Books / Natya Sastra Abhinava Bharati Abhinava Gupta Manorama Parasanatha Dvivedi Vol 3 Sampoornanad

1. Natya Sastra Abhinava Bharati Abhinava Gupta Manorama Parasanatha Dvivedi Vol 3 Sampoornanad

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भरतमुनिप्रणीतं

नाट्यशास्त्रम् व्याख्याद्वयोपेतम् [तृतीयो भाग: ]

कुलपते: प्रो० राममूर्तिशर्मण: प्रस्तावनया विभूषितम्

हिन्दी- व्याख्याकार: सम्पादकश्च डॉ० पारसनाथद्विवेदी

सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविश्वविद्यालय: वाराणसी

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नाटचशास्त्रम नृतीयी भाग।

हुषापत: प्रा , रामनुतिगमगः प्रत्वापसया दयवियय

तम्पाक

सम्पूर्णनत्यसंस्कुत विश्व विद्यालय:

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GAŃGĀNĀTHAJHĀ-GRANTHAMĀLĀ [ Vol. 14]

NĀȚYAŚĀSTRA

Of ŚRĪ BHARATA MUNI [ PART THREE ] (CHAPTERS-12-18)

With the Commentary ABHINAVABHĀRATĪ By ŚRĪ ABHINAVAGUPTĀCĀRYA

& MANORAMĀ

(Hindi Commentary) By DR. PĀRASANĀTHA DVIVEDĪ

FOREWORD BY PROF. RAMMURTI SHARMA VICE-CHANCELLOR

EDITED BY DR. PĀRASANĀTHA DVIVEDĪ Ex-Dean, Faculty of the Sāhitya-Sanskrti Sampurnanand Sanskrit University, Varanasi

कृत-ि वववद्यालया सम्पूणनन्द चोखम्भा विद्याभवन . पैतम मे गोपाय पोस्ट बाक्स नं० 1069 VARANASI थोड, नागापडी ! 2001

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Research Publication Supervisor- ISBN : 81-7270-039-3(Vol.III)

Director, Research Institute ISBN : 81-7270-040-7 (Set) Sampurnanand Sanskrit University Varanasi.

Published by- Dr. Harish Chandra Mani Tripathi Director, Publication Institute Sampurnanand Sanskrit University Varanasi-221 002.

Available at- Sales Department, Sampurnanand Sanskrit University Varanasi-221 002.

First Edition, 1000 Copies

Price : Rs. 280. 00

Printed by- VIJAYA PRESS Sarasauli, Bhojubeer Varanasi.

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गङ्गानाथझा-ग्रन्थमाला [१४]

श्रीभरतमुनिप्रणीतं

नाटयशास्न्रम्

[द्वादशाध्यायादारभ्याष्टादशाध्यायान्तो तृतीयो भागः]

श्रीमदभिनवगुप्तकृतया 'अभिनवभारती' व्याख्यया डॉ. पारसनाथद्विवेदिकृतया 'मनोरमा' हिन्दी-व्याख्यया च समलङ्कृतम्

कुलपते: प्रो. राममूर्तिशर्मण: प्रस्तावनया विभूषितम्

सम्पादक: डॉ. पारसनाथद्विवेदी साहित्य-संस्कृति-संकायाध्यक्षचर: सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविश्वविद्यालयस्य, वाराणसी

संस्कृत विद्यालय: सम्पूर्णानन्द

नैतम मे गोपाय

वाराणस्याम् २०५७ तमे वैक्रमाब्दे १९२२ तमे शकाब्दे २००१ तमे खैस्ताब्दे

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अनुसन्धान-प्रकाशन-पर्यवेक्षक :- ISBN : 81-7270-039-3 (Vol.III) निदेशकः, अनुसन्धान-संस्थानस्य ISBN : 81-7270-040-7 (Set) सम्पूर्णानन्द-संस्कृत-विश्वविद्यालये वाराणसी।

प्रकाशक: डॉ. हरिश्चन्द्रमणित्रिपाठी निदेशकः, प्रकाशनसंस्थानस्य सम्पूर्णानन्द-संस्कृत-विश्वविद्यालये वाराणसी-२२१००२

प्राप्ति-स्थानम्- विक्रय-विभागः, सम्पूर्णानन्द-संस्कृत-विश्वविद्यालयस्य वाराणसी-२२१००२

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प्रथमं संस्करणम् - १००० प्रतिरूपाणि

मूल्यम् -२८०.०० रूप्यकाणि

मुद्रक :- विजय-प्रेस सरसौली, भोजूबीर वाराणसी।

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संस्कृत के तपोधन, संस्कृत-सेवा के महाव्रती संस्कृत-रक्षा के प्रहरी ऋषियों, मुनियों, मनीषियों एवं आचार्यों को सादर अर्पित

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न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला। न तत्कर्म न योगोडसौ नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते।।

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प्रस्तावना

महामुनि भरत द्वारा प्रणीत 'नाट्यशास्त्र' वास्तव में अपने विषय का विश्वकोश माना जाता है। भारतीय नाट्यकला के स्वरूप, तत्त्व तथा प्रकृति को समझने के लिए भरत मुनि का विश्वकोशात्मक 'नाट्यशास्त्र' ही आलम्बन है। नाट्यशास्त्र के आनुषङ्गिक विषय यथा-काव्य, संगीत, नृत्य, शिल्प आदि का विस्तृत विवरण पुङ्घानुपुङ्ख रूप से इस विश्वकोश में उपलब्ध होता है। वस्तुतः इसकी विविधता ने ही इसे विश्वकोशात्मकता प्रदान की है। चतुर्विध अभिनय-सिद्धान्त, गीत एवं विद्या-विधि, पात्रों की विविध प्रकृति तथा भूमिका, रस-निष्पत्ति, रूपकों के संघटक तत्त्व आदि नाट्य-विषयों का साङ्गोपाङ्ग विवरण देने वाला यह ग्रन्थ नाट्य-कला के प्रमाणभूत आकर ग्रन्थ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ है। इस ग्रन्थ का अपर नाम 'भरत-सूत्र' भी मिलता है, जो इसके रचयिता के लोकोत्तर व्यक्तित्व को प्रतिपादित करता है। 'नाट्यशास्त्र' में भरत मुनि को ही नाट्य-वेद का आचार्य बताया गया है। यह भरत-सूत्रात्मक 'नाट्यशास्त्र' वैदिक परम्परा को आत्मसात् किये हुए है। इसी तथ्य का रेखाङ्कन और सङ्केत अधोलिखित श्लोक में देखा जा सकता है- जग्राह पाठ्यमृग्वेदात् सामभ्यो गीतमेव च। यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ।। यह श्लोक इस तथ्य को प्रतिपादित करने के लिए स्वतः प्रमाण है कि वैदिक यज्ञादि विधियों में जो गीत, नृत्य, आङ्गिक-वाचिक अभिनय आदि आयोजित होते थे, उनका साङ्गोपाङ्ग क्रोडीकरण 'नाट्यशास्त्र' में हुआ है। इसीलिए इसे षट्साहस्त्री-संहिता भी कहा गया है। इस 'नाट्यशास्त्र' में ३६ अध्याय हैं, किन्तु इसके प्रमाणभूत व्याख्याकार अभिनवगुप्तपाद ने ३७ अध्यायात्मक 'नाट्यशास्त्र' का विवरण प्रस्तुत किया है। यह ग्रन्थ प्रधान रूप से पद्यात्मक शैली में प्रणीत हुआ है। इसके श्लोकों की कुल संख्या ६००० मानी गयी है। प्रायः अनुष्टुप् छन्द में रचित ये पद्य

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सूत्र अथवा कारिका के रूप में माने जाते हैं; परन्तु भरत मुनि ने यथाप्रसङ्ग आनुवंश्य श्लोकों, आर्याओं तथा सूत्रानुविद्ध आर्याओं का भी प्रयोग किया है। गद्य का भी प्रयोग सिद्धान्त-निरूपण, व्याख्यान तथा निर्वचन के लिए किया गया है। इस प्रकार 'नाट्यशास्त्र' में सूत्र, भाष्य, संग्रहकारिका एवं निरुक्त जैसी सभी प्राचीन शास्त्रीय पद्धतियों का पुङ्घानुपुङ्ख रूप से दर्शन होता है। इस लोकोत्तर, नाट्यवेदात्मक, षट्साहस्त्री-संहितात्मक 'नाट्यशास्त्र' की लोकोत्तरता, साङ्गोपाङ्गता तथा वैदिक-पारम्परिकता को ध्यान में रखते हुए शार्ङ्गदेव ने अपने 'सङ्गीतरत्नाकर' के एक श्लोक में भरत मुनि के 'नाट्यशास्त्र' के व्याख्याकारों की ओर सङ्केत किया है- व्याख्याकारा भारतीये लोल्लटोद्धटशङ्कुकाः । भट्टाभिनवगुप्तश्च श्रीमत्कीर्तिधरोऽपरः ॥ इसी प्रकार 'नाट्यशास्त्र' पर प्रणीत व्याख्याओं की सुदीर्घ ऐतिहासिक परम्परा का परिचय अभिनवगुप्तपादाचार्य की 'अभिनवभारती' टीका में भी मिलता है, जिसके अनुसार मुख्य रूप से १६ आचार्य नाट्यशास्त्र के भाष्यकार/ व्याख्याकार माने गये हैं; किन्तु इस षट्साहस्त्री-संहिता पर अभिनवगुप्तपादाचार्य की 'अभिनवभारती' टीका अप्रतिम मानी गयी है। आचार्य भरत मुनि का भारतीय काव्यशास्त्र, नाट्यशास्त्र, अभिनयशास्त्र तथा ललित-कलाओं के आदि आचार्य के रूप में स्मरण किया गया है। इनकी ऐतिहासिकता के बारे में विद्वानों में मतभेद है। कुछ लोग इन्हें ईसा पूर्व ५०० से १०० तक के मध्य मानते हैं; कुछ लोग ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी मानते हैं और कुछ लोग इन्हें ईसा की चौथी शताब्दी का मानते हैं। भारतीय परम्परा में इन्हें वृद्धभरत या आदिभरत भी कहा गया है। वस्तुतः भरत मुनि नाट्यशास्त्र के अत्यन्त प्रतिभासम्पन्न आचार्य रहे हैं। इन्होंने नाट्यशास्त्र, संगीतशास्त्र, काव्यशास्त्र, नृत्यशास्त्र, अभिनयशास्त्र का जो विवेचन अपनी प्रत्यग्र प्रतिभा से जिस वैज्ञानिकता एवं सूक्ष्मता के साथ किया है, उसने भारतीय नाट्यशास्त्र को पराकाष्ठा के शिखर तक पहुँचाया है। इस प्रकार की अलौकिक कृति, जो नाट्यवेद भी कही गयी है, का 'अभिनवभारती' एवं स्वप्रणीत 'मनोरमा' हिन्दी-व्याख्या के साथ सम्पादन करते हुए पुराणपुरुष प्रो० पारसनाथ द्विवेदी ने जिस कठोर समर्पण, विवेचन एवं

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विश्लेषण का परिचय दिया है, उससे प्रस्तुत संस्करण मानक ग्रन्थों की श्रेणी में आया हुआ माना जाएगा। अद्यावधि इस नाट्यवेदात्मक 'नाट्यशास्त्र' के प्रायः जितने संस्करण प्रकाशित हुए हैं, उन सबसे पाठभेदों का निर्धारण करते हुए प्रो० द्विवेदी ने शुद्धतम पाठ को अपना विवेच्य-पाठ बनाया है, यह हमारे लिए अत्यन्त परितोष की बात है। मैं सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय को गौरवशाली मानता हूँ कि भरत मुनि के इस नाट्यवेद के तीसरे भाग का इतनी उदात्त व्याख्याओं के साथ (१२ से १८ अध्यायों में) प्रस्तुतीकरण किया है। एतदर्थ मैं प्रो० पारसनाथ द्विवेदी को पौनःपुन्येन अपनी सम्मानाञ्जलि समर्पित करता हूँ और यह आशा करता हूँ कि वर्तमान समय में भी चुनौती बने इस नाट्यवेद का चौथा भाग भी उक्त व्याख्याओं के साथ शीघ्रातिशीघ्र प्रकाशित हो सकेगा। ऐसे लोकोत्तर यशस्वी ग्रन्थ के हृदयावर्जक प्रकाशक प्रकाशन-निदेशक डॉ० हरिश्चन्द्र मणि त्रिपाठी को हार्दिक धन्यवाद एवं आशीर्वाद देते हुए, प्रकाशन-संस्थान के ईक्ष्यशोधनप्रवीण डॉ० हरिवंश कुमार पाण्डेय, सहायक सम्पादक डॉ० ददन उपाध्याय, ईक्ष्यशोधक श्री अशोक कुमार शुक्ल, श्री अतुल कुमार भाटिया, प्रकाशन-सहायक श्री कन्हई सिंह कुशवाहा तथा पाण्डुलिपि-संग्राहक-सहायक श्री ओमप्रकाश वर्मा का वर्द्धापन करते हुए उनका मंगलाभिशंसन करता हूँ, साथ ही इस ग्रन्थ के मुद्रक विजय-प्रेस के सञ्चालक श्री गिरीश चन्द्र एवं इस भाग के आवरणपृष्ठ के सङ्कल्पक श्रीजी कम्प्यूटर प्रिण्टर्स के सञ्चालक श्री अनूप कुमार नागर को अपनी शुभानुशंसा प्रदान करता हूँ। अन्त में इस नाट्यवेद को आदि-नट सान्नपूर्णा भगवान् विश्वेश्वर के कर-कमलों में समर्पित करते हुए यह प्रार्थना करता हूँ कि यह नाट्यवेद सुधीजनों का महान् कल्याणकारक सिद्ध हो। रायमूर्ति शमा वाराणसी राममूर्ति शर्मा माघ-पूर्णिमा, वि.सं. २०५७ कुलपति सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय

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पुरोवाक् नाट्यशास्त्र एवं अभिनव-भारती की हिन्दी व्याख्या के साथ तृतीय भाग (१२-१८ अध्याय) सुधीजन के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए अपार हर्ष हो रहा है। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि इस भाग का भी प्रथम एवं द्वितीय भाग के समान स्वागत होगा। इस भाग में भी पूर्ववत् नाट्यशास्त्र का मूल एवं अभिनव-भारती व्याख्या का सम्पादन किया गया है और पाठभेदों को नीचे टिप्पणी में दिया गया है। नाट्यशास्त्र की मूल कारिका तथा अभिनव-भारती का हिन्दी अनुवाद नीचे दिया गया है। तत्पश्चात् विमर्श के अन्तर्गत विषय के स्पष्टीकरणार्थ मत-मतान्तरों की समीक्षा की गई है। प्रस्तुत संस्करण का अनुवाद मूलग्रन्थ के मन्तव्यों के अनुरूप दिया गया है और विवेच्य विषय को विमर्श के अन्तर्गत व्याख्यात किया गया है। ग्रन्थ के प्रारम्भ में एक प्रस्तावना दी गई है, जिसमें इस संस्करण के प्रतिपाद्य विषय की संक्षिप्त रूपरेखा दी गई है। अन्त में परिशिष्ट के अन्तर्गत श्लोकार्धानुक्रमणी भी दी गई है। इसके आगे का अंश चतुर्थ भाग में प्रकाशित होगा। प्रस्तुत संस्करण के सम्पादन में मुख्य रूप से "गायकवाड़ ओरियण्टल सीरिज, बडौदा' से प्रकाशित संस्करण का पाठ ही आधार रूप में स्वीकार किया गया है और उसके पाठभेदों को बहुत कुछ अपरिवर्त्तनों के साथ यहाँ भी दिया गया है तथा प्रस्तुत संस्करण के 'क' सङ्केत द्वारा उनका निर्देश किया गया है। इसके अतिरिक्त पाठ-निर्धारण में चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस, काव्यमाला संस्करण तथा एम.एम. घोष द्वारा सम्पादित एवं प्रकाशित संस्करणों का भी उपयोग किया गया है। इसमें चौखम्बा संस्करण के पाठों का निर्देश 'ख' सङ्केताक्षर द्वारा तथा काव्यमाला संस्करण के पाठों का निर्देश 'ग' सङ्केताक्षर द्वारा और एम.एम.घोष संस्करण के पाठों का निर्देश 'घ' सङ्केताक्षर द्वारा किया गया है। पाठ-निर्धारण में अर्थसङ्गति तथा पूर्वापर प्रसङ्गों पर भी विचार किया गया है और शुद्ध पाठ को मूल में रखा गया है तथा अशुद्ध एवं विकृत पाठ को नीचे पाद-टिप्पणी में दिया गया है। प्रस्तुत संस्करण के प्रकाशन में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रकाशन निदेशक डॉ. हरिश्चन्द्र मणि त्रिपाठी ने पूर्ण तत्परता के साथ सहयोग प्रदान किया है। यदि उनका सहयोग प्राप्त न होता, तो सम्भवतः यह संस्करण प्रकाश में न आ पाता। अतः उनके प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। इसके अतिरिक्त नाट्यशास्त्र के उन सभी आचार्यों, ग्रन्थकारों तथा समालोचकों का भी कृतज्ञ हूँ, जिनकी कृतियों

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से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में सहायता मिली है। विजय प्रेस के व्यवस्थापक श्री गिरीशचन्द्र जी के प्रति आभार प्रकट करता हूँ, जिन्होंने बड़े उत्साह एवं लगन के साथ कलात्मक ढंग से इस ग्रन्थ का मुद्रण कार्य सम्पन्न किया है। प्रस्तुत ग्रन्थ को यथासम्भव शुद्ध बनाने का प्रयास किया गया है, फिर भी मानव-सुलभ त्रुटियों एवं न्यूनताओं का रह जाना स्वाभाविक है, अतः उसके लिए क्षमा-याचना करते हुए माननीय विद्वानों से विनम्र निवेदन है कि उन्हें जहाँ कहीं भी त्रुटि एवं कमी का अनुभव हो, सूचित करने की कृपा करें, जिससे अगले संस्करण में उनका परिमार्जन किया जा सके। प्रस्तुत ग्रन्थ को अधिक पूर्ण एवं उपयोगी बनाने की दिशा में जो भी सुझाव मिलेंगे, उनका मैं हृदय से स्वागत करूँगा। लेखक के अल्प अध्ययन एवं सीमित सामर्थ्य से एक गुरुतर, गम्भीर एवं जटिल विषय पर किया गया यह लघु प्रयास सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत है। इसकी सफलता/असफलता का निकष वस्तुतः उन्हीं का परितोष है। जैसा कि महाकवि कालिदास ने कहा है कि- आ परितोषाद्विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम्।

दीपावली वि.सं. २०५७- विनयावनत पारसनाथ द्विवेदी वाराणसी

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फोममन लइ

विषयानुक्रमणिका

गतिप्रचार:

पात्राणां रङ्गप्रवेशविधि: २ पादपातविधि: ८ गतौ लयविधि: १२ ११ उत्तमानां स्वभावगति: १५ १४ मिश्रगति: २२ १६ दिवौकसां गति: २४ १७ जडानां गति: ३३ २० ज्वरातंतपःश्रान्तादोनां गति: ३५ २१ गतिषु नियमा: ४० २५ शृङ्गारिणीगतिः ४० २६ प्रच्छन्नकामिते गति: ४५ २८ रौद्रे गतिः ४८ ३० बीभत्से गति: ५५ ३३ वीरे गतिः ५७ ३४ विस्मये गति: ५८ ३६ हास्ये गति: ६० ३६ करुणे गति: ६० २७

शोते, वर्षाभिद्गुते गवि: ६८ ४१ भयानके गति: ७० ४२ शान्तेऽथवा वणिगमात्यादीनां गति: ७६ ४४

यतिश्रमणादिगतिः ७९ ४५ पाशुपतानां गतिः ८६ ११० अन्धकारयानयो: गति: ८७ ४८ रथस्थ गति: ८८ ४९ विमानस्थगति: ११ ५०

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आकाशगति: ९३ ५१ प्रासादाद्यारोहणावरोहणयो: गतिः ९६ ५२ सरिदवतरणे गतिः १०४ ५४ नौस्थस्य गतिः १०५ ५५ अश्वयाने गतिः १०९ ५६ पन्नगगति: ११० ५६ विटस्य गतिः १११ ५७ कञ्चुकीयस्य गतिः ११३ ५७ कृशव्याधिग्रस्तादीनां गति: ११६ ६० दूराध्वनीनस्य गति: ११९ ६०

स्थूलस्य गतिः १२० ६१ मत्तानां गति: १२२ ६१ उन्मत्तस्य गति: १२४ ६२ खञ्जपङ्गवामनानां गतिः १३३ ६४ विद्षक गति: १३८ ६५ चेटानां गति: १४८ ६९ शकारस्य गति: १४९ ६९ पुलिन्दादोनां गतिः १५२ ७२ पक्ष्यादीनां गतिः १५३ ७२ स्त्रीणां गति: १६० ७४ आयतस्थानम्, विनियोग: १६२ ७५ अवहित्थस्थानम् १६५ ७५

अश्वक्रान्तम् १७३ ७७ स्त्रीणां प्रकृतिस्था गति: १७९ ७९ प्रौढ़ाया गतिविधि: १८७ ८१ प्रेष्यायाः गतिः १८९ ८१ नपुंसकानां गति: १९१ ८२ बालगति: १९४ ८३ भूमिका विपयंये पात्रगति: १९६ ८४

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आसनविधानम्

पुरुषपात्राणाम् आसनविधि: २१५ ९२ स्त्रीणामासनविधि: २१७ ९३ भृत्यादीनामासनविधि: २२२ ९४ सामान्य आसनविधि: २२४ ९५ सहासनम् २२७ ९६ शयनकर्माणि आसनविधि: २२८ ९७ आकुञ्चितम् २२८ ९७

समभ् २३० ९८ प्रसारितम् २३१ ९८ विर्वाततम् २३२ ९८ उद्ठाहितम् २३३ १८ नतम् २३४ ९९ भिन्नक्रमपाठवान् द्वादशोऽध्याय: - १००-१४२

त्रयोदशोऽध्याय:

कक्ष्याविभाग:

स्थानविभाग: ३ १४७ बाह्याभ्यन्तरविभाग: ८ १५० पूर्वदिग्लक्षणम् ११ १५२ प्रवेशनिष्क्रमविधि: १२ १५३ विकृष्ट संनिकृष्टभूमिविभाग: १७ १५४ अङ्कच्छेदे कालनियम: २५ १५७ हैमवता: २८ १५८ निषधवासिन: ३० १५८ नोलश्वेतपूर्वतवासिन: ३१ १५८ शुङ्गषद्वासिनः ३२ १५९ द्वीपान्तरवासिनां कक्ष्याविधि: ३३ १५९

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प्रवृत्तिनिरूपणम् प्रवृत्तिविभागः ३७ १६२

दाक्षिणात्याया देशा: ३८ १६८

आवन्तिकाया देशा: ४१ १७०

ओड्रमागध्या देशा: ४४-४६ १७१

पाञ्चालमध्यमाया देशा: ४८-४९ १७२

प्रदक्षिणाप्रदक्षिणाप्रदेशौ ५२ १७३

प्रवृत्तियोजना ५८ १७३

आविद्धप्रयोग: ६० १७६

धर्म्या द्वेविध्यम् ७० १८१

लोकधर्मी नाटयधर्मी च ७१ १८२

नाटयधर्मी ७४ १८४

चतुर्दशोध्यायः वागभिनय:

वागभिनस्य लक्षणम् १ १९६

वाचो महत्वम् २ १९६

वाच: सर्ववाङ्मयल्वम् ३-४ २०९

संस्कृतपाठयलक्षणम् ५ २२१

अक्षराणां विभाग: ८ २२२

वर्णानां स्थानानि १० २२२

घोषाधोषत्वम् ११ २२४

शब्दलक्षणम् २४ २२८ नामाख्यातयो: वणंनम् २६ २२९

उपसर्ग: ३२ २३०

निपात: ३३ २३१

प्रत्यय: ३४ २३२

तद्धितः ३५ २३२

विभ्त: ३६ २३३

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सन्धि: ३७ मRNO २३४

समासा: ३९ २३४ चूर्णपदलक्षणम् ४० २३४ निबद्धपदलक्षणम् ४० २३४

छन्दो निरूपणम्

छन्दो लक्षणम् ४४ २३६

उक्तादिष्वक्षरसङ्ख्या ४८ २३८

मालावृत्तलक्षणम् ४९ २३९

गायत्र्यां वृत्तसंख्या ५७ २४० उष्णिहि ५७ २४० अनुष्टुपि ५८ २४१ वृहत्याम् पङ्क्तयाम् ५८ २४१

त्रिष्टुब्जगत्यो: ५९ २४१ अतिजगत्याम् ६१ २४१ शक्वर्याम् ६२ २४१

अतिशक्वर्याम् ६३ २४२ अष्टयाम् ६४ २४२ धृत्याम् ६६ २४२

अतिधृत्याम् ६८ २४२ कृतौ ६९ २४३ प्रकृतौ ७१ २४३

आकृत्याम् ७४ २४३

विकृत्याम् ७५ २४७ संस्कृतौ ७६ २४४

अभिकृतौ ७७ २४४ उत्कृतौ ७८ २४४ गणविभाग: ८६ २४७

गुरुलघुलक्षणम् ९० २४८ गायत्र्यादीनां त्रिकादिगणसङ्ख्या ९२ २४८ सम्पदादि विधि: ९८ २५१

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विरामलक्षणम् १०० २५२ ११३ २५८

प्रस्तारक्रम: ११३ २५८ मात्राच्छन्दसि भेद: ११८ २६१ उद्दिष्टज्ञानम् १२८ २६६ नष्टज्ञानोपाय: १२९ २६६

पठचदशोध्याय:

वृत्तलक्षणम् तनुमध्या २ २७० मकरकशीर्षा ४ २७१ मालिनी ६ २७२ मालती ९ २७३ उद्धता ११ २७३ भ्रमरमाला १३ २७४ सिंहलेखा १५ २७५ मत्तचेष्टितम् १७ २७६ विद्युन्माला १९ २७७ चित्रविलासितम् २१ २७८ मधुकरी २३ २७९ पंक्ति २६ २८० उत्पलमाला २७ २८२ शिखिसारिणी २९ २८३ दोधकम् २६ २८४ मोटकम् ३१ २८४ इन्द्रवप्ता ३३ २८५ उपेन्द्रवज्ता ३५ २८६ रथोद़ता ३७ २८७ स्वागता ३९ २८९ शालिनी ४१ २९०

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तोटकम् ४३ २९१

कुमुदप्रभा ४५ २९२ कुमुदनिभा ४७ २९४

चन्द्रलेखा ४९ २९४ प्रमिताक्षरा ५१ २९५ वंशस्थ ५३ २९६ हरिण लुप्ता ५५ २९७

कामदत्ता ५७ २९८ अप्रमेया ५९ २९९ प्मिनी ६१ ३०१ पुटवृत्तस् ६४ ३०३

प्रभावती ६६ ३०५ प्रहर्षिणी ६८ ३०६ मत्तमयूरक: ७० ३०७

बसन्ततिलका ७२ ३०८ असम्बाधा ७४ ३०९

शरभा ७६ ३१० नान्दीमुखो (मालिनी) ७८ ३११

गजविलसितं ८० ३१२ प्रवरललितम् ८२ ३१३ शिखरिणो ८४ ३१६ वृषभचेष्टितम् (हरिणी) ८७ ३१८ श्रीधरा ८८ ३१९ वंशपत्रपतितम् ९१ ३२१

विलम्बितगतिः ९३-९४ ३२२ चित्रलेखा ९६ ३२४ शार्दूलविक्रोडितम् १९ ३२५

सुवदना १०१-१०२ ३२८ स्रग्धरा १०४-१०५ ३३०

मद्रकम् १०७-१०८ ३३२ अश्वलितम् ११०-१११ ३३४

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मेघमाला क्रोमन्चपदी ११३-११४ ३३६ ११६-११७ ३३८ भुजब्विजम्भितम् ११९-१२० ३४०

दण्डक: १२२ ३४३ विषमवृत्तलक्षणम् १२५ २४४ अर्धसमवृत्तम् १२७ ३४५ पथ्यालक्षणानि १३० ३४६ सर्वविषमपथ्या १३२ ३४७ विवसितपथ्या १३४ ३४७ चपला १३६ ३४९

विपुला १३८ ३५०

पथ्या १४४ ३५२ वानबासिका १४७ ३५३ केतुमती १४९ ३५४ अपरवक्त्रम् १५१ ३५५

पुष्पिताग्रा १५३-१५४ ३५६

उद्गता १५६ ३५७ ललिता १५८ ३५८ आर्याणां सामान्यलक्षणम् १६३ ३६० आर्या: वृत्तम् १६४ ३६१

आर्याणां यतिनियमा: १६६ ३६१ पथ्याविपुलालक्षणम् १७१ ३६६ चपला १७३ ३६७ मुखचपला, जघनचपला १८६ २६७ आर्याणां प्रस्तार: १८७ ३६८

बोडशोऽध्याय:

लक्षण विचार:

लक्षणानामुद्दे शः १-३ ३८३

विभूषणलक्षणम् ५ ३८४

अक्षरसङ्घात: ६ ३८७

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शोभा ७ ३८९

अभिमान: ८ ३९२ गुणकोतंनम् ३९५

प्रोत्साहनम् ११ ३९७

उदाहरणम् १२ ३९८

निरुक्त्तम् १३ ३९९ गुणानुवादः अतिशायः १४ ४०१

हेतु: १५ ४०५

सारूष्यम् १५ ४०७

मिथ्याध्यवसाय: १६ ४०८

सिद्धि: १७ ४०९

पदोच्चय: १८ ४१०

आक्रन्दः १९ ४११

मनोरथ: १० ४१३

आख्यानम् २१ ४१४

याम्चा २२ ४१६

प्रतिषेध: २३ ४१७

पृच्छा ४१९

दृष्टान्त: २५ AÈ ४२०

निर्भासनम् २६ ४२१

संशय: २७ ४२२

आशो: २८ ४२३

प्रियवचनम् २९ ४२४

कपटम् ३० ४२६

क्षमा ३१ ४२७

प्राप्ति: ३२ ४२९

पश्चात्ताप: ३३ ४३९

अनुवृत्ति: ३४ ४३०

उपपत्ति: ३५ ४१२

पुक्ति: ४३४

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कार्यम् ३७ अनुनीति: ३८ ४३६ परिदेवनम् ३९ ४३७

अलद्कार निरूपणम्

अलक्कारा ४० ४४०

उपमालक्षणम् ४१ ४४३

उपमायाः पञ्चभेदा: ४६ ४४५

प्रशंसोपमा ४७ ४४५

निन्दोपमा ४८ ४४५

कल्पिता ४९ ४४६

सदृशी ५० ४४६

दीपकम् ५३ ४४८

रूपकम् ५६ ४४९

यमकम् ५९ ४५२

यमकभेदा दश ६०-६२ ४५३

पादान्तयमकम् ६३ ४५३

काञचीयमकम् ६६ ४५४

समुद्गयमकम् ६८ ४५५

विक्रान्तयमकम् ७० ४५६

चक्रवालयमकम् ७२ ४५७

सन्दष्टयमकम् ७५ ४५८

पादादियमकम् ७७ ४५९

आम्रेडितयमकम् ७९ ४५९

चतुव्यवसितम् ८१ ४६०

मालायमकम् ८३ ४६१

घोष-विचार:

काव्यदोषा: ८८ ४६२ गूढार्थलक्षण ८९ ४६३ अथांन्तरलक्षण ८९ ४६३

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( १ )

अथंहोन ९० ४६४ भिन्नार्थ ९० ४६४ एकार्थंलक्षण ९२ ४६४ अभिष्लुताथं ९३ ४६६ न्यायादपेत ९३ ४६६ विषम ९३ ४६६ विसन्धि ९४ ४६७ शब्दच्युतक ९४ ४६७

गुणा: ४६९ श्लेष: ९७ ४७० प्रसाद: ९९ ४७२ समता १०० ४७४ समाषि: १०२ ४७७ माधुयंसु १०४ ४८२ भोष: १०५ ४८४ सौकुमार्यम् १०७ ४८७ अर्थव्यक्ति: १०८ ४८८

उदारता ११० ४८९ कान्ति: ११२ ४९१ रसेषु वृत्तविभाग: ११४ ४९३ पाठ्येऽक्षरविधि: १२३ ४९७

अनुबन्धलक्षणानि

भूषणाद्युद्देश: १-५ ५००

भूषणम् ६ ५०३ अक्षरसङ्कातः ७ ५०५

शोभा ८ ५०६

उदाहरणम् ५०७ हेतु: १० ५०८

संचय: ११ ५०९

दृष्टान्त: १२ ५१०

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( १२ )

प्राप्ति: १३ १११

अभिप्रायः १४ ४१२

निदशंनम् १५ ५१३

निरुक्तम् १६ ५१४

सिद्धि: १७ ५१५

विशेषणम् १८ ५१६

गुणातिपातः १९ ५१६

अतिशय: २० ५१७

तुल्यतर्क: २१ ५१७

पदोच्चय: २२ ५१८

दृष्टम् २३ ५१८

उपदिष्टम् २४ ५१९

विचार: २५ ५२०

विपयंय: १२६ ५२१

भ्रंश: १७ ५२२

अनुनय: २८ ५२३

माला २९ ५२४

दक्षिणस् ३० ५२४

गर्हंणम् ३१ ५२५

अर्थापति: E9S ३२ ५२६

प्रसिद्धि: ३३ ५२७

पृच्छा ३४ ५२८

सारूप्यम् ३५ ५२९

मनोरथ: ३६ ५३०

लेश: ३७ ५३१

क्षोभ: ३८ ५३२ गुणकीर्तनम् ३९ ५३३

अनुक्तसिद्धि: yo ५३४ प्रियोक्ति: ४१ ५३५

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सप्तवशोऽध्यायः भाषाविधानम्

प्राकृतलक्षणम् २ ५३८ प्राकृतभेदत्रयम् ३ ५३९ भाषायाश्चत्वारो भेदा: २७ ५४८ अतिभाषादि लक्षणम् २९ ९४९ नायकानुगुणपाठ्यम् ३३ ५५० संस्कृतस्याप्रयोग: ३५ ५११ प्राकृतपाठयस्य पात्राणि ३६ ५५१ स्त्रीणां पाठयम् ४१ ५५३ बर्बरादिषु पाठथविकल्प: ४६ ५५५

भाषा: विभाषा च ४९-५० ५५६ मागधी प्रयोग: ५१ आवन्ती, शूरसेनी च ५५७ ५२ ५५७ दाक्षिणात्या ५३ ५५७ शकारादि भाषा ५४ ५५८ नकारबहुला भाषा ५९ ५६० चकारबहुला ६० ५६० उकारबहला ६१ ओकारबहुला ५६० ६२ ५६० पात्राणां संबोधनविधि: ६५ ५६१ भगवच्छद्दप्रयोग: ५७ धार्यतातादिप्रयोग: ५६२ ६८ राज्ञां संबोधनम् ५६२ ६९ ५६२ भावमार्षवयस्यायुष्मन्साध्वादिप्रयोग: ७३-७४ ५६४ शाक्यादीनां ७८ अन्यपात्र सम्बोधनम् ५६५ ७९-१०० ५६६ पाठ्य विधानम १०१ ५७३ पाठ्यगुणा: १०१ सप्तस्वराणां रसेषु विनियोग: ५७३ १०२ ५७३

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( १४ )

स्थानत्रयलक्षणम् काकुभेदा: १०५ ५७८

वर्णविचार: १०८ ५८४

काकुविचार: १०९ १८६

षडलङ्कारा: ११३ ५८९

तेषां लक्षणविनियोगविधि: ११४ ५९०

रसेषु द्रुतादिकाकुभेदविनियोग: १२८ ५९६

षडङ्गानि, तेषां लक्षणानि, रसेषु विनियोगश्च १३० ५९७

विरामलक्षणम् १३२ ६०२

विरामे कृ्याक्षराणि १४० ६०८

पाठयधर्मा १४७ ६१०

अष्टादशोऽध्याय:

रूपकनिरूपणम्

दशरूपकाणि २-३ ६१७ सर्वरूपकाणां वृत्तिम।तृकत्वम् ४ ६१९

नाटक-लक्षणम् १०-११ ६२७

अङ्कलक्षणम् १४ ६३७ प्रवेशकविधानम् २६ ६४८

प्रवेशकलक्षणम् २८ ६४९

अङ्कच्छेदनियमा: ३२ ६५३

प्रवेशकविधानावसर: ३८ ६६०

अड्के प्रत्यक्षाप्रयोज्यानि ४१ ६६४

प्रकरणलक्षणम् ४४ ६६७

विष्कम्भकविधानम् ५४-५६ ६७५

नाटिकालक्षणम् ५७-६० ६७६

समवकारलक्षणम् ६३-६४ ६८३

विद्रवलक्षणम् ७० ६८६

त्रिविधकपटनिरूपणम् ९०:७१ ६८७

त्रिशुङ्गारलक्षणम् १० ७२ ६८८

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(१५ )

ईहामृगलक्षणम् ७८-८० = OF ६९३ डिमलक्षणम् ८४-८८ व्यायोगलक्षणम् ९०-९२ OTNET ६९५ ६९८

उससृष्टिका ड्कलक्षणम् ९४-९६ ७००

प्रहसनलक्षणम् १०२ ७०१

भाषालक्षणम् १०८ ७०९ वीथोलक्षणम् ११२ ७१५

वीथ्यङ्गानि ११३-११४ ७१६

उत्घात्यकम् ११६ ७१७

अवलगितम् ११७ ७१९ अवस्यन्दितम् ११८ ७१९

नालिका ११९ ७२१

वाक्केलो ११९ ७२१

असतप्रलाप १२० ७२२

प्रपञच १२१ ७२३

मुदव १२२ ७२४ अधिबल १२३ ०FF७२४ छल १२४ ७२५ व्याहार १२४ ७२६ त्रिगत १२५ ७२७ गण्ड १२६ ७२८

परिशिष्ट

इ्लोकार्धानुक्रमणिका ७३१ ७७३

=

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सक्कताक्षर

अ० पु० = अग्निपुराण अ०, अध्या० अध्याय अभिनव = अभिनव भारती अभिनव = अभिनवगुप्त अ० श० अमरुशतक

काव्यमाला निर्णयसागर प्रेस से प्रकाशित नाठ्यशास्त्र (सम्पूर्ण )

कुमार० = कुमार सम्भव

गायकवाड़ गायकवाड़ ओरिन्टल सिरीज, बड़ौदा गा० ओ. सी = " " " "

चोखम्बा चौखम्बा संस्कृत सोरिज, वाराणसी जे० ए० एच० आर० यस० = जनरल आफ आन्ध्र हिस्टोरिकल रिसरच, सोसाइटी।

जे. मो. आर० एम० जनरल आफ ओरिन्टल मद्रास

तापस० तापसवतसराज

ध्वन्या• = धवन्यालोक

ना० शा० नाठ्यशास्त्र

नि० सा० = निर्णय सागर

म.म० घोष मदन मोहन घोष काणे (पी० वी० काणे) पाण्डुरङ्ग वामन काणे दे० (यस० के० दे०) = सुशील कुमार दे

रघु० = रघुवंश

रह्ना. = रहनावली

वेणो० = वेबीसंहार विक्रमो० विक्रमोवंशीय

थाकु० = अभिज्ञानथाकुन्तल

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श्रीभरतमुनिप्रणीतं ना ट्य शा स्त्र म् [अभिनवभारतीव्याख्याविभूषितम् ] [तृतीयो भाग: ]

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। श्री:॥। भरतमुनिप्रणोतं नाट्यशास्त्रम्

'द्वादशोऽध्यायः

एवं व्यायामसंयोगे कायं मण्डलकल्पनम्। अतः परं प्रवक्ष्यामि गतीस्तु प्रकृतिस्थिता:२॥ १॥।

अभिनव-भारती श्रुत्यन्तविश्रान्तविधिर्या गतिः परमात्मनः। तां महानन्दसन्दोहतत्त्वमूर्ति१ स्तुमः सदा ॥ प्रकरणसङ्गतये 'प्रकृतानुपूर्वकं निरूपयिष्यमाणं प्रतिजानीते-एवमिति।

हिन्वी-व्याख्या गति-प्रचार मण्डल-विधान नामक ग्यारहवें अध्याय में चारियों के संयोग से बनने वाले मण्डलों का विधान बताया गया हैं अब इस बारहवें अध्याय में प्रकरण की सङ्गति के लिए प्रकृति के अनुरूप गतियों का निरूपण करते हैं- अभिनव-वेदान्तों के विश्रान्ति (पर्यवसान) की विधि रूप परमात्मा की जो गति है। महान् आनन्द-सन्दोह रूप (तत्त्वभूत) तन्मूर्त्ति स्वरूप उस गति की हम सदा स्तुति करते हैं।। अभिनव-प्रकरण की सङ्गति के लिए प्रकृत विषय के अनुरूप आगे निरूपण किये जाने वाले विषय में ग्रन्थकार प्रतिज्ञा करते हैं-'एवमित्यादि'। अनुवाद-इस प्रकार पूर्वोक्त (पिछले अध्याय में बतलाये गये) विधि से व्यायाम अर्थात् नाना चारियों के संयोग से बनने वाले मण्डलों की कल्पना करनी चाहिए। इसके बाद प्रकृति अर्थात् पात्रों की गतियों का वर्णन करूँगा ॥ १॥ १. ख. अथ त्रयोदशोऽध्यायः । २. क-प, गति तु प्रकृतिस्थिताम्। ३. क. (टि.) संवीहि सत्त्वमूर्ति। ४. क. (टि.) वणितानुपूर्वकम् ।

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व्यायामानामन्योन्यसंमीलनयोग्यानां चारीणां संहत्या योगे मिश्रीभावे सति मण्डलानां कल्पनमनुक्तमपि क्तु शक्यं बुद्धचेति तत उपरम्यते। तत्राङ्गिकस्य 2 रसभावयोविभागशो विनियोगस्य कृतत्वाद्यद्यपि क्वचित् तन्मिश्रणेऽपि पृरथग्वि- नियोगो न वक्तव्यः तथापि शिष्यहितप्रतिपन्नो मुनिर्दिशं दर्शयितुं शिरःप्रभृति- पादान्तं यानि अङ्गसंधेयानि कर्माण्युक्तानि तत्मेलनबलेन यो 'देहसन्निवेशो गतावेव न स्थितौ प्रकाराभावात्तस्य विनियोगं "प्रकटयिष्यन् चारीमण्डलप्रसङ्गस्या- चित्तवृत्तित्वाद्-गतिविनियोगमेव प्रतिजानीते। गतिश्च प्रकृति रसमवस्थां देशं कालं चापेक्ष्य वक्तव्या प्रतिपुरुषमभिधानात्। तत्र प्रक्रिया पूर्वमुच्यते, 'तदेतन शब्देन यावच्छब्दपर्यायवाचिना क्रमार्थेन काक्वाक्षिवदुभयतो धावता द्योतितम् ॥। १। अभिनव-व्यायामों के परस्पर सम्मीलन के योग्य चारियों के समूह रूप से योग (मिश्रीभाव) होने पर आचार्यों के द्वारा न कहे जाने पर भी अपनी बुद्धि से मण्डलों की कल्पना की जा सकती है, इसलिए अब उससे विरत होते हैं। उनमें। रस और भावों के सम्बन्ध में आङ्गिक अभिनय के विनियोग का विभाजन कर देने। से यद्यपि कहीं पर उनका मिश्रण होने पर भी अलग से उनका विनियोग नहीं करना चाहिए तथापि शिष्यों के हित की कामना से अर्थात् शिष्यों के हित-चिन्तक दिशा (मार्ग) दिखलाने के लिए शिर से लेकर पैर तक अङ्गों के जो कर्म कहे गये हैं उनके मेलन (मिलाने) के बल से जो शरीर का सन्निवेश है वह गति के विषय में ही है, न कि स्थिति के विषय में। क्योंकि वहाँ उनके प्रकारों का अभाव होने से उनके विनियोग को स्पष्ट करने के लिए चारी और मण्डल के चित्तवृत्ति का विषय न होने से गतियों का विनियोग बतलाने की प्रतिज्ञा करते हैं। प्रकृति (पात्र), अवस्था, रस, भाव, देश और काल की अपेक्षा करके गतियों का कथन करना चाहिए। क्योंकि प्रत्येक पुरुषों की गति अलग-अलग होती है। अतः पहिले उसकी प्रक्रिया को कहते हैं। कौए की आँख की तरह दोनों ओर दौड़ने वाले 'यावत्' शब्द के पर्यायवाची क्रमार्थक 'तु' शब्द से यह भाव द्योतित होता है॥ १॥

१. क. (टि.) संगत्या। २. क. (टि.) तत्राज्किकसाभागयोविनियोगशो। ३. क. (टि.) अङ्गकमसंयोगानि। ४. क. (टि.) भेदसंनिवेशो। ५. क. (टि.) प्रकटयिष्यामः । ६. क. (टि.) तदेतादृच्छन्देन थादृक्छन्दपर्यायवाचिना ।

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द्ववशोऽ्यायः

तत्राप्रविष्टस्य का गतिरिति प्रयोगोपक्रमं सूचयति तत्रोपवहनमिति।

विमर्श-इसके पूर्व ग्यारहवें अध्याय में मण्डल-विकल्पन का विधान बताया गया है। तदनुसार अनेक चारियों के संयोग से मण्डलों का रचना होती है। वहाँ उनके स्वरूप की कल्पना आचार्यो द्वारा नहीं बताई गई है, फिर भी अर्थात् आचार्यों द्वारा न बतलाये जाने पर भी स्वयं लक्षणों को देखकर उनके स्वरूप की कल्पना अपनो बुद्धि से कर लेना चाहिए। इसलिए यहाँ उनकी चर्चा नहों कर रहें। उसमें रस और भावों के प्रसङ्ग में विनियोग का विभागशः कथन किया है अतः उनके परस्पर मिश्रण हा जावे पर भी यद्यपि उनके विनियोग को अलग-अलग बतलाने को आवश्यकता नहों है तदपि शिष्यों के हित की कामना से भरतमुनि ने शिर से लेकर पाद पर्यन्त अङ्गों के कर्मों को कह दिया है और उनके मिश्रण कर देने से और स्थिति के विषय में प्रकारों के न होने से गति के विषय में ही विनिवोग को स्पष्ट करेंगे ।

अब प्रश्न यह उठता है कि जब पिछले अध्याय में चारो के संयोग से निमित मण्डलों को बतलाया है तो उनके उन मण्डलों के विनियोग अथवा योजना को क्यों नहीं बतलाया ? इस पर कहते हैं कि चारोमण्डल का प्रसङ्ग चित्तवृत्ति रूप नहीं है कि उन्हें रस एवं भावों की उपयोगिता में बतलाया जाय, अतः मण्डलों के विनियोग को न बतलाकर रस और भावों के अनुसार की जाने वाली गतियों के विनियोग को कहते हैं। क्योंकि यह गति प्रकृति (पात्रों) के दिव्य, अदिव्य और दिव्यादिव्य रूप और उसको अवस्था तथा देश और काल की अपेक्षा करके गति का कहना आवश्यक है। यह गति प्रत्येक पुरुषों में अलग-अलग होती है, यह आगे कहा जायगा। अतः पहिले उनकी प्रक्रिया को बतलाते हैं ॥ १ ॥

विमर्श-गति-विधान यद्यपि आङ्गिक अभिनय का अङ्ग है तथापि भरत ने इसके अन्तर्गत पाद-प्रचार, शयन, आसन आदि नाटयोपयोगी विभिन्न विघियों का तात्त्विक विवेचन किया है। इसमें रङ्गमञ्च षर पात्रों के प्रवेश से लेकर निष्क्रमण काल तक को प्रत्येक गतियों का शास्त्रोय विवेचन हुआ है। इसमें रस, भाव, अवस्था, देश, काल आदि को भिन्नता के अनुसार गतियों में भिन्नता, पात्रों के स्थानक, पाद-प्रचार, आसन, शयन, यान, आदि नाट्य-प्रयोग सम्बन्त्ो तात्त्विक सिद्धान्तों का निरूपण किया गया है। नाटय-प्रयोग को सफलता को दृष्टि से गति-विवान को नाट्य में बड़ा महत्त्व है ॥ १॥ अभिनव-रङ्गमञ्च पर जो पात्र प्रविष्ट नहीं होते, उनको किस प्रकार की गति होगी ? यह बतलाने के लिए प्रयोग के उपक्म को सूचित करते हैं-'तत्रोपव- हनमित्यादि'।

१. क. (टि.) प्रवेशोपक्रमं।

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नाटपशोस्त्रे

तत्रोपवहनं यथामार्गरसोपेतं कृत्वा भाण्डवाद्यपुरस्कृतम् । प्रकृतोनां प्रवेशने।। २॥ ध्र वायां 'संप्रयुक्तायां पटे चैवापकर्षिते"। कार्य: प्रवेशः पात्राणां नानार्थरससम्भवः ॥३॥ यद्रङ्गानुसारालाप इति प्रसिद्धं' तमालापं कृत्वा ध्रुवायां सम्यक् प्रवृत्तायां, कथं ? भाण्डवाद्यपुरस्कृतत्वादि रूपत्रययुक्तं कृत्वेति, त्रीण्यपि क्रिया- विशेषणानि। तन्त्रीभाण्डं वाद्यमानं पुष्करवाद्यम्। मार्गो देशः, रसः स्थायि- चित्तवृत्तिः। वीप्सायामव्ययीभावः यो यः कश्चिद्गृहोद्याननिर्देशः । रत्यादिश्चित- वृत्तिविशेष: तेनोपेतं कृत्वा, या ध्रुवा तथा उत्तमादिप्रकृतीनां यस्यावेशनं बुद्धौ प्रवेशो यत्र तथा कृत्वा। एतदुक्तं भवति- हंसाद्य पमानमुखेन प्रकृतिविशेष:, उद्यानादिविशेषश्चावश्यं ध्रुवासूपनिबन्धनीयः ॥२॥ अनुवाद-उस रङ्गमञ्न पर पात्रों के प्रवेश के समय भाण्डवाद्य पुरस्कृत, 'मार्ग' अर्थात् देश-काल और रसों से उपेत (युक्त) उपवहन-क्रिया सम्पन्न करके ध्रुवागान के सम्यक् प्रयोग किये जाने पर और जवनिका अर्थात् परदे के हटा दिये जाने पर नानार्थ रस के सजक पात्रों का प्रवेश कराना चाहिए।। २-३।। अभिनव-जो रङ्ग के अनुसार (पाठभेद से अङ्गों के अनुसार) किये जाने वाले, आलाप के नाम से प्रसिद्ध है उस आलाप का करके ध्रुवागान के सम्यक् प्रयोग हो जाने पर पात्रों का प्रवेश कराना चाहिए। ध्रुवागान का प्रयोग केसे करना चाहिऐ ? इस पर कहते हैं कि भाण्डवाद्य पुरष्कृतत्वादि तीन रूनों से युक्त करके (ध्रुवा का प्रयोग करे)। यहाँ ये तोनों क्रिया-विशेषण हैं। तन्त्री (वीणा) आदि भाण्ड हैं। यहाँ तन्त्री आदि भाण्डों को ग्रहण करने वाले को भाण्ड शब्द से अभिहित किया गया है। पुष्कर आदि वाद्य भी भाण्ड हैं, अतः तन्त्री आदि भाण्डों को ग्रहण करने वाले पात्र, पुष्कर आदि वाद्य और उनका वादन ये तीन रूप हैं। 'मार्ग' का अर्थ देश है और 'रस' स्थायी चित्तवृत्ति रूप है। यहाँ वीप्सा में अव्ययी- भाव समास है अर्थात् यथामागंम्-यथारसम्। जो किसी गृह एवं उद्यान का निर्देश है तथा जो रत्यादि चित्तवृत्ति विशेष है, उनसे युक्त करके, जो ध्रुवा तथा उत्तम, मध्यम एवं अधम पात्रों का जिसका आवेशन अर्थात् प्रवेश कराकर। यह कहा गया है कि हंस आदि उपमान के द्वारा प्रकृति-विशेष, चित्तवृत्ति-विशेष और उद्यानादि- विशेष का ध्रुवाओं में अवश्य उपनिबन्धन करना चाहिए ॥ २॥ १. ग. तत्रोपवाहनं। २. क-प. यथामागकलोपेतम्। ३. ख. प्रवेशनम्। ४. क. ग. सम्प्रवृत्तायां। ५. ख. चैवावकर्षिते। क. (टि.) चंवावघर्षिते। चैवावधट्टिते। ६. क, यदक्गानुसारालाप। ७. क. (टि.) प्रसिद्ध: क्रमाल।पं।

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दवेविशोऽव्याय:

एवं ध्रुवायां प्रवृत्तायामेवं सत्यां। पटेऽपकर्षिते यवनिकायामपसारितायां तवा सामाजिकानां नेपथ्यगुहादयमागत इति नटी निवत्यंते। चकारात्तत्काले पुनरुपोहनम्। ध्रुवाप्रवेशो लये मध्ये२ वलितया (वलितयेति को हलेन प्रयोगवल- नाद्युपदिष्टम्) शुष्काक्षरगानं कृत्वा, प्रवेश एव तथा समुचितस्थानकदृष्टिमुख- रागादिभियु क्तः कर्तव्यो यथा सामाजिकानां झटित्येवान्विताभिधाननयेन मुख्यरस- व्याप्तिरुदयते। प्रगीतं गीयमानग्रामरागाग्रगतैकगमकाकर्णने समग्रग्रामतत्त्व- संवेवनवशः। अभिनव-इस प्रकार ध्रुवा के प्रवृत्त हाने पर और जवनिका अर्थात् परदे के हटा दिया जाने पर नेपथ्य-गृह से 'यह आ गया' ऐसा सामाजिकों के कहे जाने पर नटीं रङ्गमञ्न से चली जाती है। 'पटे च' में चकार पद से यह सूचित होता है कि उस समय पुनः उपोहन करना चाहिए। ध्रुवा प्रवेश का तात्पर्य है कि मध्य लय में नर्त्तकी वलन करती हुई प्रवेश करे। यद्यपि नर्तकी स्वभावतः वलन करती हुई प्रवेश करती हैं अतः उसे शब्द से कहने को आवश्यकता नहीं है, फिर भी कोहल आदि आचार्यो ने बलनादि प्रयोग बताया है, इस दृष्टि से 'बलन करतो हुई' (वलितया) कहा है। शुष्काक्षर गान करके समुचित स्थानक, दृष्टि एवं मुखरा- गादि से युक्त पात्र इस प्रकार प्रवेश करे जिससे सामाजिकों को अन्विताभिधानवाद सिद्धान्त के अनुसार शीघ्र ही मुख्य रस की प्रतीति हो जाय। इसमें गाये जाने वाले ग्रामराग में मुख्यभूत एकगमक (ध्वनि-विशेष) के सुनने पर श्रोता समग्र ग्राम-तत्त्व को जानने के लिए परवश हो जाता है, उत्सुक हो जाता है। विमर्श-रङ्गमञच पर पात्रों का प्रवेश एक महत्त्वपूर्ण नाटय-क्रिया है। पात्र-प्रवेश के द्वारा सामाजिकों के हृदय में सुख-दुःखात्मक भावों का सृजन होता है। अतः रङ्गमञ्च पर पात्रों का प्रवेश इस प्रकार होना चाहिए कि पात्रों के प्रवेश काल से हो सामाजिकों के हृदय में रस का उदय होने लगे। इसीलिए भरत ने प्रवेश काल के पूर्व 'भाण्डवाद्य पुरस्कृत' तथा 'मागरसोपेत' उपोहन क्रिया का विधान बताया है। उपोहन को उपवहन भी कहते हैं। भरत के अनुसार जिससे स्वर उपवहन (धारण, परिशोलन) किये जाते हैं और उससे गीत का प्रवर्त्तन होता है और शुष्काक्षर से समन्वित होता है उसे 'उपोहन' कहते हैं। उपोह्यन्ते स्वरा येन तेन गीत प्रवर्त्तते। तस्मादुपोहनं ज्ञेयं शुष्काक्षरसमन्वितम् ॥ (नाट्यशास्त्र ३१।१३८)

१. क. पुनरुपोहनात्। २. क. (टि.) चलितया। ३. क. (टि.) मुख्यः सव्याधिरुदयते।

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नोटचशास्त्रे स्थानं तु वैष्णवं कृत्वा' ह्य तमे मध्यमे तथा। समुन्नतं समं चैव चतुरसत्रमुरस्तथा॥४॥ बाहुशीषें प्रसन्ने च नात्युत्क्षिप्ते च कारयेत्। ग्रीवाप्रदेशः कर्तव्यो 'मयूराञ्चितमस्तकः ॥ ५॥ अन्ये तु नानार्थरससम्भव इत्यत्र यथामार्गकलोपेतमिति पठन्ति। उभयतः शेषत्वेन व्याचक्षते-मार्गेषु चित्रादिषु याः कला द्विमात्राचतुर्मात्राष्टमात्रेति ग्रामेषु उच्यन्ते चालिप्तकादिबु कला वाद्याक्षराणीति। यद्यपि पात्राणामध्र वा अपि प्रवेशा वक्ष्यन्ते तथापि 'संभवमात्राभिधानमेतदुत्तममध्यमयोर्वा प्रस्तावादेवमुक्तम्। तयोहि ता ध्रु वाः प्रवेशास्तेऽपि वा चकारेण संगृहीता एव ।।३।। अथवा जिससे नाट्य प्रयोग को सूचना शुष्काक्षर ज्ञान और भाण्डवाद्य के द्वारा दो जातो है उसे 'उपोहन' कहते हैं। अभिनवगुप्त के अनुसार जिससे अङ्ग में पद, काल, ताल सहित स्वरों का संक्षेप और विस्तार से उपवहन किया जाता है उसे 'उपोहन' कहते हैं (उपाह्यन्ते समासव्यासतः पादकालतालमभिहृताः स्वराः यस्मिन्नङ्गे तदुपोहनम्)। इस प्रकार 'उपोहन' गोत का प्रारम्भिक भाग है जिसमें स्वरों का शुष्काक्षरों द्वारा गायन होता है और उपोहन-क्रिया के बाद नत्तंका का रङ्गमञ्व पर प्रवेश होता है। अभिनव-अन्य लाग 'यथामार्गरसापेतम्' के स्थान पर 'यथामार्ग- कलोपेतम्' पाठ मानते हैं और उसको दूसरी व्याख्या करते हैं-मार्ग अर्थात् चित्र आदि मार्गों में द्विमात्रिक, चतुर्मात्रक, अष्टमात्रक जो कलाएँ ग्रामराग में कही गई हैं और आलिप्तक आदि में जो कलाएँ वाद्य अक्षरों के रूप में कही गई हैं, उनसे उपेत (युक्त) होना चाहिए। यद्यपि विना ध्रुवागान के भी पात्रों का प्रवेश होता है यह आगे कहेंगे, फिर भी सम्भावनामात्र से ऐसा कहा गया है अथवा उत्तम और मध्यम पात्रों के प्रस्ताव के अनुसार ऐसा कहा गया है। क्योंकि उनकी वे ध्रु वाएँ और वे प्रवेश चकार से ग्रहण की गई हैं॥ ३ ।। अनुवाद-प्रवेश के समय उत्तम तथा मध्यम पात्र वैष्णव स्थानक में स्थित रहें, फिर वक्षःस्खल को समुन्नत, सम एवं चतुरस्र करें और बाहु एवं शिर को प्रसन्न अर्थात् अचल (स्थिर) रखें और अत्यन्त उत्क्षिप्त न करे। पीवा प्रदेश को मोर की तरह अ्चित (सुन्दर) जिसमें मस्तक हो जाय, उस प्रकार रखना चाहिए॥ ४५॥ १. क-म. कार्यमुत्तमे। २. ग. ग्रीवाप्रवेशः । ३. ग. मयूराङि्किस। ४. क. (टि.) संभवमात्राविधानं मस्तकः ।

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'कर्णादष्टाङ्कलस्थे च बाहुशीषें प्रयोजयेत्। उरसश्चापि चिबुकं चतुरङ्गुलसंस्थितम्॥ ६॥ हस्तौ तथैव कर्तव्यौ कटिनाभितटस्थितौ। दक्षिणो नाभिसंस्थस्तु वामः 2कटितटस्थितः ॥ ७॥

स्थानमिति त्र्यश्रेऽर्धद्विकतालभागिति वैष्णवं सममन्यत् समुन्नतम्। स्वप्रवेश एव सन्ने अचले प्रसन्ने नात्युत्क्षिप्ते अधो वा उपरि वा। अधोगामित्वं यत्नेन परिहार्यमिति श्लोकार्थमेव शिक्षयितुं स्पष्टमुपायमाह ग्रीवाप्रदेश इत्यादिना सार्धेन श्लोकद्वयेन। स्वस्थमयूरवदञ्चित सुरूपं शिरो यत्र ॥ ४-५ ॥ नाभिसंस्थ इति चातुरश्रयप्रस्ताव: खटकामुखः, वाम इत्यर्धचन्द्रः ।। ७ ।।

अभिनव-स्थानमिति-त्र्यस्त्र, चतुरस्र और विकृष्ट इन तीन स्थानों में त्र्यस् स्थान में वैष्णव स्थानक हो। उनमें एक पक्ष समान (सम) हो और दूशरा समुन्नत होना चाहिए। प्रसन्न इति-अपने प्रवेश के समय बाहु और शिर को सन्न अर्थात् अचल रखे। 'नात्युक्षिप्ते' का अर्थ है नीचे अथवा ऊपर। 'अधोगामित्व' (नीचे की ओर जाने) का यत्नपूर्वक परिहार करना चाहिए। इस प्रकार श्लोकार्थ के बताने के लिए स्पष्ट उपाय को 'ग्रीवाप्रदेश' इत्यादि ढाई श्लोक के द्वारा कहते हैं। स्वस्थ मोर के समान अञ्चित अर्थात् सुन्दर शिर हो जिसमें उसी प्रकार रखना चाहिए।। ४-५।।

अनुवाद-कान से आठ अङ्गल को दूरी पर बाहु और शिर को स्थित करे और उरस् अर्थात वक्षःस्थल से चार अङ्गल की दूरी पर चिबुक को स्थित करे। उसो प्रकार दोनों हाथों को कटि और नाभि तट पर स्थित करे। उनमें दाहिने हाथ को नाभि पर और बायें हाथ को कटि तट पर स्थित करना चाहिए॥ ६-७॥। अभिनव-'नाभिसंस्थः' पद से 'चतुरस्र' का सङ्कत है। अतः नाभिस्थित दाहिना हाथ खटकामख और कटिस्थित वाम हस्त का अर्धचन्द्र प्रयोग करना चाहिए, यह सङ्केत है॥ ६-७॥

१. ख. कर्ण्यदष्टाङ्गलिस्थे च। ग. कर्णाद्दष्टाङ्गुलस्थे च। क-म कर्णाभ्यां बाहुशिरसी स्यातामष्टाङ्गुलस्थिते। २. क-भ. उरसश्चापि देशाच्च चिबुकं चतुरङ्गुलम्। ३. क-म. कटिं नाभि तु संस्थितौ। ४. कग, कटितटे स्थितः। ५. तान्युत्क्षिप्ते। ६. यत्तेन।

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जद नाटचशास्त्रे

पादयोरन्तरं कारयं दौ तालावर्धमेव च। पादोत्क्षेपस्तु कर्त्तव्यः स्वप्रमाणविनिमितः ॥ ८।। चतुस्तालो द्वितालश्चाप्येकतालस्तथैव चतुस्तालस्तु देवानां पार्थिवानां तथैव च।। ९।। द्वितालश्चैव मध्यानां ताल: स्त्रीनीचलिङ्गिनाम्*। न चेदमुपविष्टस्थानकमपि तु गत्यानन्तयौंचित्यात्त स्थितस्थानकमेवेति दर्शयतुमाह-पादयोरन्तरमिति। "द्वौ तालावर्धतालश्च पादयोरन्तरं भवेदिति (१०-५२)। यत्स्थानकलक्षणं सूचित तदेव कार्यं नान्यदुपवेशनावित्यर्थः । तत्र स्थानकानन्तरं गतिमुपक्षिपति पावोत्क्षेप इति। स युक्तस्तेन भाविलक्षणेन देशकालपरिच्छेदेन च कर्तव्यः। स्वकर- मानेन च ताल: पात्रस्येत्यर्थः।।८।। तत्र देशपरिच्छेदं तावदाह एकताल इति। अभिनव-यह केवल बैठने का स्थानक नहीं है, अपितु गति के अनन्तर उचित होने से स्थित स्थानक दिखाने के लिए कहते हैं-'पादयोरन्तरमित्यादि'। अनुवाद-पात्र अपने पैरों को ढाई ताल के अन्तर पर रखे। उसके बाद हाथों के प्रमाण के अनुसार पैरों का उत्क्षेपण करे॥ ८ ॥ अभिनव-नाट्यशास्त्र के दसवें अध्याय में स्थानक का जो लक्षण बताया गया है कि स्थानक में ढ़ाई ताल के अन्तर पर पैरों को स्थिति होनी चाहिए, उसी को यहाँ करना चाहिए, उपवेशन के अतिरिक्त और कुछ नहीं करना चाहिए। अब स्थानक के बाद गति का उपक्षेपण करते हैं-'पादोत्क्षेप' इत्यादि। वह युक्त है, अतः देश-काल का परिच्छेद बतलाने वाले भावी लक्षण के अनुसार उपक्षेप करना चाहिए। ताल का लक्षण बाते हैं-अपने हाथ के प्रमाण को ताल कहते हैं ॥ ८॥ अनुवाद-पैरों का उत्क्षेपण चतुष्ताल, द्विताल तथा एकताल के प्रमाण के अनुसार करना चाहिए। उनमें चतुष्ताल देवताओं एवं राजाओं के लिए है, दो ताल मध्यम पात्रों के लिए और एक ताल स्त्री-पात्र एवं नीच पात्रों के लिए है । ९१०॥ अभिनव-उनमें पहले देश का परिच्छेद (प्रमाण) को कहते हैं-'एकताल' इत्यादि)। १. ग. पादक्षेपस्तु। २. ख. एकतालस्तथैव च । क-म. तथा स्यादेकतालकः । ३. ब. ग. श्वीनोचसज्रिनाम्। क-द. स्त्रीणां च लिफ्रिनाम्।

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द्वावशोऽध्याय:

चतुष्कलोऽथ द्विकलस्तथा ह्यककलः स्मृतः ॥ १० ॥ चतुष्कलो ह्य त्मानां मध्यानां द्विकलो भवेत्। तथा चैककलः 2पातो नीचानां संप्रकोर्तितः ॥ ११ ॥ ताल: प्रसारितमध्यमाङ्गुऽष्ठान्तरं "ताल: स्मृतौ मध्यमया ?" इति। संख्याक्रमेणाभिधाय स्थायिस्थानभूतोत्तमप्रकृतिविश्रान्तत्वात् प्रयोगजातस्य तदुपक्रमं विनियोगमाह चतुस्तालस्त्विति। तुशब्दोऽप्यर्थे कदाचिदन्यथापि भावात्। तथाशब्दो राज्ञां देवसदृशगत्य- संभावनापसारणद्योतक: ।।९।। स्त्रीणां नीचानां साहचर्यादधमानामिति मन्तव्यम्। तेषां हि लिङ्गित्वादध- मत्वं किचिन्न संभावयेत्। यथाशोभमिति नाटयधर्मोकाममित्यर्थः ॥१०।। देशनियममुक्त्वा कालनियमप्यौत्सगिकं तावदाह-चतुष्कलो हीति। अभिनव-फेलाई हुई तर्जनी और अंगूठे के बीच का प्रदेश (लम्बाई) 'ताल' कहलाता है। इसी को लोक में एकताल या एक बालिक्त (बित्ता) कहते हैं। अभिनव-संख्या के क्रम का उल्लंर्धन कर तालों को कहकर स्थायी आदि के स्थानभूत उत्तम प्रकृति में प्रयोगों की विश्रान्ति होने से उसके उपक्रम विनियोग को कहते हैं-'चतुष्ताल' इत्यादि। अभिनव-'यहाँ पर तु शब्द 'अपि' के अर्थ में हैं, कभी अन्यथा भी हो सकता है। 'तथा, शब्द राजाओं को देवताओं के समान गति असम्भव होने से सम्भावना के अपसरण का द्योतक है ।। ९॥ अभिनव-स्त्रियों और नीचों के साहचर्य से अधमों का भो ग्रहण मानना चाहिए। क्योंकि नीचों के लिङ्गी के कारण उनमें अधमत्व की कुछ भी सम्भावना नहीं है। यहाँ पर 'यथाशोभम्' यह नाटयधर्मी का बोधक है ॥ १०॥ अभिनव-इस प्रकार देश के नियम को कहकर अब काल के नियम को कहते हैं- अनुवाद-काल के माप के अनुसार पादोरक्षेप चतुष्कल, द्विकल और एककल होता है। इनमें उत्तम पात्र देवता एवं राजाओं के लिए चतुष्कल, मध्यम पात्रों के लिए द्विकल और अधम, स्त्रो एवं नीच प्रकृति के पात्रों के लिए एककल कहा गया है॥१०-११।। १. क. पुनः । २. ख-ग. पादो। ३. ङ. प्रसारितमध्यमा ? तर्जन्यङ्गुष्ठान्तरं। ना. शा०-२

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१० नाटयशास्त्रे

तथा चेति तेनोत्क्षेपेण यत्पादस्य पतनं तदुत्तनानां चतसृभिः कलाभिः यस्मात्तदर्धार्धक्रमेण मध्यमाधमयोः परिभाषित इत्युत्सर्गतयेति भावः । तत्र गति- चतुष्टयं मागध्यादि वक्ष्यते यत्तत्रार्धमागध्यादौ क्रमेण चित्रादित्रयविनियोगात। "निमेषा: पञ्च मात्रा स्यात्" इति कला सामान्यलक्षणलब्ध औत्स्गिकः सर्वत्र ध्रु वकमार्गो मन्तव्य । विशेषादभिधाने तेन ध्रु वकमानेन चतुष्कलः पादपातः तथा चोत्तमपरिग्रहे द्विपदी१ कोहलेनोक्ता- "स्यादुत्तमानां द्विपदी चतुर्गुरुसमन्विता। तत्रोत्क्षेपनिपाताभ्यां यस्मात्पादद्वयं भवेत्" ।।

विमर्श-पात्रों की प्रत्येक चेष्टा ताल, काल और लय पर आश्रित होतो है। इनमें देवताओं एवं राजाओं के पादोत्क्षेप का अन्तर चार ताल का होता है, मध्यम पात्रों का पादोत्क्षेप दो ताल और स्त्री एवं नीच पात्रों पादोतक्षेप का अन्तर एक ताल होता है। इसी प्रकाय पादोत्क्षेप का कालमान भी पाद-ताल के अनुसार हो होतो है। उत्तम पात्रों के पाद-न्यास में चार कला का, मध्यम पात्रों के चरण-न्यास में दो कला का और अघम पात्रों के पाद- न्यास में एक कला का समय लगता है। इसी प्रकार लय तीन प्रकार होते हैं-स्थित लय, मध्यलय और द्रुतलय। गम्भीर स्वभाव के पात्रों के गति क्रम में स्थितलय, मध्यम स्वभाव के पात्रों के गतिक्रम के लिए मध्यलय और अवम स्वभाव के पात्रों के गतिक्रम ये द्रुतलम का विषान किया गया है। १०-११ ॥। अमिनव-तथा चेति-पैर को उठाकर जो गिराना (पतन) है उसमें उत्तम प्रकृति के पात्रों के लिए चार कलाएँ कही गई है और उसका आधा-आधा क्रम मध्यम एवं अधम प्रकृति के पात्रों के लिए कही गई है, यह उत्सर्गतः होता है। भाव यह कि मध्यम प्रकृति के पात्रों के लिए दो कलाएँ और अधम प्रकृति के पात्रों के लिए एक कला बतलाया गया है। उनमें मागधी आदि चार गीतियों को आगे कहेंगे। क्योंकि अर्धमागधी आदि में क्रमशः चित्रादि त्रय का विनियोग होता है। पाँच निमेष की एक मात्रा होती है। इस सामान्य लक्षण से यह सूचित होता है कि सर्वत्र ध्रुवक मार्ग को औत्सर्गिक मानना चाहिए। विशेष रूप से कहने में ध्रुवक के प्रमाणानुसार पादोत्क्षेप में चार कलाएँ आवश्यक हैं, और कोहल ने उत्तमादि पात्रों के लिए द्विपदी आदि का विधान बताया है- "उत्तमों की द्विपदी चार गुरुओं से समन्वित होनी चाहिए। क्योंकि उत्क्षेप और निपातों के द्वारा उनमें दो पाद हाते हैं।" १. क. टि० द्विचारो।

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वाव द्वावशोऽ्याय:

'स्थितं मध्यं द्रुतं चैव समवेक्ष्य लयत्रयम्'। यथाप्रकृति नाट्यज्ञो गतिमेवं प्रयोजयेत् ॥ १२ ॥ लक्ष्यश्च इत्थमेव 'धिक् डिधि' इति द्विपदीभागेन पादेन पादपातः। अत्र ध्र वके चतस्रः कला भवन्ति। 'धिगडधिङ्' इत्यस्य काल: कखगघङ, इत्यादिना संकेतितः । नहि व्यञ्जनकाल: स्वरकालात्पृथक् तत्र गुरोश्च प्रचलत्वं 'खडतल- चडस्तद्विद्गिस्त्रिपुटमेवावधार्यते। तत्र हि धिगडिधि-इत्येवंरूपा लघु कला तस्यास्तिस्त्रो मात्राश्चतुर्थे गुर्वक्षरे द्वे मात्र इति च मात्राः । सर्वत्र चैवं प्रकार: समनन्तरग्रहणे विश्रान्त्यभावेन दुष्करः प्रयोग इति स्थानचेष्टाविश्रान्तिप्रक्लृप्तये मध्यगता 'विरामरूपैका मात्रा लक्ष्यविद्धिः प्रकल्पिता, तद्वशादुक्ताः तादृशाः मात्रा: चतुष्कलायां प्रतिभासन्त इत्यास्तां तावत्। इह चित्रमार्गेव चतुष्कलपाद- पतनमिति 'न्याय लक्ष्यलक्षणशोभावाह्यत्वादपेक्ष्यते च ॥११॥ अथ लयकालनियमशेषमाह- अभिनव-और लक्ष्य इसो प्रकार का होता है। 'धिक् डि धि' इस प्रकार द्विपदी भाग पाद से पाद का पात (पतन) होता है। यहाँ ध्रुवक में चार कलाएँ होती हैं। 'धिग् डि धिङ़' इसका काल 'क ख ग घ ड' इत्यादि के द्वारा सङ्गतित है। यहाँ व्यज्जनों का काल स्वरों के काल से भिन्न (पृथक्) नहीं है। उनमें स्वर कभी गुरु कभी प्लुत होने से प्रचल हैं। खड, तल, चट इस प्रकार के त्रिपुट व्यज्जनों में अवधारण करते हैं। उनमें 'धिग् डिधि' इस प्रकार लघु कलाएँ है जिनमें तीन लघु मात्राएँ है, चतुर्थ गुरु अक्षर में दो मात्राएँ है किन्तु यदि सभी जगह यही प्रकार होगा तो समन्तर-ग्रहण में विश्रान्ति का अभाव होने से अभिनव प्रयोग दुष्कर होगा। इसलिए विज्ञानों ने स्थान, चेष्टाएँ और विश्रान्ति को कल्पना करने के लिए मध्य में विराम रूप एक मात्रा की कल्पना की है। उस कल्पना के आधार पर वैसी मात्राएँ चतुष्कला में प्रतिभासित होतो है, इसलिए अब रहने दिया जाय। यहाँ चित्रमार्ग के द्वारा पाद के पतन में चार कलाएँ है, यह लक्ष्य-लक्षण की शोभा के बाहर होने से अपेक्षित नहीं है। अभिनव-अब इसके बाद लय विषयक काल के नियम को कहते हैं- स्थितमित्यादि। अनुवाद-नाट्यकला के विशेषज्ञ विद्वान् इस प्रकार स्थित, मध्य और द्रुत लय को अच्छी तरह समझकर पात्रों के अनुसार गति का प्रयोग करे ॥ १२॥ १. क=भ. स्थिरं। २. क. द. समं। ३. क-ग. लयं बुधः । ४. क. खण्डतलचेड़ल: । क-ख. खडकलयेद्धः । ५. क. मध्यगताऽपि समरूपैका मात्रा। ६. क, नायं।

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१२

धैर्योपपन्ना गतिरुत्तमानां मध्या गतिर्मध्यमसम्मतानाम्। द्रुता गतिश्च प्रचुराधमानां लयत्रयं सत्त्ववशेन बोज्यम्॥१३॥ स्थितमिति विलम्बितम् । समवेक्ष्येति प्रकृत्यादि भेदविभागेनेत्याह तमेव दर्शयति यथाप्रकृतीति धैर्यस्थैर्यबिलम्बितमध्यद्रुतलयसम्मतं संवेदनं यथार्थ-मिथ्या- गौण-धैर्य-गाम्भीर्यादिकृतं मन्तव्यं न तु जातिकालादिकृतम् । यथाप्रकृति। विदूषकस्य द्विजत्वेपि अविमलात्मत्वात् केवलमुत्तमघोषणायैव रचितं जात्यादि योजनीयम्। उतमस्याप्यन्यथाभावः क्तरचिदनुत्तमत्वेऽपि समीचीन- भाव इति ॥१२॥ प्रचुरेति लोकप्रसिद्धमेवेदमुक्तमित्यर्थः। न केवलं प्रकृतितोऽवयवभेदो यावच्चित्तवृत्तिभेदेनेत्यभिप्रेत्याह सत्त्ववलेन च लयत्रयं योज्यम् । सत्त्व चित्तवृत्ति: तेन संग्रामादावुत्तमस्यापि द्रुतं शोकादावधमस्यापि विलम्बितवम् ॥ १३॥

अभिनव-स्थित का अर्थ विलम्बित है। 'समवेक्ष्य' का अभिप्राय है प्रकृति आदि (पात्रों) में भेद के विभाग के अनुसार अच्छी तरह देखकर (विचार कर) आदि पद से यहाँ देश, काल, अवस्था, रस आदि का ग्रहण है, उन्हें देखकर यह कहा है, उसे ही दिखाते हैं-'यथाप्रकृति' का तात्पर्य है धर्यं, स्थेर्य के कारण विलम्बित लय तथा इसके अभाव में कभो मध्य और कभी द्रुत लयो से सम्मत संवेदन ज्ञान को यथार्थ, मिथ्या, गौण गत धैर्य, गाम्भीर्य आदि से किया हुआ मानना चाहिए और ज्ञाति, काल आदि से किया हुआ नहीं मानना चाहिए। क्योंकि विदूषक के द्विज (ब्राह्मण) होने पर भी उसको आत्मा विमल (पवित्र) न होने से केवल उत्तम घोषणा के लिए जात्यादि की रचना की है, यह योजना करनी चाहिए। क्योंकि उत्तम जाति के होने पर भी अन्यथाभाव अर्थात् विकार-भाव देखा आता है और कहीं उत्तम जाति के न होने पर भी उत्तम भाव होते हैं ॥ १२॥ अनुवाद-उत्तम पात्रों की गति धैर्य से युक्त (स्थितलय में ) होती है। मध्यम माने जाने वाले पात्रों की गति मध्य लय में और अधम पात्रों की गति ब्रुत होती है। इस प्रकार सत्त्व के अनुसार तीनों लयों की योजना करनी चाहिए।। १३ ।। अभिनव-प्रचुर का अभिप्राय है यह लोकप्रसिद्ध है, ऐसा कहा गया है। केवल प्रकृति (पात्रों) के अनुसार अवयवों का भेद नहीं होता। अपितु चित्तवृत्तियों के भेद से भेद होता है, इस अभिप्राय से कहते हैं कि सत्त्व के कारण तीनों लयों की १. कनप. स्थैर्योपपन्ना । २. क-न. प्रकृताधमाना ।

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एष एव तु विज्ञेयः कलाताललये विधिः। पुनर्गतिप्रचारस्य प्रयोगं शृणुतानघाः ?॥ १४॥ अत्र गत्यनुसारी तालविधिः । अन्ये त्वन्यथेत्युक्त ताले। यस्ताललयः कला- सहितः स कलाताललयः इति मध्यमपदलोपी समासः । तेनायमर्थः ध्र वतालेऽपि गत्यनुसार्येव कलाविधिलयविधिश्च। अत एवैतदनुसारेण भट्टलोल्लटगोपालादिभिर्भ- ड्रोपभङ्गविभङ्गविषये तालदीपिकादौ चिरन्तनसंमतो ध्रुवातालानां विनियोग: प्रपञ्चतो दूषितः । तत्तु ध्रुवाध्याये विचारयिष्याम इत्यास्ताम्। एवं देशकालनियममुक्त प्रकृते योजयति पुनर्गतिप्रचारस्येति गतिषु। प्रचारो वैचित्र्यं तस्य प्रयोगं पुनः शृणुतेति संबन्धः । संघटना ह्यनुक्तेति भावः ॥ १४ ॥ अथैतदनुसारिण्यां गत्युपयोगिन्यां ध्रवार्या विधिरिति दर्शयति एष त्विति। योजना करनी चाहिए। सत्त्व का अर्थ है चित्तवृत्ति। इससे सङ्ग्राम आदि में उत्तम पात्र का भो लय द्रुत होता है और शोक आदि में अधम पात्र का भी लय विलम्बित होता है ॥ १३ ॥ अभिनव-अब इसी के अनुसार गति की उपयोगिनी ध्रुवा में यही विधि होती है, यह दिखाते हैं-'एष एव' इत्यादि। अनुवाद-हे अनघ ? काल, ताल और लय के विषय में यही विधि समझनी चाहिए। अब गति प्रचार के प्रयोग को सुनिये ॥। १४ ॥। अभिनव-यहाँ पर गति के अनुसार ताल विधि होती है। अन्य लोग तो ताल के विषय में अन्यथा (अन्य प्रकार से) विधि बताते हैं जो ताल लय कला के सहित है वह कलाताल लय है। इस प्रकार यहाँ मध्यमपदलोपी समास है। इससे यह अर्थ है-ध्रुव ताल में भी गति के अनुसार ही कलाविधि और लयविधि होती है। इसलिए इसका अनुसरण करने वाले भट्टलोल्लट, भट्टगोपाल प्रभृति आचार्यो ने भङ्ग, उपभङ्ग और विभङ्ग के विषय में तालदीपिका आदि ग्रन्थों में चिरन्तन- सम्मत ब्रुवातालों के विनियोग को विस्तार से दूषित किया हे। ध्रुवाध्याय में इसका हम विस्तार से विचार करेंगे, इसलिए यहाँ रहने दिया जाय। इस प्रकार पहिले कहे हुए देश-काल के नियम को प्रकृत में योजना करते हैं-गतियों के प्रचार के प्रयोग को फिर से सुनिये। भाव यह कि गतियों में जो प्रचार है, विचित्रता है, उसके प्रयोग को फिर से सुनिये, यह सम्बन्ध है। संघटना नहीं कही गई है, यह भाव है ॥ १४ ॥ १. ख. ग. एष एव भुवि ज्ञेयः। २. ख. पुनर्गतिप्रचारस्य।

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नाटचशास्ये

'स्वभावात्तूत्तमगतौ कार्यं जानु कटीसमम् । युद्धचारीप्रयोगेषु जानुस्तनसमं न्यसेत् ॥ १५॥ पाश्वक्रान्तैः सललितैः पादैर्वाद्यान्वितैरथ। रङ्गकोणोन्मुखं गच्छेत् सम्यक् पञचपदानि च ॥ १६ ॥ वामवेधं ततः कुर्याद्विक्षेपं दक्षिणेन तु। परिवृत्य द्वितीयं तु गच्छेत् कोणं ततः परम् ॥ १७ ॥ स्वभावात्विति। तुना विशेषद्योतकेन मन्थरगतौ चतुरतालत्वमुक्त, स्वभाव गतौ तु त्रितालत्व्रं, दीप्तगतौ तु पञ्चतालत्वमपि कार्यमिति दर्शयति ॥१५॥ तां गतिप्रचारघटनामाह-पार्श्वक्रान्त रित्यादि। "कुञ्चित पातमुत्क्षिप्य पाश्वोत्थानोत्थित न्यसेत। उद्धट्टितेन पादेन पारश्वक्रान्ता विधीयते" (१०-३२) इति पाशर्वक्रान्ता चारी। रङ्गकोणं पूर्वोत्तरम् ॥ १६ ॥ अनुवाद-उत्तम पात्रों की स्वाभाविक गति में जानु और कटि को सम रखना चाहिए और युद्धवारो के प्रयोगों में जानु और स्तम के सम (बराबर) में रखे ॥ १५ । अभिनव-'स्वभावात्तु' में विशेषता के द्योतक 'तु' शब्द के द्वारा यह सूचित किया गया है कि मन्थर गति में चार ताल कहे गये हैं, स्वभाव गति में तीन ताल और दीप्त गति में पाँच ताल का प्रयोग करना चाहिए, यह दिखाया गया है ॥१५॥ अभिनव-इसके बाद गति-प्रचार की घटना को कहते हैं-'पार्श्वक्रान्तैरित्यादि'। अनुवाद-इसके बाद वाद्य-ध्वनि से युक्त पाश्वक्रान्ताचारी के अनुसार सुन्दर ललित पैरों से रङ्गमञ्च के कोण अर्थात पूर्वोत्तर कोण में उन्मुख होकर अच्छी तरह पाँच पग चले ॥ १६ ॥ अभिनव-कुञ्वितमिति-'यदि कुञ्चित पाद को पार्श्व (बगल) से ऊपर की ओर उठाकर फिर उद्घट्टित पाद से पृथ्वी पर रखे तो 'पाश्वक्रान्ता' चारी होती है।। (१०-३२) ।। यह पारश्वक्रान्ताचारी का लक्षण है। रङ्गकोण का अर्थ पूर्व और उत्तर का कोण (कोना) है॥ १६ ॥ अनुवाद-इसके बाद वाभवेध करके दक्षिण पैर से विक्षेप करे। उसके बाद द्वितीय पाद को परिवत्तित करके दूसरे कोण में चले॥ १७॥ १. ख. स्वभावैरुत्तमतौ। क. ग. स्वभावे तूत्तमगती। २. क. ग. पुनः स्तनसमं भवेत्। ३. ख. रङ्गकोणोन्मुखो।

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द्वावशोऽध्याय: १५

तत्रापि वामवेधस्तु विक्षेपो 'दक्षिणेन च। ततो भाण्डोन्मुखो गच्छेत् तान्येव *तु पदानि च ।। १८ ।। एवं गतागतैः कृत्वा पदानामिह3 विशतिम्। वामवेधं ततः कुर्यात् विक्षेपं "दक्षिणस्य च ॥ १९ ॥। रङ्गे विकृष्टे भरतेन कार्यो गतागतैः पादगतिप्रचारः । "त्र्यश्रस्त्रिकोणे चतुरस्ररङ्के गतिप्रचारश्चतुरस्त्र एव ॥ २०॥ द्वितीयं कोणमित्युत्तरपश्चिममिति। ततः परमिति । कोणद्वयेऽतिदिशि पूर्व रङ्गे चैषा पञ्चपदी व्याख्याता (अ ५-७३)। वेधः पाष्णिक्षेत्रे सूचीपादनिपातः। वामवेधमिति अन्तराविद्धमुखं (तत्) प्राप्तिसिद्धौ कोणैर्गत्वा ब्रह्मस्थानस्यानुल्लंध्य- तामाह। एतच्च पञ्चपदीगमनं सर्वत्रौत्सर्गिकम्।१७-१९। विशेषमप्याह रङ्गे विकृष्ट इति । भरतशब्देन उपचारतस्तद्विद्यायोनिसंबन्धः सूच्यते। गतागतैरिति परिमितायां दिशि पञ्चपदी गतागतेन नियमः। एकत्रैव स्थाने दौ पा्वविक्षेपादिति अनुवाद-उसमें भी बायें पैर से वेध करे और दक्षिण पैर से विक्षेप करे, फिर भाण्डवाद्य की ओर उन्मुख होकर उतने ही पग चले ॥ १८ ॥ अनुवाद-इस प्रकार आने-जाने से पैरों की बीस संख्या पूरी कर फिर बायें पैर से वेध करे और दाहिने पैर से विक्षेप करे ॥१९ ॥ अभिनव-द्वितीय कोण का अर्थ है उत्तर-पश्चिम का कोण। अन्य दो कोणों में अतिदेश है। पूर्वरङ्ग के विषय में पञ्चपदी की व्याख्या को गई है। वेध अर्थात् वामवेध का अर्थ है पाष्णिक्षेत्र अर्थात् एड़ी पर सूची पाद का निपात और प्रक्षेप। 'वामवेध' का अर्थ है अन्तराविद्ध मुख। गति की सिद्धि होने पर कोणों से जाकर ब्रह्मस्थान का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। पञ्चपदी गमन सर्वत्र औत्सर्गिक है, स्वाभाविक है ॥ १७-१९ ॥ अभिनव-अब गति के विषय में विशेष का वर्णन करते हैं-'रङ्गे विकृष्ट' इत्यादि। अनुवाद-विकृष्ट रङ्गमञ्च पर पात्र को बार-बार आने जाने के प्रकार से गति प्रचार करना चाहिए। त्रिकोण रङ्गमञ्च पर त्र्यस्त्र और चतुष्कोण रङ्गमञ्च पर चतुरस्र गति-प्रचार करना चाहिए। २० ।। १. ख. ग. वृक्षितेन। २. ख. ग. बिपदानि च। ३. ख. ग. पदामायेकविशतिम् । ४. ख. विक्षेपं दक्षिणेन च। ५. श्यस्त्र त्रिकोणे। ६. क. निर्गमा । ७. क. पादौ।

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नाटघशास्त्रे यः समैः संहितो गच्छेत्तत्र कार्यो लयाश्रयः। चतुष्कलोऽथ द्विकलऽस्तथैवैककलः पुनः॥२१॥ अथ मध्यमनीचैस्तु गच्छेद्यः परिवारितः । `चतुष्कलमथार्धञ्च तथा चैककलं पुनः ॥ २२॥ मन्तव्यम्। विकृष्टायां च भूयो भूयः पञ्चपदी। अत्रैव विषये विविधप्रमाणा पातरीतिः, तद्द्विलयद्विभङ्गचतुर्भङ्गादयः प्राधान्येन ॥ २०॥ व्यामिश्रगतेरपि विशेषं व्याचिख्यासु: समगतिमुपसंह्रात यः समैरिति- तथैवेति साम्येनेत्यर्थः ॥ २१ ॥ *मिश्रगतिमाह अथेति। परिवारित इत्युत्तमत्वेन विवक्षितः इत्यर्थः। तेन देवादिवत् साध्वाश्रीय- माणायामुत्तमप्रकृतावपि नायं विधिरन्यस्यैव तत्र प्राधान्यात् तदोत्तमादिपादपाते मध्यमस्य द्वौ नीचादेरेकः, उत्तमस्य चत्वारः ॥ २२॥ अभिनव-भरत शब्द उपचार से अर्थात् लक्षण के द्वारा नाट्य-विद्या अथवा भरत-सन्तान (नट) का सूचक है। 'गतागतैः' का अभिप्राय है परिमित दिशा में पञ्चपदी का आने जाने का नियम । एक ही स्थान पर पादों (पेरों) का दो बार विक्षेप होता है, ऐसा मानना चाहिए। विकृष्ट भूमि में बार-बार पञ्चपदी होती है। इस विषय में भिन्न प्रमाणों वाली गति को रीति ही प्रमाण है। उनमें द्विलय, द्विभङ्ग, चतुर्भङ्ग आदि प्रधान रूप है। अभिनब-अब व्यामिश्र गति के विषय में विशेष व्याख्या करने को इच्छा से समगति का उपसंहार करते हैं-'यः समेरिति'। अनुवाद-जहाँ समान अवस्था वाले पात्रों के साथ सम गति में चलना हो तो उसकी गति लय के आश्रित अर्थात् लय के आधार पर चतुष्कल, ट्विकल और उसी प्रकार एककल के अनुसार होनी चाहिए।। २१।। अभिनव-यहॉ 'तथैव' का अर्थ है समानता से। अभिनव-अब मिश्र गति को कहते हैं-'अथ इत्यादि'। अनुवाद-जहाँ कोई अभिनेता मध्यम और अधम प्रकृति के पात्रों के साथ मिलकर चले तो चतुष्कल, द्विकल और एककल के अनुसार चलना चाहिए॥ २२॥ १. ख. चतुष्कालोज्य द्विकालो भवेदेककल: पुनः । २. ख. ग. गण्छेत्संपाविवारितः । ३. ख. ग. चतुष्कलमथोध्वं च।

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द्वावशोऽष्याय: १७

'देवदानवयक्षाणां नृपपन्नगरक्षसाम्। चतुस्तालप्रमाणेन कर्तव्याथ गतिबुधैः॥२३॥ दिवौकसां तु सर्वेषां मध्यमा गतिरिष्यते। तत्रापि' चोद्धता ये तु तेषां देवैः समा गतिः ॥२४॥ अत्रैव च चतुस्तालादिविभागे निश्चयार्थं प्रश्नमुत्थापयितुमुपसंहार- मुक्त विशेषा भिधानस हितमाह *- दैत्यदानवेत्यादि ।।२३।। सर्वेषामिति देवदूतादीनाम्। उद्धता ये त्विति मातलिप्रभृतयः ॥२४।। अभिनव-'परिवारित' का अर्थ है जो उत्तम रूप से विवक्षित है। इसलिए देव आदि के समान साधु (श्रेष्ठ) माने गये उत्तम प्रकृति के पात्रों में भी अन्य की प्रधानता होने के कारण यह विधि नहीं है। उस समय उत्तम आदि के पादपात के सम्बन्ध में उत्तम की चार कला, मध्यम की दो कला और अधम की एक कला प्रमाण का पादपात होता हैं।। २२।। अभिनव-यहाँ कला के प्रसङ्ग में चतुष्तालादि के विभाग को निश्चय करने के लिए प्रश्न उठाना आवश्यक है इसलिए उपसंहार को विशेष के अभिधान के साथ कहते हैं-'देवदानव इत्यादि'। अनुवाद-देव, दानव, यक्ष, राक्षस, पन्नग (नाग ) और राजा आदि पात्रों की गति विद्वानों को चतुष्ताल प्रमाण से करनी चाहिए।। २३।। विशेष-इस श्लोक में कुछ संस्करणों में देव-दानव के स्थान पर 'दैत्य-दानव' इत्यादि पाठ मिलता है। तदनुसार इसका अर्थ होगा। दैव्य, दानव, यक्ष, राक्षस, नाग, आदि पात्रों की गति चतुष्ताल प्रमाण से होती है।। २३ ।। अनुवाद-धुलोकवासी सभी देवताओं की मध्यमा गति इष्ट है और उनमें भी जो उद्धत प्रकृति के पात्र है उनकी गति देवताओं के समान प्रमाण की होनी चाहिए।। २४॥। अभिनव-'सर्वेषाम्' पद का अर्थ है सभी देवदूत आदि उत्तम पात्र। उद्धत पात्र मातलि प्रभृति हैं॥ २४ ॥ १. क. ग. दैत्यदानवयक्षाणां। २. क. प. शेषाणां। ३. ख. ग. चोष्वंबा (गा ?) क-अ. ढ. चोष्वंतालेषु। ४. क. उपसंहारमुक्तमविशेषाभिधानसहितमाह। ना० था०३

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१८ नाट पशासत्रे

*ऋषय ऊचु :- यदा मनुष्या राजानस्तेषां देवगतिः कथम्। अत्रोच्यते कथं नैषा गती राज्ञां भविष्यति॥२५॥ 'इह प्रकृतयो दिव्या दिव्यमानुष्य एव च। 'मानुष इति विज्ञेया नाटयनृत्तक्रियां प्रति॥२६॥ 'देवानां प्रकृतिर्दिव्या 'राज्ञां वै दिव्यमानुषी। या त्वन्या लोकविदिता मानुषी सा प्रकोर्तिता॥२७॥ 'देवांशजास्तु राजानो वेदाध्यात्मसु कीतिताः । एवं "देवानुकरणे बोधो ह्यत्र न विद्यते॥ २८ ॥ ऋषिगण कहते हैं- अनुवाद-(प्रश्न यह होता है कि) जब राजा मनुष्य होते हैं तो उनकी गति देवताओं जैसे क्यों होती है ? इस पर कहते हैं कि राजाओं की गति देवताओं जैसे क्यों नहीं होगो ? अर्थात देवताओं के समान राजाओं को गति मानने में क्या आपत्ति है?॥ २५॥ अनुवाद-क्योंकि यहाँ नाटक एवं नृत्य क्रिया में प्रकृति (पात्र) दिव्य, दिव्य-मानुष और मानुष ये तीन प्रकार के होते हैं॥ २६॥ अनुवाद-उनमें देवताओं की प्रकृति दिव्य होती है, राजाओं की प्रकृति दिव्य-मानुष और अन्य लोक प्रसिद्ध पात्रों की प्रकृति मानुषी होती है॥२७ ॥ अनुवाद-वेद एवं अध्यात्मशास्त्र में बताया गया है कि राजा लोग देवताओं के अंश से उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार देवताओं के अनुकरण करने में यहाँ कोई दोष नहीं है॥ २८।

१. ख. अश्राह। २. क-उ. तथा दैवगतिः । ३. क-न. गते। ४. क-ड. अथ दिव्या प्रकृतयो। ५. ख. ग. तथा च दिव्यमानुषी। ६. ख. ग. मानुषो चेति विज्ञेया। क.ड. मानुषा इति विज्ञयो। ७. क. ङ. नाट्यवृत्तिक्रियां प्रति। क-ज़. नाट्यस्य प्रक्रियां प्रति । ८. ख. ग. देवा हि प्रकृतिर्दिव्या। ९. ख ग. राजानो दिव्यमानुषौ। १०. ख. देवान्वाजास्तु । ग. देवान्वाजा (न्वया) स्तु। ११. ख. वेदाध्यात्मप्रकीत्तिताः । १२. क-ड. एवं देवानुसरणे दोषो। ग. एवं देवानुकरणे देवो।

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अयं विधिस्तु कर्तव्यः स्वच्छन्दगमनं प्रति। संभ्रमोत्पातरोषेषु प्रमाणं न विधीयते॥ २९॥ सर्वासां प्रकृतीनां तु अवस्थान्तरसंश्रया। उत्तमाधममध्यानां गतिः कार्या प्रयोक्तृभिः ॥३०॥ देवांशजा इति लोकपालांशविनिर्माणा राजानः वेदेषु तथाध्यात्मशास्त्रेषु वेदान्तेषु। तेषामनेन प्राधान्यमुक्तम् । अनुकरणं देवादीनां वर्णनात्। उक्त च राजविद्या राजगुह्यमिति। देवानुकरणे नाल्पत्वमित्यर्थः ॥२८।। अयममिति चतुष्कल इत्यादिः। स्वच्छन्दगमनं स्वस्था गतिः। संभ्रम आवेगः । उत्पातोऽत्रोन्मादादिः । प्रमाणमिति उक्तरूपमित्यर्थः ।।२९।। सर्वासां प्रकृतीनां, गतिरिति कलालयतालाश्रिता। सर्वमेतदिति तु युक्तम् ॥ ३० ॥ अभिनव-राजा लोग भी देवताओं के अंश से उत्पन्न होते हैं क्योंकि स्मृतिशास्त्र के अनुसार राजा लोकपालों के अंश से उत्पन्न होते हैं। (अष्टानां लोकपालानां मात्राभिनिर्मितो नृपः-मनुस्मृति)। यह बात वेदों और अध्यात्म- शास्त्र वेदान्तों में कहीं गई है। इसलिए उनकी प्रधानता कही गई है। देवादि के अनुकरण का वर्णन किया गया है। यह तथ्य 'राजविद्या राजगुह्यम्' इत्यादि के द्वारा कहा गया है। अतः देवताओं के अनुकरण में अल्पता रूप दोष नहीं है॥ २८॥ अनुवाद-यह विधि (विधान ) स्वच्छन्द गमन के विषय में करनी चाहिए, किन्तु सम्भ्रम (आवेग) उत्पत्ति और रोष (क्रोध) में कोई प्रमाण (नियम) का विधान नहीं है॥। २९ ॥ अभिनव 'अयम्' पद का अभिप्राय है चतुष्कल इत्यादि। 'स्वच्छन्दगमन' का अर्थ है स्वस्थ गति। 'सम्भ्रम' का अर्थ है आवेग। 'उत्पात' का अर्थ यहाँ उन्माद आदि है। 'प्रमाण' का अर्थ पहिले कहा गया है ॥ २९ ॥ अनुवाद-नाटय-प्रयोक्ताओं को उत्तम, मध्यम, अधम सभी प्रकार के प्रकृतियों (पात्रों) की गति का प्रयोग उनकी जवस्थाओं के अनुसार करना चाहिए॥ ३०। अभिनव-सभी पात्रों की गति कला, लय और ताल के आश्रित होती है। यह सब उचित ही है।॥ ३० ॥ १. क-ख. सर्वासामित्यादि क्लोको नास्ति। २. क०प. मध्योत्तमाघमानां।

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२० नाट घशास्त्रे

चतुरर्धकलं वा स्यात् तदर्धकलमेव अवस्थान्तरमासाद्य कुर्याद् गतिविचेष्टितम्॥३१॥ ज्येष्ठे चतुष्कलं ह्यत्र मध्यमे द्विकलं भवेत्। द्विकला चोत्तमे यत्र मध्ये त्वेककला भवेत् ॥ ३२॥ कलिकं मध्यमे यत्र नीचेष्वर्धकलं भवेत्। एवमर्धार्धहीनं जडानां संप्रयोजयेत् ॥३३॥ एतदेवास्य दूषयति-चतुरर्धकलमिति। द्वे उत्तमस्य, एका मध्यमस्य, अर्धं नीचस्य, अवस्थान्तरबलात । ३१-३२।। नीचेष्वर्धकलं भवेदिति। अनेन कलातुर्यभागो भरतमुनिना सूचितोऽयं लक्षण- विदो वृत्ताकारं द्रुतमाहुः यद्यथा पञ्चमांश उक्तनीत्या श्वासादिविश्रान्तिपूर्वक इति चतुर्धा स एव द्रुतो युक्तः ॥। ३३ ।। अभिनव-इसी बात को दूषित करते हैं-'चतुरर्धकलभित्यादि'। अनुवाद-उत्तम पात्रों को गति में चतुरर्द्कल अर्थात चार का आधा अर्थात दो कलाओं का और मध्यम पात्रों की गति में एक कला का और अधमपात्रों की गति में अर्द्धकला का समय लगता है। भिन्न-भिन्न अवस्थाओं के अनुसार गति की चेष्टाएँ करनी चाहिए॥ ३१॥। अनुवाद-ज्येष्ठ अर्थात् उत्तम पात्रों की गति में चार कला और मध्यम पात्रों की गति में दो कला का समय लगता है और जहाँ उत्तम पात्रों की गति दो कलाओं की होगो वहाँ मध्यम पात्र की गति में एक कला का समय लगना चाहिए। ३२।। अभिनव-भिन्न-भिन्न अवस्थाओं के अनुरूप उत्तम पात्र की दो कलाएँ, मध्यम पात्र की एक कला और अधम की अर्धकला होती है॥ ३१-३२।। अनुवाद-जहाँ मध्यम पात्रों की गति में एक कला का समय लगता है। वहाँ अधम पात्रों को गति में अधकला का समय लगेगा। इस प्रकार जड़ों के विषय में आधी-आधी कला हीन करके प्रयोग करना चाहिए। ३३॥ १. ख. चतुर्थ्यककलं वा स्यात् तथार्धकलमेव च। क-ड. चतुर्थैककलं। २. क-ड. अथवान्तरं। ३. इतः परं सार्धश्लोकद्वयं क. ख. पुस्तकयोर्नास्ति। ४. ख. ग. विकल चोत्तमा यत्र नोचेष्वर्धकलं भवेव्। ५. ख. ग एवमर्षाधहानि तु।

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द्वावशोऽष्याय: २१

ज्वरातें च क्षुधातें च तपःश्रान्ते भयान्विते । १विस्मये चावहित्ये च तथौत्सुक्यसमन्विते ॥ ३४॥ शृङ्गारे चैव शोके च स्वच्छन्दगमने तथा। गतिः स्थितलया कार्याधिकलान्तरपातिता ॥ ३५॥ चतुष्कलादप्याधिक्यमस्तीति वर्शयति-ज्वरार्त इत्यादि। भयेन योऽन्वितो जातोरुस्तम्भः, अन्यथा ह्यस्य त्वरिततरा गतिर्वक्ष्यते। विस्मय इति तत्कृतस्तम्भ इत्यर्थः । अवहित्थ इति कृतकधैर्याणाम्; कृतकं हि नः सुश्लिष्टं कत्तु® पार्यत इति। तत्राधिक्यमेव भ्वति। तत एव हि कुशलाः कृतकतां विदुः ॥ ३४॥

अभिनव-अधम पात्र में अर्धकला होती है, इससे भरतमुनि ने कला के चतुर्थ भाग को सूचित किया है। लक्षण के ज्ञाता विद्वान् द्रुत लय को वृत्ताकार मानते हैं। जिस प्रकार उक्त नीति से पञ्चमांश है। श्वासादि से विश्रान्ति के साथ यह चार प्रकार का होता है और यही द्रुत लय युक्त है।। ३३ ।। अभिनव-अब चतुष्कल से भी अधिक का प्रयोग होता है इस बात को दिखाते हैं-'ज्वरार्त्त इत्यादि। अनुवाद-ज्वर से पीड़ित, भूख से पीड़ित, तप से श्रान्त, भय से युक्त, विस्मित अर्थात् विस्मय से युक्त, अवहित्थ और औत्सुक्य से समन्वित, शृङ्गार और शोक को अवस्था में, स्वच्छन्द गमन में चार कला के प्रमाण को गति से अधिक विलम्बित लय में गति-प्रचार करना चातिए। भाव यह कि चार कलाओं की गतियों की अपेक्षा अधिक कलाओं का प्रयोग स्थिर विलम्बित लय के साथ करना चाहिए॥३४-३५॥ अभिनव-भय से जो अन्वित (युक्त) होता है वह 'ऊरुस्तम्भ' हो जाता है। अन्यथा अर्थात् ऊरुस्तम्भ न होने पर इसको अतिशीघ्र गति को कहेंगे। 'विस्मय' के कारण जिसका 'ऊरुस्तम्भ' हो गया है। 'अवहित्त्थ' का अर्थ है कृत्रिम (बनावटी) धैर्य। कृत्रिमता हम लोगों को सुश्लिष्ट करने में समर्थ है। वहाँ आघिक्य ही होता है। उसी से कुशल लोग कृत्रिमता को जानते हैं॥ ३४॥

१. कनउ. विक्षते। २. ख. पुस्तके क्लोकार्धोयं नास्ति । ३. ग. विफलान्तरपातिता।

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२२ नाट पशास्त्रे

अत्यावरवदौत्सुक्येन सम्यगन्वितो य एव शृङ्गारभेदस्तत्रैव विप्रलम्भ इति यावत्। स्वच्छन्दगमन इति कार्येण विना क्रीडाचङ्क्रमणे । अधिकले इत्यधि- शब्दोऽधिकार्थः । अधिकलामिति केचित्। आधिक्यं प्रकर्षेण चतुःस्वरूपेण संख्या चैतत्*। प्लुतस्य विरामस्य च स्वरूपाधिक्ये तालबोधः संख्याधिक्येन षडष्टकलादेवि- कृष्टमधिकृत कलान्तरं परिमाणं यथा तथाभूतः पादपातो यस्याम्। अत एवैतत्पा- वपतनप्रसङ्गविचारणाद्वक्ष्यति- षट्कलन्तु न कर्तव्यं तथाष्टकलमेव च। पादस्य पतनं तज्ज्ैः खेदनं ता्द्गवेत् स्त्रियाः॥ १२/१८४-१८५।। अर्धकद्विचतुष्कलमिति वचसा षडष्टकलयोनिषेधेन च त्रिकलपञचकलादी- नामभावं सूचयति। विषमाणां सपरिमाणोत्क्षेपणनिपातनायोगात्तालविदां हि साम्यमुपनिषद्भूतं तच्चात्र स्फुटयति॥ ३५ ॥

अत्यन्त आदर से विशिष्ट औत्सुक्य से युक्त शृङ्गार का जो विप्रलम्भ नामक भेद है उसमें यह गति होती है। 'स्वच्छन्दगमन' का तात्पर्य है बिना किसी लक्ष्य या कार्य के क्रीड़ा करते हुए चलना (क्रीड़ा के साथ चङक्रमण करना)। 'अधिकलान्तरपपातिता' में 'अधि' शब्द आधिक्य अर्थ का सूचक है। कुछ लोग 'अधिकला' पाठ मानते हैं। 'आधिक्य'-चार कला के प्रमाण की गति से स्थितलय में पादप्रक्षेप। करना आधिक्य हैं, प्रकर्ष है। यह प्लुत जैसे स्वर या विराम के आधिक्य से ताल का बोधक होता है। छः, आठ कलाओं की संख्या के आधिक्य से अभिनय के विकृष्ट रङ्गमञ्च का बोध होता है। पादपात का जिस गति में जैसा कलान्तर का परिमाण बतलाया गया है वैसा ही पादपात होना चाहिए। इसलिए इसे पाद-पातन के प्रसङ्ग के विचार में आगे कहेंगे- "अभिनय-विशेषज्ञों को स्त्रियों से छः कलाओं और आठ कलाओं तक के पाद-पात (पाद का पतन) नहीं कराना चाहिए, क्योंकि ऐसा कराने में स्त्रियों को (थकावट ) होगी।" अभिनव-'अर्धेकद्विचतुष्कलम्' इस वचन (वाक्य) से और छः एवं आठ कलाओं को पाद-पातन के निषेध से त्रिकल और पञ्चकल पादपात का अभाव सूचित होता है। विषम संख्या के किसी विशेष परिमाण में पाद का उत्क्षेपण और निपातन का योग नहों बनता है। अतः आचार्यगण यहाँ सम संख्या को ही प्रमाणभूत मानते हैं उसी को यहाँ स्फुट करते हैं।। ३५ ।। १. क. क्रीडाचङ्क्रमेण। २. क, चेतनप्लुतस्य। ख. चैतदप्लुतस्य । ३. क. षट्कलस्तु ।

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२१

पुनश्चिन्तान्विते चैव गतिः कार्या चतुष्कला। अस्वस्थकामिते चैव भये वित्रासिते तथा ॥३६॥ आवेगे चैव हर्षें च 'कार्यें यच्च त्वरान्वितम्। अनिष्टश्रवणे चैव क्षेपे" चाद्भुतदर्शने॥ ३७॥। अपि चात्ययिके कार्यें 'दुःखिते शत्रुमार्गणे। अपराद्धानुसरणे श्वापदानुगतौ तथा ॥३८॥ एतेष्वेवं गतिः प्राज्ञो १विकलां सम्प्रयोजयेत्।

एवमेतेषु षट्कलादप्यधिकं मानं तथा च तपःशान्तानां परिक्रमे यत्र उल्लस- नाख्यो लयः कोहलादिभिरुक्तो यस्यातिविलम्बितः कालावधि:। एवं कलाधिक्यमभिधाय न्यूनत्वमप्यस्तीत्याह-अस्वस्थकामित इत्यावि। अभिनव-इस प्रकार इन प्रकरणों में षट्कल में भी अघिक प्रमाण तथा और भी तपःश्रान्तों के परिक्रम में जो उल्लसन नामक लय को कोहल आदि आचार्यो ने कहा है जिसकी कालावधि अतिविलम्बित है समझना चाहिए। अभिनव-इस प्रकार कलाधिक्य को कहकर अब कलाओं में न्यूनता भी होती है इस बात को कहते हैं-'अस्वस्थकामित इत्यादि। अनुवाद-फिर चिन्ता से युक्त दशा में गति चतुष्कल अर्थात् चार कला की होनी चाहिए। अस्वस्थकामित अर्थात् प्रच्छन्न कामुक में, भय में, वित्रासन में, आवेग में, हर्ष में, शोघ्रता युक्त कारयं में, अनिष्ट बात के में, श्रवणआक्षेप (निन्दा) में या क्षेपण में, अ्भत वस्तु के द्शन में, कष्ट कर कार्य में; दुःख में, शत्रु के खोज ने में, अपराधी के पकड़ने में, श्वापद अर्थात् व्याघ्नादि हिंसक पशुओं के अनुसरण में विद्वान् कला-रहित (विकल ) गति का प्रयोग करें॥ ३६३९॥ १. ग. पुस्तके श्लोकार्घोडयं नास्ति। २. ख. ग. अस्वस्थे कामिते। ३. ग. कायं। ४. क-ड. यच्च तुरान्बिते।

६. ग. तथा चैवारिमार्गणे। ७. ख. ग. अपराध्वानुसरणे। क-न. अपराद्धानुकरणे। क.प. अवरुद्धानुकरणे। ८. ख. ग. रवापदानुगते। ९. ग. एतेष्वेव। १०. ख. ग. ङ. द्विकलां।

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२४ माटघशास्थ्रे

अस्वस्थे प्रच्छन्नकामिते हि त्वरातिशयः। अनिष्टं यदा बान्धवादेः श्रुतं तदा- १तदन्तिकं द्रुतगमनं, अद्भुतदर्शनविषये यदा क्षेपः प्रक्षिप्तता, पुनरेतन्न दुष्यत इति। यन्नाभिरुचितमवश्यकर्तव्यं च तत्त्वरया क्रियते, त्वरयान्वितं सुकार्यमभिरुचित- मेवेति विशेष: त्वरान्वितमिति। इयता यद्यपि सर्व लम्यते तथापि कविनटव्युत्पादनाय प्रपञ्चः ॥ ३६-३७॥

