय यह है कि सभी रसों से निस्सन्देह सुख का ग्रनुभव होता है, परन्तु यह ग्रनुभव सब रसों में तुल्य रूप से नहीं होता । इसका कारण यह है कि सत्वगुण की प्राधान्यता ही सुख का हेतु है, किन्तु ऐसा कभी नहीं होता कि किसी रस में रजोगुण ग्रोर तमोगुण नितान्त श्रमिश्रित हो जाएँ ग्रोर सत्वगुण पुष्ट हो; ग्रतएव ग्रथवा सत्वगुण पुष्ट होकर रजोगुण ग्रोर तमोगुण किसी न किसी ग्रंश तक ग्रवश्य विद्यमान रहते हैं । ये किस रस में कितनी मात्रा में विद्यमान रहते हैं, यद्यपि इसका निर्णय कर सकना कठिन है तथापि वे ग्रवश्य ही रहते हैं । ग्रतः उनके मिश्रण के तारतम्य के ग्रनुसार सब रसों में सुख के साथ दुःख का मिश्रण भी सम्भवना चाहिए ।

इस प्रकार हमारे सम्मुख निम्नोक्त-चार विकल्प उपस्थित होते हैं—

(क) सभी रस सुखात्मक हैं,

(ख) सभी रस सुखदुःखात्मक हैं,

(ग) शृङ्गार, हास्य ग्रादि रस सुखात्मक हैं ग्रोर भयानक, करुण ग्रादि रस दुःखात्मक हैं,

(घ) शृङ्गार ग्रादि रस तो सुखात्मक हैं किन्तु भयानक ग्रादि रस सुखदुःखात्मक हैं ।

१. सत्वगुणस्य सुखरूपत्वात् सर्वेषां भावनां सुखमयत्वेऽपि रजस्तमोमिश्रणादेव तारतम्य-मवगन्तव्यम् । श्रतो न सर्वेषु रसेषु तुल्यसुखानुभवः । —नो ग्राफ़ र० पृष्ठ १५६

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( ५५ )

इन विकल्पों में से रामचन्द्र-गुपाचन्द्र यद्यपि स्पष्टतः तीसरे विकल्प को स्वीकार करते हुए भयानक ग्रादि को दुःखात्मक स्वीकार करते हैं, तथापि वे इन्हें ग्रानन्दात्मक भी स्वीकार करते होंगे । कुछ इस प्रकार का संकेत उन्होंने स्वयं भी दिया है—पानकमाश्रुयमिव च तीक्ष्णस्वादेन दुःखस्वादेन सुतरां सुखानि स्वदन्त इति । (हि० ना० द० पृष्ठ २९१) ग्रथांत “जिस प्रकार पानक (खट्टे-मीठे-तीखे पेय) की मिठास दुःखस्वादजनक तीक्ष्ण पदार्थ के मिश्रण से और भी ग्रधिक सुखास्वाद प्रदान करती है, उसी प्रकार करुण ग्रादि रसों में भी दुःख का मिश्रण सुखास्वाद प्रदान करता है ।" वस्तुतः देखा जाय तो पानक पदार्थ और करुण रस में स्थापित यह उपमेय-उपमान सम्बन्ध यथावत् एवं सुचोटित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि पानक में माधुर्य और तीक्ष्णता के मिश्रण में भले ही पूर्वापर-सम्बन्ध हो, किन्तु उसके ग्रास्वाद में पूर्वापरसम्बन्ध नहीं रहता, किन्तु करुण रस के शोक (लौकिक दुःख) और इस रस के ग्रास्वाद (सुख) में निस्सन्देह पूर्वापर-सम्बन्ध बना रहता है, यद्यपि यह ग्रलंकार बात है कि इनमें काल का ग्रान्तर इतना त्वरित और क्षिप्र होता है कि यह कहते नहीं बनता कि इस दुःख और ग्रौर सुख में कोई काल-सम्बन्धी ग्रान्तर है भी । प्रस्तुत ! जो हो, रामचन्द्र-गुणचन्द्र का यह उद्धरण यह मानने के लिए पर्याप्त है कि वह उक्त विकल्पों में से तीसरे विकल्प को स्वीकार न कर चौथे विकल्प को स्वीकार करते होंगे कि नायक, करुण ग्रादि केवल दुःखात्मक होकर सुखदुःखात्मक है । ग्रथवा यों कहिये कि दुःखसुखात्मक हैं । पूर्वस्थिति में यह दुःखात्मक है और ग्रान्तिम स्थिति में सुखात्मक । यदि यही उनकी मान्यता है तो इसकी व्याख्या उपरिथित की जा सकती है । यदि वे भयानक, करुण ग्रादि को नितान्त दुःखात्मक स्वीकार करते हैं तो उनकी यह धारणा काव्यशास्त्र और मनोविज्ञान के तो प्रतिकूल है ही, व्यवहार के भी सर्वथा प्रतिकूल होने के कारण सर्वथा ग्रग्रामान्य है । इस हष्टि से विश्वनाथ का केवल एक यही तर्क इसे ग्रग्रामान्य ठहराने के लिए पर्याप्त है कि करुण ग्रादि रस इसीलिए सुखात्मक है कि सहृदय जन इसे देखने के लिए सदा उन्मुख रहते हैं—

करुणादावपि रसे जायते यत्परं सुखम् । सचेतसामनुभावः प्रमाणां तत्र केवलम् ॥ किंच तेषु यदा दुःखं न कोडपि स्वाददुःखमुखः ॥ सा० द० ३१४,५

रामचन्द्र-गुणचन्द्र का कोई पाठक उनके सम्पूर्ण ग्रन्थ के ग्रवलोकन के उपरान्त यह मानने को कदापि उद्यत न होगा कि उन जैसे तत्त्ववेत्ता और चिन्तक ग्राचार्य करुण ग्रादि को केवल दुःखात्मक ही मानते होंगे । वह इसे दुःखात्मक मानते ग्रवश्य होंगे किन्तु पूर्वस्थिति में, ग्रौर ग्रान्ततः वे इन्हें सुखात्मक ही मानते होंगे ।

(७)

इस मान्यता की व्याख्या कई रूपों में तथा कई हष्टियों से की जा सकती है :

१. शृंगार, करुण ग्रादि सभी प्रकार के रसों में रति, शोक ग्रादि सभी स्थायिभाव जब तक विभावादि के संयोग द्वारा रसरूप में परिणत ग्रथवा ग्रभिव्यक्त नहीं होते, तब तक उनसे लौकिक सुख ग्रथवा दुःख का ही ग्रनुभव होता है । उदाहरणार्थ, यदि किसी प्रेक्षक को शृंगार रस के नाटक में ग्रपनी प्रेयसी की ग्रथवा करुण रस के नाटक में ग्रपने मृत पुत्र की स्मृति

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हो श्राती है तो उसका रति श्रथवा शोक भाव उसे लौकिक सुख श्रथवा दुःख की श्रनुभूति करायेगा । वह प्रेक्षक नाटकगृह में बैठा हुम्रा भी तत्क्षण के लिए सहृदय न होकर सांसारिक व्यक्ति ही होता है। किन्तु जिस क्षण वही व्यक्ति निजत्व की भावना से ऊपर उठ जाता है, वही क्षण रसदशा का है—रतिजन्य सांसारिक सुख श्रथवा शोकजन्य सांसारिक दुःख इस रस-दशा की पूर्ववस्ति बन जाते हैं श्रौर रस-दशा ग्रन्तिम स्थिति बन जाती है ।

२. काव्यशास्त्रीय श्राधार पर लौकिक कारण, कार्य एवं सहकारिकारण काव्य में इसीलिए क्रमशः विभाव, ग्रनुभाव श्रौर संचारिभाव कहाते हैं कि वे श्रभाव लौकिक क्षेत्र से ऊपर उठकर श्रलौकिकता के क्षेत्र में जा पहुँचते हैं। जब तक भय, शोक श्रादि भाव लौकिक कारण श्रादि से सम्पुक्त है, (चाहे वह घटना-स्थल नाटकगृह भी क्यों न हो), तब तक वे निःसंदेह दुःखात्मक हैं, किन्तु विभाव श्रादि से सम्पुक्त होने के कारण वे सुखात्मक भयानक, करुण श्रादि रसों के रूप में परिणत हो जाते हैं ।

३. भयानक, करुण श्रादि को अपनी परिणति में सुखात्मक स्वीकार करने के लिए काव्याचार्यों का 'साधारणीकरण' नामक सिद्धान्त एक प्रबल साधन है, जिसके बल पर सहृदय ग्र्रसाधारण (विशेष) से साधारण (सामान्य) भावभूमि पर उतर श्राता है ।१। उसका भय श्रथवा शोक किसी देश ग्रथवा काल-विशेष से मुक्त हो जाता है ।२। वह अपने समस्त मोह, संकट श्रादि (से जन्य प्रज्ञान) से निवृत्त हो जाता है ।३। परिपामतः काव्य-नाटकगत कोई पात्र ग्र्रथवा सीता नामक स्त्री-पात्र स्त्रीमात्र बन जाता है—राम नामक पुरुष पात्र पुरुषमात्र बन जाता है श्रौर इसका ग्रागला परिणाम यह होता है कि सहृदय निजत्व ग्रौर परत्व दोनों प्रकार के विश्वासों से विनिर्मुक्त हो जाता है । ग्रतः इस प्रकार की परिस्थिति में सहृदय के लिए न तो स्थूल ग्रादि रसों द्वारा लौकिक सुखानुभूति स्वीकार की जा सकती है, श्रौर न भयानक श्रादि रसों द्वारा लौकिक दुःखानुभूति — यह ग्रवस्था दोनों प्रकार के रसों ग्रलौकिक सुखात्मक ही होती है ।

इस प्रकार ग्रन्थ में हम कह सकते हैं कि—

१. प्रत्येक स्थायिभाव ग्र्रपरिपक्व ग्रवस्था में लौकिक सुख ग्रथवा दुःख का कारण बनता है, किन्तु परिपक्व ग्रवस्था में केवल ग्रलौकिक सुख का ही ।

२. भयानक, करुण श्रादि रसों में निःसंदेह प्रेक्षक स्थूल शोक श्रादि से जन्य दुःख का ग्रनुभव करता है—किन्तु वह लौकिक दुःख ही होता है—ठीक उसी प्रकार जैसे वह शृंगार, हास्य श्रादि रसों में रति, हास ग्रादि से जन्य लौकिक सुख का ग्रनुभव करता है । किन्तु यह लौकिक सुख ग्रथवा दुःख रस-दशा की पूर्ववर्ती ग्रवस्था है ग्रौर रस-दशा उसकी परवर्ती ग्रवस्था है ।

१. (क) ग्र्रसाधारण्येन साधारण्यीकरणम् इति साधारण्यीकरणम् ।

२. × × × भयसेव पर्ण देशकालाद्यन्वलिगतम् । —हिन्दी प्रभिनवभारती पृष्ठ ४७०

३. काव्ये× × नाट्ये च × × निविडनिजमोहसंकटतानिवारणकारिणा विभावादि-साधारण्य-कारणत्वात् × × । —वही, पृष्ठ ४६४-४६५

४. तत्र सीतादिजनदा परित्यक्तजनकतया यादिविशेषा स्त्रीमात्रत्वावाचिनः । —दशरूपक ४/४० वृत्ति

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३. किन्तु यह सदा प्रावश्यक नहीं कि प्रत्येक सहृदय को इस प्रकार के लौकिक सुख अथवा दुःख की अनुभूति हो ही, किन्हीं सहृदयों को नहीं भी होती, यद्यपि ऐसे सहृदयों की संख्या बहुत अल्प होती है, किन्तु दोनों प्रकार के रसों से उन्हें अलौकिक सुवानुभूति अवश्य प्राप्त होती है।

४. प्रतः भयानक श्रादि रसों को नित्य रूप से दुःखात्मक नहीं मान सकते, श्रौर ग्रधिकांशतः ऐसा मान लेने पर भी वह दुःख लौकिक ही होता है, किन्तु यह दुःख परवर्ती अलौकिक सुवानुभूति की प्राप्ति के लिए किसी भी रूप में न तो ग्रनिवार्य साधन है श्रौर न ही सहायक साधन । हाँ, वह प्रत्यन्त भाचुक सहृदयों की अलौकिक सुवानुभूति के लिए उद्दीपक कारण अवश्य सिद्ध हो सकता है।

x. निष्कर्षतःः भयानक, करुण श्रादि रस दुःखात्मक नहीं हैं, वे भी शृङ्गार श्रादि के समान सुखात्मक ही हैं।

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(ख) नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों में नाट्यदर्पण का स्थान

नाट्यशास्त्र-सम्बन्धी उपलब्ध एवं ग्रन्थरचयिता साहित्य का वर्गीकरण करने से हमें प्रमुख नाट्याचार्यों की सात कोटियाँ मिलती है :-

(१) भरत के पूर्ववर्ती ग्राचायँ जिनकी रचनाग्रों को भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में सर्वथा ग्राह्य्सात कर लिया है । इन ग्राचायोंँ की रचनाएँ कभभी तक ग्रप्राप्य हैं ।

(२) ग्राचायँ भरत जिनका नाट्यशास्त्र शताबिदयों तक प्रायः सभी ग्राचायोंँ की रचनाग्रों का मुलाधार बना रहा ।

(३) भरत के ग्रनुवर्ती ग्राचायँ जिनकी रचनाएँ भरत के नाट्यशास्त्र पर ग्राधृत हैं । इन्होंने कारिकाएँ एवं वृत्तियाँ लिखकर भरत के मत का स्पष्टीकरण किया । इस वर्ग के प्रमुख ग्राचायँ हैं—ग्रभिनवगुप्त, धनञ्जय, सागरनन्दी, रामचन्द्र-गुणचन्द्र, पारदातनय, शिङ्गभूपाल, रूपगोस्वामी, सुदरर्मित्त्र ग्रौर नन्दिकेश्वर।

(४) वे ग्राचायँ जिनकी सम्पूर्ण रचनाएँ तो ग्रनुपलब्ध है, किन्तु ग्रन्य ग्राचायों ने ग्रपनी रचनाग्रों में जिनका उल्लेख करते हुए कहीं कहीं उनके उद्धरण दिये हैं । उदाहरणार्थ ग्रभिनवगुप्त ने ग्रपने प्रथम ग्रध्याय में नान्दी का विवेचन करते हुए ‘कोहलप्रदर्शिता नान्दी’ लिख कर यह सिद्ध किया है कि उन्हें कोहल की कोई न कोई रचना उपलब्ध थी । वे एक स्थान पर भरत से कोहल का मतवैभिन्य दिखाते हुए वे लिखते हैं :

"ग्रत्तेन तु इलोकेन कोहलमतंनैकादशार्धमुच्यते । न तु भरते"

[ग्रभिनवभारती, ग्रध्याय ६ कारिका १० की वृत्ति]

ग्रभिनवगुप्त ने दत्तिलाचार्य के श्लोकों को भी चौदह बार उद्धृत किया है । इससे सिद्ध होता है कि दत्तिल नामक ग्राचायँ की भी कोई न कोई रचना ग्रभिनवगुप्त को प्राप्त थी । सागरनन्दी के 'नाटकलक्ष्मारत्नकोष' ग्र्रग्रंथकृत ग्रौर बादरायण की रचनाग्रों के कई उदाहरण प्राप्त होते हैं । इसी ग्रन्थ के शार्त्रर्‌ग्ण नामक ग्राचायँ के कई उद्धरण पाये जाते हैं । ग्रभिनवगुप्त

१. रचना—ग्रभिनवभारती - समय दसवीं शाताब्दी का ग्रन्थ ।

२. " दशरूपक - समय ९७४ से ९८४ ई० ।

३. " नाटकलक्ष्मारत्नकोष - समय ११ शतक का पूर्वार्द्ध ।

४. " नाट्यदर्पण - समय १२ शतक का मध्यभाग ।

५. " भावप्रकाशन - समय १२ ग्रौर १३ शतक के मध्य ।

६. " नाटकपरिशिष्टा - समय १४ शतक ।

७. " नाटकचन्द्रिका - समय १४ शतक ।

५. " नाट्यप्रदीप - समय १६१३ ई० ।

९. " ग्रभिनयदर्पण - समय २-३ शाताब्दी ई० (सम्भवतः)

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ने तुम्बुरु नामक ग्राचार्य की रचना का उल्लेख देकर एक स्थान पर लिखा है—‘तुम्बुरुरेवमुक्तक्म् ।’ अभिनवभारती के चौदहवें अध्याय में कात्यायन का मत कई श्लोकों में उद्धृत किया गया है । कात्यायन ने वीरों के मुजदंड के वर्णन में स्रघरा छन्द श्रोर नायिका-वर्णन में वसन्ततिलका का प्रयोग विहित माना है । इसीप्रकार इसी ग्रन्थ के चौथे श्रध्याय में राहुल नामक ग्राचार्य का मत देते हुए अभिनवगुप्त लिखते हैं—‘यथोक्तं राहुलेन,’ तथा ‘ते च यथाह राहुलः’ विश्वनाथ ने अपने ग्रन्थ साहित्यदर्पण में नखकुट्ट की रचनाओं के उद्धरण दिये हैं । इस प्रकार इस कोटि के प्रमुख नाट्याचार्य हुए—मातृगुप्त, दत्तिल, ग्राह्मकुट्ट, बादरायण, शौतिकर्णा, तुम्बुरु, कात्यायन, राहुल, नखकुट्ट श्रादि ।

(५) पांचवीं कोटि में वे ग्राचार्य ग्राते हैं जिनका एकमात्र नामोल्लेख पाया जाता है, किन्तु जिनकी न तो कोई रचना उपलब्ध है, न किसी श्लोक का उद्धरण ही कहीं पाया जाता है । ऐसे ग्राचार्यों में भरत के पूर्ववर्ती हैं—शिलालिन्, कुशाशव, धूर्तिल, शाण्डिल्य, वात्स्य जिनका उल्लेख भरत के नाटचशास्त्र में पाया जाता है । अभिनवभारती, दशरूपक श्रोर भावप्रकाशन में सदाशिव, पद्मसू, द्रोहिणा, व्यास, श्राज्जनेय नामक ग्राचार्यों का नाट्यकार के रूप में वर्णन मिलता है, परन्तु उनकी किसी रचना का उद्धरण नहीं पाया जाता । शारदातनय ने अपने ग्रन्थ भावप्रकाशन में सुबन्धु का उल्लेख किया है । यदि यह सुबन्धु वासवदत्ता के रचयिता भी हैं तो इनका समय पांचवीं शताब्दी में मानना होगा, किन्तु नाटचसम्बन्धी उनकी कोई भी रचना प्राप्य नहीं है ।

(६) छठी कोटि में वे श्राचार्य ग्राते हैं जिन्होंने नाटक के सम्बन्ध में कोई स्वतन्त्र रचना न करके केवल भरत-नाटचशास्त्र ’ का साङ्ग्य प्रस्तुत किया है । ऐसे भाष्यकारों में श्राचार्य अभिनवगुप्त, कीर्तिधर, नान्यदेव, भट्ट उद्भट, श्रीशङ्कुक, भट्टयन्त्र प्रसिद्ध है ।

(७) सातवीं कोटि में वे श्राचार्य हैं, जिन्होंने काव्यशास्त्र के सभी श्रङ्गों को ग्रहण करके उसके कुछ श्रध्यायों में नाटच-शास्त्र का विवेचन किया है । ऐसे ग्राचार्यों में शिङ्गभूपाल, रूपगोस्वामी, भोजराज, विद्यानाथ श्रोर विश्वनाथ प्रसिद्ध हैं । शिङ्गभूपाल ने अपने ग्रन्थ ‘रसार्णव-सुधाकर’ में एक श्रोर तो ‘नाटक-प्रभाषा’ की रचना केवल नाटच-विषयों को लेकर की, श्रोर दूसरी श्रोर इस ग्रन्थ के श्रन्तिम भाग में काव्य के ग्रन्थ विषयों के साथ नाटचशास्त्र पर भी प्रकाश डाला । इसी प्रकार भोजराज ने ‘शृङ्गारप्रकाश’ के बारहवें प्रकाश में नाटक का वर्णन किया श्रोर ग्रन्थ में साहित्यशास्त्र के सभी श्रङ्गों का । उन्होंने अपने ‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ के पांचवें परिच्छेद में तो नाटक का विवेचन किया श्रोर शेष श्रध्यायों में काव्यशास्त्र के ग्रन्थ ग्रङ्गों का । विद्यानाथ ने ‘प्रतापरुद्रयशोभूषण’ नामक ग्रन्थ के केवल तीसरे प्रकरण में नाटक का विवेचन किया श्रोर विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण के छठे परिच्छेद में नाटच-सम्बन्धी लक्षणों पर प्रकाश डाला । इन श्राचार्यों ने भरत-नाटचशास्त्र एवं दशरूपक को अपनी रचनाओं का श्राधार बनाया ।

उक्त ग्राचार्यों में से ग्रधिकांश ने अपने को भरत के नाटचशास्त्र का ऋणी माना है, किन्तु नाटचदर्पण के रचयिता रामचन्द्र-गुणचन्द्र बड़े गर्व के साथ अपनी रचना को सर्वथा मौलिक मानते हैं, श्रोर भरत-नाटचशास्त्र पर प्राद्धुत दशरूपक के मतों का स्थान स्थान पर खण्डन करते हैं । रामचन्द्र-गुणचन्द्र के पूर्वं धनञ्जय श्रोर उनके ग्रन्थुज धनिक की दशरूपक पर श्रवलोक-वृत्ति का इतना प्रचार हो गया था कि सर्वत्र उक्त ग्रन्थ ही समादृत हो रहा था । धनञ्जय के उपरान्त

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तीन शताब्दियाँ बीत चुकी थीं, और इस काल में ऐसे ग्रनेक नाटक विरचित हो चुके थे, जिन्हें देख कर रामचन्द्र-गुणचन्द्र को दशरूपक के लक्षण ग्रोर उदाहरण ग्रपर्याप्त प्रतीत होने लगे, ग्रोर उन्हें नाटच्यशास्त्र पर एक स्वतन्त्र मौलिक ग्रन्थ लिखने की ग्रावश्यकता जान पड़ी ।

रचना की प्रेरणा

रामचन्द्रगुणचन्द्र के पूर्वं नाट्यशास्त्र-संबन्धी तीन ग्रन्थ ग्रति प्रसिद्ध थे । १. भरतकृत 'नाट्यशास्त्र' २. धनञ्जय-कृत 'दशरूपक' ३. सागरनन्दी-कृत 'नाटकलक्षणरत्नकोष' । नाट्यदर्पण में स्थान स्थान पर उपयुक्त तीनों ग्रन्थों से मतभेद मिलता है । रामचन्द्र स्वयं एक सफल नाटककार थे । उन्होंने एक दर्जन से ग्रधिक नाटकों की रचना की । ग्रपने ग्रन्थ नाटचदर्पण में पारिभाषिक शब्दों का लक्षण देते हुए उदाहरण के लिए उन्होंने ग्रपने नाटकों से उद्धरएा दिये । इससे यह ग्राभास मिलता है कि पूर्ववर्ती ग्राचार्यों के लक्षण ग्रोर ग्रदाहरणों से ग्रप्रसन्नु होकर नवीन ग्रन्थों की रचना ग्रावश्यक समझते थे । वे स्वयं लिखते हैं कि कालिदास ग्रादि महान् कवियों के बनाए हुए ग्रनेक रूपकों को देख कर ग्रोर स्वयं भी ग्रनेक रूपकों का निर्माणय करके हम दोनों नाट्यलक्षणों की विवेचना ग्रारम्भ करते (ना० द० ११२)

ग्राचार्य विश्वेश्वर ने ग्रपनी भूमिका में इस ग्रन्थ की प्रेरणा के सम्बन्ध में ग्रपना मत देते हुए लिखा है "इसकी पृष्ठभूमि में राजनीति की प्रतिस्पर्धा की प्रेरणा रही हो तो भी कुछ ग्राश्चर्य नहीं है। दशरूपककार धनञ्जय मालवनरेश मुज के समकालीन थे । रामचन्द्र-गुणचन्द्र गुर्जरेश्वर के पिटंड थे । गुजरात ग्रोर मालवा राज्यों का सदैव संघर्ष रहता था । इसमें दीर्घकाल तक युद्ध भी चलते रहे । इसलिए गौरव-प्राप्ति के हर क्षेत्र में दोनों राज्यों की प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी । इसी प्रतिस्पर्धा के कारण मालवाधीश के ग्राश्रय में निर्मित दशरूपक की प्रतिस्पर्धा में इस नाटचदर्पएा की रचना हुई हो, यह सर्वथा संभावित है" ।

दशरूपक ग्रोर नाट्यकलकसारत्नकोष से नाटचदर्पएा की तुलना करते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि रामचन्द्र को पूर्ववर्ती ग्राचार्यों के नाट्यसम्बन्धी लक्षणों से कई स्थलों पर इतना ग्रसन्तोष था कि उन्हें ग्रपने मत को स्पष्ट करने केलिए एक नये ग्रन्थ की रचना करनी ग्रावश्यक प्रतीत हुई । दशरूपक ग्रोर नाटचदर्पण की तुलना करते हुए २१ स्थलों पर मतभेद मिलता है, जिसका विस्तृत विवेचन भूमिका के पृष्ठ २१ से २५ तक देखा जा सकता है । सागरनन्दी के मत से भी ये ग्रन्थकार कई स्थलों पर मतभेद रखते हैं, इसका विस्तृत विवेचन भी पृष्ठ २५ पर देखा जा सकता है ।

रामचन्द्र-गुणचन्द्र की मौलिकता

राम चन्द्र-गुणचन्द्र निर्मीक वास्तु प्रणेता थे । उन्होंने न केवल धनञ्जय ग्रोर सागननन्दी के ही मतों का खण्डन किया है, ग्रपितु भरतमुनि के मत का भी खंडन करने में उन्हें संकोच नहीं हुग्रा । निदर्शन एवं प्रमाण के लिए निम्न प्रसंग द्रष्टव्य है—

तृतीय विवेक में प्ररोचना के सम्बन्ध में उनका मत देखा जा सकता है । इसके लिए भूमिका का पृष्ठ २० द्रष्टव्य है । वृत्तियों का निरूपण भी भरतमुनि के मत से भिन्न जान पड़ता है ।

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रामचन्द्र ने भरतमुनि के 'भारती वृत्ति विवेचन' में 'वदतोव्याघात दोष' दिखा कर भरतमुनि के मत की आलोचना की है। भरतमुनि ने जहाँ रूपक के दश भेद किये हैं, वहाँ 'नाट्यदर्पणकार' ने इसके बारह भेद करके मंगलाचरण में ही जिनवाणी के श्राचारादि से लेकर ह्रस्ववाद पर्यन्त बारह श्रंगों के श्रनुसार रूपक के बारह भेदों का संकेत कर दिया है। भरतमुनि के दशरूपकों से दो भेद नाटिका और प्रकरणी श्रधिक मान कर इन्होंने नयी पद्घति से बारह रूपक-दशरूपकों से दो भेद नाटिका और प्रकरणी में कैशिकी, सात्वती, श्रारभटी और भारती वृत्तियाँ मानी हैं, किन्तु व्यायोग, समवकार, वीथी में केवल तीन वृत्तियाँ। इसप्रकार वृत्तियों के श्राधार पर नाटकों का वर्गीकरण रामचन्द्र-गुणचन्द्र की श्रपनी मौलिक सूझ है।

नाट्यदर्पण में रस-विवेचन भी पूर्वाचार्यों से कहीं कहीं भिन्न प्रतीत होता है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र श्रपने पूर्ववर्ती श्राचार्य मम्मट के मत का खंडन करते हुए कहीं भी संकोच नहीं करते। मम्मट 'ग्रधिक विस्तार' को रसदोष में परिगणित करते हैं, किन्तु नाट्यदर्पणकार इसे रसदोष न मान कर वृत्तिदोष मानते हैं। उनका कथन है कि रस की दृष्टि से यह दोष न होकर गुण है। 'प्रतिपक्षी का अत्यंत उत्कर्ष दिखलाकर नायक द्वारा उसका बध कराने में तो नायक का उत्कर्ष बढ़ता ही है, इसलिए यह दोष नहीं श्रभिप्रेत हुआ है।' इसका विस्तारपूर्वक वर्णन नाट्यदर्पण के पृष्ट १५५ पर देखा जा सकता है। इसी प्रकार इन श्राचार्यों ने प्रभिनवगुप्त के मतों का भी रस की दृष्टि में खंडन किया है। इसके लिए भूमिका (पृष्ठ २९ से ३१) तक द्रष्टव्य है।

नाट्यदर्पणकार का रस-विवेचन सर्वथा मान्य भले ही न हो, पर वह मौलिक प्रयास है। उन्होंने रस को सुखदुःखात्मक दोनों माना है; उनके मत से श्रृंगार, हास्य, वीर, श्रद्भुत और शांत तो सुखात्मक रस हैं, किन्तु करुण, रौद्र, बीभत्स और भयानक रस दुःखात्मक ही हैं। तृतीय विवेचन में कतिपय श्राचार्यों के सभी रसों की सुखात्मकता का खंडन करते हुए रामचन्द्र-गुणचन्द्र कारिका की वृत्ति में कहते हैं :-

[कुछ श्राचार्यों के द्वारा] जो सब रसों को सुखात्मक बतलाया जाता है, वह प्रतीति के विपरीत [होने से सामान्य ग्रासंगत] है। मुख्य [ग्रर्थात् वास्तविक] विभावों से उत्पन्न करुण श्रादि की दुःखात्मकता की तो बात ही जाने दो, काव्य के ग्रभिनय में प्राप्त [बनावटी] विभाव श्रादि से उत्पन्न ह्रास्य भी भयानक, बीभत्स, करुण, श्रथवा रौद्र रस ग्रास्वादन करने वालों को कुछ श्रवश्यम्भावी-सी क्लेश दशा को उत्पन्न कर देता है। इसीलिए भयानक श्रादि [दयों] से सामाजिकों को घबराहट होती है [यदि सब रस सुखात्मक हों तो] सुखास्वाद से तो किसी को उद्वेग नहीं होता [इसलिए करुणादि रस दुःखात्मक ही होते हैं]।

१. स्थायीभावः शृंगाराद्यविचारारभः । स्पष्टानुभावनिश्र्चयः सुखदुःखात्मकौ रसः ॥

२. यत् पुनः सर्वरसानां सुखदुःखात्मकत्वमुख्यते तत्तु प्रतीतिबाधितम् । श्रेष्ठा नाम मुख्यविभावोपचिताः, काव्याभिनयोपनीतविभावोपचितोऽपि भयानको बीभत्सकरुणरौद्रो वा रस ग्रास्वादन करने वालों को कुछ श्रवश्यम्भावी-सी क्लेशदशामुपनयति । श्रतएव भयानकादिभिरुद्धिजते समाजः। न नाम सुखास्वादोद्वेगो घटते। हि० ना० पृ० २६०-२६१

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सभी रसों को सुखात्मक मानने वाले ग्राचार्यों के तकों का खंडन करते हुए नाट्यदर्पणकार कहते हैं कि कवि एवं ग्राभिनेताओं के कौशल के द्वारा करुण ग्रादि रसों में भी बुद्धिमान् व्यक्ति को परमानन्द की ग्रानुभूति होती है, यह धारणामात्र है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र की युक्ति यह है कि कविगरण तो सुख-दुःखात्मक संसार के ग्रनुरूप ही रामादि के चरित्र की रचना करते समय सुखदुःखात्मक रसों से युक्त ही (काव्यनाटक ग्रादि की) रचना करते हैं। जब कवि को स्वतः दुःखात्मक रस की ग्रानुभूति होती है तो रोहिताश्व के मररण, लक्ष्मरण के शक्तिपातन ग्रादि को देखकर समाजिक को सुख का ग्रानन्द कैसे हो सकता है ? [इसलिए करुरणादि रसों को सुखात्मक मानना उचित नहीं है।]

उनका दूसरा तर्क यह है कि ग्रन्थकार्यंगत करुरणादि विलापादि युक्त होने के कारण निश्चित रूप से दुःखात्मक ही होते हैं। यदि उनको ग्रन्थुरण में सुखात्मक माना जाय तो वह सम्यक् ग्रन्थुरणरण नहीं हो सकता है।

तीसरा तर्क यह है कि इष्टजन के विनाश से दुःखियों के सामने करुरणादि का वर्णन किये जाने पर जो सुखास्वाद होता है वह भी वास्तव में दुःखात्मक ही होता है।

नाट्यदर्पणकार करुरण को दुःखात्मक श्रौर विप्रलम्भ शृङ्गार को सुखात्मक स्वीकार करते हुए कारणा बताते हैं कि-विप्रलम्भशृङ्गारस्तु दाहादिकार्थस्त्वाद् दुःखस्योपपादि सम्भोग-सम्भावनागम्भस्वाद् सुखात्मकः ।

शृङ्गार तो इष्टजन के दाहादि द्वारा विनाश की प्रतीति से जन्य होने के कारण दुःख रूप होने पर भी उसमें सम्भोग (पुनर्मिलन) की सम्भावना बनी रहने से सुखात्मक ही है।

नाट्यदर्पणकार का रससिद्धान्त ग्रन्थ ग्राचार्यों के सिद्धान्त से भिन्न है। वे काव्य श्रौर नाटक में सामान्य-विषयक श्रौर विशेष-विषयक द्विविध रसों की स्थिति मानते हैं ! जहाँ ग्रन्थ ग्राचार्य लोक में होने वाली स्त्री पुरुष की परस्पर रति को रस नहीं मानते, वहाँ नाट्यदर्पणकार लौकिक स्त्री पुरुष ग्रादि को भी विभावादि शब्दों से श्रौर उनकी रति ग्रादि को भी 'रस' शब्द से निर्दिष्ट करते हैं।

ग्रन्थकार के मत से रसानुभूति के पांच ग्राधार होते हैं (१) लौकिक रूप में स्थित पुरुष (२) नट (३) काव्य नाटक के श्राता (४) काव्यनाटक के ग्रन्थुसन्धाता ग्रर्थात् कवि एवं नाटककार (५) सामाजिक । ग्रन्थकार्य, ग्रन्थक्ता, श्रोता एवं ग्रन्थुसन्धाता को तो प्रत्यक्ष रूप में रसानुभूति होती है किन्तु सामाजिक को परोक्ष रूप में । रामचन्द्र-गुणचन्द्र के मत से प्रेक्षक ग्रादि में रहने वाला रस लोकोत्तर है श्रौर शेष लौकिक ।

रसभेद संबंधी ग्रन्थकार का मत ग्रन्य ग्राचार्यों के मत से भिन्न है। यद्यपि रामचन्द्र-गुणचन्द्र रस के भेद मानते हैं, किन्तु इनके प्रतिरिक्त तृष्णा को स्थायी भाव मान कर लोल्यरस, श्राद्दिता को स्थायीभाव मानकर स्नेह रस, श्राकांक्षा को स्थायी भाव मान कर वत्सलरस, श्ररति को स्थायी भाव मान कर दुःख रस, श्रौर संतोष को स्थायी भाव मान कर सुख रस की भी ग्रानुभूति वे स्वीकार करते हैं।

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इस प्रकार ग्रंथकार ने स्वतन्त्र ढंग से रसविवेचन का भी प्रयास किया है। इस प्रयास में सफलता की कसौटी एक मात्र यही है कि प्रागामी ग्राचार्यों ने उनके मत को कहीं मान्य नहीं माना, श्रीर विश्वनाथ श्वादि ने उनके मतों की सर्वंदा श्वाहेलना ही की।

नाट्यदर्पणकार की एक बड़ी विशेषता यह दिखाई पड़ती है कि वे श्रपनी कारिका के सूत्रों को व्याख्या स्वरूपचित वृत्ति में इतने विस्तार के साथ कर देते है कि वे गूढ़ स्थल स्पष्ट हो जाते हैं। कहीं कहीं तो ग्रन्थ ग्राचार्यों के कई श्लोकों में वर्णित लकराों को वे एक ही श्लोक में समाविष्ट कर लेते है। जहाँ भरत मुनि ने त्रयोदशवं श्रध्याय के १०,११,११२वें श्लोकों में नाटक का लक्षण किया है वहाँ रामचन्द्र ने केवल एक श्लोक में नाटक की परिभाषा इस प्रकार की है—

"उन रूपक भेदों में से धर्म, श्रृंग्य ग्रौर कामरूप त्रिविध फलो वाला, श्रंक, उपाय, दशा, संधि से युक्त, देवता श्रादि जिसमें सहायक हों, इस प्रकार का पूर्वकाल के प्रसिद्ध राजाश्रों का चरित्रप्रदर्शित करने वाला ग्रभिनेय काव्य नाटक कहलाता है :-

श्यातद्वाराजवरितं धर्मेकामार्थसाफलम् ।

साड्लोपायाश्रया-संधि-दिव्याद्र तत्र नाटकम् ॥ ११४

रामचन्द्रगुणाचन्द्र ने ग्रभिनवगुप्त के नाटक शब्द की व्युत्पत्ति की श्वालोचना की है। ग्रभिनवगुप्त ने 'नृत्' नृतियों के स्थान पर 'नटतों' पाठ मान कर नति प्रथांत नमनार्थक नटू धातु

से नाटक की सिद्धि मानी है, जो उनके विचार से 'मितान् ह्रस्वः ६।४।१२ (प्रश्लष्टो) सूत्र से शिन् च् परे रहते उपधा को ह्रस्व करने के विधान से 'नटक' शब्द 'घटक' के समान वनता है। किन्तु रामचन्द्र

की यह श्रापत्ति उपयुक्त नहीं है, क्योंकि ग्रभिनवगुप्त ने नर्त्नार्थक नटु से भी नाटक शब्द की सिद्धि की है। (विशेष विवेचन के लिए नाट्यदर्पणा की प्रस्तुत हिन्दी व्याख्या पृ० २३ देखिए ।)

इस सम्बंध में विवेचन करते हुए ग्राचार्य विश्वेश्वर ने यह निष्कर्ष निकाला है कि ग्रभिनवगुप्त ने केवल नमनार्थक धातु से ही नहीं, ग्रपितु नर्त्नार्थक धातु से भी नाटक शब्द की सिद्धि की है। ग्रभिनवगुप्त लिखते हैः—

नाटकं नाम तच्चेष्टितं प्रथीभावदायकं भवति तथा हृदयानुप्रविशरंजनोल्लासनया

हृदयं शरीरं च नर्तयति नाटकम् ।

नाटक ग्रौर नाटकeter काव्यों में श्रन्तर—

नाट्यदर्पणकार के पूर्व ग्राचार्यों ने नाटक एवं नाटकeter काव्य में उतनी स्पष्टता के साथ ग्रन्तर नहीं दिखलाया है, जितनी स्पष्टता हमें रामचन्द्रगुणाचन्द्र की रचना नाट्यदर्पएा में मिलती है। ग्राचार्य धनञ्जय ने नाटक ग्रौर नाटकeter रूपकों में ग्रनतर दिखाते हुए लिखा है—

प्रकृतिवादथनोर्वा भूयो रसपरिप्रहात् ।

सम्पूर्णलक्षरास्वाच्च पूर्वं नाटकसुच्यते ॥

[नाटक- ग्रन्थ प्रकार के रूपकों की प्रकृति है। श्रर्थात् प्रकरण श्रादि भेदों का लक्षण नाटक के श्राधार पर ही किया जाता है। नाटक में बहुत ग्रधिक रस का परिग्रह होता है, श्रौर उसमें संपूर्णं लक्षण होते हैं ।]

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यहाँ भनुजजय ने नाटक और ग्रन्थ रूपकों में ग्रन्थर दिखलाने का प्रयत्न किया है, पर रूपक और रूपक से इतर साहित्य का ग्रन्थन कहीं नहीं स्पष्ट किया है। रामचन्द्रगुणचन्द्र ने इस समस्या को सुलझाने का प्रयत्न किया है—

१. रामचन्द्रगुणचन्द्र ने नाटक और कथा-साहित्य में व्यवतंक धर्म स्थापित करते हुए कहा है कि यद्यपि कथादि भी श्रोतागणों के हृदय को नचा देते हैं किन्तु वे उपायादि हेतुओँ के श्रभाव में उतने उल्लासकारी नहीं होते।

२. नाटक के द्वारा राजा और उसके वंश रूप में रामाद्यदि को व्युत्पन्न किया जाता है, जो नाटकेतर साहित्य में सम्भव नहीं है।

३. कथा-साहित्य और नाटक की रचनाशैली में स्पष्ट ग्रन्थर इस प्रकार होता है। श्रध्यायाव्य में पद्य ही होता है और श्राश्रायायिका गद्य ही होता है। दोनों में समुद्र, नदी, सूर्य, चन्द्र श्रादि के प्राकृतिक वर्णन का बाहुल्य होता है। किन्तु नाटक में पद्य की संख्या स्वल्प और गद्यशैली भी श्राश्रायायिका से भिन्न होती है। कादम्बरी और वासवदत्ता श्रादि श्राश्रायायिका-ग्रन्थों में दीर्घं समासिक गद्य सुलभनीय है। किन्तु नाटक में सरल एवं दीर्घ समास-रहित गद्य ही वाञ्छनीय है, कवच श्रौर श्रधिक समस्तपदयुक्त गद्य ठीक नहीं। नाटक में उसी श्रवान्तर कथावस्तु की योजना होती है, जो परंपरा से फल की साधक होती है। रामचन्द्रगुणचन्द्र ने अपने 'नलविलास' नामक नाटक का उल्लेख करते हुए दमयन्ती के चित्रदर्शन द्वारा नल के हृदय में श्रानुराग उत्पन्न करने का प्रयत्न किया है, श्रतः चित्रदर्शन की प्रवान्तर कथा नाटक के सर्वथा उपयुक्त ही मानी जायगी।

४. नदी, समुद्र, सूर्य, चन्द्रमाँ, पर्वत, मधुपान जालक्रीडा श्रादि का वर्णन नाटकेतर साहित्य में श्रावश्यक माना जाता है। किन्तु नाटक में इन लम्बे वर्णनों से नाटक-रस तिरोभूत हो जाता है। इनका ग्रात्यल्प वर्णन तो स्वीकार्य हो सकता है, पर विस्तृत वर्णन नाटकोपयोगी नहीं माना जा सकता।

५. श्रलंकारों का विशेष प्रयोग भी नाटक में श्रनुचित नहीं समझा जाता। नाट्यदर्पणकार कहते हैं कि उन्हीं श्लेषोपमादि का प्रयोग करना चाहिए जो रससिद्धि के लिए किये जाने वाले प्रयत्न से ही सिद्ध होते हैं। कथा-भाग में उपकथेप श्रादि संध्यंगों की रचना इस प्रकार करनी चाहिए कि जिससे वे रस को तिरोभूत न कर सकें।

लक्षण और उदाहरण—

नाट्यदर्पणकारने पारिभाषिक शब्दावली के लक्षण एवं उदाहरण पूर्ववर्ती श्राचार्यों से पृथक् रूप में किये हैं। उन्होंने न तो भरत का श्रनुसरण किया है और न ग्रन्थ पूर्ववर्ती नाट्यचायों का। उन्होंने लक्षण और उदाहरण की एक नवीन पद्धति ग्रपनाई है। सूत्रों में सामान्य लक्षण और वृद्धि में उसका विवेचन किया है। यहाँ दो चार पारिभाषिक शब्दों के लक्षण और उदाहरण लिखकर रामचन्द्रगुणचन्द्र की मौलिकता पर प्रकाश डालने का प्रयत्न किया जायगा।

श्रृङ्गार का लक्षण भरतमुनि इस प्रकार लिखते हैं—

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प्रद्ध इति रुढिशब्दो भावेच रसेच रोहयत्यर्थान् । नानाविस्थानयुक्तो यथ्मात्समाद्वेददृक: ॥

इस लक्षण से 'प्रद्ध' का स्वरूप स्पष्ट नहीं होता । धनञ्जय ने भी 'प्रद्ध' का लक्षण स्पष्ट नहीं किया । नाट्यदर्पणकार ने 'प्रद्ध' का लक्षण अन्य ग्राचार्यों की अपेक्षा अधिक विस्तार के साथ इस प्रकार लिखा है—

[कार्य की प्रारम्भ ग्राह्य] अवस्था की समाप्ति अथवा कार्यवश [प्रसामाप्त अवस्था का भी] विच्छेद [जो अगले 'प्रद्ध' की कथा के बीज अर्थात्] बिन्दु से युक्त हो और दो घड़ियों से लेकर चारप्रहर तक के दर्शनीय अर्थ से युक्त हो वह 'प्रद्ध' कहलाता है ।

पाँच अवस्थाओं में से किसी भी एक अवस्था का प्रारम्भ क्षण पूर्णंतम् द्वारा समाप्त्ति [प्रद्ध की नियामिका होती है । उसको 'प्रद्ध' में दिखलाना चाहिए] अथवा अवसामाप्त अवस्था का भी कार्यवश जो बीच में विच्छेद कर दिया जाय वह भी 'प्रद्ध' का नियामक है । 'कार्य' पद से यहाँ एक दिन में न हो सकने वाले दूरदेशगमन श्रादि अथवा बहुत लम्बा होने के कारण एक दिन में जिसका अभिनय किया जाना सम्भव न हो [उसका प्रहण होता है] । उसके कारण जो अवस्था को बीच में ही विच्छेद कर दिया जाता है वह भी 'प्रद्ध' का नियामक है । [कारिका १६]

रामचंद्रगुणचंद्र का यह लक्षण पूर्ववर्ती श्राचार्यों के लक्षणों से अधिक स्पष्ट है । किन्तु श्राचार्य यह है कि परवर्ती श्राचार्यों ने इसका कोई उपयोग नहीं किया, और विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में भरत के ही लक्षण का ग्राधार लेते हुए कहा है “जिसके ग्रन्त में सम्पूर्ण पात्र रंगमंच से निष्क्रमण कर जाएँ ११९ भरत ने कहा है : निष्क्रान्त: सर्वेऽपि यत्रम्तदृक् । और विश्वनाथ ने भरत के निम्नलिखित इलोकों की सर्वथा उपेक्षा की तथा उनका कोई ग्रंश ग्रपने लक्षण में सम्मिलित नहीं किया—

यत्रार्थस्य समाप्यन्तं च बोध्यस्य भवति संहार:। किञ्चिदवलग्नबिन्दु: सोऽङ्क इति सदावगन्तव्य: ॥

'प्रद्ध' का यह लक्षण अधिक स्पष्ट है । अभिनवगुप्त ने इसी लक्षण को ग्राधार लेकर लिखा है—

प्रद्ध इत्ययं लक्षणे रूढ: शब्द: प्रयुक्तो ध्यवच्छेदकं लक्षणाम् । श्रभिनेये रसभाव- रूपलक्षिताननर्थान्न रोहयति । हृदयसंवादमाधारयत्करुणेन प्रत्यक्षीभावनया रसाकारोदयप्ररोहो भवति । प्रारम्भाद्यवस्थालक्षणयो यत्र समाप्ते सोऽङ्क: मुखादिषु यथाक्रमं बीजस्य दशाविशेषा: संहारशब्दवाच्या: अनेक रसादितत्वादिति नाम । —अभिनवभारती

अभिनवगुप्त ने भरतमत की व्याख्या विस्तार के साथ की है । सगरनदी ने 'नाटकलक्षररत्नकोश' में 'प्रद्ध' में वर्जित घटनाओं का ही उल्लेख किया है । घटनाकाल के विषय में इतना श्रवश्य लिखा है “बहुकालप्रवृत्तेयं कार्य नाटके विषयम् ।” श्रथवा दीर्घकाल में घटित होने

१. प्रत्यक्षचित्तवृत्तिरित्युक्तं ततो भावरसोद्वव: । ग्रान्तनिष्क्रान्तनिखिलपात्रोडङ्क इति कीर्तित: ॥ सा० द० ६-१९ ।

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वाले कायं को ग्रह्‌ में स्थान नहीं देना चाहिए, किन्तु प्रकृ‌ की ग्रन्थ विशेषताओं का कहीं उल्लेख नहीं किया ।

उपयुक्त लक्षराओं की तुलना करते हुए यह स्वोकार करना पड़ेगा कि रामचन्द्र-गुरूअचन्द्र ने पूर्ववर्ती ग्राचायों‌ के ग्रह्‌-सम्बन्धी लक्षणों को स्वतन्त्र रीति से सोचने श्रौर व्यापक बनाने का प्रयत्न किया है । इसी प्रकार श्रथंप्रकृति के लक्षणा का तुलनात्मक श्रध्ययन प्रस्तुत करने से भी हम उक्त निष्कर्ष पर ही पहुँचते हैं ।

श्रथं-प्रकृति—

भरतमुनि ने बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी श्रौर कार्य नामक पांच श्रथंप्रकृतियों का विवेचन किया है । परवर्ती सभी श्राचायों‌ ने भरतमुनि का ही श्रनुसरण किया श्रौर उन्हीं के निर्धारित लक्षणों को श्राधार बनाया । सभी ने प्रयोजन-सिद्धि के पांच हेतुगों का उपयुक्त क्रम रखा। किन्तु रामचन्द्रगुरूअचन्द्र ने इनमें परिवर्तन कर दिया । उन्होंने श्रथंप्रकृति को 'उपाय' नाम से श्रभिहित किया श्रौर उनका क्रम रखा—

बीज पताका प्रकरी बिन्दुः कार्यं चाथारहचि । फलसय हेतवः पञ्च चेतनाचेतनात्मकाः ॥ सूत्र ११२५

उन्होंने कारिका की वृत्ति में यह स्पष्ट किया है कि रुचि के श्रनुरूप इनके क्रम में परिवर्तन किया जा सकता है । श्रन्य ग्राचायं इस मत से सहमत नहीं । दूसरा श्रन्तर यह है कि रामचन्द्रगुरूअचन्द्र इन उपायों का विभाजन चेतन एवं श्रचेतन की दृष्टि से एक विलक्षण रीति से करना चाहते हैं । श्रचेतन हेतु भी मुख्य श्रौर श्रप्रमुख्य भेद से दो प्रकार का होता है । 'बीज' मुख्य श्रचेतन हेतु है श्रौर 'कार्य' श्रप्रमुख्य । इसी प्रकार चेतन हेतु भी मुख्य श्रौर उपकरएाभूत दृष्टि से दो प्रकार के होते हैं—(१) स्वार्थसिद्धि युक्त होने के साथ परार्थ-सिद्धिपर (२) परार्थ-सिद्धित्पर । प्रथम का नाम 'पताका' है, श्रौर द्वितीय का नाम प्रकरी ।

इस प्रकार का वर्गीकरण श्रौर क्रम हमें श्रन्य किसी ग्राचायं की रचना में नहीं दिखाई पड़ता । पंच उपायों के लक्षणा भी श्रन्य ग्राचायों‌ से कहीं-कहीं भिन्न रूप में दिखाई पड़ते हैं । रामचन्द्र की विशेषता यह है कि वे लक्षण के उपरान्त स्वरचित नाटकों से उदाहरण देकर लक्षणों की पुष्टि करते हैं । बीज श्रौर बिन्दु के लक्षणा श्रौर उदाहरण कई ग्राचायों‌ की ग्रपेक्षा श्रधिक स्पष्ट श्रौर बोधगम्य हैं । ग्रावश्यकतानुसार एक ही 'उपाय' के चार चार उदाहरण देकर उन्होंने कठिन विषय को सरल बना देने का प्रयत्न किया है । उदाहरणार्थ, बीज के लक्षण के उपरान्त रत्नावली, सत्यहरिचन्द्र, स्वरचित यादवाभ्युदय एवं मुद्राराक्षस के उन स्थलों का विश्लेषएा किया है जहाँ से 'बीज' प्रराम्भ होकर शाखा श्रादि रूप में विस्तार पाता है ।

उपयुक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि रामचन्द्र-गुरूअचन्द्र ने नाटच-सम्बन्धी ग्रह्‌ स्थलों का मौलिक रीति से चिन्तन करने का प्रयत्न किया है । इतना श्रवश्य है कि मौलिकता के उत्साह्‌ में वे कहीं कहीं इतने बहक गए हैं कि मूलतत्व तक पहुँचते पहुँचते रह जाते हैं । जैसे रस-चर्चा के कतिपय प्रसंगों में ।

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नाट्यदर्पणकार का योगदान

रामचन्द्र उन कतिपय ग्राचायों में परिगणित होने योग्य हैं जिनमें कारयित्री एवं भावयित्री दोनों प्रकार की प्रतिभा विद्यमान है। नाटचदर्पण के अतिरिक्त उन्होंने मल्लिका-मकरन्दम्, यादवाभ्युदयम्, रघुविलासम्, राघवाभ्युदयम्, रोहिताश्वमृगाङ्कम्, वनमाला-नाटिका ग्रादि नाटक एवं सुधाकलश नामक काव्य की रचना की। अपने नाट्यग्रन्थ के लिए उनके मन में नाटक-रचना की प्रेरणा उठी श्रथवा नाटक-रचना के उपरान्त प्राचीन नाटच-लक्षणों में संशोधन की श्रावश्यकता प्रतीत हुई, श्रथवा दोनों प्रेरणाएँ साथ साथ उत्पन्न हुईं, यह निश्चय करना कठिन है।

यद्यपि नाट्यदर्पणमें विद्वान् व्याकरएा की ग्रनेक प्रशंसितियाँ निकल सकते हैं, श्रौर ग्राचायों की नवीन मान्यताओं का खण्डन भी कर सकते हैं, पर इतना तो ग्रहश्य ही स्वीकार करना पड़ेगा कि (१) उन दोनों ग्रन्थकारों ने ग्रनेक ग्रप्रकाशित नाटच-ग्रन्थों का ग्रध्ययन करके उनके ग्राधार पर एक नये नाट्यशास्त्र का निर्माण किया। (२) ग्रनेक ग्रप्रकाशित ग्रन्थों का विषय प्रकाश में लाकर नाट्य-साहित्य की समृद्धि की (३) नाट्य-साहित्य ग्रोर नाट्यशास्त्र का नये ढंग से चिन्तन किया। (४) ग्रनेक गम्भीर विषयों का ग्रपने मतानुसार स्पष्टीकरएा किया। (५) विरक्त प्रधान जन समाज में श्रु गार-प्रधान नाट्यसाहित्य को भी सम्मानित किया। (६) पूर्वाचार्यों द्वारा निरूपित नाट्य-लक्षणों में संशोधन उपस्थित करने का साहस करके नवीन शैली पर सोचने का मार्ग प्रशस्त किया। (७) रस-विवेचन में इन ग्राचार्यों ने एक नया सिद्धान्त उपस्थित किया। ये ग्राचार्य रसों को प्रभिनवगुप्त के समान न तो सुख-दुःख रूप ही मानते हैं, न इनका मत धनंजय-धनिक एवं विश्वनाथ के समान सुखात्मकवादी ही है। इनका मत विभाज्यवादी मत कहलाता है जिसके विषय में हम पूर्व विवेचन कर ग्राए हैं।

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श्री रामचन्द्र-गुणचन्द्र विराचितं

स्वोपज्ञविवरवरराविभूषितं

नाट्यदर्पणम्

प्रथमो विवेक:

चतुर्वर्गफलां नित्यं जैनीं वाचमुपास्महे ।

रूपैदार्शाभि-विंश्रयं या न्याय्ये धृतं पथि ॥१॥

ग्रंथ श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसूरिदेवांतिरोमणिरविराचिता

नाट्यदर्पणदीपिका हिन्दी व्याख्या

इनोत्त पुच्छ जनिमा कवीनां मनोऽभृत: सुकृततच्छत धाम।

इमां उ ते प्रययो वर्धमान मनोवाता श्रघ्नु धर्मेऽपि ग्मन्नु॥

ऋग्वेद ३-३६-२ ।

विश्व-नाट्यविदं सूत्रधारो यस्तनुतेऽ सदा।

रस्कन्दस्वरूपाय तस्मै सूत्रात्मने नमः ॥

यदंश-भार्ष्यं भरते सृष्टिके

कृतं, न पूर्ति-विषयस्य तावता ।

स्वतोऽधिकं पूर्त्यं परिशिष्टरूपतः

तनोऽत्रि वृत्ति खलु नाट्यदर्पणे॥

वृत्तिभागका मझलाचारगा—

धर्म, श्रथ, काम श्रौर मोक्ष रूप] चतुर्वर्गात्मक फलोको प्रदान करने वाली [रागादि के विजेता] जिनोकी [उस] वाणीको हम नमस्कार करते हैं जिसने [ग्रपने] बारह रूपों के द्वारा संसारको न्यायोचित मार्गमें स्थापित किया है ।१।

इस ग्रन्थके निर्माता श्री रामचन्द्र-गुणचन्द्र (१०७३-११७५) दो व्यक्ति हैं । उन्होंने सम्मिलित रूपसे इस ग्रन्थकी रचना की है। दोनों जैन श्राचार्य श्री हेमचन्द्रके शिष्य श्रोर परस्पर सहाध्यायी गुरुभाई हैं। जैन मतावलम्बी होनेके कारण इस मझललोकमें उन्होंने ‘जैनी-वाणी’ श्रथवा रागादि विजेता श्रपने श्राराध्य जिनोंकी वाणीको नमस्कार किया है ।

उस ‘जिन-वाणी’ के उन्होंने ‘द्वादश-रूप’ बतलाए हैं । ये ‘द्वादश-रूप’ जैन शास्त्रोंमें निम्न प्रकार गिनाए गए हैं—

१. श्राचारार्ज, २. सूत्रकृतार्ज, ३. स्थानार्ज, ४. समवायार्ज, ५. भगवती,

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महाकविनिबद्धद्रानि हस्त्र्रूपाणि भूरिशः ।

स्वयं च कृत्वा, स्वोपज्ञं नाट्यलक्ष्मं विधायहे ॥२१॥

६. ज्ञाताधमंकथा, ७. उपासकदशा, ८. घनत्कुड्गुसाड़, ९. घनुत्तरोरपायिक, १०. प्रश्नव्याकरणं, ११. विपाक श्रौर १२. ह्र्स्तिवाद ।

प्राचार्य्यनुसे लेकर ह्र्स्तिवाद पयंत इन ‘द्वादश-रूपों’ के द्वारा ही रागादिके विजेता जिनोंकी वाणीने विश्वको धर्म्ममार्गमें स्थित रहनेकी प्रेरणा प्रदान की है । इसलिए ग्रन्थकारने यहां उन द्वादश-रूपों वाली जिन-वाणियोंको नमस्कार किया है । किन्तु इसके अतिरिक्त यहां ‘द्वादश-रूपों’ की चर्चा करनेका कुछ श्रौर भी कारण है उसका सम्बन्ध इस ग्रन्थसे है । नाट्यदर्पणके प्रारम्भमें जो यह मङ्गल-श्लोक लिखा गया है उसका ग्रन्थके प्रतिपाद्य नाट्य-विषयके साथ भी कुछ सम्बन्ध होना चाहिए । इस ह्र्स्तिसे ग्रन्थकार इसकी नाट्यपरक व्याख्या भी आगे स्वयं प्रस्तुत करेंगे । इस व्याख्यामें ‘दशरुपकः’ से बारह प्रकारके रूपकभेदोंका ग्रहण किया जायगा । इसी ह्र्स्तिसे ग्रन्थकारने यहां विशेष रूपसे ‘रूपदशादशाभिः’ पदोंका समावेश किया है

नाट्यके विषयपर सबसे प्राचीन श्रौर प्रामाणिक ग्रंथ भरत मुनिकका ‘नाट्यशास्त्र’ है । उसके बाद ‘दशारुपक’, ‘भावप्रकाश’, ‘साहित्यदर्पण’ तथा ‘प्रतापरुद्रयशोभूषण’ श्रादि श्रनेक ग्रन्थोंमें नाट्य-सम्बन्धी विषयका विवेचन किया गया है । इन सबमें ही प्रायः रूपक के दस भेद गिनाए गए हैं । दश-रूपककार धनञ्जयने तो श्रपने ग्रन्थका नाम ही ‘दशारुपक’ रखा है । उससे रूपकके मुख्य दस भेदोंकी सूचना मिलती है । उन्होंने दस रूपकोंका सम्बन्ध दस श्रवतारोंके साथ भी जोड़ा है । दस श्रवतारोंके समान रूपक भी दस ही हैं, यह उनका मत है । परन्तु फिर भी उन्होंने गौण भेदके रूपमें तेरहवें भेद ‘नाटिका’ का भी उल्लेख किया है । श्रौर ‘रत्नावली नाटिका’ के बहुतेरे उदाहरण भी ग्रन्थमें प्रस्तुत किए हैं । ‘भावप्रकाश’ तथा साहित्यदर्पणकारने भी ‘नाटिका’ को तेरहवां भेद माना है श्रौर उसके उदाहरणरुपमें ‘रत्नावली-नाटिका’ का उल्लेख किया है । इस प्रकार ग्रन्थ्य ग्राचार्योंके मतमें भी रूपकके तेरह भेद बन जाते हैं । किन्तु यहां संक्षेपकारने ‘प्रकरणी’ नामक एक श्रौर भेद करके रूपकके बारह भेद कर दिए हैं । उसी श्राधारपर यहां ‘द्वादश रूपों’ की चर्चा की गई है ।

इस ग्रन्थके दो भाग हैं — एक कारिकाभाग श्रौर दूसरा उसका वृत्ति श्रथवा विवरणभाग । दोनों भागोंके रचयिता एक ही हैं । श्रर्थात् जिन्होंने मूल कारिकाग्रोंकी रचना की है, उन्होंने उनपर स्वयं ही वृत्ति भी लिखी है । इसलिए यह मङ्गल-श्लोक कारिका भाग श्रौर वृत्ति भाग दोनोंके श्रारम्भमें दिया गया है । यहांपर यह श्लोक वृत्ति भागके मङ्गलाचरणके रुपमें दिया गया है । मूलकारिकाभागके मङ्गलाचरणके रुपमें श्रागे फिर इसको लिखकर इसकी व्याख्या करेंगे । सम्प्रति वृत्ति भागकी श्रवतराणिकाके रुपमें बारह

वृत्ति भागकी श्रवतरणारिकाका—

[कालिदास ग्रादि] महाकवियोंके बनाए हुए ग्रंथेक रूपकों [भूरिशः रुपाणि] को

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श्रलङ्काराम्बुधि: पन्था: कथमदीनां सुखचचर: । दु:सचचरस्तु नाक्षस्य रसकल्लोलसङ्कुल: ॥३॥ न गीतावाघनृत्चज्ञा लोकस्थितिविदो न ये । श्रभिनेतं च कुतं च प्रवन्धांस्ते वहिर्मुखा: ॥४॥

देखकर शौर स्वयं भी [अनेक रूपकोंका] निर्माण करके [प्रर्थात् नाट्य-लक्षण श्रादिका पूर्णां ज्ञान शौर ग्रनुसव प्राप्त करकें] हम दोनों [प्रर्थात् इस ग्रंथके रचयिता रामचन्द्र गुरुराचन्द्र इस नाट्यदर्पण ग्रंथमें] नाट्य-लक्षणकी विवेचना [प्रारम्भ] करते हैं।

जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है कि इस ग्रन्थके कर्ता रामचन्द्र शौर गुरुराचन्द्र दो व्यक्ति हैं। उन दोनोंने मिलकर इस ग्रन्थकी रचना की हैं। इस नाट्यदर्पणके श्रतिरिक्त 'द्रव्यालङ्कारवृत्ति' नामक एक शौर भी ऐसा ग्रन्थ है जिसकी रचना इन दोनोंने मिलकर की है। गुरुराचन्द्रका स्वतन्त्र रूपसे लिखा हुग्रा कोई ग्रन्थ नहीं मिलता है। परन्तु रामचन्द्र ने स्वतन्त्र रूपसे भी बहुतसे ग्रन्थोंकी रचना की है। उनको प्राय: 'प्रबन्ध-श्रालङ्कर्त्ता' उपाधि से विभूषित किया जाता है।

इसलिए श्रनुमान यह हुग्रा कि उन्होंने लगभग सौ ग्रन्थोंकी रचना की थी। उनके सब ग्रन्थ तो श्रब तक नहीं मिले हैं शौर न उनके नाम ही ज्ञात हैं किन्तु फिर भी श्रपने ग्यारह नाटकोंका उल्लेख उन्होंने श्रपने इस ग्रंथमें स्थान-स्थानपर किया है।

काव्यके, श्रव्य-काव्य, नाटक ग्राद्यायिका श्रादि श्रनेक भेद माने गए हैं। इन सबकी ही रचनाके लिए विशेष प्रकारकी प्रतिभाकी श्रावश्यकता होती है किन्तु ग्रंथकारकी दृष्टिमें नाटककी रचना श्रन्य ग्रन्थोंकी श्रपेक्षा श्रधिक कठिन है। इसलिए वे श्रागे श्लोकोंमें उसकी दुष्करताका प्रतिपादन करते हुए लिखते हैं—

कथा श्रादि [काव्यके ग्रनेक प्रभेदोंकी रचना] का सारांश श्रलङ्कारोंसे कोमल हो जानेकी कारण सुखपूर्वंक सच्चचर करने योग्य है [प्रर्थात् श्रलङ्कार-प्रधान कथा श्रादिकी रचना सरलतासे की जा सकती है] किन्तु रसोंकी कलोलोंसे परिपूर्ण होनेसे नाट्यकला मार्ग प्र्रत्यन्त कठिन [दु:सचचर] है।

जो गीत-वाघ-नृत्य श्रादिकों नहीं जानते हैं श्रौर जो लोक-व्यवहारोंमें कुशल नहीं हैं वे [प्रबन्धान् प्रर्थात्] नाटकोंका श्रभिनय करने श्रौर रचना करनेकेलिए [बहिःमुख ख हैं प्रर्थात्] श्रधिकारी नहीं हैं।

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नाट्यदर्पणम्

स कवितस्य काव्येन मर्थ्या श्वपि सुधान्धसः । रसोन्मादंूर्णिता नाट्ये यस्मि नृत्यति भारती ॥५॥ नानार्थशब्ददलोल्येन पराखो येऽसामृतात् । विद्वांसस्ते कवीन्‌राणाम्‌हन्त न पुनः कथामृ’ ॥६॥

इन्थलोकोंमें ग्रन्थकारने कथा श्रादि काव्यभेदोंके मार्गको ‘भलङ्कारमदः’ पतएव ‘सुसंस्कर’ कहा है श्रोर नाटककी रचनाके मार्गको ‘रस-कल्लोल-सङ्कुल’ होनेके कारण ‘दुःसंस्कर’ बतलाया है । किन्तु कथा श्रादि गद्य-काव्योंके लेखकोंोंने ‘गद्यं कवीनां निकष- वदन्ति’ लिखकर उस गद्य-रचनाको ही कवियोंकी प्रतिभाकी परखके लिए कसौटी माना है । इसी प्रकार पद्यात्मक प्रबन्ध-काव्योंके लेखकों छुद्रके परिमित श्रक्षरोकेबन्धनमें बंधकर की जाने वाली काव्य-रचना ही कवि-प्रतिभाका निष्प माना है । वास्तवमें प्रतिभावान् कवियोंके लिए तो सभी मार्ग सुसंस्कृत श्रोर श्रप्रतिभावानोंके लिए सभी जगह कठिनाई है । पण्डितराज जगन्नाथने श्रपनी रचना शक्तिकी प्रशंसा करते हुए लिखा है—

सादित्ये सुकुमारवस्तुनि हृद्यनाद्यप्रमहद्गन्थस्थले तर्के व मधु संविधातरि समं लीलायते भारती । शास्त्र्या वास्तु मृदुतरच्छदचती द्र्माकूटकुरेररास्यता । अस्मिंश्च हृदयङ्गमे यदि परिसततलया रतियोधिताम् ॥

जिस प्रकार ग्रन्थकूल पत्थिके होनेपर चाहे कठोर भूमि हो या कोमल सुसज्जित शाय्या हो स्त्रियोंके श्रानन्द ग्रोर विलासमें कोई ग्रन्तर नहीं पड़ता है इसी प्रकार प्रतिभा- वान् कविके होनेपर वह्ह किसी मार्गसे चले उसके श्रागे सरस्वती समान रूपसे ही श्रपने सौन्दर्यको श्रभिव्यक्त करती है, उसमें ग्रन्तर नहीं ग्राता है ।

रसकवियोंकी प्रशंसा—

नाट्यकी रचनाको ‘रस-कल्लोल-सङ्कुल’ होनेके कारण ही कठिन कहा गया था । किन्तु वह्ह रस ही नाट्य या काव्यकका प्राएा है । इसीसे ‘रससिद्धा: कवीश्वरा:’ रस-कवियोंकी सर्वत्र प्रशंसा की गई है । श्रागे श्लोकमें ग्रन्थकार भी उनकी प्रशंसा करते हुए लिखते हैं—

वही [ वास्तविक ] कवि है श्रौर उसके काव्य [ के पढ़ने ] से मर्त्यलोकके वासी [जन्त्रयः] भी [काव्यरस रूप] श्रानन्दको पान करते वाले बन जाते हैं जिसकी वाणी नाटकोंमें रसकी लहरियोंमें चकराती हुई-सी नाचती है ।

शब्द-कवियोंकी निन्दा—

जो कवि नानार्थक [प्रथन्त् ग्रनेकार्थक-वाचक शब्द] शब्दोंके प्रलोभनमें [पड़कर] रसामृतसे पराङ्मुख हो जाते हैं [प्रथन्त् रसकी उपेक्षा कर, केवल इलेप श्रादिके निर्वाहके लिए शब्द-प्रधान तुकबन्दियोंमें लग जाते हैं] वे विद्वान् [शब्दपण्डितुके काररा विद्वान् तो कहे जा सकते हैं किन्तु वे ‘कवीन्द्राएाम् कथा न ग्राह्मन्ति’ उत्तम कवि नहीं कहला सकते हैं ।

१. कथम् ।

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श्लेषालङ्कारभाजोऽपि रसानिस्यन्दिकर्षकशा: ।

दुर्भेग इव कामिन्या: प्रीष्यन्ति न मनो गिर: ॥७१॥

ग्रारङ्गाद् भूपतिं यावदौचित्यं न विदान्ति ये ।

स्पृहयन्ति कवित्त्वाय खेलनं ते समेधसाम् ॥७२॥

नीरस-वाणीकी निन्दा—

श्लेष श्लाङ्कारसे युक्त होनेपर भी रस-प्रवाहसे रहित होनेके कारण कर्कश [कवियों की] वाणी उसी प्रकार [सहृदयोंके] मनको प्रहुल्लित नहीं करती है जिस प्रकार प्रालिङ्गन करती हुई श्रोऱ प्रालिङ्गनारोसे सजी हुई होनेपर भी [यौन] रसके न निकलनेके कारण कठोर भग वाली [दुर्भगं] स्त्रियाँ [पुरुषोंको] श्राह्लादित नहीं करती हैं। ७।

इस प्रकार इन तीन श्लोकोंमें ग्रन्थकारने रसकवियोंकी प्रशंसा करते हुए यह दिखलाया है कि रस ही काव्य या नाटकका सर्वस्व है । उससे रहित नाटकोंको श्रालङ्कार श्रादि से चाहे जितना भी श्रलंकृत कर दिया जाय वे सहृदयोंको श्राह्लृष्ट नहीं कर सकते हैं ।

सहृदयोंके श्रालङ्कारकेलिए रसप्रधान नाटक ही उपयुक्त हो सकते हैं ।

कवियोंकेलिए व्ययहार ज्ञानकी उपयोगिता—

उत्तम काव्य या नाटककी रचनाके लिए सबसे मुख्य कारण तो कविकी प्रतिभा है । किन्तु उसके बाद कविकी व्युत्पत्ति श्रर्थात् लौकिक तथा शास्त्रीय व्यवहारका परिज्ञान भी दूसरा श्रनिवार्य कारण है । सम्मत्त श्रादिने तो इन दोनोंको श्रलग-श्रलग कारण न मानकर सम्मिलित रूपसे कारण माना है । श्रौर उनके साथ ‘काव्यज्ञशिक्षा्यास:' श्रर्थात्

शक्ति-निपुरणात्वा लोक-शास्त्र-काव्याद्वेचयात् ।

काव्यज्ञशिक्षयाास्याश् इति हेतुसतुद्दवे ॥

काव्यप्रकाश १—२ ।

शक्ति श्रर्थात् कवित्वकी वासमूत प्रतिभा, लोक, शास्त्र तथा काव्यके परिशीलन से उत्पन्न निपुरणाता श्रर्थात् व्युत्पत्ति, श्रौर काव्यके निर्माणा तथा उसकी विवेचनमें समर्थ काव्यज्ञोंकी शिक्षाके श्रनुसार श्रभ्यास करना ये तीनों मिलकर 'हेतु:' श्रर्थात् काव्यके कारण होते हैं । 'न तु हेतव:' श्रलङ्ग-ग्रलङ्ग तीन कारण नहीं होते हैं । इसी हष्टिसे यहां भी ग्रन्थकार लोकव्यवहार श्रादिकी उपयोगिताका प्रतिपादन करते हुए लिखते हैं—

निर्धनसे लेकर राजा तक [के व्यवहार] के श्रौचित्यको जो नहीं जानते हैं श्रौर कवित्वकी कामना करते हैं [श्रर्थात् कवि बनना चाहते हैं] वे विद्वानोंके उपहासके [मनोरञ्जनके] पात्र बनते हैं [लेखनं ते सुमेधसाम्] ।

विद्वत्ताके साथ कवित्व श्रावश्यक—

ग्रागले श्लोकोंमें ग्रन्थकार इस बातपर बल देते हैं कि लोक-रंजन श्रौर लोकमें प्रतिष्ठाकी प्राप्ति केवल विद्वत्ताके द्वारा नहीं हो सकती है । इनकी प्राप्तिके लिए शास्त्रीय विद्वत्ताके साथ कवित्वकी शक्ति भी श्रावश्यक है । कवित्वके बिना कोरा विद्वान् लोकमें न प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता है श्रौर लोकका ध्यान श्रपनी श्रोर श्राकृष्ट कर सकता है ।

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प्राखा: कवित्वं विद्यानां लावण्यमिव योषिताम्‌।

त्रैविद्यवेदिनोडप्यस्मै ततो नित्यं कृतस्पृहा: ॥६॥

नासिकान्ते द्वयं शृङ्गं द्वयोरीश्वरडा रसज्ञयो:।

कुचाभाव: कुरङ्गाच्च्या: काव्याभावो विपश्चित: ॥१०॥

श्रकवित्वं परस्तात्तु कलड्क: पाठशालिनाम्‌।

ग्रन्यकाव्ये: कवित्वं तु कलड्कस्यापि चूलिका ॥११॥

रिसयोंके लावण्यके समान कवित्व, विद्याग्रोंका प्रारूप है। इसलिए जयविद्याके जानने वाले [वेदोंके विद्वान्‌] भी इस [कवित्वकी प्राप्ति] के लिये सदा उत्सुक रहते हैं ॥६॥

[श्लोकके उत्तरार्धमें कही जाने वाली] दो वरहुें नाटकके ऊपर हुये कोड्के समान है और [इन] दोनोंसे रसज्ञोंको लज्जा होती है। [वे दोनों वस्तुएँ कौन सी यह कहते हैं] उनमेंसे एक तो] मृगनयनी [सुन्दरी] के स्तनोंका प्रभाव [अर्थात्‌ छोटे स्तन का होना और दूसरा] विद्वानुका काव्याभाव [अर्थात् कविता न होना, ये दोनों नाटकपरके कोढ के समान लज्जाप्रद होते हैं] ॥१०॥

काव्यापहारकी निन्दा—

जैसा कि पिछले श्लोकोंमें कहा गया है, बिना कवित्वके केवल कोरे विद्वानोंको भी जगत्में श्रादर प्राप्त करना कठिन हो जाता है। इसलिए कभी-कभी कविस्वकी प्रतिभा से हीन, किन्तु लोकमें श्रादर पानेके लिये उत्सुक, विद्वान्‌ भी दूसरोंके काव्यको चुराकर श्रापहरएा कर अपने नामसे प्रसिद्ध कर देते हैं और इस प्रकार ज्ञानायस ही लोकमें श्रादर प्राप्त करनेका प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार लोगोंको दिगा करते हुए ग्रन्थकार श्रागले श्लोक में लिखते हैं—

[पाठशालिनाम्‌ श्रर्थात्‌] विद्वानोंकेलिये कवि न होना ही बड़ा कलड्क है। किन्तु ग्रन्यों के काव्यसे [श्रर्थात् दूसरेंके काव्यका श्रापहरएा करके अपने नामसे प्रसिद्ध करनेंसे] कवित्व [को प्राप्त करनेका यत्न] तो कलड्ककी भी चूलिका [और भी श्राधिक बढ़ाने वाली चेष्टा] है ॥११॥

राजशेखर श्रादिने इस प्रकारके कवियोंका श्राचार्य विवेचन किया है। उन्होंने कवियोंके चार भेद किए हैं। (१) उत्पादक कवि, (२) परिवर्तंक कवि, (३) श्रादर्शक कवि और (४) संवर्‌गक कवि। इनमेंसे 'उत्पादक' कवि उसकाे कहते हैं जो श्रपनी प्रतिभाके बलसे सुन्दर सूक्तन काव्यकी स्वयं रचना करता है। वही वास्तमें कवि कहलानेका श्राधिकारो है। दूसरा 'परिवर्तंक' कवि वह कहलाता है, जो किसी श्रन्य कविके भाव और श्रब्दों में हेर-फेर करके उसको श्रपना काव्य बना लेता है। श्रर्थात् कुछ परिवर्तनोंद्वारा इसरेकी कवितापर श्रपने व्यक्तित्वकी छाप लगा देता है। तीसरे प्रकारका कवि 'श्रादर्शक' कवि होता है। वह दूसरेकी रचनाको छिपा देता है, प्रकाशित होनेका श्रवसर नहीं देता है श्रोर उससे मिलती-जुलती या हीन कोटिकी भी श्रपनी कविताको प्रसिद्ध कर देता है। चौथा कवि 'संवर्‌गक' कवि कहलाता है। 'संवर्‌गक' का श्रर्थ डाकू है। जो दूसरेके काव्यको

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प्रथमो विवेकः

खुल्लम-खुल्ला ग्रापना कहकर प्रकाशित करनेका दुस्साहस करता है वह ‘संवर्गक-कवि’ कहलाता है । परवर्तंक कवि श्रोर ग्राच्छादक कवि यदि चोर कवि हैं तो संवर्गक-कवि डाकू कवि है । कवियोंके ये सब भेद प्राचीन कालमें भी पाए जाते थे श्रोर ग्रथ भी पाए जाते हैं ।

इस प्रकारके कवियोंके विषयमें निम्न श्लोकमें श्राच्छ्यी छुटकी ली गई है—

कविरनुहर्त्ती च्छायां, श्रथ कुकवेः पदादिकं चोरः। साहसकृतं नमस्तस्मै ॥

ग्रर्थात् कवि यदि कभी काव्यापहरणका यत्न करता है तो वह केवल छायामात्रका ही ग्रापहरण करता है । कुकवि दूसरेके काव्यसे ग्रर्थका ग्रापहरण करता है श्रोर चोर कवि पदादिका ग्रापहरण करता है । किन्तु जो सारे प्रवन्ध, सारे काव्यका ही ग्रापहरण कर लेता हूँ उस साहसिक डाकूको दूरसे नमस्कार है ।

इसका ग्रभिप्राय यह हुग्रा कि दूसरोंके काव्यसे छायामात्रका ग्रपहरण करना, ग्रहरण कर लेना ग्रनुचित नहीं है उसकी ग्रनुमति सुकविके लिए भी प्रदान की गई है । किन्तु ग्रर्थापहरण, पदापहरण ग्रोर प्रवन्धापहरण उत्तरोत्तर गुरुतर ग्रपराध बन जाते हैं ।

त्रिविध काव्यस्संवाद—

ऊपरके श्लोकमें ‘कविरनुहर्ति च्छायां’ लिखकर कविको छायापहररगकी ग्रनुमति-सी प्रदान कर दी गई प्रतीत होती है । इसका कारण यह है कि काव्योंमें बहुधा साम्य भी पाया जाता है । श्रोर वह साम्य कभी-कभी महाकवियोंके काव्योंमें भी पाया जाता है । पर वह छाया-साम्य ही होता है । धन्यालोकार ग्रानन्दवर्धन तथा राजशेखर श्रादि ने इस प्रकारके काव्य-साम्यको तीन भागोंमें विभक्त किया है । (१) प्रतिबिम्ब-कल्प साम्य, (२) श्रालेख्यप्रकृत् साम्य श्रोर (३) तुल्यदेहत्व साम्य । इनका वर्णन करते हुए ग्रानन्दवर्धनाचार्यने लिखा है—

संवादो ग्रानन्यासाहशर्य तत् पुनः प्रतिबिम्बवत् । ग्रालेख्याकारवत तुल्यदेहिवद्रुच शरीिरयोस् ॥

धन्याालोक ४-१२ ।

इनके लक्षण राजशेखरने निम्न प्रकारसे किये हैं—

श्रथैः स एव सवंर्गो ग्राक्यामन्तरविचारणापरो यत् । तद्परमार्थविभेदं काव्यं प्रतिबिम्बकल्पं स्यात् ॥ कियतापि यत्र संस्कारकर्मणा वस्तु भिन्नवद् भाति । तत् कश्चित्मर्थचतुरैरालेख्यप्रकृतिमिति काव्यम् ॥ ग्रथ प्रतिविम्बकल्प-काव्य, मूलकाव्यका प्रतिबिम्बमात्र प्रतीत होता है उसका ग्रापना व्यक्तित्व ग्रोर स्वरूप मूलकाव्यसे बिलग प्रतीत नहीं होता है । ग्रानन्दवर्धनाचार्यने इस प्रकारके काव्यको ‘ग्रपरमार्थ-विभेद’ कहा है । यह काव्य सर्वथा हेय है । दूसरे ग्रालेख्यप्रकृत काव्यमें मूलकाव्यका कुछ संस्कार करके उसकी रचना की जाती है । जिससे वह प्रतिबिम्बभावको छोड़कर ग्रालेख्य या चित्रके समान प्रतीत होता है । यह भी हेय ही माना जाता है । तीसरा ‘तुल्यदेहत्व’ साम्य माना गया है ।

ग्रानन्दवर्धनने इसके विषयमें लिखा है—

तत्त्वस्यान्यस्य सदृशे पूर्वस्थित्यनुरूपाद्यपि । वस्तु भातितरां तन्व्या: शशिश्छाया यमिवाननम् ॥

ध्वन्या० ४-१४ ।

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कवित्वरन्ध्या: क्लिश्यन्ते सुखाकतुं जगन्ति ये । नेत्रे निमील्य विद्मांसस्तेडधीरोहन्ति पर्वतम् ॥१२॥

श्रथ शिष्टसमयपरिपालनाय प्रथयूहृद्यूहोपशमनाय च सकलसन्दर्भार्थस्त-वनागर्भ समुचितैस्त्रैधिदैवतस्य सूत्रकारो नमस्कारश्लोकं परामृशत:- [सूत्र १]— चतुर्वर्गफलां नित्यं जैनीं वाचमुपास्महे । रूपैद्रौद्रादिभि-र्विश्वं यया न्याये पथि धृतम् ॥१॥

श्रथात् जिस प्रकार कामिनीका मुख पूर्ववर्ती चन्द्रमाकी कान्तिका अनुसरण करने पर भी ग्रथयन्त शोभित होता है इसी प्रकार पूर्वकाव्यकी छायाका श्रनुसरण करनेवाला नवीन काव्य भी चमत्कारयुक्त हो सकता है । श्रज्ञानदर्शन इस प्रकारके काव्य-सामप्यके समर्थक हैं । इसीको पुष्ट इलोकमें 'कविरनुहरति छायाम्' लिखकर ग्राह्य कहा गया है ।

कवित्त्वशक्तिर रहित जो [विद्वान् श्रपनी कोरि विद्याके श्राधारपर] जगत्को प्रसन्न करते हैं । [सूत्री] बनानेके बलेश उठाते हैं । विद्वान् मानो ग्रन्थों में मोच कर पर्वतपर चढ़नेका यत्न करते हैं । [श्रथात् वे कभी श्रपने कार्योंमें सफल नहीं हो सकते हैं] उनका वह प्रयास श्रविवेक-पूर्ण है ॥१२॥

मूल ग्रन्थका मंड़लाचरण— उपरके वारह इलोक ग्रन्थकी ग्रावतरराणिके रूपमें लिखे गए थे । वे मूल ग्रन्थ के भाग न होकर उसके व्याख्यासूत्र विवरणके भाग थे । श्रब ग्रन्थसे मूल ग्रन्थ श्रौर उसकी व्याख्याका श्रारम्भ होता है । जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है यह ग्रन्थ दो भागोंमें विभक्त है—एक मूल कारिकाका भाग जिसको सूत्रभाग भी कहा जाता है, श्रौर दूसरा उसका व्याख्या-भाग श्रथवा विवरण-भाग कहलाता है । इन दोनों भागोंके निर्माता एक ही व्यक्ति हैं । श्रथात् सूत्रकारों ने स्वयं ही उसपर विवरण भी लिखा है । इसलिए मूल सूत्र-ग्रन्थका जो मंड़ल श्लोक था उसको उन्होंने श्रपने विवरणके श्रारम्भमें मंड़लश्लोकके रूपमें भी दे दिया है । 'चतुर्वर्गफलां' इत्यादि श्लोकको हम इससे पहिले भी देख चुके हैं, वही श्लोक श्रब फिर ग्रा गया है । इसका यही कारग्रण है । पहिली जगह विवरण या व्याख्या-भागके मंड़लश्लोकके रूपमें उसको दिया गया था । श्रब उसे मूल सूत्र-ग्रन्थ के मंड़लश्लोकके रूपमें लिखकर स्वयं सूत्रकार ही उसकी व्याख्या कर रहे हैं । इस बात को समझने इलोकको पुनरावृत्ति से किसी प्रकारका संदेह या भ्रम उत्पन्न नहीं होगा ।

मूल सूत्र-ग्रन्थके निर्माता रामचन्द्र गुणाचन्द्र] सम्पूर्ण ग्रन्थके प्रथर्थकी स्तुतिसे युक्त [प्रन्थके श्रारम्भमें नमस्कार करने योग्य] समुचित इष्टदेवता [जैनी वाक् श्रर्थात् सरस्वती] के नमस्कार-परक इलोक लिखते हैं— [सूत्र १]—[धर्म, श्रर्थ, काम श्रौर मोक्ष रूप] चतुर्वर्गात्मक फलको प्रदान करने वाली [चतुर्गदि दोषोंको जीत लेने वाले श्रत एव] जिनों [श्रथात् जिन नामसे कहे जाने वाले सन्तों] की [उस] वाग्योको [इस ग्रन्थके निर्माता हम दोनों] नमस्कार करते हैं जिसने

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का० १, सू० १ ] प्रथमो विवेक: [ २

'चतुर्वर्ग' इत्यादि—चतुर्वर्गो धर्मेर्थ-काम-मोक्षौ, यथौचित्यं प्रधानं गौणं वा 'फलं' यस्या: । समुदाय-समुदायिनोरभेदोद्भाससि, तेन पुरुषभेदेन एक-द्वि-त्रि-पुरुषार्थफलत्वेऽपि चतुर्वर्गफलत्वं न विहन्यते । इष्टलद्रव्याद्वाच्च फलस्य यो यस्य पुरुषार्थोऽभीष्ट: स तस्य प्रधानं, श्रपरो इष्टलद्रव्याद्वाच्च गौण: । 'नित्यम्' इत्यनेन श्रावश्यकं वाच: चतुर्वर्गफलं प्रति हेतुत्वमुच्यते । श्रथों-पच्यया जिनानामियं 'जैनी' । जिनोपदिष्टं हि श्रर्थ ऋषयोपग्रह्नन्ति । 'वाच्चम्' इति भारतीम् । 'उपास्महे' तदर्थानुष्ठानेन समीचे वर्तामहे । समीचीनृत्या च तदेकशरण-त्मात्वसातमन: ख्यापयितुम्

[श्रपने प्राचीनराज्य से लेकर ह्रदिवाद पर्यन्त प्रसिद्ध] बारह रूपोंके द्वारा समस्त जगत्की न्यायोचित [धर्मानुकूल] मार्गमें नियोजित किया है ।

'चतुर्वर्ग' इत्यादि [व्याख्येय इलोक का प्रतीक-भाग है । श्रागे उसकी व्याख्या करते हैं] चतुर्वर्गं श्रथार्तात् धर्मं, श्रर्थ, काम श्रौर मोक्ष [रूप चारों पुरुषार्थ प्रकरणानुकूल] श्रौचित्य ग्रनुसार जिसके प्रधान या गौण फल हैं [वह चतुर्वर्गफलता वाची हुई] । समुदायी [श्रथांत् समस्ति श्रोर व्यक्ति] का प्रभेद भी [माना जाता] है इसलिए पुरुषभेदसे [कहीं] एक [कहीं] दो श्रौर [कहीं] तीन पुरुषार्थके फल होनेपर भी चतुर्वर्गफलत्व का खंडन नहीं होता है ।

इसका श्रभिप्राय यह है कि यहां जिन-वाणीका जो 'चतुर्वर्गफलत्व' प्रतिपादन किया है वह सर्वत्र समान रूपसे घटित नहीं होता है । पुरुषभेदसे उसमें भेद पाया जाता है । कहीं धर्मं श्रथवा कामादिमेंसे केवल एक ही फलकी प्राप्ति होती है । कहीं दो फल भी मिल सकते हैं श्रौर कहीं तीन या चार फल भी मिल सकते हैं । इसलिए जिन-वाणी कहीं एकफला, कहीं द्विफला, श्रौर कहीं त्रिफला भी हो सकती है । इसलिए यहां जो 'चतुर्वर्गफलत्व' कहा है सो उचित नहीं है । यह शङ्का हो सकती है । इस शङ्काका समाधान करनेकेलिए ग्रन्थकारने उचित लिया है । इस सिद्धान्तके ग्रनुसार समुदायीर्य श्रथांत् व्यक्तिरूप धर्म, श्रर्थ श्रादि श्रलग-श्रलग व्यक्तियों श्रौर उन चारोंके समुदाय श्रथांत् समष्टिरूपके प्रभेद-सिद्धान्तका श्राश्रय लिया है । इस सिद्धान्तके ग्रनुसार समुदायीर्य श्रथांत् व्यक्तिरूप धर्म, श्रर्थ श्रादि श्रलग-श्रलग व्यक्तियों श्रौर उन चारोंके समुदाय श्रथांत् समष्टिरूपके प्रभेदसे एक, दो या तीन फलोके होनेपर भी चतुर्वर्गफलत्व बन जाता है । उसमें कोई दोष नहीं होता है । यह ग्रन्थकारका श्रभिप्राय है ।

ये चारों फल सर्वत्र समान स्थितिमें भी नहीं होते हैं । कोई प्रधान होता है श्रौर कोई गौण । जो फल जिस समय जिस व्यक्तिको विशेष रूपसे इष्ट होता है वह उस समय प्रधान फल कहलाता है श्रौर शेष फल गौण कहलाते हैं । परन्तु वह फल चाहे प्रधान रूप हो श्रथवा गौण रूप, प्रत्येक दशामें चतुर्वर्गफलके भीतर गिना जाता है । तभी उन चारोंकी फलरूपताका उपपादन हो उक्ता है । ऐसी बातको श्रागे कहते हैं— श्रौर फलके इष्ट होनेसे [श्रथांत् इष्ट श्रर्थकी प्राप्तिके हो फल-पद-वाच्य होनेसे धर्मादि चारों पुरुषार्थोमेंसे जिस समय] जो पुरुषार्थ जिसका इष्ट है वह उसके लिए प्रधान [फल] होता है श्रौर शन्य [पुरुषार्थ] गौण [फल] होते हैं । ['चतुर्वर्गफलके साथ ग्रन्वित होने वाले] 'नित्यम्' इस पदसे वाणीका चतुर्वर्गफलके प्रति श्रावश्यक—श्रनिवार्य—हेतुत्व

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'नित्यम्' इत्यस्यात्रापि सम्बन्धादुपासनस्याविच्छित्तिः स्वापितेति । रूपास्वित्यज्ञान्याचवारादीनि हष्टिवादपर्यन्तानिति । 'द्वादश' प्रसिद्धानि । संख्यानिर्देशन चान्त्रतसंख्याया जिनवाचः प्रस्तुतातुल्यत्वेन व्यवच्छेदः कथ्यते । 'विश्वम्' इति समुदायापेक्षमेकत्वम् । कर्मभूमितत्त्वात् प्राधान्येऽपवचचया मनुष्यलोको वा विश्वम्। 'न्याय्ये' न्यायादनपेते । 'भूतम्' व्यवस्थापितम् । तत्त्व-स्थापनस्य त्रैकाल्येडपि व्रतीतर्निर्देशोऽर्थापेक्षया वाचोडनादित्वस्यापनार्थः । 'पथि' इति पुरुषार्थपयो पात्यादिहिंसा-दानादिकं कर्म संयतते ।

सूचित किया है । 'अर्थात्' जिनवारणी प्रविष्ट हो चतुर्वर्गामृत फलको प्रदान करने वाली होती है। यह जिन-वारणी सर्वत्र साक्षात् शाब्दात्मक ही हो यह ग्राभवश्यक नहीं है [किन्तु] ग्राभप्रयेकासे [रागादिके विजेता ग्रहंत एवं 'जिन' नामसे प्रसिद्ध सन्तों] जिनोंकी यह [वारणी] 'जिनें' वार [कही गई] । 'जिनों' [ ग्रर्थात् रागादि विजेता सन्तों ] के द्वारा बतलाए हुए प्रयथको ही ऋषि लोग ग्रन्थ रूपसे लिखते हैं । [इसलिए ऋषियोंके ग्रन्थोंमें लिखी गई भाषा साक्षात् जिन-वारणी न होते हुए भी 'ग्रथप्रेक्षया' जिनोंकी वारणी 'जिनें वाग्' [कही जा सकती है] । 'वाचाम्' इस पदसे भारती [का ग्रहण होता है] । 'उपासम्ह' इससे उसके ग्रनुसार ग्राह्यचररणा द्वारा उसके समीपमें उपस्थित होते हैं । समीप रहनेके द्वारा ग्रापने एकमात्र उसका शररागदत्वका प्रतिपादन किया है ।

नियमतः इस पदके ग्राभप्राय एक वार तर्हिले 'जत्वर्गफल'के साथ कर चुके हैं । किन्तु दुबारा 'उपासम्ह' के साथ भी ग्रन्थकार उसका ग्रन्थनय करना चाहते हैं । ग्रौर इस प्रकार उपासनाकी नियता या निरंतरता सूचित करना चाहते हैं । इसलिए ग्रागली पंक्तिमें वे ग्रापने इस ग्राभिप्रायको व्यक्त करते हुए लिखते हैं—

'नित्यम्' इस [पद] का यहां [उपासम्ह पदके साथ] भी ग्रन्वय होनेसे उपासनाका श्रविच्छेद [नेरन्त्रय] सूचित किया है । [बारह] रूप ग्रर्थान्त्र ग्राचारादिसे लेकर हष्टिवाद पर्यन्त बारह ग्रागम् प्रसिद्ध हैं । [द्वादश इस] संख्याके निर्देशसे ग्रन्थ-संख्या वाली जिन-वार्णीके प्रस्तुत [ग्रर्थात् द्वादश संख्या वाले रूपकभेदों] के साथ समानता न होनेसे व्यवच्छेद किया गया है ।

इसका यह ग्राभिप्राय हुग्रा कि जिनोंकी वारणी तो ग्रन्थ विषयोंसे सम्बन्ध रखने वाली ग्रनेक प्रकारकी हो सकती है किन्तु यहां उस सबका ग्रहण नहीं किया गया है । द्वादशाग्रवाली जिन-वार्णीको ही प्रस्तुत द्वादश प्रकारके रूपकाकी साथ समानता हो सकती है इसालिए ग्राह्यचाराढसे लेकर हष्टिवाद पर्यन्त द्वादश ग्रागमोंका प्रतिपादन करने वाली जिन-वार्णीको ही यहां नमस्कार किया है ।

उस एकवचनसे समस्त रूपसे सारे चराचर जगत्का ग्रहण करना चाहिए । ग्रर्थवा कर्म-योनि होनेके कारण प्रधानताकी विवक्षासे [केवल] मनुष्यलोक [यहां] 'विश्व' [पदसे ग्राह्यप्रस्तुत हो सकत] है । [सम्पत्यर्थेन न्यायादनपेते ग्रहंतः । इस सूत्रसे न्याय-शब्दसे यत्न-प्रत्यय करके 'न्याय्य' शब्दकी सिद्धि होती है । इसलिए] 'न्याय्य' ग्रर्थात् न्यायसे ग्रनपेत [न्यायानुकूल मार्ग] में 'भूतम्' ग्रर्थात् व्यवस्थित किया । [इस] व्यवस्थापनके त्रैकालिक होने

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२--अ्रथाभिनेयवाक्यपरतया श्लोकोडयं व्याख्यायते। यद्यपि साक्षात् धर्म-व्यर्थ-कामफलान्येव नाटकादीनि तथापि 'रामवद् वतितव्यं न रावणवद्' इति हेतूपादेय-हानोपादानपरतया, धर्मस्य च मोक्षहेतुतया मोक्षोऽपि परम्परया फलम्। 'नित्यम्' इत्यनेन चतुर्वर्गफलान्येव रूपकाणि निवन्धनीयानीति इति व्याख्य्यते। जिनानां रागादिजेतृत्वात् लच्मीशप्रसादनपेक्ष्यैव 'जैनी' न नाम सर्वत्रोपदिष्टं लच्मीत्वं न नवेच्छाद्वेषचिनहश: सन्चेपविधानाभ्यां तत्तु कतुं प्रभवन्ति

पर भी [ग्रर्थात् जिन-वार्तोके द्वारा जगत्को न्याय-मार्गमें व्यवस्थित करनेका कार्यं, भूत भविष्य वर्तमान तीनों कालोंमें ही होता रहता है। फिर भी 'धृतम्' पदमें श्रतीतकालके सूचक क्त-प्रत्ययके द्वारा केवल] श्रतीत-कालका निर्देश वार्तोके श्रनादित्वको सूचित करने के लिए किया गया है। 'पथि' मार्गमें इस [पदसे] [धर्म, श्रर्थ, काम ग्रौर मोक्ष रूप] पुरुषार्थोंकि प्राप्त करनेका उपाय होनेके कारण श्रप्राहिंसा दान ग्रादि कर्मोंका ग्रग्रहण [पथि पदसे] होता है। [ग्रर्थात् जिनोंकी वाणीसे विश्वको श्रप्राहिंसा दान ग्रादि कर्मोंमें लगाया यह 'पथि धृतम्' का श्रर्थ मझल श्लोककी दूसरी व्याख्या यहाँ तक विवेचनकारने मझलश्लोककी सामान्य मझलाचरण-परक व्याख्याको है।

ग्रागे व इसकी दूसरी प्रकारकी व्यास्था करेंगे। इस दूसरी व्याख्याका सम्बन्ध प्रकट नाटकादि रूप विषयके साथ होगा। इसलिए इसमें 'वाचम्' शब्दसे सामान्य वाणी माथकका ग्रग्रहण न होकर केवल नाटकादि रूप वाणीका ही ग्रग्रहण किया जायगा। शेष पदोंके ग्रर्थोंमें तो कोई विशेष ग्रन्तर नहीं किया गया है किन्तु उनकी व्याख्या नाटकादिपरक रूपसे भिन्न प्रकारसे दिखाई है। उसीको श्रागले ग्रनुच्छेदमें लिखते हैं--

ग्रब श्रागे श्रभिनेय-वाक्य [ग्रर्थात् नाटक ग्रादि] परक रूपसे इस श्लोककी [दूसरे प्रकारसे] व्याख्या करते हैं। यद्यपि साक्षात् रूपसे नाटक ग्रादि [वारहों प्रकारके रूपक] धर्म, श्रर्थ ग्रौर काम [इन तीनोंमें ही किसी एक] फलको ही प्रदान करने वाले होते हैं [ग्रर्थात् मोक्ष रूप चतुर्थ फलके साथ नाटकादिका कोई साक्षात् सम्बन्ध नहीं होता है] फिर भी

'रामके समान ग्राचरण करना चाहिए रावणके समान नहीं' इस प्रकारकी हेय [ग्रर्थात् परित्याग करने योग्य श्रधर्माचरण] के [क्रमश:] हान [ग्रर्थात् परित्याग] ग्रौर उपादेय [ग्रर्थात् ग्रहण करने योग्य धर्माचरण] के [क्रमश:] ग्रहण [ग्रर्थात् ग्रहरण] ग्रौर उपादान [ग्रर्थात् ग्रहरण] परक होनेसे [नाटकादि मोक्षके प्रति भी परम्परया कारण हो सकते हैं। इसलिए मोक्षको भी उनका फल कहा जा सकता है। इसका दूसरा कारण भी श्रागली पंक्तिमें देते हैं कि] ग्रौर धर्मके [भी] मोक्षजनक होनेसे परम्परासे मोक्ष भी [नाटकादिका] फल [हो सकता] है। 'नित्यम्' इस [पद] से चतुर्वर्ग रूप फल [के साधक, ग्रथवा चतुर्वर्ग रूप फलको प्रदर्शित करने] वाची ही नाटकादि की रचना [कवियोंको] करनी चाहिए यह बात ['नित्यम्' पदसे] सूचित की गई है। [जैनी

इस पदमें 'जिन' पदसे तस्येदम् ष्ट्राटो। इस सूत्रके द्वारा ग्रव्यय-प्रत्यय करके 'जिनो' पद बनता है। इसलिए उसका श्रर्थ] जिनानां जिनोक्ता जैनी' [जिनोंकी यह वाणी ग्रर्थात् जिन-स्वव्धिनी वागी है। ग्रौर 'जिन' शब्दसे राग ग्रादिके विजेता सन्तोंका ग्रग्रहण होता है इसलिए] 'जिनों' ग्रर्थात् राग ग्रादिको वश में कर लेनेवालोंकी यह [वागी साक्षात् रूपसे जिनप्रोक्त न

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'वाच्यम्' नाटकाद्यां, 'उपास्महे' परिशील्यामः। 'नित्यम्' इति शास्त्रात् सम्बध्यते । सततपरिशीलिताभिनेयवाचो हि कुते न नामौचित्यवादिनो भवेयुः ।

रूपकत्वेन श्याभिनेयान्ते इति रूपाश्रि नाटकादीनि । श्र्याभिनेयानां रूपशब्दप्रतीते: श्यामान्यनिर्देशेऽपि वाच्योऽभिनेयश्च लभ्यते । मूरिश्रेमेदत्वेऽप्यभिनेयवाचो

'द्वादशभिः' इति प्रस्तुतप्रकरणेऽपेक्षम् । 'विश्वम्' इति पूर्ववत्, समवकारादीनां देव-दैत्यचरितयुक्तुपादनकत्वात् । 'पथि' इति यश:सम्पदुपायनवाचं कृत्यं लक्ष्यत ।

नायकप्रतिनायकयोर्हि नयानयफलोपदर्शनैन नाटकादिभिर्द्वन्द्वचेतसां न्यायदनपेते कृत्ये प्रवृत्तिनिवृत्तिव्यवस्थास्थ्यते ।

श्र्यात्रापि व्याख्याने श्रद्धापरत्वेन नमस्कारपतैव श्लोकोऽस्य । व्याख्येयेऽव्याख्यानथोंऽपि कत्वर्थपुनरम्यमेव श्लोकौ विरचयास्याध्यायादौ चित इति ॥ १ ॥

होने पर भी मूल रूपमें] लक्षणोंकी रचनाकी हष्टिसे 'जैनो' [वात्स्प कहो जा सकती] है । [यहाँपर यह शंका हो सकती है कि नाटकादिके लक्षण तो भरतादिके ग्रन्थोंमें सर्वत्र पाए जाते हैं फिर उनको जिन-प्रणीत कैसे कह सकते हैं । इसका उत्तर देनेकी हष्टिसे प्रागली

पंक्तिमें लिखते हैं कि] सर्वत्र उपदिष्ट श्र्यर्थ लक्षण न हो ऐसो बात नहीं है । [क्योंकि मूल रूपसे जिनों द्वारा प्रणीत लक्षणोंको हो] नवीन हष्टिवाले बादके [भरत श्रादि मुनि] संक्षेप

श्रौर विस्तारके द्वारा उनको [फिर] कर सकते हैं 'चतुर्गमे' श्रर्थात् हम परिशीलित [निरुपित] करते हैं । [प्रथम व्यास्यामें भी 'नित्यम्' पदका सम्बन्ध 'चतुर्वर्गफलां' श्रौर

'उपास्महे' दोनों पदोंके साथ किया गया था । इसी प्रकार इस द्वितीय व्याख्यामें भी दोनोंके साथ सम्बन्ध माना है । इसी बात को ग्रन्थमें लिखते हैं कि] 'नित्यम्' यह [पद पहले चतुर्वर्ग-

फलां'के साथ एक बार ग्रन्वित हो चुका है किन्तु दुबारा] यहाँ [उपास्महेके साथ] भी ग्रन्वित होता है । 'उपास्महे'के साथ 'नित्यम्' पदके सम्बन्धसे यह श्रमिप्राय निकलता है कि नाटक

प्रादिका निरन्तर परिशीलन करने से हो नाटकके लक्षणादिका निरूपण ठीक तरहले किया। जा सकता है । श्रनथ्यतः श्राभिनय वाच्य [श्रर्थात् नाटकादि] का निरंतर श्रभ्यास न करने

वाले [नाटकलक्षणकार श्रर्थात् नाट्यशास्त्रके विषयपर ग्रन्थ लिखने वाले विद्वान्] श्रौचित्य को प्रतिपादन करने वाले [ श्रर्थात् नाटकादिमें उचित नियमोंके प्रतिपादक ] कैसे हो

सकते हैं ?

नाटकादिका निरंतर परिशोलन न करनेवाले विद्वान् श्रनुभववहीन होनेके कारण नाटकादिके लक्षण श्रौर श्रौचित्य श्रादिका प्रतिपादन नहीं कर सकते हैं । इसलिए हमने

ग्रन्थके प्रणेता रामचंद्र श्रौर गुणचंद्रने नाटकोंका सतत परिशीलन करके श्रनुभव प्राप्त करनेके बाद ही इस ग्रन्थकी रचनाका साहस किया है यह ग्रन्थकारका निगूढ़

ग्राभिप्राय

ग्रन्थकार ग्रुपक शब्दकी व्युत्पत्ति द्वारा यह दिखलाते हैं कि नाटकोंकेलिए 'रूपक' शब्दका प्रयोग क्यों होता है ।

रूपित श्रर्थात् श्रभिनय द्वारा प्रदर्शित किये जाते हैं, इसलिए नाटकादि 'रूप' [या रूपक] कहुलाते हैं । जिनका श्रभिनय नहीं होता है उनको 'रूप' शब्दसे प्रतीति न होनेके कारण

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का० २, सू० २ ] प्रथमो विवेक: [ १३

अथ लक्षणस्य विषयं प्रतिजानीते—

(सूत्र २)—श्रभिनेयस्य काव्यस्य भूरिशेदभृतः कियत् । क्रियतोडपि प्रसिद्दस्य हष्टं लचम प्रचचमहे ।।

यहाँ लक्षणा सामान्य निर्देश होनेपर भी उससे श्रभिनेय [नाटकादि रूप वाची] का ही ग्रहण होता है । श्रभिनेय [नाटकादि रूप] वाचीके [बारहसे श्राधिक] बहुतसे भेद होनेपर भी 'द्वादशभिः' बारह यह [पद] प्रस्तुत प्रकारके श्रनुसार कहा गया है । 'विधवम्' यह [पद] पूर्व [व्याख्या] के समान [यहाँ इस तृतीय व्याख्यामें भी समुदायकी दृष्टिसे एकवचनमें प्रयुक्त हु्रा] है । [क्योंकि नाटकके भेद रूप] समवकार श्रादिमें देव तथा दैत्च श्रादिके चरित का प्रदर्शन होनेसे [नाट्य समस्त विश्वके ही सम्बन्ध रखता है] । 'पथिः' यह [पद] यथा-सम्पादनके उपाय होनेसे उससम कार्यको बोधित करता है । नायक श्रौर प्रतिनायकके धर्मं श्रौर ग्रथनके फलोकीँ बिखलाकर नाटकादि दृश्यावन्तचिच्त [श्रथश्रयों] के व्यवहारोंकी भी न्याय्य मार्गमें व्यवस्थित करते हैं ।

इस [दूसरी] व्याख्यामें भी श्रद्यापरक होनेसे यह इलोक नमस्कार सूचक ही समकना चाहिए । व्याख्येय [मूल कारिकाभाग] श्रौर व्याख्या [प्रथमतः इस विवरणके दोनोंके कर्ता श्रभिन्न होनेसे इसी इलोकको विवरणके प्रारम्भमें भी दे दिया गया है । [यहाँपर यह मूल ग्रंथकी कारिकाके रूपमें ग्राया है । श्रतः उसकी व्याख्या की गई है । पहली बार विवरणके मझूल-इलोकके रूपमें दिया गया था । श्रतः उसकी व्याख्या वहाँ नहीं की गई थी] ।। १ ।।

प्रतिपाद्य विषय--

प्रथम इलोकमें मङ्गलाचरण करनेके बाद श्रब द्वितीय कारिकामें ग्रन्थकार अपने ग्रन्थके प्रतिपाद्य-विषयका दिग्दर्शन कराते हैं । जैसा कि ग्रन्थके नामसे ही स्पष्ट है । नाट्यसे सम्बन्ध रखने वाले लक्षणों श्रादिका प्रतिपादन ही इस ग्रन्थका मुख्य एवं प्रधान प्रतिपाद्य विषय कहा जा सकता है । इन लक्षण श्रादिका प्रतिपादन भी ग्रन्थकार पूर्वप्रणीत भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' श्रादिके श्राधारपर करेंगे । इसलिए मूल कारिकामें कहा है—'हष्टं लचम प्रचचमहे' श्रर्थात् पूर्व-प्रतिपादित लक्षणोंके श्राधारपर ही हम लक्षण श्रादि लिखेंगे । श्रनंतर इतना है कि भरतमुनिके समान नाट्यके सारे विषयोंका श्रौर सारे भेदोंका प्रतिपादन न करके कुछ चुने भेदों श्रौर विषयोंका ही लक्षण करेंगे श्रौर वह भी बहुत विस्तारके साथ नहीं श्रपितु संक्षेपमें करेंगे । इसी हष्टिसे कारिकामें 'कियतोडपि' श्रौर 'कियत् लचम प्रचचमहे' दो जगह 'कियत्' पदका प्रयोग किया गया है । पहली जगह 'कियतोडपि' का श्रभिप्राय यह है कि सारे नाट्यभेदोंका नहीं श्रपितु केवल कुछ भेदोंका ही लक्षण करेंगे । दूसरी जगह 'कियत्' पदका श्रभिप्राय यह है कि विस्तारपूर्वक लक्षण न करके कुछ थोड़ासा ही संक्षिप्त लक्षण करेंगे । इसी बातको श्रागे लिखते हैं—

श्रब [लक्षण श्रर्थात्] शास्त्रके विषयका प्रतिपादन [की प्रतिज्ञा] करते हैं— [सूत्र २]—बहुत प्रकारके भेदोंसे युक्त श्रभिनेय-काव्य [श्रर्थात् नाट्य] मेंसे कुछ प्रसिद्ध [भेदों] के [भरत नाट्यशास्त्र श्रादिमें विस्तारपूर्वक] पूर्वं-हष्ट कुछ [श्रर्थात् संक्षिप्त] लक्षण हम [अपने इस ग्रन्थमें श्रागे] कह रहे हैं ।।

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‘अभिनेयस्य’ वाचिक-ग्राज्जिक-सात्त्विक-ग्राहायैरभिनयैः । प्रत्यक्षधीभावन-योग्यस्य । सूत्रकाराभिप्रायापेक्षं चैतत्त, तेन रस-भाव-नायक-नायिकादिलक्षणस्य ग्राभिनेयस्य प्रतिप्रवृत्तस्य ज्ञानाभिनेयद्वयापेक्षया न विरोधः । ‘काव्यस्य’ वर्योनातमनः शब्दार्थयोनित्वस्य कवित्वापारस्य । ‘भूरिन्’ रसप्रधानन नाटकादीन, च्यग्रधानरसांक्श दुर्मिलित-श्रृगारदित-भावी-प्रस्थान-रासकार्दीन ‘भेदान’ विवर्ति । ‘कियन्त’ इति ज्ञातान्तरीयकस्य रङ्कुसन्ध्यन्तरालादिलक्षणस्य परिहारेण वचयमार्गप्रवन्धाद्दशक-प्रथननान्तरीयकं कतिपयं लद्यतेति योगः ।

‘कियोटदिप’ लङ्काविधयाभिप्रेतस्य । तेन कोऽहलङ्कार इति लद्यमाने: सातकादयो न लद्यन्ते । लङ्कारीयवाचुल्येऽपि यावत्येक माने लद्यायितुः श्रद्धा तावानेव लद्यते । कियोटदिप च ‘प्रसिद्धस्य’ रसप्रधानस्याद्विलोलोकर्झकतया क्यतास्य नाटकादेः । ‘हृद्ट’ पूर्वमुनिप्रणीतानाटकलक्षणपूर्वार्धपर्यपरामर्शेन उपयुक्ततया निश्चितत्वम् । एवम् च स्वमनःकोपानिरासेन लद्यास्योपादेयत्वमुतमम् । लद्यार्यात् स्वाभिनेयादुच कियोटदिप द्वयवच्छिन्नसदृसीत ‘लद्म’ लद्यतेम । ‘चदच महे’ सारोपादानहानानाभ्यां संक्षेप-विस्तराभ्यां च प्रकारेण त्रूमहि । एवम् चापरप्रणीतलद्यस्यो-त्यक्तर्षया निष्प्रयोजनत्वमपासर्तमिति ।।

‘ग्रभिनेय [काव्य] के’ श्रर्थात् वाचिक, श्राज्जिक, सात्त्विक [श्रर्थात् मानस] श्रौर ग्राहाय [श्रर्थात् वेश-भूषात्मक चार प्रकारके] ग्राभिनयके द्वारा प्रत्यक्ष होने योग्य [नाट्य] श्रग्राहाय [लक्षरा कहेंगे] । यह बात सूत्रकारके श्रभिप्रायकी दृष्टिसे कही ही है । इसलिए रस भाव नायक-नायिका श्रादिके लक्षरा ग्रभिनेय [काव्य] की दृष्टिसे किये गए हैं उनके ग्राभिनेय [श्रर्थात् श्रदृश्य-काव्य] में पाए जाने पर भी विरोध नहीं होता है । ‘काव्यक’ श्रर्थात् वर्योनातमक शब्द श्रौर श्रव्यके ग्रन्थन रुप कविके व्यापारका ‘बहुतसे’ श्रर्थात् रस-प्रधान नाटक ग्रादि, श्रौर गौरा रस वाले दुर्मिलित, श्रृगारदित, भावी, प्रस्थान श्रौौ रासक श्रादि भेदोंको धाररर करने वाले [यह ‘भूरिमेदसुत:’ पदका श्रर्थ हुग्रा] । ‘कियन्’ इससे ग्राभावश्यक रङ्कुसन्ध्यन्तराल श्रादिके लक्षणोंको छोड़कर ग्रागे कहे जाने वाले बारह प्रकारके प्रबन्धोंकी रचनाके लिए श्रावश्यक ‘कुछ’ लक्षणोंको कहेंगे यह सम्बन्ध [या ग्रभिप्राय] है ।

इसका ग्रभिप्राय यह हुग्रा कि भरतमुनि-प्रणीत नाट्यशास्त्र श्रादिमें रङ्कुशालाके निर्माण श्रादिके विषयको बहुत सूक्ष्म विवेचन करते हुए ग्रनयन विस्तरके साथ प्रतिपादन किया गया है । प्रकृत ग्रन्थकारने उस विषयको बिल्कुल छोड़ दिया है । उन्होंने अपने सोचका बहुत विस्तार न करके सीमित क्षेत्रको ही ग्रपनाया विषय बनाया है उसकी दृष्टिसे जितना श्रावश्यक समभा गया है उसीका प्रतिपादन यहाँ किया है । श्रौर वह भी ग्रभि-नेय काव्यके केवल कुछ भेदोंके सम्बन्धमें ही लिखा गया है । बारह प्रकारके ग्रभिनेय-काव्यके भेदोंकी विवेचना ही इस ग्रन्थमें की गई है । वस्तः ग्रन्थकारका क्षेत्र उन भेदोंकी विवेचना तक ही सीमित है । इस बातको श्रागे लिखते हैं—

‘कियोटदिप’ श्रर्थात् ग्रन्थ [लक्षराविधि] में ग्रभिप्रेत कुछ छोड़-से [भेदों] का [ही लक्षणा करेंगे] । इसलिए [नाट्यशास्त्रके भरतमुनिसे भी प्राचीनतर श्राचार्य] कोहल प्रस्तुत सातक [सटूक] श्रादिका लक्षणा यहाँ नहीं किया गया है । लक्षणीय [श्रर्थात् ग्रभिनेय-

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का० ३-४, सू० ३ ] प्रथमो विवेक: [ १५

अथ व्यक्तिभेदानुदरे, नियतं न शक्यते लब्धुमार्ग्यातुमिति तानुदिशति—

[सूत्र ३]—नाटकं प्रकरणं च नाटिका प्रकरणीथ । व्यायोग: समवकारो भाषा: प्रहसनं डिम: ॥३॥

काव्यां] को बाहुल्य [बहुतायत] होनेपर भी जितने भागोंमें ['लक्षणित:' लक्षणा करने वाले शप्रथात्] ग्रन्थकारकी श्रद्धा [इच्छा] है उतने ही भागके [श्रप्रथात् केवल बारह भेदोंके] ही लक्षण करते हैं । शौर 'कियतोडपि च प्रसिद्धस्य' कुछ प्रसिद्ध [श्रभिनेय-काव्यों] का श्रथार्त् रसकी प्रधानता होनेके कारण समस्त जगत्के प्राह्लादके कारण रूपसे प्रसिद्ध नाटक श्रादिका [ही लक्षण करेंगे] । 'ह्र्द्र' श्रर्थात् [भरत श्रादि] पूर्वसुनियोंके द्वारा रचे गए नाट्य लक्षणोंके तारतम्य [पौर्वापर्य] का विचार करके उपयुक्ततया निश्चय किए हुए [लक्षणाको कहेंगे] । इस प्रकार 'ह्र्द्र' पदके प्रयोग द्वारा पूर्वाचार्योंके लक्षणोंके उपादेयता—तारतम्यकी विवेचना करके लक्षण कहेंगे इस बातको सूचित करनेसे] श्रपनी कल्पनामात्रके निरास द्वारा लक्षणोंकी उपादेयताका प्रतिपादन किया है । [श्रप्रगे 'लक्षणां' शबदका श्रप्रथ करते हैं] जो श्रभिनेय शौर कुछ श्रभिनेयोंसे भी पृथक् करता है वह लक्षण है ['समानासामानजातीयव्यवच्छेदो हि लक्षणार्थ:' इसके श्रनुसार समानजातीय श्रन्य श्रभिनेय काव्योंसे शौर प्रसामानजातीय श्रन्य श्रभिनेय काव्योंसे भिन्न करने वाले ही नाटक श्रादिके लक्षण होते हैं । यह बात इस पंक्तिसे सूचित की है ।] 'प्रकृष्टरूपसे कह रहे हैं' श्रप्रथात् [पूर्वाचार्योंके लक्षणोंमेंसे] सार भागको ग्रहण करके शौर श्रसार भागको त्याग कर शौर संक्षेप तथा विस्तारके द्वारा [श्रप्रथात् जहाँ पूर्वाचार्योंने बहुत संक्षेप कर दिया है वहाँ कुछ विस्तार करके शौर जहाँ उन्होंने श्रधिक विस्तार किया है वहाँ संक्षेप करके] प्रकृष्टरूपसे कह रहे हैं । इस प्रकार ग्रन्थोंके रचे लक्षणोंसे उत्कर्ष दिखलाकर [श्रपनी रचनाके] निष्प्रयोजनताका निराकरण कर दिया है [श्रप्रथात् उपयोगिता प्रदर्शित करदी है] ।

रूपकोंके भेद—

जैसाकि श्रग्रन्थकार प्रथम मुग्ध-श्रिलोकोमें संकेतिक कर चुके हैं इस ग्रन्थमें चारह रुपक-भेदोंका निरुपण किया जायगा । इसलिए श्रग्रली दो कारिकात्रोंमें ग्रन्थकार उन बारह भेदोंके नाम गिनाते हैं । इस नाम गिनानेको शास्त्रीय परिभाषामें 'उद्देश' शबदसे कहा जाता है । 'उद्देश' शबदका श्रर्थ 'नाममात्रेण वस्तुसद्भावमात्रं उद्देश:' श्रर्थात् नाममात्रसे वस्तुका कथन करना 'उद्देश' कहलाता है यह किया गया है । प्राय: शास्त्रोंमें उद्देश्य लक्षण शौर परीक्षा इन तीन प्रकारके उपायोंके द्वारा श्रपने विषयका प्रतिपादन किया जाता है । उस पद्धतिको ही श्रवलम्बन करके ग्रन्थकार यहाँ रुपक-भेदोंका नाममात्रसे कथन या 'उद्देश' इन दो कारिकात्रोंमें कर रहे हैं । फिर श्रग्रगे उनके लक्षण श्रादि करेंगे ।

[सूत्र ३]—१. नाटक शौर २. प्रकरण, तथा ३. नाटिका, ४. प्रकरणी एवं ५. व्यायोग, ६. समवकार, ७. भाषा, ८. प्रहसन, ९. डिम । १०. उत्सृष्टिकाङ्क, ११. ईहामृग, १२. वीथी [ये बारह रुपकके भेद होते हैं । उनमेंसे नाटक प्रकरण नाटिका शौर प्रकरणी ये] चार [भेद कैशिकी, सात्वती श्रारभटी तथा भारती रुप] सब वृत्तियोंसे युक्त होते हैं शौर बादके श्राठ [रुपक भेद] कैशिकीवृत्तिसे रहित

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ग्राहृ ईहामृगो वीथी चत्वारः सर्ववृत्त्यः । त्रिवृत्तयः परे त्वृत्तौ कैशिकीपरिवर्जनात् ॥४१॥

'चत्वार:' सर्वपुरुषार्थफलत्वेन महापुरुषोपदेशाहर्चारितत्वेन च प्रवन्धेपू नाटकप्रकरङ्गयोः प्राधान्यमाह । 'चत्वारः' इति उत्तमप्रकृतयः, न पुनरन्यद्रव्यमार्गाद्दूपः । ऋकृतां मध्ये नृत्तोपयोगात् 'उत्सृष्टिकाङ्क:' न पुरुषार्थोपदेशमार्गाद्दूपः । ऋकृवतां मध्ये पाटानं, छन्दोनुरोधाच्च एकदेशोनाभिनयम् ।

'चत्वार:' इति प्रकारसंख्या व्यक्तिभेदाः 'सर्व' गुण-प्रधानभावेन चतस्रोऽपि वृत्तयो भारती-सात्वती-भारभटी-कैशिक्यो वृत्त्यमालचय्या यत्र । 'त्रिक:' भारती-सात्वती-भारभटी वृत्तयः समस्ता वा वृत्तयो येषु नात्र च येषु व्यायोग-समवकार-ईहामृग-डिमेर्षु एकस्या वृत्तेः प्राधान्यनिर्देशमेपू व्यक्तिभेदेन पृथक्-पृथगेकस्य वृत्तेः कविवेच्छया प्राधान्यं निवन्ध्यते । येषु तु भेदेपू भाषा-प्रहसनो-त्सृष्टि-कावृत्तयः यस्याः वृत्तेः प्राधान्यनिर्देशस्तस्याः एव प्राधान्यमुपरयः-कार-वाथु यस्याः वृत्तेः प्राधान्यनिर्देशस्तत्प्रतिपाद्यक्त तस्या एव प्राधान्यमुपरयोगौतवमलप्रवाद्भावो वा । 'कैशिक्या:' परि सामस्त्येन 'वर्जनं' त्यभावः । यथापि समवकारेषु जात्याद्रवमस्ति तथापि न तत्र कैशिकी । न खलु काममात्रे शृङ्गारः, किन्तु विलासोत्सवः न चासौ रौद्रशृङ्गारौ नेतुं शक्यः । शृङ्गारशब्दश्च तत्र काममात्रपय्यवसायीति ।

होनेके कारण [केवल सात्वती, श्रारभटी तथा भारती इन] तीन प्रकारकी वृत्तियोंसे युक्त होते हैं । श-४

[चारिकाओंमें 'प्रकरसां' के बाद श्राया हुया] चकार, समस्त [श्रर्थात् चारों प्रकारके] पुरुषार्थोंकि प्रदान करने वाले होनेसे तथा महापुरुषोंके उपदेश-योग्य चरित्रसे युक्त होनेके कारण [बारहों प्रकारके इन] प्रबन्धों [प्रभिनेय-काव्यों] में नाटक तथा प्रकरणकी प्रधानताको सूचित करता है । 'प्रकारसं' के बाद प्रयुक्त हुया 'चतुष्टय:' [श्राठ-शब्द १. सम्पूर्णं [श्रर्थात् श्राठके श्राये जाने वाली पाँच प्रकृति] सन्धियोंसे युक्त होनेके कारण, २. वृत्तक्रम्भक तथा प्रवेशक [इनके लक्षण श्रागे किए जावेंगे] के श्रयोग्य होनेसे, श्रौर ३. उपदेश प्रदान करनेमें श्रग्रसरथ चरित्रोंसे पूर्ण होनेके कारण [व्यायोगसे लेकर वीथी पर्यन्त] श्रागले श्राठ [भेदों] का नाटकादि [प्रथम चार श्रेणों] से भेद सूचित करता है । [कारिकामें श्राए हुए] 'ग्राहृ' शब्दसे 'उत्सृष्टिकाङ्क:' का [प्रहण करना चाहिए] श्रवस्थासमाप्ति श्राप्ति रूप ग्राद्दोंका नहीं । ग्राहृ युक्त [नाटकादि] के मध्यमें पठित होनेसे छन्दोवके प्रातुरोधसे [उत्सृष्टिकाङ्क: पूरा शब्द न कहकर] एकदेश [ग्रादृ-पद] के कथन किया गया है ।

[चार] श्रर्थात् [नाटकसे लेकर] 'प्रकरसां' पर्यन्त [रूपकोंके] व्यवित-भेद । [सर्व-वृत्तयः] सब वृत्तियोंसे युक्त होते हैं । इसका श्रर्थ करते हैं] सब श्रर्थात् गुणभाव या प्रधान-भावसे भारती, सात्वती श्रारभटी तथा कैंशिकी चारों वृत्तियाँ जिसमें रहती हैं । [ये नाट-कादि चार भेद सब वृत्तियोंसे युक्त होते हैं । श्रागे 'त्रिवृतय:' का श्रर्थ करते हैं] तीन श्रर्थात् भारती, सात्वती तथा श्रारभटी [नामक तीन] वृत्तियाँ श्रलग-श्रलग [व्यात्त] श्रथवा सम्-

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काङ्‌ २, सू० ४ ] प्रथमो विवेक: [ १७

अथ यथोद्देशं लक्षणामाह—

[सूत्र ४]—रह्यताद्‌गराजचरितं धर्मकामार्थसत्फलम्‌ । साझोपाय-दशा-सन्धि-द्‌वग्यैः तत्र नाटकम्‌ ॥४॥

लित रूपसे [समस्ता] जिनमें रहती हैं [वे वृत्तियोंसे लेकर वीथी पर्यन्त श्राठ रूपकमेद 'त्रिभु- ति' के तीन वृत्तियों वाले होते हैं] इनमें जिन वृत्तियों, समवकार इहामृग श्रौर डिममें उनके लक्षणोंमें एक-एक वृत्तिके प्राधान्यका निर्देश [किया हुग्रा] है उनमें व्यक्ति-भेदसे कवि श्रपनी स्वेच्छासे एक-एक वृत्तिको प्रधान रूपसे निवद्ध करता है । श्रौर जिन भेदोंमें श्रर्थात् भावे प्रहसन, उत्सृष्टिकाद्‌क श्रौर वीथीमें जिस [विशेष] वृत्तिका [नाम लेकर] प्राधान्यका निर्देश किया गया है उनमें [कवि श्रपनी स्वेच्छासे नहीं श्रपितु उसी निर्देशके श्रनुसार] उसी वृत्तिको प्रधान रूपसे श्रौर श्रन्य दोनों [वृत्तियों] की गौएा रूपसे श्रथवा श्रलपताके कारएा सर्वथा प्रभावको [उपनिबद्ध करता है । श्रागे 'कैशिकी-परिवर्जनात्‌' का श्रर्थ करते हैं—] कैशिकी [वृत्ति] का 'परि' श्रर्थात्‌ सम्पूर्त्तितया वर्जन श्रर्थात्‌ श्रभाव [होनेसे वृत्तियोंसे लेकर वीथी पर्यन्त श्राठ भेद केवल तीन वृत्तियों वाले होते हैं] । यद्यपि समवकारमें 'शृङ्‌गारस्तव' [शृङ्‌गार- का भाव काम प्रदर्शित] होता है किन्तु फिर भी [शृङ्‌गारमें होनेवाली] कैशिकी-वृत्ति वहाँ नहीं रहती क्योंकि केवल सामान्य कामकी ही नाम शृङ्‌गार नहीं है [किन्तु [उसके] विलास का उत्कर्ष [उदात्तीकरणएा शृङ्‌गार शब्दसे कहा जाता है । समवकारमें सामान्य लौकिक काम- व्यापारमात्रका प्रदर्शान होता है उसके विलासोत्कर्ष या उदात्तीकरणाका नहीं] । क्योंकि [वह] समवकारमें प्रस्तुत किए जाने वाले [रौद्र-प्रकृतिके] पात्रोंमें नहीं हो सकता है । इसलिए समवकारमें यथार्थ शृङ्‌गारका प्रदर्शान सम्भव नहीं है] । श्रौर उसमें प्रयुक्त शृङ्‌गार शब्द केवल [सामान्य] काम मात्रका बोधक है ।

इसका यह श्रभिप्राय है कि तीन वृत्तियों वाले श्राठ रूपक-भेदोंमें समवकारमें यद्यपि कामकी प्रतृतियोंका दर्शन होता है किन्तु उसका उदात्त रूप होनेसे शृङ्‌गार शब्दसे नहीं कहा जा सकता है । इसलिए उसमें कैशिकी वृत्तिका उपयोग नहीं होता है । श्रत एवं व्य- योग श्रादि श्रन्य सात भेदोंके साथ, काम-युक्त होनेपर भी समवकारको कैशिकी-वृत्ति हीन केवल तीन वृत्तियां वाले वर्गम रखा गया है ॥४॥

नाटक लक्‍ष्यते—

पिछली कारिकाग्रोंमें ग्रन्थकारने रूपकके बारह प्रधान भेदोंका 'उद्देश' श्रर्थात्‌ 'नाम- मात्रका वस्तुस्‌दर्शन' किया है । 'त्रिधा च शास्त्रस्य प्रवृत्ति:' उद्देशो लक्षणं परীক্ষा च' इस सिद्धान्तके श्रनुसार 'उद्देश' के बाद लक्षणका श्रवसर श्राता है । श्रत एवं ग्रन्थकार उद्देशके क्रमसे ही लक्षणोंका निरूपएा श्रारम्भ करते हैं । उद्देशक्रममें सबसे पहले नाटकका नाम ग्राया है इसलिए सबसे पहले नाटकका ही लक्षण करते हैं ।

ग्रब उद्देश क्रमके श्रनुसार [नाटकके] लक्षणको कहते हैं—

[सूत्र ४] उन [रूपक-भेदों] मेंसे धर्म, श्रर्थ श्रौर काम [रूप त्रिविध] फलोंवाला, श्रृङ्‌ग, उपाय, दशा, सन्धिसे युक्त, देवता श्रादि जिसमें [प्रधान नायकके श्रृङ्‌ग श्रर्थात्‌ सहा- येक हों], इस प्रकारका बृत्तान्तक प्रसिद्ध राजाओंका, नृत [प्रदर्शित करनेवाला प्रभि- नेय काव्य] नाटक [नामसे कहा जाता] है ॥

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ख्यातात्यराजस्य चरितं यत्रेत्रन्यपदपदार्थ: इहु ख्यातत्वं त्रिधा, नाम्ना, चेष्टे- तेन, देशेन च। कौशाम्ब्यां चरितं वत्सराजेनैव रड्जकम्। चरित्रमपि वत्सराजस्य। कौशाम्ब्यां वासवदत्तालाभादिकसेव। वासवदत्तालाभादिकं वत्सराजस्य कौशाम्ब्यामेव।

चरितरख्यातत्वं च प्रधानचरितापेक्षया। ततस्तदनुयायीनि रड्जकत्वार्थमख्यातात्यरपि चरितानि क्रियन्ते। तेन बहुपु रामप्रबन्धेषु सीताहरणानयनोपायानां युद्धानां गौणैः पात्रैः क्रियमाणविशेषाणां श्रेडनपि न विरोधः।

पूर्वकालके प्रसिद्ध राजाका चरित्र जिसमें [प्रकट किया गया] हो वह ['ख्याताख- राजचरित' प्रसिद्धेय काव्य हुग्रा], यह 'ख्यात-पदार्थप्रधान [बहुव्रीहिसमास 'ख्याताख्यराजचरित' इस पदमें किया गया]। इसमें प्रसिद्धत्व तीन प्रकारसे होता है, १ नामसे [प्रसिद्धत्व], २ कायोंसे [वृत्तितेन प्रसिद्धत्व] श्रोर देशसे [प्रसिद्धत्व]। श्रगे इन तीनों प्रकारके प्रसिद्धत्वको उदाहरणों द्वारा स्पष्ट रपसे दिखलाते हैं। जैसे नामकी प्रसिद्धिका उदाहरणा यह है कि कौशाम्बीमें चरित [प्रथात् चेष्टाएँ श्रभिनय] वत्सराज [के नाम] से ही हृदयकव्यक होता है।

ग्रथात् इस रूपमें वत्सराज नामसे नायक उदयनका ख्यातत्व बनता है। दूसरा चरितसे प्रसिद्धिका उदाहरणा दिखलाते हैं] श्रोर वत्सराज [उदयन] का कौशाम्बीमें वासवदत्ताप्राप्ति रूप चरित ही [हृदयाकर्षक होता है]। यह चरित कायों द्वारा प्रसिद्धिका उदाहरणा हुग्रा। इसका तीसरे प्रकारसे बदल देनपर वत्सराज [उदयन] को वासवदत्ता-लाभादिक [चरित] कौशाम्बीमें ही [हृदयाकर्षक होता है यह देशसे प्रसिद्धिका उदाहरणा हुग्रा।

ग्रर्थात् एक वत्सराजके चरित्रमें ही तीनों प्रकारकी प्रसिद्धि जाई जाती है]। यह चरित्रकी ख्याति प्रधान नायककी दृष्टिसे ही [ली जाती] है। इसलिए शोमाधान केलए उस [प्रधान-नायक] के श्रनुयायी [ग्रभ्रप्रसिद्ध चरित्र भी [नाटकमे उपनिबद्ध] किए जाते हैं। इसलिए बहुतसे राम-काव्योंमें सीताके हरण तथा पुनः प्राप्तिके युदोंमें गौण पात्र [भी पाए जाते हैं]।

श्रोर ग्रन्थ [ग्रन्थप्रधान पात्रों] को उत्तियोंमें [भिन्न-भिन्न नाटकोंमें] विरोध होनेपर भी दोष नहीं होता। वहाँ ग्रन्थाकारेर्न नाम्ना, चेष्टितेन देशेन च’ तीनों प्रकारकी प्रसिद्धि एक वत्सराज उदयनके चरित्रमें ही दिखलाई श्रोर उसकेलिए तीन भिन्न-भिन्न स्थानोंपर 'एकवार' का प्रयोग किया है। 'कौशाम्ब्यां चरितं वत्सराजेनैव रड्जकम्'। इस वाक्यमें 'एक वार' द्वारा वत्सराज नामपर बल दिया गया है।

ग्रर्थात् कौशाम्बीमें वहाँके पूर्ववर्ती राजा वत्स- राज उदयनका नाम प्रसिद्ध है इसलिए वहाँ उनका चरित्र ही लोगोंको प्रिय लगता है। यह 'वत्सराजेनैव' में वत्सराजके साथ प्रयुक्त 'एकवार' का ग्रभिप्राय है। दूसरी जगह 'चरित- मपि वत्सराजस्य कौशाम्ब्यां वासवदत्तालाभादिकमेव' में प्रयुक्त 'एकवार' वासवदत्ता-प्राप्ति रूप चरितके ऊपर ही बल देता है।

ग्रर्थात् वत्सराज उदयनके ग्रन्य चरित्र इतने हृदयाकर्षक नहीं हैं जितना कि वासवदत्ता-प्राप्तिका वृत्तान्त। यह 'चेष्टितेन' प्रसिद्धिका उदाहरणा हुग्रा। तीसरी जगह 'वासवदत्ता लाभादिकं वत्सराजस्य कौशाम्ब्यामेव' यहाँ 'कौशाम्बी' के साथ प्रयुक्त 'एकवार' कौशाम्बी रूप देशपर विशेष बल देता है।

ग्रर्थात् वत्सराज उदयनका वासवदत्ता-लाभरूप चरित भी केवल कौशाम्बीमें ही विशेष रूपसे लोकप्रिय है ग्रन्थत्र नहीं।

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ग्राद्येति पूर्वः, तेन वर्तमानभविष्यतोर्निरासः कविना हि रंजनार्थं किंचित् सद्भ्युपेयते, किंचिदसद्भ्याप्रियते। वर्तमान च नेतरी तत्कालप्रसिद्धिवाधया रसहानिः स्यात्। पूर्वमहापुरुषचरितेपु च श्राद्धानं स्यात्। भविष्य्यतरतु वृत्तं चरितमपि न भवति । चर्यते स्म चरितमित्यतीनिदेशात्

यह 'देशन' प्रसिद्धिका उदाहरणा है। इस प्रकार एक वत्सराज उदयनके चारित्रम हो तो तौनो प्रकारकी प्रसिद्धिके उदाहरणा ग्रन्थकारने दिखला दिए हैं

वतैमान चरित्रोंके ग्रभिनयका निपेध—

नाटकोंमें केवल पूर्वकालके प्रसिद्ध राजाग्रोंको ही नायक रूपमें प्रस्तुत किया जा सकता है वर्तमान या भविष्यत्के राजाश्रोंके चरित-नायकके रूपमें प्रस्तुत नहीं करना चाहिए इस बातको यहीं ग्रन्थकारने 'ग्राद्य-राज' पदसे सूचित किया है। इस बातको विवरराकार ग्रागली पंक्तियोंमें दिखलाते हैं—

'ग्राद्य' इस [पद] से पूर्व [कालके राजाग्रोंका ही ग्रहरण होता है], इसलिए वर्तमान श्रौर भविष्यत् [कालके राजाग्रोंके चरित्रका वर्णन] का निषेध हो जाता है। [इसकेलिए ग्रापे हो युक्तियाँ देते हैं। उनमेंसे पहली युक्ति यह है कि नाटकोंमें] ग्रभावनाके लिए कवि कभी-कभी कुछ ग्रविद्यमान [ग्रर्थात् वास्तविक] बातको भी छोड़ देता है ग्रौर कुछ ग्रविद्यमान [ग्रर्थात् स्वयं कल्पित ग्रथ्य] को भी ग्रहण कर लेता है। [यदि नाटकोंमें वर्तमान-कालके व्यक्तिको भी नायक बना दिया जाय तो ऐसे स्थलोंमें] वर्तमानको नेता बनानेपर तो तत्कालीन प्रसिद्धिके बाधित होनेसे रसकी हानि होगी। ग्रौर पूर्वकालके महापुरुषोंके चरितकी उपेक्षा [ग्रश्रद्धान्] भी होगी। [इसलिए वर्तमान कालके चरित्रको नाटकमे नायक नहीं बनाना चाहिए] श्रौर भविष्यत् कालका [कल्पित कथानक] तो 'चरित' भी नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि जिसका [प्रतीतकालमें] ग्राचररगा किया जाता था वह 'चरित' [कहलाता] है यह [बात 'चरित' पदमें ग्राए हुए कत-प्रत्ययसे सूचित होती है। इसलिए कत-प्रत्ययके द्वारा] प्रतीतकालका निर्देश होनेसे [भविष्यत्कालके कथानकको चरित भी नहीं कहा जा सकता है]।

ग्रभिनव-भारतीकार ग्रभिनवगुप्तने भी प्रथमाध्यायमें [पृ० १४५ पर] इस विषय की विवेचना विस्तारके साथ की है। भरत-नाट्यशास्त्रके प्रथमाध्याय में 'तदन्तेजानुकृतिबंधा यथा दैत्या: सुरैर जिताः'। यह [श्लोक ५७] ग्राया है। इसमें इन्द्रकी सभामें देवताओं द्वारा दैत्योंपर विजय प्राप्त करनेके कथानकके ग्रभिनय किए जानेकी बात लिखी है । इस ग्राधारपर किन्हीं पूर्ववर्ती टीकाकारोंने यह परिणाम निकाला है कि ग्रन्थे स्वामी राजा ग्रादिको प्रसन्न करने के लिए कभी-कभी उनके चरित्रका भी ग्रभिनय उनको दिखलाना चाहिए। परन्तु ग्रभिनवगुप्त इस बातको स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए उन्होंने प्रथमा-ध्यायकी इस ५७ वीं कारिकाकी व्याख्याके प्रसंगमें इस प्रश्नको उठाकर उसका खण्डन निम्न प्रकारसे किया है—

"प्रसुपरितोषाय प्रचरितं कदाचिच्चिन्तयिष्यते 'यथा दैत्या: सुरैर जिताः' सुरैर्जिता:' इत्येतस्माल्लभ्यत इति केचिदाहुः । तदसत् । दशरूपक-लक्ष्याग्रा युक्तिविरोधात् । तत्र हि किंचित् प्रसिद्ध-चरितं, किंचिदुपपाद्य चरितमिति वद्यते" ।

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राजेतु क्षत्रियमाात्रं, न पुनरभिषिक्त एव । राम-जीमूतवाहन-पार्थादीनाामन-मिथ्याक्तानामपि दर्शनानात्। क्षत्रियो मत्र्य एव, तेन न देवनेलुकं नाटकमित्युक्तं भवति । नाटकं हि रामवद्र्तिनतलर्य्य न रावणवत् इत्युपदेशपरम् । देवतानां तु धुरुपपादस्या-प्यर्थस्येच्छामात्रत एव सिद्धिरिति तत्रचरितमशक्यानुष्ठानत्वान्न मत्र्यानामुपदेश-योग्यम् । तेन ये दिव्यमपि नेतारं मन्यन्ते न ते सम्यग्मंसतेति ।

"इत्यादि वर्तमानचारितानुसारो मुखो, विनेयानां तुच राग-द्वेषमध्यस्थता-दर्शना तन्मयत्वभावेन प्रीतिरभावेन च युक्तस्तत्र्यभावान्। वर्तमानचरिते च धर्मोदि कर्मे-कलसामन्वयस्य प्रत्यक्त्वे प्रयogवैचित्र्येण । श्रद्धात्यक्तत्वे 'भविष्यति प्रमाणाभावान्', इति न्यायेन युक्तस्तत्र्यभावान्तिकम् एतच्च दशरूपकाद्याय वितनिष्याम इत्यास्तां तावत्"

इसका श्राभिप्राय यह है कि प्रभु-राजादिके प्रसन्न करनेके लिए कभी-कभी उसके चरित्रका भी श्राभिनय उनको दिखलाना चाहिए । ऐसा जो लोग मानते हैं उनका कथन उचित नहीं है । क्योंकि दशरूपकोंके लक्षणोंमें कुछ नाटकादि प्रसिद्ध-चरित वाले माने गए हैं श्रौर समवकार श्रादि कुछ भेद उपाय-चरित श्रथवा कलिप्त चरितके श्राधारपर निर्मित माने गए हैं । वर्तमान राजादिका चरित इन दोनोंमेंसे किसी श्रेणीमें नहीं श्राता है । श्रतः उसका श्राभिनय उचित नहीं है । इस सम्बन्धमें दूसरी युक्ति यह है कि वर्तमान चरित्रोंमें देखने वालों का राग-द्वेष प्रधान होनेसे उनकी मनोरंजन होगी श्रौर न उनको कोई शिक्षा ही मिलेगी । श्रभिनय नाटकके दोनों ही प्रयोजन व्यर्थ हो जावेंगे । श्रतः वर्तमान चरितका श्राभिनय नहीं करना चाहिए । इसी विषयमें श्राभिनवगुप्तने तीसरी युक्ति यह दी है कि वर्तमान चरितमें यदि धर्ममिदका फल तुरन्त प्रत्यक्ष हो जाता है तो नाटकके प्रयोगका कोई लाभ सामाजिकको नहीं मिलता है श्रौर यदि धर्ममिदका फल प्रत्यक्ष नहीं होता है तो उससे कोई शिक्षा नहीं मिल सकती है । श्रतः वर्तमान चरितके श्राभिनय उचित नहीं है ।

यह प्रकृत ग्रन्थमें रामचन्द्र-गुणचन्द्रने भी वर्तमान चरितके श्राभिनयको ग्रनुपयुक्त ठ-राया है । उनकी युक्तियाँ श्राभिनवगुप्तकी युक्तियोंसे भिन्न हैं । इन दोनोंकी युक्तियोंको मिलाकर इस विषयका एक सर्वाङ्ग सुन्दर विवेचन उपस्थित हो जाता है । इसलिए हमने श्राभिनवगुप्तके मतका यहां उल्लेख कर दिया है ।

नाटकमें देवताओंके नायकत्वका खण्डन-- ग्रौर 'राज' पदसे क्षत्रियमाात्रका ग्रहण करना चाहिए केवल श्राभिजात्यका ही [ग्रहण] नहीं [करना चाहिए] । क्योंकि राम, जीमूतवाहन श्रादि युधिष्ठिर श्रादि ग्रन्थोंमें विवक्षित भी [नायक रूपमें] पाए जाते हैं । क्षत्रियसे मानव [रूप क्षत्रिय] का ही ग्रहण करना चाहिए

इसका यह श्राभिप्राय होता है कि नाटकमें देवताओंको नायक नहीं बनाया जा सकता है । क्योंकि 'रामके समान श्राचारण करना चाहिए रावणके समान नहीं', इस उपदेशको देनेवाला नाटक होता है । श्रौर देवताओंकेलिए तो प्रत्यन्त कठिन कार्यकी सिद्धि भी उनकी इच्छा मात्रसे ही हो जाती है इसलिए उनके चरितके श्रनुसार श्राचारण सम्भव न होनेसे वह मनुष्योंके लिए उपदेशप्र नहीं हो सकता [इसलिए देवताको नायक बनाना व्यर्थ श्रौर श्रनुचित है] इसलिए जो देवताओंको भी [नाटकोंको] नायक मानते हैं उनका मत ठीक नहीं है ।

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नायिका तु दिव्यापि भवति यथोर्वशी। प्रधाने मत्यैचारिते तच्चरितान्तर्भावात्। उपदेशानहेतुप्रायवृत्तत्वेन दृष्टान्तसत्वेनैव च समवकारादौ दिव्योऽपि नेता न विरुध्यते। चरित्रमित्याचरित न तु कविवुद्ध्रुयादिकल्पितम्। बाहुल्यापेक्षं चैतत्, तेनाल्पं किंचिद्रुजरकं कल्पितमपि न दोषायेत।

धर्मे-कामे-च्रर्थे व्यवस्त-समस्ता: सत्तु प्रधानं फलं यत्र। मोक्षास्तु धर्मकार्ये्वात् गौणं फलम्। सन्तोडचिरभावित्वाद् वर्तमानत्वा चा धर्मे-च्रर्थे-कामाः फलम्। तेन श्राविकामार्थफलत्ववादागमा न नाटकम्

तत्र धर्मफलं नाटके दया-दम-दान-न्यायप्रायं ह्रष्टफलं श्रामुष्मिकफलं च राज्यादिव्यापद्या नेतुश्चरितं ठुपस्थाप्यते। न पुनः सर्वसङ्कपरित्यागं कृत्वा पतमा-चरितमित्यमुषिमकफलमेव। साचाद् ह्रष्टफलार्थी हि लोकः।

नायिका दिव्य भी हो सकती है- नायिका तो दिव्य भी हो सकती है जैसे उर्वशी। क्योंकि प्रधान मानव [रूप नायक] के चरित्रमें उस [दिव्य नायिका] के चरित्रका ग्रान्तर्भाव हो जाता है। उपदेश प्रदान करनेंकी

क्षमातसै रहित प्रोद् दोप्त रस वाला होनेसै समवकार ग्रादिमेंतो दिव्य [ग्रश्रान्तं देवताम्रोंको] नेता माननेपर भी कोई विरोध नहिं होता है। 'चरित्रमें' इस पदसै [पहले] श्राचरण किया हुग्रा [यह श्रर्थ ग्रहीत होता है]। कविकी बुद्धिसे कल्पित [चरित्रका] का [ग्रहण] नहीं होता है। प्रोद् यह बाहुल्यकी हृष्टिसे [कहा गया है] इसलिये थोड़ा-सा कूद सोन्दर्याधायक [वृत]

कलिप्त होनेपरभी दोषाधायक नहिं होता है। [ग्रागे 'धर्मकामार्थसत्फलम्' इस कारिकाभागकी व्याख्या करते हैं—] श्लोक-ग्रन्थ [व्यस्त] या समस्त [समस्ति] रूपमें धर्म, काम श्रोर श्रर्थ जिसके सत्तु श्रर्थात् प्रधान फल हैं

[वह 'धर्मकामार्थसत्फल' हुग्रा]। मोक्ष तो धर्मका कार्य [धर्म-जन्य] होनेसै गौण फल होता है [इसलिए यहाँ उसकी गराना नहिं कराई है]। प्रयथा ग्रत्यान्तं शोिच्रं प्राप्त होने वाले होनेसैवि धर्म्मदि को भी सत्तु कहा जा सकता है इसलिये सत्तु श्रर्थात् वत्तमान

सामिप्ये वर्तमानवद्धा] धर्म काम प्रोद् श्रर्थ जिसके फल है [यह 'धर्म-कामार्थसत्फल' की दूूसरी व्याख्या हु्रई]। इस नाट्यशास्त्रके श्रनुसार [पूर्वरत्नादिजन्मान्तरमें प्राप्त होने वाले] भावी फल [का

प्रतिपादन करनें] वाले 'ग्रागम', नाटक [श्रेंमें] नहीं [माने जाते] हैं। उन [धर्म, काम ग्रोर श्रर्थ फल वाले नाटकों जैसे] से धर्म-फल वाले नाटकोंमें दया, दम, दान ग्रोर न्याय ग्रादि ह्रष्ट फल तथा राज्य ग्रादिकी ग्राभासे पारलौकिक फल वाले

नेताके चरित्रका प्रदर्शंन कराया जाता है। समस्त सम्बन्धोंको परिस्याग करके [नायकने] वतका ग्रनुष्ठान किया इस रूपमें श्रामुष्मिक फल वाले [नायकके चरित्र] का [प्रदर्शन] नहिं

वतका ग्रनुष्ठान किया इस रूपमें श्रामुष्मिक फल वाले [नायकके चरित्र] का [प्रदर्शन] नहिं वतका है इसका कारण यह कि] संसार साक्षात् ह्रष्ट फलको [देखना] चाहता है। 'धर्म-कामार्थसत्फलम्' इस कारिकाभागमें धर्म फल वाले नाटककी चर्चा की गई

है। धर्मके भीतर विधिरूप ग्रोर निषेधरूप दोनों प्रकारके धर्मोंका समावेश हो सकता है। दया दान ग्रादिका करना विधिरूप धर्म है ग्रोर सब व्यावारोंसे उपरति रूप व्रतादि, निषेध

रूप धर्म है। यहाँ नाटकमे दया दानादि रूप विधि चरिताका ही धर्म प्रधानं करना चाहिए। सर्वव्यापारोपरति रूप धर्मका ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योकि उस प्रकारके कमौं

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कामफलेऽ च दिव्यकुलजस्त्रीसम्भोग-सद्भीतक-कामचारोपवन्त्रवहारप्रायम् ।

श्रर्थफलेऽ च शत्रुच्छेदेऽर-सन्धि-विग्रहादिराज्यचिन्ताप्रायमिति ।

'साधन', इति श्रद्धा-उपाय-दशा-सन्धिभिर्वधदयमयैः सह वर्णते । 'दिव्याङ्गम्,

इति दिव्यं देवता श्रन्योडपि चोत्तमः प्रधानस्य नेता तु रङ्गं सहायः पताका-प्रकरी-

नायक-प्रकृतयो यत्र । दिव्यो हि नेतैव विरुध्यते न पुनः सद्दायः । श्रोतुयन्ति भक्तानामेव

नाम देवता; प्रसिद्धत इति देवताराधनपुरःसरं सङ्ङमुपायानुष्ठानमाचर्यमिति व्युत्पादनार्थं

दिव्योड्यङ्गञ्चेन कार्यः =

का फल लोके साक्षात् नहीं देखा जाता है । इसलिए जिन वतादिके प्रदर्शनसे सामाजिको

साक्षात् फलका दर्शन न हो सके उस प्रकारके धर्मका ग्रहण येहां धर्म पदमें श्रभिप्रेत नहीं है ।

राज्यादिकी वाधाका प्रभाव तो उसके पूर्वकृत धर्मका हष्ट फल हो सकता है किन्तु

व्रतानुष्ठानका फल उस समय देखनेको नहीं मिल सकता है । श्रत: दया, दान श्रादि हष्टफल

तथा राजकी वाधाका प्रभाव श्रादि श्रामुष्मिक धर्म फल माने जा सकते है । यह ग्रन्थकारका

श्रभिप्राय प्रतीत होता है

श्रोर कामफल वाले [नाटक] मे दिव्य [प्रथयात श्रेष्ठर] प्रथवा [उत्तम कुलमें

उत्पन्न हुई] कुलीन स्त्रीका सम्भोग, सद्भीत, कामचार [प्रथयात् यथेच्छ्छ उपभोग श्रादि श्राच-

रए] श्रोर उपवन-विहार श्रादि [प्रधान फल प्रदर्शित किया] है । श्रर्थफल वाले [नाटक]

में शात्रुका नाश, सन्धि-विग्रह श्रादि राज्य चिन्ताका [प्रधान फलके रूपमें प्रदर्शन किया

जात] है ।

यहां तक ग्रन्थकारने 'धर्मकामार्थसङफलम' इस कारिकाका-भागोंकी व्याख्या की है । ग्रह

ग्रांगे 'साधनोपदशासन्धिभि' इस पदकी व्याख्या करते है । इसमें श्रद्ध, उपाय, दशा श्रोर सन्धि

पद ग्राए है, ये सब नाट्यशास्त्रके पारिभाषिक शब्द है । ग्रन्थकार इन सबके लक्षण ग्रांगे

करेंगे । उन श्रद्ध श्रादि सबसे युक्त, पूर्वकालिक राजाओंके चरित्रका प्रस्तुत करने वाला

नाटक होता है यह इस पदका श्रभिप्राय है । इसी श्रभिप्रायकी ग्रगली पङ्क्तियोंमें देते हैं—

ग्रामो कहे जाने वाले श्रद्ध;, उपाय, दशा तथा सनिससे युक्त [ग्राद्यराजचरित नाटक

कहलाता है] । 'दिव्याङ्गम' [इस पदके दो प्रकारके श्रर्थ हो सकते है । उनमेंसे पहला श्रर्थ

यह है कि] दिव्य श्रथवा देवता [प्रथवा] श्रोर भी [कोई उत्तम-प्रकृति [महानुभाव] प्रधान

नायकका श्रद्ध प्रथयात् सहाय्यक श्रथवा पताका-नायक श्रथवा प्रकरी-नायक-रूप जिसमें

व्र्यक्त नायकका श्रद्ध प्रथयात् सहाय्यक श्रथवा पताका-नायक या प्रकरी-नायक बनानेकी बात

हो [वह नाटक 'दिव्याङ्ग' हुग्रा । इसपर यह शङ्का हो सकती है कि ग्राभी तो नाटकमे दिव्य

नायकके रखने जानेका खण्डन कर चुके है फिर उसके तुरन्त बाद ही देवताओंको नायकका

सहायक श्रथवा पताका-नायक या प्रकरी-नायक बनानेकी बात कह रहे है ये दोनो विरुद्ध बातें

हैं । इसका शङ्का समाधान करते है कि] देवताको नायक बनाना हो प्रतिविधि है । सहाय्यक

बनाना [प्रनुचित] नहीं [है] । श्रत्यान्त भक्तोंके ऊपर ही देवता प्रसन्न [होकर उनके सहाय्यक

बननेके लिए उद्यत] होते है इसलिए देवताओंका पूजन करके ही उपायोंका श्रनुष्ठान करना

चाहिए इस बातकी शिक्षा देनेकेलिए देवताओंको भी सहाय्यक [रूपमें प्रस्तुत] करना

चाहिए [यह इस पङ्क्तिका श्रभिप्राय है] ।

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क० ४, सू० ४ ]

प्रथमो विवेक: [ २३

तत्र देवता यथा नागानन्दे गौरी। उत्तमप्रकृतिर्यथा रामादिप्रबन्धेषु सुग्रीवदिरिति। यद्वा दिव्यानि झनझनव्यानि झञ्जान् वाद्यमात्राणि उपचेत्यपादीनि यन्त्र । तत्रेति निर्देशार्थः। झ्रमिनेयसमुदायानं प्रधानपुरुषार्थप्रवृत्तिनेयराजदिगुरुपादानगुणोन नाटकं निर्द्रीयते। नाटकर्मिति नाटर्यति विचित्रं रञ्जनाप्रवेशन सभ्यानां हृदयं नर्तयति इति नाटकम्। झभिनवगुप्तस्तु नमनार्थस्यापि नटे-नाटकशब्दं व्युत्पादयति। तत्र तु घटादिल्वेन हस्वभावविचिन्त्यः।

उनमेंसे देवता [के सहायक होनेका उदाहरण] जैसे नागानन्दमें गौरी [मलयवतीकी प्राप्तिमें जाम्बवान की सहायक बनती है] दूसरे प्रकारके] उत्तम-प्रकृति [के सहायक होनेका उदाहरण] जैसे रामादिके नाटकोंमें सुग्रीव श्रादि। अथवा दिव्य श्रर्थात् सुन्दर जिसके श्रद्ध श्रर्थात् प्राणे कहे जाने वाले उपक्षेप श्रादि [रुप प्राण्ज] हैं वह [दिव्याद्ध हुस्रा यह 'दिव्याद्ध' पदका दूसरा श्रर्थ है]।

[कारिकामें श्राया हुम्रा] 'तत्र' शब्द निर्देशार्थक [छांटनेके श्रर्थमें प्रयुक्त] है। [बारह प्रकारके] श्रभिनेय [काव्यों] के समुदायमेंसे [नाटकका श्रलग निरधारण यहां 'तत्र' शब्दके द्वारा किया गया है] क्योंकि मुख्य [धर्म, श्रर्थ, काम रुप] पुरुषार्थों [की सिद्धि] में प्रवृत्त। उपदेश करने योग्य राजा श्रादिको [विशेष रुपसे] शिक्षा प्रदान करने वाला होनेसे नाटकको [श्रभिनेय-काव्यके श्रन्य भेदोंसे 'तत्र' शब्दके द्वारा यहां] श्रलग किया जा रहा है [निर्धार्यते] इसलिए 'तत्र' शब्द यहां निर्देशार्थक है। श्रागे नाटक [शब्दकी व्युत्पत्ति दिखलाते हैं] नाना प्रकारसे सौन्दर्यके प्रवेश द्वारा ही सहृदयोंके हृदयोंको [नाटयति नर्तयति] श्रानन्दादि से नचाता-सा है इसलिए [नर्तनाार्थक नट धातुसे] 'नाटक' [शब्द बनता] है।

श्रभिनवगुप्तने तो 'नृत नृत्यो' के स्थानपर 'नट नतो' पाठ मानकर 'नति' श्रर्थात् नमन श्रर्थ वाले नट धातुसे भी नाटक शब्दकी सिद्धि की। किन्तु उस स्थलपर [नमन श्रर्थमें तो नट धातुके] घटादि गरपठित होनेसे [मित श्रोर घटादि गरपठित धातुप्रोंकी 'घटादयो मित:' के श्रनुसार 'मित माननेसे 'मितां हुस्व:'। ६-४-९२ सूत्रसे ऋित् परे रहते उपधाको हुस्व करनेका विधान होनेसे 'नाटक' शब्दमें] हुस्वका प्रभाव चिन्तनीय है [श्रर्थात् शुध्द नहीं प्रतीत होता]। श्रभ्राप्तौ वद घटादिगणस्थो नट धातुसे इस शब्दकी सिद्धि की जापगी तो उपधाको ह्रस्व होकर 'घटक' शब्दके समान 'नटक' शब्द बनना चाहिए। नाटक शब्द नहीं बनेगा]। 'नृत नृत्यो' बातु भ्वादिगणमें [धातु-सख्या ३१० तथा ७८१] दो स्थानोंपर पढ़ा गया है। सिद्धान्तकौमुदीकारने इनमेंसे प्रथम-पठित धातुको नाट्यार्थक श्रौर दुबारा पठित धातुको नृत्यार्थक माना है।

"इदमेव पूर्वंमपि पठितम् । तत्रायं विवेकः पूर्वंपठितस्य नाट्यमर्थः। यत्कारिषु नटव्यपदेशः। वाव्यार्थाभिनयो नाट्यम् । घटादौ तु नृतं नृत्यं चाथः। यत्कारिषु नर्तककष्यपदेशः। पदर्थाभिनयो नृत्यम् । गात्रविशेपमात्रं नृतम् । केचित्तु घटादौ नृतौ इति पठन्ति । है। इसी ऋष्ट नती पाठका उल्लेख नमनार्थक नट धातुके रुपमें यहां किया गया है। श्रभिनवगुप्तने नाटक शब्दकी व्युत्पत्ति करते समय यद्यपि 'नृत नती' धातुकी स्पष्ट

रुपसे उल्लेख नहीं किया है किन्तु 'नमनं प्राधीभाव:' नमनका श्रर्थ 'प्राधीभाव' नम्रता

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२४ ] नाट्यदर्पणम् [ काः ४, सू० ४

यद्यपि कथाद्योरपि श्रोतृहृदयं नाटर्यन्ति तथापि छद्मोपायादीनां वैचिच्य-हेतूनामभावात् न तथा रञ्जकत्वर्माति न ते नाटकम्। तथा नाटकं प्रधानपुरुषार्थेपु राझ्ञां तदङ्गभूतेष्वमात्यादीनां च बहूनां व्युत्पादकर्माति कतिपयस्युत्पादकानां प्रक-रस्यादीन्यपि न नाटकमिति ॥ ५॥

प्रदशं होता है। इस ‘प्रह्लादभाव’ श्रोर ‘नति’ शब्दोंका उल्लेख नाटक शब्दकी व्युत्पत्तिके प्रसङ्गमें किया है। भरतमुनिने नाट्यशास्त्रके विवेचनके प्रसङ्गमें—

(१) नृपतीनामेव नाटकन्नाम तच्चेष्टितं प्रह्लादभावदायकं भवति [पृ० ४१३, पंक्ति ६]।

(२) यद्यपि सर्वसुखकारकास्यामर्था हृद्ये प्रविश्टो विनेयांशच विनीतान करोति [पृ० ४१४, पंक्ति २]।

(३) प्रधान पुरुषार्थे प्रधानविनेयानां ग्रन्यान्त्रान्येषां वेद्यतोऽवनतिं व्युत्पत्तिं ददाति। तत्तु एव नाटकमुख्यते [पृ० ४१४, पंक्ति ७]। इत्यादि रूपमें अनेक स्थानोंपर नमन प्रह्लाद, नति श्रादि भावोंका नाटक शब्दके साथ सम्बन्ध दिखलाया है। जिससे प्रतीत होता है कि प्रभिनवगुप्त नमनार्थक नट धातुसे भी नाटक शब्दकी व्युत्पत्ति मानते हैं

परन्तु प्रकृत ग्रन्थकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र इस व्युत्पत्तिसे सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि घटादि गरा पठित घाटुका ही कुछ लोगों के मतोंमें ‘नृतो’ के बजाय ‘नती’ श्रथवा में माना है। घटादि गरा पठित धातुग्रोंको मित्-सञ्ज्ञा होकर उनमें मितां ह्यः सूत्रसे ह्यस्व हो जाता है उस दशामें नाटक पदमें भी ह्यस्व होकर ‘घटक’ के समान ‘नटक’ पद बनना चाहिए ‘नाटक’ शब्द उस धातुसे नहीं बन सकता है। घट एव रामचन्द्र-गुणचन्द्रने इस व्युत्पत्तिका खण्डन किया

रामचन्द्र-गुणचन्द्रने यहां अभिनवगुप्तकी व्याख्यापर जो श्रापत्ति की है वह घटादि-नट-घातुकों नत्यर्थ माननेपर ही बन सकती है। यदि उससे भिन्न पहिले स्थलपर ३१० धातु-सङ्ख्या वाले नट-घातुको नमनार्थक मान लिया जाय तो इस प्रकारकी श्रापत्ति नहीं उठ सकती है। सम्भव है प्रभिनवगुप्त उसी स्थलपर ‘नट नते’ पाठ मानते हों दूसरी जगह नहीं। उस दशामें उनकी व्युत्पत्तिमें कोई दोष नहीं होगा।

नट-घातु नत्यर्थक धातुसे भी नाटक शब्दकी सिद्धि की है। नाटकं नाम तच्चेष्टितं प्रह्लादभावदायकं भवति तथा हृदयानुप्रवेशकरणोल्लासनया हृदयं ‘शरीरं च’ नर्त्यति ‘नाटकम्’ ये दोनों प्रकारकी व्युत्पत्तियां प्रभिनव गुप्तने की हैं।

यद्यपि कथा श्रादि भी श्रोतृग्रोंके हृदयको [ग्रानन्दवातिरेकसे] नवाते हैं क्योंकि वे उपाय श्रादि वैंचिच्यके हेतुग्रोंके न होनेसे इतने ग्रानन्द-दायक नहीं होते हैं इसलिए उनको नाटक नहीं कहते हैं। श्रोर नाटक प्रधान पुरुषार्थके विषयमें राजा [प्रयत्नत मुखय नायक]

श्रोर उसके ग्रङ्ग रूपमें ग्रमात्य श्रादि बहुतोंको व्युत्पन्न करने वाला होता है इसलिए [उससे भिन्न] केवल कुछ [गिने-चुने व्यक्तियों] को व्युत्पत्ति प्रदान कराने वाले प्रकारण श्रादि [ग्रभिनेेय-काव्योंके ग्रनन्य श्र्यारहों भेद] नाटक नहीं [कहलाते] हैं।

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का० ६, सू० ४ ] प्रथमो विवेक: [ २४

अथ राजशब्दं व्याख्यास्यामः सामान्नेन नेतुः स्वरूपमाह—

[सूत्र ४]—उद्दतोदात्त-ललित-शान्ता धीरविशेषाः।।४।।

वर्ष्याः स्वभावाश्चवारो नेतृष्यां मध्यमोत्तमा:।।६।।

'घीरो' धैर्यं महाव्यसनेष्वकातरं विशेषणं येषां उद्दतादीनां, धीरोदत्त-घीरो—

दात्त-धीरललित-धीरप्रशान्ता इत्यर्थ: एवं नाम कविवरैर्याति जन्मस्थितितां तु स्वभावा नेतृष्यां यथा-तथा वा सन्तु। 'नेतृष्याम' इति बहुवचनात् प्रयोजैककर्म—

धर्म्यैकैक: स्वभावः, क्वचिदेश तु चत्वार: 'मध्यमोत्तमा' इति——यद्यपि स्वस्थाने सर्वमपि उत्तममध्यमाधमभेदेन त्रिधा, तथापि धीरोदत्तादय: स्वभावा उत्तम—

मध्यमभेदेनैव वर्ष्यनीयाः इति ।।६।।

इस ग्रन्थके निर्माता रामचन्द्र-गुणचन्द्रने इस नाटकके लक्षण-सूत्रकी रचनामें अपने कौशलका बड़ा श्रेष्ठ परिचय दिया है। अन्य ग्रन्थोंमें जहाँ नाटकका लक्षण किया गया है वहाँ कई श्लोक इसकें लक्षण रूपमें लिखे गए हैं। स्वयं भरतमुनिने अनेक श्लोकोंमें नाटकका लक्षण इस प्रकार किया गया है—

प्रबन्धविश्रुतवस्तुप्रधानविशालदर्शनं प्रख्यातोदात्तनायकं चैव । राजर्षिवंश्यचिरितं तथैव दिव्याश्रयोपेतम् ।।१८।। नानाविस्मृतिभिर्युतं रसादिविलासादिर्भगुपैश्वर्यै: ।

अङ्कप्रवेशकादिरू भवति हि तन्नाटकं नाम ।।१९।। नृपतीनां यच्चरितं नाना रस-भाव-चेष्टितं बहुधा ।

सुखदु:खोत्पत्तिकृतं भवति हि तन्नाटकं नाम ।।१९।। श्र० १८।।

किन्तु यहीं ग्रन्थकारने केवल एक ही श्लोकमें नाटकके लक्षणाको सर्वाङ्ग-पूरर्ण बना दिया है। यह उनके रचना-कौशलका चोतक है।

नायकके चार भेद—

श्रव राज शब्द [प्रथमतः नायक] की व्याख्या करनेकेलिए सामान्य रूपसे नायकके स्वरूपकी वर्षन करते हैं—

[सूत्र ४]—नायकको धीर विशेषरासे युक्त उद्दत, उदात्त, ललित शौर प्रशांत [प्रर्थात् धीरोदत्त, धीरोदात्त, धीरललित श्रौर धीरप्रशांत] चार प्रकारके स्वभाव [कैवल] मध्यम तथा उत्तम [दो रूपोंमें] ही वर्षान करने चाहिए [प्रशम नहीं] ।।६।।

धीर श्रर्थात् धैर्य श्रर्थात् भारी विपत्तिमें भी न घबड़ाना, जिनका विशेषण है वे, श्रर्थात् धीरोदत्त, धीरोदात्त, धीरललित तथा धीरप्रशांत [इन चार प्रकारके नायक-स्वभावोंका वर्षान करना चाहिए]। इस प्रकारका [स्वभावोंका] वर्षैन [केवल] कवि [अपने नाटकमे] करता है। [उन्होंने] नायकके जन्मसे उत्पन्न स्वभाव चाहे जैसे हों। 'नेतृष्याम्' इस बहुवचन के निंदंशसे [यह प्रतीत होता है कि] प्राय: एक-एक व्यक्तिमें एक-एक प्रकारका ही स्वभाव [काव्य-नाटक] में होता है। चारों स्वभाव तो कहीं [विरले] ही पाए जाते हैं। 'मध्यमोत्तमा:'

इससे [पता यह सूचित होता है कि] यद्यपि अपने-अपने स्थानपर सब ही [वस्तुएं] उत्तम, मध्यम श्रौर प्रथम भेदसे तीन प्रकारकी होती हैं। [इसलिए धीरोदत्त श्रादिके भी ये तीन—

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२६ ] नाट्यदर्पणम् [ का० ७, सू० ६

अथ बहुवचनत्वमेव विषयभेदं सस्पष्टयति—

[सूत्र ६]—देवा धीरोदात्ता, धीरोदाच्च: सैन्येश-मन्त्रिणः ।

धीरोदात्ता वशिगौ-विप्रा:, राजानस्तु चतुविधा: ॥७॥

स्वभाव-स्वभाविनोरभेदान्। सामान्याधकर एवंदेश: । राज्ञां चातुर्विध्य-

भगवान्त देवाः धीरोदत्ता एव, सैन्येश-मन्त्रिणो धीरोदात्ता एव, वशिगौ-विप्रा

धीरोदात्ता एव, वाशिगौ-विप्रा धोरशान्ताः एव, वाशिगौ-विप्रा इति स्वयोगव्यवस्थायक्त्वेनैवावधार्यते नान्ययोगव्य-

वच्छेदेन ।

तीन भेद हो सकते हैं] फिर भी धीरोदत्त प्रादि [नायकौके स्वभाव] उत्तम तथा मध्यम

[केवल दो] भेदोंमें ही वर्णन करने चाहिए [अर्थात् उनके श्रथम रूपको नाटकोंमें प्रस्तुत नहीं

करना चाहिए] ६ ।

स्वभाव-व्यवस्था—

पिछली कारिकामें नायकोंके चार प्रकारके स्वभावोंका वर्णन किया था । उसकी

व्याख्यामें यह भी कहा था कि सामान्य रूपसे एक व्यक्तिमें एक ही प्रकारका स्वभाव पाया

जाता है किन्तु कहीं-कहीं चारों प्रकारके स्वभाव भी एक व्यक्तिमें पाए जा सकते हैं । श्रब

इन चारों प्रकारके स्वभावोंकी व्यवस्था श्रथान्तु किन लोगोंमें किस प्रकारका स्वभाव पाया

जाता है । श्रथवा किसका किस प्रकारका स्वभाव नाटकादिमें चित्रित करना चाहिए इस बात

को इस कारिकामें कहते हैं—

[सूत्र ६]—देवता धीरोदत्त [स्वभाव] सेनापति तथा मन्त्री धीरोदात्त [स्वभाव]

वाशिक तथा ब्राह्मण धीरप्रशान्त [स्वभाव तथा] क्षत्रिय चारों प्रकारके [स्वभाववाले] हो

सकते हैं ॥ ७ ॥

इस कारिकामें धीरललितका कोई उल्लेख नहीं किया है । व्यक्तिभेदसे क्षत्रिय चारों

स्वभावके हो सकते हैं । इस कथनसे क्षत्रियोंमें धीरललितका समावेश हो जाता है । श्रीकृष्ण

ग्रादि धीरललित-नायकेके उदाहरण हैं । यहाँ जो देवताओंको धीरोदत्त, सेनापति श्रोर

मन्त्रियोंको धीरोदात्त, तथा विप्र तथा वाशिकको धीरप्रशान्त बतलाया है, उसका श्राभिप्राय

स्वयोगव्यवस्थापन-मात्र है, ग्रन्थयोग-व्यवच्छेद नहीं । श्रर्थात् देवता श्रादिका उसी-उस

प्रकारका स्वभाव चित्रित करना चाहिए यही इस व्यवस्थाका श्राभिप्राय है । ग्रन्थोंमें इस

प्रकारका स्वभाव नहीं हो सकता है, यह इसका तात्पर्य नहीं है । इस बातको चिरराकार

ग्रागे लिखते हैं

स्वभाव तथा स्वभाववत् दोनोंका ग्रभेद मानेकर [देवा धीरोदत्ता: श्रादिमें स्वभाव

परक 'धीरोदत्ता.' तथा स्वभाववत् 'देवा:' दोनों पदोंका समान विभक्ति तथा समान वचनमें

प्रयोग रूप] समानाधरर्ण्य-निर्देश किया गया है । राज्ञां [अर्थात् क्षत्रियों] के चातुर्विध्यके

कहे जानसे देवता धीरोदत्त हो [सकते हैं], सेनापति तथा मन्त्री धीरोदात्त हो, श्रौर

वाशिक तथा विप्र धीरप्रशान्त ही वर्णित होने चाहिए यह बात स्वयोगव्यवस्थापकत्वेन ही

निर्धारित होनी है ग्रन्थयोग व्यवच्छेदकत्वेन नहीं ।

ग्रथुक बात ऐसी ही होनी चाहिए इस भावमें सयुक्त होने वाला 'एव' शब्द निर्देशा-

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क०७, सू०६ ] प्रथमो विवेक: [ २७

यः पुनः परशुरामस्यातित्ररतस्वरूपनार्थो धीरोदात्तस्वनिबन्धः स 'भाषा-प्रकृतिवैपादे: कार्यत: 'कापि लङ्घनम्' इत्यपवादादिरुद्धः । श्रायं च नियमो देवानां मर्त्योपेतस्य न स्वापेक्षया । शिवादीनामुदात्तानां, ब्रह्मादीनां शान्तानामपि च दर्श-नात् । 'राजान:' इति क्षत्रियजातिः । बहुवचनात् व्यक्तिभेदेन चतुःस्वभावको नाटकस्य नेता, न पुनरे कस्मै ऽभ्यक्तः । एकत्र प्राधान्येन स्वभावचतुष्टयस्य वर्णोचिततुरशक्तत्वादिति । प्रधाननायकस्य चायं नियमो गौणेतरस्य तु स्वभावान्तरस्यापि पूर्वस्व-भावत्व्यागेन निवेश्यते । ये तु नाटकस्य नेतारं धीरोदात्तमेव प्रतिजानते न ते मुनि-समयाद्यवगाहिनः । नाटकेपु धीरोदात्तादीनामपि नायकानां दर्शनात् । कदिसमय-वाध्याश्र ॥५३॥

'एवकार:' ग्रन्थयोगव्यवच्छेदकः 'श्रथातो विशेष्य पदसे जब 'एव' का पद सम्बन्ध होता है तो वह ग्रन्थयोगका व्यवच्छेदक होता है । जैसे 'पार्थ एव धनुर्धर:' इसमें 'पार्थ' ग्रन्थनको छोड़कर ग्रन्थ धनुर्धर नहीं हैं यह ग्रन्थयोगका व्यवच्छेद होता है । इसी प्रकार 'विशेषरण संगतः एवकार ग्रन्थयोगव्यवच्छेदक होता है जैसे 'पार्थो धनुर्धर एव' श्रथातो श्रर्जुन धनुर्धर ही है । यहां 'एव' शब्द श्रर्जुनमें धनुर्धरके श्रयोग श्रथातो सम्बन्धभावका निपेधक श्रथवा श्रवश्य सम्बन्धधका ज्ञापक है । इसी ग्रन्थयोगव्यवच्छेदक एवकारको यहां ग्रन्थकारने 'स्वयोगव्यवस्थापक' माना है । धीरोदत्त ग्रादि विशेषणोंके साथ सम्बद्ध एवकार ग्रन्थ-योगका व्यवच्छेदक नहीं ग्रपितु ग्रन्थयोगव्यवच्छेदक ग्रथवा स्वयोगव्यवस्थापकमात्र है यह ग्रन्थ-कारका श्रभिप्राय है । तीसरा एवकार क्रियाके साथ सम्बन्ध होता है । 'क्रिया-सम्बद्ध एवकारो ग्रथन्त्ययोगव्यवच्छेदक:' क्रियाके साथ सम्बन्ध होने वाला 'एवकार' ग्रथन्त्ययोगका व्यवच्छेदक होता है । जैसे 'नीलं कमलं भवत्येव' इसमें 'भवति' क्रियाके साथ सम्बन्ध 'एवकार' कमलमें नीलत्वके ग्रथन्त्य योगका निपेध करके नील कमल भी हो सकता है इस ग्रथंको बोधित करता है ।

श्रौर जो [विप्र] परशुरामके श्रतिक्रतुत्वके सूचित करनेकेलिये धीरोदत्तत्वका वर्णन किया गया है वह 'कहीं कार्यवश [विशेष प्रयोजनसे] भाषा-प्रकृति श्रौर वेष श्रादि [विषयक नियमों] का उल्लङ्घन भी किया जा सकता है' इस ग्रपवाद विद्धमान होनेसे ग्रनुचित नहीं है [श्रथात् यहां ग्रपवाद रूपमें हो परशुरामके बाहुल्य होते हुए भी धीरोदत्त-स्वभावका वर्णन किया गया है यह समझना चाहिए] देवताओंका यह [धीरोदत्त स्वभावका] नियम मनुष्योंकी दृष्टिसे है, ग्रपनकी दृष्टिसे नहीं । क्योंकि [देवताओंमें भी] शिव श्रादि धीरोदत्त तथा ब्रह्मा श्रादि धीरशान्त [नायक] भी दिखाई देते हैं । 'राजान:' पदसे [राजाका हो ग्रहण न करके] क्षत्रियजाति मात्र [का ग्रहण करना चाहिए] । श्रौर [राजान: पदमें] बहुवचन [के प्रयोग] से व्यक्तिभेदसे नाटकके नेता चारों प्रकारके स्वभाव वाले हो सकते हैं, एक व्यक्तिमें [चारों प्रकारके स्वभाव] नहीं [हो सकते हैं यह बात सूचित की है] । क्योंकि एक व्यक्तिमें ही चारों प्रकारके स्वभावोंका वर्णन कर सकना प्रसंभव है । श्रौर यह नियम [श्रथात् चारों प्रकारके स्वभावका एक व्यक्तिमें वर्णन न किया जा सकना] प्रधान नायकके विषयमें ही है । श्रौप नायकानां तो पूर्व-स्वभावका छोड़कर ग्रन्य स्वभावका वर्णन भी किया जा सकता है ।

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अथ धीरोदात्तादीनां यथोदेशमरथामह—

[सूत्र० ७९]—धीरोदत्तश्चलश्चैवडो दर्पी दम्भी विकत्थनः । धीरोदाचोडतिगम्भीरो न्यायी सच्ची नमी स्थिरः ॥८॥ शृङ्गारी धीरललितः कलासक्तः सुखी मृदुः । धीरशान्तोऽनहङ्कारः कृपालुविनयी नयी ॥६॥

अथातरत्वे च धीरशाब्देनद्रार्थः सवत्र समान एव । चलत्वादिशः पुनरुदात्तादीनां शब्दानामर्थः: चलोऽनवस्थितः: चण्डो रौद्रः दर्पः शौर्योद्भवमदः । दम्भः कूट प्रयोगः । विकत्थनः स्वप्रशंसी । अतिगम्भीरो दुरवोधमध्यः । सच्ची शोक-क्रोध- वनभिभवनीतः स्थिरो विमुश्यकारी ! कलासक्तो गीतादितत्परः सुधी मन्त्रनयसतराजचिन्तामणिरात्न्वान्निराधिः ।

मृदुरकरूणाचारः । धनहङ्कारः: सर्वथाऽनयनवलेपः धीरोदात्तस्तु विनयच्छन्नोऽबल पः, इति भेदः । विनयी गुरुजनायनुसन्धीचती उपलब्धयमात्रं चैतन, तेनोदात्तादीनां यथौचित्यमुपरेऽपि धर्मा हछत्न्या इति ॥७-६॥

है । जो नाटकके नायकोंको केवल धीरादात्त ही मानते हैं वे भरतमुनिके सिद्धान्तको नहीं समझते हैं । श्रौर नाटकोंमें धीरललित श्रादि नायकोंके भी पाए जानेसे कवियोंके व्यवहारसे ग्रन्थपरिचित प्रतीत होते हैं । [अर्थात भरतमुनिके सिद्धान्त तथा कवियोंके व्यवहार दोनोंके ग्रनुसार नाटकोंमें चारों प्रकारके नायकोंका चित्रण किया जा सकता है । केवल धीरादात्त ही नायक हो ऐसा कोई बन्धन नहीं है ।] ॥७॥

ग्रन्थ [उद्‌देष] कमके ग्रनुसार धीरोदात्त श्रादिके ग्रन्थ बतलाते हैं— [सूत्र ७]धीरोदत्त [नायक] प्रशस्तर-चित्त, भयडूरक, श्रमिमानी, छली, श्रात्म- इलाघी, [होता है] । धीरोदात्त [नायक] प्रतयन्त गम्भीर, न्यायप्रिय, शोक-क्रोध श्रादिके वशी- भूत न होने वाला [सच्ची], क्षमाशील श्रौर स्थिर [स्थिरोच] होता है] ॥८॥

[सूत्र ७] धीरललित [नायक] शृङ्गारप्रिय, [गीत-वाद्यादि] कलाग्रोंका प्रेमी [राज्यभारहो मन्त्रीको सौंपकर निश्चित हो जाने वाला] सुधी श्रौर कोमल स्वभावका [होता है] श्रौर धीरप्रशान्त [नायक] सर्वथा ग्राहङ्कार-रहित, दयालु, विनयशील श्रौर नीतिका श्रवलम्बन करने वाला होता है ॥६॥

[कारिकामें ग्राए हुए] 'धी'र शब्दका ग्रर्थ श्राकारतरत्व [न घबड़ाना] है । वह [धीरोदात्त ग्रादि चारों प्रकारके नायकोंमें] सबमें समान हो ही है । धीर चलत्व श्रादि उद्धत श्रादि शब्दोंके ग्रर्थ हैं । 'चल' श्रर्थात् प्रसित्वरचित्त । 'चण्ड' श्रर्थात् भयङ्कर । शौर्यादिके घमण्डका नाम 'दर्प' है । 'दम्भ'का ग्रर्थ कूटप्रयोग [छल] है । श्रात्मइलाघा करने वाला 'विकत्थन:' [होता] है । 'श्रतिगम्भीर' श्रर्थात् जिसके मनकी बात सहज न समभी जा सके। 'सच्ची' श्रर्थात् शोक-क्रोध ग्रादिके वशमें न होने वाला 'स्थिर' श्रर्थात् सोच-विचार कर कार्य करने वाला । कलासक्त श्रर्थात् गीत [वाद्य] श्रादि [कलाग्रों] का प्रेमी । 'सुधी' श्रर्थात् राज्यको चिन्ताका भार मन्त्रियोंको सौंपकर निश्चित हो जाने वाला । 'मृदु:' श्रर्थात् कूर श्राचारण न

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का० १०, सू० ५ ]

प्रथमो विचेक:

[ २६

अथ चरितशब्दं ठ्याचष्टे—

[सूत्र ८]—मुख्यमिष्टफलं वृत्तं, श्रङ्गं प्रासङ्गिकं क्वचित् । सूच्यं प्रयोज्यमभ्यूनां, उपेयं तच्चतुर्विधम् ॥११॥

मुख्यं सर्वप्रबन्धस्यापि स्ववात् प्रधानम् । इष्टं सर्वोत्तमेषु कवेरभिप्रेतं फलं

प्रसिद्धौ । परकीय- यस्य । वृत्तं चरितमू । श्रङ्गं मुख्यवृत्तस्यानुयायित्वाद्वयवधयवचः ।

यत्नादागतं प्रासङ्गिकम् । इह तावत् न निसर्गतः किन्त्विच्छरितं मुख्यमङ्गं वा, किन्तु बहुङ्गापि फलेषु

कविर्यस्य नुसर्पणमभिप्रेतित तफलमिष्टम् । ध्यानेन च यत् फलवदू वृत्तं तदिह मुख्यम् । तदिवरतं श्रङ्गत्वात् प्रासङ्गिकम् । रामप्रबन्धेषु हि सुप्रीवमैत्री-शरपातागत- करने वाला । 'प्रनिहङ्कार' श्रर्थात् सर्वथा श्रभिमान-शून्य । धीरोदात्त [नायक] तो [प्रभिमान-

युक्त होनेपर भी] विनयके द्वारा श्रपने श्रभिमानको छिपा लेने वाला होता है यह [धीर

प्रशान्तसे उसका] भेद है । 'विनय' श्रर्थात् गुरजन श्रादि [की श्राज्ञा या मर्यादा] का उल्लं- घन न करने वाला । ये धर्म केवल उपलक्षण मात्र है । इसलिए धीरोदात्त श्रादि [नायकों] में श्रन्य धर्म भी समावेश लेने चाहिए । ८-११।

चरितके दो भेद—

नाटकमे वर्णित श्राख्यान-वस्तु जिसको यहाँ ग्रन्थकारने 'वृत्त' तथा 'चरित' शब्दोंसे निर्दिष्ट किया है दो प्रकारका होता है । एक मुख्य श्रौर दूसरा उसका श्राङ्गभूत । नाटकमे

वर्णित प्रधान फलकी प्राप्ति जिसको होती है वह पात्र नाटकका नायक या प्रधान पात्र होता है । उसका चरित मुख्य-चरित कहलाता है । श्रौर शेष सब चरित उसकी कार्यसिद्धिके उप- कारक होते हैं इसलिए वे सब उसके श्राङ्गभूत चरित माने जाते हैं । इसी बातका प्रतिपादन

ग्रन्थकार इस कारिकाके विवरणमें निम्न प्रकार करते हैं—

[सूत्र ९]—[कविके द्वारा श्रभिप्रेत] प्रधान फल जिसको प्राप्त होता है उसका चरित [इष्टफलं वृत्तं] मुख्य [चरित कहलाता] है । श्रौर [ग्रनिवायं रूपसे सर्वत्र नहीं श्रपितु 'क्वचित्'

श्रर्थात्] कहीं-कहीं [वर्णित] प्रासाङ्गिक [वृत्त] श्रङ्ग [ग्रप्रधान चरित कहलाता] है । [इन दोनों प्रकारके चरितोंके भी उनकी श्राख्यान-विधानकी दृष्टिसे चार भेद होते हैं । उनके

नाम इस कारिकामें निम्न प्रकार लिखलाए हैं] वह भी १ सूच्य, २ प्रयोज्य, ३ श्राङ्गभूता [कल्पनीय] श्रौर ४ उपेक्ष्यनीय [वेदयितव्य] चार प्रकारका होता है ॥११॥

[सूत्र ९]—सारे प्रवन्ध [श्रर्थात् सारे नाटकमे श्रादिसे लेकर ग्रन्थ तक निरन्तर] व्यापक रहनेसे प्रधान [वरित ही] मुख्य [चरित कहलाता] है । [उसका लक्षण यहाँ 'इष्टफलं' किया गया

है । इसलिए इस शब्दका श्रर्थ ग्रागे देते हैं ।] 'इष्ट' श्रर्थात् कवि जिसके फलको सबसे उत्तम रूपमें चाहता है [वह 'इष्ट' फल वाला वृत्त] है । [वृत्त श्रर्थात् चरित] । [वृत्त श्रर्थात्

ग्रन्थ-]ग्रर्थात् मुख्य चरितका प्रतुगामी होनेसे उसका प्रयोज्य [प्रधान-चरित कहलाता] है । प्रसङ्ग श्रर्थात् ग्रन्थ [विषय] यत्नसे प्राप्त होने वाला वृत्त प्रासङ्गिक [चरित कहलाता] है ।

इनमेंसे कोई भी चरित स्वभावतः मुख्य या ग्रङ्ग-रूप नहीं होता है । किन्तु ग्रनेक फलोंमेंसे कवि जिसको श्रात्यन्तम् उत्कर्ष [विक्लान्नाना] चाहता है वह फल 'इष्ट' [फल होता] है ।

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३०

नाट्यदर्पणम्

[ का० १०, स० ५

विमीषकारच्य-रावणवध-सीताप्रत्यानयनादिषु सीताप्रत्यानयननरैव प्राधान्यं कविना प्रतिपादितम् । तत्सम्पादनाय तदितरेषु प्रवृत्तेषु । छत एव तान्यझानि । कविरपि न स्वेच्छया फलमुखकरुष निवदयुरम्हति, किन्त्वौचित्येन । यस्य धीरोदात्तादेर्धीरोदेव फलमुचितं तस्यैवोत्कर्ष निबन्धनीयः । प्रासङ्किकस्यापि च मुख्यवृत्तप्रयत्नेनैव निष्पत्तिः । प्रयत्नान्तरे हि तदपि मुख्यं स्यात् । तपस्ववत्सराजे हि वत्सराजस्य मुख्याय कौशाम्बीरोदायلاب्याम् प्रयत्नेनैव यौगन्धरायणमुख्यापारेषा प्रासङ्किकी वासवदत्तासङ्गम-पद्मावतीप्राप्तिप्रयत्नैरपि दृश्यते ।

'क्वचित्' इति यत्रैव मुख्यो नेता फलसिद्धौ सहायमपेक्षते ततत्रैव प्रासङ्किकम् । न सर्वत्र । यथा भट्टश्रीहर्षविरचितायां कोशालिकायां नाटिकायां कोशल-लिकारप्रतिप्रतिमधिकृत्य प्रवृत्तस्य वत्सराजस्य न प्रासङ्किकम् ।

यथा वासवदत्ते सत्य-हरिश्चन्द्रे नाटके प्रति प्रतिज्ञानिर्वाहं प्रति प्रवृत्तस्य हरिश्चन्द्रस्य । 'तच्चतुर्विधम्' इति 'तत्' सामान्येन वृत्तम् ॥१०॥

यह फल जिसको प्राप्त होता है वह 'चरित' यहां मुख्य ['चरित' कहलाता] है । उससे भिन्न [चरित उसका] भट्ट होनेसे प्रासङ्गिक [चरित कहलाता] है । राम-विषयक नाटकोंमें सप्रेम-मैत्री, शत्रुनिगत विमीषणकी रक्षा, रावण-बध श्रौर सीताका लौटाना श्रादिमेंले सीताके प्रत्यनयनका ही प्रधान रूपसे वर्णन किया है । ग्रन्थों [का वर्णन करने] में उस [सीताप्रत्यनयन] के सम्पादनकेलिये ही प्रवृत्त होनेसे [सीताप्रत्यनयन ही प्रधान फल है । ग्रन्थ प्रधान नहीं है] इसलिए 'श्रङ्ग' [कहलाते हैं]

कवि भी श्रपनी इच्छासे [किसी विशेष] फलके उत्कर्ष वर्णन नहीं कर सकता है । किन्तु ग्रौचित्यके श्रनुसार [ही वह उत्कर्षका वर्णन करता है] । जिस [घीरोदत्त ग्रादि [नायक के] केलिये जो फल उचित हो उसका हो उत्कर्ष वर्णन करना चाहिए । श्रौर मुख्यवृत्तके लिये किए गए प्रयत्नके द्वारा ही प्रासङ्गिक [वृत्त] की भी सिद्धि करनी चाहिए । उस [प्रासङ्गिक वृत्तकी सिद्धि] केलिये श्रलग प्रयत्न करनेपर तो वह भी मुख्य बन जायेगा । 'तपस्ववत्सराज' [नामक नाटक] में वत्सराज [उदयन] के कौशाम्बीके राज्यकी प्राप्ति रूप मुख्य फलके लिये किए गए [वत्सराजके मन्त्री] यौगन्धरायणके व्यापारसे ही वासवदत्ताका समागम श्रौर पद्मावतीकी प्राप्ति श्रादि रूप प्रासङ्गिक कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं ।

इसो प्रकार सर्वत्र मुख्य फलकी प्राप्तिके लिये जाने वाले व्यापारसे हो प्रासङ्गिक कार्योंकी सिद्धि दिखलानी चाहिए । उसके लिये श्रलग व्यापारकी श्रावश्यकता नहीं होनी चाहिए । ग्रन्थया वह भट्ट न रहकर प्रधान बन जायगा ।

'क्वचित्' इस पदसे [यह सूचित किया है कि] जहां मुख्य नायक [अपने] फलकी सिद्धिके लिये सहायकोंको चाहता है वहां ही प्रासङ्गिक [चरित] की श्रावश्यकता होती है । [वहींपर उसका वर्णन करना चाहिए] सब जगह नहीं । जैसे श्री भवभूति द्वारा विरचित 'कोशलिका' [नामक] नाटिकामें कौशलिका प्रासङ्गिकलिए प्रवृत्त वत्सराजका [कोई सहायक प्रप्रक्षित न होने से उसमें] प्रासङ्गिक [वृत्त] या चरित्र नहीं है ।

अर्थात् जैसे हमारे बनाये हुए 'सत्यहरिश्चन्द्र' [नामक] नाटकमे अपनी प्रतिज्ञाको

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काः ११, सू० ६ ] प्रथमा विवेकः [ ३१

अथ चातुविध्यमेव स्पष्टयति—

[सूत्र ७]—नीरसानुचितं सूच्यं, प्रयोज्यं तद्विपर्ययः ।

उहां तद्विनाभूतं, उपेक्ष्यं तु जुगुप्सितम् ॥१॥

नीरसञ श्ररञ्जकम्। श्रनुचितं सरसद्यनर्हं श्रालिङ्गन-चुम्बनादि । तत् सूच्यं

विष्कम्भादिभिरञ्ज्ञोयम्। तस्य नीरसानुचितस्य विपर्ययः: सरसमुचितं च प्रयुज्यते,

वाचिकादिभिरभिनयैः सामाजिका साच्चादिव क्रियते इति प्रयोद्यम् तयोः सूच्य-

प्रयोज्यो रसविनाभूतं देशान्तरप्राप्यादौ गमनादि उह्यते स्वयञ वितर्क्यते इति उह्यम्।

न नाम देशान्तरप्राप्तिः पादविररणादिकञ बिना भवति । उपेक्ष्यते श्रीङ्गादिहेतुत्वाद-

द्वगण्यते इत्युपेक्ष्यम्।१ जुगुप्सनीयञ्च भोजन-श्नान-शयन-प्रसवरणादि । यन पुनरुत्थार-

रामचरिते सीताया:, श्ररमदुपग नलविलासे श्रररथये दमन्याश्र प्रयुक्तञ तञ प्रस्तुत-

तोपयोगित्वान्न जुगुप्सितम् ॥१॥

पूसञ करनेकलिए प्रवृत्त हरिचन्द्रकथ [कोई सहायक या प्रासङ्गिक वृत्त या चरित्र नहीं है ।

कारिकाके ग्रन्थमें ग्राए हुए ] ‘तच्चतुविधम्’ इस [पद] में ‘तत्’ [पदसे] सामान्य रूपसे चरित

[श्रर्थात वृत्त, (१) सूच्य, (२) प्रयोज्य, (३) प्राभ्यूह अर्थात कल्पनोय श्रौर (४) उपेक्ष्य

श्रौद मदीस चार प्रकारका हो सकता है यह बात प्रत्येक द्वारा सूचित की गई है] तरणञ

चरितकी चार श्रवस्थाएँ या स्थितियाँ—

ग्रब [पिछली कारिकामें बतलाई हुई चरितको] चार प्रकारकी स्थितिको हो [इस

कारिकामें] स्पष्ट करते हैं—

[सूत्र ७]-[प्रस्तुत चरितमें जो कुछ भाग] नीरस या श्रनुचित हो वह [दिखलाने योग्य

नहीं होता है श्रप्रितु विष्कम्भकादिमें ग्रन्थोंकी उक्ति द्वारा] सूचित करने योग्य [होता] है ।

[प्रतः उसकेो ‘सूच्य’ वृत्त कहा जाता है] उसके विपरीत [श्रर्थात सरस श्रौर उचित भाग हो]

‘प्रयोज्य’ [ग्रभिनय द्वारा दिखलाने योग्य होता] है । उसका ग्रविनाभूत [श्रर्थात जिसके बिना

‘प्रयोज्य’ भागका ग्रभिनय ही न हो सके वह भाग स्वयञ ‘उहां’ [श्रर्थात कल्पनीय] होता है ।

श्रौर [उपेक्ष्यपीय] [होता] है [श्रर्थात उसका श्रग्रिमय नहा करना चाहिए]॥१॥

नीरस श्रर्थात जो मनोरञ्जक न हो । श्रनुचित श्रर्थात जो सरस होनेपर भी [विल-

लानेके] योग्य हो जैसे श्रालिङ्गन, चुम्बन श्रादि, वह ‘सूच्य’ श्रर्थात विष्कम्भक श्रादि द्वारा

ज्ञापनोय [श्रर्थात ग्रन्थोंके वचनों द्वारा बोध्य होता] है । [ग्रगे ‘तद्विपर्ययः’ का श्रर्थ करते हैं]

उसका श्रर्थात नीरस श्रौर श्रनुचित रूप ‘सूच्य’ भागका विपरीत श्रर्थात सरस श्रौर उचित है

वह प्रयुक्त किया जाता है श्रर्थात वाचिक श्रादि [चारों प्रकारके] श्रभिनयों द्वारा सामाजिकों

के सामने प्रत्यक्ष-जैसा किया जाता है इसलिए ‘प्रयोज्य’ [कहलाता] है । जब ‘सूच्य’ तथा

‘प्रयोज्य’ दोनोंका ग्रविनाभूत [श्रर्थात जिसके बिना ‘सूच्य’ श्रथवा ‘प्रयोज्य’ भागका उपपादन

ही न हो सके] जैसे श्रङ्ग स्थानपर पहुँचनेके लिए [ग्रपरिहार्य] गमन श्रादिकी स्वयं ऊहा,

१. उपेक्ष्यते व्रीडादिहेतुत्वादवगण्यते इत्युपेक्ष्यञ योज्यम् ।

२. तयोः सूच्य-प्रयोज्ययो जुगुप्सनीयञ भोजन-श्नान-शयन प्रसवरणादि ॥

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अथ ज्ञाताज्ञातपात्रवृत्तभेदान् दर्शयति—

[सूत्र १०] प्रकाशं ज्ञात्यमन्येषां स्वगतं स्वहृदि स्थितम् ।

पराङ्मुखं रहस्याख्यानन्यस्तत्पवारीतम् ॥११२॥

प्रर्थात् कलपना की जा सकती है इसलिए वह 'उक्यु' [कहलाता] है । क्योंकि पैरोंसे चले बिना दूसरे स्थानपर नहीं पहुँचा जा सकता है । जो उपेक्षित किया जाता है वह प्रर्थात् लज्जादि-जनक होनेके कारणे ज्ञापित किया जाता है वह 'उपेक्ष्य' [कहलाता] है । [छद्मवेशके जनक] भोजन-स्नान-शयन श्रौर मूत्र-त्याग श्रादि [प्रवृत्तियाँ] जुगुप्सित [कहलाते] हैं । किन्तु 'उत्तररामचरित' में रामकी गोदमें पड़ी हुई सीताका श्रौर हमारे बनाए हुए 'नलविलास' में वनमें दमयन्तीके शयनका जो श्रभिनय दिखलाया गया है वह प्रस्तुतमें उपयोगी होने श्रौर मनोरञ्जक होनेके कारण दोष नहीं है ॥११२॥

भावाभिनयक्तिकके नाटकीय प्रकार—

नाटकमें श्रौर लोकमें भी सारी बातें एक ही रूपसे नहीं कही जाती हैं । भिन्न-भिन्न श्रवसरोंपर भिन्न-भिन्न प्रकारकी बोलीका श्रवलम्बन वातावरणमें किया जाता है । कोई बात ऐसी होती है जो सबके सामने कही जाती है । कोई ऐसी होती है जिसे वक्ता दूसरों से छिपा कर श्रपने तक ही सीमित रखना चाहता है । इन दोनोंके लिए नाटकमें श्रलग-श्रलग ढंगसे बोलीयों का श्रवलम्बन किया जाता है । जो बात गोप्य नहीं है, वक्ता सबको उस बातको सुनाना चाहता है उसको नाट्यकी परिभाषामें 'प्रकाशम्' शब्दसे कहा जाता है । श्रौर जिसको वक्ता श्रन्य सबसे छिपाकर केवल श्रपने तक ही सीमित रखना चाहता है इस प्रकारकी बातकेलिए नाटकमें 'स्वगतम्' शब्दका प्रयोग किया जाता है । ये 'प्रकाशम्' तथा 'स्वगतम्' शब्द नाटकमें भावाभिनयक्तिकी विशेष प्रकारकी ढंगलीको सूचित करते हैं । 'स्वगतम्' रूपमें कही जाने वाली बात गोप्य होती है । परन्तु उसकी गोप्यता केवल श्रभिनय करने वाले पात्रोंकी दृष्टिसे ही होती है । नाटकके देखने वाले सामाजिकोंकी दृष्टिसे नहीं । नाटकमें लिखते समय जिसको 'स्वगतम्' लिखा जाता है वह बात भी सामाजिकोंको सुनानी ही होती है । ग्रन्थयथा सामाजिकका रसास्वाद गड़बड़ा जायगा । इसलिए श्रभिनय करते समय उस स्वगत भागको भी जोरसे बोला जाता है कि जिससे सामाजिकगण उसे स्पष्ट रूपसे सुन सकें । केवल मुख-मुद्रादिके द्वारा ऐसा श्रभिनय किया जाता है कि मानों वक्ता श्रपने मनमें ही कह रहा है ।

इसी प्रकार जो बात श्रनेक पात्रोंसे छिपाकर किसी एक पात्र पर प्रकट करनी होती है उसे ग्रन्थ लोगोंकी श्रोर से मुख मोड़कर उस एक व्यक्तिसे कहा जाता है । उसको 'ग्रप-वारित' नामसे कहा गया है । इस 'ग्रपवारितम्' को भी सामाजिकको सुनाना श्रावश्यक श्रभिप्रेत होता है । इसी बातको इस कारिकामें लिखते हैं—

ग्रथ वृत्त [कोई श्रभिव्यक्ति] के ग्रन्य प्रकारोंको भी दिखलाते हैं—

[सूत्र १०]—ग्रन्य सबको जतलाने योग्य [वृत्त या बात] को 'प्रकाशम्' श्रौर केवल श्रपने हृदयमें स्थित [गोप्य बात] को 'स्वगतम्' [श्रोलिसे] कहा जाता है । [बहुतोंसे छिपाकर एक ही वयक्ति पर प्रकट करनेकेलिए ग्रन्योंकी श्रोरसे] मुख मोड़कर रहस्यका कथन करना 'ग्रपवारितम्' कहा जाता है ।१२।

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काः १३, सू० ११ ]

प्रथमो विवेकः

[ ३३

यद् वृत्तमगोप्यतया ज्ञेयेऽपि आत्मव्यतिरिक्तेनापि ज्ञातव्यं तद् प्रकाशते इति 'प्रकाशम्' । यत् पुनरन्येषां गोप्यतया स्वहृदयव स्थितं तन् 'स्वगतम्' । परावृत्य ज्ञैव-वलनेनाश्रावयितेष्यः पराड्‌मुखीभूय ज्ञानस्यै रहस्याख्या या तदपवार्यते बहूनां प्रच्छादयत इति 'अपवारितम्' । एवंमुत्तर-व्याख्यायते इति व्याख्या कमंसाधनः तन् वृत्तमपवारितम् ।

त्रापि ॥११२॥

[सूत्र ११]—त्रिपलाकान्तरोदन्येन जल्पो यस्तज्जनान्तिकम्‌ ।

श्राकाशोक्तिः स्वयं-प्रश्न-प्रत्युत्तरमात्रकम्‌ ॥११३॥

जो बात गोप्य न होनेसे अपनेसे भिन्न अन्य लोगोंको भी बतलाने योग्य है उसको प्रकाशित किए जानेके कार‌ए 'प्रकाशम्‌' कहते हैं । और जो [बात] अन्योनसे छिपाने योग्य होनेसे अपने मनमें ही रखनी होती है उसको 'स्वगतम्‌' कहते हैं । ज़ारीरको घुमाकर जिनको सुनाना नहीं है उनकी श्रोरसे मुख मोड़कर किसी दूसरेसे रहस्यकी कथन करना बहुतोंसे छिपाए जानेके कार‌ए 'अपवारितम्‌' इस ध्युप्तिके श्रनुसार 'अपवारितम्‌' कहलाता है ।

जिसको कहा जाय वह 'ग्राख्या' है । [यह कारिकामें श्राए हुए 'ग्राख्या' शब्दकी व्युत्पत्ति है । इसके श्रनुसार श्राख्या शब्द] कर्ममें [प्रत्यय करके] सिद्ध होता है । इसलिए [कर्मभूत प्रर्थात्‌ कहा जाने वाला] वृत्त 'अपवारित' [कहलाता] है । इसी प्रकार श्रागे [जल्प ग्रादि शब्दोंकी व्युत्पत्ति] भी समभनी चाहिए ॥११२॥

पिछली कारिकामें ग्रन्थकारोंने 'प्रकाशम्‌', 'स्वगतम्‌' श्रौर 'ग्रपवारितम्‌' इन तीन नाटकीय परिभाषाग्रोंकी व्याख्या की थी । उसी प्रसंगमें चौथा 'जनान्तिकम्‌' शब्द भी नाटकोंमें प्रयुक्त होता है । 'जनान्तिकम्‌' श्रौर 'ग्रपवारितम्‌' शब्द एक-दूसरेसे समबद्ध किन्तु एक-दूसरेसे विपरीत स्थितिके बोधक हैं । जब बहुसंख्यक अन्य सब लोगोंसे छिपाकर कोई बात किसी एक ही व्यक्तिपर प्रकट करनी होती है तब उसको 'ग्रपवारितम्‌' कहते हैं । इस 'ग्रपवारितम्‌' का लक्षण पिछली कारिकामें किया जा चुका है । 'जनान्तिकम्‌' शब्दका प्रयोग उससे विपरीत स्थितिमें होता है । जो बात किसी एक ही व्यक्तिसे छिपाकर अन्य बहुसंख्यक व्यक्तियोंपर प्रकट करनी होती है उसके प्रकट करनेकेलिए विशेष शैलोका श्रवलम्बन किया जाता है श्रौर उस विशेष शैलोको 'जनान्तिकम्‌' कहा जाता है । इस शैलीमें 'त्रिपताक' श्रथवा 'त्रिपताकार' का प्रयोग किया जाता है । 'जनान्तिकम्‌' के समान 'त्रिपताक' शब्द भी नाट्य शास्त्रका पारिभाषिक शब्द है । कनिष्ठिकाके पास वाली 'ग्रनामिका' उँगलीको ग्रंथुङ‌ठेसे दबाकर शेष तीन उँगलियाँ उठाकर जो हाथकी स्थिति बनती है उसको 'त्रिपताकार' कहते हैं । इस प्रकार हाथको मुखके पास लगाकर एक विशेष व्यक्तिसे छिपाकर ग्रन्य लोगोंको सुनानेकेलिए जो बात की जाती है उसको 'जनान्तिकम्‌' कहते हैं । इसको श्रागे लिखते हैं—

[सूत्र ११]—त्रिपताक

हाथको बीचमें लगाकर [एक व्यक्तिसे छिपाकर बहुसंख्यक] ग्रन्य लोगोंके साथ जो वार्तालाप है

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जल्प्यते इति जल्पो वृत्तमेव। ऊह्यवचसां गुह्यलिङ्गानामिक: करचेष्टप्रतिपाकः । सोडनन्तरमश्राव्यं प्रति व्यवधानं यत्र । श्रन्येन सह जल्पो जनानामेकस्यैव गोष्यवात् बहूनामन्तिकं, श्राश्रव्यतया निकटं, 'जनान्तिकम्' इह यद् वृत्तमेकस्यैव गोष्यं बहूनामगोष्यं तज्जनान्तिकम् । तद्विपरीतमपवारितम् । प्रशस्तश्च प्राङ्युत्करं चेति समाहारः । श्रप्रातक्रमं, रङ्गाश्रविशिष्टद्वितीयपात्ररहितं । रङ्गप्रविश्टपात्रेश श्रव्यमात्रमेव यः प्रश्नोत्तरं तदाकाशे पात्राभावात् शून्ये उक्तिः 'आकाशोक्ति:' । उच्चते इति उक्तिः । प्रश्नोत्तरविपयोःडर्थः । कवचिन्न स्वोत्तरार्थमनुभाष्याच्छायया परकीयः प्रश्नः, कवचिन्न स्वप्रश्नस्यानुभाषाश्राच्छायया परकीयोत्तरं इत्युभयर्माप आकाशोक्तिरिति ॥१३१॥

वह 'जनान्तिक' श्रौर बिना पात्रके स्वयंही प्रश्न तथा उत्तरका कथन 'आकाशोक्ति:' [कहलाता] है ॥१।१३१॥ जो कहा जाता है वह 'जल्प' 'वृत' हो होता है । प्रनुमिका उंगलियोंको हिलाकर श्रौर सब प्रङ्गुलियाँ उठी हों ऐसा हाथ 'त्रिपताक' [कहलाता] है । उसको श्राश्राव्य [अर्थात् जिस एक व्यक्तिको बात सुनाना श्रप्रोष्ट नहीं है उस एक व्यक्ति] के प्रति व्यवधान जिसमें बनाया जाय । [वह जल्प 'त्रिपताकान्तरः जल्प:' हुग्रा] । श्रन्योके साथ [विशेष प्रकारका] वार्तालाप एकहीके प्रति गोप्य होने, श्रौर [बहुतोंके प्रति श्रगोप्य होनेसे] बहुतसे जनोंके लिए श्राश्राव्य होनेसे 'जन्तिक' प्रधानसे निकट होनेके कारन 'जनान्तिक' [कहलाता] है । [श्रौर प्रश्नोत्तरमें जो बात एकही व्यक्तिसे छिपाना हो बहुतोंसे गोप्य न हो वह 'जनान्तक' [कहलाता] है । उसके विपरीत [अर्थात् बहुतोंसे गोप्य श्रौर एकपर ही वह प्रकाशनीय प्रयंथ] 'प्रपवारितम्' [कहा जाता] है । [ कारिकामें ग्राए हुए 'प्रतिप्रत्युत्तरं' पदमें ] प्रश्न श्रौर प्रत्युत्तर इन दोनोंका समाहार है । 'प्रप्रातक्रम' [ पदका ] रङ्गमें प्रविष्ट पात्रके द्वारा जब स्वयं श्रपने-श्रपही प्रश्न श्रौर प्रत्युत्तर किया जाता है वह श्राकाशमें श्रप्रथित दूसरा पात्र न होनेसे शून्यमें कथन होनेसे 'आकाशोक्ति:' [कहलाती] है । जो कहा जाय वह [प्रथं] 'उक्ति' है । श्रर्थात् प्रश्न श्रौर उत्तरका विषयभूत ग्रंथ [उक्ति पदसे श्रभिप्रेत है । इसके भी दो प्रकार होतेहैं] कहाँ स्वयं उत्तर देनेके लिए श्रनुभाष्यश्रपके द्वारा दूसरेका प्रश्न, श्रौर कहाँ श्रपने प्रश्नके [उत्तर रूपमें] श्रनुभाष्यश्रप द्वारा दूसरेका उत्तर [श्राकाशोक्तिके रूपमें कहा जाता है ।] ये दोनों ही 'आकाशोक्ति' [कहलाते] हैं । [श्रनुभाष्यश्रच्-थाका श्रभिप्राय यह है कि उस परकीय प्रश्न या उत्तरको स्वयं कहके सुनाता है श्रर्थात् कहाँ प्रश्नांश श्राकाशाभावित रूप होता है, श्रौर कहाँ उत्तर भाग श्राकाशाभावित रूप होता है । इस 'आकाशाभावित' शब्दका प्रयोग भी नाटकों में पाया जाता है । ] ॥ १।१३।। बारह तथा तेरह संख्याकी इन दोनों कारिकाग्रोंमें नाटकीय भावाभिव्यक्तिकी पाँच श्रङ्गलियाँ दिखाई हैं । इनमेंसे 'प्रकाशम्' तथा 'स्वगतम्' ये दोनों शब्द परस्पर समभ्र शब्द है । जब 'स्वगतम' रूपसे कहींपर कुछ बात कही जाती है तब उसके बाद फिर जहाँपर गोपनीय बात समाप्त हो जाती है श्रौर वक्ता सबको सुनाने योग्य बात कहना प्रारम्भ करता है वहाँपर 'प्रकाशम्' शब्दका प्रयोग किया जाता है । हर जगह 'प्रकाशम्' शब्दका प्रयोग

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काऽ १३, सू० ११ ]

प्रथमो विवेक: [ ३४

नहीं होता है । क्योंकि नाटकका सारा भाग तो सर्वश्राव्य श्रर्थात् 'प्रकाशम्' होता ही है । उसकेलिए हर जगह 'प्रकाशम्' लिखनेकी आवश्यकता नहीं होती है । उस 'प्रकाशम्'के बीच जहाँ कुछ भाग ऐसा श्रा जाता है जिसे वक्ता स्वयं श्रपने तक ही सीमित रखना चाहता है उसके लिए 'स्वगतम्' शैलोका प्रयोग होता है । यद्यपि 'स्वगतम्' शब्दसे श्रपने मनमें कही जाने वाली 'स्वगतं स्वाहृद स्थितम्' बातकी ही ब्राहृदय होती है किंतु वह बात इतने उपर-स्वरसे जाती है कि नाटक देखने वाले सामाजिक उसको सुन सकें । जहाँ कोई ऐसी बात कही जाती होती है जिसका उस समय सामाजिकको भी सुनाना श्रभिप्रेत नहीं होता है वहाँ उस बातको 'स्वगतम्' पदसे न कहकर 'करों एवमिव' लिख कर कानमें कहलाया जाता है । 'स्व-गतम्' के रूपमें कही जाने वाली बात केवल श्रन्य पात्रोंसे गोपनीय होती है । सामाजिकोंसे नहीं । एक बार जब 'स्वगतम्' लिख दिया गया तब वह 'स्वगतम्' के रूपमें कही जाने वाली बात जहाँ-तहाँ समाप्त होती है उसके बाद 'प्रकाशम्' पदका निर्देश करना श्रावश्यक होता है । इसलिए 'स्वगतम्' के समाप्त होनेके बाद 'प्रकाशम्' का उल्लेख नाटकोंमें सर्वत्र किया जाता है ।

गोपनीय बातको कहनेका एक प्रकारका यह 'स्वगतम्' हुश्रा । इसके श्रतिरिक्त दो प्रकार श्रौर भी हैं । एक 'श्रपवारितम्' श्रौर दूसरा 'जनान्तिकम्' । इनमेंसे जब एक व्यक्तिसे छिपा कर श्रन्य व्यक्तियोंपर बातको प्रकट करना श्रभिप्रेत होता है तब उस बातको 'जना-न्तिकम्' नामसे कहा जाता है । 'जनान्तिकम्' शब्दका श्रर्थ ही यह बता रहा है कि बहुतसे 'जनों' के 'ग्रान्तिक' श्रर्थात् समीप जो हो वह 'जनान्तिकम्' कहलाने योग्य है । इसलिए 'जनान्तिकम्' के रूपमें कही जाने वाली बात एक ही व्यक्तिसे गोपनीय श्रौर बहुतसे जनोंके लिए श्राव्य होनेके कारण उनके 'ग्रान्तिक' श्रर्थात् 'निकट' होनेसे 'जनान्तिक' नामसे कही जाती है । इसके विपरीत जो बात बहुतोंसे छिपा कर एक ही व्यक्तिपर प्रकाशित करने योग्य हो उसको प्रकट करनेके लिए 'श्रपवारितम्' शब्दका प्रयोग किया जाता है । यह शब्द भी नाटकों बहुत प्रयुक्त होता है ।

इस प्रकार गोपनीय बातको प्रकट करनेके लिए (१) 'स्वगतम्' (२) 'ग्रपवारितम्' श्रौर (३) 'जनान्तिकम्' इन तीन नाटकीय श्रभिव्यक्ति-शैलियोंका निर्देश किया गया है । इन सभी शैलियोंोंके द्वारा श्रभिव्यक्त किए जाने वाले भाव सामाजिकोंके लिए श्राव्य ही होते हैं । इसलिए इतने जोरसे श्रभिव्यक्त किए जाते हैं कि सामाजिक बिना किसी कठिनाईके उनको सुन सकें । केवल ग्रभिनयकी मुद्राओंके द्वारा उनको गोपनीयताका प्रदर्शन किया जाता है । श्रागे कही जाने वाली श्रथवा पूर्व कही जो बात सामाजिकको भी नहीं सुनानी होती है उसके लिए इनसे भिन्न (४) 'करों एवमिव' कानमें कहलानेकी चौथी शैली श्रौर भी पाई जाती है उसका निर्देश यहाँ नहीं किया गया है । श्रागे १६वीं कारिकामें उसका उल्लेख करेंगे । यह 'एवमिव' वाली शैली नाटकोंमें बहुत कम मात्रामें विरल रूपसे ही प्रयुक्त होती है । एक नाटकमे एक बारसे श्रधिक इसका प्रयोग प्रायः नहीं पाया जाता है । (४) प्रकाशम् वाली पांचवीं शैली मुख्य श्रभिव्यंजना-शैली है । जो सारे नाटकों में श्राव्यत व्यापक रहती है ।१३।

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अथ वृत्तस्य कर्तव्यगुणानाह—

[सूत्र ११]—स्वल्पपदं लघुगदं श्लिष्टार्थान्तररवस्तुकम्

सिन्धु-शृङ्गेन्दु-कालादिवर्णनाधिक्यवर्जितम् ॥१४॥

सुब्धु प्रसन्नार्थं प्रसिद्धशब्दं स्वल्पपं परिसितं पद्यं यत्र । गद्ये न ह्यार्थ: कथममान: सुखावबोधो भवति । लघु ह्यर्थं परिमितं च गद्यं यत्र करकशं बहुसमासं च गद्यं दुर्बोधत्वान्न खेदमुपनयति । श्लिष्टार्थनि पारस्पर्येण प्रधानफलसम्बद्धानि ह्यवसान्तराले प्रस्तुतान्तरालवर्त्तिनी वस्तुनि यत्र । नाट्ये हि तदेवाचान्तरं वृत्तमायोज्यं यत् पारस्पर्येण प्रधानफलसाधकं । यथा रत्नावल्यों प्लवगसम्पात: साररिकानुरागबीजस्य फलकस्य सम्प्राप्तिहेतु: । यथा वासमुद्रे नलावलासे कापालिक-विदूषकतियुद्धं राज्ञोनुरागमूलस्य दमयन्त्याःप्रतीकृतिदर्शनस्य हेतु: । सिन्धुनन्दी समुद्रो वा । सूर्येन्दुभ्यां तदुदयास्तौ गृहीते ते कालो वसन्तादि: प्रभातादिश्च । व्यादिशब्दात् गिरि-मधुपनजलक्रोडादिक । सिन्ध्वादिक हि काव्यकरेहूशान्नि:स्पृहलं न वर्जनीयम् । सफलमप्यकेनत द्वाभ्यां वा कृताभ्याम् । व्यधिकयेन्तु रसमन्तरयति ॥१४॥

नाटकरचनाविषयक विशेष बातें—

ग्रागलो दो कारिकाओंमें ग्रन्थकारोंने नाटककी रचनामें ध्यान रखने योग्य कुछ विशेष बातोंका उल्लेख निम्न प्रकार किया है—

हैं—

[सूत्र ११]—सुन्दर श्रौर थोड़े पदों तथा सरल गद्यसे एवं परस्पर सम्बद्ध ग्रवान्तर [कथा श्रादि] वस्तुओसे युक्त, समुद्र, नदी, सूर्य-चन्द्र [के उदयास्त] श्रौर कालके श्रधिक वर्णनसे रहित [श्रर्थात् स्वल्प वर्णन युक्त नाटककी रचना करनी चाहिए यह बात नाट्य-रचनामें श्रावश्यक-कर्तव्य श्रर्थात् विशेष ध्यान देने योग्य है ।१४।

सुन्दर श्रर्थात् सरल श्रर्थ श्रौर प्रसिद्ध शब्दों वाला, थोड़ा श्रर्थात् परिमित पद्य जिसमें हो [यह स्वल्पपद्यं का श्रर्थ है्र] । क्योंकि गद्यके द्वारा कहा गया श्रर्थ जल्दी समझमें श्रा जाता है । 'लघु' श्रर्थात् मनोहर श्रौर परिमित गद्य जिसमें हो [यह 'लघुगदं' का श्रर्थ है] । करकश श्रौर श्रधिक समासों वाला गद्य कष्टदायक होता है शिलष्ट श्रर्थात् परस्परसे प्रधान फल से ही सम्बन्ध रखने वाली श्रवसान्तर श्रर्थात् प्रस्तुतके बीचमें प्रयुक्त वस्तुएँ जिसमें हों [यह 'शिलष्टार्थान्तररवस्तुकम्' का श्रर्थ है] । नाटकमें उसी श्रवांतर कथावस्तु की योजना करनी चाहिए जो परस्परया प्रधान फलकी साधक हो । जैसे रत्नावली [नाटिका] में बनदरका श्राना, सागरिकाके [उदयनके प्रति] श्रनुरागके सूचक चित्रपटकी प्रातिका हेतु है । श्रथवा समुद्र नलावलासमें कापालिक श्रौर विदूषकका भिड़ना राजा [नल] के दमयन्तीके प्रति श्रनुरागके सूचक दमयन्तीके चित्रके दर्शंका हेतु है । सिन्धुका श्रर्थ नदी श्रथवा समुद्र है । सूर्य श्रौर इन्दु पड़नेसे उनके उदय-ग्रस्तका प्रहण होता है । श्रादि शब्दसे पर्वत, मधुपान, जलक्रिडा श्रादि [का ग्रहण होता है] । केवल काव्यरचनाकी रुचली मिटाने के लिए समुद्र श्रादिका श्रत्यर्थ वर्णन नहीं करना चाहिए । सारांश होनेपर भी एक-दो श्लोकों

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का० १५, सू० १२ ]

प्रथमा विवेक:

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[सूत्र १२]—एकाझिरसन्याझमझदुतान्तं रसोमिमिः ।

श्रलङ्कितमलङ्कार-कथाझैरगलद्रसं ॥१५॥

एको नायकौचित्येनान्यतमो झाङ्गी प्रधानरसो यत्र । झन्ये झाङ्गीरसादपरे रसा झाङ्ग' गौणा यत्र । नाटकं हि सर्वरसं, केवलमेको झाङ्गी, तदुपरे गौणाः: । श्रद्भुत एव रसो झन्ये निर्वेदादयः यत्र । यतः श्रृङ्गार-वीर-रौद्रे: स्त्रीरत्न-पृथ्वीलाभ-शत्रुनाशयसम्पत्तिः । करुणा-भयानक-वीभत्सै: तन्निवृत्तिः । इति इयता क्रमेण लोकोत्तरासम्भाव्यफल-प्राप्तौ भवितव्यमन्यथा । झ्रपि च नाटकस्यासाधारण्याच्चस्तुलाभः फलरचन यदि न कल्प्यते तदानीं क्रियाया: फलमार्त्र 'किश्चित्फलस्येवेति' किं तत्रोपायैर्ध्युत्पादनक्लेशन । 'रसोमिमिः' रसाधिक्येन 'श्रलङ्कितं' स्वविच्छिन्नम् । न नाम रसपर-तथा कथाशरीरमन्यतरयेत् ।

से ही करना चाहिए । क्योंकि लम्बा वरन् रसको तिरोभूत कर देता है ।

इस कारिकामें 'स्वल्पपद्य' शब्द विशेष रूपसे ध्यान देने योग्य है । वैसे 'स्वल्प' शब्द एक साधारण शब्द है । उसका अर्थ 'थोड़ा' होता है । इसलिए 'स्वल्पपद्य' का अर्थ 'थोड़े पद्यां वाला' यह होना चाहिए । किन्तु ग्रन्थकारने यहां उसकी जो व्याख्या की है उसमें उन्होंने 'स्वरूप' पदको सु+अल्प दो भागोंमें विभक्त कर 'सु' का अर्थ 'सुष्टु प्रसन्नार्थ प्रसिद्धशब्द', तथा 'अल्प' का अर्थ परिमित किया है । इसलिए यह शब्द विशेष रूपसे ध्यान देने योग्य है । यहां तक चौदहवीं कारिकाकी व्याख्या समाप्त हो गई । किन्तु यह विषय ग्रभी पूर्ण नहीं हुग्रा है । श्रगली कारिकामें भी इसी विषयको वरन् किया गया है ।

[सूत्र १२]—जिसमें एक रस प्रधान ग्रौर ग्रन्य रस ग्रप्रधान हों ग्रन्थमें श्रद्भुत रस [का निवेश] हो किन्तु रसाधिक्यसे [कथाभाग] विच्छिन्न न होने पावे, साथ ही श्रलङ्कार या कथा श्रादि [के श्राधिक्य] से रसका विच्छेद भी न होने पावे [इस इन सब बातोंका ध्यान रखते हुए ही नाटककी रचना करनी चाहिए] । १५ ।

नायकके श्रौचित्यके श्रनुसार कोई एक रस जिसमें प्रधान हो [यह 'एकाझिरस' का अर्थ है ।] 'ग्रन्ये' श्रर्थात् प्रधान रसे भिन्न रस जिसमें श्रद्भुत श्रर्थात् गौण हो । नाटकमें [वस्तुतः] सारे रस होते हैं किन्तु एक रस प्रधान ग्रौर उससे भिन्न सब गौण होते हैं । ग्रन्थमें श्रद्भुत श्रर्थात् निर्वेदादि-सन्धिमें श्रद्भुत-रस ही होना चाहिए । क्योंकि श्रद्भुतार, वीर, रौद्र रसोंके द्वारा स्त्रीरत्न प्रथवा राज्यादिक लाभ ग्रौर शत्रुके विनाश ग्रादिकी सिद्धि होती है । ग्रौर करुणा, भयानक तथा वीभत्सके द्वारा [प्रतिनायकको] उन [स्त्रीरत्न राज्य ग्रादि प्राप्ति] की निवृत्ति होती है । इस लिए इस प्रकारसे [सभी रसोंका नाटकमें उपयोग होता है ग्रौर]लोकोत्तर ग्रसम्भाव्य फल प्राप्ति [के दिलाने]मे ग्रन्थमें श्रद्भुत रस होना चाहिए । [इसकी सिद्धि के लिए दूसरा हेतु यह भी है कि] यदि श्रसाधारण्य वस्तुकी प्राप्तिको नाटकका फल न माना जाय तो प्रत्येक क्रियाका कुछ-न-कुछ फल तो ग्रवश्य होता ही है । फिर उसके लिए उपायोंका प्रवलम्बन करनेसे क्या लाभ ? रसकी लहरोंसे श्रर्थात् रसके श्राधिक्यसे [जिसकी कथावस्तु] संहित श्रर्थात् विच्छिन्न न हो । रस-प्रधान होकर कनई कथाके स्वरूपको विच्छिन्न न करे ।

१. न किञ्चिच्छत् ।

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श्रलङ्कारः: श्लेषोपमादयः। कथा वृत्तम्। श्रङ्गान्युपचछेपादीनि, श्रङ्गभूताः रसार्च, तैरगालम् श्रत्रुटनं रसो यत्र। त एव श्लेषोपमादयो विषेया ये रसनिष्पत्तिप्रयत्नेनैव निष्पाद्यन्ते। वृत्तान्ते श्रज्ञाने उपचछोपादीनि च तथा निवन्धनीयानि यथा रसनन्तरयन्नित। श्रज्ञभूता रसाश्च तथा नियोज्याः यथा न नाङ्गिनं रसं तिरोदधत इति।१३।४।

अथ वृत्तबन्धविध्यासाह—

[सूत्र १३]—उक्तत्वाद् वच्यमाणत्वाद् भूयः कार्याद् यथोचयते। तत्तु कथम् श्रावयेदू येन न याति पुनरुक्तताम्।१।१६।

उक्तं पूर्वं, वच्यमार्गं पुरः प्रकाश्यमानम्। प्रयोजनवशाद् भूयोरपि यद् वृत्तमुख्यते तत् पुनरुक्ततामयान् पात्रस्य करणं कविः श्रावयेत्। तथा च हश्यते ‘करणं एवमेव’।१।१६।

[सूत्र १४]—गोपुच्छकेशकल्पानि नाट्यवस्तूनि कल्पयेत्।

उदात्ता रङ्कका भावाः स्थापनीयाः: पुरः पुरः।१।१७। गोपुच्छस्य च केशाः: केचित् स्तोकमात्रायणः, केचिन्मध्यावधयः, केचिद् दन्ततल्य।पिनः एवं प्रवन्धवस्तून्यपि। यथा रत्नावलयं प्रमोदोत्सवो मुखसन्धावेच निहितः। एवंप्रयोगे दृष्टो नाट्यप्रबन्धो हि तिरोभववारस्मे। रत्नावली प्राप्त्या-

श्रलङ्कार इलेष उपमादि हि कथा।श्रथार्तात् वृत्तान्त। श्रप्रधान रसोंका प्रहाण होता है। उनसे [श्रथार्तात् इलेषादि श्रलङ्कार, प्रवन्धांतर कथा श्रौर उपक्षेपादि श्रङ्गों श्रथवा श्रप्रधान रसों] के द्वारा जिसमें [प्रधान] रसका विच्छेद न हो। उन्हीं इलेष उपमादिका प्रयोग करना चाहिए जो रस-सिद्धिके लिए जाननेवाले प्रयत्नसे ही सिद्ध हो सकते हों श्रोर कथाभागमें उपक्षेप श्रादि श्रङ्गोंकी रचना इस प्रकारसे करनी चाहिए कि जिससे वे रसको तिरोभूत न कर सकें। तथा श्रङ्गभूत श्रप्रधान रसोंको इस ढंगसे रखना चाहिए कि वे प्रधान रसको तिरोभूत न कर सकें।१।१।

ग्रथ कथाभागकी रचनाकी शिक्षाको कहते हैं— [सूत्र १३]—पहले कहे हुए या श्रागे कहे जानेवाले [कथाभाग] को यदि कायंवश फिर दुबारा कहा जाय तो उसको कवि ‘करणं एवमेव’ लिखकर] काव्यमें कहलावे जिससे वह पुनरुक्त न हो।१।१६।

‘उक्त’ श्रथार्तात् पहले कहा हुया श्रौर ‘वच्यमार्ग’ श्रथार्त् श्रागे कहे जानेवाला जो ग्रथ प्रयोजनवश दुबारा कहा जाता है उसको पुनरुक्तिसे बचानेकलिए कवि पात्रके कानमें कहलावे। जैसा कि नाटकोंमें ‘करणं एवमेव’ [लिखा] देखा जाता है।१।१६।

[सूत्र १४]—नाटककी वस्तुग्रोंकी रचना गोपुच्छके केशोंके समान करे। श्रौर जो उदात्त तथा मनोरञ्जक भाव हों उनको ग्रागे-ग्रागे [मुख्यरूपसे] प्रस्तुत करे।१।१७।

गोपुच्छके बालोंमें कुछ थोड़े दूर तक ही जाते हैं। कुछ बीच तक पहुँचते हैं। श्रौर कुछ ग्रन्त तक फले रहते हैं। इस प्रकार नाटककी वस्तुएँ भी [रखनी चाहिए]। जैसे रत्नावली [नाटिका] में प्रमोदोत्सव मुखसन्धिमें ही समाप्त हो गया है। मुखसन्धिमें सूचित

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दयश्च साररूपाः पदार्थाः ज्ञाने ते इति। उदात्ता उत्तमप्रकृतियोग्या:। ज्ञनुदात्ता स्थायिप ये रक्षकका भावास्ते सकलस्यापि प्रबन्धस्य रसारोदयार्थं पुरः पुरो निवेशनीयाः इति ॥१५॥

[ सूत्र १५ ]—ग्रयुक्तं च विरुद्धं च नायकस्य रसस्य वा । वृत्तं यतस्तत: परित्याज्यं प्रकृत्यनुरोधेन्यथा ॥ १५ ॥

ग्रयुक्तमनुचितं, विरुद्धं विपरीतम्। परित्याज्यमुपेक्ष्यंन्थ्याम्। धीरललितस्य ह्यानुचितं परस्त्रीसम्भोगादि, विरुद्धं धीरोदात्तत्वादि। शृङ्गारस्य प्रत्यनुमालिङ्गन-चुम्बनादि ग्रनुचितं, वीभत्सस्तु विरुद्धः। ग्रनुयेथेति श्रोचिन्येनाविरोधेन वा। यथा नलविलासे धीरललितस्य नायकस्य दोषं विना सधर्मचारिणीपतिस्यागोऽनुचित इति कापालिकप्रयोगेऽपि निवद्धः: एवंमन्यद्रप्य्यहुमिति ॥ १६ ॥

वात्सल्यप्राविका वृत्तान्त निर्वहण-संशके ग्रारसम्भवं [समाप्त हो गया है] ग्रौर रत्नावलीक्री प्राप्ति ग्रादि सारभूत पदार्थ ग्रनुमने [समाप्त हुए हैं]। उदात्त [भाव] ग्रर्थात् उत्तम प्रकृतिके योग्य [भाव मुख्यरूपसे प्रस्तुत करने चाहिए] ग्रौर ग्रनुदात्त होनेपर भी जो रक्षक भाव हैं वे भी सारे नाटकके रसके ग्राधारोहए [पोषक] केलए ग्रागे-ग्रागे [प्रधान रूपसे] रखने चाहिए ॥१७॥

इस कारिकामें ग्रन्थकारने 'करों एवमेव' को पुनरुक्तिके बचानेकेलए प्रयुक्त किए जानेवाले भावाभिव्यक्तिके साधनके रूपमें प्रस्तुत किया है। किन्तु कहीं-कहीं उस समयकी सामा-जिकसे गोष्ट बातको ग्रभिव्यक्त करनेकेलए भी इस मार्गका ग्रवलम्बन किया जाता है। नाटकमे परित्याज्य—

पिछली कारिकाग्रोंमें नाटककी रचनामें ग्रहण करने योग्य विशेष बातोंकी ग्रोर ध्यान दिलाया गया था। ग्रब इस कारिकामें नाटकमे परित्याग करने योग्य बातोंका उल्लेख करते हुए ग्रन्थकार दिखते हैं— ग्रव [नाटकमे] न रखने योग्य [बातोंको] कहते हैं—

[सूत्र १५] जो [बात] नायकके ग्रथवा [प्रकृत] रसके लिए ग्रनुचित या विपरीत हो उसको परित्याग कर देना चाहिए [नाटकमे प्रस्तुत नहीं करना चाहिए]। ग्रथवा ग्रन्य प्रकारसे उसकी कल्पना कर लेना चाहिए [ग्रर्थात् उसको बदल देना चाहिए]। १५।

ग्रयुक्त ग्रर्थात् ग्रनुचित ग्रौर विरुद्ध ग्रर्थात् विपरीत [ग्रन्थको] परित्याज्य ग्रर्थात् उपेक्षा करने योग्य [सम्भना चाहिए]। जैसे धीरललित [नायक] केलए परस्त्रीके साथ सम्भोग करना ग्रनुचित है [इसलिए परित्याज्य है]। ग्रौर धीरोदात्तत्वादि विरुद्ध है। [इस-लिए धीरललित नायकके वर्णनमें उसमें धीरोदात्तके गुण-स्वभाव ग्रादिका चित्रण नहीं करना चाहिए]। ग्रागे रसकेलिए ग्रनुचित तथा विरुद्धके उदाहरण देते हैं] प्रत्यक्ष दिखलाया हुग्रा ग्रालिङ्गन-चुम्बन ग्रादि शृङ्गारके लिए ग्रनुचित, तथा वीभत्स [रसका प्रधान श्ट्टङ्गाररसके] विरुद्ध है। ग्रन्य प्रकारसे [कल्पना कर लेना चाहिए] इसका ग्रर्थ यह है कि] ग्रौचित्यके ग्रनु-

सार ग्रथवा जिससे वह विरोधी न रहे इस प्रकारसे [कल्पना करले]। जैसे नलविलासमें धीरललित नायककेलए बिना दोषके सधर्मचारिणीका परित्याग ग्रनुचित है। इसलिए कापा-लिकके प्रयोगके कारए [नलने दमयन्तीका परित्याग किया है]। इस रूपमें [ग्रन्यथा कल्पना करके] वर्णित किया गया है। इसी प्रकार ग्रन्य [स्थलोंपर भी] समभ लेना चाहिए।

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‘धर्म-कामार्थसत्फलम्’ इति सुगमतया हुपेतद्य ‘साढ़ोपायवशासनिधि’ इत्यस्मा-दङ्कपदं लक्ष्यति—

[सूत्र १६]—श्रवस्थाया: समापत्तिर् छेदो वा कार्ययोगतः । श्रृङ्गः सविन्दु-र्ह श्यार्थः चतुर्यामो मुद्र्ततः ॥ १६ ॥

श्रवस्था वृत्त्यमाणा: प्रारम्भादिका: पड़च । तत्रान्यतमस्या श्रवस्थाया उप-कम-निष्ठपत्तिभ्या या समापत्तिः । अस्माद्वाक्यादन्यवस्थाया कार्यवशन यो वा छेदः-खण्डनं सोड्क़ः । कार्य दूराद्वगमनादि एकाहघटमानं भूयस्वादेकाहशक्याभिनयंक

शकुन्तला नाटकमें दुष्यन्तके द्वारा शकुन्तलाकी विस्मृति श्रौर प्रत्याव्य्यान भी इसी प्रकारकी घटनाएं हैं जिनकी ग्रन्यथा कल्पना द्वारा कविने ग्रपने नायकके चरितको चमका दिया है। महाभारतमें जहाँसे कि शकुन्तलाका श्राभ्य्यान लिया गया है—दुष्यन्त एक श्रात्यन्त लम्पट प्रकृतिक राजा है। जो मद्यकरके समान नऐे-नऐे पुष्पोंका रसास्वादन करनेका व्यसनी है। इसी प्रसङ्गमें उसने कण्वमुनिके श्राश्रममें उनकी श्रात्मप्रतिष्ठमें पहुँचकर शकुन्तलाके साथ सब कुछ किया श्रौर उसको श्रपने महलमें बुलानेके वचन देकरभी भूल गया। पर कालिदास ने इसको दुष्यन्तका स्वाभाविक ब्यापार न मानकर दुष्यन्तके श्रापको उसका कारण माना है। कालिदासने:ग्रथ्मनी इस प्रक्रियाद्वारा इसके कारण रूपमें दुष्यन्तके श्रापकी कल्पना करके दुष्यन्तको न केवल लम्पटके इस होससे ही वचा लिया है। बल्कि शकुन्तलाका प्रत्याव्य्यान करवाकर उसे उच्चकोटिके श्रादर्शोचरित्रके रूपमें चित्रितकर उसको धीरोदात्त नायकका रूप प्रदान कर दिया है ॥ १६ ॥

श्रृङ्गलचया— पांचवीं कारिकामें 'व्यात्यधराराजचरित' श्रादिसे नाटकका लक्षण किया गया था। उसीकी विशेष ब्याख्या श्रागे चल रही है। इसमेंसे केवल 'व्यात्यधराराजचरित' इस प्रथम पदकी ही विस्तृत विवेचना १६ वीं कारिकातक की गई है। उस नाटक-लक्षणमें दूसरा पद ‘धर्मंकामार्थंसत्फलम्’ यह है। परन्तु यह पद बहुत सरल है। इसलिए इसकी श्रलगसे विशेष ब्याख्या न करके, श्रागे 'साढ़ोपायवशासनिधि' इत्यादिकी विशेष ब्याख्या श्रागे प्रारम्भ करते हैं। इसमें सबसे पहिला 'श्रृङ्ग' पद है। इसलिए इस कारिकामें 'श्रृङ्ग' का लक्षण करते हैं।

‘धर्मंकामार्थंसत्फलम्’ यह सरल [पद] है। इसलिए उसको छोड्क़र श्रागे साढ़़ोपा-यवशासनिधि' इत्यादि [ग्रगले विवरण] में से [प्रथम] 'श्रृङ्ग' पदका लक्षण करते हैं—

[सूत्र १६]—[कार्यकी प्रारम्भ श्रादि रूप] प्रवस्थाको समापन्न प्रथवा कार्यवश श्रृङ्गः [प्रसामाप्त प्रवस्ताका भी] विच्छेद [जो श्रागे श्रृङ्गकी कथाके बीज ग्रथवा] विन्दुसे मुक्त श्रौर [दो घड़ी श्रर्थात् ४८ मिनटके] 'मुहूर्त्त' से लेकर चार प्रहर [बारह घण्टे] तकके दर्शनीय प्रयंसे मुक्त हो वह 'श्रृङ्ग' कहलाता है [यह श्रृङ्गका लक्षण हुग्रा] । १६ ।

श्रवस्था [पदसे] श्रागे कहे जाने वाली प्रारम्भ [यतन प्राप्त्यादि] श्रादि रूप पांच हैं। उनमेंसे किसीभी एक श्रवस्थाका श्रारम्भ श्रौर पूर्ष्णता द्वारा समापित [श्रृङ्गकी नियामिका होती है। उसको श्रृङ्गमें दिखलाना चाहिए] । प्रथवा प्रसामाप्त श्रवस्थाका भी कार्यवशले जो बीचमें विच्छेद श्रर्थात् समाप्ति कर दी जाय वह [भी] श्रृङ्ग [का नियामक] है। ‘कार्य’ पदसे यहां

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का० १६, सू० १६ ] प्रथमो विवेक: [ ४१

वा। तद्रशादवस्थाया अज्ञत्नराले यश्छेद: क्रियते सोऽप्यकृत इत्यर्थ:। एतावदृक्-लक्षणम्। सबिन्दुरिति सहु विन्दुना वर्तते। विच्छिन्न॒न्नवसृतार्थ॑स्य उत्तर।डश्र्य)नुसन्धानात्मा वृत्तसन्धेप उत्तरत्र विस्तार्यमाणस्त्वाहुदके तेलाबिन्दुरिव 'बिन्दु:'। पूर्वो-त्तरयोरङ्कयोः समन्धार्थंवं मा भूदिति पूर्वोऽक्ष्यस्यान्ते विन्दुनिबन्धनीय:।

एक दिनमें न हो सकने वाले दूर-दूराश्रित ग्रन्थ यदि स्यथा बहुत लघु होतेके कारण एक दिनमें जिसका ग्राभिनय किया जाना सम्भव न हो [उसका ग्रहण होता है]। उसके कारण जो प्रवस्थाका वीचमें हि विच्छेद कर दिया जाता है वह भी 'श्रृङ्गार' [का नियामक] है यह श्राभि-प्राय है। इतनाही ग्रङ्गका लक्षणा है।

[कारिकाके] 'सबिन्दु:' [प्रथयात:] बिन्दुसहित। [पूर्व शृङ्गमें] विच्छिन्न विस्तृत ग्रर्थ-तैलबिन्दुके समान 'बिन्दु' [कथलाता] है। शृङ्गे विस्तार पानेके कारण तैलबिन्दुके समान 'बिन्दु' [कथलाता] है। शृङ्गे-पोछे वाले शृङ्ग परस्पर ग्रसम्बद्ध न हो जायँ इसलिए पूर्व शृङ्गके ग्रन्थमें 'बिन्दु' की रचना करनी चाहिये

श्रंगला इलोक 'तापसवत्सराजचरित' के तृतीय शृङ्गके ग्रन्थमें दिया गया है। इलोकमें मुख्य रूपसे वृक्ष ग्रौर छायाका वर्णन किया है। परन्तु उसमें नायक-नायिकाके व्यवहारका समारोप कर एक प्रकारका विशेष चमत्कार उत्पन्न कर दिया गया है। प्रात:कालके समय सूर्यमण्डल बिल्कुल क्षितिजका स्पर्शं-ससा करता हुश्रा होता है। इसलिए उस समय वृक्षोंकी छायाका परिमारा बहुत लम्बा होता है। ग्र्रथात छाया बहुत दूर तक फैली होती है। उसके बाद ज्यो-ज्यों सूर्य ऊपर चढता जाता है त्यों-त्यों वृक्षकी छाया छोटी होती जाती है। ग्र्रन्तको दोपहरके समय वह बिल्कुल वृक्षके नीचे इकट्ठी हो जाती है। श्रौर वृक्ष उस सारीकी-सारी छायाको ग्रपने शरीरके भीतर समाविष्ट कर लेता है

वृक्षच्छायाकी इन स्थितियोंको कविने मानिनी नायिकाके व्यवहारके सदृश दिखलाया है। मानिनी नायिका जैसे ग्र्रारम्भमें प्रत्यधिक मान करके पतिसे रुष्टकर दूर चली जाती है इसी प्रकार वृक्षकी छायामें ग्रारम्भमें ग्रर्थात प्रात:कालके समय दीर्घ परिमाराको प्राप्त कर दूर तक फैल जाती है। फिर जैसे मानिनी परचातापसे पीडित होकर लाघवको प्राप्त होती है ग्र्रथीत मानको छोड़कर पतिसे पास ग्राती है इसी प्रकार ऊपर उठते हुए सूर्यका सन्निकाप वृक्षकी छायाको ग्र्रन्तत: छोटा बना देता है। ग्रौर ग्रन्थमें जब नायिका सर्वात्मना नायककी वशवर्तिनी होकर उसकी गोदमें ग्रा जाती है तब नायक उसको जैसे ग्रालिङ्गन-पाशमें बाँध लेता है इसी प्रकार मध्याह्नमें वृक्ष प्रियाके समान ग्रपने ही भीतर समर्पिण्डित छायाको सर्व-रमना ग्रथना लेता है। यह इस श्लोकका भाव है।

इस प्रकार इस श्लोकमें कविने वृक्ष ग्रौर छायाके व्यवहारपर नायक-नायिकाके व्यवहारका ग्रारोप कर जिस व्यवहारको सूचित किया है उसी प्रकारका व्यवहार नाटकके चतुर्थ शृङ्गमें नायक-नायिकाका पाया जाता है। इसलिए श्रग्रले शृङ्गके विषयका सङ्केतमें प्रतिपादक होनेसे इसको 'बिन्दु' के उदाहरणा रूपमें यहाँ प्रस्तुत किया गया है। 'बिन्दु' पदका प्रयोग यहाँ 'तैल-बिन्दु' के साहश्यसे किया जा रहा है। तेलका छोटासा बिन्दु जैसे पानीमें पडनेपर बडे ग्राकार में फैलता जाता है इसी प्रकार 'बिन्दु' रूपमें कथित ग्रर्थ ग्रग्रले शृङ्गोंमें विस्तृत रूपसे फल जाता है। इसलिए उसको 'बिन्दु' कहते हैं। इसको उदाहरणा ग्र्रगे देते हैं —

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यथा तापसवत्सराजे—

श्रादौ मानपरिग्रहेऽपि गुरुप्रे दूयं समारोपितां

पश्चात्तापभरेण तानवकृता नीतां परं लाघवम्‌।

उत्सङ्गान्तरवर्तिनीमवुगमात्‌ सम्प्रेषिताझीइमां

सर्वाङ्गप्रसृतं प्रियामिव तनुः शृङ्गारमालम्बते ॥"

इति वृत्तियुक्तिसमुतौ उत्तरार्धकथानुसन्धायको बिन्दुः।

यथा वा नलविलासे चतुर्थे स्वयंवराङ्के नेपथ्ये वन्दी—

विनयस्याभिनवोदयेऽपि श्रियं राज्ञि प्रतापोद्भ्रटो

व्यतस्य ध्यसनीव धूसरकरः सन्त्रासयदाशास्थितः ।

निद्रायहललोचनान्‌ कमलिनी सन्त्यज्य मध्येऽवन्तं

क्रामत्येव मृदङ्गमात्रविभवो देशान्तरं गोपतिः ॥इति॥

जैसे तापस वत्सराज चरितमें—

प्रारम्भमें [छाया-पक्षमें प्रातःकाल और नायिका-पक्षमें मानके श्राविदमे] प्रबल मान

[परिमाण और नखरों] को पहुँचा करके दूर तक फैली हुई [छाया पक्षमें दूर तक फैली हुई

श्रौर नायिका पक्षमें नायकसे दूर भागी हुई], बादको तनुताको प्राप्त कराने वाले सन्ताप

[नायिका पक्षमें परवशाताप और छायापक्षमें सूर्यके चढाव] के श्राधिक्यसे श्रातयन्त लघुताको

प्राप्त हुई, इसलिये [भयभीत होकर श्रातत] लताकर श्राध्वान्त समेटकर गोदमे समाई त्रिपथके समान

छायाको वृक्ष सब श्राङ्गोंसे प्रेम पूर्वक पहुँचा कर रहा है॥

यहाँ तृतीय श्रङ्ककी समाप्तिमें श्रागले श्रङ्कका सम्बन्ध जोड़ने वाला 'बिन्दु' रखा

गया] है ।

अथवा जैसे नलविलासके स्वयंवराङ्के नामक चतुर्थ श्रङ्क [के ग्रन्थमें] में नेपथ्यमें

वन्दी [सन्ध्याकालमें] सूर्यास्तका वर्णन करता हुन्श्रा निम्न इलोक कह रहा है । इस इलोकमें

इलेखसे नलकी प्रवस्थाको भी वर्णन किया गया है.]

