Books / Natya, Sankshipta Natya Sastra Radha Vallabh Tripathi (Hindi Book) (Poor Scan)

1. Natya, Sankshipta Natya Sastra Radha Vallabh Tripathi (Hindi Book) (Poor Scan)

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Barcode : 99999990077656 Title - Sankshiptanatyashastram Author - Tripathi, Dr. Radhavallabh Language - sanskrit Pages - 321 Publication Year - 1992 Barcode EAN.UCC-13

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सङ:क्षिप्त नाट्यशास्त्रम {भरतमुनि कृत नाटयशास्त के सभी छत्तीस अध्यायो से सकलित अश तथा हिन्दी अनुवाद)

सम्पादन तथा अनुवाद डॉ० सधावल्लभ विपाठी प्रोफसर तथा अध्यक्ष, सस्कृत-विभाग सागर विश्वविद्यालय सागर (म० प्र०)

अक्षयवट प्रकाशन इलाहाबाद

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संक्षिप्तनाट्य शास्त्रम् C तेखकाघीन • प्रयम सस्वरय : १६६२ • मूल्य 'दो सौ रुपये मात्र • प्रकाशक अक्षयवट प्रकाशन २६, बलरामपुर हाउस इलाहाबाद-२११००२ मुद्रकु एकेडमो प्रेस ६०२, दारागज इलाहाबाद-२११०६

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भूमिका

भरत मुनि का नाटयशास्त्र भारतीय नाट्यकना, नाट्यधि तनसरय शा्य तथा अभिनेय कलाओ का सर्वापूर्ण आकर ब्रथ है। उसकी रचेता ईमापूर्ज थे। शतादिदियो मे हुई। वृछ सहसाव्दियों की हमारी नाटयपररा और कचाचिन्तने वी सरणियो वा आकनन और व्यवस्थापन बरते हुत भर्सुन तूथा उनके 'दषिप्यो न) नाट्यशास्त्र वे म्प मे एर ऐसी विशान सहिता का निर्माण किया जो तन से जाज/ सन नाटयनारो और अभिनेताओ के लिय पथप्रदशन बती हई है। मस्कृत नावपु माहिय वा तो अध्यया इस ग्रन्थ वे बिना सम्भव ही नही है। क माथीह। ग्रथ प्राचीन भारतीय कला चिन्तन की गम्भीरता और रगमन वी सम्पेनना का भी विशद माक्ष्य है। अन्य विमी भी देश मे नाटयकना और उससे अनुपक्त अन्याय शिच्यो तथा बनाआ का इस प्रकार गहन और सर्वागीण विवेचन प्रस्तुत बरने याना ऐसा प्रथ इतने प्राचीन काल मे नहीं तिया गया। नाटयशास्त्र वस्तुन भारतीय विद्या की अद्वितीय उपनब्धि है। नाट्यशास्त्र ३६ अध्यायो की एव विशाल नाटयशास्तरीय वृति है। परवर्ती बादमम म इसे पदर्ननिशनम्' के रूप मे भी स्मरण किया गया है। यह महतीय कृति प्राचीनतम् भारतीय वाव्यशास्त्रीय एव नटयशास्त्रीय चित्तन एव शोध की समन्वित उपनब्धि है। जय विष्व वे अन्यन्य सभ्य देश चिन्तन की दहनीज पर पाँव रस रहे ये तब भारतीय मनीवी चिन्तन के शिवर पर प्रतिप्ठित हो चुये थे-दग तथ्य को मप्रमाण उजागर करता है नाट्यशास्त्र।वरण अगहार चारी विधान, लक्षण शुण अरवार, प्रवृत्ि रस एव छदो विचिति का सबथा मोलिक सुस्षष्ट एव सुसगन रूप हुमे सर्वप्रथम ाटयशास्त्र मे ही मिलता है। वस्तुत यह ग्रन्थ परवर्ती माहित्य पास्लोम पल्नवन का भूल्य प्ररोह है। दुर्भाग्य मे ऐगा अनुपम ग्रन्थ आज सभी अध्येताओ के लिय मुन्भ और बोधगध्य नही है। इसकी अत्यन्त सम्पन विन्तु इतर कलाओ और अनुशासन से अतरशाम्बन के कारण जटित पारिभाषिक शब्दावली इसके पठन-पाठन की परम्परा वा विच्छेद तथा सस्तृत नाटव की जीवन्त प्रायोगिय परम्परा से अपरिचय-इन कारणो से ऐगा महत्त्वपूर्ण शास्त्र ग्रथ दुरुह हो गया है। 'सद्क्षिप्त (राग्य) शाम्त्रम्' म नाट्यशास्त्र की सारी विषयवस्तु वो जिज्ञासु सामान्य पाठवा तथा छात्ो के लिये ग्राह बनाने वा प्रयास किया गया है। केयर छ दाविपयव अश को छोडनर मूल नाटयशास्त्र के समस्त अध्यायो से मुख्य विपयो पर प्रामाणिव जौर अविवल

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पाठ हिन्दी जनुवाद के साथ यहाँ मवनित किया गया है, जिमस इम विशाल आकर ग्रन्य म समाहित मभ्षी प्रकरण का अध्यता का सूलम्प म एक्त्र परिचय मिल सके। पाति्मिापिन शदा का पथास्थान वादटिप्पणिया म स्पष्ट किया गया है। इसके साथ हा महत्वपूर्ण स्थना पर जमिनवपुल् की जभिनवंभारनी के सदभ से व्याव्या की गशी है जा नाट्यशास्त्र की एकमात्र उपलब्ध प्रमाणिक ढाका है। आशा है यह मक्नन नाटयशास्त्र के जध्ययन म महायक होगा। इम वार्य म नाट्यशास्त्र बरोदा मस्करण मनमाहन घाप कृत अग्रेजी जतुवाद तथा डा० बाबूलान शुवन शास्त्रा वृत हिन्दी जनुवाद म यथास्थान सहायता नी गयी है, जिमक लिय मै विद्ान् सन्पादका व अनुवादको बा कृतज हूँ।

सागर विश्वविद्यालय सागर (म०प्र०) राधावल्लम व्रिपाठी

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॥ सङ्क्षिप्तनाट्यशास्रम्।।

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॥ अय प्रथमोऽध्यायः ।।

प्रणम्थ शिरसा देवौ पितामहमहेश्वरौ। नाटयशास्त्र प्रवक्ष्यामि बह्मणा यदुदाहृतम्॥१॥ समाप्तजव्यं व्रतिनं स्वसुत परिवारितम्। अनध्याये कदाचित् तु भरतं नाट्यकोविदम् ॥ २ ॥ मुनय पर्यपास्यनमात्रयप्रमुखाः पुरा। पप्रच्छुस्ते महात्मानो नियतेन्द्रियबुद्धयः ॥३॥ योषयं भगताव सम्पग ग्रथितो वेदसम्मितः । नाटयवेद: कथं ब्रह्मन्तुत्पन्नः कस्य वा कृते ॥४॥ कत्यङ्ग: किम्प्रमाणरच प्रघोगशचास्य कीद्शः । सर्वमेतद् पथातत्त्वं भगवन् वयतुमहुंसि॥ ५।। तेपा तु वचनं श्रृत्वा सुनीनां भरतो मुनिः। प्रत्युवाच ततो वाक्यं नाट्यवेदकथां प्रति ॥ ६॥ भवद्मि: शुचिभिमूरवा तथाऽ्व्रहितमानसं:। श्रूयतां नाट्यवेदस्व सम्भवो ब्रह्मनिमितः॥७।। पुरा कृतयुगे विप्रा वुत्त स्वायम्भुबेऽनतरे। त्रतायुगोय सम्प्राप्ते मनोर्वैंवस्वतस्य तृ॥द॥ ग्राम्यधर्मप्रवत्ते तु कामलोमवरं गते। ईर्ष्याक्रोधादिसम्मुढे लोके सुखितहुःखिते॥ ई ॥।

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॥ प्रथम अध्याय।

पितामह (ब्रह्मा) और महेश्वर (शिव) को सिर से नमन कर मैं ब्रह्मा के द्वारा निरूपित नाटयशास्त का विवेचन करूंगा (१)। बहुत पहले की बात है एक बार अनश्याय (अवकाश) के समय भरत मुनि जप समाप्त कर अपने पुवी से घिरे हुए बैठे थे, तब आतेय आदि जितेदरियबुद्धि महात्मा मुनि आये और उनके पास विनय पूवक बैठ कर पूछते लगे (२-३)। हे भगवन्, आपने यह जो वेदतुल्य नाट्यवेद सम्यक रूप से निर्मित किया है वह कैसे उत्मन हुआ है किसके लिये है इसके कितने अग है, इसका प्रमाण' कपा है और इसका प्रयोग किस प्रकार होता है-यह सब यथातत्व आप कृपया हम बतलाइये (४५)। उन मुनियो के वचन सुन कर भरत मुनि ने नाट्यवेद क विषय मे उत्तर दिया-आप लोग पवित्र और एकाग्रचित होकर ब्रह्मा के द्वारा निर्मित इस नाटसवेद को उत्पत्ति (का इतिहास) सुनिये (६७)। हे विप्रो, पहले की बात है। स्वायभुव मनु के मवन्तर२ मे सत्ययुग बीत जाने पर वैवस्वत मनु का त्तायुग प्राट्भ हुआ। लोग ग्राम्य धर्म मे प्रवृत्त तथा काम और लोभ के वश मे होकर ईर्ष्या क्रोध आदि से दिग्भ्रात और सुखी दुखी रहने लगे (दर्६)। १ अभिनवगुप्त ने 'प्रमाण का अर्थ नाटय के अमी क यथाथ रूप को जानने का साधन या कसोटी माना है। प० वा० ता० शुक्ल ने प्रमाण का अर्य 'परिमाण किया है जो उचित नही है। २ मचतर चौदह महने गये हैं। ब्रह्मा का एक दिन एक कल्प के बराबर होता है तथा स्वायभुव मन्वतर कल्प का पहला मन्वतर है। वैवस्वत सवतर सातवां है, जिसमे हम लोग अब विद्यमान है (अभि०) एक मबतर मे ७१ चतुयुग होते हैं तथा एक चनुयुग मे ३६ लाख मनुष्य वर्ष।

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महेन्द्रप्रमुखैरदे वं रुकतः किल पितामहः। क्रोडनोयकमिच्छामो दृश्यं श्रव्यं च यद् भवेत् ॥ १० ॥ न वेदव्यवहारोऽयं संभाव्य शद्रजातिषु। तस्मात् सृजापरं वेद पश्चमं सार्वर्वर्रिकम् ॥११ ॥ धर्न्यमर्थ्य पशस्यं च सोपदेश्यं ससड ग्रहम्। भविष्यतश्च तोकस्य सर्वकर्मानुदर्शकम॥ १२॥ सरवशास्त्रार्थसम्पन्नं नाटयाख्यं पश्चम वेवं सेतिहासं करोम्पहम् ॥ १३॥ एवं सङ्गल्य भगवान् सर्ववेदाननुस्सरन्। नाट्यवेदं ततरचकें चतुर्वेदाङगसम्भवम्॥१४॥ जग्राह पाठ्यमृग्वेदात् सामभ्यो गीतमेव च। यजुर्वेदाद भिनयान् रसानाथर्वणादवि ॥ १५॥ आज्ञापितो विदित्वाऽह नाट्यवेदं पितामहात्। पुत्रानध्यापयामास प्रयोगं चावि तत्त्वतः ॥ १६ ।। भारतीं सात्वतीं चँव वृत्िमारभटीं तथा। समाशितः प्रयोगस्तु प्रयुक्तो वे सया हिजाः ॥ १७॥ परिगृह्य प्रणम्याथ ब्रह्मा विज्ञापितो मया। अथाह मां सुरगुरु कंशिकीमपि योजय॥ १८॥ मच्च तस्याः क्षमं द्रव्यं तद् ब्रृहि ह्विजसत्तम। एवं तेनास्म्यभिहितः प्रत्युवतर्च सया प्रभुः ॥ १६॥ दोयतां भगवन् द्रव्यं केशिक्या सम्प्रयोजकम्। रसभावक्रियात्मिका ॥ २०॥ दृष्टा मपा भगवतो नीलकण्ठस्य नृत्यतः। कैशिकी रलक्ष्णनपथ्या शृङ्धाररससम्भवा ॥ २१ ॥ अशक्या पुरुषैः सा तु प्रयोवतं स्त्रीजनादते। ततोऽमृजन्महातेजा मनसाऽप्सरसो विभुः॥२२॥

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प्रथमोजयाय /५

तब इद्र आदि देवताओ ने सपितमिह बहा से कहा-हम मनोविनोद का ऐसा साधन चाहते हैं जो दृश्य भी हो औौदक्षव्य भी। यह वैद) व्यवहार शूद्ध जाति के TACCND

लोगो को तो सुनाया नही जा सकता, इसलिये आप एक अन्म पावा वेद रविये जो सभी वर्णों के लोगो के लिये हो (१. व) Lfleदc1

(ब्रह्मा ने चारो वेदो का स्मरण कर सकल्प किया)-मैं नाटय नामक पाँचवे चेद की इतिहास महित रचना करता हूँ जो धम अर्थ तथा यश की प्राप्ति कराने वाला (धर्म आति पुर्षार्थों की प्राप्ति का) उपदेश देने बाला और उस उपदश का अचछी तरह ग्रहण कराने वाला आने वाले ससार के सभी कर्मों का अनुदशन कराने वाला सभी (क्लाविषयक) शास्तरा के (तृत्त गीत वादन आदि) तत्वो मे सपन्न तथा समस्त शिल्पो का प्रदत के होगा (१२१३)।

ऐसा सकल्य क के भगवान् ब्रह्मा ने सारे वेदो का अनुस्मरण करते हुए चारो वेदो के अगो से उत्पन नाटय बेद का निर्माण किया। उहोने पाठ्य ऋवेद से गोत सामवेद से अभिनय सजुर्वेद से तया रमो को अथववेद से लिया। उस नाटयवेद का ज्ञान मैंने पितामह से प्राप्त किया और फिर उन्ही की आज्ञा से उसे अपने पुत्रो को पढाया तथा ततत्वपूवक उसका प्रयोग भी उन पुत्ो को बताया (५४१६)।

ह ब्राह्मणो मैंने भारती, सात्वती तथा आरभटी वृत्तियो से समाश्रित प्रवोध प्रदर्शित किया। फिर (उम प्रयोग को) तैयार कर प्रणाम कर के ब्रह्मा को इसकी सूचना दी । तब ब्रह्मा मुझ मे बोले-(इस प्रयोग मे) कैशिकी वृत्ति और जोड दो तथा इस वृत्ति क लिये जो उपयुक्त द्रव्य (सामग्री) अपेक्षित हो वह बताओ। उनके ऐसा कहने पर मैंने भगवान् को उत्तर दिया-हे भगवान् कैशिकी दृत्ि जिससे सपन हो सके ऐमा द्रव्य दीजिये। नृत्त और अगहारो स सपन तथा रस और भाव के अनुरूप व्यापार वाली सुदर नेपथ्य वाली तथा शुडगार रस से उत्पन कशिकी वृत्ति मैंने भगवान् नीलकठ (शिव) के नृ य मे देखी है। स्त्रियो के बिना (केवल) पुस्पो से उसका प्रयोग सभव नही है। तब महातेजस्वी और सबव्यापी ब्रह्मा ने मन के द्वारा अप्सराओ की रचना की (१७-२२)।

१ वृत्तियो के लिये देखिये स० नाशा० ६१२ तथा म० १६

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६/ सड्क्षिप्तनाट्यशास्त्रम्

ब्रह्मोवाच- महानयं प्रयोगस्य समयः समुपस्थितः। अयं ध्वजमहः श्रीमान् महेन्द्रस्य प्रवर्तते ॥। २३ ॥ अत्रेदानोमयं वेदो नाट्यसंज्ञः प्रयुज्यताम्। ततस्तस्मित् ध्वजमहे निहृतासुरदानवे ॥ २४ ॥ महेन्द्रिजयोत्सवे। पूर्व कृता मया नानदी हयाशीर्वचनसंयुता ॥ २५॥ अष्टाङ्पदसंयुक्ता विचित्रा वेदनिमिता। तदन्तेऽनुकृतिर्बद्धा यथा देत्याः सुरैजिताः ॥ २६॥ सम्फेटविद्रवकृता ततो ब्रह्मादयो देवाः प्रथोगपरितोषिताः ॥ २७॥। प्रददुमदसुतेभ्यस्तु सर्वोपकरणानि वै। प्रीतस्तु प्रथमं शक्रो दत्तवान् र्वं ध्वजं शुभम् ॥ २६। एवं प्रयोगे प्रारब्धे दैत्यदानवनाशने। अभवन् क्षुभिताः सर्वे दैत्या ये तत्र सङ़गताः ॥ २र६ ॥ रङ्रपीठगतान् विघ्नानसुरांश्चव देवराट्। जजरीकृतदेहांस्तानकरोज्जर्जरेण सः ॥ ३०॥ ततश्च विश्वकर्माण ब्रह्मोवाच प्रयत्नतः । कुरु लक्षणसम्पतनं नाट्यवेश्म महामते॥ ३१॥ ततोडचिरेण कालेन विश्वकर्मा महच्छुभस्। सर्वलक्षणसम्पन्नं कृत्वा नाट्यगृहं तु स. ।।३२॥। प्रोक्तवान् द्रुहिणं गत्वा सभायां तु कृताञ्जलि: । सज्जं नाट्यगृहं देव तदवेक्षितुमर्हृसि॥३३॥ दष्टवा नाट्यगृहं ब्रह्मा प्राह सर्वान् सुरांस्ततः । अं शभागंर्भवद्भिस्तु रक्ष्योऽयं नाटयमण्डयः ॥ ३४॥

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(ब्रह्मा ने कहा)-'नाटय के प्रयोग का यह नहान् समय उपस्थित हो गया है। यह शोभा से युक्त दद्रध्वजमहोतसव चल रहा है। इस (उत्सव के) ममय यहा इस नाटयवेद का प्रयोग किया जाय'। तब रद्र की असुरो और दानत्रो की पराजय के उपलक्ष्य म यायोजित तथा हर्षित दवताओ से मकुल उस स्वज़महोत्मव मे पहले मैंने आशीवचन से युक्त नादी1 की जो वेदो से निमिस/निचिन्न तिया आठ पदो वाली (वे ही पद उसके अग थे) थी। उस (ना दी) के अत में दरय जिस प्रकार देवताओ से जीते गये-इसकी अनुकृति प्रम्मुन की। वह अनुकृति क्रोधपूण वचन भगदड, मारकाट और युद्ध के दू्यो से भरी थी। तब इस प्रयोग से परितुष्ट हुए ब्रह्मा आदि दवताओ ने मेरे पुत्नो को सारे उपकरण दिये। सबसे पहले प्रम न हुए इद्र ने अपना शुभ ध्वज दिया (२५-२८)। दैत्यो और दानवो का नाश करने वाले इस प्रयोग के प्रारभ होने पर वहों एकन सारे दैव्य क्षुब्ध हो उठ। रगपीठर पर आये उन विघ्नो तथा असुरो को दवराज इद्र ने जजर३ स जर्जरीकृतदह बना दिया (२६३०)।

तब ब्रह्मा ने विश्वकर्माथ से कहा-हे महामति, तुम लक्षणो से मपन नाटय- शाला का निर्माण करा। तब शीघ्र ही विश्वकर्मा ने अत्यत शुभ सब लक्षणो से सपन्न नाटयगृह बना कर ब्रह्मा की सभा मे जाकर उतसे हाथ जोड कर निवेदन किया-हे देव, नाटयगह तेवार है। उृपया आप इसका अबलोकन करे। उस नाटय गृह को देख कर ब्रह्मा ने सभी देवो से कहा-आपको अपने अपने लशा से इस नाटय मण्डप की रक्षा करना है (३१ ३४)।

१ नादी के लक्षण के लिये द० स० नाशा०२६६८७३ २ नाटयशास्त्रसम्मत रचमच रगशीष और रगपीठ-इन दो भागो म बाटा जाता है। विवरण के लिये आगे दूसरा अध्याय देखिय। कभी कभी पूरे रगमच को भी रगपीठ कहा जाता है। ३ बांस का डडा। जजर पूजा का विध्ान आगे पाँचवे अध्याय म वर्णित है। नाशा० (१२१४) मे भी जर्जरपूजा उत्लिखित है। स० नाशा० ३७११ भी द्रष्टन्य। यहाँ जजर का अलग अलग रगीन बस्तो से बाँधे जाने का भी विधान बताया है। ४ वास्तुशास्द्र मे निपुण एक देवता।

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=सङक्षिप्तनाट्यशास्त्रम्

विरूपाक्ष उवाच- घोडयं भगवता सृष्टो नाट्यवेदः सुरेच्छया। अत्यादेशोऽयमस्माकं सुरार्थ भवता कृतः ॥ ३५ ॥ तन्न तदेवं कर्त्तव्यं त्वया लोकपितामह। यथा देवास्तथा दैत्यास्त्वतः सवॅ विनिर्गता ॥ ३६ ॥ विध्नानां वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा वचनमन्नवीत्। अलं वो मन्युना दैत्या विपादं त्यजतानवाः ॥ ३७ ॥ भवता देवतानां च शुभाशुभवविकल्पकः । कर्मभावान्वयापेक्षी नाट्यवेदो मया कृतः ॥३८॥ नैकान्ततोऽत्र भवता देवानां चानुभावनम्। त्रलोवपस्यास्य सर्वस्य नाटयं भावानुकीर्त्तनम्॥ ३य ॥ वर्वचिद्धर्म: वर्वाचत्क्रीडा वर्वाचदर्थः ववचिच्छमः । वर्वाचद्धास्य क्वचिद् युद्ध वर्वचत्काम: वर्वाद्वध ।।४०।। धर्मो धर्मप्रवृत्तानां काम: कामोपसेविनाम्। निग्रहो दुर्विनीताना विनीतानां दमक्रिया॥४१॥ कलोबानां धाष्ट्रयंजननमुत्साह. शूरमानिनाम्। अबुधाना विबोधश्च वैदुष्य बिदुषामपि॥४२॥ ईश्वराणां विलासश्च स्थेयं दुःखादितस्त्र च। अर्थोपजीविनामर्थो धृतिरुद्विग्नचेतसाम् ॥। ४३॥। नाना भावोपसम्पन्नं नानावस्थान्तरात्मकम्। लोकवृत्तानुकरणं नाट्यमेतन्मया कृतम्॥ ४४ ॥ उतमावनमव्यानां नराणा कर्मसंश्रयम्। हितोपदेशजननं धृतिक्रीडासुखादिकृत् ॥ ४५ ॥ दुःखार्ताना श्रमार्तानां शोकार्ताना तपस्विनाम्। विश्रान्तिजननं काले नाट्यमेतद् भविष्यति ॥४६ ॥। धर्म्थ पशस्यमायुष्यं हितं बुद्धिविवर्धनम्। लोकोपदेशजननं नाट्यमेतद् भविष्यति ॥ ४७॥

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(तब बिरुपाक्ष' से ब्रह्मा ने कहा)-देवताओ के अनुरधसेआपने यह जो नाट्यवेद रचा है, वह तो देवताओ के लिये हमारा अनादरी ्रापने Cकर दिया। इस लिये है लोक पितामह आपको ऐसा नही करना चाहिये। जिस प्रकार देवो ने उसी प्रकार दैत्यों ने भी सबने आपसे ही जन्म लिया है। उन विध्नो की बात सुन कर ब्रह्मा बोले-हे दत्यो आय क्रोध न करें और दु खी न हो। रचा है, यह आपके और देवताओ के शुभ और अशुभ दोनो प्रकार के कमी को प्रदर्शित करने वाला और कर्में, भावरे तथा अन्वय (उत्तम वंश, कुलीनता) की अपेक्षा रखने वाला है। इसमे केवत देवी का या केबल आपका अनुभावतहै नही होता, यह नाटय तो सारे वैलोक्य का भावानुकीर्तन है। इसमे वही धर्म कही क्रीडा कही अथ इही गम कही हास्य वही युद्ध कही काम तो कही वध प्रदर्शित होता है। यह धम मे लगे लोगो के लिये धर्म है काम का सवन करने वालो के लिये काम है, दुर्विनीत लोगो के लिये अनुशाम्न है तथा विनीत लोगो के लिय दम की क्रिया है (३५४१)। यह उपहासास्पद लोगो को ढिठाई दिखाने वाला शूरबीरो को उत्साह दिलाने बाला, अबोध लोपो को विशेष ज्ञान प्रदान करने वाला, विद्वानों के वैदुष्य का प्रदर्शन करने वाला, ऐश्वर्यशाली लोगो के विलास तथा दुखियारे की स्थिरता का चित्रण करने वाला है। अर्थोपजीवी लोगो के लिये वह अर्थ है तथा उद्विग्नचित वालो के लिये धंयं (४२-४३)। अनेक प्रकार वे भावो से सपन्न अनेक प्रकार की अवस्थाओ से सम्मिश्रित तथा लोकवृत्त का अनुकरण करने वाला यह नाट्य मैंने रचा है। यह उत्तम, मध्यम तथा अधम तीनो प्रकार के मनुष्य के कर्मों का आश्रय है हितकारक उपदेश देने वाला तथा धृति, करोडा और सुख का जनक है (४४-४५)। यह नाट्य समय पर दुखार्त, क्षमात, शोकार्स गरीब लोगो को विशाम देने वाला होगा। यह धर्म, यश और आयु को बढाने वाला हितकारी, बुद्धि की विशेष वुद्धि करते वाला तथा ससार को उपदेश देने वाला होगा (४६-४७)। १ राक्षसो का नायक। २ 'विघ्न' शब्द का प्रयोग यहाँ विघ्नकर्ता अमुरो या राक्षमो के लिये हुआ है। ३ भाव का अर्थ यहाँ आशय या अभिप्राय है। ४ अनुभव करने के लिये होने वाला व्यापार। ५ भावो (नासको की विभिन्न अवम्थाओ) का अभिनय, या कथन के द्वारा अनु- करण, जो रस का उद्बोध कशा सके। ६ दम का अर्थ दमन है। अभि० ने यहाँ दम का अर्थ शात कराना लिया है। 'विनीताना दमक्रिया' के स्थान पर 'मतानादमनक्रिया' पाठ लेने पर दमन बाला अर्थ भी उचित है। ३ अवस्था का अर्थ घोरोदात्त आदि विभिन्न प्रकार के नायको या पातो की सुख दुख आदि से मिश्रित मनोदशाऐं और जीवन की स्थितियाँ है।

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॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥

इह प्रेक्षागृह दृप्टवा धीमता विश्वकर्मणा। तरिविध. सन्निवेशश्च शास्त्रत. परिकस्पित ॥ १॥ विदृष्टश्चतुरभ्रश्च त्यश्रशचैव तु मण्डप । तेवा नीणि प्रमाणानि ज्येष्ठ मध्य तथाडबरम्॥ २॥ प्रमाणमेपा निर्दिष्ट हुस्तवण्डममाश्रयम्। शत चाय्टौ चतु.पष्टिर्हस्ता द्वातिसदेव च॥ ३॥ अष्टाधिकं शत ज्येष्ठ चतुषष्टिस्तु मध्यमम् । कनीयस्तु तथा वेश्म हस्ता हानिशविष्यते॥। ४ ।। देवाना तु भवेज्ज्येष्ठ नृपाणां मध्यमं भवेत्। शेधाणा प्रकृतीना तु कनीयः सविधीयते ॥ ५॥ चतु पष्टिकरान् कर्याद् दीर्घत्वेन तु मण्डपस्। द्वात्रिशत च विस्तारान्मर्त्याना यो भवेदिह ॥ ६।। अत ऊर्ध्व न कर्तव्य: कर्तृ भिर्नाटयमण्डप। यस्मादव्यक्तभाव हि तत नाट्य ब्रजेदिति ॥७॥ मण्डपे विप्रकृष्टे तु पाठ्यमुच्चारितस्वरम्। अनिस्सरणध्यर्मत्वाद् विस्वरत्वं भूशं ब्रजेत् ॥ र॥

म वेश्मनः प्रकुष्टत्वाद् व्रजेदव्यवतता पराम्॥ द ॥ प्रेक्षागृहाणा सर्वेदा तस्मान्मध्यममिष्यते। यावत्पाठयं च गेय व तत श्रव्यतर भवेत ॥ १० ॥

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॥ द्वितीय अध्याय ॥

बुद्धिमान् विश्वकर्मा ने शास्त्र की दृष्टि से प्रेक्षागृह की रचना तीन प्रकार की परिकल्पित की है। नाट्यमण्डप विकृष्ट चनुरध तथा व्यश तीन प्रवार के होते हैं तथा उनके ज्पेष्ठ, मध्य और अवर -ये तीत प्रमाण (नाप) हैं। यह नाप हृहल तथा दण्ड"-इन (दो पॅमानो) से की जाती है तथा (ज्येष्ठ मध्य तथा अवर नाट्य मण्डपो के लिये क्रमश) एक सौ आठ, चौंसठ तथा बत्तीस हाथ की लवाई निर्धारित है। नाट्यप्रस्तुति के पात्र देवता हों तो ज्येष्ठ, राजा हो तो मध्यम तथा इनके अतिरिक अन्य प्रकृतियासे हो तो अवर प्रेक्षागृह का उपयोग होता है (१-५)। मत्यों के लिये निर्धारित (विक्कष् मध्य) नाट्यमण्डप की लवाई चौमक हम्त तथा चौडाई बत्तीस हस्त रखी जाय। (नाट्यमण्डप) बनाने वालो को इससे बडे नाट्यमण्डप नहीं बनाना चाहिये कयोकि इससे बड़े नाट्यमण्डप मे नाट्य पूरी तरह दृश्य और शव्प नने हो पायगा। बड़े मण्डप मे पाठ्य के स्वर उच्चरित होन पर वे भीतर मूजेंगे और अत्यधिक विस्वर हो जायेंगे। साथ ही (अभिनेता के) मुख के विभिन्न दृष्टियो से समत्वित भाव भी नाट्यगृह की दीर्घता के कारण अत्यत अस्पष्ट दिखाई देंगे। इसनिये सारे प्रेक्षागृहो मे मध्यम सबसे उपयुक्त माना गया है, उसमे पाठ्य और गेव अपकाकृत अधिक अ्रब्ध होता है (६१०]। १ मूल मे 'हस्तदण्डसमाधयम्' पाठ है, जिमका आधुनिक विद्वानों ने अर्थ हस्त नापने का डड्धा-यह अर्थ भी किया है। अभिनव के अनुमार हस्त और दड- दोनी यहाँ नाप के आघार है। चार हाथ का एक दड़ होता है। विकृष्ट, चतुरथ तथा व्यक्ष इन तीन प्रकार के नाटयमडपो की नाप उ्देष्ठ, मध्य या अवर को दृष्टि से रखने पर नो प्रकार वे नाटयमटय बनते हैं और नाप हम्त से ली जाय या दड से-इस आधार पर कुल अठारह प्रकार के नाटयमडप होते हैं। हम्त और दड के मानक पैमाने होते थे। नाशा० (२१४१६) मे इनका प्रमाण बताया गया हे-आठ अणु=एक रज, आठ रज-बाल, बठ बाल एक लिक्षा, आठ लिक्षा=एक मूका, साठ यूका=एक यव आठ य्रवएक अगुल, चोबीस अगुल=एक हस्त, नार हस्त=एक दड। २ प्रकृति= नाटक के पात्। अन्य प्रकृतियाँ असुर, राक्षस आदि।

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१४ / सङक्षिप्तनाट्यशास्त्रम् भूमेविभाग पूर्व' तु परीक्षेत प्रयोजक:। ततो वास्तुप्रमाणेन प्रारभेत शुभेच्छया॥। ११॥ समा स्थिरा तु कठिना कृष्णा गोरी च या भवेद्। भूमिस्तत्रेव कर्तव्य. फतृ मिर्नाट्यमण्डपः ॥ १२॥ प्रथमं शोधनं कृत्वा लाङ्गलेन समुत्कृषेत्। अस्थिकीलकपालानि तृणगुल्माश्च शोधयेत्॥ १३॥ शोर्घायत्वा वसुमतीं प्रमाण निर्दिशेद तत.। पुष्यनक्षत्रयोगेन शुक्लं सूतरं प्रसारयेत्॥१४ ॥ कार्पासं बाल्बज वापि मौज्ज बाल्कलमेव च। सूत्र वुर्धस्तु कर्तव्यं यस्य च्छेदो न विद्यते।। १५॥ शान्तितोयं ततो दत्वा ततः सूत्रं प्रसारयेत्। चतुष्पष्टिकरान् कृत्वा द्विधा कर्यात् पुनश्चतान् ॥ १६ ॥ पृष्ठतो यो भवेद् भागो द्विधामृतस्य तस्य तु। सममर्धविभागेन रङ्शीषं प्रकल्पयेत् ॥१७॥ पश्चिमे च विभागेऽय नेपथ्यगृहमादिशेत्। विभज्य भागान् विधिवद्यथावदतुपूर्वश.॥९८।। एवमुस्थापयेत तज्जञो विधिद्व्टेन कर्मणा। रड गपीठस्य पार्श्वे तु कर्त्त व्य्रा मतवारणी ॥ १६ ॥। चतु स्तम्भसमायुक्ता रड् गपोठप्रमाणतः । अध्यधंहस्तोत्सेधेन कर्तव्या मततवारणी॥२०॥ उत्सेधेन तयोस्तुल्यं कर्तव्य रड् गमण्डपम्। तस्या माल्यं च धूप च गन्धं वस्त्रं तर्थव च ॥।२१।। रड गपीठं ततः कार्य विधिदृष्टेन कर्मणा। रड़ गश्ञीर्यन्तु कर्त्तव्यं पड्दारुकसमन्वितम् ॥ २२॥

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द्वितीयोऽयाय /१४

विकृष्ट मध्य नाट्यमंडप प्रयोजक (नाट्यप्रयोग करने वाला या नाट्यमण्डप बनवाने वाले मण्डप बनवाने के पूर्व) सबसे पहले भूमिखड़ की परोक्षा करे, फिर शुभ इच्छा के साथ वास्तुशास्त्र के प्रमाण (नाप) के अनुसार प्रारभ करे। जो भूमि समतल स्थिर कछोर, कालो या सफेद (मिट्टो वानी) हो उसी पर नाट्यमण्डप बनाना चाहिये। सबसे पहले उस भूमि का सफाई करवा कर उसे हल से जुतवा दे और हडिडयाँ कीले कपाल (खप्पर), तिनके और साडियो को निकलवा दे (१११३)।

इस प्रकार भूमि की सफाई करवा कर उम पर नाप के चिह्न बनवाय जाम। यह कार्य पुष्य नक्षत मे सफेद सूत्' से होगा। यह सूत् कपास, ऊन, मूँज, या किसी वृक्ष की छास से बनायी जानी चाहिये जो (नाप लेते समय कही से) दटता न हो (१४-१५) फिर शातिबल छिडक कर नापने के लिये डोरी को फँलाया जाय। (पहले सबाई मे चौसठ हाथ नाप ले फिर उन्ह दो भागो मे बाँटे। (इन दो भागो मे) जो विछना भाग है उमके भी दो भाग करके आये म रह्शीष और उसके पिछने मे नेपध्यपृह की रचना होगी। इस प्रकार विधिवत् बताये गये क्रम से उस भूमि को इन भागो मे बाँट कर नीव उठाने का काम प्रारभ किया जाय। रङपीठ के दानो पापतों में रङ्गपीक के नाथ के अनुसार चार स्तभो से युक्त डेढ हाथ की ऊँचाई वाली दो मत्तवारगिया बनाई जायं। रहमण्डर या प्रक्षामार (के भूमितल) की ऊँषाई उन दोनो मलवारगियो के अनुसार रखी जाय। फिर विधिपूर्वक रङरठबनाया जाय और रङ्गशीप को पडदारुकरे से सुमज्जिन किया जाय (१६२२)।

1 सूत्र नापने की डोरी है। इसे साय मे रखने के कारण नाटयप्रयोक्ता को सूक्ष- धार कहा गया। सूत्रधार भवननिर्माण या वास्तुविद्या से जुड़े हुए लोग थे। वैदिक काल मे यज्ञवेदी बनाने के लिये इहे बुलाया जाता था। २ मतवारणी रगपीठ के दोनो ओर चार खभो से घिरा हुआ चबूनरा है। प्रतीक्षा करसे पातो या रगमच पर अलग-अलग समूहा मे खडे पाती को दिखाने के लिये मतवारणियो का उपयोग होता होगा। ३ पडदारुक-लकटी के छ टुकड। अभि० के अनुसार नेपथ्यगृह और रगशीर्ष के बीच की दीवार से लगे दो खभे माठ हस्त के अतर पर रहते हैं उनके सामने चार हस्त की दूरी पर दो स्तभ और बनाये जाते हैं। उनके ऊनर और नीमे काष्ठ के टुकड़े लगाये जाते हैं वे पडदारुक हैं। बा: ला० शु० के अनुसार लकडी के दो आडे, दो खड़े और दो तिरछे टुकडे लगा कर बनाया गया चौखट पड्दारुक है।

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१६ / मडक्षिप्तनाटयशास्त्रम्

कार्य द्वारदवय चात्र नेपथ्यगृहकस्य तु। पुरणे मृत्िका चात्र कृत्दना देया प्रयत्नतः ॥ २२॥ लाइगलेन समुत्कृप्य निर्लोष्टतृणशर्करम्। लाडगले शद्धवर्णों तु धुर्यो योज्यौं प्रयत्नत ॥ २३॥

एवविध प्रकर्तव्य रड्गशीर्य प्रयत्नत। कूर्मपृष्ठ न कर्तव्य मत्स्यपृष्ठ तर्थव च।। २४ ।।

शुद्धादर्शतलाकार रड्गशीर्ष प्रशस्थते। एव रडगशिर कृत्वा दारुकर्म प्रयोजयेत् ॥२५॥

ऊहप्रत्यूहसयुवरत नानाशित्पप्रयोजितम्। नानासञ्जवनोपेत बहुव्यालोपशोमितम् ॥ २६॥

ससालभञ्जिकाभिश्च ममन्तात् समलडकृतम्। निव्धू हकुहुरोपेत नाना ग्रथितव विकम् ॥ २७॥

नानावित्याससयुवत चितरजालगवाक्षकम्। सुपोठधारिणोयुक्त कपोतालोसमाकुलम्॥ २८॥

नानाकद्टिमविन्यस्लै स्तम्भरचाप्युपशोभितम्। एव काष्ठविधि कृत्वा भित्तिकर्म प्रयोजयेत् ॥ २६॥ स्तम्भ वा नागदन्त वा वातायनमथापि वा। कोण वा सप्रतिद्वारवा द्वार्रवद्ध न कारपेत ॥ ३० ॥

कार्य: सैलगुहाकारो द्विभूमिर्नाट्यमण्डप। मन्दवातायनोपेतो निर्वातो धोरशब्दवान्॥ ३१॥

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द्वितीयो याय /१७

रङ्भणीर्प और नेपय्यरृह के बीच की दीवार मे (उत्तर और दक्षिण दिशा में) दो द्वार बनाने चाहिये। इस रङ्शीय की भराई' प्रयत्न पूर्वक काली मिट्टी से करनी चाहिये। इम मिट्ठी के लिये भूमि को हल से जोत कर ढेने, तिनने और पत्थर हुटा देना चाहिये। हल मे सफेद रग के अच्छे बैल जोतने चाहिये। इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक रङ्गपोठ बनाना चाहिये। इसका फर्श न तो कूर्मपृष्ठ (आसपास नीचा बीच मे ऊँचा) हो, न मत्स्यपृष्ठ (कीच मे नीचे झुका व लबा) हो। रङशीषं स्वच्छ दर्पण के तल जं तप (समतन ही) अच्छा माना जाता है। इस प्रवार रङ्गशीष वन जाने पर लकडी का काम करना चाहिये। इसमे ऊह, प्रत्यूद के साथ विभिन्न प्रकार वे शिल्प वा प्रयोग होता है, यह विभिन्न सन्जवनो से युक्त तथा कई व्यालो से सुशोभित होता है। यह सालभज्जिकाओ से भी चारो ओर से अलकन होता है। यह निध्युह और बुह्र" से युक्त तथा नाता प्रकार को वैदिवाओ से प्रथित हो। इममे विभिन्न प्रकार की रघनाएँ रहना चाहिये तथा खिडवियो और झरोखो की भी रचना सुन्दर होनी चाहिये । स्तम्भो के ऊपर सुन्दर पीठधारिणिया तथा क्पोताली बनाना चाहिये। (रह्जपीठ, रङ्शीष और मतवारणी के फर्श पर भी लकडी जडता चाहिये तथा स्तम्भो की सजावट करनी चाहिये। इस प्रकार लकडी का काम करके दीवार उठाने का काम करना चाहिये। इसमे स्तम्भ, खू्टियाँ और झरोखे या कोने किसी दरवाजे के सामने न आये तथा एक दरबाजे के सामने दूसरा दरवाजा नहीं बाना चाहिये। नाट्यमण्डप पर्वत की गुफा के आकार का द्विभूमि होना चाहिये। सरोखे और खिडकियो से हवा धीमी ही आये, तेज हवा न आ सके तथा आवाज गभीर रूप मे सुनाई दे-ऐसी व्यवस्था नाट्यमण्डप मे की जानी चाहिये (२२-३१)। १ विदृष्ट मध्य मे रमशीर्ष रगपीठ में डेढ हम्त ऊँचा होता है। मनवारणी और प्रेक्षागृह मे सीढियों के आकार में आमन व्यवस्था करने पर उसका पर्श भी रगशीर्ष की ऊँभाई के बराबर आ जाता है। ऊंचाई के कारण काली मिट्टी से भरने का विधान किया गया है। २-३. स्तभ के ऊपर निकाला गया काष्ठ प्रत्यूह है। उसके बाहर निकली तुलाएँ सजवन-फलक है (अभि०)। ४-५ सतभो या दीवारो पर बनो मिंह, व्याल आदि की आकृतियाँ निर्व्यूह हैं तथा उपर्युक्त तुलाओ के छोरी से निकले फलक जिनमे पर्वत, पुर, निर्कुंज या गहर बने हो कुहर है। ६ पीठघारिणी स्तभ के ऊपर बनी तुला है। ७ कृपोताली - मिजरे के आकार की छतरी। 5. रगशीप मतवारणी और प्रेक्षापृह-तीनो की ऊँचाई रगपीठ से अधिक होने से द्विभूमि (जिसका फर्श दी तल वासा हो) कहा गया है।

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गम्भीरस्वरता येन कृतपस्य भविष्पति। भित्तिकर्म विधि कृत्वा भित्तिलेप प्रदापयेव् ।। ३२॥ सुधाकर्म बहिस्तस्य विद्यातव्यं प्रयत्नतः । भित्तिष्वथ विलिप्तासु परिमृष्टासु सर्वतः ॥ ३३ ॥

समासु जातशोभासु चित्रकर्म प्रयोजयेत्। चित्रकर्मण चालेख्याः पुरुपाः स्त्रीजनास्तथा ।। ३४।। लताबन्धाश्च कर्त्तव्याश्चरितं चात्मभोगजम्। एवं विकृष्ठं कर्तव्यं नाट्यवेश्मप्रयोवतृभिः ॥ ३५॥

पुनरेव हि वक्ष्यामि चतुरश्रस्य लक्षणम्। समन्ततशच कर्तव्या हस्ता दान्रिशदेव तु॥ ३६ ॥

शभभूमिविभागस्थो नाट्यज्ञैर्नाट्यमण्डपः । यो विधि: पूर्व मुक्तस्तु लक्षण मड गलानि चं ॥ ३७ ॥ विकृष्टे ताव्यगेपाणि चतुरक्षडपि कारयेत। चतुरश् सम कृत्वा सूत्रण प्रविभज्य च॥ ३८ ॥ बाह्यत सर्वतः कार्या भित्ति: श्लिष्टेष्टका दृढ़ा। तन्नाध्यन्तरत कार्या रड गपीठपरि स्थिताः ॥३६॥ दश प्रयोवतुमि: स्तम्भा: शक्ता मण्डपधारणे। स्तम्भानां बाह्यतरचापि सोपानाकृतिपोठकम् ॥ ४० ॥ इप्टकादारुभि: कार्यँ प्रेक्षकार्णा निव शनस्। हस्तप्रमाणैरुत्सेधरमू मिलागसमुत्यित: रड गपीठवलोक्यं तु कुर्यादासनजं विधिस्। षडव्यानन्तरे चँव पुनः स्तम्भात् ययादिशम् ॥ ४२॥

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इससे कुतप (गायक तथा वाद्यवृद) का स्वर भी नाट्पमण्डप में गभीर रूप मे सुनाई पडगा। इस प्रकार दीवारें उठा कर उन पर भित्िलेप१ कराया जाय, फिर उसके ऊपर प्रयत्नपूर्वक चूने की पुताई कराई जाय। दीवारो पर लेप और पुताई हो चुकने पर जब दे समतल और सुन्दर दिखने लर्गे, तो उन पर चित्न बनवाये जायें। इन चित्रो मे स्त्ी, पुरुष, लताबन्ध* या अपने अनुभव से मिले चरितो का चित्रण किया जाना चाहिये। इस प्रकार प्रयोक्ताओों को विकृष्ट नाट्यगृह बनाना चाहिये (३२ ३५)।

अब मै चतुरश्र नाट्यगृह का लक्षण बताता हूँ। नाटय के जानकार लोगो को शुद्ध भूमि पर विभाग पूर्वक स्थित चतुरक्ष नाटयगृह चारो भुजाओ मे बत्तीस हाथ की नाप ले कर बनाना चाहिये। विकृष्ट नाटयगह मे जो विधि, लक्षण और माग- लिक विधान बताये गये हैं, वे सब चतुस्श्र मे भी कराये। इस चतुरश नाटयगृह की भूमि का (पूर्वोक्त प्रकार से) डोरी से समान विभाजन करके बाहर से चारो ओर से अच्छी तरह इंटे जमा कर मजबूत दीवार बनाई जाय। भीतर रङ्गपीठ क ऊपर मण्डप का धारण कर सके ऐसे दस स्तम्भ खडे करना चाहिये। इन स्तम्भो के आगे प्रेक्षको के बँठने के लिये इंट औोर लकडी से सीढियो के आकार की आसन पक्तिय बनानी चाहिये। ये पक्ियाँ भूमितल से एक एक हस्त की नाप से अपर उठती हुई होगी। आसनो की यह व्यवस्था ऐसी हो कि सबको रगपीठ अच्छी तरह दिखाई दे। प्रेक्षागार मे प्रत्येक दिशा के अमुसार ज्ञाता शिल्पी विधिपूर्वक छह स्तम्भ और स्थापित करे।

१ भित्तिलेप=पलस्तर। इसे बनाने की विधियाँ वास्तुशास्त्र के प्राचीन ग्रथो मे दो हुई है। २ लताबध=वृक्षो से लिपटी तताओं की आकृतियाँ अथवा पिडीबध (तृत्य समूह) के चिन्न।

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विधिना स्थापयेत् तज्ज्ञो दृढान मण्डपधारणे। अष्टोस्तम्भान पुनश्चंब तेषामुर्पर कल्पयेत । ४३ ॥ स्था्यं चैव ततः पीठमष्टहस्तप्रमाणतः । विद्धास्यमा्टहस्तं च पीठं तेप ततो न्यसेत्॥ ४४ ॥ तत्र स्तम्भा: प्रदातव्यास्तज्जमैण्डपधारणे। धारणीधारणास्ते च शालस्त्रीभिर्लड कृताः ॥ ४५॥ नेपथ्यगृहकं चंव ततः कार्य प्रयत्नतः । द्वारं चैकं भवेत तत्र रड़ गवीउप्रवेशनम् ॥४६॥ जनप्रवेशन चान्यदाभिमुख्येन कारयेद्। रह गस्याभिमुखं कार्य द्वितीयं द्वारमेव तु॥ ४७॥ अष्टहस्तं वु कर्तव्यं रहगपीठं प्रमाणतः । चतुरश्रं समतलं वेदिकासमलड कृतम् ॥४८ ॥ पूर्वप्रमाण निर्दिष्टा कर्तव्या मत्तबारणी। चतु.स्तम्भसमायुक्ता वेदिकायास्तु पाश्वंत. ।।४६ ।। समुन्नतं समं चंद रड मशीर्ष तु कारयेद। विकृष्टे तून्नतं कार्य चतुरथ समं तथा॥ ५०॥ एवमेतेन विधिना चतुरश्र गृहं भवेंद। अतः परं प्रवक्ष्यामि त्यश्रगेहस्य लक्षणम्। ५१॥ सपश्रं त्रिकोणं कर्तव्यं नाटयवेश्म प्रयोकतृभिः । मध्ये त्रिकोणमेवास्य रडगपीठ तु कारयेव। ५२ ॥ द्वारं तेनैव कोणेन फर्तव्य तस्य वेशमनः । द्वितीय चंव कतंब्य रड्गपोउस्थ पृष्ठतः ॥ ५३॥ भित्िस्तम्भस्षमाश्रयः । स तु सर्वः प्रयोक्तव्यस्तयश्रस्यापि प्रयोवतृभिः । एवमेतेन विधिना कार्या नाट्यगृहा बुघः ॥५४॥

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द्वितीयोऽध्याय /२१

ये स्सम्भ मण्डप को धारण करने मे समर्थ ही। उनके ऊपर फिर आठ स्तम्भ और बनाये।" इनके ऊपर बिधे मुख वाले माठ हस्त की नाप का पीठ (गहतीर) रखे जायें। ये स्तम्भ मण्डप को धारण करने मे समर्थ हो तथा धारणी को भी सँभालें और सालभजिकाओ से भी अलंकृत हो (३६-४५)। इमके पश्चाद प्रयत्न- पूर्वक नेपथ्यगृह बनाया जाय, उसमे रङ्गपीठ पर प्रवेश कराने वाले दो द्वार हो। दर्श कने का प्रवेश इसके सम्मुख बने दूसरे द्वार से कराये। रङ्गपीठ़ के सामने के दोनो द्वार रङ्गपीठ की ओर ही खुलने चाहिये४ (४६-४७) रङ्गपीठ का नाप आाठ हाथ रखना चाहिये, जो चारो ओर से बराबर हो। रङ्गपीठ को वेदिका से सुशोभित किया जाय। वेदिका के दोनो ओर चार स्तम्भो से युक्त मत्तवारणी बनानी चाहिये, जिसका नाप पहले बताया जा चुका है (४८-४६)। विकृष्ट नाट्यगृह मे रङ्गशीर्ष रङ्मपीठ से (डेढ हाथ) ऊँचा तथा समतल बनाये, जबकि चतुरश् में रङ्ग्शीर्प और रङ्गपीठ एक ही तल पर रहते हैं (५०)। इस विधि से चतुरशर गृह बनता है। अब मैं ल्यश्न नाट्यगृह का लक्षण बताता हूं। न्यम नाट्भगृह प्रयोक्ताओ को विकोणाकार बनाना चाहिये इसके ब्रीच मे त्िकोणाकार ही रङपीठ बनाया जाय। (५१, ५२)। न्यश्र नाट्यपृह मे (प्रेक्षको के लिये) प्रवेश-द्वार उसी एक कोने पर बनाना चाहिये तथा दूसरा द्वार रद्टपीठ के पीछे (अभिनेताओ के प्रवेश के लिय) बनाना चाहिये। दीवार और स्तम्भ के विषय मे चतुरश नाट्यगृह मे जो विधि बतायी गमी है, वह सारी प्रयोवताओ को त्पश्र मे भी प्रयोग करनी चाहिये। इस प्रकार जानकार सोगी को नाट्यगरह बनाने चाहिये (५३-५४)।

१ रगपीठ के दाहिनी और दो स्तभ रहेंगे, उनसे चार-चार हाथ की दूरी पर तथा परस्पर आठ हाथ की दूरी पर दो स्तंभ और रहेगे। फिर आग्नेय कोण में बने स्तभ से चार हाथ दूर दक्षिण स्तम रहेगा। इस प्रकार रगमच पर पहले से दाहिनी औोर बने स्तभो तथा दक्षिण की दीवार के बीच तोन और स्तभ प्रेक्षागृह मे हो जायेगे। इसी प्रकार उत्तर की दीवार की ओर भी तीन स्तभ बनेगे। इस प्रकार प्रेक्षागार मे छ स्तम रगमन्न के स्तभों के अतिरिक्त हुए। अब चारो दिशाओ की दीवारो से उनकी विपरीत दिशाओ मे दो-दो स्तंभ और बनाने पर आठ स्तभ और बढ़ जायेगे। २ घारणी =शहतीर (बा० णु० शा०)। ३ साल भजिका=काष्ठ पुतलिका, लकडी की नारी मूर्ति। ४ एक द्वार सबसे पीछे अभिनेताओर के प्रवेश के लिये जो नेपभ्यग्ृह मे खुलता है, दो द्वार नेपय्यगृह और रगशीष के बीच की दीवार मे मच पर प्रवेश के लिये तथा एक सामने का द्वार प्रेक्षको के प्रेक्षागार मे प्रवेश के लिए इस प्रकार चार द्वार नाट्यगृह मे हुए।

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॥ अथ तृतीयोऽध्यायः ॥

आचार्येण तु युवतेन शुचिता दीक्षितेन च। रङगस्योद्योतनं कार्य देवताना च पूजनम्॥१॥ रकता: प्रतिसरा: सूत्र रकतगन्घाश्च पूजिताः । रवताः सुमनसश्चंव वच्च रवतं फलं भवेते ॥ २॥ शालितण्डल: । नागपुष्पस्थ चुर्णेन वितुषाभिः प्रियङ गुभिः ॥। ३ ।। एतंर्द्रव्यर्मुतं कुर्याद् देवताना निवेशनम्। आलिखेन्मण्डल पूर्वं यथास्थानं यर्थाविधि॥४॥ समन्ततश्च कर्तव्यं हस्ता पोडश मण्डलम्। द्वाराणि चात्र कर्वीत विधानेन चतुर्दिशम् ॥ ५॥ मध्ये चंवात्र कर्राव्ये द्व रेखे तियगूध्वगे। ततो कक्ष्या विभागेन दवतानि निवेशयेत ॥६॥ पूजयित्वा तु सर्वाणि दैवतानि यथाक्रमम्। जर्जरस्त्वभिसम्पूज्य. स्यात् ततो विघ्नजर्जरः ।। ७।। श्वेतं सिरसि वस्त्र स्यान्नीलं रौद्रे च पर्वणि। विष्णपर्वण वे पीतं रक्तं स्कन्दस्य पर्वण॥ ॥ मृडपर्वणि चित्र त् देयं वस्त हितायिना। सद्शं व ग्रदातव्यं धूपसाल्यानुलेपनम्॥ र्दै॥

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। तृतीय अध्याय ।।

[इस प्रकार नाट्यपृह बन चुकने के बाद] एकाप्र मन वाले, पषित्र और व्रत मे दीक्षित नाट्याचार्ये की नाट्यगृह का उद्योतन (प्रकाशित करना) तथा देवताओ का पूजन करना चाहिये। (पूजन के लिये) लालरग के धामे (आँटी) से बने ककण, सुतर, लाल रग का उत्कृष्ट चदन, लाल पुष्प तथा जो भी लाल फल हो उसे ले। जो, सरसो, खीलें, अक्षत चावल, नागपुष्प का चूर्ण तथा छिलके निकले हुए प्रियगु के फन-इन द्रव्यों के साथ देवताओ की स्थापना करे। इसके पूर्व वथास्थान यथा- विधि मण्डल बना ले। मण्डल का चारो ओर का नाप (चार-चार हाथ मिला कर) कुल सोलह हाथ होता है। इसमे विधानपूर्वक चारो दिशाओ मे (चार) द्वार बमाने चाहिये। इसके बीच मे दो रेखाएं आडी तिरछी बनानी चाहिये, इनके साथ ही कक्ष्याविभागपूर्वक देवताओ को मडल मे स्थापित करे (१-६)।

क्रम के अनुमार सारे देवताओ की पूजा कर के जर्जर की पूजा करनी चाहिये, जिससे वह बिन्नो को जर्जर करने वाला बन जाय। इस जर्जर के सिर पर श्वेत वस्त बाना चाहिये। रुद्र के पर्व ९ पर नीला विष्णु के पर्ष पर पीला तथा स्कन्द के पर्वे पर लाल और मृड (शिव) के पर्व पर हित चाहने वाले प्रयोत्ता को चिन्र (रगबिरण) वस्त बाधना चाहिये। इसके अनुरूप ही धूप, माला और चदन भी प्रस्तुत करना चाहिये (७ ६) ।

१ उद्योतन दीपिकाआ या दीपको से किया जाता था। अभि० ने मशालो का यहाँ उल्लेख किया है। भरत ने भी रगपूजा के सदर्भ मे दीप्ष उल्काओ से रगशाला को जगमगाने का उल्लेख किया है (स० नाशा० ३-१२)। २ पर्वंपोर या गांठ।

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२४ सदसिप्तनाट्पशाससम् आतोद्यानि च सर्वाणि वासोभिरवगृण्ठयेत्। गन्धेमा ल्यरच धूर्परच भक्ष्यभोज्यंरच पूजयेत् ॥ १० ॥ सर्वमेवं विधि कृत्वा गन्धमाल्यानुलेपनेः । विध्नजर्जरणार्थ तु जजरं त्वभिमन्त्रयेत् ।। ११ ॥ हुताश एव दीप्ताभिरुल्काभि: परिमार्जनम्। नृपतेनॅरतकीनां च कु्याद् दीप्त्पभिवर्ध्नम् ॥ १२॥ अभिद्योत्य सहातोद्यनृर्ात नर्तकीस्तथा। मन्त्रपुतेन तोयेन पुनरभ्युक्ष्य तान् वदेत् ।१३॥ महाकुल प्रसूता: स्थ गुणौघंश्चाप्यलड कृताः। यद् वो जन्मगुणोपेत तद् वो भवतृ नित्यराः ॥१४ ॥ मिन्ने कुम्मे ततश्चंव नाट्याचार्यः प्रयत्नतः । प्रगृह्य दीषिकां दीप्ता सर्व रडगं प्रदीपयेत् ॥१५॥ यज्ञ न सम्मितं ह्यत्तव् रड गदवतपूजनम्। अपूजयित्या रडगंतु नँव श्रेक्षां प्रशोजयेत् ॥१६॥ न तथा प्रदहत्यग्निः प्रभञ्जन समोरितः । यथा ह्यापप्रयोगस्तु प्रयुक्तो दहतति क्षणात् ॥ १७॥

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तृतीयोउध्याय, /२५

सारे वाद्यो को कपडे से ढक कर रखे तथा गन्ध, माला, धूप और भक्ष्य भोज्य से उनकी पूजा करे। इस प्रकार गन्ध, माला औ र चदन से मह सारी विधि निपटा कर विध्नो को जर्जर करने के लिये जर्जर को अभिम तित करे (१०-११)।

(हवन के लिये जलाई गयी) अग्नि से ही प्रदीप्ष मशालो के द्वारा राजा तथा नर्तकियो की दीप्ति के अभिवर्धन के लिये नीराजना करे। इस प्रकार राजा और नर्तकियों को बाद्यो के साथ अभिद्योतित करके मन से पर्वित जल से प्रोक्षण करके उनसे कहे-आप लोग महान् कुल मे उत्पत्न है तथा गुणो के समुदाय से अलकृत है। आपको अपने जन्म और गुण हे अनुरूप जो प्राप्त हुआ है, वह आपको नित्य सुलभ रहे (१२-१४)। घडे का भेदन कर नाटुयाचार्य प्रमत्नपूर्वक प्रदीप्त दीपिका से सारे रङ्गमण्टप को प्रकाशित करे। रङ्ग के देवताओ का यह पूजन पज्ञ के समान है। रङ्ग की पूजा किये बिना प्रयोग न करे। तेज हवा से भडकी अग्नि भी उस तरह नही जलती जिस तरह क्षण भर मे गलत प्रयोग जला डालता है (१x-१७)।

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। अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥

ततोडस्म्युक्तो भगवता योजयामृतमन्थनम्। एतडुतसाहजननं सुरप्रीतिकरं तथा ॥ १ ॥ योऽय समकारस्तु धर्मकामार्थसाधक: । मया प्राग्ग्रथितो विद्वन् स प्रयोग. प्रयुज्यताम् ॥ २॥ तस्मिन् समवकारे तु प्रमुक्ते देवदानवाः। हृष्टा: समभवन् सर्वे कर्मभावानुदर्शनात्॥ ३॥ कस्यचित् त्वथ कालस्य मामाहाम्बुजसम्भवः । नाट्य सन्दर्सयामोऽय त्रिनेत्राय महात्मने।४॥ तत. सारधं सुरर्गत्वा वृपभाङ्गनिवेशनम्। समभ्यर्च्य शिव पश्चादुवाचेद्ं पितामहः॥५॥ मया समवकारस्तु योऽ्य सृष्ट सुरोत्तम। श्रवणे दशने चास्य प्रसादं कर्तुमहंसि॥६॥ ततो हिमवत पृष्ठे नानानगसमाकुले। बहुमूतगणाकीणे रम्यकन्दरनिझरे ॥७॥। पूर्वरडगः कृत. पूर्व तत्राय द्विजसत्तमाः । तथा त्रिपुरदाहश्च डिमसजः प्रयोजितः ॥८॥ ततो भतगणा हृप्टा कर्मभावातुदर्शनात्। महादेवश्च सुप्रीतः पितामहमथाव्रवीत्॥ दै॥ मयापीदं स्मृतं नृत्यं सन्ध्याकालेषु नृत्यता। नानाकरणसयुक्तैरड गहारविभ् षितम् 1 पूर्वरड् गविधावस्मिस्त्वया सम्यक् प्रपोज्यताम्॥ १०॥

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॥ चतृर्थ अध्याय ।।

तब भगवान् ब्रह्मा ने मुझसे कहा कि अब आप 'अमृतमन्यन' (नामर्क सम- वकार)" का प्रयोग कीजिये। यह उत्साहजनक तथा देवताओ के लिये प्रीतिकर होगा। है विद्वन्, धर्मं, काम और बर्थ का साघक यह जो समवकार मैंने पहले रचा था, उसका प्रथोग अग्प कीजिये (१-२)। उस समकार का प्रयोग होने पर (अपने) कर्म और भाव के अनुदशन से सारे देव और दानव हृष्ट हो उठे (३) । कुछ समय बीत जाने पर पद्मयोनि ब्रह्मा ने मुझसे कहा कि इस नाटय को अब हम महात्मा विनेवधारी शिव को दिखाये। फिर देवताओ के साथ वृपभाड्ू शिव के निवास पर पहुँच कर उनका पूजन कर पितामह ने कहा-हे मुरोत्तम यह जो मैंने समबकार रचा है उसे देखने और सुनने को कृपा कीजिये (४-६)। हे द्विग श्रेष्ठो, तब विभिन्न वृक्षो से घिरे हिमालय के मैदान मे जो कई प्रकार के प्राणिषो से भरा हुआ था और गम्य गुफाओ और झरनो से युक्त था मैंने पहने यह पूर्वरदद२ करके फिर इस (अमृतमन्थन समवकार) का प्रयोग किया फिर व्रिपुरदाह नामक डिमने का प्रशोग किया (७८)। तब सारे भूनगण कर्म और भाव के अनुदर्शन से हुर्षित हुए ओर महादेव ने भी प्रसन्न होकर पितामह से कहा-सध्या के समय नृत्य करते हुए मैंने विभिन्न करणो के योग से बने अबहारो से विभूषित तृत्य का निर्माण किया है, इस नाटय की पूर्वेरग विधि मे आप उसे जोड़ लीजिये (2-१०)।

१ समवकार रूपक के दस भेदो मे एक है। इसके लक्षण के लिये देखिये सt नाशा०(१० २४-३०)। २ डिम के लक्षण के लिये स० नाशा० (१७ ३५-३६)। ३ पूर्वरम के विधान का निरूपण आगे पाचवें अध्याय मे है। ४ अगहार के लक्षण के लिे स० नाशा० (४.१३-१८) देखें।

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वर्धमानकयोगेषु गीतेष्वासारितेषु च। महागीतेषु चवार्थान् सम्यगेवाभिनेष्यसि॥११॥ वश्चायं पर्वरड गस्तु त्वया शुद्धः प्रयोजितः। एभिविमिश्ितरचाय चित्रो नाम भविष्यति ॥ १२॥ ततो ये तण्डुना प्रोक्तास्त्वड गहारा महात्मना। तान् व करणसयुक्तान् व्याखयास्यामि सरेचकान् ॥ १३॥ अड गहारेषु वक्ष्यामि करणेषु च वै दविजा । सर्वेषामड़ महाराणां निष्पलिः करणैर्यतः ।।१४।। तान्यत सम्प्रवक्ष्यामि नामतः कर्मतस्तथा। हस्तपादसमायोगो नृत्यस्य करणं भवेत् ॥ १५॥ हूं नृत्तकरणे चैव भवतो नृत्तमातृका। द्वाभ्यां विभिश्चतुर्भिवाप्यड गहारस्तु मातृभिः ॥१६॥ त्रिभि: कलापक चैव चतुभि. खण्डक भवेत्। पञ्चं करणानि स्युः सङ्वातक इति स्मृतः ॥१७॥ पड्मिर्वा सप्तभिवा पि अष्टभिर्नवभिस्तया। करणैरिह संय्ुक्ता अड महारा प्रकीतिताः ॥१८॥। अष्ठोत्तरशत ह्येतत् करणानां मयोदितम्। यत्र तत्रावि सयोज्यमाचारयनाट्यशक्तितः ॥१६ ॥ प्रायेण करणे कार्यो वामो वक्षःस्थितः करः । चरणस्थानुगश्धापि दक्षिणस्तु भवेत् कर ॥ २० ॥ कटी कर्णसभा यत्र कोर्परासशिरस्तथा। समुन्नतमुरश्चंव सौष्ठवं नाम तद् भवेत् ॥ २१॥ वामे पुप्पपुटः पार्श्वे पादोऽग्रतलसश्चरः। तथा च सन्नतं पार्श्व तलपुष्टपुटं भवेत् ॥ २२ ॥

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चतुर्थोऽ्याप /२६

वर्घमानक के योग, गीत तथा आसारित और महागीत के प्रयोगों में (इस पूर्वरड्ग के) अर्थों का भली-भाँति अभिनय (प्रयोग) करोगे। यह जो पूर्वरग तुमने अभी किया है, यह शुद्ध पूर्वरग है। इन (करणो तथा अगहारो) के मिश्रण से यह चित्र पूर्वरग कहलायेगा (११, १२)। (भरत ने कहा-हे मुर्नियो) तब (शिव की आाज्ञा से) महात्मा तण्डु ने भुझे जो अङ्गहार बताये करण और रेचक के साथ मैं उनका आपके आगे विवेचन दरूगा। हे द्विजी मैं अगहारो और करणो-दोनो के विषय में विवेचन करूगा, क्योकि सभी अङ्भहारो की निष्पत्ति करणो से हुई है। उन्हे मैं नाम और कर्म द्वारा विस्तार से समझाऊँगा। नृत्य मे हुस्त और पाद का समायोग (एक साथ सचालन) करण है। दो करणो के योग से एक 'मातृका' होती है, तथा दो, तौन या चार मातृकाओ के योग से अगहार। तोन कदणो से एक 'कलापक', चार से 'पण्डक' तथा पाँच करणो के मिलने से सहातक बनता है। छ सात, आठ, या नो करणो को मिलाने से अङ्गहार बनते है (१३-१८)। ये एक सो आठ करण मैंने बताये हैं, इनका सयोजन नाट्य की आवश्यकता के अनुसार वाचार्यों को करना चाहिये (१६) तथा दाहिने हाथ की गति को दाहिने पैर की गति का अनुसरण करना चाहिये (२०)। जिसमे कमर कानो के समान हो तथा कोहनी, कसे और सिर भी समान स्थिति मे हो तथा वक्ष स्थल समुन्नत हो-वह मौष्ठब कहलाता है (२१)। बायें पा्श्वं मे पुप्पपुट हस्त और (दाहिने) पर की अग्रतलसचर४ बना कर पार्श्व सबतै रखा जाय तो तल पुष्पपुट करण होता है (२२)।

१ गीत का एक प्रकार। विवरण आगे पाँचवे अध्याय मे। २ आसारित=सोलह क्लाओ वाली तालविधि। द्व०-नाशा० ३१५५-६। ३ पुष्पपुटहस्त के लिये देखें नाशा० ६.१५० तथा स० नाशी०६७०। ४ अग्रतलसचर पाद के लिये देखें नाशा ६२७३, इसमे ऐडी उही, अंगुठा फेला तथा अंगुलियाँ तिरछी रहती हैं। ५ सनत=झुका हुआ। ससत पार्श्व का लक्षण नाशा० ६२३५ मे है।

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कुश्रिती मणिबन्ध तु व्यावृश्तपरि्वतितो। हस्ती निपतितौ चोर्बोवंतितं करणं तु तत् ॥२३॥ शुकतुण्डौ यदा हस्तौ व्यावृत्तपरिवतितो। ऊरू च वलितौ यस्मिन् वलितोरुकमुच्यते ॥ २४॥ आवत्यं शुकतुण्डाख्यमूरपृष्ठे निपातयेत्। वामहुस्तश्च वक्षःस्थोऽ्यपविद्धं तु तद् भवेद् ॥ २५ ॥

श्लिष्टो समनखौ पादौ करौ चापि प्रलम्बितौ। देहः स्वाभाबिको यत्र भ्वेत् समनखं तु तत् ॥ २६॥ पताकासल वक्षःस्थं प्रसारितशिरोधरम्। निहञ्चितासकूटं च तल्लीन करण स्मृतम् ॥२७ ॥ स्वस्तिकौ रेचिताबिद्धौ विश्लिष्टौ कटिसंस्थितौ। यत्र तत् करणं ज्ञेयं बुधेः स्वस्तिकरेचितम् ॥ २८॥ स्वस्तिकौ तु करौ कृत्वा प्राड मुखोध्वंतलौ समौं। तथा च मण्डल स्थानं मण्डलस्वस्तिक तु तत्॥२६ ॥ निकुट्हितौ यदा हुस्तौ स्वबाहुशिरसोडन्तरे। पादौ निकुट्टितौ चैव ज्ञय तत् तृ निकुट्ट कम् ॥३०॥ अश्चितौ बाहुशिरसि हस्तस्त्वभिमुखाञ्जलि: । भवेदर्धनिकुट्ट कम् ॥ ३१ ॥ पर्यामश कटिश्छित्ना वाह्नो शिरसि पल्लवी। पुन पुनश्च करणं कटिच्छिन्न तु तद् भवेत् ॥३२॥

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चतुर्ोउध्याय: /३१

कलाई पर कुचितऔर व्यावृत-परिव्तितस हस्त दोनो ऊत्ओ (जाँधो) पर गिराये जाये तो वतित करण होता है। दोनो हाथ शुकतुण्डई की स्थति मे व्यावृत्त-परिवतित करके साथ मे दोनो ऊर वलित हो तो वलितोरुक करण होता है। (२३-२४) शुकतुण्ड हस्त को आवर्तित कर ऊरु के पीछे ले जाकर गिराये और वामहस्त वक्ष स्थल पर हो तो अपवविद्ध करण होता है (२५)। दोनो पैर समनख वाले तथा परस्पर मिले हुए हो तथा दोनो हाथ (लवाहस्त मे) नीचे फैलाये हुए हो तथा देह स्वाभाविक हो, तो समनख करण होता है (२६)। दोनो पताक हुस्त मिलाकर अञजलि (सयुत) हस्त बनाया जाय उसे वक्ष स्थल पर लाया जाय, ग्रीवा रेचित हो, सिर निहच्ित तो 'तीन' करण होता है (२७)। स्वस्तिक हस्त पहले रेचित फिर वक्र कर करके देह की ओर लाये जायें और अलग-अलग (दोनो ओर) कमर पर रखे जाये, तो उसे 'स्वस्तिक रेचित' करण जानना चाहिये (२६)। स्वस्तिक हस्त को ही आगे की ओर नम और उ्डर्व तल (हथेलियाँ ऊपर होने) की स्थिति म और मण्डल स्थान मे देह को रखे तो 'मण्डलस्वस्निक' करण होता है [अभिनव के अनुसार चतुरश्ष' हुस्त अ्ध्वमण्डल मे रखने पर] (२६)। द-यदि अपनी भुजाओ और मस्तक के बोध दोनां हाथ निकु- ट्टक तथा दोनो पर भी निकुट्टक की स्थिति म रखे तो 'निकुट्टक' करण होता है (३०) । १०-इसी स्थिति मे भूजा के अब्र भाग में हाथो को अचित और सम्मुख अघुलि वाना किया जाय और इसमे अलपल्नव का भी जोड़ा जाय तो अर्धनिकुट्टक होता है (३१)। ११-बारी-बारी से कटि को छिन्रा११ स्यति मे और हाथो को मस्तक पर पल्लव की स्थिति मे बार-बार रखा जाय, तो 'कटिच्छिन्' होता है (३२)।

१ कुचित-झुके हुए। २ व्यावृत्त-परिवर्तित-घुमा कर हथेली सामने रखने की मुद्रा। ३ शुकतड के लिये नाशा० ६५३ तथा स० नाशा० ६२३। ४ त्रावतित-द्र०-नाशा० है। ५ अभि० के अनुसार कटकामुख हस्त यहाँ होगा। ६ रेचिता=प्रणाभ की मृद्रा मे झुकी। ७ निकुचित शिर (नाशा० ८३०) के साध कधे निहचित होगे। = चतुरश् हस्त नाशा = १८४ पर परिभाषित है। दै. हयेलियाँ ऊपर करके ऐंद्र मडल (नाशा० ९०६५) बनाने पर। १० अचित का अर्य अभि के अनुसार यहाँ अतपल्लव हस्त बताने से है, शकुक के अनुसार देह के सामने से उठाकर पोछे ले जाने से। ११ छिन्रा कटि (नाशा० ६२४५)) कमर को बीच से घुमाव देने पर बदनी है।

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३२/ सद्क्षिप्तनाट्यशास्त्रम् अपविद्धरर: सूच्या पादर्चव निकुटटितः । सन्नतं यत्र पार्श्वं च तद् भवेद्धरेचितम् ॥३३ ।। स्वस्तिकौ चरणौ यक्र करौ वक्षसि रेचितौ। निकुश्चितं तथा वक्षो वक्षसस्वस्तिकमेव तत् ॥ ३४॥ अश्वितेन तु पादेन रेचितौ तु करौ यदा। उन्मर्त्तं करणं तत् तु विज्ञयं नृत्तकोविदै ॥३५॥ हस्ताभ्यामथ पादाभ्या भवत. स्वस्तिको यदा। तत् स्वस्तिकमिति प्रोक्तं करणं करणारयिभि: ॥३६ । विक्षिप्ताक्षिप्त बाहुम्यां स्वस्तिको चरणौ यदा । अपक्रान्तार्धसूचिभ्यां तत्पृष्ठस्वस्तिकं भवेत् ॥३७ ॥ पार्श्वयोरग्रतश्चंव यसश्लिष्ट. करो भर्वेत्। स्वस्तिकौ हस्तपादाभ्या तद् दिवस्वस्तिकमुच्यते॥ ३॥ अलातं चरणं कृत्वा व्यंसयेद् दक्षिणं करम्। ऊर्थ्वजानुक्रमं कर्यादलातकमिति स्मृतम् ॥ ३६॥ स्वस्तिकापसृतः पाद करौ नाभिकदिस्थितौ। पार्श्वमुद्वाहितं चैव करणं तत् कटीसमम् ॥४० ॥ हुस्तो हुद्ि भरवेद् बामः सव्यश्चाक्षिप्तरेचित रेचितश्वापविद्धशच तत् स्यादाक्षिप्तरेवितम् ॥४१॥ विक्षिप्तं हस्तपादं च तस्यवाक्षेपणं पुनः। यन तत्करणं ज्ञेयं विक्षिप्ताक्षिप्तकं हिजाः ॥ ४२ ॥ स्वस्तिकौ चरणी कृत्वा करिहस्तं च दक्षिणम्। वक्षःस्याने तथा वाममर्धस्वस्तिकमादिशेत्॥४३॥ व्यावृत्तपरिवर्तस्तु स एव तु करो यदा। अश्चितो नासिकाय्र तु तदश्चितमुदाहृतम्॥ ४४ ॥