अत्ययोऽतिक्रमणं शोघ्रसम्पादनं प्रयोजनमस्य। अपराधोडभिनेयः शत्रोरन्य एव, यद्वा यस्यापराध: कृतो गुर्वादेस्ततश्च रुषा गतः सोऽपराद्धः, तथापि एतेष्विति एवं- प्रकारेष्वन्येषु मदादिष्वपीत्यर्थः । विकलामिति विकल: कलापरिमाणो यस्याः सा कला अर्धकलारहिता तुर्या यद्यपि, तथापि नादरणीया, यतः त्रिभागषड्भागादिरपि तत्र भवति। अत एव संभ्रमोत्पातरोषेषु चतुरधंकलमित्यनेन पौनरुक्त्यं तस्या- विषयत्वादस्य तु विषयभागविषयत्वात्।

अभिनव-अस्वस्थ का अर्थ है प्रच्छन्न और कामित का अर्थ है कामुक। जब बान्धव आदि का अनिष्ट श्रवण हो तो उसके पास शीघ्रता से जाना। अद्भत वस्तु के दर्शन में जब क्षेप (प्रक्षिप्तता) हो या उतावलापन हो तो त्वरा (शीघ्रता) गति का दोष नहीं होता। जहाँ अभिरुचि नहीं है किन्तु अवश्य कर्त्तव्य (कार्य) को शीघ्रता से किया जाता है। शीघ्रता से किया हुआ सुन्दर कार्य अभिरुचित ही है यह विशेष है। 'यच्च स्वरान्वितम्' अर्थात् जो शीघ्रता से करणीय है, वहाँ शीघ्रता (त्वरा) करनी चाहिए। इतने से यद्यपि सब कुछ मिल जाता है, फिर भी कवियों एवं नटों को व्युत्पन्न करने के लिए यह प्रपञ्च किया गया है।

'अत्यय' का अर्थ है अतिक्रमण अर्थात् शीघ्रता से सम्पादन ही प्रयोजन है जिसका। अपराध अभिनेय है किन्तु वह शत्रुकृत अपराध से भिन्न है अथवा जिसका अपराध किया है उस गुरु आदि से रुष्ट होकर जो चला गया है, वह अपराद्ध है। फिर भी इस प्रकार के मदादि में भी, यह 'एतेष' का अर्थ है। 'विकलाम्' अर्थात् विकल है कला का परिमाण जिसका, ऐसी अर्धकला रहित चतुर्थी कला यद्यपि होती है, तथापि वह आदरणीय नहीं है, क्योंकि उसमें तीसरा एवं छठा हिस्सा भी होता है। इसलिए सम्भ्रम, उत्पात और रोष (क्रोध) में चतुरर्घकल कहा है। इससे पुनरक्ति है, किन्तु यह उसका (पुनरुक्ति का ) विषय नहीं है इसका विषय तो विषम विभाग है।

१. क. तबन्िकं।

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दृषषशोऽध्यायः २५

उत्तमानां गतिर्या तु न तां मध्येषु योजयेत्॥ ३९॥ या गतिर्मध्यमानां तु न तां नीचेषु योजयेत्। तथाहि मत्तगतौ शेखरकस्य खण्डकप्रयोगे हि "गहिदुं धि" इत्येवं रूपे मात्रा तृतीये, तृतीयस्य नामात्र धं धग इत्येकः पातः, त्सुक इति द्वितीयो, धि इति तृतीयो, न चैषां साम्यम्। एतेन च कलानां साम्यं न्यूनाधिकतानिरूपणेन समविषमकलाभागभङ्गाभिधानेन गुरुलघुद्रुतप्लुतानां स्वीकारात्तद्वैचित्र्यम्। इयमपि १ भङ्गोपभङ्गविभङ्गप्रकारप्रस्तारसंगृहीता लक्ष्यसिद्धा भङ्गलयव्यवस्था प्रतिपाद्या- क्षरतदर्थादिरूपा च धाराबन्धादिविषयाधातमार्गशब्देन प्रसिद्धा व्यवस्था स्फुटमेव दशिता। माभूदेवं कालप्रमाण (कलापरिमाण ?) नियमाभिधानं गजस्नानीभूतमित्याह- उत्तमानां गतिर्या त्विति। जैसे 'गहि दं धि' इस प्रकार के खण्डकाव्य के प्रयोग में शेखरक के मत्तगति में तीसरे 'दुं' अक्षर में मात्रा है। इस प्रसङ्ग में यहाँ तृतीय अक्षर का 'धं धग्' यह एक पात है। 'रसुक' यह द्वितीय पात है, 'धिं' यह तृतीय पात है। किन्तु इसमें समानता नहीं है। इससे कलाओं के साम्यता एवं न्यूनाधिकता के निरूपण एवं सम, विषम कलाओं के भागों में भङ्गादि के अभिधान से तथा गुरु, लघु एवं प्लुतों को द्रुत मान लेने से कलाओं में वैचित्र्य है। यह भङ्ग, विभङ्ग उपभङ्ग के प्रकारों के प्रस्तार से संगृहीत लक्ष्यसिद्ध लय का व्यवस्था और जो धाराबन्धादि विषय घातमार्ग शब्द से प्रसिद्ध प्रतिपाद्य अक्षर और तत्प्रतिपाद् अर्थ रूप व्यवस्था उसे स्पष्ट रूप से दिखा दिया है॥ ३६-३९। अभिनव-कलाओं के परिमाण के विषय में नियम का कथन हाथी के स्नान के समान न हो जाय, इस आशय से कहते हैं-उत्तमानामित्यादि। अनुवाव-उत्तम पुरुषों की जो गति बताई गई है उसका प्रयोग मध्यम पात्रों में न करे और मध्यम पात्रों को जो गति है उसका प्रयोग नोच पात्रों में नहीं करना चाहिए॥ ४० ॥ १. क, भङ्गा द्वावश-चञ्चत्पुटः चाचपुटः, षट्पितापुत्रका, संपक्वेष्टका, हेला, त्रिगता, नर्कटः नकुटी, खञ्जकः, खञ्जिका, आक्रोडित, विलम्बिता च । उपभङ्गाः, षट्-कुटिला, आक्षिप्तिकाः, त्र्यस्त्रा, चतुरस्रा, चटुला, संयुक्तिका च। विभङ्गा :- विशेषः, माला, सुभद्रं संगतं च। लयतालानां भङ्कप्रस्तारद्वारेण यद्यवघिरन स्यात्, तेषां ध्र वातालेतिप्रसिद्धाश्च- त्वारिशत् कोहलोक्ता गतिपरिक्रमे विनियुज्यन्ते । ध्रवातालानामुदाहरणानि विक्रमोबं- श्यादी द्रष्टव्यानि। तुम्बुरुदत्तानि ताला्यायमुद्रणावसरे सूच यिष्यायः । ना० शा०-४

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११ नाटघशास्त्रे

गतिः शृङ्गारिणी कार्या *स्वस्थकामितसम्भवा ॥ ४०।। दूती दशितमार्गस्तु प्रविशेद्रङ्गमण्डलम्। सूचया चाप्यभिनयं कुर्यादर्थसमाश्रयम्॥ ४१ ॥ तुरेवार्थे अन्यक्रमेणैवेत्यर्धः। एतदुक्तं भवति अनियमेन निर्दशितेन नियमो विप्लुतः, तथापि कलाधिक्ये षट्कलतोत्तमस्य, तत्र मध्यमस्य चतुष्कलता, अघमस्य द्विकलता। यत्र न्यूनकलमुक्तं तत्राप्युत्तमस्यका कला, मध्यमस्यार्धकला, अघमस्य कलातुर्यंभाग इति कथं विप्लवः ॥ ३८-३९।। एवं प्रकृतिभेदेन गतिमभिघाय रसविषयेण दर्शयितु प्रथमं पुरुषार्थोपयोगि- रसविषयां निरूपयन् प्राघान्याच्च शृङ्गारे तावदाह-गतिः शृङ्गारिणीत्यादि।

अभिनव-यहाँ पर 'तु' शब्द 'एव' अर्थ में है। नियम के क्रम में भेद है, यह अर्थ भी इससे प्राप्त होता है। यह कहा गया है कि अभिनय के निदर्शन से (दिखा देने से ) नियम का विलोप हो जाता है। फिर भी कलाओं की अधिकता में उत्तम पात्रों की षटकलता, मध्यम पात्रों की चतुष्कलता और अधम पात्रों की द्विकलता सिद्ध है। और जहाँ न्यूनकला का प्रतिपादन है वहाँ उत्तम पात्रों की एक कला, मध्यम पात्रों की अर्धकला और अघम पात्रों की चतुर्थाश कला होती है, अतः विप्लव कैसे हो सकता है ? ॥ ४० ॥ अभिनव-इस प्रकार प्रकृति-भेद से गति का अभिधान करके रस के विषय में गति को दिखलाने के लिए पहिले पुरुषार्थ के उपयोगी रसों के विषय का निरूपण करते हुए रसों में शृङ्गार के प्रधान होने से उसको गति को कहते हैं-'गतिः शृङ्गारिणी' इत्यादि। १. शृङ्गार रस में गति अनुवाद-स्वस्थ अर्थात् अप्रच्छन्न कामुक की गति शृङ्गारिणी होनी चाहिए। शृङ्गारी पात्र दूती के द्वारा दशित (दिखाये गये ) मार्ग से रङ्गमञ्न पर प्रवेश करे। वह किसी अर्थ-विशेष का आश्रय लेकर सूचा चारी के द्वारा अभिनय करे॥ ४०-४१ ॥

१. ख. ग. स्वच्छकामितसम्भवा। २. क. दूतीदर्शनमार्गस्तु। क-प. दूतोदर्शनमार्गेण। ३. ख. सूचयञ्चाभ्यभिनयं। ग. सूचयन्वाभिनयनं। क-प. सूचया चाभिगमनं। ४. क-न. कुर्यादर्थस्य संश्रयम् । ५. क, अन्यक्रममनेनैवेत्यर्थः ।

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दववशोऽ्याय। २७

हृदैर्गन्धैस्तथा वस्त्रैरल ङ्कारैश्च भूषितः । नानापुष्पसुगन्धाभिर्मालाभि: समलंकृतः ॥४२ ॥ गच्छेत् सललितैः पादैरतिक्रान्तस्थितैस्तदा२। तथा स्वस्थकामितमप्रच्छनम्। अर्थसमाश्रये सिद्ध सूचाया पुनवर्चनं हृद्यस्य पदार्थस्य पर्यालोचनं सातिशयं चमत्कारकारीति निरूपयितुं तत्र चर्वितचर्वणवत्पुनः पुनः कञ्चिदपि भागमत्यजन् सूचां शृंगारे कुर्यादिति दर्शयति। युद्धवीरादौ हि प्रधानानुसंधानमेवोचितं तन्मध्यपतितानां कार्यान्तराणामपर्या- लोचनीयत्वात् पर्यालोचने आचार्य मातुलान् भ्रातृन् स्वजनमित्याद्यापत्त:, येऽपि चान्तरमार्गा इत्यत्रत्यान् नृत्त सूच्यान् परिहर्तुमित्यर्थसमाश्रयणमित्यसत्॥४०-४१।। साडपप हि निर्रराथका सूचैव हि कथं स्यात् ? सूचतोऽपि चान्तरङ्गमस्य प्रकृतां गतिमाह-नानेति। शोभनो गन्धः सुगन्धः। नानापुष्पैः सह सुगन्धः। अत्र समासान्ता- भावः । सललितैः सविलासैः। सौष्ठवेनाङ्गचातुरश्र्येण युक्त:, लयो विलम्बितादि, तालं चतुरश्रादि, भूयः पुनः समान्येन उक्ताप्युत्तमगतिः पुनवविशेषतया निरूप्यत इति भाव: ॥। ४२-४३ ।। अभिनव-स्वस्थकामित का अर्थ है अप्रच्छन्न कामुक। अर्थ के समाश्रयण से सूचा के समाश्रयण की सिद्धि हो जाती है, फिर सूचा का पुनः कथन आकर्षक पदार्थ का पर्यालोचन अत्यन्त चमत्कारी होता है, इसका निरूपण करने के लिए तथा चर्वित-चर्वण की तरह बार-बार निरूपण में किसी भाग को न छोड़ते हुए शृङ्गार में सूचा चारी का प्रयोग करना चाहिए, यह दिखाते हैं। युद्ध-वीर आदि में प्रधान का अनुसन्धान करना ही उचत है; क्योंकि उनके बीच में आने वाले अन्य कार्य अपर्यालोचनीय है। पर्यालोचन में तो गीता में कथित 'आचार्य, मामा, भाई, स्वजन आदि का कैसे मारूँगा' इत्यादि कथन आपत्ति- जनक हो जायेगा और जो 'आन्तरमार्ग है' वहाँ पर नृत्त में सूच्य (सूचनीय) वस्तु का परिहार करने के लिए अर्थ समाश्रयण करना चाहिए, यह कथन असत् है।। ४० .४१ ।। अनुवाद-हृद्य गन्ध, आकर्षक वस्त्र, और अलङ्गारों से सुशोभित तथा नाना प्रकार के पुष्प, सुगन्धित पदार्थ तथा माला आदि से अलङ्कृत, सौष्ठव से युक्त तथा ताल, लय, कला के अनुसार सुललित अतिक्रान्त चारी में स्थित पैरों से चलें ॥ ४२-४३ ॥ १. क-ग. हृद्यवस्त्रैस्तथा गन्घधूपैश्चूर्णेश्च भूषितः । २. ख. अतिक्रान्तोत्थितस्तथा। ३ ख. समन्वितैः'

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२८ नाट चशास्त्रे

*पादयोरनुगौ हस्तौ नित्यं कार्यौं प्रयोक्तृभिः। *उत्क्षिप्य हस्तं पातेन पादयोश्च विपर्ययात् ॥ ४४।। प्रच्छन्नकामिते चैव गति भूयो निबोधत। विसजितजनः स्रस्तस्तथा दूतीसहायवान् ॥४५॥ निर्वाणदीपो नात्यर्थ भूषणैश्च विभूषितः । "वेलासदृशवस्त्रैश्च सह" दूत्या शनैस्तथा ॥४६।। व्रजेत् प्रच्छन्नकामस्तु पादैनिश्शब्दमन्दगैः । शब्दशङ्क्युत्सुकश्च स्यादवलोकनतत्परः ॥ ४७॥ वेपमानशरीरश्च शंकितः प्रस्खलन् मुहः ।

अभिनव-क्योंकि वह निरर्थक है तो सूचा ही कैसे कहलायेगी? अतः सूचा से अन्तरङ्ग इसकी प्रकृत गति को कहते हैं-नानेति। शोभन गन्ध सुगन्ध है। नाना प्रकार के पुष्पों के कारण सुगन्धित मालाएँ। यहाँ समासान्त 'इत' (इतच् ) प्रत्यय का अभाव है। सललित का अर्थ है सविलास। सौष्ठव अङ्ग- चातुरस्र्य से युक्त लय विलम्बित आदि। ताल का अर्थ है चतुरस्र आदि ताल। सामान्य रूप से उत्तमों की गति यद्यपि कह दी गई है तथापि विशेष रूप से कहते हैं ॥। ४२-४३ ॥ अनुवाद-नाटथ प्रयोक्ताओं को पादों के अनुसार हाथों का प्रयोग करना चाहिए और एक हाथ को ऊपर उठाकर विपरीत दिशा में पैरों के पात से अभिनय करे॥ ४४ ॥

१. क. ग. पादयोरनुगौ चापि हस्तौ कार्यों प्रयोक्तृभिः ।। २. ख. उत्क्षिप्तः सह पादेन पतनेन विपर्ययः । ३. ख. विसर्जितजनरतत्र तथा दूतीसहायवान्। क-ज. विसर्जितगतिस्तत्र तथा दूतसहायवान् ४. ख. वेलासदृशवस्त्रश्य। ५. क-ज. तथा दूश्या सहायवान् । ६. क. नृत्तसूचाम्। ६. ख. प्रच्छन्नकार्मस्तु । ७. क. शब्वशाङ्क्युत्सुकश्च ।

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डवाइशोऽव्याय: ३९

प्रच्छन्नं कृत्वा कामित यत्र शृङ्गारे सागरिकादाविव वत्सराजादे: तदन्यत्र सीतादाविव पौलस्त्यप्रभुतेस्तु। निर्वाणदीपः । वेलातुल्यवस्त्रः इति। तथाहि चन्द्रालोके सितवस्त्रागुण्ठितो घनसारपरागपुञ्जमञ्जुगात्रो मुक्ताप्रायप्रचुराभरणो वस्त्राद्य पलक्षणम् ॥ ४५-४६ ॥ प्रच्छन्नकामस्तु। एवंविधकामिविषयमेव सुभद्राभिधानं ध्रुवातालमाहुः कोहलाद्याः। यस्य हि प्रस्तारो द्रुतलघुमिश्रः। शब्दशङ्गीत्यादिना खण्डितां कलां सूचयन् मिश्रप्रयोगां गतिमत्राह । उत्सुक इत्यादिना कार्यः। बेपमानवेहः प्रस्खलन्नित्यादिना कलातुर्याशात् ॥४७॥ अनुवाद-अब प्रच्छन्न कामुक की गति को फिर से समझिये। प्रच्छन्न कामी सहायकों को लौटाकर दूती के साथ चले। वह दोपक को बुझा दे और शरीर को अलङ्कारों से अधिक विभूषित न करे। समय के अनुसार वस्त्र धारण कर प्रच्छन्न कामुक दूती के साथ बिना आहट किये शब्द (आहट) की शङ्गा से उत्सुकता से इधर-उधर देखते हुए काँपते हुए शरीर से शङ्ङित लड़खड़ाते हुए पैरों से मन्दगति से गमन करें॥ ४५-४८॥ अभिनव-प्रच्छन्न रूप से अर्थात् छिपकर कामिनी से सम्बन्ध हो जिस शङ्गार में। जैसे सागरिका से वत्सराज का। उससे भिन्न अप्रच्छन्न कामुक जैसे सीता आदि में पौलस्त्य (रावण) आदि का सम्बन्ध । 'निर्वाणदोपः' का अर्थ है दीपक को बुझा देना। 'वेलातुल्यवस्त्रः' का अभिप्राय है कि चन्द्रमा के प्रकाश में सफेद वस्त्रों को धारण करने वाला कपूर से मिश्रित परागपुञ्ज से लिप्त शरीर वाला, मोती की माला (आभूषण) को धारण करने वाला। यहाँ पर वस्त्रादि आभूषण आदि का उपलक्षग है अर्थात् वस्त्रादि से आभूषणादि का भी ग्रहण होता है॥ ४५-४६॥ इस प्रकार के अर्थात् प्रच्छन्न कामी के विषय में कोहल आदि आचार्यों ने सुभद्रा नामक ताल का विधान बताया है। उसका प्रस्तार द्रुत एवं लघु से मिश्रित है। शब्दशङ्की इत्यादि के द्वारा खण्डित कला को सूचित करते हुए मिश्रित प्रयोग वालो गति को कहते हैं। 'उत्सुक' इत्यादि के द्वारा कार्य में उत्कण्ठा सूचित होती है 'वेपमानदेह' का अर्थ है काँपते हुए शरीर वाला। 'प्रस्खलन्' इत्यादि के द्वारा कला से चतुर्थांश का संकेत है॥ ४७-४८॥ १. ख. सुभद्रमित्युपभङ्गविशेषः। तल्लक्षण तु कोहलमते- नवम: पञ्चमश्चैव षष्ठः पुनग्हेष्यते। शेषास्तु गुरवः सप्त सुभद्रं रौद्रवीरयोः ॥ त्रिमात्रान्ते प्रभावत्यां ठक्करागस्थ भाषया। इति त्रिमात्रान्तविरामं प्रभावतीनामकद्विपदीच्छन्दः प्रयुक्त च सुभद्रम्।

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नाटघ शास्त्रे

रसे रौद्रे तु वक्ष्यामि दैत्यरक्षोगणान् प्रति॥४८॥ एक एव रसस्तेषां स्थायी रौद्रो द्विजोत्तमाः । नेपथ्यरौद्रो विज्ञेयस्त्वङ्गरौद्रस्तथैव च ॥ ४ ९ ॥ तथा स्वभावजशचैव त्रिधा रौद्रः प्रकल्पितः२ । विप्रलम्भे तु शृङ्गारिण्येव करुणव्यामिश्रा गतिर्व्यभिचारिसंवादिन्यभिप्रेत्य पृथङनोक्ता। एवं विषयाभिलाषप्राणे शृङ्गारेऽभिधाय तद्रूप एव रौद्रे ग्ति निरूपयति-रौद्रे रसे त्विति। दैत्यादिप्रयुक्तं यदुक्तं तत्केनाशयेनेति शङकाशमनायाह-एक एवेति। ननु किं तेषां क्रोधेन विनापि रौद्रता? ओमिति ब्रूमः । कथमिति चेतु रसाध्यायोक्तन्यायेनानु- रसयितुमाह-नेपथ्यरौद्र इत्यादि स्वभावज इत्यन्तम् । एवमेक एव रसस्तेषामिति कथितम्, रसाध्याये चैतत्प्रपञ्चितम् ॥ ४९-५० ॥ विमर्श शृङ्गारी पात्र ललित वेशभूषा धारण कर स्वच्छन्द रूप से ताल एवं लय के आश्रित पादगति से रङ्गमञ्च पर मन्द-मन्द सञ्चरण करता है। किन्तु प्रच्छन्नकामी चन्द्र-ज्योत्स्ना में कपूरवासित श्वेत वस्त्र धारण कर शब्द-श्रवण मात्र से भयभीत तथा शङ्धित दृष्टि से लड़खड़ाते पैरों से शनैः शनैः गमन करता हुआ संकेत स्थान पर जाता है।। ४७-४८॥ अभिनव-विप्रलम्भ शृङ्गार में तो सम्भोग शृङ्गार के समान करुण से मिश्रित व्यभिचारि-सम्वादिनी शृङ्गारिणी ही गति होती है। इस अभिप्राय से सम्भोग से पृथक् गति को नहीं कहा है। इस विषय की अभिलाषा रूप वाले शृङ्गार रस में गति को कहकर रसत्वेन समान रूप वाले रौद्र रस में गति का निरूपण करते हैं- 'रौद्रे रसे तु'। २. रौद्र रस में गति अनुवाद-अब मैं रौद्र रस के विषय में दैत्य, दानव, राक्षसों की गति को कहता हूँ। हे ब्राह्मणों ! उनके यहाँ रौद्र ही एकमात्र स्थायी रस होता है।४८-४९॥ अनुवाद-रौद्र रस तीन प्रकार का होता है- प्रथम नेपथ्य रौद्र रस जानना चाहिए। दूसरा अङ्ग रौद्र होता है और तीसरा स्वभावज रौद्र होता है, इस प्रकार तीन प्रकार का रौद्र कहा गया है।। ४९-५० ।। १. क. स्वभ।वतश्चैव। स्वभावश्चेति। २. ख. प्रकोतितः ।

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३१

रुधिरक्लिन्नदेहो यो रुधिरार्द्रमुखस्तथा॥ ५०॥ तथा' पिशितहस्तश्च रौद्रो ' नेपथ्यजस्तु सः। बहुबाहुर्बहुमुखो नानाप्रहरणाकुलः ॥ ५१॥ स्थूलकायस्तथा प्रांशुरङ्गरौद्रः प्रकीत्तितः । रक्ताक्ष: पिङ्गकेशश्च असितो विकृतस्वरः ॥ ५२॥ रुक्षो निर्भत्सनपरो रौद्रः 'सोडयं स्वभावजः । चतुस्तालान्तरोत्क्षिप्तैः पादैस्त्वन्तरपातितैः"॥ ५३॥ गतिरेवं प्रकर्त्तव्या तेषां ये चापि तद्विधाः ।

अभिनव-देत्य, दानव आदि में प्रयुक्त, यह जो कहा गया है वह किस आशय से कहा गया है, इरा शङका के शमन के लिए कहते हैं-'एक एव इति'। क्या उसमें क्रोध के विना भी रोद्रता रहती है? कहते हैं कि हाँ। यह कसे ? रसाध्याय में कहे हुए न्याय के अनुसार रसन करने के लिए 'नैपथ्य रौद्र' से लेकर, 'स्वभावज' यहाँ तक है। इस प्रकार उन दैत्यादि में एक ही रस कहा गया है। रसाध्याय में इसका विस्तार से कथन किया गया है॥। ४९-५० । अनुवाद -खून से सना हुआ शरीर और खून से आद्र मुख तथा हाथ में मांस के टुकड़े से युक्त रहना नेपथ्य रौद्र रस कहलाता है। ५०-५१॥ अनुवाद-जो अनेक भुजाओं और अनेक मुखों वाला, अनेक प्रकार के आयुधों को धारण करने से आकुल, स्थूल शरीर वाला तथा उन्नत (ऊँचा, लम्बा) है, वह अङ्ग रौद्र है।। ५१-५२ ।। अनुवाद-लाल आँखें, पीले केश, काला वर्ण (रङ्ग), विकृत स्वर, रूखे स्वभाव वाला, फटकारने में तत्पर रहना स्वभावज रौद्र होता है ॥५२॥ अनुवाद-इसमें पैरों को चार के अन्तर पर उठाकर उससे कम तालों के अन्तर से गिराया जाता है, इस प्रकार की गति उन्हें करनी चाहिए और जो उनके समान है उन्हें भी ऐसी गति करनी चाहिए॥ ५३-५४॥ १. ख. तथापि शिरहस्तश्च। ग. तथापि सहितस्तच्च । २. क-ड. रौद्रनेपध्यजस्तु । ३. ख. रूक्षे। ४. क. रौद्रे सोऽथें स्वभावजं। ५. ख. ग. पादस्त्र्यन्तरपातितैः ।

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२ ३२ नटधशास्त्रे

चतुस्तालान्तरोरिक्षप्तैरिति तालान्तरपातित्वं द्वितीयतालान्तरालापापेक्षयेति केचित्। उपाध्यायास्तु तालशब्देनात्र कालमानमुक्तं न तु देशमानम्, तेन यावता कालेनोत्क्षेपस्ततो न्यूनेन पतनमिति। एतदनु प्रकृतिसन्धिसंरम्भत्वं चाभिदधता विषम- गतित्वमेषामनुज्ञातम्। तथा च कोहलमुखा: कलातदर्थट्वयलक्षणेन नर्तनकोत्फुल्ल- कादिना रौद्रादौ परिक्रममाहुः। तद्विधा इति भीमसेनादयः । अनेन युद्धवीरेऽप्येषैव गतिरिति सूचयति॥५३-५४॥ अभिनव-'चतुष्तालान्तरोतिक्षिप्तैरिति'। इसका अभिप्राय है कि-तालान्तर का पात द्वितीय तालान्तर की अपेक्षा से होता है, ऐसा कुछ आचार्य कहते हैं। हमारे उपाध्याय जो तो कहते हैं कि यहाँ ताल शब्द से काल का मान (प्रामाण्य) कहा गया है न कि देश का मान। इससे अर्थात् तालान्तरपातित्व से जितने काल तक उत्क्षेप होता है उससे न्यून काल में पतन होता है, इसो के अनुगत प्रकृति में सन्धि का संरम्भत्व का अभिधान करते हुए इनके विषम गति की अनुज्ञा दी है और कोहल आदि आचार्य कला और उसके अर्थद्वय रूप लक्षण वाले नर्तनक, उत्फुल्लक आदि के द्वारा रौद्र आदि में परिक्रम को कहा है। 'तद्विधाः' पद से भीमसेन आदि का ग्रहण है। इससे युद्धवीर में ऐसे व्यक्ति की ऐसी ही गति होती है, यह सूचित होता है॥ ५३-५४॥ विमर्श-रौद रस के अभिनय में दैत्य, दानव आदि पात्र होने है। अभिनय प्रयोग में उनके भङ्ग रुषिर-श्नात होते हैं। कभो अनेक मुख, अनेक बाहु वाले होते हैं और कभी रक्त-नयन, रुखे स्वर, काले वर्ण आदि के द्वारा रौद्र रूप का प्रदर्शन करते हुए विषम रूप में पाद-प्रचार करते हैं॥ ५३-५४ ॥

१. नतनकस्य लक्षणं यथा- तिस्रोऽथ यतयः कार्या विरामोऽन्ते द्रुतस्त्रिभिः। लयो नर्तनक: प्रोक्तः सौम्यात्र द्विपढी भवेत् ॥ विजयारम्भहर्षेष मत्तोन्मत्तप्रमत्तके । सि नर्त्तनक: प्रयोक्त्यष्ठक्करागस्य भाषया ।। कछ उत्फुल्लकस्य लक्षणं तु- दौ द्रुतौ लघुरेकश्च चतस्रो यतयः स्मृताः । छिन्नकस्य विरामोऽन्ते लयमुत्फुल्लकं विदुः॥ उत्तमाधममध्यानां कामोन्मादविलासयोः। परिक्रमे पञ्चमेन तोटक सचतुष्टयम्।। मध्यमोत्त मपान्ाणां प्रफुल्लकमिहेष्यते। छन्दरच तुष्पदा चात्र गुरुमध्यविवरजिता।।

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द्वावशोऽष्याय: ३३

अहृद्या तु मही यत्र इमशानरणकशमला ॥ ५४॥ गति तत्र प्रयुञ्जीत बोभत्साभिनयं प्रति। क्वचिदासन्नपतितैः विकृष्टपतितैः क्वचित् ॥ ५५॥ एलकाक्रीडितैः पादैरुपर्युपरि पातितैः । तेषामेवानुगैर्हस्तैर्बीभत्से गतिरिष्यते ॥ ५६॥

अथ रौद्रप्राणौग्रयविवक्षामध्ये पुरुषार्थप्राणायातबीभत्साश्रयां गतिमाह- अहृद्या स्विति। शमशानरूपा युद्धपतितकबन्धप्रभृतिविरचिता अत एव रणेन कश्मला जुगुप्सिता। आसन्नपतितत्त्वेन कलार्धंतुर्यांशत्वादि, विकृष्टपतितत्वेन कलासार्धकलादि सूचयति॥५४५६॥ ३. बीभत्स रस में गति अभिनब-इसके बाद रौद्र रस की प्राणभूता 'उग्रता' को कहने की इच्छा के मध्य पुरुषार्थ के प्राण के अनुसार प्राप्त बीभत्स रस की गति को कहते हैं- 'अहृद्या इत्यादि'। अनुवाद-जहाँ पर इमशान और युद्धभूमि होने से जुगुप्सित (घुणित, घिनौनी) भूमि अप्रिय हो गई हो वहाँ बीभत्स रस के अभिनय में उपर्युक्त गति का अभिनय करना चाहिए॥ ५५॥ अनुवाद-कहीं पर आसन्नपतित और कहीं पर दूर-पतित ऊपर-ऊपर उछलते हुए एलकाक्रीड़ित पादों से और उन्हीं के अनुगामो हाथों से उपलक्षित गति बीभत्स रस में कही गई है॥ ५५-५६॥ अभिनव -रमशानरूपा अर्थात् जहाँ युद्ध में कट-कट कर गिरने वाले कबन्ध (रुण्ड-मुण्ड) आदि के कारण भूमि रमशान बन गई हो, इसलिए युद्ध के कारण भूमि जुगुप्सिता (घृणित) बन गई हो। यहाँ कश्मला का अर्थ जुगुप्सा (घृणा) है॥ ५४ ॥। १. कनन. आहोर्णा। ग. (टि.) आद्या। २. ख. बीभत्सानुनयं। ३. ख. बीभत्सागतिरिष्यते। बीभत्सगतिरच्यते। ४. क. (टि.) युद्धपतितबन्धनिहनिपरिचिता। ना० शा०-५

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३४ नाटपशास्त्रे

अथ वीरे च कर्नव्या पादविक्षेपसंयुता। द्रुतप्रचाराधिष्ठाना नानाचारीसमाकुला ॥ ५७॥

अथ वीरगतिमाह-अथ वीरे चेति। विस्तारेण क्षेप इति स्यन्दितापस्यन्दितादेग्रहणम्। तत्र च कलयार्धकलादि च प्रयोगः । तत एवोल्लासनिकाख्यं तालमत्राहुर्लक्ष्यविदः। द्रुतेन प्रचारेणाधिष्ठानं गन्तव्ये देशे यस्यामिति। मल्लघटीत्रयश्रादि विकृष्टपतितत्वे कलासार्धलघुद्रुतप्रचारं सूचितमनेन वीरे रौद्रें वा प्रवेगस्य स्पर्शभावत्वात् ॥५७॥ अभिनव-आसन्नपतित होने से बोभत्स में कला की आधी गति अथवा कला की चतुर्थांश गति और विकृष्ट अर्थात् दूरपतित होने के कारण बीभत्स में कला या अर्धकला प्रमाण की गति होती है, यह सूचित होता है॥ ५५॥ विमर्श-बीभत्स रस के अभिनय में भूमि रमशान तथा युद्ध में कटे हुए नरकंकाल से घृणित हो जाती है। इसमें पैर कभी पास में पड़ते हैं और कभी दूर पड़ते हैं। इसमें कट- कट कर गिरने वाले नर कंकालों से भूमि रमशान बन जाती है, जो देखने और सुनने में अप्रिय लगती है। ५४-५५॥ ४. वीररस की गति अभिनव-अब वीर रस की गति को कहते हैं-वीरे चेति। अनुवाद-वोर रस में पाद-विक्षेप पूर्वक द्रुत प्रचार के अधिष्ठान से युक्त और नाना प्रकार को चारियों से समाकुल (व्याप्त) गति का अभिनय करना चाहिए॥५७॥

१. ख. प्रकत्तग्या। २. ख. पदविक्षेपसंयुता। ३. द्रुता प्रहरणाविद्धा। ४. क. (टि०) उल्लसनास्यश्य तालस्य लक्षणं कोहलमते - तोटकस्यैव यः पादः द्रुतद्वयलयत्रयः । मालिनी द्विपदा चात्र ठक्करागस्य भाषया। अन्योन्यकार्यसंसगे मदे गर्वें प्रहूर्षिते। उल्लसना प्रयोक्तव्या सवंदा लयवेदिभिः ।

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३५

पारश्वक्रान्तैर्द्रुताविद्धैः' सूचीविद्धैस्तथैव च । 78 कलाकालगतैः पादैरावेगे योजयेद् गतिम् ॥ ५८ ॥

तत्र गतिमाह-कलाकालगतैरिति पादैरिति बहुवचनेन त्रयः पादपाता गृह्यन्ते। तेन कलया कालेन च सन्निधानात् तालगतैव गतिरिति लघु पातनं येषाम्। अथवैको लघुपातो द्वावन्योन्यद्रुतपातौ कलामात्रं च विराममित्येवम्।।५८॥

अभिनव-'पादक्षेप' का अर्थ है विस्तार से क्षेपण। इससे स्यन्दिता चारी एवं अपस्यन्दिता चारी का ग्रहण होता है। इसमें एक कला या अर्धकला का प्रयोग होता है। इसोलिए नाट्यवेत्ता लोग यहाँ उल्लासनिक नामक ताल को कहते हैं। इसमें गन्तव्य प्रदेश में द्रुतगति (शीघ्रता) से आगे चलकर अधिष्ठान (स्थान) प्राप्त करना अभीष्ट होता है। मल्ल एवं घटीयन्त्र आदि के विकृष्ट देश में पड़ जाने पर डेढ़ कला तक कभी लघु एवं कभी द्रुत प्रचार सूचित होता है। इससे वीर और रौद्र रस में आवेग नामक भाव का स्पर्श होने से कभी धीरे और कभो द्रुत प्रचार का विधान सूचित होता है॥५७॥

अनुवाद-पाश्वक्रान्ता, द्रुताविद्ध एवं सूचीविद्ध चारो से उपलक्षित कला प्रमाण वाले काल के अनुसार पैरों से आवेश को वशा में उचित गति का प्रयोग करना चाहिए।। ५८ ।।

अभिनव-अब आवेग में गति को कहते हैं-'कलाकालगतैरिति अर्थात् कलागत प्रमाण वाले काल के अनुसार गतिशील पेरों से यहाँ पर 'पादैः' इस बहुवचन के प्रयोग से तीन पादपातों का ग्रहण है। इससे कला और काल के सन्निधान से तालानुसरिणो गति होतो है, इसलिए इसमें लघु-पातन होता है अथवा एक लघु पात, एक दूसरे की ओर दो द्रुतपात और फिर एक कला का विश्राम होता है ॥। ५८ ।।

१. ख. तथाविद्वै।। २. ख. ग. कालाकालागतैः ।

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नांटघशास्त्रे

उत्तमानामयं प्रायः प्रोक्तो गतिपरिक्रमः । मध्यानामधमानां च गति वक्ष्याम्यहं पुनः ॥ ५९।। विस्मये चैव हर्षे च विक्षिप्तपदविक्रमान्। आसाद्य तु रसं 'हास्यमेतच्चान्यञ्च योजयेत् ॥ ६० ॥

उत्फुल्लकपरिक्रमः। स चोभयोर्वीररौद्रयोः क्रमः । उत्तमानामिति। ननु बीभत्सस्यैवोत्तमविषयतैवं केनैतदुपदिष्ट भवतः ? पुरुषार्थसाधनः बीभत्सः उत्तमेष्येवैतदभिहितरसविषय व्यभिचारियोगे तु ॥ ५९॥ मध्यमानां गतिमाह-विस्मये चेति।

अनुवाद-मैंने प्रायः उत्तम पात्रों का यह गति का परिक्रम बतलाया है। अब मैं मध्यम एवं अधम पात्रों की गति को कहूँगा॥ ५९॥ अभिनव-उत्फुल्लकपरिक्रमेति-वीर और रौद्र दोनों रसों में यह गतिपरिक्रम होता है। उत्तमानामिति-अब प्रश्न होता है कि बीभत्स रस की उत्तम-विषयता है तो आपको किसने इसका उपदेश दिया है ? कहते हैं कि बीभत्स भी पुरुषार्थ का साधन है। अतः रस के विषय में कहे हुए रसानुकूल व्यभिचारियों के संयोग से उत्तम पात्र में भी बीभत्स रस होता है। ५९॥

५-६. अन्भुत और हास्य रस में गति अभिनव-अब मध्यम पात्रों की गति को कहते हैं-'विस्मये च'। अनुवाद-विस्मय और हर्ष में पैरों की गति विक्षिप्त होनी चाहिए। भाव यह कि विस्मय और हर्ष की दशा में पॉद-क्रम इधर-उधर लड़खड़ाते हुए होने चाहिए। हास्य रस को प्राप्त करके तो इसी प्रकार की अन्य उचित गति की योजना करनी चाहिए॥ ६० ।

१. ख. ग. हास्यमेताश्चान्याश्च । २. क. (टि.) न तु बीभत्सस्योनोत्तमविषयतैवं।

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द्वादशोऽध्याय: ३७

पुनश्च करुणे कार्या गतिः स्थिरपदैरथ। वाष्पाम्बुरुद्धनयनः' सन्नगात्रस्तथैव च॥ ६१।। उत्क्षिप्तपातितकरस्तथा 2सस्वनरोदनः। गच्छेत्तथाध्यधिकया प्रत्यग्राप्रियसंश्रये ॥ ६२॥ एषा स्त्रीणां प्रयोक्तव्या नीचसत्त्वे तथैव च।

चकारादावेगादौ व्यभिचार्यन्तरेष्वपि। विक्षिप्तः इतस्ततो व्याकुलप्रायो लघुद्रुतबहुलः परिक्रमो यस्य तथा विस्मय एव व्यभिचारिरूपे स्थायिनि अद्भुतरसरूपे मध्यमानाम्। पुनरिति पुनर्ग्रहणादुत्तमानाम्द्,तेऽपि स्वच्छन्दगतिरेव पूर्वोक्तेति दर्शयति। केवलं तत्र विस्मयो वदन उत्पाद्यो मुखरागे।

७. करुण रस में गति अभिनव-अब करुण रस की गति को कहते हैं-पुनश्चेति। अनुवाद-पुनश्च करुण रस में स्थिरपद अर्थात् विलम्बित गति में पैरों को रखना चाहिये। आँसुओं के जल से रुद्ध (लबालब भरे ) नेत्र, शरीर का सुन्न होना, हाथों को उठाकर फिर नीचे पटकना, चिल्ला चिल्ला कर रोना आदि अध्य्धिका चारी के द्वारा नवोन अप्रिय घटना के समय में अभिनय करना चाहिए। इस गति का प्रयोग स्त्रियों तथा नीच पात्रों के विषय में करना चाहिए ॥ ६१-६३ ।। अभिनव-यहाँ पर चकार से यह सूचित होता है कि आवेग आदि अन्य व्यभिचारी भावों में यह गति होती है। 'विक्षिप्त' का अर्थ है इधर-उधर आने-जाने से व्याकुल तथा लघु-द्रुत-बहुल परिक्रम पादविक्षेप है जिसका। व्यभिचारी रूप का अर्थ है चितवृत्तिरूप। अन्ुत रसात्मक को प्राप्त होने वाले चित्तवृत्तिरूप विस्मय स्थायोभाव में मध्यम पात्रों की गति होती है। पुनरिति-पुनः पद के ग्रहण से सूचित होता है कि उत्तम पात्रों के अद्भुत रस में स्वच्छन्द गति पहिले बतायी जा चुकी है। केवल विशेषता यह है कि यहाँ वदन में मुख पर राग 'लालिमा' उत्पन्न हो जाती है। १. क-ज. वाष्पाम्बुनद्धनयनः । २. क-ड. सस्वररोदनः । ३. ख. ग. गच्छेत्तथाविद्धकायः प्रत्यग्रगतिसंश्रये।

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३८ नाटघशास्त्रे

उत्तमानां तु कर्त्तव्या सधैर्या वाष्पसंगता ॥ ६३ ॥ निःश्वासैरायतोत्सृष्टैस्तथैवोर्ध्वनिरीक्षितैः न तत्र सौष्ठवं कार्यं न प्रमाणं तथाविधम् ॥ ६४॥

एतच्चेति परं हास्यं स्मिताद्यतिहसितपर्यन्तं, यदोत्तमानां स्वस्थगतिरेव तदा मध्याधमानान्तु अपहसितातिहसितयोविक्षिप्तगतित्वमेव। अन्यच्चेति तावद्विदूषकगतौ वक्ष्यमाणम्। एवं प्रसङ्गाद द्रुतहास्ययोग्यगतिरभिहितार करुणे तूच्यते पुनश्च करुण इति। "ज्वरार्ते चे" त्यादिश्लोकेन यद्यपि स्तोकगतिरुक्ता तथापि यद्वक्ष्यत इति पुनः शब्दार्थः । स्थिरपदैः विलम्बितैः ॥ ६१-६२॥ आयतं दीघं कृत्वा उत्सृष्टैस्त्यक्तैः । उर्ध्वनिरीक्षणैः देवोपालम्भसूचकैः। न प्रमाणं तथाविधमिति नात्र सवथा प्रमाणाभावः, अपि त्वनियन्त्रितमेव पातात्मकं प्रमाणम्। अत एवात्र विलम्बितलयेन लघुलयेन द्रुतलयेन गुरुप्लुतमात्रेण च विरामेण

एतच्चेति-स्मित से लेकर अतिहसित पर्यन्त उत्कृष्ट हास्य है। इसमें उत्तम पात्रों को गति स्वस्थ होती है। किन्तु वहीं अपहसित और अतिहसित में मध्यम पात्र को गति विक्षिप्त होती है। 'अन्यच्च' पद से विदूषक की गति को आगे कहेंगे, यह संकेत दिया गया है। इस प्रकार यहाँ प्रसङ्गवश हास्य के योग्य द्रुत गति बतलाई गई है। अभिनव-यद्यपि 'ज्वरार्त्ते च' इत्यादि श्लोक के द्वारा करुण में स्तोक गति का उल्लेख कर दिया है तथापि जिसको आगे कहेंगे, यह पुनः शब्द का अर्थ है। 'स्थिरपदेः' का अर्थ है 'विलम्बित गति से पैर रखना' ॥ ६१-६३ ।। अनुवाद-उत्तम पात्रों की गति का अभिनय धैर्य से युक्त एवं आँसुओं से परिप्लुत, लम्बे लम्बे छोड़े गये दीर्घ निःश्वास और ऊर्ध्व-निरोक्षण के द्वारा करना चाहिए। इस गति में न सौष्ठव का कोई विधान है और न गति का कोई प्रमाण रहता है। इसमें अनियन्त्रित (स्वतन्त्र) पादपात हो प्रमाण होता है ॥ ६३-६४॥।

१. ख. सघैयं। २. ख. उत्कृष्टैः। ३. क. (टि.) धृतहास्यत्रिभिरभिहिता।

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द्वावशोऽम्याय:

मध्यानामपि सत्त्वज्ञा गतिर्योज्या विधानतः। उर:पात हतोत्साहशोकव्याकुलचेतनः१ ॥६५॥ नात्युत्क्षिप्तैः पदैर्गच्छेत् इष्टबन्धुनिपातने।

जम्भटिकाख्यो* लयः कोहलेन दशितः ॥६३-६४ ॥ उरस: पातः आभुग्नत्वात् करुणप्रसङ्गात्प्रहारे गतिमाह ॥६५ ॥

अभिनव-'आयत' का अर्थ है दीर्घ करके छोड़े गये दीर्घ श्वाँस। 'ऊर्ध्व- निरीक्षण' पद दैवोपालम्भ का सूचक है। 'न प्रमाणं तथाविधम् का अभिप्राय है गति का कोई शास्त्रीय प्रमाण न होना। इसमें केवल अनियन्त्रित पादपात की योजना ही प्रमाण है। इसलिए यहाँ पर कोहल ने विलम्बित एवं द्रुत लय के द्वारा तथा गुरु एवं प्लुत अक्षरों पर विराम के द्वारा 'जम्भटिका' लय का प्रयोग प्रदर्शित किया है ॥ ६३-६४ ॥ अनुवाद-सत्त्व के ज्ञाता अथवा सत्त्व के वेत्ताओं को विधान के अनुसार मध्य पात्रों की गति की योजना करनी चाहिए। इष्ट-बन्धु (प्रियजनों) के विनाश अर्थात् निधन हो जाने पर छाती पीटना, उत्साहहीन होना तथा शोक से व्याकुल-

१. ख. ग. पुस्तकयो: श्लोकार्धोडय नास्ति। २. ख. ग. उर:पातः गतोत्साहा। ३. ग. शोकव्यामूढ़चेतनः। क-ज. शोकव्याकुलचेतसः । कि निपी ४. जम्भटिकालक्षणमुक्तं तुम्बुरुणा- आदावृजुदयं कृत्वा द्विद्रुतान्तविरामिकम्। पुनरप्येवमेव स्याज्जम्भटी नाम कोतिता।। करुणारसपात्रेषु जम्भटीं सम्प्रयोजयेत् ।। तदेव कोहलमते -- "लघुद्वयं विघायाथ द्वौ द्रुतौ सविरामकौ। पुनरप्येवमेव स्याज्जम्भटीपात इष्यते।। फकलोक कि मरणे पतने चैवाप्रियस्य श्रवणे तथा। जम्भटिका सदा कार्या हा. त्तमाघममध्यमैः ॥ गुरुद्या चतुर्मात्रा गुरुरन्ते व्यवस्थिता। ककुभेन प्रयोक्तव्या जम्भटीलयकोविदैः ॥ जम्भटो, ज़म्भेटी, जम्भाटिका, जम्भेटिका च पर्यायवाचकाः॥

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Yo नाटघशास्म्र

गाढप्रहारे कार्या च शिथिलाङ्गभुजाश्रया॥ ६६।। विघूणितशरीरा च गतिश्चूर्णपदैरथ। शीतेन चाभिभूतस्य वर्षेणाभिद्गुतस्य च॥६७॥ गतिः प्रयोक्तृभिः कार्या स्त्रीनीचप्रकृतावथ।

चूर्णानि परिमितोत्क्षिप्तानि अधिकपतितानि पादानि 'तेनाध्यधिकातोऽ- ल्पान्तरं स्यात्। करुणे रसे दारिद्रयमभिभवस्त्वत्र शीतः 'वर्षभवः संभाव्यत इति। तद्ड्वगतिमाह-शीतेन चेति॥६७॥ चित्त हो जाना बतलाया गया है। ऐसो दशा में पैरों को बहुत ऊँचे उठाकर नहीं चलमा चाहिए॥ ६५-६६ ।। अभिनव-आभुग्न अर्थात् झुक जाने से छाती का पात 'उरपात' है। अनुवाद-चोट लगने (गाढ़ प्रहार) पर अङ्गों को शिथिल कर भुजाओं के आश्रित तथा शरीर को घुमाता हुआ पैरों को 'चूर्णपद' की स्थिति में रखना चाहिए। पैरों को थोड़ा ऊपर उठाकर जोर से पृथ्वी पर पटकना 'चूर्णपद' कहलाता है॥। ६६-६७ ।। अभिनव-करुण रस का प्रसङ्ग, होने से प्रहार अर्थात् चोट लगने पर 'गति' का निरूपण करते हैं-'चूर्णपदैरिति'। पैरों को थोड़ा ऊपर उठाकर फिर जोर से नीचे की ओर गिराना 'चूर्णपद' कहलाता है। इस क्रिया से चूर्णपद में अध्यधिका से थोड़ा अन्तर रह जाता है ॥ ६६-६७ ।। अभिनव-करुण रस के अभिनय में शीत से अभिभव होता है और वर्षा से अभिद्रव होता है अर्थात् प्रकृत में अभिभव शीतभव है और अभिभद्रव वर्षभव है। अतः शीतभव और वर्षभव गति को कहते हैं-शीतेन चेति। अनुवाद-शोत (ठण्ड) से अभिभूत तथा वर्षा होने पर दौड़ने वाले की गति का अभिनय नाट्य-प्रयोक्ताओं को स्त्री तथा अधम पात्रों की गति की तरह करनी चाहिए॥६७-६८ ॥

१. ख. काये। २. क-ड. शिथिलांसभुजाश्रण। ३. ग. गतिस्तूर्णा पदैरथ। क-ड. गतिघूर्णपदैरथ। ४. ख-ग. वर्षेणाभिहृतस्य च। ५. क. (हि.) तेनाम्पडिकातो । ६. क. (टि.) शीतभावः ।

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४१

पिण्डीकृत्य तु गात्राणि तेषां चैव प्रकम्पनम् ॥ ६८॥। करौ वक्षसि निक्षिप्य कुब्जीभूतस्तथैव च। दन्तोष्ठस्फुरणं चैव चिबुकस्य* प्रकम्पनम् ॥ ६९ ॥ कार्यं शनैश्च कर्त्तव्यं शीताभिनयने गतौ।

अथेत्यनेन मध्यमोत्तमानामनुभावन्यूनभावेन *शीतादिर्गांत सूच्यति। तेषामिति पिण्डीकृतानां गात्राणां, चकारेण कम्पनं सङ़कोचनं समुच्चीयते। एवकारेण सौष्ठवचातुरश्र्यादि निरस्यते कराविति कटिपातरूपावित्यर्थः । गात्राणि पिण्डीकृत्य करौ वक्षसि च कृत्वा या गतिः लोके तस्याभिगमने 'योऽयं शीताभिनयस्तत्र कर्तव्यः प्रयोक्तृभिनंटैर्गात्रकम्पनं कुब्जीभूतो देह इत्यादि कार्यमिति पदसङ्गतिः ॥६८-७०।।

अनुवाद -शीत के अभिनय में शरीर को सिकोड़ लेना, शरीर के अङ्गों का काँपना, हाथों को छाती पर रखकर कुबड़े की तरह टेढ़ा हो जाना, दाँत और ओठों का पकड़ना, चिबुक (ठुड्डी) का प्रकम्पन होना चाहिए तथा ठंड से धीरे-धीरे कार्य करना चाहिए॥ ६९-७० ॥ अभिनव-'अथ' पद से मध्यम और उत्तम पात्रों की शीतादि से होने वाली गति अनुभावों से शून्य भावों के द्वारा सूचित की जाती है। 'तेषाम्' का अभिप्राय है पिण्डीकृत पात्रों की। 'च' पद से (चकार) से शरीर के कम्पन एवं सङ्कोचन का समुच्चय होता है। 'एव' पद से सौष्ठव एवं चातुरश्रय आदि का निषेध किया गया है। 'करौ' पद से यहाँ वे हाथ अपेक्षित है जो कटि के ऊपर गिराये गये हैं। शरीर को सिकोड़कर हाथों को वक्षःस्थल (छाती) पर रखकर जो गति लोक में प्रसिद्ध है उसके अभिगमन में यह शीत का अभिनय है, वहाँ करना चाहिए और नाट्य- प्रयोक्ता को शरीर का कम्पन, देह का कुब्जीभाव (कुञ्चन) आदि लोकप्रचलित रूप में प्रस्तुत करना चाहिए॥ ६८-७० ।।

१. क-ढ. कुञचीभूतस्तथैव च। २. ख. चिबुकस्य तु कम्पनम्। क-च. चिम्बुकस्य च कम्पनम् । ३. क-न. शनैस्तु । ४. ख. ग. गन्तव्यं। ५. क. (टि.) गीतादिगति। ६. क. (टि.) यो भाव: क्रियते गीताभिनयः। ७. क. (टि.) नात्र कम्पनम्। ना० शा०-६

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४२ नाटघशास्त्रे

तथा भयानके चैव गतिः कार्या विचक्षणैः ॥ ७०॥ स्त्रीणां कापुरुषाणां च ये चान्ये सत्त्ववर्जिताः । विस्फारिते चले नेत्रे विधुतं च शिरस्तथा।। ७१॥। भयसंयुक्तया दृष्ट्या पारश्वयोश्च विलोकनैः'। द्रुतैश्चूर्णपदैश्चैव बद्ध्वा हस्तं कपोतकम् ॥ ७२॥ प्रवेपितशरीरश्च शुष्कोष्ठस्खलितं व्रजेत्।

एवं करुणे तत्प्रसङ्गेन चान्यत्रापि गतिमभिधाय भयानकं कथयति-ये चान्य इति। येषामुत्तमत्वं कुलाद्यौचित्यात्। अथ सत्त्वविहीनाः। तद्यथा-विराटपुत्र उत्तरः ।। ७१।। द्रुतैरित्यनेन 'धारालयादि: कोहलोक्तः सूचितः ॥ ७२॥ ८. भयानक रस को गति अभिनव-इस प्रकार करुण रस के प्रसङ्ग में और अन्यत्र भी गति का कथन करके अन्य भयानक रस में गति का निरूपण करते हैं-'ये चान्ये'। अनुवाद-भयानक रस के अभिनय में विद्वानों को स्त्री, कापुरुष और अन्य जो सत्त्व से वजित (बलहोन) व्यक्तियों को गति उस प्रकार प्रवशित करनी चाहिए। भयानक रस के अभिनय में नेत्र विस्तारित तथा चञ्चल, शिर कम्पित, भयातुर दृष्टि से दोनों पाशवों में वेखना, चूर्णपद से युक्त द्रुत गति होती है। इसमें हाथ को कपोत मुद्रा में बाँधकर, शरीर को कम्पित तथा ओष्ठ को शुष्क रखते हुए स्खलित गति से चलना चाहिए॥ ७०-७३। अभिनय-जिसमें कुल-शील आदि के औचित्य के कारण उत्तमत्व का औचित्य के प्राप्त होने पर भी जो सत्त्वहीन हैं। जैसे-विराट का पुत्र उत्तर। अभिनव-'द्रुतः' पद से कोहल के द्वारा बतलाये हुए धारालयादि का संकेत है।

१. ग. विलोकितैः । २. ग. द्रुतै। घूर्णपदैः । ३. क. (टि.) कलाद्योचित्यात। ४. क. (टि०) घारालक्षणं कोहलयते- "आदावष्टौ द्रुता ज्ञेया अन्ते चापि द्रुताष्टकम्। विरामरहिता धारा अघमेषु दुते लये।।

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एषानुकरणे कार्या तर्जने त्रासने तथा॥ ७३॥ सत्त्वं च विकृतं दृष्टवा श्रुत्या च विकृतं स्वरम्'। एषा स्त्रीणां प्रकर्तव्या नृणाञ्चाक्षिप्तविक्रमा ॥७४॥ क्वचिदासन्नपतितैविकृष्टपतितैः क्वचित्। एलकाक्रीडितैः पादैरुपर्युपरि पातितः ॥ ७५ ।

एषामेवानुगैर्हस्तैर्गात भीतेषु योजयेत्।

अनुसरण इति शत्रोः पृष्ठतः आगमनमित्यर्थः। नृणां पुनराक्षिप्तविक्रमं यत्तेनोपाहृतं मध्ये-मध्ये कृतधैर्य यस्यामित्यर्थः। तेन मध्ये गुरु-लघु-पादपाता अपि। तदाह-क्वचिदासन्नपतितैरित्यादि॥ ७३-७५॥

अनुवाद-शत्रु के द्वारा अनुसरण अर्थात् पीछा करने, फटकारने तथा डराने में इस गति का प्रयोग करना चाहिए। विकृत सत्त्व (प्राणी) को देखकर और विकृत स्वर को सुनकर आक्षिप्त (दबे हुए) पराक्रम वाले स्त्रो और पुरुषों के सम्बन्ध में इस गति का प्रयोग करना चाहिए। कहीं आसन्नपतित अर्थात् समीप में हलके पादपात और कहों पर विकृष्टपतित अर्थात् एक दूसरे से दूर रखकर भारी पादपात और कही एलकाक्रीडित चारो में एक पैर से दूसरे पैर का पादपात और इन्हीं के अनुगामी हाथों से उपलक्षित गति का प्रयोग करना चाहिए॥ ७३-७६ (१) अभिनव-'अनुसरण' का अभिप्राय है-शत्रु का पोछे से आगमन (आ जाना)। जिनमें विक्रम पुनः आक्षिप्त है उस उपाहृत विक्रय से बोच-बीच में धेर्य लाया जाता है। इसमें बीच में हलके और भारो पादपात भी हाते हैं। इसी को 'आसन्नपतितैः' आदि के द्वारा कहा गया है॥ ७३-७६ (१) ।

१. ग. विकृतं रवम्। ख. विकृतस्वरम् । २. ग. प्रयोक्तव्या । ३. स. ग. एड़काक्रीडितैः ।

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वणिजां सचिवानां च गतिः कार्या स्वभावजा ॥७६ ॥ कृत्वा नाभितटे 'हस्तमुत्तानखटकामुखम्। आद्यं चारालमुत्तानं कुर्यात्पाश्वं स्तनान्तरे ॥ ७७॥ न निषष्णं न च स्तब्धं न चापि परिवाहितम्। कृत्वा गात्रं तथा गच्छेत्तेन चैव क्रमेण तु॥ ७८॥ अथ शान्तरसे गतिर्वक्तव्या। सच प्राधान्येन तथा प्रयोगसौन्दर्यमावहति अतोऽन्तस्संस्काररूपता येषां वणिक्प्रभृतीनामस्ति "धीरप्रशान्ता वाणिज" इति वचनात्। यतिप्रभृतयोऽपि शान्तरसप्रधानाः, ये नाटकादौ प्रसङ्गा भवन्ति तेषा- मुभयेषामपि गतिमाह-वणिजामित्यादिना। सचिवा अमात्याः। शान्तत्वादेव हि हृदयं नियम्ययेषां वणिगमात्य- प्रभतीनाम्। स्वभावशब्देन तत्र १तत्रानाविष्टमेव रूपमाह। ७६-७८।

शान्तरस अथवा वणिक् एवं अमात्य की गति अभिनव-इसके बाद शान्त रस की गति बतलानी चाहिए थी, किन्तु यह गति प्रधान रूप से उसी प्रकार सौन्दर्य का आवहन करतो है, अतः 'धोरप्रशान्ता वणिजः' अर्थात् 'वणिक् (बनिये) धीरप्रशान्त होते हैं, इस वचन के अनुसार जिन वणिक् प्रभृति पात्रों के अन्तःकरण में वह शान्तरस संस्कार के रूप में स्थित है तथा जो शान्तरस प्रधान यति प्रभृति भी नाटक आदि में प्रसङ्ग होते हैं, उन सब की गति भी 'वणिजाम्' इत्यादि के द्वारा बतलाते हैं- अनुवाद-वणिक और सचिवों (अभात्यों) की गति स्वाभाविक होनी चाहिए। इसमें खटकामुख हस्त को उत्तान करके नाभि पर रखकर फिर एक अराल हस्त को उत्तान करके दोनों स्तनों के मध्य में पाशर्व में रखे। फिर शरीर को निषण्ण स्तब्ध और परिवाहित (हिलते हुए ) न रखे, अर्थात् शरीर को बिना हिलाये डुलाये उसी क्रम से अवाहित गति से चले ॥ ७६-७८॥ अभिनव-'सचिव' का अर्थ अमात्य है। वणिक्, अमाल्य आदि का हृदय शान्त होने से नियमन के योग्य है। स्वभाव शब्द से स्वभावजा गति के अनाविष्ट रूप को बतलाया गया है अर्थात् जिसको गति आवेश रहित हो॥७६-७८ ॥ १. ख. ग. हस्तं मुक्ताङ्गकटकामुखम्। २. ख. ग. तदन्तरे। ३. क. अनाविष्टं भावाविष्टमेव।

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द्वावशोऽ्यायें: ४५

अतिक्रान्तैः पदैविप्रा द्वितालान्तरगामिभिः। यतीनां श्रमणानाश्च ये चान्ये तपसि स्थिताः ॥ ७९॥ 'तेषां कार्या गतियें तु नैष्ठिकं व्रतमाश्रिताः । अलोलचक्षुश्च भवेद्युगमात्रनिरीक्षणः। ८० ।। उपस्थितस्मृतिश्चैव" गात्रं सर्वं विधाय च। अचश्चलमनाश्चैव यथावल्लिङ्गमाश्रितः॥८१॥ विनीतवेषश्च भवेत् कषायवसनस्तथा।

नैष्ठिकमिति ब्रह्मचर्य एव प्रवर्तित इत्यर्थः। युगं चतुरहस्तम्। उपस्थिता झटिति संस्कारप्रबोधप्रभवा स्मृतिर्यस्य। लिङ्गं जपभस्म कौपीनादि । अन्येष्विति नाममात्रवृत्तिषु तत्र तु विपर्यासौ यथोचितं द्रष्टव्यः। तद्यथा, लोलं चक्षुः, मन- ्चञ्चलम्। लिङ्गं पुनर्जटावि भवति। एवमन्यदुत्प्रेक्ष्यम्॥ ७९-८१॥

यति, श्रमण आदि की गति अनुवाद-हे विप्रों ! दो ताल के अन्तर के चाल से अतिक्रान्त पदों से यतियों, श्रमणों तथा जो अन्य तपस्या में स्थित है और जो नैष्ठिक ब्रह्मचर्य के व्रत में रत है उनको गति का अभिनय करना चाहिए। अभिनय में अभिनेता अलोल चक्षु अर्थात् चञ्चल दृष्टि रहित, युगमात्र का निरीक्षण करते हुए अर्थात् चार हाथ तक भूमि पर दृष्टि डालते दुए, अभिनेय वस्तु को स्मृति में रखकर, समस्त शरीर को सन्नद्ध करके स्थिरचित्त होकर अपने चिह्न को धारण कर, विनोत वेष तथा कषाय (गेरुआ) वस्त्र को धारण करे॥ ७९-८२॥ (१)

१. ख. पुस्तके श्लोकार्घोडयं नास्ति । २. ग. यतीनां चैव सर्वेषां। ३. ख. तेषां कार्या गतिविप्रा नैष्ठिकं व्रतमाश्रिता। ४. क-न. युगमात्रावलोकनः । ५. क-च उपस्थितगतिर्चैव। ६. ख. तथालिङ्गं समाश्रितः ।

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प्रथमं समपादेन 'स्थित्वा स्थानेन वै बुधः ॥ ८२ ॥ हस्तं च चतुरं कृत्वा तथा चैकं प्रसारयेत्। प्रसन्नं१ वदनं कृत्वा प्रयोगस्य वशानुगः॥८३॥ अनिषष्णेन गात्रेण गति गच्छेद् व्यतिक्रमात्*। उत्तमानां भवेदेषा लिङ्गिनां ये महाव्रताः ॥ ८४॥ एभिरेव विपर्यस्तैर्गुणैरन्येषु योजयेत्। तथा व्रतानुगावस्था ह्यन्येषां लिङ्िनां गतिः ॥ ८५।। विभ्रान्ता वाप्युदात्ता वा विभ्रान्तनिभृताऽपिर वा। शकटास्यस्थितैः पादैरतिक्रान्तैस्तथैव च।। ८६ ।। कार्या पाशुपतानां गतिरुद्धतगामिनी

अभिनव-नैष्ठिक व्रह्मचारियों की गति ब्रह्मचर्य से ही प्रवृत्त होती है। 'युग' शब्द चतुरहस्त या चतुर्हस्त का वाचक है। 'उपस्थितास्मृतिः' का अर्थ है- संस्कार के उद्बुद्ध होने से सर्वदा उपस्थित रहती है स्मृति जिसकी वह। 'लिङ्ग' पद का अभिप्राय है-जप, भस्म, कौपीन आदि। 'अन्येषु' का तात्पर्य है नाम मात्र के लिङ्गी, उनमें जपादि का विपर्यास (अभाव) दिखाई देता है। जैसे, उनके नेत्र लोल (कम्पित), मन चञ्चल और लिङ्ग जटा आदि हैं। इसी प्रकार अन्य को भी उत्प्रक्षा कर लेनी चाहिए। ७९-८१॥ अनुवाद-विद्वान् अभिनेता पहिले समपाद नामक स्थान में स्थित होकर एक हाथ को चतुर हस्त मुद्रा में रखकर दूसरे को फैला दे और प्रसन्नमुख होकर तथा प्रयोग के अनुसार नियन्त्रित होकर अस्थिर शरीर से व्यतिक्रम गति से चले। उत्तम यतियों को तथा अन्य महाब्रतधारी सन्यासियों की यही गति होती है। इन्हीं गुर्णों से विपरीत गुणों से अन्य व्यक्तियों की गति की भी योजना करे॥ ८२-८५॥

१. ख. कृत्वा। २ ख. प्रयोजनम् । ३. कन. प्रसन्नवदनं। ४. क. वशानुगम् । ५. ख. गच्छेदति अक्रमात्। ६. ख-ग. तथा व्रतानुगा च स्थान्येषां लिज्िनां गतिः । ७. क. चाप्युवात्ता। ८. क. विभ्रान्ता निभृतापि वा। ९ ख. गतिरुद्भ्रान्तगामिनी।

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व्रतानुगतत्त्वं स्फुटयति विभ्रान्ता चेति। 'उन्मत्तादिव्रतं हि श्रूयते। आगमेषु २तत्तबुचितैरित्यैवमेव गतिरित्यर्थः। 'क्रमणादुत्क्रान्तं कृत्वा पतिः पाधुपतानां परमेश्वरव्रतधारिणां गतिरत्युदात्तेत्यर्थः। यदि वा परमयोग्यवस्थायां 'नाकुल- दर्शनप्रतिपन्नानामुन्मत्तव्रतमप्यस्ति, तद्विषमेवोद्भ्रान्तत्वं गतौ। एवं रसान्त- रसङ्गतिरुक्ता। 'यच्चान्यै रौद्रानन्तरं शान्तरसाभिप्रायेण पठितम्। कह FT " रूपादित्वनिराशंसः परोपायविचिन्तकः। चतुष्कलैद्धिपातैश्च पादैर्भ्रान्त्गत ब्रजेत् ॥ इति तदनर्थमेव, "एतत् ग्रन्थे पुनरुक्तमपुष्कलार्थं, पुस्तके कथं दृष्टमिति स्वकल्पितमेवेत्युपेक्ष्यम्*॥ ८५-८६।।

अनुवाद-इनके अतिरिक्त अन्य सन्यासियों के व्रत की अवस्था के अनुगामी- जो विभ्रान्त होकर उदात्त अथवा विभ्रान्त होकर निभृत (शान्त) हैं उनकी गति का अभिनय शकटास्याचारो तथा अतिक्रान्ताचारी से करनी चाहिए। इसी प्रकार पाशुपत सम्प्रदाय के शैव सन्यासियों की उत्क्रान्तगामिनी गति का भी इन्हीं चारियों से अभिनय करे॥ ८२-८६ ॥ अभिनव-अब 'वतानुगा' का अभिप्राय स्पष्ट करते हैं -'विभ्रान्ता' इति। आगमों में जो उन्मत्त आदि व्रत सुनाई देते हैं, उनके योग्य पादों से इसी प्रकार की गति होती है। क्रमण अर्थात् उत्क्रमण करने के कारण परमेश्वर के व्रत को धारण करने वाले पाशुपतों की गति भी उदात्त होती है, उद्धत होती है अथवा परमयोगी की अवस्था में नकुलीश दर्शन के ज्ञाता पाशुपतों के लिए उन्मत्त व्रत का विधान भी है। इस व्रत के कारण उनकी गति में उद्भ्रान्तता (उद्धतता) होती है। इसी प्रकार रसान्तरों की सङ्गति कह दी गई हैं। जो अन्य विद्वानों ने रौद्र रस के बाद शान्त रस के अभिप्राय से कहा है- "रूप, रस आदि विषयों का निराकरण कर परमेश्वर (परमतत्त्व) की प्राप्ति के उपायों के चिन्तक विद्वान् चतुष्कल एवं द्विपात पादों से उद्भ्रान्त (उद्धत) गति से चले।" यह कथन अनर्थक है, निरर्थक है। इस ग्रन्थ में पुनरुक्त वचन पुष्कल नहीं है तो पुस्तक में कहाँ से कैसे देख लिया ? यह सब निजी कल्पना है, अतः यह उपेक्षणीय है।। ८५-८६ (?) ।।

१. क. उत्तमादिव्रतं। २. क. तत्र तदुचितैरेवं। ३. क. (टि) भ्रमणादुत्क्रान्तं। ४. क. नाकुटिल । ५. क. यरत्वन्थैर्वीररौद्रानन्तरं। ६. क. रूपादिसत्त्व । ७. क. तदानवमेन। ८. क. तद्ग्रन्थस्य। ९. ख. उत्प्रेक्ष्यम्।

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४८ नाटघशास्त्रे

अन्धकारेऽथ' याने च गतिः कार्या प्रयोक्तृभिः॥८७॥ भूमौ विसर्पितैः पादैर्हस्तैर्मार्गप्रदशिभिः२।

एवं रसानुसारेण गतिमुक्त्वा देशानुसारेणाप्याह-अन्धकार इति अन्धतवेन गमन इति। विसजितैरपक्षेणशन्यैः मार्गप्रदशिभिः मार्गान्वेषणपरैरित्यर्थः।।८७-८८।।

विमर्श-इस प्रकरण में यतियों, तपस्वियों एवं श्रमणों की गति का निरूपण किया गया है। यतियों, श्रमणों एवं नैष्ठिक व्रन को धारण करने वाले अर्थात् आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत को धारण करने वाले नैष्ठिक ब्रह्मचारियों की गति का अभिनय दो ताल के अन्तर का चाल से अतिक्रान्त पैरों से करना चाहिए। लिङ्ग अर्थात् भस्म, कौपोन आदि धारण करने वाले लिक्को तपस्वी होते हैं जिनको दृष्टि अचञ्चल, मति स्मृतिमान्, मन चञ्चलता रहित है, जो विनीतवेष एवं गेरुआ वस्त्र धारण करने वाले है, उनकी भी गति इसी प्रकार को होती है। इनके अतिरिक्त अन्य तपस्वियों की गति उक्त गुणों के विपरीत गुणों के द्वारा होतो है। अन्य लिङ्गियों अर्थात् पाशुपतव्रतवारियों की गति विभ्रान्त होते हुए भी उदात्त अथवा निभृत अर्थात् अनुद्धत होती है। इस प्रका उनकी गति शकटास्य एवं अतिक्रान्त पैरों से प्रदर्शित करनी चाहिए। पाशुपतों की गति उत्क्रान्तगामिनी होती है। नकुलींश पाशुपत दर्शन के अनुसार पागुपतों के लिए जो व्रत बताये गये हैं उनमें एक उन्मत्त ब्रत भी है जिसमें साधक उन्मत्तों के समान आचरण करता है। शरीर-कंपाना, लंगड़ाकर चलना, ऊट- पटांग बोलना, उलटा-सीधा काम करना, कामुक के समान आचरण करना, भस्म धारण करना आदि पाशुपतों के व्रत है॥ ७९-८६॥। अभिनव-इस प्रकार रसों के अनुसार गति को कहकर अब देशों के अनुसार गति को कहते हैं- अनुवाद-नाट्यप्रयोक्ताओं को अन्धकार में या अन्ध पात्रों के गमन में भूमि पर सरकते हुए पैरों तथा हाथों से मार्ग ( रास्ता) को टटोलते हुए गति का प्रदरशन करना चाहिए।। ८७-८८ ।। अभिनव-अन्धकार में अथवा अन्धे की तरह चलने में। 'विसर्पितैः' अर्थात् अपक्षेपण से शून्य भूमि पर पैर को खिसकाते हुए चलने से। 'मार्गप्रदशिभिः' का अभिप्राय है मार्ग (रास्ता) के अन्वेषण में तत्पर । ८७॥।

१. ख-ग. अन्धकारेऽन्घयाने च। २. ख. मागप्रद्शितैः । ३. इत्यथं: ।

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*रथस्थस्यापि कर्त्तव्या गतिश्चूर्णपदैरथ। समपादं तथा स्थानं कृत्वा रथगति व्रजेत् ॥ ८८॥ धनुर्गृहीत्वा चैकेन तथा चैकेन१ कूबरम्। जंल सूतश्चास्य भवेदेवं 9प्रतोदप्रग्रहाकुलः ।८९॥ वाहनानि विचित्राणि कर्तव्यानि विभागशः ।

गन्तव्यं रङ्गमण्डले॥ ९०॥

कर्तव्या गतिरिति च्छेदः। 'तदाह चूणपदैः,। चूर्णपदैरित्यनेन खण्ड- धारालयं द्रुतबहुलं गुर्वन्तं कोहलोक्तं सूचयति। समपादेन स्थानकेन रथेन गतिः यस्मिन् देशे तं व्रजेत। रथविशिष्टा वा गतिः। सामान्यके अकर्मकरभसात्मिका साडत्र इति। कूबरं युगन्धरं प्रतोदः प्रेषणकः, प्रग्रहो वल्गा। वाहनानि रथ्यानि तानि, प्रकृतिविभागौचित्येन विचित्राणि तुरगबलीवरदखरौष्ट्रकानि चित्राणि लिखितानि। अस्य सूतस्यैव कर्तव्यानि तच्चित्रपट सूतस्यैव हस्ते आवजयेदिति यावत। चूर्णपदानां लयविशेषनिरूपणाय पुर्नग्रहणं द्रुतैरिति। रङ्गमण्डल इत्यने- नेदमाह-वस्तुतोऽसौ ' 'रङ्गमण्डल एव गतिक्रियां करोति तथात्र सर्वम्।"'तच्चित्रं तद्रथाकृति कर्तव्यं तत्त्वनुगतपदमात्रमेव, रथो यातीति प्रतीयते। एवं सवंत्र।

रथस्थ पात्र को गति अनुवाद-रथ पर बैठे हुए पात्र की गति चूर्णपदों के द्वारा प्रदशित करनी चाहिए। रथारूढ़ पात्र समपाद स्थानक को करके एक हाथ से धनुष को लेकर और दूसरे हाथ से रथ का कूबर पकड़ कर रथ की गति का अभिनय करे और उसका सारथ चाबुक एवं लगाम को संभालने में व्यस्त हो। अलग-अलग प्रकृतियों के विभाग के अनुसार विचित्र वाहनों का अभिनय करे और द्रुत लय के साथ चूर्णपदों से रङ्गमञ्न पर प्रवेश करे॥ ८८९१॥

१. ख. अधस्तस्यापि। २. ख-ग. गतिस्तूणपदैरथ। ३. ग. ह्येकेन। ४. क. प्रतोदप्रग्रहाकुलम् । ५. कनन. रङ्गमण्डलम् । ६. क. तामाह चू्णपदै। ७. खण्डघाराया लक्षणम्-"वेदखत्रिदाः खण्डवारा"। ८. क. अधमेन। ९. क-ख. पुनग्रहघूरिति। १०. क. रथ्यामण्डल। क-ख. रम्यामण्डल । ११. क-ख. तच्छत्रम्। ना. था०-७

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५० नाटथशास्त्रे

विमानस्थस्य कर्तव्या ह्योषैव' स्यन्दिनी गतिः। *आरोदुमुद्वहेद् गात्रं किञ्चित् स्यादुन्मुखस्थितम्॥। ९१।॥। अस्यैव वैपरीत्येन कुर्याच्चाप्यवरोहणम्।

अत एवाह-विमानस्थस्यापीति। दिव्यस्याकाशगामिनोऽपि पुष्पकादेरित्यर्थः । अथ रथप्रसङ्गादुद्धतं क्रियान्तरमप्याह-आरोढमिति। उद्वहेदू्ध्वं प्रापयेत्। वैपरीत्येन अधोमुखत्वेन गात्राधोनयनेन चेत्यर्थः ॥ ९१-९२॥

अभिनव-'कत्तव्या गतिः' इस प्रकार पदच्छेद है। इसलिए 'चूर्णपदेः' कहा है। 'चूर्णपदेः' इससे कोहल के द्वारा कहे हुए द्रुतबहुल एवं गुर्वन्त (गुरु अक्षर पर विराम) खण्डधारालय का सङकेत है। समपाद स्थानक के द्वारा रथ से जिस देश में गति हो उस वेश में जाना चाहिए अथवा रथविशिष्ट की गति यहाँ प्रदशित है। सामान्यतः यहाँ पर अकर्मक रभसात्मिका (वेगवान्) गति है। 'कूबर' का अर्थ युगन्धर है, 'प्रतोद' का अर्थ चाबुक है और प्रग्रह का अर्थ लगाम है। 'वाहन' का अर्थ रथ में जोतने योग्य अश्वादि है। प्रकृति के विभागगत औचित्य से विचित्र अश्व, बैल, गदहा तथा ऊँट आदि चित्रित हों, इस सूत के ही ये कर्त्तव्य है, इसलिए चित्रपट को सूत के ही हाथों में आवर्जित कर दे। चूर्णपदों के लय विशेष का निरूपण करने के लिए 'द्रुतैः' पद का पुनः ग्रहण किया गया है। 'रङ्गमण्डल' इस पद के द्वारा यह कहा गया है कि जिस प्रकार वस्तुतः वह रङ्गमण्डल में ही गति कर्म करता है, वैसे ही यहाँ सब कार्य करता है। इसलिए रथ के आकार का चित्र बनाना चाहिए। वह भी अनुगत पदमात्र ही है, पदों में ही अनुकूलगमन हो जिससे, रथ से चल रहा है (रथ से जा रहा है), यह प्रतोत होता है। इसी प्रकार सब जगह करना चाहिए॥ ८८-९१ ।। विमानस्थ गति

अनुवाद-विमान पर आरोहण करते समय इसी स्यन्दिनी गति (रथा- रोहण की गति) का अनुसरण करना चाहिए। विमान पर आरोहण करने के लिए किञ्नित् उन्मुख (उन्नत) होकर शरीर का उद्वहन करे अर्थात् विमानारोहण के समय गात्र को उन्नत (ऊँचा उठाकर) स्थित करे और इसके विपरीत अर्थात् आरोहण क्रिया के विपरीत पद्धति से विमान से अवरोहण करे ॥ ९१-९२॥

२. स. एषैव। ३. ख. ग. आरूढमुद्हेव।

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दवेविशोऽब्याय: ५१

अधोऽवलोकनैश्चैव मण्डलावर्तनेन च॥ ९२। आकाशगमने चैव कर्तव्या नाट्ययोक्तृभिः। प्रिाघ स्थानेन समपादेन तथा चूर्णंपदैरपि ॥ ९३॥ व्योम्नश्चावतरेद्यस्तु तस्यैतां कारयेत् गतिम्। ऋज्वायतोन्नतनतैः कुटिलावतितैरथ ॥ ९४॥ भ्रश्यतश्च तथाकाशादपविद्धभुजा गतिः। 'विकीर्णवसना चैव तथा भूगतलोचना ॥ ९५ ॥

अथाकाशर्गत विमानप्रसङ्गादाह-अधोऽवलोकनेनेति।

अभिनव-'विमानस्थस्यापि' का अभिप्राय है विमान में बैठे हुए की भी अर्थात् आकाशगामी दिव्य पुष्पक आदि विमानों की। इसके बाद रथ के प्रसङ्ग होने से उद्धत अन्य क्रिया को भी कहते हैं-'आरोढुमिति'। 'उद्वहेत' का अर्थ है ऊपर को प्राप्त कराये। 'वैपरीत्येन' पद का अभिप्राय है अधोमुख रूप में गात्र को नीचे को ओर ले जाकर अवरोहण करना ॥९१-९२॥ आकाश गति अभिनव-इसके बाद विमान की प्रसङ्ज होने से आकाश गति को कहते हैं- 'अधोऽवलोकनेनेति'। अनुवाद-नाट्यवेत्ताओं को आकाश के गमन में अधः (नीचे) अवलोकन एवं मण्डलाकार आवर्तन के साथ समपाद स्थान के द्वारा चूणपदों से गति प्रवशित करे और जो आकाश से अवतरण करे उसकी गति इस प्रकार प्रवशित करे। अर्थात् आकाश से उतरते समय, ऋजु (सरल), आयत (लम्बे), नत (नीचे), उन्नत (ऊँचे), कुटिल (टेढ़े ) और आर्वात्तित (घूमते हुए) गति को प्रवशित करे तथा आकाश से गिरते हुए पात्र की गति अपविद्व-भुजा (दोला के समान झूलते हुए भुजाओं वाली), विकीर्णवसना (इधर उधर बिखरे हुए वस्त्र हों जिसमें) तथा भूगतलोचना (पृथ्वी पर लगी हुई दृष्टि से युक्त) होतो है॥ १२-९५ ॥

१. ख. ग. श्लोकार्धो नास्ति। २. ख. ग. रुद्धायतोऽनुतननं।। ३. क. विकीर्णवदना।

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नाटच शांस्त्रे

प्रासाद द्रुमशैलेषु नदोनिम्नोन्नतेषु आरोहणावतरणं कार्यमर्थवशाद् बुधैः ॥ ९६॥ प्रासादारोहणं कार्यमतिक्रान्तैः पदैरथ। 2उद्वाह्य गात्रं पादञ्च न्यसेत्सोपानपङिक्तषु॥। ९७॥ अथावतरणञ्चैव गात्रमानम्य रेचयेत् ।

मण्डलावतं परिवर्तु लगतिरिति केचित्। आकाशीयानां चारीमण्डलानां पुनः पुनरावर्तनेनेति तूपाध्यायाः एतामिति वक्ष्यमाणां कारयेन्नाट्याचार्यो नटैः ऋजुभिः सरलैः ललितजङ घैः । अत एवायतैरुत्क्षिप्तपातितैः, कुटिलया गत्या आवर्तितैः भ्रमितैः, उन्नतनतैरित्यन्ये पठन्ति, उत्क्षेपणकाले उन्नतैः पातनकाले तु नतैरिति व्याचक्षते। "भ्रश्यत इत्यबुद्धिपूर्वकं पतत इत्यर्थः । अपविद्धौ त्वरितडोला- कारपातौ भुजौ यस्याम्॥ ९२-९५॥

अभिनव-'मण्डलावर्त्त' का अर्थ कोई आचार्य परितः वर्तुल (गोलाकार) गति करते हैं। किन्तु हमारे उपाध्याय जी तो आकाशीय चारी मण्डलों का बार-बार आवर्तन करना कहते हैं। 'एताम्' का अर्थ है जिस गति को आगे कहेंगे उस गति को नाव्याचार्य नर्टों से कराये। 'ऋजु' का अर्थ सरल एवं ललित जङ्घाओं से है। इसलिए 'आयतैः' पद से 'पैरों को उठाकर गिराते हुए' तथा 'कुटिलावत्तितैः' पद से 'कुटिल (टेढ़ी ) गति से घुमाया जाना' अर्थ घोषित होता है। अन्य लोग यहाँ 'उन्नतनतः' पाठ मानते हैं। तदनुसार उत्क्षेपण के समय उन्नत और पातन (गिराने ) के समय नत रखना, इस प्रकार व्याख्या करते हैं। 'भ्रश्यतः' का अर्थ 'अनजाने में गिरते हुए' है और 'अपविद्धभुजा' का अर्थ 'डोला के आकार में जल्दी जल्दी भुजा हो जिसमें' है ॥ ९२-९५॥ प्रासादद्ुमपर्वताद्यारोहणावरोहण गति अनुवाद-प्रासाद, वृक्ष एवं पर्वत पर तथा नदी एवं ऊँचे-नीचे स्थानों पर प्रयोजन के अनुसार आरोहण तथा अवतरण करना चाहिए ॥ ९६॥ अनुवाद-प्रासाद पर आरोहण में अतिक्रान्त चारी पादों से शरीर को ऊपर उठाकर पैर को सीढ़ी पर रखे और प्रासाद से अवतरण में शरीर को थोड़ा झुका कर रेचित करे॥ ९७-९८ ॥

१. क. तधा। २. ख. उद्ाह्य गात्रपादं च सोपाने निक्षिपेन्नरः । ३. क.ग. तथावतरणं चैव गात्रमस्यैव कारयेत्। ४. क-ख. हृश्यतः ।

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प्रासादारोहणे' यनु तदेवाद्रिषु कारयेत्। केवलमूर्ध्वनिक्षेपमद्रिष्वङ्गं भवेदथ ।। ९९।। द्रुमे चारोहणं कार्यमतिक्रान्तैः 'स्थितैः पदैः। सूचीविद्वैरपक्रान्तैः पारश्वक्रान्तैस्तथैव च॥ १००॥ एतदेवावतरणं सरित्स्वपि नियोजयेत्। *प्रासादे यन्मया प्रोक्तः प्रतारः केवलो भवेत् ॥ १०१ ॥ जलप्रमाणापेक्षा तु जलमध्ये गतिर्भवेत्। तोयेऽल्पे वसनोत्कर्षः प्राज्ये पाणिविकर्षणैः ॥ १०२ ॥ किञ्चिन्नताग्रकाया तु प्रतारे गतिरिष्यते । अर्थवशादिति स्फुटयति-अवतरणमिति। तटादवतीर्य ततः शरीरं प्रयोगेन रेचयेतु ॥ ९७-९८ ॥ अभिनव-'अर्थवशात्' को स्पष्ट करते हैं-अर्थ अर्थात् प्रयोजन के अनुसार अवतरण करना चाहिए। नदो के तट से उतर कर शरीर को प्रयोग के द्वारा रेचित करे ॥ ९७९८ ॥ अनुवाद-प्रासाद पर आरोहण में जो गति-विधान बताया गया है वही गति पर्वत पर चढ़ने में करे। पर्वतारोहण में केवल पैरों के पञ्जों पर अङ्ग का निक्षेप होना चाहिए अर्थात समस्त शरीर को ऊपर को ओर उठाकर पर्वंत पर आरोहण करे॥ ९९॥ अनुवाद -वृक्ष पर आरोहण में अतिक्रान्त चारी में पैरों को उछालकर क्रमशः सूचीविद्ध, अपक्रान्त और पाश्वक्रान्त चारियों के द्वारा उठे हुए पैरों से गति प्रदर्शन करे॥ १०० ॥

१. ख. प्रसादारोहणं। २ क, केवलं तच्च विक्षेपं। ख. ग. केवलं मूर्धनि क्षेपं। ३. क. अङ्घ्रिष्वङ्गं भवेदथ । ४. ख. ग. अतिक्रान्तोत्थितैः पदैः । ५. ग. प्रसादे यन्मया प्रोक्त प्रतार: केवलो भवेद । ख. प्रासादे यन्मया प्रोक्ता प्रतारे केघलं भवेत्। ६. क-न बसनोतकरषैः ।

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५४ नाटर घं्यास्त्रे

प्रसार्य बाहुमेकैकं `मुहुर्बारिविकर्षणैः ॥१०३॥ तिर्यक् प्रसारिता चैव 'ह्ियमाणा च वारिणा। गतिरिष्यते ॥ १०४ ॥

प्रतार इति। एतत्प्रकारं व्याचष्टे। जलप्रमाणापेक्षा त्विति। एतत्स्फुटयति- तोयेऽल्प इति। उत्कर्ष: उर्ध्वं नयनं, प्राज्ये भूयसि जले यः प्रचारस्तत्र पाणिविचित्र- कर्षणेन पताकसपंशीषंकादिनोपलक्षितगतिरिति सम्बन्धः॥ १०१-१०२॥ अबुद्धिपूर्वकन्तु जलेन नीयमानस्य गतिमाह-प्रसार्येति। अशेषेऽङ्ग आकुलर्त्वं यस्यां गतौ तथा आधूतमुच्यते तिर्यक् सकृदुद्वाहितं तुलयेत्। अस्वतन्त्रत्वाच्चैवं भवति। कैश्चित्तु पर्यायशः पाश्वत्वमुक्तं, तदसत्। परिवाहितं ह्येतत बुद्धिपूर्वके च जलप्रतरणे तत्स्यात्, नत्विह॥१०३-१०४॥

अनुवाद-नदी में उतरने के समय इसी प्रकार गति का प्रयोग करे। प्रासाद से उतरने में जो गति बताई गई है वही केवल प्रतार अर्थात् जल-संतरण में होनी चाहिए। जल के मध्य में तो जल के प्रमाण की अपेक्षा से गति प्रदर्शित करे। अल्पमात्रा में जल होने पर वस्त्रों को ऊपर उठाते हुए और जल के अधिक होने पर हाथों से विकर्षण करते हुए शरीर को थोड़ा आगे की ओर झुका कर प्रतार (जल- संतरण ) का अभिनय करना चाहिए॥ १०१-१०२॥ अभिनव-'प्रतार' का अर्थ है जल-संतरण। 'जलप्रमाणापेक्षा' का अभिप्राय है जल के प्रमाण की अपेक्षा। इसी बात को 'तोयेऽल्पे' इत्यादि के द्वारा स्पष्ट करते हैं। 'उत्कर्ष' का अर्थ है 'ऊपर को जाना'। प्रभूत जल में जब प्रचार हो तो वहाँ हाथों के द्वारा विचित्र रूप से कर्षण करते हुए (हटाते हुए) पताक और सपशीर्ष हस्तमुद्राओं से उपलक्षित गति होती है ॥ १०१-१०३॥

अभिनव-अज्ञानता के कारण जल बहाकर ले जाने की गति को कहते हैं- प्रसार्येति। अनुवाद-भुजाओं को क्रमशः फैलाकर बार-बार जल के विकर्षण (हटाने ) तिरछी फैली हुई और जल के द्वारा बहाकर ले जाने वाली, समस्त शरीर के आकुल होने और कम्पित मुखवाली गति का अभिनय करे॥ १०३-१०४ ॥ १. ख-ग. शुद्धबाहुविकर्षणेः । २. ख. ग. ह्रियमाणस्य वारिणः। ३. ख. पूरवदना।

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अतिक्रान्तेन पादेन द्वितीयेनाञ्चितेन च। नौस्थस्यापि प्रयोक्तव्या द्रुतश्चूर्णपदैर्गतिः ॥ १०५ ॥। अनेनैव विधानेन कर्तव्यं गतिचेष्टितम्। संज्ञामात्रेण कर्तव्यान्येतानि विधिपूर्वकम् ॥ १०६ ॥ कस्मान्मृत® इति प्रोक्ते किं कर्तव्यं प्रयोक्तृभिः॥ १०७॥ अङ्कशग्रहणान्नागं खलीनग्रहणाद्धयम् प्रग्रहग्रहणाद्यानमेवमेवापरेष्वपि ॥ १०८ ॥ जलप्रसङ्गात् नौगतिमाह-नौस्थस्येति। ननु वृक्षप्रासादादि तत्र कि रङ्गमण्डले रथचित्रपटादिन्यायेन दर्शनीयं, नेत्याह संज्ञामात्रेणेति। संज्ञा उक्तरूपारोहणाद्यभिनयः। प्रसङ्गादन्यत्राप्यभिनयं दर्शयति। अङ्कशाग्रहणादित्यादि । तेन चित्रपटादिवियोगेऽपि रथगमनाद्यभिनयं न युक्तम्। सौकर्यांत्तु तत्करणमपि भवत्विति भाव: ॥ १०६-१०८॥ अभिनव-समस्त अङ्ग में व्याकुलता है जिस गति में यह 'अशेषाङ्गाकुला' का अर्थ है और 'आधृतकदना' का अभिप्राय है मख को एक बार तिरछा घुमाकर सन्तुलित करे। मनुष्य के स्वतन्त्र न होने से इस प्रकार की स्थिति होतो है। कुछ आचार्यो ने जो बारी-वारी से पार्श्व का परिवर्त्तन कहा है वह ठीक नहीं है, क्योंकि यह परिवाहित है। बुद्धिपूर्वक जल के संतरण में वह (पाश्वं परिवर्त्तन) होता है, यहाँ पर नहीं ॥ १०३-१०४ ॥

गति को कहते है- अभिनव-जल का प्रसङ्ग होने से 'नौस्थस्थ' इत्यादि के द्वारा नौका की अनुवाद-नौका में स्थिन पात्र की गति शोघ्रतापूर्वक चूणंपदों से एक पाद को अतिक्रान्त चारी में और दूसरा पैर अञ्रित स्थिति में प्रयोग करना चाहिए। इसी विधान के अनुसार गति की चेष्टाओं को प्रद्शित करना चाहिए। इन सभी कर्मो को विधिपूर्वक केवल सङ्केतों (इशारे) के द्वारा प्रदशित करना चाहिए। प्रयोक्ताओं के द्वारा प्रयोगकाल में 'यह मर गया' ऐसा कहने पर क्या वह मर जाता है? नहीं, वह मरने का अभिनय करता है। जिस प्रकार अङ्कश के ग्रहण से हाथी, लगाम के ग्रहण (खीचने) से घोड़े और रस्सी के ग्रहण से यान आदि का प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति होती है उसी प्रकार अन्यों में भी वैसा करना चाहिए॥ १०५-१०८॥ १. ख. गतिष्चूर्णपदैः। ग. द्रतैस्तूणेः। १. ख. ग. कस्मान्नुत्त इति । ३. कनन. प्रतोवग्रहणाद्यानं ।

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५६ नाट घशास्त्रे

अश्वयाने गतिः कार्या वैशाखस्थानकेन तु । यथा' चूर्णपदैश्चित्ररुपर्युपरि पातितैः ॥ १०९॥ पन्नगानां गतिः कार्या पदैः स्वस्तिकसंयुतैः। पाश्वक्रान्तं पदं कुर्यात् स्वस्तिकं "रेचयेदिह ॥ ११० ॥ अभिनव-क्या रथचित्रपटादि न्याय से उस रङ्गमण्डप में वृक्ष, प्रासाद आदि दिखाना चाहिए ? कहते हैं कि नहीं, संज्ञामात्र से अर्थात् सङ्कतों के द्वारा प्रदर्शित करना चाहिए। 'संज्ञा' का अभिप्राय है उक्त रूप (पूर्व कथित ) आरोहण आदि का अभिनय। प्रसङ्गवश 'अङ्कशग्रहणात्' इत्यादि के द्वारा अन्यत्र भो अभिनय दिखाते है। इससे यह दिखाया गया है कि चित्रपट आदि के बिना रथगमन आदि का अभिनय करना ठीक नहीं है, किन्तु सौकर्य के कारण वह वैसा हो भी सकता है॥ १०५-१०८ ॥ विमर्श-यहाँ यह बताया गया है कि नाट्य-प्रयोग में रङ्गमण्डप में चित्रपटों पर अद्कित अनुकृतियों एवं प्रतोकात्मक अभिनयों दोनों का प्रयोग होना चाहिए। अभिनवगुप्त भी चित्रलिखित अनुकृतियों एवं प्रतोकात्मक अभिनयों दोनों का प्रयोग उचित मानते हैं। उनका कहना है कि इससे नाट्यप्रयोग में रमणोयता आती है और प्रत्यक्ष सी आनन्दानुभूति होती है। ये प्रतोकात्मक संकेत प्रयोगकाल में सत्य से प्रतीत होते हैं। यद्यपि वे वहाँ उपस्थित नहीं होते, केवल प्रतोकों के जरिये उपस्थिति रहते हैं। फिर भी उन प्रतोकात्मक सकेतों द्वारा आनन्द की अनुभूति होती है। अश्व-गति अनुवाद-घुड़सवारी में वैशाख स्थान तथा ऊपर-ऊपर गिराये गये चित्र- विचित्र चूर्णपवों के द्वारा गति का प्रदर्शन करना चाहिए॥ १०९॥ सर्प-गति अनुवाद-स्वस्तिकयुक्त पादों के द्वारा सर्पं की गति का अभिनय करना चाहिए। इसमें पहिले पाश्वक्रान्ताचारी में पाद को रखकर फिर स्वस्तिक पाद का रेचन करना चाहिए।। ११० ।।

१. ग. तथा तूणपदैः । २. ख. ग. स्वस्तिकसंशितैः । ३. कनन, योजयेदिह।

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द्वावझोऽ्याय:

विटस्यापि तु कर्तव्या गतिर्ललितविक्रमा'। पादैराकुञ्चितैः किश्चित् तालाभ्यन्तरपातितैः ॥१११ ॥ *स्वसौष्ठवसमायुक्तौ तथा हस्तौ पदानुगौ। खटकावर्धमानौ तु कृत्वा विटर्गात व्रजेत् ॥ ११२ ॥ कञ्चुकीयस्य कर्तव्या वयोऽवस्थाविशेषतः। अवृद्धस्य प्रयोगज्ञो गतिमेवं प्रयोजयेत् ॥ ११३ ॥ अर्धतालोत्थितैः पार्दर्विष्कम्भैः ऋजुभिस्तथा। समुद्ृहन्निवाङ्गानि पङ्कलग्न इव व्रजेत् ॥ ११४॥

स्वस्तिकसंयुतैरित्युक्तमेव विभजति-पारश्वक्रान्तमिति। एवं देशापेक्षया गतिरुक्ता। नागादिप्रसङ्गात्त सर्पंगतिरपि ॥ ११० ॥ अथावस्थाभेदेन गति निरूपयन् विटावस्थायां तावदाह-विटस्यापि चेति। स्वं प्रकृत्युचितं यत्सौष्ठवम् ॥ ११२॥।

अभिनव-'स्वस्तिकसंयुतैः' यह जो कहा गया हैं, अब उसका विभाजन करते हैं-'पार्श्वक्रान्तमित्यादि'। इस प्रकार देश की अपेक्षा से गति का निरूपण किया गया है। नागादि के प्रसङ्ग से सर्पो की गति को भो कह दिया है ॥ ११०॥ अभिनव-अब अवस्था भेद से गति का निरूपण करते हुए पहिले विटावस्था की गति को कहते हैं - अनुवाद-विट की गति ललितविक्रम होनी चाहिए। आकुश्चित पादों को एक ताल के अन्तर पर रखते हुए सब सौष्ठवयुक्त तथा पैरों का अनुसरण करने वाले गोनों हाथों को खटकावर्घमान स्थिति में करके विट की गति का अभिनय करे॥ १११-११२॥ अभिनब-'स्वसौष्ठव' का अर्थ है स्व अर्थात् प्रकृति के उचित जो सौष्ठव ॥ ११२॥।

१. क. ललितिविभ्रमा। २. ख. ससौष्ठवसमायुक्त्तौ । ३. ग. कब्चुकीव प्रस्तव्या। ४. क-ह. आवृदस्य । ५. क. समुद्ृहंस्तथाङ्गानि। क-न. समुद्ृहृंश्य गात्राणि । ६. क. वरजन्। ना. शा०-८

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नाटघशारथे

अथ वृद्धस्य कर्तव्या गति: कम्पितदेहिका। गगी विष्कम्भनकृतप्राणा मन्दोत्क्षिप्तपदक्रमा।। ११५।।

कञ्चुकमिति तन्नेपथ्योचिता वृत्तिः तदिच्छत्यात्मन इति "क्यच च" कञ्चुकीयः । वयोऽवस्थाविशेषात् इति यदुक्तं तद्विभजत्येवमिति वक्ष्यमाण- क्रमेण विष्कम्भः स्थैयं तद्येषामिति मत्वर्थोयोऽकारः। समुद्वहन्निति यत्नेनाकर्षन्। एतदेव दृष्टान्तेन शिक्षयति-पडूलग्न इवेति। अत एव खञ्जकहेलाविल- म्बितलघुमयस्य कोहलोक्तस्य सङ्ग्रहः। विष्कभने यष्ट्यादिके कृतं समन्वितं प्राणो वलं येन ॥ ११५ ।

कञ्चुकीय की गति अनुवाद-कञ्चुकीय की गति उसकी आयु तथा अवस्था स्थिति) विशेष के अनुसार होनी चाहिए। नाट्यप्रयोक्ता युवक कञ्ुकी को गति का प्रयोग इस प्रकार करे। अर्धताल की ऊँचाई पर उठे हुए सरल एवं लम्बे डगों से कीचड़ में सने हुए व्यक्ति के समान अपने अङ्गों को सम्हालते हुए से गति प्रदशित करे॥ ११३-११४॥ अनुवाद-वृद्ध कञ्चुकी को गति का अभिनय शरीर को कॅपाते हुए धोरे- धीरे (रुक रुक कर), यष्टि (लाठी, डंडा) को प्राणों का आधार बनाये हुए तथा मन्दगति से पैरों को उठाकर रखते हुए करना चाहिए ॥ ११५।। अभिनव-कञ्चुक का अर्थ है नेपथ्य के योग्य वृत्ति। उस वृत्ति को जो अपने लिए इच्छा करता है। 'कञ्चुकं नेपथ्योचिता वृत्तिः तदात्मन इच्छति' इस विग्रह में 'सुप आत्मनः क्यच्' इस सूत्र से 'क्यच्' प्रत्यय और 'क्यचि च' सूत्र से कञ्चुक शब्द के अन्तिम 'क' के 'अ' के स्थान पर 'ई' आदेश होकर 'कबन्चुकीय' शब्द बनता है। वय और अवस्था विशेष से ऐसा जो कहा गया है उसका विभाजन करते हैं। 'एवम्' पद का अर्थ है वक्ष्यमाण प्रकार से। 'विष्कम्भक' का अर्थ है 'स्थैय'। वह स्थेय' जिसे हो वह भी 'विष्कम्भ' है। यहाँ मत्त्वर्थीय 'अ' प्रत्यय है। 'समुद्वहन्' का अर्थ है प्रयत्न से आकर्षण करते हुए। इसी को दृष्टान्त के द्वारा स्पष्ट करते हैं-'पड्ूलग्न इव'। इसलिए कोहलोक्त खञ्जक, हेला, विलम्बित आदि का सङग्रह हो गया। विष्कम्भन अर्थात् यष्टि आदि में बल (शक्ति) समन्वित कर दिया है जिसने ॥ ११३-११५ ॥ १. स. ग. विष्कम्भेन कृतप्राणा । २. ग. मन्दोस्थिप्तपदक्रमात।

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५९

विमर्श -'कञचुक' का अथ है अंगरखा गा चोगा। उसे जो धारण करता है वह 'कञ्चूकी' या 'क्चुकीय कहलाता है। भरत ने कञ्चुकी का लक्षण निम्नलिख्चित प्रकार बताया है- ये विद्यासत्यसम्पन्नाः कामवोषबिवर्जिताः। ज्ञानविज्ञानकुशलाः क्चुकीयास्तु ते स्मृताः ॥ -[ ना० शा० (काव्यमाला) १४।५६ ] यहाँ यह बताया गया है कि नाट्यप्रयोग में वृद्ध कबन्चुकी का शरीर कांपता रहता है, यष्टि (लाठी ) के सहारे चलता है, दीर्घ सांसे लेता है, गति मन्द होती है। किन्तु अवृद् (युवक ) कञन्चुकी आधे ताल पर उठे हुए पैरों से शरीर को सम्भालते हुए सरल गति से चलता है। इस प्रकार अवस्था भेद से दोनों की गति में अन्तर आा जाता है॥ ११३-११५॥

१०. खञ्जकस्य लक्षणं तुम्बुरुणोक्तं यथा- प्रथमं कुटिलं कृत्वा धनमेकं द्रुतद्वयम्। गुर्वन्तं खञ्जकं नाम शम्यातालो निरग्तरः ॥ हेलायास्तु तेनैव- चत्वारोऽथ नखा: पूर्वे द्विचक्र्कं तदनन्तरम्। पुनरप्यमेवमेव स्याच्छम्यातालो निरन्तरः । पाटैर्द्वादशभियुक्तः कार्याः शेषाश्चतुर्गुणम्। चञ्चत्पुटस्य भेदोऽयं हेलाया विधिरुच्यते।। वेश्याद्विजवधूनः च क्रीड़ारम्भकुटुम्बिनाम्। भवनप्रतिहाराणां योजयेत्तत्परिक्रमे॥। कोहलमते तु तस्या :- चत्वारो लघवः पूर्वमन्ते च गुरुणी तथा। पुनरप्येवमेव स्यान्मात्रा ह्यघमजातिष्।। प्रयोक्तव्या ध्रवं हेलातालक्चञचत्पुटस्य च। उद्यानभवनक्रोड़ादीपिकालोकने तथा।। भविष्यन्नायके चैव कन्यानां ठक्करागता। मालववेसरिकार्यो रागोऽत्र विहिता सवा ।। विलम्जितालक्षणं तु कोहलेन- "लघुनी गुरुणी चैव लघू आद्यन्तयो गुरु। विलम्बिता ध्रवा जञेया षट्पितापुत्रभज्जकृत्।। सर्वासामेव नारीणामभिसारपरिक्रमे । सोम्या तु द्विपदी चान ज्ञेया मालवकैशिके।। इति ।

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नोट पशास्त्रे

कृशस्याप्यभिनेया वै गतिर्मन्दपदक्रमा'। १व्याधिग्रस्ते ज्वरार्ते च तपःश्रान्ते क्षुधान्विते ॥ ११६ ॥ विष्कम्भनकृतप्राणः कृशः क्षामोदरस्तथा। क्षामस्वरकपोलश्च दीननेत्रस्तथैव च॥११७॥ शनैरुत्क्षेपणं चैव कर्त्तव्यं हस्तपादयोः। कम्पनं चैव गात्राणां क्लेशनं च तथैव च ।। ११८ ।। दूराध्वानं गतस्यापि गतिर्मन्दपदक्रमा। विकूणनञ्च गात्रस्य जानुनोश्च विमर्दंनम् ॥ ११९॥

विकूणनं सङ्कोचनं विमर्दनमिति मिश्रपरिहारार्थम् । ११९॥ अनुवाद-कृशकाय व्यक्ति की गति मन्द पदक्रम से अभिनोत की जानी चाहिए और व्याधि से ग्रस्त, ज्वर से पीड़ित, तपःश्रान्त (तप से थके हुए) तथा क्षुधा से पोड़ित, यष्टि को प्राणों का आधार बनाये हुए, कुश, क्षीण उदर वाले क्षीण स्वर और क्षोण कपोल वाले तथा दीन नेत्र वाले व्यक्तियों के अभिनय में दोनों हाथों एवं पैरों को उत्क्षेपण, शरीर में कम्पन और शैथिल्य (अथवा क्लेशन) का प्रदशन करना चाहिए ॥ ११६-११८।। विमश-कृशकाय अर्थात् दुबले-पतले शरीर वाले व्यक्ति के अभिनय में पात्र की गति धोरे-ीरे पैर उठाकर प्रदर्शित करनी चाहिए। इसो प्रकार रोग से पीड़ित, जवरग्रस्त, तपस्या से क्षीण एवं थके हुए व्यक्ति और जो भूख से व्याकुल हों, ऐसे पात्रों की गति घीमी- चाल से प्रदर्शित करनी चाहिए। इसी प्रकार लाठो के सहारे चलने वाले क्षीणकाय, क्षीण उदर वाले तथा क्षोण स्वर एवं दीन नेत्र वाले पात्रों की गति हाथ-पैरों को इषर- उघर फेंकते हुए तथा शरीर को कँपाते हुए, प्रदर्शित करनी चाहिए॥ ११६-११८ ।। अनुवाद-दूर (लम्बे) मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति की गति मन्द पदक्रम (चाल) वाली होनी चाहिए। इसमें शरीर का सङ्कोचन तथा जानुओं का विमर्दन करना चाहिए॥ ११९॥ अभिनव-'विकूणन' का अर्थ शरीर का संकोचन (सङ्कुचित होना) है। 'विमर्दन' पद मिश्रित क्रियाओं के परिहार के लिए है ॥ ११९ ॥ १. क गतिर्मन्दपरिक्रमा। ग. गतिर्मन्दपरिक्रमात्। २. क-द. व्यािग्रस्तस्य तथा एषा तपःश्रान्तस्य चैव हि। ३. क-द. क्षामस्वरश्चैव भवेत्।

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स्थूलस्यापि तु कर्तव्या गतिर्देंहानुकर्षणी। समुद्वहनभूयिष्ठा मन्दोतिक्षिप्तपदक्रमा ॥ १२० ॥ विष्कम्भगामी च भवेन्निः्वासबहुलस्तथा। श्रमस्वेदाभिभूतश्च व्रजेच्चूर्णपदैस्तथा॥। १२१।। मत्तानां तु गतिः कार्या मदे तरुणमध्यमे। वामदक्षिणपादाभ्यां घूर्णमानापसर्पणैः॥१२२॥ अवकृष्टे पदे चैव ह्यनवस्थितपादिका। विघूणितशरीरा च करैः 'प्रस्खलितैस्तथा ॥ १२३ ॥

स्थूलस्येति महाकायस्य श्रमकृत्स्वेदः ॥ १२० ॥

स्थूल-गति अनुवाद-स्थूल व्यक्ति की गति शरीर का अनुकर्षण करने वाली, अधिक बोझ (भार) उठाने वाले व्यक्ति के समान चेष्टा वाली, मन्द गति से पैरों को उठाकर चलने वाली होनी चाहिए। स्थूल व्यक्ति को सहारा लेकर चलने वाला, दीर्घ (लम्बो) सांस लेता हुआ, श्रम से उत्पन्न पसीने से अभिभूत होकर चूर्ण पदों से गमन करना चाहिए॥ १२०-१२१।। अभिनव-'स्थूल' पद का अर्थ है महाकाय। स्थूल व्यक्ति को थोड़े हो परिश्रम से पसीना आ जाता है॥। १२०-१२१।। मत्त-गति अनुवाद-मत्त पुरुषों की गति तरुण एवं मध्यम मद में बायें एवं दाहिने पैरों से घूर्णन लड़खड़ाते हुए) तथा अपसर्पण (विपरीत-सर्पण) के द्वारा प्रदर्शित करनी चाहिए और अधम मद में पैरों को अनवस्थित (अनियमित) रूप से रखते हुए, शरीर को झुकाते हुए (झूमते हुए) तथा हाथों को प्रस्खलित अर्थात् इधर- उधर घुमाते हुए प्रदशित करनी चाहिए॥। १२२-१२३ ।। १. ग. तूर्णपदैः तथा व्रजेत्। २. ख. ग. घूर्णभानोपसर्पणैः । ३. ख. अपकृष्टे। ४. ख. ग. पदैः प्रचलितैरथ।

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नाट घशारतरे

उन्मत्तस्यापि कर्त्तव्या गतिस्त्वनियतक्रमा। बहुचारीसमायुक्ता लोकानुकरणाश्रया ॥ १२४।। 2रुक्षस्फुटितकेशश्च रजोध्वस्ततनुस्तथा । अनिमित्तप्रकथनो बहुभाषी विकारवान्॥ १२५॥ गायत्यकस्माद्धसति सङ्के चापि न सज्जते । नृत्यत्यपि च संहृष्टो वादयत्यपि वा पुनः ॥१२६ ॥ कदाचिद्धावति जवात् कदाचिदवतिष्ठते'। कदाचिदुपविष्टस्तु शयानः "स्यात् कदाचन ॥ १२७ ।। नानाचीरधरश्चैव रथ्यास्वनियतालयः । उन्मत्तो भवति ह्योवं 'तस्यैतां कारयेद् गतिम् ॥ १२८॥

उन्मत्त-गति अनुवाव-उन्मत्त पात्रों की गति अनियन्त्रित पादविक्षेप से युक्त, अनेक प्रकार की चारियों से समायुक्त, लोकानुकरण के आश्रित होनी चाहिए। उसके बाल (केश) रूखे और विखरे हुए और शरीर धूल से धूसरित होता है, वह अकारण बड़बड़ाने वाला और अधिक बोलने वाला तथा विकारवान् होता है। वह अचानक गाता है और अचानक हंसने लगता है। वह किसी के साथ मेल नहीं रखता तथा बार-बार रोता है, वह कभी प्रसन्न होकर नाचता है, फिर बजाने लगता है, फिर कभी वेग से दौड़ने लगता है, कभी खड़ा हो जाता है, कभी बैठ जाता है, कभी लेट जाता है। वह नाना प्रकार के फटे पुराने कपड़े पहने रहता है और अनियत रूप से गलियों में जहाँ चाहे वहाँ पड़ा रहता है। इस प्रकार उन्मत्त पात्र होता है। उसकी गति इस प्रकार प्रदशित करे ॥ १२४-१२८॥ १. ख. गतिश्च नियतक्रमा। ग. गतिस्त्वभिनयक्रमात्। २. कनन. रुक्षस्पन्दितकेशश्च। क-प. रुक्षस्फुरितकेशश्च। ३. क. न. रुदतीह तथा पुनः । ४. क-न. कदाचिदवतिष्ठति। ५. क-प. कदाचिदुपतिष्ठति। ६. ख. शयितः स्यात् कवाचन। ७. ख. तस्य ता।