[यहाँ 'गोपति' शब्द श्लिष्ट है। उसके दो अर्थ होते हैं एक राजा और दूसरा सूर्य ।

गो पृथिवीका नाम है। उसका पति श्रर्थात्‌ राजा नल । श्रौर 'सूर्य' पक्षमें 'गवां किरसानां

पति: गोपति सूर्यदेव:' इसी प्रकार प्रथम पदमें श्राया हुन्श्रा 'राज्ञि' राजा पद भी श्लिष्ट है ।

उसका एक श्रर्थ नलका विरोधी राजा, श्रौर दूसरा श्रर्थ चन्द्रमा है । ग्रभी जिसका उदय

हुश्रा है इस प्रकारके राजा [ग्रर्थात्‌ नल पक्ष श्रप्रेन विरोषी राजाको] यह श्रर्थ होता है । श्रौर

सूर्य पक्षमें चन्द्रमाको] श्रप्रनो लक्ष्मी [नल पक्षमें धन-सम्पत्ति और सूर्य पक्षमें तेज] सेकर

स्वयं प्रतापरहित, जुद्रा खेलनेके व्यसनी [जुगारी] के समान मलिन किरयों [जुगारी पक्षमें

करका श्रर्थ हाथ होगा] वाला बनकर, श्रौर [सन्त्रासयदाशास्थितः: सूर्यके पक्षमें उसके

प्रास्तोंमुख हो जानने श्राशा प्रर्थात्‌] दिशाओंकी मर्यादाको विलोप करता हुन्श्रा [जुग्रारी पक्षमें

जिसकी श्राशाकी स्थिति बिल्कुल समाप्त हो गई है ग्रर्थात्‌ श्रप्रनी जोतसे बिल्कुल निराश हो

चुका है इस प्रकारका 'गोपतिः' श्रर्थात्‌ राजा नल श्रौर] सूर्य [दोनों ही 'निद्रायहललोचनां'

सूर्य पक्षमें] जिसकी पलकें-रुप श्रोंखें मिची जा रही है [इस प्रकारकी कमलिनीको श्रौर नल

पक्षमें] सती हुई इसमस्तिको। सूर्य पक्षमें मध्येऽवन्तं] जलके वीचमें श्रौर नल पक्षमें जंगलमें]

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का० १९, सू० १६ ]

प्रथमो विवेक: [ ४३

इदं च पद्मुपयोगापेक्षं । तेन सर्वैरुपकपर्यन्तादेशु, एकाङ्गेषु च रूपकेषु, सम्वकारादिषु पु च उपयोगाभावाद् बिन्दोरनिबन्धः ।

छोड़कर केवल श्रृङ्गाराश्रका एकदेश [प्रथमतः पञ्चम भाग] हो जिसका विभव रह गया है [नल पक्षमें 'ग्राम्य-खण्डमात्रविभवः', जिसके पास केवल एक वस्त्र मात्र ही सम्पत्ति शेष है] इस पक्षमें 'ग्राम्यो नाम नृपो नलः' [देशान्तरफो 'श्रथिन्तु सूर्यं पक्षमें प्रकारका 'गोपति:' [प्रथिन्तु सूर्यं ग्रोर नृपो नलः] देशान्तरफो 'श्रथिन्तु सूर्यं पक्षमें प्रकारका 'गोपति:' [प्रथिन्तु सूर्यं ग्रोर नृपो नलः] पाताल लोकको ग्रोर नल पक्षमें अन्य स्थानको] जा रहा है।

यह श्लोकका साधाररर्थ है । इसमें वैतालिक सन्ध्याकालीन सूर्यास्तके हृदयका ध्येयर कर रहा है । पर उसमें श्रागले श्रदृकमें दिखलाई जाने वाली घटनाका बीज-रूप

से बड़ा सुन्दर चित्रण किया गया है । यह चतुर्थ श्रदृक स्वयम्बरादृक है । इसमें नलका दमयन्तीके साथ विवाहका दृश्य दिखलाया गया है । श्रागले श्रदृकमें नलकी यौत्कीड़ा ग्रादिका वृत्तान्त

नल यौत्कीड़ामें राज-पाट सब कुछ हारकर वनमें चले जाते हैं । दमयन्ती भी उनके साथ नाती है । राजा नल वहाँ भूखसे व्याकुल होकर श्रापनी स्थितिसे बिल्कुल निराश हो जाते हैं

ग्रोर ग्रागन्तमें वनमें जब दमयन्ती सो जाती है तो उसको श्रकेला छोड़कर कहीं ग्रोर भाग जाते हैं । इस सब घटनाक्रमको श्रागले श्रदृकमें दिखलाया गया है । किन्तु यहाँ कवि ने वैतालिकके

द्वारा किए जाने वाले चतुर्थ श्रदृकके इस ग्रन्थिम इलोकमें उस सारे घटनाक्रमको श्लेष द्वारा बड़े सुन्दर रूपमें व्यक्त कर दिया है ।

नल जुएमें हारकर नवीन सम्पत्ति प्राप्त करने वाले विजयी राजाको श्रपनी सम्पत्ति अर्पंगा कर ग्रोर स्वयं प्रताप-रहित होकर द्यूतव्यसनीके समान मलिन हाथ ग्रोर सम्पूर्णं

ग्राश्रमोंका परित्याग कर श्रत्यन्त निराश होकर केवल एक कपड़ेका टुकड़ा ही जिनका वैभव शेष रह गया है इस प्रकारके गोपति श्रथंतः पृथिवीपाल बनकर 'निद्रायहिलोल्लोचना' कमलिनी-

के समान दमयन्तीको वनमें श्रकेला सोता हुग्रा छोड़कर किसी ग्राम्य देशको चले जाते हैं यह

ग्रन्थ भी इलेष द्वारा इस श्लोकसे सूचित किया गया है । इस प्रकार संक्षेपमें श्रागले श्रदृककी कथाका सूचक होनेसे यह श्रदृकके ग्रन्थमें पढ़ा हुग्रा यह श्लोक 'बिन्दु' का सुन्दर उदाहरण

वन पड़ा है ।

इस प्रकार 'सबिन्दु:' पदसे, पूर्वं श्रदृकके ग्रन्थमें श्रागले श्रदृकमें श्राने वाली कथाका सम्बन्ध सूचित करनेकेलिए 'बिन्दु:' की रचना श्रावश्यक बतलाई गई है । जिस प्रकार पानीमें

पड़ा हुग्रा तेलका बिन्दु फैलकर विस्तीर्ण हो जाता है इसी प्रकार श्रदृकान्तमें 'बिन्दु' रूपसे

जिस कथा-भागका संकेत किया जाता है वह कथा-भाग श्रागले श्रदृकमें विस्तृत होकर फैल जाता

है । इसीलिए श्रदृकान्तमें किए जाने वाले इस संक्षिप्त संकेतकेलिए यहाँ 'बिन्दु' शब्दका प्रयोग

किया गया है । यह बिन्दु प्रत्येक श्रदृकके ग्रन्थमें ग्रावश्यक हो यह ग्रापेक्षित नहीं है ग्रपितु

उपयोगकी ग्रपेक्षासे हो उसकी रचना की जाती है । जहाँ उसका उपयोग नहीं हो सकता है

वहाँ उसकी रचना श्रावश्यक नहीं है । जैसे नाटक श्रादिके ग्रन्थिम श्रदृकमें बिन्दुका कोई उप-

योग नहीं हो सकता है क्योंकि उसके ग्रागे तो फिर कोई नया श्रदृक ग्रनाना ही नहीं है जिसमें

उसका विस्तार हो सके । इसीलिए ग्रन्थिम श्रदृकमें 'बिन्दु' का सन्निवेश नहीं किया जाता है ।

इसी प्रकार एकाङ्की नाटकोंमें भी दूसरा कोई श्रदृक न होनेसे 'बिन्दु' का कोई उपयोग नहीं

होता है । इस बातको श्रागे लिखते हैं—

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‘हश्यार्थ:' इति हश्याऽ, रुजकत्वाद् दर्शनीयाऽ, श्रथो नायकचरितोपभोगयत्र। चरिताश्रयालङ्कारे हि प्रेयस्कार्यामनुयुप्तिः। सम्भोगासाच्चात्कारे च किमनेन मद्नाक्लेशेनैति वरस्य स्यात। शापाद्वामनविवाहाद्योडपि रुजकत्वात् साच्चात्कार्यो। यथा उवेश्याः शापोद्धवस्य लताभावस्य नाशः। हश्याविनाभाविनो सूच्यो-उद्यो न्यप्ययौ स्वचिच्चिद् भवतः । एतदृक्षस्य स्वरूपम् ।

यह [बिन्दु] पद उपयोगकी दृष्टिसे हो रखा गया है । इसलिए सारे रूपकोंके ‘प्रतिम' ग्रहोंमें, एकरूपकमें श्रौर समवकार श्रादिके श्रादिभोंमें उपयोग न होनेसे ‘बिन्दु' की रचना नहीं की जाती है।

ग्रन्थके लक्षणोंमें ‘सबिन्दु:' के बाद श्रागला ‘हस्यार्थ:' पद है । इसलिए श्रागले प्रकरणमें उसकी व्याख्या करते हुए लिखते हैं—

‘हस्यार्थ:' इससे [यह प्रभिप्राय है कि] हस्य प्रय्थात् मनोरञ्जक होनेसे देखने योग्य श्रर्थ प्रय्थात नायकके चरित श्रौर उपभोग जिसमें हों [बह ‘हस्यार्थ:' हुग्रा । इसमें चरित श्रौर उपभोग दोनोंका साक्षात्कार ग्रादिभक है । क्योंकि] चरितका साक्षात्कार न होनेपर देखनेवालोंको [रामादिवत् प्रवर्त्तनीयं न रावणादिवत् इस प्रकारकी] शिक्षा प्राप्त नहीं हो सकती है । श्रौर सुन्दर भोगका साक्षात्कार होनेपर [नायकके द्वारा उठाए गए] इस महान् क्लेशसे क्या लाभ हुग्रा ऐसा ग्रानुभव होनेसे [नाटक] नीरस हो जायगा । श्रौपिक निवृत्ति श्रौर विवाह ग्रादि भी रुजक होनेसे [ग्रङ्कके भीतर] साक्षात् दिखलाने चाहिये । [श्रथवा

उनका दिखलाना निषिद्ध नहीं है।] जैसे [विक्रमोर्वशीयमें] उर्वशीके शापवशा प्राप्त हुए लता-भावकी निवृत्ति [दिखलाई गई] । हस्यके श्रादिभूत होनेसे ‘श्रृङ्ग्य' श्रौर ‘हास्य' ग्रथ्थ भी कहीं [ग्रङ्कमें] हो सकते हैं । यह ग्रङ्कका स्वरूप है ।

यहाँपर ग्रन्थकारने ‘एतदृक्षस्य स्वरूपम्' कहा है । इसके पूर्व ३६ पृष्ठ पर एतद्-वद् द्वूलक्षणोंमें यह लिख चुके हैं । श्रथवा तद्वद्लक्षणोंमें श्रौर दूसरी जगह ‘एतदृक्षस्य स्वरूपम्' यह लिखा है । इस दो प्रकारके लेखका विशेष प्रयोजन है । लक्षणा दो प्रकारके माने गए हैं एक तटस्थ-लक्षणा श्रौर दूसरा स्वरूप-लक्षणा । जो स्वरूपके श्रन्तर्गत न होकर भी ग्रन्थसे भेद कराने वाला हो उसको ‘तटस्थ-लक्षणा’ कहते हैं । श्रौर जो स्वरूपके श्रन्तर्गत होकर ग्रन्थसे व्यावृत्ति कराता है वह ‘स्वरूप-लक्षणा’ कहलाता है । जैसे ‘जन्मादिस्य यत:' जिससे जगत्का जन्मादि ग्रथ्थात् उत्पत्ति, स्थिति प्रलय होता है वह ब्रह्म या ईश्वर । इसमें जगत्का जन्मादि ईश्वर या ब्रह्मके स्वरूपमें ग्रन्तर्गत न होनेपर भी व्यावर्त्तक होनेसे ‘तटस्थ-लक्षणा’ कहलाता है । श्रौर ‘सच्चिदानन्द ब्रह्म' श्रादि ब्रह्मके ‘स्वरूप लक्षणा' होते हैं । इसी प्रकार यहाँ ‘श्रवस्थाया: समाप्तिर्वा छेदो वा कार्योऽथवा काव्योऽथवा:' यह ग्रङ्कका ‘लक्षणा’ श्रथवा तटस्थ-लक्षणा' है श्रौर ‘सबिन्दु: हस्यार्थ:' यह ग्रङ्कका 'स्वरूप' श्रथवा स्वरूप-लक्षणा है । इस प्रभिप्रायसे ये दोनों पद लिखे गए हैं ।

इस प्रकार ‘ग्रङ्क' के लक्षणा तथा स्वरूपका प्रतिपादन करनेके बाद श्रागले चरणमें ग्रन्थकार ‘ग्रङ्क' के काल-परिमाणका निर्देश करते हैं । इसमें एक मुहूर्त्त श्रथवा दो घड़ी [४८ मिनट] से लेकर चार पहर [१२ घण्टा] तक ग्रङ्कका काल-परिमारा बतलाया है।

ग्रथवा एक ग्रङ्कका विस्तार उतना ही होना चाहिए जिसका ग्रभिनय इस समयके भीतर

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का० १६, सू० १६ ] प्रथमो विवेक: [ ४५

'चातुर्यामो मुहूर्त्तत:' इति मुहूर्त्तोदारस्य यामचतुष्टयम् यावत्त् । सर्वोऽपकर्षेषु घटिकाद्वयाभिनेयः । सर्वोऽत्कर्षेषु त्रिषष्टघटिकाभिनेयः । मुहूर्त्ताद्‌व्यपकर्षे प्रयोग-परिपूर्त्तञ्चैव, यामचतुष्ट्याद्‌व्यधिक्ये स्वावश्यककर्मविरोधेन च प्रेक्ष्यप्रयोगवत्त्वां वैरसस्य स्यात् । एतद्‌द्वयस्यापकृष्टमध्यमोत्कृष्टं कालमानमिति । वृद्धैर्‌दृष्टसम्प्रदायातेन तद्‌लक्षणैर्‌वृद्धमागमिकैर्‌नियमैर्‌निपुणतरमुपपद्यते । ये तु वृद्धसम्प्रदायमवलम्ब्य ग्रह्ममध्ये डङ्यवस्थां समापर्यन्त तन्मतसंग्रहार्थमुत्तरार्धमेव लक्ष्यते । छात्र पुनर्‌डङ्य नियमकारमनुसन्धेयमिति ॥१६॥

नाटकोंकी ग्रह्‌ संख्या का विषय

इस कारिकामें ग्रह् के लक्षणसे ग्रहोंकी संख्याके निश्चयकी बात कही है । उसका यह अभिप्राय है कि ग्रवस्थाकी समाप्ति एक ग्रह्ममें हो करनी चाहिए, प्रथवा कार्यवश उसका विच्छेद जहाँ होता है वह ग्रह् कहलाता है । अर्थात् ग्रह्‌की रचना ग्रवस्थाओंके श्राधारपर की जाती है । नाटकमे प्रस्तुत कार्यकी १ आरम्भ, २ यत्न, ३ प्राप्त्याशा, ४ नियताप्ति श्रौर ५ फलागम ये पाँच ग्रवस्थाएँ मानी गई हैं । उनका वर्णन श्रागे होगा । इनमेंसे सामान्यतः एक-एक ग्रवस्थाकी एक-एक श्रंकमें पूर्या‌ंत होनेपर नाटककी समाप्ति पाँच श्रंकोंमें हो जानी चाहिए । यदि किसी ग्रवस्थाकी पूर्तिमें दो श्रंक लग जाँय तो नाटकके ६ श्रंक हो सकते हैं । दो ग्रवस्थाओंमें दो-दो श्रंक लग जाने पर सात या पाँचों ग्रवस्थाओंमें दो-दो श्रंक लग जाने

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स्वथाड्कस्य लङ्घपशेषं संख्यापरिमाणमाह—

[ सूत्र १७ ]—ग्रावश्यकाविरोधेर्थः स्वल्पपात्रः सनिग्रहः ।

पश्चासं रुद्धोपकल्पेन दशासंरुद्धः प्रकर्षतः ॥२०॥

एकत्रिमित्तकृद् तावदान्तराले बहूनि कार्याणि न निवन्धनीयानि । यत्रापि निवन्ध्यन्ते तत्राप्यावश्यकस्य सन्ध्यावन्दनभोजनादेरविरोधेन । सुद्धु कार्योपयोगीनि

स्वल्पपात्राणि सन्ध्यया पात्राणि यत्र । तत्रोल्लर्षे दश, मध्यमस्यास्तु षट्, श्रपकर्षेण

चत्वारि पञ्च वा पात्राणि । स्वाधिक्ये तु पात्रवशमेवें श्रभिनयचतुत्थं प्रेक्ष्यकार्यम्‌

अमिभावनीयं स्थानं । प्रभृतपुरुषसाध्यं पवेशोत्सरख्यादि न रङ्गे दर्शनीयमित्युवर्तं भवति ।

समवकारादौ तु बहुपात्रस्त्रेदपि विशेषोपादानान्न दोषः । 'सनिग्रहः' इति निगेमो

रङ्गप्रविष्टपात्राणां स्वकार्योक्षि कुल्वा निष्क्रमो जवनीय तिरोधानम्‌।

पर आधिकसे-ग्रधिक दस श्रङ्क तक रखे जा सकते हैं । इस प्रकार नाटकोंका कमसे-कम पाँच

श्रङ्क प्रधानके-ग्रधिक दस श्रङ्कोंके रखनेका विधान किया गया है । वह सब विधान श्रव-

स्थाओंको विमाजनका श्राधार मानकर ही किया गया है । इस बातका प्रतिपादन प्रगली

कारिकामें करते हैं—

[सूत्र १७]—ग्रावश्यक [सन्ध्यावन्दन-भोजन श्रादि कार्यो] में बाधा न डालनेवाला

जिसका [ग्रभिनेय] ग्रर्थ है [इस प्रकारका], सुन्दर श्रौर परिमिति-संध्या वाले पात्रोंसे युक्त,

तथा [ग्रन्थमें सारे पात्रोंके] बाहर चले जाने [को दिखलाने] वाला कमसे-कम पाँच संख्या

श्रौर श्राधिकसे-ग्रधिक दस संख्या युक्त श्रङ्क होता है । [यह १६—२० दो कारिकाओंको मिला

कर श्रङ्कका लक्षण बनता है ।] २० ।

एक श्रङ्कमें बीचके बहुतसे कायोंका समावेश नहीं करना चाहिए । जहाँ कहीं करना

ही पड़े वहाँ भी श्रावश्यक सन्ध्यावन्दन भोजनादि कायोंमें बाधा न ग्राने देना चाहिए ।

सुद्ध, सुन्दर श्रथात् कायमें उपयोगी श्रौर संख्याको दृष्टिसे 'ग्रल्प'-कम-पात्र, जिसमें हो [वह

'स्वल्पपात्रः' होता] । इसमें [ग्रथात् प्रत्येक श्रङ्कमें]ग्राधिकसे-ग्रधिक दस, मध्यम रूपमें ग्राठ श्रौर

कमसे-कम चार या पाँच पात्र होने चाहिए । श्रङ्किक [संख्या] होनेपर तो पात्रोंकी

भीड़-भाड़के कारण ही चारों प्रकारके श्रभिनयों देखनेवालोंको ठीक तरहसे नहीं दीख सकेंगे ।

इसका यह श्रप्रकाश भी हुग्रा कि बहुत श्रधिक पुरुषोंके द्वारा साध्य पवंतका उठाना श्रादि कार्य

रङ्गभूमिमें नहीं दिखलाने चाहिए । समवकार श्रादिमें तो श्रधिक पात्र होनेपर भी विशेष

[ग्रभिनयों] का ग्रप्रकाश हो सकने [में बाधा न होने] से दोष नहीं होता है । [ग्रथात् समवकार

ग्रादिमें दससे श्रधिक पात्र भी श्रङ्कमें रखे जा सकते हैं] । 'सनिग्रं', ग्रथात् रङ्गमें ग्राए हुए

पात्रोंका ग्रपने कायोंको करके बाहर चला जाना ग्रथवा जविनिकाके पीछे चला जाना [जिसमें

हो वह श्रङ्क कहलाता है] ।

समवकारग्रादिमें दससे श्रधिक पात्र होनेपर भी 'विशेषोपादानान् दोष:' श्रभिनयके

विशेष रूपोंका ग्रहण करनेमें कोई दोष नहीं होता है यह बात जो यहाँ कही है उसका कारण

यह है कि समवकारमें देवताओं ग्रथवा देत्यादिका प्रभिनय दिखलाया जाता है इसलिए उसका

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का० २०, सू० १७ ] प्रथमो विवेक: [ ४७

'पञ्चसंख्या:' इति व्यवस्थितस्तोक्ततायां पञ्चाङ्गदृशा । सर्वोऽत्र पञ्चधा दशा । मध्यमवृत्त्या षट्, सप्त, अष्टौ, नव 'इत्यपञ्चुसंख्याया भेदाः । यदा एकैकस्यामवस्थायां एकैकदृश- स्तदा पञ्चाङ्गाः । यदा तु कार्यवशेन कार्यवस्था उपक्रमोपसंहाराभ्यां छिद्यते तदा षट् । एक उपक्रमाङ्गः, एक उपसंहाराङ्गः । अथपरावस्थाचतुष्टयस्य तु चतुवारः । एवं कृत्वा अष्टौ नव चै । सर्वावस्थाभेद तु दशेभि । यदापि कार्यबहुत्वात् कार्यवस्था द्विधा भवेत् तदाप्युक्तरष्टो दशैव । एकस्याः काव्याश्रितदशकङ्करणात् । एकस्यां चावस्थायामद्रुतं हृश्यते । यथा वेङ्गीसंहारे गर्भसंन्धौ प्राप्त्याशावस्थालंकृते तृतीय-चतुर्थ-पञ्चमे दृशाः । न्यूनत्वे तु द्वादशानामेकाङ्ग- तापि स्यात् । तथा च पञ्च सन्ध्यङ्गो नोपसंहियेरन् । श्राधिक्ये पुनरनियतसंख्यत्वं स्यादिति मध्यमया वृत्तिराश्रीयते । नाटिका-प्रकरणयोस्तु चतुरङ्गवम् । कस्याश्चिद्व- स्थाया व्यवस्थान्तरे मिश्रणादिति ॥२०॥

मण्डप भी सामान्य नाट्य-मण्डपने बहुत बड़ा बनता है इसलिए उसमें श्रभिनय ग्रव्यवस्थित नहीं होता है । मानव-चरितका श्रभिनय प्रदर्शित करनेकेलिये जो मध्यम मण्डप बनता है उसमें श्रधिक पात्रोंके श्रागमन होनेका स्थान हो जाता है । इसलिए नाटकादिमें उस पात्रोंके एक साथ रङ्गभूमिमें श्रागमेका निपेध है । 'पञ्चाङ्गदृशा' 'पांच ग्रङ्ग वाला' इससे कमसे कम पांच ग्रङ्ग हों [ यह श्रभिप्राय है ] । सबसे श्रधिक वस [ग्रङ्ग हो सकते हैं ] मध्यम दशामें छः, सात, ग्राठ या नौ तक ग्रङ्गोंकी संख्याके भेद हो सकते हैं । जब [पाँचों ग्रवस्थाग्रोंमेंसे] एक-एक ग्रवस्थाके लिये एक- एक ग्रङ्ग हो तब पांच ग्रङ्ग हुए । जब कार्यवश किसी ग्रवस्थाका उपक्रम ग्रौर उपसंहार [प्रलग्न-प्रलग्न दो ग्रङ्गोंमें] बंट जाता है तब छः ग्रङ्ग हो जाते हैं । एक उपक्रमाङ्ग । दूसरा उपसंहाराङ्ग । श्रौर शेष चारों ग्रवस्थाग्रोंके चार ग्रङ्ग [मिलकर छः ग्रङ्ग हो जाते हैं] । पांचों [सभी] ग्रवस्थाग्रोंके [उपक्रम उपसंहार रूपमें प्रलग्न-प्रलग्न ग्रङ्गोंमें] बंट जानेपर तो [मिलाकर] दस ग्रङ्ग हो सकते हैं ।

ग्रौर ग्रङ्ग कार्यके श्राधिक्यके कारणसे किसी ग्रवस्थामें तीन ग्रङ्ग हो जाय तो भी [सब मिलाकर] श्रधिक-से-श्रधिक दस ही ग्रङ्ग होने चाहिए । [इसके लिये] किसी [प्रन्य] ग्रवस्था में एक ही ग्रङ्ग करके [कुल संख्या दससे श्रधिक नहीं होनी चाहिए] । दस ही होने चाहिए । एक ग्रवस्थामें तीन ग्रङ्ग भी पाए जाते हैं । जैसे 'वेङ्गीसंहार' में प्राप्त्याशा [रूप तीसरी ग्रवस्था] में युक्त 'गर्भसंधि' [नामक तृतीय संधि-भेद] में [नाटकके] तृतीय चतुर्थ ग्रौर पञ्चम [तीन] ग्रङ्ग [लग गए हैं] । कम होनेपर तो एक ग्रङ्ग भी हो सकता है । किन्तु उससे पाँचों संधियोंका प्रदर्शन नहीं हो सकेगा । श्रौर [दससे भी] श्रधिक होनेपर संख्याकी कोई श्रवधि नहीं रहेगी इसलिए मध्यम मार्गका श्रवलम्बन करना उचित है । नाटिका ग्रौर प्रकरणमें तो चार ग्रङ्ग होने चाहिए । किसी ग्रवस्थामें दूसरी व्यवस्थाका मिश्रण कर देनेसे [पाँचके स्थानपर चार ग्रङ्ग हो जावेंगे ॥२०॥

१. इत्यपञ्चुसंख्या पद्यभेदाः ।

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४६ ]

नाट्यदर्पणम्

[ का० २१, सू० १६

श्रथाङ्गानिर्वन्धनियमाह—

[सूत्र १८]—श्रभिघातः प्रधानस्य नेतुर्ध्ययो न कुत्नचित् ।

बन्धः पलायनं सन्धिर्यों यो वा फललिप्सया ॥२१॥

श्रभिघातः शोचितहेतुः प्रहारः । प्रधानस्य मुख्यस्य । तेन पताकानां प्रकरीनायकानां प्रध्यत एव । कुत्नचिदिति विशिष्टकादार्वापि । सामान्योक्तावस्थाभिघातः परभृतः । तेन यदर्थमाभिः सत्यहरिश्चन्द्रे हरिश्चन्द्रेण देवतोपहारार्थ स्वयम् श्रात्मोक्तरन्निबद्धं न तदू दोषाय ।

श्रङ्गोंमें श्रदर्शनীয় तत्त्व—

पिछली दो कारिकाओंमें श्रङ्गका लक्षण करनेके बाद ग्रन्थ ग्रङ्गली कारिकामें ग्रन्थकार का ग्रहण करना चाहते हैं कि श्रङ्गोंमें किन-किन बातोंको नहीं दिखलाना चाहिए । जिन बातों का ग्रङ्गोंमें दिखलानेका निषेध उनमें प्रधान नायकका 'श्रभिघात' सबसे मुख्य है । श्रभिघात शब्दका अर्थ 'रक्त-प्रवाहित कर देनेवाला प्रहार' किया गया है । प्रधान-नायकका श्रभिघात तो न केवल श्रङ्गोंमें ग्रापितु विशिष्टक श्रङ्गादिमें भी कहीं किसी प्रकार नहीं दिखलाना चाहिए । उसका बन्धन पलायन श्रादि भी सामान्य रूपसे नहीं दिखलाना चाहिए । किन्तु विशेष स्थिति में यदि बन्ध श्रादिके द्वारा विशेष फलकी सिद्धि हो तब उनको प्रदर्शित किया जा सकता है ।

इसी बातको इस कारिकामें निम्न प्रकार लिखा है—

ग्रन्थ श्रङ्गों में न रखने योग्य [प्रयों] को कहते हैं—

[ सूत्र १८ ]—प्रधान नायकका श्रभिघात [शोचित-जनक प्रहार] कहीं भी [श्रङ्गादि में] नहीं दिखलाना चाहिए किन्तु उसके श्रतिरिक्त विशिष्टक श्रङ्गादिमें भी] नहीं दिखलाना चाहिए । [प्रधान नायकका] बन्धन पलायन श्रथवा सन्धि [भी सामान्य रूप से नहीं दिखलाना चाहिए किस्तु] विशेष फलकी प्राप्तिकी इच्छासे प्रदर्शित किया जा सकता है ।

२१

'श्रभिघात' श्रर्थात् रक्तको प्रवाहित करनेवाला प्रहार । प्रधान श्रथवा मुख्य [नायक] का [नहीं दिखलाना चाहिए] इस [कथन]से पताका-नायक श्रौर प्रकरी-नायक श्रादि [ ग्रन्थ मुख्य नायकों ] का श्रभिघात भी प्रतिषिद्ध किया ही जाता है [यह श्रभिप्राय है] । 'कुत्नचित्' इससे विशिष्टक श्रङ्गादिमें भी [नहीं दिखलाना या वर्णित करना चाहिए वह श्रभि- प्राय है । श्रभिघात स्वकृत श्रौर परकृत दोनों प्रकारका हो सकता है । विशेष निदर्शक बिना] सामान्य रूपसे कथित होनेपर भी यहाँ परकृत [का ही ग्रहण करना चाहिए] । इसलिए हमने 'सत्यहरिश्चन्द्र' [नाटक]में देवताको उपहार चढ़ानेकेलिए हरिश्चन्द्रके ही द्वारा स्वयं अपने मांसके काटनेका जो वर्णन किया है वह [परकृत श्रभिघात न होवेके कारए] दोषाघायक नहीं

है । इसमें प्रधान-नायकके श्रभिघातका निपेध करते हुए वृत्तग्रन्थमें पताका-नायक तथा प्रकरी नायकके श्रभिघातकी श्रनुमति दे दी गई है । तन पताका श्रौर प्रकारी-नायकोंके लक्षण श्रागे किए जावेंगे । किन्तु इस प्रकारके श्रङ्गोंके सम्भवनेके लिए सदैवमें उनका ज्ञान श्रावश्यक है। 'यथावि प्रासङ्गिकं वृत्तं पताकेत्यभिधीयते' यह 'पताका' का लक्षण, श्रौर 'प्रासङ्गिक'

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परेष्वापि विपत्तिषु कृतो निविध्यते। तेन नागानन्दे गरुडकृताभिघातस्य जीमूतवाहनस्य साक्षात्करस्य परोपकाराय सर्वाधायकत्वेन विशेषतो रसपुष्टिमवहतति। योडपि चारस्माम्भी रघुविलासे शक्तिसक्तवत्ससो लड्मणस्य प्रवेशः कृतः, सोडपि न दोषाय। सीताडणयन्तलगफलसम्बन्धेन रामस्य मुख्यत्वान। 'बन्धः' इति परैरैग्रह्यताम्। यथा वासवदत्तानृतवचारे वत्सराजस्य पलायनमपस रागम्। यदाहुः—

'शशकस्य सर्वमूलेष्टडयापगच्छत:' इति। दृश्यते हि जीवितः पुनराज्जीवितव्याः सुखप्राप्तिवचनयोः। 'सन्धिः' सन्धानम्। तदुक्तं—

"प्रवृत्तचक्रेऽपि शान्तो राज्ञा बलवटाडबलः सन्धानोपनमेत् तूर्णं कोश-दण्डात्मभूभिः।" इति फललिप्सयेतित—बन्धनादीन्त तावन्न योड्यादान। यदि च योङ्यन्ते तदा पर्यन्ते विशिष्टं फलमवेदय, न पुनरेषमेवेति ॥२१॥

प्रदेशस्थं चरितं प्रकारो मता' यह 'प्रकारो' का लक्षण है । अर्थात् प्रासङ्गिक किन्तु व्यापक चरित का नाम 'वस्तुक' है जैसे राम-प्रबन्धोंमे सुप्रीवका चरित्र रामके बाद व्यापक चरित है । व्रतः उसका नायक सुग्रीव 'वस्तुका-नायक' माना जाता है । इसके विपरीत एकदेशस्थ प्रासङ्गिक वृत्तको 'प्रकरी' कहा जाता है जैसे जटायुका वृत्तान्त रामायणमे 'प्रकरी' वोरत है । उसका नायक जटायु 'प्रकरी-नायक' है । उसका प्रभिघात श्रोष बध तक भी दिखलाया जा सकता है श्रोदिखलाया भी गया है ।

[परकृत प्रभिघातमे भी] 'पर' शब्दसे शत्रुके द्वारा किया गया [प्रभिघात] हो निषिद्ध है । इस लिए नागानन्दमे गरुडके द्वारा प्रभिघात किए हुए [रक्त प्रवाहित होते हुए] जीमूत-वाहनके साक्षात्कारसे परोपकारके पबल उत्कार्हके कारण रसकी विशेष रपसे पुष्टि होती है। [इस लिए वह दोषाधायक नहीं है]। श्रोदर हमने भी रघुविलासमें जो छातोंमें शक्ति लगे हुए लक्ष्मणराका [रामभद्रकपर] प्रवेश कराया वह दोषाधायक नहीं है । क्योंकि सीताके वापस लाने

रूप फल सम्बन्धके कारण राम मुख्य [नायक] है [लक्ष्मण मुख्य-नायक नहीं है] । व्रतः उनका प्रभिघात प्रदर्शित करना दोषावह नहीं है । कारिकामे ग्राए हुए 'बन्ध' [पदका श्रर्थ] दूसरों के द्वारा पकड़ा जाना है । जैसे वासवदत्ताकी नृत्यशालामें वत्सराजका [बन्धन दिखलाया गया है वह विशेष फलकी सििद्धका जनक होनेसे दोषावह नहीं है]। पलायनका श्रर्थ [युद्धाविसे] हूट जाना है । जैसेकि [उसके श्रौचित्यको दिखलानेकेलिए] कहा गया है 'ग्रसामयं हो जानेपर सब कुछ छोड़कर चला जाव'। क्योंकि जोवित रहते फिर वापिस श्राना देखा जाता है । जैसे सुपात्र श्रोदुदयनका [इस लिए जीवन-रक्षाके लिए श्रनिवार्य होनेपर पलायन भी उचित है]। 'सन्धि' श्रर्थात् मेल कर लेना जैसेकि [उसका श्रोचित्य दिखलाते हुए] कहा है—

[जिसका चक्र चल रहा है उस] प्रभावशाली बलवान् राजाके साथ दुर्बल राजा कोष दण्ड श्रोद्रपनी भूमि श्रादिके द्वारा सधि कर ले । 'फललिप्सया' इसका यह श्रोभिप्राय है कि [सामान्यतः] बन्ध श्रादिके योजना नहीं करनी चाहिए किन्तु यदि योजनाका हो जाय तो ग्रनन्तमे किसी विशेष फलको देखकर ही की जाय, ऐसे ही नहीं ॥२१॥

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अथ विष्कम्भादीनां लच्यताकथनार्थं श्रृङ्गावार्जनीयं विष्कम्भकादिभिरवेच्योनिमित्त्याह-

[सूत्र १५]—दूराद्वयानं पूरोधो राज्य-देशादिविप्लवः । रतं मृत्युः समीकादि वृत्तं विष्कम्भकादिभिः ॥२२॥

दूराद्वयानमिति । मूर्छोत्तेरिक-चतुष्कसाध्यं देशान्तरगमनं शक्यद्ववादड्‌डप दर्श्यंते । यत् पुनर्धिकालसाध्यं तद्‌दर्शकस्यवान् विष्कम्भकादिभिरेव वृत्त्यैम । विश्रान्तिस्थान-शयन-भोजनादीनां बहुना मरकक्रियाणां प्रसङ्गात् । सम्वकारादौ तु दूराद्वयानदर्शनेऽपि न दोषः । दिव्यस्य गगनक्रमपातस्य मध्यतः ।

विष्कम्भकादि-प्रयोग—

नाटकादिमें 'दृश्य', 'सूच्य' तथा 'ऊह्य' तीन प्रकारके अर्थ होते हैं इस बातका उल्लेख वृत्तिकार ११ कारिकाके वृत्तिभागमें कर चुके हैं । इनमेंसे जिन अर्थोंको नाटकमे साक्षात् श्राभिनय द्वारा दिखलाया जाता है वे 'दृश्य' श्रर्थ कहलाते हैं । नाटकादिका श्रधिकांश भाग 'हरय' ही होता है । उसका नाम ही 'हृश्य-काव्य' है । किन्तु कुछ भाग ऐसा भी होता है जिसका श्राभनिय द्वारा दिखलाना न सम्भव हो सकता है श्रोर न कविको श्रभिप्रेत हो सकता है । ऐसे श्राभ्रयोंको कवि ध्यान रूपमें कहलवाकर सूचितमात्र करता है । उनको 'सूच्य' श्रर्थ कहते हैं । इन 'सूच्य' श्रर्थोंमें प्रायः दो प्रकारके श्रर्थ श्राते हैं, एक नीरस श्रोर दूसरे रस विस्तीर्ण एवं ग्रन्थनुयोगी । रामादिके जीवनके मुख्यभागोंको ही श्राभनिय द्वारा प्रदर्शित किया जाता है । छोटी-बड़ी बातोंको श्राभनिय द्वारा दिखलानिने नाटकका बहुत विस्तार हो जायगा इसलिए उन श्रर्थोंको पात्रोंके वार्तालाप द्वारा सूचित कराया जाता है । इसी प्रकार नीरस श्रर्थ-की भी सूचनामात्र दी जाती है । उन श्रर्थोंको 'सूच्य' श्रर्थ कहते हैं । श्राद्धोंसे भिन्न विशेष भागोंकी रचना की जाती है । उन भागोंका सामान्य नाम 'श्रर्थोपक्षेपक' है । ये 'श्रर्थोपक्षेपक' पांच प्रकारके माने गए हैं । जिनको क्रमशः १. विष्कम्भक, २. प्रवेशक, ३. चूलिका, २. श्रङ्कास्य, श्रोर ४. श्रङ्कावतार कहते हैं । इन्हींके लक्षण करनेकेलिए ग्रन्थकार श्राद्ध विष्कम्भक श्रादिके द्वारा सूचनोय श्रर्थोंकी चर्चा इस कारिकामें निम्न प्रकार करते हैं—

श्राद्ध विष्कम्भक श्रादि [पांच प्रकारके श्रर्थोपक्षेपकों] के लक्षण करनेकेलिए ग्राद्धोंमें श्रावरानीय [सूच्य-भाग] को विष्कम्भकादिके द्वारा वर्णन [श्रथवा सूचना] करना चाहिए इस बातको कहलाते हैं—

[सूत्र १६]—दूर देशको गमन, नगरावरोध, राज्य तथा देशाविका विप्लव, सम्भोग, मृत्यु, श्रदृश्य श्रादि [श्राद्धोंमें न दिखलाने योग्य श्रर्थों] को 'विष्कम्भक' श्रादिके द्वारा वर्णन करना चाहिए । २२ ।

'दूर मार्गंका गमन' इसका यह श्राभिप्राय है कि तीन-चार मुहूतमें जिसकी समाप्ति हो सके इस प्रकारका देशान्तर -गमन तो सम्भव होनेसे श्राद्धमें भी दिखलाया जा सकता है । किन्तु जो श्रधिक कालमें समाप्त हो वह [श्राद्धमें दिखलानेकी] श्रशक्यता होनेसे विष्कम्भक श्रादि के द्वारा ही वर्णित किया जाना चाहिए । क्योंकि उसमें ठहरनेका पड़ाव, शयन, पान, भोजन श्रादि बहुत-सी श्रादृश्यक क्रियाश्रोंका समावेश होगा । सम्वकार श्रादिमें तो दूर मार्गकी यात्राके दिखलानमें भी दोष नहीं है क्योंकि देवताश्रोंमें श्राकाश-गमनकी सामथ्य होती है ।

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का० २२, सु० १६ ] प्रथमो विवेक: [ ४१

नगररोधोऽयवमेव, सेनाया: पर्ष्णिकुटि-यन्त्र-सुरङ्गादिदानव्यापारायां च बाहुल्यात् । राज्य-देशनादिर्दर्शनेऽपि पतन-मरणादिसम्भवात् तथैव । रत्नार्माति श्यालिङ्गन चुम्बनादि प्रीतादायकत्वादेवमेव । तेन तदनुकूलानि रहःप्रवेश-वक्रोक्त्या-दीर्घकूटदपि दर्श्यन्ते । मृत्युः प्राप्तानिर्गम एव । समीकं हस्त-पादादिदर्शनं एव । तेन नागानन्दे जीमूतवाहनस्य क्रोधादिविनां इन्द्रियवैकल्यादीनां, रघुविलासे च रावणस्य विभीषणं प्रति सान्तोपं चन्द्रहासग्रहणस्याङ्ग डयविरोध: । आदर्शाद्दपपरम्भवि प्रभृतकाल-क्लेशसाध्यं प्रीतादायकत्वाद् गृह्यते । आदिशब्देन प्रवेशक-छाड़ा:स्य-चूलिकाङ्गवतारायां ग्रहमिति ।।२२।।

नाटकमे 'दूराद्वयान्' श्रथितु प्रथिक लम्बी यात्राको श्रङ्गद्वारा दिखलाने का निषेध किया गया है । इसका कारण यह है कि प्रथिक लम्बी यात्रामें रास्तेमें ठहरनेकेलिये पड़ावों, उनमें होने वाले भोजन, पान श्रादि सभी व्यापारोंको दिखलाना श्रावश्यक होगा । वह सब एक तो ग्रस्तव्यत नीरस हो जायगा श्रौर दूसरे लम्बा भी श्रधिक हो जायगा । इसलिए नाटकमे उसको प्रत्यक्ष दिखलाने का निपेध कर श्रथ्यपक्षेपकोंके द्वारा सूचित मात्र करने का विधान किया गया है । किन्तु 'समवकार' श्रादि रूपकभेदोमे दूराद्वयानका श्रङ्गद्वारा दिखलाने का भी निपेध नही किया गया है । इसका कारण यह है कि 'समवकार' मे देवाशिदेवके चरित्रका प्रदर्शन किया जाता है । उन देवताश्रोमे श्राकाश-गमनकी सामर्थ्य होती है श्रत: उसमें बीचके पड़ाव, श्रादि सम्बन्धी व्यापारोके दिखलाने की श्रावश्यकता न रहनेसे न नीरसता श्राती है श्रोर न दीर्घता । नगरावरोध भी इसी प्रकार [नीरस व्यापारोसे पूर्ण होनेके कारण दिखलाया नही जा सकता] है । [क्योकि उसमें] सेनाके [ठहरनेकेलिये] पर्ष्णिकुटि [डेरा या भोंपड़ी] यन्त्र सुरङ्ग लगाने श्रादि व्यापारोको बाहुल्य होता है । राज्य-देशादिका विप्लवी पतन-मरण श्रादि [अनेक प्रकारके नीरस श्रोर श्रशोभनीय व्यापारो] की सम्भावनासे पूर्ण होनेके कारण उसी प्रकारका [ग्रर्थात् नाटकमे न दिखलाकर केवल सूचित करने योग्य] है । सम्भोग भी श्यालिङ्गन-चुम्बन श्रादि लज्जाजनक [व्यापारोसे परिपूर्ण] होनेके कारण उसी प्रकारका [श्रर्थात् रङ्गमञ्चपर न दिखलाने योग्य] है । इसलिए उस [सुरत-सम्भोग] केलिये श्रनुकूल एकान्त-स्थानमें प्रवेश श्रौर वकोक्त श्रादि तो श्रङ्गोमें भी दिखलाए जाते है । [किन्तु उसके श्रागे जहाँसे श्यालिङ्गन-चुम्बनादि प्रारम्भ होता है उस भागको द्वीर्घदायक होनेसे श्रङ्गोमें रङ्गमञ्चपर दिखलाना निषिद्ध माना गया है ।] मृत्युत: प्राप्त निकल जानेका ही ग्रहण होता है । 'समोक' का श्रर्थ हाथ-पैर श्रादिका काटना ही है । इसलिए नागानन्दे जीमूतवाहनका कुछ समय होने वाला इन्द्रिय-वैकल्य श्रादि, श्रौर रघुविलासमें रावणका विभीषणके प्रति क्रोध करके तलवारका ग्रहण [मृत्यु श्रर्थात् प्राप्तविमोचन श्रथवा समीक श्रर्थात् हाथ-पैरके छेदन तक न पहुँचनेसे, दिखलाया जानेपर] भी दोघ्रदायक नही है । ['समोकादि' मे प्रयुक्त] 'ग्रादि' शब्दसे प्रभृत काल श्रौर प्रभृत क्लेशसे साध्य तथा द्वीर्घदायक श्रद्य श्रन्य श्रथोंका भी ग्रहण होता है । [श्रोर विष्कम्भकादिषु: मे प्रयुक्त] 'श्रादि' शब्दसे प्रवेशक, छाड़ा:स्य, चूलिका श्रौर श्रङ्गवतार [रूप पाँच प्रकारके श्रथ्यपक्षेपका] का भी ग्रहण होता है । [श्रर्थात् सूच्य श्रथ को इन पाँच प्रकारके श्रथ्यपक्षेपकोंके द्वारा ही सूचित करना चाहिए । साक्षात् रूपसे नही दिखलाना चाहिए ।

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स्वाथ प्रथमं विष्कम्भकं शुद्धाशुद्धभेदं लचयति—

[सूत्र २०]—ग्रथ्यानहस्य वृत्तस्य त्रिकालस्यानुरञ्जना ।

संचिप्य संस्कृतेनोक्तिरडौ मध्यमै जनेः ॥२३॥

शुद्धो विष्कम्भकस्तत्र सङ्कीर्णो नीच-मध्यमैः ।

ग्रथ्यसन्धायकः शक्यसन्धानातीतकालवान् ॥२४॥

‘विष्कम्भकलक्षण’—

पिछली कारिकामें ग्रन्थकारने नाटकके ग्रथ्योंमें जिन बातोंका साक्षात् रूपसे दिखलाना वर्जित है उनका उल्लेख किया था । इनमेंसे दूराध्वनयन प्रादि कुछ कार्य प्रभूतकाल-साध्य या प्रभूत श्रभिनाध्य होनेसे, कुछ कार्य बीडादायी होनेसे, और कुछ कार्य श्रातिदुर्दायी होनेके कारण ग्रथ्योंमें साक्षात् रूपसे दिखलानेके प्रयोग्य माने गए हैं । परन्तु कथाभागकी सङ्क्ति बनाए रखनेके लिए इन भागोंकी भी सर्वथा उपेक्षा नहीं की जा सकती है । इसलिए प्रेक्षकोंको इन कथाभागोंसे परिचित करानेकेलिए ‘विष्कम्भक’ श्रादि पांच प्रकारके ‘प्रथ्योपक्षेपकों’ की रचनाकी व्यवस्था नाट्यशास्त्रमें की गई है इन ‘प्रथ्योपक्षेपकों’ में सबसे मुख्य ‘विष्कम्भक’ है । इसलिए गगली दो कारिकाओंमें ग्रन्थकारने ‘विष्कम्भक’ का लक्षण निम्न प्रकार किया है

श्रब [पांचों ‘प्रथ्योपक्षेपकों’ में] सबसे पहले शुद्ध श्रौर शुद्ध भेद वाले [दो प्रकारके] ‘विष्कम्भक’ का लक्षण करते हैं—

[सूत्र २०—श्रब] उन [पांचों प्रकारके ‘प्रथ्योपक्षेपकों’] मेंसे [भूत भविष्यत् श्रौर वर्तमान] तीन कालोंके [ग्रथ्यानहं] ग्रथ्योंमें न दिखलाने योग्य वृत्त [कथाभाग] को ग्रथ्यके प्रारम्भमें संक्षिप्त करके मध्यम पात्रोंके द्वारा संस्कृतमें कहलानेकी ‘शुद्ध विष्कम्भक’ [कहते हैं] श्रौर नीच तथा मध्यम पात्रोंके द्वारा [संस्कृत तथा प्राकृत भाषामें कहलानेका यत्न] सङ्कीर्ण [विष्कम्भक कहलाता है] [शुद्ध श्रौर सङ्कीर्ण दोनों प्रकारका विष्कम्भक] ग्रथ्य [के प्रतिपाद्य विषयकी सङ्क्ति] को जोडने वाला [प्रथवा दो ग्रथ्योंके बीचके कथाभागकी सङ्क्तिको जोडने शाला ‘ग्रथ्यसन्धायक:’ होता है] श्रौर जितने कालकी स्मृति सम्भव हो उतने श्रतीतकाल [को स्मृति कराने] वाला [शक्यसन्धानातीतकालवान्] होता है । २३-२४।

ग्रन्थकारने यह ‘विष्कम्भक’ का लक्षण किया है । लक्षणकी रचनाशैली कुछ अस्पष्ट-सी प्रतीत होती है । इसलिए उसको ठीक तरहसे समझनेकेलिए विशेष प्रयत्न करनकी श्राव-श्यकता है । इस लक्षणमें निम्न बातें समाविष्ट की गई हैं—

१. विष्कम्भकमं ग्रथ्यानहं ग्रथ्यत्व जिसका नाटकके ग्रथ्योंमें दिखलाना उचित नहीं है

उन्हीं बातोंका समावेश किया जाता है ।

२. उस ग्रथ्यानह भागको मध्यमपात्रोंके द्वारा प्रथवा नीच श्रौर मध्यम दोनों प्रकार के पात्रों द्वारा कहुलाया जाता है । केवल मध्यम पात्रोंके द्वारा कह्हालाया जाने पर ‘शुद्ध विष्कम्भक’ तथा नीच-मध्यम द्विविध पात्रों द्वारा कहुलाए जानेपर ‘सङ्कीर्ण विष्कम्भक’ होता है ।

३. विष्कम्भकमं प्रथ्यकी सूचना देते वाले पात्रोंकी भाषाका भी उल्लेख किया है

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क० २३-२४, सू० २० ] प्रथमो विवेक: [ ४३

श्रारम्भकं च, रक्षकमपि एकदिनाशाक्याभिनयं च, प्रेक्षकैःसाक्षादनुपलक्ष्यमानं ‘ग्राह्यानर्हम्‌’ । ‘त्रिकालस्य’ वृत्त-वर्त्स्यन्द्‌-वर्त्तमानकालस्य । श्रानुरञ्जनेन श्रससक्तेन श्रादौर्घसमासेन च प्रसन्नेन । ‘संक्षिप्य’ वितततमपि उत्तरार्धसन्धानोपयोग्येव कृत्वा । संस्कृतेनैति शुद्धविष्कम्भकापेक्षम्‌ । सद्धीर्यैः तु संस्कृतेनासंस्कृतेनापि च, नीचपात्र-स्थापि तत्र भावान्‌।

ग्राह्यादाविति प्रथमेडङ्के श्रामुखादूर्ध्वं, श्रन्येषु पुनरारम्भ इति तावन्‌ सर्वे समामनन्ति । कोहलः पुनरेतं प्रथमाङ्काद्विवेच्यच्छति ।

किन्तु उसमें केवल शुद्धविष्कम्भकके पात्रोंकी भाषा संस्कृत होती है । सद्धीर्यां विष्कम्भकमें जो मध्यम पात्र हों वे ही संस्कृत बोलते हैं और नीच पात्र प्राकृत भाषाका ही ग्रवलम्बन करते हैं । टीकामें तो इस भेदका उल्लेख किया गया है किन्तु मूलमें उसको उल्लेख न होनेसे श्रर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता है ।

४. ‘ग्राह्यसन्धायकः’ तथा ‘शाक्यसन्धानातीतकालवान्‌’ ये दो पद जो लक्षणमें रखे गए हैं वे श्रधिक स्पष्ट हैं । ‘ग्राह्यसन्धायकः’ का श्रभिप्राय यह है कि विष्कम्भक दो ग्रङ्कोंके बीचके कथाभागको जोड़कर कथासूत्रको श्रविच्छिन्न बनाता है । श्रौर ‘शाक्यसन्धानातीतकालवान्‌’ का श्रभिप्राय यह है कि श्रतीतकालकी जिन घटनाग्रोंका उल्लेख उसमें किया जाता है वे घटनाएँ बहुत श्राधिक पुरानी नहीं होनी चाहिए । केवल उतनी पुरानी हों जिनका स्मरण सामान्य रूपसे मनुष्यको रह सकता है ।

५. पाँचवीं बात यह है कि विष्कम्भककी रचना। ग्रङ्कके श्रारम्भमें ही की जाती है । ग्रन्थमें या बीचमें नहीं । ‘ग्रङ्कादौ’ का यह भी श्रभिप्राय है कि यह विष्कम्भक प्रथम ग्रङ्कमें भी रखा जा सकता है । किन्तु वहाँ यह श्रङ्कमुखके बाद ही श्रा सकता है उसके पहले नहीं । श्रन्य ग्रङ्कोंमें ग्रङ्कके श्रारम्भमें होता ही है ।

इन्हीं सब बातोंको लेकर व्याख्याकार इन श्लोकोंकी व्याख्या निम्न प्रकार करते हैं—

[श्रारम्भक श्रर्थात्‌] नीरस, ग्रथवा सरस होनेएर भी [प्रत्यन्त विस्तीर्णं होनेके कारएा]

जिसका श्रभिनय एक दिनमें करना सम्भव न हो [इसलिए] प्रेक्षकोंको साक्षात्‌ [ग्रभिनय द्वारा] न दिखलाया जाने वाला [कथाभाग] ग्रङ्कानर्ह [ग्रङ्कमें दिखलाने योग्य] है । तीनों कालका [भूत, भविष्यत्‌ तथा वर्तमानकालका ‘ग्रानुरञ्जन’ [संस्कृतेन] इससे सर्वथा समास-रहित श्रथवा छोटे-छोटे समासों वाले सरल [प्रसन्न] संस्कृतके द्वारा । ‘संक्षिप्य’ श्रर्थात्‌ विस्तीर्णं [कथाभाग] को भी ग्रङ्कले ग्रङ्कका सम्बन्ध जोड़ने मात्र [संक्षिप्त] बना कर [कहलाना] । ‘संस्कृतेन’ [संस्कृत भाषाके द्वारा कहलाना] । यह केवल शुद्ध-विष्कम्भककी दृष्टिसे कहा गया है । सद्धीर्यां [विष्कम्भक] में तो संस्कृत श्रौर [ग्रथसंस्कृत श्रर्थात्‌ प्राकृतसे भी [ग्रर्थात्‌ दोनों भाषाप्रोंके द्वारा वृत्त कहलाया जाता है] क्योंकि उसमें नीच पात्र भी होते हैं [वे संस्कृत नहीं बोल सकते हैं । श्रतः वे प्राकृत भाषामें भाषया करते हैं श्रौर जो मध्यम पात्र होते हैं वे संस्कृतभाषामें । इस प्रकार सद्धीर्यां विष्कम्भकमें संस्कृत तथा प्राकृत दोनों भाषात्रोंका उपयोग होता है] ।

‘ग्रङ्कादौ’ ग्रङ्कके श्रारम्भमें इससे [यह श्रभिप्राय है कि] प्रथम ग्रङ्कमें [ग्रङ्कमुख श्रर्थात्‌ प्रस्तावनाके बाद, श्रौर शेष ग्रङ्कोंमें ग्रङ्कके श्रारम्भमें ही [विष्कम्भककी रचना होना चाहिए]

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मध्यमैरिति ग्रामात्य-सेनापति-वरिअग-विप्रादिभिः। न पुनर्देवी-कुमार-नायक-प्रतिनायकादिभिः। मध्यमतवं चैषा राजापेक्षया। राजपरिजनापेक्षया तु तेडपि प्रधानम्। जनेरिति पुँमिः, स्त्रीभिः, श्रीः-पुंसैकेश, सामान्यवाचत्वात्। बहुवचनमतन्त्रम्। तेनैकेनापि स्वगतेनाशोकस्या च निबध्यते। जनेरिति सामान्यनिर्देशादेव च शुद्धविप्रक्रमे क्रिया श्रपि संस्कृतेनैव पाठः। शुद्धो नीचाप्रवेशात्। विष्कम्भनाति छेदानुसन्धानेन वृत्तमुपसंह्रियते इति विष्कम्भकः।

तत्रेदिति विश्कर्म्भादिपु पञ्चसु मध्यानं द्वैवेदवेन विश्कम्भकौ निर्धारित्यते। यथ सदृक्ष्योः नीचस्यापि प्रवेशात्। नीचा दास-चेट्यादयः। 'छादनुसन्धायक' इति छादृक्ष्यसदृक्षीयोः नीचस्यापि प्रवेशात्।

यह बात [नाट्यशास्त्रके] सब [प्राचार्य] मानते हैं। किन्तु कोहल [नामक नाट्याचार्य] इसको केवल प्रथम श्रावकके श्रारम्भमें ही मानते हैं

इसका श्रभिप्राय यह हुग्रा कि भरत ग्रादि ग्रनन सब नाट्याचार्योंके मतमें नाटकके किसी भी ग्रङ्कमें श्रावश्यकतानुसार विश्कम्भकका प्रयोग किया जा सकता है। किन्तु केवल इतना ध्यान रखता है कि जब कभी भी विश्कम्भकका प्रयोग किया जाय वह सदा श्रङ्कके श्रारम्भमें ही होना चाहिए। बीचमें या श्रन्तमें नहीं। किन्तु कोहलाचार्यका मत इससे भिन्न है। उनका यह कहना है कि विश्कम्भकका प्रयोग केवल प्रथम श्रङ्कके श्रारम्भमें ही किया जा सकता है। ग्रन्य श्रङ्कोंमें उसका प्रयोग नहीं हो सकता है। या फिर श्रङ्कके मध्य श्रथवा श्रन्तमें कहीं भी किया जा सकता है।

'मध्यमे:' इस पदसे ग्रामात्य सेनापति वरिअग विप्र ग्रादिके द्वारा [यह श्रथ] करना चाहिए]। महारानी, राजकुमार, नायक, 'प्रतिनायक' ग्रादिके द्वारा [यह श्रथ्य] नहीं [लेना चाहिए]।

इन [ग्रामात्य सेनापति ग्रादि] का [भो] मध्यमत राजाकी दृष्टिसे है। राजाके श्रनुय सेवकों की श्रपेक्षासे तो वे भी प्रधान हैं। 'जने:' इस पदके [पाठके] सामान्यवाचक होनेसे पुरुषोंके द्वारा, श्रथवा कियोंके द्वारा, श्रथवा श्रौर पुरुष दोनोंके द्वारा यह श्रथ्य प्रहृत [करना चाहिए]। इसलिये बहुवचन श्रन्वितक्षित [ग्रथन्त बहुलसे पात्र ही प्रयुक्त किए जायँ यह इस वचनान्त 'जनै:' पदका श्रभिप्राय नहीं है]। इसलिए 'स्वगत' श्रथवा 'ग्राकाशभाषितके रूपमें एक पात्रके द्वारा भी [ग्रप्रस्तुत श्रथको कहलवा कर विश्कम्भकका] प्रयोग किया जाता है। 'जने:' इस सामान्य निर्देशके कारण ही शुद्ध विश्कम्भकमें क्रियोके द्वारा भी संस्कृतमें ही पाठ किया जाता है। [इसका श्रभिप्राय यह है कि सामान्य रूपसे क्रियोके मुखसे प्राकृत भाषाका ही प्रयोग नाटकोंमें कराया जाता है। किन्तु शुद्ध विश्कम्भकमें यदि कोई मध्यम स्त्रीपात्र हो तो उसको संस्कृतमें भाषण कराया जा सकता है]। शुद्ध [विश्कम्भक] नीच [पात्रों] का प्रवेश न होनेसे [ही शुद्ध कहलाता है]। [ग्रगे विश्कम्भक शब्दका निर्वचन दिखलाते हैं] 'विष्कम्भनाति' ग्रथन्त स्मृतिके द्वारा कथाभागको [जोड़कर] पुष्ट बनाता है इसलिए [उसको] 'विष्कम्भक' कहा जाता है [यह बोधकम्बक शब्दका श्रथवयवर्थ है]।

'तत्र' इससे 'विष्कम्भक' ग्रादि पांच [प्रथ्योपसंख्यकों] के मध्यमेसे [शुद्ध तथा संकीर्ण रूप] दो भेद वाला 'विष्कम्भक' श्रङ्ग निर्धारित किया गया है। [यह बात 'तत्र' पदसे सूचित की है]। 'समन्वाखल' सूत्रसे ससमोके श्रथमें श्रलमप्रतियय करके 'तत्र' शब्द बना है। ग्रौर 'यतसच निष्पर्यराम' [जिससे किसी वस्तुको चुन कर श्रङ्गलग किया जाय उस निष्पर्यरामें ससमी

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का० २३-२४, सू० २० ] प्रथโม विवेक: [ ५५

श्रद्धार्थस्य सन्धायक: संसूचक: प्रथमाङ्गभावी। श्रद्धयोरङ्गार्थयो: सन्धायक: पुनरङ्गद्रयान्तरालभावी। शक्यं संधानमनुस्मरस्य यस्यासौ शक्यसन्धानः। स चासावर्तीतकालो वृत्तोङ्गर्थस्तद्वान् विश्रम्भको भवति। इह तावत् पुरुषप्रज्ञापेच्चया विशिष्टकर्मकार्थकाले निवध्यते। रामयुधिष्ठिरादयो हि चिरातीतमप्यर्थमनुसन्धत्त इति स तथ्यव् निवध्यते। ये तु प्राज्ञत: स्तोक्कालेऽन्वर्थमनुसन्धत्ते तैरर्थस्तथैव निवन्धनीय:। कामफलेऽपि तु नाटके वर्षैकवृत्तमेव निवध्यते। परतः संस्कारावच्छेदात्। वयोद्वितीयृत्तेश्चेति ॥२३-२४॥

विरभक्ति होती है। श्रत: यहां सस्मी विरभक्तिके द्वारा बने 'तत्र' पदसे निर्घार्या—छोटना—ग्रलग करना सूचित होता है यह श्रभिप्राय है। श्रागे सङ्घीरा [विश्कम्भकके] नीच [पात्रों] का भी प्रवेश होनेसे [सङ्घीराें विश्कम्भक] कहते हैं। नीच प्रार्थात् दास-दासी श्रादि । 'श्रङ्गसन्धायक:' इससे [वो श्रर्थ निकलते हैं। एक तो यह है कि] श्रङ्गका प्रार्थात् एक श्रङ्गके श्रर्थका सन्धायक श्रर्थात् संसूचक । इस प्रकारका [एक श्रङ्गका श्रर्थात् एक श्रङ्गसे सम्बद्ध श्रर्थका सूचक जो विश्कम्भक होता है वह] प्रथम श्रङ्गके श्रारम्भमें ही होता है। ['श्रङ्ग-सन्धायक:' को दूसर श्रर्थ यह भी है कि] दो श्रङ्गोंका प्रार्थात् दो श्रङ्गों के श्रर्थों का सन्धायक वह वो श्रङ्गोंके वीचमें [प्रर्थात् श्रर्थत: उत्तरवर्ती श्रङ्गके श्रारम्भमें] होता है। [ग्रागे 'शक्यसन्धानान्तीकालवान्' पदका श्रर्थ उसके दो भागोंमें विरक्त करते हैं। पहले 'शक्यसन्धान' इस भागका प्रर्थ करते हैं] जिसका सन्धान श्रर्थात् श्रनुस्मरण हो सकता है [उतना ग्रतीतकाल शक्यसन्धान हुग्रा]। इस प्रकारका [शक्यसन्धान] जो ग्रतीतकाल श्रर्थात् ग्रतीत कालमें हुश्रा कथाभाग उससे युक्त [श्रर्थात् उसको सूचित करने वाला] विश्कम्भक ['शक्यसन्धानातीतकालवान्' विश्कम्भक हुग्रा]। [इसमें पुरुषोंकी स्मरणशक्ति [प्रज्ञा] की श्रपेक्षासे विश्कम्भकके [श्रर्थात् कथाभाग] के कालको [शक्यसन्धान: जिसका स्मरण सम्भव हो सके उसके श्रनुसार] निबद्ध किया गया है। राम युधिष्ठिर श्रादि [प्रबल स्मरणशक्ति वाले उत्तम पात्र) बहुत पुराने ग्रतीत श्रर्थको भी स्मरण कर सकते हैं इसलिए [विश्कम्भकमें] उनके स्मरणासे सम्बन्ध रखनेवाली दीर्घकालीन बात भी कही जाती है वहां] उसको उसी प्रकारसे दिखलाया जाता है। श्रौर जो साधारएा पुरुष थोड़ी देरकी ही बात स्मरण कर सकते हैं उनके लिए उसी प्रकारकी रचना करनी चाहिए। कामप्रधान फलवाले नाटकमे तो [विश्कम्भकके रूपमें] एक ही वर्षके वृत्तकी रचना की जाती है। उसके बाद [प्रर्थात् एक वर्षसे श्रधिककालके प्रेमके] संस्कारोंका विच्छेद हो जाता है श्रौर श्रवस्था बीत जानेसे भी । [शुज्झार रसमे श्रधिक पुरानी बातोंका स्मरण व्यथं हो जाता है]। ॥२३-२४॥

'विश्कम्भक' के इस लक्षणमें ग्रन्थकारने 'शक्यसन्धानातीतकालवान्' इस विशेषएा की व्याख्यापर विशेष बल दिया है। उतने दूरके ग्रतीत कालके श्रर्थकाही वर्रानन 'विश्कम्भक' द्वारा करना चाहिए, जिसका श्रनुसन्धान श्रर्थात् स्मरण सम्भव हो। राम युधिष्ठिर श्रादि दीर्घकालीन श्रर्थको भी स्मरण कर सकते हैं, श्रत: उनके वृत्त में दीर्घकालीन घटना का भी वर्रानन किया जा सकता है। सामान्य पुरुष स्वल्प कालके श्रर्थको स्मरण कर सकते हैं, उनके प्रसङ्ग में उसीके श्रनुसार विश्कम्भकमें वर्रानन करना चाहिए। यह ग्रन्थकारका श्रभिप्राय है।

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अथ विष्कम्भकलच्रयानुवादेन प्रवेशकं लक्षयति—

[सूत्र २१]—एवं प्रवेशको नीचैः परार्थैः प्राकृतादिना ।

एतौ प्रभूतकार्यस्वान्नाटकादिचतुष्टये ॥२५॥

एतद्भित 'ग्राज्ञानहस्य' इत्यादि सर्वं विश्कम्भकलच्र्रयामतर्गतदिशयते । केवलमसौ नीचैरेव पात्रैः परार्थेनु र्थनायकादिकयेनिष्ठेन पुनः स्वकृत्यैकतत्परैः ।

यथा—

"ग्राज्ञानस्मिं भट्टदारिकाये इत्यादि ।

[ग्राज्ञानास्मिं भर्‌तृदारिकया इत्यादि । इति संस्कृतम]

प्रवेशकका लक्षण—

ग्रथमोपक्षेपकमें विष्कम्भकके बाद दूसरा स्थान 'प्रवेशक' का ग्रहाता है । विष्कम्भकके ग्रथमोपक्षेपकमें जो कार्य बतलाए गए हैं प्रायः वे ही सब कार्य 'प्रवेशक' के द्वारा भी सम्पन्न किए जाते हैं । फिर भी उन दोनोंको ग्रलग-ग्रलग माना गया है इसका कारण उनके स्वरूपमें कुछ भेदका होना है । उनका मुख्य भेद यह है कि प्रवेशकमें केवल नीच पात्रोंका प्रयोग होता है । श्रौर विष्कम्भकमें केवल मध्यम, या नीच श्रौर मध्यम दोनों प्रकarakे पात्रोंका प्रयोग होता है । विष्कम्भकमें केवल नीच पात्रोंका प्रयोग नहीं होता है । इन भेदोंका परिचय ग्रागे दिए जाने वाले लक्षणसे ही मिलेगा । नाट्यकार श्रागे प्रवेशकका लक्षण निम्न प्रकार करते हैं—

ग्रथ विष्कम्भकके लक्षणका ग्रनुवाद करते हुए प्रवेशकका लक्षण दिखलाते हैं—

[सूत्र २१]—इस प्रकार [ग्रर्थात् ग्राज्ञानहस्य ग्रादिकों न दिखलाने योग्य त्रिकालवर्तीं

ग्रर्थको सूचित करने वाला] दूसरोंके लिए कार्य करने वाले [ग्रर्थात् स्वामी ग्रादिको ग्रनुसार कार्यमें नियुक्त] नीच पात्रों [दास-दासी ग्रादि] के द्वारा [संस्कृतसे भिन्न] प्राकृत

ग्रादि [भाषाग्रोके प्रयोग] से [श्रव्यसन्ध्यनातिकालकके ग्रर्थको सूचित करने वाला] 'प्रवेशक'

होता है । [इतना प्रवेशकका लक्षण ह्रस्व] ग्रधिक कार्य [के साधक] होनेके कारएा नाटकादि

चारमें [ग्रर्थात् नाटक, नाटिका, प्रकरण श्रौर प्रकरणगी इन चारमें], ग्रनावश्यक या ग्रप्रधान

भागको संक्षिप्त करके सूचन करनेकेलिए विष्कम्भक श्रौर प्रवेशक इन दोनों ग्रथमोपक्षपको] का

ग्रवलम्बन किया जाता है २५।

इस प्रकार 'एवं' इस पदसे 'ग्राज्ञानहस्य' इत्यादि विश्कम्भकका सारा लक्षण यहां

[प्रवेशके] सम्बद्ध होता है [ग्रर्थधर्मसंयात्रयोरिसंवादः प्रतिवेदः। ग्रथवा धर्मका ग्रभ्यन्तर

सम्बन्ध दिखलाना 'प्रतिवेद' कहलाता है । विश्कम्भकके सारे धर्मोंका प्रवेशकके साथ सम्बन्ध

प्रदर्शन रूप 'प्रतिवेद' किया गया है । उन दोनोंमें ग्रन्वय केवल इतना है कि] यह [प्रवेशक]

केवल नीच ग्रौर दूसरोंके कार्यमें लगे हुए ग्रर्थात् मुख्य नायक ग्रादिके कार्यमें संलग्न, न कि

स्वयं ग्रपने कार्यमें लगे हुए पात्रोंके द्वारा [प्रयुक्त होता है] जैसे—

जैसे कि स्वामिपुत्रीने ग्राज्ञा दी [तदनुसार मैं श्रमुक कार्य कर रही हूं] इत्यादि

[नीच पात्र चेती ग्रादि द्वारा प्रयुक्त प्रवेशकका उदाहरणहै] ।

इस प्रकार विष्कम्भकसे प्रवेशकका एक भेद तो यह हुग्रा कि विश्कम्भकमे मध्यम

पात्रोंका उपयोग भी होता है श्रौर नीच पात्रोंका भी प्रयोग हो सकता है । किन्तु प्रवेशक

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नीचप्रयुक्तत्वादेव च प्राम्यार्थप्रायेण प्राकृतेन, श्वादिशब्दान्तैर् शौरसेन्यादिना प्रवेशको भवति। श्रप्रत्यक्षज्ञानार्थेन सामाजिकलहृदये प्रवेशयतीति प्रवेशकः । केचित् प्रवेशकं प्रथमाङ्कस्यादौ नेच्छन्ति । एतावदिति विष्कम्भक-प्रवेशकौ । नाटक-प्रकराण-नाटिका-प्रकराणैः । नाटकादौ हि परिमितोपायेन बहुपु, मुख्यवान्तरकार्येणु नुगदौतां तत्वहायानां चामात्यादीनां व्युत्पत्तिः क्रियते इत्थं स्वैरैच प्रभुतकार्यव्युत्पादको विष्कम्भक-प्रवेशको । न व्यायोगादिषु एकाङ्केषु तावदल्पवृत्तत्वेनाल्पकार्येऽपि समवकारस्य परस्परासम्बद्धत्वात्, स्वपरेषान्तु कतिपयदिनवृत्तत्वादिति । श्रङ्कास्यादीनि तु स्वल्पसूच्यत्वेन यथासम्भवं रूपकान्तरेप्वपि भवन्ति ॥२४॥

में निश्चित रूपसे नीच पात्रोंका ही प्रयोग होता है । इसीसें दूसरा भाषाविषयक भेद भी ग्रा जाता है । विष्कम्भकमें संस्कृत भाषा मुख्य रहती है किन्तु प्रवेशकमे प्राकृतभावाका ही प्रयोग होता है । इसी बातको ग्रागे लिखते हैं—

नीच [पात्रों] के द्वारा प्रयुक्त होनेके कारण ही प्राम्य [प्रविष्ट] श्रप्रत्यक्ष ज्ञानयुक्त प्राकृतके द्वारा, श्वादि शब्दसे [उनमें भो] शौरसेनी श्रादिके द्वारा प्रवेशक [का प्रयोग] होता है । [ग्रागे प्रवेशक शब्दको व्युत्पत्तिसे दिलाते हैं] श्रप्रत्यक्ष श्रथोंकी सामाजिकोंके हृदयमें प्रविष्ट कराता है इसलिए 'प्रवेशक' [कहलाता] । कुछ [नाट्याचार्य] लोग प्रथम ग्रङ्कके श्रादिमें इस [प्रवेशक] का प्रयोग नहीं मानते हैं । [यह विष्कम्भकसे इसका तीसरा भेद हुग्रा] । 'एतद्' श्रधातु विष्कम्भक ग्रोर प्रवेशक नाटकादि चारमें [रहते हैं] । इसमें नाटकादि चार से] १ नाटक, २ प्रकरण, ३ नाटिका ग्रोर ४ प्रकरणी [इन चारका प्रहरण करना चाहिए] । नाटकादिमें [श्रङ्क रूप] परिमित साधनोंके द्वारा मुख्य तथा श्रवान्तर [गौए] बहुत-से कार्योका परिज्ञान राजा ग्रोर उसके सहायक सन्च्री श्रादिको कराना होता है । इसलिए इनमें ही विस्तृत श्रवान्तर कार्योका परिचय करानेके लिए ये विष्कम्भक ग्रोर प्रवेशक [प्रयुक्त] होते हैं । 'व्ययोग' श्रादि एकाङ्की [हपक] में थोड़ा-सा कथा भाग होनेसे कम कार्य होनेके कारण [इन विष्कम्भक ग्रोर प्रवेशकोंका प्रयोग] नहीं होता है । ग्रोर श्रनेक ग्रङ्कों वालोमें भी 'समवकार' के ग्रङ्कोंके परस्पर सम्बद्ध न होनेसे, तथा ग्रङ्कोंमें कुछ दिनोंका ही वृत्तान्त होने से [प्रवेशक तथा विष्कम्भककी श्रावश्यकता नहीं होती है] यह श्रभिप्राय है । श्रङ्कारयादि [शेष तीन श्रथपक्षेपक] तो ग्रहण हुत्के सूचन करने योग्य होनेके कारण यथासम्भव [ग्रावश्यकतानुसार] ग्रन्थ हपकोंमें भी प्रयुक्त होते हैं ।

इस प्रकार इस लक्षणमें प्रवेशकके विष्कम्भक तथा ग्रन्य ग्रथपक्षेपकोंसे जो भेद दिखलाए गए हैं वे मुख्य रूपसे निम्न प्रकार हैं—

१. विष्कम्भक में मध्यमपात्र भी प्रयुक्त होते हैं इसलिए संस्कृत भाषाका भी श्राश्रय लिया जाता है । किन्तु प्रवेशकमे केवल नीचपात्र ही होते हैं इसलिए उसमें केवल प्राकृत भाषाका ही उपयोग होता है ।

२. विष्कम्भकका प्रयोग ग्रङ्कके श्रादिमें भी प्रस्तावनाके बाद किया जा सकता है । किन्तु प्रवेशकका प्रयोग प्रथम ग्रङ्कमें नहीं होता है ।

३. प्रज्ञास्य श्रादि ग्रन्य ग्रथपक्षेपकोंका प्रयोग नाटिकादिमें भी हो सकता है किन्तु

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२६ ] नाट्यदर्पणाम [ क० २६, सू० २२

स्याथ स्याद्वास्य-चूलिके लक्षण्यति—

[सूत्र २२]—ग्राद्वास्यमन्तःपात्रेषा छिन्नाङ्मुखयोजनम् ।

वस्तुनः सृचने चूला पात्रेणपध्यसंस्थितेः ॥२६॥

स्यथपात्रेप्रति पूर्वस्याङ्कस्यांते स्त्री-पुं सन्यतरस्य पुनः पात्रेषा । छिन्नस्य

स्यासमवद्धस्य उत्तराङ्मुखस्य योजनमुपचेदपो यस्सतत् । ‘ग्राद्वास्यम्’ श्रङ्मुखम् । यथा

वोर्चारित द्वितीयाङ्के—

“प्रविश्य सुमन्त्र:-भगवन्तौ वसिष्ठ-विश्वामित्रौ भवतः सभार्गवान्

स्याद्द्येते इति ।

इतरे तु-कच भगवान्तौ ?

सुमन्त्र:-महाराजदशरथस्यान्तिके ।

इतरे-तदनुरोधान्न तत्नैव गच्छामः ।

इत्यादि । सुमात्रो—ततः प्रवेशान्ति वसिष्ठ-विश्वामित्र-शतानन्द-जनक-

परशुरामः !’

इत्यत्र पूर्वाङ्कान्ते एव प्रविश्टेन सुमन्त्रपात्रेण शतानन्द-जनकः प्रय्थविन्छेदे

उत्तराङ्मुखसृचनेन स्याद्वास्यस्मिति ।

विष्कम्भक शौर प्रवेशकका प्रयोग एकांकी व्यायोगादि शौर परस्परासम्भद श्राद्दों वाले सम-

कार तथा ग्रप्लवृत वाले अन्य रूपकभेदोंमें नहीं किया जाता है ।

[सूत्र २२]—[प्रस्तुत ग्रन्थमें ही प्रवष्ट होने वाले] स्यथितम पात्रके द्वारा [पूर्व ग्राद्दूसे

स्यासम्वद्ध] विच्छिते [स्यगले उत्तरवर्ती] ग्रारम्भका सम्बन्ध जोडनेसे ‘स्याद्वास्य’ नामक ग्रारम्भक

क्षेपक होता है] श्रौर नेपध्य स्थित पात्रोंके द्वारा वस्तुकी सृचना ‘चूलिका’ [कहलाती] है । १२६।

स्यथितम पात्रके द्वारा स्यार्थात् पूर्व ग्राद्दूके ग्रन्थमें [प्रवष्ट होने वाले] स्त्री या पुरुष

किसी भी पात्रके द्वारा छिन्न स्यार्थात् [पूर्व ग्राद्दूके साथ] स्यासम्वद्ध ग्रसगले ग्राद्दूके ग्रारम्भ

[मुख] की जो योजन स्यार्थात् उपक्षेप [बीजारोपण] करना वह ‘ग्राद्वास्य’ स्यर्थात् ‘ग्रङ्मुख’

[कहलाता] है । जैसे महावीर चरितके द्वितीय ग्राद्दूके ग्रन्थमें—

“प्रविश्य सुमन्त्र [कहते हैं कि]—महोष वसिष्ठ तथा विश्वामित्र, मार्गव

[परशुराम] सहित ग्राप दोनों [शतानन्द श्रौर जनक] को बुला रहे हैं ।

ग्रान्य दोनों—[जनक श्रौर शतानन्द] दोनों कहाँ हैं [यह पूछते हैं] ?

सुमन्त्र—[उत्तर देते हैं]—महाराज दशरथके समीप हैं ।

ग्रान्य दोनों —उनकी इच्छाके प्रणुसार हम सब वहाँ जाते हैं ।

पहल ग्राद्दूकी [द्वितीय] समाप्तिमें [ग्राया है] । उसके बाद [ग्रगले ग्राद्दूके ग्रारम्भमें]

वसिष्ठ विश्वामित्र शतानन्द जनक श्रौर परशुराम प्रवष्ट होते हैं ।”

इस उदाहरणमें पूर्ववर्ती द्वितीय ग्राद्दूके ग्रन्थमें ही प्रवष्ट होने वाले सुमन्त्र पात्रने

शतानन्द श्रौर जनकके वार्तालाप रूप स्यथको विच्छिन्द करक [ग्रगले तृतीय ग्राद्दूमे वसिष्ठ

विश्वामित्र श्रादिके साथ होने वाले जनक शतानन्दके वार्तालाप रूप] ग्राद्दूके ग्रारम्भकी सृचना

वी है [इसलिए यह ग्र द्रास्यका उदाहरण है] ।

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का० २६, सू० २२ ] प्रथमा विवेक: [ ४६

'वस्तुन्' इति कस्यचिदर्थस्य सूचनमुपदेप:। 'पात्रे:' स्त्री-पुंसैः। 'नेपथ्यसंस्थितै:' यवनिकान्तरदेशस्थैरपि: सा चूड़ेव चूलिका। रङ्गाभिनेयार्थंय नेपथ्यपात्रोक्ते: शिखाकलपत्वात्। यथा 'उत्तररामचरिते' द्वितीयाङ्कस्यादौ—

“स्वागर्त तपोधनाया:। ततः प्रविशति तपोधना।”

छात्र नेपथ्यपात्रे स्त्रिया वासन्तिकया छात्रेयी वस्तुनः सूचनात् चूलिका। यथा वा 'नलविलासे' द्वितीयाङ्कस्यादौ—

“स्वागतं सपरिच्छदाय कलहंसाय। ततः प्रविशति कलहंसो मकरिकाप्रभूति-कश्च परिवार:।”

छात्र नेपथ्यपात्रे पुंसो शेखरेऽया कलहंसादिवस्तुनः सूचनात् चूलेति। यथा वा रत्नावल्यां—

“व्यस्तापास्तसमस्तभासि नमस: पारं प्रयाते रवौ व्यास्थानीनि समये समं नृपजन: सायन्तने सम्पतन । समप्रत्ययेष सरोरुहयुति मुष: पादान्तवासेचितुं प्रीतियुक्तर्षकृतो दशमुदयनस्येन्दोरवदीच्यते ॥”

यहाँ 'छूलिका' का उदाहरण दिया है इसमें 'छिन्न्तो' पद को विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। इसी पद के द्वारा 'छूलिका' श्रेणी ग्राङ्गावतारका भेद होता है। ग्राङ्गावतारमें श्रागला ग्राङ्ग पूर्व ग्राङ्गसे ग्रसनबद्ध रूपमें प्रारम्भ होता है श्रोर ग्राङ्ग ग्रारम्भ होता है। यहाँ इन दोनोंका भेद है।

'वस्तुन:' श्रर्थात् किसी श्रर्थका 'सूचन' श्रर्थात् उपक्षेप करना। 'पात्रे:' श्रर्थात् स्त्री-पुरुषोंके द्वारा। 'नेपथ्यसंस्थितै:' श्रर्थात् यवनिकाके भीतर स्थित। 'चूड़' श्रर्थात् शिखाके समान होनेसे 'चूलिका' है। क्योंकि नेपथ्यको उक्ति रङ्गमें श्रभिनय किए जानेवाले ग्रथंककी शिखाके शिक्षाके समान होती है। जैसे उत्तररामचरितके द्वितीय ग्रङ्कके श्रादिमें—

[नेपथ्यमें] तपोधनाका स्वागत है।” इसके बाद तपोधना प्रवेश करती है।” इसमें नेपथ्यमें स्थित वासन्तिका रूप स्त्रीपात्रके द्वारा छात्रेयी रूप वस्तुके सूचित होनेसे यह 'चूलिका' [का उदाहरण] है।

ग्रथवा जैसे नलविलासके द्वितीय ग्रङ्कके श्रादिमें [भी चूलिका दी गई है]—“सपरि-वार कलहंसका स्वागत है। इसके बाद कलहंस श्रौर मकरिका ग्रादि परिवार प्रवष्ट होता है।” इसमें नेपथ्यवर्ती 'शेखर' नामक पुरुषपात्रके द्वारा कलहंसादि वस्तुके सूचित होनेसे 'चूलिका' है।

ग्रथवा जैसे रत्नावलीमें—[प्रथम ग्रङ्कमें]—

“व्यस्ता पास्तसमस्तभासि नमस: पारं प्रयाते रवौ व्यास्थानीनि समये समं नृपजन: सायन्तने सम्पतन । समप्रत्ययेष सरोरहयुति मुष: पादान्तवासेचितुं प्रीतियुक्तर्षकृतो दशमुदयनस्येन्दोरवदीच्यते ॥”

“ग्रपनी समस्त प्रभाको ग्रस्ताचलपर विखेरकर, सूर्यके ग्राकाशके पार चले जानपर, सायंकालके समय सभा-मण्डमें एक साथ प्रवष्ट होते हुए सारे राजा कमलोंकी कान्तिका हरण करने वाले [ग्रर्थात् कमलोके समान सुन्दर] ग्रौर ग्रतप्त ग्रानन्द [प्रीतियुक्तकष] को प्रदान करने वाले [चन्द्रमाकी किरणोंके समान कमल-शोभापहारी ग्रौर ग्राह्लादावकारक] सतत उदयशील चन्द्रमाके पादोंके समान ग्राप 'उदयन' के पादोंको [पादोंको] चरणोंकी सेवा [उपासना] करनेकेलए देख रहे हैं ।

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६० ] नाट्यदर्पणम् [ क० २७, सू० २३

इति नेपथ्यपात्रेषु वन्दिनना काननस्थस्योदयनवस्तुनः सागरिकां प्रति सुचनात् चूलिका १२६ ॥

स्वथाज्ञानवतारं लचयितुमाह--

[सूत्र २३]--सोऽड्कावतारो यत् पात्रे शङ्खान्तरमचुनम् ।

पात्रान्तराभावेन यस्मादड्कस्य पात्रैरविच्छिन्नार्थतया सुचनीया‌र्थस्याभावात् प्रवेशक-विष्कम्भक-सूचनारहितमड्कान्तरं भवति, स द्वितीयाड्कस्यावतारस्यादौ च--

तार: । यथा मालविकाग्निमित्रे प्रथमेड्के--

"विदूषक:--तेन हि दुवे वि देवीए पेक्खविदा गइव संग्गीदोबकरयं गाहिव तत्थवदो हदयं विसज्जेज्थ । यथवा मुद्दगसदृो रयणं उत्थावडस्सदि ।

[तेन हि द्वारवि देख्या: प्रेक्षागृहं गत्या मझीतोपकरयं मुह्हीलव! तत्थभवन्तौ दूरं विसर्जयेताम् । यथवा मुद्गराशब्द एव तमुस्सापयिदव्यति इति । संस्कृतम् ]"

इद्युपक्रमे मुद्गराशब्दोऽनन्तरं तान्येव सर्वाणि पात्राणि द्वितीयाड्कमार-

भन्ते इति ।

यत्राङ्गे तु यत्राङ्के ग्रन्थाङ्कनानां बीजलचणोद्भवतारायते तमड्कावतारमाम-

नन्ति । यथा रत्नावल्यों द्वितीयोऽड्क: तत्र हि--

वहाँ नेपथ्यवर्ती चारण रूप पात्रके द्वारा सागरिकाके प्रति उद्यानमें स्थित उदयन रूप वस्तुके सूचनसे चूलिका [बनती] है

इस प्रकार इस एक ही कारिकामें ग्रन्थकारने 'ग्रड्कमुख' और 'चूलिका' इन दो ग्रन्थोंपेक्षकोंके लक्षणको सुन्दरताके साथ प्रस्तुत किए हैं ॥ २६॥

ग्रड्कावतारका लक्षण--

ग्रब [ग्रन्थकार] ग्रड्कावतारका लक्षण करनेकेलिए कहते हैं--

[सूत्र २३]--जो [पूर्व ग्रड्के] पात्रोंके द्वारा [ग्रन्य किन्हीं पात्रोंके आगमनकी विश्कम्भक आदिके द्वारा] सूचना दिए बिना [पूर्व ग्रड्कोंके पात्रोंसे ही] दूसरे ग्रड्कका प्रारम्भ होता है उसको 'ग्रड्कावतार' कहते हैं ।

[नवीन ग्रड्कमें जाननेवाले नये] दूसरे पात्रोंके न होनेके कारण और सूचनोय अंशका प्रभाव होनेसे प्रवेशक, विश्कम्भक आदिके बिना ही जिस [पूर्ववर्ती] ग्रड्कके पात्रोंके द्वारा प्रविच्छिन्न रूपसे नये ग्रड्कका प्रारम्भ किया जाता है वह द्वितीय ग्रड्कका प्रवतारगा कराने

वाला होनेसे 'ग्रड्कावतार' कहलाता है । जिस मालविकाग्निमित्र [नाटक] के प्रथम ग्रड्क [के

निम्न वाक्य ग्राता है]--

"विदूषक--इसलिए ग्राप दोनों देवीकी रज़्जणालमें जाकर और सद्दीतके साजको संभालकर [यहाँ हम लोगोंके पास] इूत भेज दीजएगा । यथवा [इूत भेजनेकी ग्रावश्यकता

नहीं होगी क्योंकि [ग्रापके] मुद्गरका शब्द ही हम सबको उठा [कर सद्दीत सुननेकेलिए ग्रापके

पास पहुँचाए] देगा ।"

[प्रथम ग्रड्कके ग्रन्तमें] इस प्रकारका उपक्रम करके मुद्गर शब्दके श्रवराके बाद वे ही सब पात्र द्वितीय ग्रड्कका प्रारम्भ करते हैं ।

दूसरे प्राचायँ तो जिस ग्रड्कमें ग्रनन्य [सब] ग्रड्कोंके बीजभूत ग्रंशकी प्रवतारगा की

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का० २७, सू० २४ ] प्रथमो विवेक: [ ६१

"ईदृशस्स कन्यागारयस्सास्त ईदृशे ध्येये वरे श्राहिलासेया भोदृढं । [ईदृशास्य कन्याारत्नस्येदृश एव वरेहिलासेया भवततदृयम् । इति संस्कृतम]" इत्यादिकोडनुरागलत्न्या: सर्वाङ्ग्जानार्थम् इति । श्रयं च गर्भाङ्कोडस्युच्यते ।

यदाहु:- "श्रज्ञान्तरेव चाङ्को निपतति यथ्मिन्न् प्रयोगमासाद्य । ही अर्थे कियाकृतो गर्भाङ्को नाम विधेय:" इति ।

ग्रथ विष्कम्भकादीनां विषयव्यवस्थामाह— [सूत्र २४]—श्राद्यौ सूच्ये बहावन्ये क्रमादुपे तरे तमे ॥ २७ ॥

तर-तम-प्रत्ययौ नान्तरीयकतया सन्निधानाच्चालपशाब्दं प्रकृतिमारुपंत:, तेनाल्पतरे श्रल्पतमे इत्यर्थ: । ह्लनोदनुरोधाच्च प्रयत्यातुकरणानिर्देश: । 'श्रन्ये' श्राद्यौ-चूलिका-ग्राङ्कावतारा: । क्रमादिति लच्याक्रमेण । 'बहौ', बहुकाले च सूच्ये श्राद्यौ विष्कम्भक-प्रवेशकौ । 'श्रल्पत' श्रल्पकाले चाङ्क्रास्यम्, श्रल्पतरे श्रल्पतरकाले च चूलिका, श्रल्पतमे श्रल्पतमकाले चाङ्कावतार इति ॥ २७ ॥

जाती है उसको 'ग्राङ्कावतार' मानते हैं । जैसे रसनावलीमें दूसरा ग्राङ्क [इनके मतसे ग्राङ्कावतार का उदाहरण बना है] । क्योंकि उसमें—

"इस प्रकारके कन्याारत्नका इस प्रकारके वरमें ही ग्रभिलाष होना चाहिए" । इत्यादिसे सब ग्राङ्कोंका [बीजभूत] ग्राङ्कराग रूप ग्रर्थ [प्रदर्शित किया गया है] । इस लिए [यह द्वितीयाङ्क ही ग्राङ्कावतार माना जाता है] । इसीको [वे लोग] 'गर्भाङ्क' भी कहते हैं । जैसाकि [गर्भाङ्कका लक्षण करते हुए] लिखा है कि——

"जहाँ प्रयोग [के श्रवसर] को प्राप्त करके ग्राङ्कके भीतर ही बीजार्थ श्रौर युक्ति सहित नवीन ग्राङ्क [उससे ग्रविच्छिन्न रूपसे] प्रारम्म हो जाता है उसको 'गर्भाङ्क' नामसे समझना चाहिए ।

विष्कम्भकादिकी विषय-व्यवस्था— पिछली कारिकाओंमें विष्कम्भक, प्रवेशक श्रादि पांच प्रकारके ग्रर्थोपक्षेपकोंका वर्णन किया था उनके विषयका उपसंहार करते हुए २७ वीं कारिकाके उत्तरार्धमें इनका प्रयोग कब-कब करना चाहिए इस विषयव्यवस्थाका निरूपण करते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं—

ग्रथ विष्कम्भक श्रादिकी विषय-व्यवस्थाको कहते हैं—— [सूत्र २४]—बहुत श्रौर बहुकाल-व्यापी [ग्रर्थके] सूचनोपर ग्रादिके दो [ग्रर्थात् विष्कम्भक श्रौर प्रवेशकका] प्रयोग करना चाहिए] श्रौर श्रल्प, श्रल्पतर एवं श्रल्पतम [ग्रर्थके सूचनोय] होने पर क्रमसे [ग्राङ्क्रास्य, चूलिका श्रौर ग्राङ्कावतार रूप] ग्रन्थ [ग्रर्थोपक्षेपकोंका प्रयोग करना चाहिए] । २७ ।

[कारिकामें दिए हुए] तर, तम दोनों प्रत्यय [प्रकृतके बिना न रह सकनेके कारण] ग्रविनाभूत होनेसे श्रौर सन्निहित होनेके कारण 'ग्रल्प' शब्दको प्रकृति रूपमें ग्राक्षिप्त कर लेते हैं । इसलिए श्रल्पतर श्रौर श्रल्पतम यह ग्रर्थ हो जाता है । [मूल कारिकामें] छन्दके अनुरोध के कारण [तर, तम] प्रत्ययके ग्रनुकरणका निर्देश किया गया है । [कारिकामें ग्रन्य' [पद] से ग्राङ्क्रास्य, चूलिका श्रौर ग्राङ्कावतार

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अथ वृत्तान्तरोहिष्टमुपायं व्याचष्टे—

[सूत्र २५]—बीजं पताकां प्रकरी विन्दु: कार्यं यथारुचि ।

फलस्य हेतव: पञ्च चेतनाचेतनात्मका: ॥ २५ ॥

उपायस्वरूपापरिज्ञाने तद्विषयत्वात्तन्मार्गभेदानां स्वरूपपरपरिज्ञानासम्भव इति उपचारस्वरूपं व्युत्पाद्यते । 'यथारुचि' इति नैपामोदिशिको निवन्धक्रम:, सर्वेषामुपायस्वरूपाणां व्या ।। 'फलस्य' मुख्यसाध्या 'हेतव:' उपायाः । इह हेतुद्विधा चेतनाचेतनश्च । चेतनोऽपि मुख्यामुख्यभेदाद् द्विधा । मुख्यो बीजं, तन्मूल-

त्वादितरेपाम् । त्रमुख्यस्तु कार्यम् । चेतनोऽपि द्विधा मुख्य उपकरःमूतश्च । मुख्यो

वतार [क्रम कहा होता है] । 'क्रमात्' इस पदसे लक्षणके कमसे [श्रृङ्गास्य चूलिका श्रृङ्गावतारका प्राप्त करना चाहिए । स्वेच्छया नहीं यह श्रृङ्गप्रस्ताव है] । बहुत तथा बहुकाल व्यापी [श्रृङ्गके] सूचनात्मक होनेपर श्राविके दो श्रर्थात् विष्कम्भक श्रौर प्रवेशक [प्रयुक्त होते हैं] । श्रृङ्ग श्रौर श्रृङ्गप्रकालीक [श्रृङ्गके सूचनात्मक] होनेपर श्रृङ्गास्य, [उससे भी कम] श्रृङ्गपतार

श्रौर श्रृङ्गपतार-कालीक [श्रृङ्गके सूचनात्मक] होनेपर चूलिका, तथा [उससे भी कम] श्रृङ्गपततम

श्रौर श्रृङ्गपततम-कालीक [श्रृङ्गके सूचनात्मक] होनेपर श्रृङ्गावतार [का प्रयोग किया जाना चाहिए] यह श्रृङ्गप्रस्ताव है । २७ ।।

इस प्रकार इस कारिकाकी समाप्तिके साथ पांचों प्रयत्नोपकल्पकोंका विषय-विवेचन समाप्त हो जाता है । पांचवीं कारिकामें नाटकका जो लक्षण किया गया था उसकी ही व्याख्या श्रागे चल रही है । इसमें 'श्रृङ्ग' पद ग्राया था उसकी व्याख्याके प्रसङ्गमें इन विश्कम्भक

ग्रादि श्रृङ्गोपकल्पकोंका निरूपण किया गया । उसके द्वारा नाटकके लक्षणमें ग्राए हुए 'श्रृङ्ग'

पदकी व्याख्या पूर्ण हो जाती है । नाटक-लक्षणा वाली कारिकामें 'श्रृङ्ग' पदके बाद 'उपाय'

पदका प्रयोग किया गया है । श्रृङ्ग एव श्रृङ्ग पदकी व्याख्याके बाद 'उपाय' पदकी व्याख्या

क्रम-प्राप्त है । इस लिए श्रगली कारिकामें 'उपाय' पदकी व्याख्या प्रारम्भ करते हैं ।

इस कारिकामें पांच प्रकारके उपाय बतलाए गए हैं । परन्तु पहले उनके चेतन

श्रौर श्रचेतन दो भेद किए हैं । उनमेंसे श्रचेतन उपायोंके भी मुख्य तथा श्रमुख्य दो भेद किए

हैं । फिर चेतन उपायोंके भी मुख्य तथा उपकराभूत दो भेद करके उनमेंसे उपकराःमूतके

भी दो भेद कर दिए हैं । इस प्रकार उपायोंकी संख्या पांच हो जाती है । इन पांचों उपायों

का वर्णनन इस कारिकामें निम्न प्रकारसे किया गया—

[सूत्र २६]—१. बीज, २. पताका, ३. प्रकरी, ४. विन्दु श्रौर ५. कार्य [पताका

प्रकरी श्रौर विन्दु ये तीन चेतन तथा बीज एवं कार्यको दो श्रचेतन इस प्रकार] ये चेतन श्रौर

प्रचेतनात्मक फलके हेतु पांच ['उपाय' कहलाते] हैं [उनका] श्रपनी रुचिके श्रनुसार [प्रयुक्त

करे । २६

उपायोंके स्वरूपको जाने बिना उनके सम्बन्धमें श्रारम्भादिके स्वरूपका परिज्ञान भी

प्रसम्भव है, इस लिए 'उपायों'के स्वरूपका परिचय करवाया जा रहा है । [कारिकमें ग्राए

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का० २५, सू० २६ ] प्रथमो विचेक: [ ६३

विन्दु:, कार्यानुसन्धानरूपत्वात् । उपकराभूतो द्विधा । (१) स्वार्थसिद्धियुक्तः परार्थसिद्धिपरः, (२) परार्थसिद्धिपरः । पूर्वः पताका, अन्यः प्रकरीति । छात्र चाचेतनचेतनानां मध्ये बीजबिन्दोःमु ह्यत्वमू, सर्वेध्याऽपिर्वादिति ॥२२॥

[सूत्र २६]—स्तोकोदिष्ट: फलप्राप्तो हेतुर्वीजं प्ररोहणात् । श्रादौ गभीरतवादिल्पनिचिप्तो मुख्यफलावसानश्च यो हेतुर्मुख्यःस।ध्योपायः, स धान्यचोज्जबदु 'बीजमू' । 'प्ररोहणात्' उत्तरत्र शाखोपशाखादिभविषतरखान् । इदं च श्रामुखानन्तरं निबध्यते । बीजं हि नाटकादीनामितिवृत्तार्थस्योपायः । श्रामुखं तु रूपकप्रस्तावनार्थं नटस्यैव वृत्तमू । याः पुनरत्र नाटकार्थे स्वशो नटोक्तयस्ताः प्रयोगपातनिकार्थमेव । छत्र एव श्रामुखोक्ता श्राप बीजोक्यः प्रवष्टनाटकपात्रेषु पुनरुच्यन्ते । तथा च व रत्नावल्याम--

हुए] 'यथारुचि' इस [पद] से [यह सूचित किया है कि] कि श्रौपदेशिक [प्रयत्नु जिस कमसे उनको यहां पढ़ा गया है उसे] कमसे [नाटकमे] उनका प्रयोग-क्रम [ग्रपेक्षित] नहीं है । और न सब [पाँचों उपायों] का श्रप्रतिहार्यत्व [ग्रपेक्षित] है । [प्रर्थात् कवि या नाटककार अपनी श्रावश्यकता श्रौर इच्छानके श्रनुसार उनमेंसे किन्हींका श्रौर किसी भी कमसे उपयोग कर सकता है] । 'फल' श्रर्थात् [नाटकके] मुख्य साध्यके 'हेतु' उपाय [कहलाते] हैं । ये हेतु [उपाय] दो प्रकारके होते हैं । एक 'ग्रचेतन' श्रौर दूसरे 'चेतन' [उनमेंसे] श्रचेतन [हेतु] भी मुख्य तथा श्रामुख्य भेदसे दो प्रकारका होता है । मुख्य [ग्रचेतन हेतु] 'बीज' [कहलाता] है । द्योकि ग्रन्थ सब अपने श्राश्रित होते हैं । श्रामुख्य [ग्रचेतन हेतु] 'कार्य' कहलाता है । चेतन [हेतु] भी मुख्य श्रौर उपकरणाभूत दो प्रकारका होता है । मुख्य [चेतन हेतु] कार्यानुसन्धान रूप होनेसे 'बिन्दु' [कहलाता] है । उपकरणाभूत [चेतन हेतु भी] दो प्रकारका होता है । एक स्वार्थसिद्धियुक्त होनेके साथ परार्थसिद्धिपर, श्रौर दूसरा [केवल] परार्थसिद्धिपर तत्पर । [इनमेंसे] पहिला [प्रर्थात् स्वार्थसिद्धयुक्त होनेके साथ परार्थसिद्धपर चेतन साधन] 'पताका' । श्रौर [केवल परार्थसिद्धिपर] दूसरा [चेतन साधन] 'प्रकरी' कहलाता है । इनसे [भी] श्रचेतन तथा चेतन [साधनों श्रौर उपायों] मेंसे [क्रमशः] बीज श्रौर बिन्दुकी [नाटक की श्राश्रयान-वस्तुमें] सर्वत्र ध्याप्तक होनेसे मुख्यता है ॥२५॥

[सूत्र २६]—ग्रारम्भमें सूक्ष्मरूपसे कहा गया श्रप [ग्रन्थमें] फल रूपमें पर्यवसित होनेवाला [मुख्य श्रचेतन] हेतु [वृक्षके बीजके समान शाखा श्रादि रूपमें] विस्तृत हो जानेसे 'बीज' कहलाता है ।

[नाटकके] श्रारम्भमें, [श्रम्भीर] दृश्य होनेसे सूक्ष्म रूपमें बोया श्रौर मुख्य फलमें समाप्त होनेवाला जो हेतु, मुख्य-साध्यका उपाय है वह धान्यके बीजके समान होनेसे 'बीज' [कहलाता] है । [कारिकामें ग्राए हुए] 'प्ररोहणात्' [पदका श्रभिप्राय] 'शाखा-प्रशाखा रूपमें फल जानेसे' पद है । [नाटककी रचनाओंमें] श्रामुख [प्रस्तावना] के बाद इस [बीज] को निबद्ध किया जाता है । बीज नाटकके इतिवृत्त [ग्राश्रयान-वस्तु] का उपाय [होता] है । [किन्तु] श्रामुख तो रूपकको प्रस्तुत करनेकेलिए नटका ही व्यापार [वृत्तमू] है ।

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"द्वीपादिन्यसमादपि मध्यादपि जलनिविंदुशोण्यान्तात्। छ्रान्तीय भटिति घटयति विधिरभिनतमभिमुखीभूतः ॥"

इत्याचामुखवोक्तं योगन्धरायणाः पठति ।

श्रामुख-भागका नाटककी मुख्य ग्राह्यान-वस्तु या इतिकृत कथा ग्राहिके साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता है।] इस [ग्रामुख] में जो नाटकके मुख्य कथा-भाग [ग्रर्थ] को स्पर्श करनेवाली नटोंकी उक्तियाँ होती हैं वे प्रयोगकी श्रावतरिताकाकेलिए ही होती हैं ।

[मुख्य नाटकका श्रृङ्ग नहीं होती ।] इसी लिए श्रामुखमें कही हुई बीजप्रोत उक्तियोंको [ग्रामुखके बाद] प्रविट्ट हुया नाटकका पात्र फिरसे दुहराता है । इसीलिए रत्नावलीमें—

"ग्रामुखताको प्राप्त हुया [प्रभिमुखभूतः] देव, ग्रन्य द्वीपसे, सागरके वीचसे श्रौर विशाखोंके छोरेसे भी श्रपने श्रभिमत श्रथ्यको लाकर मिलाता देता है ।"

ग्रामुखमें कहे हुये [नाटकके कथाभागको स्पर्श करनेवाले] इस [इलोक] को [ग्रामुख के बाद प्रविट्ट हुया नाटकका पात्र] योगन्धरायण फिर पढ़ता है ।

रत्नावलीके श्रामुखमें नटीने नटसे यह कहा था कि मेरी एक ही लड़की है तुमने बड़े दूर देशमें उसका सम्बन्ध पक्का कर दिया । पता नहीं इतनी दूरसे श्राकर वह कब मेरी लड़कीका पारिग्रहण करेगा । मैं तो इसी चिन्तामें मरी जा रही हूँ । इसलिए मेरा मन गाने-वानेकी नहीं करता । इसके उत्तरमें नटने इस इलोकको कहा है । उसका भाव यह है कि तुम नटी क्यों चिन्ता करनी हो । भगवान्के श्रनुकल होनेपर वे तो दूसरे द्वीपसे, समुद्रके मध्यसे श्रोर दिशाओंके छोरेसे भी श्रभिमत श्रथ्योंको लाकर मिला देते हैं । तब यह कार्य भी पूर्ण होगा ही । क्योंकि मैंने भी तो भगवान्की प्रेरणासे ही यह सम्बन्ध पक्का किया है ।

इस प्रकार यह श्लोक मुख्य रूपसे नटीकी चिन्ताकी निवृत्तिकेलिए नटके द्वारा कहा गया है । किन्तु वह प्रकृत नाटककी कथावस्तुको स्पर्श कर रहा है ।

इस नाटककी नायिका रत्नावली सिहलेश्वरकी पुत्री है । किसी ज्योतिषीने इस नाटकके नायक राजा उदयन श्रौर उनके मन्त्री योगन्धरायणको बतलाया था कि सिहलेश्वरकी पुत्री इस रत्नावलीके साथ जिसका विवाह होगा वह चक्रवर्ती साम्राज्यको प्राप्त करेगा ।

इस लिए उदयनकी श्रोरसे योगन्धरायणाने रत्नावलीका विवाह उदयनके साथ कर देनेका प्रस्ताव उसके पिताके सामने रखा । किन्तु उस समय उदयनकी रानी वासवदत्ता विचुमान थी जो दूरके सम्बन्धमें रत्नावलीकी बहिन लगती थी ।

सिहलेश्वरने यह सोचकर कि इस विवाहसे रत्नावलीकी रत्नावलीकी बहिन वासवदत्ताको वैलसी होगी—उस प्रस्तावको श्रश्रकार कर दिया ।

कुछ समय बाद बहिन वासवदत्ताको मरण जानेका समाचार फैलता देनेके बाद वही प्रस्ताव फिर योगन्धरायणाने वासवदत्ताके मर जानेका समाचार फैलनेके बाद वही प्रस्ताब फिर सिहलेश्वरके सामने रखा । इस बार वे सम्बन्ध करनेके लिए तैयार हो गए ।

उस प्रसङ्गमें रत्नावली सिहलसे भारत ग्रा रही थी । उसका जहाज डूब गया । वह जैसे-तैसे किसी काष्ठ के सहारे बचकर उधरसे ग्रानेबाले व्यापारियोंके द्वारा योगन्धरायणाको प्राप्त हुई ।

योगन्ध-रायणाने उसे श्रपनी बहिन बतलाकर रक्षाके लिए राजमहलमें रानी वासवदत्ताके पास कुछ दिनोंके लिए रख दिया । यह कन्या सागरसे प्राप्त हुई थी इस लिए इसका नाम भी योगन्धरायणाने 'सागरिका' रख दिया था ।

कन्याको वासवदत्ताने श्रपने पास रख तो लिया किन्तु उसके ग्रपूर्व रूप-लावण्यको देखकर वह बड़ी सशङ्क हो गई कि कहीं राजाकी दृष्टि

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का० २६, सू० २६ ]

प्रथमो विवेक:

[ ६५

यथा वा 'सत्यहरिशचन्द्रे'—

"सर्ववैकतानवृत्तीनां प्रतिज्ञातार्थकारिक्याम् । प्रभविष्णुं देवोडपि कि पुनः प्राकृतो जनः ॥"

इत्यामुखोक्तं हरिशचन्द्रः पठति ।

यथा वा 'च्रसमदुपज्ञ एवं 'यादवार्जुदये'—

उदयं चाभिमुख्यभाजां सम्पन्नार्थं विपत्तयः पुसाम् । दवलितानले प्राप्तः कनकस्य हि तेजसो वृद्ध्यै ॥

इति नाटकपात्रे गुप्तमन्त्रः पठतति

इस पर न पड़ जाय । इस लिए वह बड़े यत्न-पूर्वक राजा उदयनकी दृष्टिसे उसको बचाए रखनेका यत्न करती थी । किन्तु राजमहलमें रहकर यह कब तक सम्भव था । ग्राखिर राजा के कानों तक उसके रूप-लावण्यकी चर्चा पहुंची ही । और फिर सब प्रकारके उपायोंका श्रवलम्बन करके राजाने उसका साक्षात्कार करने और ग्रन्थमें उसके साथ विवाह करनेमें सफलता प्राप्त कर ही ली ।

इस क्रमसे 'ग्रन्थकूल' दैवने सिंहल नामक दूसरे द्वीपसे, समुद्रके मध्यसे और दिशाग्रों द्वारा उसे राहुग्रालोकों लाकर उदयनके साथ सम्बन्ध कर ही दिया । इस प्रकार ग्रामुखमें जो यह श्लोक केवल नटीकी सान्त्वनाके लिए कहा गया था वह नाटककी मुख्य कथा वस्तुकास्पर्श कर रहा है । इसलिए ग्रामुखकी समाप्तिके बाद जब नाटकके पात्रके रूपमें उदयनके मन्त्री योगन्धरायण रज्जमञ्च पर प्रवृष्ट होते हैं तो फिर वे इस श्लोकको दोहराते हैं । ग्रामुखमें पढ़ा हुग्रा यह श्लोक मुख्य कथाभागका स्पर्श करनेवाला होनेपर भी केवल नटोक्तिमात्र था, नाटकका भाग नहीं । इसी लिए मुख्य नाटकसे सम्बन्ध करनेके लिए योगन्धरायणके द्वारा उसका पुनः पाठ दिखलाया गया है । इसी प्रकारके और उदाहरण भी ग्रागे देते हैं ।

ग्रथवा जैसे 'सत्यहरिश्चन्द्र' [नाटक] में—

केवल सर्व-प्रधान वृत्तियों वालों और प्रतिज्ञात प्रयथकों [निश्चित रूपसे] पूर्ण करने वालों [के मार्गमें बाधा डालने] के लिए देव भी समर्थ नहीं होते हैं । फिर साधारण लोगोंकी तो बात ही क्या ।

ग्रामुखमें कहे हुए इस [इलोक] को [नाटकके पात्रके रूपमें प्रवृष्ट हुग्रा] हरिश्चन्द्र [फिर दुबारा] पढ़ता है ।

ग्रथवा जैसे हमारे ही बनाए हुए 'यादवार्जुनय' में—

उन्नतिकी और प्रगतिशील पुरुषोंकी विपत्तियाँ भी उनके ग्रभ्युदय [सम्पत्ति] के लिए ही होती हैं । सोनेका प्रचलित श्रभिमत श्रभिनमें पड़ना भी उसकी कान्तिको बढ़ानेवाला होता है । [ग्रामुखमें ग्राए हुए कथा-स्पर्शी इस बीजभूत श्लोकको] गुप्तमन्त्र [नामका पात्र फिर] पढ़ता है ।

ये तीनों श्लोक उस-उस नाटकके ग्रामुखमें किसी ग्रन्थ रूपमें कहे गए हैं किन्तु उनके द्वारा मुख्य नाटकके ग्राह्यान-वस्तुकी बीज रूपसे सूचना मिलती है । सूत्रधार भी मुख्य नाटकके ग्राह्यान-वस्तुको संक्षिप्त रूपमें सूचित करनेकी दृष्टिसे ही उन श्लोकोंका

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६६

नाट्यदर्पणम्

[ का० २५, सू० २६

तत्र बीजं कवचिद् व्यापाररूपम् । यथा रत्नावल्यां वत्सराजस्य रत्नावली- प्राप्तिहेतुरुच्यते—सागरिकान्तःपुत्रनिधनादिभिर्गान्धर्वायनेऽच्युत्यापारः । कवचिद् व्यसननिवृत्तिफले रूपके तद्यसनोपप्लवपरुपम् । यथा ‘मायापुष्पके’ शापः प्रवेश्य वचनक्रमेऽभिह— कैकेयी कव पतिव्रता भगवती क्वैवंविधं वारिवर्षं धर्मात्मा कव रघूत्तमः कव गमितोऽरण्यं स जायानुजः । क्व स्व कलत्रं भरतः कव वा पितृध्यानमात्राधिकं दृश्यते कि कुल्वेति कृतो मया दशरथे वध्या कुलस्य त्यजः ॥

प्रयोग करता है । परन्तु ग्रामुख भागमें प्रयुक्त इस प्रकारकी उक्तियोंको बीज नहीं माना जाता है ।ग्रामुखके बाद बीजका श्रारोपण होता है । इसी लिए ग्रामुखकी समाप्तिके बाद मुख्य नाटकका जो पात्र रङ्गमञ्चपर श्राता है उसके द्वारा इस प्रकारकी उक्तियोंको पुनः कहलाकर नाटककार बीजका श्रारोपण करता है । यह ग्रन्थकारका श्रभिप्राय है । यह बीज रूप उपाय, नाटकोके श्राघ्यान-वस्तुके अनुसार विभिन्न रूपका होता है । नाटकका ग्रावसान जिस रूपमें होना है उसौके श्रनुसार नाटकके श्रारसभमें उसका बीजा- रोपण किया जाता है । इस प्रकारके चार उदाहरणस्य ग्रन्थकार ग्रागे प्रस्तुत करते हैं । इनमें से पहला उदाहरणस्य रत्नावली नाटिकासे दिया गया है । रत्नावली नाटिकामें जैसेकि पहिले कहा जा चुका है सागरसे प्राप्त हुई रत्नावलीको योगन्धरायणने सागरिका नामकी स्वपनी बहिन कहकर उदयनके राजमहलमें वासवदत्ताके पास रख दिया है । यही इसका बीज भाग है । इसीके द्वारा वत्सराज उदयनको श्रागे चलकर रत्नावलीकी प्राप्ति हो सकी है । यह बीज योगन्धरायणका व्यापार-रूप है । इसी बातको ग्रागे लिखते हैं—

श्रौर वह बीज कहों व्यापाररूप होता है । जैसे रत्नावली [नाटिकामें] वत्सराज [उदयन] को रत्नावलीकी प्राप्ति करानेवाला देवकी ग्रहनुलतासे युक्त सागरिकाका ग्रन्थःपुरमें [वासवदत्ताके समीप] रखने श्रादिका योगन्धरायणका व्यापार । इस प्रकार रत्नावलीमें योगन्धरायणका व्यापार बीजभूत उपायके रूपमें प्रयुक्त हुग्रा है । इसमें रत्नावलीकी प्राप्ति नाटकका ग्रन्तिम फल श्रभिष्ट है । इस लिए रत्नावली का ग्रन्थःपुर-निक्षेप उस जनक होनेसे ‘बीज’ । जिस नाटकमे किसी विपत्तिकी निवृत्ति श्राघ्यान-वस्तुका चरम फलं श्रभिष्ट होता है उसमें उस विपत्तिका श्रारम्भ ही ‘बीज’ रूप उपायके रूपमें प्रस्तुत किया जाता है । इसका उदाहरण ग्रागे देते हैं ।

कहीं, जहांकि [नायकपर श्रानेवाली किसी] विपत्तिका निवारण हो [नाटकका मुख्य] फल है । उस नाटकमे विपत्तिका श्रारम्भ [बीज रूपमें प्रस्तुत किया जाता है] । जैसे ‘माया- पुष्पक’ [नाटक] में [श्रवराकुमारके वधके बाद उसके श्रन्धे माता-पिता द्वारा दशरथको दिया हुग्रा] शाप [मानव रूपमें] प्रविश्ट होकर वचनक्रमसे [नाटकके भावी श्राघ्यान-वस्तुको] कहता है— कहां तो पतिव्रता भगवती कैकेयी श्रौर कहां इस प्रकारका वाशीका विष [उगलना], कहां धर्मात्मा रामचन्द्र श्रौर कहां उसको स्त्री श्रौर भाईके साथ वनको भेजा जाना, कहां स्वच्छ-हृदय भरत श्रौर कहां पिताके वधके कारण मात्रसे भी श्राधिक ग्रपरिमित सन्तापको

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का० २६, सू० २६ ] प्रथमो विवेक: [ ६७

क्वचिदू ध्यसनोपनतेरुदययोरुपचयपररूपम्। यथा ‘तापसवत्सराजे’ माषावकः — “ग्रामच्चो वि एवं सामिस्सए झामस्सो पडिकूलमायरंतेए ढढं झायासिदो ! पथुदं च सोहए हंमएणमिस्सेहि सद्द संपधारिय सामिभत्तीए मदीवहवस्स य झ्रगरुरवं” इत्यादि ।

[ग्रामात्योदययेन स्वामिना स्वात्मनः प्रतिकूलमाचरता दृढमचासितः । प्रस्तुतं चानेन रुद्रभट्टनमिश्रेः सह सप्रचार्य स्वामिभक्त्या मतिविभवस्य चानुरूपम् । इति संस्कृतम्] ।

क्वचिदू ध्यसनोपनिपाते तन्निवृत्त्युपक्रमरूपम् । यथा मुद्राराक्षसे चारणक्यः— “ग्रा: क एस मदीए स्थिते चन्द्रगुप्तमभिभवितुमिच्छति । नन्दकुलकालभुजगीनां कोपानलबहलधूमलताम् ।। झ्रध्याप बध्यमानां बध्य: को नेच्छति शिखां मेँ ।। इत्यादि नायक-प्रतिनायक-ग्रामात्याद्याश्रयेण विचित्ररूपो बीजोपन्यास इति ।

[प्रथवा मातङ्के द्वारा दुःखकः] भोग रहा है । [मुख ज्ञापके द्वारा] केवल वधार्थके ही बध्य होने पर भी मैंने यह सारे कुलका विनाश क्यों कर डाला ।

कहीं व्यसन तथा श्रामात्योदय [ग्रथ्यत्न पहले होनेवाले व्यसन या विपत्ति के] उसके बाद प्राप्त होनेवाले श्रामात्योदयका प्रदर्शन जिस नाटककी कथा-वस्तुमें किया गया है उस प्रकार के नाटकमें] दोनोका [बीज रूपमें] उल्लेख [होता है] जैसे तापसवत्सराजचरितमें माषावक [प्रविष्ट होकर कहता है कि]—

इस प्रकार स्वामिने [वत्सराज उदयनने] स्वयं श्रपने प्रतिकूल श्राचरण करके ग्रामात्य को भी श्रात्यन्त कष्ट दिया । किन्तु उस [ग्रामात्य योगन्धरायणने] ने स्वामिभक्तिं श्रौर श्रपने बुद्धि-वैभवके श्राग्रहुप [दूसरे मन्त्री] हमणवान् मित्रके साथ विचार कर [कार्यक] श्रारम्भ कर दिया ।

कहीं [प्रारम्भमें नायकके ऊपर] विपत्तिके श्राने [की सम्भावना होने] पर उसकी निवार्तिका उपक्रम [बीज रूपमें प्रस्तुत किया जाता है] जैसे मुद्राराक्षसमें चारणक्य [कहता है]—

यह कौन मृत्युका श्रभिलाषी [बध्य: क:] नन्दकुल [का विनाश करनेवाली, उस] की काली नागिन् रूप श्रौर [मेरे] प्रचण्ड कोपानलकी नीली धूमरेखा रूप मेरी शिखाको ग्राज [नन्दकुलका नाश हो जानेपर] भी बँधने नहीं देना चाहता है ।

इत्यादि । [इस प्रकार] नायक-प्रतिनायक ग्रामात्य ग्रादिके श्राश्रयसे [नाटकके] बीजका श्रारोपण नाना प्रकारसे किया जा सकता है ।

मुद्राराक्षसमें राक्षस श्रौर मलयकेतु मिलकर चन्द्रगुप्तको राज्यच्युत करनेकी योजना बना रहे हैं । नन्दकुलका विनाश कर चारणक्यने ही चन्द्रगुप्तको राजा बनाया है । इसलिए जब उसे यह मालूम होता है कि मलयकेतुके साथ मिलकर नन्दकुलका पुराना मन्त्री राक्षस चन्द्रगुप्तको राज्यच्युत करना चाहता है तब उसने यह इलोक कहा है । यही इलोक मुद्राराक्षस नाटकका बीजभूत है । इसकें शाखा प्रशाखाद्रोंक रूपमें श्रौर कथाभागमें चारणक्य तथा राक्षस दोनोके प्रयत्नोंका परिचय मिलता है । उसका परिणाम श्रन्तमें राक्षसका चारणक्यके ग्रात्म-समर्पण होता है ।

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पताका-निरूपण—

इस कारिकाके पूर्वार्द्ध-भागमें बीजरूप प्रथम उपायका वर्णन किया गया है । अब उत्तरार्द्ध-भागमें पताकारूप दूसरे उपायका वर्णन प्रारम्भ करते हैं । जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, पाँच उपायोंको चेतन तथा अचेतन भेदसे दो भागोंमें विभक्त किया गया है । पाँचों साधनोंमेंसे बीज तथा कार्यरूप दो उपायोंके अचेतन साधनोंमें और शेष पताकारूप तीसरे तथा बिन्दुरूप तीन उपायोंको चेतन साधनोंमें गिना जाता है । पिछले प्रकरणमें 'बीज' रूप अचेतन साधनका वर्णन किया था इस लिए सामान्यतः उसके बाद दूसरे अचेतन साधन 'कार्य' का वर्णन करना चाहिए था । किन्तु मूल कारिकामें 'बीज' के बाद 'पताका' का नामतः कथन या उल्लेख किया गया है। इसलिए उल्लेख-क्रमसे ही उनके लक्षण करना उचित मानकर 'बीज' के बाद 'पताका' का लक्षण किया गया है—पाँचों उपायोंका नामतः कथन या

उद्देश करनेवाली कारिकामें जो बीजके बाद पताका का नाम रखा गया है वह कदाचित् छन्दो-जानुरोधसे ही रखा गया है ।

पताका शब्दका प्रसिद्ध ग्रन्थ ध्वजा है । परन्तु यहाँ वह प्रथं अभिप्रेत नहीं है । ध्वजा रूप पताका अचेतन पदार्थ है । यहाँ पताका शब्दसे चेतन अर्थ ग्रहण किया गया है । इस लिए पताका शब्दका मुख्य प्रसिद्ध ग्रन्थ यहाँ सज्ज्ञत नहीं होता है । यहाँ नायकके कार्यकी सिद्धिमें सहायता देनेवाले किसी चेतन व्यक्तिके लिए 'पताका' शब्दका प्रयोग किया गया है । जैसे रामचरित, के चरित्रमें सीतायनयन आदि रूप कार्यकी सिद्धिमें उनके सहायक सुग्रीव रहे हैं

इस लिए वे 'पताका' या 'पताका-नायक' कहलाते हैं । पताका जिस प्रकार प्रसिद्ध तथा प्राशस्त्र्यकी सूचिका होती है । इसी प्रकार पताका-नायक भी प्रधान-नायककी प्रसिद्धि तथा प्राशस्त्र्यग्रादिकी सूचक होता है । इस लिए पताका के सदृश होनेसे उसको भी 'पताका' या 'पताका-नायक' कहा जाता है ।

पताका और प्रकरी—

पताका'के साथ ही दूसरा शब्द 'प्रकरी' भी इन पाँचों उपायोंकी गरगनामें प्रयुक्त किया गया है । ये दोनों प्रधान-नायककी कार्यसिद्धिमें उसके प्रधान सहायक होते हैं । इन दोनोंमें परस्पर यह भ्रन्तर होता है कि 'पताका-नायक' का ग्रहण भी कुछ स्वार्थ होता है । और 'प्रकरी' का ग्रहण कोई स्वार्थ नहीं होता है । 'पताका-नायक' ग्रहने स्वार्थंकी सिद्धि के साथ-साथ प्रधान-नायकके कार्यकी सिद्धिमें सहायक होता है । किन्तु 'प्रकरी' ग्रहने किसी

स्वार्थंकी ग्रपेक्षा न रखकर निरपेक्ष-भावसे प्रधान-नायकका सहायक होता है । 'रामचरित' में सुग्रीव 'पताका-नायक' है और जटायु 'प्रकरी' का उदाहरण है । सुग्रीव बालिसे अपने राज्य और अपनी पत्नीको वापिस दिलानेके स्वार्थंको सिद्ध कर रामका सहायक बना है । और जटायु निरपेक्ष-भावसे रामकी सहायता करता है । इस लिए स्वार्थंसिद्धियुक्त होनेके कारग्रा सुग्रीव 'पताका-नायक' और केवल परार्थसिद्धि-पर होनेके कारग्रा जटायु 'प्रकरी-नायक' है ।

इसी श्रभिप्रायको लेकर ग्रंथेग्रंथकार 'पताका' और 'प्रकरी' के लक्षण देते हैं । उनमेंसे भी पहिले वे पताकाका लक्षण करते हैं

पताका और प्रकरी का दूसरां भेद—

पताका और प्रकरीका एक भेद तो यह हुग्रा कि पताका-नायकके साथ स्वार्थंका

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का० २६, सू० १६ ]

प्रथमो विवेक: [ ६६

सम्बन्ध भी रहता है ग्रोर प्रकारोके साथ स्वार्यंसिद्धिका कोई प्रश्न नहीं रहता है । इनका दूसरा भेद दोनोंके चरित्रकी व्यापकताकी दृष्टिसे है । 'प्रकरी' का चरित्र बिल्कुल एकदेशी ग्रोर सीमित होता है । पताका-नायकका चरित्र उसकी ग्रपेक्षा पर्याप्त बड़ ग्रोर ग्रधिक देश-व्यापी होता है । पताका का लक्षण करते हुए जो 'ग्रा-विमर्शात' पद दिया गया है उससे पताका-नायकके चरित्रकी व्यापकता ही प्रदर्शित की गई है । नाटकके कथाभागको पताका-नायकके चरित्रकी व्यापकताके आधार पर पांच भागोंमें बांटकर उसमें पांच प्रकारकी सन्धियोंका प्रयोग करनेका विधान किया गया है । इन सन्धियोंके नाम—१. मुख-सन्धि, २. प्रतिमुख-सन्धि, ३. गर्भ-सन्धि, ४. विमर्श-सन्धि ग्रोर ५. निर्वहणा-सन्धि रहे गए हैं ।

इनमें पताका-नायकका चरित्र मुख-सन्धिसे प्रारम्भ होकर 'ग्रा-विमर्शात' विमर्श सन्धितक व्याप्त हो सकता है । 'ग्रा-विमर्शात' पदमें ग्राए हुए ग्रादि-उपसर्गके भी दो ग्रर्थ हैं एक 'मर्यादा' ग्रोर दूसरा 'ग्राभिविधि:' । 'तेन विनाऽ‌ऽमर्यादा' ग्रोर 'तत्सहितो ग्राभिविधि:' । 'ग्रा-विमर्शात' पदमें यदि ग्रादि-उपसर्गको मर्यादार्थक मानते हैं तो 'तेन विनाऽ‌ऽ' ग्रर्थात् विमर्श सन्धिको छोड़कर ग्रर्थात् गर्भ-सन्धि पर्यन्त पताका-नायक के चरित्रका क्षेत्र रहता है । ग्रोर यदि ग्रादि-उपसर्गको 'ग्राभिविधि' ग्रर्थमें मानते हैं तो 'तेन सहितो ग्राभिविधि:' इस लक्षणके ग्रनुसार 'ग्राविमर्शात' पदसे विमर्श-सन्धिको भी सम्मिलित करके मुख, प्रतिमुख, गर्भ ग्रोर विमर्श इन चारों सन्धियोंमें पताका-नायकका चरित्र व्याप्त हो सकता है । परन्तु 'प्रकरी' का चरित्र बिल्कुल एकदेशी होती है ।

पताका ग्रनिवार्य नहीं—

पताका ग्रोर प्रकरी दोनोंके विषयमें एक बात यह ग्रोर ध्यान रखने की है कि इन दोनोंमेंसे किसी भी सन्धिति नाटकमें ग्रनिवार्य नहीं हैं । इन दोनोंके बिना भी नाटककी रचना हो सकती है । इनकी ग्रावश्यकता उसी दशामें है जब मुख्य-नायकको सहायिकी ग्रावश्यकता होती है । जिस नायकको इस प्रकारके सहायिकी ग्रावश्यकता नहीं होती उसके चरित्रको लेकर लिखे गए नाटक की रचना इनके बिना भी की जा सकती है ।

पताका ग्रोर पताका स्थान—

इस सम्बन्धमें एक बात ग्रोर ध्यानमें रख लेनी चाहिए कि यह पताका शब्द कभी-कभी भ्रम उत्पन्न कर देता है । यह जो यहां पताकाका लक्षण किया जा रहा है वह प्रधान-नायकके सहायक पताका-नायकका लक्षण किया जा रहा है । इसके अतिरिक्त चार प्रकारके पताका-स्थानोंका वर्णन भी ग्रागे ग्राएगा । वे 'पताका-स्थान' इस पताकासे बिल्कुल भिन्न वस्तु है । जहां केवल 'पताका' शब्दका प्रयोग किया जाता है वहां उससे 'पताका-नायक' का ही ग्रहण होता है । पताका-स्थानोंकी चर्चां जहां ग्रभिप्रेत होती है वहां केवल पताका शब्दका प्रयोग न करके 'पताका-स्थान' शब्दका ही प्रयोग किया जाता है । इन दोनों के नामोंमें ग्रत्यधिक साम्य होनेके कारण ही ग्रन्थकारने पताका-लक्षणके बाद ही 'पताका-स्थानों' का भी वर्णन कर दिया है । वैसे साधारतः इस स्थल पर उनके वर्णनका कोई प्रसङ्ग नहीं था ।

इस विवरणको समभ लेने पर ग्रागे कहे हुए पताका-लक्षणके समभनेमें सरलता होगी ।

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अथ पताकां निरूपयति—

[सूत्र २७]—ग्राविमर्श पताकाचेच्चेतनः स परार्थकृत् ॥१२६॥

स्वार्थीय प्रवृत्तो यो हेतुश्चैतनः परस्य प्रधानस्य प्रयोजनं सम्पादयति स प्रसिद्धि प्राशस्त्यहेतुत्वात् पताकैव ‘पताका’ । सुग्रीव-विभीषणादिहि रामादिनोपक्रियामणो रामादेराहमनश्रोपकाराय भवन्, रामादेः प्रसिद्धि प्राशस्त्यं च सम्पादयति । 'चेत्' इति यद्य फलसाधनते साहाय्यापेक्षास्वपि नायकानां वृत्तं निबध्यते । तदा पताकाभावकति । न तु स्वपराक्रमबहुमानिनामिति । एवं प्रकृत्यपि । ग्राविमर्शोऽमिति यदाऽमर्यादयामुद्, तदा मुख्य-प्रतिमुख्य-गर्भोन्, यदाऽपुनरभिनिविधौ, तदा विमर्शमविच्यायां विरमति । तावच्चेव पताकानायकस्य स्वफलसिद्धिनिबध्यते । निर्वहणसन्धावपि तत्कलो निबध्यमाने तुल्यकार्योपरपकारकत्वभावान्, न तेन प्रधानस्योपकारः स्यात् । सिद्धफलसत्वौ प्रधानफल एव द्व्याद्रियमा॑णो भूतपूर्वंगत्या पताकाराद्ध वाच्य इति ॥१२६॥

श्रावक [स्वार्थसिद्धिके साथ-साथ परार्थसिद्धि-पर उपकारणभूत चेतनसाधन रूप] पताका का निरूपण करते हैं—

[सूत्र २७]—[पताकाका होना श्रपरिहार्य नहीं है किंतु] यदि वह चेतन [स्वार्थसिद्धि सहित] परार्थकारी हो तो [मुखसन्धिसे लेकर] विमर्शसन्धि-पर्यन्त ‘पताका’ [नायक] हो सकता है । निर्वहणसन्धिर्में उसकी स्थिति नहीं रहनी चाहिए] ।१२६।

जो चेतन हेतु अपने स्वार्थके लिए प्रवृत्त होनेंपर भी दूसरें श्रर्थात् प्रधान नायकके प्रयोजनोंको सिद्ध करता है वह [प्रधान-नायककी] प्रसिद्धि एवं प्राशस्त्यका हेतु होनेसे पताका के समान [गौण रूपसे] ‘पताका’ [कहलाता] । सुग्रीव विभीषणादि रामादिके द्वारा उपकृत होकर रामादिके श्रौर अपने दोनोंके उपकारक होकर रामादिको प्रसिद्धि श्रौर प्राशस्त्य को सिद्ध करते [इसलिए ‘पताका’ कहलाते] । 'चेत्' इस पदसे [यह बात सूचित की है कि] यदि फलसाक्षतिमें सहायकीकी ग्रपेक्षा रहने वाले नायकोंने चरित्रका वर्णन किया जाता है तब तो ‘पताका’ होता है किन्तु श्रपने ही पराक्रमको बहुत समझने वाले [नायकके चरित्र के वर्णन] में [पताका-नायक] नहीं होता है । इसी प्रकार 'प्रकरी' में भी समझना चाहिए । 'ग्राविमर्श' इस पदमें जब श्राङ्ग 'मर्यादा' श्रर्थमें है तब ['तेन बिना मर्यादा' उस विमर्शसन्धिको छोड़कर] मुख प्रतिमुख श्रौर गर्भसन्धियोंमें । श्रौर जब 'श्रभिविधि' में [श्राङ्काका प्रयोग माने तो 'तेन सह श्रभिविधि:' उस विमर्श सन्धिको भी सम्मिलित करके] विमर्श-सन्धि पर्यन्त पताका [नायकका चरित्र] समास होता है । [प्रधिकसे श्रधिक] ,वहाँ तक ही पताकानायक के श्रपने फलकी सिद्धि हो जाती है । यदि निर्वहण-सन्धिमें भी उस [पताका-नायक] के फल का वर्णन किया जाय तो समान काल तक रहने वाले [प्रधान-नायक श्रौर पताका-नायकके चरित्रोंमें] उपकार्य-उपकारक भावके सम्भव न होनेसे उस [पताका-नायक] के द्वारा प्रधाननायकका उपकार नहीं हो सकेगा । [विमर्श-सन्धि पर्यन्त ही] फलकी सिद्धि हो जानेपर तो [निर्वहणसन्धिमें] वह प्रधान-नायकके फलके लिए ही यत्न करता हु श्रावक [श्रव पताका न रहनेपर भूतपूर्वंगत्या 'पताका' श्रब्दसे कहा जाता है ।

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कां ३०, सू० २९ ]

प्रथमो विवेक: [ ७१

अथ पताकाप्रस्तावात् पताकास्थानकानां सामान्यलक्षणं भेदांश्चाह--[सूत्र २८]--चिन्तितार्थतत्प्राप्ति-हेतु चे यत्रोपकारिषी । पताकास्थानकं तत्तु चतुर्द्र मण्डनं स्वचितं ॥३०॥

'अथ' कर्म-करणघटितया प्रयोजनमपायच्य । सिद्धचवसितात प्रयोजनादपायाच्च ग्रथ्यते प्रयोजनस्योपायस्य च प्राप्तिर्यत्रेतिवृत्ते उपकारिषी, प्रधानफलोपकारिका तद्वितियुक्तं पताकास्थानकम् । उपकारित्वमात्रसाम्यान्न पताकास्थानस्य तुल्यं पताकास्थानकम् । न पुनः पताकास्थानेव । अथ तु-शब्दः पताकास्वरूपान्न व्यतिरेकं वोत्यति । मण्डनमिति एकमपि पताकास्थानकं नाटच-काव्यालङ्कारां कि पुनद्रे त्रीणि चत्वारि वा । एतद्विहीनं रूपकं न कार्यमित्यर्थः । क्वचित्प्रिति झनतरान्तरा, न तु पताकावन्निरन्तरम् । अथ एव पताकातो भिद्यते ॥३०॥

पताकास्थान—

इस प्रकार पताकाका प्रकार होनेसे [उससे मिलते हुए] पताका स्थानके सामान्य लक्षणों श्रौर उसके भेदोंको कहते हैं

[सूत्र २९]--सोचे हुए श्रथ [प्रार्थ्यते प्रयोजन तथा उपाय] से दूसरे [प्रयोजन या उपाय रूप] प्रथककी [प्रनायास] प्राप्तिस जहाँ इतिवृत्त [ग्राथ्यान-वस्तु] में उपकारिणी हो जाती है वह [नाटकमे निरन्तर न रहकर] कहीं-कहीं होने वाला चार प्रकारका 'पताकास्थान' नाटच रूप काव्यका सौन्दर्याधायक होता है ॥३०॥

'प्रथ' शबसे [प्रथ्यते इति प्रथः] इस प्रकारकी करणमें व्युत्पत्तिसे प्रयोजन, तथा [प्रध्यन्ते येन स प्रथः] इस प्रकारके करण व्युत्पत्तिसे उपाय [दोनों 'प्रथ' कहलाते हैं] । निश्चित किये हुए प्रयोजन तथा उपायसे मिन प्रयोजन तथा उपायकी प्राप्ति जहाँ कथाभाग की उपकारिणी प्रथात् प्रधान फलकी [सिद्धिमें] उपकारिणी होती है वह कथा भाग [इतिवृत्त] 'पताकास्थानक' [कहलाता] है । [पहले कहे हुए पताका-नायकके समान प्रधानके] उपकारकत्वमात्रकी समानताके कारण पताकाका श्रथात पताका-नायकके स्थान श्रथात स्थितिके तुल्य होनेसे यह 'पताकास्थान' [कहलाता] है । [पताका नायक की स्थिति रूप न होनेसे] 'पताकास्थानीय' ही नहीं हैं । [प्रथात पताकास्थान पताका स्वरूप नहीं किन्तु प्रधानोपकारकत्वकी समानताके कारण पताकाके तुल्य है] । इसीलिए [कारिकामे ग्राया हुग्रा] तु-शब्द पताकाके स्वरूपसे [पताकास्थानके] भेदको सूचित करता है । 'मण्डनम्' इससे [एकवचन] से [यह सूचित किया है कि एक स्थानपर प्रयुक्त] । एक भी पताकास्थान नाटच-काव्यका सौन्दर्याधायक हो जाता है फिर दो, तीन, चार [प्रकारके कहे जाने वाले श्रथवा श्रधिक स्थानोंपर प्रयुक्त हुए पताकास्थानों] का तो कहना ही क्या है । [नाटकमे विशेष रूपसे पताकास्थानका प्रयोग ग्रवश्य करना चाहिए] इसके बिना रूपक [की रचना] को नहीं करना चाहिए यह ग्रभिप्राय है । [कारिकामें ग्राए हुए] 'स्वचितं' इस पद से [यह सूचित किया है कि नाटकमे] बीच-बीचमें [कहीं-कहीं ही पताकास्थानोंका प्रयोग करना चाहिए] पताका [नायक] के समान निरन्तर [उसकी उपस्थिति ग्रावश्यक] नहीं [है] । इसीलिए [पताका स्थान] पताका [नायक] से मिन [माना जाता है] ॥३०॥

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७२ ] नाट्यदर्पणम् [ क० २१, सू० ७२

अथ व्याघ्रमेदेमाह—

[सूत्र २८]—सहसेप्टार्थलाभश्च 'सहसा' इत्याकस्मिककरवेन सभ्यानां चमत्कारहेतुत्वमाह । यथा 'रत्नावल्या' सागरिकायां पाशावलम्बनप्रवृत्तायां वासवदत्तेति मन्यमानो राजा पाशाद्विमो-च्यति, तदा तदुकृत्या सागरिकां प्रत्यभिज्ञायाह—"कथम् त्रियं सागरिका ? झल्लमल्लमतिमात्रेण ।" इत्यादि ।

शात्रान्तरन्य प्रयोजनं चिन्तितं, वैचिच्यकारि च प्रयोजनान्तरं सम्पन्नम्। यथा वा 'नलविलासे', विदूषक-कापालिकन्यु्द्ध निवारणायोचतस्य राज्ञो दमयन्तीप्रतिरूपतिलाभ इति ।

अन्यन्रानुपपाये चिन्त्यते सहसोपायान्तरप्रयुक्तथा नागानन्दे जीमूतवाहन-स्य शंखचूड़दर्पापवध्यपटस्य कदचुकिना वासोयुगलार्पणमिति ।

अथ [चार प्रकारके पताकास्थानोंमेंसे] प्रथम भेदको कहते हैं—

[सूत्र २७]—सहसा [ग्राकस्मिक रूपसे प्राप्त होनेके कारण] सभ्योंके लिए चमत्कार-जनक] इष्ट वस्तुकी प्राप्ति [का वर्णन] प्रथम प्रकारका पताकास्थान कहलाता है] ।

'सहसा' इस [पद] से ग्राकस्मिक रूपसे प्राप्त होनेके कारण सभ्योंके चमत्कारका हेतुत्व सूचित किया है । जैसे रत्नावलीमें [तृतीय ग्रङ्कमें] सागरिकाके [ग्रपने गलेमें] फाँसी लगानेमें प्रवृत्त होनेपर राजा उदयन उसको [ग्रपनी मुख्य रानी] वासवदत्ता समझकर फाँसी से छुड़ाते हैं । उस समय उसकी उक्तिको सुनकर सागरिकाको पहिचान कर कहते हैं कि—"ग्ररे यह तो मेरी प्रिया सागरिका ! हटो हरो यह प्रतिसाहस मत करो ।" इत्यादि ।

यहाँ [राजा उदयनने वासवदत्ताको पाशसे छुड़ाने रूपमें] कुछ दूसरा ही प्रयोजन सोचा था किन्तु [सभ्योके लिए ग्रौर स्वयं राजाकेलिए भी] चमत्कार-जनक [ग्राकस्मिक रूपसे सागरिकाकी प्राप्ति] कुछ ग्रौर हो [प्रयोजन प्राप्त] कार्य हो गया ।

ग्रथवा जैसे नलविलासमें विदूषक ग्रौर कापालिककी लड़ाईको बचानेकेलिए उद्यत [प्रयत्नात् लड़ाई बचानेके प्रयत्न करते समय] राजा [नल] को [विदूषकके बगलमेंसे निकल कर गिरी हुई] दमयन्तीकी तरवारकी प्राप्ति

इसके पूर्व कारिकामें ग्राए हुए 'ग्रथ' शब्दकी व्याख्या करते समय कर्म ग्रौर करण रूप दो प्रकारकी व्युत्पत्ति मान कर 'ग्रथ' शब्दके 'प्रयोजन' तथा 'उपाय' दो ग्रर्थ किये थे ।

'सहसेप्टार्थलाभश्च' इस प्रथम पताकास्थानके लक्षणमें भी 'प्रथं' शब्दके ये दोनों ग्रर्थ अभिप्रेत हैं । इनमेंसे 'प्रयोजन' हर ग्रथंको लेकर दो उदाहरण दे दिए । ग्रब ग्रथंगे 'उपाय' रूप ग्रर्थ-

को लेकर भी एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं—

ग्रन्य उपायके सोचनेपर सहसा [ग्रचिन्तित ग्राकस्मिक रूपसे] ग्रन्य उपायकी प्राप्ति [का उदाहरण] जैसे नागानन्दमें जीनूतवाहनको शंखचूड़से वध्यपटके [धारण करने योग्य] वस्त्रोंकी प्राप्ति न होनेपर [ग्रकस्मात् ग्राकर] कंचुकीके द्वारा [लाल रंगके] कपड़ेके जोड़ेोंका समर्पण [इष्ट वस्तुकी पूर्ति करता है] ।

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का० ३१, सू० २० ]

प्रथमो विवेक:

[ ७३

अथ द्वितीयाह—

[सूत्र २०]—शिलष्टसातिशया च वाक् ।

शिलष्टा प्रकृतसम्बद्धा, सातिशया अत्यद्भुतसुतार्था । यथा 'रामास्युदये'

द्वितीयेडङ्के सीतां प्रति सुग्रीवस्य सन्देशोक्तिः:—

"बहुनात्र किमुक्तेन पारेडपि जलधेः स्थिताम् ।

अचिरादेव देवी त्वामाहरिष्यति राघवः ॥"

अत्र 'पारेडपि जलधेः' इत्यतिशयोक्तिरपि सीतां प्रति तथैव वृत्तत्वात् । कृत-

सम्बद्धा । अत्र चातिशयोक्तिमात्राच्चिन्तितानां प्रयोजनादपरं तथैव सीताहृद्यं

प्रयोजनं सम्पन्नमिति सामान्यलक्षणम् ।

इस प्रकार प्रथम प्रकारके पताकास्थानके तीन उदाहरण ग्रन्थकारने यहां प्रस्तुत

किए हैं। इन तीनों उदाहरणोंमें नायकके द्वारा श्रचितिन्त, श्रत्यन्त श्राकस्मिक रूपसे इष्ट

प्रयोजन या इष्ट उपाय रूप इष्ट श्रर्थकी प्राप्ति हो गई है। इसलिए ये तीनों उदाहरण प्रथम

प्रकारके पताकास्थानके हुए । श्रब द्वितीय प्रकारके पताकास्थानका वर्णन श्रारम्भ करते हैं ।

द्वितीय पताकास्थानमें सहसा इष्टकी प्राप्ति नहीं होती है। किन्तु प्रकृत प्रकारसे सम्बद्ध कोई

ऐसी श्रद्भुत बात किसी पात्रके मुखसे निकल जाती है जिसका श्रागेके कथाभागमें श्रद्भुत

प्रभाव दिखाई देता है। इसका वर्णन श्रागे करते हैं ।

श्रब द्वितीय [पताकास्थान] को कहते हैं—

[सूत्र २०]—[शिलष्ट] प्रकृत-सम्बद्ध श्रौर [सातिशया] श्रद्भुतार्थक वचन [द्वितीय

प्रकारके पताकास्थान कहलाते हैं] ।

'शिलष्ट' प्रकृत [प्रकारसे] से सम्बद्ध श्रौर 'सातिशया' श्रर्थात् श्रत्यन्त श्रद्भुत श्रर्थ-

वाली [वाक्यका श्राकस्मिक प्रयोग द्वितीय प्रकारका पताकास्थान कहलाता है] । जैसे

रामास्युदयमें द्वितीय श्रङ्कमें सीताके प्रति सुग्रीवकी [निम्नलिखित] सन्देशोक्ति [में पाया

जाता है]—

"ग्रोधिक क्या कहा जाय, समुद्रके पार स्थित होनेपर भी देवो ! रामचन्द्रजी श्रापको

श्रोध्र ही ले श्रावेंगे !"

यहां 'पारेडपि जलधेः स्थिताम्' समुद्र-पार रहनेपर भी यह प्रतिशयोक्ति [के रूपमें

ही कहा गया] भी सीताके प्रति उक्त प्रकार वृत्तित होनेसे प्रकृतसे सम्बद्ध है । श्रौर यहां

प्रतिशयोक्तिमात्रसे विचारित प्रयोजनसे भिन्न उसी प्रकार [समुद्रपारसे] सीताका श्राहरण रूप

प्रयोजन हो गया । यह [पताकास्थानका] सामान्य लक्षण [भी इसमें समन्वित हो जाता] है ।

इसी प्रकार की उक्ति भवभूतिके उत्तररामचरितमें भी पाई जाती है । वसिष्ठ का

प्रजाको प्रसन्न रखनेका सन्देश पाकर रामचन्द्रजी श्रागे चलकर मुनिसे कहते हैं—

स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि ।

आराधनाय लोकस्य मुख्त्वन्नो नास्ति मे ठयथा ॥

श्रर्थात् लोकके श्राराधनके लिए प्रजाकी प्रसन्नताके लिए मुखड़े स्नेह, दया, सौख्य श्रौर

यहां तक कि स्वयं जानकीको भी खो देनेमें कोई कष्ट नहीं होगा । यहां यह बात तो श्रति-

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७४ ] नाट्यदर्पणम् [ क० ३१, सू० ३१

अथ तृतीयमाह—

[ सूत्र ३१] द्व्यर्था च

'वाक्' इति इह, उत्तरत्र च सम्भध्यते । द्व्यर्था श्लेषादिवशात् प्रस्तुतोपयोग्यर्थान्तरोपचयोपिप्सा । यथा—

'प्रीत्युत्कर्षकृतो दशामुदयनस्येन्दोरिवोदितीचते ।'

अत्र हि सन्ध्यावसानप्रयोजनेऽपि काव्य प्रयुक्तं, सागरिकां प्रति उदयनाभिधयक्तिलचरणां प्रयोजनान्तरं सम्पादयति । तथा च सागरिका—

[अयं सो उदयपो, जस्स अहं तादेण दिसप्पा । इति ।

[अयं स राजा उदयनो यस्याहं तानेन दृष्टा । इति संस्कृतम् ]।

अयोग्य रूपमें ही कही गई थी किन्तु उसके बाद शौद्र ही रामचन्द्रने अपने स्नेह, दया श्रौर सोस्यके साथ जानकीका भी परित्याग कर दिया है ।

इस द्वितीय पताकास्थानके लक्षणमें 'द्विलष्ट' पदका प्रयोग किया गया है किन्तु उसका अर्थ केवल 'प्रकृतसे सम्बद्ध' इतना ही है । यहाँ 'द्विलष्ट' पद दो अर्थके वाचक शब्दका ग्राहक नहीं है । पिछले तृतीय पताकास्थानमें 'द्विलष्ट' ग्रर्थात् द्वयर्थक पदके प्रयोग द्वारा चिह्नित ग्रर्थ से भिन्न, प्रयोजन या उपाय रूप ग्रन्थ ग्रर्थकी प्रतीति होती है । इस भेदके कारण तृतीय पताकास्थानके पहले श्लोक हमारे होतों पताकास्थानोंमें सिक्त है । पहले श्लोक दूसरे किसी भी पताकास्थानमें 'द्विलष्ट' ग्रर्थात् द्वयर्थक पदका प्रयोग नहीं होता है । तृतीय पताकास्थानका ग्राधार द्वयर्थक शब्द ही होता है । इसी कारण उसे प्रागे भिन्न रूपमें कहते हैं ।

[सूत्र ३१] दो ग्रर्थोंवाली [वासोका प्रयोग करके चिह्नित ग्रर्थसे ग्रन्थ ग्रर्थकी प्रतीति

जिसमें होती वह तृतीय पताका-स्थान कहलाता है ]।

[तृतीय पताकास्थानके लक्षणमें कहा हुम्रा] 'वाक्' यह पद यहाँ [तृतीय पताकास्थान

के लक्षणमें] श्रौर प्रागे [चतुर्थ पताकास्थानके लक्षणमें] भी सम्भव होता है । 'दो ग्रर्थोंवाली'

ग्रर्थात् इलेषादिके कारण प्रस्तुतके उपयोगी दूसरे ग्रर्थका बोध करानेवाली वाणी जैसे [रत्नावली नाटिकाके प्रयम श्रङ्कके प्राप्तः ग्रन्थमें वैतालिक राजाकी स्तुति करते हुए कहते हैं कि]—

"उदयमान चन्द्रमाकी नयनानन्ददायिनी किरओंके समान [राजा लोग उदयन

राजाके चरराको श्रोर] देख रहे हैं।"

यहाँ संध्या-वर्णानके प्रयोजनसे काव्यक [इलोकका] प्रयोग किया गया है किन्तु वह सागरिकाके प्रति उदयन [राजा रूप ग्रर्थ] की ग्रभिव्यक्तिक रूप दूसरे प्रयोजनको सम्पादित कर रहा है । इसी लिए [ इस इलोकको सुननेके बाद ] सागरिका [कहती है कि]—

[श्रद्यचा ] ये वे राजा उदयन हैं जिन्हें पिताजोने मुझे [ ग्रपने संकल्प द्वारा ]

दिया था ।

इस इलोकमें संध्यााका वर्णन प्रकृत है । उसमें 'उदयनस्य' यह पद द्विलष्ट ग्रर्थान् दो

ग्रर्थोंका बोधक है । सामान्य रूपसे उसे नवोदित चन्द्रमाके लिए प्रयुक्त किया गया है किन्तु

उससे उदयन राजाका भी बोध हुग्रा है । ग्रतः यह तृतीय पताकास्थान है ।

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ग्रथ चतुर्थमाह—

[सूत्र ३२१] ग्रप्रकटे शिलष्ट-स्पष्ट-प्रत्यभिधापि च ॥३१॥

ग्रप्रकटे प्रत्युत्तरकारकेपि।विज्ञानार्थे केनापि हुप्रचि॑ते सति शिलष्टमन्याभि-

प्रायप्रयुक्तमपि प्रस्तुतसम्बद्धं, स्पष्टं विशेषनिश्चकारि, यत् प्रत्यभिधानं प्रत्युत्तरं,

तद्रूपा च वाग्भवति ।

यथा मुद्राराक्षसे—

चाणक्य:—ग्राप नाम दुरात्मा राक्षसो गृह्हीत:? एवमस्फुटेडर्थे उपचि॑ते—

[प्रविश्य] सिद्धार्थक:— ग्रार्य गर्हितो ।

[ग्रार्य गृहीतः । इति संस्कृतम् । ]

इति प्रत्युत्तरं प्रस्तुतार्थसम्बद्धं विशेषनिश्चकारि च ।

ग्रत एव पुन:—

ग्रब चतुर्थ [पताकास्थान] को कहते हैं ।

[सूत्र ३२]—ग्रप्रकट [ग्रर्थात् उत्तर देनेवाली व्यक्तिको भी ग्राज्ञात] ग्रर्थक उपस्थित होने पर [ग्रन्य ग्राभिप्रायसे कहा जानपर भी प्रकट प्रकरणमें] मुनसम्बद्ध तथा [उस प्रस्तुत ग्रप्रकट ग्रर्थके विषयमें विशेष रूपसे निश्चय करानेवाला] स्पष्ट उत्तर भी [चतुर्थ प्रकारका पताकास्थान कहलाता है । ३१

ग्रप्रकट ग्रर्थात् प्रत्युत्तर देनेवालेको ग्रवविदित ग्रर्थको किसी [वक्ताके द्वारा] प्रस्तुत किए जानपर शिलष्ट ग्रर्थात् ग्रन्य ग्राभिप्रायसे कथित होनेपर भी प्रकृत ग्रर्थसे सम्बद्ध ग्रौर स्पष्ट ग्रर्थात् [उस प्रस्तुत ग्रप्रकट ग्रर्थके विषयमें] विशेष निश्चय करानेवाला जो उत्तर उस रुपकी वागी [चतुर्थ प्रकारका पताकास्थान कहलाती है]

जैसे मुद्राराक्षसमें—

"चाणक्य—क्या दुरात्मा राक्षस पकड़में ग्रा सकेगा??"

इस प्रकारके ग्रप्रकट [ग्रर्थात् उत्तर देनेवाले सिद्धार्थकको जिस वातका ज्ञान नहीं है, ग्रर्थात् सिद्धार्थकने इस बातको नहीं सुना था उस प्रकारके] ग्रर्थके प्रस्तुत होनेपर—

'[ग्रन्य कार्यवश चाणकयके पास ग्राया हुग्रा] सिद्धार्थक [प्रविष्ट होकर कहता है] ग्रार्यं [ग्राका संदेश] प्रहण्रा कर लिया "

सिद्धार्थकके प्रवेशके पहिले चाणकयने स्वगत रुपमें 'ग्रपि नाम दुरात्मा राक्षसो गृहीत:' यह वाक्य कहा था । सिद्धार्थकने उस वाक्यको नहीं सुना था । उसे इस बातका कोई ज्ञान नहीं था । किन्तु चाणकयके इस वाक्यके उच्चारण करनेके साथ ही ग्रन्य कार्यवश चाणकयके पास ग्राया हुग्रा सिद्धार्थक प्रविष्ट होकर कहता है 'ग्रार्यं गृहीतः:' । तब इस वाक्यका चाणकयके वाक्यके साथ सम्बन्ध बन जाता है ग्रौर उससे चाणकयको यह प्रतीत होता है कि 'ग्रार्यं दुरात्मा राक्षस पकड़ लिया गया समझो ।'

[इस प्रकार सिद्धार्थक द्वारा कहा गया ] यह प्रत्युत्तर प्रस्तुत [ राक्षस प्रहरण रुप ] ग्रर्थंसे सम्बद्ध है। विशेष रुपसे [राक्षसके पकड़े जानेका] निश्चय करनेवाला [हो जाता] है।

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७६ ] नाट्यदर्पणम्‌ [ काः ३२, सू० ३३

चामाक्यः—[ सहरर्षमालम्बगतम्‌ ] हन्त गृहीतो दुरात्मा राक्षसः । इति । इदं प्रयुक्त्तरं सन्देशप्रधानाज्ञापनप्रयोजनेन प्रयुक्तं, चाणाक्यस्य राक्षसग्रहं निश्चाययति इति सामान्यलच्याम्‌ ।

प्रत्येकं चकारश्चतुर्णामपि नाटकं प्रति प्राधान्येनोपनार्थ इति ॥३३१॥

अथ प्रकारीलच्यामाह—

[सूत्र ३३३]—प्रकरी चेत कचिद्वावी चेतनोडन्यप्रयोजनः । 'कचिद्वावी' वृत्तकदेशाव्यापी। अन्यस्य 'मुख्यनायकस्य [ङ्‌.नायिकयेऽपि] प्रयोजनं यस्य । स चेतनः सहकारी प्रकर्षेण स्वार्थानपेच्चया करोतीति प्रकरी। श्रोपादिके इ-प्रत्यये सन्धाश्रयत्वेन स्त्रीत्वम्‌ । यथा रामप्रबन्धेु जटायु:। 'चेतु' इत्यनेन पताकावदवश्यम्भाविवस्वाम्‌ । कचिद्वाव्यावस्थाने स्वार्थनिरपेच्चत्वाच्च पताकातो भेद इति ।

इसलिए फिर [चाणक्य, सिद्धार्थकके इस कथनको अपने वाक्यके साथ जोड़कर और उसे राक्षसके पकड़नेमें अपनी सफलताका निश्चितकारक मानकर अपने मनमें प्रसन्न होकर कहते हैं कि—]

"निःशङ्क अपने मनमें कहता है] बड़ी प्रसन्नताकी बात है कि राक्षस पकड़में आ गया "

[यहाँ सिद्धार्थक द्वारा अन्य श्राव्यम प्रयुक्त वाक्य रूप] यह उत्तर [नाट्यपकके] सन्देशको प्रहरण कर लेनेके सूचित करनेके प्रयोजनसे [सिद्धार्थकने] प्रयुक्त किया था किन्तु [वह] चाणक्य को राक्षसके पकड़े जानेका निश्चय कराता है । इस लिए [जिसमें 'चिन्तितार्थ परप्राप्तिः' यह पताकास्थानक] सामान्यलचण [समन्वित हो जाता] है ।

[पताकास्थानके पूर्वोक्त चारों लचणोंमें] प्रत्ययके साथ प्रयुक्त चकार नाटकके प्रति चारोंकी प्रधानताको सूचित करनेकेलिए है । ३१ ।

अथ प्रकारोका लचण कहते हैं—

[सूत्र ३३२]—यदि [स्वार्थानपेक्ष रुपसे केवल] अन्यस्य [अर्थात्‌ मुख्य नायक] के प्रयोजन को सिद्ध करनेवाला चेतन [सहायक नाटकके श्राधिक भागमें व्यापक न होकर केवल] किसी एक देशमें होनेबाला हो हो तो उसे 'प्रकरी' कहा जाता है ।

[कारिकामें ग्राए हुए] 'कचिद्वावी' [इसका श्राव्य] कथाके एकदेशमें व्यापक [यह है]। 'अन्यस्य' ग्रन्थात्‌ मुख्य नायकका प्रयोजन हो जिस [सहायकके] को प्रयोजन हो [वह] 'अन्यप्रयोजन:' हुमा। वह चेतन सहकारी प्रकर्षेण ग्रथान्तु स्वार्थी ग्रपेच्चा न करता हुमा [निष्काम-भावसे मुख्यनायकके कार्यो] करता है । इस लिए [ग्रथान्त् प्रकर्षेण करोतीति प्रकरी इस व्युत्पत्तिके ग्रनुसार ] 'प्रकरी' कहलाता है । [प्र-उपसर्ग-पूर्वक कॄ-धातुसे] श्रोपादिक इ-प्रत्यय करने पर संज्ञा शब्द होनेसे स्त्रीलिङ्ग [सूचक डीप्‌-प्रत्यय होकर प्रकरी पद बनता] है । जैसे राम-[चरितको लेकर लिखे गए] प्रबन्धोंमें जटायु [स्वार्थानपेक्ष चेतन सहायक, वृत्तके केवल एकदेशमें स्थित होनेसे 'प्रकरी' कहा जाता है]। 'चेतु' इस [पद] से पताकाके समान

[ प्रकारौकी भी ] श्रवगत्स्यभाविताका निर्देश सूचित होता है । [ग्रथात्‌ नाटकमें पताका श्रौर

१. ग्रन्थस्य मुख्यनायकस्य च प्रयोजनं यस्य ।

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का० ३२, सू० ३४ ]

प्रथमो विवेक:

[ ७७

अथ बिन्दु लचयति—

[सूत्र ३४]—हेतोष्वेहेडनुसन्धानं बहूनां बिन्दुरफललात् ॥३२॥

उपायानुठ्ठानस्यावश्यकर्तव्यादिना व्यवधानाने सति नायकप्रतिनायकसाम्य-

दीनां यदनुसन्धानं ज्ञानमसौ ज्ञानविचारस्यैफललाभोपायत्वाद् बिन्दुः । सर्वव्यापि-

त्वाद् जलं तेल इव बिन्दुरिव बिन्दुः । अथफलार्थिनो बीजवन्तः समस्तेनैव वस्तुन्यपकृतत्वसाम्य ।

केवल बीजं मुख्यसन्ध्येरेक प्रभृति निबध्यते, बिन्दुस्तु तदनन्तरमर्मित ।

इहु तावन्नायकसहायक-उभयेष्वस्याऽऽधा फलासिद्धिः ततः सर्वेषां स्वलयापार-

विच्छित्तचावनुपवन गानात्मा बिन्दुनिबन्ध्यते । यथा च नायकेन प्रतिपचोऽतिवृत्तमनुसन्धी-

यते, तथा प्रतिपचोऽपि नायिकमनुसन्धीयते । छात एव बहूनामित्युपाचत्तम ।

प्रकरी दोनोका चरित्र परिहारियाह नहीं है । केवल एक देशमे होनेके कारण [स्वचिन्दूदि-

त्वात्] श्रौर स्वार्थानपेक्ष होनेसे [प्रकरी-नायकका] पताका-नायकसे भेद है ।

पाँच उपायोंमेसे बीज, पताका श्रोर प्रकरी इन तीन उपायोंका वरांन हो गया । श्रब

चोथे उपाय 'बिन्दु' का वरांन प्रसंग-प्राप्त है । उपायोंका चेतन अचेतन रूपमें जो दो प्रकार

का विभाग किया गया था । उसमें पताका, प्रकरी तथा बिन्दु इन तीनो चेतन साधनोंके

वर्गमे रखा था । उनमेंसे भी पताका श्रौर प्रकरी रूप दो चेतन साधनोंका वरांन हो चूका

ग्रब तीसरे चेतन साधन 'बिन्दु' का वरांन करते हैं ।

ग्रब बिन्दुका लक्षण कराते हैं ।

[सूत्र ३४]—[ श्रनु श्रावश्यक कार्योंके कारण ] हेतु [प्रथमतः उपायानुष्टान ] का

विस्मरण हो जानेपर भी फिरसे स्मरण [बिन्दु कहलाती]है । श्रौर वह [नायक प्रतिनायक

ग्रामात्य श्रादि रूप] बहुतोंका तथा फलप्राप्ति-पर्यन्त [सारे नाटकमे ध्याप हो सकता] है । ३२।

श्रावश्यक कर्तव्य श्रादिके द्वारा उपायानुष्टानका [व्यवधान] विच्छेद हो जानेपर

नायक, प्रतिनायक, ग्रामात्यादिके द्वारा जो उसका पुनः स्मरण [रूप ज्ञान] वह ज्ञान श्रौर

विचारके फल-प्रासिका उपाय होनेसे 'बिन्दु' कहलाती]है । श्रथवा [नाटकमे] सर्वत्र व्यापक

होनेसे [जलमें तेलका बिन्दु जैसे सारे जलमें फैल जाता है । इस प्रकार सारे नाटकमे व्यापक

होनेसे] जलमें तैल-बिन्दुके समान 'बिन्दु' कहलाती]है । 'ग्राफलात्' इस [पद] से बीजके

समान [बिन्दुकी भी] सारे कथा भागमे व्यासिको सूचित किया गया । [प्रथित बीजके समान

ही बिन्दु भी सारे नाटकमे ग्रनत तक विद्यमान रहता है । ग्रनतर] केवल [इतना है कि]

बीज मुख्यसन्ध्यके श्रारम्भसे ही निबद्ध होता है श्रौर बिन्दु उसके बाद [ग्रारम्भ होता है ।

किन्तु दोनो नाटकमे ग्रनत तक व्यापक रहते हैं यह दोनोंकी समानता है ।

यहां [नाटकमे]१ नायक [के द्वारा होने वाली]२ सहायक [के द्वारा] तथा३ उन दोनों

से मिलकर तीन प्रकारकी फलसिद्धि होती है । [उनमें सबको ही श्रपने व्यापकका विच्छेद हो

जाने पर पुनः स्मृति हो सकती है इसलिए नायक श्रौर उनके सहायक ग्रामात्यादि] उन सब

के ही [सम्बन्धसे] श्रपने-ग्रपने विस्मृत व्यापककी स्मृति रूप 'बिन्दु' की रचना होती है ।

[श्रौर न केवल नायक तथा उसके सहायकों सम्बद्ध 'बिन्दु' की ही रचना होती है । प्रतिनु

प्रतिनायकके सम्बन्धसे भी । क्योंकि] जैसे नायक, प्रतिनायकके वृत्त [चरित्र] का श्रनुसन्धान

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नायक करय विन्दुर्यथा वस्मदुपज्ञे 'राघवाभ्युदये' पञ्चमेऽङ्के सुग्रीववचरितश्रवणो-

नातिपवित्ते सीतापहारद्रुःखे सीतां स्मृत्वा रामः—

कलत्रमपि रक्षितुं निजमशक्तमात्मानवबोधय—

प्रसूतमभिवीक्ष्य मामहृद जातलज्जाजडवरः ।

प्रकाशयितुमचचः छग्रमपि स्वमास्यं जने ।

प्रयाति चरमोदधौ पतितुमेष देवो रवि: ॥

इत्यनेन पुनः सीतापहारदुःखमनुसन्धितमिति ।

[ध्यान] करता है इसी प्रकार प्रतिनायक भी नायकके चरित्रका ध्यान [अनुसन्धान] करता है [इसलिए प्रतिनायककी दृष्टि भी विन्दुका विन्यास नाटकमें हो सकता है]। इसी लिए [कारिकाओं] 'बहुनां' इस [पद] का प्रयोग किया गया है ।

'विन्दु' का यह सामान्य लक्षणा किया गया है । इस लक्षणके देखनेसे प्रतीत होता है कि नायक या उसके सहायक श्रमात्यादि श्रथवा पतिनायक श्रौर उसके सहायक श्रमात्यादिके

श्रन्य श्रावश्यक कार्योंमें व्याप्त हो जानसे कुछ समयके लिए मुख्य बीज रूप उपायकी विस्मृति या विच्छेद हो जानेके बाद उसकी जो पुनः स्मृति होती है उसको 'विन्दु' कहते है । इस स्मृति

या श्रनुसन्धानके बिना नाटकका कार्य श्रगे नहीं बढ सकता है इसलिए इसका होना श्रावश्यक है । एक नाटकमें एक ही जगह नहीं श्रनेक बार इसका उपयोग किया जाता है । उपायोंका

चेतन-श्रचेतन रूप जो द्विविध विभाग किया गया था उसमें इस विन्दुको चेतन उपायोंमें गिना गया था । पर यह विन्दु स्वयं तो चेतन रूप नहीं है । चेतनका व्यापार रूप है । परन्तु उस

स्मरण या श्रनुसन्धान रूप श्रचेतन व्यापारको चेतन रूपमें मानकर ही चेतन उपायोंके वर्गमें विन्दुका ग्रन्थकारों प्रस्तुत करते हैं ।

उदाहरणमें नायकके विन्दु [का उदाहरण] जैसे हमारे बनाए राघवाभ्युदय [नाटक] में पञ्चम श्रङ्कमें सुग्रीवके चरित्रके सुननेसे सीताके श्रपहरणके दुःखके [कुछ समयके लिए]

विस्मृत हो जानपर [फिर दुबारा] सीताको स्मरणा करके राम [निम्न श्लोक कहते हैं]—

"श्रपनये स्त्रीणां रक्षा करणेऽपि श्रसामर्थ्य श्वपने [सूर्यवंश] बंश्मे उत्पन्न हुंश्रा

देखकर लज्जासे सन्तप्त [सूर्यदेव] क्षार भरको भी लोगों श्रपनया मुख दिखलानेमें श्रक्षम हो

जानेके करणह यह सूर्य देव पश्चिम सागरमें डूबन जा रहे हैं ।

इसी [श्लोक] द्वारा [कुछ देरके लिए विस्मृत हुए] सीतापहरणके दुःखको [राम-चन्द्र] पुनः स्मरणा करते हैं ।

इस प्रकार यह नायकके 'विन्दु' का उदाहरणहै । इसी प्रकारका दूसरा उदाहरण ग्रन्थकार

'तापसवत्सराज' चरितसे देते हैं । उसमें नाटकके नायक वत्सराज उदयन मृगया श्रादि व्यापारों

में लग जानसे कुछ समयके लिए श्रपनयी रानी वासवदत्ताको भूल जाते हैं । इसी बीचमें राजा

के मृगया-चिरवमें जहाँ कि वासवदत्ता ठहरी हुई थी श्राग लग जाने श्रौर रानीके उसी

शिविरके भीतर जल जानेका समाचार राजाको मिलता है । उस समाचारको सुनकर राजा

को पुनः वासवदत्ताकी स्मृति हो श्राती है । उसी प्रसङ्गमें तापसवत्सराजचरितका श्लोक

ग्रन्थकारने यहाँ उद्धृत किया है ।

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काः ३२, सू० ३४ ]

प्रथमो विवेकः

[ ५६

यथा वा ‘तापसवत्सराजचरिते’ मृगयादिभिरन्यैरश्चामात्यव्यापारैर्वैत्सराज्यविच्छित्तनेडपि प्रियासमागमौत्सुक्यरूपे प्रयोजने, द्वितीयेडङ्के राजा वासवदत्तां दत्तां दरघासुपधुश्रूषयाद्—

ह्रमएवन् ! मुग्ध मुग्धे, क्षुद्राग्नेरमुतोदपि धूमकलुषातां निप्रस्थिते: सर्वतो डवलातएडवकारिया: किमपरं भीतोऽपिमि भाग्यैर्मस् । अनन्तरेऽद्रिपदं न पश्यसि सखे शोकानलं तेन माम् एवं वारयसि प्रियानुरसङ्गेन पाप: करोत्यन्र किम् ॥

इति वासवदत्तायामामहविषेषात् तदेवानुसंधितम् । एवमत्रोत्तरेऽप्यड्ङेपु नायकस्य विन्दुनिबन्धनोऽस्ति ।

एवं सहायोभय-विपत्तावमपि स्वव्यापारानुसन्धानातमा विन्दुरेषेष्टव्य: ।

॥ ३२ ॥

अथवा जैसे तपस्वत्सराजचरितमें मृगया श्रादि तथा श्रामात्योंके [द्वारा श्रायोजित] अन्य व्यापारोंके कारण वत्सराज [उदयन] को प्रिया [वासवदत्ता] के समागमके श्रौत्सुक्य रूप प्रयोजनके विस्मृत हो जानपर भी द्वितीय श्रङ्कमें राजा [वत्सराज उदयन शिविरमें] वासवदत्ताके जल जाने [के समाचार] को सुनकर कहते हैं—

“राजा—ह्रमएवन् छोड़ो । मुग्धे [मत पकड़ो] छोड़ दो ।

वैसे भी धूमसे कलुषित, क्षणिक स्थितिवाले श्रौर चारों श्रोर उबलाताम्रोंका ताण्डव करनेवाले इस क्षुद्र श्रग्निसे मैं श्रपने भाग्यके दोषसे ही डर गया हूँ । श्रौर क्या [कहा जाय] हे मित्र ! ह्रमएवन्] तुम मेरे हृदयके भीतर भरे हुए शोकानलको नहीं देख पा रहे हो इसी लिए [ग्रग्निमें जलकर मरनेके द्वारा] प्रियाका श्रनुसरण करनेसे मुझे रोक रहे हो । मैं श्रभागा ग्राब क्या करूँ ।

वासवदत्ताके प्रति विशेष ग्राह होनेसे [उसके श्रग्निमें जलकर मर जानेका समाचार सुनकर राजाको] उसको स्मरण हो श्राया है [जिसको वे मृगया श्रादिके प्रसङ्गमें भूल गये थे] । इसी प्रकार [तापसवत्सराजके] श्रगले श्रङ्कोंसे भी नायकके 'विन्दु' [ग्रर्थात् अन्य ग्रावश्यक कार्योंके प्रसङ्गसे कुछ समयकेलिए विस्मृत ग्रर्थको स्मृति] का निर्वन्धन किया गया है ।

यहांँ ‘तदेवानुसंधितम्’ में ‘तत्’ पदसे ‘प्रियासमागमौत्सुक्य’ का ग्रहण करना चाहिए । 'तदेव' में 'तद्' में 'तत्' पद नपुं सक-लिङ्ग है इस लिए उससे न तो वासवदत्ताका ग्रहण हो सकता है श्रौर न ग्राप्रहका ग्रहण हो सकता है । इस लिए यहां वासवदत्ताका स्मरण या ग्राप्रहक स्मरण नहीं श्रपितु प्रियाके समागमके श्रौत्सुक्यका स्मरण हुग्रा है ।

इसी श्रांति [नायकके] सहायक, श्रथवा [नायक श्रौर सहायक] दोनों श्रौर विपक्ष [ग्रर्थात् प्रतिनायक श्रौर उसके सहायक] का भी श्रपने [विस्मृत] व्यापारका स्मरण हुप्र 'विन्दु' समक लेना चाहिए [ग्रर्थात् उनके उदाहृत श्रङ्कोंमें स्वयं हृदय में लेने ग्राहिए] । ऊपर २६वीं कारिकामें बीज, पताका, प्रकरी, विन्दु तथा कार्य रूप पांच उपाय कहे गए थे उनमें से विन्दु-पर्यन्त चार उपायोंका विशेष विवेचन क्रमश: यहां तक कर दिया ।

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अथ कार्यं विभज्योत—

[सूत्र ३५]—साध्ये बीजसहकारी कार्यम्‌।

प्रधाननायक-पताकानायक-प्रकरीनायकै: साध्ये प्रधानफलरचनारमप्रेते, बीजस्य प्रारम्भभाजोपरचित्सस्य प्रधानोपायस्य, सहकारी सम्पूर्णोत्पादादायी सैन्य-कोश-दुर्ग-सामग्र्युपायलच्ययो द्रव्य-गुणा-क्रियाप्रभृतिः सर्वोपरि:, चेतनै: कार्यते फलामति कार्यम्‌।

इत्रयमत्रोपायानां निवन्धनसंक्षेप:।

सहायापेक्षयां नायकानां वृत्ते बीज-बिन्दु-कार्याख्या त्रय एषोपायाः। सहायापेक्षयास्तु पताकान-प्रकरीभ्यां, अन्यतरया वा सह पञ्च चत्वारो वेति।

ग्रन्थ शास्त्रिम उपाय 'कार्य' दोष रह जाता है इसका लक्षण ग्रादि करते हैं। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है चेतन ग्रौर अचेतन वर्गमें जो उपायोंका द्विविध विभाग किया गया है उसमें सबसे प्रथम उपाय बीज तथा सबसे शनिम उपाय कार्य इन दो उपायोंको अचेतन उपायोंके वर्गमें रखा गया था। वैसे कार्यका जो लक्षण ग्रागे किया जा रहा है उसमें भी कार्यको बीज का सहकारी बतलाया गया है। इस लिए इन दोनोका परस्पर विशेष सम्बन्ध है।

ग्रन्थ कार्यकी व्याख्या करते हैं—

[सूत्र ३५]—साध्ये [प्रार्थ्यर्थात्‌ प्रधान फलकी सिद्धि] में बीजका सहकारी [द्रव्य, गुण श्रादि श्रादि साधन] 'द्रव्य' [कथलाता] 'गुण' [कथलाता] 'क्रिया' [कथलाता] प्रधान-नायक, पताका-नायक या प्रकरीनायकके द्वारा साध्य प्रार्थ्यर्थात्‌ प्रधान फल रूपसे ग्रभिप्रेत, [विषय में] बीजस्य ग्रर्थात्‌ प्रारम्भभाजोपरचित्सस्य रूपमें ग्रारोपित बीज प्रार्थ्यर्थात्‌ प्रधानोपाय रूप बीजका सहकारी ग्रर्थात्‌ [उसको] पूर्र्णता तक पहुँचानेवाला सैन्य, कोश, दुर्ग, सामग्र्यादि उपाय रूप द्रव्य, गुण, क्रिया ग्रादि सारा ही [चेतन साधनभूत] ग्रर्थ, चेतनों के द्वारा फल [साध्यकी सिद्धिमें विशेष रूपसे प्रवृत्त ग्रर्थात्‌ उपयोग] कराया जाता है।

इस ['चेतनै: कार्यते फलमिति कार्यम्‌' इस व्युत्पत्तिमें] 'कार्य' [कथलाता] है यह पाँचों प्रकारके उपायोंका संक्षिप्त रूपमें वर्णन हुग्रा।

ये पाँचों उपाय सर्वत्र ग्रपरिहार्य नहीं हैं। किल्तु ग्रावश्यकताके ग्रनुसार ही उनका उपयोग किया जाता है। जिन नायकोंको सहायकोंकी विशेष ग्रावश्यकता नहीं होती है ग्रौर स्वयं ग्रपने सामर्थ्यसे ही जो सारे कार्यको सिद्ध कर लेते हैं उनके चरित्रको लेकर लिखे गये नाटकोंमें पताका तथा प्रकरीका कोई उपयोग न होतसे उनकी रचना नहीं की जाती है।

उस दशमें इन नाटकोंमें तीन ही उपायोंका प्रयोग होता है। सहायकोंकी ग्रावश्यकता जिनकी पडती है उनके चरित्रमें ग्रावश्यकतानुसार केबल पताका या केबल प्रकरी किसी एक का उपयोग होनेपर चार, ग्रौर दोनोका उपयोग होनेपर पाँच उपाय काममें ग्राते हैं।

इसी बातको ग्रन्थकार ग्रागली पंक्तिमें कह्हते हैं—

सहायककी ग्रपेक्षा न रखनेवाले नायकोंके चरित्रमें बीज, बिन्दु ग्रौर कार्य तीन ही उपाय [प्रयुक्त] होते हैं। ग्रौर सहायकोंकी ग्रपेक्षा रखनेवाले नायकों [के चरित्रों] में तो पताका तथा प्रकरी दोनोको मिलाकर पाँच, ग्रथवा उन दोनोमेंसे किसी [एकको बीजादि तीनके साथ] मिलाकर चार [उपायोंका प्रयुक्त किए जाते] हैं।

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क० ३३, सू० ३४ ]

प्रथमो विवेक: [ ३१

न्थामीयां मुख्यत्ववथयवस्थायां हेतुमाह--[सूत्र ३४]—कार्यस्तु मुख्यता ।

कायैः फलं प्रयुपकारविशेषे: । पुनर्वीजादिनां मुख्यता वाहुल्यं प्राधान्यं वा निवन्धनियम् । तत्र बीजचिन्द्रोस्त्वचनमुख्यत्वमेव, सर्वेध्यापित्वात् । पताका-प्रकरी-कार्याणां तु मुख्यफलं प्रत्युपयोगापेक्षया एकस्य द्वयोः कार्ययोर्वा मुख्यत्वमथ्येषां चामुख्यत्वम् ।

तत्र पताकाया मुख्यत्वं यथा श्रीशूद्रक-विरचितायां मृच्छकटिकायां पूर्वोपका-रोपगृहीतस्य व्यापारस्य ।

प्रकृतो यथा—वीरनागनिबन्ध्रायां कुन्दमालायां सीतायास्तदपत्ययोश्च पातन-संयोजनाभ्यां सफलतनिरपेक्षस्य वाल्मीके: ।

उभयोयेथा—रामप्रबन्धेपु सुग्रीव-विभीषण-जटायु-हनुमदादीनां च । पताका-प्रकर्योरलपत्वे व्याप्ये वा सर्वत्र कार्यस्य मुख्यत्वम् ।

उपायोकी मुख्यता के नियायक हेतु—

[पाँचों उपायोंके लक्षण प्राप्त करनेके बाद] जब इनकी मुख्यता [श्रौर गौरवकी] व्यवस्थामें हेतु बतलाते हैं—

[सूत्र ३४]—[फलके प्रति उपकार विशेष रूप] कार्योके अनुसार मुख्यता [निर्धारित] होती है ।

कार्य श्रर्थात् फलके प्रति उपकार-विशेषके द्वारा बीजादि [उपायों] की मुख्यता श्रर्थात् बाहुल्य श्रथवा प्रधानत्वकी रचना करनी चाहिए । उन [पाँचों उपायों] मेंसे [प्रवेतन उपाय] बीज तथा [चेतन उपाय] बिन्दु इन दोनोंके [नाटकमें श्राविसे ग्रन्त तक] सर्वत्र व्यापक होनेसे मुख्यता हो होती है । पताका, प्रकरी श्रौर कार्य [इन तीनों उपायों] की तो मुख्य फलके प्रति उपयोगिताकी दृष्टिसे [कहीं] एकोकी [कहीं] द्वोकी श्रथवा [कहीं] तीनोंकी मुख्यता श्रौर शेषकी गौणता [प्रामुख्यता] होती है

उनमेंसे पताकाकी मुख्यता [का उदाहरण] जैसे श्री शूद्रक [कवि] विरचित मृच्छ्‌कटिक [नाटक] में पूर्व उपकरणके कारण वशीभूत ग्रार्यंक [नामक पताकानायक] की [मुख्यता पाई जाती है] ।

प्रकरी [ नायक ] की [मुख्यताका उदाहरण ] जैसे वीरनाग विरचित ‘कुन्दमाला’ [नाटक] में [रामद्वारा परित्यक्त गंभीरा] सीता श्रौर उसके [कुछ लव दोनों] पुत्रोंका पालन तथा [उन दोनों पुत्रों सहित सीताका रामके साथ] संयोग कराने [रूप कार्य] के द्वारा ग्रपने किसी फलकी ग्रपेक्षा न रखनेवाले [ इसलिए प्रकरी नायकके लक्षणसे युक्त ] वाल्मीकिकी [मुख्यता पाई जाती है] ।

[पताकानायक तथा प्रकरीनायक] दोनोंकी [मुख्यताका उदाहरण] जैसे राम-प्रबन्धों में [प्रर्थात् रामके चरित्रको लेकर लिखे गए नाटकोंमें] सुग्रीव, विभीषण, जटायु, हनुमान ग्रादिकी [मुख्यता पाई जाती है] ।

पताका-नायक तथा प्रकरी-नायकके गौरव होनेपर [ग्रलपत्वे] ग्रथवा सर्वथा न होनेपर [प्रभावे च] सदा कार्यकी हो मुख्यता रहती है ।

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अथ पताकाया: प्राधान्ये समर्थिते सन्धिप्रसङ्गं निरस्यति—

[सूत्र ३६]—पताकाया: प्राधान्येडनुसन्धि: श्च्चनादिभि: ॥१३३॥

पताकावृत्तस्य प्राधान्यनिबन्धेडपि श्रानुसन्धि-मुख र्थ्यवृत्तसन्ध्यनुगत: सन्धिर्भवति। गौणेऽपि सन्धिरसित्यर्थे। यथापि पताकाया: प्राधान्ये मुखर्येऽतिवृत्तवत् सन्धय: स्मृतथापि तेडनुसन्धयो मुख्यसन्ध्युपयोगित्वेन गौणास्वन्त।

प्रासङ्गिकत्वं न स्यात् । सन्धिसंख्यावृद्धिश्च स्यात् । श्रात् एव ते सूचनादिर्भवन्ति । श्रादिशब्दान्‌ कव्वाचिद्‌भवन्ते, लेशतो निवध्यन्ते च । न च मुखयस्सन्धिष्य: पृथग्‌ रसयन्ते श्रानुसन्धारितैकवचनस्वभाववत्त्वात् । मुखय-निर्वाह्योरवस्थयोरभिव्यक्तावत् ।

तेन द्विप्रभृतयोऽनुसन्धयो भवन्ति । यथा 'मायापुष्पके'—

दुर्गं शुमिरमात्र-मुख-श्रु-हृदो दारा: शरीरं धन्‍, मानो वैरिविमर्द-शौर्यसमप्रकर्षा: सङ्योन्नतित: ।

यस्मात् सर्वैरिमे प्रियविरहितास्तस्याय शक्त्या वयन्‍, न स्वेच्छासुलभै: पथोडपि घटने शैलबभ्रखण्डैरपि ॥

[पाँचों साधनोंमेंसे पताकानायकका भी प्राधान्य कहीं हो सकता है यह बात श्रास्री कही जा चुकी है । इस प्रकार] पताकाके प्रधानत्वका समर्थन करनेपर [उसके चरित्रमें श्रागे कहे जानेबाले] सन्धियोंकी भी प्राप्ति होती है, उसका निराकरण करते हैं—

[सूत्र ३६]—पताकाया: प्राधान्येऽनुसन्धि: श्रानुसन्धि: [गौण: सन्धि] होते हैं ।१३३।

श्रादिके द्वारा श्रानुसन्धि [गौण: सन्धि] होते हैं ।

पताका [नायक] के प्राधान्यका वर्णन करनेपर भी [मुख्य सन्धि नहीं होते है किन्तु] 'श्रानुसन्धि' श्रर्थात् मुख्य सन्धिके श्रनुगत सन्धि श्रर्थात् गौण: सन्धि होते हैं यह प्रभिप्राय है ।

यथापि पताका [नायक] के प्रधान होनेपर मुख्य [नायक] के चरित्रके समान [उसमे भी मुख्य] सन्धि होने चाहिए फिर भी वे [मुख्य सन्धि न होकर] मुख्य सन्धिके उपयोगी [गौड़] होनेसे गौण: होनेके कारण 'श्रानुसन्धि' [कहलाते] हैं ।

ग्रन्थ्या [यदि पताका नायकके वृत्तमें प्रयुक्त सन्धिको मुख्य सन्धि ही माना जाय तो] पताका-नायकके चरित्रकी गौरता [प्रासङ्गिकत्व] नही बनेगी । इसलिए [गौण: सन्धि होनेके कारण [श्रानुसन्धि] सूचना श्रादिके द्वारा प्रकाशित होते हैं ।

श्रादि शब्दसे [यह भी सूचित होता है कि] कहाँ [उनकी] कल्पना की जाती है ग्रन्थ और कहाँ श्रश्रात: [श्रानुसन्धिके रूपमें] रचना की जाती है । किन्तु मुख्य सन्धियोंसे श्रलग उनकी कल्पना नहीं की जाती है ।

'श्रानुसन्धि:' [पदमें प्रयुक्त] एकवचन प्रविवक्षित है । क्योंकि [पताका-नायकके चरित्रमें भी] मुख श्रौर निर्वहण रूप दो [श्रानुसन्धियों] का होना श्रावश्यक है । इसलिए [एक सन्धि तो होता ही नहीं है] दोसे लेकर [तीन-चार श्रादि] श्रानुसन्धि होते हैं ।

जैसे माया-पुष्पकमे—

जिन [रामचन्द्रजी] को कृपसे [हमको] दुर्गं, भूमि, श्रमात्य, मित्र, स्त्री, शरीर, धन, मान, श्रान्त्र नाशका सुख श्रौर देव-कल्प [रामचन्द्रजी] के साथ मित्रता यह सब प्राप्त हुये हैं,

ग्राज हम प्रियसे विरहित उनके लिए यथेष्ट रूपमें प्राप्त होनेवाले पर्वतके समान बड़े-बड़े शिलाखण्डोंसे [समुद्रके ऊपर पुल बनाकर] मार्गका निर्माण करनेमें भी समर्थ नहीं हो रहे हैं

[यह लज्जा श्रौर दुःखकी बात है]।

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प्रथमो विवेक:

अत्र मुखादिसन्धिनिबन्धनीयं रामादि सह मैत्र्यादि किमर्थम्‍यथासम्भवत्प्रय सुग्रीव- वचनाद् रामशक्यसम्पन्नकाऽस्युदयं निर्वहणस्यैव वृत्तमुपनिबद्धमिति । यथा वा राघवाऽभ्युदये—

मित्रं दर्शनमात्रेऽपि गम्यते: किष्किन्धमागत्य च, तनु: सत्सु मम तस्य कर्तु मुचितं प्राणैरपि प्रीषणम् । जुष्टा: क्षुद्रमतिः स साहसगतिदैवता सतारा मही । इत्यर्थ: तेन वितन्वता ने विहितं देवन रामेण किं, तनु सत्स्य मम तस्य कर्तु मुचितं प्राणैरपि प्रीषणम् ॥ अत्र ‘मित्रम्’ इत्यादिना मुखं, ‘किष्किन्धम्’ इत्यादिना प्रतिमुखं, ‘जुष्टा:’ इत्यादिना विमर्शः, ‘दत्ता सतारा मही’ इति निर्वहणं सुग्रीववचनात् प्रकाशितम् । उत्तरार्थेन तु मुख्यनायकानुयायित्वादर्शनादनुसन्धितवं स्यापित्रमिति । y प्रकृतोऽपि स्वल्पवृत्तत्वात् । सन्ध्यनुसन्धिचिन्तनैव नास्तीति ॥३३॥

यहाँ [अर्थात् इस उदाहरणमें] मुखसंधिमें वर्णनीय रामचन्द्रके साथ मैत्री श्रादि कल्पनीय श्रर्थको सुप्रीवके वचनसे कल्पना करके, [अर्थात् उसका साक्षात् रूपसे वर्णन न करके] रामचन्द्रकी शक्तिसे प्राप्त श्रभ्युदय रूप निर्वहणीय [संधिमें वर्णन किए जाने योग्य] वृत्तका ही वर्णन किया है ।

इस प्रकार इसमें मुखसंधि तथा निर्वहण संधि के श्रर्थकोंका दो ग्रनुसंधियोंके रूपमें समावेश किया गया है । इसलिए यह दो ग्रनुसंधियों के समावेशका उदाहरण है । श्रागे चार ग्रनुसंधियोंके प्रयोगका उदाहरण राघवाऽभ्युदयसे देते हैं ।

श्रथवा जैसे ‘राघवाऽभ्युदय’ [नाटक] में [चार ग्रनुसंधियोंका समावेश निम्न श्लोकमें पताका-नायक सुग्रीवके वृत्तान्तमें पाया जाता है]—

[जिन रामचन्द्रजीने मुभके] देखते ही श्रपना मित्र मान लिया, [१ मुखसंधि], उसके बाद किष्किन्ध्यामें जाकर [२ प्रतिमुख संधि], क्षुद्रमति श्रौर साहसगति [प्रर्थात् दुष्टतापूर्वंक परदारापहरण श्रादि प्रकार्य करनेवाले] उस दुष्ट [बालि] का नाश किया [३ विमर्श संधि], श्रौर [मेरी पत्नी] ताराके सहित श्रपनी प्रथ्वीको [प्रर्थात् मेरा राज्य मुभको] प्रदान की [४ निर्वहण संधि] । इस प्रकार [मेरे हितके समस्त कार्य] करते हुए भगवान् रामचन्द्रजीने [मेरे लिए] क्या नहीं किया [श्रर्थात् सब कुछ किया, मेरे सारे मनोरथ पूर्ण कर दिए] । इसलिए यह बिल्कुल सत्य है कि मुभे श्रपने प्राणों [के मूल्य] से भी [प्रर्थात् प्राणोंको देकर भी] उनकी प्रसन्नताका सम्पादन करना वाहिए ।

यहाँ [प्रर्थात् इस उदाहरणमें] ‘मित्रम्’ इत्यादिसे मुख [संधि], ‘किष्किन्ध्यामें जाकर’ इत्यादिसे प्रतिमुख [संधि], ‘भूषणे:’ [बालिको मारा] इत्यादिसे विमर्श [संधि], तथा ‘दत्ता सतारा मही’ ताराके साथ मेरा राज्य मुभको प्रदान किया इससे निर्वहण [संधि] [इन चार ग्रनुसंधियों] को सुप्रीवके वचनसे प्रकाशित किया है । [श्लोकके] उत्तरार्धसे [ग्रपना] मुख्य नायकका ग्रनुयायीत्व दिखलाकर [उन मुखादि संधियोंका] ग्रनुसंधित्व [गौण संधित्व भी] सूचित किया है ।

प्रकरी [नायक ] का तो प्राधान्य होनेपर भी [उसका] थोड़ा-सा ही वृत्त होनेके कारण [उसमें] संधि या ग्रनुसंधि श्रादिकी चिन्ता ही नहीं होती है ॥ ३३ ॥

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(३) श्रथ उपायानन्तरमुद्दिष्टां दशां लचयितुं तदृते दानुทิศाति—

[सूत्र ३७]—आरम्भ-यत्न-प्राप्त्याशा-नियताप्ति-फलागमा: ।

नेतृदृशेे प्रधाने स्यु: पश्रावस्था ध्रुवं क्रमात् ॥३४॥

'नेतु:', मुख्य फलं प्रति बीजाद्युपायान प्रयोक्तु: । 'अवस्था:' प्रधानवृत्ताविषये काय-वाकू-मनसां व्यापाराः 'ध्रुवम्' इति प्रधाने वृत्ते पश्रानामवश्यम्भावमाह । तेन प्रासङ्ङिके दृश्यादयो ऽनुसन्ध्यवद् गौणाश्र भवन्ति । नाटकलचृणप्रस्तावान्तके, नाटकलचृणानुसारिणु प्रकरण-नाटिका-प्रकरषीषु चायं नियमः । तेन व्यवयोगादौ यथालचृणं न्यूनावस्थावसंपि न दोषाय । 'क्रमात्' इति उद्देशोक्तक्रम एव निवबध्यते, नो पायवतु क्रमाक्रमाभ्याम् । प्रेचापूर्वकारिषां हि प्रथममारम्भ:, तत: प्रयत्न:, तत: सम्भावना, ततो निश्चय:, तत: फलप्राप्तिरित्ययमेव क्रम इति ॥३४॥

(३) पांच दशाओं का निरूपण —

पाँचवीं कारिकामें नाटकका लचण करते समय १ श्रृङ्ग श्रोर २ उपायके श्रनन्तर तीसरे 'दशा' शब्दका प्रयोग किया गया था । 'दशा' भी नाटकका एक मुख्य भाग है । इसलिए उपायोंका निरूपण कर चुकनेके बाद 'दशा' का निरूपण प्रारम्भ करते हैं । विश्चम्भक श्रादि पांच श्रथ्योपक्षेपकोंका वर्णन करनेके बाद बीज श्रादि पांच उपायोंका वर्णन किया गया था । उसी प्रकार श्रवस्थाओंके श्रोर श्रगेे कह्ही जाने वाली सन्धियोंकी भी संख्या पांच-पांच है । इस समय पहले पांच श्रवस्थाओंका वर्णन करते हैं ।

ग्रथ उपायोंके बाद उद्दिष्ट 'दशा' का लचण करनिकेलिए उसके भेदोंको गिनाते हैं

[('उद्दशाति' नाममात्रेऽप्यथति]—

[सूत्र ३७]—नायकके मुख्य चरित्र [वृत्त] में १ श्रारम्भ, २ यत्न, ३ प्राप्त्याशा, ४ नियताप्ति श्रोर ५ फलागम ये पांच श्रवस्थाएँ [इसी] कमसे श्रोर श्रवस्था होती हैं [इसमें पांच श्रवस्थाओंका उद्देशमात्र किया गया है । उनके लचण श्रगे करेंगे] ३४।

'नेता' श्रथात् मुख्य फल [की प्राप्ति] के प्रति बीजादि उपायोंका प्रयोग करने वालोंके, [चरित्रमें] पांच श्रवस्थाएँ प्रदर्शित होती हैं । 'अवस्था:' श्रथात् प्रधान चरित्रके विषयमें शरीर, वाचो तथा मनके व्यापार । 'ध्रुवम्' इस [पद] से प्रधान [नायक] के चरित्रमें [वृत्ते] पांचों श्रवस्थाओं की परपरिहार्यंता सूचित को है । इसलिए प्रासङ्ङिक [प्रथात् पताक் प्रकरी चरित्रमें] ग्रनुसन्धियोंके समान दो श्रादि [अवस्थाएँ] भी हो सकती हैं श्रोर वे गौण हैं । नाटकके लचणोंका प्रकरण होनेसे नाटकमें तथा नाटकके लचणोंका श्रनुरसरण करने वाले प्रकरण नाटिका तथा प्रकरणीमें भी यही नियम है [प्रथात् पांचों श्रवस्थाश्रोंका होना श्रनि-

वार्य है] । इसलिए व्यव्योग श्रादिमें उनके लचणोंको श्रनुसार [पाँचों श्रवस्थाश्रोंका प्रयोग न करके] न्यूनतव [प्रथात् दो-तीन-चार श्रवस्थाओंका प्रयोग] भी दोषावह नहीं होता है । 'क्रमात्' इस [पद] से [यह सूचित किया है कि पांचों श्रवस्थाएँ] इसी कमसे निवब्घ करनी चाहिए उपायोंके समान कम या व्यतिक्रमसे नहीं । बुद्धिमान् पुरुशोंके कार्यमें पहले श्रारम्भ, फिर उसके बाद प्रयत्न, उसके बाद सम्भावना, उसके बाद निश्चिय श्रोर ग्रनन्तमें फलप्राप्ति यह्ही क्रम रहता है । [इसलिए नाटकमे भी इसी कमसे श्रवस्थाश्रोंका समावेश करना चाहिए] ॥३४॥

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(९) श्रारम्भे व्युत्पाद्यते—

[ सूत्र ३८ ]—फलायौत्सुक्यमारम्भः फलं मुख्यं साध्यम् । तदर्थमौत्सुक्यं उपायविषयं, श्रवनेनोपायेन एतत् सिध्यतीति । स्मररसोत्कण्ठादि कर्म, तदनुरूपो व्यापारश्रोभयारम्भः । उपायविषयमौत्सुक्यं, श्रौत्सुक्यानुरूपो व्यापारारम्भावस्थेयर्थः । यथा वेषीसंहारेऽ प्रथमेड्ङे सहदेवं प्रति—

"भीमः— श्रथ भगवान् कृष्णः केन पथेन सुयोधनं प्रति सन्निधं कतुं प्रहितः । सहदेवः— श्रायं नतु पञ्चभिर्ग्रामैः" इत्यादि ।

यथा वा नलविलासे प्रथमेऽङे—"नेपथ्ये तूर्यघ्वनि: । कलहंसः—देव युगादिदेव-देवायतन-सन्ध्यावलिप्तहृदयनियम् ॥ राजा— [ स्वगतम् ] ग्रहो परमं शकुनम् । [ पुनर्विमृश्य ] प्रेषयितं कलहंसे दमयन्त्या: पाश्र्वे । एषा च मकरिका विदर्भभाषा-वेषाचारकुशला सहैव यातु ।" इत्यादि ।

पिछली कारिकाओं में पाँचों श्रावस्थाओंका 'उद्देश' श्रर्थात् नाममात्रसे कथन किया गया था । श्रब उनमेंसे एक-एक श्रावस्थाका क्रमसे लक्षण श्रग्रादि करते हैं । उनमें सब से पहले श्रारम्भ श्रावस्थाका लक्षण देते हैं ।

(९) श्रारम्भावस्था—

श्रब श्रारम्भ [श्रावस्था] का विवेचन करते हैं—

[सूत्र ३९]—फलं [की प्राप्ति] केलिये श्रौत्सुक्य 'श्रारम्भ' [ग्रावस्था कहलाती] है । फल [का श्र्राप्त] मुख्य साध्य [है] । उसके लिये उपाय-विषयक श्रौत्सुक्य श्रर्थात् इस उपाय [के करने] से यह [फल] सिद्ध होगा इस प्रकारका स्मरण तथा उद्धण्ठादि कर्म, श्रौर श्रौत्सुक्यके श्रनुरूप व्यापार दोनों श्रारम्भ [ग्रावस्था होते] हैं । श्रर्थात् उपाय-विषयक श्रौत्सुक्य, श्रौर श्रौत्सुक्यके श्रनुरूप व्यापार [दोनों] श्रारम्भावस्था हैं यह श्रभिप्राय है । जैसे वेषीसंहारके प्रथम श्रङ्कमें सहदेवके प्रति [भीम कहते हैं कि]—

"भीम— श्रच्छा भगवान् कुष्णोको किन शर्तोंपर दुर्योंशनके पास सन्निध करनेकेलिये भेजा है ?

सहदेव— श्रायं पाँच गाँवोंके द्वारा ।" इत्यादि ।

यथवा जैसे नलविलासके प्रथम श्रङ्कमें—

"नेपथ्ये वाद्यध्वनि [सुनाई देता है] । कलहंस—देव, युगादिदेवके मन्दिर [देवायतन] के सन्ध्याकालीन पूजनके समयके वाद्योंका यह ध्वनि है ।

राजा—[स्वगत] ग्रहो यह बड़ा श्रच्छा शकुन है । [फिर विचार कर] तब इस कल- हुँको दमयन्तीके पास भेज दूँ । श्रौर विदर्भ देशकी भाषा वेष तथा श्राचार ग्रादिको जानने वाली वह मकरिका [वेश्या] भी उसके साथ ही भेज दी जाय ।" इत्यादि ।

यह सब मुख्य फलकी प्राप्तिके लिये उपाय विषयक श्रौत्सुक्य तथा तदनुरूप व्यापारके सूचक हैं । श्रत: ये श्रारम्भावस्थाका प्रदर्शन करते हैं ।

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एतासु चावस्थासु नायक-सहायक-प्रतिपक्ष-दैवव्यापारां ध्यान्यतमतस्य, द्वयोः ख्यात्यां चतुर्णां च एकस्यां, द्वयोरस्ति च तस्य च पक्षैरस्वैप च यथायथमुनमीयने वृत्ति: । फलयोगस्तु मुख्यनायकस्यैव न च देवात् । कर्मणां: प्रारम्भादुन्मीलने मानुषकर्माश्रयात् कथाद्युत्पत्तेर्हेतुत्वम् । दैव-मानुषव्यापारयोः परस्परपेच्चयैव शुभाशुमफलसाधकत्वम् । दैवाद्-व्यथ पश्यतः पुए्यमुपचेतुं मानुषे कर्मणि प्रवर्त्तरन । उपभोगाच्च नीचयमागमनतु-कूले देव प्रति विहितप्रतिपत्तिय: प्रतीकारोन्मुखे सवंत्र देवांश्य मानुषव्यापारोऽपि च्छत्वान् । देवायतफलान्वपि रुपकाणि सामाजिकानां बुद्धिसंस्काराय निबन्धनीयानि । यथा पुष्पदंतिक मुख्यकटिका चेति ।

येयमारम्भावस्थाके लक्षण ग्रोर उदाहरणे उपरके ग्रनुच्छेदोंमें दिखलाए हैं । ग्रव ग्रागले ग्रनुच्छेदमें ग्रन्थकार यह दिखलाना चाहते हैं कि इन ग्रवस्थाओंका प्रदर्शन नायकके व्यापार द्वारा भी हो सकता है ग्रोर कहीं-कहीं प्रतिनायक, सहायक तथा दैव-व्यापारके द्वारा भी सकता है । ग्रोर वह केवल ग्रारम्भावस्थामें ही ग्रपितु सभी ग्रवस्थाग्रोंमें हो सकता है । कभी-कभी नायक, सहायक, प्रतिपक्ष ग्रोर दैव-व्यापारोंमें दो, तीन या चारों मिलकर किसी ग्रवस्था विशोषका उन्मीलन कराते हैं । कभी तो चारों या इनमेंसे एक, दो, या तीन किसी एक ग्रवस्थाका ग्रथवा एकसे ग्रधिक दो, तीन, चार या पांचों ग्रवस्थाग्रोंका उन्मीलन कराते हैं ।

इसी बातको ग्रागले ग्रनुच्छेदमें इस प्रकार दिया है— इन [पांचों] ग्रवस्थाग्रोंमें १ नायक, २ सहायक [पताका प्रकार], ३ प्रतिनायक ग्रोर ४ देव [इन चारों व्यापारों] मेंसे किसी एक या दो या तीन ग्रथवा चारोंका, किसी एक [ग्रवस्थाके उन्मीलन] में, ग्रथवा दो या तीन ग्रथवा चार या पांचों [ग्रवस्थाग्रों] के उन्मीलन में ग्रावश्यकतानुसार व्यापार होता है । [ग्रवस्थाग्रोंका प्रकाशन या उन्मीलन चाहे किसौके भी व्यापार हो हो किन्तु] फलकी प्राप्ति [सदैव] मुख्य नायकको ही होती है । इन ग्रवस्थाग्रोंके प्रकाशनमें दैव-व्यापार भी कारगर हो सकता है यह बात ग्रभी इस ग्रनुच्छेदमें कहीं है । दैव-व्यापार को पंचविध ग्रवस्थाग्रोंके प्रकाशनमें कारगर माननेपर यह प्रश्न उठ सकता है कि नाटकका उद्देश्य मनोरंजनके साथ कर्त्तव्याकर्त्तव्यकी शिक्षा देना हो है ।

जब दैवको कारणा मानेंगे तो उसपर मनुष्यका नियंत्नण न होनेके कारणा देवाधीन कार्योसे कोई शिक्षा नहीं मिलेगी । यह दाज़ा उठाकर उसका समाधान ग्रागले ग्रनुच्छेदमें करते हैं— दैवकै व्यापारै प्रारम्भे [ग्रवस्थास्था] के उन्मीलन होनेपर उसमें मनुष्य व्यापारका प्रभाव होनेसे नाटककी शिक्षा प्रदाताका हेतु नहीं कहा जा सकेगा । यह बात नहीं समभनी चाहिए । [क्योंकि] देव तथा मनुष्य-व्यापार दोनों एक-दूसरेकी सहायतासे हो शुभ ग्रोर ग्रशुभ फलके साधक होते हैं । [दूसरी बात यह भी है कि] भाग्यसे भी ग्रप्रत्यकी प्राप्ति देखलकर [देखने वाले] पुण्यका संशय करनेकेलिए मनुष्य-साध्य कार्यमें प्रवृत्त हो सकते हैं । ग्रोर जीवनके संकटमें पड़ जानपर भी [विहितप्रारब्धात्] प्रतिकूल दैवके उपभोग द्वारा नष्ट होनेकी प्रतीक्षा कर सकते हैं । इसलिए दैवके सर्वत्र मनुष्य-व्यापारकी ग्रपेक्षा रखनेसे दैवके ग्रधीन ही जिनका फल है इस प्रकारके रूपक भी सामाजिकोंके बुद्धिको शुद्धिके लिए बनाने ही चाहिए । जैसे 'पुष्पदंतिक' तथा 'मुख्यकटिका' ग्रादि [दैवाधीन फल वाले रूपक हैं] ।

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का० ३५, सू० ३६ ]

प्रथमो विवेक:

[ ६७

(२) श्रथ प्रयत्नमाह—

[सूत्र ३६]—प्रयत्नो व्याप्तृतौ त्वरा ।

मुख्यफलोपायव्यापारेऽपि त्वरा, श्रन्येनोपायेन विना फलं न भावतीति निश्रयेन परमोत्सुक्यं, प्रकर्षेगा यत्न: प्रयत्न: । श्रौत्सुक्यमात्रमारम्भ:, परमोत्सुक्यं तु प्रयत्न इत्यर्थ: ।

यथा रत्नावल्याम्—

"तहा वि णहिथ श्रण्णो दिसणओवाड त्ति जहा तहा श्रालिदिय जधासमीहिदं करइस्सं ।

[तथापि नास्त्यन्यो दर्शानोपाय इति यथा तथा श्रालिख्य यथासमीहितं करिष्ये" इति संस्कृतम् ] ।

इत्यादि ।

यथा वा नलविलासे तृतीयेडङ्के—

"राजा—[ सत्वरम् ] मकरिके प्रभवसि राजपुत्रीमिह समानेतुं ?

मकरिका—ग्रहं दाव पर्यतिससं । श्रागमगं उग दिसवस्स श्रायत्तं ।

[ग्रहं तावत् पर्यन्तिसं; श्रागमनम् उद् दृष्ट्वा श्रायत्तं इति संस्कृतम् ]।

राजा—तहि यतस्व "

इत्यादि ।

उनसे भी सामाजिकोंको शिक्षा मिलती हो है]।

(२) प्रयत्नावस्था—

श्रथ प्रयत्न [के लक्षण श्रथवा] को कहते हैं—

[सूत्र ३६]—[फलके उपायोंके] व्यापारमें श्रौद्य्यता [करना] प्रयत्न कहलाता है ।

मुख्य फल [की प्राप्ति] के उपायोंको लागू करनेमें श्रौद्य्यता श्रर्थात् इस उपायके बिना यह फल सिद्ध नहीं हो सकता है । इस प्रकारके निश्रयके कारगा [उपायको प्रयुक्त करनेके लिये] श्रत्यन्त उत्सुकता, प्रकर्षेगा यत्न [प्रयत्न इस वृत्तिके श्रनुसार] 'प्रयत्न' [कहलाता] है ।

[इसका श्रभिप्राय यह हुग्रा कि] केवल श्रौत्सुक्य ग्रारम्भ [प्रवृत्तिमात्र], श्रथवा परम श्रौत्सुक्य प्रयत्न [ग्रवस्थामें परिणत] होता है ।

जैसे रत्नावलीमें—

"फिर भी दर्शानका कोई उपाय नहीं है इसलिए जंसे-तैसे चित्र बनाकर ही अपनी इच्छा की पूर्ति करता हूँ",

इत्यादि ।

श्रथवा जैसे नलविलासके तृतीय श्रङ्कमें—

"राजा—[ श्रोघ्रतया] मकरिके ! क्या तुम राजपुत्रीको यहाँ ला सकती हो ?

मकरिका—मैं [अपनी ग्रोरसे पूरा] प्रयत्न करूँगी । किन्तु ग्राना भगवान्के ग्राधीन है ।

राजा—तो [श्रोघ्र ही] यत्न करो ।"

इत्यादि ।

ये दोनों उदाहरण मुख्य फलकी प्राप्तिके प्रति उपायोंका उपयोग करनेके विषयमें

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(३) श्रथ प्राप्त्याशां विप्रलक्ष्यति—

[ सूत्र ४० ]—फलसम्भावना किश्चित्तु प्राप्त्याशा हेतुमात्रतः ।।३५।।

मात्रशब्देन फलान्तरयोगः प्रतिबन्धनिश्रया श्र त्यवाच्चहते । फलान्तर-

सम्बन्धात् श्रनिश्रितवाचकामावाच्चोपायदीष्टन प्राप्तानफलस्य या सम्भावना, न तु

निश्रयः, सा प्राप्तेः प्रथानफलाभस्य श्राशा प्राप्त्याशा ।

यथा वेधीसंधारे तृतीयेडडके ।

"सीम्—कृत्स्न येन शिरोरुहपुष्पनुना पाण्डुपालरज्जातत्नजा, येनास्या: परिधानमयपिहत्तन राज्ञां गुरूणां पुरः । यस्योपरि स्थलशोभिततत्सवमहं पातुं प्रतिज्ञातवान्, सोडयं मदसुभपक्षरान्तर्गतः संरन्ध्यतां कौरवा ॥"

इत्यत्र दुःशासनवधादेशेकौरववधसम्भावनेन युद्धष्ठिरस्य राज्यप्राप्त- सम्भवः ।

यथा वा नलविलासे चतुर्थे स्वयम्वराङ्के—

"नल—कलहंस ! मकरिके ! फलितः स एव वा प्रयासः । कलहंस—देव नावयोः प्रयासः: किन्तु देवस्य स्वप्नः ।

त्वरा या परम श्रोत्सुक्यको प्रदर्शित कर रहे हैं । इसलिए ये प्रयत्नावस्थके उदाहरणके रूप में यहाँ प्रस्तुत किए गए हैं ।

(३) प्राप्त्याशावस्था—

श्रथ प्राप्त्याशा [रूप तृतीयावस्था] का विवेचन करते हैं—

[सूत्र ४० ]—हेतुमात्रे फलकी [प्रासिको] कृत्स्न सम्भावना [हो जाना] 'प्राप्त्याशा' [कहलाती] है ।३५।

मात्र शब्दसे [मुख्य फलके प्रतिरिक्त या मुख्य फलसे भिन्न ] अन्य फलका सम्बन्ध

तथा प्रतिबन्धके निश्रयका निवारण किया है । [उस हेतुके साथ] अन्य फलका सम्बन्ध न

होनेसे श्रोर किसी श्रनिश्रित बाधकके श्रभावरूप उपायसे प्रधान फलकी [प्रासिको] थोड़ी-सी

सम्भावना, न कि निश्रय होना, प्रासिको श्रर्थात् प्रधान फलकी प्रासिको श्राशा होनेसे

'प्राप्त्याशा' [कहलाती] है ।

जैसे वेधीसंधारके तीसरे श्रङ्कमें

"सीम्—जिस दृष्ट [पहलूने] पाण्डुपुत्रिकी कृत्स्नकौं श्लाघा था शोर जिसने

राजाश्रों तथा गुरुश्रोंके सामने उसके वस्त्रोंका भी श्रपहरण [करनेका यत्न] किया । जिसकी

छातीका रक्त पीनेकी मैंने प्रतिज्ञा की थी वह [दुष्ट दुःशासन इस समय] मेरी भुजाश्रोंके शिकंजे- में श्रा गया है । हे कौरवो ! [तुम्हारी सामर्थ्य हो तो श्राकर ग्राब] इसकी रक्षा कर लो ।"

इसमें दुःशासनके वधसे समस्त कौरवोंके वधकी सम्भावना हो जानसे युद्धिष्ठिरको

राज्यप्रासिको सम्भावना [प्राप्त्याशा] हो गई है ।

श्रथवा जैसे नलविलासके चतुर्थ श्रङ्कमें—

"नल— हे कलहंस ! हे मकरिके ! तुम दोनोंका वह प्रयास सफल हो गया । कलहंस—देव ! हम दोनोंका प्रयास नहीं किन्तु देवकः स्वप्न [सफल हुश्रा] ।

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का० ३६, सू० ४१ ]

प्रथमो विवेक:

[ ३५

नल:-—समभूदिदानीं स्वप्नार्थप्रकाशा ।" इति ॥३५॥

(४) स्वथ नियताप्तिं स्पष्टयति—

[सूत्र ४१]—नियतातिरुपायानां सफल्यात् कार्यनिर्णयः ।

प्रधानफलहेतूनां प्रतिबन्धकाभावेन सकलसहकारिसम्पत्या कार्यस्य प्रधान- फलत्वं निश्चित्यो भविष्यत्येवेति निश्चित्यो, नियता फलाव्यभिचारिणी स्वार्थनियतात्तः ।

यथा वेगपीसंहारे—

"कर्ता मृतचछललानां जतुमयशरशयोधीपनः सोडभिमानी, राजा दुःशासनादि-गु रणुजशतस्याझाराजस्य मित्रम् ।

कृष्णाकेशोत्तरीयपटयवनपटुः पाझडवा यस्य दासा:, क्वास्ते दुर्योधनोऽसौ कथयत न रुपा दृश्यमस्यागतो स्वः ॥"

इत्यादिना भीमार्जुन ताभ्यांमेकशेषदुर्योधनान् नियताप्तिमदर्शितः ।

नल — 'स्वप्नके श्रथंकी प्रकाशी श्राशा हो गई है' इत्यादि ॥३५॥

४ नियताप्ति श्रवस्था—

ग्रारम्भ, यत्न, ग्रोर प्राप्त्याशा रूप तीन श्रवस्थाग्रोंका वर्णन कर चुकनेके बाद ग्रब 'नियताप्ति' रूप चतुर्थ श्रवस्थाके लक्षग्रादिका श्रवसर प्राप्त होता है । श्रत: श्रागे उसका

वर्णन प्रारम्भ करते है ।

ग्रब नियताप्ति [के लक्षण ग्रादि] को स्पष्ट करते है—

[सूत्र ४१]—उपायोंके सफल होजानेसे कार्य [की प्राप्ति] का निर्णय 'नियताप्ति' कहलाती है ।

प्रधान फलके हेतुश्रोंके, प्रतिबन्धक [कारणों] का नाश [हो जानेसे ग्रोर [उसकी उत्पत्तिके] समस्त सहकारियोंके प्राप्त हो जानेके कारग्रा कार्य श्रर्थात् प्रधान फलका

निर्णय श्रर्थात् श्रवश्य होगा ही इस प्रकारका निश्चित्य, नियता श्रर्थात् फलकी ग्रव्यभिचा|रिगी निश्चित प्राप्ति होनेसे [इस ग्रव्यभिचारिगीके ग्रनुसार] नियताप्ति [कहलाती] है ।

जैसे वेगपीसंहारमें—

"[हम पाण्डवोंके साथ] छलका छल [करके हमारा राज्य ग्रपहरण करने] वाला, लाखके घर [में बंद करके हम सब] को जलाने वाला, दुःशासन ग्रादिका वह ग्रभिमानी

राजा, सौ भाइयोंका गृह [ज्येष्ठ भाई], ग्रद्धराज [कर्ण] का मित्र, द्रोपदीके केश ग्रोर वचों का ग्रपहरण करानेमें पदु श्रौर [श्रधिक वया कहें] पाण्डव जिसके 'दास' हैं वह दुर्योधन

ग्रब कहाँ है, बतलाओ, हम दोनों [ग्रर्थात् भ्राजु न ग्रौर भीम] क्रोधसे [उसे मारनेके लिए] नहीं केवल मिलनेके लिए ग्राए है"

इत्यादि [वचन] से भीम तथा भ्राजुन तके द्वारा ग्रकले हुए दुर्योधनका ग्रन्वेषण किए जानेके कारग्रा [पाण्डवोंको राजकीय प्राप्तिका निश्चित्य हो जाने से यह] नियताप्ति है ।

वेधीपीसंहारके पञ्चम ग्रद्धमें कर्ण ग्रादि तक सब सेनापतियोंका वध हो जानपर ग्रौर dुर्योधनका जीवन भी सङ्कटमें पड़ जानपर मूर्छित दुर्योधनको रथमें लेकर सारथि उसके रथ

को भगा लाता है । ऐसी दशामें धृतराष्ट्र तथा गान्धारी दुर्योधनको सम्भाला रहे हैं । उसी समय दुर्योधनको खोजते हुए भीम ग्रौर भ्राजु न उद्धर ग्रा निकलते हैं । उसी प्रसङ्गमें यह

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६० ]

नाट्यदर्पणम्

[ का० ३६, सू० ४१

यथा वा राघवास्युदये पञ्ठेडङ्के—

"सुमीव:—[ जानकवन्तं प्रति] भवतु यादृशास्तादृशो वा स पारदारिको

राघ्घ्रसरतथापि देवपादानां बध्य:।

राम:—[ सीतापहारं स्मृत्वा सगर्वविश्वासम् ] कपिराज ! प्रतिराजविक्रम-

यामिनीतपनोदये भवति सहाये सति—

निहत्थ्य दशकन्धरं सह विपक्षरक्ष:कथा—

प्रत्याभिरसिस्कन्धं जनकजां गृहीत्वा ध्रुवम् ।

शशाक न स रक्षितुं रघुपतिः परस्य: प्रियाम्—

मयं तदपि सम्भवी चिरमकीर्तिकोलाहल: ॥"

इति ।

भीमकी उक्ति है । इसको सुनकर कौरवपक्षके मुख्य सेनानायकोंने मारे जाने शौर दुर्योधनके

ब्रकेलो ही लोप रह जानसे श्राब पाण्डवोंकी राज्य-प्राप्ति प्राय: निश्चित हो जाती है । इसलिए

ग्रन्यकारने इसे कार्यकी 'नियताप्ति' रूप चतुर्थी श्रावस्थाके उदाहरणरुपमें यहाँ प्रस्तुत

किया है ।

इसी प्रकारका नियताप्तिका दूसरा उदाहरण श्राब श्रपने बनाए राघवाभ्युदय नाटक

मेंसे प्रस्तुत करते हैं ।

ग्रथवा जैसे राघवाभ्युदयके पञ्चमाङ्कमें—

सुमीव:—[ जानकवन्तक प्रति कहते हैं कि] हे ग्रामस्थ ! वह दूसरेकी स्त्रीका श्रपहरण करने वाला राक्षस [रावण] चाहे कँसा भी [बलवान् शौर विहानु] हो किन्तु [दूसरेकी स्त्री

का ग्रपहरण करने वाला होनेके कारण वह पापी है श्रत देव पाद [श्री रामचन्द्रजी] के

लिए बध्य ही है ।

राम:—[सीताके ग्रपहरणके दुःखको स्मरण करके गर्वं तथा विवादके सहित कहते

हैं कि] हे कपिराज ! शत्रुभ्रो [प्रतिराज] के विक्रम रूप यामिनी [रात्रि] के लिए सूर्यके

समान [ग्रर्थात् शत्रुप्रोंके पराक्रमको नष्ट करने वाले] ग्रापके सहायक होनेपर—

शत्रु राक्षसोंकी कथाथोंकी परम्पराथोंके साथ रावरको युद्धभूमिमें मार कर निःश्वय

ही में [जनकजा] सीताको प्राप्त कर लूँगा । फिर भी वह रघुपति दूसरेंसो श्रपनी प्रियाकी

रक्षा करनेमें भी समर्थ नहीं हुग्रा इस प्रकारका श्रपकीर्तिका कोलाहल सदाके लिए हो हो

जायगा ।

यहाँ ।

यहाँ भी फलसिद्धिके बाधकोंका निराकरग्रा शौर फल-प्राप्ति श्रर्थात् सीताके उद्धारके

श्रमीष्ट साधनोंके उपस्थित हो जानसे रामचन्द्रजी सीताके उद्धार रूप फलकी प्राप्तिका निश्चित

हो हो गया है । इसलिए यह भी 'नियताप्ति' रूप चतुर्थी श्रवस्थाके उदाहरणरुपमें प्रस्तुत

किया गया है ।

इस प्रकार यहाँ तक कार्यकी श्रारम्भ श्रादि पाँच श्रवस्थाथोंमेंसे चार श्रवस्थाथोंका

लक्षण तथा उदाहरण श्रादि सहित विस्तार-पूर्वक विवेचन हो गया । श्रब एक 'फलागम' रूप

ग्रन्तिम श्रवस्था शेष रह जाती है । उसका निरुपरया श्रागले श्लोकार्थ द्वारा प्रस्तुत करते हैं !