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चतुर्थोडध्याय /३३

१२-सूचीमुख हुस्त को (कटकामुख दूसरे हस्त से) विद्ध कराया जाय और पैर निकुट्टित हो तथा पार्श्वं सपत हो तो 'अर्धरेचित' होता है (३३)। १३-दोनो पैर सवस्तिक की स्थिति मे तथा दोनो हाथ वक्ष पर हो और वक्ष निकुश्चित तो वक्ष- रस्वस्तिक करण होता है (३४)। १४-यदि अञ्चित पैर के साथ रेचित हस्त हो तो उन्मत करण जानना चाहिये (३५): १५-दोनो हाथ और दोनो पैर स्वस्तिक की मुद्रा मे हो तो स्वस्तिक करण कहा जाता है (३६) । १६-दोनो हाथो के विक्षेप (ऊपर ले जाना) तथा आक्षेप (झटके से नीचे लाना) के साथ परो को अपक्रान्ता और अधंसूची चारियो के साथ स्वस्तिक मे रखा जाय तो पृष्ठस्वस्तिक होता है (३७) । १७-यदि हाथ दोनो पाशवों तथा अप्न भाग मे स्पर्शे कराते हुए हाथो और पैरो को स्वस्तिक की स्थिति मे रखा जाय तो 'दिकस्बस्तिक' होता है (३८)। १८-पर को अलातचारीर की स्थिति मे रखकर दाहिने हाथ को कधे से मागे ले जाये तथा ऊध्वंजानु चारी में करे तो अलातक करण होता है (३६) । १६-स्वस्तिक करण मे पैर को दूर ले जाया जाय, दोनो हाथ नाभि और कटि पर हो तथा पाश्वें उद्वाहित हो तो 'कटीसम' करण होता है (४)। २०-बाया हाथ हृदय पर रखा जाय, और फिर ऊपर और दोनो पाश्वों की ओर पलटा कर ले जाया जाय फिर दोनो हाथ रेचित और अपविद्ध" किये जाय, तो 'आक्षिप्तरेत्रित' होता है (४१) । २१-एक हाथ और एक पैर विक्षिप्त और आक्षिप्त किया जाय तो विक्षिप्ताक्षिप्तक करण होता है (४२)। २२-दोनों पेरों को स्वस्तिक तथा दाहिने हाथ को करिहस्त' की स्थिति मे और बाये हाथ को वक्ष स्थल पर तो 'अर्धस्वस्तिक' होता है (४३) । २३-अघ्यंस्वस्तिक भे करिहस्त की स्थिति मे रखे दाहिने हाथ को हो व्यावृत्त-परिवर्तित किया जाय और नासिका के आगे अख्वितकी स्थिति मे रखा जाय तो 'अञ्चित' करण होता है (४४)। १ निकुचित वक्ष (माशा- ६ २२४ पर लक्षित) आभुग्न वक्ष है जिसमे पीठ ऊँची, वक्ष झुका, कधे शिमिल होते हैं। २ अलाताचारी (नाशा. १०४१) मे एक पैर पीछे फैला कर दूसरे पैर के पीछे छिपाते हैं, ऐडी भूमि से लगी रहती है। ३. ऊर्ध्बजानु चारी (नाशा० १० ३३ मे व्णित) । कुचित पैर को उठा कर घुटना वक्ष के सामने लाते हैं, इसी क्रम से दूसरे पैर से भी सही करते हैं। ४ ऊपर उठा नाशा० ६२३१। ५. अपविद्ध=चक्राकार। अभि० के अनुसार बार्या हाथ ऊपर और दोनो पाश्दों मे ले जाकर हसपक्ष की स्थिति मे फेकते हैं। ६ करिहुस्त नृत्तहुस्तो मे वर्णित नाशा ६१६८-९६६। लताहुस्त को ऊपर उठाया जाथ, फिर एक पार्श्व से दूसरे पाश्वे तक झुलाया जाय, दूसरा हस्त व्रिपताक की स्थिति मे कान के पास रखे तो करि हस्त होता है। ७. द्र०- उपर्यु क्क ४ ३० पर पा० टि० । ३

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कृश्चितं पादमुतिक्षिप्य त्यश्रमूरुतंविव येत्। कटिजानुविवर्ताच्च भुजडगत्रासितं भवेत् ॥ ४५ ॥ कुश्चितं पादमुतिक्षिप्य जानुस्तनसमं न्यसेत्। प्रयोगवशगी हस्तावूर्ध्वजान् प्रकोतितम् ॥४६ ॥ वृश्चिक चरणं कृत्वा करं पारश्वे निकुञ्चयेत्। नासाग्े दक्षिणं चैव ज्ञेयं तत् तु निकुञ्चितम् ॥४७॥ वामदक्षिणपादाभ्या घर्णमानोपसर्पणैः । उर्द्वेष्टितापबिद्धंशच हस्तमत्तल्ल्युदाहृतम् ॥ ४८ ॥ स्खलितापसृतौ पादो वामहस्तरच रेचित। सव्गहस्तः कटिस्थः स्यादर्धमसल्लि तत्स्मृतम् ॥४॥ रेचितो दक्षिणो हस्तः पादः सव्यो निकुट्टितः। दोला चैव भवेद् वामस्तद् रेचिननिकुटटितम् ॥५० ॥ कार्यों नाभितटे हुस्तौ प्राडमुखौ खटकामुखी। सूचीविद्धावपक्रान्तौ पादौ पादार्पविद्धके ॥५१॥ अपविद्धो भवेद्धस्तः सचीपादस्तर्थव च। तथा तिक विवृतं च वलितं नाम तद्मवेत ॥ ५२ ॥ वतिताघूरणित सव्यो हस्तो वामरच दोलितः । स्वस्तिकापसृतः पाद करणं घृणितं तु तद ॥। ५३। करिहस्तो भवेद् वामो दक्षिणरच विर्वाततः। बहुराः फुट्टित. पादो ज्ञयं तल्ललितं बुछः ॥ ५४ ॥ ऊ्ध्वजानुं विधायाथ तस्योपरि ल्ता न्यसेत्। दण्डपक्षं तु तत्प्रोपतं करणं नृत्तवेदिमि: ॥५४ ॥

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चतुर्थो उध्याय /३५

२४-कुज्वित पैर को उठा कर ऊरु को दपश्र स्यिति मे (तिरछा घुमा कर) फंलाया जाय और कटि औौर जमा भी इसी तरह घुमाई जायें तो 'भुजगनासित' होता है (४५)। २५-कुन्चित पैर को उठाते हुए घुटने को स्तन तक ले आये वौर दोनो हाथ प्रयोग की स्थिति मे (ऊर्ध्वमुख अलपल्लव या मराल) रहे तो 'ऊर्ध्वजानु' होता है (४६)। २६-वृश्चिक पैर' बना कर बायें हाथ को पार्श्व में निकुज्यित (झुका, सिकुडा) करे तथा दाहिने हाथ को नासिका के वागे रखे तो 'निकुन्चित' होता है (४७)। २७-बायें और दाहिने पैरो को धुमान दे कर भूमि पर पटका जाय' दोनो हाथ उद्वेष्टित और अपविद्ध गति मे रहे तो 'मतस्लि' करण होता है (४६)। २5-यदि पैरो को र्खलित करण मे पीछे ले जाया जाय तथा बाये हाथ को रेवित किया जाय और दाहिने को कटि पर रखा जाय, तो 'अर्धमतल्लि' होता है (४६)। २६-दाहिना हाथ रेचित और दाहिना पर निकुट्दितर हो तथा बायें हाथ को दोला 8 की स्थिति मे रखा जाय, तो 'रेचित- निकुट्टित' होता है (५०)। ३०-दोनो हाथ नाभि के नीचे उल्टा कर खटका- मुख स्थिति मे रखे जायें, एक पैर को 'सूची' की स्थिति मे दूसरे पर से फेसा कर अपक्रानता चारी की जाय, तो 'पादापविद्वक' होता है (५१)। ३१-एक हाथ अर्पावद्ध और पैर सूची की स्थिति मे तथा तिक (पीठ और नितब) को घुमाया जाय तो 'लिन' होता है (५२)। ३२-दाहिना हाथ व्तित करके घुमाया जाय और बायाँ दोला हुस्त की स्यति मे हो, पैर स्वस्तिक और अपसृत हो, तो घूर्णित करण होता है (५३)। ३३-बाया हाथ करि हृस्त हो तथा दाहिना विवतित, पैर (हाथो का अनुकरण करते हुए) बारवार ऊपर से नीचे पटके जायें तो 'ललित' करण होता है (५४)। ३४-ऊ्ध्वजानु8 नारी करके साथ मे घुटने पर लताहस्त बनाये तो 'दण्डपक्ष' करण बनता है (५५)।

१ आगे बताये गये वृश्चिककरण का पैर। २ एडी को जमीन पर पटकने से। ३ अभि० के अनुसार अ्रमरिकाचारी मे (नाशा० १०४५)। ४ द०-उपयुकत ४-३६ पर पा० दि०।

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भुजड्गत्रासितं कृत्वा यत्रोभावषि रेचितौ। वामपाश्वस्थितौ हस्तौ भुजड्गतरस्तरेचितम्॥ ५६ ॥ त्रिकं सुबलितं कृत्वा लतारेचितकौ करौ। नूपुरश्च तथा पादः करणे तन्तुपुर न्यसेद् ॥ ५७॥। रेचितौ हस्तपादौ च कटोग्रीवा च रेचिता। वैशाखस्यानकेनॅतद् भवेद् वंशाखरेचितम्॥ ५८ ॥ आक्षिप्तः स्वस्तिक: पादः करौ चोद्वेष्टितौ तथा। त्रिकस्य वलनाच्चव ज्ञयं भ्रमरकं तु तत्॥ ५ूर्ड ॥ अश्नितः स्यात्करो वामः सव्यशचतुर एव तु। दक्षिण: कुट्टितः पादशचतुरं तत्प्रकीतितम् ॥ ६० ॥ भुजड्गत्रासितः पादो दक्षिणो रेचितः करः। लतास्यरच करो वामो भुजडगाञ्चितकं भवेद् ॥ ६१॥ विक्षिप्तं हस्तपादं तु समन्तादत्र दण्डवद। रेच्पते तद्धि करणं जयं दण्डकरेचितम्॥ ६२॥ वृश्चिकं चरणं कृत्वा ह्वावव्यय निकटटितौ। विघ्ातव्यो करौ तत् तु ज् यं वृश्चिककुद टितम् ॥६३॥ सूचीं कृत्वापविद्ध च दक्षिणं चरणं न्यसेद। रेचिता व कटियंत्र कटिस्त्रान्तं तदुच्यते । ६४ ।। अञ्चितः पृष्ठतः पादः कुञ्चितो्घ्वतलाड्गुलि:। लताध्यश्च करो वामस्तल्लतावृश्चिकं भवेद ॥ ६५॥ अलपद्मः कटीदेशे छिन्ना पर्मामशः कटो। वैशाखस्थानकेनेह तच्छिन्नं करणं भवेत् ॥ ६६ ॥ वृश्चिकं चरणं कृत्वा स्वस्तिको च करावुमौ। रेचितौ विप्रकीर्णो च करौ वृश्चिकरेचितम्॥६७ ।।

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चतुर्थोऽध्याय /३७

३५-'भुजङ्गव्नासित' करण करके बारयें पार्श्व की ओर दोनो हाथ रेचित किये जायें तो 'भुजङ्गवस्तरेचित' होता है (५६)। ३६-विक को घुमा कर दोनो हाथ लता और रेचित की स्थिति मे रखे जायें और पैरनूपुर चारी की स्थिति मे तो नूपुर' करण होता है (५७)। ३७-हाथ और पैर रेचित की स्थति मे हो तथा कटि और ग्रीवा भी रेचित हो तथा देह को वैशाख स्थान' मे रखा जाय, तो 'वशाखरेचित' करण होता है (५८)। ३८-स्वस्तिक पैर से आक्षिप्ता चारी करायो जाय, दोनो हाथ उद्वेष्टित हो, तथा तिक को घुमाया जाय तो भ्रमरक करण जानना चाहिये (५६)। ३द-बार्घा हाथ 'अश्वित' हो, दाहिना 'चतुर"X तथा दाहिना पैर कुट्टित' तो यह चतुर करण है (६०) ।४०-पैर भुजङ्गव्नामिता चारी मे हो दाहिना हाथ रेचित हो तथा बाया लता कर की स्थिति मे हो तो यहु 'भुजङ्गाश्व्रितक' करण होता है (६१)। ४१-यदि हाथो और पैरो को दड के समान (दण्टपक्ष हस्त और दण्डपादा चारी के द्वारा) प्रसाित करे तो इसे दण्डकरेचित करण जानना चाहिये (६२) । ४२- (दाहिने) पर को वृश्चिक की स्थिति मे रख दोनो हाथ निकुट्टित (बारी-बारी से अलपल्लव हस्त बना कर ऊपर ले जाना) करे तो इसे 'वृश्चिक कुटटित' करण जानना चाहिये (६३) । ४३-सूनी चारी करके बायें पैर को तेजी से दूर से जाकर (उसके पार्श्व मे) दाहिना पर रखे और कमर रेचित हो, तो यह 'कटिभ्रान्त' करण कहा जाता है (६४) । ४४-एक पैर पीछे की ओर अञ्चित हो और बायां हाथ पजा और अगुलियां सिकोड कर हयेली ऊपर रख कर लता हस्त की स्थिति मे लाया जाय, तो सतावृश्चिक करण होता है (६५) ।४५- दोनो हाथ अलपद्मबना कर कमर पर रखें जाये, कमर को बारी बारी से क्िन्न किया जाय और देह को वैशासस्थान मे रखा जाय, तो छित्र करण होता है (६६) । ४६-वृश्चिक चरण बना कर होनो हाथ स्वस्तिक की स्थिति मे ला कर रेचित और दूर हटाये जायें तो वृश्चिकरेचित होता है (६७) ।

९. भ्रमरिका चारी (नाशा० १० ४५) मे। २ नाशा० १० ३५। ३ वैशाखस्थान नाशा १०६१-६२ पर लक्षित। ४ चक्राकार घुमामा गया। ५. द्०- नाजा ्६ ६३ सब नाशा० ६४५। ६ उद्घट्टित -ऊपर उठा कर जमीन पर पटका गया। ७ अलपल्लव नाशा० ६ मे सक्षित नुत्तहस्त । द अनपद्म असयुत हुस्त, द०-स० नाथा०६४३१

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३८ / सडक्षिप्तनाटमशास्त्रम् बाहुशीर्षाञ्चिती हुस्तौ पादः पृष्ठाश्चितस्त्था। दूरसन्नतपृष्ठं च वृश्चिक तत्प्रकरीतितम् ॥ ६८ ॥ आलोढं स्थानक यत्र करौ वक्षसि रेचितौ। ऊर्ध्वाधोविप्रकीर्णो च व्यंसितं करणं तु तव् ॥ ६ई ॥ हस्ती तु स्वस्तिकौ पाश्वें तथा पादोनिकटटितः। यत्र तत् करणं ज्ञ यं बुर्धः पार्श्वनिक टटितम् ॥ ७०॥ वृश्चिक चरणं कृत्वा पादस्याड़गुष्ठकेन तु। ललाटे तिलकं कुर्याल्ललाटतिलक तु तत् ॥ ७१ ॥ पृष्ठतः कृश्रितं कृत्वा व्यतिक्रान्तक्रमं ततः। आक्षिप्तौ च करौ कार्यो क्रान्तके करणे हविजाः ॥७२॥ आघयः पादो नतः कार्य सव्यहस्तरच कुज्चितः । उतानो वामपाश्वस्थस्तत्कुञ्चितमुदाहृतम्॥७३॥ प्रलम्विताभ्यां बाहुभ्यां यद्गात्रंणानतेन च। अभ्यनतरापविद्धः स्यात् तज्ज यं चक्रमण्डलम् ॥७॥ स्वस्तिकापसृतौ पादावपविद्धक्मौ यदा। उरोमण्डलकौ हस्तावुरोमण्डलिक तुतव्॥७५ ॥ आक्षिप्तं हस्तपादं च क्रियते यत्र वेगतः। आक्षिप्तं नाम करणं विज्ञयं तद् द्विजोत्तमाः ॥७६॥ ऊर्ध्वाड्गुलितल: पाद पाश्वॅनोध्वं प्रसारितः । प्रकुर्यादश्चिततलौ हस्तौ तलविलासिते॥ ७७॥ पृष्ठत प्रसृतः पादो ह तालावर्धमेव च। तस्यंव चातुगो हस्तः पुरतस्तवर्गलं तु तत् ॥ ७ ॥ विक्षिप्तं हस्तपादं च पृष्ठतः पार्श्वतोडपि वा। एकमार्गगतं यक्ष तद्विक्षिप्तमुदाहृतम्॥७६॥

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चतुर्थोडध्याय/ ३६

४७-दोनो हुाथ कधो पर झुके हो तथा पैर पीछे की ओर सुका हो, पीठ भी पीछे झुकी हो तो यह वृश्चिक करण कहलाता है (६८) । ४८-आलीढ स्थान" मे हाथ वक्ष पर रेचित हो तथा ऊपर नीचे फेंके जाये तो व्यसित करण होता है (६६) । ४६-दोनो हाथ स्वस्तिक बना कर पार्श्व मे रसे जाये तथा पैर निबुट्टित हो, तो इसे पाश्वनिकुट्टित करण जानना चाहिये (७०)। ५०-वृश्चिक चरण बना कर पैर के अँगूठे से ललाट पर तिलक करे तो यह 'ललाटतिलक' है (७१)। ५१-'कान्तक' करण मे (अतिक्रान्ता चारी मे) एक चरण को कुश्वित करक चारो ओर घुमा कर रखा जाता है तथा हस्त आक्षिप्त (नीचे की ओर झटके से फेके जाते हुए) रहते है (७२)। ५२-दाहिने पैर को पहले (घुटना मोड कर) झुकाये तथा दाहिना हाथ कुश्ित होकर ऊपर की ओर (अलपल्लव बना कर) बायी और लाया जाय तो यह 'कुच्छित' करण है (७३)। ५३-फंलाई भुजाओ और झके देह से (अडड़िता चारी२ करते हुए) चक्रमण्डल करण होता है (७४)। ५४-दोनो पैरो से स्वस्ति क की स्थिति मे स्थितावता चारी की जाये और दोनो हाथ उरोमडल की स्थिति मे लाये जाये तो 'उरोमण्डल' करण होता है (७५) । १५-(आाक्षिप्ता चारी मे) वेग से हाधो और पैरो को झटका देकर भूमि पर पटका जाये तो आक्षिप्त करण होगा। (७६)। ५६-दाहिना पैर तलवे और अँगुलियो को ऊपर करके पार्श्व मे ऊपर को ओर फंलाया जाये तथा दोनों हाथ (पताक की स्थिति मे) एक दूसरे से मिकुड कर सश्लिष्ट होते हो तो यह 'तलविलसित' करण है (७७)। ५७-दाहिना पैर पोछे फैलाते हुए ढाई ताल की दूरी पर रखे और दाहिना हाथ उसी का अनुगमन करे, तो 'अर्गल' करण बनता है (७८)। ५०-(विद्युद्भ्रात्ता तथा दण्ड-पादा चारी के द्वारा) हाथो और पैरो को दोनो पाश्वों मे एक साथ फेंके, तो 'विक्षिप्त' करण कहा जाता 食 (9 名 )

१ नाशा(१० ६७) आलीढ स्थान-दाहिने पैर को पाँच ताल की दूरी पर मडलाकार प्रसारित करने पर। २ अड्डिता चारी के लिये द्र०-स० नाशा० १०२१। ३. स्थितावर्ता (स्थिरावर्ता) चारी के लिये द्०-स० माशा० १० १३। ४ उरोमडल वद्धा चारी (स० नाशा० १०१६) के साय जरोमडल तृत्त हुस्त (नाशा० ६२०४) मे होगा। ५ ताल

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४० / सङक्षिप्तनाट्यशास्त्रम्

प्रसार्य कुञ्चित पाद पुनरावर्तयेत द्रुतम्। प्रयोगवशगौ हस्तौ तदावर्तमुदाहृतम्॥ न०॥ कुन्चित पादमुत्क्षिप्य पारश्वात् पा्श्वतु डोलयेत्। प्रयोगवशगौ हस्तौ डोलापादं तदुच्यते ॥८॥ आक्षिप्त हस्तपाद च त्रिक चैब विवतयेत्। रेचितौ च तथा हस्तौ विवृत्ते करणे हिजा ।। ८२॥। सूचीविद्ध विदायाथ तिक तु बिनिवर्तयेत। करौ च रेचिती कार्यों विनिवृत्ते द्विजोत्तमा ॥द३ ॥ पार्श्वक्रान्तक्रम कृत्वा पुरस्तादथ पातपेत्। प्रयोगवशगौ हस्तौ पार्श्वक्रान्त तदुच्यते॥ द४॥ पृष्ठत कुन्चित पादो वक्षरचंव समुन्नतम्। तिलके च कर. स्थाप्यस्तन्निस्तम्मितमुच्यते ॥ ८५॥ पृष्ठतो वलित पाद शिरोघृष्ट प्रसारयेत्। सवंतो मण्डलाविद्ध विद्य द्भ्रान्तं तदुच्यते ॥ ८६ ॥ अतिक्रान्तक्रम कृत्वा पुरस्तात् सम्प्रसारयेत्। प्रयोगवशभी हस्ती अतिक्रान्ते प्रकीतितौ ॥८७॥ आक्षिप्तं हस्तपाद च त्रिक चंव विवततम्। द्वितोयो रेचितो हस्तो विर्वततकमेव तत् ॥ = ॥ फणॅडञ्चितः करो वामो लताहस्तश् दक्षिण.। दोलापादस्तथा चंव गजक्रोडितकं भवेद् ॥मर्द ॥ द्रतमुत्क्षिप्य चरण पुरस्तादथ पातयेत्। तलसंस्फोटिती हस्तौ तलसस्फोटिते मतौ॥ ई० ॥ पृष्ठप्रसारित पाद लतारेचितकौ करौ। समुन्नत शिरश्चव गरुडप्लुतकं भवेत्॥ ई१॥

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चतुर्थोउध्याय /४१

प६-कुञ्चित चरण को फैसा कर शोघ्ता से लोटा ले तथा दोनो हाथ (उद्वेष्टित अपवेष्टित या दोला हस्त मे) प्रयोग रत हो तो आवर्त करण है (८०)। ६०- कुञ्चित पैर को उठा कर एक पार्श्व से दूसरे पार्श्व मे झुलाये तथा दोनो हाथ प्रयोगरत हो (दोलापादाचारी' और दोला हस्तर के साथ) तो 'डोलापाद' करण होता है (८१) । ६१-विवृत करण मे हाथ और पर को बाहर की ओर सछाल दे तथा बिक को चक्कर देकर घुमाये तथा दोनो हाथ (हसपक्ष) मे रेचित हो (८२)। ६२-सूचीविद्धा चारी का प्रयोग कर त्िक को चक्कर मे घुमाये ओर दोनो हाथ रेचित हो तो विनिवृत्त करण होता है (८३)।६३-(पार्श्वक्रान्ता चारी मे) परो को आगे की ओर पटके तथा हाथ प्रयोगरत हो तो यह 'पाश्वक्रान्त' करण कहलाता है (८४)।

६४- दाहिना पैर पीछे की ओर कुञ्चित हो और वक्ष समुन्नत हो तथा हाथ तिलक लगाने की मुद्रा मे हो तो यह निस्तम्भित करण कहलाता है (८५)। ६५-दाहिना पैर पीछे की और चकाकार घुमाते हुए सिर के आस-पास घुमाये तो विद्युदभरान्त करण होगा (८६)। ६६-अतिक्रान्ता बारी करके दोनो हाथो को आगे की मोर फंला कर प्रयोगरत टिखाये तो 'अतिक्रानत' करण है (८७)।

६७-एकहाथ और एक पैर को ऊपर की ओर उछाल दे तथा तिक को चक्कर मे गोल घुमाये, दूसरा हाथ रेचित हो तो यह विव्तितक है (८८) । ६८- बा्या हाथ कान के पास सिकोड़ कर ले जाय, दाहिना लताहस्त की स्थिति मे रहे और दाहिना पैर दोलापाद की स्थिति मे तो यह 'मजक्रीडितक' होगा (८६) । ६६-'तलसस्फोटित' करण में दाहिना पैर तेजी से उठाकर सामने नीचे मिराये तथा दोनो हाथ तलससफोटितम की स्थिति मे हो (ई०)।७0- दाहिना पैर पीछे फँलाया हो, दोनो हाथ लसारेचित की स्थिति मे हो और सिर समुन्नत हो, तो 'गरुड़प्लुनक' होगा (६१)।

१ द०-स० नाशा० १०.३४

२ द्र०-स० नाशा०६६६ 1 ३ तलसस्फोटित-दो पताक हुस्तो को शब्द करते हुए मिलाने पर बनता है।

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४२/ सडक्षिप्तनाट्यशास्त्रम् सूचीपादो नतं पार्श्वमेको वक्षः स्थितः करः । द्वितीयश्चाञ्चितो गण्डे गण्डसूची तदुच्यते ॥ ६२ ॥ ऊ्धर्वापवेष्टितौ हस्तो सूचीपादो विर्वततः । परिवृत्तत्रिक चैतर परिवृतं तदुच्यते॥६३॥ एक: समस्थितः पाद ऊरुपृष्ठे स्थिनोऽपर:। मुष्टिहस्तश्च वक्षःस्थः पार्श्वजानु तदुच्यते॥ द४ ॥ पृष्ठप्रसारित पाद. किञ्चिदञ्चितजानुकः। यत्र प्रसारितौ बाहू तत् स्याद् गृधावलीन कस् ॥ उत्प्लुत्य चरणौ कार्यावग्रत. स्वस्तिकस्थितौं। सन्नतौ च तथा हस्तो सन्नतं तदुदाहृतम् ॥ ६६॥ कुञ्चितं पादमुतिक्षिप्य कर्यादग्रस्थितं भुवि। प्रयोगवशगौ हस्तौ सा सूची परिकीतिता ॥ ६७॥। अलपदम, शिरोहस्त. सूचीपादश्च दक्षिणः। यत्र ततकरण शंयमर्धसूचीति नामतः ॥ ई८॥ पादसूच्या यदा पादो द्वितीयस्तु प्रविध्यते। कटिवक्ष स्थितौ हस्तौ सूचीविद्ध तदुच्यते॥ र दर्द ॥ कृत्वोरुवलित पादमपक्रान्तक्रमं न्यसेत्। प्रयोगवशगौ हुस्तावपक्रान्तं तदुस्यसे॥ १००। वृश्चिकं चरणं कृत्वा रेचितौ च तथा करौ। तथा त्रिक विवृत्तं च मयूरललित भवेत् ॥ १०१ ॥ अञ्चितापसृतौ पादौ शिरश्च परिवाहितम्। रेचितौ च तथा हस्तौ तत् स्वितमुदाहृतम् ॥ १०२॥ नूपुरं चरणं कृत्वा दण्डपादं प्रसारयेत। क्षिप्राविद्धकरं चंव दण्डपादं तदुच्यते ॥१०३॥

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चतुर्थोडध्याय /४३

७१ -- यदि एक पैर 'सूची" मे हो, पार्श्व सुका हो, एक हाथ वक्ष पर स्थित हो और दवूसरा गण्डस्थल (कनपटी) के पास सिकोड़ कर लाया गमा हो तो यह 'गण्डसूची' करण कहलाता है (६२)। ७२-दोनो हाथ ऊपर की और अपवेष्टित करके उठाये जायें तथा 'सूची' चारी मे पैर को घमा कर साथ मे तिक को भ्रमरी चारी के द्वारा घुमाया जाये तो परिवृत्त कहलाता है (६३)। ७३-एक पैर समपाद चारी मे और दूसरा ऊर के पीछे लगा हो तथा मुष्टि हस्त बना कर वक्ष पर रखा गया हो, तो यह पार्श्वजानु कहलाता है (६४)। ७४-एक पर थोडा घुटना मोड़कर दोनो भुजाएँ (दोनो पाश्वों मे लताहस्त बनाकर) प्रसारित की जाये तो गध्ावलीनक करण होता है (६५) ।७५-उछल कर दोतो पैरो को हरिण प्लुतारचारी मे आगे की ओर स्वस्तिक की स्थिति मे रखा जाय, दोनो हाथ (दोला हस्त की स्थिति मे) झुके हो तो सन्नत करण होता है (६६)। ७६-दुक्चित पैद को उठा कर आगे की ओर भूमि पर रखा जाय और दोनो हाथ नृत्य के अनुसार प्रयोगरत हो, तो यह सूची करण है (६७)। ७७-एक हाथ अलपद्म को स्थिति मे सिर तक ले जाया जाय, दाहिना पैर सूची की स्थिति म हो तो इस करण की अर्धसूची' कहते हैं (६)। ७८-एक पैर सूची की स्थिति में दूसरे पैर की ऐडी से सटा हो दोनो हृषय क्रमश (पक्षवच्त्ितक या अर्धचन्द्रम बना कर) कमर तथा (खटकामुख बन कर) वक्ष पर हो ता यह सूनीविद्ध कहलाता है (टदै)।उद-नपक्रान्ता चारी मे दोनो पाँवो के करुओ का दलन करे तथा दोनो हाथ प्रयोगरत हो तो यह अप क्रान्त कहलाता है (१००)। ८०-चरण वृश्चिक बना कर दोनो हाथ (हमपक्ष मे) रेचित हो तथा विक विवृत्त हो (इृश्चिक चरण को ऊरु पर निकुश्चित करके भरमरिका चारी की जाय) तो यह मयूरललित करण है (१०१) रु१-दोनो पैर अश्वित दशा मे एक दूसरे से दूर हटाये जायें, सिर परिवाहित हो, दोनो हाथ रेचित हो तो यह सर्पित कहा जाता है (१०२)। म२-नूपुरपार्दिका चारी करके दण्डमादा १० चारी करे, हाथ तेजी से आविद्ध हो तो यह दण्डपाद कहलाता है। (१०३)। १ सूची चारी के लिये द्व० स० नाशा० १० ३२। २ अभिनवगुप्त के अनुसार बढ़ा चारी मे घुमा कर दूसरे पैर की जघा (पिडली) में गुँथा जाय । ३ द्र० स०नाशा० ४ दो व्निपताल हुस्त क्रमश कमर व सिर पर रखने पर द०-नाशा० ६२००। ५ द०स० नाशा० १६ २० ६ द्० स० नाशा० ६६४ ७ गोल घुमाव दिया गया। 5 परिवाहित सिर बारी-बारी से दोनो पाश्वों मे ले जाने पर होता है। (द० नाशा० रु २५)। ६ दव०-स० नाशा० १०३३ (नाशा० १०३५) १० द०-सं० नाशा० १०४२ (नाशा० १० ४४)

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अतिक्रान्तकरं कृत्वा समुत्प्तुत्य निपातयेत्। जड्धाञ्चितोपरि क्षिप्ता तद् विद्याद्धरिणप्लुतम् ॥ १०४॥ डोलापादक्रमं कृत्वा समुत्प्लुत्य निपातयेत्। परिवृत्ततिकं चैव तत्म्रेडखोलितमुच्यते ॥ १०५॥ भुजावूध्वविनिष्क्रान्तौ हस्तौ चाभिमुखाड्गुली। बद्धा चारी तथा चंव नितग्बे करणे भवेत् ॥ १०६॥ दोलापादक्रम कृत्वा हस्तौ तदनुगाबुभौ। रंचितौ घूर्णितौ वापि स्खलितं करणं भवेत् ॥ १०७॥ एको वक्ष:स्थितो हस्तः प्रोट्वप्टिततलोऽपर । अज्चितश्चरणशचैव प्रयोज्य करिहस्तके ॥ १०८ ॥ एकस्तु रेचितो हसतो तताख्यस्तु तथा परः । प्रसर्पिततली पादौ प्रसपितकमेव तत् ॥ १०६ ॥ अलात च पुरः कृत्वा द्वितीय च हुतक्रमम्। हसतौ पादानुगौ चाषि सिंहविक्रीडिते स्मृतौ ॥ ११०॥ पृष्ठप्रसर्पितः पादस्तथा हस्तौ निकुञ्चितौ। पुनस्तर्थव कर्त्तव्ौ सिंहाकर्षितके द्विजा: ॥ १११॥ आक्षिप्तहस्तमा क्षिप्तदेहमाक्षिप्तपादकम् 1 स्मृतम् ॥ ११२॥ आक्षिप्तश्चरणश्चको हस्ती तस्यय चानुगौ । आनत च तथा गात्र तथोपसृतकं भवेत् ॥११३॥ दोलापादक्रमं कृत्वा तलसड्घटटितौ करौ। रेचयेच्च करं वामं तलसडघट्टिते सदा॥ ११४॥ एको वक्षस्थितो हस्तो द्वितीयश्च प्रलम्बितः । तलाग्रसंस्थितः पादो जनिते करणे भवेत् ॥११५॥

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चतुर्थोउध्याय /४५

८३-हरिणप्लुता चारो मे हाथ ऊपर उठा कर फैला कर स्वय उछल कर उस हाथ को मिरामे, जङ्डा अश्वित और ऊपर उछाली जाये तो यह हरिणप्लुत करण है (१०४)। द४ - डोलापाद चारी करके उछल कर (भ्रमरिका चारी के अनुमार) त्िक को घुमाव दे तो यह प्रेह्वोलित करण है (१०५/। ८५-दोनो भूजाएँ (सिर के) ऊपर निकली हो, हाथो की अगुलियाँ सामने फैली हो (पताक हस्त आमने-सामने) और साथ मे 'बढ़ा"१ चारी की जाय, तो नितम्ब करण होता है (१०६) । ६६-दोनो पेरो से दोलापाद चारी करते हुए हाथ (हसपक्ष की स्थिति मे) उन पैरो के अनुगमन मे सचालित हो या रेचित और घूर्णित हो तो रखलित करण होता है (१०७)। ८७-बार्या हाथ वक्ष पर स्थित हो, दाहिना (कान के पास व्रिपताक की स्थिति मे) प्रोद्वेष्टित हो तथा पैर अच्वित हो तो करिहस्तक करण होता है (१०८)। द-एक हाथ (हसपक्षै बना कर तेजी से घुमाने हुए) रेचित किया जाय, दूसरा लता हस्त हो तथा पैर (तलसचर४ की स्थिति मे) तलुओ को घिसते हुए मागे बढ़ें तो प्रसपित करण होगा (१०६)। द-अलाता चारी करके दूसरे पैर को चक्राकार घुमाये औौर हाथो को अलाता चारी के अनुसार रखं तो यह सिहविक्रीहित होता है (११०)। ई-एक पैर पीछे की ओर फैलाया हुआ हो (वृश्चिक बना कर) दोनो हाथ (पद्मकोश और ऊर्णनाभ बना कर) निकुस्तित हो, दूसरे पैर से वृश्चिक कैर फिर उन हाथो को उसी तरह निकुश्चित किया जाय तो सिंहाकषितक होता है (१११)। ६१-(उदवृत्ताचारी के द्वारा) मदि हाथ पर और शरीर को ऊपर उछाला जाम, तो 'उद्बृत्त' करण होता है (११२)। ६२-आक्षिप्ता चारी म एक पैर उठाया जाये तथा दोनो हाथ उसका अनु- गमन करें, देह झुका हुआ हो तो उपसृतक करण होगा (११३)। ६३-दोलापादा चारी करके दोनो हाथ तलसस्घटटित हो, (वैष्णव स्थान मे) बायें हाथ को (हुतभ्रमात्मक हसपक्ष बना कर) रेचित करे-यह तलस हटटित करण है (११४)। ६४-जनित करण मे एक हाथ (मुष्टिहम्त मे) वक्ष पर स्थित दूसरा (लता हस्त मे) फैलाया हुआ, तथा पैर अप्रतलसख्र (जनिता चारी मे) होता है (११५)।

१. द्र०-स० नाशा० १०१६ २ प्रोद्वेष्टित-घुमाया हुआ। ३ हुसपक्ष नाशा० ६ १०४ ४. तलसचर नाशा० ६ २७३ ५ अभि० के अनुसार आक्षिप्ता चारी बायी ओर व्यावतित होगी तथा दाहिना हाथ अराल की स्थिति मे रहेगा।

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४६/ सडक्षिप्तनाट्यशास्त्म्

जनित करणं कृत्वा हस्तौ चाभिमुखाड्गुली। सननिपतितौ चंव ज्ञयं तदवहित्यकम् ॥ ११६॥ करौ वक्षःस्थितौ कार्यायुरो निभुग्नमेव च। मण्डलस्थानक चंव निवेशं करणं तु तत्॥ ११७॥ पतनं भवेत्। सन्नतं वलितं गात्रमेलकाक्रीडितं तु तत् ॥ ११८॥ करमावृत्तकरणमूरुपृष्ठे 5 ज्चितं न्यसेत्। जडघाञ्चिता तथोद्वृत्ता हुयूरुदवृत्तं तुतद् भवेत् ॥११६ ॥ करौ प्रलम्बितौ कायौं शिरश्च परिवाहितम्। पादौ च वलिताविद्धौ मदस्खलितके दविजा ॥ १२० ॥ पुर. प्रसारितः पाद कुञ्चितो गगनोन्मुखः। करौ च रेचितौ यन्र विष्णुक्रान्तं तदुच्यते॥ १२१॥ करमार्वाततं कृत्वा ह्यूरुपृष्ठे निकुञचयेत। ऊरुश्चंव तथाविद्ध सम्भ्रान्तं करण तु तत् ॥ १२२॥ अपविद्धः करः सच्या पादश्चव निकुटटित.। वक्षस्थश्च करो वामो विष्कम्भे करणे भवेत् ॥ १२३॥ पादावुद्घट्टितौ कार्यों तलसड्घटटितौ करौ। नतञ्च पाश्वं कर्तव्यं बुर्धरुद्घट्टिते सदा ॥१२४॥ प्रघुज्यालातकं पूर्व हस्तौ चापि हि रेचयेत्। कुश्चितावश्चितौ चंव वृषभक्रीडिते सवा॥ १२५।। रेचितावश्चितौ हस्तौ लोलितं वतितं शिर:। उभयोः पार्श्वंयोयंत्र तल्लोलितमुदाहृतम्॥ १२६॥ स्वस्तिकापसतौ पादौ शिरश्च परिवाहितम्। रेवितौ च तथा हुस्तौ स्याता नागापसपिते ॥ १२७ ॥

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चतुर्थोध्याय /४७

६५-जनित करण कर के दोनो हाथो की अमुलियो को एक दूसरे के सामने रख कर घीरे-धोरे नीचे ले जाया जाय, तो अवहित्यक करण होता है (११६)। ६६ -- वक्षस्थन निर्भग्न हो, तथा दोनो हाथ इस वक्ष स्थल पर रखे जाये और मण्डल स्थान बनाया जाय तो यह निवेश करण है (११७)। ६७-दोनो अग-तलसन्वर की स्थिति से उछास मर कर भूमि पर लाये जायें, इस पतन के समय देह को सिकोडा जाम, फिर वंलित किया जाय तो यह एलकाक्रीडित करण है (११८)। ई८-(ऊर्द्वृत्ता चारी मे) एक हाथ को मोड कर ऊरु के पीछे सिकोड कर रखे, जल्डा अश्वित तथा उद्वृत्तर हो तो उर्दवृत्त करण होता है (११६)। द६-मदत्खलितक करण मे दोनो हाथ (दोला हस्त की मुद्रा मे) फंलाये होते हैं, सिर परिवाहित* होता है, पैर झुका कर एक दूसरे मे स्वस्तिक बना कर गुँथे होते हैं (१२०)। १००-यदि कुश्धित पर को ऊपर उठाते हुए आगे फैलाया जाय, दोनो हाथ रेचित हो तो विष्णु- क्रान्त करण होता है (१२१)। · १०१-एक हाथ को मोड़ कर ऊरु के पृष्ठ पर निकुश्तित करे, ऊरु आविद्ध * हो तो सम्भ्रानत करण होता है (१२२)। ५०२-एक हाथ अपविद् हो सूची बारी करते हुए पैर निकुट्टिल हो तथा बायां हाथ वक्षस्थ हो ता विष्कम्भ करण होता है (१२३) । १०३-दोनो पर उद्घट्टित हो दोनो हाथ तलसद्द-तथा पाश्व नत हो तो उद्घद्दित करण होता है (१२४) । १०४-अलातचारी करके दोनो हाथ रेचित करे, फिर उन्हे कुश्वित (मोडे हुए) और अश्वित (सिकोडे हुए) करे तो वृपभक्रीडित करण होगा (१२५)। १०५-दोनो हाथ रेचित और अश्वित हो, दोनो पाश्वों मे सिर लोलित तपा व्तित हो तो यह 'लोलित' करण कहलाता है (१२६)। १०६- दोनो पर स्वस्तिक [स्थिति मे पीछे हर्टै, सिर परिवाहित हो और हाथ रेचित हो तो नागापसरपित करण होगा (१२७)।

१ अभि० को सूचना के अनुमार इसमे कुछ आचार्य अबहित्य हृस्त का प्रयोग भी साथ मे अपेक्षित मानते हैं। २ मदल स्थान (नाशा० १० ६५)। ३ अभि के अनुसार अराल या खटकामुख हुस्त। ४ नाशा० ६२६ ५ द०ऊपर ४१०३ पर पा०टि०। ६ गुंथा हुमा ७ लोलित सिर सब तरफ घुमाने पर। द्व०-नाशा० ८३७ 5 अभिनव के अनुसार वर्वित=विश्रमित। रैं अभिनव के अनुसार इसमे वैष्णव स्थान रहता है।

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निषणमाड्गस्तु चरणं प्रसार्य तलसञ्चरम्। उद्वाहितमुर. कृत्वा शकटास्यं प्रयोजयेत् ॥ १२६ ॥ ऊ्ध्वईडगुलितलौ पादौ त्रिपताकावधोमुखौ। हस्तौ शिरस्सन्वतं च गड्गावतरणं त्वति ॥ १२६॥ यत्तु सन्हृश्यते किञ्चिद् दम्पत्योमंदनाश्रयम्। नृतं तन्र प्रयोक्तव्यं प्रहर्षार्यगुणोद्भवम् ॥ १३०॥ यन्र सन्निहिते कान्ते ऋतुकालादिदर्शनम्। गीतकार्याभिसम्बद्ध नृतं तत्रापि चेष्यते।। १३१।। खण्डिता विप्रलब्धा वा कलहान्तरितापि वा। यस्मिन्नङ्गे तु युवतिर्न वृतं तत्र योजपेत् ॥१३२॥ सखी-प्रवृत्ते संलापे तथा 5 सन्निहिते प्रिये। नहि नृतं प्रयोक्तव्यं यस्या वा झोषित प्रियः । १३३ ।।

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१०७-बैठ कर तलसं्चर पैर को फैंलाये, बक्ष स्थल उद्बाहित हो तो शकटास्य होता है (१२६)।१०८-दोनो पैर तल और सडगुलियो को ऊपर उठा कर रखे हो, दोनो हाथ त्िपताक को मुद्रा मे नीचे झुकाये हो और सिर सन्नत हो तो गङ्गावतरण करण होता है (१३०)। जहाँ दम्पति ने बीच प्रेम-चर्चा हो वहाँ अत्यधिक हर्ष से उद्भूत नृत्त का संयोजन किया जाय। जहाँ प्रिय के समीय नाविका अनुकूल ऋतु या समय का अनु- भव करे वहाँ भी गीत के अर्थ से जुड़ा नृत् हो सकता है (१३१-३२)। जिस अङ्ग (नाट्यप्रस्तुति के स्थल) मे खण्टिता" विप्रलवधा२ या कलहानतरिता सुवती हो वहाँ नृत का प्रयाग न करे। यदि स्खियो के बीच बातचीत चल रही हो, प्रिय पास मे न हो या नायिका का प्रिय विदेश गया होए ती वहाँ भी नृत्त का प्रयोग न करे (१३३-३४) 1

१ आठ प्रकार की नायिकाओ म एक। अन्य स्त्री से प्रेम होन के कारण जिसका प्रिय उसके पास न अव।-नाशा० २२२१७ २ द्वूती भेजने पर या मिलन का तय करने पर भी जिसका प्रिय मिलने न आये। आठ नायिकाओ मे यह भी है।-नामा० २२२१४ ३ परस्ती के कारण ई्ष्याश जो पति सा प्रिय से झगडा करे और बह इसे छाड कर चला जाय।-नाशा० २२ २१६ ४ आठ नाषिकाओ म एक। इस प्रोषितभर्तृ का कहत हैं।-नाशा २२१०० ४

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॥ अथ पञचमोऽधयायः ।।

यस्माद् रड्गे प्रयोगोऽयं पूर्वमेव प्रयुज्यते। तस्मादयं पूर्वरडगो विज्ञयो द्विजसत्तमाः ॥१॥ अस्याड गानि तु कार्याणि यथावदनुपूर्वशः । तन्त्रीभाण्डसमायोगैः पाठ्ययोगकृतैस्तथा ॥२॥ प्रत्याहारोऽवतरण तथा ह्यारम्भ एव च। आश्रावणा वक्त्रपाणिस्तया च परिघट्टना ॥३॥ सड घोटना ततः कार्या मार्गासारितमेव च। ज्येष्ठ, मध्य कनिष्ठानि तर्थवासारितानि च॥४ ॥ एतानि तु बहिर्गीतान्यन्तर्जवनिकागतैः। प्रयोवतृभिः प्रयोज्यानि तन्त्रीभाण्डकृतानि च ॥ ५ ॥ गीतानां मद्रकादीनां योज्यमेकं तु गोतकम्। वर्धमानमथापीह ताण्डवं यत्ष युज्यते।। ६॥ ततश्चोत्थापनं कार्यं परिवर्तनमेव च। नान्दी शुष्कावकृष्टा च रड गद्वारं तर्थव च॥ ७॥ चारी चँव ततः कार्या महाचारी तर्थव च। त्रिकं प्ररोचना चाषि पूर्वरड गे भर्वन्ति हि॥ ८ ॥

कृतपस्य तु बिन्यास: प्रत्याहार इति स्मृतः। तथावतरणं पोक्तं गायिकानां निवेशनम्॥६॥

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। पंचम अध्याय।।

[पू्व रड्ग के सबध मे मुनियो का प्रश्न सुन कर भरत ने कहा]-हे द्विजश्रेप्ठो, पूर्वरडग का प्रयोग नाटय प्रस्तुति के पहले रड् (रगमच) पर किया जाता है, इसीलिये इसको पूर्वरडग कहते हैं। इसके (सारे) अगो का प्रयोग विधिपूर्वक निर्धारित क्रम से वीणा, मृदग आदि वाद्यो की सगत तथा पाठ्य' के योग के साथ करना चाहिये (१-२)। [पूर्वरग के अन्तर्जवनिकागत अगो मे-] (१) प्रत्याहार (२) अवतरण (३) आरम्भ (४) आश्रावणा (५) वक्तपाणि (६) परिघट्टना (७) सड्घोटना (८) मार्गासारित (६) ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठ आसारित-ये नो अग बहिगीत (गायन से रहित) कहे जाते हैं तथा जवनिका के भीतर स्थित प्रयोक्ताओ द्वारा तकी, भाड (वीणा, मृदग आदि) के माथ प्रयुक्त किये जाते हैं (३-५)। [शेष अग जवनिका को हटाने पर इस प्रकार किये जायेंगे-] (१०) मद्रक गीतो मे से कोई एक गीत जोड़ा जाय, या साण्डव जोडा जाय तो वर्धमानक जातिके गीतो मे से कोई जोडा जाय (११) फिर उत्थापन करना चाहिये (१२) फिर परिवर्तन फिर (१३) तान्दी (१४) शुषकावकृष्टा ध्रुबा (१५) रहगदार (१६) चारी (१७) महाचारी (१८) बिक और (१६) प्ररोचना- क्रमश ये अग पूवंरड्ग मे होते है (६-८) ।

१ सवाद का गद्य या पद्य मे रचित वह भाग जो गाया नही जायेगा। पाठ्य के निरूपण के लिये स० नाशा० अ० १६ (नाशा० म० १७) देखें। २ पूर्वरङ्म शुद्ध और चित्र दो प्रकार होता है। शुद्ध मे तृत्य नही होता। चित विधि से पूवरङ्ग किया जाय तब वर्घमान के साथ ताण्डव का प्रयोग होगा ।

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५२/सङ्क्षिप्तनाट्यशास्त्रम् परिणीतक्रियारम्भ आरम्भ इति कीतितः । आतोदरञ्जनार्थ त् भवेदाश्रावणाविधि:॥१ । वाद्यवृत्तिविभागार्थं वक्त्रपाणिविधीयते। तन्दयोजकरणार्थ तु भवेच्च परिघट्टना ॥११॥ तथा पाणिविभागार्थ भवेत सड़घोटनाविधि: । तन्त्री माण्डसमायोगान्मार्गासारितमिष्यते १ १२ ॥ कलापातविभागार्थ भवेदासारित क्रिया। कीर्तनाद् देवतानां च जेयो गीतवविधिस्तया ॥।१३॥। पस्मादृत्यापयन्त्यत्र प्रयोगं नान्दिपाठकाः । पूर्वमेव तू रडगेस्मिंस्तस्मादुल्यापनं स्मृतम् ॥१४॥ पस्माच्च लोकपालानां परिवृत्य चतुर्दिशम्। वन्दनानि प्रकुर्वन्ति तस्माच्च परिवर्तनम् ॥१५॥ झशीवचनसंयुक्ता नित्यं वस्मात् प्रयुज्यते। देवद्विजनृपादीनां तस्मान्नान्दीति संजञिता ॥१६॥ अब शुष्काक्षरतेव हावकृष्टा घ्रवा मत। जर्जंरश्लोकदशिका ॥१७॥ पस्मादभिनयस्त्वन्न प्रथम हुयवतार्यते। रड्गद्वारमतो ज्ञयं वागङ्भाभिनयात्मकम् ॥ १८॥ शंगारस्य प्रचरणाच्चारी सम्परिकोतिता। शेद्रप्रचरणाच्चादि महाचारीति कीतिता ॥ १६ै॥ विदूवक सूत्रधारस्तथा वै पारिपाश्विक:। यन्र कुर्वन्ति सञ्जल्पं तच्चापि त्रिगतं मतस् ॥२॥

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जचमो उयाय /५२

अब पूवरडग के उक्त अग के क्रमश लक्षण बताते हैं]-कुतप' की जमावट प्रयाहार' है। गायिकाओ को निर्धारित स्थान पर बिठाना अवतरण है। गादन को क्रिया का (आलाप भर कर) आशस बरता 'आरम्भ के है। आतोन (वादो) को मिलाने के लिये बजाया जाना आश्ावण्रा मे विधि है। वाद्ो का उनकी अपनी स्थि्ति के अनुसार अलग अलग बजाया जाना वक्तपाणि ४ है। बीणा आदि त त्ी वादयो मे ओोज लाने के लिये उनम शुल्काक्षर का प्रयाग परिघटटना है। (मृदय बाति अवनय बाद्यो म हाथ जमाने के लिये (पाच पाच बार प्रहार करते हुए) सयोग्ना विधि की जाती है। ततत्री और भाण्ड (अवनद्य बाद्य) दीनों को मिला कर एक मथ बजाना मार्गमारित है। कला ओर पात के विभाजन की दृष्दि स इन बाद्यो को बजाया जाना आमारित क्रिया है। [सब बाहर्जवनिकागत अग बताते हैं देवताओ का नाम सवीनन या स्तुति गाना गतविधि है। ना पाठक जिसके द्वारा प्रयोग को पहले पहल उते (आरभ कराते) है वह उय्यापन । प्रपोकागण चारो दिशाओ मे परिक्रमा करव लाकपलो (दिश्ञाओ के अधिष्ठान देवो) की वदना करते है तो यह 'पश्वितन है। आशीर्वाद से युक्त प्रत्येक प्रयोग म पतिदिन प्युक्त होने बाली देवना द्विज राजा आनि की स्तुति नादी है। गुप्काक्षरो से अबकृष्टा ध्रवा का गाया जाना शुष्कावकृष्टा है जो जर्वार की स्तुति के ोक वे साथ गामी जाती है। प्रयुक्त होने वाल रूपक के लिये द्वार के समान होने के वारण रगद्वार नाम पना है। इस मे पाठय के हाथ आगिक आदि अभिनय को पहली बार यवतारणा की जाती है। (चारी अगहार आति के प्रयोग के साथ ना्मिका के चरिति के सकत के लिये) इ गाग्पूण प्रचार (मन पर बलना) चारी है तथा (शिव के तिपुरदाह के अवसर पर) रौद्र रस का सकेत देते हुए प्रचार महाचारी है। विदूपक सुतधार तथा पारिवश्त्रिक की आपस मे (प्रयुक्त होने वाले रूपक का सवेत दते हुए) बातचीत त्रिक या विगत मानी गयी है = (६२०)। १ गायक गायकाओ और बादको का समूह (आर्केस्ट्रा) २ अभि० के अनूसार आरभ का दूसरा नाम आलाप है। ३ आलाप के पश्चात् तालप्रधान वाद्यो को मिलाने के लिये आथावणा होती है। ४ ववत=मुख या आरभ 1 वाणि=हाथ। अभि के अनुसार इसमे वेणु (बशी) के स्वर का मिलान किया जाता है। ५ शुध्क क्षर=मृदग या तरले के बोल (परण) जिनका अलग स कोई अथ नहीं होना। ६ ७ कला पात और लय से धन वादो ने तीन गुण है। आवाप आदि क्रियाओ से काल का परिच्छद कला है कता वो शह से श्रुतियोचार बनाया है। = आधावणा आरभ वव्तपाणि सवोटना तथा परिघटटना-इन पाँच अगो का विस्तृत निरूपण तापा रहवें अध्याय मे है, तथा घवाओ का ३२ वे मे।

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उपक्षेपेग काव्यस्य सिद्ध नामन्त्रणा या तु विज्ञे या सा प्ररोचना ।। २१।

प्रयुज्य गीतकविधि वर्धमानम्थापि च। गीतकान्ते ततरचापि कार्या ह्यत्थापनी घ्रुवा ॥ २२ ॥ आदौ द्वे च चतुर्थ चाप्यष्टमैकादरॉ तथा। सुर्वक्षराणि जानीयात्पादे हुयेकादशाक्षर ।। २३ ।।

चतुष्पदा भवेत्सा तु चतुरश्रा तर्थेव च। चतुभिस्सन्निपातैश्च त्रिलया त्रियतिस्तया ॥२४॥

परिवर्तारच चत्वार पाणयस्त्रय एव च। जात्या चैव हि विश्लोका तां च तालेन बोजयेव्॥ २५॥ शम्या तु द्विकला कार्या तालो हविकल एव च। पुनश्चंक कला सम्या सन्निपातः कलान्नयम् ॥२६॥ एवमप्टकल: कार्यः सन्निपातो विचक्षणैः। चत्वार: सन्निपाताशच परिवर्त, स उच्यते ॥ २७॥

पूर्व स्थितलयः कार्य. परिवर्तो विचक्षण। तृतीये सन्निपाते तु तस्म भाष्डग्रहो भवेस् ॥ २६ ॥

एकस्मिन् परिवर्त त गते प्राप्ते द्वितीयके। काय मध्यलये तज्ज: सूत्रधारप्रवेशनस् ॥ २६ ॥ पुप्पाञ्जलिं समादराय रक्षामड्गलसंस्कृताः। शुद्धवस्त्रा: सुमनसस्तथा चाद्भुतहृष्टयः ॥ ३० ॥

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पञ्च मासध्याम /५

हेतु और युक्ति का आश्रय ले कर सिद्धि के द्वारा (प्रेक्षको था) बामतित करते हुए प्रस्तुत किये जाने वाले रूपक के विषय की पूर्वसूचता देता प्रशेचना है (२१) । [अब उत्थापन आदि अगो का विशेष लक्षण कहाते है-] गतिव। (गोत नामक पूर्व रग के दसवें अग का) प्रयोग करके या उसमे वर्धमानक जाति क गीत का प्रयोग कर (ग्यारहुर्वे अग उत्थापन मे) उत्थापनी भ्रबाका प्रयोग कर्ता चाकि। (इस ध वा का स्वर्म इस प्रकार है)-इसके प्रत्येव चरण में ग्यार्ह वक्षा हात है जिसमे आरभ के दो, चौथा, आठ्वा तथा ग्यारह्वा अक्षर गुर होता है।'इस प्रदार (ग्यारह-ग्यारह वक्षरी के) चार पाद इस ध्रुवा मे होते है पह पजापुट या चतुग्थ ताल के माथ गायी जाती है। (प्रत्येक पाद वे अत मे 0द-एव कम्रिपात गय वर) इसमें नार सन्निपात होते हैं तथा तीन प्रकार बी लम (घिलवित, गध्य, दन) और विविध यतिया (समा, स्रोतोवहा तथा गयष्छ) १समे रहही है। गान हिय की चारो वृत्तियां (परिवत)इसमे होती है तथा तोन पाषि' (गमपाषि, नवदाणि। तथा उपरिपाणि) भी इसमे प्रयुक्त होते हैं। वृतत की जाति की दृष्ति क यह सचा विश्जोका जानि से ाती है, उसे ताल मे मथाजित वनता चाहिय। नाल वा बस इस प्रकार होगा-दो कला की शम्या, फिर दा बना वी नाल फिश रत बेजा है। सम्या और तोन कला का सन्निदात। इम प्रकार व।ट वलाथा वास मन्नियान इससूवा मे होने हैं। चार सन्निपात मिला कर एव पर्वत-बनता है। पहसा परिितं विवत लय मे किया जाना चाहिये। तृक्षीय सनिपान में दि सृष ा मे बजाये जायें। एव पर्वि्ते पूरा होन पर दमग परि्वम दाने ही मध्य लय मे हुड घार का प्रवेग कराया जाय। पुष्पाज्न सवत् रसापूतर या छविष एव मे मबून शुद्ध वम्त तथा गृद्ध मन बाने अदभृता दृष्दि में सुद मीम लोग (सदवर दूध क पारिशाण्व्रिक) एक माम ग्रवेग क()।

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५६ / सङू्क्षिप्तनाट्यशास्त्रम् स्थानं तु वैष्णवं कृत्वा सौष्ठवाड्गपुरस्कृतम्। दीक्षिता: शुचयरचैव प्रविशेयुः समं त्रयः ॥३१॥ भुडगारजर्जरधरी भवेतां पारिपाश्चिकौ। मध्ये तु सूत्रभृत् ताभ्यां वृत्तः पश्चपदी व्रजेत् ॥ ३२॥ पदामि पञ्च गच्छेयुर्ब्रह्मणो यजनेच्छ्या। पदानाञ्चापि विक्षेपं व्यात्यास्याम्यनुपूर्वेश ॥ ३३॥

पार्श्वोत्थानोत्थितं चंव तन्मध्ये पातयेत् पुनः ॥३४।।

एवं पञ्चपदी गत्वा सुत्रधार सहेतरः। सूचीं वामपदे दद्ाद् विक्षेपं दक्षिणेन च॥ ३५ ॥ पुष्पासत्यपवर्गरच कार्यो वाह्म थ मण्डले। रड्गपोरस्य मध्ये तु स्वयं ब्रह्मा प्रतिष्ठितः ॥ ३६।।

तत. सललितर्हस्तरभिबन्दय पितामहम्। अभिवादानि कार्याणि नोणि हस्तेन भूतले॥। ३७ ॥

कालप्रकर्वहेतोर्व वादाना प्रविभागतः। वन्दनाभिनयात्मक: ।। ३८ ।।

द्वितीयः परिवर्तस्तु फार्यो मध्यलयाथितः। तत परं तृतोये तु मण्डलस्य प्रदक्षिणम् ॥३६ ॥ भवेदाचमनं चैव जजरग्रहणं तथा। उत्थाय मण्डलात् तूर्ण दक्षिणं पादमुद्धरेत् ॥ ४० ॥

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पञ्चमोड़्याम /५७

देह को सौष्ठव की स्थिति" मे रख का वैष्णव स्थान बना कर दीक्षित और पवित्र वे तीनो एक साथ प्रवेश परे (३१)।

दोनो पारिपाश्विक क्रमश शृगार और जजर धारण किय रहेंगे। उनके बीच सूतधार पांच कदम चले (३२)।

उसके साथ ब्रह्मा की पूजा की इच्छा म दोनो पारिपाश्विक भी पाच कदम चल्ेंगे। इन पाँचो चरणों का विन्यास इम प्रकार होगा-तीनो लोग तीन ताल* के अतर स अपना-अपना पैर धोरे-धीर ऊपर टसे फिर अपने पाश्व म उस टिकये। इस प्रकार गाँच नरण चल कर सूजजार अपन साबिया के माध गूची चोरो का प्रशशन वाृय पैर से करक दाहिन पैर से नक्षन दर:३३॥

फिर ब्राह्ममडल में पुप्पाजाल का छोडना चाहिय। यह ब्राह्ममदल रगपीठ क बाच मे होना है जिसम साक्षान् ब्रह्मा प्रतिष्ठिन है ते है (३६ ३०)।

फिर ललित हस्त के द्वारा पिनामह बह्मा की बदना करव भूतल पर तीन बार हाथ मे स्वर्श करके प्रणाम करना चाहिय और इनक साथ पेरो का काल के (कलाओ मे) विभाजन के अनुसार रखा जाना चाहिय। सूलधार क प्रवेश से लेकर वदना तक का यह द्वितीय पग्वित मध्य लय में होगा। उसके पश्चात् तृवीय परिवत मे मडल की प्रदक्षिणा आचमन और बजर का ग्रहण होना है। फिर ब्राह्ममडल मे तेजी म उठकर मुन्रधार दाहिना पैर उठाय उससे वेध करे और बाये पैर स विक्षप करे फिर पाश्व मे दाहिना पैर उडाय (३६४१)।

१ मोष्ठब के लक्षण के निय देवे-स० नाशा० १े०५२.२३ २ ताल-इकु वालिस्त की दूरी ह वेध-एक पैर को एडी व पीले दूसर पैर को पटकना (अभि०)। दिप्बणी-अभिनवगुप्त के अनुसार दाहिने हाथ को दाहिनी जोर ले जाना शय्पा है। उसे बायी हुषेली पर पतकता ताल है तथा दोनों टुथलिया को आमने-मासन एक दूमरे की आर वढ़ा कर (honzontal गनि म) ताली देना 'सन्निपात' है।

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५८ / स्क्षिप्तनाट्यशास्त्रम्

वेधं तेनव कुर्बीत विक्षेपं वामकेन तु। पुनशच दक्षिणं पार्द पार्श्वसंस्यं समुद्धरेद ।४१॥

ततरच वामबेधस्तु विक्षेपो दक्षिणस्य च। इत्यनेन विधानेन सम्यक् कृत्वा प्रदक्षिणम् ॥४२ ॥

भुड़गारभृतमाहूय शौचं चाषि समाचरेव। यथान्यायं तु कर्तव्या तेन हुमाचमनक्रिया ॥ ४३ ॥ आत्मप्रोक्षणमेवाद्भिः कर्तव्यं तु यथाक्रमम्। प्रयत्नकृतशौचेन सून्रधारेण यत्नतः ॥४४ ॥।

सन्निपातसमं ग्राह्यो जर्जरो विघ्नजर्जरः। प्रदक्षिणाद्यो विज्ञयो जर्जरग्रहणानतकः ॥ ४५॥

तृतीयः परिवतँस्तु विज्ञयो वै द्रुते लये। गृहोत्वा जर्जरं त्वष्टौ कला जप्यं प्रयोजयेत् ॥ ४६ ॥

वामवेद्ं ततः कुर्याद् विक्षेपं दक्षिणस्य च। तत पञ्चपदीं चंव गच्छेत् तु कृतपोन्मुख.॥।४७॥।

वामवेधस्तु तत्रापि विक्षेपो दक्षिणस्य तु। जर्जरग्रहणाद्यो डयं कृतपाभिमुखान्तकः ॥ ४८॥ चतुर्थ: परिवर्तस्तु कार्यो द्रुतलये पुन। करपादनिपातास्तृ भवत्त्यत्र तु पोडश ।। ४६ ॥।

सथश्रे द्वादश पातास्तु भवन्ति करपादयोः । वन्दनान्यय कार्याणि त्रीणि हस्तेन भूतले ॥ ५० ॥

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पञ्चमोऽधयाम /५र्६

फिर वामवेध (सूची चारी) और दाहिने पैर का विक्षेप करे। इस विधान से यथारीति प्रदक्षिणा करके भ गारधारण करने वाले पारिपार्श्विक को बुला कर (भृगार के जल से अपने को) पवित करे और उसी जल से ययोचित रीि से आचमन क्रिया करे और अपना प्रोक्षण' करे। इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक अपनी शुद्धि कर चुकने पर सूत्रधार सन्निपात के साथ ज्जर को हाथ मे ले जो विघ्नो को जर्जर करने वाला है। प्रदक्षिणा से लेकर जजरग्रहण तक का तृतीय परिवर्त द्ुत लय मे होता है। जनंर का धारण करके आाठ कलार तक मत का जाप करे फिर वामवेध (सूची चारी) और दाहिने पैर के द्वारा विक्षेप करे, फिर कुतप की ओर मँह करके पाँच कदम चले (४२-४७)। इस चसने के समम भी वामवेध के साथ दाहिने पैर का विक्षेव होगा। जर्जरग्रहण से लगा कर कुतप की और चलने तक का यह चीया परिवर्त द्रत लय मे होगा तथा इसमे हाथ और पैरो के सोलह निपात होगे, जबकि व्यश्र (दूर्वरग) मे हाथ और पैरो के बारह निपात ही होते है। इस समय हाथ से भूनल स्पर्श कर तीन बार वदना करनी चाहिये (४८ ५०)।

१ प्रोक्षण-जन छिडकु कर पविति करना। २. परिवर्त-चार सन्निपात मिला कर एक परिवर्त होता है।-नाशा० (५६३) ३ कला-कला, पात और लय-इनका उपयोग वाद्यो के वादन मे होता है। पांच निमेष (एक निमेप=एक लघु या हस्व अक्षर का उच्चारण) मिला कर एक माता होती है। मावा के योग से कला बनती है। कला के द्वारा निर्धारित होने वाला समप लय को उत्पन्न करता है (नाशा० ३१ १४)। अभि० के अनुमार आवाप आादि से द्वारा काल का परिच्छद (परिसीमन) करना कला है।

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आत्मप्रोक्षणमद्भिश्च त्यथ्र नैव विधीयते। एवमुत्थापनं कार्य ततस्तु परिवर्तनम् ॥५१ ॥

चतुरश्र® लये मध्ये सन्निपातरथाष्टमि:। यस्या लघ्यनि सर्वाणि केवलं नंधन गुरु॥ ५२।।

भवेदतिजगत्यां तुसा ध्रवा परिवर्तनी। वातिकेन तु मार्गेण वाद्येनानुगतेन च ॥। ५३॥

ललित. पादविन्यासँबंन्ध्या देवा यथादिशम्। ट्विकल पादपतनं पादचार्या गतं भवेत् । ५४॥

वामवादेन वैधस्तु कर्तव्यो नाट्ययोवतृभिः। द्वितालान्तरविष्कम्भी विक्षेपो दक्षिणस्य च ॥ ५५॥

ततः पञ्चपदी गच्छेदतिक्रान्तः पदर्थ। ततो डभिवादनं कुर्षद् देवतानां यथादिशम् ॥५६॥

वन्देत प्रथमं पूर्वा दिशं शक्राधिदेवताम्। द्वितीया द्क्षिणामाशां वन्देत यमदेवताम् ॥५७॥

वन्देत पश्चिमामाशा ततो वरुणदेवताम्। चतुर्थोमुत्तरामाशां वन्देत धनदाश्रयाम् ॥ ५र ॥

दिशा तु वन्दनं कृत्वा वामवेधं प्रयोजयेत्। दक्षिणेन च कर्तव्यं विक्षेपपरिवर्तनम् ॥५र्६ ॥

प्राड्मुखस्तु ततः कुर्यात्पुरुषस्त्रीनपुंसक: । त्रिपद्या

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पञ्चमोडध्याय:/६१

व्यश्र पूर्वरग मे जल से सूत्रधार अपना प्रोक्षण नही करता। इस प्रकार उत्थापन की विधि करनी चाहिये उसके पश्चात् फिर परिवर्तन का (५१)।

(अब परिवर्तन या परिश्तनी ध्रवाकी विधि बताते है-) यह परिवतनी घ्रुवा चतुरश ताल से युक्त मध्य लय म गायी जाने वाली होती है। इममे आठ सन्निपात होते है। इसमे त्योदश अक्षर वाला अतिजगती छद प्रयुक्त हाता है जिसमे मभी अभर लघु रहते ने केवल अतिम वष ही गुरु हाता है। इमम मुद्रधार वातिक मार्ग२ (जिसमे चार माताओ की एक कना होनी है) से वादी के द्वारा अनुगमन किया जाता हआ ललित चरणवित्यास के द्वारा सवग अलग दिशाओ मे चल कर उन दिशा्ओी क देवो की बन्ना कर। इस समय जो पादचारी की जानी है उमका प्रत्येक कत्म दो वला क प्रमाण से रखा जाता है। यहाँ भी नाट्य क प्रयोत्ता सूची चारी तथा दो ताल का अतर रखते हुए उसके साथ दाहिने पैर का विक्षेप करते है (५२-५५)।

फिर अतिब्राता चारी का प्रयोग कर पांच कदम चले और फिर दिशाओ क अनुसार देवताओ की बढना करे। (५६)।

पहले पूर्वदिशा की बदना करे, जिसका देवता इद्र है, फिर दमिण दिश की जिसका देवता यम है (५७)।

फिर वम्ण देवता वाली पश्चिम दिशा की और फिर कुदर देवता वाली उत्तर दिशा की वदना करे। दिशाओ की वदना करक वामवेध का प्रयाग करे और दाहिने पैर से विक्षेप और परिवर्तन (गोल घूमना) करे। फिर पूर्व की ओर मुख कर पुरुष, स्त्नी और नमुसक लक्षण वाले तीन डम भरता हुआ सूधार रुद्र ब्रह्मा और विष्णु का अभिवादन कर (६०) ।

१ त्यारह अक्षरो वाला जाति छद। इ०-नाश० ३२.२६। २ वार्तिक मार्ग-तीन मार्गो मे से एक, जिसमे एक पादभाग (कला) चार मातातें मिला कर बनता है।

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दक्षिणं तु पदं पुंसो वामं स्त्रीणां प्रकीतितम्। पुनद क्षिणमेव स्यान्नात्युत्किषिप्तं नपु सकम् ॥६१ ॥

वन्देत पौरुपेणेशं स्त्रीपदेन जनार्दनम्। नपु सकपदेनापि तर्थवाम्वुजसम्भवम् ॥ ६२ ।। परिवर्तनमेव स्यात् तस्यान्ते प्रविशेत ततः। चतुर्थकार. पुष्पाणि प्रगृहय विधिपूर्कम् ॥ ६३ ॥ यथावत् तेन कर्तव्यं पूजन जजरस्य तु। कृतपस्य च सर्वस्य सूत्रधारस्य चँव हि ॥६३ ॥

तस्य भाण्डसमः कार्यस्तज्जगतिपरिक्रम । न तत्र गानं कर्तव्यं तत्र स्तोभक्रिया भवेद ॥ ६५॥

चतुर्थकार: पूजां तु कृत्वान्तहितो भवेत्। ततो गेयावकृष्टा तृ चतुरश्रा स्थिता घ्र वा ॥ ६६ ॥

गुरुप्राया त् सा कार्या तथा चवावपाणिका। स्थायिवर्णाश्रयोपेता कलाष्टकविनिमिता ॥६७ ॥।

सूत्रधारः पठेतु तत्र मध्यमं स्वरमाश्रितः । नान्दी पदद्वदशभिरष्टभिर्वा्यलडकृताम् ॥ ६८ ॥ नमोऽस्तु सर्वदेवेभ्यो द्विजातिभ्यः शुभं तथा। जितं सोमेन व राज्ञा शिवं गौब्राह्मणाय च ॥ ६र्द ॥

ब्रह्मोत्तरं तर्थवास्तु हता ब्रह्मद्विघस्तया। प्रशास्ति्यिमां महाराजः पृथिवीं च ससागराम् ॥। ७० ॥

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पञ्चमोऽध्याय /६३

दाहिना पैर पुरुष का, बारया पैर स्व्री का तथा फिर से उठाया दाहिना पैर नपुमक का होता है (६१)। पुरुप चरण से ईश (शिव) की, स्त्री-चरण से जनार्दन (विष्णु) की तथा नपुसक चरण से ब्रह्मा की वदना करे (६२)। इस प्रकार परिवर्तनी ध्रुबा की यह विधि होगी, उसके अत मे पुष्प हाथ मे लेकर चतुर्थकार (सुव्धार तथा दोनो पारिपाश्विको के अतिारक्त अन्य नट) विधिपूर्वक प्रवेश करेगा (६३)। उस भी ययाविधि जर्जर की पूजा करनी चाहिये तथा सारे कुतप और सून्रधार की भी पूजा करनी चाहिये (६४)। इस पूजा के समय इसकी परिक्रमा की गतति वाद्यो के अनुसार हो। इम समय गीत नहीं गाये जायेंगे केवल स्तोभक्रिया (अथहीन अक्षर वाले बोल बोलना) होगी (६५)। इस प्रकार पूजा पूरी कर यह चतुर्थकार चला जायेगा। फिर चतुरश्र तान और विलर्बित लय मे अवकृष्टा ध्रुवा गायी जायेगी। इस अवकृष्टा ध्रुवा मे प्राय सभी वर्ण गुरु होगे, अवपाणि ताल साथ मे प्रयुक्त होगा तथा यह स्थिर या स्थायी वणोंर पर आश्रित होगी और आठ क्लाओ से रची जायेगी (६६-६७) अब सूवधार मध्यम स्वर का आश्रय लेकर बारह या आठ पदो मे अलकृत नादी का पाठ करेगा। (इस नादी का नमूना इस प्रकार है)-सब देवो को हमारा नमस्कार हो, द्राह्मगो का भी शुभ हो सदा। और राजा सोम की विजय हो, गो ब्राह्मणो का सदा कल्याण हो। ब्राह्मणो की निरतर उन्नति होती रहे, ब्रह्मद्वेपियो का अव नाश हो जाये और महाराज सागर-सहित इस पृथ्वी पर शासन करें (६८-७०)।

१ शुष्कावकृष्टा ध्रुवा के लिये द्र०-नाथ० (५१११) : स० नाशा० (१.७५)। २ जिसमे सभी स्वर सम हो वह स्थायी वर्णहै (नाशा०,२६१६)।

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राष्ट्रं प्रवर्धता चैव रड्गस्याशा समृद्धधतु। प्रेक्षाकतु ्महान् धर्मो भवतु ब्रह्मभाषितः ।। ७१ ॥ काव्यकर्तुर्यशश्चास्तु धर्मश्चापि प्रवधताम्। इज्यया चानया नित्यं प्रीयनतां देवता इति ॥ ७२॥ नान्दीपदान्तरेष्वेषु हुयेवमार्येति नित्यशः। वदेतां सम्यगवताभिर्वाग्भिस्तौ पारिपाश्विकौ॥७३॥ एवं नान्दी विधातव्या यथावल्लक्षणा्विता। ततः शष्कावकृष्टा स्यान्जर्जरश्लोकदशिका॥ ७४ ॥

नव गुर्वक्षराप्यादौ पड़ लघूनि गुरुन्नयम्। शुष्कावकृष्टा तु भवेत् कला ह्यप्टी प्रमाणतः । ७X॥।

यथा-

दिप्ले दिग्ले दिश्ले दिग्ले जम्बुकपलितकते तेचाम्। कृत्वा शुष्कावदृष्टा तृ यथावद् द्विजसत्तमाः ॥ ७६॥

ततः श्लोक पठेदेक गम्भीरस्वरसंयुतस्। देवस्तोत्रं पुरस्कृत्य यस्य पूजा प्रवर्तते ॥ ७७॥

पठेदन्यं पुनः श्लोकं जर्जरस्य प्रकाशनम । जर्जरं नमयत्वा तु ततश्चारो प्रयोजयेत् ॥७ ॥

पारिपाश्विकयोश्च स्यात् पश्चिमेनापसर्पणम्। अडडिता चात कर्तव्या ध्रू वा मध्यलयान्विता॥। ७द ॥

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पञ्च मोऽध्याय /६५

राष्ट्र की वृद्धि हो। रङ्' (प्रेक्षको) की आशाएँ पूरी हो। इस नाटक की प्रस्तुति का आयोजन कराने वाले को ब्रह्मा द्वारा बताया गया पुण्य मिले। नाटक की रचना करने वाले का यश हो। धर्म की वृद्धि हो। इस नाट्ययज्ञ के द्वारा देवता भी प्रसन्न होते रहे (७१-७२)।

नादी के प्रत्येक पद के बाद् दोनो पारिपाश्विक स्पष्ट उच्चारण के साथ हर बार-'हे आर्य, ऐसा हो हो'- यह कहे (७३)।

इस प्रकार विधिपूर्वक लक्षणो से युक्त नादी करना चाहिये। उसके बाद जर्जंर की स्तुति को निर्दिष्ट करने वाली शुप्कावकृष्टा धवा का गान करना चाहिये। इस ध्रुवा मे पहले नी बर्ण गुरु, फिर छ लघु और अतिम तीन गुरु होते हैं तथा इसका परिमाण आठ कला के बराबर होता है (७४-७५)।

(इसका उदाहरण यह है)-'दिग्ले दिग्ले दिग्ले दिग्ले जम्बुकप लितकते तेचाम्'। इस शुष्कावकृष्टा को विधिपूर्वक करके गभीर स्वर से देवस्तुति परक एक श्लोक पढे, जो जिस देव की पूजा की जा रही हो उसी के विषय मे हो २ (७६-७७)।

फिर जर्जर की स्तुति म एक अन्य श्लोक पढ़े। जजर को नमन करके (इस प्रकार रङ्द्वार की विधि पूरी कर) चारी का प्रयोग करे। इस चारी के समय दोनो पारिपा्श्विक पश्चिम की ओर से प्रस्थान करेंगे। इसके साथ मध्यलय मे अड्डिता* ध्रुवा होगी (७५-७६)।

१. अभि० ने 'रङ्' का अषयं 'नट-कुशीलव-वर्ग किया है। २ अभि० के अनुसार यहाँ से रगद्वार नामक अग बताया जा रहा है। ने अडरिता=उत्कृष्ट गुण वाली शृगाररस से युक्त ध्रुवा, द्र०-नाशा० ३२.३३४।

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६६ / सद्क्षिप्तनाट्य शास्त्रम्

चतुर्मि: सन्निपातैश्च चतुरश्रा प्रमाणतः । आद्यमन्त्यं चतुर्थ च पञ्चमं च तथा गुरु॥ ८० ॥ यस्या हस्वानि शेषाणि सा ज्ञेया त्वडडिता बुधः। अस्या: प्रयोगं वक्ष्यामि यथा पूर्व महेश्वरः ॥८१॥ सहोमया क्रीडितवान् नाना भावविचेष्टितः । कृत्वार्वहित्यं स्थानं तृ वामं चाघोमुखं भुजम् ॥८२॥

चतुरश्रमुर कार्यमञ्चितश्चापि मस्तकः । नाभिप्रदेशे वित्यस्य जर्जरं च तुलाधुतम् ॥८३े॥

वामपल्लवहस्तेन पा्दस्तालान्तरोत्थित. 1 गच्छेत्पञ्चपदीं चंव सविलासाड्गचेप्टितै: ॥। ८४॥ वामवधस्तु कर्तव्यो विक्षेपो दक्षिणस्य च। शुड्गाररससंयुक्ता पठेदायां' विचक्षणः ॥ ८५ ॥