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स्थित्वा नूपुरपादेन दण्डपादं प्रसारयेत्। बद्धां चारों तथा चैव कृत्वा स्वस्तिकमेव च ॥। १२९ ॥ अनेन चारीयोगेन *परिभ्राम्य तु मण्डलम् । बाह्यभ्रमरकं चैव रङ्गकोणे प्रसारयेत् ॥ १३० ॥ त्रिकं सुवलितं कृत्वा लताख्यं हस्तमेव च। विपर्ययगतैर्हस्तैः पद्भ्यां सह गतिर्भवेत् ॥ १३१ ॥ त्रिविधा तु गतिः कार्या खञ्जपङ्गकवामनैः । "विकलाङ्गप्रयोगेण कुहकाभिनयं प्रति ॥१३२॥ पन्धयां सह विपर्ययगतैरिति पादचेष्टा तथा करकर्मण्यनुवतंनीयेति॥१३१॥ कुहका: अधमा। लिड्गिन इति केचित् कुहकशब्देन हास्यरस इत्येतत् ॥ १३२ । अनुवाद-उन्मत्त पात्र की गति के अभिनय में नपुरपाद चारी में स्थित होकर दण्डपाद चारी में पैर को फैला दे, फिर बद्ध चारी को प्रदर्शित कर स्वस्तिक का प्रयोग करे। इसी प्रकार चारियों के संयोग से मण्डलाकार घुमाकर रङ्गमन्न के किनारे बाहचभ्रमरक पाद को फैला दे। फिर त्रिक को अच्छी तरह वलित करके 'लता' नामक हस्त को प्रदर्शित करे। फिर पैरों के साथ विपयंयगत हाथों को सञ्चालित करते हुए गति प्रदशित करे ॥१२९-१३१॥ अभिनव-'पेरों के साथ विपर्ययगत हाथों से' का अभिप्राय है कि पाद चेष्टा का हाथों के कर्म में अनुवर्तन करना चाहिए। १३१ ॥ अनुवाद-हास्याभिनय के लिए विकल अङ्गों के द्वारा लूले, लंगड़े एवं बौने पात्रों को गति तीन प्रकार की प्रदशित करनी चाहिए ।। १३२ ।। अभिनव-'कुहक' का अर्थ है 'अधम'। कुछ लोग 'कुहक' का अर्थ 'लिङ्गी' करते हैं और कुछ लोग कुहक शब्द से हास्यरस का संकेत मानते हैं ॥ १३२॥

१. ख. बष्वा। २. ख, परिक्रम्य चतुर्दिशम् । ३. क-द. रज्कोणं तु योजयेत्। ४. क-म. हासे त्वथा गतिः कार्या तथा खञ्जन वामने। क-ड. त्रिविधानुगतिः । ५. क. द्विकलार्घप्रयोगेषु।

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माट पशास्त्रे

एक: खञ्जगतौ नित्यं स्तब्धो वै चरणो भवेत्। तथा द्वितीयः कार्यस्तु पादोऽग्रतलसज्चरः ॥ १३३॥ 'स्तब्धेनोत्थापनं कार्यमङ्गस्य चरणेन तु। गमनेन निषण्णः स्यादन्येन चरणेन तु॥ १३४॥ इतरेण निषीदेच्च क्रमेणानेन वै व्रजेत्। एषा खज्जगतिः कार्या 'तलशल्यक्षतेषु च ॥। १३५ ।। "पादेनाग्रतलस्थेन हयञ्चितेन 'व्रजेत्तथा। निषण्णदेहा पङ्गोस्तु नतजङ्का तर्थव च॥। १३६ ।।

नकुटः ॥ १३६ ॥ तले पादतले शल्यादिक्षतमस्य तस्मिन् गतिमाह-पादेनाग्रतलस्थेनेति

अमुवाद-लंगड़े पुरुष की गति में एक पैर निश्चय स्तब्ध होना चाहिए और दूसरा पैर अग्रतलसञ्नर रखना चाहिए। स्तब्ध हुए पैर से शरीर का उत्त्थापन करना चाहिए और दूसरे पैर से चलकर बैठ जाय या स्थिर हो जाय। इसी क्रम से एक पैर से ठहर जाय और दूसरे पैर से चले। पादतल अर्थात् पैर के तलवे में काँटा चुभने का भाव होने पर खञ्ज गति का अभिनय करना चाहिए। १३३-१३५।। अभिनव-'तल' का अर्थ है 'पादतल'। यदि उसमें कांटा या कील चुभ जाय या घाव हो जाय तो इस प्रकार के खञ्ज की गति को कहते हैं-'पादेनाग्रतलस्थेनेति'। अनुवाद पङ्ग पात्र की अग्रतलसञ्चर पाद से तथा अश्वित पाद से निषण्ण शरीर तथा जड्घा की नत (झुकी हुई) गति से अभिनय करना चाहिए ॥१३६॥। १. कन्न. स्तब्धेनोत्त्थापनं । २. ख. विषण्णः । ३. क. विषीदेच्च। ४. ख. तालशल्यक्षतेषु च। ५. क-न. पुनरग्रतले गभ्ये। ६. क. गति: कार्याञ्चितेन तु। ७. नकुटस्य लक्षणं यथा- गुरुणी लधुनी गद्विद्विरम्यस्ते प्रयोजयेत्। तद्ध वा नकुंटं प्रोक्तमेतदर्धेन नकुटी। शकारेण प्रयोक्तव्यं हास्ये विटविदूषकैः । नर्कटं नकुँटे वृत्तं हिन्दोलस्य तु भाषया।। तुम्बुरुणाउपि- "वेक्याचेदविट्प्रेथ्यस्त्रीविधानां निधोजयेत्।" इति नर्कुटीनकुँटयोः बिनियोग उक्तः ।

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दवावशोऽ्यायः ६५

सर्वसङ्कचिताङ्गा च 'वामने गतिरिष्यते। न तस्य विक्रम: कार्यो विक्षेपश्चरणस्य च॥ १३७॥ सोद्वाहिता चूर्णपदा सा कार्या कुहकात्मिका। विदूषकस्यापि गतिर्हास्यत्रयसमन्विता ॥। १३८ ।। अङ्गवाक्यकृतं हास्यं हास्यं नेपथ्यजं स्मृतम्। विमर्श-अभिनवगुप्त की अभिनवभारती में 'नकुंटः' का उल्लेख है। वहाँ किस उद्देश्य से 'नर्कटा' का उल्लेख किया गया है, यह स्पष्ट नहीं है। सम्भव है कि कुछ और पाठ भो रहा हो जो छूट गया हो। वैसे सम्पादक महोदय ने यहां पाद टिप्पणी में 'नकुंटः' तथा 'नर्कुटी' का लक्षण लिखकर उसका विनियोग भी लिखा है। गुरुणी लघुनी गद्विद्विरभ्यस्ते प्रयोजयेत्। तद्ध वा नकुटं प्रोक्तमेतवर्धेन नर्कुटी। शकारेण प्रयोक्तव्यं हास्यो विटविदूवकेः। नर्कुट नकुटे वृत्ते हिम्बोलस्य तु भाषया । तुम्बुरुणाऽपि वेश्याचेटविटप्रेण्यस्त्रीविधानां नियोजयेत्। इति नर्कुटीनकुटयोविनियोग उक्त:।। ऐमा प्रतीत होता है कि यह प्रसङ्क विदूषक, शकार आदि से सम्बद्ध है। क्योंकि इसके बाद विदूषक, शकार आदि के गति का उल्लेख है। यहाँ पर विदूषक, शकार, विट आदि के हास्यरस में नकुंटक के प्रयोग का विधान बताया गया है। इसका उल्लेख वहीं होना चाहिए। सम्भव है कि लिपिकर्त्ताओं की भूल से यहाँ लिखा मया हो। क्योंकि इसके बाद ही विदूषक को गति की अभिनवभारती प्रारम्भ हो जाती है। अनुवाद-अभिनेता समस्त अङ्गों को सङ्गचित कर वामन (बौने) की गति का अभिनय करे। बौने की गति में विक्रम एवं पैरों का विश्लेषण नहीं दिखाना चाहिए।। १३७॥ अनुवाद-विदूषक की तोन प्रकार के हास्यों से समन्वित तथा उद्वाहन से युक्त हास्यात्मिका गति का अभिनय चूर्णपदों से करना चाहिए। अङ्गकृत हास्य, (अङ्गों के विकार से उत्पन्न हास्य), वाक्यकृत हास्य (वाणो के विकार से उत्पन्न हास्य) तथा नेपथ्यजनित हास्य (वेश-भूषा से उत्पन्न हास्य) ये तीन प्रकार के हास्य होते हैं ॥ १३८ ॥ १. क. वामेन। २. क. हास्यत्रयविभूषिता। ना. था०-९

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नाट पद्ास्त्रे

दन्तुरः खलतिः कुब्जः खञ्जश्च विकृताननः । 'य ईदृशः प्रवेशः स्यादङ्गहाक्यं तु त्रवेत् ॥ १३९॥ यदा तु बकवत् गच्छेदुल्लोकितविलोकितैः। अत्यायतपदत्वाच्च अङ्गहास्यो भवेत्स तु ॥ १४० ॥ "वाक्यं हास्यं तु विज्ञेयमसम्बद्धप्रभाषणात्। "अनर्थकैर्विकारैश्च तथा चाइलीलभाषितैः ॥ १४१ ॥ प्रवेश इति यद्यस्मादीदृशः प्रवेश्यमान: पात्रविशेषः रङ्गे भवति ततोऽङ्ग- हास्यमिति। प्रवेशपदेन नाटय एव रसो न लोक इति दर्शयति ॥१३९॥ असंबद्धं निरर्थमनुचितं च, तद्वयाचष्टे अनर्थकैरश्लीलैश्चेति, अश्रियमशोभां रातीति रेफस्य लत्वम् ॥ १४१ । अनुवाद-दन्तुर (भद्दे एवं बड़े-बड़े दांतो वाला), खल्वाट (गंजा), कूबड़ा, लँगड़ा तथा विकृत मुख वाला इस प्रक्रार के पात्रों का जो प्रवेश होता है तो वह 'अङ्गहास्य' कहलाता है॥ १३९ ॥ अभिनव-'प्रवेशः' का अभिप्राय है कि यदि इस प्रकार का प्रवेश करने वाला पात्र रङ्गमञ्च पर आता है तो 'अङ्गहास्य' होता है। यहाँ 'प्रवेश' पद से नाट्य में ही रस है, लोक में नहीं, यह दिखलाया गया है॥ १३९॥ उी अनुवाद-जब वह बगुले को तरह ऊपर-नोचे, अगल-बगल देखने हुए चलता है और लम्बे लम्बे डग भरता है तो 'अङ्गहास्य' कहलाता है॥ १४० ॥ अनुवाद-असम्बद्ध प्रलाप, निरर्थक एवं विकार युक्त तथा अश्लील (भाषण) बातचीत करने पर उत्पन्न हास्य 'वाक्य-हास्य' कहलाता है॥ १४१ ॥ अभिनव-यहाँ असम्बद्ध' पद का अभिप्राय है निरर्थक एवं अनुचित। असम्बद्ध पद को व्याख्या करते हैं अनर्थक और अश्लील, जो अश्रिय, अशोभा (शोभारहित) को आदान करता है, लाता है वह 'अश्लील' हैं। यहाँ 'र' को 'लू' हो गया है। (अश्री-अश्ली-अश्लील) ॥ १४१ ॥ १. क. यवीदृश प्रवेशः स्यात्। कन. यदीदृशो भवेद्विप्राः अङ्गहास्यं तु तत्स्मृतम्। २. ख. खगवत्। ३. क-द. आयतत्वाश्च तत्त्वाच्च ? हास्यं नेपथ्यजं तत्। ४. क. काव्यहास्यं तु विज्ञेयमसम्बद्धप्रभाषणैः । ५. ख. अनर्थंकैबंहुविधै।।

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चोरचर्ममषोभस्मगैरिकाद्यैस्तु 'मण्डितः । यस्तादृशो भवेद्विप्राः ? हास्यो नेपथ्यजस्तु सः ॥१४२ ॥ तस्मात्तु प्रकृति ज्ञात्वा भाव: कार्यस्तु तत्त्वतः । गतिप्रचारं विभजेत् नानावस्थान्तरात्मकम् ॥ १४३ ॥ स्वभावजायां विन्यस्य कुटिलं वामके करे। तदा दक्षिणहस्ते च कुर्याच्चतुरकं पुनः ॥ १४४॥ पाश्वमेकं शिरश्चैव हस्तोऽथ चरणस्तथा। -पर्यायशः सन्नमयेल्लयतालवशानुगः ॥ १४५॥ तस्मादिति त्रिप्रकारं हास्यमाश्रित्य क्वचिदेक: प्रकार:, क्वचित् द्ौ, क्वचित्सव इत्यनेन क्रमेण विदूषकः स्वामिनः प्रकृति राजामात्यश्रेष्ठिप्रकृतिभावचित्तवृत्ति करणीयं ज्ञात्वा विभाग: कार्यः। न च राजनि संनिवृत्तेज्लीलभाषणं समुचितम्। एवं सवंत्रोह्यम् ॥ १४३॥ गत्युपयोगिनं वृत्तान्तमस्याभिधाय गतिमाह-स्वभावजायमिति।

अनुवाद-हे विप्रो ! फटे-पुराने चिथड़े, चमड़ा, स्याही, भस्म, गेरू आदि से मण्डित विकृत वेश-भूषा देखकर उत्पन्न हास्य 'नेपथ्यज हास्य' कहलाता है॥१४२॥ अनुवाद-इसलिए तत्त्व रूप में प्रकृति, भाव (चित्तवृत्ति) और कार्य (करणोय) को तत्त्व रूप से जानकर नाना प्रकार के विभिन्न अवस्थाओं के अनुसार गति-प्रचार का विभाजन करना चाहिए॥ १४३॥ अभिनव-इस प्रकार तीन प्रकार के हास्य में से कहीं पर एक प्रकार का, कहीं पर दो प्रकार का और कहीं पर सभी प्रकारों का आश्रय लेकर क्रमशः विदूषक अपने स्वामी की प्रकृति अर्थात् राजा, अमात्य, श्रेष्ठी आदि की प्रकृति और चित्तवृत्ति एवं करणीय कार्य को जानकर विभाग करना चाहिए। राजा के चले जाने पर अश्लील (अशोभनोय) भाषण करना उचित नहीं है। इसी प्रकार सर्वत्र समझना चाहिए। १४३॥ अभिनव-गति के उपयोगी वृत्तान्त को कहकर अब उसकी गति को कहते हैं-'स्वभावजायामित्यादि'। १. क-प. गैरिकादिविभूषणैः । ३. स. पर्यायतः सन्नमते।

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माटपेशांस्त्रे

स्वभावजा तु तस्यैषा गतिरन्या विकारजा। अलाभलाभात् भुक्तस्य स्तब्धा तस्य गतिर्भवेत् ॥ १४६ ॥ कार्या चैव हि नीचानां चेटादीनां परिक्रमात्। अधमा इति ये ख्याता नानाशोलाश्च ते पुनः ॥ १४७॥

अनावेशे सति 'बकवद्गमनस्योक्तत्वात्। लयो विलम्बितः, तालः प्लुतलघुगुरुप्राय इह स्वोकृतः ।*अन्या द्रुतलयत्वेन प्लुतकालमानाद्वाहुल्येन शोकादि स्वभावजा गर्वात्मकोऽपि विकारो भवतीत्याशयेनाह-अलाभलाभादिति। अलाभ: लाभ-पूर्वकाल्लाभात्। भक्तं वस्त्राद्यु पलक्षयति। भयादौ तु परित एवास्य क्रम: ॥ १४४-१४६ ॥

अनुवाद-स्वाभाविक गति की अवस्था में विदूषक बायें हाथ में टेढ़ा डंडा लेकर तथा वाहिने हाथ से 'चतुर' हस्तमुद्रा प्रदशित करे। फिर एक पाश्व, शिर, हस्त और पाद को क्रमशः ताल एवं लय के अनुसार झुका दे। यह स्वाभाविक गति है, इससे भिन्न गति विकारजा गति कहलाती है। इस गति में अलस्य भोजन या अलभ्य वस्त्रादि वस्तुओं को प्राप्त करने का प्रदर्शन होता है। यह अस्वाभाविक गति है॥ १४४-१४६॥

अभिनव-आवेश के अभाव में बक के समान गमन (गति) कहा जा चुका है। लय का अभिप्राय विलम्बित लय है। यहाँ ताल से प्लुत, गुरु, लघु सभी स्वीकृत हैं। अन्यत्र द्रुतलय के न होने से तथा प्लुत के कालमान के बाहुल्य से शोकादि के प्रसङ्ग में स्वभावज गति होती है। गतियों में गर्वात्मक विकार होता है, इस आशय से कहते हैं-अलम्यलाभादिति। 'अलाभ' का अर्थ है लाभ पूर्वक लाभ से भिन्न। 'भुक्त' पद वस्त्र आदि को उपलक्षित करता है। भय आदि में तो परितः (चारों ओर) यही इसका क्रम होता है ॥ १४४-१४६ ॥

१. क-प. स्वभावजाता। २. ख. अलम्यलाभाद् भक्ष्यस्य तथा तस्य गतिर्भवेद। ३. क. वक्रत्वं गमनस्य। ४. क. न्यायतर च रत्वेन प्लुतकालः । ५. क. अद्यशोकादिः । अन्यरोकादि: ।

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दवशोऽव्याय:

पाश्वमेकं शिरश्चैव करः सचरणस्तथा। गतौ नमेत चेटानां दृष्टिश्चार्धनिमेषिणी ॥ १४८॥ शकारस्यापि कर्त्तव्या गतिश्चञ्चलदेहिका। वस्त्राभरणसंस्पर्शैमुहुर्मुहुरवेक्षितैः । १४९ ॥

सगर्विता चूर्णपदा शकारस्य गतिर्भवेत् ॥ १५० ॥

शकारस्यापीति शकारबहुल। यस्य भाषा स शकारः। शकारोपलक्षित- शकादिजनपदवासीत्वन्ये, यद्वक्ष्यते 'शकाराभीरचण्डाल' (अध्याय १७-६०) इत्यादि। हीनाशय उत्तमपदेऽभिरोपितः शकार इत्यन्ये। अध्वहारस्य श्लोक :- प्राकृतेऽपि शकारस्य विभूतिनं प्रसिद्धये तद्विभूतिरपभ्रंशे तापस्येव प्रकाशिता

अनुवाद-जो अधम इस नाम से प्रसिद्ध है नोच, चेट आदि जो नाना शोलवाले हैं उनकी गति में एक पाश्व, शिर, हाथ एवं पैर को झुका दे। चेट की दृष्टि अर्ध निमेष वाली होती है॥ १४७-१४८॥ अनुवाद-शकार को गति का अभिनय चञ्चल शरोर से करना चाहिए। अभिनेता वस्त्र एवं अलङ्कारों के स्पशं से, बार-बार इधर-उधर अवलोकन से विकार से विक्षिप्त अङ्गों से, लम्बे वस्त्रों एवं मालाओं के धारण करने से गति का अभिनय करे। इस प्रकार शकार को गति गर्वयुक्ता एवं चूर्णपदों वाली होती है।। १४९-१५० । अभिनव-जो पात्र शकार का अधिक प्रयोग करता है वह शकार कहलाता है। कुछ लोग कहते हैं शकार से अलक्षित शकादि जनपद का निवासी शकार कहा जाता है। जैसा कि आगे कहेंगे-'शकार, आभीर, चण्डाल आदि। हीन (तुच्छ) आशय वाला व्यक्ति यदि उत्तम पद पर बैठा दिया जाय तो शकार कहलाता है, ऐसा अन्य लोग कहते हैं।

१. ख. दृष्टिश्चाघविचारिणी। २. कनन. वज्त्राभरणसंस्पशैं। ३. ख. गर्विता चूर्णपादस्य। ४. क. अथ हासस्य । ५. क, प्रकाशिका ।

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नाट घशाएते

ममापि चात्रार्थे श्लोक :- लब्धापशब्दधटना विधुतश्च धर्मः स्वार्थ प्रतीतिकलनां प्रति का कथैव। मूर्धन्यतां गमयता भवता शकार: शक्नोति यत्र न विधे ! हृदि कि न्यधायि।। इस विषय में अध्वहार का यह श्लोक है- "प्राकृत भाषाओं में शकार की विभूति प्रसिद्धि का हेतु (आधार) नहीं होती। वही विभूति अपभ्रंश भाषा में ताप की तरह प्रकाशित होती है। भाव यह कि शकार की भाषा अपभरंश होती है। क्योंकि वह अपभ्रष्ट होता है, अतः शकार अपभ्रंश भाषा के ही योग्य है"। इस विषय में मेरा (अभिनवगुप्त का) भी श्लोक है- अभिनव-हे विधे! आपने शकार को मूर्धन्य बनाकर अपशब्दों की रचना कर डाली और वर्ों के धर्म को भी विच्युत कर दिया। शकार शब्द से घटित शकारि शब्द के अर्थ को प्रतोति की कथा ही क्या है ? ऐसा नहीं हो सकता अर्थात् शकार को मूर्धन्य बना देने से वह अर्थ नहीं निकल सकता। आपने मन में क्या रख कर ऐसा किया।" दूसरे पक्ष में-"हे विधे! आपने शकार को मूर्घन्य बनाकर अर्थात् शिर पर चढ़ाकर (ऊँचे पद पर बिठाकर) अपशब्दों को सुनने का अवसर पा लिया। ऐसा करके आपने वर्णों के धर्म को अर्थात् 'योग्य व्यक्ति अधिकारी बनाया जाना चाहिए' इस सिद्धान्त को भी हिला दिया, च्युत कर दिया। इस विषय में कोई कुछ नहीं जान सकता। आपने क्या मन में रखकर ऐसा किया है ?" विमर्श-शकार एक उच्च अधिकारी होता है। यहाँ कोई अभिनय विधाता (ब्रह्मा) को उपालम्भ (उलाहना) देते हुए कहता है कि हे विधे ! आपने शकार को ऊँचे पद बिठाकर (शिर पर चढ़ाकर) अपशब्दों (गालियों) के सुनने के अवसर प्राप्त कर लिया। आपने 'योग्य व्यक्ति को उच्च पद पर बिठाना चाहिए' इस नियम को खण्डित कर दिया, चयुत कर दिया। इस विषय में कोई कुछ नहीं कर सकता। आपने न जाने क्या मन में रखकर ऐसा किया है।

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दावशोऽण्याय:

तथा- सकलजनतालम्यः सोडयं शकार इति स्फुटं विरचयति यन्मूर्धन्यत्वं विभुहंतलक्षणा। हततनुरियं लोके जातापशब्दपरम्परा परिचयमयी वार्ता कौति निकृत्य निकर्तनी॥ इति

दूसरे पक्ष में-हे विषाता ! आपने तालव्य शकार को मूर्दधन्य षकार बनाकर अप- शब्दों की रचना कर डाली। आपने वर्णों के स्वभाव को जड़ से हिला दिया अर्थात् व्याकरण शास्त्र के नियमों का उल्लंघन कर दुष्ट शब्दों की रचना कर दी है। आपने शकार के निष्पन्न शकारि (विक्रमादित्य) को यदि मूर्द्धन्य षकार के निष्पन्न षकारि बना दें तो इससे उक्त अर्थ की प्रतीति कथमपि नहीं हो सकती। इसी प्रकार आप यदि शकार को षकार कहें तो उक्त अर्थ की प्रतोति कथमपि नहीं होगी। आपने न जाने मन में क्या रखकर ऐसा किया है, यह कोई नहीं ज्ान सकता। भाव यह कि आपको इस प्रकार निष्कृष्ट, अयोग्य को ऊँचे पद पर नहीं बिठाना चाहिए।

अभिनव-और भी साधारण लोगों के द्वारा लभ्य अर्थात् सामान्य लोगों से जिसका सम्पर्क था, उच्च वर्ग के लोगों से सम्पर्क नहीं था, वही यह शकार है, यह स्पष्ट है। लक्षणों के ज्ञान से रहित जिस विधाता ने जिस तालव्य शकार को मूर्धन्य षकार बनाता है उसने लोक में शरीर रहित अपशब्द परम्परा को जन्म दिया और परिचयमयी वार्ता का निराकरण कर कीत्ति को कत्तित करने वालो अपशब्द परम्परा को जन्म देकर निन्दा के पात्र बन गये।

दूसरे पक्ष में-साधारण जनता जिसका उच्चारण नहों कर सकती, यह वही शकार हैं, यह स्पष्ट है। और विभु भी हतलक्षण है अर्थात् वह भी 'इचुयशानां तालु' तथा 'ऋटुरषाणां मूर्धा' इस नियम से अनभिज्ञ है जो तालु शकार को मूर्धन्य षकार बनाता है। इससे उसके विद्वान् होने को प्रसिद्धि नष्ट हो गई और परिचयमयी वार्ता विद्वान् होने की प्रसिद्धि का निराकरण करके कीरत्ति का कर्त्तन करने वाली अपशब्द की परम्परा अर्थात् निन्दा सर्वत्र फेल गई कि वह अर्थात् वह विभु (विधाता) कुछ नहीं जानता, नहीं तो शकार को मूर्द्धन्य नहीं बनाता। विशेष-भाव यह कि व्याकरणशास्त्र के नियमों के अनुसार जिस प्रकार तालव्य शकार को मूधन्य षकार नहीं बनाया जा सकता। उसी प्रकार शकार नामक पात्र को मूघन्य (श्रेष्ठ) नहीं बनाया जा सकता। यदि कोई उसे मूर्धन्य पद पर बिठाता है तो वह निन्दा का पान होता है,।

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नाटघशाब्त्रे

जात्या नोचेषु योक्तव्या विलोकनपरा गतिः । असंस्पर्शाच्च लोकस्य स्वाङ्कानि विनिगूह्य च ॥ १५१ ॥ म्लेच्छानां जातयो यास्तु पुलिन्दशबरादयः। तेषां देशानुसारेण कार्य गतिविचेष्टितम् ॥ १५२ ॥ पक्षिणां श्वापदानां च पशूनां च द्विजोत्तमाः ?। स्वस्वजातिसमुत्थेन स्वभावेन गतिर्भवेत्" ॥ १५३ ॥ प्रतिज्ञाचाणक्ये तन्महाकविना भीमेन राजापि विन्ध्यकेतुः शकार इति भूयसा व्यवहृतः। वस्त्राभरणसंस्पर्शालोकनगर्वयोगोऽत्र पक्षे क्लिष्टतरः। न चार्यदेशजातिः शकार कश्चित्प्रसिद्धः। म्लेछजातयः पृथगेव निर्वक्ष्यन्ते "म्लेछानां जातयो यास्तु" इत्यादिना, तस्मादिहायमीदृश एव शकार इति युक्तम् ॥१४८॥ अभिनव-प्रतिज्ञा-चाणक्य में उसके रचयिता महाकवि भीम ने महाराज बिन्दुकेतु को बहुत बार शकार कहा है। शकार को अपने वस्त्र एवं आभरणों के स्पर्श एवं अवलीकन में बड़ा गर्व होता है, इस पक्ष में क्लिष्टतर है। आर्यों के देश अर्थात् आर्य जाति का शकार कहीं प्रसिद्ध नहों है। म्लेच्छ जातियों का 'म्लेच्छानां जातयो यास्तु' इत्यादि के द्वारा अलग से आगे वर्णन किया जायगा। इसलिए यहाँ शकार है' यही उचित प्रतीत होता है। अनुवाद-नीच जाति के पात्रों की गति का अभिनय इधर उधर देखते हुए लोक का स्पश न करते हुए अपने अङ्गों का विनिगूहन (संकोचन) कर करना चाहिए॥ १५१॥ म्लेच्छ गति अनुवाद-पुलिन्द, शबर आदि जो म्लेच्छों की जातिया हैं उनकी गति एवं चेष्टाएँ देश-काल के अनुसार करनी चाहिए।। १५२।। पशु-पक्ष्यादि गति अनुवाद-हे द्विजोत्तमों ! पक्षियों, हिंसक जन्तुओं एवं पशुओं (चतुष्पदों) की गति अपनी अपनी जाति के स्वभाव के अनुसार प्रवर्शित करनी चाहिए॥१५३॥

१. ख. अत्यस्पर्शाच्च । २. क-द. पुलिन्दाद्या द्विजोत्तमाः। ३. ख. गतिविचारेण। ४. गतिविचेष्टितैः। ५. क. प्रतियोजयेतु।

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७३

सिंहर्क्षवानराणां च गतिः कार्या प्रयोक्तृभिः। गिमााफी या कृता नर्रांसहेन विष्णुना प्रभविष्णुना ॥।१५४।। आलीढस्थानकं कृत्वा गात्रं तस्यैव चानुगम्। जानूपरि करं ह्योकमपरं वक्षसि१ स्थितम् ॥ १५५॥ "अवलोक्य दिशः 'कृत्वा चिबुकं बाहुमस्तके। गन्तव्यं विक्रमैविप्राः ? पञ्चतालान्तरोत्थितैः ॥ १५६ ॥

प्रभविष्णुनेति वचनादिदं सूचयत्यसाववतरणप्राधान्येन, ये ऋक्षवानरावयो जाम्बवत्सुग्रीवाङ्गवहनुमत्प्रायाः तेषामेवेयं गतिः। अन्येषां तु स्वजात्यानुरूप्येणैव। तस्यैवेत्यालीढस्यानुगतं गात्रं वामभागगमनमित्यर्थः।।१५४।।

अनुवाद-सिंह, रीछ, वानर की गति का अभिनय नाट्य-प्रयोक्ताओं को इस प्रकार करना चाहिए। जिसे विष्णु ने नृसिंह अवतार धारण करके की थी। हे विप्रो! पहिले आलीढ़ स्थानक को करके शरीर को उसी के अनुसार करे। फिर एक हाथ को जानु के ऊपर और दूसरे हाथ को वक्षःस्थल पर रखे, फिर सारी दिशाओं की ओर देखकर और चिबुक (ठुड्डी) को बाहु के अग्रभाग (स्कन्ध ) पर रखकर पांच ताल के अन्तर पर उठाये गये पाद-विन्यासों से गमन करे ॥१५४-१५६॥ अभिनव-'प्रभविष्णुना' पद से यह सूचित किया गया है कि नृसिंह अवतार को प्रधानता से यह गति करनी चाहिए। जो रीछ, वानर आदि जाम्बवान्, सुग्रीव, अङ्गद और हनुमान् आदि हैं, उनकी भी यही गति होनी चाहिए। अन्य पशुओं को अपनी जाति के अनुसार गति होनी चाहिए। 'तस्यंव' पद से आलोढ़ स्थान के अनुगत शरीर के अवयवों का वाम भाग से गमन किया जाना अर्थ अभिप्रेत है।

१. क. आलीढ़ं स्थानकं। २. ख. चैकम्। ग. त्वेकम् । ३. क-न. चोपरि। क-द. चैव स्वस्थितम् । ४. क-द. विलोलितं शिरः कृत्वा। क-न. विलोकितं शिरः कत्वा। ५. क. ग. सर्वाः ।

ना. था०-१०

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७४ नाटघशास्त्रे

नियुद्धसमये चैव रङ्गावतरणे तथा सिंहादीनां प्रयोक्तव्या गतिरेषा प्रयोक्तृभिः ॥१५७॥ शेषाणामर्थयोगेन गर्ति स्थाने च 'योजयेत्। वाहनार्थप्रयोगेषु रक्गावतरणेषु च॥१५८॥ एवमेता: प्रयोक्तव्या नराणां गतयो बुधैः। · नोक्ता या या मया ह्यत्र ग्राह्यास्तास्ताश्च* लोकतः ॥१५९॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि स्त्रीणां गतिविचेष्टितम् । स्त्रीणां स्थानानि कार्याणि गतिष्वाभाषणेषु च" ॥। १६० ।। आयतं चावहित्यं च अश्वक्रान्तमथापि च । स्थानान्येतानि नारीणामथ लक्षणमुच्यते॥१६१॥ अनुवाद-नाट्य-प्रयोक्ताओं को इस गति का प्रयोग रङ्गमञ्न पर नियुद्ध के समय तथा सिंहादि के गति का प्रयोग इस प्रकार करना चाहिए॥ १५७। अनुवाद-शेष प्राणियों को गति एवं स्थानों की योजना प्रयोजन के अनुसार रङ्गमञ्न पर अवतरिन होने तथा वाहनों के अर्थों के प्रयोग में प्रयोजन के अनुसार प्रदरशित करनी चाहिए॥। १५८ ।। अनुवाद-इस प्रकार विद्वानों की मनुष्यों की गति का अभिनय करना चाहिए। जिन प्राणियों की गति यहाँ मैंने नहीं बताई है उनकी गति लोकव्यवहार के अनुसार प्रदर्शित करनो चाहिए।। १५९।। अनुवाद-अब इसके बाद स्त्रियों की गति एवं चेष्टाओं का वर्णन करूँगा। स्त्रियों की गतियों एवं आभाषणों के क्रम में आयत, अवहित्त्य और अश्वक्रान्त तोन प्रकार के स्थानों का प्रयोग करना चाहिए। ये नारियों के स्थान हैं अब मैं उनके लक्षणों को कहता हूँ॥ १६०-१६१ ।। विशेष :- यहाँ पर 'आभाषणेषु' के स्थान पर 'आभरणेषु' पाठ भी मिलता है। तदनुसार इसका अर्थ होगा-स्त्रियों की गति और आभूषणों में आयत, अवहित्त्थ और अश्वक्रान्त स्थानों का प्रयोग करना चाहिए।। १६०-१६१ ।। १. क. गर्ति स्थानञन्च योजयेतु। २. ख. नोकाश्च या मया ह्त्र ग्राह्यास्ता अपि लोकतः । ३. ग. ताक्यापि। ४. क. गतिष्याभारेणेषु च।

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७५

वामः स्वभावतो यत्र पादो विरचितः समः । तालमात्रान्तरे न्यस्तस्त्र्यश्रः पक्षस्थितोऽपरः ॥ १६२॥ प्रसन्नमाननमुरः समं यत्र समुन्नतम्। लतानितम्बगौ हस्तौ स्थानं ज्ञेयं तदायतम् ॥ १६३ ॥। दक्षिणस्तु समः पादः त्रयत्त्रः पक्षस्थितोऽपरः। वामः समुन्नतटकटिश्चायते स्थानके भवेत् ॥ १६४॥ आवाहने विसर्गे च तथा निर्वर्णनेषु च। चिन्तायां चावहित्थे च स्थानमेतत्प्रयोजयेत् ॥ १६५॥

रङ्गावतरणारम्भ: पुष्पाञ्जलिविसर्जनम् । मन्मथेर्ष्यो.दवं कोपं तर्जन्यङ्जुलिमोटनम्॥१६६॥ निषेधगर्वगाम्भीर्य मौनं मानावलम्बनम् । 'स्थानेऽस्मिन् संविधातव्यं दिगन्तरनिरूपणम् ॥ १६७ ॥

अनुवाद-जहाँ पर बायाँ पैर स्वभावतः सम हो और तालमात्र के अन्तर पर न्यस्त हो तथा दूसरा पैर त्र्यस्र होकर पक्ष में स्थित हो। मुख प्रसन्न, उर सम और समुन्नत हो तथा लताहस्त नितम्ब पर स्थित हो तो वहाँ आयत नामक स्थान समझना चाहिए।। १६२-१६३।। अन्य मतानुसार आयत का लक्षण- अनुवाद-जहाँ पर दाहिना पैर सम हो और दूसरा अर्थात् बायाँ पैर त्र्यस्त् होकर पक्ष में स्थित हो तथा कटि समुन्नत हो, वहाँ पर 'आयत' स्थान होता है। अनुवाद-आवाहन में, विसर्जन में, चिन्ता नि्वर्णन और अवहित्त्थ में इस स्थान का प्रयोग करना चाहिए ॥ १६५।। अनुवाद-इस स्थान के द्वारा रङ्गावतरण के प्रारम्भ में पुष्पाञ्जलि का विसर्जन, काम और ईर्ष्या से उत्पन्न क्रोध, तर्जनी अङ्गली का मोटन (मोड़ना), निषेध, गर्व, गाम्भीर्य, मौन, यान का अवलम्बन और विगन्तर का निरूपण आदि भावों का अभिनय करना चाहिए॥ १६६-१६७।।

१. क, आयतं स्त्रीणामेव स्थानकमिति केचित्। २. समस्थितो वामपादस्त्र्यस्नस्तालान्तरोऽपरः ।

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नाटपशास्त्रे

समो यत्र स्थितो वामस्त्र्यश्रः पक्षस्थितोऽपरः । समुन्नतक टिर्वामस्त्ववहित्थन्तु तद्भवेत् ॥ १६८॥ पुरो विचलितस्त्र्यश्रस्तदन्योपसृतः समः । पादस्तालान्तरन्यस्तस्त्रिकमीषत्समुन्नतम् । १६९॥ पाणिर्लताख्यो यत्रैकस्तदन्यस्तु नितम्बगः । अवहित्यं समाख्यातं स्थानमागमभूषणैः ॥१७० ॥ स्त्रीणामेतत् स्मृतं स्थानं संलापे तु स्वभावजे। निश्चये परितोषे च वितर्कें चिन्तने तथा॥ १७१॥ 2विलासलीलाविब्वोकश्रृ गारात्मनिरूपणे। स्थानमेतत्प्रयोक्तव्यं

अनुवाद-जहाँ पर बायाँ पैर सम स्थित हो और दूसरा अर्थात् दाहिना पैर त्रयस्त्र (तिरछा) होकर पक्ष (बगल, पाशर्व) में स्थित हो और कटि अर्थात वाम (बायीं) कटि समुन्नत हो तो 'अवहित्त्य' स्थान होता है॥ १६८ ॥ अवहित्त्थ स्थान का दूसरा लक्षण इस प्रकार है- अनुवाद-जहाँ पर आगे त्रयस्र पाद विचलित हो और दूसरा पाद अपसृत होकर सम हो, एक पाद तालान्तर पर न्यस्त हो तथा त्रिक थोड़ा समुन्नत हो और एक हाथ लताहस्तमुद्रा में हो और दूसरा हाथ नितम्ब पर हो तो आगम को भूषित करने वाले नाट्यशास्त्रवेता विद्वान् उसे 'अवहित्य' स्थान कहते हैं ॥ १६९-१७० ॥

अनुवाद-इस स्थान का विनियोग स्त्रियों के स्वाभाविक संभाषण में, निश्चय, परितोष, वितर्क और लज्जा में, विलास-लीला, विब्बोक शृङ्गारादि के निरूपण में तथा पति (भर्ता) के मार्ग अवलोकन में (पति की वाट जोहने में) करना चाहिए। १७१-१७२॥

१. ख.ग. पुरोऽपि चलितस्त्र्यस्ना। पुराविरचितस्तिस्रः । २. ख. विवाहलीलालावण्ये शृंगारादिनिरूपणे। ३. ख. तथा भागवलोकने। क. भर्तृमार्गालोकने।

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ववाबशोऽ्याय: ७७

पादः समस्थितश्चैक एकश्चाग्रतलाञ्चितः । सूचीविद्धमविद्धं वा तदश्वक्रान्तमुच्यते ॥१७३॥ स्खलितं घूर्णितं चैव गलिताम्बरधारणम् । कुसुमस्तबकादानं परिरक्षणमेव च ॥। १७४ ॥ वित्रासनं सललितं तरुशाखावलम्बनम् । स्थानेऽ्स्मिन् संविधानीयं स्त्रीणामेतत्प्रयोक्तृभिः ॥१७५॥ शाखावलम्बने कार्यं स्तबकग्रहणे तथा। विश्रामेष्वथ देवानां नराणाञ्चार्थयोगतः ॥१७६ ।। स्खलितमिति पदम्। तथा विशेषेण च्युत इत्यथ:।। १७३ ।।

अनुवाद-जहाँ पर एक पाद समस्थित हो और दूसरा पाद अग्रतल पर अञ्चित हो और जहाँ पर सूचीविद्ध अथवा आविद्व मण्डल हो वह 'अश्वक्रान्त' कहा जाता है॥ १७३ ।। अनुवाद-स्त्रियों के स्खलन, घर्णन, गलित (गले हुए, फटे हुए) वस्त्रों के धारण, पुष्पस्तबक के ग्रहण, परिरक्षण, वित्रासन, लालित्य के साथ तरु (वृक्ष ) की शाखा के आलम्बन में नाट्यप्रयोक्ता को इस स्थान का विधान करना चाहिए॥१७४-१७५ ॥ अभिनव-'स्खलित' का अर्थ पैर का लड़खड़ाना है और विशेष रूप से च्युत होना (फिसलना) है।। १७४ ।। विशेष-नाट्य-प्रयोक्ताओों को स्त्रियों के फिसलने अथवा लड़खड़ाने, घूर्णन (घूमने), फटे-पुराने कपड़े पहनने, फूल के गुच्छे तोड़ने, पेड़ को डालो के अवलम्बन आदि के अभिनय में इस स्थान का प्रयोग करना चाहिए। अनुवाद-मनुष्यों के प्रयोजन के अनुसार वृक्ष की शाखा के आलम्बन में, फूल के गुच्छों के ग्रहण में और देवताओं के विश्राम में इस स्थान का प्रयोग किया जाता है॥ १७६ । १. ख.ग. पादः सुस्थितश्चैकः । क-द. समस्थितस्तवेकः । २. क. विश्रामेष्वथ नोचानां नराणां चार्थयोगतः। ख-ग. विश्रामेष्वथ देवाना वाराणाब्चात्रयोगतः ।

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मोट घशास्त्रे

स्थानकं तावदेव स्याद्यावच्चेष्टा प्रवर्तते। शभग्नं च स्थानकं नृत्ते चारी चेत्समुपस्थिता ॥ १७७॥ एवं स्थानविधिः कार्यः स्त्रीणां नृणामथापि च। *पुनश्चासां प्रवक्ष्यामि गति प्रकृतिसंस्थिताम् ॥१७८॥ कृत्वाऽवहित्य स्थानन्तु वामश्चाधोमुखं करम्'। नाभिप्रदेशे विन्यस्य सव्यश्च 'खटकामुखम् ॥ १७९ ॥ ततः सललितं पादं तालमात्रसमुत्थितम्। दक्षिणं वामपादस्य बाह्यपाश्वें विनिक्षिपेत्॥ १८० । तेनैव समकालश्च 'लताख्यं वामकं भुजम् । दक्षिणं विनमेतपाश्वं न्यसेन्नाभितटे ततः ॥ १८१ ॥

प्रकृतिसंस्थितामित्यविशेषोक्ता। प्राधान्यात्प्राथम्यात् तदस्ति गतिरि- त्युच्यते। *कृत्वावहित्थमित्यादि। वामश्चेति ॥१७८॥ अनुवाद-इन स्थानों का प्रयोग तभी तक किया जाता है जब तक चेष्टा को जाती है। नृत में चारी का प्रयोग यदि उपस्थित हो तो स्थान-भग्न हो जाता है, समाप्त हो जाता हैं॥ १७७। अनुवाद-इस प्रकार स्त्रियों और पुरुषों के स्थान का विधान करना चाहिए। अब मैं स्त्रियों की प्रकृति (स्वभाव) के अनुसार गतियों का कथन करूँगा॥ १७८ ॥ अभिनव-प्रकृतिस्थिताम्' यह सामान्य रूप से कहा गया है। प्राधान्यतः यदि कोई गति है तो उसे भी कहना चाहिए। यही बात 'कृत्वावहित्त्थ' ( अवहित्थ को करके) इत्यादि के द्वारा कहा गया है॥ १७८ ॥ १. ख-ग. भग्नावस्थानकं नृत्ये चारी च समुपस्थिता। श्लोकार्घोडयं ख पुस्तके नास्ति। २. ख-ग. पुनश्च सम्प्रवक्ष्यामि। ३. क. भुजम् । ४. ख. कटकामुखम्। ५. क-द. तालमात्रं समुत्क्षिपेव। ६. क.द. तालारयं। ७. क-द. वामपादकम् । ८. तमस्ति। ९. क. कुलावहित्त्थामिति। रा. तूलावहित्त्वमित्यादि।

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दवावशोऽण्याय:

नितम्बे दक्षिणं कृत्वा हस्तश्चोद्वेष्टय वामकम्। ततो वामपदं दद्याल्लताहस्तं च दक्षिणम् ॥ १८२॥ लीलयोद्वाहितेनाथ शिरसाऽनुगतेन च' *किश्चिन्नतेन गात्रेण गच्छेत्पञ्चपदीं ततः ॥१८३ ॥ यो विधिः पुरुषाणां तु रङ्कपीठपरिक्रमे। स एव प्रमदानां वै कर्त्तव्यो नाट्ययोक्तृभिः ॥१८४॥

3लताख्यं बाह्यपारश्वे कनिष्ठाङ्गुलिदेशे ॥ १८॥ यो विधिरिति वामवेधं सः कुर्यादिति। अतिदेशेन चेदं दर्शयति यावती काचिद्रसप्रकृतिदेशकालापेक्षा नृणां गतिरुक्ता सा सर्वैवोक्ता विलासरूपप्रकारा- नुविद्धा स्त्रीणामपि विवक्षिता ॥१८४॥

अनुवाद-पहिले 'अवहित्त्थ' स्थान करके बायें हाथ को अधोमुख करे, फिर दाहिने हाथ को खटकामुख मुद्रा में नाभिप्रदेश पर रखे, फिर ललित मुद्रा में पैर को ताल मात्र प्रमाण ऊपर उठाये और दाहिने पैर को बायें पैर के वाम पार्श्वं में निक्षिप्त करे (रखे), उसी समय 'लता' मुद्रा में बायीं भुजा को नाभितट पर रखे और वाहिने पारश्व को झुका दे, फिर दाहिने हाथ को नितम्ब पर रखकर और बायें हाथ को उद्वेष्टित करे, फिर बायें पैर और दाहिने हाथ को 'लता' मुद्रा में रखे। फिर लीला से उद्वाहित शिर से अनुगत और थोड़ा झुके हुए शरीर से पांच कदम (पग) चले ॥ १७९-१८३ ॥ अभिनव-'लता' नामक वाम भुजा को बायें पार्श्व में कनिष्ठिका अंगुली के क्षेत्र में रखे ॥ १८० ।। अनुवाद-रङ्गपीठ पर चलने में जो विधि पुरुषों के लिए है वही विधि नाटय-प्रयोक्ताओं को स्त्रियों के लिए भी करनी चाहिए। १८४।। अभिनव-'यो विधिः' का अरभिप्राय है उसके बाद वामवेध करना चाहिए। अतिदेश विधान से यह दिखाते हैं-जितनी भी कोई रस प्रकृति देश-काल की अपेक्षा से मनुष्यों की गति कही गई है वह सब विलास रूप प्रकार से अनुविद्ध गति स्त्रियों के लिए भी विकसित है ॥१८४॥ १. ख-ग. शिरसोनुगतेन च। २. ख.ग. पुस्तकयोरयं श्लोको नास्ति। क-द. किब्चिन्नमेत। ३. क-ख. लतास्यं। ४. क-ख. विलासरूपानुविद्धा।

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८० नाटपशास्यरे

`षट्कलं तु न कर्तव्यं तथाष्टकलमेव च। क्ी पादस्य पतनं तज्ज्ञैः खेदनं तड्रवेत्स्त्रियाः ॥ १८५॥ सयौवनानां नारीणामेवं कार्या गतिर्बुधैः। 'स्थवीयसीनामेतासां सम्प्रवक्ष्याम्यहं गतिम् ॥ १८६ ।। दिक्कालपरिमाणत्वं यत्र शोभोदात्तं तत्र विशेषमाह। एतत्प्रागेव व्याख्यातं चतुष्कलादभ्यधिको न स्त्रीणां मानविधिरिति। अष्टकलग्रहणं तदप्यधिकं मानं पुरुषेष्वपि नास्तीति सूचर्यत। अन्यथा षट्कले निषिद्धे "काष्टकलस्य संगति- स्तन्निषेधेन ।। १८५ ।। स्थानीया मध्यमवयसः, अत एव मध्यमप्रकृतित्वमनूद्यम् ॥ १८६॥ अनुवाद-नाट्यवेत्ताओं को स्त्रियों को स्थान षट्कल एवं अष्टकल अर्थात छः कला और आठ कला प्रमाण का पाद का पतन नहीं करना चाहिए। क्योंकि वह स्त्रियों के लिए खेवावह होता है॥१८५॥ विमर्श-उपयु'क्त कथन का आशय यह है कि स्त्रियों को षट्काल एवं अष्टकल पाद-पतन नहीं करना चाहिए। क्योंकि ऐसा प्रद्शन स्त्रियों के लिए खेद जनक ( थका देने वाला) होता है। १८५।। अभिनव-दिक और काल अर्थात् देश-काल के परिमाण से जहाँ शोभा एवं उदात्तता बढ़ती है वहाँ विशेष को कहते हैं। यह पहिले ही बताया जा चुका है कि स्त्रियों का पादपात चार कला से अधिक परिमाण का नहीं होना चाहिए। 'अष्टकल' पद का ग्रहण यह सूचित करता है कि उससे अधिक परिमाण पुरुषों के लिए भी नहीं है, क्योंकि जब षट् कलाओं के परिमाण का निषेध किया गया है तो अष्टकल परिमाण के निषेध की क्या संगति है॥ १८५॥ अनुवाद-विद्वानों को युवती नारियों की गति इस प्रकार करनी चाहिए। इसके बाद अब मैं स्थवीयसी (प्रौढ़ा) स्त्रियों की गति को अच्छी तरह वर्णन करूंगा॥ १८६॥ अभिनव-यहाँ 'स्थवीयसी' पद से मध्य अवस्था वाली स्त्रियों की ओर सङ्केत है। इसलिए प्रकृत में मध्यम प्रकृति को लक्ष्य करके यह विधि बतलायो गई है ।। १८६ ।। १. क-द. षटकलं तत्तु कत्तव्यं। क-न. षट्कलं न प्रयोक्तम्। २. ख. स्त्रियः ॥ ३. क. स्थानीया या। स्बियस्तासां। ४. क-ख. दिक्कालपरिमाणत्वं । ५. क, काष्ठकला स एकाघिकः। ख. काष्ठकलासंकेतिकं तन्निषेधेन।

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'कृत्वावहित्त्थं स्थानन्तु वामं न्यस्य कटोतटे। कुर्यान्नाभिस्तनान्तरे ॥१८७॥ न निषण्णं न च स्तब्धं न चापि परिवाहितम् । कृत्वा गात्रं ततो गच्छेत्तेनैवेह क्रमेण तु॥ १८८ ॥ प्रेष्याणामपि१ कर्तव्या गतिरुद्भ्रान्तगामिनी। ॥१८९॥ स्थानं कृत्वाऽवहित्थञ्च वामश्चाधोमुखं भुजम् । नाभिप्रदेशे विन्यस्य सव्यश्च खटकामुखम्॥ १९०॥

आद्यं दक्षिणम्। परिवाहितमिति ॥१८७॥ सविभागमधमानां गतिमाह-प्रेष्याणामित्यादि।

प्रौढ़ा-गति अनुवाद-अवहित्त्य स्थान को करके और बायें हाथ को कटि पर रखकर दाहिने हाथ को 'अराल' मुद्रा से नाभि और स्तनों के मध्य में उत्तान करे। फिर शरीर को न निषण्ण करे, न स्तब्ध (स्थिर) करे और न परिवाहित करे, फिर उसी क्रम से गमन करे॥ १८७-१८८ ॥ अभिनव-यहाँ 'आद्य' पद का अर्थ है दक्षिण पाद। 'परिवाहितमपि' का अभिप्राय है कि परिवाहित भी न करे॥ १८७-१८८ ॥ अब इसके बाद अधमों की गति को कहते हैं- प्रेष्या-गति अनुवाद-प्रेष्या (दासियों) को गति उद्भ्रान्तगामिनी होनी चाहिए। कहीं ऊपर उठे हुए (उन्नमित) गात्रों से आविद्ध मुद्रा में भुजाओं को सञ्चालन करे। अवहित्त्य स्थान को करके और वाम भुजा को अधोमुख करके नाभिप्रदेश पर रखकर दाहिने हाथ को 'खटकामुख' मुद्रा में रखे॥ १८९-१९० ॥

१. ख-ग. कुत्त्वापविद्धं स्थानं तु। २. ख-ग. आयञ्चारालमुक्तानां। ३. ग. (टि०) वृक्षाणामपि। ४. क.ग. किञन्चिदुन्नमितैः । ५. ख.ग. आविद्धगतिविक्रमा। ६. ख. कटकामुखम्।। ना. था०-११

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नाट पद्मास्थ्रे

अर्धनारीगतिः कार्या स्त्रीपुंसाभ्यां विमिश्रिता। उदात्तललितैर्गात्रै पादैर्लीलासमन्वितैः ॥१९१॥ या पूर्वमेवाभिहिता ह्य तमानां गतिर्मया। स्त्रीणां कापुरुषाणाश्च ततोऽर्धार्धन्तु® योजयेत् ॥ १९२॥ मध्यमोत्तमनीचानां नृणां* यद् गतिचेष्टितम्। स्त्रीणां तदेव कर्तव्यं ललितैः पदविक्रमैः॥१९३॥ उद्भ्रान्तगामिनीति समदविकारा आविद्धो वर्तनाबहुलो बाहुजानां विक्रमस्य ॥१८९॥ नार्या अर्धमिति नपुंसकलक्षणा तृतीया प्रकृतिरुच्यते, समप्रविभागविवक्षया चार्ध नपुंसकमिति समास:उदात्तत्वं पुरुषाणां, लालित्यं योषितां गतौ ॥ १९२ ॥ अभिनव-'उद्भ्रान्तगामिनी' का अभिप्राय है मद विकार के साथ। 'आविद्ध- भुजविक्रमा' का अर्थ है आविद्व अर्थात् भुजाओं का विक्रम वर्तनाबहुल होता है॥ १८९ ॥ नपुंसक गति अनुवाद-नपुंसक पात्रों को गति (अर्धनारीगति) में उदात्त एवं ललित गात्रों से तथा लीला से युक्त पैरों से स्त्री और पुरुषों को मिश्रित गति का अभिनय करना चाहिए॥ १९१ । अभिनव-अर्धनारी-'नार्या अर्धम्' (नारी का आधा भाग)। इससे यहाँ नपुंसक लक्षणा (नपंसक संज्ञक) तृतीया प्रकृति कहा जाता है। यहाँ 'नार्या अर्धम्' इस विग्रह में समान विभाग की विवक्षा होने से 'अर्ध नपुंसकम्' सूत्र से समास हुआ है। पुरुषों की गति में उदात्तता और स्त्रियों की गति में लालित्य (सौन्दर्य) होता है ।। १९१ ।। अनुवाद-मैंने पहिले जो उत्तम पुरुषों की गति बतलायी है उसकी आधी स्त्रियों की और उससे भी आधी का पुरुषों की गति की योजना करे ॥ १९१॥ अनुवाद-मध्यम, उत्तम और अधम पुरुषों को जो गति एवं चेष्टाएँ हैं। वही ललित पद विक्रमों के द्वारा स्त्रियों के लिए भी करनी चाहिए॥ १९२।। १. ग. पदैः । २. क-द. पूर्वंमेवविहिता । ३. ख. ततोऽर्धार्धञन्च योजयेत्। क-द. तदर्धेन तु योजयेत्। ४. ग. नृपं प्रति विचेष्टितम् । ५. ग. तदर्वा कत्तव्या। ६. क. (टि०) विक्रमा स्यात्। ७. क. (टि०) संप्रति विभागविवक्षया । ८. क. उदारत्वं।

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बालानामपि कर्त्तव्या स्वच्छन्दपदविक्रमा न तस्याः सौष्ठवं कार्यं न प्रमाणं प्रयोक्तृभिः॥। १९४।

गतिरिति चतुस्ताला चतुष्कला च, अनुत्तमस्त्रीणां द्विताला द्विकलेति ततऽप्यर्धा कापुरुषाणां, तत्कर्मकराणामेकताला एककला चेति। किमुत्त- मानामेवेयं स्थाने दर्शयति मध्यमोत्तमानां नुणामपुंसा यद्गतिचेष्टितं तदेव उदात्तमध्यमोत्तमनीचानां स्त्रीणां तथा तत्कमंकराणां कुर्यादित्युत्तमग्रहणम् ॥ १९२-१९३ ॥ सर्वग्राहकं दर्शयितु यत्रोत्तमादिविभागो नोदिभन्नः तत्र गतिमाह- बालानामपीति॥ १९४॥

अभिनव-'गतिः' से तात्पर्य है कि गति का परिमाण चार ताल और चार कलाओं का है। अनुत्तम स्त्रियों की गति का परिमाण द्विताल (दो ताल का) और द्विकल (दो कला) होता है। उससे भी आधा अर्थात् एक ताल और एक कला परिमाण की पुरुषों की और कर्मकर भृत्यों की गति होती है। क्या उत्तम पुरुषों को यही गति है, उसे दिखाते हैं-मध्यम और उत्तम पुरुषों एवं नपंसकों की जो गति एवं चेष्टाएँ हैं वहो गति-चेष्टाएँ उदात्त, मध्यम, उत्तम एवं नीच स्त्रियों की तथा उनके कर्मकरों भृत्यों को भी होनी चाहिए, इसी बात को संकेतित करने के लिए 'उत्तम' पद का ग्रहण है ॥ १९१-१९३।। अभिनव-सर्वग्राहकत्व को दिखलाने के लिए जहाँ पर उत्तमादि का विभाग उद्धिन्न अर्थात् स्पष्ट नहीं है उस विषय में गति को कहते हैं-'बालानामित्यादि'। बाल-गति अनुवाद-बालकों अथवा बालाओं को गति स्वच्छन्द पद-विन्यास (पदक्रम) वाली होती है। नाटय-प्रयोक्ताओं को इसमें सौष्ठव का प्रयोग नहीं करना चाहिए और न प्रमाण की अपेक्षा करनी चाहिए॥ १९४॥

१. ख.ग. स्वच्छन्दगतिविक्रमा । २. क. तस्यां। ३. प्रमाणं च। ४. क-क. द्विकला। ५. क-ख. अयं सा। नृणामुदारत्वमिति पाठान्तरम्।

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C४ नाटचशास्तरे

'तृतीया प्रकृतिः कार्या नाम्ना चैव नपुंसका। नरस्वभावमुत्सृज्य स्त्रीर्गाति तत्र योजयेत् ॥ १९५ ॥ विपर्ययः प्रयोक्तव्यः पुरुषस्त्रीनपुंसके। स्वभावमात्मनस्त्यक्त्वा तद्भावगमनादिह ॥ १९६ ॥ व्याजेन क्रीडया वाऽपि तथा भूयश्च वश्चनात्। स्त्री पुंसः प्रकृति कुर्यात् स्त्रीभावं पुरुषोऽपि च ॥ १९७॥

तद्भावगमनादिति। यदेव रूपं यो गृह्लाति तदीयैव तस्य गतिः ॥ १९६। विपर्ययपरिग्रहे च विशिष्टार्थं कारणमाह-व्याजेनेति।

अनुवाद-तृतीया प्रकृति अर्थात् जो नाम से नपुंसक है उनमें पुरुष स्वभाव को छोड़कर स्त्रीपात्र के गति की योजना करनी चाहिए। १९५।। भूमिका विपयय में पात्रों की गति अनुवाद-स्त्री, पुरुष और नपुंसक अपने स्वभाव का परित्याग कर जिस स्वरूप को धारण किया हो उसी के भाव के अनुसार विपर्यय प्रयोग करे॥ १९६॥ अभिनव-'तद्ड्ावगमनादिह' जो जिस रूप को ग्रहण करता है वहो उसकी गति है ॥ १९६ ।। विमर्श-अभिनय की दृष्टि से भूमिका विपरयय का बड़ा महत्त्व है। भरत ने संक्षेप में इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। भरत के अनुसार भूमिका-विपर्यय में स्त्री, पुरुष और नपुंसक पात्र अपने स्वभाव को छोड़कर दूसरे के स्वभाव को ग्रहण कर भूमिका अदा कर रसोदय का वातावरण उपस्थित करते हैं। भरत के अनुसार भूमिका विपर्यय की दो परिस्थितियाँ होती हैं-१. अपने स्वभाव का परित्याग और दूसरा त्गावगमन अर्थात् पात्र अपये स्वभाव को छोड़कर जिस स्वभाव को ग्रहण करता है उसी के अनुसार गति (गमन) का प्रयोग करे ॥ १९६ ॥ अभिनब-विपर्यय के ग्रहण करने में विशिष्ट कारण को कहते हैं- व्याजेनेत्यादि। अनुवाद-किसो ब्याज से, क्रोड़ा से और बार-बार वञ्चना के द्वारा स्त्री पुरुष की प्रकृति का और पुरुष स्त्री के भाव का अभिनय करे॥ १९७॥ १. श्छोकोडयं केषुचित् पुस्तकेषु नास्ति। २. क. पुरुषस्त्रीनपुंसक।। ३. ख. व्याजेन सेवया वाऽपि। क-न, व्यायामेन क्रोडयाऽपि।

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डाबशोन्याय: ८५

धैर्योदार्येंण सत्त्वेन बुद्ध्या तद्वच्च कर्मणा। स्त्री पुमांसं त्वभिनयेत् वेषवाक्यविचेष्टितः ॥ १९८ ॥

स्त्रीवेषभाषितर्युक्तं प्रेक्षिताप्रेक्षितैस्तथा। मुदुसन्नगतिश्चैव पुमान् स्त्रीभावमाचरेत् ॥ १९९ ॥

व्याज: कस्यचित्कार्यस्य साधनाय, यथा विदूषकस्य संकेतस्थाने चेटिकाव- स्त्रधारणम्। क्रीडा यथा इष्टजनस्याकृतौ नायिकानाम्। वञ्चनादिति यथा विदूषकं वञ्चयितुं चेटकस्य स्त्रीवेषकरणम्। अपिचेति ग्रहणात् स्त्रीपुंसयोर्न पुंसकेन सह तस्य च ताभ्यां सह विपर्ययं दर्शयति॥ १९७॥ अत्रैव विपयये गतिविपर्यये प्रसङ्गन व्यभिचारिभावसात्त्विकोपाङ्गाद्य- भिनयविपयंयमप्याह-धैयौंदार्येणेति।

अभिनव-व्याज (छल) किसी कार्य की सिद्धि के लिए किया जाता है। जैसे सङकेत-स्थान में विदूषक का चेटी का वस्त्र धारण करना। क्रीडा से जैसे, नायिकाओं का प्रियजन (पुरुष) का आकृति का धारण करना। बञ्चना से जैसे, विदूषक की वञ्चना के लिए चेट का स्त्री का वेष धारण कर लेना। 'अपि च' पद के ग्रहण से स्त्री और पुरुष का नपुंसक के साथ और नपुंसक का स्त्री और पुरुष के साथ विपर्यय होता है, यह दिखलाया गया है। अभिनव-इसो विपर्यय की अवस्था में गति के विपर्यय में प्रसङ्गवश सञ्चारोभाव एवं सात्त्विक भावों तथा उपाङ्गादि के अभिनयों में विपर्यय को कहते

अनुवाद-धैर्य, औवार्य, सत्त्व, बुद्धि और उसी प्रकार के कर्म से तथा वेष- भूषा, वाक्य एवं चेष्टाओं के द्वारा स्त्रो पुरुष पात्र का अभिनय करे॥ १९७ ॥ अनुवाद-इसी प्रकार स्त्रीपात्रोचित वेष-भूषा एवं भाषण (वाक्य) तथा प्रेक्षिताप्रेक्षित अर्थात् किसी वस्तु के देखने, न देखने के द्वारा मृदु एवं मन्द गति वाला पुरुष स्त्रो भाव का आचरण करे, अभिनय करे॥ १९८ ॥

१. ख. धैर्योद्वारेण। २. ख. ग. प्रेषिताप्रेषितैस्तथा। ३. क. मृदुसन्नगतिश्चैव। क-द. मृदुसत्त्वगतिश्चैव ।

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नोटप शांस्त्रे

'जातिहीनाश्च या नार्यः, पुलिम्दशबराङ़गनाः। याश्चापि, तासां कर्तव्या तज्जातिसदृशी गतिः ॥२००॥ व्रतस्थानां तपःस्थानां लिङ्गस्थानां तथैव च। खस्थानाञ्चैव नारीणां समपादं प्रयोजयेत् ॥ २०१ ॥ उद्धता येऽब्हारा: स्युर्याश्चार्यो मण्डलानि च। तानि नाट्यप्रयोगज्ञैर्न कर्तव्यानि योषिताम्'॥ २०२॥

धैयौंदार्ये सामान्याभिनयोक्ते। ताभ्यां भावा उपलक्ष्यन्ते। बुद्धयेति स्थायित्वम्। सत्त्वेनेति सात्त्विकाः कर्मणेति *स्थानकादिविषयः, वेषेति आहार्य- प्रकारा:, वाक्येति वाचिकगतसंस्कृतादिप्रयोग:, चेष्टितैरिति अन्तरालस्थाने त्रिपताकादय: ॥। १९८।। यथास्थानकगतानां पूर्वपञचाद्भावि तथोपवेशनात्मकमासनमपीति तद्विधमाह-तथासनविधिरिति तथैवेति गतौ हि शयनमपि पूर्वपश्चाद्भावि शयनाश्रय इति शेष:॥। २०३॥

अभिनव-यहाँ सामान्य अभिनय में कथित धैर्य और औदार्य का ग्रहण है। इनसे अन्य भावों का भी उपलक्षण है। जैसे, 'बुद्धया' पद से स्थायीभाव का, 'सत्त्व' से सात्त्विक भाव का, 'कर्म' से स्थानकादि विषयक अनुभावों का, 'वेष' से आहाय अभिनय (वेष-भूषादि ) के प्रकारों का, 'वाक्य' से वाचिक अभिनय से सस्कृत आदि भाषाओं के प्रयोग का, 'चेष्टित' पद से त्रिपताक आदि अभिनयों का उपलक्षण से ग्रहण होता है॥। १९८ ।। अनुवाद-जो जाति-भ्रष्ट अथवा होन जाति की नारियाँ हैं और जो पुलिन्द शबर आदि की स्त्रियाँ हैं उन्हें अपनी जाति के अनुसार (सदृश) उनकी गति का प्रदर्शन करना चाहिए॥ १९९॥ अनुवाद-व्रतधारिणी, तपस्विनी, लिङ्गिनो और आकाशचारिणी नारियों की गति में 'समपाद' का प्रयोग करना चाहिए॥ २०० ॥ अनुवाद-जो उद्धत अङ्गहार है, जो चारियाँ और मण्डल हैं, नाटच- प्रयोक्ताओं की उनका प्रयोग स्त्रियों की गति में नहीं करना जाहिए॥ २०१॥ १. ख विजातीयास्तु २. क. तथा पुनः । ३. ख-ग. योषिता ४. क-ख. धर्योदार्या ५. क. सातत्विकादि। ६. क. यथास्थानगतैः ७. क. गते। ख. गतो।

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'तथासनविधिः कार्यो नृणां स्त्रीणां विशेषतः। :STP नानाभावसमायुक्तस्तथा१ च शयनाश्रयः ॥ २०३॥ 'विष्कम्भिताञ्चितौ पादौ" त्रिकं किश्चित्समुन्नतम् । 'हस्तौ कट्यूरुविन्यस्तौ स्वस्थे स्यादुपवेशने ॥ २०४॥

विष्कम्भेन वैशाखस्थानकोचितेन विस्तारेणाञ्चितौ विस्तीर्णान्तरौ सुन्दरौ पादौ, न त्वत्राञ्चितपादलक्षणयोगः। स्वस्थे पुंसि यदुपवेशनमासनपीठिकादौ तत्र त्रिकमुन्नतं स्यादिति सम्बन्धः । "इति शब्देन वाक्यार्थः, स्यादित्यत्र कर्तव्याख्येय" इति स्यादिति। हस्ताविति कर्कटरूपौ समाहारद्वन्द्वे ।। २०४।। आसन विधान अभिनव-जिस प्रकार स्थानकगत गमन आगे-पीछे होता है उसी प्रकार उपवेशनात्मक आसन में भी पूर्वपश्चाद्द्ाविता रहती है, इसलिए उसके प्रकार को कहते हैं-'तथासनाविधिरिति'। अनुवाद-इस प्रकार स्त्री और पुरुषों के आसन-विधि (बैठने की विधि) ी नाना प्रकार के भावों से युक्त होनी चाहिए। इसी प्रकार उनकी शयन-विधि का भी विधान करना चाहिए॥२०३।। अभिनव-'तथव' पद से अभिप्राय है कि जैसे गति के विषय में पूर्व और पश्चाद्गाविता है उसी प्रकार शयन और शयन के आश्रय में भी पूर्वपश्चाद्गाविता है।। २०३ ।। अनुवाद-स्वस्थ उपवेशन (बैठने) से दोनों को विष्कम्भित एवं अश्वचित करके त्रिक को थोड़ा समुन्नत करे, फिर दोनों हाथों को कटि और जंघा पर (ऊरु) विन्यस्त करे॥ २०४॥ अभिनव-'विष्कम्भक अर्थात् वैशाख स्थानक के उचित विस्तार से अञ्चित अर्थात् विस्तीर्ण अन्तर पद से सुन्दर पादों का ग्रहण है। यहाँ पर अञ्चित पाद का लक्षणानुसारी स्वरूप अभीष्ट नही है। स्वस्थ पुरुष के आसन या पीठ पर उपवेशन

१. ख. अथासनविषिः । कार्यो नृणां स्थीणां विशेषतः । २. क, तथासनविधि: कार्यः सत्रीणां नृणामथापि च । ३. क-ग, तथैव। ४. ख. ग. विष्कम्भेणाञ्चितौ। ५. कनख. कक्षः । ६. ख. हस्ता। कटयरुविन्यस्ता। ७. ग. बाहुशीर्षाश्रितं शिरः ।

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माटयशास्त्रे

पाद: प्रसारित: किश्चिदेकञ्चैवासनाश्रयः। शिरः पाश्वंगतं चैव सचिन्त उपवेशने ॥ २०५ ॥ चिबुकोपाश्रितौ हस्तौ बाहुशीर्षाश्रितं शिरः । सम्प्रणष्टेन्द्रियमना: शोकौत्सुक्योपवेशने२ ॥ २०६ ॥ प्रसार्य बाहू शिथिलौ तथा चोपाश्रयाश्रितः' । मोहमूर्च्छामदग्लानिविषादेषूपवेशयेत् ॥ २०७॥ "सम्प्रणष्टेन्द्रियमात्र इति पाठः। मन इति पाठे (प्रोच्यत्वे ? ) कृते त्वध्याहृत्य सङ्गतिः कार्या ॥ २०६॥ अपाश्रयतीत्यादिकमाश्रितम् उपवेशयेदिति स्वार्थे णिच् आचार्ये वा कर्तृभूत- त्वमात्रम्। आचार्यास्तु बाहू प्रसार्यवासने उपवेशयेत विश्रामयेवित्याहुः॥२०७॥ अर्थात् बैठने पर त्रिक समुन्नत होता है, यह सम्बन्ध है। 'इति' शब्द के वाक्यार्थ और 'स्यात' से कर्त्तव्य का आख्यान है, यही स्यात का सम्बन्ध है। वहाँ दोनों हाथ कटि और ऊरु पर कर्कट मुद्रा में रखे जाँय, यह अभिप्रेत है॥ २०४॥ अनुवाद-चिन्तायुक्त पात्र के उपवेशन में एक पैर कुछ फैलाया हुआ और दूसरा पेर आसन पर आशित (टिका हुआ) तथा शिर पाश्व में नत (झुका हुआ) होता है।। २०५। अनुवाद-शोकाकुल (शोकयुक्त) पात्र के उपवेशन में दोनों हाथ चिबुक (ठुड्डी ) पर अञ्चित होते हैं और शिर बाहु शीर्ष अर्थात भुजाओं के सहारे टिका हुआ होता है और मन एवं इन्द्रियाँ आकुल (चेतना शून्य-सो) हो जाती हैं ॥२०६॥ अभिनव-यहां 'सम्प्रणष्टेन्द्रियमात्रः' यह पाठ है। अतः 'संप्रणप्ट' शब्द केवल इन्द्रिय से सम्बद्ध है। मन से सम्बन्ध मानकर 'संप्रणेष्टेन्द्रियमनाः' इस प्रकार पाठ मानने पर 'विकाल' या 'अकुल' पद का अध्याहार करके अर्थ-सङ्गति करते हैं अर्थात् शोक की दशा में आकुल मन से उपवेशन करे ॥ २०६॥ अनुवाद-मोह, मूर्च्छा, मद, श्रम, ग्लानि तथा विषाद की अवस्था में दोनों भुजाओं को फैला कर शिचिल कर दे और किसी वस्तु के सहारे आसन पर बैठे।| २०७।। १. क. पाश्वनितं। पार्श्योग्नतं। २. क. ग. भवेच्छोकोपवेशने। ३. क. तथा चापाश्रयश्रितः । ४. क-ग. मूर्ष्छामदश्रमर्ळानि। ५. क. 'संघ्रथष्टशब्देनेन्द्रियमात्र' इति पाठः । क-क. शब्दीन विशेषणेन संप्रणण्डेन्त्रियमात्र इति पाठ: ।

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सर्वपिण्डीकृताङ्गस्तु संयुक्तः पादजानुभिः। ध्याने चोपविशेन्नरः ॥ २०८॥ 'तथा चोत्कटिकं स्थानं स्फिक्पार्ष्णोनां समागमः१। पित्र्ये "निवापे जप्ये च सन्ध्यास्वाचमनेऽपि च'। विष्कम्भितं पुनश्चैव जानुं भूमौ निपातयेत् ॥ २०९॥ पिण्डितत्वमङ्गानां जानुविश्लेषादूर्ध्वकायं कुटिलीकरोतीत्युल्कटं "संज्ञायां कटतेः । अत्र च विरलत्वं जानुनोः स्फिग्भ्यां भूमे: "परामर्शः पूर्वत्र तु नैतदुभयमपीति विशेषः।। २०८ ।। अभिनव-'उपाश्रयाश्रितः' का अर्थ है अपने आश्रित वस्तु का सहारा लेना। 'उपवेशयेत्' में णिच् प्रत्यय है। अतः यहाँ केवल कर्त्तामात्र विवक्षित है। अन्य आचार्य कहते हैं कि दोनों बाहुओं को फैलाकर आसन पर बैठा दे, विश्राम करा दे॥ २०७॥ अनुवाद-व्याधि, लज्जा, निद्रा एवं ध्यान में मनुष्य मिले हुए पाद एवं जानुओं के साथ शरीर के अङ्गों को पिण्डीकृत अर्थात् सङ्कुचित कर आसन पर उपवेशन करे अर्थात् बैठे॥२०८ ॥ अभिनव-अङ्गों के पिण्डोकृतत्व का अभिप्राय है कि जानुओं अर्थात् घुटनों के विश्लेष होने से अर्थात् अङ्गों के पिण्डीकृत होने में जानुओं एवं शरीर के ऊपरी भाग को जो संयोग (मेल) हो गया था उससे विघटन कर देने पर घुटने अलग होकर ऊर्ध्वकाय कुटिल (टेढ़ा) हो जायगा। ऐसी स्थिति उत्कटिक स्थान कहलाती है। यहाँ संज्ञा में 'कन्' प्रत्यय होकर उत्कटिक शब्द बना है। इसमें घुटनों का विरलत्व और स्फिच् अर्थात् कूल्हों का भूमि से स्पर्श होता है। पूर्व पिण्डिताङ्गत्व को अवस्था में दोनों नहीं होते, यही विलक्षणता है॥ २०८॥ अनुवाद-पितरों के तर्पण में, जप करने, सन्ध्या-बन्दन करने और आचमन में भी उत्कटिक स्थानक, स्फिच् (कूल्हें) और पारष्णि (एड़ी) को मिलाकर आसन पर उपवेशन करे अर्थात विस्तृत कर फिर एक जानु को बिष्कम्भित भूमि पर गिरा दे॥ २०९॥। १. ग. सम्पाते। क-ढ. संयुक्त:। २. क. (टि०) व्याघिपीडावहित्थेषु। ३. ख. तथा चोत्कटिकास्थानं। ४. ग. समागमम् । ५. ग. निर्वापसलिले। ६. आचमनेषु थ। ७. क. पु'संज्ञायां कढे। । ८. क. परस्पर्शः । ना. पा०-१२

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नाटपसास्न्रे

प्रियाप्रसादने कार्यं होमादिकरणेषु च। *महीगताभ्यां जानुभ्यामधोमुखमवस्थितम् ॥ २१०॥ देवाभिगमने *चैव रुषितानां प्रसादने शोके चाक्रन्दने "तीव्रे मृतानां चैव दर्शने॥ २११ ॥ त्रासने च कुसत्त्वानां 'नीचानाञ्चैव याचने। होमयज्ञक्रियायाञ्च प्रष्याणाञ्चैव कारयेत् ।। २१२।। मुनोनां नियमेष्वेष भवेदासनजो विधि:।

पिञ्य इति श्राद्वादौ निवापसलिल इति पितृतर्पणे, प्रतिग्रहार्थ परस्य सलिलदाने तत्प्रतिग्रहे च। सन्ध्याशब्देन तदवसरोचितं, जपध्यानादि। विष्कम्भित- मिति विस्तारितमेकं भूमौ जानु द्वितीयं यथास्थितं यंत्रनिकटे ढौकनं गमनं शङ्क्चं सन्तापादिभयात। तत्र च कायं मन्त्रं तदुपलक्षणम् ॥ २०९॥ अभिनव-'पित्र्' पद का अर्थ है पितरों के उद्देश्य से किया जाने वाला श्राद्धादि कर्म। 'निवाप' का अर्थ है 'पितृ-तर्पण'। 'निवाप सलिले' का अभिप्राय है पितृ-तपंण में जल लेने के लिए अर्थात् दूसरे को जल देने तथा जल लेने में। 'सन्ध्या' शब्द से सन्ध्या के अवसर के योग्य जप एवं ध्यान आदि का ग्रहण है। 'विष्कम्भित' का अर्थ है एक जानु को विस्तारित कर भूमि पर गिरा दे और दूसरे को यथास्थित रखे। यन्त्र के निकट जाने में सन्तापादि का भय रहता है, अतः इस विषय में मन्त्रणा करनी चाहिए। यह मन्त्रणा उपलक्षण है और भी उपाय करना चाहिए॥ २०९॥ अनुवाद-प्रिया के प्रसावन (प्रसन्न करने) में और होम आदि धार्मिक क्रियाओं में दोनों जानुओं को पृथ्वी पर टिका कर अधोमुख करके बैठे २१० ॥ अनुवाद-देवताओं को वन्दना में, रुष्ट व्यक्तियों के मनगन में, शोक में, तीव्र आक्रन्दन में, मृतकों (शव, मुर्दो) को देखने में, कुत्सित प्रागियों के डराने में, नीच पुरुषों के याचना में, होम, यज्ञ आदि क्रियाओं में सेवा (या सेवक) के सम्बन्ध में इसी आसन का प्रयोग करना चाहिए और मुनिजनों के नियमों में भी इसी आसन विधि का विनियोग करना चाहिए।। २११-२१३।।

१. क-च.द. प्रियप्रसादने। २ क-द. महीमुखाम्यां। ३. क. कायं। ४. क-च. रुषितानां च सान्वने । ५. ख. तीव्रमुतानां । ग. तीव्र मृतानां। ६. ग. दीनानां । ७. क. (टि०) दशने। ८. ग. योजयेतु।

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ददिशोऽ्याय: ९१

तथासनविधिः कार्यो विविधो नाटकाश्रयः ॥ २१३।

स्त्रीणाञ्च पुरुषाणाञ्च बाह्यश्चाभ्यन्तरस्तथा। आभ्यन्तरस्तु नृपतेर्बाह्यो बाह्यगतस्य च ॥ २१४ ॥

अभिगमनं वन्दनम्। शोके चेति नीचानाञ्चेति सर्वत्रात्र संबध्यते। नीचानां शोकजनितो यस्तीवाक्रन्वस्तत्रैव, नीचा यदा मृतमवलोकयन्ति। सम्बन्ध- मात्रे षष्ठीत्युभयप्राप्त्यभावान्न नियमः कुसत्त्वा शिवादयः यदा नीचान त्रासयन्ति तथ। नीचा यदा किञ्चिद्याचन्ते तदा जानुद्वयक्षेपो भूमौ ॥ २११-२१३ (१) ॥ अथासनात्मककालसन्निकेशप्रसङ्गेन तदधिकरणेषु विधिमाह-तथासन- विधिरिति। बाह्यः सर्वजनविषयः आभ्यन्तरो राजोचितः ॥ २१४॥

अभिनव-'अभिगमन' का अर्थ 'अभिवन्दन' (वन्दना करना ) है। 'शोके च' और 'नोचानां च' इनका यहाँ सब जगह सम्बन्ध है। नीच पुरुषों का शोकजनित जो तीब्र आक्रन्द है, उसो में (इस आसन का विनियोग होता है)। नीच पुरुष जब मृतक को देखते हैं, (उस समय)। यहाँ सम्बन्ध मात्र में षष्ठी विभक्ति है, क्योंकि यहाँ कर्त्ता और कर्म दोनों में षष्ठी का नियम न होने से सम्बन्ध मात्र में षष्ठी है। 'कुसत्त्व' से गीदड़ आदि कुस्सित प्राणियों का ग्रहण है, ये जब नीचों का डराते हैं तब और नीच जब कुछ माँगते हैं तब दोनों जानुओं को भूमि पर पातन (क्षेपण) होता है।। २१०-२१३ (१) ।। अभिनव-इसके बाद आसनात्मक कालसन्निवेश के प्रसङ्ग से आसन के विषय में विधान को कहते हैं-'तथासनविधिरिति'। अनुवाद-नाट्य के प्रयोग में विविध प्रकार के आसन-विधान करना चाहिए। स्त्री और पुरुषों के लिए बाद्य और आभ्यन्तर दो प्रकार के आसन-विधान हैं। इनमें आभ्यन्तर आसन-विधि राजा के लिए है और बाह्य आसन-विधि बाह्यगत सामान्य जन के लिए है॥ २१३-२१४।। अभिनव-अभिनवगुप्त के अनुसार बाह्य आसन-विधि सब लोगों के लिए और आभ्यन्तर-विधान राजा के लिए उचित है॥ २१३-२१४।।

१. ग. अथासनविधि: ।

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९२ नाट घशासतरे

देवानां नृपतीनाञ्च दद्यात्सिहासनं द्विजाः । पुरोधसामात्यानां भवेद्वेत्रासनं तथा ॥ २१५। मुण्डासनञ्च दातव्यं सेनानीयुवराजयोः। काष्ठासनं द्विजातीनां कुमाराणां कुथासनम् ॥ २१६ ॥ एवं 'राजसभां प्राप्य 'कार्यस्त्वासनजो विधिः । वेत्रलताकृतं वेत्रासनं वेत्रासनादन्य एव रूढ़ो वर्णकम्बलखण्डः । विस्तारिके- त्येन्ये। *मुण्डासनं चातुरी 'काष्ठासनं पीठकं ॥ २१६ ॥

पुरुषपात्र का आसन विधान अनुवाद-हे द्विजों ! देवताओं और राजाओं के लिए सिंहासन देना चाहिए और पुरोहित एवं अमात्यों के लिए वेत्रासन देना चाहिए। सेनापति और युवराज के लिए मुण्डासन देना चाहिए। ब्राह्मणों के लिए काष्ठासन (चौकी) और कुमारों के लिए गलीचे या दरी का आसन देना चाहिए। इस प्रकार राजसभा में आसन विधान (आसन को व्यवस्था) करना चाहिए ।। २१५-२१७ (१) ।। अभिनव-बेंत रूपी लता का बनाया हुआ आसन 'वेत्रासन' है। इस वेत्रासन से भिन्न प्रसिद्ध रङ्गोन कम्बल खण्ड भी एक आसन है। जिसे अन्य लोग 'विस्ता- रिका' कहते हैं। अभिनव ने मुण्डासन का अर्थ 'चातुरी' किया है। चातुरी का अर्थ चतुराई या चतुरता है जिसका आसन से कोई सम्बन्ध नहीं प्रतीत हाता। कुछ लोग 'चातुरी' का अर्थ चतुराई से निर्मित आसन करते हैं। अन्य लोग 'मुण्डासन' के स्थान पर 'मुञ्जासन' पाठ मानकर 'मुञ्जासन' का अर्थ 'मूँज का आसन' करते हैं। किन्तु यहाँ युवराज के लिए मूँज का आसन देने का औचित्य नहीं प्रतीत होता। अन्य आचार्य 'मुण्ड' का अर्थ शिरस्, शीर्ष या उच्च करते हैं और मुण्डासन का अर्थ 'शीर्ष (मूर्द्धन्य ) आसन या उच्च आसन करते हैं।। २१५-२१६ ।। १. कनद, भवेदर्षासनं पुनः । २. ग. मु्जासनं। ३. क.ग. काष्ठासनं ब्राह्मणानां। ख. कुब्जासनं द्विजातीनां। मुआजासनं द्विजातीनां। ४. ख. कुमारीणां कुथासनम् । क-द. कुमाराणामथाशुभम्। ५. ग. टि०) एवं राजासनं। ६. क-द. कार्य आसनजो विधि: । ७. क-ख. दण्डासनं। ८. क-ख. मयूरकं।

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'स्त्रीणाञ्चाप्यासनविधि सम्प्रवक्ष्याम्यहं पुनः॥।२१७।। सिंहासनन्तु राज्ञीनां देवीनाम्मुण्डमासनम्। *दद्याद्वेत्रासनं तथा॥ २१८॥ भोगिनीनां 'तथा चैव वस्त्रश्चर्म कुथाऽपि वा। पट्टासनमथापि च ॥ २१९॥ वेश्यानाञ्च प्रदातव्यमासनञच मसूरकम् । शेषाणां प्रमदानान्तु भवेद् 'भूम्यासनं द्विजाः ॥ २२० ॥ राज्ञी राजवंश्या देवी। सेनापतिपुत्र्यो राज्ञा परिणीताः भोगिन्यः संगृहीतकन्याः मसूरकं वस्तुशून्यं, भूमिरेवासनं भूम्यासनम् ॥ २१८-२२० ।। नारी-आसन-विधान अनुवाद-इसके बाद अब मैं स्त्रियों के लिए आसन-विधि को कहूँगा। महारानी के लिए सिंहासन, देवियों के लिए मुण्डासन, पुरोहित एवं अमात्य की पत्नियों के लिए वेत्रासन देना चाहिए॥ २१७-२१८।। अनुवाद-भोगिनी नारियों के लिए गलीचा या दरी अथवा वस्त्र एवं चर्म का आसन, ब्राह्मणी और तपस्विनियों के लिए पट्टासन (कौशेय आसन) तथा वैश्य एवं श्रेष्ठिजनों को स्त्रियों के लिए (अथवा वेश्याओं के लिए पाठान्तर से) मसूरक नामक आसन अथवा भूम्यासन (भूमि रूप आसन) बेना चाहिए। (पाठभेद से 'मसूरकम्' के स्थान पर 'मयूरकम्' पाठ मान कर 'मयूरासन' का ग्रहण है)। इस प्रकार वेश्याओं के लिए 'मयूरासन होना चाहिए और अन्य नारियों के लिए भूमि का आसन होना चाहिए।। २१९-२२०। अभिनव-'राज्ञी' का अर्थ है राजकुल में उत्पन्न देवी (रानी)। सेनापति आदि को पुत्रियाँ, जिनका राजा ने परिणय (विवाह) कर लिया है, इस प्रकार की संगृहीत स्त्रियाँ 'भोगिनी' कहलाती हैं। 'भूम्यासन' का अभिप्राय भूमिरूप आसन है॥। २१८-२२० ॥। १. क-ग. स्त्रीणां चैवासनविर्षि। २. ग. मण्डलासनम् । ३. क-द. पुरोसधां तपस्वीनां भवेत्. ४. ग. भवेद्वेत्रासनं। ५. ग. पुनश्चैव। क-द. पुनर्चैव कृत्वा चर्म कुथा तथा। ६. ग. ब्राह्मणीनां यतीनां च। ७. ख ग. वश्यानाञच । क. वैश्यानामपि कार्तव्यमासनं हि मसूरकम् । ८. ख. दिव्यासनं। ९. क-ख. पीठनं। १०. क-ख. संगीत कम्याः ।

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१४ नाटपशास्त्रे

`एवमाभ्यन्तरो ज्ञेयो बाह्यश्चासनजो विधिः। तथा स्वगृहवार्तासु च्छन्देनासनमिष्यते ॥ २२१॥ नियमस्थमुनोनां च भवेदासनजो विधिः। 'लिङ्गिनामासनविधिः कार्यो व्रतसमाश्रयः ॥ २२२॥ *एवमिति नरपतिसन्निधौ। अन्यदात्मस्वेच्छयेति दर्शयति-तथा स्वगृहेति। वार्ताशब्देन सेनापतेरमात्यगृहगमन इत्यादि सूचयति ॥२२१॥ नियमस्थ इति कस्यचिद ङ्गविष्टरोऽन्यस्य मृगाजिनम् । लिड्गिनामिति। यथा शाक्यानां बुसो, शेवानां मुण्डासनं, क्षपणकानां वेत्रवल्कलडिम्बकम् ॥। २२२॥

अनुवाद-इस प्रकार बाह्य और आभ्यन्तर आसन विधियों को जानना चाहिए और अपने घर में बात-चोत के समय स्वच्छन्व (स्वतन्त्रतापूर्वक) आसन विधि करनी चाहिए।। २२१॥ अभिनव -'एवम्' पद का अभिप्राय है 'राजा को सन्निधि में'। अन्यथा अर्थात् अन्य समय में अपनी इच्छा से आसन-विधान करे, यह 'स्वगृहवार्त्तासु' इत्यादि के द्वारा दिखाते हैं। 'स्वगृहवार्त्ता' शब्द से यहाँ सेनापति अमात्य के घर जाना सूचित होता है।। २२१ ।। अनुवाद-नियमस्थ अर्थात् नियम में स्थित मुनियों का आसन-विधान स्वतन्त्र होना चाहिए अर्थात् किसी का अङ्गविष्टर तो किसी का मृगाजिन आसन होना चाहिए। लिङ्गो सन्यासियों का आसन-विधान उनके व्रत के अनुसार होना चाहिए॥ २२२।। अभिनव-'नियमस्थ' का अभिप्राय है कि किसी मुनि का आसन अङ्गविष्टर तथा किसी मुनि का आसन मृगछाला होना चाहिए। 'लिङ्गिनाम्' अर्थात् लिङ्गियों का आसन व्रत के अनुसार होना चाहिए। जैसे-शाक्य मुनियों का आसन बुशी या वृषो (कुशासन) होना चाहिए। शैवों का मुण्डासन, क्षपणकों का आसन बेंत, वल्कल तथा डिम्बक का बना हुआ होना चाहिए। इसो बात को 'ब्ुशी' इत्यादि के द्वारा कहते हैं ।। २२२ ।। १. एवमन्तःपुरे ज्ञेयो बाह्यश्चासने विधि:। २. क. नियमस्थो मुनीनां च। क-प. नियमस्थे मुनीनां च। ३. ग. लिङ्गिनां वासनविधिः । क-द. लि्गिनां चासनाविधि:। ४. क-क. एषविषिः । क-ख. एष्विति।

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१५

बुसीमुण्डासनप्रायं वेत्रासनमथापि च।३ होमे यज्ञक्रियायाञ्च पित्र्येऽर्थें च प्रयोजयेत् ॥ २२३ ।। स्थानीया ये च पुरुषाः कुलविद्यासमन्विताः । तेषामासनसत्कार: कर्तव्य इह पार्थिवैः ॥२२४॥ समे समासनं दद्यात् मध्ये 'मध्यममासनम् । अतिरिक्तेऽतिरिक्तञ्च होने भूम्यासनं भवेत् ॥ २२५ ॥

स्थानाय हिता वृद्धाः ये भवन्ति तन्निकटे व्यवस्था दृष्टादृष्टोपयोगिनी। अत एवाह-कुलविद्यति। आसनसत्कार इहास्यतामिति ॥२२४॥

अनुवाद-होम, यज्ञ क्रिया तथा पितरों के उद्देश्य से किये जाने वाले श्राद्ध आदि में बुशी या वुषो ( कुशासन) मुण्डासन (मुञ्जासन) तथा वेत्रासन का प्रयोग करना चाहिए।। २२३ ।। सामान्य आसनविधि अनुवाद-कुल एवं विद्या से समन्वित (कुलीन एवं दिद्वान्) जो स्थानीय पुरुष हैं उनका आसन-सत्कार राजा को 'इह आस्यताम्' अर्थात 'यहाँ बैठिये' इस प्रकार करना चाहिए॥ २२४॥ अभिनव-'स्थानीयाः' का अभिप्राय है स्थानों अर्थात् आश्रमादि स्थानों के लिए हित करने वाले जो वृद्ध हैं जिनके निकट दृष्ट और अदृष्ट के उपयोगिनी व्यवस्था होती है। इसलिए कहते हैं कि कुल और विद्या से सम्पन्न वृद्धों का आसन- सत्कार 'यहाँ आइये, बैठिये' इस प्रकार कहकर करना चाहिए॥ २२४। अभिनव-आसन के विषय में विभाग करते हैं- अनुवाद-सम अर्थात् बराबर वालों के लिए 'सम' आसन देना चाहिए, मध्यम पात्रों के लिए 'मध्यम' और अतिरिक्त अर्थात् उत्तम पात्रों के लिए विशिष्ट (अतिरिक्त ) आसन तथा हीन पात्रों के लिए भूम्यासन अर्थात् भूमि रूप आसन का विधान करना चाहिए।। २२५॥

१. ख. दण्डमुण्डवृषीप्राय। ग. वृषीमुण्डासनप्रायं । २. क-ग. वा। ३. क-न. कर्त्तव्यो गुरुपार्थिवः । ४. कनग. मध्यमे मध्यमासनम् ।

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नाटघशालथे

उपाध्यायस्य नृपतेर्गुरूणामग्रतो बुधैः। भूम्यासनन्तथा' कार्यमथवा काष्ठमासनम् ॥ २२६ ॥ नौनागरथयानेषु भूमिकाष्ठासनेषु च। सहासनं न दुष्येत गुरूपाध्यायपार्थिवैः3 ॥ २२७ ॥।

तत्र विभागमाह-सम इति तत्तुल्यजातिविद्यः। सममिति त्रित्वाच्चासना- पेक्षया मध्य इति किञ्चिदूनेन, मध्यममिति स्वासनात्प्रमाणतोऽप्यूनं हीन इति स्वापेक्षया भूम्या सह भूमिरेव इहास्यतामिति निर्दश्या। स एव तस्यासनसत्कार: . ।। २२५ ।। काष्ठमिति एकमेव दीघ भरसहं पर्यङ्कं दर्शयितुं काष्ठमित्युक्तं न तु काष्ठमयमिति ॥ २२६ ॥

अभिनव-'सम' का अभिप्राय है जो जाति एवं विद्या में तुल्य (समान) हों। आसन चार प्रकार के होते है-सम, मध्य, अतिरिक्त अर्थात् उच्च और भूमि। 'सम' तीनों की अपेक्षा से सम। 'मध्य' आसन उससे कुछ कम अर्थात् अपने आसन के प्रमाण से थोड़ा न्यून (कम)। 'हीन' अर्थात् अपनी अपेक्षा से हीन। भूम्यासन अर्थात् भूमि हो आसन। 'यहाँ बैठिंए' इस प्रकार का निर्देश भूमि हो हीन पात्रों का आसन है यह बतलाया गया है। इस प्रकार बैठने के लिए निवेदन करना आसन- सरकार है । २२५॥ अनुवाद-विद्वानों को उपाध्याय, नृपति और गुरुजनों के समक्ष भूमि रूप आसन अथवा काठ्ठ के आसन पर बैठना चाहिए॥ २२६ ॥ अभिनव-एक ही लम्बे भार को सहन करने वाले पर्यङ्क (पलंग) को दिखलाने के लिए 'काष्ठ' यह कहा गया है, न कि काष्ठमय आसन अर्थात् यहाँ काष्ठ का प्रयोग है। काष्ठमय आसन का प्रयोग नहीं है॥ २२६ ॥ अनुवाद-नौका, हाथो और रथ यान में, भूमि और काष्ठ के आसन पर गुरु, उपाध्याय के साथ बैठने पर आसन-वोष अथवा (कोई दोष) नही है।२२७॥

१. ग. सदा। २. ख. तथा काष्ठासनेषु च। ३. क-द. उपाध्याये गुरौ नूपे।

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आकुञ्चितं समज्चैव प्रसारितविवर्तने'। उद्वाहितं नतञ्चैव शयने कर्म कोर्त्यंते॥। २२८ ॥ सर्वैराकुञ्चितैरङ्ग: शय्याविद्धे तु जानुनी। स्थानमाकुञ्चितं नाम "शोतार्तानां प्रयोजयेत् ॥ २२९ ।।

अथ शयनसन्निवेशनमाह-आकुञ्चितममिति। विक्। या निजशरीरस्य कुटिलीकरणात्सा स्यात। बाहु (मध्यम ?) प्रसारणे विक्षेपयोगात् पार्श्वे संनिवेशन- वशात्। पूर्वकायस्यापरकायस्योध्वंनयनं नान्यशयनसंनिवेशात् ॥ २२८॥। शयन-विधि अभिनव-अब इसके बाद शयन के सन्निवेश को कहते हैं-'आकुन्चित- मित्यादि'। अनुवाद-आकुञ्चित, सम, प्रसारित, विर्वात्तत, उद्वाहित और नत ये शयन में छः प्रकार के कर्म कहे जाते हैं ॥ २२८॥ अभिनव-जो स्थिति (सङ्कत) अपने शरीर के कुटिलीकरण से होती है वह आकुश्चित है। पूर्व काय अर्थात् शरीर के ऊपरी भाग के समीप में उपवेशन के कारण बाहुओं के फैलाने में विक्षेप होता है और शयन पर दूसरे के सन्निवेश (बैठ जाने) से अपरकाय अर्थात् शरीर के नीचे के भाग को ऊपर ले जाने में भी विक्षेप होता है। अतः अपने शरीर के कुटिलीकरण से जो निर्देश है वह 'आकुञ्चित' कहलाता है॥ २२८ ॥ आकुश्चित स्थान अनुवाद-जिसमें समस्त अङ्ग सङ्गचित अर्थात् सिकुड़े हुए हों और दोनों घुटने शय्या (बिछौने) से आविद्ध (सटे हुए) हों, उसे 'आकुञ्चित' स्थान कहते हैं। शीत से पीड़ित पात्रों के लिए उस स्थान का प्रयोग होता है ॥। २२९॥

१. कन. प्रसारितविवर्तिते। २. ख. समञ्चैव । ग, तथा चैव। क-न. नते षोढ़ा शय्यास्थानानि निर्दिशेत् । ३. ख. स्वैरमाकुश्रितैरङ्गः श्यविद्धेषु जानुनी। ४. ख-ग. शीतानान्तु। ५. क -. सन्निवेशनाव। ६.क-ख, ऊध्वंशयनं। ना० शा०-१३

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नाट घसलाल्ये

उत्तानितमुखं चैव स्रस्तमुक्तकरं तथा। समं नाम प्रसुप्तस्य स्थानकं संविधीयते ॥ २३० ॥ एकं भुजमुपाधाय सम्प्रसारितजानुकम् । स्थानं प्रसारितं नाम 'सुखसुप्तस्य कारयेत् ॥ २३१ ।। अधोमुखस्थितञ्चैव 'विवततमिति स्मृतम् । शास्त्रक्षतमृतोत्क्षिप्तमत्तोन्मत्तेषु कारयेत् ।। २३२ ।। "अंसोपरि शिरः कृत्वा कूर्परक्षोभमेव च। उद्वाहितन्तु विज्ञेय लीलया 'वेशने प्रभोः ॥२३३॥

सम-स्थान अनुवाद-जिसमें मुख उत्तानित (ऊपर की ओर) और दोनों हाथ शिथिल एवं मुक्त (खुले हुए ) हों वह 'सम-स्थान' कहलाता है। प्रसुप्त अर्थात नींद में सोये हुए पात्र के लिए इस स्थान का प्रयोग होता है॥ २३०॥ प्रसारित स्थान अनुवाद-जिसमें एक भुजा को तकिया बनाकर जानुओं (घुटनों) को फैलाकर शयन होता है, उसे 'प्रसारित-स्थान' कहते हैं। सुख से सोये हुए व्यक्ति के अभिनय में इस स्थान का प्रयोग किया जाता है॥। २३१॥ विवतत-स्थान अनुवाद-जिसमें अधोमुख अर्थात् मुख को नीचा करके शयन होता है उसे 'विवत्त्तित' कहते हैं। शस्त्रक्षत (शस्त्र-प्रहार), मृत, उत्किप्त, मत्त एवं उन्मत्त व्यक्तियों के लिए इस आसन का प्रयोग होता है।। २३२ ।। उद्राहित-स्थान अनुवाद-जिस शयन में शिर को कन्धे पर रखकर (टिकाकर) और के हनी को मोड़कर शायन किया जाता है उसे 'उद्वाहित' समझना चाहिए। लीला- पूर्वक स्वामी के बैठने में इसका प्रयोग होता है।।२३३॥

१. क. प्रत्यङ्मक्तकर तथा। ख. ग. स्रस्तमत्तरर्क तथा। २: ख. ग. तु सुप्तस्य । ३. ख. ग. खलु सुप्तस्य । ४. ख. ग. विकर्तनमिति स्मृतम् । ९. क-न, हस्तोपरि। -६. क. ग. वचने।

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ईषतप्रसारिते जङ्डें यत्र 'सत्रस्तौ करावुभौ। आलस्यश्रमखेदेषु नतं स्थानं विधीयते ॥ २३४॥ गतिप्रचारस्तु मयोदितोऽयं नोक्तश्च य: सोऽर्थवशेन साध्यः। अतः परं 'रक्परिक्रमस्य वक्ष्यामि कक्षां "प्राविभागयुक्ताम् ॥२३५।। इति भारतीये नाट्यशास्त्रे गतिप्रचारो नाम द्वादशोऽध्यायः।

अर्थवशेनेति लौकिकेनेत्यर्थः । अथैतदुपसंहृताध्यायानन्तरावकाशं सङ्गति- प्रदर्शनपूर्वकमाह-अतः परमिति। रङ्गे यत्परिक्रमात परिक्रमणाद वृत्ते गत्यध्याये निरूपितं तदुपयोग: कक्ष्याविशेषविभाग इति शिवम् ॥ २३५।।

नत-स्थान अनुवाद-जिसमें दोनों जङ्धाएँ थोड़ी फैली हुई हो और दोनों हाथ शिथिल हों, उसे 'नत-स्थान' कहते हैं। आलस्य, थकावट, खेद में इसकी योजना होती हैं।। २३४।। अनुवाद-इस प्रकार मैंने इस गति-प्रचार को कहा है और जो बातें मैंने नहीं बतलाई है उसे प्रयोजन के अनुसार सिद्ध कर लेना चाहिए। इसके बाद मैं रङ्गपरिक्रम के विभाग-युक्त कक्ष्याओं का कथन करूँगा अर्थात इसके बाद मैं रङ्गमश् पर परितः क्रमण के कक्ष्या-विभाग का कथन करगा॥ २३५॥ इस प्रकार भारतीय नाट्यशास्त्र में गति-प्रचार नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥। १२।।

१. क. सृष्टौ। २. क-द. शास्त्रतः । ३. ख. ग. रक्कविधिक्रमस्य । v. क. ग. कक्ष्यान्तरसंविधानम् । ५. ड. नयोदशोऽष्यायः ।

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१०० नांट चशाशये

यावद्गतिभेदविधिप्रकटनमध्यायमिह विवृणुते स्मरमथनचरणसरसिजपरागभूतोऽभिनवगुप्तः । इति श्रोमहामाहेश्वराभिनवगुप्ताचार्यविरचितायां नाट्यवेदविवृतावभिनव- भारत्यां गत्यष्यायो द्वादशः समाप्तः

अभिनव-'अर्थवशेन' का अभिप्राय है लौकिक व्यवहार से। इसके बाद इस अध्याय के उपसंहार के बाद अगले अध्याय के अवकाश देने के लिए अर्थात् अगले अध्याय का प्रारम्भ को संगति के लिए कहते हैं-अतः परिमिति। रङ्गमञ्च पर परिक्रमण (घूमने ) से सम्पन्न होने वाले गत्यध्याय अर्थात् पिछले अध्याय में जिसका निरूपण किया गया है उसका उपयोग कक्ष्याविशेष के विभाग में होता है, ऐसा कहेंगे। यहाँ 'इति शिवम्' अध्याय की समाप्ति का सूचक है। अभिनव-स्मर अर्थात् कामदेव का मथन (विनाश) करने वाले भगवान् शिव के चरणकमल के परागभूत आचार्य अभिनवगुप्त ने गति के जितने भेद हैं, उनके प्रकाशन करने वाले अध्याय की व्याख्या पूरो कर दी अथवा गति के समस्त भेदों के प्रकाशन करने की विधि बतलाने वाले बारहवें अध्याय को विवृत्ति (व्याख्या) पूरी कर दी। इस प्रकार श्रीमहामाहेश्वर अभिनवगुप्तपादाचार्य विरचित नाट्यवेदविवृत्ति अभिनवभारती में गत्यध्याय नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १२॥ इति डॉ० पारसनाथद्विवेदिविरचितायामभिनयभारत्या: मनोरमाख्यायां हिन्दी व्याख्यायां गतिप्रचारो नाम द्वादशोऽध्यायः ।१२॥ इस प्रकार डॉ० पारसनाथद्विवेदी द्वारा रचित अभिनवभारती की हिन्दी ध्याख्या में बारहवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ १२॥

१. ख. त्रयोदशोऽ्यायः ।

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विशरीश समोक अभिनवभारतीस्वीकृतपाठक्रमाद् भिन्नपाठक्रमवान् द्वादशोऽध्यायः मि

गतिप्रचार: एवं व्यायामसंजातं कार्यं मण्डलकल्पनम् । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि गतिस्तु प्रकृतिस्थिताः ॥ १॥। तत्रोपवहनं कृत्वा भाण्डवाद्यपुरस्कृतम्। यथा मार्गरसोपेतं प्रकृतीनां प्रवेशनम् ॥ २ ॥ ध्रवायां संप्रवृत्तायां पटे चैवापकर्षिते। कार्यः प्रवेशः पात्राणां नानार्थरससंभवः ॥ ३॥ स्थानं तु वैष्णवं कार्यमुत्तमे मध्यमे तथा। समुन्नतं समं चैव चतुरश्रमुरस्तथा॥४॥ बाहुशोर्षे प्रसन्ने च नात्युत्क्षिप्ते च कारयेत्। ग्रीवाप्रवेशः कर्त्तव्यो मयूराञ्चितमस्तकः ॥ ५॥

हिन्दी-अनुवाद अनुवाद-इस प्रकार पिछले अध्याय में व्यायाम अर्थात् चारियों के संयोग में बनने वाले मण्डलों को कल्पना करनो चाहिए। इसके बाद पात्रों को गतियों का वर्णंन करंगा ॥१॥ अनुवाद-पात्रों के प्रवेश के समय भाण्ड-वाद्यों के साथ मार्ग अर्थात देश- काल और रसों से समन्वित उपवहन (उपोहन) क्रिया सम्पन्न करके ध्रुवा-गान के सम्यक् प्रयोग किये जाने पर और जवनिका (परदे) हटा विये जाने पर नानार्थ रस के सजक पात्रों का प्रवेश करना चाहिए। २-३॥। अनुवाद-प्रवेश के समय उत्तम तथा मध्यम पात्र वैष्णव स्थानक में स्थित रहे फिर वक्षःस्थल को समुन्नत, सम और चतुरस्र तथा बाहु एवं शिर को स्थिर रखे और अत्यन्त उत्क्षिप्त न करे तथा ग्रीवा प्रदेश को मोर के समान अश्चित करना चाहिए।। ४-५ ॥

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१०२ मांट पशास्त्रे

कर्णाभ्यां बाहुशिरसी स्यातामष्टाङ्ुलस्थिते। उरसश्चापि चिबुकं चतुरङुलसंस्थितम्॥ ६॥ हस्तौ तथैव कर्तव्यौ कटिनाभितटस्थितौ। दक्षिणे नाभिसंस्थस्तु वाम: कटितटे स्थितः ॥ ७॥ पादयोरन्तरं कार्य द्वौ तालावर्धमेव च। पादोत्क्षेपश्च कर्तव्यः स्वप्रमाणविनिरमितः ॥८।। चतुस्तालो द्वितालश्चाप्येकतालस्तथैव च। चतुष्तालस्तु देवानां पार्थिवानां तथैव च।। ९।। द्वितालश्चैव मध्यानां ताल: स्त्रोनोचलिंङ्गिनाम्। चतुष्कलोऽथ द्विकलस्तथा हयोककलः पुनः ॥१०॥ चतुष्कलो हयुत्तमानां मध्यानां ढ्विकलो भवेत्। तथा चैककल: पातो नोचानां संप्रकीतितः ॥ ११।। स्थितं मध्यं द्रुतं चैव समवेक्ष्य लयं बुधः । यथाप्रकृति नाट्यज्ञो गतिमेधं प्रयोजयेत् ॥ १२ ॥ अनुवाद-कान से आठ मङ्गुलि की दूरो पर बाहु और शिर को स्थित करे और चिबुक को उरस् अर्थात वक्षःस्थल से चार अङ्गुलि की दूरी पर स्थित करे॥ ६ ॥ अनुवाद-इसी प्रकार दोनों हाथों को कटि और नाभि तट पर स्थित करे। उसमें दाहिना हाथ नाभि पर और बायां हाथ कटि पर स्थित करे॥७ ॥ अनुवाद-पात्र अपने पैरों को ढाई ताल के अन्तर पर रखे। फिर चार ताल, दो ताल और एक ताल के प्रमाण के अनुसार पैरों का उत्क्षेपण करे। उनमें चार ताल देवताओं औौर राजाओं के लिए, दो ताल मध्यम पात्रों के लिए और एक ताल स्त्रियों तथा नोच पात्रों के लिए है। इस प्रकार पैरों का उत्क्षेपण चतुष्ताल, द्विताल और एक ताल के प्रमाण के अनुसार करना चाहिए॥ ८-१० ॥ अनुवाद-उनमें उत्तम पात्रों का चार कला का, मध्यम पात्रों का दो कला का और नोच पात्रों का एक कला का पाद-पात कहा गया है।। ११।। अनुवाद-नाटयवेत्ता विद्वान् इस प्रकार स्थित, मध्य और द्रुत लयों को अच्छो तरह समझकर पात्रों के अनुसार गति का प्रयोग करे॥ १२॥

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दवशोऽष्याय: १०३

स्वाभाविकोत्तमगतौ जानुं कुर्यात्कटीसमम्। युद्धचारोप्रचारेषु जानु स्तनसमं भवेत् ॥ १३ ॥ अयं विधिस्तु कर्तव्यः स्वच्छन्दगमनं प्रति। संभ्रमोत्यानरोषेषु प्रमाणं न विधीयते ॥ १४॥ दृप्तानां दैत्ययक्षाणां तथा पन्नगरक्षसाम्। चतुस्तालप्रमाणेन कर्तव्या तु गतिर्बुधेः ॥१५॥ दिवौकसां तु शेषाणां मध्यमा गतिरुच्यते। तत्रापि चोत्तमा ये तु तेषां देवैः समा गतिः ॥१६ ॥ पुलिन्दा: शबराश्चेव शेषा ये म्लेच्छजातयः । तेषां देशानुरूपेण कार्य गतिविचेष्टितम् ॥ १७॥ जलाशयमृगव्यालपशुश्वापदपक्षिणाम् देशजातिसमुत्थेन गति भावेन योजयेत् ॥१८ ।। स्थितं मध्यं हुतं चैव समवेक्ष्य लयं बुधैः। पादयोः पतनं सम्यकप्रकुर्वीत यथाक्रमम्॥ १९॥

अनुवाद-उत्तम पात्रों की स्वाभाविक गति में जानु को कटि के सम (बराबर) रखे और युद्धचारी के प्रचार में जानु को स्तन (वक्षस्थल) के बराबर रखे ॥ १३ ॥ अनुवाद-यह विधि (विधान ) स्वच्छन्द-गमन के लिए करनी चाहिए। सम्भ्रम अर्थात् धबड़ाकर उठने में और रोष (क्रोध) में कोई विधान नहीं है ॥१४॥ अनुवाद-दृप्त, दैत्य, यक्ष, पन्नग और राक्षसों की गति विद्वानों को चार ताल के प्रमाण से करनी चाहिए।। १५।। अनुवाद-अन्य द्युलोकवासियों की मध्यमा गति कही गई है। उनमें जो उत्तम पात्र है उनकी गति देवताओं के समान होनी चाहिए॥ १६ ॥। अनुवाद-पुलिन्द, शबर और शेष जो म्लेच्छ जातियाँ हैं, देश के अनुसार उनकी गति एवं चेष्टाएँ होनी चाहिए।। १७ ।। अनुवाद-जलाशय, मृग, व्याल, पशु, इ्वापद और पक्षियों की गति (चाल) देश और जाति के अनुसार संयोजित करे ॥ १८॥ कौल अनुवाद-विद्वानों को स्थित, मध्य और द्रुत लय को अच्छी तरह देखकर अच्छी तरह पाद-पातन करना चाहिए।। १९।।

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१०४ नाट पशास्त्रे

स्थैर्योपपन्ना गतिरुत्तमानां मध्या गतिर्मंध्यमसंस्थितानाम्। द्रुता गतिश्च प्रचुराधमानां लयत्रयं सत्त्ववशेन योज्यम् ॥ २० ॥ चतुष्कलं तूत्तमानां मध्यानां द्विकलं भवेत्। तथा चैककलं पातं नीचानां संप्रयोजयेत् ॥ २१ ॥ यः समैः संहितो गच्छेत्तत्र कार्यो लयाश्रयः । चतुष्कलश्च द्विकलस्तथा चैककलः पुनः ॥ २२॥ अथ मध्यमनीचैस्तु गच्छेत्संपरिवारितः। चतुष्कलस्तथार्ध च तथा चैककलो भवेत् ॥ २३ ॥ एवमेव तु विज्ञेयः कलानां गमने विघिः। पुनर्गतिप्रचारस्य प्रयोगं शृणुतानधाः ?॥ २४॥ पाश्वाक्रान्तैः सललितैः पाश्वांद्यान्वितैरथ। रङ्डकोणोन्मुखो गच्छेत्सम्यक्पञचपदानि तु॥ २५॥ अनुवाद-उत्तम पात्रों की गति स्थिरता से युक्त (स्थित) लय में, मध्यम पात्रों की गति मध्य (मध्य लय में) तथा अधम पात्रों की गति द्रुत लय में होनी चाहिए। इस प्रकार सत्त्व के अनुसार तीनों लयों को योजना करनी चाहिए॥ २०॥ अनुवाद-उत्तम पात्रों का पाद-पात चतुष्कल, मध्यम पात्रों का द्विकल और नीच पात्रों पाद-पात एक कल का होना चाहिए।। २१।। अनुवाद-जहाँ सम स्थिति वाले पात्रों के साथ चलना हो, तो वहाँ गति लय (स्थिर, मध्य, द्रुत) के आधार पर चतुष्कल, द्विकल और एककल के अनुसार होनी चाहिए।। २२ ।। अनुवाद-जब मध्यम और नीच पात्रों के साथ चलना हो तो चतुष्कल, द्विकल और एककल के अनुसार चलना चाहिए।। २३।। अनुवाद-हे अनघ ! इस प्रकार कला के विषय में यह विधि समझनी चाहिए। अब गति-प्रचार के प्रयोग को सुनिये॥ २४॥ अनुवाद-वाद्य-ध्वनि से युक्त, पाश्वक्रान्ता चारी के अनुसार सुन्दर ललित पैरों से रङ्गमञ्न के कोण में उन्मुख होकर पाँच पग चले ॥ २५ ॥ सि