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(४) ग्रथ फलागमं निरुपयति—

[सूत्र ४२]—साङ्गादृष्टार्थसम्भूति-नायकस्य फलागमः ॥३६॥

साद्यान् समनन्तरं, न तु दानादिभ्यः स्वर्गादिफलमिव जन्मान्तरभाविनी । इष्टस्याभिप्रेतस्य, श्रर्थस्य प्रयोजनस्य, सम्यक् पूर्वार्ज्जन, भूतिरुत्पत्ति:, फलस्यागमः श्रागामारम्भो न पुनरागमत्स्वम् । इह फलस्योत्पत्त्यावेशः पञ्चम्यम्यवस्थां । उत्पन्नस्य तु नायकेन यः सम्भोगस्तत् प्रवन्धस्य मुख्यं साध्यम् । श्रत एव फले साध्ये नायकस्य पञ्चावस्था: सङ्जृच्छन्ते ।

'नायकस्य' इत्यनेन चावस्थान्तराश्रिते सचिव-नायिका-विपक्ष-दैवादिच्यापारै-रपि निबन्ध्यते इत्युक्तं भवति । तान्ति तु तथा निबद्धान्‌ऽर्यानप फलतेो नायक एव पर्यवस्यान्ति । श्रत एव रत्नावल्यों—'प्रारम्भेडस्मिन् स्वामिनो वृद्धिहेतौ' इत्यादि स्वामिगतवेनैव यौगन्धरायणेनोक्तम् । फलागमः पुनर्नायकस्यैव निश्चध्यते ।

(५) फलागम श्रवस्था—

ग्रब फलागम [रूप पञ्चमी श्रवस्था] का निरुपण करते हैं—

[सूत्र ४२]—नायकको साक्षात्‌ [जन्मान्तरभावी फलक रूपेण नेह ग्रप्तु इसौ जन्म में कार्यके बाद] इष्ट श्रर्थकी प्राप्ति 'फलागम' [रूप पञ्चमी ग्रवस्था कहलाती] है ॥३६॥

[कारिकामें ग्राया हुया ] 'साक्षात्‌' [पद समनन्तर] तुरन्त बादमें [होनेवाली इष्टार्थ कारिका में द्राया हुया 'साक्षात्‌' पद समनन्तर तुरन्त बाद में होने वाली इष्टार्थ प्राप्तिका सूचक है], न कि दानादिले प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि फलके समान दूसरे जन्ममें प्राप्त होनेवाली [इष्टार्थ प्राप्तिका प्रापिका सूचक है], न कि दानादिले प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि फलके समान दूसरे जन्म में प्राप्त होनेवाली [इष्टार्थ प्राप्ति का प्राप्‍तिका हेतु] 'इष्ट' श्रर्थात्‌ श्रभिप्रेत [चाहे हुये] 'श्रर्थ' श्रर्थात्‌ प्रयोजनकः [सम्भूति श्रर्थात्‌] सम्यक् पूर्व हुपसे [भली प्रकार] भूतित श्रर्थात् उत्पत्ति 'फलागम' [इस पदमें] 'ग्रागम' श्रर्थात् श्रारम्भ [का ग्रहण करना चाहिए] न कि [ग्रागन्तत्व श्रर्थात् फलको] सिद्धि । श्रर्थात् फलकी उत्पत्तिका श्रारम्भ पञ्चमी [फलागम रूप] ग्रवस्था [से श्रभिप्रेत] है । ग्रोर [पूर्वार्ज्जन हुपसे] उत्पन्न [फल] का जो नायकद्वारा उपयोग है वह प्रबन्धका मुख्य साध्य है [ग्रवस्था रूप नहों] । इसलिए फलकी

सिद्धौ नायककी पांच ग्रवस्थाएं [समान्ना]युक्तिसङ्गत है ।

'नायकस्य' इस [पद] से [यह सूचित किया है कि फलागम रूप ग्रनितम ग्रवस्थाको छोड़कर] ग्रन्य [चारों] श्रवस्थाएं सचिव, नायिका, प्रतिनायक या दैव ग्रादिके व्यापारों के द्वारा भी ग्रायोजित हो सकती हैं [किन्तु फलागम रूप ग्रनितम ग्रवस्था केवल नायकको ही प्राप्त होती है] । यह श्रभिप्राय है । वे [प्रारम्भ ग्रादि रूप चार ग्रवस्थाएं] उस प्रकार से [सचिवादि द्वारा] निबद्ध होनेपर भी फल रूप में [ग्रन्थको] नायककम ही हि पर्यवसित होता है [श्रर्थात्‌ शेष चारों ग्रवस्थाथ्योंकी ग्रायोजना जना चाहे किसौके भी प्रयत्नसे हो किन्तु ग्रन्थमें उसका फल नायकको ही प्राप्त होना है] । इसीलिए रत्नावल्यों—'स्वामिकी वृद्धिके हेतूभूत इस कार्य में' इत्यादि स्वामिगत हुपसे ही

योगन्धरायणने कहा है । [प्रथात्‌ रत्नावलौ प्रारम्भम्थ-वस्ताका प्रयोजन यथाथ‌पि प्रमाण्य यौगन्धरायणने किया है किन्तु उसका फल स्वामिगत ही निश्चित किया है] । फलागम [पञ्चमी ग्रवस्था केवल] नायककी ही वर्णित की जाती है ।

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६२ ] नाट्यदर्पणम् [ का० ३६, सू० ४२ यथा वेग्पीसंहारे षष्ठेङ्के—

"भूमौ चिप्त्वा शरीरं तिहितरुमदमुक चन्दनाभं मयाल्ले, लदमिरार्ये निपत्याङ्ग चतुरुरधिपयसीमया साध्वसुर्योः । भूस्या मित्राणि योधाः कुरुवलमनुजां रघ्यमेतद् रपाग्नतौ, नामैकं यद् ब्रह्मीषि जिनिप ! तदधुना भारतराष्ट्रंय शेषम् ।"

इत्थनेन दुर्योधनं हत्वा भीमसेनेन युधिष्ठिरन् ! ड्यसमरपंषयाफलयोगो दर्शितः ।

यथा वा राघवाभ्युदये—

"वैदेही हतवांस्तदेव महतः संख्ये विपक्षे कलमान्, चक्रोत्पातितकन्धरौ दशमुखः कीनाशदासीकृतः ।"

फलागम रूप पञ्चमी अवस्थाके लक्षणोंकी व्याख्यामें 'साक्षात्' तथा 'फलागम' इन दो शब्दोंकी व्याख्यापर ग्रन्थकारने विशेष बल दिया है । 'साक्षात्' पदसे उन्होंने यह ग्रन्थ लियो है कि इष्ट श्रेयकी प्राप्ति दानादि कर्मोंसे प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि रूप फलके समान जन्मान्तरभाविनी न होकर 'साक्षात्' इसी जन्ममें श्रौर कर्मोके ग्रनन्तर ही होनी चाहिए । इसका कारण यह है कि यदि नाटकमें भी जन्मान्तरभाविनी फलप्राप्तिका वर्णन किया जाय तो फिर प्रेक्षकोंको कर्म श्रौर उसके फलका सम्बन्ध प्रत्यक्ष रूपसे गृहीत न हो सकनेसे उसे नाटकसे कर्तव्यकर्तव्यकी शिक्षा प्राप्त नहीं हो सकेगी । इसलिए फलप्राप्ति साक्षात् रूपमें ही ग्रहण होनी चाहिए ।

दूसरा बल उन्होंने 'फलागम' पदकी व्याख्यापर दिया है । फलागम शब्दसे उन्होंने फलकी पूर्ति रूपसे प्राप्ति नहीं ग्रापितु केवल फलप्राप्तिका ग्रारम्भ यह ग्रर्थ लियो है । इसका कारण यह है कि फलकी पूर्ति रूपसे प्राप्ति तो ग्रवस्थाके भीतर नहीं ग्राती है । वह तो ग्रन्तिम साध्य है । यहाँ ग्रन्तिम साध्यक नहीं ग्रापितु केवल ग्रवस्थाप्रोंका वर्णन चल रहा है । इसलिए फलागम शब्दसे फलप्राप्तिका ग्रारम्भ यह ग्रर्थ ग्रन्थकारने लियो है । जो सर्वथा उचित है ।

ग्रागे फलागम रूप पञ्चमी ग्रवस्थाके दो उदाहरणा देते हैं । जैसे वेग्पीसंहारके छठे ग्रङ्कमें [भीम कह रहे हैं]—

[दुर्योधनके] शरीरको पृथिवीपर पटककर उसका यह रक्त मैंने चन्दनके समान ग्रापने शरीरमें लगा लिया है । चारों समुद्रोंका जल जिसकी सीमा है इस प्रकारकी पृथिवीके साथ ललाटको [युधिष्ठिर] ग्रप्राय [कौरवोंके] मित्र, पिता, बन्धुवर्ग, कुरुवंश ग्रौर [दुर्योधनके] भाई सब इस रणभिनमें भस्म हो गए । हे राजन् [युधिष्ठिर] ! ग्राप जिसका नामको बोल रहे हैं [धृतराष्ट्रके पुत्र] दुर्योधनका केवल एक वही [नाममात्र ही] शेष रह गया है

इसे दुर्योधनको मारकर भीमसेनने युधिष्ठिरको राज्यापंण रूप फलको प्रदर्शित किया है । [श्रतः यह फलागमका उदाहरणा है ]

ग्रथवा जैसे राघवाभ्युदयमें [राम कह रहे हैं कि]—

[रावणके] वन्देहीका ग्रपहरण किया था इसलिए संग्राममें महान् कष्टोंकी सहकर भी चक्रसे गर्दन काटकर उस रावणको यमराजके ग्रापित कर दिया । किन्तु उस [सीताके

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का० ३६, सू० ४२ ] प्रथमो विवेक: [ ६३

प्राप्तान् यद्विरहेदयं विहृतवांस्तेन त्रपसुन्दरं, वस्त्रं दर्शयितुं तथापि न पुरस्तस्या विलज्जः श्रमः॥

इति ।

इह च तावन् पुरुषकारमात्राभिनिवेशनां दैवमपाकुर्वतां नास्तिकानां दैव-बहु मान्रयुपपत्तये पुरुषकारोपर्यफलस्तद्भावोदपि सफल इति दर्शनीयम्। ततो दैवयुक्तं दर्शयितुं दरिद्रचारुदत्तादिरूपकं पुरुषकारोपार्जितैः सम्पन्नवान् कथं प्रारम्भाद्यः स्युः ?

न, तत्रापि नायकस्य फलार्थित्वान्, फलस्य च प्रारम्भादिनान्तरीयकत्वात्। अनुनयाद्यपि हि सन्ध्यन्ति वृक्षेषु काव्यायितयां सुचि उच्चूनतां-स्तम्भ-भवन-पुष्पोद्गम-क्रम एव फलान्त ।

यद्यपि हि सेवाद्यशेषष्यापारविषयः पुरुषो न व्यप्र्रियते, तथापि दैवशेरितो राजादिर्याप्रियत एव । स च राजादिगतौ व्यापारः पुरुषगत एव । तद्यापारसाध्य-फलार्थित्वान् । श्रपरथा परतः प्राप्तमपि फलं नाझ्जीकुर्योति ।।३६।।

विरहमैं भी जो मैं प्राप्तोंको धारण किए रहता हूँ इसलिए लज्जित हूँ अपने [त्रपसुन्दर] मुखको उसके [सीताके] सामने दिखलानेंमैँ समर्थ नहीं हूँ इसमें [फलागम रूप पश्चात्ताप ग्रवस्थाका वर्णन है] ऊपर यह बतलाया था कि प्रारम्भादि ग्रन्थ ग्रवस्थाग्रोंकी योजना देवके व्यापारसे भी हो सकती है । किन्तु उसका फल नायकको ही प्राप्त होगा । इसको समस्तन करते हुए ग्रागे उसकी विशेष उपयोगिताका प्रतिपादन करते हैं केवल पुरुषार्थको मानने वाले ग्रौर देवका तिरस्कार करने वाले नास्तिकोंको भी देवमें श्रद्धा करानेके लिए [कहीं] पुरुषार्थ भी व्यर्थ हो जाता है ग्रौर उसका ग्रभाव [ग्रर्थात् देव] भी सफल हो जाता है यह बात यहाँ नाटकमैं दिखलानी चाहिए । इसलिए केवल देवके श्रधीन फल वाले 'दरिद्र-चारुदत्त' ग्रादि रूपकोंमें पुरुषके व्यापारके ग्रौए हो जानसे ग्रारम्भ ग्रादि [ग्रवस्थाएँ] कैसे हो सकती हैं [यह शङ्का यदि उठाई जाय तो]-

ठीक नहीं है । क्योंकि वहाँ भी नायकको फलकी कामना होती है । ग्रौर फल श्रारम्भादिके बिना नहीं हो सकता है [इसलिए उसमें भी ग्रारम्भादि ग्रवस्थाग्रोंका समावेश हो सकता है] [यदि कोई कहे कि जब किसी प्रकार खेतमें पड़ जाते हैं तो वे] वर्षासे तर हुई भूमिमें फूलकर [ग्रङ्कुर फूटकर] पौदे बन कर ग्रौर फूल कर क्रमसे ही फलते हैं [इसी प्रकार बिना पुरुषार्थके केवल भाग्यके द्वारा बोए गए कर्म बीज भी प्रारम्भादि ग्रवस्थाग्रोंके द्वारा हो फलको उत्पन्न करते हैं] यद्यपि सेवा ग्रादि समस्त व्यापारोंसे रहित [राजादि सहश] पुरुष [स्वयं] किसी कार्यको नहीं करता है किन्तु देवसे प्रेरित ग्रथवा राजा ग्रादि होनेपर [स्वयं भी देव-प्रेरणाके ग्रनुसार] व्यापार करता ही है । ग्रौर राजादिगत वह [दैव प्रेरित व्यापार भी] पुरुषका ही व्यापार होता है । [क्योंकि उस दैवी-] व्यापार द्वारा होने वाले फलका प्रार्थी वह [राजादि] ही होता है । ग्रन्यथा [यदि वह फलार्थी न हो तो] बादमें होनेवाले फलको भी स्वीकार न करें ।।३६।।

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(४) स्थथ दशानन्तरसन्धिस्थान व्याख्यातुं सन्धीनिरूपणम्‌---

[सूत्र ४३]—मुखं प्रतिमुखं गर्भोऽडमर्‌शे-निवर्हणाख्यानि च । सन्ध्यो मुखप्रचृतांशाः पञ्चावस्थातनुगाः क्रमात्‌ ॥३७॥

मुखस्य स्वतन्त्रस्य महावाक्यार्थस्यांशा भागाः;, परस्परं स्वरूपेण चाङ्गे: सन्धीयमाने इति सन्धयः: | अवस्थाभिः: प्रारम्भादिभिरनुगता:, अवस्थासमाम्रों समाप्‍त इत्यर्थ:। अवस्थानों च प्रवृत्तिविनिवृत्ति सन्ध्योऽपि नाटक-प्रकरण-नाटिका-प्रकरसणपु पञ्चावस्थयम्भाविन:। समवकारादौ तु विशेषोपपादनादनुस्वेदपि न दोषः । क्रमादिति मुख्यागुहेशक्रमेण श्रवस्थाक्रमेण च निवेश्यन्ते । इह तावत्‌ प्रभन्ध-निबन्धनीयोऽर्थोऽवस्थाभेदेन पञ्चभिरमागे: परिकल्प्यते । एकैकशस्र्र भागो द्वादश-त्रयोदशादिरूपया श्रङ्गसंख्या या विभाग्यते । प्रासङ्किकवृत्तसन्धियस्तु मुख्यसन्धि-नुयायित्वादनुसन्धय एवेत्युक्तमेवेति ॥३७॥

(४) सन्धि-निरूपण—

सत्रहवीं कारिकामें निर्दिष्ट नाटक लक्षणमें 'ब्रहृद' 'उपाय' 'ध्रुव' 'दशा' के वाद 'सन्धियों' का उल्लेख किया गया है । ब्रहत एवं दशाशोंका निरूपण कर चुकनेके बाद श्रव सन्धियोंका निरूपण श्रारम्भ करते हैं । पाँच श्रथ्यप्त्रकपेक, पाँच श्रङ्ग श्रौर पाँच दशाशोंके समान सन्धियों की संख्या भी पाँच हो है । यहाँसे श्रागे उन पाँचों सन्धियोंका निरूपण किया जायगा ।

श्रारम्भ करते हैं---

[सूत्र ४३]—मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श श्रौर निर्वहण ये [ध्रुवोक्त] पाँच श्रवस्थाओं का क्रमश: श्रनुगमन करने वाले मुख्य कथाके पाँच भाग 'सन्ध' कहलाते हैं ।३७।

मुख्य श्रथ्यर्थात्‌ स्वतन्त्र महावाक्य [नाटकके कथाभाग] के श्रङ्ग श्रथ्यर्थात्‌ भाग, परस्पर श्रवस्थाओंके साथ मिलते हैं इसलिए 'सन्धि' कहलाते हैं । प्रारम्भ श्रादि [पाँच] श्रवस्थाओंके साथ चलने वाले [हैं इसलिए] श्रवस्थाकी समासिपर [सन्धि भी] समाप्त हो जाते हैं । यह ['श्रवस्थातनुगाः' पदका] श्रभिप्राय है । [नाटकोंमें श्रवस्थाके लक्षणमें कहे गए 'ध्रुव' पदसे] 'ध्रुव' पदके श्रपरिहार्य होनेसे [उनका श्रनुसरण करने वाले पाँचों] सन्धि भी नाटक, प्रकरण, नाटिका श्रौर प्रकरणसमें श्रपरिहार्य हैं । समवकार श्रादि [रूपकोंके श्रन्य भेदों] में तो [सन्धियोंकी संख्याका] विशेष रूपसे निर्देश होनेके कारण कम [संख्या] होने पर भी दोष नहीं है । [कारिकामें ग्राए हुए] 'क्रमात्‌' इस [पद] से मुख्यादि रूपमें उद्देशके क्रमसे [श्रथर्थात्‌] जिस क्रमसे उनके नाम इस कारिकामें गिनाए हैं उसी क्रमसे] श्रौर श्रवस्थाओंके क्रमसे ही [सन्धियोंका] समावेश किया जाता है । यहाँ [नाटकमें] प्रभन्धमें वर्णान्नीय कथाभागको [प्रारम्भ श्रादि] श्रवस्थाओंके भेदसे पाँच भागोंमें विभक्त किया जाता है । श्रौर उनमेंसे प्रत्येक भाग बारहतेरह श्रादि श्रङ्गसंख्यामें बाँटा जाता है । [ये ही पाँच सन्धि श्रौर बारह तेरह श्रादि श्रङ्ग सन्ध्यङ्ग कहलाते हैं] । प्रासङ्किक [पताकाके श्रदि के] चरित्रके सन्धि तो मुख्य सन्धियोंके श्रनुगामी होनेके कारण 'अनुसन्धि' ही होते हैं यह बात पीछे कहो जा चुकी है ॥३७॥

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(९) अथ मुखं लचयितुमाह— [सूत्र ४४]—मुखं प्रधानवृत्तांशो बीजोत्पत्ति-रसाश्रयः । प्रारम्भावस्थाभावित्वात् प्रधानवृत्तस्य भागो मुखवमिव मुखम् । 'बीजोत्पत्तेः' मुख्योपायोपचेप्स्य, 'रसानां' च श्रृङ्गारादीनामाश्रयोदवतरस्य यत्र । प्रारम्भोपयोगी यावानर्थराशिः प्रेक्ष्यतनुप्रसक्त्या । विचित्ररससंविधानं मुखसन्धिविधेयार्थः । यथा 'रत्नावल्यां' प्रथमो ऽङ्कः । छात्र हि सागरिकाराजदर्शनेन श्रामात्य- प्रारम्भविषयीकृतेऽर्थराशौ श्रामात्ययोगन्धरायणस्य पृथिवीसाम्राज्यविजिगीषो-वीरः, वत्सराजस्य वसन्तविभावः श्रृङ्गारः, पौरप्रमोदावलोकनाद्दुतः । तत् उद्यानगमन- द्वारस्य पुनः श्रृङ्गारः इति । यथा वा 'सत्यहरिश्चन्द्रे' प्रथमो ऽङ्कः । तत्र हि कुलपतिप्रारम्भाभविष्यीकृतेः पृथिवी-सुवर्णदानानुपगमरूपे श्रार्थराशौ राज्ञः प्रथमं महाव्राहुदर्शने श्रद्दभुतः, प्रहतहरिणीदर्शने करुणा:, पुनराश्रमदर्शने श्राद्भुतः, हरिणीवधश्रवणेकुर्दस्य कुलपते रौद्रः, ततः पृथिवीसुवर्णदानाभ्युपगमे राज्ञो दानवीर इति । रसप्रायो नाट्यविधि- रिति रसाश्रयत्वमुत्ततरसन्ध्यर्थापि त्रस्लव्यमिति । (९) मुखसन्धि— अथ मुख [सन्धि] का लक्षण करने के लिए कहते हैं—

[सूत्र ४४] बीजकी उत्पत्ति तथा रसका श्राश्रयभूत मुख्य कथाभागका [मुखके समान सबसे पहले दिखाई देनेवाला] ग्रंथ 'मुखसन्धि' कहलाता है । [कथाभागकी] प्रारम्भावस्थाके साथ होनेके कारण प्रधान वृत्तका [प्रारम्भक] भाग मुखके समान [सबसे पहले हृदय होनेसे] 'मुख' [सन्धि कहलाता] है । बीजकी उत्पत्ति मुख्य उपायके [उपक्षेप] ग्रारम्भका ग्रौर श्रृङ्गारादि रसोंका श्राश्रय ग्रर्थात् प्रवतररणा जिसमें होता है [वह मुखसंधि कहलाता है] । ग्रर्थात् [नाटकके] प्रारम्भका उपयोगी जितना ग्रर्थराशि ग्रौर प्रेक्ष्यतनुप्रसक्त्या ग्रर्थात् परम्परित रूपसे विचित्र रसोंका [जितना] सन्निवेश [प्रारम्भके लिए उपयोगी है] वह सब मुखसंधि [के ग्रन्तर्गत] है । जैसे रत्नावलीमें प्रथम ग्रङ्क [मुखसंधिका उदाहरण है] । क्योंकि उसमें श्रामात्य [योगन्धरायण]के ग्रारम्भ [व्यापार] के विषयभूत सागरिकाके राजाके द्वारा देखे जाने रूप ग्रर्थसमुदायमें पृथिवीके साम्राज्यको प्राप्त करनेकी इच्छा रखनेवाले श्रामात्य योगन्धरायणका वीररस, वसन्त रूप [उद्दीपन] विभाव से युक्त वत्सराजका श्रृङ्गाररस, पुरवासियोंके प्रमोदके प्रावलोकनसे श्रद्भुत ग्रौर उसके बाद उद्यानमें ग्रानेसे लेकर फिर श्रृङ्गार [पाया जाता है] । इस प्रकार [मुखसंधिमें विचित्र रसाश्रयत्व पाया जाता है]। ग्रथवा जैसे सत्यहरिश्चन्द्रमें प्रथम ग्रङ्क [मुखसंधिका उदाहरण है] । उसमें कुलपति के ग्रारम्भके विषयभूत पृथिवी ग्रौर सुवर्णदानके स्वीकार करने रूप ग्रर्थसमुदायमें, राजाको प्रथम महाव्राहाके दर्शन रूप प्रद्भुत, [उसके बाद] मारी गई हरिणीको देखनेपर करूणा, उसके बाद श्राश्रमके देखनेपर श्रद्भुतः, फिर हरिणीवध [के समाचार] को सुनकर कु्रद्ध हुए कुलपतिका रौद्र ग्रौर फिर पृथिवी ग्रौर सुवर्ण का दान करनेपर राजाका दानवीर [रस ग्राया है] । [इस प्रकार इस नाटकमैने मुखसंधिमें नाना रसोंका विचित्र सन्निवेश किया गया

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(२) श्रत प्रतिमुखं ठ्याचष्टे—

[क्षत्र ४५]—प्रतिमुखं क्रियाल्लच्यबीजोद्घाटसमन्वितः ॥३४॥

'प्रधानवृत्तांश' इहोत्तरेऽपु च स्मर्यते । क्रियाल्लच्यस्य मुखसन्धौौ गर्भीरत्वेन न्यस्तत्वादितं प्रकाशस्य बीजस्य प्रधानोपायस्य, उद्घाटनेन प्रबलप्रकाशनेन, सम्यगनु गतः, प्रयत्नावस्थापरिच्छेदो योः प्रधानवृत्तांशः स मुखस्याभिमुखेन वर्तते इति 'प्रतिमुखम' ।

द्वैपादनयसम्मादि' इत्यादिना ह्यमान्येन सागरिकाचरित्रतरूपं बीजं मुख सन्धौ न्यस्तं, वसन्तोत्सवकामदेवपूजादिना तिरोहितत्वादिप्रकद्यम् । तस्य च सुसज्जतारचित-त्‌राज-सागरिकासमागमेन द्वितीयेऽङ्क उद्घाट इति ॥३५॥

श्रत एव यहाँ भी मुखसन्धि रसाश्रय: है)। नाट्यकी रचनाका प्राण हो रस है इसलिए [प्रतिमुख श्रादि] प्रागली सन्धियोंमें भी रसाश्रयत्व होना चाहिए ।

(२) प्रतिमुखसन्धि

श्रब प्रतिमुख [सन्धि] की व्याख्या करते हैं—

[सूत्र ४५]—[ मुखसन्धि में ] सूक्ष्मरूप से दिखाई देने वाले [ क्रियल्लच्य ] बीज के उद्घाटन से युक्त प्रति-मुख [सन्धि] होता है ।३४।

[मुखसन्धिके लच्दणमें] 'प्रधानवृत्तांश:' इस भागकी प्रधानवृत्ति यहाँ [इस प्रतिमुखके लच्दणमें] तथा श्रागे [ 'गर्भ सन्धि श्रादि के लच्दणमें ] भी श्रोती है । [ 'इह उत्तरेऽपु च स्मर्यते' इस वाक्यका यह श्रर्थ किया है] । 'क्रियाल्लच्यस्य' [ पदका श्रभिप्राय यह है कि ] मुख सन्धिमें गूढ़ रूपसे श्रारोपित किए गए, इसलिए सूक्ष्म रूपसे दिखाई देने वाले बीजके श्रर्थात प्रधान उपायके, उद्घाटन श्रर्थात प्रबल रूपसे प्रकाशनसे, सम्यक् श्रर्थात स्पष्टरूप से श्रनुगत, प्रयत्नावस्थासूत्र में श्रध्याप्त, प्रधान वृत्तका जो भाग होता है वह मुखके सामने श्रागे विद्यमान होनेसे 'प्रतिमुख' [प्रतिमुखसन्धि कहलाता] है ।

प्रतिमुखसन्धिके लच्दणकी इस व्याख्यामें तीन बातें कही गई हैं । पहली बात तो यह कही है कि 'प्रधानवृत्तांश:' इस भागका सम्बन्ध मुखसन्धिके लच्दणसे यहाँ भी लाना चाहिए । दूसरी बात यह है कि मुखसन्धिमें बीजका सूक्ष्मरूप जो निवेश किया जाता है उसका प्रतिमुखसन्धिमें श्रधिक स्पष्ट रूपसे विकास उद्घाटन किया जाता है । श्रौर तीसरी बात यह है कि जैसे मुखसन्धि प्रारम्भावस्थाका श्रनुगामी करने वाला होता है । प्रारम्भा वस्थाके समाप्त होनेके साथ ही मुखसन्धि समाप्त हो जाता है । इसी प्रकार प्रतिमुखसन्धि प्रयत्न रूप द्वितीयावस्थाका श्रनुगामी होता है । द्वितीयावस्थाके समाप्त होनेके साथ समाप्त हो जाता है । श्रागे इसका उदाहरण प्रस्तुत करते है ।

जैसे [रचनावलीमें] 'द्वैपादनयसम्मादि' इत्यादिसे श्रमात्य [योगन्धराराण] के द्वारा सागरिकाका ब्यापार रूप बीज [प्रथमाङ्कमें] मुखसन्धिमें [सूक्ष्म रूपसे] स्थापित किया था । वह वसन्तोत्सव, कामदेव-पूजनादिके द्वारा तिरोहित होनेके कारण थोड़ा-सा दिखाई देता था । उसका सुसज्जताके द्वारा कराए गए राजा श्रौर सागरिकाके समागमके द्वारा द्वितीयाङ्कमें उद्घाटन [प्रधिक विस्तार] किया गया है । [श्रत एव द्वितीयाङ्कका कथाभाग उस नाटकमे प्रतिमुखसन्धि कहलाता है ।॥३५॥

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का० ३६, सू० ४६ ]

प्रथमो विवेक:

[ ६७

अथ गर्भे द्वयाख्यातमुचाह—

[सूत्र ४६]—बीजस्यौन्मुख्यवान् गर्भो लाभालाभगवेष्षणः ।

उत्पत्ति-उद्घाटनदशाद्वार्याष्थस्य बीजस्यौन्मुख्यं फलजननाभिमुख्यं तद्वान् । प्राप्त्याशाया तृतीयावस्थया परिच्छिन्नो लाभालाभगवेष्षणः पुनः-पुनः भवद्भिरयुक्तः प्रवर्तितवृत्तिशो गर्भसन्धिः ।

यथा वेधीसंधारे तृतीय-चतुर्थ-पञ्चमेष्वंकेषु । फलसाधकानां पाण्डवानां वृत्ते नेपथ्ये भीमसेनने—

'कृष्ण येन शिरोरुहेषु पशुना' ।

इत्यादिना प्रतिज्ञानिर्वहण षष्ठोपक्रमात् विजयायोग्यतलाभेन बीजस्यौन्मुख्यं दर्शितम् ।

तथा—

'भगदत्ते हिलिकुम्भके' [भगदत्तेधिरकुम्भके:] ।

इत्यादिना राक्षसीमुखसूचितेन प्रस्थानयोद्धवधेन ।

'पशे खुदिहड जरुप्योश्रं केशेषु गपिहय दोषे वावायीईद्दि ।'

['एष खलु दृश्यते केशेषु गृहीत्वा द्वोऽपि ध्यापयति । इति संस्कृतम् ।]

इत्यादिना राक्षसमुखसूचितेन च सेनापतिवधेन ।

३ गर्भसन्धिः—

श्रव गर्भे [सन्धि] की व्याख्या करनेके लिये कहते हैं—

[सू० ४६]—[मुख्य फलके] लाभ श्रौर अलाभ [प्रार्थात् कभी प्राप्तिकी श्राशा श्रौर कभी प्राप्तिकी निराशा] के श्रनुसंधानके द्वारा बीजकी फलोनमुखतासे युक्त [कथाभाग] गर्भ [सन्धि कहलाता] है ।

[पहिले मुख तथा प्रतिमुख सन्धिमें कही हुई] उत्पत्ति तथा उद्घाटन रूप दो श्रवस्था से युक्त बीजका जो फल-जननके उन्मुख होना, उससे युक्त [तीसरा गर्भसन्धि] होता है ।

ग्रौर वह] प्राप्त्याशा रूप तृतीयावस्थासे सीमित [प्रर्थात् तृतीयावस्थाके साथ प्रारम्भ श्रौर समाप्त होनेवाला] होता है । बार-बार होनेवाले लाभ तथा अलाभके ग्रनुसंधानोंसे युक्त प्रधान कथाका भाग गर्भसन्धि [कहलाता] है ।

जैसे वेणीसंहारमें तृतीय, चतुर्थ ग्रौर पञ्चम श्रङ्कोंमें [गर्भसन्धि निम्न प्रकार पाया जाता है] फलके साधक पाण्डवोंके चरित्रमें नेपथ्यमें भीमसेनके द्वारा—

"कृष्ण येन शिरोरुहेषु" तृतीय श्रङ्कके ४७वें इलोकमें इसका श्रथ्य पौष्ठे पृष्ठ पर देखो] ।

इत्यादिसे [भोमसेनके द्वारा श्रपनी] प्रतिज्ञाके पूरां करनेके उपक्रमसे विजयकी ग्रनुकूलताकी प्राप्तिके द्वारा बीजकी फलोनमुखताका प्रदर्शन किया है ।

ग्रौर [उसी तृतीय श्रङ्कके प्रवेशकमे]—

"भगदत्तके रधिरसे भरा दृढ़प्र गढ़ा" इत्याविके द्वारा राक्षसीके मुखसे सूचित कराए गए प्रधान-योद्धा [भगदत्त] के वधसे, ग्रौर [उसी प्रवेशकमे] "यह दृश्यते बाल पकड़कर द्रोणको मार रहा है" इसके द्वारा राक्षसके मुखसे सूचित कराए गए सेनापतिके वधसे, तथा [उसी श्रङ्कमें] श्रपनी सेनामें ग्रश्रान्ति पंदा करनेवाले करण—

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श्वस्थाम्नोः कलहे च दुर्योधनस्य विजयालाभलक्ष्यां पाण्डववृत्ते फलानुरूपं बीजस्यौनसूत्रम् । तथा—

"प्रा: शक्तिरस्ति वृकोदरस्य मचि जीवति वत्सस्य छायामथ्याकर्मतुम् ।" इति योऽडु निष्कान्तेन दुर्योधनेन विजयान्वेषणारूपं श्रोत्सुक्यम् । तथा—

"राज्ञो मानधनस्य कामं कशृतो दुर्योधनस्याग्रतः, प्रत्यर्थी कुरुवान्धवस्य मिषतः करर्णस्य शल्यस्य च । पोतस्तस्य मयाध्य पाण्डववधूकोशंवीरकोषाढ्यः, कोषागारं जीवदेव तीव्रतकर जहत्युपायैदुः वचसः ॥"

इत्यादिना भीमसेनेऽत दुःशासनबन्धान् विजयलाभरूपमौनसूत्रम् । एवमत्र पुनः- पुनर्लाभालभेषैरबीजस्यौनसूत्रम् दर्शितम् । यत् एवं फलप्राप्तिसम्भावनारूपो गर्भेसन्धिरुच्यते

तथा श्रावस्थामके कलहे, दुर्योधनकी पराजय रूप श्रोत्र पाण्डवोंके पक्षमें फलके श्रानुकूल बीज का श्रोत्सुक्य [दिखलाया गया है] । तथा [चतुर्थ श्रङ्कमें]—

'कृपा! मेरे जीते रहते भीम, वत्स दु:शासनकी छाया तक दूनेकी शक्ति नहीं रखता है' [यह कहकर] युध्दके लिए निकलते हुए दुर्योधनके द्वारा विजयान्वेषणा रूप फलोमुखता [दिखलाई गई है] तथा—

"अभिमानी शौर घनघोरारी राजा दुर्योधनके सामने, कौरव वन्धुग्रोंके आगें, तथा करर्ण एवं शल्यके देखते-देखते ग्राज मैंने पाण्डवोंकी बधू [द्रौपदीके] केश तथा वस्त्रोंका ग्रपहरण करनेवाले उस दु:शासनकी श्रापने तीव्रता नाखूनों द्वारा पाडी गई छातीका गरम-गरम लहू उसके जीते हुए भी पी लिया" इत्यादि [वाक्य] से भीमसेनके द्वारा दु:शासनके वधसे [पाण्डवोंके] विजयलाभ रूप फलकी उनमुखता [दिखलाई गई है] । इस प्रकार यहाँ [वीरसींहारमें] बार-बार [विजयके] लाभ श्रोत्रालभके श्रानुसन्धान द्वारा बीजकी [फलके प्रति] उन्मुखता दिखलाई गई है । श्रत [यह] फलकी प्राप्त्तिकी सम्भावना रूप गर्भेसन्धि कहलाता है ।

वेङ्गीसंहार वीररस-प्रधान नाटक है । उसमें पाण्डवोंका विजयलाभ मुख्य फल है । प्रथम श्रङ्कमें उसमें 'लाक्षागृहलवणाथ' इत्यादि भीमसेनकी उत्तिसे जिस कौरववंशके नाश के बीजका श्रारोपण किया गया था उसका द्वितीय श्रङ्कमें श्रधिक उद्भेद होकर तृतीय चतुर्थ श्रङ्कोंमें उसके परिणामकी ग्राशा हो जाती है । इन श्रङ्कोंमें ग्रनेक स्थानोंपर कौरवोंकि प्रधान- श्रङ्गोंमे उसके परिणामकी ग्राशा हो जाती है ।

पुरुषोंके वधकी सूचना मिलती है । यह पाण्डवोंकी विजयके श्रानुकूल जाती है । कहीं-कहीं दुर्योधन श्रादि कभी श्रपनी विजयके लिए प्रयत्नशील दिखाई देते हैं । वह स्थल मुख्य फलकी प्राप्त्तिमें बाधक प्रतीत होते हैं । सब मिलकर लाभकी ग्राशा ग्रधिक रहती है । इसलिए इस भागमें प्राप्याशा रूप तृतीयावस्था ग्रोर गर्भसंन्धि रूप तृतीय सन्धिको ही निबद्ध किया गया है । इसी दृष्टिसे ग्रन्थकारने गर्भसंन्धिके उदाहरणारूपमें उस भागको प्रस्तुत किया है ।

यह वीररस प्रधान नाटकमें गर्भसंन्धिका प्रदर्शन कराया । इसी प्रकार शृङ्गार-प्रधान नाटकोंमें भी दिखलाया जा सकता है । इसी बातको शारो कहते हैं—

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का० ३६, सू० ४७ ]

प्रथमो विवेक: [ १६

एवं शृङ्गारादि प्रधानेऽपि रूपकेषु लाभालाभवेष्यादि दर्शनीयान्ति । इह गर्भसन्धौ व्यापाराप्त्यंश: प्रधानं फलसम्भावनात्मकत्वात् । ध्रव्यथाऽऽ फल-निश्चया-रमक एवं स्यात् । ध्रवमर्यो संध्यौ तु प्राप्त्यंश: प्रधानं फलनिश्चयरूपत्वादिति विशेष: । इति ।

ध्रवमर्यो संधी—

[सूत्र ४७]—उद्भिन्ननसाध्यविध्नात्मा विमर्शो व्यसनादिभि: ॥४७॥ बीजस्य उत्पत्ति-उद्घाट-फलोन्मुख्यैरुद्भिन्नं भवनाभिमुखं यत्नं साध्यं प्रधान-फलं तद्विदनात्मा तत्प्रत्ययो हेतुसम्पाताह्मा नियताप्तिचतुर्थ्यवस्थापरिच्छिन्न: प्रधान-वृत्तांश:, विमृशति बलवदन्तरायहेतुसम्पातप्रत्यासन्नरपि साध्यं प्रति सन्देहीघ नेता डिम्नान्तरिति 'विमर्श:' । नियतफलाद्यवस्थया व्याप्तान्तवेध्यस्य सङ्गे: सम्भाव-नानन्तरं सन्देहस्याप्राप्तावपि च फलं प्रति जनक-विघातकयोस्तुल्यबलत्वात् सन्देहा-त्मकत्वम् । 'विध्नैरपि हन्यमानाश्च महात्मानो विशेषतो यतन्ते' इति । तस्माद्वतो नियत-त्मकत्वम् । 'विमर्शोऽपि हन्यमानाश्च महात्मानो विशेषतो यतन्ते' इति । तस्माद्वतो नियत-

इस प्रकार शृङ्गार-प्रधान रूपकोंमें भी [फलका] लाभालाभके श्रनुसन्धान दिखलाने चाहियें ।

इस गर्भसन्धिमें, उसके फलसम्भावना रूप होनेसे श्रप्राप्तिका श्रंश प्रधान रहता है । श्रथ श्रन्यथा [गर्भसन्धि न रहकर] फल-निश्चयात्मक [विमर्शा-सन्धि] ही बन जाय । विमर्शा-सन्धिमें प्राप्तिका श्रंश प्रधान रहता है क्योंकि वह फल-निश्चय रूप होता है । यह [गर्भेसन्धि तथा विमर्शा-सन्धिका] भेद है ।

४ विमर्शा-सन्धि —

श्रथ विमर्शा [सन्धि] को कहते हैं—

[सूत्र ४७]—[बीजकी उत्पत्ति, उद्घाटन श्रौर फलोन्मुख्यके द्वारा] उद्भिन्न श्रर्थात् पूर्ण होनेके लिए प्रस्तुत जो साध्य, उसमें व्यसन श्रादिके द्वारा विध्न-स्वरूप विमर्शा [सन्धि] कहलाता है । ४७ ।

[मुख, प्रतिमुख तथा गर्भसन्धियोंमें क्रमश:] बीजकी उत्पत्ति, उद्घाटन तथा फलों-मुखताके द्वारा उद्भिन्न श्रर्थात् [फल] होनेवाला जो साध्य, श्रर्थात् प्रधान फल, उसका विध्न-स्वरूप श्रर्थात् उसमें विध्नोपनिपात रूप नियताप्ति नामक चतुर्थी श्रवस्थासे परिपिच्छन्न [ श्रर्थात् चतुर्थी श्रवस्थाके उदयके साथ उदय श्रौर उसकी समाप्तिके साथ समाप्त होने-वाला मुख्य कथाका भागको जिसमें कि 'विमृशति' श्रर्थात् बलवान् विध्नोंके श्रा जाननेसे प्रत्यासन्न फलके प्रति भी नायक सन्देहमें पड़ जाता है । इसलिए [इसो व्युत्पत्तिलभ्य श्रर्थके काररा] 'विमर्शा' [सन्धि कहा जाता] । इस [विमर्शा] सन्धिके नियताप्ति रूप [चतुर्थी] फलावस्थासे व्याप्त होनेपर भी श्रौर सम्भावना [श्रर्थात् उत्कट कोटिके निश्चय] के श्रनन्तर सन्देहका श्रवसर न होनेपर भी फलके प्रति जनक श्रौर उसके विघातक दोनोंके तुल्यबल होनेके काररण [विमर्शा-सन्धिको] सन्देहात्मकता होती है । श्रौर [सन्देहात्मकता होते हुए भी] 'विघ्नोंसे बार-बार बाधित होनेपर भी महापुरुष श्रौर श्रधिक यत्न [फल प्राप्तिके लिए] करते हैं' इसलिए वास्तवमें वह नियताप्ति रूप ही होता है । 'श्रेयांसि बहुविघ्नानि' भले कार्योंमें श्रनेक विघ्न होते ही हैं । इसलिए विध्नके कारणोंके उपस्थित होनेपर भी समीपवर्ती

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फलारूपस्वम् । 'श्रेयांसि बहुविघ्नानि भवन्ति' इति विध्नहेतुसम्पातेरडप, प्रत्यासन्नवर्तिनि फले न निवर्तनीयमिति च ध्युप्ताद्यतुमवश्यमन्त सन्धौ -विच्छ-हेतवो निबन्धनीयाः: । 'ध्यसनादिद्भि:' इति श्रादि-शब्दात् शापादि-शापग्रहः । तत्र ध्यसनादिद्भुनो यथा रामाभ्युदये पञ्चमेऽङ्के । रामः—

'प्रत्यासन्नानुरूपः कृतं समुचितं करेणा ते रक्तसा, सोऽहं त्वरित तथा त्वया कुलजनो धत्ते यथोच्चैः शिरः । यथार्थे सम्प्राप्ते विभ्रता धनुरिन्दु त्वद्विधेयपदः सौचैर्यै, रामेण प्रियजीवितेन तु कृतं प्रेम्ना: प्रिये ! नोचिततम् ॥'

अत्र रावणेन यन्मायारूपसीतायाऽपादनं तद्रूपेण ध्यसनेन सीताप्राप्तिनिर्विघ्नजो विमर्शः । यथा वा रघुविलासे षष्ठेऽङ्के । लक्ष्मणः—

'नाकीर्षो दशकन्धरेः पलमुजां पत्युः शितेः पत्त्रिभिः, दत्ता नापि विभीषणाय मुहदे लङ्काधिपत्यस्थितिः । वेदेही विरहाग्निमग्नमनससो नात्रिस्य सन्दर्शिता, जाते जन्म कृतं हद्या ! रघेधुराजौैरपदोष्पोऽपि सम् ॥'

[फल] की प्राप्तिसे निवृत्त नहीं होना चाहिए [कितने ही विघ्न श्रावि श्रापने प्रयत्नका नहीं रोकना चाहिए] इस बातकी शिक्षा [सामाजिकोंको] देनेकेलिए [विमर्श] सन्धिमें विघ्नोंके कारणोंको श्रावय प्रदर्शित करना चाहिए । [कारिकामें बताए हुए] 'ध्यसनादिद्भिः' में श्रावि शब्दसे शापादिका ग्रहण करना चाहिए । [श्रथाद् प्रत्यासन फलकी सिद्धिमें जो विघ्न-बाधाएँ उपस्थित होती हैं उसके व्यसन श्रथात् क्लेश या श्रापादि ग्रनेक कारण हो सकते हैं । उनमें किसी भी कारणसे विघ्नोंकी उपस्थिति दिखाई जा सकती है] ।

उनमें संकट [व्यसन] के कारण विघ्न [की उपस्थितिका उदाहरण] जैसे रामाश्रुमुदयमें पञ्चम श्रङ्कमें । राम [कहते हैं कि]—

'निद्दंवी राक्षस [रावण] ने प्रत्यास्यान [श्रथात् उसकी प्रार्थनाको ग्रस्वीकार] कर देनेसे उत्पन्न क्रोधके कारण तुम्हारे साथ उचित ही [व्यवहार] किया [श्रथात् रावणने तुम्हारे इनकार करनेपर तुम्हारे साथ जो व्यवहार किया वह उसके क्रोधके श्रनुरूप हो था]। श्रौर तुम्हने भी उस [प्रत्याचार] को इस प्रकारसे सहन किया जिससे उच्च कुलकी स्त्रियाँ श्राज भी गर्वसे मस्तक ऊँचा करती हैं [कितु तुम्हारी विपत्तिकालको सावधानीसे देखनेवाले [श्रौर उसका प्रतिकार करनेके कारण] यथार्थ ही धनुर्धारी करनेवाले श्रपने जीवनके लोभी रमणने हे प्रिये ! श्रपने प्रिय मके श्रनुरूप कार्य नहीं किया ।

यद्हं रावणके द्वारा बनावटी सीताको जो मार डाला गया था उस व्यसनसे सीताकी प्राप्तिमें विघ्न श्रा पड़नेसे यह व्यसन-जन्य विमर्श [सन्धि] है ।

ब्रथवा जैसे रघुविलासके षष्ठे श्रङ्कमें । लक्ष्मण [कह रहे हैं]—

"[मे लक्ष्मण] राक्षसराज [पलभुजां पतुः] के दश शिरोंके समुदायको तीक्ष्ण बाणोंके द्वारा काटकर गिरा नहीं पाया, न मित्रवर विभीषेको लङ्काके राजाका पद दिला पाया श्रोत्र न विरहाग्निसे संतप्त मनवाले श्रार्य रामचन्द्रको वन्देहीका दर्शन ही करा

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का० ३६, सू० ४७ ] प्रथमो विवेक: [ १०१

श्रत्र लब्धशक्तेरस्य शक्तिभेददर्शननन फलप्राप्तिसंविध्नजन्त्रा विमर्शः। शापाच्चथा श्रभिज्ञानशाकुन्तले पञ्चमेडङ्के दुर्वासःशापविमोहितत्वेन तस्यकाां शकुन्तलायामन्तराहितां च, पञ्चमेडङ्के श्रृङ्गुलीयकदर्शनन समुपजातस्मृतौ राजनि दुर्वासःशापावन्धनजो विमर्शः। दैवतो यथा विधिविलसिते पञ्चमेऽङ्के—

“कञ्चुक-द्दा धिक् कष्टं, नैवोल्लन्ध्यः प्राक्तनः कर्मविपाकः। वार्ताप नैव यदिहासति स राजचन्द्रः, तेनोद्विग्नतां विधिविमोहितचेतनन । देवा वने त्रिदशनाथविलासिनीभीः, कतुं गतां जगति सद्यमिति प्रवादः॥

श्रत्र सूदाचारावालम्बिनि नले दैवत्यकृतदुर्दयन्तीद्वारा प्राप्ताविध्नजो विमर्शः। क्रोधाच्चथा वेएीसंहारेऽ पञ्चमेऽङ्के सिद्धकलपेडपि कार्ये क्रोधार्तिशयादप्तु पितां

पाया । इस लिए रसैकी धुराको धारनेवाली मेरी भुजग्रोंका जन्म ही व्यर्थ हो गया ।

यहाँ लच्मएाके शक्ति लग जानेकी कारएा उपस्थित व्यसनसे फलप्राप्तिमें विघ्न श्रा पडनेसे उत्पन्न [व्यसन-जन्य] विमर्श [संशय] है। इस प्रकार इन दोनों ईलोकों द्वारा ग्रन्थकारने प्रत्यासन्न फलकी सिद्धिमें किसी श्राकस्मिक विघ्नके श्रा जानसे व्यसन-जन्य संशय या विमशंक उपस्थित हो जानेकी उदाहरणएा दिए हैं।

श्रापसे उत्पन्न [विमर्शका उदाहरणएा] जैसे श्रभिज्ञान शाकुन्तल [नाटक] के पञ्चम श्रङ्कमें दुर्वासाके शापसे बेसुध होनेके कारएा [दुष्यन्तके द्वारा] शकुन्तला का परित्याग कर देने से श्रोर उसके श्रनुतहित हो जानेकी बाद, पष्ठ श्रङ्कमें श्रृङ्गुलीयको देखकर राजाको उसका स्मरएा ग्रानपर, दुर्वासाके शापरूप विघ्नसे उत्पन्न विघ्नजन्य विमर्श सान्वय है।

दैववश [विमर्शंका उदाहरएा] जैसे ‘विधि-विलसित’ [नाटकके] पञ्चमाङ्कमें—कञ्चुकी—हा धिक्, बडे दुःखकी बात है कि पूर्व जन्मके कर्मोंके फलसे वह श्रब [दैववशात् श्रराज] राजराजेश्वर बन रहा है श्रोर [जो राज-राजेश्वर था] उसने भाग्यके कारएा बुद्धिभ्रष्ट हो जानसे [जुमें राजपाटको हारकर ग्रन्थमें श्रापनी प्रियतमा दमयन्तीको] वनमें छोड दिया । फिर देवता लोग श्रप्सराओंके सहित वनमें उससे मित्रता प्राप्त करनेके लिए संसारमें [भूतलपर] पहुँचे, इस प्रकारका [लल-दमनतीका] कथा्नक लोकमें प्रसिद्ध है। इसमें पाचकका काम करनेवाले नलके भीतर दैववश छोडो हुई दमयन्ती तथा राज्यप्राप्तिके मार्गमें श्रानेवाले विघ्नोंके कारएा उत्पन्न विमर्श दिखलाया

क्रोधसे उत्पन्न [विमर्श का उदाहरएा] जैसे वेएीसंहारके छठे श्रङ्कमें [कोरव-विजय रूप] कार्यके प्रायः सम्पूर्ण हो चुकनेपर भी भीमसेनके [ग्राज यदि मैं दुर्योंधनको नहीं मार स्रूँगा तो स्वयं प्राप्त्याग कर दूँगा इस प्रकारकी] बासी न होनेवाली [ग्रर्थात् दूसरे दिन

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१०२ ] नाट्यदर्पणम् [ क० ४०, सू० ४६

प्रतिज्ञामास्थितवति भीमसने, दुर्योधने चान्तर्जलं निमिते यत्नान्वेषगौरप्यनुपलक्ष्य- माने युधिष्ठिरो निर्वेदाद् विमुश्चन्नाह—

तीर्ये भीष्ममहोदधौ कथमपि द्रोणाचलेऽपि निर्गृते, कर्णाशौविषभोगिनि प्रशमिते शल्ये च याते दिवम् । भीमेन प्रियसाहसेन रभसान्न् स्वल्पावशेषे जये, सर्वे जीवितसंशयं वयममी वाचा समारोपिताः ॥

क्षत्रेऽभिक्रोधेन कार्याविपत्तौ सात्त्विकेति क्रोधजप्रतिज्ञाविधानाद्विमर्शः । एवमनेकहेतुजो विमर्शसन्धिः॥१३६॥

स्थ निर्वहणसन्धिर् निरुपयति—

[क्षत्र ४०]—सर्जीविकृतावस्था:, नानाभावा मुखादयः । फलसंयोगिनो यस्मिन्, श्रसौ निर्वहणो ध्रुवः ॥४०॥

बीजस्य विकृत विकार उत्पत्ति-उद्घाटन-मुख्यादिकः सह बीजविकृतैः तक न टिकनेवाली, उसी दिन पूरे होनेवाली] प्रतिज्ञा कर लेनेपर, शौर दुर्योधनके जलके भीतर डूब जाने तथा प्रयत्नपूर्वक खोज करनेसे भी न मिलनेपर श्रमन्त दुःखी होकर ‘विमर्श’ करते हुए युधिष्ठिर कहते हैं—

“भीष्म रुप महासागरको पार कर लेनेपर, जैसे-तैसे करके द्रोणाचार्य रुप शैलनिको झान्त करनेके बाद, शौर कर्ण रुप भयंकर नागराजको नाश करने तथा शल्यके स्वर्ग सिधार जानेके बाद [विजयका थोड़ा-सा ही काम ढोष रह गया था ऐसे समय साहस ही जिसका प्रिय है इस प्रकारके भीमसेनने केवल [अपनी प्रतिज्ञा रुप] वाणीसे हम सबको संशयमें डाल दिया है ।[अर्थात् यदि शत्रु दुर्योधनका पता नहीं लग पाता है तो भीमसेन अपनी प्रतिज्ञाके श्रानुसार श्रपना प्राण त्याग कर देंगे । उस दशामें हम सबकी भी वही गति होगी] ।

यह [विमर्श] भीमके क्रोधके कारण कामके बिगड़ जानेपर उत्पन्न हु्रा है, इसलिए क्रोध-जन्य प्रतिज्ञासे उत्पन्न विद्धन रुप विमर्शा है ।

इस प्रकार श्रनेक प्रकारके हेतुप्रोंसे ‘विमर्श’ उत्पन्न होता है । ॥१३६॥

४. निर्वहणम्

श्रत्र प्रागे ‘निर्वहण’ सन्धिका निरुपण करते हैं—

[सूत्र ४०]—बीज शौर उसके [उद्घाटन फलमुखता श्रादि] विकारों एवं [प्रारम्भ श्रादि रुप] श्रवस्थाग्रोंके सहित [बिन्दु पताका श्रादि] नाना प्रकारके भाव [प्रर्थात् स्थायिभाव व्यभिचारिभाव श्रादि प्रथवा बिन्दु श्रादि उपाय] तथा मुख श्रादि [सन्ध्यां] जहाँ पहुँच कर [मुख्य] फलसे युक्त होते हैं वह ‘निर्वहण’ [नामक पंचम सन्ध कहलाता] है । शौर वह [रुपकोंके समस्त भेदप्रभेदोंमें ध्रुव श्रर्याद] श्रपरिहार्य्य है ।४०।

बीजकी विकृति श्रर्थात् उत्पत्ति उद्घाटन, फलमुखता श्रादि । बीज [उसकी] विकृति तथा श्रारम्भ श्रादि श्रवस्थाग्रोंके सहित जो विद्यमान हों । [यह कारिकाके ‘सबीज-

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का० ४०, सू० ४५ ] प्रथमो विवेक: [ १०३

अवस्थाभिश्च प्रारम्भादिभिरवर्तते। नाना विचित्रा भावाः स्थायी-व्यभिचारिसात्त्विकाः, यथवा भावयन्ति फलं साधयन्ति भावाः, उपायो बिन्दु-पताका-प्रकरीकार्यैषि यत्र। सुभप्राप्तौ च फलेऽ रति-हास-उत्साह-विस्मय-स्थायिभावबाहुल्यं, श्रृति-गर्व-श्रौत्सुक्य-मदादि-व्यभिचारिबाहुल्यं च मुख्यादीनाम्। दुःखहानौ तु फले कोध-शोक-भय-जुगुप्सा-स्थायिभावबाहुल्यं, श्यालस्यौग्रयादि-व्यभिचारिबाहुल्यं च दृश्यताम्। मुख्यादयो मुख-प्रतिमुख-गर्भ-विमर्शाः फलेन मुखसाध्येन नायक-प्रति-नायक-नायिकादि-ग्रामाल्यादिभिर्यापाराः, सम्यगौचित्येन युध्यन्ते समबध्यन्ते यस्मिन् प्रधानवृत्तांशे स फलागमावस्थया परिचिच्छन्नो निर्वहणासन्धिः। ध्रुवामते प्रारम्भस्य निर्वहणाद्विनाभावाद्विसंवाद् सर्वरूपकेष्वस्यावश्यम्भावमाह— यथा रत्नावल्यामैन्द्रजालिकप्रवेशात् प्रभृत्यासमाप्तेरिति। केचित् तु मुख्यादयः सन्धयः, अवस्थाश्च यत्र पृथक्-पृथक् संचिपत: पुनरिल्लिङ्ग्यन्ते तान् निर्वहणासन्धिमाहुः— यथा सत्यहरिश्चन्द्रे षष्ठेऽङ्के। देवः—

'विकृतावस्था:' पदकाऽर्थ हुग्रा। श्रागे कारिकाके 'नानाभावा:' पदकाऽर्थ करते हैं। नाना प्रकारके श्रर्थात् विचित्र भाव श्रर्थात् स्थायी, व्यभिचारी तथा सात्त्विक [रूप भाव]। श्रथवा 'भावयन्ति' श्रर्थात् फलको सिद्ध करते हैं [इस व्युत्पत्तिके श्रनुसार फलोत्पत्तिके जो साधन होते हैं] वे 'भाव' [कहलाते हैं] [ग्रौर वे] बिन्दु, पताका, प्रकरी तथा कार्य रूप उपाय ['भाव' कहलाते हैं। वे] जिसमें विद्यमान हों [वह निर्वहण-सन्धि होता है। यह कारिकामें ग्राये हुए 'नानाभावा:' पदका श्रभिप्राय है]। मुख-प्राप्ति रूप [फल वाले नाटक] में रति, हास, उत्साह, विस्मय श्रादि स्थायिभावोंका बाहुल्य रहता है। श्रृति, गर्व, श्रौत्सुक्य, मद श्रादि व्यभिचारिभावोंका बाहुल्य मुख्यादि [ सन्धियों ] में रहता है। श्रौर दु:ख-हानि रूप फल [वाले रूपकों] में क्रोध, शोक, भय, जुगुप्सा रूप स्थायिभावोंका बाहुल्य, तथा श्रलस्य, उग्रता, श्रादि व्यभिचारिभावोंका बाहुल्य [होता है ऐसा] समझना चाहिए। [कारिकामें ग्राए हुए 'मुखादि' पदका श्रर्थ करते हैं]। मुखादि श्रर्थात् मुख, प्रतिमुख, गर्भ तथा विमर्शं [रूप चार सन्धियाँ]। फलक साध्य श्रर्थात् मुखसाध्यके साधक साथ, नायक, प्रति-नायक, नायिका, ग्रामाल्य श्रादिके व्यापार 'सम्यक्' श्रर्थात् उचित प्रकारसे जिसमें युक्त होते हैं, श्रर्थात् मुख्य कथांशके साथ समबद्ध होते हैं, फलागम रूप श्रवस्थासे युक्त वह निर्वहण-सन्धि कहलाता है। [कारिकामें ग्राए हुए] 'ध्रुवम्' इस पदसे प्रारम्भ किए हुए कार्यकी समाप्ति श्रवश्य होनी चाहिए, इसलिए समस्त रूपकोंमें इसकी [निर्वहण-सन्धिकी] सत्ता श्रवश्य होनी चाहिए यह सूचित किया [ ] निर्वहण-सन्धिका उदाहरण) जैसे रत्नावलीमें ऐन्द्रजालिकके प्रवेशसे लेकर समाप्तिपर्यन्त [का भाग निर्वहण-सन्धिका उदाहरण है]।

कुछ लोग तो [निर्वहण-सन्धिका लक्षण इस प्रकार करते हैं कि] मुख श्रादि सन्धियाँ श्रौर श्रवस्थाएँ जिसमें सङ्केपसे श्रलग-श्रलग दुबारा कही जाती हैं उसको निर्वहणसन्धि कहते हैं। जैसे सत्यहरिश्चन्द्र [नाटक] के छठे श्रङ्कमें 'ग्राखेटो मुनिकन्यका' इत्यादि श्रागले इलोकमें मुख-सन्धि श्रादिका दुबारा उल्लेख इस प्रकार किया गया है— सत्यहरिश्चन्द्र नाटककी रचना ६ श्रङ्कोंमें समाप्त हुई है। नाटकके प्रारम्भमें ही

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ग्राखेटो मुनिकन्यका कुलपतिः कीरः श्रृङ्गालोदध्वगः;, विप्रो म्लेच्छः पतिमनुष्यमरसां लम्बस्तनी मान्त्रिकः । उद्धतः पुरुषो वियच्चरवर्योगी युनादः फणी, सर्वे सद्बपरिच्छद्योऽत्सुकरसैरसमाभिरेतत् कृतम् ॥

ग्राखेट इत्यादिना मुखसन्धिवन्धः; कीर इत्यादिना प्रतिमुखसन्ध्यभावनः, श्रृङ्गवगेल्यादिना गर्भसन्धिप्रथिता:, मनुष्येत्यादिना च विमर्शसन्धिसूत्रिता:; यथासंख्यं प्रारम्भाद्यवस्थावगता: फलवन्तोऽर्था निवर्हणसन्ध्यावेकवाक्यताSSपदानाथे सन्ध्येपत् उपनिबद्धा इति ॥४५॥

कुन्तल श्रोत्र कविजलके साथ राजा हरिश्चन्द्र घोड़ेपर चढ़े हुए वराहका ग्राखेट करते हुए प्रविष्ट होते हैं, इसी मृगया-प्रसंगमें एक तपोवनके समीपमें राजाके बारासे एक गर्भिणी हरिणी की हत्या हो जाती है । यह हरिणी श्राश्रमके कुलपतिकी कन्याकी पालतू हरिणी थी । राजा को उस हरिणीके बघसे बड़ा दुःख होता है ॥ अपने शिष्योंके साथ श्राश्रममें प्रवेश करते हैं । वहाँ कुलपति उनका स्वागत करते हैं । किन्तु इसवीचमें कुलपतिको मालूम होता है कि उनकी कन्या श्रपनी प्रिय हरिणीके मारे जानेकी कारणा ज्ञानकरके मरनेके लिए तैयार हो रही है । श्रोत्र उसके साथ उसकी माता भी ज्ञानकरने जा रही है । कन्याका नाम वञ्चना श्रोत्र उसकी माताका नाम निकृति है । कन्या श्रोत्र पत्नोके ज्ञान तथा हरिणी के वधका समाचार जानकर कुलपति अत्यन्त क्रुद्ध हो जाते हैं । श्रोत्र राजाको बहुत खरी- खोटी सुनाते हैं । श्रनन्तमें कहते हैं कि यह राजा श्रपना सर्वस्व दान करनेपर ही इस पापसे मुक्त हो सकता है । श्रोत्र राजा उसी समय श्रपना सर्वस्व दान कर देते हैं । यह मुख-सन्धि का कथाभाग है । श्रागे की राजा हरिश्चन्द्रके श्रपने बेचने श्रादिकी कथा श्रागले श्रद्भुतोंमें चलती है, उस सारे कथाभाग का सङ्केत करनेवाले शब्दों द्वारा कथांशका निर्देश श्रागले श्लोकमें 'ग्राखेटो मुनिकन्यका कुलपतिः' शब्दोंसे किया गया है ।

इसी प्रकार इलोकमें 'ग्राए हुए कीरः श्रृगालो, श्रध्वगाऽदि प्रत्येक शब्द नाटकके ग्रागले श्रद्भुतोंमें वर्णित कथानक तथा विशिष्ट पात्रोंसे सम्बन्ध रखता है । इन शब्दोंके द्वारा सारे नाटकके कथाभागिकी सङ्केतमें बड़ी सुन्दरताके साथ एक तरहसे पुनरावृत्ति कर दी गई है । इसलिए यह दूसरे लक्षण के श्रनुसार निर्वहण सन्धिका उदाहरणारा है । श्लोकका ग्रर्थ निम्न प्रकार है—

(१) वह शिकार, मुनिकन्या पुत्री, कुलपति, (२) वह ततो श्रौर श्रृगालो, (३) वह पथिका, श्रध्वग श्रौर म्लेच्छराज, (४) वह मनुष्यका मरसा, लम्बस्तनी, मान्त्रिक, उद्धत पुरुष, पशुयोनि का शब्द, श्रृगालोकी श्रावाज, श्रौर सब यह सब श्रापकी [हरिश्चन्द्रकी] शक्तिकी परीक्षाके लिए हमने ही किया था ।

[इसमें] ग्राखेट इत्यादिसे मुखसन्धिषु निवद्ध [ग्रन्थ], कीर इत्यादिसे प्रतिमुख सन्धिषु निबद्ध [श्रर्थ], श्रृङ्गवग इत्यादिसे गर्भ सन्धिषु प्रतिथ [ग्रन्थ] श्रोत्र मनुष्य इत्यादिसे विमर्श सन्धिषु वर्णित [ग्रर्थ] कमरा: प्रारम्भ श्रादि ग्रवस्थाभोंसे युक्त फलवन्तो ग्रर्थ एकवाक्यता सम्पादनके लिए 'निर्वहण सन्धिषु सङ्केतसे फिर कहे गए हैं । [इसलिए निर्वहण सन्धिके दूसरे लक्षणके श्रनुसार यह उसका उदाहरण है ।]

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का० ४१-४२, सू० ४६ ] प्रथमो विवेक: [ १०४

स्वथ 'दिव्याज्जम्' इत्यत्र श्राज्ञ-शब्दोतात्तानि उपच्तेपादीनिनि श्राज्ञानि विपश्चि- यितुं प्रथमं (९) मुखसन्धिगतान्युदिशति—

[सूत्र ४६]—उपक्षेप: परिकर: परिणाम: समाहिति: । उद्भेद: करणं चैतान्यत्रैवाथ विलोभनम् ॥४१॥ मेदनं प्राप्यं युक्ति-विधानं परिभावना । सर्वसन्धिषुमूर्ति स्यु:; द्वादशाज्ञं मुखं ध्रुवम् ॥४२॥ 'श्रात्रैव' इति उपच्तेपादिति करणान्तनि मुखसन्धावेव भवन्ति । तत्रापि

उक्ते र-परिकर-परिण्यासनां यथोदेशक्रकममादावेव, समाधानस्य तु रचनावशान्म- ध्येकदेश एव, उद्भेद-करणयोस्तु उपान्त्ये निबन्ध: ।

मुखसन्धिके द्वादश श्राज्ञ— पाँचवीं कारिकामें ग्रन्थकारने नाटकका लक्षण करते समय उसमें पञ्च-सन्धियोंकी चर्चा की थी । उन पञ्च-सन्धियोंका विवेचन यहाँ तक समाप्त हो गया । श्रब श्रागे उन सन्धियों के श्राज्ञोंका वर्णन श्रारम्भ करते हैं । इन श्राज्ञोंकी संख्या प्रत्येक सन्धिमें श्रलग-श्रलग निर्‌- दिष्ट की गई है । मुखसन्धिमें १२ श्राज्ञ होते हैं । प्रतिमुखसन्धि, गर्भसन्धि तथा विमर्श- sन्धि इन तीनों सन्धियोंमें तेरह-तेरह तथा निर्वहणस सन्धिमें १४ श्राज्ञ माने गए हैं । इस प्रकार पाँचों सन्धियोंमें कुल मिलाकर श्राज्ञोंकी संख्या पैंसठ हो जाती है । श्रागे ग्रन्थकार क्रमश: पाँचों सन्धियोंके इन पैंसठ श्राज्ञोंका वर्णन करेंगे । उनमें सबसे पहले मुखसन्धिके बारह श्राज्ञोंका उल्लेख श्रथात् नाममात्रसे कथन करते हैं—

[सूत्र ४६]—(१) उपक्षेप, (२) परिकर, (३) परिणाम, (४) समाह्वान, (५) उद्- भेद, (६) करण, ये [छः श्राज्ञ] इसमें ही [श्रथात् मुखसन्धिमें ही] होते हैं । [ग्रन्थ सन्धियोंमें नहीं होते हैं] ।

[सूत्र ४६]—श्रौर (७) विलोभन, (८) मेदन, (९) प्रापरा, (१०) युक्ति, (११) विधान तथा (१२) परिभावना ये [सात श्राज्ञ] सब सन्धियोंमें हो सकते हैं । [इस प्रकार] बारह श्राज्ञोंवाला मुखसन्धि [रूपकके समस्त भेदोंमें 'ध्रुव' श्रथात् श्रावश्यक होता है । 'श्रात्रैव' इसका श्राभिप्राय यह है कि उपक्षेपसे लेकर करण पर्यन्त [छः श्राज्ञ] मुख- sन्धिमें ही होते हैं [ग्रन्य सन्धियोंमें नहीं होते हैं] । उनमें भी उपक्षेप, परिकर तथा परि- ण्यास [इन तीनों श्राज्ञों] का इस [उद्घाटके] क्रमसे [सन्धिके] श्रारम्भमें ही सन्निवेश किया जाता है । समाधानका रचनाके श्राज्ञुसार मध्यके [किसी] एक भागमें ही तथा उद्भेद एवं करणाका [मुखसन्धिके] प्राय: ग्रन्थमें [उपान्त्ये] ही सन्निवेश किया जाता है ।

कारिकामें श्राए हुए 'श्रात्रव' पदसे यह कहा था कि उपक्षेपसे लेकर करण पर्यन्त छः श्राज्ञ मुखसन्धिमें ही होते हैं, श्रन्य सन्धियोंमें नहीं होते हैं । इनमेंसे करण नामक श्राज्ञ श्रन्य सन्धियोंमें तो होता ही नहीं है किन्तु मुखसन्धिमें भी उसका होना श्रावश्यक

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उपक्षेपादीनि करणानि युक्तितरसहितानि षट् च्छान्त्रावश्यकं भवन्ति । विलोमनादीनि तु सर्वसन्धिष्वपि भवन्ति । संवाधानकवशात् तदर्थस्यान्यत्रापि सम्भवान्। बाहुल्यनिबन्धनापेक्षया त्वत्रोपादानम् । एवमन्यसनिधर्ष्वापि झेयम् । मेदस्तु सर्वसन्धिष्वड्‌घटते, प्रवेशक-वृत्तिसंभकार्ते च श्रावश्यकं निवन्धनीयं । पात्रभेदरुपवान् तस्य । उपक्षेप-पारिकर-परिण्याससंयोगडपराजयज्ञानेन वृत्तानुगुर्याहेशक्रमातिक्रमेऽपि निवन्ध्यन्ते । श्रामुख्यस्य च नटवृत्तानुवेन इतिवृत्तानुज्ञस्वान् तद्ननन्तरझानां निवन्धः । द्वादशाङ्कमिति सन्धिः । संवाधानस्वरड्‌गदान्यज्ञाने सन्धिस्वरुपस्य झ्ञेयनोडयवल्वेन निष्पादनकवान् ।

नहीं है । उस करणको हटाकर उसके स्थानपर युक्तिको जोड़ देनेपर जो उपक्षेपादि छः श्राङ्ग बनते हैं उनका मुखसन्धिमें होना अनिवार्य है इस बातको ग्रन्थके ग्रनुच्छेदमें कहते हैं— करणको छोड़‌कर श्रौर युक्तिको मिलाकर उपक्षेपादि छः [प्रर्थात् (१) उपक्षेप, (२) परिकर, (३) परिण्यास, (४) समाधन, (५) उद्भेद तथा (६) युक्ति ये छः श्राङ्ग] यहां [प्रर्थंत मुखसन्धिमें] श्रावश्यक होते हैं । विलोमनादि [शेष हैः श्राङ्ग] तो सब ही सन्धियोंमें होते हैं । क्योंकि रचनाके श्रनुसार उनका कार्य 'ग्रन्थन' [ग्रर्थांत् ग्रन्थ सन्धियोंमें] भी हो सकता है । [सब सन्धियोंमें सम्भव होनेपर भी] यहां [प्रर्थांत् मुखसन्धिमें] उन [विलोभनादि श्राङ्गोंमें] का ग्रहण बाहुल्यके कारण है [श्रर्थात् मुखसन्धिमें विलोमनादि श्राङ्गोंका ग्रधिकतर प्रयोग होनेके कारण] किया गया है । इसी प्रकार ग्रन्थ सन्धियों [के श्राङ्गोंके विषय] में भी समझना चाहिए ।

श्राङ्गन्तु प्रतिमुखादि ग्रन्थ सन्धियोंमें कहे हुए श्राङ्गोंका प्रयोग भी उस-उस सन्धिसे भिन्न ग्रन्थ सन्धियोंमें भी हो सकता है । किन्तु श्राधिकतर प्रयोग उस-उस सन्धिमें ही होता है, इसलिए उनका ग्रहण उस-उस सन्धिमें विशेष रूपसे किया गया है । मेद [नामक श्राङ्गके] श्राङ्गको सब सन्धियोंमें, श्राङ्गके ग्रन्थमें, प्रवेशक तथा वृत्तिसंभकों के ग्रन्थमें श्रावश्यक प्रयुक्त करना चाहिए । क्योंकि वह पात्र-परिवर्तन रूप होता है । उपक्षेप, परिकर तथा परिण्यास [इन तीन श्राङ्गों] को छोड़‌कर ग्रन्थ श्राङ्ग तो कथा-वस्तुकी श्रत्कूलताके ग्रनुसार उद्भेद-कथाका परित्याग करके भी प्रयुक्त किए जा सकते हैं । श्रामुख्यके नटवृत्तान्त-रूप होनेसे कथा-वस्तुका भाग न होनेके कारण [उसके बीचमें श्राङ्गोंका प्रयोग न करके] उसके बाद श्राङ्गोंका प्रयोग किया जाता है । 'द्वादशाङ्क' इससे बारह श्राङ्गवाला सन्धि गृहीत होता है । सन्धिस्वरुप श्रावश्यक र्वपसे निर्माण करनेवाले होनेके कारण [उपक्षेपादि श्राङ्ग] रचना [संविधानक] के श्राङ्ग कहलाते हैं ।

उपर जो हमने यह दिखलाया था कि मुखसन्धिके बारह श्राङ्ग, प्रतिमुख, गर्भ तथा विमर्शसन्धियोंमेंसे प्रत्येकमें तेरहतेरह श्राङ्ग तथा निर्वहणसन्धिमें चौदह श्राङ्ग माने गए हैं । यह श्राङ्गमेद्या केवल उन-उन सन्धियोंमें बतलाए गए श्राङ्गोंकी दृष्टिसे कही गई है । किन्तु उन सन्धियोंमें, कहे हुए श्राङ्गोंके श्रतिरिक्त ग्रन्थ सन्धियोंके श्राङ्गोंका प्रयोग भी हो सकता है । उनको मिला देनेपर यह संख्या वाला नियम नहीं रहता है । इसी बातको ग्रन्थकार ग्रन्थके ग्रनुच्छेदमें लिखते हैं—

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का० ४१-४२, सू० ४५ ] प्रथमो विवेक: [ १०७

ग्रझ्जसंख्यानियमश्च सन्धिपूर्वपाताज्ज्ञापत्तया। संख्यान्तर्ग्रझ्जानुप्रवेशे तु न संख्यानियमः। संख्यासंचेपश्चाझ्ञानां परस्परान्तर्भावेन प्रतिसन्धिसुकारोऽपि प्राचीनैरकर्ततवान्, भणितिरभंगिबाहुल्यस्य च चमत्कारकारित्वाद्स्माभिने कृतः। 'घ्रुवम्' इति मुखसन्धिः सर्वरूपेष्ववश्यं भवति। निर्वहणासन्ध्येवम्। आरम्भ-निर्वाह्योरवश्यम्भावित्वान्। प्रतिमुखाद्यस्तु ग्रझ्जायोगादिपु यथाललत्प्रज्ञा भवन्ति, न भवन्ति च ।

ग्रझ्जानि च वृत्तविस्तरकारित्वादवश्यं निवन्धनीयानि। यथा रासस्य पत्नी रावणेन वान्तादपहता। रामेण च जटायुषः समुपलक्ष्य, सुप्रीवं सहायं वानराधिराज्यप्रतिपादनार्द्धिगम्य, समुद्रसेतुबन्धसाधाय, निहतय च रावणं प्रत्यानीत इत्यत्र प्रारम्भाद्यावस्थानिबन्धनयैः पञ्चभिरपि सन्धिभिर्यीजुपायुक्ततै-निबद्धे रूपके वृत्तसंचेपः स्यात्। तथा च न चमत्कारः। कि चारुङ्करमपि वृत्तं ग्रझ्जवैचित्र्येण निवध्यमानं परां रक्तिमावहति। कार्यवशाच्च पुनरहच्यमाननपि वृत्तं ग्रझ्जभझ्ज्या निवद्धमपुनरुच्मिवाभाति। यथा:श्लाकाल्पता च ग्रझ्जसम्बद्धच्य वृत्तस्य न भवति। प्रत्येकशश्चाझ्ञानां प्रयोजनं यथावसरं लच्यते दर्शयिष्यामः ॥४१-४२॥

ग्रझ्जोंकी संख्याका नियम [उन-उन] सन्धियोंमें गृहीत ग्रझ्जोंकी हदृसे ही होता है। ग्रन्थ सन्धियोंोंके ग्रझ्जोंका ग्रनुप्रवेश हो जानपर तो यह संख्या-नियम नहीं रहता है। ग्रौर प्रत्येक सन्धिमें [कुछ ग्रझ्जोंका] एक-दूसरेमें ग्रन्तर्भाव करके ग्रझ्जोंकी संख्याका संक्षेप सम्भव होनेपर भी प्राचीन ग्राचार्योंके द्वारा न किए जानेके कारण तथा कयुन-शिल्पियोंके बाहुल्यके चमत्कारजनक होनेके कारण हमने नहीं किया है है कि] मुखसन्धि समस्त रूपकोंमें ग्रावश्यक होता है। इसी प्रकार निर्वहणासन्धि भी [रूपकके समस्त भेदोंमें ग्रावश्यक होता]। [प्रत्येक रूपक ग्रथवा प्रत्येक कार्यमें] ग्रारम्भ ग्रौर समाप्तिके ग्रावश्यक होनेसे [प्रत्येक रूपकमें मुखसन्धि तथा निर्वहणासन्धिका होना ग्रपरिहार्य है। ग्रन्थ सन्धियोंका सब रूपक भेदोंमें होना ग्रपरिहार्य नहीं है]। प्रतिमुख ग्र्रादि [ग्रन्थ सन्धियाँ] तो लक्षणोंके ग्रथनुसार व्यायोग ग्रादि [रूपक] भेदोंमें होती भी हैं ग्रौर नहीं भी होती हैं। [प्रत्येक सन्धिमें वृत्तान्त] ग्रझ्जोंके, कथावस्तुके विस्तारकारी होनेसे ग्रझ्जोंकी रचना [रूपकोंमें] ग्रावश्यक करनी चाहिए। ग्रन्थयथा [रूपककी कथावस्तु बहुत संक्षेपमें समाप्त हो जानेके कारण चमत्कार-शून्य हो जावेगी। जैसे] (१) रामकी पत्नीको रावणने हर कर लिया। (२) रामचन्द्रने जटायुसे [इस समाचारको] जानकर, (३) वानरोंके प्रभिराजपदको प्रदान करनेके द्वारा सुप्रीवको ग्राश्रय बना कर, (४) समुद्रपर सेतुबन्ध बना कर ग्रौर रावणको मारकर, (५) उसकी लौंड़ लाया। इस [रामायणकी कथा]में प्रारम्भादि ग्रवस्थाओं के द्वारा [युक्त पाँचों सन्धियों के प्रयोग] से [युक्त] रूपककी रचना करनेपर [भी] कथावस्तुका [प्रत्यन्त] संक्षेप हो जाता है। इसलिए उसमें कोई चमत्कार नहीं रहता है। [इसीके विपरीत] ग्राचार्य [तीरस] कथावस्तु भी विभिन्न ग्रझ्जों द्वारा [विस्तार-पूर्वक] वर्णित होनेपर ग्रत्यन्त मनोरञ्जक बन जाती है। ग्रौर कार्यवश [कहीं-कहीं] कथाभाग पुनरुक्त होनेपर भी ग्रझ्जोंकी शोभासे निबद्ध होनेपर पुनरुक्त-सी प्रतीत नहीं

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१०५

नाट्यदर्पणम्

[ का० ४३, सू० ५०

इथ्थं सकलकाव्यार्थः, प्रधानरसलच्च्यां प्रयोजनं च, संशेपेप्योपपाद्यत इति

प्रथमं (१) 'उपक्षेप' लच्य्यत—

[क्षत्र ५०]—बीजस्योप्तिरुपचेपः—

विस्तारिषु: काव्यार्थस्य मूलभूतो भागो बीजमिव 'बीजम्' । तस्य्य उत्तर-

वापमात्रं 'उपचेः:' । यथा रत्नावल्यां नेपथ्ये—

द्विपादन्यासमार्द्रपि मध्याद्रपि जलनिरेधिदशोदक्यन्त्तान् ।

श्रान्तीय भर्त्तिति घटयति विधिरभिसन्धानमुखीभूतः ।।

इत्यादिना योगन्धरायणेन वत्सराजस्य रत्नावलीप्रासिहेतुः स्वव्यापारानुकूलदैवो

बीजमुप्रमम् ।

होता है । प्रौर ग्रहणोंसे सम्बद्ध [अर्थात् ग्रहणोंकी शैलीसे निबद्ध] कथावस्तु लोहेरी शलाकाके

समान [एकदम सीधा श्रमपरिवर्त्तनीय] नहीं रहता है [उसमे लचकीलापन श्रा जाता है जिससे

कवि सौन्दर्यांथके लिए उसे श्रावश्यकतानुसार मोड़-मोड़ सकता है ।] प्रत्येक ग्रहणका श्रलग-

ग्रहलग प्रयोजन उनके लचणांमें यथावसर दिखलावेंगे ।

इस ग्रन्थेच्छेदमें ग्रन्थकारने पद्य-सन्धियोंमें कहे जानेवाले ग्रह्णोंकी उपयोगिताके विषय

में सामान्परुपसे प्रकाश डाला है । उसके ग्रनुसार ग्रह्णोंका प्रयोजन कथावस्तुमें चमत्कार

को उत्पन्न करता है । ग्रह्णोंके प्रयोकेक बिना श्रप्रसन्नत सरस कथावस्तु भी नीरस बन जाती

है । ग्रोर ग्रह्णोंके यथोचित प्रयोकेक द्वारा नीरस कथावस्तुमें भी चमत्कार उत्पन्न किया जा

सक्ता है । इसलिए ग्रन्थकारने रुपकोंमें ग्रह्णोंके प्रयोको श्रमपरिहार्यं माना है । उनके

द्वारा कथाका विस्तार श्रौर लचकीलापन प्राप्ता है श्रौर पुनरुक्ति श्रादि दोषोंका परिहार

होता है । ग्रत एवं ग्रह्णोंका प्रयोग श्रत्यन्त श्रावश्यक है ।।४९१-४२।।

इन दो कारिकाग्रोंमें मुखसन्धिके ग्रह्णोंका उल्लेख श्राव् नाममात्रसे कथन करनेके

बाद श्रब ग्रन्थकार मुखसन्धिके बारहों ग्रह्णोंका श्रलग-श्रलग लचणादि श्रागे करेंगे ।

इनमें सबसे पहिले उपचेप रुप प्रथम ग्रहणका लचण करते हैं—

(१) उपचेप—

[उपचेप रुप प्रथम ग्रहणके द्वारा] समस्त काव्यकका श्रर्थ श्रौर प्रधान रस रुप

प्रयोकेन संक्षेपमें [बीज रुपसे] उपचिप्त किया जाता है, इसलिए ['उपचिप्यतेन इति उप-

चेप:' । इस व्युत्पत्तिके श्रनुसार] सबसे पहिले 'उपचेप' का लचण करते हैं—

[सूत्र ५०]—कथावस्तुकः बीजकं वपन करना 'उपचेप' [कहलाता] है ।

[ग्रामे चलकर] विस्तृत होनेवाले कथावस्तुक मूलभूत भाग [काव्यके] बीजके समान

[होनेसे] 'बीज' [कहलाता] है । उसको डालना श्रर्थात् बोना [जिस ग्रहणके द्वारा किया

जाता है वह] 'उपचेप' [कहलाता] है—

जैसे रत्नावलीमें नेपथ्यमें [बीजका 'उपचेप' इस प्रकार किया गया है]—

दूसरे होपसे भी, समुद्रके बीचसे भी श्रौर विस्तारके छोरसे भी शत्रुतुल्य दैव श्रभि-

मत वचतुको लाकर मिला देता है ।

इत्यादि [कथन] के द्वारा [वत्सराज उदयनके मंत्री] योगन्धरायणने वत्सराज

[उदयन] को रत्नावली [नायिका] की प्राप्ति करानेवाले श्रपने व्यापारके श्रथकूल दैव रुप

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का० ४३, सू० ५१-५२ ] प्रथमा विवेक: [ १०७

(२) यथ परिकर:-[सूत्र ५१]—स्वल्पव्यास: परिक्रिया । उपचिन्मस्यार्थस्य सुष्टु विशेषवचनैरल्पं विस्तारयां ‘परिकर:’ । यथा वेणीसंहारे भीमसेन: सहदेवमाह— पृथक् पृथक् समु खानु शिशोरेव कुशलम्,; न तत्रार्यो हेतुर्मवति न कीरटी न च युवाम् । जरासन्धस्योर:स्थलमिव विरुढं पुनरपि, कृष्ण भीम: सन्नियम् विघटयति य्यूयं घटयत ॥ इति ।

(३) यथ परिन्यास:-[सूत्र ५२]—विनिश्चय: परिन्यास:-- उपसंनिध्य, विस्तारितस्यार्थस्य विशेषेण निश्चय: सिद्धतया हृदयेडवस्थानं परितो न्यसनं ‘परिन्यास:’ । यथा राघवाभ्युदये— “मतिसागर:—देव मा श्राड्क्षीथा: । प्रलयेडपि हि किं विपरीयन्ति मुनि- भाषितानि ?

बीजका श्राधान किया है ।

(२) परिकर

'परिकर' [नामक मुख्यसन्धिके दूसरे ग्रङ्कको कहते हैं]— [सूत्र ५१]—[बीज रूपमें उपकक्षित श्रार्थका] स्वल्प विस्तार 'परिकर' [नामक, मुख्यसन्धिका फहलाता] है ।

[बीज रूपमें] उपकक्षित श्रार्थका [स्वल्पव्यास: श्रार्थात्] भली प्रकारसे विशेष वचनों द्वारा तनिक-सा विस्तार करना 'परिकर' [कहलाता] है । जैसे वेणीसंहारमें भीमसेन सहदेव से कहते हैं—

"मेरा कौरवोके साथ बचपनसे ही जो वैर बन गया है उसमें न श्रार्य [प्रार्थात् युधिष्ठिर] कुशल हैं, न धार्तराष्ट्रों [प्रार्थात् दुर्योधन श्रादि] । न भर्जुन श्रौर न तुम दोनों [प्रार्थात् नकुल श्रौर सहदेव] ही कुशल हैं । क्रोधके कारण भीमसेन [प्रार्थात् मैं स्वयं] जरासन्धके उर:स्थलके समान परिपक्व संधिको भी भङ्ग- करने जा रहा हूँ तुम लोग उसे [भले ही] जोड़ते रहो ।"

(३) परिन्यास—

[सूत्र ५२]—उपकक्षित श्रौर तनिक विस्तारित प्रार्थक] विशेष रूपसे निश्चित परि- न्यास [कहलाता] है ।

[बीज रूपमें] उपकक्षित करके फिर [परिकर ग्रङ्क द्वारा] विस्तारित श्रार्थका विशेष रूपसे निश्चय श्रार्थात् सिद्ध मानकर हृदयमें धारण करना [परित: न्यसनं परिन्यास:] इस विप्रहके ग्रनुसार 'परिन्यास' [कहलाता] है । जैसे 'राघवाभ्युदय' में—

मतिसागर—हे राजन् ! श्राप शङ्का न कर । क्या मुनियोंके वचन कभों प्रलयमें भी मिथ्या हो सकते हैं ?

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जानक:- तत्तु कि मुजदएडविक्रमाक्रान्तभारतखएडत्रयस्य तस्यापि पराजय: सम्भाव्यते ?

मतिसागर:- [स्वगतम्] श्राहो दुरात्मनो रावणस्याऽऽहोश्वर्यं, यदयं रहोऽपि देवस्त्रिभिघानमुचारयन् विमृशति। [प्रकाशम्] देव सम्भाव्यत इति किमुच्यते ? सिद्ध एव कि नामिघीयते देवेन ! इति ।

यथा वा वेध्यीसंधारे-- "चञ्चद्-वज्रश्रमित-चएडगदाभिघात- सञ्चूर्णितोरुयुगलस्य सुयोधनस्य । स्यात्पापवृत्त-घनशोणितशोषपाशि- रुत्तंसयिष्यति कचांस्रव देवी भीम: ॥" इति ।

यथा वास्मदुपज्ञे रोहिणीसुमगडार्काभाने प्रकारसो प्रथमडड्ढे मृगाङ्कं प्रत- "वसन्त:- कुमार मा शङ्किष्ठा:- उन्मत्तप्रेमसंरम्भदारमन्ते यद्ज्ञानाः। तत्र प्रयूहमाऽततुं ब्रह्माऽपि बलु कातरः ॥" अनुपद्रविडोऽथों न विस्तायेंते, श्रविस्तारितश्च न निश्चीयते इति त्रयाणां- मध्येपां उद्देशकमेऽपि निवन्धः ।

जानक:- तो क्या श्रापने सुजानकके अवधारणके वलसके ही जिसने भारतके तीन खण्डोंकी श्राक्रांत कर लिया उस [रावण] की भी कभी पराजय हो सकती है ?

मतिसागर:- [ग्रपने मनमें 'स्वगत' कहते हैं] ग्रहो दुष्ट राक्षसराजके शासनका क्ंसा प्रभाव है कि ये महाराज एकांतमें भी उसका नाम लिनेमें डरते हैं । [प्रकाशायं] हे राजन् [उसकी पराजय] सम्भव है ऐसा क्यों कहते हैं, सिद्ध ही है ऐसा ग्राप क्यों नहीं कहते हैं । इसमें [विस्तारित श्रथंका 'विशेषेण निश्चय:' श्रथात् सिद्घतया कथन होनेसे यह 'परिन्यास' नामक तीसरे श्रथंका उदाहरऐण ]

प्रथवा जैसे वेध्यीसंहारमें-- हे देवी ! ग्रपनी चञ्चल भुजाओंसे घुमाई हुई भयङ्कर गदाके प्रहारसे तोड़ी हुई दुर्योधन की दोनो जङ्घाओंके गाढे जमें हुए प्रचुर रक्तसे रेंगे हुए हायोंसे ही यह भीम तुम्हारे बालोंको बाँधेंगा । इसमें [विस्तारित श्रथंका सिद्घवत् कथन होनेसे यह 'परिन्यास' का उदाहरऐण है] ।

प्रथवा जैसे हमारे बनाएं हुए 'रोहिणीसुमगडार्क' नामक प्रकरणमें प्रथमाङ्कडून मृगाङ्कं प्रति वसन्त [कहता है]— वसन्त:- कुमार ! ग्राप [किसी प्रकारकी] शङ्का न करें । उन्मत्त प्रेमके श्रावेगमें स्त्रियाँ जो [प्रेमात्-व्यापार] श्रारम्भ करती हैं उसमें बिछ्न डालनेका साहस ब्रह्मा भी नहीं कर सकता है ।

उन्मत्त प्रेमके श्रावेगमें स्त्रियाँ जो [प्रयात्-व्यापार] ग्रारम्भ करती हैं उसमें बिछ्न डालनेका साहस ब्रह्मा भी नहीं कर सकता है । [संक्षिप्त रूपमें बीजके समान] उपक्षित किए बिना श्रथंका विस्तार नहीं किया जा सकता है ग्रोर विस्तार किए बिना निश्चय नहीं किया जा सकता है इस लिए [उपक्षेप परिकर तथा परिन्यास] इन तीनों का उद्देशक्रमसे [श्रथात् इसी कमसे] सन्निवेश करना चाहिए ।

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(४) अथ समाहिति:- [सूत्र ४३]—पुनर्न्यास: समाहिति: ॥४३॥ संचिन्योपरिस्थ बीजस्य स्पष्टताप्रतिपादनार्थ पुनर्न्यासो भणितिवैचित्र्यं, सम्यग् न्यासमनुत्तानं धानं पोषणं 'समाहिति:' । यथा वेधीसंहारे—

"नेपथ्ये—हे भो द्रुपद-विराट्-वृष्ण्यन्धक-सहदेवप्रभृतयो योधास्तौषी- पतय: कौरवचमूप्रधानाश्च योद्धा: श्रायन्ताम्— यत् सत्यततभण्नाभीरोमनसा यत्नेन मन्दीकृत, यद्रिस्मरतुं मपीहितं शमवता शान्तिं कुलस्ये च्छता । तद् यतारक्यस्मृतं नृपसुताकेशाम्बरावार्षभौ:, क्रोधज्योतिरिदं महान् कुरुवने यौधिष्ठिरं जृम्भते ॥" इति । 'स्वस्था भवन्ति' इति यथ्रोजं, तदिदानीं प्रधाननायकतगतत्वेन सम्यक् पोष नीतिमिति ॥४३॥

(४) समाधन— श्राब [चतुर्थ श्राद्ध] 'समाधान' [का लक्षण करते हैं]— [सूत्र ४३]—[संक्षेपमें उपक्षिप्त बीजका] दुबारा [प्रधिक स्पष्ट रूपसे] श्राधान 'सम- धान' [कहलाता] है ४३ ।

[उपक्षेप रूप प्रथम श्राद्धमें] संक्षेपसे उपक्षिप्त बीजको श्रौर प्रधिक स्पष्ट रूपसे प्रति- पादन करनेके लिए फिरसे कथन करना प्रय्थात् विचित्र भाषारौलीसे [दुबारा] कथन करना, 'सम्यग्' भली प्रकारसे श्रौर 'ग्रा समन्तात्' पूर्ण रुपसे स्थापित करना [इस प्रकारके कथनुसार] 'समाधान' [समाहिति कहलाता] है ४३ ।

जैसे वेधीसंहारमें— "नेपथ्यमें—हे द्रुपद, विराट्, वृष्णी, ग्रन्धक श्रौर सहदेव श्रादि हमारी श्रग्रौहिरगी सेनाके सेनापतियो ! श्रौर कौरवोंकी सेनाके प्रधानाधिकारियो ! [ग्राप सब लोग कान खोल- कर] सुनलें कि—

[बारह वर्ष वनवास तथा एक वर्षके ग्रज्ञातवासका जो व्रत हम पाण्डवोंने लिया है वह कहीं भङ्ग न हो जाय इस प्रकार] सत्यततके भङ्गसे डरनेवाले [युधिष्ठिर] ने [ग्रब तक श्रपनी] जिस [क्रोधाग्नि] को यत्नपूर्वक दबाए रखा था श्रौर शान्त-स्वभाव वाले [युधिष्ठिर] ने कुलकी शान्तिकी कामनासे जिसका भूलनेका भी यत्न किया, धृतकी श्रगराइयोंसे उत्पन्न श्रौर द्रौपदीके केश तथा वस्त्रोंके खींचे जानसे नरपशु [दुःशासन] के द्वारा उदीप्त किया हुग्रा युधिष्ठिरकी वह भयानक क्रोधाग्नि ग्राज कुरुकुल रुप वनमें [उसको भस्म कर देनेके लिए] प्रदीप्त हो रहा है ।

इसमें ['स्वस्था भवन्तु मधि जीवति धार्तराष्ट्राः:' मेरे जीवित रहते कौरव कहाँ] 'स्वस्थ हो सकते हैं' [ग्रथवा कौरव स्वर्गको भावें] इस हपमें जिस बीजका श्राधान किया गया था वह इस समय प्रधान नायक [युधिष्ठिर] गत रुपसे पूर्ण रुपसे परिपुष्ट हो गया है । [इस लिए यह 'परिन्यास'का उदाहृत है] ॥४३॥

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११२ ] नाट्यदर्पणम् [ का० ४४, सू० ४४

(४) उद्भेदः—

[सूत्र १४]—स्वल्पप्ररोह उद्भेदः—

ग्रामुखानन्तरमुनस्मय बीजस्य स्वल्पप्ररोहः, किश्चित् फलानुष्ठानानुकूल्य- प्रदर्शनं धान्यस्योच्छूनत एव 'उद्भेदः' । बीजोद्भवाटनमंकुरकल्पम्, उद्भेदः पुन- रंकुरकल्पादुद्भवाटनादौ भूमिन्यासथान्योच्छूनत एव प्रार्चीनावस्था इत्ययं मुखसंधेरे- वाक्यम् । न पुनरुद्भवाटरुपवान् प्रतिमुखसंधे । यथा वेधीसंहारे—

"नाथ पुत्रो वि तपे श्रागाच्छिल्य श्राहं समासासइदृट्ठवा ।"

[नाथ पुनरपि त्वयागलय्याहं समाश्वासयितव्या । इति संस्कृतम ]

इस प्रकार यहाँ तक मुखसंधिके उपक्षेप, परिकर पर्याय तथा समाधान रूप चार ग्राज्ञोंका वर्णन हो चुका है । ग्राब उद्भेद नामक पञ्चम ग्राज्ञका वर्णन ग्रारम्भ करते हैं । उद्भेद-शाब्दसे मिलता-जुलता दूसरा उद्भवाट-शब्द । इस शाब्दका प्रयोग प्रतिमुखसंधिके लक्ष्यांक प्रसंगमें पहले किया जा चुका है। "प्रतिमुख कियल्लक्ष्यबीजोद्भवाटसमन्वित:" प्रति- mुखसंधिके इस लक्षणमें 'बीजोद्भवाट' की चर्चा की गई थी । यहाँ मुखसंधिके पञ्चम ग्राज्ञ का नाम उद्भेद है। इसमें भी बीजके 'स्वल्पप्ररोह' की चर्चा की गई है। इससे कभी यह प्रश्न हो सकता है कि इस 'उद्भेद' ग्रोर 'उद्भवाट' में क्या ग्रन्तर है । इस लिये इस 'उद्भेद' रूप मुखसंधिके ग्राज्ञकी व्यवस्थाके प्रसङ्गमें ही ग्रन्थकारने प्रतिमुखसंधिके 'उद्भवाट' से 'उद्भेद' का यह ग्रन्थर दिखलाया है कि जैसे बीजको सुमिर्य्यमें बोनेके बाद पहले बीज फूलता है तब उसके बाद बीज फूटकर उसमेंसे ग्रंकुर निकलता है । उसी प्रकार बीजको फूलनेवाली ग्रावस्थाके समान यहाँ नाट्य बीजका जो स्वल्प विस्तार होता है वह 'उद्भेद' कहलाता । ग्रोर धान्य बीजकी ग्रंकुरावस्थाके समान जो ग्रोर प्रधिक विस्तार होता है वह 'उद्भवाट' कहलाता है । इस प्रकार 'उद्भेद' ग्राज्ञ, 'उद्भवाट' की ग्रपेक्षा पूर्ववर्ती ग्राज्ञ है । इसी लिये वह मुखसंधिका ग्राज्ञ है । ग्रोर 'उद्भवाट' उसके बादकी ग्रंकुर कल्प ग्रावस्था है । इस लिये वह 'उद्भेद' के बादकी ग्रोर प्रतिमुखसंधिका ग्रावस्था है । 'उद्भेद' ग्रोर 'उद्भवाट' के इस भेदको ग्रन्थकार 'उद्भेद' की व्याख्यामें ग्रागे दिखलाते हैं ।

(५) उद्भेद—

ग्राब उद्भेद [नामक मुखसंधिके पञ्चम ग्राज्ञका लक्षण कहते हैं]—

[सूत्र १४]—[बीजका] थोड़ा-सा विस्तार उद्भेद [नामक ग्राज्ञ कहलाता] है ।

ग्रामुखके बाद बोए गए [कथावस्तुके] बीजका तत्कालमा विस्तार प्रार्चीत थोड़ी-सी फलकी श्रनुकूलताका प्रदर्शन, धान्यकी उच्च्छूनता [फूलने] के समान [होनेसे] 'उद्भेद' [कहलाता] है । [प्रतिमुख संधिमें कहा जानेवाला] बीजका 'उद्भवाट' [धान्यबीजके] ग्रंकुरकरके समान हैं । ग्रोर उद्भेद ग्रंकुर कल्प उद्भवाटसे पूर्ववर्ती धान्यके फूलनेके समान उससे पहली ग्रावस्था है । इस लिये यह [उद्भेद] मुखसंधिका ही ग्राज्ञ है । न कि 'उद्भवाट' रूप होनेसे प्रतिमुखसंधिका । [प्रथमतः प्रतिमुखसंधिके 'उद्भवाट'से मुखसंधिका 'उद्भेद' ग्राज्ञ बिलकुल भिन्न तथा उससे पूर्ववर्ती ग्रावस्था रूप है ।]

जैसे वेधीसंहारमें—

"हे नाथ ! ग्राप फिर भी श्राकर मुझे श्राश्वासन देवें ।

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का० ४३, सू० ४४ ]

प्रथमो विवेक:

[ ११३

इति द्रौपद्याभिहितो भीमः प्रत्याह---

"ग्रयि किमव्यलीकाश्वासनाभिः ?

भूयः परिभवद्वानितलड्जाविधुरितनानम् ।

ग्रन्थःशेषितकौरवर्थ्य न पश्यसि वृकोदरम् ॥"

इति कुरुनिधनारम्भरूपस्य वीजार्थस्यामुदुबेदः । इति ।

ग्रन्ये तु ' गूढभेदनमुदूभेदनमिति मन्ते । यथा रत्नावल्यों नम्नरार्जुन

कुसुमायुध-नयपदेश-निगूढस्य 'ग्रस्तापास्त' इत्यादिना वैतालिकवचसा सङ्गारिकां

प्रत्युद्भेदः ।

यथा वा राघवाभ्युदये---

"सीता---[ समन्ताद्वलोके य रामं च सविशेषं निर्वेधर्ये स्वगतम् । ] कथमय-

मझोदयझस्मास्थाय चापारोपणं द्रुतमुपायातः ! प्रसीद भगवन्नझन् ! प्रसीद । तथा

कुर्या यथा राम एव चापारोपणाय प्रभवति

लवङ्किका---[ श्रृङ्गुल्या रामं दर्शयन््ती ] जं भर्तृदारिका इत्ययं कालं मघो-

रहशोग्यरं कवयदवी तं संपर्कं दिहिगोयं करेदु ।

[ यं भर्तृदारिका इयं तु कालं मनोरथगोचरं कृतवती, तं साम्प्रतं दृष्टिगोचरं

करोतु । इति संस्कृतम् । ]

द्रौपदीके इस प्रकार कहनेपर भीमने उत्तर दिया कि---

"ग्रारे श्राव भी श्रोर मिथ्या ग्राश्वासन देनेसे क्या लाभ [ मैं तो यही कहता हूँ कि ]---

तिरस्कार सहन करनेकी लज्जाके कारण मलिनमुख भीमको तुम ग्रब कौरवोंका नाश

किए बिना दुबारा नहीं देखोगी [ ग्रर्थात् ग्रब मैं कौरवोंका समूल विनाश करनेके बाद ही

दुबारा तुम्हारे पास ग्राऊँगा ] उसे पहले नहीं ]"

इसमें कौरवोंके विनाशके ग्रारम्भ रूप बीजका 'उद्भेद' [ स्वतःप्ररोह ] है ।

इस प्रकार ग्रन्थकारने मुखसन्धिके 'उद्भेद' नामक पञ्चम ग्रङ्गका लक्षण प्रस्तुत

किया । किन्तु ग्रनय व्याख्याकार 'उद्भेद'का लक्षण ग्रनय प्रकारसे करते हैं । उनके मतमें

किसी गूढ ग्रर्थंका प्रकट होना 'उद्भेद' कहलाता है । इस मतको ग्रन्थकार ग्रागे दिखलाते हैं ।

दूसरे [ ग्राचायँ ] तो [ किसी ] गूढ [ रहस्य ] के प्रकट होनेको 'उद्भेदन' कहते हैं ।

जैसे रत्नावलीमें [ ग्रनङ्ग पूजनके प्रसङ्गपर ] कुसुमायुधके नामसे लिपे हुए वत्सराज [ उदयन ]

का 'ग्रस्तापास्त' इत्यादि [ इलोक ] से वैतालिकके वचनसे सङ्गारिकाके प्रति [ उदयके रूपमें

वत्सराजका ] प्रकट होना । [ उद्भेद कहा जा सकता है ]

प्रथवा जैसे राघवाभ्युदयमें---

"सीता---[ चारों ग्रोर देखकर ग्रोर रामचन्द्रकी ग्रोर विशेष रूपसे देखती हुई ग्रपने

मनमें स्वागत कहती है ] प्रचञ्चल यह [ ग्रनङ्ग ] कामदेव भी शरीर धारण करके धनुषके श्रारो-

परको देखनेके लिए ग्रा गया है । [ कृपा करो, भगवन् ग्रनङ्ग ! कृपा करो, जिससे रामचन्द्र ही

धनुषके चढ़ानेमें समर्थ हो सकें [ ग्रन्थ कोई समर्थ न हो सकें ] ।

लवङ्किका---[ श्रृङ्गुलीसे रामको दिखलाती हुई ] स्वामिपुत्र ! जिनको ग्राप ग्रब

तक मनोरथका विषय बनाए हुए थीं उनको ग्रब दृष्टिका विषय बना लो [ ग्रर्थात् देख लो ] ।

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सीता—[ ससराग्रं स्वगतम् ] कथमहं रामस्मै श्रुतज्ञासिद्धम् ?" इत्यनुज्ञाभ्यान्त्या निगूढस्य रामस्य लवङ्किकावचसा उदाहृतः ॥ (६) स्थ करणम्—

[सूत्र ४५]—करुण प्रस्तुतक्रिया ।

अत्रवस रानुगुणार्थस्य प्रारम्भः करणम्। यथा वेङ्गीसंहारे— "सहदेवः—ग्रार्य गुरुभ्यामो वयं गुरूजनानुज्ञाता विक्रमानुरूपमार्चितुम् । भीमः—एते च वयमुचिता एवार्यस्याज्ञामनुब्ठातुम् ।" इत्यनेन शत्रुन्तरालोद्भूतरत्नुमान्-संघारमारम्भान् 'करणम् ।

यथा वा यादवाभ्युदये द्वितीयाङ्कोपान्त्ये— "कंसः—[ सप्रसादम् ] साधु व्रमास्य साधु । श्यामेव संग्रामोपायो नान्यः । तन् तर्हि ब्रज त्वं सामग्रीकरणाय ।" इत्यनेन शत्रुन्तरालोद्भूतरत्नुमान्-मल्लयुद्धम्भप्रारम्भान् करणमार्माति ।

प्रत्यये तु विपदां शमनं करणमाहुः शमनं चाशीरवादवशेन ज्ञान्यथा वा।

सीता—" श्रावस्त-पर्वौक व्रपने मनमें " श्रद्धा मैं रामचन्द्रजीको ही कामदेव समझ रही थीं !"

इस प्रकार कामदेवके भ्रममें लिप्त हुए रामचन्द्रका लवङ्किकाके वचनसे [सीताके प्रति प्रकट होना] उद्भेद है ।

उद्भेदके दूसरे लक्षणके अनुसार ये दो उदाहरण यहाँ प्रस्तुत किए गए हैं ।

(६) करण करण [नामक मुखसंधिके षट् प्रङ्कका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र ४५]—प्रस्तुत [कार्यका ग्रनिष्ठान] करण [कहलाता] है ।

प्रस्तुतकके प्रतिपूर्वक प्रयत्नका प्रारम्भ करना 'करण' [कहलाता] है ।

जिससे वेङ्गीसंहारमें— "सहदेव—ग्रायं, हम गुरुजनोकी ग्रनुमतिसे अपने पराक्रमके ग्रनुसार [युद्ध] करनेके लिए जा रहे भीम—ग्रोर ये हम भी ग्रार्यकी ग्राज्ञाका पालन करनेके लिए तैयार हो हैं ।"

इस [सन्दर्भ] से ग्राभ्रल [शत्रु] में प्रस्तुत किए जाने वाले संघारका ग्रारम्भ करनेसे यह 'करण' [का उदाहरण] है ।

"कंस—[प्रसन्न होकर] शाबाश मन्त्रिवर शाबाश, यही [कुटिलोंके] पकड़नेका उपाय है दूसरा नहीं । इस लिए सामग्री तैयार करनेके लिए जाओ ।"

इस [कथन] से ग्रागले ग्रङ्कोंमें प्रस्तुत किए जानेवाले मल्लयुद्धका ग्राखाड़ा बनानेके ग्रारम्भ करनेसे यह 'करण' [नामक मुखसंधिका षट् प्रङ्क है] ।

प्रारम्भम ग्रनन्य [ग्राचार्य] तो विपत्तियोंोंके शमनको 'करण' कहते हैं । वह शमन ग्राशीर्वादके

रूपमें प्रत्यथा ग्रन्य प्रकारसे हो सकता है ।

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यथा वेग़ीसंहारे भीमं प्रति द्रौपदी— "जं असुरसमराभिमुहस्स हरिणो मझ्झलं, तं तुम्हारिआं भोदु । इति । [यदसुरसमराभिमुखस्य हरिरेवमध्यलं, तद् युष्माकं, भवतु । इति संस्कृतम् ] । (७) अथ विलोभनम्—

[सूत्र ४६]— विलोभनं स्तुतिगोचार्यम् स्तुते-गुरु यावदेतर्द्दाति श्लाघातः प्रस्तुते कृत्ये गाढ़्यं—स्याभिलाषस्थरोकरस्यं विलोभनम् ।

यथा वेग़ीसंहारे 'चक्खदुज' इत्यादि श्लोकानन्तरं— "द्रौपदी—नाथ कि दुक्करं तए परिकुपितेण ? ता असुगिअहंतु एदं ववसिदं देवदाद । [नाथ ! कि दुक्करं त्वया परिकुपितेन ? तदनुग्रहं एतद् वयवसितं देवता: । इति संस्कृतम् ]

इत्थनेन सुयोधनवधस्य गुप्तवचनवच्यानुपादु भीमस्य गाढ़्यपदं विलोभनम् । इदं च परिन्यासानन्तरमेव निबध्यते । सन्ध्यन्तरस सामान्याय चोक्तक्रमेषोदे श: ॥

जैसे 'वेग़ीसंहार' में भीमक प्रति द्रौपदी [कहती है]— असुरोसे युद्धके लिए जाते हुए विष्णुको जो मझ्झल प्राप्त हुण्रा था वह तुमको भी [प्राप्त] हो ।

(७) विलोभन— विलोभन—श्रृङ्ग विलोभन [नामक सातम श्रृङ्गको कहते हैं]—

[सूत्र ४६]— स्तुति द्वारा [वस्तुके प्रति] स्याभिलाष विलोभन [कहलाता] है । स्तुतिसे श्रृथात् यह [वस्तु] गुप्तवान् है इस प्रकारकी प्रेरणाके कारण प्रस्तुत कार्य के विषयमें स्याभिलाषका सृष्टि हो जाना 'विलोभन' [कहलाता] है ।

जैसे 'वेग़ीसंहार' में 'चक्खदुज्जस्समित' इत्यादि इलोकेके बाद द्रौपदी [कहती है]— "हे नाथ श्रापके प्रकुपित होनेपर क्या दुष्कर है ? [श्रर्थात् सब कुछ सहज साध्य है] । इसलिए देवतागण तुम्हारे इस निर्णयको श्रनुग्रहोत करे !"

इससे सुयोधनके वधकी गुप्तवत्ताको सूचित करके भीमसेनके [उसके प्रति] स्याभिलाष को पुष्ट करना 'विलोभन' है ।

इसका सन्निवेश [मुखसन्धिके चतुर्थ श्रृङ्ग] 'परिन्यास' के श्रनन्तर [पञ्चम श्रृङ्गके रूपमें] ही होता है । [परन्तु उद्देश्वाली कारिकामें इसे परिन्यासके बाद नहीं रखा है] । ६ श्रृङ्गोंके बाद सातवें श्रृङ्गके रूपमें रखा गया है । इसका यह कारण है कि [श्रग्र्य सन्धियोंमें भी होनेके कारण उक्त कमसे [ श्रर्थात् अन्य सन्धियोंमें होनेवाले श्रृङ्गोंके श्रारम्भमें] कथन किया गया है ।

इसका यह श्रभिप्राय है कि यह जो 'विलोभन' श्रृङ्ग यहां दिखलाया है इसका स्थान साधारणतः मुखसन्धिके परिन्यास श्रृङ्गके बाद होता है । इसलिए मुखसन्धिके श्रृङ्गोंमें 'परिन्यास' श्रृङ्गके बाद इसका विनियोग चाहिए था । किन्तु ७वें कारकमें परिन्यासके बाद इसका विनियोग किया गया है ।

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(२) भेदनम्—

[सूत्र ५७]—भेदनं पात्रनिग्रेमः ११४४।।

रङ्गप्रवेशानां पात्राणां निर्गमो रङ्गान्नःसरगं येन तद् भेदनम्। पात्राणां यथासर्व प्रयोजनवशादितशच गन्तुमन्याार्थोड्यभिग्राय उद्यमो वा रङ्गान्न-

गम्ममापाद्यन भेदनमुच्यते। यथा ‘वेणीसंहारे’ भीमो द्रौपद्या संघमापायाराङ्गदिन्या शरीरानपेच्चे पराक्रमे निषिद्धः प्रत्याह—

"भीमः—सूचक्रिये ! ग्रन्थोड्यड्गस्फालभिन्न-द्धिरुधिर-बसा-सान्द्रस्त्रस्तिकपदे, मग्नानां स्यन्दनानामुपरि कृतपदन्यासविक्रान्तपत्तौ । स्कीता स्मृक्नापानोस्थी-रसदृशि रशिवातुषी-नृत्यत्कबन्धे, संग्रामैकार्यवान्तःपर्यसि विचरतुं पिहिता: पाण्डुपुत्रा: ॥" इति।।

एतेन हि संग्रामविचरग्यो पाण्डवानां पार्टिड़त्यव्यापनन संग्रामावतरङ्गाभ-प्राय: सहदेवस्य, आत्मनश्च संघातभेदनार्थं एवोपदर्शित इति भेदोद्ङ्कम्।

इसको न कराके कराएके ग्रनन्तर उसकी गगनना कराई है। इसका कारण यह है कि करण तक्के ६ ग्राज्ञ केवल मुखसन्धियों में ही होते हैं। ग्रागे गिनाए गए शेष ६ ग्राज्ञ मुखसन्धिके अतिरिक्त अन्य सन्धियोंमें भी होते हैं। यह बात पीछे कह चुके हैं। यह विलोभन ग्राज्ञ मुखसन्धिके प्रतिरिक्त ग्रन्य सन्धियोंमें भी हो सकता है। इसलिए उसका नाम परिवर्तन के बाद न रखकर ग्रन्थ सन्धियों में भी होनेवाले ग्राज्ञों के साथ रखा गया है।

(७) भेदन

श्राब भेदन [नामक मुखसन्धिके ग्राठम् ग्राज्ञका लक्षण करते हैं]—

[सू० ५७]—पात्रोका [रङ्गभूमिसे] बाहर जाना ‘भेदन’ [कहलाता] है ११४४।

रङ्गभूमिमें प्रवृष्ट हुए पात्रोंका निर्गम श्रथन्तु रङ्गभूमिसे बाहर जाना जिससे होता है वह ‘भेदन’ कहलाता है। किसी प्रयोजनवश पात्रोंका इधर-उधर जानेका ग्रभिप्राय या उद्योग भी रङ्गभूमिसे निर्गमका हेतु होनेसे ‘भेदन’ कहलाता है। जैसे ‘वेणीसंहार’ में—युद्धमें

ग्रनिष्टकी श्राशङ्का करनेवाली द्रौपदीके द्वारा शरीरचिन्तको छोड़़कर पराक्रम करनेके लिए मना किए जानेपर भीमसेन कहते हैं—

"भीम—हे सूचक्रिये ! एक-दूसरेके साथ संघर्षमें कटे हुए शौर हथियारोंके रुधिर एवं वसा [चर्बी] से भरे हुए सिरोंकी कीचड़में डूबे हुए रथोंके ऊपर होकर पदाति सैनिक जिसमें पराक्रम दिखा रहे हैं, गरम-गरम हथिरके पानकी गोष्ठीमें भृगाल तथा श्रृगालियोंकी ग्रामझूल-ध्वानिका वाद्य [तूर्य] जिसमें बज रहा है शौर [कबन्ध श्रथन्तु सिर कटे हुए] रुण्ड जिसमें नाच रहे हैं

इस प्रकारके ग्रान्त्रोंके संग्राम-सागरके जलके भीतर घुसकर विचरनेमें पाण्डव लोग निपुण हैं [इसलिए इस विषयमें तुम किसी प्रकारकी चिन्ता मत करो] ।"

इसके द्वारा संग्रामके भीतर विचरनेमें पाण्डवोंके पाण्डित्यको सूचित करके सहदेवके संग्राममें प्रवृत्तीर्ण होनेके ग्रभिप्रायको शौर [शत्रुत्रोंके] संघातको भेदन करनेके ग्रथने

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का० ४४, सू० ४५ ]

प्रथमो विवेक: [ ११७

अन्ये तु भेदं प्रोत्साहनमाहुः। यथा ‘वेष्यीसंहारेऽ—“द्रौपदी—नाथ ! मा खु जप्पसे प्पेपरि भनुद्दीविदकोवा स्सराएविक्खदसरोरा परिक्कमिस्संघ, यदो अप्पमत्तसंचरर्स्सोआइं रिउबलाइं सुप्पीयंति ।” [नाथ मा खलु याज्ञसेनोप्परिभवोद्धीपितकोप्पा अन्यपेच्चितशरोरीराः पर-

कविकुलमुख्यैः यथोद्दिष्टप्रसिद्धैरपि श्लोकेन श्रूयते। इति संस्कृतम्।]

"भीम—श्रयि सुक्रत्रिये ! ‘अन्योडन्यास्फालभिन्न—’

इत्यादिना विषयेऽप्याया द्रौपद्याः क्रोधोत्साहवीजानुगुणयेनैव प्रोत्साहनाद् भेदः इति ।

अन्ये तु संहतानां प्रतिपक्षाणां बीजफलोৎपत्तिनिरोधकानां विशेषण्कं भेद-

रूपमुपयं ‘भेदनं’ मन्वते इति ॥४४॥

(६) प्रापरणं—

[सूत्र ४६]---प्रापणं सुखसम्प्राप्तिः;

सुवस्स सुवहेतोश्च सम्यगन्वेष्यादार्त्रिनः प्रापरणम्। यथा वेष्यीसंहारे—“कञ्चुकी—[प्रविश्य] कुमार एष खलु भगवान् वासुदेवः पाण्डवपक्षपाता-मपि तेन कुरुराजेन संयमितुमरचः। ततः स महात्मा दार्शिताविश्वरूपतेजःसम्पात-मूर्छिततमघ्रू कुरूण्हन्ममसेनासनिवेशमनुप्राप्तः। अन्यतो देवः कुमारमविलम्बितं

प्रभिप्रायको प्रवदर्शित किया है इसलिए यह ‘भेदन’ नामक ग्रह्है

अन्य [ग्राचायँ] तो प्रोत्साहनको भेद कहते हैं । जैसे वेङ्कीसंहारमें—“द्रौपदी—नाथ याज्ञसेनोके प्राप्तमानसे उद्दोश्तक्रोध होकर कहीं अपने शरीर [की रक्षाकी]

ग्रोरसे प्रसावधान होकर युद्धभूमिमें न घूमने लगना । क्योंकि शत्रु—सेनामें सावधान होकर ही

जाना चाहिए ऐसा सुनते हैं ।

भोम—हे सुक्रत्रिये ! [तुम डरती क्यों हो] ‘अन्योडन्यास्फाल’ [इत्यादि पिछले श्लोकमें कहे

हुए संग्रामके भीतर विचरने में पाण्डव लोग बहुत निपुरे हैं। इसलिए तुम चिन्ता न करो] ।

इत्यादि [कथन] से, विषण्णणा मनवाली द्रौपदीको क्रोध तथा उत्साहके बीजके श्रत्रुरूप

ही प्रोत्साहन किए जानेसे यह ‘भेद’ [नामक ग्रह्ह] है।

अन्य [ग्राचायँ] तो बीजकी फलोৎपत्तिका श्रवरोध करनेवाले संहत शत्रुग्रोंके फोड़ने

वाले भेदरूप उपायको ही ‘भेदन’ [नामक संध्यङ्ग] मानते हैं ॥४४॥

इस प्रकार ‘भेदन’ नामक ग्रह्हकी चार प्रकारकी व्याख्या उपस्थित की है ।

ग्रह्ह ग्राहे मुखसन्धिक्के नवम ग्रह्ह ‘प्रापरण’ का लक्षण ग्रादि करते हैं ।

(६) प्रापरणा—

ग्रह्ह प्रापरणा [नामक, मुखसन्धिके नवम ग्रह्ह्का लक्षण करते हैं]—

[सूत्र ४६]—सुखकी सम्प्राप्ति प्रापरणा [नामक ग्रह्ह कहलाती] है ।

सुख तथा सुखके कारणकी भली प्रकार ग्रन्वेषरासे होनेवाली प्राप्तिको ‘प्रापरणा’

[नामक संध्यङ्ग कहा जाता] है । जैसे वेङ्कीसंहारमें—

"कञ्चुकी—[प्रविष्ट होकर] कुमार पाण्डवोंके प्रति पक्षपातके कारण रुध होकर कुरुराजने इन भगवान् वासुदेवको पकड़ना चाहा । तब वे महात्मा अपने विश्वरूपके प्रदर्शित

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११६ ] नाट्यदर्पणम् [ क० ४५, सू० १५ दृष्टुमिच्छति ।"

अयं ह्यर्थो भूमिसेनस्य कुरुभिः सह सन्धिंसेद्मापदयेश्चान्तः सुखयतीति । तथा भणितवैचिद्यार्थमज्ञाति कवय एकरमन्नपि सन्धावचतर्यन्त । यथा वेशीसंधारे इदमेवाक्षः पुनर्निबद्धम् । तथाहि—

"चेटी— [ द्रौपदीमुदिश्य सानुनदम् ] भद्रिणि ! परिकुविदो विष्णु कुमारो लक्ष्मीयदिति ।

[मन्त्री ! परिकुपित इव कुमारो लज्जयते । इति संस्कृतम् ]।

द्रौपदी—एवं ता श्रावधीरणा वि मं एसो समासासेदि । ता इध घ्येव दुक्खसुस्सामो दाव नाधस्स वच्चसिदं ।

[एवं तावद्वधीरा अपि मामेषा समाश्वासयति । तदत्रैवोपपाद्य श्रृणुष्मः तावत् नाथस्य व्यवसितम् । इति संस्कृतम् ]।

भीमः— मध्नमि कौरवशतं समरे न कोपाद्, दुःशासनस्य रुघिरं न पिबाम्युरसः ।

सचूचुरायासि गदया न सुयोधनोरू, सन्धिं करोतु भवतां नृपतिः परं न ।।

द्रौपदी— [ सहपर्म ] ध्रुवमुपरंच ईदिसं वयरणं, ता पुणो वि भण । [ जइत्थपइँ हत्थग्गहणं । तथा पत्थपि भण । इति संस्कतम् ]।"

करनेके तेजसे मूर्छित कौरव बलको छोड़कर अपनी सेनाके शिविरमें चले ग्राए । इसलिए देव प्राप्तको [कुमारको] तुरन्त देखना चाहते हैं । [अर्थात् प्राप्तको तुरस्त बुला रहे हैं । ]"

कौरवोंके साथ सन्धि [के प्रयत्न] को समाप्त करनेवाला यह ग्रथं भोमसेनके ग्रन्थः-

करएको प्रसन्न करता है [इसलिए यह प्राप्तपण नामक ग्रह्ण है] ।

उचित-वैचित्र्यके सम्पादनार्थ कविगरण एक ही सन्धिमें भी ग्रह्णोंको दुहरा वेत हैं । जैसे वेशीसंहारमें [मुखसन्धिमें] होइ इस [प्राप्तपण नामक] ग्रह्णको ही दुबारा [इस प्रकारसे] निबद्ध किया गया है । जैसे कि—

"चेटी—द्रौपदीको लक्ष्य करके ग्रानन्दपूर्वक कहती है] हे स्वामिन् ! कुमार [भोमसेन] क्रुपितसे दिखाई देते हैं ।

द्रौपदी—यदि यह बात हो तो [मेरे प्रति उनको] यह उपेक्षा भी मुरक्को सान्त्वना प्रदान करती है । इसलिए हम दोनों यहीं बैठकर नाथके निश्चित्यको सुनें ।

भीम—यदि ग्राप [सहदेव ग्रादि] के राजा साहब [युधिष्ठिर] किसी शर्तपर [कौरवों के साथ] सन्धि कर लें तो क्या मैं क्रुद्ध होकर युध्द भीममें सो कौरवोंका नाश नहीं करूँगा ।

प्रथवा दुःशासनकी छातीका रक्त पीना छोड़ दूँगा । या गदासे दुर्योंधनकी जंघाग्रोंको चूर्ण नहीं करूँगा ।

प्रतिज्ञा कर तो है उसको पूरा करके ही रहूँगा । सन्धिके कारग्ण अपनी प्रतिज्ञाको कमी भी न छोड़ूँगा ।

द्रौपदी— [सहर्ष ] इस प्रकारका [ग्रानन्द-दायक] वचन पहिले कभी नहीं सुना था ।

इसलिए [इस्को] फिर-फिर कहिए ।

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इति द्रौपद्या श्रभिप्रेतार्थप्रतिपादिति ॥

(१०) श्रथ युक्ति:-

[सूत्र ४६]—युक्तिः कृत्यविचारस्था ।

विचारस्था गुणदोषविवेकत: कार्यपर्यालोचनम्‌। यथोदात्तराघवे—

“लद्मण:—

कि लोभेनं विलब्धितः स भरतो येनैतदेवं कृतं, मात्रा स्त्रीलघुतां जाता किमथवा मातैव मे मध्यमा ?

सिध्येतन्मम चिन्तितं द्वितीयमथार्यानुजोऽडसो गुरु;, माता तातकलत्रसहित्यनुचितं मन्ये विधात्रा कृतम्‌ ।”

इयं च युक्ति स्थानान्तरभाविन्यपि तापसवत्सराजे उपक्लेप-परिकरान्तरे निबद्धा हृश्यते। राघवाभ्युदये तथैवारम्भेऽभिग्रथिता। तत्र हि—

“मतिसागर:—यन्‌ पुरा भट्रकर्णा सागरबुद्धिना विभीषणाय कथितं यथा—

इससे द्रौपदीके श्रभिप्रेत श्रर्थकी प्राप्ति कही है [इसलिए यह 'प्राप्तप्रण' नामक सन्ध्यङ्ग का उदाहरण है]।

(१०) युक्ति—

श्रथ युक्ति [नामक, मुख्यसन्धिके दशम ग्रङ्कका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र ४७]—कार्यका विचार करना युक्ति [नामक दशम ग्रङ्क कहलाता] है।

विचारस्था श्रर्थात्‌ गुण-दोषके विवेचन द्वारा कार्यका पर्यालोचन करना

जैसे 'उदात्तराघव' में—

“लक्ष्मण [कहते हैं]—

क्या वह भरत [राज्यके] लोभसे पराभूत हो गए जिससे [रामको वनवास दिलानेका] यह कार्य किया है । श्रथवा क्या मेरी मङ्गली माता [कैकेयी] ही मानमें स्त्रीके समान लघुता को प्राप्त हो गई थीं । [जिसके कारण उन्होंने यह नीच कार्य करवाया]। श्रथवा मेरी सोची हुई ये दोनों ही बातें सिध्द हैं क्योंकि ये मेरे बड़े भाई [गुरु श्रर्थात् भरत] श्रङ्ग हैं । [श्रर्थात् रामचन्द्रजीके श्रङ्गज प्रौर मेरे गुरु भरत कभी ऐसा श्रनुचित कार्य नहीं कर सकते हैं] श्रौर माता [कैकेयी] पिताजीकी पत्नी हैं [इस लिए वे कभी इस गर्हित पापको नहीं कर सकती हैं । इस लिए इन दोनोंके विषयमें सोचना श्रनुचित है । तब फिर यह कार्य हुग्रा कैसे, इसका समाधान करते हैं कि] माजूम होता है कि यह श्रनुचित कार्य देवने ही किया है ।”

इस प्रकार कार्यकी विचाररूप होनेसे यह 'युक्ति' नामक ग्रङ्कका उदाहरण है ।

यह युक्ति [नामक ग्रङ्क मुख्यसन्धियोंमें] ग्रन्थ्य स्थानपर होनेवाली [श्रर्थात् दशम स्थानपर पठित] होनेपर भी 'तापसवत्सराजवृत' में 'उपक्शेप' तथा 'परिकर' के बीचमें [द्वितीय स्थानपर] निबद्ध किया हुग्रा देखा जाता है । इसलिए 'राघवाभ्युदय' में हमने भी उसी प्रकार [उपक्शेप तथा परिकरके बीचमें] प्रतिष्ठित कर दिया है । वहाँपर —

“मतिसागर—स्वामी सागरबुद्धिने जो पहले कभी विभीषणसे कहा था कि—

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१२० ] नाट्यदर्पणम् [ क० ४५, सू० ६० 'सीतानिमित्तको दाशरथितो रावणोऽवध' इति । तस्यार्थस्तु तदेतत्कचापारोपणं बीजमुपस्थि‌तम् । कथितं च मे करइकनाम्ना लड्ढाचार्येण चरितं यथा—'भूमरंडल-स्वेव रावणस्यापि सीतायां प्रेम त्वस्त्येव, किन्तु दोरप्स्पाच्छापरोपे नायात:' । [विमृश्य] तन्नूनमसौ पश्चादर्प सीतामपहृत्यार्ष्यात् ।" इति । (११) श्रृङ्गार विधानम्—

[सूत्र ६०]—विधानं सुख-दुःखाप्तिः द्वयोः सुख-दुःखयोरेकत्र वा पात्रे प्राप्तिः । एकस्यैव वा सुखस्य दुःखस्य वा प्राप्तिः, विधानम् । एकत्रपात्रे सुख-दुःखयोः प्राप्तिर्यथा—मालतीमाधवे—

"माधवः— यदृश्यमस्तिमितमस्तिमितान्यभावम्, श्रानन्दुन्मदनमन्मथविलवनादिभूत् । तस्स्त्रिभिः तद्भुना हृदयं मदीयं, श्वासोच्छ्वासमिव त्यजथमानमास्ते ॥ इत्यनेन सानुरागमालोकनान्माधवस्य सुख-दुःखाप्तिः । श्रनेक्त्र यथा तापसवत्सराजे काञ्चनमाल्या ज्ञातिगृहमवार्त्तीविशेषापदेशान वासवदत्ताया वियोगक्लेशाद्‌हते राजा स्मित्वाऽSह----

'सीताको कारण दशरथ-पुत्रके द्वारा रावणका वध होगा' । उस बातका बीजरूप यह चापारोपण [को प्रसङ्ग] श्री गयौ है । श्रृङ्गार लड्ढा विचारणा करइक नामक मुनिवर ने मुझसे कहा भी है कि—'भूमंडलके [ग्रन्थ सब राजकुलोंके] समान रावण भी सीताको चाहता ही है किन्तु श्रपनो मुजात्रोंके द्वारा पंक कारण चापारोपणमें नहीं श्राया है' । [कुछ सोच-कर] तो निश्चय हो यह वादको सीताका ग्रपहरण करेगा । यह [भी कार्यकी विचारणा रूप होनेसे युक्ति नामक श्रृङ्गारका उदाहरण है] (११) विधान

ग्रब विधान [नामक, मुग्धसंधिके ग्यारहवें श्रृङ्गारका लक्षण करते हैं]— [सूत्र ६०]—सुख-दुःखकी प्राप्ति 'विधान' [कहलाती] है । सुख तथा दुःख दोनोंकी एक पात्रमें ग्रथवा ग्रनेक पात्रोंमें प्राप्ति । ग्रथवा सुख ग्रौर दुःखमेंसे किसी एककी ही प्राप्ति [दोनों हो] विधान [नामक श्रृङ्गारके भीतर समाविष्ट हो जाते] हैं । एक हो पात्रमें सुख-दुःख दोनोंकी प्राप्ति [का उदाहरण] जैसे 'मालतीमाधव' में है—

"माधव— जो [मेरा हृदय मालतीकी उपस्थितिमें] विस्मयसे कुण्ठित, ग्रनन्य समस्त समय [मालतीके वियोगकालमें] श्रृङ्गारोंसे जला हुग्रा—सा वेदनामय हो रहा है ।" इससे ग्रनुरक्ता मालतीको देखकर माधवको सुख ग्रौर [उसके वियोगमें] दुःखकी प्राप्ति [एक ही पात्रमें पाई जाती है]।

प्राप्ति [एक ही पात्रमें पाई जाती है]। भिन्न-भिन्न पात्रोंमें [सुख ग्रौर दुःखकी प्राप्तिका उदाहरण] जैसे 'तापसवत्सराज' में पितृगृहके समाचार विशेषके बहानेसे काञ्चनमाल्या द्वारा वासवदत्ताके वियोग दु:खकी चर्चा करने पर राजा मुस्कराकर कहते हैं—

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का० ४५, सू० ६० ] प्रथमो विवेक: [ १२१

"हस्ती' प्रेमभरालसां मथि मुहुर्विन्यस्य लज्जावतीं, कालस्याहमिहासहेत्स्यविरतं' प्रत्यर्पयन्ती मनः । जाता देविग तदा ममापनयने हेतुस्त्वमेवाधुना किं सन्देशनवीभत्सकृतदौतिक्येष्टा०धिकं ताम्यसि ॥"

अत्र च वासवदत्ताया: प्रवासाभ्युपगमादु दुःखम् । वत्सराजस्य चाविदित-प्रवासवृत्तान्तमय सुखम् ।

एकस्य सुखस्य प्राप्तिर्यंथा रत्नावल्याम—

"कञ्चनमाले पिहितावेह वसोयमूले भयवतं पञ्जुन्तं । [इत्युपक्रमे] काञ्चनमाले प्रतिष्ठापयाशोकमूले भगवान्तं प्रहसुन्तम् । इति संस्कृतम् ]

राजा -कुसुमसुकुमारमुर्तिन्दृढतां नियमेन तनुंतरं मध्यम् । श्राभासि मकरकेतुः पाशर्वस्था चापपुष्टिरिव ।।

इत्यारम्य, 'वासवदत्ता राजानं पूजयति' इति यावत् । एकस्य दुःखस्य यथास्मदुपग्ने निर्भरयभीम-नाम्नि न्यायोगे—

"भीम:---

ग्रन्थायैककुजुः शठव्रतजुषो येडस्माकमत्र द्विषः, ते नन्दन्ति मटे हनन्ति महतीं गच्छन्ति च श्लाघ्यताम् ।

"मेरी धोर बार-बार प्रेमभरी हस्ती डालती हुई, लज्जायुक्त, धोर 'में श्रधिक विलम्बको सहन नहीं कर सकती हूं' इस प्रकार [ग्रणपन] मन समर्पित करती हुई, हे देविग ! उस समय तुम ही मेरे हटानेके कारण बनीं तो फिर सन्देशसे पितृगृहकी उत्कण्ठाके नवीगन हो जानेके इस समय क्यों दुःखी हो रही हो ?"

यहां वासवदत्ताके प्रवास स्वीकार करनेके कारण दुःख है । श्रौर प्रवासका वृत्तांत न विदित होनेके कारण वत्सराजको सुख है । [इस प्रकार भिन्न-भिन्न पात्रोंमें श्रलग-श्रलग सुख-दुःखकी प्राप्तिरूप विधानका यह उदाहरण है ।]

एक सुखकी प्राप्ति [का उदाहरण] जैसे रत्नावलीमें—

"काञ्चनमाले ! प्रशोक नींचे भगवान् कामदेव [प्रहसुन्तं] को स्थापित करो । [इसके प्रसङ्गमें—]

राजा -कुसुमोंके समान सुकुमार देहवाली श्रौर व्रत-पालनके कारण श्रौर भी श्रधिक क्षीण मध्यसे युक्त तुम मकरकेतु [कामदेव] के पास रखी हुई चापपुष्टिके समान प्रतीत होती हो [जोभित होती हो] ।

यहांसे लेकर 'वासवदत्ता राजाकी पूजा करती हैं' यहां तक केवल एक सुखकी प्राप्ति का वर्णन होनेसे यह विधान नामक श्रङ्गका उदाहरण है ।

केवल दुःखकी प्राप्ति [का उदाहरण] जैसे हमारे बनाये 'निर्भरयभीमसेन' नामक व्यायोगमें [भीम कहते हैं]—

भीम—केवल ग्रन्थायपर श्रारूढ, दुष्टताका व्रत धारण किए हुए, यहां हमारे जो शत्रु हैं, वे प्रानन्द कर रहे हैं, गर्व धारण किए फिरते हैं श्रौर सब जगह प्राशा प्राप्त कर रहे हैं । श्रौर [हम] जो न्यायका श्रवलम्बन कर रहे हैं श्रौर अत्यन्त सरलताका धारणा कर रहे हैं ।

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१२२ ]

नाट्यदर्पणम्

[ का० ४५, सू० ६१

ये तु न्याय्यपरा: पराजयवधरास्ते पश्यतामी वय' नीचै: कर्मकृत: पराभववृत्तस्तनाश्च वर्त्तामहे ।।" सुखस्य सुखहेतौश्च ज्ञानवेष्यरूपं 'प्राप्ति:' सन्निहितसुखात्मकं च एकपात्र- गतसुखात्मकं च विधानमिति भेद: ।

(११) श्रथ परिभावना--

[सूत्र ६१]—विस्मय: परिभावना ॥ ४५ ॥

जिन्हासातिशयेन किंमेतदिति कौतुकानुबन्धो विस्मयः; परिभावना! यथा नागानन्दे—

"[मलयवतीं हृष्ट्वा] नायक:—

स्वर्गस्त्री यदित त्कृता‌र्थंसमभवं:सुहेतुं हरे:;, नागी चेत्न रसातलं शशश्वता शून्यं मुखेडस्या: स्थिते । जातिन: सकलान्यजातिजयिनी विद्याघरी चोदिता' स्मान्। सिद्धान्वयजा यदि त्रिसुवनं सिध्दा: प्रसिद्धास्ततः ॥"

किए हैं सो वे हम देखो [रसोदया प्रादिके] नीच कमंको कर रहे हैं श्रो तिरस्कार प्राप्त कर रहे हैं ।

मुखसन्निषके 'प्रापरण' नामक ग्रन्थकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। उसमें भी 'प्रापरण' सुखसामप्राप्तिके हो उसका लक्षण बतलाया गया था। वहाँ 'विधान' ग्रन्थमें सुखप्राप्तिके विधान ग्रन्थका लक्षण बतलाया । तब इन दोनोंमें परस्पर क्या भेद है यह प्रश्न उपस्थित हो सकता है । इस लिए ग्रन्थकारने श्रागली पंक्तिमें इन दोनोके भेदको इस प्रकार प्रदर्शित किया है कि—

सुख श्रो सुखके कारणका ग्रन्थवेचारा जिसमें किया जाय वह 'प्राप्ति' [श्रर्थात प्रापरण नामक ग्रन्थ] श्रो [ग्रन्थवेचार रूप नहीं किंतु] सन्निहित सुख स्वरूप तथा एक पात्र गत 'सुखात्मक' विधान होता है यह 'प्रापरण' तथा विधान इन दोनों ग्रन्थोंका भेद है ।

(१२) परिभावना—

ग्रन्थ परिभावना [नामक, मुखसन्निषके वारहवं ग्रन्थका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र ६१]—विस्मय [का नाम] 'परिभावना' है ।

जिनासाके श्रातिशयके कारण 'यह क्या है' इस प्रकारका ग्राप्रह, विस्मय [कहलाता] है। वही 'परिभावन' [नामक ग्रन्थ कहा जाता] है । जैसे नागानन्दमे—

"[मलयवतीको देखकर] नायक [जीमूतवाहन कहा है कि]—

[यह मलयवती] यदि स्वर्गकी स्त्री है तो इनद्रके सहलों नेत्र कृतार्थ हो गए [समभो],

यदि यह नाग जातिकी स्त्री है तो इसके मुखके विधमान रहते पाताललोक चन्द्रमासे शून्य नहीं [कहा जा सकता] है । यदि यह विद्याधरी है तो निश्चय हो हमारी [विद्याधर] जाति श्रनन्य जातियोंसे श्रेष्ठ है श्रो यदि यह सिद्धवंशमें उत्पन्न हुई है तो श्रव सिद्ध लोग त्रिभुवन में प्रसिद्ध हो जायेंगे [यह समभो] ।

इसमें मलयवतीके सौन्दर्यातिशयको देखकर जीमूतवाहन श्रपने विस्मयको प्रकट कर रहा है श्रत: यह 'परिभावना' नामक ग्रन्थका उदाहरण है ।

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का० ४६-४७, सू० ६२ ] प्रथमो विवेक: [ १२३

यथा वा रोहिषीमृगाड्काभिधाने प्रकरणे प्रथमेऽड्के—

"मृगाड्क: [सोत्कर्षैक]—

सा स्वर्गलोकललनाजनवर्ष्मिका वा,

दिव्या पयोधिदुहितु: प्रतियातना वा ।

शिल्पश्रियामथ विघे: पद्मनितम्बा वा,

विश्वत्रयस्यनियनसेत्ट्टनोफला वा । ॥ ४५ ॥

[२] अथ प्रतिमुखसन्ध्याङ्गानुयिशति—

[सूत्र ६२]—विलासो घूननं रोध: सान्त्वनं वर्षसंहृति: ।

नर्मे नर्मयुतिस्ताप: स्यु:रेतानी यथारुचि १४६॥

पुष्पं प्रगमनं वज्रमुपन्यासोऽपरस्परेषाम् ।

पट्चावश्यमथाङ्गानि प्रतिमुखे त्रयोदश १४७॥

अथवा जैसे रोहिषीमृगाड्क नामक प्रकरणके प्रथम श्रङ्कमें—

"मृगाड्क [उत्कृष्टभावक कहता] है।

वह [रोहिणी] या स्वर्गलोककी स्त्रियोंकी [वर्णाङ्का] चित्रित करनेवाली लेखनी [या 'वर्णाङ्का' कस्तूरी] है । अथवा सागरकन्या [पुत्री] लक्ष्मीकी दिव्य प्रतिरुप [प्रतियातना तस्वीर] है ।

अथवा विधाताके रचना-कौशलकी चरम सीमा है अथवा तीनों लोकोंके [समस्त प्राणियोंके] नेत्रोंकी रचनाका फल है ।"

इसमें रोहिणीके सौन्दर्यातिशयके कारण उत्पन्न विस्मयको मृगाड्क[दूने] प्रकट किया है । इसलिए यह मुखसन्धिके 'परभाव' नामक बारहवें श्रङ्गका उदाहरण है ।

इस प्रकार यहाँ तक ग्रन्थकारने मुखसन्धिके बारह श्रङ्गोंके लक्षण तथा उदाहरण दिखलाकर उनका विस्तारपूर्वक विवेचन कर दिया है । इसलिए अब इसका उपसंहार करते हुए श्रागली पंक्ति लिखते हैं—

ये बारह मुखसन्धि श्रङ्ग होते हैं ॥४५॥

[२] प्रतिमुखसन्धिके तेरह श्रङ्ग—

अब इसके श्रागे प्रतिमुखसन्धिके [तेरह] श्रङ्गोंका उद्देश [नाममात्रेए कथन] करते हैं—

[सूत्र ६२]—(१) विलास, (२) घूनन, (३) रोध, (४) सान्त्वन, (५) वर्षसंहार, (६) नर्म, (७) नर्मयुति श्रौर (८) ताप ये [ग्राठ श्रङ्ग प्रतिमुखसन्धिमें] यथारुचि रखे जा सकते हैं । [प्रर्थात् उनका रखा। जाना श्रपरिहार्य नहीं है । कथा-वस्तुकी उपयोजिताके श्रनु-

सार उनको रखा भी जा सकता है श्रैर नहीं भी रखा जा सकता है । १४६।

[सूत्र ६२]—(९) पुष्प, (१०) प्रगमन, (११) वज्र, (१२) उपन्यास श्रौर (१३) उप-

सर्पगा ये पांच [श्रङ्ग प्रतिमुखसन्धिमें] श्रावश्यक हैं । इस प्रकार प्रतिमुखसन्धिमें कुल तेरह श्रङ्ग होते हैं ।१४७।

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१२४ ] नाट्यदर्पणम् [ का० ४, सू० ६३ 'यथारूचि इति वृत्तवैचित्र्यानुरोधेनात्र भववत, न सर्वत्र च । पुष्टपार्द्धान्त पुनः पञ्चावश्यं प्रतिमुखसन्ध्यौ भवन्त्येव । तदोदशांशयेतार्न हृतिमुख एव सुतरां निर्वन्धमन्त्रे । उद्देशक्रमश्च निवर्हणेऽपु नापेक्ष्यपीय इति ॥४६-४९॥ (९) ग्रंथ विलास:- [सूत्र ६३]---विलासो नु-स्त्रियोरिहा, नृत्यितोः परस्परसीला रतिभिलाषः । यथाभिज्ञानशाकुन्तले मुखसन्ध्यावुपलब्ध्यायां नायिकायां प्रतिमुखे तादृश्यो राज्ञो विलासः । तत् तत्र हि राजा ग्राह--- "कामं प्रिया न सुलभा मनस्तु तद्राकदर्शनाश्वासि । अकृतार्थ्यदपि मनसिजे रतिमुखयप्रार्थना कुरते ॥ [स्मितं कृत्वा] एवमात्माभिग्रायसम्भावितेऽर्जुनाच्चतत्स्वर्यतः प्रार्थयिता विप्रलभ्यते । कुलतः--- 'यथारुचि' इसका यह अभिप्राय है कि कथावस्तुकी विचित्रताके अनुसार [ये ग्राठ प्रतिमुखसन्धियोंमें] होते भी हैं श्रौर नहीं भी हो सकते हैं । [अर्थात् उनकी स्थितिप्रतिप्रहास्य नहीं है] । शेष पुष्ट श्रादि पाँच [ग्राह] तो प्रतिमुखसन्धिंमें अवश्य होते ही हैं । ये तेरहों ग्राठ प्रतिमुखसन्धियोंमें ही सन्निविष्ट होते हैं [ग्रन्थ सङ्घयोंमें प्रयुक्त नहीं होते हैं] । इनकी रचनाओंमें उद्देशक्रम ग्रप्रकटित नहीं होता है । [अर्थात् जिस क्रमसे यहाँ गिनाए गए हैं उसी क्रमसे इनकी रचना हो यह श्रावश्यक नहीं है] ॥४६-४७॥

इस प्रकार ४६-४७ दो कारिकाग्रोंमें प्रतिमुख सन्धिके तेरह ग्राठोंके नाम गिनाकर तथा उनमेंसे पाँचकी ग्रनिवायं स्थिति एवं ग्राठोंकी ऐच्छिक स्थितिका उल्लेख करके ग्राठ उनके लक्षण ग्रादि कमः ग्रारम्भ करेंगे । इनमें सबसे प्रथम ग्राठ 'विलास' है । इसलिए सबसे पहिले उसीका लक्षण करते हैं । (९) विलास— ग्राठ [प्रतिमुखसन्धिके ग्राठोंमेंसे प्रथम ग्राठ] 'विलास' [का लक्षण करते हैं]— [सूत्र ६३]---स्त्री श्रौर पुरुषकी [परस्पर सम्मिलनकी] इच्छा [अर्थात् रतिको कामना [विलास नामक, प्रतिमुखसन्धिका प्रथम ग्रांग कहलाती] है ।

पुरुष तथा स्त्रीकी परस्पर [सम्मिलनकी] इच्छा श्रर्थात् रतिको कामना [विलास नामक ग्राठके रूपमें कही जाती] है जैसे श्रमिज्ञानशाकुन्तलमें मुखसन्धियों [प्रथम ग्राठोंमें] नायिका शकुन्तलाके प्राप्त हो जानेपर प्रतिमुखसन्धिंमें [द्वितीय ग्राठोंमें] उसके विषयमें राजाका [रति विषयक] श्रभिलाष विलास । उसमें राजा [दुष्यन्त ग्रापने इस श्रभिलाषको व्यक्त करते हुए] कहते हैं--- "प्रिया [शकुन्तला इस समय] भले हो प्राप्त न हो किन्तु मेरा मन तो उसके भावको देखकर विचलित है [कि वह मुझको प्रेम करती है इसलिए जल्दी या देरसे वह मुझको प्राप्त होगी] । क्योंकि कामदेवके कृतार्थ न होनेपर भी [अर्थात् सम्भोगाभिलाषके पूरां न होने पर भी] दोनों प्रोरका प्रेम स्वयं रति [एक ग्रपूर्व ग्रानन्द] को प्रदान करता है । [फिर मुस्कराकर राजा कहता है]---इस प्रकार ग्रापने मनके श्रभिप्रायके श्रनुसार

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प्रथमो विवेक:

स्तनभयं वोच्चितमन्यतो डपि नयने यत्न प्रेरयन्न्या तया, यातं यतुच नितम्बयोग्रु रुतया मन्दं विलासादिव । मा गा इत्युपरुद्धया यदप तत् साश्रुयमुक्ता सखी, सर्वे किल तत् मृगपाशगमहो काम: स्वतां पश्यति ॥'

इत्यादिना राज्ञो रतिसम्मीहा ।

यथा वा नलविलासे तृतीयाङ्के—

"दमयन्ती-[राजानमवलोक्य स्वगतम] कहमेस सयं भयवं पञ्चवाणो ? श्रहवा वरायस्स व्यंगस्स कुदो ईदिसो व्यंगसोहगपदभ्भारो ? ता कदसो दमयन्तीए व्यंगचङ्गिमा ।" इति ।

[कथमेष स्वयं भगवान पञ्चबाण: ? श्रथवा वराकस्यानङ्गस्य, कुत ईदृशोऽङ्ग-सौभाग्यप्राभार:? ! तत् कृतार्था दमयन्त्या अङ्गचाङ्गिमा । इति संस्कृतम] ।

यथा वारसदुपहने कौमुदीमित्राङ्गनावन्न प्रकरणे तृतीयेऽङ्के—

"मित्राङ्गना:- प्रिये ! वक्त्रे शीत रुचि-वृचांसि च सुथा हृष्टिश्च कादम्बरी, विस्मोष्ठ: पुनरेष कौस्तुभमरसि: मूर्तिश्च लघ्मीस्तव ।"

इत्यजनकी चित्तवृत्तिकी कल्पना करके प्रेमी जन स्वयं अपनेको धोखा देते हैं । क्योंकि [अपने मनकी भावनाके श्रनुसार वे यह समभते लगते हैं । कि]—

[उनकी प्रेमपात्रके] दूसरी ओर दृष्टि डालते हुए भी जो मधुरताके साथ देखा [वह शायद मेरी ओर ही देखा था], नितम्बोंकि भारके कारण जो विलासपूर्वक धीरे-धीरे गमन किया, श्रो [सखीके द्वारा] जाम्रो नहीं इस प्रकार रोके जानेपर जो नाराज होकर [उस सखी को] फटकारा था कहा था वह सब मेरे हो कारण था । श्राश्चर्य है कि काम [या कामी पुरुष अपने प्रेम पात्रके सारे कार्योंमें श्रपनां सम्बन्ध] ही देखता है ।

इत्यादिसे राजा [नलुष्यन्त] की रतिकी इच्छा [प्रदर्शित की गई है । श्रत: यह प्रति-मुखसन्धिके विलास नामक प्रथम श्रङ्कका उदाहरण है]।

श्रथवा जैसे नवविलासके तृतीय श्रङ्कमें—

"दमयन्ती-[राजाकी देखकर श्रपने मनमें कहती है]—श्रच्छा यह तो स्वयं भगवान् कामदेव [ग्रा गए] हैं । श्रथवा [वह कामदेव तो शरीर रहित ग्रनङ्ग है] । उस विचार-

ग्रनङ्गके पास इतने देहसौभाग्यकी सम्पत्ति कहाँ हो सकती है [? इसलिए यह कामदेव नहीं है] । इसलिए [निश्चय ही यह तो] राजा नल हैं ] तब तो दमयन्तीका [प्रार्थना मेरा] श्रङ्ग-सौन्दर्य कृतार्थ हो गया ।

इसमें राजा नलके प्रति दमयन्तीकी रतिकी प्रदर्शन होनेसे यह भी 'विलास' नामक प्रतिमुखसन्धिके प्रथम श्रङ्कका उदाहरण है

श्रथवा जैसे हमारे बनाये हुए 'कोमुदी-मित्राङ्गनावृत' नामक प्रकरणमें तृतीय श्रङ्कमें—

मित्राङ्गना- प्रिये ! [तुम्हारा] मुख चन्द्रम:, [तुम्हारी] वाणी श्रमृत, [तुम्हारी] दृष्टि कादम्बरी [मदिरा], [तुम्हारी] श्रधरोष्ठ कौस्तुभमरसि: श्रो [तुम्हारी] मूर्ति लक्ष्मी रूप है । [इस सबको देखकर ऐसा

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श्रद्धालुयुं गपदुं विलोकितुमयं स्वापत्यजातं चिरात्, एकस्थं विरच्य कुन्तरदतने त्वामर्ष्टवः सूतवान् । प्रतिमुखस्य चादावेवेदमङ्ग' निवन्धननীয়म् । य एवं मुखे रस उपचीयते तस्यैव स्थायी, विभावानुभावव्यभिचारिभिः पोषणीयः । कामफलेच रूपके मुखसन्धौ प्रकान्तः शृङ्गारः प्रतिमुखे विलासेन स एवं विस्तार्यते । विलासप्रकाशकान्येव चेत रास्यज्ञाने निवन्धननীয়ानि ।

प्रतीत होता है कि] श्रपना सारी सन्तानोको एक साथ देखनके लिए उत्सुक [श्रद्धालु] सागर ने बहुत दिनोके बाद उन सबको एक साथ मिलाकर तुमको उत्पन्न किया है ।

यह भी प्रतिमुखसन्धिके विलास नामक प्रथम ग्रङ्ग का उदाहरण है ।

[इसके साथ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि] जिस रसका मुखसन्धिमें उपेक्षेप किया गया है उसके स्थायिभावको [प्रतिमुखसन्धिमें] विभाव, श्रनुभाव तथा व्यभिचारिभावोके द्वारा स्पष्ट किया जाना चाहिए ! कामफलवाले रूपकमे मुखसन्धिमें शृङ्गार-रसका उपेक्षेप होता है । इसलिए प्रतिमुखसन्धिमें विलासके द्वारा उसका विस्तार किया जाता है । श्रौर विलासके प्रकाशक हो [प्रतिमुख-सन्धिके] ग्रन्थ ग्रङ्गोकी रचना करनी चाहिए ।

'विलासो नु-स्त्रियोरीहा' इस लक्षणके घ्यानुसार पुरुष श्रौर स्त्रीकी इच्छा या रतिका प्रदर्शित करना 'विलास' कहलाता है । यह 'विलासो' नामक ग्रङ्ग प्रतिमुखसन्धिका प्रथम ग्रङ्ग है । इसलिए प्रतिमुखसन्धिके प्रारम्भमें हो उसका निवद्ध करना चाहिए । वेङ्गीसंहार नाटकके रचयिता भट्टनारायणाने अपने नाटककी रचना करते समय नाट्यके नियमोका पालन कठोरताके साथ करनेका यत्न किया है । इसलिए उन्होंने अपने नाटकके द्वितीय ग्रङ्गमें प्रति मुखसन्धिके प्रारम्भमें दुर्योधन तथा भानुमतीके विलासका वरर्णन बहुत विस्तारके साथ किया है ।

किन्तु उत्तरवर्ती सभी श्रालोचकोंने भट्टनारायणके इस कार्यको ग्रनुचित ठहराया है । इसका कारण यह है कि वेङ्गीसंहार वीररस-प्रधान नाटक है । उसमें इतने ग्राधिक विस्तारके साथ शृङ्गाररसका प्रदर्शन उचित नहीं । इसलिये 'प्रकाण्डे प्रथममू' नामक रसदोषके उदाहरणके रूपमें सर्वत्र वेङ्गीसंहारका यह प्रकरण ही प्रस्तुत किया गया है । यहाँ भी ग्रन्थकारने उसके ग्रन्थोचित्यकी श्रोर सङ्केत किया है । उन्होंने इस ग्रन्थोचित्यका कारण यह बतलाया है कि मुखसन्धिमें जिस रसका उपेक्षेप किया जाय, उसको पोपण प्रतिमुखसन्धिमें विलास श्रादि ग्रङ्गोके द्वारा किया जाना चाहिए । शृङ्गाररस प्रधान नाटकोंमें मुखसन्धिमें शृङ्गाररसका उपेक्षेप किया जाता है, इसलिए प्रतिमुखसन्धिमें विलास नामक ग्रङ्गके द्वारा उसका ही पोपण किया जाना उचित है ।

किन्तु वीररस प्रधान नाटकके प्रतिमुखसन्धिमें शृङ्गाररसका पोपण प्रधान रसके विपरीत हो जाता है श्रतः दोपाधायक है । इसलिए वेङ्गीसंहारका यह प्रकरण ग्रनुचित है । ग्रन्थकारका यह भी कहना है कि यद्यपि प्रतिमुखसन्धिके विलास ग्रङ्गका लक्षण 'नु-स्त्रियो-रीहा' किया गया है किन्तु उसका ग्रभिप्राय केवल सम्भोगकी इच्छा या शृङ्गार-भावना ही

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का० ४५, सू० ६४ ] पथमो विवेक: [ १२७

वीरादिरसप्रधानेष्वर्थफलेऽपि रूपेषु पुनरुत्साहादिसम्प्रदिष्यो नृ-स्त्रियोरिहास- ठ्यापारो विलासः। यस्तु वेषीसंहारो भानुमत्या सह दुर्योधनस्य दर्शतो रस्य- भिलाषरूपो विलासः, स नायकस्य तादृशेऽवसरेऽनुचितः। यदाह— सन्धि-सन्ध्यङ्घटनं रसबन्धयवपेक्षया । न तु केवलशास्त्रार्थसस्थितिसम्पादनेच्छया ॥इति ॥

(२) श्रथ धूननम्—

[सूत्र ६४]—धूननं साम्नानादरः। साम्नि श्रनुनये श्रनादरो मनागनाहातिः। नत्क्रोड़ाल्पार्थत्वात् । यथा पार्थिविजये चित्रसेनेऽत संयते दुर्योधने सति— "वत्स भीमसेन ! श्रय' स कालः शूराणां यत्र बन्धुपु । श्रापदूगतपरित्रायाम, श्रपूर्वींङ्गनुनयक्रमः ॥

नहीं श्रपितु प्रकृत रसके श्रनुकूल स्त्री-पुरुषकी इच्छा यह श्रथ्य करना चाहिए । वीररस-प्रधान नाटकमें 'विलास' श्रङ्गमें वीररसेके श्रनुकूल स्त्री-पुरुषोंकी इच्छाका वर्णन कर वीररसको सम्पुष्ट करना चाहिए । श्रौर उसके श्रनुकूल ग्रन्थ ग्रङ्गीकी भी रचना करनी चाहिए । भट्ट- नारायणने इस सिद्धान्तको नहीं समझा है, इसीलिए वे इस प्रकारकी भूल कर बैठे हैं । इसी बातको ग्रन्थकार श्रागले ग्रनुच्छेदमें निम्न प्रकार लिखते हैं—

वीर श्रादि रसप्रधान श्रथ्यबाले रूपकोंमें तो उत्साह श्रादिका पोषण करनेवाला स्त्री- पुरुषका इच्छा रुप व्यापार विलास [पदसे गृहीोत] होता है । इसलिए 'वेघीसंहार' में जो सुयोधनके साथ भानुमतीका रत्यभिलाष दिखलाया है वह उस प्रकारके [युद्धकी तैयारी करने योग्य] समयमें नायकके लिए श्रनुचित है । जैसेकि [धन्यालोककारने] कहा है कि— संधि तथा संधियोंके श्रङ्गोंकी रचना रसप्रयोगके श्रनुसार करनी चाहिए । केवल शास्त्रकी मर्यादाकी रक्षाकी इच्छासे ही नहीं करनी चाहिए ।

इस वचनसे ऐसा भ्रम हो सकता है कि शास्त्र-स्थिति श्रौर रस-स्थितिमें विरोध हो सकता है । वेघीसंहारकारने शास्त्र-स्थितिका पालन करनेकी इच्छासे ही दुर्योधन श्रौर भानु- मतीके रत्यभिलाषका वर्णन विलास श्रङ्गमें किया है । किन्तु यहां ग्रन्थकारने यह दिखलाया है कि वेघीसंहारकारने शास्त्र-स्थितिको ही नहीं समझा है । उन्होंने जो रत्य- भिलाषका वर्णन किया है वह शास्त्रीय मर्यादाके श्रनुकूल नहीं प्रतिपादित किया गया है ।

(२) धूनन श्रथ धूनन [नामक प्रतिमुखसन्धिके हितीय श्रङ्गका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र ६४]—शांति-वचनोका श्रनादर करना धूनन [कहलाता] है । साम श्रर्थात् श्रनुनय [वचनों] में श्रनादर श्रर्थात् थोड़ी-सी श्रनास्था [धूनन कहलाता है]। नजके श्रल्सार्थक होनेसे [मनागनाहातिः यह श्रथ्य किया है]। जैसे 'पार्थिविजय' में चित्रसेनके द्वारा दुर्योधनके पकड़ लिए जानपर — युधिष्ठिर [कहते हैं]— हे वत्स भीमसेन ! यह वह समय [श्रा गया] है जवकि श्रपने बन्धुग्रोंसे नाराज हुए, शूरोंका प्राप्त्तिमें पड़े

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भीमसेनोऽपि दुर्योधनं प्रति युधिष्ठिरस्यानुनयमगृह्णात्— "कोऽयमने कविधापकारकारिया: कौरवानुद्दिश्योऽयं स्यात्प्रतिभाव: ?" इति । केचिदू धूननमरतिमाहुः । तच्च रोघनेव संगृहीतमिति । (३) श्राथ रोघः—

[सूत्र ६५]—रोघोद्त्ति:— श्रतिः— खेदो व्यसनमित्रोषाद् रोगः । यथा देवीचन्द्रगुप्ते— "राजा [चन्द्रगुप्तमा]— तवदु:खस्यापनेतुं सा शतांशोनापि न क्षमा । श्रुवदेवी—[सूत्रधारीमुख]— हृदजे इयं' सा ईदृशी श्राजदुत्स्सस करुपापराहीनता । इति संस्कृतम्] [हृदजे ! इयं' सा ईदृशी झ्रार्य पुत्रस्य करुपापराधीनता । इति संभ्रतम्] सूत्रधारी—देवी ! पंडति चंद्रमंडलाड् वि चुलुलीड् किं एतु करिम्हु ! [देवी ! परन्तु चन्द्रमंडलादपि उल्काः । किमत्र कुर्मः ? इति संभ्रतम] राजा—सचमुकारोपितप्रेम्णा त्वदर्थे यशसा सह । परित्यक्ता मया देवी जनौडय' जन एव मे ॥

हुए [बंधुओं] की रक्षा करने रूप [उनको मनाने]का कोई ग्रपूर्व श्रतुनय प्रकार [प्रदर्शित किया जाता] है ।" [ युधिष्ठिर द्वारा इस प्रकार दुर्योधनको छुड़ाने के लिए प्रेरित किए जाने पर ] भीमसेन भी दुर्योधनके प्रति युधिष्ठिरके श्रतुनयको ग्रस्वीकार करते हुए कहते हैं — प्रनेक प्रकारसे ग्रप्रकार करनेवाले कौरवोंके प्रति ग्रप्रकी यह दया कँसी है ?" इसमें भीमसेन युधिष्ठिरके शान्तिवचन या श्रतुनयका तनिक ग्रनादर-सा करते हैं श्रत: यह 'धूनन' नायक ग्र्रङ्गका उदाहरण है । कोई [ग्राचार्य] श्र्रप्तरति [खेद या दु:ख] को 'धूनन' कहते हैं । [कितु यह उचित नहीं है । क्योंक] वह तो रोघ [नामक ग्र्रङ्गले ग्र्रङ्ग] में ही संगृहीत हो जाता है । (३) रोघ—

[सूत्र ६६]—श्रप्रति [का नाम] 'रोघ' है । श्रत: 'रोघ' [नामक प्रतिमुखसंधिके तृतीय ग्रङ्गका लक्षण करते हैं]— प्रराति श्रथातु खेदो या दु:खं [प्रकट करना] इति श्रवरोधके कारणं 'रोघ' [कथयति] है । जैसे देवीचन्द्रगुप्तमें राजा [चन्द्रगुप्तसे कहता है]— "[वह तुम्हारे दु:खको घातांशमें भी दूर करनेमें समर्थ नहीं है । श्रुवदेवी [सूत्रधारोसे कहती है]— श्रदारे ! झ्रार्यपुत्रकी यह कँसी करुणा-पराधीनता है। सूत्रधारी—देवी ! चन्द्रमंडलसे भी उल्कापात होता है । इसमें हम क्या करें ! राजा—सुममें श्रापने प्रेमको स्थिर करनेवाले मैंने तुम्हारे लिए यशके साथ-साथ देवी का भी परित्याग कर दिया । श्रौर यह [प्रजा] जन तो मेरे [प्रजा] जन ही हैं [उनके प्रति- त्यागकी तो बात हो क्या है]

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का० ४१, सू० ६४ ] प्रथमो विवेक: [ १२६

ध्रुवदेवी— ‘ग्रहं पि जीविंदं परिचिचयंती पहमयरं घ्येव तुमं परिच्छयं ।” [ग्रह्मपि जीविते परित्यजन्ती प्रथमतरमेव त्वां परित्यज्यामि ।

इति संस्कृतम् ]

व्यत्र स्त्रीवेषनिहु ते चन्द्रगुप्ते प्रियवचने: स्त्रीप्रत्ययान् ध्रुवदेव्या गुरुंन्यु- सन्तापरुपस्स ठ्यसनस्य सम्प्राप्ति: यथा वा सत्स्यहिंसनद्रे—

‘राजा—देवी ! श्रवणमुखस्स मद्धच्चनम् । श्रत्रैव तिष्ठ । श्रशिशित्तपादचारान न श्वर्यति भवती कमलिं दर्भांकुरविधुरासु व्नवसुन्धरासु सुतारा—जं भोदि तं भोऊ । ग्रहं गमिस्से । [यदि भवति तद् भवतु । ग्रहं गमिष्यामि । इति संस्कृतम् ]

राजा—[कुलपति प्रति] भगवन् ! त्यजन् हेम्नो लच्चं चतुरुद्धिकाडर्ची च वसुधां, सुधाम्भोभि: स्नानार्द्राप समधिंका प्रीतिमभजम् ।

सवत्सामेतां तु प्रवसनपरां वीदय दयितां, इदानीन मंन्येडहं डवलदनललीढं वपुर् ददः ॥ इति ।

ध्रुवदेवी—मैं भी श्रापने जीवनका परित्याग करती हुई उससे पहले ही तो तुमको छोड़ गयी ।

यहाँ चन्द्रगुप्तके स्त्री-वेषमें छिपे होनेसे ध्रुवदेवियोंको [उसमें वास्तविक] स्त्री होनेके विवासके कारण [ग्रपनते ग्रन्य स्त्रीके प्रति राजाकी श्रासक्तिको देखकर ] ग्रत्यन्त दुःख श्रौर संताप रुप ठ्यसनकी प्राप्ति हो रही है [इस लिए रोष नामक श्रंगका उदाहरण है] ।

ध्रुव स्वामिनी मगध नरेश रामगुप्त की पत्नी है । रामगुप्त बड़ा कापुरुष है । शत्रुके दबावसे वह श्रपनी प्रियतमाको शत्रुको देनेके लिए तैयार हो गया था । चन्द्रगुप्त इस श्रपमान को सहन नहीं कर सका । उसने स्वयं स्त्रीका वेष धराकर शत्रुके पास जाकर श्रपमानका बदला लेनेका निश्चय किया । इस प्रसंगमें स्त्री-वेषमें उपस्थित उसी चन्द्रगुप्तके साथ राजा रामगुप्तका वार्तालाप हो रहा है । ध्रुव स्वामिनिको यह रहस्य पता नहीं है । इसलिये वह स्त्री बेषधारी चन्द्रगुप्तको दूसरी स्त्री समझकर दुःखी हो रही है । इसीलिए इसे रोधके उदा- हरएा रुपमें प्रस्तुत किया गया है ।

र्रथवा जैसे सत्यहरिश्चन्द्र’ में—

‘राजा—देवी ! मेरी बात मान जाश्रो । तुम यहाँ रहो । [ग्राज तक] कभी पैदल न चलनेके कारएा तुम कुश-ग्रंकरोंसे भरी हुई वनभुमियोंमें नहीं चल सकोगी । सुतारा—चाहे जो हो मैं तो [ग्रवश्य] चलूँगी ।

राजा—[कुलपतिके प्रति] भगवन् ! लाखों स्वरन्-मुन्द्राओं, श्रौर चारों समुद्र रुप काठच्चीको धारएा करनेवाली वसुन्धरा का परित्याग करते हुए मैंने सुधा-सलिलस्स स्नान करनेकी ग्रपेक्षा भी ग्रधिक ग्रानन्दका ग्रनुभव किया था । किंतु बचके सहित इस प्रियतमको रानिको [वनमें पैदल] चलनेको उद्यत देखकर इस समय मुझे ऐसा लग रहा है मानो मेरा यह सारा शरीर ग्रागसे ग्रालिंगित हो रहा है ।

इस श्लोकमें राजा हरिश्चन्द्र जब ग्रपना राज-पाट सब-कुछ देकर जा रहे हैं उस

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(४) श्रथ सान्त्वनम्—

[ सूत्र ६६ ]—सान्त्वनं साम

कुध्र्यानुकूलम्। यथा रामाभ्युदये द्वितीयेऽङ्के—

मारोचः—नायमनुवृत्तिवचसामवसरः: परिभ्रष्टं विज्ञाप्यते—

दाराणां पत्निनां च रच्यापविधो वोरोतुयोध्यानुजः,

वीराणां खर-दूषण-त्रिशिरसामेको वर्णं यो नयभ्रान्त्।

तस्याविष्कृततेजस: कुलजने न्याकारं श्राविष्कृतः,

कुठेः: सङ्कररुद्रमद्यस: स्यात् चन्द्रहाससोड्ड्यस्य: ॥

रावणः—श्रथ प्रतिपन्न-पच्चपातिनं शुचं राक्षसापसदं कि बहुना—

तवैव रघीरामुभिः श्वकठोरकठेष्टसुतैः,

रिपुसुतमितभवो मम प्रशममेतु क्रोधानलः।

सुरद्विपदर्शिरः—स्थलीदलनद्रुमक्फलं:,

स्वसुतः परिभवोचितं पुनरसौ विधास्यत्यसि: ॥

(इति खड्गमाकारयति ।)

समय रानी सीतारा श्रौर पुत्रको भी साथ चलनेके लिये उचत देखकर जिस दु:ख श्रौर सङ्कट

में पड़ गए थे उसका चित्रण किया गया है । इस लिए यह प्रतिमुखसन्धिके ‘रोध’ नामक

तृतीय श्रङ्कका उदाहरण है । ‘रोध’ का लक्षण ‘भ्रान्ति’ है । श्रथातो भेद या व्यसन, दु:ख, सङ्कट

को रोध कहा गया है ।

(४) सान्त्वन—

श्रब ‘सान्त्वन’ [नामक प्रतिमुख-सन्धिके चतुर्थ श्रङ्कका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र ६६ ]—शान्ति-वचन [का नाम] ‘सान्त्वन’ है ।

शुध्दको मनाना [साम कहलाता है] जैसे रामाभ्युदयमें द्वितीय श्रङ्कमें—

“मारोचः—यह खुशामद करनेका श्रवसर नहीं है । [मैं तो] स्पष्ट रूपसे बतलाए

देता हूँ कि—

जिस वीर [रामचन्द्र] ने स्त्रो [सीता] श्रौर तपस्वियोंकी रक्षाका भार छोटे भाई

[लक्ष्मण] को सौंपकर खर, दूषण श्रौर त्रिशिरा ग्रादि वीरोंका प्रकेल हो वध कर डाला था ।

उसकी पत्नीके ह्रपमान या मारनेके लिए निकला हुग्रा तुम्हारा चन्द्रहास नामक खड्ग भी

कुपित हो जायगा ।

रावणः—ग्ररे शात्रुके पक्षपाती नीच, दुष्ट राक्षस प्रधिक क्या कहूँ—

[रामको मारनेकी बात तो जाने दे पहले] तेरे हो कठोर कण्ठसे निकले हुए रघुवीर

जलसे [तरे द्वारा की गई] श्रप्त्रुकी स्तुतिसे उत्पन्न मेरा क्रोधानल शान्त हो ले । देवताओंके हाथी

[ऐरावत] के गण्डस्थलके विदारारके कारएा जिसमें मुक्ताफल लग गए हैं इस प्रकारके [मेरे]

यह तलवार, बहिन [शूर्पणाखा] के ह्रपमानके श्रनुरुप [रामचन्द्रके वध रूप कार्य को] वादको

करेगी [प्रथात् पहले तुफ मारोचको, जो शत्रु की स्तुति कर रहा है समाप्त कर लूं तब फिर

रामचन्द्रको मारनेका कार्य वादको कर लूंगा]

ऐसा कहकर [रावण मारोचके मारनेके लिए ग्रपनो] तलवारको खींचता है ।

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का० ४७, सू० ६७ ] पथ्मो विवेक: [ १३१

प्रहस्तः—[पादयोर्निपत्य] प्रसीदतु प्रसीदतु महाराजः। नेदमनुरूपं स्वामिनः। देव !

लोकत्रयन्तव्योद्दतप्रकोपाप्रेसरस्य ते। ईहाश्वन्द्रहासस्य भृृत्येष्वनुचितः क्रमः॥

[पुनः कमादाह] देव प्रसिद्ध प्रहृयादिक्रमोऽयं न वामतया । इति मारीचं प्रति क्रुद्धस्य रावणस्य प्रहस्तवद्विहिताड्यमनुनयः सोऽनुचितः । वज्रमपयत्र प्रमृष्टान्तं प्रयुक्तम्। "कुब्जेठः सझरदुर्मदस्य भवतः स्याच्चन्द्रहासोऽपि डर्यासः; इत्यस्य प्रत्युत्तरानिष्टुरंवात॥

(४) वथ वर्गसंहारः—

[सूत्र ६७]—पात्रौघो वर्गसंहृति १४८॥

पृथक् स्थितानां पात्राणामोषः कार्यार्थ मीलनम्। वृर्येन्ते इदित वर्णा;, तेषां नायक-प्रतिनायक-नायिका-सहायादिपात्राणां संहृतिरेकत्रकरसामू। यथा रत्ना-वल्याम---

राजा —राजा सुमझते ! कवासौ, कवासौ [इत्यत् स्वाग्रस्य]—

इस प्रकार यहां तक रावणके कोपका वर्णन किया है। इसके श्रगले भाषमें प्रहस्त, मारीचके प्रति रावणके इस कोपका मानन करनेका यत्न करते हुए कहता है—

प्रहस्त—[वैरियोंमें गिरकर] प्रसन्न हों महाराज, प्रसन्न हों ! यह कार्य श्रापके श्रनुरूप नहीं है। देव !

तोंनों लोकोंका नाश करवेमेें समर्थ प्रकोपवालोंमें श्रग्रगण्य ! इस प्रकारके श्रापके चन्द्रहास [तलवार] का भृत्योंपर प्रहार उचित नहीं है । [उसके श्रगे फिर कहता है] देव ! प्रसन्न हों। प्रेमके कारण ही यह [मर्यादाका] श्रतिक्रम [मारीचने] किया है, विरोधी होकर नहीं।

इस प्रकार मारीचके प्रति श्रद्र हुए रावणके प्रति प्रहस्तका अनुनय सांहित [प्रझका उदाहरण] है। इसमें प्रसन्नतः [प्रगले प्रझ] 'वज्र' का भी प्रयोग किया गया है । [प्रत्यक्ष निष्ठुर वचनका प्रयोग 'वज्र' कहलाता । सो इस प्रसंगमें] युद्रके दुरभिमानी तुम्हारी चन्द्रहास [नामक] तलवार भी [कुठित्सा] हो जायगी। इस [मारीचके कथन] के प्रति यह ही

निष्ठुर होनेसे [यह 'वज्र' का भी उदाहरण है ।

(v) वर्गसंहार —

ग्रथ 'वर्गसंहृति' [नामक प्रतिमुखसंधि के पञ्चम श्रङ्गका लक्षराते हैं]—

[सूत्र ६७]—[प्रनेक] पात्रोंका समुदाय [इकट्ठा हो जाना] 'वर्गसंहृति' [नाम श्रङ्ग कहलाता] है ।

ग्रलग-प्रलग स्थित पात्रों का 'ग्रोभ' ग्रर्थात् किसी कार्यकेलिये एक साथ सम्मिलित [वर्गों' का वर्णन किया जाय वे [पात्र] 'वर्ग' हैं । उन 'वर्गों' ग्रथर्थात् नायक, प्रतिनायक, नायिका सहाय ग्रादि पात्रोंका, संहृति ग्रर्थात् इकट्ठा होना [वर्ग-संहृति कहलाता है]। जैसे रत्नावलीमें—

राजा—सुसंगते वह कहां है, कहां है [यहांसे लेकर—

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श्रीरेषा पाशिरपस्यस्यः पारिजातस्य पल्लवः ।

कुतोऽन्यथा स्ववृक्षेपु स्वेदचलच्छ्वासमात्रवमू ।। इति याचतू ।

श्रात्र राज-सागरिका-विदूषक-सुतकताना मेकत्र योननम् ।

ध्यानेऽपि तु वर्षाणां ब्राह्मादीनां यथासम्भवं द्वयोः क्षययोः प्राप्तां चतुर्षां वा एकत्र

मीलनं वर्षसंहारमाचचते । यथा वीरचरितेऽपि—

परिषदियं पृणीणामपि वृद्धो युद्धाजित

सह नृपतिभिरन्वैलोमपादर्श वृद्धः ।

श्यामविरतयशो नृभवावादी पुराणः

प्रसुरपि जनकानामद्रहो याचकस्ते ।। इति ।

एकेऽपि तु वर्णितार्थतिरस्कारं वर्षसंहारमामननित । उदाहरन्ति च यथा वेणीसंदारेऽपि कचुकिना रथकेतनपतने निवेशिते भानुमती—

"ग्रन्थरीयतां दाव एवं समस्तवंशप्रसृतां वेधस्करिण-मंगलरुधिरोषेण । इति"

[ग्रन्थरीयतां तावदेतत् समस्तवंशप्रसृप्तानां वेधध्वनि-समंगलोदधिरोषेण । इति संस्कृतम] ।।४२।।

यह [साक्षात्] लक्षणों से ग्रोर इसका हाथ पारिजातका पल्लव है । ग्रन्थथा [इससे] रवेके बहानेसे प्रमृतद्रव कंसे टपक रहा है ।

इस [श्रातः प्रसंग] में राजा, सगरिका, विदूषक तथा सुतनुका [श्रातः श्रनिक पात्रों] का एक साथ समीक्षण हो गया है [श्रतः यह वर्षसंहृति नामक श्रृंगका उदाहरण है] ।

श्रात्र [व्यास्याकार] तो वर्षो [की संख्या] श्रथवा ब्राह्मादिका यथासम्भव दो-तीन या बार [वर्षो] के एक साथ इकट्ठे होनेको ‘वर्षसंहृति’ कहते हैं । जैसे महावीरचरितके तृतीय श्रङ्कमें—

सीता-स्वयम्वरमें रामचन्द्रजीके द्वारा धनुष तोड़ दिए जानेके बाद परशुरामजीके श्रा जानेपर उनके साथ संघर्षका प्रसंग चल रहा है । परशुरामजी रामचन्द्रपर शस्त्रास्त्र प्रयोग

है घोर उनको मार देनेका भय दिखला रहे हैं । उस समय श्रन्य सब लोग इकट्ठे होकर परशुरामजीको मनानेका यत्न कर रहे हैं । इसी प्रसङ्गमें यह श्लोक यहाँ उद्धृत किया गया है । इसमें ब्राह्मा, क्षत्रिय श्रादि ग्रनेक वर्षाकों प्रयोजनवश एकत्र हो जानसे यह वर्षसंहारका उदाहरण है ।

यह ऋषिवृन्दोंका समुदाय, यह [भरतके मामा केकय देशके राजा] वृद्ध युद्धाजित, श्रन्य राजाओंके साथ ये बूढ़े लोभपाद तथा निरन्तर यत्न करने वाले एवं पुराने ब्रह्मवादी जनकोंने राजा [सौद्वाज] ये सब श्रापके शत्रिविरोधी होकर श्रापसे याचना कर रहे हैं [श्रतः

ग्रत्रकी बार ग्राप रामचन्द्रको क्षमा कर दें] ।

ग्रन्य लोग वर्षोक्त श्रथके तिरस्कारको ‘वर्षसंहार’ मानते हैं । श्रौर उसके उदाहरणरूप में वेणीसंहार [के द्वितीय श्रङ्क] में कचुकीके द्वारा [दुर्योधनके] रथकी ध्वजा के पतन [रूप श्रप्रशस्तकुन] की सूचना मिलनेपर भानुमती श्रापे निम्न वचनको उदाहरण रूपमें प्रस्तुत

करते हैं—

भानुमती—इस [प्रप्रशस्तकुन] को समस्त ब्राह्मणोंके [द्वारा किए जाने वाले] वेद-ध्वनि के घोष द्वारा शमन कर दो ।।४३।।

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(६) स्थाथ नर्म—

[सूत्र ६८]—कीडायै हस्तं नर्म

यथा रसनावल्यान—

"विदूषक:— [कस्यो दत्स्वा ससम्भ्रमं राजानं हस्ते गृहीत्वा] भो वयस्य ! पलायमिनं लकुचपादपं किं व महाभूतं परिवर्सति। यदि मे न प्राण्जलिसि ताव् शृगदो भविष्य सयं यथेव स्थास्यनेहि। [भो वयस्य ! पलायमहं ! एतस्मिन्न लकुचपादपे किंपि महाभूतं परिवर्सात। यदि मां न प्रत्येक्षि तदाप्रतो भूतवा स्वयमेवाकर्णय । इति संस्कृतम्]। राजा — [स्वाकार्यं] वयस्य सारिकेयम् । इति"

तथा—

"विदूषक:—भो मा पंडिच्चगट्ठमुवहह । एदं देहस्सह वक्खारिट्टस्स जं एसो श्रालिहिदा, सा कयस्सागा दंसणीय। य । [भो मा पारिडत्यगवेसमुचह । इदं देवाय वयालक्यास्सामि या एतड्ढालिखिता सा कन्यक दर्शनोया च । इति संस्कृतम्]। राजा—वयस्य यदेवं श्रुत्वहितः श्रोतव्यम् । नास्यवकार्शो न कुतूहलस्य ।"

तथा—

"सुसज्जता—सहि जस्स कए तुवं श्रागदो सो श्रयं पुरदो चिट्ठदि । [सखि यस्य कते त्वमागता सोऽयं पुरस्तिष्ठति । इति संस्कृतम्]।

(६) नर्म—

इस प्रकार यहाँ तक प्रतिमुख-संधिके पांच श्रधानों का वर्णन हो गया । श्रब श्रागे प्रतिमुख-संधिके छठे श्रधान 'नर्म' का वर्णन प्रारंभ करते हैं। श्रब 'नर्म' [नामक छठे श्रंगका लक्षरण करते हैं]—

[सूत्र ६९]—मनोरंजन [कीडायै] केलए हास्य करना 'नर्म' [कहलाता] है।

जैसे रसनावलीमें—

विदूषक—[कान लगाकर सुनते हुए श्रौर भयके मारे] राजाका हाथ पकड़कर विदूषक राजासे कहता है कि—[हे] मित्र, चलो यहाँसे भाग चलें क्योंकि इस कटहलके पेड़पर कोई भयङ्कर महाभूत रहता है। यदि तुम मेरे ऊपर विश्वास नहीं करते हो तो श्रापने-ग्राप श्रागे बढ़कर सुन लो [देखो इसपर भूत बोल रहा है कि नहीं]। राजा —[सुनकर] श्ररे मित्र ! यह तो मैनां [बोल रही] [भूत कहाँ] है।

यहाँ विदूषकका वचन मनोरंजन मात्रके लिए है इसलिए यह 'नर्म' या हास्य मजाक का उदाहरण है । रसनावलीसे इसी प्रकारका एक श्रौर उदाहरण श्रागे देते हैं—

विदूषक—श्ररे मित्र, पारिडत्यक गर्व मत करो। मैं तो इसकी ऐसी व्याख्या करता हूँ कि यह जो चित्रमें श्रालिखित है वह कन्या है श्रौर दर्शनीय है । राजा—यदि ऐसी बात है, तो तनिक सावधान होकर सुनना चाहिए [कि यह कन्या कैसी है]। क्योंकि इस कन्याकेलए] हमें उत्सुकता होना स्वाभाविक है ।

सुसज्जता—सखि ! जिसके लिए तुम श्राई हो वह सामने हो उपस्थित है ।

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सागरिका--[ सासूयम् ] मुसंगदे ! कस्य कषे ब्रहं श्रागदा ? [सुसंगते ! कस्य कूते ब्रह्ममागता ? इति संस्कृतम्]। सुमंगता--श्रथिय झ्रप्पसंकिदे ! झां चित्तफलहयस्स, ता गिरहु श्रदं !" इति । [श्रथिय झ्रात्मशक्किदे ! नतु चित्तफलकम् । तद् गुहाश्रयनम् । इति संस्कृतम् ]। एता वि दुक्ख- सुमझ्झयस्स राज-मागरिकाोऽर्थ द्वासोक्तयः । श्रनेकशोडप्य-केवोऽपिं निश्चित्तय इति त्रिप्रकोहतम् । यथा वा नलविलासे--

"विदूषकः--[लम्बस्तनौ विलोक्य समयकल्पम् ] भो रायं ब्राहं पदाउ द्वाखा उद्दिस्सं । [भो राजन् ! ब्रह्मेतस्मान् स्थानादुत्थास्यामि । इति संस्कतम् ]। राजा--किमिति । विदूषकः--जइ एसो थूलमहिस्सो कडिच्चाएं नच्चावेइ ममोवरि पडेदि, ता धुवं में मारिदी ।। [यदोशा स्थूलमहिषी कटितटं नर्तयन्ती ममोपरि पतन्ती, तथा धुवं मां मारयेत् । इति संस्कृतम् ]"

तथा--

"राजा--लम्बस्तनौ इदमासनमास्यताम् । विदूषकः--[ मोदं लम्बस्तने पुदुत्तं खु पदं श्रोस्सं] ता तुम्हे सावधाइप्प उरविसिदध्वं । [भरति ! लम्बस्तनोये दुर्बले खल्वेतदासनम् । तनु त्वया सावधान-योपवेष्टव्यम् । इति संस्कृतम् ]"

सागरिका--[क्रोध-प्रचुरं मुसज्जते !] में किसके लिए ग्राई हूं । मुसज्जता--श्रह् अपने ग्राप श्राहा कर लेने वाली, चित्रफलके लिए [ग्राई हो न] इस [चित्र] को पडको [यह तुम्हारे सामने ही रखा है] ।

ये सब विदूषक तथा मुसज्जलाकी [क्रमशः] राजा तथा सागरिकाके मनोरञ्जनके लिए हास्योक्तियां हैं [अर्थात् 'नर्म' नामक' प्रहसनके उदाहरणहै] । एक ही ग्रहं्नका ग्रनेक बार भी प्रयोग किया जा सकता है । इसके लिए तीन उदाहरणह्रां दिए हैं ।

ग्रथवा जैसे नलविलासमें--

"विदूषक--[लम्बस्तनोको देखकर भयसे कांपते हुए] हे राजन् ! मैं तो इस स्थानसे उठता हूं । राजा--क्यों किसलिए [उठते हो] ? विदूषक--यदि यह मोटी भैंस कमर नचाती हुई मेरे ऊपर गिर पड़ी तो मुझको मार ही डालेगी ।"

तथा--

"राजा--हे लम्बस्तनि ! इस ग्रासन [कुर्सी] पर बैठो । विदूषक--भगवति ! लम्बस्तनोके लिए यह ग्रासन दुबंल है इसलिए तुम इसपर साव-धान होकर बैठना ।

ये सब हास्योक्तियां नर्म नामक ग्रहं्नके उदाहरणह्रूपमें प्रस्तुत की गई हैं ।

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क० ४५, सू० ६७ ] प्रथमो विवेक: [ १३५ तथा—

"विदूषक :-भो ! किं श्यादुदुबलासि । [भवति ! किमितदुर्बलासि । इति संस्कृतम्] । लम्बस्तनी—सग्गपरिस्समेग्गए । [सागं-परिश्रमेण । इति संस्कृतम्] । विदूषक :-भो कलहंसा कित्तिणहिं गोणोहिं मुणेहि एस इध संपत्त ? [भो कलहंस ! कियद्रि-गोणीभि-मृतेपात्र सम्प्राप्ता । इति संस्कृतम्] । [कलहंसो विहुस्सयाओमुखस्तिष्ठति ।" इति ।।

(७) श्रथ नर्मव्युतिः :-

[सूत्र ६७]—दोसाइच्चों तु तद्युतिः । दोषावक्खये दोषाच्छादनाय यत् पुनहेसनं हास्यहेतुरुचक्यं सा तथा नर्मसो श्रोतं नर्मव्युतिः । यथा रत्नावल्याम—

"विदूषक—भो ! ग्रज्ज वि एस चउत्थवेई विय बंभणो रिआउ पडिकडं पयत्ता । [भो ! शयायपेक्ष चतुर्वेदी ब्राह्मणः ऋचः पठितुं प्रवृत्ता । इति संस्कृतम्] । राजा—वयस्य किमल्यन्यच्चेतसा मया नावधारितम् ? तत् किमनयोक्तम् ? विदूषक—भो ! एदं एदाए पढियदं— दुल्लहजस्स अगुरुअट्ठो लज्जा गरुई परवससो श्रप्पा । पियसह ! विसमं पिम्म मरसणं सरसं णु वरमेकम् ।। [भो: ! इदमेतया पठितम्— दुल्लभजनातुरागो लज्जा गुरुः परवश आत्मा । प्रियसखि ! विषमं प्रेम मरणं सरसं नु वरमेकम् ।। इति संस्कृतम्] । तथा—

"विदूषक—भगवति ! [कहिए] श्राप दुब्बल केसे हो रही हैं ? लम्बस्तानी—मार्गकी थकावटसे विदूषक—ग्ररे कलहंस [रास्तेमें] कितनी गाएँ मार कर ये यहाँ तक श्रापहि । [कलहंस हंसते हुए मुख नीचा कर लेता है ।"] यह सब हास्य-परक वचन है । इसलिए यह भी नर्मका उदाहरण है ।

(८) नर्मव्युतिः—

ग्रब ‘नर्मव्युतिः’ [नामक प्रतिमुख-संधिके ससम श्रंगका लक्षण करते हैं]— [सूत्र ६७]—दोषके छिपानेके लिए [हास्य वचनोंका प्रयोग होने पर तद्युतिः श्रर्थात्] नर्मव्युतिः [नामक श्रंग माना जाता] है । जैसे रत्नावली में—

विदूषक—ग्ररे यह [सारिक] तो ग्रब भी चतुर्वेदी ब्राह्मणके समान ऋचाओंका पाठ करे जा रही है ।

राजा—हे मित्र मेरा ध्यान दूसरी ओर था, मैं समझा नहीं कि उसने क्या कहा । विदूषक—ग्ररे उसने यह कहा है कि— दुलंभ जनके साथ प्रेम हो गया है, भारी लज्जा हो रही है किन्तु ग्रात्मा भी परवश है । प्रिय सखि ! प्रेम बड़ा कठिन है ग्रब तो केवल मरण ही एक शरण है ।

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१३६ ] नाट्यदर्पणम् [ का० ४६, सू० ७०

राजा—मो महान्‌राज्ञया ! कोऽन्य एव ऋचामभिज्ञः ?

क्षत्र मौर्यैर्दोषैः क्ष्वादयितुं यद् विदृप्सकेप्टं तद् राज्ञो हास्यहेतुत्वान्नर्म-

च्युति: । अन्ये तु नर्मजां धृतिं नर्मच्यु तिमादुः । यथा रत्नावल्याम्—

सुसंगता—सखि ! श्रदधिक्षुत्रा दाशि सि तुर्व जा एवं भटृणो हस्तावलंबिया

वि कोयं नु चांसि ।

सखि ! श्रदधत्या इदानों त्वमसि या पदं भरतुर्हस्तावलंबित्वतापि कोऽप नु

मुह्यति । इति संस्कृतम् ।

सागरिका—[सहृदयंगमीभृतद्रुह्मय] सुसंगते ! इयाणि पि न विरमसि ।'' इति ।

एते च नर्म-नर्मंच्युती त्री श्रृंग कामप्रधानेष्वेव रूपकेपु निवन्धमर्हंतः । कैशिकी-

प्राधान्येन तेषां हास्योचितत्ववार्दिति ।

(=) श्रथ ताप:—

[सूत्र ७०]—ग्रपायादर्शनम् ताप:

स्यथा पार्थिविजये—

कथचुको—मो हे लोकपालाः ! परित्रायध्वम् ।

राजा—हे महान्‌राज्ञया [तुमको छोड़कर] श्रौर कौन इन ऋचात्रोंको समझ सकता है ।

यहाँ [अपने] मूर्खताके दोषको छिपानेकेलिए विदृप्सकने जो-कुछ कहा है वह राजाके

हास्यका हेतु होता है । [इसलिए नर्मच्युति श्रृंगका उदाहरण है] ।

अन्य लोग तो नर्म [मजाक] से उत्पन्न धृति [प्रसन्नता] को नर्मच्युति कहते हैं । जैसे

रत्नावलीमें—

सुसंगता—सखि ! तुम बड़ी दाक्षिण्य-रहित हो जो स्वामीके इस प्रकार हाथ पकड़ने

पर भी क्रोध नहीं छोड़ती हो ।

सागरिका—[मौहें टेढ़ी करके तनिक हूँसकर] सुसंगते ! तू ग्रब भी नहीं मानती है ।

यह नर्मच्युति का उदाहरण है । क्योंकि इसमें सुसंगताके हास्यवचनसे सागरिकाको एक

प्रकारके विशेप श्रृंगारंद या भयको प्राप्ति हो रही है । इसलिए जो लोग नर्मजा वृत्तिका

'नर्मच्युति' कहते है उनकी हष्टीसे यह नर्मच्युति का उदाहरण होता है ।

ये नर्म तथा नर्मच्युति नामक दोनों श्रृंग काम-प्रधान रूपकोंमें ही निबद्ध किए जा

सकते हैं । क्योंकि उन [काम-प्रधान रूपकों] के कैशिकी-प्रधान होनेसे उनमें हास्य उचित हो

सकता है ।

(=) ताथ 'ताप' [नामक प्रतिमुखसंधिके ग्रप्ठम श्रृंगका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र ७०]—किसी इष्टजनके [ग्रपाय प्रथान्त] विनाशका दर्शन [तापजनक होनेसे]

'ताप' [कहलाता है] । जैसे पार्थिविजयमें—

कथचुको—हे हे लोकपालो ! रक्षा करो ।

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का० ४५, सू० ७० ] प्रथमो विवेकः [ १३७

एपा वधू भरतराजकुलस्य साध्वी, दुर्योधनस्य महिपी प्रियसखी रसस्य । विसृष्टय पाण्डु-धृतराष्ट्र-पितामहादीन्, गन्धर्ववीरैरपशुभिः पारिभूयते स्म ॥

युधिष्ठिरः—[ श्रुत्वा दुर्योधनतःपुरं महान्तमपायराशिकमस्मदीयकुलोत्कृष्टम्] वत्स ! स्वगोत्रपरिभवाद्विघारितधुरः शब्दः। श्यायत्यग्रान्त एवास । कः कोडत्र, चापम् । [इति चापारोपणामभिनयन सम्प्रेक्ष्याहुत्थितःप्रतति] इति । केचतु स्थानेऽस्य ऋतुनयालत्यो ग्रह्ह-निग्रहरूपं 'शमनं' पतन्ति । यथा पार्थविजये—

"भीमः—वत्सः क एष मर्य स्थिते भरतकुलं परिभवात ? वत्सः परं न मर्प-यामि" इति ।

वत्स 'श्राय वत्स ! स्वगोत्र' इत्यादि पूर्वदर्शितेन युधिष्ठिरसंरम्भेऽपि भीम-स्थापनुयमहंमू ।

अरतिनिग्रहो यथा वेधीसंधारे— यह भारतके राजवंशको साध्वी बधू, और युद्धमेंप्रथम दुर्योधनकी रानी, पाण्डु धृतराष्ट्र श्रौर पितामह [भोद्म] श्रादिको भुलाकर [अर्थात् उनकी शक्ति श्रादिको शोर ध्यान न देकर] दुष्ट गन्धर्व वीरों द्वारा श्रपमानित की जा रही है।

युधिष्ठिर—[ सुनकर, श्रोर दुर्योधनके शन्तःपुरमें किसी भारी विनाशकी शंका समभकर कहते हैं कि ] हे वत्स [भीम] ! अपने वंशके श्रपमानका कठोर श्रोप्रिय शब्द [सुनाई दे रहा है। तुम श्रव तक स्थिर बैठे हुए हो। कौन, यहां कौन है ? धनुष-धनुष लाञ्छो] इस प्रकार [कहते हुए श्रोप] धनुप चढ़ानेका श्रभिनय करते हुए जल्दीसे उठते हैं । इसमें दुर्योधनके शन्तःपुरमें होनेवाले विनाशको देखकर युधिष्ठिरकी व्यग्रताका वरन् किया गया है । वत्सः यह 'ताप' नामक श्राभ्रका उदाहरणहै ।

कुछ लोग इस ['ताप' नामक श्रङ्ग] के स्थानपर श्रत्रुनयके ग्रहण श्रोर भारतके निग्रह रूप 'शमन' को [प्रतिमुख सन्धिके श्राभ्र] पढ़ते हैं । इसका श्रभिप्राय यह है कि वे लोग 'ताप' को प्रतिमुखसन्धिके श्राभ्र न मानकर 'शमन' को उसका श्राभ्र मानते हैं । श्रोर इस शमनकी व्याख्या दो प्रकारकी करते हैं । एक श्रत्रुनयका ग्रहण, श्रोर दूसरी भरतिक निग्रह, इन दोनोंको वे 'शमन' कहते हैं ।

जैसे पार्थविजयमें [प्रतुनयप्रहारका उदाहरण]— "भीम—ग्ररे, यह कौन है जो मेरे रहते भरतकुलका श्रपमान करना चाहता है । इससे श्रधिक में सहन नहीं करूंगा ।

इस [उदाहरण] में "हे वत्स ! अपने गोत्रके पराभवका-साथ श्रोपप्रिय शब्द सुनाई दे रहा है" इत्यादि पूर्वदर्शित [ वाक्यमें दिखलाए हुए ] युधिष्ठिरके क्रोधको देखकर भीम श्रत्रुनयका प्रहार करते हैं [इसलिए यह श्रत्रुनय प्रहार रूप शमनके प्रथम भेदका उदाहरण है ।

भरति-निग्रह [नामक शमनके दूसरे भेदका उदाहरण] जैसे वेधीसंहारमें =

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“सखी—जड़ एवं ता कहेहिं जेसा म्हे पडिहाडियंतीड पसंसाए देवदायं संकित्तणेण दुविआदि परिगहेहेण पडिहडणिस्सामो !” [यह एवं तदा कथय येन वयं प्रतिष्ठापयेम्न्यः प्रशंसया देवतानां संकीर्तननेन द्वारादिपरिग्रहेण प्रतिहन्मिष्यामः इति संग्रतम् ]।

पुनः स्वावसरे “भानुमती—[ग्रागपात्रं लेकर] ग्रोर सूर्याभिमुखं स्थित्वा] भयवं ऋम्वरमहा- सरेक्कमहस्सत्तं ! दिसाहवमुखमंडण कु कुमविहेसय ! सयसमुवणरयणप्पईव ! उज्ज इह्ह सिविषयंदंसणो ज किंचि ग्रच्छाहिं, तं भयवदो पण्ण मेगए समाहुजो झ्रध्यउत्तस्स कुंसलपरिसामं मोहु ति !” [भगवन् ! ऋम्वरमहासरेक्कसपत्न ! दिग्वहुमुखमंडलकुंकुम विशेषक ! सकलभुवननत्रप्रदीप ! सय इह्ह स्वप्नदर्शने यत् किंचिदृश्याहिं तद् भगवतः प्रश्नामेन सभाजातु रायापुत्रस्य कुशलपरिणामं भवतु !” इति संग्रतम् ]। (६) यथ पुष्टम्—

[क्षत्र ७१]—पुष्टं वाक्यं विशेषवत् ॥ ४६ ॥ पूर्वं स्वयमनेन वा केनचिद् प्रयुक्तं वचनमपेक्ष्य यद् विशेषयुक्तं वचनं प्रयु- ज्यते तेन च्छन्वेन वा, तन्‌ पूर्वेसामोदरिस्सवं । तच्च वाक्यं पुष्टिमव पुष्टं । केश- रचनाया: पुष्टमिव पूर्ववाक्यालंकारारिस्संवान् । यथा ‘विलच्चदुरुसंधान’—

“सखी—यदि ऐसी बात है तो कहो, जिससे हम लोग प्रतिष्ठापना, प्रशंसा, देवताओंके संकीर्तन तथा द्वारादिके प्रहारोंके द्वारा [उस दु:स्वप्न] का प्रतिविधान करें । वेषसिंहारके द्वितीय ग्रंथमें भानुमतीके मुखसे उस स्वप्नकी बात सुनकर उसकी सखी उस श्ररतिके झामतकी चर्चा कर रही है । श्रात: यह श्ररति निग्रहका उदाहरण है । ग्रागे स्वयं भानुमती द्वारा किए जानेबाले श्ररति-निप्रग्रहका उल्लेख करते हैं । फिर श्रपना श्रवसर श्रानेपर

“भानुमती—[ग्रागपात्र लेकर ग्रोर सूर्यके सामने खड़े होकर] हे भगवान् ! श्राकाश रुप महासरोवरके ब्रह्मतृतीय कमल ! दिग्वधूके मुख-मंडलके कुंकुम-बिंदु ! श्रौर समस्त भुवनोंके [प्रकाशित करनेवाले] रत्नदीप ! श्राज स्वप्न-दर्शनमें जो-कुछ महाभय [प्रत्याहितं महाभीतः:] उपस्थित हुग्रा वह श्रापको प्रणाम करनेसे, भाइयों सहित श्रार्यपुत्रके लिए कुशल परिणमाका जनक हो । इसमें दु:स्वप्नसे उत्पन्न श्ररतिके निग्रह [स्वयं भानुमती कर रही है । श्रात: श्रमनका उदाहरण है] ।

(६) पुष्ट पुष्ट ‘पुष्ट’ [नामक प्रतिमुखसंधिके नवम ग्रंगका लक्षण करते हैं]—

[क्षत्र ७१]—विशेषत: युक्त वाक्य ‘पुष्ट’ [नामक ग्रंग होता है]— पहले स्वयं हो, ग्रथवा किसी दूसरेके द्वारा कहे गए वाक्यकी ग्रपेक्षासे जो विशेषता-युक्त वचन [वादको] उसोके द्वारा ग्रथवा ग्रन्य [वक्ता] के द्वारा प्रयुक्त किया जाता है । पूर्वं

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"भीष्मः—

एतन् ते हृदयं स्पृशामि यद् वा साक्षी तवैवास्मजः, सम्प्रत्येव तु गोब्रहे यदभवत् तत् तावदक्षर्याताम्।

एकः पूर्वसुदायुः स बहुमिरभस्सततोऽन्तरं, यावन्तो वयमाहवप्रणयिनस्तावन्त एवाजुनाः ।"

शत्रोत्तरार्धे विशेषवदाक्यम् ।

यथा वा सत्यहरिशचन्द्रे—

"वसुमती—[सरोषं राजानं प्रति]— न नाम स्रुजः स्वर्गे-नृपतिना-सुत-रलत्रयाणि यतिनां, तदस्मै यदन्तं तकिह निखिलं भस्मनि हुत्तम् ।

विहाय ष्यामोहं विमृश विमृशाथापि नृपते ! तपोऽध्याजल्छलेन किर्मपि नियतं दैवर्तमिदम् ॥

कुलपति:-[सोपहासम्] श्रारे मुखर ! सचिववापसद् ! चिराद् यथार्थमभिहित- वानसि । दुष्टप-तप:करकलितस्वर्गगर्भेशमयो मत्स्योपदेशोन दैवतान्येव सुनय: ।"

वाक्यकी अपेक्षा विशेषता-युक्त वह वाक्य पुष्पके समान [होनेसे] 'पुष्प' कहलाता है। पुष्प जिस प्रकार केशरचनाका प्रलड्कार होता है इसी प्रकार [विशेषवत् उत्तर वाक्य] पूर्व-वाक्यका शोभा-धायक होता है । जैसे 'विलक्षदुर्योधन' में—

"भीष्म [दुर्योधनसे कह रहे हैं]—यह मैं तुम्हारे हृदयका स्पर्श् करके [तुम्हारी शपथ खाकर कह रहा हूँ] प्रथवा तुम्हारा ही पुत्र इसका साक्षी हो सकता है। कि श्रमी गौओंको पकड़ते समय जो-कुछ हुग्रा उसको पहले सुन लो । पहले [युद्धके प्रारम्भ होते समय] शस्त्र उठाए हुए [हम] बहुतसे लोगोंने उस ब्रकले [भर्जुन] को देखा था और उसके बाद [जब युद्धमें गर्मी ग्राई तो] हम लोग जितने ही [उसके साथ] युद्ध करनेकी इच्छा करनेवाले थे [उनमेंसे प्रत्येकके साथ युद्ध करनेके लिए प्रस्तुत] उतने ही भर्जुन दिखाई देते थे ।"

इसमें [इलोकका] उत्तरार्ध [पुर्वार्ध का विशेषक होनेसे] 'विशेषवत्' है

प्रथवा जैसे सत्यहरिश्चन्द्रमें—

"वसुमती [क्रोधमें श्राकर राजाके प्रति कहते हैं]—

[कुलपति साधु] को जो कुछ [अपना राज्य ग्रौर स्वर्गादि] दिया है वह सब भस्ममें डाली ब्राहुतिके समान व्यर्थ है । इसलिए [मेरी प्रार्थना है कि इस] व्यामोहको तोड़कर [कि यह कोई महात्मा है] हे राजन् ! ग्राप श्रब भी विचार कीजिए [इसके चक्करमें मत पड़िए] यह तो तपस्वीके वेषमें छिपा हुग्रा निश्चय ही कोई देवता है [जो श्रापकी परोक्षा लेनेकेलए ग्राया हुग्रा प्रतीत होता है]।

कुलपति—[उपहास करते हुए] श्रारे वाचाल ! नीच मन्त्री ! बहुत देर बाद तूने ठीक बात कही है । दुषकर तपस्वी हाथके द्वारा स्वर्ग ग्रौर ग्रापवर्ग सुखको प्राप्त करनेवाले मुनीश्वर [सचमुच] देवता हो होते हैं ।

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१४० ] नाट्यदर्पणम् [ क० ५०, सू० ७२

छत्रं वसुभूतिवाक्यादुतररवाक्यं समर्थकत्वेन विशेषवदादिशति ॥ ४६ ॥

(१०) श्रथ प्रगमनम—

[ सूत्र ७२ ]—प्रगमः प्रतिवाकू-श्रेणी:

प्रशनप्रतिपन्थिनी वाक् प्रतिवाकू। तस्याः श्रेणी। ग्र्यपकर्षतो हृदे प्रतिवचने, उत्कर्षतो बहुर्न्यपि यथा वेधीसंहारेऽ—"भानुमती—ग्र्यायपुत्र ! श्वशुरमार्त्तं मे शंका बाधते । तदनु मन्यतामामार्यपुत्र ! ईतित संक्षिप्तम् ।

राजा—ग्र्यायि देवि !

कि नो व्यासादिशां प्रकम्पतसुवामच्यौहयीनां फलं, कि द्रोणेन किमंगराजवशिखावैरं यद् क्लास्य्यास । भीरु ! भारतशतस्य मे सुजवननच्छिद्यामुख्यापाश्रिता, त्वं दुर्योधनकेसरिन्द्रगृहिणी शंकास्पदं कि तव ॥

इसमें वसुभूतिके वाक्यके बादका [कुलपतिका] वाक्य [पूर्वं वाक्यके ग्रथयका] समर्थक होनेसे 'विशोषवत्' है [इसलिए यह भी 'पुष्ट' नामक ग्रथमानका उदाहरणरा है] । पहले उदाहरणमें पूर्वं वाक्य तथा उत्तर वाक्य दोनोंके वक्ता भीष्म थे । इसमें दोनों के वक्ता भिन्न-भिन्न है यह ही भेद है ।

(१०) श्रथ 'प्रगमन' [नामक प्रतिमुख सन्धि के दशम अंगका लक्षणा करते हैं]—

[सूत्र ७२]—प्रगमोत्तर-परम्परा [का नाम] 'प्रगम' है ।

प्रथनकी विरोधिनी [अर्थात् प्रश्नको समाप्त करने वाली उत्तर रूप] वाकी 'प्रतिवाकू'

[कहलाती है]। उसकी श्रेणी [अर्थात् परम्परा 'प्रतिवाकू-श्रेणी'] हुई । उसको प्रगमन ग्रथ्थ

के नामसे कहते हैं । उस परम्परामें कम-से-कम दो प्रतिवचन हों । ग्रधिक तो बहुत भी हो

सकते हैं । [उसका उदाहरणरा] जैसे वेधीसंहारमे—

"भानुमती—ग्र्यायपुत्र ! [स्वप्न-दर्शनके काररा] मुझे [ग्रनिष्टकी] शंका बहुत सता

रही है । इसलिए ग्राप मुझे [व्रतोपवासादि द्वारा उस ग्रनर्थके प्रतिविधान करनेके लिए]

श्रवस्मति प्रदान करें ।

राजा—ग्र्यायि देवि !

[यदि तनिकसे ग्रप्रुभ स्वप्नके दोख जानसे तुम इस प्रकार डर जाती हो तो फिर]

चारों दिशाओंमें व्याप्त, ग्रोर युथीचको कम्पित कर सकने वाली हमारे ग्रक्षौहिणी सेनाओं

का क्या फल ? यदि तुम इस प्रकार दुःखी हो रही हो तो [हमारे महारथी ग्राचार्य] द्रोण

[के रहने] से क्या लाभ हुग्रा ? ग्रोर ग्रंगराज [करण] के [लवकिशाली] बारोंका क्या उप-

योग हुग्रा ? [ग्रर्थात् इन लोगोंके रहते हुग्रा हमारा कोई किसी प्रकारका भी ग्रनिष्ट सम्भव नहीं

है इसलिए तुम्हको घबराने की तनिक भी ग्रावश्यकता नहीं है ।] हे भीरु ! तुम मेरे सौ भाइयों

के भुज-समूहकी छायामें बैठी हुुई दुर्योंधन रुप मृगराजकी पत्नी हो, तुम्हारे लिए डरनेका क्या

काररा हो सकता है । [इसलिए तुम बिल्कुल मत डरो । हमारा कोई ग्रनिष्ट नहीं होगा] ।

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का० ५०, सू० ७३ ]

प्रथमो विवेक: [ १४१

भानुमती—श्यृङ्ग्य आउत्त ! न हु मे किंचि संका तुम्हेसु सन्निहिदेसु । इति । [श्यार्यपुत्र ! न हि मे कार्चिच्छङ्का युष्मासु सन्निहितेषु । इति संस्कृतम् ]

यथा वा नलविलासे तृतीयेऽङ्के—

"दमयन्ती—[सुजसवलमिते राजन्न कमादृशा-] जई एवं मुंच मे पासिम् । [यच्चेवं मुंच मे पासिम् । इति संस्कृतम् ]।

राजा--कथमपराधकारी मुच्यते ?

दमयन्ती—किं एदृशा श्वसारं [किमेतेनापराधं । इति संस्कृतम् ]।

राजा—एतेन सत्यप्रतिज्ञताम लिख्य श्वहम्रियात विरहानले पालितः ।

दमयन्ती—[स्मित्वा] जड़ पएहं ता श्वहं पि ते पाणि गहिस्सं । तव पाणिलिहिदेन पडेहं श्वहं पि एतावस्थसरीरा जादा । इति [यदि एवं तदाहंमपि ते पाणिं ग्रहीष्ये । तव पाणिलिखितेन पट्टन श्वहमेतदवस्थशरीरा जाता । इति संस्कृतम् ]।

(११) श्वथ वज्रम्—

[शत्रु ७३]—वज्रं प्रत्यन्यकर्कशम् ।

यथ्रिन्द्ररतवान् प्रत्यन्यान् ऋक्श्रो वाचं यच्च पूर्वश्रुत्यनुरूपमन्यैर्न वाच्यैः शत्रु निह्निर्य वा प्रध्वंसकं तदू वज्रमिव वज्रम् । यथा वेङ्कीसंहार—

भानुमती—हे श्यार्यपुत्र [सचमुच हो] श्रापके समोप रहते पर मेरे लिए कोई शंका [का स्थान] नहीं है ।"

इसमें दुर्योधन तथा भानुमतीके प्रदानोत्तरके रूपमें प्रतिकाक्-श्रेणी दिखाई गई है । इसलिए यह 'प्रगम' नामक श्राङ्कका उदाहररा है ।

श्रथवा जैसे नलविलासमें तृतीयाङ्कमें—

"दमयन्ती—यदि ऐसी बात है तो मेरा हाथ छोड़ दो ।

राजा—श्रपराधीको कैसे छोड़ जा सकता है ?

दमयन्ती—इसने क्या श्रपराध किया है ?

राजा—इसने मेरी तस्वीर बनाकर मुझे इस प्रकार विरहानलमें डाला दिया है ।

दमयन्ती—तो फिर मैं भी तुम्हारा हाथ पकड़ लूंगी । तुम्हारे हाथके द्वारा लिखे गए पटके कारणा मेरे शरीयकी यह हालत हो गई है ।

इसमें नल-दमयन्तीके उत्तर-प्रत्युत्तरकी परम्परा होनेसे यह भी 'प्रगम' श्राङ्कका उदाहरण है ।

हरा है ।

(१२) 'वज्र'

श्रब 'वज्र' [नामक प्रतीमुख सन्धिके श्रारम्भवं प्रगमका लक्षण श्रादि कहते हैं]—

प्रत्यक्ष रूपसे कर्कश [प्रतीत होने वाला वचन] 'वज्र' [कहलाता] है ।

जो वाक्य कठोर होनेके कारणा स्पष्ट रूपसे ही रुष्ट है श्रौर पूर्व कहे हुए वाक्य श्रथवा [पूर्व किए हुए] कार्यका विनाश कर देता है वह वज्रके समान [कठोर श्रौर कार्य-विघ्वंसक] होनेसे 'वज्र' [कहलाता] है । जैसे वेङ्कीसंहारमें—

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१४२ ] नाट्यदर्पणम् [ काः ५०, सू० ७३

"कृपवत्थामा--[कर्णामुदिश्य] रे रे राघागर्भभारभूत सूतापसद ! कथं चपि न निषिद्धो दुःखदिना भीरुणा वा, हुपदतनयपाणिस्स्तेन पित्रा समाघ । तव सुज्चलदर्पाङ्मायमानस्य वामः, शिरसि चरण एष न्यस्यते कारयेनम् ॥"

यथा वा कृत्यारावणे द्वितीयेऽङ्के—

"रावः—विदेहराजपुत्रि ! विक्रमे या लोकाः, त्वया रूपेण निजिता: । सब्रह्मचारिरूपमतो भजमानं भजस्व माम् ॥

सीता—हृदास ! ऋष्पा दाव तपे न निजिञ्जदो, का गप्पणा लोएसु ।"

[इताश आत्मानं तावन् त्वया न निजितः, का गप्पना लोकेपु । इति संस्कृतम् ] श्रवणेन प्रत्यक्षकर्कशेन वाक्येन रावणवचनं प्रध्वस्तम् ।

यथा वा रघुविलासे—

"रामः--[विराधवेशं रावणं प्रति सादरम्]— युद्धश्रद्धमया: सकृत्स्मृतटिसाशया निशाताश्रया:, देवीमध्यनतलङ्गमभूषाव इमे त्रातुं पृषत्का यदिः । मदर्थान् प्रथय चापतृण्णहस्तैःसिमुल्लासमाल्यश्रियं निमिच्य: कथं सुमित्रीकृणाघटाटवीम् ॥"

"कृपवत्थामा--[कर्णांको लक्ष्य करके] घरे राधाके गर्भके भारभूत नीच सुत ! [यह ठीक है कि] दु:खी श्रथवा [तेरे कहनेके श्रनुसार] भीरु मेरे उन पिता [द्रोणाचार्य] ने किसी कारणसे प्राज दुपदतनय [धृष्टद्युम्न] के [अपना शिरको काटनेके लिए उद्यत] हाथको नहीं रोका, [उसे जाने दे] पर ले भुजबलके दर्पसे फूलने वाले तेरे सिरपर यह मैं

अपना बांवा पांव रखता हुं [तेरे भीतर सामर्थ्य हो तो] इसको रोक [के दिखला] ।

यद्वाक्यके समान प्रत्यक्ष-कर्कश वचन 'वच्र्' नामक श्रङ्कका उदाहरण है ।

कृत्यवा जैसे 'कृत्यारावणे' के द्वितीय श्रङ्कमें—

रावा—है जानकि,

मैने श्रपने पराकमसे, घोर तुमने श्रपने रूपसे लोकोंको जीत लिया है [इसलिए हम दोनों सहध्यायी हैं] इसलिए श्रपने चाहने वाले श्रपने सब्रह्मचारियो [सहाध्यायी मुख रावण] को [तुम भी] प्रेम करो ।

सीता—घरे नीच ! तूने तो श्रपने [श्रात्मा] श्रापको ही नहीं जीत पाया है, लोकों [के जीतने] की तो बात ही कहां ?

इस प्रत्यक्ष-कर्कश वाक्यसे रावणका वचन [प्रध्वस्त] कट जाता है । [इसलिए यह 'वच्र्' नामक श्रङ्कके दूसरे भेदका उदाहरण हुग्रा ।

प्रथया जैसे रघुविलासमें [कार्य-विध्वंस रूप वाक्यके तृतीय भेदका उदाहरण]—

[विराधवेश-धारी रावणके प्रति राम कहते हैं]— युद्धकी श्रद्धासे भरे हुए पक्के फरें वाली पहाड़की तटी रूप शराङ्ग [पर घिसने]

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प्रथमो विवेक:

यथा वातैव—

वैनतेयः—[रामं प्रति] ऋजितेन्द्रियः खलु दुरात्मा रावणो न चामर्यति कलितसौभाग्यसाराणां परदाराणाम्। तदियमार्या वैदेही कवचच्द्रपि गोपयितुमुचिता ।

लक्ष्मणः —ऋजितेन्द्रियः खलु दुरात्मा सूर्यहासो न क्षाम्यति पापीयसां पुंसाम्। तदियमार्या वैदेही न कवचच्द्रपि गोपायितुमुचिता ।" इति ।

श्रुत्वा वैतेयवचनं प्रहवस्तस्मिति ।

(१२) श्रथोपन्यास :-

[सूत्र ७४]—उपपचिरुपन्यासः—

कञ्चिदर्थं विधातुं या उपपत्ति-युक्त्या: उपन्यासः । यथा कृत्यारादौ—

"रावणः—सीते ऽस्मारुह्यतां पुष्पकम् ।

सीता—हतास ! श्रवि मरिष्यं न पुगा ऽस्मारुहिस्सं ।

[हताश ! श्रपि मरिष्यामि न पुनरारोह्यामि इति संस्कृतम्] ।

रावणः—श्यः ! कि बहुना यावत् करेण हृदपीडितमुच्यन्त्रमुत्वाय चन्द्र-किरणयुचिचन्द्रहासेन त्वत्पुरो बद्धशरः कमलोपहारं ऽस्मारभ्यते । समधिरोह शिवाय तावन् ।

से तीव्र धार वाले यदि मेरे ये बाण सीता की रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हो सकें तो अपने दीर्घ पुं ख पत्रोंकी हवासे रावणके केशोंकी शोभा को नष्ट करते हुए ग्रस्त्यन्त कठोर एवं सचन रावणके शिरोंके भुण्डको ये बाण कैसे काटेंगे ।

ग्रथवा जैसे यहाँ [रघुविलासमे] ही [इसका एक श्रौर उदाहरण]—

"वैनतेय—[रामके प्रति] दुष्ट रावणका बड़ा कामी है वह दूसरोंकी सुंदर स्त्रियोंको सहन नहीं करता है । इसलिए इन श्रार्या वैदेहीको कहीं छिपाकर रखना ही उचित है ।

लक्ष्मण—[तो फिर हमारा या चन्द्रहास नहीं ग्रप्रितु] सूर्यहास [लङ्ग] भी बड़ा दुष्ट प्रौर [ऋजितेन्द्रिय ग्रापने] वशमें न रहने वाला है । वह पापी पुरुषों को क्षमा नहीं करता है ।

इस [लक्ष्मण-वचन] से वैनतेय वचनकी काट ही जाती है ।

(१२) उपन्यास —

ग्रब ‘उपन्यास’ [नामक प्रतिमुख सन्धिके १२वें ग्रङ्कका लक्षण ग्रादि कहते हैं]—

[सूत्र ७४]—[किसी कार्यके लिए] युक्तिको प्रस्तुत करना ‘उपन्यास’ [कहलाता है] ।

किसी कार्यको करनेके लिए जो युक्ति वह ‘उपन्यास’ है । जैसे कृत्यारावमें—

रावण—हे सीते ! पुष्पक विमानपर चढ़ जात्री ।

सीता—ग्ररे नीच, मैं मर भले ही जाऊँ पर चढ़ूँगी नहीं ।

रावण—ग्रच्छ्या, ग्रधिक कहनेकी ग्रावश्यकता नहीं—तो ले मैं जोरसे मुट्ठीको पकड़ कर चन्द्र-किरणोंके समान वृति वाली तलवारको निकालकर तेरे सामने इन बढ़ग्रों [तपस्वी बहुचारियों] के शिरो-रूपी कमलों [को काट कर] उपहार देना ग्रारम्भ करता हूँ । भला चाहो तो चढ़ जाओ ।

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सीता—वरं षात्पन्नो शरीरस्स ष्रच्याहिदं, न उपे तचोधर्रपायां । इय ष्राध-रुद्धामि मन्दभाइणी । ह्वा ष्राजपुत्र ! [इति रुदता ष्रारोहं नाटयति] इति ।

[वरमात्मनः शरीरस्य ष्रस्याहृतं, न पुनस्तपोधनानाम् । इयमविरोहामि मन्त्रभागिनी । ह्वा ष्रायेपुत्र ! इति संस्कृतम्]

यथा वा रचुविलासे—

त्रिराघवेषो रावणः—[राम प्रति] ष्रागन्तवो यूयं, ष्रहं पुनरार्कलितर्चिप-कुहरो वरेचरदेशीयः । प्रभूतान्तरायं सम्परायं च रावणप्रभुखश्रया रक्षोऽभि-सम्भावयामि भवताम् । बन्धूगुरुनियन्त्रितमनसश्र कृत एव योधयुमलम्भविष्यावः । तदियमायां वैदेही किमपि वनकुहरमलंकुरुतेमाम् ।" इयमपहारार्थिना रावणेन सीतामेकाकिन्री कृतं युक्तिदर्शिता । इति ।

(१३) ष्रथानुसर्पणम्—

[सूत्र ७५ ]—नष्ट्टेडेह डनुसर्पणम् ॥ ५० ॥

पूर्वस्मुपलक्धस्य पुनरनुसरितस्य इति वृत्तवशाद्भिलषितस्याथस्य ईहा-ष्रन्वेषणा ष्रथानुसर्पणम् । यथा पार्थविजये द्वितीयेडङ्के द्रौपदी युद्धिष्ठर-मुढिरियाहः

"द्रौपदी—महाराय ! इमाहि ष्रयेव दिवसपरिवत्तवस्सागरराहि किम्भूदपार-मणुत्ते क्खलु कहलन्तो सो हियचरिओ पण्हुट्टो । विच ष्राजगुत्थस्सऋणं ष्रण्णो केसराहव-मणुअत्तो ।"

सीता— ष्रअपने शरीरको भयमें डाल देना प्रच्छा है किन्तु तपस्वियोंको [संकटमें डालना उचित] नहीं । प्रच्छा में संदभागिनी चढ़ती । ह्वा ष्रायेपुत्र ! [ऐसा कहकर रोती हुई वैदेही पुष्पक विमानपर] ष्रारोहेका ष्रभिनय करती है ।

ग्रहवा जैसे रघुविलासमें [उपन्य्यसाका दूसरा उदाहरण]—

विराघ वेषधारी रावण [रामके प्रति कहता है] ष्राप लोग [बाहरसे] ष्राए हुए हैं । ग्रौर मैं इस वनकी कुहरोंको छानता हुया लगभग वनचर हूँ । इसलिए मैं रावण ष्रावि राक्षसों के द्वारा [आपके मार्गमें] ग्रनेक विघ्नों तथा युद्धोंकी संभावना करता हूँ । [उस समय] स्त्री के भयभीत होनेसे ष्राप उनके साथ लड़नेमें कैसे सफल हो सकेंगे । इसलिए इन ष्रार्यां वन्देहोंको वनकी किसी गुफामें रख दीजिए

सीताके ष्रपहरणके चाहनेवाले रावणने सीताको ष्रकेला करनेके लिए यह युक्ति दिखाई है [व्रत: यह भी 'उपन्य्यास' ष्रङ्कका उजाहरण है] ।

(१३) ष्रथनुसर्पण—

ष्रब 'ष्रथनुसर्पणा' [नामक प्रतिमुखसन्धिके तेरहवें भ्रङ्कका लक्षण ष्रावि कहते हैं]—

[सूत्र ७४ ]—विस्मृत हुए इष्ट ष्रथंका पुनः ष्रथनुसंधान 'ष्रथनुसर्पण' [कहलाता] है ५०१ पहले [एक बारके ष्रथनुभव द्वारा] प्राप्त हुए, फिर [किसी कारणसे] विस्मृति द्वारा लुप्त हुए, ष्रभिलषित ष्रथंका कथाप्रसंगके वशसे फिर दुबारा ष्रथनुसंधान [या स्मृति] ष्रथनुसर्पण [नामक ष्रङ्क कहलाता] है ।

जैसे पार्थविजयके द्वितीय ष्रङ्कमें द्रौपदी युद्धिष्ठिरसे कहती है—

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का० ४१-४३, सू० ७६-७७ ] प्रथमो विवेक: [ १४५

[महाराज स्वामिरेव दिवसपरिवर्त्तनगणनाभिः किरणीभूतपरिभवोद्धृतदुःखस्य मे हृदयस्य प्रसृत एवानार्यदु:शासनेन स्वात्मनः केशप्रग्रहापमानव्यतान्तः। इति संस्कृतम्]।

अथ प्रागनुभवाद हृथ निष्प्रतीकार-कालहरणात् प्रसृतं नर्थामति श्रुवती पुनस्तमनुस्मरतीति ॥ ४० ॥

एतस्मिन् प्रतिमुखसन्ध्येरंगानि त्रयोदशोचति ।

[३] अथ गर्भसन्ध्येरंगानि व्याख्यास्यामः—

[ सूत्र ७६ ]—संग्रहो रूपमनुसमा प्रार्थनोदाहृतिः क्रमः ।

उद्धर गो विग्लवश्चैतद् गुणतः कार्यमष्टकम् ॥४५ १॥

स्वादेपोडधिकलं मार्गो सत्याहारस्य-तोटकेः ।

परुचैतनि प्रधानानि गर्भेडज्ञानि त्रयोदश ॥४५ २॥

'गुणतः' इति गुणभावेन, गुणमुपकारमपेक्ष्य वा । तेन फलोदयेऽपि दर्शनेार्थ संग्रहोडवश्यं निवन्धनीयः । स्वादिप्रादीनि तु मुख्यानिति ॥४१-४२॥

(९) अथ संग्रहः

[सूत्र ७७]—संग्रहः साम-दानादिः

साम-दानं द्वेध-मेदयोरपलक्षणम् । स्वादिशब्देन मायेन्त्रजालादिसंग्रहः ।

यथा रत्नावल्याम्—

हे महाराज ! इन्हीं दिनोंके परिवर्त्तनोंको गिनते हुए मैं, हृदयमें गांठ-सी डाल देने वाले [भाव या बार-बारकी रगड़से हारके किसी स्थानपर जो कड़ी गांठ-सी बन जाती है उसका] किरच कहते हैं] दु:शासनके द्वारा किए गए अपने बालोंके खींचे जानेकेऽपमानके वृत्तांतको भूल गई थी ।

यहां [इस कथनमें] पहले [केशप्रग्रहके कालमें] भ्रानुभव द्वारा प्राप्त श्रवण प्रतिकार के बिना ही कालके व्यतीत होनेके कारण भूले हुए दु:ख] को इस प्रकार कहती हुई [द्रौपदी] उसको फिर स्मरण करती है । [प्रत: यह 'भ्रानुसर्पणा' का उदाहरण है]।

ये प्रतिमुखसन्धिके तरह अ्रंग हैं ॥

(३) गर्भसन्धिके तरह श्रंग—

ग्रथ गर्भसन्धिके श्रंगोंकी व्याख्या करनेके लिए उनके नाम गिनाते हैं।

[सूत्र ७६]—१. संग्रह, २. रूप, ३. भ्रानुसमा, ४. प्रार्थना, ५. उदाहृतिः, ६. क्रमः, ७. उद्वेग, ८. श्रौर ९. विग्लव । ये श्राठ [अंग] गौरव रूपमें [या विशेष प्रयोजनवश प्रयुक्त] करना चाहिए ॥४१॥

९. श्रावेशप, १०. श्रधिकल, ११. मार्ग, १२. सत्याहारस्य श्रौर १३. तोटक । ये पांच श्रंग गर्भसंधिमें प्रधान [अंग] हैं । इस प्रकार [गर्भसंधिके] तरह श्रंग [होते] हैं ॥४२॥

(९) संग्रह—

[सूत्र ७७]—[सबसे पहले] 'संग्रह' नामक गर्भसंधिके श्रंगका लक्षण करते हैं]—

साम दान श्रादि [के प्रयोगों] 'संग्रह' [कहा जाता] है । जैसे रसनावलीमें—

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"राजा—वयस्य न खलु किञ्चित् त्वयि न सम्भाव्यते ।" इति साम । संकेतादिवातां श्रुत्वा कटकवितरग्यां तु दानम् । [भेद:] यथा रघुविलासे पञ्चमेडङ्के क्रमात् पवनवेषो राक्षस: प्राप्त—"राक्ष:—प्रसीदतु देव: । रावण—गृध्राण प्रसादम् । [पुन: प्रतीहारं प्रति] वराहतुङ्ग ! समादिश कुमारं कुम्भकर्णं यथा पवनं किलिकिलायितं त्वद्विधानामधिकृत् ।" एष द्वयार्थमागतवतो बालितनयस्य दोभार्तः ऋतको हतुमत्पितु: सुग्रीवाद् भेद: प्रयुक्त: । यथा वात्रीव चतुर्थेऽङ्के रावण:— "यायावरेषा किमनेन वनेचरेषा, मां स्थावरं वरमुपास्व कुरङ्ककान्ति । कि वा स्तुवे तव पुरस्खतुरस्थितीनां, वेदैरध्रसौरभवती भवती प्रकाशडम् ॥" सीता—को वा जाजावरो को वा थावरू त्ति विवेगं लक्खणानारायपड्ई वाविकरिसड । [को वा यायावर: को वा स्थावर इति विवेकं लक्मणानाराच-पद्धति राविकरिष्यति । इति संस्कृतम् ।

राक्षा: [सर्वोच्च चन्द्रद्राह्मं परामृश्य]—"राजा—हे मित्र ! तुम्हारे लिए कोई बात व्रासम्भव नहीं है ।" यह साम है । [उसके बाद उसी द्वितीयाङ्कमें] संकेतादिकी बात सुनकर कटकका दान [ग्रङ्गका प्रयोग] है । [भेद-प्रयोगका उदाहरण] जैसे रघुविलासमें पञ्चमाङ्कमें [वार्तालापके] क्रमसे हनुमान के पिता] पवनका वेष धरके किए हुए [मायावी] राक्षस कहता है—"राक्ष:—महाराज ! ग्राप प्रसन्न हों । रावण—[हमारे] प्रसादको ग्रहण करो । [फिर प्रतीहारसे] हे वराहतुङ्ग ! कुमार कुम्भकर्णांको [मेरी ग्रोरसे] ग्राज्ञा दो कि पवनकुमारको शत्रु [जाकर] किष्किन्धाके राज्यपर प्रभिविक्त करे ।" इसमे [रामकी श्रोरसे] दूत बने कर ग्राए हुए भ्रातृकके लिए हनुमानके पिता [पवनकुमार] का सुप्रीवसे यह बनावटी भेद दिखलाया गया है । [पवनकुमार] ग्राथवा जैसे यहाँ [अर्थात् रघुविलासमें हो] चतुर्थ प्रङ्कमें रावण [कहता है]— "रावण—हे मुगके समान नेत्रों वाली सीते । सर्वदा मारे-मारे फिरने वाले [प्रतिशयेन याति इति यायावर:] इस [रामचन्द्रके पास रहने] से क्या लाभ है । सदा स्थिर [एक स्थान पर] रहने वाले मुझको ग्रापना वर बना लो । तुम्हारे सामने मैं [ग्रापनी] क्या वड़ाई करूं, तुम तो स्वयं चतुरोंकी स्थितिमें ग्रथयन्त समभदार प्रसिद्ध हो । सीता—कौन मारा-मारा फिरने वाला या कौन स्थिर रहने वाला है इस बातको तो लक्ष्मणाके बारोंकी पंक्ति हो प्रकट करेगी । रावण—[कोधपूर्वक तलवारको पकड़ता हुया]

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प्रथमो विवेक:

प्रेमावनद्धहृदयःसर्वलंकेश्वरः सुर्दति ! सोढा । सोढा न चन्द्रहासः पुनरयमुल्लुठ्यवृत्तिनाम् ।" एष सीताज्जोभार्थं रावणेन द्राङ्डः प्रयुक्तः । मायाप्रयोगश्रात्रैव कृतकलहस्य सुप्रीहवानयन-रावणस्य सीताघटनादिको निवद्ध इति ।

(२) श्रथ रूपम्—

[सूत्र ७८]—हारं नानार्थसंश्रयः । नानारूपाणामर्थानां संश्रयेऽनवधार्यं रूपमथव रूपम् । ग्रनियतो ह्याकारो रूपमुच्यते । मुखसन्ध्यङ्गद् युक्ते: कृत्यविचाररूपत्वेन नियताकाराया श्रथ सेढ: । यथा कृत्यारावषो रामो जटायुणसमप्रस्यभिजानन्नाह—

"गिरिरयममरेंद्रश्रायो निलयं नपच्चः, कृतरिपु सुरेशः शान्तिततो वैनतेयः । श्रपररामह मनो मे न तः पितुः प्राणभूतः, किमुत वत स एष ध्यपेतायुर्जटायुः ।।" इति ।

किमुत वत स एष ध्यपेतायुर्जटायुः ।।" इति । अन्ये त्वधरीयते—'रूपं वितर्कवद् वाक्यम्' इति ।

हे सुन्दर दांतों वाली सीते ! प्रेमसे श्रावृढ़ हृदय होनेके कारण लंकेश्वर [अर्थात् मैं रावण] तो सब कुछ [श्रर्थात् तुम्हारी उचित-अनुचित सब बातें] सह लेगा किन्तु [यह ध्यान रखो कि] लुटेरों [प्रर्थात् राम लक्ष्मण] के श्राचार्योंकी यह तलवार सहन नहीं करेगी ।" सीताकी डरानेके लिये रावणने यह दण्डका प्रयोग किया है । श्रौर इसी [रघुविलासमें] में लक्ष्मण सुप्रीव श्रादिके बनावट श्रानयन श्रौर सीता रावणके बनावट सम्मिलनके वशान द्वारा मायाका प्रयोग किया गया है ।

(२) रूप—

श्रथ 'रूप' [नामक ग्रभिनयसन्धिके द्वितीय श्रङ्कका लक्षरण] श्रादि कहते हैं]— ग्रनेक प्रकारके श्रर्थोंका संशय [वा विभिन्न करना] 'रूप' [कहलाता] है । ग्रनेक प्रकारके श्रर्थोंका [एक जगह] संशय श्रर्थात् [किसी एकका] निश्चय न कर सकना रूप [अर्थात् ग्रनियताकार] के समान होनेसे 'रूप' [कहलाता] है । ग्रनियत श्राकारको 'रूप' कहा जाता है । कार्यके विचार-रूप श्रौर नियत श्राकार वाले 'युक्ति' [नामक] मुखसन्धिके श्रङ्गसे [ग्रनियत प्रकार होनेके कारण] इस [ग्रभिनयसन्धिके 'रूप' नामक श्रङ्ग] का भेद [स्पष्ट] है । [इस 'रूप' नामक श्रङ्गका उदाहरण] जैसे कृत्यारावणमें [रावणके द्वारा मारे गए] जटायुको पहचान सकने पर राम कहते हैं—

क्या श्राज देवराज इन्द्रने इस पर्वतके पंख काट डाले हैं? श्रथवा देत्यके राजाने वैरके कारण गरुडको काट कर डाल दिया है । मेरे मनमें एक श्रौर बात भी श्राती है कि श्रथवा ये हमारे पिताजीके प्राणभूत [घनिष्ट मित्र] मरे हुए जटायु हैं । इसमें मृत जटायुको देखकर नाना प्रकारके श्रर्थोंका संशय दिखलाया गया है इसलिए यह 'रूप' नामक श्रङ्गका उदाहरण है ।

दूसरे लोग—'वितर्क युक्त वाक्य 'रूप' है । इस प्रकार ['रूप' का लक्षरण] पढ़ते हैं ।

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यथा रस्नावल्यों राजा कमादाह—

"प्रणयविशदां दृष्टिं वक्त्रे ददाति न शंकिता, घटयति घनं कटाक्षलेखे रसज्ञः पयोधरौ। वदति बहुशो गच्छामिति प्रयत्नधृताप्यधः, रमयतितरां संकेतस्था तथाप हि कामिनी ॥ कथं विरमति वक्त्रतः कि स्त्रियां विदितः स्वापरं वक्त्रान्तो दर्शयः।"

इत्यनेन रस्नावल्लीमागमप्राप्त्यैव देवेशंकया वितर्कोऽद् रूपमिति । स्वार्थे तु—'चित्रार्थ रूपकं वचः' इति पठन्ति । यथा वेष्ट्यसंधारे सुन्दरकेशा चित्रसंप्रायवर्णनिमिति ।

(३) ग्रथानुमानम्—

[सूत्र ७६]—ग्रनुमा निश्चयो लिंगात् ।

लिंगाद्देतोर्नान्तरीयकस्य लिंगिनो निश्चयोऽनुमानम्। निश्चयार्थपत्पेन च उद्‌- रूपया युक्तिभियते । यथा भास्कृते स्वप्नवासवदत्ते शेफालिकामण्डपशिलातलमव- लोक्य वत्सराजः—

[उदाहरण] जैसे रत्नावलीमें क्रमसे राजा कहता है— भ्रमभीत होनेके कारण मुखकी ओर प्रेमपूर्वक [निम्रभ होकर] देख नहीं पाती है गले में प्रालिंगन करती हुई भी ग्रानन्दमग्न होकर जोरसे स्तनोंको नहीं चिपटाती है । प्रयत्नपूर्वक पकड़ने पर भी बार-बार में जाती हूँ यह कहती है । फिर वो संकेतवशा प्राई हुई कामिनी श्रानन्द ग्रानन्द प्रदान करती है ।

वस्तुतः [विदूषक न जाने] देर क्यों कर रहा है [श्रमी तक ग्राया नहीं] ? कहाँ यह समाचार देवी [वासवदत्ता] को मालूम तो नहीं हो गया ?" इस [कथन] से रत्नावलोके साथ समागमके श्रानन्दूल होई देवी [वासवदत्ता] की शंका से वितर्क होनेके कारण 'रूप' [ग्राहकका यह उदाहरणहै] ।

ग्रथ्य [ग्राह्य] तो— 'विचित्र ग्रथ्य वाला रूप [कहलाता]' । यह ['हद' का लक्षण] बतलाते हैं [पठन्ति] । जैसे वेष्ट्यसंधारमें [पंचम ग्रङ्कमें] सुन्दरके संप्रायका विचित्र रूपसे वर्णन करता है [वह 'रूप' नामक ग्राद्धका उदाहरणहै] ।

(३) ग्रनुमान— ग्रन्थ 'ग्रनुमान' [नामक गर्भसंधिके तृतीय ग्रङ्गका लक्षण ग्रादि कहते हैं]—

[सूत्र ७७]—लिंगके द्वारा [लिंगीका] निश्चय 'ग्रनुमान' [कहलाता] है । लिंग प्रयोजन हेतुके द्वारा उससे प्रविनाभूत [नित्य सम्बद्ध] लिंगी [ग्रर्थात् साध्य] का निश्चय करना 'ग्रनुमान' [कहलाता] है । निश्चय रूप होनेके कारण ही ऊह रूप 'युक्ति' [नामक मुख्यसंधिके ग्रङ्ग] से इसका भेद है ।

जैसे भास्करचित स्वप्न वासवदत्तमें शेफालिकामण्डपके शिलातलको देखकर वत्स- राज [उदयन कहते हैं]—

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प्रथमो विवेक:

"पादाकान्तान्तिपुष्पार्ङि सोस्म चेदं शिलातलम् । नूनं काञ्चिदिहासीनां मां हस्त्टवा सहसा गता ॥"

पूर्वार्ङं लिंगम् । उत्तरार्ङमनुमानम् ।

यथा वा यद्वाभ्रुयुदये पष्टे गर्भाङ्ङे रक्षिणींमवलोक्य कृष्णा— "अस्यां मुगीहशि हशोरमुतच्छटायां, देवः स्मरोऽपि नियतं वितताभिलाषः । एतन् समागममहोत्सवबद्धदृष्टि- श्रान्ति न मामपरथा विशिखैः कर्थ सः ॥" इति

(४) स्वार्थ प्रार्थना—

[सूत्र ५०]—प्रार्थना भाव्यावाचनम् ।४५ ३।।

भावानां साध्यफलोचिनानां रति-द्वेष-उत्सवादीनां याचनं प्रार्थना । यथा देवीचन्द्रगुप्ते चतुर्थाङ्ङे चन्द्रगुप्तः—

"प्रिय माधवसेन ! त्वन्मदानीनां मे बन्ध्मसाझापय । करठे कित्तररक्षित ! बाहुलतिकापाशः समासज्जर्ता, दारस्ते स्तनबालक्वधो मम बलादू वध्नातु पाणिद्रियम् । पादौ त्वज्जघनस्थलप्रणयिनी सन्दानयोनिमेखलां, व त्वद्‌गुणबधमेव हृदयं बन्धं पुनर्नाहिन्ति ॥"

"फूल पैरोंसे कुचले हुए हैं श्रौर यह शिलातल गर्म हो रहा है । [इससे प्रतीत होता है कि] निश्चय हो यहाँ कोई [स्त्री] बैठी हुई थी जो शुभको देखकर सहसा चली गई है ।" इसमें पूर्वार्ङ [भाग] लिंग है, श्रौर उत्तरार्ङ [भाग] श्रनुमान है ।

ग्रथवा जैसे यद्वाभ्रुयुदयके छठे [प्रकृत] गर्भाङ्ङमें कृष्णा [कहते हैं]—

नेत्रोंके लिए श्रामृतके समान [श्राहाद-वायिनी] इस मुगनयनोके विषयमें निश्चय ही कामदेवका उत्कट श्राभिलाष है । ग्रन्था इसके समागमके महोत्सवके लिए उत्सुक मुष्को [ग्रन्थना प्रतिहन्तही श्रौर बाधक सम्भाकर] यह श्रपने बाणों से क्यों मार रहा है ??