चारीश्लोक गदित्वा तु कृत्वा च परिवर्तनम्। तरेव च पदेंः कारयँ पश्चिमेनापसर्पणम्॥ ८६॥ पारिपाश्विकहस्ते तु न्यस्य जर्जरमुत्तमम्। महाचारीं ततश्चव प्रमु्जीत यथाविधि॥८७॥ चतुरश्रा ध्रवा तत्न तथा दुतलयान्विता। चतुर्मि: सन्निपातैश्च कला ह्यष्टौ प्रमाणत ।। ८द ॥ भाण्डोन्मखेन कर्तव्य पादविक्षेपणं ततः। सूचीं कृत्वा पुन कुर्याद विक्षेपपरिवर्तनम्॥ दई॥ अतिक्रान्तः सललितः पादद्रुतलवान्वितः। ततः ॥ ई० ॥

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पञ्चमोऽध्याय/६७

इम अडडिता मे चतुसश्र साल और चार सत्निपाती के साथ गान होगा तथा पहला चौथा और पाँचवा अक्षर गुरु होगा, शेष अक्षर लघु। इस प्रकार अड्डिता ध्रुवा मे प्रत्येु पाद मे बारह वण होते हैं। शिद ने पार्वती के साथ क्रीडा करते हुए अनेक प्रकार के भावो तथा चेष्टाओ के साथ जिस प्रकार इस अड्डिता घ्रुवा का प्रयोग किया था, मैं उसको बतलाता हूँ। अबहित्य स्थान बना कर बायी भुजा को नीचे करके वक्ष को चतुरध और मस्तक की अचित रखे। जर्जर को सतुलित करके नाभिम्यल पर जमाये। बायें हाथ को पल्लव की मुद्रा में रखे, दोनो चरणो से एक एक ताल का अतर रखते हुए चले। इस प्रकार सविलास अग चेष्टाओ के साथ पाँच क्दम चले। बायें पैर से सूची चारी का प्रदर्शन तथा दाहिने पैर से विक्षेप करे साथ मे बुद्धिमान् (सूवधार) शुगाररस से युक्त एक आर्या छद का पाठ करे (८०-८५)। चारी के साथ एक अन्य श्लोक का भी पाठ करके फिर परिवर्तन (गोल घुमना) कर के जिनसे वहाँ तक आया था उन्ही कदमो से पश्चिम२ की ओर अपमर्वण करे (र६)। फिर उस उत्तम जर्जर को पारिवा्श्विक के हाथ मे रख कर विधिपूर्वक महां- बवारी का प्रयोग करे। इस महाचारी के साथ भी चतुरश् साल और दुतलय के साथ धवारें शायी जायेगी, जिसमे चार सत्निपात तथा आठ कलाएं होगी। फिर कुतप की और मुख करके चले फिर सूची चारी का प्रदर्शन करके पादविक्षेप के साथ पलट जाप (८्2)। अब अतिक्राता चारी मे तलित गति के साथ हुत लय से चलते लुए सीन ताल के अतर से पर उठाता हुआ पांच डम भरे (६०)।

१ अभि के अनुसार इस आर्या मे पार्वती का शिव के प्रति रठ्ना वर्णित होसा है। २. दर्शको की ओर नट का बढता पूर्व की ओर बढना है, उसके विपरीत (कुतप या नेपथ्यपृह की ओर) बढना पश्चिम की ओर बढना मानवा चाहिये। ३ इस धुवा का उदाहरण नाशा० मे यह दिया गया है- 'पादतलाहतिपातितशल ताषडवनृत्तमिंद प्रतयान्ते पातु जगतसुखदायि हरस्य ॥-नाशा० ५१२७

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तत्रापि वामवेधस्तु कर्तव्यो दक्षिणस्य च। तैरेव च पदेः कार्यं प्राइमुखेनापसर्पणम्॥१॥

पुनः पदानि त्रीष्येव गच्छेदप्राडमुख एव तु। ततरच बामवेध: स्याद् विक्षेपो दक्षिणस्य च ॥ ६२ ॥ ततो रौद्ररसं श्लोकं पादसंहरणं पठेत्। तस्थान्ते तु त्रिपद्याथ व्याहरेत्पारिपाश्विको॥ ई३ ॥। तयोरागमने कार्यं गानं नर्कुटकं बुघः। तथा च भारतीभेदे त्रिगतं सम्प्रयोजयेत् ॥ म४॥

विदूष कस्त्वेकपदां सूत्रधारस्मिताबहाम्। असम्बद्धकथाप्रायां कुर्यात् कथनिका ततः ॥ ६५ ॥ प्ररोचना च कर्तव्या सिद्धेनोपनिमन्त्रणम्। रडुगसिद्धौ पुनः कार्यं काव्यवस्तुनिरूपणम् ॥ द६ । सर्वमेद्र विधि कृत्वा सूचोबेधकृतरथ। पादेरनाविद्धगतैनिष्क्रानेयुः समं न्रयः ॥ ६७ ॥

प्रयुज्य विधिनवं तु पूर्वरड्गं प्रयोगतः। स्थापकः प्रविशेत् तन्र सूत्रधारगृणाकृति. ॥द॥

स्थानं तु वैष्णवं कृत्वा सौष्ठवाड्गपुरस्कृतम्। प्रविश्य रडगं तरेव सूत्रधारववैव्र जेत्॥र ददै ॥

स्थापकस्य प्रवेशे तु कतव्या डर्यातुगा ध्रूबा। हयशा वा चतुरश वा तज्जैमध्यलयान्विता। कर्यादनन्तरं चारी देवब्राह्मणरंसिनीस्॥ १००॥

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पञ्च मो ध्याय /६्६

यहाँ भी क्रमश बायें और दाहिने पैर से सूची चारी का प्रदशन करे फिर ऊपर बताये क्रम स ही पूर्व की ओर मुख करके पीछे की और हटे फिर तीन कदम पूर्व की ओर मुख किये हुये हो चले और फिर उसी प्रकार बायें पैर स सूची चारी और बाहिने पैर से विक्षेप करे (६१ ६२)। फिर रोद्र रस से युक्त श्लोक का पाठ करे जिसके चारो चरण ममासो के सयोजन से कसे हुए हो उस श्लोक के अत मे तीन कदम आमे बढ कर दानो पारिपाश्विको को बुलाये (६३) । उनके आगमन के समय नकटक ध्रुवा वा गान किया जाना चाहिये। (महाचारी के पश्चात्) भारती वृत्ति के अतगत त्रिगत' का प्रयाग करे। (इस स्रिगत म) विदूपक एक पद वाली सूत्रधार के (मुख पर) मुस्कान उत्पन करने वाली क्लबलूल बाता म भरी बातचीत करे। (त्रिगत' के पश्चात्) प्ररोचना करनी चाहिये जिसम प्रेक्षका को नाटक के अवलोक नाथ यामवित किय जाता है। रग (प्रयोग) की सिद्धि क लिय काव्य की वस्तु (नानक का कथा) का भी निस्पण करे (८४ +)। इस प्रकार पूवरग की यह सारी विशव निपटा पर तीना अभिनेता सूची चारी तथा याविद्व चारी के अतिरित्त अय चारी के द्वारा निष्क्रमण करें (६७)।

[प्रमनावना निरूपण]- इम प्रकार विधिपूवक पूवरग का प्रयोग हो चुकने पर सूवनार के क्षमान गुण औौर आकार वाला स्थापक प्रवेश कर ()। वह देहु को सोष्ठव२स युक्त रख कर वष्णव स्थान बना कर रगपीठ पर प्रवश करे और मतधार जैस चला था वैसे ही चन (दैद)। स्थापक के प्रवेश के समय भी अर्थानु कल धवा गायी जाय जो ह्यश्र या चतुरश्नताल मे मध्यलय के साथ प्रस्तुत हा। फिर देव और ब्राह्मण की स्तुति करने वाली चारी प्रदशित कर (१००)।

१ नकुटक-आठ जातिप्रकारो वाली ध्रुवा। द०-नाशा० ३२२७२-२८३ २ मोष्ठव-द्०-नाशा १०८८-६३, स० नाशा० १०५२५३

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७० / सड्क्षिप्तनाट्यशाह्त्रम् सुवाक्यमधुरे. श्लोकर्नानाभावरसान्वित.। प्रसाद्य रडगं विधिवत् कवेर्नाम च कीतयेत् ।। १०१ ॥ प्रस्तावनां ततः कुर्यात् काव्यप्रस्यापनाश्रयाम्। उद्घात्यकादि कर्तव्यं काव्योपक्षेपणाश्रयम् ॥ १०२॥ दिव्ये दिव्याश्रयो भूत्वा मानुषे मानुषाश्रप.। दिव्यमानुषसंयोगे दिव्यो वा मानुषो इपि वा ॥ १०३॥ मुखबोजानुसहृशं नाना मार्गसमाध्रयम्। नानाविधेरुपक्षेपँः काव्योपक्षेपणं भवेत् ॥ १०४॥ प्रस्ताव्यवं तु निष्क्रामेत् काव्यप्रस्तावकस्ततः । एवमेष प्रयोत्तव्य: पूर्वरड्गो यर्थाविधि ।।१०% I

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पञचमोऽध्याय/७१

अनेक भावो तथा रसो से युक्त, सुन्दर वाकयो से मधुर श्लोको के द्वारा प्रेक्षको को प्रसन्न कर (नाटक लिखने वाले) ववि का नाम बताये, फिर प्रस्तुत होने वाले नाटक की सूचना देने वाली प्रस्तावना करे जिसमे उस नादक का उपक्षेप१ (अवतरण) करने वाले उद्घात्यकादि९ का प्रयाग होता है (१०१-१०२)। दिव्य पात्री बाले नाटक मे दिव्य रूप, मानुष पात्ो वाले नाटक मे मानुप रूप तथा दिव्य मानुष दोनो पात्रो से मिश्रित नाटक के प्रयोग मे स्थापक चाहे दिव्य रूप मे आये चाहे मानुष रूप मे। मुख सधिष् तथा बीज अर्थप्रकृति के अनुसार विभिन्न पद्धतियो का आश्रय नेते हुए काव्य (नाटक) का उपक्षेप प्रयोग प्रारभ करने की कई विधियो से सभव है (१०३-१०४। इस प्रकार प्रस्तावना प्रस्तुत करके काव्य प्रस्तावक (स्थापक) निष्क्रमण करे। इस प्रकार विधिपूर्वक इस पूर्वरग का प्रयोग करना चाहिये (१०५)।

५. उपक्षेप-कथा का बीज-वपन। बीज का लक्षण स० नाशा० १८१३ पर। २. प्रस्तावना के भेदो मे एक उद्घात्यक है। द्र०-नाशा० १८११६

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॥। अथ षष्ठोऽध्यायः ।।

न शक्यमस्य नाट्यस्य गन्तुमन्तं कथक्चन। कस्माद्, उहुत्वाजज्ञानानां शिल्पानां बाप्यनन्ततः ।। १।।

रसा भावा हुयभिनया धर्मी वृत्तिप्रवृत्तय। सिद्धि स्वरास्तथातोद्य गान रड्गश्च सड्ग्रहः ॥२॥ शृड्गार हास्थकरुणा रोद्रवीरभयानकाः । वीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्ये रमा. स्मृना ॥३॥

रतिर्हासश्च शोकश्च क्रोधोतसाहौ नय तथा। जगुप्सा विस्मयश्चेति स्थायीभावाः प्रकीतिताः ॥४ । निर्वेदग्लानिशड का्यास्तथ सया मदः श्रमः। आलस्य चंव दैन्य च चिन्ता मोहः स्मृतिधु तिः ॥५ ॥

ब्रोडा चपलता हर्ष आवेगो जड़ता तथा' गर्वो विषाद औतसुक्यं निद्रापस्मार एव च॥ ६॥

सुप्तं विबोधो डमपंर्चाग्यवहित्थमथोग्रता। मरणमेव च॥७॥

त्रासश्चंव वितर्केश्च विज्ञया व्यभिचारिण। तर्या्न्निशदमी भावाः समाव्यातास्तु नामत ॥८।।

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॥ षष्ठ अध्याय।।

(रसनिरूपण)

इम नाट्य का अन पाना किमी तरह सभव नही है कयोंकि इमम अनन्न प्रकार के ज्ञान और शिल्पा का उपयाग हाना है (१)। रम भाव अभिनय, धर्मी वृति प्रवृत्ि, सिद्धि, स्वर आनोद गात तथा रग (नाट्यशाजा)-यह इम नाट य के अतगन आने वाले तत्त्वो का सब्रह है (२)। शृगार, हास्य वरुण रौद् वीर, भयानक वीभत्म अद्भुत-य जठनाटय म रस कहे गय है (३)। इन आठा रमा क्रमश - रति, हाम, शाक आाध उत्साह, भय जुगुप्मा विस्मय-व आठ स्थायी भाव है (४)। इन रसो और भावा के साथ तैतीम व्यभिचारी भाव रहते है तनक नाम इम प्रकार है-निर्वेद (वैशस्) ग्लानि शका, अस्या (ईष्या) मद, श्रम आलम्य दैन्य (दीनता) चिना मोह स्मृति, धनि (घंय) व्रोडा (नज्जा), चपलता, हर्ष आवेग, जडता, गव, विषाद औतसुक्य निद्वा, अपस्मार (मिर्गी) सुप्त (साना) रिबोध (जागना), अमप अवहित्य (आकार छिगना), उग्रता, मति व्याधि (रोग), उन्माद मरण, वाम तथा वितक (५८)।

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७४ / सद्क्षिप्तनाटयशास्त्रम् स्तम्भ: स्वेदो Sथ रोमाश्चः स्वरमडगो ऽथ वेपथुः। वैवर्प्यमश् प्रलय इत्यष्टो सात्विका, स्मृताः ॥६॥ आड गिकौ वाचिकर चंत्र हुधा हार्यः सात्विकस्तथा। चत्वारो भिनया हुयेते विज्ञया नाट्यसंशयाः ॥ १० ॥ लोकधर्मी नाटयधर्मो धर्मीति द्विविधः स्मृतः। भारती सात्वती चँब केशिक्यारभटी तथा॥ ११॥ वतत्रो वृतयो हुयेता यासु नाट्यं प्रतिष्ठितम् । आवन्ती दाक्षिणात्या च तथा चँवौढ़मागधी ॥ १२॥ पाञ्चालमध्यमा चेति विज्ञयास्तु प्रवृत्तय: । दैविकी मानुषी चैव सिद्धि: स्याद् द्विविधवत्॥१३ ॥ शारीराश्चंव वपाश्च सप्त षडजादप: स्वराः। ततं चंवावनद्धं च धनं सुषिरमेव च॥ १४॥ चतुविधं च विज्ञेयमातो्य लक्षणा्वितम् ततं तन्त्रीगतं जयमवनद् तु पौष्करम्॥ १५॥ घनस्तु तालो विज्ञय: सुषिरो वंश एव च। प्रवेशाक्षेपनिष्क्ाम प्रासा्दिक्रमथान्तरम् । १६ ॥ गानं पञ्चविधं ज्ञयं ध्रवायोगसमन्वितम्। चतुरश्रो विकृष्टश्च रड्गस्त्यशरर्च कीतितः ॥। १७॥ तत्र रसानेव तावदादावभिव्याख्यास्यामः ।न हि रसाहते कश्विदर्थ: प्रवर्तते। तत्र विभावानुभावव्यभिचारिसयोगाद रस- निष्पत्ति: । को दृष्टान्त ? अत्राह-यथा हि नाना व्यज्ञनौयधि- द्रव्यस्षयोगादू रसनिष्पत्तिः तथा नानाभावोपगमाद् रसनिष्पत्तिः। यया हि-गुडादिभिर्द्वव्यव्यंज्ञनरौषधिभिश्च वाडवादयो रसा

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षष्ठोउध्याय /७५

स्तम्भ, स्वेद (पसीना), रोमाच, स्वरभग वेपशु (कांपना), वैदष्यं (मुख का रग फीका पडना), अश्रु तथा प्रलय (मृत्यु) -- ये आठ सात्विक भाव हैं (6)। आगिक, वाचिक आहार्य तथा सात्विक-ये नाटय मे होने वाले चार अभिनय हैं (१०)। धर्मी दो प्रकार का है-लोकधर्मी तथा नाटयधर्मी। भारती, सात्वती, कैशिकी तथा आरभटी-ये चार वृत्तियाँ हैं जिनमे नाटय प्रतिष्ठित है। आवती, दाक्षिणात्य, मौढमागधी तथा पाचाली ये चार प्रतृत्ियाँ जाननी चाहिय। सिद्धि दो प्रकार की है-दवी औौर मानुषी (१११३)। पड्ज आदि (स, रि, ग म, प घ नि) मात स्वर है जो शरीर (कठ आदि स्थान से) के भी होते हैं, बीणा आदि वाद्यो के भी। तत अबनद्ध धन और सुघिर -- अच्छ लक्षणो से मुक्त वाद्य इन चार श्रेणियो मे आते हैं। तार वाले (बीणा आदि वाद्य) तत है, पुष्कर (मृदग अदि चमडे से मढे वाद्य) अवनद्ध (मँजीरा आदि) ताल वाद्य घन है तथा वशी (आदि फूंक कर बजाये जाने वाले बाद्य) सुषिर है। नाटय मे पाँच प्रकार की ध्रुवाओ के साथ पाँच प्रकार का गान होता है-प्रवेश, आक्षेप, निष्क्राम प्रासादिक तथा आतर। रग या नाटयशाला तीन प्रकार की है- चतुरश्र, विकृष्ट तथा व्यश्र (१४ १७)। अब नाटय सग्रह के उपर्युक्त ११ तत्वो मे से सबसे पहले रसो की द्वाखय। करते है। नाटय मे रस के बिना कोई भी वस्तु प्रवृत्त नही होती। विभाव अनुभाव तथा व्यभिचारी भावो के सयोग से रस की निष्पत्ति होती है। इसका उदाहरण कवा है? बताते हैं-जिम प्रकार (ससार में) कई प्रकार के व्यजनो और औषधियो (ममालो) के सयोग से रस की निध्पत्ति होती है उसी प्रकार विभिन्न भावो के समोग से रस की निष्पत्ति होती है। जिस प्रकार गुड आदि द्रव्यो, व्यजनो और

१ ध् वा के लक्षण के लिये द्र०-नाशा० ३२२८ (स० नाशा० ३१२, ३) ।

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निर्वर्त्यन्ते तथा नानाभावोपगता अपि स्थायिनो भावा रसत्वमा- प्नुवन्तीति। अव्ाह-रस इति कः पदार्थः ? उच्यते-आस्वा- धत्वात्। कथमास्वाद्यते रसः ? यथा हि नाना व्यक्षनसंस्कृतमन्नं भुख्जाना रसानास्वादयन्ति सुमनसः पुरुषा हर्षादीश्चाधिगच्छन्ति तथा नानाभावाभिव्यक्ञितान् वागड्गसत्त्वोपेतान् स्थायीभावाना- स्वा्यन्ति सुमनसः प्रेक्षका: हर्षार्दीश्चाधिगत्छन्ति। तस्मान्नाटय- रसा इत्यभिव्यात्याता: ।

नानाभिनयसम्बद्धान् भावयन्ति रसानिमान्। यस्मात् तस्मादमी भावा विज्ञया नाट्ययोक्तृभिः ॥८॥

न भावहोनो उस्ति रसो न भावो रसवजितः । भवेत् ॥ ६ै ॥

व्यञ्जनौषधिसयोगो यथान्नं स्वादुतां नयेत्। एवं भावा रसाश्चव भावयन्ति परस्परम्॥ १०॥

यथा बीजाद भवेद् वृक्षो वृक्षात्ुष्पं फलं तथा। तथा मूलं रसा: सर्वे तेभ्यो भावा व्यवस्यिताः ॥११॥

तेपामुत्पत्तिहेतवशचत्वारो रसाः। तद्यथता-शुडगारो रौद्रो वीरो बीभत्स इति।

शड्गाराद्धि भवेद्धास्यी रौद्राच्च करुणो रसः। वीरच्चंवाद्भुतोत्पत्तिर्बीभत्साच्च भयानक: ॥। १२॥।

तत्र शड गारो नाम रतिस्थायिभावप्रभवः । तस्य द्व अधि- छाने-सम्भोगो विप्रलम्भरच।

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पष्ठोऽध्याय /७5

औषधियों से पाडव आदि रस बनते हैं, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न प्रकार के भावो से युक्त स्थायी भाव रसत्व को प्राप्त करते हैं। यहाँ प्रश्न होता है कि यह रस किस प्रकार का पदार्थ है। इसका उत्तर है-रस आस्वाद्य पदार्थ है। इसका मास्वाद केस होता है-जिस प्रकार अनेक प्रकार के ब्यजनो से सस्कृत भोजन को खाते हुए सहृदय लोग रस्ष का आस्वादन करते है, और हर्ष आदि को प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार अनेक भावो से अभिव्यजित तथा वाचिक, आषिक और सात्विक अभिनय से युक्त स्थायी भावो को सहृदय प्रेक्षक आस्वादित करते हैं तथा हर्ष ादि को प्राप्त करते है। इसीलिये (नाट्य म आस्वादित होने वाले पदाथ को) नाटयरम कहते हैं।

विभिन्न प्रकार के अभिनयो से सबद्ध इन रसो को भाव भावित या अनुभूत कराते हैं इसीलिये नाट्यप्रयोक्ता इन्हे 'भाव' के रूप मे जानें (८)। भाव स रहित कोई रस नहीं और रस से रहित कोई भाव नहीं। अभिनय मे इनकी सिद्धि एक दूसरे के द्वारा की जाती है (६) 1 व्यजनो और औौषधियों का सयोग जिस प्रकार अन्न की स्वादिष्ट बनाता है उसी प्रकार भाव और रस एक दूसरे को भावित करते हैं। जिस प्रकार बीज से वृक्ष होता है और वृक्ष से पुष्प तथा फल (उनसे फिर बीज) उसी प्रकार (बीज रप) रस ही नाट्य मे मूल हैं उनसे भाव उत्पन्न होते हैं (उन भातो से फिर रसो की निष्पतति होती) है। (११)।

इन रतो मे भी चार रस मूल स्रोत है। वे ह-शृङ्गार, रौद्र, वीर और बीभत्स 1

शङ्गार से हास्य होता है और शौद्र से करुण रस। बीर से अद्भुत की उत्पत्ति होती है तथा बीभत्स से भयानक की (१२) ।

शृद्धार रति स्थायी भाव से उत्पन्न होता है। वह दो प्रकार का है-सभोग और चिप्रलभ।

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अथ हास्यो नाम हासस्थायिभावात्मक.। तस्योष्ठनासा कपोलस्पन्दनदृदष्टि व्याकोशाकुञ्चनस्वेदास्यरागपा र्श्वग्रहणादि- भिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः। व्यमिचारिणश्चास्यावहित्या- लस्ष्यतन्द्रानिद्वास्वप्नप्रबोधासूयादयः । द्विविधश्चायमात्मस्थः पर- स्थश्च। यदा स्वयं हुसति तदात्मस्थः । यदा तुपरं हासयति तदा परस्थ ।

स्मितमय हसितं बिहुसितमुपहसितं चापहसितमतिहसितम्। द्वो द्वौ भेदौ स्थातामुत्तमध्याधममप्रकृतौ ।१३॥

अथ करुणों नाम शोकस्थायिभावप्रभवः।सच शापवलेश विनिपतितेष्टजन विप्रयोगविभवनाश वघबन्धविद्रवोषघातव्यसन- संयोगादिमि विभावँः समुपजायते। तस्याध पातपरिदेवनमुखशोषण-

प्रयोक्तव्पः । व्यभिचारिण श्चास्य निर्वेदग्लानिचिन्तौत्सुक्यावेगभ्रम-

अथ रौद्रो नाम क्रोधस्थायिभावात्मको रक्षोदानवोद्धतमनुष्य- प्रकृति: सडग्रामहेतुकः।स च क्रोधाघर्षणाधिक्षेपानृतवचनो- घातवाक्पारुध्या भिद्रो हमात्सर्यादिभि विभावरुतपद्यते । तस्य च ताडनपाटनपोडनचछेदन सेदन प्रहरणाहुरणशस्त्रसम्पातसम्प्रहाररु- धिराकर्षणाद्यानि कर्माणि। पुनश्च रवतनयनुटीकरणन्त् पीडनगण्डस्फुरणहस्तार्य्नप्पेषादिभिर नुभारवैरभिनयः प्रयोकसव्यः। भावाश्चास्याकम्मो होत्साहावेगा मर्वचप लतौ प्र चगर्वस्वेदव पपुरो माश्चगद्गदादय: ।

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पष्ठोऽघ्याय /७६

हास्य रस हास स्थापी भाव नाला है। उसका अभिनय ओठ नाक और गाल के फडकाने दृष्टि के फंलाकर झपकाने सिकोडन पसीना, मुह के लाल होने तथा दोनो बगलो को दबाने आदि अनुभावो से किया जाता है। इसके व्यभिचारी भाव अबहित्या, आलस्य तद्रा निद्वा स्वप्न, प्रबोध तथा असूया आदि है। यह दो प्रकान का है-आत्मस्थ और पराथ। जब (पात्र) स्वय हसता है तो आत्मस्य हास्य रस होता है। जब वह दूमरे को हुँसाता है ता परस्थ होता है। ये आमस्थ और परस्थ दोनो हास्य भेद स्मित (मुस्कान) हसित (हँसी) विहसित (खनकती हँसी) उपहसित (हसी उड़ाना) अपहमित (विकृत हसी) अति हसित (अटटहास)-रस छ प्रकारो में उत्तम मध्यम और अधरम तीना कोटियो क हो सकने है (१३)।१ करण रस शोक स्थायी भाव स उत्पन्न होता है। शोक की उत्पत्ति भी शाप क्लेश, पतन प्रिस जनो का वियोग, वैभव्र का नाश, वद्य वधन, भगदड चोट लगना और इम प्रकार की अय विपत्तियो से होती है। इसका अभिनय आसू विराता विलाप मुह सूखना मह फीका पड़ना शरीर का ढीला होना साँस छोडना स्मृति लोप आदि अनुभाव से होता है। निर्वेद ग्लानि चिता औसमुवय आवेष भ्रम मोह यम वियाद दव्य व्याधि जडता समाद अयसमार, तास आलस्व, मरण स्तभ वेपथ, वंवष्य और स्वरभद आदि इसके व्यमिचारी भाव है। रोद्र रस क्रोधस्थायो भावात्मक है। यह राक्षस दानव और उद्धततम ननुष्यो के पानो से होता है। सग्राम इसका हेतु है। क्रोध बलपूर्वक खोचना कुवचन अठ वचन प्रहार कठोर वाणी, द्रोह मात्सय आदि विभावो से यह जन्म लेता है। मार पीट चीरना पीडन (दबाना), छदन, भेदन शस्त्रो को लाना और फँकना शस्त्रो से प्रहार करना खून निकालना सीचना आदि इसके अनुभाव हैं। इसका अभिनय लाल वाँखो भ्रकुटी टेढी करना दाँत पीसना ओठ दबाना गडस्थल (कनपटी) का फडकना हथेलियाँ मसलना आदि अनुभावो से होता है। सम्मोह उत्साह आदेग अमध चपलता उप्रता गब पसीना, कॅफकपी रोमाच तथा गद्गद् (स्वरभग) आदि इसके व्यभिचारी तथा सात्विक भाव हैं। १ स्मित उत्तम पात्ो मे अधिक होता है। इसमे माल थोडे से विकसित होते हैं आखो में सोष्ठव आ जाता है। हसित भी उत्तम पात्रो मे होता है। इसमे योे से दांत झलकते है। विहसित तथा उफ्हसित मध्यम श्रणी के पातो मे अधिक होते हैं। विहमित मे आंख तथा गाल सिकुडते हैं हँसी का स्वर हल्का और मधुर होता है। उपहमित मे नासिका फूल जाती है। दृष्टि टेढी रहती है। अटटहसित अधम पाव्ो मे होता है। इसमे कधे कारते हैं पेट मे बल पड जाते हैं तथा आँघो मे आँसू तक आा जाते हैं। -नाशा० ६.५३५६

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८० / सदक्षिप्तनाट्यशास्तम्

अथ वीरो नामोत्तमप्रकृतिरुत्साहात्मकः। सचासम्मोहाध्य-

अथ भयानको नाम भयस्थायिभावात्मक: । स च विकृत

दर्शनश्र तिकया दिभिविभावैरुत्पध्यते। तत्य प्रवेपितकरचरणनयन- चपलदुलकमुख वैवर्ण्यस्वरभेदादिभिरनुभावैरभिनये प्रयोक्तव्यः।

मोहदैन्यावेगचापल जडता त्रा सापस्मार म र णादम । अथ बोभत्सो नाम जुगुप्सास्थायिभावात्मकः । स चाहुद्या- प्रियाचोप्या निष्टशवणदर्शनकी तना दिभि विभावरुत्पद्यते। तस्प

भिनय प्रयोक्तव्य। भावाश्वास्यापस्मारोद्वेगावेगमोहव्याधिमरणा दय: १ अथाद्भुतो नाम विस्मयस्थाययिभावात्मकः।स च दिव्यजन-

जालसम्भावनादिभि विभावरुत्पद्यते। तस्य नयनविस्तारानिमेष-

चेलाइगुलिभ्रमणादिभिरनुभावरभिनय प्रयोवतव्यः । भावाश्चास्य स्तम्भाश्रुस्वे दगद्गढरोमाञ्चावेगसम्भ्रमजडताप्रलयादयः। अथ शास्तो नाम शमस्यायिभावातमको मोक्षप्रवर्तकः। स

यमनिय माध्यात्मध्यानधारणोपासनसर्व भूत या लिड् ग ग्रहणादि भिरनुभावरभिनय. प्रयोकतव्यः। व्यमिचारिणश्चास्य निर्वेदस्सृति-

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षष्ठोऽध्याय /८१

उत्तम श्रेणी के पात्ो मे होने वाला उत्साह स्थायी भाव वाला वीर रस है। वह असम्मोहू, अध्यवसाय (निश्चय1, नय (नीति), विनय, बल, पराक्रम,र्शक्ति, प्रताप, प्रभाव आदि विभावो से उत्पन्न होता है। उसका अभिनय स्थरता, धैर्य, शीर्य, त्याग, चतुरता आदि अनुभावो से कग्ना चाहिये। घृति, मति, गर्व, आवेग, उप्रता, अमर्ष, स्मृति तथा रोमाच आदि इसके सचारी भाव है।

भयानक रस भय स्थायी भाव वाला है। वह विकृत आवाजो, हिमक पशु के दर्शन, सियारो या उल्सुओ को बोली से वास होना, उद्वेग, सूने घर या जगल मे जाना, अपने प्रिय जन का वध या बधन देखना-सुनना या उमकी चर्चा करना- इस प्रकार के विभ्वावो से उत्पन्न होता है। उसका अभिनय काँपते हाथ-पैर, फडकती आँर्खे, मुँह का फीका पडना, स्वर टूटना आदि अनुभावो से होता है। स्तभ, स्वेद, अधु, रोमाच, कँपकेंपी, स्वरभग, ववण्य (ये सात्विक भाव) तथा शका, मोह, स्मृति, दैन्य, आवेग, चपलता, जडता, नास, अपस्मार और मरण-ये इसके मचारा भाव हैं। बोभत्स रस जुगुप्सा स्थायी भाव बाला है। वह अमुदर, अप्रिय, अभक्ष्य तथा अनिष्ट पदार्थों के श्रवण, दर्शन, कीतन आदि विभावो से उत्पन्न होता है। उसका अभिनय सारे अगो को सिकोडना, मुँह विचकाना या घुमा लेना, थूकना या उद्विग्न होना-इण अनुभावो से होना चाहिये। अपस्मार, उद्वेग, आवेग, मोह, व्याधि तथा मरण आदि इसके सचारी भाव हैं।

अद्भुत रस का स्थायी भाव विस्मय है। वह देवताओ का दर्शन, इच्छित मनोकामना का पूरा हो जाना, उपवन या मदिर आदि मे जाना, माया, इद्रजाल आदि विभावो से उत्पन्न होता है। उसका अभिनय आंखो का फैलना, अपलक देखना, रोमाच, अश्रु, हर्ष, साधुवाद (शाबासी) देना, निरतर हाहाकार, हाथ, मुंह, कपडा, अंगुली आदि घुमाना-इत्यादि अनुभावो से होता है। स्तभ, अश्र, स्वेद, गद्गद, रोमाच, आवेग, सभ्रम, जडता तथा प्रलय आदि इसके सात्विक तथा सचारी भाव हैं। शम स्थायी भाव वाला तथा मोक्ष मे प्रवृत्त कराने वाला रस शात है। वह तत्वज्ञान, वराम्य, आशय शुद्धि आदि विभावो से उत्पन्न होता है। उसका अभिनय यम, नियम, अध्यात्म, ध्यान, घारणा, उपासना, सर्वभूतदया, सन्यास-ग्रहण आदि अनुभावो से करना चाहिये। निर्वेद, स्मृति, धृति, सभी आश्रमो की पविव्रता, स्तभ, रोमाच आदि इसके भाव हैं।

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। अथ सप्तमो्यायः ॥

विभावेनाहुतो योयों हुयनुभावैस्तु गम्यते। वागड्गस्त्वाभिनयें: स भाव इति संतितः ॥१॥ वागड्गमुखरागेण सत्वेनाभिनयेन च। कवेरन्त्गतं भावं भावयन् भाव उच्यते ॥। २ ।। नानाभिनयतम्बद्धात् भावयव्ति रसानिमान्। यस्माव् तस्मादमी भावाविज्ञेया नाट्ययोदतृभि ॥३॥

अथ विभाव इति कस्माव ? उच्यते-बिभावी विज्ञानार्थ:। विभाव: कारण निमितं हेतुरिति पर्याया। विभाव्यनते उनेन वागडगसत्त्वाभिनया इत्यतो विभावः । यवा विभावितं विज्ञात- मित्यनर्थान्तरन्।

अथानुभाव इति कस्माव् ? उच्यते-अनुभाव्यतेडनेन वागडग- सत्वकृतो S भिनय इहि।

1 अनुभावा विभावाशच नयास्त्वभिनये वुधः ॥४॥ तत्राथ्टौ भावा. स्थायिनः। तमस्त्रिशद् व्यभितारण.। अष्ठौ सात्त्विका इति भेदा:। एवमेतें काव्यरसाभिव्यक्तिहेतव एकोनपश्चाराद् भावाः प्रत्यवगन्तव्याः । एभ्वश्च सामान्यगुण- योगेन रसा निष्पद्यम्तें।

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। सप्तम अध्याय ।।

(भाव निरुपणम्)

नाट्यप्रस्तुति मे जो अर्थ विभाव के द्वारा आहुत या उत्पादित, अनुभावो के साथ वाचिक, आगिक और सात्विक इन तीन प्रकार के अभिनयो से प्रतीत कराया जाता है वह भाव है (१)। वानिक तथा आगिक अभिनव औोर मुखराग तथा सात्विक अभिनय के द्वारा कवि के मन के भीतर के भाव को जो भावित कराता है, वह नाटयप्रस्तुति म भाव है (२)। अनेक प्रकार के अभिनयो से सबद्ध दसो को भावित कराने के कारण नाट्य प्रयोक्ता भावो को भाव के रूप मे जानें (३)।

अब प्रश्न उठता है कि विभाव को विभाव क्यो कहते है? उत्तर मे कहते है-विभाव का अर्थ विज्ञान (विशेष ज्ञान कराना) है। विभाव, कारण, निमित्त, हेतु-ये पर्याय है। वाचिक, आगिक और सात्विक अभिनय इमके द्वारा विभावित (सुस्पष्ट रूप मे प्रतीत) होते है अत विभाव को विभाव कहा जाता है। विभावित होना या विशिष्ट रूप में ज्ञात होना एक ही बात है।

अनुमाद को अनुभाव कयो कहते है? वाचिक, आगिक और सात्विक अभि- नय जिसके द्वारा अनुभावित (अनुभव के योग्य) बनते हैं वह बनुभाव है।

अभिनय मे अनुभावो और विभावो को लोकस्वभाव से उत्पन्न तथा लोक- याता (लोकव्यवहार) का अनुगमन करने वाला जानना चाहिये (४) भावो के ४६ भेद हैं। इनमे आठ स्थायी भाव, तैतोस सचारी भाव और आाठ सातत्विक भाव आते हैं। इस प्रकार काव्यरस की अभिव्यक्ति के हेतु इन ४र्६ भावो को जानता चाहिये। इनसे सामस्य गुणयोग (माधारणीकृत रूप मे मिश्रण) से रस उत्पक्न होते हैं।

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व्यभिवारिण इति कस्मात्? विवि माभिमुस्येन रसेषु चरन्तीति व्यभ्िचारिणः । वागडगसत्वोपेताः प्रयोगे रसान्त- यन्तीति व्यभिचारिणः ।

अन्राह-किमन्ये भावाः सत्वेन बिनाभिनीयन्ते यस्मादुच्यते एते सात्विका इति। अत्रोच्यते-इह हि सत्त्वं नाम मन.प्रभवम्। तच्च समाहितमनस्त्वादुच्यते। मनसः समाधौ सत्वनिष्पत्ति- भंवति। तस्व यो 5 सौ स्वभावो रोमान्चाश्रुववर्ण्यादिलक्षणो यथा भावोपगत. स न शक्यो 5 न्यमनपा कतुमिति। लोकस्वभावा- नुकरणत्वाच्च नाट्यस्य सत्वमोप्सितम्। को दृष्टान्त :- इह हि नाट्यर्घमिप्रवृत्ता: सुखदुःखकृता भावास्तथा तत्वविशुद्धाः कार्या: यथा सरूपा भवन्ति। तत्र दुःखं नाम रोदनात्मक तत्कथमदुःखितेन सुखं च प्रहुर्षात्मकमसुखितेन वाभिनेयम्। एतदेवास्य सत्वं यत् दुःखितेन सुखितेन वा S थुरोमाक्चो दर्शयतव्यौ इति कृत्वा सात्विका भावा इत्यभिव्यास्याता: ।

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सप्तमोऽध्याय /८५

व्यमिवारी भावो को व्यभिचारी भाव क्यों कहते है? जो रस के प्रति विभिन्न प्रकार से अनुकूल दिज्वा मे सचरण करते हैं, वे व्यभिचारी भाव हैं।

(सत्व से अभिनीत होने वाले भाव सातत्विक भाव है।) अब प्रश्न उठता है कि वमा बाकी भाव सत्त के बिना अभिनीत होते है। इसके उत्तर मे बताते हैं- नाट्यप्रस्तुति मे सत्त्व मन से जन्म लेता है। (अभिनेता का) अपने चित्त मे एकाग्र होना सत्त्व है। मन की इस समाधि मे सत्व की निष्पति होती है। उस सत्व को रोमाच, अश्रु, वव्ण्य आदि जो भाव के अनुसार होने वाला स्वभाव है, उस चित्त की विचलित स्थिति में नहीं किया जा सकता। नाट्य लोवस्वभाव का अनुकरण है अत इसम भी सत्व अपेक्षिन है। इसमे दृष्टात क्या है? नाट्यप्रस्तुति मे नाट्यधर्मी" के द्वारा प्रवृत मुख और दुख से जन्मे भावो को सत्व क द्वारा इस प्रकार विशुद्ध बनाना चाहिये कि वे (लोक के) जैसे प्रतीत होने लगे। इसमे दुगन का स्वर्प रुदन से झलकता है। रुदन वह कैसे करके दिखायेगा जो स्वय दुखी न हो। उसी प्रकार हर्ष के भाव को वह कँसे करके दिखायेगा जो स्वय सुखी न हो? इसलिये यह अभिनेता का सत्त्व ही है जिससे वह दुखी और सुखी की भूमिका मे क्रमश अश्ु या रोमाच दिखा सकता है, इसलिये अश्चु, रोमाच आर्दि को सात्विक भाव माता गया है।

१ देखें-स० नाशा० अ० १३

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॥। अय अष्टमोऽध्याय: ।।

यस्मात् प्रयोगं नर्यत तत्मादभिनय: स्वृतः ॥१॥

विभावर्यत यत्मान्च नानार्थन हि प्रयोगत.। शााखाइगोपाड्गतंयुवतल्तत्नादमिनयः स्मृकः॥२॥

चतुरविधर्चेष नवेन्नाव्यस्यानिनयो दविजाः। अनेक मेदबहुतं नाठ्यमस्मित् प्रतिष्डितन्॥३॥

आडनिको वाचिकर्चंव हयाहारयं:सात्विकसतया। ज्ञ पस्त्वभितयी विप्ाश्चतुर्घा परिकीतितः ॥४ ॥

त्रिदिधत्त्वाडगिको ज्यः सारोरो मुखउस्तया। तथा चेष्टाकृतरवंव शाखाङ्गोपाड्गसपुतः ॥। ५॥।

1 अड्गप्रत्यड्गलंयुक्त षडङ्गो नाद्यमंग्रह: ॥।६॥ तस्व शिरोहस्तोर पारर्वकटीपादत: पडड गानि। नेत्रभ्न नामाधरकपोलचचिक्ठुकान्युपाड, गानि

अस्य शाखा च नृतं च तर्थवाडकुर एव क। वस्तूचमिनयत्येह विज्ञयानि प्रयोक्तृनिः॥=॥

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। अष्टम अध्याय ॥

(आगिक अभिनय)

'अभिनय' शब्द अभि (=आगे या सामने) उपसर्ग को नी (ले जाना) धातु मे जोड़ने से बना है। जो नाटक के अर्थ (रस, भाव) को दर्शको के आगे ले जाये वह अभिनय है (१)। शाखा, अगरे तथा उपागो के सयोग से प्रयोग के समय विभिन्न अर्थों का अनुभव अभिनय से होता है (२)। हे द्विजो, नाटय मे अभिमय चार प्रकार का होता है। अनेक भेदो वाला नाट्य इसी मे प्रतिष्ठित है (३) । अभिनय के चार प्रकार हैं-आगिकि, नाचिक, आहार्य तथा सात्विक (४)। शाखा, अम और उपागो से युक्त आगिक अभिनय तीन प्रकार का है-शारीर, मुखज तथा चेप्टाइृत।

यह नाट्य छ अगो बाला है। इससे छ अगो मे शरीर का हर अम प्रत्यम आ जाता है। ये अग है-सिर, हाव, कटि, वक्ष, पार्श्व और चरण (६)। आगिक अभिनय के अतर्गत सिर, हस्त, वक्ष, पार्श्व, कटि और पाद-ये छ अग तथा नेत्, भ्रू, नासिका, अधर, कपोल तथा चिबुक (कुइडी)-ये छ उपाग हैं (७)। आगिक अभिनय के अतर्गत शाखा, तृत और अकुर इन तीन वस्तुओ को भी प्रयोक्ताओों को समझना चाहिये (८)।

१ शाखा के लिये आगे (स० नाशा0 रूई) देखें। २ वही।

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आङ्गिकस्तु भरवेच्छासा हुयड़कुर: सूचना नवेद। अड गहार-विनिष्पन्न नृतं तु करणाधयम्॥रईै॥।

आकम्पितं कम्पितं च् धुतं विधयुतमेव च। तथाविश्वतम् ॥1१0 ॥

निहश्चितं परावृत्तमुत्किप्तं चाप्य धोगतम्। लोलितं व्ेति वित्धं तयोदशविवं शिर । ११॥

कान्ता नयानका हात्या करुणा चाहभुता तथा। रौद्रा बीरा च वीभत्सा विज्ञया रसदृष्टयः ॥१२॥

स्निग्धा हृष्टा च दोना च कुद्धा दुप्ता अपान्विता। जुगुप्सिसा बिस्मिता न स्थाविभावेषु दृष्टयः ॥१३॥

शन्या व मलिना चंव आास्ता लज्जान्विता तथा। उलामा च राङकिता चैव विषम्णा मुकुला तथा॥ १३॥

कज्वता चामितप्ता च जिहुमा सलसिता तथा। वितकिताघंमुकुला विभ्रान्ता विप्तुता तथा ॥१४॥

आकेकरा विकोशा च त्रता च नदिरा तथा। षद्िशद् हृष्टयो हुयेतासतालु नाटयं प्रतिष्टिपतन्॥ १६॥

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अष्टमोऽध्याय/दर्६

अगसचालन शाखा है अकुर (उम अमसचालन) के द्वारा सूचना देना। मगहारो से निष्पन्न तथा करणो पर आधारित (आगिक अभिनय) नृत्त है। ()

[छ अगो की स्थितियाँ बताते हैं।-सिर तेरह प्रकार का होता है-आक पित (ऊपर तथा नीचे धोरे धीरे हिलाया गया) कपित (बार बार तेजी से हिलाया गया), धुत (धीरे से वेचित) विधुत (तेजी से हिलाया गया), परिवाहित (दोनो पाष्वों मे क्रमश कपित) आधृत (तिर्छा तथा एक बार ही कपित) अदधूत (नीचे की ओर एक बार कपित) अचित (झुकी बीवा बाला) निह्चित (कछे ऊपर फैला कर ग्रीवा को सकोच देन पर। परावृन (गोन घुमाव तिया गया) उत्क्षिपन (ऊपर उठा), अधोगत (नीच युका) तथा लौलिन (बारो और घुमाया गगा) (१० ११)। आठोरसो के अनुमार आठ रस दृष्टियाँ है-काना भयानका हाम्या करणा अद्भुता रोद्रा वीरा तथा बीभत्सा (१२)। आठ स्थायी भादो के अनुमार- स्निग्धा हृष्टा दोना क्रुद्धा दृप्ता भयाविता जुगुष्मिता तथा विस्मिता-य आठ दृषिगियां है (१३) ।

सचारी भावो के अनुमार ३६ दृष्टिरया है-शूया, मनिना" धाता (यकी) लज्जान्विता रलाना (मुरझाई) झकिता, विषण्णा (उदास) मुदुला (खिलती हुई) कचिता (मिकुडी), अभितप्ता २ जिह्या (टेढी) सललिता र वितर्किता, अद्भुकुला वभ्राता, विप्लुता आकेकरा* विकोशा, वस्ता तथा मदिरा-से ३६ दृष्टिया हैं इनमे नाट्य प्रतिब्ठिन है (१४ १६)।

१ बरोनियां कांपती हुई हो, पलकें सिकुडी न हो। २ घूनती पुतरलियो से द्वारा विष्न या दुगति प्रदशित करती हुई। २ माधुय मा प्रमभाव से भरी। ४ जिसमे पलके पहले कांें फिर स्यिर हो जायें पुतलियाँ ऊपर की और फडकती रहे। ५ पलके और आँखो के कोने सिकुडे हो, एक दूसरे से मिले तथा आघ खुले हो, पुनलियाँ गोल घूमती हो। ६ फंमी खुली पलको बाली, हिलती पुतलियो के साथ।

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[ताराकर्म]- स्रमणं वलनं पातरचलनं सम्प्वेशनम्। विवर्तनं समुदवृत्तनिष्क्राम: प्राकृतं रभा ॥ १७॥ [पुटकर्म ]- उन्नेषरच निमेषश्व प्रसृतं कुज्चितं समन्। विर्वाततं त स्कुरितं पिहितं सविताडितन् ॥ १॥ नता मन्दा विकृष्दा व सोच्छवासाय बिकूिता। स्वाभाविका वेति बुर्ध: पड़विघा नालिका स्वृता ॥ १६॥ विवर्तनं कम्पनं च वितगो विनिगूहनन्। सन्दष्टकं समुद्गं व षट्कर्माम्यघरस्य सु॥ २० ॥ वितिवृतं व विधुतं निर्भुग्नं भुग्तमेव न। विवृत च तयोद्धाहि कर्माण्यत्रात्यजाति तु॥ २१॥ वयातो नुखरागस्तु चतुर्घा सम्प्रकोतित: । स्वानाविरु: प्रतन्नरय रक्तः श्यामो ज्र्यतंधयः ॥ २२ ॥ समा नतोन्नता हपधा रेविता कश्चितान्चिता। वलिता विवृत्ता क स्ोवा नवविद्यार्यत. ।। २३।।

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आंख की पुतनियों के टै कर्म ये हैं-भ्रमण,१ वलन,२ पात,१ चलन, भ सप्रवेश," विवर्तन,' समुद्वृत्त," निष्क्राम, तथा प्राकृतह। पुतलियो के कर्म भी नौ है-उन्मेष,1० निमेष, " प्रमृत, १२ कचित,१ सम,१४ विवतित,१४

(१७-१८) । स्फुरित (फडकना) पिहित (मुंदी होना) तथा सविताडित (जल्दी से झपकाना)

नासिका छ प्रकार की है-नता, 1 मदा, १७ विकृष्टा १८ सोचछवासा,१८ विकूणिता (सिकुडी) तथा स्वाभाविकी (१६)। मधर (निचले ओोठ) के छ कर्म हैं- विवर्तन,२० कपन, विसर्ग,२१ बिनिगूहत (छिपाना) सदस्टक (दात से दबाना) तथा समुदग (बाहर की ओर ऊँचा करना) (२०)। मुख के छ कमं इम प्रकार हैं- विनिवृत्त (खुश), विधुत (तिरछा फेलाया) निरभुग्न (नोचे झुका) व्याभुग्न या भुग्न (कुछ खुला हुआ) विवृत्त (ओठ जिसमे सटे हो) तथा उद्वाहित (ऊपर उठा हुआ) (२१) । अभिनेय अर्थ के अनुमार स्वाभाविक प्रसन्न, रक्त तथा श्याम-यह चार प्रकार का मुखराय है (२२) । अभिनेय अर्थ के अनुसार ही प्रीवा तो प्रकार को होती है-समा, नतोन्नता व्पशा (तिरछी) रेचिता (मागे बढी) कुचिता (सिकुडी), अचिता (झुकी) बलिता (घुमाई) तथा विवृता (सामने स्थित) (२३)।

१ गोल घुमाव। २ तिरछा से जाना। ३ ऊपर से नीचे आना। ४ दोनो सोर बराबर घूमना। ५ अदर खीचना। ६ कटाक्ष। ७ फैलाकर ऊपर उठता। ८ बाहुर धकेलना। द सहज अवस्था। १० खुलना। ११ बद होना। १२ फैंलना। १३ सिकुडना। १४ स्वाभाविक अवस्था। १५ ऊपर उठना। १६ चपटी। १७ स्थिर नथुनो वाला। १5 फूले तथुनो वाली। १६ माँस खीचती हुई। २० फडकना या नौने झुवना। २१ बाहर निकालना।

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। अथ नवमोडयायः ॥

पताकस्व्रिपताकश्च तथा वं कर्तरीमुख। अर्धचन्द्रो हयरालश्त शुकतुण्डस्तर्थँव च ॥ १॥

मुद्टिश्च शिखराय्यश्च कपित्थ, खटकामुखः । सूच्यास्य. पद्मकोशः सर्पशिरा मृगशीर्षक: । २॥।

काड्गूलको इलपद्मश्च चतुरो भ्रमरस्तथा। हंसास्यो हंसपक्षशच सन्दंशो मुकलस्तया ॥ ३॥

ऊर्णनाभस्ता म्रचूड श्चर्तुविश तिरीरिता 1 असंयुताः सयुताश्च गदतो मे निबोधत ॥४॥

अञ्लिश्च कपोतश्च कर्कटः स्वस्तिकस्तया। खटकावर्धमानरच ह्युत्सड्गो निषधस्तया। ५॥

दोल: पुप्पपुटरचंव तथा मकर एव च। गजदन्तो ड््वहित्थश्त् वर्धमानस्तर्थव व॥ ६॥

एते तु संयुता हुस्ता मया प्रोवतास्त्रयोदश। नृत्तहस्तानतश्चोध्वं गदतो मे निबोधत ॥ ७ ॥

चतुरश्रौ तथोद्वृत्तौ तथा ततमुखौ स्मृतौ। स्वस्तिकौ विप्रकीणो चायरालखटकामुखौ॥रू॥

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।। नवम अध्याय ।।

[आगिक अभिनय मे हस्त तीन प्रकार है-अमयुत, सयुत तथा तृत्तहस्त। असयुत हस्त २४ है।-पताक, त्रिपताक, क्तरीमुख, अर्धचद्र अराल, शुकतुड, मुष्टि, शिखर, कपित्थ, खटकामुख, सूची, पद्मकोश, सर्पशीर्ष, मृगशीरषक कागू, अलपद्म, चतुर, भ्रमर, हसास्य, हसपक्ष, सदेश, मुकुल, ऊर्णनाभ तथा ताम्र चूड़। अब सयुत हस्त बताते है (१४)-अजलि, कपोत, ककट, स्वस्तिक, खटवा चर्धमान, उत्सग निषछ, दोल पुष्पपुट, मकर, गजदत, अवहिन्य तथा वर्धमान-ये तेरह समुल हस्त मैंने बतलाये। अब मैं नृत्तहस्त बताता हूँ (५-७)। चतुरश्, उददत्त, तलमुख, स्वस्तिक, विप्रकोर्ण, अराल खटकामुख,

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आविद्धवक्रौ सूच्यास्यौ रेचितावर्धरेचितौ। उत्तानवञ्चितौ चैंव पल्लवी च तथा करौn ै॥ नितम्बा्वपि विज्ञयो केशबन्धौ तर्थव च। लताख्यौ च तथा प्रोक्तौ करिहस्तौ तथव च। पक्षवञ्चितकौ चैव पक्षप्रद्योतकौ तथा। ज्ञथौ गरुडपक्षी च दण्डपक्षावतः परम्॥ १०॥ ऊर्ध्वमण्डलिनौ चैव पार्श्वमण्डलिनी तथा। उरोमण्डलिनौ चॅव उरःपार्श्वर्धमण्डली।।११॥ मुष्टिकस्वस्तिको चार्पि नलिनीपद्मकोशकौ। अलपल्लवोत्वणो च ललितौ वलितौ तथा। चतुःपप्टिकरा हुयेते नामतो sभिहिता मया ॥१२॥ प्रसारिता समा: सर्वा यस्थाड्गुत्योभवन्ति हि। कुश्चितश्च तथाड्गुष्ठः स पताक इति स्मृतः ॥१३ ॥ एव प्रहारपाते प्रतापने नोदने प्रहुषे च। गर्वे डप्यहमिति तज्जञैललाटदेशोस्थित कार्यः ॥ १४ ॥ पताके तु यदा वक्रानामिका त्वडगुलिर्भवेत्। तिपताक: स विज्ञयः कर्म चास्य निबोधत ॥१५॥ आवाहनमवतरण विसर्जन वारणं प्रवेशश्च। उन्नामन प्रणामो निदर्शनं विविधवचनं च॥ १६।। त्रिपताके पदा हस्ते भवेतृष्ठावलोकिनी। तर्जनी मध्यमायाश्च तदासौ कतंरीमुख॥१७॥

ऊ्ध्वंमुखेन तु कर्याद् दष्टं शृड्गं च लेखं च ॥ १६ ।।

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नव मोडध्याय /६५

आविद्वक्र, सूच्यास्य, रेचित, अर्धरेचित, उत्तान-वचित, पल्लव नितब, केशबध, तता, करि, पक्षवचितक, पक्षप्रद्यो तक, गरुडपक्ष, दडपक्ष, ऊध्वंमडली, पाशर्वमडली, उरोमडली, उर पश्वर्धमडली मुष्टिक स्वस्तिक, नलिनीपद्मकोश, अलपल्लव, उल्वण, ललित तथा वलित। इस प्रकार (असयुत सयुत तथा नृत हुस्त मिला कर) कुल ६४ हस्तो के नाम मैंने गिनाये (८१२)।

(अब मैं असयुतत हस्तो के लक्षण बताता हूं-)

जिसकी सारी अँगुलियां समान रूप से (एक दूसरे से सट कद) फंली हुई हैं तथा अंगूठा कुचित हो वह पताक हस्त है (१३)। यह प्रहार करने, आग तापने, प्रेरित करने या चलाने, हषित या गर्वित होने मे प्रयुक्त होता है तथा यह मै हूँ' ऐसा बताने पर इसे ललाट पर लाया जाता है (१४)। पताक मे अनामिका अगुली जब वक्र हो तो इसे त्निपताक जानना चाहिये। इसका विनियोग-आवाहन (बुलाना), उतरना विसजन (बिंदा देना) रोकना या सना करना, प्रवेश करना उठना प्रणाम करना निर्देश देना या विविस वचन आदि मे जानना चाहिये (१५ १६।

विपताक मे ही जब तर्जनी अँगुली को मध्यमा के पीछे ले जाया जाय ता कर्नसेमुख हस्त होता है जिसका उपयोग मार्ग पर पैर रखने पैरो मे महावर आदि लगाने या रग भरने मे होता है तब इसे नीचे झुका कर रखा जाता है, जब दशन (काटना इसना), सीग गजाना या लिखना-इनमे होता है तो इसे ऊर उठाकर रखा जाता है (१७१८)।

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मत्याड गुल्यस्तु विनता: सहाड गुष्टेन चापवव्। सो 5 धंचन्द्र इति ख्यातः करः कर्मात्य वक्यते ॥1 १ु६॥

एतेम बालतरवः शशिलेखा कम्बु कलरावलयानि। निर्धाटनमायस्तं मध्यौपम्यं व पीनं न॥ २०॥

आद्या घमुलंता कार्या कु्चितो 5 ङ्गुष्टकस्तथा। शंपा भिल्लोधर्ववलिता हुयराले S इगुलयः करे॥ २१॥

एतेन सत्त्वशौष्डीर्य वीयकान्ति धृति दिव्यगाम्भीयम्। आशीर्वादाश्च तथा भावा हिततंज्ञकाः कार्या: ॥ २२॥

अरालत्य वदा वक्रानामिका त्वड चुलिभवेद। शुक्षतुण्डत्तु त करः कर्म चात्य निबोधत ॥ २३॥

एतेन त्वभिनेयं नाहं न त्वं न कृत्ममिति चायें। आवाहने विसरगे धिमिति बचने व सावतन्॥२४॥॥

अङ्गुल्यो मत्म हत्तत्व तलमध्ये 5 प्रतंत्थिता: । तासामुर्वर वाडगुप्ठ स मुध्धिरिति संजित: ॥२४॥

एष प्रहारे व्यायामे निगमे मोडने ता। संवाहने 5 सियष्टीनां दण्डकुन्तम्रहे तथा॥। २६॥

अत्यंब च यदा मुष्टेरूर्ध्वो 5 ङगुष्ठः प्रजुज्चते। हस्तः स शिखरो नाम तदा जेय. प्रयोक्तृमिः ॥।२७ ।।

रश्मिकशाड कराधतुषां तोमरशक्तिप्रमोक्षणे चँव। वंद ॥ २८ ॥

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अँगूठे के साथ अंगुलियाँ धनुप की तरह झुकी हुई हो तो अर्धंचद्र हस्त होता है। इसके द्वारा निम्नलिखित वस्तुओ या कार्मों का प्रदर्शन होता है -- पौधे, चद्रमा, शब, कलश, कगन, बाहर धकेलना, परिश्रम तभा कमर का पतला होना या मोटाई (१६, २०)। जधंचद्र मे पहली अँगुली धनुष की तरह झुकी रहे, अँगूठा कुचित हो, शेप अंगुलियाँ ऊपर की ओर बलित हो तो अराल हस्त होता है। इसके द्वारा सत्व (सार, बल, प्राण), शूरता, पराक्रम, काति, धर्स, दिव्य- गाभीर्य तथा आशीर्वाद आदि हितसूचक भाव दिखाये जाने चाहिये (२१, २२)। अराल हस्त की ही अनामिका जब देढी हो. तो शुक्तुड हस्त होता है। इसका कर्म इस प्रकार है-इसके द्वारा मैं नही, तुम नही, यह कार्य नही-इस प्रकार के अर्थ का अभिनय करता चाहिये, या आवाहन, विसर्जन, धिक्कार और अवज्ञा के वचनो का (२३, २४)। जिस हृस्त की अॅगुलियाँ हधेली के बीच आगे स्थित हो, अँगूठा उनके कपर रखा ही, तो मुष्टि हस्त होता है। इसका विनियोग प्रहार, व्यायाम, निर्गम, पीडन (थन से दूध दुहने या दवाने), सवाहन, तलवार और लाठी पकडने या डडा, भाला आदि उठाने मे होता है (२५, २६)। मुष्टि हस्त मे ही अंगूठे को ऊपर रखा जाय तो शिखर हस्त बन जाता है। इससे लगाम, कुश, अकुश (हाथी के माये पर मारने की हथोडी), तोमर, शक्ति आर्दि छोडना, निचले ओठ या पैर को रगना तथा बालो का उमाना-ये कार्य प्रदर्शित होते हैं। (२७, २८)

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नवमोऽध्याय/दर्

इसी शिखर हुस्त मे सर्जनी को टेढी किया जाय तथा दो अँगुलियो को अँगूठे से दबाया जाय, तो कपित्य हस्त होता है। इससे तलवार, धनुष, चक्र, तोमर, भाला, गदा, शक्ति, वज्त्र आदि शस्त्रो को छोडना तथा सत्य और हितकर कार्य करने का अर्थ सूचित होता है (२६, ३०)।

इसी कवित्य हुस्त मे जब अनामिका और कनिष्ठा को ऊपर उठा कर टेढा किया जाय, तो खटकामुख हस्त होता है। इसके द्वारा-होत, हव्य, छत, लगाम खीचने, पखा, दर्पण पकडने, तोडने या पीसने का प्रदर्शन हो सकता है (३२)। खटकामुख हस्त मे तर्जनी को फैला दिया जाय, तो इसे प्रयोक्ताओ को सूचीमुख हस्त जानना चाहिये (३३)। इससे चक्र, बिजली, पताका, मजरियाँ, कानो के झुमके, हेढी चाल तथा साधुवाद-ये सब निर्दिष्ट किये जायें (३४)। अँगूठे के साथ अंगुलियो को मोड़ कर दूर-दूर रखा जाय और उनके अगले हिस्से को भी मिलने न दिया जाय, तो पद्मकोश हुस्त होता है (३५) । वेल, कैथा आदि फलो को (हाथ मे लेना), स्त्रियो के स्तनो का दर्शन, आदि इससे सूचित होते हैं। (किसी वस्तु को) लेने से सास की करिया दिखाने मे इस हस्त मे अँगुलियो के अग्रभाग सिकुडे होगे (३६) । सारी अँगुलियाँ अँगूठे सहित एक दूमरे से मिली हुई हो और हथेली झुकी (गहरी) रखी जाय, तो स्पशीर्ष हुस्त होता है (३७)। यह जल देने, सर्प की सति दिखाने, सोचने, ताल ठोकने तथा हाथी के मस्तक को थपकाने आदि मे उपयुक्त होता है (३८) ।

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१००/ सद्क्षिप्तनाट्यशास्त्नम्

अधोमुखीनां सर्वासामङगुलीना समागम । कनिष्ठाड गुष्टकावूध्वों स भवेन्मृगशीषक:॥३॥

इह साम्प्रतमस्त्यद्य च शक्तेश्चोल्लासनेऽक्षपाते च। स्वेदापमार्जनेषु च कुटटमिते प्रचलितस्तु भवेद् ॥ ४० ॥

व्रेताग्निसंस्थिता मध्या तर्जन्यड गण्ठका यदा। काड गुले Sनामिका वक्रा तथा चोधर्वा कनीयसी।। ४१॥

एतेन तरुणफलरूपरणानि तथाविधानि च लघूनि। कार्याणि रोपजानि स्त्रीवचनान्यड गुलिक्षेपं ।। ४२।। आवतिताः करतले म्रस्याड्गुल्यो भर्वन्ति हि। स भवेदलपल्लवः ॥। ४३॥

प्रतिपेधकृते योज्य कस्य त्वं नास्ति शन्यवचनेषु। पुनरात्मोपन्यास: स्त्रीणामेतेन कर्तच्य. ॥। ४४ ॥

तिस्र प्रसारिता यत् तया चोर्ध्वा कनीयसी। तासां मध्ये स्थितोऽ्ड गुष्ठः स करश्चतुरः स्मृतः ॥४५ ॥

नयविनयनियमसुनिपुणवालासुरसत्वकंत वार्येपु 1 वावये युकते पथ्ये सत्ये प्रशने च विनियोज्य: ॥।४६ ॥

मध्यमाड गष्ठसन्दंशो वक्रा चंव प्रदेशिनी। ऊध्वमन्ये प्रकीणें च दवघड गुल्यी समरे करे॥४७॥

पद्मोत्पलकमुदानामन्येषाँ चैव दीघंवृन्तानाम्। पुथ्याणां ग्रहणविधिः कर्तव्यः कर्णपूरश्च ॥ ४६ ॥

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नवमोऽध्याय /१09

सभी अंगुलियाँ नीचे सुकाकर सटायी वायें तथा कनिष्ठा और अँमूठा ऊपर सने हो तो मृगशीर्ष हस्त होता है। इसका उपयोग-यह वस्तु अब यहाँ है यह दिखाने, शक्ति (अस्त्र) को उठाने, पासे फेंकने मे होता है। पसीना पोछना तथा कुट्टमित दिखाने के लिये इसे काँपता हुआ रखा जाता है (२६. ४०)। कागुन हस्त मे मध्यमा, तजनी तथा अँगूठे अलग-अलग रहते हैं, अनामिका टेढी तथा कनिष्ठा ऊर रहती है। इसके द्वारा दैर, सुपारी जैसे छोटे फल दिखाये जाते हैं। स्त्वियो के रोपपूर्ण वचन मे इसकी अंगुलियाँ घुमाई जाती है (४१, ४२)। सारो अँगुलियाँ हथेलो की ओर मोड कर पाश्व मे घुमा कर विखरा दी जाये तो अलपल्लव हस्त बनता है। यह मना करने, 'तुम कौन हो' इस प्रकार के प्रश्न पूछने, शून्य वचन आदि मे उपयोज्य है। स्वियो के द्वारा स्वय का परिचय भी इसी के द्वारा किया जाय (४३, ४४)। तीनो अँगुलियां फैली हो, कनिष्ठा ऊपर हो, उनके बीच अंगूठा स्थित हो तो यह चतुर हस्त कहलाता है। इसे नय (नीति), विनय (शिक्षा), नियम, चतुरता, कन्या, रोगी, सत्व तथा कैतब (घूर्तता), युक्तियुक्त साक्य, हिनरूर बात, सत्य तथा प्रशम (शति) मे विनियोजित करना चाहिये (४५, ४६)। मध्यमा और अगुष्ठ को एक दूमरे से मिला दिया जाय, तजनी मुडी हुई हो, शेष दो अंगुलियाँ ऊपर छिनरा दी गयी हो तो यह भ्रमर हस्त है। इससे कमल, नोलकमल, कुमुद (सफेद कमल), और भी लवे डठल या टहनी वाले फूलो को तोड़ना या कानो के कुडलो को दिखाया जाता है (४७, ४८)।

१. कुट्टमित के लक्षण के लिये द्व० नाशा० २२.२० स० माशा० २१.१७

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सभा. प्रसारिता स्तिस्रस्तया चोर्ध्वा कनीयसी। बड गुळ् कन्चितर्चँव हंसपक्ष इति स्मृतः ॥४६॥ एष च निवापसलिले दातव्ये गण्डतंश्रये चैंद। कार्य: प्रतिग्रहाचमनभोजनार्थेषु विश्राणान्॥५०॥

तर्जन्यक् गुष्ठसन्दं शस्त्वरालस्य यदा भवेद्। आभुग्नतलमध्यस्थ. त स्दश इति स्मृतः ॥५१॥

पुष्पापचयग्रभणे ग्रहणे तृणपर्णकेशसूत्राणाम्। शल्यावयवग्रहणे प्रकर्ष णे चाप्रतन्दंशः ॥ ५२॥

समागताग्रास्सहिता पत्याङ्गुल्यो भर्वन्त हि। ऊर्ध्र्वा हंसमुखत्यैव स भवेन्मुकुलः करः ॥५३॥ देवारवनबलिकरणे पद्मोत्पलमुकुलरूपणे चैँव। विटचम्बने च कार्यो विकृत्तिते विप्रकोर्णरच।। ५४॥

पद्मकोशस्य हत्तत्व हृयङ्गुल्य: कुश्चिता यदा। ऊर्णनाभ:

मध्यमाङ्गुष्ठसन्दंशो वक्रा चैष प्रदेशिनी। शेषे ततत्ये कर्तव्ये ताम्रचूलकरेऽङ गुली ॥५६॥ विच्युतरच सशम्दश्च कार्यो निर्भत्लनादिषु। ताले विश्वासने चँव शोघ्राषे संत्ितेषु च॥५७॥

। अय संयुतहस्ताः ॥ पताकाम्यां त हत्ताम्यां संश्लेषादञ्जलिः स्मृतः । देवतानां गुरुणां च मित्राणां चाभिवादने।। ५८ ॥

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नवमोउध्याय/१०३

तीन अगुलियाँ बराबर सामने फेली हो, कनिष्ठा ऊपर उठी हुई हो, अंगूठा कुचित हो तो यह हस-पक्ष हुस्त कहलाता है। यह तिलाजलि या तर्पण का जल देने, कनपटी पर हाथ से जाने तथा ब्राह्मण के द्वारा दान लेने, आचमन या भोजन करने मे उपयुक्त होता है (४६, ४०;।

अराल हस्त मे तजनी और अँगूठे को मिला दिया जाय और गहरी हथेलो तक लाया जाय तो यह सदश हुस्त कहलाता है। इसे आगे ले जाकर फूल इककढे करना, घास-फूस, बाल या सून् उठाना, काँटा निकालना या बाण आदि खीचना बताया जाता है (५१, ५२)। हसप्रक्ष हस्त मे सारी अँगुलियो के छोर मिला कर उन्हे ऊर्ध्वमुख रखा जाय तो मुकुल हस्त होता है। इसका उपयोग देवपूजा, उपहार देना, लाल कमल या नीले कमल की कली दिखाने आदि मे होता है। बिट के

(५३, ५४) द्वारा चुबन या तिरस्कार आदि मे इसे बिखरा कर उपयुक्त किया जाता है

पद्मकोश हस्त की सारी अंमुलियों को कुचित कर दिया जाय, तो अरगनाभ हस्त बनता है। केश, चोरो को पकड़ना आदि मे उपयुक्त होता है (५५) मध्यमा और अगूठो को मिलाया जाय, तर्जनी को मोडा जाय तथा शेष अगुलियाँ हुथेली से मिली हो तो ताम्रचूड हस्त होता है। भत्संना करने मे इसे शब्दपूर्वक नीचे की ओर रखा जाता है। ताल, विश्वास दिलाना, शीघ्रता करमा आदि मे भी इसका उप- योग होता है (५६-५७)।

संयुत हस्त

दोनो हाथ पताक बना कर एक दूसरे से जोड़े जायें तो अबलि हस्त होता है। यह देवता, गुरु और मित्रो को अभिवादन करने मे प्रयुक्त होता है (५८)।

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7०४ / सडक्षिप्तनाट्यशास्तम्

उभाभ्यामि हस्ताभ्यमन्योन्यं पार्श्वसङ् ग्रहाद। हुस्तः कपोतको नाम कर्म चास्य निबोधत॥ ५र्६ ॥ एष विनयाभ्युपगमे प्रणामकरणे गुरोश्च सम्भाषे। अड गुल्यो यस्थ हस्तस्य हृयन्योन्यान्तरनिस्सृताः ॥ ६०॥ स कर्कट इति ज्ञय कर. कर्म च वक्ष्यते। एष मदनाड गमर्दे सुप्तोत्थितजुम्भणे बृहद्देहै॥ ६१। मणिबन्धन विन्यस्तावरालौ स्त्रीप्रयोजितौ। उत्तानौ वामपार्श्वस्थौ स्वस्तिकः परिकीतितः ॥६२॥

स्वस्तिक विच्युतिकरणाद् दिशो घना खं वन समुद्राश्च। ऋतवो मही तथौघं विस्तीर्ण वाभिनेयं स्थात् ॥ ६३ ॥ खटकः खटके न्यस्त: खुटकावधंमानकः। शुड गारार्थेषु योवतव्यः प्रणामकरणे तथा।६४ ॥ अरालो तु विपर्यस्तीवुत्तानौ वर्धमानकौ। उत्सडग इति विज्ञेय: स्पर्शस्य ग्रहणे करः ॥ ६४ ॥ मुकुलं तु यदा हस्तं कपित्थः परिवेष्टयेत। स मन्तव्यस्तदा हस्तो निषधो नाम नामतः ॥६६॥

सडग्रहपरिग्रहौ धारणं व समयश्च सत्यवचनं च। सडक्षेप: सडक्षिप्तं निपीडितेनाभिनेतव्यम्॥ ६७॥ अंसौ प्रशिथिलौ मुक्तौ पताकौ तु प्रलम्बिती। यदा भवेतां करणे स दोल इति संजञितः ॥ ६८ ॥

सम्भ्रम विषयादमुच्छितमदाभिघाते तर्थव चावेगे। व्याधिप्लुते च शस्त्रक्षते च कार्यो 5 भिनययोग: ॥ ६६ ।।

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नवमौऽयाम /१०५

दोनो (पताक) हस्तो को एक दूसरे से बगल से सदा कर रखने पर कपोत हुस्त होता है। इसका उपयोग विनय प्रदर्शन प्रणाम करना, गुरु से बातचीत आदि में होता है। दोनों हाथो की अगुलियाँ एक दूसरे से मिल कर एक दूसरे के बीच से निकली हो तो ककंट हस्त होता हे। इसका काम के मद मे अग मरोडना, जमुहाई या अमडाई तेना, देह को फैलाना या विशालकाय होने का भाव बताना-इनमे उपयोग होता है (५६-६१)। दो अराल हुस्त कलाई पर ऊपर मुँह रख कर बादी भुग की ओर रखे जाय तो स्वस्तिक हस्त होता है। इसका प्रयोग सिव्निर्याँ करती है। स्वस्तिक बना कर हाथो को अलग करने पर दिशाएँ बादस, आकाश वन, समुद्र, ऋतुएं, पृथ्वी, बाढ या विस्तीण प्रदेश आदि का अभिनय होता है (६२-६३)। दो खटकामुख हस्त स्वस्तिक बना कर एक दूसरे पर रखे जाये तो खटकावर्धमानक होता है। इसका उपयोग शृद्द्ारपूर्ण बातो तथा प्रणाम करने मे होता है (६४) ।

दो अराल हस्त उलट कर ऊपर की ओर मुँह कर स्वस्तिक दशा मे दोनो कधो पर रखे जायें तो उत्पग हुस्त होता है। इसका उपयोग स्पश दिखाने के लिम किया जाता है (६५)। जब एक हाथ से भुकुल हसत बना कर उमको कपित्थ हस्त से लपेटा जाय तब इसे निषध हस्त जानना चाहिये (६६)। इसे दबा कर सग्रह, दान लेना, धारण करना, प्रतिज्ञा या सत्य वचन, सक्षेप करना या समेटना आदि अभिने तव्य है (६७) । दोनो कछे ढीले और खुले हो, दो पताक हस्त नीचे लटकाये जाय तो दोल हस्त होता है, जिसका उपयोग करण के साथ होता है (६८)। इसका अभिनय सभ्रम, विपाद, मूर्च्छा, मद का अभिघात (झटका), आवेग, रोग का बढ़ना या शस्त्र से चायल होना-इनमे होता है (६६)।

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मस्तु सर्पशिताः प्रोव्तस्तत्याड्गुलिनिरन्तरः। द्वितीय: पारर्वतश्तिष्ठः ल तु पुप्सपु्ः सवृतः॥७0॥

धान्यफलपुष्दसट्टर इन्यनेन नानाविधान पुक्तानि। ग्ाह्याष्युपनेयानि व तोयानयनापनयने च॥ ७१॥

उपर्युर्वार विन्यस्तौ तदातौ मकरः स्वृतः ॥७२॥ सिहुब्याल द्वीपि प्रदर्शनं नक्रमकरमत्त्यानास्। ये चान्ये कव्यादा अभिनेमात्ते डर्थमोगेन ।। ७३।।

कूमरांसोचितौं हस्तौ मदाल्ता सर्पशोषकौ। गजदन्त, स तु करः कर्म चात्य निबोधत ।। ७४ ।। एष षधूवराणामुद्वाहे चातिभारयोगें न। स्तम्भग्रहणे च तपा शैलशिलोलाटने वँव ।। ७४ :। शुकतुण्डो करो कृत्वा वक्षत्यभिसुखाश्चितौं। शर्नंरघोसुखाविद्ञौ सो 5 वहित्य इति स्वृत: ॥७६॥ दोबंत्ये निःश्वसिते पात्राणा दर्शने तनुत्वे च। उत्कंठिते च तज्जरभिनययोगस्तु कर्तनबः ।। ७७ ।। नथो वॅ वर्धमानस्तु हंसपश्ौ पराड मुखौ। जालवातायनादोना प्रमोद्दव्यी विघाटने 11 ७= ।1

नास्ति कशिचद हस्तत्वु नाटये पर्पों डभिन्म प्रति। मस्य यद् दृशयते एवं बहुदास्तन्मयोदितन्॥। ॥:॥

अन्ये चाप्पयसंसक्ता लौकिका मे करास्विह्। घन्दतस्ते प्रयोनतव्वा रसमजविचेष्टित: ।॥

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नवमोऽघयाय/१०७

दो सर्पशीपं हस्तो को अगुलिया सदा कर माश्व में रखा जाय तो पुष्पपुट होता है (७०)। इसने द्वारा धान्य फल-पुष्प या इनवे जैसी वस्तुओ का ग्रहण करना या ले जाना तथा जल जाना ले जाना निखाया जाता है (७१) । दो पताक हस्तो को हथेलियाँ नीचे की ओर करके एक दूमरे पर रख दिया जाय और दोनों के अंगूठे ऊपर तने हो तो मकर हस्त होता है (अँगूठे एक दूसरे के विपरीत दिशाओ में हों)। इसके द्वारा मिह सप चीता, पडियाल मगर मछली तथा मौर भी इस प्रकार के हिसक पशुओ का प्रदशन होता है (७३)।