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एवं गतागतैर्गत्वा पदानामेव विशतिम्।ण वामवेधं ततः कुर्याद्विक्षेपं दक्षिणस्य च॥ २६ ॥ रङ्गे विकृष्टे भरतेन कार्यो गतागतैः पादगतिप्रचारः। त्यश्रस्त्रिकोणे चतुरश्ररङ्गे गतिप्रचारश्चतुरश्र एव ॥। २७ ॥ द्रुता गतिस्तु कतंव्या द्विकला पादपातने। ज्येष्ठे चतुष्कला कार्या ट्विकला तत्र मध्यमे ॥ २८॥ ढविकला चोत्तमे यत्र मध्ये त्वेककला भवेत्। कलाप्रमाणं मध्ये च नीचे त्वर्धकला ततः ॥ २६॥ एवमर्धार्धहानि तु कलानां संप्रयोजयेत्। उत्तमानां गतिर्या तु न तां मध्येषु योजयेत् ॥ ३० ॥ या गतिश्चैव मध्यानां न तां नीचेषु योजयेत् ॥३१॥ उत्तमानां मयोक्ता तु गतिविप्राः यथायथम् । मध्यानामधमानां च गति वक्ष्याम्यहं पुनः ॥ ३२॥

अनुवाद-इस प्रकार आने-जाने के प्रकार से पैरों के बीस पग (कदम) चलकर बाये पैर से वेध करे और फिर दक्षिण पाद से विक्षेप करे॥२६॥ अनुवाद-विकृष्ट रङ्गपञ्न पर अभिनेता के बार-बार आने-जाने के प्रकार से पाद-प्रचार करे। त्रिकोण रङ्गमञ्न पर त्र्यस्त्र और चतुष्कोण रङ्गमन्न पर चतुरत्न गति प्रचार करना चाहिए॥ २७॥ अनुवाद-पाद-पातन में द्रुत लय के अनुसार दो कला की गति होनी चाहिए। जब उत्तम पात्रों को गति चार कला प्रमाण की हो तो मध्यम पात्रों की गति दो कला प्रमाग की होनी चाहिए और जहाँ पर उत्तम पात्र की गति दो कला को हो तो मध्यम पात्र की गति एक कला को होनी चाहिए और जब मध्यम पात्रों को गति एक कला की हो तो अधम पात्रों की गति अर्द्धंकला प्रमाण की होनी चाहिए।।२८-२९।। अनुवाद-इस प्रकार कलाओं का प्रमाण आधा-आधा कम करके प्रयोग करना चाहिए। उत्तम पात्रों की जो गति हो, उसे मध्यम पात्र की गति में प्रयोग नहीं करना चाहिए॥। ३० ।। ना० शा०-१४

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१०३ नाटयशास्थरे

वणिजां मन्त्रिणां चैव गति: कार्या स्वभावजा। अतिक्रान्तपदैः सा तु द्वितालान्तरगामिभिः ॥३३॥ कृत्वा नाभितटे हस्तमुत्थानं खटकामुखम्। आद्यं चारालमुत्तानं कुर्यात्पाशर्वस्तनान्तरे॥। ३४॥ न निषण्णं न च स्तब्धं न चैव परिवाहितम्। कृत्वा गात्रं तथा गच्छेत्तेन वाद्यक्रमेण तु॥ ३५॥ हासे त्वथ गतिः कार्या तथा खज्जनवामने। द्विकलार्धप्रयोगेषु (कुहको दाम्भिकः) कुहकाभिनयं प्रति ॥३६॥ ख्जे गतिस्तु कर्तव्या स्तब्धकचरणाश्रया तथा द्वितीयः कार्यस्तु पादोऽग्रतलसंचरः ॥ ३७॥ स्तब्धेनोन्नमनं कार्यमङ्गस्य चरणेन तु। गमने च निषण्णः स्यात्तथान्यचरणाश्रये॥।३८॥ अनुवाद-जो गति मध्यम पात्रों की बताई गई है उसे अधम पात्रों की में प्रयोग न करे। हे विप्रों ! मैंने उत्तम पात्रों की गति बतलाई है। अब मध्यम और अधम पात्रों की गति बतलाता हूँ। वणिक (बनियों) और मन्त्रियों की गति उनके स्वभाव के अनुसार होनी चाहिए॥ ३१-३२।। अनुवाद-बनियों और सचिवों की गति दो ताल के अन्तर पर अतिक्रान्त चारी में होनी चाहिए। इसमें खटकामुख हस्त को उत्तान करके नाभि पर रखकर, फिर अराल मुद्रा में एक हस्त को उत्तान करके दोनों स्तनों के मध्य में पाश्व में रखे। शरीर को स्थित, स्तब्ध और परिवाहित (हिलाते हुए ) न रखकर वादन के क्रम से चले ॥ ३३-३५ ॥ अनुवाद-हास्य उत्पन्न करने के लिए लूले, लंगड़े और बौने की गति से चलनी चाहिए। वम्भी अथवा ईर्ष्यालु ब्यक्तियों की गति २३ कला की होनी चाहिए। अनुवाद-खञ्ज व्यक्ति की गति में एक पैर स्तब्ध रखना चाहिए तथा दूसरा पैर अप्रतलसञचर में होना चाहिए। इसमें स्तब्ध पैर से शरीर का उत्त्थापन करना चाहिए और गमन में दूसरे पैर को निषण्ण रखे। लंगड़े व्यक्ति की गति में यही क्रम रखना चाहिए, पैर के तलवे में चोट, घाव होने, काँटा चुभने में इसी गति का प्रदर्शन करना चाहिए।। ३६-३८।।

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हाबशोञयाया

एष खञ्जप्रयोगेषु तलशल्यक्षते तथा। पावेनाग्रतलेनाथ गतिः कार्याञ्चितेन तु॥ ३९॥ निषण्णदेहा कर्तव्या नतजङ्घा तथैव तु। सर्वसंकोचिताङ्की च वामने गतिरिव्यते॥ ४०॥ न तस्यातिक्रमः कार्यो विक्षेपश्चरणस्य तु। उद्वाहिता चूर्णपदैः सा कार्या कुहकात्मिका।।४१॥ विदूषकस्यापि गतिर्हस्यत्रयविभूषिता। अङ्गहास्यं कार्यहास्यं हास्यं नेपथ्यजं तथा ॥ ४२॥ कुब्जः खज्जोऽथ खलतिर्दन्तुरो विकृताननः। यत्तादृशो भवेद्विप्राः ! अङ्कहास्यं तु त्गवेत् ॥ ४३ ॥ यदा तु बकवद् गच्छेदुल्लोकितविलोकितैः। अत्यायतपदत्वाच्चाप्यङ्गहास्यो भवेत्तु सः॥४४। चीरचमंमषीभस्मगैरिकादिविभूषणैः यत्तादृशो भवेद्विप्राः ! हास्यं नेपथ्यजं तु तत् ॥४५॥। अनुवाद-अग्रतल सञचर तथा अञ्चित पैर से शरीर को स्थित एवं जङ्गा को नत (झुका हुआ) करके पङ्गु-पात्र का अभिनय करना चाहिए ।। ३९ । अनुवाद-बौने पात्र को गति में सम्पूर्ण अङ्ग को सङ्कुचित रखना चाहिए। उसका अतिक्रमण और पैरों का विक्षेप नहीं करना चाहिए॥४०॥ अनुवाद-तोन प्रकार के हास्यों से विभूषित चूर्णपवों से उद्धाहित दम्भ अथवा ई्ष्या से युक्त विदूषक को गति का अभिनय करना चाहिए।४१॥ अनुवाद-अङ्गकृत हास्य, कार्यहास्य और नेपथ्यज हास्य ये तोन प्रकार के हास्य होते हैं। हे मित्रों! दन्तुर (बड़े-बड़े दाँतों वाला) गञ्जा, कुबड़ा, लंगड़ा और विकृत मुख वाले इस प्रकार के विदूषक का प्रवेश हो तो 'अङ्गहास्य' कहलाता है। यदि वही पात्र बगुले को तरह ऊपर-नोचे देखते हुए और लम्बे- लम्बे डग भरते हुए चले तो भी 'अङ्गहास्य' होता है॥ ४२-४४॥ अनुवाद-चीर (चिथड़े), चर्म, मसो (स्याहो) भहम और गैरिक (गेव) आदि से विभूषित पात्र जहाँ हों, वह नेपथ्पज हास्य कहलाता है॥ ४४-४५॥

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१०८ नाटपद्यास्त्रे

कार्यहास्यं तु विज्ञेयमसंवद्धप्रभाषणैः अनर्थवाक्यैविविघैस्तथा चाइलीलभाषणैः ॥ ४६ ॥ तस्य तु प्रकृति ज्ञात्वा तथा भावं विचक्षणः । गतिप्रचारं विभजेन्नानावस्थान्तरात्मकम् ॥ ४७ ॥ स्वभावजायां विन्यस्य कुटिलं वामके करे। दक्षिणं चैव हस्तं तु कुर्याच्चतुरकं तथा॥४८ ॥ पाश्वमेकं शिर्चापि हस्तं चरणमेव च। पर्यायतः सन्नमयेल्लयतालवशानुगम्॥४९। स्वभावजाता तस्यैषा गतिरन्या विकारजा। लाभे तथा च भुक्तस्य तुष्टे चापि गतिर्भवेत् ॥ ५० ॥ शकारस्यापि कर्तव्या गतिश्चञ्चलदेहिका। वस्त्राभरणसंस्पशं सम्यक् पञ्चपदानि तु॥५१॥ वामवेधं ततः कुर्याद्विक्षेपं दक्षिणेन च। परिवृत्य द्वितीयं तु गच्छेत्कोणं ततः परम् ॥ ५२॥

अनुवाद-असम्बद्ध भाषण, निरर्थक और विकार युक्त अश्लोल भाषण से युक्त हास्य 'कायहास्य' कहलाता है॥४६॥ अनुवाद-विद्वान् पुरुष उसकी प्रकृति और भाव को जानकर नाना अवस्थाओं के अनुसार गति प्रचार का विभाजन करे॥४७॥ अनुवाद-स्वाभाविक गति के अभिनय में बायें हाथ को कुटिल करके दाहिने हाथ को चतुरक हस्तमुद्रा में रखे। उसके बाद एक पाश्व, शिर, हाथ तथा पैर को क्रम से ताल और लय के अनुसार झुका दे। यह स्वाभाविक गति है, इसके अतिरिक्त विकारजा गति होती है॥। ४८-५० (१) ।। अनुवाद-उपभोग किये हुए वस्त्रादि के लाभ में और सन्तुष्ट होने पर इस (विकरजा) गति का प्रयोग करे। शकार को गति चञ्चल शरोर से करनी चाहिये॥५०-५१ ॥ अनुवाद-इसमें अभिनेता वस्त्र और आभूषणों का स्पशं करता हुआ पाँच पग चले। उसके बाद बामवेध करे फिर दाहिने पैर से विक्षेप करे ॥५१-५२॥

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तत्रापि वामवेधं तु विक्षेपो दक्षिणेन च। जसकी ततो भाण्डोन्मुखो गच्छेदेतान्येव पदानि तु ॥ ५३॥ एवं गतागतैर्गत्वा पदानि त्वे्कविशतिम्। वामवेधं ततः कुर्याद्विक्षेपः दक्षिणेन च॥ ५४॥ एषा स्वभावगमने गतिः कार्या प्रयोक्तृभिः। अवस्थान्तरयोगे तु गति समनुबोधत॥५५॥ अस्वस्थकामिते चैव भयवित्रासयोस्तथा। आवेगे च तथा हषें तथानिष्टश्रुतावपि॥५६॥ कालातिक्रमणे चैव क्षेपे चाद्गुतदर्शने। कार्य आत्ययिके चैव दुःखिते चारिमार्गणे॥ ५७ ॥ अवरुद्धानुसरणे श्वापदानुगतौ तथा। गतिमेतेषु भावेषु द्विकलां संप्रयोजयेत् ॥५८ ॥

अनुवाद-उसके बाद दूसरे पैर को परिवतित कर दूसरे कोण में रखे। फिर बायें पैर से बेध करे और दाहिने पैर से विशेष करे। फिर भाण्ड-वाद्य की ओर उन्मुख होकर उतने ही पग चले । ५२५३॥ अनुवाद-इस प्रकार आने-जाने से इक्कोस पग चलकर फिर बाये पैर से वेध करे और वाहिने पैर से विक्षेप करे। प्रयोक्ताओं को स्वाभाविक गति में इस प्रकार प्रयोग करना चाहिए ।। ५४-५५।। अनुवाद-इसके बाद अन्य अवस्थाओं के योग में गति को समझिये। अस्वस्थकामित (प्रच्छन्न कामुक), भय, वित्रासन (डराये हुए), आवेग, हर्ष, और अनिष्ट बात के शवण में, समय के अतिक्रमण में निन्दा, अ.द्गुत वस्तु के दर्शन कष्टकर कार्य में या उत्पात-सूचक कार्य में, दुःख में, शत्रु के खोजने में, अपराधो के पकड़ने में, व्याघ्रादि हिंसक जानवरों के अनुसरण में इन भावों के प्रदशन में दविकला गति का प्रयोग करे और देवताओं एवं राजाओं की गति का इसी प्रकार का विधान लाना चाहिए । ५५-५८॥

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दिव्यानां नृपतीनां च गतिरेवं विधोयते। अत्रोच्यते कथं देवः समा राज्ञां गतिर्भवेत् ॥ ५९॥ दिव्या तु प्रकृतिज्ञेंया तथान्या दिव्यमानुषी। मानुषी चैव मन्तव्या नाट्यवृत्तिक्रियां प्रति ॥६० ॥ दिव्या तु देवप्रकृती राज्ञां स्याद्दिव्यमानुषी। अन्या या लोकसंस्था तु मानुषो सा प्रकीर्तिता ॥६१॥ तस्माद्देवानुकरणे दोषस्तत्र न विद्यते। गतिः शृङ्गारिणी कार्या स्वस्थकामितसंभवा ॥ ६२॥। चतुष्कलाप्रमाणेन सविलासा तथैव च। दूतोदशितमार्गस्तु प्र विशेद्रङ्गमण्डलम् ॥ ६३ ॥। सूच्या चैवाप्यभिनयं प्रकुर्यादर्थसंश्रयम्। योजितैः ॥ ६४॥ सुगन्धिभिश्च मालाभिविचित्राभिरलंकृतः । गच्छेत्सललितैः पादैरतिक्रान्तोत्थितैरथ ॥ ६५ ।। सौष्ठवेन समायुक्तैर्लयतालवशानुगैः। पादयोरनुगौ चापि हस्तौ कार्यौं प्रयोक्तृभिः ॥६६॥

अनुवाद-अब कहते हैं कि देवताओं के समान राजाओं को गति क्यों होती है ? क्योंकि नाटय एवं नृत किया में प्रकृति तीन प्रकार को होती है- दिव्य प्रकृति, और दिव्यमानुषी तथा मानुषी। उनमें देवताओं की प्रकृति दिव्य, राजाओं की प्रकृति की दिव्य-मानुषी और अन्य लोक प्रसिद्ध पात्रों की प्रकृति मानुषी होती है। इसलिए देवताओं के अनुकरण करने में कोई दोष नहीं है।। ५९-६२ ।। अनुवाद-स्वस्थ अर्थात् अप्रच्छन्न कामुक की गति शृङ्गारिणी, चार कला प्रमाण की और ललित (विलासयुक्त) होती है॥६२-६३।। अनुवाद-स्वस्थ कामुक (शृङ्गारो) दूती के द्वारा प्रदर्शित मार्ग से रङ्गमञ्न पर प्रवेश करे और वह किसो अर्थ विशेष का आश्रय लेकर सूचा चारी के द्वारा अभिनय करे॥ ६३-६४॥

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प्रच्छन्नकामिते चैव गति भूयो निबोधत। गि विसजितजनस्तत्र तथा दूतीसमन्वितः ॥६७ ॥ निर्वाणदीपो नात्यर्थं भूषणैश्च विभूषितः। वेलासदृशवस्त्रश्च निवृत्तस्तु शनैः शनैः ॥६८॥ शब्दशंक्युत्सुकश्चापि पश्चाल्लोकनतत्परः। वेपमानशरीरश्च प्रस्खलंस्तु मुहुर्मुहुः ॥ ६९॥ शा्ितः पुरुषो गच्छेद्दिदृक्षुवंल्लभं जनम्। उत्तमानामियं कार्या पुरुषाणां गतिर्बुधैः ॥७०॥ मध्यमानां गति चैव संप्रवक्ष्याम्यहं पुनः । ज्वरार्ते च रुजारतें च तपः श्रान्ते भयान्विते ॥ ७१॥ विक्षते छन्नगमने त्ववहित्थे तथैव च। चिन्तान्विते तथा स्वस्थ औत्सुक्ये संहते तथा ॥७२॥ गतिः स्थिरलया कार्या करणाश्रयभाविनी।

अनुवाद-आकर्षक वस्त्रों से सुसज्जित, गन्ध, धूप और पाउडर से सुवासित, चित्र-विचित्र सुगन्धित मालाओं से अलङ्कृत होकर ललित गति से 'अतिक्रान्त' चारी में और ताल, लय एवं कला के अनुसार सौष्ठव ने युक्त सुन्दर गति से चले। नाटय-प्रयोक्ताओं को पादों के अनुसार हाथों का प्रयोग करना चाहिए॥ ६४-६६ ।। अनुवाद-अब प्रच्छन्न कामुक की गति को समझिये। प्रच्छन्न कामुक अपने सहचरों को लौटाकर दूती के साथ चले। दीपक को बुझाकर अधिक अलङ्गारों से अलङ्कृत न होकर, समय के अनुसार वस्त्रों को धारण कर शब्दों के आहट की शङ्गा से पोछे देखते हुए, काँपते हुए शरीर से, बार-बार लड़खड़ाते हुए, सशद्गित पुरुष अपनी प्रियजन को देखने की इच्छा से मन्द गति से गमन करे। विद्वानों ने इसे उत्तम पात्रों की गति कही है॥ ६७-७० ।। अनुवाद-अब पुनः मध्यम पात्रों की गति को कहता हूँ। ज्वर से पोड़ित, रोग से पोड़ित, तप से श्रान्त, भय से युक्त, विस्मय, अवहित्त्थ, प्रच्छन्न गमन में अथवा स्वच्छन्द गमन में, चिन्ता से युक्त, स्वस्थ और औत्सुक्य से समन्वित अवस्था में करणों के आधित स्थिर लय में गति प्रचार करना चाहिए॥ ७१-७२ ।

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११२ नाट घशास्ये

भये वित्रासिते चैव प्रमत्ते शङ्किते तथा॥७३॥ व्याधिते हर्षिते क्रोधे कारयं तु चतुराञ्चितम्। संभ्रमाद्भुतसंदर्शे मुहुर्मुहुरवेक्षणैः ॥ ७४॥ कम्पनेन च गात्राणां वस्त्रस्याकर्षणेन च। सुगन्धिता चूर्णपदा शकारस्य गतिर्भवेत् ॥ ७५॥ स्थूलस्यापि तु कर्तव्या गतिदेंहानुकर्षिणी। समुद्धाहितगात्रा विलम्बितपदक्रमा ॥ ७६॥ विष्कम्भगामिनो चैव निश्वासबहुला तथा। अतिक्रान्ता च कर्तव्या तथा चूर्णपदैः सदा ॥ ७७॥ कार्या चैव तु होनानां चेट्यादीनां द्विजोत्तमाः । अधमा इति ये ख्याता नानाशीला कुवृत्तयः ॥ ७८॥ पाश्वमेकं शिरश्चैव करं चरणमेव च। नामयेत्तद्गतौ किञ्चित्कुजन्मा चेटसंजञितः ॥ ७९॥ अनुवाद-भय में, वित्रासन में, प्रमाद में, शङ्ित अवस्था में, व्याधिग्रस्त दशा में, हर्षित अवस्था में और क्रोध में चतुराश्ित गति का प्रोग करना चाहिए।। ७३ ।। अनुवाद-घबड़ाहट से अद्धत वस्तु के दशन में, बार-बार-इधर-उधर देखने से, शरीर के कम्पन के द्वारा, वस्त्रों के आकर्षण के द्वारा, सुगन्धित चूणंपवों के द्वारा शकार की गति प्रदर्शित करे॥ ७४७५॥ अनुवाद-स्थूल पुरुष की गति शरीर का अनुकर्षण करने वालो शरीर को संभालने को चेष्टा से युक्त, विलम्बित पदक्रम वाली, किसी सहारे से चलने वाली तथा अधिक श्वास-प्रश्वास से युक्त अतिक्रान्त चारी में चूर्ण पदों से प्रदशित करनी चाहिये॥। ७५-७७ (१) ।। अनुवाद-हे द्विजोत्तमों ? चेटी आदि हीन पात्रों की और जो दुराचारी स्वभाव वाले अधम पात्र हैं, उनकी गति में एक पाश्व, शिर, हाथ और पैर को झुका दे और चेट संज्ञक जो कुजाति पात्र है, उनकी और नीच जातियों की गति इषर-उधर देखने वाली होनी चाहिये।। ७८-७९।।

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द्वावशोऽध्याय: ११३

जातिनोचेषु कर्तव्या विलोकनपरा गतिः।लफ् विकला वकसंचारा गात्रं सर्वं नियम्य च। ८० ॥ स्वजातिसदृशी चैव तथा देहानुकर्षिणी । संभ्रमे चैव हर्षे च विक्षिप्तपदविक्रमा॥ ८१॥ आसाद्य हास्यं तु रसमेताश्चान्याश्च योजयेत्। पुनश्च करुणे कार्या गतिः स्थिरपदक्रमा॥ ८२॥ सवाष्पः साश्रुनयनः सन्नगात्रस्तथैव च। उत्क्षिप्तपातितकरः तथा सस्वनरोदनैः ॥ ८३॥ गच्छेदथाध्यधिकया प्रत्यग्राप्रियसंश्रयात् । एषा स्त्रीषु प्रयोक्तव्या नीचसत्त्वेषु चैव हि॥ ८४॥। उत्तमानां तु कर्तव्या सवाष्पा धैर्यसंयुता। निश्वासैरायतोत्सृष्टैस्तथा चोध्वनिरीक्षणैः ॥८५॥ न तत्र सौष्ठवं कारयं न प्रमाणं यथोदितम् ।

अनुवाद-नोच पात्रों की गति विकल, बगुले के समान गति वाली समस्त शरोर नियन्त्रित कर अपनी जाति के समान शरीर को अनुकर्षित करने वाली होनी चाहिये ।। ८० ।। अनुवाद-सम्भ्रम एवं हर्ष में पैरों की गति विक्षिप्त गति वाली अर्थात् लड़खड़ाती हुई होनो चाहिये। हास्य रस के अभिनय में ऐसी ही गति और अन्य उचित गति की योजना होनी चाहिये ।। ८१॥ अनुवाद-करुण रस में स्थिर पैरों से उपलक्षित गति होनी चाहिये। आँसुओं से भरे हुए नेत्र, सुन्न शरीर, हाथों को उठाकर फिर नोचे पटकना, चिल्ला-चिल्लाकर रोना आदि का अभिनय नवीन अप्रिय घटना के समय में अध्य्धिका चारी के द्वारा करना चाहिये। इस गति का प्रयोग स्त्रियों तथा नीच पात्रों के विषय में करना चाहिये॥ ८२-८३॥ अनुवाद-उत्तम पात्रों की गति का अभिनय धैर्य से युक्त, आँसुओं से परिप्लुत, लम्बेलम्बे छोड़े गये दीर्घ निश्वास और ऊर्ध्व-निरीक्षण के द्वारा करना चाहिये। इस अभिनय में न सौष्ठव का विधान है और न पादपात का कोई प्रमाण है।। ८४-८६ (१) ।। ना० थ्ा०-१५

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११४ माहयस्ाल्ते

पदैर्गच्छेदिष्टबन्धुनिपातने ॥ ८६॥ गाढ़े प्रहारे कार्या च शिथिलाङ्कभुजाश्रया। विघूणितशरीरा च गतिश्चूर्णपदैरथ ॥८७॥ गतिः कञ्चुकिनी प्रोक्ता वयोऽवस्था विशेषतः । वृद्धे वा मध्यमे वापि तथा चैव कनीयसी।। ८८ ।। अर्धतालोत्थितैः पादैर्विष्कम्भैन्रजुभिस्तदा। उद्वहन्निव गात्राणि पङ्कमग्न इव व्रजेत् । ८९ ॥ अथ वृद्धस्य कर्तव्या गतिः कम्पितदेहिका। विष्कम्भितगतिप्राणा मन्दोत्क्षिप्तपदा तथा ॥ ९०॥ शीतेन चाभिभूतस्य वर्षेणाभिकृतस्य च। गतिः प्रयोक्तृभिः कार्या स्त्रीनीचप्रकृतौ सदा ॥ ९१॥ पिण्डीकृश्य च गात्राणि तेषां चैव प्रकम्पनात्। करौ वक्षसि निक्षिप्य कुब्जहा तथैव च।

हिेस दन्तोष्ठस्फुरणाच्चव चिबुकस्य प्रकम्पनात्॥ ९२॥। शनैः शनैश्च कतंव्या शीतार्ताभिनये गतिः। उष्णे चापि प्रयोक्तव्या गतिर्दाहसमाकुला । ९३॥

अनुवाद-इष्ट बन्धुओं अर्थात् प्रियजनों के बिनाश होने पर पैरों को बहुत ऊँचे उठाकर नहीं चलना चाहिये। गाढ़ प्रहार के समय अङ्गों को शिथिल कर भुजाओं के आश्रित, शरीर को घुमाते हुए चूणपदों से गति का अभिनय करे॥ ८६-८७ (१) ।। अनुवाद-कञ्चुकी की गति वय और अवस्था (स्थिति) के अनुसार कही गई है। वृद्ध अथवा युवा अथवा कम अवस्था का कञ्चुकी अर्धताल पर उठाये हुए पैरों से, लाठी के सहारे कोमल गति शरीर को कीचड़ में सने हुए के समान धारण किये हुए के समान गति प्रवशित करे॥ ८७८९ (१)॥ अनुवाद-वृद्ध कञचुकी की गति का अभिनय शरीर को कँपाते हुए, काठी के सहारे धीरे-धीरे पैरों को उठाते हुए करना चाहिये। ६९-९० (१)

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दवदिशो्याय। ११५

नेत्रसंकोचनस्वेदगात्रसंहरणान्विता अतिक्रान्तैरपक्रान्तैरेलकाक्रीडितैस्तथा । ९४ ॥

तथा चूर्णपदैरपि। एतानन्यांश्च युञ्जीत नाट्यज्ञैः करुणे रसे ॥ ९५ ॥ रौद्रे रसे प्रवक्ष्यामि दैत्यरक्षोगणान् प्रति। एक एव रसस्तेषां स्थायो रौद्रौ द्विजोत्तमाः ॥ ९६॥ नेपथ्यरौद्रौ विज्ञेय: स्वाङ्गरौद्रस्तथैव च। अथ स्वभावजशचैव त्रिधा रौद्रः प्रकी्तितः ॥९७ ।। फ्री रुधिरक्लिन्नवेहो यो रौद्राभिविकृताननैः। तथा पिशितहस्तश्च रौद्रो नेपथ्यजस्तु सः । ९८ ॥

अनुवाद-नाटथ-प्रयोक्ताओं को शीत (ठण्ड) से अभिभूत तथा वर्षा से पीड़ित स्त्री और अधम पात्रों की गति का अभिनय शरीर को सिकोड़कर अङ्गों को कॅपाते हुए, दोनों हाथों को वक्षःस्थल पर रखकर, कुबड़े की तरह टेढ़ा होकर, बाँत और ओठों को फड़काते हुए, चिबुक (ठुड्डी) के कम्पन के द्वारा धोरे-धोरे करना चाहिये और गर्मो के पीड़ित होने पर वाह ( जलन) से व्याकुल गति का प्रयोग करना चाहिये।। ९०.९३ ।। अनुवाद-नेत्र का संकोचन, पसीना आना, शरीर का संहरण, अतिक्राम्त, अनाक्रान्त और एलकाक्रोड़ित चारियों के द्वारा चूर्ण पवों से गर्मो से पीड़न का अभिनय करना चाहिये। नाटयवेत्ताओं को इसी प्रकार का अभिनय करुण रस में भी करना चाहिये ॥ ९४-९५॥ अनुवाद-अब मैं रौव्र रस के विषय में दैत्य, वानव, राक्षसों की गति को कहता हूं। हे ब्राह्मणों? उनके यहाँ रौद्र ही एक मात्र स्थायी रस होता है॥ ९६॥ अनुवाद-रौद्र रस नेपथ्य रौद्र, अङ्ग रौद्र और स्वभाव रौद्र भेद से तोन प्रकार का होता है।। ९७ ।।

अनुवाद- रुधिर (खून) से सना हुआ शरीर और रक्त से विकृत मुख तथा हाथ में मांस के टुकड़े लिये रहना 'नेपथ्य रौद्र' कहलाता है ॥ ९८ ॥

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११६ मोट पशोर मे

बहुबाहुबंहुमुखो नानाप्रहरणाकुलः। स्थूलकायस्त्वतिप्रांशुरङ्गरौद्रस्तु स स्मृतः ॥ ९९॥ रक्ताक्ष: पिङ्गकेशश्च कृष्णाङ्गो विकृतस्वरः। रौद्रनिर्भत्सनकथो रौद्रोऽयं स्यात्स्वभावजः ॥ १०० ॥ चतुस्तालान्तरोरिक्षप्तैः पादैस्त्वन्तरपातितैः । गतिरेवं प्रकर्तव्या शेषा ये चापि तद्विधाः ॥१०१ ।। एक एव रसस्तेषां स्थायी रौद्रो द्विजोत्तमाः । विग्रहः प्रहसश्चैव तथा शुङ्गार इष्यते ॥ १०२॥ तथा भयानके चापि गतिः कार्याः विचक्षणैः । स्त्रोणां कापुरुषाणां च ये चान्ये सत्त्वर्वजिताः ॥। १०३ ॥। अनुवाद-अनेक भुजाओं एवं अनेक हाथों वाला तथा अनेक प्रकार के आयुधों से युक्त, अत्यन्त लम्बा और स्थूल शरीर वाला होना 'अङ्ग रौद्र' कहलाता है ॥ ९९॥ अनुवाद-लाल आँखे, पीले केश, काले रङ्ग, विकृत स्वर, रूखा स्वभाव होना और फटकारने में तत्पर रहना 'स्वभावज रौद्र' कहलाता है॥ १०० ॥ अनुवाद-रौद्र रस में चार ताल के अन्तर पर पैरों को उठाकर फिर तीन ताल के अन्तर पर गिराया जाता है और जो उनके समान प्रकृति के अन्य पात्र है, उन्हें भी ऐसीं ही गति करनी चाहिए॥ १०१॥ अनुवाद-हे द्विजोत्तमो ! उनमें रौद्र हो एकमात्र स्थायी रस है। विग्रह, प्रहास और शृङ्गार में इष्ट है॥ १०२ ॥ अनुवाद-भयानक रस के अभिनय में विद्वानों को स्त्री, कापुरुष (नीच) और अन्य स्त्री सत्त्व से वरजित (बलहीन, कमजोर) व्यक्तियों को गति उसी प्रकार की सहज गति होनी चाहिए॥ १०३॥

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द्वादशोऽ्याय: ११७

विष्फारितचलन्नेत्रो विधुन्वन् स्वशिरस्तथा। भयाकुलितचित्तत्वात्पाश्वानि च विलोकयन् ॥ १०४।। द्रुतैश्चूर्णपदैश्चैव कृत्वा हस्तं कपोतकम्। प्रलेपितशरीरस्तु शुष्कोष्ठश्च स्खलन् व्रजेत् ॥ १०५ ॥ एषानुकरणे कार्या तर्जने कलहे तथा। सत्त्वं च विकृतं दृष्टवा श्रुत्वा च विकृतस्वरम् ॥ १०६॥ एषा स्त्रीणां प्रयोक्तव्या नृणां चाक्षिप्तविक्रमा। क्वचिदासन्नपतितै विकृष्टपतितैः क्वचित् ॥ १०७ ॥

एलकाक्रोडितैः पादैरुपर्युपरिपातितैः । एषामेवानुगैहस्तैर्गतिर्भीतेषु योजयेत् ॥ १०८ ॥

अहृद्या तु मही यत्र श्मशानरणकश्मला। गतिस्तत्र प्रकुर्वोत बीभतसाभिनयं प्रति ॥ १०९॥

क्वचिदासन्नपतितैः विकृष्टपतितेः क्वचित् । अतिक्रान्तैः पदैर्गच्छेज्जुगुप्सितगति प्रति ॥ ११० ॥

अनुवाद-भयानक रस के अभिनय में नेत्र खुले हुए एवं चञ्चल, शिर कम्पित, भय से व्याकुल चित्त होने से बगल ( पाइवं) में झाँकते हुए, द्रुत तथा चूणपद गति से युक्त हाथ को कपोतक मुद्रा में रखकर, कम्पित शरीर और शुष्क (सूखा हुआ) रखते हुए स्खलित गति से चलना चाहिए॥ १०४-१०५॥

अनुवाद-शत्रु के द्वारा पीछा किये जाने पर, फटकारने तथा डराने में इस गति का प्रयोग करना चाहिए। विकृत सत्व (प्राणी) को देखकर और विकृत आवाज को सुनकर आक्षिप्त (दबे हुए ) पराक्रम वाले स्त्री और पुरुष के सम्बन्ध में इस गति का अभिनय करना चाहिए॥ १०६-११० ॥

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नाटपशरित्रे

तथा वीरे च कर्तव्या पादविक्षेपसंयुता। द्रुतप्रचारणाविद्धा नानाचारीसमाकुला ॥ १११ ॥ सूचीविद्धैस्तथैव च। कलातालगतैः पादैरावेगे योजयेद्गतिम् ॥११२ ॥ विटस्यापि तु कर्तव्या गतिर्ललितविक्रमा। किंचिदाकुञ्चितैः पादैस्तालाभ्यन्तरपातितैः ॥११३ ॥ अङ्गसौष्ठवसंयुक्तं तथा हस्तौ कटिस्थितौ। खटकावर्धमानौ च कृत्वा कार्या विटे गतिः ॥ ११४॥ कृशाङ्गानां तु कर्तव्या गतिर्मन्दपरिक्रमा। व्याधिग्रस्तो ज्वरार्तश्च तपशश्रान्तः क्षुधान्वितः ॥११५॥ विष्टम्भनगतप्राणस्तथा क्षामोदर: सदा। क्षामस्वरकपोलशच सन्नगात्रस्तथैव च॥ ११६॥ हस्तपादसमुत्क्षेपं शनैस्तत्र प्रयोजयेत्। कम्पनं चैव गात्राणां इलथनं चैव योजयेत्॥ ११७॥।

अनुवाद वोर रस में पाद-विक्षेप से युक्त, द्रुत प्रचार (गति) से आविद्ध तथा नाना प्रकार की चारियों से समाकुल पाशर्वक्रान्ता, द्रुताविद्धा और सूची- विद्धाचारियों से उपलक्षित, कला और ताल के अनुसार आवेश को दशा में गति का प्रयोग करे॥ १११-११२॥

अनुवाद-विट पात्र की ललित एवं विलास युक्त गति का अभिनय करना चाहिए। अभिनेता थोड़ा-थोड़ा आकुश्रित पावों को एक ताल के अन्तर पर रखते हुए सौष्ठव युक्त अङ्गों से युक्त और कटि भाग पर स्थित हाथों को खटकावर्धमानक स्थिति में रखकर करके विट की गति का अभिनय करे॥११३-११४॥ अनुवाद-कृश अर्थात दुबले-पतले शरीर वाले पात्र की गति धोरे-धीरे पैर के प्रक्षेप के द्वारा प्रदशित करे। व्याधि-ग्रस्त, ज्वर से पोड़ित, तप से श्रान्त, भूख से व्याकुल, वण्डे के सहारे चलने वाला, क्षोण उदर वाला, क्षीण स्वर और क्षीण कपोलों वाला, सुन्न शरोर वाला, कुशकाय पात्र धोरे-धोरे हाथ और पैरों का उत्कोपण करे तथा शरोर का कम्पन और शिथिलता प्रदर्शित करे॥ ११५-११७ ॥

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११९

प्रकर्तव्याध्वगस्यापि विकूणनेन वक्त्रस्य जानुनोश्च विमर्शनात् ॥ ११८॥ नीचानां मध्यमानां च गति: कार्या सदा बुधैः। तालमात्रोत्थितैः पादैस्तथा व्याकुञ्चिताञ्चितैः ॥ ११६॥ व्रतिनश्चाशरमस्था ये ये चान्ये तपसि स्थितान् ऋषयस्तापसाश्चैव नैष्ठिकं व्रतमास्थिताः ॥ १२० ॥ अलोलचक्षः स्याच्चव युगमात्रनिरीक्षणे। उपस्थितस्मृतिश्चैव गात्रं सर्वं नियम्य च।। १२१ ॥ अचञ्चलमनाश्चैव गर्च्छोल्लङ्गसमाश्रितः। विनीतवेषश्च तथा काषायवसनोऽपि च॥१२२॥ प्रथमं समपादेन स्थित्वा स्थानेन नाट्यवित्। हस्तं चतुरकं कृत्वा तथा चैतत्प्रसारयेत् ॥ १२३ ॥। प्रसन्नं वदनं कृत्वा प्रयोगस्य वशानुगम्। सुनिषण्णेन गात्रेण गति कुर्याद्यतेस्तथा ॥ १२४॥

अनुवाद-पथिक (राहगीर) की गति मन्द-चाल मुख के सङ्कोचन तथा जङ्गाओं के विमर्शन के द्वारा प्रदर्शित करनी चाहिए ॥ ११८।। अनुवाद-विद्वानों को नीच और मध्यम पात्रों की गति आकुश्चित एवं अश्नित तथा एक ताल पर उठाये हुए पैरों से प्रदर्शित करना चाहिए। ११९।। अनुवाद-व्रतो, आधमी, तपस्वी, ऋषि, तापस, नैष्ठिक ब्रह्मचारी, अचञ्चल (स्थिर ) नेत्र, चार हाथ तक सामने दृष्टि डालते हुए, स्मृतिमान् अर्थात् सभी अभिनेय वस्तुओं को स्मृति में रखते हुए, समस्त शरीर को नियन्त्रित करके, स्थिर- चित्त होकर, भस्म, कौपीन आदि को धारण करने वाले लिङ्गो, सन्यासी, विनोत वेष और गेरुआ वस्त्र धारण करने वाले सन्यासी पहले समपाव स्थान में स्थित होकर, हाथ को 'चतुर' हस्तमुद्रा में रखकर एक हाथ को फैला दे। फिर प्रसम्ममुख होकर तथा प्रयोग के अनुसार अस्थिर शरीर से गति को प्रदशित करे॥१२०-१२४॥

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१२० माहयशार्ये

उत्तमानां भवैदेषा लिख्िनां ये महाव्रताः एभिरेव विपर्यस्तर्गुणैरन्येषु लि्गिषु॥ १२५॥ तथा व्रतानुगा च स्यादन्येषां लिङ्गिनां गतिः। हस्तौ तदनुगौ चापि यथायोगं प्रयोजयेत् ॥ १२६ ॥ विभ्रान्ता वा ह्य दात्ता च विक्रान्ता विहृता तथा। शकटास्यस्थितैः पादैरतिक्रान्तैस्त्थैव च॥ १२७।। कार्या पाशुपतानां च गतिरुद्भ्रान्तगामिनी। एवं लिङ्गस्थितानां हि प्रयोज्यैव गतिर्बुधैः ॥१२८ ॥ अन्धस्येव गर्ति कुर्यादन्धकारेषु योगवित्। भूमौ विसपितैः पा्दैरहंस्तदशितमार्गकैः ॥१२९ ॥ रथस्थस्यापि कर्तव्या गतिश्चूर्णपदक्रमा। समपादन्तथा स्थानं कृत्वा रथगति व्रजेत् ॥ १३० ॥ धनुरेकेन हस्तेन गृहीत्वान्ये सायकम्। सूतश्चास्य भवेदैवं प्रतोदप्रग्रहाकुलः ॥१३१॥ अनुवाद-यह गति उत्तम लिङ्गियों जौर महाब्रतधारियों तपस्वियों के लिए है और उन्ही गुणों से विपरीत गुणों से अन्य यतियों के गति की योजना करनी चाहिए। अनुवाद-अन्य लिङ्गी सन्यासियों की गति ब्रत के अनुसार होनी चाहिए। और जो विभ्रान्त (उन्मत्त), उदात्त, विक्रान्त एवं विहृत तथा पाशुपतब्रतधारो सन्यासी हैं, उनको उद्भ्रान्त गामिनी गति का अभिनय शकटास्या चारी तथा अतिक्रान्ताचारी में करनी चाहिए। इस प्रकार विद्वानों को सन्यासियों की गति प्रवशित करनी चाहिए।। १२६-१२८।। अनुवाद-नाट्य प्रयोक्ताओं को अन्धकार में अन्धे के गति के समान पैरों को भूमि पर सरकाते हुए और हाथों से मार्ग को टटोलते हुए चलना चाहिए॥ १२९। अनुवाद-रथ पर बैठे हुए पात्र की गति की चूर्णपदों द्वारा प्रदशित करनी चाहिए और रथारूढ पात्र समपाद स्थानक को करके एक हाथ में धमुष लेकर और दूसरे हाथ में बाण लेकर रथ की गति का अभिनय करे।

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१२१

करणानि विचित्राणि कर्तव्यानि विभागतः । द्रुतश्चूर्णपदैश्चैव गन्तव्यं रङ्गमण्डलम् ॥ १३२॥ विमानस्थस्य कर्तव्या गती रथगतोपमा। किंचित्स्यादुन्मुखस्तथा ॥१३३॥ अस्यैव वैपरोत्येन अधोऽवलोकनेनैव कुर्याच्चाप्यवरोहणम् । मण्डलावर्तनेन च ॥ १३४॥ आकाशगमने चैव कर्तव्यं गतिचेष्टितम्। स्थानेन समपादेन तथा चूर्णपदैरथ ॥१३५॥ व्योम्नस्त्ववतरेद्यस्तु तस्येमां कारयेद्गतिम् । ऋज्वायतोन्नतनतैः कुटिलारवतितैस्तथा ॥१३६ ॥ भ्रममाणस्य विकीर्णवसना चाकाशादपरुद्भुजागतिः । चैव तथा भूगतलोचना।। १३७ ॥

अनुवाद-और उसका सारथि चाबुक और लगाम को संभालते हुए विचित्र वाहनों का अभिनय करते हुए द्रुत लय के साथ चूणंपदों से रङ्गमञ्न पर प्रवेश करे॥ १३०-१३२ ॥ अनुवाद-विमान पर बैठे हुए व्यक्ति को भी रथ की गति की भांति गति करनो चाहिए। विमान की ओर उन्मुख होकर चढ़ने के लिए शरीर को ऊपर उठाये और इसके विपरोत अवस्था में नोचे की ओर देखते हुए मण्डलावत्तंन के द्वारा विमान से अवतरण करे॥ १३३-१३४॥ नाट्य के हाथों को आकाश-गमन में भी समपाद स्थान और चूर्णपदों के द्वारा इसी प्रकार की चेष्टा करनी चाहिए।। १३५।। अनुवाद-और आकाश से अवतरण में इसी प्रकार ऋजु, (सरल, सीधे) आयत (लम्बे ) उन्नत (ऊँचे) नत (नीचे) जटिल (तिरछे ) और आवतित गति को प्रदर्शित करे॥ १३६॥ अनुवाद-आकाश से गिरते समय पात्र को गति दोला के समान हाथों झुलाते हुए, वस्त्रों को बिखराते हुए तथा नेत्रों से पृथ्वी की ओर बेखते हुए होनी चाहिए॥ १३७॥ ना. घा०-१६

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३े= १२२ नाट घयझार्त्रे

द्रुमप्रासादशैलेषु नदीनिम्नोन्नतेषु च। आरोहणावतरणं कार्यमर्थवशाद्बुधैः ॥१३८॥ प्रासादारोहणं कार्यमतिक्रान्तैः पदैरथ। उद्वाह्य गात्रं पादं च सोपानं निक्षिपेद् बुधः ।। १३९॥ तथावतरणे चैव गात्रमानम्य रेचयेत् अतिक्रान्तेन पादेन द्वितोयेनाञ्चितेन च॥ १४० ॥ प्रासादारोहणं यत्तु तदेवाद्रिषु कारयेत्। केवलं तूर्ध्वंविक्षेपमद्रिष्वङ्गं भवेदथ ॥ १४१ ।। द्रुमे चारोहणं कार्यमतिक्रान्तोत्थितैः पदैः। सूचीविद्वैरपक्रान्तैः पार्श्वक्रान्तैस्तथैव च॥ १४२॥ एवं देवावतरणं प्रयोज्यं सरिदादिषु। प्रसादेषु तथा प्रोक्तं तथैवोत्तरणं भवेत् ॥ १४३।।

अनुवाद-विद्वानों को प्रासाद (महल), वृक्ष और पवंतों पर तथा नवी एवं ऊँचे-तोचे स्थानों पर प्रयोजन के अनुसार आरोहण तथा अवतरण करना चाहिए॥ १३८॥ अनुवाद-अतिक्रान्त चारी पैरों से प्रासाद (महल) पर चढ़ना चाहिए। विद्वान् पुरुष शरीर को ऊपर उठाकर पैर को सोपान (सीटी) पर रखे ॥ १३९॥ अनुवाद-तथा प्रासाद से अवतरण में शरीर को थोड़ा झुका कर एक पैर को अतिक्रान्त चारी में और दूसरे पैर को अख्चित करके रेचित करे॥ १४० ॥ अनुवाद-प्रासाद के आरोहण में जो गति बतलाई गई है, वही पर्वतारोहण में भी करनी चाहिए। केवल पर्वतारोहण में शरीर को ऊपर विक्षेप करे॥ १४१॥ अनुवाद-अतिक्रान्त चारी में पैरों को उछाल कर क्रमशः सूचीविद्ध, अपक्रान्त तथा पाश्वक्रान्त चारियों द्वारा वृक्षों पर आरोहण करना चाहिए ॥१४२॥ अनुवाद-इसी प्रकार नदी में उतरने के समय भी इसी प्रकार की गति का प्रयोग करे। प्रासाद से उतरने में जो गति बतलायी गई है, उसी गति से नदी आदि में उत्तरण करे॥ १४३॥

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दवदशोआप्याम:

द्रुमप्रासादशैलांश्च संज्ञामात्रेण दर्शयेत्। का जलप्रमाणापेक्षा तु जलमध्ये गतिर्भवेत् ॥ १४४॥ तोयेऽल्पे वसनोत्कर्षः प्राज्ये पाणिविकर्षणैः । किचिन्नताग्रकाया तु प्रतारे गतिरिष्यते ॥ १४५॥ प्रसायं बाहुमेकैकं मुहर्वारिविकर्षणैः। तिर्यकप्रसारिता चैव ह्ियमाणा स्ववारिणा ॥ ४४६॥ अशेषाङ्गाकुलाधूतवदना गतिरिष्यते। नौस्थस्यापि प्रयोक्तव्या द्रुतैश्चूर्णपदैर्गतिः ॥१४७॥ अनेनैव विधानेन कर्तव्यं गतिचेष्टितम्। संज्ञामात्रेण कर्तव्यान्येतानि विधिपूर्वक्म् ॥ १४८ ॥ अङ्कुशग्रहणान्नागं प्रग्रहग्र हणाद्रथम् । खलीनग्रहणादश्वं नावं चैवावरोहणात् ॥ १४९॥

अनुवाद-प्रासाद, वृक्ष और पर्वत आदि का प्रदशन सङ्केतों द्वारा करना चाहिए। जल के मध्य में जल के प्रमाण के अनुसार गति होनी चाहिए ॥ १४४॥ अनुवाद-कम जल होने पर कपड़े के ऊपर उठाये हुए और अधिक जल होने पर हाथों से जल का विकर्षण करते हुए शरीर को थोड़ा आगे को ओर झुका कर तैरने की गति का अभिनध करे ॥ १४५॥ अनुवाद-एक-एक भुजा को फैलाकर बार-बार जल का विकर्षण करते हुए, तिरछा फैलाये हुए हाथों से जल को हटाते हुए सम्पूर्ण शरीर से आकुल एवं कम्पित मुख वाली गति का अभिनय करे।॥१४६-१४७॥ अनुवाद-नौका में स्थित पात्र की गति का अभिनय त्रुत लय में चूर्णपवों द्वारा करना चाहिए। इसी विधि के अनुसार विभिन्न गतियों की चेष्टाएँ प्रदशित करनी चाहिए। इन सब को विधि पूर्वक इङ्गित (सङ्केत) मात्र से प्रवर्शित करना चाहिए।। १४७-१४८॥ अनुवाद-जैसे अड़डश के ग्रहण से हाथी की, लगाम लगाने से घोड़े की रास खोंचने से रथ की और अधिरोहण से नौका की अभिव्यक्ति होती है॥१३९॥

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१२४

अश्वयाने गतिः कार्या वैशाखस्थानकेन तु।पR तथा चूर्णंपदैश्चैव हय पर्यपरिपातितः ॥ १५० ॥ पन्नगानां गति: कार्या पादैः स्वस्तिकसंस्थितैः । पाश्वाक्रान्तक्रमं कृत्वा स्वस्तिकं योजयेत्तथा॥ १५१ ॥ मत्तानां तु गतिः कार्या तरुणे मध्यमे मदे। वामदक्षिणपादाभ्यां घूर्णंनादपसर्पणात्॥१५२॥ आकाशस्खलितैः प्रायः पादैश्चाप्यनवस्थितैः । विघूणितशरीरा च करैः प्रचलितैस्तथा ॥१५३ ॥ उन्मत्तस्यापि कर्तव्या गतिस्त्वनियतक्रमा। बहुचारीसमायुक्ता लोकानुकरणाश्रया ॥ १५४ ॥ रुक्षस्फुटितकेशस्तु रेणुध्वस्ततनुस्तथा। अनिमित्तप्रकथनो बहुभाषी विकारवाक्॥ १५५ ॥ प्रगोतहसितश्चापि नानाविकृतभूषणः । नूने गीते च वाद्ये च भाषणे च सदा रतः ॥१५६ ।। अनुवाद-घोड़े पर चढ़ने में वैशाखस्थानक के द्वारा तथा ऊपर-ऊपर उठाये हुए चूर्णपवों से गति का अभिनय करना चाहिए॥ १५० ॥ अनुवाद-स्वस्तिक पदों द्वारा सपो को गति का अभिनय करना चाहिए। इसमें प्रधम पाश्वक्रान्ता चारी में पद को रखकर फिर स्वस्तिक की योजना करे ॥१५१॥ अनुवाद-तरुण और मध्यम मद को बाये और दाहिने पैरों को घुमाए हुए अपसर्पण (लड़खड़ाने) के द्वारा मत्तों की गति का अभिनय करना चाहिए ॥१५२॥ अनुवाद-अधम मद में ऊपर से लड़खड़ाते हुए अव्यवस्थित पैरों से, तथा शरीर को घुमाते हुए और हाथों को चलाते हुए अभिनय प्रदशित करे॥१५३॥ अनुवाद-उन्मत्तों की गति का अभिनय अनियन्त्रित पदक्रम के द्वारा लोक के अनुकरण के आशित बहुत सी चारियों के संयोग से करना चाहिए। इसमें पात्र के बाल रूखे और बिखरे दुए होते हैं, शरोर धूलि से धूसरित रहता है, बिना कारण के कुछ बोलता रहता है, बड़बड़ाता है, वह कभी गाता है कभी हँसता है और विकृत आभूषणों को धारण किये रहता है। वह सदा नाचने, गाने, बजाने

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दाबसो्याय: ११९

कदाचिद्धावति जवात्कदाचिदवतिष्ठते। कदाचिदुपविष्टस्तु शयानश्च कदाचन ॥ १५७ ॥ नानाचीरधरश्चैव रथ्यास्वनियतालयः । उन्मत्ताभिनयस्त्वेवं तस्येमां कारयेद्गतिम् ॥१५८ ॥ स्थित्वा नूपुरपादेन दण्डपादं प्रसारयेत्। कृत्वा चारीं तथोद्बद्धामथ स्वस्तिकमेव च ॥ १५९ ॥ अनेन चारीयोगेन परिभ्राम्य तु मण्डलम् । वक्रं तु भ्रमणं चैव रङ्गकोणेषु योजयेत् ॥ १६० ॥ त्रिकं सर्लालतं कृत्वा लताख्यं हस्तमेव च। विपर्ययगतैर्हस्तैः पादैहसगात ब्रजेत् ॥१६१॥ सिंहर्क्षवानराणां च गति: कार्या प्रयोक्तृभिः । या कृता नरसिंहेन विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ १६२॥।

तथा बोलने में तत्पर रहता है। कभी वेग से दौड़ता है, कभी कभी खड़ा हो जाता है। कभी बैठ जाता है और कभी लेट जाता है। वह अनेक प्रकार के चिथड़े लपेटे रहता है और गलियों में पड़ा रहता है। उन्मत्तों का यहो अभिनय है। इस प्रकार उसकी गति का अभिनय करे॥ १५४-१५८॥ अनुवाद-उन्मत्त की गति के अभिनय में नूपुर पादचारी में खड़ा होकर दण्डपाद चारी में पैर को फैला दे, फिर बद्धा चारी को प्रदशित कर पैरों को स्वस्तिक मुद्रा में रखे। इस प्रकार चारियों के संयोग से पैरों को मण्डलाकार घुमा कर रङ्गकोण में वक्र भ्रमण करे ॥ १५९-१६० ॥

अनुवाद-त्रिक अर्थात कमर को सुललित स्थिति में रखकर और हाथ को लता हस्तमुद्रा में करके विपयय गत हाथों का संचालन करते हुए पैरों से हंस की चाल चले ॥ १६१ ॥

अनुवाद-नाटय-प्रयोक्ताओं को सिंह, भालू और वानरों की गति का अभिनय उस प्रकार करना चाहिए जिस प्रकार भगवान् विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण करके किया था॥१६२॥

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आलीढ़स्थानकं कृत्वा गात्रं तस्यैव चानुगम्। शोणाणाड ऊर्ध्वजानु च विक्षिप्य करमेकं च संस्थितम् ॥१६३ ॥ विलोलितं शिरः कृत्वा चिबुकं बाहुमस्तके। गन्तव्यं विक्रमैश्चैव पञ्चतालान्तरस्थितैः ॥१६४॥ नियुद्धे संशये चैव रङ्गावतरणे तथा। सिंहादीनां च योक्तव्या गतिरेषा प्रयोक्तृभिः ॥१६५॥ शेषाणामर्थयोगेन स्थानान्यपि तु कारयेत्। गजवाजिरथादींस्तु चिह्नमात्रेण कारयेत् ॥ १६६ ।। वाहनार्थंप्रयोगेषु रङ्गावतरणेषु च। एवमेता: प्रयोक्तव्या नृणां तु गतयो बुधैः ॥१६७॥ अत्र नाभिहिता यास्तु विज्ञेयाः शास्त्रलोकतः । अतः परं प्रवक्ष्यामि स्त्रीणां गतिविचेष्टितम् ॥१६८॥

अनुवाद-आलीढ़ स्थानक को करके शरीर को उसी के अनुसार रखे। फिर जानु को ऊपर उठाकर एक हाथ को उस पर स्थित करे। फिर शिर को विलोलित करके चिबुक को भुजाओं के अग्रभाग पर रखकर पैरों को पांच ताल के अन्तर पर रखते हुए चलना चाहिए।। १६३-१६४ ।। अनुवाद-नियुद्ध और संशय में तथा रङ्गमञ्न पर नाट्य-प्रयोक्ताओं को सिंह आदि को गति का प्रयोग करना चाहिए ॥ १६५॥ अनुवाद-शेष प्राणियों की गति या स्थान का प्रयोग प्रयोजन के अनुसार करना चाहिए। हाथी, घोड़े, रथ आदि का चिह्न मात्र से प्रवशन करना चाहिए ॥ १६६ । अनुवाद-रङ्गमन्न पर वाहनों पर चढ़ने-उतरने के अभिनय में विद्वानों को इस प्रकार मनुष्यों को गति का प्रयोग करना चाहिए॥ १६७ । अनुवाद-जिनकी गतियों का व्णन मैंने नहीं किया है उन्हैं लोक शास्त्र से समझ लेने चाहिए। इसके बाद मैं नारियों की गति एवं चेष्टाओं का वर्णन करूगा ॥ १६८॥

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स्त्रीणां स्थानानि कार्याणि गतिष्वाभाषणेषु च। पिक् आयतं चावहित्थं च तथाश्वक्रान्तमेव च ॥ १६९॥ दक्षिणस्तु समः पादस्त्र्यश्रः पक्षस्थितोऽपरः । वामो नतः कटीपाश्वमायतस्थानके भवेत् ॥ १७० ॥ वाम: स्वाभाविको यत्र पादो विरचितस्ततः । तालमात्रान्तरे न्यस्तस्त्र्यश्रः पक्षस्थितोऽपरः ॥ १७१॥ प्रसन्नमाननमुरस्समं यत्र समुन्नतम् । लतानितम्बगौ हस्तौ ज्ञेयं स्थानं तदायतम् ॥ १७२ ॥ रङ्गावतरणां पुष्पाउजलिविसर्जनम् । मम्मथेर्ष्योदद्रव: कोपस्तर्जनाङ्ग लिमोटनम् ॥ १७३ ॥ निषेधगर्वगाम्भीयंमौनमायावलम्बनम् स्थानेऽस्मिन् सन्निधीयीत दिगन्तरनिरूपणम् ॥ १७४ ॥। आवाहने विसर्गें च तथा निर्वर्णनेषु च। चिन्तायामवहित्थे च स्थानमेतत्प्रयोजयेत् ॥ १७५॥ अनुवाद-स्त्रियों की गति और भाषण में तीन स्थान होते हैं-आायत, अवहित्त्थ और अश्वक्रान्त ॥। १६९ ।। अनुवाद-आयत स्थानक दाहिना पैर सम और दूसरा पैर त्र्यस्त्र और पक्ष में स्थित होता है और बार्यो ओर कटि नत (झुको हुई) होती है ॥ १७० ।। अनुवाद-जहाँ पर बायाँ पैर स्वाभाविक रूप में हो और ताल मात्र के अन्तर पर न्यस्त दूसरा पैर त्रयस्र और पक्ष में स्थित हो, मुख प्रसन्न हो, वक्षःस्थल सम और समुन्नत हो और दोनों हाथ लता मुद्रा में नितम्ब पर हो, वहाँ 'आयत' स्थानक समझना चाहिए॥ १७१-१७२। अनुवाद-रङ्गमन्न पर अवतरण (आने का) आरम्भ, पुष्पाञ्जलि का विसर्जन, ईर्ष्या से उत्पन्न प्रणय-कोप, तर्जनी उँगुली का मोटन, निषेध, गरवं, गाम्भीयं, मौन एवं माया (अथवा) मान के अवलम्बन तथा दिगन्तर के निरूपण में (अथवा अवलोकन में) इस स्थान का संयोजन करना चाहिए॥ १७३-१७४॥ अनुवाद-आवाहन में, विसर्जन में, निर्वणंन में, चिन्ता और अबहित्त्य में इस स्थान का प्रयोग करना चाहिए॥ १७५ ॥

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नाट पशारिये

समो यत्र स्थितो वामस्त्र्यश्रः पक्षस्थितोऽपरः। वामोन्नतं त्रिकं यस्मिन्नवहित्थं तदुच्यते ॥ १७६ ॥ स्थानमेतत्तु नारीणां संल्लापे तु स्वभावजे। निश्चये परितोषे च वितर्कें लज्जिते तथा॥१७७॥ एक: समस्थितः पाद एकस्त्वग्रतलाञ्चितः । सूचीविद्धमविद्धं वा तदश्वक्रान्तमुच्यते॥ १७८॥ स्खलिते घूणिते चैव स्खलिताम्बरधारणे। चित्रासने सललिते स्थानमेतत्तु रक्षणे ॥ १७९ ॥ शाखावलम्बने कार्या स्तबकग्रहणे तथा। विश्रा्तिषु तथैव स्यात्पादताडन एव च॥ १८० ॥। स्थानकं तावदेव स्याद्यावच्चेष्टा प्रवतंते। भग्नं च स्थानकं नृत्ते चारी चेत्समुपस्थिता॥।१८१ ।।

अनुवाद-जहाँ पर बारयाँ पैर 'सम' स्थित हो और वाहिना पैर त्र्यस्त्र (तिरछा होकर) पक्ष में स्थित हो और कटि बायी ओर समुम्नत हो, वहाँ 'अवहित्त्थ' स्थानक होता है।। १७६ ।। अनुवाद-स्त्रियों के स्वाभाविक संलाप (बात-चीत), निश्चय, परितोष, वितक एवं लज्जा में इस स्थान का प्रयोग करना चाहिए॥ १७७ । अनुवाद-जहाँ पर एक पाद सम स्थित हो और दूसरा पाद अग्रतळ स्थिति में हो तथा सूचीविद्ध हो अथवा अविद्ध हो वहाँ 'अश्वक्रान्त' स्थानक होता है।। १७८ । अनुवाद-स्त्रियों के स्वलन में (फिसलने में), धूर्णन में (घूरने में) फटे- पुराने वस्त्रों के धारण में, ललित (सुन्दरता पूर्ण) चित्रासन में और रक्षण में इस स्थान का प्रयोग करना चाहिए॥ १७९ । अनुवाद-वृक्ष की शाखा के अवलम्बन में, फूल के गुच्छों के ग्रहण में, विभ्रान्ति में और पादताडन में इस स्यान का प्रयोग करना चाहिए॥ १८० ॥ अनुवाद-नृत्त में स्थानक तभी तक रहता है जब तक कोई चेष्टा की जाती है। यवि नृत्त में चारो का प्रवर्शन उपस्थित हो जाय तो स्थानभग्न हो जाता है।।१८१ ॥

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एवं स्थानविधि: कार्यः स्त्रीणां सम्यग्ट्विजोत्तमाः। पुनरासां प्रवक्ष्यामि गतीस्तु प्रकृतिस्थिताः ॥।१८२॥ कृत्वावहित्यं स्थानं वामं चाधोमुखं भुजम् । नाभिप्रदेशे विन्यस्य सव्यं च खटकामुखम्॥ १८३॥ ततः सललितं पादं तालमात्रं समुत्थितम् । दक्षिणं वामापादस्य बाह्य पाइवें विनिक्षिपेत्॥ १८४॥ तेनैव समकालं च लताख्यं वामकं भुजम्। दक्षिणं च नयेत्पाश्वं न्यसेन्नाभितटे ततः ॥१८५॥ नितम्बे दक्षिणं कृत्वा हस्तं चोद्वेष्टय वामकम्। ततो वामपदं दद्याल्लताहस्ते च दक्षिणम् ॥ १८६॥ लोलयोद्वाहितेनाथ शिरसानुगतेन च। किचिन्नतेन चाङ्ेन गच्छेत्पञ्चपदीं ततः ॥ १८७॥ यो विधिः पुरुषाणां तु रङ्कपीठपरिक्रमे। स एव प्रमदानां तु कर्तव्यो नाट्ययोक्तृभिः॥१८८॥ अनुवाद-हे द्विजोत्तमों ! इस प्रकार स्त्रियों की स्थान-विधि करनी चाहिए। अब उनको प्रकृति के अनुसार गतियों को बतलाता हूँ॥१८२॥ अनुवाद-पहिले अ्वहित्त्य स्थान को करके बायीं भुजा में अधोमुख करे। फिर उसी बाये हाथ को खटकामुख मुद्रा में नाभिप्रदेश पर रखे। उसके बाद ललित संचार पाद एक ताल प्रमाण ऊपर उठाकर बायें पैर के बगल में रखे, फिर उसी समय बाये हाथ को लता हस्तमुद्रा में नाभितट पर रख कर दक्षिण पाश्वं को झुका दे। फिर वाहिने हाथ को नितम्ब पर रखकर बायें हाथ को उद्वेष्टित क्र, फिर बायें पैर को और वाहिने हाथ को लता हस्तमुद्रा में रखे। फिर लीला से उद्वाहित सिर के अनुगत शरीर को कुछ झुकाकर पाँच पग चले॥१८३-१८७॥ अनुवाद-रङ्गमञ्च पर परिक्रमण पुरुषों के लिए जो विषान है, नाटथ- प्रयोक्ताओों को वही विधान स्त्रियों के लिए भी करना चाहिए॥ १८८ ।। ना. चा०-१७

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१३० माहयशारयरे

षट्कलं न प्रयोक्तव्यं तथाष्टकलमेव च। पादस्य पतनं तज्ज्ञैः खेदजं तद्भवेत् स्त्रियाः ॥१८९॥ सयौवनानां नारोणां कार्या त्वेवं गतिर्बुधैः। स्थानीया या स्त्रियस्तासां संप्रवक्ष्याम्यहं गतीः ॥ १९० ॥ कृत्वाऽवहित्थं स्थानं तु वामं न्यस्त कटीतटे। आद्यं चारालमुत्तानं कुर्यान्नाभिस्तनान्तरे॥ १९१ ॥ न निषण्णं न च स्तब्धं न चैव परिवाहितम्। कृत्वा गात्रं ततो गच्छेत्तेनैवाद्यक्रमेण तु॥ १९२॥ प्रेष्याणामपि कर्तव्या गतिर्विभ्रान्तिगामिनी। किंचिदुन्न मितैर्गात्रैराविद्धपदविक्रमा ॥ १९३ ।

स्थानं कृत्वावहित्थं तु वामं चाधोमुखं भुजम् । नाभिप्रदेशे विन्यस्य सव्यं च खटकामुखम्॥ १९४॥

अनुवाद-स्त्रियों को छः कला और आठ कल। प्रमाण का पादपात नहीं करना चाहिए, क्योंकि इतने समय तक पाद का पतन स्त्रियों के लिए खेवजनक होता है॥१८९॥। अनुवाद-युवती नारियों की गति इसी प्रकार की होनी चाहिए। अब मैं प्रौढ़ा नारियों की गति को बतलाऊंगा॥ १९० ॥ अनवाद-अवहित्त्थ स्थानक को करके बायें हाथ को कटितट पर रखकर वाहिने हाथ को 'अराल' मुद्रा में ऊपर की ओर मुख करके ( उत्तान) नाभि और स्तनों के मध्य में रखे। फिर शरीर को न निषण्ण करे, न स्थिर करे और न परि- वाहित करे, बल्कि उसी क्रम से चले ॥ १९१-१९२॥ अनुवाद-दासो नारियों की गति उद्भ्रान्तगामिनी करनी चाहिए। इस स्थिति के अभिनय में शरोर को थोड़ा उन्नमित कर भुजाओं को आविद् मुद्रा में रखे और अवहितत्थ स्थान को करके बांयी भुजा को अधोमुख करके और दाहिनी भुजा को कटकामुख मुद्रा में नाभिप्रदेश पर रखे॥ १९३-१९४।।

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दवाबसोउ्याय। १३१

अर्धनारीगतिः कार्या स्त्रीपुंसाभ्यां विमिश्रिता। उदात्तल लितैर्गात्रै: पादर्लीलासमन्वितैः ॥ १९५॥ या मयाभिहिता पूर्वमुत्तमानां गतिर्बुधाः । स्त्रीणां कापुरुषाणां च ततोऽर्धार्धं च कारयेत् ॥ १९६ ।। उत्तमाधममध्यानां नृणां यद्गतिचेष्टितम्। स्त्रीणां तदेवं कर्तव्यं ललितैः पदविक्रमैंः ॥१९७॥ बालानामपि कर्तव्या स्वच्छन्दपदविक्रमा। न तस्यां सौष्ठवं कार्यं न प्रमाणं तथाविधम् ॥ १९८॥। तृतीया प्रकृति: कार्या नाम्ना चैव नपुंसका । नरस्वभावमुत्सृज्य स्त्रीगति तत्र योजयेत् ॥ १९९ ॥ विपर्यस्तप्रयोगस्तु पुरुषस्त्रीनपुंसके। स्वभावमात्मनस्त्यक्त्वा परभावेन योजयेत्॥ २०० ॥

ल अनुवाद-नपुंसक पात्रों की गति का अभिनय स्त्री और पुरुषों की मिश्रित गति उदातत और ललित गात्रों एवं लोलायुक्त पैरों से करना चाहिए।। १९५। 5अनुवाद-पहिले जो मैंने उत्तम पुरुषों की गति वतलाई है, उसका आधा स्त्रियों को तथा उसका भी आधा नोच पुरुषों की गति को योजना करनी चाहिए॥ १९६॥ अनुवाद-उत्तम, मध्यम और अधम मनुष्यों की जो गति और चेष्टाएँ कही गई हैं वही ललित पद-विक्रमों द्वारा स्त्रियों को भी करनी चाहिए॥ १९७ ॥ अनुवाद-बालकों की गति में स्वच्छन्द पद-विक्रम होने चाहिए। नाटयप्रयोक्ताओों को उसमें न सौष्ठव की योजना करनी चाहिए और न प्रमाण की॥ १९८ ॥ अनुवाद-तृतोया प्रकृति अर्थात् नाम से जो नपुंसक है, उनमें पुरुष के स्वभाव को छोड़कर स्त्रो को गति की योजना करनी चाहिए॥ १९९ । अनुवाद-विपयय प्रयोग में पुरुष, स्त्री और नपुंसकों को अपना स्वभाव छोड़कर दूसरे के स्वभाव के अनुसार गति का अभिनय करना चाहिए॥ २०० ॥

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१३२ माडचसाल्त्रे

निजां प्रकृतिमुत्सृज्य क्रोडया वञ्चनेन वा। स्त्री पुंसः प्रकृति कुर्यात्स्त्रीभावं पुरुषोऽपि वा॥ २०१ ॥ सौष्ठवेनाथ सत्त्वेन बुद्धया तदच्च कर्मणा। स्त्री पुमांसं ह्यभिनयेद्वेषवाक्यविचेष्टितैः ॥ २०२॥ स्त्रीवेषभाषितैर्युक्तं प्रेक्षिताप्रेक्षितस्मितैः मृदुसन्नगतिश्चैव पुमान् स्त्रीभावमाचरेत्॥ २०३॥ जातिहोनास्तु या नार्य: पुलिन्दशबराङ्गनाः । याश्चापि तासां कर्तव्या तज्जातिसद्दशो गतिः ॥ २०४॥ व्रतस्थानां तपःस्थानां लिङ्गस्थानां तथा पुनः। खस्थानां चैव नारीणां समपादं प्रयोजयेत् ॥ २०५ ॥। उद्धता येडक्गहारा: स्युर्याश्चार्यो मण्डलानि वा। तानि नाट्यप्रयोगज्ञैर्न क्तव्यानि योषिताम्॥ २०६॥ अनुवाद-अपने स्वभाव को छोड़कर क्रोड़ा अथवा वञ्चना के द्वारा स्त्री पुरुष को प्रकृति का और पुरुष स्त्री की प्रकृति का अनुसरण करे॥ २०१॥ अनुवाद-स्त्री पुरुष का अभिनय करते समय सौष्ठव, सत्त्व, बुद्धि और उसी के समान कर्म, वेष, भाषा और चेष्टाओं का अभिनय करे॥२०२॥ अनुवाद-इसी प्रकार स्त्री की वेष एवं भाषा से युक्त तथा उसो के समान देखने, न देखने एवं मुस्कराहट के द्वारा कोमल एवं मन्द गति वाला पुरुष भी स्त्री के स्वभाव का आचरण करे॥ २०३॥ अनुवाद-होन जाति को पुलिन्द, शबर आदि की जो स्त्रियाँ हैं और उनके जो कर्त्तव्य है, अपनो जाति के समान उनकी गति करनो चाहिए॥ २०४॥ अनुवाद-व्रत में संलग्न, तपस्विनी तथा सन्यासिनी और आकाश में विचवरण करने वालो स्त्रियों की गति में 'समपाद' चारी की योजना होनी चाहिए॥२०५ ॥ अनुवाद-जो अहङ्कार, चारियाँ और मण्डल उद्धत है, नाटयवेत्ताओं को स्त्री-पात्रों मैं उनको योजना नहीं करनी चाहिए॥ २०६।।

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अथासनविधि: कार्यः स्त्रोर्णां नूर्णां तयैव च। नानाभावसमायुक्तं तथैव शयनाश्रयः ॥२०७॥ स्वस्थं मन्दालसं क्लान्तं स्रस्तालसमथापि च। विष्कम्भकमुत्कटिकं मुक्तजानु तथासनम्॥ २०८ ॥ जानुगतं विमुक्तं च स्थानकान्युपवेशने। लक्षणं पुनरेतेषां विनियोगं च वक्ष्यते ॥ २०९॥ विष्कम्भेनान्चितौ पादौ किञ्चिद्वक्षः समुन्नतम्। हस्तौ कट्यूरुविन्यस्तौ स्वस्थे स्यादुपवेशने ॥ २१०॥ स्वभावाभिनये चैव तथा स्वस्थोपवेशने। आविष्कृतेषु सर्वेषु भावेष्वेतत्प्रयोजयेत् ॥ २११ ॥ एक: प्रसारितः किंचित्पादोऽन्यस्त्वासनाश्रितः । शिर: पार्श्वगतं चैव स्थानं मन्दालसं तु तत् ॥ २१२॥ अनुवाद-स्त्री और पुरुषों की आसन विधि में (बैठने का विधान) नाना प्रकार के भावों से युक्त करनी चाहिए और शयन-विधि भी इसी प्रकार करनी चाहिए॥२०७॥ अनुवाद-स्वस्थ, मन्दालस, क्लान्त, स्त्रस्तालस, विष्कम्भित, उत्कटिक, मुर्तजानु, जानुगत और विमुक्त ये उपवेशन में स्थानक है। अब इनके लक्षण तथा विनियोग को कहता हूँ॥। २०८-२०९।। अनुवाद-स्वस्थ उपवेशन में पैरों को वैशाख स्थानक में अश्रित कर और वक्ष को थोड़ा ऊँचा करके दोनों हाथों को कटि और ऊरु पर रखना चाहिए॥२१०॥ अनुवाद-स्वाभाविक अभिनय में और स्वस्थ उपवेशन में तथा आविष्कृत सभी भावों में इसका प्रयोग करना चाहिए ।। २११ ॥ अनुवाद-जहाँ एक पैर थोड़ा फैलाकर और दूसरा पैर आसन पर टिका कर शिर को पाश्व में किया जाता है वहाँ 'मन्वालस' नामक स्थानक होता है। २१२ ॥

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१३४ मोट पझारिये

चिन्तायां च तदौतसुक्ये निर्वेदे विरहे तथा। विवादादिषु चाधेयं स्थानमेतत्प्रयोक्तृभिः ॥ २१३ ॥ चिबुकापाश्रयौ हस्तौ बाहुशीर्षाश्रयं शिरः। संप्रणष्टेन्द्रियमना विज्ञेयं क्लान्तमासनम् ॥ २१४॥ चिबुकोपाश्रितौ हस्तौ बाहुशीर्षानतं शिरः। सम्प्रणेष्टन्द्रियमना भवेच्छोकोपवेशने ॥ २१५॥ बलेन विगृहीतस्य रिपुणा खण्डितस्य च । शोकग्लानस्य चौत्सुक्ये स्थानमेतद्विनिर्दिशेत ॥ २१६ ॥ स्त्रस्तौ हस्तौ विमुक्तौ च शरीरमलसं तथा। खेवालसं तथा चक्षुर्यत्र स्रस्तालसं तु तत्। २१७।। अ्रमग्लानौ मदे चैव मूर्छायां व्याधितेषु च। मोहे प्राणमये चैव विषादे चैव तद्भवेत् ।॥ २१८ ॥

पपा अनुवाद-चिन्ता में, औतसुक्य में, निर्वेद में, विरह में और विवाद आदि में नाट्य प्रयोक्ताओं को इस आसन का प्रयोग करना चाहिए॥ २१३॥ अनुवाद-जब दोनों हाथों को चिबरुक के सहारे रखे और शिर को बाहुशीषं अर्थात भुजाओं के सहारे रखे तथा मन और इन्द्रियाँ संज्ञा शून्य हो जाँय तो वहां 'क्रान्त' आसन समझना चाहिए॥। २१४॥ अनुवाद-पाठ भेद से शोक के उपवेशन में दोनों हाथों को चिबुक के सहारे तथा शिर को भुजाओं के सहारे रखे तथा मन और इन्द्रियाँ क्रिया शून्य की स्थिति में होनो चाहिए। २१५।। अनुवाद-बलपूर्वक निगृहोत और शत्रु के द्वारा खण्डित तथा शोक और ग्लानि में इस स्थानक का प्रयोग करना चाहिए॥ २१६।। अनुवाद-जहाँ पर दोनों हाथ शिथिल और विमुक्त हो, शरीर अलसाया हुआ हो औौर आँख खेव से अलसाई हुई हों, वहाँ 'स्रस्तालस' कहलाता है॥ २१७॥ अनुवाद-श्रम, ग्लानि, मद, मूर्च्छा, व्याधि, मोह और विषाद में इस आसन का प्रयोग करना चाहिए।। २१८।

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द्वादशो्याय: १३५

प्रसारय बाहू शिथिलौ तथा चोपाश्रयाश्रितः । मूर्च्छामदश्रमग्लानिविषादेषू पवेशयेत् ॥ २१६ ॥

पाठान्तरम्- विष्कम्भावञ्चितौ पादावूरू विष्कम्भित भुजौ। निमीलितं तथा चक्षुः स्थानं विष्कम्भनामनि ॥ २२० ॥ स्ववक्षोगतया दृष्टया योगध्याने विलीयते। स्वभावसंस्थया चैव नटानामुपगम्यते॥ २२१ ॥

पाठान्तरम्- सर्वपिण्डीकृताङ्गस्तु संयुक्त: पादजानुभिः। व्याघिपीडितनिद्रासु ध्याने चोपधिरोन्नरः ॥। २२२।।

अनुवाद-मूर्च्छा, मद, श्रम, ग्लानि तथा विषाद की दशा में पात्र दोनों भुजाओं को शिथिलता से फैलाकर किसीं वस्तु के दुराश्रित होकर आसन पर बैठे ॥ २१९ ॥ पाठभेद से अर्थ अनुवाद-जहाँ पर दोनों पैर वैशाखस्थानक में अञ्चित हों, और ऊरु तथा दोनों भुजाएँ विष्कम्भित हों और नेत्र निमीलित हो, वहाँ 'विष्कभ' नामक स्थानक होता है॥। २२१ ॥ अनुवाद-इस आसन में पुरुष अपने वक्षःस्थल पर दृष्टि गड़ाकर योग और ध्यान में विलीन हो जाता है और नटों के उपवेशन में स्वाभाविक स्थिति में रखा जाता है॥। २२२ ॥। पाठभेद का अर्थ अनुवाद-ध्याधि, व्रोड़ा, निद्रा और ध्यान को स्थिति में पुरुष सम्पू्ण अङ्गों को सिकोड़कर पैर और जानुओं को मिलाकर उपवेशन करे।

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माट पझरिये

समौ पादौ समाधाय समं यदुपविश्यते। अपृष्ठभूतलं चैव ज्ञेयमुत्कटिकासनम् ॥ २२४॥ पित्र्ये समाधिजप्ये च होमादिकरणेषु च । एतत्स्थानं विधातव्यं तथाचमनकर्मणि॥२२५॥

पाठान्तरम्- तथा चोल्कटिकं स्थानं स्फिक्पार्ष्णोनां समागमः । पित्र्ये निवापे जप्यं च सन्ध्यास्वाचमनेषु च ॥ २२६॥ एकं जानु यवास्यैव महीपृष्ठे निधीयते। मुक्तजानुकमेताद्धि विज्ञेयं ह्यासनं बुधैः ॥ २२७॥ एतत्कृतव्यलीकानां प्रियाणां संप्रसादने। मार्जने कुट्टिमानां च तथाभूम्यनुलेपने॥ २२८॥

अनुवाद-दोनों पेरों को सम रखकर भूतल को स्पर्श किये बिना जो बैठा जाता है, उसे 'उत्फटिका' आसन समझना चाहिए। पितरों के तर्पण में, समाधि में जप करने में, होमादि कार्यो में और आचमन करने में इस आसन का विधान करना चाहिए॥ २२४-२२५ ॥

पाठभेद से अर्थ

अनुवाद-स्फिक् (कूल्हा) और पार्ष्णि (एड़ी) को मिलाकर बैठना 'उत्कटिक' स्थानक कहलाता है। आाद् तथा पितरों के तर्पण, आदि में, जप करने में, सन्ध्या करने में तथा आचमन करने में इस आसन का प्रयोग करना चाहिए॥ २२६।। अनुवाद-जब इसी के एक जानु (घुटने ) को पृथ्वी तल पर रख दिया जाय तो विद्वानों को उसे 'मुक्त जानु' आसन समझना चाहिए। प्रिया के प्रसावन में, फशं साफ करने में भूमि के लोपने में इस आसन का विधान करना चाहिए॥ १२७-२२८॥

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१३७

पाठान्तरम्- विष्कम्भिनं पुनश्चैव जानुं भूमौ निपातयेत्। प्रियाप्रसादने कार्य होमादिकारणेषु च ॥ २२९॥ महोगताभ्यां जानुभ्यां स्थानं जानुगतं भवेत्। देवाभिवन्दने कार्यं रुष्टानां च प्रसादने ॥ २३०॥ शोके चाक्रन्दने तीव्रे मृतानां चैव दर्शने। संत्रासने कुसत्त्वानां नीचानां चैव याचने॥ २३१॥ भूमौ यदूर्ध्वपतनं तठ्विमुक्तमिति स्मृतम्। प्रहारे तत्प्रयोक्तव्यमावेगे करदिते तथा ॥ २३२॥ तथासनविधि कार्यो विधिवन्नाटकाश्रयः । स्त्रीणां च पुरुषाणां च बाह्योऽयाभ्यन्तरस्तथा ॥ २३३ ॥ पाठान्तर से अर्थ अनुवाद-प्रियतमा को प्रसन्न करने तथा होम आवि क्रियाओं में पुरुष अपने फैले हुए घुटनों को भूमि पर गिरा दे अथवा रख वे ॥ २२९॥ अनुवाद-यदि दोनों जानुओं (घुटनों) को पृथ्वो पर रख विया जाय तो 'जानुगत' आसन कहलाता है। देवताओं के अभिवावन में, रूठे हुए को प्रसन्न करने में, शोक में, चिल्लाने में, या आक्रन्वन में, मृतकों के देखने में, कुत्सित प्राणियों को डराने में, तथा नीचों के माँगने में इस आसन का विधान बताया गया है।। २३०-२३१ ॥। अनुवाद-पैरों का पृथ्वी पर ऊर्ध्वंपतन 'विमुक्त' स्थानक कहा गया है। प्रहार में, आवेग में और क्रन्वन में इस आसन का प्रयोग करना चाहिए। २३२॥ अनुवाद-स्त्री एवं पुरुष पात्रों के लिए नाटिकाश्रित विधिपू्वक आसनों का विधान करना चाहिए। यह आसन-विधान वो प्रकार का होता है-आम्यन्तर और बाहया । २३३॥ ना. था०-१८

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नाटपसाचे

देवानां नूपतीनां च योज्यं सिंहासनं तथा। पुरोधः श्रेष्ठयमात्यानां भवेद्वत्रासनं तथा ॥। २३४॥ मुण्डासनं तु कर्तव्यं सेनानीयुवराजयोः। काष्ठासनं ब्राह्मणानां कुमाराणां कुथासनम् ॥२३५॥ स्थानीया ये तु पुरुषा: कुलविद्याप्रकाशिताः । तेषामासनसत्कार: कर्तव्य इह पार्थिवैः ॥ २३६ ॥ समे समासनं चैव मध्ये मध्यं तथासनम्। अतिरिक्तेऽतिरिक्तं च हीने भूम्यासनं तथा॥ २३७॥ उपाध्यायस्य नुपतेर्गुरूणं चाग्रतो बुधैः। भूम्यासनं तथा कायं काष्ठासनमथापि वा॥ २३८॥ नौनागरथयानेषु तथा काष्ठासनेषु सहासनं न दुष्येत गुरूपाध्यायपार्थिवैः ॥२३९॥

अनुवाद-देवता एवं राजाओं के बैठने के सिंहासन की योजना करनी चाहिए। पुरोहित, श्रेष्ठी और अमात्यों के लिए वेत्रासन देना चाहिए॥ २३४॥ अनुवाद-सेनापति और युवराज के लिए मुण्डासन, ब्राह्मणों के लिए काष्ठासन और राजकुमारों के लिए कुथासन (दरीया गलीचा) देना चाहिए॥ २३५ ॥ अनुवाद-कुल और विद्या से सम्पन्न (कुलीन और विद्वान्) जो स्थानीय लोग हैं। राजाओं को उनका आसन-सत्कार करना चाहिए।। २३६ ॥ अनुवाद-बराबर वालों के लिए बराबर का आसन, मध्यम लोगों के लिए मध्यम आसन, साधारण लोगों के लिए अतिरिक्त आसन और होन पुरुषों के लिए भूमि ही आसन देना चाहिए।। २३७ ॥ अनुवाद-उपाध्याय, राजा और गुरुओं के सामने (सम्मुख) काष्ठासन (चौकी) या भूमि पर बैठना चाहिए॥२३८।। अनुवाद-नौका, हाथी, रथ और यान (गाड़ो ) में तथा काष्ठासन पर गुरु, उपाध्याय और राजा के साथ बैठने में कोई वोष नही होता।। २३९ ।। oi1a oiF

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दाबशोडध्याय १३९

एवं राजसभां प्राप्य कार्यस्त्वासनजो विधिः । प्रकृतोनां तु सर्वासां तथा ज्ञानसमुत्थितम् ॥ २४० ॥ पुरुषाणां भवेदेषु विधिरासनसंश्रयः। स्त्रीणां चैवासनविधि संप्रवक्ष्याम्यतः परम्॥ २४१॥ सिंहासनं महादेव्या राज्ञीनां मुण्डमासनम्। पुरोधोऽ्मात्यपत्नीनां भवेद्वेत्रासनं तथा ॥ २४२॥ भगिनीनां तु कर्तव्यं वस्त्रं चर्म कुथासनम्। ब्राह्मणीनां तापसीनां पट्टासनमथापि च॥ २४३॥ वेश्यानामपि कर्तव्यमासनं हि मसूरकम् । शेषाणां प्रमदानां तु भवेद्भूभ्यासनं बुधाः॥ २४४॥ एवमन्तःपुरे ज्ञेयो बाह्यश्चासनजो विधि: । तथा स्वगृहवार्तासु छन्देनासनमिष्यते ॥ २४५॥

अनुवाद-राजसभा में इसी प्रकार का आसन विधान करना चाहिए। समस्त प्रकृतियों और ज्ञानवान् पुरुषों के लिए इसी प्रकार का आसन-विधान बिहित है। अब मैं स्त्रियों के लिए आसन-विधि को कहूँगा॥ २४०-२४१॥ अनुवाद-महावेवी के लिए सिंहासन, ज्ञानियों के लिए भुण्डासन (मूढ़ा), पुरोहित और मन्त्रियों की पत्नियों के लिए वेत्रासन (बेंत का आसन) देना चाहिए॥ २४२॥ अनुवाद-भोगिनी नारियों के लिए (पाठ भेव से भगिनी के लिए) वस्त्रासन, धर्म का आसन (मृगछाला आदि) तथा कुथासन (गलीचा) होना चाहिए। ब्राह्मणी और तपस्विनो स्त्रियों को पट्टासन देना चाहिए॥ २४३॥ अनुवाद-वेश्याओं के लिए मसूरक आसन (आराम कुर्सी अथवा मसनद वाला आसन) होना चाहिए और शेष सभी प्रमवाओं के लिए भूमि रूप ही आसन होना चाहिए।। २४४॥ अनुवाद-इस प्रकार आभ्यन्तर और बाह्य आसन-विधि को जानना चाहिए और अपने घर में बात-चीत के समय अपनी इच्छा के अनुसार आसन-विधान करना चाहिए।। २४५।।

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नाट्यशारने

नियमस्थो मुनीनां तु भवेदासनजो विधिः । लिङ्गिनां चासनविधिः कार्यो व्रतसमाश्रयः । २४६॥ वेत्रासनमथापि च। होमयज्ञक्रियायां च पित्र्येऽ्थें च प्रयोजयेत् ॥ २४७ ॥ आकुन्चितं समं चैव प्रसारितविवतिते। उद्वाहितं नतं षोढा शय्यास्थानानि निर्दिशेत् ॥ २४८॥ सर्वैराकुञ्चितैरङ्गः शय्याविद्ध तु जानुनी। स्थानमाकुञ्चितं नाम शीतार्तानां प्रयोजयेत् ॥ २४९॥ उत्तानितमुखं चैव प्रत्यङ्मुक्तकरं तथा। समं नाम प्रसुप्तस्थ स्थानकं संविधीयते ॥ २५० ॥ एकं भुजमुपाधाय संप्रसारितजानुकम् । स्थानं प्रसारितं नाम सुखसुप्तश्य कारयेत् ॥। २५१ ।।

अनुषाव-मुनियों का आसन-विधान नियमों के अनुसार होना चाहिए और सन्यासियों का आसन-विधान उनके व्रतानुसार होना चाहिए। २४६॥ अनुवाद-बुशी (कुशासन), मुण्डासन और वेत्रासन का प्रयोग होम, यज्ञ क्रिया एवं पितरों में श्राद्ध-तर्पण आदि में करना चाहिए॥ २४७। अनुवाव-आकुञ्चित, सम, प्रसारित विर्वात्तत, उद्गाहित और नत ये छः शयन के स्थान कहे गये हैं।। २४८।। अनुवाद-सभी अङ्गों को सङ़चित करके दोनों घुटनों को शय्या पर आविद् कर लेटना 'अकुश्ित' स्थानक कहलाता है। शोत से पोड़ित होने पर इस स्थान की योजना करनी चाहिए॥। २४९।। अनुवाद-मुख को ऊपर की ओर उत्तानित करके और हाथ को नीचे की ओर मुक्त रखकर शयन करना 'सम' स्थानक होता है, सोये हुए व्यक्ति के लिए इसकी योजना करनी चाहिए॥ २५० ॥ अनुवाव-एक भुजा को तकिया बनाकर जानुओं (घुटनों) को फैलाकर- शयन करना 'प्रसारित' स्थान कहलाता है। सुख से सोये हुए के लिए इसकी योजना करनो चाहिए॥ २५१॥

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द्वाबशोऽष्याय:

अधोमुखस्थितं चैव विर्वाततमिति स्मृतम्। शस्त्रक्षतमृतोरिक्षिप्तमत्तोन्मत्तेषु कारयेत् ॥ २५२ ॥ हस्तोपरि शिरः कृत्वा कूर्परक्षोभमेव च। उद्ठाहितं तु विज्ञेयं लीलया वेशने विभो: ॥२५३॥ ईषतप्रसारिते जङ्घे यत्र स्स्तौ करावुभौ। आलस्यश्रमखेदेषु नतं स्थानं विधीयते ॥२५४॥ रङ्गे विकृष्टे भरतेन कार्यो गतागतैः पादगतिप्रचारः । श्र्यश्रेस्त्रिकोणेश्चतुरश्रके वा समेर्गतैरर्थवशेन नित्यम्॥ २५५॥ वयोऽनुरूपः प्रथमस्तु वेषो वेषानुरूपेण गतिप्रचार: । गतिप्रचारानुगतं च पाठ्यं पाठ्यानुरूपोऽभिनयश्च कार्यः ॥ २५६॥

अनुवाव-नीचे मुख करके सोना 'विर्वात्तत' कहलाता है। शस्त्र से घाव होने पर, मृत्यु, ऊपर से गिरने पर, मत्त एवं प्रमत्त होने को दशा में इसका उपयोग करना चाहिए।। २५२।। अनुवाद-शिर को हाथ पर रखकर और कोहनी को मोड़कर शयन करना 'उद्राहित' स्थान समझना चाहिए। लीला के साथ स्वामी के बैठने में इस स्थान की योजना करनी चाहिए॥२५३॥ अनुवाद-जङ्गाओं को थोड़ा फैलाकर जहाँ पर दोनों हाथों को शिथिल कर दिया जाता है, वहां 'सम' नामक स्थानक होता है। आलस्य, शरम और खेद की अवस्था में इस स्थान का प्रयोग किया जाता है॥५४॥ अनुवाद-विकृष्ट रङ्गमञ्न पर नटों (अभिनेताओं) को आने-जाने के प्रकार से पाद-गति में प्रचरण करना चाहिए। त्रिकोण रङ्गमन्न पर त्र्यत् और चतुरस्र मञ्च रङ्गमञ्च पर चतुरस्र प्रकार वालो गति से प्रचरण करना चाहिए। ५५॥ अनुवाद-नाट्य-प्रदशन में वय (अवस्था) के अनुरूप वेष-भषा और वेष- भूषा के अनुरूप गति-प्रचार होना चाहिए। गति प्रचार के अनुगत पाठ्य तथा पाठ्य के अनुरूप अभिनय करना चाहिए॥५६॥

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१४२ नार्टयेशारन्रे

गतिप्रचारस्तु मयोदितोऽयं नोक्तस्तु यः सोऽर्थवशेन साध्यः। अतः परं रङ्परिक्रमस्य वक्ष्यामि कक्ष्यानुगतं विभागम् ॥२५७॥ इति शीभरतीये नाट्यशास्त्रे गतिप्रवारो नाम द्वावशोऽध्याय:।।

अनुवाद-इस प्रकार मैंने गति प्रचार का वर्णन किया है, जिसे मैंने नहीं कहा है उसे लोक-धयवहार से सिद्ध कर लेना चाहिए। अब इसके बाद रङ्गमञ्न पर परिक्रमण (सञ्चरण) के कक्ष्यानुगत विभाग को कहूँगा॥५७॥ ।। इस प्रकार भरतमुनि प्रणोत नाट्यशास्त्र में प्रतिप्रचार नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १२॥

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त्रयोदशोऽ्ध्यायः

अभिनवभारती ममका

देशस्य२ बाह्यान्तरभेदिकक्ष्या विभागधर्मो विविधां प्रवृत्तिम्। आसूत्रयन्दोषविशुद्धिवक्ष- क्रमोऽकंदृष्टिजंयताद्वृषाङ: ॥

अभिनव-भारती अभिनव-देश के बाह्य एवं आभ्यन्तर भेद से बनने वाली कक्ष्या, उसके विभाग, द्विविध धर्मी, चतुर्विध प्रवृत्तियों को सूत्र रूप में निबद्ध करता हुआ तथा दोषों से शुद्ध करने में दक्ष, सूर्य रूपी दृष्टि वाला वृषाक्क शिव विजयी होवें। विशेष-रङपीठ पर देशादि की कल्पना करके बाह्य और आभ्यान्तर कक्ष्या की कल्पना करे। रङ्गमञ्च पर जो पहिले प्रवेश कर चुके हैं, वे आाभ्यन्तर पात्र है और उनसे अषिष्ठित देश विशेष को आभ्यन्तर कक्ष्या कहते हैं। जो पात्र पीछे प्रवेश करते हैं वे बाह्य है औोर उनका स्थान बाह्य कक््या है। धर्मी-यहाँ धर्मी पद से द्विविध धर्मो का ग्रहण होता है-लोकधर्मी और नाटयषर्मी। प्रवृत्ति-यहाँ विविधा प्रवृत्ति से चतुर्विधा प्रवृत्ति का ग्रहण होता है। प्रवृत्तियाँ चार होती हैं-आावन्ती, दाक्षिणात्या, पाञ्चाली और ओडमागघी। क्रम :- क्रम शब्द से पाद और स्थानक भेद सूचित होता है। 'पाद' ३६ तत्त्वों में तेरहवाँ तत्त्व है। स्थानक गति प्रधान होने से कक्ष्या में विनियोजित है। अरकदृष्टि-धर् (सूयं) के समान दृष्टि वाला शिव। वृषाङ्ू-वृष चिह्न है जिसका उसे 'वृषाढ्' कहते हैं। शिव का चिह्न 'वृष' है अतः शिव को वृषाक्क कहा जाता है। १. स. ङ. पतुर्दशोऽष्यायः ; २. देहस्य;

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१४U नाट्यशार्ने

इहाभिनयानन्तरं यद्यपि सर्वा वृत्तिप्रवृत्तस्य उदृष्टा:, सर्वान्ते च रङ्ग (३६) सूचिता कक्ष्या,' तच्चतुरविधाभिनयाभिधानानन्तरमेतदध्यायार्थो वक्तव्यः। तथापि प्रत्यभिनयमितीतिकर्तव्यतोपयुज्यते। तदभिधानं विना न आङ्गिकमेवोक्तं *स्यादिति वक्तव्यम्। 'तदुद्देशे तु सामान्यशब्दत्वान्नास्ति प्रत्येकमुद्देशने "हतिः। तद्देशनेऽपि च गौरवं स्यात्। अत एव वादिना "कक्ष्यादेरपृथग्भावे यो' हेतुरुक्तः क्रमोल्लङ्गना- दिति तस्यासिद्धत्वं विरुद्धता च, प्रत्युत प्रत्येकप्रसङ्गत्वलाभात, क्रमस्यापदार्थ- त्वान्नार्थप्रमाणकत्वान्मुख्यश्रौतपदार्थबाधकत्वयुक्तं, श्रुत्या वाक्यप्रमाणस्य बाधना- विति तु भट्टलोल्लटोक्तं प्रकृते सिद्धघतत विरोधाभावात्, क्रमस्य च मध्यत्वात् गति- रपप्रयोगहेतुत्वात, अतरतदवसरवाभिधानं युवतम्। 'तद्द्वारेणाभिनयेऽङ्गताम- गात। "तद्देशन्रयं 'वस्तुत्रयं वक्तव्यम्। तत्र प्रथमं कक्ष्याभिधानेऽ्यमभिप्रायः इह गतिर्गन्तव्यदेशाश्रयात्, देशश्च जलस्थलादि11 बहुतरसमविषमादिस्वभेव- सहित काव्यार्थतामात्रेणैवेह संभवन्नपि प्रयोगस्थाने न संभवत्येवेति, तस्य परिहारार्थ कक्ष्यानिरूपणं क्तव्यम्। अत एव पूर्वाध्यायान्त उक्तं परिक्रमे गतावुपयोगिनां स्थानविशेषाणां सम्यग्विभागं वक्ष्यामीति। सेयमध्यायसंगतिस्तां" दर्शयितुमाह- ये तु पूर्वमिति ।

१. ग कक्षा। १. क. (टि०) उक्ता; ३. क. (टि०) तद्देशे। ४. क.ख. हति । ५. क. (टि०) एवं वादिना। क-ख. एवोपादिना। ६. क-फ. योगेत्युक्त: ।

८. क-फ. तद्द हत्रयं। ९. क. वषतृत्रयं। १०. क-फ, देशाश्रयात्मदेशश्च । ११. क-क, जलस्थलानि। १२. क-क. कक्ष्यादिरूपणं। ११. क-फ. सङ्र तिम्।

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१४५ TOFSIF

अभिनव-यहाँ पर यद्यपि अभिनय के बाद सभी वृत्तियों एवं प्रवृत्तियों को कह दिया गया है और सबके अन्त में नाट्य के ग्यारहवें अङ्ग रङ्र (रङ्गभूमि) के प्रसङ्ग में कक्ष्या की सूचना दे दी गई है। इसलिए चतुर्विध अभिनयों के निरूपण के पश्चात् इस अध्याय के अर्थ कक्ष्या का निरूपण अवश्य करना चाहिए था; फिर भी प्रत्येक अभिनय में इसकी इतिकर्त्तव्यता का उपयोग है, उसके कहे बिना आज्ञिक अभिनय का भी कथन नहीं हो सकेगा, अतः इतिकर्तव्यता का कथन करना चाहिए। इतिकर्तव्यता का कथन होने पर अभिनयों का सामान्य रूप से कथन हो जायगा, तत्पश्चात् प्रत्येक के कहने में कोई क्षति नहीं है अर्थात् लक्ष्य एवं लक्षण के सामान्य कथन के बाद विशेष के कथन में कोई हानि नहीं है। दूसरे प्रत्येक के कहने में गौरव भी है। इसलिए वादी ने कक्ष्या आदि के इतिकर्त्तव्यता से पृथक् न होने में क्रमोल्लंधन रूप जो हेतु कहा है वह असिद्ध है और विरुद्ध भी। यहाँ हेत्वाभास रूप दोष उपस्थित करते हुए कहते हैं कि 'कक्ष्या इति- कर्त्तव्यताऽपृथग्भाववती क्रमोल्लघनात्' अर्थात् कक्ष्या इतिकर्तव्यता से पृथक् नहीं है, क्रमोल्लंघन होने से। इसका परिहार करते हुए कहते हैं कि यहाँ कक्ष्या में करमोल्लंघन रूप हेतु है ही नहीं। क्योंकि कक्षा में तो क्रम रहता ही है। अतः क्रमयुत्त कक्ष्या में क्रमोल्लंघन रूप हेतु स्वतः असिद है। दूसरे यहाँ विरुद्धत्व रूप हेत्वाभास भी है। क्योंकि क्रमोल्लंघन इतिकत्तंव्यता अनेकत्व से व्याप्त है अर्थात् इतिकर्त्तव्यता में क्रम बना रहता है, उसका उल्लंघन नहीं होता, प्रत्युत प्रत्येक में प्रसङ्गत्व का लाभ है। इसके अतिरिक्त क्रम नामक कोई पदार्थं भी नहीं है अर्थात् क्रम के पदार्थ मानने मैं कोई प्रमाण नहीं है। अतः मुख्य रूप से शब्द से लाभ पदार्थ का बाधक होना भी अयुक्त है। श्रुति से वाक्य प्रमाण का बाध होता है, यह भट्टलोल्लट का कथन प्रकुत में सिद्ध होता है, कोई विरोध न होने से और क्रम के मध्यवर्ती होने के कारण गति रूप प्रयोग का हेतु होने से। अतः गतिरूप प्रयोग के अवसर पर ही क्रम का कथन करना युक्त है। गति के द्वारा ही वह अभिनय का अज्ज बन गया है। अतः बेशनय और वस्तुत्रय का अवश्य विवेचन करना चाहिए। ना. था०-१९

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नाडयशाइने

किको ये तु पूर्व मया प्रोक्तास्त्रयो वै नाट्यमण्डपाः। तेषां विभागं विज्ञाय ततः 'कक्ष्यां प्रयोजयेत् ॥ १॥

तु शब्दाद दूरत्वं पूर्वताया: सूचयन् द्वितीयाध्यायार्थ स्मारयति। तेषामिति प्रत्येकमित्यभिप्रायः। मण्डपस्य यो विशिष्टो भागोऽतरङ्गपीठात्मकस्तं विज्ञाय विभागतो ज्ञात्वा कक्ष्यागत्युपयोगिनं स्थानविशेषं प्रयोजयेत्, विभागेन संबन्धं नयेत्। नाट्यदेशानुसारेण *प्रकोष्ठे त्यक्ते यो देशोऽवशिष्यते तत्रैव चातुरश्रीयम्। अत एव वामदक्षिणभागयो: कुतपविन्यास: शिष्टे कक्ष्याविभागः।।१।।

वहाँ कक्ष्या च कथन में यह अभिप्राय है कि यहाँ गन्तव्य देश के आश्रय से गति होती है और बहुत प्रकार के सम, विषम आदि स्वभेद सहित जो जल, स्थल आदि देश है, काव्य के अर्थ मात्र से यहाँ सम्भव होने पर भी प्रयोग-स्थान पर सम्भव नहीं है, अतः इनके परिहार के लिए कक्ष्या का निरूपण अवश्य करना चाहिए। अत एव पूर्व अध्याय अर्थात् बरहवें अध्याय के अन्त में कहा है कि परिक्रम अर्थात् रङ्गमञ्च पर परिक्रमण के प्रसङ्ग में गति में उपयोगी स्थल-विशेष के विभाग को सम्यग रूप से कहूँगा। यहाँ अध्याय की संगति को दिखाने के लिए कहते हैं-ये तु इत्यादि।

अनुवाव -जो कि पहिले मैंने तीन प्रकार के नाट्यमण्डपों का विवेचन किया है उनके विशिष्ट विभाग को समझकर तब कक्ष्या का प्रयोग करना चाहिए ।। १ ॥ अभिनव-यहाँ 'तु' शब्द से पूर्वता की दूरत्व की सूचना देते हुए द्वितीय अध्याय के अर्थ का स्मरण दिलाते हैं। यहाँ 'तेषाम् में' 'प्रत्येकम्' का अध्याहार है। मण्डप का रङ्पोठात्मक जो विशिष्ट भाग है उसे अलग-अलग जानकर कक्ष्या और गति के उपयोगो स्थान-विशेष का उपयोग करना चाहिए और विभाग करके उनका सम्बन्ध स्थापित करे। नाट्य-प्रदेश के अनुसार प्रकोष्ठ के छोड़ देने पर जो स्थान शेष बचे, उसी में कक्ष्या का विभाग करे। इसलिए बायें और दायें भाग में कुतुप का विन्यास करे और शेष भाग में कक्ष्या का विभाग करे ॥ १॥

१. ग. कक्षां । २. क-क. च दोषे त्यक्तो वा विशिष्यते। १. क-क. दिलष्टे।

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ये 'नैपथ्यगृहद्वारे मया पूर्व प्रकीर्तिते। तयोर्भाण्डस्य विन्यासो मध्ये कार्यः प्रयोक्तृभिः ॥ २॥। कक्ष्याविभागो निर्देश्यो रङ्गपोठपरिक्रमात्। परिक्रमेण रङ्गस्य ह्यन्या कक्ष्या भवेदिह ॥ ३ ॥

रङ्गस्य को 'विभाग इत्याह-ये नेपथ्यगृहद्वार इत्यादिना । पूर्वमिति द्वितीयाध्याये प्रकोतिते भाण्डस्य ततातोद्यसहितस्य त्रिपुष्करस्य ॥ २॥ ततः किमित्याह-कक्ष्याविभाग इति। तेन *भाण्डेन यत्परित आक्रान्तं 'तद्विवज्यं शेषे रङ्गपीठदेशे निष्क्रमणप्रवेशगत्याद्युपयोगी स्थानविभागो निर्देश्यः प्रेक्षकावधिः संक्रमयितव्यः । ननु कः स्थानविभाग इत्याह-परिक्रमेणेति।

अनुवाद-जिन नेपथ्यगृह के दरवाजों को मैंने पहिले (द्वितीय अध्याय में) कहा है उनके बोच में नाटचप्रयोक्ता को भाण्ड-बाद्य का विन्यास करना चाहिए॥ २॥ अभिनव-रङ्ग का कौन विभाग है? इस पर कहते हैं कि जो नेपथ्यगुह के द्वार इत्यादि अर्थात् जो पहिले द्वितीय अध्याय में कहे गये हैं, वहाँ तत् और आतोद् वाद्यों के साथ त्रिपुष्कर वाद्यों का विन्यास करना चाहिए।। २।। विशेष-अभिनवगुप्त का कथन है कि पूर्व में अर्थात् द्वितीय अध्याय में नेपथ्यगूद् में जिन दो द्वारों का उल्लेख है, जो दो दरवाजे कहे गये हैं, उन दोनों दरवाजों के मध्य में नाटयप्रयोक्ताओं को भाण्ड बाद्यों को रखना चाहिए। इस प्रकार नेपथ्यगुद्द में वो द्वार होने चाहिए औब दोनों दरवाजों के बीच के भाग में भाण्ड-वाद्यों का विभ्यास करना चाहिए ॥ २॥ अनुवाद-रङ्गपोठ पर परिक्रमण के अनुसार कक्ष्या-विभाग का निर्वेश करना चाहिए, क्योंकि परिक्रमण के द्वारा रङ्गपीठ की अन्य कक्ष्या का विधान करना चाहिए॥। ३ ॥

१. क-भ.म. नेपथ्यरङ्जभूमौ तु यौ विभागी प्रकोतितौ। २. क-न. प्रकोतिता: । ३. क-न. तेषां। ४. ग. विभागो। क-भ. म, कक्ष्याविभागो निर्देक्यो रङ्कपीठपरिक्रमैः । १. ख. कक्या हान्या विषोयते। कनभ.म. कक््यान्या श्वभिघोयते। क-द, अन्यककष्या भवेधतः। ६. क. कोउपि भाग: । ७. क. दण्डेन । ८. ह. तद्रिभन्य । ९. क. क्रमस्थानविभाग: ।

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मारट्यशाहये

कक्ष्याविभागे ज्ञेयानि गृहाणि नगराणि च। उद्यानारामसरितस्त्वाश्रमा अटवी तथा।४ ॥ पुथिवी सागराशचैव त्रैलोक्यं सचराचरम्। "वर्षाणि सप्तद्वीपाश्च पर्वता विविधास्तथा ॥५॥ 'अलोकश्चंव लोकश्च रसातलमथापि च। "दैत्यनागालयाश्चैव गृहाणि' भवनानि च ॥६॥ परिक्रामन्त्यनेनेति परिक्राम: चार्यादिसंनिवेशः तद्वशादेकस्यापि रङ्गदेशस्य स्थान- भेवेनापरित्यागः, यथा-'आरोढुमुद्वहेदगात्रं', 'अतिक्रान्तेन पादेन' (१२-१०२) इत्याबिना विशेष तु प्रासावपर्वंतादिरूपत्वमस्यैव ॥३॥ अभिनव-यहाँ अभिनवगुप्त का कथन है कि इससे क्या हुआ? इस पर कहते हैं कि कक्ष्या विभाग इत्यादि। उस भाण्ड-वाद्य के विन्यास से जो चारों तरफ से आक्रान्त है, उसे छोड़कर शेष बचे हुए रङ्गपीठ पर निष्क्रमण और प्रवेश के लिए गति के उपयोगी स्थान के विभाग का निर्देश करना चाहिए अर्थात् प्रेक्षकों के बैठने की भवघि तक स्थान-विभाग को सङक्ान्त कर देना चाहिए। वह स्थान-विभाग क्या है ? इस पर कहते हैं कि जिससे परिक्रमण करते हैं वह परिक्रम है, चारी आदि का सन्निवेश है उसके अनुसार रङ्ब के एक भाग का परित्याग स्थान-भेद से नहीं करना चाहिए। जैसे-'चढ़ने के लिए शरीर को ऊपर उठाये और 'प्रासाद के आरोहण में एक पेर अतिक्रान्त चारो और दूसरे पैर को 'अञ्चित' गति में रखनो चाहिए' इत्यादि के द्वारा विशेष स्थल में तो पर्वत, प्रासाद रूप तो है ही ॥ ३ ॥ अनुवाद-कक्ष्या के विभाग में गृह, नगर, उद्यान, आराम (क्रोड़ा-स्थल), नबी, आभ्रम, अटवी (वन), पुथिवी, सागर, चराचर अर्थात् जड़ और चेतन पदार्थो सहित त्रेलोक्य, भारतवर्ष आदि सभी वर्ष, सातों द्वीप, विविध पवंत, लोक और अलोक, दैत्यों और सर्पो के आलय, आराम-गृह एवं भवन आते हैं। ४६॥ १. ग कक्षाविभागे। २. ख. उद्यानारामसरित आश्रमा वलभीस्तथा। १. कनभ. म. ससागरा च पुथिवी तथा त्रैलोक्यमेव च। दीपा सप्ताथ वर्षाणि पवता विविधास्तथा।। ४. क-प. द्रीपाश्च सप्तवर्षाणि। ५. क-द. साघं क्लोकदरयं नास्ति। ६. क-इ दैत्यानामालयस्चैव । ७. क-इ. भुबनानि। ८. क-भ.म. परिक्रमेषरक्स्य तथेवायंबद्येन थ।