इसमें कामदेवके बागोंके प्रहार रूप लिंगसे कामदेवके नायिकाके प्रति श्राभिलाष रूप लिंगोका श्रनुमान किए जानेसे यह 'ग्रनुमान' रूप प्रङ्कका उदाहरण है ।

(४) प्रार्थना—

श्रब प्रार्थना [नामक गर्भसन्धिके चतुर्थ प्रङ्गका लक्षणादि करते हैं]—

[सूत्र ५०]—भावोकी याचना प्रार्थना [कहलाती] है ।

साध्य फलके श्रनुरूप रति, हर्ष, उत्सव श्रादि भावोकी याचना प्रार्थना [कहलाती] है ।

जैसे देवीचन्द्रगुप्तके चतुर्थ श्रङ्ङे चन्द्रगुप्त [कहता है]—

[ प्रिये माधवसेने ! तुम श्रब मेरे बन्धनकी श्राज्ञा [श्रपने प्राणोंको इस प्रकार] दो—

हे कित्तररके समान [मधुर] कण्ठ वाली [प्रिये] ! श्रपनी बाहुलताका पाशा मेरे गलेमें डालो । तुम्हारे स्तनोंका बान्धव [स्तनोंके साथ रहने वाला] हार जबरदस्ती मेरे दोनों हायोंको बांध ले । तुम्हारे जघनस्थलका प्रालिंगन करने वाली मेखला मेरे पैरोंको जकड़ ले ।

किन्तु पहिले हो तुम्हारे पादसे बन्धे हुए हृदयको बन्धनकी श्रावश्यकता नहीं है ।

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श्रत्र रते प्रार्थना।

तथा कृत्यारावयगे चतुर्थेऽङ्के सीताहरण-भयाद्दुःखितो विफला-न्वेषणा लचमनः---

"तदपि नामायमसदृशवृत्तान्तस्य प्रतिज्ञणमुपचीयमान-नायककृत्यसनभाजोड-श्रुदयावसानः संहारो नाटकस्येव भवेत्" इति।

श्रत्रयुदयात्मक डलवर्गो लहसगोर्नार्थितः।

केचिद्वदन्त्यन्रैव प्रार्थनासाहः यया शुचिविलासे कृतकथानुरूपतथुवेपो राज्ञः [रावयं प्रति]---

"यदि भग्नं विपिनं धनुर्धरकरालदचो यदचो हतः, शिर्श्रां लङ्घयत; र्नाचारपते र्थन्मूर्तिददतं पदम्। यदि वेश्मनि परःशतनि शिशुना जुगुप्सान कापेयत;, तनं ज्ञान्त्यमशेषपेम पुरतस्ते देव ! बद्धोद्यमालः॥ इति । केचित् तु प्राक्तनमिदं चाङ् न मन्यन्ते ॥ ५३ ॥

(५) स्थादाहृति---

[श्रत्र ९१]---उदाहृति: समुत्कर्षः ।

इसमें रमराकी प्रार्थना है।

ग्रोर कृत्यारावयके चतुर्थ प्रंकमें सीताहरण तथा भाईके दु:खसे दु:खित [सीताके] ग्रन्वेषरामें ग्रसफल लचमराके [कहते हैं]---

"फिर भी क्या प्रतिक्रया बढ़ने वाली विपत्तियोंसे युक्त नायक वाले नाटकके उपसंहार के समान हमारा भी ग्रन्थयमें पर्यवसान होगा ।"

यहां लचमराकने ग्रन्थयुदयात्मक उत्कर्षकी कामना-प्रार्थना की है। [श्रत्रः यह 'प्रार्थना' नामक श्रृंगारका उदाहरण है ।

कुछ लोग ग्रस्थयत्नान्मात्र [प्रर्थात् प्रत्येक प्रकारकी याचन] को 'प्रार्थना' कहते हैं ।

जैसे रघुविलासमें हनुमानके पिता [प्रर्थात् पवनकुमार] का बनावटी वेष धाररा करनेवाला राचस [रावणके प्रति कहता है]---

[मेरे पुत्र हनुमानने लङ्कामें श्राकर] जो उद्योग उजाड़ा, ग्रोर धनुर्धरोंकी कलामें दक्ष राचसराजके सिरपर जो पंर रखा, ग्रक्षकुमारकी मारा, ग्रोर शिशुपालको उल्लङ्घन करनेवाले राचसराजके सिरपर जो पंर रखा, तथा वानरभावके कारररण [कापेयत;] मेरे बच्चोंने जो संकड़ों घर जला डाले, हे देव !

उस सबको क्षमा करें । मैं [उसका पिता ग्रपने सामने यह मैं हाथ जोड़ता हूँ॥

इसमें पवनकुमारका वेष धारराए किए हुए मायावी राचस, जो रावणसे हनुमानको क्षमा करनेकी याचना कर रहा है उसको भी 'प्रार्थना' ब्रह्म कहा जा सकता है ।

कोई [ग्राचार्य] तो इसे पहले [प्रर्थात् ग्रन्थुनानको] ग्रोर इसको [प्रर्थात् प्रार्थना] को श्रृंग नहीं मानते हैं ।

(५) उद्राहृति---

उद्रह 'उदाहृति' [नामक ग्रर्भेसंधिके पटचचम श्रृंगारका लचमराक ग्रादि करते हैं]---

[सूत्र ९२]---किसीके] समुत्कर्ष [का वर्रान] 'उदाहृति' [कहलाता] है---

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का० ४४, सू० ४२ ] प्रथमो विवेक: [ १४१

लोकप्रसिद्धवस्तुप्रेच्चया य: समुत्कर्ष: समुत्कृष्टोऽर्थ: स उत्कर्षोऽतिरक्षादुदाहृतिः । यथा रत्नावल्यां—

"राजा—ग्रहो महदाश्चर्यम्—मनः प्रकृत्यैव चलं दुर्लङ्घं च तथापि मे । कामेनैव कृतं विद्धं सर्वे: शीलोमुखः ॥ छात्रेतरधनविषयो मनस्तस्य स युगपत् सर्वैः शरैः स्वभावचपल-दुर्लङ्घमनोवेधेन समुत्कर्षः ।

(६) व्याथ क्रम:— [सूत्र ४२]—क्रमो भावस्य निश्चयः ।

भावस्य पराभिप्रायस्य, व्यथवा भाटचमानस्यार्थस्य ऊहः-प्रतिभादिवशातिर्यङ्यो यथावस्थिततद्रूपनिश्चय: 'क्रम' । बुद्धिसतत्त्व कमते, न प्रतिहन्यते इत्यर्थः ।

यथा देवोचन्द्रगुप्ते—"चन्द्रगुप्त:—[ध्रुवदेवो हृष्टवा स्वगतमाह] इयमपि देवी तिष्ठति । यैषा—रम्यां चारुतराकार्षीं च करुणां शोकेन नीता दशां, तर्कोलोकोपगतैरथ राहुशिरसो गुप्तैव चान्द्री कला । पत्सु: क्लैव्यजनोचितेन चरितेनाननेन पुंस: सत:, लज्जा—कोप—विपाद—भीर्यरतिभ: द्वेषीकृता तामस्यत् ॥"

लोकप्रसिद्ध [सामान्य] वस्तुश्रोंकी प्रपेच्चा [किसी वस्तुका] जो समुत्कर्ष है वह उत्कर्ष का प्राहररा [करनेवाला] होनेसे 'उदाहृतिः' [कहलाता] है । जैसे रत्नावलीमें—

"राजा—ग्रह ! ब्रहो ! बडे श्राश्चर्यकी बात है कि—मन तो स्वभावत: ही चञ्चल ग्रौर न दिखाई देनेवाला है । फिर भी कामदेवने मेरे उस मनको एक साथ ही ग्रपने सारे बाणोंसे विद्ध कर दिया है !"

यहाँ स्वभावत: चञ्चल ग्रौर न दिखाई देनेवाले मनको एक साथ ही सारे बाणोंसे वेध देनेके काररा ग्रन्य धनुर्धरियोंकी प्रपेच्चा कामदेवका उत्कर्ष [वर्णित होनेसे यह 'समुत्कर्ष' नामक श्रग्रकी उदाहरण है] ।

(६) क्रम—

ग्रथ 'क्रम' [नामक गर्भसंधिके षट् ग्रङ्गका लक्षण करते हैं]— [सूत्र ४२]—भावका निश्चय 'कम' [कहलाता] है—

भाव ग्रर्थात् दूसरेके ग्रभिप्रायक, ग्रथवा ऊह, प्रतिभा ग्रादिके द्वारा भाव्यमान भाव ग्रर्थात् उसके ग्रभिप्रायके यथावस्थित रूप ग्रादिके निश्चय 'क्रम' [कहलाता] है । उसके विषयमें बुद्धि कमरगे करती है [चलती है ।] प्रतिहत नहीं होती है [इसलिए उसका 'क्रम'

कहते हैं ।] जैसे देवी चन्द्रगुप्तमें—"चन्द्रगुप्त—[ध्रुवदेवो हृष्टवा स्वगतामाह] यह देवी भी बैठी हैं जो--

तत्काल ग्राए हुए राहुके शिरके द्वारा ग्रोल्लसितकी हुई चन्द्रमा की कलाके समान शोक के काररा रम्य होने पर भी दु:खदायिनी करुणा प्रवस्थाको प्राप्त, पतके पुरुष होने पर भी

के काररा रम्य होने पर भी दु:खदायिनी करुणा प्रवस्थाको प्राप्त, पतके पुरुष होने पर भी नपुसकों-जैसे इस ग्राचाररगसे लज्जा, कोप, विषाद, भय ग्रररतिसे प्रस्त दु:खी हो रहा है ।

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क्षत्र ध्रुवदेवेभ्याभिप्रायस्य चन्द्रगुप्तेन निश्र्चयः ।

तथा रन्नावल्याम्—

हिया सर्वेस्यासौ हरति विदितास्मीति बदनं द्रयोदष्टावालापं कलयति कथामन्सविपयाम् ।

सखीषु स्मेरासु प्रकटयति वैलक्ष्यमधिकं, प्रिया प्रेयसीति हृदयानु हितेतिकर्तव्यतां कुरुते ॥

श्रप्रत्र राज्ञा भाव्यमानाया: सागरिकाया: स्वरूपवसथानिर्णय: कृत: ।

श्रन्ये तु—‘क्रम: सखीन्यमानग्र्रथ:' इत्याहुः । यथा रस्तावल्याम्—

वत्सराजस्य सागरिकासमागमर्म्मभसलपतो विचेष्टके नोपवने योजनम् ।

श्रन्ये तु भविष्यदर्थतन्वोपलब्धिं क्रममिच्छन्ति । यथा वेणीसंहार—

“कुप:—राजन् दुर्योधन ! महान् खलु द्रोणपुत्रो वोधुमध्यवस्थित: समरभार: ।

भवता च कृतपरिरोेऽमुचेल्ले तु लोकत्रयमपि समर्थ: ।

कि पुनरेतद् युधििष्ठिरबलम् ।” इति ।

(७) श्रथोद्घेग:-

[सूत्र ७३]—उद्वेगो भी: चौर-नृप-श्रत्रु-नायकादिष्यो भयमुद्रेग: ।

यथा श्रामात्यशंकुर्कावरचित्रो त्पलावलम्बितके प्रकरणो पञ्चमेडङ्क—

यहाँ श्रद्वेगवीके श्राभिप्रायका चन्द्रगुप्तके द्वारा निश्चय [होनेसे 'क्रम' का उदाहरणहै] ।

इसी प्रकार रत्नावलीमें—

“सब लोगोको [मेरा वत्सराजके प्रति प्रेम] विदित हो गया है ऐसा समभ कर [साग-

रिका] सखे मुख छिपाती है, [कहीं] दो जनोंकी बात करते देखकर यह समभती है कि ये

लोग मेरे विषयमें ही बात कर रहे हैं । सखियोंके मुस्करानेपर श्रौर भी श्रधिक शङ्का जाती

है । इस प्रकार प्रिया [सागरिका] प्राय: हृदयमें बैठे हुए भयसे पीडित रहती है ।”

इसमें राजाने भाव्यसान सागरिकाके स्वरूप तथा श्रवस्थाका निर्णय किया है [इस

लिए यह भी 'क्रम' नामक श्रङ्गका उदाहरणहै] ।

श्रन्ये लोग तो—‘सखीन्यमान ग्र्रथकी प्राप्तिके 'क्रम' कहते हैं । जैसे रत्नावलीमें

सागरिकाके समागमकी चाहनवाली वत्सराजका उपवनमें विचरणकने द्वारा [सागरिकाके साथ]

मिला देना [योजना सखीन्यमान ग्र्रथकी प्राप्ति रूप होने से 'क्रम' श्रङ्गहै] ।

श्रन्ये लोग श्रागे होने वाले श्र्रथतत्के ज्ञानको 'क्रम' कहते हैं । जैसे वेणीसंहारमें—

“कुप:— राजन् दुर्योधन ! द्रोणके पुत्र [श्रश्वत्थामा] ने महान् युद्धके भारको प्रहार

करनेका निश्चय किया है । श्रापके द्वारा [सेनापति पदपर] श्रभिषिक्त किए जानेपर वह तीनों

लोकोंका नाश करनेमें भी समर्थ हो सकता है । इस युधििष्ठिरकी सेनाकी तो बात ही क्या है ।

(७) उद्वेग

श्रथ 'उद्वेग' [नामक गर्भसन्धिके सङ्क्षम श्रङ्गका लक्षण श्रादि करते हैं]—

[सूत्र ७२]—भय [का नाम] 'उद्वेग' है ।

चौर, राजा, श्रत्रु श्रथवा नायिका श्रादिसे भय 'उद्वेग' [कहलाता] है ।

जैसे श्रामात्य

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का० ४४, सू० ८३ ]

प्रथमो विशेष:

[ १४३

"[नेपथ्ये सचीविकारम्] गिरिरहेऽ ले गिराहेऽ वेढेढ ले वेढेढ । [सर्वे सभयमव- लोकयन्ति] ।

[गुड़ीत रे गुड़ीत वेष्ट्रहवं रे वेष्ट्रहवम् । इति संस्कृतम् । ]

स्थविर :—हा थिक् कष्टं, द्रस्यवः सम्पर्तान्त । किमत्र शरयां प्रपद्येऽहि ।"

श्रत्र नायिका-सखी-स्थविरादीनां राजगृहाद्दने विद्रुताो दशसुस्थो भयम् । तथा मुच्छककृतां साथंवादचारुदत्तस्य चौर्याभिशापज नृपादु भयम् । तथा वेधीसंहारे पञ्चमेडङ्के [नेपथ्ये कलकलानन्तरम्]—

"मो भो दुर्योधनानुजीवनः कौरवभटा: किमिदमस्मद् भयादयथार्थ स खर- रन्ति भवन्तः ।

धृतराष्ट्र :—[साशङ्कम्] सख्य ! ज्ञायतां किमेतदिति ।

सख्य :—[ उत्थाय नेपथ्याभिमुखमवलोक्य] तात ! महाराज ! प्राप्तावेकरथ्याहलो पुछ्छन्तौ त्वामितस्ततः ।

सर्वे—(साशङ्कम्) कक्ष कक्ष---

सख्य:—स करोरि: स च कूषो वृककर्मा वृकोदर: ।।

गान्धारी :—जात कि संपद श्रवणवेधा इति ।

[जात किं साशङ्कतमवलम्बनम् । इति संस्कृतम् ]

एतदरिभयम् तथा रस्तनावल्या्मु

शांकुक विरचित 'चित्रोद्पलावलम्बितक' नामक प्रकारके पद्याङ्कमके—

"[नेपथ्ये चीत्कार करते हुए] पकड़ो रे पकड़ो, बांधो रे बांधो । [सब लोग भयभीत होकर देखने लगते हैं] ।

बृद्ध—हाय डाकू आा रहे हैं ! यहां किसकी धारा में जॉय ?"

इसमें राजगृहके भंग हो जानेसे भागे हुए नायिका, सखी तथा स्थविर ग्रादि को डाकुओं से भय [वर्णित हु्रा है यह 'उद्देग' नामक श्रृङ्गारका उदाहरण] है ।

इसी प्रकार मुच्छककटिकमें साथंवाद चारुदत्तको चौर्यके श्रभिशापसे उत्पन्न राजासे भय

[उद्देगका उदाहरण] है ।

इसी प्रकार वेधीसंहारमें पञ्चम श्रङ्कमें—

"[नेपथ्ये] कोलाहलके ग्रनन्तर] श्रारे रे दुर्योधनके ग्रनुयायी कौरव वीरो ! हमारे भयके मारे तुम इधर-उधर क्यों भा रहे हो ?

धृतराष्ट्र—[सशङ्क शोक] सख्य ! देखो तो क्या बात है ।

सख्य—[उठ कर श्रोर नेपथ्यकी श्रोर देख कर] तात महाराज !

ग्रापको इधर-उधर पूछते हुए एक रथपर बैठे हुए दोनों श्रा गए हैं ।

सब लोग—[भयभीत होकर] कौन कौन ?

सख्य—वह करोरका नातु [वृक न ] श्रोर वह भेड़ियाके समान कर्म वाला भीम :

गान्धारी—श्रारे बेटा ! श्रावत क्या सहारा हो सकता है ?

वह शङ्कुभय [का उदाहरण] है ।

इसी प्रकार रस्तनावलीमें—

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सागरिका—वरं दारैर् ग्रहं संय् गयेव श्वश्रुरायैर् उद्वगधैय उवरदा। न उशा जाणिसंकेदवुत्तंताए देवीए सुसंगदाए विय परिभूद सिह्। ता जाव इध व्वसोए गदुत्त्र जहासमीहिदं करिस्सं।

[वरमिदानीमहं स्वयमेवात्मानमुद्दश्योपरता। न पुनर्ज्ञातसंकेदवृत्तान्तया देव्याः सुसंगतया व परिभूयास्मि। तद् यावदत्राशोके गद्वा यथासमीहितं करिष्ये। इति संस्कृतम्‌।]

श्राथ नायिकातो भयम्‌

(=) श्राथ विद्रव :-

[सूत्र ८४]—द्रवः शंका

भय-प्रासकारिस्सो वस्सुनो या शंकाडपायिकारकरवसम्भावना सा द्रवति शल्थीअमवति हृदयस्मनयेइत ‘द्रवः’। उप्पन्नंतं भयमुद्देगः। तत्सम्भावना तु विद्रवः।

यथा कुत्सारावसो पष्ठडण्णदे शांतिगुहस्थे रावसो—

"[नेपथ्थे] हला ब्रज्जउत्त ! परित्तायाहि परित्तायाहिअ ।

[दा श्रायं पुत्र ! परित्रायस्व, परित्रायस्व इति संस्कृतम्‌ ]।

प्रतिहारी—[श्रुवा ससम्भ्रममात्मनमगतम्‌] श्रुम्मो भद्दिणीओ चिद्धकंदहिअ ।

[प्रकाशम्‌] भण्णा श्रवणेडरे महंतो कलयकलो सुसंययिद ।

[श्रहो भर्त्ती एवाकंदिदि भर्त्तः ! श्रांतःपुरे महान्‌ कलकलः श्रूयते । इति संस्कृतम्‌]

रावणः—ज्ञातां किस्मेतन्‌" इति ।

सागरिका—ग्रहच्छा हो कि ग्रह मैं स्वयं ग्रापने-ग्राप फाँसी लगा कर मर जाऊँ ताकि सकेंत [मिलन] के समाचारको जान जाने वाली रानो [वासवदत्ता] के द्वारा सुसंगताके समान श्रपमानित न होना पड़े। इसलिए इस श्रशोकके पास जाकर श्रपनी इच्छाको पूर्ति करती हूँ ।

याह नायिकासे भय [का उदाहरणहै]

(=) विद्रव—

[सूत्र ८४]—शंका ‘द्रव’ [नामसे कही जातीहै]।

ग्रह ‘विद्रव’ [नामक गभंसंधिके ग्रंथम श्रद्धका लक्षण ग्रादि करतेहैं]—

भय या त्रास उत्पन्न करने वाली वस्सु जो शंका श्राद्धात्‌ विनाश या श्रनिष्ट करने की सम्भावना, वह, जिससे हृदय द्रवित श्रथ्वा शिथिल होता है [इस व्युत्पत्तिके श्रनुसार] ‘द्रव’ [कहलातीहै] । [प्रागे ‘उदेग’ नामक पूर्वोक्त श्रद्धसे इस ‘द्रव’ का भेद दिखलातेहैं] ।

श्रा जाने वाला भय ‘उदेग’ [कहलाता]है । [ग्रोर [ग्रागे ग्राने वाले भयकी] सम्भावना ‘द्रव’ [नामसे कही जातीहै] । [यह ‘उदेग’ तथा ‘द्रव’ इन दोनों श्रद्धोंका भेदहै] ।

जैसे कुत्सारावसमें पष्ठडण्णमें रावणके शांतिगृहमें बैठे होनेपर—

"[नेपथ्थे] हला श्रायं पुत्र ! बचाग्रो बचाग्रो ।

प्रतिहारी—[श्रुनकर भयभीत होकर श्रपने मनमें] ग्ररे यह तो स्वामिनी ही चिल्ला रहीहै । [प्रकाशमें] स्वामिनु ! ग्रनंतःपुरमें बड़ा कोलाहल सुनाई दे रहाहै ।

रावण—[जाकर] देखो यह कया बातहै ।

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का० ४५, सू० ४५ ]

प्रथमो विवेक:

[ १४५

चत्र रावणस्य शंका ।

ये चत्र शंकां त्रासरूपं ससम्भ्रममंगमाहुः तदू विद्रव-उद्देगाभ्यां गतार्थर्मत ।

(९) व्याख्येप:—

[सूत्र ८५]—श्रानेपो बीजप्रकाशनम् ॥ ४४ ॥

प्राश्रयार्थप्राप्तिस्थानिवदस्य बीजस्य मुख्यकार्योपायस्य प्रकाशनं प्रकटर्पेण विवर्मातनं व्याचष्टेप: यथा वेधीसंहारे सूत्र:—

"द्रुबा द्रोणेन पाथान्दभयर्माप न संरच्यते: सिन्धुराज:,

कुरूं दु:शासनेडस्मिन् हरिण इव कृतं भीमसेनेन कर्मे

दु:साध्यमप्यरीणां लगुमिव समरे पूरयितवा प्रतिज्ञां,

नाहं मन्ये सक्करं कुरुकुलवमुखं देवमेतावतापि ॥"

चत्र पाण्डवानां राज्यप्राप्तिकरकार्योपायस्मुख्यविषयकं रचयितॄणां कृतम् ।

यहां रावणको [भयको] शंका है [इसलिए यह 'विद्रव' नामक ग्राझकका उदाहरण] है।

जो लोग यहां त्रास रूप शंका को ससम्भ्रम [नमंसंधिका १४वीं] ग्राझ कहते हैं [वह उचित नहीं हैं क्योंकि] वह 'विद्रव' ग्राझ्यवा 'उद्देग' के ही अन्तर्गत हो जाता है ।

इसका ग्रभिप्राय यह है कि किन्हीं ग्राचार्योंने गर्भसंधिखे इन तेरहों में से रिक्त 'समग्रम' को भी गर्भसंधिका चौदहवहीं ग्रंग माना है । किन्तु ग्रन्थकार उनके इस मतसे

सहमत नहीं हैं । 'समग्रम' को गर्भसंधिका ग्रंग मानने वालोंने उसका लक्षण, त्रास रूप शंका को 'समग्रम' कहते हैं इस प्रकार किया है । ग्रन्थकारका कहना यह है कि यदि त्रास ग्रर्थात्

भयको 'समग्रम' माना जाय तो वह तो 'उद्देगो भी:' इस लक्षण वाले उद्देगके ग्रन्तर्गत हो जाता है । ग्रथवा यदि शंका को 'समग्रम' कहा जाय तो वह 'विद्रव: शंका' इस लक्षण वाले

जात है । ग्रथोर यदि शंका को 'समग्रम' कहा जाय तो वह 'विद्रव: शंका' इस लक्षण वाले विद्रवके ग्रन्तर्गत हो जाता है । इन दोनोंसे अतिरिक्त उसका श्रलग कोई ग्रस्तित्व नहीं

बनता है । ग्रतः 'समग्रम' को श्रलग चौदहवहीं ग्रंग मानना उचित नहीं है ।

(९) व्याख्येप—

ग्रथ 'ग्राक्षेप' [नामक गर्भसंधिको नवम ग्राझकके लक्षण ग्राप्ति कहते हैं]—

[सूत्र ८६]—बीजके प्रकाश [करने] को 'ग्राक्षेप' कहते हैं । ४५ ।

[गर्भसंघिके ग्रंगमूत] प्राप्त्याश्रयकी ग्रवस्थामें निबद्ध, मुख्यकार्यंकें उपायमूत बीजका प्रकाशन ग्रर्थात् प्रकटर्पेण ग्राविर्भावन 'ग्राक्षेप' [कहलाता] है । जैसे वेधीसंहार

में सूत्र [कहता है]—

द्रोणाचार्यंने ग्रभय-दान करके भी ग्रर्जुनसे सिन्धुराज [जयद्रथ] की रक्षा नहीं कर

पाई । इस दु:शासनके विषयमें भी [सिंहसदृश] भीमसेनेने हरिणके समान कृतं कर्म कर

डाला [ग्रर्थात् सिंह जिस प्रकार हरिणायस ही मार डालता है इसी प्रकार भीमसेनने

दु:शासनको समाप्त कर दिया] । इस प्रकार शत्रुनों [ग्रर्थात् पाण्डवों] की दु:साध्य प्रतिज्ञाओं

को भी गुदभूमिमें भ्टपट पूरां करके भी मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि कुरुकुलका विरोधी देव

भी पूरां मनोरथ नहीं हो पाया है [प्रभी वह कुछ श्रोद भी खेल दिखलावेगा] ।

यहां पाण्डवोंके राज्य-प्राप्ति रूप कार्यंकें उपाय [शत्रुके प्रमुख पुरुषोंके वध] का मुख्य

रूपसे प्रकाशन [किया गया ] है [ग्रतः यह 'ग्राक्षेप' नामक नवम ग्राझकका उदाहरण है] ।

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१४६ ] नाट्यदर्पणम् [ क० ४५, सू० ६६

अथवा बीजस्य हृदयभूमिनिमित्तगृहीतवार्द्रभिप्रायस्य वहिष्कररामान्वेपः। यथा रत्नावल्यां, वासवदत्तायामेव सागरिकेति राज्ञा विदूषकेन च परिगृहीतायां तदुक्तिप्रतिप्रिये सागरिके !

शीतांशुरुम्बुसुत्पले तव हृशौ पादानुकारौ करौ, रम्भागर्भनिर्मे तवोरुयुगले बाहू मृणालोपमौ। इत्याह्लादकराखिलाङ्गि ! रभसा निःशङ्कमालिङ्ग्य माम्, राज्ञाऽनि स्वमनुज्ञातपतिवरायेर्हि निर्वापय ॥"

इत्यादिपु राज्ञा स्वाभिप्रायबहिष्करणम्। केचिदेतदद्भुतं न मन्यन्ते इति।।४४।।

(१०) श्रथाधिबलम्

[सूत्र ८६]—ग्राधिबलं बलाधिक्यम् । परस्परबचनप्रत्युत्तरयोगेषु बुद्धिसाहायादबलाधिक्येन यत्कर्म इतरमभिसन्धातु समर्थं तत्कर्म बलविषये श्राधिकबलयोगादधिबलम् ।

यथा रत्नावल्याम्—

"किं पद्मास्य रुचि न हन्ति नयनानन्दं विधत्ते न वा, वृद्धि वा भषकेतनस्य कुरते नालोकमात्रेऽपि किम् ? वक्त्रेन्दौ तव सत्यं यदपरः शीतांशुरस्युद्गतो, दर्पः स्विदधुना तदेव निभृताधरः ।"

'ग्राक्षेप' [कहलाता]— जैसे रत्नावलीमें राजा तथा विदूषकके द्वारा वासवदत्ताको ही सागरिका समभ लेनेपर उनकी उक्तियोंमें [राजा कहता है]—

"प्रिये सागरिके ! तुम्हारा मुख चन्द्रमाके समान, तुम्हारे नेत्र नीलकमल रूप, तुम्हारे हाथ कमलके सदृश, तुम्हारी दोनों जाँघें कदलीके भीतरी भागके समान, तुम्हारी बाहुएँ मृणालके तुल्य हैं। इस प्रकार सर्वाङ्गसे ग्राह्लादकारिणी [हे प्रिये] ! प्राश्रो, ग्राह्रो, जल्दीसे निशांक भासे गाढालिङ्गन द्वारा कामावेशले सन्तप्त हुए मेरे ग्राङ्गोंको शान्त करो ।"

इत्यादिमें राजा द्वारा अपने ग्रभिप्रायका प्रकाशन किया गया है ।

(१०) श्राधिबल—

ग्रब [गर्भसन्धिके] 'ग्राधिबल' [नामक दशम ग्राङ्गका निरूपण करते हैं ]—

[सूत्र ८६]—बलके श्राधिक्यकको 'ग्राधिबल' कहते हैं ।

ग्राधिक्यके कारके जिसका कार्य दूसरेकी धोखा देनेमें समर्थ हो जाता है उसका वह कार्य बलाधिकेक विषयमें ग्रधिक बल सम्पन्न होनेसे 'ग्राधिबल' [नामक ग्राङ्ग कहलाता है] ।

जैसे रत्नावलीमें—

क्या [तुम्हारा मुख चन्द्रमाके समान] कमलोंकी कान्तिको नष्ट नहीं करता है ? ग्रथवा [चन्द्रमाके समान ही] नेत्रोंको ग्रानन्द प्रदान नहीं करता है ? ग्रथवा वर्षणमात्रसे ही [ चन्द्रमाके समान तुम्हारा मुख भषकेतन प्रर्थात् ] कामको नहीं बढ़ाता है जो यह दूसरा

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का० ४५, सू० ४६ ] प्रथमो विवेक: [ १४७

इति पाठान्तरं राज्ञा वासवदत्ताया मुखोद्घाटने प्रत्यभिज्ञानम्‌। छात्र सागरिकावेशं धारयन्ती विद्युष्कबुद्धिदौर्बल्याद् वासवदत्ता राजानमभिसंधत्ते । कपटस्यान्थाभावमन्ये श्रधिबलमाहुः । यथा रत्नावल्याम्‌—

"राजा—एवमपि प्रत्यदृष्ट्यलीकः किश्चित्कथं नापयामि— ज्ञातास्र्रतामपनयामि विलच एषः; लाज्जाकृतां चरयोस्स्तव देवि ! मूर्छनां कोंपोपरागजनितां तु मुखेन्दुविम्बे हतं च नमो यदि परं करुणा मचि स्यान्‌ ॥ इति छात्र वासवदत्तां प्रति राज्ञो बचनं विफलं जातम्‌। एके तु सोपपत्तिम्बाक्यमधिकचिन्ति । यथा वेधीसंधारे पञ्चमेऽङ्के धृतराष्ट्रमुदिश्य

"भोमसेनः—श्रलमिदानीं मन्युन । कृष्णा केशपु कृष्णा नृपसदसि वधूः पाण्डवानां नृपपत्नीः सर्वे ते क्रोधवह्नौ कुशाशलभकुलाच्चन्या येन दद्धा: ।

चरहसा [प्राकाशमें] उदय हो रहा है । यदि [उसको] ग्रह्मृतका गर्भ हो [श्रोर उसी कारण तुम्हारे मुखके सामने उदय होनेका हुसाहस कर रहा हो तो] वह [ग्रह्मृत] भी तो तुम्हारे श्रदर-विसमें विद्धमान ही है।

इस पाठके बाबत राजाके द्वारा [सागरिका समक्री हुई] वासवदत्ताके मुखको खोलनेपर वासवदत्ताका पहिचानना । यहां सागरिकाका वेष धारए किए हुए वासवदत्ता विद्धूषककी मूर्खता [बुद्धिदौर्बल्यात्‌] से राजाको घोखेमे डाल देती है। दूसरे लोग कपटके ग्रन्थ्यभाव [ श्रर्थात् परिवर्तन ] को 'श्रधिबल' कहते हैं । जैसे रत्नावलीमें—

"राजा—इस प्रकार श्रप्रत्यक्ष देख लिए जानेपर भी कुछ प्रार्थना करना चाहता हूँ [ग्रोर रह प्रार्थना यह है कि]— हे देवी ! [ग्रपने सागरिका-प्रेम रूप इस ग्रपराधके कारण] लज्जित मैं लक्ष्मी द्वारा सम्पादितकी हुई तुम्हारे चरर्योंकी रक्‍तताको ग्रपने सिरसे दूर कर ही रहा हूँ [श्रर्थात् तुम्हारे चरणोंपर सिर रखकर ग्रपने इस ग्रपराधकी क्षमा मांग रहा हूँ किन्तु] यदि मेरे ऊपर ग्रात्यन्त दया हो जाय तो कोपके कारण उत्पन्न हुई मूल-रूप चन्द्रमाकी रक्‍तताको भी [चुम्बनादि द्वारा] दूर करनेंमें समर्थ हो सकता हूँ "

यहां वासवदत्ताके प्रति [कुशामद द्वारा] धोखा देनेंका राजाका प्रयत्न विफल हो गया । [श्रर्थात् वासवदत्ता उसकी बातोंसे प्रसन्न नहीं हुई।] कुछ लोग उपालम्भ युक्त वाक्यको 'श्रधिबल' कहते हैं , जैसे वेधीसंहारके पांचवें श्रङ्कमें धृतराष्ट्रको लक्ष्यमें रखकर भीमसेन [कहते हैं कि]—

भीमसेन—श्रब दुःख करनेकी श्रावश्यकता नहीं है। जिन राजाओंोंने पाण्डवोंकी वधू द्रौपदीके बालोंको पकड़कर राज-सभामें घसीटा था उन सबको श्रतुद्र पतङ्कके समान जिसने क्रोधाग्निमें भस्मसात् कर दिया है

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तात ! त्वां श्रावयेऽहं न खलु सुज्चलश्लाघचया नापि दर्पात्‌। पुत्रैः पौत्रैश्च कर्मयेऽतिगुरुभिः कृते तात ! साक्षी स्वमेव ॥” इति ।

(११) स्वार्थ मार्ग:—

[सूत्र ८७]—मार्गस्तु स्वार्थंशंसनम्‌ ।

परमार्थस्य वचनं सामान्येनोच्यमानं प्रकटार्थत्न यत्‌ सम्वध्यते तन्मार्गः ।

यथा मुदाराराच्चे—

“राजा—[प्रविश्य स्वगतमाह] राज्यं हि नाम राजधर्मानुवृत्तितत्क्षितस्य नृपतेर्महद्र्रीतिस्थानम्‌। कुतः—

परार्थानुष्ठाने जडयति नृपं स्वार्थपरतां, परिदृश्यतेऽर्थी नियतमयथार्थश्चित्तिपतिः । परार्थश्चेतन् स्वार्थोद्भिमततरो हन्त बलवान्‌, परायत्तः प्रीते: कर्थामवशं वेत्ति पुरुषः ॥

अथ च दुराराध्य लब्धुमात्रवृद्धो राजभिः । कुतः—

तितिक्षावुद्धिजाते मूर्खे परिभवत्रासत्र सन्तिष्ठते, मूर्खे दृष्टिं न गरलत्लिं प्रथयति मत्योंऽतचिह्नस्वराप । शूरेऽशूरेऽधिकं विशेषत इह फलस्थेय कान्तभीरू हो, श्रीर्लब्धप्रसरेव वेशवदिता दु:खोषचर्य्या भूशम्‌ ॥” इति ।

सब समाचार ग्रापको] इसलिए सुना रहा हूँ कि हे तात ! पुत्रों श्रोत्र पौत्रोंके द्वारा किए जाने वाले किसी भी बड़े कार्यमें ग्राप ही साक्षी हो सकते हैं [इसलिए यह सब समाचार ग्रापको सुनाया है] । श्रापने भुजबलकी प्रथमानकेलिए ग्रथवा प्रभिमानवश होकर नहीं [सुनाया है] । भीमसेनका यह सोपालम्भ वचन इस लकषरासे ‘प्रतिबल’ ग्राद्धका उदाहरण होता है ।

(११) मार्ग—

श्रब ‘मार्ग’ [नामक गर्भसन्धिके श्रङ्गका निर्देश यहाँ करते हैं]—

[सूत्र ८६]—तस्वार्थकथन करना ‘मार्ग’ [कहलाता] है ।

वास्तविक बातका सामान्य रूपसे कथन होनेपर भी प्रकृत प्रकारके साथ [उसके विशेष रूपसे] सम्बद्ध होनेपर ‘मार्ग’ [नामक श्रङ्ग कहलाता] है । जैसे मुदाराराक्षसमें—

“राजा—[प्रविश्य स्वगतमाह] राज्यं हि नाम राजधर्मस्य पालन करणके लिए राजाके [ज्ञानका सञ्चालन] बड़े सङ्कटका कारण होता है । क्योंकि—

[यदि राजा अपने स्वार्थको प्रधानता देता है तो] स्वार्थपरता राजाको दूसरोंका कार्य करनेसे रोकती है । [यदि दूसरेके लिए] अपने स्वार्थको छोड़ देता है तो निश्चय ही राजा [प्रत्यार्थीं] राजा नहीं रहता है । श्रौर यदि स्वार्थकी श्रपेक्षा परार्थताको प्रधानता दी जाय तो दूसरेके श्राधीन हो जानपर बलवान्‌ [राजा] भी ग्रानन्दका भोग कैसे कर सकता है ।

श्रौर जितेन्द्रिय राजाओंके द्वारा भी लकष्मीकी श्राराधना बड़ी कठिन है । क्योंकि—

[ग्रत्न्यन्त] तोकष्म प्रकृतिके [के राजा] से [लकष्मी] घबरड़ाती है श्रौर कोमल प्रकृतिके पास [इसरोंके द्वारा] ग्रापमानित होनेके भयसे नहीं टिकती है । मूर्खोंसे द्वेष करती है, श्रौर श्रधिक विद्वानोंके पास भी नहीं रहती है । डरती है, श्रौर अत्यन्त भोरुग्रोंका भी उपहास

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का० ४५, सू० २२ ]

प्रथमो विवेक: [ १४५

यथा वा रघुविलासे चतुर्थेऽङ्के—रावणः—[सविषादम्‌] "लंकेश्वरे त्रिदशदर्पहरे विरागो, रागस्तु, काननचरे जनकात्मजायाः । सौन्दर्य-विक्रम-कला-विभवापेक्षः प्रेम्णां विचारविमुखः खलु कोऽपि पन्थाः ॥"

एतन् तत्त्वार्थकथनं सामान्येनोक्तमपि प्रकृतेऽन सम्बध्यत इति ।

(१२) ग्रथ ग्रसत्याहारस्य—

[सूत्र ७८]—ग्रसत्याहारस्य छलम्‌

यथा मालविकाग्निमित्रे यज्ञोपवीतबद्धाङ्गुष्ठो विदूषकः । "विदूषकः—[प्रविश्य ससम्भ्रमम्‌] परित्तायते परित्तायते भवं । [ परित्रायतां परित्रायतां भवान् । इति संस्कृतम्‌ ] । राजा—किमेतत्‌ ? विदूषकः—भो ! सर्पेऽसि दृश्यते । [भो ! सर्पोऽस्मि दृश्यः । इति संस्कृतम्‌ ] । [सर्वे विदूषकं हृष्ट्वा विषण्णाः । ] राजा—कष्टं क्व भवान् परिभ्रान्तः ?

विदूषकः—देवि पैक्खवस्स त्ति ग्राचारपुष्फेसु करिस्सामि गिद्दु मिद्‌ । तहि च ग्रसोयस्थवगस्स पसारिदे ग्रग्गहत्यो कोदंडव्विगदेसा सप्परुपेहि कालेण तिद्‌ लभिदो । इमाइं दुवेदाढावणाइं ।

करती है । इस प्रकार लड्डू-प्रसरा प्रौढ वेश्याके समान लक्ष्मी बड़ी कठिनतासे वशमें आती है । यहाँ तत्त्वार्थका प्रकृतसे सम्बन्ध रूपमें कथन किया गया है इसलिए यह 'मार्ग' नामक श्रृंगका उदाहरण है । अथवा जैसे रघुविलासके चतुर्थ श्रङ्कमें रावण वि- षादपूर्वक [कहता है]—देवताओंके भी दर्पका श्राहरण करनेवाले लङ्केशके [मुख रावण] के प्रति सीताका वैराग्य है [अर्थात् मुख रावणको तो नहीं चाहती है] प्रौर वन-वनमें भटकनेवाले [रामचन्द्र] के प्रति राग है । निश्चय ही प्रेमका मार्ग सौन्दर्य, विक्रम, कला ग्रौर वैभवकी उपेक्षा करनेवाला ग्रौर विचारशील होता होता है ।

यह यथार्थ बातका कथन सामान्य रूपसे उक्त होनेपर भी प्रकृतिसे सम्बद्ध है ।

(१२) ग्रसत्याहार—

ग्रब ग्रसत्याहार [नामक गभस्त्राङ्कके ग्यारहवें श्रङ्कका निरूपण करते हैं]—

[सूत्र ८७]—छल 'ग्रसत्याहार' [कहलाता] है ।

जैसे मालविकाग्निमित्र यज्ञोपवीतसे ग्रङ्गुष्ठेको बाँधे हुए विदूषक [ग्राकर घबराते हुए कहता है—] बचाइए ग्राप मुझे बचाइए । राजा—ग्ररे यह क्या हुग्रा ? विदूषक—ग्ररे सोंपने डर लिया है । [सब विदूषकको देखकर खिन्न हो जाते हैं] । राजा—तुम कहाँ घूम रहे थे ? विदूषक—तुम्हारे पास ग्रा रहा था इसलिए ग्राचार्यार्थ पुष्प लेनेके लिए प्रमदवनमें नया था । वहाँ ग्राशोकका गुच्छा लेनेके लिए हाथ बढ़ाते ही कालके समान सोंपने पकड़ लिया । दं दं दत्त [लग] है ।

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१६० ] नाट्यदर्पणाम [ काः ४५, सू० ५६

देवं प्रेक्षिष्य इत्याचारपुष्टस्य कार्ष्यान्न प्रमादवन्तं गतोडसिम । तत्र चाशो-

कतवकाश्य प्रसारिते हस्तामे कोटरविनिर्गतेन सर्पैरुपेता कालेनारिम लड्ः: । इमौ

हौ दृष्टान्तपौ ॥ [इति संस्कृतम्]"

अत्र राज्यप्रसादपरोहितार्थे विदूपकस्य केतकीक.ष्टक.चूतस्थस्य असत्या सर्पदंशता

प्रकाशितेति ।

(१३) स्त्रथ तोटकम—

[छत्र ८५]—तोटकं गमितं वचः ।।५५।।

क्रोध-हर्षादिसम्भूतावेगगर्भित वचनं तोट्यति भिन्नत्ति हृदयमिति तोटकम् ।

यथा रामाभुदये चतुर्थेऽङ्के—

"इन्द्रजित्—तात ! किमिदमनुचितमारव्यं तातेन, यदयमकार्ष्ट एतत् कुमार-

कर्षः: प्रतिवोध्यते । किमत्र न कश्चिन्न हृततापसोपमर्दाय सम्भावितमतातेन । श्वाप च-

रच्चोवोरा: हृदोर:प्रतिफलदलस्फालदण्डप्रचण्डा:,

दोर्दण्डकैकड्कररूडूविषमणिकषणात्रासितद्रुमाघेरेष्ट्रा: ।

याताः कार्म न नाम स्मृतिपथसम्प्रस्थितेनेन्द्रानुसारी,

स्ववीसिस्किल्टष्ठष्ठ: कथमहस्मसि ते विस्मृतो मेघनादः ॥

एतत् क्रोधा दावेगा वचनतम् ।

यथा वा रघुविलासे चतुर्थङ्के रावरण;—

इसमें राजाके प्रेमकी परीक्षे लेनेके लिए विदूषकने केतकीके काटोंके चिह्नोंको भूत-

मूठ सर्पदंशके रूपमें प्रकाशित किया है [छ्रातः यह 'प्रसङ्गाहाररूप' का उदाहरणरूप है] ।

(१३) स्त्रथ तोटक

[नामक गर्भसञ्चारिके तेरहवें श्राङ्कका निरूपण करते हैं]—

[सूत्र ५६] [किसी विशेष भावसे] गम्भित वचन 'तोटक' [कहलाता] है ।५५।

क्रोध, हर्ष, श्रादिसे उत्पन्न श्रावेगयुक्त वचन, हृदयका तोटन् श्रर्थात् भेदन करता है

इसलिए 'तोटक' [कहलाता] है ।

इसलिए [तोटकका उदाहरणरूपे] जैसे रामाभ्युदयमें चतुर्थ श्रङ्कमें—

"इन्द्रजित्—हा तात् ! श्रापने यह क्या श्रनुचित काम प्रारम्भ कर दिया कि बिना

वात के ही कुम्भकर्णको जगा रहे हैं । क्या श्रापने यहांँ किसी शत्रौरको शुद्ध तपसका उपमर्दन

करनेके लिए ऋऋत नहा समकते । श्रार—

जिनके पृष्ट वक्ष:स्थलोंपर पडकर कालका दण्ड भी खण्ड-खण्ड हो जाता है इस

प्रकारके प्रचण्ड, श्रौर भुजदण्डोंमें श्रानाके उठी हुई खुजलीके निवारएकेलिये खुजलाकर जो

पर्वतोंको भी हिला डालते हैं इस प्रकारके [शक्तिशाली] राक्षस वीरोंकी श्रोर श्रापका ध्यान

नहीं गया तो कोई बात नहीं है, किन्तु [ग्रप्रत्यप्रस्थित श्रर्थात्] भयभीते हुए इन्द्रका भी पीछा

करने वाती श्रौर स्वर्गलोकके रहने वाले जिसको भयभीत होकर देखते हैं इस प्रकारके मेघनाद

को श्राप कैसे भूल गए [जो इस कुम्भकर्णको जगाने लगे] ?

यह [मेघनादका] क्रोधके कारण श्रावेगमय वचन है ।

प्रथवा जैसे रघुविलासमें चतुर्थ श्रङ्कमें, रावरण—

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क० ४६-४७, सू० ६०-६१ ] प्रथमो विवेक: [ १६१

'वक्त्राय हं ! हस्त गयत तारतारं, नेत्रायै ! चुम्बत विलास्य च कर्सापालि: । दोर्वेल्लय ! कुरु ताडवडम्बरं च, श्रीरावयं नतु विदेहसुता रिरंसु: ॥'

इदं ह्यपादविगमेभ्य वचनेभ्य: पातितानि गर्भस्नवस्त्राण्योदशेझ्जानेति ॥श्लि॥ [४] यथामशोसन्ध्येरंगानि ध्याख्यातुसुदिशति—

[सूत्र ६०]—द्रव: प्रसंग: सम्पेटोडपवादश्लादनं भृति: । खेदो निरोध: संरम्मो भवेयुर्युप्णातो नव ॥५६॥ शक्ति-प्ररोचना-दान-व्यवसायास्तु मुख्यतः। त्र्योदशांगान्यामर्शे

द्रवादीनी नव प्रयोजनमपेक्ष्य गौणतया बध्यन्ते । शक्स्यादीनि चत्वारि पुन: प्राधान्येन । (१) श्रथ द्रव:—

[सूत्र ६१]—द्रव: पूर्वव्यतिक्रम: ॥५७॥ व्यतिक्रमो मार्गोच्चचलनम् । यथा रत्नावलयां सन्निहितं भरतारसचगणाध्य विदूषकृष्य सागरिकायाश्च वासवदत्तया बन्धनमिति ॥५७॥

"रावरे—हँ [मेरे वश] मुखो ! तुम लोग [प्रसन्न होकर खूब] हँसो श्रौर गाश्रो । हे नेत्रो ! तुम प्रसन्नतासे [फैल-फैल कर] कानोंका चुम्बन करो [कानों तक फैल जाओ] । हे भुजवल्लियो ! तुम खूब नाचो क्योंकि श्राज वंदेही रावणके साथ रमरण करना चाहती है ।" यह [रावणके] हर्षसे श्रावेगमय वचन है । ये गर्भसन्धिके तेरह श्रङ्ग हुए ॥५७॥

[४] श्रामर्श सन्धिके तेरह श्रङ्ग—— श्रत्र श्रामर्श सन्धिके श्रङ्गोंकी व्याख्या करतेके लिए उनके नाम गिनाते हैं——

[सूत्र ८६]—१ द्रव, २ प्रसंग, ३ सम्पेट, ४ श्रपवाद, ५ छादन, ६ भृति, ७ खेद, ८ निरोध, श्रौर ९ संरम्मो ये नौ [विमर्शसन्धिके] गौरण श्रङ्ग हैं ॥५६॥

[सूत्र ८७]—१० शक्ति, ११ प्ररोचना, १२ दान श्रौर १३ व्यवसाय ये चार मुख्य श्रङ्ग हैं । इस प्रकार श्रामर्श सन्धियोंमें तेरह श्रङ्ग होते हैं

द्रव श्रादि नौ श्रङ्ग प्रयोजनके श्रनुसार गौरण रूपसे निबद्ध किए जाते हैं, श्रौर शक्त्यादि चार मुख्य रूपसे निबद्ध होते हैं

(१) श्रथ 'द्रव' [नामक विमर्शसन्धिके प्रथम श्रङ्गका निरूपण करते हैं]— [सूत्र ६०]—पूर्व्योंको व्यतिक्रम करना 'द्रव' [कहलाता] है

व्यतिक्रम श्रर्थात् मार्गसे हट जाना । जैसे रत्नावलीमें सामने उपस्थित भरत [ वत्सराज उदयन ] की उपेक्षा करके वासवदत्ताके द्वारा विदूषक तथा सागरिकाको बन्धवाना ॥५७॥

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१६२ ] नाट्यदर्पणम् [ क० ४१, सू० ६२

(२) ग्रथ प्रसंग :--

[सूत्र ६२]---प्रसंगो महतां कीर्तिः

कीर्तिः संशब्दनम्। यथा वेष्टीसंहारेऽपि पठ्यतेडह—

युधिष्ठिरः---[मुखं प्रज्ञाल्य उपस्पृश्य च] एष तावडनलाक्षलि-गोंड्रे याय गुरवे प्रतिपाद्यहव्य शांततवे। जयमपि पितामहाय विचित्रवीर्योय। [सास्रम्]

तातस्य श्युतावसरः। जयमपि तत्भवते स्वर्गस्थिताय गुरवे सुगुडीतानाम्ने पित्रे देवाय पांडवे" इत्यादि ।

केचिदप्रस्तुतार्थवचनं प्रसंगामच्छन्ति। यथा वेष्टीसंहारेऽपि पठ्यतेडह—

"युधिष्ठिर :--[द्रौपदीं प्रति]

स कीचकनिपूदनो वक-हिडिम्ब-किरमीरहः,

सदांघ्रिप्रसादितदरिद्रदर्शनाद्रिसंभृगाशनि: ।

गदा-परिघशोभिना सुजयुगेन तेनान्वितः ।

प्रियस्तव समामनुजोडजु नगुरूंगतोडस्तं किल ॥"

शोक:

(२) ग्रथ प्रसंग [नामक विमर्शो संधिके द्वितीय श्रृङ्कका निरूपण करते हैं]—

[सूत्र ६१]---महान् [पूर्वज] लोगोंका कीर्तन करना 'प्रसंग' [नामक श्रृङ् कहलाता] है।

कीर्ति: प्रथार्थम कथन करवा। जैसे वेष्टीसंहारक छठे श्रृङमें—

"युधिष्ठिर:--[द्रौपदीके प्रति]—

कमश: उनका कीर्तन करते हुए कहते हैं] सबसे पहले यह जलाञ्जलि गंगाातनय पूज्य प्रपितामह शान्तनुकेलिए है। यह दूसरी जलाञ्जलि पितामहु विचित्रवीर्योयकेलिए है। [रोते हुए]

श्राब पिताजीकी बारी आती है। श्रद्धया यह [तीसरी जलाञ्जलि] स्वर्गलोकवासी पूज्य श्रौर सुगुर्होतनामा पिता पांडुकेलिए है" इत्यादि ।

इस वचनमें जलाञ्जलि देते समय युधिष्ठिर द्वारा अपने पूर्वज महापुरुषोंके नामोंका कीर्तन किया गया है। मतः यह 'प्रसंग' नामक ग्रंथांशके द्वितीय श्रृङ्कका उदाहरण है।

कोचकको मारने वाला, बकासुर, हिडिम्ब श्रौर किरमीर [ग्रादि राक्षसोंका] नाश करने वाला, मदमत्त मगधराज [जरासंध] रूप हाथीकी सन्धियोंको भेदन करने वाला, वक्च्र श्रौर गदा तथा परिघ [नामक शस्त्रों] से शोभित उन [प्रपौर्वज वीर्यशालो] भुनाजयोंसे युक्त, तुम्हारा प्रिय, मेरा छोटा भाई श्रौर ग्रभु नका ज्येष्ठ भ्राता [अर्थात् भीमसेन, इन सुनीजो महाराजके

कथनके ग्रनुसार] समाप्त हो गया है

यहाँ बनावटो तपस्वी [दुर्योधनके पक्षपाती] राक्षसने भूत-मडू भीमके मारे जानेको बात कहकर युधिष्ठिरको ग्रप्रासंगिक शोकमें डाल दिया है [अ्रत: यह प्रसंग नामक ग्रृङ्कका उदाहरण है] ।

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प्रथमो विवेक:

[ १६३

क० ४५, सू० ६३ ]

(३) ग्रथ सम्फेट:-

[सूत्र ६३]—सम्फेट: क्रोधजं वचः ।

परस्परं क्रोधजन्मोत्तर-प्रत्युत्तररूपः संलापः सम्फेटः । यथा वेषीसंहारे—

"भीमः—भो कौरवराज ! कृतं बन्धुनाशदर्शनमनज्युन । मैवं विषादं कृथा:

पर्याप्ताः पाण्डवाः समराय ब्रह्मसहाय इति ।

पक्षान्तरं मन्यसे डस्माकं यं सुयोधन सुयोधन !

दंशितस्यात्तशस्त्रस्य तेन टेड्मु रजनीष्वचः ॥

इत्थं श्रुत्वा व्यसूयात्मिकां निन्द्यिं कुमारे दृष्टिं उक्तवान् धार्तराष्ट्रः—

कार्षी-दुःशासनवधात् तुल्यावेच युवरां मम ।

व्यपियोऽपि प्रियो योधूं त्वमेव प्रियसाहसः ॥"

इत्येतद् भीम-दुर्योधनयोर्न्योऽन्यं रोषभाषणम् ।

यथा वा यादवाभ्युदये सममेऽडक—

"वलभद्रः—[स्वगतम् ] कथमुपहसतति नारदः । भवतु [ प्रकाशम् ]—

बुद्धोत्तंस्य नृपस्य तस्य नियतं को नाम मल्लो युधि,

व्याधत्त किल यस्य चिक्रमचरणः पञ्च सुविनिन्द्रदः ।

(३) ग्रंथ सम्फेट [नामक विमर्शसंधिके तृतीय भ्रङ्कका लक्षण ग्रादि कहले हैं]—

[सूत्र ६२]—क्रोधपूर्वक भावने 'सम्फेट' [कहलाता] है ।

जैसे वेणीसंहारमें—

"भीम—हे कौरवराज [दुर्योधन] ! बन्धुप्रोंके नाशको देखकर दुःखी होनेकी प्रवृत्ति

इयकता नहीं है । तुम यह दुःख मत करो कि पाण्डव लोग युद्ध करने के लिए [पर्याप्त] बहुत से

हैं शोर में थकेला हू ।

हम पांचोंमेंसे जिसके साथ युद्ध करना तुम सहज समभी कवचादि धारणा करके शोर

शस्त्र लेकर उसके साथ तुम युद्धका श्रानन्द ले सकते हो ।

ऐसा सुनकर [ओम तथा श्रर्जुन] दोनों कुमारोंकी शोर प्रासयार्पूर्वक देखकर दुर्योधन

कहता है कि—

[श्रर्जुनने कराँका शोर तुमने दुःशासनका वध किया है । ये दोनों ही मेरे प्रिय थे

इसलिए] करर्ण शोर दुःशासनका वध करनेवाले होनेके कारण तुम दोनों ही मेरे लिए एक-

जैसे [प्रप्रिय] हो, फिर भी, श्रप्रिय होनेपर भी साहसी तुम ही युयुके लिए मुझे प्रिय मालूम

पड़ते हो ।"

यह भीम तथा दुर्योधनका एक-दूसरेके प्रति रोष-भाववाला है [श्रत: यह 'सम्फेट' नामक

ग्रङ्कका उदाहरण है] ।

ग्रथवा जैसे यादवाभ्युदयमें सहम ग्रङ्कमें—

बलभद्र—[श्रपने मनमें] श्रच्छा नारद हमारी हँसी उड़ा रहे हैं । [प्रकाशम्]—

बूढ़े सांदकके समान उस राजाके साथ युद्ध करनेवाला प्रतिमल्ल कौन हो सकता है

जिसका पक्ष स्वयं नारद मुनि ले रहे हैं [यह व्यङ्ग्योक्ति है] फिर भी कंसका विनाश करनेमें

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कंसध्वंसकृतश्रमौ मधुरिपोर्बाहू तथास्याहवे, नामस्थामलवनानुरूपमचिरादाधास्यत: किंचन ॥ नारद: [सरोषमिव]–– कंसांशभूतिमदमर्दनकेलिचक्रो- शक्रकुलिज्जङ्गणसंघपिशोगवाह: । सम्पूर्णश्रियाति हरेरपि गङ्गारुढ- संग्रामदोहतदसमौ मघवाथिनाथ: ॥ इति ।

(४) श्रथापवाद:–

[सूत्र १४]—ग्रपवाद: परिपवाद: । परिपवाद: स्वपरदोषोद्धटनम् यथा पुष्पदूषितके पञ्चवमेडकेः— "ग्राजिता हि ब्राह्मणस्य सुवग्मधुर: कालपाश: ! तथाहि— हत: पुत्रो हतो ब्राता हतो मांर्जितया पिता । तथाप्येतां स्वगोत्रस्थां निन्दामि च पिबामि च ॥" इति ।

परिश्रम कर चुकनेवाले मधुरिपु कृष्णके दोनों बाहु दुर्बल या प्रबल जो कुछ हैं उसके अनुरूप युद्धमें कुछ-कुछ शीघ्र ही दिखलावेंगे नारद [कोधपूर्वक]— कंसके अंशोंकी भित्तिका मर्दन करनेमें चतुर, चक्रकी चिनगारियोंके संगर्ससे [सपु- दायसे] पोतवाह [प्रत्यात कृष्णका सुदर्शन चक्र भी जिसके हाथोंमें केवल चिनगारियाँ उत्पन्न कर सकता है उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता इस प्रकारका] यह मघवराज, कृष्णकी भी प्रबल युद-कामनाको पूरा कर देगा

यह नारद तथा बलभद्रके रोष-वाक्य एक-दूसरेके प्रति कहे गये हैं श्रतएव यह भी 'सम्फेट'का दूसरा उदाहरणहै

(४) ग्रब ग्रपवाद [विमर्शांशके चतुर्थ श्रङ्कका निरूपण करते हैं]— [सूत्र १३]--[किसीकी] निन्दा करना 'ग्रपवाद' [कहलाता] है । निन्दा करना श्रर्थात् श्रपने या दूसरेके दोषका प्रकट करना । जैसे पुष्पदूषितके

पञ्चम ग्र्रांकमें— "माजिता" [प्रत्यात शंकर मिले हुए दही] बाहुल्यके लिए सवके मुखर लगने वाला कालपाश है इसलिए— इस माजिता [शंकर मिले हुए दही] ने यद्यपि श्रपने पुत्र [चूत] को मार डाला [प्रत्यात वही से घी उत्पन्न होता है इसलिए घी दहीका पुत्र है । किन्तु जब दहीको शंकर मिलाकर खानेके काममें ले लिया जाय तो उससे घी कॅन्स निकाल सकता है इसलिए 'माजिता' शंकर मिले दहीने श्रपने पुत्रको नष्ट कर दिया यह कहा है] श्राता [तक्र मट्ठे] को भी मार डालिया है घोर पिता [दूध] को भी नष्ट कर डाला है फिर भी श्रपने बंशका नाश करने वाली इस 'माजिता' की निन्दा करता हॅू श्रपनेको पी रहा हूँ इसमें माजिता शंकर मिले दहीकी निन्दा होनेसे यह 'ग्रपवाद' नामक ग्रङ्कका उदा- हरग है ।

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का० ५९, सू० १४ ] प्रथमो विवेक: [ १५६

छत्र स्वदोषोद्घटनम् ।

तथा रघुविलासे सप्तमेड्के रावणः प्रति मारीचः—

"खरडय न्यायतेजोभि: शूर ! कौलिनदुर्दिनम् । स्थानीति-धूमशरी हन्ति यशश्चूताम्रमझरी: ॥"

छत्र परदोषोद्घटनमिति ।

(४) यथा छादनं—

[सूत्र ६५]—छादनं मन्युमार्जनम् ॥५९॥

मन्यु: उपमानो येन माझ्यंते तत्त् छादनम् । यथा रत्नावल्याम्— "सागरिका-दिट्ठया पज्जलिदो भयरं हुयासगे अ्रङड करिसद् मे सयलदुक्खवसायर् ञति ।

[दिट्ठया प्रबवलितो भगवान् हुताशनोऽपि करिष्यति मे सकलदुःखावसान- मिति । इति संस्कृतम्]"

अ्रथन्ये तु —कार्यार्थमसहाऽऽस्यार्थस्य सहनं छादनममन्यन्ति । यथा श्रीशुक्ति- वासकुमारविरचिते ग्रन्थङ्गसेना-हरिनन्दिन्द्रनि प्रकरयो नवमेड्के, राजपुत्रचन्द्र- केतुनाऽऽ हतां कर्पूरलङ्कारयगलं नायिकया माधव्याऽऽ नायकस्य प्रेषितम् । नायकेन केतनाऽऽ हतां हरिनन्दिना पुष्पलकनामां ब्राह्मण्या राजबन्धनान्मोचितयितु तन्मात्रेडितसूचम् ।

इसमें [वक्ताने] अपने दोषका [अ्रथर्थात् निन्दा करते हुए भी पीनेका] उद्घाटन किया है ।

श्रौर रघुविलासके सातवें श्रङ्कमें रावणके प्रति मारीच [कहता है]— "हे शूर [रावण] ! न्यायके तेजोंके द्वारा ग्रयथाऽऽ-रूपि दुर्दिनं [मेघाच्छन्नं तु दुर्दिनमं] का नाश करो [अ्रथर्थात् सीताको मुक्त करके ग्रपने न्यायका परिचय देकर तुम्हारा जो ग्रप्रपयन्न सीताहरऽऽपेके कारण हो रहा है उसको दूर करो] ग्रनीतिको धूमरी यशो रूप ग्राछादकी उत्तम मञ्जरीका नाश कर देती है । [इसलिए ग्रनीतिके मार्गको छोड़ दो]

इसमें [वक्ता] दूसरेके दोषका उद्घाटन [कर रहा] है ।

(४) ग्रथ 'छादन' [नामक विरमर्थके सन्धिके पश्चात् ग्राछादकका निरूपण करते हैं]—

[सूत्र ६४]—ग्रप्रमानका परिमार्जन 'छादन' [कहलाता] है ॥५५॥

मन्यु ग्रर्थात् ग्रप्रमानका मार्जन जिसके द्वारा किया जाय वह 'छादन' [नामक ग्राछ- कहलाता] है ।

जैसे रत्नावली में— "सागरिका-सौभाग्यसे प्रज्वलित हु्रग्रा ग्रङ्गिन् ग्राङ्ग मेरे सारे दु:खोंको समास कर देगा ।"

ग्रथन्य लोग तो विशेष प्रयोजनके कारऽऽण ग्रप्रसह्य ग्र्रथथकोऽऽ भी सह लेनेको 'छादन' मानते हैं । जैसे—श्री शुक्तिवासकुमारके बनाए हुए 'ग्रन्थङ्गसेना हरिनन्दी' नामक प्रकऽऽरके नवम ग्रङ्कमें, राजपुत्र चन्द्रकेतुके द्वारा दिए हुए काञ्चनोंके ग्रलङ्कारके जोड़ेको नायिका माधवीने नायकके पास भेजा था । नायक हरिनन्दीने पुष्पलक नामक ब्राह्मणऽऽको राजबन्धनसे मुक्त करानेके लिए उसको [कर्पूरलङ्कार-] मञ्जरीका दान कर दिया । उस [कर्पाभूषण

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तत्प्रस्यभिञ्ज्ञाय च स ब्राझ्मणः: पौरेपु प्रकाशितचौर्यो राजाञ्ज्ञया वध्यस्थाने नेतुमारचछः । तन्मात्रा चागत्य हरिनन्दिने निर्वोचदतं । हरिनन्दनं च ब्राझ्मणारचछार्थं चौर्यमात्मनोऽञ्ज्ञात्वा व्ययशो विसोढमिति ।

श्राञ्चे त्वस्य स्थाने च्छलनमवमाननरूपमाचहुः । यथा रामाश्रुदये सीताया: परित्यागेनावमानं च्छलनम् । यथा वेगीसंहारे घट्टेऽटृहे--

"युधिष्ठिर:—[ अश्रृणुचछ्राव चावीकमाह ]— सर्वथा कथय ब्रह्मन् सञ्चेपाद विस्तरेण वा । वस्तुस्य किंरूपं श्रोतुमेतद् दच्तमुरो मया ॥

राक्ष:—श्रुत्वातं तस्मिन् कौरव-पार्थयोगृ हृदगधोरध्वनौ संयुगे । त्रिपदी—[लघुसंज्ञा] श्र्यति तदो किम् ? [ श्रव्यं ततः किम् ? इति संस्कृतम् ]

राक्ष:—[ श्रात्मगतं ] कथं पुनरतनया लब्धा संज्ञा । त्रपहराम्यस्या: प्राणान् । [प्रकाशं ]—

सीतां तत्क्षणमात्राचछ्रितसमस्ततस्यामृतः संगर: । कटुचूको—नूनं तत्कूतनोटत्र क्षत्रिनपचारो भवविष्यति ।

का उपयोग किए जानपर उस] को पहिचान कर नगरवासियोंमें चोरीका श्रारोप घोपित कर राजाकी श्राज्ञासे ब्राह्मणाको वध्य स्थानकी श्रोर ले जाया जाने लगा । तब ब्राह्मणाकी मासाने श्राकर हरिनन्दीसे कहा । हरिनन्दीने ब्राह्मणाकी रक्षाके लिए स्वयं चोरी करनेके श्रपराधको स्वीकार कर त्रिपयशको सहन किया । यह [च्छादन] नामक श्रङ्गका उदाहरणरहा है ।

श्रन्य लोग इस [च्छादनके] स्थानपर श्रवमान रूप 'च्छलन' [श्रङ्ग] को मानते हैं [च्छादनको श्रङ्ग नहीं मानते हैं] । जैसे राम.श्रुदयमें सीताको परित्यागसे किए गए श्रपमानको ['च्छलन' नामक श्रङ्ग] कहते हैं । ['च्छलन' श्रङ्ग]य लोग सम्मोहनको छलन कहते हैं । जैसे वेगीसंहारके छठे श्रङ्कमें—

"युधिष्ठिर:—[रात्रि हुए नार्वाकीमत कहते हैं ]— हे बहनु ! संक्षेपसे या विस्तारसे जैसे चाङ्छ श्राप कहिए । वत्स [भौम] के किसी भी समाचारको सुननेके लिए मैंने श्रपना हृदय तैयार कर लिया है ।

राक्ष:—श्रच्छा सुनिए । द्रौपदी—[होशमें श्राकर] श्रच्छ्छा तब फिर क्या हुग्रा ? राक्ष:—[ स्वगत ] श्रच्छ्छा यह तो फिर होशमें श्रा गई । श्रभी इसके प्राणोंका श्रप- हरष करता हूं । [प्रकाशं कहता है ]—

उसी समय बलरामजी वहां श्रा गए श्रौर उनके सामने बहुत देर तक [भीम तथा दुर्योधनका] युद्ध होता रहा । कटचूको—निश्चय ही उनके द्वारा किया गया कोई श्रनिष्ट इसमें उपसिथत होगा ।

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का० ४५, सू० १६६-१६७ ] प्रथमो विवेक: [ ५६७

राक्षस:-

शालमद्य प्रियशिष्यतां तु हलिना संज्ञा रकः सा कृता यामासाच कृत्तभः प्रतिकृतं दुःशासनारौ गतः ॥ इति श्वात्र तपसेन श्यामोः कृतः ॥४५॥

(६) श्रथ श्यति:-

[सूत्र १६६]--तिरस्कारो श्युतिः

यथा कृत्यारावशो मन्तोदरां प्रति शृङ्गदः-

"मा गास्तिष्ठ पुत्रञ्ज ज्ञातृगमितो गत्वा पुनः स्थीयतां, यत्रास्ते सुजवीर्यदर्पितमदो विद्रावयिषो रावणः । मद्वाहुधृतयपज्जरान्तर्गतामूढे किमाक्रन्दसि, सिंहस्याङ्कमुपागतमिव सुरगी कस्वां परित्रास्यते ॥"

तर्जनोद्देजने श्युतिः केचिचिच्छन्ति । श्रापरे तु तर्जनार्थस्य श्युतिं मन्यन्ते । तदेतन्मतद्वयमञ्यथोस्सदेवान् सङ्गृहोतम् । एवं सद्यर्दपि साज्ञात् पारम्पर्येण वा न्याक्कार-

पर्ण वाक्यं शु तिरेव ।

(७) श्रथ खेद:-

[सूत्र १६७]--खेदः श्रमः कार्य-मन्दोदरः

यथा विक्रमोर्वश्यां पुरुरवा

राक्षस—बलरामजीने श्रपने प्रिय शिष्य [दुर्योधन] का पक्ष लेकर चुपचाप कोई ऐसा संकेत किया जिसको प्राप्त कर कुरुराज [दुर्योधन] ने दुःशासनको मारने वाले [भीमसेन] से [दुःशासनके वधका] बदला ले लिया [प्रत्यर्थात् भीमसेनको मार डाला] "

यहाँ तापस [वेषधारी राक्षस] ने व्यामोह उत्पन कर दिया है

(६) श्रव 'श्युति' [नामक श्रामर्श संधके छठे श्रङ्गका निरुपण करते हैं]—

[सूत्र १५]—तिरस्कार करना 'श्युति' [कहलाती] है—

जैसे कृत्यारावशेकमें मन्तोदरीके प्रति शृङ्गद [कहता है]—

"मत जाग्रो, ठहरो, ग्रन्थ फिर चलो, तनिक इधर चल कर खड़ी हो जाओ, जहाँ पर भुजद्वयके पराक्रमके श्रौचित्य हेतु यह [शिविरावेश] सभामें करनेवाला रावण [खड़ा] है । श्ररी मूर्ख ! मेरी दोनों भुजाओंके पड़जमें पड़ी हुई तू चिल्ला किस लिये रही है । सिंहके पड़जमें फंसी हुई हरिणीके समान श्रब कौन तुझे बचा सकता है ?"

कोई लोग डाटने-फटकारने [तर्जन-उद्वेजन] को 'श्युति' कहते हैं । दूसरे लोग डाटने घोर घसीटनएको 'श्युति' कहते हैं । इन दोनों मतोंमें श्रव्यका भेद न होनेसे [इसी श्युति-लक्षरके भीतर] संग्रह हो गया है । इसी प्रकार साक्षात् या परम्परासे श्रव्य श्रपमान-परक वाक्य भी 'श्युति' ही माने जाते हैं ।

(७) खेद—

श्रव 'खेद' [नामक प्रमर्शा संधके सप्तम श्रङ्गका लक्षण श्रादि करते हैं]—

[सूत्र ६७]—शारीरिक या मानसिक श्रम 'खेद' [कहलाता] है ।

जैसे विक्रमोर्वशोमें पुरुरवा

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१६६ ] नाट्यदर्पणम् [ का० ५६, सू० १५

"व्यथो श्रान्तोडस्मि । भवतु श्वस्यास्तावद् गिरिनद्यास्तीरे स्थित्वा तावत् रङ्गवार्तं सेविष्ये ।" इत्यादि । शत्रु कायिकः ।

तथा रघुविलासे सप्तमेडके रावणः-[स्खेदम्]—

"हन्त शक्तः स जितो जितो ऋृत-श्रृत्तः कैलासशैलोऽप्यररे ! क्रान्तः क्रान्तमिदं जगत् 'प्रतिमुजम्रस्तासिकैर्बिभिः । यारद्धा प्रति बन्धबन्धनकथा लङ्कापतेर्जीवतः:, कषंपु प्रथते किमन्तमनया नीतिं न विर्फूर्जितम् ॥"

शत्रु मानसः ।

तथा कृत्यारावयो ललमगा:—

"मार्गः क्रटत्किनः प्रततनसिकतापांशूकरा लङ्घिता:, क्रान्ता: शृङ्गवतां निकामपुरुषा: शूलोपला भूमयः । धान्ते तमस्मुगेन्द्रनादजननितत्रैः समं दन्तिभिः ? पीतं च द्विपदानराजिकलुषच्यांस गतक्तं पयः ॥"

शत्र्रोभयजः । यथापि श्रमोद्रेगविततकोदयो व्यभिचारिमध्ये लभ्यिष्यन्ते, तथापि रसविशेषपुष्टोऽर्थः सन्ध्यङ्गावसरे लभ्यन्ते । इति ।

(९) शत्र विरोधः—

[श्लोक ७६]—विरोधः प्रसुत्युद्यमनि:

"श्रमे बड़ा थक गया हूँ । श्रच्छा चलो इस पहाड़ी नदीके किनारे बैठकर तरङ्गोंकी वायुका सेवन करें ।" इत्यादि । इसमें शारीरिक [श्रम दिखलाया गया है] ।

श्रौर रघुविलासके सप्तमेऽङ्के रावण [विद्पूर्वक कहता है]—

"हन्त उस इन्द्रको तो बार-बार जीता था । श्ररे ! उस कल्लास पर्वतको भी बार-बार उठाया ही था । श्रौर प्रत्येक भुजामें तलवार पकड़कर इस सारे जगत्को अनेक बार श्राक्रान्त किया ही है किन्तु ब्राज रावणके जीतने-जीते उसके बन्धुपुत्रोंको पकड़नेका जो यह प्रसंग प्रारम्भ हुग्रा है श्रौर काननों में पहुँच रहा है उससे क्या उस सारे दर्पका नाश नहीं कर दिया है ।

इसमें [रावणके] मानसिक [विदका वर्णन है] ।

श्रौर कृत्यारावयो लक्ष्मणा [कहते हैं]—

"काँतो श्रोर जलती हुई बालू तथा धूल कूड़ा-कचकटसे भरे हुए मार्गमें चलना पड़ा । पहाड़ोंकी श्रस्तन्त कठिन श्रौर बड़े-बड़े पत्थरोंसे भरी हुई भूमियोंको पार करना पड़ा । मत्त सिंहोंके गर्जनसे भयभीत हुए हाथियोंके साथ वनमें घूमना पड़ा श्रौर हाथियोंके सदके कलुषित स्रोतके कारण तिक्त पानी पीना पड़ा ।"

इसमें [शारीरिक श्रौर मानसिक] दोनों प्रकारका [विद पाया जाता है] ।

यथापि श्रम-उद्वेग वितर्क श्रादिके लक्षणा व्यभिचारिभावोंके प्रसंगमें किए जावेंगे फिर भी रसकी विशेष पुष्टिके लिए सन्धियोंके श्रङ्गोंमें यहाँ भी उनके लक्षण कर दिए गए हैं ।

(९) शत्र विरोध [नामक विस्मयसन्धिके शत्र का लक्षण श्रादि करते हैं]—

[सूत्र ७७]—प्रस्तुत शत्र्यकी हानि 'विरोध' [कहलाता] है ।

१. प्रतिभट

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का० ४६, सू० ६६ ] प्रथमो विवेक: [ १६६

प्रस्तुतस्य कार्यस्य ज्ञातिन: क्रिययोर विरोध इव 'विरोध:' । यथा कृतयारावणो

सप्तमेडके—

"कटचुकी—[लक्ष्मण और विभीषणके प्रति] कुमार ! एतत् । उभौ—किम् ।

कटचुकी—श्रृ: इदम् । उभौ—श्रृण्याम् ! कथय कथय !

कटचुकी—का गतिः? श्रृयताम् । श्रायां खलु सीता रावणस्याङ्कया क्रिडरो-

पत्नीतं भरतु मोयाशिरोडवलोक्य सखीभिराश्वास्यमानापि निवृत्तप्रयोजना 'नाहममा-

तानं क्लेशयामि' इत्युक्त्वा—

सर्वे—कि कृतवती ?

कटचुकी—यत्न शक्त्यते वक्तुम् ।

शशिन इव कला निशावसान' कमलवनोदरमुखुकेव हंसी ।

पतिमरगएरसने राजपुत्री रुरितरतकरालशिखं विशेष वाङ्मु ।"

श्रत्र सीताप्रस्याननगनस्य प्रस्तुतस्य विरोधः

श्रन्ये तु खेद-विरोधौ न मन्यन्ते । विद्रव-विचलन तु पठन्ति । तत्र चिद्रवो

बन्ध-बन्धाध्यवसायादि: । यथा च्छलितरामे—

प्रस्तुत कार्यकी हानि श्रथवा नाश विरोधके समान होनेसे 'विरोध' [कहलाता] है । जैसे कृत्यारावणके एक सर्गमें—

"कटचुकी—[लक्ष्मण तथा विभीषणके प्रति कहता है]—कुमार ! यह ।

दोनों—क्या ?

कटचुकी—श्रृणु यह ।

दोनों—श्रार्य ! कहिए-कहिए [क्या बात है] ।

कटचुकी—क्या करूं । श्रृणुध्वा शृणु । श्रार्या सीताने रावणकी ग्राज्ञासे नौकर द्वारा लाए गए [स्वामी] रामचन्द्रके [कटे हुए] बनावटी सिरको देखकर, सखियोंके द्वारा श्राश्वासन दिए जानेकर भी 'ग्राब [मेरे] जीवनका प्रयोजन समाप्त हो गया' ऐसा कहकर—

सब लोग—क्या किया ?

कटचुकी—जिसको कहा नहीं जा सकता है ।

रात्रिके समाप्तिपर चन्द्रमाकी कलाके [समाप्त हो जानेके] समान, उत्सुक हंसीके कमल वनोके भीतर [समा जाने]के समान, पतिमरगएके रससे राजपुत्री सीता भयङ्कर ज्वालाएँ जिनमेंसे निकल रही हैं इस प्रकारकी श्रनिमें प्रवृत्त हो गई ।

इसमें सीताके प्रत्यनयन रूप प्रस्तुत कार्यका विरोध है । [इसलिए यह ग्राभ्रश सन्धिके 'विरोध' नामक ग्रंशका उदाहरण है] ।

श्रन्य लोग तो खेद श्रौर विरोध [इन दोनों ग्रंशों] को नहीं मानते हैं [उनके स्थान पर] 'विद्रव' तथा 'विचलन' [ग्रंशों] को मानते हैं । उनमेंसे बन्ध श्रथवा बन्धनके निश्चयको 'विद्रव' कहते हैं । जैसे 'च्छलितराम' में—

१. दिनावसाने ।

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“येनाग्रृत्य मुखानि साम पठतामस्त्यनतमायासितं, बाल्यादू येन हततश्चुतवलयप्रत्युपैः क्रीडितम्। युवामं हृदयं स एष विशिखैरापुरितांसस्थलो, मुर्छाङ्घोरतमःप्रवेशविवशो बध्वा लवोनीयते ॥” इति।

बन्धाङ्यवसायस्तु मुर्छाङ्कटिकायां चारुदत्तविषयः । तथा रत्नावल्याम्—

“पुनर्वासवदत्ते—[श्राङ्गधर] ! सं मु चेताग्रेण कारग्रा अणुअमि एसो मए निअअस्सहिअअए संपदा साअरिआ विवड्झदिइति ।

[श्राङ्गपुत्र ! नत्थु खल्वावल्मनः कार णात् भगाम्मेषा मम निर्हृऽऽहृदयया: संपन्न् सागरिका विपचाते । इति संस्कृतम् .]”

स्वस्त्रा सागरिकाया बन्ध-बधाङ्गानिर्भिद्रवः; तथा वेङ्गीसंहारेः—

“युधि[ष्ठिर]:—कः कोडत्र सतिपेझं धनुरुपनयिताम् । कथं न कश्चित्त् परिजनः । भवतु वा, बाहुयुद्धऽसम्भावनाविहस्तमेनं दुरात्मानं गाढमालिङ्ङ्ंय द्र्वालित-डवलननममिपतामि ।” इति ।

स्वस्त्र सम्भ्रमात्मकौ विद्रवः । इति । शौर्य-कुल विद्या-रूप-सौभाग्यादिसम्बन्धमात्रविचारनं तु विचलनम् ।

युश्रा वेङ्गीसंहारेउ पडमेड्‌केए—

“हात [श्रम्य !

“जिस [लव] ने सामवेदका पाठ करते हुए [ब्राह्मणियोंका] मुख बन्द करके उनको बड़ा तंग किया । जिसने बचपनके कारणा उनके श्रृङ्गसूत्र श्रैर वलय ग्रादिको छीनकर फिर देकर क्रीड़ाएँ कीं, तुम्हारे हृदयके समान [प्रत्यन्त प्रिय] वाक्योंसे जिसका कन्धा भरा हुया्रा है श्रैर मूर्छाङ्कटी गहन ग्रन्थकारमें पहुँच जानेके कारणा उसका लवको [तुम्हारे सैनिक] बांधकर लिए जा रहे हैं?”

[यह बन्धनाङ्यवसायका उदाहरणह्र्रा] बधके प्रयत्नावसायका [उदाहरणह्र्रा] जैसे ‘मुर्छा-कटिक’में श्रावस्तके विषयमें [पाया जाता है] । श्रैर जैसे 'रत्नावली'में—

[वासवदत्ता] फिर कहती है ] श्राङ्गपुत्र ! मैं अपने कारणा ही कहती हूँ कि मुभु निर्हृदयाकी संपन्न् सागरिकां [इस ग्रन्थमें जलकर] मरी जा रही है ।

इसमें सागरिकाके बन्ध तथा बध श्रादि [दोनों]के होनेके कारणा ‘विद्रव’ [श्र्रद्धा पाया जाता] है । श्रैर ‘वेङ्गीसिंहार’में—

“युधि[ष्ठिर]-श्र्रहे ! यहाँ कौन है ? तुझैर सहित धनुष लाम्रो । श्र्रहे, कोई नौकर नहीं जान पड़ता है । प्रच्छा रहने दो । बाहुयुद्धकी सम्भावनाके कारणा [ग्रस्त्रसे रहित] खाली हाथ वाले इसको जोरसे पकड़कर प्रज्वलित ग्रग्निमें क्रूदा पड़ता हूँ ।”

इसमें सम्भ्रम रूप ‘विद्रव’ है । शौर्य, कुल, विद्या रूप, सौन्दर्य श्रादिके कारणा श्रपनी प्रज्ञांसा करना ‘विचलन’ [कहलाता] । जैसे ‘वेङ्गीसंहार’के पचचम्र श्रङ्कमें—

“हे तात ! हे मातः !

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क० ४६, सू० ६६ ] प्रथमो विवेक: [ १७३

सकलरिपुजयाशा यत्र बृद्धा सुतैस्ते, तृणमिव परिभूतिो यस्य गर्वेण लोकः । रणशिरसि निहन्ता तस्य राधासुतस्य, प्रणमति चरणौ वां मध्यमः पाण्डवोडियम् ॥

श्रवि-च वचन !

नृणिताशेषकरथ्यः श्रीबो दुःशासनासृजा । भक्कवा सुयोधनस्योक भोमोडयं शिरसार्चति ॥" इति । शत्रु स्वगुणाविष्करण्यात विचलनमति ।

(६) श्रथ संरम्भः—

[मत्र ६६]—संरम्भः शक्तिककीर्तनम् ॥५९॥

सरुधानामुत्तर-प्रत्युत्तरेऽपि आत्मशक्तिभाषणं संरम्भः । यथा ‘वेणीसंहारेऽ दुर्योधनं प्रति क्रमाद्—

"भीमः—घ्रन्यच मूढ ! शोकं श्ववचनसलिलैरयन्त परित्याजितोत्ससि, श्राततवचःःस्थलावघटन यथा सौदामृतड्यास ग्रासीदेतन तव कुलपतेः कारगं जीवितस्य, कुधे युय्मकुलकमलिनी-कुहरेऽपि भीमसेनेः ॥

तुम्हारे पुत्रोंने जिसके ऊपर सारे क्षत्रियोंको विजय करनेकी श्राशा लगाई हुई थी, श्रौर जिसके प्रभावके कारण सारे संसारको तृणके समान तिरस्कृत किया था, उस राधा-सुत [कर्ण] को युद्ध भूमिमें मारनेवाला यह मध्यम पाण्डव [अर्जुन] श्रापके दोनों चरणोंमें प्रणाम करता है ।

हे तात ! श्रौर भी [सुनिए]—

समस्त कौरवोंका नाश करनेवाला, दुःशासनके रक्तसे मत्त हुग्रा और दुर्योंधनकी जंघाग्रोंको तोड़कर यह भीम [भी] श्रापको शिरसे नमस्कार करता है ।"

इसमें श्रापने गुप्तकी प्रकट करनेके कारण यह 'विचलन' [श्रात्मश्लाघा] है ।

(७)—ग्रात्म संरम्भ [नामक ग्रात्मश्लाघके भेद नवम ग्रात्मके लक्षण प्रापि कहते हैं]—

[सूत्र ५८]—[ग्रात्मनी] शक्तिका कथन करना 'संरम्भ' [नामक श्रात्मश्लाघा] है ।१५९। श्रावेश भरे दो जनोका उत्तर-प्रत्युत्तर द्वारा श्रपनी-श्रपनी शक्तिका कथन करना 'संरम्भ' [कहलाता] है । जैसे ‘वेणीसंहार’ में दुर्योधनके प्रति भीम ऋमसे [कहते हैं]--

"मूर्ख ! श्रौर भी [सुन]—

स्त्रियोंके समान [श्रपने सम्बन्धियोंका नाश देखकर] तुम्हें जो हलाया गया, श्रौर भाई दुःशासन] की छातीको फाड़ने [ग्रौर उसका रक्तपान करने] जो तुमको साक्षी बनाया गया । तेरे कुल रूप कमलिनीके लिए हाथोके समान [विनाशाक] भीमसेनके क्रुद्ध होनेपर भी तेरे ग्रात्म तक जीवित रहनेका यही कारण था [जन्यथा तुम्हें जाने कबका मार दिया जाता] ।

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१५२ ] नाट्यदर्पणम् [ का० ६०, सू० १००

राजा—दुरात्मन् ! भरतकुलापसद ! पापडवपशो ! नाहं भवानिव विकत्थ-

नापगल्भः । किन्तु तद्यन्ति न चिरात् शुम्रं बान्धवास्त्वां रणाङ्गणे ।

मदूद्गदाभिन्नवच्चोऽस्ति वेगैकाभिभूषराम ॥" इत्यादिति ।

इत्थं सरघस्यापि हृश्यते यथा वेधीसंहारे युधिष्ठिर:-

"नूनं तेनाऽपि वीरेगा प्रतिज्ञाभीरोहणा ।

बध्यतां केशपाशस्ते च चास्याकर्ष्याऽऽत्मम् ॥" इति ॥

सम्फेट क्रोधेन भाष्यमात्रं संरम्भे तु बलकर्तृनमित्यानयोमेन्द इति ॥१५१॥

(१०) श्रथ शक्तिः-

[सूत्र १००]—कृदुप्रसादनं शक्तिः

कुर्दस्य प्रसादनं श्रनुकूलनं बुद्धि-विभवादिशक्तिक्रियार्यत्वेन सा शक्ति: । यदि वा क्रुद्धस्य दृष्टः: प्रकर्षेए साधनं विनाशनं शक्तिः । यथा रत्नवल्याम्—

राजा—ग्ररे नीच ! भरतकुलकलंक ! पापडवपशो ! मैं तेरे समान शत्रुसिलाघार्ंे

निपुरा तो नहीं हूँ किन्तु—

तेरे बान्धव लोग शस्त्र ही, मेरी गदासे टूटी हुईं छातीकी प्रस्थियोंकी मालासे भयङ्कर

भूषरगोंसे युक्त तुम्हको युद्धभूमिमें सोता हुआ्रा देखेंगे ।

इत्यादिमें [संरम्भोक्ते: शक्तिक्रीतनेके कारराए 'संरम्भ' का उदाहरण है] ।

क्रोधवेशाके बिना भी [शक्ति-स्थापन] देखा जाता है । जैसे वेधीसंहारमे—

'युधिष्ठिर—प्रतिज्ञाके श्रङ्ग भङ्ग होनेके भयसे वह [भीमसेन] श्राज तुम्हारे केशपाश

'बध्यतां' पद बध्यार्थक तथा बन्धनार्थक दोनों धातुप्रोंसे समान रूपमें ही बनता है । ग्रतएव

को श्रौर जिसने उसका श्राक्षेपण किया था उन दोनोंको [क्रमशः] बाँधे तथा मारेगा । [इसमें

'बध्यतां' पद बध्यार्थक तथा बन्धनार्थक दोनों धातुप्रोंसे समान रूपमें ही बनता है । ग्रतएव

उसके दोनों श्रर्थ लगते हैं]।

प्रतः दूसरे प्रकारके 'संरम्भ'

यह वचन युधिष्ठिरकृतने क्रोधवेशाके बिना ही कहा है । ग्रतः दूसरे प्रकारके 'संरम्भ'

ग्र्राज्ञका उदाहरण है । ग्रागे इसी ग्र्राज्ञसंधिके सम्फेट नामक तृतीय ग्राज्ञके साथ इस

'संरम्भ' नामक नवम ग्राज्ञका भेद दिखलाते हैं ।

'सम्फेट' [ग्राज्ञ] में केवल क्रोधसे भाषरण मात्र होता है ग्रोर 'संरम्भ' में शक्तिका

कोतन होता है यह इन दोनोंका भेद है ॥१५२॥

(१०) श्रथ 'शक्ति' [नामक श्राज्ञसंधिके दशम ग्राज्ञका लक्षण श्रादि करते हैं]—

[सूत्र १००] कृद्रदको प्रसन्न करना 'शक्ति' [कहलाती] है ।

कृद्रदको प्रसन्न करना श्रर्थात् श्रनुकूल करना, बुद्धि या वैभव श्रादि शक्तिका कार्य

होनेसे वह [कृद्र प्रसादन] 'शक्ति' [कहलाती] है । प्रयवा क्रुद्ध हुए श्रात्मका [प्रसादन श्रर्थात्

प्रकर्षेए सावन] ग्रासक्तिन विनाश 'शक्ति' [कहलाती] है ।

[पहले प्रकारका उदाहरण] जैसे रत्नावलीमें—रजा—

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का० ६०, सू० १०० ] प्रथमो विवेक: [ १७३

"सट्याजै: शपथै: प्रियैश्च वचसा चित्तानुमृतस्य च भृशं, वैलद्यैश्च परेषां पादपतनेर्वाक्यै: सखीनां मुहु: । प्रत्यासत्तिमुपागता मम तथा देवी रुदस्या यथा, प्रत्ताल्येव तयैव वाष्पसलिलै: कोपोदपनीतो यथा ॥" तथा कृत्यारावणोऽपि प्रसंसांकस्य पूर्वार्द्ध—

"Alas! Alas! Rama, with the great being's play, has destroyed this ten-headed one like a mountain in the Śṛṅgāvan." Here, the destruction of the enemy Rāvaṇa is delighted. Some consider it as a pacification of the enmity. As in the Uttara Charita— "Lava: The enmity that has turned into love, the rasa that has become a cloudburst, the pride that is sometimes tamed, and the humility that delights me. When I see this, I am filled with joy, and I feel that there is some great power in the great being." Here, the sentiment of Prasādana is also related to the sentiment of Prasatti. And here, Lava's anger is pacified.

"बहाने बनाकर शपथोंके द्वारा, प्रिय वचनोंके द्वारा, सर्वथा चित्तके अनुकूल ग्रनुगमन करनेके द्वारा, शत्रुयन्न लज्जाके [भ्रानुभव या प्रकाशन] द्वारा, पैरोंपर पड़कर ग्रौर बार-बार सखियोंके कहनेपर भी प्रिया [वासवदत्ता] उस प्रकार प्रसन्नताको प्राप्त नहीं हुई जैसी कि स्वयं रोती हुई उसने ग्रांशुमतीसे मानो क्रोधको बहा दिया हो [प्रर्थात् वासवदत्ताके इन ग्रांशुमतोंने मानो उसका सारा क्रोध बहा दिया हो ।] यह प्रथम प्रकारके प्रसादन रस शक्त ग्रह्काका उदाहरण है । दूसरे लक्षणके ग्रनुसार शक्तित ग्रह्क्का उदाहरण वे देते हैं—

ग्रोर जैसे 'कृत्यारावण'के सहमांकके पूर्वार्द्ध में— "ग्ररे ! बड़े दु:खकी बात है कि— प्रलयके समान महा-शक्तिशालिना रामचन्द्रन भृगुजन्मके युक्त पर्वतक समान इस दश शिरोवाले रावणको ग्रनायास हो गिरा दिया ।" इसमें विरोधी रावणका विनाश कहा गया है [प्रतः यह दूसरे लक्षणके ग्रनुसार शक्तित नामक ग्रह्क्का उदाहरण है । कुछ लोग विरोधके प्रशमन को 'शक्ति' कहते हैं । जैसे 'उत्तरचरित' में—

"लव—[रामचन्द्रजीके ग्राज्ञानसे चन्द्रकेतुकके साथ होनेवाले युद्धमें हम दोनों ग्रर्थात् लव ग्रौर चन्द्रकेतु] विरोध शांत हो गया ग्रौर ग्रानन्द प्रदान करने वाला प्रेम [रस] उत्पन्न हो रहा है । वह उद्दण्डता [जो मेरे शत्रव भोतर थी] जाने कहाँ चली गई, ग्रौर विनय मुभ्के [उसके सामने] विनम्र बना रही है । इनको देखकर न जाने क्यों तुरन्त हो परवश्न-सा हो गया हूँ ग्रथवा तीर्योकि समान महापुरुषोंका कुछ ग्रनिवर्चनीय प्रभाव होता है । इसमें यह [विरोध-विर्र्वान्त] भी इसी [क्रुद्ध-प्रसादन] में ग्रन्तर्भू हो जाती है । प्रसादन

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प्रकृताभिप्रायविरुद्धाचरणहेतुभिरप्रायो भावान्तरसङ्गः श्रच्याऽन्य मन्यन्ते ।

यथा तापसवत्सराजे षष्ठेऽङ्के—योगन्धरायणवासवदत्तां सरसाऽध्यवसायान्वर्तयितुं भावः । तद्विरुद्ध चित्ताविरचनक्रिया श्रभिप्रायान्तरान् कुरुत इति भावान्तरम् ।

तत्र हि—

‘योगन्धरायण ! भद्र विनीतक ! रचय चित्ताम् ।’ इति ।

इत्र्यन्वये शक्यतेः स्थानेऽज्ञा पठितान्ति युक्तियुक्तमभावविचारः क्रोधाक्ष यथा—ज्ञापनं सा ज्ञा ।

यथा कुल्यारावणोऽत्रिजटया दारुणिकाभिधाना राक्षसी दृष्टा—

त्रिजटा—दारुणिके ! कि तुमं भणसि । [दारुणिके ! कि त्वं भणसि । इति संस्कृतम् ।]

दारुणिका—श्राय्ये तियडे ! श्रवि नाम श्रावडिहदा श्राणा मम शरीरेऽतिनिव-डिस्सइ न उण ईदिसं श्रक्खडुजं करइस्सं

पुनरीहशकार्यं करिष्यामि इति संस्कृतम् ।]

त्रिजटा—तहा वि तुमं दारुणिक्क त्तु च्चसि । [तथापि त्वं दारुणिके ! इत्युच्यसे । इति संस्कृतम् ।]

‘प्रसत्त’ प्रसन्नताके भी ग्रा जानिस्से । ग्रोर यहाँ कुड लवके मनकी प्रसत्ति ग्रत्यातु प्रसन्नता हैं ।

‘श्रत: यह क्रुद्ध प्रसादन रुप शक्तिके भीतर ही ग्रा जाता है । उसका ग्रलग लक्षण करने की श्रावश्यकता नहीं है ।

इसके स्थान पर श्रज्ञ लोग प्रकृत श्रभिप्रायके विरुद्ध श्राचरणके हेतुभूत श्रभिप्राय-रुप भावान्तरको

दर्शाते हैं । जैसे तापसवत्सराजके षष्ठ ग्रङ्कमें योगन्धरायराका वासव-दत्ताको मरतलेसु बचानेका श्रभिप्राय है ।

किन्तु उसके विपरीत चिता बनानेकी क्रिया दूसरे श्रभिप्रायसे कराई है ।

इसलिए वह भावान्तर [ग्रज्ञ] का उदाहरण है । जैसे कि—

वहाँ [योगन्ध रुपराए कहते हैं]—

‘योगन्धरायराए— भद्र विनीतक ! चिता बना दो ।’

यह [योगन्धरायराएका वचन उनके प्रकृत श्रभिप्रायके विपरीत होनेसे भावान्तरका उदाहरण है ।

ग्रज्ञ्य लोग शक्तिके स्थानपर ज्ञा [नामक ग्रज्ञ] को रखते हैं । उचित-ग्रनुचितका विचार किए बिना क्रोधसे जो ग्रा ग्रा देना है उसे श्रज्ञा [ग्रज्ञ] कहते हैं ।

जैसे कुल्या-रावणमें त्रिजटा दारुणिके नामकी राक्षसीसे पूछती है—

त्रिजटा—हे दारुणिके ! तुम कया कह रही हो ?

दारुणिका— श्राय्ये त्रिजटे ! [रावणकि] श्रप्रतिहत श्राज्ञा मेरे शरीरपर भले ही गिरे

किन्तु मैं इस प्रकारका श्रनुचित कार्य नहीं करूंगी ।

त्रिजटा—फिर भी लोग तुमको दारुणिके [नामसे] कहते हैं ।

फिर क्रमसे नेपथ्ये—

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का० ६०, सू० १६ ] प्रथमो विचेक: [ १७४

"हा त्रिजटे ! एसो दे पिसयहो सीदो भत्तुंसो मायासिरदंसुग्रुप्ततिमरयानीच्छलुया श्विगं पविसिसुकामा। [हा त्रिजटे एसो ते प्रियसख्खी सीता भहुं माथ-

शिरोदरंनोदपत्तिमरगानिश्वया श्विन्तं प्रवेष्टुकामा] त्रिजटा-हा हदंबिमि मंदभाइणी मा दारिय दिसुवेएण भत्तुणा झाणा संपादीददि । [हा हतिस्सिं मंदंभागिनी ! मा इहलोणि हैवेएण अतणं राणो संपावादे]।

एतस्मादवसीयते सीताऽऽयपादनाय क्रुद्धादु रावणेए दारुणिकाएइ झाझा दत्तेति ।

सर्वेसणिद्धेसवि मतान्तराएण बुद्धोदक्वातं भणितिभेदादु वैचिच्चएस रक्खफ-

त्वाच्च प्रमाणान्येव । झयत एवं सर्वेसणिद्धवयंग संधुकरणमुहारणपरामति मन्तवयिमिति ।

अथ प्ररोचना—

[सूत्र १००]—भावसिद्धिः प्ररोचना ।

निर्वहणएसंधो भाविनोऽस्थिस सिद्धिः सिद्धत्वेनोपक्रमयां प्रकर्षण रोच्यते दीप्यतेरडणया रुपकाएर् इति प्ररोचना यथा वेघीसंधारे—

पाख्खालक:-‘ग्रहं च देवन्त चक्रपाणिना’ इत्युपक्रम्य] कृतं सन्देहनेन—

पूर्वेन्तो सकितेत्तिन् रस्नकलशो राज्याभिपेकाय ते

कृष्णास्यान्तचिरोडिक्खते च कवरिवन्धे करोउ तु दार्एम् ।

हा त्रिजडे ! तुम्हारी यह प्रिय सखी सीता स्वामी [रामचन्द्रके] बनावटी शिरको देखनेके कारणेके निश्चय करके ग्रहिणमें प्रविष्ट होना चाहती है

त्रिजटा—"श्ररे मैं श्रभागिनी मरी । भगवान् करे इस समय स्वामी [रावण] की

ग्राज्ञापूर्ण न हो सके ।

इस [संवाद] से प्रतीत होता है कि रावणने दारुणिकाके सीताको मार डालनेकी

ग्राज्ञा दी थी । [इसलिए यह ‘ग्राज्ञा’ नामक ग्राज्ञाका उदाहरणहै क्योंकि वह ग्राज्ञा क्रोधा-

वेशमें ही दी गई है ।

सभी संघियोंमें [ग्राज्ञोंके विषयमें] ग्रन्थ-ग्रन्थ [लक्षण प्रस्तुत करनेवाले] मत वृद्धों

द्वारा कथित होनेसे श्रोर वरणन-शोलेक भेदसे उत्पन्न वाच्यभेद मनोरञ्जक होनेके कारण

प्रमारणभूत [मान्य] ही है । इसीलिए सभी संघियोंमें ग्राज्ञोंकी गरगना केवल उदाहरणा-परक

समभनी चाहिए । [ग्राज्ञात् उसी प्रकारके ग्रन्थ ग्राज्ञ भी हो सकते हैं । वह संध्या निश्चित

नहीं है यह समभना चाहिए]।

ग्रथ ‘प्ररोचना’ [नामक विमर्शांशके दशम ग्राज्ञके लक्षण ग्रादि करते हैं]

ग्रागे होनेवाली सिद्धि [का कथन] ‘प्ररोचना’ [कहलाती] है ।

निर्वहण संघमें ग्रागे होनेवाले ग्रथ्यकी सिद्धि, ग्रथ्य या उसको सिद्ध ही मानकर कथन

करना जिसके द्वारा रूपकका विषय प्रकर्षंसे प्रकाशित या दीप्त होता है [इस ध्युत्पत्तिके ग्रथ्य-

सार] ‘प्ररोचना’ [कहलाती] है । जैसे ‘वेघीसंहार’ में—

पाख्खालक-[‘शुक्रे देव चक्रपाणि’ए कृष्णा ने यहांसि लेकर] सन्देहकोई ग्रावश्यक्ता

नहीं है [इस लिए]

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रामे शातकुठारभासुरकरे नतत्रद्रुमोच्चैदिनि क्रोधान्धे च वृकोदरे परिपतित्याजो कृतः संशयः॥

भत्र युधिष्ठिरराज्याभिषेकस्य द्रौपदीकेशसंयमनस्य च भाविनोडपि सिद्ध- त्वेन कल्पनमू॥

यथा वा राघवस्युदये सम्प्रेक्षितं— सतीया वन्दन विक्रियम्यतां रामस्य शोकार्तः। शान्तिं यातु संगीतयशस्करेभुजेन्तु शाखासुगा:। सन्धानाय विशेषा: प्रयततां लङ्काधिपस्प्यश्रिय: सौमित्रेर्दर्शकष्ठ-कटाक्षटविपं काल: कियोग्लिनन्दत: ॥ इति ।

अथ्ये तु सत्कारादेशन' प्ररोचनामाहुः । यथा वेणीसंहारे— युधिष्ठिर:-[ पुरुपभवोलोकं ] भद्र उच्यतां सहदेवः कृत्स्नस्य वृकोदरस्या- पर्युं वितां दारुणां प्रतिज्ञामुपलभ्य प्रणष्टस्य मानिनः कौरवनाथस्य पदवीमवेच्छितु- मतिनिपुणमतया; तेनु तेनु स्थानेपु परात्मवेदिनश्वारा, मन्त्रिण: सचिवाश्व शक्तिमन्तः पटुपटहव्यक्तघोषणा: सुयोधनसभ्र्रवेदिन: प्रतिश्रुतधन-पुजा-प्रत्युपपक्रिया: सकृरन्तु समनन्तपकक्रमिति । धन-पुजाप्रतिश्रवणप्रचोदिता: प्रत्युपकारे वतिष्यन्ते दुर्योधन- प्रतिलम्भवार्त्तायै । इति ॥

ग्राप [प्रत्युतं युधिष्ठिर] ग्रपने राज्याभिषेकके लिए ग्राप रथनोके कलशोंको जलसे भरवावें, श्रौर द्रौपदीके बहुत दिनोंसे खुले हुए केशपाशको बाँधनेका उत्सव करे । क्योंकि तीक्ण कुठारसे वृक्षोंको फाटनेवाले परशुराम श्रौर क्रोधान्ध भीमके संग्राममें श्रा जाने पर [विजयमें] क्या संदेह है ?

इस [पाँचचालकके कथन] में श्रागे होनेवाले युधिष्ठिरके राज्याभिषेक तथा द्रौपदीके केशबंधन रूप ग्रभिनयको सिद्ध-सा मान लिया गया है [अ्रभतएव यह 'प्ररोचना' नामक ग्रभिनयका

उदाहररगा है]

ग्रभ्थवा जैसे राघवस्युदयके सक्ष्मू ग्रभ्थमें— लोग गीत गाते हुए श्रौर ह्राथ हिलाते हुए नाचें, श्रौर विभूषरगा लदृतीकी राज्यलक्ष्मीको प्राप्त करते हैं क्योंकि लक्ष्मणके द्वारा रावणके कानोंमें कितनी देर लगनी है [तनिक देरमें काट डालेंगे] ।

इसमें श्रागे होनेवाली बातोंको सिद्धवत् वर्णन किया गया है । इसलिए यह 'प्ररोचना' ग्रभिनयका उदाहरण है ।

ग्रान्य लोग सर्कारकी ग्राज्ञाको 'प्ररोचना' कहते हैं । जैसे 'वेरग्गीसंहार'- में— होनेवाले युधिष्ठिर-[पुरुपकी श्रौर देखकर] भद्र सहदेवसे कहो कि कृत्त्स्न भीमकी वासो न होनेवाली [प्रत्युतं ग्राज्ञा ही पूरी होनेवाली दुर्योधनके वधकी] प्रतिज्ञाको सुनकर छिप गए हुए

ग्रभिमानी कौरवराजके स्थानका पता लगानेके लिए उन-उन स्थानोंपर ग्रापने श्रौर शस्त्रुपक्शके पहिचाननेवाले गुप्तचर, मन्त्री श्रौर शक्तिमान् सचिव श्रौर तीक्र पटहु वाद्य द्वारा स्पष्ट हृपसे घोषणा धन पूजा ग्रादि पुरस्कारकी सूचना प्राप्, दुर्योधनके गमनागमन [के स्थानों] को

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का० ६०, सू० १०१-१०२ ] प्रथमो विवेक: [ १५७

श्रन्ये त्वन्य स्थाने युक्ति पठन्ति । युक्तिक्ष शविन्च्छेदोक्ति:। यथा पुष्टपदुतिके——

"समुद्रदत्त:——

भर्ता तवाहरमिति कष्टदशाविरुढं, पुत्रस्तवैष कुत इत्यनुदातरैषा । श्रुतं पुरः पतति किं करवाणि हन्त, त्वयक्तं विरौमि यदि साक्ष्युपस्रयते माम्॥" इति ।

(१२) श्रथादानम्——

[सूत्र १०१]——फलसामीप्यमादानम् । मुख्यफलस्य दर्शनमादानम् । यथा नागानन्दे——

[नायकमुदिश्य] गरुड:—— नागानां रक्षक ये भाति गुरुरेष यथा मम् । तथा सर्पाणकान्चा त्यक्तुमच्यापनेद्यति ॥ श्रुत्वा नगरचालचापस्य मुख्यफलस्य सामीप्यनिबन्ध इति ।

(१३) श्रथ व्यवसाय:——

[सूत्र १०२]——व्यवसायोदृश्यहेतुयुक् ॥ ६० ॥

जाननेवाले लोगोंको समन्त-पञ्चकके वारों श्रो भेज दें । बदलेमें धन पूजा श्रादिके श्रादिवासन से प्रेरित होकर दुर्योधनको पकड़वानेके [लिए] समाचार देनेको तैयार हो जावेंगे

इसमें दुर्योधनका पता लगानेवालोंको सत्कार धन श्रादिका प्रलोभन देनेका जो वचन दिया गया है वही 'प्ररोचना' है ।

श्रन्य लोग तो इस [प्ररोचन] के स्थानपर युक्ति [वाक्य] को पढ़ते हैं । जैसे पुष्टपदुतिक में समुद्रदत्त [कहता है]——

"में तुम्हारा स्वामी यह [कहना इस] कष्टदशाके विपरीत है । यह तुम्हारा पुत्र है [यह कहा जाय] तो फिर यह श्रनुदारता क्यो ? शास्त्रका प्रहार होनेवाला है श्रब क्या करूं,

यदि स्पष्ट रुपसे रोता-चिल्लाता हो तो वह मुझको जान लेगी ।"

(१२) श्रव 'श्रादान' [नामक विमर्शसन्धिके वारहवें श्रङ्कका लक्षण श्रादि करते हैं]——

[सूत्र १०१] फलका समीप दिखाना 'श्रादान' कहलाता है ।

मुख्य फलका [समीप] दीखना 'श्रादान' कहलाता । जैसे नागानन्दमें नायकका लक्ष्य

करके गरुड [कहते हैं]——

"नागोंके रक्षक ये [जीमूतवाहन] मेरे गुरुसे प्रतीत होते हैं इसलिए श्रव सर्पोंको खाने की [मेरी] इच्छा निश्चय ही समाप्त हो जायगी ।"

इसमें नागोंकी रक्षा रुप मुख्य कार्यके सामीप्यका वर्णन किया गया है । [ श्रव एव यह 'श्रादान' नामक इस श्रङ्कका उदाहरण है ।]

(१३) श्रव 'व्यवसाय' [ नामक विमर्शसन्धिके तेरहवें श्रङ्कका लक्षण श्रादि करते हैं ]——

[सूत्र १०२]——श्रप्रत्यनीयर फलके हेतुका योग 'व्यवसाय' [कहलाता] है । ६०।

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१७५ ] नाट्यदर्पणम् [ काः ६०, सू० १०२ 'युगिति' योजनं युक्। व्यर्थनोयफलस्य हेतुस्तद्योगो व्यवसांय। यथा रत्नावल्याम्—

"ऐन्द्रजालिकप्रवेशादारम्य—'एको उदय खड्गक्यो ताए ण्ववस्सं पेक्खदव्वो' [एकः पुनः खेलकत्वयावश्यं प्रेक्षितव्यः] इति यावत्। व्यर्थं हि। यौगन्धरायणेन यदंगोकुर्तं तत्निष्पादकहेतुतस्मागमः।

तथा वेश्यसंहारे—अन्यत्र तु 'व्यवसायकृत्याक्क:' इति परिभाषित। नूनं तेनात्र वीररत्ना प्रतिज्ञारङ्गभीषणा। वध्यते केशपाशान्ते स चाम्याकारपणोचमः ॥ इति ।

एतच्च 'संरम्भः शक्तिकर्तनम्' इत्यनेनैव संगृहीतर्मात केचिदनियमाज्ञानत्कारारेषु द्वादशभेदैरपि सनिर्घोषमच्छुनित । एवं गर्भसन्धिमपेति ।

एतान् यवमरसं च वेशत्रयोदशार्कान् लचयितुमुदीराति— [सूत्र १०३]—सन्धि-निरोधो प्रथनं निःसयं परिसमापयाम् । उपासति: कृतिरानन्दः समयः परिगूहनम् ॥६१॥

'मुख' अर्थात् योजन। 'व्यवसायी' फलकाजो हेतु उसका योग 'व्यवसाय' [कहलाता] है जैसे रत्नावलीके प्रवेशसे लेकर 'मेरा एक खेल आपको प्रवश्य देखना चाहिए यहाँ तक [व्यवसायी फलक योग होनेसे व्यवसाय श्राजका उदाहररहा है]। इसमें योगन्धरायणने

[उदयन तथा वासवदत्ताका सम्बन्ध करानेका] जो निश्चय किया था उसके सम्पादक हेतुका समागम हो रहा [प्रत एवं यह 'व्यवसाय' नामक श्राजका उदाहरणरहा है]।

धान्य लोग तो "व्यवसाय का कथन करना 'व्यवसाय' [कहलाता] है" ऐसा लक्षण करते हैं। जैसे वेश्यसंहारमें—

"प्रतिज्ञाका भङ्ग होने पावे इस भयसे बह वीर [भीमसेन] निश्चय ही ब्राज तुम्हारे केशपाशको बाँधेंगा श्रोद जिस [दुःशासन] ने इसकी लींचा था उसको मारेगा ।"

यहाँ 'बध्यते' यह पद बाझ्यार्थक तथा बन्ध्यार्थक दोनों धात्वग्रोसे समान रूपमें ही बनता है इसलिए उसका एक पक्षमें बाँधना श्रोद दूसरे पक्षमें मारना दोनों ही प्रथ्य होते हैं ।

[कुछ लोग 'व्यवसाय' का 'व्यवसायः शक्तिकृतः' ऐसा लक्षण करते हैं] किन्तु यह [उद्क्त लक्षण 'व्यवसाय' का लक्षण न होकर 'संरम्भ' का लक्षण है] है इस [संरम्भ ग्राज्ञ] के भीतर ही श्राज

"शक्तिका कथन करना संरम्भ [श्राज्ञ कहलाता] है" इस [संरम्भ श्राज्ञ] के भीतर ही श्राज जाता है [प्रतः व्यवसायका यह लक्षण उचित नहीं है]।

कुछ लोग [विमर्शसन्धिके तरह ब्राज्ञोंमें] किसी श्राज्ञको न मानकर इस सन्धिके बारह श्राज्ञ ही मानते हैं इसी प्रकार गर्भसन्धिमें भी [बारह श्राज्ञ ही मानते हैं]।

ये प्रबन्धराशिके तरह ब्राज्ञ हैं । ६० ॥

निवद्धस्य सन्धिके चौदह श्राज्ञ—

[सूत्र १०३ क]—(१) सन्धि, (२) निरोध, (३) प्रथन, (४) निःसय, (५) परिषमापना, (६) उपासना, (७) कृति, (८) श्रानन्द, (९) समय, (१०) परिगूहन ६१॥

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का० ६२-६३, सू० १०४-१०५ ] मथमो विवेक:

भाष्यां काव्यसंहार-पूर्वभाव-प्रशस्तयः । चतुर्देशाझो निवोहः; विशेषानुपादानं सर्वाव्यपेता नु प्रधानानि ॥६१॥

(१) अथ सन्धि:- [सूत्र १०४]—सन्धिर्वीजफलागमः ॥६२॥

मुखसन्ध्यो न्यस्ततस्य प्ररम्भावस्थाश्रयैरुक्तत्वे बीजस्योद्घाटनमुखस्य च विकारैः फलं फलागमावस्थायामगमनं हेतुर्न सन्धिः यथा रत्नावल्याम— वसुमती:- [ रग्निर्विद्रवातरन्तरं सागरिका निवेष्ट्ये ] बाह्रव्य ! सुश्रूष्यं राजपुत्र्या: । बाह्रव्य:--समाश्रयेमेव मनस इति ।

शत्रु मुखे यदुमं बीजं तत्रिकटीभूतमिति इदमझमवश्यं निवन्धननियमः॥६२॥

(२) अथ निरोध:- [सूत्र १०५]—निरोधः कार्यमीमांसा ।

नष्टस्य कार्यस्य युक्त्यै यदन्वेष्यां तन्त्रिरुद्धवस्तुप्रचयैरविधरोधः यथा च्छलित-रामे लङ्ङ्मयेन बद्ध्वा आणीतो लङ्को यज्ञार्थं सीताप्रतिकृतिमुपकल्पयित्वां रामस्य दर्श हृ्ट्र वा स्वगतमाह—

[सूत्र १०३ ख]—(११) भाषा, (१२) काव्योपसंहार, (१३) पूर्वभाव तथा (१४) प्रयोगा, निर्वहण [संधि] के ये चौदह भ्रङ्ग होते हैं ।

[अन्य संधियोंके समान इनमें गौण शौर मुख्यका] भेद न किए जानेसे ये सभी मुख्य श्रङ्ग हैं [इनमें कोई भी श्रङ्ग गौण नहीं हैं] ६१ ।

(१) ग्रथ 'संधि' [नामक निर्वहणासंधिके प्रथम श्रङ्गका लक्षण ग्रादि करते हैं]— [सूत्र १०४]—बीजका फल वप तक पहुँचना 'संधि' [नामक श्रङ्ग कहलाता] है । १६२।

मुखसंधिमें बीजरोपित प्रारम्भावस्था बीजप्रकका, उद्घाटन-श्रोनमुख्य श्रादि विकारोंके द्वारा फल श्रथ्यांत् फल-प्राप्तिके श्रवस्थामें ग्रा जाना श्रथ्यांत् पहुंच जाना 'संधि' [नामक श्रङ्ग कहलाता] है । जैसे रत्नावलीमें—

"वसुमती—[रग्निदाहके उपरान्तके बाद सागरिकाको देखकर] हे बाह्रव्य ! यह तो राजपुत्रीके समान मालूम होती है ।

बाह्रव्य—मेरे मन में भी यही बात है । यहां मुखसंधिमें जिस [सागरिका प्राप्ति रूप] बीजका वपन किया गया था वह [प्राप्तिके श्रथ्यन्त] निकट पहुंच गया है । इस श्रङ्ककी रचना श्रवश्य ही करनी चाहिए ।१६२।

(२) ग्रथ 'निरोध' [नामक निर्वहणासंधिके द्वितीय श्रङ्गका लक्षण ग्रादि कहते हैं]— [सूत्र १०५]—कार्यका विचार करना 'निरोध' [कहलाता] है ।

विनष्ट कार्यके बनानेके लिए जो श्रनुसंधान करना वह निरुद्ध [विनष्ट] वस्तु-विषयक होनेसे 'निरोध' [कहलाता] है । जैसे श्छलितराममें [प्रहस्तमेधयजका घोड़ा पकड़नेके काररा] हनुम्रा लङ्काव रामके सभा-भवनमें यज्ञके लिए बनाई हुई सीताकी सुवर्णामयी प्रतिमाको देखकर श्रपने मनमें कहता है—

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"लवः——श्रायं कथमियमस्या राजद्वारमागता । [इस्थाय सहसोपसृत्याऽऽलि वद्धवा] श्रभ्वभिवादये । [निरुत्य] कथमियं काचिदनयी । [ऽपसृत्योपविशति, सर्वे परस्परंवलोकयन्ति] ।

रामः--[हस्ते वा] वत्स ! किसियं तव माता ।

लवः——राजन् ! ज्ञायते सवेयंमसमञ्जननो, किन्त्वेषा देवी भूषणोइचला । [रामः सर्वाष्पं हस्ते गृहीत्वा समीपे उपवेश्यति] ।

लक्ष्मणः——[सविनयम्] श्रग्रजुनन् ! किशामयेषा सा देवानां त्रियसी जननी ।

लवः——तां खलु मातामहो श्रस्माकमभिधत्ते सीतेति ।

लक्ष्मणः——[सवाष्पं रामस्य पादयोर्निपत्य] श्रार्य ! दृष्ट्वा वधंसे, सपुत्रा जीवस्यायोः ।"

क्षत्र नष्टय सीतानिवनकार्यस्य युक्त्या मीमांसते ।

(२) श्रथ प्रथनम्—

[क्षत्र १०६]—प्रथनं कार्यदर्शनम् ।

कार्यं मुख्यफलम् । प्रथथते सम्बन्ध्यते यथाप्रधानं मुख्यफलमननेनैति प्रथनम् ।

यथा वेधीसंहारे——

"भीमसेनः—पाञ्चालि ! न खलु मचि जीवति संहर्तंध्या हुःशासनविलुलिता वेशीरालम्पाकिना । तिष्ठथु तिष्ठतु स्वयमेवाहं संहराराम ।" इति ।

वेधीराल्मपाकिना । तिष्ठथु तिष्ठतु स्वयमेवाहं संहराराम ।" इति ।

लव——ग्रे, ये माताजी राजाके द्वारपर कैसे श्राए ? [उठकर श्रोर सहसा पास जाकर हाथ जोड़कर] नमस्ते ! [देखकर] ग्रारे यह तो सोनेकी है । [हटकर बैठ जाता है] सब लोग एक-दूसरेको देखने लगते हैं ।

राम——[देखकर] वत्स ! क्या ये तुम्हारी माताजी हैं ।

लव——हे राजन् ! ऐसा मालूम होता है कि ये हमारी वे माता ही हैं । किन्तु यह देवी

तो भूषण धारण किए हुए हैं ।

[रामचन्द्र रोते हुए हाथ पकड़कर लवको पास बिठालते हैं] ।

लक्ष्मण——[रोते हुए] श्रग्रजुनन् ! तुम्हारी माताजीका क्या नाम है ?

लव——उनको हमारे नानाजी सीता कहते हैं ।

लक्ष्मण——[रोते हुए रामचन्द्रके पैरोंपर गिरकर] श्रार्य, भाग्यसे श्रापकी वृद्धि है ।

श्रार्या [सीता] पुत्र सहित जीवित ।

यहाँ सीताके जीवनरूप विनष्ट हुए कार्यकी युक्ति द्वारा मीमांसा की है । [प्रतः यह निरोष नाम श्रद्धाके उदाहरराए है ।

(१) श्रब ‘प्रथन’ [नाम निर्वहुराए संधिका तृतीय श्रङ्कका लक्षण श्रादि करते हैं]—

[सूत्र १०६]—कार्यका दिखलाई देना ‘प्रथन’ [कहलाता] है ।

कार्य श्रर्थात् मुख्य फल । जिस व्यापारके द्वारा मुख्य फल प्रतिथ श्रर्थात् सम्बद्ध होता

है वह ‘प्रथन’ [प्रङ्ग] है । जैसे वेधीसंहारमें——

"भीमसेन—हे पाञ्चालि ! मेरे जीवित रहते दुःशासनके द्वारा खींचे गए केशोंको अपने हाथसे मत बांधना । ठहरो-ठहरो, मैं स्वयं श्रभी बांधता हूँ ।"

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का० ६३, सू० १०७ ]

प्रथमो विवेक:

[ १६१

व्यात्र द्रौपदीकेशसंयमनकार्यस्य व्यापारेणैव प्रथन्रमति ।

(४) श्राथ निर्णय:-

[सूत्र १०७]—निर्णयोडनुभवर्य्यति: !

ज्ञेयेर्ध सन्दिद्वानं श्रयतिपचमानं वा प्रति यदनुभवस्यानुभूतस्यार्थस्य निर्णयार्थं कथनं तन् ज्ञेयार्थनिर्णयाय निरर्णयः। यथा यादवा्श्रयुदये समुद्रविजयः प्रत—

“वसुदेव:—[लिप्समोहनं ] देव ! यथा कंसप्रतिभयेन कृष्णां शोकले गोपीयत्ता यो महान क्लेशोडनुभूतस्तस्य फलमिदानीनिमभूत् । किन्तु लोकपरिज्ञानभयेन यन्मया देवपादानामपि न विज्ञप्तं तत् देवन तन्रतद्र्यम् ।”

व्यात्र वसुदेवेन स्वानुभूतं क्लृप्तश्रगोपनक्लेशं समुद्रविजयो बोचि: ।

यथा वा पुष्पदृतिके प्रकारणेऽ—

'किन्रामनदत्तोऽ्य ड्य बालक:' इति समुद्रदत्तेन पृष्ट: सेनापति: 'विशाखानच्त्रो ड्यं बालक:' इत्याह ।

समुद्रदत्त: श्रथवा पूर्वानुभूतेन नन्द्रयन्तीसमागमं स्मरन्नाह—'तदा किल तन्द्र-

यन्ल्या पृष्टेन मया कथितं यथा—

एतौ तौ प्रतिहश्रयते चारुचन्द्रसमप्रभौ ।

व्यातौ कल्गणनामानौ उभौ तिष्ठपुनर्वसू ।।

तदौधानन्दू दर्शं जनन्मनच्त्रयोर्मात् उद्यति:शास्त्रेसमयोचवेत् । यदौ श्रवते तदुप-

पन्न्रमेवेति ।

इसमें द्रौपदीके केशोंके बांधनेक रूप कायंका व्यापार द्वारा प्रथन किया है ।

(४) ग्राथ 'निर्णय' [नामक निर्णयप्रकार्शकके चतुर्थ श्राड्कका लक्षण श्रावि करते हैं]—

[सूत्र १०७]—ग्रन्थुभवका कथन करना 'निर्णय' [कहलाता] है ।

जानने योग्य ग्रथंक विषयमें सन्देहयुक्त या ग्रज्ञानयुक्त व्यक्तिके प्रति जो निर्णयके

लिए ग्रन्थुभूत ग्रथंका कथन करना है वह, जों ग्रथंका निर्णय करनेवाला होनेसे 'निर्णय'

[कहलाता] है । जैसे यादवा्श्रयुदयमें समुद्रविजयके प्रति वसुदेव कहते हैं—

“वसुदेव—[ग्रानन्दके साथ] देव कंसके भयके कारन कृष्णाको गोकुलमें छिपाकर

रखने में मैंने जो कष्ट उठाए उनका फल ग्राज प्राप्त हो गया । किन्तु लोगोंको मालूम हो जानेके

भय से जो मैंने ग्रापकों भी नहीं बताया उसके लिए ग्राप क्षमा करें ।”

यहां वसुदेवने अपने ग्रन्थुभूत क्लृप्तश्रगोपनके क्लेशकी समुद्रविजयको सूचना दी ।

ग्राथवा जैसे पुष्पदूतिक [नामक] प्रकरणमें—“यह बालक किस नक्षत्रमें उत्पन्न हुग्रा

है” इस प्रकार समुद्रदत्तके द्वारा पूछे जानेपर सेनापति—“यह बालक विशाखा नक्षत्रमेंका

है” यह कहते हैं । इसको सुनकर समुद्रदत्त पूर्वानुभूत नन्द्रयन्तीके समागमको स्मररण करते हुए

कहते हैं कि “उस समय नन्द्रयन्तीके द्वारा पूछे जानेपर मैंने उससे कहा था कि—

चन्द्रके समान सुन्दर कान्ति वाले ग्रौर प्रसिद्ध सुन्दर नामवाले ये दोनों तिष्य ग्रौर

पुनर्वसुके समान दिखाई देते हैं ।

उनको ध्यानमें रखनेसे ज्योतिःशास्त्रके पण्डित जो यह कहते हैं कि इनका जन्म-नक्षत्र

दशम है सो ठीक हो है ।”

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११२ ]

(४) ग्रथ परिभाषा—

[सूत्र १०८]—परिभाषा स्वनिन्दनम् ॥ ६३ ॥ स्वापराधोद्घटनं परिभाषा । यथा तापसवत्सराजचरिते वासवदत्तां प्रति— "राजा—[ साश्रम् ] देवि ! किं ब्रवीषी— यथा तथा घृतप्रायं नि:स्नेहं निरपत्नपम् । स्वानन्दामृतवषियेया दृष्ट्वाऽस्यानुगृहायाः माम् ॥" यथा वा नलविलासे दमयन्त्यै प्रति नल:— "न प्रेम निहितं चित्ते न चाचार: सतां स्मृतः । त्यजता त्वां वने देवि ! मया दारुणमाहितम् ॥" यथा वा रामाभ्युदये राम: [ स्वगतम् ] "वैदेही हतवास्तु देशे महर्तः सङ्ख्ये विषय्य क्लममान, चक्रोन्तपाटितकन्धरो दशमुख: कीनाशदासीकृतः । प्राणान् यदिरहेतॆ्यं विधुतवास्तेन त्रपापांसुरं, वक्त्रं दर्शयितुं तथापि न पुरस्तस्या विलचॆ: त्वमः ॥" एतदृशं रुषकृतवा-दत्रावश्यं निवन्धनीयम् ।

(५) ग्रह 'परिभाषा' [नामक निर्वहणङ्ग के पञ्चम ग्रह्लकका लक्षण ग्रादि कहते हैं]— अपनी निन्दा करना 'परिभाषा' [कहलाता] है । ६३ ।

[सूत्र १०५]—अपने ग्रपराधका प्रकाशित करना 'परिभाषा' [ग्रह्ह कहलाता] है । जैसे तापसवत्सराज चरितमें वासवदत्ताके प्रति [राजा उदयन कहते हैं]— "राजा—[रोते हुए] देवि ! क्या कहती हो— सनेहरहित श्रोत्रि निलज्ज, जैसे-तैसे अपने प्रारब्ध धारनेवाले मुभको तुम अपनी ग्रानन्दामृतको वरसानेवाली दृष्टिसे ग्रग्रहण करो ।" ग्रथवा जैसे नलविलासमें नल दमयन्तीके प्रति [कहते हैं]— "मैंने [तुमको वनमें सोता छोड़कर जाते समय] न तुम्हारे प्रेमका मनमें विचार किया श्रोत्रि न सज्जन-पुरुषोंके ग्राचारका । हे देवि ! तुमको वनमें छोड़कर मैंने ग्रत्यन्त निष्ठुरताका कार्य किया था ।" ग्रथवा जैसे रामाभ्युदयमें राम [स्वगत कहते हैं]— "इस [रावण] ने वन्देहोका ग्रपहरण किया था इसलिए युद्धमें नाना प्रकारके क्लेशोंको उठाकर चकस्ते गले काटकर उस रावणको यमराजका दास बना दिया । किन्तु तुम्हारे वियोग में भी जो मैं प्रारब्ध किए रहा इस लज्जाके कारण मैं अपने मलिन मुखको तुम्हारे सामने दिखला नहीं पाता हूँ" इन [तीनों उदाहरणों] में [क्रमशः] वत्सराज, नल श्रोत्रि रामचन्द्र अपने-अपने ग्रपराधों को प्रकाशित करते हैं [इसलिए ये 'परिभाषा' नामक ग्रह्लकका उदाहरणरू] हैं । को मनोरञ्जक होने के कारण इस ग्रह्लककी रचना ग्रावश्य ही करनी चाहिए । कुछ लोग 'ग्रापसमें बातचीतकी परिभाषा' कहते हैं । इसमें भी यही [वत्सराज,

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का० ६४, सू० १०६ ] प्रथमो विवेक: १६३

एके तु 'परिभाषा मिथो जल्प.' इति पठन्ति । स्त्रापीडसेवोदाहृत्यामिति ।१६२।

(५) स्त्यथोपास्ति:-

[सूत्र १०६]—सेवोपास्ति: ।

सेवा पर-ग्र स्तितिहेतुत्व्यो पार: । यथा वेघीसंहारो—

"भीम:- [द्रोपदीमुपुसृत्य] हे देनि पादुचालितनय ! हृष्टया वधंसे मति प्रकट-

ज्योयग ।"

झननेन, भीमेन द्रोपद्या: प्रसादिततवान् पर्युपास्ति: ।

यथा वा रघुविलासे—

"राम: [सविनयं सीतां प्रति]—

हे देविः प्रियप्राप्त-

प्राणान् यदिरहेऽयं विहृतवान् ! प्रियप्राप्ति-

स्तनुं तनत्वयमशेषमेष समय: स्मेराऽक्ति ! नैव ऋधाम ।

सौमित्रे: कुप्भृतु रस्य च मनः प्रीयतै तदेह प्रिये,

हस्तिस्कन्धमत्कुरुष्व नतु ते पूर्ष: प्रतिज्ञावधि: ।"

अत्र रामस्य सीताप्रसत्तिहेतुत्व्योपार: ।

ज्ञानयो तदव्य स्थाने प्रिहिताचारजनितां प्रसत्तिं प्रसादमङ्गमाह: । यथा

तपसवत्सराजे गृहीतपरिचुलालाऽऽदिप्ति रुमएवन्तं यौगन्धरायसं च प्रति—

नल तथा रामचन्द्र तीनोंफी उक्तियाँ] उदाहरणा हैं । ६२३

(६) ग्रथ 'उपास्ति' [नामक नित्यवहार्यसंधिके षष्ठ ग्राद्धका लक्षण ग्रादि कहते हैं]—

[सूत्र १०६]—सेवा [का ही नाम] 'उपास्ति' [उपासना] है ।

सेवा श्यरातन्‌ दूसरेको प्रसन्न करनेवाला व्यापार [उपासना उपास्ति कहलाता है] जैसे

वेघीसंहारामें—

"भीम:- [द्रोपदीक पास जाकर] हे देनि पादुचालितनये ! सौभाग्यसे शत्रुकुलके नाशसे

तुम्हारी वृद्धि हो रही है !"

इसके द्वारा भीमके द्रोपदीको प्रसन्न करनेसे यह पर्युपासन [का उदाहरण] है ।

अथवा जैसे रघुविलासमें—

"राम [विनयपूर्वक सीताके प्रति]—

हे देिव ! तुम्हारे विरहमें भी अपने जीवनका प्रेमी मैं जो प्राण धारण किए रहा उस

सबको क्षमा करो । हे स्मेराऽक्षि ! यह समय क्रोधका नहीं है । लक्ष्मणत ग्रोर इस वानरराज

[सुग्रीव] के मनको प्रसन्न करनेके लिए श्राद्ध्रो हाथोंकी पीठको श्रालिङ्गित करो । तुम्हारो प्रतिज्ञा

की श्रवधि समाप्त हो चुकी है ।"

यहां सीताको प्रसन्न करनेवाला रामका व्यापार है [ग्रतः यह भी 'उपास्ति' नामक

ग्राद्धका उदाहरणा है] ।

ग्रन्थ लोग तो इस [उपासित] के स्थानपर प्रिय तथा हितके किए जानेके कारएा

[होनेवाला मनको] प्रसन्नतता रूप 'प्रसाद' को ग्राद्ध कहते हैं । जैसे तपसवत्सराजमें पादुचाला-

धिप्तिके पकड़ लिए जानेके बाद रुमएवन्तं श्रोर यौगन्धरायणाके प्रति—

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१६४ ] नाट्यदर्पणम् [ काः ६४, सू० ११०

"राजा— साधु सचिवाग्रेसर ! साधु— श्लाघ्या धीरिषड्गणस्य रावणवंशो यतः सुराग्यां पतिः, सर्व वेधयुश्चनो रसातलमहाकालान्धकारे बलिः । इत्यस्मान्नपदच्य वैरिविजयप्राप्तौजसो के वयं, स्तोत्रः स्वयमेव वेतु युवयोलोकस्त्योषान्तरमू ॥"

श्रत्र वत्सराजस्यामात्याभ्यां प्रियहितताचाररताजनिता प्रसत्तिरिति ।

(७) श्रथ इति—

[श्रत्र ११०]—क्षेमम् । लब्धमध्य परिपालनं क्षेमः । यथा रत्नावल्याम— "वासवदत्ता— श्रार्यपुत्र दूरे से श्रादिदुलं । न सुमेरोदित [श्रार्यपुत्र दूरेह्स्या ज्ञातिकुलमू । तं तथा कुर्योः यथा बन्धुजनं न स्मरति । इति संस्कृतम् ।]"

श्रथेन लब्धाया रत्नावल्या: स्थिरीकरणं । श्रथं पुनरस्स्थाने प्राप्यमध्य प्रातिकूल्यशमनं चुतिमाहुः । यथा मुद्राराक्षसे— "नवानकय— श्रामात्य राक्ष ! श्रपोष्यते चन्दनदासस्य जीवितम् ?

राजा— साधु [श्राबाकः] सचिवयोर्मध्ये श्रप्रगण्य साधु [श्राबाकः]— इन्द्रपत्निकों वधू बही इलाघनीया मानी जाती किंतु [वे जिन इन्द्रके मंत्री हैं वह] शुक्राचार्य सब-कुछ जानते हैं इन्द्र [ग्रपने शत्रु] रावणके वशमें फंस गया । [लोग कहते हैं] शुक्राचार्य सब-कुछ जानते हैं किंतु [ वे जिनके मंत्री हैं वह] बलि पातालके महाराज्यमें पड़ा है । इसलिए हमारी श्रपेक्षा के बिना ही बैरी [पातालचालराज] पर विजय प्राप्त कर लेने के कारएा श्रपरिमित पराक्रमशोल श्राप दोनोंकी प्रशंसा करनेवाला मैं कौन होता हूँ, संसार स्वयं हो तुम्हारा श्रौर उन दोनों [श्रर्थात् बृहस्पति तथा शुक्राचार्य] के ग्रंतरको समझले [श्रर्थात् तुम दोनोंकी प्रतिभा बृहस्पति

तथा उशनासे कहीं श्रधिक है इसमें कोई संशय नहीं । इसमें [रमणीयान् तथा योगन्धरायण] दोनों श्रामात्योंके द्वारा किए गए [वैरिविजय तथा सगानिका संयोजन रूप] प्रिय तथा हितके कारएा वत्सराजकी प्रसन्नता [का वयंजन] है [श्रत्रः यह प्रसाद रूप श्रथका उदाहरण है

(७) श्रब 'क्षेम' [नामक निर्वहणसंधिको सशक श्रथंक लकर श्रादि कहते हैं]—

[श्रत्र ११०]—क्षेमोति क्षेमो कहलाते हैं । प्राप्तकी रक्षा करना 'क्षेम' [कहलाता] है । जैसे रत्नावलीमें— "वासवदत्ता— श्रार्यपुत्र ! इस [लागरिक] के घरके लोग [माता-पिता] बहुत दूर रहते हैं । इसलिए श्राप ऐसा यत्न करें जिससे इसको बन्धुजनोंकी याद न श्रावे ।"

हैं । इसलिए श्राप ऐसा यत्न करें जिससे इसको बन्धुजनोंकी याद न श्रावे । इस [कथन] से प्राप्त रत्नावलीको स्थिर किया जा रहा है । [श्रत्रः यह लब्ध-परि- पालन रूप 'क्षेम' का उदाहरण है ।]

श्रन्य लोग तो इस [लब्ध-परिपालन रूप क्षेम] के स्थानपर प्राप्तके प्रतिकूलताके शमन रूप क्षुतिको [श्रथं] मानते हैं । जैसे मुद्राराक्षसमें— "नवानकय— श्रामात्य राक्षस ! क्या श्राप चन्दनदासके जीवन [की रक्षा] को चाहते हैं ?

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का० ६४, सू० ११० ] प्रथमो विवेक: [ १८४

राक्षस:—भो विष्णुगुप्त ! कुतः सन्देहः । चाणक्य:—अ्रग्रहीतशस्त्रेण भवता नानुग्रह्यते वृषल इत्यतः सून्रदेहः । तथ्यद् सत्यमेव चन्दनदासस्य जीवितमध्यते गृद्यतामिदं शास्त्रम् ।

राक्षस:—विष्णुगुप्त ! मा मेवम् । श्रयोग्या वयमस्य विशेषतस्व्या गृहीतस्य ग्रहणो ।

पुनर्वद्ु पुनः प्रशस्यं राक्षसं चाणक्य च्राह—

चाणक्य:—किमनेन ? भवतः शास्त्रप्रग्रहणमन्यतरेषा न चन्दनदासस्य जीवित-मस्ति ।

राक्षस:—नमः सर्वैकान्तप्रतिपत्तिहेतवे सुहृदनेहाय । न का मातिः । एप गृद्यामि ।"

एतल्लब्ध्वस्य राक्षसस्य सचिव्यप्रग्रहणवामताप्रशमनाद् यु तिः । व्यपरें तु क्रोधादेः प्राप्तस्य शमनं युतिसामन्नति । यथा वैसीसंहारे—

"भीमसेन:—राजपुत्र ! श्रल्लं मामवलोक्य त्रासेन— कृष्ण येनासि राज्ञां सदसि नृपशुना तेन दुःशासनेः । स्यान्न्येनाति तम्य स्रु शम् करयोः पीतशेषायसृजिझ ।

राक्षस:—हे विष्णुगुप्त ! [इसमें] क्या संदेह है ? चाणक्य:—शास्त्रको [मंत्रिपद को] ग्रहण करके प्राप्त वृषल [चन्द्रगुप्त] को ग्र्रगृहीत नहीं कर रहे हैं इसलिए संदेह है । इसलिए यदि सचमुच हो चन्दनदासके जीवनको [बचाना] चाहते हैं तो इस शास्त्र [मंत्रिपद] को स्वीकार करो ।

राक्षस:—हे विष्णुगुप्त ! नन, ऐसी बात मत करो । हम इसके योग्य नहीं हैं । और विशेषकर तुम्हारे द्वारा ग्रहण किए [शास्त्र या मंत्रिपद] के ग्रहणमें [हम बिलकुल ही प्रयोग्य हैं] ।

फिर ग्रनेक प्रकारसे राक्षसकी ग्रत्यन्त प्रशंसा करके चाणक्य कहता है—चारणक्य:—इस सबसे क्या लाभ ? [सीधी-सी बात यह कि] तुम्हारे शास्त्र ग्रहण [मंत्रिपदको स्वीकार] किए बिना चन्दनदासका जीवन नहीं [बच सकता] है ।

राक्षस:—[मित्रकी रक्षाके लिये ग्रहित कार्य भी स्वीकार करना पड़ता है इसलिए] सब कार्योंको स्वीकार करनेके हेतुभूत मित्र-स्नेहको नमस्कार है । और कोई मार्ग नहीं है । इसलिए इस [मंत्रिपद] को स्वीकार करता हूँ ।

यह प्राप्त हुए राक्षसके सचिव पदके स्वीकार करनमें विरोधका शमन है इसलिए च्युतिनामक ग्रंगका उदाहरण है ।

ग्रनन्य लोग तो प्राप्त होनेवाले क्रोध ग्रादिके शमनको 'च्युति' कहते हैं जैसे वैसीसंहारमें—

"भीमसेन:—हे देवी ! मुग्धको देखकर डरो मत । जिस नरपशु दुःशासनने राजाग्रोंकी सभाके बीच तुम्हको [बाल पकड़कर] खींचा था, उसके; पौनेसे बचे हुए ग्रौर हाथोंमें जमे हुए इस रक्तको छुड़कर देखो ! और हे प्रिये ! मेरी गदासे जिसकी जंघाएँ तोड़ डाली गई हैं उस प्रकारके कौरवोंके राजा [दुर्योधन] के

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[ का० ६४, सू० १११

कान्ते राज्ञः कुरुप्रेमतिसरसमिद्धं मद्गुरदाचूषितोरोः,

क्षत्रत्र भीमेन द्रौप्याचः क्रोधोपशमः ।

“कान्ते राज्ञः कुुरुप्रेमतिसरसमिद्धं मद्गुरदाचूषितोरोः,

क्षत्रत्र भीमेन द्रौप्याचः क्रोधोपशमः ।

तथा रत्नावल्याम—

“देव श्रृणुताम् । इयं सिंहलेश्वरदुहिता सिद्धनेनादिष्टा । यौडस्या: पाणिं

ग्रह्हिष्यति स वह्नौसो राजा भविष्यति ।” इत्यादेरार्ष—

प्रहर्ष्यति न स वचनेन राजा भविष्यति ।” इत्यादेरार्ष—

परिज्ञातया: स्वभर्तिन्या: समर्पित करषीये देवो प्रसादयम् ।” इति यौवतू ।

अत्रेन स्वाजन्यावगमान् वासवदत्ता: सारिकां प्रति ईर्ष्याकोपष्य

शमनरमति ।

(६) श्रानन्दः—[क्षत्र १११]—श्रानन्दो वाच्छित्तागमः ।

प्रकारश्तेर्वाच्छिततम्यार्थस्य समास्येन श्रागमः प्राप्तिः, श्रानन्दहेतुत्वात्

श्रानन्दः ।

तथा रत्नावल्याम—

“वासवदत्ता-[राजा जानमुपेत्य] श्रडजूत्त पदिच्छल एतं ।

श्रार्यपुत्र ! प्रतीच्छताम् । इति संस्कृतम् ।”

राजा-[हम्ति प्रसाद्य] को दृष्ट्या: प्रसादं न बहु मन्यते ?

विदूषकः—हो ही भो जायदु भवं । सां पुहवी हत्थे भूद श्येव पिय-

विलकुल ताजे रक्खो मैंने श्रपने प्रत्येक श्रंगमें मला हुग्रा है उससे तुम्हारे श्रपमानसे जन्य ताप

की शान्ति होगी ।

इसमें भीम द्वारा द्रौपदीके क्रोधका शमन है [श्रानन्द श्रुतिका उदाहरण है] ।

ग्रौर रत्नावलीमें—

“हे देव ! सुनिए । इस सिंहलेश्वरकी पुत्रीके विषयमें सिद्धने कहा था कि जो कोई

इसका पाणिग्रहण करेगा वह सार्वभौम राजा बनेगा ।” यहाँसे लेकर—

“निब्नब पहिचानी हुई श्रपनी बहिनके विषयमें क्या करना चाहिए । इस विषय में श्राप

हो प्रमाण है ।” यहाँ तक

इस [प्रसंग] से [रत्नावलीका] श्रपनी बहिन जानकर सारिकाके प्रति वासवदत्ताकी

ईर्ष्या तथा क्रोधका शमन पाया जाता है [इसलिए यह श्रुतिका उदाहरण है] ।

(७) श्रृङ्गार [नामक निर्वहणासंधिके श्रष्ट श्रृङ्गका लक्षण श्रादि करते हैं]—

[सूत्र १११]—वाच्छित श्रर्थकी प्रापि ‘श्रानन्द’ [नामक श्रृङ्ग कहलाता] है ।

सैकड़ों प्रकारोंसे वाच्छित श्रर्थात् चाहे हुए सम्पूर्ण रूपसे श्रागम श्रर्थात् प्रापि

संकड़ों प्रकारोंसे वाच्छित श्रर्थात् चाहे हुए सम्पूर्ण रूपसे श्रागम श्रर्थात् प्रापि

ग्रानन्दका कारण होनेसे 'ग्रानन्द' कहलाता] है । जैसे रत्नावलीमें—

“वासवदत्ता-[राजाके पास जाकर] श्रार्यपुत्र ! इस [रत्नावली] को प्रहरण कीजिए ।

राजा-[हाथ फलाकर] देवोके प्रसादका कौन श्रादर नहीं करता है ? [इसलिए मैं

देवोका प्रसाद समभकर रत्नावलीको स्वीकार करता हूँ] ।

विदूषक—ही-ही श्रपकी विजय हो [ज्योतिषियोंके कथनके श्रनुसार रत्नावली

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का० ६४, सू० ११२-११३ ] प्रथโม विवेक: [ १६७

वयस्सस्स इति ।

[ही ही भो । जयतु भवान् नतु पृथिवीदानीं हस्ते भूतैव प्रियवयस्य । इति संस्कृतम् । ]"

(५) ग्रथ समय:-

[सूत्र ११२]—समयो दुःखनिर्वासः ।

दु:खनिवृत्तिमयुक्तः काल: समयः । यथा मुच्छकटिकां चारुदत्तं, पालकस्य राज्यं श्राज्ञया बध्यतं चैन चाडालगोचरगतं, तद्रूपापराराज्यस्य श्रायिकस्याज्ञया श्रार्वालिक श्राह—

"शार्वालिक:- श्रपयात श्रपयात जाल्मः। [हस्ते वा सहरुणम्] ध्रियते चारुदत्तः सह वसन्तसेनया । सम्पूर्णः: खलवसन्तः स्वामिनो मनोरथा: । दिष्ट्या भो ! व्यसनमहाग्र्यावादगाध- दुत्तीर्यो गुणप्रवृत्तया सुशीलवत्या । t्वामेव प्रियतमया युतं समीचै, ड्योतनाल्हं' शशिनमिवोपरागमुक्तम् ।"

ग्रत्र चारुदत्तस्य दु:खापगम इति ।

(१०) ग्रथ परिगृहनम्—

[सूत्र ११३]—ग्रदृष्टतासः: परिगृहनम् ॥६४॥

का परिग्रहण कर लेनेके कारण] ग्रब समझो कि सारी पृथिवी ही प्रिय वयस्यके हाथमें ग्रा गई ।

इसमें सागरिका रूप वाच्छित प्रार्थकी प्राप्ति हो जानसे राजाको प्राप्तयं ग्रानन्द हुग्रा । इस प्रकार यह ग्रानन्द नामक ग्रंगका उदाहरण है ।

(५) ग्रब 'समय' [नामक निर्वहरणसंधिके नवम ग्रंगका लक्षण ग्रादि करते हैं]—

[सूत्र ११२]—दु:ख [के दिनों] का निकल जाना 'समय' [कहलाता] है ।

दु:खके निकल जानेबाला काल 'समय' [नामक ग्रंग कहलाता] है । जैसे मुच्छकटिकमें राजा पालककी ग्राज्ञासे वध किए जाने योग्य चारुदत्तके चाण्डालोंके हाथमें पहुंच जानपर [नगरकी हुई राज्यकीतिनमें 'पालक' को हटाकर 'ग्रार्यक' के राजा बन जाने पर] उसी समय राजके ऐश्वर्य [ग्रर्थात् राजसिंहासन को] प्राप्त करनेकेलए 'शार्वालिक' कहता है—

"शार्वालिक- हटो चाण्डालो हटो । [देखकर हृपपूर्वक] सौभाग्यसे वसन्तसेनाके सहित चारुदत्त जीवित हैं । ग्रब हमारे स्वामिके सब मनोरथ पूरे हो गए । सौभाग्यवश गुणों से परिपूर्ण तथा सुंदर शील स्वभाववाली [ग्रपनो प्रियतमा वसंत- सेना] के सहित [ग्रार्थ चारुदत्त] ग्रपार दु:खसागरको पार कर चुके हैं ग्रब मैं प्रहारसे मुक्त चंद्रिकायुक्त चंद्रमाके समान तुमको [भी ग्रपनो] प्रियतमासे युक्त देखना चाहता हूं ।"

यहां चारुदत्तके दु:खकी समासि हो जानसे [यह 'समय' ग्रंगका उदाहरण है] ।

(१०) ग्रब 'परिगृहण' [नायक निर्वहरणसंधिके दशम ग्रंगका लक्षण ग्रादि करते हैं] ।

[सूत्र ११३]—ग्रदृष्टतासः प्रार्थकी प्राप्ति 'परिगृहण' [कहलाता] है ।

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विस्मयस्थायिभावात्मकस्य श्रृङ्गारतरङ्गस्य प्रातिपदिकगृहीतनम् । यथा रामाभ्युदये रामेण प्रत्यारब्धयाता सीता डवलतां प्रविश्टा । तदनन्तरं—

नेपथ्ये कलकल:— 'धूमम्रात्रं वितानीकृतमुपरि शिखादोर्भिरहिलताम्रै:, विश्रृङ्ग श्राजिष्णु रत्नं ततमुरसि तथा चर्म चामूरवं च । भूयस्तेज: प्रतानैर्विरहरमलिनतां द्वालिकृतत्रिभाजो, देव्या: श्मश्रुचार्विर्भवति विफलयन् वाच्छिलततान्यनतकस्य ।।'

ततः प्रविशति पटाटोपेण सीतामादाय वह्नि: । सर्वे दष्ट्वा वा ससंभ्रममुस्थाय श्वाश्रयं श्वाश्रयम् । नमो भगवते हुताशनाय इति प्रयामन्त । श्वात्रापितप्रविश्टसीताप्रत्युद्गमनात् श्रृङ्गारप्राप्ति: ।

यथा वा रघुविलासे— "मध्येऽस्मिन् बभूव विश्रतिसुजं रक्तो दशास्यं पुन- स्तन्नू पाताल-मही-त्रिविष्टप्रभांशचकाम दोषिक्रमै: । मर्त्येऽस्तस्य पुनर्नृ स्यातलतया चिच्छेद करठाटवीं, वैराग्यस्य च विस्मयस्य च पदं रामायणं वर्तते ।।" विस्मय जिसका स्थायीभाव है इस प्रकारके श्रृद्गुत रसकी प्राप्ति 'परिग्रुहान्' [कहलाता] है। जैसे रामाभ्युदयम् रामक द्वारा [प्रत्यारब्धयान श्रृद्गुत] श्रृद्गारकार कर दिए जानेके बाद सीता ग्रभिनमें प्रविष्ट हो जाती है । उसके बाद—

"नेपथ्ये कोलाहल [प्रौर उसके साथ निम्न वचन सुनाई देते हैं]— ग्राकाशो चुम्बन करनेवाली द्वालारूप बाहुहस्त्रे: भूमसमूहकी वितान बनाकर, छाती पर चमकते हुए रत्नको तथा मृगचर्मको धारण किए हुए श्वाने तेज:समुदयके द्वारा सीतादेवीके विरहकी मलिनताको दूर करते हुए गोदमें बेठी हुई सीतादेवीकी विरहजन्य मलिनताको दूर करते हुए बह्निदेव कालके मनोरथको विफल करके [सीता सहित] प्रकट हो रहे हैं ।

उसके बाद सीताको लिए हुए, पटाक्षेपसे बह्निदेव प्रविश्ट होते हैं । सब लोग देखकर ग्रादरपूर्वक खड़े होकर—ग्राश्रयं है, ग्राश्रयं है, भगवान् ग्रग्निदेवको नमस्कार है । यह कहकर प्रणाम करते हैं । यहां ग्रग्निमें प्रविश्ट हुई सीताको फिर जीवित हो जानेसे श्रृद्गुत रसकी प्राप्ति है ।

[ ग्रतः यह 'परिग्रुहान्' नामक श्रृङ्गारका उदाहरण है । श्रथवा जैसे रघुविलासम— "वीस भुजाओं ग्रौर दस शिरों वाला राक्षस [रावण] समुद्रके वीचमें था किन्तु उसने भुजाश्रोके बलसे पाताल, पृथिवी ग्रौर स्वर्ग सबको ग्राक्रांत कर लिया था । फिर एक मनुष्यने उसके कन्धोंके समुादय को मृगालके समान [प्रणामास हो] काट डाला । इस प्रकार रामायरण [संसरके बल-वैभव ग्रादि की व्यर्थताको दिखलानेके कारण] वैराग्य ग्रौर विस्मय स्थान है ।" [यहां भी श्रृद्गुत रसका वर्णन होनेसे 'परिग्रुहान्' श्रृङ्गार माना जाता है] ।

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का० ६४, सू० ११३ ] प्रथमो विवेक: [ ११३

पुष्पदूषितके तु निर्नीयवर्जितानि सन्ध्यादीन्यंगानि परिगृहूनान्तानि एकारसिम-न्नेव श्लोके दृश्यन्ते । तथाहि—

“समुद्रदत्त:- स्वप्नोड्य । सेनापति:- न हि ! समुद्रदत्त:- विध्रमो न मनसः ? [१ सन्धिः]

सेनापति:- शान्तम् ! समुद्रदत्त:- तदेषा त्रपा । [२ निरोभः]

सेनापति:- जायात ते । [ ३ प्रथनम् ] समुद्रदत्त:- कथं मज्ञाबालतनया ? [४ परिभाषणम् ]

सेनापति:- पुत्रस्तबायो । समुद्रदत्त:- मृषा । [५ शुति:]

सेनापति:- श्रालम्ब्याय न एष वेत्ति नियतं सम्वन्धमेतद्‌दूगतम् । [६ प्रसादः]

समुद्रदत्त:- केनैतदू घटितं विसन्धि [७ श्रानन्दः]

सेनापति:- विधिना । [८ समयः]

समुद्रदत्त:- [सुतरूपं दृष्ट्वा] सर्वे समायुद्यते । [६ परिगृहणम् ] इति १६४।

पुष्पदूषितकमे तो [निर्वहणसन्धिके श्लोक तक व्रिएत इन दस श्रृङ्गोंमेंसे] एक निरणय को छोड़कर सन्धिसे लेकर परिग्रूहण पर्यन्त [ नौ श्रृङ्ग ] एक ही इलोकमें दिखाई देते हैं। जैसे—

'समुद्रदत्त-क्या यह स्वपन है ? सेनापति - नहीं । समुद्रदत्त—तो क्या मनका भ्रम है ? [यहाँ तक सन्धि नामक प्रथम श्रृङ्ग हुग्रा]

सेनापति - नहीं—नहीं [शान्तम्]। समुद्रदत्त—तो क्या यह लज्जा है ? [यह निरोश नामक द्वितीय श्रृङ्ग हुग्रा]

सेनापति - यह ग्रापकी स्त्री है । [यह प्रथन नामक तृतीय श्रृङ्ग हुग्रा] समुद्रदत्त—तो इसकी गोदमें छोटा बच्चा कैसे है ? [यह परिभाषणा नामक चतुर्थ श्रृङ्ग हुग्रा]

सेनापति - यह ग्रापका पुत्र है। समुद्रदत्त—भूठ ! [यह पांचवां शुति नामक श्रृङ्ग हुग्रा] सेनापति - [इस पुचके] ग्रहण करनेके लिए यह निश्चय ही इसके साथ ग्रपने सम्बन्ध को नहीं जानता है। [यह छठा प्रसाद श्रृङ्ग हुग्रा]

समुद्रदत्त—इस दूटे सम्बन्धको किसने जोड़ दिया ? [यह सातवां श्रानन्द श्रृङ्ग है] सेनानति - देवने । [यह श्राठवां श्रृङ्ग समय हुग्रा] समुद्रदत्त—[पुतकके रूपको देखकर] सब कुछ हो सकता है ।

[यह 'परिग्रूहण' नामक नवम श्रृङ्ग हुग्रा]

इस प्रकार एक ही इलोकमें निर्वहणसन्धिके नौ श्रृङ्गोंका इकट्ठा समावेश इस इलोकमें दिखलाया गया है। इलोकिक रूपमें इस सबविके इसे प्रकार लिखा जायगा—

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(११९) श्रथ भाषणम्

[सूत्र ११४]—भाषणं सामदानोक्तिः ।

साम्नो वचनं ददातश्च वचनम् । ग्राह्यासुपलच्यापरस्वान् प्रियं हितं च गृह्रते ।

'यथा मुचुकुन्दकथ्यमू— ग्राह्यकराज्ञया शार्वलिककथारुदत्तमाह--

त्वचाने यः समररुहि गतरते शरखः पुरा ।

पशुव्रते वितते यत्रे हतस्तेनाच पालकः ॥

चारुदत्तः— शार्वलिक ! कि योडसौ राज्ञा पालकिन घोषादानीय निष्कार्यां कूटागारे वन्धने बद्ध श्यार्यकरनामा त्वया मोचितः?

शार्वलिकः—सत्यम् । सिंहासनाधिरोहे श्रानुष्टतमात्रे च तेन तव सुहृदा राज्ञा श्रायकेप उदञ्जयिन्या च वेलातटे तुम्हयं राज्यमिसृष्टम् । तत् प्रातिमान्यतां प्रथमः सुहृन्-पणयः [ पुनर्वसन्तसेनासाह] श्यार्ये वसन्तसेने ! राजा तवोपरि तुष्टो भवर्त्ती वधूशब्देन अनुगृह्णाति

वसन्तसेना— श्रज्ज सखवलिय कयत्थ म्हि [ श्रार्ये शार्वलिक ! कृतार्थोऽस्मि इति संस्कृतम् ] ।

[पुनः शार्वलिकम्— श्रार्ये ! किमस्य भित्तोः क्रियतां ? स्वप्नोडयं, न हि, विभ्रमो नु मनसः, शान्तं, तदेव तृपा जाय तें, कथमेकबालतनया, पुत्रस्त्वयि, मृपा । ग्राहामि न एप वेत्ति नियतं सम्बन्धमेतदूर्गतं केनतदु घटितं विरसन्ध, विधिना, सर्वे समुदयुज्यते ॥१८४॥

(११) ग्रब भाषण [नामक निर्वहणांशदिके ग्यारहवें श्रङ्गका लक्षण ग्रादि करते हैं]—

[सूत्र ११४] साम-दानके वचन 'भाषण' [कहलाते] हैं ।

सामका वचन श्रौर देते हुए [दान] का वचन [भाषणा कहलाता है] । इनके उप-लक्षणमात्र होनसे इनसे प्रिय तथा हित [वचनका ग्रहण होता है] । जैसे मुचुकुन्दकथिकमें ग्राह्यंक राजाकी श्रान्तसे शार्वलिक चारुदत्तसे कहता है —

"जो तुम्हारे रथपर चढकर [राजा बननेसे पहले छिपनेके लिए] तुम्हारी शररमें ग्राह्यो था उस [ग्राह्यिक] [पहिल राजा] पालकको दृष्टृत दर्शन पथुके समागम मार डाला ।

चारुदत्त— शार्वलिक ! क्या जिसको राजा पालकने ग्रह्हीरोकी बस्ती से लाकर बिना कारण ही तहखानेमें कैद कर दिया था उस ग्राह्यिकको तुमने छुड़ दिया ।

शार्वलिक—हाँ [ठीक है] । श्रौर सिंहासन पर बैठनेके साथ हो तुम्हारे उस मित्र राजा श्रार्यकरने उदञ्जयिनोंमें वेलाके किनारे तुम्हें राज्य प्रदान किया है । इसलिए मित्रकी इस प्रथम इच्छाको स्वीकार करो ।

[फिर वसन्तसेनसे कहता है] श्रार्ये वसन्तसेने ! राजा तुम्हारे ऊपर प्रसन्न होकर तुमको वधू पद [श्रथर्थात चारुदत्तकी वधू पद] से सम्बोधित करते हैं ।

वासवदत्ता—ग्रार्य शार्वलिक ! मैं धनुग्रुहीत हूँ ।

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का० ६४, सू० ११४ ] प्रथमो विवेक: [ १६१

चारुदत्तः--भिक्षो ! किं तक बहुमतम् ? भिक्षु:--व्यतिचचतयां पेक्खिय पचवजा बहुमायो संवुत्ते । [ग्रनिस्सयन्च प्रदेयं प्रत्नयद्यावहुमानः संवृत्तः] । चारुदत्तः--सखे दृढ़ोऽस्य निश्चयः । ततः पृथिव्यां सर्वविहारेऽपि कुलपतिः क्रियताम् ।

शार्वलिकः--एवमेतत् । चारुदत्तः--प्रियं नः । वसन्तसेना--संपदं जीवद् भिक्षु । [साम्प्रतं जीवतास्मिन् । इति संस्कृतम्] । शार्वलिकः--स्थावरकस्य किं क्रियताम् ? चारुदत्तः--मुहुर्योड्यमदासोडस्तु । शार्वलिकः--एवं, यथा श्रायह श्रायः: " श्वात्र साम्ना दानेन शनैरैश्च प्रियाहेतैरेकितः । शनयोः पृथग्भ्युक्तिनिबन्ध्यते । इदृश्यझ्भमवश्यं निवन्धनीयैरमति ।

(१२) यथ् पूर्वभाव:-- [श्लोक ११३]--प्रभावः क्रियदर्शनम् ।

यथा रत्नावल्याम्-- "योगनवरायाए--एवं विह्नाय भगिन्या: समप्रति करणीये देवी प्रमाखं । [शार्वलिक]--[फिर चारुदत्तसे कहता है] श्रायं ! इस भिक्षुका क्या किया जाय ? चारुदत्त--हे भिक्षो ! कहिए श्राप क्या चाहते हैं ? भिक्षु--[संस्कारको] ग्रनिस्सयताको देखकर मुझे वैराग्य हो गया है । चारुदत्त--हे मित्र ! इसका यह निश्चय हढ़ है । इसलिए पृथिवीके सब विहारोंका इनको कुलपति बना दो ।

शार्वलिक--यह ठीक है ऐसा ही होगा । चारुदत्त--यही हमें प्रिय है । वसन्तसेना--ग्राप नोचित हुई [श्राप मेरी जानमें जान आई] । शार्वलिकः--स्थावरकका क्या किया जाय ? चारुदत्त--इस उत्तम सेवकको दासतासे मुक्त कर दो । शार्वलिक--जैसा श्रायं कहते हैं वैसा ही होगा ।

इसमें सामसे, दानसे श्रौर श्रन्य प्रकारोंसे प्रिय उत्तियाँ हैं । इन दोनोंका श्रलग-श्रलग कथन भी किया जाता है । इस प्रंगको भी श्रवश्य ही निबद्ध करना चाहिए । (१२) श्राब 'पूर्वभाव' [नामक निवन्धरासंधके बारहवें श्रध्यायके लक्षण श्रादि करते हैं]-- [सूत्र ११४]--कार्य [ग्रर्थात् मुख्य फल] का दर्शन [करना या कराना] प्रभाव

[या पूर्वंभाव कहलाता] है । जैसे रतनावली में-- "योगन्धरायण--इस सबको जानकर श्राब श्रपनी बहिनकेलिये क्या करना चाहिए इसमें श्राप ही प्रमाण हैं ।

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१६२ ] नाट्यदर्पणम् [ का० ६४, सू० ११४

वासवदत्ता—फुङ् ड रयेव कित्न भस्मासि पडिवाहेदि से रयणामालं ति । [स्कुटमेव किन्त भस्मसि प्रतिपादयस्मै रत्नावलीरिति । इति संस्कृतम् ।]"

क्षत्र 'वस्सराजाय रत्नावली दीयताम्' इति कार्यस्य योगन्धरायणाभत् तया-तुपविष्टस्य वासवदत्तया दर्शनम् ।

यथा वा यादावाभ्युदये—तलुरुङ्घट्टर:—देव ! कुरुष्वाड् भारतार्थचक्रवर्ती नरयो तवाहुदेव इति सुन्तः श्'सन्ति ।

समुद्रविजय:—जाने भारतार्थराज्ये कुष्णार्मभिपेक्तुं मामुत्साह्यति महाराज:।

युधिष्ठिर:—एतदेव देवस्य जरासन्धवधगयासफलम् ।" इति ।

क्षत्र युधिष्ठिराभिमतं कुष्णाराज्याभिषेककार्यं समुद्रविजयेन दर्शितम् ।

मुखसन्ध्याच्च वाक्यस्य सदृशवाक्यदर्शनम् पूर्ववाक्यं श्रृङ्गमस्य स्थाने केचिद्-

दामनन्वित

स मुद्राराजचसे—

"चाणक्य: [पुरुष प्रति]—इदं च वक्तव्यो विजयो दुर्गपालः । ग्रामात्यराज्ञस्-

दर्शनप्रीतो देवश्‍चन्द्रगुप्तः समाश्वपति, विना हस्तिभ्यः क्रियतां सर्वबन्धनमोक्ष इति ।

स्वथवा ग्रामात्यराज्ञसे नेतारि किं हस्तिभिः प्रयोजनम् ?

वासवदत्ता—स्पष्ट रूपसे क्यों नहीं कहतें हो कि रत्नावली इन [उदयन] को दे दो ।" यहाँ योगन्धरायणके प्रभिप्रायके भीतर श्रानुप्रविष्ट 'रत्नावलीको वत्सराजको दे दो' इस [मुख्य] कार्यका वासवदत्ताके द्वारा वर्णन है [यथा: यह पूर्वभावका उदाहरण है] ।

यथा यादावाभ्युदयमें—

"युधिष्ठिर—देव ! मुनि लोग कहते हैं कि वसुदेवके नवम पुत्र यह कुष्ण भारतके

ग्रामे भागके चक्रवर्ती राजा होंगे

समुद्रविजय—जान पडता है कि कुष्णाको ग्रामे भारतके राज्यपर ग्रभविषक्त करनेके

लिए महाराज मुखको उत्साहित कर रहे हैं

युधिष्ठिर—यही आपके जरासन्धके वध करानेके प्रयासका फल है ।"

यहाँ युधिष्ठिरके प्रभिमत कुष्णके राज्याभिषक कार्यको समुद्रविजयने दिखलाया है

[इसलिए यह पूर्वभाव ग्रङ्क्का उदाहरण है]

कुछ लोग इस [पूर्वभाव ग्रङ्क] के स्थानपर मुखसन्धि ग्रादिमें कहे गए वाक्यके [पुनः] दर्शन ग्रङ्कको मानते हैं ।

यथा मुद्राराक्षसमें—

"चाणक्य—[पुरुषके प्रति] ग्रौर दुर्गपाल विजयसे यह भी कहो कि ग्रामात्य राक्षसके

दर्शनसे प्रसन्न हुए देव चन्द्रगुप्तः प्राज्ञा देते हैं कि हस्तियोंको छोडकर शेष सभी बन्धन वालों

को मुक्त कर दो । प्रयवा ग्रामात्य राक्षसके नेता हो जाने पर प्रभु हस्तियोंको भी क्या ग्राव-

श्यकता है?

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का० ६४, सू० ११४ ] प्रथमो विवेक: [ १६३

विना वाहनपोताश्र्यां मुख्यतां सर्वबन्धनम्‌ । पूर्णेऽप्रतिज्ञेन मया केवलं बध्यते शिखा ॥

अत्र मुख्ये यदुपचिन्त्यम्‌—'बध्य:' को नेच्छति शिखां मे' इति तदेव भङ्गचन्तरेपा उपन्यास्यतामति ।

उद्रेशोक्तसंभार: संज्ञान्तरेऽपि यल्लक्षणविधानं सर्वत्र तच्छ्रुत्वादोतुरोधाद्रिति । (१३) ग्रथ काव्यसंहार:-

[सूत्र ११४]—वरिच्छा काव्यसंहार: । ईदृशतं दातुममिलापो वरेच्छा । तदुज्जानतो 'भूय: किमे ते प्रियमुपकरोम'

इति प्रशन इत्थ्ये: । स च ग्रहोत्करी ज्यप्रतीच्छति, प्रतीच्छति च सम्पादयितुर्भूयसीमिच्छां दर्शयितु' निवध्यते । तत्र सति सर्वस्मिन्नेवेष्टे सम्पन्ने प्रस्तुतं काव्यमेव संहियते इति 'काव्यसंहार:'।

यथा 'कृत्यारावण्ये' सीतारकण्ये रामस्य प्रिये हिते च महति कर्मणि कृते डपि ग्रन्थनुत्थान ग्रन्थिराह—

वाइन तथा पोत [जहाज] को छोड़कर ग्रन्थ सबके बन्धनोंको खोल दिया जाय । प्रतिज्ञापूर्व हो जानेके कारण केवल मैं ग्रब अपनी चोटी को बाँधता हूँ ।

इसमें मुखसंदर्भ में जो यह जो कहा था कि 'बधंके योग्य कौन व्यक्ति मेरी शिक्षाको बन्धने नहीं देना चाहता है' उसको प्रकारान्तरसे फिर कहा गया है [इसलिए यह पूर्ववाक्य रूप प्राक्का उदाहरण है]।

निर्बंधाग-संधिके चौदह श्रृङ्गोके नाम गिनाते समय पूर्वभाव नामसे वारहवें श्रृङ्गका निर्देश किया गया था । 'प्रागभाव' नामके किसी श्रृङ्गका उल्लेख उद्देश्य-कारिकाओंमें नहीं किया गया था ।

किन्तु यहाँ लक्षण करते समय 'पूर्वभाव' का लक्षण करके 'प्रागभाव' का लक्षण किया गया है । यह 'प्रागभाव' 'पूर्वभाव' का ही दूसरा न.म. है । इलोकोमे 'पूर्वभाव' शब्दका प्रयोग छंदकी दृष्टि से ठीक नहीं बैठता था इसलिए ग्रन्थकारने उनके स्थानपर 'प्रागभाव' शब्दका प्रयोग कर दिया है ।

इसी बातको ग्रन्थकार ग्रहलो पंकितमें लिखते हैं—'उद्देश [काल] की संज्ञाको छोड़कर ग्रन्थ नामस लक्षणको कथन करना उचित छंदक ग्रन्थरोगसे किया गया है ।

(१३) ग्रंथ 'काव्यसंहार' नामक निर्बंधाग-संधिके तेरहवें श्रृङ्खका लक्षण ग्रादि कहते हैं]—

[सूत्र ११४] वर [प्रदान करने] की इच्छा काव्यका उपसंहार [कहलाता] है । प्रभिष्ट वरको प्रदान करनेका प्रभिलाष वरेच्छा [कहलाता] है ।

उससे उत्पन्न 'तुम्हारा ग्रोर कौनसा प्रिय कार्य करूं' इस प्रकारका प्रश्न [काव्यसंहार कहलाता है] । यह ग्राभिप्राय है कि वह (१) ग्रहीताके द्वारा प्रहण करनेपर ग्रोर (२) अथवा स्वीकार करने पर देनेवालेकी ग्रोर श्रधिक इच्छाको दिखलानेके लिए [दो कारिकाओंसे] निवद्ध किया जाता है ।

उस [वर प्रदानके] होनेके बाद समस्त कामनाओंके पूर्ए हो जानेसे कार्य ही समाप्त हो जाता है इसलिए [इसको] 'काव्यसंहार' [कहा जाता] है ।

जैसे कृत्यारावण्ये रामक प्रिय तथा हित सीतारकण्य रूप महान्‌ कार्यके कर चुकनेपर

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"दुष्यन्तः—वत्स ! उच्चयतां कि ते भूयः प्रियमुपकरोमि ? रामः—भगवन् ! श्रुतः परमपि प्रियमस्ति ? इति ।" "दुष्यन्तः—देव ! हृद्मत्परं प्राध्यंते यदूनाम् ? समुद्रविजयः—[ साश्चर्यम् ] किमतः परमपि प्रार्थनीयमस्ति ? त्रातो घोषसुतां विश्वस्य मधुजित्, कंसः न्रियं लब्भतः, सम्प्रत्येव [ विनीतमत् ] मगधोभूमितु : कतस्य वधः । पादाक्रान्तमजायतार्धभर्त्त तं बूभि नः किं परं ? श्रेयोऽस्मादपि पारडवेश ! पुत्ररत्न्याशास्महे यद्र्रयम् ।"

श्रेयोरप्रतिगृहीतेे वरे काव्यसंहारः तथा इन्दुलेखायां नाटिकायां राज्ञी नायिकामिन्दुलेखामाह— "इदिस्सीए तुह इमाए कुलजुसरिस्सीए सीलसंपत्तीए समुहीकदंस मे हिद- यस्स उववन्नो झ्शेव समुच्चिदाए पडिवच्तीए श्रियमवसरो, ता मम झ्शेव प्पियं करिती वरसु जं ते समी हिदं ।" [इहश्या तवानया कुलानुरहश्या शीलसम्पत्त्या समुचीकृतस्य मे हृदयस्य उपपन्न एव समुचितया प्रतिपत्त्या श्रियमवसरस्तत् ममैव प्रियं कुर्व्वन्ती वृद्धिम् यन्‍ ते समीहितम् इति संस्कृतम् ।]

नाटिका—इदिस्सस्स देवीपासायस्स न दाव श्राध्यायं सरिस्सं कि पि भविस्सद, जं वरइस्सं । तथा वि को देवीए पासादायं पडज्जतकामो ? ता पियदंसणस्सं मे पसादीकरेदु देवी। भी संतुष्ट न होकर [रामसे] कहता है— "श्रमिन्—वत्स ! कहो तुम्हारा ग्रौर क्या प्रिय करूं ? रामः—भगवन् ! क्या इससे भी श्राधिक प्रिय हो सकता है ?" [यह वरको स्वीकार करनेके रूपमें 'काव्यसंहार'की रचना की गई है।]

श्रथवा जैसे यादवांशयुदयमें— "दुष्यन्तः—देव ! यदुवंशियोंकेलिये इससे श्राधिक ग्रौर क्या चाहते हैं ? समुद्रविजय—[ग्राश्चर्यसहित] क्या इससे भी श्राधिक प्रार्थनीय हो सकता है ? ग्रहकारिक यहाँ रखकर कुशको रक्षा कर लो, कल्स्को नाश कर दिया । श्रौर भामा मगधराज [जरासंध] के शिरोर्को [सिर काटकर] कबंध बना दिया, श्राधा भारत देश ग्रापने ग्राधीन हो गया, तो हे पाण्डव राज ! बतलाइए कि इससे श्राधिक ग्रौर क्या कल्याण हो सकता है जिसकी हम कामना करें ?" इन दोनों [उदाहरणों] में वरके स्वीकार न करनेमें 'काव्यसंहार' हु्रा हैं ।

ग्रोर इन्दुलेखा नाटिकामें रानी नायिका इन्दुलेखासे कहती है— "राणी—तुम्हारी ग्रपने कुलके श्रनुरूप इस प्रकारकी शील-सम्पत्तिसे प्रसन्न हुये मेरे हृदयमें उपयुक्त विरवाससे यह ग्रवसर प्राप्त हु्रा है इसलिए मेरे हो प्रिय कयंको करती हुई जो तुम्हारी इच्छा हो वह वर मांग लो ।

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का० ६५, सू० ११५ ]

प्रथमो विवेक: १६५

[ईदृशस्य देवीप्रसादस्य न तावदधिकं सदृशं किमपि भवेत्यत: यदृशास्याम् | तथापि को दृष्ट्या: प्रसादानां पर्याप्तकाम:? तत् प्रियदर्शनै मे प्रसादीकरोतु देवी | इति संस्कृतम् ]।

राणी—वाढं पडिवादिदा।

[वाढ प्रतिपादिता। इति संस्कृतम् ]।

नायिका—महतं पसादो। [ स्वर्गतं। ] संपद परमज्जियं मुजेसंभवं पिथ-दंसणाए इच्छा-गुरुव-नेहुर्स्स झगुसरिस्स वयहरिस्सं ।

[महान प्रसाद:। साम्प्रतं प्रमाद्यं मुजिज्यभावं प्रियदर्शनाया इच्छा-गौरव-स्नेहस्यानुसहर्शां व्यवहरिष्ये। इति संस्कृतम् ]।

छात्र वरस्य प्रतिग्रहः। इति ।

इदमझसवस्सयं निवन्वननीयरं प्रशस्तिनान्तरीयकत्वादिति ।

(१४) ग्रथ प्रशस्ति:—

[सूत्र ११६]—प्रशस्तिः: शुभशंसना ॥ ६५ ॥

जगतः कल्याणशंसना प्रशस्तिः। तच्च नायकस्तदन्यो वा पठित । यथा क्रत्यारावण्णे—

"राम:—तथापिदंबहु—सम सम्पूर्णाश्चिन्तितार्थो मनोरथ:। यथार्यं सम म सम्पूर्णाश्चिन्तितार्थो मनोरथ:। एवमऋ्यातो रज्ञ: सर्व्वपापै: प्रमुच्यताम् ॥

ग्रपि च—

नायिका—इस प्रकारके देवीके प्रसादसे अधिक ग्रौर कुछ नहीं हो सकता है जिसका मैं वर माग करू । फिर भी देवीके प्रसादसे किसको तृप्ति होती है इसलिए [मैं यह वर माँगती हूँ कि] देवी प्रियदर्शनाको मुझे प्रसाद रुपमें प्रदान करें ।

रानी—व्रच्छा दे दी ।

नायिका—बड़ी कृपा है । [ अपने मनमें ] ग्रब प्रियदर्शनाके दासीभावको दूर करके [ उसके साथ उसकी ] इच्छा, गौरव ग्रौर स्नेहके ग्रनुरुप [इसके साथ ] व्यवहार करूँगी ।"

इसमें वरको स्वीकार किया गया है ।

इस [काव्यसंहार रुप ] ग्रंझको [ग्रागले] प्रशस्ति [नामक ग्रंझ] से ग्रविनाभूत होनेके कारण ग्रंझइय ग्रथित करना चाहिए ।

(१४) ग्रब ‘प्रशस्ति’ [नामक निवन्धुसंधिके चौदहवें ग्रंझकका लक्षण ग्रावि करते हैं ]—

[सूत्र ११६]—कल्याणकी कामना प्रशस्ति [कहलाती] है ।

संसारके कल्याणकी कामना ‘प्रशस्ति’ [कहलाती] है । उसको नायक ग्रथवा कोई ग्रन्य [पात्र] पढ़ता है । जैसे क्रत्यारावण्णे—

"राम—फिर भी यह हो कि—

जिस प्रकार विचारित प्रयथके विषयमें मेरा यह मनोरथ पूर्ण हुग्रा इसी प्रकार [नाट्यावलोकनार्थ] ग्राए हुए सब सामाजिक सब प्रकारके दुःखों [पापों] से मुक्त हो जावे ।

ग्रौर भी—

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१९६ ] नाट्यदर्पण् [ का�० ६४, सू० १९६

निरीतय: प्रजा: सन्तु सन्त: सन्तु चिरायुुष: ।

प्रथन्तां कवय: काड्यै: सम्यङ् नन्दन्तु मातर: ।"

यथा वा यादवाभ्युदये—

"मुधिष्ठिर:- तथापि किमर्थं ब्रुमो वयम्—

कल्याणं भूयुय: स्वः प्रसरतु, विपदा: प्रथ्यर्य यान्तु सर्वा:,

सन्त: श्लाघां भजन्तामपचयमयतां दुर्मतिदुर्जनानाम् ।

धर्मे: पुष्टिंयातु वृद्धिं सकलयदुमन: कैरववा रामचन्द्र:,

प्राप्य स्वातन्त्र्यलदमीं मुदमथ वहुतां शाश्वतीं यादवेन्द्र: ॥"

इत्यं चावश्यं निवन्धनीया तथा इति वृत्तान्तमूता तेयेम् । तेनास्या: पृथग्-

गणने चतुःपष्ट्रप्रपि श्राङ्खसंख्या भवति

सन्धि-निरोध-प्रथन—पूर्वभाव—काव्यसंहार—प्रशस्तितम्योडन्यैर्यांगानां शेष-

सन्धिष्वपि कार्यवशतो निवन्ध्य: श्रृङ्गारपि च स्वेच्छया निवेश: । एतासनि निर्वहण-

सन्चेशरुतदशाझ्ञाति

सर्वसन्धीनां चांगानि इतिवृत्ताविच्छेदार्थमुपादीयन्ते । इतिवृत्तस्याविच्छेदेश्र

रसपुष्ट-्यर्थे: विच्छेदे हि स्थायिरादेशृङ्गाटतलवान् कुतस्त्यो रसास्वाद: ? ततो रस-

विधानैकताचेतस: कवे: प्रयत्नान्तरानपेक्षं यदंगमुख्यं भवते, तदेवोपनिबद्धं सहृदयानां

प्रजागरे [प्रतिवस्तिरत्नावृष्टि:] मूषकाः शलभाः शुको: । प्रत्यासन्नोइच राजान: वडवा

ईतय: स्मृतित: । इन छ: प्रकार को] इयितोसे रहित हो, सज्जन लोग चिरायु हों और कवि-

गरोंके कार्योंकी अभिवृद्धि हो, तथा माताएं पूरांगुरूपसे ग्रानन्दित हों । [यह जगत्की कल्यारा

कामना प्रस्तुत कहलाती है ]"

ग्रथवा जैसे यादवाभ्युदयमें—

"मुधिष्ठिर-फिर भी हम कुछ कहते हैं कि—

भू: भुव: स्वः [सब लोकोंमें] कल्यारााका प्रसार हो, सारी विपत्तियोंका विनाश हो,

सज्जन पुरवोकी प्रखंसा हो, ग्रौर दुर्जनोकी दुर्मति का हास हो, धर्म वृद्धिको प्राप्त हो, सब

यादवोंके मनोरुप कंरवोंको ग्राह्लादित करनेवाले चन्द्रके समान यादवेन्र स्वातंत्र्य लक्ष्मीको

प्राप्त कर चिरस्थायी ग्रानन्दको प्राप्त हों ।

इस [प्रशस्ति नामक ग्रद्ध] की रचना प्रवश्य हो, करनी चाहिए । ग्रोर यह कथावस्तु

के ग्रन्थगंत भी होती है इसलिए इसकी गरगाना न करनीपर [ पूर्वोक्त ६५ ग्रद्रोंके स्थानपर

केवल ] ग्रद्रों की संख्या केवल चौंसठ रह जाती है ।

[निर्वहरणसंधिके] १. सन्धि, २. निरोध, ३. प्रयत्न, ४. पूर्वभाव, ५. काव्यसंहार ग्रोर

६. प्रशस्ति, इन [ छ: ग्रद्रोंको छोड़कर ग्रन्थ ग्रद्रोंका कार्यवशने शेष सन्धियोंमें भी प्रयोग हो

सकता है । ग्रोर यहां [प्रथान्त निर्वहरण संधिमें] भी ग्रपनो इच्छानके ग्रनुसार प्रयोग हो सकता

है । ये चारह निर्वहरणसंधिके ग्रद्ध हैं

सभी सन्धियोंके ग्रद्र कथाभागके [प्रविच्छेदके] लिए हो निबद्ध किए जाते हैं । ग्रोर

कथावस्तुका प्रविच्छेद रसकी परिपुष्टि के लिए होता है । [कथावस्तुका] विच्छेद हो जाननेपर

तो स्थायिभाव ग्रादिकका भी विच्छेद हो जानसे रसका ग्रास्वादन कैसे हो सकेगा ? इसलिए

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का० ६४, सू० ११६ ] प्रथमो विवेक: [ ११७

हृदयमानन्दयति । शृङ्गान्ति च स्थायी-भावानुभाव-व्यभिचारिभावापि द्रष्टव्यानि । श्रमीषां च स्वसन्धौ सन्ध्यान्तरे च योगयतया निबन्धः। योग्यतां च रसनिवेशैकव्यवसायिनः प्रबन्धकवयो विद्रन्ति, न पुनः शब्दार्थप्रधानवैचित्र्यमात्रोन्मदृष्टवो मुक्तकवयः ।

तेनैकमध्यं रसपोषकत्वादेकस्मग्रपि मुख्यौ द्वितीयो हि सन्धौ त्रिबन्धने । यथा वेधीसंहारेऽस्फेट-विद्रवौ पुनः-पुनर्दर्शितौ वीर-रौद्ररसावुभयतः। रत्नावल्यां च विलासः पुनः-पुनरुक्तः शृङ्गारमूल्लास्यत । स्वतः परमपि निवन्ध्रन्तु वैरसयमवहतौति ।

तथाङ्गद्रयेन साध्य यदैकनैव सिद्धयति तदेकमेव निबध्यते । यथा श्री-भोमदेवसुतोः वसुनागस्य कृतौ प्रतिमानिरुद्ध परिकरार्थस्य उपचारेपौव गतत्वात् न तत्रिबन्धः।

एवमङ्गत्रयेऽपि । यथा भेदजलविरचिते राधाविप्रलम्भे रासकाङ्के परिकर-परिन्यासयोरुपकल्पेपौव गतत्वात् तत्रिबन्धः। एवं परस्परान्तभावे चतुरझोर्डाप कापि सन्धिर्भवति ।

रसके विधानमें ही सर्वातिशय लगे हुए कविके प्रायः प्रयत्नकी श्रेष्ठताके बिना [स्थाभाविक रूप से] जो श्रद्ध उद्भूत होता है उसकी रचना ही सहृदयोंको ग्रानन्द प्रदान करती है [कृत्रिम रूपसे प्रयत्नपूर्वक सन्निविष्ट श्रद्धोंकी रचना उस प्रकार ग्राह्याददयिनी नहीं होती है]। श्रद्ध स्थायिभाव, भाव, प्रतिभाव, व्यभिचारिभाव श्रादि रूप होते हैं । इनका श्रपनी सन्धिमें [अर्थात् जिस-जिस सन्धिमें उनके नाम गिनाए गए हैं उस-उस सन्धिमें] तथा श्रन्य सन्धियोंमें योग्यताके कारण ही सन्निवेश किया जाता है, श्रोर उनकी योग्यताको केवल रसका सन्निवेश करनेमें तत्पर प्रबन्ध-काव्यके निर्माता कवि ही समभते हैं । केवल शब्द श्रोर श्रथकी रचना-वैचित्र्यसे ही उन्मत्त हो जानेवाले मुक्त [निर्माता] कवि नहीं समभ सकते हैं ।

इसलिए [अर्थात् योग्यता के प्राधान्यपर हो] रसका परिपोषक होनेपर एक ही श्रद्ध एक ही सन्धिमें दो या तीन बार भी निबद्ध किया जाता है । जैसे वेधीसंहारमें सम्प्फेट तथा विद्रव श्रद्धके बार-बार प्रदर्शित किए जाकर वीर तथा रौद्र रसकी पुष्टि कर रहे हैं । श्रोर रत्नावलीमें विलास नामक श्रद्ध बार-बार निबद्ध होकर शृङ्गाररसको परिपुष्ट करता है । इससे श्राधिक [अर्थात् जहाँ तक उससे रसका परिपोष होता है उससे श्राधिक] रखनेपर तो विरसता को प्रकट करनेवाला हो जाता है [इसलिए किसी श्रद्धका श्रत्यधिक सन्निवेश नहीं करना चाहिए]।

[इसके विपरीत] जब वो श्रद्धोंके द्वारा साध्य कार्य एक हो श्रद्धके द्वारा हो सकता हो तब एक होकी रचना की जाती है । जैसे श्री भीमदेवके पुत्र वसुनागकी प्रतिमानिरुद्ध रचनाओंमें [मुखसन्धिके] परिकर [प्रंगके] कार्यकी उपेक्ष [प्रंग] के द्वारा ही सिद्धि हो जाने से उस [परिकर] की श्रलग रचना नहीं की गई है ।

इसी प्रकार तीन श्रंगोंके द्वारा [साध्य कार्य जब एक ही श्रंगके द्वारा सिद्ध हो सकता है तब उस श्रंगके श्रतिरिक्त दो श्रंगोंकी रचना नहीं की जाती है] । जैसे मेङ्जल विरचित राधाविप्रलम्भ नामक रासकाङ्कमें परिकर तथा परिन्यास [इन दो श्रंगों] के उपेक्षेपके द्वारा ही है तब उस श्रंगके श्रतिरिक्त दो श्रंगोंकी रचना नहीं की जाती है ।

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११६ ]

नाट्यदर्पणम्

[ क० ६५, सू० ११६

स्वान्तरे च केचिदेकविंशति सन्ध्यन्तराणि स्मरन्ति—

साम भेदस्तथा दण्डो दानं च वध एव च ।

प्रत्युत्पन्नमतित्वं च गोत्रस्वखलितमेव च ॥

साहसं च भयं चैव भी-माया क्रोध एव च ।

क्रोजः संवररणां आन्तरस्तथा हेत्वधारराम् ॥

दूती लेखस्तथा स्वप्नश्चित्रं मेद इति स्मृतः । इति ॥

एपु च केपांचिन्न सामादीनाॅं स्वयंग्रहरुपत्वात्, केपांनिन्नमत्यादीनां व्याभि-चारिरुपत्वात्, दूत-लेखादीनामित्यादिरुपत्वात्, प्नान्तरेपामुपनेयाद्यनन्तर्भावाच्च न पृथग् लन्ञ्य-प्रयासः । तथाहि गर्भसन्धौ साम-दानादिरुपसंग्रहोऽपि । मत्यादयो व्यग्रन्थ लन्ञ्य-प्रयासः । तथाहि गर्भसन्धौ साम-दानादिरुपसंग्रहोऽपि । मत्यादयो व्यग्रन्थ

लञ्यमिचारिरुपु लञ्यष्यन्ते । दूत-लेखादीनाॅमित्यादिरुपता हृश्यते । तथा उदात्त-राघवे हेत्वधारराम उपक्लेपः । प्रतिमानिरुद्धे स्वपन्रुपः । रामाभ्युदये भयात्मा । वेषो-

संद्दारे क्रोधात्मा । एवमन्येच्वव्ययोगेवन्तर्भावः कीर्त्तनीय इति ॥१४२॥

इति श्रीरामचन्द्र-गुराचन्द्रविरचितां स्वोपज्ञनाट्यदर्पणाव्याख्यतो नाटकनिर्यणः प्रथमो विवेकः ॥ १ ॥

गतार्थ हो जानेसे उन दोनोँकी रचना नहीं की गई है । इस प्रकार एक-दूसरेके भीतर ग्रन्थोँका [ कोई ] लेन देन [ कहीं-कहीं ] केवल चार शब्दोँका ही [ कोई ] सन्निवेश हो जाता है ।

ग्रन्थ ग्राचायँके सतका खंडन—

इस प्रसंगमे [हमारे प्रतिपादित पाँच संधियोँके अतिरिक्त ] कुछ लोग २१ संधियाँ और मानते हैं । [उनके नाम निम्न प्रकार हैं]—

१. साम, २. भेद, ३. दण्ड, ४. दान, ५. वध, ६. प्रत्युत्पन्नमतित्व, ७. गोत्रस्वखलित

८. साहस, ९. भय, १०. भी आ्रन्ति, ११. माया, १२. क्रोध, १३. क्रोज, १४. संवररण, १५. आ्रान्ति, १६. हेत्वधारराम, १७. दूत, १८. लेख, १९. स्वप्न, २०. चित्र

तथा २१ सद्‌ ।

[इन २१ संधियोँको भी कुछ लोग मानते हैं] किन्तु इनमेंसे साम ग्रादि कुछके स्वयंग्र अंग रुप होनेसे, मति ग्रादि किन्हीँकि व्यभिचारिभावरुप होनेसे, दूत लेख ग्रादिके कथावस्तु

रुप होनेसे, ग्रौर ग्रन्थोँके उपक्लेप ग्रादि रुप होनेसे उनके श्रलग लक्षणा करनेका प्रयत्न हमने नहीं किया है । जैसेकि गर्भसन्धिमें साम, दान रुप संग्रह नामक ग्रंग ग्राया है । मति

ग्रादिके लक्षण व्यभिचारिभावोँमें किए जायेंगे । दूत लेख ग्रादि कथा-भाग रुप ही होते हैं ।

ग्रौर उदात्त राघवमें उपक्लेप [ग्रंग] हेत्वधारण रुप है । प्रतिमानिरुद्धमें [उपक्लेप ग्रंग] स्वप्न

रुप है । रामाभ्युदयमें [उपक्लेप] भय रुप है । ग्रौर वेषोसंहारमें क्रोधरुप [उपक्लेप] है । [ग्रत-

एव इन ग्रनेक संधियोँके उपक्लेपमें ग्रन्थभूत हो जानेसे उनको भी ग्रलग कहनेकी ग्रावइयकता नहीं है ।

इसी प्रकार ग्रन्थ ग्रागोँमें भी [इन २१ संधियोँका] ग्रन्थरभाव समक लेना चाहिए ।

[ग्रत: इन संधियोंको मानना उचित नहीं है] ।

श्री रामचंद्र गुराचन्द्रविरचित स्वनिर्मित नाट्यदर्पण की

विवृतिमें नाटक-निर्यणय-नामक प्रथम विवेक पूर्र्ण हुग्रा ॥ १ ॥

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ग्रथ द्वितीयो विवेक:

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अथ द्वितीयो विवेकः

अथ 'नाटक' प्रकारस च इत्यतो नाटक लचयितवा प्रकारस लचयते—

अथ नाटकादर्पण-दीपिकायां द्वितीयो विवेकः ।

विवेक-सङ्गति

प्रथम विवेकके श्रारम्भमें तीसरी तथा चौथी कारिकामें ग्रन्थकारने बारह प्रकार के रूपकोंका उद्देश्य श्रथात् नाममात्र का कथन किया था । उनमें सबसे पहिला स्थान 'नाटक' का शोर उसके बाद दूसरा स्थान 'प्रकरण' का था । इसलिए प्रथम विवेकके शेष भागमें नाटकके लक्षण श्रादिका विस्तारपूर्वक विवेचन किया था । मुख्यरूपसे नाटकका ही विवेचन होनेसे प्रथम विवेकका नाम ग्रन्थकारने 'नाटक-निरूपण' रखा है । रूपकोंमें नाटक ही सबसे मुख्य है इसलिए उसके लक्षण श्रादिका विस्तारपूर्वक विवेचन करनेमें एक पूरा विवेक (ग्रध्याय) लगाया गया है । श्रब इस द्वितीय विवेकमें प्रकरण श्रादि शेष ग्यारह प्रकारके रूपक-भेदोंका विवेचन किया जाएगा । इसलिए ग्रन्थकारने इस 'विवेक' का नाम 'प्रकरणादीनां चादशरूपकनिरूपणम्' रखा है । इन शेष एकादश रूपकोंमें प्रथम शोर सबसे मुख्य स्थान 'प्रकरण' का है । इसलिए इस विवेकका श्रारम्भ प्रकरणके निरूपणसे ही करते हैं ।

[सूत्र ११७] 'नाटकं प्रकरणं च' इस [रूपक भेदोंका उद्देश्य श्रथात् नाममात्रसे करने वालो कारिकामें] गिनाए हुए रूपकभेदों] मेंते [प्रथम विवेकमें प्रथम रूपक भेद] नाटकका लक्षण करके [द्वितीय रूपक भेद] ग्रथत् 'प्रकरण' का लक्षण करते हैं—

'प्रकरण' का लक्षण करते हुए ग्रन्थकार मुख्य रूपसे 'नाटक' से उसके भेदोंका प्रदर्शन करेग । 'समानासमानजातीयैर्व्यवच्छेद्यैः' इस नियमके श्रनुसार समान-जातीय तथा श्रसमान-जातीयसे भेद करना ही 'लक्षण' का प्रयोजन है । इसलिए 'प्रकरण' का लक्षण करते समय उनके समान-जातीय 'नाटक' से भेद दिखलाना श्रावश्यक है । इस भेद-प्रदर्शनके द्वारा ही 'प्रकरण' का लक्षण पूर्ण बनता है । श्रतः 'प्रकरण' का लक्षण करने वाली इन दो कारिकाओंमें 'नाटक' से उसका भेद दिखलाते हुए ही 'प्रकरण' का लक्षण किया गया है ।

'नाटक' से 'प्रकरण' का मुख्य भेद कथावस्तुके स्वरूपके विषयमें है । 'नाटक' की कथावस्तु इतिहास-प्रसिद्ध होती है । किन्तु 'प्रकरण' की कथावस्तुमें कल्पनाकी प्रधानता रहती है । नाटक 'श्याताद्यराजचरितं' पूर्ववर्ती इतिहास-प्रसिद्ध राजाओंके चरित को प्रस्तुत करता है किन्तु 'प्रकरण' 'कल्प्यनेतृ-फल-वस्तूनां' कल्पित नेता, फल तथा वस्तु के श्राधारपर स्थित होता है । इसका दूसरा भेद यह है कि 'नाटक' राजवंशपर श्रलम्बित होता है तो 'प्रकरण' वणिकु, विप्र, श्रथवा सचिव चरित्रोंके श्राधारपर निर्मित लम्वित होता है ।

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[सूत्र ११७] प्रकारणं वणिग्-विप्र-सचिवस्वाम्यसडू राज्ञां । मन्दगोत्राऽऽदीनां दिव्यानाश्रितं मध्यवेश्चिततम् ॥ १[६६]॥ दास-श्रेष्ठि-विटैर्युक्तं बलेशाढ्यं तच्च सप्तधा । कल्प्येन - फल-वस्तूनामेक-द्वि-त्रि-विधानतः ॥२ [६७]॥

होता है। वणिक्, विप्र अथवा सचिवमेंसे कोई भी ‘प्रकरण’ का नायक हो सकता है किन्तु एक ‘प्रकारण’ इनमेंसे एक ही नायक होगा । इन तीनोंमेंसे ‘सचिव’ पदका अर्थ ‘राज्यचिन्तक’ किया गया है। राज्यचिन्तकमें मुख्य रूपसे ‘ग्रामात्य’ होता है किन्तु मुख्य ग्रामात्यके अधीन ही सेनाविभाग भी रहता है और सेनापति भी राज्यक की चिन्ता करने वाला प्रमुख अधिका री है इसलिए उसका भी ग्रहण इस पदसे किया जा सकता है। इस प्रकार सेनापति तथा ग्रामात्य दोनोंका ग्रहण ‘सचिव’ पदसे होता है। इनमेंसे सेनापति तथा ग्रामात्य दोनों धीरोदात्त नायक माने जाते हैं । और विप्र तथा वणिक् ये दोनों धीर प्रशान्त नायक माने जाते हैं । अर्थात् ‘प्रकरण’ में मुख्य रूपसे धीरोदात्त तथा धीर प्रशान्त नायक ही होते हैं । धीरोदात्त आदि नहीं । कोई-कोई प्राचीन आचार्य ग्रामात्यको धीर प्रशान्त नायक मानते हैं । और ‘प्रकरण’ को धीरोदात्त-नायक वाला रूपक मानते हैं । किन्तु ग्रन्थकार इस मतको मान्य नहीं है । उनके मतमें ग्रामात्य धीरोदात्तनायक होता है । विप्र और वणिक् धीर प्रशान्त नायक होते हैं । इसलिए ‘प्रकरण’ का नायक धीरोदात्त भी हो सकता है और धीर प्रशान्त भी ।

‘नाटक’ और ‘प्रकरण’ का तीसरा भेद यह है कि ‘नाटक’ में दिव्य पात्र भी नायकके सहायक-रूपमें उपस्थित हो सकते हैं । किन्तु ‘प्रकरण’ में दिव्य पात्रोंका प्रवेश नहीं हो सकता है। नाटक ‘दिव्याऽऽद्रिं’ और ‘प्रकरण’ ‘दिव्यानाश्रितम्’ है । अर्थात् ‘नाटक’ में रंग- रूपमें, नायकके सहायक रूपमें, दिव्य पात्रोंका उपयोग हो सकता है । ‘प्रकरण’ में नहीं । इसका मुख्य कारण ‘प्रकरण’ का ‘बलेशाढ्यम्’ क्लेश-प्रधान होना है। दिव्य पात्र सुख-प्रधान होते हैं । और ‘प्रकरण’ के पात्र दुःखाऽऽदय होते हैं । इसलिए ‘प्रकरण’ में दिव्य पात्रोंका प्रवेश उचित नहीं माना गया है । ‘नाटक’ और ‘प्रकरण’ के इन मुख्य भेदोंको ध्यानमें रखते हुए ही ग्रन्थकार दो कारिकाओंमें ‘प्रकरण’ का लक्षण इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं— वणिक्, विप्र तथा सचिव इनमें श्रेष्ठ-श्रेष्ठ किसका एक नायकत्व युक्त, मृदु [मध्यम्] कुलकी नायिका बाला, दिव्य पात्रोंका ग्राश्रय न लेनेवाला, मृदु-चेष्टाओंसे युक्त—॥१[६६]॥ दास, श्रेष्ठी और विटोंसे परिपूर्ण, एवं क्लेश-प्रधान [रूपक] ‘प्रकरण’ [कहलाता] है । और वह नेता, फल, तथा वस्तुनोंमेंसे एक-दो अथवा तीनके कल्पित होनेके विधान के अनुसार सात प्रकारका होता है ॥ २ [६७] ॥

ग्राधारपर ‘प्रकरण’ के सात भेद दिखलाए हैं। नायक, फल तथा वस्तु इन तीनके कल्पित होनेके आधारपर ‘प्रकरण’ के जो सात भेद बनाए गए हैं वे, उनमें एक, दो, या तीनोंकी कल्पनाऐं कारण बन जाते हैं । तीनोंमेंसे किसी एकके कल्पित होनेके कारण तीन भेद होंगे । फिर दो-दो के कल्पित होनेपर भी तीन भेद बनेंगे । इस प्रकार छः भेद हुए । और

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का० ६६-६७, सू० ११७ ]

द्वितीयो विचेक :

[ २०३

प्रकरोऽपे क्रियते कल्प्यते नेता फलं वस्तु वा समस्त-व्यस्ततयाsडत्रेति 'प्रकरणम्' । प्रसिद्धत्वात् लच्यमनीयं लचयते विधीयते । वाणिजः क्रय-विक्रयकृतः। विप्रः षट्-कर्मोपेतः । सचिवो राज्यचिन्तकः । श्रयण वार्ता-विप्रयोस्सध्यपात्यपि धीरोदात्त-धीर-प्रशान्तौ प्रकारोए नेतारौ भवत इति प्रतिपादनार्थ पृथगुपात्तः यस्स्वमत्यं नेतारमभ्युपगम्य धीरप्रशान्तनायककमिति 'प्रकारणम्' विशोपयति स वृद्धसम्प्रदाय-वन्ध्यः।

सातवाँ भेद उन तीनोंके कल्पित होनेपर बनेगा । इस प्रकार 'प्रकरण' के सात भेद हो जाते हैं इसको और अधिक स्पष्ट करनेकेलिए इन भेदोंको निम्न प्रकार दिखलाया जा सकता है : एकके कल्पित होनेपर तीन भेद :

१. केवल नायकके कल्पित होनेपर प्रथम भेद ।

२. केवल फलके कल्पित होनेपर द्वितीय भेद ।

३. केवल श्राश्रयान-वस्तुके कल्पित होनेपर तृतीय भेद ।

दो-दो के कल्पित होनेपर तीन भेद :

४. नायक श्रोर फलके कल्पित होनेपर चतुर्थ भेद ।

५. नायक श्रोर वस्तुके कल्पित होनेपर पञ्चम भेद ।

६. फल श्रोर वस्तुके कल्पित होनेपर षष्ठ भेद ।

तीनोंके कल्पित होनेपर एक भेद :

नायक, फल, तथा वस्तु तीनोंके कल्पित होनेपर सप्तम भेद ।

इस प्रकार 'प्रकरण' के सात भेद दिखलाए माने गए हैं । इनमेंसे जहाँ नायक, फल, तथा श्राश्रयान-वस्तु तीनों कल्पित होते हैं वह 'प्रकरण' सर्वथा कल्पित होता है । जहाँ एक या दोकी कल्पना की जाती है वहाँ शेष दो या एक भाग इतिहासाश्रित होते हैं यह सम्भवता चाहिए । कवि जिस भागकी कल्पना करता है वही 'प्रकरण' का मुख्य भाग होता है । 'प्रकरण' का चमत्कार उसी भागमें निहित होता है । 'प्रकरण' की इसी कल्पनाकी प्रधान-ताको दिखलानेकेलिए ग्रन्थकार 'प्रकरण' पदका निर्वचन करते हुए इन कारिकाग्रोंकी व्याख्या प्रारम्भ करते हैं—

जिसमें नायक, फल, श्राश्रयाsनवस्तु श्रलग-श्रलग [एक-एक श्रथवा दो-दो] श्रथवा सब [प्रथात् तीनों] प्रकृष्ट हेतुसे किए जाते श्रर्थात् कल्पित किए जाते हैं वह 'प्रकरण' [कहलाता] है । [यह 'प्रकरण' शब्दका निर्वचन होता है । उससे ही 'प्रकरण' की कल्पना-प्रधानता सूचित होती है।] लक्ष्य [ग्रतथात् 'प्रकरण'] के प्रसिद्ध होनेसे [कारिकाके श्रारम्भ में सबसे पहले प्रकृष्ट 'प्रकरण' इस पदसे] उसका प्रथुवाद करके [कारिकाग्रोंके शेष भाग में] लक्षण किया गया है । [ग्रंगे लक्षणाभागमें ग्राए हुए वरीक ग्रादि पदोंकी व्याख्या करते हैं] क्रय-विक्रय करने वाले वाणिक् [कहलाते हैं] । [१ श्रध्ययन २ श्रध्यापन, ३ यजन, ४ याजन, ५ दान देना श्रोर ६ प्रतिग्रह श्रर्थात् दान लेना इन] छः कर्मोंको करने वाले 'विप्र' [कहलाते हैं] । राज्यकी चिन्ता करने वाला 'सचिव' [कहलाता] है । यह [सचिव] वरीक तथा विप्रके श्रन्तर्गत हो जानेपर भी [प्रथात् क्षत्रिय राजा हो है श्रोर शूद्र सेवक हो है । वे दोनों सचिव नही होते हैं । इसलिए वरीक या विप्रमेसे ही सचिव होता है] श्रतः उन दोनोंके मध्यपाती होनेपर भी, धीरोदात्त [सचिव] श्रथवा धीरोदात्त [विप्र]

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यदाहु:-

'सेनापतिरमाल्यश्च धीरोदात्तौ प्रकृतितदौ' इति। 'व्रतसङ्करात्' इति व्यक्तिभेदेन वर्गीगदयो नेतारः। न पुनरेकरसयोमेव प्रक- रसात्ककती समवकारादितव त्रयोदपि।

'प्रकरखा' के नेता होते हैं इस बातके प्रतिपादनकेलए श्लग कहा गया है। जी 'श्रमाल्य' को सेनापति मानकर धीरप्रख्यात-नायक वला रूपक 'प्रकरखा' होता है इस प्रकार ['प्रकरखा' को] विशपषित करते हैं वे वृद्ध-सम्प्रदायकों नहीं समकते हैं। [श्रथात् वे प्राचीन श्राचार्योंकी परम्पराके विपरीत बात करते हैं । बयोंकि प्राचीन श्राचार्योंके मतानुसार श्रमाल्य या सच्चिव धीरप्रख्यात नहीं [श्रपितु धीरोदात्त नायक होता] है ।"

जैसा कि कहा भी है- सेनापति श्रोद्र श्रमाल्य धीरोदात्त [नायक] माने जाते हैं।

इस श्रनुच्छेदमें 'विप्र: घटकर्माथ:' । यह जो लिखा गया है वह मनु श्रादि स्मृति-कारोंकी व्यवस्थाके श्राधारपर लिखा गया है । 'मनुःस्मृति' में ब्राह्मणोंके छः कर्म निम्न प्रकार गिनाए गए हैं---

व्रध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयन्‌ ॥ मनु:

ग्रंथगे कारिकामें ग्राए हुए 'व्रतसङ्करात्' पदकी व्याख्या करते हैं । उसकी श्राशय यह है कि यदपि 'प्रकरखा' में विप्र, श्रमाल्य तथा वेश्य श्रादि तीनों नायक हो सकते हैं किन्तु उनका सङ्कर नहीं होना चाहिए। श्रर्थात् एक 'प्रकरखा' में इनमेंसे एक ही नायक होना चाहिए । एक ही 'प्रकरखा' में तीनों नायक नहीं हो सकते हैं । 'समवकार' श्रादिमें तो एक ही 'समवकार' में ग्रनेक नायक भी हो सकते हैं । किन्तु एक 'प्रकरण' में ग्रनेक नायक नहीं हो सकते हैं। यह बात ग्रन्थकारने 'व्रतसङ्करात्' पदसे सूचित की है । इसी बातको श्रागली पङ्क्तिमें लिखते हैं—

श्रलग-श्रलग 'प्रकरखा' में श्रलग-श्रलग वशीक श्र्रादि नायक हो सकते हैं । 'समवकारदि के समान एक हो तो 'प्रकरखा' [रूप व्यक्शित] में तीनों [नायक] नहीं [हो सकते]।

ग्रंथगे कारिकाके 'मुनद्गोत्राङ्गानम्' पदका श्रर्थ करते हैं । इस पदकी दो प्रकारकी व्याख्या की गई है। पहली व्याख्यामें 'मुनद्' पदको 'गोत्र' पदका विशेपखा मान कर 'मुनद् गोत्रा' श्रर्थात् नीचकुलोत्पन्ना वेश्यादि 'प्रकरखा' की नायिका होती है यह श्रर्थ किया है । श्रौर दूसरी व्याख्यामें पहले 'गोत्र' पदका 'ग्रङ्गनता' पदके साथ समास करके, फिर 'मुनद्' पद को 'गोङ्गनता' पदका विशेपखा बनाया है । इस प्रक्रियासे 'मुनद्' श्रर्थात् निकृष्ट ग्राचारखा वाली 'गोत्राङ्गना' श्रर्थात् स्ववंशोत्पन्ना श्रर्थात् नायकके समान गोत्रकी नायिका 'प्रकरखा' में होती है यह श्रर्थ किया है । श्रर्थात् 'प्रकरखा' में कहीं नीचकुलजा वेश्या श्र्रादि श्रौर कहीं स्वकुलोत्पन्ना, श्रौर कहीं दोनों प्रकारकी नायिकाएँ होती हैं । इसीलिए साहित्यदर्पणकार ने 'प्रकरखा' के लक्षरामें लिखा है :

'नायिका कुलजा ववापि, वेश्या ववापि, द्वयक्चित्' । सा० द० ६-२२६ ।

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का० ६६-६७, सू० ११७ ] द्वितीयो विवेक: [ २०५

'मन्दगोत्रा' मन्दकुला, अङ्गना नायिका यत्र । यद्वा 'मन्दा' मन्दवृत्ता, गोत्राङ्गना यत्र । श्वेत एवात्र नायिकेच्छित्येन नायकोऽपि मन्दगोत्र एव । एवं च पुष्पदूतिके श्रशोकदत्तादिशब्दकार्षनेन समुद्रदत्तस्य तन्वङ्गनस्यां या व्यलीकशङ्कोपनिबद्धा, सा न दोषाय । परपुरुषसम्भावनाया निर्वहरणं यावदत्रोपयोगान । श्रपरथा उत्तमप्रकृतिनां श्वशुरेपा वध्वा:; पुत्रे दूरेऽपि स्थिते निवासनं, निवासितायाश्च शवरसेनापतिगृहद्वस्थातमनुचितमेव ।

'मन्दगोत्रा' श्रर्थात् मध्यम कुलकी 'अङ्गना' श्रर्थात् नायिका जिसमें हो । श्रथवा 'मन्दा' श्रर्थात् मध्यम श्राचारवाली 'गोत्राङ्गना' श्रर्थात् कुलजा नायिका जिसमें [वह 'प्रकृत्या' कहलाती है] । इसीलिए नायिकाकी श्रनुरूपताके कारण नायक भी मध्यम कुल का ही होता है । इसलिए 'पुष्पदूतिक' में 'श्रशोकदत्त' आदिके शब्दको सुन कर 'समुद्रदत्त' की 'तन्वङ्गन्ती' के चरित्रके विषयमें जो शंका व्यक्त की गई है वह दोषावह नहीं है । क्योंकि यहाँ निर्वहरण सन्धि-पर्यन्त परपुरुष [के साथ 'तन्वङ्गन्ती' के सम्बन्ध] की सम्भावनाका उपयोग [दिखलाई देता] है । श्रन्यथा उत्तमप्रकृति वाले लोगोंमें पुत्रके बाहर दूर गए होने पर इवशुरके द्वारा पुत्रवधूको घरसे निष्कासन, श्रौर निकाल दिए जानेपर [पुत्रवधू का] शवरसेनापतिके घरमें रहना [जो कि इस 'पुष्पदूतिक' के 'प्रकररण' में दिखलाया गया है वह] श्रनुचित ही हो जाएगा [उसकी संगति तब ही लगती है जब उसके नायक तथा नायिका श्रादिको उत्तम-प्रकृतिक न मान कर मध्यम-प्रकृति माना जाए] ।

इसका श्रभिप्राय यह है कि उत्तम प्रकृतिकी नायिकाके प्रति कभी परपुरुष-सम्बन्ध की शंका श्रादि नहीं की जा सकती है । 'पुष्पदूतिक' की नायिका 'तन्वङ्गन्ती' के प्रति उसके इवशुरको परपुरुष सम्बन्धकी शंका उत्पन्न हो गई थी इसलिए उसने पुत्रवधूको घर से निकाल दिया था । इसपर यह शंका होती है कि जैसे 'पुष्पदूतिक' की नायिकाके चरित्र के विषयमें शंका हो गई थी, इसी प्रकार 'वेणीसंहार' में दुर्योधनको भी श्रपनी पत्नी भानुमती के चरित्रके विषयमें शंका हो गई थी । तो क्या भानुमती श्रौर दुर्योधनकी गणना भी मध्यम प्रकृतिके नायक नायिकामें की जानी चाहिए ? श्रथवा उनको उत्तम वर्गके नायकनायिकामें ही गिनना चाहिए ? इस शंकाका ग्रन्थकार यह समाधान करते हैं कि 'वेणीसंहार' में जो भानुमतीके प्रति शङ्काका वर्णन किया गया है वह श्रनुचित है । वे दोनों उत्तम प्रकृतिके नायक-नायिका हैं । श्रत एव भानुमतीके चरित्रके प्रति शङ्काका वर्णन नाटककारको नहीं करना चाहिए था ।

वेणीसंहारके द्वितीय श्रङ्कमें इस घटनाका उल्लेख किया गया है । दुर्योधनकी रानी भानुमतीने युद्धके प्रारम्भ होनेके पूर्व एक दिन रातको एक बहुत भुरा स्वप्न देखा था । उसकी शान्तिके व्यवस्थाके लिये वह एकान्तमें श्रपनी सखियोंको उस स्वप्न को सुन रही है । इसी वीचमें दुर्योधन उस स्थानपर पहुंच जाता है श्रौर छिपकर उनकी बातें सुनने लगता है । स्वप्नमें भानुमतीने यह देखा था कि किसी नेवलेने सौ सांपों को मार डाला है । यह सौ संख्या कौरवोंके साथ सम्भद हो जाती है । इसलिए उसे सौ भाइयों सहित दुर्योधनके श्रानिष्टका शंका हो गई थी । इसी स्थानको वह सखियोंको सुन रही है । उसमें दुर्योधनके श्रानिष्टका शंका हो गई थी । इसीमें नेवलेके लिये 'नकुल' शब्दका प्रयोग किया गया है । इसको सुन कर दुर्योधनको मातृपुत्र

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२०६ ] नाट्यदर्पणम् [ का० ६६-६७, सू० ११७

उत्तमप्रकृतितीनां राज्ञां तु कुलस्त्रियां व्यलीकसम्भावना दुर्योधनस्येव भानुमत्या-

मनुचितैव । वरिङ्गमात्यविप्राष्च स्वर्गोपेत्यैव बोत्समा:, न राजापेक्षया । एतदर्थमेव च

मन्दशब्देन गोत्रं विशोषितम् । प्रकरणो हि नायको व्युत्पाद्यश्च मध्यमप्रकृतिरेव ।

नकुलके साथ भानुमतीके श्रृङ्गारिक सम्बन्धकी शङ्का हो गई है । उस प्रसंगके शब्द जिन्होंने

दुुर्योधनके मनमें इस प्रकारकी शङ्काको उत्पन्न किया निम्न प्रकार है—

"भानुमती—ततोऽहं तस्यातिशयितदिव्यरूपेण नकुलस्य दर्शनेनोत्सुका जाता

हतहृदया च तदुज्झितत्वा तदासनस्थां लतामण्डपं प्रवेष्टुमारुढा ।

दुर्योधन:—[सवैलच्यमालम्बतम्] किं नामातिशयितदिव्यरूपेण नकुलस्य

दर्शनेनोत्सुका जाता हतहृदया च । तत्किमनया प्राप्तया मातृसुतातुरक्तया वयमेवं

दर्शनेनोत्सुका । [यौधिष्ठिरं इयमस्मत् २-१० इति पठित्वा] मूढ दुर्योधन ! कुलटाविप्र-

लङ्घा: [योत्रेक्ष्यम् इयमस्मत् २-५ इति पठित्वा] दिशोऽलक्ष्यमात्मानं वहुमन्यमानोऽधुना कि वधयसि । [किं करे २-५ इति पठित्वा] दिशोऽ-

लोक्य] हृदयो एतदर्थमेवास्या: प्रातरेव विवादस्थानाभिलाष: सव्जीजनकथासु च

वलोक्य] हृदयो एतदर्थमेवास्या: प्रातरेव विवादस्थानाभिलाष: सव्जीजनकथासु च

पत्यपातः । दुर्योधनस्तु मोहाद्विज्ञातवचनकीहृदयसार: क्वापि परिभ्रान्तः । व्याः पापे !

मतपरिमहणांसुल—

तदु भीरुत्वं तव मम पुर: साहसनीडशानि,

श्लाघा सास्मद्रुपि विनयभयोल्कै:स्फुलिङ्ग राङ्गः ।

तरुचौदार्य मचि जडमतौ चापलें कोऽपि पन्था:,

रयाते तस्मिन् चितमसि कुलङ्गन्यकौलीनमेतत् ॥ २-११

स्वकी—ततस्ततः ?

भानुमती—ततः सोऽपि मामनुसरन्नेव लतागृहं प्रविष्ट: ।

उभे—ततस्ततः ?

भानुमती—ततस्तेन सङ्गलभप्रसरितकरेरैषहतं मे स्तनांशुकम् ।

उभे—ततस्ततः ?