दो सपशौष हस्त स्वतिव दना कर अलग अलग कघा पर रखे जाय तो मजदत हुस्त होता है। यह वर बधु के विवाह में बहुत बोझ होने मे खभे को पक डने या पहाड अथवा चट्टान उसाडने मे अभिनीत होता है (७४ ७५)। शुक्तूड हस्त वक्ष स्थल पर एक दूसरे के आमने सामने लटकते हुए रखे जाये फिर उह नीचा मुख करके धीरे से एक दूसरे से मिलाया जाय तो अवहित्य हुस्त होता है। इसका अभिनय दुबसता, ससि छोड़ना शरीर को देखना पतलापन, उत्कठा आदि मे करना चाहिये। दो हक्षपक्ष हस्त एक दूसरे से विपरीत मुख करवे रखे जायें तो वधमान हस्त होता है। इसका उपयोग सरोखा या खिडकी आदि को खोलने में हाना है (७६७०)

नाटय मे हुस्त का उपयोग नाट्य के अभिनय म किसी भी पदाथ को बिना हुस्त मुद्रा के नहीं दिखाया जा सकता। इम दृष्टि से जिस हस्त का जैसा स्वरप है वह मैंने बताया है (७६ै)। ससार मे औोर भी कई प्रकार के हुस्त प्रयोग मे आते है जो मनग मलग वर्यों को सूचित करते हैं। रम भाव आदि की सूचक चेष्टाओ वे अनुसार इनका प्रयोग करना चाहिये (८ब)।

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व्रिषण्णे मृच्छिते होते जुगुप्सा शोकपोडिते। ग्लाने स्वप्ने बिहस्ते च निश्चेष्टे तन्द्रिोजडे॥ ८१॥ व्याधिग्रस्तें जराते च भयार्ते शीतविप्तुते। मत्ते प्रमते वोन्मते चिन्ताया तपसि स्थिते॥ ८२॥ हिमवषंहते स्वप्नायिते च सम्भ्ानते नतसंस्फीटने तथा ॥८३॥

न हस्ताभिनयः कार्यः कार्यः सत्वसमाश्रयः ।

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नवमोऽ्माय/0र्द

निम्नलिखित स्थितियो में (केवल) हस्त मुद्राओ का उपयोग नही क रना चाहिये-विषाद, मूर्च्छा, लज्जा, धृणा, शोक से पीडित होना, ग्लानि, स्वप्न, असहायता, निश्चेष्टा, तदा, जडता, व्याधिग्रस्त होना, जर से व्यावुल या आत होना, भय से व्याकुल होना, ठड से ठिठुरना, मत्त, प्रमत या उत्मत्त होना चिंता या तप की स्थिति, बर्फ की वर्षा की मार खाना, बाढ से घिरना, स्वप्न मे बडबडाना, घबराना, तथा नतमस्फोटन१ मे इनमे सात्विक अभिनय करना चाहिये।

१. 'नखसस्फोटन' पाठ लेने पर नखो से (अत्यधिक भावावेग में) फाडना, कुरेदना- यह अथ होगा।

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॥ अथ दशमोऽध्यायः ॥

एकमादप्रचारो यः सा चारीत्यभिसंजञिता। द्विपादक्रमणं यतु करणं नाम तद्दवेव्॥ १ ॥ करणाना समायोग: खण्ड इत्यभिधीयते। खण्डस्त्रिमिश्रतुभिवा संयुक्तमण्डलं मवेक् ॥ २ ।

धारीभि प्रसृतं मृतं चारोभिक्वेष्टितं तथा। चारीभिः शस्तमोक्षश्र चार्यो युद्ध च कातिताः॥ ३॥

प्रदेतत्प्रस्तुतं नाट्यं तच्चारीव्वेव संस्थितम्। न हि चार्या विना किचिन्नाद्येषङ्गं संप्रवर्तते॥४॥

तस्माच्चारीविध्ानस्य संप्रवदयामि लक्षणम्। या यस्मिस्तु यथा योज्या नृते भुद्ध गतौ तथा ।। ५॥

समपादा स्थितावर्ता शकटास्या तर्थव च। अध्यधिका चायगतिविच्यवा च तथापरा॥६।।

एटकाकरोडिता बढ़ा कस्दूत्ता तथाडि्डिसा। उत्स्पन्दिताथ जनिता स्यन्दिता चापस्यन्दिता ।७॥ समोत्सारितमतल्ली मतल्ली चेति वोडश। एता भोम्य. स्मृताश्चार्य: शृणृतताकाशिको: पुन ॥८॥

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॥ दशम अध्याय ।।

(चारी विधान) /

एक पैर का सचार होने पर चारी तथा दानो पैरो का क्रमण होने पर करण होता है। करणो के मिलने से खण्ड बनता है। तीन या चार खड़ो के मिलने से मड़ल होता है (१-२)। चारियो से ही नृत प्रव्तित हाता है, चारियो से नाटय प्रयोग मे विभिन्न वैष्टाएँ होती हैं तथा चारियो से ही पस्तमोक्ष होता है। युद्ध वे दृश्य दिखाने मे भी चारियी का उपयोग होना है (३)। यह जो नाट्य प्रस्तुत किया जा रहा है, यह चारियो मे ही अवस्थित है। चारियो के बिना नाट्य का कोई अग प्रवृत्त नही होता। इस लिये मैं अब चारी विधान का लक्षण बताता हूँ तथा नृत, युद्ध और गति मे जिस चारी का जैसा उपयोग होगा उस बताता हूँ (४-५) भोमी (भूमि पर अभिनीत) चारिया १६ है-सम्पादा, स्थतावर्ता, शक्- टास्या, अध्यधिका, चापगति, विच्यवा, एडकाक्रीडिता, बद्धा, जरदवृता, भडडिता, उत्स्पदिता, जनिता, स्यदिता, अपस्यदिता, समोत्सारितमत्तल्ली तथा मततल्ली (६-७)। आकाशिकी चारिया इस प्रकार हैं-अतिक्राना, उपकराता, पाश्वकाता, क्ध्वधानु, सूची, नूपुरपादिका, डोलापादा, आक्षिप्ता, आविद्धा, उद्वत्ता, विद्युद्भ्राता, अवातर, भुजङ्गवासिता, भृगप्लुता, दडा तथा भ्मरी (८११)।

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अतिक्रन्ता हापक्रान्ता पाश्वक्रान्ता तरथव न। क्ध्वजानुय मूची त तथा नृपुरपादिका॥ मै॥

डोलापादा तयाश्षिप्ता आविदोद्कतमनिते। विद्य दत्रान्ता हलाता च भुजद्गत्रामिता तथा।१०।

मृगप्तुना च दण्टा च स्रमरी चेति पोटश। आकाशिकय: स्मृता होता लक्षणं त निवोधत ॥११॥ पदनिगतरकृतस्नया ममनखैरवि। नमपादा तु मा चारी वितेया स्थानसंभया ॥। १२॥ भूमिघुप्टेन पादेन हत्वाम्यन्तरमण्डलम्। पुनरत्सारयेदन्यं स्यितावर्ता तु सा स्ृता ॥१३॥ निषण्णाङ्गम्नु वरणं प्रमार्य तनमश्चरम्। उद्ाहितमुरः कृत्वा शकटास्यां प्रयोजयेव्॥ १४॥ सध्यन्य पृष्ठनो वामरचरपस्त यदा नवेत। तन्यापसपंण चँब जेया माध्य्िका वुघः॥१४॥ पाद: प्रसारितः नव्य: पुनर्थ्वापसपितः । वाम: सच्मापनपों वा चाषपत्यां विधीयते ॥ १६ ॥ विन्यवात्समपादाया विच्यवां संप्रपोजयेव। निकुटृयंस्तलाग्रेज पादस्य धरणीतलम्॥१७॥ तन्नसभ्च रवादाभ्यासृत्म्ुत्य पतनं तु यद। पर्यायशश्त करियते एडकाट्रीडिता तु सा।। ५८॥

अन्योन्यजङ्गासंवधयातकृत्वा तु स्वस्तिकं ततः। करम्यां वतनं यस्मात्मा बद्ा वार्युदाहृता ॥१६॥

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दश मोऽ्याय / ११३

अब मैं क्रमश इन सबके लक्षण बताता हूं। दोनो पैरो को पास रखते हुए, पैरो के नखो को भी बराबर मिला कर रखा जाय तो समपादा चारी होती है (१२)। एक (अव्रतलसचर) पैर को भूमि पर रगडते हुए दूसरे पैर के [जानु मे) पास स्वस्तिक बना कर रखे, फिर दोनों को अलग कर यही गति पुन दोहराये, ता स्थिरतावर्ता चारी होती है (१३)। शकटास्या चारी मे शरीर के ऊपर के हिस्से (घड़) को सोधा स्थिर रख कर एक अग्रतलसचर पाद को आगे फंलाये तथा वक्ष को उद्वाहित' स्थिति मे रखे (१४)। बाया पैर जब दाहिते पैर के पीछे ले जाम और उसे पीछे हटाया जाय तो अध्यकिका चारी होती है (१६)। चापगति चारी मे दाहिना पर आगे फैलाया जाता है और फिर पीछे हटाया जाता है, बायें पैर को भी दाहिने के पीछे रख कर फिर आगे बढाया जाता है' (१६)। समपादा चारी मे परो को अलग करने पर विच्यवा चारी होती है। पैरो को अलग करते समय पजो को (वाल के अनुसार) भूमि पर पटकते हैं (१७)। लसचर परो से उछल कर बारी-ारी से नीचे आने पर एडकाक्रीडिता चारी होती है (१८)। जघाओ (पिंड- लियो) को परस्पर गूंथ कर स्वस्तिक बना कर दोनों ऊर्ओ से वलन किया जाय, तो बद्धा चारी होती है (१६)।

१ उद्वाहित वक्ष-ऊपर उठा हुआ। नामा० ई/२३।

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११४ / सदक्षिप्पनाट्य शास्त्रम् तलसञ्चरपादस्य पा्रिणर्वाह्योन्मुखी यदा। जङ्गाञ्चिता तथोदृत्ता ऊसदृत्तेति सा स्मृता ॥ २०॥ अग्रत पृष्ठतो वापि पादोऽग्रतलसश्चरः। द्वितीयपादनिघृष्टो यस्या स्यादडिडता तु सा ॥२१॥

शनं पादो निवर्तेत बाह्य नाभ्यन्तरेण च। यद्रेचकानुसारेण सा चायु रस्पन्दिता रमृता ॥ २२॥

मुष्टिहस्तथ् वक्षस्स्य करोऽन्यश्र प्रबर्तितः । तलसब्चरपादथ जनिता चार्युदाहृता ॥ २३॥ पञ्चतालान्तर पाद प्रसार्य स्यन्दिता व्यसेत्। द्वितीयेन तु पादेन तथापस्चन्दितामपि॥२४॥

तनसब्रपादभ्या समोत्सरितमतल्ली व्यायामे समुदाहृता ॥ २५ ॥

उमाश्यामनि पादस्या घूर्णमानोपस्पपी। सद्वेष्टितापविद्वश्व हस्तमंत्ततत्युदाहृता ॥ २६॥

एता भोम्प स्मृताथ्वार्यो नियुद्धकरणाश्रयाः। आकाशिकीना चारीणा सप्रवक्ष्यामि लक्षणम्॥ २७॥। कुश्रित पादमुत्किषित्य पुरत. संप्रसारयेव। उत्क्षिप्य पातयेच्चंतमतिक्रान्ता तु सा स्मृता ॥ २॥

ऊरन्या वलन कृत्वा कुश्ित पादमुद्धरवे। पार्श्वे बिनिक्षिपेरच्चनमपक्रान्ता तु सा स्मृता ॥ २६ ॥ कन्चित पादमुत्किप्य जानुस्तनसम न्यमेत्। उद्धदितन पादेन पार्श्वक्रान्ता विधयोयते॥ ३॥

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दशमोऽध्याय /११५

तलसचर पाद का पजा बाहर की ओर रखा जाय, पिडली अचित तथा उद्वृत्त हो तो अरद्वृता होती है (२०)। जिसमे एक अग्रतल सचर पैर आगे या पीछे की ओर रगडते हुए दूसरे पैर के पास रखा जाये, वह अडडिता चारी है (२१)।

यद्रि रेचक के अनुमार पेर को दूसरे पैर के आगे और पीछ घुमाया जाय, तो उत्स्पदिता चारी होती है (२२)। एक मुष्टि हस्त बक्ष पर रखा जाय दूसरा हृग्थ प्रवर्तित (गाल चक्कर लगा कर स्थित) हो तथा एक पैर अग्रतलसचर की स्थिति मे रहे तो यह जनिता कही जाती है (२३) । एक पैर को दूसरे से पांच ताल की दूरी पर रखे तो यह स्यदिता चारी है। इसके विपरीत जब दूसरे को पहले पैर से पांच ताल की दूरी पर रखे तो अपस्यदिता होती है (२४)। यदि अग्रतलसचर पावो को गोल चक्कर मे घुमाते हुए पीछे की ओर लाया जाय, तो समोत्सारित मत्तल्ली' होती है (२५)। समोःसारित मत्तन्ली मे पैरो से चक्कर और पीछे ले जाते के कार्य के साथ दोनो हाथो को उद्वेष्टित और अपविद्ध भी रखा जाय तो मत्तत्ली होती है (२६) । यहाँ तक भौमी चारियाँ बतामी गयी जिनका उपयोग युद्ध और करणो मे होता है। अब मै आकाशिकी चारियो के लक्षण बताता हूँ (२७)। कचित पैर को ऊपर उठा कर सामने फैलाये और ऊपर से नीचे पटके तो यह अतिज्राता कहलाती है (२८)। दोनो ऊरुओ से वलन करके कुचित पर को ऊपर उठा कर बगल मे पटक तो अपकाता चारी होती है (२६) । कुचित पैर को ऊपर उठाकर घुटने को स्तन के पा्श्व तक रखे और उस पार्श्व मे ले जाये, तो पाश्वकाता होती है (३०)।

१ ताल-एक बालिश्त की दूरी।

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११६/सङ्क्षिप्तनाट्यशास्त्रम् कुश्चितं पादमुत्क्षिप्य जानुस्तनसमं न्यसेत्। द्वितोयं च क्रमस्तब्धमूर्ध्वजानुः प्रकीतिता ॥३१ ॥

कुञ्चितं पादमुत्किषिप्य जानूध्वं संप्रसारपेत्। पातयेच्चाग्रयोगेन सा सूची परिकीतिता॥३२॥ पृष्ठतो हयञ्वितं कृत्वा पादमग्रतलेन तु। द्रुसं निपातयेद्द् मौ चारी नूपुरपादिका॥ ३३॥

कुश्चितं पादमुतिक्षिप्य पार्श्वात्पार्श्वन्तु दोलयेत्। पातयेदञ्चितं चँव दोलपादा प्रकोतिता ॥ ३४॥

कुज्वितं पादमुत्किषिप्य आक्षिप्य त्वश्चितं न्यसेव। जङ्गास्वस्तिकसंयुक्ता चाक्षिप्ता नाम सा स्मृता ॥३५॥

स्वस्तिकस्याप्रतः पादः कुञ्चितथ प्रसारितः । निपतेदञ्चिताबिद्धमाविद्धा नाम सा स्मृता ॥ ३६ ॥

पादमाविद्धमावेष्ट्य समुत्य्तुत्य निपातयेत्। परिवृत्य द्वितीयं च सोदृत्ता चायु दाहृता॥ ३७ ॥। पृष्ठतो वलितं पावं शिरोघृष्टं प्रसारयेद। सर्वतो मण्डलाविद्ध विद्य दधान्ता तु सा स्मृता ॥ ३ ॥

पृष्ठप्रसारित. पादो वलितोऽभ्यन्तरीकृतः। पाष्णिप्रपतितश्चंव हृयलाता संप्रकीतिता॥ ३६ ॥ कुन्चितं पादमुत्किषिप्य त्यश्रमूरु विव्रर्तंमेद। कटीजानुविवर्ताच्च भुजङ्गत्ासिता भवेत् ॥ ४० ॥

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दशमोऽध्याय /११७

एक पैर से पारश्वक्राता करके फिर क्रम से दूसरे पर से भी पार्श्वक्राता करे और पहले को स्थिर रखे तो उधर्वजानु चारी कही जाती है (३१)।

कचित पैर को उठा कर घुटने के ऊपर तक फैलाये फिर इसके पजे को भूमि पर पटके तो सूची चारी होती है (३२)। नूपुरपादिका चारी मे एक पैर को दूसरे के पीछे अचित करे और दूसरे को अग्रतलसचर बना कर तेजी से भूमि पर पटके (३३)। कुचित पैर को ऊपर उठा कर एक पाश्वें से दूसर पारश्व तक डोलाये फिर अचित करके नीचे गिरा दे तो दोलपादा चारी होती है (३४)। कुचित पर को ऊपर उठा कर अषित स्थिति मे जल्दी स पृथ्वी पर रख और पिइलियो से स्वस्तिक बना दे तो आक्षिप्ता होनी है (३५)। यदि पिडलियो स स्वस्तिक की उपर्युक्त स्यिति मे ही एक पैर को कुचित करके फैलाये और उस दूसरे पेर म आविद्व कर अचित स्थिति मे भूमि पर गिराये तो आविद्वा चारी होती है (३६)। उपर्युक्त आविद्वा चारी की स्थिति मे आविद्ध पैर को दूसरे से लपेट कर उछाल भर कर नीचे गिराये फिर बदल कर दूसरे पैर से भी यही क्रिया करे तो उददृतता चारी होती है (३७)। पीछे की ओर घुमा कर ले जाये गये पैर को माथे से रगड़ देता हुआ फैलाये और इसी स्थिति मे चाभे और गोल चककर लगाये तो विद्युद्भ्राता चारी होसी है (३८)। एक पैर पीछे फलाया हो, फिर धुमा कर भीतर ले जाय और दूसरे पर के पजे के पास पटका जाय तो मलाता बारी होती है (३६)। कुचित पैर को ऊपर उठा कर ऊछ को तिरछा करके गोल धुमाव दे, साथ मे कटि और घुटने को भी घुमाये तो भुजयतासिता वारो होती है (४०)।

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१९८ / सङशषिप्तनाट्य शास्त्रम् अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा चोत्प्लुत्य विनिपालयेव्। जङ्भाञ्चिता परिक्षिप्ा सा जञेया हरिणप्लुत्ता।।४१॥

नपुरं चरणं कृत्वा पुरतः संप्रसारयेत्। क्षिप्रमाविद्धकरणं दण्डपादा तु सा स्मृता ॥४२॥

अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा त्रिक तु परिवर्तयेद्। द्वितीयपादभ्रमणातलेन भ्रमरी स्मृता ॥। ४३ ॥1

आकाशिक्य: स्मृता हो ता ललिताङ्गक्रियात्मिकाः । धनुर्वज्रासिशस्त्राणा प्रयोक्तव्या विमोक्षणे।। ४४॥ अग्रगौ पृष्ठगौ वावि ह्यनुगौ वाषि योगतः। पादयोस्तु द्विजा हस्ती कतंव्यौ नाट्ययोवतृमिः॥४५॥

यतः पादस्ततो हस्तो यतो हस्तस्ततस्त्रिकम्। पादस्य निर्गमं कृत्वा तथोपाङ्गानि योजयेत्॥४६॥ पादचार्या यथा पादो धरणोमेव गच्छति। एवं हस्तश्चरित्वा तु कटीदेश समाश्चयेत् ॥ ४७ ॥

एताक्षार्यो मया प्रोक्ता ललिताङ्भक्रियात्मकाः। स्थानान्यासां प्रवक्ष्यामि सर्वशस्त्रविमोक्षणे॥ ४८॥

वैष्णवं समपादं व वैशाखं मण्डलं तथा। प्रत्यालीढं तथालीढं स्यानान्येतानि घप्णणाम्।४र्६॥

न्यायाश्चवात्र विज्ञेयाश्चत्वारः शस्त्रमोक्षणे। भारतः सात्वतर्चंव वार्षगण्यो 5थ फैशिकः ॥ ५०॥

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दशमोडम्याय /११६

अतिक्राता चारी मे उछाल भर कर नीचे आये, जङ्गा (पिडली) अचित तथा आक्षिप्त हो तो इसे हरिणलुता चागे जानना चाहिय (४१) । नूपुरपादिका चारी को करके एक पैर आगे फैलाय और तुरत उसे देह के सामने दडाकार घुमा कर पीछे हटाये तो दडपादा चारी होती है (४२)। अनिक्राता चारी करके पीठ के नीच के हिस्से को घुमाव दे तथा नोचे से दूसरे पैर को घुमाये तो भ्रमरी चारी होती है (४३)। य आकाशिकी चारिया है जो ललित अगसचालन से युक्त होती है। इनका प्रयोग धनुप वज्द्र, तलवार आदि शस्त्रो का सचालन दिखाने मे करना चाहिये (४४)। इन चार्यिो मे पैरो की आगे पाछ या साथ जैमी गति हो उसी के अनुसार हाथो की गनि भी होना चाहिय (४५)। जिधर पैर जाये, उधर हाथ, जिध्वर हाथ जाय उधर तिक (पोठ का अधोभाग) जाना चाहिय। चारी मे पैर बाहर निकाल लेने पर उपागो (अक्षि, भ्रू आदि) मे उसक अनुमार काम ले (४६)। पाद चारी में पैर प्रदर्शन करक वापस घरती पर आ जाना है, उमके साथ हाथ कटि पर ा टिकता है (४७)।

मैंने ललिताग क्रियातमक य चारियाँ बताड। अब मैं इनके स्थान बनाता हूं, जिनका उपयोग प्रस्त मोक्ष मे होता है। वष्णव समपाद वशाख मडल प्रत्यालीद तथा मालीद-य नटो के निये छ स्थान वह गय है (४६)। शस्त्रमोक्ष मे ही भारत मात्वत वार्पेगण्य तथा कैशिक ये चार न्याय जानना चाहिये (५०)!

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१२०/ सङक्षिप्तनाट्यशास्त्रम् भारते तु कटिच्छेद्य पादच्छेद्य तु सात्वते। वक्षसो वार्षगण्ये तु शिरश्छेद्य तु कैशिके॥५१॥ कटी कर्णसमा यत्र कूर्परासशिरस्तथा। समुन्नतमुरश्चंब सौष्टवं नाम तद्भवेद् ॥ ५२॥ अन्न नित्यं प्रयत्नो हि विधेयो मध्यमोत्तमेः । ाट्यं नृतं च सर्व हि सौष्ठवे सम्प्रतिष्ठितम्॥ ५३ ॥

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दशमोडध्याय /१२१

भारतनत्याव कटि से, सात्वत पैरी से, वार्षगण्य वक्ष से और कैशिक सिर के सचालन से किया जाता है (५१)। जिसमे कटि और कान एक दूसरे की बराबरी मे सौधे हो, कलाई, कधे और सिर भी सीधे रहे, वक्ष ऊँचा हो वह सोष्ठव है। मध्यम और उत्तम पादो को सोष्ठव के निर्वाह का सदेव प्रयत्न करना चाहिय। नाट्य और नृत सब सौष्ठव ही प्रतिष्ठित है (५२, ५३j।

6

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।। अथ एकादशोडध्यायः ॥

एताथार्यो मया प्रोक्ता यथावच्छस्त्रमोक्षणे। चारोसयोगजानीह मणडलानि निबोधत॥ १॥ अतिक्रान्त विचित त तथा सलितसचरम्। सूचीविद्ध दण्डपाद बिहृतालातके तथा॥२॥ वामविद्ध सललित क्रान्त चाकाशयानि तु। मण्डलानि द्विजश्रेष्ठा भुमिगानि निबोधत॥ ३॥ भ्रमरास्वदिते स्यातामावर्त च तत- परम्। समोत्मारितमप्पाहुरेडकाक्रडित तथा॥। ४ ॥ अडिडत शकदास्य च तथाध्यर्धेकमेव च। पिष्टकुट्ट च विज्ेय तथा चाषगत पुन. ।। ५ ॥ एतान्य्रपि दशोक्तानि भूमिगानीह नामत। अत पर प्रवक््यामि लक्षणानि यथाव्रमम् ॥ ६॥ आद्य पाद च जनित कृत्वोद्वाहितमाचरेव्। अलात वामक चैव पाश्वक्रान्त च दक्षिणम्॥७।। सचों चाम पुर्धं हिक च पिचिर्तासेद। तथा दक्षिणमुद्दत्तमलात चंव वामकम्॥ ८ ॥ परिच्छिन्न तु कर्तव्यं बाह्यम्रमरकेण हि। अतिक्रान्त पुनर्वाम दण्डपाद च दक्षिणम्। विज्ञेयमेतद्वजायामे त्वतिक्रान्त तु मण्डलम् ॥ ६ ॥

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॥ एकादश अध्याय ।

मंडल-विधान

शस्त चलाने के प्रदर्शन मे उपयुक्त होने वाली से चारियाँ मैंने मथावद् बतायी। वारियो के सयोग से होते बाली मडल जानना चाहिय (१)। दम आकाश- पत महल ये है-अतिक्रात, विचित्न ललितसचर सूचीविद्ध दडपार विहय बला- तक, वार्मािद्ध, सल्लित, तथा क्रात (२ ३)। दम भूमिगत मडन इम प्रकार है- प्रमर, आम्कदित, आवत, समोत्मारित, तडकाक्रीनित अडडित शकटास्व अध्यक्षक पिष्ट कुट्ट तथा नाषगत (६-५)। अव मैं (दोनो प्रकार के मडली वे) क्रमश लक्षण बताता है-पहले एक पैर से जनिता चारी का प्रदशन करे फिर वक्ष स्थत उद्वाहित रखत हुए शकटास्या चारी का। फिर बायें पर से अलात और दाहिने से पाशवकराता चारो करे। फिर बायें पैर से सूची और कमर को घुमा कर समरी चागे करे। फिर दाहित पर से उदवृत्ता और बाये से अलात चारी का प्रदशन करे उसे भ्मरी चारे मे पर्वितित कर दे। फिर इसी बायें पर से अतिकराता तथा दाहिने से दडपादा बारी का प्रदर्शन करे। इमे नृत्य-ध्यापाम मे प्रयुक्त होने वाला अतिक्रात मबल जानना चाहिय (६ ६)।

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आद्य तु जनितं कृत्वा तेनैव च्र निकुट्टनम् ॥ १॥

आस्पन्दितं तु वामेन पार्श्वक्रान्तं च दक्षिणम्। वामं सूचीपदं दद्यादवक्रान्तं च दक्षिणम्। ११॥ भुजङ्गन्नासित वाममतिक्रान्तं च दक्षिणम्। उद्दत्तं दक्षिणं चैव हयलातं चैव वामकम्॥ १२॥

पार्श्वक्रान्तं पुनः सव्य सूची वामक्रम तथा। विक्षेपो दक्षिणस्य स्वादपक्रान्तथ वामकः ।१३॥

वाह्यभ्रमरक चव विक्षेपं चैव योजयेत्। विज्ञेयमेतववचायामे विचित्र नाम मण्डलम् ॥ १४॥

कृत्वोघर्वजानु चरणमाद्य सूचीं प्रयोजयेत्। अपक्रान्तः पुनर्वाम आद्यः पार्श्वगतो भवेत्॥ १५।।

वामं सूची पुनर्दद्यात्त्रिक च परिवर्तयेत्। पार्श्वक्रान्तं पुनश्वाद्यमतिक्रान्तं च वामकम् ॥१६॥

सूचीमाद्यक्रमं कृत्वा ह्यापक्रान्तं च वामकम्। पार्श्वंक्रान्तं पुनक्षाद्यमतिक्रान्तं च वानकम् ॥ १७॥

परिछिन्नं च कर्तव्यं बाह्यम्रमरकेण च। एप चारोप्रयोगस्तु कार्यो ललितसक्जरे॥ १८॥

सूची वामपदं दद्यात्त्रिकं च परिवर्तयेत्। पार्श्वक्रान्त पुनश्वाद्यो वामोडतिक्रान्त एव च ॥ १६ ॥ सूचीमाद्य पुनर्दद्यादपक्रान्तं च वामकम्। पाश्वंक्रान्तं पुनश्राद्ं सचीविद्वे तु मण्डले ॥ २० ॥

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एकादशो ध्याय /१२४

दाहिने पैर से जनिता चारी वरके उससे निवुद्धक पाद बनाय। फिर बायें पर से स्पदिताचारी और दाहिने से पाश्वंब्राता फिर बायें से सूची ओर दाहिन स उपक्राता फिर बामे से भुजमवामिता और दाहिन म अनिक्रान का फिर दाहिन से उद्दत्ता और बायें से अलाता का, फिर दाहिने पर मे पार्वक्राता और दार्ये स सूच का, फिर दाहिने से विक्षिप्ता और बायें से अपभाता का (फिर बाहर का ओर म भरमरी चारो और विक्षिप्ता भी चाहे तो जाडे)। तृत्यव्यायाम म टसे विचिन्न मडन जानना चाहिये (१०-१४)। दाहिन पैर के घुटने को ऊपर रदा कर सूची चारी करे, बायें पैर से अपकाता का फिर दाहिने से पार्श्वकता, फिर बायें म सूची चारी करके पीठ घुमाने हुए भ्रमरी चारी करे। [फिर दाहिने मे मूची और बाय से अप- क्राता करे अब दाहिने से पाश्वकाता और वार्ये मे अतिकाता। अब इमक साथ बाहर की ओर से भ्रमरी चारी जोडे तो वह ललितमचर मडल बनता है (१५ १८)। बायें पैर से सूची चारी करके पीठ को धुमाय। फिर दाहिने पैर से पाश्व- भराता और बायें से अतिक्राता, फिर दाहिने म सूची और बारयें से अपक्राता फिर दाहिने से पाश्वंक्राता चारी की जाय-तो सूचाविद्ध महल बनता है (१६२०)।

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१६/मइक्षिप्तनाट्य शास्त्रम आद्यस्तु जनितो मूत्वा स च दण्डक्रमो भवेद्। वामं सूचीं पुनर्दद्यात्निकं च परिवतयेत् ॥ २१ ॥ उद्वृत्तो दक्षिणश्च स्यादलातश्चंव बामकः । पार्श्वक्रान्तः पुनश्वाद्ो भुजङ्गनासितस्तथा ।। २२।

अतिक्रान्तः पुनर्वामो दण्डपादस्तु दक्षिणः । वाम सतोत्रिकावर्तो दण्डमादे तु मण्डले॥। २३ ॥

आद्य तु जनितं कृत्या तेनैव च निकृट्टकम्। आस्कन्दितं च वामेन ह्यद्वृत्त दक्षिणन च ॥ २४ ॥ अलातं वामकं पादं सूचीं दद्यातु दक्षिणम्। पारश्वक्रान्तः पुनर्वाम आक्षिप्तो दक्षिणस्तथा॥२५॥

समावत्यं त्रिकं चत्र दण्डपादं प्रसारयेत्। सूचीं वामपद दद्यात्त्रिक तु परिवर्तयेत् ॥२६॥

भुजङ्गन्रासितश्वादो वामोडतिक्रान्त एवं च । एद चारीप्रयोगस्तु बिहृते मण्डले भवेत् ॥२७॥ सूचोमाद्यक्रमं दद्यादपक्रान्तं च वामकम्। पाश्वंक्रान्त, पुनश्चाद्या हयलातश्चंव वामकः ॥ २८ ॥

म्रान्त्वा चारीभिरेताभि: पर्यायेणाथ मण्डलम्। पट्सरयं सपसंरयं वा ललितेः पादविक्रमै.॥२र्६॥

आद्यं कर्यादपक्रान्तमभिक्रान्त व वामकम्। अवक्रान्तः पुनश्चाओो वामोऽतिक्रान्त एव च ॥ ३० ॥ पादभ्रमरकर्च स्यादलाते खलु मण्डले। सूचोमाद्यक्रमं कृत्वा हयापक्रानतं च वामकम् ॥ ३१ ॥

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एकादशोऽध्याय/१२७

पहले दाहिने पैर से जनिता चारी करके इसी से दहपादा चारी करे। फिर बायें पैर से सूची करके पीठ घुमा कर अमरी चारी करे। फिर दाहिते पेर से उद्वृत्ता और बायें से अलाता चारी करे। जब दाहिने पर से क्रमश पाश्वक्राता और भुजग नासिता चारी करे और फिर बायें से अतिकाता तथा दाहिने से दडपादा करके बाये से सूची करके पीठ़ को घुमाये तो तह दडपाद मदल होता है (२१ २ ३)। दाहिने पैर से जनिता करके उसी को निकुट्टित या तलसचर की स्थिति म रखे। फिर बाये पैर से आस्कदिता और दाहिने से उददृत्ता चारी करे। अब बाये से अलाता और दाहिन स सूची करे। फिर बायें से पार्धर्वव्राता और दाहिन से आक्षिप्ता करके भ्रमरी चारी करे और दडपादा करे। अब दाहिने पैर मे भुजगवामिता और बायें से अतिक्राता चारी करे। चारिया का इस प्रकार का प्रयोग विहृत मडल म होता है (२४ ₹७)। दाहिन पैर स सूची चारी तथा बाये से अपकाता करे। फिर दाहिन स पार्श्वकराता और बाय से अलाता करे। अब इन्ही (चार) चारियो के द्वारा बारी- बारोसछ या सात बार ललित पादन्यास वे द्वारा घुमाव का प्रदर्शन कर। [अब दाहिने से अपक्राता और बाये स अतिक्राता चारी करे ]1 अब दाहिने पैर से अप- कराताऔर बायें से अतिक्रता करके भमरी चारी करे। यह सब अलात मडत म होता है (२८-३१)।

१ बडौदा स० म यह पक्ति कोष्ठक म रख कर प्रक्षिप्त मानी गयी है।

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आद्यो दण्डक्रमश्चव सचीकार्यस्तु वामकः । कार्यस्त्रिकविवर्तश्व पार्श्वक्रान्तरच दक्षिणः ॥ ३२ ।।

आक्षिप्तं वामकं कुर्याहण्डपा्द तु दक्षिणम्। ऊर्द्वू तत च तेनंव कर्त्तव्यं दक्षिणेन तु॥ ३३॥

सूचीवामक्रमं कृत्वा त्रिकं च परिवर्तयेद। अलातश्च भवेद्वाम: पार्श्वक्रान्तश्च दक्षिणः । ३४ ।। अतिक्रान्तः पुनर्वामो वामबन्धे तु मण्डले। सूचीमाद्यक्रमं दद्यादपक्रान्तं च वामकम्॥ ३५॥ पार्श्वक्रान्त: पुनश्चाद्यी भुजगत्रासितः स च। अतिक्रान्तः पुनर्वाम आक्षिप्तो दक्षिणस्तया ॥३६ ॥ अतिक्रान्तः पुनर्वाम ऊरूद्वत्तसतर्थव च। अलातय् पुनर्वामः पार्श्वक्रान्तश्व दक्षिण, ।३७॥

सुचीवामं पुन्दद्यादपक्रान्तश् दक्षिणः। अतिक्रान्तः पुनर्वाम कार्यो ललितसंचर, ॥३८॥।

एध पादप्रचारस्तु ललिते मण्डले भवेत्। सूचीमाद्यक्रमं कृत्वा ह्यपक्रान्तं च वामकम् ॥। ३्६ ॥।

पाश्वक्रान्तं पुनरयाव वामं पार्श्वक्रमं तथा। भ्रानत्वा चारीभिरेताभिः पर्यायेषाथ भण्डलम् ॥४० ॥

वामं सूचीं ततो दद्यादपक्रान्तं च दक्षिणम्। स्वभावगमने ह्यतन्मण्डलं संविधीयते ॥४१॥ क्रान्तमेतततु विज्ञेयं नामतो नाट्ययोक्तुभि:। एतान्याकाशगानोह ज्ञेयान्येवं दराव तु॥। ४२ ॥

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एकादशोऽध्याय/१२६

दाहिने पैर से सूची और बायें से अपकाता चारी करे। फिर दाहिने से दड़पादा और बायें से सूची, फिर दाहिने पैर से भ्रमरी चारी करके पाश्वक्राता, फिर बायें पैर से आक्षिप्ता और दाहिते मे दडपादा करके दाहिने से ही रूदवृत्ता चारी करे। अब बायें पैर से सूची करके भ्रमरी तारी करे, फिर बायें से अलाता और दाहिने से पार्श्वकाता और बायें से अतिक्राता करे। यह वामबघ् मडल है (३१ ख ३५क)।

दाहिने पैर से सूची और बायें से अपक्ाता करे। फिर दाहिने से पार्श्वक्राता और भुजगनासिता-ये दानो चार्रिया करे। अब बायें से अतिद्राता तथा दाहिने से आक्षिप्ता करे। फिर बायें से अतिक्र ता और करदवृना-य दोनो करे। अब बायें से अलाता और दाहिते से पाश्वक्रना करे। फिर बार्यें मे सूची और दाहिने से अप क्राता, फिर बायें से अतिक्राता करके ललित गृति का प्रदशन करे। यह ललित मडल, मे होता है (३५ख ३६क)।

दाहिने पर से सूची और बायें से अपक्राता दाहिने से पार्श्वक्राता और बाय से भी पाश्वक्राता-इन चारियो से बारी बारी से घुभाव लेकर बायें पैर से सूची और दाहिने पैर से अपक्राता करे। इसे नाटय प्रयोक्ताओ को क्रात मडल जानना चाहिये। इसका प्रयोग स्वाभाविक गति मे होता है (२र्दख ४२क)। ये दशमडल आकाश गत हैं (४२ख)।

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अतः परं प्रवक्ष्यामि भौमानामवि लक्षणम्। आद्यस्तु जनितः कार्यो वामश्चास्पन्दितो भवेत् ॥ ४३ ॥

कटास्य पुनश्चादों वामश्चापि प्रसारितः । आद्यो भ्रमरक कार्यस्त्रिकं च परिवर्तपेत्।४४ ।

आस्प्दितः पुनर्वामः शकटास्यश्च दक्षिण। वाम पृष्ठापमर्षी च दद्याद्भ्रमरकं तथा॥ ४५ ॥

स एवास्पन्दितः कार्यस्त्वेतद्श्रमरमण्डलम्। आद्यो भ्रमरक: कार्यो वामशचवाडिडितो भवैत् ॥ ४६॥

कार्यस्त्निक विवर्तश्च शकटास्यश्च दक्षिणः। ऊर्दू तः स एव स्याद्वामश्चैवापसपितः । ४७॥

कार्यस्त्रिकविवर्तशच दक्षिणः स्पन्दितो भवेत। शकटास्यो भवेद्ामस्तदेवास्फोटनं भवेत् ॥। ४८ ॥

एतदास्पन्दितं नाम व्यापामे युद्धमण्डलस्। आद्यन्तु जनितं कृत्वा वामेन तु निकुट्टकम् ॥ ४र ॥

शकटास्यः पुनर्चाद ऊरूदृत्त स एवं तु। पृष्ठापसर्षी वामश्च स च चावगतिर्भवेत्॥५०॥ आस्पन्दितः पुनः सव्य शकटास्यश्च वामक:। आध्यो म्रमरकश्चंव त्रिकं तु परिवर्तयेत ॥५१॥

पृष्ठापसर्पी वामश्चेत्यावर्ते मण्डलं भवेद। कृत्वादो समपादं तु स्थानं हस्तौ प्रसारयेत्।। ५२।।

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एकादशोछयाय/१३१

अब में भूमिगत मडलो के लक्षण भी बताता हूँ। दाहिना पैर जनिता चारी मे और वार्या आस्कदिता मे। फिर दाहिने से शकटास्या करके, वायें को प्रसारित करे। फिर पीठ को घुमाव देकर दाहिने से घमरी चारी करे। अब बार्यें से आस्क- दिता और दाहिने से शकटास्या फिर बायें से अपकाता चारी करके पीछे हटे और फिर समरी चारी करते हुए बायें पर से फिर आस्कदिता चारी करे। यह भ्रमर मडल है (४३-४६क)।

दाहिने पैर से अ्रमरी चारी करे और बायें पैर से बड्डिता। फिर पीठ को विवर्तिस करते हुए भ्रमरी चारी करे और दाहिने पैर से शक्टास्या चारी करे। फिर इसी पर से ऊर्दवृत्ता करे और बायें से अतिक्राता। फिर पीठ को घमाव देकर भ्रमरी चारी करे और दाहिने पैर से स्पदिता चारी करे। अब बारयें पैर से शकटास्या चारी कर उसे भूमि पर जोर से पटके। यह युद्ध-व्यायाम मे प्रयुक्त होने वाला आस्पदित मडल है (४६ख-४६क)।

दाहिते पर से जनिता चारी करे और बायें को निकुटटित (तलस्षचर) बनाये। फिर दाहिते से क्रमश शकटास्या मोर ऊरद्वृत्ता चारियाँ करे। अब बायें पैर से अतिक्राता चारी करते हुए उसे पीछे ते जाये और चाषगति चारी करे। अब दाहिने पैर से आह्कदिता तथा बायें से शकटास्या करे। फिर दाहिने से भ्रमरी करके त्रिक (पीठ) को घुमाव दे। लब बायें पैर से अतिक्राता चारी करे। यह आवतं मडल है (४ ६ख-४१ क)।

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कटोतटे विनिक्षिप्य चाद्यमाव्तयेत्क्रमात ।।५३॥ यथाक्रमं पुनर्वाममावर्तेन प्रसारयेत्। चार्यानया च भ्रान्त्वा तु पर्याेणाय मण्डलम् ॥ ५ू४ ॥ समोत्सारितमेतच्च ज्ञेयं व्यायाममण्डलम्। पार्दस्तुभूमिसयुत्त: सूचीविद्धस्तथैव च ॥५४॥ एलकाक्रोडितैश्चैव तूर्णेस्त्रिकविवर्तनः । सूचीविद्धापविद्धश्व क्रमेणावृत्य मण्डलम्॥ ५६॥ एलकाक्रीडितं ववद्यात्खण्डमण्डलसज्ञितम् । सव्यमुद्धट्टितं कृत्वा शकटास्यरच वामक:॥ ५७। तेनवास्कन्दित कार्य शकटास्वश्च वामकः। आद्यः पृष्ठापसर्पी च सच चापगतिर्भवेद्॥ ५८॥ आडिडतरच पुनर्वाम आद्यशचवापसर्पितः । वामो भ्रमरक: कार्य आद्य आस्कन्दितो भवेद् ॥ ५र्८ ॥ तेनवास्फोटनं कुर्थादेतदडि्डत मण्डलम्। आद्य तु जनितं कृत्वा तेनव च निकुट्टकम ॥ ६० ॥ स एव शकटास्यक्ष वामर्चास्कन्दितो भवेद्। पादश्व शकटास्यस्थः पर्याेणाथ मण्डलम् ॥६१॥ विज्ञेय शकटास्यं तु व्यायामे युद्धमण्डलम्। आद्यस्तु जनितो भूत्वा स एवास्कन्दितो भवेत ॥ ६२॥ अपसर्पी पुनर्वामः शफटास्यक्र दक्षिणः। स्राप्त्वा चारोभिरेताभि: पर्याेणायमण्डलम्। ६३॥ मध्यधमेतद्विज्ञेषं नियुद्ध चापि मण्डलम्। सूचीमाद्यक्रमं कृत्वा हयपक्रानतं च वामकम् ॥ ६४ ॥

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एकादशो ऽधयाय / १३३

पहुबे समपाद स्थान बना कर दोनो हायो को फैलाये। हाथो की हयेली ऊपर हो और उन्हे सटाकर आवेष्टिस उद्वेष्टित करे। अब बायें हाथ को कमर पर रख कर दाहिने को आवर्तिस करे। फिर दाहिने को कटि पर रख कर बाये को बारषतत करे। अब इसके साथ आवतित चारी मे बारी-बारी से गोलाकार घुमाव ले। इसे समोतसारित नामक व्यायाम मडल जानना चाहिये (५२ख ५५क)। दोनों पर भूमि पर सम स्थिति मे रख कर सूचो और एलकाक्रीडित चारियाँ करे। फिर मीठ को ह्ुत गति से घुमाव देकर भमरी चारी करे। फिर क्रमश सूची तथा आविद्धा (अपविद्धा) चारियो के साथ गोल घुमाव ले। इसे खड़मडल नाम वाला एलकाक्रोडित मडल कहा जाता है (५५ख-५७क)।

दाहिने पैर को उद्घटदित करते हुए घुमाये, फिर उसी पेर से आास्कदिता चारी करे और बायें पर से शकटास्या। अब दाहिने से अतिब्राता और चाधगति चारियाँ करे। अब बाया पैर अडडिता चारी मे रखे और दाहिने से अपक्राना कर। बायें से फिर भ्रमरी और दाहिन स आस्कदिता चारी करते हुए उसी को जोर से भूमि पर पटके। यह अडडित मडल है (५७छ ६०क)।

दाहिने पैर से जनिता चारी करक उसी से निकुटटिंत पाद (अप्रतलसचर) का प्रदर्शन कर। अब दाहिते से शकटास्या और बायें से आस्कदिता चारी करे। अब शकटासया चारी मे दोनो पेरो स गोल घुमाव ले। यह युद्धोपयोगी शक्रटास्य नामक व्यायाम मडल है (६०ख-६२क)।

दाहिने पैर से जनिता चारी करके उसी स आस्कदिता चारी का। फिर खायें पैर से अपकराता और दाहिने से शकटास्या करे। इन्ही चारियो से बारो बारी से घूम कर मडल बनाये तो यह युद्ध-प्रदर्शन मे उपयोगी अध्यर्थ नामक मडल है (६२ख ६४क)।

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भुजङ्भन्रासितश्राद् एवमेव च वामक:। भुजङ्गत्नासितैभ्नन्त्वा पादरवि' च मण्डलम् ॥ ६५॥ पिष्टकुटटं च विज्ञेयं चारीभिमण्डलं बुधः। सर्वेश्ाषगतैः पार्देः परिक्रम्य च मण्डलस् ॥ ६६॥

एतत्चायगतं विद्यान्नियुद्ध चापि मण्डलम् । नानाचारीसमुस्थानि मण्डलानि समासतः ॥६७ ॥

उक्तान्यतः पर चैव समचारी नियोजयेत । समचारीप्रयोगो वस्तत्समं नाम मण्डलम्। आचार्यबुद्धया तानीह फर्तव्यानि प्रयोक्तृमि: ।। ६८॥

एतानि खण्डानि समण्डलानि युद्ध नियुद्ध च परिक्रमे च। लोलाङ्गमाघुर्यपुर स्कृतानि कार्याणि वाद्यानुगतानि तज्जः ॥ ६६ ॥

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एकादशोऽध्याय /१३₹

दाहिने पर से सूची चारी और बायें से अपकाता करें। फिर दोनो पैरो से क्रमश भुजगतासिता चारी कहे। इसी चारी से मडलाकार घुमे तो पिष्टकुट्ट मडल होता है (६४ख-६ ६क) । चाषगत चारी के पैरो से गोलाकार परिक्रमा करे तो युद्धोपयोगी चापगत मडल जानना चाहिये (६६ख-६७र)।

अनेक चारियो से बनने वाले मडल मैंने सक्षेप मे बताये। अब समचारी मडल बताता हूं। (इसमे आवाशगत और भूमिगत दोनो प्रकार की चारियो का समान मिश्रण करके प्रयोग होता है)। चारियो के समान प्रयोग को समचारी मंडल जानना चाहिये (६७ख-६८)।

इन मडलो के खड़ो न पूरे मडलो का युद्ध, बाहुयुद्ध तथा परिक्रमा में उप- योग करना चाहिये। इनका प्रदर्शन लीला और अंगमाघुर्य से युक्त तथा वाद्यो से बनुगत हो (६६)।

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॥ अथ द्वादशोऽध्यायः ॥

एवं व्यायामसंयोगे कार्य मण्डलकल्पनम्। अल पर प्रवक््पामि गतीस्तु प्रकृतिस्थिताः । १ ॥ तलोपबहनं कृत्वा भाण्डवादयपुरस्कृतम्। यथामार्गरसोपेत प्रकृतीना प्रवेशने ॥ २॥ घ्र वाया सम्प्रवृत्तायां पटे चँवापकचिते। कार्य प्रवेश पात्राणा नानार्थरससम्भव ॥३ ॥ स्थान तु वेष्णवं कृत्या हपुत्तमे मध्यमे तथा। समुन्नत समं चंव चतुरश्रमुरस्तया।।४॥ बाहुशोषें प्रसन्ने च नात्युत्क्षिप्ते च कारयेव्। ग्रीवाप्रदेशः कर्तव्यो मयूराञ्चितमस्तकः ॥। ५ I। कर्णादप्टाङन्मुलस्पे च बाहुशीषे प्रयोजयेत्। उरसश्चाषि चिब्ुकं चतुरडगुलसस्थितम् ॥ ६ ॥ हस्तो तर्थव कर्तच्यौ कटिनानितटस्यितौ। दक्षिणो नाभिसंस्यस्तु वाम: कटितटे स्थितः ॥ ७॥ पादयोरन्तरं कार्य दवौ तालावर्धमेव च। पादोत्केपस्तु कर्तव्यः स्वप्रमाणविनिमितः॥८। दतुहतालो द्वितालशचा येकतालरतथंत्र च। चतुस्तालस्त देवानां पाभिवानां तर्थव च॥ ई ॥

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।। द्वादश अध्याय ।।

इस प्रवार व्यायाम के लिय मडला को रचना करनी चाहिय। अब मैं विभिन्न पातो की गनियां बताता हूँ (१)। पात्रो के प्रवश क पूर्व वाद्या के वादन क साथ उपवहन मार्गऔर रस के अनु र किया जाय (र)। जब ध् वागान जारी हो, तब पट हडा लिना जाय। इम प्रकार विभिन प्रकार के रस और भावो क जनक पाती का प्रवश कराना चाहिय (२। उतम और मध्यम पात्ो का प्रवश वैष्णव स्थान कु द्वारा होगा जिसमे उनका वक्ष मम ममुनत तथा चतुरश्र रहेगा, भुजाएँ और मस्तक प्रसन तथा बहुत उत्क्षप्त न हा, गरदन मयूर के समान अचित हो तथा बाहु और मस्तक बानो से आठ अमुन की दूरी पर रह, छावी ने ठुद्टी चार अगुल दूर रहे तथा दोनो हाथ करमर और नाभि पर क्रमश रख जाय। दाहिना हाथ नाभि पर ओर बारम कटि पर रखा जायगा (४-3)। दोनों पेरो के बीच की दूरी ढाई ताल रहेगो। पेरो का चलते समय अपनी ऊँबाई के अनुसार कपर उठाय (८)। ऊपर उठान में ऊँचाइ चार ताल, दा ताल या एक ताल हो सकती है। दवताओ के लिय तथा राजाआ के लिये चार ताल, मध्यम अकृति वालो के लिये तथा स्त्री, नीच पात्ो या सन्यासियो के लिये दा ताल ऊँचाई हो सबती है। डग भरने मे समय चार कला, दा कला या एक कला रखी जाती है।

१ उपवहन (उपोहन) अलाप के समान है। अभि के अनुसार ध्रुवा गान मे पद, ताल और कला के अनुसार स्वरो को विस्तार देते हुए उठाना उपवहन है। द् नाशा० ५१७४ के अनतर अतिरिक्त श्लोक तथा नाशा० ३११३२-१४०। उपोहन मे शुष्कासरो का प्रयोग होता है। २ सब तरफ से समान विस्तार वाला।

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द्वितालश्चैव मध्यानाँ ताल: स्त्रीनीचलिडगिनाम्। चलुष्कलोऽथ द्विकलस्तथा हृपेककलः पुनः ॥१०॥

चतुष्कलो हुयुत्तमानां मध्यानां द्विकलो भवेत्। तथा चँककल: पातो नीचाना सम्प्रकीतितः ॥ ११॥

स्थितं मध्यं द्ुतं चैद समचेक्ष्य लयं बुधः । यथाप्रकृति नाट्यज्ञो गतिमेव प्रयोजयेत् ॥ १२॥ धर्योपपन्ना गतिरुत्तमानां मध्या गतिर्मध्यमसम्मतानाम्। द्रुता गतिश्च प्रचराधमानां लयत्रयं सत्ववशेन योज्यम्॥ १३॥

देवाता नृपतीनां च दद्यात् सिहासनं ह्विजाः । पुरोधसाममात्यानां भवेद् वेत्रासनं तथा ॥१४ ॥

मुण्डासनँ तु वातव्यं सेनानीयुवराजयोः। काप्ठासनं ब्राह्मणाना कमाराणां कथासनम् ॥ १५॥ सिंहासनं तु राजीना देवीनां मुण्डमासनम्। पुरोधसो इ मात्यपत्नीनां दद्याद् वेत्रासनं तथा ॥१६॥ बुसीमुण्डासनंप्रायं वेन्नासनमयापि वा। होमे यज्ञक्रियार्यां च पित्यथे व प्रयोजयेत्॥ १७ ॥

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उत्तम पान्ो म चार कला मध्यम मे दो कला तथा नाच पात्ा म एक कला समय डग भरने मे रखा जाता है (६ १५)। विलबित मध्य तथा दुत लय के अनुसार सुद्धिमान् प्रयोकता मलग-अलग पात्ो की गति प्रयुक्त पराये (१२)। उत्तम पावो की ग्ति धंय से युक्त मध्यम पात्ो की गति मध्यम लम मे अधम पात्ो की गति द्ुत लय मे रहेगी इस प्रकार तीनो प्रकार के लय का उपयोग तीनो प्रवार के पातो की गति मे करना चाहिये (१३)। देवता तथा राजा के बठने के लिये सिंहासन और पुरोहित अमात्य क बैठने के लिये वेत्ासन रखना चाहिये (१४)। सेनापति और युवराज के लिये भुडासन रखना चाहिये ब्राह्मणो के लिये काष्ठ का े और कुमारो के लिये कुथा २ का आसन देना चाहिये। पटरानी के लिये सिंहासन तथा अय रानियो के लिय मुडासन और पुरोहित तथा अमात्यों को पत्नियों के लिये वेव्नासन का उपयोग करना चाहिये। होम, वज्ञानुष्ठान या पिसरो के तपण के दृश्यो म ब्रसी या भुडासन या वेव्रासन का भी उपयोग हो सकता है (१५ १७)।

१ पेड के तने को फाट कर बनाया आसन, बिना हत्ये का। २ लकड़ी का। २ कुपा-भूर्मि पर बिछामा गलीचा या मोटा वस्त।

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।। अथ व्रयोदशोऽध्यायः ॥

ये तु पर्व मया प्रोक्तास्त्रयो वे नाठ्यमण्डपाः। तेवां विभागं विज्ञाय ततः कक्ष्यां प्रयोजयेत् ॥ १॥ ये नेपभ्यगृहदारे मया पूर्व प्रकीतिते। तयोर्भाण्डस्य विन्यासो मध्ये कार्य. प्रयोक्तृभि ॥२॥ कक्ष्याविभागो निदॅश्यो रड्गपाउपरिक्रमात् परिक्रमेण रडगम्य ह्यन्या कक्ष्या भवेदिह॥ ३ ॥ वाह्य वा मध्यमं वाषि सर्थवाभ्यन्तरं पुनः । दूरं वा सन्निकृष्टं या देशं तु परिकल्पपेत् ॥४॥ पूर्वप्रविष्टा ये रडमं ज्ञेयास्ते 5 भ्यन्तरा बुछ्य:। पश्चात्प्रबिष्टा विज्ञेया कक्ष्याभागे नु बाहयतः॥ ५ ॥1 तेयां तु दर्शनेच्छुर्यः प्रविशेद् रड्गमण्डलम्। दक्षिणाभिमुख सो इ थ कुर्यादात्मनिवेदनम् ॥६॥ यतो सुखं भवेद् भाण्डव्वारं नेपथ्यकस्य च। सा मन्तव्या तुदिक पूर्वा नाट्ययोमेन नित्मशः ॥७ ॥ निष्क्रामेद्यश्च तस्माद् वे स तेनैव पथा ब्रजेद। मतस्तस्य कृतं तेन पुरुपेण निवेदनम्॥८ ॥ चतुविद्याप्रवृत्तिश्च प्रोक्ता नाट्घप्रपोतृमि.। आवन्ती दाक्षिणात्या च पाश्चाली चोढ़मागधी॥ य ॥

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॥ वयोदश अध्याय ।।

कक्ष्यातथा विभाग

मैंने पहले जो तीन प्रकार के नाटय मडप' बताये उनके नाप को समझ कर कक्ष्या का प्रयोग करे(१)। मैन पहले जो नेपथ्यशह और रगपीठ के बीच की दीवार मे बनाये जाने वाले दो द्वारो की मर्चा की है, उनके बीच मे भाड (कुतप या वादको) को बिठाना चाहिये (२)। रगपीठ पर परिक्रमा करने से कक्ष्या का विभाजन सूचित होता है। रगमच पर परिक्रमा करने से पाक्ष का एक कक्ष्या मे दूसरी कक्ष्ा म जाना बताया जाता है (३)। इस प्रकार परिक्रमा के द्वारा बाहा, मध्यम और आभ्यतर तथा दूरस्थ और निकटस्थ स्थानो की मच पर कलपना को जाती है (४)। जो पात पहले प्रवेश कर चुके है उन्हे आभ्यतर कक्षा मे स्थित् माना जायेगा, तथा जिन्होने बाद मे प्रवेश किया है, उन्हे बाहा कक्षा मे (५)। इन पाक्ो से मिलने के लिये यदि अन्य कोई पात रगपीठ पर प्रवेश करे, तो वह दक्षिण की ओर मुख करकेै अपना परिचस दे या अपनी बात कहे (६)। जिस दिशा की ओर उपर्पुक्त नेपथ्यगृह द्वार खुलते हैं तथा जिसकी ओर कुतप मुंह करके बैठता है, यह नाट्य-प्रयोग मे सदव पूर्वदिशा मानी जानी चाहिये (७)। जो पाव् जिस दिशा से रगमच पर प्रविष्ट होकर अपना सवाद बोत चुका है वह उसी दिशा से निष्क्रमण करेगा (८)। माट्यप्रयोक्ताओ ने चार प्रकार की प्रदृत्तियाँ बतायी हैं-आावन्ती, दाक्षि- गात्या, पाचाली और औढमागधी (६)।

१. द्र० स० नाशा० अ०२ २ कसमा एक नाटयधर्मी युक्ति है, जिसके द्वारा रगमच का कुछ क्षेत्रो मे काल्पनिक विभाजन कर लिया जाता है। ३ कुतप जिम ओर मुख करके बैठता है वह रगमच की पूर्व दिशा है, तदनुसार कुतप के दाहिने दक्षिण तथा बायें उत्तर और पीछे पश्चिम जानना चाहिये। कुतप का भुख दर्शको के सामने होता है।

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अत्राह-प्रवृत्तिरिति कस्मात् ? उच्यते-पृथिव्यां नानादेश- वेषभाषाचारा: वार्ताः ख्यापयतोति वृत्ति. प्रवृत्तिश्च निवेदने। ... यृत्तिसंशितैश्च प्रथोगरभिहिता देशाः, यतः प्रवृत्तिचतृष्टयमभि- निवृत्त प्रयोगश्चोत्पादितः ।

प्रयोगो द्विविधश्चैय विज्ञेयो नाटकाश्रय। सुकमारस्तथाविद्धो नाट्यपुक्तिसमाश्रयः ॥ १० ॥

मायेन्द्रजाल बहुलं पुस्तनैपथ्यसयुतम् ॥११॥ पुरुषंबंहु भियु वतमल्पस्त्रीकं तथव न सात्त्वत्यारभटीप्राय नाट्यमाविद्धमेव तत् ॥ १२॥ डिम: समवकारश्च व्यायोगेहामृगी तथा। एतान्याविद्धसंज्ञानि विज्ञेयानि प्रयोक्तृभिः ॥१३॥

नाटकं सप्रकरणं ाणो वीथ्यड़क एव च। सुकमारप्रयोगाणि अय बाह्यप्रयोग तु प्रेक्षागृहविवजिते। विदिक्ष्वपि भवेद् रडनां कदािद्भतु राज्ञया ॥१५॥ धर्मो या द्विविधा प्रोकता मया पूर्व द्िजोतमाः । लोकिकी नाट्यधर्मो च तयोवक्ष्यामि लक्षणम् ॥१६॥ स्वभावभावोपगतं शुद्ध त्वविकृतं तथा। लोकवार्ता क्रियोपेतमड्गलीला विर्वाजतम् ॥१७॥ स्वभावाभिनयोपेत नानास्तीपुरुषाश्रयम्। यदीदृशं भर्वेन्नाटयं लोकधर्मी तु सा स्मृता ॥१८॥

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व्रयोदशोडयाय /१४३

यहाँ मह प्रश्न उठता है कि 'प्रवृति' यह नाम कैसे चल पडा? उत्तर-इस पृथ्वी के विभिन्न देशो मे प्रचलित वेष, भाषा और आचार तथा वार्ता-इन सब को मिला कर धृर्ति कहते हैं और वृत्ति की सचना देने वाला तत्त्व प्रवृत्ति है। विभिन्न देश चार वृत्तियो के प्रयोग से सबद्ध माने जाते हैं, अत, इन चारो वृत्तियो के आधार पर चार प्रवृतियो का निर्माण कर उनसे नाटप्रयोग किया जाता है (या जनका नाट्य मे प्रयोग होता है।] नाट्य का प्रयोग नाट्ययुक्तियों के आधार पर दो प्रकार का जानना चाहिये-सुकुमार तथा आबिद्ध (१०)। जा आाविद्व (कठोर) अगहारो वाला, छेघ्य, भेदय तथा युद्ध से युक्त, माया और इद्रजाल की प्रनुरता वाला, पुस्त और नैषध्य२ से सवलित हो, जिसमे पुस्ष पात अधिक तथा स्त्री पाव् कम हो तथा सात्त्वती और आरभटो वृत्तियो की प्रधानता हो-ऐसा नाट्यप्रयोग आविद्व है (१०-१२) । डिम', समवकार व्यायोग4 तथा ईहामृग-ये चार प्रकार के रूपक आविद्ध नाट्यप्रयोग के उपयुक्त जानने चाहिये (१३)। नाटक, प्रकरण, भाणई, वीधी1 तथा अक"-ये रूपक सुकुमाशप्रयोग वाले जानने चाहिये, इनमे प्राय मनुष्य पात् ही होते है (१४/। बाह्यप्नयोग१२ की स्थिति मे जब नाट्य प्रेक्षागृह के बाहर खेला जा रहा हो तब भर्ता (नाट्यप्रयोग का आायोजन कराने वाले) की आज्ञा के कारण रगमच (पूर्वा भिमुख न हो सके तो) अन्य दिशा की ओर भी बनाया जा सकता है (१५)। हे द्विजोत्तमो, लोकधर्मी और नाट्यधर्मी-यह दो प्रकार की धर्मी मेंने पहले बताई थो। इन दोनो प्रकारो के लक्षण अब बताता हूँ (१६)। जब प्रयोग (लोक) स्वभाव के अनुसार प्रवृत्त हो, शुद्ध तथा विकाररहित हो, लोकवार्ता और लोकक्रिया से युक्त तथा आगिक अभिनय मे लोला से रहित हो, स्वाभाविक अभिनय से युक्त हो, अनेक स्त्री पुष्षो से आश्रित हो-तो ऐसा नाट्यप्रयोग लोकधर्मी है (१७-१८)

१ पुस्त आहायं अभितय के अतर्गत विभिव्न आकृतियाँ, दश्य आदि बनाने की विधि। द०-स० नाशा २०२४ २ प्रसाधन आदि आहार्यामिनय की सारी विधिया। नषध्य शब्द का प्रयोग जव- निका के पीछे का भाग बताने के लिये भी होता है। ३-११ दशरूपको के प्रकार। द्र०- स० नाशा० न० १७ १२ जो प्रयोग शास्त्र सम्मत न हो। द्0- नाशा० २२ गुन.

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१४४ / सङक्षिप्तनाट्यशास्त्रम्

अतिवाक्यक्रियोपेतमतिसत्त्वा तिभावकम् 1 लोलाइगहाराभिनयं नाट्यलक्षणलक्षितम्॥१६॥ स्वरालड् कारसंयुक्तमस्वस्थपु रुषाश्रयम् 1 यदीहशं भवेन्नाटयं नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥२०॥ लोके यदमियोज्यं च पदमत्रोपयुज्यते। सूतिमत् साभिलाषं च नाट्यधर्मो तु सा स्मृता ॥२१॥ आसन्नोवतं च यद्वाक्यं न शण्वन्ति परस्परम्। अनुक्त श्र यते यच्च नाट्यधर्मी तु मा स्मृता ॥ २२॥ रालयानविमानानि चर्मवर्मायवध्वजाः । भूतिमन्तः प्रयुज्यन्ते नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥२३॥

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त्यादशोऽघ्याय /१४५

जब वाक्य (सवाद), क्रियाऐं, पातो का स्वभाव या चित्तवृत्ि' तथा बोलने का ढग असामान्य हो, लीला (शोभा) के साथ अगहारो का प्रयोग हो जिससे लक्षण- युक्त नृत्यप्रदर्शन हो सके, स्वर और अलकारो का प्रयोग हो, स्त्नी पुरुष जैसी या पुरुष स्त्री जैसी चेप्टाएँ करे-तब इस प्रकार के नाट्यप्रयोग की पद्धति नाटयधर्मी कहलाती है (१६ २०) । जब नाट्य प्रयोग के अत्तर्गत लोक मे प्रयुक्त होने वाली (जड) वस्तुओ को साकार और चंतन्य रूप मे दिखाया जाय, तो यह नाट्यधर्मी है (२१)। रगमच पर स्थित पाव निकटस्थ पात् के (स्दगत) सवाद को नही सुनते, और (आकापभाषितर मे) न कहे हुए स्वादो को भी सुनते हैं-यह नाट्यधर्मी है (२२)। पर्वत, रथ आदि यान, विमान, ढाल, कवच, शस्त्र तथा ध्वज का मूर्त रूप मे प्रयोग हो तो यह भी नाट्यघर्मी है (२३)।

१ मूल में सत्त्व शब्द का प्रयोग है, अभिनव ने उसका अथ उपर्युक्त किया है, प० बाबूलाल शास्त्री ने 'प्राणी' अर्थ माना है। २ नाट्योक्ति का प्रकार, जिसमे एक अभिनेता अदृश्व या नेपथ्यगत पात से सवाद करता हुआ उस पाव् के उत्तर को भो 'कया कहा?' कह कर स्वय ही अनुकृत करता है। १०

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।। अथ चतुर्दशोडध्यायः ॥

यो वागभिनयः पूर्व मया प्रोक्तो द्विजीत्तमाः । लक्षणं तस्य वक्ष्यामि स्वरव्यञ्जनसम्भवम्॥ १ ॥ ाचि यत्नस्तु कर्तव्यो नाट्यस्यॅपा तभुः स्मृता। अड्गनैपथ्यसरवानि वाक्मार्थ व्यस्यन्ति हि। २ ॥ वाड़मयानीह शास्त्राणि वाडनिष्ठानि तर्थेव चे। तहमाद् वाच परं नास्ति वा्घि सर्वस्थ कारणम् ॥ ३॥ छन्दोहीनो न शब्दो डस्ति नच्छन्दरशब्दर्वजतम्। एवं सूभयसंयोगो नाट्यस्योद्योतकः स्मृतः ॥४॥ अष्टौ स्थानानि वर्णानामुर: कण्ठः शिरस्तथा। जिहवामूलं च दन्तारच नासिकोच्ठो च तालु च ॥ ५॥ अकहविसर्जंनोया: कण्ड्पा:, इचुपशास्तालव्याः, मादुरपा मूर्धन्याः, लृतुलसा दन्त्या, उपूपष्मानीया ओष्ठ्याः, ए-ऐ कण्ठता- लव्ौ, वकारो दन्तौष्ठ्यः, ड-ज-प-न-मा अनुनासिका. विसर्जनीयस्य औरस्य इत्येके। सर्वमुखस्थानमवर्णमित्यपरे। द्वौ दौ वर्णो तु वर्गादयौ रापसाश्च त्रयो S परे। अघोषा घोपवन्तस्तु ततो 5 नये परिकीतिताः ॥ ६।

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। चतुर्दश अध्याय ।

वाचिक अभिनय

हे द्विजोत्तमो, मैंने पहले जिस वाचिक अभिनय का उल्लेख किया था, अब मैं स्वरो और व्यजनो (के उच्चारण) से निर्मित उसका लक्षण कहूँगा (१)। अभिनेता को बाक के विषय मे प्रयत्न करना चाहिये, कयोकि यह वाक नाट्य का शरीर कही गयी है। आगिक, सात्विक और आहारयं-ये वाक्यार्थ१ को व्यज्ञित करते हैं (२)। सारे शास्त्र वाक से व्याप्त और वाक से निर्मित हैं इसलिये बाक से परे दुछ भी नही है वाक् ही सबका कारण है (३) । छद से रहित शब्द नहीं और शब्द से रहित छद नही, इस प्रकार इन दोना का सयोग नाट्य को चमका देता है (4)। बर्णों के आठ (उच्चारण) स्थान है-छाती, कठ, शिर, जिह्हामूल, दाँत, नासिक, ओठ तथा तालु (५): अ, व्, ख्, ग्, घ्, ड् तथा विसर्ग-ये कठ्य हैं। इ, च्, छ, ज, झ्, ज् तथा श्- तालव्य हैं। ऋ, ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण और ष्-ये मूर्धम्य हैं। लृ, त्,थ्, द्, ध, न् और स्-ये दत्य हैं। उ,प्, फ, ब्, भ्, म् तथा उपघमानीय ये ओष्ठच है। ए और ऐ कठतालव्य हैं, ओ और औ कठोप्ट हैं, व दतौष्ठ्य हैं, ड, ब् ण्, न् तथा म्-ये अनुनासिक हैं। कुछ लोगो के मत मे विसर्ग के उच्चारण का स्थान (कर न होकर) उटम् (छाती) है। अन्य लोगो के अनुसार अकार का उच्चारण स्थान सारा मुख है। कवर्ग, चवर्ग, दवर्ग, तवग तथा पवगं-इन पाँच वर्गों में प्रत्येक वर्ग के प्रथम दो-दो वर्ण तथा झ्, प्, स्-ये अघोप हैं, शेष वर्ण सघोष हैं (६)।

१ वाकपार्थ=रस।

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॥। अथ पञ्चदशोडध्यायः ॥

विभूषणं चाक्षरसंहतिश्च शोभाभिमानो गुणकीर्तनं च। प्रोत्साहनोदाह रणे निरुवतं गुणानुवादो 5 तिशयः सहेतुः॥ सारूप्य मिथ्याध्यवसायसिद्धि- पदोच्च याक्रन्दमनोरथारच

tt

आशी: प्रियोवित. कपटः क्षमा च आप्तिश्च पश्चात् तपनं तथेव। अर्थानुवृत्तिह्यु' पर्पातयुवती कार्यो अनुनीतिः परिदेवनं च॥

पटत्रिशदेसानि तु लक्षणानि प्रोकतानि वं भूषणसम्मितानि। काव्येपु भावार्थगतानि तज्जः सम्यपप्रयोज्यानि पयारसं तु।।

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। पञचदश अध्याय ।।

वाचिक अभिनय-लक्षण, अलंकार और गुण विभूषण१, अक्षरसहति२ शोभा१, अभिभान", गुणकीतन५, प्रोतसाहन, उशहरण9 निरुत्प, गुणानुवादर्ड अतिशय१०, हेतु1 साम्य्य१२ मिध्याध्यव ताय १३ मिद्ि१४ पदोच्चय१५ आक्रद६ मनोरथ१७ वाम्पान१ याच्जाो प्रतिपे६१ पृच्छ२१ दृष्टात२, निर्भासन२३, सशय९४, आझी र प्रियोक्ति २६ कपट२ क्षमार, प्राप्तिप्ह पश्चात्ताप० अर्थानुवृत्ति २१, उपपति३२, युक्ति३३ बार्य१४, अनुनीति३ तथा परिदेवन३ ये ३६ लक्षण काव्य के शोभावर्धक होते है। इनका प्रोग (वाट्य मे अभिनय) काव्य मे भाव और अर्थ के साथ रसों के अनुरूप करना चाहिये (१४)। १ अनेक गुणो तथा अलकारो से अलकुत होना।२ कम अक्षरो मे विचित्न वर्णन। ३ असिद्ध अर्थ को सिद्ध के समान चिव्नित करना। ४ अनेक वचनो, युत्तियो से भी किमी बात का सिद्ध न हो पाना। ५ गुणो के विवरण मे दोप का अकथन। ६ औपम्य युक्त उत्साहजनक वचन। ७ एक के उदाहरण से अनेक की सिद्धि। तथ्य या तम्परहित का लक्षण। द हीन व्यक्ति को उत्तम से उपमा देकर उसके गुणो को बढ़ा कर बताना। १० उत्तम से बढ़ कर कोर्ई वैशिष्ट्य बताना। ११ बहृतो मे से एक अपाधारण कारण का निर्णय। १२ परोक्ष सास्प्य को दिखाना। १३ अपारमार्थिक तत्व से मिथ्या वस्तु का निर्षय। १४ बहुत नी प्रसिद्ध वस्तुओ के बीच एक अप्रसिद्ध का नाम लेना। १५ एकार्थ- निष्ठ अनेक शब्दो से किसी वस्तु को प्रशसा। १६ साक्षात् अवाच्य अर्थ का स्फुट कथन। १७ अन्यापदेश के द्वारा हृदयस्थ भाव का प्रदर्शन। १८ पूछे या न पूछे गये अर्थ का निणय। १६ प्रारभ मे क्रोध तथा अत मे हष उतपन्न करने वाला वाज्य। २० विपरीत् बात को रोकना। २१ प्रश्न उठाते हुए प्रतिपादन। २२ उदाहृरण देकर समझाना। २३ अनेक युक्तियो वाता अनेक अर्थों का सिद्ध करने वाला वाक्य। २४ निणेय न हो पाना। २५ मनोरथ समुद्भव या शास्त्र समुद्भव शुभाशमा। २६ आशीर्वचन समन्वित प्रारभ मे अप्रिय अत मे प्रिय लगने वाला वचन। २७ छतपूर्ण उक्ति। २८ क्रोधजनक वाक्यो मे भी क्रोध न होना। २६ एक अवयव देख कर अवयवी का ज्ञान। ३० अकार्य करने, कार्य न कर पाने पर पछतावा। ३१ दूसरे के मनोनुकूल चलना। ३२ दोपो का शमन। ३३ परस्पर अनुकूल अर्थों मे सबध बिठाना। ३४ दोष हदा कर गुण को कथ्य से जोडना। ३५ सेवारयेक मधुर वाक्यो को अपराध क्षमा कर कहना। ३६ लन्य के दोषो को अन्य से जोडना।

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उपमा दीपकं चैव रूपकं यमकं तथा। काव्यस्यते हयलड् काराश्व्वार: परिकोतिता.॥ यत् किश्चित् काव्यबन्धेषु साहृश्येनोपममीयते। उपमा नाम सा ज्ञेया गुणाकृतिसमाश्रया ॥ नानाधिकरणार्थानां शब्दाना सम्प्रदीपकम्। एकवावयेन संयुक्तं तद्दीपकमिहोच्यते॥

स्वविकल्पेन रचितं तुल्यावयवलक्षणम्। किञ्वित् साहश्यसम्पननं यद्रूपं रूपकं तु तत्।। शब्दाभ्यासस्तु यमकं पादादिषु विकल्पितम्।

भिन्नार्थमेकार्थमभिप्लुतार्थम। न्यायादपेतं विषमं विसन्धि शब्दच्युतं वे दश काव्यदोपाः ।। श्लेषः प्रसाद: समता समाधि- र्माधुर्यमोजः पदसौकमार्यम्। अर्थस्य च व्यनितिरुदारता न कान्तिश्च काव्यस्य गुणा दर्शते।।

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पञ्च दशोऽयाय /१५१

उपमा, दीपक, रूपक और यमक-ये चार काव्य के अलकार कहे गये हैं (५)। काव्यब्रघ मे गुण और आकार की समानता के आधार पर एक वस्तु को दूसरे से उपमा दी जाती है-वह उपमा है (६) । भिन अर्थों को बताने वाल शब्दो को एक वाक्य मे दीपक के समान प्रका- शिस करने वाला दीपक' अलकार है (७)। अपने विकल्प से निमिन तुध्य अवयदा बाला कुछ सादृश्य के आधार पर दो वस्तुओ म रूप की अभितता बताने वाला मल कार रपक े है (८)। श्लोक क एक चरण या अनेक चरणो मे शब्दो की आवृत्ति यमके है (६)। दाव्य क दम दोष है-गुढ़ाथ४ जर्घातर अथहीन भिनाथ७, एकाथअभिप्सुलाथर्म सामादपेत९ विषम "१ विसधि तथा शब्दच्युत१२ (१०) काव्य के दक्ष गुण है-श्लव'१ प्रसाद ४ समता"४ समाधि१६, माधुय १७ ओजस१८ पदसीकुमार्य" अथव्यक्ति२, उदारक्षा २१, तथा कातिर२ (99)।

१ एक क्रिया के अनेक कारक होने या अनक कारको की एक क्रिया होने पर दीपक माना गया। २ भेद होने पर अभेद का आरोप करना जैसे मुखचद। ३ एक ही शब्द भिन अर्थों में दोहगया जाय। ४ स्पष्टाथक के स्थान पर उसका विलष्ट पर्याय प्रयुक्त करना। ५ अवण्य का वणन। ६ असबद्ध तथा अर्वश- घटार्थक प्रयोग। ७ असभ्य या ग्राम्थ का प्रधाण। एक अर्थ को अनेक शब्दो मे दोहराना। ह दो वाक्यो का गडडमगडड होना। १० देशकाल विरुद्ध या कल्ाशास्त्रादिविरुद्ध ।११ छद का भ्रात प्रयोग। १२ सधि का उचित प्रयोग न होना। १३ ईप्सित अर्थ स सबद्ध पदो की िलष्टता। १४ अथ की स्पष्टता, १५ शैली का समान रूप से सुबोध होना। १६ अधूव या विशिष्ट अर्थ को प्रतीति: १७ बार-वार कहे या सुने जाने पर भी आकषक लगने वाला वाक्य- विन्यास १८ समास युक्त विचित्र पदो का प्रयोग। १६ सुख-प्रयोज्य सुश्लिष्ट सधि पदो मे अर्थ की सुकुमारता। २० अभिव्यक्ति की प्राजलता। २१ दिव्य भाव तथा शृद्गार और अद्भुत की मोजना। २२ मन और कानो को माह्नादित करने की क्षमता।