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नयोदशोड्ध्याय: १४९

नगरे वा वने वापि वर्षे वा पर्वतैऽपि वा। यत्रवार्ता प्रवर्त्तेत तत्र कक्ष्यां प्रवर्तयेत्॥७॥ ननु भाण्डवाद्यविनियुक्ते रङ्गपीठदेशे क्रमविशेषस्थानभेवक्लृप्ति। *तन्ने- त्याह-कक्ष्याविभाग इत्यादि। विशिष्टे शिष्टे देशे स्थानान्तराणि कल्पनीयानि तानि कविजनस्मरणार्थ- मुपलक्षणत्वेन पठन्ति। गृहादीनि पृथ्वीस्वर्गपातालभेदात्पुनरुदाहृतानि सर्व- संग्रहाय त्रैलोक्यमित्युक्तेऽपि स्मरणार्थ "वर्णनोद्देशः ४-५-६। ननु सर्वत्र प्रयोगे सर्वे त्रैलोक्यवर्तिनः स्थानभेदाद (भिन्नाः गृहाः) किं संभावितः । नेति दर्शयति नगरे वेत्यादि । निपातरनुक्ता अटव्यादयः साक्षात् ग्राह्या इति वा वीप्सया द्योत्यते। यत्र-यत्र वार्ता वृत्तान्त इतिवृत्तबलायातः प्रकर्षण वतते तत्रमध्ये यो देशविभागस्तमेव प्रवर्तयेत् रङ्गपीठे दर्शयेत न सर्वमित्यर्थः।।७।। अभिनव-यहाँ जा यह प्रश्न उपस्थित होता है कि भाण्डवाद्यों से 'विनिर्मुक्त रङ्गपीठ पर क्रम-विशेष एवं स्थान-भेद को कल्पना कर ली जातो है, वह बात नहीं है। इस पर कहते हैं कि कक्ष्याविभाग इत्यादि। अभिनव-कक्ष्या-विभाग के विशिष्ट देश में भिन्न-भिन्न स्थानों की कल्पना कर लेनी चाहिए, उन्हें कवि जनों के स्मरणार्थ उपलक्षण द्वारा कहा गया है। यद्यपि पृथ्वी आदि सभो स्थानों का एक साथ संग्रह के लिए एक शब्द 'त्रेलोक्यम्' से कह दिया गया है, फिर भी स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल भेद से ग्रह, प्रासाद आदि का पुनः कथन कवियों के स्मरणार्थ वर्णनोद्देश के लिए पृथक्-पृथक् वर्णन किया है ॥ ४६॥ अनुवाद-नगर में अथवा वन में अथवा वर्ष (भारतवर्षादि) में अथवा पवंतों पर जहाँ-जहाँ वार्ता अर्थात् वृतान्त फैल सके वहाँ-वहाँ कक्ष्या का प्रयोग करना चाहिए।। ७। १. ख. ग. तथा सप्त समुद्राश्च वर्षा वे पर्वतास्तया। २. क-द. यत्र वार्त्ता। प्रवर्त्तन्ते। ३. क. तानेत्याह। ४. क. गृह्यादीनि। ५. क. कथनेनोद्देशः । ख. स्मरणोद्देशः । ६. क. अटम्यानयसाक्षात्। ७. क. तथा बोप्साधोते।

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नाटयशाब्ने

बाह्यं वा मध्यमं वापि तथैवाभ्यन्तरं पुनः। 5 दूरं वा सन्निकृष्टं वा देशं तु परिकल्पयेत्'।। ८।। पूर्वप्रविष्टा ये रङ्गं ज्ञेयास्तेऽभ्यन्तरा१ बुधैः। पश्चातप्रविष्टा 'विज्ञेया: कक्ष्याभागे तु बाह्यतः" ॥ ९॥

विशिष्टे देश इत्युक्तं तं रङ्गपीठस्य विशेषं वशयति-बाह्यं वेत्यादि। भागत्रितये सति का्मिश्चिद्भागे देशादि कल्पयित्वा तत्रैव दूरादिभेदं परिकल्पेत, भूयस्त्वाल्पत्वादि भिन्नेन परिक्रमेण कल्पयेदित्यर्थ।।।८।। बाह्यादिभेदं निरूपयति पूर्वप्रविष्टा इति। अभिनव-अभिनवगुप्त का कथन है कि सब जगह प्रयोग होने पर सभी त्रेलोक्यवर्त्ती का स्थान भेद से क्या वहाँ प्राप्त होना सम्भव है ? इस पर कहते हैं कि नहीं, इसलिए कहत हैं कि नगर में इत्यादि। यहाँ पर अटवो (जंगल), नदी, उद्यान, आश्रम, आराम आदि का साक्षात् बोध में पदों से कथन नहीं है अतः उनका निपातों से ग्रहण करना चाहिए, यह बात 'वा' शब्द की वोप्सा से घोषित होती है। जहाँ-जहाँ पर वार्त्ता अर्थात् इतिवृत्त के कथन से प्राप्त वृत्तान्त प्रकृष्ट रूप से हो, वहाँ उनके मध्य में स्थित जो देश विशेष हैं, उसी को प्रवर्त्तित करे अर्थात् रङ्गपीठ पर दिखाये, सभी देशों को नहीं ।। ७॥ 1अभिनव-विशिष्ट देश, यह जो कहा गया है, अतः उस रङ्गपीठ के विशेष देश को 'बाह्यं वा' इत्यादि से दिखाते हैं- अनुवाद-बाहर या मध्य में, उसी प्रकार भीतर, अथवा दूर या पास में देश को कल्पना करनी चाहिए ।। ८।। रङ्गपोठ के तीन भाग होने से किसी भाग में देशादि की कल्पना करके उसी में दूरादि भेदों की कल्पना करे। अभिनय के भूयस्तव (आधिक्य) और अल्पत्व के कारण भिन्न हुए परिक्रम से हो कल्पना करे, यह इसका भाव है, अर्थ हैं ॥ ८॥ अब बाह्यादि भेद का निरूपण करते हैं- अनुवाद-जो पहिले रङ्गमञ्न पर प्रवेश कर चुके हैं, उन्हें विद्वानों को आभ्यन्तर पात्र समझना चाहिए और जो बाद में प्रविष्ट हुए हैं, उन्हें कक्ष्या भाग में बाह्य समझे ॥ ९॥ १. ख. देशात् । २. क-द. समुपलक्षयेत्। भ. समुपपारयेत्। ३. ख ग. अभ्यन्तरे। ४. ग. ते ज्ञय: । ५. ग. (टि०) कथाभागे तु मध्यतः ।

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तेषान्तु दर्शनेच्छुर्यः प्रविशेद्रङ्गमण्डलम्। दक्षिणाभिमुखः 'सोडय कुर्यादात्मनिवेदनम् ॥ १० ॥

पूर्वभूताः प्रधानभूता सन्तः पूर्व ये प्रविष्टास्ते अभ्यन्तरा इति तदधिष्ठितो देशविशेषोऽ्भ्यन्तरकक्ष्या प्रधानभूतस्तु पूर्वप्रविष्टोऽपि प्रधाने प्रविशति स्वकक्ष्यान्त्य इत्येव । पश्चात्प्रविष्टानां तु स्थानं बाह्यकक्ष्या। ते तु येन स्थानविशेषेण प्राक् प्रविष्टमुपसर्पन्ति स देशो मध्यमा कक्ष्या ॥ ९॥। एतदुक्तं भवति पूर्वप्रविष्टस्य स्वस्थान एवेतिवृत्तोचितगृहोद्यानादिविभागः पश्चात्प्रविष्टस्यापि पूर्वप्रविष्टेन सह यावन्न संमिलनं, तावत्प्रेक्षायामेव। मध्यम- कक्ष्यायां तु गतिपरिक्रमादिः तत्संमेलनार्थम्। संमिलितानां तु कक्ष्याविभागो विच्छिद्यत इति संमेलन इतिकर्तव्यतामाह-तेषां त्विति।

अभिनव-यहाँ पूर्व शब्द का अर्थ दो प्रकार से होता है-एक पूर्वभूत अर्थात् प्रधानभूत। अतः प्रधान होने के कारण जो पहिले प्रविष्ट हैं, वे आभ्यन्तर हैं, इसलिए उनसे अधिष्ठित देशविशेष को आभ्यन्तर कक्ष्या कहते हैं। दूसरा पूर्व का अर्थ अप्रधानभूत। अप्रधानभूत पूर्व में प्रविष्ट हुआ भी प्रधान के प्रवेश करने बाद भी अपनी कक्ष्या के अन्त ही में रहेगा। पीछे से प्रवेश करने वालों का स्थान तो बाह्य कक्ष्या है। जो जिस स्थान-विशेष के द्वारा पूर्व प्रविष्ट का उपसर्पण करने वालो का स्थान विशेष मध्यम कक्ष्या है॥ ९॥

अभिनव-यहाँ यह कहा गया है कि पूर्व प्रविष्ट का अपने स्थान में ही इतिवृत्त के योग्य गृह एवं उद्यानादि का विभाग है और पीछे प्रवेश करने वालों का भो जब तक पूर्व प्रविष्ट हुए के साथ सम्मिलन नहों होता तब तक प्रेक्षागृह में ही वह विभाग है। मध्यम कक्ष्या में तो उनके साथ सम्मेलन के लिए गति, परिक्रम आदि करना चाहिए। सम्मिलित हो जाने पर तो उनका कक्ष्या-विभाग विच्छिन्न जाता है। अतः सम्मेलन के विषय में इतिकर्त्तव्यता को कहते हैं-तेषां तु इत्यादि- अनुवाद-उनमें भी दशन के इच्कक जो प्रेक्षक रङ्गमण्डप में प्रवेश करते हैं उन्हें वक्षिणाभिमुख होकर आत्म निवेदन करना चाहिए। १०॥

१. ग. दर्शनेच्छः सन्। ३. ब. वक्षिणाभिमुखं। ३. कन्त, सो वै।

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नाडयशाभे

यतो मुखं भवेद्भाण्डं द्वारं नेपथ्यकस्य च। 2सा मन्तव्या तु दिक्् पूर्वा नाट्ययोगेन नित्यशः॥ ११॥ पूर्वप्रविष्टानां कर्मणि षष्ठी पूर्व प्रविष्टस्य यो दक्षिणो भागस्तं वीक्षमाणः स्थितो यथा प्रेक्षकस्य यः पराङ्मुखी भवतीत्यर्थः। एषां प्रवृत्तये दाक्षिणत्यादिके क्रमः एतद्विपरीतमन्यत्र। प्रवृत्त्यवयवोद्भाविनं क्रममथशब्देन सूचयति तेनेदमाह प्राधान्येनोत्तराभिमुखं दक्षिणस्यामात्मनिवेदनं यथावदितिवृत्तवशात्तादृङ् निबध्यते। पूर्वप्रविष्टैः सह संमिलितस्य सर्व बाह्यकक्ष्यायामेवेति तुशब्दस्यार्थः ॥१० ॥ का खल्विह पूर्वा दिगित्याह-यतोमुखमिति समस्त पदम्। यदपेक्षं भाण्डस्य मुखं सा दिक पूर्वा। ननु भाण्डस्य मुखं दुर्मानमित्याह द्वारमति। नेपथ्यग्रहणेन गृहस्य पूर्वमुखं द्वारम्। भाण्डोपावानं तु तस्य प्रतियोजने पूर्वतां प्रकटयति प्राधान्यज्ञापनेन ॥ ११ ॥ अभिनव-यहाँ 'पूर्व प्रविष्टानां' में कर्म में षष्ठी है। पूर्व प्रविष्ट पात्र का जो दक्षिण भाग है उसको देखता हुआ ऐसा खड़ा हो जिसमें प्रेक्षक से पराङ्मुख हो जाय। पूर्व प्रविष्टों इनकी प्रवृत्ति के लिए दाक्षिणादि में क्रम है। अन्यत्र अर्थात् बाद में प्रविष्ट पात्रों का इसके विपरीत क्रम है। यह क्रम अथ शब्द से सूचित होता है। इसलिए ऐसा कहते हैं कि प्रधानता के कारण उत्तराभिमुख होकर दक्षिण दिशा में आतम निवेदन करना केवल इतिवृत्त के वश से (यथानत) उचित है। पूर्व में प्रविष्ट हुए पात्रों के साथ सम्मिलित हुए पात्रों का सब कुछ बाह्य कक्ष्या में ही होता है, यह 'तु' शब्द का अर्थ है ॥ १० ।। पूर्व दिशा कौन है ? इस पर कहते हैं- अनुवाद-जिधर अर्थात् जिस ओर भाण्डवाद्य का मुख हो और जिस ओर नेपथ्यगृह का द्वार हो, नाटयप्रयोग में उसे पूर्व दिशा समझनी चाहिए।। ११ ।। १. अयं क्लोका 'ख' पुस्तके नास्ति । २. क-भ. पूर्वादि विक्षु विज्ञयं प्रयोगे नाट्यसंश्रये। १. क-द, माठयषोगे तु नित्पनः।

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निष्क्रामेद्यश्च तस्माद्वै स तैनव यथा व्रजेत्। यतस्तस्य कृतं तेन पुरुषेण निवेदनम्॥ १२॥ 'निष्क्ान्तोऽर्थवशाच्चापि प्रविशेददि' तद् गृहम्। यतः प्राप्तः स पुरुषस्तेन "मार्गेण निष्क्रमेत् ॥ १३ ॥। अथवार्थवशाच्चापि तेनैव सह गच्छति। तर्थव प्रविशेत् गेहमेकाकी सहितोऽपि वा ॥ १४ ॥ तेनैवेति पूर्वप्रविष्टपात्रान्तरयोगेनेत्यर्थ:॥।१२।। अभिनव-'यतो मुखम्' यह समस्त पद है। जिसकी अपेक्षा से भाण्डवाद्यों का मुख हो, वही पूर्व दिशा है। अब प्रश्न यह है कि केवल भाण्ड के मुख को प्रमाण मानना कष्टकर है। इस पर कहते हैं कि द्वार को प्रमाण मानकर। क्योंकि द्वार विधिपूर्वक निर्मित होता है। नेपथ्य पद के ग्रहण से ज्ञात होता है कि नेपथ्यगृह का द्वार पूर्वाभिमुख होता है। भाण्ड पद का उपादान तो उसकी प्रतियोजना रहने पर प्रधानता के कारण पूर्व दिशा को सूचित करता है ॥ ११ ॥ अनुवाद-जो व्यक्ति जिस मा्ग से निष्क्रमण करे, वह उसी माग से वैसे ही प्रवेश करे, क्योंकि उस व्यक्ति ने उसो मार्ग का उपयोग किया था॥ १२॥ अभिनव-यहाँ 'तेनेव' पद का अर्थ है पूर्व में प्रविष्ट पात्र के अनन्तर प्रविष्ट दूसरे पात्र के सम्बन्ध से ॥ १२॥ अनुवाद-किसी प्रयोजन से बाहर निकल जाने पर यदि वही व्यक्ति पुनः उस गृह में प्रवेश करे तो जिस मार्ग से वह प्रवेश किया था उसी मार्ग से निकल जाय ॥ १३ ॥ अनुवाद-अथवा किसी कार्यवश कोई व्यक्ति किसी के साथ जिस मार्ग से बाहर जाता है तो उसे उसी के साथ अथवा अकेले उसी मार्ग से उसी प्रकार प्रवेश करना चाहिए॥। १४॥ १. ख. ग. पुस्तकयो अय श्लोक: इत्ं पठयते । निष्क्रामेच्वापि यस्तत्र नरः कार्येण केनचित्। स निष्क्रमेत्तु तेनैव कुतं येन निवेशनम्। २. इतः परं क्लोकचतुष्टयं क.ख. पुस्तकयोर्नास्ति। ३. क-द. निवेशेदत्र तद्गृहम् । क-द-न. थिशेददि तद्गृहम्। ४. क-ज. प्राप्तः स पुरुषो येन। ५. क-न. तेनैव थथा ब्रजेत्। ६. क-ह. यदप्यर्थ वशानचंव। ७. क. तथैव प्रविषेद्रङ्गम्। ना. चा०-२०

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तयोश्चापि प्रविशतोः 'कक्ष्यामन्यां विनिर्दिशेत्।ी परिक्रमेण रङ्गस्य त्वन्या कक्ष्या विधीयते ॥ १५।। समैश्च सहितो गच्छेन्नीचैश्च परिवाहितः । अथ प्रेक्षणिकाश्चापि विज्ञेया ह्याग्रतो गतौ ॥ १६ ॥ सैव भूमिस्तु बहुभिविकृष्टा स्यात्परिक्रमैः । मध्या वा सन्निकृष्टा वा तेषामेवं विकल्पयेत्॥ १७ ।। 'एवं बाह्यं वा मध्यमं वापि तथैवाभ्यन्तरमिति दूरं वा सन्निकृष्टं वेत्यादि विभजति सैव भूमिरिति॥१७॥ विकल्पानां मध्याल्पत्वरचनादिश्च न केवलमल्पत्वबहुत्वकृतमेव ? परिक्रम- वैचित्र्यं यावदन्यदपीति दर्शयति नगरे वेत्याबिना प्रयोगत इत्यन्तेन। अनुवाद-इस प्रकार दोनों पात्रों के प्रवेश करते समय अन्य कक्ष्या की सूचना दी जाय और रङ्गमञ्न के परिक्रमण से अन्य कक्ष्या का विधान होना चाहिए॥ १५॥ अनुवाद-समान श्रेणी के पात्रों के साथ-साथ चलना चाहिए और अधम पात्रों के साथ परिवारित (घिरे हुए) होकर चलना चाहिए तथा चलने के समय प्रतीहारी को आगे चलना बताया जाय ॥ १६ ॥ अभिनव-अब पूर्वोक्त बाह्य, मध्य एवं आभ्यन्तर तथा दूर, मध्य एवं सन्निकृष्ट के बिभाग के कहते हैं- अनुवाद-रङ्गमण्डप की वही भूमि, यदि बहुत परिक्रमण करने पड़े तो 'विकृष्टा', यदि मध्य परिक्रमण करने पड़े तो 'मध्या' और यदि थोड़ा परिक्रम करने पड़े तो 'सन्निकृष्टा' कहलाती है। परिक्रम के कारण उस भूमि का विकल्प इस प्रकार करना चाहिए ॥ १७ ॥ अभिनव-भूमि की विकृष्टत्वादि का रचना केवल बहुत्व एवं अल्पत्व के कारण ही नहीं, बल्कि परिक्रम-वैचित्र्य के कारण भी होती है, इसो बात को कहते हैं- १. ख.ग. काण्ठामन्यां। २. क-द. प्रेषणकाः । क-न. प्रेषणिकाः । ३. क-भ-म. इदं श्लोकार्घं नास्ति। ४. क, एवं बाह्ये बा मध्यमे वापि तथैवाभ्यन्तर इति विकृष्ट दूराभित्यादि।

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१५५

नगरे वा वने वापि सागरे पर्वतेऽपि वा दिव्यानां गमनं कारयं 'दोपे वर्षेषु वा पुनः ॥।१८।। आकाशेन विमानेन माययाप्यथ वा पुनः। विविधाभि: क्रियाभिर्वा नानार्थाभि: प्रयोगतः ॥ १९ ॥ नाटके च्छन्नवेषाणां दिव्यानां भूमिसञ्चरः । मानुषैः कारणादेषां यथा’ भवति दर्शनम् ॥ २० ॥ प्रयोगो नाट्यम्। दिव्यानां देवयोनीनां पिशाचादिब्रह्मान्तानां यन्नगरादि- द्वीपादिविषयाऽडगमनं तदाकाशेनैव आकाशगामिना विमानेन, मायया वा अदर्शन- रूपया, अन्याभिर्वा बलादाहरणादिक्रियाभिविविधप्रयोजनाभिः कार्यमिति सम्बन्धः ॥ १९ ॥ न च द्विव्यानामेष एव प्रकारः किं तु अन्योऽप्यस्तीत्याह नाटक इति। अनुवाद-दिव्य पात्रों को नगर, वन, पर्वत, समुद्र, भारतवर्षादि वर्ष तथा द्वोप आदि सभी स्थानों में आकाश मार्ग से, विमान से, अथवा माया के द्वारा अथवा विविध क्रियाओं के द्वारा नाना प्रकार के प्रयोगों के द्वारा गमन करना चाहिए॥ १८-१९ ।। अभिनव-प्रयोग-जो नाव्य में किया जाता है दिव्य अर्थात् पिशाचादि से लेकर ब्रह्म पर्यन्त सभी देव योनियों का नगर, द्वीप आदि स्थानों में गमन आकाशगामी विमान से अथवा अदर्शन रूप माया से अथवा नाना प्रयोजनवती आहरणादि रूप विविध क्रियाओं के द्वारा करना चाहिए। १८-१९।। PP अभिनव-दिव्यों के लिए केवल यही उपर्युक्त एक ही प्रकार नहीं है, किन्तु अन्य भी प्रकार है, उसको कहते हैं- अनुवाद-नाटक में दिव्य पुरुषों का प्रच्छन्न वेष में पृथ्वी पर संचरण होना चाहिए; क्योंकि कारण विशेष से ही मनुष्यों को इस विव्य विभूतियों का वर्शन होता है॥ २० ॥ १. कनन. द्वोपवषेयु बा पुनः। क-प. वर्षाद्वीपेषु वा पुनः। २. कनन. मानुषैः कारणरेषां। ३. क-न. प्रयोक्तुभिः। क, यदा।

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१५६ नांवयसारते

भारते त्वथ हैमे वा हरिवर्ष इलावृते। शीक रम्ये किंपुरुषे वापि कुरुषूत्तरकेषु वा॥। २१॥ दिव्यानां छन्दगमनं सर्ववर्षेषु कोतितम्। भारते मानुषाणाज्च गमनं संविधीयते ॥ २२॥ गच्छेद्यदि विकृष्टस्तु देशकालवशान्नरः। 'अङ्कच्छेदे तमन्यस्मिन् निर्दिशेद्धि प्रवेशके ॥ २३ ॥

वेषशब्देन चापादतलं वपुर्लक्ष्यते। तेन वरप्रदानाद्यनुग्रहनिमित्ताच्छन्नस्व- रूपाणां देवानां मानुषे दर्शनं भवति, तदा नाटके प्रयोगे तेषामपि भूमिसञ्चरः, संचरत्यस्मिन्निति सञ्चरः भूमिरेव ॥ २० ॥ अयं तु देवेषु सामान्यकल्प इत्याह-दिव्यानामिति। पुराणेषु त्वयं सामान्यविधिरित्याह-भारत इति न त्विलावृतावावि- त्यर्थ: ॥२२।। अभिनव-वहाँ वेष शब्द से पादतल तक शरोर लक्षित होता है। इससे यह प्रतीत होता है कि वरदान आदि अनुग्रह के कारण ही प्रच्छन्न स्वरूप वाले देवताओं का मनुष्य के रूप में दर्शन होता है, ऐसी अबस्था में नाटक के प्रयोग में दिव्यों का भी भूमि पर सञ्चार होता है, क्योंकि जहाँ धूमते हैं वहाँ भूमि ही होगी ॥ २० ॥ अभिनव-अब देवताओं के सामान्य कल्प (प्रकार) का निरूपण करते हैं- अनुवाद-भारतवर्षं और हिमपर्वत पर, हरिवर्ष, इलावृत्तवर्ष, रम्य किंपुरुष वर्ष (किन्नर प्रवेश ) अथवा उत्तर कुरु प्रदेश में सभी वर्षों में दिग्य पात्रों का स्वतन्त्र गमन कहा गया है। किन्तु भारतवर्ष में तो मनुष्यों के गमन का संविधान है ही। २१-२२।। अभिनव-पुराणों में तो यह सामान्य-विधान कहा गया है। यह भारतवर्ष में ही, न कि इलावृत्त आदि वर्षों में। यह भावार्थ है॥ २१-२२।। अनुवाद-यदि कोई मनुष्य कार्यवश दूरदेश में जाय तो अङ्क का विच्छेद होने पर दूसरे अङ्क के प्रारम्भ में प्रवेशक के द्वारा प्रवर्शित करे ॥ २३॥ १. ख. वर्षेष्वेतेषु कारयेत्। २. विकृष्टं यस्तु गच्छेद्धि देशं कायवशान्नरः । क-द. गच्छेद्यदि विकृष्टं तु देशं कालवशाग्नरः। म. पुस्तके इतः पञ्च श्लोका: न सन्ति। ३. क-ज. अङ्कच्छेदेन चाम्यास्मिन् निर्विधेत्तं प्रवेशके।

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त्रयोदशोऽ्याय: अह्हः प्रमाणं गत्वा तु कार्यलाभं विनिर्दिशेद्। "तथालाभे तु कार्यस्य अङ्कछेदो विधीयते ॥ २४ ॥ क्षणो मुहर्तो यामो वा दिवसो वापि नाटके। `एकाड्के सविधातव्यो बीजस्यार्थवशानुगः ॥ २५।। "अङ्कच्छेदे तु निर्वृत्तं मासं वा वर्षमेव वा। नोर्ध्व वर्षात्प्रकर्तव्यं कार्यमडकूसमाश्रयम् ॥२६॥ एवन्तु भारते वर्षें कक्ष्या कार्या प्रयोगतः । "मानुषाणां गतिर्या' तु दिव्यानान्तु निबोधत॥। २७।। अनुवाद-दिन के प्रमाण के अनुसार किसी स्थान पर जाकर काय-सिद्धि का निर्वेश करे। यवि उतने समय में उस प्रकार का लाभ न हो तो अङ्कच्छेद कर देना चाहिए॥। २४॥ अनुवाद-नाटक में क्षण, मुहूर्त, प्रहर अथवा एक दिन का वृत्त बीज के प्रयोजन के अनुसार एक ही अङ्कू में समाप्त कर देना चाहिए॥ २५ ॥ अनुवाद-वर्ष अथवा मास के कार्य को अङ्कच्छेद में (अङ्क की समाप्ति पर) निवर्त्तन (समाप्त) कर देना चाहिए। एक अङ्क में कार्य को एक वर्ष से अधिक के नहीं होने चाहिए॥ २६ ॥ अनुवाद-इस प्रकार भारतवर्ष में प्रयोग के अनुसार कक्ष्या का विभाग करना चाहिए। यह मनुष्यों की गति हैं। अब विव्य पात्रों की गति को समझे ॥।२७॥ १. ख. ऊर्ष्वप्रमाणं। क-ज. अङ्कप्रमाणं । २. क-न. तथालाभेषु कार्य स्यात। क-भ, तथालाभे तु कार्य स्यात्। ३. क-ज. मध्याह्वा दिवसोऽपि वा। ४. क-ज. अद्के अद्टू। ५. ख. अङ्कच्छेदं पुनवृ'त्त। ६. क-उ. कक्ष्या कार्या प्रयोक्तुभिः । ७. ख. मानुषाणां गतौ येषां दिव्यानां तु निबोधत। ८. क. (टि०) गतिर्शेया। गतिहर्येषां। गतिर्यास्तु।

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नाट्यशाचे

हिमवत्पृष्ठसंस्थे तु कैलासे पर्वतोत्तमे।णमर ाध यक्षाशच गुह्यकाश्चव धनदानुचराश्च ये ॥ २८ ॥ रक्षःपिशाचभूताश्च सर्वे हैमवताः स्मृताः । हेमकूटे च गन्धर्वा विज्ञेया: साप्सरोगणा: ॥ २९ ।। सर्वें नागाश्च निषधे शेषवासुकितक्षकाः। महामेरौ त्रर्यास्त्रिशद् ज्ञेया देवगणा बुधैः ॥ ३०॥ नीले तु वैडूर्यमये "सिद्धा ब्रह्मर्षयस्तथा। दैत्यानां दानवानाञ्च इवेतपर्वत इष्यते ॥ ३१॥ वर्षे प्रचारावाह-हैमतो इति। हिमवति बाहुल्ये नैषां गतिरित्यर्थ:। एवं सवंत्र ॥ २८-२९।। नील इति अद्रिविशेषे, तस्यैव विशेषणं वैडूर्यमये, एतच्च कवे: शिक्षार्थम् ॥ ३१ ॥ अनुवाद-हिमालय पर्वत के पृष्ठभाग पर स्थित पर्वतश्रेष्ठ कैलास पर रहने वाले जो यक्ष, गुह्यक और कुबेर के अनुचर और राक्षस, भूत, पिशाच हैं, वे सब 'हैमवत' अर्थात् हिमालय पर्वत के वासी हैं और अप्सराओं सहित गन्धवं हेमकूट पर्वत के निवासी हैं॥ २८-२९ ॥ अभिनव-वर्ष अर्थात् हरिवर्ष, किंपुरुष वर्ष आदि वर्षो में विचरण करने के कारण ये देवता 'हैमवत' कहे जाते हैं। हिमवान् में इनकी गति (प्रचार) अधिक है। इसी प्रकार सब जगह समझे ॥ २८२९ ॥ l अनुवाद-शेष, वासुकि, तक्षक आदि सभी नाग निषध पर्वत पर रहते हैं। और विद्वान् पुरुष तैंतोस देवताओं को महामेरु (सुमेरु) पर्वंत का निवासी समझें ॥ ३०॥ अनुवाद-वैदूर्यमणि वाले नीलगिरि पर सिद्ध और ब्रह्मषि निवास करते हैं और दैत्य एदं वानवों का निवास-स्थान श्वेत पर्वत पर हैं॥ ३१॥ अभिनव-नील यह पर्वत विशेष का नाम है। उसी का विशेषण वैदूर्यमणि- मय है। यह कवि को शिक्षा के लिए कहा गया है॥ ३१ ॥ १. क.ग. रक्षोभूतापिशाचाश्च। क-ट. रक्षः पिशाचा भूताश्च । २. क-ट. विजेयाप्सरसां गणाः । ३. क-म. शेषप्रभृतयः स्मृताः । ४ ख. तथा। क.(टि.) द्विजाः । ५. ख. सिद्धव्रह्मर्षयस्तथा। ६. क. ग. उच्यते।

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त्योदशोडध्याय: १५९

पितरश्चापि विज्ञया शृङ्गवन्तं समाश्रिता: इत्येते पर्वताः श्रेष्ठा दिव्यावासाः प्रकीरतिता:२॥ ३२॥ तेषां कक्ष्याविभागश्च जम्बूद्वोपे भवेदयम्। तेषां न चेष्टितं कार्य स्वैः स्वैः कर्मपराक्रमैः ॥३३॥

दिग्यानां पिशाचादिब्रह्मान्तानामावासः ।। ३२॥ ननु वर्षान्तरेषु दिव्यपरवतेषु यदुचितं गमनं तत्कत्तुं शक्यमित्याह तैषामिति। चकार इवाथें। जम्बूद्वीप इव दिव्यपर्वतेष्वपि। दिव्यानामपि कक्ष्याविभागः स्थानविशेषोपलक्षिता गतिरित्यर्थः । एतत् स्फुटयति न तेषामिति ॥३३ ॥

अनुवाद-पितरों को शुङ्गवान् पर्वत का निवासी समझना चाहिए। ये पर्वतश्रेष्ठ दिव्यों (दिव्यपात्रों) के आवास-स्थान कहे गये है।। ३२॥ अभिनव-दिव्यों का अर्थात् पिशाच आदि से लेकर ब्रह्म पर्यन्त दिव्यों आवास दिव्यावास है ॥ ३२ ॥। अनुवाद-उन दिव्यों का कक्ष्या-विभाग जम्बू द्वीप में होता है। इन वेवताओं की चेष्टाएँ अपने-अपने कर्म और पराक्रम के अनुसार नहीं होनी चाहिए॥३३॥ अभिनव-'तेषाम्' इत्यादि के द्वारा वर्षान्तरों में होने वाले दिव्य पर्वतों पर जो गमन उचित है, उसे करना चाहिए, यह द्योतित होता है। यहाँ पर 'कक्ष्या- विभागश्च' में 'चकार' इव के अर्थ में उपात्त है। जम्बू द्वीप के समान दिव्य पर्वतों पर भी कक्ष्या-विभाग है। अतः दिव्यों की भी स्थान-विशेष में उपलक्षित गति होती है। इसी बात को 'तेषाम्' इत्यादि के द्वारा स्फुटित करते हैं ॥ ३३॥

१. क-म. शृङ्गवद्धिरिवासिनः । २. क. ग. दिव्यवासा भवन्ति हि। ३. ग. कथाविभागस्तु । ४. ख.ग. तेषां तु। ५. क-क. द्वीपान्तरेषु।

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१५० नाटचार्त्रे

परिच्छेदविशेषस्तु तेषां मानुषलोकवत्। सर्वे भावाश्च दिव्यानां कार्या मानुषसंश्रयाः ॥३४॥ 'तेषां त्वनिभिषत्वं यत्तन्न कार्य प्रयोक्तृभिः । इह भावा रसाश्चैव "दृष्टावेव प्रतिष्ठिताः ॥। ३५।। परिच्छेवविशेषश्च तदीय: परिचारः स्वाभितो न काय इत्यर्थ: परिच्छेदो वा ज्ञानं तद दूरव्यवहिताविविषयं न प्रवशनीयम्। कथं ताि, इत्याह मानुषेति मानुष- गत एवैषां सर्वो भावः कार्य:, कथं, मानुषलोकवत् यथा मानुषे लोके अंशावतरणे नायकानां रामावीनां किंचिदुत्कृष्टं सातिशयं मनुष्योचितमेव चरितं तथैव दिव्य- भावबहुवृ त्तोनामपोत्यर्थः।। ३४।। अनुवाद-उन दिव्यों के परिच्छेद-विशेष का अभिनय मनुष्य-लोक की तरह करना चाहिए। क्योंकि दिश्यों के सभी भाव मनुष्यों के समान दिखाना बाहिए॥ ३४॥। जडी अभिनव-परिच्छेद-विशेष का अभिप्राय है कि उन दिव्यों के परिवार (उपकरणों) को अपने चारों ओर नहीं रखना चाहिए। अथवा परिच्छेद का अर्थ ज्ञान है, अर्थात् दूरस्थ पदार्थ को जान लेना और व्यवधान रखे हुए (व्यवहित) पदार्थ को जान लेना आदि विषय नहीं दिखाना चाहिए। क्यों नहीं दिखाना चाहिए? इस पर कहते हैं कि इनके अर्थात् दिव्यों के सभी भाव मनुर्ष्यों के समान दिखाना चाहिए। कैसे ? कहते हैं मनुष्यों के समान दिखाना चाहिए। जैसे मनुष्य लोक में अंशावतार नायक रामादि का थोड़ा उत्कृष्ट एवं अतिशय विशिष्ट चरित मानवोचित ही है। उसी प्रकार दिव्य भावों की बाहुल्येन स्थिति भी मानुषोचित ही है अर्थात् उनका चरित मनुष्यों के समान दिखाना चाहिए॥ ३४॥ अनुवाद-दिव्यों अर्थात् देवताओं के निर्निमेषत्व का अभिनय नाटघ- प्रयोक्ताओं को नहीं करना चातिए। क्योंकि अभिनय में सभी भाव एवं दृष्टि पर ही अषिष्ठित है॥ ३५ ।।

१. ख. परिष्छेदाविशेषस्तु। २. क.ग. सर्वे भावास्तु। क.भ. सर्वो भावषच कार्यो मानुषसंश्रयः । ३. ग. तेषामनिमिषं यत्तु। ४. दृष्टयामेव।

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वृष्ट्या हि सूचितो भावः 'पुनरङ्गविभाव्यते एवं कक्ष्याविभागस्तु मया प्रोक्तो द्विजोत्तमा: ।। पुनश्चैव प्रवक्ष्यामि प्रवृत्तीनान्तु लक्षणम्॥ ३६॥

न निमषतीत्यनिमिषं रूपं तेषां नैव कार्यम्। तुरवधारणे अथ हेतुरिहेति। भावा व्यभिचारिणो, रसा: स्थायिनो दृष्टावेवेति वृष्टयामिति स्पष्ठयति। दृष्ट्येति सूचितः सूचाभिनय एव विभाव्यते विभावादिशेषयुक्तत्वे स्फुटो- भवतीत्यथ:। अत एव न तेषां चेष्टितमित्यनेन साध्योऽप्ययमर्थः पुनरुपात्तः प्राधान्यात्॥ ३६॥।

एवं सर्वोपकारित्वावुद्द शस्य संग्रहे सवं पश्चावभिधानं तेनैवं न यद्यपि कक्षया- विभाग: सूचितस्तथापि चारीपरिक्रमसङ्गेन गत्यध्यायानन्तरं वशितः। इवानों स्वाद्गिकोपयोगिधर्म्यादित्रयमुद्दिष्टं, तत्र वृत्तीनामग्रतो निरूपणं भविष्यति, तत्र च हेतुं वृत्त्यध्याय (अ-२० ) एव वक्ष्यामः । यद्यपि धर्मी पू्वमुददिष्टा तथापि यत्र वार्ता प्रवर्तेत' (१३-७ ) इत्यनेन कक्ष्याविभागकल्पितदेशभेदाभिधानप्रसङ्गेन च वेश-

अभिनव-जिसमें आँखों का स्पन्दन नहीं होता वह अनिमिष रूप है। उस अनिमिष रूप को यहाँ नहीं दिखाना चाहिए। क्यों नहीं दिखाना चाहिए ? कहते हैं कि इस लोक में भाव व्यभिचारी भाव है, रस स्थायो हैं, ये सभी भाव दृष्टि में ही हैं अर्थात् दृष्टि के द्वारा ही प्रस्तुत किये जाते हैं, इसी को 'दृष्टयाम्' के द्वारा स्पष्ट करते हैं।। ३५॥ अनुवाद-क्योंकि पहिले दृष्टि के द्वारा भावों को सूचित किया जाता है, फिर अङ्गों के द्वारा उसका अभिनय किया जाता है। हे द्विजशेष्ठों! इस प्रकार मैंने कक्ष्या-विभाग का वर्णन किया है। अब प्रवृत्तियों का लक्षण कहूँगा ॥ ३६॥ अभिनव-'दृष्ट्या सूचितः' से सूची चारी के द्वारा किया जाने वाला अभिनय अभिप्रेत है। क्योंकि सूचा चारो का अभिनय ही भाव-विशेष के योग में स्फुट होता है। अत एव 'न तेषां चेष्टितं कार्यम्' अर्थात् 'उनके चेष्टित को नहीं करना चाहिए। इस कारिका से साध्य अर्थ का यहाँ पुनः उपादान किया गया है। यह उनकी प्रधानता के कारण ॥ ३६ ॥

१. ब. पुनरङ्गः । ग. पकचावङ्गः। ना. प्ा०-२१

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चतुर्विधा प्रवृतिश्च प्रोक्ता नाट्यप्रयोगतः। ही गफक आवन्तो दाक्षिणात्या च पाउ्चाली चौड्रमागधो। ३७ ।।

विभाग प्रतिपन्नाः प्रवृत्तय आक्षिप्ताः। कि च पात्रस्य सति प्रवेशे कक्ष्याविभाग उत्तरद्वारेण वक्षिणात्यावन्त्यो प्रवेश:, अन्ययोस्तु सव्येनेत्येवं प्रवृत्तिविभागः प्रवेशक- भेदमाक्षिपति। सोऽपि तत्स्यानेनेदमिति तदुपयोगित्वेनापि समनन्तरं प्रवृत्तयो वक्तव्या इति मनसि कृत्वाह चतुविधेति।

प्र वृति-निरूपण

अभिनव-इस प्रकार सर्वोपकारी होने के कारण उद्देश के सङ्ग्रह में जो अभिधान किया गया है, उस अभिधान से यद्यपि कक्ष्या-विभाग की सूचना नहीं मिलती, तथापि चारी और परिक्रम के प्रसङ्ग से गत्यध्याय नामक बारहवें अध्याय के अनन्तर कक्ष्या-विभाग दिखा दिया है। इस सभय तो आङ्गिक अभिनय के उपयोगी धर्मी, वृत्ति, प्रवृत्ति तीनों का उद्देश्य क्रम से जो कथन किया था, उनमें वृत्तियों का निरूपण पहिले होगा, उसका हेतु वृत्यध्याय नामक बोसवें अध्याय में किया जायगा। उद्देश संग्रह में यद्यपि धर्मी का पहिले कथन है तथापि 'यत्र वार्त्ता प्रवर्त्तेत' इसके द्वारा कक्ष्या-विभाग के लिए कल्पित देश-भेद के अभिधान के प्रसञ्ज से देश- विभाग प्रतिपन्न है और प्रवृत्तियाँ आक्षिप्त हैं और भी पात्र के प्रवेश करने पर जो कक्ष्या-विभाग होता है, वह दाक्षिणात्य और आवन्ती में उत्तर द्वार से प्रवेश करना चाहिए और अन्य पाञ्चाली और औड्मागधी में वामद्वार से प्रवेश करना चाहिए, इस प्रकार प्रवृत्ति-विभाग प्रवेशक भेद का आक्षेप करता है। वह प्रवेशक भेद भी उस स्थान से 'यह करना, ऐसा करना' इस प्रकार वृत्ति के उपयोगी होने पर भी वृत्तियों के समनन्तर प्रवृत्तियों को कहना चाहिए, इस बात को मन में रखकर कहते हैं- अनुवाद-नाटय-प्रयोक्ताओों ने चार प्रकार की प्रवृत्तियों को कहा है- भावन्ती, वाक्षिणात्या, पाञ्चाली और औड्रमागधी।। ३७। S tlg

१. क.ग. प्रोक्ता नाटयप्रयोक्तृभिः। क-न. प्रयोज्या नाटयप्रोक्तृभि।। क-म. विज्ञया नाट्यकोविदैः। क-द. प्रयोगतः नालसंश्रया। २. कनप. चान्ध्रमागघी। क-ड. चैव मागधी।

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पेचोदशोकवाय: अत्राह प्रवृत्तिरिति कस्मात् ? उच्यते पृथिव्यां 'नानावेशवेष- भाषाचारवार्ताः प्रस्यापयतीति" वृत्तिः । 'प्रवृत्तिश्च निवेदने। अत्राह- यथा पृथिव्यां बहवो 'देशाः सन्ति, कथमासाञ्चतुर्विधत्वमुपपन्नं, समानलक्षणश्चासां प्रयोग 'उच्यते, सत्यमेतत्। समानलक्षण आर्सां प्रयोग:। किन्तु नानादेशवेषभाषाचारो लोक इति कृत्वा लोकानुमतेन वृत्तिसंशरितस्य® नाट्यस्य वृत्तोनां मया चतुर्बिधत्वमभिहितं भारतो" सात्त्वतोकैशिक्यारभटी चेति। अनुवाद-इस विषय में भरतमुनि कहते हैं कि इन्हें प्रवृत्ति क्यों कहते ? इस प्रश्न क्रा उत्तर देते हुए कहते है कि पृथ्वी पर विभिन्न प्रदेशों में प्रचलित नाना वेष-भूषा, भाषा, आचार और वार्ता को ख्यापन करने वाली वृत्ति हो 'प्रवृत्ति' है और निःशेष ज्ञान रूप अर्थ में प्रवृत्ति शब्द है। इस विषय में पुनः प्रश्न जठता है कि जब पृथ्वी पर अनेक देश हैं तो इन प्रवृत्तियों का चतुबिधत्व कैसे संगत होगा ? क्योंकि इनके प्रयोग का लक्षण समान है। इस पर कहते हैं कि यह सत्य है कि इनके प्रयोग (अभिनय) में लक्षण की समानता है। किन्तु नाना देशों में विभिन्न वेष, भाषा, आचार वाले लोग हैं, इसलिए लोक के अनुमत लोक के रचि के अनुसार वृत्तियों पर आश्रित नाटय की चार प्रकार को वृत्तियों को मैंने कहा है- भारती, आरभटो, सास्वती और कैशिकी।

१. क-न. नानादेशकुतान् वेषकृतान्। २. क-8. प्रक्यापयन्तीति। क-म. आख्यापयतीति। ३. ख. वृत्तिष्च। ४. क-ग, नानादेशाः। ५. कनम. अत्रोच्यते एवमेतत् । ६. ग. लोकानुमतेऽनुवृत्तिसंश्रितमस्य। ख. संश्रितस्य नाटपस्य। क-म. वृत्तिसमाशितस्य प्रयोगस्य । ७. ख. ग. भारत्यारभटोसातवतोकैशिको चेति। वृत्तिसंश्रितेष्वमीषु प्रयोगेष्वभिरता।

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११४ मोडयशारने

वृत्तिसंश्रितश्च प्रयोगैरभिहिता देशाः । यतः 'प्रवृत्तिचतुष्टय मभिनिर्वृत्तं प्रयोगश्चोत्पादितः२ । प्रवृत्ति: कस्मादिति प्रश्नाः । कस्माविति चतुष्कप्रश्नः । अर्थ तावदाह पृथिव्यामिति। प्रवृत्ति: देशविशेषगता वेषभाषासमा- चारवैचित्र्य प्रसिद्धिरुच्यते। तत्रैवं योजना देशे वेशे येष्वेव वेषादयो नेपथ्यं, भाषा वा, आचारो लोकशास्त्रव्यवहार:, वार्ता कृषिपाशुफल्याविजोविका इति तान् प्रख्यापयति पथिव्याविसवंलोकुविद्याप्रसिद्धि करोति। प्रवृत्तिर्बह्यारथें यस्मान्निवेदने निःशेषेण वेवने ज्ञाने प्रवृत्तिशब्दः। 'अस्त्येषा' भुवने प्रवृत्तिरभवद्रामेण रामस्य यत्" इत्यादौ। अनुवाद-वृत्तियों के आधार पर किये जाने वाले प्रयोगों के आधार पर चार देश कहे गये हैं। क्योंकि इन्हों चार देशों के आधार पर प्रवृत्तियों के चार प्रकार उपपन्न हुए और प्रयोग भी किया जाने लगा। अभिनव-अब प्रश्न होता है कि इन्हें प्रवृत्ति क्यों कहते हैं ? इनको प्रवृत्ति मानने में क्या हेतु है? किस आधार पर ये प्रबृत्तियाँ है? और किससे ये प्रवृत्तियाँ उद्भूत हुई हैं ? ये चार प्रश्न यहाँ उपस्थित होते हैं ? इन्हीं चार प्रश्नों को लक्ष्य कर आचार्य कहते हैं-'कस्मादिति'। अभिनव-इनमें पहिले अर्थ को कहते हैं अर्थात् प्रवृत्ति के विषय को कहते हैं-पुथिव्यामिति। देश विशेष के वेष, भाषा, आचार-विचार और वार्ता के वेचित्र्य की प्रसिद्धि को 'प्रवृत्ति' कहते हैं। इसमें योजना इस प्रकार है-जिन-जिन देशों में जो वेष-भूषा, एवं भाषा प्रचलित है, जो आचार-विचार, लोक-व्यवहार एवं शास्त्रीय व्यवहार हैं, जो वार्त्ता अर्थात् कृषि, पशु पालन एवं वाणिज्य आदि जोविका है, उनका प्रख्यापन करने वाली वृत्ति 'प्रवृत्ति' है। वह पूथिवी आदि सब लोकों की को विद्या की प्रसिद्धि करता है, इसलिए उसे प्रवृत्ति कहते हैं। क्योंकि प्रवृत्ति बाह्य अर्थ के विषय में निवेदन अर्थात् निःशेष वेदन ज्ञान रूप अर्थ में प्रवृत्ति शब्द प्रयुक्त है। 'लोक में यह एक प्रवृत्ति है जो राम के द्वारा राम को है' इत्यादि में। १. क-म. यतस्ततः प्रवृत्तष्चतुष्टयमिति निवृ तम्। २. क. (टिप्पण्यां) द-भ. पुस्तकयो: दाक्षिणात्यालक्षणात्पूर्वमेवावन्तोळक्षणमुक्तं यथा- आन्मदाया आसिन्धोरापूर्वावर्त्तिनस्तथा। आपश्चिमार्समुद्राच्ब तथा सौवीरराष्ट्रतः ।। आहिमाद्रेस्तथा देशा विदेशश्चास्तरेण से। सास्वती कौशिकी युक्ता तेषामावन्तिकी हमृता।। ३. क-क, अस्पैषा।

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अथ संख्याप्रश्ने स्वाभिप्रायमाह यर्थेति वेशा इति। तत्कृत्वापि चतुष्टयो प्रवृत्तिरित्युक्तं न वत्वार एव वेशाः । स्यावेतदेव तावत्यस्तावदुक्ता अम्यधिकास्तु त्यक्ता इत्याशङ्याह समानलक्षणश्चारसां प्रयोग इत्युच्यते महदभिरिति शेषः। प्रयोग इति नाट्यम् । चतसृणामेवारसां समानलक्षणानामेतत्साधारणस्वभावः सर्वप्रयोग इत्येव व्यवहारः, युष्मन्मते न त्वन्यो व्यवहारः कश्चिद्दशितः । 'यथा च कामक्रोषलोभमोहैस्तु सावरणोकृतजगच्चिन्तादिः प्रदेश: आशु पराक्रियते तथा प्रकृतेऽपि। ननु चतुस्साधारणप्रयोग इत्येव नत्वन्योऽन्र प्रविशति व्यवहार इत्येतदुक्त्तम्। विस्मरणशोलो भवान् न स्म्यते। उक्तं पूर्वरङ्गान्ते (अध्याय ५वाँ) इत्येवाजवन्ति- पाञचालदाक्षिणात्योड्रगमागधो। कर्तव्यः पूर्वरङ्गस्तु । १८१ । इति पूर्वरङ्गस्य प्रयोगस्य गर्भाधानीयस्थानीय इत्युक्तम्। तत्रैवाम्युपगमपूर्वकमुत्तरमाह-तत्तु सत्य- मित्याविना नानादेशवेषेत्यन्तेन अभ्युपगमोक्तवेशाविशन्देन प्रवृत्तिमभिवषता। आसामिति व्याख्यानम्। कित्वित्यादिनोत्तरे एतदुक्तं भवति वृत्तिसंभितं बुत्तीरा- भितमेतच्चतुरविषम्। अभिनव-अब इन प्रवृत्तियों के संख्या के विषय में ग्रन्थकार अपना अभिप्राय कहते हैं-'यथा' इत्यादि से लेकर 'देशाः' तक। देश के नानाश्व को मानकर भी प्रवृत्तियाँ चार हैं, ऐसा कहा है देश भी चार हैं, ऐसा नहीं कहा है। कदाचित् इतनी हो कही गई है, और जो अधिक है, उन्हें छोड़ दिया हो, ऐसी आशकरा करके कहते हैं कि 'नाट्य-प्रयोग में लक्षणों की समानता है' ऐसा महान् लाग कहते हैं। 'प्रयोग' का अर्थ है नाट्य। इन चारों के लक्षण समान है, अतः समान (साधारण ) स्वभाव वाला प्रयोग सर्वत्र होता है, यही व्यवहार हैं। तुम्हारे मत में भी अन्य कोई व्यवहार नहीं दिखाया है। जैसे, काम, क्रोध, लोभ, मोह के कारण जगत् की चिन्ता आदि साधारण करके मनुष्य उस प्रदेश को शोघ्र छोड़ देता है उसी प्रकार प्रकृत में चार हो प्रवृत्तियों को कहा है, अन्यों को छोड़ दिया है।

१. क. तथा थ। २. क. कित्त्वित्यादिनोत्तरमाह। क-क. किचिदादिना।

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नाडंयशार्न्े

ह ननु का प्रवृत्ति: कि तथैवाम्युपगमः प्रवृत्तिः। नेत्याह लोकानुगुणानु- सारेग। लोकस्य हि दक्षिणापयः पूर्वदेशः पश्चिमदेशः उत्तरभूमिरिति चतुर्धा विभागोऽस्ति, न चैष निनिबन्धनः (चित्तवृत्तिभेद ) सादृश्यसंभवात। तथाहि दाक्षिणाश्येषु शृङ्गारप्रचुरतया कैशिक्या: संभवः। पश्चिमेष्वावन्त्येव संगृहीता एषु सापि, सति धर्मप्राधान्ये सात्वत्यस्ति। प्राच्येषु तु घटाटोपवाक्याडम्बर- प्राघान्याद भारत्यारभद्यो: योगः। उत्तरभूम्यां यद्यपि प्राधान्याद भारत्यारभटी- योगस्तथापि केशिकोलेशात्त श्रुङ्गारमयप्रयोगसहिष्णवो जनाः। यद्वक्ष्यते "प्रयोग- सत्वल्पगीतार्थ" (१३-५१) इति। अर्थशब्देन तत्प्रयोजनं नृत्तवाद्यादि । इत्येवं चित्तवृत्तिभेवसादृश्याल्लोकस्य यश्चतुर्धाविभाग: स एवास्मिन्नुक्त: ।

अब प्रश्न होता है कि चारों प्रवृत्तियों के प्रयोग साधारण हैं, यही व्यवहार यहाँ प्रवेश करता है, अन्य व्यवहार यहाँ प्रवेश नहीं करता, यहो तो आपने कहा है। इस पर कहते हैं-आप बहुत भुलक्कड़ हैं, बहुत भूलते हैं, अतः मैं याद दिलाता हूँ, सुनिये, पाँचवें अध्याय में पूर्वरङ्ग के निरूपण के अन्त में 'इत्येवावन्तिकापाच्चाली- दाक्षिणात्यौड्रमागधो। कर्त्तव्य: पूर्वरङ्गस्तु' अर्थात् 'इस प्रकार आवन्ती, दाक्षिणात्या- पाञ्चाली और औड्रमागधी लोगों द्वारा पूर्वरङ्ग का विधान करना चाहिए' यह कहना पूर्वरङ्ग के प्रयोग के लिए गर्भाधान स्थानीय है, ऐसा कहा है। इस विषय में अभ्युपगम पूर्वक अर्थात् स्वीकृति पूर्वक उत्तर देते हैं-'तत्तु सत्यमित्यादिना'-'नाना- देशवेषेत्यन्तेन' अर्थात् आपने जो कहा 'वह सत्य है', यहाँ से लेकर 'नाना देश-वेष' यहाँ तक के अभ्युपगम में उक्त देशादि शब्द से प्रवृत्ति को कहते हुए उत्तर देते हैं- 'आसाम्' इत्यादि को व्याख्या कर दो गई है, किन्तु 'इत्यादि' के द्वारा उत्तर में यह कहा गया है कि वृत्तियों के आश्रित ये प्रवृत्तियाँ चार प्रकार की होती हैं। TTHE अभिनव-अब पुनः प्रश्न उठता है कि प्रवृत्ति क्या है ? क्या जैसा कहा गया है, उसी प्रकार मान लेना प्रवृत्ति है? इस पर कहते हैं-नहीं। लोक के अनुकूल अनुसरण को ही प्रवृत्ति कहा जाता है। क्योंकि लोक के दक्षिणापथ पूर्वदेश, पश्चिम देश और उत्तरभूमि-ये चार विभाग हैं। ये विभाग बिना किसी कारण के नहीं है; क्योंकि चित्तवृत्तियों के सादृश्य को सम्भावना है। जैसा कि दाक्षिणात्यों में शुङ्गार रस की प्रचुरता होने से केशिको वृत्ति सम्भव है। पश्चिम देश में आवन्ती का संग्रह तो है हो, किन्तु केशिको भो है, इसके अतिरिक्त धर्म की प्रधानता होने से सात्त्वती वृत्ति भी है। पूर्व प्रदेश में घटाटोप वाक्याडम्बर होने की प्रधानता होने से

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ननु किमित्ययं संक्षेप आदृतः। आह। यस्माल्लोको बहुविधवेषभाषा- चारादियुक्त: कस्ते प्रतिपदं शक्तुं शवनुयात शिक्षितुमभ्यसितुं वा प्रयोक्तुं व्रष्टुं वा, चित्तवृत्तिप्रधानं चेदं नाट्यमिति तदेव वक्तुं न्याय्यम्। एतदेव स्पष्टीकुवन्नाह भारतीत्यादिना। प्रयोगे वागङ्ग चेष्टासु अभिनिर्वृत्तं लोकप्रसिद्धमित्यर्थः। चकारेण तत इत्या- कृष्यते। तल्लोकप्रसिद्धचतुष्टयमवलम्व्य ब्रह्मणा प्रयोग उत्पादितः । अयं ग्रन्थ- श्चिरन्तनैवृंत्तीनां चतुष्वॅव दृष्टान्ततामाशित्य व्याख्यातः, तत्र च वैषम्येण दूषण- मुक्तम्, वृत्तीनां हि सनिमितं चतुर्धात्वं प्रवृत्तीनां तस्माच्चतुष्ट्वमात्रेण दृष्टान्तोऽ- यमिति व्याख्यानेषु गजस्नानीयताया आनयनेनालूनविशीणं: वृत इत्यास्तां तावत्। भारती और आरभटी का योग रहता है। उत्तर प्रदेश में यद्यपि प्रमुख रूप से भारती एवं आरभटी वृत्तियों का ही योग है तथापि केशिकी के अंशतः सम्बन्ध होने से लोग शृङ्गारमय प्रयोग के सहिष्णु होते हैं। जैसा कि आगे कहेंगे-'अल्प गीतार्थ वाला प्रयोग यहाँ होता है' (१३।५०)। यहाँ अर्थ शब्द से उसके (गीत के) प्रयोजन- भूत नृत्य, वाद्य आदि का ग्रहण होता है। इस प्रकार चित्तवृत्तियों के सादृश्य से लोक का जो चार विभाग किया गया है वही यहाँ चार प्रवृत्ति के रूप में कहा गया है। अभिनव-अब पुनः प्रश्न होता है कि यह संक्षेप क्यों किया गया? इस पर कहते हैं-क्योंकि यह लोक अनेक प्रकार के वेष, भाषा, आचार आदि से युक्त है तो कौन उनका प्रतिपद कहने, शिक्षा देने, अभ्यास कराने अथवा प्रयोग करने या दिखाने के लिए समर्थ होगा ? क्योंकि यह नाट्य चित्तवृत्ति प्रधान है, अतः तदनुकूल ही उसको कहना न्याय-संगत है। इसी बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं-'भारतो इत्यादि'। अभिनव-प्रयोग अर्थात् वाचिक एवं आङ्िक चेष्टाओं में अभिनिवृत्त अर्थात् लोकप्रसिद्ध है। 'प्रयोगश्च' में उपात्त चकार से 'ततः' का आकर्षण करते हैं। लोक प्रसिद्ध वृत्तिचतुष्टय एवं प्रवृत्तिचतुष्टय का अवलम्बन करके ब्रह्मा ने इस प्रयोग का उत्पादन किया। यह ग्रन्थ चिरन्तनों द्वारा वृत्तियों की चतुरस्रता में दृष्टान्त का आश्रय बनकर व्याख्यात है; किन्तु वहाँ विषमता के कारण दोष कहा गया है, क्योंकि वृत्तियों में सनिमित्त चतुर्धात्व प्रवृत्तियों में भी चतुर्धात्व है। इसी से प्रवृत्तियों को चार मानने में दृष्टान्त है। इस प्रकार व्याख्यानों में गजस्थानीयता के आनयन से यह ग्रन्थ आलून अर्थात् नोच लेने से विशीर्ण हो गया, इसलिए रहने दया जाय।। ३७ ॥

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११८ माड्यसाइये

कैशिकीप्राया: चतुरमधुरललिताङ्काभिनयाश्च । तद्यथा- महेन्द्रो मलयः सहयो मेकलः पालमज्जरः'। एतेषु ये श्रिता देशा: स ज्ञेयो दक्षिणापथः ॥३८ ॥ *कोसलस्तोशलाश्चैव कलिङ्गा 'यवनाः खसाः। 'द्रविडान्ध्रमहाराष्ट्रा वैष्णा" वै वानवासजा।। ३९।। दक्षिणस्य समुद्रस्य तथा विन्ध्यस्य चान्तरे। ये देशास्तेषु युञ्जीत दाक्षिणात्यां तु नित्यशः ॥ ४० ॥

१. दाक्षिणात्या प्रवृत्ति अनुवाद-उनमें वाक्षिणात्या प्रवृत्ति अनेक प्रकार के नृत्य, गीत, वाद्य से युक्त, कैशिकी वृत्ति से सम्पन्न और चतुर, मधुर, ललित आङ्गिक अभिनयों से पूर्ण होती है। वह जैसे- अनुवाद-महेन्द्र, मलय, सहा, मेकल और कालपंजर नामक पर्वतों के मध्य स्थित प्रदेश 'दक्षिणापथ' कहलाता है॥। ३८॥ अनुवाब-कोसल, तोसल, कलिङ्ग, यवन, खस, द्रविड़, आम्ध्र, महाराष्ट्र, वैष्ण (कृष्णा और पिनाको नदी के तटवासी), वानवासिक तथा दक्षिण समुद्र औौर विन्ध्य पवंत के मध्यवर्त्ती जो प्रदेश है उनमें वाक्षिणात्या प्रवृत्ति की योजना करनी चाहिए॥ ३९-४०॥ १. ग. बहुगीतनृत्यवाद्या। २. ग. पुस्तके 'तच्यथा' नास्ति। ३. ग. मेखक कालपञ्जरः। ख. मेखक: कालपञजर: ककक-प. मेहकः पलस्जरः। ४. ख. कोसला तोशलाश्चंव। ५. क-ख. कालिङ्गा एव मोसलाः। ६. क-ग. ड्रमिडाः । प्रमिला: । ७. क-द. भिल्ला। वैणा इति कृष्णापिनादिकी तोरवासिन:। Fi ८. ब. ग वानवासिजा: । क-प, वानवासिका:। ९. क-द, चोतरे। १०. ब. ये देशा: संभरितास्तेषु दाक्षिणात्यास्तु नित्यशः। प क FFF] क-म. ये देवा वाक्षिणात्यास्तु पृत्िभारभटी भिताः।

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कैशिकी प्रायेण एषु इति बहुव्रीहिः। असामानाधिकरण्यात्सामानाषि- करण्येऽपि वा सामानायामाकृतौ भाषितपुंस्त्वाभावान्न पुंवद्भावः। केशैनिवृत्ता- स्तेषु भवा वेत्याविव्युत्पत्तिनिमित्तमात्रम्। एतच्च वक्ष्यामः संक्षेपेण (अध्याय २०)। दक्षिणसमुव्रस्य विध्यपर्वतस्य च मध्ये ये देशास्तेषु दाक्षिणात्या। एतेनंब सिद्धे सति देशभेदानां प्रतिपदपाठस्तवन्तरालानां पर्वतकच्छादिम्लेच्छानां निषेधेन, प्रसिद्वया देशोपसंग्रहणार्थः कवीनाम्। एवमुत्तरत्र ।। ४१ ॥ अभिनव-'केशिकीप्रायाः' में बहुब्रीहि समास है। 'केशिकी प्रायेण एष' इस विग्रह में बहुब्रीहि समास होकर 'कैशिकीप्रयाः' शब्द बनता है। अब यहां प्रश्न उठता है कि बहुब्रीहि समास होने पर 'कशिकी' में पुंवद्धाव होना चाहिए था। इस पर आचार्य कहते हैं-'असामानाधिकरण्यात्' अर्थात् समानाधिकरण न होने से। भाव वह है कि यहाँ पर 'कैशिकी प्रायेण एषु' में सामानाधिकरण नहीं है, क्योंकि प्रफृत में केशिकी स्त्रीलिङ्ग है, किन्तु प्रायेण स्त्रीलिङ्ग नहीं है, अतः यहां समानाधिकरण नहीं है और समानाधिकरण होने पर हो पुंवद्धाव होता है दूसरे समानाधिकरण होने पर भी कैशिकी शब्द के भाषितपुंस्त्व न होने से पुंवद्धाब नहीं हुआ। 'केशेः निवृत्ता केशिकी' अथवा 'केशेषु भवा केशिकी' इत्यादि व्युत्पत्तियाँ साधुत्व बोधन में निमित्त मात्र हैं। इसे हम बीसवें अध्याय में संक्षेप में कहेंगे। दक्षिण समुद्र और विन्ध्य पर्वत के मध्य का जो देश है उनमें दाक्षिणात्या प्रवृत्ति है, इतने कथन मात्र से ही विन्ध्य और दक्षिणी समुद्र के मध्य के प्रदेशों का ग्रहण हो जाता है, फिर भी भिन्न-भिन्न देशों का प्रतिपद पाठ विन्ध्य पर्वत और दक्षिणी समुद्र के मध्यवर्त्ती पर्वत, कच्छ-खाड़ी और म्लेच्छों के देश के निषेध और प्रसिद्ध होने से कवियों के देशविषयक ज्ञान कराने के लिए किया गया है। इसी प्रकार आगे भी समझना चाहिए॥ ३९-४० ।। विशेष-दक्षिणो समुद्र और विन्ध्य पर्वत के मध्य में बसै जितने प्रदेश है, उनमें वाक्षिणात्या प्रवृत्ति का प्रयोग करना चाहिए। वेष-भूषा, भाषा, आचार-विचार में इन प्रदेश- वासियों में बहुत कुछ समानता है, अतः इन प्रदेश-वासियों के लिए दाक्षिणात्या प्रवृत्ति का विधान बताया गया है। इस प्रवृत्ति में म्यु्कार रस की प्रधानता होती है।। ३९-४० ।। ना. था०-२२

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१३१ १७० नाळपशानन

आवन्तिका वैदिशिका सौराष्ट्रा मालवास्तथा ।सी सैन्धवास्त्वथ सौवोरा 'आनर्ताः सार्बुदेयकाः ॥४१ ॥तागत दाशार्णास्त्रैपुराश्चैव तथा वै मार्तिकावताः । कुर्वन्त्यावन्तिकीमेते प्रवृत्ति नित्यमेव तु॥ ४२ ॥ सात्त्वतों कैशिकों चैव वृत्तिमेषां समाश्रिताः । भवेत् प्रयोगो नाट्येऽत्र* स तु कार्यः प्रयोक्तृभिः॥४३॥

नित्यमेव स्विति-अनादिरयं देशभेदेन चित्तवतिक्रमः। दृष्टो हि वस्त्रा- भरणात्मना देशभेदोचित्तः स्वभावभेदः ॥। ४२॥

२. आवन्ती प्रवृत्ति

अनुवाद-आवन्ती, विदिशा, सौराष्ट्र, मालव, सैन्धव, सौवीर, आनत्तं, आर्बुदेय, दशार्ण, त्रिपुर तथा मृत्िकावत देशवासी नियमतः आवन्ती प्रवृत्ति का प्रयोग करते हैं । ४१-४२। अभिनव-नित्यमेवत्विति-देशभेद से होने वाली चित्तवृत्तियों का क्रम अनादि है, क्योंकि देश-भेद के औचित्य से प्राप्त स्वभाव-भेद वेष-भूषा पर स्पष्ट परिलक्षित होता है॥। ४२ ॥ अनुवाद-नाटप्रयोक्ताओं को नाटय में सात्वती और कैशिकी वृत्ति के समा्ित नाटय-प्रयोग करना चाहिए। ४३॥

१. ग. आावर्ता । क-व. आवर्शका:। २. ड. साबु देशकाः । क-द. सावंदेशकाः । ३. स. तथा वैवत्तिकावताः । ग. तथा वैवत्तिकावता।। क-ज. तथा वैभानिकावताः । क. मातिकावताः मृत्तिकावतीपुरणासिनः। ४. ख.म. वृत्तिमेषा समाश्रिता। क-म. वृत्तिमेते समाश्रिताः । क-द. वृत्तिमेषां समाश्रया। ५. क.च.ग. नास्पन।

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अङ्गा बङ्गा: कालिङ्गाश्च वत्साश्चैवोदमागधाः। `पौण्ड्ा नेपालकाश्चैव अरन्तगिरिब्हिगिराः॥ ४४।। तथा प्लवङ्गमा जञेया मलदा मल्लवर्तकाः । ब्रह्मोत्तरप्रभृतयो भार्गवा *मार्गवास्तथा ॥४५। प्राग्ज्योतिषाः पुलिन्दाश्च वैदेहास्ताम्रलिप्तकाः"। 'प्राङ्गा प्रावृतयश्चैव युञ्जन्तीहोढ्मागधीम् ॥४६॥ तत्र प्राग्देशानां सोमात्वेन दक्षिणत ऊढ़ा: समुद्रनिकटे उत्तरतो मागधा: तदुभयमध्यबतित्वादूढ़मागधा, अत= एवोढ़कलिङ्गानामुभयोपजोवित्वाभिप्रायेण वृत्तिववयमध्ये गणनम्। गिरोणामन्तर्यं भवास्तेऽन्तगिरा: गिरोणां बहिर्भवा बहिगिरा 'गिरेश्च सेनकस्य' इति समासान्ते अचि रूपम् ॥४४-४६।। अनुवाद-अङ्ग, बङ्ग, कलिङ्ग, वत्स, उड्, मगध, पौण्ड्र, नेपाल, अन्तगिरि, बर्हिगिरि, प्लवङ्गम, मालवा, मल्लवर्जक, ब्रह्मोत्तर, प्राग्ज्यातिष, भागंध, मागव, पुलिन्द, वैदेह, ताम्रलिप्त और पूर्व दिशा के अन्य प्रदेशवासी लोग औड्रमागषी प्रवूत्ति का प्रयोग करते हैं ॥। ४४-४६॥ अभिनव-प्राच्य देश की सीमा होने से दक्षिण में समुद्र तटवर्ती उड् है और उत्तर में मगध है। दोनों के मध्यवर्त्ती प्रदेश में औड्मागबी प्रवृत्ति होती है। इसलिए उड़ (आन्ध्र) और कलिङ्ग दोनों के लिए उपजीव्य होने के कारण इनका दो दो वृत्तियों के मध्य में परिगणन किया गया है। पर्वतों के अन्दर होने वाले देश अन्तगिर और पर्वतों के बाहर होने बाले देश बहिगिर हैं। यहाँ पर 'गिरेश्च सेनकस्य' सूत्र से समासान्त अच् प्रत्यय होने पर यह रूप बनता है॥ ४४-४६॥

१. फ. पौण्डनेपालकाश्चव १. ख ग. अन्तगिरिबहिदु'राः ।

४. ख. भागंवस्तथा। ५. क. ता्मलिप्तका।। ६. स. ग. प्रांशु प्रबुत्तयश्चैब युज्यन्तो चौड्ड मागधो। ७. क. भोडमागनो। क-क. आग्म्रमागयो । ८. क-फ. (टि०) वतय्वान्ध्रकवि्टानां।

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नाटयशास्त्रे

'अन्येऽपि देशाः प्राच्या ये पुराणे सम्प्रकीर्तिताः। तेषु प्रयुज्यते होषा "प्रवृत्तिश्चोढूमागधी ॥ ४७॥ पाठ्चाला सोरसेनाश्च' काश्मीरा हस्तिनापुराः। बाह्लोका शल्यकाश्चैव मद्रकौशोनरास्तथाः ।।४८।। हिमवतसंशरिता ये तु गङ्गायाश्चोत्तरां दिशम् । ये शरिता वै जनपदास्तेषु पाञ्चालमध्यमाः ॥४९॥

पुराण इत्यागमपूर्वकत्वमाह। एषेति आवन्तिकी प्रागज्योतिषकामरूपोया

तुरुष्काश्चारटटकखसदरदप्रभृतयः मध्ययायामेव ये प्रविष्टाः, ते तु व्यवहार- बहिष्कृतत्वात् स्वकण्ठेन न पठिताः ।।५०।। अनुवाव-इसी प्रकार पुराण आदि में पूर्व के जो अन्य प्रदेश कहे गये हैं उनमें भी इस औड़रमागधी प्रवृत्ति का प्रयोग होता है॥ ४७ ॥ अभिनव-'पुराणे' इस कथन से सिद्ध होता है कि यह विषय आगम सिद्ध है। यह ओड्रमागधो प्रवृत्ति कामरूप और प्राग्ज्योतिष में भी होती है॥।४७ ।। अनुवाद-पाञ्चाल, शूरसेन, काइमीर, हस्तिनापुर, बाहलीक, शाकल, भद्र, उशोनर प्रदेश तथा हिमालय पर्वत पर स्थित और गङ्गा नवी के उत्तरविशा में आधित जनपदों में (प्रवेशों में) पाञ्ाल-मध्यमा प्रवृत्ति का प्रयोग होता है।। ४८-४९।। अभिनव-तुरुष्क, आरटटक, खस और दरद प्रभूति देश मध्यमा में हो प्रविष्ट हैं। वे व्यवहार से बहिष्कृत होने के कारण भरतमुनि ने अपने कण्ठ से, अपने मुख से उनका पाठ नहीं किया है। ४८-४९॥

  1. अयं क्लोक: क-भमयोर्नास्ति। २. स. प्रवुत्तिक्चौड्डमागघी। ग. प्रवृत्तिसथबौड्र मागषी । ३. क. ग. शौरसेना।। ४. भ. बव्धिका। शल्यकरचेय।

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नयोबशोऽ्याथ: *पाञ्चालमध्यमायान्तु सात्त्वत्यारभटी स्मृता।िष्ट प्रयोगस्त्वल्पगीतार्थ आविद्धगतिविक्रमः ॥५०॥ व्विधा क्रिया भवत्यासां रङ्गपीठपरिक्रमे। प्रदक्षिणप्रदेशा च तथा चाप्यप्रदक्षिणा॥ ५१॥ आवन्ती दाक्षिणात्या च प्रदक्षिणपरिक्रमे · अपसव्यप्रदेशास्तु पाञ्चाली चोढ्मागधी॥५२॥ आवन्त्यां दाक्षिणात्यायां पार्श्वद्वारमथोत्तरम्। पाञ्चाल्यामोढमागध्यां योज्यं द्वारन्तु दक्षिणम् ॥ ५३॥ अल्पगीतार्थ इति लेशतः कैशिकोमनुजानाति॥५१॥ िF अनुवाद-पाञ्चाल-मध्यमा प्रवुत्ति में सात्त्वती और आरभटो वृत्ति होती है। इसमें गीत प्रयोग को अल्पता और आविद् गति एवं विक्रम (पावसंचालन) होता है।। ५०।। अभिनव-'अल्पगोतार्थ' यह कथन लेशतः केशिकी वृत्ति को अनुज्ञा देता है ॥ ५०॥ अनुवाद-रङ्गपीठ के परिक्रम में (रङ्गपोठ पर चलने में) इन प्रबुत्तियों को वो प्रकार की क्रियाएं होती हैं एक दक्षिण को ओर से और दूसरी वाम भाग से प्रवेश किया जाता है॥।५१॥ अनुवाद-प्रवक्षिण परिक्रम में आवन्ती और दाक्षिणात्या प्रवृत्ति होनी चाहिए और अपसव्य अर्थात् अप्रदक्षिण परिक्रम में (बायीं ओर से प्रवेश करने में) पाञवालो और ओड़रमागधी प्रवृत्ति होनी चाहिए॥। ५२॥ अनुवाद-आवन्ती और वाक्षिणात्या प्रवुत्ति में द्वार की योजना उत्तर की और पाञ्चाली एवं औड्रमागवी में द्वार की योजना दक्षिण की ओर करनी चाहिए॥५३॥ १. अरयं क्लोक: 'ग' पुस्तके नास्ति । २. ख. ग. पोज्यं। ३. क-प. पाञ्चालमध्यामागध्योः ।

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१७४ नाटपशारने

एकोभूता: पुनश्चैताः प्रयोक्तव्याः प्रयोक्तृभिः। पाषंद वेशकालौ चाप्यर्थयुक्तिमवेक्ष्य च॥ ५४ ॥

दक्षिणोत्तरव्यतिरेकेण परिक्रमणस्थानाभावात् नैकटघाद दवे प्रवृत्ती एकीकृत्य प्रयोगाभिधानम्। तत्र दक्षिणात्य उत्तरेण द्वारेण प्रविश्य पश्चिमायां विशि परि- क्रम्य ततोडपि वक्षिणस्यां ततः पूर्वस्यां तत उत्तरस्यां परिक्रमेत। परिक्रम्य च तस्यामेव विश्यात्मनिवेवनं कुर्यात। 3तदुक्तं दक्षिणाभिमुख इति। तत उत्तरस्या: पूर्वा ततोऽपि वक्षिणां ततः पश्चिमां प्राप्योत्तरद्वारेणैव निष्क्रामेतु। एवं सात्त्वत्यादौ तद्विपर्ययेण पाञचाल्यां। तदस्यां वक्षिणद्वारेण प्रवेशो निष्क्रम्ण च प्रदक्षिणेन वक्षिणदिशा प्रवेशोऽम्यन्तरकक्ष्याव्यवस्यितपात्रनिकठ एवेति स्याद। एवमपसव्य- प्रवेश इति ॥५४॥

किहि अभिनव-उत्तर और दक्षिण को छोड़कर अन्य तरफ से परिक्रमण नहीं करना चाहिए। इसलिए निकट को दो वृत्तियों को मिलाकर प्रयोग करने का विधान बताया गया है। इस प्रयाग के समय दाक्षिणात्य उत्तर द्वार से प्रवेश कर पश्चिम दिशा में परिक्रमण करके फिर दक्षिण दिशा में पुनः पूर्व में फिर उत्तर में परिक्रमण करे। इस प्रकार घूमकर उसी दिशा में आत्मनिवेदन करे। जैसा कि कहा गया है कि 'दक्षिणाभिभुख होकर आत्मनिवेदन करे, फिर उत्तर दिशा से पूर्व को, पूर्व दिशा से दक्षिण को तथा दक्षिण दिशा से पश्चिम की ओर जाकर फिर उत्तर द्वार से निष्क्रमण करे। इसी प्रकार सात्त्वती आदि वृत्तियों से विपरीत क्रम से पाञ्चाली में प्रयोग होना चाहिए। इसीलिए दक्षिण द्वार से किया जाने वाला प्रवेश भी आभ्यन्तर कक्ष्या में स्थित पात्र के निकट ही होना चाहिए। यही प्रक्रिया अपसव्य प्रवेश में भी करनी चाहिए ॥ ५२५३॥ अनुवाद-इस प्रकार पाषंद (सभा), देश, काल और अर्थयुक्ति (अर्थ-विशेष की अभिव्यक्ति) को देखकर नाट्य-प्रयोक्ताओं को इनका एकोकरण करके (सम्मिलित) प्रयोग करना चाहिए ।। ५४॥।

१. ख. एकभूता।। ख. ग. देश्नाप्यर्थयुक्ति कालमवेक्ष्य च। क-म. देशं कालमवस्थां च काव्ययुक्तिमवेक्ष्य च। २. क-द अवेक्षते। FOP

३. क-खा. तदुत्तरम्।

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१७५

येषु देशेषु या कार्या प्रवृत्तिः परिकीतिता तद्वृत्तिकानि रूपाणि तेषु तज्ज्ञः प्रयोजयेत् ॥५५॥

विशेषाग्तरमाह-एकीभूता इति। पार्षदमिति। परिवदि स्वामित्वकृतं वा प्राधाम्यं देशकृतं कालकृतं प्रयोजनकृतं बहुतरपात्रपरीक्षायातोचितं यद्वचित्रयं तत्कत- मिदमवेध्य सङ्करोऽपि क्तव्यः, तदाह एकीभूता इति प्रधानानुयायिन्य एवेत्यर्थ: ।। ५४।। एवं प्रयोक्तकरि परिक्रमोपयोगः । प्रवृत्तीनां प्रत्येकविषयेऽपि तं वर्शयन्नाह येषु देशेष्वित्यादि। या प्रवृत्तिरित्यर्थ:, सा वृत्तियॅषु रूपकेषु तेषु। तेन काश्मीर देशगत नायक नाटिकानुचिता तस्यां कैशिकीप्राधान्ये वाक्षिणाप्यौचितत्वात्। देशादौचित्ये तच्चे- ष्टितग्यावर्तनेन प्रतीतिविधाताद्रसमयत्वाभावः। रसाइच नाटघस्य प्राणाः व्युत्पत्ति- रपि वा परेव भवेत् असत्यताशड्का च समूलघातं विहम्यादेव प्रयोगमित्यनेनाभि- प्रायेणाह तद्वृत्तिकानीति। येषु देशेषु यो वृत्तिप्रकार उत्तः स येषु रूपकेषु नाटका- दोनामन्यतमेषु भवति, तानि रूपकाणि तेष्विति तद्देशगतनायकप्राधाग्येन कतंव्यानि कविना नटेन च । ५५॥

अभिनव-पार्षवमिति -परिषद् (सभा) में स्वामित्व के कारण या अध्यक्ष बनने के कारण अथवा देश के कारण या काल के कारण अथवा किसी प्रयोजन से अथवा बहुत से पात्रों को परीक्षा करने से प्राप्त वेचित्र्यकृत प्रधानता को देखकर उसी के अनुसार नियम में सांकर्य किया जा सकता है। इसी कारण 'एकीभूता' कहा गया है अर्थात् प्रधान का सर्वत्र अनुयायी रहे ॥५५॥ अभिनव-इस प्रकार प्रयोक्तका में परिक्रम का उपयोग दिखाया गया है, अब प्रत्येक प्रवृत्तियों के विषय में भी उपयोग को दिखलाते हुए कहते हैं- अनुवाद-जिन देशों में जो प्रवृत्ति पहिले कही गई है। उन देशों में उन वृत्तियों से युक्त अभिनय नाटध-विशेषज्ञ करें॥५५॥

१. स. ग. पूर्व।

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नाटपशास्णे

'एकीभूता: पुमस्त्वेता* नाटकादौ' भवन्ति हि। अवेक्ष्य वृत्तिबाहुल्यं तत्तत्कर्म समाचरेत्॥५६॥ साथें बाहुल्यमेकस्य शेषाणामथ बुद्धिमान्। येषामन्यस्य बाहुल्यं प्रवृत्ति पूरयेत्तदा ॥ ५७ ॥

अभिनव-जिन देशों में जिन प्रवृत्तियों का विधान है उसी के अनुसार रूपकों में भी यहो वृत्ति होनी चाहिए। इससे कश्मीर देशगत नायक को प्रधानता होने पर नाटिका का प्रयोग अनुचित है, क्योंकि नाटिका में केशिकी वृत्ति की प्रधानता होने से दादिणात्य नायव बा होना अधिक उचित है। दूसरे देशा काल आदि के औचित्य में उसके चेष्टित के व्यावर्तन से प्रतीति का विघात होने से रसमयत्व का अभाव हो जायगा, क्योंकि रस ही नाट्य के प्राण हैं और व्युत्पत्ति भी। अन्यथा सामञ्जस्य न होने पर असत्यता की आशङ्का का समूल नाश कर देगी। इस अभिप्राय से कहते हैं-तद्वृत्तिकामिति। जिन देशों में जो वृत्ति-प्रकार कहा गया है वह प्रकार जिन रूपकों के नाटकादि प्रकारों में किसी एक रूपक में होता है। वे ही रूपक उस देश के नायक की प्रधानता से कवि और नट को करने चाहिए अर्थात् उस देश की नाटक को प्रधानता से ही रूपक का प्रयोग करना चाहिए ॥ ५५॥ अनुवाद-ये प्रवृत्तियाँ एकीभूत होकर नाटक आदि में प्रयुक्त होती हैं। अतः वृत्तियों की बहुलता को देखकर (पर्यवेक्षण कर) उन-उन कार्यो का प्रयोग करना चाहिए ॥५६॥ अनुवाद-जहाँ समुदाय में किसी एक की प्रधानता (या अधिकता) होती है और शेष की अड्गता तथा जहाँ पर दूसरे की बहुलता होती है, वहाँ प्रवृत्ति को पूर्ण करना चाहिए।। ५७ ।।

१. इतः परं क्लोकटवयं क. ख. पुस्तकथोर्नारिति। २. क-म. यबात्त्वेताः । ३. ए.प्र. गानकादौ भवन्ति च। v. ब. ग. तत्तस्कर्माचरेतु सदा। क-म. तदर्मीमाचरेतथा।

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नयोदशोड्याय: १७७

प्रयोगो द्विविधश्चैव' विज्ञेयो नाटकाश्रयः सुकुमारस्तथाऽडविद्वो नाट्ययुक्तिसमाश्रयः ॥ ५८ ॥ नाटघशब्दवाच्यस्य प्रयोगस्याधयो नाटकशब्दोऽत्र न रूपकविशेषे, अपि तु नाट्य एव। यथा- "हास्यस्थानानि यानि स्युः कार्योत्पम्मानि नाटके" (अ २२ ) इत्यत्र नाटक- मुन्नयति प्रेक्षकान (स्वावेशेन ) संवेशेन ? व्युत्पत्त्या च तथा तद्भावानुप्रवेशेन प्रयोक्तुनिति। नाटके कृताविति पाठे गात्राणि विक्षिप्यम्ते अभिनयप्रयोगायाऽस्मा- दिति संज्ञाकाले। अन्ये तु नटशब्दात काठकाविवच्चरणाथें बुज् इच्छन्तो नटानां कर्म इलाध्यमिति गोत्रवरणयोश्च इलाधाविविशेषणर्वाद् वुजित्याहुः(पा-१-१-१३४) लौकिकं च लिङ्गमिति नैवं शङ्ितव्यमेतस्येकान्तिकं स्त्रीत्वमिति ॥५८॥ अनुवाद-नाटय-युक्ति (नाटय-नियम) की योजना के अनुसार नाटककारों को नाटकाश्रित प्रयोग दो प्रकार का समझना चाहिए-सुकुमार और आविद्ध ॥५८॥ अभिनव-नाटथ शब्द के वाच्य-प्रयोग के आश्रय नाटक शब्द यहाँ पर रूपक-विशेष के अर्थ में नहीं, अपितु नाट्य के अर्थ में है। जैसे-"हास्य के जो स्थान है वे नाटक में कार्योत्पन्न हैं" यहाँ पर नाटक स्वावेश से या व्युत्पत्ति से प्रेक्षकों का उन्नयन करता है और भावानुप्रवेश से प्रयोक्ताओं का उन्नयन करता है। यहाँ 'नाटकादौ' के स्थान पर 'नाटके कृतौ' ऐसा पाठ मानने पर अभिनय के प्रयोग के लिए जिससे पात्रों का विक्षेप करते हैं वे संज्ञाकाल में कर्त्तव्य हैं। अन्य लोग तो नट शब्द से पाठक की तरह चरण अर्थ में वुञ् (अक) प्रत्यय मानते हुए 'नटों का कर्म श्लाध्य है' तथा गोत्र और चरण के इलाघा आदि का विशेषण होने के वुञ् (अक) प्रत्यय होता है, ऐसा कहते हैं। वहाँ पर एकान्तिक स्त्रीत्व ही वुञ् प्रत्यय का द्योत्य है ऐसो शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि लिङ्ग प्रयोग तो लोक को इच्छा के अधीन होता है ॥ ५६॥ १. ग. (टि०) बिविघष्चैव। १. स. नाट्काशय। कनम. नाटकाश्रित:। ना. प्ा०-२३

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१७८ नाटयशाहन

मायेन्द्रजालबहुलं *पुस्तनेपथ्यसंयुतम् ॥ ५९॥ `पुरुषैबहुभियु क्तमल्पस्त्रीकं तथैव च। सात्त्वत्यारभटीयुक्तं नाट्यमाविद्धसंज्ञितम् ॥ ६० ॥ डिम: समवकारश्च व्यायोगेहामृगौ तथा। 'एतान्याविद्धसंज्ञानि विज्ञेयानि प्रयोक्तृभिः ॥ ६१॥

आविद्ध उत्कटः, अङ्गानां हारो हरणं यत्र। छेदेन भेदेन प्रधान: आहृष: संग्राम:, आह्वयन्ते परस्परं वीरा यत्रेति। माया मंत्रौषधाविकृतं रूपपरिवर्तनावि, इन्व्रजालं हस्तलाघवसादृश्यादिकृतं पुस्तं द्रुमृण्मयमाकृत्यादि आविद्धं स्त्रीकर्मरूपाणां स्वरूपं स्वक्षेत्रे एव वक्ष्यामः ॥ ५९-६० ॥

अनुवाद-जो आविद् अङ्गहारों से युक्त, छेवन, भेवन एवं युद्धमय, माया एवं इन्द्रजाल की बहुलता से परिपूर्ण, पुस्त एवं नेपथ्य से युक्त, अनेक पुरुषों (पात्रों) से युक्त एवं अल्प स्त्रीपात्र वाला, तथा सात्त्वती एवं आरभटी वृत्तियों से युक्त नाट्य है, उसे 'आविद्ठ' संज्ञक नाटय समझना चाहिए॥५९-६०॥ अभिनव-आविद्ध का अर्थ है उत्कट। जहाँ पर अङ्गों का हरण हो वह अङ्गहार है। छेदन-भेदन-प्रधान आहव सङ्ग्राम (युद्ध) है। जहाँ पर वीर लोग परस्पर एक दूसरे को ललकारते हैं। मन्त्र, औषधि के प्रयोग से रूप का परिवर्त्तन माया है। हस्तलाघव अर्थात् हाथ की सफाई से किया गया परिवर्तन 'इन्द्रजाल' है। लकड़ी और मिट्टी से निर्मित आकृति युस्त है। आविद्ध का अर्थ है स्त्रियों के कर्म एवं रूपों का स्वरूप, जिसका निरूपण आगे अपने क्षेत्र में करेंगे ॥ ५९-६० ॥ अनुवाद-डिम, समवकार, व्यायोग और ईहामृग रूपकों को नाट्य- प्रयोक्ताओं को 'आविद्' संज्ञक नाट्य मानना चाहिए॥ ६१॥

१. कनम. सत्त्वाविद्वाज्हारसु। क-व. तत्राविद्धाक्हार तु। २. ख. ग. पुंसो नेपथ्यसंयुतम्। ३. क-म. संयुतः । ४. क-म. प्रयोग: पुरुषप्रायस्तथाल्पस्त्रीक एव थ। ५. क. ग. सात्त्वत्यारभटीप्रायं नाटयमाविव्मेव तत्। क-(म.) सात्त्वत्यारभटीयुक्तो ज्ञेय आविद्धसंज्ञितः । ६. क-म. आविद्धसंज्ञा विज्ञेया: प्रयोगस्य वशानुगा।

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एषां प्रयोगः कर्तव्यो दैत्यदानवराक्षसैः। उद्धता ये च पुरुषा: शौर्यवीर्यबलान्विताः ॥६२॥ नाटकं सप्रकरणं भाणो वीथ्यङ्क* एव च। सुकुमारप्रयोगाणि मानुषेष्वाश्रितानि" तु ॥ ६३॥ 'यतो मुखं भवेद्द्ाण्डं द्वारनेपथ्यकस्य तु। सा मन्तव्या तु दिक् पूर्वा नाट्ययोगेषु नित्यशः ॥ ६४॥ शौर्यमभीरत्वं वोयंमुत्साह:, बलं कायधर्मः पराक्रमः ॥ ६२॥। मानुषेष्विति बाहुल्यापेक्षमेतत्। एवं चत्वारि भिन्नानि डिमादीति उद्धतानि, वगंसुकुमाराणि नाटकादीनि ॥ ६३॥ अनुवाद-इनका प्रयोग दैत्य, वानव, राक्षस तथा शौय, वोर्य एवं बल से युक्त उद्धत पुरुषों द्वारा करना चाहिए।। ६२।। अभिनव-शौर्य का अर्थ है डरपोक न होना। बीर्य का अर्थ है उत्साह। बल शरीर का धर्म पराक्रम है ॥ ६२॥ अनुवाद-नाटक, प्रकरण, भाण, वोथी, अङ्क ये सुकुमार नाट्यप्रयोग है और ये मनुष्यों के आश्रित होते हैं ॥ ६३ ॥ अभिनव-'मानुषेषु' में बहुवचन का प्रयोग मनुष्यों की अपेक्षा से है। इस प्रकार डिमादि चार रूपक आविद् अर्थात् उद्धत हैं और नाटकादि रूपक सुकुमार है ॥ ६३॥ अनुवाद-प्रेक्षागृह से रहित बाह्य प्रयोग में कदाचित् स्वामी की आज्ञा से विदिशाओं में भी प्रेक्षागृह हो सकता है॥ ६४॥ १. छ. एष प्रयोग: । २. क. देवदानबराक्षसैः । ३. क-भ. शौयंधैयंदयान्विताः । ४. ख. ग. वीष्यक्क नाटिके। ५. ठु० मानुषेष्बाश्रितास्तु ये। क-भ. योज्यान्येतानि मानुषैंः । ६. पव क्लोक: क, ग. पुस्तकयोर्नास्ति।

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१८० नाटयशास्त्र

अथ बाह्यप्रयोगेषु प्रेक्षागृहविवर्जिते। विदिक्ष्वपि भवेद्रङ्गः कदाचिद् भर्तुराज्ञया ॥६५॥ पृष्ठे कृत्वा कुतपं नाटये युक्ता यतो मुखं भरताः। सा पूर्वा मन्तव्या प्रयोगकाले तु नाटथज्ञैः ॥ ६६॥ द्वाराणि षट् चैव भवन्ति चास्य रङ्गस्य दिग्भागविनिश्चितानि। नाटयप्रयोगेन खलु प्रवेशे प्राच्यां प्रतीच्यां च दिशि प्रवेशः ॥ ६७॥ विधानमुत्क्रम्य यथा च रङ्गे विनाप्रमाणाद्विदिशः प्रयोगे'। द्वारन्तु यस्मात्समृदङ्गभाण्डं प्राची दिशं तां मनसाऽध्यवस्येत् ॥६८।। वयोऽनुरूपः प्रथमन्तु वेषो वेषानुरूपश्च गतिप्रचारः । गतिप्रचारानुगतश्च पाठ्यं पाठ्यानुरूपोऽभिनयश्च कार्यः ॥ ६९॥ अनुवाद-नाट्य-पृष्ठ पर कुतप अर्थात् भाण्ड-वाद्यादि रखकर नट लोग जिधर मुख करके नाट्य का प्रयोग करते हैं। प्रयोग-काल के अनुसार नाट्यवेत्ताओं को उसे पूर्व दिशा समझनी चाहिए ॥ ६५॥ अनुवाद-रङ्गमण्डप के विशा (मार्ग) एवं भाण्डवाद्यों के विन्यास के अनुसार छः द्वार होते हैं किन्तु नाट्यप्रयोग के अनुसार रङ्गमण्डप में केवल पूर्द एवं पश्चिम विशा से प्रवेश करना चाहिए ॥। ६६।। 9 अनुवाद-विधान (नियम) का उल्लंघन करके जिस प्रकार रङ्गमण्डप में बिना प्रमाण के विदिशाओं में भी द्वार होता है वहाँ मृदङ्ग आदि भाण्डवाद्यों के विन्यास को देखकर मन से उसे पूर्वं विशा समझनी चाहिए॥ ६७ ।। अनुवाव-नाट्य-प्रयोग में अवस्था (आयु) के अनुसार वेष-भूषा और वेष- भूषा के अनुसार गति-प्रचार, गति-प्रचार के अनुकूल पाठ्य (संवादादि) और पाट्य के अनुकूल अभिनय करना चाहिए॥। ६८ ।। १. कनम. कुतः करथचिद्विदिश प्रयोगः ।

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त्रयोदशोउ्डवाय:

धर्मों या द्विविधा प्रोक्ता मया पूर्व द्विजोत्तमाः ?। लौकिकी नाटघधर्मी च तयोर्वक्ष्यामि लक्षणम्॥ ७० ॥

एवमम्तरङ्गोपकारित्वात्कक्ष्यामाधारमुक्त्वा तवाक्षिप्तं च वृत्तिभेदमभिधाय धर्म्यो निरूप्यन्ते। तथा हि लोकस्वभावमेवानुवर्तमानं धर्मोद्ठयम्। लोको नाम जनपदवासी जनः, जनपदश्च देश एव, स च प्रवृत्तिक्रमेण प्रपश्ितः, तत्प्रसङ गेनैव तावद्वर्म्यायाता। सा चाङ्गिकशेषतया वक्तव्या। प्रसङ्गाच्च वाचिकाहार्यादि विषयाप्युच्यते तुल्यलक्षणत्वादिति। सा च द्वेधा। यद्यपि लौकिकधमंग्यतिरेकेण नाट्ये न कश्चिदुर्मोडस्ति, तथापि स यत्र लोकागतप्रक्रियाक्रमो रञ्जनाधिक्य- प्राधान्यमधिरोहयितं कविनटव्यापारे वैचित्र्यं स्वोकुर्वन् नाटघधमोंत्युच्यते। तदेतदाह धर्मो या द्विविधेति। प्रोक्ता उद्दिप्टेत्यर्थः । पूर्वमिति 'रसा भावा' इत्यादिसंग्रहविभागावसरे (अ ६-१०) ॥ ७० ॥

अभिनव-इस प्रकार नाट्य का अन्तरङ्ग उपकारी होने के कारण कक्ष्याओं के आधार पर उद्धत एवं सुकुमार प्रयोगों को कहकर और उनसे आक्षिप्त वृत्तियों के भेद कहकर अब धर्मी का निरूपण करते हैं। लोक के स्वभाव का अनुवर्त्तन करने वाली दो धर्मियाँ हैं। लोक का अथ है जनपदवासी लोग और जनपद का अर्थ है देश। देश ही प्रवृत्ति के क्रम से प्रपश्चित है। उनके प्रसङ्ग से ही धर्मी प्राप्त हो गई। उसो का आङ्गिक अभिनय के अङ्ग रूप में प्रतिपादन करना चाहिए। और उसो के प्रसङ्ग से समान लक्षण होने के कारण वाचिक, आहार्य एवं सातत्विक विषयक धर्मी को भी कहते हैं। वह धर्मी दो प्रकार का होता है। यद्यपि लौकिक धर्म के अतिरिक्त नाट्य में कोई दूसरा धर्म नहीं है, तथापि जहाँ पर वह लौकिक प्रक्रिया का क्रम रञ्जनाधिक्य को प्रधानता के आधार पर आरोहण करने के लिए कवि और नट के व्यापार में विचित्रता लाता है, स्वीकार करता है वह 'नाट्यधर्मी' कहलाता है। इसी बात को कहते हैं- अनुवाद-हे श्रेष्ठ द्विजों ! मैंने पहिले जो दो प्रकार की धर्मो का निरूपण किया था-लोकधर्मो और नाट्यध्मों। अब मैं उनका लक्षण कहूँगा॥ ६९। अभिनव-प्रोक्ता का अर्थ है उद्देश क्रम से कहा है अर्थात् पहिले छठे अध्याय में 'रसा भावाः' इश्यादि सङ्ग्रह के विभाग करने के अवसर पर उद्देशक्रम से कहा है ।। ६९ ।।

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१८२ नाटयशाएने

'स्वभावभावोपगतं शुद्धं त्वविकृतं तथा। लोकवार्ताक्रियोपेतमङ्गलीलाविर्वाजितम्' *स्वभावाभिनयोपेतं नानास्त्रीपुरुषाश्रयम् । यदोद्दशं भवेन्नाट्यं लोकधर्मो तु सा स्मृता ॥ ७२॥ लौकिकस्य धर्मस्य मूलभूतत्वान्नाटच्यम वैचित्रयोल्लेख्यभित्तिस्थानीयत्वेन लोकधर्मोमेव लक्षयति स्वभावभावोपगतमित्यादि। काचित्तद्विषया धर्मी, काचिन्नाटघविषया। यो यस्य स्वभावतो भावः स्यात् स्थायिध्यभिचार्यादिः तेनोपेतम् कथमधिकृतत्वादित्याह शुद्धमिति। शुद्धत्वात् स्वविकल्पतेनाव्यामिश्रत्वात्। तथा, इति कृत्वा। लोकवार्ता लोक- प्रसिद्धि: तस्यां या क्रिया व्यवहारो वृत्तान्तस्तया शुद्धमेव कृत्वा युक्तं यन्नाटयं नटनोयं कार्यं सा लोकधर्मी धर्म्यास्तद्वतश्चाभेदोपचारात्सामानाधिकरणम्। अङ्गलोलया व्तनाविकया वजितं कृत्वा। अभिनव-लोकधर्म के मूलभूत होने से तथा नाटयधर्म सम्बन्धी विचित्रता के उल्लेख के योग्य भित्ति-स्थानीय होने से पहिले लाकधर्मी का लक्षण कहते हैं- अनुवाद-स्वाभाविक भावों से युक्त, शुद्ध और अविकृत, लोक-व्यवहार की क्रियाओं से उपेत (युक्त), अङ्ग लीलाओं के अभिनय रहित, अपने भावों के अभिनयों से युक्त, अनेक पुरुष एवं पात्रों से समाश्रित ऐसा जो नाटथ है उसे 'लोकधर्मी' नाटय कहा गया है।। ७०-७१ ।। अभिनव -- अभिनवगुप्त का कथन है कि कोई धर्मी लोकविषया होती है और कोई धर्मो नाट्यविषया। जिसका जो स्वाभाविक भाव है स्थायो और व्यभि- चारो भाव आदि, उनसे युक्त। उनसे युक्त केसे हैं? कहते हैं-अधिकृत हाने से, इसलिए कहते हैं कि शुद्ध होने से अर्थात् स्वगत विकल्पों के व्यामिश्रण से रहित होने से शुद्ध है, अविकृत है। लोकवार्त्ता का अर्थ है लोकप्रसिद्धि। उसमें जो क्रिया, व्यवहार या वृत्तान्त है उससे शुद्ध युक्ति-सम्पन्न जो नाटय है, नटनीय कर्म है वह लोकधर्मी है। यहाँ धर्मी और धर्मवान् में अभेदोपचार करके समानाधिकरण है। वर्तनादि रूप अङ्गलोला से वर्जित करके। १. क-भ. स्वभावकर्मोपगतं। २. क. शुद्धं तु विकृतं यथा। कनन. शुद्धं च विकृतं च यत्। ३. क-म. नानाभावरसान्वितम्। ४. क-म. स्वभावाभिनयस्थानम्।

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१८३

स्वभावबलपतनप्रहारनादावसरविवादाविव पताकादिना योऽभिनय स्तेनोपेतम्। नानात्वेन च स्त्रीपुंसादे: स्त्रियां प्रयोज्यायां योषिदेव प्रयोक्त्री पुरुषे पुरुष इत्येवंभूतं यत्राभ्यस्तचेष्टित सा लोकधर्मो तद्धमव्यपदेशात्। यदि वा समुवाय- रूपं काव्यं तवा मनस एकदेशभूता धर्मों।

एतदुक्तं भवति-यदा कविर्यथावृत्तं वस्तुमात्रं वर्णयति नदश्च प्रयुङ्क्ते, न तु स्वबुद्धिकृतं रञ्जनावैचित्र्यं, तत्रानुप्रवेशयंस्तदा तावान् स काव्यभाग: प्रयोग- भागशच लोकधर्माश्रयः अतोऽत्र धर्मो। अर्थाभिनये सहकारिरूपा इतिकतव्यतारूपा वेति दशशततमादितरत्र प्रवेशानाह शन्यतायाम्। काव्यनाट्ययोहि लोकानुसारित्वं वा वैचित्र्ययोगित्वं वा धर्मः। तत्र किमेतद्भावमुदभावमुच्यते तदास्तामेतत् ॥७२।।

स्वाभाविक वलन, पतन, प्रहार, नाद (गर्जन) और सामयिक विवाद आदि के समान पताका आदि के द्वारा जो अभिनय किया जाता है उससे युक्त। स्त्री और पुरुष पात्रों के प्राचुर्य (प्रचुरता) होने पर भी स्त्री के प्रयोज्या होने पर स्त्रो हो प्रयोक्त्रो (प्रयोजिका) होती है और पुरुष के प्रयोज्य होने पर पुरुष हो प्रयोजक होता है, इस प्रकार का अभ्यास और चेष्टाएँ जहाँ हों, लोकधर्म का व्यपदेश होने से उसे 'लोकधर्मी' कहते हैं। यदि वह समुदाय रूप काव्य है तो उनके मन को एकदेश रूप धर्मी है।

यह कहा जाता है कि कवि तो जेसा हुआ यथावत वस्तुमात्र का वर्णन करता है और नट उसका प्रयोग करता है, किन्तु स्वबुद्धि के द्वारा किये गये रञ्जना-वैचित्र्य का उसमें प्रवेश नहीं करता, तब तो उतना काव्यभाग और प्रयोग- भाग लोकधर्म के आश्रित होता है, इसलिए यह धर्मी है। इस प्रकार किसी अर्थ- विशेष के अभिनय में सहकारी रूप अथवा इतिकत्तव्यता रूप जो इतर स्थानों में प्रवेश कहते हैं, वह शून्यता में है। क्योंकि काव्य और नाटय दोनों में ही लोकानु- सारी अथवा रग्जन-वैचित्र्य का योग है वही धर्म है, लोकधम है। क्या यह भाव उद्धाव कहा जाता है ? बस यह रहने दिया जाय । ७२॥।

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१८४ माटयशास्त्रे

ह।अतिवाक्य क्रियोपेतमतिसत्त्वातिभावकम्* लीलाङ्गहाराभिनयं नाट्यलक्षणलक्षितम्॥ ७३॥ स्वरालड्कारसंयुक्त 'मस्वस्थपुरुषाश्रयम् यदीदृशं भवेन्नाट्यं नाटयधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७४॥

अथ नाट्यधर्मो लक्षयति अतिवाक्यक्रियोपेतमिति। इतिहासादिवाक्यमतिक्रम्य या उचितरञ्जकेतिवृत्तकल्पनात्मिका क्रिया। यथा राजशेखरेण रामनिर्वासनार्थ दशरथवेषराक्षसविरचिततत्त्वकल्पना, तथा यदुपेतम्। भावं सत्त्वं स्वभावं चित्तवृत्तिञ्चातिक्रभ्य यत्स्थितं कविकल्पित- चित्तवृत्त्यन्त रयुक्तमित्यर्थः । यथा स्वभावचपलविदूषकचित्तवृत्यतिक्रमात् वत्सराजेन मन्त्रिसमुचितगाम्भीर्यावहित्थयोजनं वसन्तकस्य तथा स्वभावभा- षितमतिक्रम्य यत्स्थितं यथा राज्याः संस्कृतम्। एवंभूतमभिनेयं तद्गत- नाट्यधर्मी नटगता तु नाट्यलक्षणलक्षितं कृत्वा लीलाया: शोभाप्रधानतया मनोहरा ये अङ्गहारा तत्प्रधानैरभिनयैः उपेतं तथा पाठें॥ ७३॥

अब नाट्यधर्मी का लक्षण कहते हैं- अनुवाद-इतिहासादि के वाक्यों का अतिक्रमण करने वाली कल्पनात्मक क्रिया से युक्त, प्राणियों एवं भावों का अतिक्रमण करने वाले, लीला से युक्त अङ्गहारों के अभिनयों से उपेत, नाट्य लक्षण से लक्षित, स्वर एवं अलङ्कारों से संयुक्त, अस्वस्थ पुरुषों से आश्रित -ऐसा जो नाट्य है, उसे नाट्यधर्मी कहते हैं॥ ७३-७४॥

१. ख. अतिसत्त्वक्रियोपेतम्। क-ट. गीतवाद्यक्रियोपेतम्। २. ख. ग. अतिभाषितम्। क-द. अतिभाषिकम्। क-ट. सत्वभावसमान्वितम्। ३. नाटयताछछयान्वितम्। ४. क. सर्वालक्कार संयुक्तम्।

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१८५

स्वरालड्गारसंयोजनया युक्तं यत्र च पुरुषो न स्वरूपे तिष्ठति, अपि तु स्त्रीबलमाश्रयति प्रयोज्यः पुरुषो यत्र न स्वरूपस्थः अपितु स्त्रिया प्रयुज्यते तन्नाट्य- धर्मी। भवेदित्यनेन संभावनामाचक्षाण इदमाह नैवेदं समयमात्रनिष्ठमिति वक्तव्यं अपि तु संभाव्यमानमेव सद्रञ्जनोपयोगि वस्तूपयोगि च॥ ७४ ॥ अभिनव-इतिहास-पुराण आदि के प्राचीन वृत्तों का अतिक्रमण कर अर्थात् यथावत् प्रस्तुत न कर जन-रञ्जन के लिए उचित अनुरञ्जक इतिवृत्त की कल्पना- त्मक क्रिया है, उस क्रिया से उपेत (युक्त)। जैसे राजशेखर के द्वारा की गई राम के निर्वासन हेतु दशरथ-वेषधारी राक्षस की कल्पना, उस कल्पनाल्मक क्रिया से उपेत। सत्त्व का अर्थ है स्वभाव और भाव का अर्थ है चित्तवृत्ति। इनका अतिक्रमण करके स्थित कवि-कल्पित चित्तवृत्तियों से युक्त। जैसे-स्वभाव चपल विदूषक की चित्तवृत्ति का अतिक्रमण कर अर्थात् उसकी चंचल मनोवृत्ति के वत्सराज के द्वारा प्रतिकूल वसन्तक में मन्त्री पद के योग्य गाम्भीर्य एवं अवहित्त्थ की योजना और भी जैसे-स्त्री स्वभाव के अनुरूष प्राकृत-भाषा का अतिक्रमण करके महारानी द्वारा संस्कृत में भाषण करना। इस प्रकार का जो अभिनेय है, उसमें नाट्यधर्मी है। अर्भिनय तो नटगत होता है। लीला के शोभा-प्रधान होने से जो अङ्गहार है, उन उन अङ्गहार-प्रधान अभिनयों से युक्त एवं नाट्य लक्षणों से लक्षित नाट्यधर्मी होता है। अभिनव-स्वरालद्वार की योजना से युक्त। जहाँ पर पुरुष अपने सहज रूप में नहीं रहता, बल्कि स्त्री-भाव का आश्रय ले लेता है। अतः प्रयोज्य पुरुष जहाँ अपने स्वरूप में स्थित नहीं रहता, अपितु स्त्री के द्वारा प्रयुक्त किया जाता है वहां नाट्य- धर्मी होता है। यहाँ पर 'भवेत्' क्रिया के द्वारा सम्भावना में लिङ् लकार का प्रयोग होने से ग्रन्थकार यह कहते हैं कि इसलिए यह समयनिष्ठ मात्र है, ऐसा नहीं कहना चाहिए, अपितु सम्भाव्यमान होते हुए रञ्जन के उपयोगो और कथावस्तु के लिए उपयोगी है।। ७४।। ना० शा०-२४

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१८१ नाटयशाह्य

न हयासन्नवचनस्यापि। अश्रवणमन्यैर्यश्रयमाणस्य च श्रव्णं लोकेऽपि कदाचन न भवत। केवलं तन्त्रे तत्सौन्वर्यार्थमानोयते यथोक्तमुपाध्यायै :-

तदत्रास्ति न तत्रास्य कवेर्वर्णनमहति। यन्नासंभवि यत्र स्यात्सम्भव्यत्र तु धर्मतः ॥

यत्र नियमहेतुः सौमनस्यं तत्र नाट्यधर्मो व्यापकत्वमति बहुतरोवाहरण- निदशंनदिशा दर्शयितुमाह-लोकेति।

विशेष-'अतिवाक्यक्रियोपेतम्' का अभिप्राय है कि इतिहास-पुराण आदि में वर्णित प्राचीन कथानको को यथावत् प्रस्तुत न कर जन-रक्षन के लिए उपयुक्त इतिवृत्त की कल्पना- त्मक क्रिया का प्रयोग होता है अर्थात् इतिहास-पुराण की प्राचीन घटनाओं में रब्जक, रोचक एवं रमणीय रूप में प्रस्तुत किया जाता है। 'अतिसत्त्वातिभावकम्' का अभिप्राय है कि पात्रों के स्वभाव और चित्तवृत्ति का अतिक्रमण करके इसमें नबीन कवि-कल्पित चित्तवृत्ति भिन्न रूप में प्रस्तुत होती है। जैसे तापसवत्सराज में वत्सराज की पत्नी स्त्री-स्वभावोचित प्रथोज्य प्राकृत भाषा का प्रयोग न कर संस्कृत भाषा का प्रयोग करती है।

नाट्यधर्मी में नाट्य के समस्त लक्षण विद्यमान रहते हैं। उन लक्षणों से छक्षित आद्गिकादि अभिनय लोला के शोभा प्रधान होने से मनोहर अज्जहारों के द्वारा प्रस्तुत किये जाते हैं। इस प्रकार नाटयघर्मी में शास्त्रीय विषियों से सम्पन्न अभिनय, अतिरञ्जक, हृदय- ग्राही, रोचक एवं रमणीय होता है।

अभिनव-आसन्न वचन का अश्रवण नहीं हो सकता और दूसरों के अश्रूयमाण पद का श्रवण लोक में कभी भी सम्भव नहीं है। केवल तन्त्र में सौन्दर्य के लिए उसका आनयन होता है। जैसा कि उपाध्याय ने कहा है-

णार "वह यहाँ है, वहाँ नहीं, अतः वह कवि के वर्णन के योग्य है। जो जहां सम्भव नहीं, वह यहाँ धर्मतः सम्भव है।"

जहाँ नियम का हेतु सौमनस्य है वहाँ नाट्यधर्मी की व्यापकता है। इसे अनेक उदाहरण निदर्शन के द्वारा दिखाने के लिए कहते हैं-

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ऋयोदशोउध्याय: १८७

लोकप्रसिद्धं द्रव्यन्तु यदा नाट्ये प्रयुज्यते। मूर्तिमत् साभिलाषञ्च नाटयधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७५॥ आसन्नोक्तन्तु यद्वाक्यं न शृण्वन्ति परस्परम्। अनुक्तं श्रूयते वाक्यं नाट्यधर्मी तुसा स्मृता ॥७६॥

अभियोज्यं क्रियासु पदं मूर्तत्वात केवलं नाभिलाषं लोकेऽपि कलाशिल्पि- कल्पनाकलितमतस्तदपि मूर्तिसंपादनेन प्रयुज्यते प्रयोग: क्रियते। यथा मायापुष्पके "ततः प्रविशति ब्रह्मशाप" इति ॥ ७५॥ न शृण्वन्ति जनान्तिकापवारितकयोः। अनुक्तं श्रूयते, आकाशभाषितं, गतादावाका शा दौ ।। ७६ ।।

अनुवाद-लोक में जो अभियोज्य, अभिलाष-युक्त एवं मूर्ततिमत् पद यहाँ प्रयुक्त किया जाता है उसे भो नाट्यधर्मी कहते हैं।। ७५ । अनुवाद-जहाँ पर समीप में कहे हुए वचन परस्पर सुनाई नहीं बेते और अनुक्त (बिना कहे हुए) वचन सुनाई देते हैं वहाँ भी नाट्यधर्मी होता है॥ ७६॥ अभिनव-लोक में क्रियाओं में अभियोज्य पद है, जो प्रयोग के योग्य हैं और मूरत्तिमान् साकार होने से साभिलाष हैं अर्थात् लोक में भी जो कला-शिल्पो की कल्पना से आकलित हैं उनका भी मूर्त्ति बनाकर प्रयोग किया जाता है जिसमें नायक- नायिकाओं की अभिलाषाएँ साकार प्रतोत होती है। जैसे 'मायापुष्पक' में 'ततः प्रविशति ब्रह्मशापः' अर्थात् उसके बाद ब्रह्मशाप प्रवेश करता है। जनान्तिक और अपवारित रूप नियतश्राव्य में प्रेक्षक नहीं सुनते, वह कुछ ही व्यक्तियों के लिए श्राव्य होता है। अनुक्त वचन को आकाशभाषित के द्वारा केवल अभिनेता श्रवण करते हैं। ये जनान्तिक, अपवारित और आकाशभाषित विधियाँ नाट्यधर्मी विधियाँ हैं ॥ ७५-७६ ॥।

१. क, लोके यदभियोज्यं च पदमत्रोपयुज्यते। क-म. लोकेऽप्रयुज्यं यद् द्रव्यं समं नाटये प्रयुज्यते। १. ख. ग. वृत्तिमत्। १. क. (ट०) नाट्यबर्मो कृतं तु तस्।