भानुमती—तत् श्वश्रुपुत्रस्य प्रभातमङ्गलतूर्यरवमिश्रेण वारविलासिनीजन-

संगीतरवे प्रतिबोधितास्मि ।

इस प्रकरणमें भानुमतीके स्वप्न—दर्शनके वृत्तान्तका जो वर्णन किया गया है

उससे दुर्योधनको भानुमतीके चरित्रके विषयमें शङ्का हो जाना स्वाभाविक था । किन्तु

ग्रन्थमें जब उसका यह मालूम हुया कि यह स्वप्नका वर्णन है तब स्वयं ही उसकी शङ्का

का निवारण भी हो गया । किन्तु अन्यकारका कहना यह है कि उस उत्तम प्रकृतिके नायक-

नायिकाके विषयमें इस प्रकारकी शङ्काका होना भी उचित नहीं है । इसलिए कविका यह

वर्णन ग्रनुचित है । इसी बातको वे ग्रन्थे लिखते हैं—उत्तम प्रकृतिके राजाओंमें तो, कुलस्त्रीके प्रति भानुमतीके विषयमें दुर्योधन द्वारा की

गई शङ्काके समान, दुष्टचरित्रताकी सम्भावना [का वर्णन] भी ग्रनुचित ही है । [प्रत एव

'वेङ्कटसिंहार' का यह प्रसंग ग्रनुचित ही है । [प्रत एव

वंशिगौ प्रमात्य ग्रोत्र विप्र ग्रपनेऽपने वर्ङ्करी दृष्टिसे ही उत्तम हो सकते हैं । राजाकी

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का० ६६-६७, सू० ११७ ] दिवतीयो विवेक: [ २०७

'दिव्यानाश्रितम्' इति दिव्यैरत्नाश्रितम् । नाटके हि श्रृंगारवेन दिव्यो भवति । प्रकरणे तु तथाभावोऽपि नेष्टः । तस्य सुखदुःखाल्पदुःखत्वात् । अपरस्थ दिव्यत्वमेव हीयते । मध्यं सर्वोत्तम-हीनप्रकृतयोग्यं चेष्टितं विहार-व्यहार-वेष-सम्भोगादिको ब्यापारो यत्र । तेन कल्पितत्वृत्तवेषस्य न राजोचितान्तःपुरादिसम्भोगः । कञ्चुकि-प्रकृतिभृत्यवर्गो वा । न चाऽऽश्रपारसम्भोगादिर्वा निवन्धनीयः । तथा च वेश्यायां नायिकायां विनयरहितमपि चेष्टितं निवध्यते । यथा विशाखदेवकृतेऽपि 'देवीचन्द्रगुप्ते' माधवसेनां समुदिश्य कुमारचन्द्रगुप्तस्योकि:-

ग्रानन्दाश्रुजलं सितेतरपललरुचोरवदन्नता नेत्रयोः, प्रत्यंगेपु वरानने पुलकितपु स्वेदं समातन्वता । कुर्वाणेन नितम्बवरुपचयं सम्पूर्णावयवस्य सौ, केलाव्यपुषटाड्यधोनिवासनगतिस्थैववोच्, वासितः ॥ इति ॥

ग्रपेक्षase नहीं । इसके लिए भी 'मन्ड' शब्दसे 'गोत्र' को विशोधित किया है । ग्रर्थात् 'मन्डगोत्राज्जुन' पदमें जो 'मन्ड' पदको 'गोत्र' पदका विशेषण बनाया गया है उसका यह भी ग्रभिप्राय है कि व्रणिक श्रमाध्य विप्र ग्रादि, राजाकी ग्रपेक्षase मन्ड गोत्र वाले ही होते हैं] । 'प्रकरण' में नायक ग्रोर [क्युत्पाद्यः ग्रर्थात् जिनकी शिक्षाके लिए 'प्रकरण' की रचना की गई है वे] सामाजिक दोनों मध्य श्रेणीके ही होते हैं ।

ग्रागे कारिकामें ग्राए हुए 'दिव्यानाश्रित' पदकी व्याख्या करते हैं— 'दिव्यानाश्रितम्' इसका यह ग्रर्थ है कि दिव्यपात्रोंसे रहित । 'नाटक' में तो ग्रंग रूपसे [ग्रर्थात् नायकके सहायक रूपमें] दिव्य पात्र [उपस्थित] होता है किन्तु 'प्रकरण' में तो उस प्रकारकी [ग्रर्थात् नायकके श्रृंगाररूपमें] स्थिति भी इष्ट नहीं है । उस [दिव्यपात्र] के सुखप्रधान होनेके ग्रोर श्रलपदुःखयुक्त होनेके कारण [नायकके साथ] उनकी स्थिति संगत नहीं बनती है] । ग्रन्थथा [ग्रर्थात् यदि दिव्य पात्रोंको सुखप्रधान ग्रोर श्रलप दुःखवाला न माना जाय तो उनकी] दिव्यता ही नष्ट हो जावेगी ।

ग्रागे कारिकामें ग्राए हुए 'मध्यचेष्टितम्' पदकी व्याख्या करते हैं— मध्य ग्रर्थात् सर्वोत्तम ग्रथवा सबसे निकृष्ट प्रकृतिके योग्य, चेष्टित ग्रर्थात् विहार, [व्यहार ग्रर्थात्] भाषण, वेष ग्रोर सम्भोगादि ब्यापार जिसमें [वह मध्यचेष्टित 'प्रकरण' होता है] । इसलिए श्राङ्ग्यान-वस्तुके कल्पित होनेपर भी इसमें राजाग्रोंके समान ग्रन्थःपुर-ग्रादिका भोग, कञ्चुकीकी प्रभृति भृत्यवर्ग, ग्रथवा प्रधानपात्रोंके-सा सम्भोगादिका वर्णन नहीं करना चाहिए । [ग्रपितु सब कुछ मध्य स्थितिके ग्रनुरूप ही होना चाहिए ] । इसलिए वेश्या के नायिका होनेपर शिष्टता-रहित वातोंका भी वर्णन हो जाता है । जैसे विशाखदेवके बनाए हुए 'देवीचन्द्रगुप्त' में माधवसेना [वेश्या] को लक्ष्यमें रखकर कुमार चन्द्रगुप्तके [शिष्टतासे रहित निम्नलिखित] उक्ति है—

शुत्र-कमलके समान कान्ति वाली ग्राँखोंमें, ग्रानन्दाश्रुओंका उत्पन्न करने वाले, ग्रोर हे वराङ्गने ! तुम्हारे रोमाञ्च-युक्त सारे ग्रंगोंमें स्वेदोत्पादन करनेवाले, एवं भरे हुए नितम्ब- की वृद्धि करा देने वाले, किसी [प्रेमी] ने स्पष्ट किए बिना हो तुम्हारे नीचे पहननेके वस्त्रकी नारकी गांठको खुलवा डाला है ।

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व्युत्पत्त्योडपि च प्रकारणो मध्यमप्रकृतिरेव । नेतरचितरस्यापि तथाभूतत्वादिति ।

'दास-श्रेष्ठि-विटैयुक्तम्' इति । 'दासो' जीवितार्थकृतो वेतनक्रीतो, बाल्यात् । प्रसृत्ति पोपितो वा 'श्रेष्ठी' वणिगप्रधानम् । 'विटो' धूर्तः ततः कट्टकुकिस्थाने दासः । व्यमात्य-स्थाने श्रेष्ठी । विदूषकस्थाने विटः । उपलक्ष्यं चैतत् , तेनापरमपि चाटुकार-सहाया-दिकं वणिगाद्यौचित्येन निर्वन्धनीयम् । 'क्लेशाल्लभम्' इति हि खदन्ति । व्यपाय-शतान्तरिफलत्वादिति एतावल्लक्ष्यम् ।

तत्रोक्तलक्षणं 'प्रकारणो' सम्प्रेक्ष्यम् । 'इनो' नायकः । 'फल' मुख्यसाध्यम् । 'वस्तु' फलसाधक उपाया: एतेषां एक-द्वि-त्रिविधानं सम्प्रेक्ष्यं 'प्रकराराम्' । तत्र नेतुः प्रकल्पने तदितरयोश्चाकल्पने एको भंगः ; एवं फल-वस्तुनोरपि । एवंमेककल्पविधाने त्रयो भंगा: ; तथा नायक-फलयोः, नायक-वस्तुनोः, फलवस्तुनोरवा कल्पने शेषयैकस्य चाकल्पने त्रयो द्विकभंगाः: नायक-फल-वस्तूनां त्रयाणामपि कल्पने एको भंगः ; एवं सर्वमेलनेनैष सद्रधा प्रकारणामिति ॥ १-२ [६६-६७] ॥

यह कुमारचन्द्रगुप्तका वचन विनय-रहित या शिष्टता-रहित है । उत्तम प्रकृतिके पात्रों में इस प्रकारके वचनोंका प्रयोग उपयुक्त नहीं होता है । किन्तु यहाँ वेश्या माधवसेनाके नायिका होनेके कारण ही इस प्रकारके वचनके प्रयोगकी संगति लगाई जा सकती है । यह ग्रन्थकारके अभिप्राय है ।

नायिकाके चारित्रिक मो [उस प्रकारके] श्रृंगार । मध्यम-प्रकृतिके होनेके कारण 'प्रक-ररम्' में [व्युत्पत्ति श्रथवा] सामाजिक भी मध्यम-प्रकृतिके ही होते हैं ।

ग्रंथे कारिकामें ग्राए हुए 'दास-श्रेष्ठि-विटैयुक्तं' वचनकी व्याख्या करते हैं—

'दास-श्रेष्ठि-विटैयुक्तं कम्' [इसका यह ग्राभिप्राय है कि] जीवन-पर्यन्तके लिए वेतनसे क्रय किया हुग्रा श्रथवा बचपनसे पाला हुग्रा 'दास' होता है । वणिकोंका प्रधान, श्रेष्ठवा प्रधान वणिक कहलाता है । 'विट' [का श्रथ] धूर्त है । उनमेंसे [नाटकमें] कट्टकुकिस्थाने [प्रकारणमें] 'दास' [को समझना चाहिए] । प्रधानके स्थानपर श्रेष्ठी श्रौर विदू-षकके स्थानपर विट [का उपयोग] होता है । [दास-श्रेष्ठि-विटैयुक्तं तत्त्र] यह [वचन] उपलक्षरम् रूप है । इसलिए वणिग् ग्रादि [नायकों] के ग्रौचित्यानुसार चाटुकार [चापलूस] सहायक ग्रादि ग्रन्थ्य [पात्रों] का भी वर्णन करना चाहिए । 'क्लेशाल्लभम्' इसका 'दुःख-प्रधान' यह ग्रथं है । क्योंकि उसका फल सैकड़ों कष्ट भोगनेके बाद प्राप्त होता है । [इसलिए 'प्रकररम्' दुःख-

प्रधान रूपक होता है] । यहाँ तक [ग्रथर्थात् ६७वीं कारिकाके पूर्वार्ध भाग तक प्रकरणका] लक्षण कहा है [ग्रंथे उसके भेद दिखलाते हैं] ।

ग्रंथे ६७वीं कारिकाके उत्तरार्ध भागकी व्याख्या करते हैं । इसमें 'कल्पन-फल-वस्तूनां' इस पदमें 'कल्पन' का पदच्छेद 'कल्प + इन' यह किया जाना चाहिए । इस प्रकार का पदच्छेद करके ही उसका ग्रर्थ श्रागे दिखलाते हैं—

'बह' ग्रर्थात् पूर्वोक्त लक्षणवाला 'प्रकररम्' सात प्रकारका होता है । 'इन' [शब्दका ग्रर्थ] नायक है । फल [शब्दका ग्रर्थ] मुख्य साध्य है । ग्रौर फलके साधक उपाय 'वस्तु' [कहलाते] हैं । इनमेंसे एक, दो, या तीनके [कल्पित होनेके] विधानसे 'प्रकररम्' के सात

१. वणिगाद्यो विधव प्र० । २. क्लेशाद्यो प्र० । ३. सर्वमेलनेन ।

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द्वितीयो विवेक:

[ २०५

का० ६७, सू० ११६ ]

अथ नायिकायोगद्वारेण भेदसंख्यानमप्याह—

[सूत्र ११६]—कुलस्त्रो गृहवार्त्तायां पण्यस्त्री तु विपर्यये ।

विटे पत्यौ द्वयं तस्मादेकत्रशतिधाड्यद: ।। ।। [३]६६।।

महावार्त्तीयां गाईस्थ्योचितपुरुषार्थसाधके वृत्ते कुलजेव स्त्री नायिकात्वेन वरीयते । यथा ‘पुष्पदूतीके’ विपर्यये तु गाईस्थ्योचितपुरुषार्थोद्देश्येन वरीयते । यथा ‘तारदत्ते’ । उभययोगस्य विट एक विधाना-

दनयोरप्यवधारणात् । विटे गीत-नृत्य-वाद्यविचक्षणे धूर्त्त-पान-वेश्यादिपु प्रसक्ते कला-कुशले मूलदेवादौ पत्थौ नायकत्वेऽपि विवक्षिते वेश्या कुलस्त्री चैति द्वयं तदुचि-

तगाईह-स्थपुरुषार्थेपिच्चया निवन्धनीयम् । यस्मात् तु विटत्वादेव परस्त्रीप्रधानत्वम् । कुलस्त्री तु पित्रृ-पितामहाद्यनुरोधाद् गौरवात् । विटस्य पतितत्वानुवादाद् वरीयते । यथा ‘प्रकरणे’ विटो नेता लभ्यते । वेश्या-कुलजाभ्यां संकीर्णत्वादयं भेदोऽशुद्ध: । पूर्वों तु शुद्धौ स्त्रीसंकराभावात् । शुद्धभेदोरपि विट: ससहाय एक: संकीर्णे तु बहव: ।

केचित् तु वरीयते क्रमपि भूतसंकरुत्तमकटिकादिक संकीर्ण मन्यन्ते ।

मेद हो जाते हैं । उनमेंसे नायकके कलिप्त, श्रौत शेव दोहों [प्रश्नत्थ फूल श्रौर वस्तु] के कल्पित न होनेपर एक भेद होता है । इसी प्रकार फल श्रौर वस्तुमें भी [एकके कल्पित श्रौर

शेष दोके कल्पित न होनेपर एक-एक भेद होता है । इस प्रकार एकेकी कल्पनाके विधानसे तीन भेद बनते हैं । इसी प्रकार (१) नायक श्रौर फल, (२) नायक श्रौर वस्तु तथा (३) फल

ग्रौर वस्तु इन दो-दो के कल्पित, श्रौर शेव एकके कल्पित होनेपर दो-दो वाले तीन भेद होते हैं । नायक, फल श्रौर वस्तु तीनोंके एक साथ कल्पित होनेपर एक भेद बनता है । इस प्रकार

सबको मिलाकर ‘प्रकरण’ के सात भेद हो जाते हैं । [१-२] ६६-६७ ।।

इस प्रकार ६७ वीं कारिकाके उत्तरार्धमें नायक श्रादिके कल्पित होनेके श्राधारपर ‘प्रकरण’ के सात भेद दिखलाए हैं । श्रागे कुलस्त्री, वेश्या तथा दोनों प्रकारकी नायिकाश्रों

के वर्णित होनेपर इन सातों प्रकारके ‘प्रकरणों’ के तीन-तीन भेद श्रौर भी बन सकते हैं । इसलिए ‘प्रकरण’ के २१ भेद हो जाते हैं । इन भेदोंकों श्रागली कारिकामें दिखलाते हैं—

[सूत्र ११६]—गृहस्थोचित वृत्तमें कुलस्त्री, इसके विपरीत वृत्तमें वेश्या श्रौर विट

[घूर्त्त] के, पति [रूपमें वर्णित] होनेपर [कुलस्त्री श्रौर वेश्या] दोनों [नायिकाएं हो सकती

हैं ] । इसलिए [‘प्रकरण’ के पूर्वोक्त सात भेदोंमेंसे प्रत्येकके तीन-तीन भेद हो जानेसे सब

मिलकर] यह इक्कीस प्रकारका भी हो सकता है [३] ६७ ।

गृहवार्त्तमें श्रर्थात् गृहस्थोचित पुरुषार्थके साधक वृत्त [कथा] में वरीय श्रादि [नायकों] की कुलजा स्त्री हो नायिका रूपमें रखनी चाहिए । जैसे ‘पुष्पदूतीक’ में । इसके

विपरीत श्रर्थात् गृहस्थ धर्मके उचित पुरुषार्थंका वर्णन न होनेपर वेश्याको ही नायिका

रूपमें प्रस्तुत करना चाहिए । जैसे ‘तरंगदत्त’ [कुलजा श्रौर वेश्या] दोनोंके योग

का विटके साथ ही [प्रर्थात् विटकेके पति होनेपर] ही विधान होनेसे इन [कुलजा तथा

१. विवक्षते ।

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एतु च भेदेषु नायकवृत्तानुरूपं एव व्युत्पाद्य । छत्र हि वणिगमात्यविप्रायु-चिता त्रिवर्गप्राप्ति तदर्जने स्थैर्य-चयौद, व्ययपदि मूढता, कुलस्त्रीदूषणं, वेश्यासुसम्बोग-चातुर्यं, विट-द्यूतयो स्वरूपं, नायिकारागापरागलिगानि, हृदयग्रहणप्रयोगश्च, नायक-नायकयोरपरागकारस्मानि, चतुरोत्तममध्यमप्रकृते नायकस्य, उत्तम-मध्यमप्रकृतेर्नायिका-याश्च स्वरूपं, सामायुपायप्रयोगश्च व्युत्पाद्यादानुपदिश्यते । 'तस्मादिति' यतः शुद्ध-संकीर्णामेदतयारूपं सप्तभेदं 'प्रकरस' 'तस्मादेकविशतिधाष्ट्यद' एतत् 'प्रकरस' । चतुर्देश शुद्धत सप्त संकोर्णा प्रकरसभेदा नायकाय कल्पेताकल्पतत्त्वनोऽपि भेदा संसवर्न्ति । परमार्थस्त्वादुपेक्षिता ॥ ३ ॥ ६६ ॥

वेश्य] दोनोँका भी प्रवृत्तिधारगा [अर्थात् गृहवासत्मि केवल कुलजा ही, और उससे भिन्नमे केवल वेश्य ही नायिका हो सकती है इस प्रकारका नियम] है । 'विट' [अर्थात् गीत-नृत्य शौर वाद्यमें निपुरा छूत, पान शौर वेश्यादिके सेवनमे तत्पर कला-कुशल मूलदेवादि जैसे पतियोँके नायक रूपसे विवक्षित होनेपर वेश्या शौर कुलजा दोनोँ श्वपन-श्वपने योग्य गृह-स्थोचित पुंस्त्वार्यको [शौर उससे भिन्न पुरुषवार्यको] प्रपेक्षते [नायिका रूपमे] वेश्या शौर कुलजा दोनोकी रचना करनी चाहिए । इस [विट रूप पति] के छूत होनेके कारणा ही वेश्या प्रधान है शौर कुलस्त्री तो पिता पितामह प्रादिके धनुरोधसे [रखी हुई होनेके कारए] गौण होती है । विटके पति रूपमे कथन करनेसे वणिग् श्रादिके श्रतर्गत होने पर भी विट नायक हो सकता है यह बात निकलती है [अर्थात विट 'प्रकरस' का नेता तो हो सकता है किन्तु वह पूर्वोक्त वणिग् श्रामात्य या विप्रोमसे ही कोई होगा] । उनसे भ्रलग नही] । वेश्या तथा कुलजा [दोनो प्रकारको नायिकाओँ] से संकोर्ण होनेके कारणा यह भेद प्रशुद्ध भेद है । पहले दोनोँ [अर्थात् जिसमे केवल कुलजा ग्रहण की केवल वेश्या ही नायिका हो वे] शुद्ध भेद है । शुद्ध भेदोँमे भी सहायकोँके सहित एक विट होता है । संकोर्णोँमे तो ग्रनेक होते है कोई लोग वराक् जिसका नायक है इस प्रकार के 'प्रकरस' को भी शुद्धोँसे व्याप्त होनेके कारणा संकोर्ण मानते है । जैसे मुचककटिक श्रादि ।

इन भेदोँमे नायकके वृत्तके श्रनुसार ही सामाजक [व्युत्पाद] होते है । इसमे वासिक, श्रामात्य, विप्र श्रादिके उचित [धर्म श्रर्थ काम इत्यादि त्रिवर्गकी प्राप्ति, २ उसके प्राप्त वशिक, श्रमात्य, विप्र श्रादिके भली प्रकार सम्भोगका चातुर्य, ४ कुल-स्त्रियॉका श्राचार, ५ वेश्यादिक श्रादि प्रकार सम्भोगका चातुर्य, ४ कुल-स्त्रियॉका श्राचार, ५ वेश्यादिक नायिकाके श्रनुराग तथा प्रप्ररागके लिग, ६ हृदयको वशमे करनेके प्रयोग, १० नायक-नायिका दोनोँ के परस्पर श्रप्ररागके कारए, ११ चतुर उत्तम मध्यम प्रकृतिके नायक, तथा उत्तम मध्यम प्रथम प्रकृतिके नायिकाके स्वरूपोँका श्रोदर १२ सामादि उपायोँके प्रयोग का उपदेश सामाजिकोँको दिया जाता है । 'तस्मात्' इससे [यह श्रभिप्राय है कि] क्योँकि [पूर्वोक्त] सात भेदोँसे युक्त 'प्रकरस' [एक केवल कुल स्त्रीके नायिका] होनेपर शौर दूसरा केवल पण्यस्त्रीके नायिका होनेपर] दो शुद्ध श्रोदर एक संकोर्ण [अर्थात् जिसमे दोनोँ प्रकारकी नायिकाएँ होँ इस प्रकार] तोन भेद हो सकते हैँ । इसलिये यह 'प्रकरस' ७ × ३ = २१ प्रकारका भी हो सकता है । उनमेसे चौबह शुद्ध शोर सात संकोर्ण भेद होगे । नायि-

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का०६६, सू० १२० ]

द्वितीयो विवेक:

[ २११

अथाकल्प्यस्वरूपं निरूपयति—

[सूत्र ११६]—श्रत्राकल्प्य पुरा कल्पितं यदाऽऽनार्षमसद्गुरूणाम् ।

श्रत्र 'प्रकरोः' श्रकल्प्यं श्रनुत्पाच्च यत् तत् पूर्ववेकविकृतकाव्यादौ कल्पितं सत् समुद्रदत्ततच्चे श्रितादिवद् ग्राह्यम् । अथवा यदत्राकल्प्यं तत् पूर्वविंप्रणीतशास्त्रव्रयातिरिक्त-

बृहकथाद्युपनिबद्धं मूलदेव-तच्चरितादिवदुपादेयम् इति । यदेतद्-ग्रकल्प्यं तत्र प्राक्तनं निवद्धच्यते तत्रापि कविना रसपुष्टिहेतोरधिकावापो विधेय इत्यर्थः । श्रत्र पाञ्चार्षस्य वर्जनम् । तत्र श्रभूतगुणावापे श्रादालक्ष्य जुगुप्सा स्यादिति ॥

काव्योक्ते कल्पित श्रोअकल्पित होनेसे श्रोर भी श्राधिक भेद हो सकते हैं । परन्तु [लक्षप्रन्थोंमें] न पाए जानेसे उनका यहाँ वर्णन नहीं किया है [उनकी उपेक्षा कर दी है] । [३]६६ ॥

ग्रथ 'ग्राकल्प्य' [ग्रर्थात् जिसमें नाटयकारादिकी कल्पना नहीं की जाती है उन] के स्वरूपको कहते हैं—

[सूत्र ११६]—जिसकी कल्पना पहले [ग्रन्य काव्योंमें] की जा चुकी है श्रथवा अनार्ष प्रस्थोंमें वर्णित किन्तु [प्रसद्गुरूणाम् श्रथवा] नवीन गुरूणसे युक्त [नाटयादि यहाँ 'प्रकरो' में] श्रकल्पित हो सकते हैं ।

यहाँ श्रर्थात् 'प्रकरो' में जो श्रकल्पित श्रर्थात् [कविके द्वारा स्वयं] श्रनुत्पादित होता है वह पूर्वं कवियोंके बनाए काव्योंमें कल्पित समुद्रदत्तादिके चरित्रके समान [यहाँ 'प्रकरो' में] ग्रहण किया जाता है । श्रथवा जो यहाँ श्रकल्पित होता है वह पूर्ववर्ती ऋषि-प्रणीत शास्त्रादिसे भिन्न बृहकथादि [ग्रनार्ष प्रस्थों] में उपनिबद्ध मूलदेवचरित्र प्रादिके समान उपादेय होता है । [किन्तु विशेषता यह होती है कि वह] 'प्रसद्गुरोः' श्रर्थात् पूर्वविकल्पित श्रथवा बृहकथादिमें वर्णित, जो चरित्र यहाँ [प्रकरोमें] श्रकल्पित रूपमें लिया जाता है वह भी, उसमें जो गुण वहाँ [कविके पाठमें] नहीं होते हैं उस प्रकारके पूर्वच गुरूण से युक्त होता है । श्रर्थात् पूर्व कवियोंके काव्योंमें श्रोर बृहकथादिमें जो गुण उसमें नहीं से युक्त होता है । श्रर्थात् पूर्व कवियोंके काव्योंमें श्रोर बृहकथादिमें जो गुण उसमें नहीं

दिखलाए गए हैं इस प्रकारके रसके परिपोषक श्रपूर्व वचन-विशेषादि रूप गुण जिसमें हों इस प्रकारका ['प्रकरः'] होना चाहिए] इसमें जो कुछ पुरानी बात कही जाए उसमें भी रस की परिपुष्टिकेलिए कविको नई बात श्रोर बढा देनी चाहिए । यह श्रभिप्राय है ! इसी-

लिए यहाँ [ग्रनार्ष पदोंसे] श्रार्थ [चरित्रों] का निषेध किया गया है । क्योंकि उन [ग्रार्थ चरित्रों] में नवीन गुरूणका वर्णन होनेपर श्रादालु लोगोंको घृणा हो जाएगी ॥

[इस प्रकार 'प्रकरो' के लक्षणमें नाटकसे भिन्न] श्रभिप्रायाद्भूत कार्यको कह कर ग्रब [नाटकके समान ही जो-जो बातें 'प्रकरो' में भी पाई जाती है उन] उत्सगंर्भूत [सामान्य बातों] का ['प्रकरो' में] प्रतिदेश करते हैं—

१. कल्पस्वरूपं ।

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२१२ ]

नाट्यदर्पणम् [ क० ७०, सू० १२१

[सूत्र १२०]—शेषं नाटकवत् सर्व कैशिकीवृत्तांतं विना ॥ [४] ६७॥

उक्तादौ वागीक-विप्र-सचिव-स्वाम्यादिकालिदासैःश्लेष्य ऽपरमभिनेयप्रबन्धो-

चितं फल-श्रद्ध-उपाय-दशा-संधि-संध्यंग-प्रवेशक-वृत्तं भक-श्रृंगारवतार-श्रृंगमुख-चूलि-

कावृत्तिभेद-रसादिकं यथा नाटके लचितं तथात्रापि सर्वमौचित्यानतिक्रमेणायोज्यम्‌।

वृत्तिचरित्रष्टच्यास्यातिदेशेऽपि कैशिकीवाहुल्यं न निवन्धनीयम्‌। क्लेशप्राचुर्येण शृङ्गार-

हास्ययोः प्रलपन्तान्‌ । यथा मृच्छकटिका-नाटकटी-पणिकन्यासंगतादिशु । अतन्तु श्रृङ्गार-

मालतीमाधवे कैशिकीवाहुल्यमुपनिबन्धः, 'तत्नु श्रृङ्गारभिप्रायमनुरूपद्धीति ।

तदयं संक्षेपः—यस्य पूर्वप्रसिद्ध एवार्थः कुतूहलं श्रासौ मुनिप्रणीतशास्त्रप्रसिद्ध-

चरितेन नाटकेन राजादिरुप्तमप्रकृतित्वं त्याप्यते । यस्य पुनरुपलब्धचेष्टे कुतूहलमसौ

वागीशादिभिरभिध्यमध्यमप्रकृति: 'प्रकरोति' दुमेंधसां हि न्याय्ये वत्मंनि प्रवृत्यर्थं कवयोऽ-

भिनेयप्रबन्धान्‌। ग्रथनन्तरिति ॥ [४] ६७ ॥

स्याथ प्रकरणान्तरोहिष्टां नाटिकां लक्ष्यतुमाह—

[सूत्र १२०]—कैशिक्याः पूर्र्वंताको छोड़कर शेष सब नाटकके समान 'प्रकरण' में

भी होता है ॥ [४] ६७ ॥

[प्रकरणके लक्षणमें विशेष रूपसे कहे हुए] वराइक्‌ विप्र, श्रथवा श्रग्रामात्यके

नायकत्वादि विोशष लक्षणके श्रतिरिक्त श्रभिनेय प्रबन्धके योग्य श्रनयन १ फल, २ अंक, ३

उपाय, दशा, ४ संधि, ६ संध्यंग, ७ प्रवेशक, ५ वृत्तं भक, ९ श्रृंगारवतार, १० श्रृंगमुख,

११ चूलिका, १२ वृत्तिभेद श्रौर १३ रसादिक सब जैसे नाटकोंमें कहे गए हैं उसो प्रकार

श्रौचित्यका श्रतितिक्रमरण करते हुए यहाँ ['प्रकरण' में] भी प्रयुक्त करना चाहिए । [इस

सामान्य नियमसे सान्वती श्रग्रभटी कैशिकी भारती श्रादि] चारों वृत्तियोंकी प्राप्ति होनेपर

भी ['प्रकरण' में] कैशिकोके बाहुल्यकाप्रयोग नहीं करना चाहिए । क्योंकि उसमें क्लेशका

श्राधिक्य होनेसे शृङ्गार श्रो हास्यका प्रभावर कम होता है [इसलिए 'प्रकरण' में कैशिकी

वृत्तिका श्राधिक प्रयोग उचित नहीं होता है]। जैसे मृच्छकटिक, पुष्पदूतिक श्रौर तरंगदत्त

श्रादि [प्रकरणोंमें] [कैशिकी वृत्तिका श्राधिक प्रयोग नहिं किया गया है]। भवभूतिने

जो श्रप्रणी मालती माधव ['प्रकरण' में] कैशिकोका प्रचुर प्रयोग किया है वह वृद्ध-सम्प्रदाय

[श्रर्थात् पूर्व श्राचार्यो मत] के श्रनुकूल नहीं है ।

इसका सारांश यह हुंआ कि—जिनके पूर्वप्रसिद्ध चरित श्रादिम हों श्रामाश्च

होती है उन राजादि उत्तम प्रकृतिके लोगोंको मुनियोंके बनाए हुए शास्त्रादिमें प्रसिद्ध

चरित वाले नाटकाविके द्वारा हो ध्युत्पत्ति कराई जाती है । श्रो जिनको कल्पित श्रथमें

श्रभिनेय होती है उन मध्यम प्रकृति वाले वागीश श्रादिकोंके 'प्रकरण' के द्वारा [ध्युत्पत्ति कराई

जाती है]। क्योंकि मन्दबुद्धियोंको उचित मार्गमें प्रवृत्त करानेकेलए ही कविजन श्रमिनेय

[नाटकादि] प्रबन्धोंकी रचना करते हैं ॥ [४] ६७ ॥

३. तृतीय रूपक भेद 'नाटिका' का लक्षण

ग्रंथ 'प्रकरण' में श्रनन्तर कही हुई 'नाटिका' का लक्षण करनेकेलए कहते हैं—

१. तत्नु त्याप्यते ।

२. दृश्यं त्याप्यते ।

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[सूत्र १२१]—चतुरंका बहुस्रीका नुपेशा स्त्री-महीं-फला । कलप्यार्था कैशिकीमुख्या पूर्वरूपद्रव्योत्तिथा ॥ [५] ७०॥ प्रख्याति-ख्यातितः कन्या-देव्योर्नाटी चतुर्विधा । 'चतुरंक' इति । अवरस्थात्रयसमाप्तिपरिच्छिन्ननाट्योऽङ्कः। कस्याश्चिदवस्थाया: प्रभूततरसेडवस्थान्तरे समावेशेन युगपदवस्थाद्वयसमाप्त्या अङ्कविनिर्देशे चत्वारोडङ्कः । शलपं हि वृत्तं नाटिकायामतो वृत्तसंश्रयार्थमवस्थाया: समावेशः । बहुस्रीकता च कैशिकीमुख्यस्वेन भृङ्गाररसबहुल्यान् । शृङ्गार एव ललिताभिनयात्मका: । क्रियते देवो-द्दूती-सखी-चेटी-कन्यका जयः । नृप: कैशिकीप्रधानत्वाद् धीरललितो राजा ईशो नेता यस्याम् । शृङ्गार एवात्र प्रकारेणोद्भवत्वेऽपि सर्वो राजोचितो व्यवहारः । नायकानुसारित्वान् सर्वव्यवहारस्य । 'स्त्री-महींफला' इति स्त्रीलाभपुरसरराज्यप्रामिफला । 'कल्प्यार्था' इति कर्मे-कर्मकारकयोरुत्पत्तिस्थां 'र्थ:' फलमुपपाद्याश्र ॥

[सूत्र १२१ क]—चार अङ्कों वाली, अनेक स्त्री पात्रों, राजा रूप नायक, और स्त्री प्रथमा प्रतिपदि [की प्राप्ति रूप] फल वाली, कल्पित अर्थों से प्रधान, कैशिकी की बहुत, पूर्वकथित दोनों रूपकों ['प्रथान् 'नाटक' और 'प्रकरण'] से उत्पन्न, 'नाटिका' होती है । [यह 'नाटिका'का लक्षण हुआ] । [५] ७० ।

[ सूत्र १२१ ख ]—कन्या और देवी [दो प्रकारकी इसकी नायिकाएँ होती हैं उन दोनों] के [भी] सुप्रसिद्ध तथा प्रसिद्ध होनेसे [दो-दो भेद हो जाते हैं । इस प्रकार कुल मिलाकर] 'नाटिका'के चार भेद होते हैं ।

['नाटक'में साधाररतः 'कार्य'की पाँच 'अवस्थाएँ' बतलाई गई हैं और उनमेंसे प्रत्येक 'अवस्था'का वर्णन एक-एक अङ्कमें पूरा होनेके कारण 'नाटक'में कम-से-कम पाँच अङ्क श्रावश्यक माने गए हैं किन्तु 'नाटिका'में चार ही अङ्क बतलाए हैं । इसका उपादान करते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं कि—

'चतुरङ्क' इससे तीन अवस्थाओंकी समासिसे युक्त तीन अंक और किसी एक अवस्थाका प्रधानभूत अन्य प्रवेश्यमें समावेश कर एक साथ दो अवस्थाओंकी समासि वाला एक [चौथा] अङ्क, इस प्रकार चार अंक होते हैं । 'नाटिका'में कथावस्तु कम होनेके कारण कथा-वस्तुके संक्षेपकेलिए ही एक अवस्थाका [किसी दूसरी अवस्थामें] समावेश कहा गया है ।

['नाटिकामें] कैशिकीकी प्रधानताके कारण भृङ्गाररसकी प्रचुरता होनेसे बहुत स्त्रियाँ [प्राधयक] होती हैं । इसी कारण [वे स्त्रियाँ] ललित प्रभिनय वाली होती हैं । ['नाटिकाकी] स्त्रियाँ देवी, दूती, सखी, चेटी, और कन्या आदि होती हैं । ['नुपेशा'में] रूप [शब्द] से धीरललित राजा, [का प्रहण होता है ।] वह जिसमें स्वामी अर्थात् नायक हो [वह 'नुपेशा' नाटिका होती है]। इसीलिए [नाटिकाके] 'प्रकरण'से उद्भूत होनेपर भी उसमें सारा व्यवहार राजाके योग्य ही होता है । क्योंकि सारा व्यवहार नायकके प्रतिरूप ही उचित होता है । 'स्त्री-महींफला' इससे [यह बात सूचित की कि] स्त्रीलाभ पुरःसर राज्यप्रामि [नाटिकाका] फल होता है । 'कलप्यार्था' इसमें ['प्रथंते इति श्रर्थ:' इस प्रकारकी कमंपरक

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तेन द्वावनयोःप्रोत्पाद्यौ।

'कैशिकी' वृत्त्यमागलकृता, सा 'मुख्या' प्रधानं यस्याम्‌। मुख्यतश्च च शेषवृत्त्यपेच्चया बाहुल्यम्‌। तत् एवं गीत-नृत-वाच्य-हास्यादीनां श्रृङ्गारादीनां प्राचुर्यम्‌। पूर्वरूपकदयं 'नाटक', 'प्रकरण' च। तस्मादुत्थितमतुल्यानं यस्याम्‌। कैशिक्यप्राधान्यानुच्च यत् क्षोभ्रायं कामफलं 'नाटक', 'प्रकरण' च किञ्चित्, तदिह ग्राह्यम्‌। अन्येषामनुरुपतया-भावात्‌। पतदृश्योद्योतिततयेन चावस्था-सन्धि-सन्ध्यङ्ग-बीज-बिन्दु-पताका-प्रकरी-पताकास्थानक-श्रङ्ग-प्रवेशक-विक्रमक-इतिवृत्तभेदादीन्, उभयभेदसाधारण्येन लभ्यन्ते। तत्र 'नृपेशा' इति नाटकधर्मः; तत् एवं नायकोड्कलिपतः 'कल्यान्थी' इति प्रकरणधर्मः । पतावल्लक्षणत्वात्‌ ॥ ७० ॥

युगपन। अपरिगृहीता कन्या। ध्यान्तःपुरसङ्गीतभेदभिन्ना। परिगृहीता तु देवी। तयोःः शृङ्गार्यते ग्रानेनेति श्रायः' इस प्रकारकी करण-परक ध्युत्पत्ति हो सकती है [इसलिए] करण गौर करण-परक [द्विविध] ध्युत्पत्तियोंके करणके फल गौर उपाय दोनों 'श्रथ्य' होते हैं [प्रथमतः करणमें ध्युत्पत्तिके श्रानुसार फलको 'श्रथ्य' कहा जाता है और करण गौर ध्युत्पत्तिके श्रानुसार 'उपाय' को 'श्रथ्य' कहा जा सकता है इसलिए [नाटिकामें फल गौर उपाय] ये दोनों कलिपत होते हैं । [यह श्राभिप्राय है] । 'कैशिकी' का लक्षण श्रागे किया जायगा। वह जिसमें मुख्य श्रर्थात् प्रधान हो [यह 'कैशिकीमुख्य' का श्रर्थ है]। प्रन्य [भारती श्रारभटी गौर सात्वती] वृत्तियोंकी श्रपेक्षा [कैशिकीक] बाहुल्य हो [उसकी] मुख्यता है इसीलिए [नाटिकामें] गीत, नृत्य, वाच्य गौर हास्य श्रावि श्रृङ्गारके श्रङ्गोंकी प्रचुरता रहती है । पहिले कहे हुए जो दो रूपकभेद श्रर्थात् नाटक गौर प्रकरण उनसे जिसकी उत्पत्ति होती है [वह नाटिका होती है यह 'पूर्वरूपद्वययोगस्थितता' पदका श्रर्थ है]। 'कैशिकी' की प्रधानता होनेके कारण जो कोई नाटक श्रथवा प्रकरण स्त्री-बाहुल्य और कामफल वाला हो उसका हो [नाटिकाकी प्रकृतिके रूपमें] ग्रहण करना चाहिए। प्रन्य [नाटक या प्रकरणमें] [नाटिकाके स्वरुपके] श्रनुकूल न होनेसे [अन्य प्रकार के नाटकादिको नाटिकाकी प्रकृति नहीं माना जा सकता है]। इन [नाटक तथा प्रकरणों] दोनोंसे उद्भत होनेके कारण श्रवस्था, सन्धि, सन्ध्यङ्ग, बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी, पताकास्थानक, श्रङ्क, प्रवेशक, विक्रमक, गौर कथावस्तुक। भेद श्रावि 'नाटक' तथा 'प्रकरण' दोनोंमें मिलते-जुलते हो [नाटिकामें] लिए जाते हैं। नाटिकामें 'नृपेशा' [श्रर्थात् राजा नायक होता है] यह नाटकका धर्म है। इसीलिए नायक कलिपत नहीं होता है। श्रौर 'कल्यार्थी' यह 'प्रकरण' का धर्म है। ['श्रथ्य' शब्दसे ध्युत्पत्तिभेद द्वारा फल श्रौर उपाय दोनोंका ग्रहण होता है यह बात श्रभी कह चुके हैं। इस कारण नाटिकामें फल श्रौर उपाय दोनों कलिपत होते हैं। यह 'कल्यान्थी' पदका श्राभिप्राय है। इस प्रकार नाटिकामें 'नाटक' तथा 'प्रकरण' दोनोंके धर्म पाए जाते हैं इसलिए नाटिकाको 'पूर्ववद्वययोगस्थितता' कहा है]। इतना हो [नाटिका-

का] लक्षण है [ग्रन्थे उसके भेद कहे हैं। लक्षणभाग यहाँ समाप्त हो गया है ]। [६] ७०। 'श्रभिज्ञाति-व्याति.' इसका यह श्राभिप्राय है कि-इस नाटिकामें कन्या श्रौर देवी दोनों एक साथ नायिकाएँ होती हैं। प्रपरिगृहीता [स्त्री] 'कन्या' होती है। श्रौर वह ग्रान्तःपुरके

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प्रत्येकं प्रसिद्धा-प्रसिद्धाभ्यां चतुर्थमद्वानाटिकापि चतुर्विधा । तत्रैव 'देव्यप्रसिद्धा कन्या प्रसिद्धा इत्येकः । देव्यप्रसिद्धा कन्यकाप्यप्रसिद्धेति द्वितीयः । देवी प्रसिद्धा कन्यापि प्रसिद्धेति तृतीयः । देवी प्रसिद्धा कन्यापि अप्रसिद्धेति चतुर्थः । उभयोः प्रसिद्धवेडपि च कलिप्तार्थस्वं नाटिकाया: । शन्यथासंविधानकरचनात् । नाटयति नर्तयति व्युत्पाच्यमानसोती स्वाच्च, गौरादिग्रहणात्प्रकृतिवाच्च डयोर 'नाटी' । शीलप्रकृतत्वादिलप्तियं 'कापि नाटिका इत्यपोति । शीलप्रधानत्वान् सुकुमारातिशयत्वाच्च शीलिङ्गसंज्ञानिर्देशः । एवं प्रकारण्यामपोति ॥

अथ 'नाटिकागतं कर्तव्यमुपादिशति—

[ सूत्र १२२ ]—अत्र मुख्याकृतो योगः पर्यन्ते नेतरस्यथा । [६] ७१। प्रेमाद्रौं वर्तमानस्यां नेता मुख्याभिशंकितः ।

संगीत श्रादि भेदोंके कारण अनेक प्रकारकी होती है । विवाहित [स्त्री] 'देवी' होती है । उन दोनोंकी प्रसिद्धि तथा श्रप्रसिद्धिके कारण [नायिकाके] चार भेद हो जानसे नाटिका भी चार प्रकारकी होती है । उनमेंसे (१) देवी श्रप्रसिद्ध हो श्रौर कन्या प्रसिद्ध हो यह पहल। भेद हुग्रा । (२) देवी श्रप्रसिद्ध हो श्रौर कन्य भी श्रप्रसिद्ध हो यह दूसरा भेद हुग्रा । (३) देवी प्रसिद्ध हो किन्तु कन्या श्रप्रसिद्ध हो यह तीसरा भेद हुग्रा । (४) देवी प्रसिद्ध हो श्रौर कन्या भी प्रसिद्ध हो यह चौथा भेद हुग्रा । [देवी श्रौर कन्या] दोनोंके प्रसिद्ध होनेपर भी [नाटिकामें उनके चरित्र श्रादि रूप] संविधानकी रचना [प्रसिद्ध कथाकी श्रपेक्षा] कुछ श्रन्य ही प्रकार से कर देनेसे नाटिका 'कल्प्यार्था' हो जाती है । [ग्रगे नाटिका शब्दकी व्युत्पत्ति दिखलाते हैं । यह शब्द न तनतने धातुसे बना है । उसके श्रनुसार] जो सामाजिकों [व्युत्पाच्यमानसो] के मनोको नचाती है [ग्राह्लादित करती है] इस विषयमें श्रच्-प्रत्यय करके [विदिगौरादिषच सूत्रमें] गौरादि गणके श्राकृति गण होनेसे डो प्रत्यय होनेपर 'नाटी' [यह पद सिद्ध] होता है । [यह नाटी पद नाटिकाका पर्यायवाचक शब्द ही है । नाटी पदसे शल्पार्थमें कप्-प्रत्यय करके 'नाटिका' पद बन जाता है । इस बातको ग्रागे कहते हैं] श्रल्प कथावस्तु होनेके कारण श्रल्पार्थमें कप्-प्रत्यय होकर 'नाटिका' यह भी [रूप बनता है] [नाटिका श्रौर नाटी पदोंमें जो स्त्रीलिङ्गका प्रयोग किया गया है उसका उपपादन करते हैं] स्त्री-प्रधान होनेके कारण श्रौर सुकुमार्यंका प्रतिशय होनेके कारण स्त्रीलिङ्गकी संज्ञाके द्वारा निर्देश किया गया है । इसी प्रकार 'प्रकरखी' [इस पद] में भी [स्त्रीलिङ्गके पदका प्रयोग समभ लेना चाहिए] ।

[ सूत्र १२२ ]—उस [नाटिका] में, ग्रन्तमें [ग्रर्थात् निर्वहण-सन्धिमें] नायकका मुख्य नायिका द्वारा ग्रन्थ [कन्या] के साथ योग कराया जाना चाहिए । [ग्रौर उसके पूर्व] नायक प्रेमासक्त होकर भी मुख्य नायिकासे डरता हुग्रा-सा ग्रन्थ [कन्याके साथ प्ररणय-व्यापार] में प्रवृत्त होता है ।

१. देव्यचसिप्र । २. सुकुमारातिशयत्वाच्च । ३. नायकागत प्र ।

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‘छत्र’ नाटिकायां ‘मुख्यां’ नृपवंशजत्व-गम्भीरत्व-परिपुष्टतवादिभिः प्रधानं नायिका, तदशादनतःपुरसंगीतकसम्भन्व्येन श्रुति-दर्शनाभ्यामासन्रया ‘ग्रन्थया’ ‘कन्यया’ ‘योगः’ सम्वन्धो नायकस्य ‘पर्यन्ते’ निर्वहणासनधौ दर्शयितव्यः ॥ [६] ७१ ॥ नेता च तत्त्वाभदार्चक_प्रवर्धमानानुरागो मुख्यातश्रकितहृदयः कन्यायासुप- वनादिपु स्केतस्थानेषु संघटते । कृत्यान्तरमपि दर्शयति—

[सूत्र १२३]—देव्यो दक्षाडपराः मुग्धा समा धर्मा ह्योः पुनः ॥[७] ७२ ॥ क्रोध-प्रसाद-प्रहासो-रति-च्छद्मादि भूरिशः । देवो दक्षा चतुरा नितम्बनधनीया । छ्यपराः तु कन्या मुग्धा चातुर्यवरजिता । धर्मोः- पुनः चत्रियवंशजत्व-नय-विनय-लज्जा-महत्त्व-गाम्भीर्यादः, तुल्यो द्रयोः देवो-कन्य- योर्नितम्बनीया: ॥ [७] ७२ ॥ तथा कन्यानुरागपरिज्ञाने देव्या राजनि क्रोधः । राज्ञा च तस्या: प्रसादनम् । देव्या च राज्ञि कन्यायसमागमे विद्नः । राज-कन्ययोः परस्परं रतिः । सर्वेषामान्योऽन्य वचनम् । छ्यादि शब्दादनन्यदपि श्रं ‘गारंगं भूयौ भूयौ निवन्थनीयमिति ।

इस नाटिकामें राजवंशमें उत्पन्न होनेके कारण, गम्भीरत्वके कारण श्रौर परिपुष्टता होनेके कारण, मुख्य नायिका हो प्रधान होती है । उसके द्वारा ग्रन्थःप्ररके संगीत श्रादिके सम्बन्धसे श्रवण या दर्शन द्वारा प्राप्त दूसरो कन्याके साथ नायकका सम्बन्ध ग्रन्थमें श्रार्यतः निर्वहण सन्धिमें दिखलाना चाहिए ॥ [६] ७१ ॥ ग्रौर उसके [प्रार्थतः निर्वहण सन्धिके] पहिले तो नायक [अन्य कन्याके प्रति कमःः] ग्रनुरागको वृद्धि होनेपर भी मुख्य नायिकासे डरता हुग्रा-सा हो उपवन श्रादिमें कन्यासे मिलता है ।

[सूत्र १२३]—देवोको चतुरा रूपेमं, श्रौर [कन्या श्रार्यात्] कन्याको मुग्धा रूपमें [दिखलाना चाहिये] । दोनोके [कुलजत्वादि] धर्म समान [दिखलाने चाहिये] । ७ [७२] ॥ [श्रौर नाटिकाकी ग्राख्यानवस्तुके वीचमें] क्रोध, प्रसाद, विद्न, रति श्रौर छल श्रादि- का प्रचुर-प्रयोग दिखलाना चाहिए । देवी दक्ष श्रार्यात् चतुरा रूपमें प्रदर्शित करनी चाहिए । श्रौर दूसरी कन्या तो मुग्धा श्रर्थात् चातुर्यरहित [दिखलानी चाहिए] । क्षत्रियवंशजत्व, नय, विनय, लज्जा, महत्त्व, गाम्भीर्य ग्रादि धर्म दोनों श्रर्थात् देवी तथा कन्यामें समान रूपसे दिखलाने चाहिए ।

कन्याके [प्रति राजाके] ग्रनुरागका ज्ञान होनेपर राजाके प्रति देवोका क्रोध, ग्रौर राजाके द्वारा उस [देवी] को प्रसन्न करनेका यत्न [दिखलाना चाहिए] । देवोके द्वारा राजाके कन्याके साथ समागममें विद्न उपस्थित करना, राजा श्रौर कन्याका परस्पर ग्रनुराग, श्रौर सबका एक दूसरेकी धोखा [देकर कार्य सिद्ध करनेका प्रयत्न नाटिकामें दिखलाना चाहिए] । आदि शब्दसे श्रं ‘गारकके अंगभूत ग्रन्थ धर्मोंको भी बार-बार प्रथित करना चाहिए ।

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काङ ७३, सू० १२४ ]

द्वितीयो विवेक: [ २१७

अथ नाटिकालक्षणातिदेशेन 'प्रकरण्या' लक्षणयति—

[सूत्र १२४]—एवं प्रकरणी किन्तु नेता प्रकरणोदितः । ॥ [५] ७३ ॥

एवं नाटिकोक्त-चतुरङ्कलवादिलक्षणानुसारेणैव 'प्रकरण्या' प्रथनीया । किन्तु नेता प्रकरणोक्तो वशिगादिः तेन वशिगाद्युचित एवं वेष-संभोगादिः सर्वोऽप्यत्र व्यवहर्तव्यः । स्त्रियोचितकलाविहारश्चैव फलमपि महालोभस्य वशिगादेरनुचितत्वात् स्त्रीप्राप्तिपुरः-

सरं द्रव्यलाभादिकं दृष्टव्यम् ।

कैशिकीवहुलतवं च नाटकधर्मः । प्रकरणस्याल्पकैशिकीत्वात् । कलाप्यार्थेतवं वशिगादिनायकत्वं च प्रकरणधर्मः । तथा नाटकप्रकरणयोः स्थिति-त्वेडपि नाटिका-प्रकर-

रीकयोः नाटकोक्तनायकानुसारेणैव नायिकाव्यपदेशः । नायकानुसारित्वात् सर्वव्यव-

हाराख्यम् । प्रकर्षेण क्रियते कलाप्यते यस्म्यार्थे इति 'प्रकरणी' । श्रृङ्गारार्थः कपी 'प्रकरणिका' । एते च द्वे रूपि मुख्यरूपद्वयसङ्करनिष्पन्नत्वात् सङ्कीर्णाभेदरूपे । एवं-

मन्येडपि सङ्करभेदा रूपकद्वय-त्रयादि-सङ्कर्येण सम्भवन्ति परमश्रृङ्गारवृजकत्वाच्च न ते लघ्यन्ते इति । नाटिकायां च राज्ञः, प्रकरणिकायान्तु वशिगादीनां विलासप्रधानं

धर्मार्थीवरौधि वृत्तं नाटक-प्रकरणयोःव इत्युपद्यायम् ॥७३॥

२. चतुर्थ रूपक भेद 'प्रकरणी' का निरूपण

इस प्रकार यहाँ तक नाटिका के लक्षण का निरूपण कर ग्रन्थकार 'प्रकरणी' के लक्षणका निरूपण प्रारम्भ करते हैं ।

ग्रन्थ 'नाटिका' के लक्षणके 'अतिदेश' द्वारा [ग्रन्थके धर्मका ग्रन्थके साथ सम्बन्ध दिखलाना 'अतिदेश' कहलाता हैं] 'प्रकरणी' का लक्षण करते हैं—

[सूत्र १२४]—इस प्रकार [अर्थात् नाटिका की रचना के समान हो] 'प्रकरणी' [की रचना करनी चाहिए] किन्तु उसमें, 'प्रकरण' में कथित [वशिक आदि में से ही कोई] नायक होना चाहिए ॥ [५] ७३ ॥

इसी प्रकार श्रथान्तु नाटिकामें कहे चतुरङ्कलवादि लक्षणों कि अनुसार 'प्रकरणी' की रचना करनी चाहिए । किन्तु [इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि प्रकरणीमें] 'प्रकरण' में कहे हुए वशिक श्रादिमें से ही [कोई] नायक होना चाहिए । इसलिए वशिक श्रादि के योग्य ही वेष श्रौर सम्भोग श्रादि सारा व्यवहार यहाँ दिखलाना चाहिए । स्त्री नायिका भी उसी जाति के श्रनुरूप होनी चाहिए । स्त्रीप्राप्ति सहित द्रव्यलाभ रूप फलके वशिक श्रादिकेलिए श्रनुचित होनेसे स्त्रीप्राप्तिपूर्वक द्रव्यलाभादि फल भी ['प्रकरण' के समान हो] होना चाहिए ।

['नाटिका' के समान 'प्रकरणी' में भी नाटक श्रौर 'प्रकरण' दोनोंके धर्मों का समा-

वेश होता है जिनमेंसे] कौशिकी का बाहुल्य नाटकका धर्म है । क्योंकि 'प्रकरण' में कौशिकी की न्यूनता होती है । ['प्रकरणी' में] कौशिकी-बाहुल्य रहता है वह धर्म नाटकसे लिया जाता है ['प्रकरणी' है 'प्रकरण' से नहीं] । कलिप्त श्रथवा वशिगादिका नायकत्व ये दोनों 'प्रकरण' के धर्म [प्रकरणीमें ग्राते हैं] । नाटक श्रौर 'प्रकरण' से उत्पन्न होनेपर भी 'नाटिका' श्रैर 'प्रकरणी' दोनोंमें, नाटक [ग्रौर प्रकरण] में कहे हुए नायकों के श्रनुसार हो नायिकाका

व्यवहार होना चाहिए । क्योंकि सारे व्यवहार नायक के श्रनुसार ही उचित होते हैं ।

१. नायिकानुसारेण नायक व्यपदेशः

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स्वथ पूर्वादशा-संधीनी रुपकाभ्यो लच्यित्या नूतनदशा-संधीनी निरुप्यन्ते। तत्रापि नायकप्रत्यासत्या प्रथमं 'व्यायोग' लच्यति—

[सूत्र १२४]—एकाहचरितैकांको गर्भोर्मिशिवर्जितः । शस्त्रोनिमित्तसंग्रामो नियुद्धस्पर्धनोद्भवतः ॥ [५] ७४ ॥

स्वल्पयोषिज्जनः ख्यातवस्तुर्दीप्तरास्रयः । श्रदिव्यभूपतिस्वामी व्यायोगो नायिकावर्जितः ॥[१०]७५॥

एकदिवसनिवर्तनीयकार्य एक एवं श्रद्रढो यत्र। एकाहचरितत्वाच्च काव्य-

['प्रकररण' के समान ही 'प्रकरणी' का निर्वाचन ग्रंथे दिखलाते हैं] जिसमें [ग्राश्रयान-वस्तुरूप] अर्थ भली प्रकारसे किया प्रर्थात् कलिप्त किया जाता है वह 'प्रकरणी' कहलाती है [यह 'प्रकरणी' शब्दका ग्रव्ययार्थ हुग्रा] श्रालंकार्यमें कुप्र-प्रथय करके 'प्रकररिका' [पद भी बन जाता है]। [नाटिका ग्रौर प्रकरणी] दोनों ही [नाटक तथा प्रकरण रूप] मुख्य दो रूपकों के संकरसे उत्पन्न होनेके कारण संकीर्र्णभेद रूप हैं इसी प्रकार दो या तीन रूपकों के संकरसे उत्पन्न ग्रन्थ संकर भेद भी हो सकते हैं किन्तु [लक्ष्य ग्रन्थोंके रूपमें] न पाए जानेसे ग्रौर मनोरञ्जक न होनेसे हमने उनके लक्षण नहीं किए हैं। 'नाटक' ग्रौर 'प्रकरण' के समान हों नाटिकाओं ग्रौर 'प्रकरणीका' में व्रलिप्रादिके, धर्म एवं ग्राश्रयके

ग्रविरोधी विनीतप्रधान वृत्तिका वर्णन करना चाहिए [७] ७३ ॥

व्। पचचम रुपकभेद 'व्यायोग' का निरुपरण

इस प्रकार नाटक, प्रकरण, नाटिका ग्रौर प्रकरणी इन चार रुपकभेदोंका निरुपरण कर चुकनेके बाद ग्रंथ पचचम भेद 'व्यायोग'के लक्षणका श्रवसर श्राता है। यहां तक जिन चार रुपकों भेदोंका निरुपरण किया गया है उन सममें सम्पूर्ण दशाश्रों ग्रौर संधियों-

का वर्णन था। किन्तु यहांसे ग्रंथे जिन रुपकभेदोंका वर्णन किया जाएगा उनमें दशा ग्रौर संधि दोनों न्यून संख्यामें रहेंगी। इसी भेदको दिखलाते हुए ग्रन्थकार ग्रंथे 'व्यायोग'-

का लक्षण ग्रादि करते हैं

पूर्वांग दशाश्रों ग्रौर पूर्व संधियोंसे युक्त [१ नाटक, २ प्रकरण, ३ नाटिका ग्रौर ४ प्रकरणी इन चार] रुपकोंके लक्षण कर चुकनेके बाद ग्रंथ न्यून दशा ग्रौर संधियोंसे युक्त

[रुपक भेदों] का निरुपरण [प्रारम्भ] करते हैं। उनमें से भी ['व्यायोग'] में नाटकादि पूर्वोक्त

चार रुपकभेदोंके समान [?] मनुष्य नायकका सम्बन्ध होनेके नाते हुए 'व्यायोग'का निरुपरण करते हैं—

[सूत्र १२४ क ]—एक दिनके वृत्तान्तको दिखलाने वाले ग्रौर एक ही ग्रंक से युक्त, गर्भ तथा विमर्श [विमर्श] संधियोंसे रहित, स्त्रीसे भिन्न निमित्तसे संग्राम जिसमें दिखलाया गया हो,

मल्लयुद्ध ग्रौर स्पर्धासे दीप्त । [५] ७४ ।

[सूत्र १२४ ख ]—बहुत कम स्त्री पात्रों वाला, प्रसिद्ध कथा-वस्तु तथा दीप्त रसोंसे

सम्पन्न, श्रदिव्य [देवता तथा राजा ग्रादिसे भिन्न सेनापति श्रादि रूप] नायकसे युक्त

रुपक 'व्यायोग' [कहलाता]है। किन्तु उसमें नायिका नहीं होती है । [१०] ७५ ।

एक दिनमें ही कार्यकी समाप्तिको प्रदर्शित करने वाला, एक ही ग्रंक जिसमें हो

[वह रुपकभेद 'व्यायोग' कहलाता है। यह व्यायोगका मुख्य लक्षण है]। एक ही दिनके

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का० ७४-७५, सू० १२४ ] द्वितीयो विवेक: [ २१६

मस्य । दीप्तरस-नायकयुक्तत्वात् गर्भविमर्शविवर्जनम् । दीप्तरसो हि कालच्येपास्थितिप्रुतया विनिपातानां शंकया च प्रारम्भ-प्रयत्नानन्तरं फलागम एव यतते ।

एवमीशामग्ननायकात्3 श्याप । डिम-समवकारनायकास्तु बहुत्तरफलार्थित्वेन प्राप्त्याशायुक्ता दीप्तरसतवेन च विनिपाताशङ्किनो निर्विमर्शकाः । भाण-प्रहसनयो-नायकस्याधमतवाद्, उत्सृष्टिकाङ्के शोकार्थत्वाद्, वीथ्यां चाश्रयत्वाद्, सर्वेषामल्पवृत्तत्वाच्च प्रारम्भानन्तरं फलागमिनवन्धः । नाटकादिनायकस्य तु प्रेक्षणीयकारित्वे-नार्थिसहत्वान् हित-बहुफलकरत्वाद्यारम्भत्वाद् विनिपातप्रयत्नापकरणैरच सर्वावस्थासम्भवेन पृथ्चापि सन्ध्यो भवत्येव ।

वृत्तान्तका वर्णन होनेसे इसमें केवल एक ही शृङ्ग होता है । दीप्तरस [रोद्र वीर श्रादि रसप्रधान] नायकसे युक्त होनेके कारण [हो] गर्भ तथा शवर्म सन्धियोंका निर्देश किया गया है । दीप्तरस वाला [नायक] कालक्षेपको [व्यर्थात् कार्यसिद्धिमें विलम्बको] सहन नहीं कर सकता है [जल्दीबाज होता है] । श्रौर काम बिगड़ जानेके डरसे [कालक्षेप किए बिना] प्रारम्भ श्रौर प्रयत्न [रूप दो श्रवस्थाओं] के ग्रनन्तर हो फलको प्राप्त करनेका यत्न करता है । [इसलिए इसमें गर्भ तथा विमर्श सन्धियोंका श्रवसर नहीं श्राता है] सन्धि तथा श्रवस्थाथोंकी न्यूनताका उपादान इसी प्रकार 'ईशामग्न' [नामक रूपकभेद] के नायक भी [कालक्षेपको सहन नहीं कर सकते हैं इसलिए उसमें भी गर्भ शौर विमर्श सन्धियाँ नहीं होती हैं] । 'डिम' श्रौर 'समवकार' के नायक तो प्रचुर फलकी कामना वाले होनेसे 'प्राप्त्याशा' [श्रवस्थावाली 'गर्भ सन्धि'] से युक्त तो होते हैं किन्तु दीप्तरस [जल्दीबाज] होनेसे विनिपात [कार्य विनाश] की शंकासे युक्त होनेके कारण 'विमर्श' रहित होते हैं । [इसलिए 'डिम', 'समवकार' श्रादि रूपकभेदोंमें 'गर्भसन्धि' होता है किन्तु 'विमर्शसन्धि' नहीं होता है] । 'भाण' श्रौर 'प्रहसन' [नामक रूपक-भेदों] के नायकके प्रथम होनेसे, श्रौर 'उत्सृष्टिकाङ्क' में झोकका प्राधान्य होनेसे, तथा 'वीथी' श्रादि [रूपकभेदोंमें नायकके] सहायक-विहीन होनेसे, श्रौर इन सभीके स्वल्प-वृत्तवाला होनेसे प्रारम्भ [प्रवृत्त्यावस्था] के बाद ही [बीच की यत्न, प्राप्त्याशा श्रादि तीन श्रवस्थाओं को छोड़कर] फलप्राप्ति [रूप पतचमावस्था] का वर्णन किया जाता है । नाट-कादिके नायक, तो विचारपूर्वक कार्य करने वाले, कष्टसहिष्णु, हितकर श्रौर बहुफल वाले कार्यके श्रारम्भ होनेसे [नाटकादिमें] सारी श्रवस्थाथोंका सम्भव होनेसे पाँचों सन्धि होते हो हैं ।

इस प्रकार इस ग्रन्थछेदमें ग्रन्थकारने विभिन्न रूपक भेदोंके नायकोंकी मनोवृत्ति का विश्लेषण करते हुए दीप्त स्वभाव वाले नायक जलदबाज होते हैं श्रौर कार्यमें कोई विध्न न श्रा जाय इस दृष्टिसे तुरन्त ही फल प्राप्तिका यत्न करते हैं इसलिए उस प्रकारके नायकों से युक्त 'व्यायोग' श्रादि रूपकभेदोंमें एक, दो या तीन श्रवस्थाथोंको छोड़कर शेष दो या तीन श्रवस्थाथों श्रौर उसीके श्रनुसार दो, तीन या चार सन्धियोंका प्रयोग किया जाता है । नाटकादि प्रारम्भिक चार रूपकभेदोंमें ही पाँचों श्रवस्थाथों तथा पाँचों सन्धियों का उपयोग होता है । श्रन्तके दो रूपकभेदों में सारे सन्धियों श्रौर सारी श्रवस्थाथोंका

१. नायिका ।

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शस्त्र च गभोवमर्शसन्धिप्रतिपेधे एतत्सन्धिपरिक्छेदिके प्राप्त्याशा-नियताप्ती श्रावस्थे श्रादि प्रतिपिधे एव। एवमपरेष्वपि रुपकेषु तत्तत्सन्धिनिपेधे तत्तत्सन्धि-परिच्छेदिकावस्थापि निपिधदैव दृश्यतेति ।

व्यस्त्रीतौ श्रास्यर्थसंग्रामसंयुक्तश्च यथा जामदग्न्यजये परशुरामेए सहस्त्रा-जुनवधः ऋत। नियुद्धं बाहुयुद्धम्। सर्पर्धनं शौर्य-विद्या-कुल-धन-रूपादिकृतः संहर्षः। ताभ्यामुद्धतो दीप्तः।

प्रयोग नहीं होता है। इनमेंसे 'व्यायोग'मे 'गर्भ' श्रौर 'विमर्श' को छोड़कर केवल तीन सन्धियों का प्रयोग होता है। 'डिम', 'समवकार' श्रादिमें विमर्श सन्धिको छोड़कर शेष चार श्रावस्थाश्रोंका ही प्रयोग होता है। 'भाण' तथा 'प्रहसन' 'उत्सृष्टिकांक' तथा 'वीथी' इन चारोंमें केवल श्रादि श्रौर ग्रन्थकी दो श्रावस्थाश्रों श्रौर दो सन्धियोंका ही उपयोग होता है। बीच की तीन श्रावस्थाश्रों तथा तीन सन्धियोंका उपयोग नहीं होता है।

इन वारह प्रकारके रुपक भेदोंकी सन्धि तथा श्रवस्था श्रादिके प्रयोगकी दृष्टिसे स्थिति निम्न प्रकार बनती है—

रुपक भेद प्रयुक्त श्रवस्था सन्धि वजित श्रवस्था सन्धि १. नाटक पांचों श्रावस्था तथा सन्धियाँ — — २. प्रकरणा पांचों श्रावस्था तथा सन्धियाँ — — ३. नाटिका पांचों श्रावस्था तथा सन्धियाँ — — ४. प्रकरणी पांचों श्रावस्था तथा सन्धियाँ — — ५. व्यायोग तीन श्रावस्था तथा सन्धियाँ गर्भ, विमर्शं रहित ६. ईहामृग तीन श्रावस्था तथा सन्धियाँ गर्भ, विमर्शं रहित ७. समवकार चार श्रावस्था तथा सन्धियाँ विमर्शं वर्जित ८. डिम चार श्रावस्था तथा सन्धियाँ विमर्शं वर्जित ९. भाण श्रादि ग्रन्थ की दो सन्धि-ग्रावस्था प्रतिमुख, गर्भं, विमर्शं रहित १०. प्रहसन भारावत् भारावत् ११. उत्सृष्टिकांक भाणवत् भाणवत् १२. वीथी भारावत् भारावत्

यहाँ [श्रादि व्यायोगोंमें] गर्भं तथा विमर्श सन्धिका निषेध होनेसे इन सन्धियों को व्याप्त करने वाली 'प्राप्त्याशा' श्रौर 'नियताप्ति' रुप श्रावस्थाश्रोंका भी निषेध सम्भवना चाहिए। इसी प्रकार श्रन्यान्य रुपकोंमें भी उस-उस सन्धिके निषेध होनेपर उस-उस सन्धि को व्याप्त करने वाली श्रावस्थाश्रों को भी निषिद्ध हो सम्भवना चाहिए ।

'श्रासत्रों' इत्यादिसे स्त्रियोंको छोड़कर श्रन्यान निमित्तसे संग्रामयुक्त हो [यह सूचित किया है] जैसे 'जामदग्न्यजय' [नामक व्यायोगमें] परशुरामने सहस्त्रार्जुनका वध किया है। 'नियुद्ध' का श्रर्थ बाहुयुद्ध है। शौर्य, विद्या, कुल, धन श्रौर रुपादिके कारण होनेवाला संहर्ष 'सपर्धा' [कहलाता] है। उन दोनों [प्रथात् नियुद्ध तथा सपर्धा] से उद्धत श्रर्थात् युक्त [व्यायोग होता है]।

१. सुरतविपि ।

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का० ७६, सू० १२२६ ] द्वितीयो विवेक: [ २२१

स्वल्पस्त्रीपात्रत्वं च कैशिकीरहितत्वात्। एतेन पुरुषपात्रबाहुल्यं लभ्यते । ख्यातं प्रसिद्धं वस्तु नायकोपायलक्षणं यस्मिन् । दीप्तानां वीर-रोद्रादीनां रसानामाश्रयः । शत्रु-एवात्र गद्यं पद्यं चोज्ज्वलं युक्तम् । तथा दिव्यभूपतिवर्जितं सेनापत्यमात्यादि-दीप्तरशनायकसम्पन्नः । केचिदस्मिन् द्वादशनायकत्वमामन्यासुः। विशेषेण शृङ्गारसमन्ताद् गुज्यन्ते कार्यार्थं संर्भरनेदत्रिते 'व्यायोगः'। 'नायिकां विना' इत्यनेन नायिकाया-रतदुचितस्य च दूर्यादेः परिजनस्य निषेधः । तेन नायकपरिच्छेदभूताश्चेट्यादयो भवन्त्येव । शत्रु च मन्त्री-सेनापत्यादीनां युद्धादिवद् युद्धं वृत्तं व्युत्पाद्यतेर्मति ॥ [६-१०] ७४-७५ ॥

अत्र क्रमप्राप्तं समवकारं लच्यते—

[सूत्र १२२६]—विज्ञेयः समवकारः ख्यातार्थो निर्विमर्शकः ।

उदात्तदेव-दैत्येशो वीथ्यद्धृद्रो वीर-रोद्रवान् ॥[११]७६॥

सङ्गतिरवर्कीगोऽश्चार्थः त्रिवर्गोऽपायैः पूर्वप्रसिद्धैरैव क्रियते निवध्यते इति 'समवकारः' । ख्यातार्थः इति । अत्र बहुकथादिप्रसिद्धनायक-उपाय-त्रिवर्गफले विमर्शासन्धि-विवर्जितश्च ।

[व्यायोगमें] स्त्री पात्रोंकी अल्पता केशिकी रहित होनेके कारण होती है । इससे पुरुष पात्रोंका प्राधान्य सूचित होता है । जिसमें नायक तथा उपाय रूप 'वस्तु' ख्यात अर्थात् प्रसिद्ध हो । वीर रौद्र श्रादि दीप्त रसोंका आश्रय हो । इसीलिए इसमें गद्य श्रौर पद्य दोनों योज गुप्तसे युक्त होने चाहिए । शृङ्गार [व्यायोग] दिव्य [अर्थात् देवता रूप नायक] श्रौर राजाओं [रूप नायकों] से भिन्न, दीप्त रसके श्रनुरूप सेनापति प्रभृत्यादि नायकोंसे युक्त होना चाहिए । कोई लोग इसमें बारह प्रकारके नायक बतलाते हैं । [प्राचीन 'व्यायोग' शब्द का निर्वचन कर उसका श्रवयवार्थ दिखलाते हैं ] जिसमें 'विशेष' रूपसे 'श्र समन्तात्' श्रर्थात् सब शृङ्गारसे युक्त होते हैं श्रर्थात् कार्यकेलिए प्रयत्न करते हैं । वह 'व्यायोग' [कहलाता] है [यह 'व्यायोग' पदका श्रवयवार्थ या निर्वचन है] । 'नायिकां विना' इस पदसे नायिका श्रौर उसके योग्य इत्याादि परिजनोंका निषेध किया गया है । इसलिए नायकके सेवकादि के रूपमें चेटी श्रादि होती हो हैं [उनका निषेध नहीं समझना चाहिए । इस सबका फलितार्थ यह हुग्रा कि] इसमें [श्रर्थात् व्यायोगमें] सेनापति श्रामात्य श्रादिका युद्ध-प्रधान चरित्र प्रदर्शित करना चाहिए ॥ [६-१०] ७४-७५ ॥

६. पष्ट रूपकभेद 'समवकार' का निरूपण

['व्यायोग' नामक पष्टम रूपकभेदके निरूपणके बाद] श्रब 'समवकार' [नामक पष्ट रूपकभेद] का श्रवसर प्राप्त होनेसे उसका निरूपण करते हैं—

[सूत्र १२२६]—प्रसिद्ध श्राख्यान वस्तुके श्राधारपर प्रवृत्त, विमर्श-सन्धिसे रहित उदात्त प्रकृतिके देव-दैत्य श्रादि नायकों वाला, वीर या रौद्ररस प्रधान, वीथीके श्रङ्गोंसे युक्त [रूपकभेदको] 'समवकार' सम्भवना चाहिए । [प्रर्थात् 'समवकार' के लक्षणमें इन सब बातोंका समावेश होता है ।]

[कारिकाकी व्याख्या प्रारम्भ करते हुए प्रन्थकार सबसे पहले 'समवकार' पदका निर्वचन कर उसका श्रवयवार्थ दिखलाते हैं ।] कहीं मिले हुए श्रौर कहीं बिखरे हुए त्रिवर्ग

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'उदात्त' इति उदात्तत्वं महर्षि-नामभियोरपि । देव-दैत्यानां हि धीरोदात्ततत्वं मत्योपेत्त्यैव, स्वजात्यपेक्षया तु धीरोदात्तत्वमपि ।।

श्रेष्ठ च तत्तदे व-दैत्यानां इष्टदेवतादि-कर्मप्रभावादिकृतेनातु महती प्रीति-यात्राजागरादि-प्रेक्षकासण-तदनुष्ठितोपायादिपु प्रवृत्तिरच भवतीति देव-दैत्यौ नेतारौ ।

एवमन्येष्वपि ग्राहमनुस्यूनेतुकेपु वाच्यम् । वीध्यज्ञानी व्याहारादीनि वद्यमात्राणि । तद्वान् । वीर-रौद्रौ प्रधानम् ।। [११] ७६ ।।

पूर्व-प्रसिद्ध उपायोंके द्वारा जिसका किया प्रथयात बनाया जाता है वह 'समवकार' कहलाता है । [प्रर्थात समवकार शब्द सम + ग्रव + उपाय + कृत-चातु से निष्पन्न होता है] । 'व्यातार्थ' से [यह श्रभिप्राय कि] वृहत्कथा आदिमें प्रसिद्ध नायक, उपाय तथा त्रिवर्ग-रूप फलसे युक्त, तथा विमर्ष-सङ्घर्षसे रहित होना चाहिए

['उदात्तदेव-दैत्योंमें] 'उदात्त' इससे महत्त्व गाम्भीर्यादिको उदात्तत्व समभना चाहिए । देवों और दैत्योंका धीरोदात्तत्व मनुष्योंकी श्रपेक्षासे होता है । अपनी-अपनी जाति की श्रपेक्षासे तो [देवों तथा दैत्यों दोनोंमें] धीरोदात्तत्व भी होता है । यहाँ [संस्कारमें या समवकारमें] उन-उन देवों तथा दैत्योंके भक्तोंमें श्रपने-श्रपने इष्टदेव श्रादि, उनके कर्म तथा प्रभाव श्रादिके कीर्तनसे श्रभ्यन्त ग्रानन्द [प्रोति] यात्रा, जागरण, [प्रेक्षकासण श्रथवा] दर्शक प्रभाव की कीर्तनसे श्रभ्यन्त ग्रानन्द [प्रोति] यात्रा, जागरण, [प्रेक्षकासण श्रथवा] दर्शक या भक्तोंके द्वारा किए गए उपायों में श्रभिप्रेरण प्रवृत्ति होती है इसलिए देव और दैत्योंको यहाँ [प्रथार्त समवकारमें] नायक माना गया है । इस प्रकार मनुष्योंसे भिन्न नायकों वाले श्रन्य रूपकभेदोंके विषयमें भी समभना चाहिए । ['वीध्यज्ञ-वान्' इस पदमें निर्दिष्ट] 'वीधी' के 'व्याहारादि' श्रंग जो श्रागे कहे जाने वाले हैं उनसे युक्त

[होना चाहिए] । 'वीर-रौद्रवान्' इसमें प्रतिशायन श्रथर्मन्-प्रत्यय है । इसलिए [समव-कारमें श्रृङ्गली ७७ वीं कारिकामें कहे हुए (१) धमंष्फलक, (२) प्रथयफलक, तथा (३) कामफलक] तीनों प्रकारके शृङ्गारके होनपर भी, वीर और रौद्र प्रधान [रस] होते हैं । क्योंकि देव और दैत्योंके उद्दत होनेके कारण उनके शृङ्गारका [समवकारमें] छायामात्र रूपसे ही वर्णन होता है । [इसलिए शृङ्गाररस उसमें प्रधान नहीं होता । वीर या रौद्ररस

हो समवकारमें प्रधान रस होते हैं । [११] ७६ ।।

इस प्रकार 'समवकार'का सामान्य लक्षण इस कारिकामें दिया है । ७७ से ५० तक श्रङ्गली चार कारिकाओंमें उसके समन्वयमें श्रन्य ग्रनेक बातोंका वर्णन करेगे । इनमें 'समव-कार'के द्वारा दश नायक और तीन श्रङ्ग बताए गए हैं । दश नायकोंकी संख्या उपपादन दो प्रकारसे किया गया है । एक मत तो यह है कि समवकारके जो तीन श्रङ्क होते हैं इनमें से प्रत्येकमें चार-चार नायक होते हैं । इस प्रकार तीनों श्रङ्कोंमें मिलाकर बारह नायक हो जाते हैं । प्रत्येक श्रङ्क में जो चार-चार नायक कहे गए हैं उनमें नायक-प्रतिनायक और उन दोनोंके सहायक ये चारों नायक माने जाते हैं । तभी चार नायक बनते हैं । दूसरे मतमें 'समवकार'के प्रत्येक श्रङ्कमें बारह-बारह नायक होते हैं । यह बारह संख्या भी इसी प्रकार नायक-प्रतिनायक और उनके श्रनुरूप सहायकोंको मिलाकर पूरी होगी ।

१. शृङ्गारत्पदी ।

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द्वितीयो विवेक:

अथ कृत्यान्तरमुपदिशति

[सूत्र १२७]—श्रथ द्वादश नेातारः फलं तेषां पृथक् पृथक् ।

श्रंकास्त्रयः त्रिशृंगाराः: त्रिकपटा त्रिविद्रवा: ॥ [१२]७७ ॥

पड्-युग्मैकमुहुर्ता: स्यु: निष्ठितार्था: स्वकार्यतः ।

महावाक्ये च सम्बद्धा: क्रमाद् हि-एकैकसन्धौ:॥[१३]७८॥

'श्रथ' समवकारे नायकाद् द्वादश । तत्र' प्रत्येकं द्वादश । यदि वा* प्रत्येकं नायक-'समवकार'को श्रागली कारिकामें 'त्रिशृंगार' तीन प्रकारके शृंगारोसे युक्त कहा गया है । वैसे तो रसके प्रसंगमें शृंगारके सम्भोगशृंगार श्रौर विप्रलंभशृंगार केवल ये दोनों ही भेद किए गए हैं । किन्तु यहाँ तीन प्रकारके शृंगाररसोंकी चर्चा की गई हैं । यहाँ शृंगार के ये तीन भेद फलकी दृष्टिसे किए गए हैं । (१) धर्मप्रधान शृंगार (२) श्रर्थप्रधान शृंगार श्रोर (३) कामप्रधान शृंगार । इस प्रकार शृंगारके तीन भेद करके 'समवकार'को 'त्रिशृंगार:' कहा गया है । शृंगारके ये तीनों भेद 'समवकार'के तीनों श्रंकोंमेंसे प्रत्येक श्रंकमें होने चाहिए । एक-एक श्रंकमें एक-एक भेदका निष्ठान नहीं करना चाहिए । यह बात भी श्रागे कही जायगी । 'समवकार'के तीनों श्रंकोंकी रचनाके विषयमें भी यह बात विशेष रूपसे निर्दिष्ट की गईहै कि उनकी रचना इस प्रकारसे होनी चाहिए कि उनमेंसे प्रत्येक अंक श्रथमें परिपूर्ण हो । उसको ग्रहणने श्रथंककी पूर्षांताके लिए दूसरे श्रंकके सहारेकी श्रावश्यकता न हो । इसके साथ ही ग्रंथमें तीनों श्रंकोंकी एकवाक्यता या परस्पर सम्बन्ध भी प्रतीत हो सके । इसके लिए यह मार्ग बतलाया गया है कि प्रथम श्रंकके श्रारंभमें ही ग्रंथके उपरांतके बीजका निवंधन करना चाहिए । उसके बाद तीनों श्रंकोंको इस प्रकारसे बनावें कि उनका श्राश्रयानवस्तु उसी श्रंकमें समाप्त हो जाय । किन्तु ग्रंथमें तृतीय श्रंकमें फिर इस प्रकारकी रचना करनी चाहिए कि जिससे उसका श्राश्रयानभाग ग्रथनमें परिपूर्ण हो किन्तु साथ ही तीनों श्रंकोंके श्रथंक परस्पर सम्बन्ध बन सके । इन्हीं सब बातोंको ७७-७८ श्रागली दो कारिकाप्रोंमें इस प्रकार कहा गया है—

[सूत्र १२७ क]—इस [समवकार] में बारह नायक होते हैं । उनका फल श्रलग-श्रलग होता है । तीन प्रकारके शृंगार, तीन प्रकारके कपट श्रौर तीन प्रकारके विद्रवसे युक्त तीन श्रंक होते हैं । [१२] ७७ ॥

[सूत्र १२७ ख]—[समवकारके तीनों अंक क्रमशः] षट्: मुहुर्त्तं, दो मुहुर्त्तं श्रौर एक मुहूर्त्तं वाले [श्रथात् इतने समयमें जिनका ग्रभिनय हो सके इस प्रकारके] । स्वयंमें परिपूर्ण श्रथय वाले, श्रौर महावाक्य [प्रथात् स्वयमें परिपूर्ण होनेपर भी एकवाक्यता युक्त श्रथात् परस्पर] में सम्बद्ध, तथा कमशः दो, एक श्रौर एक सन्धि वाले होने चाहिए । [श्रथात् प्रथम श्रंकमें मुख प्रतिमुख रूप दो सन्धियाँ, द्वितीय श्रंकमें केवल एक गर्मसन्धि तथा तृतीय श्रंकमें केवल एक निर्वहणीय सन्धिकी रचना होनी चाहिए] [१३] ७८ ।

इस 'समवकार'में बारह नायक होते हैं । उनमेंसे प्रत्येक श्रंकमें बारह [नायक] होते हैं ।

१. प्रत्येकं ।

२. प्रत्येकं ।

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प्रतिनायकौ तत्त्वसायौ चेति चत्वारश्चतवारः।। ततः सर्वेषु संख्यया द्वादश द्वादश इति मध्यमा वृत्ति:। तेन कचिन्न्यूना‌धिक्ये‌ऽपि न दोषः। 'तेषाम्' इति द्वादशानां नायकानां पृथग्भूतानि फलानि बध्नन्ते । यथा 'पयोऽधिमन्थने' हरि-बलिप्रभृतिनां लब्ध्यादिलाभः । व्रत एव सहायका व्याप्ति सुधीवृदिवन्नायकोक्तवचन वयपादिशयन्ते । 'त्रय:' इति त्रयो‌ड्र्रा भवन्ति गूढारतर्यादिविशिष्टा: न त्वेकैक एकस्मिन्न‌के गूढारतर्यादीनामेकैक-भावादिति । महर्तो घटिकाद्वयम् । तत् प्रथमः पत्सुर्हर्ता: । द्वितीयो द्विसुर्हर्ता: । तृतीय एकसुर्हर्ता: एके तु प्रत्येक यथोदितदिगुगणैः कालमानाहुः ।

'निष्ठिततार्थ:' शृङ्कारसाध्यफलस्य शृङ्कान्तरार्थासम्बद्धतया स्वरसन्नतेऽपि परि-समापार्थः महाकाव्ये च परिपूर्णप्रबन्धार्थसाध्या: फलेः समबद्धा: । सकलप्रबन्धस्य साध्य-फलोपायो‌ऽर्थात् शृङ्गारो‌ड्र्र इत्यर्थः:

इह तावद्मुखानन्तरं सन्दे‌पे‌ऽन्र्रकथार्थोपनिपतं बीजं निवन्धनीयम् । तद-न्तरमङ्कद्वयं श्रवातरत्रवाक्यार्थेन परस्परवच्छिन्नमायोज्यम् ।। तृतीयस्वङ्करतथा हैं [यह एक मत है] । श्रङ्कवा प्रत्येक अङ्कमें १ नायक, २ प्रतिनायक, और उन दोनों के

सहायक इस प्रकार चार-चार, और फिर [तीनों श्रङ्कोंके चार-चार नायककोंके] सब मिलाकर बारह [नायक] होते हैं यह मध्यम मार्ग है । इसलिए किसी अङ्कमें कम श्रोर श्रधिक [नायकों-की संख्या] होनेपर भी दोष नहीं होता है । 'तेषाम्' श्रङ्गात् उन बारहों नायकोंके फल श्रलगा-

लाभ वपाते हैं । जैसे पयो‌ऽधिमन्थन में विभिन्न श्रङ्गार वलि, श्रादि [नायकों] के लक्श्मी श्रादि रूप [प्रलग-प्रलग] फल [दिखलाए गए हैं] । हैं इसलिए [सब नायकोंके श्रलग-प्रलग फलोका निवन्धन होनेसे] सुप्रविष्ट श्रादिके समान सहायक भी नायक रूपसे कहे जाते हैं । 'त्रय:' तोन, इससे तीनों प्रकारके शृङ्गारो‌से विशिष्ट तीन अङ्क होते हैं यह प्रभिप्राय

है। न कि एक-एक अङ्कमें एक-एक शृङ्गारादि होता है [इसका श्रयं यह हुग्रा कि 'समवकार'के प्रत्येक अङ्कमें तीनों प्रकारके शृङ्गार, तीनों प्रकारके कपट, श्रोर तीनों प्रकारके विद्रव, दिख-लाए जाने चाहिए। एक-एक श्रङ्कमें एक-एक प्रकारके शृङ्गार, कपट श्रोर विद्रवका प्रदर्शन

नहीं करना चाहिए]। मुहूर्त्तसे दो घड़ी [कालका ग्रहण होता] है । उन ['समवकार'के तीन अङ्कों]में प्रथम [अङ्क]में प्रथम मुहूर्त्तका, द्वितीय [अङ्क]में द्वि मुहूर्त्तका श्रौर तृतीय [अङ्क] एक मुहूर्त्तका होना चाहिए [यह कारिकामें ग्राए हुए पृथक्-पृथक् मुहूर्त्ता: स्वय:' इसका श्रयं है] ।

इसका श्रभिप्राय यह है कि इतने कालमें तीनों अङ्कोंका प्रभिनयादि रूप ग्रयं समाप्त हो जाना चाहिए । कोई [व्यास्याकार] तो प्रत्येक श्रङ्कमें इसे कालके दुगने कालकी परिमाणे मानते हैं ।

[कारिकामें ग्राए हुए] 'निष्ठिततार्थ:' इससे उस अङ्ककी कथामें साध्य फलका दूसरे अङ्कसे सम्बन्ध न होनेसे ग्रभिप्रायमें ही ग्रयंकी समाप्ति हो जाय यह श्रमिप्राय है । [श्रयंात् 'समवकार'के

तीनों अङ्कोंमेंसे प्रत्येक श्रङ्कके कथाभागकी समाप्ति उसमें हो जानी चाहिए] फिर भी महा-वाक्यमें [श्रयंात् सम्पूर्ण समवकारमें] पूर्ण प्रबन्धके कथासे साध्य फलमें परस्पर समबद्ध होने चाहिए । श्रयंात् सम्पूर्ण प्रबन्धसे साध्य फलके उपायभूत श्रर्थ वाले तीनों श्रङ्कृ होने चाहिए

यह श्रभिप्राय है ।

[इस प्रयोजनकी सिद्धिके लिए समवकारके श्रङ्कोंकी रचना इस प्रकारसे करनी चाहिए कि ] सबसे पहले प्रामुख्यके ग्रनन्तर सङ्क्षेपमें तीनों श्रङ्कोंकी ग्रथंका उपक्शेप करना

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द्वितीयो विवेक:

निबन्धनीयो यथा श्रवान्तरवार्तायर्थविच्छिन्नः सर्वार्थसम्वद्वार्थश्र भर्यात। एव हि पूर्वापरानुसन्धानावधेयधियो व्यवहितार्थानुसन्धानावहितबुद्धयश्च त्रिवर्गसिद्धयच्य पाय-व्युप्तन्न्याड्ग्रहीता भवन्ति।

श्रद्वान्तरार्थानुसन्धायी च परस्परासम्वद्वार्थाकस्वादत न विन्दुनिबन्ध्यते।

'क्रमाद्' इति प्रथम-द्वितीय-तृतीयक्रमेभ्य श्रद्वा। द्वि-एक-एक्सन्धयः ततः प्रथमड्गमुख-प्रतिमुखे, द्वितीये गर्भः:, तृतीये निर्वहणामिति ।

[सूत्र १२८]—श्रृङ्गारस्विविधो धर्मकामार्थफलहेतुकः। वाच्य-वाचक-देवेष्यः:, सम्भवी कपटस्विधा ।

जीवाजीवोभयोत्थः स्याद् विद्रवस्विरमिषु तु । प्रत्येकमकेष्वेवैकः पद्य च श्रृङ्गारादिकसु ।

वाले बीजक्री रचना करनी चाहिए । उसके बाद [प्रथम तथा द्वितीय] दोनों श्रृङ्गारोंको [स्वयंमें समास हो जाने वाले] श्रवान्तर वाक्यार्थके रूपमें एक-दूसरेसे विच्छिन्न रूपमें प्रस्तुत करना चाहिए।

[उसके बाद] तृतीय श्रृङ्गारकी रचना इस प्रकार करनी चाहिए कि [प्रथम श्रौर द्वितीय श्रृङ्गार रूप] श्रवान्तर वाक्यार्थके श्रृङ्गमें विच्छिन्न होनेपर भी सब श्रृङ्गोंके श्रथसे सम्वद्ध श्रथ वाला हो जाय ।

इस प्रकार पूर्वापर श्रथकूप्रग्रह करनेमें श्रौर व्यवहित श्रथके ग्रनुसन्धान करनेमें समर्थ बुद्धिवाले [सामाजिक, धर्म श्रथ काम रूप] त्रिवर्गकि सिद्धिके उपायोंके परिज्ञाके द्वारा ग्रन्थग्रहीत होते हैं ।

यहां [समवकारमें श्रृङ्गारोंके] परस्पर श्रसम्बद्ध होनेके कारण, दूसरे श्रृङ्गके श्रथोंको जोडनेवाले 'बिन्दु' की रचना इसमें नहीं की जाती है ।

'क्रमाद्' [द्वि-एक-एक्सन्धयः: इस कारिक भागमें] क्रमसे, इससे प्रथम द्वितीय ततीयके क्रमसे श्रृङ्ग, क्रमश: दो एक और एक सन्धि वाले होते हैं ।

उनमेंसे प्रथम श्रृङ्गमें मुख श्रौर प्रतिमुख[वो सन्धि], द्वितीयमें गर्भसन्धि, श्रौर तृतीय [प्रृङ्गमें] निर्वहण सन्धि होता है ।

[इस प्रकार तीनों श्रृङ्गोंमें क्रमश: दो एक और एक सन्धि होती है ।

विमर्श सन्धि समवकारमें नहीं होती है ।

यह बात उक्त कारिकामें ही 'निर्वहणस्' पदसे कही जा चुकी है ।

इन दोनों कारिकाग्रन्थोंमें ३७७४ कारिकामें समवकारके तीनों श्रृङ्गारोंकि त्रिशृङ्खार, त्रिकपट श्रौर त्रिविद्रवसे युक्त कहा गया था ।

किन्तु इन पदोंका श्रथ वहां स्पष्ट नहीं किया गया था ।

इसलिए श्रागली दो कारिकाओंमें इन तीनों शब्दोंके श्रथको स्पष्ट करनेका प्रयत्न किया गया है ।

इसमें 'त्रिशृङ्खार' पदसे धर्म, श्रथ श्रौर काम हेतुक तथा तत्फलक तीन प्रकारके श्रृङ्खारोंका, त्रिकपट पदसे वच्चोक्त, वच्वककोथ तथा दैवोक्त तीन प्रकारके कपटोंका, तथा जीव अजीव श्रौर उभयसे उपस्थित तीन प्रकारके विद्रवोंका ग्रहण होता है ।

इसी बातको ग्रन्थ-कार श्रागली दोनों कारिकाओंमें दिखलाते हैं—

[सूत्र १२९ क]—धर्म काम श्रौर श्रथ जिसके (१) फल तथा (२) हेतु हैं वह [विष्कन्धार] तीन प्रकारका श्रृङ्खार होता है ।

[विष्कन्धार] तीन प्रकारका श्रृङ्खार होता है । [इसी प्रकार] वच्यच, वच्वक तथा दैवसे उत्पन्न होने वाला कपट [भी] तीन प्रकारका होता है ।

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धर्म-काम-अर्थार्थः फलं हेतुवश्र यस्य । तत्र पत्नीसंयोगरुपस्य शृङ्गारस्य परदार-वर्जनादिको धर्मः फलम् । दानादिकमन्तु धर्मःः स्यात्पादिलाभस्य हेतुः । काम-शृङ्गार-शब्दाश्रयां स्त्री-पुंसयको रतिः, तद्र तुज्र स्त्री-पुंसादिगुण्याते । तत्र स्त्री-पुंसादिरुपसपुज्जारस्य रतिरुपः कामः फलम् । रतिरुपस्य शृङ्गारस्य स्त्री-पुंसादिरुपः कामो हेतुः । श्वात्र च कामशृङ्गारे स्त्री परकीय कन्या च ग्राह्या । न पुनः स्वदारा वेश्या वा । यथा शक्रस्याङ्गुल्या । स्वदारारडडौ हि धर्मस्याप्यनुप्रवेशोन केवलम्यैव कामस्य फल-हेतुभावो न स्यात् ।

अर्थार्थी राज्य-सुवर्ण-धन-धान्य-वृद्धादिः । तत्र पश्यादियोजितां, केषांचित सुभ-गानां पुंसां चार्थफलः शृङ्गारः । वेश्यादिपु च पुंसामर्थहेतुकः शृङ्गारः । देवादीनामपि गन्धर्वाद्यङ्गिरुपापन्नां राज्यावृद्धिसमोहा भवत्येव । तदाराधनानां चार्थप्राप्तिः । श्वात्र च पत्नों कार्यो कार्योपचाराद देवानामर्थ शृङ्गारो दृष्टान्तः । श्राथवा श्रार्थी श्र्यर्थनीयं परोपकार-प्रतिज्ञानिर्वाहादिकम् तच्च देवादीनामपि भवत्येवेति ।

[सूत्र १२६ ख] — जीव प्रजीव श्रौर [जीवाजीव] उभयसे उत्पन्न होने वाला विद्रव तीन प्रकारका होता है । इनमेंसे प्रत्येक श्रद्धमें एक-एक [अर्थात एक शृङ्गार, एक कपट और एक विद्रव] की रचना करनी चाहिए । और [समवकारमें] सङ्घरादिक वृत्त होना चाहिए । [१४] ५०

धर्म-काम श्रौर श्रर्थ जिसके फल [अर्थात साध्य] तथा हेतु [अर्थात साधक] हैं [वह धर्म-कामार्थफलहेतुकः कहलाता] है । उनमेंसे पत्नी-संयोग रुप शृङ्गारका परदारवर्जन रुप धर्म-फल होता है । श्रौर दानादि रुप धर्मं उस स्त्री [स्वपत्नी] के लाभका हेतु होता है । [इस प्रकार स्वपत्नी-संयोग रुप शृङ्गारका फल भी धर्म होता है, श्रौर उसका हेतु भी धर्म होता है ।] काम श्रौर शृङ्गार जबतकसे स्त्री-पुरुषकी रति [रुप फल] श्रौर उसके हेतु स्त्री श्रौर पुरुष दोनोंका प्रग्रहण होता है । उनमेंसे स्त्री-पुरुष शृङ्गारका रति रुप काम फल है । श्रौर रति रुप शृङ्गारका स्त्री-पुरुषादि रुप काम हेतु है । श्रौर इस काम-शृङ्गारमें ‘स्त्री’ पदसे पर स्त्री ग्रथवा कन्याका ही प्रग्रहण करना चाहिए । अपनी पत्नी श्रथवा वेश्याका प्रग्रहण नहीं करना चाहिए । जैसे इन्द्र की ग्रङ्गुल्या । अपनी स्त्री श्रादिमें तो घमंका भी सम्बन्ध होनेसे केवल कामका फलभाव या हेतुभाव नहीं बन सकता है । [इसलिए काम-शृङ्गारमें ‘स्त्री’से परस्त्री या कन्याका ही प्रग्रहण करना चाहिए यह अभिप्राय है ।

[अर्थ-शृङ्गार वृत्तमें] ‘ग्रर्थ’ से राज्य, सुवर्ण, धन, धान्य वस्त्रादि [का प्रग्रहण होता है ।] वह वेश्याद्रों श्रौर कितनीहि सुन्दर कुलस्त्रीका प्रथयश्रिलक शृङ्गार होता है । श्रौर वेश्यादिके विषयमें पुरुषोंका श्रर्थहेतुक शृङ्गार होता है । [अर्थात वेश्यादिके शृङ्गारके द्वारा श्रर्थ-रुप फलकी प्राप्ति होती है इसलिए उनका शृङ्गार श्रर्थफलक होता है । श्रौर पुरुषों श्रर्थ द्वारा शृङ्गारकी प्राप्ति होती है व्रतः उनका वेश्या विषयक शृङ्गार श्रर्थहेतुक शृङ्गार होता है] गन्धर्व यक्षादि रुप देवताओंोंको भी राज्य श्रादि श्र्यर्थकी इच्छा होती है । श्रौर उनके श्राराधकोंको श्रर्थकी प्राप्ति होती है । इस पक्षमें कार्याद्में कार्यका उपचार मानकर देवताओंोंका श्रर्थ-शृङ्गार समझना चाहिए । श्रथवा परोपकार प्रतिज्ञा निर्वाह श्रादि श्र्यर्थनीयं ‘श्रर्थ’ कहलाता है । श्रौर वह देवादिकमें भी होता है । [इसलिए उनका शृङ्गार श्रर्थ-शृङ्गार कहलाता है] । श्रौर वह देवादिकमें भी सत्य-सा प्रतीत होने वाला सिध्या प्रकल्पित प्रपञ्च कपट [कहलाता] है ।

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द्वितीयो विवेक:

मिथ्याप्रकल्पितः सत्यानुकारी प्रपञ्चः कपटः। स च यत्र वञ्चनीयः सापराधः स वञ्च्योऽथो वञ्चकस्य वञ्चनतश्च्छायां सत्यां कपटः। वञ्चकबुद्धच्यभावे सापराधेऽपि वञ्च्ये वञ्चनाया: सम्पत्तियोगात्। तेन वञ्च्ये तः कपटो वञ्चकाविनाभावीयेव।

एव उभयजाश्रतुर्थी न भवति । यत्र तु वञ्च्योऽपराधी विनाऽपि वञ्चकबुद्धयैव केवलया कपटो भवति स वञ्चकसम्भवी। यत्र तु द्वयोः स्तुल्यफलाभिधानवतः: काकतालीयन्यायेन एक उपचीतेऽपराधपचीतते स वञ्च्योऽपराधाभावेन वञ्चकस्य च वञ्चनबुद्धि यौगोन त द्वैवस्म्भवतीति।

विद्रवन्न्ति त्रस्यन्ति जना यस्मादिति विद्रवोऽर्थः। ‘त्रि:' इति प्रकारत्रययुक्तः । तत्र जीवोऽथो हस्त्यादिजः। ब्रजीवोऽथः शस्त्रादिजः जीवाजीवोऽथो नगरोपरोजः । तत्र हस्त्यादेः शस्त्रादिश्च व्यापारोऽरादिति ।

ग्रामेऽपि तु शृङ्गार-कपट-वितथावादां त्रिषु भेदेषु मध्ये एकैको भेदोऽपि पृथक् पृथग् निवन्धनीयः। तत्र प्रथमेऽङ्गनयस्ततः कपट उपार्ये, विद्रवो व्याप्तिसम्भावनाभ्यां, शृङ्गारः फलांशे। एवं द्वितीये तृतीये च। प्रथमे चाङ्ग शृङ्गारः कामशृङ्गार एव । रज्जनायां साधकतमस्य प्रथमसुपादानात्।

एवं प्रहासोऽप्यत्र निवन्ध्यते । ‘पथ्य’ (१) जहाँ वञ्चनीय [पुरुष] अपराधी होता है वहाँ वञ्च्योऽथ कपट कहलाता है । (२) वञ्च्य [पुरुष] के अपराधी होनेपर भी वञ्चक को उस प्रकारका ज्ञान न होनेपर वञ्चना बन ही नहीं सकती है। इसलिए वञ्च्योऽथ्य कपट वञ्चक [में वञ्चन करनेकी बुद्धि] का श्राविनाभावो है । इस कारण [वञ्च्य-वञ्चक] दोनों से उत्पन्न चतुर्थ भेद नहीं होता है ।

यहाँ तक वञ्च्योऽथ्य कपटका वर्णन किया । ग्रन्थ आगे वञ्चकेऽथ्य कपटका वर्णन करते हैं—

जहाँ वञ्च्य [जिसको धोखा दिया जा रहा है उस] के अपराधके बिना ही केवल वञ्चककी [वञ्चना] बुद्धिसे ही कपट होता है वह वञ्चकेऽथ्य कपट कहलाता है । [ग्रन्थे द्वेऽथ्य कपटका लक्षण करते हैं] जहाँ तुल्य फल श्रोर तुल्य कारण [अभिधान] होनेपर भी काकतालीन्यायसे एककी बुद्धि [हास वाले] का अपराध न होने श्रोर वञ्चक [बुद्धि वाले] में वञ्चनाबुद्धि न होनेके कारण वह द्वेऽथ्य कपट होता है ।

[ग्रन्थे कारिकामें ग्राए हुए तीन प्रकारके विद्रवोंका वर्णन करते हैं] जिससे लोग चिद्रुत होते हैं प्रर्थात् भयभीत होते हैं उस ग्रन्थको ‘विद्रव’ कहते हैं । वह तीन प्रकारका होता है । [१ जीवोऽथ, २ ब्रजीवोऽथ श्रोर ३ जीवाजीवोऽथ] । उनमेंसे हस्ती श्रादिके द्वारा उत्पन्न होने वाला [प्रनर्थ] जीवोऽथ है । शस्त्रादिसे होने वाला ब्रजीवोऽथ है । [और नगरोपराधजन्य ग्रनर्थमें] हस्ति श्रादि श्रौर शस्त्रादि दोनोंका व्यापार होनेसे [उस प्रकारके ग्रन्थको जीवाजीवोऽथ ग्रन्थ कहा जाता है ।

[ग्रामेऽपि तु] इससे शृङ्गार, कपट श्रोर विद्रवोंके तीन-तीन भेदोंमेंसे एक-एक भेद श्रग्रेऽग्रे ग्रन्थौम श्रलङ्ग-श्रलङ्ग निवद्ध करना चाहिए । उनमेंसे प्रथम श्रङ्गमें [तीन प्रकारके कपटोंमें] शृङ्गारको प्रथमस्थान देना चाहिए ।

१. सम्भवायोगात् । २. उपाये । ३. तनस्य ।

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२२६ ।

नाट्यदर्पणम् [ का० ७६-५०, सू० १२६

च स्मघरादिकम्¹। श्रादिशब्दाद् बहुलत्वं शादू लाक्योगरुपयुक्तं गृह्यते, न पुनर्गो-यच्च्यादि। तेन हि वह्याभिधाने क्लिष्टता स्यात्। केचित् पुनरल्पाक्षरं गायत्यादिकं श्रधसमविपसमादिकं चात्र पठं मन्यन्ते। तत्रेन च गव्यसात्र न निपेधः पद्यवैशिष्टच-विधानार्थत्वादिति।

समवकारे च संक्षिप्रः सहास्यः शृङ्गारः, कपटो विद्रवो देवासुरवैरानिमित्तं, सम्प्रहारादिकं च दिव्यप्रभावसाध्यम्। लौकिकीभिरुपपत्तिभिर्हीनं माया-इन्द्रजाल-प्लुत-लङ्घनोच्छलना-कू दना² स्वारम्भतोऽ इन्चैः सर्वमोप प्रहसन-कपट-विद्रव-वादी कुलुबिलतिनां परां तुष्टिमुत्पादयितुं व्युत्पाद्यते इयदाहुः—

शूरास्तु वीर-रौद्रे पु निःयुद्धप्वाहवेपु च ।

वाला मूर्खाः स्त्रियश्चैव हास्य-शोक-भयादिपु ॥

परितुष्ट्यन्त इति वाक्यशेष इति ॥ [१४-१५] ७६-५० ॥

कोई एक कपट उपाय [के रूप] में, [कायमें] ग्राप्तिकी सम्भावना रूपमें एक विद्रव, श्रौर फल रूपमें [कोई एक] शृङ्गार दिखलाना चाहिए। इसी प्रकार हितीय तथा तृतीय श्रङ्गोंमें [भी एक कपट उपाय रूपमें, ग्राप्तिकी सम्भावना रूपमें एक-एक प्रकारका विद्रव, श्रौर फल रूपमें एक-एक प्रकारके शृङ्गारका वर्णन करना चाहिए। किन्तु इस वातका विशेष रुपसे ध्यान रखना चाहिए कि] प्रथम श्रङ्गमें काम-शृङ्गार हो रखा जाय । मनोरञ्जनमें उस [काम-शृङ्गार] के साधकतयम होनेसे उसका प्रथम ग्रहण किया जाता है। इसी कारण इसमें प्रहासकी रचना भी की जाती है। पद्यमें लघुगा श्रादि [लम्बे पद्य ही समवकारमें प्रभुक्त करने चाहिए] प्रादि शब्दसे श्राधिक श्रक्षरों वाले श्रौर गोजो गुरुपयुक्त शादू लविक्रीडित वृत्ति [वृत्तों] का प्रहरण होता है । [श्लप श्रक्षरोंवाले] गायत्री श्रादि [छन्दों] का प्रहरण नहीं होता है। उस [गायत्री श्रादि श्रलपाक्षर छन्दों] के प्रहरण करनेसे लम्बे श्रथका वर्णन करनेमें कठिनाई होगी। [इसलिए स्वल्पाक्षर छन्दोंका प्रहरण समवकारमें नहीं करना चाहिए.] कोई लोग स्वल्पाक्षर गायत्री श्रादि और श्रथसम तथा विसम श्रादि छन्दोंका इसमें प्रहरण मानते हैं। इस [पक्षोंका विशेष रूपसे नाम लेने] से यहां गद्यका निपेध [प्रतिप्रेत] नहीं है। पद्योंके श्राधिक्यका विधान करनेके लिए हो [स्मघरादिका] विधान होनेसे

समवकारमें हास्य सहित संक्षिप्त शृङ्गार, श्रौर देवों तथा श्रसुरोंके वैरके कारण होने वाला कपट, विद्रव तथा दिव्य प्रभावसे साध्य युद्धादिक [रू वर्णन पाया जाता] है। लौकिक गतिकोमी रहित [अर्थात् लौकिक उपायोंसे सिद्ध न होने वाला] माया, इन्द्रजाल,

उच्छलन-कू दना [उच्छेद्य श्रथयात्नु नष्ट करने योग्य] ज्ञातुके पुतले श्रादिका गिराना श्रादि, जिसमें मुख्य रूपसे किया जाता है इस प्रकारको श्रारम्भटी वृत्तिसे सम्पादित प्रहसन, कपट,

विद्रव श्रादि सभी कुछ कौतुहलोत्पुक जनताको ग्रानन्द प्रदान करते हैं [इसलिए उनका वर्णन किया जाता है.]। जैसा कि कहा भी है कि—

वीर लोग वीर रौद्र रसोंमें, मलयुद्ध श्रौर युद्धोंमें [ग्रानन्द अनुभव करते हैं] श्रौर बालक, मूर्ख तथा स्त्रियाँ हास्य, शोक, भय श्रादिमें [ग्रानन्वका श्रनुभव करते हैं] ।

'प्रसन्न होते हैं यह वाक्य शेष है [अर्थात् इस वाक्यको ऊपरसे जोड़ लेना चाहिए]

॥ [१४-१५] ७६-५० ॥

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द्वितीयो विवेकः

अथ भागस्य क्रमप्राप्तो लक्षणावसरः—

[सूत्र १२५]—भारा: प्रधानशृङ्गार-वीरो मुख-निर्वहवान् । एकाङ्को दशलास्याङ्कः प्रायो लोकानुरञ्जकः ॥ [१६] ५१॥

भगवते त्योसोक्यो नायकेऽन स्वभावतः प्रकटयेद्योति 'भावा:' । शृङ्ख-सौभाग्य-वर्षणना बाहुल्येनात्र वीरशृङ्गारयोः प्राधान्यम्‌। शृङ्गाराल्वादु हास्योपित्राज्जतया वर्णनीयः । तथा मुख-निर्वहहासन्धिसम्पूर्ण एकाहनिवर्तनीयत्वादेकाङ्कः । दश चात्र लास्याङ्कानि निबध्यन्ते । तानि चैतानी यथा च— गेयपदं स्थितं पाच्च्यमासीनं पुष्पगाण्डिका । प्रच्छेदकं त्रिगूढं च सैन्यवाक्यं दिग्घुक्कम्‌ ॥ उत्तमोत्तमकं चैवमुक्त-प्रत्युक्तमेव च । इति । प्रायेण लोकस्य पृथग्जनस्य विट-वेश्यादिवृत्तात्मकरवाद रुजनोत्मकः । विट-धूर्त-कुट्टिन्यादिचेष्टितं राजपुत्रादीनामपि चातुर्यार्थ हेयमेति प्रायोऽग्रहणास्मति ॥ [१६] ५१ ॥

७. सप्तम रूपक भेद 'भावा' का लक्षण—

श्रवण क्रमसे 'भावा' का लक्षण करनेका श्रवसर आता है [इसलिए 'भावा' का लक्षण करते हैं] ।

[सूत्र १२५] शृङ्गार या वीर रस प्रधान, मुख सन्धि तथा निर्वहण [दो ही सन्धियों] से युक्त, दश लास्याङ्गोंसे पूर्ण, एक श्रङ्क वाला, श्रोत्र प्रायः साधारण जनोंका मनोरञ्जन करनेवाला [रूपकभेद] 'भावा' [कहलाता] है ॥ [१६] ५१॥

जिसमें नायक [कथ्य किसी पात्रके रङ्गभूमिमें उपस्थित न होनेसे] श्राकाशोक्ति द्वारा अपने श्रोत्र दूसरके वृत्तको कहता या प्रकाशित करता है । वह 'भण्यते यत्रेति भावा:' इस व्युत्पत्तिके श्रनुसार 'भावा' कहलाता है । इसमें शृङ्गार या सौभाग्यका श्रधिक वर्णन होनेके कारण वीर तथा शृङ्गारका प्राधान्य होता है । शृङ्गारका श्रङ्क, होनेसे हास्यरसका भी इसमें श्रङ्गरूपसे वर्णन होना चाहिए । श्रोत्र एक हो दिनमें पूर्ण [होनेवाले कथाभागसे युक्त] होनेसे एक श्रङ्क वाला, तथा मुख श्रोत्र निर्वहण [दो ही] सन्धियोंसे युक्त ['भावा' होता है] । इसमें दश लास्याङ्गोंका भी वर्णन होता है । वे [दश लास्याङ्ग] निम्न प्रकार कहे गए हैं—

१ गेयपद, २ स्थित, ३ पाच्च्य, ४ पुष्पगाण्डिका, ५ प्रच्छेदक, ६ त्रिगूढ, ७ सैन्यवाक्य नामक द्विगूढक, ८ उत्तमोत्तमक, ९ उक्त श्रोत्र १० प्रतयुक्त [ये दश लास्याङ्ग कहे गए हैं । [इन सबका प्रयोग 'भावा' में होता है] ।

[कारिकामें ग्राए हुए] 'प्रायो लोकानुरञ्जक:' इस भागकी व्याख्या करते हैं । प्रायः लोकका अर्थात् विट, धूर्त, श्रोत्र वेश्या श्रादिके वृत्तसे युक्त साधारण लोगोंके मनोरञ्जनका कारण होता है [उच्च कोटिके लोगोंके मनोरञ्जनका कारण नहीं होता है] । विट, धूर्तं कुट्टिनी श्रादिका चरित्र चातुर्यकी शिक्षा के लिए राजपुत्रादिको भी जानना चाहिए इसलिए [कारिकामें] 'प्राय:' पदका ग्रहण किया गया है ॥ [१६] ५१ ॥

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ग्रथ कर्तव्योपदेशेन नायकमुदिशति—

[सूत्र १३०]—एको विटो वा धूर्तो वा वेश्यादेश्वस्य वा स्थितिम् । व्योमोक्या वरयेदत्र वृत्तिमुग्र्या च भारती ॥ [१७]८२ ॥

एको द्वितीयपात्ररहितः । विट: पल्लवकः; धूर्तश्चौर: शृंगारादि:, वेश्यादेश्वेश्यस्त्री-कुलटा-शम्बलाद्ये: स्वस्यात्मनो वा स्थितिं चरितं व्योमोक्या रङ्गप्रविष्टद्वितीयपात्रसम्बन्धिवचनानुवादेन वेश्यादर्शविकारे: सामाजिकानुरञ्जनंयते । श्रृत्ते भारती चात्र वृत्तिः प्रभूततया प्रधानम् । वीर-शृंगारयो: प्रभानतवेधपि व्योमोकृत्या वार्चिक एवंात्राभिनयो न सात्विकादिकावित्ति, न सांवती कैशिकी वा प्रधानम् । श्रृत्त विटादीनां परवचननात्मकं वृत्तं प्रेक्षागारामवृश्चनौत्यवापदानार्थं व्युत्पाद्यत इति । श्रृत्त केचित्‌च विटार्कलिप्तं वृत्तं, नायकं च विटमेव मन्यन्ते ॥ [१७] ८२ ॥

[सू० १३१]—वैमुख्यकार्य वोध्या? श्यतकौलीनदम्भवत् । हस्याद्धि भारणासन्ध्यद्ध-वृत्ति प्रहसनं विद्रुha ॥[१८] ८३१॥

ग्रथ [नायकके] कर्तव्यके प्रदर्शन द्वारा नायकका वर्णन करते हैं—

[सूत्र १३०]—एक विट या धूर्त [नायक] वेश्यादिको ग्रथवा अपना स्थितिको 'ग्राकाशभाषित' के द्वारा इसमें वर्णन करता है श्रौर इसमें भारती वृत्तिकी प्रधानता होती है ॥ [१७]

एक श्रथ्यन्त दूसरे पात्रले रहित विट श्रथवा [पल्लवक श्रथवा] वेध्यासक्त श्रौर धूर्त चोर जुघारी श्रादि [भारणका नायक होता है ।] वेध्यादि श्रथवा बाजीर श्रौरत, कुलटा [छिनाल, व्यभिचारिणी स्त्री] श्रौर [जम्बली श्रथ्यालात] कुट्टिनी, दूती श्रादिके [चरितको], ग्रथवा ग्रपनी स्थितिको या चरितको रंगमें प्रवृष्ट न होने वाले हितीय पात्रके वचनौंका श्रनुवाद करके [श्रथवा रंगमें श्रथवस्थित किसी ग्रन्य पात्रके साथ वार्तालापके रूपमें किए जाने वाले] श्राकाशभाषितके द्वारा वर्णन करे, श्रौर ग्रप्रसिद्ध विकारौके द्वारा सामाजिकोंको समझावे 'श्रृत्त' इसमें श्रथर्ात् भारामें श्रौर प्रभुराम्रात्‌ होनेसे इस [ भार ] में भारती वृत्ति प्रधान होती है । वीर श्रौर शृङ्गार रसौकी प्रधानता होनेपर भी ग्राकाशभाषितके द्वारा वर्णन करने, श्रौर ग्रप्रसिद्ध विकारौके द्वारा सामाजिकोंको भाषित [के रूपमें प्रति] होनेसे वाचिक हो श्रभिनय होता है । सात्विक या श्राद्धिक नहीं ।

इसलिए सातवती ग्रथवा कैशिकी वृत्तिकी प्रधानता [भावमें] नहीं होती है । इसमें विट श्रादि का दूसरौंक ठगने वाला चरित्र भी, प्रेक्षक ठगे न जा सकें इस प्रकारकी शिक्षादेनेकेलिए, दिखलाया जाता है । कुछ लोग इस [भावे] में कथाभासको [सर्वथा] विट द्वारा कल्पित तथा नायक [सदा] विट होना चाहिए ऐसा मानते हैं ॥[१७]८२॥

ग्रथं श्टपक भेद—प्रहसनका लक्‌पा—

ग्रथ 'प्रहसन' का [लक्षणा करनका] ग्रवसर श्राता है—

[सूत्र १३१]—[पाखण्डीं श्रादिके प्रति] उदासीनताको उत्पन्न करानेवाला, वीथीके श्रङ्गोंसे युक्त, प्रसिद्ध जनापवाद श्रौर मिथ्या दम्भसे युक्त, श्रौर भारणके समान [मुख निर्वहण] १. रतिक

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द्वितीयो विवेक:

[ २३१

का० ७४, सू० १३२ ]

वैसुक्यं बहुमानाभाव: कायं प्रयोजनं यस्म् । प्रहसनेन हि पाखण्डिप्रभृतीनां चरितं विज्ञाय विमुख: पुरुषो न भूयस्तान् वञ्चकानुपस्पति । वीर्याद्भिर्हि त्व्याहारादिभिर्य-थायोगं संयुक्तं च विधेयम् । कौलीनं जनवाद: तत् ख्यातं प्रसिद्धम् । दम्भाश्च श्यात्मन्य-तथ्यसाधुस्त्वारोपारूप: ख्यातोदत्त्र विधेय: । यथा शाक्यानां स्त्रीसम्पर्को¹ गर्हणीयो न चौर्यम् । एवं दम्भोदपि हास्यो रसौ शृङ्गारो मुख्यों यथा । भाणवच्च शृङ्गी मुख-निरवहासे । एकोऽपि: भारती वृत्तिश्च निवन्धनीया । हास्यरसप्राधान्येऽप्यत्र न कैशिकी वृत्ति: । निन्द्यपाखण्डिप्र-प्रभृतीनां शृङ्गारस्यायौचित्येनाभावात् केवलहास्यविषयत्वमेव । शृङ्गार एवं लास्याङ्गानि यत्र । 'द्रिघा' द्विप्रकारकं शुद्धं सद्भिग्रयां चेति ॥ [१६] ८३ ॥

श्रथ नायककथनद्वारेण शुद्धमाह—

[सूत्र १३२]—निन्द्यपाखण्डिविप्रादेरसद्भव्यवर्जितम् । परिहासवच:प्रायं शुद्धमेकस्य चेष्टितम् ॥[१६] ८४॥

निन्द्या: शीलादिना गर्हणीयाः, पाखण्डिन: शाक्य-भगवत्तापसादय:, विप्रा रूप दो] संधियों [एक] ग्रहृद्, तथा [भारती] वृत्ति वाला हास्यप्रधान [रूपमेद] 'प्रहसन' [शुद्ध तथा सकोरां भेदसे] दो प्रकारका होता है । [१६] ८३ ।

[पाखण्डियों श्रादिके प्रति] कैमुख्य श्रर्थात् आदरका श्रभाव [उसका उत्पदन] जिसका कार्य श्रर्थात् प्रयोजन है । प्रहसनके द्वारा पाखण्डी आदिके चरितको समभकर, मनुष्य उन ठगोंके पास फिर नहीं जाता है [इसलिए प्रहसनको पाखण्डियोंकि प्रति वञ्चककारी कहा गया है] । व्यवहारादि वीर्यादिभोंसे युक्त [प्रहसनको] बनाना चाहिए । कौलीन श्रर्थात् लोकापवाद । [प्रसिद्ध करना चाहिए] । हास्यरस जिसमें ग्रहृद्दी श्रर्थात् मुख्य हो [इस प्रकारका प्रहसन होता है] । भाणके समान मुख तथा निर्वहासे नामक दो ही संधि [इस प्रहसनमें भी होते हैं] । एक ही अंक, श्रौर भारती वृत्ति [भी भाणके समान हो] निबद्ध करनी चाहिए । हास्य रसकी प्रधानता होनेपर भी इसमें कैशिकी वृत्ति नहीं होती है । क्योंकि निन्दनीय पाखण्डी श्रादिमें शृङ्गाररसका श्रनौचित्य होनेसे उनमें केवल हास्य-विषयत्व ही होता है । इसीलिए [प्रहसनमें शृङ्गारकी प्रधानता न होनेके कारगा] इसमें थोड़े ही लास्याङ्गोंका वर्णन होता है । वह दो प्रकारका श्रर्थात् शुद्ध श्रौर सङ्कीर्ण दो प्रकारका होता है ॥[१६]८३ ।

[सूत्र १३२]—निन्द्या योग्य पाखण्डी बाहुल्या श्रादि किसी एकका ग्रहृलीलता तथा ग्रसत्यतासे रहित परिहास वचनसे पूरां चेष्टित [जिसमें हो वह] शुद्ध प्रहसन कहलाता है । [१६] ८४ ।

निन्दनीय श्रर्थात् गर्हित श्राचार वाले, पाखण्डी श्रर्थात् बौद्ध श्रौर बाहुल्या तपस्वी ग्रादि [प्रथकार जैन हैं इसलिए उन्होंने बौद्ध तथा भगवत्तापस श्रर्थात् ब्राह्मण तापस श्रादि

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जातिमात्रोभ्जीविनो द्विजन्मनः। श्यादिशब्दादान्यकस्यैवंविधस्य दुष्टस्यैव कस्यचिच्चेष्टितं वृत्तं, श्वशलीलेन ग्राह्यते जुगुप्सा-ग्राम्यत्वहेतुना च, श्रमभ्येन च भीडाकारिणा रहितम्। परिहासप्रधानवचनबहुलं च । एतदर्थमिधायि रूपकमपि चोपचाराद शुद्धं प्रहसनम् । द्वितीयवेश्या दिचारितसाक्ष्यंरहितत्वादिति ॥ [१६] १३४॥

[सूत्र १३२]—सङ्कीर्णवृत्तकिलक-ग्राम्याभाव-परिच्छेदम् ।

बहूनां बन्धकी-चेट-वेश्यादीनां विचेष्टितम् ॥[२०]४५॥

बहूनां चरितैः सङ्कीर्णवृत्तान् सङ्कीर्णम् । श्रत्युल्वणवेषस्यचर्यवहारोचारपरिजनम् । उद्धतत्वं च सतामनुचितत्वात् । बन्धकी स्वैरिणी, चेटो दासः, वेश्या परयस्त्री । श्यादिशब्दादान् श्मश्रुली-धूर्त-बृद्ध-पाखण्ड-विप्र-मूर्ख-चार-भटादयो विकृतवेष-भाषाचारौ विगर्हनीयौ हास्यजनकौ चेष्टितमुष्टानम् । एकस्य बन्धक्यादेः कस्यचित् द्वारेगा यत्नानेक एवंविध एवं प्रकर्षेण हृद्यते तन् सङ्कीर्णचरितविपयत्वात् सङ्कीर्णम् । शुद्धे तु पाक्षण्डादेरेकस्यैव चरितं प्रहस्यते इति पूर्वेमाद् भेदः ।

दोनोंको निश्चय पालण्डी कहा है] विप्र [विद्यादि ब्राह्मणोचित गुणोंसे रहित होनेपर भी] केवल जातिसे जीविका-निर्वाह करने वाले हिज्जे 'ग्राम्य' शब्दसे इस प्रकारके किसी ग्रन्य एक हो दृष्टेिे जुगुप्सा श्रौर ग्राम्यत्व जनक प्रहेलिका श्रर्थात् व्याप्तिसे श्रौर द्विजातिक श्रमभ्यता [रूप ग्रहेलीलता] से रहित व्यपारकारक वरान्त [प्रहसनमें होना चाहिए] । परिहास प्रधान वचन श्रधिक मात्रमें पाए जाते हैं । इस लिए इस [इस परिहास प्रधानवचन] को कहने वाला रूपक भी उपचारसे 'शुद्ध' 'प्रहसन' कहलाता है । वेश्यादि किसी द्वितीयके चरित का सङ्कीरण होनेसे [इस प्रकारका प्रहसन 'शुद्ध' कहलाता है ॥[१६]४५॥

[सूत्र १३३]—ग्राम्यन्त उद्धत वेष, भाषा, श्राचार श्रौर परिजनोंसे युक्त, वेश्या तथा स्वैरिणी [स्वेच्छाचारिणी स्त्री] श्रादि बहुधोंके चरित्रसे युक्त [प्रहसन] सङ्कीर्णम् [प्रहसन कहलाता] है । [२०]

बहुलोंके चरितसे व्याप्त होनेके कारण [इस प्रकारका प्रहसन] सङ्कीर्ण कहलाता है । [वेष, भाषा, श्राधार श्राविका] उद्धतत्व [उस प्रकारके वेष श्रादिके] सज्जनोचित न होनेके कारण [कहा जाता] है । बन्धकी श्रर्थात् स्वैरिणी, चेट श्रर्थात् दास, वेश्या, वाजाहु स्त्री । 'ग्राम्य' शब्दसे श्मश्रुली [छिनाल], धूर्त, वृद्ध, हिज्जड़ा, पाखण्डी, बाह्मणप, मुर्ख, [वेश्याग्रोंके सेवक], चार तथा भाट श्रादि विकृत वेष, भाषा श्रौर श्राचार वालोंका ग्रहण होता है । [ग्रंगे 'विचेष्टितं' शब्दका श्रर्थ करते हैं] विशेष रूपसे गर्हणीय श्रर्थात् हास्यजनक चेष्टित श्रर्थात् व्यापार [प्रनुष्ठान] । बन्धकी श्रादिमेंसे किसी एकके द्वारा जहाँ इस प्रकारके ग्रन्य ग्रनेक लोगोंका उपहास किया जाता है वह सङ्कीर्णे चरितोंका विषय होनेसे सङ्कीर्ण प्रहसन कहलाता] है । शुद्ध [प्रहसन] में तो पाखण्डी श्रादि किसी एकके ही चरितका उपहास किया जाता है यह पूर्वलले [शुद्ध प्रहसन] से [सङ्कीर्णरूप प्रहसनका] भेद है ।

१. श्रास्यान । २. चारबद्ध । ३. विचित्रत ।

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द्वितीयो विवेक:

ग्रन्ये तु—स्वभावशुद्ध-पाखण्ड्यादेश्वरितं प्रहसते तत्त् सङ्कीर्णचरितविषयत्वात् सङ्कीर्णस्मित्याहुः । सङ्कीर्णस्मनेकाङ्क्ष केचिदनुस्मरन्ति । श्रत च प्रथमेन श्लोकेन सामान्यलक्षणम् । द्वितीयेन शुद्धस्य, तृतीयेन च सङ्कीर्णस्य लक्षणम् । उभयत्र तु विट-चेट्यादेः परिजनस्य भूयस्त्वमिति । प्रहसनेन च वाल-स्त्री-मूर्खाणां हास्य-प्रदर्शनेन नाट्ये प्ररोचना क्रियते । ततः सङ्घातानुरुरचयः शृङ्गाररूपकैर्धर्मार्थकामेषु प्रवृत्ताव्याने । तथा च वृत्तच्युतस्य पाखण्डिप्रभृतेःवृत्तं शुद्धं, वन्धक्यादेश्वर धूर्तादिसङ्कुलं सङ्कीर्णं वृत्तं त्याज्यतया व्यवस्थते इति ॥२०॥ ८५॥

[सूत्र १३४]—शान्त-हास्य-शृङ्गार-विमर्शः ख्यातवस्तुकः । रौद्रमुख्यरक्ततुरङ्गः सेन्द्रजाल-रङ्गो डिमः ॥ [२१] ८६ ॥

शान्त-हास्य-शृङ्गारगतरूपपरसत्त्वयेग विमर्शाश्रयचतुर्थस्सन्धानना च रहितत्ववान् शोकरसेरन्यसनिधिमिश्रो युक्तः । शान्तस्य करुणापहेतुकत्वेनोपलच्यत्वात् करुणोऽपि निपिध्यते दुःखप्रकर्षोत्कत्वात् ।

सङ्कीर्णे प्रहसनका दूसरा लक्षण— ग्रन्य लोग तो—स्वभावशुद्ध [प्रथमतः पवित्र आचारवाले होनेपर भी पाखण्डी ग्रादि ग्रन्य धर्मोंके ग्रनुयायी ब्राह्मणादि] के चरितका जिसमें उपहास किया जाता है वह चरितका सङ्कीर्ण [प्रहसन] होता है यह कहते हैं । कुछ लोगोंका कहना यहहै कि सङ्कीर्ण [प्रहसन] ग्रनेक ग्रङ्गों वाला होता है । [और शुद्ध प्रहसनमें केवल एक ग्रङ्ग होता है यह उन दोनोंका भेद है । प्रहसनके लक्षणमें ८३-८५ तक तीन इलोक ग्राए हैं] इसमेंसे प्रथम इलोकसे [प्रहसनका] सामान्य लक्षण, द्वितीयसे शुद्धका लक्षण, तथा तृतीय इलोकसे सङ्कीर्ण [प्रहसन] का लक्षण किया गया है । [शुद्ध तथा सङ्कीर्ण] दोनोंमें विट, चेट ग्रादि परिजनोंका बाहुल्य रहता है । प्रहसनके द्वारा हास्य प्रदर्शित करके मूर्खों ग्रौर स्त्रियोंकी नाट्यके विषयमें ग्रभिरुचि उत्पन्न की जाती है । उससे नाटकके विषयमें हर्ष हो जانيपर शेष रूपकभेदोंके द्वारा उनको धर्म, ग्रर्थ श्रौर काम की शिक्षा प्रदान की जाती है । श्रौर साथ ही ग्राचारहीन पाखण्डी ग्रादि [किसी एक] का शुद्ध वृत्त तथा धूर्तादिसे व्याप्त वन्धकी ग्रादिका सङ्कीर्ण चरित त्याज्य रूपसे दिखलाया जाता है । [वह प्रहसनकी उपयोगिता है] ॥२०॥ ८५॥

९ नवम रूपक भेद ‘डिम’ का लक्षण— [प्रहसनके लक्षणके बाद ग्रन्थकार] ग्रन्थ ‘डिम’ के लक्षणाका ग्रन्थसर प्राप्त है —[श्रतः शान्त, शृङ्गार ग्रौर हास्य रसों सहित, विमर्श सन्धि-विहीन, प्रसिद्ध ग्राख्यान-वस्तु वाला, तथा रौद्ररस-प्रधान, इन्द्रजाल एवं युद्धादिसे परिपूर्ण चार ग्रङ्कों वाला [रूपकभेद] 'डिम' [कहलाता] है । ॥ [२१] ८६ ॥

शान्त, शृङ्गार ग्रौर हास्य रूप तीन रसोंसे, तथा विमर्श नामक चतुर्थ सन्धिसे रहित होनेसे ग्रन्थ रतों तथा सन्धियोंसे मुक्त [डिम होता है] । शान्त रसके [यहाँ] करण-जन्म

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इह च करुण-रौद्र-भयानक-बीभत्साच्चत्सारो रसः दुःखात्मकः। शृङ्गार-हास्य-वीर-श्रृद्भुत-शान्ताः पञ्च सुखात्मकाः। दिव्यानां च सुखबहुल्येनालपदु.ख्वादन्यथा दिव्यत्वसैव न स्यातदित्येपां तत्प्रभावानुरुगहीतानामन्येषां च दु.खात्मकानो रसः अग्र्योज्या एव। समवकारादौ तु यद् रौद्रादिष्येन तद् दिव्यचेतुकस्वाभाविकसुखावाधकत्व-दुःखमेव। मृत्योर्वाशिवशरीराद्वलोकनाद् वीभत्सश्च दिव्यानामगान्तुक एव। करुणः पुनरष्ट-वियोगप्रकर्षोकप्रकर्षेनरूपवान् स्वाभाविकसुखपरिपन्थी सर्वदैवामवर्षणनीय एव। शान्तोऽपि विषयासक्तमतत्वादसम्भव्येव

व्यत्र च डिमे हास्य-शृङ्गारवर्जनमिन्द्रजालादिवहुलत्वादुचितमेवति। स्वार्थ रूपसे उपलक्षरण होनेके कारण [शान्त पदसे ही] कथनारसका भी निषेध किया गया है [यह समकक्षना चाहिए] [कथनएररसेके] दु.खप्रकृतिमक होनेसे।

रसोंकी सुख दु.खात्मकता—

कथनारसकी दु.खात्मकताके कथनके प्रसंगसे रसोंके सुखात्मक तथा दु.खात्मक द्विविध विभागको दिखलाते हैं—

यहाँ करुण, रौद्र, भयानक ग्रोर बीभत्स ये चार रस दु.खात्मक रस हैं। शृङ्गार, हास्य, वीर, श्रृद्भुत ग्रोर शान्त ये पाँच रस सुखात्मक रस है। दिव्य पात्रोंमें सुखप्रधान होनेके कारण यदि उनमें दु.खकी न्यूनता होनेसे, श्रभयान्तु या उनमें मुखही प्रघानता न मानी जाय तो] उनमें दिव्यता ही नहीं बनेगी। इसलिए इन [दिव्यात्रोंमें] ग्रोर उनके प्रभावसे श्रनुरग्रहीत श्रन्यो [श्रर्थात् उनके भक्तगरणों] के साथ दु.खात्मक रसोंका प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसपर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि [यदि दिव्य पात्रोंके साथ दु.खप्रधान रसोंके प्रयोगका निषेध किया जाता है तो रौद्ररस-प्रधान समवकारमें दिव्य पात्रोंकी संगति कैसे लगेगी इस शङ्काका उत्तर प्रागे देते हैं कि] समवकारादिमें [दिव्य पात्रोंके होते हुए भी] जो रौद्ररसका वर्णन कहा गया है वह [उन पात्रोंके] दिव्यता-जन्य स्वाभाविक सुखका बाधक न होनेसे दोषावह नहीं है। [प्रागे विभिन्न रसोंके कारण तथा स्वरूपका उपपादन प्रसंगतः करते हैं] मनुष्य श्रादिके द्वारा की जाने वाली श्रावाज ग्रादिसे रौद्र [रसका स्थायीभाव क्रोध]

उत्पन्न होता है। श्रापनतसे श्रधिक [श्रवित्शाली पुरुषके] क्रोधादिसे भयानक [रसके स्थायी-भाव भय] की उत्पत्ति होती है। श्रोर मनुष्यादिके श्रात्मवित्र शरीर श्रादिके श्रवलोकनसे बीभत्स [रसका स्थायीभाव जुगुप्सा] [दिव्य पात्रोंमें [वास्तविक नही] श्रागन्तुक हो होता है। [श्रर्थात् दु.खात्मक रौद्र भयानक ग्रोर बीभत्सरसोंका देवताओंोंके साथ वर्णन श्रागन्तुक रूपमें हो किया जा सकता है। वास्तविक रूपसे नहीं। कथनएररसा वर्णन तो उनके साथ किसी भी रूपमें नहीं करना चाहिए इस बातको प्रागे कहते हैं] किन्तु प्रयोजनके वियोगसे उत्पन्न शोकके प्रकर्ष रूप होनेके कारण स्वाभाविक सुखके विरोधी कथनए रसका इन [देवताओंों] के साथ कभी भी वर्णन नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार [देवताओंोंके] विषयासक्ति-प्रधान होनेके कारण उनमें शान्तरस भी श्रसम्भव हो है [श्रर्थात् देवताओंोंके चरितमें शान्तरसका भी वर्णन नहीं करना चाहिए।]

यहाँ ‘डिम’ में इन्द्रजालादिका बाहुल्य होनेसे हास्य तथा शृङ्गारका वर्जन उचित ही

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पूर्वप्रसिद्धं वस्तुतिवृत्तं नायकोपायफललचणामात्र । रौद्रे मुख्योड्ज्जि यत्र । शेषा रसा: पुनरंगानि। ग्रवस्थाचतुष्टयविशिष्ट: चतुःसन्धित्त्वेन चतुदिननिवर्तनोयेतिवृत्तत्वेन च चतुरङ्गवान् । च्छायावातारुपाश्चात्र च्छाया विधेया:। नूलिकाङ्कमुख्योरपि युद्धादिवर्णने निवन्ध्यो भवत्येव । 'सेन्ट्र' इति सहेन्द्रजाल-रङ्गाभ्यां वर्तते । विध्यमानता चात्र सहार्थ:। इन्द्रजालमसद् शस्त्र-रुपादीनां प्रकाशतम् । अन्यथापि पतनं वा । रषा: संग्राम:, बाहुयुद्ध-चलात्कारपराभवादिरुप:। डिमो डिम्बो विप्लव इत्यथ: । तद्यागादिय डिम:। डिमे: संघातार्थ त्वादिति ॥[२१] ८६ ॥

[सूत्र १३५]—ग्रत्रोलकापात-निर्घाताश्चन्द्रसूर्योपरककय: । सुरासुरपिशाचाच्चार्य: प्राय: षोडश नायकाः ॥[२२] ८७॥

है । [लक्षणमें ग्राए हुए 'ग्र्यातवस्तुक:' पदका ग्रर्थ करते हैं कि] जिसमें नायक, फल, तथा उपाय रुप ग्रथ्य 'वस्तु' ग्रर्थात् इतिवृत्त ग्र्यात ग्रर्थात् पूर्व-प्रसिद्ध है । [इस प्रकारका डिम होना चाहिए।] रौद्ररस जिसमें च्छायो ग्रर्थात् प्रधानरस है । शेष रस च्छायो ग्रर्थात् ग्रप्रधान होते हैं । [विमर्शसन्धि-रहित केवलो ग्रलेप]। चार सन्धियोंवाली वृत्तिहोनेके कारणहू चार ग्रंकोंसे युक्त, तथा चार दिनोंमें सम्पादित कथा-भाग वाला होनेसे चार ग्रङ्गोंसे युक्त [डिम को कहा गया है]। इसमें च्छायोंकी रचना च्छायावतारके रुपमें करनी चाहिए [ग्रङ्कावतारका लक्षण 'सोऽङ्कावतारो यत्' पात्रे च्छायान्तरमसूचनं यह २७वों कारिकामें किया जा चुका है। इसके ग्रनुसार पूर्व च्छायके पात्रों द्वारा ही बिना किसी ग्रन्थ सूचनाके नवीन च्छायका ग्रारम्भ होता है उसकी च्छायावतार कहते हैं । डिमके च्छायोंकी रचना इसी प्रकारसे करनी चाहिए यह ग्रन्थकारका श्रभिप्राय है । ग्रर्थात् डिमके च्छायोंमें प्रथम च्छायके पात्रों द्वारा ही द्वितीय च्छाय प्राविका ग्रारम्भ होना चाहिए । ग्रौर उसमें विष्कम्भक प्रवेशक श्रादि ग्रर्थोपक्षेपकोंका प्रयोग नहीं करना चाहिए। किन्तु युद्धादिके वृत्तान्तमें चूलिका तथा च्छायमुख दोनों [प्रथयोपक्षेपकों] का प्रयोग होता हो है । [विष्कम्भक प्रवेशक ग्रादिकाप्रयोग नहीं होता है]। 'सेन्द्रजालरपो डिम:' इसका ग्रर्थ यह है कि इन्द्रजाल ग्रौर युद्धसे युक्त हो । यहाँ 'सह' पदका ग्रर्थ विद्यमानता है । [ग्रर्थात् सेन्द्रजालमें सहार्थक 'स' ग्राया है उससे इन्द्रजाल ग्रौर युद्धकी डिममें विद्यमानता सूचित होती है।] ग्रविद्यमान ग्रादि ग्रौर रुपादिको प्रकाशित करना 'इन्द्रजाल' [कहलाता] है । बाहुयुद्ध, बलात्कार पराभवदि रुप संग्राम रषा [शब्दका ग्रर्थ] है । डिम ग्रर्थात् डिम्ब या विप्लव 'डिम' शब्दका मुख्य ग्रर्थ है । उसके योगसे [रुपकभेदका नाम] डिम है । 'डिम' धातुके संघातार्थक होनेसे [विप्लवादि-प्रधान रुपकभेद डिम कहुलाता है । यह डिम शब्दका निर्वचन है । यह ग्रन्थकारका ग्रभिप्राय है]

।। [२१] ८६ ।। ग्रब [डिममें] करने योग्य ग्रन्य बातोंका, ग्रौर नायकका निर्देश करते हैं— [सूत्र १३६]—इत्र [डिम] में उत्कापात, नृकल्पना, ग्रकस्माद् ग्रौर सूर्यके उपराग [ग्रर्थात् प्रहरण ग्रथवा परिवेष] दिखलाए जाने चाहिए । [सूर्य तथा चन्द्रमाके चारों ग्रोर कभी-कभी एक गोल घेरा दिखलाए देता है इसको 'परिवेष' कहते हैं] सुर, ग्रसुर, पिशाच ग्रादि प्राय: सोलह

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‘डिमत्र’ डिमे उल्कापात-निर्घात-चन्द्रसूर्यपरिवेषाः। उपलक्षणेऽपरतवाञ्चास्य लेऽ्यकिलिङ्ग-वर्म-वस्त्र-काष्ठकृतानि रूपाणि च प्रदर्श्यन्ते। ‘सुरागुर’ इत्याद्यशब्दाद्दू यत्न-रत्नसमुज्ज्वलन्द्रादिग्रहः। प्रायोऽभरणान्त न्यूनाधिकत्वेऽपि न दोषः। दिव्यनानुसूक्ष्मतत्त्वाद् धीरोरद्धता एते दृश्यधाः। स्वजात्यपेक्षया तु धीरोदात्तत्वमपि न विरुध्यते। एपां च परस्परविभिन्ना भावाः। स्थायी-व्यभिचारिभिर्योजनीयाः। समवकारवत् तत्तद् देवताभक्तिग्रीतिकार्याद्वाद दिव्यनायकत्वं दिव्यचरितानुष्टानवृत्यत्पत्तिश्च दृश्यधा। एवमीहामृगेडपि॥ [२२] ५७॥

छ्रथ क्रमप्राप्तमूलस्त्रिकादीन् निरूपयति—

[सूत्र १३६]—उत्सृष्टिकाङ्कः पु स्वामी ख्यातयुद्धोत्थवृत्तवाः।

भारतोक्तवृत्तिसन्ध्यङ्गैरू वाग्युद्धः करुणार्द्रकः॥ [२३] ५८॥

प्रकारके नायक होते हैं। [२२] ५७।

इन[डिमोंमें] उल्कापात, भूकम्प, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण ग्रोर इनके उपलक्षणमात्र होनेसे [प्रर्थात् प्लास्टर करने योग्य दृश्यसे बनी हुई] प्रथवा किलिङ्ग [प्रर्थात् हरी चटाई प्रथवा पतले तख्तेसे बनी हुई] चर्मंसे, वस्त्रसे तथा काष्ठसे बनी हुई प्रतिमात्रों ग्रादि [रूपों] को दिखलाया जाता है। [कारिकामें ग्राए हुए सुरासुरपिशाचाद्या: पदमें] ‘श्रादि’ शब्दसे यक्ष, राक्षस, भुजङ्गेन्द्र, ग्रादिका प्रहार करना चाहिए। [‘प्रायः’ श्लोडशानायका:।’ में] ‘प्राय:’ पदसे यह सूचित होता है कि कभी-कभी इससे ग्राधिक या कम होनेपर भी दोष नहीं है। [प्रर्थात् साधारण्यात् डिममें सोलह नायक होते हैं, किन्तु कभी-कभी इस संख्यामें न्यूनाधिक्य हो जानेपर भी कोई दोष नहीं होता]। दिव्यजनोंके उद्भत होनेसे ये [डिमके सोलहों नायक] धीरोदात्त समझने चाहिए। [मनुष्योंकी ग्रपेक्षासे ही ये धीरोदत्त कहे गए हैं]। ग्रपनी जातिकी ग्रपेक्षासे तो इनका धीरोदात्तत्व भी विरुद्ध नहीं है। [ग्रर्थात् ग्रपनी जातिकी

ग्रपेक्षासे तो धीरोदात्त भी कहे जा सकते हैं।] इन [सोलहों नायकोंने] के स्थायिभाव ध्याभिचारिभाव श्रादि भी परस्पर पृथक्-पृथक् हो वर्णन करने चाहिए। समवकारके समान उन-उन देवताओंके भक्तोंके प्रति उपकारी [ज्ञानवादी] होनेसे [डिममें भी] दिव्य नायक होते हैं ग्रोर दिव्य चरितके ग्रभुष्टानका परिज्ञान [रूप उसका फल] समझना चाहिए। इसी प्रकार ‘ईहामृग’ में भी [दिव्य नायकोंनेकी स्थितिका समर्थन समझना चाहिए।]

समवकारमें तीन श्रङ्गोंमें बारह नायक दिखलाए थे। प्रत्येक श्रङ्गमें नायक, प्रति-नायक ग्रोर उनके दो सहायक इस प्रकार चार नायकोंने होने से तीन श्रङ्गोंने समवकारमें कुल मिलाकर बारह नायक माने थे। इसी प्रकार चार श्रङ्गों वाले डिमके प्रत्येक श्रङ्गमें चार-चार नायक होनेसे कुल मिलाकर सोलह नायक माने गए हैं। इन सबके विभाव ग्रनुभाव ग्रोर फल श्रादि पृथक्-पृथक् हो वर्णन करने चाहिए।

१०. दशम रूपक भेद ‘उत्सृष्टिकाङ्क’ का लक्षण—

श्रब क्रमसे प्राप्त उत्सृष्टिकाङ्कका निरूपण करते हैं—

[सूत्र १३६] [‘डिम’ श्रोर ‘समवकार’ में दिव्य नायक कहे गए थे उनके विपरीत]

पुरुष नायक वाला, प्रसिद्ध युद्धसे जन्य [प्रर्थात् प्रसिद्ध युद्धोपाख्यानपर ग्राधारित] कथावस्तु

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द्वितीयो विवेक:

उत्क्रमस्योन्मुखा सृष्टिजीवीतं यासां ता उत्सृष्टिका:, शोचन्तिय: स्त्रिय: । ताभिरड्कितत्वाद् 'उत्सृष्टिकाङ्क:' । पुंसा सो मर्या छत्र्र स्वामिनो, न दिव्या दु:खात्मक करुणारसस्यात्र प्राधान्यात् । दिव्यानां च सुखवahul्येन तत्रसम्बन्धायोगात् । ख्यातं भारतातौ प्रसिद्धं यद् युद्धं तत्र सम्भवि, करुणारसवहुलं यद् वृत्तं तत्, स्वयं प्रसिद्ध वाड्मयदत्त्र निवन्धनद्रियम् । भायप्रतिपादिते सुख-निवृहहुरूपयो:सान्ध्योयम् । पारदेवितवahul्यानुमुख्या भारती वृत्तिः । एकाहनिवर्तनीयचरितवदेकाङ्कशास्त्र कर्तव्य: । शौर्योदिमदावलिप्तानां परस्परं द्वेषोद्भटचुनं वाग्युद्धं, तद्रकुहल: । मत्वर्थीयानो भूम्नयत्र विधानात् । वाग्युद्धं चानुशोचनपरायराणामिति रौद्रप्रवेशन न करुणस्याङ्कित्व्याघात: । करुणे रसोड्डीनि प्रधानं वाहुल्यनिवन्धनादत्र विधेय: । ख्यातयुद्धोथवृत्ते ध-वन्ध्यासदृभावेनेट्टव्ययोगाद्राचुर्योदिति ॥ [२३] ५५ ॥

वाला, भारामें कहे हुए [मुख तथा निर्वहण दो] सन्धियों, [भारती] वृत्ति तथा [एक] श्रृङ्गसे युक्त, करुणरस-प्रधान, वाग्युद्ध प्रदर्शक, [रूपकभेद] उत्सृष्टिकाङ्क [कहलाता] है ॥ [२३] ५५ ॥

इस कारिकाकी व्याख्या ग्रन्थम्भ करनेसे पहले प्रथमत: 'उत्सृष्टिकाङ्क' पदका निर्वाचन दिलाते हैं—

जिनकी सृष्टि प्रथमत: जीवन उत्क्रमोन्मुख है इस प्रकारकी शोकोपप्रस्त स्त्रियाँ 'उत्सृष्टिका' [कहलाती हैं] । उनसे श्राद्धित [प्रथमत: उनकी चर्चा करने वाला रूपकभेद] उत्सृष्टिकाङ्क [कहलाता] है । 'यु' स्वामो' कहनेसे इसमें पुरुष प्रथमत: मर्त्य ही नायक होते हैं । दु:खात्मक करुणारसकी प्रथानता होनेके कारण [उत्सृष्टिकाङ्कमें] दिव्य नायक नहीं होते हैं । क्योंकि दिव्यजनोंके सुखप्रधान होनेसे उनके साथ उस [दु:खात्मक करुणारस] का सम्बन्ध नहीं होता है । [प्रत: इसमें दिव्य नायक नहीं होते हैं] । 'ख्यातं' प्रथमत: महाभारत ग्रन्थमें प्रसिद्ध जो युद्ध, उसमें होने वाले करुणारससे परिपूर्ण जो ग्रन्थान-वस्तु, श्रथवा [महाभारतादिके ग्रन्थारके बिना] स्वयं प्रसिद्ध जो विद्यमान या प्रवृत्तिमान ग्रन्थान-वस्तु, उसकी रचना इसमें करनी चाहिए । भारामें प्रतिपादित मुख तथा निर्वहण नामक दो सन्धि, विलाप श्रादिका बाहुल्य होनेसे भारती मुख्य वृत्ति, तथा एक दिनमें समाप्त्य चरित वाला होनेसे एक श्रङ्ग इसमें रखना चाहिए । शौर्य श्रादिके मदसे मत्त जनोका एक-दूसरेपर द्वेषारोपित वाग्युद्ध [कहलाता] है । उसका बाहुल्य [इस उत्सृष्टिकाङ्कमें] होता है । यहाँ मत्वर्थीय प्रत्यके बाहुल्यार्थमें विहित होनेसे [वाग्युद्ध का अर्थ वाग्युद्धबहुल: करना चाहिए] । और यह वाग्युद्ध शनुशोचनपरायराज जनोका है इसलिए [वाग्युद्धमें युयद्ध पदके होनेसे] रौद्र का प्रवेश नहीं होता है इसलिए करुणरसकी प्रथानताका व्याघात भी नहीं होता है [प्रथमत: उत्सृष्टिकाङ्कमें शनुशोचनपरायराज स्त्रियाका वाग्युद्ध होनेपर भी उसमें रौद्ररस नहीं प्राप्ति करुणरस हो प्रधान रहता है] । इसमें श्रधिकांशमें वर्गित करके करुणरस हो प्रधान रुपसे निबद्ध करना चाहिए । प्रसिद्ध युद्धात्मक इतिहामें बन्ध-बन्धनके होनेसे इष्ट-वियोगादिका प्राचुर्य होनेके कारण [करुणरस हो उत्सृष्टिकाङ्कका प्रधानरस होता है] ॥ [२३] ५५ ॥

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[सूत्र १३७]—निर्वेदवाचो भूम्नात्र योषितां परिदेवितम् । नरा निवृत्तसंग्रामश्चेष्टाचित्त्रा विसंस्थुला: ॥[२४]८७॥

ग्रथ उत्कृष्टिकाढ़े यासु श्रुतासु निर्वेदो जायते, ता निर्वेदवाचो बाहुल्येन निवन्धनीयाः। देवोपलम्भ-ग्रात्मनिन्दादिरुपानुशोचनात्मकं परिदेवितं च योषितां बहुलं वचनीयम्। पुंरुपसंचरिताद्‌ बहुलं नाटनारिकपरंपराग्रामः प्राप्तव्यवेत नियोज्याः। भूमिनिपात-विवर्तितो: शिरस्ताडन-स्वकेशरोटनानादिका नानाप्रकाराश्चेष्टा विसंस्थुला दर्शनीया: ग्रथ चोत्सृष्टिकाढ़े उत्तमानां मध्यमांनां च बहुविधव्यसनपातेन वैरसादितानां महाविपदपि ग्रतिपादिनां स्थिररायां च पुनरुन्त्तिथ्यशते इदयविपादं चित्तस्थैयैं च विधातुं स्त्रीपरिदेवितबहुलं वृतं व्युत्पादित इति ॥ [२४] ८७ ॥

[सूत्र १३८]—ईहामृग: सदृश्यो दिव्येशो हस्तमानव: । एकाढ़ुचतुरड़ो वा ख्याताल्यातेतिवृत्तवान् ॥ [२४] ९० ॥

ग्रथ [उत्कृष्टिकाढ़ौ] करने योग्य ग्रन्थ बातोंका निर्देश करते हैं— [सूत्र १३८]—इसमें मध्य रुपसे स्त्रियोंके विलाप तथा [संसारकी ग्रनित्यता कु.खमयस्वादिके प्रतिपादन द्वारा] वैराग्यकी जनक बातोंका वर्णन करना चाहिए। पुरुषों की संग्रामसे निवृत्ति शौर [भूपतन उरस्ताडन केशग्रोचनादि रुप] नाना प्रकारकी विश्वृङ्खल चेष्टाएँ प्रदर्शित करनी चाहिए ॥ [२४] ९७ ॥

उत्कृष्टिकाढ़में जिन [बातों] के सुननेसे वैराग्य उत्पन्न होता है इस प्रकारकी वैराग्यजनक बातें निबद्ध करनी चाहिए। देवको उपालम्भ देना, ग्रात्मनिन्दा, शौर ग्रनुशोचन रुप स्त्रियोंका विलाप, प्रचुर मात्रामें वर्णन करना चाहिए। शौर पुरुषोंको उद्दत प्रहार बघ, बन्ध, ताडन ग्रादि रुप संग्राम व्यापारोंसे उपरत पात्रके रुपमें दिखलाना चाहिए। भूमिपर लोटना, धाति पीटना, सिर फोड़ना, बाल नोचना, ग्रादि नाना प्रकारकी विश्वृङ्खल चेष्टाएँ [स्त्रियोंकी] दिखलानी चाहिए। इस उत्कृष्टिकाढ़में नाना प्रकारकी ग्रापत्तियोंके ग्रा पड़नेसे, दु:खोंसे पीड़ित, किन्तु महान् विपत्तिकालम्भ भी न घबड़ाने वाले, एवं स्थिर रहने वाले, उत्तम तथा मध्यम-लोगोंकी फिर दुबारा उन्नति होतो है इसलिए [मनुष्यको दु:खमें पड़ जानेपर भो] घबड़ाना नहीं चाहिए तथा चित्तको स्थिर रखना चाहिए, इस बातकी शिक्षा देनेके [लिए] स्त्रियोंके विलापादिसे पूरां कथा प्रस्तुत की जाती है ॥ [२४] ९७ ॥

११ एकादश रुपक भेद 'ईहामृग' का लक्षण— ग्रथ 'ईहामृग' के लक्षण ग्रादि करनेका ग्रवसर [प्राप्त] है— [सूत्र १३८]—योग्यतोंसे युक्त, दिव्य नायक, तथा ह्मस मानवपात्रों वाला, एक ग्रथवा चतुरड़ू ग्रकार ग्रथवा ख्यात ग्राल्यात इतिवृत्त—[२४] ९० ।

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दिव्यस्त्रीहेतुसंग्रामो निर्विश्वासः सविड्वरः । स्त्रिपहार-भेद-दण्डः प्रायो द्वादशनायकः ॥ [२६] ६१ ॥

ईहा चेष्टा मृगस्येव स्त्रीमात्रार्थो च्छत्र इति ईहामृगः । सह वीर्यादिकं व्योहादि-द्विरवर्तते । दिव्येशो दिव्यनायकः । ह्यमा उद्दतता मानवाः मर्त्यपुरुषपात्रास्त्रयच । एकादश-शतुरङ्गोः वेति । अत्र च वृत्तसंचेप-विस्तारानुरोधिनी कविरवेच्छा प्रमाणम् । एकादशत्वे एकाहनिर्वर्त्यमेव चरितम् । चतुरङ्गत्वे तु चतुर्दिननिर्वर्त्यम् । ख्यातास्यातं प्रसिद्ध-प्रसिद्धं यदिति वृत्तं तद्वान् । प्रश्नास्यां च मतुस्तेन चतुरङ्गत्वे परस्पराङ्कसंबद्धमिति-वृत्तम् ' न तु समवकारवत् तदसम्बद्धम् ।

दिव्यस्त्रीहेतु: संग्रामो यत्र । च्छत्र हि दिव्यां नायकस्त्रियमनिच्छन्तीं प्रति-नायकोडपहरति । ततस्तन्निमित्तको नायक-प्रतिनायकयोः संग्रामो निर्वन्धनीयः । निर्गततो विश्वासः परस्परं प्रयो यन्मात् । श्रावेगाद्यर्थपरस्परस्पर्धादयो विड्वरः, तयु क्तः । स्त्रीनिमित्तमपहार-भेद-दण्डा यत्र । ते च यथासम्भवं स्त्रीविषया ऋन्या-विषया वा । भेदः सामदानादिना विशेषोपपादम् । दण्डो बन्ध्यादिः । प्रायोग्यह्रसं नायिका-नयनाधिकलवस्यापनार्थम् ॥ [२५-२६] ६०-६१ ॥

दिव्य स्त्रीके कारण जिसमें संग्रामका प्रदर्शन किया जाय, परस्पर विद्वेष रहित, उनसे युक्त, स्त्रियोंके ग्रपहरणा, भेद ग्रथवा दण्डका प्रदर्शक, श्रृङ्गार प्रायः बारह नायकों वाला [रूपकभेद] ईहामृग होता है ॥ १ ॥ [२५-२६] ६१ ॥

जिसमें 'मृग'के समान केवल स्त्रीके लिए 'ईहा' अर्थात् चेष्टा होती है वह 'ईहामृग' [कहलाता] है । [यह 'ईहामृग' शब्दका निर्वचन हुग्रा] । वह व्यवहारादि रूप वीर्यादिकोंसे युक्त होता है । दिव्य नायक तथा हृश्य अर्थात् उद्धत मानवपात्र जिसमें हों । एक श्रृङ्गार चरित्र ग्रादि वाला हो । इस विषयमें [ग्रथात् ग्रङ्गोंकी संख्याके विषयमें] कथाभागके संक्षेप ग्रथवा विस्तारका ग्रनुसरण करनेवाली कविकी इच्छा ही प्रमाण है । [कवि ग्रङ्गादि-वस्तुके संक्षेप विस्तारके ग्रनुसार ग्रङ्गोंकी संख्या रखनेमें स्वतन्त्र है ।] एक ग्रङ्ग होनेपर एक दिनमें समाप्त होने वाला ही चरित्र रखना चाहिए । श्रृङ्गार चार ग्रङ्ग होनेपर चार दिनमें समाप्त होने वाली कथा होनी चाहिए । प्रसिद्ध ग्रथवा ग्रप्रसिद्ध जो कथा, उसपर ग्राधारित । इसमें प्रश्ना ग्रङ्गमें मतुप्र प्रत्नय है । इसलिए चार ग्रङ्ग होनेपर उनकी कथा परस्पर सम्बद्ध होनी चाहिए, समवकारके समान ग्रसम्बद्ध नहीं । ['समवकार' के ग्रङ्गोंसे भिन्न परस्पर सम्बद्ध होते हैं ।] 'ईहामृग' के ग्रङ्गोंसे उससे भित्र परस्पर सम्बन्ध होते हैं ।

दिव्य स्त्रीके कारण जिसमें संग्राम हो । इसमें नायककी [प्रतिनायकको] न चाहने वाली दिव्य स्त्रियोंको प्रतिनायक [बलात्] ग्रपहरण करता है । श्रृङ्गार उसके कारण नायक ग्रनर्थ, परस्पर स्पर्धा ग्रादि 'विड्वर' [कहलाते] हैं । उनसे युक्त, स्त्रीके कारण जिसमें ग्रपहरणा, भेद श्रौर दण्ड होते हैं । वे यथासम्भव स्त्री के विषयमें ग्रथवा ऋणके विषयमें [होते हैं ।] भेद श्रर्थात् साम या दानादिके द्वारा फूट डालना । दण्ड ग्रर्थात् बन्ध ग्रादि । 'प्रायः' पदका प्रहार [संख्याके] न्यूनतक श्रधिकतकके सूचित करनेके लिए है ॥ [२५-२६] ६०-६१ ॥

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अथ कृत्यशेषमुपदिशति—

[सूत्र १३६]—व्याजेनात्र रसाभावो बधासन्ने शरीरीभिः । क्यायोगोभवता रसा: सन्धि-वृत्त्योश्चित्ता रतिः ॥ [२७] ६२ ॥

बधासन्ने समरानन्तरं भाविवधयोग्ये शरीरीभिः व्याजेन पलायनादिना रसाभावो विचार्य: । श्रास्यां सात्त्विकं, नेपथ्येऽपि बधो न वर्जनीय: । रसा वीर-रौद्राद्या दीर्घा: । सन्ध्यादि: कर्मावेशवशात्स्थेय: । वृत्यादिकैकशीकृतो विष्क एतत् । 'सन्धि-वृत्त्यो:' इत्येतरेयोगो द्वन्द्व: । श्रनुचिता रति रत्याभास: । स च प्रतिनायककस्य निष्प्रे-मास्रीविषयत्वादिति । [२७] ६२ ॥

अथ क्रमप्राप्तां वीथीं लच्यति—

[सूत्र १४०]—सर्वस्वामि-रसा वीथी त्वेकङ्का द्वचकपात्रिका । मुखनिर्वाहसन्धि: स्यात्, सर्वंरूपोपयोगिनी ॥ [२८] ६३ ॥

नाटकादिसर्वरूपकारणमेतदुक्तं वक्रोक्तिमार्गेण गमनाद् वीथीव वीथी ।

श्रब [उत्सृष्टिकाङ्कमें] करणे योग्य शेष बातोंको कहते हैं—

[सूत्र १३७]—इमें बधासन्न व्यक्तिके [पलायन श्रादिके] बहानेसे युद्धकी समाप्ति तथा ध्यायोगमें कहे हुए [वीर रौद्रादि द्वेष] रस सन्धि: एवं [कैशिकीछोड़कर भारती, सात्वती, श्रारभटी श्रादि] वृत्ति [होनी चाहिए। तथा एवं श्रनुचित रतिका वर्णन होना चाहिए ॥ [२७] ६२ ॥

बधासन्न श्रर्थात् बादमें शोच्य हो जिसका बध होने वाला हो इस प्रकारके शरीरी श्रर्थात् व्यक्तिके पलायन श्रादिके बहानेसे इसमें युद्धकी समासि दिखलानी चाहिए । श्रर्थात् साक्षात् [बध दिखलाए जानेके] की बात तो दूर रही नपथ्यमें भी बधका वर्णन नहीं करना चाहिए । [ध्यायोगोक्त] रस श्रर्थात् वीर रौद्रादि द्वेष रस [होने चाहिए]। गर्भ श्रोर प्रव-मशक सन्धियोंको छोड़कर [मुख, प्रतिमुख तथा निर्वहणारूप तीन] सन्धि [होने चाहिए]। श्रौर कैशिकीको छोड़कर [भारती, सात्वती, श्रारभटी श्रादि] तीन ही वृत्तियाँ होनी चाहिए । 'सन्धि-वृत्त्य:' इस पदमें इतरेयोगमें द्वन्द्व-समास है । श्रनुचित रति श्रर्थात् रत्याभासका वर्णन होनसे होता है ॥[२७] ६२ ॥

द्वोदिश रूपक भेद 'वीथी' का लचण—

प्रव क्रमप्राप्त 'वीथी' का लक्षण करते हैं—

[सूत्र १४०]—[उत्तम, मध्यम श्रधम] सब प्रकारके नायकसे श्रोर समस्त रसोंसे युक्त, एक ग्रद्रुक् श्रोर एक या दो पात्रों वाली, मुख तथा निर्वहण [रूप दो] सन्धियोंसे युक्त, [अपने श्रवयवश् ब्रह्मों द्वारा नाटक श्रादि] समस्त रूपकोंकी उपकरणी 'वीथी' [कहलाती] है ॥ [२८] ६३ ॥

[सर्वंरूपोपयोगिनी] यह बात नाटकादि सभी रूपकोंके विषयमें कही गई है ।

[श्रर्थात् वीथियोंमें कहे जानेवाले तेरह श्रद्रुक् नाटक सहित सभी रूपकोंमें होते हैं]। वक्रोक्तिमार्गसे

१. वीथीति ।

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द्वितीयो विवेकः

[ २४१

काङ ६३, सू० १४० ] सर्वे स्वामित उत्तम-मध्यम-श्रधमसरूपा:। सर्वे रसाश्च शृङ्गारादय: पर्यायैरात्र विधात-व्याः। यदाह कोहल :-

उत्तमाधममध्याभि-युक्ता प्रकृतिभिस्त्रिधा ।

एकहायो द्विहायो वा सा वीथीत्यभिसंज्ञिता ॥ इति ॥

शङ्कुकस्त्वमे प्रहृतिनोयकलमौ च्छिन्दन् प्रहसन-भृङ्गारौ हास्यरसप्रधानौ विट-

देर्नोयकर्त्वं प्रतिपादयन् कथमुपादेय: स्यादिति?

'एकाङ्का' इत्यनेन एकदिवसप्रयोग्योदितमित्त्वमतद्रेति दर्शयति। द्वाभ्यां पात्राभ्यां

उक्ति-प्रत्युक्तिवैचित्र्यविशिष्टाभ्यां, एकेन वा पात्रेण श्राकाशभाषितसमन्वितेन युक्ता

वीथी कविना स्वेच्छया विधेया। मुख-निर्वहाह्यो सन्धी यस्याम्। सर्वपात्र रुपकाणां

नाटकादीनां वक्रोक्त्यादिसंकुल-त्रयोदशाकप्रवेशन उपयोगिनी वैचित्र्यकारिका।

व्रत एवान्ते लचिता। वक्रोक्तिसहस्रसंकुलत्वेन शृङ्गार-हास्यो: सूचनामात्रत्वात्।

कैशिकी-वृत्तिहीनत्वम्। व्रत्र च बहुविधा वक्रोक्तिविशेषा उत्तम-मध्यम-श्रधमनायकानां

व्युत्पाद्यन्ते इति ॥ [२८] ६३ ॥

[इसमें कहे हुए त्रयोदश श्रङ्गोंके नाटकादि सारे रुपकोंमें] जाननेसे वीथीके समान होनेके कारण

यह 'वीथी' कहलाती है। उत्तम, मध्यम, श्रधम रूप सारे स्वामियों [इसमें होते

हैं]। शृङ्गार श्रादि सारे रस एक-एक करके पर्यायिसे इसमें वर्णन किए जाते हैं। जैसा

कि कोहलने कहा है—

उत्तम, श्रधम और मध्यम तीनों प्रकारके पात्रोंसे युक्त एक पात्रके द्वारा श्रथवा दो

पात्रोंके द्वारा सम्पादित [रुपक भेद] 'वीथी' कहलाती है

शङ्कुक जो श्रधम प्रकृतिको नायक नहीं मानना चाहते हैं। वे भारती, प्रहसन श्रादि

हास्यरसप्रधान [रुपकोंमें] विट श्रादि [श्रधम पात्रों] को नायक [बनाने] का प्रतिपादन

करके कैसे श्रधम वचन हो सकते हैं? [प्रथमतः शङ्कुक एक शोर तो यह कहते हैं कि श्रधम

प्रकृतिका नायक नहीं होना चाहिए। दूसरी शोर भाषा प्रहसन श्रादिमें श्रधम प्रकृतिके

विटादिको ही नायक बनानेका विधान करते हैं। ये दोनों बातें परस्पर विपरीत हैं। इसलिए

उनका कथन उपादेय नहीं हो सकता है। इसलिए वहाँ वीथीमें जो श्रधम प्रकृतिके भी नायक

होनेकी बात कही गई है वह श्रमुचित नहीं हैं।]

'एकाङ्का' इस पदसे एक दिनमें समाप्त होनेवाले प्राधान्य-भागका ही इसमें वर्णन

होना चाहिए यह दिखलाया है। उक्ति-प्रत्युक्ति द्वारा वैचित्र्य युक्त दो पात्रोंसे, श्रथवा

श्राकाशभाषितका श्रवलम्ब करने वाले एक ही पात्रसे युक्त 'वीथी' कवि स्वप्नानो इच्छाके श्रन्त-

सार बना सकता है। मुख तथा निर्वहण नामक दो ही सन्धि इसमें होते हैं। वक्रोक्ति श्रादिसे

युक्त त्रयोदश वीथ्यङ्गोंसे नाटकादि [समस्त] रुपकोंमें उपयोगिनी

श्रथन्त् वैचित्र्यसम्पादिका [वीथी] होती है। इसीलिए सबके श्रन्तमें उसका लक्षण किया गया

है। सैकड़ों प्रकारकी वक्रोक्तियोंसे युक्त होनेके कारण हास्य तथा शृङ्गारकी सूचनामात्र

होनेसे इसको कैशिकीवृत्तिहीन कहा जा सकता है। इसमें उत्तम, मध्यम तथा श्रधम नायकों

कृ [ग्रपनादि-ग्रपना होतक ग्रनुकूल] प्रनेक प्रकारके वक्रोक्ति-भेदोंका [सामाजिकको] ज्ञान

१. त्न्येकादश ।

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ग्रथास्या ग्रन्यान्यमिधीयन्ते—

[सूत्र १४१]—व्याहारोद्भबलं गण्डः प्रपत्प्रचित्रमगतं छलम् । प्रसतप्रलापो वाक्केली नालिका मृदवं मतम् ॥ [२५] ६४ ॥

उद्घात्याकावलगिते ग्रथावस्पन्दितं स्मृतम् । भरतैः स्वीकृतिहेतोस्तु वीर्य्यज्चित्ति त्रयोदश ॥ [३०] ६५ ॥

एतानि त्रयोदश वीर्य्यज्ञाने विविधवकोक्त्यादिरूपत्ववाद् भरतस्य वृत्तौ वर्तनशीलानि । व्रत एव वीर्य्यपदेशामज्ञातां ग्रज्ञीभूता भरतीवृत्त्येकदेशः ॥ [२५-३०] ६४-६५ ॥

(१) तत्र प्रथमं व्याहारः—

[सूत्र १४२]—ग्रन्थ्यार्थो भाविहृत्स्वर्वा व्याहारो हास्यलेहागीः । ग्रन्योऽर्थः प्रयोजनं यस्याः, भाविनी वा भविष्यन्ती दृष्टदर्शितविषयोऽर्थो

यस्या: सा । हास्ये लेहप्रधाना गीर्वाग्भी । विविधोऽर्थ इहाह्यते डनयेतिं व्याहारः । तत्रास्यार्थो यथा मालविकानिर्मित्रमात्रे लास्यप्रयोगावसाने मालविका निर्गन्तु-

मिच्छति ।

करुणा जानता है ॥ [२५] ६३ ॥

ग्रव इस [वीथी] के [तेरह] ग्रज्ञ कहते हैं—

[सूत्र १४१]—१. व्याहार, २. प्रहसिबल, ३. गण्ड, ४. प्रपत्च, ५. त्रिगत, ६. छल, ७. प्रसतप्रलाप, ८. वाक्केली, ९. नालिका, १०. मृदव, ११. उद्घात्यक, १२. ग्रवलगित, १३.

ग्रवस्पन्दित आरती-वृत्तिमें होने वाले ये तेरह वीथीके ग्रज्ञ हैं ॥ [२५-३०] ६४-६५ ॥

ये तेरहों ग्रज्ञ विविध प्रकारकी वकोक्ति रुप होते । [वाग्व्यापार रुप] भारती वृत्तिमें रहने वाले होते हैं । इसलिये इन वीर्थ्यज्ञोंकी ग्रज्ञीभूत 'वीथी' भी भारती-वृत्तिका

ही एक भाग है ॥ [२५-३०] ६४-६५ ॥

(१) व्याहार नामक प्रथम वीथ्यज्ञ—

उन [तेरह वीथ्यज्ञों] मेंसे पहला 'व्याहार' है [उसका लक्षण निम्न प्रकार करते हैं]—

[सूत्र १४२]—[काव्य प्रयोगवशे] ग्रन्य प्रयोजन वाली ग्रथवा ग्रागे होने वाले [किसी विशेष]

[विषयसे] प्रयोजनसे हास्यके लेढसे युक्त कही गई वाणी 'व्याहार' [कहलाती] है ।

[सामान्य कवित प्रयोजनसे] ग्रन्य ग्रर्थ, ग्रर्थात ग्रागे होने वाली दृष्टि ग्रर्थात दिखलाए जाने वाला ग्रर्थ जिसका विषय हो, इस प्रकार

की, हास्यके सम्पकसे युक्त वाणी, [व्याहार कहलाती] है । [व्याहार शब्दका निर्वचन

दिखलाते हैं]—जिस [वाणी] के द्वारा विविध ग्रर्थोंका ग्राहररण किया जाता है वह व्याहार

[कहलाती] है ।

उनमेंसे ग्रन्यार्थ विषयक व्याहारका उदाहरण जैसे मालविकाग्निमित्रमें नृत्यप्रयोगके

समास होनेपर मालविका बाहर जाना चाहती है । [उस समय विट़ुषक उसको रोकता हुग्रा

कहता है कि—

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का० १६, सू० १४२ ] द्वितीयो विचेक: [ २४३

"विदूषक:-भोदि ! चिट्ठ दाव, विसुमरिदं खु वो किंचि तं ताव पुच्छ्लस्सं । [भवति ! तिष्ठ तावद् विस्मृतं खलु वः किञ्चित् तन् तावन् प्रक्ष्यामि]।

गणदास:-वत्से ! तिष्ठ तावदेषविशुद्धो गामिष्यसि । [मालविका स्थिता]। धारिणी—गोदमवयणं पि झज्जो हिअए पमाझीकरेदि । [गौतमवचनमपि श्रद्धा हृदये प्रमाणीकरेति] ।

गणदास:-देवि मा मैवम् । देवप्रत्ययान् सम्भावयते सूक्षमदर्शी गौतमः ।

पश्य—

मन्दोऽध्यमन्दतां याति संसर्गेण विपश्चितः । पद्मच्छिद्रद: फलस्येव निरर्थस्याविलं पयः ॥ [विदूषकं विलोक्य] किं विवक्षितमार्यस्य ?

विदूषक:-पढमं दाव पेक्खवगे पुच्छ । पच्छा जो मए कम्मभेदो लक्खिदो तं भअिस्सं । [प्रथमं तावन् प्रेक्ष्य प्रक्ष्यामि, पश्चाद् यो मया कर्मभेदो लक्षितस्तं भक्ष्यामि]।

गणदास:-भगवति ! गुणो वा दोषो वा यथादृष्टम्रभिधीयताम् । परित्राजिका—यथा मे दर्शनं तथा सर्वमनुबद्धम् ।

गणदास:-देवः कथं मन्यते ? विदूषक:-ग्राप जराअ ठहुरिआए । ग्राप कुछ भूल गई हैं उसके विषय में पूछता हूँ । गणदास:- [मालविकाका नृत्य-शिक्षक गुरु है, वह कहता है] वत्से ! ठहर जाग्रो । [विदूषक जो कुछ पूछना चाहता है उसका उत्तर देकर] उपदेशको शुद्धता हो जाइपर जाना । [मालविका रुक जाती है] ।

धारिणी— [राजाकी प्रधान रानी है वह मालविकाका अधिक देर राजाके सामने रहना पसन्द नहीं करती है इसलिए कहती है कि] कया इस [गोतम] मूर्ख [विदूषक] के वचनको भी श्रार्य झ्रपने हृदयमें प्रमाणे मानेंगे । [प्रर्थात इस मूर्खकी बात ध्यान देने योग्य नहीं है] ।

गणदास:-देवि ! ऐसा मत कहिए । महाराजके सम्बन्ध्यसे [गौतम विदूषकमे भी नृत्यकी बारोक्तियोंको समभ सकनेकी क्षमता हो सकती है । इसलिए] गौतम सूक्षमदर्शी हो सकता है । देखिए—

विद्धानुके संसर्गसे मूर्ख भी विदत्ताको प्राप्त कर सकता है । [जलकी] मलिनताको दूर करने वाले [कटककृच्क्रकषे] फलके संसर्गसे जंसे मलिन जल भी शुद्ध हो जाता है । [विदूषकको देखकर] ग्राप क्या कहना चाहते हैं ?

विदूषक:-पहिले [जिसको इस नृत्यकी परोक्षामें निर्णायक नियत किया गया है उन] प्रेक्षक-महोदयसे पूछो, उसके बाद मैंने जो कमी देखी है उसको बतलाऊँगा ।

गणदास:- [परित्राजिकासे] भगवति ! [इस मालविकाके नृत्यमें] गुणा या दोष जो श्रापने देखा हो उसे कहिए । परित्राजिका:-जहाँ तक मैं समभती हूँ सब-कुछ ठीक है ।

गणदास:- [राजासे] महाराजकी क्या सम्मति है ?

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राजा—वयर्माप स्वपर्ण प्रति शिथिलाभिमानः संवृत्ता:।

गणदास:—देव ! श्राजु नर्तयिताडस्मि ।

घारसी—दिट्ठया पेक्खगाराधरसोअ [गणदाससमवलोक्य] ग्राजो वडद्वाद । [दिट्ठया प्रेक्षकाधनेन स्वार्यो वर्धते ।

गणदास:—देवीपरिग्रहो मे वृद्धिहेतुः । [विदूपकं विलोक्य] वदेदानीं, यत् ते मनः करिष्यति ।

विटूपक:—पह्मोवदेसदंसणस्से पढमं बंभणस्स पूआ इच्छिदव्वा, सा तह लंचिदा । [प्रथमोपदेशदर्शनस्य प्रथमं ब्राह्मणस्य पूजा एष्ठव्या, सा स्वया लंकिता ।]

परित्राजिका—श्रह्हो ! प्रयोगाभ्यन्तरे प्रश्नः ! "[सर्वे प्रहसन्ति मालती स्मितं करोति]"

इत्तयं नायकस्य विश्रब्धनायकादर्शनार्थ प्रयुक्तो हास्यलेककारिस्वाद् व्याहारः। भाविहिस्सित्थं रत्नावल्यों द्वितीयेऽङ्के—

राजा—हमारा भी श्रपने पक्षमें [श्रर्थात् मालविकाग्रीतिद्विनोके विषयमें] श्रभिमान नहीं रहा [मालविकाग्रीतोत हुई] ।

गणदास:—देव ! श्राजु मे नर्तयिता [सच्चा नृत्य-शिक्षक कहलानेका श्रधिकारी] हूँ । [क्योंकि श्राप मेरे कार्य से सन्तुष्ट हुए हैं।

घारसी—सोभाअस्से पेक्खक [श्रर्थात् निर्णायक] को प्रसन्न करके श्रापकी [वृद्धि] विजय हो रही है ।

गणदास—प्रापकका सेवक होना हो मेरी वृद्धि का कारण है । [विदूषककी ग्रोर देखकर], श्रच्छा, श्रब तुम्हारा मन क्या कहता है सो बताओ ?

विटूपक:—पहली बार उपदेशका प्रदर्शन करते समय [श्रर्थात् श्रपनी कलाकी परीक्षादेत समय] पहिले ब्राह्मणएवेताकी पूजा करनी चाहिए सो श्रापने नहीं की हैं ।

परित्राजिका—श्रह्हो ! प्रयोगकी बड़ी बारोको प्रदान है । [सब लोग जोरसे हँसने लगते हैं मालविका मुस्कराती है ।]

यह नायक [राजा] को विश्रब्ध रूपसे [श्रधिक काल तक] नायिका को दिखलाने [रूप ग्रन्थार्थ] के लिए [विदूषक द्वारा] तनिक हास्यकारो [वचन कहा गया है इसलिए यह व्याहार [का उदाहरण] है ।

भाविहिस्सि [रूप द्वितीय प्रकारके व्याहारका उदाहरण] जैसे रत्नावलोके द्वितीय श्रङ्कमें राजा [कहते हैं]—

यह श्लोक इलेषयुक्त है इसमें दिए गए विशेषगा लता ग्रोर नारी दोनों पक्षोंमें लगते हैं । राजा समदनानारी-सी देखनेबाली लताको देखकर कह रहे हैं कि इसकी ग्रोर देखनसे महारानी समदनानारीका प्रवलोकन मानकर श्रवश्य नाराज होंगी । ग्रोर श्रागे चलकर इसी प्रसंगमें समदना सारीकाके साथ राजाको देखकर महारानीका मुख क्रोधसे लाल हो जाता है । इसलिए इस श्लोकमें जो 'कोपविपाटलभृति मुखं देव्या:' करिष्याम्यहम् कहा है वह भाविदृष्टि विषयक हास्यलेकक्ति होनेसे व्याहार नामक बीथ्यङ्कका उदाहरण है । श्लोक

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का० ७६, सू० १४२ ]

द्वितीयो विवेक: [ २४३

राजा—उदात्तमौतिकां विपाटदुररुचि प्रारब्धजृम्भां चेष्टा-दायासं ग्रशनोद्गमैरविचलैरतन्वतीमत्तनः । "श्रद्योध्यानतामिमां समदनां नारीमिवान्यां ध्रुवं पश्यन् कोपविपाटलस्युति मुखं देव्या: करिष्याम्य्यहं ॥" अत्र राज्ञा वासवदत्तां प्रति श्राव्यर्थदर्शनं हास्येनोक्तम् । अ्रन्ये तु वर्तमानप्रत्यच्यार्थवाचकं हास्यलेहकरं वचो व्याहारमिच्छन्ति । yथा मृच्छकटिक्यां विदूषको गरिएकाया वसंतसेनाया गृहं प्रविशन् वसंतसेनाया मात्रं हस्त्रा प्रच्छति ।

"Vidūṣaka: - Who is this relative? [Who is this relative?] Chāṭī: - This is the mother of Āryā. [This is the mother of Āryā]. Vidūṣaka: - If she dies, then I will be entitled to thousands of coins. So why has she been brought inside? Has she been brought in through the main door or through the back door?"

का श्रयं निस्स पकासु हि— "प्रचुर उत्कलिकाप्रों [नारी पक्षमें प्रियमिलनकी उत्कंठाओं श्चोर लतापक्षमें कलियों] से परिपूर्णां, [नारी पक्षमें प्रियवियोगके कारण श्चोर लतापक्षमें फूलोंसे लदी होनेके कारण] धवलकान्तिवालो, जृम्भायुक्त श्रो[र 'प्रारब्धजृम्भां' में 'जृम्भा' पदसे नारी पक्षमें जम्भाई तथा लतापक्षमें कुसुमोंका विकास ग्रथ्यं लेना चाहिए ] श्चोर निरंतर होनेवाले वायुके झोंकोंसे [नारी पक्षमें 'इवसनोद्गमै:' का श्रर्थ दीर्घ निःश्वास श्चोर लतापक्षमें इसका श्रर्थ वायुके झोंके लेना चाहिए] से ग्रपने ग्रायास [नारी पक्षमें ग्रपने दु:ख तथा लतापक्षमें अपने कम्पन ] को प्रकाशित करती हुई ग्रन्य नारीके समान [तुल्य विशेषणोंवाली] इस उद्यानलताको देखता हुइ्रा ग्राज मैं निश्चय हो देवी [महारानी] के मुखको क्रोधसे श्रारक्तवर्ण कर दूँगा ।" इसमें राजाने वासवदत्ताके प्रति भावी श्रथंका दर्शन [ग्रथ्यतः ग्रागे होनेवाली घटना] को हास्येक रूपमें कहा है । [इसलिए यह भविषद्‌व्यापार रूप 'ध्याहार' नामक वाक्यका उदाहरण है ।]

ग्रन्य लोग तो वर्तमान प्रत्यच्यर्थके बोधक हास्यमय वचनको व्याहार कहते हैं । जैसे मृच्छकटिकमें वसन्तसेना वेश्याके घरमें प्रवृष्ट होते समय वसन्तसेनाको माताको देख-कर विदूषक पूछता है—

"विदूषक — यह [बंधुला] रंडो कौन है ? चेटो- यह आर्या [वसन्तसेना] की माता श्रत्तिका है । विदूषक - यदि [यह] मरे तो हजारों श्रोहजारोंकेलिए [भोजनार्थ] पर्याप्त है । श्चोर [यह तो बतलाय्रो कि] बया इसको [मकानके भीतर] प्रवृष्ट करनेके बाद द्वारकी शोभाका निर्माए करवाया था ग्रथवा ऊपरसे उठाकर भीतर लाये थे [क्योंकि वह इतनी ग्रधिक मोटी है कि दरवाजेसे तो यह भीतर श्रा नहीं सकती है]।

९. पविसि ।

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[यदि स्त्रियेत तदा श्रंगालसहस्रस्य पर्योप्ता। श्रथ किमेतां प्रवेश्य द्वारशोभा निर्मांपिता ? श्रथवावस्कंदेन प्रवेशिता ?]

चेटी—श्रार्य ! मा एतियं ग्रननेक्षसु। श्रात्तिका चाउत्थिएण 'बाधीयादि।

[श्रार्य ! मा एतादृशनेक्षस्व। श्रात्तिका चातुर्थिकेन बाध्यते]

विदूषकः—भयवं चाउत्थियं मे पि बंभणं श्राग्र्रकुमारीहि। इति

[भगवन् चातुर्थिक ! मामपि ब्राह्मणमनुकम्पस्व]।

यथा नलविलासे तम्वस्त्रीकान्तोलिक्री प्रति विदूषकः—

"एकं दावं मे संसयं भजेहि । मह बंभणाए माया श्रूलकुट्टिणी जा पाडालिपुत्ते वसदि सा किं तुमं, श्रादु श्रन्ना का वि । इत्यादि।

[एकं तावन्मे संशयं भडतु । मम ब्राह्मणया माता स्थूलकुट्टिनी या पाटलिपुत्रे वसति, सा किं त्वम् ? उतान्याऽपि ?]

(२) श्रथाधिवलम्—

[सूत्र १४३]—मिथो जल्पे स्वपक्षस्य स्थापनाधिबलं बलात् ॥

॥ [३१] ६६ ॥

मिथः परस्परं जल्पे उक्ति-प्रत्युक्तिक्रमे क्रियाम्यो स्वपक्षस्य स्वाश्रुप्रगमस्य परस्परप्रज्ञोपजीवनवलान् स्थापना सुग्टटिततत्वं क्रियते यत्र तदधिकवलसम्बन्धाद्‌विध-वेलम्‌।

चेटो—श्रार्य ! इतना ही [मोटा इनको] मत समभो । माताजी [ग्राजकल] चातुर्थिक चौथे दिन ग्रानेवाले उबर] से पीडित है [इसलिए दुबली हो गई है] ।

विदूषक—भगवन् चातुर्थिक ! [यदि श्रापकी कृपासे यह इतनी मोटी है तो फिर] मुर्ख ब्राह्मणके ऊपरभी कृपा कीजिए ।

यह वर्तमान प्रत्यक्ष ग्रथंका बोधक हास्यकर वचन है ।

[प्रथथ] जैसे नलविलासमें लम्बस्तनी कापालिकाके प्रति विदूषक [कहता है]—

"विधू—मेरे एक संशयको दूर करो [यह बताओ कि] मेरी ब्राह्मणीकी [ग्रर्यात् मेरी पत्नीकी] स्थूलकुट्टिनी नामकी माता जो पटनामें रहती है वह क्या तुम ही हो, श्रथवा कोई ग्रोर है ? इत्यादि [मो वर्तमान प्रत्यक्ष ग्रथं विषयक हास्यकर वचन होनेसे इस प्रकारके व्याहारका उदाहरण है] ।

(२) 'श्राधिवल' नामक द्वितीय वీథ्यङ्ग—

ग्रथ 'श्राधिवल' [नामक द्वितीय वీథ्याङ्कका लक्षण श्रादि करते हैं]—

[सूत्र १४३]—परस्पर वार्तालापं बलपूर्वक श्रपने पक्षकी स्थापना करना 'श्राधिवल' [कहलाता] है ।

[कहलाता] है ।

'मिथः' श्रर्थात् परस्पर, 'जल्पे' श्रर्थात् उक्ति-प्रत्युक्तिके क्रममें [कथनोपकथनके करनेमें] श्रपने पक्ष ग्रथर्थात् स्वपक्ष सिद्धान्तका परस्पर बुद्धिका प्रवलबलंबन कर जो स्थापन श्रर्थात् युक्ति-युक्ततत्व सिद्घ किया जाता है वह श्रधिक बलका सम्बन्ध होनेसे 'श्राधिबल' [कहलाता] है ।

१. वाधी ।

२. मूल ।

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काः ६६, सं० १४३ ] द्वितीयो विवेकः [ २४७

यथा कृत्यारावणे प्रथमेड्ढे सीतावेषधारिण्या शूर्पणखया सह संवاده [नेपथ्ये]—

"हा भ्रातलक्ष्मण ! परित्रायस्व मां परित्रायस्व । [इति श्रुत्वा शूर्पणखा मोहमापन्ना । तस्यां च महतां] लक्ष्मणः—ग्रार्ये ! समाश्वसिहि समाश्वसिहि । शूर्पणखा—[श्रुत्वापि उन्मील्य सक्रोधं] श्रा: श्रायाज ! श्राज्ञ वि तुम्ह चित्तसि ग्येव । श्रहो ! दार्इए सि तुम्हं निसंसो निमिग्घियो यि चिट्ठदु दाव भादुइसिहो, कधं ग्याम इक्खाकुकुलसंभवेग महाखचियणं भविय एव तए ववसियं ? गां भइरामि एवमक्कंदंतो सत्तू वि न उवेक्खिज्जदि कि पुरा श्राज्ञउत्तो ? [ग्रा: श्रानार्य ! अद्यापि त्वं तिष्ठग्येव । श्रहो इदानीन्तसि त्वं नृशंसो निर्घृणोऽसि तिष्ठंतु तावद् भ्रातृनेहः; कथम् नाम इदानीकुलसम्भवेन महाचत्रियेणैव भूत्वैव त्वया व्यवहारसितं ? ननु भइरामि एवमात्रन्दन् शत्रुरूप नोपेच्यते किं पुनरार्यपुत्रः । इति संस्कृतम् । ]।

लक्ष्मणः—ग्रार्ये ! ननु त्वदर्थ एव श्रार्येण स्थापितोऽस्मि । शूर्पणखा—कुमार ! एवं मम श्रात्थो कदो होदि । एवं च श्रहं परिरक्षित्ता होमी ता सद्वधा श्रत्थं ग्येव दे व्यारिअं श्रभिप्पायं लक्खेइमि । इत्यादि । [कुमार ! एवं ममार्थः कृतो भवति । एवं च चाहं परिरक्षित्ता भवामि ? तत्सर्वथान्यमेव टेडनिट्ठमभिप्रायं लद्धासिम । इति संस्कृतम् । ]"

जैसे कृत्यारावणमें प्रथम ग्रड्डमें सीताका वेष धारण किए हुए शूर्पणखाके साथ संवادमें [प्रत्यात् संवावके श्रवसरपर] नेपथ्यमें—

"हे भाई लक्ष्मण ! मुझे बचाप्रो, बचाग्रो । [ऐसा सुनकर शूर्पणखा मूर्छित हो जाती है] शूर्पणखा—ग्रार्ये ! श्रेयं धारसा करो । शौर उसके मूर्छित हो जानेकत् लक्ष्मण [कहते हैं]—ग्रार्ये ! श्रेयं धारसा करो । शूर्पणखा—[ग्रांखें खोलकर क्रोधपूर्वक कहती है] हे घरे ! दुष्ट ग्रानार्य ! तुम श्रभी खड़े हुए ही हो । ग्रहरे ! तब तो तुम बड़े कूर शौर निर्लज्ज [प्रतीत होते] हो । भाईके स्नेहकी बात जाने भी दो, तो भी इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न महान् क्षत्रिय होकर तुमने यह कैसे किया ? [प्रभ तक तुम गए क्यों नहीं ?] मैं कहती हूं कि इस प्रकार पुकारनेपर शत्रुकी भी उपेक्षा नहीं की जा सकती है [शत्रुकी रक्षाके लिए भी तुरन्त जाना चाहिए था] फिर श्रार्यपुत्रकी तो बात ही क्या है ?

लक्ष्मणः—ग्रार्ये ! श्रापकी ही रक्षाकेलिए मुझे श्रार्य [रामचन्द्र]ने नियुक्त किया है । शूर्पणखा—कुमार ! क्या इस प्रकार मेरा काम होगा । और क्या इस प्रकार मेरी रक्षा होगी । इसलिए मैं तुम्हारा कुछ शौर ही ग्रनिष्ट श्रभिप्राय देखती हूं [जिसके कारण तुम श्रभी तक नहीं गए] ।"

ग्रथवा जैसे रघुविलासमें—

१. सूर्य ।

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मय:—देव ! सीतापहारमतितरां जुगुप्सते लड्दालोक: ।

रावण:—[ साध्वेपम् ] सीतापहारमतितरां जुगुप्सते लड्दालोक: ?

मय:—[ समयम् ] श्वस्थ किं ।

रावण:—[ सावहेलम् ]—

श्रवदितपथ: प्रेम्णां बाधानुरागरुजां जडो, वहतु हर्षितामैत्रीवन्त्स्थो यथाप्रतिभं जनः । मम पुनरियं सीता राज्यं सुरवै विववः प्रियं, हृदयमसवो मित्रं मन्त्री रतिरृतुः हुतसवः ॥

पुनः सखेदम् ] श्रार्य ! किसेमस्य पामरप्रकृतेःलड्दालोकस्य विचारचातुरी- वैमुख्यमुद्रावयामि—

श्रास्यां प्रेम ममेव वाड्मनसयोरुत्तीर्यामनस्य चेद्, वैदेह्यां नयनैकहेलहवमप्रारोहोभूषौ भवेत् । कापेयं परिरम्भ्य स प्रकटननुलुठेभूयं हृत्तान्, किश्चिन्न कामितमादधीत, ऋतवान् वैध्यास्तु मां रावणम् ॥

श्रापरथा पुनराये !

श्रहङ्कुनिकरपीरवरगण्य धर्मशीलां, प्रसद्य यद् जानकीमभिरसत लड्दापतिः । 'भय—[ रावणसे ] देव ! लड्दावासी लोग सीताके श्रपहरणकी घ्रात्यन्त निन्दा करते हैं ।

रावण:—[ क्रोधपूर्वक ] श्रार्य ! क्या लड्दावासी लोग सीताके श्रपहरणकी घ्रात्यन्त निन्दा करते हैं?

मय:—[ डरता हुआ ] श्रोह क्या

रावण [ घृनादर पूर्वक् ] श्रार्य ! प्रेममार्गको न समभनेवाले, घृणारागकी पोड़ाका घ्रनुभव करनेमें श्रक्षम, श्रोह प्रियजन की मात्रीसे रहित, मूर्ख लोग अपनी समझके श्रनुसार चाहे जो कहें । पर मेरे लिए तो यह सीता ही राज्य, सुख, वैभव, प्रिय, हृदय, प्राण, मित्र, मन्त्री, धैर्य श्रोह प्राणन्द सब-कुछ है ।

[ फिर घृणापूर्वक कहता है ] श्रार्य ! इन पामर-प्रकृति वाले लड्दावासियोंकी घ्रविचार- शीलताको क्या कहूँ ?

श्रोहका केवल नेत्रोंसे घ्रावष्वादन करने योग्य लावण्यके जम्मभूमि सीतामें [ मेरा जैसा ] प्रेम हो जाय तो वह निश्चय हो [ उसको ] जबर्दस्ती पकड़कर घ्रानन्दातिरेक पूर्वक वातरता

[ वानरके समान काम-प्रवृत्ति ] को प्रकट करता हृद्रा कुछ [ प्रदर्शित ] काम-व्यापार करने लगता । यह तो कहो कि विधाताने मुझे [ श्रात्यन्त धैर्यशाली ] रावण बनाया है [ कि मैंने अपने हाथमें होने श्रोह उसके लिए इतना कष्ट उठानेपर भी श्रमी तक उसके साथ बलात्कार नहीं किया है । ]

नहीं तो हे श्रार्य !—

श्रभिमानियोंका श्रप्रणी लड्दापति, धमसंमार्गका परित्याग करके जानकीके साथ

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का० ६७, सू० १४४ ] द्वितीयो विवेक: [ २४६

श्रमुष्य न तु रोदसीविजयनिष्पादोष्णा: समि-न्मृगयवरसिकस्तदा क इव नाम वैतसीटक: ! !

मय:-[श्रपवार्य मन्दोदरी प्रति] वत्से । यथावस्थितसमिधाने लड्ढ़ापतौ किमत: परं विज्ञापयामि । इति !" केचितु 'श्रन्योऽन्यव्यावृत्त्योक्तिः सपर्ययाडधिवलं भवेत्' इति पठन्ति । एतदर्थोभेदादनेन संगृहीतमिति ॥ [३१] ६६ ॥

(३) श्रथ गरुड:-

[सूत्र १४४]—गण्ठीकस्माद् यदन्यार्थ प्रस्तुतानुगत' वच: ।

श्रन्याभिप्रायेणाकस्मात् प्रत्युक्तं प्रतिवचनतयानुरूचारितमपि प्रतिवचनरूपतथा प्रकान्तेन यत् सम्बद्धं वचर्नं, तद् दुश्यर्थंगर्मत्वाद् दुष्टशोभितगर्मंगरुड इव 'गरुड:' ।

यथोत्तरचिरते—

"राम:-[सीतामवलोक्य]—इयं रोहे लड्मीरियमसृतवर्त्मर्तिनियनयो—रसायस्या: स्पर्शो वपुषि बहुलशुचन्दनरस: ।

श्रयं बाहु: कण्ठे शिशिरमसृणो मौक्तिकसर:किमस्या न प्रेयो यदि परमसह्यस्तु विरह: ॥

बलात् रमरण करने लगे तो द्यावा-पृथिवीको विजय करनेमें समर्थ भुजदण्ड वाले, उसके साथ युद्ध-मृगयाका रसिक कौन बाधक बन सकता है ?

मय:-[ग्रौर कोई न सुन सके इस प्रकार—श्रपवार्य—मन्दोदरीके प्रति वत्से ! [यह बात तो] लड्ढ़ापति ठीक ही कह रहे हैं तब मैं श्रौर क्या कहूँ ?"

यहां परस्पर संवादमें रावणाने युक्तियोंके बलसे प्रवर्त्तलातेके साथ श्रपने पक्षको स्थापनाकी है । श्रत: यह 'श्रधिबल' नामक तृतीय वोध्यचकका उदाहरण है ।

कोई लोग स्पर्धाके कारण एक-दूसरेसे बढ़कर वाक्योंके कथनको 'श्रधिबल' कहते हैं । श्रग्रन्थमें भेद न होनेसे [श्रथात् श्रग्रन्थत: इसी पूर्व लक्षण वाले श्रधिबलके समान होनेसे] उसका भी श्रन्थर्भाव इसी [पूर्वोक्त लक्षणोंमें] हो जाता है ॥ [३१] ६६ ॥

(३) गण्ठ नामक तृतीय वोध्यचक

२—श्रथ 'गण्ठ' [नामक तृतीय वोध्यचकका लक्षणादि करते हैं]—

[सूत्र १४४] श्रन्यार्थक होनेपर भी प्रस्तुतसे सम्बद्ध हो जाने वाला जो वचन प्रकस्मात् कहा जाय वह 'गण्ठ' कहलाता है ।

श्रग्रन्य श्रभिप्रायसे प्रकस्मात् बोला गया जो वचन प्रत्युत्तरके रूपमें उच्चारित न होनेपर भी, प्रकृतके साथ प्रत्युत्तर रूपमें संबद्ध हो जाता है वह, श्रनिष्ट श्रर्थको श्रपने भीतर लिए हुए होनेसे गन्दे खूनसे भरे हुए फोड़ेके समान 'गण्ठ' कहलाता है । जैसे उत्तर-रामचरितमें—

"राम [सीताको देखकर]—यह [सीता] घरमें लक्ष्मीके समान है, यह नेत्रोंके लिए श्रमृतकी शलाकाके समान [सुखद] है । इसका यह [शीतल] स्पर्शों शरीरमें प्रचुर चन्दन रसके लेपके समान है ।

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प्रविश्य—[प्रतिहारी] देव उवस्थितो [देव उपस्थितः ।]

रामः—श्रयि ! कः ?

प्रतिहारी—देवस्स ग्रासन्तपरिचारक्रो दुम्मुहो इति [देवस्य ग्रासनपरिचारको दुस्मुखः इति ।] श्रत्राकस्मान् प्रतीहारवचनमन्या‌भिप्रायप्रयुक्तं प्रस्तुतरामवचसा संयुज्यमान्त्वाद् 'गड:' ।

यथा वा बालिकावडितके— कंसः—शिष्टावदुदग्रश्रृं गविकटः शैलेन्द्रकल्पो वृषः, सन्ट्रीपसमुद्रजस्य पयसः शोशचमा पूतना । केशी वाजितनुः खुरैर्विघटयेदप्नगान्मेदिनों, साधं बन्धुभिरेवमूर्जितवलं कः कंसमास्नन्दति ।। [नेपथ्ये]

जो श्रुत्नस्त्रो पमूत्त्रो ग्रन्थेगा य बडिद्हस्त्रो महास्पहवो । करहो सो परउटठो मारेइ न कोइ धारेइ ।। [योन्ततः प्रस्तो‌ड्येन च वर्धितो मधुपभवः । कृष्णः स परपुष्ट्रो मारयति न कोडपि न धारयति ।]

यह बाहु गलेंमें शीतल श्रो चिकना हार है [इसका कौनसा भाग प्रिय नहीं है ? [सब कुछ ही प्रिय है] । किन्तु यदि कुछ श्रप्रिय है तो वह इसका वियोग है ।

[प्रविष्ट होकर] प्रतीहारी—देव ! उपस्थित है । राम—श्ररे कौन ? [उपस्थित है] प्रतीहारी—श्रापका ग्रासन परिचारक दुम्मुंह ।

इस [संवाद] में ग्रन्य ग्रभिप्राये प्रयुक्त [प्रर्थात् दुस्मुखे श्रागमनकी सूचना देनेके ग्रभिप्राये कहा गया] भो प्रतीहारीका वचन ['यदि परमसह प्रस्तु विरहः इस] प्रस्तुत राम-वचनके साथके-साथ मिल जानसे 'गड' [नामक बोधक्यत्नका उदाहरण बन गया है] ।

ग्रथवा जैसे 'बालिकावडितक' में — "कंस—बड़े-बड़े सींगोस भयडूर रिष्ट, महान् पर्वतके समान वृष, सातों द्वीपोंके लमुद्रोंमें होनेवाले सारे जलको सोख जानमें समर्थ पूतना, [ये सब मेरे सहायक हैं] । ग्रोर प्रदव-रुपधारो केशी श्रपने खुरोंसे पाताल तक भूमिको खोद डाल सकता है ? इस प्रकारके बन्धुत्रों [ सहायकों ] के कारगा अत्यन्त शक्तिशालो कंसको कौन पराजित कर सकता है ?

[नेपथ्ये] जो किसी दूसरसे उत्पन्न हुग्रा श्रो किसी दूसरेसे पाला गया [प्रर्थात् देवकी—वसुदेव का पुत्र ग्रोर नन्दके द्वार पाला गया कृष्ण] । वह अत्यन्त बलवान् [परिपुष्ट, मधुसे उत्पन्न] माधव कृष्ण मार रहा है ग्रोर कोई बचानेवाला नहीं है ।

रंगभूमिमें प्रविष्ट [कंस रूप] पात्रके द्वारा पठित वचनके साथ मिल जाने वाला यह नेपथ्य-पठित ग्रनिष्टार्य सूचक वचन गड [का उदाहरण बना गया] है ।

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का० ६७, सू० १४४ ] द्वितीयो विवेक: । २४१

इदं रंगमध्यप्रविष्टपात्रपठितेन वचसा नेपथ्यपठितमनिष्टार्थसूचकं संगुच्यमानं चूलिकागर्ड: ।

यथा वा सत्यहरिश्चन्द्रे—

"राजा—कपिञ्जल ! पुरो गत्वा विलोकय, श्वाश्रमः कियति दूरेः ?

['यदादिशति देवः इत्यभिधाय कपिञ्जलो निष्क्रान्तः]

राजा ! [सवेदनं—

धिक् मां भृगूणांविघातिनं सकलुर्षं धिग् जीवितं मेडखिल—

धिग्लोककरोपतापनिता धिग् धिग् ममैताः श्रियः ।

पुरयासते करुणामृतैर्द मनसो ये नाम वाच्यंयमाः,

हस्तारोपितशर्मणि प्रति कलं वृत्ता: शुभे कर्मणि ॥

कुन्तल ! वयमिदानीं सर्वस्वपरित्यागमीहामहे ।

[प्रविश्य] कपिञ्जल:—देव प्रत्यासन्नं पश्य—

राजा—किं सर्वस्वपरित्यागम् ?

कपिञ्जल:—नहि, मुनिनामाश्रमम् ।" इति ।

इस श्लोकमें मुख्य रूपसे वसन्तमें होनेवाले कोकिलके वियोगियों को मार डालनेवाले

श्रयात् श्रात्यन्त सन्तापदायक वलरबक वचनों हैं । परन्तु प्रकृतमें कंसको मारनेवाले कृष्ण

के साथ भी उसका सम्बन्ध है । 'ग्रन्यतः: प्रसूत:', 'ग्रन्थेन वर्धित:', 'परपुष्ट:' आदि सब पद

कोकिलके वाचक भी होते हैं । शौरि कृष्णपरक भी । कोकिलका नाम 'परमृत' भी है । क्योंकि

कोकिल श्रपने बच्चोंका पालन कौशिके द्वारा कराता है । कृष्ण भी परमृत दूसरके द्वारा पाले

हुए हैं । 'कृष्ण:' तथा 'मधुप्रभव:' पद भी कोकिल पक्ष तथा कृष्णा दोनोंमें लगते हैं । यह

किन्तु ग्रन्थार्थक होनेपर भी वह वाक्य प्रस्तुत कंसके वचनके साथ मिल गया है । इसलिए

यह गण्डका उदाहरण बन गया है ।

श्रथवा जैसे सत्य हरीशचन्द्रमें—

"राजा—कपिञ्जल जरा श्रागे बढकर देखो कि आश्रम कितनी दूर है ?

[जो ग्राहा, कहकर कापञ्जल बाहर चला जाता है]।

राजा—[क्षुब्धपौर्वाक]—

भूयोहत्या करने वाले मुझको धिक्कार है । मेरे पापी जीवनको धिक्कार है । सारे

भूमण्डलके लोगोंको करों द्वारा सन्ताप देकर प्राप्त की गई मेरी इस लक्ष्मीको धिक्कार है ।

करुणासे द्राद्र हृदय वाले श्रोैर मोन धारऐ करने वाले जो [मुनिगण] ग्रनायास सुख प्रदान

करनेवाले [हस्तारोपितशर्मणि] शुभ काममें प्रति कलं लगे रहते हैं वे धन्य हैं ।

कुन्तल ! श्रब हम सर्वस्व दरित्याग कर [मुनिव्रत ग्रहण करना] चाहते हैं ।

कपिञ्जल—[प्रविश्य] देव ! समीप श्रा गया है उसको देखिए ।

राजा—क्या ! सर्वस्व परित्यागको [देखूं] ?

कपिञ्जल—जी नहीं, मुनियोंके श्राश्रमको ।"

इसमें 'ग्रन्य श्रामप्रत्यास' कहा गया 'कपिञ्जलके वचन, प्रस्तुत राजाके वचनके साथ

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२४२ ]

नाट्यदर्पणम्

[ का० ५७, सू० १४५

(४) प्रप्रथ प्रपञ्च:-

[सूत्र १४५]—प्रप्रथ्र: सस्तवं हास्यं मिथो मध्ये कलाभृत् ॥ [३२]६७॥

[सूत्र यथा रत्नावल्यां राजा कदलीगृहे चित्रगतां सागरिकां पश्यन् सुसझतया दर्शनेन फलकं प्रच्यलाद्य तामाह—

“राजा—सुसझते कथमिहस्थो भवत्या ज्ञातः ?

सुसझता—भट्ट ! न केवलं तुर्व, संयं चित्तफलकेन सर्वो वृत्तान्तो मए ज्ञातो, ता गहुया देवीए निवेदहिस्सं । [भट्टः— न केवलं तु, संयं चित्रफलकेन सर्वो वृत्तान्तो मया ज्ञातः । इति संस्कृतम् । ]

वसन्तकः—(ग्रपवार्य) भो ! सर्वं संभावियदि । मुहरा खु एसो गर्भदासी, ता किंचिद दइय परिदोसेहि र्णा । [भो ! सर्वं संभाव्यते । मुकरा खुलु एपा गर्भदासी, तनु किंचिद दत्वा परितोपय णनाम । ]

राजा—[सुसझतया खलकान प्रमार्ज्जयेन सुसंगते ! क्रीडामात्रकमेवैतन् । तथापि नाकार्यो त्वया देवी खेलदयितव्यो । इदं च ते पारितोपिकम् । [इति करणोभरयं ददाति] ।

सुसझता—[प्रप्रथस्य ससित्वम्] भट्ट ! पसादो मए करणोभरओ । इत्यादि ।

श्र वत राज—सुसझतयोमिथो 'देवीए निवेदयिष्यामि' इति हास्यम् । 'भट्ट ! पसादो' इति स्ववसहितमेकस्य राझः सागरिकासङ्गत्मलाभकारस प्रपञ्चोदसद्भूतत्वात् । सुसझलक्षणाभरियालस्सु मुख्यस्सचिय प्रत्यनुप्रयत्नान्न विवाद्धित ।

मिलकर भावी ग्रनिष्ठका सूचक हो गया है । इसलिए यह भी गण्डका उदाहरण है । इसके पूर्वं पताका स्थानके रूपमें भी इसका वर्णन ग्रा चुका है ।

४ ग्रप्र प्रपञ्च [नामक चतुर्थ बोधकका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र १४५]—किसी एकको लाभ प्रदान करने वला, स्तुति सहित मध्ये हास्य कहा जाता है ॥ [३२] ६७ ॥

जैसे रत्नावलीमें, कदलीगृहमें सागरिकाके चित्रको देखते हुए राजा, सुसंगताको देख-

कर चित्रफलककी ढककर [उससे कहते हैं]—

राजा—सुसंगते ! हम यहाँ बैठे हैं यह तुमको कैसे मालूम हुग्रा ?

सुसंगता— हे स्वामिन् ! न केवल ग्राप, ग्रापतु चित्रफलकके सहित समस्त वृत्तान्त

मुझे मालूम हो गया है । सो मैं जाकर देवीसे कहूँगी ।

वसन्तक—[दूसरा न सुन पाए इस प्रकार—ग्रपवार्य—राजासे कहता है] घर्रे ! सब मुख्य हो सकता है । यह गर्वदासी बड़ी वाचाल है इसलिए इसे कुछ देकर सन्तुष्ट करो ।

राजा—[सुसंगताके बालोंको संवारता हुग्रा] सुसंगते ! यह सब तो केवल खेल-मात्र

है फिर भो तुम देवीको व्यर्थ ही कष्ट मत देना । लो यह तुम्हारा पारितोषिक है । [यह कहकर कानोका ग्राभूषण देता है] ।

सुसंगता—[मुस्कराती हुई प्ररणाम करके] हे स्वामिन् ! यह करणाभरा मुझे पुरस्कार में दे रहे हैं । इत्यादि ।

इसमें 'देवीसे जाकर निवेदन करुँगी' [पहाँसे लेकर] 'भर्तः ! यह [करणाभरा मेरा]

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का० ६७, सू० १४५ ] द्वितीयो विवेक: [ २४३

केचित् त्वसद्भूतेन पारदार्यादिनैपुण्यादिना योजन्योडन्यस्तवो हास्यहेतुरुत्तम् प्रपञ्चयसाहु: । यथा—

"रंडा चंडा दीक्षिता धम्मदारा मज्झं मंसं ख्वादिए। पिड्ढाए। त्वा। भिक्खा भोज्जं चम्मखंडं च सेञ्जा कोलो धम्मो कस्स नो भादि रम्मो। [रेडा चंडा दीक्षिता धर्मदारा, मछं मांसं खाद्यते पियते वा। भिद्रा भोज्यं चर्मखंडं च शय्या, कौलो धर्म: कस्य नो भाति रम्य: ।]" इति संस्कृतम्।

अन्र्ये तु द्वयोर्लाभं विना मध्यमुपं हास्यं सस्तवयुक्तं प्रपञ्चयित्वेन मन्यन्ते । यथा प्रयोगाभ्युदये—

"तरंगदत्तकचेटी—श्रम्मो श्रायं खु एसो संचारिंम् उव्हासपडुक्कं श्रायंभंडीरवो इदो श्रयेva गच्छादि । [श्रहो श्रायं खुल्लेव संचारिकाप्रहासपद्धतिं श्रायंभंडीरव इत्यादि ।]" इति प्राकृतम् ।

विदूषक—उपासृत्य भोदी ! सागर्दं ते । [भवति ! स्वागतम् ते]।

चेटी—[स्वगतम्] परिहासदस्सं दाव याँ [प्रकाशम्] को दारिअ एसो श्रम्हारां पुरस्कार है' [यहाँ तक] यह स्तुति सहित; राजा श्रौर सुसंगताका परस्पर हास्य है । एक अ्रथ्र्यांत राजाकी सार्वजनिकी प्राप्ति रुप लाभका कारन है श्रौर सिथ्या ब्यवहार रुप होनेसे प्रपञ्च है । सुसंगताको कर्याभभ्राराकी प्राप्ति [प्रपञ्चके लक्श्रणमें कहे हुए 'एकलाभकृत्' पदसे यहाँ] मुख्य साध्यके प्रति श्रनुपयुक्त होनेसे विवक्षित नहीं है ।

कुछ लोग श्रसद्भूत परदाराभिगमन श्रादिके नैपुण्यके द्वारा जो एक-दूसरेको स्तुति हास्यका कारन है उसको प्रपञ्च कहते हैं—

उद्कट [कामवeg वाली] रंडियाँ [जिस धर्ममें] दीक्षाप्राप्त धर्मदारा [सम्भी जाती] हैं, मछ श्रौर मांस [स्वेच्छा-पूर्वक] खाया-पिया जाता है । [जिस धर्ममें] भिक्षा हो भोजन है, श्रौर चमंका टुकड़ा ही शय्या है ऐसा कौल [वाममार्गी सम्प्रदायक] धर्म किसको सुन्दर [आकर्षक] करने वाला] नहीं लगता है

इसमें कौल धर्मके ग्रनुयायी किसी साथीका उपहास करते हुए उसमें परदाराभिगमन श्रादि दिखलाकर उसकी हास्यकर स्तुति की गई है । इसलिए यह दूसरे लक्श्रणके श्रनुसार प्रपञ्चका उदाहरण है ।

ग्रन्य लोग तो दोनों [मेंसे किसी] के लाभके बिना ही प्रशंसायुक्त सिथ्या हास्यको प्रपञ्च कहते हैं । जैसे प्रयोगाभ्युदयमें—

"तरंगदत्तकी दासी—श्रमे सुणरणझील उपहास-नगर रुप यह श्रायं भण्ढीरक इधर ही श्रा रहे हैं ।

विदूषक—[पास श्राकर] श्रापका स्वागत है ।

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पेषणकारच्रो चेटउ त्ति ।

[परिह्ह.सविध्यामि तावदेनम् । क इदानीनेषपोष्यस्माकं प्रेषणकारकश्चेटक इति ।

विवृपक:-ग्राहं घटदासीरां सामिगो ।

[ग्राहं घटदासीनां स्वामिक:]।

चेटी—किं चेडउ त्ति भणिदे कुविदो तुब्भं ।

[किक चेटक इति भणिते कुपतस्स्वम्]

विवृपक :-को दारिए विसेसो घटदासीरंप कुभदासीरं च ?

[क इदानों विशेषो घटदासीनां कुभदासीनां च] ?

चेटी—मा कुष भद्दउत्तो त्ति भणिअस्सं ।

[मा कुर्य, भरृत पुत्र इति भणिअस्सामि ।

विवृपक:- मोदी तुब्भ पि मा कुउप्प ज्जा इति भणिअस्सं ।

[भवति, त्वमपि मा कुर्य, श्रायो इति भणिअस्सामि]।

चेटी—ग्राहो भद्दउत्तस्स गदी ।

[ग्राहो भरृत पुत्रस्य गति:] ।

विवृपक:-ग्राहो श्रदिदुच्चा श्रज्ज्जया ।

[ग्राहो श्रतिरुपा श्रायंकां]" इति । [३२] ६७ ॥

(४) यथ त्रिगतम्—

[सूत्र १४६]—त्रिगतं शब्‌दसाम्येन भिन्नस्सार्थस्य योजनम् ।

भिन्नस्य प्रस्तुतादनस्य । त्रिगतमनेकार्थंतं शब्‌दस्स्यानेकार्थत्वान् । तेन द्व-र्थ-

चेटी—[स्वगत] इससे तनिक मजाक कर लूँ । [प्रकाश] यह हमारा प्रपंच कराने

वाला कौन दास है ।

विवृपक—में घटवासियोंका स्वामी हूँं । [घटदासीक प्रथ्थ जन्मसे दासी है] ।

चेटी—क्या चेट कहनेसे ग्राप नाराज हो गाए ?

विवृपक—घटदासी श्रोर कुभदासीमे क्या भेद है ?

चेटी—नाराज न हों ग्रब 'भत्तु पुत्र' कहूँगी ।

विवृपक—ग्राप भी नाराज न हों ग्रब 'ग्रार्यां' कहा करूँगा ।

चेटी—ग्रो—हो भत्तुपुत्रक्चालि [कैसी सुंदर है] ?

विवृपक—ग्राहो ग्रार्यांक रुप कैसा सुंदर है !

दोनोमें किसके भी लाभके बिना यह मिथ्या संसतवयुक्त हास्य वचन है । यह दूसरे मतसे प्रपञ्च नामक वीर्य्यद्धका उदाहरण है ।[३२] ६७॥

॥ त्रिगतनमाक पञ्चम वीर्य्यद्ध—

ग्रब त्रिगत [का लक्श्रण ग्रावि करते]हैं—

[सूत्र १४६]—शब्दकी समानताके] कारन [प्रनेकार्थक शब्‌दको प्रस्तुत ग्रर्थंसे] भिन्न

ग्रर्थ निकलना, 'त्रिगत' [कहलाता] है ।

ग्रन्य शब्‌दोंकी समानताके कारन [प्रन्यार्थंक शब्‌दोंसे] ग्रन्य ग्रर्थकी योजना 'त्रिगत'

[कहलाता] है । जैसे 'देवोचन्द्रगुप्त' के द्वितीय ग्रंकमें प्रजाग्रोंके ग्रादिवासनके लिए राजा राम-

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का० ६५, सू० १४६. ] द्वितीयो विवेक: [ २४५

मपि । यथा देवीचन्द्रगुप्ते द्वितीयेडङ्के प्र कृतिनामाश्वासनाय शकम्य घृ वदेवीसम्प्रदाने ऽस्म्युपगते राझा रामगुप्तेनारिवधार्थं यियासु:, प्रतिपन्नघृ वदेवीनेपथ्य: कुमारचन्द्रगुप्तो विज्ञप्यनुच्यते—

यथा—

"राज—प्रतिष्ठाकृतपुं ने लब्वहं त्वां परिलक्षितुमुत्सहे । प्रत्यम्रयौवनविभूषणमझमेतदु, रूपश्रियं च तव यौवनयोग्यरूपम्‌।। सक्ति च मध्यमुपमा मनुरुद्धमनानो देवीं त्यजामि बलवांस्वपि मेढुरागः ॥"

घृवदेव—"यदि भक्ति त्रवकेवास्मि तदो मां मंदभागिनि परिरचयसि ।

[यदि भक्तिमपेक्षसे ततो मां मन्दभागिनीं परित्यजसि] । राजा—घ्रपि च, त्यजास्मि देवीं तृष्यवन्तं त्वदनन्तरे । घुवदेव—"अ्रहं पि जीवदं परिलचयंती अ्राझदउत्तं पहमरयं घ्येव परिलचइस्सं । [श्रमापि जीवितं परिलक्षितुं श्राझपुत्रं प्रथमतरमेव परिलच्यामि ।]

राजा—"त्वया विना राज्यमिदं हि निष्फलम्‌ । घुवदेव—"ममापि संपद निष्फलो जीवला च्रो सुहपरिचयसी च्रो भविष्सदि । [ममापि साम्प्रतं निष्फलो जीव लोक: सुहपरित्यजनो भविष्यति ।]

गुप्तके द्वारा घृवदेवोको शकराजको देना स्वीकार कर लेनेपर घृवदेवीका वेष धारएा करके शात्रुके बघके लिए जाने वाले कुमार चन्द्रगुप्तको लक्ष्य करके कहते हैं——

राजा — प्रतिष्ठा-वचनोके श्राश्रपर में तुमको भुला नहीं सकता हूँ ।

में [यदि] देवीका परित्याग करने जा रहा हूँ किम्तु श्रभिनव यौवने रमणीय तुम्हारी यह देह, यौवनके श्रानुरूप इस रूप-सौन्दर्य, श्रौर श्रापने प्रति श्रनुरप प्रेमको देखकर तुम्हारे प्रति मेरा प्रबल श्रनुराग है ।

घृवदेवो—[ चन्द्रगुप्तकी दूसरी स्त्री समझे कर] यदि इसके प्रेमको श्रापकी नो झ्राशा है तो [इसका श्रर्थ यह है कि श्रापने प्रति प्रनन्य श्रनुराग रखने वाली] मुक्त मन्दभागिनोका परित्याग कर रहे हैं ।

राजा — श्रौर तुम्हारे कारण [ग्रर्थात्‌ तुम देवीकी रक्षा कर हो लोगे ऐसा मानकर दूसरे पक्षमें तुम्हारे प्रेमके वशीभूत होकर] में तु झाके समान देवीका परित्याग कर रहा हूँ । [श्रर्थात्‌ शकराजको देखिके दे देनेको स्वीकार कर रहा हूँ] ।

घुवदेवो — [ग्रापके इस परित्यागसे खिन्न होकर] में भी श्रापने जीवनका परित्याग करके श्रायम्पुत्रको पहिले हो छोड़ दूंगी ।

राजा — [ चन्द्रगुप्तके प्रति] तुम्हारे बिना मेरा यह राज्य व्यर्थ है । घुवदेवो—मेरे लिए भी श्रव यह जीव लोक निष्फल है । उसे में सरलतासे परित्याग कर सकूंगी ।

राजा—किन्तु देवी मेरी विवाहिता पत्नी है इसलिए उनके प्रति मुझे दया ग्राती है ।

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राजा—उद्भवति देवीं प्रति मे दयालुता। धु० वदेवी—इयं श्राज्जौत्त ! ईंदिसी दयालुता, जं श्रापवरद्धो जस्सो श्रागुगदो एवं परित्यजीयादि। [इयंआर्यपुत्र ! ईंदिशी दयालुता यदनपरड्ढो जनोडनुगत एवं परित्यज्यते]। राजा—त्वयि स्थितं स्नेहानिवनवर्त्यन् मनः ॥ धु० वदेवी—ऋ्रद्यो स्येव मंदभागी परित्च्चइयामि । [श्रत एवं मंदभागी परित्यज्य]। राजा—स्वव्युपरोपितप्रेम्णा स्वदर्थं यशसा सह । परित्यकता मया देवी जनोडयं जन एवं मे ॥ धु० वदेवी—हं जे ! इयं सा श्रार्य्योत्तस्स करुणापदा । [हं जे ! इयं सा श्रार्यपुत्रस्य करुणापता]। सूत्रधारी—देवी ! पडंति चंद्रमंडलड् चुडुलीह्रो, किं पत्थ करीयदि । [देवी ! पतन्ति चन्द्रमंडलदलादप्युलका:, किंमत्र क्रियते] ? राजा—देवीवियोगःखातस्वस्मान् रमादिष्यसि । धु० वदेवी—वियोगदुःखव् पि दे श्राकरुण्णपस्स व्वस्थित स्येव ? [वियोगदुःखमपि टेडकरुण्णपस्यास्त्येव] ? राजा—त्वद्‌दुःखःवस्यापनेतुं सा शतांशोनापि न चमा ॥" इति ॥

अन्तत स्त्रीविषयर्चिन्तनरत्प्रबोधनार्थमभिहितमपि विशेषणासाम्येन देव्या स्त्रीविषयं प्रतिपन्नत्वमिति भिन्नार्थयोजनं एवं न्र्यार्थसपि श्लेषादिवशाद्द्वयाहार्यम् । धु० वदेवी—हे श्रार्यपुत्र ! यह [प्रापको] ऐसी दयालुता है किि अपने प्रति श्रतुरक्त श्रौर अनपराधी सेविका [मुक्क] को छोड़ रहे हैं ? राजा—[चन्द्रमुखे प्रति] किन्तु तुम्हारे प्रेमके कारण मेरा मन तुममें लगा हुमा है । धु० वदेवी—इसलिए मुख् मंदभागिनीका परित्याग कर रहे हैं ? राजा—तुम्हारे ऊपर प्रेम् [विश्वास] करके तुम्हारे लिए [प्रार्थन् तुम देवीकी रक्षा करके शत्रुवध कर सकोगे ऐसा मानकर, देवोपिरत्यागका वचन देकर] यशाके साथ-साथ मैने देवीका परित्याग कर दिया श्और यह प्रजाजन तो मेरे प्रजाजन ही ठहरे । धु० वदेवी—हं जे ! यह श्रार्यपुत्रकी वह करुणापता है [जो मेरे प्रति रखते हैं]। सूत्रधारी—देवी ! चन्द्रमंडले भी यह उल्कापात हो रहा है श्रव इसमें क्या [किया जा सकता है ? राजा—देवोके वियोगके दु:खमें दु:खी हमको श्रब [शत्रुका वध करके देवीकी रक्षा द्वारा] तुम ही सुखी बनाओगे । धु० वदेवी—करुणा-रहित आपको वियोग-दुःख बना हो है ? राजा—तुम्हारे दुःखको दूर कर सकनेमें वह् तनिक भी समर्थ् नहीं है ।" st्री—चवधारी चन्द्रमुखको बोधित करनेके लिए कहे हुए भी ये सब वचन विशेषणोंकी समानताके कारण हैं इसलिए यह भिन्नार्थमें उनकी योजना [होनेसे त्रिगत नामक बी०्यॅजूकका उदाहररए] है । इसी प्रकार इलेषादिके द्वारा तीन

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का० ६५, सू० १४६ ] द्वितीयो विवेक: [ २४७

अथवा श्रुतिसारूप्येऽङ्कस्यैव प्रश्नरूपतया सतः प्रतिवचनतया भिन्नार्थस्य योजनम् ।

यथा विक्रमोर्वश्याम्—

सर्वक्षितिभृतां नाथ ! हृश्या सर्वाङ्गसुन्दरी ।

रामो राम्ये वनान्तेsस्मिन् त्वया विरहिता मया ॥

यत्र प्रश्नो महाभृतः प्रतिशब्देनैवदेवोत्तरम् ।

यथा शब्दोऽव्यक्तध्वनिमात्रं, तत्रास्म्येनानेकार्थयोजनं ‘त्रिगतम्’ । यथा इन्दुलेखायां वीथ्याम्—

“राजा-वयस्य—

किं नु कलहंसनादो मधुरो ? मधुपायिनां नु भङ्ङार: ?

हृदयगृहदेवतायास्त्वां न सन्नुपरश्चराः ? ।।इति।।”

(६) अथ छलम्—

[सूत्र १४७]—वचोडन्यार्थ छलं हास्य-वञ्चना-रोषकारकम् ।।[३३]६।।

प्रथयोसि सम्बन्ध [त्रिगत] का उदाहरण समक लेना चाहिए ।

प्रथवा प्रश्न रूपसे स्थित एक ही वचनको शब्दकी समानतासे उत्तरके रूपमें लगानेसे भिन्नार्थमें योजना [‘त्रिगत’ कहलाती] है । जैसे विक्रमोर्वश्य में—

[उर्वशीके चले जानेपर उसके दिव्योक हताश होकर उसका खोजता फिरता है और वह हिमालय पर्वतसे उर्वशीके विषयमें प्रथन करता हु्रा कहता है]

हे समस्त पर्वतोंके स्वामिन् ! इस सुन्दर वन-भागमें मुर्छिते होलग हुई सर्वाङ्ग-सुन्दरी स्त्री [प्रथार्थत उर्वशी] को क्या श्रापने देखा है ?

इस प्रथनके करनेपर प्रतिध्वनि द्वारा पर्वतका यही उत्तर पर्वतकी श्रोरेसे उत्तरके रूपमें इन शब्दोंका प्रथर्थ यह होगा कि—हे समस्त राजाओंके श्राधपति [महाराज] ! ‘त्वया विरहिता’ तुमसे वियुक्त हुई, सर्वाङ्ग-सुन्दरी स्त्रीको ‘मया’ मैंने

इस सुन्दर वन-भागमें देखा है । इसमें प्रथन कालमें ‘मया विरहिता त्वया हृश्या’ यह ग्रन्थय होता है । श्रौर उत्तर-पक्ष में ‘त्वया विरहिता मया दृष्टा’ यह ग्रन्थय होता है । इसी प्रकार

‘सर्वक्षितिभृतां नाथ’ का ग्रथर्थ दोनों पक्षोंमें भिन्न हो जाता है । प्रथन पक्षमें क्षितिभृत का ग्रथर्थ पर्वंत श्रोरे उत्तर पक्षमें क्षितिभृत का ग्रथर्थ राजा होता है ।

प्रथवा शब्दसे प्रथ्यक्त ध्वनिमात्र [ लेना चाहिए ], उसकी समानतासे ग्रनेकार्थकी योजना ‘त्रिगत’ [नामक वोध्यद्ध कहलाता] । जैसे इन्दुलेखा [नामक] वीथ्योमें—

क्या कलहंसोंका नाद या मधुपुरका भङ्ङार मधुर है ग्रथवा मेरे हृदयमनिद्रककी उस देवताके नूपुर [की ध्वनिसे युक्त] चरण [श्रधिक मधुर हैं ] ?

(६) छल नामक छठा वीथ्यङ्ग—

ग्रब ‘छल’ [नामक ग्रन्थय षष्ठ वोध्यद्धका लक्षण करते हैं।]

[सूत्र १४७]—दूसरेके लिए प्रयुक्त, हास्य, वञ्चना या रोषके जनक वचनका प्रयोग ‘छल’ [कहलाता] है । [३३] ५ ।

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२५६ ] नाट्यवेदर्पणम् [ कार्तिक ६५, सन् १९४३

प्रयोजनान्तरेण प्रयुक्तं यद्वचनमन्यस्य, अन्यस्य हास्य-वचचन-रोपकारां तद्-ज्ञानाहेतुवाच्चलत्म् । यथा—

"कस्स व न होइ रोसो डढो णा पियाए सच्चस्स छाहरं | सभसमरपउमण्हाडरि वारियवमे सहसु इसिंहं ॥"

[कस्य वा न भवति रोषो दृढो ऽपि प्रियायाः सत्यस्य चौरं । सङ्घसमरपद्मनाभायिते वारितवने सहस्रवेतालीयम् ॥ इति संस्कृतम् ] ।"

एतद्चः सख्या भर्तुः प्रत्यायनप्रयोजननोक्तं विदग्धजनस्य हास्यं श्वशुरादेव्च्चत्रां सपल्न्या रोषं जनयतीति ॥ [३३] ८५ ॥

(७) हास्यालापः—

[सूत्र १४८]—हासप्रलापस्तरवेन हितं यन्नावगम्यते ।

परमार्थंतो हितमुपकारपर्यवसायि यद्वचनं श्रविवेचकत्व-मौख्याभ्यां तत्त्वेन हितत्वेन नैवावबुध्यते श्रविवेचकैश्वर्यं चैतच्च, तन्न तु प्रति श्रस्ततो हासाधुभूतस्य प्रलपनमसत्यप्रलापः ।

तत्र विवेचकं प्रति यथा रामाभ्युदये द्वितीयेडडके—

"रावणः—प्रायशः श्रुतमेव भवद्भिर्यथा कलत्रमात्रसाधनोऽसौ तापस्ततदपहार एव तु कलत्रापहार्यते पुरुवध्वत्यपि परं सव्स्यादानिमित्तम् ।

तत्र मारीचेन साहायकं क्रियमाणमिच्छलामि ।

श्रथवा रोषका कारण हो वह वचनाका हेतु होनेसे 'छल' कहलाता है । जैसे—

ग्रपनी प्रियाके श्रद्रहमें [ दंतकथकता ] घाव देखकर किसको क्रोध नहीं प्राता है ?

इसलिए मना करनेपर भी न मानने वाळी, श्रौर भ्रमर-युक्त कमलको सूंघने वाली म्राब [ भ्रमरके काट लेनेसे बने श्रद्रहव्रणाके कारण अपने पतिके क्रोध को] भोग ।

यह वचन सखीने [ नायिकाकी रक्षाके लिए उसके] स्वामिको [यह] विश्वास दिलाने के लिए [ कि इसके परपुरुष- द्वारा श्रद्रहरण नहीं हुग्रा है ग्रपितु भ्रमरके काट लेनेसे 'व्ररए हुग्रा है ] कहा जानपर भी विदग्ध लोगोंमें हास्य, इशुरादिकी वचनना तथा सपल्नीमें रोष उत्पन्न करता है ॥ [३३] ८५ ॥

(७) हासप्रलाप नामक सातवां वृत्त्यंग—

ग्राव हासप्रलाप [ नामक सप्तम वृत्त्यंगका लक्षणादि कहते हैं ] ।

[सूत्र १४८]—जिस हितकारी वचनको यथार्थ रूपमें ग्रहण नहीं किया जाता है वह 'हासप्रलाप' है ।

वास्तवमें हितकारी ग्रर्थात् लाभ पहुँचाने वाला होनेपर भी [ सुनने वालेके ] ग्रविवेकत्व श्रथवा मूर्खताके कारण हितकारी रूपसे ग्रहण नहीं किया जाता है वह उन दोनोंके प्रति ग्रहण न किए जानेके समान होनेसे 'हासप्रलाप' [ कहलाता ] है ।

जैसे रामाभ्युदयके द्वितीयांकमें—

रावणः—तुमने यह तो सुना ही है कि उस तपस्वके पास केवल एक स्त्री

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का० ६५, सू० १४५ ] हितीयो विवेक: [ २४५

मारीच:- स्वामिन् ! जीवतो रामस्य परिसव इत्यशङ्क्यमेतत् । न खलु तापस्

इति तमवज्ञातुमर्हति देवः । यद्यदेव वस्त्वन्तरं किंपि तन् ।

रावणः- [ सकोधम् ] श्रा: कि नाम वस्त्वन्तरं तन् ? मूढ !

युक्त्यैव तत्त्वबन्धोः परिसवमसं जीवतः कतु मिच्छन्,

मार्गीसहायै क त्वं निपुणैरतरे इति प्राथयै नासमर्थः ।

यच्चान्यन् । तत्र वज्रप्रहृतिमसुरगिरितस्कारकेयूरभाजः,

सज्जासु त्रिलोक्यलदमोहत्थरङ्गासहा वाहवो रावणस्य ॥"

छात्र मारीचवचनं परमार्थतो हितमपि रावरोन नावगतम् ।

मूर्ख प्रति, यथा भीमटविरचिते 'मनोरमावत्सराजे' वत्सराजाभ्युदयशंसि

रुष्यवान पांचालमुच्छेत्तुकामरतस्य द्विषत्कृत्युतां श्वित्रो विश्वासोत्पादनार्थं वत्सराज-

न्तरःपुरमादृश्य योगन्धरायणैरप्रमुखैराह —

"कौशाम्ब्यां मम हस्त एवं परया शक्या मया स्वीकृतः,

पंचालाधिपतिः प्राहः श्र भवतां न ज्ञायते क्वाधुना ।

नन्वादीपित एव मोहितपरानीकैन लावारिको,

देवि ! सम्प्रति रुद्यतामसं महत् प्राणतो रुष्यवान स्वयम् ॥"

है है । इसलिए उसका ग्रहपरहण ही सबसे पहले करना चाहिए । स्त्रीके ग्रहपरहणसे प्रधिक

पुरुषके लिए ग्रहपमानका दूसरां स्थान नहीं हैं । इसमें मारीच सहाय्यता करे ऐसा मैं चाहता हूँ ।

मारीच- स्वामिन् ! रामके जीते रहते उसका ग्रपमान हो सके यह ग्रसम्भव है ।

वह कोई साधाररग तापस है यह समभकर उसकी ग्रवज्ञा नहीं करनी चहिए । वह कुछ

श्रौर हो चीज है ।

रावरण- [ सकोध होकर ] श्रारे वह कौनसी दूसररी चीज है ? मूर्ख-

उस नीच क्षत्रियके जीते रहें ही उसका ग्रपमान करनेके लिए ही, तू धोखा

देनेमें श्रधित चतुर है ऐसा समभकर तुमसे कहा था, में ग्रसमर्थ हूँ ऐसा मत समभना । श्रौर

वह जो कुछ श्रौर है उसके लिए बछकेके प्रहारोंसे विकने हुए वाजुबन्धोंको धाराग करने वाले

श्रौर तीनों लोकोंकी लक्ष्मीको बलात हरकर सकोतमें समर्थ हैं, मेरे [ रावणके ] हाथ नेयार हैं ।

यहाँ मारीचका वचन वस्तवमें हितकर होनेंर भी रावणानें [ हितकर ] नहीं

समझा ।

मूर्खके प्रति— जैसे भोमट [ कवि ] विरचित सनोरमावत्सराजमे वत्सराजकी उन्नति

की कामना करने वाले [ मन्त्री ] हम्पवान पांचालराजको नाश करनेकेलिए उसके बनावट

भृत्य बनकर उसको विद्वास दिलानेके लिए वत्सराजके [ लावारिक बनमें स्थित होनेके समय ]

ग्रस्तःपुममें ग्राग लगाकर योगन्धरायण ग्रादिसे कहते—

कौशाम्बीको मेरे हाथों में ही समपोभो । शत्रुय्न्त शकितशाली होनेके काररग [ उसपर

नीतिसे ही विजय प्राप्त करनी होगी ऐसा मानकर ] मैने पांचालराजको [ बनावटी रूपसे ]

ग्रपने स्वामी रूपमें स्वीकृत किया है । श्रापके प्रभु [ उदयन ] न मालूम कहाँ हैं । ज्ञानुकी

सेनाको ग्रस्तमें डालने वाले मैने इस लावारिक [ वन ] को ग्राग लगा दी है, ग्रब [ इस लावा-

१. महं ति ।

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२६० ] नाट्यदर्पणम् [ का० ६६, सू० १४६

एतच्च परमार्थत: पांचालोच्छेदपरं योगन्धरायणोनावबुद्धम् । वासवदत्तया सम्भ्रमकनाम्ना योगन्धरायणानुचरेण च मौख्यैर्न्नावगतम् ।

यथा वा व्यसनिनां राजपुत्राणां कि सुखमिति पृछते मन्त्रिपुत्रेणोच्यते—

"सर्वदा योत्स्यविजयी सुरासेवनतत्पर: । तस्यार्थानां सुखानां च समृद्धि: करगामिनी ॥"

एतदपि मृक्वेत्यवत् प्रियांशे पाशकविजय-मद्यपानरूपे गृहीते, न त्विन्द्रियविजय-

देवतार्चनको हितांधे इति ।

अथन्ये तु बालोक्तिष्विततादीनामसम्यक्कथाग्रायमसत्यलापमिच्छन्ति । यथा—

"पक त्रीणि नवाष्ट सप्त पडिति व्यालुत्सरख्याक्रमा:, वाच: क्रौंचचारिपो: शिशुवकलिता: श्रेयांसि पुष्णन्तु व: ॥"

यथा वा रघुविलासे सीताविरहितो राम: —

"श्रररये मां त्यक्त्वा हरिणा! हरिणाक्षी क्व नु गता, पराभूता हस्त्वा कथयसि न चिन्मा स्म कथय ।

श्ररे कीडाकीर ! त्वमपि वहसे कामपि रुपं, यदेवं तृष्णीकामनुसरसि वाच्यंम इव ॥" इति ।

राककेक शिविरमें स्थित] देवीको ग्राप लोंग बचा लो [इस बातका समाचार देनेके लिए मैं]

रमणवांन् स्वयं श्रापया हूँ

पांचालराजके नाशके लिए यह [रमणवाकं प्रयog हे] इस बातको योगन्धरायणाने

सम्भव लिया किन्तु वासवदत्ता तथा योगन्धरायणके सम्भ्रम नामक पुत्रवर्ने मूर्खतावश नहीं

सम्भा

पर श्रथवा [उसी मनोरमावत्सराजमें] व्यसनी राजपुत्रके द्वारा सुख क्या हे यह पूछे जाने

पर मन्त्रिपुत्र कहता है—

जो सर्वदा श्रपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करने वाला हे श्रौर देवताओंकी सेवामें

तत्पर रहता है उसके लिए श्रथ्य श्रौर सुखकी समृद्धि हस्तगत रहती है ।

[यह इस लोकका विवक्षित श्रथ्य है किन्तु यमनी राजपुत्र] श्रपनी मूर्खताके कारण

श्रपने प्रिय श्रथ्यमें [प्राक्षविजयी पदसे] श्रुतकी विजय, तथा [सुरासेवन पदसे] मद्य-सेवन श्रथ्य

को लेता है । इन्द्रियविजय श्रौर देवतार्चन रूप हितांशको नहीं ।

दूसरे लोग तो श्रासम्भद कथायुक्त बालकोंकी उक्तिठा श्रापदिके वर्र्णनको श्रसत्यप्रलाप

मानते हैं । जैसे—

क्रौंचचारि केतिकेयकी शिशुवकके कारण श्रासम्भद एक, तीन, नौ, श्राठ, सात, छ:

श्रादि संख्या के कमसे रहित वाणी तुम्हारा कल्याण करें ।

श्रथवा जैसे रघुविलासमें सीतासे विरहित राम [कहते] हैं—

हे हरिणे ! हरिणाक्षी [सीता] वनमें मुभकुकी छोड़कर कहाँ चली गई है ? क्या तुम

मुभको देखकर डर जानसे नहीं कह रहे हो, यदि ऐसी बात हो तो डरो मत, बतला दो । श्रारे

कीडाके तोते ! क्या तुम भी नाराज हो गए हो कि मुनियोंके समान इस प्रकार चुप्पी धारए

किए हुए हो ।

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(७) श्रथ वाक्केली—

[सूत्र १४६]—प्रश्नोत्तरं तु वाक्केली हास्या वाक्-प्रतिवागपि ॥

[३४] ६७॥

प्रश्नस्य प्रश्नयोः प्रश्नानां बोत्तरं प्रश्नोत्तरम् । सहास्या श्रेकोक्ति-प्रत्युक्तिर्या । दयमध्येतद् वचनकीडालुपत्वाद् वाक्केली । यथा—

"नदीना मेघविगमे का शोभा प्रतिभासते ? । वाघान्तरा विजेतव्या के नाम कृतिनाड़यः ? ॥"

छत्र 'श्ररय' इति एकत्र रयाभावो, श्रपरत्र शत्रव इति एकं प्रतिवचनम् । एवं बहूनामपि दृश्यम् । एतत्प्रश्नोत्तरम् ।

श्रेकोक्ति-प्रत्युक्तिरथ्या—

"कोडयं द्वारि ? हरिः; प्रयातु पवर्न शाखामृगस्यात्र किं, कृष्णोऽहं दयिते, विभेमि सुत्रां कृष्णात् पुनर्वानरात् । सुग्धेऽहं मधुसूदनो, व्रज लतां तामेव तन्वीमलं, मिथ्या सूचयसील्युपेत्य धनिकान् होतो हरिः पातु वः ॥"

(८) वाक्केली नामक श्रृङ्गम विलीय—

श्रथ 'वाक्केली' [का लक्षणादि करते हैं]—

[सूत्र १४७]—प्रद्नोत्तर श्रथवा हास्यपूर्णोत्तर-प्रत्युत्तर 'वाक्केली' कहलाती है [३४] ६७ ।

एक प्रश्नका, दो प्रश्नोंका; श्रथवा बहुत प्रश्नोंका उत्तर [यहाँ पर] प्रश्नोत्तर [कहलाता] है । प्रथवा हास्ययुक्त, चातुर्यपूर्णां, उक्ति-प्रत्युक्ति [ये दोनोंही वचनोंकी क्रोडा रूप होने से वाक्केली है]। जैसे—

बरसातके बाद नदियोंकी कैसी शोभा होती है ? श्रौर किन बाह्य तथा ग्रान्तरोंको विजय करना चाहिए ? [ये दो प्रश्न हैं । इन दोनों प्रश्नोंका एक हो उत्तर देते हैं कि] 'श्ररय:' ।

इसमें एक पक्षमें [श्रर्थात् प्रश्नके उत्तरमें] 'श्ररय' का श्रर्थ रयका प्रभाव श्रथवा दूसरे पक्षमें [श्रथवा यह [दोनों प्रश्नोंका] एक हो उत्तर है । इसी प्रकार बहुत प्रश्नोंका भी [एक हो उत्तर] हो सकता है । यह प्रद्नोत्तर [रूप वाक्केलोका उदाहरण है] ।

चातुर्यपूर्णां उक्ति-प्रत्युक्ति [का उदाहरण] जैसे—

श्ररे दरवाजेपर यह कौन है ? [यह धनिका राधिकाका प्रश्न है । इसका उत्तर कृष्ण देते हैं] हरि [श्रथांत मैं कृष्ण हूँ । 'हरि' शब्दका श्रर्थ कृष्ण भी होता है श्रौर वानर भी । कृष्णने तो हरि शब्दसे कृष्ण श्रर्थ लेकर श्रपना परिचय दिया था । किन्तु राधाने

उसका वानर श्रर्थ लेकर कृष्णाको उत्तर दिया कि यदि तुम वानर होते] उपवनमें चले जाओ । यहाँ वन्दरका क्या काम ? [इस पर कृष्ण फिर] प्रिये ! मैं [वन्दर नहीं श्रपितु] कृष्ण हूँ । [इस पर राधा उसका काल्पनिक वन्दर श्रर्थात् लङ्गूर श्रर्थ लेकर कहती है कि] काले वन्दरोंसे तो मैं बहुत डरती हूँ । [इस पर कृष्ण फिर मधुसूदन नामसे श्रपना परिचय देते हुए कहते हैं] मेरी गोली पियो ! [मङ्गूर नहीं] मधुसूदन हूँ । [राधा मधूसूदनका श्र्रमर

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केचितु साकांक्ष्य वाक्यस्य विनिवर्तनं वाक्केलीसंभ्रयते। यथोत्तरचरिते—

“त्वं जीवितं त्वमसि मे हृदयं द्वितीयं, त्वं कौमुदी नयनयोरमृतं त्वमझे। इत्यादिमिः प्रियशतैरुनुरुद्ध्य मुग्धां, तामेव शान्तमथवा किमत: परेषा ॥” [२४] १५ ॥

(९) नालिका—

[सूत्र १५०]—हास्याय वचसा नाली—

परविप्रतिप्ररेणाकारी यदुत्तरं हास्याय हास्यनिमित्तं निगूढार्थत्वादु भवति सा नाली व्याजरुपा प्रहेलिका। यथा रत्नावल्यों सागरिका चित्रफलकार्थमागता कदलीगृहे वत्सराजे दृष्टवा बहिः स्थिता सुसझेतोय्यते—

“सुसज्जता—मुहि जस्स के तुव्व आगदा सो पत्थ ययेइ चिड्ढदि । [सवि यस्य कुते त्वमागता सोऽत्रैव तिष्ठति । इति संस्कृतन ।]

सागरिका—[सकोपमिव] सा हि कुस्स ? [सखि कस्स ?