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१५४ / सङक्षिप्तनाटयशास्त्रम्

अथ पडलड कारा नाम- उच्चो दोप्तश्च मन्द्रश्त नीचो द्ुतविलम्बिती। पाठ्यस्येते ह्यलड्कारा लक्षणं च निबोधत। उच्चो नाम शिरःस्थानगतस्तारस्वर:, स च दूरस्थाभावण- विस्मयोत्तरे त्तरसञ्जल्पदूरा हृवा त्रासन बाधाद्येु। दोप्तो ना शिरःस्थानगतस्तारतर, स चाक्षेपकलह विवा दामर्पकृष्टाघर्णणक्रोध- शौरयदपतीक्ष्ण रूक्षा मिधा ननिभर्सनाकरन्दितादिषु। मन्द्रो नाम उर :- स्थानगतो निर्वेदग्लानिचिन्तौत्सुक्यदैन्य व्याधि क्रीडागाढशस्वक्षत- मूर्च्छामदगुहुयार्थवचनादिषु। नीचो नाम उरःस्थानस्थो मन्द्रतरः

नाम कण्ठगत स च् त्वरितः, लल्लनमन्मनभयशीतज्बरत्रासायस्ता- त्यथिककार्यववेदनादिषु। विलम्विरितो नाम कण्उस्थानगतस्तनुमन्द्र, स व शडगारकरुणविताकत विचारा मर्पासूयिता व्यवतार्थद्रवादलज्जा- चिमतातर्जन विस् मय दोपानुक्की तेनदीर घरोगनिषीडनादिषु। अथाड्गानि पट-विच्छेदोडर्पंणं विसगोडनुबन्धो दीपनं प्रशमनमिति। तत्र विच्छेदो नाम बिरामकतः । अर्पणं नाम लीलायमानमधुरवलुना स्वरेण पूरयतेव रदगं यत्परपते तदर्पणम्। विसर्गों नग्म वाक्य- विन्यासः। अनुबन्धो नाम पदान्तरेप्वपि विच्छेदः, अनुच्छबसनं वा। दीपनं नाम त्रिस्थानशोभि वर्धमानस्वरं चेति। प्रशमनं नाम तार- गतानां स्वराणा प्रशाम्यतामर्वस्वर्येणावतारणमिति।

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षोडशोऽध्याय /१५५

पाठय के छ अलकार इस प्रकार हैं-उच्च, दीप्, मद्र, नीच द्रत और विल ह बत। अब इसके लक्षण जानो। उच्च सिर के स्थान से उत्पन्न तार (ऊँचे) स्वर बाला होता है। इसका प्रयोग दूरस्थ व्यक्ति से सवाद, विस्मय, कहा सुनी, दूर से पुकारना, डराना बाधा देना आदि मे होता है। दीप भी सिर स्थान से उत्पन्न होता है, पर इसका स्वर तारतर (और भी ऊँचा) होता है। आक्षेप, कलह विवाद, अमर्ष, चीखना, जोर से खचना, क्रोध, शोर्य, दर्प, तीखा या रूखा बोलना, डपटना तथा रोना-इनमे प्रयुक्त होता है। मद्र नामक अलकार वक्ष के स्थान से उत्पन्न है। इसका प्रयोग वैराग्य ग्लानि, चिता, उत्सुकता दोनता, बीमारी, पस्त्रो के गहरे घाव बेहोशी, वशा, गुह्य या गोपनीय बात या शब्द बताने मे होता है। तीच अलकार भी वक्ष स्थानीय होता है पर यह और धोमे स्वर मे रहता है। यह स्वाभा विक बातचीत, बीमारी, शाति, श्रम, दुखी डरे गिरे या मूच्छित को बतान मे प्रयुक्त होता है। हुस नामक अलकार कठगव होता है। इसका प्रयोग शोघ्नता से (हुत लय मे) किया जाता है। इसे दुलारना चुप कराना भय शीत, ज्वर, ज्ास, आवेग और अत्यादश्यक कार्य बताने मे योजित करते हैं। विलबित नामक अलकार भी कर स्थानीय है, यह थोडा मद्र लय मे प्रयुक्त होता है। वह शृगार करण वितर्क विचार, अमर्ष असुमा, अव्य- कार्थ प्रवाद (अटपटी या अस्पष्न बात कहना), लब्जा, चिंता, मना करना, विस्मय, दोष बताता लबी बीमारी तथा दबाने आदि मे प्रयुक्त होता है। पाठम के अगछ हैं-विच्छेद अर्पण विसर्ग, अनुबद दीपक तथा प्रममन। विराम (pause) से होने वाला विच्छेद है। लीला (शोभा मुकुमारता) से युक्त मधुर, कोमल स्वर से रगशाला को भरते हुए जब पाठ किया जाता है, तो अपण होता है। वाक्य की पूर्ति विसर्ग है। शब्दो के बीन में विच्छेद न होना अनुवध है। जब पाठ तीनो स्थानो (वक्ष, क तथा सिर) से उच्चारित होवर क्रमश बढता जाय तो यहं दीपन है। तार (उच्च) स्वर को बिना वेसुरा किये तीचे उतार लाना प्रशमन है। १ अभिनव द्वारा उद्धुत एक मत के अनुसार इन छ अगो का सबध उच्चारण- काल से माना गया है। इनके आधार पर वर्णोच्चारण मे वर्णध्वनि शुन्य काल भी छ प्रकार का हो जाता हू। इस प्रकार द्रुत, मध्य और विलबित-इन तीन तय प्रकारो के अनुसार पाठ्य के छ अग प्रयुक्त होते है। अभिनव इससे असहमति प्रकट करते हुए इन अगो को पदो के विशिष्ट धर्म मानते हैं। पदो का टूटना विच्छेद, न टूटना अनुबध, पुष्ट होना अर्पप अपुष्ट होना विसर्ग, आरोहण दीपन तथा अवरोहण प्रशमन है। इस प्रकार भाव अभाव, उपचय, अपचय, आरोह और अवरोह से नाद भी छ प्रकार का हो जाता है।

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युक्तं पाठ्यं कार्यम्। दीपनप्रशमनयुक्तं करुणे। विच्छेदप्रशम- नदोपनानुबन्धबहुलं वोररौद्राद्भुतेपु, विसर्गविच्छेदयुक्तं बोभतस भयानकयोरिति 1 सर्वेषामप्येषां मन्द्रमध्यतारकृतः प्रयोगस्त्रिस्था नगतः। तत दूरस्थाभायणे तारं शिरसा, नातिदूरे मध्यं कण्ठेन, पाश्वंतो मन्द्रमुरसा प्रयोजयेत पाठ्यर्मिति। मन्द्राव तारं न गच्छेत्, ताराद् वा मन्द्रमिति। एचा च हुतमध्यविम्व्रितास्त्रयो लया रसेसूपपादयाः। तत्र हास्पशड मारयार्मध्यलयः, करुणे विलम्वितो, वोररौद्रा्भुततवोभत्स भघानकेषु दुस इति। अथ विराम. अर्थसनस्तौ कार्यवशान्न छन्दोवशात्। कस्मात, हृश्यन्तें हुयेकद्वित्रिचतुरक्षरा विरासा: ।

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पोडमोऽध्याय / १५७

इनमे से हास्प और पद्धार रस के प्रसग मे पाठ्य का प्रयोग अर्पण, विच्छेद, दीपन और प्रशमन मे मुक्त करना चाहिये, करुण रस में दीपन और प्रशमन से युक्त तथा बीर, रोद्र, और अद्भुत रसो मे विच्छेद, प्रशमन, दीपन और वनुबध से बहुल पाठ होना चाहिये तथा बीभत्स और भपानक मे विसर्ग और विच्छेद से युक्त। इन सभी अगो का प्रयोग मद्, मध्य और तार स्वरो के जनक तीन स्थानो (वक्ष, कठ तथा सिर) से होता है। दूर स्थित पात्र से बात करने मे सिर से तार स्वर, बहुत दूर न होने पर कठ से मध्यम तथा पास होने पर वक्ष से मद्र स्वर के माथ पाठ्य का प्रयोग करे। मद्र से सहसा तार पर और तार से मद्र पर न जाये। पाठ्य की दुत, मध्य और विलबित-ये तीन प्रकार की लय रसी के अनु- सार उपयोग मे आती है। हास्य और शृगार मे मध्य लय, करुण मे विलवित, वीर, रोद्र, अद्भ त, बीभत्स और भमानक मे दवत लय का प्रयोग होता है। विराम का प्रयोग अर्थ पूरा होने पर कार्य-व्यापार की दृष्टि से होना चाहिये, छद की दृष्टि से नही। (एक चरण के भीतर भी) एक, दो, तौन या चार अक्षरो पर विराम सभव है।

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।। अथ सप्तदशोऽष्यायः ।

नाटकं सप्रकरणमड़को व्यायोग एव च। भाण: समवकारश्च वीथी प्रहसनं डिमः ॥ ईहामृगश्च विज्ञेयो दशमो नाटयलक्षणे ॥ १ ॥। सर्वेषामेव काव्यानां मातृका वृत्तयः स्मृताः । आभ्यो विनिःसृतं ह्येतद् दशरूपं प्रयोगतः ॥२॥

ज्ञेयं प्रकरणं चँव तथा नाटकमेव च। नानाबन्धसमाश्रयम् ॥। ३ ॥।

बीधी समवकारश्च तथेहामृग एव च। उत्सृष्टिफाडको व्यायागो भाण: प्रहुसनं डिमः ॥। केशि कीवृत्तिहीनानि रूपाण्येतानि कारयेत् ॥ ४॥

प्रख्यातवस्तुविषयं प्रख्यातोदातनायकें चंब। रारजपिवंश्यचरितं तथेव दिव्याश्रयोपेतम् ॥। ५ ॥

भड् कप्रवेशकाढयं भवति हि तन्नाटकं नाम ॥ ६॥

नृपतीनां यच्चरितं नानारसभावचेष्टितं बहुधा। सुखदुःखोत्पत्तिकृत भवत हि तन्नाटकं नाम ॥ ७॥

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। सप्तदश अध्याय ।।

दश रूपकनिरूपण

नाटक प्रकरण अक व्यायोग भाण समवकार वीथी प्रहुसन डिम और ईहामृग-ये रूपक के दस भेद हैं। (१)

सभी प्रकार क काव्यो (रूपको) की माता वृति मानी गयी है। वृत्तियो से ही दस प्रकार के रपक प्रयोग की दष्टि से निकले है (२)

नाटक और प्रकरण-पे दो प्रकार के रपक सारी वृत्तियों से युक्त होते है तथा विभिन्न प्रकार के काव्पवध इनम प्रयुक्त होते हैं (३) ।

वीथी समवकार ईहामृग उ मृटिबक व्यायोग भाण प्रहुसन तथा डिम-ये आठ रपक कैशिकी वृत्ति से रहित हाते हैं (४)। [नाटक का लक्षण]- नाटक को कथवस्तु प्रस्यात होती है। इसका नायक प्रस्यात और उदात्त होता है। इसमे राजर्षियों के वशज का चरित् रहता है। साथ ही दिव्य पातो का भी आश्रय लिया जाता है। नाटक विभिन्न विभूतियो ऋद्धि और विलास आदि गुणो से युक्त तथा अको और प्रवेशको मे सपन होता है। राजाओ का अनेक रसो और भावो से समन्वित चेष्टाओ वाला तथा सुख दुख की उत्पत्ति से होने वाला चरिद इसम दिखाया जाता है (v७)।

१ वृत्ति के लिये देखे स० नाशा० अ० १६ २ इतिहास (रामायण महाभारत) या पुराण आ्दि से गृहीत । ३ अभिनव के अनुमार सबथा देवचरित नाटक मे नही रह सकता उससे सपूर्ण रसास्वाद नही हो सदेगा।

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यत्रार्थस्य समाप्तियंत्रच वीजस्य भर्वत संहारः । किञ्चिदवलग्नबिन्दुः सोडड क इति सदावगन्तव्यः ।। ८।।

एकदिवसप्रवृत्तं कार्यस्त्वड को डर्थबीजमधिकृत्य। आवश्यक कार्याणामविरोधेन प्रयोगेषु॥ द ॥

दिवसावसानकार्य यद्यड के नोपपद्यते सर्वम्। अड कच्छेद कृत्वा प्रवेशकंस्तद् विधातव्यम् ॥ १०॥

प्रकरणनाटकविषये पञ्चाद्या दशापरा भवन्त्यडका। अड कान्तरसन्धिपु च प्रवेशकास्तेषु तावन्तः ॥। ११। न महाजनपरिवार कर्तव्यं नाटकं प्रकरणं वा। ये तन् कार्यंपुरुषाश्चत्वार: पञ्च वा ते स्यु. ॥ १२॥

काव्यं गोपुच्छाग्रं कर्तव्यं कार्यबन्धमासाद्य। ये चोदात्ता भावस्ते सर्वे पृष्ठतः कार्या ॥१३॥

सर्वेपां काव्यानां नानारसभावयुवितयुक्तानाम्। निर्वहृणे कर्त्तव्यो नित्यं हि रसो उद्भुतस्तजजः ॥ १४ ॥ यत्र कविरात्मशवत्या वस्तु शरीरं च नायक चँव। औत्पत्तिकं प्रकुरुते प्रकरणमिति तद बुघेजञयम्॥ १५॥ यदनापॅमयाहायं काव्यं प्रकरोत्यभूतगुणयुक्तम्। उत्पन्नघोजवस्तु प्रकरणमिति तदपि विज्ञयं॥ १६॥ यन्नाटके मयोवतं वस्तु शरीरं च वुत्तिभेदाश्च। तत्प्रकरणे डपि योज्यं सलक्षणं सर्वसन्धिषु तु॥ १७ ॥ विप्रवणिकसचिवाना पुरोहितामात्यसार्थवाहानाम्। चरितं यन्नेकविघं जञयं तत्प्करणं नाम॥ १८॥

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(अक का लक्षण)-जहाँ एक अर्थ (विषय) की समाति हो जाये, बीज का समाहार हो तथा बिंदुरे का कुछ स्पर्श हो उसे अक जाना जाय (८)। अर्थ और बोज का आश्रय लेकर अक मे एक दिन की घटनाऐं दिखायी जायें, ऐसे आवशयक काय जो प्रयोग मे परत्पर विरोधी न हो अषक म दिखाये जाये, दिन भर मे होने वाला काय मदि सब एक अक मे न दिखाया जा सके तो अह का विच्छेद करके शेप कार्य प्रवेशको के द्वारा सूचित कराया जाय (१०)।

प्रकरण औौर नाटक मे पाँच से दस तक अक रहते है। दो अको के बीच उतने ही (पाँच से दस तक) प्रव्रेशक रह सकते हैं (११)। नाटक या प्रकरण म प्रत्येक अक मे पातो की भीड़ अधिक न रहे। कार्य करने वाले पुरुष चार या पाच रहे (१२)। काव्य (नाटय के आलेख) की सरचना कायबध की दृषिि से गाय की मंछ के अगले भाग के समान होती है। इसमे सारे उदात्त भाव पीछे दिखाये जाते है (१३)। सभी प्रकार के रसो, भावो और युक्तियो से समन्वित काव्यो के नि्वहण (उपसहार) मे काव्य ममज्ञ रचनाकार को सदैव अद्भुत रस का समावेश करना चाहिये (१४)।

(प्रकरण का लक्षण)-जहा कवि अवती शक्ति (प्रतिभा, कल्पनर) से रूपक को कथा, शरीर और नायक की मृष्टि करता है, उसे बुद्धिमान् लोग प्रहुमन जाने (१५)। जो अभूतपूर्व गुणो से युक्त अना्प तथा आहार्य काव्य कवि रचता है जिसका बीज और कथावस्तु कल्पत हो उसे प्रकरण जानना चाहिये (१६)। मैंने नाटक के लिये जो कथावस्तु शरीर और सृत्ति के भेद बताये हैं उन्हें लक्षण सहित सभी सप्ियों मे प्रकरण मे भी जोडना चाहिये (१७)। जिसमे ब्राह्मण, वणिक, सचिव, पुरोहित, अमात्य, सार्थवाह (व्यापारी)-इनका अनेक प्रकार का चरित रहे वह प्रकरण है (१८)।

१-२ बीज, बिंदु, पताका, प्रकरी तथा कार्य-ये पाँच अध प्रकृतियाँ हैं। आागे देखो। ३ पहले के कबिया के काव्य या वृहत्कया आदि से जिसकी कथा या परिकल्पना ली जाय।

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१६२ / स ड्क्षिप्तनाट्यशास्त्रम्

नोदात्तनायककृतं न विव्यचरितं न राजसम्भोगम्। बाहुयजनसम्प्रयुक्तं तज्ज्ञेयं प्रकरणं तज्जः ॥१॥ दासविटश्रेष्ठियुतं वेशस्तयुपचारकारणोपेतम्। काव्यं कार्य प्रकरणे तु॥ २०॥

प्रकरणनाटकलेदादुत्पादयं वस्तु नायक नृ्ततम्। अन्तःपुरसड्गीतककन्यासधिकृत्य कर्तव्या॥ २१ ॥

स्त्रीप्रायाचतुरडका ललिताभिनयात्मिका सुविहिताडगी। बहुमृत्तगीतपाठ्या रतिसम्भोगात्मिका चैब ॥ २२॥

राजोपचारयुत्ता प्रसादनक्रोधदम्भसंयुक्ता। नायकदेवीदूती सप रिजना नाटिफा जंया ॥ २३ ॥

देवासुरबीजकृतः प्रख्यातोदात्तनायकर्चंव । हयड् करतथा त्रिकपटस्न्रिविद्रवः स्पात् त्रिशृडगारः ॥। २४॥

द्वादशनायकबहुलो ह्यप्टादशनाडिका प्रमाणशच। यक्ष्याम्यस्याडकविधि यावत्यो नाडिका यत्र॥२५॥

अड्कस्तु सप्रहसनः सविद्रवः सकपटः सवीथीकः । द्वादशनाडीविहितः प्रथमः कार्यः क्रियोपेतः ॥२६॥

कार्यस्तथा द्वितीयः समाश्रितो नाडिकाश्वतस्रस्तु । वस्तुसमापनविहितो द्विनाडिकः स्यात तृतोयस्तु ॥ २७ ॥ नाडी संज्ञा जञेया मानं कालस्य यन्मुहूर्तधिम। युद्धजलसम्भवो वा वायवग्निगजेन्द्रसम्भ्रमकृती वा। नगरोपरोधजो वा विज्ञेयो विद्रवस्त्रिबिघ्यः ।। २८ ।।

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सप्तदशोडघ्याय /१६३ प्रकरण मे उदात्त नायक नहीं रहते, दिव्य (देयता) पात्ो का चरिति नही रहूता, राजा का पङ्गार नही दिखाया जाता तथा बाह्य (अत पुर के बाहर के) पातो (वेश्या, दाम, शिक्षु, जुआरी आदि) के द्वारा इसकी कथा आगे बढायी जाये (१६) । प्रकरग मे काव्म दास, विट और श्रेष्ठियों के चरित वाला हो, वेशस्त्री (वेश्या) के उपचार को इसमे कारण के रूप मे दिखाया जाय, नीच कुल की स्त्रियो का चरित इसमे बताया जाय (२०)।

(नाटिका का लक्षण)-ताटिका की कथा प्रकरण और नाटक से मिली-जुनी तथा कस्पित होती है। इसमे राजा नायक होते हैं। इसमे अत पुर मे होने वाले सगीतक१ मे निपुण कन्या का आश्रम लिया जाता है (२१)। इसमे स्त्री पात्र अधिक होते है। अक चार होते हैं। यह ललिव अभिनय से युक्त होती है। सारे अगो की इसमे अच्छी तरह योजना को जाती है। इसमे नृत, मीत और और पाठय की प्रश्ा- नता रहती है तथा रति और सभोग से युक्त भी यह होती है। राजा के उपचार से युक्त, प्रसन्न करना, क्रोध और दभ के दृश्यो वाली, नायक, देवी और दूती तथा परिजनो से युक्त नार्टिका होती है (२२) ।

(समचकार का लक्षण)-समवकार में देवा और असुरो की प्रख्यात कथा का बीजार्थ रहुता है। इसमे प्रस्यात और उद्यत्त नायक रहते है। इसमे तीव अक रहते है तथा तीन प्रकार के कपट, तोन प्रकार के उपद्रव और तोन प्रकार का श्ृद्धार प्रयुक्त किया जाता है। यह बारह नायको से भरा हुआ होता है। इसे खेलने का समय बारह नाडी है। अब मैं प्रत्येक अक मे जितनी नाडी का समय प्रयोग की दृष्टि से लगता है उसे बताता हूँ (२५)। पहला भङ्ू प्रहसन से युक्त, विद्रव, कपट और बीथी वाला होता है, इसमे बारह नाडी वा समय लगता है (२६)। द्वितीय अक्क बार नाड़ी के समय वाला होता है। तृतीय अक्क मे तौन नाडियाँ होती है तथा वस्तु का स्षमापत होना है (२)। वाधे मुहुत का समय एक ताड़ी है। विद्रव तीन प्रकार का होता है-(१) युद्ध और जल से उत्न (२) वायु, अग्नि या बड़े हाथियो की भगदड़ से होने वाला (३) नगर पर बेरा डालने से होने वाला (२८)।

१ वृत्त, गोत तथा वाद-तीवो का योग। सगीतक कन्या=सभ्गीतशाला मे प्रशि- क्षित कन्या। (बभि०)

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वस्तुगतक्रमबिहितो दँववशाद् वा परप्रयुक्तो वा। सुखदुःखोत्पत्तिकृत स्न्निविधः कपटोडत्र विज्ञेयः ॥ २६ ॥।

त्रिविधश्चान्र विधिज्ञ पृथक पृथक् कार्ययोग-विहितार्थ। शड्गार: कर्तव्यो धर्में चार्ये च कामे च॥। ३० ।।

दिव्यपुरुषाश्रयकृतो दिव्यस्त्रीकारणोपगतयुद्ध। सुविहितवस्तु निबद्धो विप्रत्ययकारकश्चंव ॥ ३१॥

उद्धतपुरुपप्रायः स्त्रीरोपग्रथितकाव्यबन्धर्च। सडक्षोभविद्रवकृत: सम्फेट कृतस्तथा चैव ॥ ३२॥

स्त्री भे दनापहुरणवमर्दनप्राप्तवस्तु शुड्गार: । ईहामृगस्तु कर्तरव्यः सुसमाहितकाव्मबन्धरच ॥ ३३ ॥

यद् व्यायोगे कार्य ये पुरुषा वृत्तयो रसाश्चैव। ईहामृगेडपि ते स्युः केवलममरस्त्रिया योग: ॥ ३४॥

प्रख्यातवस्तुविषयः प्रख्यातोदात्त नायकरचंद। पड्रस लक्षणयुक्तश्चतुरडको वं डिम. कार्य ॥३५॥

शड्गारहास्यवर्जः शेपैः सवें रसंयु'क्.। दीप्तरसकाव्ययो निर्नानाभावोपसम्पत्नः ॥ ३६ ॥

1 युद्धनियुद्धाध र्पणसम्फेटकृतश्च कर्तव्य. ॥ ३७ ॥

मायेन्द्रजालबहुलो देवभु अगेन्द्रराक्षस यक्षपिशाचावकोर्णरच

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इस समवकार मे तीन प्रकार का कपट प्रयुक्त होता है जो इस प्रकार हैं-(१) वस्तु (कथा वस्तु) के क्रम मे होते वाला (२) भाग्यबश होते वाला (३) शतु से प्रयुक्। वह कपट सुख या दुख की उत्पत्ति करने वाला होता है (२६)। अलम अल्लम कार्य या योग की दृष्टि से इसमें सीन प्रवार का पृद्गार विधि जानने वाले प्रयोत्तकषो को रखना चाहिये-षमशृद्धार, अभपरङ्गार तथा काम- भूद्धार (३0)।

(ईहामृग का लक्षण)-ईहामृग म दिवय पुरुष (देवता पात) रहते है। दिन्य स्तियो (अप्सराओ आदि) के कारण इसमे युद्ध होता है। इसकी कथावस्तु बच्छी प्रकार से सुगठित रूप मे निबद्ध होती है। इसमे अविश्वसनीय घटनाएँ होती है। इसमे उद्धत पुर्पो की भरमार होती है। इसके काव्यबध म सत्ियो के कारण होने वाले क्रोध की अभिव्यक्ति होती है। इममे सक्षोभ और विद्रव तथा सफेट की उत्पति होती है। श्रृद्गार रस इसम स्त्रियो के कारण होने वाले भेद, अपहरण तथा अवमदन से उत्पन होता है। ईहामृग का काव्यवध सुचितित ओर सुमबद्ध होना चाहिये। व्यायोग मे जैसे पुरुष वृत्तियां और रस होते है ैसे हीर्वहामृग मे भी होगे केवल व्य स्वियों से सयोग इसमे और रहता है (३१ ३४)।

(डरिम का लक्षण)- डिम की वथावस्तु प्रस्यात होती है। इसका नायक भो प्रध्यात और उदात्त होता है। इसमे छ रसो की निष्पति तथा चार अक रहते है (३५)। (आठ रसो मे से) शृद्गार और हास्य को छोड वर शेष सभी रसो से हिम युक्त रहता है। इसका बाव्य दोप् रसो से जन्म लेता है तथा विविध प्रकार वे भावो से सपन्न होता है (३६)। इसकी कथा मे चोट लगना बिजली गिरना सूय या चदमा का ग्रहण युद्ध मल्लयुद्ध चुनोती और सफट (क्रोध या आवेश से मुक्त झडप) का प्रयोग बहता है (३७)। इसमे माया और इद्रजाल का बाहुल्य रहता है पुस्त को बिधियोर तथा उत्थानयोग की भी प्रचुरता होती है। यह देवता, नाग राक्षत यक्ष पिशाच आदि से भरा हुआ होता है (३६) ।

१ सफद-क्रोध या आवैग से बुक्त झडप। २ पुस्त की विधियो के लिये देखिये स० नाशा० अ० २० ३ उत्पानयोग से आजञय पावो के परस्पर मिल कर सघप या प्रगति करने से प्रतीत होता है।

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पोडशनायकबहुलः सात्वत्यारभ टिवृत्तिसम्पन्नः । कार्यो डिमः प्रयत्नान्नानाश्रयभावसम्पन्न: । ३६ ॥।

व्यायोगस्तु विधिज्ञः कार्य: प्रख्यातनायकशरीर:। अल्पस्त्रीजनयुक्तसत्वेंका हुकृतस्तथा चव ॥ ४0॥

बहवश्च तन्र पुरुषा व्यायच्छन्ते यथा समवकारे। न च तत्पमाणयुक्तः कार्यस्त्वेकाड क एवायम् ॥ ४१ ॥

न च दिव्यनायक कृत: कार्यो राजविनायकनिबद्धः । युद्धनियुद्धाधर्षणसड घर्प कृतरच कर्त्यः ॥ ४२ ॥

प्रख्यातवस्तुविषयस्त्वप्रख्यातः कदाचिदेव स्यात्। दिव्ग्रपुरुष वियुत्त: शैपयुक्तो भवेद पृभिः ॥४३॥

करुण रसप्रायकृतो निवृत्तयुद्धोद्द्धतप्रहाररच। स्त्रीपरिदेवितबहलो निर्वेदितभावितरचंव ॥ ४४ ॥

नाना व्याकुलचेष्टः सात्वत्यारभटिकेशिकोहीनः। कार्य: काव्यविधिज्ञः सततं ह्युत्सृष्टिकाड कस्तु ॥ ४५॥

प्रहसनमप विज्ञेयं द्विविधं शुद्ध तथा च सड कोरणक् हास्यवादसम्बदस् ॥ ४६॥।

कापु रुषसम्प्रयुव्तं परिहासाभाषण प्रायम्। अविकृतभाषाचारं विशेषभावोपपन्नचरितपदम् ॥ ४७॥

नियतगतिवस्तुविषयं शुद्ध ज्ञेयं प्रहृसनंतु। वेश्याचेटनपु सकविटधुर्ता बन्धकी यत्र स्युः ॥ ४६ ॥

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रुप्तवशो उपाय /१६७

इसमे सोलह नामक होते हैं, यह सात्वती और आरभटी वृत्तियो से सपन्न होता है । इस प्रकार का विभिन्न आथय वाले भावो से सपन्न डिम प्रस्तुत किया जाना चाहिये (२६) ।

(व्यायोग का लक्षण)-व्यायोग मे असयात नामक की कया रहती है। इस के सत्नी पाह थोड़े ही होते है तथा एव दिन का वृस्तात रहता है (४०)। समबकार मेरिस प्रकार अनेक पुर्ष एक साथ कायरत रहते है बैसा इसम नही रहता। इसमे एक हो अक होता है। इसमे देवता नायव नहीं रहते। राजा नायक हो सकते है। युद, मल्लयुद्ध, चुनौती त्था सघर्ष इसमे रहता है (४१ ४२)।

(उ(सृष्टिकाक का लक्षण) -- उत्सृप्टिकाक की कथावस्तु प्ररुमात होती है। वह अप्रस्यात भी कभी-कभी रह सकती है। इसके भी देवता पात नहीं होते। शेव पुरुप पान् इसमे रह सबते हैं (४३)।

इसमे कर्गरम को प्रधानता होता है। इसकी कथा युद्ध और उद्धत प्रहार समाप्त हो चुकने पर प्रारभ होती है। इस्म स्तियो के विनाग की बहुलता होती है तम्मा देसम्यपूर्ण सवाद भी रहते है। विभिन्न प्रकार की व्याकुलता से भरी घेपटाएँ इममे रहती है। सात्वती, आरभटी तथा कशिकी दृत्तिया इसमे नही होती [8४, ४५) । (प्रहमन का लक्षण)-प्रहुसन दो प्रकार का जानना चाहिये-शुद्ध तथा वकीय। शुद्ध मे सन्यासी तपस्दी तथा ब्राह्मणो का हास्यपूण चरित्र रहता है (४६)। इसकी कथा कापुस्पी (कायशे) से विद्ध होती है तथा परिहाम और सवाद इसमे प्रचुरता से रहते हैं। इनके पथाथ मरषा और आचार को प्रहमन उपस्थित करता है। इसमें विशेष भावो ने युक्त चरित सयोजित होता है तथा कथावस्तु नियत गति वासी होती है (४७ ४८क)

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१६८/ सङक्षिप्तनाट्यशास्त्रम्

अनिभूतवेषपरिच्छद चेष्टितकरर्णस्तु सड कोर्णस्।। लोकोपचारयुक्ता या वार्ता यश्च दम्भसंयोग: । स प्रहसने प्रयोज्यो धूर्तप्रविवादसम्पन्नः ॥४्द ॥

आत्मानुभूतशंसी विविधाश्रयो हि भाणो विज्ञेयस्त्वेक हार्यश्च ॥। ५० ॥

परवचनमात्मसंस्थं प्रतिवचनैरुत्तरोत्तर ग्रथितैः । 11५9 11

घूर्तविटसम्प्रयोज्यो नानावस्थानतरात्मकशचैव। एकाड को बहुचेष्टः स्तत कार्यो बुधर्भाषः ॥५२॥ सर्वरसलक्षणाढया युक्ता हुयड गेस्न्रयोदशभिः। वीथी स्यादेकाड का तर्थकहार्या द्विहार्या वा॥ अधमोत्तममध्याभियुं वता स्यात् प्रकृतिभिस्तिसृभिः ।

दावकेस्यथ प्रपञ्चो मृदवाधिवले छलं त्रिगतम्। व्याहारो गण्डशच न्योदशाड गाव्युदाहृतान्यस्या.।

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सकोणं प्रहसन में वेश्या, चेट, तपुसक, विट, धूर्स बौर बघकी पत रहते हैं। इसमे वशभूषा, चेष्टाएँ आदि खुल्लमसुहला या असभपत्ापूर्ण हाती है। नोकन्यवहार से युक्त बार्ता तथा दभ के सयोग को धूर्तों के बादविवाद के साथ इम सकीर्ण पहुसन मे सयोजित करना चाहिये (४रख-४६)। (भरण का लक्षण)-भापा मे एक पात् अपने अनुभवो का विवरण देता है या दूसरे पातो के सबध मे वर्णन करता है। इसमे बादत एक पात का हे अमिनय होता है पर विवरण अनेक पाक्ो के बारे मे रहते है (५०)। दूसरे के सवादी को भा्म का रगमच पर स्थित पाद् स्वय बालता है उनका उत्तर भ स्वय दे कर सवादो को आगे बढाता है। इस प्रकर माग भाण आकशभापितर मे चलता है अभिनद तथा अगवकार इसके साथ रहते है (५१)। आण का एकन पाव्रक धृत बिट होता है। इसमे विभिन्न अवस्थाएँ प्म्तृत को जाती है। अब एक ही हना है। चेष्टाएँ अनेक प्रकार की होती है (५२)। (वीथी का लक्षण)-बीथी सभो लक्षणो मे सपन्न तथा तेरह अगा से युक्त होती है। इसमे भी एक ही अक होता है तथा पान एक भी ही सकता है या दो। उत्तम, मध्यम और अधम तीनो प्रकार के पातो की कथा इसमे रह सकती है। वीधो के तरह अग ये है-उद्धा्यअवनलत,सवस्पदित ,नाली,अस-प्रलादद, चावकेि, प्रपच९, मृदु११, अधिबल ११, ल, निगत१४, धाहार तथा

१ वार्ता-प्रवृत्ति, मा खुदर। २ सकीर्ण-मिश्रित। ३ें आकाशभाषित-६ ऊपर १३ २२ पर पाद दिए। * अज्ञात बाल को सुचित करने के लिये स्पष्ट अर्थ बाले शब्दो को अन्य अर्थ बताने वाले शब्दो से जोड देना। ५ एक कार्य से दूसरे कार्य को सिद्धि। ६ शुभ या अशुभ को सूचवा को कौशल से आक्षिह करना। ७ ह्ास्वपूर्ष पहेली। असरबद्ध प्रश्न का असबद्ध उत्तर या मूख के आगे हितकारक बात करना। ६ कई प्रमनों का एक मात उत्तर। य हास्यास्पद मिय्या प्रशसा जो किसी के कार्य की सिद्धि कराये। १० विवाद मे किसी के दोषो को गुण तथा गुणो को दोष बताना। ५९ स्पर्धा में पपनी विशेषताऐँ बढ़ा-चढ़ा कर बताना ।१२ प्रत्यु तर स लोभित कर किसी के विरुद्ध वाचरण करना। १३ सीन व्यक्तियों की हाम्थपूर्ण बातचीत, वाक्य को तीन-तीन दुरही मे र बाट कर। १४ नायक के वाये भविष्य मे होने दाली दग्तु का वर्षेन। १५ आवेग या सभ्रम के साथ अदबाद और आक्षेपत्र से भरा कपन करना।

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॥ अथ अष्टादशोडध्यायः ।।

इतिवृत्तं तु नाटयस्य शरीरं परिकीर्तितम्। पञचभिः सन्धिभिस्तस्य विभाग सम्पकस्पितः ॥ १॥ इतिवृत्त द्विधा चंव बुधस्त् परिकल्पमेव्। आधिकारिकमेकें स्यात् प्रासड्गिकमथापरम्॥ २॥ यत्कार्य हि फलप्राप्त्या सामर्थ्याद परिकल्प्यते। तवाधिकारिकं ज्ञयमन्यत् प्रासड गिर्क विदुः ॥ ३॥ संसाध्ये फलयोगे तु व्यापारः कारणस्य य। तस्यानुपूर्व्वा बिज्ञ याः पञ्चावस्था: प्रयोवतृभिः ॥४॥

प्रारम्भश्च प्रयत्नशच तथा प्राप्तेशच सम्भवः । नियता व फलप्राप्तिः फलयोगशच पञ्चमः ॥ ५॥

औत्सुक्यमानवन्वस्तु यद् बोजस्य निबध्यते। महतः फलयोगस्य म फलारम्भ इष्यते ॥ ६ ॥

अपश्यतः फलप्रात्ति व्यापारो यः फलं प्रति। परं चौत्सुक्यगमनं स प्रयत्न: परिकीसितः ॥७॥

ईषत् प्रात्तिरयदा काचित् फलस्य परिकल्प्वते। भावमार्तेण त प्राहुविधित्ञाः प्रापिसम्भव्॥॥

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। अष्टादश अध्याय ॥

इतिदृत्त (कथा) को नाटय का शरीर कहा गया है। इसका विभाजत पाँच सधियों के द्वारा कल्पित होता है (१)। इतिदृत दो प्रकार का होता है-आधि- कारिक तथा प्रासगिक फलप्राट्ति की दृष्टि से जो कार्य समर्थ है व अधिकारिक इतिवृत मे आते हैं। श्रेप इतिवृत्तप्र सर्गिक होता है (२ ३)। फलयोग की साध्यता में कारण का जो व्यापार है, उसको क्रमश माँच अवस्थाए होती है-आरभ प्रयलन प्रात्ति-सभव, नियतापति तथा फ्लयोष (४ ५)। बोज का औत्सुक्य्रमाव वो प्रारभ करने वाला निवधन नो आगे चल कर महान् फतयोग म परिणत हो फमारभ या आदम है(६)। फल की प्राप्ति की ओर ध्यान न दते हुए भी फल न प्रति व्यापार तथा अत्यकष उत्मुक होना प्रयत्न है (७)। जब फस की थोडी सी प्राप्ति विचार या भाव

है (५)। के द्वरा होती लगे, तो ना्ट्य विधि को जानने वाले इस प्रातिसभय अवस्था कहते

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१७२/ स दक्षिप्त नाद्यशा स्स्रम्

नियता तु फलप्रासि यदा भावेन पश्यति। नियतां तां फलप्रासिं सगृर्णा परिचक्षते॥ दै॥

अभिप्रेतं समग्रं च प्रतिरूपं क्रियाफलम्। इतिवृत्ते भवेद् यस्मित् फलयोगः प्रकीतितः ॥ १० ॥

इतिवृत्ते यधावस्था: पञ्चारम्भादिका: स्मृताः। अर्थप्रकृतयः पश्च तथा वीजादिका अवि॥११॥

बीजं बिन्दुः पताका च प्रकरी कार्यमेव च। अर्थप्रकृतय: पञ्च ज्ञात्वा योज्या यथाविधि ॥१२॥ स्वल्पमातं समुत्सृष्टं बहुधा यद विसर्पति। फलावसानं यच्चव बीजं तत् परिकीतितम्॥ १३ ॥ प्रयोजनानां विच्छेदे यदविच्छेदकारणम् । यावत् समाप्निर्वन्धस्य स बिन्दुः परिकीतितः ॥१४ ॥ यद् वृर्त्त तु परार्थ स्यात् प्रधानस्योपकारकम्। प्रधानवच्च कल्प्येत स पताकेति कीतिता ॥१५ ॥

फलं प्रकोत्यते यस्याः परार्थायेव केवलम्। अनुबन्धविहीनत्वात् प्रकरीति विनदिशेत्॥ १६॥ यदाधरिकारिकं वस्तु सम्यक प्राज्ञः प्रयुज्यते। तदर्थो यः समारम्भस्तत्कार्य परिकीतितम्॥१७॥ यत्रार्थ चिन्तितेऽर्न्यास्मिस्तल्लिड गोऽन्यः प्रयुज्यते। आगन्तुकेन भावन पताकास्थानकं तु सद् ॥ १८॥ सहसंवार्थसम्पत्तिग णवत्युपकारतः पताकास्यानकमिर्दे प्रथमं परिकीतिम् ॥ १६॥

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अष्टादशोऽपपाय /१७३

जब अपने विचार मे (नादक) निश्चित रूप से फल प्राप्ति होती जान ले, तो गुण से युक्त यह अवस्था नियताप्ति है (६)। जिस कथा मे सारे कार्य व्यापार का अनुरूप तथा अभिप्रेत फल प्राप्त हो जाय वह फलयोग है (१०)।

जिस प्रकार इतिवृत्त मे आरभ आदि पाँच अवस्थाएं होती है, उसी प्रकार बीज आदि पाँच अर्थप्रकृतियाँ भी (११)। बीज, बिंदु, पताका, धकरी तथा वार्य- इन पाँच अर्थप्रकृतियो को नाट्यकार तथा प्रयोगकर्ता जान कर विधिपूवंक नाटक मे प्रयोग करें (१२)। जो थोडा सा डालने पर अनेक रदो मे विस्तृत हो जाय तथा फल की ओर ले जाये वह बीज कहा गया (१३)। प्रयोजनो के बीच में टूटने पर जो कथाब्ध्न की समाप्ति तक उन्हे जोड़े रखता है वह बिंदु है (१४)। जो वृत्तात नामक के अति रिक्त किसी बन्य पाव के लिये हो पर आधिकारिक वृत्त के लिये भी उमवारक हो और आधिकारिक या प्रधान दृत्त की भौति जिसकी परिकल्पना की जाय् -वह पताका है (१५)। जिसका फल केवल अन्य पात् के लिये ही हो वह प्रधान कथा से सीथे न जुडने के कारण प्रकरी१ कही जाती है (१६)। नाटक मे आधिकारिक्या प्रधान बस्तु के लिये किया गया आदभ कार्ये है (q७)। जब कोई एक अर्थ (वृलात प्रमो- जन या विचार) चल रहा हो तब उमी प्रकार का दूसया अर्थ आकस्मक या अप्त्या- शित रुप मे सामने आ जाये तो इसे 'पताका स्थानक' कहते है (१5)। (पताका स्थानक चार प्रकार का है।-जब दर्शको को किसी गोण उपाय से मा अद्रत्वक्ष रूप से सहसा किसी प्रयोजन, कथाश का बोध हो जाय तो पहला पताका स्थानक होता है (१६)।

१ रामरपा विषयक नाटको में सुग्रीव या विभीषण के वृत्तात पताका के उदाहरण है, उत्तरबमचरित में वाल्मोकि का वृत्त प्रकरी का उदाहरण है। पताका गर्भ या चिनर्श सधि तक चलती है, प्रकरी सी मित है। २ उदा-रतावली मे फाँसी लगाती सागरिका को बासवदत्ता समझ कर राजा का बचाने दोडना, फिर रत्नावली को पहचान कर प्रसन होना।

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१७४, सदक्षिप्तनाट्यशास्त्र म्

वच: सातिशयं श्लिष्टं काव्यवन्धसमाश्रयम्। पताकास्थानकमिदं द्वितीय परिकीतितम्॥ २०॥

अर्थोपक्षेपण यत्र लीन सविनयं भवेव। श्लिष्टप्रत्युत्तरोपेतं तृतीयमिदमिष्यते । २१॥

द्वचर्यो वचनविन्यास: सुश्लिष्टः काव्ययोजित. । उपन्याससुयुक्तरच तच्चतुर्थमुदाहृतम् ॥ २२ ॥

मुखं प्रतिमुखं चंव गभो विमर्श एव च। तथा निर्वहणं चेति नाटके पञ्चसं्धयः ॥ २३ ।।

यन्र बोजसमुत्पत्तिर्नानार्थरससम्भवा। काव्ये शरीरानुगता तन्मुख परिकीतितम् ॥ २४ ॥ बोजस्योदघाटनं यत्र दृष्टनष्टमिव वर्वाचत्। मुखन्यस्तस्य सर्वंत्र तद् वं प्रतिमुख स्मृतम् ॥ २५ ॥ उदभेदस्तस्य बीजस्य प्राप्तिरप्रापतिरेव वा। पुनश्चान्वेषणं यत्र म गर्भ इति सज्ञितः ॥२६ ।।

गर्भनिभिन्नबीजारथो विलोभनकृतोऽथवा। क्रोधव्यसनजो वापि स विमर्श इति स्मृतः ॥ २७ ॥

समानयनमर्थाना मखाद्याना सवोजिनाम्। नानाभावोत्तराणा यद् भ्वेन्निर्वहृणं तु त॥ २ ।। एतें तु सन्धयो ज्ञेया नाटकस्य प्रयोवतृभिः। तथा प्रकरणस्यावि शेषाणां द निवोधत ॥ २६ ॥ डिम: समवकारश्च चतुःसन्धी प्रकीतितौ। न तयोरवमर्शस्तु कर्तव्यः कविभि. सदा॥ ३०।।

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अष्टादशोडप्याय /१७५

काव्यवध के भीतर अत्यत शलष्ट (दो अर्थों वाले) वचनो का विन्याम किया जाय तो दूसरे प्रकार का पताकास्थानक होता है (२०)। जब श्लिष्ट सवादो की प्रश्नोत्तर विधि से गुप्तरूप मे अर्थ को सूचना हो तो यह तीसरे प्रकार का पताकास्थामक है (२१)। काव्य के भीतर द्वध्पर्थक वचन विन्यास वी सुशिलिष्ट योजना जिमसे मुख्य कथा या प्रयोजन के साथ आवानर अर्थ की भी प्रतीति हो- चौथा पताकास्थानक है" (२२) । नाटक मे पाँच सधियाँ होती हैं-मुख प्रतिमुख गर्भ विमर्श तथा निवहण (२३)। 'बीज' नामक अर्थप्रकृति की उत्पत्ति जो विभिन्न रमो, साबो को जन्म दे वह काव्यशरीर के मुख के समान मुखसधि है (२४)। एक बार देख लिय जाने पर नुप्न मे हो चुके बीज का, जो मुखसधि में प्रकट हुआ था, उद्घाटन करना प्रयत्न सधि है (२५) । जम बीज का प्रकट होना मिलना फिर लुप्त होना और फिर अन्वषण- ये जिसमे हो वह गर्भमधि है (२६)। गभमधि मे प्रम्तुन बीन वे अर्थ बा लोभ देव, क्रोध या व्यसन के साथ और विस्तार दिया जाये तो अवमश सधि होती है (७)। सुत आदि मधियो तथा बीज आदि अथ प्रकतियो मे नाना भावा की वृद्धि वे साथ प्रस्तुन अर्थ समवेत होकर फल प्राप्ति करा दे तो निर्वहण सधि होती है (२८)। नाटक और प्रकरण मे य पांचो सधियाँ रहती है। शेप रूपका मे सभी मधियाँ नहीं रहती (२६)। डिम और समवदार मे चार सधियाँ रहती है-इनमे अवमश का प्रयोग नही करना चाहिय (३०)।

१ रामाश्युदय मे सुग्रीव की सीतान्वेधण विषयक अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतिश्रुति को अभि० ने इसका उदाहरण माना है। र उदा०-मुद्रा राक्षस मे चाणवम के क्या दुरत्मा राक्षम पक्ड़ मे आ जायेगा? -- इम स्वगत वथन के तुसत बाद सिद्धार्थक का कथन-पकड़ मे आ गया।' ३ उदा०-रत्नावली मे नायिका का राजा को कामदेव समझना, इम समय गना का द्वनर्थक वर्णन,

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१७६ / सद्क्षिप्तनाट्यशातम् व्यायोगेहामृगौ चापि सदा कार्यो त्रिसन्धिकौ। गर्भावमर्शों न स्यातां तयो वृत्तिश्च कैशिकी॥ ३१॥

द्विसन्वि तु प्रहसनं वोश्यड को भाण एव च। मुखनिर्वहणे तन्न कर्तव्ये कविभिः सदा॥ ३२॥ विष्कम्भरचलिका चंत्र तथा चै प्रवेशक:। अड कावतारोज्ड कमुखमर्थोपक्षेपपञ्तकम् । ३३ ॥

मध्यमपुरुपनियोज्यो नाटकमुखसन्धिमात्र सक्चारः । विष्कम्भकस्तु कार्य: पुरोहितामात्यकञचुकिभिः ॥३४॥ शुद्ध सड कीर्णो वा द्विविधो विष्कम्मकस्तु विज्ञेयः । मध्यमपातेः शुद्धः सड कीर्णो नीचमध्यकृतः ॥ ३५।

अन्तर्यवनिकासस्थेः सूता दिभिरनेकधा। अर्थोपक्षेपण यत्तु क्रियते सा हि चूलिका ॥ ३६। अडकान्तरानुसारी सड क्षेपार्थमधिकृत्य बिन्दुनाम्। प्रकरणनाटकविषये प्रवेशको नाम विज्ञेय: ॥३७।

अड् कान्त एव चाड को निपतत अस्मित् प्रयोगमासाद्य। बोजार्थयुक्तियुक्तो ज्ञयो हृयड्कावतारोऽसौ। ३८। विश्लिष्टमुखमड्कत्य स्त्रिया वा पुरुषेण बा। पूवं तदड क मुख मुच्यते ॥ ३र६ै।

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वष्टादशोऽध्याय /१७७

व्यायोग और ईहामृग मे तीन सधियां रखनी चाहिये। इनमे सर्भ तथा अबमर्श नही होती तथा कैशिकी वृत्ति भी नही रहती (३५)। प्रहमन बीथी, अक तथा भाण-ये दो-दो सधियो वाले होते हैं-इनमे केवल मुख और निर्वहण सधिपो की ही सदव योजना करनी चाहिये (३२)। अर्थोपक्षेपक पाँच है-विष्कभ या विष्कभक, दूलिका, प्रवेशक, अकावतार तथा अकमुख (३३)। जो पुरोहित, अमात्य, कनुकी आदि मध्यम पात्ो के द्वारा प्रयुक्त तथा नाटक की मुखस घि मे ही काम मे लाया जाय वह विष्कभक है (३४) । विष्कभक दो प्रकार का है-शुद्ध तथा सकीण। मध्यम पाती के ही द्वारा प्रयुत्त शुद्ध तथा मध्यम और नीच दोतो के द्वारा प्रयुक्त होने वाला सकीर्ण है (३)। जवनिका (पर्दे के पीछे या नेपध्वगृह) के भीतर से सूत आदि अभिनेता विभिन्न प्रकार की ध्वनियो, शब्दो या सवादो से किसी अर्थ की सूचना दें तो यह चूलिका' है (३६)। दो अको के बीच मे होने वाले, बिंद्डु अर्थ प्रकृति के वृत्तातो की सक्षेप मे सूचना देन वाला प्रबेशक है जिसे नाटक या प्रकरण मे रखा जाता है (३७) : एक अक के अत मे सीवे जब दूसरा अक बीज के प्रयोजन की यक्ति से होकर आ जाय तो यह अकाबतारर है (३८)। अक के प्रारभ मे ही जब स्त्ी या पुरुष पात् के द्वारा पिछले अक के बाद घट चुकी घटनाओ का विवरण देकर विश्लिष्ट अक को पिछले अक से जोड़ दिया जाय तो यह अकमुख है (२ह)।

१ उदाहरणायं शाकतल के चौथे अक मे नेपथ्य से वनदेवताओ की उक्ति। २. उदाहरणार्थ स्वप्नवासवदत्तम् के दूसरे अक के अत मे वासवदत्ता और बेटी के सवाद जो तीसरे अक की वस्तु का अवतरण करा देते हैं। या मालविकाग्नि- मिन के द्वितीय अक के अत मे शजा का सवाद। ३ उदाहरणार्थ मुद्रा राक्षस का द्वितीय अक जिसमे आहितुडिक पिछली घटनाओ को आरभ मे ही सूचना दे देता है।

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॥ सङ्क्षिप्तनाटयशास्त्रम् ।

दूसरा भाग

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। अथ ऊर्नवशोऽषयायः ॥

या वायप्रधाना पुरुषप्रयोज्या स्त्रीवजिता संस्कृतपाठययुवता। स्वनामधेयर्भरतेः प्रयुक्ता सा भारती नाम भवेत् तु वृत्तिः ॥ १॥

भेदास्तस्यास्तु विज्ञेयारचत्वारोऽडगत्वमागताः। प्ररोचनामुखं चंव वीथी प्रहसनं तथा॥ २ ॥

उद्घात्यक कयोद्घातः प्रयोगातिशयस्तथा। प्रवृत्तकाबगलिते पञ्चाइ्गान्यामखस्य तु॥३॥

पा सात्वतेनेह गुणेन युक्ता न्यापेन वृत्तेन समन्विता च। हर्षोट्कटा संहुतशोकमावा सा सास्वती नाम भघेत तु वृत्तिः ।। ४।।

वीराद्भुतरौद्ररसा निरस्तशुड गारकरुणनिर्वेदा। उद्धतपुरुपप्राया परस्पराधर्षणकृता

उत्थापकरच परियर्तकरच सल्लापकश्च सडघात्यः । चत्वारोडस्या मेदा विज्ञेया नाट्यतत्वजं: ॥६॥।

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॥ उन्नीसवॉ अध्याय ।।

वृत्तिविधान

जिस वृत्ति मे वाक् (वाचिक अभिनय) की प्रधानता हो, जो पुरुषों के द्वारा प्रयुक्त और स्त्रियों से रहित हो, जिसका पाठ्य सस्कृत मे ही हो तथा 'भरत' नाम वाले मटा के द्वारा जिसका नाम 'भारती' किया जाय, वह भारती वृत्ति है। इस भारती वृति के चार भेद है। ये (चार भेद) इसके (प्रकार न हो कर) वगसूत हैं- प्ररोचना१, आमुखर, वीयी ९, पहसन४/१-२)। आमुख के पाँच अग होते हैं-उद्घात्यक, कथोद्घात', प्रयोगा तिशय", प्रवत्तकतथा अबगलित । जो सार्वत (चित्त की एकाग्रता) सुण से युक्त, न्याय और सद्वृत्त से समन्वित उत्कट हर्ष बाली तथा शोकभाव से रहित हो वह सात्वती वृत्ति है। इस सात्वती वृत्ति मे बीर, अद्भुत और रोद्र रसो की प्रधानता होती है, शद्गार, करुण और निर्वेद नही होते। इसमे उद्धतपुरुष अधिक रहते हैं तथा उनके द्वारा एक दूसरे के तिरस्कार से यह वृत्ति होती है (५)। नाट्य के तत्त्वज्ञ लोग इसके चार भेद जानें-उत्थापक, परिवर्तक, सल्लापक और सचात्य (६)। १ पूर्वरग का एक अग। नाशा ५,२६ २. नटी, विदूषक या पारिपाश्विक की सूत्रधार से बातचीत। इसी को प्रस्तावना भी कहा गया है। नाशा० २०,३०-३१ ३,४ द नाशा० स० १६, स० नागाब अ० १७१ ५. ई वोध्यगो मे भी पठित। (नाश० १८, ११६) । अर्थं समझ कर कुछ पदो या सब्दो को अत्य पदो से सयोजित कर देना उद्घात्यक तथा किसी कथन को अन्य के साथ जोड कर अन्य कोई कार्य सिद्ध करा लेना अवगलित है। ६ सूतधार के वाकय या वाक्यार्ध को ले कर नाटक के किसी पात का मच पर प्रवेश, जसे रत्नावली की प्रस्तावना मे पात् सूवधार के कथन को दोहराता हुआ आाता है। ७ सूत्रघार द्वारा प्रस्तावना मे नाटक की अवतारणा, जैसे विक्रमोवंशीय या म सुन्नधार द्वारा किसी ऋतु, काल आदि का वर्मन कर पात प्रवेश कराना, जैसे शाकुन्तल मे।

वेणी सहार मे।

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१८२/ सङ्क्षिप्तनाट्यशास्व्म्

अहमप्युत्थास्यामि त्वं तावद् दर्शयात्मनः शक्तिम्। इति सडघप समुत्यस्तज्जरुत्थापको ज्ञेय: ॥७। योऽथयोगवशाद्। अन्यानर्थात् भजते स चाषि परिवर्तको ज्ञेयः ॥८॥ साधय जो निराधष जो 5 पि वा रागवचनसंयुक्तः। साधिक्षेपालापो ज्ञेय: सल्लापकः सो 5िई। मन्त्रार्थवाक्यशवत्या दैववशादात्मदोपयोगाद् वा। सड्घातमेदजननस्तज्ज: सड्घात्यको ज्ञेय: ॥ १०॥

या श्लक्षणनैपथ्य विशेषचित्रा स्त्रीसंयुता या बहुनृत्तगीता । कामोपभोगप्रभवोपचारा तां कंशिकीं वृत्तिमुद्राहरन्ति ॥ ११ ॥

नर्म च नर्मस्फुओ्जो नर्मस्फोटोडथ नर्मगभंश्व। कैशिक्याशचत्वारो भेदा हृयेते समाखयाताः ॥१२॥

आस्थावितशुड्गार विशुद्धकरण निवृत्तवीररसम् । हास्यप्रवचनवहुल नम त्रिविधं विजानीयाद॥ १३॥

नवसडनमसम्भोगो रतिसमुद्यवेषवाक्यसंयुक्तः। ज्ञेयो नमंस्फुञ्जो ह्ययसानभयात्मकश्चैव ॥१४॥

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ऊनविशोऽध्याय /१८३

मैं भी (युद्ध के लिये) उठता हूँ, तुम भी अपनी शरक्ति बता दो'-इस प्रकार दो लोगो के परहपर सघर्ष से उत्थापक होता है (७) उत्थान करने वाली वस्तुओ का त्याग कर प्रयोजनवश अन्म वर्थ का ग्रहण किया जाय तो परिवतक जानना चाहिये (८)। अपमात करते वाले दुर्वचन, जो चुनौती देते हुए या बिना चुनौती के रागपूर्ण वचनो से उत्पस्ष हो, सल्लापक होते हैं (६)। मन्त्रार्थं या वाकय की शक्ति, भाग्यवश हुई दुर्घटना या अपने दोष के कारण शसुसमूह मे भेद होना सघात्यक है (१०)। हय को आकृष्ट करने वाले सुकुमार पहनावे और प्रसाशन की विशेषता से रमणीप या वैविध्यपूर्ण, स्वीबहुल, नृत्त और गीत की बहुलता वाली शृगार के उप चार (व्यवहार) स युक्त केशिकी वृत्ि होती है (११)। इसके चार भेद हैं-नम, नमस्फुज, नमस्फोट तथा नमगभ (१२)। शृगार का स्थापक विशुद्ध करणो वाला, वीररस से रहित और हास्य जनक वार्तालाप से भरा हुआ नमें तीन प्रकार का है (१३) । नवीन सगम मे प्रेम बढाने वाला वेष, वाश्य आदि से युक्त सभोग नमस्फज२ है इसके सवसान मे भव होता है (१४)।

१ ईर्ष्या को सूचित करना, किसी उपानभ (शिकायत, उलाहना) देना तथा किसी के हृदयगत भाव को प्रकट करना ये तीन प्रकार नम के हैं। पहले का उदाहरण रत्नावली के दूसरे अक मे उदयन के द्वारा अकित रत्नावली के चित्र पर वासव- दत्ता द्वारा ईर्ष्या व्यक्त करना, दूसरे का उदाहरण भी उदयन के प्रति उसी प्रसग मे वासवदत्ता के सवाद तथा तीसरे का उदाहरण सुसगता द्वारा चित्र बना कर रत्नावली के प्रति कथन है-(अभिभा० भा० रे, पृ० १०१)। २ रफुज्र का अथ विघ्न है। उदा-रत्नावल्ी में नायक नाषिका के बीच नम (तिनोद) का स्फुज वासवदत्ता के दोना के बीच आा जाने से होता है।-वही

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विविधानां भावानां लरबलवभू पितो बहुविशेषः । असमग्राक्षिप्तरसो नर्मस्फोटस्तु विज्ञय: ॥१५॥ विज्ञानरुपशोभाघना दिमिर्नायको गुणयंत्र। प्च्छन्नं व्यवहरते कार्यवशान्नमँगमो 5 सौ ॥१६॥ आरमटगुणप्राया तर्थव बहकपटवच्चनोपेता। दम्नानृतवचनवती स्वारभटी नाम विज्ञया॥ १७॥ सदक्षिप्तकावपातो वस्तुत्यापनमयापि सम्फेट: । ऐते हयस्या नेदा लक्षणमेपां सम्प्रवक्ष्यामि॥१८॥ अन्दय शिल्पयक्तो बहुपुस्तोत्यान चिजनेपय्य: । नंयः सडकषिप्तको नाम ॥१र्६ ॥

क्षिप्रपवेश निर्गममवपातमिमं दिजानीयाद् ॥ २०॥ सर्वरससमासकृतं सविद्रवाविद्रवाश्रयं वापि। नाट्यं विभाव्यते यत तद्बद्वस्तूत्यापनं झंयम् ॥ २१॥ बहुसुद्ध नियुद्धकपटनिभेद। शस्त्रप्रहारवहुलः सम्फेटो नाम विज्ञयः ॥२२॥

हात्पशड्गारवहुला कैशिकी परित्क्षिता। सात्वती चावि विज्ञया वीरादभुतरामाथ्रया॥२३। रौद्रे भमानके चंव विज्ञ मारभटी वुछः। बोभत्से करुणे चैव भारती सम्प्रकीतिता ॥२४॥

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ऊर्नवशोऽध्याय /१८५

विभिन्न भावो१ के छोटे अशो से तथा उनकी अनेक विशेषताओ से विभूषित जिसमे सारे रस आक्षिप्त या व्यक्त त ही वह नमस्फोट२ है। (१५) जहाँ नायक विज्ञान, रूप, शोभा, घन आदि गुणो के द्वारा किसी प्रयोजन से प्रच्छन्न व्यवहार करे वहाँ नमगर्भे होता है (१६)। (क्रोध, आवेग आदि) व रोचित गुणो से भरी हुई अत्यधिक कपट और छल से युक्त, दभ तथा झूठे बचनो वाली आरभटी वृत्ति जानना चाहिये (१७) । इसके चार भेद है-सक्षिप्क अबपाव वस्तूत्थापन तथा सफट। अब मैं इनके लक्षण बताता हूँ (१८)। साथक शिक्ष्प से युक्त अत्यधिक पुस्त की विधियो वाला निचित्र नेपथ्य वाला जिसमे विषयवस्तु सक्षिप् हो-ऐमा सक्षिप्तक जानना चाहिये (१६)। जिसमे हुष और भ्य का उत्यान हो विद्रव (भगदड) विनिपात (गिरना) तथा सभ्रम (हडबडी) का आचरण हो तथा प्रवश और निगम तैजी से हो उसे 'अबपात' जाने (२०)। जिसम सभी रस समाहित हो विद्रव या अविद्रव से जिसमे नाटय बिभावित होता हो उसे वस्तूत्यापन जानवा चाहिये (२१)। हडबडी मे प्रयुक्त अत्यधिक युद्ध बाहुपृद्ध तथा कपट और चीरफाड से युक्त पस्तप्रहार की बहुलता वाला सफेट जानना चाहिये (२२)। कैशिको मे शृगार और हास्य का बाहुल्य रहता है सात्वती मे वीर अद्भुत और शात रसो का आश्रम रहता है। रोद्र और भयानक दसो की अधिकता मे आरभटी तथा बीभत्स और करुण की अधिकता होने पर भारती होती है (२३, २४) ।

१ अभि के अनुसार भय हास हर्ष, लाम, शेष आदि भाव। २ अभि० के अनुसार रत्नाबली मे उदयन के सम्मुख चित्नफ लक लेने के लिये साप रिका का भजती हुई सुसगता के कथन जिसके लिये तुम सायी थी वह यही है-मे हास्य का अश है हास्य नहीं। इसी पर सागरिका के प्रत्युत्तर म रीद्र का अश है। इस प्रकार के कथन मे नम (विनोद) तथा उससे ललित शृपार का स्फोट हुआ है। ३ 'पुस्त' के लिये द्र० नाशा० २१ ५ र .- स० नाशा० २०, २-६

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।। अथ विशोडव्यायः ॥

आहार्यामिनयो नाम ज्ञेयो नेपथ्यजो विध्वि:। तत्र कार्य: प्रयत्नस्तु नाट्यस्य शुभमिच्छता।१॥ चतुबिधं तु नेपथ्यं पुस्तोऽलडकार एव च। तथाड्गरचना चंव ज्ञेय सञ्जीवमेव च॥२॥ पुस्तस्तु त्रिविधो जञयो नाना रूपप्रमाणत। सन्धिमो व्याजिमश्चंव वेष्टिमश्च प्रक्रीतितः ॥ ३ ।। फिलिञ्जचर्मवस्त्राद्यर्यंदुरपं क्रियते वुछेः। सन्धिमो नाम विज्ञय: पुस्तो नाटकसंथ्रयः ।।४ ॥ व्याजिमो नाम विज्ञयो यन्त्रेण क्रियते तुय। चेष्ट्यते चंव यद् सपं बेष्टिमः सतु संजञितः ॥५॥ शंलयान विमानानि ये क्रियन्ते हि नाट्ये तुस पुस्त इति संजञितः ॥६॥ अलड्कारस्तु विज्ञयो माल्याभरणवाससाम्। नानाविध: समायोगो 5 प्यड्गोपाड्गविधि: स्मृत. ।। ७ ।। वेप्टिमं वितत चंव्र सद्धात्यं ग्रन्थिमं तथा। प्रालम्बितं तथा चंव माल्यं पक्चविध स्मृतम् ॥ १८॥ चतुविधं तु विज्ञयं नाट्ये हुयाभरणं बुधः। आवेध्यं बन्धनीयं व क्षैप्यमारोप्यमेव च॥ई॥

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।। बोसवॉ अध्याय ।

आहार्याभिनय

नेपथ्य (वेषभथा, प्रसाधन व रगोपकरण) की विधि आहाष अभिनय है। नाटय का शुभ चाहने वालो को इसके लिये प्रयत्न करना चाहिये (१)। नेषध्य चार प्रकार का है-पुस्त, अलकार, अगरचना तथा सजीव (२)। विभिन्न रूपो तथा प्रभाण (नाप) के अनुसार पुस्त तीन प्रकार का जानना चाहिये-सधिम व्याजिम तथा वेप्टिम (३) । जब नाटयप्रयोग के लिये बांस, चटाई चमडा, वस्ब् आदि से कोई आकृति बनायी जाय तो इसे सधिम नामक पुस्त जानना चाहिये (४)। जो यवो द्वारा बनाया जाय, वह व्याजिम है तथा ऊपर से लाख या माड स जोड लगा कर कुछ आकार बनाया जाय तो यह वेप्टिम है (५)। मच पर (सघिम, व्याजिम या बेष्टिम की विधियो से) पर्वत, रथ आदि वाहन, विमान, ढाल, अस्त्शस्त्र, स्वज आदि बना कर प्रयुक्त किये जायें तो (आहार्य अभिनय का यह प्रकार) पुस्त कहलाता है (६) । माला, आभूषण तथा वस्त्र आदि का अगो और उपागो पर समायोजन अलकार है (७)। मालाएँ पाँच प्रकार की है-वेष्टिम१, वितत, सघात्य मे, ग्रथिम।र तथा प्रालवितष (८)। • नाट्प म विद्वानों को आभरण या आभूषण चार प्रकार का जानना चाहिये- आवेध्य, वधनीय७, क्षेप्य तथा आरोप्य (६)। १ अनेक मालाएँ लपेट कर बनामा हुआ। २ एक दूसरे मे श्लिष्ट मालाओ का समूह अथवा वस्त पहनने समय ऊपर उठाया हुआ माल्य समूह। ३ बिधे मोतियो या फूलो के अनेक गुच्छो से बनायी मालाएँ। ४ गाँठ लगा कर बनायी मालाएँ। ५ नीचे तक लटकती हुई मालाएँ। ६ शरीर को बीध कर पहने जाने वाले कुडल कावो के झुमके आदि ७ जो शरीर पर ऊपर से बाँधे जायें-बाज़ूबद, करधनी आदि । रू. जो सरका कर पहने जाये-नूपुर, चूडियां आदि। आरोष्य-जो शरीर पर ऊपर से डाले जायें, जैसे विभिन्न प्रकार के हार।

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१६८/सदक्षिप्तनाट्यशास्त्रम्

सितो नीलश्च पीतश्च चतुर्थो रक्त एव च। एते स्वभावजा वर्णा यः कार्य त्वडगवर्तनम्॥ १० ॥ संयोगजा: पुनश्चान्ये उपवर्णा भर्वन्ति हि। सितनीलसमायोगे कारण्डव इति स्मृतः ॥११॥ सितपीतसमायोगात् पाण्डुवर्ण: प्रकीतितः। सितरकतममायोगे पद्मवर्ण: प्रकीतितः ॥१२॥ पीतनीलसमायोगादुधरितो नाम जायते। कषायो नाम जायते ॥ १३॥ रवतपीतसमायोगाद् गौरवर्ण इति स्मृतः। वर्तनाच्छादनं रूपं स्ववेषपरिवजितम् ॥१४॥ नाटयधर्मप्रवृतं तु ज्ञेय तत् प्रकृतिस्थितम्। वर्णकवेपसंथयः ॥१५॥ आकृतिस्तस्य कर्तव्या यरस्य प्रकृतिरास्यिता। यथा जन्तुः स्वभावं स्वं परित्यज्यान्यदहिकम्॥ १६॥ तत्स्वभावं हि भजते देहान्तरमुपाश्चितः। वेषेण वर्णकंरचंवाच्छादितः पुरुषस्तथा॥। १७॥ परभावं प्रकरुते यस्य वेषं समाश्रित: । प्राणिसंज्ञा स्मृता हुयेते जीववन्धाश्च ये ऽ परे॥ १८॥ शैलप्रासादयन्त्राणि चर्मवर्मध्व जास्तया । नानाप्रहरणाद्याशच ते्प्राणिन इति स्मृताः। अथवा कारणोपेता भवन्त्पेते शरीरिणः ॥१६॥ यः प्राणिनां प्रवेशो वे सजीव इति संजितः । चतुष्पदोऽथ द्विपदस्तथा चँवापदः स्मृतः ॥ २०॥ जरजरो दण्डकाय्ठ च तर्थब प्रतिशीषकम्।

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विशोऽध्याय /१६र्६

अगवर्तना के लिये चार स्वाभाविक रग है-सफेद नीला, पीला तथा लाल (१e) । इनके सयोग से अन्य उपवर्ण बनते हैं। सफेद और नीले का समान मिश्रण 'कारडव' कहलाता है। (११) सफेद और पीले को समभाग मिलाकर 'पाडु' बरण बनता है तथा सफेद और लाल को सम भाग मिलाकर 'पद्म' वर्ण (१२)। पीले दर नीले के सयोग से 'हरित उत्पन्न होता है, तथा नीले और लाल के समान मश्रण से 'कषाय'। लाल और पीले का समान योग गौर वर्ण कहलाता है। (१३, १४ क) ।

वर्तना (शरीर को रगने) के द्वारा अपने स्वाभाविक वेष को छियाना नाट्य- धर्म की प्रवृत्ति है और नाटय के पात्ो पर यह लागू होती है। विभिन्न रगो के द्वारा अपना सहज रग छिपाना चाहिये। जिसका वेद बनाना है उसके अनुसार रगी का प्रयोग करे। जिसकी भूमिका करनी है, इस विधि से उसकी आकृति बनाये (१४ख- १६ क)

जिस प्रकार जीव एक देह को छोडकर अन्य देह म प्रवेश करने पर उसी अन्य देह के स्वभाव को प्राप्त कर लेता है उसी प्रकार वेष और रगों स आच्छादित अभिनेता भी जिसकी भूमिका करता है, उसी के भाव को व्यवत करने लगता है (१६ख-१८ क)।

[पुस्त की विधि से जो दृश्य बनाने हैं, वे प्राणी और अप्नाणी दो प्रकार के हो सकने हैं ।] जो जीवधारी है, वे 'प्राणी' कहे जाते हैं तथा पर्वत महल, यत्र, ढाल, धवज तथा विभिन्न हथियार अपाणी। अथवा नाटक में प्रयोजनवश य (पर्वत, हथियार आदि) भी शरीरधारी हो सकते हैं (१८ ख-१६)।

प्राणियो के रगमच पर प्रवेश को मजीव या सजीव कहते हैं। इसके अतर्गत चार पैर वाले, दो पैर वाले या पैर रहित प्राणी मच पर प्रदर्शित किये जाते है (२)।

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१६०/ सङक्षिप्तनाट्यशास्त्रम्

छत्रं च चामरं चंव हवजो मुडगार एव च॥ २१।। यत्किञ्चिन्मानुष लोके द्रव्यं पुंसां प्रयोजकम्। यच्चोपकरणं सवं नाट्ये तत सम्प्रकीतितम् ॥ २२॥ श्वतभूम्या तु यो जात. पृष्यनक्षत्रजस्तथा। सड़ग्राहुयो वं भवेद वेणुर्जर्जरार्थे प्रयत्नतः ॥ २३॥ प्रमाणमड्गुलानां तु शतमप्टोत्तरं भवेद । पञच्चपर्वा चतु ग्रंन्थिस्तालमान्रस्तथव च ॥ २४ ॥ कपित्यबित्ववंशेभ्यो दण्डकाष्ठं भवेदथ। वक्रं चँब हि कर्तव्य त्रिभागे लक्षणान्वितम्॥ २५॥ यत् किश्चिदस्मित् लोके तु चराचरसमन्विते। बिहितं कर्म शित्पं वा तत्तूपकरणं स्मृतम् ॥२६॥ या काष्ठयन्त्रभूयिष्ठा कृता सृष्टिरम हात्मना। न सास्माकं नाट्ययोगे कसमात् खेदावहा हि सा ॥२७॥ यद् द्रव्यं जीवलोके तु नाना लक्षणलक्षितम्। नाट्योपकरणं भ्रवेत् ॥ २८ ॥ लोकधर्मी भवेत् त्वन्या नाट्यघर्मी तथा परा। स्वमावो लोकधर्मी तु विभावो नाटयमेव हि॥ २र६ ॥ आयसं तु न कर्तव्यं न च सारमय तथा। नाट्योपकरण तज्जेगु रुखेदकरं भवेत्॥ ३० ॥ काष्ठचर्मंसु वस्तरेपु जतुवेणुदलेयु च। नाटयोपकरणानोह लघुकर्माणि कारयेत् ॥ ३१ ॥ चर्मवर्मध्वजा: शैला: प्रासादा देवतागृहा। हयवारणयानानि विमानानि गृहाणि ॥ ३२॥ पू्वं वेणुदलैः कृत्वा कृतीर्भावसमाश्रयाः। ततः सुरड्गैराचछाद्य वस्त्रंः सारूप्पमानयेद्॥ ३३ ॥ .