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१८८ नोटपशास्त्रे

शैलयानविमानानि चर्मवर्मायुधध्वजा:। मूर्तिमन्तः प्रयुज्यन्ते नाट्यधर्मी तु सा स्मृता॥७७॥ य एकां भूमिकां कृत्वा कुर्वीतकान्तरेऽपराम्'। -कौशल्यादेककत्वाद्वा नाट्यधर्मोति सा स्मृता ॥७८ ॥ यागम्या प्रमदा भूत्वा गम्या भूमिषु युज्यते। गम्या भूमिष्वगम्या च नाटयधर्मी तु सा स्मृता ॥ ७९॥ सूतिमन्त इति प्रक्रिया तु कर्म कायवत्प्रयुज्यन्त इत्यर्थः। तद्यथा-'अग्रे पर्वत एष कथमत्र गन्तव्यम्" इत्यादि। चर्म खेटकं वसुनन्दादि अपूर्ण रूपं वारुवस्त्र- चित्राविरूपतया प्रयुज्यते ।। ७७ ।। अनुवाद-शैल, यान, विमान, ढाल, कवच, आयुध, ध्वज आदि का जहाँ पर मूर्त रूप में (साकार रूप में) प्रयोग किया जाता है, वहाँ भी नाट्य- धर्मो होता है।। ७७ ।। अभिनव-प्रक्रियाओं में शैल आदि पदार्थो का मूर्त (साकार) रूप में प्रयोग किया जाता है। जैसे-आगे यहाँ पर्वत है, कैसे यहाँ जाँय ? इत्यादि। यहाँ चर्म, खेटक आदि का अपूर्ण रूप दारु (लकड़ी) वस्त्र, चित्र आदि के रूप में प्रयोग किया जाता है।। ७७ ॥ अनुवाद-जहाँ अभिनेता एक भूमिका का निर्वहन करने के पश्चात् अपनो कार्य-कुशलता से अथवा एकाकी (अकेला) होने के कारण बीच में दूसरी भूमिका को धारण करता है उसे भी 'नाट्यधर्मो' कहते हैं॥ ७८ ॥ अनुवाद-जो अभिनेत्री अगम्या नारी की भूमिका करके फिर गम्या नारी को भूमिका करतो है अथवा गम्या नारी की भूमिका में अगम्या नारी को भूमिका ग्रहण करती है, उसे भी 'नाट्यधर्मो' कहते हैं ॥ ७९॥ १. म. (द०) पुनरन्यां प्रयोजयेत्। २. म. (ट० ) कोशलादेककृत्यत्वाद् । ३. म. (न०) योज्यते।

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त्रेयोदशोउंध्याये

नृत्यते गम्यते यच्च नाट्यधर्मो तुसा स्मृता॥ ८०॥ योऽयं स्वभावो लोकस्य सुखदुःखक्रियात्मक: ॥क सोऽङ्गाभिनयसंयुक्तो नाट्यधर्मी तुसा स्मृता ।।८१।। ललितैरिति आवेष्टितादिचतुविधकरणोपगृहीतवर्तनाप्रवतितैः। उत्क्षिप्तानि यानि पदानि तेषां चतुस्तालादिना (अ ९-२७३-१८९) क्रमात्कालविभागाश्चतुष्कल- त्वादयः। च शब्द इवशब्दार्थ:। नृत्यत इव यद् गम्यते नृत्तसदृशी या विशाखा सा गतिरित्यथंः । तद्भावे लटौ।। ८० ॥ एतत्प्राणितमेव नाट्यमित्याह योऽयं स्वभाव इति। अङ्गरातोद्यादिभिर- भिनयैश्च संयुक्तत्वं लोकस्वभावानुभावविलासोपेतत्वं विधायकस्य नाट्यधर्मोत्वं विधानमिति प्रथमाध्याये (१-११८) इलोकादभिन्नार्थ एवायं तत्र नाट्यलक्षणपरो वाक्यार्थ इति विवृतं चैतत्तत्रैवाध्याये॥ ८१॥ अनुवाद-जहाँ पर ललित अङ्गों के विन्यास तथा उत्क्षिप्त पद क्रमों से नाचते हुए के समान चलते हैं, उसे भो नाट्यधर्मो कहा गया है॥। ८० ॥ अभिनव-'ललितः' अर्थात् आवेष्टित आदि चतुरविध करणों से गृहीत वर्तनाओं से प्रवत्तित तथा उतिक्षप्त जो पद हैं उनका चतुष्तालादि के द्वारा क्रमशः जो काल-विभाग है वह चतुष्कल रूप है। यहाँ 'नृत्यते गम्यते च' में उपात्त 'च' शब्द 'इव' अर्थ में है। अतः इसका अर्थ होगा-'नाचते हुए की तरह चलता है' अर्थात् नृत्य के समान जो विशाखा है, वही गति है। यहाँ भाव अर्थ में लट्लकार का प्रयोग है॥ ८० ॥ अनुवाद-यह जो लोक का सुख-दुःख रूप स्वभाव है वह आङि्गक आदि अभिनयों से युक्त है, उसे 'नाट्यधर्मो कहते हैं ॥ ८१ ।। अभिनव-'योऽयं स्वभावः' इत्यादि। अङ्ग अर्थात् आतोद्य, गोत आदि तथा अभिनयों से संयुक्त हैं अर्थात् लोक-हवभाव तथा अनुभव रूप विलास से युक्त विधायक का नाट्यधर्मीतव का विधान है, ऐसा नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में उल्लेख (श्लोक संख्या १।१२७, श्लोकार्थ) की अपेक्षा भिन्नार्थक है। यह तो नाट्यलक्षण- वाक्यार्थ है। यह विवरण वहीं प्रथम अध्याय में दिया गया है ॥ ८१ ॥ १. क. (ट०) यश्चाऋहारविन्यासैः । २. ग. नाट्यघर्मी प्रकीत्तिता।।

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१९ नाटयशास्त्रे

यश्चेतिहासवेदार्थो ब्रह्मणा समुदाहृतः। दिव्यमानुषरत्पर्थ नाट्यधर्मी तु सा स्मृता ॥ ८२ ॥ यश्च कक्ष्याविभागोऽयं नानाविधिसमाश्रितः। रङ्गपीठगतः प्रोक्तो नाट्यधर्मी तु सा भवेत् ॥ ८३ ॥ नाट्यधर्मोप्रवृत्तं हि सदा नाट्यं प्रयोजयेत्। न 'ह्यङ्गाभिनयातिकिञ्चिहते रागःप्रवर्तते ॥ ८४॥

प्रसङ्गोपयोगेन सर्वाभिनयप्रकारसारा नाट्यधर्म्यभिहिता, तां दर्शयति यश्चेति। चकारः प्रसङ्गं द्योतयति। प्रोक्त इति समनन्तरमेव ॥ ८२॥ व्पापकत्वमेव नाट्यधर्म्या उपसंहरति-नाट्यधर्मीत्याविना। उपदेशद्वारेण नाट्यधर्मोप्रवृत्ता गतिः। हेतुः न ह्यङ्गाभिनयादिति। अङ्गानि च गोतातोद्यादोन्यभिनयश्चेति द्वन्द्वः समाहारः। राग इति सामाजिकप्रीतिः॥८४॥ अभिनव-प्रसङ्गगत उपयोग के द्वारा समस्त अभिनय प्रकारों का सारभूत नाट्यधर्मी को जो कहा है, उसे दिखाते हैं- अनुवाद-ब्रह्मा जी ने देवता और मनुष्यों के रत्यर्थ अर्थात् मनोरञ्जन के लिए इतिहास-पुराण एवं वेद के अर्थ को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है, उसे नाट्यधर्मों कहा गया है।। ८२।। क अभिनव-यहाँ पर 'चकार' प्रसङ्ग को द्योतित करता है। 'प्रोक्तः' का अभिप्राय है-इसके बाद ही कहा है ॥ ८२॥ अनुवाद-नाना प्रकार के विधानों के समाश्रित रङ्गपोठगत अर्थात् रङ्ग- पीठ पर जिस कक्ष्या विभाग को कहा गया है वह नाट्यधर्मो कहा गया है॥। ८३॥ अभिनव-अब नाट्यधर्मी की व्यापकता का उपसंहार करते हैं- अनुवाद-नाट्यधर्मो के द्वारा प्रवृत्त अर्थात् सम्पन्न होने वाले नाट्य का सदा प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि आङ्गिक अभिनय के बिना कोई राग प्रवृत्त नहीं होता।। ८४।। १. क-म यत्सेतिहासो। २. क. (टि०) देवमानुषर्यर्था। ३. क-न. नानादेशसमाश्रयः । ४ ख. ह्यमिनयार्थजः । ५. क-म. किम्चिदुविना। ६. क, नाटयं।

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१९१

सर्वस्य सहजो भावः सर्वो ह्यभिनयोऽर्थंतः। अङ्गालद्वारचेष्टाभिर्नाट्यधर्मी' प्रकीतिता॥ ८५ ।।

नाट्यधर्म्या यदि व्यापकत्वाल्लोकस्वभावभाविन्या न प्रयोजनमुक्तयेत्या- शंक्याह-सर्वस्य सहज इति। हि शब्दो हेतुमदभावं द्योतयति। तदयमर्थ यस्मात्कविगता नाट्यगता वागङ्गालङ्कारचेष्टा नाट्यधर्मीरूपा सर्वप्राणवती। अर्थत इति अर्थमपेक्ष्य प्रवतते अभिनयश्च सर्वाभिनेयमर्थमपेक्ष्य प्रवर्तते, तस्मात्सर्वस्य संबन्धी सहजो भावो लोकधर्मलक्षण उक्तो भित्तिस्थानीयत्वेन नाट्धर्म्या सहजसंवादिकर्मणः। अङ्गं गुणाः लक्षणानि च चेष्टा व्तनारूपा अलडकूार उपमादिः॥८४।।

अभिनव-'अङ्गानि च गोतातोद्यानि च अभिनायाश्च' में समाहार में द्वन्द समास है। अज्ज का अर्थ है गीत, आतोद आदि और अभिनय में समाहार दवन्द समास होने से एकवचन है। 'राग' का अर्थ है सामाजिक प्रीति॥८४ ॥ अभिनव-अब इसके बाद नाट्यधर्मी यदि व्यापक है तो लोकस्वभाव युक्त लोकधर्मो से क्या प्रयोजन है? इस प्रकार आशङ्का करके कहते हैं- अनुवाद-सभी प्राणियों का सहज भाव, आङ्िक आदि अभिनय, अलद्धार और चेष्टाएँ जब अर्थ की अपेक्षा से प्रवृत्त होती है। तो उसे 'नाटघधर्मों कहते हैं।। ८५॥ अभिनव-यहाँ पर 'हि' शब्द हेतुहेतुमद्धाव को सूचित करता है। इसधयिए इसका यह अर्थ है कि जिससे कविगत और नाट्यगत सर्व प्राणवतो नाट्यधर्मी रूप शब्द, अङ्ग, अलङ्कार और चेष्टाएँ हैं वे अर्थ की अपेक्षा से प्रवृत्त होती हैं और अभिनय भी समस्त अभिनेय अर्थ की अपेक्षा से प्रवृत्त होते हैं। इसलिए सहज भाव अर्थात् सहज संवादादि कर्म से नाट्यधर्मी के भित्तिस्थानीय होने से लोकधर्मी का कथन किया गया है अर्थात् लोकधर्मी सबका सहज भाव है। यहाँ अङ्ग गुण है, लक्षण है, अलङ्कार उपमादि हैं और चेष्टा वर्तना रूप है ॥ ८५ ॥ १. ग. कक्षाविभागस्तु॥।

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१९२ नाटयशास्त्रे एवं 'कक्ष्याविभागस्तु धर्मी युक्तय एव च। ए 'विज्ञेया नाट्यतत्त्वज्ञैः प्रयोक्तव्याश्च तत्त्वतः"॥ ८६ ॥। उक्तो मयेहाभिनयो यथावत् शाखाकृतो यश्च कृतोऽङ्गहारैः। पुनश्च वाक्याभिनयं यथावद्वक्ष्ये स्वरव्यञ्जनवर्णयुक्तम्।८७॥ 'इति भरतीये नाट्यशास्त्रे करयुक्तिधर्मोव्यञ्जको नाम त्रयोवशोऽध्यायः अङ्गाभिनयः समाप्तः। अध्यायार्थंमुपसंहरति एवं कक्ष्याविभागस्त्वति। धर्मी होकवचनं नाट्यधर्म्या अत्र प्राधान्यादन्यस्यास्तत्रैव मग्नत्वात्। युवतय इति प्रवृत्तयः ॥।८६।। अध्याय के अरथ का उपसहार करते हैं- अनुवाद-इस प्रकार कक्ष्या-विभाग, धर्मो और प्रवृत्तियों को नाटघतत्व- वेत्ताओं को समझना चाहिए और तास्विक रूप से (यर्थार्थरूप से) प्रयोग करना चाहिए॥ ८६॥ अभिनव-धर्मी दो हैं, किन्तु यहाँ आचार्य ने द्विवचन का प्रयोग न करके एकवचन जा प्रयोग किया है। उनका एकवचन कहने का तात्पर्य यह है कि नाट्य- धर्मी का ही यहाँ नाट्य में प्रधानता होने से लोकधर्मी उसी में समाविष्ट हो जाता है। यहाँ 'युक्तयः' का अर्थ प्रवृत्तियाँ है॥ ८५॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने यहाँ पर शाखीकृत (आङ्गिक अभिनय) तथा अङ्गहारों से निर्मित अभिनय का यथावत् वर्णन किया है। अब मैं स्वर-व्यञ्जन वर्गों से युक्त वाक्यार्थाभिनय का यथावत् वर्णन करूँगा ॥ ८६॥ १. ख. नाटयघर्मी प्रकीतिता: । २. ख. धर्मीयुक्ता प्रकीतिता। ३. विज्ञेयो नाटयतत्त्वज्ञैः प्रयोक्तव्यव्च तत्त्वतः । ४. ग. यश्नतः । ५. म. अज्हारः। ६. ब, इति भारतीयनाट्वशास्त्रे कक्याप्रवृत्तिधर्मव्यञ्जको नाम चतुरदशोऽध्याय:।,१

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१९३

E अथोपसंहारे च प्रयोजनं धर्म्यावयो उपकरणभूताः, तेषामल्पबाहुल्यविरचित- क्रमाभिधानं योजयित्वा प्रतिपावनमित्यध्यायार्थो प्रकरणप्रस्तावे च प्रथमेन योज- यति अन्येन च भाविप्रकरणार्थमासूत्रयति-उक्तो मयेहाभिनय इति। स मयेत्यात्मज्ञानोत्कषंणों व्युत्पत्ति शिष्याणामुपपावर्यति। यद्यप्यस्य शाखानृत्तं (करवतंना) चाङ्गहारश्च वस्तुनीत्युक्तं, तथापि, भावाध्याये सात्त्विकप्रसङ्गोन (७१४३) अङ्करस्याभिहितत्वात, सामान्याभिनये च (अ २२-४१) तदुक्तम्। वक्तव्यशेषस्य वक्ष्यमाणत्वावाङ्गिकाभिनयोपसंहारावेवोपसंहरति। वाक्यमेवाभिनयः तत्त्वतश्च धर्मी, अभिनयो वाक्यं हास्यादौ। एवं यद्यपि वाक्याभिनय उक्तस्तथापि सति उक्तस्वरूपमभिनेयेमिति तवाह यथावदिति, अत एव पुनरुक्तम्। स्वराः अचः । व्यञ्जनानि हलः। वर्णा अज्झल्समुबया इति शिवम्॥८७ ॥

अभिनव-यहाँ उपसंहार में उपकरणभूत धर्मी आदि प्रयोजन हैं। उनका अल्पत्व एवं बहुत्व से रचित क्रमाभिधान (क्रम के प्रतिपादन) की योजना करके प्रतिपादन करना, इस अध्याय का अर्थ प्रकरण के प्रस्ताव का पहले योजना करते हैं और अन्य के द्वारा भावो प्रकरण का अर्थ आसूत्रित करते हैं-'उक्तो मयेहाभिनय इति'। अभिनव-'स मया' इस कथन से आत्मज्ञान का उत्कर्ष करने वाली व्युत्पत्ति शिष्यों के लिए उपपादन करते हैं। यद्यपि इसे शाखानृत्त (करवर्त्तना) और अङ्गहार रूप वस्तु के विषय में कहा है तथापि भावाध्याय में सातत्विक भावों के निरूपण के प्रसङ्त में अङ्कर का भी कथन है और सामान्याभिनय में उसे भी कहा गया है। अब जो कुछ कहना शेष है उसको आगें कहेंगे। आङ्गिक अभिनय के उपसंहार से ही उपसंहार करते हैं। वाक्य ही अभिनय है, तत्त्वतः धमीं भी है। हास्यादि रसों में अभिनय वाक्यरूप है। इस प्रकार यद्यपि वाक्याभिनय कह दिया गया है तथापि जैसा मैंने कहा है-उक्त स्वरूप हो अभिनय है। इसलिए कहते हैं-'यथावदिति'। अर्थात् यथावत् कहेगे, इसलिए पुनरुक्त नहीं है। स्वर का अर्थ है अच् और व्यञ्जन हल् हैं तथा स्वर एवं हलों का समुदाय वर्ण हैं॥ इति शिवम्। ना. था०-२१

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१९४ नाडपशाहे

वृत्ति: कृताभिनवगुप्तपदाभिधेन कक्ष्याङचित्रतललक्षणवर्णनेऽ्रस्मिन् ॥१३॥

भारत्यां कक्ष्याप्रवृत्तिधम्यंभिधानं (धर्मीव्यञ्जको) नाम त्रयोदशोऽध्याय: समाप्त: ॥१३॥

अभिनव-शोतांशु अर्थात् चन्द्रमण्डल रूप शिरोभूषण वाले चन्द्रशेखर शिव के चरणकमल के किजल्क (पराग) से परिपूत केश से सुशोभित अभिनवगुप्त- पादाचायं ने इस कक्ष्या, अङ्क, चित्र के वर्णन में व्याख्या लिखो है ॥ १३ ॥ इस प्रकार महामाहेश्वर आचार्य अभिनवगुप्त द्वारा विरचित नाट्यवेद- विवृति अभिनवभारती में कक्ष्या, प्रवृत्ति एवं धर्मी का अभिधान करने वाला तेरहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।। १३ ।। इति डॉ० पारसनाथद्विवेदिविरचितायामभिनयभारत्याः मनोरमाख्यायां हिन्दी व्याख्यायां कक्ष्याप्रवृत्तिघम्यभिधानं नाम त्रयोदशोऽध्याय: ॥। १३॥ इस प्रकार डॉ० पारसनाथद्विवेदी द्वारा रचित अभिनवभारती की हिन्दी ध्याख्या में तेरहवां अध्याय समाप्त हुआ ।। १३।।

१. इति भारतीयनाटयशास्त्रे कक््याप्रवृत्तिषर्मीव्यञ्जको नाम चदुर्वेकोऽ्याया। ज655

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अथ चतुर्दशोऽध्याय: अभिनवभारती द्विधास्थितं सद्य (कर्म) सवाविभक्तं २विश्वान्पवार्थान् समुपाववानम्। पाणोन्व्रियं संव्यवहारहेतुं यस्पेश्वरं तं वरदं नमामः ।। १४ ।। आङ्गिकाभिनयानन्तरं वाचिकस्य भेदं नाटधानुप्राणकतया पूर्वोद्दिष्टाद्गि- कस्य विषयसमर्पणत्वाच्च वाचिको लक्षणोय इत्येवंभूतामध्यायसङ्गात करोति यो वागभिनय इति। हिन्दी व्याख्या आद्ञिक अभिनय के निरूपण करने के पश्चात् अब वाचिक अभिनय का विशेष निरूपण करते हैं- अभिनव-जिस परमेश्वर को पाणि अर्थात् हस्तेन्द्रिय दक्षिण और वाम दो रूपों में स्थित, सदा अविभक्त, विश्व के समस्त पदार्थो का आदान करने वाली तथा समस्त व्यवहार का हेतु है, उस वरद (वरदान देने वाले) ईश्वर को हम प्रणाम करते हैं ॥ १४॥ विशेष-अभिनवगुप्त चतुर्दश अध्याय की अभिनव-भारती के प्रारम्भ में मङ्गलाचरण करते हुए कहते है कि हम महेश्वर शिव को प्रणाम करते हैं। जिस शिव की पाणीन्द्रय अर्थात् दोनों हाथ दायें-बायें दो रूपों में विभक्त है और वह कर्म करने वाली पाणीन्व्रिय दो रूपों में विभक्त होते हुए भी सदा अविभक्त रहती है अर्थात् अलग-अलग होते हुए भी दोनों हाथ मिलकर काम करते हैं तथा पदार्थों का मिलकर आदान करते हैं। ये ही दोनों हाथ विश्व के समस्त व्यवहार के हेतु है, अतः उस शिव की हम वन्दना करते हैं। अभिनव-आङ्गिक अभिनय के निरूपण करने के बाद नाट्य के अनुप्राणक तत्त्व तथा पूर्व में उद्दिष्ट आङ्गिक अभिनय के विषयों को प्रस्तुत करने में आधारभूत वाचिक अभिनय का लक्षण निरूपणीय है, इस प्रकार अध्याय की संगति दिखाते हुए कहते हैं- १. ग. पर्चवशाध्याय।। २. क-(ख) विष्वात्पदार्थाद्। ३. क- (टि० ख.) सव्यवहारहेतु। ४. क. (टि० ब०) वाचिकस्पेदं।

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माटपंसारे

यो वागभिनयः 'पूर्व मया प्रोक्तो द्विजोत्तमाः । लक्षणं तस्य वक्ष्यामि स्वरव्यञ्जनसम्भवम् ॥ १ ॥ वाचि यत्नस्तु* कर्तव्यो नाट्यस्पेयं' तनुः स्मृता। "अङ्गनेपथ्यसत्त्वानि 'वाक्यार्थं व्यञ्जयन्ति हि॥ २ ॥

वागेवाभिनय: वाचिकाभिनयः । पूर्वमिति षष्ठेडध्याये स' निरूप्यते तत्त्वेन' चास्याभिषानप्राधान्यात्।। १॥ अत्र हेतुमाह-वाचि यत्नस्तु कतंव्य इति कविना निर्माणकाले नटेन प्रयोग काले। कुत इत्याह-नाटघस्यैषेति। एषा हि तनुर्नाट्यस्य सकलप्रयोगभित्तिभूतत्वे- नातोद्यगोताभिनयानुग्राहकरवात् स्वयमभिनयरूपत्वाच्च। प्रवशितं चैतवस्माभि- रपाङ्गाभिनयारम्भ एव (अध्या-८)।

अनुवाद-हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों ! पहिले जो मैंने वाणी के अभिनय (वाचिक

कहूँगा ।। १ ।। अभिनय) को कहा है अब स्वर और व्यञ्जन से सम्भूत उसके लक्षण को

अभिनव-वाणो ही अभिनय है, अतः कर्मधारय समास है (वागेवाभिनयः बाचिकाभिनयः)। पहिले छठे अध्याय में जिसका नाम मात्र से कथन किया गया है अब यहाँ तत्त्वतः अभिधान में प्रधानता के कारण उसका लक्षण निरूपण करते हैं, प्रस्तुत करते हैं ॥ १ ॥ अनुवाद-वाक् अर्थात् वाणी के विषय में प्रयत्न करना चाहिए। क्योंकि वाणी ही नाटघ (अभिनय ) शरीर है और अङ्ग (बङ्ङिक अभिनय), नेपथ्य (आहाय अभिनय) तथा सत्त्वाभिनय वाक्यार्थ को ही अभिव्यक्त करते हैं ॥ २॥

१. ख. प्रोक्तो मया पू्वं। २. क. (टि० ल०) तन्निरूप्यते। ३. क-फ. तब। ४. क-भ. वाचि बरनो विधावन्तः। ५. कनप. नाडधस्पेय। ६. क. ज. अङ्गनेपष्यसतत्वानि। ७. क-भ. बागर्यंम्।

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यत्तु कैश्चिवभिषोयते चित्तवृत्ति प्रति शब्दानां बहिरङ्गस्वम्"। तबसत्। तथा हि यदुच्यते व्यतिरेकाभावान्न रसावयः शब्ववाच्या इति, सर्वेः शन्वौव्यंति- रेकाभावोऽसिद्ध:१ अभिनयचतुष्टयसामान्यं बहिः सवंत्र प्रतीतिस्फुटतायां व्याप्रियत इत्यवोचाम सप्तमेऽष्याये । अथ शुङ्गाराविशब्वानां वाचकानामभावेऽपि तत्प्रतिपत्ति:। परिणतश्ञरकाण्डापाण्डुरा गण्डपालो हिमसमयनिमोलरपुण्डरोकायमाणम्। नयनमघरबिम्बं श्वासविशान्तितान्तं तव सुतनु ! तनोति प्राणितं मन्मथस्य ।।

अभिनव-वाचिक अभिनय के लक्षण में हेतु को कहते हैं कि कवि को काव्य निर्माण के समय तथा नट को नाट्य-प्रयोग के समय वाणी के विषय में यतन करना चाहिए, क्योंकि यह वाणो (वाचिक अभिनय) नाट्य का शरीर है। समस्त प्रयोगों का भित्ति-स्थान (आधारभूत) होने से, गोत, वाद्य का अनुग्राहक होने से और वाणो के स्वयं अभिनय रूप होने से वाणी को नाटय का तनू (शरीर) कहा गया है। हमने उपाङ्गों के अभिनय के प्रारम्भ में (अष्टम अध्याय में) दिखा दिया है। जैसा कि कोई कहते हैं कि चित्तवृत्ति के प्रति शब्दों की बहिरङ्ता है। अर्थात् चित्तवृत्तियाँ अन्तःपदार्थ हैं और तद्वोधक शब्द बहिरङ्ज, किन्तु आपका यह कहना ठोक नहीं है। क्योंकि आप जो कहते हैं कि व्यतिरेक का अभाव होने के कारण रसादि शब्दों के वाच्य नहीं है। वहाँ सभो शब्दों से व्यतिरेकाभाव सिद्ध नहीं है। क्योंकि सामान्यतः चारों अभिनय बहिरङ्ग होते हुए भी सब जगह रसप्रतीति में व्यापृत होते हैं। यह बात सप्तम अध्याय में कह चुके हैं। और जो कहते हैं कि रसादि के वाचक शृङ्गारादि शब्दों के अभाव में भी रस की प्रतीति होती है। जैसे-

१. क-क. पस्तु। २. क-ख. बहिरऋ्त्वं धर्मः । ३. क-क, व्यतिरेकभावः सिद्:। ४. क-क. पमम्परोकायमाण:।

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११८ नोड्यशारच्रे

इत्यावावयमेव च व्यतिरेकाभावः। तवप्यसत्। एतावतापि हि वृश्चिकावि- वत् निमित्तान्तरमपि तत्प्रतोतौ सुवचम्। वृश्चिकोऽ्यो गोमयजोऽ्य एव वृश्चिक- प्रभव इति चेविहापि तत्समानम्। न हि शृङ्गारशब्दात् यादृशो प्रतीतिस्तादृश्ये- वाग्यतः' , नच न भवत शृङ्गारशब्दातत्प्रतोतिः शृङ्गारहास्येति (६-१६ ) इ्लोकस्य काकवाशितदेशीयतापत्तेः। यथासंकेतं हि शब्ात्प्रवतंमानासिद्वं साध्यं चाभिधातुं केन प्रतिहम्यत इति साध्यमानता२ कापि विभीषिका। परिणतशरकाण्डापाण्डुरा गण्डपाली

नयनमधरबिम्बं श्वासविश्रान्तितान्त तव सुतनु ! तनोति प्राणितं मन्मथस्य ।। अर्थात् 'हे सुतनु ! पके हुए सरकण्डो के समान पाण्डुर वर्ण की तुम्हारे कपोल- स्थल, हेमन्त ऋतु में संकुचित होने वाले कमल के समान संकुचित तुम्हारे ये नेत्र और श्वास की विश्रान्ति से मुरझाए हुए तुम्हारे अधरबिम्ब कामदेव के जीवित होने को सूचित कर रहे हैं अर्थात् कामदेव जोवित है, इस बात को स्पष्ट कर रहे हैं। यहाँ पर यही व्यतिरेकाभाव है अर्थात् यहाँ पर रसादि अथवा रसादि के वाचक शृङ्गारादि शब्दों के अभाव में भी शृङ्गार रस को प्रतोति हो रही है। उनका यह कहना भी ठीक नहीं है। बल्कि इससे भी यही कहना उचित है कि वृश्चिकादि के समान रसप्रतीति में अन्य कारण भी है। जैसे गोबर से पेदा होने वाला वृश्चिक (विच्छू) दूसरा है और विच्छू से उत्पन्न विच्छू अन्य है। उसो प्रकार यहाँ भी शृङ्गारादि शब्दों के प्रयोग से होने वाली रसप्रतीति भिन्न है और विभावादि के प्रयोग से होने वाली रस प्रतीति भिन्न हैं। क्योंकि शुङ्गारादि शब्दों के कथन से जेसी प्रतीति होती है वैसी अन्य से नहीं होती। हम यह नहीं कह सकते कि शुङ्गार शब्द के प्रयोग से शुङ्गार रस को प्रतोति नहीं होतो है। क्योंकि यदि हम ऐसा कहते हैं तो षष्ठ अध्याय में "शृ ङ्गारहास्यकरुणा-६।१६" इत्यादि श्लोक में कौओं के काँव-काँव के समान निरर्थक आपत्ति लग जायगी। क्योंकि संकेत के अनुसार शब्द से सिद्ध साध्य का अभिधान को कौन रोक सकता है, इस प्रकार शब्द से रस की साध्यमानता कोई विभीषिका है। १. क-क. ताडश्येबाद्यना च न भवति। १. क. साध्यनामकादि।

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किंचेवमपि शृङ्गारायते हसति करुणायते इत्यादि साध्यशब्दनीयत्वं प्रति किं वक्तम्यं स्यात, अवश्यं चैतत्, अन्यथा- याते दवारवती तवा मधुरिपौ तद्दत्तझम्पानता कालिन्दीतट रूढ़ न ञजुललतामालिङ्य सोत्कण्ठया। तद्गीतं गुरुवाष्पगदगदं गलत्तारस्वरं राधया येनान्तर्जलचारिभिर्जलचरैरप्युत्कम्पमुत्कजितम्।। इत्यादौ सोत्कष्ठंयेति, उत्कमिति चानुव वो विफल एव स्यात, तद्रूपास्पशें तदनुभावसमाकर्षणस्याप्ययोगात्। और यह भी है कि 'शृङ्गारायते' (शृङ्गार की तरह मालूम पड़ता है), हसति (हंसता है); करुणायते' (करुणा की तरह आचरण करता है) इत्यादि में साध्य शब्द से शब्दनीय श्रृङ्गारादि रसों के सम्बन्ध में क्या कहना चाहिए ? आप ही बतायें ? यह बतलाना आवश्यक है, अन्यथा- याते द्वारवतों तदा मधुरिपौ तद्दत्तकम्पानतां कालीन्दीतटरूढ़ वञजुललतामालिङ्गय सोल्कण्ठया तद्गोतं गुरुवाष्पगद्गदगलत्तारस्वरं राधया येनान्तगंतवारिभिजंलच रैरत्युल्कमुल्कूजितम्।। अर्थात् 'मधुरिपु श्रीकृष्ण के द्वारका चले जाने पर राधा के द्वारा दी गईं उछाल से झुकी हुई, कालिन्दी यमुना के तट पर उत्पन्न वञ्जुल लता का आलिङ्न करके उत्कण्ठा से युक्त राधा ने महान् आँसुओं से रुधे हुए कण्ठ से ऊँचे स्वर से वह गाना गाया जिससे जल के भीतर रहने वाले जलचरों ने भी भारी उत्कण्ठा से कूजन किया।" यहाँ पर 'सोत्कण्ठया' और 'उत्कम्' इस प्रकार अनुवाद विफल हो जायगा। क्योंकि तद्रप का स्पर्श न होने पर अर्थात् व्यभिचारिभावों के शब्दतः उपात्त न होने पर उनके अनुभावों के समाकर्षण का आक्षेप का अयोग होने से अर्थात् तदनुकूल अनुभावों का आक्षेप नहीं हो सकेगा। विशेष-यहाँ पर आलम्बन विभाव मधुरिपु श्रीकृष्ण हैं, उद्दीपन विभाव कालिन्वी तट आदि है, अनुभाव लता-आलिङ्गन आदि हैं। इस प्रकार यहाँ पर विभाव और अनुभाव वाच्य है और लता-आलिङ् गन आदि अनुभावों से उत्कण्ठा व्यक्त होती है, तथापि 'सोत्कण्ठा' शब्द का उपादान सिद्ध का साबक होने से अनुवादक है, निरर्थक है, किन्तु यह अनुवाद निरर्थक नहीं है, क्योंकि यह 'उत्कम्' शब्द अनुमावों का आक्षेप करता है।

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२०० नाट्यशाहम

स्थायिव्यभिचारिणा च भेवाप्रतीतौ- यान्त्या तया वलितकन्धरमानतं तद्- आवृत्तवृभ्तशतपत्रनिभं वहन्त्या। विग्धोऽमृतेन च विषेण च प्मलाक्ष्या गाढं निखात इव मे हृवये कटाक्ष:।। (मालतीमाधवे १।३२ ) इत्यादावनुभावप्रत्ययोऽपि' दुर्लभीभवेत का कथा रसस्य, वलितावृत्तदिग्ध- निखाताबोनां कटाकशब्दे जीवभूतानां क्रियासु प्रतिपत्तेरभावात। एवम्- लोनेव प्रतिबिम्बितेव लिखितेवोत्कीणंरूपेव च प्रश्युप्तेध च वज्त्रलेपघटितेवाम्तनिधातेव च। सा नश्चेतसि कीलितेव विशिखैश्चेतोभुवः पञचभि- शिचन्तासन्ततितन्तुजालनिविडस्यूतेव लग्ना प्रिया॥ (मालविकाग्निमित्रे ५।४)। इत्यादावेषेव वार्ता।

अभिनव-स्थायीभाव और व्यभिचारीभावों के भेद की प्रतीति न होने पर-जैसे यान्त्या तया वलितकन्धरमानतं त- दावृत्तवृन्तशतपत्रनिभं वहन्त्या - दिग्धोऽमृतेन च विषेण च पक्ष्मलाक्ष्या- गाढ़निखात इव मे हृदये कटाक्षः।। (मालती माधव १।३२) अर्थात् 'जाती हुई, झुके हुए वलित कन्धे और आवृत्त वृन्त वाले कमल के समान मुख को धारण करती हुई तथा अमृत और विष से दिग्ध अर्थात् सने हुए नेत्रों वाली उस नायिका ने कटाक्ष को मानो मेरे हृदय में गहराई से गड़ा दिया है।" इस उदाहरण में अनुभावों की प्रतीति ही दुर्लभ है तो रस की प्रतीति के विषय में क्या कहना है। क्योंकि अनुभाव क्रियात्मक होते हैं किन्तु कटाक्ष के जीव- भूत वलित, आवृत्त, दिग्ध, निखात आदि के विशेषण रूप से प्रतीति होने से क्रिया- रूप में प्रतिपत्ति नहीं हो रही हैं। अतः अनुभवों की प्रतीति दुर्लभ है।

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२०१०

एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया वीतोत्तरं ताभ्यतो- रन्योन्यं हृकयस्थितेऽप्यनुनये संरक्षतोगौरवम्। दम्पत्योः शतकैरपाङ्गवलनान्मिश्रोभवच्चक्षुषो- भंग्नो मानकलि: सहासरभसव्यावृत्तकण्ठग्रहः।। (अमर्कशतके, २३)

और भी- लीनेव प्रतिबिम्बितेन लिखितेवोत्कीर्णरूपेव च प्रत्युप्तेव च वज्त्लेपधटितेवान्तर्निखातेव च। सा नश्चेतसि कीलितेव विशिखेश्चेतोभुवःपञ्चभि- श्चिन्तासन्ततितन्तुजालानिबिडस्यूतेव लग्ना प्रिया॥ (मालविकाग्निमित्र ५।४) "वह प्रिया मेरे हृदय में मानों लीन हो गई है, मानो प्रतिबिम्बित हो गई है, मानो लिख दी गई है, मानो उत्कोर्ण कर दी गई है, मानो हृदय में बो दी गई है, मानो बज्लेप से जड़ दी गई है, मानो अन्तःकरण में गाड़ दी गई है, अर्थात् मेरी प्रिया मानो मेरे चित्त ने कामदेव के पाँच बाणों से कोल दी गई है और मानों चिन्ता- सन्तति रूप तन्तुजाल से निबिड़ रूप में सो दो गई है।" उसी प्रकार यहाँ भी- एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया वीतोत्तर ताभ्यता- रन्योन्यं हृदयस्थितेऽप्यनुनये संरक्षतोर्गौरवम्। दम्पत्योः शनकेरपाङ्गवलनान्मिश्रीभवच्चक्षुषो :- भग्नो मानकलि: सहासरभसव्यावृत्तकण्ठग्रहः।। (अमरूशतक २३) "एक ही शय्या पर पराङ्मुख होकर लेटे हुए बात-चीत बन्द हो जाने से भीतर ही भोतर संतप्त होते हुए, परस्पर हृदय में अनुराग होने पर भी गौरव (शान) की रक्षा करते हुए दम्पति के धीरे से कटाक्षपात (टेढ़ी चितवन) से दोनों की आंखे परस्पर मिल जाने पर हँसते-हँसते जल्दी से मुख मोड़कर गले से लग गये और मान-कलह टूट गया।" ना. था०-२६

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१०२- नाडपश बिन्रे

उत्तिष्ठन्त्या रतान्ते भरमुरगपती पाणिनैकेन कृत्वा धृत्वा चान्येन वासो विगलितकबरीभारमंसे बहन्त्या। भूयस्तल्कालकान्तिद्विंगुणितसुरतप्रोतिना शौरिणा वः शय्यामालिङ्गय नीतं वपुरलसद्वाहुलक्ष्म्याः पुनातु॥ (वेणीसंहारे) आविलपयाधराग्रं लवलीदलपाण्डुराननच्छायम्। कतिचिवहानि वपुरभूत्केवलमलसेक्षणं तस्या: ॥ (विक्रमोवंशीये ५।७)।

इसी प्रकार यहाँ भी- उत्तिष्ठन्त्या रतान्ते भरमुरगपतौ पाणिनैकेन कृत्वा धूरवा चान्येन वासो विगलितकबरीभारमंसे वहन्त्याः। भूयस्तत्कालकान्तिद्विगुणितसुरतप्रीतिना शौरिणा वः शय्यामालिङ्गय नीतं वपुरलसलसद्वाहुलक्ष्म्याः पुनातु ॥ ( वेणीसंहार) "रति के अन्त में अपने भार को एक हाथ से उरगपति शेष नाग के ऊपर रखकर और दूसरे हाथ से वस्त्र को पकड़कर, खुले हुए केशपाश को कन्धे पर वहन करती हुई, उठती हुई लक्ष्मो के उस समय की कान्ति (शोभा) से द्विगुणित सुरत प्रोति वाले श्रीकृष्ण के द्वारा आलिङ्गन करके पुनः शय्या पर ले जाया गया शिथिलता से सुशोभित लक्ष्मी का शरीर तुम सबको पवित्र करे।" इसो प्रकार यहाँ भी- आविलपयोधराग्रं लवलीदलपाण्डुराननच्छायम्। कतिचिदहानि वपुरभूत् केवलमलसेक्षणं तस्या:। (विक्रमोर्वशीय) "उस नायिका का शरीर कुछ दिनों के लिए कुचों का अग्रभाग आबिल हो गया, लवली के पत्ते के समान मुख की शोभा पीली पड़ गई और आँखें अलसाई हुई हो गई।"

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I्िल रम्याणि वोक्ष्य मधुरांश्च निशम्य शब्दान्। 1कUREपर्यत्सुकीभवत यत्सुखितोऽपि जन्तुः ॥। तच्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्व भावस्थिराणि जननाम्तरसौहदानि। (अभिज्ञानशाकुम्तले) निद्रानिमीलितदृशो मवमन्थरायाः नाप्यर्थवन्ति न च यानि निरर्थकानि॥ अद्यापि मे मृगद्शोर्मधुराणि तस्या- स्तान्यक्षराणि हृवये किमपि ध्वनन्ति॥ (चौरपञचाशिका ३६) विवृण्वती शैलासुतापि भावमङ्ग: स्फुरद्वालकवम्बकल्पैः साचीकृता चारुतरेण तस्थौ सुखेन पर्यस्तविलोचनेन।। (कुमारसम्भवे ३३७)। इसो प्रकार- रभ्याणि बीक्ष्य मधुरांश्च निशम्य शब्दान् पयुंत्सुकीभषति यतसुखितोऽपि जन्तुः। तच्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्व भावस्थिराणि जननान्तरसौहृदानि ॥। (अभिज्ञानशाकुन्तले) "रमणीय वस्तुओं को देखकर और मधुर शब्दों को सुनकर सुखी जीव-जन्तु भी जब नितान्त उत्सुक हो जाता है तब तो भाव से स्थिर जन्म-जन्मान्तर के सौहार्द अबोधपूर्वक चित्त से स्मरण करता है। इसी प्रकार- निद्रानिमीलितदृशोर्मदमन्थराया नाप्यर्थवन्ति न च यानि निरर्थकानि। अद्यापि मे मृगद्शोमंधुराणि तस्या- स्तान्यक्षराणि हृदये किमपि ध्वनन्ति ॥ (चौरपञ्चाशिका ३६ ) "निद्रा से निमीलित नेत्रों वाली और मद से ( यौवनमद या मद्यमद) अलसाई हुई उस मृगनयनी नायिका के जो न सार्थक है, न निरर्थक है वे मधुर अक्षर मेरे हृदय में कुछ ध्बनित कर रहे हैं।" १. क. पयुहसुको।

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२०४ नाडपेश्ामे

इत्याविकाव्येषु सहृवपह्वयसागरसमुठवलवाकामृगाङूप्रतिबिम्बेवु1 जोवितभूतानां

ध्यस्वभावेषु वीतरागतेव1 बककाकक्रीडाकल्पनैव स्यात्। सिद्धस्वभावानामेव पदैरभिधानम्। तत्र भवनमिति तवनुभवतोतिषत्साध्य- स्वभावेति चेतु, अन्यतरघमंमुखेन क्रियाख्यस्य धर्मिणो हवाभ्यामपि यथासङ्केत- स्पर्शाद् "द्वि तोयधर्मास्पर्शस्योभ योरपि तुल्यत्वात्। साध्यतार्थं क्रियाया जीबित- मिति चेतु, धर्मद्ठयवति धर्मिणि क एवोऽन्यतरघमंपक्षपातः। PiTene इसी प्रकार विवृण्वती शैलसुतापि भावमङ्गः स्फुरद्बालकदम्बकल्पैः। साचीकृता चारुतरेण तस्थौ मुखेन पर्यस्तविलोचनेन।। (कुमारसम्भव ३६८ ) "पार्वतो भी खिले हुए नवीन कदम्ब के समान अङ्गों से रत्यादि भावों को प्रकट करती हुई पर्यस्त नेत्रों वाले सुन्दर मुख को थोड़ा तिरछा करके खड़ी हा गई।" इत्यादि काव्यों में सहृदयों के हृदय रूपी सागर में तैरते हुए पूणं चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब में जीवितभूत हास, आलस्य, औत्सुक्य, निद्रा मदागम और अभिलाषागम आदि का शब्द स्पर्श अर्थात् शब्द से वाच्य कर देने से और विभावादि के साध्य न होने से बगुले और कोए को क्रीड़ा की कल्पना के समान सहृदय की बोतरागता ही होगो अर्थात् सहृदय भी वीतराग हो जायगा। सिद्ध स्वभाव वाले पदार्थों का हो पदों से कथन होता है। जसे 'भवनम्' यह 'अनुभवति' को तरह साध्य स्वभाव वाला भी है, यदि ऐसी बात है तो एक क्रिया रूप धर्मी में दो धर्म हैं। उनमें से किसी एक धर्म के द्वारा सद्केत के अनुसार स्पर्श करने से द्वितीय धर्म का स्पर्श न होना दोनों में समान है, ऐसो बात नहीं है। यदि साध्यता क्रिया का जोवन है तो दो धर्म वाले धर्मी में किसी एक धर्म में पक्षपात क्यों ?

१. क. (टि०) प्रतिमेषु। २. क. शब्दास्पृष्टत्वेन। क-ख. शब्दस्पृष्टत्वे तान् विभाबान्। ३. क. (टि०) चदीतरगतेष। ४. क. (टि०) बाह्यानामपि। ५ क. द्वितीयधर्मस्पशंदय।

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चतुदशोश्यारय: २०५

न च सिद्धताधर्मोडस्या नास्ति, तथात्वे वा कदाचिवपि कूलवशन न स्यात्। भवनमिति चारोपितगौणोप्रतिपत्िः स्यात्। सापि बलादारोपस्थानस्य चानीतस्यैव केनापि शब्देनास्पृष्टत्वात् तस्मात्सिद्धाभिधायिना वा शृंगारादिशब्देन स्पृश्यत एव तवर्थः। न तु सर्वो वक्ता कविरित्यतिप्रसङ्ञिगलक्षणप्रबन्धबन्धुरकाव्य- निर्मातृत्वं हि कवित्वं, न चित्तवृत्ति प्रतिपावकत्वम्। 18

यहाँ सिद्धता धर्म नहीं हैं, ऐसो बात भी नहीं है। क्योंकि वैसा मानने पर कभी भी कूल (किनारे) का दर्शन नहीं होगा अर्थात् कभी भी तोर पर नहीं पहुँच सकेंगे अथवा 'भवनम्' में आरोपित क्रिया को गौणो प्रतिपत्ति होगी और गौणो प्रतिपत्ति भी बलात् आरोप स्थान और आरोपित अर्थ की होती है। क्योंकि आरोप्यमाण अर्थ का किसी शब्द से स्पर्श नहीं है। अतः सिद्धाभिधायो शृङ्गारादि से उसके अर्थ का स्पर्श होता हो है और सभी वक्ता कि हैं, ऐसा कोई नियम नहीं है, क्योंकि अतिव्याप्ति लक्षणों से रहित काव्यों के निर्माता ही कवि होता है, चित्त- वृत्तियों का प्रतिपादन करने वाला कवि नहीं होता। विशेष-यहाँ 'भवनम्' में भू धातु से ल्युट् (अन) प्रत्यय हुआ है, जो भाव (साध्यता) का प्रकाशन करता है और वह भाव द्रव्य के समान होने से सिद्ता का भो प्रकाशन करता है। इस प्रकार 'भवनम्' क्रिया साध्य एवं सिद्ध दो धर्मों से युक्त है अर्थात् यह साध्य भी है और सिद्ध भी। दूसरे यह कि 'भवनम्' में आरोपित क्रिया को गौणी प्रतिपत्ति होती है, और गौणो प्रतिपत्ति भी आरोपस्थान और आरोप्यमाण की होती है क्योंकि आरोष्य- माण का शन्द से स्पर्श नहीं होता है। अतः शुङ्गारादि अथवा रसादि शब्दों से उस अर्थ का एपर्श होता ही है, अब प्रश्न यह उठता है कि यदि रसादि सामान्य शब्दों तथा शरुङ्गाराषि विशेष शब्दों के अभिधान से रस की प्रतीति होने लगेगी तो 'त्वामुद्वीक्ष्य कुरज्गानि। रसो नः कोऽप्यजायत' अथवा 'ता निभाल्य सरोजाक्षीं शुङ्गारे मग्नमन्तरम्' इत्यादि वाक्यों में 'रस' तथा 'शृङ्गार' शब्दों के अभिधान से रस की प्रतीति होने लगेगी और ऐसी स्थिति में सभी वक्ता कवि हो जायगे, जबकि विभावादि के द्वारा रस-व्यक्जक वाक्यों के निर्माता ही कवि होते हैं। उपरिनिर्दिष्ट 'ता निभाल्य सरोजाओ्ं भुङ्गारे नग्नमन्तरम्' इत्यादि में चित्तवृत्तियों का अभिधान है किन्तु वे विभावादि के द्वारा रस-म्यञ्ज क नहीं है। अतः अतिव्याप्ति दोष से दूषित होने से रस लक्षण के लक्ष्य नहीं होते हैं। अतः सभी बक्ता कवि नहीं हो सकते, जो अतिव्याप्ति दोषों से रहित काव्यों का निर्माण कराता है वहो कवि है। चितवृत्तियों की अभिषान करने वाला कवि नहीं होता। १. क. (टि०) वारोपिता। २. क. (टि०) बालाभावे बारोप। ३. क. (टि०) न ्वसर्वो। ४. क. (टि०) निर्माणरमं।

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२०३ नाटघशास्त्र

यत्तु शृङ्गारादिशब्वाद्यवधिन प्रतीतिरित्युच्यते, तत्र सङ्गतस्मृतिु्् नान्यदवयवधानं विद्यः। विततलक्षणपौर्वापर्यविपाकोऽयमिति सङ्कतग्रहणे कि तथा- प्रतीतिः। एतेनान्वयाभावः प्रत्युक्तः । विभावाविभ्योऽपि पूर्वकाव्यप्रक्रियापरिगत- मन्तरेण न रसावय: । अभिनव-और जो कहते हैं कि शृगारादि शब्दों के अभिधान में रस की प्रतीति नहीं होतो है, इसमें हम समझते हैं कि सङ्कत-स्मृति को छोड़कर अन्य कोई व्यवधान नहीं है, सङ्कत-स्मृति हो उस अर्थ की प्रतीति में व्यवधायक है। यह सब प्रसिद्ध रस लक्षण के पौर्वापर्य का परिणाम है। क्या सङ्कत-स्मृति (संकेतग्रह) के होने पर उस प्रकार रस की प्रतोति होगी ? इस कथन से अन्यथा का प्रत्याख्यान हो गया। विभावादि के द्वारा भो जहाँ रस की प्रतोति हाती है वहाँ पर काव्य की पूर्ण प्रक्रिया जाने बिना विभावादि के द्वारा रस की प्रतीति नहीं होगी। विशेष-अभिनवगुप्तवादाचार्य का कथन है कि जो लोग ऐसा कहते है कि शृङगारादि अथवा रसादि का शब्दतः उपात होने पर रस को प्रतीति नहीं होती है। हम तो समझते हैं कि सक्केत-स्मृति को छोड़कर और कोई ध्यवधान नहीं है। भाव है कि जिस शब्द का जिस अर्थ में सङ्केत हाता है वह शब्द उसी अर्थ को कहता है। प्रस्तुत उदाहरण में 'तो निमाल्य सरोजाक्षीं शुङ्गारे मग्नमम्तरम्' में प्रथम शुङ्गगार शब्द फिर ऋङ्गार रूप अर्थ दोनों को स्मृति फिर उससे अर्थ की उपस्थिति होती है, तव्नन्तर शृङ्गगार रस का बोध होता है। ग्रन्थकार का अभिप्राय वै कि ऋङ्गारादि शब्दों के उपादान में मध्य में शृङ्गगारादि विषय सङ्कत स्मृति आवश्यक है किन्तु जहाँ पर विभावादि के द्वारा शृङ्गारादि रसों को प्रतीति हातो है वहाँ शृङ्गगारादि को स्मृति आवश्यक नहीं है। अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा यह बात सिद्ध होतो है कि शुङ्गगारादि अथवा रसादि पदों का प्रयोग होने पर भी विभावादि-वर्णन के अभाव में रस को प्रतीति नहीं होतो और बिभावादि का वर्णन होने पर रसादि अथबा शृङ्कगारादि पदों का प्रयोग न होने पर भो रस की प्रतीति होती है। 'तत्सत्त्वे तत्सत्त्वमन्वयः' (उसके रहने पर वह रहे ) यह अन्वय हैं। यहाँ पर 'जहाँ जहाँ शृङ्गार शब्द है वहाँ वहाँ शृङगार रस को प्रतीति होती है, इस अन्वय का अभाव है। क्योंकि जहाँ विभावादि के संयोग से रस को प्रतोति होतो है वहाँ शुङ्गगारादि

१. क. (टि०) नाप्रतीतिः । २. क. (टि०) सङ्केतस्मृतिमुक्त्वा। ३. क. (टि०) परगमं।

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२००

यथा- उद्याने तु स्थितावेतावन्योन्यं ददतौ दृशम्। मध्ये भुवं लिखन्तौ च प्राप्य सङ्गमसङ्गतौ। इति। तस्मावपूर्णत्वे1 तुल्योऽन्वयाभावः। यत्तूपाध्याये: काव्यकौतुके रसोद्दशपरश्लोके-"तासां तु परिपूर्णत्वे सिद्ध एव रसो मतः" इत्याविनिरूपितं तदुक्तान्यार्थंतयैय न गृहोतव्यम् ।२॥

शब्दों के अभाव में भी रस को प्रतोति होती है, अतः यहाँ व्यभिचार दोष है। इस कथन का प्रत्यास्थान हो गया। क्योंकि विभावादि के संयोग-स्थल में शृङ्गगारादि शब्दों का उपादान म हीने पर भो रस की प्रतीति होती है, विन्तु शृडगाशद शब्दों के उपादान होने पर भी विभावादि के अभाव में रस की प्रतीति नहीं होती, यह अर्थ कहा से निकलता है। हमती बहते हैं कि विभावादि के संयोग से भी जहाँ पर रस की प्रतीति होती है वहाँ पर भी काव्य की पूर्ण प्रक्रिया जाने बिना विभावादि के संयोग से रसादि को प्रतीति नहीं होगी। जैसे- अभिनव-"उद्ान में स्थित वे दोनों नायक और नायिका परस्पर एक दूसरे पर दृष्टि (आँखें) गड़ा दी है और दोनों के बीच की भूमि पर लिखते हुए दोनों सङ्ग (नाथ) को पाकर भी सङ्कत नहीं हुए अर्थात् मिल नहीं सके।" यहाँ पर नायक-नायिका दोनों आलम्बन विमाव है एकान्त-स्थान, उद्यान उद्दोपन विभाव है, परस्पर एक दूसरे के ऊपर आँखे गड़ाना आदि अनुभाव है, तथा भू-लेखन, चिन्ता का विषय होने से चिन्ता व्यभिचारीभाव है। यहाँ पर विभावादि के रहते हुए भी रस की प्रतीति में प्राधान्य नहीं है। प्रस्तुत प्रकरण में सङ्कल्प कारणों के होते हुए भी मिलन रूप कार्य नहीं होता है, अतः विशेषोक्ति अलङ्कार है। अतः काव्य को पूर्ण प्रक्रिया के अभाव में विभावादि के रहने पर भी रस की प्रतोति नहीं हो रहो है, अतः अन्वय का अभाव दोनों जगह समान है। अभिनव-और जो उपाध्याय जी ने अपने काव्य-कौतुक ग्रन्थ में रसोद्देश- परक श्लोक में-'तासां तु परिपूर्णत्वे सिद्ध एव रसो मतः' अर्थात् 'उन प्रक्रियाओं की परिपूर्णता में रस तो सिद्ध ही है, रत्यादि को भिन्न अथं के रूप में ग्रहण नही करना चाहिए। २ ॥

१. क. (टि०) सस्मावपूवत्ये।

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१०८ नाहपशारने

नन्वेवं रससूत्रे शब्दोऽप्युपावातव्य :? तविवमायातं-उत्सङ्गसडिगनि बालके तदन्वेषणमिति। अत्र भावोपावाने हि कि न संगृहीतम्। यवयमाह-अनुभाव्यतेऽनेन वागङ्गसत्त्वकृतः" इति (७४)। आवृत्या चान्वयः वागित्याविष्वेव छेदः। तद्यवि वाग्भवति तदैता्यर्थ व्यञ्जयन्ति, वाक्यहतानि २स्वार्थं व्यञ्जयन्ति एकतस्त्र्या- त्मकतश्च वागिति समासयोगेनाह। सैवेयमुपायोगिनी किन्तु चतुर्थंगोपायभूता परमपुरषार्थस्वभावा विश्वकारणभूता भगवती भारतीत्याह वाङ्मयानोति।

अभिनव-इस प्रकार शृङ्गारादि एवं रसादि शब्दों का उपादान करने पर भी यदि रस की प्रतीति हो सकती है तो रससूत्र में शब्द का भी उपादान करना चाहिए था। इसका उत्तर देते हुए आचार्य कहते हैं कि 'बालक की गोद में स्थित होने पर भो उसका खोज करना, यही उसका अर्थ है। क्या भावों का उपादान करने पर उसका संग्रह नहीं हुआ ? जो यह कहते हैं कि-"वाचिक, आद्विक एवं सात्त्विक अभिनयों का जिससे अनुभावन होता है, उसे 'अनुभाव' कहते हैं।" यहाँ वाक्, अङ्ग सत्त्व ये तीन खण्ड है, फिर आवृति करके इनका अन्वय होता है। इसलिए यदि वाणी से (वाचिक) अभिनय होता है तो ये अङ्गादि भी अर्थ को अभिव्यक्त करते हैं अर्थात् वाणी के साथ ये अपने अर्थ को व्यक्त करते हैं अर्थात् एक साथ मिलकर अर्थ को व्यक्त करते हैं और तोनों अलग-अलग अर्थ को भो अभिव्यक्त करते हैं, वागङ्गसत्व में समास का योग होने से ऐसा कहा है कि ये एकतः और त्र्यात्मक रूप से अर्थात् ये वाणी ने साथ मिलकर अपने अपने अर्थ को व्यक्त करते हैं। यह भगवती वाणी उपयोगिनी है किन्तु यह भगवती चतुर्थगोपायभूत अर्थात् चतुर्थ मोक्ष को उपायभूत, परमपुरुषार्थ मोक्ष के स्वभावरूपा और विश्व के कारणभूता है, इसा बात को 'वाङ्मयानीह' इत्यादि के द्वारा कहते हैं-

१. क. (टि०) वा भवति । २. र. (डि०) सायं।

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चतुदशोऽध्याय: २०९

वाङ्मयानोह शस्त्राणि वाङ्निष्ठानि तथैव च। तस्माद्वाचः परं नास्ति वाग् हि सर्वस्य कारणम् ॥। ३।। इह भावानां सत्तासंबन्धनिजलक्षणार्थक्रियाकारिरवादिकृतं यत्सत्त्वं तत्प्रधान- कबोधत्वभूतं शपथशरणं, तस्य बोधस्य पारमैश्वयं स्वातन्त्र्यं प्रत्यवमर्शात्मक- मेव जडवैलक्षण्यदायीति विभक्तमस्मत्परमगुरुपादैः प्रत्यभिज्ञादौ, अस्माभिश्च तद्विवरणे भेदवादविवारणादौ च। एवं वागेवावभासिका। सैव च निर्वाहिकी अब- भासनैव हि परमार्थतो निर्वाणम्। तवाह वाग्घि सवस्येति।

अनुवाद-इस संसार में सभी शास्त्र वाङ्मय है और वाङ्निष्ठ अर्थात् वाणो पर ही आधारित है। अतः वाणी से बढ़कर विश्व में कुछ भी नहीं है, क्योंकि वाणी ही समस्त विश्व का कारण है।। ३। विशेष-वाषी की महत्ता बताते हुए आचार्य कहते हैं कि इस संसार में समस्त शास्त्र समस्त वाङ मय वाङ्निष्ठ है अर्थात् वाणी पर ही आधारित हैं। यह वाणी हो समस्त विश्व की अषिष्ठात्रो देवो है, यही वाणो समस्न लोंकों की उत्पादिका, शासिका और मोक्ष की उपायभूता ज्ञानमयो सवज्ञा है, यह वाक समस्त, लोकों में सवत्र अनेक रूपों से व्याप्त है और समस्त जगत् का कारण है। सम्पूर्ण सृष्टि-प्रक्रिया इसी वाक् (वाणी) का स्फुरण है। यह समश्त ज्ञान, समस्त विद्याओं को अवभासिका है, समस्त विश्व वाणी का ही विवर्त्त है, यह कारणरूप है और समस्त विश्व, समस्त शास्त्र, समस्त वाङ्मय इसके कार्यरूप में अवभासित होते हैं॥। ३ ॥ अभिनव-यह वाक् भावों की सत्ता से सम्बन्धित, निजलक्षण-स्वरूप अर्थ- क्रियाकारित्व आदि से जन्य जो सत्त्व, तत्प्रधान अर्थात् सत्त्व प्रधान बोध (ज्ञान) रूप शतपथ शरण अर्थात् सैकड़ों मार्ग वाला बोध है, उस बोध (ज्ञान) का पारमेश्वर्य, स्वातन्त्र्य प्रत्यवमर्शात्मक है, यह जड़ पदार्थो में बिलक्षणता को प्रदान करने वाला है, इसलिए हमारे परम गुरुजी ने इसे प्रत्यभिज्ञा का एक विभाग माना है और हमने भी उसके विवरण में तथा भेदभाव के खण्डन में बतलाया है। इस प्रकार वाणी ही समस्त विश्व की अवभासिका है, और वही निर्वाहिका भी हैं, वस्तुतः वह अवभासना ही निर्वाण है, इतोलिए कहते हैं कि वाणी ही समस्त विश्व का कारण है।

१. क-भ. वाङ्मयानि तु। २. क, वाग्घि। क-न. वाग्भिः। ना. शा०-२७

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२१० नाटघशास्त्रे

वागेव विश्वाभुवनानोति श्रुतेः शब्दविवर्तादिरूपत्वं च प्रसाधितं तत्र भवद्भिरभर्तृहरिप्रभृतिभिरिति 'तदिहानुसरणीयम्। सर्वाकरत्वे च वाचः 'इतिवृत्तं तु नाट्यस्य शरीरं परिकीतितमिति' (अ १९।१) यद्वक्ष्यते तन्न विरुद्धं, तस्यापि वाङ्मयत्वाविति तत्रैव निर्णेष्यते ॥३॥ श्रुति भी कहती है कि वाणी ही समस्त विश्व, समस्त लोकों का कारण है (वागेव विश्वा भुवनानि जज्ञे) इस श्रुति के अनुसार समस्त विश्व शब्द (वाणी) का ही विवर्त्तरूप है। श्रोमान् भर्तृहरि प्रभृति आचार्यो ने इसी सिद्धान्त को मान्य किया है, उसी का यहाँ अनुसरण करना चाहिए। जैसा कि आचार्य भतृहरि ने कहा है- शब्दस्य परिणामोऽयमित्याम्नायविदो विदुः। छन्वोभ्य एव प्रथममेतद् विश्वं प्रवत्तितम् ॥१॥ इतिकत्तव्यता लोके सर्वा शब्दव्यपाधया। यां पूर्वाहितसंस्कारो कालोऽपि प्रतिपद्यते॥ २॥ आद्यः करणविन्यासः प्राणस्योध्वं समीरणम्। स्थानानामभिधातशच न विना शब्वभावनम् ॥३॥ न सोडस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते। अनुविद्धमिव ज्ञानं सवं शब्देन भासते॥। ४॥ वाग्रपता चेदुत्क्रामेदवबोधस्य शाश्वती। न प्रकाश: प्रकाशेन सा हि प्रत्यवमशिनी॥ ५॥ सा सवंविद्या शिल्पानां कलानां चोपबन्धिनी। तद्वशादभिनिष्पन्नं सवं वस्तु विभज्यते ॥ ६॥ यह वाणी सर्वाकार है, विश्वरूप है, इसीलिए इतिवृत्त को नाट्य का शरीर कहा गया है (इतिवृत्तं तु नाटचस्य शरीरं परिकीतितम्-१९।१), ऐसा जो कहा जायगा, उसके विरुद्ध नहों है। क्योंकि इतिवृत्त भी वाङ्मय ही है। इसका निर्णय आगे वही पर करेंगे।। ३॥ १. वाक्यदीय आगमकाण्डे 'शब्दस्य परिणामोऽयं' इत्यस्य षट्कारिकासु वाघः सर्वस्वकारणतवं प्रतिपादितं भतृंहरिणा स्ववुत्तौ प्रपश्चितं च।

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बतुदशोडयाय: २११

तत्र शास्त्रान्तरप्रसिद्धानपि रसाङ्गत्वेन कविशिक्षार्थ नटस्य च तत्र तत्राभिनेये विश्रान्तिकरानितिकर्तव्यतयोपदेशार्थमागमान् निर्विशति आगमेत्यादि। विमर्श-अभिनवगुप्त के अनुसार वाणो की सत्ता का स्व-स्वरूप-लक्षण अथक्रिया- कारित्व रूप सत्त्व-प्रधान बोध (परामशं, ज्ञान) का पारमैश्वयं अर्थात् परमतत्त्व का ऐ्वर्य स्वातन्त्र्य प्रत्यवमशत्मिक है। भाव यह कि परमतत्त्व परमेश्वर अपने ऐश्वर्य से अनेक रूपों में स्फुरित होता हुआ भी स्वयं अखण्ड रहता है। उस परमेश्वर की इच्छा का प्रसार ही उसका स्वातन्त्र है और स्वातन्त्र् ही परमेश्वर की पराशक्ति है। वह पराशक्ति वाग्रूपा है जो परमेश्वर से विलग नहीं है (शक्तिशक्तिमतोरभेदः)। वह वाग्रूपा शक्ति हो स्वेच्छा से समस्त विश्व एवं समस्त लोकों का सृजन करतो है। वह वाक समस्त विश्व की अधीश्वरो ज्ञानरूपा है, वह विविष रूपों में विचरण करतो हुई सर्वत्र व्याप्त है। परमशिव जब विश्वविकास की ओर प्रस्फुरित होता है तो उसे सर्वप्रथम 'अहं' का बोध होता है। इसके 'अहं' में 'अ' समस्त वर्णों में अग्रथ प्रकाशरूप अनुत्तर शिव का बोषक है और 'ह' विमर्श शक्ति का उद्बोधक है। यह विमशं- शक्ति 'अहं' के रूप में 'परावाग' कहलाती है। यह विन्दु युक्त 'अहं' ही समस्त विश्व का आधार है। इसी से समस्त जगत् प्रसुत होता है और इसका प्रसार ही जगत् के रूप में अवभामित होता है। इस प्रकार यह बाग् हो समस्त विश्व को अवभासिका एवं निर्बाहिका है। और यह अवभासना हो वस्तुतः निर्वाण है। यह विश्व उस वाक् का विवत्त है। वस्तु का पूर्वावस्था छोड़े बिना अर्थात् अपने स्वरुप को त्याग किये बिना दूसरे रूप में अवभासित होना विबर्त्त है (अतस्वतोऽन्यथा विवत्त' इत्युवीरितः)। इस प्रकार यह वाकू ही विश्व के रूप में अवभासित होती है, इसलिए इसे समस्त विश्व की अवभासिका कहा गया है। भर्तृहरि ने भी कहा है कि यह विश्व शब्द का हो परिणाम है। शब्द से हो यह विश्व विवततित है, यह विश्व शब्द का ही विलास है। इसो को शब्द ब्रह्म कहा गया है। इसोलिए शब्दरूप इतिवृत्त को नाटय का शरोर कहा गया है। अतः बाणो के विषय में यतन करना चाहिए (वाचि यत्नस्तु कत्त'व्यः)। इसी तथ्य को भतृहरि ने वाक्यदीय में बिस्तार से वर्णन किया है।। ३ ॥ अभिनव-विभिन्न शास्त्रों में प्रसिद्ध आगमशास्त्र का रस का अङ्ज होने के कारण कवियों की शिक्षा के लिए और नटों को अभिनय में विश्रान्ति देने वाले इतिकतध्यता के रूप में उपदेश के लिए निदेश देते हैं-

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२१२ नाट्यशास्त्र

आगमनामाख्यात निपातोपसर्गसमासतव्वितैर्युक्तः

अर्थद्वारेण रूपसौन्दर्यॅण चैषामुभयथा च योग:, क्षुभितं महामिदं मे, क्षुब्ध- मिति मन्थे: प्रतोति: स्यात। अर्थभेवेऽपि स्वरूपसौन्दयं सावंत्रिकं, विषयभेदेन च 'अस्यश्दिष्यन्त सिन्धवः' इति हि कर्तव्ये 'अस्यन्विष्यन् सर्वे सिन्धवः' इति दुर्भणम्, अश्रवम् च, 'भक्ष्यं भक्षति वक्षसः क्षतमहो यद् वेपते क्लोबितम्' इति-अत्र रौद्रे भोक्ष्यतीति हुदयम्। अत्र 'लोचने कदा संमाजिष्यति' इति, न तु कदा समाक्ष्यंतीति। एवं वैकल्पिकेऽपि आगमे सौन्दर्यात्। अनुवाद-यह वाचिक अभिनय आगम, नाम (संज्ञा शब्द), आख्यात (क्रिया), उपसर्ग, निपात, समास, तद्धित, सन्धि, वचन, विभक्ति तथा उपग्रह (लिङ्ग-ज्ञान) से युक्त होता है॥४ ॥ अभिनव-अर्थों के द्वारा और रूपसौन्दर्य के द्वारा इनका दोनों प्रकारों से योग हैं। 'मेरे लिए यह क्षुभित है, अथवा 'क्षुब्ध' है। इस प्रकार यहाँ क्षुभित और क्षुब्ध दोनों प्रयोग देखे जाते हैं किन्तु क्षुब्ध कहने पर मन्थन की प्रतीति होतो है। यहाँ दोनों में अर्थभेद होने पर भी स्वरूप-सौन्दर्य सर्वाधिक है। अतः विषय-भेद से 'अस्यन्दिष्यन्त सिन्धवः' इसके स्थान पर 'अस्यन्दिष्यन् सिन्धवः' ऐसा कहना कठिन है और अश्रव भी है अर्थात् सुनने योग्य नहीं है। और 'भक्ष्प भक्षति वक्षसः क्षतमहो यद् वेपते क्लीबितम्' अर्थात् 'वक्षःस्थल के क्षत भक्ष्य को खाता है, किन्तु जो कांपता है, वह नपुंसकता है'। यहाँ रौद्र रस में 'भक्षति' के स्थान पर 'भक्ष्यति' प्रयोग ही है, और 'लोचने कदा संमाजिष्यति' अर्थात् 'आँखों का सम्मार्जन कब करेंगे' यहाँ पर 'संमार्जिष्यति' यह प्रयोग तो हुद है। 'कदा समा्क्ष्यति' यह प्रयोग तो कभी भी ठीक नहीं है, यहाँ इडागम वैकल्पिक है, फिर भी सौन्दर्य के अनुसार प्रयोग हाना चाहिए। १. क. नामाख्यातनिपातोपसर्गतद्धितसमासनिर्वत्यः ।

क. (टि०) आममनामाख्यातोपसर्गतद्धितनिपातसन्घिव्रतः । २. क. सन्धिविभक्तिनियुक्तो विज्ञयो वाचिकाभिनयः । ख. ग. सन्धिविभत्तिषु युक्तो विज्ञेयो वाचिकाभिनयः । क. (टि०) सवचनविभक्त्युपग्रहनिर्वत्यो बाचिकाभिनयः । ३. क. (टि०) वाधिकोऽभिनयः ।

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चतुदशोऽध्याय: २१३

'अभावपक्षे वा। आच्छिद्य प्रियतः कदम्बकुसुमं यस्यारिदारैनंवम् यात्राभङ्गविधायिनो जलमुचां कालस्य चिह्नं महत्। हर्ष्या्द्गि: परिचुम्बितं नयनयोरन्यंस्तं हृदि स्थापितं सीमन्ते निहितं कथञ्चन ततः कर्णावतंसीकृतम्॥ इति सुध्यक्तमेव। एकानृत्संप्रतीतिनश्चेति धुटोऽसत्त्वपक्ष एव। आगमेना- देशोऽप्युपलक्ष्यते। मुग्धाशब्दस्थाने न मूढाशब्द: प्रयोगाहंः। नाम यथा मदनरिपुरिति भगवत्पर्यायश्चेति तदीयशङ्गगारवर्णने न प्रयोज्यम्।

अथवा अभाव पक्ष में- आच्छिद्य प्रियतः कदम्बकुसुम यस्यारिदारैर्नव यात्राभङ्गविधायिनो जलमुचां कालस्य चिह्न महत्। हृष्यद्द्ि: परिचुम्बितं नयनयोन्यस्तं हुदि स्थापितं सीमन्ते निहितं कथञ्चन ततः कर्णावतंसीकृतम्॥ यहाँ पर सब सुस्पष्ट है। और 'एकान्त्सप्रतीतिनः' इस प्रयोग में 'एकान्' और 'प्रतीतिनः' को मिलाकर जब प्रयोग करेंगे तो यहाँ 'धुट्' का आगम होकर 'एकान्त्सप्रतीतिनः' प्रयोग बनता है। किन्तु यह पक्ष सुवाच्य नहीं है। यहाँ 'धुट्' का असत्त्व पक्ष ही हृद्य है। आगम शब्द आदेश का उपलक्षण है, अतः मुग्ध शब्द के स्थान पर मूढ़ शब्द का प्रयोग उचित नहीं है। नाम इति-जैसे 'मदनरिपु' यह नाम अर्थात् संज्ञा वाचक शब्द है और कामारि शिव का पर्याय भी है। अतः शृङ्गार के वर्णन में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। क्योंकि जो काम का अरि (शत्रु) है वह शृङ्गारी कैसे हो सकता है ? इस प्रकार यहाँ अनौचित्य दोष है और अनौचित्य से बढ़कर रस-भङ्ग का और दूसरा कारण नहीं है। नानौचित्यादृते कश्चिद् रसभङ्गस्य कारणम् अतः शृङ्गार रस के वर्णन में 'मदनरिपु' इस नाम का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

१. क. अभावपक्षो। क. (टि०) अभावलक्षो।

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२१४ नाटंयशास्त्र

आख्यातमपि किन्तु यद्वैचित्र्यमावहति (तत्प्रयोज्यम् यथा)- "समरसि स्मर मेखलागुणैः' इति वर्तमानप्रत्ययेन तत्साक्षात्करणमुपालम्भ- विषयता, त्वमेवात्र साक्षी अनृतं न प्रकटितं, अन्यथा स्मृतवानिति मेखलागुणैरिति स्यात्। उपसर्गोऽपि प्रकृताथंयोगी यथा-विधिना तव निर्मितिः कृता इत्यथे न मितिः। अधिकद्योतको यथा -मुहुरुपचितैदृष्टिरालुप्यते3 इति।

आख्यात इति-वैचित्र्य के आधान में ही क्रिया पद (आख्यात) प्रयोज्य है, प्रयोग इष्ट है। यथा- स्मरसि स्मर! मेखलागुणरुत गोत्रस्खलितेषु बन्धनम्। च्युतकेस रदूषितेक्षणान्यवतंसोत्पलताड़नानि वा। (कुमारसम्भव ४।८) यहाँ पर 'स्मरति' यह क्रिया वैचित्र्य का आधान करती है। भाव यह कि नायिका नायक से कहतो है कि याद है कि गोत्रस्खलन करने पर मैंने तुम्हे करधनी से बाँधा था, केसर के पराग से तुम्हारी आँखों को दूषित किया था और कर्णावतंस से ताड़ित किया था, क्या उसे तुम याद कर रहे हो ? यहाँ पर वर्तमानकालिक लट् लकार के प्रयोग से बन्धन का साक्षात्करण अर्थात् प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हो, इस प्रकार उपालम्भ की विषयता प्रतोत होती है। तुम्ही साक्षो हो, मैंने कोई झूठ तो नहीं कहा ! अन्यथा 'स्मृतवानसि मेखलागुणैः' इस प्रकार का पाठ होता। उपसर्ग इति-उपसर्ग भी प्रकृत अर्थ से योग सम्बन्ध रखने पर प्रयोज्य होता है, अन्यथा नहीं। जैसे-'विधिना तव निर्मितिः कृता' (ब्रह्मा जी ने इस काम के लिए तुम्हारी निर्मिति की है)। यहाँ पर 'निर्' उपसर्ग ब्रह्मा की सृष्टि से सम्बन्ध रखता है, अतः 'निर्मितिः' पद उपयोगो है। इस अर्थ में 'मितिः' शब्द का प्रयोग अनुपयुक्त है।

१. स्मरसि स्मर मेखलागुणरुत गोत्रस्खलितेषु बन्घम्। च्युत के सरदूषितेक्षणान्यवतंसोत्पलताड़नानि वा। (कुमारसम्भवे ४१८। २. तत्साक्षातकारेणोपालम्भविषयता। ३. त्वामालिख्य प्रणयकुपित्ता धातुरागैः शिलाया- मात्मानं ते चरणपतितं यावदिच्छामि कर्त्तुम्।

कूरस्तस्मिन्नाप न सहते सङ्गमे नौ कुतान्तः ॥ (मेधदूत उत्तरादं-४४)

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चतुदशोऽ्याय: २१५

उपसगः कर्मप्रवचनीया अप्युपलक्ष्यते (यथा) "कः स्यावर्जुनात प्रति", विचितो नास्तीति पुनरेव स्यात। अर्जुनकृते विचितमिति। मोमांसते हृदयमात्मन एव बाला। नाम्नापि मानकलनां सहते न जातु।। न तु चित्तं विचारयत्यामान एवेति। एवं सुब्धातुप्रत्ययपद न तत्सुकृत्सु वाच्यं गौरवभयात्तु नोदाहृतम्। स्त्रोप्रत्ययो यथा-'अध्यासोनः स वैदग्धी कृतोति न तु वैदग्ध्यं कृतीति; स्त्रीप्रत्ययेन सौभाग्यातिशयप्रतीते: ।

अधिक अर्थ के द्योतक उपसर्ग का उदाहरण है। जैसे- त्वामालिस्य प्रणयकुपितां धातुरागँ: शिलाया- मात्मानं ते चरणपतितं यावविच्छामि कर्त्तुम्। अस्त्रैस्तावन्मुहुरुपचितैदृष्टिरालुप्यते मे- क्रूरस्तस्मिन्नपि न सहते सङ्गमं नौ कृतान्तः॥ (मेघदूत उत्तरार्द ४५) यहाँ 'उपचितेः' में 'उप' उपसर्ग का प्रयोग अधिक अर्थ घोतित करता है। अभिनव-उपसग पदों के द्वारा कर्मप्रवचनीय का भो उपलक्षण हो जाता है। जैसे-"कः स्यादर्जुनात्प्रति" (अर्जुन का प्रतिनिधि कौन है ?)। यहाँ पर "प्रतिः प्रतिनिधिप्रतिदानयोः" सूत्र से प्रतिनिधि अर्थ में प्रति के योग में कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है। इसलिए 'अर्जुनात्' ये पञ्चमी विर्भाक्त हुई है। "बाला अपने हृदय से मीमांसा करती है, क्योंकि मान करने अर्थात् रूठने का तो नाम ही नहीं ले रही है।" यहाँ पर बाला हृदय में ही मीमांसा करती है, अपने चित्त की नहीं। इस प्रकार सुब्धातु से प्रत्यय करने पर निष्पन्न शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए। गौरव के भय से उन प्रत्ययो का उदाहरण नहीं दिया है। स्त्रीप्रत्यय का उदाहरण-जैसे, "अध्यासीनः न वैदग्धीं कृती" अर्थात् वह व्यक्ति पद पर आसोन होकर वैदग्धी क्रिया को करके कृती हैं। यहाँ पर इस प्रकार के प्रयोग से सौन्दर्यातिशय द्योतित होता है। उसके स्थान पर 'वैदग्ध्यं कृती' प्रयोग करने में सौन्दर्य नहीं है। स्त्रीप्रत्यय (वैदग्धी कृतो) के प्रयोग से सौन्दर्यातिशय की प्रतीति होती है।

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२१३ नाट्यशाइचे

कीर तद्धितपदं तद्धितप्रत्ययोपलक्षणम् तद यथा-"शात्रवं व पपुर्यंशः" इति न तु शत्रणां वेति; तद्धितवृत्त्या ह्योकार्थोभावान्वयात् तद्ग्रासीकृतमपि यशस्ते स्वयं- ग्राहीचक्रुरित्यर्थः। निपातो यथा-"'हा हा हा देवि धोरा भव"। तद्धितपद यहाँ तद्धितपद तद्धित प्रत्यय का उपलक्षण है। तद्धित प्रत्यय का उदाहरण-जैसे- ताम्बलीनां वलैस्तत्र रचिता पानभूमयः। नारिकेलासवं योधा: शात्रवं व पपुर्यशः ॥ (रघुवश ४।४२) "पवंत पर मद्यपान के लिए स्थान बनाकर योद्धाओं ने शत्रुओं के यश के समान नारियल के आसव( मद्य ) को नागवल्ली के पत्तों में पिया।" वहाँ पर 'शात्रवं व' पाठ ही ठीक है 'शत्रणां व' यह पाठ उचित नहीं है। क्योंकि 'शत्रुणामिदम्' इस अर्थ में अण् प्रत्यय होकर 'शात्रवं' प्रयोग बनता है। क्योंकि तद्धितवृत्ति के द्वारा एकार्थीभाव होकर पदार्थो के साथ उसका अन्वय होता है। तद्धित वृत्ति के द्वारा ग्रासीकृत यश को स्वयं ग्रहण कर लिया। निपात इति, जैसे- स्निग्धश्यामलकान्तिलिप्तवियतो वेल्लद्बलाका घनाः वाताः शोकरिणः पयोदसुहृदामानन्दकेकाः कलाः। कामं सन्तु कठोरहृदयो रामोऽस्मि सवं सहे वैदेही तु कथं भविष्यति ह हा हा देवि ! धोरा भव।। (उत्तररामर्चरत ) यहाँ पर 'ह हा हा' ये निपात तीब्र खेद को प्रकट करते हैं। १. ताम्बूलीनां दलैस्तत्र रचितापानभूमयः । नारिकेलासवं वोधा: शात्रवं व पपुर्पशः॥ (रघु० ४।४२) २. स्निग्घश्यामलकान्सिलिप्तवियतो वेल्लद्वलाका घनाः। वाता शोकरिणः पयोदसुहदामानन्दकेकाः कलाः ॥ कामं सन्तु कठोरहृदयो रामोऽस्मि सवं सहे। वैदेही तु कथं भविष्यति हा हा हा देवि घोरा भव।। (उत्तरामचरिते)

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बतुदंशोडव्याय: २१०

सूचक :- आ: ? किमत्र किरातैयंत्र वान्ति वर्षानिला विशेषेण निरङशा इति। समासेन एकार्थोभावे यत्र सति वृत्तम् ... यथा-मध्येगङ्गाय मुनमनु (नेति?) न तु मध्ये गङ्गायमुनयोरिति। 'एवं समासान्तरेषु वाच्यम् । शुद्धेषु संकीणॅषु चागमावयो निवृत्यन्ता विद्यन्ते यत्रेति मत्वर्थोंये च। सन्धिद्विधा नैरन्तर्यरूपः श्लेषशच-भवतोयेति । विपर्ययेण 'नैरन्तयें असिद्धता तत्रास्थिरा इति शलेषे बीभत्साइलीलने। सूत्रं ब्राह्ममिति पृथगपि द्विश्रुतिः, सङ्ग पवयो:, नैकपववत्ता, ब्रह्मसूत्रमित्यनुस्वानस्योत्तर संक्रान्तिव्यतिरेकेण चात्मनि विश्रावयितुमशक्यत्वादेकपदवद्भावः। सूचक कहता है-आः यहाँ किरातों से क्या प्रयोजन ? जहाँ वर्षा ऋतु की हवा निरङ्कश होकर विशेष रूप से बह रही है। समास के द्वारा एकार्थीभाव में-जसे-'मध्ये गङ्गायमुनमनु'। यहाँ 'मध्ये गङ्गायमुनयोः' यह प्रयोग ठोक नहीं है। इसो प्रकार अन्य समासों में भो समझना चाहिए। इसो प्रकार शुद्ध और सक्कीर्ण वृत्तियों में जहाँ आगम आदि निरवृत्ति पर्यन्त रहते हैं और मत्त्वर्थीय प्रत्ययों में भो समझना चाहिए। सन्धिरिति-सन्धि दो प्रकार की होती है-नैरन्तर्यरूप और श्लेषरूप। जैसे-भवतोया' में विपर्यय करने पर 'या भवतः' नैरन्तर्य में असिद्धता है। श्लेषरूप सन्धि में जैसे-तत्र+अस्थिरा=तत्रास्थिरा। बोभत्स+अश्लीलने=बीभत्सा- इलीलने। 'ब्रह्मसूत्रम्' इसमें दो पदो का सङ्ग है। यहाँ एकश्रुति है। अतः एकपदवत्ता है। 'सूत्रं ब्राह्म' ऐसा अलग अलग कहने पर दो पदों का सङ्ग है, द्विश्रति है, अतः एकपदवद्ाव नहीं है। इसी को आचार्य स्पष्टोकरण करते हैं-'बह्मसूत्रम्' में अनुस्वान अर्थात् उच्चारण किये गये ब्रह्म पद को सूत्र में सङक्रान्त किये बिना आत्मा के विषय में प्रख्याति करना अशक्य है, इसलिए यहाँ एकवद्धाव है। भाव यह कि आत्मविषयक सिद्धान्तों के प्रतिपादक सूत्र को 'ब्रह्मसूत्र' कहते हैं। १. क. (टि०) गङ्गारचितनयनयोरिति। २. क. (टि०) अनिच्छन्ना। ३. क. (टि०) विपरययौ। ४. क. (टि०) असिलता। ५. क. (टि०) भस्मनि। ना० शा०-२८

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२१८ नाटघशास्त्र

विभक्तयः सुप्तिङः, तैः कारकशक्तयो लिडाद्युपग्रहाश्चोपलक्ष्यन्ते। यथा- दाहोडम्भ: प्रसृर्तिपचः प्रचयवान् वाष्पः प्रणालोचितः श्वासा: कम्पितदीपवतिलतिकाः पाण्डिम्नि मग्नं वपुः । किञ्चान्यतकथयामि रात्रिमखिलां त्वन्मागंवातायने हस्तच्छत्रनिरुद्धचन्द्रमहसस्तस्याः स्थितिर्वत्तते॥ (विशालसिद्धभञ्जिका ) इति वपुष्येव मज्जनकर्तकत्वं तदायत्तां पाण्डिम्नश्चाधारतां द्योतयन्नतीव रञ्जयति, न तु पाण्डुस्वभावं वपुरिति। एवं कारकाम्तरेषु वाच्यम्। वचनं यथा-"पाण्डवा यस्य दासाः" सर्वें च पृथक् चेत्यर्थः। विभक्तियां सुप और तिङ् हैं। इनसे कारकशक्ति और लिङ्गादि का उपग्रह उपलक्षित होता है। जैसे- दाहोडम्भ: प्रसर्तिपचः, प्रचयवान् वाण्पः प्रणालोचितः श्वासा: कम्पितदीपवततिलतिका: पाण्डिम्नि मग्नं वपुः। किञ्चान्यत्कथयामि रात्रिमखिलां त्वन्मार्गवातायने हस्तच्छत्रानिरुद्धचन्द्रमहसस्तस्याः स्थितिर्वतते॥ (विशालसिद्धभञ्जिका ६।२१ ) यहाँ पर 'पाण्डिम्नि मग्न वपुः' में शरोर पाण्डिमा 'पाण्डुरता' में डूब गया है। यहाँ पर शरीर मज्जन (डूबना) करिया का कर्त्ता बताया गया है। उसके अधीन पाण्डिमा (पाण्डु) का आधार द्योतित करता हुआ वह अत्यन्त रञ्जक हो गया है। यहाँ शरीर को पीलिमा (पीलापन) नहीं कहा है। इसी प्रकार अन्य कारकों में भी करना चाहिए। वचन का उदाहरण जैसे- कर्त्ता धूतच्छलानां जतुमयशरणोद्योतनः सोडभिमानी कृष्णाकेशोत्तरीयव्यपनयनपटु: पाण्डवा यस्य दासाः। राजा दुःशासनादेर्गररनुजशतस्याङ्गराजस्य भिन्नं क्वास्ते टुर्योधनोऽसौ कथयत न रुषा द्रष्टुमभ्यागतौ स्वः ॥। (वेणीसंहार) यहाँ पर 'पाण्डवाः' में उपात्त बहुवचन से यह सिद्ध हाता है कि सभी पाण्डव पृथक् पृथक् भी दास हैं। १. कर्त्ता द्यतच्छलानां जतुमयशरणोद्दोपनः सोडभिमानी कृष्णाकेशोत्तरीयव्यपनयनपटुः पाण्डवा यस्य दासा:। राजा दुःशासनादेगुरुरनुजशतस्याङ्गराजस्य मित्रं क्वास्ते दुर्योघनोऽसौ कथयत न रुषा द्रष्टुभ्यागतौ स्वः ॥ (वेणीसंहारे) ns otF

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चतुदंशोग््याय: २१९

तथा वैचित्र्येण "त्वं हि रामस्य द्वारा किम्" "मैथिलो तस्य द्वाराः" लिङ्गाद्य पग्रहः, यथा- कीतिस्तव श्वेतेति न तु श्वेतं यशस्तवेति। कुर्ते भुजशालिन: शेयम्। न तु कुर्वते भुजशालिनि पुंस्वं लिङ्गम्।

वेचित्र्य के द्वारा जेसे- "हवं हि रामस्य दारा: किम् ?" "मैथिलो तस्य दाराः। अर्थात् 'तुम राम को दारा हो, क्या ?' :मैथिलो (जानको) उसकी दारा है।' यहाँ पर 'त्वं' (तुम) और मैथिलो' एकवचन और 'दाराः' बहुवचन का प्रयोग अत्यन्त वैचित्र्य है, वैचित्र्यकारक है। लिङ्गादि उपग्रह का उदाहरण-जैसे- "कीर्तिस्तव श्वेतेति न तु श्वेतं यशस्तव। दानाविप्रभवा कीति: शौर्यादिप्रभवं यशः ॥ "तुम्हारी कीत्ति श्वेत है, तुम्हारा यश श्वेत नहीं है। क्योंकि कीति दानादि के प्रभव है और यश शौर्यादि प्रभव होता है"। यहाँ पर दानादिप्रभवा श्वेता कीर्ति स्त्रोलिङ्ग का प्रयोग किया है, 'तुम्हारा यश श्वेत है' (यशः श्वेतं) नपुंसकलिङ्ग का उपादान ठोक नहीं है। यहाँ 'कोर्त्ति' स्त्रीलिङ्ग का प्रयोग ही उचित है। उपग्रह का अन्य उदाहरण-जैसे 'कुरुते भुजशालिनः श्रेयम्' यहाँ पर 'कुरुते' का प्रयोग है 'कुर्वते' का नहीं। यहाँ 'भुजशालित्व' पुरुष का लिङ्ग हैं। अन्य उदाहरण-जैसे- अलसव लित मुग्धान्यध्व संपातखेदा- न्यशिथिलपरिरम्भैदंत्तसंवाहनानि परिमृदितमृणाली कोमलान्यङ्गकानि त्वमुरसि मम कृत्वा यत्र निद्रामवाप्ता । (उत्तररामचरित १।२४) यहाँ पर नपुंसक लिङ्ग का उपन्यास यह सूचित करता है कि तुम्हारे अङ्ग न तो उपमर्दक्षम हैं न उपभोगक्षम। अपितु कुश एवं कोमल हैं।

परिमृदितमृणालीकोमलान्यङ्गकानि- त्वमुरसि मम कुतवा यत्र निद्रामवाण्ता ।। (उत्तर १।२४)

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नाटघशारचे

आसमन्ताद वैचित्र्यं यथा- •आपातेऽपि विकारकारणमहो वक्त्राम्बुजन्माऽडसवः। नियुज्यते क्रियायामिति नियुक्तो धातुः तस्य वैचित्र्यं यथा- "ग्रस्तं कुलान्तं जगत" न तु भुक्तम्। ग्रसतेरदनमात्रे परिभाषितेऽपि ग्रासा- तिशयसंरम्भ: कुलान्तेऽत्र वत्तते । पूर्ववदत्रापि द्वन्द्वाम्मत्वर्थीयः। एतदेवोपजीव्या- नन्दवर्धनाचार्येणोक्तं "सुप्तिङ्वचने" त्यादि। अन्यत्रापि सुबादिवक्रतेति॥४॥

आसमन्तात् वैचित्र्य का उदाहरण जैसे- केलीकन्द लितस्य विभ्रममधोर्धुयं वपुस्ते दृशौ भङ्गीभङ्गरकामकार्मुकमिदं भ्रूनमकमक्रमः । आपातेऽरपि विकारकारणमहो वषत्राम्बुजन्मासव: सत्यं सुन्दरि ! वेधसस्त्रिजगतीसारं त्वमेकाकृतिः॥ यहाँ पर नायिका हर प्रकार की विचित्रताओं से सम्पन्न है, अतः यह आसमन्तात् वैचित्र्य का उदाहरण है। क्रिया में जिसका नियोग किया जाता है वह धातु है उसका वैचित्र्य जैसे- 'ग्रस्तं कुलान्तं जगत' यहाँ पर 'ग्रस्त' पद का उपन्यास है, 'भुक्त' पद की नहीं यहाँ 'ग्रसति' पद से यद्यपि भक्षण मात्र को परिभाषित किया है तथापि यहाँ 'कुलान्त' के विषय में ग्रासातिशय है। यहाँ भी कुलान्त में पहिले द्वन्द्व समास है (कुलं च अन्तश्च =कुलान्तम्), फिर द्वन्द्व के बाद मत्वर्थीय अच् प्रत्यय है। (कुलान्त- मस्मिन्नस्तीति' इस विग्रह में मत्वर्थीय अच् प्रत्यय होता है। इसी को उपजीव्य बनाकर आनन्दवर्धनाचार्यने कहा है-

कृत्तद्वितसामसैश्च द्योत्यो लक्ष्यक्रमः ववचित्॥ (ध्वन्यालोक ३।१६ ) इस प्रकार अन्य स्थलों पर भी सुबादिवक्रता कहनी चाहिए।। ४।। १. केलीकन्दलितस्य विभ्रममधो धुय वपुस्ते दृशौ- भङ्गीभ ङ्गरकामकार्मु कमिद भ्रनर्मकमक्रमः । आपातेऽपि विकारकार गमहो वक्त्राम्बुजन्मासव :- सव्यं सुन्दरि वेघसस्त्रिजगतीसारं त्वमैककाकृतिः।

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चंतुदंशो्याय: २२१

द्विविधं हि स्मृतं पाठ्यं संस्कृतं प्राकृतं तथा। तयोविभागं वक्ष्यामि व्यक्षनानि स्वराश्चैव यथावदनुपूर्वशः ।।५।। सन्धयोऽय विभक्तयः। नामाख्यातोपसर्गाश्च निपातास्तद्धितास्तथा ॥६।। एतैरङ्ग: समासैश्च विज्ञयं संस्कृतं पाठ्यं नानाधातुसमाश्रयम्"। प्रयोगञ्च "निबोधत ॥। ७॥

इत्येवं दशभिरङ्गैविभज्य कवितावाचकशब्दनिष्ठो व्यवहार उक्त। 'स्थान- प्रयत्नादिज्ञानञ्व कवेर्गाढशिथिलमसृणपरुषादिगुम्फविशेष विभागायोपदिष्टं न च तस्य सम्यगुच्चारणोपदेशाय। वर्गश उपादानं सावण्येन प्रबन्धसौन्दयंज्ञानार्थ यथा- दत्तानन्दं धनिनमनुसरन् वृतिधनः । इस प्रकार आगमादि दस अङ्गों के द्वारा कविता के वाचक शब्दनिष्ठ व्यवहार को विभक्त करके कहा है। स्थान (कण्ठादि स्थान) और प्रयत्न आदि के ज्ञान का उपादान कवियों के गाढ़, शिथिल, कोमल और कठोर आदि गुम्फ विशेष के विभाग के लिए उपदेश दिया है, उसके सम्यग उच्चारण के उपदेश के लिए उसकी उपादान नहीं किया है। वर्गशः उपदान सवर्णता अर्थात् वर्णों की समान वर्णता से होने वाले प्रबन्ध के सौन्दर्य ज्ञान के लिए है। जेसे- 'दत्तानन्दं धनिनमनुसरन् वृत्तिधनः'। इत्यादि में न की सवर्णता है। अनुवाद-पाठ्य दो प्रकार का कहा गया है-संस्कृत और प्राकृत। अब मैं क्रमशः उन दोनों के विभाग को विधिपूर्वक कहूँगा ॥ ५ ॥ अनुवाद-व्यञ्जन, स्वर, सन्धि, विभक्ति, नाम (संज्ञा शब्द), आख्यात (क्रिया), उपसर्ग, निपात और ताद्धित, समास और नामधातु-इन अङ्गों से सम्पन्न संस्कृत पाठ्य को समझना चाहिए, अब उनके प्रयोग को समझिये ॥६-७॥

१. क. (टि०) यथा। २. क. (टि०) अङ्गानिकक्ष्याम्यनयोः । ३. ख. ग. एतैरङ्गविधानस्तु । ४. क. नानाघातुगवेक्षितम् । क-न (टि०) नानाधातुगवक्षितम् । क. (टि०) नानाघातुसमन्वितम् । ५. ख. ग. तद्वक्ष्यामि समासतः । ६. क. स्थानकरणादिज्ञानं च।

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२२२ नाध्यशास्त्रे

अकारादयाः स्वरा ज्ञेया औकारान्ताश्चतुदशः। हकारान्तानि कादोनि व्यञ्जनानि विदुबुंधा ।। ८ ।। तत्र स्वराश्चतुर्दश-अआइ ईं उ ऊऋ ऋ लृ लृ ए ऐ ओ औ इति स्वरा जया: ॥

कादीनि व्यञ्जनानि यथा-कखगध ङ़च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ णत थद ध न प फ ब भ म य र ल व श ष,स ह इति व्यञ्जनवर्गः। वर्गे वर्गे समाख्यातौ दवौ वर्णौं प्रागवस्थितौ। अधोषा इति ये त्वन्ये सघोषाः संप्रकीतिता ॥ ९॥ अष्टौ स्थानानि वर्णानामुरः कण्ठः शिरस्तथा। जिह्वामूलश्च दन्ताश्च नासिकोष्ठौ च तालु च ॥ १० ॥

अनुवाद-अकार से लेकर औकार पर्यन्त चौदह स्वर होते हैं और कादि से हकारान्त तक तैतीस व्यञ्षन समझने चाहिए ॥ ८॥ अनुधाद-स्वर चौदह हैं-अ, आ, इ, ई, उ,ऊ, ऋ, ऋ, ल, लू, ए, ऐ, ओ, औ-ये चौदह स्वर हैं। क से लेकर ह तक-क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह-ये तैंतोस व्यञ्जन वण हैं।

का अनुवाद-प्रत्येक वर्ग के प्रथम दो वणं अघोष कहे जाते हैं शेष वर्ण सघोष कहलाते हैं ॥ ९ ॥ (8- विमश-प्रत्येक वर्ग के प्रथम और द्वितीय अक्षर अर्थात् क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ और श, प, स-ये अधोष वर्ण हैं और शेष वर्ण अर्थात् वर्ग के तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम अर्थात् ग, घ, ङ, ज, झ, ङ्, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, म तथा य, र, ल, व, ह-ये वण सघोष कहे जाते हैं ॥ ९॥ वर्णो के आठ स्थान हैं-उर (उरस्), कण्ठ, शिर, जिह्वामूल, दन्त, नासिका, औठ और तालु ॥ १० ॥

१. क (टि०) अकारादि। २. क-भ (टि०) ककादीनि हान्तानि।

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चतुदशोऽष्याय: २२३

अ कु ह विसर्जनीयाः कण्ठयाः । इ चु य शास्तालव्याः । ऋ टु र षा मूर्धन्याः । लृ तु ल सा दन्त्याः। उ पूपध्मानोया ओष्ठया। प-फ इति पफा भ्यां प्राक् अर्धविसर्गसदृशः उपध्मानीयः। क - ख इति कखाभ्यां प्राक अर्धविसर्गसदृशो जिह्वामूलीयः। ए ऐ कण्ठचतालव्यौ। ओ औ कष्ठोष्ठयौ। वकारो दन्त्योष्ठयः । ङ ञण न मा अनुनासिकाः । विसर्जनीय औरस्य इत्येके। सर्ववर्णानां मुखं स्थानमित्यपरे। अनुवाद-अब वर्णो के स्थान का निरूपण करते हैं- १. अकार, कवर्ग (क, ख, ग, घ, ङ) ह और विसर्ग का कण्ठ स्थान है। २. इकार, चवर्गं (च, छ, ज, झ, ज) य और श का तालु स्थान है। ३. ऋ, टवगं (ट, ठ, ड, ड, ण) र और ष का मूर्धास्थान है। ४. लकार, तवगं (त, थ, द, ध, न) लकार और सकार का दन्त स्थान है। ५. उ कार, पवर्गं, (प, फ, ब, भ, य ) और ऊपध्नानीय ( - प ) का ओोष्ठ स्थान है। ६. क और ख के पू्वं जो अर्धविसरगं सदृश चिह्न (-क ख) का जिह्वामूल स्थान है। ७. ए, ऐ का कण्ठ और तालु स्थान है। ८. ओ, औ का कण्ठ और ओष्ठ स्थान है। ९. वकार का दन्त और ओष्ठ स्थान है। १०. ङ, ज, ण, न और म का नासिका स्थान भी होता है। ११. विसर्जनीय (विसगं) का औरस्य स्थान है, ऐसा कुछ आचा्य मानतो हैं। १२. सभी वर्णो का मुख स्थान है, ऐसा अन्य आचार्य कहते हैं।

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२२४

दवौ हवो वर्णों तु वर्गादयौ शषसाश्च त्रयोऽपरे। अद्योषा घोषवन्तस्तु ततोऽन्ये परिकीर्तिताः ॥११॥ एते घोषाघोषा कण्ठ्योष्ठ्या दन्त्यजिह्वयानुनासिक्या। ऊष्माणस्तालव्या: विसर्जनीयाश्च बोद्धव्याः॥१२॥

घोष इति अनुप्रदानविशेषः। नासिका तद्व्यापारोऽन्ते वस्य तथाभूतो धर्मोडनुस्वारः। तत्र घोषबाहुल्याद गाढता यथा- "अङ्गं दधन्निबिडचन्दनमङ्गनानां। नैवाघवातसदनं न तु मन्मथस्य ।।" अत्र चकारतकारावेव अघोषौ। एतदर्थस्य च स्थानादिविभाग उपन्यस्तः। एतद् (भाषा) स्वर? लक्षणाध्याये (१७) स्फुटयिष्यामः । - क खयोरुच्चा- रणाय ककारखकारौ। जिह्वाशब्देन (जिह्वमूल) स्थानम्। करणञच।

अनुवाद-प्रत्येक वर्ग के आदि के दो-दो वर्णं (क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ) और श, ष, स ये तीन वर्ण अघोष कहलाते हैं और शेष वर्ण अर्थात प्रत्येक वर्ग के अन्तिम तीन वर्ण (ग, ध, ङ, ज, झ, ज, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, त) और य, र, ल, व, ह ये सघोष हैं॥ ११ ॥ अनुवाद-ये घोष और अघोष वर्ण कण्ट्य, ओष्ट्य, दग्त्य, जिह्वा, नासिका, ऊष्माण, तालव्य, विसर्जनीय, स्थानों से उच्चारित होते हैं॥१२॥ अभिनव-घोष यह वर्णों का प्रयत्न विशेष है। नासिका और उसका व्यापार जिसके अन्त में हो वह धर्म अनुस्वार संज्ञक है। इनकी गाढ़ता घोष वर्णों ने आधिक्य से होती है। जेसे- अङ्गं दधान्निबिड़चन्दनमङ्गनानां। नैदाघबातसदनं न तु मन्मथस्य ।। अर्थात् 'सघन चन्दन' (चन्दन का लेप) को धारण करने वाला अङ्कनाओं का अङ्ग ग्रीष्म ऋतु के वायु का सदन नहीं है, अपितु कामदेव का सदन है।" यहाँ पर नकार और तकार ही अघोष हैं। इसीलिए ही स्थान आदि का विभाग उपन्यस्त किया गया है। इसे हम स्वर-लक्षण के अध्याय में सत्तरहवें श्लोक में स्पष्ट रूप में कहेंगे।- क> ख के उच्चारण के लिए जिह्वामूल स्थान है। १. क (टि०) अधोषाविति ये श्वन्ये सघोषाः सम्प्रकीत्तिता। क-म. अघोषवन्तो ये चान्ये सघोषा: परिकीलिताः।

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चतुर्दशोडयायः २१५

गघङ जझज डढण दधन बभम तथैव यरलवा मता घोषा:। कख चछ टठ तथ पफ श, ष, सा इति वर्गेष्वघोषा: स्युः ॥१३॥ कखगघजाः कण्ठस्थास्तालुस्थानास्तु चछजझञाः। टठडढणा मूर्धन्यास्तथदधनाश्चैव दन्तस्थाः ॥ १४॥ पफबभमास्त्वोष्ठ्या: स्युः दन्त्या लृलसा अहौ च कण्ठस्थौ'। तालव्या इचुयशा स्युऋंटुरषा मूर्धस्थिताः ज्ञेयाः ॥१५॥ लृलू दन्त्यौ ओऔ कण्ठोष्ठ्यो एऐकारौ च कण्ठतालव्यौ। कण्ठयो विसर्जनीयो जिह्वामूलोद्भवः कखयोः ॥१६ ॥ पफयोरोष्ठस्थानं भवेदुकारः स्वरो विवृतः। स्पृष्टाः काद्या मान्ता: शषसहकारास्तथा विवृताः ॥१७॥ अनुवाद-ग, घ, ङ, ज, झ, ञ, ड, ढ, ण, द, घ, न, ब, भ, म, य, र, ल, व- ये घोष वर्ण हैं और क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ, श, ष, स-ये अधोष वर्ण हैं ॥ १३॥ अनुवाद-क, ख, ग, घ, ङ का कण्ठस्थान च, छ, ज, झ, ञ का तालुस्थान, ट, ट, ड, ढ, ण का मूर्धास्थान त, थ, द, ध, न का दन्तस्थान, प, फ, ब भ, म का ओष्ठ स्थान होते हैं और लृ, ल, स को दन्त्य, अ,ह को कण्ठ्य कहते हैं।। १४-१५ (१)। अनुवाद-इ, चु (चवगं-च, छ, ज, झ, ञ) य, श का तालव्य स्थान है (इचुयशानां तालु)। ऋ, दु (टवगं ट, ठ, ड, ढ, ण ), र और ष का मूर्धा स्थान है (ऋटुरषाणां मूर्धा) ल लृ को दन्त्य, ओ, ओ को कण्डोष्ठच, ए, ऐ को कण्ठतालग्य, विसरगं का कण्ठ्य और -क ख का जिहवामूल स्थान है।। १५-१६ ।। अनुवाद-उकार पवरगं और- प फ का ओष्ठ स्थान है। स्वर, का विवृत स्थान है। क से म पर्यन्त वर्ण (क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म) स्पश संज्ञक कहे जाते हैं। श ष स ह को विवृत कहते हैं॥। १७ ।। १. क-प (टि०) कण्ठोष्ठयौ। २ क. मृग्नि स्थिता ज्ञयाः । ३. क. कण्ठ्यौ विसर्जनोयौ जिह्वाम । ४. ख. जिह्वामूलोन्द्व: कपयोः । ५. ख. ग. कण्ठेन रसान् विद्यात्। ना० शा०-२९

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२२६ नाटघशासो

अन्तस्था: संवृतजा: ङञणनमा नासिकोद्भवा ज्ञेयाः । ऊष्माणश्च शषसहाः यरलववर्णास्तथैव चान्तःस्थाः ।। १८।। जिह्वामूलीयःकःप उपध्मानीयसज्ज्ञया ज्ञेयः। कचटतपा स्वरिता: स्युः खछठथफा स्युः सदा क्रम्याः ॥ १९॥ कञ्ठ्योरस्यान् विद्यात् गजडदबान् पाठ्यसंप्रयोगे" तु। वेद्यो विसर्जनोयो जिह्वास्थाने स्थितो वर्णः ॥ २०॥ एते व्यञ्जनवर्णाः समासतः सज्ज्ञया मया कथिता। शब्दविषयप्रयोगे स्वराँस्तु भूयः प्रवक्ष्यामि ॥ २१ ॥

अनुवाद-अम्तःस्थ (य, र, ल, व ) वर्ण संवृत कहलाते हैं। ङ, ण, ञ, न, म का नासिका स्थान भी होता है। श, ष, स, ह, ऊष्मा संज्ञक वणं है और य, र, ल, व को अन्तःस्थ वर्ण कहते हैं ॥१८।। अनुवाद-जिह्वामूलीय (- क - ख) का जिहवामूल स्थान है और - प फ को ऊपध्मानीय कहते हैं। क, च, ट, त, प, वे स्वरित हैं और ख, छ, ठ, थ, फ-ये क्रभ्य वर्ण हैं। पाठभेद के अनुसार ये कण्ठ्य कहे जाते हैं॥। १९ ॥ अनुवाद-ग, ज, ड, द, ब वर्णों का और पाठभेद के अनुसार घ, झ, ढ, थ, भ वर्णो का कण्ठोरस्य स्थान है और विसर्जनीय का जिह्वामूल स्थान है, ऐसा समझना चाहिए॥ २०॥ अनवाद-इन व्यञ्जन वर्णों का मैंने संक्षेप में वर्णन किया है। अब शब्द प्रयोग के विषय में स्वरों का वर्णन करूँगा ॥ २१॥

१. ख. म. पाठ्ययोगे तु। २. ख. ग.घझढधभान् । ३. ख. ग. विद्यास्थानस्थितो वणंः । क (टि०) जिह्वामूले स्थितो वणी। ४. क. शब्दप्रयोगिषये।

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२२७

यस्मिन् स्थाने स समो विज्ञयो यः सवर्णसंज्ञोऽसौ। य इमे स्वराश्चतुदर्श निर्दिष्टास्तत्र वै दश समानाः। पूर्वो ह्रस्वस्तेषां परश्च दोर्घोऽवगतव्यः॥२२॥

सवर्णसंज्ञ इति। ये येन तुल्यास्ते तत्सवर्णभूतयः ॥२२॥ अनुवाद-जिस स्थान में जो वर्ण सम (समानस्थानीय) होता है, उसे सवर्ण संज्ञक समझना चाहिए। जो ये चौवह स्वर कहे गये हैं उनमें दस स्वर समान हैं। इन समान स्वरो में क्रमशः पहिले को हरस्व और दूसरे को बीघं समझना चाहिए।। २२ ।। अभिनव-सवर्ण संज्ञा कहने का अभिप्राय है कि जो वर्ण जिस वर्ण के साथ समान हो वे सवर्ण संज्ञक होते हैं ॥ २२ ॥ विशेष-पाणिनि ने भी समान स्थान और प्रयतन वाले वर्णो को सवण कहा है। (तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम्) आचार्यों ने जो चौदह स्वर बताये हैं उनमें प्रारम्भ के दस स्वर सवणं संज्ञक है। वे दस स्वर है-अआ इ ई उ ऊऋ ऋ ल लृ। इनमें प्रथम अ ई उ ऋ ल यै पाँच स्वर ह्रस्ब और आ ई ऊ ऋ ल वे पाच दीर्घ स्वर है। इस पर ये हरस्व दोघ भेद से भिन्न होते हुए भी एकवद्धाव होने से अभिन्न हैं। पाणिि ने आ, ई, ऊ, ऋ के दोर्घ रूप तो माने हैं किन्तु 'लृ' का दोर्घरूप नहीं मानते। (लबर्णस्थ दोर्घाभावः) ॥ २२॥ १. ख-ग. पुस्तकयोर्नास्ति श्लोकार्घोऽयम्। २. क (टि० भ-म. पुस्तकयोः )- य इमे स्वराश्चतुदंश तत्रादो दश समानसंज्ञास्तु । पूर्वो ह्रस्वस्तेषां परश्च दीर्घोऽवगन्तव्यः । पूर्वाचार्येरुक्तं विस्तरतो लक्षणं तु शब्दानाम्। संक्षेपादहमेषां लक्षणमर्थ च लक्षयामि। अर्थप्रधानं नाम स्यादाख्यातं तु क्रियाकृतम्। घोतयन्त्युपसर्गास्तु विशेषं भावसंश्रयम् । नामाश्यातार्थविषयं विश्येषं द्योतयन्ति ते। पृथक तत्रोपसर्गेम्बो निपाता नियमे च्युते । ३. ख. विषातम्यः ।

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२१८ नांडघशाते इतथं व्य्जनयोगैः स्वरैश्च साख्यातनामपदविहितैः । काव्यनिबन्धाश्च स्युर्धातुनिपातोपसर्गास्तु ॥ २३॥ एभिव्यञ्जनवर्गैर्नामाख्यातोपसर्गनिपातैः तद्धितसन्धिविभक्तिभिरधिष्ठितः शब्द इत्युक्तः ॥ २४॥ *पूर्वाचार्यैरुक्तं शब्दानां लक्षणं समासयोगेन। विस्तरशः पुनरेव प्रकरणवशात् संप्रवक्ष्यामि॥२५॥ पूर्वापरीभूत ह्वस्वदीघरूपतया स्वरा भिन्ना अपि अभिन्ना, एकवद्भावात। करिष्यमाणं क्रियमाणं कृतमिति भूतादिकालयुक्तं गमनागमनाभ्यामध्यक्ष- परोक्षभूताम्यां क्रियाम्यां युक्तमाख्यातम्। एकत्वादिवचनलिङ्गयुक्तं नाम ।। २३ ॥ अनुवाद-इस प्रकार स्वर और व्यञ्जनों के योग से आख्यात सहित नाम (संज्ञा शब्द ) पद, निपात और उपसर्गो के योग से काव्यों का निबन्धन होता है ।। २३ ॥ अभिनव-पूर्व के ह्रस्व स्वर और बाद के दीर्घ स्वर भिन्न होते हुए भी अभिन्न हैं, एकवद्धाव होने से। अभिनव-करिष्यमाण और क्रियमाण रूप भूतकाल से युक्त तथा गमन रूप प्रत्यक्षभूत और अगमन रूप परोक्ष भूत क्रियाओं से युक्त आख्यात है। एकत्व वचन और पुंस्त्वादि लिङ्गों से युक्त नाम है ॥ २३ ॥ अनुवाद-इन व्यञ्षन वर्गो तथा नाम, आख्यात, उपसर्ग, निपात, तद्धित, सन्धि, तथा विभक्तियों से अधिष्ठित शब्द कहा गया है॥ २४। अनुवाद-प्राचीन आचार्यो ने शब्दों का लक्षण संक्षेप में कहा है, अब प्रकरण के अनुसार विस्तार से लक्षण कहूँगा॥ २५ ॥ १. क. ग. उदिष्टं शब्दानां लक्षणमेतत्समासयोगेन । प्रकारणवशाद्धि तदहं विस्तरशः संप्रवक्ष्यामि।। ख. पूर्वाचार्यैरुक्तं शब्दाना लक्षणं तु विस्तरशः। पुनरेव संहृताथ लक्षणतः संप्रवक्ष्यामि। २. ख. ग. पूर्वाचार्यरुक्तं शब्दानां लक्षणं तु विस्तरतः । पुनरेव संहृतार्थ लक्षणतः सप्रवक्ष्यामि॥