सुसज्जता—[महासम्] ब्रहि ग्रागपसकिदे गंं पउत्तमहूसवे चित्तफलहयस्स ।

श्रर्थ लगाकर कहती है कि हे ! तो फिर उसी कोमल लताके पास जाकर मुझें क्यों धोखा देते हो इस प्रकार [ध्वनिका] राधा के प्रागम जाकर लजितत हुआ कुसुमावली तुम्हारी रक्षा करें । कोई लोग साकांक्ष [ग्रपरिसमाप्त] वाक्य वाचिस कर लेनेको वाक्केली कहते हैं । जैसे उत्तरचरितमें—

तुम [ग्रर्थातु सोत] मेरी प्राणास्वरुप हो, तुम हो मेरा दूसरा हृदय हो, तुम नेत्रोंके लिए कौमुदीरुप हो । इस प्रकारके सैकड़ों प्रिय वचनोंसे उस भोली [सीता] को ग्रानावासन देकर ग्रब तुमने घरसे निकाल दिया । इस वातको वासन्ती ग्रागे कहना चाहती है, किन्तु उसको बीचमें ही रोक देती है । ग्रथवा चुप रहो इसके ग्रागे कहनेसे क्या लाभ ? ॥ १५ ॥

(९) नालिका नामक नवम वृश्यङ्ग—

ग्रब 'नालिका' [नामक नवम वृश्यङ्गका लक्षण करते हैं]—

(सूत्र १५०) मजाक करनेके लिए धोखा देना 'नाली' [कहलाता] है।

घोखा देनेवाली जो उत्तर हास्यक लिए प्रयुक्त गूढार्थ होनसे हास्यका जनक होता है वह नाली ग्रर्थात बहाना रुप [हास्यकी] प्रहेलिका [होनेसे 'नाली' कहलाता है] । जैसे रत्नावलीमें चित्रफलकके लेनके लिए आई हुई सागरिका कदलीगृहमें वत्सराज उदयनको बैठा देखकर बाहर रुक जाती है । तब सुसज्जता उससे कहती है—

सुसज्जता—हे सखि ! जिसके लिए तुम ग्राई थीं यहाँ स्थित हैं । सागरिका—[क्रुद्ध होती हुई सी] हे सखि ! किसके लिए [मैं ग्राई थी] ?

सुसज्जता—[हंसकर] ग्रह्री ग्रापने ग्राप हृदय कर लेने वाली ! इस ग्राननन्दके ग्रवसर पर चित्र-फलकेके लिए ।

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का० १००, सू० १४१ ] द्वितीयो विवेक: [ २६३

[ त्र्ययि श्यामशक्लित नतु प्रवृत्तमधृत्सवे चित्रफत्कलस्य]। केचित्तु हास्यहेतुनोपेतां निगूढार्थैरुपपां प्रहेलिकां नालीन मन्यन्ते । यथा 'वालिकावचित्रके' पारिपाश्विक:-

"तपनोयोज्ज्वलकरकं कुवलयारुचि भासमानमाकाशे । तेजोमयं दिनकरदू द्वितीयमाचक्ष्व मे भूतम् ॥"

छात्र निगूढो नारदलक्षणोऽर्थ: सूत्रधारेणैवस्मिन्नेव श्लोके 'द्वितीयमेनं मुनीन् पश्य'इति चतुर्थपादान्यथाकारेण कृतस्यात इति ।

(१०) श्रथ मृदवम्—

[सूत्र १४१]—वयस्ययो गुण-दोषयोः । मृदवं गुहानां दोषत्वं, दोषाणां च गुणत्वं येनोत्तरेण वयस्ययो विपर्ययः क्रियते, तन्मृदा परपक्षमर्दनेन स्वपक्षमवति रक्षतोति मृदवम् ।

गुणास्य दोषीकरसं यथा वेङ्गीसंहारे द्वितीयेऽङ्के—

"जयद्रथमाता— जाद ! ते खु बन्धुवधामरिसुहृदविदकोवा समरे ण्ययवेक्खय-

सरीरा परिकमिस्सन्ति ।

[जात ! ते खु वन्धुवधामरिसुहृदविदकोवा: समरे ण पेच्छितशरीरा: परिक्रसिष्यन्ति ।

इति संस्कृतम् ।

कुछ लोग हास्यके हेतु रूपमें प्राप्त होने वाली निगूढार्थ वाली 'प्रहेलिका' को 'नालीं'

बतलाते हैं । जैसे बालिकावचित्रतकमें पारिपाश्विक [कहता है] ।

सोनके समान चमकते हुए करों [किरणों और दूसरे पक्षमें हाथों] वाले, प्राकाशमें

चमकते हुए श्रौर पृथिवी-मण्डलपर रचि न रखने वाले, सूर्यको छोड़कर तेजोमय किसी ग्रन्य

भूत [प्राणी] को मुनि बतलात्त्रो ।

यहाँ नारद रूप श्रथ शब्द छिपा हुआ है । सूत्रधारने [सूर्यसे भिन्न तेजोमय] 'इन मुनींको

देखो' इस प्रकार चतुर्थ पादको बदलकर [श्रथात् 'द्वितीयमाचक्ष्व मे भूतम्' के स्थानपर द्वितीय-

मेनं मुनीन् पश्य' ऐसा पाठ करके] बतलाया है ।

(१०) मृदव नामक दशम वृत्त्यङ्ग—

श्रथ 'मृदव' [नामक दशम वृत्त्यङ्गका लक्षणादि कहते हैं]—

[सूत्र १४१]—गुण श्रौर दोषको बदल देना [श्रथात् गुणको दोष, श्रौर दोषको गुण

बना देना] 'मृदव' कहलाता है ।

जिस उत्तरसे गुणोंका दोषत्व, श्रौर दोषोंका गुणत्व इस प्रकार परिवर्तन हो जाता

है वह मृदा श्रथात् दूसरे पक्षके मर्दन द्वारा अपने पक्षकी रक्षा [श्रवण] करनेके कारण 'मृदव'

कहुलाता है ।

गुणको दोष बना देने [रूप 'मृदव' का उदाहरण] जैसे वेङ्गीसंहारके द्वितीय अंकमें—

जयद्रथकी माता— श्ररे बेटा ! बन्धु [अभिमन्यु] के वधके कारण अत्यन्त क्रुद्ध हुए वे

[पाण्डव लोग] अपने शरीरका भी मोह छोड़कर [युद्धभूमिमें] विचरण करेंगे [इसलिए उनसे

सावधान होकर लड़ना चाहिए] ।

१ पक्षों ।

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राजा—[ सोपहासं ] एवमेतत् । सर्वजनप्रसिद्धमेवार्पितत्वं पारडवानाम् ।

पश्य—

हस्तकृष्टविलोलकेशवसना दुःशासनेनाह्न्या, पांचाली ससि राजचक्रपुरतो गौगौरिति व्याहता ।

तस्मिन्नम्स्व स किन्न गाङिडबधरो' नासीत् पृथानन्दनो, यूनां नत्स्रियवशङ्कस्य कृतिनः कोपस्पदं किं तनू । ?"

ञत्र धनुर्धरत्वादयो गुणाः दोषीकृताः।

यथा नलविलासे—

"राजा—देवी ! उपालभ्यसे श्वाभ्यन्तर-परिजनापराधेन । दमयन्ती—कर्हि विय ?

[कथमिव] ?

राजा—वकत्रेन्दु: स्मितमातनोदधिगते हृद्ये विकासश्रियं, बाहू कर्णटकोरकारणयविभ्रमां प्राप्तौ गिरो गौरवम् ।

कि नाझानि तवातिथेयमसृजन स्वसावपतेयोचितं, सम्प्राप्ते मथि नैतदजुर्कतु कचद्र्वन् पुनः स्तब्धताम् ॥"

ञत्र स्तब्धता स्तनगुणौ दोषीकृतः ।

राजा—[उपहास करता हुया] श्रच्छ्या यह बात । [पाण्डवोंके कोप तो सब लोग जानते हैं [कि वे कोप करके भी मेरा कुछ नहीं

विगाड़ सकते हैं] देखो—

मेरी भ्रातासे दु:शासनके द्वारा राजकन्याको सामने केश ग्रोर वस्त्रोंके हाथसे खींचे जानेपर [में तुम्हारी गो हूं मेरी रक्षा करेो इस प्रकार धनेक वार] द्रौपदीसे

गौ-गौ [ये दीनतापूर्ण शब्द] कहलवाे लिए । [द्रोपदी गो-नो कहकर चिल्लाती रही] उस

समय क्या गाङीवधारी [भ्राजुन] नहीं था ? श्रथवा क्षत्रियवंशमें उत्पन्न हुए मनस्वी युवकके

लिए क्या वह [अपनी पत्नीका ऐसा घोर द्रव्यन] लज्जाजनक नहीं था ?

यथाह[प्रजनेके] धनुर्धरत्व आदि गुणोंको दोष बना दिया है ।

यथा नलविलासम—

राजा—अपने ऊपरी परिजनोंके श्रपराधके कारण तुमको उलाहना मिल रहा है ।

दमयन्ती—कैसे ?

राजा—[मेरे ग्रानेपर तुम्हारा] मुखचन्द्र मुस्कराने लगा, दोनों नेत्र [विकासको

प्राप्त हो गए] खिल उठे, बाहुओंमें रोमाञ्च हो श्राया श्रोैर वाणी भारी हो गई । इस प्रकार

क्या तुम्हारे प्राज्ञोंने श्रपनी-ग्रपनी क्समताके श्रनुरूप मेरा श्रातिथ्य या स्वागत नहीं किया ?

[प्रर्थात मेरे ग्राने पर तुम्हारे ग्रन्य सारे श्राज्ञोंने मेरा स्वागत किया] किन्तु मेरे ग्राने पर

भी यह,तुम्हारा स्तन-युगल श्रपनी स्तब्धता [प्रर्थात् कठोरता] प्रथ्रात् कठोरता [ग्रोर दूसरे पक्षमें जड़ता] को

नहीं छोड़ रहा है ।

यहांँ स्तब्धता [कठोरता] स्तनोंका गुण है किन्तु उसको दोष बना दिया है ।

१ काण्डवरोो ।

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काङ् १००, सू० १४१ ]

द्वितीयो विवेकः

[ २६४

श्रपि चास्मदुपदेष्टे 'सुधाकलशे'- "लचछी गिहीए भूषा श्रप्रत्तविज्जाए सा पुण्णो गरुइ। तत्तो पढेउज्ज विज्जा झ्रज्ज मदहेकरं सकन्तो ॥" [लचछीहिं गृहिणी भूषा, श्रप्राप्तविद्यार्त्र सा पुनर्गुर्वी । ततः पठनीय विद्या श्राज्ञां मदहेत्करं सकृतः । इति संस्कृतम्]

श्रत्र निवेदादू विदुरैरैर्वि गुरोरडप दोषीकृतः । दोषस्य गुप्तीकरं यथा वेधीसंधारे करचुकिना सह् विवादे—

"दुर्योधनः—सृक्मिदं कस्यापि— गुरुः साच्चान् महानल्पः स्वयमन्येन वा कृतः । करोति महतीं श्रेभिमपकारोडपकारिषु श्रापि ॥" yेनाद्य द्रोण—कर्ण—जयद्रथादिनिहतभिनन्युपश्रुत्योच्छृ, वसितमिव 'नश्र्चेतसा।' श्रत्र नात्रधर्म त्यक्त्वा श्रभिमन्युर्निहित इत्ययं दोषः, स्वग्रीतिहेतुत्वेन गुप्तीकृतः । यथा वा नलविलासे—

"सर्वेधामपि सन्ति वेशसु कृताः कान्ताः कुज्जद्धेशो, न्यायार्थी परदारविलङ्करं राजा जर्न बाधते । श्राज्ञां कारितवान् प्रजापतिमपि स्वां पक्वबागास्सतत्;, कामार्त्तः कव जनेन परहिता: पण्याङ्ग्नाः स्वुर्य चेत् ॥"

श्रौर जैसे हमारे बनाये हुए सुधाकलशमें भी— लक्ष्मी गृहस्थोंका भूषण है, श्रौर विद्या न पढ़े हुए वह श्रौर भी बड़ा भूषण है । इसलिए श्राजन्म दुःख देने वाली विद्याको [सकरार्न = बड़े कानोंवाला गवहा] पूर्ङ् ही पढ़ेगा । यहां विद्या रूप गुरूओंको भी देवोंने निवेदके वशीभूत होकर दोष बना दिया है । दोषको गुप्त बना देना जैसे वेधीसंधारमें कढ़चुकीके साथ विवादमें— दुर्योधन—यह किसका कथन बड़ा सुन्दर है ?

श्रपने [श्रप्रकारियों अत्यन्त] श्रात्मनोप्रति गुप्त रूपस श्रथवा साक्षात् रूपसे छोटा या बड़ा स्वयं या दूसरेके द्वारा किया जाने वाला श्राकार भी श्रत्यन्त ग्रानन्ददायक होता है ।

इसीलिए श्राज द्रोण, कर्ण, जयद्रथ श्रादि [सात महारथियों] के द्वारा श्रभिमन्युके मारे जानेका समाचार सुनकर हमारा चित्त प्रसन्न हो उठा है ।

यहां क्षात्र-धर्मका परित्यागकरके [सात महारथियोंने मिलकर] श्रभिमन्युको मार दिया यह [धर्मविरुद्ध होनेसे] दोष होनेपर भी श्रपनेलिए ग्रानन्ददायक होनेसे गुप्त बना दिया गया है ।

श्रथवा जैसे नलविलासमें— सब लोगोंके घरमें तो मृगनयनो [सुन्दरी] स्त्रियाँ कहांसी हो सकती हैं श्रौर न्यायकारी राजा दूसरोंकी स्त्रियोंको बिगाड़नेवाले लोगोंको दण्ड देता है । श्रौर कामदेवने स्वयं प्रजापतिसे भी श्रपनी श्राज्ञा पालन करवा ली [श्रथर्थात् प्रजापति सहश भी जब कामपर विजय प्राप्त न कर सके तब सामान्य मनुष्य कामपर विजय प्राप्त कर सकेगा यह तो श्रसम्भव हो है ।

ऐसी दशामें] यदि वेधाएं न हों तो कामार्त्त-जन [ग्रपनी तृप्तिके लिए] कहां जाय ?

१. उपसृतेऽस्सितमिव ।

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१६६ ] नाट्यदर्पणम् [ का० १००, सू० १४७

शात्र परणयस्त्रीत्वं दोषः श्रृङ्गारपुष्ट यर्थ गुप्तीकृतः ।

श्रापि च यथा 'सुधाकलशे—

तथा नमो निर्गुणसहेरराय गुप्तिसलहिज्जस्सम्भायं ।

निग्गुरुअविहलत्तभवा सिरिवइओ वि न जाणे झारईड ॥

[ तेथ्थो नमो निर्गु याशेखरेस्सो गुप्तिश्लाघ्यमाजन्मभ्यः ।

निग्गुरुअविफलत्तभवो: स्वप्नेऽपि न येषांमतयः ॥ इति संस्कृतम् ]"

शात्र निवेदाद्द गुप्ताभियोगु श्रुत्वा दोषाय गुप्तीकृतः ।

उभयमेकत्र यथा—

"सन्तः सचचरितोदयव्यसनिनः प्रादुर्भवचान्तरङ्गाः; सर्वत्रैव जनापवादचकितसस्थितान्ति दुःखं सदा ।

व्याकुलो व्युप्तसमति: ऋतेन न सतां नैवास्तता व्याकुलो, युक्तायुक्तविवेकशून्यहृदयो धन्यो जनः प्राकृतः ॥

शात्र सर्वं गुप्तोऽपि दोषीकृतः प्राकृतत्व तु दोषोऽपि गुप्तीकृत इति ।

(११) श्रुतोद्घात्य क्रम—

[सूत्र १५१]—परस्परं स्यादुद्घात्यं गूढभावणासु ॥ [३५] १०० ॥

पृच्छक-प्रतिप्रश्नकत्रोरन्योन्यं गृहीत्वा मुक्त-प्रश्न-यातकं भाषणं उद्घाते प्रश्नात्मक साध उद्घात्यम् यदा प्रश्ना विरचितोत्तरदर्शनासमर्थः: किन्तु यन्म्माभिप्रेतं तद् युक्तमयुक्तं वेध्यभिसन्धाय पृच्छति, प्रतिवाक्क चोचितमभिधत्ते तदा उद्घात्य-मित्यर्थः ।

यहाँ वेधियात्व रूप दोष भी भ्रूय्ज्ज्ञारकी पुष्टिकेलिए गुरण बना दिया गया है ।

श्रोत्र जैसे सुधाकलशं—

गुरणिजन भी जिनके जन्मकी प्रशंसा करते हैं उन निर्गु ण-शिरोमणियोंको नमस्कार है । क्योंकि श्रापने गुरुप्रके विफल हो जानेका दुःख उनके स्वभावमें भी नहीं होता है ।

यहाँ गुरिणोंने वैराग्यके कारणा निर्गुणात्व रूप दोषको भी गुरण बना दिया है ।

[दोषको गुरण बना देना श्रोत्र गुरुआको दोष बना देना इन] दोनोंका एकसाथ उदाहरण—

उत्तम कार्यों करनेके श्राग्रहासो सज्जन पुरुष लोकापवादके भयसे यत्नत्र्याप्रस्त श्रोत्र सदा कष्टमें रहते हैं । किन्तु उचित-ग्रनुचितके विचारसे रहित, इसलिए की हुई भलाई-बुराईसे व्याकुल ने होने वाले मूर्ख सावरहित लोग श्रच्युत हैं ।

यहाँ सज्जनतता भी गुरुआको भी दोष बना दिया गया है श्रोत्र मूर्खता रूप दोषको भी

गुरण बना दिया गया है ।

(११) उद्घात्य नामक ग्यारहवाँ वेध्यध्य—

जब 'उद्घात्य'का [का लक्षण श्रादि करते हैं]—

[सूत्र १५१]—परस्परं गूढभावणासु 'उद्घात्य'क कहते हैं । १०० ॥

प्रश्नकर्ता श्रोत्र उत्तर देने वाले दोनोंके बीच परस्पर गूढार्थयुक्त उत्तर-प्रत्युत्तर रूप भाषरणं प्रश्नात्मक उद्घाते साथु होनेसे 'उद्घात्य'कहलाता है । जब पूछने वाला स्वयं विवक्षित उत्तर देनेमें समर्थ होनेपर भी, जो मेरा श्रभिप्रेत श्रर्थ है वह उचित है या अनुचित इस विवक्षित उत्तर देनेमें समर्थ होनेपर भी, जो मेरा श्रभिप्रेत श्रर्थ है वह उचित है ।

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क० १०१, सू० १४२ ] द्वितीयो विवेक: [ २६७

यथा 'पाण्डवानन्दे' सूत्रधार-पारिपाश्विकयोरुक्ति-प्रत्युक्ति--

"कां भूषा बलिनां नृपो परिभवः को यः स्वकुल्यैः कृृतः; किं दुःखं परसंशयो जगति कः श्रद्धाल्यो य श्राश्रीयते । को मृत्युर्यसनं शुचं जहरति के यैनिजिता: श्रवः; कैविज्ञातमिदं विराटनगरनृत्यस्थितं: पारडवैः॥" इति ॥ [३४] १०० ॥

(१२) ग्रथावलगितम्

[सूत्र १४२]—तद्वावलगितं सिद्धौ: कार्यस्यान्यमिषेऽपि या । विवक्षितप्रयोजनस्यैवकार्यकरत्वाज्जेन सम्पत्तिर्यत्र तद्न्यकायौंवलगनादवल- गितम्। यथोत्तरंचरिते समुप्पन्नवनविहारदौहदयाः सीताया दोहदकार्यमिषेऽपि केचित् तु पात्रान्तरे स्वव्यापारं निधाय यत् कार्यान्तरकरणं तद्वलगित- मिल्याहुः यथा ऋतुसंहारस्यामुखे—

"सूत्रधार:—[ निःश्वस्य ] श्राय ! नतु ब्रवीमि—

चित इस प्रभिप्रायसे [ दूसरे से ] पूछता है, और उत्तर देने वाला उचित उत्तर देता है वह 'उद्घात्यक' होता है ।

जैसे पाण्डवतानन्दमें सूत्रधार और पारिपार्श्विकके उक्ति-प्रत्युक्तिका [निम्न प्रकार] है— बलवानोंका भूषण क्या है ? [यह सूत्रधारका प्रदान है] । क्षमा [बलवानोंका भूषण है यह उत्तर]। ग्रपमान कौनसा है ? [यह प्रदान है] । जो अपने कुलके लोगों द्वारा किया जाय वही ग्रपमान है [यह उत्तर हुया] । दुःख क्या है ? [यह प्रश्न है] । दूसरेका श्राश्रय लेना [दुःख हैं यह उत्तर हुया]। संसारमें प्रज्ञांश्रय कौन है ? [यह प्रश्न है] । जिसका लोग श्राश्रय लेते हैं [यही इलाध्य है यह उत्तर हुया] । मृत्यु क्या है ? [यह प्रश्न है] । व्यसन [ही मृत्यु है यह उत्तर हुया]। शोकसे कौन बचता है ? [यह प्रश्न है] । जिन्होंने शत्रुपर विजय प्राप्त कर ली [वे ही दुःखके पार हो जाते हैं यह उत्तर हुया]। इस सबको किसने समभ्र लिया है ? [यह प्रश्न है] । विराटके नगरमें छिपकर रहने वाले पाण्डवोंने [इन सब बातोंको ठीक तरहसे समभ्र लिया है यह उत्तर है] ।

(१२) श्रावलगित नामक बारहवाँ वृत्त्यभेद—

ग्रन्थ श्रावलगित [का लक्षणादि करते हैं]—

[सूत्र १४२]—जहाँ ग्रन्थके बहानेसे कार्यकी सिद्धि हो उसको 'ग्रावलगित' कहते हैं । जहाँ ग्रन्थ कार्यके करनेके बहानेसे विवक्षित प्रयोजनकी सिद्धि हो जाय वह ग्रन्थ कार्यका श्रवलम्बन करनेसे 'ग्रावलगित' कहलाता है । जैसे उत्तररामचरितमें सीताके मनमें वनविहारकी इच्छा उत्पन्न होनेपर सीताके इच्छा [दोहद] रूप कार्यके बहानेसे जनापवादके कारण सीताको वनमें छोड़ देना [ग्रावलगितका उदाहरण है] ।

कुछ लोग श्रापने कार्यकी दूसरे पात्रके ऊपर डालकर ग्रन्थ कार्यमें लग जानेकी 'ग्रावलगित' कहते हैं । जैसे ऋतुसंहारके श्रामुखमें—

सूत्रधार—[निद्वास लेकर] श्रोर श्राय ! मैं तो यह कहता हूँ कि—

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वाक्प्रपञ्चैकसारेषु निर्विशेषाल्पवृत्तिषु । स्वामिनेव नटवने निर्वर्त्यः सर्वथा वयम् ।। तदू गच्छतु भवती पुत्रं मित्रं वा कमपि पुरस्कृत्य क्रमागतामिमां कुजीविका- मनुवर्त्तयितुम् ।"

तत् क्षेमादाह— "परित्यजोरमाहौघाद् गृहसंसारसागरात् । वन्धुस्नेहमहावातादिदमुत्तीर्य गामिने ।। छात्र स्वजीविकां दारेषु नित्यिप्य परलोकहेतुकरणं स्वयमाश्रितम् । श्वपरे तु प्रस्तुतेऽन्यस्मिन् कार्ये यदन्यत् स्वयमेव सिद्धंयति तदवलगितम् । यथा छलितरामे— "रामः—लक्ष्मण ! तातविप्रयुक्तामयोग्यां विमानस्थो नाहं प्रवेष्टुं शक्नोमि । तदवतीर्य गच्छामि । कोऽपि सिंहासनस्याधः स्थितः पादुकयोः पुरः । जटावान् चवलयी चामरीव विराजते ।। छात्र भरतदर्शिनकार्योत्तरस् तैवमेव सिद्घिरिति । (१३) व्‍यवस्पन्दितम—

[सूत्र १५३]—स्वेच्छोक्तवस्त्रथान्यथाल्यानां यदवस्पन्दितं तु तत् ।।[३६] १०११

बात बनाना ही जिसका सार है इस प्रकारके, श्रोत्र साधारण-सो श्ाल्प वृत्तिवाले स्वामी जैसे नट-व्यापारसे हम सर्वथा खिन्न हो गए हैं इसलिए पुत्र या किसी मित्रको लेकर तुम कुलकमागत इस कुजीविकाका श्रनुसरण करनेके लिए जाश्रो [मैं तो नहीं जाऊँगा] । उसके बाद फिर क्रमसे [प्रागे चलकर] कहता है— परिवार रूप महान् प्राहुंसे भरे हुए श्रोत्र बन्धुस्नेह रूप भयंकर भवरों वाले इस गृहस्थ रुप संसार सागरको पार करके मैं तो जाता हूँ यहां श्रपनी जीविकाको स्त्रीके ऊपर छोड़कर [नट] स्वयं परलोकके हेतुभूत कार्यों में लग जाता है । दूसरे लोग तो जहां श्रग्रन्य कार्य प्रस्तुत होनेपर श्रग्रन्य कार्य स्वयं ही सिद्ध हो जाय उसको 'ग्रवलगित' कहते हैं । जैसे छलितराममें— राम — हे लक्ष्मण ! पिताजीसे झूठे श्रयोग्यांमें, मैं विमानपर बैठा हु्रा नहीं जा सकता हूँ इसलिए उतरकर चलूँगा ।

[श्ररे यहां तो] सिंहासनके नीचे पादुकाोंके सामने जटाधारर किए हुए, प्रकसमाला- युक्त, श्रोत्र चमर-युक्त-सा कोई बैठा हु्रा है । (१३) व्यवस्पन्दित नामक तेरहवाँ वृत्त्यङ्ग— श्रग्र 'ग्रवस्पन्दित' [का लक्षण श्रादि करते हैं]—

[सूत्र १५३]—स्वेच्छोक्तसे [ग्रर्थात् उस विशेष श्रमिप्रायसे न] कहे हुए [वचन] का

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का० १०२, सू० १४४ ] द्वितीयो विवेक: [ २६६

स्वेच्छया वर्णनाभिप्रायमात्रेणोक्तस्यान्यथाख्यानं यदवस्पन्दितमन्यार्थकथन-रूपं यत् तदवस्पन्दितम् । चक्षु:स्पन्दनादिवत् श्वान्तर्गतसूचनायैसम्भवात् । यथा वेष्टि-संहारे—

"सत्पक्षे मघुरागिर: प्रसाधितताशा मदोद्धतारम्भा: । निपतन्ति धार्तराष्ट्राः कालवशान्मेदिनीरूढे ॥"

अत्र स्वेच्छया शाब्देरन्वयं हुंसवर्गेण सूत्रधारेरपि कतम् । एतत् पारिपाश्विकेन धृतराष्ट्रसुतानां दुर्योधनादीतामङ्गलार्थकथनेन ग्रन्थथाख्यातम् ।

यथा वा छलितरामे—

"सीता—जात ! पभाते तुम्हेहि श्रउक्खाए गन्तव्वं । सो अह राजा विसप्पे परामिदवो ।

[जात ! प्रभाते युत्रास्यामयोध्यायां गन्तव्यम् । स च राजा विनयेन प्रगन्तव्यः] लव:—श्रम्ब ! किमावास्यां राजोपजीविकाभ्यां भाव्यम् ?

ग्रन्थ प्रकारसे कथन करना 'प्रवस्पन्दित' कहलाता है । [३६]१०१ । स्वेच्छया से शाब्दति साधाराणा वर्णनके श्राभिप्रायेसे कहे हुएका ग्रन्थ प्रकारसे कथन करना श्रर्थात् अन्य श्रथकका कथन जो होता है वह ग्रान्थके फड़कनेसे ग्रान्तर्गत श्रभिप्रायके सूचनके समान होनेसे 'प्रवस्पन्दित' कहलाता है । जैसे वेष्टिसंहारमें—

शारद्वतांके श्रभिप्राये सूत्रधारने 'सत्पक्षा' श्रादि श्लोक पढ़ा है । उसमें 'धार्तराष्ट्र:' पद हंसोंके लिए ग्राया है । किन्तु उससे कौरवोंके पतन रूप ग्रन्थ श्रथकी भी प्रतीति होती है । यद्यपि सूत्रधारने इस श्रभिप्राये नहीं कहा है किन्तु पारिपाश्विकने कौरवोंके नाश-रूप ग्रन्थालाथमें उसकी व्याख्या कर ली है । श्रत्रः यह 'प्रवस्पन्दित' नामक बोधपाठका उदाहरण है ।

इलोकका श्रथ दोनों पक्षोंमें निम्न प्रकार लगता है :— सुन्दर पक्ष वाले [हंस श्रौर दुर्योधनके पक्षमें 'सत्पक्षा' का श्रथ भीष्म, द्रोण श्रादि उत्तम पुरुष जिसके पक्षमें हैं इस प्रकारके कौरव यह होंगे] जिन [हंसों] ने [ग्रपनी स्थिति से] विश्रान्तोंको ग्रलंकृत कर दिया है [ग्रौर कौरवोंके पक्षमें जिन्होंने सारी दिशाग्रोंको ग्रपने वशमें कर लिया है ।] मदके कारणमही उद्धत ग्रारम्भ [व्यापार] करने वाले धार्तराष्ट्र [प्रर्थात् हंस ग्रौर कौरव दोनों] काल [हंसपक्षमें शरद्‌ऋतु रूप काल, तथा कौरव पक्षमें मृत्यु रूपकाल] के वशीभूत होकर पृथिवीपर गिर रहे हैं ['पतन्ति' का श्रथ हंस पक्षमें उतरना श्रौर कौरव पक्षमें गिरना है । हंस शरद् ऋतुमें पृथिवीपर उतरते हैं ।]

यहां सूत्रधारने शरद् ऋतुके वर्णनके लिए स्वेच्छया हंसका वर्णन किया है । इसको पारिपादिकने दुर्योधन श्रादि धृतराष्ट्रके पुत्रोंके ग्रन्थलाथ-परक श्रथमें ग्रन्थ प्रकारसे समभ लिया है । [इसलिए यह 'प्रवस्पन्दित' का उदाहरण है ।]

प्रथवा जैसे छलितराममें—

सीता—हे पुत्रो ! कल सवेरे तुम दोनों श्रायोध्या जाना, श्रौर उस राजाको विनय-पूर्वक प्रणाम करना ।

लव—माताजी ! क्या हम दोनोंको राजाका सेवक बन जाना चाहिए ? [फिर हम उसकी विनयपूर्वक नमस्कार किया कर ? ]

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सीता—सो खु तुम्हारिँ पिदा ।

[स खलु युवयोः पिता] ।

लवः—किमावयो रघुपतिः पिता ?

सीता—[साश्रुं] न खु तुम्हारिं सयलाइँ रघुवँ पितुबिऐ ।

[न खलु युवयोः सकलाया अपि पृथिव्याः] इति ।

एतत्त्रिच त्रयोदश वीथ्यज्ञाने सर्वरूपकाराणां सर्वसन्ध्यर्थपुनरुक्तिप्रसावादिमुखोद्गमभावाच्च सन्ध्यर्थः पृथग्गृहीतोऽस्ति ।[३६]१०१।

व्यर्थ व्ययोगादौ रूपकान्तरे सामान्यनाटकलक्षणप्रतिदेशामाह—

[सूत्र १४४]—स्वां स्वां वैशेषिकीं हित्वा सन्धि-वृत्त्यादिकां स्थितिम ।

सामान्या नाटकस्याल्या विज्ञेया रूपकान्तरे॥[३७]१०२॥

वैशेषिकीमसाधारण्यं सन्धि-वृत्त्यादिकां इति व्यादिशब्दाद्रूपक-रस-नायकादिप्रग्रहः 'ग्रन्थ्या' इति पात्रोक्तिवैचित्र्य-ग्रन्थोपाय-दशा-सन्ध्यङ्गलचणनाय-कार्दप्रकृत्यौचित्यादिका स्थितिद्रव्ययोगादौ रूपकान्तरे नाटकप्रतिपादिता ज्ञातव्या ।

प्रकरणे तु नाटकसमासत्वमेव । नाटिका-प्रकरणयोः पुनर्नाटक-प्रकरणाभ्यांन्तर्भू तत्वान्न

किञ्चिन्न पुथङ वाच्यमिति सर्व समुज्झसम् ॥ [३७] १०२ ॥

इति रामचन्द्र-गुणचन्द्रविरचितायां स्वोपज्ञ-नाटकयदर्पणविवृतौ

प्रकरणादिविवेकाश्रुपरिपूर्णायां हितीयो विवेकः समाप्तः ॥

सीता—वह तुम्हारे पिता हैं ।

लव—क्या रघुपति हम दोनोंके पिता है?

सीता—[आश्रु] केवल तुम्हारे ही नहीं सारी पृथिवीके [वह पिता हैं] ।

इन तरह वीथ्यज्ञानोके सारे रुपकोंको सब संध्यियोंमें दिखलाना चाहिए । सब संध्यियों

में साधारण होनेसे, श्रौर ग्रामुख्यमें भी निवद्ध होनेसे इनको संध्यज्ञानोंसे अलग कहा गया

है ।[३६]१०१।

ग्रन्थ व्ययोग श्रादि श्रन्य रुपकोंमें सामान्य, नाटक-लक्षरणका प्रतिदेश करते हुए

[ग्रन्थकार] कहते हैं—

[सूत्र १४४]—अपनी-अपनी संधि तथा वृत्ति श्रादि विषयक विशेष स्थितिको छोड़-

कर नाटककी शेष स्थितिको श्रन्य रुपकोंमें भी समान रूपसे समक लेनी चाहिए ।[३७]१०२

'वैशिष्टचका' श्रादित्ये प्रसाधनारणे । 'सन्धि-वृत्त्यादिकां' इसमें श्रादि शब्दसे ग्रन्थक-परि-

माण, रस श्रौर नायक श्रादिका प्रग्रह करना चाहिए । 'ग्रन्थ्या' इस पदसे पात्रोक्तिवैचित्रय,

ग्रन्थ, उपाय, दशा, संध्यङ्ग, लक्षण तथा नायकादि प्रकृतिका श्रौचित्य श्रादि रुप स्थिति

व्ययोगादि श्रन्य रुपकोंमें भी नाटकमें प्रतिपादित [स्थितिके समान] समक लेनी चाहिए ।

प्रकरणमें तो नाटककी समानता कही ही जा चुकी है । श्रौर नाटिका तथा प्रकरणके श्रतर्गत

होनेसे [उन दोनोंके विषयोंमें] अलग कुछ कहनेकी श्रावश्यकता नहीं रहती है । इस प्रकार

सब विषय स्पष्ट हो जाता है ।[३७]१०२।

श्री रामचन्द्र-गुणचन्द्र विरचित स्वप्रणीत नाट्यदर्पणकेकी विवृतिमें प्रकरणग्रादि,

एकदश रुपकनिरूपण नामक हितीय विवेक समाप्त हुश्रा ।

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ग्रथ तृतीयो विवेक:

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अथ तृतीयो विवेकः

अथ रूपकोद्देशश्लोकोद्विष्टः क्रमप्राप्तो वृत्तयः: प्रपञ्च्यन्ते—

[सूत्र १४५]—भारती सात्वती कैशिकीआरभारती च वृत्तयः ।

रस-भावाभिनयगतत्वो नाट्यमात्रः ।[१]१०३।।

पुरुपार्थसाधको विचित्रों व्यापारो वृत्तिः । रस-भावाभिनया वच्यमाणाः । तास्तनुमयवेन गृच्छन्ति । रस-भावाभिनयसमन्वितो हि सर्वो नाट्ये व्यापारः । 'चतस्र' इति चतुर्थदैवतंमन्यतमचेष्टाश्रयाधान्यविवक्षया, न्यपरथादनेच्छव्यापारसंवलितमेकमेव वृत्तितत्त्वम् । न नाम प्रवन्धेषु व्यापारान्तरसंवलितः कोडप्येकस्य काव्यस्य वाचिको मानसों वा व्यापारो लचयते । काव्यको हि व्यापारतयो मानसैरचिकैश्च व्यापारैः सहितोऽपि मनःस्थैयेन विना रङ्कृतस्य कायस्यापारपरिस्पन्दविनाभावित्वात् । वाचिकयो मानस्यश्च कायपरिस्पन्दविनाभाविन्य एव । ताल्वादियापाराभावे

अथ नाट्यवृत्त्यादिपिकायां तृतीयो विवेकः

वृत्तिनिरूपण—

[प्रथम द्वितीय विवेकमें रूपकके समस्त भेदोंके लक्षण श्रादि कर चुकनेके बाद] श्रव रूपकोंका उल्लेख [श्रथात् नाम-परिगणन] करानेवाले [श्रथर्थात् ३-४] इलोकोंमें ['सर्ववृत्तयः' तथा 'त्रिविधृतयः शब्दोंके प्रयोग द्वारा] कही हुई वृत्तियों [को व्याख्या] का श्रवसर प्राप्त होनेसे वृत्तियोंका निरूपण [प्रारम्भ] करते हैं ।

[सूत्र १४५]—रस, भाव, श्रभिनय विषयक भारती, सात्वती, कैशिकी श्रौर श्रार-

भटी चार प्रकारकी वृत्तियाँ नाट्यकी माता [के सदृश] होतीहैं ।[१] १०३ ।

पुरुषार्थके साधक नाना प्रकारके व्यापारको 'वृत्ति' कहते हैं । रस, भाव श्रौर श्रभि-

नय [का लक्षणादि] प्रागे कहेंगे । [भारती श्रादि वृत्तियाँ] तत्तत् [श्रथर्थात् रसभावादिमय]

होनेसे उनका ग्रनुगमन करती है [इसलिए इस कारिकामें उनके विशेषणके रूपमें 'रसभावा-

भिनयगा:' इस विशेषणका प्रयोग किया गया है । इसका यह प्रभिप्राय है कि] नाट्यमें

सारा ही व्यापार रस, भाव श्रौर श्रभिनयसे युक्त होता है ।[कारिकामें ग्राए हुए] 'चतस्र'

इस पदसे कहा हुग्रा चतुर्थदैवत किसो एक व्यापारांशकी प्रधानताकी विवक्षासे कहा गया है

ग्रथवा [वास्तवमें तो] ग्रनेक व्यापारोंसे मिला हुग्रा वृत्ति-तत्त्व [श्रथर्थात् व्यापार] एक ही

होता है । क्योंकि नाटकादि [रूप प्रवन्धोंमें] [कायिक, वाचिक श्रौर मानसिक व्यापारोंमेंसे]

कोई भी व्यापार ग्रनन्य व्यापारोंके योगके बिना नहीं होता है । कायिक व्यापार मानसिक

तथा वाचिक व्यापारोंसे मिश्रित होते हैं । क्योंकि शब्द द्वारा निर्दिष्ट मानसिक ज्ञानके

बिना कोई सुन्दर कायिक व्यापार सम्भव नहीं है श्रौर मानसिक तथा वाचिक व्यापार तो

कायिक व्यापारके बिना हो ही नहीं सकते हैं । क्योंकि तालु श्रादिके व्यापारके बिना शब्दका

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वचनानुच्चारसंश्रितं, प्राणादिरूपकायपरिस्पन्दाभावे मनोव्यापारप्रत्युपलब्ध्यापेच्च । मनः-शून्यश्च व्यापारः कायिको वाचिको वाडरञ्चकवादिनिवन्धनीय एव । विदूषकोडपि हास्यार्थं बुद्धिपूर्वकमेव विसंस्थुलं विचेष्टते । श्रतं संकीर्तनैवेदपि श्रंशप्राधान्यानुपेच्चया वृत्तयश्चेतसः ।

नाट्यस्य ग्रभिनेयकाव्यस्य मातर इव मातरः । श्राम्यो हि वर्णनीयत्वेन कविहृदये व्यवस्थिताभ्यः काव्यमुत्पद्यते । 'नाट्य' इति च प्रस्तावापेक्षम् । तेनाभिनेयेडपि काव्ये इत्यो भवन्न्येव । न हि व्यापारशून्यं कश्चिद्रव्यं नियाम्यमस्ति । रङ्गानन्तरं च नाट्यमिति रङ्गस्य व्यापारशून्यत्वेनानिष्टत्वेऽपि न कश्चिद् दोषः । मुच्र्छादौ तु व्यापाराभावेन वृत्तिभावेऽपि नाट्यस्य वृत्तिमयत्वहानि । बाहुल्यापेच्चया वृत्तिमयत्वस्याभिनयवादिति ॥ १०३ ॥

उच्चारसद नहीं हो सकता है । श्रौर प्राणादि रूप काव्यक व्यापारके श्रभावमें मनोव्यापारोंका भी परिज्ञान नहीं हो सकता है । [इसलिए मानसिक तथा वाचिक व्यापार दोनों काविक व्यापारके साथ मिश्रित होते हैं । प्रकटे नहीं हो सकते हैं । इसी प्रकार] मनोव्यापारसे रहित काविक या वाचिक व्यापार नीरस [श्ररंजक] होनेसे [नाटकादिमें] वर्णन करनेके योग्य नहीं होता है । विदूषक भी हास्यके लिए बुद्धिपूर्वक ही ग्रटपटी चेष्टाएँ करता है । इसलिए

[काविक, वाचिक श्रौर मानसिक व्यापार रूप भारती श्रादि चारों वृत्तियोंके परस्पर] संकीर्ण होनेपर भी [उस-उस] श्रादिको प्रवृत्तितत्त्वको दृष्टिसे चार प्रकारकी वृत्तियाँ [कही गई हैं] ।

[ग्रागे कारिकामें ग्राए हुए 'नाट्यमातरः' पदका ग्रर्थ करते हैं] नाट्यकी श्रर्थात् श्रभिनेय काव्यकी माताके समान [जननी] होनेसे [वृत्तियाँ नाट्यकी] माता [कहलाती] है । क्योंकि कविके हृदयमें वर्णनीय रूपसे स्थित [काव्यिक-वाचिक-मानसिक व्यापार रूप] इन [भारती श्रादि चारों वृत्तियों] से ही काव्यकी उत्पत्ति होती है [श्रर्थात् कवि श्रपने काव्यमें काविक, वाचिक श्रौर मानसिक व्यापारोंका ही वर्णन करता है । वह त्रिविध व्यापार ही काव्यका जनक होता है । श्रौर भारती श्रादि वृत्तियाँ काविक, वाचिक, मानसिक व्यापार रूप ही हैं । इसलिए काव्यकी जननी होनेसे उनको काव्यकी माता कहा गया है । 'नाट्यमातरः' इसमें] 'नाट्य' यह पद प्रकारकी दृष्टिसे श्राया है । [श्रर्थात् इस समय नाटकका निरूपण किया जा रहा है इसलिए यहाँ 'नाट्यमातर.' कहा गया है । वैसे ये वृत्तियाँ केवल नाट्य श्रर्थात् श्रभिनेय काव्यकी ही नहीं श्रपितु श्रभिनेय श्रव्य काव्यकी भी माता हैं । क्योंकि श्रव्य-काव्यमें भी काविक, वाचिक श्रौर मानसिक व्यापारका ही वर्णन होता है । इसलिए श्रभिनेय [श्रर्थात् श्रव्य] काव्यमें भी [भारती श्रादि] वृत्तियाँ होती ही हैं । क्योंकि व्यापार-रहित किसी श्रव्यका वर्णन नहीं होता है । मुख्य नाटकका श्रारम्भ पूर्व [नान्दीपाठ श्रादि

रूप] पूर्वरङ्गके बाद होता है इसलिए पूर्वरङ्गके [नाट्यमें वर्णनीय] व्यापारोंसे रहित होने पर भी कोई दोष नहीं है [क्योंकि वह पूर्वरङ्ग वाला भाग वास्तवमें नाटकका श्रंश नहीं है । इसी प्रकार मुख्य नाटकके बीचमें ग्राने वाले] सूत्रधार श्रादि [के प्रसंगों] में व्यापारादि न होने से वृत्तियोंका श्रभाव होनेपर भी नाट्यके वृत्तिमयत्वकी हानि नहीं होती है । क्योंकि [वृत्तियों के] बाहुल्यकी दृष्टिसे वृत्तिमयत्वका कथन किया जानेसे [कहीं थोड़ेसे भागमें व्यापार-शून्यता होनेसे कोई हानि नहीं होती है । सूत्रधारि प्रसंगोंमें वृत्त्यभाव होनेपर भी नाट्य

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क० १०४, सू० १४६ ] तृतीयो विवेक: [ २७३

ग्रथ भारत्या लचयामाह—

[सूत्र १४६]—सर्वरूपकागामिन्यामुख-प्ररोचनोत्थिता ।

प्रायः संस्कृतनिःशेषरसाढचया वाचि भारती ॥[२]१०४॥

सर्वरूपकेपु ग्राह्मिनेयानभिनेयेपु गमनशीला प्रायस्तन्मयत्वाद् वर्णनाया: ।

ग्रामुखप्ररोचनयोरुत्थितः सम्भवतो यतः । प्रायो वाहुल्येन संस्कृतेन सर्वरसे च दीप्तः ।

वृत्तिमय हो माना जाता है। यह ग्रन्थकारका श्राभिप्राय है] ॥ [१] १०३

(१) भारतीवृत्तिका निरूपण—

इस प्रकार पिछली कारिकामें वृत्तियोंका सामान्य लक्षणा करनेके बाद श्रव श्रागे भारती श्रादि चारों वृत्तियोंमेंसे एक-एक वृत्तिका लक्षणा करेंगे। पिछली कारिकामें यह कहा था कि चारों वृत्तियां कायिक, वाचिक तथा मानसिक व्यापार-रूप हैं इसी दृष्टिले श्रागे इन चारोंके लक्षणा करेंगे। इस इनमेंसे भारती वृत्ति वाचिक व्यापार-रूप श्रौर सात्वती वृत्ति मानसिक व्यापार-रूप होती है। शेष कैशिकी तथा श्रारभटी दोनों वृत्तियां कायिक व्यापार-रूप होतीं हैं। काव्य श्रौर नाट्यमें वाचिक व्यापारकी प्रधानता होनेके कारण सबसे पहले वाचिक-व्यापार रूप भारती-वृत्तिका लक्षणा निम्न प्रकार करते हैं

ग्रब भारती [वृत्ति] का लक्षणा कहते हैं—

[सूत्र १४६]—समस्त रूपकोंमें रहने वाली, ग्रामुख तथा प्ररोचनासे उद्भूत [ग्रर्थात् नाट्य के प्रारम्भिक भागोंमें विशेष रूपसे उपस्थित] सम्पूर्णं रसोंसे परिपूर्ण, तथा प्रायः संस्कृत [भाषा] का श्रवलम्बन करने वाली, वाग्व्यापार-प्रधान वृत्ति 'भारती' [वृत्ति कहलाती] है। ॥[२] १०४

[कारिकामें ग्राए हुए 'सर्वरूपकागामिनी' पदका श्राभिप्राय यह है कि यह भारती वृत्ति] ग्राह्मिनेय ग्रौर ग्रनभिनेय [ग्रर्थात् हृय-काव्य ग्रौर श्रदृश्य-काव्य] सब रूपकोंमें जाने वाली [सब प्रकारके काव्योंमें विद्धमान रहने वाली] है। क्योंकि सारा वर्णन प्रायः [उससे युक्त भारतीवृत्तिमय] होता है । ['ग्रामुख-प्ररोचनोत्थिता' का श्रर्थ करते हैं कि] ग्रामुख तथा प्ररोचना [रूप काव्य या नाटय भागों] का उदय जिससे होता है। [ग्रामुख श्रौर प्ररोचना किसको कहते हैं यह ग्रन्थ यहां उपस्थित होता है। इसका लक्षणा श्रागली दो कारिकाओंमें करेंगे]। प्रायः श्रर्थात् श्रधिकतर संस्कृत भाषा श्रौर सब रसोंसे युक्त [भारती वृत्ति होती है] ।

भारतीवृत्तिके इस लक्षणमें मुख्यरूपसे ग्रामुख तथा प्ररोचना भागोंमें भारतीवृत्ति का निर्देश किया गया है श्रौर उसको प्रायः संस्कृतभाषा तथा सब रसोंसे युक्त कहा गया है। यहां 'प्रायः' शदका जो प्रयोग किया गया है उसकी ग्रन्थकार यह व्याख्या करते हैं कि यद्यपि भारतीवृत्तिका मुख्य-स्थान ग्रामुख तथा प्ररोचना भागोंको माना गया है किन्तु इनसे भिन्न स्थानोंपर भी इसका स्थान पाया जाता है। इसी प्रकार मुख्य रूपसे भारतीवृत्तिमें संस्कृत-भाषाका ही प्रयोग होता है किन्तु वह एकदम अनिवार्य नहीं हैं। कभी-कभी संस्कृतसे भिन्न प्राकृतभाषाका भी भारतीवृत्तिमें श्रवलम्बन किया जा सकता है। इसी बातको ग्रन्थकार श्रागली पंक्तिमें निम्न प्रकार कहते हैं—

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प्ररोचना-प्रायोगहरयोर्नत्यत्रापि च रूपकैकदेशे प्राकृतादिपाठेन भारतीदर्शनान् ।

प्रायोगहरं ह्यर्थवत् । सर्वरूपकभावित्यादू रसानां च वाजजन्यत्वादू सर्वरसात्मकरत्वम् ।

ये तु भारत्यां वीभत्स-करुणयोः प्रपत्तनास्ते सर्वरसप्रधानवीरथी-शृङ्गारवीरप्रधानभाष्य-हास्यप्रधानप्रहसनानि स्वयमेव भारत्यामेव वृत्तौ नियन्न्रतानि नावेक्षिातनि ।

'प्ररोचना' श्रोर 'प्रायमुख' [भागों] से भिन्नत्र भी रूपकोंमें किसी एकदेशमें [भारती वृत्तिके देखेजानेके श्रोर [संस्कृतग्रंथोंके] श्रादि [भाषा] के पाठसे भी भारतीवृत्तिके देखेजाने] श्रोर 'प्रायः' शब्दका प्रहरा सायंक है । रसोंके सब वृत्तिके देखे जानसे [कारिकामें किया गया] 'प्रायः' शब्दका प्रहरा सायंक है ।

रूपकोंमें व्यापक होने श्रोर वाणी द्वारा व्यक्त होनेसे [वाग्यापारप्रधाना भारती वृत्ति] सर्व-रसात्मक होती है । जो [दशरूपककार धनञ्जय श्रादि] भारतीवृत्तिमें [सब रस न मान कर] केवल वीभत्स श्रोर करण रस मानते हैं उन्होंने स्वय [अपने श्रादि] भारतीवृत्तिमें नियन्न्रत सर्व-रसप्रधान [वीर] शृङ्गार श्रौर वीररस प्रधान [भाष्य], तथा हास्यरस-प्रधान [प्रहसन कमशः] वीथी भाषा तथा प्रहसनों की श्रोर ध्यान नहीं दिया है [इसीलिए वे भारतीवृत्तिमें केवल वीभत्स श्रोर करुणको ही मानते हैं किन्तु उनका यह सिद्धान्त ठीक नहीं है] ।

इसका श्रभिप्राय यह कि धनञ्जय जो केवल वीभत्स तथा करुणरसमें भारतीवृत्तिका प्रयोग मानते हैं उन्होंने भी 'वीथी', भाषा तथा प्रहसनके लक्षणों में भारतीवृत्ति का समावेश माना है । सूत्र १४० में 'वीथी' का लक्षण करते हुए 'सर्वस्वामिरसा वीथ्योक्त लिखकर प्रकृत ग्रन्थकारने वीथीमें समस्त रसोंके रखनेका विधान किया है । १५१ वें सूत्रमें 'वीथ्योके तेरह प्रकारों में वीथीके लक्षणके श्रनुसार हास्यरसके साथ, भाषाके लक्षणके श्रनुसार वीर श्रौर शृङ्गार

रसोंका विधान करते हुए फिर 'भारतीवृत्तिस्थिनी वीध्यगत्न त्रयोदश' लिखकर वीथीमें श्रंगोंका विधान करते हुए फिर 'भारती' वृत्तिका समावेश किया है । इस प्रकार वीथीमें समस्त रसोंके साथ भारतीवृत्तिका 'भारती' वृत्तिका समावेश किया है ।

प्रयोग माना जाता है । इसके प्रतिरिक्त ११६वें सूत्रमें 'भाषा-प्रधानशृङ्गार-वीरो' लिखकर प्रयोग माना जाता है । इसके प्रतिरिक्त ११६ वें सूत्र में 'भाषाप्रधान शृङ्गार वीरौ' लिखकर

प्रयोग माना जाता है । इसके प्रतिरिक्त ११६ वें सूत्र में 'भाषा-प्रधान शृङ्गार-वीरौ' लिखकर प्रयोग माना जाता है । इसके प्रतिरिक्त ११६ वें सूत्र में 'भाषा प्रधान शृङ्गार वीरौ' लिखकर

शृङ्गार तथा वीररसकी प्रधानताका प्रतिपादन किया गया है । श्रोर उसके साथ ही भाषणमें शृङ्गार तथा वीररसकी प्रधानताका प्रतिपादन किया गया है । श्रोर उसके साथ ही भाषण में

भारतीवृत्तिकी मुख्यता प्रतिपादन की १३० वें सूत्र में 'वृत्ति मुग्या च भारती' लिखकर भाषण में भारतीवृत्तिकी मुख्यता प्रतिपादन की

है । इसलिए वीर तथा शृङ्गारके साथ भारतीवृत्तिका सम्बन्ध भाषाके लक्षण में प्रतिपादन किया है । फिर सूत्र १३१ वें 'हास्याङ्गि भाषासंघृत्ते प्रहसंन हि'षा' इस प्रहसन के

लक्षण में हास्यरसको प्रहसनका प्रधानरस तथा भाषाके समान सन्धि, अङ्क तथा वृत्तियों का प्रतिपादन कर प्रहसन में भी भारतीवृत्तिकी प्रधानता निर्विष्ट की है । इसलिए हास्यरसके साथ

भी भारतीवृत्तिका समावेश पाया जाता है । इसका प्रथं यह हु्रा कि भारतीवृत्तिका सम्वन्ध भी भारतीवृत्तिका समावेश पाया जाता है । इसका प्रथं यह हु्रा कि भारतीवृत्तिका सम्वन्ध

प्रहसनके लक्षणके श्रनुसार हास्यरसके साथ, भाषाके लक्षणके श्रनुसार वीर श्रौर शृङ्गार रसोंके साथ, श्रौर वीथीके लक्षणके श्रनुसार सभी रसोंके साथ होता है । वीथी, भाषा श्रौर

प्रहसनके ये लक्षण सर्वसममत लक्षण हैं । जो दशरूपककार धनञ्जय श्रादि भारतीवृत्तिका सम्बन्ध केवल वीभत्स और करुण रससे बतलाते हैं, वे भी वीथी भाषा श्रौर प्रहसनके इसी

प्रकारके लक्षण करते हैं । इन लक्षणोंके श्रनुसार उन्होंने भी वीथी, भाषा तथा प्रहसनों को

सम्बन्ध केवल वीभत्स और करण रससे बतलाते हैं । यह बात उनके श्रपनेही कथनके विपरीत हो जाती है । इसी वातको ग्रन्थकारने यहांँ 'तैः वीथी, भाषा, प्रहसनानि स्वयमेव भारत्यां वृत्तौ नियन्न्रतानि

नावेक्षितानि' इस रूप में लिखा है ।

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क० १०४, सू० १४७ ] तृतीयो विवेक: [ २७७

'वाचि' वाग्यापारविषये वाग्यापारात्केत्यर्थः। भारती वाग्यापारविषय एवेत्योगव्यवच्छेदः। तेन वाचिकाभिनयात्केत्यर्था सात्वत्यपि भवति। वृत्त्यन्तरायैः तु सर्वथाभिनयविषयात्वापि। भारतीरुपत्वाद् व्यापारस्य भारतीति ॥ [२] १०४ ॥

[सूत्र १०५]—विदूषक-नटी-नाट्यः: प्रस्तुताक्षेप विषयासं सूत्रधारस्य वक्रोक्त-स्पष्टोक्तैरयं तदामुखम ॥[३]१०५॥ पारिपाश्विक एवं विदूषकवेषधारी विदूषक:

इस स्थलका पाठ कुछ भ्रष्टप्राय है। पूर्व संस्करणोंमें 'सर्वव्रीथीप्रधानपुञ्जारवोरभाणप्रधानहास्यप्रहसनानि' इस प्रकार का पाठ छपा था। उसकी कोई सङ्ङति नहीं लगती है। इसमें 'सर्वरसप्रधानवीथीभुङ्जारवोरभाणहास्यप्रहसनानि' इस प्रकार पाठ होना चाहिए था, अतः हमने यही पाठ मूल में दिया है

'वाचि' शब्दार्थात् वाग्यापारके विषयमें होने वाली शब्दार्थात् वाग्यापारात्मक वृत्ति 'भारती' ही होती है। भारती वाग्यापारके विषयमें हो होती है यह श्रयोग-व्यवच्छेद [का नियम] है। [इसका अभिप्राय यह है कि भारती वृत्ति वाग्यापारके विषयमें हो होती है। श्रन्यान्य वृत्तियोंका वाग्यापारसे सम्बन्ध नहीं हो सकता है ।] इसका यह अर्थ नहीं है कि केवल भारती वृत्ति ही वाग्यापार-विषयक होती है, श्रन्या

वृत्तियोंका वाग्यापारसे सम्बन्ध नहीं हो सकता है ।] इसलिए सात्वती वृत्ति भी वाग्यापारा- त्मका होती है। भारती तथा सात्वती वृत्तिको छोड़कर] श्रन्या वृत्तियाँ तो सर्वथा [कायिक श्रभिनय रूप] ही होती हैं। [भारतीवृत्तिमें] व्यपारके [पूर्वसत्यया] भारती रूप [श्रर्थात् वाचिकरूप] होनेसे [इस वृत्तिका नाम] 'भारती' [रखा गया] है।

इस कारिकाकी व्याख्यामें 'भारती वाग्यापारविषय एवं इतियोगव्यवच्छेदः' यह वाक्य ग्राया है। इसे विशेष रूपसे समझनेकी श्रावश्यकता है। 'एव' पदके श्रयोग-व्यवच्छेद, श्रन्वययोग-व्यवच्छेद श्रौर श्रप्रत्यान्तयोग-व्यवच्छेद ये तीन श्रर्थ माने गए हैं। 'पार्थ एव धनुर्धरः' श्रादि वाक्योंमें जब 'एव' पद विशेषके साथ संगत होता है तब वह 'विशेषसंगतस्त्वे-

वकार श्रन्वययोगव्यवच्छेदकः' इस नियमके श्रनुसार श्रन्वययोगका व्यवच्छेदक होता है । 'पार्थ एव धनुर्धरः' नान्यः। यह उसका श्रर्थ होता है। इसके विपरीत जब 'पार्थो धनुर्धर एव' इस रूपमें उसका सम्बन्ध विशेषके साथ होता है तो 'विशेषसंगतस्त्वेवकारो योग-व्यवच्छेदकः' इस नियमके श्रनुसार उसका श्रर्थ ग्रयोग-व्यवच्छेद होता है। श्रर्थात् पार्थमें धनुर्धरत्व श्रवश्य

है। उसमें धनुर्धरत्वका श्रयोग-श्रभाव-नहीं है। इसी प्रकार यहाँ 'भारती वाग्यापारविषय एवकार श्रयोग-व्यवच्छेदक है ॥[२] १०५ ॥

[सूत्र १४७]—सूत्रधारका विदूषक, नटी श्रथवा पारिपाश्विकके साथ स्पष्ट रूपसे श्रथवा वक्र मार्गसे, प्रस्तुत [प्रर्थात् नायकादि मुख्यपात्रके प्रवेश] का सम्पादन करनेवाला जो वातालाप होता है वह श्रामुख [कथनातमक] है ॥[३]१४७॥ [ नटका मुख्य सहायक ] पारिपाश्विक हो विदूषकका वेष धारखा कर लेनेसे यहाँ

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रङ्गसूत्र मार्षः पारिपाश्विकः। विदूषक-नटी-माथर्यस्तैः समस्तैर्वा सह सूत्रधारस्य रङ्गसूत्रप्रकर्तृभिः। सूत्रधारगुणानुकरकरो वा नाटचस्य स्थापनाकर्तृः स्थापकरस्य प्रहुतस्य काव्यार्थस्याल्लोपी उपस्थापकं भाष्यं वक्रोक्तिभिः साक्षाद् विवक्षितार्थस्याप्रतिपादकैः, स्पष्टोक्तिभिः साचाद् विवक्षितार्थस्य प्रतिपादकैश्च यत्र स्वस्यामिप्रायोत्कीर्तनं तदाग्रमुखम्। 'आड् मर्यादायाम्' तेन मुखसन्धिभ्यां प्राप्य निवर्तते। 'ईप्सदर्थे वा' तत ईप्सितमुखं मुखसन्धिसूचककथावादरम्भः। प्रस्तावनाशब्दे नाट्येतदुच्यते।

इदं तावदग्रं नाट्यं यत् प्रथमभूतम्। ततः कदाचित् रङ्गसूत्रप्रायितं च स्वाग्रसूत्रार्थमनुतिष्ठति, तथा च हश्यते- 'नान्व्यन्ते सूत्रधारः'। 'नान्व्यन्ते' इत्यव्ययवत् समुदायोपबिदुषक कहा गया है। [वैसे नायक राजा प्रादिका सहायक विदूषक होता है उस विदूषकका यहां प्रयोग नहीं सम्भवना चाहिए। श्रपितु सूत्रधारका सहायक, जो पारिपार्श्विक भी कहलाता है वही नाटकादिके प्रारम्भमें मुख्यपात्रका रङ्गमञ्चपर प्रवेश करानेके लिए विदूषकका वेष धारसा करके सूत्रधारके साथ वार्तालाप करता है उसी पारिपार्श्विककेलिए यहां विदूषक शब्दका प्रयोग हुया है यह ग्रन्थकारका श्रभिप्राय है। पारिपार्श्विक [प्रथानू सूत्रधार या नटकका मुख्य सहायक] है। [यहां पारिपार्श्विक अपने मुख्य रूपमें श्रभिप्रेत है। पहिले उसकी विदूषक रूपमें उपस्थिति बतलाई थी] विदूषक, नटी श्रौर पारिपार्श्विकोंके साथ प्रलग्न-प्रलग्न ग्रथवा एक साथ सूत्रधार श्रथवा रङ्गकी ग्रायोजना करनेवाले [प्रधाननट] हा, ग्रथवा नाटचोंकी स्थापना करने वाले, जोर सूत्रधारके रूपमें श्रनुकरण करने वाले

[किन्तु सूत्रधारसे भिन्न] 'स्थापक' का प्रस्तुत काव्यार्थको उपस्थित करानेवाला जो भाषया, वक्रोक्तियोंसे श्रथवा साक्षात् रूपसे विवक्षित ग्रथंका प्रतिपादन न करनेवाले [वचनोक्त], अथवा स्पष्टोक्तियोंसे श्रथवा साक्षात् रूपसे विवक्षितका प्रतिपादन करने वाले वाक्योंसे जो भाषा ग्रथंवा [भाषया ग्रथंवा] अपने श्रभिप्रायका कथन करता है वह 'ग्रामुख' कहलाता है। [ग्रामुख शब्दमें श्राड् उपसर्ग है। उसके दो श्रथं होते हैं : एक मर्यादा श्रौर दूसरा ग्राभिविधि। ये दोनों शब्द सीमा श्रथंका वाचक हैं। उनमें भेद यह है कि जो सीमा बतलाई जाती है वह यदि सीमित होने वाले भागके ग्रन्दर ही समाविष्ट होती है तो उसे 'ग्राभिविधि' कहते हैं। ग्रौर यदि उस तक हो, श्रथवा उसकी बाहर छोड़कर उसके पहिले-पहिले सीमा मानो जाती है तो उसका 'मर्यादा' कहते हैं। जैसे यहां ग्रामुखकी सीमा मुखसन्धि पर्यन्त कहो है। उसमें मुखसन्धिका भी ग्रामुखके भीतर माना जाय तो श्राड्-श्रभिविधयर्थक श्रौर यदि मुखसन्धिको ग्रामुखसे प्रलग्न रहना श्रभिप्रेत हो तो 'ग्राड्' का श्रथं मर्यादा होगा]। यहां 'ग्राड्' मर्यादा श्रथमें है इसलिए [ग्रामुख] मुखसन्धि तक पहुंचकर [प्रथात् मुखसन्धिसे ग्रारम्भ होनेसे पहिले] समाप्त हो जाता है। ग्रथवा [यहां ग्राड् 'ईप्सित' श्रथमें है इसलिए ईप्सितमुख [प्रथात् छोटा मुख प्रथंवा] मुखसन्धिका सूचक होनेसे ग्रारम्भ [ग्रामुख कहलाता है]। इसको 'प्रस्तावना' नामसे भी कहा जाता है।

यह ग्रामुख [मुख्य] नाटचसे प्रलग्न होता है [मुख्य नाटकका भाग नहीं होता है]। उसमें कभी [रङ्गसूत्रयिता श्रथवा] सूत्रधार हो स्वयं ग्रामुखमें किए जाने वाले [वार्तालाप श्रादि रूप] कार्यको करता है। जैंसा कि [भास श्रादि के नाटकोंके श्रारम्भमें] 'नान्दीके ग्रनन्तमें सूत्रधार' [प्रविष्ट होकर ग्रामुखका ग्रारम्भ करता है यह लिखा हुया] दिखाई देता है

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क० १०४, सू० १४७ ] तृतीयो विवेक: [ २७६

चारान्न पूर्वरङ्गान्ते इति दृश्यते। नान्दी हि पूर्वरङ्गस्याङ्गम् । श्रत्त्र च पतने श्रामुखथेस्य सूत्रधाराविषयत्वान्मुखसन्धे: प्रभृति कविकव्यापार: ।

है । यहां 'नान्द्यन्ते' इस पदमें श्रवयवमें समुदायका उपचार होनेसे [नान्दी पद समस्त पूर्वरङ्गका बोधक है यह समझना चाहिए] । क्योंकि नान्दी पूर्वरङ्गका श्रङ्ग है । [किन्तु यहां उस श्रङ्ग या श्रवयवका 'नान्दी' पदसे जिसका वह श्रङ्ग या श्रवयव है उस श्रङ्गी-रूप समस्त पूर्वरङ्गका ग्रहण होता है । श्रथवा समस्त पूर्वरङ्गका विधान समाप्त हो जानेपर सूत्रधार प्रवृष्ट होकर मुख्य नाटकके पात्रके प्रवेशकी प्रस्तावना श्रारम्भ करता है] । इस पक्षमें श्रामुखका [प्रतिपाद्य] ग्रथं सूत्रधारसे सम्बन्ध रखता है, इसलिए मुखसन्धिसे पहिले-पहिले [ श्रथवा मुखसन्धिके श्रारम्भ होनेसे पूर्व तक जो कुछ वर्णन होता है वह सब ] कविकका व्यापार होता है ।

इसका श्रभिप्राय यह है कि मुखसन्धि, मुख्य नाटकका श्रङ्ग है, इसलिए मुखसन्धिसे मुख्य नाटकका श्रारम्भ होता है । उस मुख्य नाटक वाले भागमें जितना व्यापार होता है वह कविके द्वारा वर्णित होनेपर भी कविकका व्यापार नहीं होता है श्रपितु जिन पात्रोंके द्वारा उसका कथन होता है उन पात्रोंका व्यापार होता है । कवि केवल उस व्यापारको सुनानेके निमित्त बनता है । किन्तु मुखसन्धि या मुख्य नाटकका श्रारम्भ होनेसे पहिले 'ग्रामुख' तकका जो व्यापार होता है वह सब कविकका ग्रथन व्यापार होता है । काव्यशास्त्रके लक्ष्यग्रन्थोंमें 'कविप्रौढोक्तिसिद्ध' श्रौर 'कविनिबद्धवस्तुप्रौढोक्तिसिद्ध' दोनों व्यक्योंको श्रलग-श्रलग माना है । यद्यपि कविनिबद्ध वस्त्रकी उक्तिको कविके द्वारा ही निवद्ध होनेसे कविप्रौढोक्तिमें ग्रा सकती है । किन्तु स्वयं कविकी उक्तिसे कविनिबद्ध वक्त्र की उक्तिको श्रलग माना गया है । इसी प्रकार यह कविव्यापार श्रौर कविनिबद्ध-वस्तुव्यापारको श्रलग-श्रलग मानकर ग्रन्थकारने 'ग्रामुख' तकके व्यापारको कवि-व्यापार कहा है । उसके ग्रागे मुख्य नाटकके भीतर होनेवाला सारा व्यापार कविके द्वारा वर्णित होनेपर भी कवि-व्यापार नहीं श्रपितु कवि-निबद्ध पात्रों या वक्त्रयोंका व्यापार है, यह ग्रन्थकारका श्रभिप्राय है ।

'ग्रामुख' के इस प्रसङ्गमें ग्रन्थकारने सूत्रधार तथा स्थापक, नटी, विदूषक, पारिपाश्विक मार्ष श्रादि श्रनेक पदोंका प्रयोग किया है । नाटकका श्रभिनय करनेवाले नटगणका प्रधान नेता नाटयके सारे [सूत्र] का कार्य-सञ्चालन करता है इसलिए उसको 'सूत्रधार' कहा जाता है । इस कार्यमें सूत्रधारके दो प्रधान सहायक होते हैं । एक नटी श्रौर दूसरा पारिपाश्विक । नटी सूत्रधारकी स्त्री है जो उसके कार्यमें उसकी प्रमुख सहायिका होती है शेष नटोंमेंसे जो सूत्रधारका प्रधान सहायक होता है वह 'पारिपाश्विक' कहलाता है । सूत्रधार वार्तालाप करते समय नटीको 'ग्रारी' कहकर श्रौर पारिपाश्विकको 'मार्ष' कहकर सम्बोधन करता है । यह सूत्रधार, नटी तथा पारिपाश्विक तथा 'मार्ष' पदोंकी व्याख्या हो गई । इसी पारिपाश्विकके लिए 'विदूषक' पदका प्रयोग भी किया गया है । वैसे नाटकमें राजा श्रादि मुख्य नायकका प्रधान सहायक विदूषक होता है । उसका कार्य राजाके गुप्त प्रयत्न-व्यापार श्रादिमें उस की सहायता करना, श्रौर हर समय राजाका मनोरञ्जन करना होता है । यहां श्रामुखके प्रसङ्गमें जो विदूषकका नाम लिया गया है यह उस मुख्य विदूषकका ग्राहक नहीं है । श्रपितु

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२५० ] नाट्यदर्पणम् [ का० १०४, सू० १४७

कदाचित् तु सनान्दींकं रङ्गमञ्चस्थाय विश्रान्ते सूत्रधारे, तत्त्वलयगुणाकृतिः स्थापक श्रामुखमुनुतिष्ठति । तथा चानङ्गवतां नाटिकायां दृश्यते—‘पूर्वेरङ्गस्यान्ते स्थापकः' । श्रथ च पद्ये श्रामुखानुष्टानेडपि केवल्योपार । 'स्थापकस्य सूत्रधारारिकारिणो रामानुकारिणो नटस्येव कवनेन प्रवेशात् । 'वक्कोक्त' इति च वीथ्यङ्गज्ञानामेव विध्रुपाणां व्याहारादीनां सङ्ग्रावमाहति । स्पष्टोक्तिकरेव यथा—'नागानन्द नाटयतत्त्वये किमित्यकारणमेव रच्यते ?' इति ॥[३]१०४॥

सूत्रधारका मुख्य सहायक या पारिपाश्विक भी कभी विदूषकक-सा वेष धारण करके उसीके समान कार्य करता हुग्रा सामने श्राता है इसके लिए ही यहाँ विदूषक शब्दका प्रयोग किया गया है ।

ग्राम एक शब्द श्रोर रह जाता है 'स्थापक' सूत्रधारके समान ही वेष तथा कार्यको करने वाला उसका कोई सहायक स्थापकके रूपमें नाटककी प्रस्तावना करता है । उसका 'स्थापक' कहते हैं । मुख्य नाटकके प्रारम्भ होनेसे पहले ग्रनेक प्रकारकी तैयारी करनी होती है । उसकी पूर्वरङ्ग कहा गया है । पूर्वरङ्गके १३ श्रङ्ग भरतनाट्यशास्त्रमें कहे गए हैं ।

इन्हींमें नान्दी पाठ भी एक श्रङ्ग है । प्रायः नाटकोके प्रारम्भमें सबसे पहले 'नान्दी' के श्लोक लिये मिलते हैं । भासकविके नाटकोंमें उन नान्दी-श्लोकोंका उल्लेख नहीं रहता है । नाट्यशास्त्र वाले श्लोक नाटकमें लिये गए हों श्रथवा न लिखे गए हों किन्तु उनका पाठ किया ग्रावश्यक जाता है । नान्दी पाठ तकका सारा पूर्वरङ्गका कार्य निश्चित रूपसे सूत्रधार ही करता है । उसके बाद ग्रामुख या प्रस्तावानाका श्रवसर श्राता है । इस प्रस्तावनाके विषयमें दो प्रकारकी व्यवस्था पाई जाती है । कभी तो सूत्रधार स्वयं ही प्रस्तावानाका कार्य भी करता है । प्रस्तावना या ग्रामुख द्वारा स्वयं ही मुख्य पात्रोंका प्रवेश करवाकर सूत्रधार रङ्गमञ्चसे बाहर जाता है । किन्तु दूसरे प्रकारकी यह व्यवस्था भी पाई जाती है कि नान्दीपाठ तकका कार्य सूत्रधार स्वयं करता है । नान्दीपाठके समय सारा नटवर्ग उपस्थित रहता है । श्रभिनय करनेवाले सारे नट मिलकर प्रार्थनानु ग्रादि करते हैं । उसमें सूत्रधार भी श्रवश्य उपस्थित रहता है । किन्तु उसके बाद सूत्रधार स्वयं निवृत्त हो जाता है । उसके स्थानपर उसके सदृश दूसरा व्यक्ति श्राकर प्रस्तावना या ग्रामुखका कार्य करता है उसका 'स्थापक' कहते हैं । इसी बातको ग्रन्थकार ग्रागे दिखलाते हैं—

कभी तो नान्दी सहित पूर्वरङ्गके समाप्त कर सूत्रधारके विश्राम कर लेनेपर उसके तुल्य गुणों श्रोर श्राकृतिवाला स्थापक [स्थाकर] 'ग्रामुख'का सम्पादन करता है । जैसे कि 'ग्रानन्दवती' नाटिकामें 'पूर्वरङ्गके बाद स्थापक' [प्रविष्ट होता है यह लिखा है] । इस पक्षमें श्रामुखके श्रनुष्ठानमें भी कविकका व्यापार होता है । रामका श्रनुकरण करनेवाले नटके

[प्रवेशके] समान सूत्रधारका श्रनुकरण करनेवाले स्थापकका भी प्रवेश कविके द्वारा ही कराए जानेके कारएा 'ग्रामुख' भी कविकका व्यापार होता है, लक्षरणमें दिए हुए] 'वक्कोक्त' इस पदसे इस प्रकारके [प्रथन्त् श्रभी द्वितीय विवेकके श्रन्तर्गत कहे हुए] व्यवहारादि रूप चौथ्यङ्गों की सत्ता [ग्रामुखमें] सूचित की है । स्पष्टोक्त तो इस प्रकार होता है जैसे कि 'नागानन्दका श्रभिनय करते समय बिना बातके क्यों रोते हो' ॥ [३]१०४॥

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क० १०६, सू० १४५ ] तृतीयो विवेक: [ २६१

अथासुखाद्भूतं नाट्यपात्रप्रवेशविधिमाह—

[सूत्र १४५]—वाक्यार्थसमयाह्नानैर्भावोक्ते: पात्रसंक्रम: ।

समय: काल: । ग्राह्यन्तं संज्ञा । एतै: सूत्रधार-स्थापकाभ्यामुक्तैर्हेतुभूतै:

पात्रस्य मुख्यनायकादिभूमिकाधारीणो नटादिलोकस्य संक्रम: प्रवेश: । वाक्यार्थ यो-

रत्नस्यातनतया पात्रप्रवेशहेतुत्वम् । समयाह्नयोस्त सूचकत्वेति ।

वाक्येन यथा हरिश्चन्द्रे—

"सत्वैकतालनुत्तीनां प्रतिज्ञातार्थकारिष्याम् ।

प्रभविष्युर् देवोडपि किं पुन: प्राकृतो जन: ॥"

एतदेव पठन हरिश्चन्द्र: प्रविशति ।

अर्थेन यथा वेणीसंहारे—

"निर्वाणैरदहना: प्रशमादरीष्यां,

नन्दन्तु पांडुतनया: सह माधवेन ।

रक्तप्रसाधितसुव: श्वतविप्रहाश्च

स्वस्था भवन्तु कुरुराजसुता समृत्या ॥"

ग्रामुखके श्रङ्गभूत पात्रप्रवेशके नियम—

ग्रामुखके श्रङ्गभूत नाट्यके पात्रोंके प्रवेशके विधिको कहते हैं—

[सूत्र १४६]—[भाव ग्रर्थति] सूत्रधार ग्रर्थवा स्थापकके द्वारा कहे हुए वाक्य [ग्रर्थवा

उसके] ग्रर्थ, [ग्रर्थवा] काल, [ग्रर्थवा] नामके द्वारा [नाट्यके मुख्य] पात्रका प्रवेश होता है

[या कराना चाहिए]।

समय ग्रर्थात् काल । ग्राह्रान ग्रर्थात् संज्ञा [नाम] । सूत्रधार अथवा स्थापकके द्वारा

कहे गए इन [वाक्य, ग्रर्थ, समय तथा नाम] के द्वारा पात्र ग्रर्थात् मुख्य नायक ग्रादिके वेष

को धारण करनेवाले नटादिका संक्रम ग्रर्थात् प्रवेश होता है । वाक्य तथा ग्रर्थका ग्रनुवाद

द्वारा पात्रप्रवेशके प्रति हेतुत्व होता है ग्रौर काल तथा नामका, सूचक होनेसे ।

वाक्यके द्वारा [प्रवेश] जैसे हरिश्चन्द्रमें—

'एकमात्र सात्विक वृत्तिवालों, ग्रौर प्रतिज्ञात ग्र्रथको पूर्ण करनेवालों [के कार्य] का

भगवान भी बाधक नहीं हो सकता है, तद् साधारगा मनुष्यों [के बाधक बन सकने] की तो

बात ही क्या है ।'

[ग्रामुखमें सूत्रधार पठित] इसी वाक्यको बोलते हुए [प्रधान पात्र] हरिश्चन्द्र प्रवेश

करता है ।

ग्रर्थके द्वारा [प्रवेशका उदाहरण] जैसे वेणीसंहारमें—

"रात्रिग्रोंके नष्ट हो जानसे जिनका वेर रूप ग्राग्नि शांत हो गया है इस प्रकारके पांडव

लोग कुष्णके साथ ग्रानन्द मनाएं । ग्रौर रक्तसे भूमिको सु शोभित करनेवाले [अथवा रक्तेश्य:

पियजनेभ्य: प्रसाधिता दत्ता भूम्य:, ते रक्तप्रसाधितभुव:] ग्रपने प्रिय सेवकोंको भूमि प्रदान

करनेवाले, तथा जिनके विप्रह ग्रर्थात् शरीर घायल हो गये हैं [ग्रर्थवा जिन्होंने विप्रह

ग्रर्थात् युद्ध समास कर दिया है] इस प्रकारके कौरव लोग ग्रपने भृत्योंके सहित स्वर्गमें स्थित

[ग्रर्थवा स्वस्थ शरीर] हों ।"

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२२३ ] नाट्यदर्पणम् [ कारिका १०६, सूत्र ११५

इत्यस्य वाक्यस्य छन्दसा प्रथितस्य चतुर्थपादेन 'स्वस्था भवन्ति मयि जीवति चार्तराष्ट्राः' इत्थनेनार्थ गृहीत्वा भीमः ।

समयेन यथा झुलितरामे—

"अ्रासादितप्रकटनिर्मलचन्द्रहासः;

प्राप्तः शरत्समय एव विशुद्ध कान्तिः ।

उत्सवाय गाढतमसं घनकालमुरम्,

रामो दशस्यमिव सम्प्राप्तवधूजघनः ॥"

इत्यत्र समानविशेषणैः रामशब्दकीर्तनानुच्च रामप्रवेशासूचना ।

प्राहान्नेन यथा प्रभिज्ञानशाकुन्तले—

"तवारिमि गीतरा गेषा हारिणा प्रसभं हत: ।

एव राजेव दुश्यन्तः सारंगेणातिरंहसा ॥"

छन्द रूपमें प्रथित इस वाक्यके चतुर्थ चरणके अर्थको लेकर 'स्वस्था भवन्ति मयि जीवति धार्तराष्ट्राः' मेरे जीते रहते कौरव कभी स्वस्थ बैठ सकते हैं ? यह कहते हुए भीमका प्रवेश होता है

रसमय [कै वयार्न] से [मुख्यपात्रका प्रवेश] जैसे झुलितरामें—

इस इलोकमें शरत्कालके वर्णनके द्वारा रामचन्द्रका प्रवेश कराया गया है । इलोकमें कहे हुए विशेषण शरत्काल और रामचन्द्र दोनों पक्षोंमें लगेंगे । प्रथम चरणमें 'चन्द्रहास' शब्द

चिलष्ट है । शरत्काल पक्षमें उसका श्रार्थ चन्द्रमाका हास यह होता है । श्रोर रामचन्द्र के पक्षमें चन्द्रहासका श्रर्थ तलवार होता है । चतुर्थ चरणमें 'सम्प्राप्तवधूजघनः' में शरत्पक्षमें 'वन्धुजीव'

पुष्पविशेषका नाम है, श्रोर रामचन्द्रपक्षमें उसका श्रर्थ वन्धु श्रर्थात् लक्ष्मणके जीवनको बचा लेनेवाला है । तृतीय चरणमें 'घनकालमुर्' में शरत्पक्षमें घनकालका अर्थ वर्षांकाल है

ग्रोर रामचन्द्रन-पक्षमें उसका श्रर्थ रावण है । इलोकका श्रर्थ निम्न प्रकार है—

"[मेघोंके बाहर] प्रकाशित निर्मल चन्द्रमाके हासको प्राप्त करने वाला, [रामपक्षमें

नंगी तलवारको हाथमें लिए हुए] विशुद्ध कान्ति वाला, यह शरत्समय, गाढ़ श्रन्धकारयुक्त

[रामपक्षमें गहन प्रज्ञानग्रन्थकारसे युक्त] भयंकर वर्षकाल [रामपक्षमें वर्षकालके समान उपर] को विनष्ट करके बन्धुजीव पुष्पको धारता हुग्रा इस प्रकार ग्रा गया है जैसे

निम्नलिखित नंगी तलवारको लिए हुए विशालकान्ति श्रोर बन्धु श्रर्थात् लक्ष्मणके जीवनकी रक्षा

कर लेने वाले रामचन्द्र भयंकर रावणको मारकर ग्राए हों ।"

इसमें [शरत्समय तथा रामचन्द्र दोनों पक्षोंमें लगने वाले] समान विशेषणोंसे श्रोर

राम शब्दका कथन करनेसे रामचन्द्रके प्रवेशकी सूचना मिलती है ।

[प्राहरण श्रर्थात्] नामसे [पात्रप्रवेशकी सूचनाका उदाहरण] जैसे 'प्रभिज्ञानशाकुन्त-

नल, में—"[प्राहरणमें सून्रधार नटीसे कहता है] तुम्हारे मनोहर गीतरा गेसे यह में ऐसे हरणकर लिया गया हूँ जैसे मनोहर श्रौर ग्रस्त्यन्त वेगवान् इस मृगके द्वारा यह राजा दुश्यन्त [हरणकर

लिया गया है] ।"

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कां १०६, सू० १४६ ] तृतीयो विवेक: [ २४३

अत्र नाट्य-ग्रासुखयो: सम्बन्धनार्थं कविना भाविप्रवेशस्य पात्रस्य युक्त्या नामग्रहणम् । पूर्वत्र समानविशेषप्वलात्नामागतमित्यनयोर्विशेष इति ।

एपां च नाट्यपात्रप्रवेशप्रकाराणामन्यतम एवंैकश्रचमत्कारी निवन्धनीय: ।

अन्यथा पात्रप्रवेशप्रंथबाहुल्येन प्रस्तुतार्थविघात: स्यादिति । शब्दद्यापारवाडुल्याच्च

भारतीयश्रभूतत्वमस्य । एवं प्ररोचनाया: पूर्वरङ्गाभूताया ग्रपिति । पात्रप्रवेशस्य पूर्वो भाग ग्रासुखम् ।

उत्तर: पुनर्नाट्यमिति ॥

ग्रथ प्ररोचनां व्याचष्टे—

[सूत्र १४६]—पूर्वरङ्गु श्रस्तुत्या सभ्यौन्मुख्यं प्ररोचना ॥[४]१०६॥

पूर्वं नाट्यात् प्रथमं, गीत-ताल-वाद्य-नृत्यादिकं च पाठ्यं व्यस्तं समस्तं च प्रयुज्यते यत्र रङ्गे रुजनाहेतौ नाट्यशालायां स पूर्वरङ्ग: । तत्र च पूर्व-रङ्गस्य प्रत्याहारादीनि व्यासारितान्तानि नव जन्त्रवादनिकं, गीतकादीनि प्ररोचनान्तानि च दश बहिर्जवनिकां यावज्जनैरैलचितानि ।

इस [उदाहरणमें] नादय तथा ग्रामुखका सम्बन्ध जोड़नेके लिए कविने ग्रांगे होने वाले पात्रके प्रवेशके लिए युक्तिपूर्वक [बुद्धिन्तके] नामका ग्रहण किया है [ग्रात: यह ग्राद्दान द्वारा पात्रप्रवेशका उदाहरण है] पहले ['ग्रासादित प्रकट निर्मलचन्द्रद्रहास' ग्रादि उदाहरण में] तो समान विशेषोंके बलसे नाम प्राप्त हो जाता है [मुख्यरूपसे उसमें समयका ही वर्णन है । किन्तु इसमें मुख्य रूपसे बुद्धिन्तके नाम ही कथन है] यह इन दोनों उदाहरणोंका भेद है !

पात्रप्रवेशके इन [चार] प्रकारोंमें से किसी एक ही चमत्कार-जनक प्रकारका श्रव-लम्बन करना चाहिए । [ग्रन्थथा [सब प्रकारोंका श्रववलम्बन करनेपर तो] पात्रप्रवेश विषयक ग्रंथका विस्तार हो जानेसे प्रस्तुत विषयमें विघ्न पड़ेगा । इस [ग्रामुख] में शब्द-द्यापारकी प्रचुरता होनेके कारण यह भारती वृत्तिका श्रङ्गभूत है

इसी प्रकार पूर्वरङ्गकी ग्राद्धस्त प्ररोचनामें भी [शब्द-द्यापारके बहुल होनेसे भारतीय वृत्तिका श्रङ्गभूत] है । [मुख्य] पात्रके प्रवेशके पहलेका भाग 'ग्रामुख' [कहलाता] है ग्रौर पात्रप्रवेशके बादका भाग नाट्य [कहलाता] है ।

प्ररोचना निरूपणा—

ग्रब [भारतीय वृत्तिसे समृद्ध] 'प्ररोचना' की व्याख्या करते हैं—

[सूत्र १४६]—पूर्वरङ्गे [कवि, नाटय, सूत्रधार ग्रादि] गुणोंकी स्तुति द्वारा सभ्यों को [नाटय दर्शानेकेलिए] उन्मुख करना 'प्ररोचना' [कहलाती] है । [४] १०६ ।

[पहले कारिकामें ग्राए हुए पूर्वरङ्ग शब्दका निर्वचन दिखलाते हैं] नाटयके पहले गीत, वाद्य, नृत्य नाटयादि श्रौर पाठयका श्रलग-श्रलग ग्रथवा मिलाकर जिस [भाग] में रंग ग्रर्थात् रंजनाके कारणभूत नाट्यशालामें प्रयोग किया जाता है वह पूर्वरङ्ग कहलाता है ।

इस पूर्वरङ्गके 'प्रत्याहार' से लेकर 'ग्रासारित' पर्यन्त नौ जवनिकाके भीतर, श्रौर गीतकादिसे लेकर प्ररोचना पर्यन्त दश जवनिकाके बाहर किए जाननेवाले ग्रगोंके लक्षणों पूर्व ग्राचायों ने किए हैं । हमने तो उनके १ इत्थ: लोकसिद्ध होनेका कारण, २ उनके वर्गानुरूपके

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२९४

नाट्यदर्पणम्

[ क० १०७, सू० १४६

प्रसिद्धत्वात्, तन्न्यासक्रमस्य निष्फलत्वाद्, विविधदेवतापरितोषधरुपस्य तत्फलस्य च श्रद्धालुप्रतारसमात्रत्वादुपेच्छितानि । प्ररोचना तु पूर्वरङ्गगभूतापि नाट्ये प्रवृत्तौ प्रधानमिति लभ्यते ।

तत्र पूर्वरङ्ग गुणास्तुत्या प्रस्तुतप्रबन्धार्थस्य प्रीत्यादिहेतुत्वप्रशंसनेन सामजिकानां श्रवणावलोकनोत्साहोत्पादनं प्रकृतोद्देशः: प्रकर्षेण रोच्यते उपादेयतया धियते डनयेतिप्ररोचना ! यथा क्षीरस्वामिविरचिते श्रीमन्नवरत्ने—

"स्थापक:—[सहर्षम्] श्रायं ! चिरस्य स्मृतम् । व्यासस्येव राघवमहीनकथापचितं, काव्यं प्रबन्धघटनाप्रथितप्रयत्नः । भट्टेन्दुराजचरणामधुजु तस्य, वीरस्य नाटकममन्यसमासरम् ॥"

यथा वा रघुविलासे—

"सीतां कननतो जहार विहितव्याजः पुरा रावण— स्तं व्यापाद्य रपोन तां पुनरथो राम: समानीतवान् ।

निष्फल होनेके कारन, श्रौर ३ विविध देवताओंको प्रसन्न करने रूप उनके फलके केवल श्रद्धालुप्रेरित होनेके होते, उनकी उपेक्षा कर ही देनी है । [पूर्वरङ्गके उन १६ श्रंगोंसे] 'प्ररोचना' तो पूर्वरङ्गका श्रंग होनेपर भी नाटकमें प्रवृत्ति करानेमें मुख्य है इसीलए

उसका लक्षण [हम भो] कर रहे हैं

उस पूर्वरंग [के १६ श्रंगों] में, गुणोंकी स्तुति द्वारा प्रस्तुत प्रबन्धके ग्रर्थकी श्रानन्द ग्रहण

ग्राविके जनक रूपमें प्रहांसा करके सामाजिकोंमें उसके देखनेका उत्साह उत्पन्न करनेकेलए

प्रकृत ग्रर्थ जिसके द्वारा [प्रकर्षेण रोच्यते] ग्राह्यन्त रोचक बनाया जाता है ग्रर्थात् उपादेय

सिद्ध किया जाता है वह 'प्ररोचना' [कहलाती] है

जैसे क्षीरस्वामी विरचित ग्रभिनवराघवमे—

"स्थापक:—[सहर्ष] श्रायं ! बडी देर बाद याद ग्राई—

रामचन्द्रकी परमोत्कृष्ट कथासे पवित्र, श्रौर नाटक रचनाओं में प्रसिद्ध सामर्थ्य् वाले,

भट्टे इन्दुराजके चरणकमलोंके चढचरोख, क्षीरस्वामिको प्रद्धतीय महत्व् वाला [ग्रभनव

राघव नामक काव्य ग्रर्थात्] नाटक तो विद्यमान है ही [फिर चिन्ता किस बातकी है ।

सामाजिकोंको प्रसन्न करनेके लिए ग्राज हम लोग उसे प्रद्धतीय नाटकका ग्रभिनय प्रस्तुत

कर सकते हैं]"

इसमें रामचन्द्रके चरित्र और क्षीरस्वामिको नाटक-रचना-सामर्थ्य्योदिको प्रहांसा द्वारा

सामाजिकोंमें नाटक-दर्शनका उत्साह उत्पन्न करनेका यत्न किया गया है इसलिए यह पवंरंग

की ग्रंगभूत 'प्ररोचना' का उदाहरण है

व्याख्या जैसे रघुविलासम—

"पूर्वकालमें छल करके रावण सीताको बनवास हरग्ण कर ले गया था, उसकी मारकर

रामचन्द्र फिर उसकी छुड़ाकर लाए थे कवियोंकी सूक्त्त रूप मुक्तक मणियोंके [उत्पादक

के लिए स्वाति जलके समान तथा मृ, भूदः, स्वः: तीनों लोकोंको मोहित करने वाले मोह—

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क० १०७, सू० १६० ]

तृतीयो विवेक: [ २४७

एतस्मै कविसुक्तिमौक्तिककमरीएस्वात्यम्भसि भ्रूभृद व:—स्वर्या मोहनकार्मण्यपाय सुकथारत्नाय नित्यं नमः ॥

यथा वा नलविलासे—

"कवि: काव्ये राम: सरसवचसामेकवसति—नलस्येदं हृदयं किमपि चरितं धीरललितम् । समादिष्टो नाट्ये निखिलवटसुन्दरपटवरहं, प्रसन्न: सभ्यानां कटाक्ष ! भगवानघ स विधि: ॥" इति ।

इयं प्ररोचना पूर्वरङ्गान् प्रथमं पश्चाच्च निवध्यते । निवन्धे चास्या नावश्य-स्मावनियम इति ॥ [४] १०६ ॥

[सूत्र १६०]—साच्वतो सत्य-वाग्‌गुण-ऽभिनेयं कर्म मानससम् । साज्वार्ष-धैर्य-स्त्रद्ध-वीर-शान्ताद्भुतम् ॥[४]१०७॥

कमंके समान [रामायणकी] इस सुन्दर कथारत्नको नमस्कार है । इसमें कथा भागकी प्रशंसा द्वारा उस कथाके प्राधारपर विरचित 'रघुविलास' नाटकके देखनेके लिए समाजको प्रोत्साहित करनेका यत्न किया गया है ।

ग्रथवा जैसे नलविलासमें—

"[इस नलविलास नामक नाटकका निर्माता] सरस वचनोंका निधान रामचन्द्र इस काव्यका [निर्माता] कवि है, नलका मनोहर धीरललित ग्रौर श्रद्भुत चरित्र [इस काव्यकका वर्ण्य विषय] है, श्रौर समस्त नाटयकलाग्रोंमें निपुरा मुझको नाटय करनेकी श्राज्ञा मिली है, [इससे सिद्ध होता है कि] हे सुन्दर कटि वाली [श्रायि] ! श्रराज भगवान् सभ्योंके ऊपर प्रसन्न हो रहे हैं !"

इसमें ग्रन्थकारने अपने बनाए हुए नवविलासकी ‘प्ररोचना’को उद्धृत किया है । इस प्ररोचना भागमें कविकी भी प्रशंसा की गई है । नाटकके प्राधारभूत प्राध्यान-वस्तु, श्रौर उसका श्रभिनय करने वाले नटकी भी प्रशंसा की गई है । इन सबकी प्रशंसा द्वारा सामाजिकोको इस नाटकके देखनेके लिये उत्साह एवं श्राभिरुचि उत्पन्न करनेका यत्न किया गया है । इसलिए यह भी प्ररोचनाका उदाहरण है ।

यह प्ररोचना पूर्वरंगके पहले ग्रौर पीछे [दोनों रूपोंमें] निवद्ध की जा सकती है । श्रौर इसके रखने जानेका कोई ग्रावश्यक नियम नहीं है । [ग्रथात् यह ग्रावश्यक नहीं है कि प्रत्येक नाटकमें प्ररोचना ग्रवश्य ही रखी जाए । कवि इस विषयमें स्वतन्त्र है । वह चाहे तो प्ररोचना रखे चाहे न रखे । यह ग्रन्थकारका श्रभिप्राय है फिर भी ग्रधिकांश नाटकोंमें ‘प्ररोचना’ पाई ही जाती है ॥ १०६ ॥[४]॥

२ सांत्वती वृत्तिका निरूपण—ग्रब उद्देशकर्मे प्राप्त सात्वती [वृत्ति] का लक्षण करते हैं—

[सूत्र १६०]—मानसिक, वाचिक तथा कायिक श्रभिनयोंसे सूचित, श्रृङ्गार, डाॅत्कार [प्राधर्ष] इत्यादि ग्रौर धैर्यसे युक्त, तथा रौद्र, वीर, शान्त एवं श्रद्भुत रसोंसे सम्बद्ध मानस व्यापार ‘सात्वती’ वृत्ति कहलाता है । [४] १०७ ।

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२५६ ] नाट्यदर्पणम् [ का० १०७, सू० १६०

सत् सत्त्वं प्रकाशः, तयत्रास्ति तत् सत्त्वं मतः, तत्र भवा सात्वती । संज्ञा-शब्दत्वेन बाहुलकात्तु जीवतम् । सत्त्व-वाग्जाभिनयैर्युतं सात्वती-वाग्जाभिनययुक्तम् । सत्त्वाभिनयवाग्भिनय-श्रृङ्गाभिनययुक्तं मानसंकर्म सात्वतीस्थायिर्थः । ऋभिनयत्रयाभिधाने डपि मानसव्यापारस्य सत्त्वप्रधानत्वात् । सत्त्वाभिनय एवात्र प्रधानमितरौ गौणौ । श्रृत एवं सत्त्वशब्दः प्रथममुपात्तः । श्रृङ्गारस्य वाचो न्यकारः । मुदू हर्षः । श्रेयं वयसनेष्ट्यकारत्यम् । एतेः रौद्रादिमिश्र सह सर्वमाने मनोव्यापारः सात्वती । श्रृङ्गारस्योपादानेच्च कपटाभावः । श्रृङ्गारस्थस्यैपनिदुष्टत्पुरुषसदृशावः । मुनि-जातिपदन-च्छोक-करुण-निर्वेदाभावः । श्रेयाभिधानात् स्यादिसङ्कमौत्कन्याभावश्रृाभिहितो भवति । रौद्रतरसयोगेडपि केपचित् सत्त्वं प्रकाशरूपं हश्यत एवेति रौद्रोपादानम् । वीर-रसश्रृान युध्द-दैन-दयावीरादिरूपः, सत्त्वबहुल्याद् गृह्यते । 'शम' इति च शम-स्थायी-भावः शान्तो रसो दृश्यः । श्रृपिडपवर्गजस्य सत्त्वेकतिनवन्धनत्वात् । श्रृद्वसुतोडप्यान्तन्य-सत्त्वावलोकनात् सात्विकानां हश्यत एवेति । इदं च मानसंकर्म विचित्राभिगमभीरो-क्ति-भिः प्रारब्धकार्योपरित्यागान्, कार्योत्तरपरिग्रहेण, सङ्ग्रामाय परोत्साहनेन, सामादि-प्रयोग-दैवादिना श्रृपारिसङ्घातभेदजननेनैवंश्र बहुभिः प्रकारैरलद्यते इति ॥ [५] १०७॥

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का० १०७, सू० १६१ ]

तृतीयो विवेक: [ २५७

अथ कैशिकी—

[सूत्र १६१]—कैशिकी हास्य-शृङ्गार-नाट्य-नर्मभिदातिमका ।

अतिशायिनः केशाः सन्त्यासामिति केशिका: स्वियः । 'स्तनकेशवतीत्वं हि स्त्रीणां लचुरणम्' । तत्प्रधानत्वात् तासामिर्यं कैशिकी । हास्य-शृङ्गाराभ्यां स्त्रीबाहुल्य-विशिष्टप्रकारेणैव पथ्य-कामव्यवहारार्षा सद्धावमाह । नाट्यं नृत्य-गीत-वादित्राणि । नृग्रामस्य इष्टजनावर्जनरूपो वाग्-वेष-चेष्टाभिः परिहासो नर्म । वाचा यथा—

"पत्युः शिरश्छेदकलमनेन स्पृशेति सख्या परिहासपूर्वम् । सा रक्ष्यतिवा चरणौ कृताशीरमोल्येन तां निर्वचतं जग्धान"

यथा वा सत्यहरिश्चन्द्रे—

"राजा—[ विहस्स ] विहडराय ! निःशेषवेश्याचक्रवर्त्तिनीमेनां लम्बस्तनीमुप-

श्लोकय ।

शुकः—पुरयग्रालम्भ्यलभ्याय वेश्योपपद्याय मझलम् । यत्र प्रतिपाः शास्त्रास्तस्य, कामादर्शप्रसूतयः ।।

पर भी] न छोड़नेसे, नए कार्योका [भी] स्वीकार कर लेनेसे, संग्रामादिके लिए दूसरोंको उत्साहित करनेसे, साम ग्रादिके प्रयोग श्रथवा देवाविदशा शास्त्रु-समुदायमें भेद डालनेसे श्रौर इसी प्रकारके अन्य बहुतसे प्रकारोंसे लक्षित हो सकता है ।।[४]१०७।।

३ कैशिकी वृत्तिका निरूपण—

अब केंैशिकी [वृत्तिका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र १६१]—हास्य, शृङ्गार [ नृत्य, गीत श्रादि रूप ] नाट्य तथा [ नर्म श्रर्थात् शिष्ट परिहास श्रादिके भेदोंसे युक्त कैशिकी [वृत्ति] होती है ।

श्रतिशय युक्त केश जिनके हों वे स्त्रियाँ कैशिका हुईं [ श्रर्थात् केंैशिकी वृत्तिकी उत्पत्ति केश शब्दसे हुई है । लम्बे केशोंसे युक्त होनेके कारण स्त्रियोंको 'केशिका' कहा जाता है क्योंकि 'स्तनकेशवती स्त्री' यह स्त्रीका लचुरण है । उनका प्राधान्य होनेसे उनकी यह वृत्ति 'कैशिकी' कहलाती है । उसमें हास्य श्रौर शृङ्गार शब्दोंसे स्त्रियोंकी श्राधिक्यता, नाना प्रकारके वेष-विन्यास, तथा कामव्यवहारकी उपवस्थिति सूचित की है । 'नाट्य' से नृत्य, गीत, वाद्यका प्रहण होता है । इष्टजनोंको प्राकर्षित करनेवाला, वाणी, वेष तथा चेष्टा श्रादिकेद्वारा किया जानेवाला शिष्ट [नृग्रामस्य] परिहास नर्म [कहलाता] है । वाणीके द्वारा [नर्मका उदा-

हरण] जैसे—

"पत्योंं महावर लगा चु रुनेपल सख्योके द्वारा परिहासपूर्वक इस [चररु] से पति [शिव] के सिरपर [अपनी रूप] चन्द्रकलाका स्पष्टं करना इस प्रकार श्राङ्गीरोवाच् किएजाने पर बिना उत्तर दिए हुए ही उसने [ग्रर्थात् पार्वतीने] उस [सखी] को मालासे मार दिया ।"

ग्रथवा जैसे सत्यहरिश्चन्द्रमें [वाचिक नर्मका उदाहरण निम्न प्रकार है]—

"राजा—[ हंसकर ] हे विहडराय ! [मन्त्रिन्त्रु शुकदेव] समस्त वेश्याग्रोंकी चक्रवातिनी इस लम्बस्तनीकी प्रधांसा तो करो ।

शुक—पुरय सम्भ्रान्ते प्राज्ञो हि नोद्विजते । वेश्या-व्यापारक भला, तो जिसमें शास्त्राविधानके विपरीत, कामसे ग्रर्थकी प्राप्ति होती है [ शास्त्रमें तो ग्रर्थसे कामको प्राप्ति

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वेषेष यथा—नागानन्दे विदूषक-शेखरवयतिकरे।

चेष्टनर्म यथा मालविकाग्निमित्रे—

निपुणिका विदूषकस्योपरि सर्पविभ्रमकारि दण्डकाष्ठं पातयति । इति ।

एतच्च कचिन्मनानन्, कचिद्वास्यान्, कचिन् शृङ्गारहास्यान्, कचिद् भयहास्यान्, कचिच्चापराधप्रिय-प्रतिभेदनान्, कचिन् पूर्वनायिका-प्रतिभयान्, इत्याद्यनेकधा दृष्टम् ।

स्त्रिग् शृङ्गाररसेन रत्याख्यो मनसो, हास्येन नर्मभेदेश्च वाचिको, नाट्येन कायिकश्च व्यापार: संगृहीत इति व्यापात्रयसङ्कीर्तितमिति ।

[सूत्र १६२]—ग्रारभटीवृत्ति-हिन्दो-छन्द-दीप्तरसाञ्चिता ।।[६]१०५।।

व्यारेण प्रतोदकेन तुल्यो भटा उद्धतः: पुरुषो ग्रारभटः।

‘ज्योत्स्नादिलव्धापि’ व्यारभटी । ध्यान्त्रमसल्यम् । इन्द्रयुद्धमनेकप्रकारम् ।

छाया वध्र्नहेतुः प्रयोगः । ध्यान्तेन इन्द्रजाल-पुस्तप्रयोग-छलादि-मेघादिग्रहः ।

दीयते रसा रौद्रादय: कही गई हैं किन्तु वेष्याव्यापारमें इसके विपरीत कामसे ग्रारभटी की प्राप्ति वेष्टयाभ्रोंको होती है ।

वेश्ये द्वारा [ परिहास रूप नर्मकका उदाहरण ] जैसे नागानन्दमें विदूषक और शेखर के सम्पर्कमें [हास्य है] ।

चेष्टाके द्वारा परिहासका [उदाहरण] जैसे मालविकाग्निमित्रमें—

निपुणिका विदूषकके ऊपर सर्पकी भ्रान्ति उत्पन्न करने वाले लकड़ीके [ टेड़े-मेढ़े ] डण्डेको डाल देती है ।

यह [परिहास या नर्म] कहीं मानके कारण, कहीं हास्यके कारण, कहीं शृङ्गारजनक हास्यके लिए, कहीं भयजनक हास्यके लिए, कहीं व्यापाराधि प्रियके प्रतिभेदनके कारण, और कहीं पूर्व नायिकाके भयके कारण, इस प्रकार अनेक तरहका होता है ।

यहां [कारिकामें आए हुए] शृङ्गाररसेन रति-हप मनास-व्यापारका, हास्य [पद] से और परिहासके [पौर्व्वक] भेदोंसे वाचिक-व्यापारका, तथा ‘नाट्य’ [पद] से कायिक व्यापार का संग्रह होता है ।

इसलिए यह [कैशिकी वृत्ति] तीनों प्रकारके व्यापारों सङ्कीर्ण रूप है ।

[ व्यारभटी वृत्तिमें तीनों प्रकारिक व्यापारोंका समावेश रहता है] ।

४ व्यारभटी वृत्तिका निरूपण—

अब व्यारभटी [वृत्तिका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र १६२]—ग्रनुत् भाषणै:, छल-प्रपञ्च, इन्द्रयुद्ध, तथा [रौद्र रादि] द्वीक्षरसोसे युक्त [वृत्ति] ग्रारभटी [वृत्ति कहलाती] है । [६] १०५ ।

‘ग्रार’ ग्रर्थात् चाबुकके समान, जो भट ग्रर्थात् उद्धत पुरुष, वे ‘ग्रारभट’ हुए ।

वे जिनमें प्रचुर मात्रा में हों वह [ग्रारभट शब्दको] ज्योत्स्नादि गिरापठित मानकर ग्रहण-प्रत्यय करनेपर व्यारभटी [वृत्ति कहलाती] है ।

[लक्षणमें ग्राए हुए ग्रनुतादि शब्दोंका ग्रर्थ करते हैं] । ग्रनुत ग्रर्थात् ग्रनृत्य भाषण ।

इन्द्रयुद्ध ग्रनेक प्रकारका हो सकता है ।

घोखा देनेकेलिए किए जाने वाला प्रयोग छल कहलाता है ।

इसके द्वारा इन्द्रजाल [पुस्त लेङ्यादि निर्मित] पुतली ग्रादिका

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श्रृङ्गाराद्यवegādihete:। श्रात्रानुतादिभिरविचित्रनेपथ्य किलिज्ञहस्तप्रयोग-सायाशिरो-

दर्शनादिकं, भय-हर्षोतिशयाकुलितपात्रप्रवेश:, पूर्वनायकावस्थाया: परित्यागेन नायकावस्थान्तरग्रहो श्रवसक्न्द-श्रन्यान्यादृतविन्दवादिकं, विविधस्थायी-स्थायिभिचारि-

भावयुक्तं प्रसङ्गागतकार्यादिकं बाहुयुद्ध-शस्त्रप्रहारादिकं च संगृह्यते । यत् पेयं सर्वा-

भिनयात्मिका सर्वेष्टापारातमका च । तत्र विचित्रं नेपथ्यं वेषीसंहारे श्रश्वत्थाम्न: । उदयनचरिते किलिज्ञहस्त-

प्रयोग:। मायाशिरोदार्शनं रामाभ्युदये । बलीमुखेन पात्रप्रवेशो रत्नावल्याम् । हर्षेण वामनचेष्टा: प्रवेश: (सत्यहरिश्चन्द्रे) । बालिनेत्रुत्यागेन सुप्रीवनेत्रान्तरग्रहणम् । परशु-

रामश्रृङ्गारद्वावस्थात्यागेन शान्तावस्थान्तरग्रहणम् । विचित्रभाषं कार्यान्तरं कृत्यारावणो । तथा हि शृङ्गदेनाज्ञभिद्यमाणाया मन्दोदर्या भयम् । शृङ्गदस्योत्साह: । श्रस्यैव रावणदर्शनेन ‘एतेनापि शूराजिता:’ इत्यादि वदतो हास: । ‘यस्तालेन निगृह्य बालक इव प्रच्युत्पल कण्ठन्थे’ इति च जल्पतो जुगुप्सा-हास-विस्मया: । रावणस्य रति-क्रोधौ । नियुद्धादि तु रामायणीयेषु इन्द्रजित्कल्मषयोरिति ॥६॥१०५॥

प्रयोग तथा श्रृङ्गारादिका ग्रादिका ग्रहणा होता है । श्रृङ्गारद्य, श्रावegादिके कारराभूत रोद्रादिर्स दीप्तररस [कहलाते हैं] । इसमें श्रृङ्गारादिसे, नाना प्रकारके वेष विन्यास, [किलिज्ञहस्तप्रयोग

प्रथ्यात] चटाई ग्रादिसे बने हुए [बनावटी] हाथीका प्रयोग, तथा [मायाशिरोदर्शनं प्रथ्यात] बनावटी सिर ग्रादिका दिखलाना [ग्रहोत होता है], भय तथा हर्षके प्रतिशयसे ग्राकुल पात्रका प्रवेश, नायककी पूर्वावस्थाफो छोडकर नायककी दूसरी श्रवस्थाका ग्रहण, श्राकस्मा

या श्रृङ्गिन ग्रादिके द्वारा किए जानेवाली भगदड़, श्रृदि रुप नाना प्रकारके स्थायी-स्थायिभावोंसे युक्त प्रसङ्गिक कार्यादि, बाहुयुद्ध श्रौर शस्त्रप्रहारादिका संग्रह हो जाता है । इसलिए यह [प्रसङ्गटी वृत्ति कायिक, वाचिक तथा मानसिक] सब प्रकारके ग्रभिनयोंसे युक्त श्रौर सब

प्रकारके व्यापारों वाली [वृत्ति] है । उनमें विचित्र वेष-विन्यास [का उदाहरण] जैसे वेषीसंहारमें श्रश्वत्थामाका विचित्र वेष-विन्यास वर्णित है । नायकके चरित्रमें बनावटी हाथीका प्रयोग पाया जाता

है । बनावटी सिरका दर्शन जैसे रामाभ्युदयमें [रामके बनावटी कटे हुए सिरका दर्शन सीता को कराया गया] है । [बलीमुख प्रथ्यात] बन्दरके भयसे प्रवेश [का उदाहरण] जैसे रत्ना-

वली में [पाया जाता है] । हर्षसे जैसे सत्यहरिश्चन्द्रमें वामनचेष्टीका प्रवेश [वर्णित है] । बालिके नेत्रोंको छोडकर सुप्रीवके नेत्रोंको स्वीकार करना । परशुरामकी उद्धतावस्थाको

छोडकर दूसरी शान्तावस्थाका वर्णनम् [ये दोनों नायकान्तर श्रौर श्रवस्थान्तरके उदाहरण

हरा हैं] । विचित्र प्रकारके [प्रासङ्गिक] ग्रन्थ कार्य [का उदाहरण] जैसे कृत्यारावणोमें [निम्न प्रकार पाया जाता है] । श्रृङ्गदके द्वारा पीटे जानेपर मन्दोदरीका भय, श्रृङ्गदका

उत्साह, इस [श्रृङ्गदके द्वारा ही रावणको देखनपर ‘ब्रच्छा इस [रावण] ने भी देवताओं को जीता था’ इस प्रकार कहते हुए [रावणके प्रति श्रृङ्गदकी] हास्य बनाना, श्रौर ‘जिसकी [रावणके] पिताजी [प्रथ्यात श्रृङ्गदके पिता बाली] ने बालकके समान पकड़कर कोठरीमें [बन्द कर दिया

था]’ इस प्रकार कहते हुए [रावणके प्रति श्रृङ्गदकी] घृणा, हास्य श्रौर विस्मय [का वर्णन

तथा रावणके रति, क्रोध [ये सब प्रसङ्गोचित कार्योके उदाहरण हैं] । रामायणके श्राधारपर

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२२० ] नाट्यदर्पणम् [ का० १०६, सू० १६३

स्थ 'रसभावाभिनयग:' इत्थतो वृत्तिलचणात् प्रथमं रसमाचष्टे—

[सूत्र १६३]—स्थायी भाव: श्रृङ्गारादिभि: विभाव-व्यभिचारिभि: । स्पष्टानुभावनिश्चय: सुख-दुःखात्मको रस: ॥[७]१०६॥

प्रतितचयासुधय-व्ययधर्मकेऽपि बहुष्वपि व्यभिचारिरूपचयविनुयायितयावश्यं तिष्ठतीति स्थायी । यद्वा तद्वादि एव भावान् श्रृभाव वाभावित रत्यादिविभावैर्भिचारिगणै: स्लानादिकं प्रत्यवश्यं स्थायी । उपचयं प्राप्य रसरूपेण रत्यादिभिरूपतीति भाव: । विभावै-वल्लनो-च्यानादिभिरालम्बनोहीपनारूपै-वृंहै हैंतुभि: सत एवाविर्भावादु, व्यभिचारिभिरिग्लान्या-दिश्री रसिकमन:-शरीरवर्तिभि: परिपोषणाच्च श्रृङ्गारादि: स्वीकृतसञ्चारकारितया-नु-भूयमानास्थो, यथासम्भवं सुख-दुःखस्वभावो रस्यते व्यास्वायते इति रस: ।

तत्रेश्रृङ्गार-हास्य-वीर-श्राद्भुत-शान्ता: सुखात्मक: । श्रृङ्गारे पुनरनिष्ठितविभावाभुपनोतात्मक: करुण-श्रौद्र-बीभत्स-भयानकाश्च त्वारो दुःखात्मक: ।

बने नाटकादिमें लक्मणा श्रोर सेघनावके नियुद्ध श्रादि [के उदाहररा हैं] ॥[६] १०५ ॥

[इस प्रकार भारती श्रादि चारों वृत्तियोंके लक्मरण हो जानेके बाद] श्रब वृत्तिके [इस पदमें सबसे पहले रसका वर्णन

[सामान्य] लक्मरामें ग्राए हुए 'रस-भावाभिनयग:' इस पदमें

प्रारम्भ करते हैं—

[सूत्र १६३]—विभाव तथा व्यभिचारिभाव ग्राविके द्वारा परिपोषको प्राप्त होने वाला, स्पष्ट ग्रनुभावोंके द्वारा प्रतीत होनेवाला, स्थायीभाव [रूप हो] सुख-दुःखात्मक [प्रथवा

केवल सुखात्मक ग्रथवा केवल दुःखात्मक न होकर उभयात्मक] रस होता है । [७] १०६ ।

[यह ग्रन्यकर्त्तने रसका लक्मरण किया है । श्रब उसमें ग्राए हुए स्थायीभावादिका

स्वरूप दिखलाते हैं] प्रतिप्रकाश्रू उदय तथा ग्रास्त होनेवाले श्रनेक व्यभिचारिभावोंमें जो ग्रनु-

गतरूपसे ग्रनुभवय विद्धमान रहता है वह 'स्थायिभाव' [कहलाता] है । ग्रथवा उस [स्थायी-

भाव] की विद्यमानतामें ही होने श्रौर उसकी ग्रनिव्यमानतामें [व्यभिचारिभावोंके] न होनेसे,

व्यभिचारिभाव स्लानि श्रादिके प्रति, रत्यादि ग्राविके ग्रनुभवय स्थायिभाव होता है । [यह स्थायी

श्रान्दका ग्रर्थ श्रुग्रा श्रब श्रागे हुए भाव ग्रान्दका ग्रर्थ करते हैं । [व्यभिचार-

भाव ग्राविके द्वारा] परिपोषको प्राप्त करके रत्यादि, रसरूप हो जाता है इसलिए

['भवतीति भाव:' इस व्युत्पत्तिके ग्रनुसार रत्यादि] 'भाव' [कहलाता] है । विभावों ग्रथवा

ललना ग्रौर उच्चान श्रादिके [रूप] श्रालम्बन तथा उदीपन विभावरूप बाह्रा हेतुप्रोंके द्वारा

पूर्वंसे ही विद्यमान [रत्यादि स्थायिभाव] का श्राविर्भाव होनेसे, श्रौर रसिकोंके मनमें विद्यमान

स्लानि श्रादि व्यभिचारिभावोंके द्वारा परिपुष्ट होनेके कारण, उत्कवंको प्राप्त [ग्रथवा

साक्षात्कारात्मक ग्रनुभावानावस्थाको प्राप्त होनेवाला, यथासम्भव सुख-दुःखोमयात्मक [स्थायी-

भाव 'रस्यते इति रस:' इस व्युत्पत्तिसे] ग्रावादात्मक होनेसे रसपदसे वाच्य [बोधित] होता है ।

[रसके इस लक्मरामें रसको सुख-दुःखात्मक प्रथवा उभयात्मक माना है । उन दोनों

प्रकारके रसोंका विभाग श्रागे दिखलाते हैं] उनमेंसे इष्ट विभावादिके द्वारा स्वरूपसम्पत्तिको

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यन्त् पुत्रः सर्वरसानां सुख-दुःखात्मकत्वमुच्यते तन्त् प्रतीतिबाधितम् । श्रास्तां नाम मुख्यविभावोपचितः:, काव्याभिनयोनीतविभावोपचितोऽपि भयानको वीभत्सः करुणो रौद्रो वा रसास्वादवतामनुभ्रेयां कामपि क्लेशादशामुपन्रयात् । श्रातनेव भयानकादिभिरुद्धिजते समाजः । न नाम सुखास्वादादुद्रेगो घटते ।

यन्त् पुनरेभिराप चमत्कारो दृश्यते स रसास्वादविरामे सति यथावस्थितवस्तुप्रदर्शकेन कवि-नटशक्तिकौशलेन । विस्मयन्ते हि शिरःश्छेदकारिप्यापि प्रहारकुशलेन वैरिणा शौर्यडीरमातिनः। श्रतनेव च सर्वज्ञाद्धादकेन कविनटशक्तिजन्मना चमत्कारेण विप्रलब्धाः परमानन्दद्रुत्पातां दुःखात्मकेष्वपि सुस्थेमसः प्रतिजानते । एतदस्मादलौल्येन प्रेक्षकाः श्रपि एतेषु प्रवर्तन्ते । कवयस्तु सुख-दुःखात्मकसंसारारुरूपेण रामादिचरितं निवन्धनन्तः सुख-दुःखात्मकसन्निविद्धसेव श्रथनन्ति । पानकमाधुर्यमिव च तीव्रेणास्वादेन दुःखास्वादेन सुतरां सुखानि स्वदन्ते इति । श्रप च सीताया हररां, द्रौपद्या: कचाम्बराकारर्षां, हरिशचन्द्रस्य चण्डालदास्यं, रोहिताश्वस्य मररां,

प्रकाशित करने वाले शृङ्गार, हास्य, वीर, प्रदभुत शौर शान्त [ये पांच] सुखप्रधान रस है । शृङ्गार शौर शान्त विभावादिके द्वारा स्वरूप लाभ करने वाले करुण, रौद्र, वीभत्स शौर भयानक ये चार दुःखात्मक रस हैं ।

[कुछ श्राचार्योंकि द्वारा] जो सब रसोंको सुखात्मक बतलाया जाता है वह प्रतीति के विपरीत [होनेसे प्रमाण्य ग्रहसंगत] है। मुख्य [प्रथयातू वास्तविक] विभावोंसे उत्पन्न [करुणा श्रादिकी] दुःखात्मकताकी तो बात ही जाने दो, काव्यके प्रभिनयमें प्राप्त [भावको] विभाव ग्रादिसे उत्पन्न हुग्रा भी भयानक, वीभत्स, करुणा ग्रथवा रौद्ररस ग्रास्वादन करने वालोंकी कुछ प्रवृत्तान्नोंयसी क्लेशदशाको उत्पन्न कर देता है । इसी लिए भयानक श्रादि [हृदयों] से सामाजिकोंको घबराहट होती है । [यदि सब रस मुख्यात्मक हो होते तो] सुखास्वादसे तो किसीको उद्वेग नहीं होता है । [इसलिए करुणादि रस दुःखात्मक ही होते हैं] ।

श्रौर जो इन [करुणादिरसों] से भी सहृदयोंने चमत्कार दिखाई देता है वह रसास्वादके समाप्त होनेके बाद यथास्थित जैसे-तैसे पदार्थोंको दिखलाने वाले कवि शौर नटजनोंके कौशलके काररां होता है । क्योंकि वैरिताके श्रमिमानां जन भी [एक ही प्रहारमें] सिरको काट डालने वाले, प्रहार-कुशल वीरि [के कौशलको देखकर, उस] से भी विस्मय [शौर तज्जन्य चमत्कार] को प्राप्त करते हैं । सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको ग्रानन्द प्रदान करने वाले [सब इन्द्रियोंके ग्राह्लादक], कवि शौर नटजनोंकी शक्ति [कौशल] से उत्पन्न चमत्कारके द्वारा खोखलेमे ग्राकर बुद्धिमान् लोग भी दुःखात्मक करुणादि रसोंमें भी परमानन्द रूपता सम्भने लगते हैं । और उनका ग्रास्वादन करनेके लोभका संवरण न कर सकनेके काररां प्रेक्षक सामाजिक भी इन [के ग्रास्वादनमें] प्रवृत्त होते हैं । कविगरा तो सुख-दुःखात्मक संसारके श्रनुरूप ही रामादिके चरित्रकी रचना करते समय सुख-दुःखात्मक रसोंसे युक्त ही [काव्य नाटक श्रादि की] रचना करते हैं । अपने का माधुर्य जैसे [उसमे पड़ी हुई मिर्चकें] तीखे ग्रास्वादसे शौर ग्राधिक ग्रहचछा प्रतीत होता है इसी प्रकार [करुणादि दुःखप्रधान रसोंमें] दुःखके [तीखे]

ग्रास्वादिस मिलकर सुखकी श्रनुभूति शौर ग्राधिक ग्रानन्ददायिनी बन जाता है । [नाटकादिमें] सीताके हरा, द्रौपदीके केश एवं वस्त्रोंके सींचे जाने, हरिशचन्द्रकी चाण्डालके

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लक्ष्मणस्य शक्तिभेदनं, मालत्याः व्याघादनारम्भाद्यमित्याभिनीयमानं पश्यतां सहृदययानां को नाम सुखास्वादः ? तथानुकायगताश्रु करुणादयः परिदेवितानुकार्यत्वात् तावद् दुःखात्मकाः एव । यदि चानुकरणे सुखात्मानः स्युस्ते सम्यगनुकरणं स्यात् । विपरीतत्वेन भाषणादिति । योडपीशादिविनाशदुःखवतः करुणे वय्यमानेऽभिनीयमाने वा सुखास्वादः सोऽपि परमार्थतो दुःखास्वाद एव । दुःखी हि दुःखितस्य सुखसम्भावनस्यते । प्रमोदवातिकया तु तामयिति करुणादयो दुःखात्मन एवति विप्रलम्भशृङ्गारस्तु दाहादिकार्यत्वाद् दुःखरूपोडपि सम्भोगसम्भावनागर्भत्वात् सुखात्मकः ।

यहाँ दार्शता, रोहिताद्वके मरण, लक्ष्मणके शक्तिभेदन, मालतीके मारनेके उपायके प्राप्तिके प्रश्रयको देखने वाले सहृदयोंको सुखका प्रास्वाद कैसे हो सकता है ? [इसलिए करुणादि रसोंको सुखात्मक मानना उचित नहीं है । इसी बातके समर्थनकेलए आगे और भी युक्ति देते हैं ।]

और श्रृङ्गारादि [प्रायःवात् रामचन्द्र श्रादिके वास्तविक जीवनमें सीतावियोगके समय] करुणादि विप्रलम्भयुक्त होनेके कारण निश्चित रूपसे दुःखात्मक ही होते हैं । यदि उनको क्रन्दनादि [रुदन नाटकादि] में सुखात्मक माना जाय तो वह सम्यक् प्रतुत्करणा नहीं हो सकता है । [वास्तविक दुःखात्मक प्रतीतिसे] विपरीत रूपमें [नाटकादिमें] प्रतीत होनेसे [नाटकादिमें] रामके वृत्तान्त यथार्थ प्रतुत्करणा नहीं बनेगा । इस कारण भी करुणादिको दुःखात्मक हो मानना पडेगा ।

कभी-कभी किसी इष्टजनके विनाशके समय उसका सान्त्वना देतेकेलए लोग किसी ग्रन्थके इसी प्रकारके दुःखका वर्णन श्रादि करते हैं । और उस प्रकारके दूसरेकी दुःखको सुनकर या देखकर दुःखित व्यक्तिको कुछ सान्त्वना श्रोर श्रपने कष्टको सहनेका बल मिलता है परन्तु वह सुख नहीं है । वह दुःखास्वाद हो है । दुःखी व्यक्तिके सामने दूसरोंने उक्त प्रकारके दुःखके वर्णनसे तो उसको सान्त्वना मिलती है किन्तु यदि उस दुःखके समय उसके सामने नाच-रंग श्रादि श्रानन्द वार्ताकी चर्चा की जाय तो वह उसको बुरी मालूम होती है । इसलिए करुणादि रस दुःखात्मक ही है । इस वातको आगे ग्रन्थकार इस प्रकार लिखते हैं—

ग्रोर इष्टजनके विनाशमें दुःखित्वास सान्त्वना करणादिका वर्णन किए जानेपर जो सुखास्वाद होता है वह ही वास्तवमें दुःखास्वाद ही होता है । दुःखी व्यक्ति दूसरके दुःखी व्यक्तिको दुःख-चर्चा स सुख-सान्त्वना-सी श्रनुभव करता है । श्रोर प्रमोदकी वार्तास [उस समय] उद्विग्न होता है । इसलिए भी करण श्रादि रस दुःखात्मक होते हैं [उनको सुखात्मक रस नहीं माना जा सकता है ।]

विप्रलम्भ शृङ्गार तो [इष्टजनके] बाह्यादि [द्वारा विनाशकी प्रतीति] से जन्य होनेके कारण दुःखरूप होनेपर भी उसमें पुनर्मिलन [सम्भोग] की सम्भावना बनी रहनेसे सुखात्मक [कहा गया है ।]

इस पंक्तिमें ग्रन्थकारने करण तथा विप्रलम्भ शृङ्गारका भेद दिखलाया है । करुण-१. तालिकायत्वात् । २. स्युर्या ।

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रसश्च मुख्यलोकगतः प्रेक्षकगतः काव्यस्य श्रोत्र-चतुरुसन्धायिकधरयगतो वेति। 'स्पष्टा:' इति स्पष्टा: सम्यङ् निरीक्ष्यते। य्रसनुद्र्गं हि लिङ्‌गं भवति । श्रनुभावयन्ति

रसको दुःखात्मक श्रौर विप्रलम्भ श्रृङ्गारको सुखात्मक रस माना है । इस भेदका कारण यह है कि विप्रलम्भ श्रृङ्गारमें पुनर्मिलनकी सम्भावना बना रहती है । किन्तु करुणमें पुनर्मिलनकी सम्भावना नहीं रहती है । रामचन्द्रके जीवनमें सीता हराएक बादका प्रसंग विप्रलम्भ शृङ्गार का प्रसंग है श्रौर सीतानिष्कासनके बादका प्रसंग करुणारसका प्रसंग है । इसी भेदको महाकवि भवभूतिने उत्तर रामचरितमें इस प्रकार दिखलाया है—

उपायानां भावादविरलविनोदव्यतिकरैः, विमदैर्वीरारारां जनितजगलयद्भुतरसः । वियोगो मुग्धाच्छया स खलु रिपुगणातावधिरमूत्, कटुस्तूपणी सख्यो निरवधिरयं तु प्रविलयः ॥

करुण तथा विप्रलम्भ दोनोंमें प्रियजनका वियोग होता है । उस वियोगमें दोनों जगह दुःखी व्यक्ति रुदन विलाप श्रादि करता है । पर इन दोनोंका भेद कराने वाली सीमारेखा मरण है । मरणके पहले वाला वियोग विप्रलम्भका क्षेत्र है श्रौर मरणके बादका वियोग करुण का क्षेत्र है । विप्रलम्भश्रृङ्गारमें पतित-पत्नीका वियोग होता है, पर किसका मरण नहीं होता है । इसलिए उस वियोगकी श्रवस्थामें किया जाने वाला रुदन श्रौर विलापादि सब विप्रलम्भश्रृङ्गारकी सीमामें ग्राता है । किन्तु जहाँ किसी एककी मृत्यु हो जानेके बाद उस प्रकारका रुदन श्रौर विलाप पाया जाता है वह सब करुणकी सीमामें ग्राता है । करुणरसी सीमाका निर्घारर्ष करने वाला यह मरण कभी वास्तविक भी होता है श्रौर कभी श्रवास्तविक भी हो सकता है । श्रवास्तविक मरणका श्रभिप्राय यह है कि वास्तवमें

मृत्यु तो नहीं हुई है किन्तु किसी कारणसे पतित-पत्नी दोनोंमेंसे किसी एकने अपने दूसरे साथी की मृत्यु समभ ली है । जैसे रामचन्द्रने सीताको बनमें भिजवानेके बाद यह समभ लिया है कि 'काव्याद्ृष्टरत्नलतिका नियतं विलुप्ता' सीताके शरीरको मिट्टी ही जंगलके मांसभक्षी सिंहादि प्राणी खा गए हैं । यथपि सीता मरी नहीं है किन्तु रामचन्द्रने उसको मरा हुश्रा समभ लिया है । फलतः उत्तररामचरितमें किया गया रामचन्द्रका सारा विलाप करुणरसका विषय, श्रौर उत्तररामचरितको करुणरस प्रधान नाटक माना जाता है । इसलिए उत्तररामचरितमें सीताके इस वियोगको 'निरवधिरयं तु प्रविलय:' कहा गया है ।

रसका श्राश्रय— इस प्रकार ग्रन्थकारने यहाँ तक रसोंको सुखात्मक श्रौर दुःखात्मक दो वर्गोंमें विभक्त करते हुए सारे रसोंको सुखात्मक माने जानेके सिद्धांतका विस्तारपूर्वक खण्डन किया है । श्रव श्रागे श्रौर व्याख्या श्रारम्भ करते हुए लिखते हैं कि—

ग्रौर रस [मुख्य लोकगत श्रर्थात्] ग्रन्थकार्यगत [प्रर्थात् रागादिगत] होता है ग्रथवा सामाजिकगत होता है। [प्रर्थात् मुख्य रूपसे नटमें रस नहीं रहता है ] ग्रौर काव्यमें [काव्यके] श्रोता ग्रथवा निर्माता [श्रतुसन्धायक] इन दोनोंमें रहता है । [प्राप्ते कारिकार्मे ग्राते हुए 'स्पष्टाखु- भावनिश्चित्यै:' पदकी ध्याश्या करते हैं ] 'स्पष्टा' इससे स्पष्ट ग्रर्थात् भली प्रकारसे निरीक्षित

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परस्थानपि रसानवबोधयन्नीति ग्रनुभावा:। स्तम्भ-स्वेद-व्रणु-रोमांच-भ्रू-लेप-ग्रादयः।। तैर्यथासम्भवं सत्त्वया निश्चयः । इह तावत् सर्वलोकप्रसिद्धा परस्थस्य रसस्य प्रतिपत्तिः । सा च न प्रत्यक्षा चेतो- धर्माणामतीन्द्रियत्वात्। तस्मात् परोक्षैव । परोक्षा च प्रतिपत्तिरविनाभूताद् वस्त्वन्तरात् । श्रत्र च रसेनदृश्यस्य वस्त्वन्तरस्यासम्भवात् । कार्यमेवाविनाकृतम् ।

[ग्रनुभावोंके द्वारा रसकी लि‌ञ्चय होता है]। क्योंकि ग्रन्थविधि ही लिङ्ग [ग्रनसूचक] होता है । [ग्रागे इस पदमें ग्राए हुए 'ग्रनुभाव' पदको व्युत्पत्ति विखलाते हैं] ग्रनुभव कराते हैं ग्रर्थात् दूसरमें रहने वाले रसोंको लक्षित करते हैं इसलिए ['ग्रनुभावयन्निति ग्रनुभावा:' इस व्युत्पत्तिके ग्रनुसार] स्तम्भ, स्वेद, व्रणु, रोमाञ्च, भ्रू-लेप ग्रादि 'ग्रनुभाव' [कहलाते हैं] । उनके द्वारा यथासम्भव सदृुपमें निश्चय किया जानेबाला [रत्यादि स्थायिभाव रस कहलाता है]।

यहां [काव्य नाटक ग्रादिमें] दूसरे [रामादिमें] रहने वाले रसकी प्रतीति सारे लोक में प्रसिद्ध है । [बह ग्रन्थ:करणारवातिनी होती है ।] ग्रौर ग्रन्थ:करणाके धर्मोंकि इन्द्रियग्राह्या न होनेसे प्रत्यक्ष नहीं कहों जा सकती है। इसलिए परोक्ष रूप हो है । ग्रौर परोक्ष प्रतीति उससे ग्रविनाभूत [ग्रर्थात् जिसके विना वह प्रतीति नहीं बन सकती है] इस प्रकारके [शब्द या लिङ्ग श्रादि] ग्रन्य वस्तुके द्वारा होती है । ग्रौर रसमैं [इस प्रकारकी] ग्रन्य वस्तुका सम्भव न होनेसे उसका कार्य [ग्रर्थात् ग्रनुभावादि] ही [रसके] ग्रविनाभूत है। इसलिए उन्हींके द्वारा रसकी प्रतीति होती है ।

इस प्रकृतमें ग्रन्थकारने यह कहा था कि ग्रनुभावादि कार्य ही रसके ग्रविनाभूत या नान्तरीयक होते हैं इसलिए उनके द्वारा ही रसकी प्रतीति होती है । इसपर यह शंका उपस्थित की जा सकती है कि ग्रनुभावादिको रसका नान्तरीयक यां ग्रविनाभूत नहीं कहा जा सकता है। इसका कारण यह है कि रसका ग्रविनाभूत केवल उनको कहा जा सकता है जो रसके बिना हो न ही सकें । स्तम्भ स्वेदादि ग्रनुभावोंकी वह स्थिति नहीं है । वे तो रसके बिना भी हो सकते हैं । जैसे ग्रभी ऊपर कहा जा चुका है कि रस या तो मुख्य लोक ग्रर्थात् सामाजिकमें रहता है ग्रथवा प्रेक्षक ग्रर्थात् सामाजिकमें रहता है नटमें रस मुख्य रूपसे नहीं रहता है । किन्तु रसका ग्रभाव होनेपर भी नटमें स्तम्भ-स्वेदादि ग्रनुभाव पाए जाते हैं । इसलिए वे रसके ग्रविनाभूत या नान्तरीयक नहीं है । तब उनसे रसकी प्रतीति कैसे हो सकती है ?

इस शंकाका समाधान ग्रन्थकार दो प्रकारसे करते हैं । पहला समाधान तो यह है कि हम नटमें स्वेदादि ग्रनुभावोंके द्वारा रसकी ग्रनुमूति नहीं मानते हैं। क्योंकि हमने 'कार्य- मेवाविनाकृतं' कहा है । हम रसके कार्यरूप ग्रनुभावोंको रसका ग्रविनाभूत कहते हैं । नटगत स्तम्भादि रसके कार्य नहीं ग्रपितु कारण हैं । नटगत सामाजिकमें रसानुभूति होती है । इसलिए नटगत स्तम्भ-स्वेद श्र्रादि सामाजिकगत रसके कारण हैं, कार्य नहीं । प्रेक्षकगत व्रणु ग्रादि उसके कार्य हैं । उन प्रेक्षकगत ग्रनुभावादिको देखकर दूसरोंको परस्थ रसकी प्रतीति होती है । यह ग्रन्थकारके द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रथम समाधानका ग्रभिप्राय है ।

इस समाधानके विषयमें एक बात विशेष रूपसे ध्यान देनेकी यह है कि यहां ग्रन्थकार ने प्रेक्षकगत ग्रनुभावादिको कार्यरूप कहा है, ग्रौर उनके द्वारा 'परस्थ' रसकी प्रतीतिक

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परगतविभावाद्यनुकार्यां च पररञ्जनार्थ प्रवृत्तस्य नटस्य रसाभावेsपि स्तम्भस्वेदादयो भवन्तीत, नैषां रसनान्तरीयकत्वमाशङ्कनीयम्। तेषां परगतरसजनकत्वेन कार्यत्वात्। नटगता हि स्तम्भादय: प्रेक्षकगतरसानां कारणम्। प्रेक्षकगतरस्तु कार्यास्ते। परोचं चार्थं बुझुत्कुना परोचार्थ-नान्तरीयके लिङ्गस्वरूपे निपुणेन प्रतिपत्त्रा भाव्यम्।

उपपादन किया है। यह सिद्धांत श्रन्य सिद्धांतोंसे विलक्षण है। श्रन्य सिद्धांतोंमें रसको साक्षात्कारात्मक ब्रह्मानन्द-सहोदर माना गया है। परन्तु यहाँ रसकी परोक्षात्मक श्रोद परस्य प्रतीतिका उपपादन किया गया है।

पंक्तियों का श्रर्थ निम्न प्रकार है--

दूसरोंके मनोरञ्जनकेलिए, दूसरोंमें [प्रथमतः ग्रनुकायं राम ग्रादिमें] रहनेवाले विभावके ग्रनुकरणमें प्रवृत्त होनेवाले नटमें रसका प्रभाव होनेपरभी स्तम्भ स्वेदादि [प्रनुभाव] होते हैं इससे उनके रसके ग्रविनाभूत न होनेकी शङ्का नहीं करनी चाहिए। क्योंकि वे [प्रथमतः नटगत स्तम्भ स्वेदादि ग्रनुभाव] परगत [प्रथमतः सामाजिकमें रहनेवाले] रसके जनक होनेसे [रसके] कार्य नहीं [प्रविनाभाव कारण] होते हैं। नटगत स्तम्भ ग्रादि सामाजिकगत रसके कारण होते हैं। सामाजिकगत [स्तम्भ ग्रादि] के [रस के] कार्य होते हैं।

ग्रन्थकारने यहां यद्यपि नामतः किसिके मतका उल्लेख नहीं किया है किन्तु उनके इस लेखसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि इस विषयमें शङ्कुकके ग्रनुमितिवादका ग्रनुसरण कर रहे हैं। परन्तु इनका ग्रनुमितिवाद भी भरत सूत्रके व्याख्याता ग्राचार्य शङ्कुकके ग्रनुमितिवादसे कुछ भिन्न-सा है। शङ्कुकके मतमें नटगत ग्रनुभावादिसे रसकी ग्रनुमिति मानी गई है। परन्तु यहां सामाजिकगत ग्रनुभावादिके द्वारा उसकी ग्रनुमतिका प्रतिपादन किया गया है।

परोक्ष ग्र्रथकों जाननेकी इच्छा रखने वालोको परोक्ष ग्र्रथके ग्रविनाभूत लिङ्गके स्वरूपके समभनेमें निपुण ज्ञाता होना चाहिए।

इस पंक्तिका श्रभिप्राय यह है कि परस्थ रसका ग्रनुमान करने वाला व्यक्ति इस विषयको भली प्रकार समझता हो। क ग्रनुक प्रकारके ग्रनुमानव् ग्रनुमिति शङ्कुक प्रकारकी मनःस्थिति में होते हैं। तभी वह सामाजिक या प्रेक्षकगत विशेष प्रकारके ग्रनुभावोंको देखकर उसमें शृङ्गार वीर ग्रादि विशेष रसोंका ग्रनुमान कर सकता है। इस प्रकार ग्रन्थकारने यहां परगत रसके ग्रनुमानका प्रकार तो दिखला दिया। किन्तु प्रेक्षकगत ग्रनुभावादिसे रसकी प्रतीति किसको होती है यह प्रश्न ग्रनुत्तरित रह जाता है। सभी प्रेक्षकोंको एक-दूसरेमें रहने वाले रसकी परोक्ष प्रतीति होती है यही एक समाधान इस प्रश्नका हो सकता है। किन्तु वह कुछ उचित प्रतीत नहीं होता है। रसकी प्रतीति सामाजिकको साक्षात्कारात्मक होती है तभी उसका ग्रास्वादन बन सकता है। परोक्ष ज्ञानको ग्रास्वादन नहीं कहा जा सकता है।

दूसरा समाधान, नटमें ग्रनुभावोंकी स्थित--

ग्रनुभावोंके द्वारा रसकी प्रतीति होती है इस सिद्धांतके विषयमें यह शङ्का उठाई गई थी कि ग्रनुभावोंको रसोंका ग्रविनाभूत या नान्तरीयक नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि

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नटेडपि च रसं गमयन्त्येव यदा रसकार्या भवन्ति। न च नटस्य रसो न भवतीत्येकान्तः। परयस्त्रियो हि धनलोभेन पररत्यर्थ रतादि विप्रलम्भनृत्यः कदाचित् स्वयमपि परां रतिमनुभवन्ति। गायनाश्च परं रञ्जयन्तः कदाचित् स्वयमपि रञ्जयन्ते। एवं नटोडपि रामादिगतं विप्रलम्भाद्यनुकुर्वाणा: कदाचित् स्वयमपि तन्मयीभावसुपया- त्येवति तद्गता ऽपि रोमाञ्चादयस्तत्र रसं गमयुरेव। श्रत एव 'स्पष्टानुभाव' इत्युस्तम्।

रोमाञ्चादयश्च ये स्त्री-पुं-सनट-काव्यस्थापरेपां रसजनकत्वाद् विभाव- मध्यवर्तिनः। प्रेक्षक-श्रोत्र-मनुसन्धातृादिस्थितास्तु रसस्य कार्योऽपि सन्तो व्यवस्थापकाः। यत्र विभावा: परमार्थेन सन्तः प्रतिनियतविषयमेव स्थायिनं रसत्वमापादयन्ति, तत्र नियतविभोल्लेखी रसास्वादप्रत्यः। युवा हि रागवती युवतिमवलम्ब्य तद्रिष्या-मेव रति श्रृङ्गारतायास्वादयति

नटमे रसके न होनेपर भी ग्रनुभाव उत्पन्न होते हैं। तब जिन ग्रनुभावोंकी रसके साथ व्याप्ति या श्रविनाभाव ही नहीं है उनसे रसकी प्रतीति या ग्रनुमिति कैसे हो सकती है ? इस शंकाका एक समाधान ग्रन्थकारने यह दिया कि नटगत ग्रनुभावोंसे रसकी प्रतीति नहीं होती है ग्रपितु प्रेक्षकगत कार्यभूत ग्रनुभावोंसे रसकी प्रतीति होती है। ग्रव इसी विषयमें दूसरा समाधान यह भी रहे है कि नटमें रस नहीं होता है यह बात भी नहों है। नटमें भी रस हो सकता है। इसलिए नटगत ग्रनुभाव भी रसके श्रविनाभूत हैं। इसी बातको ग्रन्थकार ग्रगली पक्तियोंमें निम्न प्रकार लिखते हैं—

[नटमें रहने वाले ग्रनुभावादि] जब [नटगत] रसके कार्य [प्रथ्यांत नटगत रसेसे उत्पन्न] होते हैं तब वे नटमें भी रसका ग्रनुमान कराते हैं। श्रौर नटमें रस होता ही नहीं है यह कोई नियम नहीं है। वेइयाएं जो धनके लोभसे दूसरोंको [भोगके लिए] रति श्रादिका ग्राविर्भाव देती हैं कभी स्वयं भी ग्रप्रत्यक्ष ग्रानन्दका ग्रानुभव करती हैं। श्रौर गाने वाले दूसरोंके मनोरंजनके लिए गाते हुए कभी स्वयं भी ग्रानन्द-सुख हो जाते हैं। इसी प्रकार नट भी रामादिगत विप्रलम्भादि श्रृङ्गारका ग्रनुकरण करते हुए कभी स्वयं भी तन्मयीभावको प्राप्त हो जाता है। इसलिए उसमें रहने वाले रोमाञ्च ग्रादि [ग्रनुभाव] भी [उसके भीतर रहने वाले] रसका ग्रनुमान कराते हैं। इसलिए [कारण] 'स्पष्टानुभावतयैच:' यह कहा गया है। [प्रथांत् प्रेक्षकमें या नटमें जहाँ भी रसके कार्यभूत ग्रनुभव स्पष्ट रूपसे प्रतीत हों वहाँ वे रसका ग्रनुमान करा सकते हैं।]

[लोकमें] स्त्री, पुरुष, नट, तथा काव्यमें स्थित जो रोमाञ्च आदि [ग्रनुभाव] होते हैं वे ग्रन्थ्योंमें [स्थित] रसके जनक होनेसे [रसके कार्यभूत] विभावोंमें [गिने जाते] हैं। [इसके विषयमें] नाटकादि दृश्य-काव्यके] प्रेक्षक [श्रध्य-काव्यके] श्रोता तथा [उन दोनोंके] ग्रनुसन्धाता [प्रथांत् निर्माता कवि]में स्थित [रोमाञ्चादि] तो रसके कार्य रूप होनेसे [रसके ग्रनुसन्धाता [प्रथांत् निश्चायक] होते हैं।

जहां [प्रथांत् लोकमें] वास्तविक रूपमें स्थित विभाव [सीता राम ग्रादि] निश्चित व्यक्ति-विशेषमें [रति ग्रादि रूप] स्थायिभावको रसत्वताको प्राप्त कराते हैं वहाँ रसका ग्रानुसन्धाता [प्रथांत् निश्चायक] होता है। जैसे कि [लोकमें कोई] युवक किसी युवतिको लेकर ग्रास्वादन होता है।

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यत्र तु परानुरक्तां वर्णितामलम्ब्य सामान्यविषया रतिरुपचयमुपैति, तत्र न नियतविषय: शृङ्गाररसास्वाद: । विभावानां सामान्यविषये स्थाय्यविभावकत्वात् । वन्धुशोकार्त्तां च रुदतीं स्त्रियमवलोक्य सामान्यविषय एव करुणरसास्वाद: । एवं सन्येष्टेपि रसेऽपि विशेष-सामान्य-विषयत्वं दृष्टव्यम् ।

उसके विषयमें ग्रापनी रतिको शृङ्गाररके रूपमें ग्रास्वादन करता है । [इसी प्रकार लोकमें वास्तविक रूपसे विद्यमान सीता-रामादि रूप विभावमें नियत विद्ववसे सम्बद्ध रूपमें ही रसास्वादकी ग्रानुभूति होती है । यहाँ रसकी प्रतीति विशेष-विषयक ग्रौर लौकिकी हुई । ग्रापे सामान्य-विषयक रसकी प्रतीतिका ग्रालोकपता का उपपादन करते हैं ।]

जहां [लोकमें वास्तविक रूपसे स्थित, पर] ग्रन्थमें ग्रानुरक्त वनिताको [प्रर्थात् परकोया नायिका] को लेकर [ग्रनेक व्यक्तितयोंमें] सामान्य विषयक रति परिपोषण होता है वहां नियत व्यभिचारविभावसे सम्बद्ध रूपमें शृङ्गाररसका ग्रास्वाद नहीं होता है [प्रर्थात् एक स्त्रीसे ग्रनेक व्यक्तियोंकी सामान्यरूपसे शृङ्गारानुभूति होती है] क्योंकि [ऐसे उदाहरणोंमें स्त्री ग्रादि रूप] विभावोंसे सामान्य रूपसे [ग्रनेक व्यक्ति विषयक रतिका ग्रादि] स्थायिभाव का ग्राभिव्यभाव होनेसे [सामान्य-विषयक ही रसास्वाद होता है] । इसी प्रकार ग्रापने किसी प्रिय बन्धुबन्धु वियोगास पीड़ित युवतिका रति हुए देखकर [देखने वाले ग्रनेक व्यक्तियोंका] सामान्य विषयक हो करुणरसका ग्रास्वाद होता है ।

[इस प्रकार इन दो उदाहरणों द्वारा प्रष्णाकरण यह दिखलाया है कि शृङ्गार ग्रौर करुण दोनों रसोंकी सामान्य-विषयक तथा विशेष-विषयक दोनों प्रकारकी स्थिति होती है । यही बात ग्रन्य रसोंके विषयमें भी समझनी चाहिए । इसी बातको ग्रागले पंक्ति में लिखते हैं ।] इसी प्रकार ग्रन्य रसोंमें भी सामान्य-विषयत्व ग्रौर विशेष-विषयत्व समझ लेना चाहिए ।

यह जो रसोंका सामान्य-विषयत्व तथा विशेष-विषयत्व दिखलाया है वह वास्तविक रूपसे विद्यमान 'परमार्थेन सन्त:' विभावादिकी द्वारा उत्पन्न रसोंके विषयमें कहा गया है । 'परमार्थसत्ता' वास्तविक रूपमें विद्यमान विभावादिकी स्थिति लोकमें ही होती है, काव्य नाटक ग्रादिमें नहीं । इसलिए यह सामान्य ग्रौर विशेषतः द्विविध रसोंकी स्थिति भी लोक में ही हो सकती है । काव्य या नाटकमें नहीं । काव्य ग्रौर नाटकमें साधारणीकरण व्यापार द्वारा सामान्य रूपसे ग्रनेक व्यक्तितयोंमें रसकी ग्रानुभूति होती है ।

इस बातको ग्रागले प्रकरणमें दिखला रहे हैं । किन्तु यहाँ एक बात विशेषरूपसे ध्यान देने योग्य है ग्रौर वह यह बात है कि ग्रन्थ ग्राचार्यनि रसको ग्रलौकिक माना है । लोकमें होने वाली स्त्री-पुरुषकी परस्पर रतिको ग्रन्थ ग्राचार्योंने रस नहीं माना है । काव्य नाटकमें होने वाले विभावादिको ही उन लोगोंने विभावादि शब्दसे कहा है । उनके मतमें विभावादि शब्द भी लोकके नहीं काव्य नाटकके क्षेत्रमें ही सीमित शब्द है ।

यहां ग्रन्थकारने लौकिक स्त्री-पुरुष ग्रादिको भी 'विभावादि' शब्दोंसे ग्रौर उनकी रति ग्रादिको भी 'रस' शब्दसे निर्दिष्ट किया है । इसलिए उन्होंने सामान्य-विषयक ग्रौर विशेष-विषयक द्विविध रसोंकी स्थिति मानी है । उनका यह सिद्धान्त ग्रन्थ ग्राचार्योंने विलक्षण है ।

इस प्रकार लौकिक रसादि-विषयक विवेचना करनेके बाद ग्रब ग्रन्थकार ग्रागले प्रकरणमें काव्य-नाटकगत रसोंकी विवेचना करते हुए लिखते हैं—

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ये पुनरपरमार्थसन्तोडपि काव्याभिनयाभ्यां सन्त इवोपनीता विभावास्ते श्रोत्र-

ग्रनुसन्धातृ-प्रेक्षकाभ्यां सामान्यविषयमेव स्थायिनं रसत्वमापादयन्ति। छात्र च विषय-

विभागानपेक्षी रसास्वादप्रत्ययः। न हि रासस्य सीतायां श्रृङ्गारेऽनुक्रियामाणे सामाजिकस्य

सीताविषयः श्रृङ्गारः समुल्लसति। अपि तु सामान्यस्त्रविषयः। नियतविषयस्मरणा-

दिना स्थायिनः प्रतिनियतविषयतां तु प्रतिनियतविषय एव रसास्वादः।

तथा डपपरार्थसति, श्रोत्रमन्यग्रन्थयोःपतितानां च विभावानां बहुमाधार्ग-

त्वाद् य एकस्य रसास्वादः सोऽन्यप्रतिपेधात्मा, इत्ययोगव्यवच्छेदेन न पुनरन्ययोग-

व्यवच्छेदेन।

ग्रोर वास्तविक रूपमें न होनेपर भी काव्य या प्रभिनय [नाटक] के द्वारा विद्वमानसे

प्रतीत होनेवाले जो विभावादि हैं वे [काव्यके] श्रोता, ग्रनुसन्धाता [ग्रर्थात् निर्माता] तथा

प्रेक्षक [तीनोंमें] सामान्य विषयक स्थायिभावको ही रसरूपताको प्राप्त कराते हैं। यहाँ

[ग्रर्थात् काव्यनाटकमें] विषय-विभागकी ग्रपेक्षा न करने वाला रसास्वाद होता है। [ग्रर्थात्

काव्य नाटक ग्रादिमें सामान्य-विषयक श्रोत्र विशेष-विषयक दो प्रकारका रसोद्बोध नहीं होता

है ]। रामके सीता-विषयक श्रृङ्गारका प्रतुतकरणे होनेपर समाजमें होता-विषयक [ग्रर्थात्

व्यक्ति-विशेषसे सम्बद्ध] श्रृङ्गारानुभूति नहीं होती है [ग्रपितु सामान्य स्त्री-विषयक [श्रृङ्गारकी

ही ग्रनुभूति होती है । लोकमें नियत विषयके विभावान न होनेपर भी] नियत विषयके स्मरणादि

से नियत-विषयक [ग्रर्थात् उस स्मरमाणारे व्यक्ति-विशेषसे सम्बद्ध] हो रसास्वाद होता है।

ग्रर्थात् लोकमें भी विभावादिकी वास्तविक रूपसे विद्वमान ग्रोर वास्तविक रूपसे

ग्रविद्यमान होनेपर भी स्मरमाणारे, दो रूपोंमें स्थिति हो सकती है। ग्रोर उनसे विशेष-विषयक

ग्रर्थात् विशेष-व्यक्तिसे सम्बद्ध रूपमें भी रसानुभूति हो सकती है। किन्तु काव्य ग्रोर नाटच

में विभावादि वास्तविक रूपमें विद्वमान नहीं होते हैं। केवल काव्य तथा ग्रभिनयके द्वारा

समर्पित होते हैं। इसलिए उनसे विशेष-विषयक रसानुभूति न होकर सामान्य-विषयक रसा-

नुभूति ही होती है। इस वातको ग्रागली पंक्तियोंोंको इस प्रकार लिखते हैं—

ग्रोर वास्तविकमें ग्रविद्यमान किन्तु [केवल] काव्य तथा ग्रभिनयकेद्वारा समर्पित विभावोंके

ग्रनेक पुरुषोंके लिए समान होनेसे [बहुसाधारग्रतया] जो [उन बहुतसे सामाजिकोंमें] किसी

एकका रसास्वाद वह ग्रन्यकका प्रतिबिम्बक रूप [ग्रर्थात् ग्रन्योंकी रसानुभूतिमें बाधक] न होने

से[उस विशेष सामाजिकमें] ग्रन्ययोगव्यवच्छेदसे [ग्रर्थात् ग्रन्योंमें उसकी स्थितिमें बाधक बनकर] नहीं रहता है।

यहाँ 'य एकस्य रसास्वादः सोऽन्यप्रतिपेधात्मा इत्ययोगव्यवच्छेदेन न पुनरन्ययोग-

व्यवच्छेदेन' यह सारी पंक्ति तनिक क्लिष्ट पंक्ति है। पंक्तिके ग्रारम्भमें 'तथा परमार्थसन्तां'

पद भी संदिग्ध-सा या भ्रमजनक हो सकता है। उसमें 'तथा' के ग्रागे 'परमार्थसन्तां' पदच्छेद

न करके 'तथा ग्रपरमार्थसन्तां' इस प्रकारका पदच्छेद करना चाहिए। क्योंकि काव्य नाटक

ग्रादिमें जो विभावादि होते हैं वे 'परमार्थसन्त्' वास्तविक रूपमें विद्यमान नहीं होते हैं। इस-

लिए यहाँ 'तथा ग्रपरमार्थसन्तां' यही पदच्छेद करना उचित है। इसके बाद 'य एकस्य रसा-

स्वादः सोऽन्यप्रति क्षेपात्मा' इस प्रकारका पाठ पूर्व संस्करणमें छपा था। पूर्व पाठके समान

१. परमार्थसन्तः।

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एवं च लोके काव्ये वा सर्वरसिकसाधारणयो रसास्वादो न पुनः सर्वथाप्याधारतुल्यलेखी । श्राधारोलेखनिरपेक्ष्यारिचत्तवृत्तेः कस्याश्चिदनुपलब्धत्नात् । चित्तवृत्तिविशेषश्च रसः ।

यह पाठ भी श्रत्यन्त भ्रामक पाठ है । मूल पाण्डुलिपमें तो यहाँ ‘सोऽन्याप्रतिक्षेपात्मा’ पाठ था । किन्तु पूर्व संस्करणोंके सम्पादक महोदयने ‘सोऽन्यान् प्रति क्षेपात्मा’ यह पाठ सुधारा है । किन्तु यह पाठ ठीक नहीं है । ‘सोऽन्याप्रतिक्षेपात्मा’ यही ठीक है । इसका श्रभिप्राय यह है कि काव्य-नाटकमें समर्पित विभावादिसे जो एक व्यक्तिको रसास्वाद होता है बहु श्रन्य लोगोंका प्रतिक्षेप नहीं करता है । श्रर्थात् श्रन्योकी रसप्रतीति का बाधक या निपेध करने वाला नहीं होता है । काव्य नाटकमें जिस समय किसी एक व्यक्तिको रसास्वाद हो रहा है उसके साथ ही श्रन्य श्रनेक व्यक्तियोंको भी रसास्वाद होता है । इसी बातको ग्रन्थकारने यहाँ ‘सोऽन्याप्रतिक्षेपात्मा’ पदसे दिखलाया है । इसलिए यही पाठ ठीक है । पूर्व संस्करणमें सुधाया गया पाठ ठीक नहीं है ।

ग्रब ग्रागे ‘ग्रयोगव्यवच्छेदेन न पुनर्योगव्यवच्छेदेन’ वाली पंक्ति श्राती है । इसका श्रभिप्राय यह है कि काव्य नाटकमें जो एक व्यक्तिका रसास्वाद होता है वह ‘ग्रयोगव्यवच्छेदेन’ उस विशिष्ट व्यक्तिको होता है ‘ग्रनयोगव्यवच्छेदेन नहीं । ‘ग्रयोगव्यवच्छेद’ का श्रर्थ उस व्यक्तिमें रसके श्रयोग श्रर्थात् प्रभावका व्यवच्छेद श्रर्थात् निपेधक श्रर्थात् उसमें सद्भावका सूचक रूप होता है । इसमें ‘ग्रयोग’ श्रौर ‘व्यवच्छेदक’ दो शब्द श्राए हैं । इन दोनों का श्रर्थ श्रभाव-परक है । श्रभावका श्रभाव श्रर्थात् भाव होता है । दो निपेक्षोंके एक साथ प्रयुक्त होने पर उनका श्रर्थ भाव हो जाता है । यहाँ श्रभाव परक ‘ग्रयोग’ तथा ‘व्यवच्छेदक’ दो शब्दोंका एक साथ प्रयोग होनेसे उनका श्रर्थ भाव रूप बन जाता है । श्रर्थात् काव्य श्रौर नाटकोंमें जो एक व्यक्तिका रसास्वाद होता है वह उस व्यक्तिमें रसकी सत्ताका ही बोधक होता है ।

'न पुनरन्ययोगव्यवच्छेदेन' यह इस पंक्तिका दूसरा भाग है । इसका श्रर्थ ‘ग्रन्ययोग’ श्रर्थात् ग्रन्यके साथ सम्बन्धका ‘व्यवच्छेदक’ श्रर्थात् निषेधक रूपमें ‘न’ श्रर्थात् नहीं है यह श्रर्थात् काव्य नाटकोंमें जो एकका रसास्वाद होता है वह ‘ग्रनन्ययोगव्यवच्छेदक’ होता है । श्रर्थात् ग्रन्य व्यक्तियोंके साथ उसे निषेधकके रूपमें नहीं होता है । श्रर्थात् ग्रन्य व्यक्तिको रसास्वाद न हो । लोकमें तो रसास्वाद विशेष व्यक्तियों तक सीमित भी हो सकता है । उस दशामें एक व्यक्तिका रसास्वाद ग्रन्य व्यक्तियोंके रसास्वादमे बाधक हो सकता है । किन्तु काव्य नाटकमें एक ही सामग्रीसे एक व्यक्तिको जो रसास्वाद होता है वह उसी सामग्रीसे ग्रन्यके होने वाले रसास्वादमें बाधक नहीं होता है । यह ग्रन्थकारका श्रभिप्राय है ।

इस प्रकार लोकमें श्रौर काव्यमें [दोनों जगह] सब रसिकोंके लिए साधारण रूपसे रसास्वाद होता है । [लोकमें विशेष-विषयक रसास्वाद केवल विशेष रसिक तक सीमित होता है । किन्तु सामान्य-विषयक रसास्वाद रसिकमात्रसे सम्बन्ध रखता है । इस श्रभिप्रायसे ‘सर्वरसिकसाधारणः:’ कहा है । उसके] श्राधारका सर्वथा श्रप्रतुलेख करने वाला नहीं होता है [चित्तवृत्तिके श्राधारके उल्लेखसे रहित रसानुभूति नहीं हो सकती है । चित्तवृत्तिका श्राधार रसिक

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श्रृङ्गार च रत्यादिर्विभावैरविभावितस्तस्य पोषकारिस्थो व्यभिचारिरणो रसिकगता एव प्राध्याः । यदा हि विभावैः स्थायिभावः कार्यनाट्यगतैर्वा श्रृङ्गारस्य रस्यादयो रसोन्मुख-त्वेनोन्मील्यन्ते, तदा यथायोगं व्यभिचारिभिरप्योडप तत्र प्रादुर्भवः शान्त । न हि स्थायिभावचिन्तां शृङ्गारो, धृति हास्यो, विषादं करुणो, स्मरर्ष रौद्रो, हर्ष वीरः, त्रासं भयानकः, शोकां बीभत्सः, श्रुत्सुक्यमदसुतो, निर्वेद शान्तः सहचारिभिः विना प्रादुर्भवति । शृङ्गारगतचेतसो विरक्तचेतसो वा, शोकव्यभिचारो दैन्येनोष्णो, वनितावियोगदुःखेन्तरदपि वा चिन्ताद्यभावे रसाभावात् । सौहृद्यादाशुभभावाच्च क्वचिदनुपलच्योऽपि न दोषः । प्रादुर्भूतास्तच व्यभिचारिरणो रसोन्मुखे स्थायिनि पोषयन्तो रसत्वमापादयन्ति । श्रृङ्गार एव रसत्वान्मुखानां स्थायिनां व्यभिचारिरणः सहचारिणो, विभावास्तु प्राभविनः ।

है । जिसकी चित्तवृत्ति हो वह व्यक्ति उस चित्तवृत्तिक श्राधार हेतु ।] चित्तवृत्ति-विशेष ही रस है । [इसलिए इस प्रतीतिमें उसके श्राधारभूत रसिकका सम्बन्ध श्रप्रत्य रहता है । यह प्रन्थकारका श्रमिप्राय है ।

और यहां विभावोंसे श्राधिभूत होने वाले रति आदि [स्थायिभाव] को पुष्ट करने वाले व्यभिचारिभाव रसिकगत हृी लेने चाहिये । [नटगत या ग्रन्थकायंगत व्यभिचारियोंसे सामाजिकगत रत्यादिको पुष्टि नहीं होती है । यह श्रमिप्राय है ।] जब [लोकमें] स्त्री ग्रादि विभावोंसे, ग्रन्थका काव्य नाटयगत विभावोंसे रत्यादिको रसोन्मुख रूपसे उन्मीलन होता है तब [उन सामाजिकोंके] भीतर यथोचित व्यभिचारिभावोंका भी श्राधिभाव होता है । क्योंकि स्त्री श्रादिको चिन्ता [ रूप व्यभिचारिभाव ] के बिना शृङ्गाररस, श्रृङ्गार [ रूप व्यभिचारिभाव] के बिना हस्य, विषाद [ रूप व्यभिचारिभाव ] के बिना करुणा, स्मरष्के [रूप सहचारी] के बिना रौद्र, हर्षके [रूप वीर, त्रास [ रूप सहचारी] के बिना भयानक, शोक [रूप सहचारी] के बिना बीभत्स, श्रोत्सुक्य [ रूप सहचारी] के बिना वीर निर्वेद [रूप सहचारी] के बिना शान्त प्रादुर्भूत, शृङ्गार निर्वेद [रूप सहचारी] के बिना शान्त

के बिना ज्ञानतका श्राधिभाव नहीं हो सकता । क्योंकि चित्तके दूसरी ग्रोर लगे होनेपर ग्रथवा विक्षिप्तचित्तको चिन्तादि [सहचारी] के प्रभावमें [काव्य नाटकके] वाच्यपोंके ज्ञान होने पर व्यथवा साक्षात् रूपमें] स्त्री श्रादिके दर्शन होनेपर भी शृङ्गार रसकी ग्रातृप्राप्ति या उत्पत्ति नहीं होती है । [कहीं यदि चिन्तादिके बिना भी रसकी प्रतीति श्रानुभव हो तो वहीं यह समाधान चाहिये कि] सूक्ष्म होनेके काररा ग्रथवा अत्यन्त श्रोप्रताके काररण [उन सह-चारियोंकी स्थिति होनेपर भी] उनके न दिखलाई देनेके कारण उसमें कोई दोष नहीं ग्राता है । [इस प्रकार लौकिक स्त्री श्रादि विभावों ग्रथवा काव्य नाटकगत विभावोंसे रसिकोंमें] प्रादुर्भूत होने वाले व्यभिचारिभाव रसोन्मुख स्थायिभावको पुष्ट करते हुए [उसको] रसत्वको प्राप्त कराते हैं । इसीलिए व्यभिचारिभाव रसोन्मुख स्थायिभावोंके सहचारी [कहलाते] हैं । ग्रोर विभाव तो [स्थायिभावोंके] पूर्ववर्ती [ग्रथवा कारण कहलाते] हैं ।

रसके लक्षणोंकी कारिकामें ग्रन्थकारने ‘स्थायिभावो विभाव्यभिचारिभिः’ यह कहा था । इसमें व्यभिचारिभावसे ग्रन्थकार रसिकगत व्यभिचारिभावोंका ग्रहण करना चाहते हैं। यद्यपि व्यभिचारिभाव नटादिमें भी हो सकते हैं किन्तु उन सबको वे केवल विभाव मानते हैं । नटगत ग्रनुभाव व्यभिचारिभाव ग्रन्थकारकी दृष्टिमें विभावकोटिके ही ग्रन्तर्गत होते हैं । इसलिए यहां व्यभिचारिभाव सामाजिकगत ही लेने चाहिये । इसी बातको ग्रोर श्रधिक खोल-

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ये पुनः स्थायिगता: काव्यामिनयोदपदर्शिताश्च व्यभिचारिसंयोनुभावा वा ते परस्मिन् रसोन्मुखवेन् स्थायिनसून्मीलयन्ति । ते विभावा एव जनकत्वान् । व्यभिचारि-चित्रानुभावव्यपदेश: पुनरेतेषां स्थायिव्यपेक्षया, वर्णनीयानुकार्योपेक्षया च । यदप्युच्यते—‘विभावानुरभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्ति:' इति तत्राप्यनुभावा व्यभिचारिष्वेश्च स्थायिद्वार्णनीयानुकार्योपेक्षयैव दृश्यन्ते ।

तदेवं स्व-परयो: प्रत्यक्ष-परोक्षाभ्यां गम: (१) लोकस्य (२) नटस्य (३-४) काव्य-श्रोत्र-ग्रनुसन्धातृणाम् (?) प्रत्यक्षस्य च रस: केवलं मुख्यतया-प् 'यो: स्पष्टतनेव रूपेण रसो, विभावानां परमार्थसत्त्वात् । श्रृङ्गार एवं व्याभिचारिसंयोनुभावाश्च

कर ग्रन्थे लिखते हैं—

श्रृङ्गार [लोकमें] जो स्त्री ग्रादिमें रहने वाले श्रृङ्गारवा [काव्य तथा नाटकमें] काव्य तथा श्रोत्रिनवके द्वारा समर्पित व्यभिचारिभाव श्रृङ्गारवा श्रृभाव होते हैं वे दूसरोंके भीतर [अर्थात् सामाजिकोंके हृदयमें] स्थायिभावको रसोन्मुख बनाते हैं इसलिए [रसासूत्रितेके] कारण रूप होनेसे विभाव हो कहलाते हैं । उनके लिए व्यभिचारिभाव या अनुभाव शब्दका प्रयोग [सामाजिककी दृष्टिसे नहीं होता है अपितु लोकमें केवल] स्त्री प्रादिको ग्रपेक्षासे श्रौर [काव्य नाटकमें] वर्णनीय श्रृङ्गार्यकों ग्रपेक्षासे ही होता है [अर्थात् श्रृङ्गार्यक रामादिमें श्रृङ्गारवा नटमें श्रृङ्गारवा लोकमें स्त्री प्रादि निष्ठ जो श्रनुभाव या व्यभिचारिभाव होते हैं वे उन लोकों हृष्टिसे तो श्रनुभाव या व्यभिचारिभाव कहे जा सकते हैं किन्तु सामाजिककी दृष्टि से वे सब रसके कारण रूप होनेसे विभाव ही कहे जाते हैं । स्थायिभावोंकी पुष्टिके लिए यहाँ जिन श्रनुभावों तथा व्यभिचारिभावोंका ग्रहण किया गया है वे रतिकगत श्रर्थात् सामाजिकगत श्रनुभाव तथा व्यभिचारिभाव हो हो सकते हैं]।

श्रौर [भारतमुनिने] जो “विभाव, श्रनुभाव तथा व्यभिचारिभावोंके संयोगसे रसकी निष्पत्ति होती है” यह कहा है वह यहाँ भी श्रनुभाव श्रौर व्यभिचारिभाव [लोकमें] स्त्री श्रादि [और काव्य नाटकमें] वर्णनीय श्रृङ्गार्यकों ग्रपेक्षासे ही समझने चाहिए ।

इस प्रकार ग्रन्थकारके मतसेन रसकी प्रतीति या रसानुभूतिके श्राधार चार होते हैं । लोकमें (१) स्त्री श्रादि विभावोंमें भी रसकी प्रतीति होती है श्रौर (२) उनको देखने वाले प्रेक्षकोंको भी स्त्री श्रादिकी रसानुभूति स्वगत श्रौर प्रत्यक्षात्मक होती है । प्रेक्षककी रस-प्रतीति परगत श्रौर परोक्षात्मक होती है । नाटकमें (३) नटको स्वगत प्रत्यक्षात्मक, रसप्रतीति श्रृङ्गार (४) प्रेक्षकोंको उस नटगत या परगत रसकी परोक्षात्मक प्रतीति होती है । इसी बातको श्रग्रले श्रनुच्छेद में निम्न प्रकार कहते हैं—

इस प्रकार (१) [लोकस्य] लोकको [अर्थात् लौकिक रूपमें स्थित पुरुषको], (२) [नटस्य श्रर्थात्] नटको, (३) काव्य [तथा नाटक दोनों]के श्रोता, तथा (४) [श्रर्थात् कर्ता]को एवं (४) प्रेक्षक [सामाजिक] को [इन पाँचोंको दो भागोंमें विभक्त करने पर पहले चारको एक कोटिमें रखनेसे उन चारोंके एक वर्गकी स्वतः प्रत्यक्ष रूपमें तथा पाँचवीं प्रेक्षक श्रर्थात् सामाजिकको परगत श्रौर परोक्ष रूपमें रसकी प्रतीति होती है । इसी बातको यहाँ ‘स्व-परयो: प्रत्यक्ष-परोक्षाभ्यां' शब्दसे कहा है । स्व तथा परको [कमशः] प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूपसे सुख-दुःखात्मक रस प्रतीत होता है । इसमेंसे भी [लोकमें] केवल मुख्य स्त्री-

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रसजन्यः तत्र स्पष्टरुपः। ज्ञात्यत्र तु प्रेक्षकादौ ध्यामलेनैव रुपेऽ। विभावानाम-

परमार्थस्तमेव काव्यादिना दर्शयति। ज्ञात एव व्यभिचारिणोडनुभावश्च रसासु-

सारेऽनुपष्ट एव । ज्ञात एव प्रेक्षकादिगतो रसो लौकत्तर इत्युच्यते ।

काव्यस्य च रसाविभावकविभाववरवत् सरसत्चम् । न पुनः काव्यमेव रसः,

काव्ये श्राधारे वा रसः । श्रितोत्कर्षो हि चेतोव्युत्पत्तिरुपः स्थायी भावो रसः । स चाचे-

तस्य काव्यस्यात्मा । श्रविद्यैव वा कथम् स्थानं ? तत्रः काव्यव्यतिरेकेण तन्वं प्रतिपत्तृगां

रसाविभावः

प्रतिपत्तृश्रचात्मस्य सुखमिव रसमास्वाद्यन्ति । न पुनर्वहिःस्थं रसं मोदक-

मिव प्रतीयान्ति । ज्ञात्रयो हि मोदकस्यास्वादनोडनिश्च प्रत्ययो रसस्य । न हि बहिस्थस्य

रसस्य प्रत्ययमात्रेऽपि रसास्वादश्र्चर्वणात्मकः सङ्गच्छते । भयानक-करुणादिविभावादि

काव्यार्थात् प्रतिपत्तुःचेतोधर्मतया स्थितौ भय-शोकौ भयानक-करुणातया परिसमाप्तः ।

यदि च प्रतिपत्तुः स्थायी एव न रसतया भवति तदा बहिःस्थस्य रसस्य प्रत्ययोडपि न

पुरुषमे विभावोंके वास्तविक होनेसे रसकी स्पष्टरुपसे प्रतीति होती है । इसलिए उनमें रससे

उत्पन्न होने वाले [रसके कार्यरूप] श्रनुभाव तथा व्यभिचारिभाव स्पष्टरुप होते हैं । ज्ञात्यत्र

प्रेक्षक आदिमें [ध्यामल श्रर्थात्] श्रस्पष्ट रुपमे ही [श्रनुभाव व्यभिचारिभाव होते हैं] काव्य-

द्विके द्वारा वास्तविकमे श्रवविद्यमान विभावादिके ही उपस्थित किए जानेसे [उनके द्वारा होनेवाली

रसप्रतीति भी श्रस्पष्ट ही होती है] । इसीलिए [प्रेक्षकादिमें] व्यभिचारिभाव तथा श्रनुभाव

भी रसके श्रनुसार श्रस्पष्ट हो होते हैं । ज्ञात एव प्रेक्षक आदिमें रहने वाला रस [प्रसत्त

विभावोंसे उत्पन्न श्रौर श्रस्पष्ट श्रनुभाव व्यभिचारिभाव युक्त होनेसे] लोकोत्तर कहलाता है ।

रसके श्राविर्भाव करानेवाले विभावादिसे युक्त होनेसे काव्यको सरस माना जाता है ।

न तो काव्य ही रस है श्रौर न काव्य रुप श्राधारमें रस रहता है । [इसलिए काव्यकी सर-

सत्ता का उपपादन रसके श्राविर्भावक विभावादिके उसमें विद्यमान होनेके कारण ही किया जा

सकता है] । परिपुष्ट हुग्रा चित्तवृत्ति रुप स्थायिभाव ही रस [कहलाता है] । वह श्रवेतन

काव्यक ब्रात्मा या श्राधेय नहीं हो सकता है । इसीलिए काव्यके श्र्रथकों समभ्र लेनेके बाद

समभने वाले [प्रेक्षक या श्रोता] के भीतर रसका श्राविर्भाव होता है ।

श्रौर श्रनुभव करने वाले [प्रेक्षकादि] अपने भीतर रहने वाले सुखके समान, रसका

ग्रास्वादन करते हैं । मोदक श्रादिके समान बाहर रहने वाले रसका ग्रहण नहीं करते ।

मोदक प्राविकका ग्रास्वादन ज्ञान प्रकारका होता है श्रौर रसका ज्ञान श्रौर तरहका । बाहर

रहने वाले रसके ज्ञानमात्रसे चर्वणात्मक रसास्वादका उपपादन नहीं हो सकता है । [श्रर्थात्

यदि मोदकादिके समान रसको बहिस्थ बाहर रहनेवाला मान लिया जाय तो उसकी चर्वणा का

उपादान नहीं हो सकता है] । इसीलिए बाह्य रसका श्रनुभव नहीं होता है [ग्रपितु ग्रनुभव करने

वालके हृदयमें भीतर रहने वाले सुखादिके समान ही रसका ग्रास्वादन होता है] । क्योंकि

भयानक तथा करुणा विभावोंका वर्रान करने वाले काव्यके श्र्रथसे ज्ञात [सामाजिक] के

चित्त-धमंकके रुपमें स्थित भय तथा शोक [स्थायिभाव] भयानक तथा करुणा रसके रुपमें परि-

रात हो जाते हैं । यदि सामाजिकका स्थायिभाव ही रस रुप न माना जाय तो फिर बाहर

रहनेवाले रसकी प्रतीति भी नहीं हो सकती है । क्योंकि काव्य या नटमें या कहीं ज्ञात्यत्र रस

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क० ११०, सु० १६४ ] तृतीयो विवेक: [ ३०३

प्राप्नोति। काव्ये नटेडनयत्र वा रसस्यासत्त्वात् । ग्रसस्तश्चापि प्रत्यये श्रहृदयस्यापि प्रतीति: स्यात् । ततो विभावप्रतिपादककाव्यप्रतिपत्तेरनन्तरं प्रतिपत्तुरेव स्थायी रसो भवति । तद्धेतुत्वाच्च काव्यं रसवदति ॥ [७] १०६ ॥

स्यथ रसभेदकथनावसरेऽपि प्रस्तुतावगतानमनुभावादिसंज्ञानां विषयं लक्षणति—

[सूत्र १६४]—कार्य-हेतु: सहकारी स्थाय्यादे: काव्यवर्त्मनि । ग्रनुभावो विभावच व्यभिचारी च कीर्त्यन्ते ॥[७]१०१॥

स्थायिनां श्रादिशब्दात् रसभावानां च यथासम्भवं ये लोकसिद्धा: कार्य-हेतुसहचारिण:, ते काव्यवर्त्मनि श्रनुभाव-विभाव-व्यभिचारिसंज्ञामि: कीर्त्यन्ते । काव्यसंस्कारतत्कृतात्मभि: कदाचिल्लोकोक्तयेवं व्यव-ह्रीयन्ते । तत्र श्रनु लिंगनिश्चयात् पद्माद्राव भाव्यन्ति गमयन्ति लिङ्गिनं रसमित्यनुभावा:, स्तम्भादय: । वासनात्मकया स्थितं स्थायिनं रसतत्त्वेन भवन्तं विभाव्यन्ति श्रविभावना-विशेषेण प्रयोजयन्ति इति श्रालम्बन-उद्दिपनरूपा ललनोचयनादयो विभावा: रसोत्सुकं

स्थायिनं प्रति विशिष्टेनाभिमुख्येन चरन्ति वर्तन्ते इति व्यभिचारिण: । श्राभिमुख्येन रहता हो नहीं है । [तो फिर उसकी प्रतीति हो कैसे हो सकेगी ? श्रौर [सामाजिकके भीतर] प्रवृद्धिमान [रस]की प्रतीति माननेपर तो ग्रहृदयकोंभी होने लगेगी। इसलिए विभावादिके प्रतिपादक काव्यको समभनेके बाद प्रतिपत्ता सामाजिकके भीतर रहने वाला स्थायीभाव ही रस बन जाता है । श्रौर उसका कारण होनेसे काव्य रसवत् कहलाता है ॥ [७] १०६ ॥ श्रथ रसेके भेदोंकी कथनका श्रवसर होनेपर भी प्रकरणमें ग्राए हुए श्रनुभाव श्रादि संज्ञात्रोंका विषय बतलाते हैं [ग्रथ्यत्नु ग्रनुभाव आदिका लक्षण करते हैं]

स्थायिभाव ग्रादिके [ लोकसिद्ध ] कार्य, कारण श्रौर सहकारियोंको काव्यमार्गमें क्रमश: श्रनुभाव, विभाव तथा व्यभिचारिभाव कहा जाता है ।[=]१०१।

स्थायिभावोंके, श्रौर श्रादि-शब्दसे रस तथा [रतिद्वेषादिविषया भाव: श्रादि लक्षणोंके श्रनुसार देवादि-विषयक रति-रूप] भावोंके हेतु होते हैं वे ग्रभिनेय श्रौर ग्रभिनेय दोनो प्रकारके काव्यमार्गमं क्रमश: श्रनुभाव, विभाव तथा व्यभिचारिभाव नामोंसे कहे जाते हैं, श्रौर काव्यसंस्कारसे प्रभावित लोगोंके द्वारा कभी-कभी लोकमें भी इसी प्रकार [ग्रर्थात् श्रनुभाव श्रादि नामोंसे] कहे जाते हैं । [ग्रागे इन तीन शब्दों

का ग्रवयवर्थ दिखलाते हैं] उनमेंसे 'ग्रनु' ग्रर्थात् लिङ्कके निश्चित्यके बाद [रसो] भावित

करने वाले होनेसे [काव्य रूप] स्तम्भ श्रादि [रसेके कार्य] 'ग्रनुभाव' कहलाते हैं। [ यह ग्रनुभाव शब्दका श्रवयवर्थ हुग्रा । श्रागे विभाव शब्दका निर्वचन करते हैं] । वासना रूपसे स्थित, रसहुपताको प्राप्त होनेवाले, [ रत्यादि ] स्थायिभावको विशेष रूपसे

भावित करते हैं वे ललन श्रौर उद्यानादिरूप [रसके कारण] 'विभाव' कहलाते हैं । [ग्रागे व्यभिचारिभाव शब्दका निर्वचन करते हैं] । रसोत्सुक स्थायिभावकेप्रति विशेष प्रकारके श्राभिमुख्यसे चरित करनेवाले श्रथवा विद्यमान होनेसे 'व्यभिचारिभाव' कहलाते हैं । [ श्राभिमुख्येन चरन्ति'में 'ग्राभिमुख्य'का श्रर्थ पोषकत्व है । [ग्रागे व्यभिचारिभाव शब्दका दूसरे प्रकारका

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पोषकत्वम्। यद्वा व्यभिचरन्ति स्थायिनि सत्यपि केडपि कदापि न भवन्तीति व्यभिचारिणः, स्वविभावव्यभिचारिणः भावे भावात् श्रमभवेदभावाच्च। रसायनसुप-युक्तवतो हि ग्लानि-श्रमप्रभृतयो न भवन्त्येव ।

तत्र स्थायिनो रत्यादयः संविदात्मकत्वाद् जडा एवं । घ्रेयादीनां स्वेदादीनां चानुभावानां वनितादीनां पर्वतादीनां च विभावानां, निर्वेदादीनां व्याध्यादीनां च व्यभिचारिणां यथासिद्धं सत्त्वमकत्व-शरीरधर्मत्वेनैकत्वं जहदजात्मकत्वम् ।

एते चानुभावादयः स्थायिनं प्रति कार्य-कारण-सहचारिरूपत्वादेव प्रधानम् । स्थायी तु प्रकरप्राप्त्य एतां प्रच्छादकत्वात् प्रधानम् । तथा व्यग्रादेर विभावस्य क्रोध-निर्वंचन करते है] स्थायिभावके विद्यमान होनेपर भी कभी कोई [व्यभिचारिभाव] नहीं होता है इसलिए [स्थायिभावके साथ अन्वित अर्थात्] व्यभिचारी होनेसे व्यभिचारिभाव [कहलाते हैं] प्रयथात् अपने विभावके होनेपर भी न होनेसे और न होनेपर भी होनेसे [ये अपने विभावोंके व्यभिचारिभाव कहलाते हैं] । क्योंकि रसायनका उपयोग करनेवालोंको ग्लानि, प्रालस्य, थकावट आदि नहीं होते हैं [इसलिए जो अपने कारणके होनेपर भी वपद्य नहीं होता है वह 'प्रत्ययभिचारी' कहलाता है । श्रोर जो कारणके न होनेपर भी हो या कारणके होनेपर भी न हो वह 'व्यभिचारी'

कहलाता है । उनमेंसे रत्यादिरूप स्थायिभाव ज्ञानस्वरूप होनेसे चेतनात्मक ही होते हैं । घ्रेयादि [रूप मानस] ग्रनुभाव ज्ञानरूप होनेसे ग्रजड़ तथा स्वेदादि [रूप शारीरिक] ग्रनुभाव जड़ात्मक [होते] हैं । वनितादि [विभाव चेतन रूप] तथा पर्वतादि विभाव [जड़ चेतन रूप होते हैं] श्रोर निर्वेदादि [व्यभिचारिभाव ज्ञान रूप होनेसे अजड़ ] तथा व्याध्यादि रूप व्यभिचारिभाव [शारीरधर्म होनेसे जड़ात्मक होते हैं । श्रतः ये कमशः] ज्ञानरूप [ग्रजड़ ] तथा शारीरधर्मादि रूप [जड़ इस प्रकार] जड़ श्रोर चेतन उभयरूप होते हैं ।

इस ग्रनुच्छेदमें ग्रन्थकारने स्थायिभावोंको केवल चेतनस्वरूप तथा ग्रनुभाव, विभाव एवं व्यभिचारभावोंको चेतन अचेतन उभयविध माना है । स्थायिभावोंको चेतनस्वरूप मानने का यह हेतु दिया है कि ये ज्ञानात्मक होते हैं । वेदान्तदि शास्त्रोंके ग्रनुसार ज्ञानात्मकता ही चेतनाका स्वरूप है । स्थायिभाव ज्ञानात्मक 'संविदात्मक' होनेसे चेतन स्वरूप हो है । यह ग्रन्यकारका ग्राशय है । न्याय सिद्धान्तम ज्ञान चेतन शास्त्रोंका गुण है । स्वयं 'चेतन नहा है । नैयाायिक गुरा श्रोर गुरगी ग्रर्थात् ज्ञान श्रोर ज्ञाताका भेद मानते हैं । किन्तु वेदान्ती गुग्गी-

माने जाते हैं । स्थायिभाव प्रकटत्वको प्राप्त होकर इन [प्रतिभावादि] का प्रच्छादक होने जानेसे

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क० १११, सू० १६२ ] तृतीयो विवेक: [ ३०४

भयाविभावकत्वात् श्रम-चिन्तादेश्च व्यभिचारिणो भयोत्साहादिपोषकत्वात्, स्तम्भ-वेपथु-स्वेदादेश्चानुभावास्य शृङ्गार-भयानकदिजत्वात् क्वचिदपि न पार्थक्ये नियमः । सामग्रीपतितस्य तु नियम इति सामग्री एवैषामविभाविका पोषिका ज्ञापिका चेति ॥[६]११०॥

अथ प्रस्तुतानेव रसभेदानाह— शृङ्गार-हास्य-करुणाः रौद्र-वीर-भयानकाः । बीभत्साद्भुत-शान्तारच रसाः सन्ति नव स्मृताः ॥

[सू० १६३]—शृङ्गार-हास्य-करुणाः रौद्र-वीर-भयानकाः । बीभत्साद्भुत-शान्तारच रसाः सद्भिर्नव स्मृताः ॥ [६]१११॥

तत्र कामस्य सर्वजातिसुलभतया अत्यन्तपरिचिततया च सर्वान् प्रति हृद्यतेऽति पूर्वं शृङ्गारः । ततः शृङ्गारानुगामित्वाद् हास्यः । ततो हास्यविरोधित्वात् करुणः । कामस्य चार्थजत्वान् ततोडर्थप्रधानो रौद्रः । कामार्थयोश्च धर्मजन्यत्वात् ततो धर्मप्रधानो वीरः । श्यास्य च भीताभयप्रदानसारत्वात् ततो भयानकः । भीतस्य च सात्त्विकैर्जुगुप्सनीय-

प्रधान माना जाता है । (१) व्याभिचारिभावोंके [ रौद्र रसके स्थायिभाव ] क्रोध, तथा [भयानक रसके स्थायिभाव] भयके शृङ्गार [ वीररसके स्थायिभाव ] उत्साहादि दोनोंका पोषक होनेके कारण, (२) श्रम तथा चिन्तादि व्यभिचारी-भावोंके [ भयानकके स्थायिभाव ] भय शृङ्गार [ वीररसके स्थायिभाव ] उत्साहादि दोनोंका पोषक होनेके कारण, (३) [इसी प्रकार] स्तम्भ, वेपथु श्रादि [ अनुभावोंके ] शृङ्गार तथा भय-नक दोनोंसे जन्य होनेके कारण श्रलग-अलग [रसोंके भाव श्रनुभाव तथा व्यभिचारिभावों के निश्चित रूपसे श्रलग] होनेका कोई नियम नहीं है । [किसी विशेष रसकी] सामग्रीमें श्रा जाननेपर तो नियम है । इसलिए सामग्री ही इनकी उत्पत्ति करनेवाली, पोषण करनेवाली श्रोर ज्ञापन करानेवाली होती है [यह समझना चाहिए] ॥[६]११०॥

[सूत्र १६४]—१. शृङ्गार, २. हास्य, ३. करुण, ४. रौद्र, ५. वीर, ६. भयानक, ७. बीभत्स, ८. श्रद्भुत श्रौर ९. शान्त ये नौ रस सहृदयोंने माने हैं ॥[६]१११॥

उनमेंसे कामके सब जातियोंमें सुलभ, श्रौर प्रत्यन्त परिचित होनेसे तथा सबके प्रति उनमेंसे कामके सब जातियोंमें सुलभ, श्रौर प्रत्यन्त परिचित होनेसे तथा सबके प्रति हृद्य होनेसे शृङ्गारको सबसे पहले उसकी ग्रहण किया गया है । शृङ्गारका श्रनुगामी होनेके कारण उसके बाद हास्य [कहा] । हास्यका विरोधी होनेसे उस [हास्य] श्रनुगामी होनेके कारण उसके बाद हास्य [कहा] । हास्यका विरोधी होनेसे उस [हास्य]

के बाद करुण रखा गया है । [इस प्रकार हास्य श्रोर करुणका कामसे सम्बन्ध दिखलाकर श्रथ श्रर्थप्रधान रौद्रका कामसे सम्बन्ध दिखलाते हैं] । कामके अर्थंज होनेसे उस [करुण] के बाद रौद्रका भी कामसे सम्बन्ध दिखलाते हैं] । कामके अर्थंज होनेसे उस [करुण] के बाद प्रथप्रधान रौद्र [रखा गया है] । काम श्रोर श्रर्थ दोनोंके धर्मजन्य होनेके कारण उस [रौद्ररस] प्रयप्रधान रौद्र [रखा गया है] । काम श्रोर श्रर्थ दोनोंके धर्मजन्य होनेके कारण उस [रौद्ररस]

के बाद धर्मप्रधान वीररस रखा गया है । यह वीर रस मुख्य रूपसे भयभीतोंके प्राभय प्रदान करनेवाला होता है इसलिए [भयके साथ सम्बन्ध होनेसे] उसके बाद भयानकका ग्रहण किया गया है । सात्त्विक वृत्तिके लोग भयकी निन्दा करते हैं इसलिए [भयका जुगुप्साके साथ सम्बन्ध होनेसे] उसके बाद [जुगुप्सा स्थायिभाव वाला] बीभत्स रस रखा गया है । बीभत्स

का विस्मयके द्वारा नाश हो जाता है इसलिए [बीभत्सका विस्मयके साथ सम्बन्ध होनेसे] उसका विस्मयके द्वारा नाश हो जाता है इसलिए [बीभत्सका विस्मयके साथ सम्बन्ध होनेसे] उसके बाद [विस्मय स्थायिभाव वाला] श्रद्भुत रस रखा गया है । धर्मका मूल कारण श्रथ श्रम

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३०६ ] नाट्यदर्पणम् [ काः ११२, सू० १६६

त्वान् ततो वीभत्सः। वीभत्सस्य च विस्मयेनापनीयमानत्वान् तलोद्वृतः। धर्मस्य च शममूलत्वान् तदन्ते शमः। इति। एते श्रृङ्गारादयो नवैव रसा रज्यनाविशेषेण पुरुषार्थोपयोगाधिक्येन च सन्ति: पूर्वाचार्यैरुपदिष्टाः। सम्भवन्ति त्वपरेऽपि। यथा—गर्द्रस्थायी लोभ्यः: श्रृङ्गारस्थायी स्नेहः: श्रासक्तिस्थायी व्यसनम्। श्ररतिस्थायी दुःखम्। सन्तोपस्थायी सुखामित्यादि। केचिदेषां पूर्ववचन्तर्भावमाहुरिति ॥[५]?१२॥

[सूत्र १६६]—सम्भोग-विप्रलम्भात्मा श्रृङ्गारः प्रथमो बहुः।

मान-प्रवास-शापेच्छा-विरहैः पञ्चधा परः ॥[१०]११२॥

विलासिनोर्न्योन्यनुकूलवतिनोः प्रेमपर्यवदृष्टौ दर्शने-स्पर्शनादिषु, स सम्भोगः। परस्परानुरक्तयोरपि विलासिनोः पारतन्त्र्यादेरघटनं चित्तवशिलेपो वा विप्रलम्भः। एतौ द्वावण्वयव्यतिरेकविशेषौ श्रात्मा स्वभावो यस्य श्रवस्थातः श्रदर्शनानुयायिनः श्रास्था-बन्धात्मकत्प्रकारत्वेन रूप्य श्रृङ्गारस्य। तेन श्रृङ्गारस्य नेमौ भेदौ गोत्वस्येव शावलेय-बाहुलेयौ, श्रपितु सम्भोगेऽपि विप्रलम्भसम्भावनासद्भावात्, विप्रलम्भेऽपि मनसा सम्भोगानुवेधाद् उभयसंवलितस्वभावः श्रृङ्गारः। उत्कटत्वाच्चैकदेशेऽपि सम्भोग-श्रृङ्गारो विप्रलम्भश्रृङ्गार इति चोपचार्योऽन्यते। श्रवस्थाद्यमेलननिबन्धने च सातिशयश्चमत्कारः। यथा—

है इसलिए सबसे ग्रन्थमें शम [ स्थायीभाव वाला शान्तरस ] रखा गया है। विशेषरूपसे मनोरञ्जक तथा पुरुषार्थोकी सिद्धिमें उपयोगी होनेके कारण श्रृङ्गार ग्रादि ये नौ रस ही पूर्ववर्ती स्राचार्योंने निर्दिष्ट किए हैं। किन्तु इनसे भिन्न ग्रोर रस भी हो सकते हैं। जैसे तृष्णा रूप स्थायीभाववाला लोभ्य, प्रादितारूप स्थायीभाववाला स्नेह, आसक्तिरूप स्थायीभाववाला व्यसन, श्ररति रूप स्थायीभाववाला दुःख ग्रोर सन्तोष रूप स्थायीभाव वाला सुख इत्यादि [ग्रन्थ रस भी हो सकते हैं]। कुछ लोग [इनको रस तो मानते हैं किन्तु] इनका ग्रन्तर्भाव पूर्वोक्त नौ रसोंमें ही कर लेते हैं ॥[५]१११॥

अब ग्रागे भेदों सहित भृङ्गार रसका निरूपण [प्रारम्भ] करते हैं—

[सूत्र १६६]—सम्भोग ग्रौर विप्रलम्भात्मक दो प्रकारका भृङ्गाररस होता है। उनमेंसे पहला [ग्रत्मक सम्भोग श्रृङ्गार] अनन्त प्रकारका [बहुः] होता है। दूसरा [विप्रलम्भ श्रृङ्गार] १. मान, २. प्रवास, ३. शाप, ४. इष्यो तथा ५. विरह रूप पाँच प्रकारका होता है।[१०]१११॥

एक-दूसरेके ग्रन्थकूल पड़नेवाले ग्रोर एक-दूसरेको प्रेम करने वाले [स्त्री-पुरुष रूप] दो विलासियोंका जो परस्पर दर्शन स्पर्शन ग्रादि है वह सम्भोग [श्रृङ्गार कहलाता] है। परस्पर अनुरक्त होनेपर भी परतन्त्रता ग्रादिके कारण [स्त्री-पुरुष रूप] दोनों विलासियोंका परस्पर ग्रनुरक्त होनेपर भी परतग्नता श्रादिके कारण [स्त्री-पुरुष रूप] दोनों विलासियोंका परस्पर मिलन न हो सकना प्रथवा चित्तका विलग हो जाना विप्रलम्भ श्रृङ्गार [कहलाता] है। ये दोनों ग्रवस्थाएँ विशेष जिस ग्रवस्थावान् प्रेमबन्ध रूप रतिके उत्कर्ष रूप श्ट गग़ारका ग्रात्मा ग्रथया स्वभावभूत है वह ['सम्भोग-विप्रलम्भात्मक'] है। यह इस शब्दका श्रर्थ है।

इसलिए गोप्रांकने चितकबरी ग्रोर काली [ शावलेयत्व ग्रौर काहलेयत्व ] भेदों समाग्र ये इसलिए गोप्रांकने चितकबरी ग्रोर काली [ शावलेयत्व ग्रौर काहलेयत्व ] भेदों समाग्र ये अपितु सम्भोगमें भी विप्रलम्भभाकी तथा विप्रलम्भमें भी सम्भोगभाकी चर्चा है। अपितु सम्भोग तथा विप्रलम्भ दोनों प्रलग-अलग भेद नहीं हैं।

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क० ११२, सू० १६६ ] तृतीयो विवेक: [ ३०७

"एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया वीतोत्तरं ताम्यतो-

रन्योंन्यं हृदयस्थितेऽप्यनुनये संरचातोगौरवम्।

दम्पत्योः शनकैःपांगवलनानामिश्रीभवचचुपो

भवन्नो मानकलिः सहासरभसंव्यावृत्तकष्ठग्रह्रम् ॥"

अत्र ईर्ष्याविप्रलम्भ-सम्भोगयोर्विभावादिकृता सातिशया चमत्कृति:। प्रथमः

सम्भोगाख्यो बहुः। परस्परावलोकन-चुम्बन-विचित्रव्रोक्त्यादिभेदतोऽनन्तप्रकारः।

यथा—

"किमपि किमपि मन्दं मन्दमासक्तियोगा-

द्विरलितकपोलं जलपतोरकमेए।

शिथिलपरिरम्भव्याप्तैकेकदोष्णो—

रविदितगतयामा रत्रिरेव व्यरंसीत् ॥"

अपरो विप्रलम्भः ईर्ष्या-प्रायैरङ्गमाभ्यां वैमनस्यं मानः। यथा—

"याते द्वारवतीं तदा मधुरिपौ तद्भतभम्पानतां,

कालिन्दीतरटङ्कर्चजुललतामालिङ्गिय सोत्कष्ठया।

सम्भावना बने रहने शृङ्गार विप्रलम्भ में भी मतनेमें सम्भोगका [इच्छात्मक] सम्भन्ध विद्धमान

रहनेसे शृङ्गाररस उभयात्मक होता है। किन्तु [किसी एक ग्रंशकी] प्रधानताके कारण सम्भोग

शृङ्गार, विप्रलम्भ-शृङ्गार इस प्रकार कहा जाता है। दोनों प्रवस्थाओंके सादृश्यरुपका

वर्णन होनेपर विशेष चमत्कार होता है

जैसे—

"रुठे होनेके कारण एक ही पलंगपर लेटे होनेपर भी चुपचाप दुःखी होते हुए शृङ्गार

मनमें एक-दूसरेके माननेकी इच्छा होते हुए भी अपने-अपने गौरवकी रक्षा करनेमें लगे हुए

दम्पतियोंके घोरसे श्वासोच्छ्वासकर देखते समय ग्रालिङ्गनसे-ग्रालिङ्गन मिल जानपर उनका प्रणय-

कलहह स्वयम् ही समाप्त हो गया शृङ्गार [दोनोंके] हँसते हुए वेगसे एक-दूसरेके कण्ठप्रह श्वालिङ्गन

कर लिया।"

इसमें ईर्ष्याविप्रलम्भ शृङ्गार सम्भोग दोनोंकी [एक साथ मिश्रित रुपमें] विभावादिके

कारण अत्यन्त चमत्कारयुक्त प्रतीति होती है

पहिला सम्भोग नामक शृङ्गार बहुत प्रकारका होता है। अर्थात् एक-दूसरेके प्रवलोकन,

चुम्बन शृङ्गार नाना प्रकारके सुन्दर वातिलाप आदिसे भेदसे ग्रनन्त प्रकारका होता है। जैसे—

अत्यन्त प्रेमके कारण गालसे गाल मिलाए हुए, गाढ श्वालिङ्गनमें जिनकी एक-एक भुजा

लगी हुई है इस प्रकारके [हम दोनों सीता शृङ्गार रामचन्द्रके] बिना कमके [संगत ग्रसंगत

सभी प्रकारकी] बात करते हुए ही सारी रात बीत गई।"

यह उत्तररामचरितका श्लोक है। इसमें सम्भोग शृङ्गारके ग्रनेक रुपोंका प्रदर्शन

कराया गया है।

दूसरा विप्रलम्भ शृङ्गार [ पाँच प्रकारका होता है यह बात कही जा चुकी है। उन

पाँच भेदोंमेंसे] ईर्ष्या ग्रथवा प्रणय कलहके कारण होनेवाला वैमनस्य मान कहा जाता है।

[मानका उदाहरण] जैसे—

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२०५ ] नाट्यदर्पणाम [ का० ११२, सू० १६६

तदृ गीतं गुरुवाष्पगदगदगलत्तारस्वरं राधया, येनान्तर्जलचारिभिलचचरै रुप्तकसुक्तुजितम् ।"" सत्निहितदेशस्यापि रुपान्तरापादनं शाप: । यथा कादम्बयां महाश्वेतया वशम्पातनस्य शुक्रुपापादनम् ।

मातापित्रादिपात्रतथ्याद भाविनवसंगमयो: संगमाभिलाष इच्छा । यथा—"उदधिच्छो पियइ जलंजह जह विरलंगुली चिरं पहिञ्ञो । पावालिया वि तहँ तहँ धारं तरुअण्णइ ॥" [उदधावाच: पिपति जलं यथा यथा विरलांगुलिकशिरं पथिक: । प्रपापालिकापि तथा तथा धारां तनुकामपि तनयति ॥" इति संस्कृतम् ]।

यथा वास्मार्क सुधाकलशे—"रत्ताइ संचरंतं नियच्छिऊं" पाडिवेसियजुवार्ं । कम्मियरेकम्मं पि हु धणेअवड्ढिया सरयं कुणइ ॥" [रथ्यायां सञ्चरन्तं दृष्ट्वा प्रतिवेशिकायुवानम् । कर्मकरोऽपि खलु धनपतिदुहिता स्वयं कुरते ॥" इति संस्कृतम् ]।

तत्र कृष्णगोपिकाद्वारा हरिणी चले जाते जानोपर विरहाकुल हुई राधाने उन [कृष्ण] के द्वारा भोंका किए जानेके कारऱ भुकी हुई यमुनाके किनारेकी वेतसलताको पकड़कर बड़े-बड़े आँसू हरकाते हुए ग्रोर भरे हुए गलेसे उच्च स्वरसे इस प्रकार रुदन किया कि जिसको सुनकर [यमुनाखे] जलके भीतर रहनेवाले जलजन्तु भी गर्वान उठाकर रोने लगे ।

यह [विप्रलम्भके अन्यजन्य मानरुप विप्रलम्भका उदाहरण है]। [विप्रलम्भका दूसरा भेद या कारऱ शाप है ] उसका लक्षण करते हैं ] समीपस्थ

वशम्पातनको शुक्र-रुपमें बना देना [शापका उदाहरणरा है] । माता-पिता श्रादिके परतन्त्र होनेके कारऱ [इस समय जिनका मिलन नहीं हो पा रहा है] श्रपने प्रथम मिलन होनेवाले है उनकी परस्पर मिलनकी इच्छा श्रभिलाष (कहलाती) [उसके कारऱ दो प्रेमियोंका जो मिलनका श्रभाव है वह श्रभिलाषजन्य विप्रलम्भ कहलाता है] । जैसे—

"[पानी विलानेवालोके पास देर तक रहनेके लिए] ऊपर देखते हुए पथिक ग्रंगुलियोंको विरल प्रथारत खोलकरके जैसे-जैसे पानी पी रहा है उसो प्रकार प्याऊवाली पहिलसे हो पतली धाराको ग्रोर भी श्रधिक पतली करती जाती है [श्रथार्त् पानी पीनेवाले

पथिक ग्रोर पिलानेवाली प्रपापालिका दोनों ही प्रधिकसे प्रधिक कालतक एक-दूसरेके पास रहना चाहते हैं] ।"

ग्रथवा जैसे हमारे [बनाये हुए] सुधाकलशमें [श्रभिलाषका उदाहरण]—"पड़ोसि युवकको गलेमें घुसता हुग्रा देखकर धनपतिकी पुत्री नौकरानोके करने योग्य कामोंको भी ग्रपनने-ग्राप कर रही है [जिससे उस युवकको देखनेका ग्रवसर मिल सके] ।"

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क० ११३, सू० १६७ ] तृतीयो विवेक: [ ३०७

सम्भूतभोगयोरमातावचभावेऽपि कार्यान्तरव्यापृततया ग्रनानुसर्पेऽ विरहः । यथा—

"अन्यत्र व्रजतीति का खलु कथा नाप्यस्य ताटक सुहृन्, यो मां नेच्छति नागतश्च हहा कोऽयं विधे: प्रकमः ? इत्यल्पे तर कलपना-कवलितसवंता निशान्तान्तरे, बाला वृत्तिविवर्तनवयतिरका नाप्नोति निद्रां निशि ॥"

[१०] ११२ ॥

अथोभयात्मनोडपि श्रृंगारस्य विभावानुभावौ प्रतिपादयति—

[सूत्र १६७]—स्त्री-पुंस- काव्य-गीतर्तु -माल्य-वेष-चेष्टित: । ग्रभिनेय: स चोत्साह-चाटु-तापाश्रु-मन्युिभ: ॥ [११] ११३ ॥

इह शृंगारे स्त्री-पुंसौ परस्परं मुख्यविभावौ। तयोश्चोत्तमप्रकृतिकयोरुपयोगी काव्यादि: । काव्यं च सरससम्भिनेयान्भिनेयभेदेभिन्नम् । गीतेन वाच्यत्वाच्च गृह्यते । ऋतवो वसन्ताद्या: । माल्येन विलेपन-ताम्बूल-विशिष्टभवनादि लभ्यते । वेषो जिनको श्रृंगार पहले हो चुका है इस प्रकारके प्रेमियोंके माता-पिता श्राद्धिक प्रति-

बन्धके बिना भी अन्य कार्योके कारण परस्पर मिलन न हो सकना विरह [ कहलाता ] है । जैसे—

"[मेरे पति] कहाँ श्रौर चला जाय ऐसा तो सोचना भी श्रभसंगत है, श्रौर उनका कोई ऐसा मित्र भी नहीं है जो मुके न चाहता हो [प्रथात् किसी मित्रने उनको रोककर मुझे कष्ट दिया हो ऐसी बातभी नहीं हो सकती ] किन्तु फिरभी श्राभौतिक श्राएँ नहीं, हाय, भगवान् ! यह क्या खेल कर रहे हैं [जो वे ग्रप्राप्तक नहीं ग्राए] इस प्रकारकी श्रनेक कल्पनाश्रोंमें डूबी हुई बाला रातको करवट बदलती हुई पड़ो है श्रौर उसकी नींद नहीं श्रा रही है ।"

यह [विरह-रूप विप्रलम्भका उदाहररण है ] ।[१०]११२]

[सूत्र १६७]—स्त्री पुरुष [श्रृंगारके मुख्य विभाव है] । काव्य, गीत, ऋतु, माल्य, वेष ग्रन्य इष्ट वस्तु तथा [वन-विहार जलक्रीड़ा श्रादि] श्रादि [श्रृंगार] केलियोगे: [श्रृंगारार] उत्पन्न होता है । ये सब श्रृंगारके कारण विभाव हैं । नाटकमें] उत्साह [एक-दूसरेको] चाटुकारित, संताप,

हृदन तथा मान श्रादिके द्वारा उसका श्रभिनय करना चाहिए ।[११]११३

इनमेंसे स्त्री-पुरुष एक-दूसरेके प्रति मुख्य विभाव हैं । उत्तम प्रकृतिवाले उन दोनोंके उपयोगी काव्यादि [भी गौण कारण होनेसे गौण विभाव कहे जा सकते हैं] । काव्य पदसे श्रभिनेय ग्रौर श्रनभिनेय [ प्रथात् हृदयकाव्य तथा श्रध्येयकाव्य ] श्रादसे युक्त सरस काव्यकका ग्रहण करना चाहिए । 'गीत' पदसे [उसके सहकारी] वाद्य श्रौर नृत्य ग्रादि भी ग्रहरण होता है । 'ऋतु' पदसे वसन्तादि [ग्रभिप्रेत हैं] । माल्य पदसे विलेपन, ताम्बूल श्रौर विशेष भवन

ग्रादिका भी ग्रहरण समझना चाहिए । 'वेष' पदसे विशेष प्रकारके वस्त्र श्राभूषणादि रूप

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विशिष्टवेशाभरणादि नेपथ्यम्। इष्टो विदूषक-चन्द्रोदय-चक्रवाक-हंससालेख्यादिः। यथा नयन-वदन-प्रसाद-स्मित-मनोंज्ञविचार-वक्रोक्त्यादयो ग्लान्यालस्य-श्रमादयश्चेष्टा:। एवंविधा हि विकारा: परस्परं स्त्री-पुंसयोरिष्ठ भवन्ति। केलय: पुष्पावचय-उपवन-गमन-जलक्रीडादयश्चेष्टावरोपाः। एवंमन्येडप्युपलक्षणादेवविधा विभावा दृश्यन्ते। एष्यो यथायोगमुभयात्मापि जायते रतिस्थायीर श्रृंगारः। स्त्रौ च शृंगारौ। लघुसंलक्ष: सम्भिनेयो: कारिक-सात्विक-ग्राह्यिक-ग्राह्यार्य-भिनयैरन्तेन सामाजिकानां साचाराभासेनागोचर उत्साहादिभि: कलेव्य:। उत्साहो नयन-वदनप्रसादकारी चित्तोल्लासः। श्रृंग च स्थायीरपि वीरस्य श्यात्रा-गन्तुकत्वाद् रसानुभावः। एवं रसान्तरं प्रति व्यभिचारित्वमपि स्थायिनां सहचारितया भवत्येव। श्रास्य च स्थाय्यनुभावाभिनय-द्वारेप्यात्राभिनयहेतुत्वम्। एवं रत्याद्यावपि वाच्यम्। तापोभिमतप्राप्ते: काय-मन:-पीडा। मन्युरीष्याग्रप्रणययशंगभ्यां चित्तोद्वेगः। उत्साह-चाड्भ्यां नयनचातुर्य श्वासान्-लेप-पर्यंगाविकारादि: सम्भोगस्थ गारस्यानुभाव: सूचितः। ताप-श्रृ-मन्युबि: पुन: पुन: परिदेवितादिविप्रलभ्यभृंग गारस्यानुभावो लक्षितः। तत्र सम्भोगे सुखमया धृत्यादयो व्यभिचारिणः। विप्रलभ्भे त्वलस्ययुंञ्जुगुप्सावर्या निर्वेदादयो दु:खप्रायाः इति ॥१९१॥११३॥

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अथ हास्यः—

[सूत्र १६५]—विकृताचार-जल्पांगाकल्पविस्मापनोद्‌द्रवः । हास्योद्स्प्राभिनयो नासास्पन्द्राश्रुजठरप्रहः॥ [१२]११४॥

विकृतः प्रकृति-देह-काल-वयोऽवस्थादिविपरीतः । श्रृंगस्य च विकृतत्वं विरूपो व्यापारः, खञ्ज-कुष्टत्वादि वा । उपलक्षणाच्च शृङ्गार-लोल्यादिनामुचितानां मर्यादोघाटन-श्रन्यहसनावलोकनादेश ग्रहः। विस्मापनं कच-नासावादन-ग्रीवा-कम्पो-चूडाभ्रू नर्तन-परभाषाण्यनुकरणादिकं च विटचेष्टितम्। एषःः स्वपरस्थेमयो हासस्थायी विकारः। नासया गेडौष्ठादयो, श्वासप्रश्वासादयो नेत्र-विकारा:, जठरप्रहेपा पार्श्वप्रग्रह-कर्तनादन-मुखरागादयः संगृह्यन्ते। व्यभिचारिभिरश्रास्य श्वबहित्या-हर्पोत्काह-विस्मयादय इति ॥ [१२] ११४ ॥

[कारिकामें ग्राए हुए ग्रागले] ताप, श्वासु तथा मन्यु पदोंके द्वारा विप्रलम्भसंभोगारके परिदेवन ग्रादि रूप श्रृङ्गारभावोंको सूचित किया गया है। उनमेंसे संभोग-श्रृङ्गारमें सुख रूप श्रृङ्गयादि व्यभिचारिभाव होते हैं श्रौर विप्रलम्भसंभोगारमें ग्रालस्य, उद्याता श्रौर जुगुप्सा के छोड़कर दुःख-प्रधान निर्वेदादि [व्यभिचारिभाव होते हैं] ॥११२३॥

हास्यरस—

श्रब श्रागे हास्यरसका निरूपण करते हैं—

[सूत्र १६६]—विकृत ग्राचारः, वातचीत, वेष-विन्यास श्रौर [नाक बजाना, बगल बजाना श्रादि रूप विस्मापन अर्थात्] ग्राद्भुत्यजनक चेष्टाप्रोंसे हास्यरस उत्पन्न होता है । नाक सिकोड़ने श्वासु ग्रौर पेट पकड़ने ग्रादिके द्वारा इसका ग्रभिनय किया जाता है ॥[१२]११४॥

विकृत श्रर्थात् प्रकृति [ स्वभाव ]। देश, काल, ग्रायु ग्रौर श्रवस्था ग्रादिके विपरीत [ श्राचार हास्यजनक होता है ]। ग्रङ्गोंका विकृतत्व [दो प्रकारका हो सकता है । एक तो] विरूप व्यापार [का किया जाना], श्रर्थात् [दूसरा] खञ्जत्व [लंगड़ापन] या निर्बलता ग्रादि रूप होता है । [कारिकामें गिनाए गए विकृताचार ग्रादिके] उपलक्षण रूप होनेसे [उनसे भिन्न] श्रनुक्त दृश्यता नालच श्रादि ग्रौर सर्म्य भागोंको दिखलाना, दूसरोंका मजाक बनाना, श्रौर [विशेष प्रकारसे] देखने श्राविका भी ग्रहण होता है । [कारिकामें श्राए हुए] 'विस्मापन' पदसे बगल श्रौर नाकका बजाना, गर्दन, कान, सिर या भौंहोंका मटकाना श्रौर दूसरोंकी बोलीका ग्रनुकरण करना ग्रादि रूप व्यापारका ग्रहण होता है । श्रपनमें श्रथवा किसी दूसरेमें स्थित इन [विकृताचार ग्रादिके देखने]से हास्यस्थायिभाव वाले हास्यरसकी उत्पत्ति होती है । [कारिकामें ग्राए हुए नासास्पन्दके] 'नास' शब्दसे गाल श्रौर ग्रोठ [के चलाने] का भी ग्रहण होता है । 'श्वास' पदसे [नेत्रोंके] सिकोड़ने और फैलाने ग्रादि रूप नेत्रविकारोंका भी ग्रहण समझना चाहिए । [कारिकाके] 'जठरप्रह' शब्दसे [पेट पकड़नेके साथ हीं] पार्श्वप्रग्रह हाथ पीटना, मुखराग ग्रादिका भी संग्रह होता है । 'श्रावहित्या' [प्रर्थात् श्राकाग्योपन] हर्ष, उत्साह, विस्मय ग्रादि इस [हास्यरस] के व्यभिचारिभाव होते हैं ॥ [१२]११३॥

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३१२ ]

नाट्यदर्पणम्

[ का० ११४, सू० १६६

स्थास्य भेदानुपदिशति—

[सूत्र १६६]—विहासश्चोपहासरुच मध्ये ज्येष्ठे स्मितं हसः ।

श्रपहासोडतिहासरुच नीचे प्रायोडधमे रसः ।[१३]११५॥

तत्र हसनं मद्युरस्वरम् । सास्यराग-समयप्राप्तं च विहसितम् । सांसशिरःकम्प-कम्पितदृक् सुपहसितम् । एतौ भेदौ मध्यमप्रकृतौ । श्रालोलितं स्मितम् । किक्किट्टहसदन्तं हसितम् । इमौ भेदौ उत्तमप्रकृतौ । श्रनवसरप्राप्तं सास्रनेत्रमुक्तकम्पितांस-शिरःश्रॉप-हसितम् । करोष्ठग्रहणापेक्षं विकृतस्वरमुद्रितं चातिहासितम् । झ्रमू भेदावध्यमप्रकृतौ ।

एवं षड्ढते हास्यभेदाः । श्रयं च हास्यो रसः प्रायो बाहुल्येनाधमप्रकृतौ पामर-प्राये भवति । स्वर्गगोपेच्या च क्रिया: प्राधान्येडपि पुरुषेति तस्यामपि । एवं करुण-भयानक-बीभत्स-श्रद्भुतादिसंयुक्तोऽप्यधमप्रकृतौ भूयस्त्वमनुभवन्ति । पामरग्राय: सर्व: प्रकर्षेण हसति, शोचति, विभेति, परनिन्दामार्द्रित्यते, स्वल्पेनापि सुभाषितेन सर्वत्र विस्मयते इति ।[१३] ११६॥

प्रबन्ध प्रागे इस [हास्यरसके] भेदोंको दिखलाते हैं—

[सूत्र १६७]—मध्यम [प्रकृतिक पात्रों] में [हास्यरसके] विहास श्रो उपहास [रूप दो भेद पाए जाते हैं], उत्तम [श्रेष्ठ प्रकृतिक पात्रों] में स्मित श्रो हसित [रूप दो हास्य भेद पाए जाते हैं] श्रो उपहसित [रूप दो हास्य-भेद पाए जाते हैं] । श्रो उपहास तथा प्रतिहास [रूप दो हास्य-भेद पाए जाते हैं] ।

हास्यके जो छः भेद कारिकार्मे दिखलाए [उनमेंसे समुचित प्रवसरपर जिसमें गाल लाल हो जाएँ इस प्रकारका मद्युर स्वरसे हँसना 'विहसित' [कहलाता] है । कण्ठे श्रो ग्रीवा में हिलने लगें [इस प्रकारका हँसना] 'उपहसित' कहलाता है । ये [विहसित श्रो उपहसित दोनों भेद मध्यम प्रकृति [के पात्रों] में होते हैं । जिसमें दाँत दिखाई न दें इस प्रकारका हास्य 'स्मित' [मुस्कराना] कहलाता है । श्रो जिसमें दाँत थोड़े-थोड़े दिखाई देने लगें [इस प्रकारका हास्य] 'हसित' [कहलाता] है । [स्मित और हसित] ये दोनों भेद उत्तम प्रकृति [के पात्रों] में होते हैं । बिना प्रवसरके जिसमें ग्राँखोंमें ग्राँसू श्रा जाएँ 'अपहसित' कहलाता है । श्रो जिसमें कन्थे श्रो ग्रीव हिलने लगे, इस प्रकारका हँसना 'श्रतिहास' कहलाता है । [श्रपहसित श्रो

बगलोंको थामकर जोर-जोरसे उद्दततापूर्वक हँसना 'प्रतिहास' कहलाता है । [प्रपहसित श्रो अतिहासित] ये दोनों भेद श्रधम प्रकृति [के पात्रों] में होते हैं ।

इस प्रकार हस्यके छः भेद हो जाते हैं । यह हास्यरस प्रधिकतर श्रधम प्रकृतिक नीच पुरुषोंमें होता है । श्रपने वर्गकी श्रपेक्षासे [किसी विशेष] स्त्रीकी उत्तमता [प्रधानता] होनेपर भी पुरुषोंकी प्रपेक्षा उस [ उत्तम स्त्री ] में भी प्रधमता ही होती है । इसलिए उन [स्त्रियों] में भी हास्यरस प्रधिकतर पाया जाता है । इसी प्रकार करुण, भयानक, प्रद्भुत तथा बीभत्स रस भी प्रधिकतर श्रधम प्रकृति [प्रथर्थात नीच पात्रों]में होते हैं । इसलिए नीच प्रकृति वाले सभी लोग प्राय: जोरसे हँसते, प्रधिक शोक करते, अधिक डरते श्रो अधिकतर दूसरों की निन्दा करते हैं तथा तनिक-से भी सुभाषितको सुनकर श्राइचर्यं करने लगते हैं ।

[१३] ११७॥

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क॰ ११६-१७, सू॰ १७०-७१ ] तृतीयो विवेक: [ ३१३

अथ करुणः—

[सूत्र १७०]—मृत्यु-बन्ध-धनह्र शाप-शाप-व्यसन-सम्भवः ।

करुणोद्भिनयस्तस्य वाष्प-बैवर्ण्य-निन्दनने:।[१४]११६॥

शापोद्भिमतवियोगहेतुर्दिव्यप्रभाववतः श्वाक्रोशः। व्यसनसन्तर्थः। श्रवण देशोच्चाटनादर्जातं विप्लवजंतं सङ्गृह्यते। एष्यो विभावेभ्यः शोकोस्थायी करुणो रसः सम्भवति। वाष्प-बैवर्ण्याभ्यां निश्वास-सुखशोष-स्मृतिलोप-हृदयात्राताद्योऽनुभावा: सुचिता:। निन्दनमातनो दैवस्थान्यस चोपलम्भः। श्रवणेन ह्रदित-प्रलपित-उरस्तो-डनादि गृह्यते। व्यभिचारिभावस्तु निर्वेद-म्लानि-चिन्ता-श्रुत्सुक्य-मोह-श्रम-भय-विषाद-दैन्य-व्याधि-जड़ता-उन्माद-त्रपस्मार-व्यालस्य-मरसा-स्तम्भ-वेपथु-बैवर्ण्य- अश्रु-स्वरभेदादय इति ॥ [१४] ११६ ॥

अथ रौद्रः —

[सूत्र १७१]—प्रहारास्त्य-मात्सर्य-द्रोहाधर्षणपनीतिजः ।

रोद्रः स चाभिनेतव्यो घातदन्तौष्ठपीडनः।।[१४]११७।।

परमविदारयतो विदारयतश्च शस्त्रादिव्यापारेऽणं प्रहारः। श्रवणेन गृह्णृत्या-लुप्तसदनस्य प्रहः। व्यासयेन वध-बन्धाद्याभिधायकवाक्यपुरुषस्य ग्रहः। गुरुष्वसूया मात्सर्यम्। द्रोहो जिघांसाः। द्वारादिखलीकार-विद्या-कर्म-देह-जत्यादिनिन्दा-राज्य-[विप्रतिपत्तिर्] हति।

अब ग्राथे करुरे [रसका निरूपर] करते हैं]—

[सूत्र १७०]—[किसी प्रियजनके] मृत्यु, बन्धन, धननाश, शाप तथा विपत्ति [को देखनें]से करुणरस उत्पन्न होता है । श्रवणसुख, [चिह्नरे]ी विविधता तथा [भाग्यकी] निन्दा श्रादिके द्वारा इसका प्रबिनय किया जाता है ।[१३] ११६ ।

प्रियजनके वियोगको कराने वाली, विध्य प्रभाव वाले व्यकितकी शापसनत्ता 'शाप' कहलाता है । प्रणर्थ [का नाम] 'व्यसन' [होता] है । इससे देश-नाशसे होने वाले विप्लव-समुदायका प्रहार होता है । इन विभावोंके द्वारा शोक ह्व स्थायीभाव वाला करुणरस उत्पन्न होता है । श्रवणसुख, [चिह्नरे]ी विविधता, निःश्वास, मुख शोषना, स्मृतिका लोप, शारीरिक शिथिलता श्रादि अनुभाव भी सूचित होते हैं । निन्दासे श्रापनी निन्दा, भाग्यको श्रथवा ग्रात्माकी उलाहना देना [प्रतिपत्ति है] । इससे रौद्र, प्रणति करने घोर क्रोधी पीटनेंका भी संग्रह होता है । निर्वेद, म्लानि, चिन्ता, श्रोत्सुक्य, मोह, श्रम, भय, विषाद, दैन्य, व्याधि, जड़ता, उन्माद, त्रपस्मार, व्यालस्य, मरसा, स्तम्भ, वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु, स्वरभेद श्रादि इसके व्यभिचारभाव होते हैं ।[१४]११६ ।।

श्रव ग्राथे रौद्ररस [का लक्षणादि करते हैं]—

[सूत्र १७१]—प्रहार, असत्य, मात्सर्य, द्रोह, श्राधर्षण तथा श्रपनोतितसे रौद्ररस होता है और मारने, दांत तथा श्रोंठोंके चबानेके द्वारा इसका प्रबिनय किया जाता है । [१५]११७ ।

दूसरेको काट देने वाला यां न काटने वाला शस्त्रका व्यापार 'प्रहार' कहलाता है । इससे घर श्रोर शत्रु श्रादिके उपमर्दनंका भी प्रहार होता है । 'व्यासय' पदसे वध, बन्ध श्रादिके वाच्यो ग्रादिका संग्रह होता है । गुरूओंमें श्रसूया [द्वेषविषकरए] 'मात्सर्य' कहलाता है । मारनेकी इच्छा 'द्रोह' [कहलाती] है । स्त्रियों श्रादिका श्रपमान,

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३१४ ] नाट्यदर्पणम् [ क० ११६, सू० १७२

सर्वस्वापहरणादिरादिरार्षः: ऋऋन्यायोदपनयनीति: श्वानेनौद्वत्यं सुचितम्। एतेष्यो विभाव-वेश्म्य: क्रोधस्थायी रौद्रो रसो जायते। घातेन छेदन-मेदन-रुधिरार्क्षरणादिरतुभावो गृह्यते। दैनौष्टपीडननेन गर्दौष्ट्रफुरण-हस्ताप्रनिपेषाचानुभाववृन्दं सूच्यते। व्यभिचारिष्वचास्य मोह-उत्साह-आवेग-ग्रमर्ष-चापल-श्रोग्य-स्वेद-वेपथु-रोमाञ्चादय इति। स्थायिनोऽपि चोत्साहादयो रसान्तरं प्रति व्यभिचारितां स्वीकरुवन्ति। स्तम्भ-स्वेदादयश्च न रसकार्यो व्यभिचारिण:, किन्तु स्थायिकार्यो इति ॥ [१५] ११७ ॥

अथ वीर:-

[सूत्र १७२]—पराक्रम-बल-न्याय-यशास्तत्वविनिश्चय:। वोरोऽभिनयनं तस्य धैर्य-रोमाञ्च-दानतः ॥[१६]११८॥

पराक्रम: परकीयसमण्डलादाक्रमरणसमर्थ्यम्। बलं हस्त्यश्व-रथ-पदाति-धान्य-धान्यादिसम्पन्नं शारीरिकी शक्तिव्वा। न्याय: सामादीनां सम्यक् प्रयोग:। धान्येन निन्द्रयजयो गृह्यते। यश: सार्वत्रिकी श्लाघ्योद्गुरणस्याति। धान्येन शत्रुपक्षये सन्ताप-कर्तृ त्वप्रसिद्धिरूपं प्रतापो गृह्यते। तत्व्वं यथातथ्यं तस्य विनिश्चय:। एवंवादिभिर्विभावैरुत्साहस्थायी वीररस: सम्भवति। से चानेकधा, युद्ध-धर्म-दान-गुष्ण-प्रतापावरर्जन-विद्या, कर्म, देश, जाति आदिकी निन्दा श्रौर राज्य या सर्वस्वका ग्रपहरणा श्रादि 'ग्राश्रयध' [कहलाते] हैं। धान्यायको नाम 'ग्रपनयनीति' है। इसके द्वारा ग्राद्रव्यको भी सूचित किया है। इन विभावोंसे कोष रूप स्थायीभाव वाला रौद्ररस उत्पन्न होता है। 'घात' पदसे छेदन-मेदन श्रौर रक्त बहाने श्रादि अनुभावोंका ग्रहण होता है। दैनोंके पीसने श्रौर ग्रोठ चबानेसे गालों श्रौर प्रोठोंके फड़कने, हाथके श्रादि भागके मलने, श्रादि ग्रनुभाव-समुदायका ग्रहण होता है। इस [रौद्रस] के व्यभिचारभाव मोह, उत्साह, श्रावेगा, ग्रमर्ष, चपलता, उप्रता, स्वेद, वेपथु श्रौर रोमाञ्चादि होते हैं। उत्साहादि [वीररसमें] स्थायिभाव होनेपर भी [रौद्रादि] दूसरे रसों में व्यभिचारी बन जाते हैं। स्तम्भ श्रौर स्वेदादि रसके कार्यरूप होनेसे [यहाँ] व्यभिचारिभाव नहीं कहुलाते हैं। ग्रप्रितु स्थायिभावके कार्य होनेसे व्यभिचारिभाव कहलाते हैं ॥[१५]११७॥

है, श्रौर धैर्य, रोमाञ्च तथा दानके द्वारा उसका प्रभिनय किया जाता है। [१६] ११८ ।

दूसरेके राज्य ग्रादिपर ग्राक्रमरणकी सामर्थ्य पराक्रम [कहलाता] है। हाथी, घोड़े, रथ, पदाति, धन-धान्य श्रौर सैन्य ग्रादिकी सम्पत्ति बल [पदसे प्रभिप्रेत] है। श्रथवा शारीरिक शक्ति [बल कहलाती है]। सामादि [उपायों] का समुचित प्रयोग 'न्याय' [कहलाता] है। इसके द्वारा इन्द्रिय-जयका ग्रहण होता है। शत्रुविदों गुरणोंकी सर्वत्र प्रसिद्धि 'यश' [कहलाती] है। इसके द्वारा शत्रुपक्षके सोतर सन्ताप करनिकी प्रसिद्धि रूप प्रतापका [भी] ग्रहण होता है। तत्व अर्थात् यथार्थता, उसका विनिश्चय [तत्वविनिश्चय कहलाता है]। इस प्रकारके विभावोंसे उत्साह रूप स्थायिभाववाला वीररस उत्पन्न होता है। श्रौर युद्ध, धर्म, दान, ग्रादि गुरणों तथा प्रतापाकरर्षण ग्रादि उपायोंके भेदसे [युद्धवीर, धर्मवीर, दानवीर ग्रादि रूपसे] ग्रनेक प्रकारका होता है। महान् शत्रु-सैन्य ग्रथवा महान् विपत्तिके उपस्थित

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ग्रायुः पाथिभेदात्। घ्रेयं महत्यपि परसैन्ये विपदि वा श्राकातयेऽपि । ग्रान्तेन सैन्यो- तेजन-पराचोपादेरनुभावस्य ग्रहः । दानेन प्रमोद-माध्यस्थ्य-शान्तचेष्टादेः । व्यभिचा- रिपाश्चास्य धृति-मति-गर्व-च्यावेग-श्रौगत्य-श्रमर्ष-स्मृति-रोमाञ्चादयः । वीररसे च युद्धा- दिभावेऽपि न रौद्रत्वम्, उत्साह-न्यायप्रधानत्वात् । रौद्रे तु मोह-श्राहङ्कार-श्रप्रन्याय- प्राधान्योमतो न सङ्कर्याति ॥ [१६] ११६ ॥

[सूत्र १७३]— पताका-कीर्ति-रौद्रश्राजि-शून्य-तस्कर-दोषज्ञः । भयानकोऽभिनेतव्यः: स्तम्भ-रोमाञ्च-कम्पनैः ॥ [१७] ११६॥

रौद्राः स्वराकारवैकृत्येन भीषणाः: पिशाचोलुकादयः । श्राजिः:शस्त्राघातः । श्रयं चोपलद्र्ण वध-बन्धयोः शून्यं निर्जनं गेहारण्यादि । दोषो गुरुपादेरपराधः । श्रन्यो हष्ट-श्रुतेभ्यश्चिन्त्यन्वितमभ्यो वा विभावेभ्यो भयस्थायी भयानको रसो जायते । गात्रस्याचलनं स्तम्भः । कम्पनं करचरणादीनां प्रवेपनम् । श्रभिगोत्र-मुख-दृष्टिविकार- गलशोष-बैवर्ण्य-मूर्छा-दैन्योत्पत्तावः सङ्घटन्ते । व्यभिचारिपाश्चास्य शङ्का-मोह- दैन्य-श्रावेग-चपलता-त्रास-श्रपस्मार-मरण-स्तम्भ-स्वेद-रोमाञ्च-वेपथु-स्वरभेद- वैवर्ण्योदय इति ॥ [१७] ११६ ॥

होनेपर भी न घबराना 'वीर्यं' कहलाता है । इसके द्वारा [अपनी] सेनाको उत्तेजित करने ग्रोर दूसरेकी श्राक्षेप ग्रादि प्रतिभावोंका ग्रहण होता है । 'दान' पदसे प्रमोद मध्यस्थता ग्रोर शांत चेष्टाद्विका ग्रहण होता है । इस [वीररस]के व्यभिचारभाव धृति, मति, गर्व, श्रावेग, श्रमर्ष, उप्रता, स्मृति तथा रोमाञ्च ग्रादि होते हैं । वीररसमें युद्धादिके होनेपर भी रौद्रत्व नहीं ग्राता है । क्योंकि उसमें उत्साह तथा न्यायोकी प्रधानता रहती है । रौद्ररसमें तो मोह श्रहङ्कार ग्रोर अन्याय ग्रादिकी प्रधानता रहती है इसलिए [वीर ग्रोर रौद्र] ये दोनों एक साथ नहीं रह सकते हैं ॥ [१७] ११६ ॥

श्रथ भयानक [रसका वर्णन करते हैं]— [सूत्र १७३]— पताका, कीर्ति, भयोत्पादक [पिशाच उलूकादि], युद्ध [ग्राजिः], निर्जन स्थान, ग्रोर चोर-डाकू श्रादि तथा [गुरु श्रादिके] दोषोंसे भयानकरस उत्पन्न होता है । स्तम्भ- रोमाञ्च तथा कम्पनके द्वारा उसका ग्रभिनय करना चाहिए । [१७] ११६।

स्वर तथा श्राकारकी विकृति द्वारा भयोत्पादक पिशाच उलूकादि रौद्र [पदसे गृहीत] होते हैं । यह [रौद्रपद] वध तथा बन्धनका भी उपलक्षण [ग्राहक] है । निर्जन घर या श्ररण्यादि 'शून्य' पदसे लिया जाता है । दोष अर्थात् गुरु श्रथवा राजा ग्रादिका ग्रपराध । इन विभावोंके देखने या सुननेसे भयस्थायी भाव वाले भयानक रसकी उत्पत्ति होती है । अंगोंको हिलने- डुलनेका प्रभाव 'स्तम्भ' कहलाता है । हाथ-पैर श्रादिककी हिलना 'कम्पन' कहलाता है । इसके द्वारा शरीर, मुख, या हस्तिकादि विकार, गलेका सूखना, विवर्णता ग्रोर मूर्छा ग्रादि ग्रनुभावों- का [बी] ग्रहण होता है । क्रोध, मोह, दैन्य, श्रावेग, चपलता, त्रास, श्रपस्मार, मरण, स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, कम्पन, स्वरभेद, वैवर्ण्य आदि इसके व्यभिचारिभाव हैं ॥ [१७] ११६ ॥

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[सूत्र १७४]—जुगुप्सनीयरूपादि-परश्लाघासमुद्रूवः ।

बीभत्सोऽभिनयैश्चास्य निष्ठेवोद्वेग-निन्दनैः ॥[१८]१२०॥

जुगुप्सनीया मालिन्य-कुथितत्व-दुर्गन्धत्व-कर्कशात्वादिभिरमनोज्ञा: । रूपाद्यो रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-शब्दलक्षणा: विषयाः । परस्य विपचस्य श्लाघा स्तुतिः । अस्यो हष्ट-श्रुतस्य विमर्शेन जुगुप्सस्तया वीभत्सो रसः समुद्रूवते । परश्लाघया तु निन्द्योऽपि दोषदर्शनेन जुगुप्सते । निष्ठेवः कफनिरसनम् । उद्वेगो गात्राधूननम् । निन्दनं दोषोद्घाटनम् । अभिनयत्रसद्भावेन मुखविकृणान-नासाकुंचन-प्रच्छादन-हुल्लेखादिरनुभावः सूच्यते । व्यभिचारिणश्चास्य व्याधि-मोह-श्रावेग-ग्रपस्मार-मरषादयः इति ॥ [१८] १२० ॥

[सूत्र १७५]—दिव्येन्द्रजाल-रम्यार्थ-दर्शनाभीष्टसिद्धितः । श्रद्भुतः, सोऽभिनेतव्यः श्लाघा-रोमाञ्च-हर्षतः ॥

[१९] १२१ ॥

दिव्याः शकादयः इन्द्रजालं मन्त्र-दिव्य-हस्तयुक्त्यादिना व्यासंभवाद्रष्टु-प्रदर्शनम् । रम्याः सातिशयत्वेन हृद्योदर्थः शिल्पकर्म-रूप-वाक्य-गन्ध-रस-स्पर्श-नृत्यादिकः; तस्य दर्शनं साच्चीकारः श्रयन्ते स्वयम् कोतिं श्रवणं च गृह्णाति । श्रभ्रष्टमत्य-

ग्रथ बीभत्स [रसका वर्णन करते हैं]—

[सूत्र १७४]—वृणित नु ग्रादि तथा शास्त्री की प्रशंसा ग्रादिसे उत्पन्न बीभत्सरस होता है । थूकने, नाक-मुँह सिकोड़ने और निन्दाके द्वारा इसका अभिनय किया जाता है ॥[१५]१२०१॥

[प्रथं] कहलाते हैं । रूप, रस, गन्ध, स्पर्श शब्दादि रूप 'पर' प्रार्थ्यन्तु‌ विपक्ष [शत्रु] की प्रशंसा 'परश्लाघा' पदसे ग्राह्यप्रेत है । इन विमर्शोंके देखने या सुननेसे जुगुप्सा‌ रूप स्थायीभाव वाला बीभत्सरस उत्पन्न होता है । शास्त्री की प्रशंसामें विशेष रूपसे दोषोंको देख-कर उससे घृणा करता है । 'निष्ठेव' पदका श्रथ कफका निकलना [प्रत्यत्तु थूकना] है । ह्राथ-

पंर ग्रादिका चालनां उद्देग [का सूचक] है । निन्दा ग्रथितो‌ दोष निकालना । इनसे श्रोत्रों के सिकोड़ने, मुखके विचकाने. नाक-कान ग्रादिके बन्द करने ग्रोर जो मिचलाने, आदि अनुभवोंका ग्रहण होता है । व्याधि, मोह, श्रावेग, ग्रपस्मार, मरषा ग्रादि इसके व्यभिचारि-

भाव है ॥ [१८] १२० ॥

ग्रथ श्रद्भुत [रसका निरूपण करते हैं]—

[सूत्र १७५]—देवताद्राथ्र, ग्रथवा इन्द्रजाल, सुन्दर वस्तु ग्रादिके देखने तथा श्रभ्रोष्ट ग्रार्यकिम [ग्राकस्मिक] सिद्धिसे उत्पन्न होने वाला श्रद्भुत रस होता है । ग्रक्षंसा रोमाञ्च तथा

हर्षके द्वारा उसका ग्रभिनय करना चाहिए ॥ [१५] १२१॥

दिव्य ग्रार्थात् इन्द्रादि देवता । मन्त्र ग्रथवा किसी दिव्य अथवा हाथकी चालाकी ग्रादिके द्वारा ग्रसम्भव बातको दिखला देना 'इन्द्रजाल' कहलाता है । रस्म ग्र ग्रर्थात् प्रयत्न सुन्दर लगने वाला ग्रर्थ जैसे शिल्प-रचना, ग्रथवा रूप या वाक्यरचना, ग्रथवा गन्ध, रस,

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नतमीप्सितम् । तस्य सिद्धिः प्राप्निनिर्षपत्तिर्या । एवमादिम्यो विभावेभ्यो विस्मय-स्थायी श्रद्भुतो रसो भवति । हर्षेण स्वानुभावा: सूच्यन्ते । एपिर्नेयनविस्तार-गात्रोल्लस-कसन-श्रनिमिषप्रेक्ष्यण-चेलोंडगुलिभ्रमरया-नाद्गद्गद्-वचन-वेपथु-स्वेदादेरनुभावस्य ग्रहः । व्यभिचारिरपश्चास्य श्रावेग-श्रद्भुतादयः संप्रलम्भ-स्तम्भ-श्रृद्गार-रोमाञ्चादय इति ॥ [१६] १२१ ॥

श्रथ शान्तः— [सूत्र १७६]— संसारभय-वैराग्य-तत्व-शास्त्र-विमर्शनेः । शान्तो,डभिनयनं तस्य क्षमा-ध्यानोपकारतः ॥[२०]१२२॥

देव-मनुष्य-नारक-तिर्यगूपेताः बहुधा परिभ्रमग्यं संसारः, तस्माद् भयम् । वैराग्यं विषयहवैमुख्यम् । तत्वस्य जीवाजीव-पुण्य-पापादिरुपस्य, शास्त्रस्य मोक्षहेतुप्रतिपादकस्य विमर्शनं पुनः पुनश्चेतसि न्यसनम् । एवमादिमिरविभावाैः, काम-कोध-लोभ-मान-मायाद्यनुरक्त-परानुरक्ताविजिताक्लिष्टचेतोरुपशमस्थायी शान्तो रसो भवति । तर्जन-वध-बन्धादिसहनं क्षमा। ध्यायं जीवाजीवातिनिर्वभावनम् । ध्यानेन स्वानुभावा स्पर्शं, नृत्, गीतादि, उसका दर्शन श्रथवा साक्षात्कार करना । इससे स्वयं कहना या सुनना भी ग्रहीत होता है । अभीष्ट पदसे श्रप्राप्त वस्तुके वाचने योग्य श्रथवा प्रिय अर्थ ग्रहीत होता है । उसको सिद्ध श्रथवा प्राप्ति अथवा उत्पत्ति । इस प्रकारके विभावोंसे विस्मय रूप स्थायी-भाववाला श्रद्भुत रस उत्पन्न होता है । [कारिकामें ग्राए हुए] ‘हर्ष’ पदसे अपने अनुभव सूचित होते हैं, इनसे नेत्रोंका विस्तार, अंगोंको तोड़ना-मोड़ना टकटकी लगाकर देखना, कपड़ा श्रथवा अंगुलियोंका घुमाना, गद्गद् वचन, कम्पन ग्रोर स्वेदादि श्रनुभावोंका ग्रहण होता है । श्रावेग, जड़ता, स्तम्भ, श्रृङ्गार, गद्गद् ग्रोर रोमाञ्चादि इसके व्यभिचारिभाव होते हैं ॥ [१६] १२१ ॥

श्रब शान्त [रसका निरूपण करते हैं]— [सूत्र १७६]— जन्म-मरण [रूप संसार] से भय, वैराग्य, [ग्रात्मा-परमात्मा ग्रादि] तत्वों ग्रोर शास्त्रादिके चिन्तनसे उत्पन्न होने वाला शान्तरस होता है । ग्रोर क्षमा, ध्यान तथा उपकरण के द्वारा इसका ग्रभिनय किया जाता है । [२०] १२२ ।

देव मनुष्य नारक यातिर्यग् [पशु-पक्षी] ग्रादि रूपमें भ्रमण करना [प्रचार करना] ‘संसार’ कहलाता है । उससे भय [शान्तरसका कारण होता है ।] विषयोंसे विमुखता ‘वैराग्य’ कहलाती है । तत्व अर्थात् जीव ग्रोर ग्रजीव ग्रथवा पाप ग्रोर पुण्य ग्रादि रूप, तथा मोक्षके उपायोंके प्रतिपादक शास्त्रका विचार करना, चित्तमें बार-बार लाना । इस प्रकारके विभावोंसे काम, क्रोध, मोह, ग्रभिमान, माया ग्रादिके सम्बन्धसे रहित विषयोंन्व-खतासे रहित ग्रक्लिष्ट चित्तवृत्ति रूप शमस्थायिसाव् वाला शान्तरस उत्पन्न होता है । डांट-फटकार [तर्जन], बध, बन्धन ग्रादिको सह लेना ‘क्षमा’ कहलाती है । जीव-ग्रजीव ग्रादि तत्वोंका विचार करना ‘ध्यान’ कहलाता है । इससे अपने निर्विकल्पता ग्रादि ग्रनुभाव सूचित होते हैं । ‘उपकरण’ पदसे मंत्री, मुदिता [प्रमोद] करना, ग्रोर उपेक्षा [माध्यस्थ्य] ग्रादि ग्रनुभाव सूचित होते हैं । निर्वेद, मति, स्मृति, श्रृति ग्रादि इसके व्यभिचारिभाव हैं । [नाट्यशास्त्र ग्रादि] ग्रन्थोंमें [शान्तरस] को नहीं मानते हैं । उनके मतमें [नाटकादि] में इसका [प्रतीकार] नहीं करना [चाहिए] ।

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३१८ ] नाट्यदर्पणम् [ का० १२२, सू० १७७

निश्चलदृष्टितादृशि सूचितः । उपकारेऽपि मैत्री-प्र मोद-कारुण्य-माध्यस्थ्यादियोज्ज्वलभावा ग्राह्यन्ते । व्यक्तिभिचारिराश्चास्य निर्वेद-मतिस्मृति-धृत्यादयः । श्रयश्च कैश्चिन्नोक्तः, तेषां सकलकलेशविमोचचयेऽपि पुरुषार्थे पराड्मुखत्वमेव दृश्यतेमिति ॥ [२०] १२२॥

[सूत्र १७७]—श्रथ-शब्दपुः काव्यं रसैः प्ररथैराविसर्पति । श्रृङ्गारसा तेन सौहार्दं रसेपु कविसंनिनिनाम् ॥[२१]१२३॥

शब्दार्थौ श्रभिनेयाभिनेयमेदेन काव्यस्य वपुः शरीरम् । रसाश्च पुनः प्राणाः । तैर्विभावोपनवनधनरसरोपनीतैः सहृदयहृद्येपु काव्यं विसर्पति । तेन हेतुना कविमममन्यानां श्रृङ्गजसा मुख्यतो रसेषु सौहार्दं प्रीति: । रसाविभावविना प्रयत्नैनैवोपनितस्य, श्रलङ्कारस्यापि निवन्धः: श्र चेतश्चमत्कारोत्येव इति श्रृङ्गजसा इत्युक्तम् । यथा—“कपोले पत्राली करतलतिरोचते स्मितेति, निपीतो निःश्वासैैरमृतहयोडरररसः ।

सकल क्लेशोंके छुड़ाने वाले मोक्ष रूप पुरुषार्थसे पराड्मुख होना ही दूषित है । [इसलिए उन का मत उचित नहीं है] इसका श्राभिप्राय यह है कि मोक्ष-प्राप्तिके लिए शान्तरको स्थिति श्रावश्यक है । जो लोग शान्तरको नहीं मानना चाहते हैं उनके मतमें मोक्षकी सिद्धिका मार्ग ही बन्द हो जाता है । फिर मोक्षकी सिद्धि किस प्रकार होगी। इसलिए सकल पुरुषार्थके शिरोमणिभूत मोक्ष पुरुषार्थकी सिद्धिके एकमात्र हेतुभूत शान्तरसका मानना अनिवार्य है यह पण्डितकारका श्राभिप्राय है ।

[सूत्र १७७]—शब्द ग्रौर श्रथ्य रूप शरीर वाला काव्य, रस रूप प्राणोंसेही चलता है इसलिए श्रप्रनेको कवि समझने वाले [सुकवियों] का रसोंके प्रति श्रनुराग प्रेम होता है ।

ग्रभिनेय तथा श्रथनभिनेय भेद वाले काव्यकका शरीर शब्द ग्रौर श्रथ्य है । ग्रौर रस उनका प्राण है । विभावोंके समावेश रूप साधनोंसे प्राप्त उन [रसों] के द्वारा काव्य सहृदयों के हृदयमें प्रवेश करता है [विसर्पति] । इस कारण श्रप्रनेको कवि समझने वाले सुकवियोंका रसोंमें प्रधान रूपसे प्रेम होता है । [मुख्य रूपसे] रसकी श्राविर्भूत करने वाले प्रयत्नसे ही प्राप्त होने वाले श्रलङ्कारोंकी भी रचना करनी चाहिए । [ग्रलङ्कारोंकी रचनाके लिए ग्रलङ्गसे प्रयत्न सुकवि नहीं करते हैं । रसके सन्निवेशमें जो यत्न करते हैं उससे स्वाभाविक रूपसे श्रलङ्कार भी उनके काव्योंमें श्रा जाते हैं] । ग्रौर वे चित्तमें चमत्कार उत्पन्न करते हैं । इस बातके सूचन करनेके लिए [कारिकामें] ‘श्रृङ्गजसा’ पदका ग्रहण किया है ।

हे मानिनि प्रिये ! तुम्हारे गालोंपरकी पत्राली [चन्दनादिके द्वारा बनाई गई सौन्दर्याश्रायक रेखाएँ, नाराज हो जानेके कारण गालोंके ऊपर रखे गए] हाथोंकी रगड़ से मिट गई [किन्तु तुमने हमें उनके छुड़नेका श्रवसर नहीं दिया] ग्रमृतके समान सुन्दर तुम्हारे

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का० १२३, सू० १७७ ] तृतीयो विवेक: [ ३१५

मुहः कष्ठे लग्नस्तरलयति वाष्पः स्तनतटं, प्रियो मन्युझातस्तव निरनुरोधे न तु वयम् ॥"

यथा राघवाभ्युदये—

"तल्लावण्यमनन्यगृवृत्तिवचसां तत् कौशलं पेशलं, तत् सौभाग्यसम्पाग्यसः्येविषमुर्वे तद् यौवनं पावनम् । एकैकेन प्रियसदृशेन मनसो विश्रामधाम्ना विना, व्यर्थं सा हृदि सर्वमेव मनुते व्यालोलनेत्रोत्पला ॥"

यथा वास्मदुपज्ञे मल्लिकामकरन्दे प्रकारोऽ मकरन्दः—

"ग्रास्यं हास्यकरं शाङ्क़दूयशरसं बिम्बाधरः सोदरः, पीयूषस्य, वचांसि मन्मथमहाराजस्य तेजांसि च । हृष्टिविष्टपचन्द्रिका स्तनतटी लघ्मींतटी नाट्यभूः, श्रौचित्याचररैः विलासकररैः तस्या: प्रशस्यावधिः ॥"

यथा वास्मदुपज्ञार्ँ वनमालायां नाटिकायाम—

"राजा—[दमयन्ती प्रति]— "दृष्टिः कर्थ जरठपाटलपाटलेयं कम्पः किमेष पदमोष्ठदले बबन्ध । नारङ़रङ़हरगप्रवणाः प्रियेऽस्य वक्त्रस्य कुंकुमसृतडुरङ़ाम कुटीड्यम्॥" एपु रसप्रयत्नेनैव शब्दार्थालङ्कारलाभः। ॥(२१) १२३ ॥

इन श्लोकोंके रसको उड़ने निःश्वासोंसे पी डाला [पर हमें न मिल सका] श्रौर तुम्हारे ग्रासूं गलमें लिपटते हुए स्तनोंके [ऊपर गिरकर उनके] तटको कम्पित कर रहे हैं [पर हम उसके दर्शनके लिए तरस रहे हैं ] जान पड़ता है कि [ग्राज] क्रोध हो तुम्हारा प्रिय बन गया है, हम नहीं !"