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विशोऽध्याय/१६१

[मच पर प्रमुख रूप से उपयुक्त उपकरण ये हैं-] जजर दण्ड़काष्ठ, प्रति- शी्षंक छत चामर शवज तथा भ गार (२१)। इस मनुष्य लोक म मनुष्यो के काम मे आने वाली जो भी वस्तु है वह सब नाटय मे उपकरण कही जा सकती है (२२)। जर्जर के लिंये प्रयत्नपूवक ऐसा बाँस ले जो श्र्वेत भूमि में उत्पन्न हो तथा पुष्यनक्षत्र मे हुआ हो (२३)। इसकी नाप एक सी आठ अगुल है। इसमे पांच पर्व (परे) चार गाँठे हो तथा यह ताल मान हो (प्रथियां अधिक निकली हुई न हो) (२४)। दडकाष्ठ कैथे बेल या बास के पेड से बनाना चाहिये। यह लक्षणो से युक्त तथा तीन भागो पर टेढा हो (२५)।

(२६)। इस चराचरयुक्त जगत मे जो कुछ भी कम या शिल्प है वह उपकरण है

महात्मा (विश्वकर्मा) ने यह जो काष्ठयत् बहुल सृष्टि की है, वह हमारे लिये नाटय की दृष्टि से उपयोगी नही है, क्योकि वह (भारी होने से) खेदजनक है (२७)। इस जीवलोक मे विभिन्न लक्षणो से लक्षित जो भी द्रव्य है उसकी अनुककति मे निर्मित रचना नाट्योपकरण है (२८)। यह अनुकृति दो तरह की हो सकती है- लोकधवर्भी और नाटयधर्मी। लोकशर्मी वस्तु का स्वमाद है, विभाव होने पर वही नाटय बन जाता है (२६)। नाटयोपकरण लोहे का तथा भारी नहीं बनाना चाहिये क्योकि भारी होने से वह खेदजनक होगा (३०) । लकड़ी, चमडा, वस्त् लाख तथा बास से हल्के फु्के नाटयोपकरण बनाना चाहिये (३१)। ढाल उवज, पर्वत, महल मदिर घोड़, हृाथी रथ विमान तथा घर- ये सब पहले उस-उस वस्तु की आकृति बाँस से बनाकर अच्छी तरह रगे वस्त्ो से ढक कर उसके जैसा रूप आकृति दे दे (३३)।

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। अथ एकर्विशोऽध्यायः ॥

सामान्यामिनयो नाम ज्ञेयो वागडगसत्वजः। तत्र कार्यः प्रयत्नस्तु नाट्यं सत्त्वे प्रतिष्ठितन् ॥ १॥ सत्वातिरिक्तोडभिनयो ज्येष्ठ इत्यभिधीयते। समसत्वो भवेन्मध्य सत्वहीनोऽयमः स्मृतः ॥ २॥ अलडकारास्तु नाट्यज्ञज्ञॅया भावरसाश्रया:। यौवने 5 भ्यधिका स्त्रीरणां विकारा वक्त्रगात्रजाः।।३।। आदौ तयोऽड़गजा स्तेषा दश स्वाभाविका: परे। अयत्नजा: पुनः सप्त रसभावोषधृहिताः॥४॥ देहात्मकं भवेत सत्त्व सत्त्वाद् भावः समुत्थितः । भावात् समुस्थितो हावो हावाद्धेला समुत्थिता ॥ ५॥ हेला हावश्च भावश्च परस्परसमुत्थिताः । सत्वभेदे भवन्येते शरीरे प्रकृतिस्थिताः ॥ ६॥ वागड गमुखरागैश्च सत्वेनाभिनय्रेन कवेरन्तर्गतं भार्व मावयत् भाव उच्यते॥७॥। तत्राक्षिम् विकाराठय. शुड्गाराकारसूचकः । सग्रीवारेचको ज्ञैयो हावः स्थितसमुत्थितः ॥८॥ यो वै हाव: स एवंषा शुड्गाररससम्भवा। समाखयाता बुधहेला ललिताभिनयात्मिका॥ द॥

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। इक्कोसवाँ अध्याय ।।

सामान्याभिनय

वाक, अग ओर सत्व के सम्मिलित प्रयोग से सामान्याभिनय होता है अभिनेताओ को इसमे प्रयत्न करना चाहिये, क्योकि नाट्य सत्व मे प्रतिष्ठित है (q)। जिसमे सत्त्व का उत्कर्ष हो वह अभिनय ज्येष्ठ है, जिसम सत्त्व समान रूप से प्रयुक्त हो वह मध्यम तथा सतत्व से रहित अभिनय अधम है (२)। नाटय के जानकार लोगो को भाव और रस पर आाधारित अलकारो से परिचित होता चाहिये। ये अलकार स्त्रियो के योबन मे मुख और देह से उत्पन्न विकार हैं। इनमे तीन अगज, दस स्वाभाविक तथा रस और भाव से परिपुष्ट सात अयत्नज अलकार होते हैं (३, ४)। सत्त्व देहात्मक होता है, सत्व से भाव व्यक्न होता है, भाव से हाव और हाव से हेला की अभिव्यक्ति होती है (५)। हेला, हाव और भाव-ये एक दूसरे को व्यक्त करने वाले सत्त्व के भेद से अभिनेता के देह मे प्रकट विकार हैं। वाक, अग, मुखराग तथा सात्विक अभितय-(चारो प्रकार के अभिनयो से) कवि के अन्त स्थित भाव को भावित कराने वाला 'भाव है (७)। आँखो और मोहा के सचालन की प्रचुरतावाला, शृगार को सूचित करने वाला, ग्रीवा की रेवना से युक्न चित्तवृतियो से उत्पन् होने वाली भाव की अवस्था ही 'हाब' है। हाव' हो शृगार रस के आश्रित होकर ललित अभिनय से युक्त 'हेला' बन जाता है (र सै)। [इम प्रकार भाव, हाथ और हेला-ये तीन अगज अलवार हुए ।]

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१६४ / संडक्षिप्तना टृपशास्त्रम्

लोला विलासो विच्छिततिविभ्रमः किलकिश्चितम्। मोट्टायितं कट्टमितं विब्वोको ललितं तथा॥१० ॥ बिहृतं चेति विज्ञेया दश स्त्रीणां स्वभावजाः । वागडगालडकारै: शिष्टैः प्रीतिप्रयोजितैर्मधुरैः । इष्टजनस्यानुकृतिर्लोला ज्ञेंया प्रयोगत: ॥११॥ स्थानासनगमनानां हस्तभ्् नेत्र कर्मणां चैद। उत्पद्यतें विशेषो यः श्लिप्ट सतु विलास: स्यात ॥ १२॥ 1 स्वल्पो उदि परां शोभां जनयति यस्मात तु विच्छित्ति: ॥१३॥ विविधानामर्थानां बागइगाहार्यसत्त्वयोगानाम्। मदरागहर्षजनितो व्यत्यासो विश्नमो ज्ञेय ॥ १४ ॥ स्मितरु दितह सितभ य हषग्वंदुःखश्रमाभिलावाणाम्। सड्करकरणं हुर्षादसकृत् किलकिञ्चितं जञयम्॥ १५॥ इष्टजनस्य कथायां लीलाहेलादिदर्शने बापि। तद्भावभावनाकृतमुक्त मोट्टायितं नाम ॥१६॥ केशस्तनाधरादिग्र हणदति हुर्षस्भ््मो त्पन्नम् 1 कुट्टमितं विज्ञयं सुखमपि दुःखोपचारेण॥ १७॥ इप्टानां भावानां प्राप्तावभिमानगर्वसम्भतः । स्त्रीणामनादरकृतो दिन्योको नाम विज्ञये ॥ १८॥ हस्तपादाड गविन्यासो स्र् नेत्रोष्टप्रयोजित: । सौकमार्याद् भवेद् वस्तु ललितं तत्प्रकीतितम्॥ १६ बावयानां प्रोतियुक्तानां प्राप्तानां यदभावणम्। व्याजाद स्वभावतो वापि बिहुत नाम तद् भवेत् ॥ २० ॥ शोभा कान्तिरच दीप्तिश्च तथा माघर्यमेव च। स्यु रयतनजा: ॥ २१ ॥

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एकविशो जध्याय /१६५

स्तियों के दस स्वाभाविक अलकार हैं-लीला, विलास विच्छिति, विश्वम, किल किचित, मोटटाथिन, कुटटमित, बिब्बोक, ललित तथा विहृत (१०)। वाचिक और आगिक अभिनयो तथा शेप अलकारो के द्वारा प्रेम के कारण प्रियजन की मधुर अनुकृति 'लोला' है (११): खडे रहने बठन चलने तथा हस्त भ्र. नेत् के कर्मों को इनके साथ सयोजित करने से जो श्लिष्ट विशेषता आती है वह 'विलास' है (१२}। माला, वस्त्र, गहने लेप आदि को उपेक्षा के साथ थोडा सा भी लगाने पर परम शोभा जिससे उत्पन्न हो जाय वह विच्छतति है (१३)। चाचिक आगिक आहाय तथा सात्विक अभिनयो के साथ विविध् अर्धों का मद, राग या हर्ष के कारण उलटफेर होना विभ्रम' है (१४)। हरप के कारण मुस्कान रोना हँसना भय, हर्ष, गर्व दुख श्रम तथा अभिलाप का बार-वार सकर करना किलकिचित' है (१५)। प्रियजन के विषय मे बातचीत करते हुए या उसकी लीला, हेन आदि के दर्शन मे उसी की भावना मे भर कर की गयी चे्टा और कही गयी उक्ति मष्ट्टाययित है (१६)। केश स्तन, अधर आदि के ग्रहण से अत्यत हष और सभ्रम वे कारण उत्पन सुख जिसे दुख का बहाना बना कर ग्रहण किया जाय कुददमित जानना चाहिये (१७)। इष्ट वस्तुओ की प्राप्ति मे अभिमान और गव के कारण उत्पन्न स्तिरियो का अनादर-भाव बिब्बोक है (१८)। भौहो, नेवो और ओठो से प्रयोजित सौकुमार्यपूर्वक हस्त, पाद आदि अभो का विन्यास ललित' कहा जाता है (१६)। प्रेम से युक्त वचन के अवसर होने पर भी स्वभाववश या किसी बहाने से न कहे जायं, तो यह विहृत' कहलाता है (२०। अयत्मज अलकार मे हैं-शोभा, कान्ति, दीप्ति, माघुर्य, मंय, पागदभ्य तथा ओदाम (२९)।

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१६६/ सडक्षिप्तनाटयशास्त्म्

1 अलड करणमड्गानां शोभेति परिकीतिता ॥२२॥ विज्ञेया च तथा कान्तिः शोभेवापूर्णमन्मथा। कान्तिरेवातिविस्तीर्णा दीप्तिरित्यभिधीयते ॥ २३॥ सर्वास्थाविशेषेसु दीप्तेपु नलितेषु च। अनुल्वणत्वं चष्टाया माधुर्यमिति संजञितम्॥२४॥ चापलेनानुपहता सर्वार्थेष्व विकत्थना। स्वाभाविको प्रयोगनिस्साध्वसता प्रागत्म्यं समुदाहृतम्। औदार्य प्रश्यः प्रोक्तः सर्वावस्थामुगो बुध ॥ २६॥ शोभा विलासो माधुर्य स्थेर्य गाम्भीर्यमेव च। ललितौदार्यतेरजामि सत्वभेदास्तु पौर्षा: ॥ २७॥ दाक्ष्य शोयमयोत्साहो नीचार्थेषु जुगुप्सनम्। उत्तमैश्च गुणः स्पर्धा यतः शोभेति सा स्मृता॥ २८ ॥ धोरसक्वारिणो दृष्टिर गंतिर्गोवृपभाश्चिता। स्मितपूर्वमथालापो विलास इति कीनितः ॥ २ ॥ अभ्यासात् करणानां तु श्लिष्टत्व यत्र जायते। महत्स्वपि विकारेषु तन्माधुर्यमिति स्मृतम् ॥३० ॥

व्यवसायादचलनं स्थैर्यमित्यमिसंजञितम् ॥३१॥ यस्य प्रभावादाकारा हर्षक्रोधभयादिषु। भावेषु नोपलक्ष्यन्ते तद्गाम्मीर्यममिति स्मृतम् ॥३२॥ अबुद्धिपूर्वकं यत् तु निरविकारस्वभावजम्। शड्गाराकारचेष्टत्वं ललितं तदुदाहृतस् ॥ ३३॥

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एक्विंशोडध्याय /१६७

उपभोग से परिपुष्ट रूप, यौवन और लावण्य के द्वारा अगो का सलकरण 'शोमा' है। मन्मय (काम भाब) से परिपूर्ण शोभा ही 'कावि' जाननी चाहिये तथा अत्यत विस्तीर्ण काति ही 'दो'प्त' कही जाती है (२३)। सभी विशेष अबस्थाओं मे, दीप्ति या ललित मे चेष्टा की रमणीयता माघुर्य है (२४)। जो चचलता से बाधित न हो, सभी स्थितियों मे बडबोलेपन से रहित हो- ऐमी स्वाभार्विक चित्तवृत्ति धैये कही जाती है (२५) । प्रयोग मे घबशहट न होता भागल्भ्य है तथा सभी अवस्थाओ मे साथ रहते वाले विनय को विद्वानों ने 'ओद्ार्थ' कहा है (२६)। पुर्षो के सत्त्व के आठ भेद है शोभा, विलास, माधुर्य, स्थैर्य, गाभीयं, ललित, औदार्य तथा तेजस (२७)। दक्षता शौर्य, उत्साह अघम वस्तुओ से घृणा तथा उत्तम मुणो मे स्पर्धा जिससे हो, बह 'शोभा' है (३८)। धैर्पं से सचारित दृष्टि तथा गो या व्रपभ के समान सुन्दर गति और मुस्कान के साथ वातचीत-ये विलास कहलाते हैं (२६)। अभ्यासर के कारण बड़े विकारो मे भी करणो का समजस होना माधुर्यं है (३०) शुभ या अशुभ से प्राप्त, धर्म, अर्थ बर काम से सयुक्त निर्णय से विचलित न होता स्थेर्ये है (३१)। जिसके प्रभाव से ह्ष, क्रोध और भय भावो में भी आकार पता न चले, वह 'गाभीर्य' है (३२)। बिता सोचे-समझे, निविकार स्वभाव से उत्पन्न शरृगार के अनुरूप चेष्टा होना 'ललित' कहा जाता है (३३)। १ अभिनद के अनुसार रूप, योवन और लावण्य पुस्ष के द्वारा उपभुज्यमान होने पर अन्य हो छाया का परिपोप करते हैं। वह छाया मन्द, मध्य, तीव्र के क्रम से सभोग की स्थिति मे शोभा, काति और दीप्ति का आश्रय बनती है। २ अभितव के अनुसार चौसठ कामकलाओ का प्रयोग। ३ अभिनव के अनुसार युद्ध, बाहुयुद्ध, व्यायाम आदि का अभ्यासष। ४ करण का अर्थ अभितव ने यहाँ करनरणादिक्रिया लिया है। इस पारिभाषिक वर्थ मे करण नाशा चतुर्थ अमे प्रतिपादित है। प० बाबू लाल शुक्ल ने करण का सामान्य सर्थ (इद्रिय) लिया है।

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दानमन्युपपत्तिश्च तथा च प्रियभाषणम्। स्वजने व परे वापि तदौदायँ प्रकीतितम्॥ ३४॥ अधिक्षेपावमानादे. प्रयुक्तस्य परेण यत्। प्राणात्ययेऽप्यसहनं तत् तेजः समुदाहृतम् ॥ ३५॥

पडात्मकस्तु शारीरो वादयं सूचाडकुरस्तथा। शाखा नाट्यायितं चैव निवृत्यडकर एव च॥ ३६॥ नानारसार्थयुवतैवृत्तनिबन्धः कृत. सचूर्णपदैः। प्राकृतसंस्कृतपाठो वाक्माभिनयो बुर्धज्ञेयः॥ ३७ ॥ वाक्यार्थो वाक्यं वा सत्वाड्गेः सूच्यते यदा पूर्वम्। पश्चाद् वाक्यानिनयः सूचेत्यभिसंज्ञिता सा तु॥ ३८॥ हृदयस्थो निवंचनैरडगाभिनयः कृतो निपुणसाध्यः। सूचैवोत्पत्तिकृतो विज्ञ यस्त्वड्कुराभिनय: ॥।३६ ॥ यत् शिरोमुखजड घोरुपाणिपादैर्यथाक्रमं क्रियते। शाखादर्शनमार्ग: शाजाभितयः स विज्ञयः॥४०॥ नाट्यायितमुपच।रैयः क्रियते 5 भिनयसूचया नाटये। कालप्रकषहेतोः प्रवेशकं: सङगमो यावत् ॥ ४१॥ स्थाने ध्र वास्वभिनयो यः क्रियते हर्षशोकरोषाद्यं:। नाट्यायितं तर्दम॥४२॥ यन्राव्योकतं वाक्यं सूचाभिनयेन योजयेनयः। तत्सम्बन्धार्थकर्थ भवेन्निवृत्यडकुरः सो 5 य ॥ ४३॥ शिरोहस्तकटीवक्षोजडघोरुकरणेपु तु सम. कर्मवभागो य. सामान्याभिनयस्तु सः॥४४॥

अभिनेयस्तु नाटयज्ञे मृद्वड्गचेष्टितैः । [रस्षभावसमन्वितैः ॥ ४५॥

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अपने प्रिय जन तथा अन्य के प्रति भी दान, स्वोकार तथा प्रियभाषण करना 'औदार्य' कहा जाता है (३४)। दूसरे (शत्रु) के द्वारा कहे गये अपशब्द या किये गये अपमान को प्रागो के व्यय होने पर भी सहन न करना 'वेजस्' कहा जाता है (३x)। [यहाँ तक सामान्याभिनय के सत्गत सत्त्व पर आधारित अभिनय बताया। अब शरीर अभिनय बताते हैं। शारीर अभिनय छ प्रकार का है-वाकय, सूचा, अकुर, शाखा, नाटयावित तथा निवृत्यकुर (३६)। गद्य मा पद्य मे निबद्ध सस्कृत या प्राकृत भाषा मे विभिन्न रसो की सामग्री से युवत पाठ वाक्याभिनय जरनना चाहिये (३७)। वाक्यार्थ या वाक्य को सात्विक और आगिक अभिनय के द्वारा पहले सूचित कर दिया जाय, और बाद म वाक्या- भिनय किया जाय तो इसे मूचा' कहते है (३८)। निवचन या बिना वाचिक अभि नय के हुदयस्थ भाव का आगिक अभिनय किया जाय फिर सूचा के द्वारा उन भावो को शब्दों के द्वारा व्यकत किया जाय, तो यह अकुराभिनय है (३्द)। सिर, मुख जघा (पिंडली), ऊरु (जघन) हाथ तथा पाव से यथाक्रम शाखा के अनुसार किया गया अभिनय शाखाभिनय" है (४०)। नाटय मे उपचारपूर्वक काल-प्रकर्ष को दृष्टि से मच पर प्रवेश करने वाले पात्ो से समागम होते समय सचाभितय के साथ किया जाने वाला अभिनय नाट्यायित है (४१)। ध्रुवागान के समय हृप, शोक, रोष आदि क साथ भाव और रस की अभिव्यक्ति करते हुए जो सभितय किया जाय वह भी नाटयायित है (३२)। अम पात के द्वारा कथित वाचय को कोई पात् सूचाभिनय स सयोजित करता हुआ उसका विस्तार करे तो यह निवृत्यकुर है (४३) । सिर हाथ, कमर वक्ष, पिडली तथा ऊर-इनकी चेष्टाओों मे समान क्रियाएँ होना सामान्याभिनय है (४४)। रस और भाव से समन्वित मृदु आधिक चेष्टाओ के साथ ललित हस्तसचार- पूर्वक सामान्याभिनय किया जाना चाहिये (४५)।

१ नाशा (र १५) के अनुसार आगिक अभिनय आाखा है। कुछ आचार्यों ने अगुलियो के सचालन या करवतना को भी शाखा कहा है। २ अभि० के अनु र जिसमे नट स्वय सामाजिक होकर नाट्य देखने लगें, नाटया- पित है।

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अनुद्धतमसम्भ्राग्तमनाविद्धाड़ गर्चेप्टतम् 1 लयतालकलापातप्रमाणनिय तात्मकम् सुविभक्तपदालापमनिष्ठुरमकाहलम् वदीदृशं भवेन्नाटयं जञयमाभ्यन्तरं तु तत्॥४७॥ एतदेव विपर्यस्तं स्वच्छन्दगतिचेष्टितम्। अनिवद्धगीतवाद्यं नाट्यं बाह्यमिति स्मृतम् ॥ ४॥ लक्षणाभ्यन्तरत्वाद्धि तदाभ्यन्तरमिप्यते। शास्त्रबाहयं भवेद्यस्तु तद् बाह्यमिति भण्यते ॥ ४६ ॥ अनाचार्योपिता ये च ये च शास्त्रबहिष्कृताः । बाह्यं प्रयुञ्जते ते तु अशात्वाचार्यकीं क्रियाम्॥ ५० ॥

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एकविशोज्याय /२०१

[आभ्यतर नाटय]-अनुद्धत, असभ्रात (हडबडी या घबराहट से रहित], तीव्रवेग वाली आगिक चेप्टाओ से रहित लघ, ताल कला पात और प्रमाण से नियत, जिसमे पदो का उच्चारण साफ-साफ अलग अनग किया जाय जो ककश और जोर से सुनाई देने वाला न हो-इस प्रकार का नाट्याभितय किया जाय, तो आभ्यतर नाट्य होता है (४६-४७)। आभ्यत्र नाटय का ही उलटा स्वच्छद गति और चेष्टाओ वाला, गीत और वाद्य के सयोजन से रहित नाट्य बाह्य नाटय कहा जाता है (४६) । नाटयशास्त्रीय लक्षणो के भीतर होने से पहले को आभ्यतर नाटय तथा शास्त्र बाह्य होने से दूसर को वाह्य नाटय कहत हैं (४६)। जो जाचार्य के पास रह कर नाटय मे दीभित नहीं हो पाये भो शास्त्र से बहिष्कृत है वे आचायनिर्दिष्ट क्रिया को न जान कर बाहय नाट्य का प्रयोग करते है।

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॥ अथ द्वाविशोडध्यायः॥

समासतस्तु प्रकृतिस्त्रिविद्या परिकीतिता । पुरुषाणामथ स्त्रीणामृत्तमाधममध्यमा ।। १।। जितेन्द्रियज्ञानवती नानाशिल्पविचक्षणा। दक्षिणाथमहालक्ष्या भीतानां परिसान्तवनी ॥२॥

स्थैर्यत्यागगुणोपेता ज्ञेया प्रकृतिरुत्तमा ॥। ३।। लोकोपचारचतुरा शिल्पशास्त्र विशारदा। विज्ञानमाघुर्ययुता मध्यमा प्रकृति: स्मृता ॥ ४ ॥ सूचकाः पापकर्माण: परद्रव्यापहारिण: । एभिदोविस्तु सम्पत्ना भवन्तीहाधमा नराः ॥५॥ अत्र चत्वार एव स्युनयिकाः परिकीतिताः । मध्यमोत्तमप्रकृतो नानालक्षणलक्षिता: ॥ ६ । धीरोद्धता धीरललिता धीरोदात्तास्तरथैव च। नायकाः परिकीतिता:॥।७।

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।। बाईसवॉ अध्याय ॥

प्रकृतिविचार

सक्षेप मे नाटक के सभी स्त्री-पुरुष पात्ी के स्वभाव तीन प्रकार के होते हैं- उत्तम, मध्यम तथा अघम (१) । जिलेंद्रिय, ज्ञान से युक्त विभिन शिल्पो मे दक्ष उदार, महान् लक्ष्य वाली डरे हुए लोवो को सात्वना देने वाली विभिन्न शास्त्रो के स्रथ से सपन, गाभीयं तथा औदाय से युक्त स्थय और त्याग के गुणो दाली प्रककति उत्तम जानना चाहिये (२, ३)। लोकोपचार मे चतुर, शिल्पशार्त्र मे विशारद तथा विज्ञान और माधुर्य से युक्त प्रकृति मध्यमा प्रकृनि होती है (४) । चुगलखोर, पापकर्म करने वाले, दूसरे के घन का अपहरण करने वाले-इस तरह के दोपो से भरे लोग अघम प्रकृति वाले होते हैं (५)। मध्यम और उत्तम प्रकृति मे विभिन्न लक्षणो से लक्षित चार प्रकार के नायक होते हैं-पीरोदषत, धीरललित, च्ीरोंदात तथा घीरतशात (६-७)

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। अथ त्रयोविशोध्यायः ।।

अडगाद्यभिनयस्यँव यो विशेषः ववचित् व्वचित। अनुक्त उच्यते चित्रः स चित्राभिनयः स्मृतः॥१॥ उत्तानौ तु करौ कृत्वा स्वस्तिकौ पार्श्वसस्थितौ। उद्वाहितेन शिरसा तथा च्ोध्बनिरीक्षणात् ॥२॥ प्रभातं गगनं रात्रि प्रदोष दिवसं तथा। ऋतून धनात् वनान्ताश्च विस्तीर्णाशच जलाशयान् ॥३॥ दिशो ग्रहान् सनक्षत्रात् किञ्चित् स्वस्थं च यद्भवेत्। तस्य त्वभिनयः कार्यो नाना दृष्टि समन्वितः ॥४।। एभिरेव करैमूयस्तेनैव शिरसा पुनः। अधो निरीक्षणेनाथ भूमिस्थान् सम्प्रदशयेत् ॥५॥ स्पर्शस्थ ग्रहुणेनैव तथोल्लुकसनेन च। चन्द्रज्योतस्नां सुखं वायु रसं गन्ध च निर्दिशेत ॥६।। वस्त्रावगुण्ठनात् सूर्यं रजोधुमानिलास्तथा। भूमितापमथोष्णं च कर्याच्छायाभिलापत.॥। ७।। ऊध्व किक र हष्टिस्तु मध्याहने सूर्यमादिशेत्। उदयास्तगतं चैव विस्मयार्थेः प्रदर्शयेत् ॥ ८ ॥

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।। तेईसवॉ अध्याय ।।

चित्राभिनय

आगिक अभिनय की कुछ विशेषताएँ, जो पहले नही बतायी गयी, चित्रा- भिनय के अत्र्गत आती है (१)। हाथो को उत्तान (ऊपर उठो स्थिति मे) कर के पाश्वें मे स्वस्तिक बना कर रखा जाय और उद्वाहित मिर से ऊपर देखे तो प्रभात गगन रावि साँक्ष दिन ऋतुएँ, वादल, वन के छोर, बड़े जलाशय दिशाएँ ग्रह. नक्षत्र तथा जो कुछ भी आकाश मे स्थित हो विभिन्न दृप्टियों का उपयोग करते हुए उसका अभिनय करे। उपर्युक्त हुस्त (उत्तान और स्वस्तिक) के द्वारा तथा उसी िर (उद्वाहित) के द्वारा नीचे देखने पर भूमि पर स्थित (विभिन्न वस्तुओ का) प्रदर्शन करे। स्पर्श के ग्रहण (जैसे किसी को छू रहा हो ऐसा दिखाकर) तथा उल्लुकसन (उलूक की मुद्रा मे ऊपर की ओर हिलाना) के द्वारा चद्रमा, चाँदनो, सुख, वायु, रस तथा गध् का निर्देश करे। (६) वस्त का वबगुठत बना कर सूय धल, धुरआं का तथा हवा और लू, गर्मी आदि का अभिनय छाया की अभिलाषा के द्वारा करे (७)। आजेकर दृष्टि को ऊपर बठा कर मध्याहन के सूर्य का निर्देश करे तथा उदय होते और अस्त होते सूर्य को विस्मय के भाव द्वारा प्रदरशित करे (८)।

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२०६/ सङ्क्षिप्तनाट्यशास्त्रम् यानि सौम्यायंयुक्तानि सुखभावकृतानि च। गान्नस्पर्शेस्सरो माञ्वैस्तेषाममिनयो भवेत ॥ ई ॥ यानि स्युस्तीक्ष्णरूपाणि तानि चाभिनयेत् सुघीः। मुखविकुण्ठनैः ॥ १०॥ यज्ञोपवीतदेशस्थमरालं हस्तमादिशेत्। स्वस्तिकौ विच्युतौ हारस्त्रग्दामार्थान् निदर्शयेत् ॥११॥ भ्रमणेन प्रदेशिन्या: दृष्टे परिगमेन च। अलपद्मकपीडायाः सर्वार्थग्रहृणं भवेत् ॥ १२॥ श्रव्यं श्रवणयोगेन दृ्श्यं दृष्टिविलोकनैः । आत्मस्यं परसंस्थं वा मध्यस्यं वा विनिदिशेत्॥ १३॥ विद्यु दुल्का घन रवा विस्फुल्लिड गाचिषस्था 1 वस्ताइगाक्षिनिमे रच तेऽभिनेयाः प्रयोवतृभि ॥१8॥ उद्वेप्टितपरावृत्तौ करौ कृत्वा ततं शिरः। असंस्पर्शे तथानिष्टे जिहमदृष्टेन कारयेत्॥१५॥ वायुमुष्णं तमस्तेजो मुखप्रच्छादनेन च। रणुतोयपतड्गांरच भ्रमरांश्च निवारयेत् ॥ १६॥ कृत्वा स्वस्तिकसंस्थानी पद्मकोशावघोमुखौ। निरुपयेत् ॥ १७ ॥ स्वस्तिकौ त्रिपताकौ तु गुरूणां पादवन्दने। खटकस्वस्तिकौ चाषि प्रतोदग्रहणे स्मृतौ ॥१८॥ छत्रध्वजपताकाश्च निर्देश्या दण्डधारणात्। नाना प्रहरणं चाय निर्देश्यं धारणाश्रमम्॥१ै॥ शुकाश्च शारिकाश्चैव सूक्ष्मा ये चापि पक्षिणः । शख सारसहसाद्या. स्थूला ये 5 पि स्वभावतः ॥ २० ॥

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सुखकारक सोम्य पदार्थों का अभिनय अपो के स्पर्श को रोमाच के साथ दिखा कर होता है (६) । तीक्ष्ण पदार्थों का अभिनय बुद्धिमान नट कघ्े के स्पर्श, उद्वेग और मुँह फेरने के द्वारा करे (१०)। अराल हुस्त को यज्ञोपवीत (जनेऊ) पहनने के स्थान की ओर ले जाकर • नीचे की ओर स्वस्तिक बनाये, तो इससे हार, माला आदि का निर्देश होता है (११)। प्रदेशिनी (तजनी) अगुली को घुमाने और दृष्टि को आसपास डालने तथा अलवद्म हस्त की अगुलियो को मिता कर हुथेली पर दजाने से सभी पदार्थों का ग्रहण होता है (१२) । श्रव्य वस्तु का सुनने के प्रदशन और दृश्य का दृष्टि डालने पर निर्देश होता है, ये वस्तुएँ आत्मस्थ, परसस्थ या मध्यस्थ हो सकती हैं (१३)। बिजली, उस्का, बादल की गड़गडाहट, चिंगारी, लपट आदि त्सत चक्षु और पलक झपकाने के द्वारा अभिनीत होते हैं (१४)। असस्पर्श (स्पर्श न कर पाना न मिलना) तथा अनिष्ट बताने मे जिह्मा दृष्टि के साथ उद्बेष्टित और पशावृत्त हस्त करके नत शिर से अभिनय करे (१५)। गर्म हवा, अंधेरा, तेज रोशनी, धूल, पानी, सूर्य भ्रमर आदि से बचने का भाव मुह ढक्ते हुए अभिनीत करे (१६)। सिंह, भालू, चीता आदि जन्तुओ का निरूपण दोनो हाथो से स्वस्तिक और अधोमुख पद्मकोश बना कर करे (१७)। गुरुजता की चरण वन्दना मे तरिपताक हुस्तो को म्वस्तिक बनायें, चाबुक पकड़ने क अभिनय में खटकास्वस्तिक का प्रयोग करे (q८)। दड (डडा) हाथ मे लेने से छत ध्वज, पताका आदि का निर्देश होता है, इसी प्रकार विभिन्न अस्त शस्त्रो का भी दड के प्र हृण या धारण से निर्देश होता है (१६)।

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२०८/ सङक्षिप्तनाट्यशात्म्

रेचकैरडगहारैश्च तेथामभिनयो भवेत्। खरोष्ट्राश्वतरासिहव्याघ्रगोमहिषादयः । २१ ॥ गतिप्रचारैरडगैरच तेडभिनेया: प्रयोवतृभिः । भताः पिशाचा यक्षाश्च दानवाः सह राक्षसेः ॥ २२॥ लोको वेदस्तथाध्यात्म प्रमाणं त्रिविद्यं स्मृतम्। वेदाध्यात्मपदायेंषु प्रायो नाट्यं प्रतिष्ठितम्॥ २३॥ वेदाध्यात्मोपपन्नं तु शब्दच्छन्दरसमन्वितम्। लोकसिद्ध भवेत् सिद्ध नाटयं लोकात्मकं तथा ॥२४॥ न च शक्यं हि लोकस्य स्थावरश्य चरस्य च। शास्त्रेण निर्णयं कतु भावचेष्टाविधि प्रति ॥२५॥ नानाशीला: प्रकृतयः शोले नाट्यं प्रतिष्ठितम्। तस्माल्लोकप्रमाणं हि विज्ञेयं नाट्ययोवतृभिः ॥२६॥

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जयोविशोज्याय /२०६

तोता, मैना आदि छोटे पक्षियो तथा मोर, सारस, हस आदि स्वभावत बड़े पक्षियो का अभिनय रेचक तथा अगहारो से किया जाता है। गध्ा ऊँट, खच्चर, सिह्, व्याघ्र, बैल, भैसा, भूत, पिशाच, यक्ष, दानव तथा राक्षस आदि का अभिनय गति प्रचार तथा आगिक अभिनय से होता है। (२० २२) )। नाट्य में तीन प्रमाण माने गये हैं-लोक, वेद तथा अध्यात्म। नाटय प्राय वेद और अध्यात्म मे प्रतिष्ठित है (२३)। वेद तथा अध्यात्म से युक्त तथा शब्द और छद से समन्वित नाट्य लोकसिद्ध तथा लोकात्मक होता है (२४)। इस स्थावर जगम (जड चेतन) लोक की भाव और चेष्टाआ का निर्णय शास्त्र से सभव नही (२५)। लोक मे विभिन्न प्रकार के स्वभाव वाले लोग होते हैं और स्वमाव में ही नाटय प्रतिष्ठिन है। इसनिये नाट्यप्रयोक्ता को लोक प्रमाण को स्वीकार करना चाहिये (२६)।

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।। अथ चतुविशोध्यायः।।

अनुरूपा विरूपा च तथा रूपानुरूपिणी। त्रिप्रफारेह पानाणा प्रकृतिश्च विभाविता॥१॥ नानावस्थाक्रियोपेता भूर्मिका प्रकृतिस्तथा। भृश मुद्योतयेन्नाटयं स्वभावकरणाश्रयम् ॥२॥

यथा जीवत स्वभाव हि परित्यज्यान्यदेहिकम। परभाव प्रकुरुते परभावं समाभित॥३॥

एवं बुध. परं भाव सोडस्मीति मनसा स्मरन्। घेपां बागड्गलीलाभिश्चेष्टाभिस्तु समाचरेद् ॥ ४ ।। सुकुमा रप्नयोगो यो राज्ञामामोदसम्भवः। शूड्गाररसमासाद्य तन्नारीपु प्रमोजयेत् ॥ ५ ॥ सरम्भारभटाश्च ये। न ते स्नीभि: प्रयोक्तव्या योक्तव्याः पुरुवेषु ते ॥ ६ ॥ एवं कार्यं प्रयोगज्ञंभ् मिकाविनिवेशनम् । स्नियो हि स्त्रीगतो भाव पौरपः पुरुषस्य च॥ ७॥ यथावयों यथावस्थमनुसपेति सा स्मृता। पुरुषः स्त्रीकृत भाव रूपात् प्रकुरुते तु यः ॥ रूपानुरूपा सा ज्ञया प्रयोगे प्रकृतिघुधै.॥। र ।।

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।। चौबीसवॉ अध्याय ।।

भूमिका विचार

अभिनेताओ की दृष्टि से नाटक के पात्ो की भूमिकाएं तीन प्रकार ही होती है-अनुस्पा, विस्पा तथा रूपानुसारिणी (१)। जिस पात्र की भूमिका करती है उसी के स्वभाव को प्रकट करते हुए विभिन्न अदस्थाआ और क्रियाम से युक्त भूमिका नाट्य को चमका देती है (र)। जैसे जीव एक देह से दूसरे देह मे पहुँच कर अपना स्वभाव छोड़कर परभाव के आश्रिन होकर परभाव (दूसरे के शील) को प्रक्ट करता है वैसे ही चतुर अभिनेता मन मे में वह पात हूँ ऐसा ध्यान करता हुआ उस पाल के भाव को प्रकट करे, जिसका वाणी, आगिक अभिनय तथा लीला और चेप्टा का अनुकरण उसे करना है (३४)। राजाओ को आमोदित करने दाले सुकुमार प्रयोगा म शृगार की प्रचुरता होने पर भूर्मिकाय रितया से करवाय (५)। उद्घत युद्ध, तीव्र, देग तथा हडबडी से युक्त पातो का अभिनय स्व्रिया स न करा कर पुरुषा से कराये (६)। इस प्रकार प्रयोग के जानकार लोग भूमिकार्ये निर्धारित करे-अर्यात् स्त्री प्रधान भावा वाली भूमिका रित्यो को और पुरष प्रधान भावा वाली भूमिका पुरुष अभिनता को दें (७)। आयु और अवस्या के अनुसार स्त्नी की भूर्मिका सत्ी ओर पुरुष की भूमिका पुरुष करे तो यह 'अनुरूपा प्रकृति' कहलाती है। पुरुष रूप के द्वारा स्वरीकृत भाद को करके दिखाये तो इसे रूपानुष्पा प्रकृति (भमिवा) जानना चाहिये (न) ।

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२१२/ सङ्क्षिप्तनाट्यशास्त्रम् यत्र स्त्रीणा पाठ्याद् गुणनराणां च कण्ठसाधुर्यस्। प्कृतिविपर्ययजनितौ विज्ञेयौ तावलडकारौ। ललितं सौष्ठवं यच्च सो 5 लडकारः परो मतः ॥ई ॥ गीतं नृतं तथा वाद्यं प्रस्तारगमनक्रिया। शिष्यनिष्पादनं चंव पडाचार्यगुणाः स्मृताः ॥१०॥ ऊहापोही मतिश्चंव स्मृतिमॅधा तथैव च। मेधास्मृतिर्गुणश्लाघारागः सड्घर्ष एव च। उत्साहश्च षडेवंतान शिष्यस्यापि गुणान् विद्ठुः ॥११॥

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चतुषि सोजध्याय /२१३

जहां स्तियों में पाठ्य के कारण तथा पुर्षों मे गुथो के कारण करमाघुय हो, वहाँ इन दोनों वो प्रकृतिविपयय जनित अलकार जानना चाहिए (६ै)। ललित और सोष्ठव ही परम अलकार है (६) । गीत, नृत्त तथा दाद बौर प्रस्तारगमन क्रिया (ताल का ज्ञान) और शिष्यो को तैयार करना-ये छ आचार्य के गुण है (१०)। ऊहापोह, मति, स्मृति, गुगो की सराहता मे अनुराग, सघर्ष (स्पर्धा) और उन्साह-ये छ शिष्य के गुण जाने जाते हैं (११)।

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। अथ पञर्चविशोऽध्यायः॥

सिद्धिस्तु द्विविधा ज्ञेया वाड्मनो 5 डगसम्भवा। दैवी च मानुषी चैव नानाभावसमुत्यिता॥१॥ दशाड़गा मानुषी सिद्धि देवी तु द्विविधा स्मृता। नाना सत्त्वाश्रमकृता वाङनेपथ्यशरीरजा ॥२॥ स्मितापहासिनी हासा साध््वहो कष्टमेव च। प्रबद्धनादा च तथा सिद्धिर्ज्ञेयाथ वाड्मयो॥ ३॥ च। चेलदानाडगुलिक्षेपे. शारीरी सिद्धिरिष्यते ॥ ४॥ न शब्दो यत न क्षोभो न चोत्पातनिदर्शनम्। सम्पूणंता च रड्गस्य दैवी सिद्धिस्तु सा स्मृता ॥५॥ देवात्मपरसमुत्या त्रिविधा घाता बुधस्तु विज्ञया:। औत्पातिक श्चतुर्थ. कदाचिद्थ सम्भवत्येषु॥६॥ वाताग्निवष कुक्षरभुजड्गमण्डपनिपाता: 1 कीटव्यालपिपीलिकपशप्रवेशनाश्च दैवककृताः ॥७॥ मात्सर्याद् दवषाद् वा तत्पक्षत्वात् तथार्थनेदत्वात्। एते तु परसमुत्या ज्ञया घाता बुरधनित्यम्॥८॥ अतिह सित रुदित बिरफो टितान्यथोत्कप्टतालिका पाताः। गोमयलोप्टपिपो लिकविक्षेपा रचारिसम्भूताः

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।। पच्चीसवा अध्याय ।।

सिद्धि निरूपण

चाचिक, सास्विक और आगिक अभिनयो से होते वाली विभिन्न भावो से व्यक्त सिद्धि दो प्रकार की जाननी चाहिए-ददी तथा मानुषी (१)। मानुषी सिद्धि के दम अग है और देवी सिद्धि दो प्रकार की है। ये दोनो वाचिक, आहार्य तथा आगिक और सात्विक अभिनयो का कई प्रकार से आश्रय लेने पर होती है (२)। प्रेक्षका का मुस्काना, अपहास या हास करना, साधु-साधु (वाह-वाह) कहना कष्ट है-(हाय, हाय) कहना, जोर से आवाज करना-ये सब वाड्मयी सिद्धि के लक्षण हैं (२) । पुलकित होना, रोमाचित होना, खडे हो जाना, वस्त्र या अँगूठी (उतार कर अभिनेता की ओर) फेंकना-इन सबके द्वारा शारीरी सिदधि जानी जाती है (४)। जब पेक्षागार मे न कोई शब्द हो, न कोई क्षोभ न कोई उत्पात देखा जाय और प्रेक्षागार दर्शको से (खचाखच) भरा (भी) हो तो इसमे दैवीसिद्धि है (५)। प्रयोग मे घात (विध्न) तीन प्रवार के जानने चाहिये-दैव (भग्य) समुष्थ, आ:मसमुत्य तथा परस्षमुत्य। इनमे चौषा औत्पातिक घात भी कभी-कभी आा मिलता है (६) । अघो, आग लगता, वर्षा, हाथी या साँप का आा घुसना, मटप का पिर पड़ना, कोडे, चोटियो या अन्य पशुओ का प्रवेश-ये सब दैवकृत घात है (७) । ईर्ष्या, द्वेप, अपने पक्ष (का प्रयोग) को आगे मढाने की चिता, रुपये पैसे का लागच देकर किसी को फोड लिया जाना-ये परकृत (अन्य लोगों द्वारा कराये गयै) घात है (८) : बहुत जोर से हँसना, सेवा, स्फोट करना, चीख-पुकार या बहुत जोर से ताली बजाना, गोबर, देले, चीटिया आदि मत्र पर फैकना-ये (परकृत घात के व सर्गत) शतरुओ द्वारा कराये जाने वाले घात हैं (६)।

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२१६ / स दक्षिप्तनाट्यशास्त्रम्

औत्पातिकाश्च घाता मत्तोन्मत्तप्रवेशलिङगकृताः। पुतरात्मसमुत्था ये घातांस्तांस्तान् प्रवक्ष्यामि॥ १० ।। वैलक्षण्यमचेष्टित विभूमिकत्वं स्मृतिप्रमोषशच। अन्य वचनं च काव्ये तथार्तनादो विहस्तत्वम्॥ ११ ॥

सिद्ध्या मिश्रो घातस्सर्वंगतशचैकदेशजी वाषि। नाट्यकुशलैः सलेख्या सिद्धिर्वा स्थाद् विघातो वा ॥ १२॥ चारित्राभिजनोपेताः शान्तवृत्ताः कृतश्रमाः। यशोधमंपराश्चैव मध्यस्थवयसषान्विताः ।। १३।। पडडगनाटयकशलाः प्रबुद्धा: शुचयः समा। चतुरातोद्यकुशला वृत्तज्ञास्तत्वर्दाशनः देशभाषाविधानाज्ञा: कलाशि्पप्रयोजका। चतुर्धाभितयोपेता रसभार्वविकल्रकाः शब्दच्छन्दोविधयानज्ञा नानाशास्त्रविचक्षणा: । एवविधास्तु कर्त्तव्याः प्राश्निका: दशरूपके ॥ १६॥ अव्यग्ररिन्द्रियः शुद्ध ऊहापोहविशारदः। त्यवतदोषो 5 नुरागी च स नाट्ये प्रेक्षक, स्मृतः ॥१७॥ महतुप्टे तुष्टिमायाति शोके शोकमुपैति च। क्रुद्धः क्रोध भये भीतः स श्रेष्ठः प्रक्षकः स्मृत ॥ १८ ॥ एवं भावानुकरणे यो यस्मिन् प्रविशेन्नरः । स तन्र प्रेक्षको जञयो गुणरेभिरलडकृत ॥१६ ॥ पूर्वाहपस्त्वथ मध्याह्नस्त्वपराहृणस्तस्थैव च। दिवा समुत्या विज्ञेया नाट्यवारा. प्रयोगतः ॥ २०॥ प्रादोषिकार्धरान्निश्च तथा प्राभातिको इ पर:। नाट्यवारा भवन्त्येते रात्रावित्यनपुर्वशः ॥२१॥

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पच्र्विशोषयाय /२१७

जलपातिक घात नशलची पागत या सन्यासियो के प्रवेश से होते हैं। अब मैं आत्मसमुत्य (प्रयोगकर्ताओो की अपनी लुटियो से होने वाले) चात बताता हूँ (१०)। असहजता या घबराहट, चेष्टा न करना गलत भूमिका करना भूमिका (सवाद) भूा जाना, अय के सवाद बोलने लगना, चीखने लगना अस्त-व्यस्त ढवग से हाथ चलाना-ये आत्मक्षमुस्य मात है (११)। नाटयकुशल (सुन्धार आदि को) सिद्धि और घात दोनो का योग-पूरा या एकदेशज-लिखकर समीक्षा करनी चाहिए कि कहाँ सिद्धि है और वहाँ घात (१२)। प्रत्येक प्रयोग के प्राश्निक या निर्णायक बनाने चाहिए। ये प्राश्निक सच्चरित् कुलीन, शात स्वभाव के कृतश्रम (जिहोने नाटयशास्त्र आदि के अध्ययन मे परिश्रम किया हो) यशोधमपरायण मध्यस्थ (पक्षपान न करने वाल बुजुग, छ अगा वसे नाटय मे कुशल पवित, समबुद्धि वाले, चारो आतोदो के जानकार छनो के ममज्ञ वत्त्वदर्शी देश की विभिन्न भाषाओ को समयने वाले, कता और शिल्प के प्रयोग करने मे समर्थ चार प्रकार के अभिनयो रस भाव शब्द, छदोविधान आदि से परिचित तथा विभिन शास्त्रो मे पारगत हो। (१३१६)। अव्यग्र इद्द्रियो के साथ शुद्ध मन वाला ऊड्ापोह मे विशारद दोपो को छोड़ने वाला तथा प्रम से युक्त-ऐसा नाटय का (आइश) प्रक्षक होता है (१७)। जो (पास के) सतोष मे सतुप्न हा, शोक मे शाक करे, क्रोध मे क्राध तथा भय मे भय का अनुभव करे-वह श्रष्ठ प्रशकु माना जाता है (१८)। भावानुकुरण मे जिसम भावानु- प्रनेश की क्षमता हो-इस तरह के गुणो वाला प्रसक नानना चाहिए (१६)। नाटयप्रयोग तिन या रात मे हो सकता है। रास मे सध्या आधी रात और रात हलने पर होता प्रभात-ये नाटय प्रयोग के समय हैं। दिन मे पूवहिय मध्याहून तथा अपराहण नाटदप्रयोग के समय है (२० २१)।

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२१८/ स द क्षिप्तनाट्यशास्त्रम्

यच्छोत्ररमणीयं स्याद् धर्मोत्थान कृतं व यद्। पूर्वाहृणे तत्प्रयोवतव्यं शुद्ध वा विकृतं तथा ॥२२॥ सत्त्वोत्थानगुणयु क्तं वाद्यं भूयिष्ठमेव च। पुष्कल सत्त्वयुकतं च अपराहणे प्रयोजयेत् ॥ २३॥ शुड्गाररससंश्रयम्। प्रदोषे नाट्यमिष्यते ॥ २४॥ यन्नर्महास्यबहुलं करुणप्रायमेव च। प्रभातकाले तत्कार्य नार्टर्य निद्राविनाशनम्॥२५॥ अर्घराते नियुञ्जीत समध्याहने तथैव च। सन्धयाभोजनकाले च नाटयं नैव प्रपोजयेत् ॥ २६॥ अथवा देशकालौ च न परीक्ष्यौ प्रयोवतृभि। यथैवाज्ञापयेद् भर्ता तदा योज्यमसंशयम्॥२७॥ तथा समुदिताश्चैव विज्ञेया नाटकाश्रिताः । पात्र प्रयोगमृद्धिश्च विज्ञेयास्तु त्रयो गुणाः ॥२८॥ बुद्धिमत्त्व सुरूपत्वं लयतालज्ञता तथा। रसभावज्ञता चैव वयस्स्थत्वं कृततुहलम् ॥ २६ ॥। ग्रहणं धारणं चैव गान्नावैकल्यमेव च। जितसाध्वसतोत्साह इति पात्रगतो विधिः॥ ३० ॥ सुवाद्यता सुमानत्वं शास्त्रकर्मसमायोग: सुपाठ्यत्वं तथैव च। प्रयोग इति संज्ञितः ॥३१॥ शुचिभषणतायां विचित्ररचना चैव तु माल्याभरणवाससाम् । समृद्धिरिति संज्ञिता ॥३२॥ पदा समुदिताः सवें एकीभता भ्वन्ति हि। अलड्कार: स तु तथा मन्तव्यो नाटकाश्रय. । ३३॥

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पर्ञ्चावशोऽध्याय /२१६

सुनने मे मनोहर तथा धार्मिक आध्यान वाला शुद्ध पा मिश्रित नाट्यप्रयोत पूर्वाहण मे करना चाहिए (२२)। सत्त के उत्थानगुण से युक्त, वाद्यभूयिष्ठ (जिसमे बाजे अत्यधिक बजते हो, तथा पर्याप्त सिद्धि युक्त नाटय अपराहण मे प्रयुक्त करे (२३)। कैशिकीवृति से युक्त, शृगार रस का आश्रय तथा नृत्त, वाद्य शर गीत से सपन्न नाटय प्रदोष (सधया के समय) प्रयोजनीय है (२४)। जा नम (मजाक) तथा हास्य की बहुलता वाला या करणप्राय हो ऐसा निद्वानाशक नाट्य प्रभात के समय करना चाहिए (२५)। आधी रात या मधवाहन में भी नाट्यप्रयोग करे पर मझया (पूजा) और भोजन के समय प्रयोग न करे (२६) । अधवा (आवश्यकता होने पर) प्रयोता देशकाल का विचार न करे, भर्ता (प्रयोग कराने वाला) जैसा आदेश हे, मशय रहित होकर वैसा ही प्रभोग करे (२७)। नाटर के सम्मिश्चित रूप मे तीन गुग होते हैं-पात्, प्रयोग और ऋदि (5) । पात् मे पे विशेषताएँ होनी चाहिए-बुद्धिमता, सुमपता, लमतालज्ञता, रक्षभावज्ञता, उचित आयु, कौतूहल ग्रहण (भूमिका को समझना), धारण (समझरूर स्मरण रखना), देह की अविकलता (चुस्त दुरुम्त होना) घबराहट से उबरने को क्षमता तथा उत्साह (२६ ३०)। अच्छे वाद्य, अच्छा गान, अच्छा पाठ तथा शस्त्र (सिद्धान्त) और कर्म (व्यवहार) का सम्यक् योग यह प्रयोग है (३१)। आभूषणो, माल्य और आभरण तथा वस्तों की धुचिता और इनकी वैविध्य पूण अकर्ष के रचना समृद्धि वही जाती है (३२) । जब ये तीनो गुण मिलकर एक साथ प्रयोग मे रह, तो उसे नाटर का अलररार मानना क हि ये (३३)।

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। अथ षडविंशोडध्यायः ।

ततं•चैवावनदधं च घनं सुषिरमेव च । चतुर्दिधं तु विज्ञेयमातोद लक्षणान्वितम् ॥१॥ ततं तन्त्रीकृतं शेयमवनदर्ध तु मौटकरम्। घनं तालस्तु विज्ञेय: सुषिरो बंश उच्यते ॥ २ ॥ प्रयोगस्त्रिविधो हुयेषा विज्ञेयो नाटकाश्रयः। ततं चैवावनदधं च तथा नाट्यकृतो ड परः ॥ ३ ॥ तते कुतपबिन्यासो गायनः सचरिग्रह। वॅपञ्चिको वॅणिकश्च वंशवादरतथैव च।४।। मार्दडगिक पाणविकस्तया दार्दरिको 5 पर:। अद न दधविधादेष कतप: समुदाहृतः ॥ ५॥ एवं गानं च वादं च नाटयं च विविधायम्। अलातचक्रप्रतिनं कर्तव्यं नाटयमोवतृभि: ॥६। यत् तु तन्त्रीकृतं प्रोवतं नानातोदयसमाश्रयम्। गान्धवमिति तज्ज्ञेयं स्वरतालपदातमकम ।। ७॥ अस्य योनिर्भदेद गानं वीणा वंशस्तर्थैव च। एतेपां च वक्ष्यामि विधि स्वरसमु्थितम् ॥८॥ गान्धर्व तरिविधं विद्यात् स्वरतालपदात्मकम्। त्रिविध्स्यापि वक्ष्यामि लक्षणं कर्म चैव हि। ईै।

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।। छब्बीसवाँ अध्याय ।।

आतोद्यविधान

लक्षणो मे युक्त आतोद चार प्रकार का जानना चाहिए-तत, अवनद्ध घन और सुषिर (१)। तसी (तर) से बने वाद तत है। पुष्कर आदि (चमडे से मढे) वाद्य अवनद्ध, (मजीरे आदि) ताल वाद घन तथा वशी आदि (फूंक कर बजाये जाने वाले वाद्य) सुबिर है (२) 1 नाटक के प्रयोग ने इन वाद्यो का प्रयोग तीन प्रकार का जानना चाहिये-तत अवनद्ध तथा नाटयकृत (३)। तत के प्रयोग मे वैपचिक (विपची वीणा बजाने वाला) वोणावादक तथा बाँसुरी बजाने वाला-इनके साथ गायक बैठता है-यह तत-प्रयाग मे कुतप विन्यास है (४)। मार्दगिक, पाणविक तथा दार्दरिक क्रम से बैठें-यह सवनद्ध प्रयोग का कुतपदियास है (५)। इस प्रकार नाटय प्रयरकाओ को गान वाद्य और नाटय को प्रयोग मे अलातचक्र के समान मिलाबर प्रयुक्त करना चाहिये (६)। स्वर, ताल और मद के अनुसार विभिन ततीवाद्ो का आश्य लेना गान्भ्रव है (७)। गायन, वीणा और दशी इनके मूलस्रोत हैं। अब मैं स्वरो क योग से होने वाली इनकी विधि बनाता हूं (८) । स्वर, ताल और पद् के अनुसार गश्धव तीन प्रकार का है। तीनो प्रकार के लक्षण और काय अब बताता हूँ (६)

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२२२ / सङक्षिप्तनाट्यशास्त्रम् दचघिष्ठाना: स्वरा: वैणाः शारीराशच प्रकीतिता.। एतेषां सम्प्रवक्ष्यामि विधानं लक्षणान्वितम् ।। १०॥ स्वरा ग्रामौ मू्च्छनारच ताना: स्थानानि वृत्तयः। सष्कं साधारणे वर्णा हुयलड्काराशच धातवः॥ ११॥ श्रुतयो यतपश्चव नित्यं स्वरगतात्मकाः। दारव्यां समवायस्तु वीणार्या समुदाहृत. ॥ १२॥ स्वरा ग्रामावलड्कारा वर्णाः स्थानानि जातयः। साधारणे च शारीर्यां वीणायामेष सड्ग्रहः॥१३॥ व्यञ्ञनानि स्वरा वर्णाः सन्धयोऽ थ विभवतय । नामाख्यातोपसर्गाश्च निपातास्तद्धिता कृतः ॥ १४ ॥ छन्दोविधिरलडकारा ज्ञेय: पदगतो विधि। निबद्ध चानिबद्ध च द्विविधं तत्पदं स्मृतम् ॥ १५॥ घ्र वस्त्वावापनिष्क्रामी विक्षेपी डय प्रवेशनम्। शम्या ताल: सन्निपातः परिवर्तः सवस्तुकः ॥ १६॥ मावा प्रकरणाडगानि विदारी यतयो लयाः। गोतयो 5 वयवा मार्गा. पादमार्गाः सपाणयः ॥ १७॥ इत्येकवि शति विधं ज्ञेय तालगत बुधंः। गान्र्वसड्ग्रहो हयेष विस्तरं तु निबोधत ॥ १८ ॥

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बड़विशोऽध्याय/२२३

स्वरो के अधिष्ठान दो है-वंण (काष्ठ निमित बीपा मे) तथा शारीर (मनुष्य देह रूपी बीणा मे) । अब मै लक्षणो से युक्त इनका विधान बताता हूँ (१०)। दारबी (काघ्ठ की) वीण में निम्नलिलित तत्वो का विधान है-स्वर, ग्राम, सूच्छेना, तान, स्थान, वृत्ति, शुष्क, साधारण वर्ण, अलकार धातु, श्रुति, यति ये इसमे स्वरगत रहते हैं (११, १२)। शारीरी वीणा मे प्रयुव्त तत्वो का सग्रह यह है-स्वर, ग्राम, अलकार, वर्ण, स्थान, जाति तथा साधारण (१३)। पदगत विवि मे निम्नलिखित तत्व आते हैं-व्यजन, स्वर, वर्ण, सधि, विभक्ति, नाम, आख्यात, उपसर्गे, निपात, तद्धित, कृदन्त, छन्दोविधि तथा अलकार। पद दो प्रकार का है-निबद्ध तथा अनिबद्ध (१४, १५)। तालगत गाध्व सग्रह मे २१ तहब है-धवा, आवाप, निष्क्राम, विक्षेप, प्रवेशन, शम्पा, ताल, सन्निपात, परिवर्त, वस्तु, माता, प्रकरण के अग विदारी, यति, लय, गीति, अवयव, मार्ग, पादमार्म तथा पाणि (१६९८)।

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। अथ सप्तविशोऽध्यायः॥

पड्जोदीच्यवती चैव पड्जमध्या तर्थैव च। मध्यपञ्चमबाहुल्यात कार्या शडगारहास्ययो:॥१॥ पाडजी त्वयार्थभो चैव स्वस्वरांशपरिग्रहाद। प्रयोज्ये गानयोक्तृभिः ॥२॥ निषादें डशे तु नैवादी गाधधारे पड़जकशिकी। करुणे तु रसे कार्या जातिर्गानविशारदैः॥३॥ धंवती धैषतांशे तु बीभत्से सभयानके। श्र वविधाने कर्तव्या जातिर्गाने प्यतनतः ॥ ४॥ गान्धारांशोपपत्तित । करुणे तु रसे कार्ये निवादें डरे तथेव च॥ ४॥ मध्यमा पश्चमी चैव नन्दयन्ती तथैव च। गान्ारपञ्चमी चेव मध्यमोदीच्यवा तथा। मध्यपञंत्रमबाहुल्यात् कार्या शडगारहास्थयोः ॥६॥ कार्मारवी तथा चानश्री गान्धारोदीच्यवा तथा। वोरे रोडें 5 द्भुते कार्या: षड़जर्षमांशयोजिताः । कैशिको धंवतांशे तु बीभत्से सभयानके ॥७॥ एकव षडजमध्या ज्ेया सर्वरससंश्रया जाति:। तस्पासत्वंशा: सरवें स्वरास्तु विहिताः प्रयोगविधौ॥ ८ ॥

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। सत्ताईसदॉ अध्याय ।।

जाति विचार

[पबागाधन मे रसो के अनुसार जाति]-शगार और हास्य मे पडजोदी च्यवती तथा पडजमध्या जाति का मध्यम और पचम स्वर की बहुलता के साथ प्रयोग करना चाहिए (१)। वीर, रौद्र तथा अद्भुत रसो मे पाड्जी, आार्षभी का अपने-अपने स्वर के अश के साथ गायका को प्रयोग करना चाहिये (२)। करुण रस मे निषाद अश के साथ नैषादी तथा गाधार अश के साथ पड्जकशिकी जाति का प्रयोग करना चाहिये (३)। बीभत्स तथा भयानक रस मे धवत अश के साथ धंबती जाति का प्रयोष धवागान मे करना चाहिये (४)। करुण रस मे गाधार अश के योग से गाधारी और रक्त गाधारी जातिया का प्रयोग हो सकता है तथा निपाद अश के साथ भी इनका प्रयोग हो सकता है (५)। शृगार तथा हास्य मे मध्यम और पचम स्वरो की बहुलता के साथ मध्यमा, पचमी, नन्दयती, गाधारपचमी तथा मध्यमोदीच्यवती का प्रयोग भी हो सकता है (६)। वीर, रौद्र और अद्भुत रसो मे षड़ज और ऋषभ अश के योग से कार्मारवी आधी, तथा गान्यारोदीच्यवा का प्रयोग हो सकता है तथा बीभत्स तथा भयानक मे धवत अश के साथ कँशिकी का (७)। एक अकेली पडजमध्या जाति ही सभी रसा का आश्रय है और सारे स्वर प्रयोगविधि मे उसके अश हैं (८)।

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२२६ / सङक्षिप्तनाटयशास्त्रम् यो यदा बलवान् यस्मिन् स्वरो जातिसमाश्रयात्। तत्प्रवृत्त रसे कार्य गान गेये प्रयोवतृभिः॥र६॥ मध्यपञ्चमभुविष्ठ गानं शुड्गारहास्थयो.। पड्जर्षभप्रायकृत वीररौद्राद्भुतेतु न ॥ १0॥ गान्धारसप्तमरचाय करुणे गानमिष्यते। तथा धंवतभमिष्ठ बीभत्से सभयानके ॥११॥

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सप्तर्बिशोऽडयाय/२२७

जावि का आश्रय लेते हुए जिस रस के साथ जो स्वर बलवान हो, उस आधार बनाकर प्रयोक्ता को गेय का मात करना चाहिये (है)। श गार और हास्य मे मध्यम और पचम का प्रयोग अधिक कर गायन होता है, वीर, रौद्र और अद्भुत मे घडज और ऋपभ का, करुण मे माधार और सप्तम का तथा वीभत्म और भयानक मे धैवत का (१०, ११)।

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॥। अय अष्ारविशोध्यायः I।

सातोयं सुषिरं नामम ज्ञेयं वंशगतं हुछैः। वैण एव विधिस्तन्र स्वरग्रामसमाश्रमः ॥१॥ द्विकत्रिकचतुप्कास्तु नथा वंशगता: स्वराः। कम्प्यमानार्धमुवतारच व्यवतमुक्तास्तथैव च॥२॥ तन्नोपरि यथा हयेकः स्वरो वैणस्वरान्तरे। प्राप्नोत्यन्यत्वमेवेह तथा वंशगतो 5 पि हि॥३॥ द्विकस्त्रिकश्यतुप्को वा श्रुतिसख्यो भवेत स्वरः। अनीरणात् तु शेषाणां स्वराणां श्रुतिसम्भवम् ॥ ४ ॥ व्यवतमुक्ताइगुलिस्तत्र स्वरो ज्ञेयश्चतुःश्रुतिः। कम्प्यमानाङ्गुलिश्वंव त्रिश्रुतिः परिकीतितः ।। ५। द्विको ऽ र्धाड्गुलिमुक्तः स्यादिति श्रुत्याभ्षिता: स्वराः । एते स्युर्मध्यमग्रामे भूयः पडजाघिता: पुनः। व्यक्तमुक्ताइगुलिकृता: पडजमध्यमपञचमाः ॥ ६ ॥। ऋपभो धवतर्चापि अर्धमुक्ताड्गुलिश्चैव गानधारो डथ निषादवान्॥ ७॥ स्वरसाधारणें चापि काकल्यन्तरसंज्ञके। निपादगान्वारकृती

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।। अट्ठाईसवॉ अध्याय ।।

सुपिर विधान

सुषिर नामक आतोद का प्रयोग वशी के रूप मे (नाटय सगीत मे) होता है। इस मे स्वर ग्राम की विधि वीणा के अनुसार ही होती है (१)। वशी म होने वाले स्वर ट्विक, तिकर, चतुष्क क्रमश कपमान, अर्धमुक्त तथा व्यक्तमुक्त होते हैं (२) इसके आगे (यदि श्रुतियो का विस्तार किया जाय तो) जैसे वीणा का स्वर आरोही और उत्तरवर्ती स्वर से परिवर्तन प्राप्त कर लेता है वैसे ही वश स्वरो की भी स्थिति होती है (३)। श्रुति की सख्या के अनुसार स्वर द्विक तिक या चतुष्क हो सकते हैं। फूकने की गति या बाल के अनुसार शेप स्वर भी बशी से फट सकते हैं (४) । व्यक्नमुक्त स्वर चार श्रुति वाला और कपमान अगुलि वाला स्वर तीन श्रृति वाला होता है (५)। अर्धागुलिमुकत स्वर दो श्रुति वाला होता है-इम प्रकार ये श्रुति की सखपा पर आथित होते हैं। य मध्यमग्राम म हाने वाले श्रुत्या पित स्वर है। षड़जग्राम के शुत्याधित स्वरो मे पडज, मध्यम और पचम व्यक्त मुकनागुलि वाले होते हैं (६)। ऋपभ तथा धवत कपमान अमुलि वाले तथा निषाद से युक्ल धैवत अर्धमुक्ततागुलि होता है (७)। साधारण स्वर तथा काकली स्वर भी कपमानागुलि होते हैं। निषाद तथा गाधार तथा पडुज और मध्यम का विपर्यय श्रुतिनक्षण के सिद्धिभाव के कारण होता है। बशी के स्वर वीणा ओर कठ दोनो के प्रयोग मे गति होने पर सिद्ध होने हैं (र, ह)।

१३ दो, तीन या चार श्रुतियो वाले स्वर। द्विक को कपित, तिक को अर्घमुक्त और चतुष्क को व्यकतमुक्त किया जाता है।

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विपर्यंम: सन्निकय श् तिलक्षसिद्धितः । वंणकण्ठप्रवेशेन सिद्धा वंशाश्रिता: सबराः॥ ई।। य यं गाता स्वरं गच्छेत तं तं वंशेन वादयेत्। शारीरवैणवंश्यानामेकीभाव. प्रशस्यते ॥१०॥ अचिचलितमविच्छिन्नं वर्णालड्कारसंयुतं विधिवद्। तलितं मधुरं स्निन्धं वेणोरेवं स्मृतं बाद्यम् ॥ ११ ॥

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अष्टाविशोऽध्याय /२३१

गायक जिस-जिस स्वर की ओर जाये, उस स्वरका बशी से बजाये। सारीर वीणा, काष्ठ बीणा, तथा बशी का तालमेल प्रशसनीय माना जाता है। अविचलित, अचिच्छिन्न (न टूटता हुआ), वर्ण और अलकार से युवत, चिधि सहित, ललित, मधुर तथा स्निग्ध ऐसा देणु का वाद्य होता है (१०-११)।

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।। अथ ऊर्मात्शोडध्यायः ।।

बाद्यं तु यद् धनं भ्रोवतं कलापातलयान्वितम्। कालस्तस्य प्रमाणं हि विज्ञेयं तालयोगतः ॥ १॥ या लौकिकी कला काष्ठा निमेषरच स्मृता बु्धः । न सा तालकला ज्ञेया हुयन्यपां तालगा: कलाः ॥२॥ त्रिविधा सा च विज्ञेया त्रिमागनियताद्भुतैः। चित्रे द्विमात्रा कर्तव्या वृत्तो सा द्विगुणा स्मृता ॥३॥ चतुर्गृ'णा दक्षिणे स्यादित्येवं त्रिविधा कला। निमेपा: पक्च विज्ञेयागीतकाले कलान्तरन्॥४॥ ततः फलाकालकृतो लय इत्यभिसंजितः । त्रयो लयास्तु विज्ञेया दृतमध्यव्रिलम्बिताः॥५॥ व्वशरचाचपुटेः प्रोक्तो गुरुलध्वक्षरान्वितः। आदो गुर्वक्षरं ज्ञेयं लघुनी गुरु चं हि॥। ६। आदौ ह्व गुरुणी यत्र लघु च प्लुतमेव च। स विज्ञेय: प्रयोगज्ञैस्तालश्चच्चस्पुटाशय ॥७॥ सन्निपातस्ततः शम्या ताल: शम्या तर्थैव च। एवमेककल: शुद्धो योज्यश्चच्चत्पुटो वुछेः ॥८॥ शम्यातालौ द्विरग्यस्तौ ताल: शम्या तथापि वा। सन्निवातादिके ज्ञेयः शम्पादिश्च तथा परः॥। दै॥

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।। उन्तीसवॉ अध्याय ।।

ताल-विचार

कला, पात और लय से युक्त धन वाद का ताल के योग से प्रमाण काल होता है (१)। लोक मे जो कला, काफ्ठा तथा निमेष हैं, उनको ताल की कला नहीं जानना चाहिये,' ताल की वला लोक से भिन्न है (२) तीन मार्गों से नियत (निर्धारित) वह ताल की कला तीन प्रकार की जाननी चाहिये। चित्र मार्ग मे दो मात्रा, वृत्ति या वातिक मार्ग मे चार मात्ा तथा दक्षिण मार्ग मे आठ मात्रा की 'कला' मानी जाती है। पाँच निमेप का समय गीत-काल मे दो कलाओ के बीच का समय माना जाता है (१, ५)। कला और मात्ा के सयोग से लय उत्पन्न होता है। दू ल, मध्य और बिलबित-ये तीन लय है (५)। चच्चत्पुट या चाचपुट ताल मे प्रथम दो गुरु, फिर लघु और प्लुत का प्रयोग होता है। यह व्यश्र और चतुरश्र दो प्रकार का होता है। व्यश्र चाचपुट म पहल्ते गुरु, फिर दो लघु और फिर गुरु का प्रयोग होता है (६, ७) इसकी पात कला इस प्रकार है-सन्निपात, शम्या, ताल और शभ्या। इनसे एक कला वाला चाचपुट बनता है। अथवा शभ्या-ताल, शभ्या-ताल, ताल-शभ्या, ताल-शभ्य-यह भी पात कला हो सकती है (द, ६)।

१ माग =पाणि।

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तालादिश्च त्रिभिर्भेदैर्यु तश्चच्चत्पुटी भवेत्। शम्यादिकस्तु तालादिस्तथा प्रोवतो विद्ृवद्भिः पाणिकादिषु। चच्चतपुटस्य ये भावाः सन्निपातादयश्च थे। त एव भेदा विज्ञेया बुधेश्चाचपुटे पृथक॥११॥ सन्निपातादिकस्त्वस्य बलवानितरौ तथा। षट्कलो S प्टकलश्चंव तालो हुयस्मात् प्रवर्तते ॥ १२॥ द्विप्रकार: पुनश्चायं निःशब्द:शब्दवांस्तथा। अनयोमिश्रभावात् तु मिश्रस्तालः प्रक्रीतितः ॥ १३॥ राम्यातालप्रवेशेन तयश्रो 5 न्योडपि विधीयते। षट्पितापुत्रककृतः पञ्चपाणिरुदाहृतः ॥ १४॥ आद्यं प्तुतं द्वितीयं च लघु बन्नाक्षरं भवेक्। तृतोयं च चतुर्थ च गुरुणो पश्चमं लघु॥ १५॥ प्लुतान्तः पट्पितापुत्रो गुरुलाघवसंयुत.। पञ्चपाणि. स विज्ञेय: षटपातास्तु षडक्षरः ॥ १६॥ सन्निपातास्ततस्ताल: शम्यातालस्तथैव च। शम्या चैव हि तालश्च घट् पातास्तस्य कीतिता: ॥ १७॥ तालादिस्त्पश्रभेदो 5 न्यः सम्पककेष्टकसंजञितः ।

तयश्र सर्वगुरु कृत्वा निष्क्रामं त्वन्र योजयेत्। शम्याद्यं ततस्त्वेष उद्घट्टः कथितो बुघः ॥१६॥ परिकीतितः । चतुष्कलो हुयष्टकल: कलाः षोडश चंब हि ॥ २०॥

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ऊनविशोऽधयाय /२३५

इस प्रकार चाचपुट के चार भेद हो जाते है-सविपातादि शम्यादि तया तालादि। नाटय मे चाचपुट सनिपात शभ्या ताल और शभ्या-इस पात कला से प्रयुक्त होता है आसारित गीतो म शभ्या ताल शभ्या-ताल ताल रभ्या ताल शम्या-इस क्रम से और पाणिकादि गीतो मे तालादि की पातकला होती है। चच्चतपुट के भाव और सन्निपास आदि वैस के वैसे ही चाचपुट मे भी प्रशुक्त्त होते हैं (१० ११)। केवल इम (चाचपुट) का सन्निपात आदि अधिक बलवान् होता है। छ तथा आठ कलाओ वाले ताल इसी से प्रवृत्त होते हैं (१२)। यह दो प्रकार का है-नि शब्द तथा शब्द वाला। इन दोनों के मिश्रण से मिश्रतान होता है। शम्या और ताल के मिश्रण से अन्म प्रकार का तपश्र ताल बनता है जिने घटपिता-पुत्रक या पत्रपाणि कहते हैं (१३, १४)। जहां पहला अक्षर प्लुत तघा दूसरा लघु हो तृतीय चतुर्थ गुरु हो तथा पचम फर लघु हो और जो प्लुत मे अत होता हो-ऐमा गुरु लघु से सयुक्त ताल पढपिता पुन्र है। इसी मे छ पात और छ अक्षर होने पर पच्पाणि कहा जाता है (१५-१६)। सनिपात ताल शम्या ताल, शभ्या, ताल ये इसके छ पात है (१७)। ताल आदि के त्यक्ष भेद मे सपवक्रेष्टक नामक ताल होता है जिसके बीच के पाच अक्षर गुरु तथा आदि और अत मे प्लुन माताएँ होती है (१८)। सयश्र मे सारे बण गुरु रखे और कलाओ का क्रम इस प्रकार रखे-निष्क्राम शभ्या शम्या-तो यह उद्घट्ट ताल कहा जाता है (१६)। चतुरश्र ताल तोन प्रकार का होता है- चतुष्कल अप्टकल तथा मोलहु कलाओ वाला (२०)।

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२३६ / सद्क्षिप्तनाटयशास्तम्

तयश्रस्तालस्तु पडमेदस्त्रिकल: पट़कलस्तथा। कला द्वादश चंव स्यात् तुविशतिरेव व॥ २१॥ चत्वारिशत तथाष्टो घ तथा षण्णवतिः कलाः । तालो नवविधश्चायं समासात् परिकीतित. ॥ २२॥। तघ्रावापो Sथ निष्क्रामो विक्षेपो ड थ प्रवेशनम् । चतुविकल्प इत्येव निःशब्दः परिकीतितः ॥२३॥ रम्या तालो ध्रवश्चंव सन्निपातस्तथा पर:। इति शब्देन संयुवतो विज्ञयो ड पि चतुविद. ॥ २४ ।। एतेपामेव क्ष्यामि हस्ताडगुलिविकत्वनम् । उत्तानाइगुलिसड्कोच आवाप इति सजञित. ॥ २५॥ निष्कामो 5 घोगतस्य स्यादड्गुलीनां प्रसारणात्। तस्य दक्षिणतः क्षेपो विक्षेप इति सजितः ॥२६॥ निवर्तनं च हस्तस्य प्रवेशो ड धोमुखस्य तु। यदा चतुष्कलो योगस्तदा त्वेष विधि: स्मृतः ॥ २७ ॥ निष्क्रामश्च प्रवेशश् ट्विकले परिकीतितौ। आवापनिष्क्रामकृतो द्विकली योग इध्यते ॥२ ॥ एपामन्तरपातास्तु पातसंज्ञाः प्रकीतिता:। शम्या तालस्तु विज्ञेयः सन्निपातसतथैव च ॥ २६ ॥ सव्यहस्तनिपातः स्याच्छम्या तालस्य वामतः । हस्तयोस्त सम. पातः सन्निपात इति स्मृतः ॥३० ॥ कला या त्रिविधा प्रोवता तस्या पातो ध्र वः स्मृतः । यथाक्षरस्य तालस्य स च गुर्वक्षरे स्मृतः ॥ ३१ ॥ यथाक्षरकृतैः पातैस्तालो ज्ञेपो वथाक्षरः। गुर्वक्षरेश्च विश्लिष्टैः स एव द्विकलो भवेत्॥ ३२॥

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ऊन व्रिशोऽध्याय /२३७

त्यश्र ताल छ प्रकार का है-व्रिवल, षट्फ्ल, द्वादशकल, चतुविशतिकल (२४ कलाओ वाला), अष्टचत्वारिंशत्कल (अड्तालीस क्लाओ वाला) तथा पण्णव तिकल (६६ कलाओ वाला)। इस प्रकार तीन सामान्य भेद तथा उपर्युक्त छ भेद मिला कर तयश्र ताल के भेद हो जाते हैं (२१, २२)। नि शब्द ताल के चार भेद हैं-आवाप, निष्क्राम, विक्षेप और प्रवेश (२३)। सशब्द ताल भी चार प्रकार का है-शम्मा, ताल, ध्रुव तथा सन्निषात (२४)। अब मैं इन तालो मे हाथ और अगुलियो की क्रियाएँ बताता हूँ। ऊपर उठी अगुलियो को सिकोडना आवाप है (२५)। नीने झुकी अंगुलियो को फैलाना निष्क्राम है। इनको दाहिनी और से जाना विक्षेप है (२६)। नौचे मुख बाले हाथ को पीछे लोटाना प्रवेश है। जब चतुष्कल ताल के प्रयोग मे यह विधि है-निष्क्राम और प्रवेश दो कलाओ वाले होते हैं तथा बाबाद और निष्क्राम भी दो कलाओ वाले होते है (२७, २८) । इनवे बीच मे होने वाली ताली को 'पात' कहा गया है। इनमे से दाहिने हाथ को बायें पर पटक कर ताली देना शम्या है। इसके विपरीत तात है और दोनो हाथो की एक साथ गति करके मिला कर ताल देना सन्निपात है (२६, ३०)। इस प्रकार शम्या, ताल और सन्निपात ये 'पात' के तीन भेद हैं। उपर्युक्त तीन प्रकार की कला मे पात का प्रयोग भव है (एक मात्रा पर विराम के लिए किया जाने वाला पात झ्ूब' है।) यपाक्षर ताल मे प्रब गुरु मक्षर पर होता है। अक्षरो के अनुसार जिसमे पात हो वह यथाक्षर ताल है। (३१)

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द्विर्भावाद् द्विकलस्याधि विज्ञेयो जय चतुष्कलः। त्यश्रश्च चतुरश्ररच पटकलो ष्टकलः स्मृतः ॥ ३३ ॥ घ्र वाणा च भवेत तालस्तं च वक्ष्यामि तत्त्वत । कनिष्ठाइगुलिनिष्क्रामः शम्या चैव ततो भवेत् ॥३४॥ कनिष्ठानामिकाम्यां तु निष्क्रामो 5 तो विधीयते। ततरच ताल: कर्तव्यः शभ्या चैब तु पक्चमी॥ ३४॥ प्रवेशो मध्यमापष्ठः कर्तव्यस्तर्जनीकृतः। निष्क्राम: सन्निपातो 5 न्ते नित्यमष्टकलो भवेत् ॥ ३६ ॥ शम्यापातो द्वितीया च तृतोया ताल एव चं। राम्या ततश्चतुर्थी तु पञ्चमी तर्जनी क्रमात्॥ ३७॥ पष्ठश्च सन्निपातः स्यादेष वे पटकलो विधि। एप तयश्र कलापातविकल्पो डड्गुलिभिः कृतः ॥ ३८ ॥ अप्टौ तालस्तु पट शम्याः सन्निपातास्त्रयस्तथा। आसारिते विधिहुर्येष एकंकं परिकीतितम्॥ ३६ ॥ आसारितानां संयोगो वर्धमानकमुच्यते। उत्पत्ति लक्षणं चास्य गदतो मे निबोधत ॥ ४० ॥ अतालं च मतालं च वर्धमानं द्विधा स्मृतम्। चतस्त्रः कण्डिकाश्चैवं तावन्त्यासारितानि तु॥४१॥ ध्र वकेण कलाभिश्व कण्डिका देवकल्पिताः। वर्धमानशरीरे तु क्रियते भार्गयोजना॥४२॥ आद्या नवकला तु स्यादव्टाभिस्तत्परा स्मृता। दश पद् न तथा चंद्र तृतीया कण्डिफेप्यते ।। ४३॥ चतुर्थी कण्डिका चब द्वात्रिशत् तु कला: स्मृता । कलाभिरेवं निर्दिष्टा: फण्डिका वर्धमानके।। केवलं