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चतुदशोड्याय: १े२९

अर्थप्रधानं नाम स्यादाख्यातं तु क्रियाकृतम्। EP

द्योतयन्त्युपसर्गास्तु विशेषं भावसंश्रयम् ॥ २६॥ तत्प्राहुः सप्तविधं षट्कारकसंयुतं प्रथितसाध्यम् । निर्दशसम्प्रदानापादानप्रभृतिसज्ज्ञाभिः । २७ ॥ नामाख्यातार्थविषय विशेषं द्योतयन्ति ते। पृथक्तत्रोपसर्गेभ्यो निपाता नियमेऽच्युते॥२८ ॥ *संप्रत्यतोतकालक्रियादिसंयोजितं प्रथितसाध्यम्। PE वचनं नागतयुक्तं सुसदृशसंयोजनविभक्तम् ॥२९॥ प्रथित: साध्योऽर्यों वाच्यत्वेन यस्य ।।२७।। अनवाद-नाम (संज्ञा शब्द) अर्थप्रधान होता है और आख्यात क्रिया होतो है और उपसर्ग क्रिया के विषय में विशेषताओं को द्योतित करते हैं॥ २६॥ विशेष-नाम (संज्ञा शब्द) पाँच प्रकार के होते हैं-उणाद्यन्त, कृदन्त, तद्धितान्त, समासान्त और शब्दानुकरण। जैसा कि कहा है- उणाद्यन्तं कृदन्त्व तद्धितान्तं समासान्तम्। शब्दानुकरणं चैव नाम पञ्चविधं स्मृतम् ॥ अनुवाद-नाम शब्द सात प्रकार का होता है और छः कारकों से संयुक्त होता है तथा प्रथित साध्य होता है। यह करण, सम्प्रदान, अपादान आदि संज्ञाओं से युक्त होता है॥२७॥ अभिनव-रूप से प्रसिद्ध है साध्य अर्थ जिसका ॥ २७॥ अनुवाद-नाम और आख्यातार्थ के विषय को विशेषताओं को जो द्योतित करते हैं, वे उपसर्गो से पृथक् निपात है यह नियम अच्युत है॥२८॥ अनुवाद-वर्तमान एवं भूतकाल की क्रियाओं से संयोजित प्रथित साध्य होतो है। वचन विभक्तियों से युक्त तथा सुसदृश संयोजन से सम्पन्न होते हैं ॥२९॥ १. अयं श्लीक: ख. ग. पुस्तकयोर्नास्ति। २. ख. संप्रत्यतीतकालयोजितः क्रियादिसंयोगः । प्रथित. साव्ये वचनानां यतियुकतं संदृश संयोजनविभक्तम्। ग. संप्रत्यतीतकाल सम्प्रयोजितः क्रियादिसंयोगः प्रथितः । साध्ये वचनानां यतियुक्त सदृश संयोजकविभक्तम ।

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नाटघशास्त्र

`पञचशतधातुयुक्तं पञ्चगुणं पञ्चविधमिदं वापि।

प्रातिपदिकार्थलिङ्गर्युक्त्तं' पञ्चविधमिदं ज्ञेयम् ॥ ३०॥ आख्यातं 'पाठ्यकृतं ज्ञेयं नानार्थाश्रयविशेषम्'। वचनं नामसमेतं पुरुषविभक्तं तदाख्यातम्॥३१॥ प्रातिपदिकार्थयुक्तान्धात्वर्थानुपसृजनन्त ये स्वार्थैः । उपसर्गा ह्यृवदिष्टास्तस्मात् संस्कारशास्त्रेऽस्मिन् ॥ ३२॥

अनुवाद-पाँच सौ धातुओं से युक्त वह पञ्चगुणित पञ्नविध है। सु आदि विभक्तियों तथा अर्थविशेष से युक्त तथा प्रातिपविकार्थ एवं लिङ्ग से युक्त पाँच प्रकार के होते हैं॥। ३०।। 39 विशेष-भरत के अनुसार ५००x५-२५०० धातुएँ हैं। और वे पाँच वर्गों में बिभाजित है। भट्टाजिदीक्षित ने सिद्धान्तकौमुदो में लगभग २१०० घातुओं का उल्लेख किया है और उन्हें दस गणों में विभाजित किया है ॥ ३०॥ अनुवाद पाध्य में नाना प्रकार अर्थ विशेष के आश्रयोभूत क्रिया को आख्यात समझना चाहिए। वह आख्यात नाम (संज्ञा शब्द, प्रातिपदिक) के साथ वचन (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन) तथा पुरुष (उत्तन, मध्यम, प्रथम पुरुष ) में विभक्त है॥ ३१॥ अनुवाद-इस व्याकरण शास्त्र में जो अपने अर्थो के द्वारा प्रातिपदिक अथं से युक्त धातु के अर्थ को विशिष्ट बना देते हैं वे उपसर्ग कहलाते हैं ॥ ३२॥

१. ख ग. पुस्तकयो: क्लोकार्धोऽयं न वर्तते । २. अयं क्लाक: कासुचिन्मातृकासु नोपलभ्यते। ३ क. (ड.) विभूषिता न्यासाः । ४. ख. ग. प्रातिपादिकार्थलिङ्गयुक्तं। ५ क-ड. पाठ्यमिदं। ६. क नानायविशेषम् । क-द नामाश्रयविशेषम् । क-प. नानार्थाश्रयविशेष। ७. श्लो+ार्द्धोडये न दृश्यते। ८. क. प्रातिपदिकार्थयुक्त्या। ९. क. ये स्वार्थे। १० क. संस्कारतस्तस्मिन् ।

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चतुदशोष्याय: २३१

यस्मान्निपतन्ति पदे तस्मातप्रोक्ता निपातास्तु॥३३॥

घात्वर्थानुपसृजन्ति उपरागेण अन्यादृशान् कुर्वन्ति तेनोपकारेण प्रादिपादिका- थंस्य युक्तसम्बन्धेन प्रकरीतीति। हि शब्दः प्रकषे। प्रातिपदिकार्थोंपरागेण वा घात्वथं विचित्रं करोति। यढ्वा तु स्वार्थेः धात्वर्थानुपसृजन्ति। अतः उपसजनात प्रातिपदिकार्थे च युक्ता उपसर्गा: यथा प्राचार्य: प्रान्तेवासी ॥। ३२ ।।

अभिनव-धात्वर्थ का उपसूजन करते हैं, उपराग से अन्य के सदृश करते हैं, उस उपकार से प्रातिपदिकार्थ को उक्त सम्बन्ध से प्रकृष्ट करते है। यहाँ हि शब्द का अर्थ प्रकृष्ट है। प्रातिपदिकार्थ के उपराग से धात्वर्थ को विचित्र बनाते हैं। अथवा अर्थ से धातु के अर्थ को उपसृष्ट विशिष्ट करतै हैं। अतः उपस्जन करने के कारण प्रातिपदिकार्थ भो उपसर्ग युक्त होते हैं। जैसे-'प्राचार्य' में तथा प्रान्ते- वासी में उपसर्ग है॥। ३२।। विशेष-घातु [क्रिया] के साथ उपसर्ग लगाने से तीन प्रकार के अर्थ को दोतित करते है-१. कोई उपसर्ग धातु के अर्थ को बाघित (नष्ट) कर देता है। जैसे जि (जय) धातु का अर्थ जीतना है किन्तु परा उपसर्ग लगने पराजय अर्थ हो जाता है। कुछ उपसरग धातु के अर्थ का ही अनुमरण करते हैं। जैसे-जय का अर्थ जीतना है वि उपसर्ग लगाने से वही (विजय) अर्थ द्योतित होता है। कुछ उपसग घात्वर्थ की बिशिष्ट बनाते हैं। जैसे-

घात्वर्थं बाधते कश्चित् कश्चित तमनुवर्तते। तमेव विशिनष्टयन्य उपसर्गगतिस्त्रिषा॥

अनुवाद-प्रातिपदिकार्थ के योग से धातु, छन्द, निरक्त और युक्ति से पद में जो निपतन करते हैं, इसलिए वे निपात कहे जाते हैं॥ ३४ ॥

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२३२ नाटयशास्त्रे

प्रत्ययविभागजनिताः प्रकर्षसंयोगसत्त्ववचनैश्च। यस्मात्पूरयतेऽर्थान् प्रत्यय उक्तस्ततस्तस्मात् ॥ ३४॥ लोके प्रकृतिप्रत्ययविभागसंयोगसत्त्ववचनैश्च । तांस्तात् पूरयतेऽर्थास्तेषु यत्तद्वितस्तस्मात् ॥३५॥ प्रातिपविकार्थयागात’ वृद्धश्च वटुश्च, धातुयुक्त्या पर्चतत पठति च पाक- पाठयोरेव हि समुच्चयार्थको चशब्दौ युक्तौ। अयुक्त्याश्रयात्तु पादपूरणार्थमुच्यते। यत्र द्योतनेन विना न मण्डना, द्योतने च सति वाक्यमलंकृतं भवत। तद्यथा- "मिलति न खलु यस्या" इति खलुशब्दः प्रयासस्याकृतार्थत्वं द्योतयति। तच्च येनापि विना स्फुंटमेव वाक्यार्थत एव लाभात्। "अहरहरनुरागात" इति निर्भज्य वचनं द्योतितस्यापि स्फुटीकरणम्, तद्युवत्या। "अहो बतासि स्पृहणीयवीर्यः" इत्यत्र प्रातिपदिकार्थानेतैरथैरुपनिपतितैर्ञापयति ॥३३॥

अभिनव-प्रातिपदिकार्थ के योग से 'वृद्धश्च बटश्च' अर्थात् वृद्ध और बट का धातु के साथ योग होने पर 'पचति' और 'पठतत' में पकाना और पढ़ना अर्थ में 'च' शब्द समृच्चय अर्थ को युक्त करता है और अयुक्ति के आश्रय से तु केबल पादपूरण के लिए होता है अर्थात् जहां युक्ति का आश्रय नहीं है वहाँ 'च' शब्द पादपूर्ति के लिए होता है। जहाँ द्योतन (अर्थप्रकाशन) के विना कोई मण्डना (शोभा) नहीं हैं और द्योतन होने पर वाक्य अलंकृत हो जाता है। जैसे- 'मिलति न खलु यस्याः' इसमें 'खलु' शब्द प्रयास के अकृतार्थ को द्योतित करता है और वह खलु के विना भी वाक्यार्थ से ही स्पष्ट मिल जाता है। 'अहरहरनुरागात्' यहाँ पर द्योतित का भी स्फुटीकरण किया है। यहाँ प्रातिपदिक और धातु से युक्ति है। 'अहो बतासि स्पृहणीयशोभः' में अहो और बत शब्द प्रातिपदिकाथ को द्योतित करते हैं। अनुवाद-जो प्रकर्ष, संयोग एवं सत्त्व के कथन से प्रत्यय के विभाग से जनित प्रत्यय द्वारा अर्थ को पूरित करते हैं। इस लिए वे प्रत्यय कहे जाते हैं॥ ३४ ॥ अनुवाद-लोक में प्रकृति और प्रत्यय के विभाग एवं संयोग तथा सत्त्व के कथन के द्वारा उन-उन अर्थो का पूरण करते हैं, इसलिए वे तद्धित कहे जाते हैं॥। ३५॥

१. क. टि०) अय श्लोकः केषुचित् पुस्तकेषु नोपलभ्यते। २, क०प. तांस्तान् । ३. क, सश्ववचनेषु।

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चतुदंशोऽध्याय: २३३

एकस्य बहूनां वा धातोलिङ्गस्य वा पदानां वा। डी

'विभजन्त्यर्थं यस्मात् विभक्तयस्तेन ताः प्रोक्ताः ॥ ३६॥ तद्धितः-तस्मै प्रातिपदिकार्थाय हितस्सः प्रातिपदिकार्थ यश्च वा स्वात्मो- कुरुते। प्रकृतिप्रत्ययोविभागोऽवयवः काव्ये तन्मतं सम्प्रयोगप्रयोजनमैन्द्रेऽ- भिहित संयोग: संबन्धः । चान्द्रो ज्योत्स्ना। सत्त्वं तद्भावः यथा सूक्तस्य स्वभावः सौक्त्यं वचनं प्रवचनं काठकमादित्यश्रुत्या, तुर्यपञ्चमाध्यायविहिता निर्देक््यन्ते ॥३५॥ एकस्य पदस्य बहूनां वा पदानां समाप्ति प्राप्तानाम्। वाशब्दाद द्वयोरपि। येनार्थों विभज्यते विभक्त्याख्यः प्रत्ययः, तेषां च पदानां द्वैविध्यं धातोर्वा संबन्धि यदुत्पन्नं लिङ्गस्य वा सम्बन्धि अर्थवल्लिङ्गमिति संज्ञायां अव्युत्पन्नम्। यदि वा लिङ्गस्य संबन्धिन्यो विभक्तयः प्रतिपादिकात सुपः, धातोस्तिङः ॥३६॥ अभिनव-'तस्मै हितः तद्धितः' अर्थात् उसके प्रातिपदिकार्थ के हित के लिए जो प्रत्यय है, वे 'तद्धित' हैं। भाव यह है कि प्रातिपदिकार्थ (नाम) शब्दों से जो प्रत्यय होते हैं वे 'तद्धित' प्रत्यय कहलाते हैं। प्रातिपदिकार्थ का जा आत्मसात् कर लेता है वह ताद्धित है। प्रकृति और प्रत्यय का विभाग (अवयव) काव्य में और प्रकृति- प्रत्यय के संयोग का प्रयोजन ऐन्द्र व्याकरण में बताया गया है। यहाँ संयोग का अर्थ सम्बन्ध है, जैसे चन्द्र से सम्बन्धित चान्द्री ज्योत्स्ना। सत्त्व का अर्थ सत् का भाव है, सूक्त का भाव सौक्त्य है। कठ का वचन (कठ में प्रोक्त) काठक है, इत्यादि युक्ति से जैसा चतुर्थ पञ्चम अध्याय में निर्देश करेंगे॥ ३५॥ अनुवाद -- एक या अनेक धातु के लिङ्ग अथवा पदों के अर्थों का विभाजन करते हैं, इसलिए वह विभक्ति कही जाती हैं॥ ३६॥ अभिनव-एक पद अथवा वाक्य के समाप्ति पर्यन्त अनेक पदों के। 'वा' पद से दोनों का ग्रहण होता है। जिससे अर्थ का विभाग होता है वह प्रत्यय विभ्त है। वे पद (विभक्यन्त पद) दो प्रकार के होते हैं-एक धातु से उत्पन्न होने वाला तत्सम्बन्धो व्युत्पन्न पद और लिङ्ग से सम्बन्धित अर्थवान् शब्द। लिङ्ग शब्द संज्ञा में अव्युत्पन्न हैं। लिङ्ग से सम्बन्धित विभक्तियाँ सुप् आदि हैं और धातु से सम्बन्धित विभक्तियाँ तिप् आदि हैं। सुबन्त और तिङन्त को पद कहते हैं ॥ ३६ ॥ १. क. यस्माद्विभजन्त्यर्थान् विभक्तयः कीर्तितास्तस्मात् । ना० शा० -- ३०

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२३४ नाट्यशास्त्रे

विशिष्टास्तु स्वरा यत्र व्यञ्जनं वापि योगतः। सन्धीयते पदे यस्मात्तस्मात्सन्धिः प्रकीतितः ॥३७॥ वर्णपदक्रमसिद्धः२ पदैकयोगाच्च वर्णयोगाच्च। सन्धीयते च यस्मात्तस्मात् सन्धिः समुद्दिष्टः ॥ ३८॥ लुप्तविभक्तिर्नाम्नामेकार्थ संररत्समासोऽपि। तत्पुरुषादिसंज्ञ निर्दिष्टः षड्विधो विप्राः ॥ ३९॥ एभिः शब्दविधानैर्विस्तारव्यञ्जनार्थसंयुक्तैः। पदबन्धाः कर्तव्या निबद्धबन्धास्तु® चूर्णा वा ॥ ४० ॥

पद इत्येकपदे नित्या संहितेत्याह॥३७॥

अनुवाद -- जहाँ पर विश्ञिष्ट स्वर अथवा व्यक्षन का योग होने के कारण वर्णों का सन्धान होता है, उसे 'सन्धि' कहते हैं॥ ३७।। अभिनव-पद अर्थात् एक पद में संहिता (सन्धि) नित्य होती है॥३७॥ विशेष-सन्धि के विषय में नियम है- संहितैकपदे नित्या नित्या धातूपसर्गयोः। नित्या समासे वाक्ये तुसा विवक्षाभपेक्षते।। अनुवाद-वर्ण एवं पदों के योग से वर्ण एवं पदों का सन्धान होने के कारण उसे सब्धि कहते हैं॥ ३८॥ अनुवाद -- नाम (प्रातिपदिक) शब्दों के विभक्तियों का लोप करके संक्षेप में एकार्थक पद को प्रस्तुत करता है। हे विप्रो ! तत्पुरुष आदि नामों से निर्दिष्ट वह एकार्थोभाव रुप समास छः प्रकार का होता है॥ ३९॥ अनुवाद -- इन विस्तृत व्यञ्जन तथा अर्थों ये युक्त शब्दविधान (व्याकरण शास्त्र) के द्वारा पदबन्ध काव्य की रचना करनी चाहिए अथवा चूर्ण आदि गद्य की रचना करनी चाहिए॥ ४० ॥

१. ख. ग. पुस्तकयोरयं इ्लोको नास्ति। २. क. (टि०) वर्णक्रमसांसिद्धः । वर्णक्रमसन्बन्घः । ३. क. (टि०) पदैकयोगान्यः । पदैकयोगोऽन्यः । ४. क तस्मादुपदिश्यते सन्धिः । ५. ख. ग षडविधः सोऽपि। ६ ख. ग. विस्तारव्यञ्जनात्वसंयुक्तः। ७ ख. ग. वृत्तनिबद्धास्तु चूणं वा।

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चतुदंशोऽव्याय: २३५

विभक्त्यन्तं पदं ज्ञयं निबद्धं चूर्णमेव च। तत्र चूर्णपदस्येह सन्निबोधत® लक्षणम् ॥४१॥ अनिबद्ध पद छन्दोविधानानियताक्षरम्। ज्ञथं चूर्णपदं बुधैः ॥४२॥ निबद्धो भाविछन्दोविघिना बद्धः संघट्टनायुतः । पदबन्धा इत्युक्तम् ॥४० ॥ पदं निरूपयति तत्रेति परिमितवक्तव्यत्वादित्यत्राशयः ॥।४१॥ च्छन्दोनियताक्षरम्। अक्षरसंख्यानियम: अक्षरनियमो गुरुलघुनिवेशनियम: (संख्यानियमः एकाक्षरः पादो द्वयक्षरः पाद इत्यादिः) एतद्विहीनं चूर्णपवम्। अर्थः शृङ्गारवीरादिस्तदपेक्ष्यक्षराणि परमितानि भूयांसि वा स्यूतानि यत्रेति असमास- संघट्टनात्मकमुक्तमिति। इयं तु केवलं पठनकर्मत्वाद् गद्यमित्युच्यते॥ ४२॥ अभिनव-निबद्ध का अर्थ है छन्दोवद्ध रचना, (संघटना) पदों का बन्ध पहिले बताया जा चुका है॥ ४० ॥ अनुवाद-विभक्त्यन्त अर्थात् सुबन्त-तिङन्त शब्दों को पद कहते हैं। वह दो प्रकार का होता है -- निबद्ध और चूर्णपद। उनमें चूणपद के लक्षण को कहता हूँ, उसे समझिये ॥४१ ॥ अभिनव-पद का निरूपण करते हैं तत्रेति। परमित वक्तव्य यह आशय है।। ४१ ।। अनुवाद-छन्वोविधान के अनुसार पद निबद्ध न हो अर्थात् छन्दोविधान के अनुसार नियत अक्षरों के नियमन से रहित अर्थ की अपेक्षा करने वाले अक्षरों से अनुस्यूत पदों को विद्वानों को चूर्णपद समझना चाहिए ।। ४२।। अभिनव-छन्द नियत अक्षरों वाला होता है। अक्षरों की संख्या का नियम होना अर्थात् गुरु, लघु अक्षरों के निवेश का नियम से रहित चूर्णपद होता है। अर्थ का भाव है शृङ्गार, वीर आदि उसकी अपेक्षा करने वाले अल्प (थोड़े) अथवा बहुत अक्षर जहाँ स्यूत हों, निबद्ध हों, वहाँ समासरहित संधटनात्मक पद चूर्ण है। यह तो केवल पठन का कर्म होने से गद्य कहलाता है॥ ४२॥ १. र. ग. विभज्यैकं पदं ज्ञेयं निबन्धं चूर्णमेव च । २. ख. ग. बहिर्बोषत। क. संिबोधत। ३. क. अनिबद्धपदं छन्दस्तथा चानियताक्षरम्। ख. ग. अनिबद्धं पदवृन्दं तया चानियताक्षरम्। ४. ख. ग. अथोपेक्षाक्षरयुतं।

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२१६ नाट्यशास्त्रे

निबद्धाक्षरसंयुक्तं यतिच्छेदसमन्वितम्' । निबद्धं तु पदं ज्ञयं प्रमाणनियतात्मकम् ॥४३॥ एवं नानार्थसंयुक्तैः पदैर्वर्णविभूषितैः । चतुभिस्तु 'भवेद्युक्तं छान्दोवृताभिधानवत्" ॥ ४४ ।।

यतिर्विरामः । (छेदस्तत्कृतः पदविभागः ) पादसंख्यया सामान्यलक्षणमाह- प्रमाणेन श्रोत्रेन्द्रियेण नियत आत्मा यत्र श्रव्यमित्यथं:।। ४३।। अथ छन्दोलक्षणं कत्तु तस्य स्वरूपं तावदाह-एवमित्यादि। वर्णा गुरुत्वलघुत्वाद्यवच्छिन्नाः । विविधैर्भूषणैः सालंकारैः पादैश्चतुभिरिति संबन्धः। इदं तत्पद्यपादेषु भवति गद्यमिति निगदनीयत्वेऽपि विशेषसंज्ञया व्यपदेशः ॥ ४४ ।

अनुवाद-निबद्ध अक्षरों से युक्त, पदच्छेद से समन्वित नियत अक्षरों के प्रमाण से युक्त निबद्ध पद समझना चाहिए ।। ४३।। अभिनव-यति का अर्थ विराम है और छेद का अर्थ यतिकृत पद विभाग है। पाद की संख्या के अनुसार उसका सामान्य लक्षण कहते हैं। प्रमाण से अर्थात् श्रोत्रेन्द्रिय के द्वारा नियत है स्वरूप जिसमें उसे निबद्ध पद कहते हैं अर्थात् श्रव्य हैं।। ४३ ।। अभिनव-अब छन्दों का लक्षण बताने के लिए उसके स्वरूप को कहते हैं- एवमित्यादि। अनुवाद-इस प्रकार नाना प्रकार के अर्थों से युक्त नथा वर्णों के विभूषित चार पादों से युक्त छन्द होता है उसे वृत्त भी कहते हैं।। ४४।। अभिनव-वर्ण का अभिप्राय है गुरुत्व और लघुत्व से युक्त, अनेक प्रकार के अलङ्कारों से अलंकृत, चार पदों से युक्त पद होता है। वह पद्य पादों में रचित होता है। पद्य और गद्य दोनों उचारणीय होने से इसे गद्य इस बिशेष संज्ञा से व्यवहृत किया जाता है॥ ४४॥

१. ख. ग. पदच्छेदस मन्वितम् । २. ख. ग. प्रमाणनियताक्षरम्। ३. क. पाद।। ४. ख. ग. भवेद्युक्त। ५. क-भ, छदन्दोवृत्तसमाश्रयम् । कनन, छन्दोवृक्ष्यभिधानवत्।

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चतुदशोऽष्याय: २३७

षड्विशतिः 'स्मृतान्येभिः पादैश्छन्दांसि संख्यया। समञ्चार्धसमञचैव तथा विषममेव च॥ ४५॥ छन्दोयुक्तं समासेन त्रिविधं वृत्तमिष्यते। नानावृत्तिविनिष्पन्ना शब्दस्येषा तनूस्समृता ॥४६ ॥ छन्दोहीनो न शब्दोऽस्ति न च्छन्दशशब्दवजितम्। तस्मात्तूभयसंयोगो नाट्यस्योद्योतकः स्मृतः ॥ ४७॥

षड्विशतिरिति तावत्परिमाणान्येकाक्षर।तप्रभृति षड्विशत्यक्षराणि याव- दुक्तादीन्युत्कृत्यन्तानि छन्दांसीत्यर्थः । पादचतुष्टये तुल्यलक्षणं समं, अतुल्यलक्षणं विषमम् अर्धसमं प्रथमतृतीययोद्वितीय चतुर्ययोः । संज्ञाभिश्छन्दोभेदा आश्रिता ॥४५॥।

अनुवाद-इस प्रकार पादों की संख्या के अनुसार छन्द २६ प्रकार के कहे गये हैं। सम, अर्धसम और विषम इसके तीन भेद हैं॥ ४५॥ अभिनव-उतने परिमाण वाले एकाक्षर से लेकर छब्बीस अक्षरों तक उत्का से लेकर उत्कृति पर्यन्त छन्द है। उनमें चारों पादों में समान लक्षण (समान अक्षर) होने पर 'सम' छन्द होता है और विषम अक्षर होने पर 'विषम' छन्द होता है तथा प्रथम एवं तृतीय अथवा द्वितोय एवं चतुर्थ पादों में सम अक्षर हो तो अर्धसम होता है॥ ४५॥ जनुवाद-इस प्रकार छन्दों से युक्त वृत्त संक्षेप में तीन प्रकार का होता हैं। नाना प्रकार के वृत्तों से निष्पन्न इसे शब्द का तनू (शरोर) कहा गया है।। ४६ ॥ अनुवाद-छन्दों से रहित कोई शब्द नहीं होता और न शब्दों से रहित कोई छन्द होता है। इसलिए दोनों का संयोग नाटय का उद्योतक माना गया है॥४७॥

१. ख. ग. स्मूनानीह । २. ख. ग. निबद्धं। ३. क. एवं तूभयसंयोगो। ख. ग. तस्मात्तूभयसंयुक्ते। ४. ख. ग. नाट्यस्योद्योतके स्मुते।

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२३८ नाटयशास्त्र

एकाक्षरं भवेदुक्तमत्युक्तं द्वक्षरं भवेत्। मध्यं त्र्यक्षरमित्याहुः प्रतिष्ठा चतुरक्षरा॥ ४८ ॥

सुप्रतिष्ठा भवेत् पञ्च गायत्रो षट् भवेदिह । 'सप्ताक्षरा भवेदुष्णिगष्टाक्षरानुष्टुबुच्यते। ४९॥ नवाक्षरा तु वृहती पडिक्तश्चैव दशाक्षरा। एकादशाक्षरा त्रिष्टुब् जगतो द्वादशाक्षरा ॥ ५० ॥ त्रयोदशाऽतिजगती शक्वरो तु चतुर्दशा। 'अतिशक्वरी पश्चदशा षोडशाष्टिः प्रकोतिता ॥। ५१ ॥

अनुवाद-एक अक्षर वाले छन्द को उक्ता, दो अक्षर वाले छन्द को अत्युक्ता, तोन अक्षर वाले छन्द को मध्या और चार अक्षर वाले छन्द को प्रतिष्ठा कहते हैं।। ४८ ॥ अनुवाद-पांच अक्षरों वाला प्रतिष्ठा, छः अक्षरों वाला गायत्री, सात अक्षरों वाला उष्णिक् और आठ अक्षरों वाला छन्द अनुष्टुप् कहा जाता है।। ४९। अनुवाद-नव (नौ) अक्षरों वाला छन्द वृहतो, दश अक्षरों वाला पंकि, ग्यारह अक्षरों वाला 'त्रिष्टुप्' और बारह वाला छन्द 'जगती' कहलाता है ॥५०॥ अनुवाद-तेरह अक्षरों वाले छन्द को 'अतिजगती' चीवह वक्षरों वाले छन्द को 'शङगरी', पन्द्रह अक्षरों वाले छन्द को 'अतिशक्वरो' और सोलह अक्षरों के छन्द को 'अष्टि' कहते हैं ॥५१॥

१. क. एकाक्षरा भवेदुक्ता ह्यत्युक्ता दवयक्षरा भवेत। मध्य। तु त्र्यक्षरेत्याहु: प्रतिष्ठा चतुरक्षरा। २. क. म. मध्यम त्र्यक्षरं प्रोक्तं। ३. क-म. तर्थव च। ४. क-म. उष्णिक सप्ताक्षरकृतात्वष्टाऽनुष्टुप् प्रकीर्तिता। ५. क. इष्यते। ६. क, दशपञचातिशक्वर्याः अष्टः स्यात् षोडशाक्षरा।

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चतुर्दशोऽध्यायः १३९

'अत्यष्टिः स्यात्सप्तदशा धृतिरष्टादशाक्षरा एकोर्नविशतिधृतिः कृतिर्विशतिरेव च॥५२॥ द्वाविशत्याकृतिस्तथा। विकृतिः स्यात् त्रयोविशा चतुर्विशा च संकृतिः ॥ ५३॥। पञ्चविशत्यतिकृतिः षडविशत्युत्कृतिर्भवेत्। अतोऽधिकाक्षरं छन्दो8 मालावृत्तं तदिष्यते ॥ ५४॥ "छन्दसां तु तथा ह्योते भेदाः प्रस्तारयोगतः। 'असंख्येप्रमाणानि वृत्तान्याहुरतो बुधाः॥५५॥ अनुवाद-सत्तरह अक्षरो वाला वृत्त 'अत्यष्टि', अठारह अक्षरों वाला 'धृति' उन्नीस अक्षरों वाला 'अतिधृति' और बीस अक्षरों वाला छन्द 'कृति' कहलाता है। ५२॥ अनुवाद-इक्कीस अक्षरों वाले छन्द को 'प्रकृति', बाइस अक्षरों वाले छन्द को 'आकृति' तेइस अक्षरों वाले छन्द को 'विकृति' और चौबीस अक्षरों वाले छन्द को 'संकृति' कहते हैं ॥५३॥ अनुवाद-पचीस अक्षरों का 'अभिकृति' और छब्बीस अक्षरों का 'उत्कृति' वृत्त कहलाता है, इससे अधिक अक्षरों के पाद वाले छन्द को 'मालावृत्त' कहलाते हैं ॥। ५४ ॥ अनुवाद-छन्दों के इतने भेद प्रस्तार के योग से बनते है। इसलिए बुधजन वृत्तो के प्रमाण (संख्या) असंख्येय मानते हैं ॥५५ ॥

१. क. तया सप्तदशात्षष्टिः । २. क. एकोनविशातिधृतिः । ३. क-ब. प्रकृतिस्त्वेकविशतिः । ४. ख. ग. यत्तु। क-ब. यत्स्यात्। ५. क-उ. छन्दसां च भवेदेषां भेदो नंकविषः पृथक्। ६. क-च, असंख्येयप्रमाणानि परिमाणा वृत्तसंख्या समाश्रिता।

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२४० नाटपशाएत्रे

गायत्रीप्रभृतित्वेषां प्रमाणं संविधीयते' प्रयोगजानि सर्वाणि प्रायशो न भवन्ति हि ॥ ५६ ॥ वृत्तानि च चतुष्षष्टिर्गायत्रयां कीर्तितानि तु। (६४) शतं विशतिरष्टौ च वृत्तान्युष्णिगथोच्यते॥ ५७॥(१२८) तथा ह्योते भेदा इत्याह-प्रस्तारयोगत इति। प्रस्तारे योगो युक्तिः तेन तत्र युक्तिवंक्ष्यते- "प्रकीर्य सर्व गुरु, तत्र पूर्वगुरोरधो लं परिपूर्य तत्त्वम्। स्यात्पूर्वपूर्व गुरुणेति यावत्सर्वत्र लं प्रस्तरणे तदेव"। एते यथा भेदाः ॥ ५५॥ षडक्षराणि गायत्र्यां तत एवारभ्य प्रयोगाहतेति सूचयति उवत्यादीनामश्र- वत्वात्। तदाह प्रयोगजानीति लक्ष्यतो न स्थितानि, अपि तु वेदवद दृश्यन्त- इति भाव: ॥५६॥ वृत्तानि च चतुःषष्टिरित्यादिना स्वकण्ठेन संख्यां पठति यावत्॥५७॥ अभिनव-प्रस्तार के योग से छन्दों के इतने भेद होते हैं। प्रस्तार में जो योग युक्ति है उससे इतने भेद होते हैं। उनमें युक्ति को आगे कहेंगे- "प्रथम सभी वर्ण गुरु हो, फिर आदि अक्षर गुरु और उसके नीचे लघु हो, इस प्रकार पूर्व पूर्व को गुरु से पूणं करे और तब तक करे जब तक सर्व लघु आ जाय।" ये प्रस्तार के भेद हैं ॥ ५५॥ अनुवाद-इनमें गायत्री प्रभूति छन्दों के प्रमाण को हम बतलाते हैं, क्योंकि छन्दों के सभी भेद प्रयोग में नहीं आते ॥५६॥ अभिनव-भरत मुनि षडक्षरा गायत्रो से प्रारम्भ करके छन्दों का विवेचन करते हैं, क्योंकि उक्त्यादि पाँच छन्दों के प्रयोग कहीं दिखलाई नहीं देते। अपितु वेद के समान इनका अध्ययन होता है ॥५६॥ अनुवाद-गायत्री में ६४ प्रकार के वृत्त होते हैं और उष्णिक् छन्दों में १२८ भेव कहे गये हैं॥।५७॥ अभिनव-भरत मुनि अपने मुख से संख्या को पढ़ते हैं॥ ५७॥ १. क. संप्रबक््यते। १. क. (टि०) वृत्तानां तु चतुष्षष्टिर्गायित्री परिकीतिता ।

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बतुदशोऽष्याय। २४१

षट्पञ्चाशच्छते द्वे च वृत्तानामप्यनुष्टुभि। हगगे (२५६) शतानि पञ्च वृत्तानां बृहत्यां द्वादशैव च।५८॥ (५१२) पङ्क्त्यां सहस्र' वृत्तानां चतुर्विशतिरेव च। (१०२४) (F "त्रैष्टुभे द्वे सहस्र च चत्वारिशत्तथाष्ट च।। ५९॥(२०४८) सहस्राण्यपि चत्वारि नवतिश्च षडुत्तरा। (5 जगत्या) 'समवर्णानां वृत्तानामिह सर्वशः ॥६०॥(४०९६) अष्टौ सहस्राणि शतं द्वृयघिका नवतिः पुनः । जगत्यामतिपूर्वायां वृत्तानां परिमाणतः ॥ ६१॥(८१९२)

(2 शतानि त्रीण्यशीतिश्च सहस्राण्यपि षोडश। वृत्तानि चैव चत्वारि शक्वर्याः परिसंख्यया ॥६२।।(१६३८४) अनुबाद-अनुष्टुप् छन्द के दो सौ छप्पन (२५६) भेद और वृहती के पांच सौ बारह (५१२) भेद होते हैं ॥५८ ॥ अनुवाद-पंक्ति छन्द के एक हजार चौबीस (१०२४) भेद और त्रिष्टुप् छन्द के दो हनार अड़ताली (२०४८) भेद होते हैं ॥ ५९ ॥ अनुवाद-सम वर्ण जगती छन्द के चार हजार छानवे (४०९६) भेद होते हैं ॥। ६० ।। अनुवाद-अतिजगती नामक छन्द से आठ हजार एक सौ बानवे ( ८१९२) भेद होते हैं॥। ६१ ॥ अनुवाद-शक्वरी नामक वृत्त को संख्या सोलह हजार तोन सौ चौरासी (१६३८४ ) होती हैं ॥। ६२ ।। १. क. पंक्ते। २. क. श्रैष्टुभो द्विसहस्र । ३. क. (टि०) समपादानां । ४. क. वृत्तानां सर्वशो भवेत्। ना० शा०-३१

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२४२ नाट्यशास्त्र

द्वात्रिशच्च सहस्राणि सप्त चैव शतानि च। 5 अष्टौ षष्टिश्च वृत्तानि ह्याश्रयन्त्यतिशक्वरीम्॥६३।।(३२७६८) पञचर्षष्टिसहस्राणि सहस्त्रार्धञ्च संख्यया। ( 8षट्त्रिशच्चैव वृत्तानि ह्यष्टयां निगदितानि च ॥ ६४॥(६५५३६) एकत्रिशत्सहस्त्राणि वृत्तानाञ्च द्विसप्ततिः। तथा शतसहस्त्रञ्च छन्दांस्यत्यष्टिसंजञिते ॥ ६५॥ (१३१०७२) धृत्यामपि हि पिण्डेन वृत्तान्याकल्पितानि तु। (तज्ज्ञैः शतसहस्त्रे द्वे शतमेकं तर्थैव च ॥ ६६॥ द्विर्षष्टिश्च सहस्राणि चत्वारिशच्च योगतः। 2चत्वारि चैव वृत्तानि समसंख्याश्रयाणितु॥६७ ॥ (२६२१४४) अतिधृत्यां सहस्राणि चतुर्विशतिरेव च । तथा शतसहस्राणि पञ्च वृत्तशतद्वयम् ॥ ६८॥ अष्टाशीतिश्च वृत्तानि वृत्तज्ञैः कथितानि च। (५२४२८८)

अनुवाद-अतिशक्वरो छन्द के बत्तीस हजार सात सौ अड़सठ (३२७६८) भेद होते हैं ॥ ६३ ॥ अनुवाद-अष्टि नामक छन्द के पैंसठ हजार पांच सौ छत्तोस (६५५३६) भेव होते हैं॥। ६४।। अनुवाद-अत्यष्टि छन्द एक लाख इकतीस हजार बहत्तर (१३१०७२) प्रकार का होता है।। ६५ ।। अनुवाद-धृति नामक वृत्त के दो लाख बासठ हजार एक सौ चौवालीस (२६२१४४ ) भेद होते हैं॥ ६६-६७ ।।

१. क. द्वात्रिशत्तु। २. क-म. अष्टो षष्टिश्च वृत्तानां संश्रयन्त्यतिशक्वरीम् । ३. षड विशच्चैव वृत्तानि यथाष्ट्या गदितानि तु। ४. क. चत्वारिशत् प्रयोगतः ।

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चतुर्दशोऽब्यायः ४.२४३

कृतौ शतसहस्त्राणि दश प्रोक्तानि संख्यया ।। ६९।। चत्वारिशत्तथा चाष्टौ सहस्राणि शतानि च। पञ्चषट्सप्ततिश्चंव वृत्तानां परिमाणतः'॥ ७०॥(१०४८५७६) तथा शतसहस्त्राणां प्रकृतौ विशतिर्भवेत्। सप्त वै गदितास्त्वत्र नवतिश्चैव संख्यया। ७१॥ सहस्राणि शतं चैकं द्विपञ्चाशत्तथैव च । वृत्तानि परिमाणेन2 वृत्तज्ञैर्गदितानि तु ॥ ७२॥(२०९७१५२) *चत्वारिंशत्तथैकञ्च लक्षाणामथ संख्यया। तथा चेह सहस्राणि नवतिश्चतुरुत्तरा ॥ ७३ ॥ शतत्रयं समाख्यातं ह्याकृत्यां चतुरुत्तरम् । (४१९४३०४)

अनुवाद-अतिधृति नामक छन्द पांच लाख चौबोस हजार दो सौ अठासी (५२४२८८) प्रकार का होता है॥। ६८-६९ ।। अनुवाद-कृति छन्द दस लाख अड़तालोस हजार पांच सौ छिहत्तर (१०४८५७६) प्रकार का होता है।। ६९-७० ।। अनुवाद-प्रकृति नामक छन्द के बीस लाख सत्तानवे हजार एक सौ बावन (२०९७१५२) भेद होते है॥। ७१-७२ ।। अनुवाव-आकृति नामक छन्द एकतालोस लाख चौरानबे हजार तीन सौ बार (४१९४३०४) प्रकार का होता है।। ७३-७४।।

१. क. (टि०) प्रतिभागरः । २. क. (टि०) प्रविभागेन । ३. क-म. बुर्धः वतसहस्त्रणि चत्वारिशत्तथापरम् । नवतिश्चैव चत्वारि सहस्राणि शतत्रयम् । चत्वारि चंव वृत्तानि कथितान्याकृतौ बुषैः ॥

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२४४ नाटयशास्त्र

`ज्ञ या शतसहस्त्राणामशोतिस्त्र्यधिका बुधैः ॥ ७४॥ अष्टाशीति सहस्राणि वृत्तानां षट्छतानि च। अष्टौ चैव तु वृत्तानि विकृत्यां गदितानि तु ॥ ७५॥ (८३८८६०८) तथा शतसहस्राणि सप्तषष्टिश्च सप्ततिः । सप्त चैव सहस्राणि षोडश द्वे शते तथा ॥ ७६ ॥ कोटिश्चैवेह वृत्तानि संकृतौ कथितानि वै। (१६७७७२१६) *कोटित्रयञ्चाभिकृत्यां पञ्चत्रिशद्भरन्वितम् ॥७७॥

पञ्चाशद्भ: सहस्रैश्च चतुर्भिरधिकैस्तथा। चतुष्टयं शतानाश्च द्वात्रिशद्भि: समन्वितम्॥७८।। (३३५५४४३२)

(४०६ अनुवाद-विक्कृति नामक छन्द के तिरासो लाख अठासी हजार छः सौ चार ( ८३८८६०४ ) भेद होते हैं॥। ७४-७५।। अनुवाद-संकृति नामक छन्द एक करोड़ सड़सठ लाख सतहत्तर हजार दो सौ सोलह (१६७७७२१६) प्रकार का होता है॥ ७६-७७ ।। अनुवाद-अभिकति नामक छन्द के तोन करोड़ पैंतोस लाख चौवन हजार चार सौ बत्तीस (३३५५४४३२) प्रकार होते हैं॥७७.७८ ।।

१. क-म. तथा शतसहस्राणामशीतित्रिकसंयुता। अष्टाशीतिसहस्राणि षडष्टौ च शतानि च।। वृत्तानि विकृती छन्दस्युदिष्टानोह संख्यया ।। २. कनन. कोटिष्षडघिका नित्यं सप्तसप्ताधिका पुनः । सप्त चैव सहस्राणि वृत्तानां च शतद्वयम् ।। षोडशोत्त रमाक््यातं संकृत्यां परिमाणता॥

३. क. तथा शतसहस्राणि पञ्चत्रिशच्च संख्यया। puRFs (०sी)

तिस्त्रः कोटयः सहस्राणि चतुष्पञचाशदेव च ।। शतानि चत्वारि तथा द्वात्रिशत्प्रविभागतः । फिल ककोश वृत्तान्यभिकृतौ चैव छन्दोज्ञंः कथितानि वै।

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चतुदंशोऽध्याथ! १४५

·षट् कोटयस्तथोत्कृत्यां लक्षाणामेकसप्ततिः। अकी चतुष्टपष्टिशतान्यष्टौ सहस्राण्यष्ट चैव हि ।७९॥ (६७१०८८६४) उक्ताद्युत्कृतिपर्यंन्तवृत्तसंख्यां विचक्षणः । 35 एतेन च विकल्पेन वृत्तेष्वेतेषु निर्दिशेत् ॥ ८। 'सर्वेषां छन्दसामेवं' वृत्तानि कथितानि वै। षट्कोट्यस्तु सहस्राणां शतानि होकसप्ततिः। अष्टौ चैव सहस्राणि शतान्यष्टौ तथैव च।। चतुःषष्टिस्तु वृत्तानि ह्यत्कृतावपि संख्यया। इति प्रमाणम् ॥ ७९॥ अनुवाद-उत्कृति नामक छन्द छः करोड़ इकत्तर लाख आठ हजार आठ सौ चौंसठ (६७१०८८६४) प्रकार का होता है ॥ ७९ ॥ अभिनव-अभिनवभारतो में भी उत्कृति के छः करोड़ इकहत्तर लाख आठ हजार आठ सौ चोंसठ भेद बताये गये हैं । ७९॥ अनुवाद-इस प्रकार उक्ति से लेकर उत्कृति पर्यन्त वृत्तों की प्रस्तारगत संख्या बतलायी गई है। विद्वानों को इसी के अनुसार छन्दों की योजना करनी चाहिए॥। ८० । १. क. षट्कोटयस्तु सहस्राणि शतानि ह्येकसप्ततिः । अष्टौ चंव सहस्राणि शतान्यष्टौ तर्थव च। चतुष्पष्टिस्तु वत्तानि हयुत्कृतावपि संख्यया।। २. क, उत्काद्युत्कृति जातानि वृत्तसंख्याविचक्षणैः । ३. क. (टि०) सर्वेषां छन्दसां पिण्डं कोटयोऽत्र त्रयोदश । शतानि सप्तसप्तैव सहस्राणि दशैव। तथा शतसहस्राणों द्विचत्वारिशदत्र हि।। षड्विशतिश्च वृत्तानामित्थं चानन्त्यमुच्यते।। ४. क. (टि०) वृत्तांश कथितं मया। वृत्तान्तं कथितं मया।

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२४६ नाटयशास्न्र

'तिस्रः कोटयो दश तथा सहस्राणां शतानि तु ॥ ८१॥ चत्वारिशत्तथा द्वे च सहस्राणि दशैव तु। सप्तभिः सहितान्येव सप्त चैव शतानि च ॥ ८२॥ षड्विशतिरिहान्यानि व्याख्यातानि समासतः (१३४२१७७२६) समानि गणनायुक्तिमाश्रित्य कथितानि वै॥ ८३॥ 2सर्वेषां छन्दसामेवं त्रिकैर्वृत्तं प्रयोजयेत्। ज्ञ याश्चाष्टौ त्रिकास्तत्र संज्ञाभि: स्थानमक्षरम्।। ८४।।

उत्कृत्यन्तानां संख्यां प्रमाणोकृत्याह-तिस्त्रः कोट्य इत्यादिना॥८१-८२॥

अभिनव-उत्कृति पर्यन्त छन्दों को संख्या एकत्रित कर कहते हैं-'तिस्रः कोटथ:' इत्यादि।

अनुवाद-इस प्रकार सभी छन्दों को संख्या तेरह करोड़ बयालोस लाख सत्तरह हजार सात सौ छब्बीस (१३४२१७७२६ ) संख्या संक्षेप में मैंने बताई है।। ८१-८२ ॥ अनुवाद-इस प्रकार गणना के प्रमाण के द्वारा छब्बीस अक्षर पयन्त सभी छन्दों को संख्या (भेद) मैंने संक्षेप में कहा है ॥। ८३॥। अनुवाद-इस प्रकार सभी छन्दों का त्रिकों के द्वारा गठन किया जाता है। ये त्रिक आठ है, जिनका अपने स्वरूपानुसार संज्ञा, स्थान और अक्षरो को समझना चाहिए।। ८४।।

१. क-म. काटयस्त्रयादश तथा चत्वारिंशद्दयं तथा। ज्ञेयं शतसहस्त्राणां ततो दश च सप्त च।। सहस्राणि ततः सप्तशतानि प्राविभागशः । षडविशति: च वृत्तानि वृत्तसंख्याविचक्षणः। २. कनन. एतेषां तु पुनर्ज्ञेयं त्रिकर्वृ त्तप्रवर्त्तनम् । एकं वा विशर्ति वापि सहस्रं कोटिरेव वा।। सर्वेषां छन्दसामेंवं वृत्तान्तं वा द्विजोत्तमाः। ज्ञेयाश्चाष्टी त्रिकास्तत्र स्वसंज्ञाभि: पृथक-पृथक्॥

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पतुर्दशोऽष्याय: २४७

त्रीण्यक्षराणि विज्ञेयस्त्रिकोंडशः परिकल्पितः। िम कगि गुरुलध्वक्षरकृत: सर्ववृत्तेषु नित्यशः ॥ ८५ ॥ गुरुपूर्वो भकार: स्यान्मकारे तु गुरुत्रयम्'। जकारो गुरुमध्यस्थः सकारोऽन्त्यगुरुस्तथा ॥ ८६ ॥ 2लघुमध्यस्थितो रेफस्तकारोऽन्त्यलघुः परः। लघुपूर्वो यकारस्तु नकारे तु लघुत्रयम् ।। ८७ ।। एते ह्यष्टौ त्रिका: प्राज्ञैविज्ञेया ब्रह्मसम्भवाः । लाघवार्थं पुनरमी छन्दोज्ञानमवेक्ष्य च। ८८।। एभिविनिर्गताश्चान्या जातयोऽथ समादयः । अस्वराः सस्वराश्चैव प्रोच्यन्ते वृत्तलक्षणैः ॥ ८९॥ अनुवाद-प्रथम तीन अक्षरों को समझना चाहिए जिनसे सभी छन्दों में नियमतः गुरु एवं लघु लक्षरों के द्वारा त्रिक अंश की परिकल्पना की गई है ॥ ८५॥ अनुवाद पूर्व गुरु अर्थात जिसमें आदि वर्ण गुरु हो और शेष लघु हो (5।।) तो उसे भगण कहते हैं। इसी प्रकार तीन गुरु वाला मगण (SSS), मध्य में गुरु हो तो जगण (।5।) अन्त्य गुरु वाला सगण (।। 5) मध्य लघु रगण, (S।S), अन्त्य लघु तगण ( 55।), आदि लघु यगण (ISS) और तोनों वर्ण लघु होने से नगण (।।।) कहलाते हैं। ये आठ त्रिक हैं॥ ८६-८७।। अनुवाद-ये आठ त्रिक माने जाते हैं। ब्रह्मा से उत्पन्न हुए लाषव लिए ये गण छन्द के प्रमाण को देखकर बतलाये गये हैं॥ ८८॥ अनुवाद-इन्हीं त्रिकों से सम, अर्धसम, विषम जातियाँ उदभूत हुई है। वृत्त-लक्षण-वेत्ता विद्वानों ने इन्हें अस्वर और सस्वर भी कहा है ॥। ८९॥ १. क. (टि०) मकारो गुरुकत्रयम् । मकारः स्याद गुरुत्रयम्। २ क, गुरुमध्यस्तु रेफः स्यात्।

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२४८ नाटयशाहत्रे

गुर्वेकं गिति विज्ञयं तथा लघु लिति स्मृतम्। नियतः पदविच्छेदो यतिरित्यभिधीयते ॥ ९०॥ गुरु दीघं प्लुतञ्चैव संयोगपरमेव च। सानुस्वारविसर्ग च तथान्त्यञ्च लघु क्वचित् ॥। ९१ ।। 'गायत्यां द्वौ त्रिकौ ज्ञ यो उष्णिक चैकाधिकाक्षरा। अनुष्टुप् द्वचधिका चैव बृहत्यां च त्रिकास्त्रयः ॥। ९२ ।। एकाक्षराधिका पङ़िक्तस्त्रिष्टुप् च द्वयधिकाक्षरा। चतुस्त्रिका तु जगती सैवातिजगती पुनः ॥ ९३॥ शक्वरी व्ृयधिका पञ्च त्रिका ज्ञेयातिशक्वरी। एकाधिकाक्षराष्टिश्च वृयधिकात्यष्टिरुच्यते ॥ ९४ ॥

अनुवाद-एक गुरु वर्ण को 'ग्' और एक लधु को ल् समझना चाहिए। नियत स्थान पर किये गये पदविच्छेद को 'यति' कहा जाता है॥९० ॥

11 अनुवाद-दीर्घ, प्लुत, संयुक्ताक्षर के पूर्व का वर्ण, अनुसार एवं विसरगं से युक्त वर्ण और कभी-कभी पाद के अन्त का लघु वर्ण भी गुरु होता है ।। ९१॥ अनुवाद-गणों के प्रमाणानुसार गायत्री छन्द में दो त्रिक, उष्णिक् छन्द एकाक्षर अधिक दो त्रिक, अनुष्टुप् में दो अधिक दो त्रिक तथा बृहती में तोन त्रिक होते हैं ।। ९२ ॥ अनुवाद-पंक्ति छन्द में एकाक्षर अधिक तीन त्रिक, त्रिष्टुप् छन्द में दवधक्षर अधिक तीन त्रिक, जगती वृत्त में चार त्रिक और अतिजगती वृत्त में एकाक्षर अधिक चार त्रिक समझने चाहिए ॥ ९३॥ अनुवाव-शक्वरी छन्द में द्वयक्षर अधिक चार त्रिक, अतिशक्वरी में पाँच त्रिक, अष्टि वृत्त में एकाक्षराधिक पांच त्रिक और अत्यष्टि वृत्त में द्धक्षर अधिक पांच त्रिक होते हैं॥। ९४ ।।

१. क. गायत्रीप्रभृति त्वैषां प्रमाणं सम्प्रवतते। प्रयोगणानि पूर्वाणि प्रायशो न भबन्ति हि।।

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बतुदशोऽव्याय: २४९

षट्त्रिकास्तु धृतिः प्रोक्ता सैका चातिधृतिस्तथा। कृतिश्च दृयधिका प्रोक्ता प्रकृत्यां सप्त वे त्रिकाः ॥ ९५॥ आकृतिस्त्वधिकैकेन दवचधिका विकृतिस्तथा । ·अष्टत्रिकाः संकृतौ स्यात् सैका चाभिकृतिः पुनः । उत्कृतिद्वर्यंधिका चैव विज्ञेया गणमानतः ॥९६॥। गुर्वेकं ग इति प्रोक्तं गुरुणी गाविति स्मृतौ। लघ्वेकं ल इति ज्ञेयं लघुनो लाविति स्मृतौ ॥। ९७ ॥

एकादिकक्रमवशाद् द्विगुणाविपिण्ड्या। च्छन्द: प्रमाणकलितानथ पिण्डयेत्तान्। एकं क्षिपेत्तदुपरीति समस्तवृत्त- संख्याप्रकाशनविधौ लघुरभ्युपाय: ॥ अनुवाद-धृति छन्द छः त्रिकों वाला, अतिधुति छन्द एकाक्षर अधिक छः त्रिकों वाला, कृति छन्द दवधक्षर अधिक छःत्रिकों वाला तथा प्रकृति छन्द सात त्रिकों वाला होता है ।। ९५। अनुवाद-आकृति वृत्त में एकाक्षर अधिक सात त्रिक, विकृति वृत्त में द्वधिकाक्षर सात त्रिक, संकृति छन्द में आठ त्रिक और अभिकृति छन्द में एकाक्षराधिक आठ त्रिक होते हैं। उत्कृति छंद में दो अधिक त्रिक समझने चाहिए ॥ ९६ । अनुवाद-एक गुरु का चिह्न 'ग' (5) दो गुरु का गौ,' (55), एक लघु का चिह्न ल (1) तथा दो लघु का चिह्न 'लौ' (II) माना जाता है॥ ९७ ।। अभिनव-एक से लेकर छब्बोस अक्षर पर्यन्त छन्द क्रमशः द्विगुण पिण्ड बनाकर, फिर छन्दों के प्रमाण से कलित उन पिण्डों को जोड़ दे, फिर उसमें एक अङ्क और जोड़ दे, समस्त छन्दों के प्रकाशन को यह एकलघु उपाय है। १. क. षट्त्रिका घृतिरुददिष्टा ह्यतिपूर्वास्त्रिकाक्षरा। २. क. संकृत्यां तु त्रिका ह्यष्टो सैका स्वभिकृतिर्भवेत्। ना. था०-३२

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२५० नाटघशास्त्र

यथा त्र्यक्षरे1 तत्पिण्डयित्वा एकाक्षरक्षेपात (पूर्तिः) एकसंख्याकाक्षरावन्या- क्षरक्षेपः षडविशत्यक्षरं यावत् "दवयंश उक्तक्रमेणेह द्वगुण्यं यावदुत्कृतेः" इति एकाक्षरे द्वौ, द्वयक्षरे चत्वारः, त्र्यक्षरेऽष्टौ, चतुरक्षरे षोडशेत्यादिसंक्षेपः। अनेनैवोपायेन विचार्य ग्रन्थे पाठो निश्चेयः ॥ ९६॥ सर्वेषां छन्दसां वत्तानामित्यादावर्थः समासेन जयदेवोऽभ्यधात्-"सर्वादि- मध्यान्त ग्लौ त्रिकौ म्नौ भ्यौ ज्ौ स्तौ" इति (म. १-२) त्रिकैरुपलक्षितेऽपि वृत्त त्रिकसंख्यानेन यत्र छन्दो न पूयंते यथोष्णिक, अत्रैकमधिकमक्षरमधिकत्वेनोक्तं अनुष्टुभि द्वे। अत्र त्रिकबीजानि गुरुलघुरूपाण्येव कतव्यानि॥

जैसे सात अक्षर वाले उष्णिक छन्द में त्रिकों के जोड़ने के बाद एकाक्षर का क्षेपण करने पर छन्द को पूर्ति हो गई। इसो प्रकार अन्य एक अक्षर का और क्षेपण करे अर्थात् द्वयक्ष का क्षेपण करे। इसी प्रकार छब्बीस अक्षरों तक यही प्रक्रिया करनी चाहिए। जैसे कि छन्दों में पढ़े गये क्रमानुसार उत्कृति पर्यन्त छन्दों को संख्या दुगुनी कर देनो चाहिए। जैसे-एक अक्षर वाले छन्द के प्रस्तार में दो भेद, दो अक्षर वाले छन्द के प्रस्तार में उससे द्विगुणित चार भेद, तोन अक्षर बाले छन्दों के प्रस्तार में उससे द्विगुणित अर्थात् आठ भेद, चार अक्षर वाले छन्दों के प्रस्तार में उससे भी, दुगुना अर्थात् सोलह भेद होते हैं इत्यादि संक्षेप में कथित है। इसी उपाय से वचार करके ग्रन्थ में पाठ का निश्चय करना चाहिए। सर्वेषां छन्दसां वृत्तानामित्यादि' में जयदेव ने संक्षेप में जो कहा है कि सभी छन्दों में आदि, मध्य ार अन्त में गुरु एवं लघु के वने हुए त्रिक-जैसे भगण, नगण, भगण, य,, जगण, रगण, सगण और तगण-इन त्रिकों वृत्त (छन्द) के उपलक्षित हाने पर त्रिक में संख्यान के द्वारा छन्द को पूर्ति नहों होती, जैसे- उष्णिक् छन्द। यहाँ पर एक अक्षर अधिक का कथन है, अनुष्टुप् में दो अक्षर अधिक का कथन है। इसमें त्रिक बनाने के बोज रूप गुरु-लघु रूप अक्षर ही अधिक करने चाहिए।।

१. क. सप्ताक्षरे।

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चतुदशोध्याय: २५१

*संपद्विरामपादाश्च दैवतस्थानमक्षरम् । वर्णः स्वरो विधिवृं त्तमिति छन्दोगतो विधिः ॥। ६८ ।। नैवातिरिक्तं होनं वा यत्र संपद्यते क्रमः । "विधाने च्छन्दसामेष संपदित्यभिसंज्ञितः ॥९९॥

अत्रैकमधिकमिति। तथा चैकं गुरु लघु वा द्वे गुरुणी द्वे लघूनी द्वू लघुगुरुणो गुरुलघूनी बा तदाह द्विकौ गलावित्यादि वक्ष्यमाणश्लोकेन व्याचष्टे नैवातिरिक्त- मिति।

अनुवाद-अब इन छन्दों के सम्पदादि को कहते हैं-सम्पत्, विराम, पाद, दैवत, स्थान, अक्षर, वर्ण, स्वर, विधि और वृत्त ये छंदोगत विधि है । ९८ ॥ अभिनव-जैसा कि कहा है कि एक गुरु एक लघु (ग्लौ), दो गुरु तथा दो लधु (गौ लौ) अथवा लघु-गुरु (लगौ) गुरु लघु (गलौ)। इसलिए कहते हैं कि 'द्विकौ ग्लौ' इत्यादि वक्ष्यमाण श्लाक के अनुसार व्याख्या करते हैं- अनुवाद-जहाँ पर वर्णो की संख्या न अधिक हो, न कम। छंदोविधान में उसे 'सम्पत' कहते हैं ॥ ९९॥

१. क. द्वयक्षरादधिको पादावन्यो होनाक्षरावपि। स्वराडिति समाख्याता विराडिति हि सूरिभिः । पादौ यस्या ऋचश्चैव भवेदेकाघिकाक्षरः । समाहत्वन्ये त्रयः पादाः सा भूरुक सम्प्रकोर्तिता ।। एकाक्षरो नः पादश्चेदेको यस्या ऋचो भवेत्। समा पादस्त्रयश्चान्ये सा निवृत्सम्प्रकोतिताः ।। सम्पदाद्यधुना चैषा छन्दसा सम्यगुच्यते। २. क. वर्णः स्वरा विधिवृ त्तामिति। ३. क. (टि०) होन नैवातिरिक्तं च यत्तु स्यात्पादयोगतः । विधानं छन्दसामस्मिन् सा हि संपदुदाहृता।। ४. क. संपद्यतेऽक्षरम्। ५. क. (टि०) विविधा। ६. क. (टि०) संपदित्यभिधीयते।

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२५२ नाटपशास्त्रे

यथार्थस्य समाप्तिः स्पात् स विराम इति स्मृतः। 'पादश्च पद्यतेर्धातोश्चतुर्भाग' इति स्मृतः ॥ १०० ॥

सम्पदिति स्वराट् विराट भूरिक निचृत इत्येषां श्रुतावेव संभवो न काव्य इति तात्पर्यम्। एतन्निरूपणं तु उपयुज्यते यत्र वेदवाक्यसदृशं वाक्यं निर्णोयते, अभिज्ञानशाकुन्तले ॥। ९९॥

अभिनव-सम्पदिति-स्वराट, विराट, भूरिक्, निचृत ये छन्द वेद में ही सम्भव हैं काव्य में नहीं, यह तात्पर्य है। इसके निरूपण का वहीं उपयोग है जहाँ वेद-वाक्य के सदृश वाक्य का निर्णय करना होता है। जैसे-अभिज्ञान- शाकुन्तल के पञ्चम अङ्क में नेपथ्य-वचन ऋवा के समान प्रतोत हो रहा है।। ९९।। अनुवाद-जहाँ पर अर्थ की समाप्ति हो, वह विराम है। 'पाद' शब्द पद् धातु से बनता है, वह छन्द का चतुर्थ भाग कहलाता है॥ १०० ॥

१. क. (टि०) पादस्य । २. क. (टि०) गत्यर्थात्सम्प्रकीत्तितः । क, चतुर्भाग: प्रकीत्तितः। ३. क. स्वरादय: काव्येष्वपि दृश्यन्त इति जयश्रोकारः। यथा विराट्- शूरः सुमुखः सदयः शान्तो वीरस्त्यागो गुणवान् भक्तः । कुलजोऽस्माकं नित्यं मित्रं भवतु इ्लाध्यम् ।। यथा निवृत्- अम्भोदानमसितानां श्रृत्वा शब्दं सन्ततबहंः। अम्भोभारान् मन्दगतीनामुद्ग्रोवोऽपि रौति मयूरः ॥ स्वराट् यथा- अथ तत्र शुची लतागुहे कुसुमोद्गारिणि तौ निषीदतुः। मृदुभिमृं दुमारतेरितैरुपगूढ़ाविव बालपल्लवैः।। भूरिक् यथा- मनोज्ञमपि सिन्दुरवारतः कुन्दकुसुमाग्रयं च षट्पदः।

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पतुदशोऽष्याय: २५१

अर्थस्यावान्तररूपस्य समाप्तिर्लंक्षणतो यतिः । "यथा मीलति सति राज्ि" यथा "आयान्त्या तुल्यकालं" इति न तु "2जम्भारातीभकुम्भोद्भवं" इति उच्छब्दोऽथंसमाप्त्यभावात्। चतुर्भाग इति पादान्ते छेदः कर्तव्यः, न तु " 'ताम्बूल- वल्लीपरिणद्पूगासु, ऐला" इति । प्रयोगा प्रतिपादमङ्कुरीकृत्य पठन्मध्ये विश्राम्यति। विश्रान्तौ चात्र वृत्तभङ्गोऽर्थभ ङ्गोडभिनेयस्याश्रव्यत्वाद्भट्टशङ्गूराविभि- रुपगमेतत् "क्वचिदुपान्त्यो वा" इति॥१०० ॥ अभिनव-अवान्तर रूप अर्थ को लक्षणतः जहाँ समाप्ति हो, उसे 'यति' (विराम) कहते हैं। जैसे-'मोलति सति राजि' में और जैसे 'आयान्त्या तुल्यकालम्' में यति है। 'जम्भारातीभकुम्भोद्ूवमिव दधतः सान्द्रसिन्दूररेणु- रक्ता सिक्ता इवोघैरुदयगिरितटीधातुधाराद्रवस्य।। आयान्त्या तुल्यकालं कमलवनरुचेवारुणा वो विभूत्यै- भूषासुर्भासयन्तो भुवनमभिनवा भानवो भानवीयम्॥ यहाँ पर जम्भारातीभकुम्भो पर यति होती है किन्तु अवान्तर अर्थ की समाप्ति नहीं है। अर्थ की समाप्ति तो 'कुम्भोदद्गव' पर होती है। अर्थ समाप्ति न होने के कारण वह उच्छन्द है। 'चतुर्थ भाग' अर्थात् छन्द का चतुर्भाग करना आवश्यक है और उसमें भी पाद की समाप्ति होनो चाहिए। किन्तु 'ताम्बूलवल्ली परिणद्धपूगासु, ऐला' में जैसा पदच्छेद किया है वैसा नहीं होना चाहिए, क्योंकि 'पूगासु ऐला' पर विश्रान्ति करने पर छन्दोभङ्ग, अर्थभङ्ग और अभिनेय का अश्रव्यत्व दोष हैं। इस तथ्य को भट्टशंकर आदि आचार्यों ने भी स्वीकार किया है ॥ १०० ॥ १. गायत्रीप्रभृतिजगतोपर्यन्तानां दैवतानि-अग्निः सविता सोमो वृहस्पतिर्मित्रावरुणो शक्रो विश्वदेवाः । २ क. जम्भारातीभकुम्भोद्गवमिव दघतः सान्द्रसिन्दूररेणु- रक्ता सिक्ता इवौघैरुदयिगिरितटोघातुघाराद्रवस्य । आयान्त्या तुल्यकाल कमलवनरुचेवारुणा वो विभूत्य भूयासुर्भासयन्तो भुबनमभिनवा भानवो भानवीयाः ।

तमालपत्रास्तरणासु रन्तुं प्रसीद शश्वन्मलयस्थलीषु ॥। (रघुवंश ६।६४)

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२५४ नाटयशास्त्र

अन्यादिदैवतं प्रोक्तं स्थानं द्विविधमुच्यते। शरीराश्रयसंभूतं *दिगाश्रयमथापि च॥ १०१॥ शारोरं मन्त्रसंभूतं छन्दो गायत्र संज्ञितम् । क्रृष्टे मध्यं दिनं प्रोक्तं त्रैष्टुभं परिकोर्त्यंते॥ १०२ ॥ अधिष्ठात्री देवता वह्नचादयः। शरीराश्रयेत्यादि। तथोक्तं कात्यायनेन- वीरस्य भुजदण्डानां वर्णने स्रग्धरा भवेत्। नायिकावरणने कार्यं वसन्ततिलकादिकम्॥ शादू ललीला प्राच्येषु मन्दाक्रान्ता च दक्षिणे। इत्यादि। प्लुस्याप्यत्र प्रयोगो भवत्येव । यथा-"यतोऽभिमानेन स एष मूढो द्रोणा- रिरे याति पदे विलग्नः" स तु पाठो दीर्घवत्पठितव्यः प्रयोक्त्रा त्रिमात्र एव। अनुवाद-अग्नि आदि इनके देवता हैं और इनके आश्रय स्थान दो हैं-शरोर के आश्रय से सम्भूत और दिशाओं के आश्रय से सम्भूत ॥ १०१॥ किअभिनव-अग्नि, सविता, सोम, बृहस्पति मित्रावरुण, इन्द्र एवं विश्वदेव इन गणों अथवा छन्दों के अधिष्ठातृ देव हैं। जैसाकि कात्यायन ने कहा है- "वोर पुरुषों के भुजदण्डों के वर्णन में स्रग्धरा छन्द का प्रयोग होना चाहिए और नायिका के वर्णन में वसन्ततिलका आदि छन्दों का प्रयोग करना चाहिए। प्राच्य प्रदेशों में शादूलविक्रोडित छन्द का और दक्षिण देश में मन्दाक्रान्ता छन्द का प्रयोग करना चाहिए" इत्यादि। यहाँ पर प्लुत का प्रयोग होता ही है। जैसे- 'यतोऽभिमानेन स एष मूढ़ो द्रोणारिरे याति पदे विलग्नः। यहाँ पर 'ए सम्बोधन प्लुत है। अतः प्रयोक्ताओं को इसे दीर्घ के समान पढ़ना चाहिये, किन्तु यह त्रिमात्र प्लुत हो है। अनुवाद-मन्त्र से सम्भूत गायत्री नामक छन्द शरीर का अवयव है (छन्दः पादी तु)। क्रृष्ट अर्थात उच्च स्वर में दोपहर में गाया जाने वाला छन्द त्रिष्टुप् कहलाता है॥ १०२।। १. क. देवा ह्यग्नादयः प्रोक्ताः । २. क. (टि०) ऋक्सामाश्रयमेव च। जिह्वाश्रयमथापि च। ३. ख ग. सार्द्धश्लोकी नास्ति।

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२५५

तृतीयसवनश्चापि शोर्षण्यं जागृतं हि यत्।कड 'हस्वं दोघं प्लुतञ्चव त्रिविधञ्चाक्षरं स्मृतम्॥ १०३॥ श्वेतादयस्तथा सर्वा विज्ञेयाश्छन्दसामिह । तारश्चव हि मन्द्रश्च 'मध्यमस्त्रिविधः स्वरः ॥ १०४॥। ध्रुवाविधाने चैवास्य" संप्रवक्ष्यामि लक्षणम्। *विधिर्गणकृतश्चैव तथैवार्थकृतो भवेत्।।१०५।।

श्वेतादय इति छन्दसि प्रतशाख्यादौ विविधो वर्णः कृतः तदनुप्रयोगान्ना- स्माभिलिखितम्। भगवते कृत इति श्लोके केषाञ्चिद्दोधकतोटकादोनां गीयमानतया शोभातिशयो भवति। स्रग्धरादीनां तु पाटेन।

अनुवाद-तृतोय सवन की बेला में उच्चारण किये जाने वाला जगती छन्द शोषंण्य है। ह्रस्व, दोर्घ, प्लुत ये तीन प्रकार के अक्षर (स्वर) होते हैं ॥ १०३ ॥

अनुवाद-यहाँ छन्दों के श्वेत आदि वर्ण समझने चाहिए। इस प्रकार तार, मन्द्र और मध्य तीन प्रकार के स्वर हैं॥ १०४॥ अभिनव-छन्दःशास्त्र तथा प्रातिशारूप आदि ग्रन्थों में उनके (छन्दों में) विविध वर्ण बताये गये हैं। उनका उपयोग न होने के कारण मैंने यहाँ उल्लेख नहीं किया है। 'भगवते कृतः' इत्यादि श्लोक में दोधक एवं तोटक छन्दों में गाने से शोभातिशय होता है। स्रग्धरा आदि छन्दों के पाठ (पढ़ने) से सौन्दर्य होता है॥ १०४॥। अनुवाद-ध्रुवा विधान में मैं इनका लक्षण कहूँगा विधि दो प्रकार की होती है-गणकृत और अर्थकृत ॥ १०५ ॥

१. क. म. प्लुतं दीघ च ह्रस्तं च। २. क-म. द्यक्षरं स्मृतम्। ३. क. गायत्रोप्रभृतिजगतोपरयन्तानां छन्दसां सितसारङ्गपिशङ्गकृष्णनीललोहितगौरा वर्णाः। ४. क. (टि०) मध्यश्च त्रिविष: स्वरः। क-भ द्विविध: स्वर उच्यते। ५. क-म. चैतेषां। ६. क-म. विधिर्कालकृतश्चापि तथा चैवार्थतो भवेत्।

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नाटघशाए्त्र

वृत्तमर्धसमं चैव समं विषममेव च "छन्दसो यस्य पादे स्याद्धोनं वाऽधिकमेव वा। अक्षरं निचृदिति प्रोक्तं भूरिक् चेति द्विजोत्तमा ॥ १०६ ॥ अक्षराभ्यां सदा द्वाभ्यामधिक होनमेव वा। तच्छन्दो नामतो ज्ञयं स्वराडिति विराडपि॥ १०७॥

अनुवाद-वृत्त तीन प्रकार के होते हैं-सम, अधंसम और विषम ॥१०६॥ अनुवाद-जिस छन्द के एक अक्षर हीन (कम हो) वह निचृत छन्द और एक अक्षर अधिक होने पर 'भूरिक़्' छन्द कहलाता है ॥ १०६॥ विशेष आचार्य पिङ्गल के अनुसार जिम छन्द में निर्धारित सख्या से एक अक्षर कम हो 'निच्त्' छन्द और एक अक्षर अधिक हो तो 'भूरिक़' छन्द कहलाते हैं। जैसे-गायत्री छन्द में २४ अक्षर होते हैं। यदि इसमें एक अक्षर कम अर्यात् २३ अक्षर हो तो 'निचुत्' गायत्री कहलाती है। इसी प्रकार एक अक्षर अधिक अर्थात् २५ अक्षर हों तो 'भूरिक्' गायत्री कहलाती है॥ १०६॥ अनुवाद-जिस छन्द में दो अक्षर न्यून हों तो उसे 'विराट्' तथा वो अक्षर अधिक हों तो वह 'स्वराष्ट्र' छन्द कहलाता है॥ १०७॥

विशेष-भाव यह कि जिस छन्द में निर्धारित संख्या से दो अक्षर कम हो तु 'विराट' छन्द और दो अक्षर अधिक हो तो 'स्वराट्' छन्द कहलाते है। जैसे गायत्री छन्द २४ अक्षरों का होता है। यदि गायत्री में दो अक्षर कम अर्थात् २२ अक्षर हों तो 'विराट्' गायत्री और दो अक्षर अधिक अर्थात् २६ अभर हो तो 'स्वराष्ट्र' गायत्री हाती है। इसो प्रकार अन्य छन्दों में भी समझना चाहिए॥ १०७॥

१. क. विषमं सममेव वा। 5. क. छन्दसो यस्य पादे स्याद्वीनं वाघिकमेव। अक्षरं तन्निवृत् प्रोक्तं भूरिक् चेति द्विजातिभि:॥ ३. क. स्वराड्थ विराड़पि।

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२५७

सर्वेषामेव वृत्तानां तज्ज्ैज्ञैया गणास्त्रयः। दिव्यो दिव्येतरश्चैव दिव्यमानुष एव च॥ १०८।। गायत्रयुष्णिगनुष्टप् च बृहती पडिक्तरेव च। त्रिष्टुप् च जगती चैव दिव्योऽयं प्रथमो गणः । १०९ ॥। तथातिजगती चैव शक्वरी चातिशक्वरी। अष्टिरत्यष्टिरपि च धृतिश्चातिधृतिर्गणः ॥ ११०॥।

च शब्देन प्रकारार्थेन व्याचष्टे दिव्य इति। प्रथम इति स्तोत्रशास्त्रेषु सप्तानामेव छन्दसां बाहुल्येन दर्शनात। देवस्तुत्यादौ देवेषु वक्तृष्वयं गण इत्यर्थः । गण इति द्वितीयो दिव्यानिवृत्तौ गण इत्यर्थ:। तेन मानुषेषु वक्तव्ये प्रायेण। तृतीयस्तु दिव्यमानुषेषु च रामादिषु नरपतिषु च ॥। १०८-१०९॥ अभिनव-प्रकारार्थ 'च' शब्द से कहते हैं-दिव्येति- अनुवाद-विद्वानों को सभी वृत्तों के तीन गण (त्रिक) मानना चाहिए। वृत्तों के तीन गण होते हैं-दिव्य, दिव्येतर और दिव्यमानुष॥ १०८ ॥ अनुवाद-गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप्, वहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् और जगती ये सात छन्द दिव्य वर्ग में आते हैं। यह प्रथम गण हैं।। १०९॥ अभिनव-स्तोत्र शास्त्र में इन सात छन्दों का प्रयोग अधिकतर देखा जाता है। देवताओं को स्तुति आदि में या देवताओं के वक्तृत्व में यह गण होता है। 'गणः' पद का अभिप्राय प्रतीत होता है-दिव्यों को निबृत्ति बतलाने के लिए द्वितीय गण कहा है। जब मानुष वक्ता हो तो उस समय यही गण प्रायः होता है जौर दिव्य मानुष रामादि तथा राजा में तृतीय गण प्रयुक्त होता है। अनुवाद-और अतिजगती, शक्वरी अतिशक्वरी अष्टि, अत्यष्टि, धृति, अतिधृति-ये सात छन्द दिव्येतर द्वितीय गण के अन्तगत आते है॥ ११०॥ १. क. (टि०) मानुषश्चातिजगती शक्वरी चातिशक्वरी। ना० शा०-३३

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२५८ नाट्यशास्त्रे

कृतिश्च प्रकृतिश्चैव ह्याकृतिर्विकृतिस्तथा। संकृत्यभिकृती चैव उत्कृतिर्दिव्यमानुषा ॥ १११॥ एतेषां छन्दसां भूयः प्रस्तारविधिसंश्रयम् । लक्षणं सम्प्रवक्ष्यामि नष्टमुद्दिष्टमेव२ च ॥ ११२॥ प्रस्तारोऽक्षरनिर्दिष्टो मात्रोक्तश्च' तर्थव हि। द्विकौ ग्लाविति वर्णोक्तौ मिश्रौ चेत्यपि मात्रिकौ ॥ ११३॥ प्रस्तारस्तत्र संख्यादि स्वमिति संश्रयशब्देनाह, तद्गुणसंविज्ञानाच्च प्रस्तारो- डप्युच्यते। प्रस्तरणं विताननं लक्षणमङ्कसं्येत्यर्थः । नष्टमिति स्वरूपेणैव न ज्ञातं संख्यया तु ज्ञातम्, उदिदष्टं तु स्वरूपेण ज्ञातं न संख्यया। तज्ज्ञानोपायेन नष्टादयः सिद्धाः४ । अनुवाद-दिव्य-मानुष तृतीय गण के अन्तर्गत कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति, संकृति, अभिकृति और उत्कृति ये सात छन्द होते हैं।। १११ ।। अनुवाद-अब मैं इन छन्दों के प्रस्तार-विधि का अनुसरण करते हुए नष्ट और उद्दिष्ट के लक्षणों का वर्णन करूँगा ॥ ११२। अभिनव-प्रस्तार में वृत्तों की संख्या, गुरु, लघु आदि सभी कुछ आते हैं, यह संश्रय शब्द से कहते हैं। 'प्रस्तारविधि संश्रयम्' में तद्गुण संविज्ञान बहुब्रीहि समास होने से इसे प्रस्तार भी कहते हैं। प्रस्तार का अर्थ है प्रस्तरण, वितानन, फैलाव और लक्षण का अर्थ है अङ्कसंख्या । 'नष्ट' पद का अर्थ है जो स्वरूप से ज्ञात न हो, संख्या से ज्ञात हो और उद्दिष्ट का अर्थ है जो स्वरूप से जान लिया जाय किन्तु संख्या से ज्ञात न हो सके। उसके ज्ञान के उपाय से (जानने से) नष्ट, उद्दिष्ट सिद्ध हैं ॥ ११२ । अनुवाद-प्रस्तार दो प्रकार का होता है-अक्षरनिर्दिष्ट अर्थात् व्णिक छंद प्रस्तार और दूसरा मात्रोक्त अर्थात् मात्रिक प्रस्तार। इनमें जो द्वित्व संख्या के परिमाण वाले गुरु-लघु और मिश्रीभृत हैं वे व्णिक् भी हैं और मात्रिक भी हैं ॥ ११३ ॥ १. क, एवं तु छन्दसामेषां। २. क. (टि०) नष्टोहिष्टं तथव च। ३. क. (टि०) समानोक्तं तथैव च। समाः प्रोक्तास्तथैव थ। समात्रोक्तस्तरथैव च । ४. क. सिद्वाः । क-ख. बग्दाः।

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बतुर दशोऽ्याय: २५९

गुरोरधस्तादाद्यस्य प्रसारे लघु विन्यसेत्। अग्रतस्तु समादेया गुरवः पृष्ठतस्तथा ॥ ११४॥ प्रथमं गुरुभिवंर्णैलंघुभिस्त्ववसानजम् । वृत्तन्तु सर्वछन्दस्सु प्रस्तारविधिरेव तु ॥ ११५ ॥ तत्र वर्णगतो मात्रागतश्चेति प्रस्तारो द्विधा, तमुदाहरति। द्विकौ ग्लाविति वर्णसंख्यादिनियमेन यौ गुरु-लघू। द्विकौ संख्यापरिमाणौ तौ मात्रिकौ मात्रागणेषूक्तौ। अन्येनाधिकृतत्वादेकेन भेदेन मिश्रौ भवतः ॥ ११३ ॥ अभिनव-इस प्रकार वर्णगत (वर्णिक) और मात्रागत (मात्रिक) भेद से दो प्रकार का प्रस्तार होता है, उसका उदाहरण प्रस्तुत करते हैं-द्विकौ ग्लौ इत्यादि। वर्गो की संख्या आदि के नियम से जो द्वित्व संख्या के परिमाण वाले गुरु और लघु हैं, वे ही मात्रिक है। एक दूसरा एक दूसरे से अधिकृत होने के कारण एक भेद से वे मिश्र हो जाते हैं॥ ११३ ॥ विशेष-प्रस्तार का विवेचन करते हुए आचार्य कहते हैं कि एकाक्षर प्रस्तार में गुरु का उल्लेष्व करे, फिर उसके नीचे लघु लिखे। जैसे- गुरु 8 लघु। आचार्य ने 'द्विको' का अर्थ 'द्े आवृती प्रमाणमयोरिति' अर्थात् दो आवृत्ति प्रमाण है जिसका, वह द्विक है। दो अक्षर के प्रस्तार से प्रथम दो गुरु स्थापित करे (S5), फिर लघु गुरु का बिन्यास करे (15) तदनन्तर गुरु-लधु का विन्यास करे। (5।) फिर अन्त में दो लघु लिखे (11) इस प्रकार चार भेद होते हैं। यह दो अक्षर का प्रस्तार है। (गौ, रगो, फलो, लो) जंसे sS -गौ I5 -ल्गौ 5I- ग्लो ।। - लौ १. क. इतः प्रारभ्य क्लोकदवयं नास्ति 'च भ' योरिति। २. क. (टि०) छन्दस्य ।

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नाटधशास्त्रे

गुर्वधस्ताल्लघुं न्यस्य तथा द्विद्वि यथोदितम्। न्यस्येन् प्रस्तारमार्गोऽयमक्षरोक्तस्तु नित्यशः ॥ ११६॥ मात्रासंख्याविनिर्दिष्टौ गणौ मात्राविकल्पितः । मिश्रौ ग्लाविति विज्ञेयौ पृथक् लक्ष्यविभागतः॥ ११७॥। मात्रागणो गुरुशचैव लघुनी चंव लक्षिते। आर्याणां तु चतुर्मात्राप्रस्तारः परिकल्पितः ॥ ११८॥ अत्र प्रस्तारेऽप्युपायमाह-गुर्वधस्तादिति। आद्यस्यैव गुरोरधो लघुः सर्वो न्यसनीयः । यत्र द्वौ भागौ मिश्रौ विषमसंख्यायां तदा द्विरिति भूयो भूयः। अनुवाद-प्रस्तार के समय आद्य गुरु के नीचे लधु का विन्यास करे, फिर उसके आगे गुरु रखे (ISS), इसी प्रकार आगे द्वितीय प्रस्तार में आदि गुरु के नोचे लघु रखें और उसके आगे-पीछे गुरु रखे (5 ।5), इस प्रकार प्रथम भेद सर्व गुरु (S55) और अन्तिम भेद सर्वं लघु (।।।)। सभी छन्दों में यही प्रस्तार विधि है॥ ११४-११५।। अनुवाद-गुरु वर्ण के नीचे लघु वर्ण रखकर दो दो वर्णों का विन्यास करे। यह प्रस्तार मा्ग अक्षर निर्दिष्ट प्रस्तार का भेद है ॥ ११६॥ अभिनव-यहाँ प्रस्तार के विषय में उपाय को कहते हैं-पाद में आदि गुरु के नीचे सर्वत्र लघु का न्यास करना चाहिए। जहाँ विषम संख्या में दो भाग मिले हुए हों, वहाँ दो लघुओं का विन्यास करे। अनुवाद-मात्रिक छन्दों में मात्राओं को संख्या के अनुसार गण का निर्देश होता है। अतः इनमें मात्राओं को कल्पना करके अलग-अलग लक्ष्यों के विभाग के अनुसार 'ग्लौ मिश्रौ' का प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि मात्रा गण एक गुरु या वो लघु से लक्षित होता है॥। ११७-११८।।

१. क. (टि०) लक्ष्यविभागशः। २. क-भ. मात्रे द्वे गुरु विज्ञयं लध्वेका त प्रकोर्तिता । ३. क. (टि०) लघुनीति च । ४. क. लक्षितः । क-प. बिलक्षितैः । ५. क आर्याणां स चतर्मात्रे प्रस्तारे परिकल्पितः । म. आर्याणां स चतुर्मात्रः प्रस्तारे गण इष्यते।

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चतुर्दशोऽच्याय: २६१

मात्राप्रस्तारो निरूप्यते। मात्रापरिकल्पितो यस्त्रिमात्रचतुर्मात्रादि: समूहो गणमात्रसंख्याया लध्वक्षरसंख्याया: तत्र प्रथम प्रस्तार इत्याह पृथग्लक्षणीयोऽपि भागोऽत्र संख्यायास्तत्र गुरुः सर्वतो न्यसनीयः । यत्र तु द्वौ भागौ मिशौं, विषम- संख्यायां तत्राद्यो लघुरन्यो गुरुः शेषं वर्णप्रस्तारेण तुल्यम्। केवलं मात्रासंख्येति वचनाद् गणन्यासे पूर्वत्र मात्रा देया। यत्र वर्णप्रस्तार: तत्र विषयप्रस्तारेऽपि मात्रे- त्युदाहृता एव ॥। ११७ । द्वितीयस्तु तदाह गुरुरिति जातावेकवचनं गुरु इत्यर्थः । लघुनी चकाराद गुरु, तथा शब्दादन्यद्गेदत्रयम् ॥ ११८ । अभिनव-अब मात्रा प्रस्तार का निरूपन करते हैं-मात्राओं के द्वारा परिकल्पित जो त्रिमात्रिक तथा चतुर्मात्रिक गणों का समूह है वहाँ लघु अक्षर की संख्या की अपेक्षा से प्रथम प्रस्तार है और जहाँ संख्या के भाग का पृथक् विन्यास करना है वहाँ सर्वप्रथम गुरु का विन्यास करे, जहाँ पर दो भाग मिश्रित हो, विषम संख्या में प्रथम लघु और अन्य गुरु शेष वर्ण प्रस्तार के अनुसार रखना चाहिए। केवल यात्रा संख्या कहने से गणों के न्यास में पहले मात्रा को देना चाहिए। जहाँ पर वर्ण प्रस्तार है वहाँ मात्रा प्रस्तार में भी मात्रा देनो चाहिए यह बता दिया गया है॥ ११७ ॥ अभिनव-यहाँ 'गुरु' में जाति में एकवचन है। अतः इसका अर्थ हुआ दो गुरु और लघुनी का अर्थ है दो लघु। चकार से दो गुरु का ग्रहण है। तथा शब्द से अन्य तोन भेदों का ग्रहण होता है॥ ११८ ॥ विशेष-त्र्यक्षर प्रस्तार में प्रथम सर्वगुरु को रखना चाहिए (5ss), फिर आदि गुरु के स्थान पर लघु अक्षर विभ्यस्त करे (।S5) यह द्वितोय भेद है। फिर मध्य गुरु के स्थान पर लघु अक्षर रखे (5।S) यह तृतीय भेद हुआ। पुनः आदि गुरु के स्थान पर लघु विन्यस्त करे (।।5) यह चतुर्थ भेद हुआ। तदनन्तर अन्तिम गुरु के स्थान पर लघु वर्ण रखे और लघु के स्थान पर गुरु रखे (55।)। यह पञ्चम भेद हुआ, तदनन्तर आदि गुरु

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नाटयशास्त्र

गोतकप्रभृतीनान्तु वैतालीयं पञ्चमात्रो गणः' स्मृतः । पुरस्कृत्य षण्मात्राद्यास्तथैव च ॥ ११९॥

चतुर्मात्रा आर्याणां प्रस्तारे गणभेदः पञ्चदश इत्यर्थः। पञ्चमात्रोऽष्टधा, एवं षष्टोऽत्र प्रस्तार्यातीत इति वर्णवृत्तेष्वेव च कृत इत्यर्थः । अन्यत्र तु मात्राकृतो गणविभाग: तदपेक्षया गुरुलघुव्यवस्थानान्न स्वातन्त्रयेण।। ११८-११९।।

के स्थान पर लघु वणं विन्यस्त करे (।S।)। यह षष्ठ भेद हुआ। फिर मध्य गुरु के स्थान पर लधु रखे और आदि में गुरु रखे (5।।) यह सप्तम भेद है और अन्त में सर्व लघु विन्यस्त करे (।।।)। इस प्रकार यह प्रस्तार हुआ। जैसे-

प्रथम भेद -- SSS मगण द्वितीय भेद -ISS यगण तृतोय भेद -SIS रगण चतुर्थ भेद - ।।S सगण पञ्चम भेद - SS। तगण षठ्ठ भेद -I5। जगण सप्तम भेद -5।। भगण अष्टम धेद-।।। नगण

वृत्तरत्नाकरे यथा -

यदि सर्वगुरावाद्याल्लघुं न्यस्य गुरोरधः । यथोपरि तथा शेषं भूय: कुर्यादमुं विधिम् ।। ऊने दद्याद् गुरूनेवं यावत्सर्व लघुर्भवेत्। प्रस्तारोऽयं समाख्यातश्छन्दोविचितिवेबिभिः ।।

अनुवाद-आर्या नामक वृत्त में चार मात्राओं का प्रस्तार होता है। तथा गोतक आदि में पांच मात्राओं का प्रस्तार होता है और वैतालीय आदि छन्दों में छः मात्राओं का प्रस्तार होता है॥ ११८-११९।

१. क. पञ्चमात्रस्तथेष्यते। २. यं पुरस्कृत्य षण्मात्राः स्युस्तथैव च त्र्यक्षराः । उक्ताद्यास्तु त्रिका ज्ञेया गुरुल्वक्षराश्रया।। इति 'ग' पुस्तके दृश्यते।

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बतुदशोउध्याय: २६३

'तर्यक्षरास्तु त्रिका ज्ञैया लघुगुर्वक्षरान्विताः । मात्रागणविभागस्तु गुरुलध्वक्षराश्रयः ॥ १२०॥ अन्त्याद् द्विगुणिताद्रपाद् द्विद्विरेकं गुरोर्भवेत्। द्विगुणञ्च लघो: कृत्वा संख्यां पिण्डेन योजयेत्2 ॥१२१ ॥ तत्रोद्दिष्टमाह द्विगुणितादिति वर्णवृत्तेष्वेव चेदं सर्वं मन्तव्यम्। (कमप) भेदं पश्य; एकमङ्कं द्विगुणितं च वत्वा द्विद्विरिति भूयो द्विगुणितम् कृत्वान्त्यं परिसमाप्य गुरुसंबन्धिनोऽड्ञान् हरेत पुंसयेत। लघो: रबन्धिनोऽङ्कान पिण्डीकृत्य? तेन पिण्डेनातिक्रान्तेनैतावानयं भेद इति संख्यां निर्दिशेत, यथा चतुरक्षरस्येदृशीं क्रियां कृत्वा भेदं वदेत् यत्र लध्वङ्कगणनातिक्रान्ता ॥ १२१ ॥ अभिनव-आर्या नामक छन्द के प्रस्तार में चतुर्मात्रिक गण होता है, इसके १५ भेद हैं। पञ्च मात्रा के गणों में आठ भेद होते हैं। इस प्रकार छः मात्रा के गणों में प्रस्तार-भेद नहीं होता, किन्तु यह प्रस्तार भेद व्णिक छन्दों में होता है। अन्यत्र तो मात्राकृत गणों का विभाग होता है और उसकी अपेक्षा से गुरु-लघु की व्यवस्था होने से स्वतन्त्र रूप से नहीं होता। अनुवाद-गुरु-लघु अक्षरों के आश्रित तीन अक्षरों के वर्ग को त्रिक समझना चाहिए और मात्रागण भी गुरु-लघु अक्षरों के आधार पर होता है अर्थात् गुरु- लघु के आधार पर मात्रिक छन्दों का गण विभाग होता है॥ १२०॥ अनुवाद-संख्या को द्विगुणित करे, फिर द्विगुणित करने के बाद उस संख्या के अन्तिम द्विगुणित रूप वाले गुरु से एक निकाल दे, फिर लघुस्थ द्विगुणित संख्या को पिण्ड के रूप में जोड़ वे ॥ १२१ ॥ अभिनव-अब उद्दिष्ट का निरूपण करते हैं-वर्णवृत्तों में ही इन सब को मानना चाहिए। किसी एक भेद को देखिये। एक अङ्क को द्विगुणित करके रखे, फिर दुगुने से भी दुगुना करके अन्तिम अङ्क पर समाप्त करके गुरु सम्बन्धी अङ्कों को हटा दे, फिर लघु सम्बन्धी अङ्कों को पिण्ड बनाकर, उस पिण्ड से अतिक्रान्त (अतिक्रमण) करके यह अमुक संख्या वाला भेद है, ऐसा निर्देश करे। जैसे चार अक्षरों के उद्दिष्ट में इस प्रकार की क्रिया करके भेद को कहे। जहाँ लघु अक्षरों के अड्कों की गणना अतिकान्त कर जाती है॥ १२१ ॥ १. ग उक्ताद्यास्तु । २. क. (टि०) आद्यात्। ३. क. गुवुर्भवेत्।

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नाट्यशास्त्र

आद्यं सर्वगुरु ज्ञेयं वृत्तन्तु समसंज्ञितम्। `कोशं तु सर्वलध्ष्वन्त्यं मिश्ररूपाणि सर्वतः ॥१२२॥ वृत्तानान्तु समानानां संख्यां संयोज्य तावतोम्। राश्यूनामर्धविषमां समासादभिनिर्दिशेत् ॥१२३॥

अथैकादिलघुज्ञानार्थ पोठं रचर्यात आद्यं सर्वगुर्वित्यादि। कोश इत्याद्यन्तयोर्मध्यगो भेदगणः । सोऽस्य लघोः संख्यया निश्चयः कुर्यात। तद्यथा चतुरक्षरौ प्रथमान्तौ सर्वगुरु: सर्वलघुश्च, एकद्वित्रिलघवस्तु चतुःषट् चतुःप्रकारा: संक्षपत इतिा तदडू व्यामिथ णेन संस्या लग्यते षोडशभेदा- इचतुरक्षरस्येति॥ १२२ ॥

अभिनव-अब एकादि लघु के समझने के लिए पृष्ठभूमि की रचना करते हैं- अनुवाद-सम संज्ञक वृत्त के आदि पाद को सर्व गुरु समझना चाहिए और मन्तिम पाद में सर्वलधु समझना चाहिए तथा बीच के पादों में मिश्ररूप में होने चाहिए॥ १२२। अभिनव-'कोश' पद का अर्थ है प्रथम और अन्त के बोच का गण। वह कौन भेद है ! यह लघुओं की संख्या से निश्चय करे। जैसे, चार अक्षरों के पाद वाले छन्द में प्रथम पाद में सभो अक्षर गुरु होते हैं और अन्तिम षाद के सभी अक्षर लघु है। बीच का कोई पाद एक लघु का कोई दो लघु का और कोई तीन लघु का होता है। इस प्रकार एक लघु के चार भेद, दो लघु के छः भेद और तीन लघु के चार भेद होते हैं। इन अङ्कों के मिला देने से यह संख्या ज्ञात होतो है कि चतुरक्षर वृत्त के सोलह भेद होते हैं॥ १२२ ॥ अनुवाद-समान संख्या वाले वृत्तों को संख्या को उतने प्रकार से जोड़ दे। इसी प्रकार समान जोड़ो हुई संख्या में अद्धविषम संख्या वाले छन्दों मे एक राशि घटाकर निर्देश करे॥ १२३॥

६. क. निर्दिशेन। १ क ख. ग. कोशे तु सर्वलध्वन्त निश्रः शेषाणि सर्वतः । क-भ. लध्वन्तमपि चैवं तु कोशस्थस्य हि संख्यया । २. ग. पुस्तके श्लोकोडयं नास्ति। ३. ए. समासाबिति निर्दिशेत्।

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चतुदशोड्याया २६५

एकादिकां तथा संख्यां छन्दसो विनिवेश्य तु। यावत् पूर्वन्तु पूर्वेण पूरयेदुत्तरं गणम् ॥ १२४॥ समानां विषमाणां च संगुणय्य तथा 'स्फुटम्। राश्यूनामभिजानीया द्विषमाणां समासतः ॥ १२५ ॥

संख्यास्थान उपायान्तरमाह एकाविकामिति। छन्दोऽक्षरोपरि एकद्विचत्वारीत्यदीनि निक्षिपेत्। तत्र पूर्वेणोत्तरस्य मिश्रणं कुर्यात् यावत्पर्यन्तं गणपिण्डस्तां चैकादिकामेकेन मिश्रितं कुर्यादित्येवं समवृत्तानां संख्या। लधनामित्थं षोडशभिर्गणयेत। ततो गुणराशेः षोडशसंख्या- मवपातयेत्। तेन चतुरक्षरे विशत्यधिकं शतमर्धसमवृत्तानां तामपि संख्यां गुणयित्वा गुणराशि पातयेत्। तेन च सहस्राणीति शतान्यशीतिश्चेति चतुरक्षरे विषमवृत्तानि ॥ १२४-१२६ ॥ अभिनव-संख्या के ज्ञान के लिए उपायान्तर को बतलाते हैं-एकादिका- मिति। अनुवाद-छन्द को एकादिक संख्या का क्रमशः निवेश करके जब तक पूरा न हो जाय तब तक पूर्व पूर्व गण से उत्तर-उत्तर गण की पूति करे॥ १२४ ॥ अनुवाद-इस प्रकार सम और विषम मात्राओं की संख्या को स्फुट रूप से गुणन करके समास करने के बाद विषम छन्दो की राशि को घटा दे तब राशि संख्या ज्ञात हो जायगी॥। १२५ ॥ अभिनव-छन्द के अक्षरों के ऊपर एक, दो, चार इत्यादि क्रम से लिखे। उनमें पूर्व से उत्तर का मिश्रण करे, जहाँ तक गण पिण्ड है वहाँ तक एक से मिश्रित करे। इस प्रकार सम वृत्तों की संख्या होती है। लघुओं को इस प्रकार सोलह से गुणा करे। फिर गुणित राशि से सोलह धटा दे। उससे चार अक्षर के छन्द में १२० (एक सौ बीस) अर्धसमवृत्तों की होती है। उस संख्या को भो गुणा करके गुणित राशि को घटा दे। उससे १०००८० (एक लाख अस्सी) चार अक्षर के विषमवृत्त होते हैं ॥ १२६ ॥। १. ग. एकाषिकां। ख. एकाद्या च। २. ग. यावण्चरणं। ३. ख. उत्तरस्तथा। x. क. (टि०) संख्यां कृर्वा तु तावतीम् संख्यां। संयोज्य तावतीम्। ना. शा०-३४

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२६६ नाटयशास्त्रे

एवं' कृत्त्वा तु सर्वेषां परेषां पूर्वपूरणम्। 3क्रमान्नैधनमेकैकं प्रतिलोमं विसर्जयेत् ॥ १२६ ॥ सर्वेषां" छन्दसामेवं लध्वक्षरविनिश्चयम् । जानीत समवृत्तानां संख्यां संक्षेपतस्तथा ॥ १२७ ॥ वृत्तस्य परिमाणन्तु छित्वाऽर्घेंन यथाक्रमम्। न्यसेल्लघु तथा सैकमक्षरं गुरु "चाप्यथ ॥ १२८॥। एवं विन्यस्य वृत्तानां नष्टोद्दिष्टविभागतः । 'गुरुलध्वक्षराणोह सर्वछन्दस्सु दर्शयेत् ॥ १२९ ॥

अनुवाद-इस प्रकार सभी स्थानों पर उत्तरवर्ती संख्या को पूर्ववर्त्तो संख्या से पूरण करके क्रमशः अन्तिम संख्या में एक-एक को विपरीत प्रक्रिया से विसजित कर हटा दे॥ १२६ ॥ अनुवाद-इस प्रकार समवूत्त सभी छन्दों के लधु अक्षरों तथा उनकी संख्या संक्षेप में समझें ॥ १२७॥ अब नष्ट को कहते हैं- अनुवाद-वृत्त के परिमाण अर्थात् समस्त भेदों को आधे पर छिन्न करके (आधा करके) क्रमशः एल लघु तथा एक गुरु को विन्यस्त करे। इस प्रकार विन्यास करके नष्ट एवं उद्दिष्ट की प्रक्रिया से सभी छन्वों के गुरु एवं लघु अक्षरों को दिखा दे॥ १२८-१२९ ।।

१. एवं कर्यात्तु सर्वेषां। २. पूर्वष्वंस्य परणम । ३. क. नैधनादेकमेकं तु प्रातिलोम्यक्रियात्मकम । ४. क. सर्वेषां छन्दसां न्यस्य लष्वक्षरविनिश्चयम् ॥ ५. क (टि) गुरु न्यसेत्। ६. क, गुरुलध्वक्षरानिह सव छन्दःसु दर्शयेत्।

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२६७

इति छन्दांसि यानीह मयोक्तानि द्विजोत्तमाः ! वृत्तान्येतेषु नाटयेऽस्मिन् प्रयोज्यानि निबोधत ॥ १३० ॥ इति भरतीये नाट्यशास्त्रे वाचिकाभिनये छन्दोविधानं नाम चतुर्दशोऽध्यायः। अथ नष्टमाह वृत्तस्य परिमाणं त्विति संख्यामर्धेन छिन्दात। यत्र विषमाङ्कूं न पूर्यते, तत्र पूरणार्थमेकमधिकं कुर्यात्। तदाह यथाक्रममिति। तत्र गुरु। सैककरणा- त्प्रयत्नगौरवात् लघुरन्यथा च्छेदनात । एवं पुनः पुनर्यावदक्षराणि पूर्णानि तावत्। चतुरक्षरे पञ्चमो भेदः कीदूगिति-पूर्व पञ्चाङ्स्य सैकच्छेदात् गुरु, पुनरपि त्रयङ्कस्य सैकच्छेदात गुरु, द्वयोश्च समच्छेदाल्लघु एकस्य सैकच्छेदाद गुरु, एतेनेदृशः पञ्चमो भेद: ॥ १२९ ॥ अभिनव-वृत्त के परिमाण संख्या के आधे से काट दे। जहाँ पर विषम अङ्क पूरा नहीं होता वहाँ एक पूरण के लिए एक और जोड़ दे, और यह प्रक्रिया क्रमा- नुसार करे उस क्रम को विषम संख्या में एक और जोड़ दे। इस पर कहते हैं कि इस प्रक्रिया के करने पर प्रयत्न में गौरव होता है अत जहाँ पर विषम संख्या में एक मिलाकर आधा करने की स्थिति हो वहाँ गुरु लेना चाहिए। अन्यथा ऐसी स्थिति न हो वहाँ आधा करने को स्थिति में लघु लेना चाहिए। इस प्रक्रिया को बार-बार तक करे जब तक वृत्त के अक्षर पूरे न हो जाँय। अब प्रश्न होता है कि चतुरक्षर वृत्त में पाँचवा भेद कैसा है ? इस पर कहते हैं-पाँच को विषम संख्या को आधा करने के लिए एक मिलाकर आधा करने से गुरु प्राप्त हुआ। पुनः पाँच अङ्क में एक मिलाने से आधा करने पर तोन विषम अङ्क प्राप्त होते है, इसमें भी आधा करने के लिए एक अङ्कमिलाना पड़ता है। इस प्रकार तीन अङ्क में एक मिलाकर आधा करने पर दो अङ्क प्राप्त होता है। यह सम संख्या है। उसका आधा करने पर एक प्राप्त होता है। इस प्रकार दो गुरु और एक लघु प्राप्त हुआ। पुनः विषम संख्या में एक मिलाकर आधा किया तो एक गुरु मिला। यह 'SS ।5' यह चार अक्षर का पांचवा भेद है। १. क-म. छन्दांस्येतान्यथोक्तानि मयैव तु द्विजोत्तमाः । २. क. वृत्तान्येतानि। ३. इति भारतीये नाट्यशास्त्र वाचिकाभिनयच्छन्दोविभागो नाम पञ्चदशोऽध्यायः। ४. छेबाव।

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२१८ नाटयश्ास्त्र

एवमिति व्याकृतेन विभागेन लघुप्रधानानि वा गुरुप्रधानानि वा लक्ष्ये निवेशयेत कविरुपबध्नीयादिति शिवम् ॥१३० ॥। पार्वतीवदनाम्भोजभृ ङ्रनेत्रत्रयीभुव:

इति श्रोभन्महामाहेश्वराभिनवगुप्ताचार्य विरचिताय। मभिनवभारत्यां विवृत्तौ' छन्दोऽव्यायश्चतुदशः समाप्तिमगमत् ॥

अभिनव-इस प्रकार अध्याय का उपसंहार करते हुए अध्यायान्त का आसूत्रण करते हैं- अनुवाद-हे ब्राह्मगों ! इस प्रकार मैं आप लोगों के लिए मैंने समस्त छन्दों का कथन किया है। इस नाट्य में इन वृत्तों का प्रयोग करना चाहिए, यह समझें॥१३० ॥ इस प्रकार भारतोय नाट्यशास्त्र में वाचिक अभिनय में छन्दो विधान नामक चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १४॥

अभिनव-इस प्रकार किये गये विभाग के अनुसार लघु प्रधान अथवा गुरु प्रधान अक्षरों को लक्ष्य में निवेश करे अर्थात् कवि अपने प्रवन्ध में निबन्धन करे॥ १२९ ॥ अभिनव-पार्वती के मुख रूपी कमल का भ्रमर रूप नेत्र त्रय अर्थात् त्रिनेत्र भगवान् शिव के दास अभिनवगुप्त ने इस छन्दोऽध्याय को प्रख्यात किया॥ इस प्रकार महामाहेश्वर अभिनवगुप्तपादाचार्य विरचित अभिनव भारती व्याड्या में छन्दो विचिति नामक चोदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १४॥

इस प्रकार डॉ० पारसनाथद्विवेदीकृत नाटपशास्त्र एवं अभिनवभारती की व्याख्या में चौदहवां अध्याय समाप्त हुआ ।। १४ ।।

१. क. ख. वृत्तौ।

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जिया

अथ पञ्चदशोऽध्यायः

छन्दांस्येवं हि यानीह मयोक्तानि द्विजोत्तमाः । वृतानि तेषु नाटयेऽस्मिन्प्रयोज्यानि निबोधत ॥ १॥

अभिनवभारती समस्तवृत्तानि विना न येन पटूद्भवश्रोत्ररसायनेन। छन्दांसि यस्मात्प्रभवन्ति वन्दे तं वाङ्मयं रूपमिहाष्टमूते:।१५।। यदुक्तमक्षराणि निवेशयेदिति (१४-१३३) तत्र शव्यताकृतं प्रविभागमाख्या- तुमुपचक्रमे छन्दांस्येवमिति। एषां छन्दसां नाट्यप्रयोगयोग्यानि वृत्तानि निबोधतेति सम्बन्धः। गुरुलघु- नियमेन श्रव्यता वतते येषु तानि वृत्तानि, अव्यार्थत्वात, अधिकरणे क्तः ॥। १॥

अभिनव-सुन्दरता से उद्भूत कानों को रसायन की तरह आप्यायित करने वाले जिस वाङ्मय के विना छन्द (वृत) उत्पन्न नहीं हो सकते, उस अष्टमूर्ति भगवान् शिव के वाङ्मय रूप की मैं वन्दना करता है। अभिनव -जैसा कि पिछले अध्याय में बतलाया जा चुका है कि 'अक्षराणि निवेशयेत्' अर्थात् काव्यों में अक्षरों का निवेश करना चाहिए, उस अक्षर निवेश की अव्यता के लिए रसायन बनाने के उद्देश्य से शब्दो के विभाग को कहने के लिए उपक्रम करते हैं- अनुवाव-हे द्विजश्रेष्ठ ब्राह्मणों ! इस अध्याय में मैंने जिन छन्दों को बतलाया है, उनमें इस नाट्यशास्त्र में प्रयोज्य वृत्तों को समझिये ॥ १ ॥ सि अभिनव-नाट्य-प्रयोग के योग्य इन छन्दों से निर्मित वृत्तों को समझना चाहिए। किन वृत्तों को ? गुरु-लघु के नियम के कारण जिनमें श्रव्यता का आधान हो- ऐसे वृत्तों को समझना चाहिए। यहाँ अधिकरण अर्थ में क्त प्रत्यय है॥ १॥

१. ग. पुस्तके षोडशोध्यायः । २ ख ग. इति छन्दांसि। ३. ग. वृत्तान्येषु। क-न. वृत्तान्येतानि।

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२७० नाट्यशाएणे

आद्ये पुनरन्त्ये द्वे द्वे' गुरुणी चेत्। *सा स्यात्तनुमध्या गायत्रसमुत्था ॥। २।।

यथा- संत्यक्तविभूषा भ्रष्टाञ्जननेत्रा *हस्तापितगण्डा किं ? त्वं तनुमध्या ॥३॥

गायत्रोत आरभ्य प्रयोगाहंतेति पूर्वाध्याये निरूपितत्वात् तदुपक्रममेवाह- आद्ये पुनरिति, मध्ये तु लघुनी अर्थात् गायत्रयैव गायत्रम्। तत्रेहाध्याये भरतमुनि- कृतमिति त्रिकैर्मकारादिभि: कैश्चित्किञ्चिल्लक्षणं स्वीकृतमिति द्विविधः पुस्तकपाठो दृश्यते मध्ये च चिन्तनाय पुस्तकेषूभयमपि पठ्यत इति ॥ २॥ अभिनव-गायत्री से आरम्भ करके हो छन्द प्रयोग के योग्य है, यह पिछले अध्याय में कहा जा चुका है, अब उसी का उपक्रम करते हैं- १. तनुमध्या (षडक्षरा वृत्ति) अनुवाद-जिसमें प्रत्येक पाद में आदि में दो गुरु और फिर अन्त में दो गुरु हों तथा शेष लघु हों, गायत्री छन्द से समुत्य उसे 'तनुमध्या' कहते हैं ( S5 1 1 5 S ) ॥ २ ॥ अभिनव-लक्षण में आदि और अन्त में दो-दो गुरुओं का विधान बताया गया है, इससे यह सिद्ध है कि मध्य में दो लघु होने चाहिए। गायत्री से जो सम्पन्न है वह गायत्र है। इस अध्याय में भरत मुनि कृत कुछ लक्षण है और कुछ आचार्यो ने मगण आदि त्रिकों के आधार पर कुछ लक्षण कहे हैं, इस प्रकार पुस्तक में दो तरह का पाठ दिखाई देता है और चिन्तन करने के लिए पुस्तकों के मध्य में दोनों पाठ मिलते हैं ॥ २॥ जैसे- अनुवाद-आभूषणों का परित्याग करने वाली अञ्जन रहित नेत्रों वाली और कपोलों को हथेली पर रखे हुए तुम क्या तनुमध्या कृशोदरी हो॥ ३॥

१. क-भ. पादे। २. ख. वृत्तं तनुमध्या। क-प. मध्ये लघुनी चेद्धूत्तं तनुमध्या । ३. ख. संत्यक्त भूषणा। ४. ख. ग. हस्तार्पितवक्त्रा।

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पञन्चदशोऽष्याय: २७१

लघुगण आदौ भवति चतुष्कः विम्कप

*गुरुयुगमन्त्ये मकरकशीर्षा ॥ ४ ॥

यथा- "स्वयमुपयान्तं भजसि न कान्तं 1

'भयकरि किं च त्वं मकरकशीर्षा। ५॥

विशेष-तनुमध्या का उदाहरण -- SSIISS SS II SS संत्यक्त विभूषा भ्रप्टाञ्जननेत्रा। SSII SSSS IISS हस्तापित गण्डा कि त्वं तनुमध्या। यहाँ पर प्रश्येक चरण में आदि और अन्त में दो-दो गुरु और मध्य में दो लघु है, अतः यहाँ 'तनुमध्या' छन्द है॥ ३ ॥ २. मकरकशीर्षा अनुवाद-जिसके प्रारम्भ में चार अक्षर लघु और अन्त में दो गुरु हों, उसे 'मकरकशोर्षा' छन्द कहते हैं॥ ४ ॥ उदाहरण जैसे- IIII SS III I SS स्वयमुप यान्तं भजसि न कान्तम्। II II SS भयकरि कि त्वं मकरक शीर्षा॥५। यहाँ पर प्रत्येक चरण में आदि के चार अक्षर लघु और अन्त के दो गुरु हैं। अतः यहाँ 'मकरकशीर्षा' छन्द हैं।

१. ख. ग. आद्यो। २. ख, चतुष्के । 3. ख. गुरुयुगमन्त्ये ४. क-प. मकरकशीर्षा। फिलो हिए ५. क. (टि०) कमलनिभास्ये परिजनमध्ये वरतन्तु कि एवं मकरकशीर्षा। ६. ब. भयकारि कि त्वं।