ग्रथवा जैसे 'राघवाभ्युदय' में—

"बह चञ्चल नेत्रों वाली [व्यालोलनेत्रोत्पला, ग्रपने] उस [लोकोत्तर] लावण्यको, ग्रनन्यत्र न पाए जाने वाले वचनोंके उस सुन्दर कौशलको, प्रभामाग्यशाली पुरुषोंको प्राप्त न हो सकने वाले उस सौभाग्यको, श्रौर उस पवित्र [ग्रपने] यौवनको, हृदयको विश्वास देने वाले एकमात्र प्रियसदृशके बिना इस सबको व्यर्थ ही समझती है !"

ग्रथवा जैसे हमारे बनाए हुए 'मल्लिकामकरन्द' नामक प्रकरणमें मकरन्द—

"सौन्दर्यकी चरम सीमा [प्रशस्यावधिः] रूप उस [नायिका] का मुख चन्द्रमाकी कीर्ति का उपहास करने वाला है, बिम्बाधर ग्र्रमृतका सहोदर है, वाणी मनमथ महाराजके तेजके समान है, हृष्टि स्वर्गकी चाँदनी-सी है, स्तनतटी लक्ष्मी रूप नटीकी क्रोडाभूमि है श्रौर उचित ग्राचाररै विलासको उत्पन्न करने वाला है !"

ग्रथवा जैसे हमारी बनाई हुई 'वनमाला' नाटिकामें—

"राजा [इमयन्तीके प्रति]— "[हे प्रिये ! तुम्हारी] दृष्टि पुराने लोध्र [पाटल वृक्ष विशेष] के समान लाल क्यों हो रही है? तुम्हारे ग्रोठमें कम्प क्यों हो रहा है ? ग्रौर बिना हो कुंकुमके लगाए तुम्हारे मुखपर नारङ़ीके रंगकी शो पराजित करने वाली यह लालिमा क्यों हो रही है ?

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क्ष्ममुसेवार्थ दृढ्यात्—

[सूत्र १७५]—न तथार्थशब्दोत्तम्रेक्षा: इलाछया: काव्ये यथा रस: ।

विपाकक्रममप्यास्त्र उद्र जपति नीरसस् ॥[२२]१२४॥

न हि नवननार्थव्युत्पन्नशब्दग्रथनमेव काव्यां, तर्क-व्याकररायोरपि तथाभावप्रसंगात् । किन्तु विचित्ररसपवित्रशब्दार्थनिवेश: । विपाकक्रमनीयमपि सहकारफलं विरसमुद्राग्निवहति । श्रत: शब्दार्थमात्रश्रेष्ठ:; गुष्टकवेष्टया यमकमलेपादीनामपि निवन्धमर्हन्ति । न तु रसैकशरणस्य नाट्यस्येति ॥ १२४ ॥

एत्थ विरुद्धरसां विरोधे व्यवस्थास्यामह—

[सूत्र १७६]—एकत्र स्वैरिरणोस्तुल्यशक्तियोगे विरुद्धता ।

एकस्मिन्नात्राश्रये नायकादौ तस्मिन्नेव प्रक्रमे परस्परविरुद्ध्यो रसयोरिविरुद्धता, न तु मिन्ने । यथाड्नजुनचरिते—

इनमें रसके लिये किये गए प्रयत्नसे हो [स्वाभाविक रूपसे] शब्दालङ्कार तथा अर्थालङ्कारों समावेश हो गया है [उनके लानेके लिये कविने पृथक् प्रयत्न नहीं किया है ।]

इसी बातको पुष्ट करते हुए [ग्रंथे कहने] हैं—

[सूत्र १७७]—काव्ये शब्द तथा अर्थकी कल्पना उतनी प्रशंसनीय नहीं होती है जितनी रसकी स्थिति । जैसे पंक जाननेके कारण सुन्दर लगने वाला ग्रामका फलभी रस-रहित होनेपर दुरा मालूम होता है ।[२२] १२४ ।

नए-नए श्रथ्योंको प्रकाशित करने वाले शब्दोंकी रचना कर देना मात्र हो काव्य नहीं कहलाता है क्योंकि न्याय तथा व्याकरनमें भी यह [नए-नए श्रथ्योंके प्रकाशक शब्दोंकी रचना] हो सकता है । किन्तु [विचित्र] वमत्कारजनक, रससे पवित्र शब्द श्रोर श्रथंका सन्निवेश [ही काव्य कहलाने योग्य होता है ।] जैसे परिपाक हो जाननेके कारणा सुन्दर दिखलाई देने वालो भी ग्रामका फल रसशून्य होने पर बुरा लगता है । इसलिए केवल शब्द तथा श्रथ का श्रवलम्बन करने वाले गुष्ट कवि यमक श्रादि ग्रादिकी हो रचना कर सकते हैं, रसप्रधान नाटककी [रचना] नहीं कर सकते ॥ [२२] १२४ ॥

प्रब विरुद्ध रसोंका विरोध [उपस्थित] होनेपर उसके परिहारके मार्ग [व्यवस्था] को बतलाते हैं—

[सूत्र १७८]—एक ही स्थानपर वो स्वतन्त्र श्रोर तुल्यशक्ती वाले रसोंमें विरोध होता है । [प्रथमत: (१) भिन्न श्राश्रयोंमें रहने वाले श्रथवा (२) स्वतन्त्र न रहने वाले, अथवा (३) तुल्य बल न रहने वाले रसोंमें विरोध नहीं होता है । श्रत: एव (१) दो विरोधी रसोंमें श्राश्रयभेदसे, (२) एकको दूसरेके अङ्ग बना देनेपर, श्रथवा (३) दोनोको किसो तीसरे प्रबिरोधी रसका अङ्ग बना देनेसे श्रोर गौण रूपसे वर्णन करनेपर विरोध नहीं रहता है । यही उनके विरोध-परिहारके मार्ग ]।

एक ही श्राश्रय अर्थात् नायकादिमें श्रोर उसो प्रसंगमें परस्पर विरोधी रसोंका विरोध होता है । जिनन श्राश्रयोंमें श्रथवा भिन्न प्रसंगोंमें [उसी नाटकमें विरुद्ध रसका वर्णन] होने पर विरोध नहीं होता है । जैसे श्रङ्क नचरितमें—

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का० १२४, सू० १७६ ] तृतीयो विवेक: [ ३२१

समुत्थिते घनुर्घ्वनौ भयावहे किरीटिनः । महानुपप्लवोद्भवत् पुरे पुरन्दरद्रिषाम् ॥" छात्र नायकस्य वीरः, प्रतिपक्षारां तु भयानकः ।

यथा वा— "दन्तच्छदानी करजैश्च विपाटितानि, प्रोद्भिन्नसान्द्रपुलके भवतः शरीरेः । दत्तानि रक्तमनसा मृगराजवध्वा जातस्थहेमुनिभिरप्यवलोकितानि ॥" छात्र तस्मिन्नेव प्रकमे मुनि-कामुकयोर्भिन्ननोर्न शृङ्गार-शान्तौ विरुद्धाविति ।

तथा स्वैरिपोः स्वातन्त्र्योः सतोरिविरुद्धयो रसयोविरुद्धता, न तु परतन्त्र- स्वतन्त्रयोः, मुख्यस्यायत्ततयोरवा यथा "कुरवक ! कुचाघातकीडासुखेन वियुज्यसे, बकुलविटपिन् ! स्मरतेह्यं ते मुखासवसेचनम् । चरराघटनाशून्यो यास्यस्यशोक ! सशोकतां, इति निजपरतत्यागे यस्य दृशां जगदु स्त्रियः ॥"

प्रभुजुंके भयावहु धनुप्के ध्वनिके उदय होनेपर इधरके छात्रग्योँके नगरमें बड़ी घबराहट फैल गई ।

इसमें [वीर तथा भयानक दो रसोंका वर्णन है । ये दोनों रस एकाश्रयमें होनेपर विरोधी माने जाते हैं । यहां उन दोनोंके श्राश्रयका भेद कर दिया गया है । इसलिए उनमें विरोध नहीं रहता है ।] नायक [प्रभुजुं] में वीर रस है श्रोर शत्रुओंमें भयानक रस है [इस- लिए श्राश्रयभेद हो जानेसे उनमें विरोध नहीं रहा ।]

अथवा रक्तपानकी इच्छा करने वाली [दूसरे पक्षमें छत्रुरागपूर्वक मन वाली] मृगराजकी वधू [सिहनी दूसरे पक्षमें किसी राजाकी पत्नी] ने श्रापके रोमाञ्चयुक्त शरीरके ऊपर जो दन्त- प्रहार श्रोर नखोंसे विपाटनके चिन्ह बनाए हैं उनको मुनियोंने भी सग्रह होकर [प्रार्थना हम भी इन दंतकस्त नखाक्षतोंसे विभूषित होते इस इच्छासे] देखा ।

यहां उसो प्रसङ्गमें मुनि श्रोर कामुक दो भिन्न श्राश्रयोंमें रहने वाले शान्त श्रोर शृङ्गार रसोंका विरोध नहीं है ।

इसी प्रकार [दो विरोधी रसोंके] स्वतन्त्र रूपसे [वर्णित] होनेपर ही विरोध होता है एकके परतन्त्र श्रोर दूसरेके स्वतन्त्र होनेपर श्रथवा दोनोंके किसी तीसरे मुख्य रसके श्रधीन होनेपर [उनका विरोध] नहीं होता है । जैसे— हे कुरवक ! [वृक्ष विशेष, हमारे यहांसे चले जानेपर] तुम [हमारे द्वारा प्राप्त होने वाले] कुचाघातके सुखसे वञ्चित हो जाग्रोगे । हे बकुल ! [मूलश्रोके वृक्ष] तुम्हें [हमारे द्वारा प्राप्त होने वाले] मधुकर कुल्ले द्वारा सेचनकी याद प्रायेगी । हे श्रशोक ! हमारे चरण- प्रहारसे वञ्चित हो जानेपर तुम शोकयुक्त हो जाग्रोगे । जिसके [भयके कारण उसके] रात्रुप्राणि स्त्रियाँ इस प्रकार [इन वृक्षोंको सम्बोधित करके] कहती थीं ।

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छत्रोद्दीपनविभावैः: कुरवकादिभिरिह दृश्यमानः शृङ्गारो विशेषतः करुणां स्वतन्त्र-मझिनं हि द्रष्ट्रियां पोपयति ।

यथा वा— "ग्रयं स रशनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः । नाभ्युरुजघनस्पर्शी नीवीविवर्तनः करः ॥ छात्र अरुणश्रवाः समरभूवि पतितवह्नदर्शनन तत्क्रियारां शृङ्गारः स्मर्यमाणः करुणां पोपयति ।

मुख्यस्यायत्तौ यथा— "चिप्टो हस्तावलम्बः प्रसभमभिहते डन्याददानोऽङ्गशुकान्तं, गुहून केशेष्वपास्यच्वररसनिपतितो नेक्षितः सम्भ्रमेण । श्यालिझने योषद्भूतं त्रिपुरयुवतिभिः साश्रुनेत्रोत्पलाभिः;, कामीवद्रापराधः स दहतु दुरितं शान्त्ववो वः शरणिनः ॥"

अत्र त्रिपुररिपुप्रभावातिशस्य करुणेऽ-शृङ्गारवजृभूतौ । परस्परबिरोधेऽपि चान्य-मुखप्रेच्छिलपात्रतद्गत-स्वाभियातेन स्वात्मपुष्टिमलभमानयो-नृप्तं पशिमेप्सिते-ग्रातता-यिद्ययवन कृतः करुणेऽ-शृङ्गारयोऽन्यत्-श्चातकभावः इति ?

इसमें कुरवक श्रादि रूप उद्दीपन विभावोंके द्वारा उद्दीप्त किया जाने वाला शृङ्गार रस उनके भीतर रहनेवाले प्रधान श्रृङ्गार स्वतन्त्र करुणेरसको पुष्ट करता है ।

कथनवा जैसे— [हमारी रझाना ध्यथात्] तगड़ीको हटाने वाला, पीन स्तनोंका मदन करने वाला तथा नाभि जंघाओं श्रौर नितम्बोंका स्पर्श करने वाला तथा नारीको खोलने वाला [हमारे प्रियतम सूरिश्वावाक] यह वही [ग्रानन्ददायक] हाथ है ।

इसमें समरभूमिमें पड़े हुए सूरिश्वावाके हाथको देखकर उसको पत्नियोंका स्मर्यमाण शृद्धार रस [भूतश्रिश्वावाकी मृत्युके बाद वर्तमान] करुण रसका परिपोषण कर रहा है । [इसलिए शृङ्गार करुण रसका ग्रङ्ग होनेसे उसका विरोधी नहीं है]।

[किसी तीसरे] मुख्य रसके श्रङ्गीन रहने वाले [दो विरोधी रसोंके अङ्ग होनेसे] उदाहरण ] जैसे—

शिवाजीके द्वारा किए गए त्रिपुरदाहक समय त्रिपुरकी स्त्रियोंकी बुद्धिशक्तिका वर्णन करते हुए कविने इस इलोकमें ग्रानिकाक कामोंके साथ सदृश इस प्रकार दिखलाया है—

[श्रानन्दापराध कामीके समान स्त्रियोंका] हाथ पकड़नेपर झटका दिया गया, बलात्कार हटाए जानेपर भी वस्त्रोंको ग्रहण करनेवाला, केशोंको छुड़ते समय दूर हटाया गया, परन्तु गिरनेपर भी [ग्रङ्गिन पक्षमें] भयके कारण [श्रौर कामी पक्षमें संभ्रम श्रादरपूर्वक] न देखा गया, श्रौर [परस्त्री गमन श्रादि रूप तुरन्त किए हुए शत्रुप्राधके कारण] ताजे ग्रपराध वाले कामीके समान ग्राङ्गोंमें ग्रांसू भरे हुए त्रिपुरकी युवतियोंने ग्रालिङ्गन करते हुए जिस [ग्रङ्गिन] को भटक दिया है ।

इसमें करुण श्रौर शृङ्गार [दोनों परस्पर विरोधी रस] त्रिपुरारि [शिवजी] के प्रताप-

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का० १२४, सू० १७६ ]

तथा एकाश्रययोरपि तुल्यबलयोरविरोधो, न तु हीनाधिकबलयोः । यथा पुरुरवा: प्राह—

"क्वाकार्यं शशलचस्माः क्व च कुलं भुयोडपि हश्येत सा, दोषाग्नां प्रशमाय नः श्रुतमहो कोपेडपि कान्तं मुखम् । कि वच्यत्यपकल्मषपा: कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा, चेतः ! स्वास्थ्यमुपेहि कः खलु युवा धन्योऽधरं धास्यति ॥

छात्र शृङ्गार-शान्तयोः परस्परमञ्ज्ञाभावो च्यपोध्य-पोषकत्वान् तृतीयस्य भावान् शृङ्गारभावोऽपि नास्ति, किन्तु स्वतन्त्रौ । तथापि न विरोधः, शान्तस्याग्नुत्कलत्वेन शृङ्गारवलत्वात् । शृत एवात्र पर्यन्ते शृङ्गारे विस्थान्तिः एवमन्यत्राप्युदाहयम् ।

तथा एकाश्रययोः स्वैरिपोसतुल्यशक्त्योरुद्रुतयोरङ्गेऽङ्गिनोस्तैरन्तर्य विरोधो न त्वतिशयके अंग हैं ।

इसलिए परस्पर विरोधी होनेपर भी दूसरे [प्रधानभूत शिवके प्रतापातिशय] का मुख देखने वाले होनेसे परतन्त्रताके दुःखसे ब्राक्रान्त होकर स्वयं अपने परिपोषकको न प्राप्त कर सकने वाले कुरङ्ग शृङ्गारमें, राजाके समीपमें स्थित दो ग्राततायियोंके समान एक दूसेरे के लिए घात्य-घातक भाव नहीं हो सकता है ।

[इसलिए यहां इन दोनों रसों का परस्पर विरोध नहीं है ।]

दूसरे प्रकार एक हो [नायक ग्रादि वृत्ति] ग्राश्रयमें रहने पर भी दोनोंके तुल्य बल होनेपर ही विरोध होता है ।

दुर्बल शृङ्गार प्रबल होनेपर नहीं ।

जैसे [विक्रमोर्वशीयमें] पुरुरवा कहता है—

(१) कहां यह ग्रनुचित कार्य शौर कहां [हमारा उज्ज्वल] चन्द्रवंश [तक] ।

(२) क्या वह फिर कभी देखनेको मिलेगी [श्रौसमुख्य] ।

(३) [क्वारे] मैंने तो दोषोंपर विजय प्राप्तके लिए ही शास्त्रोंका प्रधययन किया है [फिर इस कुमार्गपर क्यों जा रहा हूँ] [मति] ।

(४) [श्रोहो] क्रोधमें [नाराज होनेपर] भी उसका [लाल-लाल मुख कितना सुन्दर लगता है] [स्मरण] ।

(५) [प्ररे मेरे इस व्यवहारको देखकर] विद्वान् एवं धर्मात्मा लोग मुझे क्या कहेंगे [शङ्का] ।

(६) वह तो श्रव स्वप्नमें भी दुर्लभा हो गई । [दैन्य]

(७) अरे मन तनिक धीरज रखो । [धैर्य]

(८) न जाने कौन सौभाग्यशाली युवक उसके श्रधरामृतका पान करेगा [चिन्ता] ।

इसमें शांत शौर शृङ्गार रसोंका पोष्य-पोषकभाव न होनेसे अंगांगिभाव [ग्रर्थात् प्रधानभाव] नहीं है ।

शृङ्गार किसी तीसरे [रस] के न होनेसे [दोनोंका तीसरेके प्रति] श्रंगभाव भी नहीं है ।

किन्तु दोनों स्वतन्त्र रस हैं ।

फिर भी यहां शान्त रसके आगन्तुक होनेसे दुर्बल [तथा शृङ्गारके प्रकृत होनेके कारण प्रबल] होनेसे [उन दोनोंका] विरोध नहीं है ।

इसलिए यहां शृङ्गार रसमें ही विस्थान्ति होती है ।

इसी प्रकार श्रन्य उदाहरणों भी समझ लेना चाहिए ।

श्रौर एकाश्रयमें रहने वाले दो स्वतन्त्र तथा तुल्य बल रसोंमें भी नैरन्तर्य [निपात

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विरुद्धेन रसान्तरेण व्यवधानेऽथवा नागानन्दे—

“रागस्यास्पदमित्यवैमि न हि मे ध्वंसेऽति न प्रत्ययः |”

इत्यादिनोपचेत्पानं प्रकृति शांतो रसस्तस्य विरुद्धो मलयवतीविषयः शृङ्गारः—

‘ग्राहो गीतमहो वादित्रम्’ इत्यादिना शृङ्गारसुतमन्तरे कृतवा निवद्धः | एवमन्येऽप्युदाहार्यमिति |

तद् रसानिरोधेन विरोधः परिहारश्च दृष्टव्यः | विमिश्रविचारिणां चारित्राणां तु रसानिरोधेन विरोधः परिहारश्च दृष्टव्यः |

अथ रसदोषाणाह—

[सूत्र १९०]—दोषोद्भिच्चित्यमडौषधग् ग्रपोष्योज्ज्वलितरङ्गभित्‌ ।। [२३] १२५ ।।

(त्रय) सहृदयानां विचिकित्साहेतु कर्मानौचित्यं तच्चानेकधा |

(क १) तत्र क्वचिन् प्रतिकूलविभाव-मानसनिबन्धो यथा—

“न्यत मानसलं वत विग्रहैर्हि पुनरेकि गतं चतुरं वयः । परस्त्रीभिरितीव निवेदिते स्मरमते स्म वधूजनः ॥”

प्राङ्‌व्यवधानसे वर्णनं] होनेपर हो विरोध होता है [बोंके] अविरोधी ग्रन्थ रसके व्यवधान होनेपर विरोध नहीं होता है | जैसे नागानन्दे—

[हिन् मित्र शात्रेय] यह यौवन] विषय-वासनाका घर है यह बात में जानती हूं श्रार यह सदा रहने वाला नहीं है यह बात भी मुझे मालूम है [प्रथमाेंक इलोक संख्या ४] ।

इत्यादि [मुखसञ्चारके] उपक्रमे [नामक अंग] से लेकर शांत रस [प्रारम्भ हो गया] है ।

उसका विरोधी मालती विषयक ग्रनुराग [प्रथमाेंकके १४ वें इलोके पूर्व कहे गए] ‘ग्राहो गीतं

ग्रहो वादित्रं इत्यादि [वाक्य] से बीचमें ग्रथित रसका समावेश करके [व्यवधानसे] वर्णन किया गया है [इसलिए यहां शांत तथा शृङ्गार रसोंका विरोध नहीं रहता है] ।

इसी प्रकार ग्रन्थ रसोंमें भी सम्भव लेना चाहिए ।

[विरोधी रसों] के विभावों तथा व्यभिचारिभावोंमें रसके [विरोध-प्रतिरोधकी

व्यवस्थाके] ग्रनुसार हो विरोध तथा उसका परिहार सम्भव लेना चाहिए ।

ग्रपब रसके दोषोंंका वर्णन ग्रारम्भ करते हैं—

(क) शृङ्गारकी उपरता [अर्थात्‌ सप्रधानमूत

[सूत्र १९०]—(क) [रसाके] ग्रनौचित्ये, (ख) [मुख्य रसकी] पुष्टिका ग्रभाव, (ग) [मुख्य रसको भी ग्राह्यवधकतासे] अधिक विस्तार (घ) [अङ्गिमित्त श्यार्यात्‌] प्रधान रसको भुला देना [ये पांच प्रकारके रसके] दोष होते हैं ।

(क) सहृदयोंके [मनमें] झटका या संवेग [उत्पन्न] करने वाला कर्म ग्रनौचित्य कहलाता है ।

ग्रौर वह ग्रनेक प्रकारका हो सकता है ।

[रसका ग्रनौचित्य] कहीं (क १) प्रतिकूल विभावादिके वर्णन रूप होता है ।

जैसे—

इस मानको छोड़ दो, [प्रधिक काल तक] प्रिय-कलह करना उचित नहीं है ।

[यौवनको] सुन्दर प्रवस्था [एक बार समाप्त हो जानेपर] फिर लौटकर नहीं ग्राती है ।

कोकिलोंकि [कूइह शब्द द्वारा] मानो इस प्रकारकी सूचना देनेपर वधूजन कामोत्सुक पतियोंके

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का० १२४, सू० १५० ] तृतीयो विवेक: [ ३२४

छत्र शृङ्गारप्रतिकूलस्य शान्तस्यानित्यताप्रकाशारूपो विभावो विरुद्धः। (क २) क्वचिदकाण्डे प्रथनम्। यथा वेधीसंधारे शिरोरक्तप्रकरैरपि दुर्योधनस्य भीष्म-प्रमुखमहावीरलताच्छ्याकारियो प्रवृत्ते समरसंस्मे भानुमती प्रातः शृङ्गारवर्णनम्। (क ३) क्वचिदकाण्डे विनिद्देशो यथा वीररचिन्ते राघव-भार्गवयोः चाराविरुढे वीररसे 'कड्क्षामोचनाय गच्छामि' इति राघवस्योक्तः। (क ४) क्वचिदुत्तममाध्यमाधमसमान् प्रकृतिनानास्म्यथा वर्णनम्। यथा—

उत्तमानां हास्य-वीभत्स-करुणाद्भुत-शृङ्गारसुतप्रकर्षः। (क ५) मध्यमाधममानां तु श्रृङ्गारः, वीर-रौद्र-शान्तप्रकर्षश्च। (क ६) उत्तमेष्वपि दिव्येषु सम्भोगशृङ्गारवर्णनं पित्रोः सम्भोगवर्णनसर्मं यथा कुमारसम्भवे उमामहेश्वरयोः। (क ७) स्त्रादिव्येषूतमेष्वपि सङ्घः फलदक्रोध-श्च- पातालगमन-समुद्रलङ्घनाद्युत्साह-वर्णनम्।

साथ रमण करने लगों। (क १) इसमें शृङ्गार रसके प्रतिकूल ग्रनित्यता प्रकाशन रूप शांत रसके विभावोंका वर्णन [प्रकृत शृङ्गार रसके] विपरीत है। (क २) कहों बेमौके विस्तार कर देना [भी रस दोष होता है] जैसे वेधीसंहार [के द्वितीयाङ्क] में घोरोदयत प्रकृतिके [नायक] होनेपर भी भीष्म श्रादि लाखों वीरोंका नाश कर डालने वाले [भयङ्कर] युद्धके श्रारम्भ होनेपर भी भानुमतीके प्रति शृङ्गारका वर्णन [प्रकाण्ड-प्रथन रूप रसदोषका उदाहरण है]।

(क ३) कहों ग्रावसरके बिना ही रसका विच्छेद [कर देना भी रसदोष होता है] जैसे—महावीरचरित्रमें रामचन्द्र तथा परशुरामजीके बीच वीररसके पूर्ण प्रवाहपर श्रा जानेकप [ग्रच्छा ग्राव में] 'कंगन खोलनेके लिए जा रहा हूँ' यह रामचन्द्रका कथन [प्रकाण्डमें रसका विच्छेदक होनेसे रसदोष है]। (क ४) कहों उत्तम ग्रावम तथा मध्यम प्रकृतियों [वाले पात्रों] का विपरीत रूपमें वर्णन [प्रकृति-विपर्यय नामक रसदोष है] जैसे उत्तम [प्रकृति वाले पात्रों] के वर्णन हास्य-

वीभत्स करण भयानक श्रौर श्रद्भुत रसोंका ग्रात्यधिक वर्णन [ग्रनुचित है] जैसे उत्तम [प्रकृति वाले पात्रों] के वर्णन हास्य-वीभत्स करण भयानक ग्रौर ग्रद्भुत रसोंका ग्रत्यधिक वर्णन [ग्रनुचित है]। (क ५) मध्यम तथा श्रधम [प्रकृतिके नायकादि] के [साथ ग्रप्राम्य ग्रर्थात्] शुद्ध शृङ्गार वीर, रौद्र और शान्तरसके प्रकर्षका वर्णन [ग्रनुचित होनेसे ये दोनों प्रकारे वर्णन प्रकृति-विपर्यय नामक रस दोषमें ग्राते हैं]।

(क ६) उत्तम [प्रकृतियों] में भी दिव्य [पात्रों] के शृङ्गारका वर्णन [ग्रप्रने] माता-पिताके शृङ्गार रसके वर्णनके समान [होनेसे ग्रनुचित] है। जैसे कुमारसम्भवमें पार्वती श्रौर शिवके [शृङ्गारका वर्णन]। (क ७) देवताओंको छोड़कर उत्तम प्रकृतियोंमें भी तुरन्त फल देने वाले क्रोध, स्वर्ग या पातालमें गमन, समुद्रलङ्घनादिके उत्साहका वर्णन [भी ग्रनुचित होनेसे इस प्रकृति-विपर्यय रसदोषकी श्रेणीमें ग्राता है]।

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(क ८) धीरोदात्त-धीरोद्धत-धीरललित-धीरशान्तेष्वमेपु वीर-रौद्र-शृंगार-शांतानामवस्थानं, विपरीतवर्ग्योनं वा। मध्यमाधमेपु वीरोदादिरसप्रकर्ष वर्जनीयम्।

(क ९) क्वचिद् वर्णः समासानन्यथाप्रथनम्। तत् तदीप्तेपु रसेपु संयुक्तैर्मू धान्यैश्च वर्णैः समासाद्दशये च प्रायः प्रसन्नो मसृणश्च बन्धः। ऋद्दीप्तेपु तु शृंगार-हास्य-करुण-शान्तेषु मूर्धस्थवर्गापन्चु मैह स्वैरश्च वर्णः। श्रसमासेन मध्यमसमासेन च प्रायः प्रसन्नो बन्धः। सर्वेषु च प्रसिद्धैर् क्लिष्टैर् ग्राम्यैः पुष्टिः। पदैर्न्यासः।

(क १०) क्वचिदुत्कमस्य उत्तमनीयकायां लीलीकसम्भावना।

(क ११) क्वचिन्नायिकापादप्रहारादिना नायकस्य कोपः।

(क १२) क्वचिद् वयो-वेष-दश-काल-प्रवस्था-व्यवहारादीनामन्यथा वर्णनम्।

(क १३) एवमन्यदपि यथक-श्लेष-चित्रादिकं ऋतु-समुद्रादि-चन्द्रार्कोदया-स्तादिप्रकर्षवर्णनं च रसाभिज्ञनौचित्यं दृष्टव्यमिति।

(ख) श्रृंगस्य मुख्यतरसोपकतया श्रवयवसूत्रस्य श्रौष्ठवं विस्तरेप्टकत्वं दोषः। यथा कृतारावयो जटायुबद्ध-लंक्मणाशक्तिभेद-सीताविप्रत्ति-रसेप्टकत्वादि।

(क) धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित शौर धीरशांत रूप उक्तम प्रकृतियोंमें भी वीर, रौद्र, शृंगार तथा शांत रसोंका वर्णन न करना प्रायः विपरीत वर्णन [प्रकृति-विपर्यय नामक रस दोष होता है]। शौर मध्यम तथा प्रथम प्रकृतियोंमें तो इन [धीरोदात्तादि] में वीरादि नामक रस दोष होता है।

(क ९) कहों वर्णों तथा समासोंका [रसके विरोधी रूपमें] प्रयोग [भी रसदोष में गिना जाता है]। जैसे [वीर रौद्रादि] दोष रसोंमें संयुक्त शौर मूर्खन्य [प्रख्यात ऋद्धरवारां मूर्ख-र, प, तथा टवर्ग] वर्णों तथा लम्बे-लम्बे समासोंसे सुंदर शौर मनोहारिणी रचना बनती है। शौर शांत जैसे प्रदीप्त रसोंमें तो वर्णकि पद्मन प्रकर्ष से युक्त होना चाहिए।

हस्व वर्णों शौर समास-रहित श्रथवा अल्प समासके द्वारा सुंदर तथा मनोहारिणी रचना होती है। शौर सभी रसोंमें प्रसिद्ध प्रकृष्ट ग्राम्यता-रहित तथा पुष्टार्थक पदोंका विन्यास होना चाहिए।

[इसके विपरीत होनेपर दोष हो जाता है]।

(क १०) कहों उत्तम [प्रकृति] के [नायक] की उत्तम नायिकाके प्रति व्यभिचार-सम्भावना [भी ग्रनौचित्य मानी जाती है क्योंकि उत्तम प्रकृतिकी नायिकामें इस प्रकारके दोषकी सम्भावना भी नहीं करनी चाहिए]।

(क ११) कहों नायिकाके पादप्रहारादिसे नायकका कोपका वर्णन [ग्रनौचित्य है]।

(क १२) कहों ग्राम्य, वेष, देश, काल, प्रवस्था तथा ध्यवहारादिक ग्रन्थया-वर्णन [भी ग्रनौचित्य माना जाता है]।

(क १३) यमक, इसी प्रकार [ग्रनौचित्य रूपसे प्रयुक्त] इलेष, चित्र, ऋतु, समुद्रादि, सूर्य तथा चन्द्रके उदयास्तादिके जो कि रसके अंग नहीं हैं उन [रसके ग्रन्थ] के प्रकवंका वर्णन [ग्रनौचित्य समरचना चाहिए]।

वर्णन [ग्रन्थ] [अर्थात् प्रथाशिक विस्तारके साथ वर्णन] ग्रनौचित्य समरचना चाहिए।

(ख) ग्रह [प्रज्ञाकी] उप्रता [बोधका निरूपण करते हैं]। ग्रह श्रथयात् मुख्य रसके पोषक होनेसे श्रवयव रुपकी उप्रता प्रयर्थात् श्रत्यान्त विस्तारके कारण उत्कट हो जाना भी दोष है। जैसे कृत्याराव्यामें जटायुके बंध, लक्ष्मणके शक्तिभेद लगने, शौर सीताकी विपत्तिको सुनने

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क० १२५, सू० १५० ] तृतीयो विवेक: [ १२७

श्रवणोषु रामस्य मुहुरमुधः करुणाधिक्यम्‌। व्यंगभूतो हि रसो न धाराधिरोहमहंति, ग्रन्थ्यथाऽड्‌जिनं वीररस‌ं विरोदधतीत । केचितत्र हयग्रीववधे हयग्रीववर्णनमुदाहरन्ति । स पुनस्तदो‌पे वृत्तनायक- स्थाल्पवर्णनात्‌। तत्र हि वीरो रसः स विशेषतो बध्यस्य शौर्य-विभूत्यतिशयवर्णनैनेन भूष्यत इति ।

(ग) ‘ग्रप्रोष:’ इति धाराधिरोहिणां ग्रप्रोषो दोषः। यथा— “बीभत्सा विषया, जुगुप्सिततमः कायो, वयो गल्वरी, प्रायो बन्धुमिरदर्शनवती पतिकैयोंगो वियोगावहः। हातव्योड्यमसम्मवावय विरसः संसार इत्यादिकं, सर्वस्यापि हि वाचि, चेतसि पुनः कस्यापि पुष्यालमनः ॥” छत्र कविना ‘वाचि’ इत्युपनिबद्धता विषयबीभत्सत्वादीनां शान्तजननं प्रति मन्दत्वमुक्तम्‌। ग्रन्थ्यथा सर्वस्य चेतस्यपि स्यात्‌। ग्रप्रोषश्चाङ्गिनो, व्यंगगिभावरवर्ज- तस्य वा मुक्तकোপात्तस्य । व्यंगभूतस्यापोषः पुनर्दोष एवति ।

(घ) ‘ग्रत्युक्ति:’ इति धाराधिरुहस्यापि रसस्य नैरन्तर्येण पुनः पुनः उद्दीप्त- पर रामचन्द्र के बार-बार कहने [विलापादि] का ग्राधिकय [इस ग्रोप्रच नामक रसदोषका उदा- हरण है]। ग्रप्रभूत [ग्रप्रधान] रसका ग्रस्त्यन्त विस्तार नहीं होना चाहिए। ग्रन्थ्यथा वह प्रधान भूत वीररसको दबा देगा ।

कुछ लोग हयग्रीव-बध में हयग्रीवके वर्णनको इसका उदाहरण बतलाते हैं। किन्तु [हमारी सम्मतिमें तो] वह वृत्तदोष है [रसदोष नहीं है] क्योंकि उसमें वृत्त [प्रर्थात कथाभाग] के नायकका वर्णन कम [ग्रो‌अर प्रतिनायक हयग्रीवका वर्णन ग्रधिक हो गया है । ग्रत: वह वृत्तदोष है रसदोषमें उसका उदाहरण नहीं देना चाहिए]। उसमें वीररस [मुख्य रस] है ग्रोर बध्य [हयग्रीव] के शौर्य तथा विभूति श्रादिके प्रतिशय वर्णनसे वह शोभित [परिपुष्ट] हो होता है [ग्रत: उसमें रसदोष नहीं माना जा सकता है । वह वृत्तदोष ग्रर्थात कथाभागका दोष है]।

(ग) ग्रप्रोष ग्रर्थात [मुख्य रसका] प्रवाहपर न ग्राना [ग्रप्रोष नामक रसदोष होता है]। जैसे— विषय ग्रप्रस्यन्त वोभत्स है, वह शरीर [मल-मूत्र ग्रादिकी खान होनेसे] ग्रप्रत्यन्त गृणात है, ग्रग्रायु विनष्ट होने वाली है, ग्रौर बन्धु-बान्धवोंके साथ मिलन रास्तेमें मिलने वाले पथिकों के समान ग्रन्थमें वियोगमें पर्यवसित होनेवाला हो होता है [ग्रसदभावय ग्रर्थात] पुनर्जन्मसे बचनेके लिए [मुक्तिकी प्राप्तिकेलिए] इस नीरस संसारको त्याग देना चाहिए इत्यादिक [बैराग्यपूर्ण बातें] सब लोगोंके केवल वचनोंमें रहती है, मनमें तो किसी पुण्यात्माके ही पाई जाती है। इसमें ‘वाचि’ [वचनोंमें हो होती है मनमें नहीं] ऐसा कहकर कविने विषयोंकी बीभत्सता ग्रादिकी शान्तरसीकी उत्पत्तिके प्रति म‌न्दता सूचित की है । ग्रन्थथा [यदि इनमें प्रबलता होती तो] सबके मनमें भी [उनकी स्थिति] होती [इसलिए यहाँ रसका ग्रप्रपरिपोष वरिणतका होता है । ग्रङ्गभूत [प्रधान रस] का ग्रपरिपोष, दोष नहीं होता है ।

(घ) ‘ग्रत्युक्ति’ ग्रर्थात रसके प्रवाहपर पहुंच जानपर भी उसका बार-बार उद्दी-

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१२८ ] नाट्यदर्पणम् [ कारिका १२४, सूत्र १५०

दोषो यथा कुमारसम्भवे रतिप्रलापेपु । लघ्धपरिपोषो हि रसः पुनः पुनः परामृश्यमानो मालती-माल्यमिव म्लायति । शृङ्ग एव प्रकर्षप्राप्तरसविशिष्टानां कवीनामल्पीयानेव वाग्विलास इति ।

(ङ) ‘शृङ्गिभिन्न’ इति बहुरसे प्रवन्धे शृङ्गयभूतरसापेक्षया शृङ्गिनोडवयव(ङ्ग)भिन्न’ इति बहुरसे प्रवन्धे शृङ्गानुसन्धानं दोषः । शृङ्गानुसन्धिही सर्वेष्वं रसोपपस्य । स्मृत्यभावे पुनरपोष एव । यथा रत्नावल्यां चतुर्थेऽङ्के वासवद्यागमनान्त् । सङ्गिकाविस्मृतिरिति । शृङ्गोऽनुयाद्यरच दोषः परमार्थतो शृङ्गौचित्यान्नःपातिनोडपि सहृदयानामनु-

चिन्त्यव्युत्पादनार्थमुदाहृतंवेलोपपत्ता। केचित्तु व्यभिचारि-रस-स्थायिनां स्वशब्दवाच्यत्वं रसदोषमाहुः, तदयुक्तम् । व्यभिचारिदीनां स्ववाचकपदप्रयोगेऽपि विभावपुष्टे— “दूरोत्सुकमागते विलसितं सम्भापिते स्फारितं, संश्लिष्यतरुर्प गृहीतवसने किञ्चाख्यितभ्रू लुतम् ।”

पन [करनेका प्रयत्न] करना [प्रधान रसका शृङ्गार-विस्तार ‘शृङ्गयभूत’ नामक रसदोष कहलाता है]। जैसे कुमारसम्भवमें रतिके विलापमें [बार-बार करुण रसको उद्दीसत करनेका यत्न किया गया है। इसलिए वह दोष है । क्योंकि] रसका पूर्ण परिपोष हो जानेके बाद उसको बारम्बार स्पर्श करनेसे वह [बार-बार हुई गई] मालतीकी मालाके समान कान्तिहीन हो जाता है। इसलिए प्रकर्ष-प्राप्त रसविशिष्ट कवियोंका वाग्विलास थोड़ा ही होता है । [प्रायःत्त उससे कवि रसका पूर्ण परिपोष हो जानेके बाद रसका शनिवार्य विस्तार नहीं करते हैं]।

(ङ) ‘ग्रद्भित्’ इत्यर्थात् अनेक रसों वाले प्रवन्ध [काव्य नाटकादि] में प्रवयवभूत रसको प्रपेक्षसे ग्रदृत्ति [अर्थात् प्रधान] शृङ्गारविभूत [प्रधान] रसका भेदन श्रृङ्गारानुसन्धान, ग्रभित् नामक रस] दोष होता है । क्योंकि [हर समय मुख्य] रस-

विस्मरण [शृङ्गानुसन्धान, ग्रद्भित् नामक रस] का ध्यान रखना ही उसके परिपोषका प्राप्त होना उसके भुला देनेपर तो उसका परिपोष हो नहीं बनता । [इसलिए प्रधान रसको भुला देना रसका प्रपरिपोष-जनक ‘ग्रद्भित्’ नामक दोष कहलाता है] जैसे रत्नावलीके चतुर्थ श्रङ्कमें वासवदत्तके शा जाननेपर [नाटककी प्रधान नायिका] सागरिकाकी विस्मृति [होनेसे मुख्य रसकी ही विस्मृति हो गई है । शृङ्गः उस में ‘ग्रद्भित्’ नामक रसदोष माना जाता है]।

[नाटकादि दोषों में से प्रथम शनौचित्यको छोड़कर] ग्रदृत्तोंकी उत्पत्ति श्रावि [शेष चार] दोष वास्तवमें तो शनौचित्य [रूप प्रथम दोष] के भीतर ही श्रा जाते हैं फिर भी सहृदयोंके शनौचित्य [के विविध प्रकारों] का परिचय करानेकेलिए ही यहाँ दिखलाए गए हैं ।

कुछ लोग व्यभिचारिभाव, रस, तथा स्यायिभावोंके नामतः प्रहृतए [स्वशब्दवाच्यत्व] को भी रसदोष मानते हैं । [हमारी प्रत्त्यकार रामचन्द्र गुणाचन्द्रकी सम्मतिमें] यह उचित नहीं है। व्यभिचारिभाव श्रादिके वाचक श्रपने पदों [नामों] का प्रयोग होनेपर भी विभाव श्रादिकी पुष्टि होनेपर [रसकी श्रनुभूति होती ही है]। उसमें कोई बाधा नहीं होती है। इसलिए व्यभिचारिभावादिकी स्वशब्द-वाच्यता कोई दोष नहीं है । जैसे इस प्रकारके उदाहरणके रूपमें ग्रत्थकार श्रागला श्लोक उध्दृत करते हैं—

[नायकके] दूर रहनेसे [उसके दर्शकके लिए] उत्कट, [पास श्रानेपर] विलसितं सम्भापिते स्फारितं, संश्लिष्यतरुर्प गृहीतवसने किञ्चाख्यितभ्रू लुतम् ।

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का० १२६, सू० १२१ ]

तृतीयो विवेक:

[ ३२५

मानिन्याश्चरषनातिभयतिकिरे वाष्पाम्बुपूर्णोंचचार्या, चचुर्जातमहो प्रपक्वचतुरं जातागमि प्रेयसि ।।" इत्यादौ रसोत्पत्तौ रदोष एवायम्। तस्माद्व्युत्पत्तिनोक्तिवादवकोत्तरेवेयम्। एवमुभयरससाधारणविभावपदानां कद्टेन नियतविभावाभिधायित्वाधि- गमोडपि सन्दिग्धत्वलक्षणो वाक्यदोष एव । यथा—

"परिहरति रति मृत्ुनीते स्वललितरां परिवर्त्तते च भूः । इति वत विषमा दशा स्वदेहं परिभवति प्रसभं किमत्र कुर्मः ।।" श्रथ सतिपरिहारादीनां विभावानां करुणादावपि सम्भवात् शृङ्गारं प्रति भाव- त्वसन्देह इति ।। [२३] १२४ ।।

श्रथ वृत्तिलच्यो रसान्तरसुदुष्टिनां भावानामवसरसस्त्राप रसानुरोधेन प्रथमं स्थायिन उच्यन्ते ।

[सूत्र १५१]—रति-हास-शोक-क्रोधोत्साहौ भयं तथा । जुगुप्सा-विस्मय-शमा रसानां स्थायिनः क्रमात् ।। [२४] १२६ ।।

जाने वाले, उसके बात करनेपर [प्रसन्नतासे] फूले हुए, श्रृङ्गाररस करने वाले [कोषसे] लाल हुए, श्रौर कपड़ा पकड़नेपर बोंहीं टेढ़े किए तथा चरणोंमें प्रणाम करने लगनेपर श्राँसुओंसे भरे, मानिनीके नेत्र प्रतितमके [परस्त्री-संसर्ग रूप श्रप्रगाराधके] श्रप्रगाढ़ी होनेपर नाना प्रकारकी प्रपञ्च-रचनामें चतुर हो गए हैं यह श्रप्रचार्यकी बात इत्यादिमें [उत्सुकता ग्रादि रूप व्यभिचारिभावोंके स्वशब्दवाच्या श्रप्रथात् नामतः गृहीत होनेपर भी] रसकी उपस्थित होनेसे यह [व्यभिचारिभावादिकी स्वशब्दवाच्यता] दोष नहीं होता है । इसलिए श्रविचारोंके द्वारा कथित होनेसे यह [स्थायिभावादिकी स्वशब्दवाच्यताको दोष ठहराने वाली] उक्ति ठीक उक्ति नहीं है [अर्थात् व्यभिचारिभावादिकी स्व- शब्दवाच्या तो दोष नहीं मानना चाहिए]

इसी प्रकार दो रसोंमें समान रूपसे पाए जाने वाले विभावादि वाचक पदोंसे किसी एक नियतरसके विभावादिको कल्पिततासे प्रतीति भी [जिसेकि समष्टि श्रविचाने रसदोषोंमें गिनाया है वह रसदोष न होकर] सन्दिग्धत्वरूप वाक्यदोष हो है । जैसे—

[इस नायिकाको] बड़ो बेचैनी हो रही है, इसकी बुद्धि ठिकाने नहीं है, बार-बार गिर पड़ती है, श्रौर निरो करवटें बदल रही है । इस प्रकार इसके बेहकी बड़ो विषम श्रवस्था हो रही है इसका क्या उपाय करना चाहिए।

इसमें रतिकी परिहरषा ग्रादि रूप विभाव[श्रृ गारमें तो होते ही हैं]करुणादिमें भी हो सकते हैं इसलिए उनके श्रृ गारके प्रति भाव होनेमें सन्देह है[इसे ग्रन्थ लोग रसदोष मानते हैं] । परन्तु ग्रन्थकारके मतमें वह वाक्यदोष है, रसदोष नहीं] ।। [२३]१२५ ।।

ग्रथ वृत्तियोंके लचयमें रसोंकि बाद कहे हुए भावोंके प्रतिपादनका यद्यपि ग्रवसर है किन्तु रसोंकि प्रसङ्गसे पहले स्थायिभावोंको कहते हैं

[सूत्र १५१]—रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा, विस्मय श्रौर शम [ये श्रृ गारादि पूर्वोक्त नो] रसोंके कमशः स्थायिसभाव हैं । [२४] १२६ ।

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स्त्री-पुंसयोरस्थ वाङ्ङापरिपुञ्जनोऽन्योन्यमभिष्वङ्गो 'रतिः' । एषा च कामावस्थाजुर्वतिन्या श्राभिलाषमात्रसाराया व्यभिचारिण्या:, देवतातिपु वाङ्गुपु मनोहरवस्तुपु च प्रीतिरुपायाश्च रतेर्विलसनगव । रजनोनमादाविवृद्धिरवस्थास्य विकासो 'हास:' । निर्वेदानुविद्धं दु:खं 'शोक:' । ग्रपचितोर्षा-जुगुप्साहेतु: परितापावेश: 'क्रोध:' । धर्म-दानयुद्धादिकर्मण्यनालस्यं 'उत्साह:' । वैक्लव्यं 'भयम्' । कुशिततत्वाद्यव्यवसायो 'जुगुप्सा' । उत्कृष्टतत्त्वाध्यवसायो 'विस्मय:' । निःस्रेहत्वं 'शम:' । रसानां स्थैयंगारादीनां स्थायिन: परिप्यामिकार्पति 'क्रमात्' इति रसोद्द शङ्कमेया । तेनामी रसान्तरार्प्या व्यभिचारिपरिणामिकार्पति । सहभावितवेन रिष्योडनुभावाश्च भवन्ति । तत्रैषामागमनुकत्वेन स्थायित्वमाभावात । तथैषां विभावा व्यनुभावाश्च ये पोषकत्वे व्यभिचारिता । कार्यत्वे त्वनुभावता । तथैषां विभावा व्यनुभावाश्च ये शृङ्गारादिषु रसेपुक्तास्त एव न पृथक् उच्चन्ते । [२४] १२६ ॥

निर्वेद-ग्लानियपस्मार-शङ्का-जुगुप्सा- मद-श्रम-शम: । चिन्ता-चापलमावेगो मति-विरोधि:स्मृति-धृति: ॥

॥ [२५] १२७ ॥

स्त्री पुरुष का एक-दूसरेके प्रति प्रेम, जिसका दूसरे शब्दोंमें 'ग्रास्यादबन्ध' भी कहते हैं, 'रति' कहलाता है । यह [रति] कामावस्थाओं में रहनेवाली ग्राभिलाषमात्र रूप व्यभिचारीभावोंके, तथा देवतातिपुके प्रति [प्रेम ] , वाङ्गपुके प्रति प्रेम, ग्रौर मनोहर चारुभावोत्क वस्तुप्रोंके प्रति प्रीति रूप रतिसे भिन्न प्रकारकी होती है । मनकी प्रसन्नता ग्रौर उन्माद ग्रादिसे उत्पन्न चित्तका विकास 'हास' कहलाता है । निर्वेदसे युक्त दु:ख 'शोक' कहा जाता है । [दूसरेके] ग्रप्रकार करने तथा [दूसरेसे] घृणा करनेके हेतुभूत सन्तापका ग्रावेश 'क्रोध' कहलाता है । धर्म, दान ग्रौर युद्धादि कार्योंके प्रति ग्रालस्यका प्रभाव 'उत्साह' कहलाता है । घबराहटका नाम 'भय' । कुशित होनेका निश्चय 'जुगुप्सा' कहलाता है । उत्कृष्ट होनेका निश्चय 'विस्मय' कहा जाता है । [किसी वस्तुकी प्राप्ति ग्रादिकी ] इच्छाका प्रभाव 'शम' कहलाता है । रसोंके प्रथान् शृङ्गारादिके प्रति स्थायिभाव [प्रथान् रत्यादि परिप्यामके जनक] क्रमसे इन [स्थायिभावों]को समभना चाहिए । इसलिए [ये रस्यादि जिस रसके स्थायिभाव माने गए हैं] उससे भिन्न रसोंमें वे व्यभिचारिभाव ग्रनुभाव रूप भी हो सकते हैं । [दूसरे रसों] में इन [रस्यादि] के ग्रागमनुक होनेसे स्थायिभावत्व [इनमें] नहीं बनता है । [रस्यादिके] सहकारी रूपसे रस-पोषक होनेपर उनको व्यभिचारिभाव कहा जाता है । ग्रौर कार्यरूप होनेपर उनको ग्रनुभाव कहा जाता है । इन [रस्यादि] के विभाव ग्रौर ग्रनुभाव जो शृङ्गारादि रसोंमें कहे जा चुके हैं वे ही रस्यादि स्थायिभावोंके बाद ग्रागले तीन कारिकाओंमें व्यभिचारिभाव दिखलाते हैं—

[सूत्र १५२]—१. निर्वेद, २. ग्लानि, ३. ग्रपस्मार, ४. शङ्का, ५. जुगुप्सा, ६. मद, ७. श्रम, ८. चिन्ता, ९. चापलता, १०. ग्रावेग, ११. म्राषि, १२. मति, १३. स्मृति, १४. धृति

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क० १२६-२६, सू० १२२ ] तृतीयो विवेक: [ ३३१

श्रमर्षो मरषं मोहो निद्रा सुप्तौष्ण्य-हृष्यः । विषादोन्माद-दैन्यानि ब्रीडा त्रासो वितर्कणम् ॥

गर्वोन्मादावहित्यानि जाड्यालस्य-विबोधनम् । त्रयस्त्रिशद् यथायोगं रसानां व्यभिचारिराः ॥

'त्रयस्त्रिशत्' इति द्वात्रिंवादमात्रम् । अन्येऽपि पुनः सम्भवन्ति । यथा भूत-ऋषणा-मैत्री-मुदिता-श्रद्धा-दया-उपेक्षा-रति-सन्तोष-क्षमा-मादव - श्राजेव - दाक्षिण्यादयः, तथा स्थायिनोऽङ्गतुभावाश्चेति । 'यथायोगम्' इति रसौचित्यानतिक्रमेण । तेन केचित् साधारणाः, केचित् पुनरसाधारणाः । एतच्च यथारसं निरीतिमेेति ॥

(१) व्यभिचारिं प्रत्येकः स्वरूपप्रतिपादकं लङ्गमुच्यते— [सूत्र १५३]—निर्वेदस्तत्त्वधीः बलेशैरैरस्यं श्वासतापकृत् । क्लेशो दैन्यं चाऽध्यवमानोऽन्येषां श्रमाक्रोश-ताडनेष्टविगोपरविभूतिदर्श-

१५. अमर्ष, १६. मरषं, १७. मोह, १८. निद्रा, १९. सुप्ति, २०. हर्षं, २१. उप्रता, २२. विषाद, २३. उन्माद, २४. दैन्य, २५. ब्रीडा, २६. त्रासो, २७. वितर्कं प्रालस्य, श्रौर ३३. विबोध—ये तैंतीस श्रौचित्यके श्रनुसार [यथायोग] रसोंके व्यभिचारिभाव होते हैं । [२५-२७] १२७-१२६ ।

तैंतीस कहनेसे इस [ तीन श्रौर तीन ] द्वात्रिंशद् [समासे तैंतीस संख्या] श्रनुवादमात्र किया गया है । किन्तु इनके श्रतिरिक्त श्रन्य [व्यभिचारिभाव] भी हो सकते हैं । जैसे—भूख, प्यास, मैत्री, मुदिता, श्रद्धा, दया, उपेक्षा, रति, सन्तोष, क्षमा, मृदुता, सरलता, दाक्षिण्य ग्रादि । श्रौर स्थायिभाव तथा ग्रनुभाव [भी व्यभिचारिभाव हो सकते हैं वे सब इन ३३ से श्रतिरिक्त हैं । इसलिए ३३ संख्या केवल पूर्वोक्त संख्याका श्रनुवादमात्र है] । 'यथायोगम्' इसका श्रभिप्राय यह है कि रसके श्रौचित्यके श्रनुसार [इनमेंसे कौन कहाँ किस रसमें व्यभिचारिभाव है इसका निर्णय करना चाहिए] । इसलिए कुछ [व्यभिचारिभाव ग्रनेक रसोंमें समान रूपसे विद्यमान रहनेके कारण ] साधारण होते हैं श्रौर कुछ [निश्चित रूपसे किसी विशेष रसमें ही रहनेके कारण] श्रसाधारण होते हैं । इस बातका निर्णय रसोंके प्रसङ्गमें कर हो चुके हैं ॥

(१) श्रनु कमशः इनके स्वरूपके प्रतिपादक लक्षण कहते हैं— [सूत्र १५३]—तत्त्वज्ञान [परक चित्तवृत्ति] का नाम 'निर्वेद' है । वह क्लेशोंसे उत्पन्न विरसता के कारण होता है श्रौर श्वास तथा तापका कारण होता है । क्लेश, श्रप्रतीत, दरिद्रता, व्याधि, श्रप्रसाद, ईर्ष्या, श्रम, फटकार [प्राक्रोश], मार, इष्टवियोग, द्वेष्यपादर्शन श्रादि । तत्त्वज्ञानादि रूप विभावास जो व्यक्त वह 'निर्वेद

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नादयः। तत्त्वज्ञानादिभिरविभावैरयेद् वैरसयं स निर्वेदः। स च नि:श्वास-सन्तापयो-

रुपलचणैस्त्वादनेयषां च चिन्ताश्रु-वैवर्ण्य-दैन्यादीनामनुभावानां कारक इति। श्रयं च रसेष्वनियतत्वात् कादाचित्कत्वाच्च व्यभिचारी न स्थायी। एवमन्येष्वपि वाच्यम्।

मम्मटस्तु व्यभिचारिकथनप्रस्तावे निर्वेदस्य शान्तरसंस प्रति स्थायितां, ‘प्रतीकूल-

विभावादिपरिहरः:' इत्यत्र तु तमेव प्रति व्यभिचारितां च, ब्रुवाणः स्ववचनविरोधेन प्रतिबन्ध इति।

(२) श्रथ ग्लानि:-

[सूत्र० १५४]—ग्लानि: पीडा जराड्यसैः;, श्रशक्तिः कायँ-

कम्पादिभाक्॥ [क॰] १३०॥ 'पीडा' व्याधि-वमन-विरेचन-क्षुत्तृण-पिपासादिभिरनेकधा काय-मनोदुःखम्। 'जरा-

यासो' व्यायासाभ्वगति-सुरतादिभिः काय-क्लेशः: पीडा-जराड्यसैरुपलचणादनुबैश्व। निद्रोच्छेदमनस्तापादिभिरविभावैरयैः शक्ति: सामर्थ्योभावः सा 'ग्लानि:'। कायस्य काय-

श्रन्तता। काश्रयं कायँ-कम्पादुपलचणैस्त्वान् द्वामवाक्यँ-मन्तदौौत्सेप-वैवर्ण्यँ-श्रुतसाहा-

दीर्घानुभावान भजत इति॥ [क॰] १३०॥ कहुलाता है। और वह निद्रावास श्रौर सन्तापका, तथा उनके उपलक्षरारूप होनेसे चिन्ता,

कहलाता है। और वह निद्रावास श्रौर सन्तापका, तथा उनके उपलक्षरारूप होनेसे चिन्ता,

कादि ग्रनुभावोंका भी जनक होता है। यह [निर्वेद] रसोंमें नियत न

होनेसे श्रौर कावाचिक होनेसे व्यभिचारिभाव होता है। इसी प्रकार ग्रन्थ्य [व्यभिचारिभावों]

में भी [प्रतीयत्व श्रौर कादाचित्कत्व होनेके कारण] ही उनका व्यभिचारिभावत्व समभना

चाहिए।

[ काव्यप्रकाशकार ] मम्मटने तो व्यभिचारिभावोंके निरूपराके प्रसंगमें निर्वेदको

ज्ञान्तरस्य स्थायिभाव कहा है श्रौर ‘प्रतीकूलविभावादिपहः' रूप रस दोषके प्रसंगमें उसी

[ज्ञान्तरस] के प्रति [निर्वेद] के व्यभिचारभावत्वका प्रतिपादन करके स्वयं ही श्रपने कथनका

खण्डन कर लिया है।

इसका श्रभिप्राय यह हुग्रा कि निर्वेद स्थायिभाव नहीं होता है। सदा व्यभिचारिभाव

ही होता है। मम्मटने जो व्यभिचारिभावोंके निरूपराके प्रसंगमें निर्वेदको स्थायिभाव माना

है वह श्रनुचित है। श्रौर श्रग्रे स्वयं उनके कथनसे ही यह सिद्ध हो जाता है कि निर्वेद शान्त-

रसका स्थायिभाव नहीँ श्रग्रप्तु केवल व्यभिचारिभाव है। उस दशान्तर शान्तरस्यका स्थायिभाव

‘शम’ होगा। इसलिए यहाँ ग्रन्थकारने शमको ही शान्तरस्यका स्थायिभाव माना है॥

(२) [सूत्र १३४]—ग्रथ ग्लानि [का लक्षण करते हैं]—

पीडाका नाम ग्लानि है। वह वाधँ कय श्रौर श्रम श्रादि विभावों [कारणों] से उत्पन्न

होती है श्रौर कुशता तथा कम्प प्रादि[ग्रनुभावों]को उत्पन्न करनेवाली होती है॥[क॰]१३०॥

व्याधि, वमन, विरेचन, भूख, प्यास आदिके द्वारा ग्रनेक प्रकारसे शारीरिक, मान-

सिक दु:खका नाम 'पीडा' है। व्यायाम, मार्गगमन श्रौर सुरतादिसे होनेवाला शारीरिक क्लेश

‘ग्रायास’ [कहुलाता] है। पीडा, वाधँ कय श्रौर ग्रायासादिसे तथा उनके उपलक्षरारूप होनेसे

निद्रा न ग्रान्ते, मानसिक सन्ताप श्रादि ग्रन्थ विभावोंसे जो श्रशक्ति होती है वह 'ग्लानि'

कहुलाती है। कुशता प्रार्थात् शारीरिक दुर्बलता। [ग्रौर वह कम्पादि जनक होती है]।

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(३) ग्रथापस्मारः—

[सू० १८५]—वैकल्यं ग्रह-दोषेष्योडपस्मारो निन्द्यचेष्टितः । 'ग्रहाः' परग्रहाशेशीलाः पिशाचाद्याः। धातुवैषम्यं दोषः। बहुवचनादुचिछष्ट-शून्यस्थानसेवनाशुचिसम्पर्काद्यैर्वैकल्यं कृत्याकृत्याविवेचकत्वं सोडपस्मारः। निन्द्यं विगहितं सहसा भूमिपतन-फेनमोचन-नि:श्वसन-धावन-प्रवेपन-स्तम्भ-स्वेदादिकं चेष्टितमतत्रेति ॥

(४) ग्रथ शङ्का—

[सू० १८६]—शङ्का स्व-परदौरात्म्याद् दोलनं श्यामतादियुक्‌ ।। [२६] १३१ ।।

दौरात्म्यमकार्यकररामू। उपलक्षणत्वाच्चास्य साहश्यादयोऽपि विभावा ग्राद्याः। दोलनं चोभ-सन्देहाभ्यामनवस्थितं चेतः। श्रादिशब्दान् मुहुरलोकल-श्रवगुणठन-मुखौष्ठ-कण्ठशोष-जिह्वापरिलेहन-वेपथु-चलहस्तित्वादयोऽनुभावा गृह्यन्ते इति ।। [२६] १३१ ।।

(५) ग्रथासूया—

कार्यं तथा काम्यं चेष्टालक्षणस्याप्यरोचते श्वानाज् न निकलता। पैरैः धीरेर उठना, विरसांतरा शोर ग्रनुत्साह ग्रादि ग्रनुभावोंको भी बोधित करते हैं ॥१३०॥

(३) ग्रब ग्रपस्मार का लक्षण करते हैं—

[सूत्र १८५] [ पिशाचादि रूप ] ग्रहों तथा [वात-पित्तादि रूप] दोषोंकी विषमतासे उत्पन्न बेचैनी 'ग्रपस्मार' कहलाता ही और वह [ भूमिपतन श्रादि रूप ] ग्रहित व्यापारोंसे युक्त होता है ।

दूसरोंको पकड़ लेनेवाले पिशाचादि 'ग्रह' कहलाते हैं । वात, पित्त, कफ रूप धातुओंके रहने, और गन्दे पदार्थों सम्पर्क रखनेसे जो विकलता श्रथार्त्‌ कर्तव्य अकर्तव्यका निर्णय न कर सकना वह 'ग्रपस्मार' कहलाता है । 'निन्द्य' अर्थात्‌ गर्हित सहसा भूमिपर गिर पड़ना, फेन गिराने लगना, जोरसे इधर उधर लेने लगना, दौड़ना, कॉंपना, कड़ा पड़ जाना और पसीना ग्राने लगना श्रादि चेष्टाएँ इसमें होती हैं ॥

(४) ग्रब 'शङ्का' [रूप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र १८६]—अपने या दूसरेके दुष्टकर्मोंसे [मनका] कम्पन शङ्का कहलाती है । शोर वह इयामता ग्रादिको उत्पन्न करनेवाली होती है ॥ [२६] १३१ ॥

'दौरात्म्य' अर्थात्‌ ग्रनुचित कार्योंका करना [दौरात्म्य पदके] उपलक्षण रूप होनेसे [सर्पादिसे उत्पन्न शङ्का]में रक्जु श्रादि रूप] साहश्य ग्रादि विभावोंका भी ग्रहण करना चाहिये । दुःख तथा समबेहेके कारण मनकी प्रसिथरता 'दोलन' कहलाती है । श्रादि शब्दसे बार-बार देखना, मुंह ढक लेना, मुख, ग्रोष्ठ कण्ठका सूख जाना, जीभ चलाना, कॉंपना, चंचल दृष्टि आदि ग्रन्य ग्रनुभावों का भी ग्रहण होता है ॥ [२६] १३१ ॥

(५) ग्रब 'ग्रसूया' [का लक्षण करते हैं]—

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[सू० १५७]—द्वेषादे: सद्गुरणाक्षान्तरस्या दोषदर्शिनी। ग्रादिशब्दादपराध-गर्व-परसीभाम्य-ऐश्वर्य-विद्या-लीलादर्शनादिग्रह: । सद्-गुणा ज्ञान-क्रियादयो विशिष्टधर्मा: । एपा च दोषान् वचकत्वादीन् सतो वा दर्शयति । उपलक्षणात् भू-मंग-श्रवण्या-गुणनिह्नव-मन्यु-क्रोधाद्योडनुभावा गृह्यन्त इति ॥

(६) ग्रादि मद:— [सू० १५८]—ज्येष्ठादौ मुन्मदो मद्यात्, निद्रा-हास्याश्रु कृत क्रमात् ॥ [३०] १३२ ॥ इत्येष्ठ उत्तम: । श्रादिशब्दान्मध्यमाधमौ गृह्यते । निद्रया रसभत-मधुरास्वराग-रोमहर्ष-ईपद्ध च्छलुवचन-सुकुमाररगतयादय: , हास्येन स्वकलन-व्रीडन-बाहुल्य सन्-कुटिल-गमनादय:, श्रवण्या च निष्ठीवन-जिह्वास्कलन-स्मृतिनाश-मतिेभ्र श-श्रदित-हिक्का-कफादयो गृह्यन्ते । 'क्रमान्' इति उत्तमादौ यथासंख्य निरद्रायोडनुभावा: । नाट्ये च रक्षनानिमित्तमपानरपि क्वचिदभिनीयते । तत्र च मदे व्यभिचारी सम्भवति । यत्र पुन: पात्रं पीतमचमेव प्रविशति, तस्य त्रासादिना मदोडपनेयोडन्यथा कार्यव्याघात: स्यादिति ॥ [३०] १३२ ॥

[सूत्र १५७]—ह्वेषादिके कारण [किसी दूसरेके] सद्गुरुप्राकी सहन न कर सकने 'प्रसूया' कहलाता है श्रौर वह [सदा दूसरेके] दोषोंको देखने वाली होती है । ग्रादि शब्दसे अपराध, गर्व, दूसरोंके सौभाग्य, या विद्या, या लीला श्रादिके दर्शानका प्रहरण होता है । सद्गुरु ग्रर्थात् ज्ञान, क्रिया श्रादि विशिष्ट धर्म । यह [प्रसूया] विद्यमान वचकत्वादि दोषोंको देखने वाली होती है । [दोषदर्शिनी पदके] उपलक्षण रूप ग्रविद्यमान वचकत्वादि दोषोंको देखने वाली होती है । [दोषदर्शिनी पदके] उपलक्षण रूप होनेसे भू-भंग, अपमान, गुणोंका छिपाना, मन्यु तथा क्रोध, श्रादि [असूयाके] अनुभावोंका भी ग्रहरण होता है (६) श्रादि सद् ध्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]— [सूत्र १५८]—ज्येष्ठ श्रादि [अर्थात उत्तम, मध्यम या अधम प्रातों] में मद-जन्य श्रोर निद्रा, हास्य तथा रोदनको उत्पन्न करनेवाला श्राननद 'मद' कहलाता है ॥[३०]१३२॥ ज्येष्ठ अर्थात् उत्तम । श्रादि शब्दसे मध्यम तथा अधमका भी ग्रहरण होता है । निद्रा पदसे मुस्कराहट, चेहरेपर हलकी लालीमा, रोमांच हो ग्राना, ग्रस्त-व्यस्त वचन श्रोर सुकुमार गति श्रादिका, 'हास्य' पदसे गिरना चक्कर खाना, हाथ ढीले हो जाना श्रोर लड़ख- ड़ाना आदि, तथा 'श्रवण्या' पदसे झूंकना, जीभ चटकाना, स्मृतिनाश, गतिेभ्र श, वमन, हिचकी, कफ श्रादिका प्रहरण भी होता है । 'क्रमान्' इससे यह प्रभिप्राय है कि उत्तम श्रादि में क्रमश: निद्रा श्रादि ग्रनुभाव होते हैं । [ग्रर्थात मदसे उत्तममें निद्रा, मध्यममें हास्य तथा ग्रश्रममें रोदन होता है ] । स्वामिके मनोरंजनके लिए कभी मद्यपानका भी ग्रभिनय किया जाता है । उनमें सद् व्यभिचारिभाव होता है । जो पात्र मद्यपान किए हुए ही प्रभिनय करने के लिए प्रस्तुत है उसका मद तो भयादि द्वारा दूर कर देना चाहिए नहीं तो [ग्रभिनय] कार्य में विघ्न पड़ेगा ॥ [३०] १३२ ॥

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काः १३३३, सू० १६१ ]

वृतीयो विवेकः

[ ३३४

(७) श्रथ श्रमः—

[सूत्र १८९]—श्रमसो रतादिभिः सादः: स्वेद-श्वासादिकारणैः ।

श्रादिशब्दादध्वगति-ध्यायामादेरविभावस्य ग्रहः । सादोऽ्जादीनां शोषः ।

द्वितीयादिशब्दानुस्वविकृत्पन-विजृम्भण-शृङ्गमर्दन-मन्दपदोत्तेपादेरनुभावस्य ग्रह

इति ॥

(८) श्रथ चिन्ता—

[१९०]—ग्राधिश्विन्ता प्रियानाप्ते: शून्यता-श्वास-कार्ययुक्त

। [३१] १३३३ ॥

ग्राधिमानसी पीडा । प्रियस्येष्टस्याप्राप्तिः । श्रप्रियाप्राप्तेर्वा प्रियानाप्तिः । शून्यता

विकलेन्द्रियता । उपलचणत्वादेकाग्रत्व- स्मृत्यादियोडप्यनुभावा इति ॥ [३१] १३३३॥

(९) श्रथ चापलम्—

[सूत्र १९१]—चापलं साहसं राग-द्वेषादेः स्वैरितादिमत् ।

साहससमविमुश्यकारितता । श्रादिशब्दाज्जाडचादेरग्रहः । स्वैरितं स्वच्छन्दा-

चारः । श्रादिशब्दाद्वाक्पारुष्य-ताडन-बन्ध-बन्धनादेरनुभावस्य ग्रह इति ॥

(७) ग्राब श्रम [रूप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र १८९]—रमरण करने श्रादिके कारण उत्पन्न थकावट 'श्रम' कहलाता है ।

श्रौर वह स्वेद तथा श्वासादिका कारण होता है ।

[रतादिमें] 'ग्रादि' शब्दसे मार्गंगमन श्रौर व्यायाम श्रादि विभावोंका ग्रहण होता

है । 'सादः' प्रयर्थात् शरीराविका दोष । [श्वासादिकारणैः में श्राए हुए] दूसरे 'श्रादि' शब्दसे

कुङ्ह सिकुड़ना, जम्भाई, ग्रहणोंकी मलिनता, धीरे-धीरे पल्र उठाना श्रादि श्रनुभावोंका ग्रहण

होता है ।

(८) ग्राब चिन्ता [रूप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र १९०]—इष्ट वस्तुकी प्राप्ति न होने [प्रथवा ग्रनिष्टकी प्राप्ति होने] से उत्पन्न

मानसी पीड़ाको 'चिन्ता' कहते हैं । वह इन्द्रियोंकी विकलता, श्वास और क्रन्दनकी

जननी होती है । [३१] १३३३ ॥

'ग्राधि' श्रर्थात् मानसिक वेदना । प्रिय श्रर्थात् इष्टकी ग्रप्राप्ति श्रथवा श्रप्रियकी प्राप्ति

[दोनोंसे ही चिन्ता उत्पन्न होती है] । शून्यताका श्रर्थ इन्द्रियोंकी विकलता है । श्रौर उप-

लक्षणाभूत होनेसे वह उससे टकटकी लगाना, यद्यद्याना श्रादि श्रनुभावोंका भी ग्रहण होता

है ॥ [३१] १३३३ ॥

(९) ग्राब चपलता [नामक व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र १९१]—रागद्वेषादिके [श्रतिरेकके] कारण बिना विचारे जो कायं करने

लगना है वह [श्रविमृश्यकारितिता रूप साहस] 'चपलता' कहलाता है । श्रौर वह स्वेच्छाचरिता

श्रादिकी जननी होती है ।

'साहस' श्रर्थात् बिना सोचे-समझे कायं करना । [पहले] 'श्रादि' शब्दसे जबतक

ग्रादिका ग्रहण होता है । स्वच्छन्दाचाररुप 'स्वैरिता' है । [दूसरे ] 'ग्रादि' शब्दसे कठोर

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(१०) स्थावेगा:—

[सूत्र १६२]—ग्रावेग: सभ्रमोद्भव: कार्यात् विकर्त्ताद्भ्यो मनो गिराम् ॥

[३२] १३४ ॥

सम्भ्रमः सञ्चोभः । ऋतकृत्यं श्राचिन्तितोपनतिमिष्टमनिष्टं वा । तत्रेष्टं देवता गुरु मान्य वल्लभ सम्भच् छव्दण ऋष्टचादि । श्रनिष्टेऽभिनि भुकम्पाद्युल्पात वात वर्ष कुज्जर चोर सर्पादिनोझश्रवसादर्शनादि । तत्राभ्युल्थान पुलकादि लिङ्गन वस्त्रादिप्रदानादयः प्रिया:, सर्वाङ्गर सस्तलावुकैवैवर्ण्यं-श्रङ्गडी भाव प्रह्लादन श्राकुलनेत्रता-त्वरिततापसरणं -पश्चादव लोकन शास्त्रादिम्रहणादि उर्वी पतन कम्प स्वेद स्तम्भादयो व्यप्रियाश्चाङ्गिका: । हर्ष विस्मय दय: प्रिया:, शङ्का विषाद भयादयोऽप्रियाश्च मानसाः । स्मृति चाटुकराश्च स साक्षया दय: प्रिया:, क्रन्दन परिदेवन श्रसम्बन्धव चनादयेऽप्रियाश्च वाचिका विकारा यथा योगं प्रियाप्रियात्कृत्य वस्त्रादिवेगस्यानुभावा:। सर्वेषु चैते विकारा उत्तमस्य, स्थैयैनु विद्धा:, नीचस्य तु चापलानुविद्धा इति ॥ [३२] १३४ ॥

(११) स्थामति:—

[सूत्र १६३]—प्रतिभानं मति: शास्त्र तर्कादि भ्रांतिच्छेदादिकृत् ।

वचन, शास्त्रादिपाठ करने श्रादि बुद्धि सम्बन्धिनी श्राठिका रहना होता है ।

(१०) ग्राबावेग [रूप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र १४२]—प्रकस्मात् उपस्थित हो जाने वाले [इष्ट या श्रनिष्ट] से उत्पन्न क्षोभ

'ग्रावेग' कहलाता है । श्रौर शरीर, मन तथा वाणीमें विकारका जनक होता है। [३२]१३४

'सम्भ्रम' श्रर्थात् सञ्चोभ। 'ऋतकृत्य' श्रर्थात् जिसका सोचा भी नहीं था इस प्रकारके इष्ट या श्रनिष्टका प्रकस्मात् उपस्थित हो जाना। उसमें [ऋतकृत्योपनत] 'इष्ट' से देवता, गुरु,

साध्य, प्रिय श्रथवा सम्पत्तिकी प्राप्तिका सुनना श्रादि [ग्रुहीत होता है] । 'ग्रनिष्ट' से श्राग

माध्य, प्रिय श्रथवा सम्पत्तिकी प्राप्तिका सुनना श्रादि [ग्रुहीत होता है] । 'ग्रनिष्ट' से श्राग

मुख पीला हो जाना, विषाद्भाव, दौड़ना, नेत्रोंमें घबराहट देखना, जल्दीसे हठ जाना, लौट लौटकर पीछे

देखना, शस्त्रादि उठाना पृथिवीपर गिर जाना, कम्पन, स्वेद श्रौर शारीरकी निश्चिक्तया

ग्रादि श्रप्रिय [ग्रनुभव] होते हैं । हर्ष विस्मय श्रादि प्रिय, शंका, विषाद, भय श्रादि

ग्रप्रिप मानसिक [ग्रनुभव] होते हैं । प्रशंसा, चापलूसी जुगाड़ाकाँके वाच्य श्रादि प्रिय, तथा

ग्रौर श्रप्रलाप करना श्रादि वाचिक विकार, यथायोग्य प्रिय ग्रप्रिय रूप [ऋतकृत्य

रोना विलाप करना श्रर्थात्] प्रकस्मात् उपस्थित होने वाली वस्तुप्रोसे उत्पन्न ग्रावेगके श्रनुभाव

होते हैं । ये सभी विकार उत्तम पुरुषोंमें घैयँसे युक्त श्रौर नीच [पात्रों] में चपलतासे युक्त

रहते हैं ॥ [३२] १३४ ॥

(११) ग्राब मति [रूप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र १४३]—शास्त्र [के दिन्तन] तथा तर्कसे उत्पन्न होने वाली नवन वोद्मेश-

शालिनी प्रज्ञा 'मति' कहलाती है । श्रौर वह भ्रमोच्छेदन ग्रादिकी जननी होती है ।

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नवनवोल्लेखशालिनी प्रज्ञा प्रतिभानम्‌ । शास्त्रं शास्त्रविषयं चिन्तनम्‌ । तर्को विधि-निषेधविषयौ सम्भावनास्त्रयौ अन्योन्य-व्यतिरेकप्रत्ययौ वा । भ्रान्तिः संशयो विपर्ययो वा । श्रादिशब्दादुपदेशादिग्रहः इति ॥

(१२) श्रव व्याधि:-

[सूत्र १६४]—दोषिभ्योऽहित-मनोंऽक्लेशो व्याधिः स्तनित-कम्पनौ

दोषा: कफ-वात-पित्त-सन्निपातदयः । स्तनितमात्स्वरः । उपलचणान्मुखशोष-दन्तवेष्टनावेदन-शीताभिलाष-विच्छिन्नगोता-संतापादयोडन्येऽनुभावा गृह्यन्ते इति ॥ [३३] १३४ ॥

(१२) श्रव स्मृति: -

[सूत्र १६५]—हृ्टाभासः स्मृतिस्तुल्यहृष्टयादेशे न्नतत्क्रिया ।

हृ्टाभासः पूर्वं हृ्टमिति ज्ञानम्‌ । तुल्यहृष्टिः सदृशदर्शनम्‌ । श्रादिशब्दाद्‌ सदृशश्रवणाद्‌-चिन्ता-संसकार-रात्रित्रिपंश्चादूभाजनिद्रोच्छेद-प्रणिधान-पुनःपुनःपरिशीलन-पूर्वं दर्शनपाटवादेरिव भावस्य ग्रहः । श्रे न्नतेदृशव ऊर्ह्वदृशेपस्य उपलचणादृशेर्‌ कम्पना-वलोकनादेश्चानुभावस्य क्रिया निष्पत्तिरित्यर्स्या:, सा तथेति ॥

नई-नई सूझ देने वाली बुद्धि 'प्रतिभा' कहलाती है । शास्त्रसे शास्त्र-विषयक चिन्तन [का ग्रहण होता है । किसी एक पक्षको] विधि और निषेध से उत्पन्न होने वाले द्विविध सम्भावना ज्ञान श्रथवा ग्रन्वय तथा व्यतिरेकको 'तर्क' कहते हैं । 'भ्रान्ति' शब्दसे संशय श्रथवा विपर्यय [दोनों का ग्रहण होता है] । श्रादि शब्दसे उपदेश श्रादिका ग्रहण होता है ।

(१२) श्रव व्याधि [रूप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र १६४]—[वात-पित्तादि रूप] दोषोंसे उत्पन्न शारीरिक या मानसिक क्लेश 'व्याधि' कहलाता है । श्रौर वह श्रातंसर तथा कम्पनादिका जनक होता है ॥ [३३] १३४ ॥

'स्तनित' श्रथात् ग्रातंस्वर । उसके उपलक्ष्य रूप होनेसे मुखका सुखना, दांतोंकी वेदना, ठंडककी इच्छा श्रौर ग्रह्णोंकी विक्षिप्तता तथा सन्ताप श्रादि प्रनुभावोंका भी ग्रहण होता है ॥ [३३] १३४ ॥

(१२) श्रव स्मृति [रूप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं ]—

[सूत्र १६५]—मिलते-जुलते सहश पदार्थोंको देखने श्रादिसे उत्पन्न पूर्व हृ्ट ग्रथंका ज्ञान 'स्मृति' कहलाता है । श्रौर वह मोहोंकी उन्नति श्रादिकी जननी होती है ।

हृ्टाभास श्रथात् पूर्वहृ्ट अर्थका ज्ञान । तुल्यहृष्टिका श्रथ्‌ मिलते-जुलते सहश पदार्थका देखना, है । श्रादि शब्दसे सहश श्रवरा, चिन्ता, संस्कार, रात्रिके पिछले भागमें नींदका खुल जाना, ध्यान, बार-बार सोचना, दर्शनोंकी तीव्रता श्रादि [विभावों श्रथ्रात्] कारणोंका ग्रहण होता है । मोहोंकी उन्नति श्रथात् मोहोंका ऊपर चढना श्रादि श्रनुभावोंका । उसके उपलक्ष्य रूप होनेसे सिर हिलाना श्रौर देखने श्रादि श्रनुभावोंकी क्रिया श्रथ्रात् उससे होती है वह उस प्रकारकी [भू न्नततिक्रियाकी जननी स्मृति होती है ।]

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३३५ ] नाट्यदर्पणम् [ क० १३६-३७, सू० १६६-६७

(१४) ग्रथ श्रुति: —

[सूत्र १६६]—श्रुतिज्ञानिष्ठलाभे: सन्तुष्टिदृंहपुष्टिकृत् ।। [३४]

१३६ ।।

ज्ञानं विवेकज्ञानं बाहुश्रुत्यं वा । इष्टस्येष्टतस्य लाभः प्राप्तः। श्रादिशब्दान् शौचाचारशौकीर्तिदेवताभक्ति-विशिष्टशक्त्यादिर्विभावस्य ग्राहः । देहपुष्टिहुपलक्षणं गताननुशो चिनादीनामनुभावानामिति ।। [३४] १३६ ।।

(१५) श्रथामर्ष: —

[सूत्र १६७] —क्षेपादे: प्रतिकारेच्छाड्मस्मन् कम्पनादय: । देहपतर्सकार: श्रादिशब्दादपमानादेर्विभावस्य ग्राहः । श्रपकारिणिे स्वयंसपकरषाभिलाष: प्रतिकारेच्छा । परस्यापकाराभावेSपि परार्थकरषाभिप्रा यरूप: क्रोध इत्यनयोर्वे: अस्मिन्मनसि श्रादिशब्दादघोमुखचिन्तन-प्रस्वेद-उत्साह-ध्यानोपायान्वेषणान्तर्जन-ताडनादीनामनुभावानां ग्राह इति ।

(१६) श्रथ मरषाम—

[सूत्र १६८]—व्याध्यादेर्मृ त्युसडूल्पो मरषां विकलेन्द्रियसम् ।।[३५]

१३७ ।।

(१४) ग्रथ ति [रूप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र १४६]—ज्ञान ग्रथवा इष्टप्राप्ति श्रादिसे उत्पन्न सन्तोष 'श्रुति' है । और वह शारोरकी पुष्टि आदिका करने वाला होता है । [३४] १३६ ।

ज्ञान श्रथात् विवेकज्ञान ग्रथवा बहुश्रुतता । इष्ट ग्रथ्यात् मनचाही वस्तुका लाभ ग्रथ्यात् प्राप्त होना । श्रादि शब्दसे शुचाचारण क्रोड़ा [मनोरंजन], देवताग्रोंकी भक्ति, विशेष शवित आकि कारणों [विभाव] का ग्रहरण होता है । देहपुष्टि श्रादि शब्द, बोती बातका शोक न करने श्रादि शानुभावोंका भी उपलक्षण है । [३४] १३६ ।।

(१५) ग्रथ ग्रमार्ष [रूप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र १४७]—तिरस्कार श्रादिके कारणसे उत्पन्न बदला लेनेकी इच्छा 'ग्रमार्ष' है । इसमें कम्पन श्रादि [श्रनुभाव] होते हैं ।

क्षेप ग्रथ्यात् तिरस्कार । श्रादि शब्दसे श्रपमानादि विभावोंका ग्रहण होता है । श्रपकारोंके प्रति स्वयं उसका ग्रपकार करनेकी इच्छा 'प्रतिकारेच्छा' कहलाती है । दूसरेके द्वारा ग्रपकार न किए जानेकपर भी दूसरेकी हानि पहुँचानेकी ग्राभिप्राय क्रोध' कहलाता है । यह इन दोनोंका मेल है । इसमें ग्रथ्यात् ग्रमार्षमें । श्रादि शब्दसे सिर नीचा करके सोचना, पसीना ग्राना, उत्साह, ध्यान, उपायोंके खोनेने, फटकारने, पीटने श्रादि ग्रनुभावोंका भी ग्रहरण होता है ।

(१६) ग्रथ मरषा [रूप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र १४८]—व्याधि श्रादिके कारणसे मरणेकी इच्छा करना 'मरषा' कहलाता है

[प्रथात् यह मरषा शब्दसे ग्राप्रे निकल जाने रूप वास्तविक मरषाका ग्रहरण नहीं होता है । क्योंकि नाटकोंमें वास्तविक मरषाका दिखलाना निपिद्ध माना गया है । ] ग्रोर वह इन्द्रियोंको विकल करने वाला होता है । [३५] १३७ ।

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का० १३७, सू० १६६ ] तृतीयो विवेक: [ ३३६

व्याध्यादयो वात-पित्त-श्लेष्मवैषम्य-ड्वर-विचर्चिका-पिटकादयः। श्रादि-शब्दान् शस्त्राभिघात-विषपान -व्याघ्रादंश-रवापद-गज-तुरगाद्याक्रमण-वाहितोच्चस्थान-

पतनादेर्विभावस्य ग्रहः। 'मृत्युसंकल्पो' दुष्प्रतिकारोडमनर्थस्तस्मादृवश्यं मरिष्यामील्यध्यवसायः। विकलानि स्वविषयेषुग्रहणं प्रत्यस्मर्थानोन्द्रियाणि यस्मिन्। उपलक्षणाद विह्वलचेष्टित-

हिक्का-नि:श्वास-पिरिजनानवेच्छा - श्रद्वाद्यक्ताद्बरभाषणं - बदनदैन्य-सहसाभूमिपतन-कम्पन - स्मुरणा-काश्यं - फेन-जृम्भा - हस्तस्कन्धभङ्गानपेक्षित्राग्रासस्खारादयोऽनुभावा

ग्रुध्यान्ते। प्राणानिरोधरूपं तु मरणं न नाट्ये प्रयोज्यमिति, तै तस्य विभावानुभावस्व-रूपाणि प्रतिपादयन्त इति ॥ १३७ ॥

(१७) श्रथ मोह: —

[सूत्र १६६]—प्रचेतनयं प्रहारादेमोहो,डत्राघूर्णानादयः। 'श्रचेतन्यं' प्रवृत्ति-निवृत्तिज्ञानाभावो न तु सर्वथा गतचेतनत्वम्। 'प्रहारो' मर्म-

ण्यभिघातः। श्रादिशब्दानं तीव्रवेदना-श्रशक्यप्रतीकार-चौर-राजा-श्रहि-व्याघ्राद्या-क्रमण-देशविप्लव-श्रन्युदरकागुपचात-वैरिदर्शन-शत्रुसैन्यादेर्विभावस्य ग्रहः। श्रत्र मोहे।

आदि शब्दाद् भयणाद-पतनादनिद्राल्यापारादेरनुभावस्य ग्रहः। व्याधि प्रर्थात् वात, पित्त कफके वैषम्यसे उत्पन्न उबर विचार्चिकाका खाज श्रौर फोड़ा-

फुन्सी ग्रादि। ग्रादि शब्दसे शस्त्रप्रहार, विषपान, सांपके काटने, हिल जन्तुओं, हाथी, घोड़े श्रादिके श्राक्रमण, ऊंचे स्थानसे गिरने श्रादि विभावोंका प्रहार होता है।

[वास्तवमें तो मरनेकी इच्छा भी कोई नहीं करता है इसलिए] 'मृत्युसंकल्पसे यहाँ, यह प्राप्ति ऐसी ही है जिसका प्रकार ग्रसम्भव है इसलिए प्रवृत्ति ही मर जाऊँगा इस

प्रकारका निश्चय [मृत्युसंकल्प पदसे गृहीत होता है]। विकल श्रर्थात् अपने विषयको ग्रहण करनेमें ग्रसमर्थ इन्द्रियां जिसमें हो जाती हैं [वह मृत्युसंकल्प विकलेऽनिद्रिय मरसै रूप हुद्रा]।

उसके उपलक्षण रूप होनेसे विह्वल चेष्टाश्रों, हिचकी, निःश्वास, परिजनोंको न देखने, ग्रस्पष्ट शब्दोंका उच्चारण, चेहरेकी दीनता, सहसा पृथिवीपर गिर पड़ने, काँपने, पड़कने, फुन्सता,

फेन डालने, जृम्भता, हाथ कन्धे आदिेक डुलने-फूलनेकी चिन्ता न करके ग्रद्वाद्वोक संचालन श्रादि ग्रनुभावोंका ग्रहण होता है। प्राण बन्द हो जाना रूप [वास्तविक] मरण तो नाटकमे नहीं

दिखलाना चाहिए। इसलिए उसके विभाव श्रौर ग्रनुभावोंके स्वरूपोंको यहाँ प्रतिपादन नहीं किया है ॥[३५] १३७ ॥

(१७) ग्रथ मोह [रूप श्यभिचारिभाव का लक्षण करते हैं]—

[सूत्र १६६]—प्रहार ग्रादिसे उत्पन्न प्रचेतनय 'मोह' कहलाता है। इसमें चक्कर

ग्राना ग्रादि होता है।

श्रचेतनयका श्रार्थ [कत्स्य व प्रकृतत्वमे] प्रवृत्ति-निवृत्तिके ज्ञानका न रहना है। सर्वथा

चेतनयका प्रभाव [ श्रचेतन्य शब्दसे विवक्षित नहीं है ] । प्रहार श्रर्थात् मर्मस्थलपर। श्राघात ।

ग्रादि शब्दसे तीव्र वेदना, जिनका प्रतीकार सम्भव न हो इस प्रकारके चोर, राजा, सर्प, व्याघ्र

ग्रादिके श्राक्रमण, देश-विप्लव, श्रन्युदरका उपद्रव, वैरिदर्शन आदि विभावोंका ग्रहण होता है। इसमें श्रर्थात् मोहमें। श्रादि शब्दसे भयणाद-पतनादनिद्राल्यापारादेरनुभावस्य ग्रहण होता है। इसमें श्रर्थात् मोहमें। श्रादि शब्दसे चक्कर खाने

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(१५) अथ निद्रा—

[सूत्र २००।]—इन्द्रियाव्यापृतिनिद्रा, खेदादेमूर्छांकम्पनी॥

[३६] १३६॥ इन्द्रियैः स्पर्शनादीनि, न तु मनः, तस्य निद्रायामपि व्यापारात्। ‘ग्रव्यापृतिः’ विषयविषयकज्ञानोपरतिः। स्वादिसंघट्टादालस्य-दौर्बल्य-रतिजागरस्य-ग्रन्थ्याहार-मद-श्रम-क्लम-चिन्ता-शयालतादेरविभावास्य ग्रहः। मूर्छांकम्पनेन जृम्भण-वदनविकास-नि:श्वास-नेत्रवूरणन-ग्जृम्भक-ग्रच्छिमीलन-सर्वक्रियासमोहाद्योडनुभावा उपलभ्यन्त इति॥ [३६] १३६॥

(१६) ग्रथ सुप्तम्—

[सत्र २०१।]—सुप्तं निद्राप्रकर्षोऽत्र स्वप्नायित-खमोहने।।

‘प्रकर्षः’ गाढतमावस्था। स्वप्नस्य ताल्कालिकविषयज्ञानस्य व्यायितं प्रतीत- यंतस्तत् ‘स्वप्नायितम्’ प्रलापितम्। खानां मनःषष्टानामिन्द्रियाणां मोहनमतिशयेन विषयवैमुख्यम्। निद्रायां मनसोऽवधानमस्ति। व्यत्र तु तदपि मनागुपरुध्यत इति भेदः। विशावस्तु निद्रागता एषात्र ग्राह्या:॥

गिरने ग्रौर इन्द्रियौक व्यापारिक प्रभाव आदि ग्रनुभावोंसे प्रहर्ष होता है।

(१७) ग्रब निद्रा [रूप विभावचारिभावका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २००।] थकावट ग्रादिसे उत्पन्न इन्द्रियोंके व्यापारका प्रभाव ‘निद्रा’ कहलाता है। उससे सिर हिलने लगता है। [३६] १३६॥

इन्द्रियोंसे स्वेच्छा ग्रादि [ज्ञानिन्द्रियोंका ही प्रहरण करना चाहिए] मनका नहीं। क्योंकि उसका व्यापार तो निद्राकालमें भी होता रहता है। [इन्द्रियोंका] विषयोंसे प्रग्रहणसे हट जाना। ग्रादि शब्दसे ग्रालस्य, दौर्बल्य, रातमें जगने, प्राधिक भोजन, सदके सेवन, परिश्रम, थकावट, चिन्ता, सेवनके स्वभाव ग्रादि [निद्राके विभावों अर्थात्] कारणोंका प्रहण होता है। सिर हिलानेसे जम्हाई ग्राने, लम्बी नि:श्वास छोड़ने, ग्रांखें घुमाने, ग्रघाई प्राने, ग्रांखें भपकने ग्रौर सारी क्रियाग्रोंको भूल जाने आदि ग्रनुभावों-

का प्रहुण होता है॥ [३६] १३६॥

(१७) ग्रब सुप्त [नाम विभावचारिभावका लक्षणा करते हैं]—

[सूत्र २०१।]—प्रबल निद्राका ग्राना ‘सुप्त’ [नामक विभाव] कहलाता है। इसमें बराबर [स्वप्नायित] ग्रौर मन सहित सब इन्द्रियोंका विषयोंसे प्रतिन्त बैमुख्य [मोहन]

हो जाता है।

[निद्राका] प्रकर्ष ग्रर्थात् गाढतम अवस्था। स्वप्नकी ग्रर्थात् उस समय [स्वप्नमें होने वाले] ज्ञानकी ‘ग्रायितं’ ग्रर्थात् प्रतीति जिसमें हो उस ‘स्वप्नायित’ कहते हैं। ‘ग्रा’ प्रर्थात् मनके सहित [पाँचों कुल मिलाकर] छहों इन्द्रियोंका ‘मोहन’ ग्रर्थात् विषयोंसे प्रतिन्त विमुखता। निद्रामें मनकी वृत्ति रहती है यहाँ [सुप्तमें] तो वह भी बिल्कुल निरुद्ध हो जाती है। यह [निद्रा ग्रौर सुप्ति इन दोनोंका] भेद है। निद्रामें कहे हुए विभाव हो यहाँ [सुप्तके भी कारण] समझने चाहिए॥

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का० १४०, सू० २०२-२०४ ] ततीयो विवेक: [ ३४१

(२०) व्यथौग्रयम् — [सत्र २०२]—दुष्ट उपराधान्नैष्ठृ नयं श्रौग्र्यं बन्ध-बधादिभिः

॥ [३७] १३६ ॥ 'दुष्टे' हिंस्रस्वानृतवादित्व-वधकत्वादियुक्ते । व्यपराधाकार्यकारित्वाद् दौर्मुख्य-चौर्यादिकृतं निष्पाद्य तं राजादिमुखैरपि निदयत्वं तदौग्र्यम् । तत्रैव बन्ध-बधाद्याभ्याम् । व्यादिशब्दान् ताडन-निर्भर्त्सन-स्वेद-शिरःकम्पादिभिरनुभावैरभि-नेतव्यमिति ॥ [३७] १३६ ॥

(२१) व्यथ हर्षः — [सूत्र २०३]—हर्षः प्रसत्तिरिष्ठापतेरत्र स्वेदाश्रु-गद्गदः ।

'प्रसत्ति'रेच्छेतोविकासः । 'इष्टं' प्रियसंयोगाप्रियसंयोगानिवृत्तौ देव-गुरु-राज-भरितृ प्रसाद-भोजनाच्छादन-धन-पुत्रादिलाभ-पुत्रादिगतहर्ष-विषयोपभोगोत्सवादि । 'गद्गदो' वाष्पपरुद्धकण्ठाभ्य वाक् । उपलब्धौ सान पुलक-प्रियभाषण-नेत्रमुखप्रसादादेर-नुभावस्य ग्रह इति ।

(२२) व्यथ विषादः — [सूत्र २०४]—विषादस्त्वनिष्टसंतान्तरिष्टानुप्तिनिर्वेदाचिन्तनः । ॥

[३७] १४० ॥ (२०) ग्रथ उप्रता [रूप व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]— [सूत्र २०२]—व्यपराधके कारण दुष्ट पुरुषके प्रति बन्ध-बन्धादि द्वारा जो निर्दयता

[का प्रकाशन है] वह 'उप्रता' कहलाती है । [३७] १३९ । दुष्ट प्र्यथात् हिंसा करने वाले, झूठ बोलने वाले, अथवा धोखा देने वाले [के प्रति] अपराधके कारण प्र्यथान्वित कार्य करने, ऊटपटाँग बात करने, चोरो, व्यादि रूप कारणोंसे जो राजा व्यादि की निष्ठुरता प्र्यथात् निर्दयता, उसको 'उप्रता' कहा जाता है उसका अभिनय बध तथा बन्धनके द्वारा किया जाता है । व्यादि शब्दसे मारने-फटकारने पसीना ग्रौर सिर हिलाने व्यादि अनुभावोंके द्वारा उसका श्रभिनय होता है ॥ [३७] १३६ ॥

(२१) ग्रथ 'हर्ष' [व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]— [सूत्र २०३]—इष्टकी प्राप्तिके कारण [मनकी] प्रसन्नता हर्ष होता है । इसमें स्वेद,

व्यथु ग्रौर गद्गदता हो जाती है । प्रसन्नता प्र्यथात् चित्तका विकास । इष्ट प्र्यर्थात् प्रियका संयोग व्यथवा ग्रप्रियके संयोग की निवृत्ति, देवता, गुरु, राजा व्यथवा स्वामीकी कृपाकी प्राप्ति, भोजन, रू. अच्छादन, वस्त्र, धन, पुत्रादिकी प्राप्ति, पुत्रादिकी प्रसन्नता, विषयोंके उपभोग ग्रौर उत्सव व्यादि [का प्रग्रहण होता है]। ग्रांसुओंसे गला भरे हुएकी वाणी 'गद्गद' कहलाती है । उसके उपलब्धि रूप होनेसे रोमांच, प्रिय भाषरणा, ग्राँखों ग्रौर मुखकी प्रसन्नता व्यादि ग्रनुभावोंका ग्रहण भी होता है ।

(२२) ग्रथ विषाद [का लक्षण करते हैं]— [सूत्र २०४]—इष्ट वस्तुतः के मिलनेसे [चित्तका] ग्रनुत्साह 'विषाद' कहलाता है । नि:इवास तथा चिन्ताके द्वारा [उसका ग्रभिनय किया जाता है] ॥[३७]१४०॥

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'तान्त्र' रतुस्साहाक्रान्तशिचत्ततसन्तापः । 'इष्ट' प्रारघननिर्वहणाद्देवाप्रतिकूलत्वादि । तस्यांनाविरतरलाभो विपरीतलाभो वा । चिन्तनमुपायानां । बहुवचनात् सहायान्वेषण-वैमनस्यादिभिर्मध्यमोत्तमगतेर्मुखवशोषप-निद्रा-ध्यान-जिह्वापरिलेहादिम्स्वधर्मगतैरत्नुभावैररभनीयत इति ॥ [३६] १४० ॥

(२३) ग्रथोन्मादः— [सूत्र २०५]—मनोविप्लुतिरुत्सादो ग्राहदोषैरयुक्तकृत् । विप्लुतिरविशसुलता, क्वचिदष्यविश्रान्तिरन्तरित यवन् । ग्रह-दोषौ ग्रापस्मारे व्याख्यातौ । ग्रयुक्तमनुचितं गीत-नृत्य-पाठितोत्सित-शायित-प्रहावित-रुदित-श्राक् ष-ग्रासम्वददग्रलापन - ध्यानेमित्तहसित-रस्मपांशुस्ववधूलन- निर्मोल्य - वीरघटवक्त्रशराव-भरशोपभोगादि । ग्रयं चोत्तमस्य विप्रलम्भे, श्रधमस्य करुणेऽपि व्यवमिचारी । ग्रापस्मारस्तु बीभत्स-भयानकयोः । स च मनोवैकल्यम्, ध्यानन्तु मनोडनवस्थितिरिति भेद इति ।

[सूत्र २०६]—ग्रापदः स्वान्तनवीचत्वं दैन्यं काणण्यावगुण्ठनैः ॥

॥ [३६]१४१ ॥ तान्त्र श्रर्थात् ग्रनुत्साहसे युक्त चित्तका सन्ताप । इष्ट श्रर्थात् प्रारम्भ किए हुए कार्यको समाप्ति भाग्यकी श्रप्रतिकूलतादि । उसका प्राप्त न होना श्रथवा विपरीत [श्रथ्यात् श्रनिष्ट] की प्राप्ति । चिन्तन श्रर्थात् उपायोंके चिन्तनद्वारा [उसका श्रमिनय होता है । चिन्तनतनः पदमें] बहुवचनके प्रयोगसे सहायकोंकी खोज श्रौर वैमनस्य प्रादि मध्यम तथा उत्तम पात्रगत [ग्रनुभावों] के द्वारा तथा श्रेष्ठ पात्रगत ग्रनुभावोंके द्वारात तथार श्रौर मुख सूखने, नींद, ध्यान, जीभ फेंकने श्रादि ग्रधमपात्रगत ग्रनुभावोंद्वारा उसका श्रमिनय किया जाता है ॥[३६]१४०॥

(२३) ग्रब उन्मादका [लक्षण] करते हैं]— [सूत्र-विश्रादि रूप] ग्रह तथा [वात पित्तादि रूप] दोषोंके कारण मनका पथभ्रष्ट हो जाना 'उन्माद' कहलाता है श्रौर उसमें ग्रनुत्थित कार्य करने लगता है ।

[सव २०५]—'विप्लुति' श्रर्थात् ग्रप्रसिरतरता, कहों भी चित्तका न लगना । ग्रह तथा दोष दोनोंकी व्याख्या ग्रापस्मारमें की जा चुको है । ग्रहयुक्त श्रर्थात् ग्रनुत्थित गाना, नाचना, पढ़ना, उठना, भोजन करना, रोना, खिलखिलाना, प्रमशाद बकवाद करना, बिना बातके हॅसना, पहनना, उठनेका प्रयत्न करना, प्रमशाद बकवाद करना, बिना बातके हॅसना, पहनना, उठनेका प्रयत्न करना, वृक्षोंपर टाँगे हुए घड़ों, राख या धूल फेंकना, देवताओंकी वस्तुओं [निर्माल्य] पोछल ग्रादिके वृक्षोंपर टाँगे हुए घड़ों, राख या धूल फेंकना, देवताओंकी वस्तुओं [निर्माल्य] पोछल श्राविके वृक्षोंपर टाँगे हुए घड़ों, राख या धूल फेंकना, देवताओंकी वस्तुओं [निर्माल्य] पोछल श्रादि वीरघट करवा, सकोर श्रादि ग्रौर ग्राभरपाश्रादिका उपभोगादि । यह [उन्माद] उत्तमके विप्रलम्भमें ग्रौर ग्रधमके करुणमें व्यवमिचारिभाव होता है । श्रौर ग्रापस्मार बीभत्स तथा भयानक रसोंमें [व्यभिचारिभाव] होता है । [यह उन्माद तथा ग्रापस्मारका एक भेद है । उनका दूसरा भेद यह भी है कि] वह [प्रर्थात ग्रापस्मार] मनकी ग्रप्रसिरतरतारूप होता है यह इन [उन्माद तथा ग्रापस्मार] का [दूसरा] भेद है ।

(२४) ग्रब दैन्य [नामक व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]— [सूत्र २०६]—ग्रापत्तियोंके कारण मनकी विकलता 'दैन्य' कहलाती है । [चेहरेको] कुष्ट्राता श्रौर ढकनेके द्वारा उसका श्रभिनय किया जाता है ।

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काङ १४२, सू० २०७-२०५ ] ततीयो विवेक: [ ३४३

'ग्रापदो' दौर्गत्य-न्यकारादे:। स्वान्तर्नीचत्वं मनःक्लैव्यम्। काष्यैर्वदन-श्यामता। श्रवगुण्ठनं शिरो-गात्रवरेऽपम्। बहुवचनाच्छरीरासंस्कार-गौरवपरिहार-वस्त्रमालिन्यादौचैश्वानुभावैरभिनेतव्यमिति ॥ [३८] १४१ ॥

[सूत्र २०७]—ब्रीडाडनुताप-गुर्वादेरधाष्टच्य गात्रगोपनम् । अकृत्यकरष्यादनु पश्चात्तापो मनसो विवेकः। गुरुमातापित्रादि:। श्रादि-शब्दान् प्रतिज्ञातानिर्वहृणां-गुरुयतिक्रम-श्रवज्ञान-श्रासत्सवादेविभावस्य ग्रहः। श्रद्धा-श्रष्टं चमवैयात्यम्। गात्रगोपनेनोपलक्ष्यषाद् श्रधोमुखचिन्तन-नखनिस्तोदन-भूविलेखन-वस्त्रांगुलीयस्पर्शनादेरनुभावस्य ग्रह इति ॥

(२५) ग्रथ ब्रीडा—

[सूत्र २०५]—घोराच्चभयतता त्रासः काय-सड्गोच-कम्पितादेः ।

॥ [४०] १४२ ॥

'घोरं' भीप्सरां निर्घाताशनिपात-महामैरवनाद-महाउत्सवस्तव-शब्दर्शनादि । 'चकिता' उद्वेगकारी चमत्कारः। श्रुतार्थसम्भावनातः सत्त्ववृत्तेशो भयमिल्यनयोर्भेदः । बहुवचनाद् स्तम्भ-रोमांच-मूर्च्छादि-गद्गदवचनादिभिश्चायमनुभावैरभिनीयते इति ॥

॥ [४०] १४२ ॥

ग्राप्तित्से श्रथातं दुर्गति या ग्रपमान ग्रादिके कारणा, अपने मनकी नीचता श्रथातं विकलता। कृष्णतां श्रथातं मुखका काला पड़ जाना। श्रवगुण्ठन श्रथातं सिर ग्रोर शारीरका ढक लेना। बहुवचनसे शरीरका [शुद्ध श्रादि रूप] संस्कारका प्रभाव, गौरवको भुला देना ग्रोर वस्त्रोंकी मलिनता ग्रादि अनुभावोंके द्वारा उसका प्रभिनय होता है ॥[३६]१४१॥

(२५) ग्रथ ब्रीडा (का लक्षण करते हैं)—

[सूत्र २०७]—परचात्ताप श्रथवा माता-पिता ग्रादि गुरुजनों [की उपस्थिति]के कारण शरतताका न करना 'ब्रीड' कहलाती है ग्रोर उससे मुख शारीरादिको छिपाता है ।

ग्रनुचित कार्यके करनेके कारण बादको होनेवाला ताप श्रथातं मानसज्ञान [अनुताप कहलाता है]। माता-पिता आदि गुरु हैं। ग्रादि शब्दसे प्रतिज्ञाको पूरा न कर सकने, गुरुजनों की मर्यादाका उल्लंघन, ग्रपमान ग्रोर ग्रपरिचय ग्रादि विभावोंका ग्रहण होता है । ग्रग्रहाष्टच्य ग्रथ्यातं उद्वडणताका प्रभाव। गात्रगोपनके उल्लेखसे, उससे सिर भुकाकर रोचने, नाखून चबाने, भूमी कुरेदने, कपड़े या श्रंगूठी ग्रादिके द्वारा ग्रनुभावोंका ग्रहण होता है ।

(२६) ग्रथ त्रास [का लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २०५]—भयंकर वस्तुको देखकर चकित हो जाना 'त्रास' कहलाता है। शरीर के सिकोड़ने ग्रोर कंपनेके द्वारा [उसका प्रभिनय किया जाता है] ॥ [४०]१४२॥

भयंकर गर्जन, बिजली गिरना, महाभयंकर शब्द, श्रुत्यंत भोषण प्राणीका दर्शन ग्रादि 'घोर' पदसे लिये जाते हैं । भयको उत्पन्न करनेवाला ग्राञ्चर्य 'चकिता' कहलाता है । [उस घोर दर्शनादिसे त्रास होता है । घोर] ध्वन्थकी होनेको सम्भावनासे मानसिक बलका नाश 'भय' होता है । यह भय ग्रोर त्रासका भेद है । बहुवचनसे स्तम्भ, रोमांच, मूर्च्छा,

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(२७) ग्रथ तर्कः— [सूत्र २०६]—एकसम्भावनं तर्को वादादेरज्ञानतकः । 'वादे' विप्रतिपत्तिस्तस्मात् । श्रादिग्रहणात् सन्देहवाधकवलोद्भूतपक्षान्तरामावज्ञानविशेष-प्रतिपत्त्यभिलाषादेरिवभावादू यथोकेस्य पक्षस्य सम्भावनं भवितव्यमने-नेति प्रत्ययः स तर्कः । श्रज्ञस्य श्रृङ्ग-शिरोऽज्ञ ल्यादेर्नेतिक इति ॥

(२८) ग्रथ गर्वः— [सूत्र २१०]—श्रात्मन्याधिक्यधोगर्वो विदादेरन्यरोधया ॥ [४१] १४३ ॥ 'श्राधिक्यधी:' परजुगुप्साक्रान्तः स्वस्मिन् बहुतमानः । श्रादिशब्दाद्जाति-तुल-लाभ-बुद्धि-वलैश्वर्यादेरिवभावस्य ग्रहः । 'रोधा' श्रवज्ञा । तयाऽ । उपलब्धगान् पारुष्य-ग्रसूया-ग्रार्थर्षणा-ग्रनुत्तरदान - ग्रज्ञानवलोकन- उपहासन - श्रलङ्कारवचस्यासादि-मिश्रानुमानैरभिनेतव्य इति ॥ [४१] १४३ ॥

(२९) ग्रथौत्सुक्यम— [सूत्र २११]—इष्टाभिमुख्यमौत्सुक्यं स्मरगाद्यात् त्वरादिभिः । मतङ्गवचन ग्रादिके द्वारा मी इसका श्रस्तित्व किया जाता है ॥४०॥१४३॥

(२७) ग्रंथ तर्क [वाभिचारिभावका लक्षण करते हैं]— [सूत्र २०६]—वाद आदिके द्वारा एक पक्षकी सम्भावना 'तर्क' कहलाता है । उससे अंगोंका नचना [रूप ग्रनुभाव उत्पन्न होता है] वाद प्रयत्नत मतभेद [विप्रतिपत्ति] उससे [तर्क होता है] । ग्रादि शब्दसे सन्देहके निवारक [प्रबल प्रमाण] के बलसे उत्पन्न दूसरे पक्षके प्रभावका ज्ञान ग्रोर विशेष प्रतीतिकी इच्छा प्राप्ति भावोंसे जो किसी एक पक्षकी सम्भावना, श्रथया यह बात ऐसी होनी चाहिए इस प्रकारकी प्रतीति, वही 'तर्क' कहलाता है । ग्रङ्ग प्रयत्नत् मौह, सिर या ग्रङ्गुलि ग्रादिका नचाने वाला होता है ।

(२८) ग्रंथ गर्व [का लक्षण करते हैं]— [सूत्र २१०]—विद्या ग्रादिके कारणा ग्रज्ञानोकी ग्रवज्ञा करके प्राप्तवेकी बडा़ सम्भना 'गर्व' कहलाता है । [४१] १४३ 'ग्राच्चिवर्यधी:' श्रर्थात् [ग्रनन्यके प्रति] घृणाके सहित श्रपने प्राप्तको बडा सम्भना । [विद्यादे: मे प्रयुक्त] श्रादिशब्दसे जाति, कुल, लाभ, बुद्धि, [किसीकी] बलभता, यौवन, ऐश्वर्य ग्रादि विभावोंका ग्रहे होता है । 'रोधा' श्रथया ग्रवज्ञा । उससे उपलब्धगान् पारुष्य, ग्रसूया, रोब जमाने [र्ष्या] उत्तर न देने, [ग्रपन] अंगोंका देखने, [दूसरे] उपहास करने ग्रोर ग्रलङ्कारवचनोंके भिन्न स्थानोंपर प्रयोग करने प्राप्ति ग्रनुभावोंके द्वारा उसका प्रभिनय किया जाता है ॥ [४१] १४३ ॥

(२९) ग्रौत्सुक्य [का लक्षण करते हैं]— [सूत्र २११]—[इष्टके] स्मरण ग्रादिके कारणा इष्टके प्रति शोभ्रता ग्राविसे प्रभिमुख प्रवृत्त होना 'प्रोत्मुक्य' कहलाता है ।

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काः १४४, सु० २१२-१३ ] तृतीयो विवेक: [ ३४४

ग्राभिमुख्यमौत्सुक्यम् । स्मररागमिश्रस्य । ग्राह्यशब्दानमनोज्ञादिहचाऽग्रविषय्ज्ञलोभादेर्विभावास्य ग्रहः । त्वरा मनो-वाक्-कायदृष्टि-चापलम् । ग्राहादिशान्दात् कृत्य-विस्मरणे-दीर्घनिःश्वास-ऽनसंबद्धवचन-स्वेद-हत्तापादेरनुभावास्य ग्रह इति ।

(३०) ग्रथ प्रवहित्या—

[सूत्र २१२]—धाष्टर्यादौवीर्यारोधोऽवहित्यादष्ट क्रियांतरम् ॥

॥ [४२] १४४ ॥

'धाष्ट्र'्य' प्रागल्भ्यम् । ग्राहादिशब्दादात् भय-लज्जा-गौरव-कुटिलाशयत्वादेर्विभावास्य ग्रहः । सर्वानुगतत्वव्यापारार्थं धाष्ट्र्यं प्रथममुपापत्तम् । सभयादिरपि ह्यप्रगल्भो न शक्नोत्याकारं संवरितुम् । 'विक्रिया' ह्यविकारः-मुखरागादिका, तस्या रोधः संवररागम् । रोहकारकल्वेनोपचाराच्चित्तवविशेषोडपि रोधः । न बहिःस्था चित्तवृत्तिरिति पृष्ठोदरादित्यादू 'अ्रवहित्या' । अ्रत्रावहित्यां प्रस्तुतक्रियातोडन्यकथनावलोकनकथा-भझकृतकस्थेयोडनिक क्रियांतरमिति ॥ [४२] १४४ ॥

(३१) ग्रथ जाड्यम्—

[सूत्र २१३]—जाडयमिष्टादितः कार्याज्ञानं मौनानिमेषरौः ।

ग्राभिमुख्य श्रोत्सुक्य कहलाता है । स्मरराग इष्टका [ ग्राभिप्रेत है 'स्मररागाद्यात्' में ] 'प्रागल्भ्य' शब्दसे सुन्दर वस्तुके देखनेकी इच्छा, प्रेम श्रोर लोभादि विभावों [कारणों] का ग्रहण होता है । त्वराका प्रभिप्राय मन, वाणी तथा शरीर श्रोर दृष्टिकी चपलता है । ग्रादि शब्दसे कामको भूल जाने, लम्बी इवास छोड़ने, ग्रसंबद्ध बात करने, स्वेद, ग्रोर हृदयकी जलन प्रादि अनुभावोंका ग्रहण होता है ।

(३०) ग्रब प्रवहित्या [का लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २१२]—धृष्टता [प्रागल्भ्यसे उत्पन्न विकारोंको छिपानेके यत्न 'अ्रवहित्या' कहलाता है । इसमें [प्रागार-विकृतिको छिपानेके लिए] दूसरो कियाकी जाती है । [४२] १४४ ।

है । इसमें 'प्रागार-विकृतिको छिपानेके लिए] दूसरो कियाकी जाती है । [४२] १४४ । धृष्टताका दूसरा नाम 'प्रागल्भ्य' है । 'ग्रादिशब्दादात्' भय, लज्जा, गौरव, कुठिलाभिप्राय प्रादि कारकों

[विकारों] का ग्रहण होता है । [ग्राद्याद्यके] सबसेमें ग्रनिष्ट होनेके कारण सबसे पहले धृष्टताका

प्रहण किया है । सभय ग्रादि यपित भी यदि प्रगालभ न हो तो ग्राकारको छिपानेमें

समर्थ नहीं हो सकता है । विक्रिया ग्रथार्त भौंहोंका तेड़ना होना या मुखका लाल ग्रादि हो

जाना प्रादि, उसका रोष ग्रथार्त [बाह्रा विकारोंको] छिपानेके कारण होनेसे उस

ग्रभिप्रायकी चित्तवृत्ति-विशेषको भी 'रोध' कह सकते हैं । बाहर प्रकाशित न होने वाली चित्त-

वृत्ति 'न बहिस्था' होनेसे 'ग्रवहित्या' कहलाती है [यह ग्रवहिस्था पदका निर्वाचन है]

'पृष्ठोदरादिगरा' पठित नियमसे इसकी सिद्धि होती है । इसमें ग्रथार्त ग्रवहित्यामें प्रस्तुत

क्रियासे भिन्न कथन, ग्रवलोकन, बात समाप्त कर देना, बनावटी स्थिरताका दिखलाना ग्रादि

दूसरी क्रियाएं की जाती हैं ॥ [४२] १४४ ॥

(३१) ग्रब जाड्य [का लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २१३]—इष्ट प्रादिसे [ग्रथार्त इष्टप्राप्तिकी प्रसन्नतासे] कामको भूल जाना 'जाड्य'

कहलाता है । मौन ग्रोर टकटकी लगाकर देखनेके द्वारा [उसका प्रभिनय किया जाता है] ।

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'इष्ट' प्रियं, तस्य दर्शन-श्रवणेऽपि इष्टे। श्रादिशब्दादानिष्टदर्शन-श्रवणाद्-व्याधिदैर्विभावस्य ग्रहः कार्योज्ञानं नेत्राभ्यां पश्यतोऽपि श्रोत्राभ्यां श्रृण्वतोऽपि चेदानीं किं कृत्यमित्यनिश्चयः नेदं वैकल्य-स्वचैतन्यस्वभावादिमत्यपस्मार-मोहाभ्यां भिन्नम् । 'मौनं' तूष्णीभावः 'अनिमेष्रां' अनिमेषनिरীক্ষणम् । बहुवचनात् परवशत्वादिभि-रनुभावैरभिनेतव्यमिति ।

॥ [४३] १४५ ॥ [सूत्र २१४]—कर्मानुत्साहग्रालस्यं श्रमाद्याजृम्भितादिभिः

श्रादिशब्दादान सौहित्य-स्वभाव-व्याधि-चिन्तादिभिरविभाववैः स्त्री-नीचानामनुचम-रूपमालस्यं म्रवति । श्रमस्य व्यभिचारित्वेऽपि अन्यव्यभिचारिभ्यां प्रति विभावत्वे न दोषः । व्यभिचारिता तु परस्परं व्यभिचारिणां स्थायीत्वप्रसङ्गाद् दुष्टैव । एवं व्यभिचारिणां चरिताणां चानुभावत्वमपि भवत्येव । जृम्भितेन, श्रादिशब्दाद् व्यासितेनाहारवर्जित-पुरुषार्थानारम्भादिमिश्चानुभावैस्तद्भिन्नेनेदत्यम् । श्रालस्योऽपि अवश्यमहारं करोत्येति ॥ [४३] १४५ ॥

इष्ट प्रियार्थात् प्रिय, उसका दर्शन श्रौर श्रवण भी इष्ट [पदसे ग्राह्यप्रेत] है । यदि श्रादि शब्दसे श्रनिष्टके दर्शन, श्रवण, व्याधि श्रादि कारणों [वभावों] का भी ग्रहण होता है । कार्य का ज्ञान न होना प्रर्थात् ग्रालस्यसे देखते हुए श्रौर कानोंसे सुनते रहनपर भी, अब क्या करना चाहिए इसका निश्चय न कर सकना । यह [जड़त्व] न विकलता रूप है श्रौर न श्रचेतनत्य रूप चाहिए इसका निश्चय न कर सकना । यह [जाक्ष्य] न विकलता रूप है श्रौर न व्यचेतनत्य रूप है, क्योंकि [वैकल्य रूप] ग्रपस्मार तथा [ग्रचेतनत्य रूप] मोह दोनोंसे भिन्न है । मौन श्रर्थात् चुप रहना । ग्रनिमेष्ष्रां प्रर्थात् टकटकी लगाकर देखना । बहुवचनसे परवशता श्रादि ग्रनुभावों द्वारा इसका ग्रभिनय किया जाता है

(३२) श्रव श्रालस्य [व्यभिचारिभावका लक्षण करते हैं]— [सूत्र २१४]—श्रम श्रादिके कारण कार्यमें उत्साहका न होना 'ग्रालस्य' कहलाता है ।

[जृम्भितादिभिः: में प्रयुक्त] जृम्भादि शब्दसे पेट भरा होना, [ग्रालस्यका] स्वभाव, रोग, जड्झाई श्रादिके द्वारा उसका श्रभिनय किया जाता है । [जृम्भितादिभिः: में गिन्तितादिभिः:] श्रमके या गर्म श्रादि कारणोंसे स्त्री श्रौर नीचोंकी उदासीनता श्रालस्य कहलाती है । श्रमके व्यभिचारिभाव होनेपर भी दूसरे व्यभिचारिभावके प्रति विभाव [कारण] होनेमें कोई दोष नहीं है । व्यभिचारिभावोंकी परस्पर व्यभिचारित्व [उनमेंसे एकके] स्थायिभाव बन जानेके कारण दूषित हो है । [प्रर्थात् व्यभिचारिभाव तो किसी स्थायिभावका ही होता है । यदि एक व्यभिचारिभावको दूसरेका व्यभिचारिभाव माना जाय तो पहला व्यभिचारी, व्यभिचारिभाव न होकर स्थायिभाव हो जायगा । इसलिए किसी व्यभिचारिभावको दूसरे व्यभिचारीका व्यभिचारिभाव नहीं माना जा सकता है । हाँ उनको विभाव श्रौर ग्रनुभाव माना जा सकता है] इसी प्रकार व्यभिचारिभाव श्रनुभाव भी हो सकते हैं । जृम्भित शब्दसे श्रौर श्रादि शब्दसे बैठे-बैठे खानेके श्रतिरिक्त कोई काम न करने श्रादि श्रनुभावोंके द्वारा उसका श्रभिनय किया जाता है । श्रालसी भी भोजन तो अवश्य ही करता है [इसलिए खानेके छोड़कर अन्य कोई काम न करना श्रालस्य कहलाता है ।। [४३] १४५ ।।

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अथ विवोध:-

[सूत्र २१५]—निद्राच्छेदो विवोधश्च शब्दादेरड्भङ्ङवान् ।

ग्रादिशब्दात् स्पर्श-स्वप्नान्त-ग्राहारपरिणामादेविभावास्य ग्रहः। उपलचणात्

जृम्भा-ग्रादिविमर्दन-शयनमोचन-सुजाग्रेप-ग्रङ्गुलीरोदनादिरसुभावो दृश्यः। पर्यन्ते

चकारः सर्वव्यभिचारिसमुच्चयार्थः: इति ।

ग्रथैवां रसादीनां मध्ये केषांचित् परस्परं कार्यकारणभावो—

[सूत्र २१६]—केशांचित् तु रसादीनामन्योन्यं हेतुकार्यंता ॥ [४४] १४६ ॥

ग्रादिशब्दाद् व्यभिचारिणाम्। यथा वीराद्‌द्रुतः। महापुरुषोत्साहो हि

जगद्विस्मयँ फुलं साच्चाद्‌नुसन्धत्ते। तथा द्रौपदीस्वयंवरादौ वीराच्च शृङ्गारोदपि। रौद्राच्च

वध-वन्धादिफलानन्तरं करुणाद्-भयानकौ। तथा सर्वरसेष्वजन्तरं सर्वे सजातीयारसा भवन्ति। यथा शृङ्गारिषु हर्ष्च वा शृङ्गारः, हसन्ते हृष्टवा हास्यः इत्येकं सर्वरसेषु

हेतु-फलभावो वाच्यः। सर्वरसां चाभासा ग्रानौचित्यप्रयुक्तत्वात् हास्यरसस्य कार-(३३) अव विवोध [का लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २१५]—शब्द श्रादिके कारणे होने वाला निद्राभङ्ग 'विवोध' कहलाता है और

उसमें अंगड़ाई आदि [प्रनुभाव] होते हैं

ग्रादि शब्दसे हूने, स्वप्नकी समाप्ति, भोजनका परिपाक हो चुकने ग्रादि [विभावों]

कारणोंका ग्रहण होता है। [अङ्गसंघटन पदके] उपलब्धण रूप होनेसे जम्भाई, ग्रालिङ्ग

फिर सो जाने, खाट परसे उठ बैठने, हाथ फँलाने, अंगुलियों कटकाने आदि ग्रनुभावोंको

समभना चाहिए। [विवोधके वर्णनके साथ व्यभिचारिभावोंका वर्णन समाप्‍त होता है।

इसलिए 'विवोधश्च' इस पदमें ग्रादिया हुए] अन्तमें प्रयुक्त चकार व्यभिचारिसमुच्चयकेलिए

है। [प्रथमत यहाँ तक सारे व्यभिचारिभावोंका वर्णन समाप्‍त हो गया इस बातका सूचक है]।

श्रव इन रसादिमेंसे किन्हींके परस्पर एक-दूसरेके प्रति कार्य-कारणभावका कथन

करते हैं—

[सूत्र २१६]—रसादिकोंमेंसे किन्हींकों परस्पर एक-दूसरेके प्रति कार्य-कारणभाव

होता है।। [४४] १४६।।

ग्रादि शब्दसे व्यभिचारिभावोंका ग्रहण होता है। [रसोंके परस्पर कार्य-कारणभावका

उदाहरणस्वरुप देते हैं] जैसे वीररससे प्रद्भुत रस [उत्पन्न होता है]। महापुरुषोंका उत्साह [जो

वीररसका स्थायिभाव होता है] साक्षात्‌ रूपसे जगत्के विस्मय रूप फलको [प्रथमत् श्रद्भुत

रसके स्थायिभावको] उत्पन्न करता है। ग्रोर द्रौपदी स्वयंवरादिमें [प्रथमत् वीर नायकके पराक्रमको

देखकर द्रौपदीके मनमें] वीररससे शृङ्गाररसकी भी उत्पत्ति होती है। ग्रोर रौद्ररससे उसके

वध या बन्ध रूप फलोंको देखकर करुण तथा भयानक रसोंकी उत्पत्ति होती है। इसी प्रकार

सब रसोंसे उनके बाद होनेवाले सजातीय रस उत्पन्न होते हैं। जैसे शृङ्गारयुक्तको देखकर

[दूसरेमें] शृङ्गार, हँसते हुएको देखकर [दूसरेमें] हास्य [उत्पन्न होता है]। इस प्रकार सारे

रसोंमें कार्य-कारणभाव समभना चाहिए। [ग्रानौचित्यसे प्रयुक्त होनेवाले रस, रसाभास

रसोमें कार्य-कारणभाव समभना चाहिए।

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३४८ ।

नाट्यदर्पणम्

[ का० १४६, सू० २१७

राम । रावणस्य हृदविषयप्रवृत्तत्वान् शृङ्गाराभासः स्वरतां हास्यमुपजनयति । हास्याभा-

सादपि हास्यो भवति यथा—

लोकोत्तरैः चरितैर्न लोक एषः

सम्भाव्यते यदि किमत्र वदाम नाम ?

यत् स्वत्र हासमुखरत्वमसुखं तेन,

पाश्वोपीडमिह को न विजाहसीति ॥

व्यभिचारिभावैरपि उत्प्यायोत्पादकभावा यथा व्याधीन वेदः, चिन्ताविषा-

धास्यां स्मिति:, श्रमादालस्यमित्यादि । व्यभिचायिभावसादृश्यनौचित्यप्रवृत्तत्वाद हास्यो

भवतीति ॥ [४५] १४६ ॥

अथ रसानां स्थायिनां व्यभिचारिणमनुभावानां च कार्यभूताननुभावान् प्रति

पादयति

[सूत्र २१७]—वेपथु:-स्तम्भ-रोमाञ्चा: स्वरभेदोदश्रु-मूर्च्छनम् ।

स्वेदो वैवर्ण्यमित्याद्या ग्रनुभावा रसादिजा: ॥[४५]१४७॥

प्रायशोऽनन्दात् प्रसाद-उत्साहवास-नि:श्वास-कृन्दन-परिदेवनित - उल्लुकसन - भूमि-

विलेखन-विवर्तन-उद्वर्तन-नखनिस्तोदन-भ्रुकुटी-कटाक्ष- तिर्यगधोमुखनिरिरीक्षण- प्रशंसन-

हसन-दान-चाटुकार-व्यस्यरागादय: कचित् स्थायिनो व्यभिचारिणाश्रय । यथायोगं रसानां

स्थायिनं व्यभिचारिणमनुभाविनो च सहृदयैःस्थैय शनुभावा इति ॥ [४५] १४७ ॥

कहलाते हैं। ग्रानन्दोचित्यसे प्रवृत्त होनेके कारण सारे रसोंके रसाभास हास्यरसेके कारण होते

हैं। जैसे रावणके [सीताके प्रणयुरक्त होनेके कारण] क्रवियमें प्रवृत्त शृङ्गाराभास, सहृदयोंने

भीतर हास्य उत्पन्न करता है। [ग्रन्थ रसाभासोंसे ही नहीं प्राप्ति] हास्याभाससे भी हास्य-

रस उत्पन्न होता है। जैसे—

[रावणके] लोकोत्तर चरित्रोंको यदि यह लोक उचित नहीं समझता है तो हम क्या

कह सकते हैं। किन्तु [प्रनुचित कर्म करके भी] बेशर्मोंकी तरह जो वह ग्रट्टहास करता हुप्रा

हँसता है उसको देखकर ऐसा कौन है जो कोख पकड़कर नहीं हँसता है। [हँसते-हँसते किस

की कोखमें दर्द नहीं होने लगता है।]

व्यभिचारिभावोंमें भी परस्पर उत्पाद्य-उत्पादकभाव होता है। जैसे ध्यानसे निवेद

उत्पन्न होता है। जिन्त तथा विवोधसे स्मृति, ग्लानि श्रामस्य उत्पन्न होता है। ग्रानोचित्य

से प्रवृत्त होनेवाले व्यभिचारिभावसेभी हास्यरस्की उत्पत्ति होती है ॥[४५] १४६॥

प्रब रसोंके, स्थायिभावों ग्रौर व्यभिचारिभावोंके [तीनोंके] कार्यभूत शनुभावोंका

प्रतिपादन करते हैं—

[सूत्र २१७]—कम्प, स्तम्भ, रोमाञ्च, स्वरभेद, ग्रांस्रु, मूर्च्छा, स्वेद, विवर्णता

नोचना, भूमि खोदना, लोचना-पोटना, नाखून चबाना, भ्रुकुटी कटाक्ष, इधर-उधर या नीचे

देखना, प्रशंसा करना, हँसना, दान, चापलूसी ग्रौर मुखका लाल पड़ जाना ग्रादि [श्रनुभाव

भी ग्रहोते होते हैं।] कहाँ स्थायिभाव तथा व्यभिचारिभाव भी [ग्रनुभाव हो सकते हैं।]

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क॰ १४८, सू॰ २१५-२० ] तृती यो विवेक: [ ३४६

अथ ते प्रत्येकशो लच्यन्ते । तत्र (?) वेपथु:-

[सूत्र २१५]—भयादेवे पथुगत्रस्पन्दो वागादिविक्रिया: ।

ग्रादिशब्दाद् रोग-हर्ष-शीत-रोष-प्रियस्पर्शादेवि भावस्य ग्रहः । स्पन्दः किचि-

कचलनम् । वागादेरादिशब्दाद् गति-चेष्टादेर् विक्रिया यस्मात् । इत्यनुभावकथनम् ॥

(२) ग्रथ स्तम्भ:-

[सूत्र २१६]—यत्नेऽप्य यत्न क्रिया स्तम्भो हृदि:, हा ! विषादवान् ॥ [४६] १४८ ॥

ग्रज्ञानां हस्त-पादादीनाम्तः परिस्पन्दे डप्यव्यक्रिया चलनाभावः स्तम्भः । ग्रादि-

शब्दाद् विस्मय-भय-मद-रोगादेविभावस्य ग्रह इति ॥ [४६] १४८ ॥

(३) ग्रथ रोमाञ्च:-

[सूत्र २२०]—रोमाञ्च: प्रियहृष्टचादे: रोमहर्योऽर्ज्जनेः ।

ग्रादिशब्दाद् व्याधि-शीत-क्रोध-स्पर्शादेवि भावस्य ग्रहः । बहुवचनाद् क्ष्मेदुर-

प्रमुख-नेत्रविकास-दन्तवीपादि भावाद् तदिरमिनेतव्यः ॥

रसोंके स्वाभिमाव् तथा व्यभिचारिभावोंके ग्रोर ग्रनुभावोंके भी यथायोग्य सहलों ग्रनुभाव

हो सकते हैं ॥[४५]१४७॥

(१) ग्रब उन ग्रनुभावोंमें प्रत्येकका ग्रलग-ग्रलग लक्षण करते हैं । उनमें सबसे पहने

वेपथु: (का लक्षण करते हैं)—

[सूत्र २१५]—भय ग्रादिके कारणे शरीरका किडिचत् विचलित हो जाना 'वेपथु'

कहलाता है । ग्रोर उससे वागी ग्रादिमें विकार ग्रा जाता है ।

ग्रादि शब्दसे रोग, हर्ष, शीत, क्रोध, प्रियके स्पर्श् ग्रादि विभावोंका ग्रहण होता है ।

स्पन्द ग्रर्थात् तनिकसा हिल जाना । 'वागादे:' इसमें ग्रादि शब्दसे गति ग्रोर चेष्टा ग्रादिमें जिससे

विकार ग्रा जाता है । यह [वेपथु:] ग्रनुभावका कथन किया है ॥

(२) स्तम्भ (का लक्षण करते हैं)—

[सूत्र २१६]—हर्ष ग्रादिके कारणे यत्न करनेपर भी ग्रङ्गोंकी क्रियाका न होना

'स्तम्भ' कहलाता है । ग्रोर उसमें 'हा!' ग्रादि शब्दोंसे विषाद प्रकट होता है । [४६] १४८।

ग्रङ्गोंका प्र्यर्थात् हाथ-पैर ग्रादिके भीतर गति होनेपर भी बाहर उनका न चल सकना

स्तम्भ कहलाता है । ग्रादि शब्दसे विस्मय, भय, मद ग्रोर रोगादि [ग्रन्य कारणों] विभावों

का ग्रहण होता है ॥[४६]१४८॥

(३) ग्रब रोमाञ्च (का लक्षण करते हैं)—

[सूत्र २२०]—प्रियके देखने ग्रादिसे उत्पन्न होनेवाला रोमहर्ष 'रोमाञ्च' कहलाता

है । ग्रादि शब्दसे उसका ग्रभिनय किया जाता है ।

ग्रादि शब्दसे व्याधि, शीत, क्रोध, स्पर्श ग्रादि विभावोंका ग्रहण होता है । बहुवचनसे

ग्रङ्गोंके फूल जाने, ग्राँखोंके खिल जाने ग्रोर दन्तवीपादिके बजाने ग्रादि ग्रनुभावोंद्वारा उसका

ग्रभिनय करना चाहिए ।

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३४० ] नाट्यदर्पणम् [ क० १४०, सू० २२१-२३

(४) ग्रथ स्वरभेद:- [सूत्र २२१ ]—स्वरभेद: स्वराल्पत्वं मदादिर्हर्ष-हास्यकृत् ।। [४७] १४६ ।। ग्रानि-न्यत्वमुपचयापचयाभ्यां भेद: । श्रादिशब्दाद्दू भय-जरा-हर्ष-क्रोध-राग- रौद्यादिर्विभावस्य ग्रहः । उपलब्ध्यादू श्रीडा-निव्वेदाद्योऽनुभावा दृश्यते इति ।। [४७] १४६ ।।

(५) ग्रथाश्रु— [सूत्र २२२ ]—ग्रश्रु नेत्राम्बु शोकादैनसास्पन्ददाक्षिरूक्श्रु: । ग्रानन्द-ग्रसर्पथ-धूम-ग्रक्ष्वण-जृम्भणा-भय-पीडा-हास्या- देविंभावस्य ग्रहः । नासाया: स्पन्द: श्लेष्मस्रवणम् । बहुवचनाच्छ्रिष्टीवन-गद्गदस्वरा- देरनुभावस्य ग्रह इति ।।

(६) ग्रथ मूच्छनम्— [सूत्र २२३ ]—मूच्छनं घात-कोपाद्यै: खल्यानिभू मिपातकृत् ।। [४७] १५०।। ग्रादिशब्दाद्दू मदादेर्विभावस्य ग्रहः । खल्यानिरिन्द्रियाणामभिभव: । उप- लक्षणान् स्वेद-श्वासाद्योऽनुभावा इति ।।[४७] १५०।।

(४) ग्रन्थ स्वरभेद [रूप ग्रन्थभावका लक्षण करते हैं]— [सूत्र २२१]—मद ग्रादिके कारण होनेवाली श्राद्बिकी भिन्नता 'स्वरभेद' कहलाता है । ग्रौर वह हर्ष तथा हास्यको उत्पन्न करनेवाला होता है ।[४७]१४६।। ग्रन्थता ग्रथ्यन्तु उसके तीव्र या मन्द हो जाननेवाला भेद । श्रादि शब्दसे भय, जडता, हर्ष, क्रोध, राग श्रौर रौद्रता ग्रादि विभावोंका ग्रहण होता है । उपलब्ध्या रूप होनेसे श्रीडा तथा निव्वेद ग्रादि ग्रनुभाव भी सम्भवित लेने चाहिए ।[४७] १४६।।

(५) ग्रन्थ ग्रश्रु [रूप ग्रन्थभावका लक्षण करते हैं]— [सूत्र २२२]—शोक ग्रादिके कारणे उत्पन्न होनेवाले नयनजलको नाम 'ग्रश्रु' है । नेत्रोंके फड़कने ग्रौर श्राँखोंके पोंछनेकेदारा [उसका ग्रभिनय करना चाहिए] । ग्रप्राप्त शब्दसे टकटकी लगाकर देखना, ग्रानन्द, क्रोध, धुग्राँ, ग्रडचन, जम्भाई, भय, पीडा, हास्य ग्रादि विभावोंका ग्रहण होता है । नासिका स्पन्दन ग्रर्थात् उससे श्लेष्माका प्रवाहित होना । बहुवचनसे थूकने ग्रौर गद्गद स्वर ग्रादि ग्रनुभावोंका भी ग्रहण होता है ।

(६) ग्रन्थ मूच्छा [रूप ग्रन्थभावका लक्षण करते हैं]— [सूत्र २२३]—प्रहार या कोप ग्रादिके कारणे उत्पन्न इन्द्रियोंकी ग्रसमर्थता 'मूच्छा' कहलाती है । ग्रौर वह [मूर्छित व्यक्तिको] भूमिपर गिरा देने वाली होती है । १५०।। ग्रादि शब्दसे मद ग्रादि कारणोंका भी ग्रहण होता है । खल्यानि ग्रर्थात् इन्द्रियोंका ग्रसमर्थं हो जाना । उपलब्धि होनेके कारण स्वेद ग्रौर श्वास ग्रादि ग्रनुभावोंका भी ग्रहण होता है । [४७]१५०।।

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का० १५१, सू० २२४-२६ ] तृतीयो विवेक: [ ३४१

(७) ग्राथ स्वेद:—

[सूत्र २२४]—स्वेदो रोमजलस्राव: श्रमादेऽथ्यजनप्रग्रह: ।

ग्रादिशब्दाद् भय-हर्ष-लज्जा-रोग-ताप-ग्रह-दु:ख-धर्म-व्यायामादिर्वभावस्य

ग्रह: । बहुवचनाद् वाताभिलाष-स्वेदापनयनादिमिरप्यभिनेतव्य इति ।

(८) स्थैर्य वैवर्ण्यम्—

[सूत्र २२५]—छायाविकारो दैवर्ण्यं क्षेपोर्वीदृशुनिरीक्षणं: ।

छाया शोभा तस्या विकारो विरूपत्वम् । नेपथ्यरस्कार: । श्रादिशब्दात् सन्ताप-भय-क्रोध-व्याधि-शीत-श्रम-तीक्ष्णांशुकरादेर्विभावास्य

ग्रह: । बहुवचनान् नख-निस्तोदन-स्त्रीदादिभिरप्यभिनेतव्यमिति ।

[४६] १५२।

ग्रथ रसभावान्तरोहृष्टस्याभिनयस्यावसर: । स च वाचिक-ग्राह्यिक-सात्त्विक-ग्राहार्यभेदैश्चतुर्द्धा । तत्र प्रथमं वाचिकं लचयति—

[सूत्र २२६]—वाचिकोऽभिनयो वाचां यथाभावमनुक्रिया ।

वागनुकार्या प्रयोजनं हेतुरस्त्येति 'प्रयोजनम्' [हेम० ६-४-११७] इति 'इकारे'

(७) ग्रथ स्वेद [का लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २२४] —धम श्रादिके कारणे उत्पन्न होनेवाला रोमजलका ग्राव 'स्वेद' कहलाता

है । ग्रोर पलका हाथमें लेने श्रादिके द्वारा उसका ग्रभिनय किया जाता है ।

ग्रादि शब्दसे भय, हर्ष, लज्जा, रोग, सन्ताप, ग्रह, दु:ख, व्यायाम ग्रादि कारणों

[विभावों] का ग्रहण होता है । बहुवचनसे हवाकी इच्छा, पसीना पोंछना ग्रादि श्रतुभावोंके

द्वारा भी उसका ग्रभिनय किया जाता है ।

(८) ग्रथ वैवर्ण्यंता [रूप ग्रतुभावका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २२५]—रूपमान ग्रादिके कारणे उत्पन्न होनेवाला मुखकी कान्तिकका विकार

'वैवर्ण्यं' कहलाता है । इधर-उधर देखने श्रादिके द्वारा उसका प्रभिनय किया जाता है ।

छाया प्रथात् [मुखकी] शोभा । उसका विकार श्रथात् 'निगड़ जाना । क्षेप प्रथात्

तिरस्कार । श्रादि शब्दसे सन्ताप, भय, क्रोध, रोग, शीत, यकावट ग्रौर घृण ग्रादि विभावों

का ग्रहण होता है । बहुवचनसे नाखून चबाने ग्रौर लज्जा श्रादिके द्वारा भी इसका ग्रभिनय

किया जाता है यह सूचित किया है ।

[४५] १५२॥

ग्रथ रस ग्रौर भावोंके ग्रनन्तर कहे हुए प्रभिनय [के निरूपण] का ग्रवसर प्राप्त

है । वह [प्रभिनय] वाचिक, ग्राह्यिक, सात्त्विक ग्रौर ग्राहार्य [प्रथात् वेष-भूषादि रूप] चार

प्रकारको होता है । उनमेंसे सबसे पहले वाचिक [प्रभिनय] का लक्षण करते हैं—

[सूत्र २२६]—[ वक्ताके ] भावके ग्रनुसार [ उसकी ] वाणीका ग्रनुकरण वाचिक

[प्रभिनय] कहलाता है ।

ग्रनुकरण की जाने वाली वाणी [का ग्रनुकरण] जिसका 'प्रयोजन' हेतु है । वह हेम

'च्वङ्कृत' हेम ध्याकरपके 'प्रयोजनम्' इस सूत्रसे 'इकारे' प्रत्यय होकर 'वाचिक' पद बनता

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३४२ ] नाट्यदर्पणम् [ का० १४२, सू० २२६

वाचिक: । सामाजिकानामिभिमुख्येन साच्वाकारेणै नीयते प्राप्यते चार्थोऽनेनेति ब्यभि-

नय: । वाचां संस्कृत-प्राकृतादीनां सार्थिकानमनर्थिकारां वा । यथाभावं क्रोध-क्रहद्वार-

जुगुप्सा-उत्साह-विस्मय-हास-रति-भय-शोक-सुख-दुःख-मोह-लोम-माया-व्यसुया-राध्द-

डडीनां, वेपथु-स्तम्भ-रोमाञ्च-मुर्च्छा-वैवर्ण्य-प्रसादादीनां वा भावानमनतिक्रमेण ।

तथा च कवय: 'सकोध' 'सावेग' इत्यादीन्यनुकार्यै भावप्रकाशकानि क्रियाविशेषराण्यनु-

पतिबन्धनति । तैवैकैकोपकार्यस्य यथाभांवं ज्ञानवतः प्रयोगुपरत एव न वाचिकोडपिनस्य

इति । श्रानुक्रिया च वागादीनां तद्भवसायवशात् न पुनरवलस्तुतः । रामादेरनुकार्यस्य

नटेन प्रेक्केर्वो स्वयमदृष्ट्वान् । श्रानकर्तो हनुकायंदृष्ट्वान नानुकर्तुं म्लाय । प्रेक्कोडपि

चादृष्टनकार्यों नानुकर्तु रतुकर्तुं त्वमनुमन्यते । तदयं नटो रामादेश्चरितं कविनिबद्धम्-

धीतिय श्रवणान्याभ्यासवशात: स्वयं हस्तानुमन्यमानो ऽनुकारोमी इत्यध्वस्यति ।

परमार्थस्तु लोकव्यवहारसेवामनुवर्तते । प्रहश्रोडपि हि रामेऽ रुदिते रोदिति, न

तु हसति। विषयेऽपोदपि च हसति हसति, न तु रोदितीयादि ।

प्रेक्कोडपि रामादिशब्दसंकेतश्रवणादितिहासंगीतकाहितवैवश्याच्च स्वरूप-

है । [ग्राभिनिय] शब्दका निर्वाचन करते है । [ग्राभिनयत्व] ग्रंथ जिसके द्वारा सामाजिकोंको पास पहुंचाया जाता है वह [ग्रभिनेयते

इस निर्वंचनके ग्रनुसार] ग्रभिनय कहलाता है । वचनोंका अर्थात् संस्कृत ग्रथवा प्राकृत भाषा-

मय वचनोंका ग्रथवा सार्थक या ग्रनर्थक वचनोंका । [वक्ताके] मनके ग्रनुसार 'यथाभावं

ग्रर्थात् क्रोध प्रहद्वार, जुगुप्सा, उत्साह, विस्मय, हास्य, रति, भय, शोक, सुख-दुःख, मोह-लोम

माया, ग्रप्रसूया, डडां ग्रादि [ भावों ] का, तथा कम्प, स्तम्भ, रोमाञ्च, मुर्च्छा, वैवर्णय तथा

प्रसन्नता ग्रादि रूप भावोंका प्रतिक्रमरण किए बिना [ ग्रभिनय करना ] 'यथाभावमनुक्रिया'

कहलाती है । इसीलिए कविगरण 'सावेग' 'सकोध' इत्यादि ग्रानुकार्य भावके प्रकाशक पदोंका

प्रयोग करते हैं । इसीलिए एकके द्वारा कहे गएका, दूसरेके द्वारा यथोचित भावका ग्रानुकरण

किए बिना जो [प्रनुवाद करना] कथन करना है वह केवल 'ग्रनुवाद' कहलाता है उसका

वाचिक ग्रभिनय नहीं कहा जाता है । क्योंकि वाचिक ग्रभिनयमें यथाभावानुक्रिया भावोंका

ग्रानुकररण ग्रनावश्यक है । ग्रौर वाणी प्रादिकका ग्रानुकररण [यह रामका कथन है ] इस प्रकारके

निर्देशयके काररण होता है वास्तविक रूपमें नहीं । क्योंकि नटने ग्रथवा प्रेक्षकोंोंने किसोने भी

ग्रानुकार्य रामादिकों स्वयम् नहिं देखा है । [ग्रानुकरण करने वालो [नट] ग्रानुकार्य [रामादि]को

देखे बिना उसका ग्रानुकररण करनेंमें समर्थ नहीं हो सकता है । ग्रौर प्रेक्षक भी ग्रानुकार्यंको

देखे बिना ग्रानुकरण करने वालेकी ग्रानुकर्ता नहीं मान सकता है । इसीलिए यह नट कविके

द्वारा निर्दिष्ट राम प्रादिके चरित्रको पढ़कर ग्रप्रस्यन्त श्रप्रम्यासके द्वारा स्वयं देखा जैंसा मान

कर 'मैं [इस समय] उसका ग्रानुकररण कर रहा हूँ' ऐसा निश्चय करता है [इसी ग्रद्धयव-

सायके काररण उसके व्यापारको ग्रानुकररण कहा जाता है ] । वास्तवमें तो वह [रामके व्यापार

का नहीं ग्रपितु] लोक-व्यवहारका हो ग्रानुकरण करता है । क्योंकि स्वयं प्रसन्न होनेपर भी

रामके रोनेपर रोता है हँसता नहीं है । ग्रौर स्वयं दुःखो होनेपर भी [राम प्रादिके] हँसने

पर हँसता है, रोता नहीं है । इत्यादि

ग्रौर प्रेक्षक भी [ नटके विषयमें ] राम प्रादि शब्द-संकेतको समझने तथा ग्रप्रम्यासत

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देश-कालभेदेनातथाभूतेष्वप्यभिनयचतुष्ट्याच्छादनान् तथाभूतेष्वच नटेऽपु राम-दीर्घावस्यति। तत्र एवं तासु तासु सुव-दुःखरूपासु रामायवस्थासु तन्मयीभवति। व्यपरे तेषु तु नामसंकेत-संगीतकाभिनयेपु रामाध्यवसायहेतुतपु उपदेशपरमेतदिति मन्यमाना हेयोपादेय-हानोपादानैक्तानचेतसो जायन्ते। अथवा इह तावत् इत्यस्माकम्। इत्यं गति:। इत्यं जल्पितं, इत्यं क्रोधादिललितं इत्येवमरोषमपि रामादिललितं दृश्यैरपि कालदर्शिना ज्ञानेन निश्चितं कवयो नाटके निवध्नन्ति। तत्र चार्थे मुनिजनैरविश्वासान्नतस्य साध्वाद् दर्शनेपि च कदाचनमांसदशो वस्तुस्वरूपे भ्राम्यन्ति न पुनर्ज्ञानदश:। तत्र मुनिज्ञानदर्शिनं अर्थं दर्शनेनाध्यविकतामवगते वस्तुत एवानुकूल्येऽप्यो दुर्विदग्धबुद्धिभि: कर्थद्वारमपाक्रियते वराको नट:? प्रेक्षकायां तु सत्यसति च स्वदर्शने नटेऽपु रामाध्यवसाय एव। अन्यथा तु कृतिममेतदिति जानन्तो न रामादिसुख-दुःखेपू तन्मयीभवेयु:। उन्मिषन्ति च अन्यतरेऽपि श्रृङ्गारादय: कामिनो-वैरि-चौरादीन्विश्वनमभिपश्यत: पुंस: कथंस्परथा रसप्ररोहरोहितासत्र स्तम्भादयोऽनुभावा: प्रादुर्भेवन्त्युरिति मनोहर संगीतको सुनने आदिके कारणे विवश होकर, स्वरूप देश और कालका भेद होनेसे उस प्रकारके [प्रथयात् रामादि रूप] न होनेपर भी [वाचिक, आंगिक, सात्विकव तथा श्राहार्य रूप] चारों प्रकारके अभिनयोंके द्वारा [नटके] स्वरूपका प्रगटावन कर जानसे उस प्रकारके [अर्थात् रामादि रूप] बने हुये, नटोंमें रामका निश्चय कर लेते हैं। इसीलिए उस प्रकारकी सुख-दुःखमयी राम प्रादिको प्रवृत्त्याश्रयों में तन्मय-सा हो जाता है।

दूसरे लोग [यह कहते हैं कि नटमें] राम श्रादिका निश्चित कराने वाले नामके संकेत संगीत प्रोर श्रभिनय प्रादि हेतुओंके उपस्थित होनेपर यह [प्रभिनय प्रादि सब सामग्री मनोरंजनके साथ-साथ कल्पन्यकके] उपदेश देनेके लिए है ऐसा मानकर हेय तथा उपादेयके परिल्याग श्रथवा ग्रहणमें ही तत्पर हो जाते हैं। श्रथवा [तीसरा मत यह है कि राम श्रादि] ग्रनुकार्य पुरुषोंकी इस प्रकारकी श्राकृति, इस प्रकारकी गति, इस प्रकार की बात-चीत, श्रोर इस प्रकारका क्रोधादिकी चेष्टा थी। इस प्रकार रामादिके सम्पूर्ण चरित्रको ऋषियोंके त्रिकालदर्शी ज्ञानके द्वारा निश्चित करके हो कविगण नाटकमें उसकी रचना करते हैं और उसके विषयमें मुनिजनोंके द्वारा नटका [राम रूपमें वर्णन] साक्षात् [रामका हो] दर्शन है।

ग्रोर दूसरी बात यह भी है कि इन चर्म-चक्षुओंसे देखने वाले लोग भ्रांत हो सकते हैं किन्तु ज्ञान-चक्षुप्रोसे देखने वाले [मुनिगरण श्रांत] नहीं [हो सकते हैं]। इसलिए मुनियों [के सहृश कवियों] के ज्ञान द्वारा प्रदर्शित [प्रथ्य] वास्तविक देखे हुये श्रथ्यसे भी अधिक श्रद्धी तरहसे ग्रवगत श्रथ्यको वास्तविक रूपमें ग्रनुकरण करने वाले विचारे नटको श्रप्लपबुद्धि [यह ग्रनुकरणा नहीं है इस प्रकार] निराकरणा कैसे कर सकते हैं ? प्रेक्षकोंने [ग्रनुकायंकों] देखा हो या न देखा हो किन्तु उनका [रामादिका प्रभिनय करते समय] नटोंमें राम श्रादि [के स्वादात्म्य] का निश्चय होता हो है। अन्यथा यह बनावटी [राम] है इस प्रकार का ज्ञान होने-पर रामादिके सुख-दुःखोंमें तन्मयताको प्राप्त नहीं कर सकते हैं। [इस प्रकार नटमें रामादि बुद्धिको चाहे भ्रम ही क्यों न माना जाय किन्तु उससे समाजमें श्राहार्यविको प्रतीति

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३४४ ] नाट्यदर्पणम् [ का० १५२, सू० २२७

व्यथाङ्क:-

[सूत्र २२७]—कर्मङ्गोडनुकार्य चेष्टाया व्युङ्गे: शिरो-हस्त-वचः-कटी-पार्श्व-पादादिमिः, उपाङ्गै -

श्च नेत्र-भ्रू-नासाग्र-मूर्ध-कपोल-चिबुकादिभिः । साच्चादृ भावनं परोक्षस्यापि सामा-

जिकेभ्य: साच्चादिव करणस्याङ्किक: । व्युङ्गैजैनी प्रयोजनं हेतवो यस्येत्याङ्किक: । 'यथा-

भावं' इति, शत्रन्तपि स्मर्यते । तेन रामादीनुकार्यस्य ये क्रोध-उत्साह-व्यावেগ-वैमनस्य-

हर्ष-वैवर्ण्य-श्वास्यराग-श्र कुत्रादयश्चेष्टारविमिश्रा भावाः, तैरतस्युतस्य कर्मङ्गै:

साच्चादिव भावनं न तु केवलस्यैति ।

तत्रोतमाङ्गस्य कर्मपित-कम्पितादेरुपोदश

होती ही है । [क्योंकि] आंतिसे भी शृङ्गारादिकी उत्पत्ति हो सकती है । अन्यथा स्वप्नमें

कामिनी, वेश्या चोर ग्रादिको देखने वालोंके भोतर रसके श्रम सोमापर पहुंच जानेकपर [रसोंके

ग्रानुकूल] स्तम्भादि ग्रनुभाव कैसे होते हैं ?

ग्राव ग्राङ्गिक [ग्रभिनयका वरन् करते हैं]—

[ सूत्र २२७ ]—अङ्गों श्चेष्ट उपाङ्गोंके द्वारा कायोंका साक्षात्कार कराना आङ्गिक

[ ग्रभिनय कहलाता] । [प० १५२ ।

कायोंका प्रथमत ग्रनुकार्य [रामादि] की चेष्टाका । अङ्गोंके द्वारा ग्रर्थात् सिर हाथ

छाती कमर पाइब श्चेष्ट पर आदि रूप [मुख्य अङ्गों] के द्वारा । श्चेष्ट उपाङ्गों श्चर्थात् नेत्र

मोंह, पलक, श्रृङ्गार, कपोल, ठोड़ी ग्रादि [गोऐ] उपाङ्गोंके द्वारा । साक्षात् भावन श्चर्थात्

परोक्ष ग्रर्थंकी भी सामाजिकोंके लिए साक्षात्-सा बना देना । ग्राङ्गिक [ग्रभिनय कार्य] है ।

अङ्ग जिसका प्रयोजन प्रथमत हेतु वह ग्राङ्गिक [यह आङ्गिक शब्दका निर्वाचन हुग्रा] ।

इस कारिकाके पूर्वार्धमें पठित 'यथाभावनुकार्येने'से 'यथाभावं' यह भाग यहां [ग्राङ्गिकके

लक्षणमें] भी संगत होता है । इसलिए रामादि ग्रनुकार्यके जो क्रोध, उत्साह, व्यावेग, वैम-

नस्य, हर्ष, वैवर्ण्य, मुखराग श्चेष्ट कुत्रादिसे युक्त चेष्टारविमिश्रित भाव हैं उनसे समन्वित

कायोंका सा साक्षात्कारकरना [होना ग्रावश्यक है], केवल [भावानुकरण रहित कर्म] का नहीं ।

भादि श्चाद शब्द ग्रन्थकार भरत मुनिके नाट्य

इस प्रकार ग्राङ्गिक श्चभिनयका लक्षण करतेहुए श्चाद शब्द प्रन्थकार आगे प्रतिपादन करते हैं ।

शास्त्रके ग्राधारपर ग्राङ्गिक श्चभिनयोंका संक्षिप्त विवेचन करते हैं ।

भरतमुनिके नाट्यशास्त्रके ग्राठवें श्चध्यायमें इन ग्राङ्गिक श्चभिनयोंका विशेष रूपसे

वरांन किया गया है उसका संकेत करते हुए ग्रन्थकार आगे प्रतिपादन करते हैं ।

ग्रन्थकारने यहां ग्रङ्गों श्चेष्ट उपाङ्गोंके द्वारा किए जाने वाले ग्रभिनयका ग्राङ्गिक

ग्रभिनय कहा है । भरतमुनिने इन ग्रङ्गों तथा उपाङ्गोंका विभाजन निम्न प्रकार किया है—

"तत्र शिरो हस्तोः पार्श्वकटीपादत: पडङ्गानि ।

नेत्र-श्र-नासाग्र- कपोल - चिबुकन्यूपाङ्गानि ॥ ८-१४ ॥

उनमेंसे सिरके कम्पित श्चाकम्पित ग्रादि तेरह प्रकार [के ग्रभिनय होते] हैं ।

इन छः ग्रङ्गोंमें सिरके तेरह प्रकारके श्चभिनयका संकेत यहां ग्रन्थकारने किया है ।

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का० १५२, सू० २२७ ] तृतीयो विचेक: [ ३४५

हृ्टे: कान्तभयानकादय: पड्विधान् । नेत्रतारकयो: भ्रमण-वलनादयो बहव: क्रियाभेदा: समसाचर्यादयो दर्शने- प्रकाराश्च । ऋृप्टिपुटयोर्निमेपादयो बहव: । भ्रुवोरुल्लेप- पतनादय: सप्त । नासिकाया नता-मनादय: षट् । गण्डयो: चाम-

उनका उल्लेख नाट्यशास्त्र में इस प्रकार किया गया है— मुखजेऽभिनेये विप्रा नानाभावरसाश्रये । शिरस: प्रथमं कर्म गदतो मे निबोधत ॥ ८-१७ ॥ न्र्याकम्पितं कम्पितं च धुतं विधुतमेव च । परिवाहितमाधूतं श्वभ्रधूतं तथांचितम् ॥ १५ ॥ निह्हि चंतं परावृत्तमुप्लुत्य चाप्यधोगतम । ललितं चेति विज्ञेयं त्रयोदशविधं शिर: ॥ १६ ॥ हृ्टिके काम्ता, भयानका श्रादि छत्तीस प्रकार होते हैं भरतमुनिने दृ्टिके इन छत्तीस प्रकारोंके नाम निम्न प्रकार गिनाए है— कान्ता भयानका हास्या चादुसुता तथा । रौद्रा वीरा च वीभत्सा विज्ञेया रसाश्रया: ॥ ४१ ॥ स्निग्धा हृष्ट च दीना च कुढा दीप्ता भयान्विता । जुगुप्सिता विमिसिता च स्थायिभावेपु हृ्टय: ॥ ४२ ॥ शून्या च मलिना चैव श्रान्ता लज्जान्विता तथा । कुंचिता चाभिनीत च जिह्रा सललिता तथा ॥ ४३ ॥ वितर्कितार्थमुखीला विश्रान्ता विलुप्ता तथा । न्र्याकेकरा विकोशा च त्रसिता च मदिरा तथा ॥ ४४ ॥ पड्विधाशु टष्टयो ये तास्तासु नाट्यं प्रतिष्ठितम् । नेत्र प्रो र तारकोंके भ्रमणे, वलन श्रादि बहुतसे क्रियाभेद होते हैं । सम प्रो र वक्र [साची] श्रादि दर्शनके प्रकार हैं

इस सम प्रोदि दर्शन प्रकारों का वर्णन करते हुए भरतमुनिने लिखा है— स्थात्रैव प्रवर्तव्यामि प्रकारान् दर्शयस्य तु । सर्म साच्चनुगृदृते च ह्यालोकित-विलोकिते । प्रलोकितोल्लोकिते चाप्यवलोकितमेव च ॥ १०६ ॥ ८ ॥ [प्रक्ष] नेत्रपुटोंके उन्मेप, निमेप श्रादि बहुतसे भेद होते हैं । भरतमुनि ने इन नेत्रपुटोंके श्रभिनय-भेदोंका निरूपण निम्न प्रकार किया है— तारागतोडनुगतं पुटकर्म निवोधत । उन्मेषश्च निमेषश्च प्रस्तुतं कुञ्चितं सर्म । विवर्तितं सर्मपिरितं पिहितं सविताडितम् ॥ भौंहोंको उठाना- गिराना श्रादि सात [प्रभिनय प्रकार होते हैं]। नासिकाके नता, मुख श्रादि छ: । होठोंके कडन, वलन श्रादि बहुतसे [प्रभिनय प्रकार होते हैं] । गालोंके

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३४६ ] नाट्यदर्पणम् [ काः १४२, सू० २२७

फुल्लादयः पठ्‌ । श्राधरस्य विवर्तन-कम्पादयः पठ्‌ । चिबुकस्य कुड्‌न-खण्डनादयो बहवः । श्रीवायाः समा-नतादयो नव । हस्तयोः पताक-त्रिपताकादयश्चत्वुःपष्टिः । वक्षसि श्रासनुन्नि-ग्नादयः पञ्च । पार्श्वयोर्नत-समुन्ततादयः पञ्च । उदरस्य त्वाम-खल्ल-पूर्णलक्षणादयः । कत्पारिलक्षणानि-नतादयः पञ्च । जङ्घयोरेर्वर्तित-नतादयः पञ्च । पादयोः रुचकिट-समादयः पठ्‌ । तथैकपादप्रचार-पञ्च । जङ्घयोरेव स्थितौ चोद्यौः शोभश । श्वसनिक्रान्त-श्वपक्रांतादयः शोभश । रूपाणि समपादा-स्थित्योवर्तिकादयः मोद्यः शोभश ।

ग्राकाशिकयशच 'चार्यः' । स्थिरहस्त-पर्यस्तकादयो ग्रज्ञ्हाराः द्वात्रिशन्‌ ।

पिचक जाना, या फूल जाना ग्रादि छः; ग्रधरके फड़कना, काँपना ग्रादि छः, थोड़ीके कुड्‌न, खण्डन ग्रादि बहुलसे [प्रभिनय प्रकार होते हैं] । गर्दनके समा, नता ग्रादि नौ, हाथोंके पताका, त्रिपताकादि ६४ प्रकार होते हैं ।

लपेटना ग्रादि पांच, जङ्घाग्रोंके ग्रावर्त्तन नत ग्रादि पांच [प्रभिनय प्रकार होते हैं] । पंरोंके उरुग्रहित, समपाद ग्रावि छः [प्रभिनय प्रकार होते हैं] । श्रोणि एक पैरसे चलने रूप समपाद, स्थित, ग्रार्वर्तित ग्रादि सोलह प्रकारकी भूमिपर की जाने वाली 'चारी' तथा श्वसनिक्रांत ग्रप्रकांत ग्रादि सोलह प्रकारकी ग्राकाशीय 'चारो' एवं स्थिर हस्त पर्यस्तक ग्रादि बत्तीस ग्रप्रक्रांत ग्रादि सोलह प्रकारके ग्रज्ञ्हार [ये सब प्राङ्गिक प्रभिनयके ग्रन्तर्गत ग्राते हैं] ।

इसमें प्रय्यकारने जिन 'चारी', 'ग्रज्ञ्हार' ग्रादि प्राङ्गिक प्रभिनय भेदोंका उल्लेख किया है उनका वर्णन नाट्यशास्त्रके दशम श्रध्यायमें विस्तारपूर्वक दिया गया है । उसमें 'चारी'का लक्षण निम्न प्रकार किया है—

एकः पादप्रचारो यः स चारोत्यभिसंज्ञितः । द्विपादक्रमयो यत्नु करणं नाम तद्‌वचत्‌ ॥ १०-३ ॥

प्रथवा एक पैरकेद्वारा चलनेका नाम 'चारी' श्रोदर दोनों पैरोंसे परिक्रमण करनेको 'करण' कहते हैं । नाटकमें 'चारी'के महत्त्वका प्रतिपादन करते हुए भरतमुनिने लिखा है—

चारोभिः प्रस्तुतं नृत्यं चारोभिरवेष्टितं तथा । चारोभिः शून्यमुत्सृष्टं च कीर्तितः ॥ ५ ॥

यदेतत्‌ प्रस्तुतं नाट्यं तच्चारोभिरेव संस्थितम्‌ । न हि चार्यों विना किंचिद्‌ग्रङ्गं सम्भव्रवर्तते ॥ ६ ॥

नाट्यमें चारीके महत्त्वका प्रतिपादन करनेके बाद भरतमुनिने श्रङ्ग सोलह प्रकारकी भूमि ग्रौर ग्राकाशिकी चारियोंके नाम गिनाकर उनके लक्षण विस्तारपूर्वंक दिखलाए हैं । इन सबको देखना चाहें तो नाट्यशास्त्रके दशम श्रध्यायमें देखना चाहिए । यहाँ ग्रन्थकारने उनके नामोंका संकेतमात्र किया है । वे नाम निम्न प्रकार गिनाए गए हैं—

समपादा स्थितावस्था शकटाक्ष्या तथैव च । ग्रध्यर्धिका चाषमात्रीच्चैव तथा परा ॥ ८ ॥

एडकाक्रीडिता बद्धा उरुद्वृत्ता तथांकिता । उत्प्लुताश्च जनितास्ता स्वप्निदिता चापसृतिदिता ॥ ९ ॥

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काङ १४२, सू० २२७ ] तृतीयो विवेक: [ ३४७

तलपुष्प पुटरवर्तितादीनि करष्यान्यष्ठोत्तरं शतमित्यादि: सर्वोऽपि चेष्टाविषयो

ऋज्वोपाश्रप्रभवत्वाद्-श्राङ्क एवाभिनय: गतयोडप्येवम् । तत्रोत्तम-मध्यम-नीचानां क्रमेण धीरा मध्यमा द्रुता च

सामान्येन गति: । विशेषस्तु वृद्ध-व्याधित-व्धित-श्रांत-तप:क्लांत-नुभित-सावहिल्य-शोक-शृङ्गारान्वित-स्वच्छन्दादीनां मन्थरा । हर्ष-श्रावेग-कुतूहल-भय-श्रौत्सुक्यादि-मतां त्वरिता । प्रच्छन्नत्कामुक-वैरि-चौर-रौद्रसच्वादिर्शोभितादीनां निःशब्दपदसंच्चारा

उन्मार्गो दिगवलोकनवती च । शीत-वर्षादितयो: कम्पमाना सम्पीडिताङ्गा । धर्मार्थस्य

स्वेदापनयनना श्रायावलोकनवती । प्रहारार्त-स्थूलयोरड्करषण-श्वासवती स्थिरा च ।

यातन्नां नेत्रचापल्य-पुरतो युगमात्रनिरोक्षणवती । उन्मत्त-मत्तयोरविच्छिन्ननेत्रा स्वालित्ता

समुत्सारितमत्तली मत्तली चेति षोडश । एता भूम्य: स्मृताश्चार्य: नृगुणताकाशिकी: पुनः ॥ १० ॥

इन सोलह भौमी चारियोंके नाम गिनानेके बाद भरतमुनिने सोलह प्रकारकी श्राकाशि-

चारीयोंके नाम दिए हैं जो निम्न प्रकार हैं—

वातिकांतां द्वापकांतां तथैव च । उद्ध्वजानुश्च रुचिरा च तथा नूपुरपादिका ॥ ११ ॥

डोलापादा तथापि श्राविद्धोद्वृत्तमंज्ञिते ।

विधुद्रुभांता वलाता च भुजंगत्रासिता तथा ॥ १२ ॥

मृगप्लुता च दरडा च भ्रमरी चेति षोडश ।

श्राकाशिक्य: स्मृता ह्यतो लच्यांश्च निवोधत ॥ १३ ॥

तलपुष्प पुटरवर्तिता श्रादि एक सौ श्राठ प्रकारके करण होते हैं [द्विपदक्रमसं यत्तु

करणां नाम तद् भवेत्] इस प्रकार वेष्टाका सारा ही विषय श्रङ्गों श्रोद उपाङ्गोंके द्वारा होने

वाला होनेके कारण श्राङ्गिक ग्रभिनय कहलाता है ।

इसी प्रकार गतियां भी [ग्राङ्गिक ग्रभिनयके भीतर हो श्राती हैं । भरतमुनिने बारहवें

प्रध्यायमें गतिप्रचारका विस्तार-पूर्र्वक वर्र्णन किया है । उसके श्राधारपर गतियोंका संक्षिप्त

विवररण ग्रंथकार यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं । उन्मेंसे उत्तम, मध्यम तथा श्रधम पात्रोंकी

साधारणतः क्रमशः धीरा, मध्यमा तथा द्रुता गति होती है । विशेष हपसे रोगी, वृद्ध, भूखे,

थके हुए, तपसे क्षीण हुए, श्रमित, श्राकार-नोपनमें लगे हुए [सावहिल्य] शोकयुक्त या भृङ्गार

युक्त प्रौद स्वच्छन्दादिकी गति मन्थर होती है । हर्ष, श्रावेग, कौतूहल, भय, श्रोत्सुक्य श्रादिसे

युक्त व्यक्तियोंकी गति तेज़ [स्वरिता] होती है । प्रच्छन्न-कामुक, वैरी, चोर श्रोद भयानक

प्राप्तियोंसे डरे हुए ग्रादि व्यक्तियोंकी धीरे-धीरे, श्रावाज न होने पावे इस प्रकार पैर रखते

हुए, रास्ता छोड़कर श्रोद चारों श्रोर देखते हुए चलनेवाली गति होती है । जाड़े तथा वर्षासे

पीड़ितोंकी गति काँपते हुए श्रोद झुर्रीरको सिकोड़ते हुए होती है । धूपसे संतप्त व्यक्तिकी

पसीना पोंछते हुए श्रोद छायाकी खोज करते हुए गति होती है । प्रहारसे श्रोतं श्रोद मोटे

प्राणियोंकी ग्रपने शरीरको खींचते हुएसी हाँफते हुए युक्त प्रौद स्थिर गति होती है ।

सासुग्रोंकी गति नेत्रोंकी चपलतासे रहित श्रोद सामनेकी श्रोद थोड़ी दूर तक देखने वाली होती

है । पागल श्रोद मत्तपान किए हुए व्यक्तियोंकी गति प्रांकें चढ़ाए हुए श्रोद लङ्खड़ाते हुए,

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च। विदूषकस्य हासमवद्रेक्ष्यपती। जले पादविकर्षवती, पतनं झठर-शय-काया-बाहुभ्यां जलविपाटनवती च। जलहियमाॅस्य विसंस्थुलाझ-केश-वसनवती। धनध-अन्धकारगतयोः श्राकृष्यमाॅगमन्दपदा पुरःप्रसारितविलोलहस्ता च। श्रोरोहिणी उर्ध्वावलोकनपरा, विपरीता त्वररोहिणी। श्राकाशे समभ्यां पादाभ्यां, वाहने:, पक्ष-श्र्यां वा। श्राकाशान्यतो विसंस्थुलांगकेश-च्शुका। इत्याद्यनेको गतिप्रकार इति।

तथा रूपस्य शिरसि हस्ता कृत्रा। चिकीर्षया चालनानिमित्तम् श्रप्रे क्षिप्याभ्यां शब्दस्य शिरसा पार्श्ववनेनत्, स्पर्शस्य नेत्राकुब्जनेनत्, रस-गन्धयोश्चै कोच्छ्वासेनाभिनयः। सर्वौडिपि चामिनय इष्टो, मध्योऽनिष्टश्चैति त्रिपकारः। तत्रेष्टः सौमुख्य-पुलक-गात्र-नेत्रविकासादिना क्रियते। मध्ययो माध्यस्थ्येन। श्रनिष्टः शिरःपरावर्तन-नेत्र-नासाविकोर्णनादिति। चतुर्विधश्चात्र मुखराग:, प्रसन्नः, स्वाभाविको, रक्तः, श्यामश्चैति रसौचित्यानतिक्रमेण भवति। यदपि सर्वशरीरसाध्यं भूपातादिकं तदप्याझिक एवं। श्रझ्झोपाझरूपत्वाच्छरीररस्मयेतिति॥५०॥१४२॥

अथ सात्विक:— [सूत्र २२७]—सात्विक: स्वरभेदैरतुभावस्य दर्शनम्।

जितेन्द्रियकी गति ग्रस्तब्ध वातोंको देखते हुए होती है। पानीमें, पंरोंको घसोटते हुए, तैरते समय पेट, हाथ, शरीर तथा बाहुभोंसे जलको चीरते हुए, श्रोर जलमें बहते हुएकी प्रसत-व्यस्त हस्त-पैर, केश तथा वस्त्रोंसे युक्त गति होती है। ग्रन्थों श्रोर ग्रन्थकारमें चलने वालों की घीरे-धीरे पंरोंको खचेड़ते हुए ग्रोर प्रागेकी श्रोर फंले हुए हाथको हिलाते हुए [ गति होती है]। ऊपर चढ़ते समय ऊपरकी श्रोर देखते हुए और उतरते समय उसके विपरीत होती है]। [प्रर्थात् नीचेकी श्रोर देखते हुए गति होती है]। श्राकाशमें दोनों पंर एकसे किए [प्रथवा वाहनोंके द्वरा श्रथवा पंखोंके द्वारा [गति होती है]। ग्राकाशको छोड़कर ग्रन्यत्र प्रसत-व्यस्त केश वस्त्रादिसे युक्त ग्रनेक प्रकारका गमनविषय कहा गया है।

ग्रोर रूप [के दर्शन] का [ग्रभिनय] सिरके ऊपर हाथ रखकर तनिक सिर हिलाते हुए टकटकको लगाकर देखते हुए नेत्रों:, शब्द [के श्रवणे] का [प्रभिनय] एक श्रोरको हुए श्राकर मुननेसे, विशेष प्रकारके स्‍पर्शका [प्रभिनय] ग्रालिङ्गन कर लेनेसे, ग्रोर रस तथा गन्धका एक लम्बी साँस लेनेके द्वारा होता है। सभी श्रभिनय इष्ट, मध्यम तथा श्रनिष्ट तीन प्रकारका होता है। उनमेंसे इष्ट प्रभिनय मनकी प्रसन्नता, शरीरौके रोमाञ्च तथा नेत्रोंके विकास ग्रादिके द्वारा [प्रदर्शित] किया जाता है। मध्य ग्रभिनय मध्‍यमस्थताके द्वारा [प्रदर्शित] किया जाता है। माध्य [प्रभिनय] मध्‍मस्‍थताके द्वारा ग्रोर नेत्र एवं नाकके सिकुड़नेके द्वारा किया जाता है। इस प्रभिनयमें प्रसन्न, स्वाभाविक रकत, लाल तथा काला चार प्रकारका मुखराग जाता है। इस प्रभिनयमें प्रसन्न, स्वाभाविक रक्त, लाल तथा काला चार प्रकारका मुखराग होता है। जो रसके ग्रौचित्यके ग्रनुसार होता है। ग्रोर वृक्षवीपर गिर पड़ना ग्रादि जो सारे शरीरसे साध्य व्यापार है वह भी श्राझिक प्रभिनयके ग्रन्तर्गत ही होता है॥ [प० १४२ ॥

ग्रथ सात्विक [प्रर्थात् मानसिक प्रभिनयका वर्णन करते हैं]—[सूत्र २२८]—स्वरभेदादि अनुभावोंका प्रदर्शन सात्विक [प्रभिनय] कहलाता है।

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काः १५३, सू० २२५ ] तृतीयो विवेकः [ ३४५

श्रवहितं मनः सत्त्वं, तत् प्रयोजनं हेतुरस्येति सात्विकः । मनोनिबधाने हि न शक्यन्ते एव स्वरभेदादयो नटेन दर्शयितुम् । श्रादिशब्दाद् वेपथु-स्तम्भ-रोमाञ्च-मूर्छन-स्वेद-वैवर्ण्य-वैश्रु-निःश्वासोच्छ्वास-वास-सन्ताप-शैत्य-जृम्भा-काश्यं -मेदुरत्व-उल्लुक-सन-श्रवहस्थ-सावधानता-लालाल-फेनमोच-गात्रसम्बोध-हिक्कादिग्रेहः । नायर्मभिनयो वाचिकः, शब्दानुकारात् । नाट्यालिकः, श्रज्ञानुप्रासाद्य-स्पष्टचेष्टाया भावावार्दिति । स्वरभेदानुभावप्रदर्शनं रसेऽत्तम-मध्यम-श्रधमप्रकृत्यानौचित्यानुसारतो दृष्टव्य-मिति ॥

[सूत्र २२६]—वर्गाद्यन्तु क्रियाश्रहार्यो बाह्यवस्तुनिमित्तकः ।

[५१] १५३ । वर्णाः श्वेतादिः । श्रादिशब्दाद् रस-गन्ध-वेश-श्राकल्प-श्रायुध-वाहन-श्रज्ञानाधिक्य-दश-नदी-नगर-वन-पक्षि-द्वीपद-चतुष्पद-ग्रपद-प्रासाद-पर्वतादिग्रेहः । बाह्यं शरीरचयति-रिक्तं भस्म-धातु-जतु-राग-हरिताल-मश्री मुक्तिका-वस्त्र वेगु-दलादिक निमित्तमस्येति । वाचिकादयस्तु शरीरनिमित्ता इति भेदः । श्रयं च देश-काल-कुल-प्रकृति-दशा-स्त्रीत्व-एकत्वाद् मनकानां सत्त्वं हेतु है वह सात्विक [प्रभिनय] होता है । मनको स्थिरता हो होनेपर नट स्वरभेदादिका प्रदर्शन नहीं कर सकता है [इसलिए स्वरभेदादि श्रनुभावोंका प्रदर्शन सात्विक प्रभिनय कहलाता है] । श्रादि शब्दसे कम्पन, स्तम्भ, रोमाञ्च, मूर्छा, स्वेद, विवरांता, ग्रांसू, नि:श्वास, उच्च्छ्वास, सन्ताप, शैत्य, जम्भाई, कुशता, स्थूलता, उल्लुकसन, श्राकाग्योपन [प्रवहिस्थ] सावधानता, लाल गिराना या फेन गिराना, शरीरका विधिल कर देना प्रोद हिक्ककी श्रादिका प्रहार्य होता है । इन सबका यह श्रभिनय शब्दानुकारे रूप होनसे वाचिक नहीं कहा जा सकता है प्रोद अंगों श्रथवा उपांगोंसे साध्य स्पष्ट चेष्टा रूप होनसे श्रांगिक भी नहीं कहा जा सकता है । [इसलिए यह तीसरे प्रकारका सात्विक श्रभिनय कहलाता है ।] स्वरभेद श्रादि श्रनुभावोंका प्रदर्शन रस तथा उत्तम मध्यम श्रधम श्रादि प्रकृतियोंके श्रौचित्यके श्रनुसार किया जाना चाहिए । श्रादि [वेश-भूषादिसे साध्य चौथे प्रकारहे] श्रादि [ग्रभिनयका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २२६]—बाह्य वस्त्रुग्रोंके द्वारा किया जाने वाला वर्ण श्रादिका श्रनुकरश्राहार्य [श्रभिनय कहलाता] है । [५१] १५३ ।

वर्णं श्राद्यन्त् इवेतादि । श्रादि शब्दसे रस, गन्ध, वेश [श्राकल्प] वस्र्र, वाहन, श्रंगोंकी श्रधिकता, देश, नदी, नगर, वनपक्षी, द्वीपद, चतुष्पद, पदरहित [सर्प श्रादि] प्रासाद प्रोद पर्वंत श्रादिका प्रहार्य होता है । बाह्यं श्रथार्त् शरीरसे भिन्न भस्म धातु लाल श्रादिका राग, हरिताल, स्याही, मिट्टी, वस्र्र, बाँसुरी प्रोद पत्त्रादि जिसके निमित्त श्रथार्त् प्रयोजक हैं [वह सब श्राहार्य श्रभिनय कहलाता है] । श्रोर वाचिक श्रादि [पहले कहे हुए तीनों प्रकारके श्रभिनय] तो शरीर निमित्त होते हैं यह [उन तीनोंसे इस श्राहार्यं श्रभिनय] का भेद है । देश, काल, प्रकृति, दशा, स्त्रीत्व, पुंस्त्व, श्रणत्व श्रादिके प्रोदचित्यके श्रनुसार इस [श्राहार्य प्रभिनय]को करना चाहिए ।

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पुस्त्व-पठत्वादौचित्यनुसारतो विधेय इति ।

यस्तु पञ्चमश्रिचित्राभिनयः प्रोक्तः सोऽङ्यादिकर्मविशेषरूपत्वादांगिक

एवांतरर्भवति ।

व्यभिचारिद्रय-त्रय-चतुष्टयसन्निपातरूपः सामान्याभिनयः पुनर्वाचिकादिलक्षणे-

नैव चरितार्थ इति ॥ [५१] १४३ ॥

इति श्रीरामचन्द्र-गुणचन्द्रनिरिजिताभ्यां स्वोपज्ञनाट्यदर्पणविवृतौ

वृत्ति-रस-भाव-अभिनयविचारस्तुत्यीयो विवेकः ॥ ३ ॥

श्रोर जो पांचवें प्रकारका चिताभिनय [नाट्यशास्त्रमें] कहा गया है वह भी अङ्गों

तथा उपांगोंके विशेष कर्म-रूप होनेसे आंगिक प्रभिनयके भीतर ही आ जाता है ।

बो, तीन या चार प्रभिनयोंका सन्निपात रूप जो सामान्याभिनय [नाट्यशास्त्रमें]

कहा गया है वह भी वाचिक श्रादिके लक्षणोंके ग्रंथरंतर्गत ही हो जाता है ॥[५१]१४३ ॥

श्री रामचन्द्र-गुणचन्द्र विरचित स्वनिर्मित नाट्यदर्पणकी विवृत्तिमें

वृत्ति-रस-भाव-अभिनय-विचार नामक

तृतीय विवेक समाप्त हुआ ॥३॥

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ग्रथ चतुर्थो विवेक:

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अथ चतुर्थो विवेकः

व्रतः परं सर्वरूपकोपयोगि किश्चिदुच्यते—

[सूत्र २३०]—देव-भूप-सभा-भर्तृ मुख्यानां मङ्गलाभिधा ।

नित्या रूपमुखे नान्दी पदेः षड्भिरथाष्टभिः ॥ [१] १५४ ॥

'मुख्य' ब्रह्माणं सरस्वती-कविग्रहप्रवृत्तीनामुपलक्ष्यणार्थम् । 'मङ्गलाभिधा' सदृद्गुणोत्कीर्तनं, श्राशीर्‌वचनं वा । 'नित्या' एवंविधरूपैव । य्यपरेषां तु पाठ्यानामुत्थापनादीनां पूर्वरङ्गाझ्ञां प्रयogवशादन्यथाव्‌मपि भवति । श्रवश्यम्भावाद्वा नित्यत्वम् । शेषाणां हि रङ्गाझ्ञां नावश्यम्भावः । श्रहरहः प्रयोज्यत्वाद्वा नित्यत्वम् । यावद् रूपकस्याभिनयरतावदेशा नान्दी प्रयोक्तव्या । 'रूपकस्य' नाटकादेः; 'मुखे' प्रारम्भे, नान्दी । प्रयोगस्थानकथनमेतत् । नान्दीतवं च मङ्गलाभिधयाप्रत्यूहापसारणेन समृद्धिजनकत्वात् । 'पदेः' वाक्याझ्ञाने । केचितु पूवें वाक्यापेच्चयावानन्तरवाक्यनि 'पदानि' इत्याहुः । तथा च भरतमुनिरनु नान्दीं पठति--

अथ नाट्यदर्पणादिप्रोक्कान् चतुर्थो विवेकः

अ्रब सब प्रकारके रूपकोंमें उपयोगी कुछ बातें कहते हैं—

[सूत्र २३०]—देवताद्रोंकि, राजाकी, सभाकी तथा स्वामी ग्रादिकी मंगल-कामना

रूप, छः पदोंसे युक्त ग्रथवा ग्राठ पदोंसे युक्त 'नान्दी' प्रत्येक रूपकके ग्रारम्भमें नित्य हो

करनी चाहिए । [१] १५४ ।

'मुख्य' पदका ग्रहण सरस्वती ग्रौर कवि प्रादिकी उपलक्षण है । 'मंगलाभिधा' ग्रर्थात् सद्गुणोंका कथन करना, अथवा ग्राशीर्वचन । 'नित्या' ग्रर्थात् (१) सदा इसो प्रकारकी [मंगलाभिधा रूप] होनी चाहिए । पूर्वरङ्गके, पदे जाने वाले 'उत्थापन' ग्रादि ग्रन्य

अंगोंमें तो प्रयोगके भेदसे परिवर्तन भी हो जाता है । [किन्तु नान्दीका सभी रूपकोंमें एक हो

स्वरूप रहता है । यह 'नित्या' पदका ग्राभिप्राय है ।] (२) ग्रथवा [सब रूपकोंमें नान्दीका]

ग्रवश्यम्भाव होनेसे नित्यत्व कहा है । रंगके ग्रन्य अंगोंका होना ग्रावश्यक नहीं है । ग्रथवा

(३) प्रतिदिन प्रयोग किए जानेके कारण नान्दीका नित्यत्व कहा है । जब तक रूपकोंका

ग्राभनय रहेगा तब तक इस नान्दीका प्रयोग किया जाना चाहिए । [यह 'नित्या' पदका

ग्राभिप्राय है ।] 'रूपक' ग्रर्थात् नाटकादिके 'मुख' ग्रर्थात् प्रारम्भमें नान्दी होती है । यह प्रयोगके

स्थानका कथन किया गया है । विद्वानोंके विनाशद्वारा समृद्धिजनक होनेके कारण मंगल-कामना

मंगलाचरणको 'नान्दी' कहा गया है । 'पद' ग्रर्थात् वाक्यके ग्रङ्ग । कुछ लोग पूर्ण वाक्यको

हुष्टिसे ग्रवान्तर खण्ड-वाक्योंको 'पद' कहते हैं । जैसेकि [प्रवान्तर खण्ड वाक्योंको पद मानकर]

भरतमुनिने [नाट्यशास्त्र ५०,११०-११३ में] इस प्रकार नान्दीका पाठ विखलाया है ।

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"नमोडस्तु सर्वदेवेभ्यो द्विजातिभ्यश्च वै नमः । जितं सोमेन वै राज्ञा शिवं गो-ब्राह्मणाय च ॥ ब्रह्मोत्तरं तथैवस्तु हतां ब्रह्मादिपस्तथा । प्रशास्तिवमां महाराजः पृथिवीं च ससागराम् ॥ राष्ट्रं प्रवर्धतां चैव रङ्गस्याशा समुद्यतु । प्रचाकतुमहं धमो भवतु ब्रह्माप्सितम् ॥ काव्यकतु यशश्चापि धर्मश्चापि प्रवर्धताम् । इज्यया चानया नित्यं प्रीयन्तां देवता इति ॥"

ना० ग्र० ५, ११०-११३ ॥ श्रथ द्वादशवातराशिवोक्त्यानि । षड्भिरिति न्यस्तं, षड्राशिभिरिति चतुरशं रङ्गमपद्य मध्यमस्थानानां निर्देशः। न्यस्तरङ्के चोत्तमा द्वादशभिः, श्रधमा त्रिभिः पदै-र्नान्दी । चतुरङ्करङ्के पुनरुत्तमा षोडशभिः, श्रधमा चतुर्भिरिति । नान्दी च पूर्वरङ्ग-ज्ञानाॅ द्वादश मझँ सकलपूर्वरङ्गज्ञोंपलचिका । तेन 'नान्ध्यन्ते सूत्रधारः' इत्यस्य । सकल-पूर्वरङ्गानि तु केषाञ्चिल्लोकप्रसिद्धत्वान्, केषाञ्चिल्लिङ्गफलबान्, केपाञ्चिदनवश्यम्भा-वित्वाच न लच्यन्ते । नान्दी त्ववश्यम्भावित्वात्, मंगलाभिधानपूर्वकत्वाच्च शुभ- समस्त देवताभोंको श्रोत्र द्विजातियोंको हमारा नमस्कार है । सोम रुप राजा [पृथ्वी- प्रकाशमान बनद्रमां] को विजय हो तथा गौत्रों एवं ब्राह्मणोंका कल्याण हो । इसो प्रकार ब्राह्मणोंकी वृद्धि यह ब्रह्मविद्याकी वृद्धि हो । तथा ब्रह्मद्रो वियोंका विनाश हो । श्रोत्र महाराज सागरों सहित इस पृथिवीको शासन करें । rाटककी समृद्धि हो श्रोत्र रङ्गशालाओंोंकी ब्राहा पूर्ण हो । नाट्यकी व्यवस्था कराने वाले [राजा प्रादि] को महान् यशकी प्राप्ति हो श्रोत्र [उनके द्वारा] वेदोंका पाठ होता रहे । तथा काव्यकी रचना करने वाले [कवियों] को यशाकी प्राप्ति हो, उनके धर्मकी सदा वृद्धि होतो रहे । तथा इस यज्ञके द्वारा सदेव देवगण प्रसन्न होते रहें । इसमें 'प्राश्चार्वात्मक वारह' प्रवान्तर वाच्य हैं । [कारिकामें] 'वडूभिः' इस पद्से त्रिभुजात्मक रंगको लक्ष्यमें रखकर मध्यम नान्दीका निर्देश किया गया है श्रोत्र 'ग्राथभिः' पद्से चतुरस्र मण्डपको ध्यानमें रखकर मध्यम नान्दीका निदश किया गया है । त्रिभुजात्मक मण्डपमें उत्तम नान्दी बारह पदोंकी [मध्यम ६ पदोंकी] श्रोत्र ग्राथम [नान्दी] तीन पदोंकी होती है । श्रोत्र चतुरस्र मण्डपमें उत्तम [नान्वी] सोलह पदोंकी [मध्यम श्राठ पदोंकी] तथा ग्राथम [नान्दी] चार पदोंकी होती है । नान्दी, पूर्वरङ्गके श्रङ्गोंमें बारहवाँ अङ्ग है श्रोत्र यहां वह पूर्वरङ्गके सारे श्रङ्गोंकी उपलचका रुप है । इसीलिए 'नान्ध्यन्ते सूत्रधारः । [यह जो नाटकोंमें लिखा जाता है] इसकी भी उपलचिका । [पूर्वरङ्गके श्रङ्गोंमेंसे] कुछ लोक-प्रसिद्ध होनेसे, कुछके निष्फल होनेसे श्रोत्र किन्हींके श्रावश्यक न होनेसे पूर्वरङ्गके समस्त श्रङ्गोंका लचण्रा हमने यहां नहीं किया है । नान्दीका होना तो श्रावश्यक है इसलिए, श्रोत्र प्रत्येक शुभ कार्यके प्रारसभमें मंगलाचरण करना ही चाहिये, इसलिए नान्दीका लचण किया है । इसीलिए [अर्थात् प्रत्येक शुभकायर्के प्रारसमें मंगलाचरणके श्रावश्यक होनेके कारण जो लोग नान्दीको नाटकका श्रङ्ग नहीं मानते हैं वे] कविगण [भी] नाटक श्रारसमें नान्ध्यन्ते सूत्रधारः ।

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काङ् १४४, सू० २३१ ] चतुर्थो विवेक: [ ३६४

कृत्यारम्भस्येति लचिता। अत एव कवयो रूपकारम्भे 'नान्द्यन्ते सूत्रधार:' इति पठन्ति। यत्र तु कविकृता नान्दी न हश्यते तत्रापि रङ्कसूत्रधारकृतैव कृता दृश्यते। नान्दी-पाठकाश्च सूत्रधार-स्थापक-पारिपाश्विकाः इति ॥ १४४ ॥

[सूत्र २३१]—प्रवेश-निष्क्रमाक्षेप-प्रसादान्तरसङ्कतम् । चित्रार्थं रूपकं गेयं पञ्चधा स्यात् कविभ्रुवा ॥ [२] १५५ ॥

'रूपकं कविभ्रुवा' इति सम्बन्धः। प्रविशतः पात्रस्य रस-भाव-प्रकृति-ग्रावस्था-दिकं प्रवेशशब्देनोच्यते। तदनुसारेण श्लेष-समासोक्त्यादिकृतं यद् रूपकं गीयते सा, 'प्रवेश:' प्रयोजनमस्या इति 'एकङ्ग:' प्रावेशिकी। (१) यथा ग्रनगराघवे—

(क)—'दिग्वायकरिगङ्कुचेरो पियायरो को वि जीवोयस्स । कमलमउलंकवालि-कर-मुहुत्त-कडहडावियडहो ॥

[पर्यातु नान्दी सम्पादनके बाद सूत्रधार प्रवृष्ट होता है] इस प्रकार लिखते हैं [भास श्रादि के नाटकमें] जहाँ कवि द्वारा की गई नान्दी उपलब्ध नहीं होती है वहाँ भी रंगकी श्रव्यवस्था करमने वाले सूत्रधारकी श्रोरेसे की गई नान्दी समझ लेनी चाहिए। नान्दी-पाठ करने वाले सूत्रधार, स्थापक तथा पारिपाश्विक ये तीन होते हैं ॥ [१] १४४ ॥

[कारिकामें] 'रूपकं कविभ्रुवा' इस प्रकारका ग्रन्थय करना चाहिए। [रूपकं श्रर्थात् गेय पदोंको 'ध्रुवा' कहते हैं यह ग्राभ्रिप्राय है] उसका प्रयोजन पात्रोंका प्रवेश निष्क्रमण श्रादि पाँच प्रकारका होता है इसलिए 'ध्रुवा' भी पाँच प्रकारकी कही गई है। उनमेंसे पहले पात्रोंके प्रवेशसे सम्बद्ध प्रावेशिकी 'ध्रुवा' दिखलाते हैं] श्रागे प्रवृष्ट होने वाले पात्रके रस, भाव, प्रकृति, प्रवस्था श्रादिको यहाँ 'प्रवेश' शब्दसे कहा गया है। उसके श्रनुसार श्लेष समासोक्त प्रादिके द्वारा जिस [रूपक अर्थात् गेय पदका गान किया जाता है वह प्रवेश जिसका प्रयोजन है] 'एकङ्ग-प्रयत्न करने पर' प्रावेशिकी [पद सिद्ध होता है]।

(१) प्रावेशिकी ध्रुवा—[प्रवेशिकी ध्रुवाका उदाहरण] जैसे ग्रनगराघवमें—

(क) सूर्यदेवकका किरगण समुदाय जो कमल-कलिकाग्रोंकी गोदमें भौरोंका श्राकर्षण करनेमें विदग्ध है, समस्त जीवोंकेलिए कुछ ग्रानन्ददायक है।

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३६६ ] नाट्यदर्पणम् [ का० १५३, सू० २३१

[दिनकरकरिप्रसोत्करः प्रियकरः कोडपि जीव लोकस्य । कमलमुकुलांकपालीकृतमधुकरकर्र्याविदग्धः ॥ इति संस्कृतम ]" इयं स्वाश्रमरचनार्थं रामाकर्षण्यागारच्छलो विश्वामित्रस्य द्वादित्योदयवर्गानन्वयाजेन प्रवेशासूचिका ।

(ख) यथा वा देवीचन्द्रगुप्ते पञ्चमेऽङ्के— "पसो सियकरवित्थरपरिणामसियासेसवेरितिमिरोहो । नियविहवरेस चन्दो गयगं गाहं लन्धितं विसइ ॥ [ एष सितकरविस्तरप्रणाशितशेषवेरितिमिरौषः । निजविभववरेण चन्द्रो गगनं ग्राहं लन्धितुं विशति ॥ इति संस्कृतम ]" इयं स्वापायशङ्किनः कृतकोनमत्तस्य कुमारचन्द्रगुप्तस्य चन्द्रोदयवर्गाननेन प्रवेशप्रतिपादिकेति ।

(२) श्रद्धान्ते श्रद्धमध्ये वा सनिमित्तं रञ्जनं पात्रस्य बहिनिःसरयां निष्क्रमः । तत्प्रयोजना । श्रानुशतिकादेराकृतिगणत्वाद् 'इकङ्गा' उभयपदवृद्धौ नैष्कामिकी ।

यथा देवीचन्द्रगुप्ते पञ्चमाङ्कान्त— "बहुविहकज्जविसेसं विग्गृहं निह्हवेढ मयणादो । निक्खलइ खुद्दचित्तो रत्ताहुत्तं मयणो रिडपो ॥ [बहुविधकार्यविशेषमतिगृंहं निह्नुते मदनाद् । निष्कलति क्षुद्रचित्तो रक्ताहुतिं मदनो रिपोः ॥ इति संस्कृतम ]"

यह सूर्योदय-वर्गानके बहाने से अपने ग्राश्रमकी रक्षाके लिए रामचन्द्रको लिवा जानेके उद्देश्यसे ग्रानेवाले विश्वामित्रके प्रवेशकी सूचना [प्रवेशकी ध्रुवा] है ।

(ख) ग्रथवा जैसे देवी चन्द्रगुप्तके पञ्चम श्रङ्कमें— अपने शुभ किरयोंके विस्तारद्वारा शत्रु रूप समस्त ग्रन्थकार-समुदायको नाश कर देने वाला चन्द्रमा ग्रपने प्रचुर [ज्योत्स्ना रूप] वेभवसे [ग्रनिष्ट] ग्रहोंका उल्लङ्घन करनेके लिए ग्राकाशमें प्रवृत्त हो रहा है ।

यह चन्द्रोदयके वर्गानके बहानेसे ग्रपने विनाशकी शङ्का करनेवाले बनावटी रूपसे उत्तम बने हुए कुमार चन्द्रगुप्त के प्रवेशकी सूचना [प्रवेशिकी ध्रुवा] है ।

(२) नैष्कामिकी ध्रुवा—

(२) ग्रङ्कके ग्रन्तमें ग्रथवा ग्रङ्कके वीचमें कारणवश पात्रका रंगसे बाहर जाना निष्क्रमण कहलाता है । वह जिसका प्रयोजन हो, वह [नैष्कामिको ध्रुवा होता है । यह नैष्कामिकी पद] ग्रनुशतिकादिगणको ग्राकृतिगण मानकर [हैषचन्द्र व्याकरणके ग्रनुलार] ईकण-प्रत्यय करनेपर तथा उभयपद-वृद्धि करके 'नैष्कामिको' [पद सिद्ध होता है] ।

जैसे देवीचन्द्रगुप्तके पञ्चम ग्रङ्कके ग्रन्तमें— नाना प्रकारके प्रयत्न गुप्त विशेष कार्योंको कामके ग्रवेगसे छिपाना चाहता है प्रौर शत्रुके रत्कपानके लिए उत्सुक क्षुद्रचित्तवाला [कुमार चन्द्रगुप्त रज्जभूमिसे] बाहर जाता है ।

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का० १४५, सू० २३१ ] चतुर्थों विवेक: [ ३६७

इयसुन्‍मत्तस्य चन्द्रगुप्तस्य मदनविकारगोपनपरस्य मनाक् शत्रुभीतस्य राजकुलगमनार्थं निष्क्रमसूचिकेति ।

(३) प्रस्तुतरसोल्लंघनन रसान्तरोद्भावनमाचेप: । तत्रयोद्योना श्राद्धोपिकी ।

यथोदात्तराघवे रामस्य प्रस्तुतशृङ्गारोल्लंघनन—

"ग्रारे रे तपस ! स्थिरीभव, कवेदानीं गम्यते ? स्वसुरं पराभवप्रसव एकद्‌दतवयथ: । खरप्रसृतिबान्धवोऽहलनावातसनुचित्त: तवेह विदलीभवत्नुसमुच्‍छलच्छोभित-

रहटाच्‍छुरितवच्‍चस: प्रशममपेतु कोपानल: ॥"

इत्यादि नेपथ्यवाक्यकारितेन वीररसाल्लेप: ।

(४) प्रस्तुतस्य रसस्य विभावोन्मीलननेन निर्मलीकृत्यं 'प्रसाद:' । प्रविष्टपात्रस्य श्‌वन्तर्गतच्‍चित्तप्रवृत्ते: सामाजिकान प्रति प्रथनं वा 'प्रसाद:' प्रसादप्रयोजना 'प्रासादिकी' ।

इयं च प्रावेशिकी श्राल्लेपिक्यनन्तरमेवशयं प्रयोद्यते इति वृद्धसम्प्रदाय: ।

(y) 'ग्रान्तर' 'छिद्र', तत्र भवा 'ग्रान्तरी' । ग्रानुकृतं यदा ग्रानाशङ्कित एव धनविघातादिना विघात: उत्पत्तिप्रागश्रयाद: शृङ्गार-शमादिसम्भावना, वृथा श्रमादेर्वा

यह मदन-विकारको छिपानेकीलिए उत्तम् प्रोद् कुछ शास्त्रुसे भयभीत चन्द्रगुप्तके राज-भवनमें जानेकीलिए [रज़्‌मबसे] निष्क्रमराकी सूचीका है ।

(३) श्राल्लेपिकी ध्रुवा— प्रस्तुत रसको हटा‌कर अन्य रसका उत्पन्न करना 'प्राल्लेप' कहलाता है । वह जिसका प्रयोजन है वह 'श्राल्लेपिकी' हुई । जैसे 'उदात्तराघव'-में—रामचन्द्रके प्रस्तुत शृङ्गाररसको

हटा‌कर [निम्न श्लोक द्वारा वीररसका श्राल्लेप कराया गया है]—

ग्रारे हत् तपस् ! ठहर जा, खड़ा रह, प्रब जाता कहाँ है ? मेरी बहिन [सीता] के श्रमपमानसे उत्पन्न, एक [प्रसह्य प्रचण्ड] बलेशको देनेवाला

खर-दूषण प्रादि बन्धुओके विनाश रूप वायुपसे प्रज्वलित किया हुग्रा क्रोधानल प्राज चूर्ण चूर्ण

किए जाते हुए तेरे शारीरसे निकलनेवाले रक्तप्रवाहसे जिसका वक्षःस्थल व्याप्त हो रहा है इस

प्रकारका बनकर हो तो ज्ञात होगा ।

इत्यादि नेपथ्यगत [ रावणके ] वाक्यको सुननेसे वीररसका प्राल्लेप होता है ।

(४) प्रासादिकी ध्रुवा— विभावोके उन्मीलन द्वारा प्रस्तुत रसका निर्मलीकरए 'प्रसाद' कहलाता है । प्रयवा प्रविष्ट हुए पात्रको चित्तवृत्तिको सामाजिकोंके सामने प्रकाशित करना 'प्रसाद' माना जाता है ।

'प्रसाद' जिसका प्रयोजनहै वह 'प्रासादिकी' ध्रुवा हुई । 'प्रावेशिकी' और 'श्राल्लेपिको' वाधोंके

बाद इस [प्रासादिकी ध्रुवा] का प्रयोग श्रबधय करना चाहिए यह वृद्धजनोंकी परम्परा है ।

(y) श्रान्तरी ध्रुवा— ग्रन्तर श्रर्थात् छिद्र । उस [छिद्र या शून्य] के होनेपर प्रपुत्र्तकी जाने वाली

[ध्रुवा] 'ग्रान्तरो' [ध्रुवा कहलाती] है । [इसका श्रभिप्राय यह है कि] जब ग्रानुकरण करने

वाले [नट] को (१) जिसका श्राभा भी नहीँ हो सकता था इस प्रकारक श्रात्मिक बन-

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प्रच्युति:, तदा तत्संवरणावकाशादित्सया इयं गीयते। झ्रस्यां च प्राप्तंनं भावि वा रसस्वरूपमनुवर्त्यम्। चित्राच्छादनमात्रप्रयोजनत्वाच्चार्या न सार्थकपदनयसनमुपयोगीति शुष्काचारायेबास्यां निवद्ध्यन्ते।

'संगतं' प्रवेशाद्यनुरुपार्थम्। 'चित्रो' नानाप्रकारः, सरः-काननादि-दिवस-रात्रिसंध्यादि:, उत्तम-मध्यमाधमप्रकृति: गज-वाजी-सिंहादिर्भावो रत्यादिकशृंगारो यत्र। झ्रथश्र्च तथो निवन्धनो भवति। 'उपप्रेक्षित-शकुननयादि'म् पतायोगेन प्रस्तुतोपयोगी भवति। 'रूपकं' नियतमात्राच्चार्वं छन्दः 'गेयं' स्वरतालैर्गानानैर्हैम्। पञ्चधा प्रवेशादिभि:

विनाश प्राप्तिके कारणं प्राधात लगति है तब, झ्रथवा (२) किसी उद्दात प्रयोगके कारण मुर्छ्या या चककर झ्राने लगनेकी सम्भावना होनेपर, झ्रथवा (३) वस्त्र, झ्राभरण झ्रादिके गिर जानेपर उस [वस्त्र, झ्रंगत्र या चित्र] के छिपानेकीलिए झ्रवसर प्रदान करनेकी हृष्टिसे इस [ग्रंथरी झ्रथवा] का गान किया जाता है [जिससे प्रेक्षकांका ध्यान उस गानकी झ्रोर चला जाता है झ्रोर नटको उस त्रुटिको पूरा करने झ्रोर संँभल जानेकी झ्रवसर मिल जाता है]। इसमें पूर्ववर्ती झ्रथवा झ्रोर ग्रानेवाले रसके स्वरूपका झ्रनुगमन आवश्यक होता है। केवल चित्रोंका झ्राच्छादन करना ही इसका प्रयोजन होता है इसलिए इसमें सारथक पदके पाठ ग्रादि हो उपयोगी नहीं हैं [ झ्रो० सारथक गेय पद इस समय झ्रकस्मात बनाए भी नहीं जा सकते हैं ]। शुष्कप्रक्षरमात्रका इसमें जोड़-तोड़ किया जाता है। [उन्हींके मनसे सामाजिकोंका चित्त बँड़ाकर नटको झ्रपनेभी त्रुटिको छिपाने तथा संँभलनेकाझ्रवसर मिल जाता है]।

[प्रवेश, निष्क्रम, प्रालोप, प्रसाद झ्रो० ग्रंथत्र इन पाँचोंके साथ] 'संगत' झ्रर्थात् प्रवेश ग्रादि [ पाँचों ] के झ्रनुरुप जो गेय पद वह 'ध्रुवा' कहलाता है। चित्र झ्रर्थात् नाना प्रकारका [ञ्रर्थात्] तालाब, वन झ्रादि झ्रथवा दिन, रात व संध्यादि झ्रथवा उत्तम, मध्यम व प्रधान प्रकृति झ्रथवा हाथी, घोड़ा, सिंह झ्रादि पदार्थ झ्रोर रत्यादि रूप झ्रर्थ जिस [गेय पद] में हों [वहु 'वित्रार्यं' गेय पद 'ध्रुवा' कहलाता है]। इस झ्रर्थकी रचना इस ढंगसे करनी चाहिए कि जिससे वह 'उपश्रुतिशकुनन्याय' से झ्रपने [श्रवणासक्त] ज्ञानमात्रसे प्रकृतमें उपयोगी हो सके।

इसमें 'उपश्रुतिशकुनन्याय' शब्दका प्रयोग किया गया है। इसका झ्रभिप्राय यह है कि परम्परागत संस्कारोंके झ्रनुसार यात्रापर जाते समय यदि नीलकण्ठ झ्रादि किसी विशेष पक्षीका दर्शन या उसकी ध्वनिका श्रवण झ्रथवा जलसे भरे घट झ्रादिका दर्शन हो जाय तो वह कार्यसिद्धिके लिए शुभ शकुन माना जाता है। यद्यपि जलभरे घटको ले जानेबाले, झ्रथवा पक्षीके शब्द करनेका प्रयोजन यात्र करनेवालेकेलिए शकुन करना नहीं होता है। उसका प्रयोजन कुछ झ्रो० ही होता है। किन्तु इन पदोंके दर्शन झ्रथवा शब्दके श्रवणमात्र से मंगल होता है। इसी प्रकार इन ध्रुवागीतके पदोंका झ्रर्थ चाहे कडु हो किन्तु उनके श्रवणमात्र झ्रथवा ज्ञानमात्रसे उनका प्रकृतमें उपयोग हो सके। यह 'उपश्रुतिशकुनन्याय'

नियत मात्रा झ्रो० नियत अ्रक्षरों वाला छन्द यहाँ 'रूपक' [पदसे झ्रभिप्रेत] है। स्वर झ्रो० तालके सानने योग्य 'गेय' कहलाता है। [ध्रुवा] पाँच प्रकारकी झ्रर्थात् प्रवेश [प्रवेश

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पञ्चप्रकारा। उपयोगबाहुल्यापेक्षं चैतत्। अपरे च ध्रुवाप्रकारा: सत्त्वर्, झलपेापयोगित्वात् तु न लचिता: ‘कवित्‍ववा’ इति कबे: प्रबन्धकर्तु रियं पञ्चविधा धुवा । श्रवणेन रङ्गमध्ये-वर्तनीनां ध्रुवाणां रंगविध्यनत्तरं नाट्याचार्यकलिपतानां गानध्रुवाणां च व्युदास इति ॥[२]१४५॥

स्वस्थ नाट्यप्रकाराणां पकृतिभेदानां—[सूत्र २३२]— उत्तमा मध्यमा नीचा प्रकृतित्नु स्त्रियौस्त्रिधा । एकैकापि त्रिधा स्व-स्वगुणानां तारतम्यत:॥ [३] १४६ ॥

'उत्तम:' इत्यव्ययेन उत्कृष्टे डर्थे । तत: प्रकृष्टार्थे 'तमपि' उत्तमा । प्रकर्षेण क्रियन्ते वाध्याश्चेष्टा शस्यमाना इति । प्रकृतिजन्मसहस्रुवं शुभाशुभर्म शीलम्‌। 'त्रिधा' तिखोडपि प्रकृतय: स्वस्थाने उत्तमा मध्यमा नीचाश्चेति । 'गुणा:' प्रत्येकं प्रकृतिषु वच्यमाणाः । प्रकृष्टस्य किचिदाधिक्य-बहुत्वभाविनोस्तरप्‌-तमप्‌-प्रत्यययोरनुच्‌.तिस्‍तर-तमौ इति । तयोभाव: 'तारतम्यम्'। सामानय- किचिदधिक्य- सातिशयाधिक्यलचणावस्थात्रययोगित्वमिति ॥ [३] १४६ ॥

निष्करमं, आक्षेप, प्रसाद श्रौर ग्रनत॥ प्रादिसे पाँच प्रकारकी होती है । [इन पाँच प्रकारोंके] उपयोगके बाहुल्यकी दृष्टिसे यह [पाँच भेदोंका] कहा गया है । [वैसे तो इन पाँचके अतिरिक्त] श्रौर भी ध्रुवाके प्रकार हैं किन्तु उनका उपयोग बहुत कम होनेसे उनके लक्षण नहीं किए हैं । [कारिकामें इन पाँचकों 'कविध्रवा' कहा है इसका प्रभिप्राय यह है कि कविध्रवाश्रोंके प्रतिरिक्त श्रनय ध्रु वाएँ भी होती हैं । इसलिए ] 'कविध्रवा' इस पदके द्वारा कवि अर्थात् ग्रन्थकर्ताकी [प्रश्याति ग्रन्थकर्तकि द्वार प्रयुक्त] ये पाँच प्रकारकी 'ध्रुवा' होती हैं । इससे पूर्व रङ्कके मध्यमें होनेवाली श्रौर पूर्वंरंगविधिके बाद नाट्याचार्य द्वारा कलिप्त गानकी ध्रुवाओंका निराकरण किया गया है । [प्रश्यात् ये पाँच प्रकार केवल 'कविध्रवा' के होते हैं । श्रनय ध्रुवाओंसे इन भेदोंका कोई सम्बन्ध नहीं हैं ।] ॥ [२] १४५ ॥

[सूत्र २३२]— [नाटकके] स्त्री श्रौर पुरुष [पात्रों] की उत्तम, मध्यम तथा प्रथम तीन प्रकारकी प्रकृति होती है । श्रौर ग्रहण-ग्रहण गुनोंके तारतम्यसे उनमेंसे प्रत्येक [प्रकृति] के फिर तीन-तीन भेद हो सकते हैं ॥ [३] १४६ ॥

[उत्तम पदका निर्वचन करते हैं । इस उत्तम पदमें] 'उत्‌' यह प्रथय उत्कृष्ट श्रर्थमें है । उससे प्रकट श्रर्थमें तमप्‌-प्रत्यय होकर 'उत्तमा' [पद बनता है । इसका श्रभिप्राय यह है कि] जिसकी बाह्य चेष्टाएँ उत्तम रुपसे की जाती हैं [वह उत्तम प्रकृति कहलाती है ।] जन्मसे प्राप्त होनेवाले भले-बुरे स्वभावको 'प्रकृति' कहते हैं । ['एकैकापि त्रिधा' इस स्थलपर दुबारा प्रयुक्त हुए] 'त्रिधा' इससे [यह सूचित किया जाता है कि पहली बार जो उत्तम, मध्यम व प्रधम तीन प्रकारकी प्रकृति कही गई थीं वे] तीनों प्रकारकी प्रकृतियाँ अपने स्थानमें भी उत्तम, मध्यम तथा नीच [भेदसे] तीन प्रकारकी हो सकती हैं । [स्व-स्वगुणानां तारतम्यत: कहे हुए] गुण प्रत्येक [प्रकृतियों में] कहे जाते वाले हैं ।

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३७० ] नाट्यदर्पणम् [ क० १४७, सू० २३३-३४

ग्रथोत्तमप्रकृतेः पुंसो गुणानाह—

[सूत्र २३३]—शरण्यो दक्षिणासत्यागी लोक-शास्त्रविचक्षणः । गाम्भीर्य-धैर्य-शौण्डीर्य-न्यायवानुत्तमः पुमान् ॥

॥ [४] १४७ ॥

शरणः—साधुः । 'दक्षिणो'डनुकूलः । 'लोक'-शब्देनात्र लोकव्यवहार उच्यते । तत्र 'विचक्षणः' एवमाद्योऽन्यैडन्वितमुत्तमपुरुषगुणा दृश्यन्ते इति ॥ [४] १४७ ॥

ग्रथ मध्यमप्रकृतिः—

[सूत्र २३४]—मध्यो मध्यगुरुः । 'मध्य' नाप्युत्कृष्ट नाप्यपकृष्ट 'गुणा' लोकव्यवहार-चातुर्य-कला-विचक्षणा-स्वादयो धर्मा व्यस्यते ।

ग्रथ नीचप्रकृतिः—

[सूत्र २३५ ]—नीचः पापीयान् पिशुनोडलसः । कृतघ्नः कलहप्रियः स्त्रीलोलो रक्षस्वाग जड़ः ॥

[ग्रन्थे 'तारतम्य' शब्दका ग्रथ करते हैं] 'प्रकृष्ट' [पद] से कुछ ग्राधिक्य ग्रोर बहुत ग्रप्रथमें होनेवाले 'तरप-तमप' दोनों प्रत्ययोंके ग्रनुकरण हूपमें 'तर-तम' [प्रत्यांश] हैं । उन [तर-तम] का भाव 'तारतम्य' हुग्रा । [उसका ग्रथ यह है कि] सामान्य, उससे कुछ ग्रधिक ग्रोर उससे भी विशेष ग्रधिक हूप तीन प्रवस्थाग्रोसे युक्त [भाव 'तारतम्य' कहलाता है] ॥[३]१४६॥