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ऊन विशोऽध्याय /२३६

जब इसमे दो गुरु अक्षर अलग अलग हो, तो यही दविकल तथा द्विकल का दो बार प्रयोग हो तो यही चतुष्कल होता है (३२-३३)। अब मैं ध वाओ मे त्यश्र तथा चतुस्त ताल के जो पटकल और अष्टकल भंद होते हैं उह समझाता हूँ। (अ्टकल ताल मे) कनिष्ठिका अगुमि सें निप्कराम और सम्या, कनिष्ठिका और जनामिका अगुलियो से निष्क्राम, ताल और शम्या, मध्यमा अगुलि से प्रवेश और अंगूठे तथा तजनी से निष्क्राम औौर सन्तिपात को प्रद- शित करना चाहिये (३४-३६) । त्र्यश् मे अमुलियों के द्वारा कलापात विभाग को प्रदर्शित करने की विधि यह है-(पटकल ताल की) प्रथम कला मे कनिष्ठा अमुलि के द्वारा निष्क्राम, दूसरी मे शम्या, तोसरी मे ताल, चोथी मे शम्या और पाँचवी मे तजनी से शम्या और सन्निपाल का प्रदशन किया जाय (३५-३८)। आठ ताल, छ शम्या और तीन सन्निपात मिल कर आसारित बनता है। आसारितो वा सयोग वघ्यमान है। इसकी उत्पत्ति और लक्षण में बताता हूँ। (३६ ४०)। वधंमान दो प्रकार का है-ताल रहित और तालयुक्त। इसमें चार भाग होते हैं और उनके अनुसार चार ही आसारित है (४१)। देवो ने घबाओ के अनुसार इसके प्रत्येक भाग की कलाओ को निर्मित किया। इस वर्धमान के स्वरूप मे मार्गो की भी योजना की जातो है। प्रथम कडिका मा प्रथम भाग म नो दूसरे में आठ, तीसरे मे सोलह और चोथे मे बत्तीस कलाएँ होती है। इस प्रकार वर्धमान ने प्रत्येक भाग मे कलाओ की योजना की जाती है, जो मार्ग से उत्पन्न हो तथा आसारित के [मुख, परतिमुख, देहसहरण विभाग आदि] अगो तथा आसारित के ताल से रहित हो (४२-४३)।

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।। अथ त्रिशोऽध्यायः ॥

या ऋच: पाणिका गाथाः सप्तरूपाड्ग एव च। सप्तरूपप्रमाणं हि तत् ध्र् वेत्यभिसंजञितम्॥१॥ एभ्यस्त्वद्गान्यथोद्धुत्य नानाच्छन्दः कृतानि तु। ध्र वात्वं यानि गच्छन्ति तानि वक्ष्याम्यहं पुन ।। २।। मुखं प्रतिमुखं चँद वहायसिकमेव तु । स्थितप्रवृत्ते वज्तं च सन्धिः संहरणं तथा॥ ३॥ प्रस्तारो माषघातः स्यादुषवतंनमेव च। उपपातः प्रवेणी च चतुरश्र' सशीर्षकम्॥ ४ ॥ सम्पिप्टमन्ताहरणं माहाजनिकमेव च। घ्र वाणामडगसज्ञानि पञचानामवि नित्यशः ॥ ५ ॥ एकवस्तु ध्र वा ज्ञया द्विवस्तु परिगीतिका। त्रिवस्तु मद्रकं ज्ञेयं चतुर्वस्तु चतुप्पदा ॥ ६॥ घ्र वा वर्णास्त्वलडकारा यतयः पाणयो लयाः। घ्र वमन्योन्यसम्बद्धा यस्मात तत्माद् श्र् वाः स्मृताः॥७॥ उपवृत्तं प्रवृस्तं च प्रावेशिकयां प्रकीत्यते। वज्रं च शीर्षकं चैव शोषिकायां विनिदिशेत॥८॥ प्रस्वारो माषघातश्च प्रवेणी ह्युपघातश्च माहाजनिकमेव च। अड्डितायामथापि च॥ ई॥

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।। तीसवा अध्याय ।

घ्र वा-विचार

जो ऋक, पाणिका तथा सप्त भीताग और वर्णाग वयश्र, चतुरश् आदि सप्त दप प्रमाणो वाले हैं, वे मिन कर झ्वा कहलाते है। इन अगो से विभिन्न छदो के अनुसार घ बाए बनती है जिहे मैं बताता हूँ (१,२)। पाँचो प्रकार की ध्रुवाओ के अग ये है-मुख, प्रतिमुख वैहायमक, स्थित, प्रबृत, वद्न, सधि, सहरण, प्रस्तार, उपवर्त, मापघात, नतुरश्र, उपपात, प्रवेणी, शीर्षक, सपिष्टक, अताहरण और भहा जनिक (३-५)। एक वस्तु मे निबद्ध गीत धुदा है दो वस्तु मे निबद्ध गीत, परिगीतिका, तोन मे०निबद्ध मद्रक, तथा चार ब्रम्मु मे निबद्ध गीत चतुष्पदा है (६) । धुवा, वर्ण, अलकार, यति, पाणि तथा लग-य ध्रुव (निश्चित) रूप से एक दूसरे से सबद्ध है अत इन्हे भ वाएँ कहते हैं ।श)। उपवृत्त तथा प्रवृत्त प्रावेशिकी म, वञ्त तथा शीर्षक शोषिका मे, और प्रस्तार, माषघात, महाजनिक, प्रवेमी तथा उपाचात अडिदिता मे होते हैं (८, ६)।

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मुखपतिमुखोपेता हयव कृष्टा विधीयते। वंहायसान्तहरणे स्थिताया सम्प्रकीत्यते ॥ १0॥

संहारश्चतुरश्रश्च नकुटे खञ्जके तथा। सन्धिः प्रस्वारसंयुकता अन्तराया त्मृता तथा ॥११॥ यान्यड्गानि कलाश्चव गीतकान्तर्गतानि तु। तानि छन्दोगतैवृ संविभाव्यन्ते घरृवास्वय ॥१२॥ व्यश्रश्च चतुरश्रश्च ताल कार्यो श्रवात्मक.। पट्कलो डष्टकलश्चेव य्रस्तु पूर्व प्रकीतितः ।। १३॥ पूर्वेपामेव गोताना वान्यडगानि स्मृतान्यय। तेषां वृत्तविधौ कार्यमेकको विवधो 5 थवा ॥ १४॥ एककं तु विदार्येका ते चोभे विवधः स्मृत । पट्परं त्यवरं वाषि विदार्य वृत्तमिष्यते। पदवर्णसमाप्तिस्तु विदारीत्यभिसंजिता ॥१५॥ एतेषां चावि वक्ष्यामि विधि प्रकृति सम्भवम्। ज्येष्ठानां वृत्तसयुक्तं कुर्यादादौ तर्थव च। विवधं चंव मध्यानां नीचानामेककं तथा॥ १६॥ त्पध वा चतुरश वा योगं जञात्वा प्रयोगजम्। तेन प्रमाणयोगेन ध्रुवा कार्या 5 वसानिकी॥ १७॥ मध्यमोत्तमयो कार्या चतुरभवसानिकी। मध्याधमाना कर्तव्या व्यक्षा चैवावसानिकी॥ १८ ॥ श्रवास्तु पञ्च विज्ञेया नाना वृत्तसमुद्भवाः। यथास्यानरसोपेता हयुत्तमाधममध्यमाः ॥१६॥ कनीघसी प्रहा काचित् सन्निमातग्रहापरा। तथाकाशग्रहा काचित् त्रिविधा तुम्रवा स्मृता ॥ २०॥

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विशोगयाय/२४३

अवकृष्टा ध्रुवा मुख तथा प्रतिमुख के साथ प्रयुक्त होती है। स्थिता घ्रया मे बहायस और अताहरण होते हैं (१०)। नकुट तथा खतक म सहार और चतुरक्ष होते हैं। प्रस्तार से युक्त सधि अतरा ध वा म हाती है (११)। गीतक के अतगत जो अग और कलाऐं है, वे घ्रुवाओ मे भी जाने जाते हैं। ध्रुवा के साथ त्यश्र या चतुरश ताल का प्रयोग होता है जिसम छ या आठ कलाएं होती हैं, जिनका निर्देश पहले किया गया है (१२, १३)। गोतो के जो अग बताए है उनकी वृत्तविधि (छदोविधान) मे एकक और विदध प्रयोग होता है (१४)। एकक एक बिदारी स होता है दा विदारियो स विवध बनता है। छ स अधिक या तीन से कम विदारियों से वृत्त बनता है। पद और वर्ण की समाति विदारी है (१५)। नाट्य प्रयोग मे विभिन्न भूमिवाओ के अनुसार मैं अब इनकी प्रयोग विधि बताता हूँ। उत्तम पात्रो के गीत या ध्रुवा मे वृत्त मध्यम पात्ो की ध्रुवा मे विवध तथा नीच पात्रो की ध्रुवा मे एकक का प्रणोग होता है (१६)। नयश्र या चतुरश्र ताल का प्रयोग के अनुसार योग करके उसक प्रसा स अवसानिकी धुवा की जानी चाहिये (१७)। मध्यम औौर उत्तम पावी के लिये चतुरश्रा अवसानिका ध्रुवा की जाय तथा अध्म पात्ो के लिय वपश् अवसानिकी (१८)। विभिन्न छद्दो म निर्मित उपयुक्त स्थान पर (यथावसर) रसो स युक्त उत्तम मध्यम और अधम पातो की ध्रुवाएँ पाँच प्रकार की होती हैं (१६)। ग्रह की दृष्टि से ध्रुवाओ के तीन वग बनत है-कनीय सोग्रहा मन्निपातग्रहा और आकाशग्रहा (२०)।

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प्वेशिको तु प्रथमा द्वितीया ड5 क्षेपिकी मता। प्रासार्दिकी तृतीया च चतुर्थी चान्तरा ध्रुवा।। निष्क्रामिकी च विज्ञेया पञ्चमी वृत्तकर्मणि॥२१॥ गान्धर्वं यन्मया प्रोवतं स्वरतालपदात्मकम्। 'पदं तस्य भवेद् वस्तु स्वरतालानुभावकम् ॥ २२॥ यत् स्यादक्षरसम्बद्धं तत् सर्व पदसंज्ञितम्। निवद् चानिबद्ध च येन तेन द्विदा स्मृतम्॥२३॥ अतालं च सतालं च द्विप्रकारं तदुच्यते। सतालं च ध्रवार्थेषु निबद्ध सर्वसाधकम्॥ २४॥ यत् तु वाक् करणोपेतं सर्वातोद्यानुरञ्ञकम्। अतालमनिबद्ध च पदतालं प्रकोतितम् ॥ २५॥ नियताक्षरसम्बद्ध छन्दो यतिसमन्वितम्। निबद्ध तु पदं ज्ञेयं सतालपतनाक्षरम्॥ २६॥ अनिबद्धाक्षराणि स्युर्यानि जातिकृतानि तु। विधानमभिनिर्मितम् ॥२७॥ पदानि त्वनिबद्धानि तालेन रहितानि तु। आतोद्ेषु नियुक्तानि तानि तानि तु रक्षयेत् ॥ २८ ॥ यानि चैवं निबद्धानि छन्दोवृत्तविधानतः। घ्र वारूपाणि पूर्वाणि तानि वक्ष्यामि तत्वतः ॥ २र६ ॥

अत्युक्त च प्रतिष्ठं च मध्यं गायत्रमेव च। एताः स्थितावकृष्टास्तु व्यस्रा ज्ञेयास्तु जातयः ॥ ३० ॥ जष्णिगनुष्टुप् बृहती पडक्तिश्चतीह ज्ातयः । एता: प्रासादिकोनां तृ वयश्रा ज्ञेया यथाक्रमम् ॥ ३१॥

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विशोऽध्याप /२४५

दृत्त (छरो) के अनुसार प्रावेशिकी, आक्षेपिकी, प्रासादिको, आतरा और ननिफामिको-से पांच प्रकार को म्रुवाएँ होती है (२१)। स्वर, ताल और परदों से निमिन जिस गाधर्व को मैंने पहले बताया उसका स्वर औोर ताल को प्रकाशित करने वाला भाग पद या वस्तु है (२२)। अक्षरी से निरममिन गेय वस्तु पद है। वह निबद्ध तथा अनिवद्ध-दो प्रवार का होता है। इसी के अतान और सताल दो भेद और बनते हैं। यरबाओ के लिये निबद्ध सताल पद हो सरमाधक है। जो करणों (उपकरणो) से सबद्ध हा, सभी वादों का उपरजक ही वह अनाव जोर अनिवद्ध पद होता है (२५)। निर्धारित अक्षरो से दना, छद तथा यति से पमन्वित ताल पर वक्षरो की समाप्ति वाला पद निवद्ध है (न६)। जाति के अनुमार गाये गये वक्षर अनिबद्ध पव बनाते है। बतोद के उपकरणो के अनुवार इनरे गाे का विधान होता है (२७)। ताल रहित अनिवद्ध पद विभिन बादयो पर गाये जाये तो गायन मे रजकता आ जाती है (२८)। छदो के अनुमार जो घुवा का निदद्ध पद है उनका स्वरूप अब मैं बनाता हूँ (२६)। अत्यक्त प्रतिष्ठ तथा मध्यगायज-ये तीन स्थितावकुष्टा घ्रुवा म प्रबुक होते हैं (३) उष्मिक अनुष्टुप बृहती तथा मत्ति-इनकी जातियाँ प्रामादिकी पुवा मे गायी जाती है (३१)।

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२४६ / सड्क्षिप्तनाटयशास्त्रम् अनुष्टप् बृहती चैव जगत्यय बिलम्बिता। द्रुता च चपला चैवमुद्गता कृतिरेव च। घ्रवाणां जातयो हुयेताः प्रयोगेषु प्रकीतिताः ।२२।। प्रावेशि कोनां जातीनामुद्घतानां निबोधत पङवितस्त्रिष्ट्रुप् सजगती तथा 5 तिजगती पुनः। शक्करी चेति निर्दिष्टा उद्धताना तु जातयः ॥ ३३॥ सर्वासामेव जातोनां त्रिबिधं वृत्तमुच्यते। गुरुप्रायं लघुप्रायं गुरुलध्वक्षरं तथा॥ ३४ ॥ गुरुप्रायावकृष्टा स्याल्लघुप्राया द्वुता तथा। गुरुलघ्वक्षरप्राय्या: शपा: कार्या श्र्वास्तया ॥। ३५ ॥ वृत्तान्योज:कृतानि स्युर्द खे यानि भर्वन्ति हि। तानि द्रुतासु योज्यानि लघुयुग्मकृतानि तु॥ ३६॥ यानि चाल्पाक्षराणि स्युर्पच्छन्दःकृतानि तु। तानि स्थितावकृप्टासु कार्याण्याक्षेपिकीु च॥३७॥ प्रवेशाक्षेपनिष्कामप्रासादिकमथान्तरम् 1 मानं पर्श्चविधं विद्याद भ्रयायोगसमन्वितम् ॥३८॥ नानारसार्थयुकता नणां या गीतये प्रवेशे तु। प्रावेशिकी तु नाम्ता विजेया सा ध्रवा तजतंः॥३६॥ अड़कान्ते निष्क्रमणे पात्राणा गोयते प्रयोगेषु। निष्क्रासोपगतगुणा विद्यान्नैप्क्रामिकीं तां तृ॥४॥ क्रममुल्लइ्घ्य विधिनं: क्रियते या द्रुतलयेन नाट्यबिधौ। आक्षेपिकी ध्रृवासौ दुता स्थिता वापि विज्ञया ॥४१॥ या च रसान्तरमुपगतमाक्षेपवशात कृतं प्रसादर्यात। रागप्रसादजननीं विद्याव प्रासादिकीं तां तु। ४२॥

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*वशोऽ्याय /२४७

द्रुता घ् वा मे प्रयुक्त होने वाले छदो की जातियां अनुष्टुप् वृहृती, जमती, विलबिता, दरुता तथा चपला, उदगता तथा कृति है (३२)।

उद्धता (उद्धत पात्ो के लिये गायी जाने वालो) प्रावेशिकी ध्रुवा मे छदों की निम्नलिखित जातियाँ प्रयुक्त होतो है-पकि, द्विष्टुम्, जगती, अतिजगती तथा शक्रकरी (३३)। सभी जातियो मे तीन प्रकार का वृत्त काम मे आता है-गुरुप्राय नघुप्राय तथा गुरु और लघु दोनो प्रकार के अक्षरो वाला (३४)। अवकृष्टा ध्रुवा गुरु प्राप होती है, द्ृता लघुप्राम तथा शेश ध्रवाऐं गुरु-तधु दोनो प्रकार के अक्षरा बाली हाती हैं (३५)। ओजस गुण वाले वृत्त जो दुख के प्रक्षग मे गाये जाते हैं उनका प्रयोग लघु अक्षरो के युग्म क साथ हुता ध्रया मे होता है (३६) । जो कम अक्षर और छोटे छदों मे हो, वे स्थितावकृप्टा तथा आक्षेपिकी घबाओ मे काम मे आते हैं (३७)। उपर्युत पाँच प्रकार की ध्रवाएँ इन पाँच अवसरो पर क्रमश गायी जाती हैं-(पात्र का) प्रवेश आक्षेप निष्क्राम (पात् का निर्गभन) प्रसाद (प्रसन्न करना) तथा अतर (बीच का अतराल) (३६)। विभिन्न रसो के अय स युक्त, जो पात्ो के प्रवेश के समय गायी जाय बह प्रावेशिकी है (३६)। अके के अत म पाता के निष्क्रमण क अवमर पर गायी जाने वाली निष्कमण के भाव को बताने वाली घबा नष्कामिकी है (४०)। क्रम का उल्ल- धन कर नाट्यविधि म दुत लय मे प्रयोग के जानकार जिस घ्रवा का प्रयग करते हैं वह अरक्षेपिकी या स्थिता कहलाती है (४१)। आक्षपवश आये अन्य रस (अगभूत या अप्रधान रस) के प्रमग को हदा कर जो पक्षको के चित्त को प्रमन्न करे वह शामादिकी ध्रुवा है (४२)।

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२४८ / सदक्षिप्तनाटयशास्त्रम् विषण्णे मच्छिते भ्रान्ते वस्त्राभरणसंपमे। दोषप्रच्छादने या च गीयते सान्तरा धुवा॥४३॥ शीर्षका चोद्धता चंव ह्यसुबद्धा चिलम्बिता। अडडिता चापकृष्टा च पट्प्रकारा ध्र वा. स्मृताः ॥ ४४॥ शिर:स्थानीय मेतद्धि यस्मात् तस्मात् तु शीषका। उद्धता तूद्धता यस्मात् तस्मात् जेया ध्रवा बुघेः ॥४५॥ यति लयं वाद्यगति पदं वर्णान स्वराक्षरम्। अनुबध्नाति यत्रंवमनुबद्धा भर्वेत् तु सा॥ ४६ । नाति त्वरितसञ्च्ारा नाट्य धर्ममनुव्रता। भवेदय विलम्बिता ॥ ४७॥ अड्डिता तूत्कटगुणा शृड्गाररससम्भवा। यस्मात सा स्थाने प्रसन्ना च तस्मादेषाडडिता स्मृता॥४८ ॥ अन्य भावेषु कृष्टा च कृष्टहेतुषु गीयते। यस्मात् कारुण्यसंयुक्ता हुयवकृष्टा भवेत् ततः ॥ ४६॥

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विशोऽघयाय /२४र्६

पात के विषादग्रस्त होने, सच्छित या भ्रात होने, वस्त्र और आभरण पहनते समय, दोषो (मच पर कार्यव्यापार के दोष) को ढकने के लिये जो गायी जाय, वह आतरा भ् वा है (४३) । ध्रुवाओ के छ अन्य प्रकार और है-शीषंका, उद्धता, अनुबद्धा, विलबिता, अडिदता तथा अपकृष्टा (४४)। ध्रवाओ मे शीर्षस्थानीय झ्र् वा शीर्षका है। उद्धत भावो वाली घया उन्धना है (४५)। जिसमे यति, लय, वाद्यगनि, पद, वर्णे, स्वर, अक्षर-सभी अनुबद्ध हो, वह अनुबद्धा है (४६)। जो अत्यत त्वररत गति वाली न हो, नाट्यघमें का अनुमरण करने वाली हो और जिसमे पात्रो का सचार विलबित (धीरे-धीरे) हो वह विलबिता भ्रवा है (४७)। शरगार रस से उद्भूत कितु उत्कट गुण वाली और उचित अवसर पर प्रसन्न करने वाली धुवा अदिंडिता है (४८)। अन्य भावा से आकृष्ट या कृष्ट हेतुओ मे गायी जाने वाली कारण् से मयुक्त घवा अवकृष्टा है (४६)।

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। अथ एकत्रिशोडध्यायः ।।

यावन्ति चर्मनद्धानि हुयातोद्यानि द्विजोत्तमाः। जानि त्रिपुष्करकाद्यानि हृयनमिति स्मृतम् ॥ ॥ वाय्वात्मको भवैच्छब्दः स चाषि द्विविधो मतः। स्वरवांश्चैव विज्ञेयस्तथा ववाभिधानवान्॥२॥ तत्राभिधानवान् नाम नाना भाषासमाश्रय: । स्वरवानपि विज्ञेयो नानातोद्यसमाश्रयः ॥३ ॥ शारोर्यमिव वोणायां स्वराः सप्तप्रकीतिताः । तेभ्यो विनिःसृताश्चवमातोद्येपु द्विजोत्तमाः ॥४।। पूर्व शरीरादुद्भूतास्ततो गच्छन्ति दारवीम्। ततः पुष्करजं चवमनुयान्ति धर्वन युताः॥य॥ तेपां वावकरणर्ज्ञेयाः प्रहारा वचनाश्रयाः। झण्टुं झॉझेति सयुक्ता वीणावाद्यप्रयोगिनः ॥६।। पोडशाक्षरसम्पन्नं चतुर्मागं तथैव न। द्विलेपनं घट्करणं त्रिरयति त्रिलयं तथा॥७॥ त्रिगतं त्रिप्रचार च त्रिसंयोगं त्रिपाणिकम्। दशार्धरमाणिप्रहतं त्रिप्रहारं त्रिमार्जनम् ॥८ ॥ विशत्यलड कारयुतं तथाष्टादशजातिकरम्। एभि: प्रकारै: सम्पल्नं वादयं पुष्करजं भवेत् ॥ दै ॥

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। इकतीसवॉ अध्याय ।।

अवनद्ध-विधान

जितने भी चमड़े से महे विपुष्कर आदि वाद्य है, व अवनद्ध के अतर्गत आते है (१)। अवनद्ध मे शब्द वायु के कारण होता है। वह सो प्रकार का होता है-म्वरबान् तथा अभिधानचान् (२)। अभिधानवान् में विभिन्न भाषाओ का आश्रम (स्कषक शच्द समूह) होता है, जबकि स्ववान् विभिन्न वाद्यो के अपने शन्दो पर आकित है (.)। शारीरी वीणा (कठ सगोत) मे सात म्वर होते है। उन्ही का आश्रम विभिन्न वाद्यो मे लिया जाता है (४)। पहन शरीर से उत्पन्न ा फिर दाएवीणा में प्रयुस हुए, फिर य स्वर ध्वनियुत्त होकर पुष्कर-वाद्य म अनुगत होत है।)। इन अवनद्ध बाद्यो पर झटु झाँज आदि बाल शेलत हुए तान बजाबी जाती है और बीणा अदि बाद्यो क साथ इनका प्रयोग होता है (६)। मोलह अक्षरो से सम्पन्न, चार मागों वाता दो लेपन दाला छ करण वाल, तीन बतियो वीर तीन लगो वाला, तीन गतियो और तीन प्रचार वाला विसयाग व्रिपाणि, पचपाणि के प्रहार मे युक्त या विप्रहार, तीम माजना वाला और बीम अल कारों से सुवत तथा अठारह जाति बाला-इस प्रकार से सपन्न पुप्कर वाद होना है (७ ६)।

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२५२ / सङक्षिप्तनाट्यशास्त्रम्

कखगघटठडढतथदधमरलह इति वोडशाक्षराणीह। नियतं पुष्करवाद्ये वाक्करणः संविधेयानि ॥ १॥ आलिप्ताड़कितगोमुखवितस्ताश्चत्वारो मार्गाः। द्विलेपं नाम वामोध्वकप्रलेपात्। पटकरणं नाम रूपं कृतप्रतिकृतं प्रतिभेदों रूपशषमोघः प्रतिशुल्का च्ेति। त्रियतिर्नाम समा स्रोतोगता गोपुच्छा चेत्यन्वयात्। त्रिलयं नाम हुतमध्यविलम्बितयोगात। त्रिगतं नाम तत्त्वमनुगतमोघश्चेति।त्रिप्रचार ना मचारो विषमप्र- चारो समविषमप्रचारश्चेति। त्रिसयोगं नाम। गुरुसयोगो लघु- संयोगो गुरुलघुसयोगश्चेति। त्रिपाणिकं नाम समपाणिरवर्माणि- रुपरिपाणिश्चति। प्चपाणिप्रहुर्त नाम-समपाणिरधसमपाणिरर्धार्धस मपाणि: पार्श्वपाणिः प्रदेशिनी चेति। त्रिप्रहारं नाम निगृहीतोऽर्धनिगृहीतो मुक्तरचेति। त्रिमार्जनं नाम-मायूर्यर्धमायूरी कार्मारवी चेति ॥ ११॥ भृड्गारहास्ययोगे वाद्यं योज्यं तथाडडिते मार्गे। वीराद्भुतरौद्राणी विततस्तमार्गेण वाद्यं तु॥ १२॥ करुणे रसेऽपि हि वाद्यं योज्यं हृयालिप्तकरण मार्गे तु। बोमत्सभयानकयोस्तयैव नित्यं हि गोमुख्याम् ॥ १३॥ तत्रोपविष्टे प्राडमुखे रड़गे कुतप एव विन्यासः कर्तव्यः । तत्र पूर्वोकतयोनेपथ्यगृहद्वारयोमंध्ये ृतपविन्यासः कायः। तत्र रड्गाभिमुखो औौरजिकस्तस्य पाणबिकदर्दरिकौ बामत। एप प्रथममवनद्धकेन तत्य ततः कृतपविन्यास उक्तः । तत्रोत्तराभि- सुखों गायकः । गायकस्य तु वामपार्श्वे वैणिकः। वैणिकस्य दक्षिणेन वंशबादकौ। गातुरभिमुखं गायिका। इति कतप विन्यास: ।। १४।।

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एकविशोऽध्याय /२५३

क, ख, ग घ, ट ठ ड्, ढ त श, द ध म, र ल, ह-ये इसके मालह अक्षर हैं, जिनका प्रयोग ताल के बोल बोलने में होता है (१०)। आलिप् अकित, गोमुख और वितस्त मे चार मार्ग हैं। बायी ओर और ऊपर की ओर-दस प्रकार दो प्रकार का लेप होता है। रप, कृतप्रतिकृत प्रतिभेद, रूपशेष, ओष और प्रति- शुल्का-मे छ करण हैं। समा स्रोतोगता और गोपुच्छा-ये तीन यतियाँ है। द्ुत मध्य और विलवित-ये तीन लय है। तत्व अनुगत और ओघ-यह विगत है। समप्रचार, विषम प्रचार और समविपस प्रचार-यह तीन प्रकार का प्रचार है। गुरु सयोग लघु सथोग और गुर लघुसशेग-यह तीन प्रकार का सयोग है। समपाणि, अवपाण और उपरिपाणि-यह तीन प्रकार का परणणि है। समपाणि, अधसमपाणि अर्धार्धं समपाणि, पापर्वपाणि औोर प्रदेशिनी-यह पचपाणिप्रहृत है। निगूगेत अर्ध निगन्नीत औ्रर मुक्त-यह विप्नहार है। मायूरी अर्धमायुरी और कार्मारवी-ये तीन मार्जनाएँ है (११)। शरुगार और हास्य के योग म बाद्य को इडिडत मार्ग मे योजित करता चाहिये। बर, अद्भुत और रोद्र मे वितस्त मार्ग म (१२।। करुण रम मे आलिप करण मार्गे म बाद्य योजित करना काहिये नया वीभरस और भयानक में नितम गोमुखी मे (१३)। पूर्व को ओर मुख रखत हुए रगमच पर कुतप का विन्याम इस प्रकार करना चाहिये। यह वुतप विन्यास नेप्यगृह के पूर्वोक्त दोनों द्वारो क बीच होता है। प्रेक्षकों के सामने मुरज बजाने वाला बँठना है, पणव और ददर बैज्ञाने बाल उसके बायें बठते हैं। यह अवनद्ध कुतप का वित्यास बताया। उत्तर को ओर मुख करवे गायक बैठता है, उमके बायी ओर वीणा बजाने वाला वीणावादक के दाहिनी ओर बांसुरी बजाने बाला। गायक के सामने मुख करके गायिका बैठती है(१४)।

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भूमिका-निचेश

आचार्य: पात्रजांश्चेय गुणान् ज्ञात्वा स्वभावजान। ततः कुर्थाद् यथायोगं नृणां भूमिनिवेशनम्॥ १॥ अड् गप्रत्यडगसंयुधत महीनाइगं वयोन्वितम्। न स्थूलं न कृशं चँव न दीर्घ न च मन्थरम् । २॥ श्लिष्दाडगं द्युतिमन्तं च सुस्वरं प्रिमदर्शनम्। एतैगु णैश्च संयुक्तं देवभूभिषु योजयेत्॥३॥ स्थूल प्राश वृहद्वेहं मेधगम्भीरनिःस्वनम्। रौद्रस्वभावनेत् च स्वभावभ्र कटीमुखम् ॥ रक्षो दानवदैत्यानां भूमिकासु प्रयोजयेत् ॥४॥ यदि वा नेहशा सन्ति प्रकृत्या पुरुषाः द्विजाः । आचार्यबुद्ध्या योज्यास्तु भावचेष्टास्वभावतः ॥ ५॥ या यस्य सदशी चेष्टा हुयुत्तमाधनमध्यमा। सा तथा 5च्ार्ययोगेन नियम्या भावभाविनी॥६॥ भरताश्राश्च भरतो विटूपकस्तौरिकस्तथा नान्दी। [तौरिको नटो बादी ।] नरन्दी ससूत्रछारो नाट्यफरो नायकश्चेव ।। ७।। मकटाभरणिकल्पविज्ञेया माल्यवस्तुविविधश्च। फारककशीलवाद्या विज्ञेया नामतसशचंव ॥८ ॥

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। वत्तीसवॉ अध्याय ।।

भूनिका विकल्प

आचाय नाटक के पाछो के म्वभावगत गुणो को पहचान कर जा जिम अभि नेता * अनुरूर हो वैसी भूमिका उम दे (१)। जिसके अग प्रत्यग ठाक हो काई अग कम ने हो उचित आयु हो जो न बहुन मोटा हो न दुबन न वसुत लवा हो न बोना जो सश्लिष्ट अमो वाला का्ति म यक्त, अच्छ स्वर वाला, देखन मे ्रिय लगन वाला ह-ऐसे नट को देवना की भूमिया द (२-३)। जो माग, लबा विदालकाय मेघ न समान गभीर स्वर बला रोद्र ग्वभ व और गेद्र नवो वाला स्वभावन टेही भौहो वाला ह।-ऐस नट को राक्षसा का भूमिका दे (४) । यदि भूमिका के अनुस्प पुरुद न मिल सो आचाय सपनी बुद्धि स भाव चेष्टा और स्वभाव दख वर अयनटोके य भूमिकार दे (४)। उत्तम मध्यम और अध्यम (पात्ो के अनुसू्प) जिम नट की जँसी चप्टा हा उसे आचाय भूमिक वे भाव केा समय कर नियत्तित करे (६) । प्र वेक नाटय दल म निस्नलिखिन नट होते है-भत व आथरि- नट भरत विदूपक तूय बनाने वाला नट वाही नदी, सूवधार, नाटयकर नानक भकुट और आभरण चनाने वाले मालाऐँ और अय वस्तुएँ बनाने वाल बढई या शिल्पी तथा वुशीलब आदि (७८)।

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नाम्बरग्रहण रडगे न स्नानं न विलेपनम्। नाञजन नाडगरागश्छ केशर्संयमन तथा।१॥ नाप्रावृता नकवस्त्रा न रागमधरस्य तु। उत्तमा मध्यमा वाषि कर्वोत प्रमदा वर्वाचत् ॥२ ॥। अधमाना भवेदेष सर्वं एव बिधिः सदा। कारणान्तरमासाद्य तस्मादषि न कारयेतु॥ ३। न कार्य शयन रड्गे नाट्यधमं विजानता। केनचिद् वचनार्थेन अड़कच्छेदो विधीयते। ४॥ यदवा शयोतार्थवशादेकाकी सहितो Sपि वा। चुम्बनालिड्गन चँव तथा सुहयं च यद्भवेत्॥ ५॥ दन्तच्छेदयं नखच्छेदं नीबीस्त्नसनमेव च। स्तनान्तर विमद च रड्गमध्ये न कारयेत्॥६॥ भोजन सलिलक्रीडा तथा लज्जाकर च यद्। एवंविधं भवेद्यद्यतसद्रड़गे न कारयेत ॥ ७॥ पितापुत्रस्ुषाश्वश्ूद्दशयं यस्मात् तु नाटकम्। तस्मादेतानि सर्वाणि वर्जनीयानि तत्वत. ॥८॥

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॥ तैतौसवॉ अध्याय।।

निषिद्ध-दृश्य

रगम पर उत्तमा या मध्यमा प्रकृति की स्त्ोपान्-वस्त धारण करना, ह्नान लप और अजन लगाता, अनरग लगाता, केश बाँधता-ऐसे काम करती हुई न दिखाइ जाय (१)। वह खुल बदन या एक कपड़ा पहने हुए प्रवेश न करे। ओठ रगता हुई भी वह न ददिखाई जाथ (२)। अधम कोटि के स्त्रीपाढ य कार्य करत दिखाये त्रा सकते हू, अथवा अनय किसी माध्यम से इन कार्यों को सुचित करवा कर अधम पातरो मे भी इनका न दिखाये (३)। नाटक में किसी पाव का क्षोता हुआ न दिखाया जाम। जहाँ ऐसा प्रसग हा, वहाँ अक समाप्त कर दिया जाता है (और ऐसे अप्रदश्य व्यापारी की सूचना अगल अक मे प्रवेशक या विष्कथक के द्वारा दो जा सकती है। (४)। य्दि नाटक गे किसी प्रयोजन से पात्र को एकाकी या ।कसी के साथ सोता हुआ दिखाया भी जाय तो चूबन, आलिंगन, दत्तक्षत, नखक्षत, नीवी (वस्तो की गाठ) खोलना, स्लनविमई आदि गोपतीय काय रव के बीच न कराये जायँ (५,६)। इसी प्रकार भाजन, जलक्रीड़ा या और भी इस तरह क सज्जाजनक कार्य जो है, बन्हे रगमच पर प्रवशित न कराया जाथ (७)।

नाटक पिता, पुव, बहू, सास सबके द्वारा मिल कर देखते के लिये है, अत ये व्जनीय कार्य इसमे प्रदर्शित न किये जाये (८]।

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। अथ चतुस्त्रिशञोदध्याय: ॥

आकाशवचनानोह वक्ष्याम्यात्मगतानि च। अपवारितकं चैव जनान्तिकमथापि च॥ १॥ दूरस्थाभाषण यत् स्यादशरोरनिवेदनम्। परोक्षान्तरित वाक्यमाकाशवचनं वु तत्॥ २ ॥ तन्रोत्तर कृतर्वाक्यै: संलाप सम्प्रयोजयेव्। नानाकारणसयुक्ते: काव्यभावसमुत्थितैः ॥ ३ ॥ हृदयस्य वचो यत् तु तदात्मगतमिष्यते। सवितर्क च तद् योज्यं प्रायशी नाटकादिपु॥४॥ निगूढभावसयुक्तमपवारितकं स्मृतम्। कार्यवशादश्रवण पार्श्वगतेर्यंज्जनान्तिकं तद स्थात् ॥५॥ हृदयस्थ सविकतप भावस्थ चात्मगतमेव। इति गूढार्थयुक्तानि वचनानीहु नाटके ॥ ६॥ जनान्तिकानि कर्मे तु तानि योज्यानि योकतृभि:। पूर्ववृत्त तु यत्कार्य भूय कथ्यं तु कारणात्। कर्णप्रदेशे तद्वाच्य मागात् तत पुनरुक्ततास्॥ ७॥ अव्यभिचारण पठेदाकाशजनाम्तिकात्मगतपाठयम्। प्रत्यक्षपरोक्षकृतानात्मससुत्यान् परकृताशच ॥=॥ हस्तमन्तरित कृत्वा त्रिपताकं प्रयोवतृभिः। जनान्तिकं प्रयोक्तव्यमपवारितकं तथा ॥ ई ॥

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॥1 चौतीसवाँ अध्याय।।

संबादयुक्तियाँ

अव् मैं आकाशभापित तथा आत्मगत कथन अववारित और जनातिक की व्यास्या करता हूँ (१)। दूर स्थित पाद् से जो शरीर से दशका को प्रत्यक्ष न दिखाई देता हो, तथा मच पर स्थितर पात क लिये भी परोक्ष तैथा अतरित (छिपा हुआ) हो- बात करना आकाशभाषित है (२)। इसमे उत्तर की कल्पना करके विभिन कारणो या काव्यगत भावो के द्वारा बार्तालाप आगे बढ़ाया जाता है (३)। किसी पात्र के हृदय की बात आत्मगत या स्वगत है। इसका अभिनय नाटक मे वितक के भाव को व्यक्त करते हुए करना चाहिये (४)। नियूढ भाव्री से सयक्त कथन अपवारित है तथा नाटक के वभिप्नाय से पाश्व मे खड्े पातो का भी (एक पात्र का दूसरे पात् से कहा सवाद) न सुनना जनातिक है (५)। हुदय मे चलने वाले तकं चितक या मनो भाव-इनके गूढ अर्थ को प्रकट करने वाले जनानिक होते हू उहे एक पात्र दूमरे पास के कान मे कहे (६)। इमी प्रकार पहले हो चुकी बात (जो दशको को ज्ञात हो) कारणदश फिर से बताना हो, तो एक पात के कान म ऐमा है" कह कर कहता हुआ प्रदर्शशित कर दिया जाय, जिससे पुनकक्त न हो (७)। आकाशभाषित जनातिक तथा अपवारित मे (इसके विपरीत) पाठ (सवाद) तो पूरा पूरा कहा जाता है। यह सवाद किसी प्रत्यक्ष या परोक्ष व्यकत्ति से (बोलने वाले पाव क) स्वय के या दूमरे के कार्य से सबधित होते है। त्रिपनाक हस्त बनाकर छिपान का भाब बताते हुए जनाविक और अपवारित का प्रयोग करना चाहिय।

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।। अथ पञ्चततिशोडध्यायः ॥

प्रयोगो द्विविधश्चैव विज्ञेयो नाटकाश्यः। सुकमारस्तथाविद्धो नानाभावरसाश्रय: ॥१।। नाटकं सप्रकरणं भाणो वीथ्यडक एव चं। ज्ञैयानि सुदुमाराणि मातुषराभितानि तु॥ २ ॥ सुकुमारप्रयोगो 5 य राज्ञामामोदकारकः। शडगाररसमासाद्य स्त्रीणा तत् तु प्रयोजयेत् ॥। ३।। युद्धोद्वताविद्धकृता सरभारभटारच ये। न ते स्त्रोणा प्रकर्तव्या कर्तव्या पुरुषैहि ते॥॥ यथाविद्धाडगहारं मायेन्द्रजालबहुलं पुस्तनेपथ्यदीपितन् ॥ ५ ॥

सात्वत्यारभटीयुवसं नाट्यमाविद्धसंजञितम् ॥६॥ डिम समबकारश्च व्यायोगेहामृगौ तथा। एतान्याविद्धसज्ञानि विज्ञ यानि प्रयोव्तृभिः ॥७॥

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॥। पँतीसवॉ अध्याय।।

प्रयोग-स्वरूप

विभिन भावो और रसो से आश्रित नाटय प्रयोग के दो प्रकार जानना चाहिये-मुकुमार तया आबिद्धि (१)। नाटक प्रकरण भाषा वीथी तथा अक- ये पाँच प्रकार के रूपक मुकुमार है। इनमे मनुष्य पाव्र होने हैं। इनका सुक्मार प्रयोग राजाओ को प्रमन्न करने वाला तथा शृगार रम से परिपूण होता है इसका अभिनय स्त्रियो द्वारा करना चाहिये (२ ३)।

युद्ध वे उद्धत कठोर सरभ से भरे शोयपूण भावो का अभिनय स्त्रियो से न करा कर पुरषो से हो कराना चाहिये (४)। आविद्ध अगहारी मार-काट और युद्ध से भरपूर, माया और इद्रजान की बहुलता वाला, पुस्त और नेपथ्य की विधियो स प्रकाशित, प्राय पुरुष पात्ो वाला कम स्त्ी पात्ी वाला उद्धत तथा सात्त्वती आर भटी वृत्तियो से बुक्त नाट्य प्रयोग आबिद्ध सज्ञक होता है (५ ६)। डिम, समवकार उयायोग, ईझमृग-पे रूपक प्रकार आर्रबद्ध जानने चाहिय (७)।

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।। अथ पढत्िशोडध्यायः ॥

ममैते तनया: सबॅं नाट्यव्रेदसमन्विताः । सर्बलोकं प्रहुसनैर्बाधन्ते नाटसश्रयं:।।१।। कस्यचित्वय कालस्य शित्पकं ग्राम्यधर्मकम्। ऋपीणा व्यड्म्यकरणं कुर्बद्भिर्गणसंश्रयम् ॥२ ॥ अथ्ाव्यं तद दुराचारं ग्राम्यधर्मप्रवर्तितम्। निष्ठुरं चाप्रस्तुतं च काव्यं ससदि योजितम् ॥ ३ ॥ तच्छ त्वा मुनयः मर्घे भीमरोषप्रकम्पिताः । ऊचुस्तान भरतान् क्रद्धा निर्दहन्त इवाग्नयः ॥४॥ मा तावद् भो हविजा युक्तममिदमस्मद्विडम्बनम्। को नामायं परिभवः किश्च नास्मासु सम्मतस् ।। ५॥ यस्माज्ज्ञानमदोन्मत्ता न विद्धा न विनयाशिता: । तस्मादेतदुधि भवतां कज्ञानं नाशमेप्यति॥६॥ ऋपीणा ब्राह्मणाना च समवायसमागताः । निराहुता विना होमैः शुद्राचारा भविप्यय॥।७॥ एतच्छर त्वा तु वचनं मुनीनामुग्रतेजसाम्। विषण्णास्ते ततः सचे श्रुत्वा मा समुपस्थिताः ॥८॥ प्रोमतवन्तश्च मां पुतास्त्वयाहो नाशिता वयम्। अनेन नाट्यदोपेण शूद्राचारा हि यत् कृताः ॥ै॥

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॥ छत्तीसवाँ अध्याय ॥।

नाट्यावतरण

मेरे ये (मो) पुत्र नाट्यवेद सीख कर अपने प्रहसनो के प्रयोग से लोक को व्यथित करने लगे (१)। कुछ समय बाद उन्होने ग्राम्य धमं स युक्त शिल्पक का प्रयोग किया जिसमे ऋषियो पर सामूहिक रूप से व्यग्य था। उन्होने वह अश्राव्य, दुराचार से युक्त, ग्राम्यधर्म से प्रवर्तित, निष्ठुर और अप्रासगिक काव्य समाज के आगे प्रस्तुत कर दिया (२ ३)। उस सुन भयकर रोष से काते हुए ब्राप की भांति जलते हुए मुनियो ने कुद्ध होकर उन भरतपुत्नो से कहा-हे द्विजो, तुम लोगा ने हमारी यह हास्यास्पद नकल करके ठीक नहीं किया। यह अपमान हमे स्वीकार नही है (४, ५)। चूंकि तुम लोग ज्ञान के मद से मतवाले होकर दीठ हो गये हो अत तुम लोगो का यह कुज्ान नष्ट हो जायेगा (६) । ऋृषियो और ब्राह्मणो के सम- बाय मे तुम लोगो के लिये आहुति नही दी जायेगी तथा तुम लोग शूद्रो के समान आचार वाले हो जाओगे (७)। उग्र तेज वाले मुनियो के ये वचन सुनकर दुखी होकर वे लोग भरे पास आये और मुझसे बोले-आपने तो हमारा नाश करवा दिया। इस नाट्यदोष के कारण हम शूद्रो के समान आचार वाले हो गये हैं ()।

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मयावि सान्त्वयित्वोकता मा क्रोध वजतानघा:। कृतान्तविहितोऽस्माकं नूनमेष विधि सुताः ॥ १० ॥ मुनीना न सृषा वाद्यं भविष्यति कदाचन। निधने च मनो मा भृद् युष्माकमिति सान्विताः ॥११॥ जानीध्व तत् तथा नाटय व्रह्मणा सम्प्र्वतितम्। शिप्येभ्यश्च तदन्येम्यः प्रयच्छामः प्रयोगतः ॥ १२॥ मा वे प्रणश्यतामेतन्नाटयं दुःखप्रवतितम्। महाश्रयं महापुण्यं वेदाडगोपाडगसम्भवम्॥ १३॥ कस्यननित्वय कालस्य नहुषी नाम पार्थिय। प्राप्तवान् देवराज्य हि नयदुद्धिपराक्रमैः ॥ १४॥ प्रशशाम तदा राज्य दैवव्युपिटिमवास्तुवन्। गान्ध्व चैव नाटय च हप्ट्वा चिन्तामुपागमत् ॥ १५॥ कृताञ्जलि: प्रयोगार्थ प्रोकतर्वांस्तु सुरान् नृप। अप्सरोभिरिद सार्ध नाट्यं भवतु मे गृहे॥ १६ ॥ प्रत्युक्तश्च ततो देवेवृ हस्पतिपुरोगमैं। दिव्याड्गनाना नंवेह मानुषै सह सड्गतिः॥१७॥ हित पथ्य च वक्तव्यो भवान् स्वर्गाधिपो हि यत्। आचार्यास्तत्र गच्छन्तु गत्वा कर्वन्तु ते प्रियम्॥ १८॥ प्रोकतवांस्ततो मां तु नृपत स कृताञ्जलि:। इदमिच्छामि भगवन् नाट्यमुर्व्या प्रतिष्ठितम् ॥१॥ पितामहगृहे 5 स्माभिरेतदन्तःपुरे जने। पितामह क्रियायुक्तमुवंश्या सम्प्रव्तितम् ॥ २०॥ प्रकाशमेतदिच्छामो भयस्तत् सम्प्रयोजितम्। तिथियज्ञक्रियास्वेतद् यथा स्यान्मड्गलै: ुभेः ॥२१॥

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पटर्न्निशोऽडपाय /२६५

मैंने भी सात्वना देकर उनमे कहा-हे निप्पाप पूत्रो क्रोध मत करो। हमारे लिये यही विधि का विधान था (९०) । मुनियो का वचन कभी यूठा नहीं होगा। उसके कारण तुम लोग विनाश के लिये मन भत बनाओ। हमे ब्रह्मा के द्वारा प्रवर्तित इस नाटय का ज्ञान शिष्यो तथा अन्य लोगो को प्रयोग के द्वारा देना है। यह नाट्य बडी कठिनाई स प्रवर्तित हुआ है। इसका नाश नही होना चाहिय। यह महान् आश्रय वाला महान् पुण्य वाला (पवित्र) तथा वेद के अगो और उपागो से जन्मा है (११-१३) । कुछ समय पश्चात् नहुष नामक राजा ने अपनी नीति बुद्धि और पराक्रम से स्वर्ग का राज्य प्राप्त कर लिया। देवो से सपत्ति प्राप्त करते हुए वह (उन पर) राज्य करने लगा। (स्वर्ग स) गाधव (सगेत तृत्य) तथा नाटय को देख कर वह इन विद्याओ को पृथ्वी पर लाने वे लिए चिंतित हुआ (१४ १५)। उस राजा ने देवताओ से अजल बांध कर नाटय प्रयोग के लिए कहा-अप्सराओ के माथ मेरे घर मे भी नाटय हो (१६) तब वृहम्पति को आगे करके देवो ने उसे उत्तर दिया-अप्यराओ का मनुष्या से मल सभव नही है (८) । पर आप स्वर्ग के शामक है अन हम हितकारव और उचित उपाय बतात हैं। यहाँ से (नाट्य के) आचार्य पृथ्वी पर जाकर आपका (नाटय प्रयोग सिखाने का) प्रिय कार्य बरे (१८)। तब नहुप ने हाथ जोट कर मुझमे कहा-ह भगबन् मैं इस नाटय को पृथ्वी पर प्रतिष्ठित देखना चाहता हूँ (१६) 1 मेरे पिनामह (पुरुग्वा) के घर उस समय यह अत पुर के लोगो में पितामह की प्ररणा से उरवशी के द्वारा प्रचारित किया गया था। (अब बह लुप्त हो गया अत) हम चाहते है कि यह फिर से प्रकाशित हो और फिर से इमका प्रयोग पृथ्वी पर किया जाय। शुभ अवमर, यज्ञ की क्रिया आदि मे मगल के रूप मे इम नाटय का प्रयोग हो (२० २१)।

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तथास्त्विति मया प्रोवतो नहुषः पार्थिवस्तदा। सुताश्चाहूय सम्प्रोक्ता सामपूर्व सुरैः सह ॥। २२।। अयं हि नहुषो राजा याचते नः कृताञ्जलिः। गम्यतां सहितैभूमि प्रयोवत् नाट्यमेव च॥ २३॥ करिष्यामश्च शापान्तमस्मिन सम्यक प्रयोजिते। ब्राह्मणाना नृपाणा च भविष्यथ न कुत्सिताः ॥ २४ ॥। अस्माकं चैव सर्वेषा नहुषस्त महात्मनः । आप्तोपदेशसिद्ध हि नाट्यं प्रोकतं स्वयं भुवा ॥ २५॥ शेषमुत्तरतन्न्न ण कोहलस्तु करिष्यति। प्रयोगात् कारिकाश्चैव निरुवतानि तथैव च॥२६॥ ततश्च वसुधा गत्वा नहुषस्य गृहे द्विजाः। स्त्रीणां प्रयोगं बहुधा बद्धवन्तो यथाक्रमम्॥२७॥ एवमुर्वीतले नाट्य शिष्यः समवतारितम्। भरताना च वंशोऽयं भविष्यं च प्रदशितः ॥२८॥

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पट्व्रिशोऽध्याय /२६७

मैंने राजा नहुष से कहा-ऐसा ही होगा, फिर अपन पुवा को बुलाकर देवो सहित सात्वनापूर्वक उनस कहा (२२)-वे राजा नहुष हाथ जोड़ कर हमसे प्रार्थना कर रह है। तुम लोग नाटय के प्रयोग क लिये धदती पर जाआ (२३) । इसका समुचित प्रयोग करके हम ऋषियो के शाप का अत कर देंगे और ब्राह्मणो तथा राजाओ की निदा के पात् न रहेगे (२४)। हम सबके तथा महात्मा नहुष के लिये ब्रह्मा ने आप्तोपदेश से सिंद्ध होन चाला यह नाट्य बताया है (२५)। इस नाटयशास्ह्र मे जो बात छूड गयी हैं उन्हे प्रयोग निर्देश के साथ कारिकाओ और निरुकत के द्वारा (मरे शिष्य) कोहल अपते उत्तरतन्न (कोहलीय नाटयशास्त्र) मे बतायेंगे (२६)। तब व भरतपुत्र पृथ्वी पर नहुप के घर जाकर क्रमानुसार अनेक प्रकार से (अत पुर की) स्त्िया से प्रयोग कराने लग (२७)। इस तरह मेरे शिष्यो ने पृस्वी पर इस नाटय को उतारा और इस भरतवश और इसक भविष्य का बचाया (२८)।

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श्लोकानुक्रमणिका

मलोद सं० नाशा० (बडोदास०)

अमौ प्रशिथिलौ मुक्तो ६१४८ भवु हनिगज नीया १४ ५ १४ १० (गग्र) (गध) अग्रगो पृष्ठरौ वाषि १०२१ १०२३ अप्रत पृष्ठतो वापि १० १०२३ अङ्गुस्तु सप्रहसन १७ २६ १८ ६५ अङ्कानन एवचाड्गो १८ ३४ ५६११५ १८ ३७ १६ ११४ अज्नुरते निष्न मणे ३०४० ३२ ३१२ अड्गप्रत्यड्प सयुक्त ३२२ ३५५ अङ्गहारेपु वक्ष्याषि २३१ २५१ अङ्ध तवी यस्थ हस्तस्य ६२५ अन्भ ल्य भहता सर्वा ६३७ ६८४ अच्वित परष्ठत पाद ४ ६१ ४१०४ अच्िन स्मात् वरोवाम ४६० अश्ितापमृता पदो ४ १०२ ४ १४१ अच्चितेन तु पादेन ४ ३ ४७४ अञ्चितो बाहुशिरि ४.३१ ४७० अञ्ज लिश्च कपोतबच अर्ड्ाइत शकटास्यन १०५ १०५

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श्लोकानुक्रमणिका/२६६

श्लोक स० नाशा० नाश्रा (बडोदाम०)

अड्डितश्च पुनर्वाम ११ ५६ ११६० अ इडिता तूत्क टपुणा ३० ४८ ३०३३ अत ऊस्व न कर्तव्य २७ २१८ अत पर प्रवक्ष्यामि ११४३ ११४४ अताल च सताल च २६४१ ३१ ७६ ३० २४ ३२ २र६ अतिक्रान्तकर कृत्वरा ४ १०४ ४ १४३ अतिक्रान्तक्रम कृत्वा ४८७ ४१२६ अतिक्रान्तकर कृत्वा १०४१ १०४३ अतिकान्नकर कृत्वा १0४३ १०४५

अतिक्रान्त विचित च १०.२ अतिक्रानत' पुनर्वास 99.3₹ ११२४ 13 ११ ३५ ११ ३७

11 ११ ३७ अनिक्रान्ता ह्यपकान्ता १०११ अतिवाक्यक्रियोपेत १३१६ १३ ७५ अनिहमितरुदित २५६ -3२४ अत्युक्त म प्रतिष्ठ च ३० ३० ३२ ३५ अत् चत्वार एव स्यु २२६ =४ १६ अन्न नित्य प्रयत्नो हि १०५३ १०५३ अवाह-किमन्ये 9 गद्य

अव्राह-प्रतुत्िरिनि कस्मात् १३६ १३३७ गद्य गद्य

अथ अद्भुतो नाम ६ गद्य ६ गच

जथ करुणो नाम अथ बाह्मप्रयोगेषु १३१५ १३६८

अथ बीभत्सो नाम ६ गदय ६ गद

अथ भयानकी नाम ६ गद्य ६ गद

अध रोद्रो नाम

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श्लोक सं० नाशा० नाशाक (बडोदास०)

अथवा देशकाली च २५२७ २७ ६७ अथ विभाव इति कस्मात् ७.गद्य ७ गद्य अथ विराम १६.५ १७१३१ गद्य गद्य

अथ वीरो नाम ६ गद्य ६ गद अय शान्तो नाम अथ हास्यो नाम अथातो मुखरागस्तु ८ २२ ८ १६१ अथानुभाव इतिकस्मात् ७ गद ७ गद्य अधमाना भवेदेप ३३३ २२२४२ अधमोत्तममध्याभि १७५४ १७११३ अधिक्षेपावमानादे २१.३५ २२४१ अधोमुखीना सर्वासा ६=६ अध्यध मेतद् विश्ञय ११६४ ११६५ अनाचार्योपिता येच २१.५० २२८० अनिबद्धाक्षराणि स्यु ३० २७ ३२३२ अनिभृतवेषपरिच्छद १७४६ १८१०३ अनुद्धतमसम्भ्रान्तम् २१४६ २२७५ अनुरपा विरुपा च २४.१ २६ १ अनुप्टुप बृहती चंब ३०.२२ ३२३७ अन्तजवनिका सस्थ १३६ १६०११३

अन्य भावेपु कृष्टा च ३०४६ ३२ ३३५ अन्ये चाप्ययसयुत्ता: 2.50 ६१६३ १० १६ १०२१ २० ६८ अपविद्धकर सुच्या ४ ३७ ४ ७२ ४ १२३ ४ १६२ अपविद्धो भवेद्धस्त अपश्यत फलप्रामि १८७ १६१० अपसर्पी पुनर्वाम ११६३ ११६४

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श्लोकानुक्रमणिका /२७१

इ्सोक स० नाशा० नाश1- (बडीदास०) अपदात्यनिबद्धानि ३० ३३ (पदानि त्वनिवद्धानि) अब्ुद्धिपूर्व क यत् तु २१३३ २२३६ अभिद्योत्य सहातोह ३१३ अभिपूवस्तु णीज् सभिप्रेत समप्र च १८१० १६१२ अभ्यासात करणाना तु २१३० २२ ३६ अय हि नहुषो राजा ३६ २३ ३७ ११ अरालस्य यदा वक्रा ७२१ ६५३ अवालो तु विपयसतो ६६५ अर्थोपक्षेपण यत्न १८२० १६३३ अध राते नियुञ्जीत २१ १६ अलद्वारस्तु विज् यो २०७ २१ १० अल द्दारास्तु नाटयज्ञ २१ ३ अलयद्म क्टीदेश ४ ६६ ४१०५ अलपद्म शिरोहस्त ४१३७ अलात च पुर कृत्वा ४ ११० ४ १४६ अलात चरण कृत्वा ४३७ ४ ७८ अलात बामक पादम् ११२५ ११ २६ अविचलितमविच्छि न २८ ११ ३० ११ अव्यभिचारेण पठत् २५६३ अशवया पुर्षं सा तु १२२ १४६ अश्राव्य तद् दुराचारम् ३६३ ३६ ३४

अष्टहस्न तु कर्तव्य २४८ २६८

अ्गसपदसपुक्ता १२६ १५७ अष्टोत्तरशत ह्रा तत् ४ १६ ४ ५५ अप्टो तालस्तु पटशम्या २६२६ ३१ ६७ अष्टी स्थानानि वर्णाना १४ ५ १४ १० अष्टहस्त तु कर्तव्य २४८ असिचापचक्रतामर ६३० ६६०

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२७२/ सङक्षिप्तनाट्यशास्तम्

श्लोक सं० नाशी० नाशा० (बडौदासं०)

अस्माक चैव सवेंधा ३६ २५ ३३१७ अस्य योनिर्भवेद् गान २६८ २६१०

अस्य शाखा प तृत्त च. अस्याडगानि तु कार्याणि ५२ ५ म अस्यंव तु यदा मुप्टे ६२७ अस्यव शिखरासयस्य ६ २६ १६७ २०४५ आकम्पित कम्पित च 5१० वकाशवचनानीह ३४१ २५६६ आकाशिक्य स्मृता १० ४४ १०४६ आकृतिस्तस्यवतथ्या २० १६ २१ मर्द आक्षिप्त वामक कुर्यात् ११ ३३ ११३४ आक्षिप्त हस्तपाद च ४ ६२ 8 55

४ ७६ ४ १२१

४ ८६ ४१२७ ४ ११३ ४ १३२ ४ ११२ ४१५९ आककरा विकोश च = १६ आडगिकस्तु भवेच्छाखा ८१६ आाइगिको वाचिकशचैव ६१० ६२३ आचार्य पातजाशचेव ३२१ ३५ V आचार्यण तु युक्नन ३१ ३१७ आज्ञापितो विदित्वाह १२५ आतोद सुपिर नाम २= १ आतोद्यानि तु कार्याणि ३१० ३ ७६ आत्मप्रोक्षणमद्भिश्न ५५१ आत्मप्रोक्षणमेवादभि. आत्मानुभूतशमी १७५०

आदो नयोऽङ्गजास्तेपा २१४ २२५

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श्लोकानुक्रमणिका /२७३

इलोक स० नाशा नाथा० (बडौदास०)

आदो द्व गुरुणी यक्ष २६७ ३११० आदौ द्व च चतुथ ५२३ ५५= आद्य कुर्याददपक्रान्तम् ११३० ११३९ आद्य तु जनित कृत्वा ११२१ ११२२ आद्य पाद व जनित ११७ 99७ आद्य प्लुन द्वितीय च २६ १५ ३११८ आद्य पादो नत काय ४७३ ४ अद्य्यस्तु जनितो भूत्वा ११ २१ ११ २२ अद्या दण्डकमश्चंव ११ ३२ ११३३ आद्या नवकला तु २८४३ ३१ ७८ आद्या धनुलता कार्या आयम तुन वतव्यम् २० ३० २१ २०४

आरभटगुणप्राया २० ६४ आलीढ स्थानक यल् ४६4 ४ १०८ आवतिता करतले ८४३ आवत्य शुक्तुण्डाक्ष्य ४ २५ ४६४

आवाहनमवतरणम् ६१६ = XE आविद्ववक्रो सूच्याखयो ६१२ आशे प्रियोकि १५३ १६३ आशीवंचनसयुक्ता ५१६ ५२४ आसनोकत च पद्वावय १३२२ १३७६ आमारिताना सयोगो २६४० ३१६६ आस्थावितनृडगारम् १६१३ २० ५७ आस्पादित पुनर्वाम ११४५ ११४६ ११५१ ११५२ इतिवृत्त तु नाटयस्य १८१ १६१ इतिवृत द्विघ्ा चॅव १६२ इविवृते यथावस्था १८११ १६२०

हत्येकर्विशतिविध जैय २६१८ २८२०

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२७४ / सद्क्षिप्तनाटयशास्त्म्

श्लोक सं० नाशा० नाशा० (बडौदाम०)

डए्कादारुभि कायम् २४१ २६१

दष्यजनस्य कथायाम् २१ १६ २२१६ इप्टाना भावाना प्राप्ता २११८ २२२१ इह प्रक्षागृह दृष्टवा २ १ २७

इह साम्पतमस्त्य य ईप्वराणा विलासश्च १४३ 4999 ईपत प्राप्तिरयंदा काचित् १८ ८ १६११ उत्तन्यत पर चैत्र ११६८ ११६६ उच्चो दीप्तश्च म द्रश्च १६ ५ १७११३ उच्चो नाम १६५ १७११२. गद्य गद्य उत्क्षिप्नवक्रा तु यदा ६२५ ६६० उत्तमाधममध्याना १४५ १११३ उत्तानी तु करो कृत्वा २३२ २५२ १६८ २०४६ उत्थापकश्व परिवतकषत १६.६ २० ४४ उत्प्लुत्य चरणो वार्या ४६६ ४ १३५ उत्सधेन तथोस्तुल्य २२१ २६५ उदात्तश्चानुदात्तश्व १६४ १७१०६ उद्घात्यक कथोद्यात १६३ २० ३३ उद्धतपुरुपप्रभ १७३२ १८७६ उद्भेदम्तस्य वीजस्य १८२६ १६४१ उद्वृत्ता दनिणश्च स्यात् ११२२ ११२३ उद्वष्टितपरातृत्ती २१५ २५ १६ उनमपइच निभेपश्च ८ ११ उपक्षेपेण काव्यस्य ५ २१ उपमा नोषक चैव १६४० उपवृत्त प्रव्ृत्त च ३० ८ ३२६

उभाभ्यामपि पादाभ्याम् १० २६ १०२६

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इलोकानुक्रमणिका /२७५

श्लोक स० माशा नाशा० (बडौदास०)

उभाभ्यामपि हस्ताभ्याम् ६X६ उष्णिगनुष्टुप बुहती ३० ३१ ३२ ३६ ऊरुभ्या वलनं कृरवा १० २६ १०३१ ऊर्ण नाभस्ताम्रचूड ६११ ऊ्ध्ब जान विधायाथ ४ ५ ऊध्व भ डलिनी चँव ऊ्ध्वाकेकर दृप्टिस्तु २३ ८ २५८ ऊर्ध्वाद्ग लितल पाद ४ ७७ ४११६ ऊध्वपिवेप्टिती हस्तो ४६३ ४१३२ ऊहप्रत्यूह्सयुक्तम् २२६ २७५ ऊहापो हो मतिश्चेव २४ ११ २६ ३६ ऋृषभो धंवतश्वापि २८७ ३०७ ऋपीणा ब्राह्मणाना च ३६७ ३६३८ एक समस्थित पाद ४ १३२ एकक तु विदार्येका ३० १५ ३१ १७ एकदिवसप्रवृत्तम् व७र्६ एकपाद प्रचारो य १०१ १०३ एकवस्तु भ्र वा ज्ञ या ३० ६ ३२७ एकस्तु रेचितोहस्त ४१०६ ४ १४७ एकस्मिन् परिवर्त तु ५. २७ ५४५ एको वक्ष स्थितो हस्त ४ ११५ ४ १५४ एडकाक्रीडिता बद्धा १०७ १०६ एकच्चायगति विद्याव ११६७ ११६८ एतच्छ रवा तु वचन ३६ ४४ एतदास्प दित नाम १९४६ ११५० एतदेव विपर्येस्त २१४८ २२ ७७ एताश्चार्यो मया प्रोक्ता १०४८ १० ५० 99.9 99 9 एतानि खण्डानिसमण्डलानि

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२७६ /सङ्क्षिप्तनाट्यशास्त्रम्

श्लोक सं० नाशी० नाशा० (बडौदामं०)

एतान्यपि दशोवतानि ११५ ११६ एता भोम्य स्मृताशचायं १०२७ १०२६ एते तु सपुता हस्ता ६१० एते तु सन्धययो के या १८२६ एतेन त्वभिनेयम् ६२४ एतेन वालतरव ६.२० ६४४ एनेन सत्त्वशोण्डीयॅम् ६२२ ६४७ एभ्पस्त्वङ्णान्यथो ३०२ ३२३ एलककीडित विद्यात ११५७ ११५८ एलकाक्रीडितैश्चव ११.५६ ११५७ एव काय पयोगन २४७ २६ १३ एव गान च वाद्य च २६६ २८७ एव नान्दी विद्यातव्या ५७४ ५११० एव पस्तपदीं गत्वा ५.३% एव प्रयोगे प्रारब्घे १ २र्६ १६४ एव सुध पर भाव २६८ एव भावानुकरणे २५ 9६ २७.६२ एव विध प्रकर्तव्य २२४ २.७२ एवं सङल्प्यभगवान् ११४ १ १६ एवमप्टक्ल कार्य ५२७ ५६३ एवमुत्थापयेत् तज्ज्ञो २१६ २६३ एवमुर्वीतले नाट्यम् ३६ २६ ३७ २३ एवमेतेन विधिना २५१ २१०९ एप च निवापसलिसे ६.५० ६१०७ एप प्रहारगाते ६१४ एष प्रहारे व्यायामे ६.२६ ६५६ एप वधूवराणामुदवा हे ६७X ६ १५५ एप विनयाभ्युपगमे ६.६

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श्लोकानु क्रमणिका /२७७

इलोक सं० नाशा० नाशा० (बडोदासं०) एपों प द्रुत १६५ १७१३१ गद्य गद् एषामन्तरपातास्तु २६.२६ ३१३६ मतपातिकाश्च घाता २५ १० २७२५ भरसुक्यमात्बवधस्तु १८६ १६६ कक्ष्पाविभाया निर्देश्यो १२६ १२६ कख गघटठडढ 7990 ३४ ३६ कटी कर्णममा चल ४ २७ ४६० १० ५२ १०६३ E कत्यडग. किम्प्रमाणश्व १५ १५ कनिष्ठानामिकाभ्या २६३५ ३१ ४२ कनी यभी ग्रहा काचित् ३०२० ३२ २६ कपित्थ वित्ववशेभ्यो २०२५ २१ १८३ करणाना समायोग १०२ करमावतित कृत्वा ४.१२२ ४ १६१ करमावृतकरण ४ ११६ ४ १५८ करिष्यामपच शापान्त ३६ २४ ३७ १५ करिहस्तो भवेद् वामो ४X४ ४६३ करुणरसप्रायकृतो १७४४ ८६५ करणो रसेऽपि ३११३ ३४ ६४ करो प्रलम्बितो कायो ४ १५६ करो वक्ष स्थितो कार्यो ४ ११७ ४ १५६ १२६ १२६ कर्णेपश्वित कगेवाम ४८६ ४ १२८ कलापात विभागाथं ५१३ ५ २१

४६७ ४ १२६ कत्षा या तिविधा ओोक्ता २६ ३१ ३१३५ कस्यचिस्वथ कालस्य ३६.२ ३६१४ ३७१

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२७८ / सङ्क्षिप्तनाट्यणा स्त्रम्

श्तोक सं० नाशा० नाशा० (बड़ोदासं०)

काङ्गूलकोऽ्लपद्मशच ६.६ 43

कान्ता मयानका हास्या ८१२

कापुरुपसम्प्युवन १७४७ १८१० कार्पास बाल्बज वापि २१५ २२६ कार्मारवी तथा चाघ्ी २७७ २६७ कार्य द्वारहवय चान २.२२ २६६ काय शेलगुहाकारो २३१ २८० कायस्तया द्वितीय १७ २७ १८६६ ११४७ ११४६ कान प्रकप हुतोपच ५३८ काध्यकतृयंशपचास्तु ५७२ ५१०८ काव्य गोपुच्छाप्र १७१३ १८४ काष्ठचर्मेंसृ वस्त्ेपु २० ३१ २१ २०५ किलिकज चर्मवस्ताहं २० ४ २१७ सुश्चित पादमुरिक्षिप्य ४४५ ४ ८४ ४ ४६ ४ ८% 11 ४ ८१ ४ १२० १०२८ १०३० १०३० १० ३२ १०३१ १०३३ १० ३२ १०३४

+1 १०३४ १०३६ १० ३५ १०३७ १०४० १०५२ कुश्चिता चाभितप्ताच = 4 !. कुश्विती मणिबन्धेतु ४२३ ४ ६२ कुतपस्य तु विन्यास ५१७ वूर्परासो चितो हस्तो ६७४ ६१५४

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भलो कानुक्रमणिका/२७र्६

शसोक सं० नाशा० नाशा0 (बडीदास०)

कृताउजलि प्रयोगार्थ ३६.१६ ३७४ कृरवा स्वस्तिकसस्थानो २ १७ २५१८ करवोहवलित पाद ४१०० ४ १२६ कृत्वोध्वंजानुच रणमाययं 99 9% १०१६ केशहस्तस्तनाघरादि २११७ २२२० कैशिकीवृत्तिसयुक्त २५२४ २७६३ क्रममुत्लड्घ्य विधिज्ञ ३०.४ ३२ ३१३ वलीबाना ध्राष्ट्यंजनन १४२ १११० क्वचिद् धर्म ववचित्क्रीडा १४० ११०८ खटक खटके न्यस्त ६६४ ६१३८ खटकालये यदा हस्ते ६३३ ६६४ सण्डिता विपलब्धा वा ४ १३२ ४ ३०८ गतिप्रचारेरडगैश्च २३२२ २५७० गम्भीरस्वरता येन २३२ २६२ गर्भनिमिन्नबीजार्थो १८२७ १६४२ गानध्वं विविध विद्याव २६६ २= ११ गान्यवं यन्मया प्रोक्तम् ३० २२ ३२ २७ गीत नृत तधा वाद्यम् २४ १० २६३४ गीताना मद्रकादीना ५६ ४१३ गुरुपाया तु सा कार्या X६७ ५१०३ गुरुपायाव कृष्टा ३०.३५ ३२४० गूढार्यमर्धान्तर १५१० ग्रहण धारण चव २५३० २७.१०० प्राम्प धर्मप्रवृत्ते तु १६ १६ वनस्तु तालो बिजयो ६६ ६२६ चक्र तडित्पताकामञ्जर्य म ३४ ८.६६ चतत्रो वृत्तयो हुयेता ६१२ ६२२ चतु पष्टिकरान् कुर्यात् २६ २१७ चतु स्तम्भसमायुक्ता २२० २६४

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श्लोक सं० नाशा० नाशा0 (बडोवामं०)

चतुरध लये मध्ये ५५२ ५ 55

२६२० ३१ २७ चतुरश्नो घवा यत्न ५१२५ चतुरश्रो तथोद्वृत्तो ६११ चतुर्ुणा दक्षिणे स्याद २६४ ३१ ७ चतुर्थ परिवर्तस्तु ५५६ ५८५ चतुर्थकार पूजा तु ५.६० ५ १०२ चतुर्थी कण्डिका चेव ३१.७६ चतुभि: सन्निपातैशच x ११७ चतुविध तु नेपय्य २०.२ २१ ५ चतुरविध तु विज्ञे यम् ५ १५ ५.२६

चतुर्मवि ध्श्चव भवेत् २०६ २११२ 5 ३ 55 चतुविधा प्रदृत्तिश्च १३३७ चतुप्कलो ह्य तमाना 9299 १२१ चतुष्पदा भवेत सा तु ५.२४ ५.६० चतुस्तालो द्वितालश्च १२६ १२ ६ चत्वारिशद् तथाप्टो च १६२२ ३१ २६ चर्मवर्मध्वजा शेला २० ३२ २१२०६ चापलेना नुपहता २५१३ २७ ५० चारीभि प्रमुत नृत्त १०३ १०५ छत्रध्वजपताकाशच २३ १६ २५.२३ छन्दोविघिरलद्वारा: २६ १५ छन्दोहीनो न शब्दोऽस्ति २६१७ १४ ४ १४४५ जग्राह पाठ्यमृग्वेदाद् ११५ १ १७ जनप्रवेशन चान्यत् २४७ जनान्तिकानि कर्णे तु २६७ ३४.७ जनित करण कृत्वा २५६१ ४११६ ४ १५५ जजंरो दण्डकाष्ठ च २०.२१ २१.७१

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फ्लोकानुक्रमणिका /२८१

श्लोक सं० नाशा० नाशा (बडौदासe)

जानीष्व तत् तथा नाट्यम् ३६१२ ३६४* जितेन्द्रियज्ञानवती ३२२ २४ २ ज्ञेय प्रकरण चँव ९७३ १८७ जेयो वै वर्धमानस्तु ६ १५८ डिम समवकारषच १३१३ १३१२

11 11 १८३० १६४५ ३२७ २६३० डोलापादा तथाक्षिप्ता १०90 १२ तच्छस्वा सुनय सरव ३०४ ३५ तत चैवावनद्ध च २६ १ रत तन्त्रीकृत जञेघम् २६ २ २२ तत कलाकाल कृतो २६ ५ ३१ ५ तत पच्चपदी गच्छेतु ५५६ ५६२

सत श्लोक पठेदेकम् ५७७ ५११३

तत सललितहस्ते ५३७ तत सारध सुरर्गत्वा ४ ५ ४ ६ ततश् चमुधा गर्वा ३६२७ ३७ २०

ततश्च वामवेघस्तु ५४२ ततश्च विश्वकर्माणम् १३१ १७६

तलश्चोत्यापन कार्यम् तते कुतपबिन्यासो २६४ २८४

ततो भुनगणा हुण्टा ४२ ४ ११ तलेिरेणव कालेन १३२ 950 ततो ये तण्डुना प्रोकता ४ १३ तनो रोद्ररसश्लोकम् ५६३ ५१३२ तोऽम्म्युकतो भगवता ४ १ ४२

ततो हिमवत पृष्ठे ४७

तन्त रमानेव ६ गद्य ६ गद

तन्न भृडगारो नाम ६.गझ ६ गद्य

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२८ू२/ सङ्क्षिप्त्नाट्यशास्त्रम्

श्लोक सं० नाशा० नाशा0 (बड़ौदासं0)

तल स्तम्भा प्रदातव्या २४५ २.६५ १६४५ १७ १०६ तताक्षिभ्त विकाराढभ २१८ २२ १० तत्नापि वामबेधस्तु ५.६१ ५१३० तत्राभिघ्यानवान नाम ३१३ ३४ २६ तक्षावापोज्य निष्क्रामो २६ २३ ३११० तन्नाप्टो भावा स्थायिन ७ मद्य ७ गद्य

३४ ३ २५८७ तत्नोपरि यथा ह्यक २८३ ३०३ तक्ोपवहन कृत्वा १२२ १२२ तलोपविप्टे प्राड्मुखे ३१ १४ ३४ २१५ तत्स्वभाव हि भजते २०१७ तथा पाणिविभागार यंम् ५२ ५.२० तथा समुदिताश्चैव २५२८ २७ ६८ तथास्त्विति मया प्रोक्तो २६ २२ ३७१३ तदेतन्नैव वर्तव्यम् १३६ ११०७ तन्नात् मन्यु कर्तव्यो १४६ १११७ तयोरागमने कार्यम् ५१३३ तजन्यडगुष्ठसन्दशो ६११० तलसच्चरपादस्य १०२० १० २२ तलसच्रपादाभ्याम् ४.११६ ४ १५७

35 १० ९८ ९०.२० १० २५ १० २७ तस्माच्चारीविधानस्य १०५ १०७ तस्मिन् समबकारे तु ४ ३ ४४ तस्य भाण्डसम कार्य ५ ६५ ५१०१ तस्य शिरोहस्तोह ६६

वान्यत सम्प्रवक्ष्यामि ४१५ ४ ३०

तालादिश्च विभिभेदे ३१ १३

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इलोकानुक्रमणिका/२८ू३

श्लोक स० नाशा० नाशाक

तालादिस्तथा प्रोक्तो २६ ११ ३१ १४ ताला दिस्त्य श्रभेदोन्य तिस्र प्रसारिता यन्र सृतीय परिबर्तस्तु ५४६ ५६२ तेनेवास्फोटन कुर्याव ११६० ११६ तेनैवास्कन्दित कार्य ११ ५८ तेषा तु दर्शनेचछुयं १३६ १३१० तेषा तु वचन श्रुत्वा १ ६ १६ तेपा वाक्करणॅज्ञ या ३१६ ३४ ३२ वासश्चैव वितर्कश्च ५२१ तिक सुवलित कृत्वा ४५७ ४६६

विगत तिप्रचार च ३१८ ३४ ३७

वितालान्तर विष्कम्भ ५३४ ५७०

निपताके यदा हुस्ते ६१७ ६३६

विभि कलापक चैव ४१७ ४३२ निविधश्चात विधिज्ञ १७३० १८ ७२

ननिविधस्त्वाट गिकोज य ८५ = १२

तिविधा साच विज्ञया २६३ ३१३

वेवाग्नि सस्थिता 255

त्यश्र वा चतुरथ वा ३०१७ ३२१६

व्यम्न तिकोण कर्तव्यम् २५२ २१०२

व्यश सर्वगुरु क्ृवा २६१६ ३१२२

व्यश्रश्च चतुरध्राच ३०१३ ३२१५

दपश्रश्चाचपुट प्रोक्तो २६६ २१ ६

न्यथ्रस्तालस्तु षडभेद* २६२१ ३१२६

त्यश्षे द्वादशपातास्तु ५ू =६

दक्षिण तु पद पुँसो ५ ६१ ५६७

दन्तच्छेद्य नखच्छेद्य ३३६ २२ २६७

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श्लोक सं० नाशा० नाशा०

(बड़ौदासं०)

दशप्रयोक्नृभि स्तम्भा २४० २६० दशाङ्गामानुपी सिद्धि २५२ २७ ३ दाक्ष्य शोषमयोत्साहो २१ २८ २२ ३४ दानमभ्युपस्तिश्च २१३४ २२४६ दास विट श्रेषप्ठियुत १७२० १८५० दिनले दिग्ले दिग्लेदिग्ले ५७६ ५११२ दिवसावसानकायम् १७१० १८२६ १७३१ ९८७६ दिव्ये द्रिव्यधयोभूत्वा ५१०३ ५ १६७ दिशा तु वन्दन कृत्वा ५५६ ५६५ दिशो ग्रहान् सनक्षत्रान् २३४ २५४ दौयना भगदन् द्रव्यम् १.२० ९४४ दु खार्ताना शमार्ताना ९४६ १११४ दूरस्थाभापण यद ३४२ २५ ८६ दृप्ट्वानाट्यगृह ब्रह्मा १३४ १६३ दूष्ट्वा मयाभगवतो १२१ १४५ देवाचंनवलिकरणे ६ ५४ ६११८ देवाभुरीजद्टत १७२४ देवाना तुभवेज्ज्येष्ठम् १८६३ २ ५ २११ देवाना नृपतीना न १२१४ १२२१५ देवानामसुराणा च १५० देशभापाविधानज्ञा १.११८ २५.१५ २७ ५२ देहात्मक भवेत सत्वम् २०५ दे वात्मप रसमुत्या २२६ २५.६ दोल पुष्पपुदश्चैद २७.१६ ६६ दोलापादक्रम वृत्वा ४१०५ ४ १४४ दोलापादक्रम कृत्वा ४ १०७ ४ १४६ दोलापादक्रम वृत्वा ४ ११४ ४ १५३

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श्लोका उक मशिका /२५

शलोक सं० नाशा (यजोरास ०)

दोबतये नि श्वसिते द्रुतर्मुक्षप्तचरणम् ४ ६० ४ १२६ द्वादशनायकबहुलो १७ २५ द्विकसिक च तुषकास्तु २६२ ३०२ द्विकलिकचतप्को वा ३०४ द्विकोडर्घाड गुलिमुक्त: २८.६ ३०५ द्वार तेनेव कोणेन २५३ २१०२ द्वितालश्चैव मध्याना १२१० १२१४ द्वितीय परिवर्तस्तु X३E द्विप्रकार पुनश्चाय २६१३ ३१११ विर्भावा दविरुलस्यापि २६ ३३ ३१४० द्विर्माध तु प्रह्स्तनम् १८३२ १६४७ द्वयधिष्ठाना स्वरा वेणा २६१० २८ १२ द्वे नृत्तकरणे चंव ४ १६ द्वो -द्वो वर्णा सु १४ ६ १४ १२ ट्वयर्षो वचनविन्यास १८२२ घर्मार्थकामस युकता २१ ३१ २२३७ धर्मी या द्विविधाप्रोवता १३१६ १३७० धर्मो धर्मप्रवृत्ताना १४१ ११०६ ध्म्यं यशस्थमायुध्यम् १४७ धर्म्य मभ्यं यशस्य च ११४

घान्यफलपप्पस दृशा ध्रीरसञ्चारिणी दृष्टि ११ २६ २२३५ घीरोद्घता धीरललिता २२७ २४ १७ धूर्तविटसम्प्रयोज्यो १७५२ १८११० धेर्योपपनागतिरुतमानाम् १२१३ १२१३ धंबती धवताशे त २७४ २६४ धुवकेण च कलाभिरच RE YR ३१ 3७ २६ १६

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२८६ / सङक्षिप्तनाट्यशास्त्रम्

श्लोक सं० नाशा० नाशा0 (वडौदारस०)

घ्रुवाणा च भवेठताल २६ ३४ ₹9.89 घ्रुवावर्णास्त्वलडकारा ३० ७ ३२.८ धुवास्तुपञ्च विज्ञेया ३०१६ ३२६ ध्ुवाया मम्पवृत्ताया १२३ १२.३ न कार्य शयन रडगे ३३४ २२ २६५ न च दिव्यनायककृत १७४२ १८ ६२ न च शक्य हि लोकस्य २३.२५ २५१ न तज्जान न तच्छि्पम् १.४८ १ ११६ न तथाप्रदहत्यग्नि ३ १७ न भावहीनोऽस्ति रसो ६ १६ ६.३६ न महाजनपरिवारम् १७१२ १६४१ नमोऽम्तु सर्वदेवेभ्यो ५६६ ५१०५ नय विनयनियमसु निपुण ६४६ द ६४ नर्म च नर्मसफुञ्जो १६१२ २० ५६ नवगुर्वक्षराण्यादो ५.७४ ५१११ नवसड्गमसम्भोगो १६५४ २०५६ न वेद व्यवहारोऽयम् १११ ११२ न शक्यमस्य नाट्यस्य ६१ ६६ न शब्दो यत् न क्षोमो २५५ २७ १७ नाटक सप्रकरणम् १३ १४ १३.६४ नाटक सम्नकरणम् १७.१ १६ २ नाटक मग्नकरणम् ३५२ २६२५ नाट्यधमप्रवृत्त सु २०१५ २१.८८ माद्यायितमुपचारय २१.४१ २२४८ नाडीसज्ञा जेया १७२८ नाति त्वरितसव्वारा १६८ ३०.४७ नानाकुट्टिमविन्यस्त ३२ ३३ २७६ नानाधिक रणार्थानाम् १५७ १६५३ नानाभावोपस्म्पन्नम् १.४४ १.११२

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श्लोकानुक्रमणिका / २८७

श्लोक स० नाशा० नाशा० (बडोदासं०)

नानाभिनयसम्बद्धान् ६.१८ ६-४

नाना भिनयसम्बद्धान् ७३ ७३

नाना रसाथयुक्ता नृणाम् ३० २६ ३२ ३११

नाना रसार्थयुव्त २१३७ २२ ४४

नानावस्था: क्ियोपेता २४ २ २६ २

नाना विन्याससयुक्तम् २२६

नाना विभूतिभियुंक्तम् १७६ १८११

नाना व्याकुलचेष्ट १७४५ १८६६

२२ ३ २४ ३

नानाशीला प्रकृतय २३ २६ २५१२३

नान्दीपदान्तरेव्वेप ५.७३ ५१०६

नाप्रावृता नेकबस्ता ३३२ २२२४१

नाम्बरग्रहण रड्गे ३३.१ २२ २४६

नास्ति कश्चिदहस्तस्तु E७E ६ १६२

निकुट्टिती यदा हस्ती 8 จุด ४ ६६

निगूढभावसयुक्तम् ३४ ५

नितम्बाव पि दिज यौ ६१०

नियतग तिवस्तु विषयम् १७४६ १८१०४

नियताक्षरसम्बद्धम् ३० २६ ३२ २१

नियता तु फलप्राप्तिम् १८ ६ १६१२ ११ ५३ ११५४

निर्घातोल्कापात १७३७

निर्वेदग्लानिशड्डा ६५ ६१८

निवर्तनं च हस्तस्य २६ २७ ३१३४

निषण्णाङ्गस्तु चरणम् ४१२5

निषण्णाङ्मस्तु चरणम् १००४ १० १६

निधादेडशे तुनैपादी २७ ३ २६३

निष्क्रामश्व प्रवेशश्च २६ २८ू

निष्क्रामेद थश्च तस्माद १३८ १३१२

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शमोक सं० नाशा० नाशा० (वडोदास०)

२६.२६ ३१३३ निहुञ्चित परावृत्त ८१६ नूपूर चरण कृत्बा ४ १०३ ४ १४२ नूपूर चरण दृत्वा १०४२ १० ४४ नृपतीना यच्चरित १७७ १८२ २४६ २६६

१३६ ११०७ नोदातनायकवृत १७१६ १८४६ न्यायरचवाल १०५० १०७२ पक्षवन्चितको चंव पश्चतानान्तर पादम् १०२४ ११० २६ पठदन्य पुन श्लोकम् ५७८ ५११५ पताकस्तिपताकश्च ६४ पताबन्जलिवक्ष स्थम् ४ २७ ४६६ पताकाभ्या तु हस्ताभ्याम् ६ १२६ पताके तु यद्रा ६१५ ६२८ पतानो तु यदा हुस्ती ६.७२ ६१५२ पथि चरणरचन पदानि पञ्त पच्छेयु ५३३ ५६६ पदेनिरन्तर कृत १० १२ १०१४ पद्मकोशस्य हम्तस्य ६१२० पद्भोत्पल कुमुदानाम् ६४८ ६१०२ परभाव प्रकुस्ते २० १८ २१ ६१ परवचनमात्मसस्थम् १७५१ १८१०६ परिगीत क्रियारम्भ ५१० परिग ह्य प्रणम्ाध ५१८

परिच्छिन्न तु वर्नव्यम् ११८ १४२ 49 € १११० परिच्छि न तु कर्तव्यम् १११८ परिवर्तनमेव स्वात् १११६ ५६३

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श्लोकानुक्रमणिका/२म्६

इ्लोक स० नाशा० (बडौदास०)

परिवर्ताश्चत्वार ५ २५ ५ ६१

पर्यायश कटिश्छिन्ना ४ ३२ ४.७१

पश्चिमे च विभागेऽय २१८ २३५

पाञवालमध्यमास्वेवम् ६१६

पाठ्यगुणानिदानीम् १६ गद १७.८१ गद्य

पादचार्या यथा पादो १०४७

पादभ्रमरकश्च स्यात् ११३१ ११ ३२

पादमाविद्धमावेष्टय १०३७ १०३६

पादयोरन्तर कार्यम् १२६ १२८

पादसूच्या यथा पादो ४ १३८

पाद प्रसारित सव्य १०१६

पादवुद्घटटिती कार्यो ४ १२४ ४ १६३

पारिपाश्विकयोश्च ५ ११६

पारिपाश्विकहस्ते तु ५ ८७ ५१२४

पार्श्वक्रान्तक्रम कृत्वा ४ ८४ ४.१२३

पाश्वक्रान्त पुन सव्यम् ११ १३ ११ १४

पार्श्वक्रान्त पुनश्चाद्यम् ११.४० ११४१

पार्श्वक्रान्त पुनश्चाद्यो ११ ३६ ११ २७

पाश्वयोरग्रसश्चव ४ ३८ ४.७७

३३८

पितामहग् हेऽस्माभि ३६२० ३७ ६

पिष्ट्कुटट च विज्ेथम् ११६६ ११६७

पुनः पदानि तीण्येव ५ १३१

पुनरेव हि वध््पामि २३६ २ ८६

पुर प्रमारित पाद ४ १२१ ४ १६७

पुरा कृतयुगे विप्रा 95 १८

पुरुपप्रायसकनचार ३४ ६ २६२६

पुरुषव हुभिय क्तम् १३१२ १३६१

पुलकॅश्च सरोमाञ्चे २५४ २७ ५

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२६० / सभ्क्षिप्तना ट्यशास्त्रम्

श्लोक स० नाशा० नाशाक (बडोदासं०)

पुष्पाञ्जलि समादाय ५३० ५६६ पुष्पान्जत्यपवरगपच ५ ३६ ५.७२ पुष्पापचय प्रथणे ६५२ ६११२ पुस्तस्तु विविधी २०३ २१६

पूजयित्वा तु सर्वाणि ३७ ३७३ पूवप्रमाणनिदिप्टा २.४६ २६६ पूर्वरङ्ग कृत ४१० पूर्व प्रविष्टा ये रज्जम् १३५ १२ पूर्व वेणुदलै कृख्वा २०३३ २१ २०७ पूर्व शरीरादुद्भूता २१ ५ ३४.३१ पूर्व स्थितलय कार्य ५ २८ ५६६ पूर्वाह णस्त्वय मध्याह्त २५२० पूर्व पामवगीतानाम् ३०,१४ ३२१६ पृष्ठ प्रमारित पाद: १०३६ 90 89 पृष्टगो यो भवेद्भाषो २.१७ २.३४ पृष्ठत कुश्चित कृत्वा ४ ७२ ४ १११ पृष्ठत कुश्चित पादो ४ १३४ पृष्ठतो बलित पादम् ४.5६ ४ १२५ पृष्ठतो वलिंत पादम् १०३८ १०४० पृथ्ठनो ह्.यन्चित कृत्वा १०३३ १० ३५ पृष्ठ प्रसारित पाद ४.६९ ४९३० पृष्ठ प्रसारित पाद ४ १११ ४१५० पृष्ठ प्रसारित पाद ४ ६५ ४ १३४ पृष्ठापसर्पी वामश्च ११५२ ११ ५३ प्ररुरणनाटकभेदात् १७२१ १८५८ प्रकरणनाटकविपये १७११ 95 R8 प्रकाशमेतदिच्छामो ३६२१ ३७ ११ प्रख्यातवस्तुविषयम् १७५ १८१० प्रख्यातवहतु विपय १७ ३५ १७४३

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श्लोकानुक्रमणिका /२६१

श्लोक सं० नाशा० नाशा० (बडोदास०)

प्रणम्य शिरसा देवो ११ प्रतिषेधकृते थोज्य प्रत्याहारोऽवतरणम् ५ ३ प्रत्युक्तश्च ततो देव ३६१७ ३७५ प्रथम शोधन कृत्वा २१२ २ २६ १२८ १५६ प्रभात पगन रात्ि २३३ २५.२ प्रमाणमड्सुलाना तु २०२४ २१ १७७ प्रमाणमेपा निदिष्टम् २६ प्रयुज्यगीतकविधिम् ५२२ ५ ५८ प्रयुज्य विधिनब तु ५ १६१

प्रयुज्यालातक ४ १२५ ४ १८४

प्रयोगनि साध्बसता २१ २६ २२३१ प्रयोगस्त्रिविद्यो हे षाम् २६३ २८.३ प्रयोगो द्विविधरचव १३.१० १३५१ प्रयोजनाना विच्छेदे १८९४ १६२३ प्ररोचना च कर्तेव्या ५६६ ५१३५ प्रलम्बिताभ्या बाहुभ्याम् ४७४ ४ ११३ प्रवेशाक्षेप निष्काम ३०३८ ३२३१० प्रवेशो मध्यमाषष्ठ २६ ३६ ३१४३ प्रशपरस तदा राज्यम् ३७ २ प्रसारिता समा सर्वा: ६१३ प्रसाप कुच्वित पादम् 8.50 ४ ११६ प्रस्तारो माषघात ३४ ३२५ प्रस्तावना तत कुर्यात ५१०२ ५१६६ प्रस्वारो मापघातश्च ३० ६ ३२११ प्रस्ताष्यैव तु निष्क्रामेव् ५१०५ ५ १६4 महुसनमपि विज्ञयम् १७४६ १८१०१ प्रहुष्टामरसङकीणे १२५ १५६

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श्लोक सं० नाशा०नाशा (दड़ोदासं०)

प्राड्मुखस्तु ततः कुर्यात् ५६० ५६६ प्रादोपिकार्धराव्रिश्च २५२१ २७ ८६ प्रायेण करणे कायों ४ २० ४.X७ प्रारम्भइच प्रयत्नश्च १८५ १६.५ प्रावेशिकी तु प्रथमा ३०२१ ३२२७ प्रावेशिकीना जातीनाम् ३०.३३ ३२.३८ ग्रेक्षागृहाणा सर्वेपाम् २ १४ २२१ प्रोकवन्तश्न मा पुता ३६ ६ ३६.४५. प्रोक्तवान् द्रुहिण गत्वा १३३ १.59 प्रोक्तवास्ततो मा तु ३६५६ ३७७ प्लुतान्त पट्पितापुत्नो ३१ १६ फल प्रकीत्यते (प्रकल्प्यते) १८ १६ १६२५ बहवश्च तन् पुरुपा 96 89 १८६९ बाहुशीष प्रसन्ने च १२५ १२५ बाहुशीर्पाश्विती हुस्त ४.६ ४१०७ वाह्यत सवंत कार्या २३६ २.८६ वाह्य भ्रमरक नंव १११४ ११ १५ बाह्य वा मध्यम वापि १३४ विल्व कपित्यफला नाम बीज बिन्दु पताका च १८ १२ 96,79 बीजस्याद्घाटन यत्न १८ २५ १६४० बुद्धिमत्त्व सुर्पाव २५ २६ २७ ५६ ब्रुसी मुण्डासन प्रायम् १२ १७ १२२२३ ब्रह्मातर तर्थेवास्तु ५७० ५१०६ भयहपस मुत्यान १६२० २०६६ भरत शयाश्चभरती ३२७ ३५.२१ भवता देवताना च १३८ ११०६ भवद्भि सुचिभिभूरवा १.७

भवेदतिजगत्या तु ५ ५३

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श्लोकानक्रमणिका / २६३

इलोक सं० माशा० नाशा० (बड़ौदासं०)

भवेदाचमन चैव ५७६ भाण्डरोन्मुखेन कर्तव्यम् ५ दर्द भारती सात्वती चँव ११७ १४१ भारते तु कटिच्छेद्यम् १०५१ १०७७ भिन्ने कुम्भे ततश्चव ३१५ ३६० भुजइ्गन्रासित कृत्वा ४ ५६ ४ ६५ भुजड्गनासित पादे ४ ६१ ४१०० भुजड्गल्ासितश्चाद्य ११.६५ ११ ६६ भुजङ्गन्रासितश्चाद्यो ११२७ ११ २८ भुजड्गत्ासिते वामम् 99 97 १११३ भुजादूष्व विनिष्क्रान्तो ४१०६ ४ १४६ भूमिघृप्टेन पादेन १० १३ १०१५ भूमेविभाग पूर्व तु २११ २२४ भुड्गारजर्जरघरो ५ ३२ ५६:

भुड्गारभृत माहूय ५४० ५७६ मेदास्तरयास्तु १६२ २०२७ भोजन सलिलक्रीडा ३३ ७ २२ २६६ भ्रमण वलन पात ८६६ भ्रमणेन प्रदेशिन्या २३१२ २५१७ भ्रमशम्कन्दिते स्थाताम् 99४ भ्रानतवा चारीभिरेतामि ११ २६ ११ ६४ मणिबन्धनविन्यस्त ६६२ ६ १३५ मण्डपे विप्रकृष्टे तु २६

२७ १० २६१० मध्यमाइगुष्ठ सदशो ६१०१ ६५६ ६१२२ मध्यमा पश्चमी नैब २७.६ २६.६ मध्यमोत्तमयो कार्या ३० १५ ३२२३ मध्ये चंबाव कर्तव्ये ३६ ३२३

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२६४ / सदक्षिम्तनाट्यश्ाम्न्म्

श्लोक सं० नाशा० नाशा० (बर्डोदास०)

मन्वार्थंवाक्य शकत्या १६१0 २०५० ममैने तनया सर्वे ३६ १ ३६ ३२

मयापि मान्त्वयित्वोक्ता ३६१० ३६४६ मयापीद स्मृत नृत्यम् ४१० ४ १२

मया समवकारस्तु ४ ६ ४७ महानय प्रयोगस्य १२३ ९५४ महेन्द्रप्रमुखदेव ११० १११ मा तावद् भो द्विजा ३६५ ३६ मात्मर्याद् द्वेषाद्वा २५८ २७ २३ मान्ना प्रकरणाडगानि २६.१७ २८ १६ मार्दङिक पाणविक: २६५ माल्या चछादन भूपण २११३ २२४६ मायेन्द्रजाल बहुलो १७३८ ९८ 53 मा वै प्रणश्यतामेप ३६१३ ३६४ मुकु टाभरण विकल्प ३२८ ३५२ मुकुल तु यदा हम्तम् ६६६ ६ १४१ मुख प्रतिमुख चँब १८ २३ १६३

11 11 ३० ३ ३२४ मुखप्रतिमुखोपेता ३० १० ३२ १२ मुखबीजानुमदूशम् ५१०४ ५१६5 भुण्ड़ासन त दातव्यम् १२१५ १२२१६ मुनय पर्युपास्येनम् १३ मुनोना न मृपा वाक्यम् ३६११ ३६४७ मुष्टि स्बस्तिकौ चापि ६.१२ मुष्टिहस्तश्च वक्ष स्थ १० २३ १०२५ मृगप्लुता च दण्डा च १०.११ १०१३ मृड्पर्वणि चित्र तु ३६ ३७६ य य गाता स्वर गच्छेतु 35.90 ३० १० य प्राणिना प्रवशो वै २५२२ २०२० ₹9 957 E E

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श्लोकानुक्रमणिका /२६५

श्लोक सं० नाशा० (बड़ौदासं०)

यच्च तस्या क्षर्मं द्रव्यम् १ १६ १४३ यच्छोत्नरमणोय स्यात् २५२२ २७ ६१ यज्ञ न सम्मित हंतद १५२ ११२४

11 ३१६ ३६७ यज्ञोपवीतदेशस्थमरालम् २२.११ २५१२ यत पादसततो हुस्तो १०४६ १०४८ यतिलमवाद्य गाने ३०४६ ३२ ३३१ पत्रोमुख भवेद्भाड १३७ १३ ११ यत्कि्चिदस्मिन् लोकेतु २० २६ २११६७ चरि्कच्चिन् मानुषे लोके २० २२ २११७२ य्रत् तु वाककारणोपेतम् ३०.२५ ३२३० यत् सन्त्रीकृत प्रोक्तम् २६७ यत् तु शिरामुख जजोर २१४० २२.४७ यत् तु सन्दृश्यते किज्चिद् ४९३० ४ ३०६ यत्न कविरात्मशवत्या १७१५ १८४% पत्न बीजसमुन्पत्ति: १८ २४ १६२६ यत् सप्निहिते कान्ते ४ १३१ ४३०७ यत् स्त्नीणर पाठ्याद २४ ६ २६ ६ यत्रान्योक्त वाक्यम् २१४३ यत्नार्थस्य समाप्ति १८१६ यतार्थे चित्तिते १८ १८ १६३० 93 99 १३६४ यतु स्यादक्षर सम्बद्धम् ३०.२३ ३२२६ यथाक्रम पुनर्वाम ११५४ ११ ५५ यथाक्षरकृत. पातै. २६ ३२ ३१४६ यथा जीवत् स्वभाव स्वम् २४ ३ २६ ७ बथा बीजाद भवेद वृक्षो ६२१ ६३८ पथावत तेन कर्तव्यम् ५ ६३ ५१०० .य पावयो यथावस्थम् २५१८ २७ ६१

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२६६ / सदक्षिप्तनाट्य शास्तम्

श्लोक सं० नागा० नागा0 (e शोदासं०)

पथावयो यथावस्थम् २४ ८ २६.१४ मथाविद्वाङ्गहार तु २६२८ यदाधिकारिक वस्तु १८१७ १६२१ यदा समुदिता सचे २५३३ २७ १०३ यदि वा नेदशा सन्ति यदेतत् प्रस्तुत नाट्यम् १०४ १०.६ यद् द्रव्य जोवलोक तु २०.३६ २१२० यद् वा शयोतार्थंवशाव ३३५ RR.REE बद् वृत्त तु पराथं स्याद् १८१५ १६२४ यद् व्यायोगे कायम् १७.३४ १८ .= १ यश्नमहास्य बहलम् २५२५ २७.६४ मन्नाटके मयोकतम् १७.१७ २७ ६४ यर्व सिद्धार्थकैरलाज ३.३ ३.२० यश्चाय पूव रङ्जस्तु 8 97 4.१५ यश्चाप्यास्यगतो भादो २२० मस्तुप्टे तुष्टिमायाति २० २७ २१२०० पस्तु सपशिरा प्रोक्तो ६.७० ६१५० यस्माच्च लोकपालानाम् ५१२ ५२३ मस्मा ज्ज्ञानमदोन्मत्ता ३६.६ यस्मादभिनयस्त्वत ५२२ यहमा दुत्यापयन्त्यव् ५ २२ यस्माद् रङ़ड प्रयोगोऽ्यं ५.७ ५.७

यस्य प्रभावादाकारा २१३२ २२३८ यस्या हस्वाति शेषाणि ५.११र यस्याङ्ग ल्यस्तु विनता यस्याङ्ग ल्यस्तु बिरला. ६३५ ६.७2 या ऋच पाणिका गाथा ३० १ ३२२ या काष्ठयन्त्रभुयिष्ठा २०.२७ २१२०० या च रसान्तरम्पगत ३०५२ ३२ ३१४

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1 पलोकानुक्रमिका /२६७

श्लोक स० नाशा० नाशा० (बडोदासं०)

यानि स्वल्पाक्षराणि स्यु ३०३७ ३२४२ यानि चैवे निवद्धानि ३० २६ ३२.३४ यानि सौम्पाथयुक्कतानि २३६ २५६ यानि स्युस्तीक्ष्णरूपाणि २३ १० २५ १० यान्यङ्वानि कलाश्चैव ३०.१२ ३२ १६ या यस्य सदूशी ३२.६ ३५ २० यावन्ति चर्मनद्धानि ३११ ३४ २३ या वादप्रघाना पुरुषप्रयोज्या १६१ २० २६ या लोकिकी कला २६२ ३१२ या श्लक्ष्णनेपथ्य १६११ २० ५३ या सात्वते नेह २०४ ३५.४ २६ २७ युद्धोद्घता विद्धकृता २४.६ २६.१० ये तु पूर्व मया प्रोक्ता १३१ १३ १३१ ये नेपथ्यगृहद्वारे १३२ १३.२ यो यदा बलवान् यस्मिन् २७ ६ योष्य भगवता सम्यक १.४ १४ पोड्य भगवता सृप्टो १३५ ११०३ योऽय समचकाररतु ४२ योज्य स्वभावो लोकस्प १५१ १११६ यो वागभिनय पूर्वम् १४ १ १४१ योवेहाव स एवंपा २१६ २२ ११ रत्तपीत समायोमात् २० १४ २१ ८३ रक्ता प्रतिमर सूत्रम् ३२ ३१६ रज्जपीठगतान् विछ्वनान् १३० १७० रङ्गपीठ तताः कार्यम् २ २२ २६८ रङ्मपीठावलोक्य तु २४२ २६२ रतिर्हासश्च शोकपच ६४ ६१७ रश्मिकुश।ङकुशधनुषाम

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श्लोफ सं० नाशा० नाशा० (वडौदास०)

रसा भावाह्यमिनपा ६२ ६.१० राजोपचारयुत्ता १७२३ १८.६० राष्ट्र प्रवर्धता चेव ५.१०७ रूपयोवनलावण्ये २१.२२ २२.२७ रेचकरड्हारयच २३.२१ २५.६६ रेचितो दक्षिणो हस्त. ४.५० रेचितौ हुस्तपादी च v.५= रेचित दश्विती हस्ता ४ १२६ ४ १६५ रोद्र भयानके चँव १६.२४ २०७४ लक्षणाभ्यन्तरत्वाद्धि २१२६ २२७८ लताबन्याश्च वतव्या. २ ३५ २८५ ललितः पादवित्यास: ५५४ ५६० ललित हं स्तसन्चार २१४५ २२७४ साङ्गलेन समुत्कृप्य २.२३ २.७० नोला विलामो विष्छिति लोक्धर्मी नाटयधर्मी २१.१० ६११ ६२४ लोकधर्मी भवेद त्वन्या २०.२६ २१२०३ लोक्स्वभावससिद्धा ७६ लोके यदभियोज्यम् १३२१ १३ ७५ लोकोपचार चतुरा २२४ २४४ लो कोवे दस्तथाध्यामम् २३.२३ २५.१२० वच सातिशय श्लिप्टम् १८२० १६३२ वन्देन पश्चिमामाशाम् ५.५८ वन्देत पोरुपेणेशम् ५६२ ५६ वन्देत प्रथम पूर्वाम् ५५७ वर्नितापूणित सब्यो ४ ५३ ४ ६२ वर्धमानकयोगेपु ४. ११ ४ १६ वस्तुगतकमबिहितो १७.२६ १८७१ चस्त्नावगुण्डनात् सूर्यम् २३७ २५७

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प्लो कानुक्रमणिका /२द्६

मलोक सं० नार0 नाशा (बडोदास०)

याककेल्यथ प्रपञ्चो १७ ५५ १८११४ वाक्याना प्रीतियुक्ता नाम् ३१ २० २८ २६ वाक्यार्थो वाक्य बा २१३८ २२ ४५ वागङ्गमुखरागेश्च २१७ ागड्गसत्वरागेण ७२ ७२ वाहमयानीह शास्ताणि १४ ३ १४ ३ चाचि यत्नस्तु कर्तव्यो १४ २ १४ २ याताग्निवर्ष कुञ्जर २५७ २७ २०

वाद्य तु यद घन प्रोक्तम् २६१ ३११

वाद्यवृत्ति विभागाथम् ५११ वाम सूची पुनर्दद्यात ११ १६ ११२२

वाम सूची ततो दद्यात ११४ ११४२ वामदक्षिणपादाभ्याम् वामपल्लवहस्तेन ५ १२१

वामपादेन चेधस्तु ५ ५५ वामवेध तत् कुर्यात् X ४७

वामवेधस्तु कतक्यो ५ ८५ ५ १२२

वामे पुष्पपुट पाश्व ४ २२ ४ ६१

वायुमुष्ण तमस्तेजो २३ १६ २५१७

वाय्बा मको भवेच्छब्दो विशत्यल द्वारयुक्तम् ३१६ ३४ ३५

२२

विकृष्टे तान्यशेषाणि २३= २८८

विक्षिप्त हस्तपाद च ४ ४२ ४ ६२ ४१०६

४ ६६ ४ ११८ - विक्षिप्ताक्षिप्त बाहुभ्याम् ४ ३७ ४ ५१

विनाना वचन श्रुत्वा १३७ ११०५

विच्य बात् समपादाभ्याम् १०१७

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३००/ सद्किप्सनाट्यशास्तरम्

श्लोक सं० नाशा० नागौo (बड़ोदासं०)

विध्युतपच सशनश्च ६X७ ६१२३ विज्ञानरूपशोभा १६१६ २०६१ विज्ञेय शकटास्य तु ११६२ ११६३ विज्ञ यमेत दब्याया मे १११० ११ १० विज्ञेया च तथा कान्ति २१२३ विदूषक सूत्रधार. ५२० ५ २८ ५६५ ५१३४ विद्युदुल्काघनरवान् २३ १४ २५ १४ विधिना स्थापमेत् २४३ २६३ विधियंश्चतुरधस्प २५४ २ १०४ विनिवृत्त च विधुतम् ८२१ विभाव्यत वस्माचच म २ विभावेनाहूतो योऽर्थ: ७ १ ७१ विभूषण चाक्षरसहतिश्च १५१ १६१ विपयय सलनिकर्ष २८ ६ ३० ६ विप्रवणिक सचिवानाम् १७१८ विवतन कम्पन च ८२० 5 989 विविधानामर्थानाम् २११४ २२ १७ विविधाना भावानाम् १६१५ २० ६० विश्लिष्टमुखमडकस्य १८३६ 98 998 विषष्णे मूच्छिते होते ६८१ ६ १७६ विपष्णे मूच्छिते भ्रान्ते ३०४३ ३२ ३१४ विप्कम्भश्चू लिका चँव १८४३ १६११० विहृत चेति विज्ञेया २१११ २२१३ वीधी समवकारशच १७४ वीराद्भुतरोद्ररसा १६५ २०४३ वृतान्योज कृतानिस्यु. ३० ३६ ३२ ४१ वृश्चिक चरण कृत्वा ४ ४७ ४ ६६

11 ४ ६३ ४१०२

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श्लोकानुक्रमणिका/३०१

श्लोक स० नागा० नाशा० (बड़ोदास०)

वृश्चिक चरण कूरवा ४ ६७ ४ १०६ ४ ७१ ४ ११०

४१४० E 2 वेदाध्यात्मोपपन्न तु २३२४ २५ १२१ ब्ेष्टिम विततं चैव २० ८ २१ ११ बैल क्षण्य म चेप्टित २५११ २७ २६ वैष्णव समपाद च १०४० १०५१ २८५ ३०५ व्यञ्जनानि स्वरा वर्णा: २६ १४ २८ १६ व्यञ्जनोषघिसयोगे ६२० ६३७ व्यभिचारिण इति कस्माव ७ गुद्य ७ गध्य व्याजिमी नाम विजयो २०५ २९ ८ व्याधिग्रस्ते जरारते च ६१७३ व्यायोगस्तु विधिन्न १७४० १८६० व्यायोगेहा मृगौ चापि १८ ३१ १६४६ शकटास्य पुनश्चाद्य ११ ५० ११५१ शकटास्य पुनश्चाद्यो ११४४ ११४५ शब्दच्छन्दोविघानज्ञा २५ १६ २७ ५२ शब्दाश्यासस्तु १६ ५६ शने पादो निवर्तेत १०१० १०२४ शम्या तालप्रवेशेन २६१४ ३१ १७ शम्ण तालो भ्रुवश्चैन २६२४ ३१ ३१ शभ्यातालो द्विरभ्यस्तो २६ ६ ३११२ शम्या तु द्विकला कार्या ५२६ ५६२ शम्यापाती द्वितीया च २६३७ ३१४५ शान्तितोय ततो दत्वा २३३ शारीराश्चव वैणाशच ६१४ ६२७ शारीर्यामथ वीणायाम् ३१४ ३४ ७३ शारीर्याेव वीपायाम् ३१४ ३४ ७३

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३०२/-सदक्षिप्तनाट्य शास्त्रम्

ब्लोक सं. नाशा० नाशा० (बडीदासस)

शिर स्थानीयमेतद्धि म६ ८१२ शिर स्थानीयमेतद्धि ३० ४५ ३२.३२६ शिरोहस्त कटी वक्षो २१४४ १२७२ शीर्षिका चोदभृता चंव ३०४४ ३२३२६ शुकतुण्डो करो कृत्वा ६७६ ६१५६ शुकतुण्डौ मदा हस्ती ४ २४ ४.5३ शुकाश्च शारिकाश्चव २३२० २५६= शुचि भूषणताया तु २५३२ २७ १०२ शुद्ध सड्कीणों वा १८.३५ १६११२ शुद्धादशतलाकारम् २२५ २७३ शुभभूमिविभागस्थो २.३७ २.१७ शून्या च मलिना चंव शुङ्गारम्य प्रचरणाव ५१६ ५ २७ ६१० शुङ्गारहास्ययोगे ३११२ ३४ ६२ शुङ्गारहास्यवज १७ ३६ १८.८५ शृङ्धाराद्धि भवेद्धास्यो ६२२ ६ २६ शेपमुत्तरतन्त्नेण ३६.२६ ३७ १८ शल प्रासाद यन्नाणि २०१६ २१.६३ शैलयान विमाना नि १३ २३ १३ ७७ शेलयानविमानानि २०६ २१६ शोधयत्वा वसुमतीम् २१४ २७७ शोभा कान्तिश्न दीप्तिश्च २१,२१ २२ २६ शोभा बिलासो माधुयंम् २१ २७ २२३३ धव्य श्रवण योगेन २३१३ २५१४ श्र तयो यतयश्चैव २६ १२ २८ १४ श्लिप्टाडग धुतिमन्त च ३२३ ३५६ श्लिप्टो समनखोपादी ४.२६ ४.६५

श्लेष प्रसाद १६६६

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प्लोकानुक्रमणिका/२०३

श्लोक सं० नाशा० नाशा ० (बडौदासं०)

श्वेतभूम्या तु यो जात २०२३ २१ ९७६ श्वेत शिरसि वस्वम् ३.७४ पट्त्िशदेतानि १५४ १६४ पडङ्गनाट्यकुशला २५१४ २७५१ पड़्जोदीच्यवती चँव २७ १ २६ १ पड्मिर्वा सप्तामर्य ४ २३ पष्ठश्च सननिपात २६३८ ३१४६ पाड्जी स्वथापभी २७ २ ३६२ षोडशनायकबहुल १७३६ 9555 पोडशाक्षरसम्पन्नम् ३१७ ३४ ३६ स एव शकटास्यश्च ११ ६१ ११६२ सयोगजा पुनश्चान्ये २० ११ २१७६ १६२२ २०७१ समाध्ये फलयोगे तु १८४ १६७ सहारचतुरधपच ३०११ ३२१३ सखोप्वृत्ते सलापे ४ १३३ ४ ३०६ सडक्षिप्तकाबपातो २० ६ ६६७ ६१४२ सङ्गोटना तत कार्या ५४ २१२ २२२ सत्वोत्यानगुण र्यूक्तम २५ २३ २७ ६२ सन्निपातसम ग्राह्मो ५४५ सस्िपातस्तत शम्या २६ ८ ३१ ११ सत्निपातादिकस्त्वत ३१ १५ २६ १७ ३१ २० सप्रहसने प्रयोज्ये १७४६ १८१०६ समन्ततश्च कर्तव्यम् ३५ ३२२ समपादा स्थितावर्ता १०६ १०८ समा प्रसारितास्तिसत्र १०६

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श्लोक सं० माशा० नाशास (बडोदासं०)

समागताग्रास्सहिता ६ ५३ ६११७ समानतोनत्षास्व्यश्रा र २३ 59७० समानयनमर्यानाम् १८२४ १६४३ समाप्तजप्य व्रतिनम् १२ समावर्त्य तिक चैव ११ २६ ११ २७ समासस्तु प्रकृति २२१ २४ १ समासु जातशोभासु २३४ २८४ सभा स्थिरा तु कठिना २१२ २२५ समुन्नत सम चँव २५० २.१०० समो सारितमतल्ली १०८ १०१० समोसारितमेतच्च ११ ५५ ११५६ सम्पिष्टमन्ताह रणम् ३०५ ३२६ सम्फे विद्रवकृता १२७ १ ५८ सम्भ्रम विषादमु्च्छित ६६६ ६१४E सर्वमेव विधि कृत्या ५१३६ ३ ११ ३ ७७ सर्वरसलक्षणाढया १७५३ १८११२ सर्व रससमासकृतम् १६.२१ २०७० सर्वाशास्त्रार्थंसम्पन्नम् ११३ ११५ सर्बावस्थाविशेपेपु २१२४ २२ २र्६ सर्वासामेव जातीनाम् ३०.३४ ३२ २६ सन्यशच पृष्ठतो चाम १०१५ १०.१७ सव्पहस्त निपात स्ात् २६३० ३१ ३७ ससालभज्जिकाभिश्च २२७ २.७६ सहोमया क्रीडितवान् ५ ११६ साधर्षजो निराधर्षजो १६६ २०४६ सामान्याभिनयो नाम २११ RR 9 सारूप्यमिथ्याध्यवसाय १५२ १६२ ६७३ ६ १५३

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श्लोक सं० नाशा० नाशा0 (बड़ौदासब)

सिंहासन सु राज्ञीनाम् १७.२२ १८५१ सितपीतसभायोगाव २०१३ २१८१ मितो नीलशच पीतश्च २०१० २१७ सिद्धिस्तु द्विविधाज्ञ या २५१ २७२ मिद्धच्या मिश्रो घात २५१२ २७ ३६ मुकुमारप्रयागोडय ३५ ३ २६ २६ मुकुमार प्रयोगो यो २४ ५ २६ ६ सुप्त विवोघोडमष ६७ ६२० सुधाकर्म बहिस्तस्य २३३ २ ८३ सुआाक्यमधुर श्लोके ५१०१ ५१६६ सुवाद्यता सुगानत्वम् २५३१ २७१०१ सुविभक्तपदा २१ ४७ २२७१ सूचका पापकर्माण २४७ सूची कृत्वापविद्ध च ४ ६४ ४१०३ सूची पादो नत पार्श्व 8979 सूचीमाद्य पुनदद्याव ११ २० ११ २१ सूनीमाद्यक्रम कृत्वा ११.१७ १११८ सूचोमाद्यक्रम दद्याव् ११ २5 ११ २६ सूचीबाम पुनददाव ११२६ सूचीवामक्रम कृत्वा ११ ३४ ११ ३५ सूचीविद्धो विदायाथ ४ ८३ ४ १२२ सूनधार पठेत तन्र ५रू ६८ ५१०४ सखलितापसृतो पदौ ४ ४६ ४ ८प

स्तम्भ वा नागदर त बा २३० २७६ स्तम्भ स्वेदाऽय रोमान्व ६र्६ ६२२ स्त्रीप्राया चतुरड्ा १७२२ १८५६ स्व्नीभेदनापहरण १७३३ १८ ८६ स्थान तु वैष्णव कृत्वा १२४ १२४

11 x ३१ ५६७

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श्लोक सं० नाशा० नाशा० (बडोदासं०)

स्थानासनगमनानाम् २११२ २२१५ स्थाने त्र वास्वभिनयरे २१.४२ २२,४६ स्थापकम्य प्रवेशे तु ५१६३ स्थाप्य चवतत पीठे २४४ २६४ स्थित मध्य द्ुत चेव १२.१२ १२१२ स्थूल प्राशु बृहद्शम् ३२४ ३५५ स्निग्धा हृष्टा च दीना च ८ १३ =४२ स्पर्शस्य ग्रहण चेव २३६ २५६ स्मितमथ हसितम् ६२३ ६५२ स्मितरुदित हुसितभय २११५ २२१८ स्मितापहासिनी हासा २५३ २७४ स्वभावमात्नोपगतम् १३ १७ १३७१ स्वाभावाभिनयोपेतम् १३१८ १३७२ स्वरसाधारणे ापि ३०८ स्वरा ग्रामावल द्वारा २६ १३ २८१५ स्वरग्रामो मूर्च्छनाइच २६११ २८ १३ स्वरालङ्कारसयुक्तम् १३.२० १३७४ स्वल्पमान्न समुत्मृष्टम् 95.97 १६२२ स्वाववेकात्पेन रचित्म् १५८ १६.६६ स्वस्तिकविच्युतिकरणाव् ६ ६३ ६१३७ स्वतिकस्याग्रत १०३८ स्वस्तिकापसृत पाद ४.४० ४ ७६ स्वस्तिकापसृती पादी ४ १२७ ४ १६६ स्वस्तिको चरणो कृत्वा ४.४ ३ स्वस्तिको तु करो कृत्वा ४ २६ ४ ६८ स्वस्तिको त्निपताको तु २३१८ २५१६ स्वस्तिको रेचिताविद्धौ ४ २८ ४६७ हस्तपादा ङग विन्यासो २११६ हस्तमन्तरित कृत्वा २५.E४

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श्लो कानुक्रमणिका /३०७

इ्लोक स० नाशा० नाशा (बडौदा स०)

हस्ताभ्यामथ पादाभ्याम ४३६ ४ ७ ५ हस्तो यदि भवेदबाम ४ ४१ हस्सो तर्थव कतव्यो १२७ १२७ हुस्तो त स्वस्तिकौ कायों ४७० ४९०६ हास्य शृडगारबहुला १६२३ २०,७३ हास्य शृड्गारयो १६१ १७१०३ हित पश्य च बक्तव्यो ३६१ १७ ६ हिमवपहते बद्ध ६ १७८ हुताश एव दीप्ताभि ३ १२ ३८३ हृदयस्थ सविकल्पम ३४ ६ २५६० हृदयस्य बचो यत तु ३४ ४ २५ ८८ हेला हावश्चभावशच २१६ २२७ होत हव्य छनम ६३२ ६ ६१

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शब्दानुक्रर्मणका

अक्षरमहति (लक्षण) १४१ अनिबद्ध (पद) अडक १७६१० (शारीर वीणा मे) २६१५ अङकमूख १८३३,३६ अनुकृनि १२६ अङकावतार १८ ३३,३६ अनुबदा ३०४४,४६ बडकुर . = ६, २१ ३६-४३ अनुबन्ध (पाठयाङ्ग) १६.६ बढ़ग * ५ ६,१७ अनुनासिक (बर्ण) १४५ अट्दगहार ४१३-१८,८, अनुनीति १५३ बधोप (बर्ण) १४ ६ धनुभाव ६ १७ के बाद गद्य ७१,४ अन्चित करण ४५४ अनुम्पा प्रकृति २४ १,६,७ अन्चित शिर ८१० अन्तर ६१६ अड्डित मण्डल ११ ५,५७-६० अन्ताहृर्ण (घबा का अग) ३० अड्डिना (ध्रवा) ५६१ अपक्रान्त ४.१०० अइडिमा। चारी १०७०१,३०४४,४८ अपक्रान्ता चारी १० ६,२६ सतिक्रान्त वरण ४८७ अपप्रयोग ३१७ अतिक्रान्त मण्डल ११ २, ६-६ अपवारित ३४ १,५ अतिक्रान्ना चारी १० ६,२८ अपविद्ध करण ४ २५ अतिशय १५१ अपस्यन्दिता चारी १०७, २४ सतिहमित ६२२ मे बाद गद्य अपहसिता ६२२ के वाद गद्य मत्युक्त (नाति) ३० ३० अप्राणी (आहार्याभिनय मे) २०१६ सथर्व वेद ११५ अभिनय ६२, १०, ६१-४ अद्भुता दृष्टि र १२ अभिप्सुतार्थ (दोष) १५ ६ अधम (अभिनय) २१२ बभिमान (लक्षण) १५१ अधमा प्रकृति २२५ अमृतमन्यन समयकार ४१ अधरकर्म८२० अशल हस्त ६ २१, २२ अघोगत (शिर) ८.११ अर्गल करण ४७८ अध्यष १० ५,६२-६४ अर्थप्रदृसि ०८ ११-१७ अध्य घिका १० ६,१५ अर्थव्यक्ति (गुण) १५१० अध्यात्म (प्रयाण) २३.२३, २४ अचंहोन (दाप) १५६

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शब्दानु क्रमणिका/३०६३

अर्थानुवृत्ति (काव्यलक्षण) १५३ आकाशवचन ३४१६ अर्थान्तर (दोप) १५ ६ आकाशिकी चारी १०८११ अर्थोपक्षेपक १८३३-३६ आक्रन १५२

अर्धचन्द्र हस्त ६ १६,२० आक्षिप करण ४ ७६

अधनिकुटटक ४३१ आक्षिप्तरेचित करण ४ ४१

अधरेनित ४ ३३ आक्षिप्ता चारी १०१० ३५ अधसूची ४ ६८ आक्षेप ६१६ अर्पण (पाठशगुण) १६६ अ क्षपिकी ध्रुवा ३० २१, ४१ अलडकार (आहार्याभिनय मे) २०७ आख्य त २६१४ अलडकार (काव्यगत) १५५-८ आध्यान १५२ अलड़कार (गात्रज विकार) २१३३५ आद्क्कि अभिनय ६१०, ८ु४२३ अलटकार (अडगज) २१४-६ आ तरा झ्रुवा ३० २१, ४३ अलडकार (अयत्नज) २१४ २१ २६ आभरणकार मे८ अलडकार (ध्रुवा मे) ३० ७ अनचाय की क्रिया २१५० अलड्कार (नाटयप्रयोगाश्चय) २५.३३ आतोद ३१० ६२ १४१५ अलडकार (प्रक्कृतिविपययजव्य) २४ ६ आतोद विधान २६११८ अलटकार (शारीरदीणा म) २६१३१५ आनोद (सुबिर) २८ १-११ बचात मण्डल ११२ २८-३१ आत्मसभुत्यघात २४६ १० ११ आत्मस्थ हास्य ६२२ के बाद अलाताचारी १० ११३६ आनय १३ अवकृष्टा घुवा २०१०३० ४४४६ आधिकारिक इतिवृत्त १८ २३ अवगलित १६२ आछुत शिर र ९० अवतरण ५२६ आवतरा झवा ३०२१,४२ अवधुत गिर ६ १० आा जो जानि २७७ सबनद्ध ६१३१४ २६ १-३३१.१-४ आभरणकार ३२८

अवपात १६२० आभ्यन्तर कक्षा १३ ५

अवस्या १४४, १८४५ आभ्यन्तर नाटय २१४६४६ मवहित्यक करण ४ ११६ आमुख १८२

बधु ६६ आरभटी ११७, १६ १७-२४

मसयुत हस्त र १४ आरम्भ ५१े, १० आकम्पित शिर ६५० आरम्भ (अवस्था) १८५६ आकाशगत मण्डल ११२४२ रोप् २०र्६

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आर्पभी २७२ उद्दीच्यबती २७ १ आलीढ स्थान १०४६ उद्घटटित ४ १२४ आवन्ती प्रदृत्ति ६१२, १३६ उद्घात्यक १६२ आवर्त करण ४ ८० उद्योतन २४२ आवर्त मण्डल ११४,४६-५१ उद्वृत्त करण ४ ११२,११६ आवाप २६ १६ उद्बृत्ता १०१०,३७ आवाप (नि शब्द ताल मे) २६२३ २५ उन्मत्त व रण ४ ३५ आविद्ध प्रयोग १३१०१२, ३५१,५-३ उपकरण (आहार्याभिनय मे) २०२०. आविद्धा चारी १० १०,३६ २६-३३ आवेध्य २०६ उपपत्ति १५ ३ आशो: १५ ३ उपघात (प्रवाइग) *०४, ्स आाश्रावणा ५ ३,१० उपपात ३०४ आसन विधान १२१४ १७ उपमा १५५,६ आसनविधि २४२ उपवर्ण २० ५१ आसारित ४११,५४,१३, २६३८४३ उपवर्तन (धुवाडग) ३०४ आस्पन्दित मण्डल ११४,४६-४र्६ उपवहन १२२ आस्यज कर्म प २१ उपवृत्त (ध्रुवा मे) ३० ८ आहार्य (अभिनय) ६१०;२०१-३३ उपसर्ग २६ १४ इतिवृत्त निरूपण १८१.३६ उपसृत्तक ४ ११३ ईहामृग १७ ४,३१-३४ उपहसित ६२२ के बाद उच्च (पाठयालङकार) १६६ उपाड्ग १० ४६ उत्क्षिप्त शिर ८ ११ उरोमण्डलिक करण ४७५ उत्तम पाव्र की गति १०१३ ऊहद्वृत्ता चारी १०७,२० उत्तमा प्रकृति ५ ७,१४ ऊर्ध्वजानु चारी १० ६,३१ उत्थापक १६६,७ ऊह २२६ उत्पापन ५७,१४, १६ १८ २१ ऊह्ापोह (शिष्य गुग) २४ ११ उत्थापनी झ्रुवा ५.२२ ऋक ३०१ उत्सृप्टिकाइ् क १७४,४३-४५ ऋग्बंद ११५ उत्स्पन्दिता चारी १०७,२२ ऋृ व्ि (समृद्धि) २५२६,३२ उदात भाव १७ १३ एकार्थ १4र्द उदारता १५१० एलकाकोडित (करण) ४ ११८ उदाहृनण १५१ 13 मण्डल ११४, ५५-५५

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शब्दानुक्रमणिका /३११

एल (ड) काक्रीडिता १०७ १८ कारुक ३२८ ओघ ३१११ कार्मारवी २७ ६,७ ओष्ठय १४५ कार्य १५३ औढमामधो ६१२, १३८ कार्य (अर्थप्रकृति) १८२,१७ औत्पातिक घात २५६८,१० काल (घनवाद मे प्रमाण) २६ १,५ औदार्य २१२१ २६-३४ काव्यगुण १५ १० कक्ष्या विभाग ३६ १३१८ काव्यदोष १५ र्द कथ निका ५६५ का व्यप्स्ताबक ५१०५ कथोदुघात १६२ काव्योपक्षेप (ण) ५ू १०२,१०४ क्टिच्छिन्न ४.३२ काप्ठविधि - २६ कटिक्ान्त ४ ६४ काच्ठा (धन वाद्य मे) २६२ कटीसमकरण ४४० किलकिच्चित २११०,१५ कण्डिका २६४३-४४ कुञ्चित करण ४७३ कण्ठतालन्य १४५ कुटटमित १०१७ कृष्ठय १४ । कुतपविन्यान ३११४ कनीयस् मण्डस २४ कुतपविन्यास (तत वाद) २६४ कपट १५३ वुतपविन्यास (अवनद्ध म) २६५ कपोताली २२८ छुशीलब ३२६ कम्पित शिर ८ १० कुहर २.२७ करण ४१२ १४६६१०२ वृत्ष (प्रत्यय) २६१४ व रिहिस्तक करण ४१०८ कृतप्रतिङ्कत ३१११ कहण रस ६२२ के बाद गद्य कंशिक न्याय १०५० बहणा दृष्टि ८ १२ कैणिकी ११८,२० २२ १६ ११,२३ कर्तरीमुख ६ १७,१८ कोहल ३६ २६ बला २१४६ २६१५३१ क्रा-तक करण ४७२ कलापक ४१७ क्रान त भण्डल ११ ३ ३६४२ काकु १६ गद्य क्र द्वा दृष्टि ८ १३ कान्ता दृष्टि ८ १२ क्षमा १५३ (काव्य लक्षण) कान्ति (गुण) १५१० क्षेप्य २०६ कारति (अयतनज भाव) २१ २१,२३ खञ्जक ३०११ कारण्डव (वण) २० ११ खण्ड १०२ कारिका ३६ २६ गड्गावतरण करण ४१२६

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गजक्रोडिसक ४ ८्६ चतुर्थंकार ५६३,६६ गण्डसूची करण ४ ६२ चतु षष्टि कर (हस्त) ६े १.१२ गरुण प्लुनक ४ ६९ चतुरश ताल २६ २६ गति १२.१-१७ वतुरश म्र वाङ़ग ३० ४ गर्भे (सन्धि) १८२३,२६ चतुप्पदा३०.६ गाथा ३०.१ चाचपुट २६, ६-१२ फान ६२,६,१७ चामर २० २१ पान्धवं २६ ७-६ चारी ५८, १६, १० १-५३ गान्ध व सडग्रह २६ १-१८ चारी इनोक ५ मद गाम्मीयं (पौरुष सत्वभेव) २१.२७,३२ चारी स्थान १०४८ गायत् ३० ३० चापगति चारी १० ६,१६ चापगति मण्डल १९ ५,६६-६७ गुणकीर्तन १५१ चित्रकम २३४ गुणानुबाद (लक्षण) १५१ चित्र पूर्वरडा ४.१२ गूढार्थ (दोप) १५४ चित्तामिनय २३ १-२६ गृधाव जीनककरण ४ ६५ चूलिका १८३३,३६ ग्राम (दारवो बीणा मे) २६११ चेष्टाकृत अभिनय र ५ ग्राम (शारीरी बीपा मे) २६१३ छत २०२१ ग्रीवा कर्म ६,२३ छन्द्रोविधि २६१५ ग्रन्यिम २० ८ छिन्न वर्ण ४६६ गान (भेद) -०३६ जनान्तिक २४ १,५-६ धन ६१३,१६, २६,१,२ जनित करण ४ ११५ घनवाद्यविघ्ान २६१-४४ जनिता चारी १० ७,२३ घात २१६-१र जजंर १२०, ३,७,११,१ ६२,४५,८३- घूर्णित ४ ५३ ७२०२१-२४ घोष १४६ जर्जरत्हण ५४०,४५ चक्रमण्डल ४ ४७ जर्जरपूजन ५६३,७८ वञ्चत्पुट जानि (रमानुमार) २७ १-११ (चच्चतपुट) २६७ जुगुप्सिता दृष्टि रु १३ चतुर करण ४६० ज्येष्ठ अभिनय २१२ चतुरश्रा प्रूवा ५ मम ज्येप्ठ मण्टप २४ चतुग्स (श) २२, ३८ू-५१ डोलापाद करण ४ ६९

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शब्दानुक्रमणिका / ३१३

fम १७४ २५-२६ द्रन्त्य १४५ तन ६१३, १५,२६१४ दन्ताष्ठय १४५ तलपु टपुर ५२२ दरशरूपक भेद १७१ तद्धित २६ १४ दशरूपक विधान १७१५५ तलविलासित ४ ७७ दाक्षिणात्या ६१२ १३.१ तलमस्फोटित ४ ६० दिकस्वस्तिक ४ ३६ तलभटघद्ितक ४११४ हीना दृष्टि ८ १३ नान (दारबी वीणा मं) २६११ दीपक (अलडकार) १५५७ ताश कम ८१७ दीपन (पाठय) १६६ बा २६ १६, २६ ३४-२६ दीप्न (पाठयालइ कार) १६६ तालब्य १४५ दीप्ति (अमत्नज भाव) - १२१२३ तेजस् (पोरुष मत्वभेद) २१ २७,३५ दुप्ता दृष्टि ८ १३ तौरिक ३२७ दृष्टान्त (लमरण) ५२ विगत ५८,२० ३१७,११ दुष्टि (३६ भद) ८११६ विपतारु ६११५,१६ देवभूमिका :२ ३ त्रिपाणण ३१७११ देव चात २१६७ निपुरदाह डिम ४ ६ देबिको सिद्धि ६१३२५१५ व्िप्रचार ३१५,११ दोलपादा चारी १०१०३४ विमहार ३१ ११ द्र त (लय) १६ ८ बिमाजं ना ३१११ द्रुत (पाठ्यालइकार) १६ ६ व्रिपति ३१ ११ दु.हिण १ ३३ विलय २१११ द्विलेप ३१ ३,११ विसयाम ३१७११ धर्मो ६२१११३ १६२३ व्यश्र (मण्डप) २२,५१-५४ धीर लनित नायक २२७ ज्यश्न (चाचपुट ताल) २६ ६-१४ घीरशा त (प्रशान्त) २२७

दण्डकाष्ठ २०२१,२५ छोरोदात्त २२७ दण्वपक्ष करण : ५१ धीरोद्धत २२७ दण्डपाद ४१०३ धुतशिर र१३ दण्डपद्द मण्डल ११ २,२१-२३ धैर्य (अयत्नन भाव) २१ २१,२५ दण्इब्लुता चारी १० ११४२ घुवा ६ १७ २६.११,२६ ३१ दण्डरचित ४६२ मुवाविधान २७ १-१९ ने० १४६

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३१४ / सड् सिप्तनाट्य शास्त्र म्

भ वा लक्षण ३० ५ नान्दी १ २५, ५ ७,१६,३२.७ प्रथा (घट् भेद) ३०४४ नाम (शारीर वीणा मे पदगत विधि) घ्र वाडग ३० ३-५ २६ १४

धर.वा जाति ३०३२ नापक २२६,३२-७

ध्वज २० २१ नासिका = १६

नटवर्गं ३२ ७,६ निकुज्चित करण ४४७ नन्दयन्ती २७६ निबुट्ट क ४३० नन्दी ३२७ नितम्ब करण ४१०६

न्त्ुट ३०११ निपात २६१४ नबृंरव ५ ६४ निवद्ध (पद) २६१५,३० २३-२६ नमं १६ १२,१३ निमेप २६२ नम गम १६ १२,१६ नियनाप्ति १८ ५६ नर्मसफुन्ज १६.१२,१४ निरुक्त १५ १,३६२६ नर्मेस्फोट १६५२,१५ निमसिन १४२ नहुष ३६ १४,२२,२५ निरयूह २ २७ नागद्त २३० निर्वेहण १८ २३,२८ नागापसर्पित करण ४.१२३ निवेश (करण) ४ ११७ नाटन १७१-१६ निविद्ध दृश्य ३३१६ नाटकाश्ित जुग २५ २८ निप्क्राम ६ १६,२६ १६,२१ २३,२६,२६, नाटिका १७२२,२३ ३५

नाट्य १३६,४४,४६,४७-५१,६१ निष्रामिकी (नेष्क्रामिकी) ३०२१,४० नाटयकर ३२.७ नि शच्दताल २१ २३ नाट्यकृत (आतोद् प्रयोग) २६ ३ नि स्तम्भित करण ४८५ नाट्यगृह १३२,२३ निहुन्चित शिर ८ ११ नाट्यधर्मी ६१,१३ १६,१६-२३,२०२६ नीच (पाठपलटकार) १६६ नाट्यमण्डप १३४,२७,८,१२ नृत ४,१३०-३३ नाट्पवार २५ २०-२७ नृत् मातृका ४१६ नाट्बेंद १४,१४,२४,३६ नृत्त हस्त ६ ७-१२ नाट्यवेश्य १३१,२६ नूपुर करण ५७ नाट्यमङग्रह ६२८६ नूपुर पदिका चारी १० ६, ३३ नाटयार्वित (शारीर अभिनय का भेद) नृत ६.५,र्द २१.३६,४९,४२,५ ६८-७४, नेपध्य २०२

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शब्दानुक्रमणिका/३१४ पञ्चसन्घि १८२३ पाव (नाटकाश्रित गुण) २५ २८ पट १२३ पात्रगतविधि २५ २६.३० पताक ६ १,११,१४ पादमार्ग २६१ पताका १८ १२,१५ पादाविद्वक ४५१ पताकास्थानक १८१८-२२ पारिपाश्विक ५३२,७८ पद ३० २३,२६,२८ पार्श्वक्रान्त करण ४५४ पदसीकुमाय १५१० पारश्वक्रान्ता १० ६,३० पदोच्चय १५२ पारश्वजानु करण ४ ६४ पद्मवर्ण २० १२ प. श्वंनिकुट्टित ४७० परकृतघात २५६,८ (सु) पीठधारिणी २२८ परभावकरण २० १६, १८,२४ ३ पिष्टकुटट ११५,६४-६६ परस्थ हास्य ६२२ के दाद गद्य पुढकर्म ६ १८ परावृत्त शिर ८११ पुस्त २० २-६ परिगतिका ३०६ पुष्कर बाघ ३२ ७- ६ परिघट्टना ५ ३,११ पूर्वरड्ग ४८,१० परिदेवन १५३ पूर्वरडग ५१-१०५ परिवर्त २६१६ पृच्छा ११२ परिवर्तक १६.६८ पृष्ठस्वस्तिक करण ४३७ प्रकरण १७१,३,११,१७-२० परिवर्तनी धुवा ५५३ प्रकरणाडग (ताल विधि मे) २३१६ परिवाहित शिर: ६१० प्रकृति (विविध भेद) २२१ परिवृत ४ ६३ प्रकरी १८१२,१६ पश्चात्ताप १५३ प्रकृति (पातो की भूमिका) २४ १-८ पाञ्चालमध्यमा ६१२ प्रतिभेद ३१ ५१ पाज्वालो १३६ प्रतिमुख १८२३,२५,३० ३ पाठ्यगुण १६१ प्रतिशोर्षक २०२१ पाठ्याङ्म १६६ प्रतिशुल्का ३१११ पाठ्यालइकार १६६ प्रतिपेध १५२ पणि (ध्रुवा मे) २६१६,३० ७ प्रतिष्ठ (जानि) ३० ३० पणिका ३०१ प्रत्यडग ८ ५-3 परण्डुवर्ण २० १२ प्रत्यालीढ स्थान १०४६ पात २१ १६, २६१,२६ प्रत्याहार ५ श६

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३१६/ सङक्षिप्त नाटयशास्त्र म्

प्रत्यूह २ २६ प्रावेशिकी ३०८,२१ ३६

प्रमाण २१४६ प्राश्निक २५१३.१3 प्रमाण (नषटय मे विविध प्रमाग) २३२३, प्रासङगिक इतितृत्त १८२,३ प्रासादिक ६१६ प्रथत्न १८५, ७ प्रासादिकी २० २१,३१४२ प्रयोग १५१७, २३, ३६ २७ प्रियोक्ति (लक्षण) ५५३ प्रयोग (सािकाश्रित गुल) र५२६,३१ प्रक्षक २५ १८,१६ प्रयोग (दो प्रकार) १३१०, ३५१७ प्रेङ्खोलित करण ४१०५ प्रयोगातिशय १६२ प्रेक्षाग्ृह २ १ प्ररोचता ४ ६२१६६६,१०२ प्रोनसाहन १५.१ प्रलय ६ ६ फलयोग १८५,१० प्रवन (ध्रुवाङ्ग) ३० ३,३० ८ बद्वा चारी १०७,१६

प्रवृत्तक १६२ वन्धनीय २०६ प्रृत्ति ६२ १२,१३,१३ र्६ वाह्य कक्षा १३५ प्रवणी ३०४६ बाह्य नाटय २१४६-५० प्रवेश (न) ६१६,२६१६ बाह्य प्रयोग १३१४ प्रवेश (नि शन्द ताल मे) २८३६ २६२३ बिन्दु १८१२१४ प्रवेशक १८३३३७ बिब्बोक २११०,१८ प्रशमन १६ ६ बीज १८ १२,१३ प्रसपितक ४१०६ बीभत्स रस ६ २२ के बाद गद्य प्रसाद (वाज्य गुण) १५१० वीमत्सा दृष्टि ८ १२ प्रस्तार ३० ४,८,११ मयानक रस ६ २२ के बाद गद्य (प्रस्वार) भयानका दृष्टि ८ १२ प्रस्नाग्गमन क्रिया २४१० भयास्विता ८१३ प्रस्तावना ५ १०२ भरत ११,३२ ७ प्रह्सन १७४४६४६,६६१ भरताश्य ३२.७,= प्रहसन (भारती वृत्ति का भेद) १६२ भाम १७४४६५२ प्रागम्भय (अयरनज भाव) २१२१,२६ भारतन्याय १०५१ प्राणी (माहार्याभिनय मे) २०१६ भारती वृत्ति ११७,१८२४ प्रदिनि १५ ३ प्राप्नि सम्भव १८५८ू भाव ७१,४, ६ २,३ (स्थायी) प्रारम्भ १८५,६ ६ १ २०,७ १-३

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शब्दानुक्मणका /३१७

भाव (सत्वोत्थ अड्गज अलडकार) २१५७ मधयमा प्रकृति २२४ भावानुकीतन १२६ मनोवभ (लक्षण) १५२ भितिकर्म २६३२ मयूर लित करा ४१०१ भित्िलेप २ ३२ महाचारी ५८ १६ ८७ भिलाथ १५ ६ महेद्रविजयोरसव १२५ भुजडमाञ्चितक ४६१ माग पुष्कर वाद्य मे) १०.३१११ भुजदगनम्तरेचित ४ ५६ मार्गामारित ५४,१२ भजटगबामिता ४ ४५ मात्रा २६ १७ भुजइगत्ासिता १०१२४० माधुय (पोस्पमत्व भेद) २१२७,३० भूमिका निवेशन २४ ७ माधुप (गुप) १५१० भुड़गार २०२१ मानुषी मिद्धि ६१-२५१४ भौम मण्डल ११४३-६६ मापघात ३०४६ भोमी चारी १०६-६ माहाजनिक (ध्रचागग) ३० ५र्६ भ्रमरक ४ ५६ मिध्याध्य वसाय १५२ स्रमर मण्डल ११४४३४६ मुकुट बार ३२८ भ्रमरी १०११४३ मुखर्सा घ १८२३२४ मण्डम २२ मुख (ध वाड़ग) ३०२ मण्डल (ब्रह्ममण्टल) ३५ मुखज (अभिनय) र.५ मण्डल ९० २ मुखराग प २२ मण्डल विधान ११ १-६१ मूच्छना (दाखी बीणा) २६ ११ मण्डल विनियोग ११६2 मूखन्य १४५ मण्डल स्वास्निक ४ २६ मोटगयित २१९० १६ मत्तल्लि ४ ४६ यजुर्वेद ११५ मत्तल्ली चारी १० ८ु,२६ यति (तालगत बिधि) २६७ मतबारणो 4१६,२०,४६ यनि (दाखी वीणा म) २६१२ मदम्खलितक ४१२० यति (घ्र वा म) 2० 3 मद्रक ५६३०६ यमक (रलनकार ) १५५६ मघ्य (जाति) ३०३० याच्जा १५२ मध्य लय १६ ८ यक्त १५ ३ मणउमाभिनय २१२ रवतगान्वारी २३५ मध्यम पात्-गति १२१३ रटग ६२६ मपम मण्डप २ ४ १० रइद्वार ५७१८

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रड्मपीठ ११६,४६,४८,५२ लोलित करण ४१२६ रड्गमण्डप १२१ लोलित शिर म.9१ डगशीप ११७,२४,२५ लोविकी कला (घन वाद मे) २६ ४ रड्गोद्योतन ३१,१२-१५ वक्ष स्वस्तिक ४३४ रस ६ २,३,६१७-२२ वक्त्रपाणि ५ ३,११ रसोत्पत्ि (परस्पर रमो मे) ६२२ वज्र (शोपंका, ध्रवाड्स मे) ३०८ रसदृष्टि ८१२ वर्णं (पाठ्यगत) १६४ शक्षम भूमिका ३२४ दणं (घ्र वागत) ३० ७ ल्पय १५.५,८ चण (भरर वीणा गत) २६ १२,१४ रपरेप १११ वर्तनाच्छादन २० १४ रूपानुर्पा (प्रकृति) २४८ वर्धमान (क) ४११,५ २२,२६३८-४२ रेचक ४१३ वलित करण ४२३५२ रेंचित निकुट टित ४ ५० वलितोहक करण ५२५ गेमाञ्च ६६ वाक्य (शारीर अभिनय मे) २१.३६३७ रोद्र ६२२ वे बाद गय्र वाक्याभिनय २१ ३६-३६ रोद्रा दृष्टि ८ १२ वाडगमघी सिद्धि २५ ३ लक्षण (काव्य वक्षण) १५१४ वाचिव अभिनय ६१०, ८४ १४ १-६ लतावृश्चिक करण ४ ६५ बादी ३२ ७ ललितमण्टल ११३ ३५-२६ वामबन्ध मण्डल ११ ४,३१-३५ लय १६८२६१७ बामदेध ५ ४२-४६.८५ लय (घन बादय मे) २६१,५ वा्षंगण्य न्याय १० ५० लय (ध्रुवा मे) ३०७ विकृष्ट (मण्डप) - २-३५ ललाट तिलक करण ४७१ विक्षिप्त करण ४ ७६ ललित (अलड्कार) २४ ६ विशिप्ताक्षिप्तर ४४२ ललित (पोरुप सत्व भेट) २१ १०,१६ विक्षेप ५४१,२६ २३ २६ ललित करण ४ ५४ बिदारी २६१७,३० १५ ललित मञ्वरमण्डल ११२,१५-१८ विधात (घात) २५६-१२ लोन y २ विचित् मण्डल ६२,१०-१४ तीना (याविदलट्रवार) २११० वि्छिति २१ १०,१३ लोकधर्मो ६ ११, १३ १६, १८,२० २६ विच्छेद १६६ लोकप्रमाण २३.२३.२६ विच्यवा १०.६,१७ लोकवृतानुकरण १४४ विडम्बन ३६.५

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शब्दानुक्रमणिका /३१६

वितत (माल्यभेद) २०८ बीरा दृष्टि-८ १२ विदूषक ५६५,३२७ ृति ६.२११,१२,१७२ विद्यद्भ्रान्तक करण ४८६ वृश्चिक करण ४ ६ विद्युद्भ्रानता १०११,३८ वश्चिक कुटटित ४६३ विद्यत शिर ८१ वृश्चिक रेचित ४ ६७ विनिवृत्त करण ४ ८३ वषभक्रीडित ४ १२५ विप्रलम्भ शृडगार ६ २२ के बाद बद (प्रमाण) २३,२३,२४ विभक्ति २६ १४ वेदिका २ २७ ४६ विभाव ६१७ के बाद ७१३ वेध-५४१ विभूषण (लक्षण) १५१ बवेप्टिम २०३५८ विभ्रम २११० १४ वेण (स्वर)-६१३२६१० बिमश १५ २३,२७ वेपथु (सात्विक भाव)-६६ विराम १६६ चैदण्य () ६६ विरुपाक्ष १३५ वशाखरेचित करण ४५८ विलम्बित (पाठ्यालडकार) १६६ वैशाखस्थान १८४६ विलम्बित लय १६ द वष्णब स्थान १० ४६,१२४ विसमम्बिता २े० ४४,४७ विलास २११०,१२ व्यञ्जन-२६१४ रिवतंक करण ४मप व्यसित करण-४६६ विव्रृत करण ४,८२ व्या्य करण-३६२ विषम १५६ व्यभिचारी भाव-६ ५-८ विष्कम्भ १३३३५ व्यभिचारि भाव-३१७ के बाद, विष्कम्भ करण ४ १२३ ७४ के बाद विध्णुकानव ४ १२१ व्याजिम २० ३५ दिसन्धि १५६ व्यायोग-१७४४०-४२ विस्मिता १३ व्याल २२६ बिहुमिन ६ २२ के बाद गद्य शकटास्य करण ४ १२८,११५,६०६२ विहृतमण्डल-११२,२४ २७ एकटास्या चारी १० ६,५४

विहृत ₹ १ १०,२० शक्र - १ २८ बीधी १७ ४५२-५५ शकधवज-१२5 बीथी (भारतीदृत्ि का भेद)-१६२ श०द (अवनद्ध मे द्विविध) ३१२ वीर रक-६ २२ के बाद गद्य शम्या २६ १६ २६ ३४-३६

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३२०/ सडक्षिप्त नाटयश्ष:स्व्वम्

शाबा =५८६२१६४ LIb. सेडघेप (िसे्सगुण) २४११ शात रस ६७२ वे वाद सन्घातक ४७ शारेर आभनय ८ ५२१ २ ACC 'भडघाय (HT के भेदों मे)-२०# शारेर ग्वर ६१३२६१०१११ सडघोटज०७/ १२ शारेरी मिद्धि २५२४ सजीव (मेउजीब)-२०२० शिर कर्मं ८१0 शिल ११२४ २६६१ सतव ७२७४२११२१५ शल्पय ।१)-३६२ सfघि १८१३६२६१४ शिप्यनिप्पाटन २४ १० सि (घुवाड़)-३०३ प्रीपक ध्रवा का उद्ग) ३४८ मचिम- २०३४ मीपिक * ४४४/ समतकरण - ४ ६६ शुद्ध पूवरद्ध ४१ मातिपात-२६ १६२७ २६३० मप्तस्वर- १६१ शृङ्ग र ६ २२व व दे समचारी मण्डल ११५ ६७ ६६ गोभा (अख मत्र भाग ) २१२१२२ समता १५ १० शोभा (लक्षण) १५१ समनख ४ २६ शोभा (पौष्प मत्व भद्) २१ २७२६ समपादा चागे १० ६१२ श्रुति (न खा जा) २६१२ समववार ४२, ६१७४,२३,३० मनप- १५१० समाधि - १५१० पत्करण ३१७११ समारसाग्नि ११४५२५५ पर्टाव्रिशद् दृष्टि-६१३१६ ममोकसारित मतल्ली चारी १० ८,२% पटर्पितापुनवकृत २६१४ १६ सम्पिष्ट (धुवाङ़्)-३०८ पडजकेशिकी-२७ ३ सम्फट १२७,१६ १८ २२ पड्लमष्ण २७१८ सम्भोग शद्ार-६२२ के बाद पडजा २७ (१) सम्भ्रान्त करण ४१२२ पण्डक-४१७ सर्पित ४१०२ पाटजी-२७ २ सल्लापक १६६६ सयुत हस्त ४७ सवस्तुक २६ १६ समप १५२ सशब्द ताल (शब्दताल)-२६२४ सहरण ३०३ सात्वत न्याय १०५० सङक्षिप्तक १६१८१६ सात्वती ११७ १६४२३ सड़घात्य १६६,१० सात्विक अभिनय ६१०,८४

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शब्दानुक्रमणिका /३२१

मात्विक भाव ६६,७४ के बाद स्थान (देह के, तीन) १६१,३ साधारण (शारीर वीणाका समुदाय) स्थान (शारीर वीणा समुदाय मे) २६ १३ स्थापक ५ू हप सामवेद ११४ स्थामिभाव दृष्टि र १३ सामान्यमुणयोग ७४ के बाद स्थायी भाव-६१७ के बाद, ७३ सामा याशिनय २१२४ (लक्षम) के बाद मामान्याभिनय प्रकरण २११५० स्थित (ध्रवाज़) ३०३ सारथ्य (लक्षण) १५२ स्थितावर्ता चारी १०६१३ सालभकडिक २३३ न्धैर्प (पीरुष सत्वभेद) २१ २७,३१ मिदि-६२,१३२५१-३३ स्निम्धा र दूष्ट ८ १२१३ सिद्ध १५३ म्मित-६२२ के बाद मिशक्षितक करण ४ १११ स्वभावज अलङ्कार २१४१०-२० मिहत्रिक्रीटिन ६११० स्वभावज वर्ण-२० १० सुकुमार प्रयोग १३१०,१४२४ ५ स्वर (दाखो वोणा ममुदाय म) २६१५ ३५ १०४ स्दरर (गगेर बीणा मे) २६१३ सुधाकर्म २३३ सवर ६२१४२६१४ सुषिर ६१३१६२६१२ स्वर (रसानुमार) -- २७१०११ सुषिग विध न २८ १-११ स्वरभज्ग ६दे सूचा २१-६,३८ ४३ स्वसतिक करण ४३६ मूची ४ ६७ १० ६३२ स्वस्तिकरेचित ४२८ सूची विद्ध ४ ६६ स्वेद ६६ सूची विद्ध मण्डल ११ २, १६-२० हरिणलुप्त ४ १०४ सून्रधार ५ ३५,६८,६५,३२७ हरिणप्लुता १०१०४१ सूवधार प्रवेशन ५२४-३६ हतित ६२२ के बाद मूत्रभूद ५ ६० हाव २१ ५,६,८,६ सोष्ठच ४२१,१०५२,५३ २४, ६ हास्य रस ६ २२ के बाद स्खलित करण ४१०७ हास्या दृष्टि ८ १२ स्तम्भ- ६६ हृष्टा दृष्टि ८ १२,१३ स्तोभक्रिया ५ ६५ हेतु (लक्षण) -१५१ स्थान (उच्चारण के) १४.५ हेला- २१५६६