ग्रन्थ ग्रन्थ उत्तम प्रकृतिवाले पुरुषके गुणोंको कहते हैं—

[सूत्र २३३]—शरण्यासक्तोंकी रक्षारमे साधु, शत्रूलकेल त्यागी, लोकव्यवहार तथा शास्त्रो में निपुरा, गाम्भीरता, धीरता, पराक्रम ग्रोर न्याय-विचारसे युक्त पुरुष 'उत्तम' पुरुष कहलाता है ।

शरण ग्रर्थात् विपत्तिमें पड़े हुएकी रक्षा करना । उसमें साधु [धयक्त 'शरण्य' कहलाता है । 'दक्षिरण' ग्रर्थात्] 'लोक' शब्दसे यहाँ लोकव्यवहारका कथन किया गया है । उसमें निपुरा । इसी प्रकारके ग्रन्य भी गुणा उत्तम प्रकृतिवाले पुरूषोंमें होते हैं ।

अब ग्रन्थे मध्यम प्रकृति [के पुरुषके गुणोंको कहते हैं]—

[सूत्र २३४]—मध्यम गुरणोंवाला [पुरुष] मध्यम प्रकृति कहलाता है । 'मध्यम' ग्रर्थात् न तो ग्रधिक उत्कृष्ट ग्रोर न ही ग्रधिक निकृष्ट 'गुरा' ग्रर्थात् लोक-व्यवहारकी निपुराता, कला, विदहत्ता ग्रादि धर्म जिनके हों [वह मध्यम प्रकृतिक पुरुष कहलाता है] ।

ग्रन्थ ग्रन्थ नीच प्रकृति [पुरुषके गुरणोंको कहते हैं]—

[सूत्र २३५ ]—नीच प्रकृतिवाला पुरुष पाप करने वाला, चुगलखोर, ग्रालसी, कृतघ्न, महाङ्कालु, पराक्रम-विहीन, स्त्री-निरत ग्रोर रक्ष बोलनेवाला होता है ।[५]१५८॥

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का० १५६, सु० २३६-३७ ] चतुर्थो विवेक: [ ३५७

'पिशुन:' कृतेऽप: 'क्लीबो' हीनस्त्र्व इति ॥ [४] १५५ ॥

[सूत्र २३६]—लज्जावती मुदुरधीरा गंभीरास्मितहासिनी । विनीता कुलजा दक्ष वत्सला योषिदुत्तमा ॥

वत्सला स्नेहलেতि ॥ [६] १५६ ॥

[सूत्र २३७]—नरवनमध्येमा-नीचे —

मध्ये-नीचपुरुषवनमध्येमा-नीचे क्षियौ बोद्धव्ये । एषा नु-क्षियोरविधा प्रकृति-रतरुपा विरुपा रुपानुरुपिणी चेति पुनस्त्रिप्रकारा । तत्सनुरुपा पुंस: पौंस्न:, क्षियास्तु स्त्रैणो वयोऽवस्थाडनुरुपो भाव: । विरुपा तु बालोचितभावस्य स्थविरेऽपि, स्थविरोचित-तस्म्य तु बालेन दर्शनम् । रुपानुरुपिणी पुरुषपोडपि स्त्रीरुपेण भूत्वा, क्षिया पुरुषपया च श्री-पुं समावदर्शनमिति ॥

'दिशा' शर्यात् तुंगलोचने 'क्लीबो' शर्यांत् नप्तुंसक इति ॥[५]१५७॥

ग्रंथ प्राजे उत्तम स्त्री [के गुणों] को कहते हैं—

[सूत्र २३६]—लज्जावती, मृदु, घीर, गंभीर, मंद मुस्कानवाली, नपुंसक, उच्च-कुलोत्पन्न, चतुर शौर सहनशील स्त्री उत्तम स्त्री कहलाती है ।[६]१५६

'वत्सला' शर्यांत् स्नेह करने वाली ॥[६]१५५॥

इस प्रकार यहाँ तक उत्तम, मध्यम व श्रथम तीनों प्रकारकी प्रकृतिवाले पुरूषों तथा ग्रंथ प्राजे मध्यमा तथा नीचा [स्त्रियोंके लक्षण कहते हैं]—

[सूत्र २३७]—[मध्यम तथा नीच] पुरूषके समान मध्यमा तथा नीच स्त्रियाँ [होती हैं]। मध्यम तथा नीच पुरूषोंकि समान [प्रकृतिवाली] मध्यमा तथा नीचा स्त्रियोंकि समभना चाहिए । पुरूष तथा स्त्रियोंकि यह [उत्तम, मध्यम तथा श्रथम रूप] तीन प्रकारकि प्रकृति (१) ग्रतरुपा, (२) विरुपा तथा (३) रुपानुरुपिणी भेदसे फिर तीन-तीन प्रकारकि होती है । उनमेंसे पुरूषका पुरूषके ग्रतरूप शौर स्त्रीका स्त्रीके ग्रतरूप ग्रादि के ग्रनुकूल भाव 'ग्रतरुपा' [प्रकृति] कहलाता है । शौर बालोचित भावका वृद्धोंद्वारा ग्रथवा वृद्धोचित भावका बालकके द्वारा प्रदान 'विरुपा' प्रकृति [कहलाता] है । जहाँ पुरूष भी स्त्री बनकर [कर्म:] स्त्रीभाव तथा पुरूषभावको प्रदान करते हैं वह 'रुपानुरुपिणी' प्रकृति कहलाती है ।

इस प्रकार यहाँ तक उत्तम, मध्यम तथा श्रथम प्रकृतिके पुरूष तथा स्त्रियोंके लक्षण दिखलाकर ग्रंथ प्राजे मध्यम तथा श्रथम प्रकृतिके पात्रोंको भी नाटकमें नायक बनाया जा सकता है इस बातको लिखते हैं । प्रथम विवेकमें केवल उत्तम प्रकृति वाले नायकको बनाए जानेका विधान किगा था । उससे ग्रपवाद रूपमें यहाँ मध्यम तथा नीच प्रकृतिके नायकोंके बनाए जानेका भी विधान किया जा रहा है ।

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३७२ ] नाट्यदर्पणम् [ क० १६०, सू० २३५-४०

अथ प्रबन्ध्येषु नीचप्रकृतिकमपि नायकमाहि—

[सूत्र २३८]—नीचोद्धोष: कथावशात् ।

कस्याचिद् कथावृत्तं, तस्य वश: सामर्थ्यं हसनीयत्वादि तस्माद् भाषा-प्रहसनयो:, कस्याचिद् विधियां च नीचोऽपि नायक:। प्रथमविवेके मध्यमोत्तमयोर्नायकत्वमुक्तं तद्-

पवादोऽयमिति ।

[सूत्र २३६]—प्रधानफलसम्पन्नोदव्यसनो मुख्यनायक: ।

व्यसनं स्वच्युत्याद्यशक्तिः, विपद्रा ॥ [७] १६० ॥

अथास्य गुरणानुदिशति—

[सूत्र २४०]—तेजो विलासो माधुर्यं शोभा स्थैर्यं गभीरता ।

प्रौदायं ललितं चाष्टौ गुरगा नेतॄरि सत्त्वजाः ॥

॥ [८] १६१ ॥

'श्रेष्ठो' इत्युक्तपरिगणनम्। न तु सङ्ख्यानियमोऽन्येषामपि सम्भवान्। सत्त्वं विपुलाश्रयत्वम् ॥ [८] १६१ ॥

अथैषां प्रत्येकशः लक्षणम्—

ग्रथ ग्रन्थकाद्योंमें नीच प्रकृतिवाले नायकों [के हो सकने] का भी प्रतिपादन करते हैं

[सूत्र २३८]—कथाके श्रानुसार कहाँ नीच भी नायक हो सकता है ।

कथा श्रर्थात् श्राश्रयान-वस्तु । उसके वशसे श्रर्थात् सामर्थ्यसे श्रर्थात् हसनीयत्व ग्रादि को हृष्टि है। इसलिए 'भाषा' ग्रोर 'प्रहसन'में तथा किसी 'वीथी'में नीच भी नायक हो सकता है। प्रथम विवेकमें [केवल] मध्यम तथा उत्तमके नायकत्वका कथन किया था यह उसका श्रप्रवाद है

ग्रथ ग्रन्थकार समस्त रूपकोंके मुख्य नायकका लक्षण करते हैं—

[सूत्र २३६]—[रूपकके] प्रधान फलको प्राप्त करनेवाला [विषयासक्ति श्रथवा प्राप्त-हानि कुप विपत्ति] व्यसनसे रहित मध्यम नायक होता है ।[७]१६०।

है ॥[७]१६०॥

[सूत्र २४०]—ग्रब इस [मुख्य नायक] के ग्रुगों को गिनाते हैं—

१. तेज, २. विलास, ३. माधुर्य, ४. शोभा, ५. स्थैर्य, ६. गभीरता, ७. उदारता, ८. ललित्य ये ग्राठ गुरण रहते हैं ॥[८]१६१।

'श्रेष्ठो' इस पदसे [कारिकामें] कहे हुए [ग्राठ गुरणों] की गरगाना दिखाई है । यह सङ्ख्याका नियम नहीं है [श्रर्थात् ग्राठ हो गुरण मुख्य नायकमें होते हैं यह इस 'श्रेष्ठो' पदका श्रभिप्राय नहीं है] क्योंकि इनके प्रतिरिक्त] ग्रन्य गुरण भी नायकमें हो सकते हैं । ['सत्त्व-

सम्भवान्'] पदमें] 'सत्त्व' शब्दसे विपुलाश्रयत्वका ग्रहण होता है ॥[८]१६१॥

(१) ग्रब आगे इन [ग्राठ गुरगों] मेंसे प्रत्येकके प्रलग-अलग लक्षण कहेंगे—

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चतुर्थो विवेक:

[सूत्र २४१]—क्षेपादेरसहिष्णुं त्वं तेजः प्राणात्ययेपि च । चोपस्तिरस्कारः । श्रादि शब्दादौ दैन्यावज्ञादिम्रहः । 'प्राणात्ययेपि च' इति प्राणात्ययेपि श्रुपगम्येत्यर्थः । तेनासहिष्णुत्वमच्तमा । न तु देशकालावस्थापेक्षया नीत्या सहनपूर्वकं निर्यातनमिति ।

(२) स्वथ विलास:—

[सूत्र २४२]—विलासो दृशवद् यानं धोरा हृक् सस्मितं वचः । 'व्रीपो' महोचः । धीरत्वमुदात्तत्वमिति ।

(३) स्वथ माधुर्यम्—

[सूत्र २४३]—माधुर्यं विकृति: स्तुत्या क्षोभहेतौ महत्यपि ! प्रस्तुताद् रूपाद् रूपांतरं 'विकृति:' । 'स्तुत्या' रोमांच-परिरच-नख-शश्रु-केशसमारचन-श्राव्यावलोकनादिकान् । 'क्षोभ:' सत्वचलनमिति ।

(४) स्वथ शोभा—

[सूत्र २४४]—शोभा चिह्तं धृणा-स्पर्धा-दाक्ष्य-शौर्योद्धमोन्ये ।

[सूत्र २४१]—प्राणानाइके संकटको स्वीकार करके भी ग्रप्रमान ग्रप्रदिको सहन न करना 'तेज' कहलाता है । 'क्षोभ' अर्थात् तिरस्कार । श्रादि शब्दसे दैन्य ग्रोर प्रवज्ञा ग्रादिका ग्रहण होता है । 'प्राणात्ययेपि च' इसका श्रायने ग्रप्राणोंके विनाशको भी स्वीकार करके यह श्रभिप्राय है । इसलिए 'प्रसहिष्णुत्व' का ग्रर्थ सहन न करना क्षमा न करना है । देश, काल, प्रवस्था ग्रादि की ग्रपेक्षासे उस समय सहन करके बादमें उसका बदला लेना [निर्यातन, प्रसहिष्णुत्व शब्द का ग्रर्थ] नहीं है ।

(२) स्वव विलास [गुएका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २४२]—वृपके समान गति, धीर हृदि ग्रोर मुस्कराते हुए बात करना यह 'विलास' गुएका लक्षरया है । 'व्रीपो' अर्थात् सांड़ । धीरत्वका ग्रर्थ उदात्तत्व है ।

(३) स्व ग्रंगे माधुर्य [गुएका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २४३]—क्रोध आनेका महान् कारण उपस्थित होनेपर भी हृदकी-सी विकृति माधुर्य [गुए कहलाती है] । प्रस्तुत वर्तमान रूपसे भिन्न रूपकी प्राप्ति 'विकृति' कहलाती है । हलके-से [स्तुत्या अर्थात्] रोमांच, कमर क्सना, मूछोंपर ताव देना ग्रोर हस्रकी ग्रोर हृद्रदिसे ग्रोर देखना ग्रादिसे [हलकी-सी विकृतिकाका प्रकाशन माधुर्य गुए कहलाता है] ।

(४) स्व 'शोभा' [गुएका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २४४]—धृणा, स्पर्धा, दक्षता, शौर्य तथा उद्यमके विद्धमान होनेके ग्रनुमान करनेका चिह्त शोभा [गुए] कहलाता है ।

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‘चिह्न’ घृणादेः सत्त्वनिश्चयहेतुः शरीराविकारः । ‘घृणा’ नीचार्थजुगुप्सनम् । ‘स्पर्धा’ श्वाधिकेन सह साम्याधिक्याभिलापः । ‘उद्यम’ उत्साहः । एषामुन्नयः सत्त्व-निश्चय इति ॥ [१०] १६३ ॥

(५) स्थायि स्थैयं—

[सूत्र २४५]—विभिन्नेऽङ्यचलनं स्थैर्यं प्रारब्धशुभादपि । ‘विभिन्न’ प्रत्ययः । ‘अङ्यचलनं’ दादृश्यम् । शुभमिह परलोकानुचितमति ॥

(६) स्थायि गाम्भीर्यं—

[सूत्र २४६]—गाम्भीर्यं सहजा मूर्तिः कोप-हर्षादिगोपनी ॥ [११] १६४ ॥

‘सहजा’ मुखराग-हस्तविकारादिरहिता । ‘मूर्ति:’ दृशुस्वभावः । ‘आदि’ शब्दाद् भय-शोकादिग्रहः । ‘गोपनी’ प्रच्छादयितुमिति ॥ [११] [१६४] ॥

(७) स्थायौदात्यं—

[सूत्र २४७]—औदार्यं ज्ञातृ-मित्राणां प्राप्तेनाप्युपग्रहः । बहुवचनान्तमध्यस्थानां ग्रहः । ‘प्राप्तिन्’ शब्देन स्वजीवितवस्तुस्य दानमुख्यते । ‘ग्रह’ शब्देन दान-प्रियभाषणादिग्रहः । ‘उपग्रह’ उपचार इति ॥

(प्र.) जब ग्रागे स्थैयं [गुणका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २४५]—विधिनोऽपस्थित होने पर भी जो स्थिर ग्रशुभ प्रारब्धसे भी [अपने निश्चितको न छोड़ना स्थिर कहलाता है] ।

‘विधन’ अर्थात् प्रतिबंध बाधा । ‘अचलन’ अर्थात् हड़ रहना । ‘ग्रशुभ’ का अर्थ यहां परलोकके ग्रयोग्य [कर्म ग्रादि] है ।

(६) जब ग्रागे गाम्भीर्य [गुणका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २४६]—श्रदव ग्रादि होने ग्रादिको प्रकट न होनेवाली स्वाभाविक देह-स्थिति का नाम गाम्भीर्य है ॥ [११] १६४ ॥

सहजा ग्रर्थात् [क्रोधादिके ग्रानेपर भी] मुखकी लालिमा ग्रौर दृष्टिके विकार ग्रादि से रहित । ‘मूर्ति’ अर्थात् देहका स्वभाव । ‘ग्रादि’ शब्दसे [कोप ग्रौर हर्षके साथ] भय-शोकादिका भी ग्रहण होता है । ‘गोपनी’ अर्थात् प्राच्छादन करने वाली [प्रकट न होने देने वाली] ॥ [११] १६४ ॥

(७) जब ग्रागे श्रौदार्य [गुणका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २४७]—अपने प्राण देकर भी ज्ञातु या मित्रका उपकार करना ‘प्रौदात्य’ कहलाता है ।

बहुवचनमे [ज्ञातु ग्रौर मित्रोंके साथ] मध्यस्थोंका भी ग्रहण होता है । ‘प्राप्तिन्’ शब्देन स्वजीवितवस्तुस्य दानमुख्यते लाताहै ।

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काः १६४, सू० २४८-४० ] चतुर्थो विवेकः [ ३७४

(८) श्रथ ललितम्—

[सूत्र २४८]—श्रृङ्गारचेष्टा ललितं निर्विकाराः स्वभावजाः ॥ [१२] १६५ ॥

'श्रृङ्गारिस्य:' श्रृङ्गारजनिता। 'चेष्टा:' तिर्यगविलोकन-वक्रोक्तिभाषण-शरीर-संस्कारादिका। 'निर्विकाराः' गर्हारहिता। 'स्वभावजाः' श्रात्मवृत्तेर्व्वका इति ॥[१२]१६५॥

श्रथ मुख्यनेतारमुख्वा गौणमाह—

[सूत्र २४९]—प्रमुख्यो नायकः किश्चित्प्रबुद्धोदप्रचनायकात् । 'अनुसृतत्व' प्रधानफलापेक्ष्याद्वान्तरफलभाजनत्वात् । 'नायकत्व' बहुत्तर-वृत्त्यात्मकत्वान्मुख्यनेतृसहायभूतत्वाच्च । 'किश्चित्प्रबुद्ध' स्वल्पेन्यूनं वृत्तं शौर्य-त्याग-बुद्धि श्रादिकं यस्मात् । श्रयं च पताकाप्रकरोऽपि नायको दृश्य इति ॥

श्रथ प्रतिनायकमाह—

[सूत्र २५०]—लोभी धोरोदात्तः पापो, व्यसनो प्रतिनायकः ॥ [१३] १६६ ॥

मुख्यनायकस्य प्रतिपन्थी नायकः 'प्रतिनायकः' । यथा राम-श्रुधिष्ठिरयोः-रावण-दुर्योधनौ इति ॥ [१३] १६६ ॥

श्रन्दसे श्रपने जीवनको डालेनेका श्रभिप्राय है । 'ग्रप्रति' शब्दसे दान श्रौर प्रियभाषण श्रादि का ग्रग्रहण होता है । 'उपप्रग्रह' प्रार्थीत्व उपयोग ।

(९) ग्रथ ललित [गुणका लक्षण श्रागे करते हैं]—

[सूत्र २४८]—[निन्दित] विकारोंसे रहित स्वाभाविक शृङ्गार-चेष्टाएं ललित कहलाती हैं । [१२] १६५ ।

'श्रृङ्गारिस्यो' श्रर्थात् शृङ्गारसे उत्पन्न होने वाली । 'चेष्टा' श्रर्थात् तिरछी नज़रसे देखना, वक्रोक्तियोंसे भाषा, तथा शरीरको सजाना श्रादि । 'निर्विकार' श्रर्थात् ग्रनुन्दरतासे रहित । 'स्वभावजाः' श्रर्थात बिना सोचे कर की हुई । [१२] १६५ ॥

मुख्य नायकके व्ररण करनेके बाद ग्रागे श्रागे गौण नायकको कहते हैं—

[सूत्र २४९]—मुख्य नायककी श्रपेक्षा कुछ कम वृत्त [कम कथाभाग] वाला ग्रमुख्य नायक कहलाता है ।

प्रधान फलकी श्रपेक्षा श्रवान्तर ग्रमुख्य फलका पात्र होनेसे इसको 'ग्रमुख्य' कहा गया है । श्रौर बहुत बड़े कथाभागमें व्यापक होने तथा नायकके सहायक रूपमें होनेसे उसका 'नायकत्व' होता है । जिसका वृत्त श्रर्थात् शौर्य त्याग श्रौर बुद्धि श्रादिका [मुख्य नायककी श्रपेक्षा] कम है । श्रौर यह [ग्रमुख्य नायक कारिका २६ तथा ३२ में प्रथम विवेकमें कहे हुए] 'पताका' तथा 'प्रकरो' नायक समभने चाहिए ।

अब श्रागे प्रतिनायकका लक्षण करते हैं—

[सूत्र २५०]—प्रतिनायक लोभी, धोरोदत्त, पापी श्रौर व्यसनी होता है । [१३]१६६ ।

मुख्य नायकका विरोधी नायक 'प्रतिनायक' कहलाता है । जैसे राम श्रीर युधिष्ठिरके विरोधी रावण श्रौर दुर्योधन प्राप्ति । [१३] १६६ ।

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ग्रथ विदूषकादीनां प्रकृति केषांचिल्लच्द्राणां चाह—

[सूत्र २५१]—नीचा विदूषक-क्लोब-शकार-विट-किड्डुरा: । हास्यायादो नृपे श्याल: शकारस्त्वेकविद् विट: ॥

'क्लीबो' नपुंसक: । एषां नीचत्वं नैसर्गिकम् । स्वामिचित्तानुरोधादौपाधिकं तु मध्यमत्वमार्गाम् । इत्थं शो विदूषको हास्यसामग्रीभवति । हार्यां चास्य श्रृंगार-नेपथ्य-वचो-विकारान् त्रेधा । तत्संघाताच्च खलति-शठ-दंस्र्‌-विकृताननत्वादिना । नेपथ्यहास्य-मत्यायतांवर्तोल्लोकित-विलोकित-गमनादिना । च चोहास्यंसमसंबद्धानर्थकाशलील-भाषणादिना भवति । 'नृपे' नृपस्य सम्बन्धी 'श्याल:' पल्लीभ्राता । नीचत्वादेव चायं हीनजाति: । 'हास्याय' इति छत्रापि सम्बन्धान्न सर्वो राजपुत्रादिर्नपश्याल: शकार:, किन्तर्हि विशिष्टहास्यहेतु: परिचारक एव । एकं राजोपयोगि किश्चित् गीतादिषु मध्ये वेत्ति इति एकविद्, विटो श्रेय इति ॥ [१४] १६७ ॥

ग्रथ धूरोद्रतादीनां नेत्र यां प्रत्येकं विभिन्नान् विदूषकानाह—

[सूत्र २५२]—स्निग्धा धूरोद्रतादीनां यथौचित्यं वियोगिनाम् । लिंगो त्विजो राजजीवी शिष्यश्चैते विदूषका: ॥

[१२] १६७

ग्रन्थ ग्रांगे विदूषक ग्रादिको प्रकृति ग्रोर उनमेंसे किन्हींके लक्षण कहते हैं—

[सूत्र १६७]—विदूषक नपुंसक शकार विट ग्रोर श्रृंग्य ग्रादि नीच [पात्र होते हैं] उनमेंसे पहला [प्रथमतः विदूषक] हास्यके [उत्पन्न करने] केलिये होता है । राजाका [नीच जातीय] साला 'शकार' कहलाता है । [राजाके उपयोगी नृत्य गीतादि] किसी एक बातको जानने वाला 'विट' कहलाता है ।

'वलेव:' प्रथमतः नपुंसक । इनका नीचत्व स्वाभाविक होता है । किन्तु स्वामीके वित्तके श्रनुरूप ग्रौपाधिक रुपसे मध्यमत्व भी हो सकता है । उनमेंसे पहला ग्रर्थात् विदूषक [सबके लिये] हास्यजनक होता है । इसका हास्य (१) ग्रंथ, (२) वेष-भूषा तथा (३) वचनोंसे [उत्पन्न] तीन प्रकारका होता है । जैसे गंजापन, लंगड़ापन, बाहर निकलते हुए या ऊपर बैठे हुए दाँत ग्रोर विकृत मुख ग्रादिसे [हास्य] होता है । स्वभावत: लबड़े-चौड़े श्रोत्रोंसे ऊपर ताकने, इधर-उधर देखने ग्रोर गमन ग्रादिके द्वारा नेपथ्यहास्य होता है । ग्रोर ग्रसंंबद्ध ग्रन्थयंक तथा ग्रसलील भाषण ग्रादिके द्वारा वचन-मूलक हास्य उत्पन्न होता है । 'नृपे' ग्रर्थात् पल्न्नीकका भाई । नीच [पात्रोंमें परिगणित] होनेके कारण ही वह नीच जातिका होता है । 'हुस्याय' इस पदका यहाँ [श्यालके साथ] भी संबंध होनेसे राजाके राजपुत्र ग्रादि [उत्तमजातीय] सारे साला 'शकार' नहीं होते हैं । ग्रपितु विकृति हास्यके कारणभूत [नीचजातीय] परिचारक [ रुपसाला ] हो 'शकार' कहलाता है । विटके लक्षणमें ग्रांगे हुए 'एकविद्' पदका ग्रर्थ करते हैं] गीतादिमें राजाके उपयोगी किसी एक को जानता है इसलिए 'एकविद्' विट कहलाता है ॥ [१४] १६७ ॥

ग्रन्थ ग्रांगे धौरोद्रत ग्रादि नायकोंमेंसे प्रत्येकके ग्रलग-ग्रलग्य विदूषकों [के लक्षणोंको

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का० १६७, सू० २४२-४३ ] चतुर्थो विचेक: [ ३७७

'स्निग्ध:' सुहृद: 'श्रादि' शब्दादू धीरोदात्त-धीरललित-धीरप्रशान्ता गृह्यन्ते । एतां 'वियोगिता' विप्रलम्भशृङ्गारवतां शृङ्गार्यानतिक्रमेणै लिङ्ग्यादयो यथासम्भवं सन्ध्ये विग्रहेऽपि, विग्रहं सन्धित्सा च विरोषेषा दृश्यन्ते विनाशयन्ति, विप्रलम्भं तु विनोददातेन विस्मारयन्त इति 'विदूषक:' । उचितश्व लिङ्गी देवान्तां, ब्राह्मणस्य शिष्यः, राज्ञां तु शिष्यवर्योस्त्रयः । एतद्व वयिगादेरपीति ॥ [१५] १६६ ॥

[सूत्र २४३]—युवराज-चमूनाथ-पुरोध:-सचिवादयः ।

सहाया एतद्वात्तकर्मणैव ललितः पुनः ॥ [१६] १६६॥

'श्रादि' शब्दादाटविक-सामन्तदायरस्तापसादयश्व गृह्यन्ते । एते च केचिदर्थ-कामयोः सहायाः । केचित् धर्मसहायाः । तथा सहायार्थसिद्धिरेव धीरललितः । सहायोऽ्यापारश्च नायककथ्यापार एव, एतद्वत् पत्वान्नायकस्य । धीरोदात्तादयस्तु स्व-चान्य-उभयसिद्धयः इति ॥ [१६] १६६॥

कहते हैं]—

[सूत्र २४२]—धीरोदत्त आदि नायकोंके [स्निग्धः अर्थात्] मित्र शौर वियोगियोंके शृङ्गार्यके अनुसार लिङ्गी [श्रथात् ब्राह्मणचारो या सङ्ग्यासी श्रादि] ब्राह्मण राजजीवी तथा शिष्य श्रादि विदूषक होते हैं । [१५] १६६ ।

'स्निग्ध' श्रथ्यांत् मित्र । [धीरोदत्त पदके साथ जुड़े हुए] 'श्रादि' शब्दसे धीरोदत्त, धीरललित तथा धोरप्रशांत नायकोंका भी प्रहरण होता है । इनके 'वियोगी' श्रथांत् विप्रलम्भ-शृङ्गारयुक्त होनेपर यथासम्भव लिङ्गी श्रादि [विदूषक] शृङ्गार्यके श्रनुसार होते हैं । [प्रायः विदूषक शब्दका निर्वचन दिखलाते हैं] सन्धिक्को विप्रहोत्पादनके द्वारा तथा विप्रहको सन्धि-जनन द्वारा विशेष रूपसे दूषित ग्रह्यांत विनष्ट करते हैं शौर विप्रलम्भको मनोरंजन प्रदान करनेके द्वारा विनष्ट करते हैं इसलिए 'विदूषक' कहलाते हैं । देवनाओंके लिए [लिङ्गी अर्थात्] ब्राह्मणचारो [या सङ्ग्यासी], ब्राह्मणके लिए शिष्य, शौर राजाके लिए शिष्यकों छोड़कर शेष होनो विदूषक उचित हैं । इसो प्रकार वणिग् श्रादि भी [शृङ्गार्यानुसार विदूषक समर्प लेने चाहिए] ॥ [१६] १६६ ॥

श्रथ ग्रादि किन्हीं धीरोदत्त श्रादि [नायकों] के सहायकोंका वर्णन करते हैं—

[सूत्र २४३]—युवराज, सेनापति, पुरोहित शौर सचिव श्रादि [इन धीरोदत्त प्रादि नायकोंके] सहायक होते हैं । शौर धीरललित [नायक] तो इन [सहायकों] के ग्रायत्त-सिद्धि वाला हो होता है । [श्रथ्यांत स्ववयं कार्य नहीं करता है । सहायकोंके द्वारा हो धीरललित नायकके सारे कार्यका सम्पादन होता है] । [१७] १६६ ।

'प्रादि' शब्दसे प्रधानायक [प्राटविक] तथा सामन्त शौर तपस प्रादिका प्रहरण होता है । इसमेसे कुछ अर्थ तथा काम [की सिद्धि] में सहायक होते हैं । कुछ धर्म [की सिद्धि] में सहायक होते हैं शौर धीरललित [नायक] सहायार्थसिद्धि हो होता है । सहायकोंका व्यापार नायकका हो व्यापार माना जाता है । क्योंकि [धीरललित] नायक इसो [सहायार्थसिद्धि के] रूपमें होता है । [सहायार्थसिद्धि धीरललित नायकको छोड़कर] धीरोदत्त प्रादि [शेष तीन प्रकारके नायक] तो (१) स्ववात्तसिद्ध, (२) अन्यार्थसिद्धि शौर (३) उभयत्सिद्धि

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अथ शुद्धान्तोचितं परिवारमाह—

[सू० २५४]—शुद्धान्ते कारुको द्वारस्थ: कंचुकी शुभकर्मसु । वर्षवरस्तु रक्षायां, निर्मृड: प्रेष्यो स्त्रियां: ॥ कार्याध्याने प्रतीहारी, रक्षा-स्वस्त्योमहत्तरा । पूर्वंस्थितविधौ वृद्धा, चित्रादौ शिल्पकारिका ॥

[१७] १७० ।। [१६] १७१ ॥

शुद्धान्तमन्यत्पुरं, तस्मिन्नाचारवान् श्रायो हीनस्वभाव: पुमान् ‘कारुक:’ । स द्वारपालो दच्चो नपुंसक: ‘कंचुकी’ श्रादृष्यजाति: स्त्रीस्वभाव: । तुच्छक्छसत्वो विनीतश्च ‘वर्षवर:’ । श्रहितनि:शक्वोडकर्मकरश्च निर्मृड: । स च स्त्रियां दास्यादीनां प्रेष्यकारक: । ‘रक्षा’ भृत्यादिकर्म । ‘स्वस्ति’मेङ्गलवाचनम् । ‘चित्र’ं पत्र-वल्ल्यादि । ‘श्रादि’शब्दाद् गन्ध-पुष्प-शिल्प-शय्या-ग्रासन-च्छत्र-परडन-संवाहन-न-श्राक्रीड-नव्यजनादिग्रह इति ॥ [१७-१८] १७१-१७? ॥

अथ नायिकां लचयति—

[सू० २५५]—नायिका कुलजा दिव्या क्षत्रिया पण्यकामिनी । श्रेष्ठतम ललितोदात्ता पूर्वोदात्ता त्रिधा परे ॥

[१६] १७२ ॥

[तीन प्रकारके] होते हैं । [१७] १६६ ॥

ग्रथ श्रगे अन्त:पुरके उपयोगी परिचारक-वर्ग का वर्णन करते हैं—

[सूत्र २५४]—ग्रन्त:पुरमें (१) कारुक, द्वारपास, कंचुकी शुभकाममें, (२) रक्षामें वर्षवर, (३) स्त्रियोंके प्रेषणा ग्रादिमें निर्मृड: [ये कार्यकर्ता होते हैं पुरष] । [१७] १७० ।

कार्यकी सूचना देनेमें प्रतीहारी, प्रभूत ग्रादि देते ग्रोर स्वस्तिवाचनमें महत्तरानी, पूर्वं-परम्परा विधिके पालनमें वृद्धा ग्रोर चित्रादि रचनामें शिल्पकारिका [ये स्त्रियाँ कार्यकत्री होती हैं] ।। [१६] १७१ ॥

शुद्धान्तका श्रयं ग्रन्त:पुर है । उसमें सदाचार, श्रेष्ठ ग्रोर परुषवहोन पुरुष ‘कारुक’ [विशेष कार्यकर्ता] होना चाहिए । द्वारपाल नपुंसक होना चाहिए । उत्तम जाति का ग्रोर विनीत [पुorुष] कंचुकी होना चाहिए । ग्रनून पुरुष वाला ग्रोर स्त्रीस्वभाव वाला [पुरुष] कंचुकी होना चाहिए । ग्रस्तंगत पुरुषवहीन ग्रोर प्रकमंण्य निर्मृंड [पुरुष] वर्षवर [ग्रन्त:पुर-रक्षक] होना चाहिए । वह दासी ग्रादि स्त्रियोंको इधर-उधर भेजनेवाला होता है । [कारिकाके रक्षा-स्वस्त्योमहत्तरा भाग में प्रयुक्त] ‘रक्षा’ पद भभूत ग्रादि देनेके ग्रर्थमें प्रयुक्त है । स्वस्ति श्रर्थात् मंगल वाचन । चित्र ग्रर्थात् पत्रवल्लो ग्रादि [की रचना] । ग्रादि शब्दसे गन्ध-पुष्प, शिल्प-शय्या-ग्रासन-च्छत्र, मण्डन संवाहन, खिलौना ग्रोर पचं ग्रादिका ग्रहण होता है ॥ १७०-१७१ ॥

ग्रथ नायिकाके लचणरको कहते हैं—

[सूत्र २५५] कुलजा दिव्या क्षत्रिया ग्रोर वेश्या [चार प्रकारकी] नायिका होती है । उनमेंसे श्रेष्ठतम [ग्रर्थात् वेश्या नायिका] ललितोदात्ता [ही] होती है । ग्रोर पहले [ग्रर्थात् कुलजा नायिका] ललितोदत्ता [ही] होती है ।

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क० १७२, सू० २४६ ] चतुर्थो विवेक: ३७५

'कुलजा' विप्र-वणिगादिकुलसम्भूता। 'ग्रान्तमा' इति पण्यकामिनी ललितोदात्त-रुपकेपु वर्णनीया कार्थप्रधानत्वात् । 'पूर्व' कुलजा पुनरुदात्ता, नय-विनय-गुरु-भक्तियादिवहुलत्वात् । 'परे' द्वाभ्यामन्वये । त्रिधा धीरा-ललित्य-उदात्तत्वेन त्रिप्रकारे । दिव्योत्तमजातित्वास्यां, कार्थनिष्ठत्वाच्च । शान्तत्वप्रकारस्तु भोगभूमिजत्वेन दिव्यानां दिव्यासाहचर्येऽपि प्राप्तत्वाच्च नात्रियासु नैव गृह्यते इति ॥ [१९] १७२ ॥

अथासां विशेषमाह—

[सूत्र २४६]—रागिण्येवाहसने नृपे दिव्ये च न प्रभौ। गरिएका क्वापि दिव्या तु भवेदेशा महीभुजः ॥

[२०] १७३ ॥

प्रहसनवर्जिते रुपके गरिएका नायिका रागिण्येव विभेया । यथा मुच्छुककटि-कायां चारुदत्तस्य वसन्तसेना । प्रहसने तु हास्यनिर्मित्तं श्रृङ्गारक्तापि । नृप-दिव्यनायक-कोशच गरिएका न नायिका निवन्धनीया । अपि गरिएका यदि दिव्या भवति, तदा राज्ञः 'क्वापि' इति, वृत्तानुरोधान्नायिकत्वेन भवति । यथोवंशी पुन्हवसः— 'नृपे दिव्ये च न प्रभौ' इत्यस्यापवादोऽयमिति ॥ [२०] १७३ ॥

कुलजा नायिका] उदात्ता होती है । [कुलजा दो प्रकारकी होती है ।] शेष दोनों दिव्या क्षत्रिया [धीरा, ललिता क्षत्रिया उदात्ता]

तीन प्रकारकी होती हैं । [१९] १७२ ।

कुलजा श्रेष्ठातु ब्राह्मण या वर्णिक् श्राद्धिक कुलमें उत्पन्न हुई । [क्षत्रिया नायिका श्रेष्ठ नहीं गिनी गई है इसलिए कुलजाकी व्याख्यामें क्षत्रियाका प्रभाव या वेध कुलोभ्द्नताका ही वर्णन किया है ।] ग्रान्तमा श्रेष्ठातु [पण्यकामिनी] वेध्या नायिका रुपकमें

ललितोदात्ता ही वर्णन करनी चाहिए । पूर्वा श्रेष्ठातु पहली कुलजा नायिका नीति विनय

श्रोर गुरुग्रों [माता पिता श्राद्धि] से भयसे युक्त होनेके कारण उदात्ता हो [वरेण्य होती

है] 'परे' श्रर्थात् [वेध्या तथा कुलजा] इन दोनोंमें भिन्न [दिव्या तथा क्षत्रिया रुप] शेष दोनों

[प्रकारकी नायिकाएं] घोरा, ललिता तथा उदात्ता रुप होनेसे तीन प्रकारकी होती है । दिव्य

तथा उत्तम जातिवाली होनेसे श्रोर काम तथा श्रर्थनिष्ठ होनेसे [दिव्य तथा क्षत्रिया

नायिकाएं घोरा, ललिता तथा उदात्ता] तीन प्रकारकी होती हैं । दिव्य नायिकाओंके भोग-

भूमिमें उत्पन्न होनेके कारण श्रोर क्षत्रिया नायिकाओंको दिव्यके साहचर्यसे प्राप्य होनेके कारण

धीर्षान्त वाला चौथे प्रकारका नहीं लिया जाता है । [श्रर्थात् घोर प्रशान्त नायकके समान

धीर्षान्त नायिका वर्णनीय नहीं होती है] ॥ [१९] १७२ ॥

[सूत्र २४६] अब इन [नायिकाओं] के विशेष भेदको कहते हैं—

रागिण्येवाहसने नृपे दिव्ये च न प्रभौ। गरिएका क्वापि दिव्या तु भवेदेशा महीभुजः ॥

प्रहसनसे भिन्न रुपकमें गरिएका नायिका ग्रनुरागिणी ही निबद्ध करनी चाहिए ।

प्रहसनमें ग्रनुराग रहित गरिएका नायिका भी हो सकती है । राजा श्रोर दिव्य नायकके

साथ गरिएका नायिकाका वर्णन नहीं करना चाहिए । कहीं-कहीं यह नायिका नायिका यदि

दिव्य हो तो उसका राजाके साथ सम्बन्ध वर्णन हो सकता है । [२०] १७३ ।

प्रहसनसे भिन्न रुपकमें गरिएका नायिका ग्रनुरागिणी ही दिखलानी चाहिए । जैसे

मृच्छकटिकमें चारुदत्तकी वसन्तसेना [ग्रनुरागिणी नायिका है] । प्रहसनमें तो हास्य [जनन]

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स्वथासां त्रैविध्यमाह—

[सूत्र २५७]—मुग्धा मध्यां प्रगल्भेति त्रिविधाः स्वुरिमाः पुनः । इमाः कुलजादय इति ।

स्वथ मुग्धा—

[सत्र २५८]—मुग्धा वामा रते स्वल्पमाना रोहद्रयः-समरा ।

रतं सुरतं, तत्र विपरीता ग्रानभिलाषात् । स्व्रात एषेपदी श्या-कोपा । रोहत प्रवरध-मानं वयो यौवनं स्मरश्च यस्मा इति ।

स्वथ मध्य—

[सूत्र २५९]—मध्या मध्यवयः-काम-माना मृद्वान्तमोहना ।

मध्या ग्रान्धिरूढप्रौढवयः-काम-माना यस्या । मृद्वान्तं श्रचेतनतन्यपर्यवसाय मोहनं सुरतं किंचिदभिलाषवश्या: । एषा च धीरा श्रधीरा धीराधीरा चेति त्रिधा । तत्र धीरा ऋतागसि प्रिये सोत्म्यासवकोक्तिपरा । अधीरा साश्रुपरुपभाषिणी । धीराधीरा साश्रुपासं परुषवकोक्तिवादिनीति ।

के कारण श्रानुरागहीन [गणिका नायिका] भी हो सकती है । राजा श्रौर दिव्य नायकों के साथ गणिका नायिकाका वर्‌सन नहीं करना चाहिए ; किन्तु यह गणिका यदि दिव्य हो तो 'क्वानि' इस कथन से कथा-वस्तुके श्रानुरोधसे कभी राजाकी नायिका भी हो सकती है । जैसे उर्वसी पुहुवराकी [नायिका है] । 'नृपे दिव्ये च न प्रभो' राजा श्रौर दिव्य नायकके साथ गणिकाका वर्‌सन नहीं करना चाहिए' इस [पूर्वोक्त नियम] का यह श्रपवाद है जिसमें दिव्य गणिकाको राजाको नायिका रूपमें वर्‌सन करनेकी श्रनुमति दी गई है] ।

ग्रव इन [नायिकाश्रों] के तीन भेद बतलाते हैं—

[सूत्र २५७]—[कुलजा दिव्या क्षत्रिया श्रौर गदिका] [चारों नायिकाएँ] फिर मुग्धा मध्यां श्रौर प्रगल्भा [भेदसे] तीन प्रकारकी होती है ।

ये स्वथांता कुलजा ग्रादि [चारों नायिकाएँ इनमेंसे प्रत्येकके तीन-तीन भेद होते हैं । कुल मिलाकर बारह भेद हो जाते हैं] ।

ग्रव मुग्धा [नायिकाका लक्षराते हैं]—

[सूत्र २५८]—'यौवन श्रौर कामके उठावपर स्थित' स्वल्प मान वाली तथा सुरत-व्यापारमें प्रतिकूल नायिका 'मुग्धा' नायिका कहलाती है ।

ग्रव श्रागे मध्यां [नायिकाका लक्षराते हैं]—

[सूत्र २५९]—मध्यम ग्रायु, मध्यम काम और मध्यम मान वाली तथा सुरतकालमें [ग्रानन्दातिरेकसे] मुग्धा पर्यन्त पहुँचनेवाली मध्यमा नायिका होती है ।

मध्यम श्रायु, श्रायु श्रौर प्रौढ, जिसकी श्रायु, काम तथा मान [ग्रौढ] होते हैं [वह मध्यां नायिका कहलाती हैं] मृद्वान्त श्रर्थात् श्रचेतन पर्यन्त जिसका 'मोहन' श्रर्थात् सुरत-व्यापार होता है । क्योंकि वह [सुरत-व्यापारसे] कुछ परिचित हो चुकी है । श्रौर यह धीरा, श्रधीरा तथा धीराधीरा भेदसे तीन प्रकारकी होती है । उनमेंसे प्रियके [ग्रानन्दोत्सव-सम्बन्धरूप] ग्रपराध-युक्त

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का० १७५, सू० २६०-६२ ] चतुर्थो विवेक: [ ३=२

अथ प्रगलभा—

[सूत्र २६०]—प्रगलभे द्वयोर्यो-मन्यु-कामा स्पर्शोऽप्यचेतना ।। [२२] १७५ ।।

इदं द्वयोर्द्वयोर्मन्यु-कोमल यस्याः । प्रियेषु सृष्टापि प्रकृष्टकार्मत्वाद्देशि चेतन्ये मुञ्चति । एषापि मध्यत्वात् त्रिप्रकारा । तत्र धीरा कृतागसि प्रिये साहित्यादार कृत्रिमासीनाम्य च रते । श्राधीरा सन्तर्ज्जन-ताडनपरा । धीराधीरा सोत्सवकोक्ति-परेऽति ।। [२२] १७५ ।।

अथ प्रकारान्तरेsषा नायिकानां प्रसिद्धान् भेदानाह—

[सूत्र २६१]—कार्यत: प्रोषिते पत्यावभूषा प्रोक्षितप्रिया । कार्यं धनर्ज्जन-राजप्रयोजनादि, तस्माद् देशान्तर्गते प्रिये, अभूषा केश-सम्मार्ज्जनादिभूषरहितेति ।

अथ विप्रलब्धा—

[सूत्र २६२]—विप्रलब्धा ससंकेते प्रेष्य दूतीमनागते ।। [२३] १७६ ।।

होनेऽपर व्यंग्यपूर्णां ताने देने वाली होती है । श्राधीरा रोते हुए कठोर वचन कहने वाली होती है । श्रौर धीराधीरा रोते हुए कयग्म श्रौर कठोर ताने सुनाती हैं ।

अब आगे प्रगलभा [नायिका का लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २६०]—पूर्वं श्रपसे द्वेष्ट्रयापु, काम तथा मान वाली श्रौर [प्रियके] स्पर्श-मात्रसे [प्रानन्दातिरेक से] मूर्छित हो जाने वाली [नायिका] प्रगलभा नायिका कहलाती है ।

[२२] १७५ ।

इदं श्रथ्यात् द्वेष्ट्र श्रापु, मान तथा काम जिसके हैं वह [इद्र्वयोर्-मन्यु-काम हुई] । प्रस्यन्त उप्र काम-वासनासे मुक्त होनेके कारण यह [प्रगलभा नायिक] प्रियतमके स्पर्शमात्रसे भी होर्ष-हावास भूल जाती है । यह भी मध्यकी तरह [धीरा-ग्राधीरा श्रौर धीराधीरा भेदसे] तीन प्रकारकी होती है । उनमेंसे धीरा प्रियके अपराधी होनेपर श्रपने श्राकारको छिपाते हुए [प्रियके प्रति] क्रोध प्रकट करती है, किन्तु गुप्तरूपसे उदासीन हो जाती है । श्राधीरा प्रियकेो डांट-फटकार करती श्रौर मार तक लगाती है । धीराधीरा व्यंग्यपूर्ण ताने सुनाती है [२२] । १७५ ।।

अब नायिकाग्रोंके ग्रन्थ प्रकारसे प्रसिद्ध भेदोंको कहते हैं—

[सूत्र २६१]—कार्यवश प्रियके बाहुर चले जानेपर शरीरकी सजावट न करनेवाली प्रोक्षितपतिका नायिका कहलाती है ।

कार्यं श्रथ्र्यांत् धनोपार्ज्जन श्रथवा राजाका प्रयोजन श्रादि, उसके कारण प्रियके देशांतर को चले जानेपर भूषरहित श्रथ्र्यांत् केशप्रसाधन श्रादि रूप भूषससे रहित [नायिका 'प्रोक्षित्पतिका' कहलाती है ।

अब श्रागे विप्रलब्धा [नायिकाका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २६२]—[नायिकाके साथ मिलनका] संकेत करके श्रौर दूतीको भेज कर भी [प्रियके] न श्रानेपर [नायिका] 'विप्रलब्धा-नायिका' कहलाती है ।। [२३] १७६ ।।

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पत्यावृत सर्वेषु स्त्रोभेदेषु स्मरस्यैवम्। तेन कार्यतः कृतसंकेतें दूतीं वा प्रेष्यनागते पत्यै ‘विप्रलब्धा’ इति सम्बन्धः ॥ [२३] १७६ ॥

[सूत्र २६३]—खण्डिता खण्डयत्यन्यसक्त्या वासकमोष्यन्ता । आपरस्याभिसर्वंगादचितं वासकर्म करवांइ प्रिये इष्युवावती खण्डिता। विप्रलब्धायां नान्यस्यासक्तिरित्यस्या भेदः इति ।

ग्रथ कलहान्तरिता—

[सूत्र २६४]—ईर्ष्याकलहनिष्क्रान्ते कलहान्तरितातिभाक् ॥ [२४] १७७ ॥ ईर्ष्याकलहैन तत्समीपान्निष्क्रान्ते तत्सविधमनागत्यति प्रिये पीडावती कलहान्तरितेति । ज्ञातेऽद्यैषा कलहपूर्वकं परस्परमसंयोगामिलाषः। पूर्वत्र तु नायिका समागमार्थिनी कलहाभावान्, किन्तु अन्यासंगिनि प्रिये ईर्ष्यामात्रवतीति विशेष इति

ग्रथ विरहोत्कण्ठिता—

[सूत्र २६५]—विलम्बयत्यदृष्टौप विरहोत्कण्ठितातिसुका ।

‘पत्यौ’ यह पद सब स्त्रियों [ग्रथातु सब नायिकाओं ] के साथ सम्भव लेना चाहिए । इसलिए कार्यवश मिलनेका संकेत करके और दूतोंको भेज करके भी कार्यवश पतिके न ग्रा सकनेपर विप्रलब्धा नायिका होती है यह सम्बन्ध है ॥ [२३] १७६ ॥

ग्रव ग्रागे खण्डिता [नायिकाका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २६३]—खण्डिता नायिका [पत्नी] ग्रन्य स्त्र्रीके प्रति ग्रासक्तिके कारण ग्रन्थ स्त्र्रीके प्रति होकर [ग्रन्थ स्त्र्रीके पास जाते समय उसे] वस्त्रों को खण्डित कर देती है । ग्रन्थ स्त्र्रीके प्रति ग्रासक्तिके कारण सुन्दर वस्र्र ग्रादिको धारण करते समय पतिके प्रति ग्रसूयावती नायिका ‘खण्डिता’ कहलाती है । विप्रलब्धा नायिका] में [उसके पति में दूसर स्त्रीके प्रति ग्रासक्त नहीं होती है यह [खण्डिता तथा विप्रलब्धा का] भेद है ।

ग्रव ग्रागे कलहान्तरिता [नायिकाको लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २६४]—ईर्ष्य-कलहके कारण पतिके बाहर चले जानपर दुःखी होने वाली ‘कलहान्तरिता’ नायिका कहलाती है । [२४] १७७

ईर्ष्याकलहके कारण उस [स्त्रो] के पाससे प्रियके निकल जाने और समीपमें न ग्राने पर पीडा ग्रनुभव करने वाली नायिका ‘कलहान्तरिता’ होता है । इसमें ईर्ष्या के कारण ग्रापस में मिलने की इच्छा नहीं होती है । पहिली [खण्डिता] नायिका तो कलह न होने के कारण समागम के लिए इच्छुक है, किन्तु ग्रन्य के साथ सम्बन्ध रखने वाले प्रिय के विषय में केवल ईर्ष्या वाली है यह भेद है । [२४] १७७॥

ग्रव प्रागे विरहोत्कण्ठिता [नायिकाका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २६५]—ग्रथपना कोई ग्रपराध न होनेपर भी [ग्रन्थ स्त्र्रीके प्रति ग्रासक्तिके कारण] विलम्ब करनेंपर उत्कण्ठा [नायिका] विरहोत्कण्ठित कहलाती है ।

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चतुर्थो विवेकः

अ्रनन्यनारीकथ्यासंगादिना प्रस्तुतस्त्रोकोत्कृतापराधाभावेऽपि तत्रागन्तुकामेऽपि विलम्बकुरङ्गो पत्या नायकोत्सुकया सती विरहोक्तक्ठिता । अ्रत्र प्रियागमनमिच्छादवश्यस्मावि, परस्परं कलहश्च नास्तीति सर्वाभ्यो भिन्नेयमिति ।

अ्रथ वासकसज्जा—

[सूत्र २६६]—हृष्टा वासकसज्जात्मन्यलंकृतिपरेऽप्यति ॥ [२५] १७८ ॥

प्रियेषा सहू रात्र्यादिवसं वासक: । तत्रोचिते उद्यमपराः । ‘एष्यति’ विवक्षित-कालागमनवति प्रिये स्वमरङ्गवती नायिका वासकसज्जा । पूर्वासु सर्वासु विप्रलम्भ-शृङ्गारो ऽत्र तु सम्भोगशृङ्गार इति मेِد: ॥ [२५] १७८ ॥

[सूत्र २६७]—सु भगवमिननी वध्वासनने स्वाधीनभर्तृ का ।

सुभगमात्मानं मन्यते या नायिका सा वध्वे श्रासनने च पत्या एतदीयरूप-यौवनाद्याशिष्टहृदयत्वान् स्वाधीनभर्तृ का । श्रासनन्वर्तिनप्रियतमवेन पूर्वास्या भिन्नेयमिति ॥

प्रस्तुत श्रोका अ्रपराध न होनेपर भी उस [अपनी] स्त्रीके प्रति श्रानेकी इच्छा रखते हुए भी दूसरी स्त्रीके पास होने श्रादिके कारण पतिके विलम्ब करनेपर नायकसे मिलनेके लिए उत्सुक नायिका ‘विरहोक्तक्ठिता नायिका’ कहलाती है । उसमें प्रियका श्रागमन जोत्र ही ग्रवश्य होने वाला श्रौर परस्पर कलह नहीं है इसलिए यह पूर्वकी सब नायिकाश्रों से भिन्न है ।

ग्रब श्रागे वासकसज्जा [नायिकाका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २६६]—पतिके श्रानेको श्राशा होनेपर प्रसन्न होकर श्रापनेको सजानमें लगी हुई नायिका ‘वासकसज्जा’ कहलाती है ।

रात्रि श्रादिको प्रियके साथ रहना ‘वासक’ है । उसके योग्य ध्यापारमें लगी हुई [वासक-सज्जा कहलाती है] । ‘एष्यति’ श्रर्थात् प्रियके विवक्षित कालपर श्रागमन करनेकी श्राशा होनेपर श्रापनेको सजानमें लगी हुई नायिका ‘वासकसज्जा’ कहलाती है । पहले कही हुई [प्रोषितपतिका] से लेकर ‘विरहोक्तक्ठिता’ तक पाँच] सब नायिकाश्रोंमें विप्रलम्भ शृङ्गार है । इस [छठी वासकसज्जा] में सम्भोग शृङ्गार है यह इसका ग्रन्य सब नायिकाग्रोंसे भेद है ॥ [२५] १७८ ॥

ग्रब श्रागे स्वाधीनभर्तृ का [नायिकाका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २६७]—[पतिके] श्रपने वशमें और सदा समीपवर्त्ती होनेपर श्रपनेको सुन्दर समभने वाली नायिका ‘स्वाधीनभर्तृं का’ कहलाती है ।

जो नायिका श्रपनेको सुन्दर समभती है वह पतिके श्रपने वशमें श्रोर समीपवर्त्ती होनेपर उसके रूप यौवन श्रादिसे हृदयके वशीभूत हो जानसे स्वाधीनभर्तृ का कहलाती है ।

प्रियके समीप उपास्थित होनेके कारण यह पिछली [अ्रर्थात् वासकसज्जा नायिका] से भिन्न है ।

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अथाभिसारिका—

[सूत्र २६६]—सरन्ती सारयन्ती वा रिरंसुरभिसारिका ॥

सरन्ती स्वयं तस्य पाश्र्वे, सारयन्ती वा तं प्रियमात्मसमीपे । रिरंसुः सुरतार्थिनी नायिका ऽभिसारिका । श्रत्र नायिकाया: प्रियसन्निधौ गमनमिति भेद: इति ॥ [२६६] १७९ ॥

अथ स्त्रीणां यौवनस्थान धर्मोनाह—

[सूत्र २६७]—भावाद्या यौवने स्त्रीणामलङ्कारास्त्रयोदशजा: । दश स्वाभाविकाश्चैते क्रियारूपास्त्रयोदश ॥[२७]१५०॥

सति भोगे गुणा: सप्तायत्नजाश्च स्वभावजा: । नावश्यम्भाविनोऽप्येषा, वृत्तित: स्त्रीषु मुख्यत: ॥[२८] १५१ ॥

यौवने उत्तमप्रकृतीनां च, वनितानां च भाव-हावादयोऽलङ्कारा: कटक-केयूर-दिवद् वपुरविभूषाहेतव: श्राद्धर्मभवन्ति । बाव्येऽपि किञ्चिदुन्मीलन्ति । वार्धके तु प्राचुर्येए नश्यन्ति । अते च यौवने स्त्रीणां प्राधान्यतोऽलङ्कारा: । पुंसां तु त्साहादयो मुख्यत्वो

ग्रब प्रागे ‘अभिसारिका’ [नायिकाका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २६६]—रमण करनेकी इच्छासे स्वयं [प्रियके पास] जाने वाली ग्रथवा प्रिय को ग्रापने पास बुलाने वाली नायिका प्रभिसारिका कहलाती है । [‘सरन्ती’ ग्रर्थात् स्वयं उसके पास जाती हुई ग्रथवा ‘सारयन्ती’ ग्रर्थात् उस प्रियको

ग्रापने पास बुलाने वालो । रिरंसु ग्रर्थात् सुरताभिलाषिणी नायिका ऽभिसारिका कहुलाती है । इसमें नायिका स्वयं प्रियके पास जाती है [और स्वाधीनभर्तृकासे इसकाके] भेद है ॥ [२६६] १७९ ॥

ग्रब ग्रागे स्त्रियोंके [अथात् नायिकाग्रोंके] यौवनमें होने वाले धर्मोंको कहते हैं—

[सूत्र २६७]—यौवनकाले स्त्रियोंके भाव आदि तौन ग्राङ्गिक ग्रौर दस स्वाभा- विक ग्रलङ्कार होते हैं । ये तेरहों [ग्रलङ्कार द्रव्य रूप न होकर ] क्रिया-रूप होते हैं ।

[२७] १५० ।

[प्रायका] सम्भोग होनेपर बिना प्रयत्नके उत्पन्न होने वाले सात स्वाभाविक गुण होते हैं जो श्रवश्यम्भावी नहीं होते हैं । ये बीस [१३+७=२०] गुण मुख्य रूपसे स्त्रियोंमें होते हैं जो ग्रवश्यम्भावी नहीं होते हैं । [२८] १५१ ।

यौवनमें उत्तम प्रकृति वाले [पुरुषों] ग्रोर स्त्रियोंमें भाव-हाव ग्रादि ग्रलङ्कार कटक- केयूर ग्रादिके समान शरीरकी शोभाके जनक उत्पन्न हो जाते हैं । बाल्यावस्थामें भी कुछ-कुछ उदित होते हैं, ग्रोर वृद्धावस्थामें श्राधिकांश प्राय: नष्ट हो जाते हैं । यौवनमें ये स्त्रियोंके मुख्य रूपसे ग्रलङ्कार होते हैं । पुंषोंके तो उत्साहादि मुख्य रूपसे ग्रलङ्कार होते हैं । इसीलिए उद्धतादि नायकोंके साथ धैर्यादि विशेषण कहा गया है । पुरूषोंमें भावादि

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क० ११२, सू० २७० ] चतुर्थो विवेक: [ ३२५

डलङ्कारा: । तेन नायकभेदेषूद्भता हि धीरत्वं विशेषेऽपमुक्ततम् । भावादयस्तु पुरुषार्थान् उत्साहाद्याच्छादिता एव भवन्तीत ते गौणाः । भावादीनां च विशतिसंख्यात्वमत्रो- दृष्टभेदापेक्षया, श्रपरथा यौवने वनितालङ्काराणामनन्तसंख्यात्वमेव । तत्र प्रथमे त्रयो- ऽङ्गाद्, यौवनोद्दोः शशालिनः प्रियहृष्ट-वस्त्र-माल्यादिबाह्यानिमित्तरहिताद् गात्रमात्राद्- जयन्ते । तेभ्यः परे दश स्वस्माद् स्त्रलङ्काराद् भवन्ति प्रियाप्रभोगानुपभोगप्रयोगान्ते । एते च दश एक-द्वि-च्यादिविकल्पेन भावात्रावश्यम्भाविनः । श्रथाङ्गजःस्वाभावि- काश्च क्रियारूपाः स्त्रीचेष्टात्मकाः । मिलितास्त्रयोदशसंख्याः । ततः परे सप्त यत्न- श्रान्तःपरिस्पन्दं विना देहधर्मरूपाः पुरुषोपभोगे सति भवन्ति । पूर्वे तु चेष्टात्मकाः । इच्छातो यत्नस्ततो देहचेष्टेति यत्नजा इति ॥ [२७-२८] १५०—१५१ ॥

(१) श्रथ भावादीनां प्रत्येकशो लच्यमाह—

[सूत्र २७०]—भावो वागादिवैशिष्ट्यं यं चिह्नं रत्युत्समत्कयोः । वाचां, श्रादिशब्दात् कर-पादादीनां वैशिष्ट्यं यद्द्‌ हृदो विकारः श्रन्तर्गतैरतिभावस्य पामरनायिकावेलङ्गयेन उत्तमप्रकृतित्वस्य च निश्चयहेतुर्भावः । भवति हि तथाभूतं वागादिवैचित्र्यमुपलभ्य उद्बुद्धुब्धोदयमन्तःकामप्रदीपोभया इति, उत्तमप्रकृतिश्च नायिके- यामिति सहृदयैः निश्चीय इति ।

[ग्रलङ्कार] उत्साहादि [पुरुषोचित अलङ्कारों] से प्राच्छादित हो होते हैं इसलिए [पुरुषोंमें] उनको गौण कहा गया है । भाव श्रादिकी बीस संख्या यहां गिनाए गए [बीस] भावोंकी हष्टिसे ही है । वैसे तो यौवनमें स्त्रियोंके ग्रलङ्कारोंकी संख्या ग्रनन्त होती है । उन [बीस ग्रलङ्कारों] में से [भाव-स्थाव श्रङ्ग हेला ये] पहले तीन यौवनोदयसे युक्त शरीरमें प्रियके देखने ग्रथवा वस्त्र-माल्य आदिके बिना बाह्य साधनोंके बिना केवल शरीरमात्रसे उत्पन्न होते हैं [इसलिए इनको ग्रङ्ग कहा गया है] । ग्रोर उनसे ग्रागले दस स्वयं अपने रतिरूप भावसे प्रियका उपयोग होने या न होनेपर उत्पन्न होते हैं । ये दस [ग्रलङ्कार] कहीं एक, कहीं दो, या कहीं तीन ग्रादि रूपसे भी उत्पन्न हो सकते हैं । इसलिए वे ग्रथवद्भावी नहीं होते हैं । ग्रोर ग्रङ्ग तथा स्वाभाविक सभी ग्रलङ्कार क्रियारूप श्रथात् स्त्रियोंके चेष्टात्मक होते हैं । [ग्रङ्गज तथा स्वाभाविक दोनों प्रकारके ग्रलङ्कारोंको] मिलाकर तेरह संख्या होती है । उनके बाद सात [ग्रलङ्कार] पुरुषका उपयोग हो जानेके बाद [स्त्रियोंके भीतर] यत्न श्रथात् भीतरी व्यापारके बिना ही देह धर्मके रूपमें प्रकट होते हैं । पहले [तेरह] तो चेष्टात्मक होते हैं । [पर ये सात चेष्टात्मक नहीं ग्रपितु देह धर्मरूप होते हैं यह इनका भेद है] । इच्छासे यत्न होता है । यत्नसे देह-चेष्टा होती है । इसलिए [देह-चेष्टात्मक पहले तेरह ग्रलङ्कार] यत्न ग्रोर ग्रनन्तम् सात ग्रलङ्कार अयत्नज] होते हैं ॥ [२७-२८] १५०—१५१ ॥

[सूत्र २७०]—वाचिका श्रङ्ग श्रादि शब्दसे हस्त-पाद ग्रादिके बन्धादि य प्रथात् मनोहर विकार, भीतर रहने वाले रति-भावका ग्रङ्गर पामर नायिकासे भिन्न उत्तम प्रकृतित्वके निदर्शक चिह्न, 'भाव' कहलाता है । उस प्रकारके वाणी श्रादिके वैशिष्ट्यको देखकर इसके भीतर काम-प्रदीप प्रज्वलित हो गया है इस प्रकारका ग्रङ्गर यह नायिका उत्तम

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३६६ ] नाट्यदर्पणम् [ का० १८३, सू० २७१-७२

(२) हाव:

[सूत्र २७१]—नेत्रादिविकृतं हाव: सशृङ्गारमसन्ततम् ॥

नेत्रयो:, ग्रादिश्वाद्दौ भ्रू-चिबुक-ग्रीवादेश्च सातिशयो विकार: शृङ्गारोचित उद्भ्रमितोन्मीलन-विश्रान्तिसम्भ्रमसन्ततो हाव इति ॥ [२५] १८२ ॥

(३) हेला—

[सूत्र २७२]—तदेव सन्ततं हेला, तारुण्योद्बोधशालिनी ।

तदेव सातिशयं नेत्रादिविकृतं सन्ततं प्रसरणशीलं सशृङ्गारं समुचितविभाव-विशेषोपम्रहविरहादनियतविषयं प्रबुद्धरतिभावसमन्वितं हेला । ग्रास्यां च तारुण्यस्य प्रकर्यगमनं । एते च त्रयोदशाः परस्परसमुल्थित्या इति भवन्ति । तथा हि कुमारो-शरीरे प्रौढतमकुमारगत-हाव-भाव-हेलादर्शन-श्रवणाभ्यां भावाद्योऽनुरूपा विरूपाश्च भवन्ति । किन्तुत्तरानपेक्ष्य एवं भावः हावस्तु भावापेक्षः । हावापेक्षी च हेला ।

पूर्वपूर्वोत्तरर्ष्वसप्तावधानयोरिति प्रकृतिको है इस प्रकारका निश्चय सहुदयोंको हो जाता है [इसलिए भावको रति तथा उत्तमस्वका चिह्न कहा गया है] ।

प्रब श्यामे 'हाव' [का लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २७१]—शृङ्गारयुक्त किन्तु निरन्तर न रहनेवाला नेत्रादिका विकार 'हाव' कहुलाता है । [२५] १८२ ।

दोनों नेत्रोंका, और ग्रादि शब्दसे भौंह, ठोड़ी, गर्दन ग्रादिका श्युंगारके ग्रनुकूल विशेष प्रकारका [विकार] उठ-उठकर विर्थांत हो जानेके कारण निरन्तर न विद्यमान रहने वाला विकार 'हाव' कहलाता है ॥ [२५] १८२॥

प्रब श्यामे 'हेला' [का लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २७२]—यौवनोक्तर्ष्वपर उदित और निरन्तर रहनेवाला वही [नेत्रादिका विशेष प्रकार भ्युंगारके अनुरूप श्रोैर निरन्तर विद्यमान रहनेवाला नेत्र ग्रादिका वही विशेष प्रकार का विकार किसी विशेष कारण [विभाव] के सम्बन्धके बिना, ग्रनियत-विषय [ग्रर्थात् किसी व्यक्तिविशेषसे सम्बद्ध न होनेवाला] प्रबुद्ध सामान्य रतिभावसे सम्बन्धित [वही नेत्रादि

का विशेष प्रकारका विकार] 'हेला' कहुलाता है । इस [हेला] में यौवनोदय प्रकर्यको प्राप्त हो जाता है । [भाव, हाव ग्रौर हेला] तीनों ग्राङ्गिक विकार एक-दूसरेसे भी उदित होते हैं । जैसे कि कुमारोके शरीरमें प्रौढतम कुमारके भाव हाव हेलाको देखने या सुननेसे [उस

कुमारके प्रति रति या प्रहृति होनेके कारण] ग्रनुरूप या विरूप भावादि उत्पन्न होते हैं । [ये परस्पर ग्रन्योन्य भावादि होते हैं] किन्तु इनमेंसे भाव उत्तरवर्त्तों [हावादि] की ग्रपेक्षा नहीं रखता ग्रौर हावके बाद उत्पन्न होनेवाली] हेला हावकी ग्रपेक्षा करती है [हाव के बिना उत्पन्न नहीं होती है] । ग्रौर हावके बाद उत्पन्न होनेवाली] हेला हावकी ग्रपेक्षा करती है [हाव

के बिना उत्पन्न नहीं होती है] । इन [हाव तथा हेला] दोनोंके पूर्व-पूर्वक उत्तरप्त रूप होते हैं ।

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का० १५४, सू० २७३-७४ ] चतुर्थो विवेक: [ ३५७

अथ स्वभावजेपु प्रथमं विभ्रममाह—

[सूत्र २७३]—रागादिना विपर्य्यास: क्रियारामथ विभ्रम: ॥

॥ [३०]१८३ ॥

अथेति स्वांगिकान्तर्यार्थ: । राग: प्रियतमे प्रत्ययो बहुमानः । श्रान्तिदैन्यादि हर्षादिग्रह: । मदो मचकृतत्क्षितौकस: । हर्ष: सौभाग्यगर्व: । ज्ञान्यथ वक्तव्येडन्यथा-वचनं, हसतेनादातव्ये पादेनादानं, कटीयोग्यस्य करेठे निवेशानं, इत्यादिक्श्चेष्टाविपर्य्यसो

विभ्रम: । विशिष्टविभावलाभे रतिप्रकपौद देहविकार: स्वाभाविक: । श्रृंगजास्तु विशिष्टविभावमन्तरैर्योगेति विशेष: ॥ [३०]१८३ ॥

[सूत्र २७४]—विलास: प्रियहृष्ट्यादो चारुत्वं गात्रकर्मणो: ।

आदर्शबन्धात् सम्भाषणादिम्रह: । चारुत्वं तार्कालिक: सातिशयो विशेष: । कर्मस्थासासन-गमन-निरोचेष्टादिचेष्टति ।

अथ विच्छित्ति:

अर्थात् अपने पूर्ववर्ती भावके उत्कर्ष रूप होनेसे हाव, भावकी प्रेक्षा करता है और अपने पूर्ववर्ती हावके उत्कर्ष-रूप होनेसे हावकी प्रेक्षा करती है।

[इस प्रकार तीन प्रकारके श्रांगिक धर्मोंको कह चुकनेके बाद] अब श्राभ स्वाभाविक [धर्मों] मेंसे पहले 'विभ्रम' को कहते हैं—

[सूत्र २७३]—रागादिके कारण किया उलट-पुलट हो जाना 'विभ्रम' कहलाता है ।

॥[३०]१८३॥

'अथ' इस शब्दका अर्थ श्रांगिक [धर्मोंके वर्णन] के बाद यह है । राग अर्थात् प्रियतम के प्रति ही श्रध्यन्त श्रादर । श्रादि शब्दसे मद, हर्ष श्रादिका ग्रहण होता है । मद अर्थात् मदके कारण उत्पन्न चित्तकी प्रसन्नता । हर्ष अर्थात् अपने सौभाग्यका गर्व । कुछ और कहनेके स्थान पर कुछ और कहना, हाथसे पकड़ने योग्यको पैरसे पकड़ना, कमरमें पहिनने योग्यको गलेमें डाल लेना [यह सब 'क्रियारामथ विभ्रम:'] 'विभ्रम' कहलाता है । विशिष्ट कारण [विभाव] के प्राप्त होनेपर रतिके प्रकट होने बेहमें विकार होना स्वाभाविक

है [ इसलिए इनको स्वाभाविक धर्म कहा गया है ] और श्रांगिक विकार तो विशिष्ट कारणके बिना [शारीरमात्रसे उत्पन्न] होते हैं यह [इन दोनों प्रकारके धर्मोंका भेद है] ॥[३०]१८३॥

[सूत्र २७४]—प्रियके दर्शन श्रादिसे शारीर कर्मोंमें विशेष सुकुमारता 'विलास' कहलाता है ।

ग्रादि शब्दसे सम्भाषणादि ग्रहण होता है । चारुत्व अर्थात् उस समय उत्पन्न होनेवाला विशेष प्रकारका सौन्दर्य । कर्म अर्थात् खड़ा होना, बैठना, चलना और देखना श्रादि

चेष्टाएँ ।

अब श्राभो 'विच्छित्ति' [का लक्षण करते हैं]—

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[सूत्र २७५] -वेषाल्पतैव विच्छित्तिः परां शोभां वितन्वती ॥

स्वल्पाप्याकल्परचना प्रकृतिसौभाग्यादिगुणयुक्त्वात् । परां शोभां स्वियाः वितन्वती विच्छित्तिरिति ॥ [३१] १८४ ॥

[सूत्र २७६] -लीला दयितवागादेः स्वे न्यासो बहुमानतः । आदिशब्दाद् वेष-ध्यापारादिग्रहः । प्रियतमप्रीत्यतिशयेन दयितवागादेः सङ्घृज्यां स्वस्मिन् न्यासः सम्यक् करसां लीलैति ।

[सूत्र २७७] -विव्वोकोडनादरो मान-दर्पाभिलाषटेडपि वस्तुनि ॥

मानक्षत्तसमुन्नतिः । दर्पः सौभाग्यगर्वः । इष्टं वस्तुमाल्यालङ्कारादौ । [३२] १८५ ॥

[सूत्र २७८] -विहुतं जल्पकालेपि मौनं ही-व्याज-मौग्ध्यातः ।

जल्पकालो भावप्रकाशनोचितः समयः । मौनमभावग्रामः । व्याजः छद्म । उपलक्षणात् ।

[सूत्र २७५] -अत्यधिक सौन्दर्यको प्रदर्शित करनेवाला स्वल्प वेष-धारण ही विच्छित्ति कहलाती है ॥ [३१]१८४॥

त्रियको भौतर उनके प्रकृष्ट सौभाग्यादि गुणोंसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त सौन्दर्यं को प्रकाशित करनेवाला थोड़ा-सा भी वेष-विन्यास 'विच्छित्ति' कहलाती है ॥ [३१] १८४॥

[सूत्र २७६] -प्रियके वचन आदिको ग्रहणपूर्वक अपने भीतर रखना लीला कहलाती है ।

ग्राह्य वचवसे वेष और व्यापार आदिका ग्रहण होता है । प्रियतमके प्रति ग्रत्याधिक प्रेम होनेके कारण प्रियतमकी वाणी आदिको शृङ्गाराभिव्यक्तिपूर्वक अपनेमें लगाना प्रथमतः यथार्थ बनाना 'लीला' कहलाती है

[सूत्र २७७] -मान ग्रथवा दर्पके कारण इष्ट वस्तुके प्रति भी अनादर दिखलाना 'विव्वोक' कहलाता है [३२]१८५॥

मान प्रथात् चित्तका चढ़ा होना । हर्ष प्रथात् सौभाग्यका गर्व । इष्ट प्रथात् वस्त्र माला, अलङ्कार प्रादि ॥ [३२] १८५॥

[सूत्र २७८] -लज्जा ग्रथवा किसी बहाने ग्रथवा मुग्धताके कारण बोलने है ।

उचित समयपर भी न बोलना 'विहुत' कहलाता है ।

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क० १५७, सू० २७६-५१ ] चतुर्थी विवेक: [ ३५२

त्वादनायत्तत्व-बाल्यादयोऽपि गृह्यन्ते। आत्मनो हृथ्यादिप्रकाशननिमित्तं समयेऽप्य- भाष्यां विहितमित्यर्थः।

अथ ललितम—

[सूत्र २७६]—ललितं गात्रसंचारः सुकुमारो निरर्थकः।।[३३]१५६।।

गात्रस्य नेत्रह्रदयोः; संचारो व्यापारः। सुकुमारोऽतिमनोहरो, दृश्यो विना दृष्टिचेपो, ग्राह्यमते हृथादिचर्याप्रतिरित्येव निष्प्रयोजनो ललितम्। सम्प्रयोजनस्तु व्यापारो विलास, इत्यनयोर्भेदः इति ।। [३३] १८६ ।।

अथ कुडुमितम—

[सूत्र २५०]—कचौष्ठादिग्रहे कोपो मूषा कुडुमितं मुदि ।

आदिशब्दात् स्तन-करादिग्रहः। प्रियतमेन कचादिपु गृहमाणाया ग्रान्तः- प्रमोदे डपि व्यलीककोपकरणं कुडुमितमिति ।

अथ मोद्रायितम—

[सूत्र २८१]—मोद्रायितं प्रियेक्षादौ रागतो गात्रमोटनम् ।।[३४]१५७।।

प्रियस्य दर्शन-श्रवणादिपु तद्रावभावनात्मकरागवशाद्गमर्दनपर्यन्तं नेह।पितरश्चेष्टितमिति ।। [३४] १८७।।

जल्पकाळ श्रर्थात् भाषणके उचित समय मौन श्रर्थात् चुप रहना । व्याज श्रर्थात् बहाना । इसके उपलक्ष्य रूप होनेसे परवशता श्रौर बाल्य श्रादिका प्रहरण होता है । श्रपनी लज्जा श्रादिके प्रकाशनके लिए बोलनेके प्रवसरपर भी न बोलना 'विहित' कहलाता है यह श्रभिप्राय है ।

ग्राबे 'ललित'का [लक्षएा करते हैं]—

[सूत्र २७९]—अर्थ ही नझाकतके साथ अंगोंका चलाना 'ललित' कहलाता है ।

गात्र श्रथवा नेत्र श्रौर हृथ श्रादिका, संचार श्रर्थात् संचालन-चापार । सुकुमार श्रर्थात् प्रियतन्त मनोहर । [जैसे] दृश्य विषयके न होनेपर भी दृष्टि बौधना, पकड़ने योग्य किसी वस्तुके न होनेपर भी हाथ श्रादिकाका चलाना । इस प्रकारका निष्प्रयोजन व्यापार 'ललित' कहलाता है । श्रौर सम्प्रयोजन व्यापार 'विलास' कहलाता है । यह इन दोनोंका श्रेद है ।।[३३]१५६।।

ग्रब श्राबे 'कुट्टमित' [का लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २८५]—[प्रियतम द्वारा] केश, प्रोठ श्रादि पकड़े जानेपर [हृथके भीतर तो प्रसन्नताके होनेपर भी [बाहर] मिथ्या क्रोध दिखलाना 'कुट्टमित' कहलाता है ।

ग्रादि शब्दसे स्तन, कर श्रादिकाका प्रहरण होता है । प्रियतमके द्वारा केश श्रादिके पकड़े जानेपर भी भीतर प्रसन्नता होनेपर भी भ्रूभङ्गमुख नाराज होता 'कुट्टमित' कहलाता है ।

ग्रब ग्राबे मोद्रायित [का लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २८१]—प्रियतमके दर्शन श्रादिके होनेपर अंगोंका मरोड़ना 'मोद्रायित' कह-

है ।।[३४]१५७।।

प्रियतमके दर्शन, श्रवणए, ग्रनुकरणएादिके होनेपर तन्मयतारूप रागके कारएा [विशिष्ट] अंगोंके सर्दन पर्यन्त स्त्र्रीकृत व्यापार 'मोद्रायित' कहलाता है ।। [३४] १८७।।

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अथ किलकिचितम्—

[सूत्र २५२]—मुहुः स्मिताहृकम्पादेः सङ्करः किलकिचितम् ।

ग्रादिशब्दाद् भय-हसित-श्रम-रोष-गर्व-दुःखाभिलाषादिग्रहः । गवाक्षं वारं वारं स्मितादीनां सङ्कीर्णतया योषिता यत्करसं तत् किलकिचितम् । एते दश स्वाभाविका भुक्तायामुक्त्यां च योषिति रतिभावोद्बोधाद् भवन्तीति ।

यथार्थतज्जेयु सप्तसु शोभा प्रथमं लभ्यते—

[सूत्र २५३]—ग्रौज्ज्वल्यं यौवनादीनामथ शोभोपसोगतः । [३५]१८५ । यौवनस्य, ग्रादिशब्दाद् रूप-लावण्यादीनां च पुरुषेषोपसुज्यमानानां यदौज्ज्वल्यं छायाविशेषः सा शोभा । अथेति स्वाभाविकान्तर्यर्थ इति ॥ [३५] १८५ ॥

अथ कान्ति-दीप्ती—

[सूत्र २५४]—सा कान्तिः पूर्वैरसम्मोगा दीप्तिः कान्तेसु विस्तारः । शोभैव रागावतारचना कान्तिः कान्तिरेव चातिविस्तीर्णा दीप्तिः । यौवनादीनामौज्ज्वल्यस्य मन्द-मध्य-तीव्रावस्थाः क्रमेण शोभा-कान्ति-दीप्तय इत्यर्थः इति ।

ग्रब ग्रागे 'किलकिचित' [का लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २५२]—वार-वार हस्सने, रोने प्रोर कम्पन ग्रादिका सम्मिश्ररा 'किलकिचित' कहलाता है ।

ग्रादि शब्दसे भय, हास्य, श्रम, रोष, गर्व, दुःख और ग्रभिलाष ग्रादिका प्रहरण होता है । गवंके कारण स्त्रियोंके द्वारा हँसने, रोने ग्रादिका जो बार-बार सङ्कीर्ण रूपसे किया जाना है वह 'किलकिचित' कहलाता है [यह ग्रभिप्राय है] । भुक्ता तथा प्रभुक्ता दोनों प्रकार की स्त्रियोंमें रतिभावका उदय होनेपर ये दश स्वाभाविक धर्म उदय होते हैं ।

ग्रब ग्रागे बिना यत्नके उत्पन्न होने वाले सात घर्मोंमेंसे पहले 'शोभा' का लक्षण करते हैं—

[सूत्र २५३]—उपभोगके बाद यौवन ग्रादिकी उज्ज्वलता 'शोभा' कहुलाती है ।

[३५] १८५ । ग्रथ श्रीर आदि शब्दसे रूप-लावण्यादिकी पुहुषके द्वारा भोगे जाने श्रथ शृङ्गारपर जो उज्ज्वलता अर्थात् सञ्जीवनीयात्कार उत्को 'शोभा' कहते हैं [ग्रह ग्रभिप्राय है] । ['ग्रथ' शब्द स्वाभाविक ग्रानन्तर्य श्रर्थका बोधक है । [ग्रर्थात् पहले नि]उपपरा किए दस स्वाभाविक धर्मोंके बाद शोभाका लक्षण किया जा रहा है ]॥ [३५] १८५ ॥

ग्रब ग्रागे 'कान्ति' ग्रोर 'दीप्ति' [दोनोंका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २५४]—पूर्वं विस्तारको प्राप्त हो जानेपर वह शोभा हो 'कान्ति' कहुलाती है । ग्रोर 'कान्ति' का भी विशेष विस्तार 'दीप्ति' कहलाता है ।

ग्रर्थात् घनरागावतिशयके कारण घनताको प्राप्त शोभा हो 'कान्ति' कहुलाती है ग्रोर प्रस्र्यन्त विस्तारको प्राप्त हो जाने वाली 'कान्ति' ही 'दीप्ति' कहलाती है । ग्रर्थात् यौवन ग्रादिकी उज्ज्वलताको मन्द, मध्य ग्रोर तीव्र प्रवस्थाएँ ही क्रमशः शोभा, कान्ति ग्रोर दीप्ति कहलाती हैं यह ग्रभिप्राय है ॥

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अथ माधुर्योदय—

[सूत्र २८५]—सौम्यं तपेऽपि माधुर्यं, श्रौदार्यमुचिताच्युतिः ॥

[३६] १५६ ॥ शोक-क्रोध-भय-ग्रामर्ष-ईर्ष्यादिज: सन्तापस्ताप: । स्त्रिपि शब्दादि ग्रीडा-नृत्य- दिजे ह्रस्वास्थ्ये डपीति । तपे डपि सत्युचिततस्य विनयादिकस्य श्रच्युतिरपरित्यजनं श्रौदार्यम् । माधुर्ये श्राकाराविकृति: इत्यनयोर्विशेष इति ॥ [३६] १५६ ॥

[सूत्र २८६]—चेतोद्विकतथनं धैर्यं प्रागल्भ्यं कौशलं रते । ग्रविकलत्थनं श्रात्मश्लाघा-चापलाभ्यां रहितं चेति धैर्यमिति । कौशलं वैशारद्यं, रते सुरतक्रियायां यत्नं तन् प्रागल्भ्यम् । एते यत्नमनस्तरेषा पुरुषोपभोगनिष्पन्ना: स्त्रिय: सप्त गुणा इति ।

[सूत्र २८७]—यथौचित्यं च नेतॄरां नायिका:, कुलजादय: ।।[३७]१९० ग्रौचित्यं प्रकृति-ग्रवस्था-ग्राचार-देशनकालादिविरोध: । तदनतिक्रमेण धीरोद- तादीनां नायकानां कुलजादयो नायिका नाटकेषु निवन्धनीयाः इति ॥ [३७] १९० ॥

ग्रब ग्रागे 'माधुर्य' ग्रोर 'श्रौदार्य' [दोनोंके लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २८५]—तापके होनेपर भी सौम्यता माधुर्य कहलाता है । श्रौदार्य उचित मार्गसे पतित न होना 'श्रौदार्य' कहलाता है । [३६] १५६ । शोक, क्रोध, भय, ग्रामर्ष ग्रोर ईर्ष्यादिसे उत्पन्न होने वाला सन्ताप यहाँ 'ताप' [माना गया] है । 'ग्रपि' शब्दसे लज्जा ग्रोर रत्यादिसे उत्पन्न ह्रस्वस्थताका भी प्रहण होता है । इस तापके होनेपर भी [सौम्यताका बना रहना 'माधुर्य' कहलाता है ।] ग्रोर आपके होनेपर भी विनय श्रादि रूप उचित बातोंका परित्याग न करना 'श्रौदार्य' कहलाता है । श्राकारमें विकार का उत्पन्न न होना माधुर्य है । [ ग्रोर मनमें विकारका उत्पन्न न होना श्रौदार्य है ।] यह इन दोनोंका भेद है ॥ [३६] १५७ ॥

ग्रब ग्रागे 'धैर्य' तथा 'प्रागल्भता' [दोनोंका लक्षण करते हैं]—

[सूत्र २८६]—ग्रात्मश्लाघा ग्रोर चपलतासे रहित चित्तकी अविकलताका नाम 'धैर्य' है ग्रोर सुरत-व्यापारमें निपुरणताकी प्राप्ति 'प्रागल्भता' कही जाती है । ग्रविकलत्थन श्रर्थात् ग्रात्मश्लाघा और चपलतासे रहित चित्तावस्था नाम 'धैर्य' है । ग्रोर 'रते' ग्रर्थात् सुरत-व्यापारमें जो कौशल ग्रर्थात् निपुरणता वह 'प्रागल्भ्य' कहलाता है । ये सात गुण पुरुषोपभोगके द्वारा स्त्रियोंमें बिना यत्नके स्वयं ही उत्पन्न हो जाते हैं ।

ग्रब इस प्रकारके [१०+७=१७] ग्रलंकारोंसे युक्त नायिकाग्रोंका नायकोंके साथ सम्बन्ध दिखलाते हैं—

[सूत्र २८७]—श्रौचित्यके अनुसार कुलजा श्रादि नायिकाएँ नायकके साथ विनि- युक्त करनी चाहिए । [३७] १९० । ग्रौचित्य ग्रर्थात् प्रकृति, ग्रवस्था, ग्राचार, देश, काल, ग्रादिके साथ विरोध । उस ग्रनतिक्रमेण धीरोद-

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स्वथासो नायिकानां सहायिन्य उच्च्यन्ते—

[सूत्र २८८]—सहायिन्यस्तु धात्रेयी-लिंगिनी-प्रातिवेशिका: । शिल्पिनी चेटिका-सख्या गुप्ता दक्ष्षा मृदु-स्थिरा: ॥

[३५] १६१ ॥

धात्रेयी स्तन्यदायिनी । लिंगिनी परिव्राजिकादिलिंगवती । प्रातिवेशिका निकटवसथा । शिल्पिनी चित्रादिशिल्पकारिका । चेटिका दासी । सख्या समानगुणा मैत्र्यमुपगता । एवमादिका:प्रियघटने सहायिन्य: । एताश्च 'गुप्ता' रहस्यधारणासमर्थ: । दक्ष्षा देश-काल-समयादिविद: । मृद्वश्‍च यो ऽनहंकृत: । स्थिराश्चापलवर्जिता: । एवमन्येडपि गुणा दृश्यत्व्या हि ति ॥ [३५] १६१ ॥

[सूत्र २८९]—देवानीचनुरणां पाठ: संस्कृतेनाथ जातुचित्। महिषी-मंत्रिजाया-पण्यस्त्रीणामव्याजोलिंगिनाम् ॥

[३५] १६२ ॥

[प्रोक्तस्य] का उल्लेख किये बिना धीरोदात्त श्राद्ध नायिकाके साथ कुलजा श्राद्ध नायिकाओं का नाटकादिमें वर्णन करना चाहिए ॥ [३७] १६० ॥

[सूत्र २८८]—धाय, परिव्राजिका, पड़ोसिन, शिल्पिनी, दासी श्रौर सखी जो [गुप्ता प्रर्थात् रहस्यको धारण करनेमें समर्थ, चतुर, ग्राहंकाकाररहित श्रौर चपलतारहित हों इनकी

सहायिकाएँ होती हैं । [३५] १६१ ।

धातृयी श्रर्थात् दूध पिलाने वाली धाय । लिंगिनी श्रर्थात् परिव्राजिक श्रादिके चिह्नों को धारण करने वाली । प्रतिवेशिका श्रर्थात् समीप रहने वाली पड़ोसिन । शिल्पिनी श्रर्थात् चित्रादि शिल्पकी रचना करने वाली । चेटी श्रर्थात् दासी । सखी श्रर्थात् समान गुण वाली प्रौर मित्रताको प्राप्त स्त्री । इस प्रकार की स्त्रियाँ प्रियघटनमें समर्थ, दक्ष्षा श्रर्थात् देश, काल,

होती हैं । वे सब गुप्ता श्रर्थात् रहस्यको छिपानेमें समय, दक्ष्षा श्रर्थात् देश, काल, समयादि जाननेमें चतुर, मृदु श्रर्थात् ग्रहंक्काररहित श्रौर स्थिरा श्रर्थात् चपलतारहित

होनी चाहिए । इसी प्रकारके अन्य गुणों मो [सहायिकाओंमें ] समकने चाहिए ॥ [ ३५ ] १६१ ॥

ग्रथ सामान्य रूपसे भाषाविधानको कहते हैं—

[सूत्र २८९]—देवताओं श्रौर नीचोंको छोड़कर श्रर्थात् उत्तम तथा मध्यम पुरुषोंके पाठ संस्कृतमें [होना चाहिए] । श्रौर कभी-कभी पटरानी, मन्त्रि-पत्नीवेग्याग्रोंका तथा

[लिंगिनी पदमें लिंगिनयच लिंगिन्यश्च प्रर्थात् पुरुष तथा स्त्री-रूप दोनों प्रकारके लिंगियोंमेंसे एक दोष हो जानेसे] पुरुष तथा स्त्री-रूप दोनों प्रकारके परिव्राजकों दम्भ-रहित [प्रर्थात् मुनि, बोद्ध, शिष्य, श्रोत्रिय श्रादि] द्वारा [सो संस्कृत का प्रयोग किया जाना वाहिए] ।

३५ [१६२]॥

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क० १६३, सू० २६० ] चतुर्थो विवेक: [ ३६३

देवशब्देन सुराः सुरवेशकशेपाद् गृह्यन्ते । एषां च नीचवर्जितानामुतम-मध्यम-नराणां च । स्त्रियां प्राकृतस्यैव विधानान् पुरुषाणामेव संस्कृता भाषा । कदाचित् पुनः कार्यवशात् कृताभिषेकाया राज्ञा मन्त्रज-पतयस्त्रियोलिङ्गिनां च एकशेषेण पुं-स्त्रीरूपाणां परित्राड्-मुनि-शाक्य-श्रोत्रियादीनां संस्कृतं दृश्यम् । लिङ्गिनश्च दम्भं विना ये गीतीनृतास्तेषां संस्कृतम् । सामर्थ्याच्च व्यञ्जनलिङ्गिनां प्राकृतस्मृति लभ्यते । स्वगोपनार्थमेतैषांन्यास्यादित्वस्य करणात् । तत्र महिष्या: संधि-विग्रहादिदिना, मन्त्रि-जाया न्यायप्रवृत्त्यादिना वेश्याया वेदाध्यादिना, लिङ्गिनां च सर्वविद्याकौशललक्ष्या-पनादिना कार्येऽपि संस्कृतं, शनैस्त्र तु सा प्राकृतमवर्गतध्यम् । 'योषिताम्' इति सहित्यादीनां प्राकृतस्यैव प्राप्तौ 'देवानीचनप्राणां' इति च लिङ्गिनां संस्कृतस्यैव प्रसङ्गे 'जातुचित्' इत्यमप्राप्त्यर्थे प्राप्तनिषेधार्थं चोपपत्तम् । तेन लिङ्गिनां बाहुल्येन प्राकृतं भवतीति ॥ [३५] १६२ ॥

[सूत्र २६०]—बाल-षणड्-ग्रहप्रस्त-मत्त-स्त्रीरूप-योषिताम् । प्राकृतनोक्तमस्यापि दारिद्रेश्वयमोहिन: ॥ [४०] १६३ ॥

'देव' शब्दसे एक शेषसे देव श्रौर देवो दोनोंका ग्रहण होता है । इनमें श्रोर नीचोंको छोड़कर शेष पुरुषोंकी भाषा संस्कृत होनी चाहिए । [स्त्रियोंकी प्राकृत भाषाही होनी चाहिए ।] कभी-कभी कार्यवश पटरानी मन्त्री-पत्नी वेदज्ञा तथा लिङ्गियोंमें एक शेष द्वारा स्त्री-पुरुष रुप दोनों प्रकारके संन्यासियों मुनियों बौद्ध तथा बाह्यरा श्रोत्रिपादिकी संस्कृत भाषा सम्भवनी चाहिए । लिङ्गधे जिनहोंने दम्भ रहित होकर व्रत लिया है उनको संस्कृतका प्रयोग कराना चाहिए । इस कथनकी सामर्थ्यसे बनावटी परिव्राजक ग्रादिके द्वारा प्राकृतका प्रयोग करना चाहिए । यह श्रर्थ निकलता है । क्योंकि ये श्रपननेको छिपानेके लिए भाषाको बदल भी लेते हैं । उनमेंसे संधि-विग्रह श्रादिको ग्रवसरपर राजनीतके [द्वारा संस्कृत भाषण करना चाहिए ।] न्याय, विचार श्रादिके समय [मन्त्रजाया द्वारा [संस्कृत भाषण कराना चाहिए ।] वेदाध्ययन [प्रवचन] के लिए वंध्या द्वारा घोर सब विद्याग्रोंमें प्रवृत्तेताके सिद्ध करनेके लिए परिव्राजिका ग्रादिके द्वारा कार्यविशेषके कारण संस्कृत का प्रयोग कराना चाहिए । श्रोर साधारण रीतसे श्रममें श्रन्य जगह प्राकृतका ही प्रयोग सम्भवना चाहिए । 'योषिताम्' इस पदसे महिषी श्रादिमें प्राकृत [का प्रयोग] प्राप्त होनेसे श्रोर 'देवानीचनप्राणां' पदसे परिब्राजक श्रादिमें संस्कृत [के प्रयोगके] हो प्राप्त होनेपर 'जातुचित्' इस पदको [प्राप्ततिके]प्रश्राप्तिकेलिए श्रर्थात् प्राप्तके निषेध करनेके लिएप्रहृत किया गया है । इसलिए परिव्राजक श्रादिमें श्रधिकतर प्राकृतका प्रयोग होता है ॥ [३५]१६२ ॥

[सूत्र २६०]—बालकों, नपुसकों ग्रहप्रस्त, मत्त, स्त्रीप्रकृति वाले श्रौर स्त्रियोंका प्राकृतका ही प्रयोग कराना चाहिए । श्रोर दारिद्रय श्रथवा ऐश्वर्यबि मोहित उत्तम पुरुषके हारा सो [प्राकृत भाषाका ही प्रयोग कराना श्रनुचिा । [४०] २८३ ।

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ग्राहे: शनैश्चरादिभि:, कदाग्रहेर्वा प्रस्ता दूषिता ग्रहग्रस्ता:। स्त्रीरूपा: स्त्रीप्रकृतय: पुरुषा: बालादीनामज्ञत्व-नीचप्रकृतित्व-सुच्छ्रस्वभावत्वादे: प्राकृतेन पाठ:। तथोत्तमप्रकृतेरपि धीरोदात्तादे-दारिद्र्यै: श्वयोम्यां उपलब्धग्रादु धनभ्रंशादिना च मूढमनस: प्राकृत पाठ इति ॥ [४०] १६३ ॥

अपरस्मपि वाक्प्रकारमाह— [सूत्र २११] ग्रत्यान्तनीच-भूतादौ पैशाची मागधी च वाक् । शौरसेनी तु नीचस्य देशोद्भवेशे स्वदेशजो: ॥[४१]१६४॥

ग्रत्यान्तनीच: प्रकृष्टाधमप्रकृति: । श्रादिशब्दात् पिशाचादिम्रह: । पशु पैशाची मागधी च सांकर्येण भाषा भवति । नीचमात्रप्रकृते: पुन: शौरसेनी । देशस्य कुरुमगधादेरुच्च श: प्रकृततद्वं तस्मिन् सति स्व-स्वदेशसम्बन्धिनी भाषा निवन्धनीयेति ॥ [४१] १६४ ॥

प्रकारांतरमप्याह— [सूत्र २१२]—तिर्यङ्जात्यन्तरादीनामनुरूपयैव संकथा । तिर्यञ्च: पशवो पक्षिग्राश्च । जात्यन्तराग्रं वणिग्-विप्र-चाण्डालादिनी । एतानि ग्रहों श्रपत्यं ज्ञानेश्चर श्रादिके प्रयवा कुलित्सत श्रग्राहो जो दूषित है वे ग्रहप्रस्त हुए [उनके द्वारा प्राकृत भाषाका प्रयोग कराना चाहिए ] । स्त्रीरूप अर्थात् स्त्रियों-जैसे स्वभाव-वाले पुरुष [उनके द्वारा भी प्राकृतका ही प्रयोग कराना चाहिए]। बालकों श्रादिके मूर्ख, श्रज्ञानी, नीच प्रकृति वाले तथा शुद्ध स्वभाववाले होने प्राकृतिक श्रादि [स्वभाव वाले कराया जाता है । श्रौर [कभी] उत्तम प्रकृति वाले श्रप्रथित धीरादात्त श्रादिके [स्वभाव वाले पुरुषके] भी वृद्धिता श्रथवा ऐश्वर्यातिशयतयालसे मोहित हो जानेपर श्रौर इनके उपलब्ध रूप होनेसे धननाश श्रादिसे भी विमूढमनस्क हो जानेकर प्राकृत ही बुलवाना चाहिए ॥[४० ]१६३॥

[सूत्र २११]—ग्रत्यान्त नीच श्रादि [ के भाषा ] में ‘पैशाची’ तथा मागधी भाषा प्रयुक्त होती है । नीच [पात्रके भाषण] में ‘शौरसेनी’ [प्राकृत भाषा] होती है । और किसी देश-विशेषका उल्लेख होनेपर श्रग्रपन-प्रेपण देशकी भाषाका ही प्रयोग कराना है । [४१] १६४ । ग्रत्यान्त नीच अर्थात् श्रत्यधिक श्रथम प्रकृति वाला । [भूतादि पदमें प्रयुक्त] श्रादि शब्दसे पिशाचादिका ग्रहण होता है । इसमें पैशाची श्रौर मागधी दोनों भाषाओंका संकीर्ण रूपसे प्रयोग होता है । श्रौर केवल सामान्य रूपसे नीच प्रकृति वाले पात्रमें शौरसेनी भाषाका प्रयोग कराना चाहिए ॥ [४१] १६४ ॥

[सूत्र २१२]—पशु-पक्षी श्रादि ग्रौर विभिन्न जातियोंमें ग्रौचित्यके श्रनुसार [भाषा का प्रवर्तन करना चाहिए]। तिर्यङ् श्रर्थात् पशु श्रौर पक्षी । श्रन्य जातियाँ श्रर्थात् वणिक्, विप्र, चाण्डाल श्रादि । एतानी

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कां १९६, सू० २३३-२३४ ] चतुर्थो विवेक: [ ३२५

चैत्रसित्रपि देशे भवन्ति । ग्राम्यादिशब्दाद् ग्राम्य-नागरक-श्रारण्यक-विट-देवकुलिकादि-ग्रहः । एतद्विधप्रातिप्रणामानुरूप्येण यस्य तिर्यगादेर्यो भणितिरेति: प्रसिद्धा सा सा तस्य सम्यग् वर्णनीया । येन स एवार्य तिर्यगादिरिति तादृश् प्‍यावगमो भवति । इयं च देशगीशच प्रायो ग्रपपश्रे निपतत इति ॥

अथ भाषादेशरन्यार्थाल्वापि भवत इत्याह—

[सूत्र २३३]—भाषा-प्रकृति-वृत्तादे: कार्यत: क्वापि लङ्घनम् ॥ [४२] १९५ ॥

भाषाया: संस्कृत-प्राकृतादेवाच । प्रकृतेरुत्कृष्ट-मध्यम-श्राधमरूपाया: । वृत्तस्य श्राचारस्य, इतिवृत्तस्य वा । श्रादिशब्दाद् धीरोदात्तादिधर्मोणां नेपथ्यादेर्वा केनचित् प्रयोजनेन लङ्घनमिति विषय: । एतच्च यथायर्थं क्वचित् किंचित् प्रदर्शितमेव । स्वयं वाभ्यूपगमिति ॥ [४२] १९५ ॥

अथ रूपकेषु येन तेन नाम्ना व्यवहर्तव्यस्तस्य तदाह—

[सूत्र २३४]—ग्रार्येति शब्द्यते पत्नी लिङ्गिनी ब्राह्मणी द्विजे: । श्रन्वापि जननी-बृद्धा पूज्या तु भवतोत्यपि ॥ [४२] १९६ ॥

ग्रोर वनमें रहने वाले तथा विट, देवकुलिका ग्रादिका प्रग्रह होता है । इस प्रकारके पात्रोंकी भाषा ग्रानुरूप्य ग्रनुसार ग्रर्थात् जिस तिर्यगादिकी जो भाषा लोकमें प्रसिद्ध है उसकी उसके साथ भली प्रकारसे प्रयोग करना चाहिए जिससे यह वहो तिर्यगादि है यह बात ठीक तरह से प्रतीत हो सके । यह [ तिर्यगादिकी भाषा] ग्रोर देश-भाषा दोनों प्राय: ग्रपपश्रं शबमें आती हैं ।

ग्रब ग्रागे भाषा ग्रादिमें परिवर्तन भी हो सकता है यह बात दिखलाते हैं—

[सूत्र २३३]—भाषा, प्रकृति, वृत्त प्रर्थात् प्राचार या कथावस्तु प्रादिका कार्यवश कहों उल्लङ्घन भी किया जा सकता है । [४२] १९५ ।

भाषा ग्रर्थात् संस्कृत ग्रोर प्राकृत ग्रादि वाचीका । प्रकृति ग्रर्थात् उत्तम, मध्यम, ग्रथम रूप प्रकृतिका । वृत्त ग्रर्थात् प्राचाररेका ग्रर्थवा कथावस्तुका । ग्रादि शब्दसे धीरोदात्त-त्वादि धर्मोंका ग्रथवा नेपथ्यादिका किसी विशेष प्रयोजनसे लङ्घन किया जा सकता है इस प्रकारका [ क्रम ग्रर्थात् ] ग्रन्वय करना चाहिए । इस बातका कहों-कहीं कुछ वचैन किया जा चुका है । ग्रथवा स्वयं समभ् लेना चाहिए ॥ [४२] १९५ ॥

ग्रब रूपकोंमें जिसको जिस नामसे पुकारा जाना चाहिए उसके उस नाम ग्रादिको बतलाते हैं—

[सूत्र २३४]—ब्राह्मणोंके द्वारा पत्नी, परिव्राजिका ग्रोर ब्राह्मणी 'ग्रार्या' इस नामसे कही जाती है । माता ग्रोर बूढ़ा स्त्री [ग्रार्य शब्दसे तो कही ही जाती है किंतु उसके प्रतिरिक्त] 'ग्राम्बा' भी कही जाती है । पूज्या स्त्री [भी ग्रार्या तो कही ही जाती है उसके प्रतिरिक्त] 'अवती' इस पदसे भी कही जाती है । [४२] १९६ ।

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भ्रात्राप्रजो डधर्मेमन्त्री नटी-सूत्रभृतौ मिथः। पुरोधः-सार्थवाहाभ्यां य पत्नी पत्या जरन् पतिः॥ [४४] १९७ ॥

‘श्रायशब्दः’ इत्यन्तो ग्रनिवचन्तिलिंग-संख्या-काकारः शक्तिस्वरूपमात्रेण प्रहरणार्थमुपात्तः। तेन नानालिंग-संख्या-कारकेषु प्रयुज्यते। ‘एवमन्यत्रापि दृष्टव्यम्। पत्नी सधर्मंचारिणी। ‘श्रम्यापिति’ न केवलं ‘श्रायीं’ शब्देन किन्तु ‘श्रम्बा’ शब्देनापि जनन्या-बृद्धे। उच्येते। पूज्या मान्या। सा चात्रेषु बृद्धा सती, ‘भवति’ इति शब्देन ‘श्रायी’ शब्देन च वाच्या।

भ्रात्रा भ्रातृजननेः भ्रात्राप्रजो ज्येष्ठो भ्राता, श्रधर्ममैनैः मन्त्रो राज्ञः सचिवो नटी-सूत्रधारौ मिथःः परस्परं नट्या सूत्रधारःः सूत्रधारेषु च नटौ, पुरोधः-सार्थवाहाभ्यां कर्तृ श्यां पत्नी, पत्न्या च कर्त्र्यो बृद्धः पतिः ‘श्रायं’ इति शब्वते इति संबंधः। ‘श्रायंत्ति शब्वते पत्नी’ इत्थनेनैव सिद्धेऽपि ‘पुरोधः-सार्थवाहाभ्यां पत्नी’ इति यौवनेऽपि ‘श्रायी’ इति वा निबंधनार्थम्॥ [४३-४४] १९६-१९७॥

[ छोटे भाईके द्वारा ] बड़े भाईको ‘श्रायं शब्दसे भी कहा जाता है और उसके [छोटे भाईके द्वारा] नटीका [को नटी] शोर नटी प्रतिरिक्त] ज्ञाता [भी कहा जाता है]। नोच पात्रोंक द्वारा मन्त्रीको [को श्राता] शोर सूत्रधार परस्पर एक-दूसरेको [श्रायं तथा श्रायी] प्रोच पुरोहित तथा सार्यवाहके साथ

[ यौवनस्थामें ] पत्नी [ श्रायी ] तथा पत्नीक द्वारा बृद्ध पति [श्रायं शब्द कहा जाता है ]। [४४] १९७ ।

[आयेंत इस कारिकाभागमें] इति शब्द जिसके श्रन्तमें दिया गया है इस प्रकारका श्रायं शब्द लिंग, संख्या, कारक श्रादिसे रहित शक्तिके स्वरूपमात्रसे प्रहरण किया गया है। इसलिए विभिन्न लिंग, संख्या तथा कारकोंमें उसका प्रयोग माना जाता है। इसी प्रकार श्रन्य शब्दोंके विषयमें भी समझना चाहिए। [श्रर्थात् श्रम्बा, भवती श्रादि शब्द भी नियत संख्या, नियत कारक श्रादिके प्राहक न होकर सामान्य रूपसे ही पढ़े गए हैं]। पत्नीक श्रायं सहधर्मंचारिरणी है ‘श्रभ्यापित’ इसमें जननी तथा बृद्धाके न केवल ‘श्रायी’ शब्दसे ही नहीं

ग्राप्तु ‘श्रम्बा’ शब्दसे भी कही जाती है। पूज्या श्रर्थात् माना। वह कुछ थोड़े बृद्ध होनेपर ‘भवती’ इस शब्दके द्वारा तथा ‘श्रायीं’ शब्दके द्वारा सम्बोधित की जाती है।

भाई श्रर्थात् छोटे भाई द्वारा बड़े भाईको [‘श्रायं शब्दसे], तथा नोच पात्रोंके द्वारा मन्त्री श्रर्थात् राजाके सचिवको [‘श्रायं कहा जाता है]। तथा नटो शोर सूत्रधार एक-दूसरेको परस्पर श्रर्थात् नटीकेद्वारा सूत्रधारको [‘श्रायं] तथा सूत्रधारकेद्वारा नटीको [‘श्रायां’ सम्बोधन किया जाता है] पुरोहित तथा सार्यंवाह रूप प्रयोगकर्त्तृकोंके द्वारा पत्नी [‘आर्या’ कही जाती

है] शोर पत्नीक द्वारा बृद्ध पति [‘श्रायं रूप पदसे सम्बोधित किया जाता है। ‘आर्यंत्ति शब्वते पत्नी’ इस १९६वें कारिकाके प्रारंभिक भाग] से ही [पत्नीक लिए श्रार्य शब्दके प्रयोगके]

सिद्ध होनेपर भी ‘पुरोधः-सार्थवाहाभ्यां पत्नी’ इसमें [जो पत्नीक ‘श्रार्या’ पदसे सम्बोधित किए जानेको बात दुबारा कही गई है] वह [पुरोहित तथा सार्यवाहकेद्वारा] यौवनावस्थामें

भी पत्नीक ‘श्रार्यां’ कहकर ही सम्बोधित करना चाहिए इस बातको सूचित करनेकेलिए कही गई है॥ [४३-४४] १९६-१९७ ॥

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क० १६७, सू० २६५ ]

चतुर्थो विवेकः

२ ३६७

अन्यदृश्याह—

[सूत्र २६५]—महाराजो नृपः सर्वस्वार्यपुत्रेति यौवने । पुंसां भद्रेति भोक्तव्या प्रियेतिं दयिताथवा ।। [४५] १६५ ।।

पिता-पुत्राभिधायोगेऽपि ख्या देवस्यपि राजभिः । विदूषकेऽपि भवती राज्ञी-चेट्यो नृपक्रियः॥ ।। [४६] १६६ ।।

भर्त्तृनी स्वामिनो देवोत्येवं सर्वाः परिच्छदैः । वेश्या उज्जुकेति वृद्धा तु साधत्ता तुल्या द्विया हला ॥ ।। [४७] २०० ।।

'पत्न्या' इति 'जरन्' इति चाऽनुवर्त्तते । पत्न्या जरन्नृपो 'महाराज' इति । सर्व-स्त्री नपुंसकञ्च पत्नीयौवने वर्तमान 'श्रार्यपुत्र' इति पत्न्या कीर्त्यते । श्रार्यपुत्र इति हि श्वशुरेऽपि व्यवदेशो यौवनस्य नृपारोचतत्त्वोपनार्थे । यौवनाद् नृपतिं तु 'श्रार्य'

[इसी विषयमें श्रागे] श्रौर भी कहते हैं—

[सूत्र २६५]—[पत्नीके द्वारा वृद्ध] राजाको महाराज [कहकर सम्बोधन करना चाहिए] सब राजा श्रौर श्रन्य [सामान्य रूपसे राजा तथा] पति को पत्नी के द्वारा यौवन कालमें श्रार्यपुत्र [नामसे सम्बोधित किया जाता है] । भोकृत्या स्त्रीको पुरुष [प्रथम परिचायक के साथ ] भद्रा [ कहकर ], श्रौर दयिता श्रार्यात् भार्याको या प्रिय, [कहकर सम्बोधन करें] ।

[४५]१६५।

प्रथवा [ दयिता प्रार्थ्यांत श्रार्यनी पत्नीको उसके ] पिता या पुत्रोंके नामको जोड़कर [रामचन्द्रकी माता श्रथवा सोमसामकी पुत्री इस रूपमें सम्बोधन किया जाता है] । राजाओं के द्वारा मुख्य प्रार्थ्यांत पट्टरानीको [प्रथवाेक प्रतिरिक्त] देवी भी [कहा जाता है] । विदूषकके द्वारा रानी श्रौर चेटी [दोनोंको] भवती पदसे सम्बोधित किया जाना चाहिए] ।

[४६] १६६।

सारो रानियोंको परिजनों के द्वारा भर्त्तृनी, स्वामिनो, देवी इस प्रकार सम्बोधन किया जाना चाहिए [इसमें 'नृपस्रियः' पद १६७वें इलोकके ग्रन्थमें श्रार्या उसका ग्रन्थय इस २००वें इलोकमें होता है] । [यौवनवती] वेश्याको [उसके सेवकवर्ग] 'अज्जुका' [कहकर सम्बोधन करते हैं] श्रौर उसी [वेश्या] के वृद्ध होनेपर 'अस्ता' पदसे उसका सम्बोधन किया जाता है । श्रौर बरावर बाली स्त्रियाँ एक-दूसरेको 'हला' कहकर सम्बोधन करती हैं ।

[४७]२००।

'पत्न्या' श्रौर 'जरन्' ये दोनों पद [१६७ संख्यावाली कारिकासे] श्रनुवृत्त्ति द्वारा श्राते हैं । इसलिए पत्नीके द्वारा वृद्ध राजाको महाराज [कहकर सम्बोधित किया जाता है । यह श्रमिप्राय है] । सामान्य रूपसे सारे राजाओंको [महाराजके प्रतिरिक्त] श्रार्यपुत्र [भी कहा जाता है] । सामान्य रूपसे सान्त्रियोंको [पत्नी] श्रार्यपुत्र पदसे कहती है । 'श्रार्यपुत्र' यह नाम इस्सुरके सम्‌बन्धसे बना है । [श्रौर यौवनकालमें इस शब्दका प्रयोग] यौवनके भूख़्ज़ारो-

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इत्येवं कीर्त्यते । मोक्तव्या मोक्तुममिलषिता प्रथमपरिचये पुरुषेण स्त्री 'भद्रा' इति, दयिता भार्यां पुनर्यौवने 'प्रिया' इति कीर्त्यते । अथवा दयिता पिता-पुत्रयोर्यद्भिधानं तथ्योगास्तेन युज्यमानैः शब्दैः 'माठरपुत्रि' 'सोमशर्मजननि' इत्येवमादिभिः पुरुषेण-भार्यां मुख्यया कृताभिषेका दयिता पुनर्द्रवीति, श्रापिशब्दान्त् प्रियेत च राजमिर्यबहु-वचनादन्यैश्च पुष्टिभः । तथा विदूषकेगा राणी राजपत्नी चेटी च 'भवति' इति वाच्याः । तथा सर्वो श्राप नुपभियो राजपल्न्यः परिजनेन मोहिनीस्वामिनी देवी इति शब्द-शब्द्यन्ते । वेश्या परयस्त्री यौवनवती दृश्यया, वृद्धया नामान्तरविधानात् । परिजनेन 'ग्रज्जुका' इति । सा इति वेश्या । वृद्धा पुनः 'भत्ता' इति । तुल्या समानकुल-शीलययो-डवस्थादिका वचनिता च समानया क्रिया'हला'हल' इति वाच्येति ॥ [४५-४७]१८-२००॥

ग्रन्थ्यदयाह— [सूत्र २९६]—हुंजे त्वनुत्तमा-प्रेष्ये भगवदिति देवता । tपःस्था चार्य-देवाः-बहुविद्याः सयोषितः ॥ [४८] २०१ ॥

चित होनेफी सूचना देणेवाला है । यौवनकालको छोड़ ग्रन्थ समयमें केवल 'ग्राप्' पदसे [पत्नी पतिको सम्बोधित करती है] । भोगरुचि श्रर्थात् जिसके साथ पुरुष भोग करना चाहता है उस स्त्रीको प्रथम परिचयके समय पुरुष 'भद्रे' कहकर सम्बोधित करता है । श्रौर दयिता श्रर्थात् श्रपनी भार्याको यौवनकालमें 'प्रिय' पदसे सम्बोधित करता है । प्रयवा दयिता श्रर्थात् पत्नीको [उसका पति प्रियके प्रतिरिक्त उसके] पिता श्रौर पुत्रके जो नाम हों उनके साथ जोड़कर माठरही पुत्री, सोमशर्मकी माता ग्रादि इस प्रकारके शब्दोंसे सम्बोधित करता है । मुख्यया श्रर्थात् प्रभिषिक्त पत्नीको राजा लोग देवी भी कहते हैं । श्रपि शब्दसे प्रिया भी राजाओंके द्वारा कहा जाता है । बहुवचनसे ग्रन्थ पुरुषोंके द्वारा भी [कृताभिषेका रानीको देवी कहा जाता है] । तथा विदूषकके द्वारा राजपत्नी श्रर्थात् रानी श्रौर चेटी दोनोंको 'भवती' पदसे सम्बोधित किया जाता है । श्रौर राजाओंके सभी पत्नियों श्रर्थात् रानियोंको परिजनवर्ग मुग्धिनी, स्वामिनी तथा देवी शब्दोंसे सम्बोधित करते हैं । वेश्या पदसे यौवनावस्थावाली वाज्ञारू स्त्रीको पुकारना चाहिए । क्योंकि वृद्धा वेश्याग्रोंके लिए [भत्ता इस] दूसरे नाम का विधान किया गया है । [उस यौवनवती वेश्याको] परिजनवर्ग 'ग्रज्जुका' इस नामसे कहते हैं । 'सा' श्रर्थात् वही वेश्या वृद्धा हो तो 'भत्ता' पदसे कही जाती है । तुल्या श्रर्थात् समान कुल, शील, श्रायु और वय श्रादि वाली बरावरवाली स्त्रीको बरावरवाली दूसरी स्त्री 'हला' कहकर सम्बोधित करती है ॥ [४५-४७] १९५-२०० ॥

[इस विषयमें श्रागे] श्रौर भी कहते हैं— [सूत्र २९६]—उत्तम प्रकृतिसे रहित [ग्रत एवं श्रप्रेष्या श्रर्थात् दूती श्रादिके रूपमें प्रियके पास न भेजने योग्य ] श्रौर प्रप्रेष्या दोनोंको 'हुंजे' शब्दसे सम्बोधित किया जाता है । [सरस्वती श्रादि ] देवता श्रौर तपस्विनी स्त्रीको 'भगवती' शब्दसे कहा जाता है । पूज्य और बहुश्रुत पुरुषों श्रौर उनकी पत्नियों दोनोंको भी भगवत् शब्दसे सम्बोधित करना चाहिए । [४८] २०१ ॥

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क० २०३, सू० २६६ ] चतुर्थो विवेक: [ ३५५

मान्यो नामान्तरै राजा लिंगिनाथ विदूषकै: । वयस्यो ड्यधमर्मध्यो लोकैर्देवेति भूपति: ॥ [४६] २०२ ॥

उत्तमप्रकृतिरोहिता युवति: सुप्रशस्यपौत्रा सती ध्रुवतमा, सा, प्रेश्या च हंहे' शब्देन कीर्त्यते । देवता सरस्वतयादिका तपःस्था व्रतविशेषवती । एते च स्वतन्त्रे, न तु कंचनापि पतिमाश्रिते । श्रचर्यो: पूज्यतमा! बहुविचा: बहुश्रुता: ! एते श्रचर्योदय: सखोपितो भार्योप्येतदीया भगवच्छेदेनोच्यते इत्यर्थ: । तथा मान्य: प्रसिद्धतामपरिहारेण नामान्तरै: प्रशंसासूचिभि: श्रमात्य ! श्रेष्टिन् ! वत्सराज ! सोमवंशमौक्तिकमयै ! इत्यादिभिराभाष्यप्यौ । प्रायिकं चैतन् । तेन चाटुकारद्वौ-उदयने मही शासति को विपदामवकाश:' इति स्वानाम्नत्याभाष्य: ।

मान्यादन्यस्तु मध्यम: स्वनामभिरोच्य: । नीचस्य सम्भाप्यन्तु वद्याम इति । लिंगिना च 'राजन्' शब्देन श्लाघते भूपति: इत्युत्तरेगा संबन्ध: । उपलक्षणान 'कौरव्य' इत्यादि: प्राप्तव्यप्रत्ययान्तरेऽपि । विदूषक: पुत्रभू पतिं: 'वयस्य' शब्देन श्रापि शब्दान् 'राजन्' शब्देन च । श्रधमर्मध्ये नीचप्रकृतिनिर्भर्स्ति पतिं: श्रधम-शब्देन लोकैश्च उत्तममध्यम-श्रचयमप्रकटिभिरिज्ञे: भूपतिदेव शब्देन श्लाघ्यत इति ॥ ४८-४५ ॥ २०१-२०२ ॥

मान्य पुरुषोंको [ उनके श्रसली नामोंको छोड़कर ] ग्रन्य नामोंसे सम्बोधन करना चाहिए । राजाको परिव्राजक श्रादि 'राजन्' पदसे और विदूषक 'वयस्य' पदसे, श्रधम पुरुष 'भटृी' पदसे तथा साधारण लोगोंने 'देव' पदसे सम्बोधित किया जाता है । [४५][४६]२०२ । उत्तम प्रकृतिसे रहित युवती जो [ दूती श्रादिके रूपमें ] भेजने योग्य नहीं है उसको तथा भेजने योग्य स्त्री [प्रेश्या] दोनोंको हंहे पदसे सम्बोधित किया जाता है । देवता श्रर्थात् सरस्वती आदि । श्रौर तपःस्था श्रर्थात् किसी विशेष व्रतके श्रनुष्ठानमें लगी हुई हैं । ये दोनों स्वतन्त्र हों किसी पतिके श्राश्रित न हो तब [भगवत् शब्दसे कहीं जाती हैं] । श्रचर्यनीय श्रर्थात् पूज्य, श्रौर बहुविचा श्रर्थात् बहुश्रुत पूज्य ये श्रचर्योदय श्रादि 'सखोपित:' श्रर्थात् अपनी पत्नियोंके सहित, श्रर्थात् उनकी पत्नी भी 'भगवत् ' शब्दसे वाच्य होती है यह श्रभिप्राय है । श्रौर मान्य जनोंको प्रसिद्ध नाम छोड़कर प्रशंसासूचक दूसरे नामोंसे सम्बोधित किया जाता है । जैसे-श्रमात्य, श्रेष्टिन्, वत्सराज, चन्द्रवंशाके मौक्तिकमणि ! इत्यादि [उपतर इस प्रकारके नामोंके द्वारा सम्बोधित किया जाना चाहिए । यह कथन प्रायिक है [श्रर्थात् प्राय: श्रथिकतर 'श्रथिकतर श्रविक-तर इस प्रकारके नामोंसे सम्बोधित करना चाहिए] इसलिए चाटुकारिता श्रादि [ खुशामद श्रादि] के समय 'महाराज उदयनके राज्यमें विपत्तियोंका प्रवेश कहाँ ग्रा सकता है?' इत्यादि में श्रपने प्रसिद्ध नाम द्वारा भी सम्बोधन किया जा सकता है ।

मान्यको छोड़कर ग्रन्य श्रर्थात् मध्यम लोगोंको उनके प्रसिद्ध नामोंके द्वारा हो सम्बोधित करना चाहिए । नीचके लिए सम्बोधित पदोंको ग्रागे कहेंगे । परिव्राजक श्रादि लिंग-धारियोंके द्वारा राजाको राजन् पदसे सम्बोधित किया जाता है । यह श्रागे वाच्यके साथ सम्बद्ध है । [राजा पदके] उपलक्षण रूप होनेसे कौौरव्य श्रादि श्रप्राप्तव्य-प्रत्ययार्थ प्रत्यय जिनके श्रन्तमें हों इस प्रकारके शब्दोंके द्वारा भी [राजाको सम्बोधित किया जा सकता है] । विदू-

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[ का० २०३, सू० २६७

४०७ ]

नाट्यदर्पणम्

किंच —

[सूत्र २९७]—मित्राख्याभिविदू राज्ञा कुमारो भरतु दारकः ।

मुनिशाक्यौ भदन्तेति स्वप्रसिद्धचाडपरौ व्रती ॥ [४०] ३०३ ॥

सूत्री भावोऽनुगेनासौ तेन माषः समः सखा ।

शिष्यात्मजानुजा: पुत्रवत्सौ तातो जरन्नपि ॥ [४१] २०४ ॥

सौम्यो भद्रमुख इचेति नीचो हण्‌डे तु पामरेः ।

येन कर्मादिना यस्तु ख्यातः स तदुपाधिकः ॥ [४२] २०५ ॥

वयस्यसखीत्यादयो मित्राख्याः । ताश्विदृप्तस्य राज्ञः सम्बोध्यः । सूत्रतस्त्वाच्च 'विदू' इत्येकदेशनिर्देशो न विरोधी । कुमारो युवराजः कौमारेऽवयसि वर्तमानोऽन्यो वा एष भरतृदारक इति, सुत दारकः । वा एष भरतृदारक इति, सुत दारकः । 'कुमार' इत्यस्यमध्यातव्यः । एवं कुमार्यपि वयस्यसखीत्यादिकं राज्ञको 'वयस्य' कहकर श्रोत्र गृहीत शब्दसे 'राजन्' इस पदसे भी सम्बोधित किया जा सकता है । श्रेष्ठमों श्रेष्ठात् नीच प्रकृति बालोके द्वारा राजाको 'भदृ' शब्दसे सम्बोधित किया जाता है । उत्तम, मध्यम तथा श्रधम प्रकृतिके सामान्य लोगोंके द्वारा राजाको 'देव' कहकर सम्बोधित किया जाता है ॥ [४४-४५] २०१-२०२ ॥

श्रोर भी [इसी विषयमें श्रागे कहते हैं]—

[सूत्र २९७]—राजा विदूषकको मित्रवाचक पदोंसे सम्बोधित करता है । स्वामीके पुत्रको कुमार पदसे कहा जाता है । जैन तथा बौद्धभिक्षु 'भदन्त' पदसे सम्बोधित होते हैं । अन्य व्रती [तपस्वी] लोग अपनेअपने सम्प्रदायमें प्रसिद्ध नामोंसे सम्बोधित होते हैं । [४०] २०३ ।

सूत्रधारका उसका अनुनय 'भाव' शब्दसे पकटाता है । श्रोर वह श्रर्थात् सूत्रधारका 'सार्थ' कहकर सम्बोधित करता है । भरारबर बालको 'सखा' कहकर श्रोर शिष्य, पुत्र तथा छोटे भाईको कमरः पुत्र, वत्स तथा तात कहकर सम्बोधित किया जाता है । तात शब्दसे वृद्ध जनोको भी सम्बोधित किया जाता है । [४१] २०४ ।

नीच पुरुषके [मध्यम तथा उत्तम पुरुषोंके द्वारा] सौम्य भद्रमुख कहकर श्रोर नीचों के द्वारा [नीचको ही] हुंडे कहकर सम्बोधित किया जाता है । श्रोर जिस कार्यके द्वारा जिसकी प्रसिद्धि है उस कार्यको करने वाला उसउस पदसे सम्बोधित किया जाना चाहिए । [४२] २०५ ।

वयस्य, सखा इत्यादि मित्रवाचक पद । उनके द्वारा राजा विदूषकको सम्बोधित करता है । [इन कारिकाओंमें] सूत्ररूप होनेसे इसमें [विदूषक इस पूरे पदके स्थानपर] 'विदू' इस [शब्दके] पदके प्रयोगमें कोई विरोध नहीं ग्राता है । कुमार श्रर्थात कौमारावस्थामें वर्तमान युवराज । श्रथवा स्वामीके अन्य पुत्र को 'भरतृ दारक' कहा जाता है । श्रथवा स्वामी

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द्रष्टव्या। मुनिनिर्णयन्थकः, शाक्यः: सौगतः, एतौ भदंतौ। झपरः: पाशुपतस्यादित्रती स्वसमयप्रसिद्धतनामभिवाच्यैः यथा पाशुपतस्य भापूर्वं ‘भासर्वज्ञ’ इत्यादि सम्भाष्यते। तथा सूत्री सूत्रधारो श्रप्रतुगेन श्रनुचरेऽपि कत्रोः ‘भाव’-शब्देन सम्भाष्यः। झ्रसौ इत्यनुगः सूत्रधारात् किंचिन्न्यूनगुणः: तेन सूत्रधारेऽपि ‘मार्ष’ इत्यमिधीयते। तथा समो क्यो डवस्था-गुणादिना तल्यः: समनेनैव ‘सखा’ इति वाच्यः। मित्रामिधायिना शब्देन सम्भाष्य इत्यर्थः। झ्रनेन च विधानेन समस्त्य प्रसिद्धस्वनाम्ना सम्भाष्यां न निषिध्यते। झ्रसम्भवायोगयोरप्यवच्छेदकफलत्वात् सर्वेष्यापि नामविधानस्य। तेन श्रार्यादिनामविधानेपि नान्त्यशब्देन कीर्तनानिषेधः।

‘शिष्यात्मजानुजा:’ इति शिष्यो द्विचित्तोडध्यापितो वा। झात्मजः पुत्रः। झ्रनुजो लघीयान् झ्राता। एते गुरु-नक-ज्येष्ठप्रभृतिभिः यथासंख्या पुत्रशब्देन वत्सशब्देन च सम्भाष्या:। तातशब्देन पुनर्जनन, श्रप्रि-शब्दात् शिष्यात्मजानुजाश्च कीर्तनीया:। तथा नीचप्रकृतिमध्यमोत्तमास्यां ‘सौम्य’ इति ‘भद्रमुख’ इति च शक्यते। पासरेन्नीचैः पुनर्नीच एव ‘हंडे’-शब्देन, उपलक्षणादु ‘ग्रेरे’, ‘हुंहो’ इत्यादिना च के पुत्र ‘भृतृ’दारक) को ‘कुमार’ कहा जाता है। इसी प्रकार कुमारोके लिए भी [भृतृ दारिका पदका प्रयोग] सम्भवना चाहिए। मुनि श्रर्थात् दिगम्बर, जैन श्रौर शाक्य श्रर्थात् बौद्ध-भिक्षु।

इन दोनोंको ‘भदन्त’ इस पदसे सम्बोधित किया जाता है। पाशुपतादि श्रन्य सम्प्रदायोंके साधु अपने-अपने सम्प्रदायमें प्रसिद्ध नामोंसे सम्बोधित होते हैं। जैसे पाशुपत साधुकेलिए भा-शब्द को पहले लगाकर ‘भा-सर्वज्ञ’ श्रादि सम्बोधन किया जाता है। श्रौर सूत्रो श्रर्थात् सूत्रधारको श्रनुग श्रर्थात् उसके ‘किंचित् न्यून गुण’ वाले श्रौर ‘दासो’ श्रर्थात् अनुचरको जोकि हू-धरसे ‘किंचित् न्यूनगुण’ वाला होता है सूत्रधार द्वारा ‘माष’ शब्दसे सम्बोधित किया जाता है। श्रौर बराबर वाले श्रर्थात् प्रायु, दशा श्रौर गुणादिमें श्रपने समान व्यक्ति को बराबर वाला व्यक्त ‘सखा’ कहकर सम्बोधित करता है। इस विधानके द्वारा बराबर वालेके उसके प्रसिद्ध नामसे सम्बोधित करनेका निषेध नहीं किया जा रहा है। इन सारे सम्बोधन-प्रकारोंके विधानका प्रयोजन श्रसम्भव [अर्थात् श्रस्यन्तयोग]

ग्रौर द्वयोग्य-यवच्छेद करना है, इसलिए श्रन्य जातोंके विधानमें भी श्रन्य ह्रास्दोंके द्वारा सम्बोधित करनेके निपेक्ष नहीं है। ‘शिष्यात्मजानुजा:’ इसमें शिष्य श्रर्थात् जिसका दीक्षा दी हो श्रप्रथवा पढ़ाया हो। झ्रात्मज श्रर्थात् पुत्र। श्रौर श्रनुज श्रर्थात् छोटा भाई। इनको [क्रमशः] गुरु, पिता श्रौर बड़े भाईके द्वारा ‘पुत्र’ शब्दसे श्रौर ‘वत्स’ शब्दसे सम्बोधित किया जाता है। ‘तात’ शब्दसे शिष्य, पुत्र तथा छोटे भाईको भी ‘तात’ शब्दसे सम्बोधित किया जाता है।

ग्रोर नीच प्रकृति वालेको उत्तम तथा मध्यम लोग ‘सोम्य’, श्रौर भद्रमुख कहकर पुकारते हैं। पामरों श्रर्थात् नीचोंके द्वारा नीच पुरुषको ही ‘हंडे’ शब्दसे और इसके उपलक्ष्यमें रूप होनेसे ‘ग्रेरे’, ‘हुंहो’ श्रादि शब्दोंसे भी पुकारते हैं। ‘येन’ श्रर्थात् जिस कर्म

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वाच्य। येनेऽतित कर्म वाणिज्य-कृषि-पाशुपाल्य-गीत-नृत्य-वाघवाघन-चित्र-राजसेवा-शास्त्र-श्रमादिव्यापार। श्रादिशब्दात् जाति-कुलादिग्रहः। येन केऽनचिन् कर्मोऽदिना यः कश्चिन् प्रसिद्धः स तेन कर्मोदिनोपाधिना शब्दप्रवृत्तिनिमित्ते न संकोर्तनीयः। यथा गांधिकः ताम्बूलिकः, कृषीवलः, पशुपालो, गोपालो, गंधर्वः, चित्रकारः, सेवकः, वन्धः, क्षत्रियो, ब्राह्मण इत्यादि। तथा स्वयं वा यत् कल्प्यते तदपि कर्माऽनुरूपेणैवचति॥ [४०-४२] २०३-२०४॥

[सूत्र २६७]—श्रूरे विक्रमसंश्रुचि कल्प्यं नाम्नाथ वाणिजे। दत्तान्तं प्रायशो विप्रे गोत्रकर्मानुरूप्यतः॥ [४३] २०६॥

नृपस्त्रियाः शुभं दत्ता-सेनान्तं परायोषिति। पुष्पादिवाचकं चेतचां चेटे मझलकोतिनम्॥ [४४] २०७॥

श्रूरे स्वप्रघाने पुरुषे विक्रमस्य शौर्यस्य संसूचकं नाम कल्पनीयम्। यथा श्रर्थात् वाणिज्य, कृषि, पशु-पालन, गीत, नृत्य, वाध्य-वादन, चित्ररचना, राजसेवा, शास्त्र श्रमादि व्यापारसे [जो प्रसिद्ध हो उसको उस उपाधिके द्वारा सम्बोधित किया जाता है] आदि शब्दसे जाति, कुल आदिका ग्रहण होता है। जिस किसी कर्म श्रादिसे जो कोई प्रसिद्ध हों उसको उस कर्म-सूचक उपाधि श्रादिके द्वारा प्रयात् उस उपाधिको नाम शब्दका प्रवृत्ति-निमित्त मानकर सम्बोधित करना चाहिए। जैसे [इतर, फुलेल श्रादिका व्यापार करने वालेको] गांधिक, [पान बेंचने वालेको] ताम्बूलिक, [खेती करनेवालेलोको] किसान, [कुत्ते पालनने वालेको] गुपाल [संगीतसे जीविकोपार्जन करने वालेको] गंधर्व, [चित्ररचनाका कार्य करने वालोको], चित्रकर [नौकरीपेशाको] सेवक, वन्ध, क्षत्रिय, ब्राह्मण इत्यादि [ये सब कर्म-निमित्तक सम्बोधन-पद कहलाते हैं]। श्रौर जिन नामोंकी कल्पना की जाए वे भी कर्म आदिके अनुरूप ही होने चाहिए॥ [४०-४२] २०३-२०४॥

जब श्रागे कल्पित किए जाने वाले नामोंकी कल्पना करनेके प्रकारको कहते हैं—

[सूत्र २६८]—श्रूर-वीरके लिए पराक्रम-सूचक नामकी कल्पना करनी चाहिए। वणिक्का नाम ऐसा रखना चाहिए जिसके अंतमें दत्त श्राता हो श्रौर ब्राह्मणका नाम गोत्र एवं कर्मके श्रनुरूप रखना चाहिए॥ [४३] २०६॥

राजाकी रानिका शुभ-सूचक नाम कल्पित करना चाहिए। वेश्याओंके नाम ऐसे बनाने चाहिए जिनके श्रन्तमें ‘दत्ता’ या ‘सेना’ पद श्राते हों। चेटीके नाम फूल श्रादिके ऊपर रखने चाहिए। श्रौर चेटकका नाम किसी मंगल-वस्तुसूचक कल्पित करना चाहिए॥ [४४] २०७॥

श्रूर प्रर्थात् पराक्रम-प्रधान पुरुषकेलिए विक्रम प्रर्थात् पराक्रमके संसूचक नामकी कल्पना करनी चाहिए। जैसे भीमपराक्रम शरिमदर्शन आदि। वणिकोंके लिए प्रायः श्रर्थात्

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क० २०७, सू० २६५ ] चतुर्थो विवेक: [ ४०३

भीमपराक्रमोऽर्जुनिमर्दन इत्यादि। वापिजे पुनः प्रायशो बाहुल्येन दत्तशब्दान्त नाम विवेयम्। यथा समुद्रदत्तः सागरदत्त इत्यादि। प्रायोवचनाद् धनपर्तिरस्यापि। विप्रे तु गोत्र-कर्मसङ्घोरानुरूपेण नाम कल्पनीयम्। यथा शाण्डिल्यो गाङ्गेयश्र इत्यादि। श्राथवंशिकः सामको ब्रग्निहोत्रिय इत्यादि। प्रायोवचनादमिशर्मा सोमशर्मा इत्याप।

तथा नृपस्त्रियां शुभं शुभसंश्र्चक नाम कर्तव्यं। यथा सुलक्ष्मा विजयवती इत्यादि। पत्नयोषिति वेश्याश्च पुनर्दत्ताशब्दान्तं सेनाशब्दान्तं च नाम करणीयम्। यथा देवदत्ता, वसन्तसेना। प्रायोग्रहणाद् विदग्धमित्रा वसन्तश्रीरित्याद्यपि। तथा चेटीं प्रेष्यां योषिति मालिनी मल्लिका इत्यादीनि पुष्पवाचकानि, श्रादिशब्दात् नृत्यलतिका प्रियंगुमंजरी इत्यादीनि च नामानि कल्पनीयानि। चेटे प्रेष्यीपुरुषे पुनः मङ्गलं मङ्गलकारकं वस्तु कीर्त्यते येन नाम्ना तत् सिद्धार्थकिल्यादि सिद्धि नेयम्। एवमन्यदपयत उत्तम-मध्यम-श्रधानुसारतो नाम रूपकेषु कीर्तनोयमिति ॥ २०६-२०७ ॥

तदेवं नाटकादौनी वీథ्यन्तानि द्वादश रूपकाणि सपप्रक्चं लक्षणानि ॥ अन्यान्यपि रूपकाणि दृश्यन्ते। यथा:-

प्रशिकतर 'दत्त' शब्द जिसके अंतमें हो इस प्रकारके नामकी कल्पना करनी चाहिए। जैसे समुद्रदत्त, सागरदत्त इत्यादि। प्रायः शब्दका प्रहण होनेसे [दत्तान्त नामोंको छोड़कर अन्य प्रकारके नामभी बनियोंके रखे जा सकते हैं] जैसे धनपति इत्यादि। ब्राह्मणोंके नाम, गोत्र और कर्मके अनुरुप कल्पित करने चाहिए। जैसे शाण्डिल्य, गाङ्गेयश्र [ये दोनों नाम गोत्र-परक हैं] श्रौर श्राथवंशिक, सामक, ब्रग्निहोत्रिय इत्यादि [ये तीनों नाम कमके आधारपर बनाए गए हैं]। राजाको स्त्रीके लिए शुभ अर्थात् मंगलका सूचक नाम कल्पित करना चाहिए। जैसे सुलक्ष्मा या विजयवती इत्यादि। पणयोषित प्रर्थात् वेश्याके लिए दत्ता शब्द या सेना शब्द जिसके अंतमें इस प्रकारके नामको कल्पना करनी चाहिए। जैसे देवदत्ता, वसन्तसेना इत्यादि। प्रायः शब्दके प्रहणसे [दत्तान्त तथा सेनान्त नामोंको छोड़कर] विदग्धमित्रा वसन्तश्री इत्यादि। नाम भी नेधान्तों रखे जा सकते हैं]। चेटी श्रर्थात् जिसको [प्रायके पास वसन्तश्री इत्यादि [नाम भी नेधान्तों रखे जा सकते हैं]। चेटी अर्थात् जिसको [प्रियके पास भेजा जा सके इस प्रकारकी [विदुषस्त्री सेविका] स्त्रीके लिए मालिनी, मल्लिका इत्यादि पुष्पवाचक, श्रौर श्रादि शब्दसे नृत्यलतिका, प्रियंगुमंजरी इत्यादि नामोंकी भी कल्पना की जा सकती है। श्रौर चेट अर्थात् भेजे जा सकने योग्य पुरुषके लिए मंगल प्रर्थात् मंगलजनक वस्तुका जिस शब्दसे कथन सूचित हो इस प्रकारका नाम कल्पित करना चाहिए। जैसे सिद्धार्थक श्रादि नाम बनाने चाहिए। इसी प्रकार यहाँ रूपकोंमें प्रयोजनोंके अनुसार उत्तम, मध्यम तथा प्रथम पात्रोंके नाम रखने चाहिए। [४३-४५] २०६-२०७] ॥

इस प्रकार नाटकसे लेकर वीथी-पर्यन्त बारह प्रकारके रूपकोंका विस्तारपूर्वक विवेचन यहाँ तक कर दिया गया है।

[इन बारह प्रकारके रूपकोंकि अतिरिक्त] अन्य रूप भी पाए जाते हैं। जैसा कि श्रागे कहते हैं—

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[सूत्र २९५-१]—विष्कम्भक-प्रवेशकरहितो यस्त्वेकभाषया भवति । ग्रप्राकृत-संसक्तया स सट्टको नाटिका ॥५५॥

[२]—श्रीगदितं दानवशत्रोऽस्मिन् कुलाङ्गना पत्या: । वरांपति शौर्य-धैर्यप्रभृति गुणान्‌प्रति: सख्या: ॥ पत्या च विप्रलब्धा गालव्ये तं क्रमादुपालभते । 'श्रीगदित'मिति मनोऽभिलषिताहुतोड्‌गसौ पदाभिनय: ॥

[१] सट्टक— विष्टक्मभक तथा प्रवेशकसे रहित, प्राकृत-रहित केवल एक भाषामें [प्रथात् संस्कृत भाषा वाला या प्राकृतसे रहित और प्राकृत वाता संस्कृतसे रहित] बनाया गया, नाटिकाके सदृश रूपक 'सट्टक' नामसे कहा जाता है ॥ १ ॥ साहित्यदर्पणकारने सट्टकका लक्षण निम्न प्रकार किया है— सट्टकं प्राकृताशेषपात्रं स्यादप्रवेशकम् । न च विश्कम्भको डप्यत्र प्रचुरश्चादिसूत्र रस: ॥ २७६ ॥ श्रङ्का जवनिकाव्या: स्यु: स्यादन्यत्राटकासमम् । yथा पूर्वरंजनी ।

साहित्यदर्पणकारके अनुसार सटटकमें सारा पात्र्य भाग केवल प्राकृत भाषामें लिखा जाता है, किन्तु नाट्यदर्पणकारके अनुसार संस्कृत या प्राकृत किसी भी एक भाषामें लिखा जा सकता है। जो सटटक प्राकृत भाषामें लिखा जाए वह संस्कृत भाषासे रहित हो श्रोर जो संस्कृतमें लिखा जाए वह प्राकृत भाषासे रहित हो । यह नाट्यदर्पणकारके 'प्राकृत-संसक्तया भवति' का अभिप्राय प्रतीत होता है ।

[२] श्रीगदित— इसमें भी जहाँ दानवशत्रु श्रर्थात् विष्णुकी पत्नो लक्ष्मीके समान कोई कुलाङ्गना अपने पतिके शौर्य, धैर्य श्रादि गुणोंके सामने बखान करती है । श्रोर पतिके द्वारा ठगी जानपर किसी गीतमें उसको उपालम्भ देती है उसको विद्‌गानोंने 'श्रीगदित' कहा है । श्रोर वह [पदाथोंका प्रभिनय न होकर केवल] पदाभिनयात्मक होता है ॥ ५६ ॥ साहित्यदर्पणकारने 'श्रीगदित' का लक्षण निम्न प्रकार किया है— प्रस्ख्यातवृत्तमेकाङ्कं प्रस्ख्यातोदात्तनायकम् । प्रसिद्धनायिकं गर्भ-विमर्शाभ्यां विवर्जितम् ॥ २७३ ॥ भारतीयवृत्तबहुलं श्रीतिशब्देन संकुलम् । मतं श्रीगदितं नाम विद्‌गद्भिरुपपकम् ॥ २७४ ॥ श्रीरासेना श्रीगदिते गायेत् किचित् पठेदपि । ekाङ्का भारतीप्राय इति कीचिन् प्रचक्षते ॥ २७५ ॥

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[३]—चौर्यरतप्रवीदं यूनोरनुरागवर्यानं वापि । यत्र ग्राम्यकथाभिः कुरुते किल दूतिका रहसि ॥ मन्त्रयति च तद्विषयं न्यग्जातित्वेन याचते च वसु । लब्ध्वापि लब्धुमिच्छति 'दुर्मिलिता' नाम सा भवति ॥५७॥

[४]—प्रथमानुराग-मान-प्रवास-भृङ्गारसंश्रयं यत् स्यात् । प्राबृड्-वसन्तवर्यानपरमन्यद वापि सोत्कण्ठम् ॥ ग्रन्थे वोद्रसादीनिबद्धमेतच्चतुर्भिरपसारैः । प्रस्थानमिति बुबते प्रवासमुपलक्षयत् सुधियः ॥५८॥

[३] दुर्मिलिता— जिसमें कोई दूती एकान्तमें ग्राम्य [प्रश्लील] कथाओं द्वारा युवक और युवतियोंके प्रेमका वर्णन करती है उसके विषयमें सलाह करती है नीच जातिकी होनेसे धन माँगती है धनके मिल जानेपर भी और अधिक धन चाहती है उसको 'दुर्मिलित' नामक रूपक कहा जाता है ॥ ५७ ॥

दुर्मेल्ली चतुरङ्कं स्थान् कैशिकी-भारतीयुता । श्रृङ्गारभरा नागर-नरा नायिकाभूषितिता ॥ ३०३ ॥

त्रिनाली: प्रथमोऽङ्कोऽस्यां विटक्रीडामयो भवेत् । पंचनालिद्रतीयोऽङ्को विद्रूपकविलासवान् ॥ ३०४ ॥

शृङ्गारालिकस्ततीयस्तु पीठमर्दविलासवान् । चतुर्थी दशाली: स्याद्‌क्रोशितनागरैः ॥ ३०५ ॥

[४] प्रस्थान— प्रथम अनुराग, मान, प्रवास, भृङ्गाररसे युक्त वयस्या और वसन्तके वर्णन, ग्रथवा और भी उदकण्ठा-प्रदर्शक समप्रेसी परिपूर्ण, ग्रन्थमें वीररस द्वारा निबद्ध किया गया और बार अपसार [प्रर्थात् नृत्य द्वारा छिन्न होनेवाले खण्डों] में विरचित [उपयुक्तप्रवीदकों] विद्वान् लोग प्रवासके सूचक 'प्रस्थान' इस नाम से कहते हैं ॥ ५८ ॥

प्रस्थाने नायको दासो हीनः स्यादुपनायकः । दासी च नायिका वृत्ति: कैशिकी भारती तथैव ॥ २८० ॥

सुरापानसमायोगाद्‌उद्भटार्थस्य सेहातः । श्रङ्कौ द्वौ लयतालादिविलासो बहुलस्तथा ॥ २८? ॥

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[५]—नोष्ठे यत्र विहरतश्चेष्टितमिह कैंटभद्रिषः किंचित् । रिष्ठासुरप्रमथनप्रभृति तदिच्छान्वितं गोष्ठीति ॥ ५६ ॥

[६]—यन्मण्डलेन नृतं स्त्रियां हल्लीसकं तु तत् प्राहुः । तत्केको नेता स्याद् गोपक्रीडामिव मुरारिः ॥ ६० ॥

[७]—यस्य पदार्थाभिनयं ललितलयं सदसि नर्तकी कुरते । तन्नर्तकं शाम्या लास्यच्छलितद्विपद्यादि ॥ ६१ ॥ किन्तरविषयं लास्यं नृतं शाम्या । शृङ्गाररसम प्रधानं लास्यम् । शृङ्गार-वीर-रौद्रा-द्विप्रधानं छलितम् । द्विपदादयः छन्दोभेदाः ॥

[८]—रथ्या-समा-ज-चत्वर-सुरालयादौ प्रवर्त्यन्ते बहुभिः । पात्रविशेषैरयत् तत् प्रेक्षराकं कामदहनादि ॥ ६२ ॥

[५] गोष्ठी— जिसमें गोष्ठमें विहार करनेवाले कृष्णके रिष्ठासुरवध आदि जैसे किसी क्यापारका प्रवर्शन किया जाय उसको 'गोष्ठी' कहते हैं ।।५६।। साहित्यदर्पणकारने 'गोष्ठी' का लक्षण निम्न प्रकार किया है— प्राकृतैर्नवभिः पुं सिर्दर्शनामिर्वणयलंकृता । नोदात्तवचना गोष्ठी कैशिकीवृत्तिशालिनी ॥ २७४ ॥ हीना गर्व-विस्मश्रभ्यां पंच-भड़ योपिदन्विता । काम-शृङ्गारसंयुक्ता स्यादेकाङ्कनिरमिता ॥ २७५ ॥

[६] हल्लीसक— स्त्रियोंका जो मण्डलाकार बनाकर नाचना है उसको 'हल्लीसक' कहते हैं । गोपियोंके बीच कृष्णके समान उसमें एक नायक होता है ।। ६० ।। साहित्यदर्पणकारने हल्लीसकका लक्षण निम्न प्रकार किया है— हल्लीसक एक एवाङ्कः सप्ताष्टौ दश वा स्त्रियः । वागुदात्तकपुरुषः कौशिकोड्यत्र तु योज्यते ॥ मुख्यान्तिमौ तथा सन्धी बहुताललयस्थितिः ॥ ३०७ ॥

[७] शम्या— सभामें नर्तकी ललित लयके साथ जिसके पदार्थोंका प्रभिनय करती है उस नृत्यको शम्या, लास्य, छलित, द्विपदी आदि नामोंसे कहते हैं ।। ६१ ।। किन्तरों नाचको 'शाम्या' कहते हैं । शृङ्गाररसम प्रधान नृत् 'लास्य' कहलाता है । शृङ्गार, वीर और रौद्रादि प्रधान नृत्तको 'छलित' कहते हैं । 'द्विपदी' आदि [उन नृत्तोंमें गाए जानेवाले] छन्दोंके भेद होते हैं ।

[८] प्रेक्षराक— गलियोंमें, समाजोंमें, चौराहोंपर अथवा मचशाला आदिमें बहुतसे विशेष प्रकारके पात्रों के द्वारा जिसका प्रर्दशन किया जाय उस [नृत्यविशेष] को 'प्रेक्षराक' कहते हैं । जैसे काम-दहन आदि [प्रेक्षराकके उदाहरण हैं] ।। ६२ ।।

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का० २१४-१७, सू० २१६ ] चतुर्थो विवेकः [ ४०७

[९]—षोडश द्वादशाष्टौ वा यस्मिन्नृत्यन्ति नायिका; । पिण्डीबन्धादिविन्यासै: रासकं तदुदाहतम् ॥ पिण्डनात् तु भवेत् पिण्डी गुम्फनाच्छृङ्खला भवेत् । मेदनाद् मेढको जातो, लताजालापनिबदत: ॥६३॥

[१०]—कामिनोभिर्युंवो भर्तृरिच्छितं यत् तु नृत्यते । रागाद् वसन्तमासाद्य स ज्ञेयो नाट्यरासकः ॥६४॥

साहित्यदर्पणकारने 'प्रेक्षणकं' के स्थानपर 'प्रेक्ष्यगैम्' नामका प्रयोग किया है श्रोर उसका लक्षण निम्न प्रकार किया है— गर्भावमर्यादाहितं प्रेक्ष्यगैर्ं हीननायकम् । व्यासूत्रधारमेकाङ्कमविच्छिन्नम् - प्रवेशकं ॥ २८६ ॥ नियुद्धसम्प्रफेटयुतं सर्वद्रुत्यसमाश्रितम् । नेपाल्ये गीयते नान्दी तथा तत् प्ररोचना ॥ २८७ ॥

[५] रासक— जिसमें सोलह, बारह या आठ स्त्रियाँ [नायिकाएँ] पिण्डीबन्ध प्रादिको रचना द्वारा नाचती हैं उसको 'रासक' कहा जाता है । [नाचने वालियोंके] एक साथ इकट्ठे हो जानेको पिण्डी कहते हैं । एक-दूसरेसे गुँथ- कर [नाच] भुङ्खला कहलाती है । [पूर्व गुम्फित] लताजालको तोड़कर श्रलग हो जानेको मेढक कहते हैं ॥ ६३ ॥

साहित्यदर्पणकारने 'रासक' का लक्षण निम्न प्रकार किया है— रासकं पंचपात्रं स्यात् मुख-निर्वहणान्वितम् । भाषा-विभावाभूयिष्ठं भारतीकैशिकीमयम् ॥ २२९ ॥ व्यासूत्रधारमेकाङ्कं सर्वाङ्गं कलान्वितम् । शिलष्टाननद्युते ख्यातिनायिकं मुखनायकम् ॥ २३० ॥ उदात्तभावनिन्याससंश्रितं चोत्तरोत्तरम् । इहु प्रतिमुखसन्धर्मपि केचित् प्रचक्षते ॥ २३० ॥

[१०] नाट्य-रासक— वसन्त श्रादि[उन्मादक] ऋतुओंके श्रानेपर स्त्रियोंके द्वारा रागादिके श्रावेशमें जो राजाओं के चरित्रका नृत्य द्वारा प्रवन्धन किया जाता है उसको 'नाट्य-रासक' कहा जाता है ॥ ६४ ॥

साहित्यदर्पणकारने नाट्यरासकका लक्षण निम्न प्रकार किया है— नाट्यरासकमेकाङ्क बहुतालस्थिस्थिति ॥ २८७ ॥ उदात्तनायकं तद्वत्पीठमर्दोपनायकम् । हार्योदात्त्य च सह्यूतारो नारी वासकसज्जिका ॥२७८॥ मुखनिर्वहणो सन्धी लास्याङ्गानि दशाङ्गपि च । केचित् प्रतिमुखं सन्धिमिव नेच्छन्ति केवलम् ॥ २७९ ॥

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[११]—प्राक्षिप्तकाथ वर्गो मात्राध्रुवकोड्यभरनतालश्च । पद्धतिका छर्दनिका यत्र सृष्टविदह काव्यमिति ॥६५॥

[१२]—हरि-हर-भानु-भावनी-स्कन्द-प्रमथाधिपस्तुतिनिबद्धः । उद्धत-करुणप्रायः स्त्रीवर्गो वर्गान्वयुक्तः ॥ यदि चैव शुद्धवाचा शुद्धः संकीर्णया च संकीर्णः । सर्वाभिरभाषाभिचित्रैश्च विचेष्टितैश्चित्रः ॥ प्रयमुद्र्तोदथ ललितो भावो ललितोदतश्च सम्भवति । श्रथर्नामोद्र्त्याज्जालित्यादुभयस्त्वाच्च ॥६२॥

[१३]—यद दुष्करमभिनेयं चित्रं चान्यदूद्र्तं च सम्भवति । तद् भारतेकेऽभिनेयं युतमनुतालैवितालैश्च ॥ प्रायो हरिचरितयुक्तः स्त्रीकृतगाथादिवर्गो मात्राश्च । सकुमारत: प्रयोगाद् भावो डप हि भाषिका भवति ॥६३॥

इत्यादीनि ॥ ६३ ॥

[११] काव्य— जिसमें प्राक्षिप्तका, वर्गें, मात्रा, ध्रुव श्रोर न टूटनेवाला ताल, पद्धतिका श्रोर छर्दनिका जिसमें हो उसका 'काव्य' कहते हैं ॥ ६५ ॥

[१२] भाव— विष्णु, महादेव, सूर्य, पार्वती, स्कन्द श्रोर प्रमथाधिपकी स्तुतिमें निबद्ध किया गया, उद्धत करुणादोंसे युक्त, स्त्री पात्रोंसे रहित, यदि शुद्ध संस्कृत वागों द्वारा वर्गान्वयुक्त हो तो शुद्ध श्रोर यदि [संस्कृत तथा प्राकृतके] संकर [द्वारा किए गए वर्णन] से युक्त हो तो उसे संकीर्ण [भाषा कहलानेवाला] सब प्रकारके भाषाश्रों श्रोर नाना प्रकारके व्यापारोंसे विचित्र यह भाव उद्धत [जिसमें वसंगत] विषयोंके उद्धत ललित तथा उभयात्मक होनेसे उद्धत, ललित तथा ललितोद्र्त [तीन प्रकारका हो सकता है ।] श्रोर उस भावमें श्रभिनेय वस्तु श्रनुताल तथा वितालोंसे युक्त होता है ॥ ६२ ॥

[१३] भाषिका— प्रधिकतर विध्युके चरितसे युक्त स्त्रियों द्वारा गाथा [छन्द], वर्गें श्रोर मात्राश्रोंकी रचना जिसमें की जाय इस प्रकारका भाषा भी सुकुमारताके प्रयोग के [विश्लानेके कारणे] भाषिका कहलाता है ॥ ६३ ॥

साहित्यदर्पणकारने भाषा तथा भाषिकाके लक्षण निम्न प्रकार किए हैं— मुख-निर्वहणान्विता । कैशिकी-भारतीभूतयुकैव काव्यविनिर्मिता ॥ ३०८ ॥ उदात्तत्नायिका मन्दपुष्पास्त्राऽऽड्गसमकम् । उपन्यासोडथ विन्यासो विभोष: साधवर्स तथा ॥ ३०६ ॥

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उपसंहार: ] चतुर्थो विवेक: [ ४०७

एतानि च स्वल्पमात्रं जनानिमित्तवाद, बुद्धैररनभिहितत्वाच्च वृत्ताच्च कीर्तिता-नीति ।

शब्द-प्रामाण्य-साहित्य-छन्दोलद्मविधायिनाम् । श्रीहेमचन्द्रपादानां प्रसादाय नमो नमः ॥ १ ॥

परोपनीतशास्त्रार्था: स्वनाम्ना कृतकोतिय: निवद्धारोज्जयुनातेन, को नो क्लेशववेष्यति ॥ २ ॥

न सूत्रवृत्त्योराधिक्यं न हीनत्वं न कुष्ठता । यावदर्थौ गिर: सन्ति स्वर्य सन्तो विवेचताम् ॥ ३ ॥

शब्दलद्म-प्रामालद्म-काव्यलद्म-कृतश्रम: वाग्विलाससत्रमार्गो नौ प्रवाह इव जाह ज: ॥ ४ ॥

रूपस्वरूपं विज्ञातुं यदीच्छल यथास्थितम् । सनस्तदानीं गहीत निर्मलं नाट्यदर्पणम् ॥ ५ ॥

समर्प्य नित्यत्रिश संहार इति सप्तम: । उपन्यास: प्रसंगेन भवेत कार्यस्य कीर्तनम् ॥ ३१० ॥

निर्वेदवाक्यव्युत्पत्तिविन्यास इति स स्मृत: । भान्तिनाशो विवोध: स्यान्तस्थाध्यायान्तु साध्वसम् ॥ ३११ ॥

सोपानम्भवच: कोपपीडयेह समर्पणम् । निर्देशन्स्योपन्यासो निवृत्तिरिति कथ्यते ॥ ३१२ ॥

संहार इति च प्राहुर्यत कार्यस्य समापनम् ।

इनके स्वल्प मात्र में ही मनोरंजक होने तथा भरतमुनि [बृद्ध] के द्वारा न कहे जानेके कारण [इनको हमने मूल ग्रन्थ में न दिखलाकर यहाँ] वृत्तिभाग में ही दिखलाया है ।

व्याकरन, न्याय, साहित्य तथा छन्द:शास्त्र के लक्षण ग्रंथों की रचना करनेवाले श्री पूज्य प्राचार्य हेमचन्द्रजी की प्रसन्नता के लिए हम उनको नमस्कार करते हैं ॥ १ ॥

आजकल [के ग्रन्थकार प्राय:] दूसरों के शब्दों श्रोर ग्रन्थों को लेकर अपने नाम से [ग्रन्थ रचना-दिखलाकर] कीर्तिका उपार्जन करते हैं [इसी दशा में इस ग्रन्थ की रचनाशीलता में उठाए हुए] हमारे क्लेश को कौन समझता है ॥ २ ॥

[हमारे इस ग्रन्थ में] न सूत्रका आधिक्य है और न वृत्तिभाग की कमी है श्रोर न [कुठता प्रयत्नात्] श्रस्पष्टता है । विद्वान् लोग स्वयं ही देखलें कि इसमें जितना ग्रथ कहना है उतने ही शब्दों का प्रयोग किया गया है । [ज्ञानावश्यक कत्थु भी नहीं लिखा गया है श्रोर न अप्रेक्षित बातों को थोड़ा ही गया है] ॥ ३ ॥

व्याकरणशास्त्र, न्यायशास्त्र श्रोर साहित्यशास्त्र में श्रम को प्रदर्शित करनेवाला हम दोनो की वारणका प्रवाह गंगाकी धारार्के समान तोन धाराओं वाला है ॥ ४ ॥

हे सज्जन पुरुषों यदि श्राप रूपकों के वास्तविक स्वरूप को देखना चाहते हो तो इस निर्मल नाट्यदर्पण की प्रहण कीजिए । [इस निर्मल नाट्यदर्पण में ही रूपकों के स्वरूप को यथार्थ वर्णन हो सका है ।]

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४१० ] नाट्यदर्पणम् [ उपसंहार:

इति श्री रामचन्द्र-गुणचन्द्रविरचितां स्वोपज्ञाट्टकदर्पण्याविबृत्तौ

सर्वरूपकसाधारलक्षणनिरर्णयो नाम चतुर्थो विवेक:

श्री रामचन्द्र-गुणचन्द्र विरचित स्वर्निमित नाट्यदर्पणको विवरणमें

सब रुपकोंके समान विषयोंका प्रतिपादन करनेवाला

चतुर्थ विवेक समाप्त हुअा ॥

उत्तरप्रदेशस्थ 'पोलीभीत' मण्डलान्तर्गत 'मक्तुल' ग्रामनिवासिनां

श्री शिवलाल-बक्षी-मोहोदयानां-तनुजनुषा

वृन्दावनस्य-गुरुकुलविवद्वविद्यालयाधिगतविद्येन, तत्रस्थाचार्यपदमभितिष्ठता,

एम० ए० इत्युपपदधारिणा 'विद्यामार्तण्डेन' श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिना

विरचिता 'नाट्यदर्पणदीपिका' हिन्दीपाख्या समाप्ता ।

समाप्तइचायं प्रन्थ:

समाप्त

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परिशिष्ट [१]

रामचन्द्र-गुणचन्द्रसं सूचितं

नाट्यदर्पणाम्

(मूलम्)


: १ :

ग्रथ नाटकनिर्णय: प्रथमो विवेक:

चतुर्वर्गफलां नित्यं, जैनीं वाचमुपास्महे ।

रूपैर्दशाभिर्विश्वं, यया न्याय्ये धृतं पथि ॥ १ ॥

ग्रभिनेयस्य कार्यस्य, सूरिभिर्मेदभृतः कियत् ।

कियतोऽपि प्रसिद्धस्य, दृश्यं लक्ष्म प्रचक्ष्महे ॥ २ ॥

नाटकं प्रकरणं च, नाटिका प्रकरणयथ ।

व्यायोग: समवकार: भागा: प्रहसनं डिमः ॥ ३ ॥

श्रृङ्ग ईहामृगो वीथी, चर्वार: सर्ववृत्तयः ।

त्रिवृत्तय: परे त्वष्टौ, कौशिकी-परिवर्जनात् ॥ ४ ॥

व्यायातद्यराजचरितं, धर्मं-कामार्थसङ्कलम ।

सा ङ्कोपाय- दशा-सन्धि, दिव्याङ्कं तन्त्र नाटकम ॥ ५ ॥

उद्भतोदात्त-ललित-शान्ता धीर-विशेषणा: ।

वर्ण्याः स्वभावाच्चवार:, नेतृगां मध्यमोत्तमा: ॥ ६ ॥

देवा धीरोदत्ता धीरोदात्ता: सैन्येश-मन्त्रिणा ।

धीरशान्ता वृणिग्-विप्रा:, राजानस्तु चतुर्विधा: ॥ ७ ॥

धीरोदात्तरचलश्र्चण्ड:, दर्पी दम्भी विकत्थन: ।

धीरोदात्तोडतिगम्भीर:, न्यायी सत्वी क्षमी स्थिर: ॥ ८ ॥

शृङ्गारी धीरललित:, कलासक्त: सुखी मृदु: ।

धीरोशान्तोडनहङ्कार:, कृपालुरविनयी नय: ॥ ९ ॥

मुख्यमिष्टफलं वृत्तं, श्रृङ्गं प्रासङ्किं कवचिन् ।

सुख्यं प्रयोग्यमर्यादं, नाट्यं नाटचविनिर्मितम ॥ १० ॥

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नीरसानुचितं सूच्यं, प्रयोज्यं तद्विपर्ययः।

ऊह्यं तदविनाभूतम्, उपेक्ष्यं तु खुपुस्सितम् ॥ ११ ॥

प्रकाशं ज्ञाप्यमन्त्र्येऽपि, स्वगतं स्वहृदि स्थितम् ।

परोक्तृत्य रहस्यार्थाडन्यस्मै तद्वपारितम् ॥ १२ ॥

त्रिपताकान्तरोद्यान्त, जल्पो वस्तुजल्पनात्मकम् ।

ग्राकाशोक्तिः स्वयंप्रस्तुत-प्रयुत्तरमपात्रकम् ॥ १३ ॥

स्वल्पपदं लघुगद्यं, श्लिष्टतावान्तरवस्तुकम् ।

सिन्धु-सर्गेन्दु-कालादि-वसन्तान्ताच्चयवर्जितम् ॥ १४ ॥

एकाङ्करसमान्याङ्गं, ब्रहृतान्तं रसोमिभिः ।

प्रलक्षितमलङ्कार-कथा-डिम्भ-रङ्गलद्-रसम् ॥ १५ ॥

उक्तत्वाद् वक्ष्यमारास्वाद्, भूयःकार्याद् यदुच्यते ।

तद् करणं श्रावयेद् येन, न याति पुनरुक्तताम् ॥ १६ ॥

गोपुच्छ-केश-कल्पानां, नाटचेऽवस्तुनि कल्पयेत् ।

उदात्तत रज्जका भावाः, स्थापनीयाः पुरः पुरः ॥ १७ ॥

प्रयुक्तं च विरुद्धं च, नायकस्य रसस्य वा ।

वृतं यत् तत् परित्याज्यं, प्रकार्यमथवाडन्यथा ॥ १८ ॥

ग्रावस्थया: समाप्यर्वा, छेदो वा कार्ययोगतः ।

ग्रद्धः सबिन्दुङ्‌ श्यार्थः:, चतुर्यामो ह्रुतंतः ॥ १९ ॥

ग्रावस्याकविरोध्यर्थः;, स्वल्पपात्रः सनिगमः ।

पञ्चसन्ध्योऽङ्गपक्षेऽपि, दशसड्‌ङ्ख्यः: प्रकर्षतः ॥ २० ॥

प्राभभतिः प्रभविष्णुः, नेतृपात्रे न कुत्रचित् ।

बन्धः: पलायनं सन्धिः, योज्यो वा फललिप्सया ॥ २१ ॥

दूराध्वानं पूरः:, राज्य-दేశादि-विप्लवः ।

रतं मुखः समीकादि, वण्यं विष्कम्भकादिभिः ॥ २२ ॥

ग्रद्धानहन्स्य वृत्तस्य, त्रिकालस्यानुरञ्जन ।

सड्‌क्षिप्य संस्कृतेनोक्तिः:, ग्रद्धादौ मध्यमेज्जने: ॥ २३ ॥

शुदो विष्कम्भकस्तत्र, सड्‌क्षिप्योऽर्‌ नीच-मध्यमैः ।

ग्रद्‌धकसन्धकः: शावय-सन्धानातीतकालवान् ॥ २४ ॥

एवं प्रकाशको नीचः:, परार्थः: प्राकृतादिना ।

एतो प्रभूतकार्यस्वात्, नाटकादिचतुष्टये ॥ २५ ॥

ग्रद्धार्यमन्वितपात्रेऽपि, छिन्ना ड्‌मुख्योजनम् ।

वस्तुनः सूचनं जुला, पात्रे लैपद्यसंस्थितैः ॥ २६ ॥

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प्रथमो विवेकः

सोडन्वावतारो यत्न-पात्रे:, श्राद्धान्तरम सूचनम । श्राद्धो सूच्ये बहावने, क्रमादल्पे तरे तमे ॥ २७ ॥

बीजं पताका प्रकरी, बिन्दुः कायं यथारुचि । फलस्य हेतवः पञ्च, चेतनाचेतनात्मकाः ॥ २५ ॥

स्तोकोदृष्टः फलप्राप्तः, हेतुबिन्दु प्ररोहयोः । प्राविमर्श पताका चेतु, चेतनः स परार्थंकृत् ॥ २६ ॥

चिन्तितार्थपरप्राप्तिः, वृत्ते यत्नोपकारिषु । पताकास्थानकं तत्तु, चतुर्थ मण्डनं वचचितं ॥ ३० ॥

सहसेप्टार्थलाभश्च, शिलष्टसातिशया च वाग् । द्वचर्था चाप्रकटे शिलष्ट-स्पष्टप्रत्यभिघादपि च ॥ ३१ ॥

प्रकरी चेतुं वचिचद् भावी, चेतनोऽन्यप्रयोजनः । हेतौश्छेदेऽनुसन्धानं, बहूनां बिन्दुराफलात् ॥ ३२ ॥

साध्यो बीजसहकारो, कार्ये कार्यस्तु मुख्यता । पताकाया: प्रघानवेधनुसन्धिः सूचनाड्डिद्भिः ॥ ३३ ॥

आरम्भ-यत्न-प्राप्त्याशा-नियताप्ति-फलागमा: । नेतुर्वत्ते प्रघाने सूः, पञ्चावस्था ध्रुवं क्रमात् ॥ ३४ ॥

फलायोत्सुक्यमारम्भः, प्रयत्नो व्याप्तौ स्वरा । फलसम्भावना किश्चित्, प्राप्त्याशा हेतुमात्रतः ॥ ३५ ॥

नियताप्तिरुपायानां, सकल्यात् कार्यनिर्यणः । साक्षादिष्टार्थसम्भूति:, न्यायकस्य फलागमः ॥ ३६ ॥

मुखं प्रतिमुखं गर्भांशो-वहरणान्यनिमौ । सन्धयो मुख्यवृत्तांशा:, पञ्चावस्थाड्डनुगा: क्रमात् ॥३७॥

मुखं प्रधानवृत्तांशः, बीजोभत्न-रसाश्रयः । प्रतिमुखं कियल्लक्ष्य-बीजोद्भाट-समन्वितः ॥३५॥

बीजस्योन्मुख्यवादन गमः, लाभालाभ-गवेषणे: । उद्दृढरसाध्य-विच्छित्तामा, विमर्शो व्यसनादिभिः ॥ ३९ ॥

सर्वबीजकृतावस्था: नाना-भावा मुखादयः । फलसंयोगिनो यस्मिन्, ग्रासी निर्वहणो ध्रुवम् ॥ ४० ॥

उपक्षेपः परिकरः, परिन्यासः समाहितिः । उद्दोधः करणां चिन्तान्यत्रैवाथ विलोभनम् ॥ ४१ ॥

भेदनं प्राप्तयं युक्तिः, विधानं परिभावना । सर्वसंशयमुनि सूः, द्वादशाङ्गं मुखं ध्रुवम् ॥ ४२ ॥

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बीजज्योतिरुपरक्षेप: स्वल्पव्यास: परिक्रिया ।

विनिरिचय: परिन्यास:, पुनर्न्यास: समाहिति: ॥ ४३ ॥

स्वल्पप्ररोह उद्भेद:, करणं प्रस्तुतक्रिया ।

विलोलनं स्तुतिगाथ्यं, श्रवणं पाठनिगम: ॥ ४४ ॥

प्रापणं सुखसम्प्राप्ति:, युक्ति: कृत्यविचारणा ।

विधानां सुख-दु:खाप्ति:, विस्मय: परिभावना ॥ ४५ ॥

विलासो घूननं रोष:, सान्त्वनं वच्यसंहृति: ।

नम्रं नम्रत्वनिस्ताप:, स्युरेतानि यथारुचि ॥ ४६ ॥

पुष्टं प्रगमनं वच्यम्, उपन्यासोपसंश्रयम् ।

पठनावश्यमध्यज्ञनि:, प्रतिमुखे त्रयोदश ॥ ४७ ॥

विलासो नृ-स्त्रिग्योरोर्हा:, घूननं साम्न्यानुसार: ।

रोधोर्धति: सान्त्वनं साम, पात्रोधो वच्यसंहृति: ॥ ४८ ॥

क्रोधादये हसनं नम्रं दोषावृतो तु तद्यृति: ।

श्रपादर्शानमं ताप:, पुष्टं वाक्यं विशेषवत् ॥ ४९ ॥

प्रगम: प्रतिवचो-श्रुति:, वच्य प्रत्यक्षकरंशम ।

उपनतिपुरन्यास:, नष्टेष्टेहानुसंश्रयम् ॥ ५० ॥

सङ्ग्रहो रुपमनुमा, प्रार्थनोदाहृति: क्रम: ।

तदृते गो विद्रवश्र्चेतद्, गुणात। कार्यमष्टकम् ॥ ५१ ॥

ग्राक्षेपोद्घिबलं मार्गोऽस्त्यहरण-तोतके ।

पंचैतानि प्रधानानि, गर्मंडलानि त्रयोदश ॥ ५२ ॥

सङ्ग्रह: साम-दानादि:, रुपं नानार्थसंश्रय: ।

श्रनुमान निश्चितयो लिङ्गात्व, प्रार्थना भावनाचनम् ॥ ५३ ॥

उदाहृति: समक्षर्ष:, क्रमो भावस्य निर्णय: ।

उदेगेगो भीद्रव: शङ्काड्क्षेपो बीजप्रकाशनम् ॥ ५४ ॥

श्रविबलं बलाधिकयं, मार्गस्तवार्थसंश्रनम् ।

प्रस्तुताहरयां छुद्म, तोटकं गर्मितं वच: ॥ ५५ ॥

द्रव: प्रस्तुत: सम्प्रेक्ष्योद्घावदानं ब्रुति: ।

वेदो विरोध: संग्रभ: भवेत्युग्रतरो नव ॥ ५६ ॥

शक्ति-प्ररोचनस्सदन-व्यवसायास्तु मुख्यत: ।

त्रयोदशाश्रनियंरश:, द्रव: पूज्यवयतिक्रम् ॥ ५७ ॥

प्रसक्तो महतां कीर्ति:, सम्प्रेक्ष: क्रोधजं वच: ।

प्रसक्तो महतां कीर्ति:, सम्प्रेक्ष: क्रोधजं वच: ।

श्रप्रवाद: परावाप:, धावनं मुख्यमार्जनमु ॥ ५८ ॥

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प्रथमो विवेकः

तिरस्कारो द्वु तिः खेदः, श्रमः काय-म्नो-भवः ।

विरोधः प्रस्तुतज्यापित, संप्र्रम्भः शक्तिकीतिंनम् ॥ ५९ ॥

कृदुप्रसादनं शक्तिः भाविसिद्धिः प्ररोचना ।

फलसामिप्यमादानं, व्यवसायोद्यमहेतयुक् ॥ ६० ॥

सनि्धानिरोधो प्रथनं निरस्यैः परिभाषणम् ।

उपास्तिः कृतिरावनं; समयः परिजोहनम् ॥ ६१ ॥

भाषणां काव्यसंहार-पूर्वभाव प्रशस्तताय ।

चतुदंशाझो निर्वाहिः; सनिग्रहौजः-फलागमः ॥ ६२ ॥

निरोधः कार्यमीमासा, प्राथनं कार्योदशंनम् ।

निरस्योदनुमवस्यातिः; परिभाषा स्वनिर्दनम् ॥ ६३ ॥

सेवोपास्तिः कृतिः क्षेमम, ज्ञानन्दो वाचिश्छतागमः ।

समयो दुःखनिवसोसद्धुत्थितः परिजोहनम् ॥ ६४ ॥

भाषणां साम-दानोक्तिः, प्राभावः कृत्यदर्शनम् ।

वरेच्छा काव्यसंहारः प्रशस्तिः शुभशंसना ॥ ६५ ॥

इति श्रीरामचन्द्र-गुणेाचन्द्रविरचिते नाटचदर्पणसूत्रे नाटकनिर्णयौ नाम

प्रथमो विवेकः ॥ १ ॥

: २ :

प्रथः प्रकरणाचैकादशरूपनिणंयो द्वितीयो विवेकः

प्रकरगं वाकिग-विप्र-सचिव-स्त्रियां-संकरात ।

मन्दगोत्राझानं दिव्यान्वितं मध्यचेष्टितम् ॥ १ ॥

दास-श्रेष्ठ-विटियुक्तं; क्लेशाढच' तचच सप्तधा ।

कल्प्येन फल-वस्तुनाम, एक-द्वि-त्रि-विधानतः ॥ २ ॥

कुलस्त्री गृहवार्तायां, पण्यस्त्री तु विपर्यये ।

विटे पर्यो दय तस्मादू एकविंशतिधाड्ययदः ॥ ३ ॥

श्रन्राकल्यं पुरा क्लृप्तं, यथादाणार्षमसदुपराम ।

शेषं नाटकवत् सर्वं, केशिकोपूर्वांतां विना ॥ ४ ॥

चतुरङ्गा वधूनेप्ता स्त्री-महीफला ।

कल्प्यार्था केशिकी-मुख्या, पूर्वंरूपद्योतिष्यता ॥ ५ ॥

प्राय्याति-शयातितः कन्या-देवयोर्नाटी चतुर्विधा ।

श्रन्र मुख्याकृतो योगः, पर्यन्ते नेदुर्न्यया ॥ ६ ॥

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प्रेमाद्रौ वर्तमानस्यां, नेता मुख्याभिनिष्पत्तिः । देवी दक्षिणपार्श्वे मुग्धा, समा धर्मा द्वयोः पुनः ॥ ७ ॥

क्रोध-प्रसाद-प्रत्युत्तर-रति-च्छद्मादि भूरिशः । एवं प्रकाराः किन्तु, नेता प्रकारणोदितः ॥ ८ ॥

एकाहृतैककान्तो, गर्भांशोऽनुर्विजृम्भितः । प्रास्त्रोनिमित्तं सङ्ग्रामो, नियुद्ध-स्पर्धनोदितः ॥ ९ ॥

स्वल्पोपपिज्जनः श्यातः-वस्त्रादि-स्वप्नसाश्रयः । प्रादिवध्योपपत्तिस्वामी, व्यायोगो नायिकां विना ॥ १० ॥

विज्ञेयः समवकारः, श्यातार्थो निर्विमर्शकः । उदात्तश्रृङ्ग-देत्येशो, वीथ्याङ्गो वीरोदृदवान् ॥ ११ ॥

पत्तन द्वादश नेतारः, फलं तेषां पृथक् पृथक् । श्रृङ्गारस्य त्रिसन्ध्यङ्गः, त्रिकपटास्त्रिविध्रवा ॥ १२ ॥

षड्युग्मकमेकमुखर्तः स्त्री, निष्पितार्थाः स्वकायंतः । महावाक्ये च सम्भेदः, क्रमाद् दृश्यैः केकसंश्रयः ॥ १३ ॥

शृङ्गारस्त्रिविधो धर्मे-कामार्थफलहेतुकः । वृत्त्याद्-वृत्त्यन्तक-द्वैशस्यः, सम्भवी कपटस्त्रधा ॥ १४ ॥

जीवाजीवोपयोगः स्यात्, स्यात्, विद्रवस्तिररमेधिषु तु । प्रत्येकमुद्र श्वेतकः, पद्यं च सङ्घर्षाड्डिकम ॥ १५ ॥

मुखे: प्रधानश्रृङ्गार-वीरो मुखनिर्वाहवान् । एकाङ्को दशालास्याङ्गः, प्रायो लोकानुरञ्जकः ॥ १६ ॥

एको वृत्तो वा भूतो वा, वेश्याङ्गे: स्वस्य वा स्थितिम् । व्योमोकृत्य वराङ्गयेतत्र, वृत्तिमुख ख्या च भारती ॥ १७ ॥

वृत्तिह्यकार्य वीथ्याङ्गि, श्यातकोलोन-दश्भवत् । हास्याद्भि: मुख-सन्ध्याद्भिः-वृत्ति प्रहसनं द्विषा ॥ १८ ॥

निन्द्य-पाखण्ड-विप्रादेः, प्रहेलिकासम्य-वञ्जितम् । परिहासवचः-प्रायं, शुद्धमेकस्य चेष्टितम ॥ १९ ॥

सङ्कीर्णमुद्भटत्कल्प-मालासङ्चार-परिच्छदम् । बहूनां बन्धकी-चेष्ट-वेश्याङ्गीदीनां विचेष्टितम ॥ २० ॥

श्रृङ्गान्त-हास्य-श्रृङ्गार-विमर्शः श्यातवस्तुकः । रोदमुख्यशृङ्गारद्रुः, सेन्द्रजाल-ररसो डिमः ॥ २१ ॥

श्रात्रोल्कापात-निर्घाता:, चन्द्र-सूर्योपरक्तयः । श्रृङ्गारादि विश्रान्तः, प्रायः शोभे नायकाः ॥ २२ ॥

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द्वितीयो विवेकः

उत्सृष्टिकाङ्‌कः पुंसां स्वामी, ख्यातयुद्धोत्थवृत्तवान् ।

आरणोक्तसन्धि-वृत्त्यड्‌कः, वाग्युद्धः करुणार्ज्जकः ॥ २३ ॥

निर्वेदवाचो भूननाट्यं, योषितां परिदेवितम् ।

नरा निवृत्तसङ्‌ग्रामाः;, चेष्टाश्चिच्चा विसंस्थुलाः ॥ २४ ॥

ईहामृगः सर्वार्थज्ञः;, दिव्यश्च हेतुमानवः ।

एकाङ्‌करचतुरङ्‌क्रो वा ख्यातार्य्यातेतिवृत्तवान् ॥ २५ ॥

दिव्यस्त्रीहेतुसङ्‌ग्रामः;, निर्विश्वासः सविड‌्वरः ।

स्त्रीपहार-मेद-दण्डः;, प्रायो द्वादशनायकः ॥ २६ ॥

व्याजेनात्र रताभावः, वधासनने शरीरिणः ।

व्यायोगोक्ता रसाः सन्धि-वृत्तयोऽनुचिता रतिः ॥ २७ ॥

सर्वस्वामिरसा वीथी, त्वेकाङ्‌काऽ‌दृश्य कपात्रिका ।

मुखनिर्वाहसंस्थः स्वादु, सर्वैरुपोपयोगिनी ॥ २८ ॥

व्याहारोऽधिकवचनं, प्रपञ्चविग्रहं छलम् ।

अ्रसद्‌प्रलापो वाक्केलि, नालिका मृदवं मतम् ॥ २९ ॥

उद्घात्यकावलग्निते, श्रथावस्पन्दितं स्मृतम् ।

भारतीवृत्तिवर्त्तिनि, वीथ्यङ्‌गानि त्रयोदश ॥ ३० ॥

अ्रन्यार्था भाविहश्रिवचि, व्याहारो हास्यलेशभाः ।

मिथो जल्पे स्वपक्षस्य, स्थापनाडधिकबलाद् बलात् ॥ ३१ ॥

गण्डोदकसमा‌द् यदन्यार्थं, प्रस्तुतानुगतं वचः ।

प्रपञ्चः सस्तवं हास्यं;, मिथो मिथ्यैकलाभ्रकृत् ॥ ३२ ॥

निगदं छद्मवाक्येन, विवादार्थस्य योजनम् ।

वचोडन्यार्थं छलं हास्यवक्च्छना-रोषकारसाम ॥ ३३ ॥

अ्रसत्प्रलापस्तस्मेन, हितं यत्नावगम्यते ।

प्रशनोत्तरं तु वाक्केली, हास्या वाक् प्रतिवागपि ॥ ३४ ॥

हास्याय वक्च्छना वाक्ती, व्यतययो गुण-दोषयोः ।

मृदवं परस्परं स्वादु, उद्‌वचयं मूढ-भावसाम ॥ ३५ ॥

तच्वावलगितं सिद्धिः, कार्यस्यान्यमिषेण या ।

स्वेच्छोक्तस्यान्यथाऽ‌ऽन्यानं, यदवस्पन्दितं तु तत् ॥ ३६ ॥

स्वां स्वां वैशेषिकीं हित्वा, सन्धि-वृत्त्यादिकां स्थितिम् ।

सामान्या नाटकस्याया, विशिष्टा रूपकान्तरे ॥ ३७ ॥

इति श्रीरामचन्द्र-गुराचन्द्रविरचिते नाटचदर्पणे प्रकरणाध्यो कादशरूपनिरूपणं नाम

द्वितीयो विवेकः समाप्तः ॥ २ ॥

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: ३ :

ग्रंथ: वृत्ति-रस-भावभिनय-विचार: तृतीयो विवेक:

भारती सात्विकी कौशिकीभारती च वृत्तय:।

रस-भावाभिनयगत:, चत्वारो नाट्य-मातर:॥ १ ॥

सर्वरुपकगामिन्यामुख-म्रप्रोचनोस्थिता।

प्राय: संस्कृतनिष्ठेष-रसाढ्या वार्चि भारती ॥ २ ॥

विधूदक-नटी-मार्थ्य:, प्रस्तुताश्रेपि भावश्रयम्।

सूत्रधारस्य वचोक्त-स्पष्टोक्तैरयंत तदामुखम् ॥ ३ ॥

वाक्यार्थ-समयानुज्ञाने:, भावोक्तै: पात्रसड्ग्रह:।

पूर्वरङ्गे गुणासूत्र्या, संयोगेनमुख्य प्ररोचना ॥ ४ ॥

सात्वती सत्व-वाग्गङ्गाभिनेय कर्म मानसम्म्।

सात्विकाभिनयैरमुख्यैरौदात्य-वीर-शमाहुतम्॥ ५ ॥

कौशिकी हास्य-शृङ्गार-नाट्य-धर्मभिदाविमका।

ग्रारभटस्यनुनिर्द्दश-छद्म-छद्म-दीप्तरसास्रिता ॥ ६ ॥

स्थायी भाव:, श्रितोल्कर्ष:, विसाव-व्यभिचारिभिः।

स्पष्टानुभावनिश्चेष्टै:, सुख-दुःखात्मको रस:॥ ७ ॥

कार्यंहेतु: सहकारी, स्थाय्यादे: कार्यवर्त्मनि।

ग्रनुभावो विभावारुच, व्यभिचारी च कीर्त्यते ॥ ५ ॥

शृङ्गार-हास्य-करुण:, रौद्र-वीर-भयानक:।

वीभत्साद्भुत त-शान्ताइच, रसा: सद्भिरन्व स्मृताः॥ ९ ॥

सम्भोग-विप्रलम्भास्मा, शृङ्गार: प्रथमो बहु।

मान-प्रवास-शापेच्छा-विरहै: पञ्चधाडपर:॥ १० ॥

स्त्री-पुं' सं-गाव्य-गीतत्नुं-माल्य-वेषप्रकेलिज:।

ग्रभिनेय: स चोत्साह-चाटु-तापाथु-मन्स्युभिः ॥ ११ ॥

विकृतताचार-जल्पाद्यै-ग्राकल्प-विस्मापनोद्भव:।

हास्योद्रस्याभिनयो नासा-स्पन्दाश्रु-जठर-ग्रहै:॥ १२ ॥

मृत्यु-वन्ध-घन्ट्रश-शाप-विसन-सम्भ्रम:।

करुणेाडभिनयस्तस्य, वाष्प-वैवर्ण्य-निन्नने:॥ १३ ॥

प्रहारालस्य-मात्सर्य-द्रोह-धर्षापनीतिज:।

रौद्र: स चाभिनेतव्य:, घ्रात-दन्तौष्ठ-पीडनै:॥ १४ ॥

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पराक्रम-बल-न्याय-यशस्तस्वविनिश्चयः । वीरोंडभिनयनं तस्य, वैर्यं-रोमाञ्च-दानतः ॥ १६ ॥

पताका-कीर्ति-रोद्राजि-शून्य-तस्करदोषजः । भयानकोऽभिनेतव्यः, स्तम्भ-रोमाञ्च-कम्पनैः ॥ १७ ॥

जुगुप्सनीयरूपादि-परिलाघ-समुद्भवः । वीभत्सोऽभिनयश्चास्य, निष्ठेवनोद्वेग-निन्दनैः ॥ १५ ॥

दिग्येन्द्रजाल-रम्यार्थ-दर्शनाभीष्टसिद्धितः । श्रद्धा तः सोऽभिनेतव्यः, इलाघा-रोमाञ्च-हर्षनत ॥ १९ ॥

संभारभय-वैराग्य-तत्व-शास्त्रविचारतः । शान्तोऽभिनयनं तस्य, क्षमा-ध्यानोपकारतः ॥ २० ॥

प्रयं-शब्द-वपुः कायं, रसेः प्राणैविसर्पति । प्रज्ञास तेन सोऽपादि;, रसेपु कविमानिनाम् ॥ २१ ॥

न तथार्थ-शब्दोत्त्रेक्षा:, इलाघ्याः काव्ये यथा रसः । विपाकक्रममप्यात्रं, उदेजयति नीरसः ॥ २२ ॥

एकत्र स्वैरिणोस्तुल्य-शक्तियोगे विरुद्धता । दोषोन्नोचित्यमड्गाप्रचं, प्रपोपोड्युक्तिरज्जभित् ॥ २३ ॥

रतिहासश्च शोकश्च, क्रोधोत्साहौ भयं तथा । जुगुप्सा-विस्मय-शमाः;, रसानां स्थायिनः क्रमात् ॥ २४ ॥

निर्वेद-ग्लान्यपस्मार-शड्का डसूया- मद-श्रमाः । चिन्ता चापलमावेगः;, मतिधर्यादि: स्मृतिधृतिः ॥ २५ ॥

श्रमर्षो मरषां मोहः;, निद्रा-सुप्तोग्रच-हृप्यतः । विषादोन्माद-दैन्यानि;, द्वेषा त्रासो वितर्कराम ॥ २६ ॥

गवों त्सुक्रन्दावहिस्थानि;, जाड्यालस्य-विवोधनम । तत्र्यस्त्रशद यथायोगं;, रसानां व्यभिचारिणः ॥ २७ ॥

निर्वेदस्तत्रवधी-क्लेशो:, वैरस्यं श्वास-तापकृत । ग्लानिः पीडा जराड्यासे:, शक्तिः कार्य-कम्प-भ्रकु ॥ २८ ॥

वैकल्यं ग्रहदोपैस्योऽस्मारो निन्यचेष्टितः । शड्का स्व-पर-दौर्ताद्यौ;, दोर्ननं इयामताड्डदियुक ॥ २९ ॥

दैन्यादेः सदृशाकान्तः;, श्रमूया दोषदर्शनी । ज्येष्ठादो मुग्मदो मच्यात्;, निद्राहास्याश्रुकृत क्रमात ॥ ६० ॥

श्रमो रतादिभिः साधः;, स्वेद-श्वासादि कारणम । श्राविदिचन्ता प्रियानाप्ते;, शून्यता-श्वास-काश्ययुक ॥ ३१ ॥

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तृतीयो विवेकः

चापलं साहसं राग-द्वेषौ शादे: स्वैरितालस्सदिमत् । श्रावेगः सम्भ्रमोऽत्कस्माद्, विकर्त्ताज्ज्ञ-मनों-गिराम् ॥ ३२ ॥

प्रतिभानं मति: शास्त्र-तर्काद् श्रान्तिश्चिच्छेदादिकृत् । दोषेम्योऽज्ज्ञ-मनः-क्लेशात्, व्याधि: स्तनित-कम्पवान् ॥ ३३ ॥

हृष्टाभास: स्मृतिस्फुलिङ्गो हृष्टचादेशे' क्रतिक्रिया । धृतिज्ञाने�्टलाभादे:, सन्तुष्टेर्देहेहुष्टिकृत् ॥ ३४ ॥

क्षेपदे: प्रतिकारे च्छादमवरोधस्मिन् कम्पनादय: । व्याधिदेशमु' खुसज्जल्प: मुखर्या विकलेन्द्रियं ॥ ३५ ॥

श्रचेतनं प्रहारादे: मोहोऽत्पादावर्ज्जनादय: । इन्द्रियाग्यापूर्त्तिनिद्रा, क्षेदादेमु' धिकम्पिनी ॥ ३६ ॥

सुप्तं निद्राप्रकरोऽनुत्रा, स्वप्ननायित-खमोहने । हुष्टेडपराधानैर्‌ज्ञुष्टं, श्रोग्रत्र' बन्ध-बन्धादिभि: ॥ ३७ ॥

हर्ष: प्रसत्तिरिष्यापते:, श्रप्राप्त स्वेदाश्रु-गद्गदा । विषादस्तान्तरिष्टस्थ्यानात्पन्ने:श्वास-चिन्तनैः ॥ ३८ ॥

मनोविष्पत्तिरुमादे:, ग्रहण-दोषैर्यु क्तकृतः । श्रापद: स्वास्तनீचरत्वं, दैन्यं काष्ण्यादिगुणैस्तने: ॥ ३९ ॥

त्रीडाज्जनुप-गुर्व्वादि:, श्रधाष्ट्र्यं गात्रशोपकम् । घोराच्चकितता त्रास:, कायसज्ज्ञोच-कम्पिते: ॥ ४० ॥

एकस्मावनं तर्क:, वादादेर्‌ज्ञ्जनतंक: । श्रास्मन्या चाच्छिद्ययर्धीगर्व्वं; विद्यास्सदेरन्ग्यरीडया ॥ ४१ ॥

इष्टाभिमुख्यमोऽसुकृतं, स्मरणा'ध्यातु स्वराड्‌डिदभि: । धाष्ट्र्यं चार्द्धवि कियारोगोद्भवहुष्टादन क्रियां त्तरम् ॥ ४२ ॥

जाड्यमिष्टादिति: कार्यज्ञानं मौनानिमेषणै: । कर्मानुत्साह श्रालस्यं, श्रमाद्याज्जुम्भतादिभि: ॥ ४३ ॥

निद्राच्छेदो विवोधरच, शब्दादेर्‌ज्ञ्जृम्भवान । केशाचित्तु रसादीनाम, ग्रन्थो'न्यं हेतु-कायंता ॥ ४४ ॥

वेपथु-स्तम्म-रोमाञ्चा:, स्वरभेदोऽथ शु'ङ्खनंम । स्वेदो वैवर्ण्यमित्याद्या:, ग्रन्थुभावरसादिजा: ॥ ४५ ॥

भवदेरप्युपाप्रात् स्पन्दो वागादिविक्रिया । यत्नलेशाज्ज्ञक्रियाया स्तम्म: हर्षादिर्वा विपादवान् ॥ ४६ ॥

रोमाश्च: प्रियहुष्टादे:, रोमर्हषि'डोमार्ज्जने: । स्तम्भो'ज्ञ: स्वराद्युत्थो महादेहेर्ष-विस्मयक्त ॥ ४७ ॥

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तृतीयो विवेक:

प्रश्रु नेत्राम्बु शोकाच्चः; नाश्तास्पन्दाक्षिरुक्क्षराः ।

मूर्छनं घात-कोपाच्चः; खग्लानिबों मिपातकृत् ॥ ४८ ॥

स्वेदो रोमजलस्रावः; श्रमादेव्यंजनप्रहे ।

छायाविकारो वैवर्ण्यं, क्षपर्देददनरीक्षणाः ॥ ४९ ॥

वाचिकोडभिनयो वाचां, यथाभावमनुक्रिया ।

कर्मंङ्गोडड़गे रुपाड़नैरच, साक्षाद् भावनमाज्ञिकः ॥ ५० ॥

सात्त्विकः स्वरमेदादे; ग्रन्थभावस्य दर्शनम् ।

वर्णाच्चानुक्रियाSSडहायः;, बाह्यावस्तुनिमित्तकः ॥ ५१ ॥

इति श्रीरामचन्द्र-गुणाचन्द्रविनिर्मिते नाट्यदर्पणेासूत्रे वृत्ति-रस-भावभिनय-विचारस्तृतीयो विवेकः ॥ ३ ॥

: ४ :

ग्रथ सर्वरूपक-साधाररा-लक्शरानिर्णय: चतुर्थो विवेक:

देव-श्रूप-सभा-भतृं-मुख्यारां मड्ङलाभिधा ।

नित्या रूपमुखे नान्दी, पदेः षड्भिरथाष्टभिः ॥ १ ॥

प्रवेश-निष्क्रमाक्षेप-प्रसादान्त रसडुत्वम् ।

चित्रार्थ रुपकं गेयं, पठवधा स्यात् कविच्छया ॥ २ ॥

उत्तमा मध्यमा नीचा, प्रकृतिनूं-स्त्रियौ स्त्रिधा ।

एकैकापि त्रिधा स्व-स्व-गुणानां तारतम्यतः ॥ ३ ॥

श्रारणयो दक्षिरणस्थागी, लोकशास्त्रविचक्षराः ।

गारम्भीर्य-धैर्य-शोण्डीर्य-न्यायवान् उत्तमः पुमान् ॥ ४ ॥

मध्यो मध्यगुरणो नीचः, पापीयान् पिशुनोडलसः ।

कृतघ्नः कलही कलीबः;, स्त्रीलोलो रक्षसांग जड़ ॥ ५ ॥

लज्जावती मृदुर्धीरा, गम्भीरा स्मितहासिनी ।

विनीता कुलजा दक्षा, वत्सला योपिदुत्तमा ॥ ६ ॥

नरवन्तमध्यमा-नीच:, नीचावीप्सा: कथावधात् ।

प्रधानफलसम्पत्तौडध्यसनी मुख्यनायकः ॥ ७ ॥

तेजो विलासो माधुर्यं शोभा स्थैर्यं गम्भीरता ।

ग्रोदर्यं ललितं वाष्टी, गुगा नेतरि सत्स्वजा; ॥ ५ ॥

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क्षेपादेरसहिष्णुत्वं, तेजः प्रागल्भ्ययुतेऽपि च ।

विलासो वृत्तवान् यानं, घोरा हृक् सस्मितं वचः ॥ ९ ॥

माधुर्यं विकृतिः स्तुत्या, क्षोभहेतुरमहत्यपि ।

शोभा चिह्नं घृणा-स्पर्धा-दाक्ष्य-शौर्योभयमोहये ॥ १० ॥

विभ्रमैडचलनं स्थैयं प्रागल्भ्यादशुभादपि ।

गाम्भीर्य सहजा मूर्ति:, कोप-हर्षादि-गोपनी ॥ ११ ॥

श्रौदायं शत्रु-मित्राणां, प्रापितेनाप्यनुपग्रहः ।

श्लाघ्यार्हेष्टा बलितं, निर्विकाराः स्वभावजाः ॥ १२ ॥

ग्रामुख्यो नायकः किञ्चिद्-धूनवृत्तोद्ग्रचनायकात् ।

लोभी घोरोदरत् पापी, व्यसनी प्रतिनायकः ॥ १३ ॥

नीचा विदूषक-श्लीब-शकार-विट-कङ्कुःरा:

हास्यायादो नृपे दयालः, शकारस्त्वेकविद् विटः ॥ १४ ॥

स्निग्धा घोरोदरादीनां, यथौचित्यं वियोगिनाम् ।

लिङ्गी दृश्यो राजजीवः, शिष्याश्रितच विदूषकः ॥ १५ ॥

युवराज-चमूनाथ-पुरोधाः;-सचिवादयः ।

सहाया एतदायत्त-कर्मेव ललितः पुनः ॥ १६ ॥

शुद्धान्ते कारुको द्वाःस्थः, कञ्चुकी शुभकर्मणि ।

वर्षवरस्तु रक्षायां, निर्युण्डः प्रेष्योऽस्त्रियाः ॥ १७ ॥

कार्यीक्षाने प्रतीहारी, रक्षा स्वत्योमहत्तराः ।

पूर्वपीठस्थितिविष्टो बृद्धा, चित्रादो शिल्पकारिका ॥ १८ ॥

नायिका कुलजा दिव्या, क्षत्रिया पण्यकामिनी ।

ग्रन्तिमा ललितोदात्ता, पूर्वोदात्ता त्रिधा परे ॥ १९ ॥

रागिण्येवाप्रहसने, नृपे दिव्ये च न प्रभौ ।

गरिका क्वापि दिव्या तु, भवेदेशा महीसुजः ॥ २० ॥

सुगधा मध्या प्रगल्भेति, त्रिविधाः सुरतिमाः पुनः ।

सुगधा वामा रते स्वल्प-माना रोहद्-वयः-समराः ॥ २१ ॥

मध्या मध्य-वयः-काम-माना मूच्छा स्तम्-मोहना ।

प्रगल्भेष्ट्‌-वयः-मन्यु-कामा स्रग्धण्‌डव्यचेतना ॥ २२ ॥

कार्येतः प्रोषिते पत्यावभूषा प्रोषितप्रिया ।

विप्रलब्धा ससज्ज्ञाते, प्रियश् दूतीमनागते ॥ २३ ॥

खण्डिता खण्डयन्न्यसकृत्‌क्या वासकर्मोद्यताऽतिसा ।

ईर्ष्याव्‌-कलह-निष्क्रान्ते, कलहान्तरिताsड्‌ऽडतिभाक् ॥ २४ ॥

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विलम्बयत्यदोषेऽपि विरहोल्काठिततोलत्सुका । हृष्ठा वाससज्जा डतमन्यकृतिपरेष्यति ॥ २५ ॥

सुभगम्मानिनो वश्यासने स्वाधीनभर्तृका । सरन्ती सारयन्ती वा रिरंसुरभिसारिका ॥ २६ ॥

भावाढ्या यौवने स्त्रीणाम्, प्रगल्भा रास्त्रयोडनुजा: । दश स्वाभाविकैर्‌चेष्टै:, क्रियारूपास्त्रयोडनुजा ॥ २७ ॥

सति भोगे गुणा: सप्ताऽनुजाश्च स्वभावजा: । नावश्यम्भाविनोड्येषा, विविध: स्त्रीषु मुध्यते ॥ २८ ॥

भावो वागादिवैशिष्ट्यं, चित्तं रत्युक्तमतयो: । नेत्रादिविकृतं हारः सखीज्ज्ञापारमसन्ततम् ॥ २९ ॥

तदेव सन्ततं हेला, तारुण्योद्बोधशालिनी । रागादिना विपर्य्याप्त:, क्रियारूपमथ विग्रहम् ॥ ३० ॥

विलास: प्रियदर्शयितौ, झाङ्कृतं गात्र-कर्मणो: । वेषाल्पतैव विच्छित्ति:, परां द्वोभां वितनुते ॥ ३१ ॥

लीला दयित्त्वागादे:, स्वे न्यासो बहुमानतः । विच्वोकोडनादरो मान-दर्पोऽपिड्टे डपि वस्तुनि ॥ ३२ ॥

विहृतं जल्पकाले डपि मौनं ही-व्याज-मुग्धयत: । ललितं गात्रसञ्चार:, सुकुमारो निरर्थक: ॥ ३३ ॥

कचोष्टादिग्रहे कोप: मूर्षा कुड्‌डुमितं मुदि । मोट्टायितं प्रियेऽक्षादौ, रागतो गात्रमोट्टनम् ॥ ३४ ॥

पुट्ट: स्मितातिशयकम्पादि:, सकृद्‌ (ल) (ड) किश्चित् । श्रोड्डवश्यं यौवनादीनां, श्रथ शोभोपभोगतः ॥ ३५ ॥

सा कान्ति: पूर्वंसम्भोगा, दीप्ति: कान्तेस्तु विस्तार: । सोम्यं तापेऽपि माधुर्य्यं, श्रौदायंमुचिताच्युति: ॥ ३६ ॥

चेतोऽविकल्यनं धैर्य्यं, प्रागल्भ्यं कौशलं रते । यथोचित्यं च नेत्राणां, नायिकाः कुलजादय: ॥ ३७ ॥

सहायिन्यस्तु घात्रेयी-लीलिज्जनी-प्रतिवेशिका: । शिल्पिनी-चेटिका-सख्या:, गुप्ता दक्षाः मृदु-स्थिरा: ॥ ३८ ॥

देवानीचानुरणां पाठ:, संस्कृतेनाथ जातुचित् । महिषी मन्त्रिजा-पण्यस्त्रीणामव्याजलिड्‌निनाम् ॥ ३९ ॥

वाल-षण्ठ-ग्रहग्रस्त-मत्त-स्त्री-रूप-योषिताम् । प्राकृतेनोक्तमस्यापि, दारिद्रघ्ने द्वयंमोहिन: ॥ ४० ॥

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प्रत्यन्तनीचोभूतादौ, पैशाची मागधी च वाक् । शौरसेनी तु नीचस्य, देशोदेशे स्वदेशगीः ॥ ४१ ॥

तिर्यग्जात्यन्तरादीनाम्, श्रानुरूपेया सङ्कृथा । भाषा-प्रकृति-वृत्तादेः, कार्यतः क्वापि लक्षयेत् ॥ ४२ ॥

श्रायेंति शाङ्ख्यते पत्नी, लिङ्गिनी श्राह्मणी द्विजः(जैः) । ग्राम्बाडपि जननी-बुद्ध्रे, पूज्या तु भवतात्यपि ॥ ४३ ॥

श्रात्राजग्रोडमैमंत्रं, नटी-सूतसुताश्च ते । मिथः । पुरोषः-सार्थवाहाश्याम्, पत्नी पत्या जरन् पतिः ॥ ४४ ॥

महाराजो नृपः सर्वस्वामिपुत्रेति यौवने । पुंसा भद्रेति भोक्रव्यां, प्रियेतिं दयिताड्यवा ॥ ४५ ॥

पिता पुत्राभिधयोरगेवंख्या देवस्यपि राजभिः । विदूषकेऽपि भवती, राज्यीचीष्यो नृपस्य्रियः ॥ ४६ ॥

भद्रिन्द्रे स्वामिनी देवोऽीयेव सर्वः परिच्छदैः । वेश्याज्जुकेतिं वृद्धा तु, साडत्तां तुल्याश्र्चित्रया हला ॥ ४७ ॥

हृतेजस्त्वगुत्तमो-प्रेष्ठे, भगवदितिं देवता । तपःस्थया वाचर्य-देव-बाहुविद्या सयोजित ॥ ४८ ॥

मान्यो नामास्तरे राजा, लिङ्गिनाड्य विधूषकैः । वयसोड्यधमैमंत्रं, लोकद्वैतेति सुप्रतिः ॥ ४९ ॥

मित्रार्ज्याभिविदूराज्ञा, कुमारोऽभतुं दारकः । मुनिन-श्राक्ष्यो भदन्तेति, स्वप्रसिद्धचापरो नती ॥ ५० ॥

सूत्री भावोड्यनुनेनासो, तेन मार्षः समः सखा । शिष्यात्मजानुजः पुत्र-वत्सो तातो जरन्निजः ॥ ५१ ॥

सोम्यो भद्रमुखरेचेति, नीचो हुण्डे तु पामरेः । येन कर्मोद्दिना यस्तु, स्यातः स तदुपचिकः ॥ ५२ ॥

धूरे विक्रमसंश्चि, कल्यं नामाथ वारिण्जे । दत्तान्तं प्रयाश्चो विप्रे, गोत्र-कर्मानुरुप्यतः ॥ ५३ ॥

नुपस्रियामं शुरं दत्ता-सेनाड्न्तं पश्योषितिं । पुष्टादिवाचकं चेटच्यां, चेते मझीलकीर्त्तनम ॥ ५४ ॥

इति श्री रामचन्द्रगुणचन्द्रनिम्मिते नाट्यदर्पणसूत्रे सर्वरूपकसाधारङ्गलक्षणनिरूप्यो नाम चतुर्थो विवेकः समाप्तः ॥४१॥

२०७ पदाथकमं समाप्तं नाट्यदर्पणसूत्रम् ॥

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परिशिष्टम् [२]

नाट्यदर्पणविवरणनिर्दिष्ट-ग्रन्थकर्तृनांसूची ।

[ वर्णाक्रमेण ]

ग्रन्थकर्तृनाम

(नाट्यशास्त्रस्य अभिनवभारतीवृत्तिकारः)

२३

इन्दुराजभट्टः

(श्रीरस्वामिगुरुः)

२८४

कोहलः

(सङ्गीतादिलक्षणप्रयोता)

१४,२४१

क्षीरस्वामी:

(भट्टेन्दुराजशिष्योऽभिनवगुप्तवराश्रयवाटककारः:)

२८४

भरतमुनिः

(नाट्यशास्त्र-निर्माता)

२७,२१२

भवनुतचूड भट्टः

(कौशलिकानाटिकाकारः)

३०

बवसूति:

(मालतीमाधवकर्ता)

२१२

भासः

(स्वप्नवासवदत्तकर्ता)

१४६

भीमटः

(मनोरमा-वस्सराजकर्ता)

२५५

भोमदेवः

(वसुनाग-जनकः)

१९७

भेज्जलः

(राधाविप्रलम्भरचयिता)

१९७

मम्मट!

(काव्यप्रकाशकारः)

३३२

मुनिः (भरतमुनिः)

(नाट्यशास्त्रकर्ता)

२७, २१२

वसुनाग!

(भोमदेवसुतः, प्रतिमानिरुद्धप्रयोता)

१९७

विशाखदेवः

(देवीचन्द्रगुप्तरचयिता)

२०७

वीरनागः

(कुन्दमालाकर्ता)

४१

शार्ङ्‌कः

(प्रमात्यः, चित्रोत्पलावलम्भितकप्रकरङ्कारः)

२४१,१५२,

शुक्तिवासकुमारः

(प्रनञ्जसेना-हर्षनिद्रप्रकरङ्कारः)

१६५

शूद्रकः

(मृच्छकटिकाकारः)

४१

हेमचन्द्रः

(शब्द-प्रामाण्य-साहित्य-छन्दो-लक्षणविशारदः, नाट्यदर्पणाख्यद-गुरुः)

४०६

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परिशिष्टम् [३]

नाट्यदर्पं ग्रन्थेर्वरस्य निर्दिष्ट-नाट्यादिप्रन्थनाम-सूची ।

[ वर्णाक्रमेण ]

नाटचादिप्रन्थनाम

(१) म्रनज्जवती नाटिका (शक्तिवासकुमाररचितम्) २५०

(२) म्रनज्जसेना-हरिन्द्रप्रकरराम् (शुक्तिवासकुमाररचितम्) १६५

(३) म्रनध्यंराघवम् (मुरारिररचितं नाटकम्) ३६४

(४) ग्रभिज्ञानशकुन्तलम् (महाकविकालिदासकृतं नाटकम्) १२४, २८२

(४) ग्रभिनवराघवम् (भट्ट न्दुराजशिष्यक्षीरस्वामिरचितं नाटकम्) २८४

(६) ग्रभ्रु नचरितम् (ग्रानन्दवर्धनरचितं महाकाव्यम्) ३२०

(९) ग्राचाराज्यम् (ग्राहंत-नगेँधर-प्राथितं सूत्रम्) १९४

(५) इन्दुलेखानाटिका २४७

(८) इन्दुलेखावीथी १७३,२४९,२६२

(१०) उत्तरचरितम् उत्तररामचरितम् (सवमूर्तिरचितं नाटकम्) २५९

(११) उदयनचरितम् ११५

(१२) उदात्तराघवम् (मायुराजविरचितं नाटकम्) ३०६

(१३) कादम्बरी (बाणभट्टप्रणीता कथा) ५१

(१४) कुन्दमाला (वोरनागनिबद्धा) नाटकम् ३२४, ३२८

(१५) कुमारसम्भवम् (महाकविकालिदासकृतं महाकाव्यम्) १४२,१४३,१४७,१५०,१५४,१६७,१६८,१६९,१७३,१७४

(१६) कृत्यारावणम् (नाटकम्) १४२,१४३,१४७,१५०,१५४,१६७,१६८,१६९,१७३,१७४, १९३,१९५,२४७,२६७

(१७) कौमुदी-मित्रान्द प्रकरराम् (स्वोपज्ञम्) १२४

(१८) कौमुदी-मित्रान्द प्रकरराम् (स्वोपज्ञम्) १२४

(१८) कौशिकविजयाटिका (मडत्रशीमचतुर्न्नूडविरचिता) ३०

(१९) चित्रोत्पलावलम्बितकं प्रकरराम् (प्रमात्यशाकृंल् कविरचितम्) ११२

(२०) छलितरामम् (नाटकम्) २२०

(२१) जामदग्न्यजय: (व्यायोग:) २०६, २१२

(२२) तरङ्गदत्तम् (प्रकरराम्) ४२,६७, ७६,१७४,१६२,१६३

(२३) तापसवत्सराजम् [नरेन्द्रवर्धनसुतान्न त्जहर्षीवरनाथाश्रितमात्रराजरचितं नाटकम्]

(२४) दरिद्रचारुदत्त* रूपकम् (भासरचितम्) ९३

(२५) हस्तिवाद: (ग्राहंत-नगेँधर-प्राथित: विवादान्त:) १०

(२६) देवीचन्द्रगुप्तम् (वि(द्या)खदेवकृतं) नाटकम् १२५,१४६,१५१,१९१,२०७,२५५

Page 544

(२७) द्रौपदीस्वयंवरम्

३४७

(२८) नलविलासं नाटकम् (स्वोपज्ञम्) ४२,७२,६५,८७,८९,१२५,२३४,१४१,१६२,२४६,२६४,२६६,२६८,२६५

(२९) नागानन्दम् (श्रीहर्षनिर्मितं नाटकम्)

१२२,१७७,२५०,२८६

(३०) निर्माणमीमव्यायोगः (स्वोपज्ञः)

१२१

(३१) पयोधिमथनम्

२२४

(३२) पाण्डवानन्दम्

२६७

(३३) पार्थविजयम् (त्रिलोचनकृतं नाटकम्)

२२७,१३६,१३७,१४४

(३४) पुष्पदूषितकं प्रकरणम्

१६४,१७७,१९१

(३५) प्रतिमानिरुद्धम् (भीमदेवसुतवसुनागकृतं नाटकम्)

१९७

(३६) प्रयोगस्तुतयम्

२५३

(३७) बालिकाविच्चितकम् (नाटकम्)

२५०,२६३

(३८) बृहद्कथा (गुणाढ्यचरिता)

२११,२२१

(३९) भारतम् (व्यासप्रणीतं काव्यम्)

(४०) मत्तविलासराजम् (भीमटविरचितं नाटकम्)

२५८

(४१) मल्लिका-मकरन्द प्रकरणम् (स्वोपज्ञम्)

३१९

(४२) मायापुष्पकम् (नाटकम्)

६६,६२

(४३) मालतीमाधवम् (भवभूतिनिमितं प्रकरणम्)

१५५,२८८

(४४) मालति (वि) कादम्बरीमित्रम् [कविकालिदासनिमितं नाटकम्]

१२०

(४५) मुद्राराक्षसम् (विशाखदेवनिर्मितं नाटकम्)

६७,७५,१५८,१८४,१९२

(४६) मृच्छकटिका प्रकरणम् (शूद्रकविरचितम्)

१९०

(४७) यादवाभ्युदयं नाटकम् (स्वोपज्ञम्) ६५,११४,१४९,१६३,१६१,१९२,१९४,१९६

(४८) रघुविलासं नाटकम् (स्वोपज्ञम्) १००,१४२,१४४,१४६,१५०,१५९,१६०,१६४,१६६,१६३,१६५,२४७,२६०,२६४

(४९) रत्नावली [श्रीहर्षविरचिता नाटिका]

१६,६१,६३,८७,८९,१०५,११२१,१२२,१२६,१४५,१४८,१५१,१५३,१५६,१५७,१६५,१७०,१७२,१७५,१७६,१७९,१८४,१८६,१९४,१९६

१६१,२४४,२५२,२६२

(५०) राघवाभ्युदयं नाटकम् (स्वोपज्ञम्)

७५,७३,९०,१०२,१०५,११३,१६२

(५१) राघाविप्रलम्भं रासकाख्यं रूपकम् (मेघजलविरचितम्)

१९७

(५२) रामाभ्युदयम् [यशोवर्मविरचितं नाटकम्]

७३,१००,१३०,१६०,१६६,१७६,१८८,२५८

(५३) रोहिणी-मृगाङ्कं प्रकरणम् (स्वोपज्ञम्)

११०, १२३

(५४) वनमाला नाटिका (स्वोपज्ञा)

३१९

(५५) विक्रमोर्वशीयं नाटकम् [कविकालिदाससृष्टम्]

१६७, २५७

(५६) विश्वविलसितं (नाटकम्)

२०१

(५७) विलक्षणदुर्योगनम् (नाटकम्)

१३९

Page 545

(५८) वीरचरितं नाटकम् (सर्वसूति रचितम्)

(५९) वेङीसंहारम् [भट्टनारायणनिर्मितं नाटकम्] ८५,८६,८९,९२,९७,१०१,१०२,११०, १११,११२,११४,११५,११७,११८=१२७,१३७,१४०,१४१,१४८,१५२,१५३,१५५,११-७,११२,११६३,११६६,११७०,१७१,१७२, १७५,१७६,१७८,११०,११३,१८५,२६३,२६५, २६७,२६१

(६०) सत्यहरिश्चन्द्रं नाटकम् (स्वोपज्ञम्)

६५,९५,१२९,१३९,२५१,२८१,२८७

(६१) सुधाकलशः (स्वोपज्ञः)

२६५, २६६

(६२) स्वप्नवासवदत्तम् (कविवत्सकृतं नाटकम्)

१४८

(६३) हयग्रीववधम् [भट्टु मेघविरचितं महाकाव्यम्]

३२७

Page 546

परिशिष्टम् [४]

[ वर्णाक्रमेण ]

पदप्रारम्भः

ग्रहद्वान्तरेव चाङ्गो

ग्रहते वीररसाधैः

ग्रन्थत्र न्रजतीति

ग्रन्थायैकजुषः

ग्रन्थोन्यास्फालमित्र

ग्रयमुदततोडय ललितो

ग्रयं सः कालः दूरारां

ग्रयं स रशनोत्कर्षी

ग्रयं मा त्वरन्वचा

ग्रविदितपथःप्रेम्नां

ग्रस्तपासतसमस्त

ग्रस्तयैव राघवमहीन

ग्रस्त्यां प्रेम मसेव

ग्रस्त्यां मुग्डीक्षि

ग्रहंनिकरा[प्र]णी

प्राक्षितकाड्यवर्णों

ग्राबेटो मुनिकन्यका

ग्रातात्रातामपनयासि

ग्रादी मानपरिग्रहेए

ग्रानन्दाश्रुजलं

ग्रालम्बय प्रियशिष्यतां

ग्रासादितप्रकटनिमर्ल

ग्रास्यं हास्यकरं

इयं गेहे लक्ष्मीः

उत्तमाङ्गमध्यायि:

उत्तमोतमकं चैव

उदयाभिमुख्यभार्जा

उद्र! मोत्कलिकां

उदधिच्छो पियद जलं (प्रा०)

पुष्ट

६१

४०५

३०५

१२१

११६

४०५

१२७

३२२

२६०

२४६

५५

२८४

२४७

१४९

२४६

४०५

१०४

१५७

४२

२०७

१६७

२८२

३१५

२४९

२४१

६३

२४५

३०५

ग्राधारस्यलम

[नाट्यशास्त्रे प्र० १६,११०]

[काव्यप्रकाशे ४,३२३ उद्धृतम]

निर्मयभीमव्यायोगे

वेधीसंहारे

[महाभारते स्त्रीपर्वणि प्र० २४,१६]

रघुविलासे

(०१५) रत्नावल्याम्

प्रभिनवराघवे

रघुविलासे

यादवाभ्युदये प्र० ६

रघुविलासे

सत्यहरिश्चन्द्रे प्र० ६

(०१५) रत्नावल्याम्

तापसवत्सराजे

देवीचन्द्रगुप्ते

वेधीसंहारे

छलितरामे

मल्लिका-मकरन्दे

उत्तर [राम] चरिते

कोहलस्य [प्र० भा० १५,६३]

[नाट्यशास्त्रे प्र० १५,१७६]

यादवाभ्युदये

रत्नावल्याम् प्र० २

गाथासप्तशत्याम् प्र० २,६१

Page 547

२० ]

चतुर्थं परिशिष्ट

उन्मत्तप्रेमसंरम्भादू एकस्मिन्न् झायने एकं त्रीहि नवाष्ट एतव् ते हृदयं स्पृशामि एतेनापि सुरा जिताः एतो तो पतिहश्येते एषा वधूंबरतराज एसो सियकरविस्थार- (प्रा०) कंसांसभित्तिमदमर्दन कण्ठे किन्तरकण्ठ कथमपि न निषिड़ो कपोले पत्राली करणी-हुःशासनवधात् कर्ता वृत्तच्छलानां कलत्रमपि रक्षितुं कल्याणं भूयन् वः स्वः कविः काव्ये रामः कस्स व न होइ रोसो (प्रा०) का भूआ बलिनां

११० ३०७ २६० १३९ २८६ १५१ १३७ ३६६ १६४ १४६ १४२ ३१९ १६३ ६९ ७६ १९६ २९५ २५७ २६७

रोहिणी-मृगाढ़्के ग्रं० १ ग्रामरत्नाके २३ [दशरूपकावलोके प्र० ३ उद्धृतम्] विलक्षदुर्योंघने कृत्यारावयो पुष्पदूषितके पार्थंविजये देवीचन्द्रगुप्ते यादवाभ्युदये ग्रं० ७ देवीचन्द्रगुप्ते ग्रं० ४ वेङीसंहारे [ग्रामरत्नाके ६१] वेङीसंहारे राघवाभ्युदये ग्रं० ३ यादवाभ्युदये नलविलासे [प्रभिनवभा० १५,६१ उ] [ध्वन्यालोके उ० १ उद्धृतम्] पाण्डवानन्दे प्रभिज्ञानशकुन्तले

कामं प्रिया न सुलमा कामिनीभिर्मृदु वो भर्त्तुंः काव्यकर्त्तु यंशश्चापिम किमपि किमपि मर्द्द कि नु कलहंसनादो कि नो व्याप्तदिशां कि पदास्य रुचं कि लोभेन विलज्जितः कुरबक ! कुचाभात- कुसुमसुकुमारमूर्ति- कुष्टा केशेषु कृष्णा कुष्टा येन शिरोऽहिषु कुष्टा येनासि राज्ञां कंकेधियो वव पतित्रिता कोडपि सिंहासनस्थाधः कोड्यं द्वारि, हरिः

१२४ ४०७ ३६४ ३०७ २५७ १४० १५६ ११६ ३२१ १२१ १५७ ५५ १८५ ६६ २६७ २६१

[नाट्यशास्त्रे ग्रं० ४] उत्तररामचरिते इन्दुलेखायाम् वेङीसंहारे रत्नावल्याम् उदात्तराघवे [काव्यमीमांसायां पृ० ७३ उ] रत्नावल्याम् वेङीसंहारे ग्रं० ४ ,, ग्रं० ३ मायापुष्पके छलितरामे [शृङ्गारप्रकाशे १२ उ]

Page 548

चतुर्थ परिशिष्ट

कोशाम्बीमम हस्त एव

स्तवाकार्य शाशलक्षणः:

क्षितो हस्तावलग्नः

क्षुद्राग्नेरमृतोदिपि

खण्डय न्यायतेजोमिः

गिरिरयममरेंद्रे षाद्य

गुप्तः साक्षात महानल्पः

शेयपदं स्थितपालयम्

३२३

३२१

७९

१६५

१४७

२६५

२२९

मनोरमावत्सराजे

[विक्रमोर्वश्याम]

[ग्रामघृतके २]

तापसवत्सराजे ग्रं० २

रघुविलासे ग्रं० ७

कुल्यारावले

वेधीसंहारे

[नि०सा०नाट्यशास्त्रे ग्रं० १५,१५३;

१६,११६]

गोष्ठे यत तु विहरतः

वृन्दावनुजश्रमित—

दूसीताशेवकारव्यः

चौर्यरतप्रतिभेदं

जो ग्रन्नो पसुम्रो (प्रा०)

तपनोज्ज्वलकरकं

तल्लावण्यमनन्यवत्ति

तवास्मि गीतिरागेया

तवैव रहिरामुभिः

तस्मिन् कौरव पाथंयोः

तथा नमो निम्रुचाट-(प्रा०)

तित्तडुदुविचजते मुग्दी

तीथा भीष्ममहोदघो

त्यजत मानमलं

त्यजन् हेम्नो लश्नं

रघजामि देवीन्

त्रातो घोषयुवां

स्वदुधःवस्यापनंतु सा

स्वदुयानं यः

स्वयुपारोपितप्रेम्णा

स्वं जीवन्तं स्वमसि मे

दत्वा द्रोणेन

दनतक्षणतनि करजेहच

दारारां व्रतिनां च

दिरायरकिरसुक्केरो (प्रा०)

दिष्ट्या भो !

दुर्गं सूमिरमात्य

४०६

११०

१७१

४०५

२५०

२६३

३१५

२५२

१३०

१६६

२६६

१५५

१०७

३२४

१२९

२५४

१९४

१२६

१९०

२५६

२६२

१५१

३२१

१३०

३६५

१६७

५२

[है०का० ग्रलं० ६ उ]

वेधीसंहार

ग्रं० ५

बालिकावधिचितके

"

राघवाभ्युदये

श्रभिज्ञानशाकुन्तले

रामाभ्युदये ग्रं० २

वेधीसंहारे ग्रं० ६

सुद्राकलवे

मुद्राराक्षसे

वेधीसंहारे ग्रं० ६

[रघुवंये ६,४७]

सत्यहरिशचन्द्रे

देवीचन्द्रगुप्ते ग्रं० २

यादवाभ्युदये

देवीचन्द्रगुप्ते

मृच्छकटिकयाम

उत्तर [राम] चरिते

वेधीसंहारे

[चवन्यालोके उ० ३ उद्धतम]

रामाभ्युदये ग्रं० २

ग्रनध्यरराष्षवे

मृच्छकटिकयाम

मायापुष्पके

Page 549

२२ ]

चतुर्थ परिशिष्ट

दुल्लहजस्साघुराम्रो (प्राणो)

दूतो लेखस्तथा स्वप्नः

दूरादुत्सुकमागते

हृ्ष्टि प्रेमभरालसां

हृ्ष्टि: कथं जरठ—

देवीवियोगदुःखातां—

दक्ष्यन्ति न विराव

द्वीपादन्यसमादपि

धिग् मां भूषणविधातिनं

भूमित्रातं वितानी—

नदीना मेघविगमे

न नाम स्यु: स्वरां—

न प्रेम निहितं चित्ते

नमोऽस्तु सर्वदेवेभ्यो

नाकीर्या दशकन्धरी

नागानां रक्षिता माति

निरोत्य: प्रजा: सन्तु

निर्वार्तावैरदहतः

निहतय दशकन्धरं

नूनं तेनाऽपि वीरेप

पञ्चानां मन्यसेप्सितं

पत्या च विप्रलब्धा

पत्यु: शिररचनकलामनेन

परार्थानुष्टाने जडयति

परिप्रहोःप्रग्रहीष्याद

परिषदियमृषीणामेष

परिहरति रतिं मति लुनीते

पादाक्रान्तानि पुणरपि सा

विण्डनात तु भवेत् पिण्डी

पुण्यप्रागल्भ्यलस्म्याय

पूर्व्यन्तां सलिलेन

प्रणयविशादां हृ्ष्टि

प्रत्यप्रयोजनविभूषण-

प्रत्याख्यानहप: कृतं

प्रथमानुराग-

प्रवृत्तचक्रे याक्रान्तः

१३५

१६५

३२५

१७१

३१९

२५६

१७२

६४,१०५

२५१

१५५

२६१

१७९

१५२

३६४

१००

१७७

१६६

२६१

५०

१७२,१७६

१६३

४०४

२६७

१५५

२६५

१३२

३२५

१४२

४०७

२६७

१७५

१४५

२५५

१००

४०४

४५

रत्नावल्याम्

[नाट्यशास्त्रे ग्रं० १९,१०३]

[श्रृङ्गारशतके ४५]

तापसवत्सराजे

वनमालायाम्

देवीचन्द्रगुप्ते ग्रं० २

वेणीसंहारे

रत्नावल्याम्

सत्यहरिश्चन्द्रे

रामाभ्युदये

[श्रृङ्गारभू० ग्रं० १६. उ]

सत्यहरिश्चन्द्रे

नलविलासे

[नाट्यशास्त्रे ग्रं० ४,१०५]

रघुविलासे ग्रं० ६

नागानन्दे

कृत्यारावण्णे

[वेणीसंहारे ग्रं० १]

राघवाभ्युदये ग्रं० ६

वेणीसंहारे

[कुमारसम्भवे ७,१८]

मुद्राराक्षसे

कृत्यारावण्णे

वीरचरिते ग्रं० २

[काव्यप्रकाशे ७,३२६ उ]

स्वप्नवासवदत्ते

सत्यहरिश्चन्द्रे

वेणीसंहारे

रत्नावल्याम्

देवीचन्द्रगुप्ते ग्रं० २

रामाभ्युदये ग्रं० ४

[कोटालवीडम्बने ग्रं० १, ग्रं० ३]

Page 550

चतुर्थं परिशिष्ट

प्रबुद्ध यद् वैरं

प्राप्नुयात् यदिव हेतुमत्

प्राप्तावेकरथारूढौ

प्रायोहिरचरितयुक्तः

प्रेमावनद्धहृदयः

बहुनाटकिमुक्तेन ?

बहुविहङ्गविवसेन् (प्रा.०)

दीर्घससा विषया

ब्रह्मोत्तरं तथैवास्तु

श्रता तवाहुमिति

सूक्ष्मो क्षिप्त्वा शरीरं

श्रुयः परिभावक्षान्ति

मध्नान्ति कोरवार्षतं

मध्येऽस्मिन्‌षोडश वसू

मनः प्रकृत्यैव चलं

मन्त्रत्रयति च तद्विषयं

मन्दोऽस्यमन्दतां याति

मा गास्तिष्ठ पुनत्र ज

मार्गाःकण्टककिनः

मित्रं दर्शंनमात्रतोऽपि

यच्च पदार्थाभिनयं

यत् सत्यव्रतमञ्जूभिरुमनसा

यथातथा धृतप्रायं

यथाऽयं मम सम्पूर्णःः

यदि चैष शुद्धवाचा

यद् दुष्करमभिनेयं

यद् भस्मन् विपिनं

यद् विस्मयस्तिमित

यन्मण्डलेन नृत्‌

यस्तातेन निगृह्य बालक इव

यते द्वारवती तदा

यायावरेष किनेन

युक्त्यैव क्षत्रबन्धोःः

युद्धश्राद्धयं

येनात्रृश्यते मुखानि

रक्षोवोरा इदार्ः-

१०६

१५२

१५३

४०५

१४७

७३

३६६

३२७

३६४

१७७

१२

११३

११५

१५६

१४१

४०५

२४३

१६७

१६९

५३

४०६

१११

१६२

१९३

४०५

४०५

१५०

१२०

४०६

२८२

३०७

१४६

२५९

१४२

१७०

१६०

[ २३

वेङीसंहारे

रघुविलासे

वेङीसंहारे प्र० ५

रघुविलासे

रामाभ्युदये प्र० २

देवीचन्द्रगुप्ते प्र० ५

[नाट्यशास्त्रे प्र० ४,१०६]

पुष्पदूषितके

वेङीसंहारे प्र० ६

रघुविलासे

रत्नावल्याम्‌

मालविकाग्निमित्रे

कृत्यारावणो

राघवाभ्युदये

वेङीसंहारे

तापसवत्सराजे

कृत्यारावणो

रघुविलासे

मालतीमाधवे

[अभिनवभारती उ० श्लो० ४, पृ० १६१]

कृत्यारावणो

[वक्रोक्तिजीविते २,५९ उ०]

रघुविलासे

रामाभ्युदये प्र० २

रघुविलासे

खलितरामे

रामाभ्युदये प्र० ४

Page 551

२४ ]

चतुर्थं परिशिष्ट

रंडा चंडा दिख्खदा (प्रा०)

रस्थाइ संचरन्तं (प्रा०)

रस्था-समाज-चहवर-

रस्यां चारितकारियं

रामस्यास्पदिमत्यवैमि

राज्ञो मानवनस्य

रामेऽपि प्रलयेनव

राष्ट्रं प्रवर्धतां चैव

रिष्टस्तावदुदग्र-

लङ्कां इवरे त्रिदशदर्पहरे

लच्छीं गिहीए भूसा (प्रा०)

लोकत्रयस्ययौदूवृत्-

लोकोत्तराणि चरितानि

वक्त्रं शीत रुचिवंचासि

वक्त्राणि हे ! हसंत

वक्त्रेन्दु: स्मितमातनो-

वाक्प्रपञ्चेकसारेण

वार्ता'डपि नैव यदिहास्ति

विक्रमेऽपि मया लोका:

विना वाहन-पोतास्यां

विन्यस्याभिनवोदये

विरोधो विश्वान्तः

विष्कम्भक-प्रवेशक

वृद्धोक्षस्य नृपस्य

वैदेही हुतवास्तदेश

२५३

३०५

४०६

१५१

३२४

९६

१७३

३६४

२५०

१५७

२६५

१३१

३४६

१७५

१६१

२६४

२६६

१०१

१४२

१६३

४२

१७३

४०४

१६३

९२,१६२

शशिन इव कला

शीतांशुमुं खमुत्पले

शूरास्तु वीर-रोद्रेषु

शोकं स्त्रीवन्नयनसलिलै:

श्रीरिव दानवशत्रो:

श्रीरेप्सा पाञिरप्यस्या:

इलाद्या धीरीघ्रपास्य

षोडश द्वादाष्टो वा

सकलरिपुजयाशा

स कीचकनिषूदनो

सपक्षे मधुरंगिर:

१६९

१५६

२२५

१७१

४०४

१३७

१५४

४०७

१७१

१६२

५५६

[कपुं रमज्जयां]

सुधाकलशे

देवीचन्द्रगुप्ते ग्रं० ६

नागानन्दे

वेणीसंहारे

कृत्यारावणो ग्रं० ७

[नाटचशास्त्रे ग्रं० ५,१०७]

बालिकावतिचतके

रघुविलासे ग्रं० ४

सुधाकलशे

रामाभ्युदये ग्रं० २

[बालमुप्तसय ग्रं० भा० ६,४५]

कोमुदीमित्रानन्दे ग्रं० ३

रघुविलासे ग्रं० ४

नलविलासे

कृत्यारावणो

विधिविलसिते ग्रं० ५

कृत्यारावणो ग्रं० २

मुद्राराक्षसे

नलविलासे

उत्तर [राम] चरिते

[है० काव्य० उ० ग्रं० न]

यादवाभ्युदये ग्रं० ७

राघवाभ्युदये

कृत्यारावणो ग्रं० ७

रत्नावल्याम्

[हैमकाव्या विवेके ग्रं० ५,३२६ उ०]

वेणीसंहारे

रत्नावल्याम्

तापसवत्सराजे

वेणीसंहार ग्रं० ५

ग्रं० ६

"

"

Page 552

सच्चेकतानुवृत्तीनां सन्तः सच्चरितोदयः

संशिसंध्याॠजुंगटनं समुत्थिते घनुध्वन्नो

सर्वक्षितिभर्त्तां नाथ ! सर्वथा कथय ब्राह्मन् !

सर्वंदायोदक्षविजयी सर्वोपामपि सन्ति

सत्याजैः शापथैः

साम वेदस्थथा दण्डो

सा स्वर्गलोकललना-

साहसं व भयं चैव

सीतां काननतो जहार

सीताया बदनं

सिन्धुं वीक्षितमन्यतो-

स्वप्नोद्भि नाहि विध्रमः

स्वगांगस्त्री यदि तत्र

स्वसुमनं परामव-

हतः पुत्रो हतो भ्राता

हरि-हर-भानु-भवानी-

हस्ताकृष्टविलोल-

हूं शाकः स जितो

हिया सर्वस्यासो

चतुर्थं परिशिष्ट

६४,२८१

२६६

१२७

३२१

२५७

१६६

२६०

२६५

१७३

१६५

१२३

१९५

२८४

१७६

१२५

१६२

१२३

३६७

१६४

४०५

२६४

१६५

१४२

[ २५

सत्यहरिश्चन्द्रे

[दशरू०प्र० प्र० ३ उ०]

[छाया०लो० उ० ३,११२]

ग्रजुं नचरिते

विक्रमोर्वश्याम्

वेणीसंहारे प्र० ६

मनोरमावत्सराजे

नलविलासे

रत्नावल्याम्

[नाट्यशा० ग्र० १९,१०१]

रोहिणी-मृगाङ्के ग्र० १

[नाट्यशा० ग्र० १६,१०२]

रघुविलासे

राघवाभ्युदये प्र० ७

प्रभिज्ञानशकुन्तले

पुष्पदूषितके प्र० ५

नागानन्दे

उदात्तराघवे

पुष्पदूषितके ग्र० ५

वेणीसंहारे २

रघुविलासे ग्र०

रत्नावल्याम्