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१७२ नाटघशास्त्रे

एकमात्रं षट्के स्याद् द्वितोयं पादे। खयातरूपा वृत्ते मालिनी सा नाम्ना। ६।। षडक्षरकृते पादे लघु यत्र द्वितोयकम्। शेषाणि तु गुरूणि स्युर्मालिनो सा मता यथा ॥। ७॥

व्यक्तमेवासौ त्वं मालिनी प्रख्याता ।।८।1

एतन्नाम्ना प्रसिद्धा ख्यातरूपा इ्लाघनीयेत्यर्थः ॥ ६।।

३. मालिनी

अनुवाद-जिसके छः अक्षरों के पाद में दूसरा अक्षर लघु हो और शेष अक्षर गुरु हो तो वह छन्दों में प्रसिद्ध 'मालिनी' छन्द कहलाता है॥ ६॥ अभिनव-मालिनी नामक छन्द ख्यातरूपा है अर्थात् प्रसिद्ध, श्लाधनीया है॥। ६ ।। मालिनी का दूसरा लक्षण- 5अनुवाद-जिसके छः अक्षर वाले पाद में दूसरा अक्षर लघु हो और शेष अक्षर गुरु हो तो उसे 'मालिनी' छन्द कहते हैं॥। ७॥ उदाहरण जैसे- SIS SSSSISSSS स्नान गन्धाधिक्येर्वस्त्रभूषायोगे । SISSS SSISSS S व्यक्तमेवासौ स्वं मालिनी प्रख्याता ॥ स्नान, गन्ध (सुन्धित द्रव्य, इत्र आदि), वस्त्र और आभूषणों से युक्त तुम सचमुच मालिनो लग रही हो ।। ८ ॥ यहाँ पर प्रत्येक्र चरण का द्वितीय अक्षर लघु है और शेष अक्षर गुरु है, अतः यहाँ मालिनी छन्द है।

१. ग. स्नानगन्धसग्भि: । २. क-न. व्यक्तभूषायोगैः ।

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२७१

द्वितीयं पञचमं चैव लघु यत्र प्रतिष्ठितम् शेषाणि च गुरूणि स्युर्मालती नाम सा यथा।। ९॥ शोभते बढ्धया षट्पदाविद्या'। मालतीमालया मानिनी® लोलया ॥१० ॥

द्वितोयं च चतुर्थं च पञ्चमं च यदा लघु। यस्याः सप्ताक्षरे पादे ज्ञेया सा तूद्धता यथा॥ ११।

४. मालती

मनुवाद-जिसके प्रत्येक पाद में दूसरा और पांचरवां अक्षर लघु हो तथा शेष अक्षर गुरु हो उसे 'मालती' छन्द कहते हैं ।। ९ ।। जैसे- SISSI S S I S SIS शोभते बदया षट्पदाविद्वया। मालतीमालया मालिनी लीलया।। मालिनी नायिका सुबद्ध, भौरों से आक्रान्त लीला पूर्वक धारण की हुई मालती माला से सुशोभित है॥ १०॥ यहाँ पर छः अक्षर वाले पाद का द्वितीय और पञ्चम अक्षर लघु है और शेष प्रथम, तृतोय, चतुर्थ और षष्ठ अक्षर गुरु हैं, अतः मालती छन्द है।

५. उद्धता (सप्ताक्षरा वृत्ति)

कर न अनुवाद-जिस सात अक्षरों वाले पाद का दूसरा, चौथा, पांचवाँ वर्ण लघु हो और शेष वर्ण गुरु हो, उसे 'उद्धता' छन्द समझना चाहिए।। ११ ।।

१. क. (टि०) षट्पदाबद्धया। २. क. (टि०) मालिनी। ३. इतः परं 'क' पुस्तके- सौं त्रिको यदि पादे ह्यन्तिमश्च गकारः । उष्णिगुस्थितपादा उद्धता खलु नाम्ना ।। इत्यधिकं लक्षणं दृश्यते। ना० शा०-३५

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२७४ नाटयशास्त्र

दन्तघातकृताङूं व्याकुलालकशोभम् शंशतीव तवास्यं निर्दयं रतयुद्धम् ॥१२॥ आदौ द्वे निधने चैव गुरुणी यत्र वै सदा। पादे सप्ताक्षरे ज्ञेया नाम्ना भ्रमरमालिका॥। १३ ॥ यथा- नानाकुसुमचित्रे प्राप्ते सुरभिमासे एषा भ्रमति मत्ता कान्ते भ्रमरमाला ॥ १४॥ उदाहरण जैसे- SISIISS SISIISS दन्त घातकृताङ कं व्याकुलालकशोभम्। शंसतीव तवास्यं निदयं रतयुद्धम् ॥ १२। अनुवाद-दन्तघात के निशान से युक्त, बिखरे हुए बालों से सुशोभित तुम्हारा मुख निर्दय प्रणय-युद्ध को मानो कह रहा है। यहाँ पर सप्तोक्षर इ्लोक के प्रत्येक पाद में द्वितीय, चतुर्थ, पञचम वर्ण लघु और शेष वण गुरु हैं अतः यहाँ 'उद्धता' छन्द है। ६. भ्रमरमालिका अनुवाद-सात अक्षरों के पाद वाले श्लोक में प्रथम दो तथा अन्तिम दो वर्ण गुरु हों और शेष वर्ण लघु हों तो 'भ्रमरमालिका' वृत्त होता है ।। १३ ।। उदाहरण जैसे- SSTII SS SS III SS नानाकुसुमचित्रे प्राप्ते सुरभिमासे एषा भवति मत्ता कान्ते भ्रमरमाला॥ v 'हे कान्ते ! नाना प्रकार के पुष्पों से चित्रित चैत्र मास (सुरभिमास) के आने पर यह मस्त भ्रमरमाला भ्रमण कर रही है।'॥ १४।। इस श्लोक के प्रत्येक पाद में आदि और अन्त के दो वर्ण गुरु तथा शेष लघु हैं, अतः यहाँ भ्रमरमाला है। ६. क-प. दन्तधातकृताङूं। ७. ख. ग. निर्भरं। ८. इतः पर 'क' पुस्तके- पादे यदि निर्दिष्टौ सम्यग्विरचितौत्सौ। अन्त्ये यदि गकारः सातु भ्रमरमाला ॥ इति भ्रमरमाला लक्षणमधिकं दृश्यते।।

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पञन्चदशोयाय: २७५

आद्यं तृतोयमन्त्यं च पञ्चमं सप्तमं यथा । गुरुण्यष्टाक्षरे पावे सिंहलेखेति 'सा समृता ॥ १५॥ यत्त्वया ह्यनेकभावैश्चेष्टितं रहः सुगात्रि!। तन्मनो मम 'प्रविष्टं वृत्तमत्रं सिंहलेखम् ॥ १६ ॥

विशेष-गायकवाड़ संस्करण में भ्रमरमाला का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया जाता है- पादे यस्य निर्दिष्टौ सम्यग्विरचितौ ससौ। अन्स्ये यदि गकारः सातु भ्रमरमाला। यदि सप्ताक्षर पाद वाले ब्लोक के प्रत्येक पाद में तगण (5SI) सगण (।।S) हो और अन्त में एक गुरु हो तो 'भ्रमरमाला' वृत्त होता है। ७. सिंहलेखा (अष्टाक्षरा वृत्ति) अनुवाद-यदि आठ अक्षर वाले छन्द के प्रत्येक पाद में प्रथम, तृतीय, पञ्चम, सप्तम एवं अष्टम वर्ण गुरु हों तो 'सिंहलेखा' नामक वृत्त कहलाता है।। १४॥ उदाहरण जैसे- SIS I SI SS SIS ISISS यत्त्वया ह्यानेक भावैश्चेष्टितं रहः सुगात्रि। तम्मनो मम प्रविष्टं बृत्तमत्र सिंहलेखम्। "हे सुगात्रि ! जो तू ने एकान्त में अनेक भावों से पूर्ण चेष्टाएँ की हैं वह मेरे मन में प्रविष्ट सिंह की नखलेखा के समान कुरेद रहा है।" यहाँ पर प्रत्येक पाद में प्रथम, तृतीय, पञ्चम, सप्तम एवं अष्टम अक्षर गुरु है, शेष लघु हैं, अतः यहाँ 'सिहलेखा' छन्द है।

१. इतः परं 'क' पुस्तके- जातं यस्य गौ च पादे संस्थितौ समस्तरूपौ। तामनुष्टुभाश्यस्थां वा वदन्ति सिंहलेखाम्।। इति सिंहलेखालक्षणमाधिकं दृक्यते। २. कनप. प्रविष्ट। ३. ख. ग. सिहलीलम्।

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२७६ नाटयशाए्न्र

चतुर्थ च द्वितोयं च षष्ठमष्टममेव च। गुरूण्यष्टाक्षरे पादे यत्र तन्मत्तचेष्टितम्' ॥ १७ ॥ यथा- *मदावघूणितेक्षणं विलम्बिताकुलालकम्। असंस्थितैः पदैः प्रिया करोत्ति मत्तवेष्टितम् ॥ १८ ॥ त्वया यन्मवोयं मनः प्रविष्टं व्याप्तमाक्रान्तं त्त्सिहनखविलेखनसदृशं। तादृशं वृत्तं तद्यथाक्रान्तम् ॥ १६ ॥ अभिनव-तुम जो मेरे मन में प्रवेश कर गई, व्याप्त हो गई हो वह सिंह के नखविलेखन के समान हो गया। उसो प्रकार यह वृत भी मेरे चित्त को आक्रान्त कर दिया है। विशेष-गायकवाड़ संस्करण में सिंहलेखा का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया जाता है-

जातु यस्य गौ च पादे संस्थितौ समस्तरूपो। तामनुष्टुभाश्रयस्थां वाववन्ति सिंहलेखाम्।। अर्थात् जिसके प्रत्येक पाद में समस्थान में गुरु वर्ण न हो अर्थात् सम में लघु और विषम वण दीघं हो. वहाँ 'सिंहलेखा' छन्द होसा है । १५।। उदाहरण उपर्युक्त है। ८. मत्तचेष्टितम् अनुवाद-जिसके आठ अक्षर वाले पाद में द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ और अष्टम अक्षर गुरु हों, शेष लघु हों तो 'मत्तचेष्टित' वृत्त होता है॥ १७ ॥ १. इतः परं 'क' पुस्तके तन्मत्तचेष्टितलक्षणम्- यदा तु जात्परो रलनौ गकार एव च स्थितः । अनुष्टुबुद्धवं तद् वरदन्ति मत्तचेष्टितन् ।। इत्यघिकं दृश्यते। २. क. उ. चरावघू णितेक्षणं। विघूणित क्षणा सदा । 5. क-भ, प्रलम्बिलोहिताम्बरा। सलस्तत

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पञ्चदशोऽ्याय: २७७

अष्टाक्षरकृते पादे सर्वाण्येव भवन्ति हि।मस गुरूणि यस्मिन्सा नाम्ना' विद्युन्मालेति कोतिता॥ १९॥

उदाहरण जैसे- ISI SISIS ISISISIS मदाव घूणितेक्षणं विलम्बिताकुलालकम्। असंस्थितैः पदैः प्रिया करोति मत्तचेष्टितम्॥ अर्थात् प्रिया बार-बार आँखों से धूरतो हुई, अटके हुए बालो को वखेरतो हुई और असंस्थित लड़खड़ाते हुए पैरों से मत्तता को चेष्टाएँ कर रही है ॥ १८ ॥ यहां पर प्रश्येक पाद में द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ एवं अष्टम अक्षर गुरु हैं शेष लघु। अतः यहाँ मत्तचेष्टित वृत्त है। विशेष-गायकवाड़ संस्करण में मत्तचेष्टित का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया जाता है- यदा तु जात्परौ रलौ गकार एव च स्थितः। अनुष्टुबुद्भवं तथा वदन्ति मत्तचेष्टितम्।। अर्थात् यदि प्रत्येक पाद में जगण के बाद रगण हों और अन्त में छघु और गुरु हो तो अनुष्टुप् से उद्भूत छन्द को मत्तचेष्टित कहते हैं। उदाहरण उपर्युक्त है।

९. विद्युन्माला अनुवाद -- जहाँ पर जाठ अक्षर वाले पाद के सभी अक्षर गुरु हों वहाँ 'विद्युन्माला' बृत्त होता है। १९।

१. ख. विद्युल्लेखेति संज्ञिता। २. इतः परं 'क' पुस्तके विद्युन्मालायाः अघोलिखितं लक्षणमधिकं दृश्यते- "मौ गौ चान्तयौ यस्या। पादे पादस्यान्ते विच्छेदश्च । सा चानुष्टुप् छन्दस्युक्ता नित्यं सन्द्रिविद्युन्माला"।।

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२७८ नाटघशास्त्र

साम्भोभारैरानदद्गि: श्यामाम्भौदैर्व्याप्ते व्योम्नि। आदित्यांशुस्पधिन्येषा दिक्षु भ्रान्ता विद्युन्माला*॥ २० ॥ 'पञ्चमं सप्तमं चान्त्यं गुरु पादेष्टके तथा। छन्दोज्ञैज्ञैय मेतत्तु वृत्तं चित्तविलासितम् ॥ २१ ॥

उदाहरण जैसे- SSSSSS SS साम्भोनादैरानर्दन्गिः, श्यामाम्भोदैर्व्याप्ते व्योम्नि। आदित्यांशुस्पर्द्धिन्येषा दिक्षु भ्रान्ता विद्युन्माला। अर्थात् जल से भरे हुए गरजते हुए काले बादलों से व्याप्त आकाश में सूर्य की किरणों से स्पर्द्धा करने वाली यह विद्युन्माला (बिजली) दिशाओं में धूम रही है॥ २० ॥ यहाँ पर प्रत्येक पाद के सभी अक्षर गुरु है, अतः विद्युन्माला छन्द है। विशेष-गायकवाड़ संस्कारण में विद्युन्माला का दूसरा लक्षण भी दिया गया है- मौगौ चान्त्यौ यस्या: पादे पादस्यान्ते विच्छेदशच। नित्यं सदि्भविद्युन्माला ।। जिसके प्रत्येक पाद में दो मगण और अन्त में दो गुरु हों तथा अन्त में विराम हो, उसे विद्वानों ने अनुष्टप छन्द के भेदों में 'विद्य न्माला' कहते हैं। कुछ विद्वान् इसी को विद्यु ल्लेखा भी कहत हैं। इसका उदाहरण ऊपर दिया गया है ॥ २०॥ १०. चित्तविलसितम् (अष्टाक्षरा वृत्ति ) अनुवाद-आठ अक्षर के पाद वाले जिस श्लोक के प्रत्येक पाद में पञ्चम, सप्तम और अन्तिम अर्थात् आठवाँ अक्षर गुरु हो शेष वर्ण लघु हों उसे 'चित्तविलासितम्' छन्द कहते हैं॥। २१ ॥

१. ख. सान्द्राम्भोभिर्नानाम्भोदैः श्यामाकारैर्व्याप्ति व्योम्नि। 'ग'-अम्भोभारैरानर्दद्गिः। क. (टि० भ.) साम्भोदैर्व्याप्तैर्वर्योम्ना गम्भी रोधैर्नातानादैः। आदित्यांशुप्रख्या ह्यषा दिक्षु भ्रान्ता विद्यन्माला ॥ २. ख. विद्युलखा। ३. इतः प्रारम्य श्लोकद्वयं ख. ग. पुस्तकयोर्नास्ति।

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२७९

स्मितवशविप्रकाशैदंशनपदैरमीभि: वरतनु ! पूर्णचन्द्रं तव मुखमावृणोति।२२॥ नवाक्षरकृते पादे त्रीणि स्युर्नैधनानि च। गुरूणि यस्या: सानाम्ना ज्ञेया मधुकरी यथा' ॥ २३ ।। विविधतरुगणैश्छन्नम्। वनमतिशयगन्धाढयं भ्रमति मधुकरी हृष्टा ॥ २४ ॥

उदाहरण जैसे- II11 SISSIIIISI SS स्थितवशविप्रकाशैदंशनपदैरमोभिः। वरतनु ! पूर्णचन्द्रं तव मुखमावृणोति ॥२२॥ 'हे वरतनु ! मुसकान के कारण चमकने वाले उन दशनों (दांतों) के द्वारा तुम्हारा मुख मानो पूर्णचन्द्र को आच्छादित कर रहा है॥ २२॥ इस श्लोक के प्रत्येक पाद को पांचवा, सातवाँ और आठवां अक्षर गुरु है और शेष अक्षर लघु है, अतः यहाँ 'चित्तविलासितम्' छन्द है ॥ २२ ॥ ११. मधुकरी ( नवाक्षरा वृत्त) अनुवाद-जिस छन्द के नौ अक्षर वाले पाद में अन्तिम तीन अक्षर गुरु हों और शेष लघु हों उसे 'मधुकरो' छन्द कहते हैं।। २३ ।

१. इतः परं 'क' पुस्तकेऽघोलिखितं मधुकरोलक्षणमधिकं दृश्यते - षडिह यदि लघूनि स्युनिधनगतमकारश्चेत्। बुघजनबृहत्तीसंस्था भवति मधुकरी नाम्ना।। २. ख. कुसुमितमभिपश्यन्ती। क-भ. कुसुमितमपि पश्यन्ती शुभविहगगणैश्छन्नम्। ३. ख. ग. नवनलितसुगन्धाय्यं।

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१८० नाटघशाक्यं

दशाक्षरकृते पादे त्रीण्यादो त्रीणि नैधने। सी यस्या गुरूणि सा ज्ञेया पङ्क्तरुत्पलमालिका॥। २५।।

उदाहरण जैसे- IIIIISSS IIIIIISSS कुसुमितमभिपश्यन्ती विविधतरुगणैश्छिन्नम्। वनमतिशयगन्धाढघं भ्रमति मधुकरी हृष्टा ॥ २४॥ अनेक प्रकार के वृक्षों से आच्छन्न, अत्यन्त सुगन्ध से परिपूर्ण कुसुमित वन को देखकर मधुकरी (भ्रमरी) झूम रही है।। २४ ।। यहाँ पर प्रत्येक पाद के अन्तिम तीन वर्ण गुरु शेष लघु है। अतः यह 'मधुकरी' नामक छन्द हैं। विशेष-गायकवाड़ संस्करण में मधुकरी छन्द का निम्नलिखित लक्षण अधिक दिया गया है- षडिह यदि लघूनि स्युनिधनगतमकारश्चेत्। बुधजनबृहृतोंसंस्था भवति मधुकरी नाम्ना ।।

'जहाँ पर आदि के छः अक्षर लघु और अन्त में मगण (SS5) तीन वर्ण गुरु हों, वहाँ बृहती जाति का मधुकरी नामक छन्द होता है। इसका उदाहरण ऊपर दिया जा चुका है॥। २४।।

१२. पंक्ति (दशाक्षरा वृत्ति ) अनुवाद-यदि दश अक्षर वाले पाद में आदि के तीन वर्ण और अन्त के तोन वर्ण गुरु हों और मध्य के चार अक्षर लघु हों तो 'उत्पलमालिका' (उत्पलमाला) पंक्तिष्छन्द कहते हैं।। २६।।

१. क. (टि०) नैधनानि तु। २. क. (टि०) उत्पलमालिनी । 'क' पुस्तकेऽघोलिखितं कुवलयमालालक्षणमषिकं दृश्यते- त्रीण्यादौ यदि हि गुरूणि स्युश्च त्वारो यदि लघवो मध्ये। पक्कावन्तर्गतमकार: स्याद्विज्ञया कुवलयमालाख्या॥

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२८१

यथा- उमित जगावनर कतुर अस्मिस्ते शिरसि तदा कान्ते वैडूयस्फटिकसुवर्णाढ्ये। शोभां स्वांन वहति तां बद्धा सुश्लिष्टा कुवलयमालेयम्॥। २६॥

शं भां स्वाम् (स्वभाववतने ये भेदा: ?) वैड्यंच्छायानि यानि दलानि तत्त- त्स्फुरत्सुवणंतुल्यानि वर्णानि तदभ्यन्तरकेसराणि॥२६॥

उदाहरण, जैसे- S'SS IIIIS SS SSSII1S5 अस्मिस्ते शिरसि तदा कान्ते वैडूयंस्फटिकसुवर्णाढघे। शो्भा स्वां न वहति तां बद्धा सुश्लिष्टा कुवलयमालेयम्॥२६॥ "हे कान्ते ! वैदूर्यमणि, स्फटिक एवं सुवर्ण के अलङ्कारों से अलङ्त इस तुम्हारे शिर पर गुथी हुई (धारण की हुई) यह कुवलयमाला अपनी शोभा को धारण नहीं करती है॥ २६ ॥ यहाँ पर प्रत्येक पाद में आदि के तीन अक्षर गुरु और अन्त के तीन अक्षर गुरु तथा मध्य के चार अक्षर लघु है, अतः यहाँ उत्पलमाला कुवलयमाला छन्द कहते हैं॥ २६ । अभिनव-स्वभाव के वर्त्तने में जितने भेद हैं, उस शोभा को नहीं धारण करते। वैदूर्य मणि के समान कान्ति वाले जो दल हैं उनके सुवर्ण के समान चमकते हुए किजल्क (केशर) हैं॥ २६ ॥ विशेष-गायकयाड़ संस्करण में उत्पलमाला या कुवलयमाला का निम्नलिखित लक्षण अषिक दिया गया है- त्रीण्यादौ यदि हि गुरूणि स्युश्चस्वारो यदि लघवो मब्ये। पंक्ावन्तगंतमकार: स्याद्विज्ञेया कुवलयमालाल्या।। "यदि पाद के आदि के तीन अक्षर गुरु हों और मध्य के चार अक्षर लबु हो तथा अन्त के तीन अक्षर गुरु हों तो कुवलयमाला 'उत्पलमालिका' नामक पंक्ति्छन्ब होता है।' इसका उदाहरण ऊपर दिया गया है। १. ख. ग. पुस्तकयो: इत्युदाहरणम अस्मिस्ते भ्रमरनिभे कान्ते नानारत्नरचितभृषाढये। शोभामावहति शुभां मष्नि प्रोत्फुल्ला कुबलयमालेयम्।। ना. था०-२६

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२८२ नाटघशात्रे

द्वितीयं च चतुर्थं च षष्ठमष्टममेव च । ह्रस्वं दशाशरे पादे यत्र सा शिखिसारिणी ॥२७॥ 1139 यथा-

नैव तेऽस्ति सङ्गमो मनुष्यैर्नापि कामभोगचिह्नमन्यत्। गर्भिणोव दृश्यसे ह्यनायें! किं मयूरसारिणी त्वमेवम्' ॥। २८।।

मयूरवद् व्याकोचमस्या: मयूरीभिर्वा (सारी) गतिविशेषो भवती- त्याहुः॥ २८॥

१३. शिखिसारिणी (दशाक्षरा वृत्तिः)

अनुवाद-जिस वृत्त के दश अक्षर वाले पाद में द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ एवं अष्टम अक्षर हरस्व हो शेष गुरु हो उसे 'शिखिसारिणी' वृत्त कहते हैं॥।२७।। उदाहरण जैसे-

नैव तेऽस्ति सङ्गमो मनुष्यैर्नापि कामभोगचिह्मन्यत्। गभिणीव दृश्यसे ह्यनायें! किं मयूरसारिणी त्वमेवम् ॥ २८॥ OT'हे अनायें! तुम्हारा मनुष्यों से सङ्गम नहीं है और न कामभोग के कोई चिह्न है, किन्तु गर्भिणी के समान दिखाई दे रही हो, क्या तुम मयूरसारिणी (मयूर के समान आचरण करने वाली) हो?॥ २८॥ यहाँ पर पाद में द्वितोय, चतुर्थ, षष्ठ और अष्टम अक्षर लघु है और शेष गुरु हैं, अतः यहाँ 'शिखिसारिणी' या 'मयूसारिणी' छन्द है। अभिनव-मयूर के समान विकसित (फैले हुए) स्वरूप है जिसका अथवा मयूरी की तरह गति विशेष हैं जिसकी इसे 'मयूरसारिणी कहते हैं ॥ २८॥

१. इत परं 'क' पुस्तके शिखिसारिण्या अघोलिखितं लक्षणमधिकं दृक्यते- जौ त्रिकौ हि पादगौ तु यस्या गौ च संश्रि तौ तथा समौ तौ। पंक्तियोग सु प्रतिक्षिताङ्गो सा मयूरसारिणीति नाम्ना। २. क. गर्भिणी च जायसे। ३. ख. त्वमेव ।

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पञन्चदशोञ्यायः २८३

'आद्यं चतुर्थमन्त्यं च सप्तमं दशमं तथा। गुरूणि त्रैष्टुभे पादे यत्र स्युर्दोधकं तु तत् ॥ २९॥ यथा- प्रस्खलिता प्रपदप्रविचारं मत्तविघूणितगात्रविलासम्"। पश्य विलासिनि ! 'कुञ्जरमेतं दोधकवृत्तमयं प्रकरोति ॥ ३०॥ मन्दं मन्दं दोधकेन गोयमानं वृत्तं वोधकवत्तम् ॥ २८ ॥ विशेष-गायकवाड़ संस्करण में शिखिसारिणी का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया जाता है- जौ त्रिकौ हि पादगौ तु यस्य गाँ च संशरितौ तथा समौ स्तौ। पंक्तियोग सुप्रतिष्ठिताङ्गी सा मयूरसारिणीति नाम्ना ।। 'जिस छन्द के दशाक्षर पाद में रगण, जगण और रगण तथा अन्त में गुरु हो वह पंक्ति के योग से सुप्रतिष्ठित 'शिखिसारिणो' या 'मयूरसारिणो' नामक वृत्त होता है। इसका उदाहरण उपर्युक्त उदाहरण है। की

१४. दोधक (त्रिष्टुप् एकादशाक्षरा वृत्ति ) अनुवाद-जिस वृत्त के एकादशाक्षर पाद में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, दशम और अन्तिम (ग्यारहवाँ) वर्ण गुरु हो वह 'दोधक' छन्द कहलाता है॥२९॥ अभिनव-जो वृत्त दूध दुहने को तरह मन्द-मन्द हो गाया जाता है वह दोधक वृत्त कहलाता है॥ ३० ।। १ ख. ग. प्रथमं च चतुर्थ च सप्तमं दशमं गुरु। अन्त्यं च श्रेष्टुभे पादे यत्र स्याद् दोघकं तु तत्।। २. इतः परं 'क' पुस्तकेऽघोलिखितं दोधकलक्षणमधिकं दृश्यते- भौ तु भगाविति यस्य गणा: स्युः स्थाच्च र्यातस्त्रिचतुभिरथोक्ता । श्रैष्टुभमेव तु तत्खलु नाम्ना दोषकवत्तमिति प्रवदन्ति ॥क ३. क. प्रश्खलमानगति प्रविचारो । ४. ख. गात्रविनामम् । ५. कुञ्जर एषो। ६. ख. दोधकवृत्तगति प्रकरोति।

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२८४ नाटघशारने

आदौ दवौ पञ्चमं चैवाप्यष्टमं नैधनं तथा।31 गुरुण्येकादशे पादे यत्र तन्मोटकं यथा॥ ३१॥

उदाहरण जैसे- S IISI ISIISS प्रस्खलिताग्रपदप्रविचारं मत्तविघूणितगात्रविलासम्। पश्य, विलासिनि ! कुञ्जरमेतं वोधकवृत्तमयं प्रकरोति॥ ३० ॥ "अरी विलासिनि ! इस हाथी को देखो, जो लड़खड़ाते हुए पैरों के अग्रभाग से विचरण कर रहा है और मतवाले की तरह झूमते हुए शरोर से विलास कर रहा है, छोटे बछड़े जैसी हरकतें कर रहा है।" यहाँ पर प्रत्येक पाद में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, दशम और अन्तिम अक्षर गुरु है और शेष लघु हैं। अतः यह 'दोधक' वृत्त का उदाहरण है ॥३०॥ विशेष-गायकगण संकरण में दोघक वृत्त का लक्षण निम्नलिखित रूप में अधिक पाया जाता है-

भौ तु भगाविति यस्य गणा: स्यु: स्याच्च यतिस्त्रिचतुर्भिरथास्मिन्। त्रैष्टुभमेव हि तत्खलु नाम्ना दोधकवृतमिति प्रबदन्ति ॥ ३० ॥ "जिस एकादशाक्षर पादवाले छन्द के प्रत्येक पाद में भगण, भगण, भगण और अन्त में दो गुरु हो तथा तोन एवं चार अक्षरों पर यति हो वहाँ 'दोधक' नामक वृत्त होता है। यह त्रिष्टप् जाति का छन्द है। इसका उदाहरण ऊपर दिया गया है। १५. मोटक वृत्त (एकादशाक्षरावृत्ति ) अनुवाद-एकादशाक्षर पाद वाले जिस छन्द के प्रत्येक पाद में आदि के दो अक्षर, पांचवाँ, आठवाँ एवं अन्तिम अक्षर गुरु हो तथा शेष अक्षर लघु हो, उसे 'मोटक' वृत्त कहते हैं।। ३१ ।

१. क. (भ.) द्वे आदये। २. क. गुरु एकादशाक्षरे।

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पञ्चदशोडण्याय: २८५

एषोडम्बुदनिस्वनतुल्यरवः 'क्षीबः स्खलमानविलम्बगतिः । श्रुत्वा 'घनगजितमद्रितटे वृक्षान् 'प्रतिमोटयति द्विरदः ॥ ३२ ॥ नवमं सप्तमं षष्ठं तृतोय च भवेल्लघुः । एकादशाक्षरे पादे इन्द्रवञ्तेति सा यथा'॥ ३३ ॥।

1135 त्वं "दुर्निरोक्ष्या दुरतिप्रसादा दुःखैकसाध्या "कठिनस्वभावा। सर्वास्ववस्थासु च कामतन्त्रे योग्यासि किं वा बहुनेन्द्रवज्रा ॥ ३४॥

एष इति यावन्मुरजघाततुल्यं गजितं श्रुत्वा ॥। ३२।।

उदाहरण जैसे-

एषोऽम्बुदनिस्वनतुल्यरवः क्षीबः स्खलमानविलम्बगतिः। धरुत्वा घनगजितमद्रितटे वृक्षात् प्रततिमोटयति द्विरदः ॥ ३२॥ "यह मेघ के गर्जन के समान ध्वनि करने वाला, मत्त स्खलन एवं मन्द गति वाला हाथी पर्वत के तट पर बादलों के गर्जन को सुनकर वृक्षों को ठोकर दे रहा है।" यहाँ पर प्रत्येक पाद में आदि के दो अक्षर पञ्चम, अष्टम एवं अन्तिम अक्षर गुरु हैं और शेष अक्षर लघु हैं, अतः यहाँ 'मोटक' छन्द है॥ ३२ ॥ अभिनव-नगाड़े पर आधात हुए के समान गर्जन को सुनकर ॥ ३२॥ १६. इन्द्रवज्रा ( एकादशाक्षरा वृत्ति ) अनुवाद-एकादशाक्षर पाद वाले जिस छन्द के प्रत्येक पाद में तृतीय, षष्ठ सप्तम, नवम अक्षर लघु हों, शेष गुरु हों, वह 'इन्द्रवज्रा' छन्द कहलाता है॥३३।

१. ख. क्षणस्खलमानविलम्बगतिः । २. क. (टि०) घननिस्वन । ३. क. (टि०) प्रतितोटयते। मोटयते । ४. ख. ग लघुन्यथ। ५. ख. ग. यत्रैकादेशके ६. क. (टि०) स्मृता । ७. ख. ग. चन्द्रं निरीक्ष्या दुरितस्वभावा। क (भ.) दुष्प्रेक्षणीया विगतप्रसादा दुःखेन साध्या कठिनाभिषाता। ८. क. (टि०) दुःखेन साध्या कठिनस्वभावा।

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२८३ नाटघशास्त्रे

एभिरेव तु संयुक्ता लघुभिस्त्रष्टुभी यथा। उपेन्द्रवज्ता विज्ञेया 'लध्वादाविह केवलम्॥ ३५॥ यथा- प्रिये ! श्रिया वर्णविशेषणेन स्मितेन कान्त्या सुकुमारभावैः । अमी गुणा 'रूपगुणानुरूपा भवन्ति ते कि? त्वमुपेन्द्रवज्रा" ॥३६।। उदाहरण जैसे- SSISS IISISS त्वं दुर्निरीक्ष्या दुरतिप्रसादा दुःखंकसाध्या कठिनैकभावा। सर्वास्ववस्थासु च कामतन्त्रे योग्यासि कि? वा बहुनेन्द्रवज्रा ॥ ३४ ॥। "हे कामतन्त्रे ! तुम सभी अवस्थाओं में दुनिरीक्ष्या, कठिनाई से प्रसन्न होने वाली, दुःख से साध्य, और कठोर स्वभाव वाली हो, अतः तुम्हारा इन्द्रवज्ता (इन्द्र के वज्त की तरह कठोर) नाम योग्य है, उचित है'॥ ३४॥ प्रस्तुत छन्द का तृतीय, षष्ठ, सप्तम एवं नवम अक्षर लघु है और शेष गुरु हैं अतः यहाँ इन्द्रवज्रा छन्द है॥ ३४॥

१७. उपेन्द्रवज्रा (एकादशाक्षरावृत्ति: ) अनुवाद-जिस एकादशाक्षर वाले त्रिष्टुप् जाति के पाद में यदि इन्द्रवज्त्रा के लक्षण में प्रथम लघु हो जाय अर्थात प्रथम, तृतीय, षष्ठ, सप्तम, तथा नवम अक्षर लघु हों, शेष गुरु हो तो 'उपेन्द्रवज्रा' छन्द हो जाता है॥ ३५॥

१. ग. लध्वाढ्यमिह। २ ख. श्रिया च वर्णेन विशेषणेन। ग. प्रम्णा श्रिया वर्णविशेषणेन । ३. क-भ. यथा च कान्त्या सुकुमारयुक्त्या। ४. ख रूपगणा। ५. इतोऽग्रे ग्रन्यान्तरेषु "षष्ठं च नवम" मेत्यादिश्लौकद्वयमधिकं वतते।

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पठ्पदशोऽ्याय: २८७

आद्यं तृतीयमन्त्यं च सप्तमं नवमं तथा। गुरूण्येकादशे पादे यत्र सा तु रथोद्ता ॥३७॥

उपेन्द्रवज्ता अस्या उपमानत्वेन सा तथा। मत्वर्थीय उपेन्द्रवज्त्रन्तु इन्द्रधनुष उपमितमुपेन्द्रवञ्त्रमित्युपमितसमासः द्विगुप्राप्ते परवल्लिङ्गनिषेधः। स्मितेन कान्त्या च। इन्द्रधनुषोऽपि वर्णवैचित्र्यं भ्वत ॥ ४५॥

उदाहरण जैसे-

प्रिये ! बिया वर्णविशेषणेन स्मितेन कान्त्या सुकुमारभावात्। अमी गुणा रूपगुणानुरूपा भवन्ति ते किं त्वमुपेन्द्रवज्रा ॥ ३६ ॥ 'हे प्रिये ! शोभा (कान्ति ), वर्ण-विशेष (गौर वर्ण), मुस्कुराहट, कान्ति एवं सुकुमार भावों से युक्त तुम्हारे ये गुण तुम्हारे रूप के अनुरूप है । अतः क्या तुम उपेन्द्रवज्ा (इन्द्र की वज्त्र की तरह कठोर) हो॥ ३६॥ इस छन्द के ग्यारह अक्षर के प्रत्येक पाद में प्रथम, तृतीय, षष्ठ, सप्तम एवं नवम अक्षर लघु हैं और शेष वर्ण गुरु हैं, अतः यहाँ उपेन्द्रवज्ा छन्द है ॥। ३६ ।। अभिनव-उपेन्द्र का वज्तर जहाँ पर उपमान के रूप में हो वह उपेन्द्रवज्ा है। मत्वर्थोय अच् प्रत्यय करने पर 'उपेन्द्रवज्तम्' बनता है। इसमें इन्द्रधनुष से उपमा दी गई है, इसलिए उपेन्द्रवज्रम् में उपमित समास है। द्विगु समास होने पर परवत् (परपद) लिङ्ग का निषेध होता है। स्मितेन अर्थात् मुस्कुराहट कान्ति से इन्द्र धनुष का भी वर्ण वैचित्र होता है॥ ३६।।

१८. रथोद्वता ( एकादशाक्षरावृत्ति: ) अनुवाद-'ग्यारह अक्षर के पाद वाले जिस छन्द के प्रत्येक पाद में प्रथम, तृतीय, सप्तम, नवम तथा अन्तिम अर्थात् एकादश वर्ण गुरु हो और शेष लघु हो तो 'रथोद्ता' छन्द कहलाता है॥ ३७ ।

१. क. गुर्वेकादशके।

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२८८ नाटयशाहणे

यथा- कि ? त्वया 'सुभट ! 'दूरवर्जितं नात्मनो न 'सुहृदां प्रियं कृतम्। यत्पलायनपराणस्य ते याति धूलिरधुना रथोद्वता॥।३८ ।। यथा- कि ? त्वया कुमतिसङ्कया सदा नाज्ञयेव सुहृदां प्रियं कृतम्। यद् गृहाववचनरोषकम्पिता याति तूर्णमबला रथोद्धता।।

दूरर्वाजतं प्रियं न कृतम्। हे सुभट, कि त्वया कृतम् (दूरत्यक्तमिप्यर्थः?) कुत इत्याह यत्पकायनेति॥३८॥

उदाहरण जैसे- S IS III SISIS कि त्वया सुभट ! दूरवजितं नात्मनो न सुहवा प्रियं कृतम्। यस्पलायनपरायणस्य ते याति धूलिरधुना रथोढ़ता॥।३८ ॥ 'हे सुभट ! तुमने दूर से ही युद्धभूमि को छोड़ कर क्या किया? युद्धभूमि छोड़कर तुमने न अपना भला किया और न मित्रों का हित किया। क्योंकि युद्धभूमि से पलायन करने वाले तुम्हारे रथ से उद्धत धूलि उड़ रही है" ॥ ६८ ॥ यहाँ प्रत्येक पाद का प्रथम, तृतीय, सप्तम, नवम तथा अन्तिम वर्ण गुरु है, शेष लघु है। अतः यहाँ पर 'रथोद्धता' छन्द है। अभिनव-हे सुभट ! तुमने युद्ध को दूर से ही छोड़कर अच्छा नहों किया। तुमने दूर से ही युद्ध को त्यागकर, यह क्या किया? कैसे, जो कि डरकर युद्ध से भाग गये।। ३८।।

१. क. (टि०) सुभग। १. क. (टि०) दरवर्जितात्मना। ३. क. (टि०) सुहृदः । ४. ड. ग. पुस्तकयोरयं क्लोको नास्ति ।

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पम्बदशोऽव्याय। २८९

आद्यं तृतोयमन्त्यं च सप्तमं बशमं गुरु। यस्यास्तु त्रैष्टुभे पादे विज्ञेया स्वागता हि सा ॥ ३६॥ यथा- अद्य मे सफलमायतनेत्रे! जोवितं मदनसंश्रयभावम्' । आगतासि भवनं मम यस्मात्स्वागतं तव वरोरु ! निषोद ॥ ४० ॥ मदनसंथयो भावो यस्य कामफलमिति यावत् ॥ ४० ॥ दूसरा उदाहरण जैसे- S IS III SIS IS किं त्वया कुमति सङ्गया सवा नाज्येव सुहृदां प्रियं कृतम्। यद् गृहाव्वचनरोषकम्पिता याति तूर्णमबला रथोदता॥३९॥ 'हे अबले ! अज्ञा (मूर्खा) के समान सदा कुमत का सङ्ग करने वाली तुमसे क्या लाभ ? तुमने कभी भी मित्रों का हित नहीं किया। जो अबला होकर भी थोड़े से वचन कहने पर क्रोध से काँपती हुई रथ से उद्धत धूलि की तरह घर से बाहर जा रही हो।' यहाँ रथोद्ता छन्द है। १९. स्वागता (एकादशाक्षरा वृत्ति: ) अनुवाद-त्रिष्टुप् जाति के जिस छन्द के प्रत्येक पाद में प्रथम, तृतीय, सप्तम, दशम तथा एकादश अक्षर गुरु हो, शेष लघु हों तो 'स्वागता' वृत्त होता है।। ३९ ॥ उदाहरण जैसे- SISIII SIISS अद्य मे सफलमायतनेत्रे जीवितं मदनसंअयभावम्। आगतासि भवनं मम यस्मात स्वागतं ते वरोरु निषीद ॥ ४० ॥ १. ग. गुरूणि त्रष्टुभे पादे। क (टि०) तथा गुरूणि त्रैष्टभे पादे यत्र सा स्वागता यथा। २. क. (टि०) मधनसंश्रितभावम्। ना. था०-३७

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नाट्यशास्त्रे

षष्ठं च नवमं चैव लघुनी त्रैष्टुभे यदि। गुरूण्यन्यानि पादे तु सा ज्ञेया शालिनो, यथा । ४१ ॥ दुःशोलं वा निर्गुणं वापरं वा लोके धैर्यादप्रियं न ब्रवीषि। तस्माच्छीलं साधुहेतो: सुवृत्तं माधुर्यात्स्यात्सर्वथा शालिनी त्वम् ॥४२।।

'हे आयतलोचने ! कामदेव के आश्रित (अधीन) मेरा जीवन आज सफल हो गया। क्योंकि आप मेरे धर पधारी हैं। हे वरोर ! आपका स्वागत है, बैठिये। यहाँ पर एकादशाक्षर पाद वाले छन्द में प्रत्येक पाद में पहला, तीसरा, सातवाँ दसवां ग्यारहवां अक्षर गुरु है। अतः यहाँ 'स्वागता' छन्द है॥ ४०॥ अभिनव-जिसका भाव कामदेव के संश्रित (अधोन) है, अर्थात् काम फल है॥। ४० ॥

२०. शालिनो ( एकादशाक्षरा वृत्ति ) क्षनदाद-त्रिष्टुप् जाति के जिस छन्द के प्रत्येक पाद में छठा, नौवां अक्षर लघु हो, शेष बीघ हो तो वहाँ 'शालिनी' वृत्त होता है।। ४१ । उदाहरण जैसे-

SSS SSIS SISS दुःशीलं वा निर्गणं वापरं वा लोके धैर्यादप्रियं न व्रवीषि। तस्माच्छीलं साधुहेतोः सुवृत्तं माधुर्यात् स्यात् सर्वथा शालिनी त्वम् । ४१ ॥ "हे देवि ! धैर्यशालिनो होने के कारण तुमने कभी किसी को दुःशील अथवा गुणहीन अथवा अन्य कोई अप्रिय शब्द नहीं कहती हो, इसलिए साधुता के कारण

हो॥। ४२ ॥ तुम्हारा शोल (स्वभाव ) सुवृत्त है, और मधुरता के कारण तुम सर्वथा शालिनी

यहाँ प्रत्येक पाद में छठा, नौवाँ अक्षर लघु और शेष गुरु है, अतः यहाँ 'शालिनी' वृत्त है।

१. ग. पुस्तकैऽयं श्लोको नास्ति । TsTaNSE (ost) .oF

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पंच्यदशोउ्याथ! १९१

तृतीयं चैव षष्ठं च नवमं द्वादशं तथा।फक जिराफ गुरूणि जागते पादे यत्र तत्तोटकं भवेत्॥l ४३।। यथा- किमिदं कपटाश्रयदुर्विषहं 2बहुशाठ्यमथोल्वणरूक्षकथम्। स्वजनप्रियसज्जनभेदकरं ननु तोटकवृत्तमिदं कुरुषे॥ ४४॥

किमिदमिति तोटकस्य छेदकस्य वृत्तं चेष्टितम् ॥५५॥ २१. तोटक वृत्त (जगती जाति, द्वादशाक्षरा वृत्ति ) अनुवाद-जगतो जाति के द्वादशाक्षर पाद के जिस छन्द के प्रत्येक पाद में तीसरा, छठां, नौवाँ तथा बारहवां अक्षर गुरु हो, शेष ह्रस्व हों तो वहाँ 'तोटक' वृत्त होता है।। ४३॥ उदाहरण जैसे-

किमिदं कपटाशयदुर्विषहं बहुशाध्यमथोल्वणरूक्षमथम्। स्वजनप्रियसज्जनभेदकरं ननु तोटकवृत्तमिदं कुरुषे॥ ४४ ॥ "धोखेवाजी के आश्रय से असह्य, धूर्तता से पूर्ण, अत्यन्त रूखे वचन से युक्त, स्वजन और प्रिय सज्जनों में भेद करने वाले इस तोड़ने वाले आचरण को क्यों कर रहे हो।" यहाँ पर प्रत्येक पाद में तीसरा, छठा, नौवां तथा बारहवां अक्षर गुरु हैं, शेष लधु। अतः 'तोटक' छन्द है॥ ४४ ॥ अभिनव-तोटक अर्थात् छेदक का वृत्त आचरण ॥ ४४।।

१. इतः परं क, पुस्तकेऽयं अधिकं दृक्यते- यदि सोऽन भवेत्तु समुद्रसमस्त्रिषु चापि तथा नियमेन यतिः । सततं जगतीविहितं हि ततं गदितं खलु तोटकवृत्तमिदम् । २. स. बहुगजमिवोद्गणरूक्षकथम्। ग. बहुगण्डमिवोल्वणरूक्षपथम् ।ड ३. ग. पकुर।

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२१२ नाटपशास्त्रे

'आद्यं तृतीयमन्त्यं च पञ्चमं षष्ठमेव च। तथोपान्स्यं जगत्यां च गुरु चेत्कुमुदप्रभा१ ॥। ४५।। यथा- मन्मथेन विद्धा सललितभावा नृत्तगीतयोगा प्रविकसिताक्षी। निन्धमद्य किं ? त्वं विगलितशोभा चन्द्रपादयुक्ता कुमुदवती च।४६॥ विशेष-गायकवाड़ संस्करण में तोटक का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया जाता है- यवि सोऽन्र भवेत्त समुद्रसमस्त्रिषु चापि तथा नियमेन यतिः। सततं जगती विहितं हि ततो गवितं खलु तोटकवृत्तमिदम्॥। "यदि जगती जाति के द्वादशाक्षर पाद वाले वृत्त के प्रत्येक चरण में चार सगण हो और नियमानुसार तीन अक्षरों पर 'यति' हो तो 'तोटक' नामक वृत्त होता है" जेसे-रगण सगण सण सगण

किमिदं कपटा अयदुरविषहं २२. कुमुदप्रभा ( द्वादशाक्षरा वृत्ति ) मनुवाद-जगती जाति के जिस छन्द के प्रत्येक पाद में प्रथम, तृतीय, पञ्चम, षण्ठ, एकावश, और द्वादशा अक्षर गुरु हों और शेष वर्ण लघु हों तो 'कुमुबप्रभा' नामक छन्द कहलाता है॥४५॥ १. 'ग' पुस्तकेश्यं श्लोको नास्ति । २. इतः पर क. पुस्तकेंऽयं अधिकं दृश्यते- यौ त्रिकौ तथा न्यौ यदि खलु पादे षड्भिरेव वर्णैयंदि च यदि स्यात्। नित्यसंनिविष्टा जगतिविधाने नामतः प्रसिद्धा कुमुदनिभा सा। ३. क. (टि०) कामबाणविद्धा किमसि नतभ्र। शीतवातदग्घा नवनलिनीव। पाण्डुवष्त्रशोभा कथमसि जाता।। अग्रतः सखीनां कुमुदनिभा त्वम्।

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२९३

मतान्तरे- यदि लघु पादे न्यौ द्विकौ यथा यौ यतिरपि वर्णैः षड्भिरेव चेत्स्यात्। जगति विधाने नित्यसंनिविष्टा कुमुदनिभा सा नामतः प्रसिद्धा ॥४७॥

यथा- कुमुदनिभा त्वं कामबाणविद्धा किमिति ? नतभ्रूः शोतवातदग्धा। मृदुनलिनीवापाण्डुवक्त्रशोभा कथमपि जाता ह्यग्रतः सखोनाम्॥४८॥

मन्मथेनेति नृत्तगोतयुक्ता भवतीति सम्बन्धः ।४६।।

उदाहरण जैसे- SISI SS TTII SS मन्मथेन विद्धा, सललित भाषा नृत्यगोतयोगा, प्रविकसिताक्षी। निन्दमद्य कि त्वं, विगलितशोभा चन्द्रपादयुक्ता कुमुदवती च ॥४६॥ इस श्लोक के प्रत्येक पाद में प्रथम, तृतोय, पञ्चम षष्ठ, सप्तम, एकादश और द्वादश अक्षर गुरु हैं, शेष वर्ण लघु हैं। अतः यहाँ कुमुदप्रभा छन्द है ॥ ४६॥ अभिनव-मन्मथ अर्थात् कामदेव के उद्रेक से नृत्य एवं गीत से युक्त नहीं हो सकती ॥ ४६॥ विशेष-गायकवाड़ संस्करण में कुमुदवतो का निम्नलिखित लक्षण अधिक दिया गया है- यौं त्रिकौ तथा न्यौ यदि खलु पादे षड्भिरेव वर्णैयंदि च यतिः स्यात। नित्यसंनिविष्टा जगतिविधाने नामतः प्रसिद्धा कुमुदनिभा सा।। "जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में रगण, यगण, नगण, यगण त्रिक हों और छः वर्णों पर यति हो तो जगती छन्द अर्थात् द्वादशाक्षरा छन्द के विधान में 'कुमुदनिभा' वृत्त होता है।"

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२९४ नाटयशास्त्रे

द्वादशाक्षरके पादे सप्तमं दशमं लघु।ता आदौ पञ्चाक्षरच्छेदश्चन्द्रलेखा सा यथा॥४९॥ यथा- वक्त्रं सौम्यं ते पद्मपत्रायताक्षं कामस्यावासं सुनासोच्चप्रहासम्। *कामस्यापीदं काममाहर्तुकामं कान्ते ! कान्त्या त्वं चन्द्रलेखेव भासि॥५०॥

-रगण यगण नगण यगण SISI SS IIII SS मन्मथेन विद्धा, सललितभाषा यहाँ पर रगण, यगण, नगण, गगण है, आर छ अक्षरों पर यति है अतः कुमुदनिभा छन्द है। अन्यमतानुसार कुमुदनिभा का लक्षण- अनुवाद-यदि जगतो वृत्त के द्वादशाक्षर पाद में नगण, यगण, रगण, यगण का त्रिक हो और छ अक्षरों पर यति हो तो 'कुमुदनिभा' वृत्त होता है।४७।। उदाहरण जैसे- नगण यगण रगण यगण HIL ISS SIS ISS कुमुदनिभात्वं कामबाणविद्धा। किमिति ! नतभ्रः शीतवातदग्धा। मृदुनलिनोव पाण्डुवक्त्रशोभा कथमपि जाता ह्यग्रतः सखीनम् ॥४८॥ यहाँ पर प्रत्येक पाद में नगण, यगण, रगण, यगण और छः अक्षरों पर यति है। अतः यहाँ 'कुमुदनिभा' छन्द है॥ ४८॥ २३. चन्द्रलेखा (द्वादशाक्षरा वृत्तिः ) अनुवाद-द्वादशाक्षर पाद वाले छन्द में यदि सातवाँ दसवाँ अक्षर लघु हो और शेष गुरु हो तथा पाँच अक्षरों पर यति हो तो 'चन्द्रलेखा' नामक वृत्त होता है।। ४९ ।।

१. क. (टि०) यत्रान्यानि दोर्धाणि। २. क. कामस्यावासं। 3HG FF

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पञ्च दशोकध्याय: २९५

तृतीयमन्त्यं नवमं पञ्चमं च यदा गुरु। द्वादशाक्षरके पादे यत्र सा प्रमिताक्षरा ॥ ५१॥ यथा- स्मितभाषिणी' ह्यचपलापरुषा निभृतापवादविमुखी सततम्। अपि कस्यचिद्युवतिरस्ति सुखा प्रमिताक्षरा स हि पुमाव्जयति ॥५२॥

उदाहरण जैसे- SS SSS SISSISS वक्त्रं सौभ्यन्ते पद्मपत्रायताक्षं कामस्यावासं सुनासोच्चप्रहासम् कामस्यापीदं कामाहर्त्तुकामं कान्ते ! कान्त्या त्वं चन्द्रलेखेव भासि ॥। ५० ॥ "हे कान्ते ! तुम्हारा सौम्य मुख कमलदल के समान विशाल नेत्रों वाला, कामदेव का आवास, उच्च नासिका और प्रहास युक्त, कामदेव को भी कामना को आहरण करने वाला है। हे देवि ! तुम अपनी कान्ति से चन्द्रलेखा के समान लग रहो हो" ॥। ५० ॥ यहाँ पर पाद का सातवाँ और दसवाँ अक्षर लघु और शेष अक्षर गुरु हैं, अतः यहाँ 'चन्द्रलेखा' छन्द है ॥ ५०॥ २४. प्रमिताक्षरा (द्वादशाक्षर वृत्ति ) अनुवाद-जिस द्ववशाक्षर पद वाले छन्द के प्रत्येक पाद में तृतीय, पञ्चम, नवम तथा अन्तिम (बरहवाँ) अक्षर गुरु हो, शेष लधु हो तो 'प्रमिताक्षरा' नामक वृत्त होता है।।५१॥ उदाहरण जैसे-

स्मितभाषिणी ह्यचपलापरुषा निभुतापवादविमुखी सततम्। अपि कस्यचिद्युवतिरस्ति सुखा प्रमिताक्षरा स हि पुमान् जयति ॥५२॥ १. ख. ग. स्थितहासिनी। भ. स्मितभासिनी। २. ग. विमुखा। क. (टि०) वशवर्तिनी मधुरवाङनिभृता। ३. ग. जगति।

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नाट्यशास्त्रे द्वितीयमन्त्यं वशमं चतुर्थ पञ्चमाष्टमे। गुरुणि द्वादशे पादे वंशस्था जगती1 तु सा॥ ५३॥ न मे प्रिया तवं बहुमानवरजितां प्रियं प्रिया ते परुषाभिभाषिणी। तथा च पश्याम्यहमद्य विग्रहं ध्रुवं हिवंशस्थगति करिष्यति ॥५४॥ स्मितेति। प्रमिताक्षरा भण्यते, सा स्मितभावित्वादिगुणयुक्ता सा तादृशी सुमुखी युवतिरपि कस्यचिद्भवेदिति शेषः॥ ६४॥ "मुसुकरा कर बात करने वाली चञ्चलता और कठोरता से रहित, शान्त तथा निरन्तर अपवाद से रहित सुख देने वाली तथा कम बोलने वाली जिस किसी की युवति नारी है वह पुरुष सबसे श्रेष्ठ है" ॥ ५२॥ यहाँ पर प्रत्येक पाद का तृतीय, पञ्चम, नवम और द्वादश अक्षर गुरु है, शेष लघु। अतः यहाँ 'प्रमिताक्षरा' छन्द है। अभिनव-स्मितभाषित्व आदि गुणों से युक्त वह नारी प्रमिताक्षरा कही जाती है, ऐसी सुमुखो यवति जिस किसी को हो, वह सर्वोत्कृष्ट है॥ ५२॥ २५. बंशस्थ (द्वादशाक्षरावृत्तिः) अनुवाद-जगती जाति के द्वादशाक्षर वाले पाद में यदि द्वितीय, चतुर्थं, पञचम, अष्टम, वशम एवं द्वादश अक्षर गुरु हो, शेष लघु हो तो वहाँ 'वंशस्थ' वृत्त होता है ।५३ ॥ उदाहरण जैसे- ISIS S IISISIS न मे प्रिया त्वं बहुमानवजिता प्रियं प्रिया ते परुषाभिभाषिणी। तथा च पश्याम्यहमद्य विग्रहं ध्रुवं हि वंशस्थगतति करिष्यति ॥५४॥ १. क. (टि०) गदिता तु सा। २. क. इतः परं पुस्तकेऽधिकं हश्यते- यदि त्रिकौ ज्तौ भवतस्तु पादतस्तथैव च जाववसानसंस्थिती। तवा हि वृत्तं जगतीप्रतिष्ठितं वदन्ति वंशस्थमितोह नामतः ॥ ३. ख. ग. न मे प्रियं यद्बहूमानवजिता, कृता प्रिये ते परुषाभिभाषणै।। तथा च पश्याम्यहमद्य विक्रमं घ्रवं स वंशस्थगति: करिष्यति।

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२९७

चतुर्थमन्त्यं दशमं सप्तमं च यदा गुरु। भवेद्धि जागते पादे तदा स्याद्धरिणप्लुता॥ ५५॥ परुषवाक्यकशाभिहता' त्वया "भयविलोकनपार्श्वनिरोक्षणा। वरतनुः प्रततप्लुतसर्पणैरनुकरोति" गतैहैरिणप्लुतम् ॥५६॥ यहाँ पर प्रत्येक पाद में बारह अक्षर हैं और प्रत्येक पाद का द्वितीय, चतुर्थ, पञ्चम, अष्टम, दशम, एवं द्वादश वर्ण गुरु है, शेष लघु है, अतः यहाँ 'वंशस्थ' छन्द है ॥ ५४॥ विशेष-गायकवाड़ संस्करण में वंशस्थ का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया पाया जाता है- यदि त्रिकौ ज्तौ भवतस्तु पादत- स्तथैव व ज्ाववसानसंस्थितौ। तथा हि वृत्तं जगतीप्रतिष्ठितं वदन्ति वंशस्थमितीह नामतः।। "जगती जाति के जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में जगण, तगण, जगण और रगण त्रिक हों उसे 'वंशस्थ' नामक वत्त समझना चाहिए।" जैसे- जगण तगण जगण रगण 1

S SIS

न मे प्रि या त्वंब हु मान वजिता २६. हरिणप्लुता (द्वादशाक्षरा वृत्तिः ) अनुवाद-जिस जगती जाति के द्वावशाक्षर पाद वाले वृत्त के प्रत्येक पाव में चतुर्थं, सप्तम, वशम एवं द्वावश वर्ण गुरु हो, शेष वर्ण लघु हो, उसे 'हरिणप्लुता' छन्द कहते हैं ॥। ५५॥ १. क (भ.) यस्यास्तु जागते पादे सा ज्ञेया हरिणष्लुता। २. ग. हरिणीप्लुता। ३. ग. परुषवाचककथाभिहिता। ४. क (भ.) भयनिरीक्षणपार्श्वविलोकनैः । ५. क ( भ.) प्रकुरुते प्रगत हरिणप्लुता। ६. म. हरिणीप्लुतम्।

ना. था०-३6

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२९८ नाट्यशास्त्रे

सप्तमं नवमं चान्त्यमुपान्त्यं च यदा गुरु। उमफाल द्वादशाक्षरके पादे कामदत्तेति सा यथा।। ५७।।

परुषेत्यादि। भवत्परुषवाक्यरूपया कशया अभिहता वरतनुहरिणप्लुतमिव करोति ॥५६॥

उदाहरण जैसे- नगण भगण भगण रगण

SII SII SIS परुष वाक्यक शाभिह ता त्वया भय विलोकनपाश्वंनिरीक्षणैः। वरतनुः प्रततप्लुतसर्पंणै- रनुकरोति गतैहरिणप्लुतम्॥५६॥ "तुम्हारे कठोर वचन रूपी कशा (कोड़े) से ताड़ित वह सुन्दरी अपनी चाल से भय से चकित अगल-बगल देखते हुए, सतत उछल-उछल कर भागते हुए हरिण की गति का अनुसरण कर रही है ॥ ५६॥ यहाँ पर द्वादशाक्षरपाद में चतुर्थ, सप्तम, दशम एवं द्वादश अक्षर गुरु है, और शेष लघु। अतः यहाँ पर 'हरिणप्लुता' वृत्त है। अभिनव-परुषवचनेति-आपके कठोर वचन रूपी कशा (कोड़े) से अभिहत (ताड़ित ) हुई वह वरतनु हरिण की उछाल की तरह उछल रही है। ५५-५६ ॥ विशेष-पिङ़ल तथा अन्य आचार्यों ने इसे 'द्रुतबिलम्बित' नाम से अभिहित किया है। ५५॥

२७. कामदत्ता

अनुवाद-जिसके बारह अक्षर के पाद में सातवाँ, नौवां, ग्यारहवाँ तथा बारहवाँ अक्षर गुरु हो और शेष अक्षर लघु हो तो 'कामवत्ता' नामक वृत्त कहलाता है॥।५७॥ १. क-भ. सप्तम नवमं चैव ह्यन्तोपान्ते गुरूण्यथ। यत्र स्युर्जागते पादे कामदत्ता तु सा मता। २. ख. स्मूता।

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२९९

करजपदविभूषिता यथा तवं सुदति ! दशनविक्षताधरा च। गतिरपि चरणावलग्नमन्दा त्वमसि *मृगनिभाक्षि! कामदत्ता ।।५८।। आद्यं चतुर्थ दशमं सप्तमं च यदा 'लघु। पादे तु जागते यस्या अप्रमेया तु सा यथा ॥५९॥

उदाहरण जेसे- नगण नगण रगण रगण 1111 IIIIII SIS IS S करज पदवि भूषिता यथा त्वं सुदति ? दशानाविक्षताधरा च। गतिरपि चरणावलग्नमन्दा त्वमसि मृगानिभाक्षि। कामवता ।।५८ ।। अनुवाद-हे सुवति ! तुम जिस प्रकार नखक्षत से विभूषित हो और अधर वन्तक्षत से युक्त हैं, तथा तुम्हारी गति भी पैरों के लड़खड़ाने से मन्द है, इससे प्रतीत होता है कि हे मृगनयनो ! तुम कामदत्ता हो, अर्थात् काम के लिए प्रदान की गई हो ॥ ५८ ॥ यहाँ पर प्रत्येक पाद में सातवां, नौवां, ग्यारहवां और बारहवाँ अक्षर गुरु है, शेष लघु है और अतः यहाँ 'कामदत्ता' छन्द है ॥ ५८॥ २८. अप्रमेया ( भुजङ्गप्रयात) अनुवाद-जिस जगती जाति के बारह अक्षर के पाद में प्रथम, चतुथं, सप्तम एवं वशम अक्षर लघु हों, शेष गुरु हों तो 'अप्रमेया' नामक वृत्त होता है।। ५९॥

१. क. (भ ) सुतनु । २. ग. चरणारविन्दमन्दा। ३. ख. त्वमसि मृगसमाक्षि काममत्ता। ४. क. (भ.) लघुन्यथ। ५. ख. द्वादशाक्षरके पादे।

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३०० नाव्यशास्त्र

न ते काचिदन्या समा दृश्यते स्त्री `नृलोके विशिष्टा गुणैरद्वितीयैः । ·त्रि लोक्यां गुणज्यान् समाहृत्य सर्वान् जगत्यप्रमेयाऽसि सृष्टा* विधात्रा ॥ ६० ॥

उदाहरण जैसे-

ISSISS ISSISS न ते का चिदन्या समा दू श्यते स्त्री नुलोके विशिष्टा गुणैरद्वितीैः। त्रिलोक्यां गुणाग्रधान् समाहृत्य सर्वान् जगत्यप्रमेयाऽसि सृष्टा विधात्रा ॥ ६० ॥ इस मानव लोक में अद्वितीय गुणों से विशिष्ट तुम्हारे समान अन्य कोई स्त्री दिखाई नहीं देती, क्योंकि विधाता ने त्रिलोको में सभी श्रेष्ठ गुणों को इकट्ठा करके जगत् में अप्रमेय तुम्हें बनाया है॥ ६० ॥ इस श्लोक के प्रत्येक पाद में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम एवं दशम अक्षर लघु है और शेष गुरु हैं, अतः यहाँ 'अप्रमेया' छन्द है ॥ ६० ॥ विशेष-इसे ही पिङ्गल तथा अन्य आचार्यो ने 'भुजङ्गप्रयात' नामक छन्द कहा है। 'भुजङ्कप्रयात' छन्द का लक्षण अन्य आचार्यों ने "भुजङ्गप्रयातं चतुभियकारैः" लिखा है अर्थात् जिस जगतो छन्द के प्रत्येक पाद में चार यगण (ISS) हों उसे भुजङ्गप्रयात छन्द कहते है। जैसे-

यगण यगण यगण यगण

S S S S 1 S S ISS -

न ते का चि द न्या स मा श्य ते स्त्रो इस पाद में चार यगण है अतः यह भुजङ्गप्रयात छन्द है।

१. ख. ग गुणैर्वाद्वितीया तृतीयापि चास्मिन् । २. ख. ग. ममेयं मतिर्लोकमालोक्य सर्व। ३. क. दृष्टा ।

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पञंचदशोगव्यायं: द्वितीयं पञ्चमं चैव ह्यष्टमैकादशे तथा। पादे यत्र लघूनि स्युः पग्मिनी नाम सा यथा ॥ ६१॥ देहतोयाशया वकत्रपद्मोज्ज्वला नेत्रभूङ्गाकुला दन्तहंसस्मिता। केशपाशच्छदा चक्रवाकस्तनी पद्मिनीव प्रिये भासि मे सर्वदा ॥६२॥

२९. पद्मिनी अनुवाद-बारह अक्षर के पाद वाले जिस छन्द के प्रत्येक पाद में द्वितीय, पञचम, अष्टम तथा एकादश अक्षर लघु हों और शेष वर्ण गुरु हों, उसे 'पझ्मिनी' नामक वृत्त कहते हैं।। ६१ ॥ विशेष-अन्य आचार्यों ने 'पदिमनो' को ही 'स्त्रग्विणो' नामक छन्द कहा है।। ६१ ।। उदाहरण जैसे- रगण रगण रगण रगण

SIS SIS SIS SIS देहतो याशया वक्त्रप दुमोज्ज्वला नेत्रभृङ्गाकुला दन्तहंसस्मिता। केशपाशच्छदा चक्रवाकस्तनी प्मिनीव प्रिये भासि मे सर्वदा ॥ ६२॥ TER "हे प्रिये ! तुम्हारा शरोर जलाशय है, मुख विकसित कमल है, नेत्र आकुल भोंरे हैं, मुस्कराहट युक्त तुम्हारे दन्त हंस है, केशपाश छद (सेवार) हैं और स्तन चक्रवाक हैं, इस प्रकार पद्मसर को भाँति शोभित हो रही हो ॥ ६२॥ इस श्लेक के प्रत्येक पाद में द्वितीय, पञ्चम, अष्टम, एवं एकादश अक्षर लधु हैं और शेष गुरु है। अतः यह 'पदिमनी' नामक वृत्त का उदाहरण है। १. ख अष्टमैकादशं यथा। २. इतः परं 'क' पुस्तकेऽघोलिखितं पद्मिनोलक्षणमधिकं दृश्यते- रास्त्रिकाः सागराख्या निविष्टा यदा स्यात् त्रिके च त्रिके युक्तरूपा यतिः । सन्निविष्टा जगत्यास्ततस्सा बुरधर्नामतश्चापि संकीत्यंते पथ्मिनी॥

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नाडघशास्त्रे

उदाहरणान्तरं यथा- 'फुल्लपद्मानना त्वं द्विरेफेक्षणा केशपत्रच्छदा चक्रवाकस्तनी। पीततोयावली बद्ध काञचीगुणा प्मिनीव प्रिये ! भासि नोरे स्थिता ॥ ६३॥

अन्य उदाहरण- रगण रगण रगण रगण

िह्ी स शाए SIS SIS SIS SIS फु हल प दमानना त्वं द्विरे फेक्ष णा केशपत्रच्छदा चक्रवाकस्तनी। पीततोयावलो बद्धकाञचोगुणा पदिमनीव प्रिये ! भासि नीरे स्थिता॥ ६३॥ "हे प्रिये! जल में स्थित तुम खिले हुए कमल रूपो मुखवालो, भ्रमर रूप नेत्र वाली, पोत जल रूप बाँधो हुई करधनो वाली पझ्मिनी (पद्मसर) के समान लग रहो हो ॥ ६३ ॥ यहाँ पर प्रत्येक चरण में द्वितीय, पञ्चम, अष्टम एवं एकादश अक्षर लघु हैं, शेष गुरु है। अतः यहाँ 'पझ्मिनी' का 'स्त्रग्विणी' छन्द हैं। विशेष-गायकवाड़ संस्करण में 'पथ्मिनी' बुत का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया जाता है- रास्त्रिका: सागराख्या निविष्टा यदा स्यात् त्रिके च त्रिके युक्तरूपा यतिः। सन्निविष्टा जगत्यास्ततस्सा बुधै- र्नामतश्चापि संकीत्यंते पझ्मिनी॥ अनुवाद-जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में चार रगण सन्निविष्ट हों और तीन-तीन अक्षरों पर यति हो, विद्वान् लोग उसे जगती जाति का 'पच्मिनो' या 'स्त्रग्विणी' नामक वृत्त कहते हैं। जैसे-

१. ख. पुस्तके इतः परं कलोकद्वयं नास्ति ।

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३०३

आदौ षट्दशमं चैव पादे यत्र लधून्यथ। जनागलही शेषाणि तु गुरूणि स्युर्जागते पुटसंज्ञिता ॥। ६४।। उपवनसलिलानांबालपद्मैभ्रमरपरभृतानां कण्ठनादैः। मदनमदविलासैः कामिनोनां कथयति 'पुटवृत्तं पुष्पमासः ॥६५॥

रगण रगण रगण रगण FR

SIS SIS SIS 5 देहती याशया पद्मव कत्रोज्ज्वला

यहाँ पर पाद में चार रगण हैं, अतः 'पझ्मिनी' नामक छन्द है।

३०. पुट

अनुवाद-जिस बारह अक्षरों वाले पाद में प्रत्येक पाद का प्रथम छः वर्ण एवं बशम अक्षर लघु हों और शेष गुरु हों, तो 'पुट संज्ञक' वृत्त होता है॥ ६४॥

उदाहरण जैसे-

उपव नसलि लानां बा लप दमै- भ्रंमरपरभृतानां कण्ठनादैः। मदनमदविलासैः कामिनीनां कथयति पुटवृत्तं पुष्पमासः।। ६५।।

१. ख. पुस्तकेऽघोलिखितं पुष्पवृत्तलक्षणमधिकं दृश्यते- यदि चरणनिबिष्टौ नौ तथा म्यौ यतिविधिरपि युक्त्याष्टाभिरिष्टः। भवति व जगतोस्थः सवंदा स इह हि पुटवृत्तं नामतस्तु ॥ २. क. (टि०) बालपद्मे। ३. क. (टि०) कण्ठनादे। ४. क. (टि०) समदगतिविलासे। ५. क. (टि०) कथयति पटुलवूत्तं।

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३०४ नाटघशास्त्रे

द्वितीयान्त्ये चतुर्थ च नवमैकादशे गुरु "विच्छेदोऽतिजगत्यां तु चतुर्भिः सा प्रभावतो॥ ६६ ॥ उपवनेति। पुटस्य युगलस्य वृत्त तथा चोपवनं सलिलं चेति युग्मम्, एव- मन्यत् ॥६५ ॥

अनुवाद-यह पुष्पमास उपवन के जलाशय में उत्पन्न नूतन कमलों से, भौरे और कोयल के कण्ठनादों से, कामिनी नारियों के काम मद से उत्पन्न विलासों के द्वारा यह पुष्पमास पुटवृत्त (युगल वृत्त ) को कह रहा है। ६५ ।। यहाँ पर प्रत्येक पाव आदि के छः अक्षर और वशम वर्ण लघु हैं और शेष गुरु हैं। अतः यहाँ 'पुटवृत्त' छन्द है। अभिनव-उपवनेति-पुटवृत्त का अर्थ है युगल का वृत्त और यहाँ उपवन तथा सलिल युगल हैं। इसी प्रकार अन्य भो भ्रमर-कोयल आदि युग्म हैं ॥ ६५॥ विशेष-गायकवाड़ संस्करण में पुटवृत्त का निम्नलिखित लक्षण अषिक पाया जाता है। यदि चरणनिविष्टौ नौ तथा म्यौ यतिविधिरपि युक्त्याऽष्टाभिरिष्ट:। भवति च जगतीस्थः सर्वदासौ य इह हि पुटवृत्तं नामतस्तु ॥। अनुवाद-यदि जगती जाति के छब्व के प्रत्येक पाद में दो नगण, मगण यगण हों और आठ अक्षरों पर यति हो तो 'पुटवृत्त' नामक छन्व होता है। जैसे- नगण नगण मगण यगण 7 1 SSS I SS उपव नसलि लानांबा लप दमै- भ्रमरपरभृतानां कण्ठनादैः। यहाँ पर पाद में दो नगण, मगण और यगण हैं। अतः यहाँ 'पुटवृत्त' नामक छन्द हैं।।

१. ब. ग. द्वितीयं च चतुर्थ च। २. क, भ. पादे तु जगतीसंस्थे यत्र सा तु प्रभावती।

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पञ्चवद्योउ्याय: ३०५

कथं न्विदं कमलविशाललोचने! गृहं 'धनैः पिहितकरे दिवाकरे' 1 अचिन्तयन्त्यभिनववर्षविद्युत- स्त्वमागता सुतनु ! यथा प्रभावती॥६७ ॥।

३१. प्रभावती (अतिजगतो जाति, त्रयोदशाक्षरावृत्ति )

अनुवाद-यदि अतिजगती जाति के वृत्त के प्रत्येक पाद का द्वितीय, चतुर्थ, नवम, एकादश तथा द्वावश अक्षर गुरु हों, शेष लधु हों तथा चार-चार अक्षरों पर यति हो तो 'प्रभावती' नामक वृत्त होता है । ६६ ।।

जैसे-

5 कथ न्वि दं क म ल वि शा ल लो च ने गृहं धनेः पिहितकरे दिवाकरे। अचिन्तयन्त्यभिनवर्षविद्युत- स्त्वमागता सुतनु यथा प्रभावती ॥ ६७ ।। अनुवाद-हे कमल के समान विशाल नेत्रों वाली सुन्दरि ! बादलों के द्वारा सूय के ढक जाने पर अर्थात् अंधेरा हो जाने पर, नूतन वर्षा तथा बिजली की परवाह न करती हुई तुम प्रभावती के समान मेरे घर कैसे चली आई ? ॥६७॥ इस श्लोक में प्रत्येक पाद का द्वितीय, चतुर्थ, नवम, एकादश तथा द्वादश वर्ण गुरु है, शेष वर्ण लघु है। अतः 'प्रभावती' नामक वृत्त है॥ ६७ ॥।

१. क. (भ.) अदः कथं। २. क. (भ.) गृहं गता। ३. ख. ग. निशाकरे। ४. क. (भ.) न मानसे भयमतिवृष्टिसम्भवं पराक्रमैस्त्वमसि। ५. क. (प.) समागता । ना. था०-३९

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३०६ नाटयशार्त्रे

त्रीण्यादावष्टमं चैव दशमं नैधनन्वयम्' *गुरूण्यतिजगत्यां तु त्रिभिश्छेदैः प्रहर्षिणी ॥ ६८॥ भावस्थमंधुरकथैः सुभाषितैस्त्वं साटोपस्खलित विलम्बितैर्गतैश्च *शोभाढ्चैर्हरसि मनांसि "कामुकानां सुव्यक्तं ह्यतिजगती प्रहर्षिणी च' ॥ ६९॥

३२. प्रहर्षिणी (त्रयोदशाक्षरावृत्ति ) अनुवाद-अतिजगतो जाति के जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में आदि के तीन वर्ण तथा अष्टम, दशम एवं अन्त के दो वर्ण अर्थात बारहवाँ और तेरहवाँ अक्षर गुच हों, शेष लघु हो तथा तीन-तोन अक्षरों पर यति हो तो, प्रहर्षिणी' नामक वृत्त होता है॥ ६८ ।। उदाहरण जेसे-

भावस्थैमंधुर क थैः सुभा षि तै स्तवं साटोपस्खलित विलम्बितैर्गतैश्च। शोभाढचैहंरसि मर्नासि कामुकानां सुव्यक्तं हयसि जगति प्रहर्षिणी ॥६९ ॥ अनुवाद-हे युवति ! तुम भावपूर्ण मधुर कथाओं वाले सुभाषिरतो से और गव के साथ लड़खड़ाती हुई विलम्बित (मन्द) गति से कामुकों के मन को हर लेती हो, अतः इस संसार में तुम प्रहर्षिणो (हर्षित करने वालो) हो, यह स्पष्ट है।। ६९। इस श्लोक के प्रत्येक पाद का आदि के तोन अक्षर तथा अष्टम, दशम, द्वादश एवं त्रयोदश वर्ण गुरु हैं, शेष लघु हैं, और तोन-तीन अक्षरों पर यति है, अतः 'प्रहर्षिणी' नायक वृत्त है ॥ ६९।।

१. ख. ग. नैधनं तथा। २. क. (भ.) गुरूणि पाद ह्यत्रैव यस्या: सा प्रहर्षिणी। ३. क. (टि०) मधुरसकैः। मधुरतरैः । ४. क. (टि०) नानाङ़्। ५. क. (टि०) मानवानां। ६. क. (टि०) श्वम्।

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३०७

षष्ठं त्रयोदशाक्षरे सप्तमं चैव दशमैकादशे लघु। त्री पादे ज्ञेयं मत्तमयूरकम् ॥ ७० ॥ विद्युन्नद्धाः वातोद्धूताः श्वेतवलाकाकृतशोभाः१। एते मेघा गर्जितनादोज्ज्वलचिह्नाः* प्रावृट्कालं मत्तमयूरा: कथयन्ति ॥ ७१ ॥

३३. मत्तमयूरक अनुवाद-त्रयोदशाक्षर पाद वाले जिस छन्द के प्रत्येक पाद में छठां, सातवाँ, दशवाँ और ग्यारहवाँ अक्षर लघु हों और शेष वर्ण दीघं हों तो 'मत्तमयूर' नामक वृत्त कहलाता है।। ७० ।। उदारण जैसे-

विद्युन्नद्धाः सेनधनूरकिजित दे हा- वातोद्धूता: इ्वेतबलाकाकृतशोभाः। एते मेघा गजितनादोज्वलचिह्नाः प्रावृदकालं मत्तमयूरं कथयन्ति ॥ ७१॥ "बिजली की चमक से युक्त, इन्द्रधनुष से रञ्जित देह वाले, वायु के द्वारा उड़ाये जाते हुए, सफेद बगुलों की कतार से सुशोभित और गरजते हुए नाद से उज्ज्वल ये मेघ मतवाले मयूरों को वर्षाकाल को सूचना दे रहे हैं"॥ ७१॥ इस श्लोक के पाद में षष्ठ, सप्तम, दशम एवं एकादश अक्षर लघु और शेष गुरु है। अतः यहाँ 'मत्तमयूर' वृत्त है ॥ ७१॥

१. क. (टि०) तथा। २. क. (भ.) लघूनि यस्य पादे तु गच्छेन्मत्तमयूरताम् ।

४. क. (टि०) कृतचिह्काः । ५. क. (भ.) गर्जितगम्भोरनिनादैः । ६. क. बतमयरं।

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३०८ नाटथशाएन

आदौ ह्े चतुर्थ चाष्टमैकादशे गुरु। अन्त्योपान्त्ये च शक्वर्या वसन्ततिलका' यथा ॥ ७२॥ चित्रैवंसन्तकुसुमैः कृतकेशहस्ता

नानावतंसकविभूषितकर्णपाशा साक्षादवसन्ततिलकेव विभाति नारी॥ ७३॥ चित्रैरिति। वसन्तस्य यस्तिलकस्तस्यास्ति उपमानं त्वनेनेति। साक्षादिति। छन्दानुर्वातनीत्यथं: ।। ७३।। ३४. वसन्ततिलका (शक्वरी जाति, चतुर्दशाक्षरा वृत्तिः) अनुवाद-चतुर्दशाक्षरा शक्वरी जाति के वृत्त के प्रत्येक चरण में यदि प्रारम्भ के दो तथा चौथा, आठवाँ, ग्यारहवाँ, तेरहवाँ तथा चौदहवाँ वर्ण गुरु हों, शेष लघु हों तो 'वसन्ततिलका' नामक बृत्त कहलाता है॥ ७२॥ उदाहरण जैसे- S S ISILIS IISISS चित्रैः वसन्तकुसुमैः कृतकेशहस्ता- स्रग्वाममाल्यरचनासु विभूषिताङ्गी। नागावतंसकविभषितकर्णपाशा साक्षाद्वसन्ततिलकेव विभाति नारी॥ ७३॥ अनुवाद-नाना प्रकार के वासन्तिक फूलों से केशपाश को सजाये हुए, फूलों से गुथो हुई मालाओं से शरोर को विभूषित किये हुए, नाना प्रकार के कर्णा- भूषणों से (अथवा नागकेसर के फूलों से) विभूषित कर्णपाश वाली नारी साक्षात् वसन्ततिलका के समान सुशोभित हो रहो है॥ ७३ ॥ इस पद्य के प्रत्येक चरण में आदि के दो अक्षर तथा चौथा, आठवाँ, ग्यारहवां, तेरहवाँ एवं चौदहवाँ वर्ण गुरु हैं, और शेष लघु हैं। अतः यहाँ 'वसन्त- तिलका' छन्द है॥ ७३ ॥ अभिनव-वसन्त का जो तिलक है, उसका इसके साथ उपमानत्व है। 'साक्षात्' का अर्थ है, अभिप्राय का अनुसरण करने वाली। १. क. (टि०) वसन्ततिलका, उद्धर्षिणीति सैतवाचार्येण, सिंहोन्नतेति काश्यपेन, मधुमाघवीति गोमानसेन, चेतोहितेति रामकीर्तिना लक्षिता "इन्दुमुखो सैतवस्य" जनाश्रय्यामुक्तम। "उद्धर्षिणी सैतवस्य" इति पिङ्गलः । २. ख.ग. विभूषितगण्डपाली।

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पश््चदश्ञोउ्याय: १०९

पञ्चादौ शक्वरो पादे गुरुणि त्रीणि नैधने। पञ्चाक्षरादौ च यतिरसंबाधा तु सा यथा*॥ ७४॥ यथा- मानी लोकज्ञः सुतबलकुलशीलाढयो यस्मिन्सम्मानं न सदृशमनु पश्येद्धि। गच्छेत्तं त्यक्त्वात्तं द्रुतगतिरपरं देशं कोर्णा नानार्थैरवनिरियमसंबाधा॥ ७५॥ ३५. असम्बाधा (चतुर्दशाक्षरा वृत्ति ) अनुवाद-चौदह अक्षर वाले शक्वरी जाति के प्रत्येक पाद में यदि आदि के पांच अक्षर और अन्त के तीन अक्षर गुरु हों, शेष लघु हों, और पांच अक्षरों पर यति हो तो 'असम्बाधा' नामक बृत्त होता है।। ७४॥। उदाहरण जैसे- 12

मानी लोकज्ः श्रुतबलकुलशीलाढचो यस्मिन् सम्मानं न सदृशमनु पश्येद्धि। गच्छेत्तं त्यक्त्वा तं द्रुतगतिरपर देशं कीर्णा नानाथैरवनिरियमसम्बाधा॥ ७५॥ अनुवाद-लोकवृत्त को जानने वाला, शास्त्र, बल, कुल और शोल से सम्पन्न मानो पुरुष जहाँ पर अपने अनुकूल सम्मान को नहीं पाये, उसे उस स्थान को छोड़कर शीघ्र ही दूसरे स्थान पर चला जाना चाहिए। क्योंकि नाना अर्थो से पूर्ण यह पृथ्वो सङ्गोर्ण नहीं है।। ७५ ।। यहाँ पर प्रत्येक पाद के आदि के पांच और अन्त के तोन वर्ण गुरु हैं और शेष लधु है। अतः यहाँ 'असम्बाधा' नामक बृत्त है॥ ७५॥ १. क. (भ) चतुर्दशाक्षरे पादे पञ्चादी त्रीणि नैघने। यस्या गुरूण्यसम्बाघा नाम्ना ज्ञेया तु सा बुधः ॥ २. ख. ग. चान्ततः ३. ख. ग. स्मृता। ४. क. (भ) यस्मिन्सामान्यं। ५. क. (भ.) पश्येत्तं।

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३१० नाटयशास्त्रे

चत्वार्यादौ गुरूणि स्युदशमैकादशे तथा। अन्त्योपान्त्ये च शक्वर्याः पादे तु शरभा यथा । ७६ ॥। यथा- एषा कान्ता व्रजति ललिता वेपमाना गुल्मैश्छन्नं वनमभिनवैः संप्रविद्धम्। 'हा हा कष्टं किमिदमिति नो वेग्यि मूढो व्यक्तं कान्ते ! शरभललितात्वं क रोषि ॥ ७७॥ ३६. शरभा ( चतुर्दशाक्षरा वृत्ति: ) अनुवाद-यदि चौदह अक्षर वाले शक्वरो जाति के प्रत्येक पाद में आदि के चार वर्ण तथा दशवाँ, ग्यारहवा, तेरहवाँ और चौदहवाँ अक्षर गुरु हों और शेष लघु हों तो 'शरभा' नामक वृत्त होता है।। ७६ ॥ उदाहरण जैसे- SSSS 1II 1IS SISS एषा कान्ता व्रजति ललितं वेपमाना गुल्मैश्छन्नं वनमभिनवः संप्रविद्धम्। हा हा कष्टं किमिदमिति नो वेदिम मूढ़ो व्यक्तं कान्ते शरभललिता त्वं करोषि॥७७ ॥ अनुवाद-यह कान्ता अभिनव गुल्मों से आच्छन्न वन में ललित गति से कांपतो हुई जा रही है। हा हा बड़े कष्ट की बात है कि मूर्ख मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि यह क्या है ? हे कान्ते ! स्पष्ट है कि तुम हाथी के बच्चे की तरह चेष्टाएँ कर रहो हो।। ७७॥ इस श्लोक के प्रत्येक पाद में आदि के चार तथा दशम, एकादश, त्रयोदश तथा चतुर्दश वर्ण गुरु हैं और शेष लघु है, अतः यहाँ 'शरभ' नामक वृत्त है॥ ७७॥ १ ख. आदो चतुर्गुरूणि स्युर्दशमैकादशे तथा। क. (भ) चत्वार्यादी हि दशमं ततोऽन्यच्च भवेद्गुरु। २. क. (टि०) गुल्मच्छन्नं वनमुरुनागैः प्रवृद्धम् । ३. क. (टि०) अहो कष्टं किमिदमिति संविग्नचेष्टा। ४. ख. ग. व्यक्तं क्रोघाच्छरभललितं कतुँकामा । क. (टि०) व्यक्तं क्रोडाच्छरमललित हतु कामा।

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आदौ षट् दशमं चैव लघु चैव त्रयोदशम् । यत्रातिशक्वरे पादे ज्ञेया नान्दीमुखी तु सा। ७८॥ यथा- जडड

न खलु तव कदाचित्क्रोधताम्त्रायताक्षं भ्रुकुटिव लितभङ्गं दृष्ट पूर्व मयास्यम्"। किमिह बहुभिरुक्तैर्या ममेच्छा हुदिस्था त्वमसि मधुरवाक्या देवि ! 'नान्दीमुखीव।। ७९ ॥।

३७. नान्दीमुखी ( अतिशकवरी जाति, पञ्चदशाक्षरा वृत्ति) अनुवाद-यदि अतिशक्वरी जाति के पञ्चदश अक्षरों वाले पाद में आदि के छः वर्ण और दसवाँ एवं ग्यारहवाँ अक्षर लघु हो और शेष वर्ण गुरु हों तो वहाँ 'नान्दीमुखी' नामक जाति होती है।। ७८।। उदाहरण जैसे- I IIIIIES SIS SISS न खलु तव कदाचित् क्रोधताम्रायताक्षं भूकुटिवलितभङ्गं दृष्टपूर्व मयास्यम्। किमिह बहुभिरुक्तैर्या ममेच्छा हुदिस्था त्वमसि मधुरवाक्या देवि नान्दीमुखीव। ७९॥ अनुवाद-हे देवि ! मैंने कभी भी तुम्हारे मुख को क्रोध से लाल नेत्रों वाला तथा भुकुटियों के वक्र विलास से युक्त नहीं देखा था। अब और अधिक कहने से क्या लाभ? हे देवि ! तुम हृदय में बसने वाली मेरी अभिलाषा नान्दीमुखी की तरह मधुरभाषिणी हो।। ७९ ॥ १. स. लघूनि स्युस्त्रयोदश । २. ख. यत्र पञ्चदशे पादे ज्ञेया नान्दीमुखीति सा।5P ३. क. (टि०) वद। ४. क. (टि०) भ्रकुटिपुटतरङ्ग। ५. क. (टि०) तवास्यम। ६. क. (टि०) वेद्धि मान्दीमुखा त्वम्।

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२१२ नाठयशास्त्रे

आद्यं चतुर्थं षष्ठं च नैधनं च यदा गुरु। षोडशाक्षरके पादे यत्रेभललितं तु तत् ॥ ८० ॥ यथा- तोयधरैः' सुधीरधनपटुपटहरवैः" सजंकदम्बनीपकुटजकुसुमसुरभिः - कन्दलसेन्द्रगोपकर चितमवनितलं' वीक्ष्य करोत्यसौ वृषभगजविलसितम्।।८१।

नान्दीमुखीति नान्यां मङ्गलदुन्दुभेरिव मुखं यस्याः॥७८।

यहाँ पर प्रत्येक पाद में आदि के छः वर्ण तथा दशम एवं त्रयोदश वर्ण लघु हैं, शेष गुरु हैं, अतः यहाँ 'मान्दीमुखी' नामक वृत्त है॥ ७९॥ अभिनव-नान्दीमुखीति-नान्दी पाठ के समय बजाये जाने वाले दुन्दुभि की तरह जिसका मुख हो, वह नान्दीमुखी है॥ ७८। विशेष-अन्य आचार्यो ने 'नान्दीमुखी' को 'मालिनी' वृत्त कहा है। ३८. गजविलसितम् (शोडशाक्षरा वृत्ति ) अनुवाद-यदि सोलह अक्षर वाले पाद में पहला, चौथा, छठाँ और अन्तिम वर्ण गुरु हो और शेष लघु हों तो 'गजविलसितम्' वृत्त कहलाता हैं॥ ८० ॥

१. क. (टि०) गुरुण्यथ। २. ख. गज विलसितं तु तत्। ३. इतः परं 'क' पुस्तकेऽघिकमिदं दृश्यते- क स्रो यदि नाव्च नित्यमिह विरचितचरणा गव्च तथा च वै भवति निघनमुपगतः । स्यादपि चाष्टिमेव यदि सततमनुगतं सल्खलु वृत्तमग्रवूषभगजविलसितम्॥ ४. ग. घर:। ५. ख. पदुपटहरषः । क. (टि०) पटुविशदनिनदितैः । ६. क-म. भत्तगजविलसितकम्। ७. ग. अन्त्ये ढ़े यत्र दीर्घामि प्रबरं ललितं हि तत्।

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३१३

तोयधरैरिति गज एवं, वा गजोचितं विलासं करोति। इदमिदं वीक्ष्य ।८१।।

उदाहरण जैसे- SIIS ISIIIIIS तोयधरै: सुधीरघनपटह रवंः सर्जकवम्बनीपकुटजकुसुमसुरभि:। कम्दलसे्व्रगोपकरचितमवनितलं वीक्ष्य करोत्यसौ वृषभगजविलसितम् ॥।८१ । अनुवाद-घन नगाड़े को आवाज के समान गम्भीर ध्वनि वाले मेघों से व्याप्त, स्ज कवम्ब, नोप एवं कुटज के फूलों से सुगन्धित, कन्द (कन्वली) एवं इन्द्रगोप (लाल रङ्ग की कोड़े) से रञ्जित पृथ्वो तल को देख कर वह वृषभगज की तरह चेष्डाएँ कर रहा है।। ८१ ।। यहाँ पर प्रत्येक पाद का प्रथम, चतुर्थ, षष्ठ एवं अन्तिम वर्ण गुरु है और शेष वर्ण लघु हैं। अतः यहां 'गजविलसितम्' छन्द है ॥। ८१॥ अभिनव-तोयधरैरिति-गज ही, अथवा गज के सदृश विलास करता है। इसको देखकर ऐसा करता है ॥ ८१॥ विशेष-गायकवाड़ (बड़ौदा) संस्करण में इसे 'वृषभगजविलसितम्' कहा गया है। वहाँ इसका लक्षण निम्नलिखित प्रकार दिया गया है- भ्रौ यदि नाश्च नित्यमिह विरचितचरण: गश्च तथा च वै भवति निधनमुपगतः। स्यादपि चाष्टिमेव यदि सततमनुगतं तत्खलु वृत्तमग्रवृषभगजचेष्टितम् ।। "जिसके प्रत्येक पाद में भगण, रगण और तीन नगण हो और अन्त में एक गुरु हो तो 'अष्टि' का निरन्तर अनुगमन करने वाला 'वृषभगज चेष्टित' नामक वृत्त होता है।।" इसका उदाहरण उपर्युक्त है।। ना. पा०-४०

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३१४ नाटघशास्त्रे

आद्यात्पराणि वै पञ्च द्वादशं सत्रयोदशः । अन्त्योपान्त्ये च दीर्घाणि ललितप्रवरं हितत्॥८२॥

यथा- नखालीदं गात्रं दशनखचित्तं चोष्ठगण्डं शिरः पुष्पोन्मिश्रं प्रविलुलितकेशालकान्तम्। गति: खिन्ना" चैयं वदनमपि संभ्रान्तनेत्रं अहो श्लाध्यं वृतं प्रवरललितं कामचेष्टम्॥ ८३ ॥

३९. प्रवरललित (षोडशाक्षरा वृत्ति )

प अनुवाद-जिस वृत्त के प्रत्येक पाद का प्रथम अक्षर के बाद पांच अक्षर तथा बारहवाँ, तेरहवाँ, पन्द्रहवाँ एवं सोलहवाँ अक्षर बीर्घ हों और शेष छघु हों तो 'प्रवरललित' वृत्त होता है। ८२ ॥

१. ग. अन्त्ये हि यत्र दीर्घाणि प्रवरं ललितं हि तत्। २. इतः परं 'क' पुस्तके प्रवरललितलक्षणमित्त्थमधिकं दृश्यते- यदा य्मौ पादस्थौ भवत इह चेत्स्तौ तथा गौ। तथा षड्भिक्चान्यैयंतिरपि च वर्णैयंथा स्यात्। तदप्यष्टी निष्यं समनुगतमेवोक्तमन्यैः । प्रयोगज्ञैवृ तं प्रवरललितं नामतस्तु ।। ३. ख. दशननिहितं। क. (टि०) दशनविहतं। विकचवशनं । ४. क. (टि०) केशाग्रकान्तं। ५. क. (टि०) गतिमन्दा चेयं। गतिः मन्दायामा। ६. क. (टि०) यद् भ्रान्तनेत्रं। ७. क. (ट०) कामवेषम्।

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३१५

उदाहरण जैसे- IS SSSS IIIIISS ISS न खा लो ढ़ं गात्रं दशन खचित ञचो ष्ठ गण्डं शिर: पुष्पोन्मिअं प्रविलुलितकेशालकान्तम् । गतिः छिन्ना चेयं वदनमपि सम्भ्रान्तनेत्रं अहो इलाध्यं वृत्तं प्रवरललितं कामचेष्टम् ।। ८३ ।। "नायिका का शरीर नखक्षत से युक्त है, ओष्ठ तथा कपोलों पर दन्तक्षत हैं, शिर पर फूल मिश्रित हैं, मस्तक पर केश इतस्ततः विखरे हुए हैं, गति (चाल) मन्द है अर्थात् लड़खड़ा रहो है, और मुख भ्रान्त नेत्रों से युक्त है, अहो! उसका काम चेष्टाएँ ललित एवं श्लाधनीय है।"॥। ८३ ।। इस छन्द के प्रत्येक पाद में द्वितोय, तृतोय, चतुर्थ, पञ्चम, षष्ठ, द्वादशा, त्रयोदश, पञ्चदश एवं सोलहवाँ अक्षर गुरु है और शेष लघु। अतः यहाँ 'प्रवरललित' वृत्त है।। विशेष-गायकवाड़ संस्करण में प्रवरललित का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया जाता है- यवा स्मौ वादस्थौ भवत इह चेतु स्तौ गौं तथा षड्भिश्चान्यैयतिरपि च वर्णयंथा स्यात। : 3 तवप्यष्टौ नित्यं समनुगतमेवोक्तमन्यैः प्रयोगज्ञवृंत्तं प्रवरललितं नामतस्तु ॥। "जहाँ अष्टि जाति के वृत्त के प्रत्येक पाद में यगण, भगण, नगण, सगण, रगण और अन्त में एक गुरु हो तथा छःछः अक्षरों पर यति हो, तो उसे आचार्यो ने 'प्रवरललित' नामक वृत्त है।" जैसे- यगण मगण नगण सगण रगण गुरु iSS SSs 111 SISS नखालो ढूं गात्रं दशन ख चित ज्चोष्ठ गण्डं

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नांटपंशास्न्रे

आद्यात्पराणि पञ्चाथ द्वादशं सत्रयोदशम्। अन्त्यं सप्तदशे पादे शिखरिण्यां गुरूणि च॥ ८४॥ यथा- महानद्या भोगं पुलिनमिव ते भाति जघनं तथास्यं नेत्राढयं भ्रमरसहितं पङ्कजमिव। तनुस्पशच्छायं सुतनु सुकुमारो न पुरुषः स्तनाभ्यां ताभ्यां त्वं शिखरिणि "सुपोनासि वनिते॥ ८५॥

४०. शिखरिणी (सप्तदशाक्षरा वृत्ति) अनुवाद-जहाँ पर सत्तरह अक्षर के पाद में पहिले के बाद के पांच अक्षर अर्थात् द्वितीय, तृतोय, चतुर्थ, पञ्चम, षष्ठ तथा द्वावश, त्रयोदश और अन्तिम व्ण गुरु हों, शेष लघु हों तो 'शिखरिणो' नामक छन्द होता है।। ८४॥ उदाहरण जैसे-

ISSS SS IIIIIS SI TIS महानद्या भोगं पुलिनमिव ते भाति जघनं तथास्यं नेत्राढयं भ्रमरसहितं पङ्गजमिव। गतिर्मंन्वा चेयं सुतनु ! तव चेष्टा सुललिता- स्तनाभ्यां ताभ्यां त्वं शिखरिणि सुपोनासि वनिते ॥ ८५॥

१. क. (भ.) गुरुस्मृतम् । इतः परं 'क' पुस्तकेऽधोलिखितं लक्षणमधिकं दृश्यते- चतुर्भिस्तस्यैव प्रवरललितस्य त्रिकगणै- यंदा लौ गश्चान्ते भवत चरणेऽत्यष्टिगदिते। यदा षड भिश्छेदो भवति यदि मार्गेण विहित- स्तदा वृत्तेष्वेषा खलु शिखरिणी नाम गदिता।। २. ख. ग. महानद्या भोगे। ३. क. (टि०) नेत्रास्यं। ४. क. (म.) गतिमंन्दा चेयं सुतनु ! तव चेष्टा सुललिता। ५. क. ख. निभाभासि दयिते। ममाभासि दयिते।

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यत्र पञ्च लघून्यादौ त्रयोदशचतुदशे। षोडशैकादशे चैव तत्स्याद् वृषभचेष्टितम् ॥ ८६॥

अनुवाद-हे सुतनु ! तुम्हारी जङ्घाएँ महानवी के पुलिन के समान बीघं है, और नेत्रों के सहित तुम्हारा मुख भ्रमरयुक्त कमल के समान है, तुम्हारी गति मन्द है और चेष्टाएँ सुललित है। हे वनिते ! तुम पीन स्तनों से युक्त शिखरिणी (पहाड़ी ) जैसी सुशोभित हो रही हो।। ८५॥ यहाँ पर प्रत्येक पाद में द्वितोय, तृतीय, चतुर्थं, पञ्चम, षष्ठ, द्वादश, त्रयोदश तथा अन्तिम वर्ण गुरु है और शेष लघु है। अतः यहाँ शिखरिणी नामक वृत्त है।।८५॥ विशेष-गायकवाड़ संस्करण में शिखरिणो का निम्नलिखित लक्षण अषिक पाया जाता है- चतुर्भिस्तस्यैव प्रवरललितस्य त्रिकगणै- यंवा लौ गश्चान्ते भवत चरणेऽत्यष्टिगदिते। यदा षड्भिश्छेदो भवति यदि मार्गेण विहित- स्तदा वृत्तेष्वेषा खलु शिखरिणी नाम गतिता। "यदि अत्यष्टि जाति के प्रत्येक पाद में उसी प्रवरललित चार त्रिक गण अर्थात् यगण, मगण, नगण, सगण और एक भगण, एक लघु एवं अन्त में गुरु हों तो 'शिखरिणी' नामक वृत्त होता है।" यगण मगण नगण सगण भगण

ISS SSS TIS SIAIS महान द्याभोगं पुलिन मिव ते भाति ज घनं

१. इतः परं 'क' पुस्तकेऽघोलिखितं दश्यते- यदि हि चरणे न्सौ स्लौ गः क्रमाद्विनिवेशिता: यदि खलु यतिः षड भिवर्णेस्तथा दशभि। पुनः । यदि विहितं स्यादत्यष्टि प्रयोगसुखाश्रयं वृषभललित वृत्तं ज्ञेयं तथा हरिणोति वा।

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-११८ नाटयशास्त्रे

यथा- `जलधररवं श्रुत्वा श्रुत्वा मदोच्छ्यवर्पितो। विलिखितमही शृङ्गाक्षैपैवृषः प्रतिनद्यं च॥। स्वयुवतिवृतो 'गोष्ठाद्गोष्ठं प्रयाति च निर्भयो। वृषभललितं चित्रं वृत्तं करोति च शाहले ॥। ८७ ॥

४१. वृषभचेष्टितम् ( सप्तदशाक्षरा वृत्ति ) अनुवाद-जिस वत्त के पाद के आदि के पांच अक्षर तथा ग्यारहवाँ, तेरहवाँ, चौदहवाँ एवं सोलहवॉ अक्षर लघु हो और शेष अक्षर गुरु हों, उसे 'वृषभ चेष्टित' वृत्त कहते हैं।। ८६ ।। उदाहरण जैसे-

ज ल ध रु र वं ध्रुत्वा श्रुत्वा मदोच्छय वर्पितो विलिखति महों शुङ्गाक्षेपैवृंषः प्रतिनर्द्य च। स्वयुवतिवृतो गोष्ठाद्गोष्ठं प्रयाति च निभयो वृषभललितं चित्रं बृत्तं करोति च शाह्ले ।।८७ ।। 'मेघ के गर्जन को सुन-सुन कर मद के उद्रेक से गर्वित यह वृषभ (सांड़) प्रतिगर्जन करके सोगों के टक्कर से पृथ्वो को खोद रहा है और अपनी युवति गायों के साथ एक गोष्ठ से दूसरे गोष्ठ में निर्भय होकर विचरण करता है तथा हरी घास पर वृषभ की ललित एवं चित्र-विचित्र चेष्टाओं को कर रहा है॥ ८७ ॥। इस पद्य के प्रत्येक चरण में आदि के पांच अक्षर तथा ग्यारहवाँ, तेरहवां, चौदहवाँ एवं सोलहवाँ अक्षर लघु हैं और शेष गुरु है। अतः यहाँ 'वृषभचेष्टित' वृत्त है।। ८७ ।।

१. ख. जलदनिनदं श्रुत्वा गजन् मदोच्चयदर्पितो। २. ग. दोप्तस्मरोत्सवलालितो। ३. ख. गोष्ठोपगोष्ठं।

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३१९

चरवार्यादौ च दशमं गुरु यत्र त्रयोदशम्।न चतुर्दशं तथान्त्ये हे चैकादशमथापि च॥दद ॥ यदा सप्तवशे पादे शेषाणि च लघून्यथ। भवन्ति 'यस्मिन्सा ज्ञेया श्रीधरो नामतो यथा। ८९॥ विशेव-गायकवाड़ संस्करण में 'वुषभचेष्टित' का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया जाता है- र्यादि हि चरणे न्लौ स्त्रौ स्लौ गः क्रमाद्विनिवेशिताः यदि खलु यतिः षड्भिवंर्णैस्तथा वशभ पुनः। यदि च विहितं स्यावत्यष्टिप्रयोगसुखाध्यं वृषभललितं वृत्तं ज्ञेयं तथा हरिणीति वा। "यदि सप्तदशाक्षर वृत्त के प्रत्येक पाद में नगण, सगण, मगण, रगण, सगण, लघु और गुरु हों, और पहिले छः अक्षरों पर फिर दस अक्षरों पर यति हो तो अत्यष्टि जाति का 'वृषभललित' वृत्त होता है अथवा 'हरिणी' नामक वृत्त कहा जाता है।" इसका उदाहरण है- नगण सगण मगण रगण सगण rल० गु० IISSSS SIS जलध ररवं श्रृत्वाश्रु स्वामदो चछुयद पि तो यहाँ पर पाद में नगण, सगण, मगण, रगण, सगण, लघु एवं गुरु हैं, अतः 'वृषभललित' अथवा 'हरिणो' वृत्त है। नोट-पिंगल आदि आचार्यों ने इसे 'हरिणी' कहा है। ४२. श्रीधरा ( मन्दाक्रान्ना ) ( सप्तदशाक्षरा वृत्तिः ) क्षनुवाद-यवि सप्तदश अक्षर के पाद में प्रारम्भ के चार अक्षर तथा बशम, एकावश, त्रयोवश, चतुदंश और अन्त के वो वर्ण अर्थात् सोलहवाँ, सत्तरहवाँ वर्ण गुरु हों और शेष अक्षर लघु हों तो 'श्रीधरा' नामक वृत्त होता है।। ८८ ।। विशेष-पिङ्गलादि आचार्यों ने 'श्रीघरा' को हो 'मन्दाक्रान्ता' कहते हैं।

१. पनर-पत्र ।

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नाटघशास्त्रे स्नानैश्चूर्णेः सुखसुरभिगन्धवासश्च धूपैः' पुष्पश्चान्यैः2 शिरसि रचितैर्वस्त्रयोगैश्च तैस्तैः। नानारत्नै: कनकखचितैरङ्गसंभोगसंस्थै- व्यंक्तं कान्ते! कमलनिलया श्रीधरीवातिभाति ॥ ९०॥

उदाहरण जैसे-

स्नानैश्चूण: सुख सुरभि मिगंन्ध वासैरच धूपैः पुष्पैश्चान्यैः शिरसि रचितैर्वंस्त्रयोगैश्च तैस्तैः। नानारत्नैः कनकखचितैर ङ्गसम्भोगसंस्थै- ध्यंक्तं कान्ते कमलनिलया शीधरेवातिभासि॥८९॥ "सुखद एवं सुरभित चूर्णों से स्नान, सुगन्धित धूप, शिर में गुथे हुए पुष्प, विविध रङ्ग-विरङ्ग वस्त्र और नाना प्रकार रत्नों से जड़े हुए स्वर्णांभूषणों से स्पष्ट हो रहा है कि हे कान्ते ! तुम कमल में निवास करने वालो लक्ष्मो (सौन्दर्य की देवी) सो लग रही हो।। ८१ ॥ इस पद्य के प्रत्येक पाद में आदि के चार वर्ण तथा दशम, एकादश, त्रयोदश, चतुर्दश और अन्तिम दो वर्ण गुरु हैं और शेष लघु हैं। अतः यहाँ 'श्रीधरा' या 'श्रोधरी' नामक वृत्त है॥। ८९ ॥ १. ख. पुस्तके श्रोधरीलक्षणमित्यं वतते- मो स्नो च स्युश्चरणरचितास्तौ गुरू च प्रविष्टा शछेद: श्लिष्टो यदि च दशभिः स्यात्तथान्यैश्चतुभिः। अत्यष्टो व प्रतिनियमिता वर्णतः स्पष्टरूपा सा विज्ञेया द्विजमुनिगण। शीधरी नामतस्तु।। 'क' पुस्तके इदं लक्षणमधिक दृश्यते। २. ख. गण्टुलेपै। सुधूपैः । ग. गन्वसारैब्च धूपः। क. (टि०) गन्ववासैः सुधूपैः। ३. ल. पुष्पैः माल्यैः । ४. ग. निलये। ५. क. (टि०) श्रीधरा त्वं विभासि। श्रीघरेवावभासि।

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पञ्चवशोऽ्याय: ३२१

आद्यं चतुर्थ षष्ठं च दशमं नैधनं गुरु। तद्वंशपत्रपतितं दशभि: सप्तभिर्यतिः।।९१।।

यथा- एष गजोऽद्रिमस्तकतटे कलभपरिवृतः क्रीडति वृक्षगुहमगहने कुसुमभरनते। मेघरवं निशम्य मुदितः पवनजवसमः सुन्दरि ! चंशपत्रपतितं पुनरपि कुरुते ॥ ९२ ॥ विशेष-गायकवाड़ संस्करण में श्रीधरी वृत्त का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया जाता है- मो स्नौच स्युश्चरणरचितास्तौ गुरु च प्रविष्ठा- शछेद: श्लिष्टो यदि च वशभि: स्यात्तथान्यैश्चतुभिः। अत्यष्टौ च प्रतिनियमिता वर्णतः स्पष्टरूपा सा विज्ञेया द्विजमुनिगणैः श्रीधरी नामतस्तु ॥ लाक "जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में मगण, भगण, नगण, दो तगण और अन्त में दो गुरु हो तथा दश एवं चार अक्षरों पर यति हो तो अत्यष्टि जाति का 'श्रोधरी' नामक वृत्त होता है। उदाहरण जैसे- मगण भगण नगण तगण तगण गु० गु०

SSSSII SSISS स्नानैश्चू र्णैः सुख सुरभि भिगन्ध वासैश्च धू पैः यहाँ पर पाद में मगण, भगण, नगण, तगण, तगण और अन्त में दो गुरु हैं, अतः यहाँ 'श्रोधरी' छन्द है ॥ ८९॥ ४३. वंशपत्रपतितम् अनुवाद-जिस बृत्त के प्रत्येक पाद में प्रथम, चतुर्थं, षष्ठ, दशम और अन्तिम वर्ण गुरु हो तथा दस ओर सात अक्षरों पर यति हो, उसे 'वंशपत्रपतित' वृत्त कहते हैं ।। ९१ ॥ १. क. (भ०) यत्र सप्तदशे पादे वंशपत्रा ह्वयं तु तत्। २. क. (भ.) युवतिपरिवृतः । ३. ल. मुदितपबनजववशात्। क. (टि०) पवनजवशात्। ना. था०-४१

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३२२ माट्यशार्णे

द्वितीयमन्तयं षष्ठं चाप्यष्टम द्वादशं तथा। चतुर्दशं पञचदशं पादे सप्तदशाक्षरे ॥ ९३ ॥ भवन्ति यत्र दीर्घाणि शेषाणि च लघून्यथ। विलम्बितगतिः सा तु विज्ञेया नामतो यथा ॥ ९४ ॥

उदाहरण जैसे- y्रई

SI ISIS IIIS ITIIIIS एष गजोऽद्रि मस्तकतटे क ल भ प रिक्ु तः- क्रीड़ति वृक्षग ल्मगहने कुसुमभरनते। मेघरवं निशम्य मुदितः पवनजवसमः सुन्वरि ! वंशपत्रपतितं पुनरपि कुरुते ॥। ९२॥ "हे सुन्दरि ! यह हाथी हस्ति-शावकों से घिरकर, फूलों के भार से झुके हुए वृक्ष और लताओं से घने पर्वत को चोटो पर क्रोड़ा कर रहा है। अब यह मेध के गर्जन को सुनकर प्रसन्न होकर वायु के वेग के समान बांस के पत्तों को बार-बार गिर रहा है॥ ९१ ॥ यहाँ पर प्रत्येक पाद में प्रथम, चतुर्थ, षष्ठ, दशक और अन्तिम वर्ण गुरु हैं और शेष वर्ण लघु हैं, अतः 'वंशपत्रपतित' नामक वृत्त है॥९१॥ ४४. विलम्बितगतिः ( सप्तदशाक्षरा वृत्ति )

अनुवाद-यदि सत्तरह अक्षरों के पाद में द्वितीय, षष्ठ, अष्टम, द्वादश, चतुदश, पञ्चदश और अन्तिम वर्ण गुरु हों और शेष वर्ण लघु हों तो 'विलम्बित- गति' नामक वृत्त होता है। ९३-९४॥ विशेष-विलम्बितगति को पिङ्गलादि आचार्यो ने 'पृथ्वी' कहा है।

१. इतः परं क पुस्तकेऽधोलिखितं विलम्बितगतिलक्षणमघिक दृश्यते- यदा द्विरुदितौ हि पादमभिसंग्रितौ ज्सौ त्रिकौ तथैव च पुनस्तयोनिघनमाश्रितो यो लगौ। तदाष्टिरतिपूर्विका यतिरपि स्वभावाद्यथा विलम्बितगतिस्तदा निगदिता द्विजैर्नामतः

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प्चदशोशव्याय: .३२३

घथा- विधूरणितविलोचना 'पृथुविकीर्णहारा पुनः 2प्रलम्बरशना चलतसवलितपादमन्दवलमा। न मे प्रियमिदं जनस्य बहुमानरागेण य 'नमदेन विवशा विलम्बितगतिः कृता त्वं प्रिये! ॥ ९५ ॥

उदाहरण जैसे- विर्धाण ता वि लोचना पृथु वि कोर्ण हारा पुनः प्रलभ्बरशना चलत्स्खलितपादमन्दवलमा । न मे प्रियमिदं जनस्य बहुमानरागेण य- न्मन्देन विवशा विलम्बगतिः कृता त्वं प्रिये ॥ ९५॥ 'हे प्रिये ! तुम्हारे नेत्र विधूणित हो गये हैं, विशाल हार इधर-उधर विखर गया है, करधनी शिथिल होकर लटक रही है, चलने में लड़खड़ाते हुए पैर मन्दगति से क्लान्त है, यह मुझे पसन्द नहीं है जो तुमने बहुत अधिक मान और राग मद से विवश होकर मन्दगति को भी विलम्बित कर दिया ॥ ९५॥ यहाँ प्रत्येक पाद में दूसरा, छठाँ, आठवाँ, बारहवाँ, चौदहवाँ, पन्द्रहवाँ और सत्रहवाँ अक्षर गुरु है और शेष लघु। अतः यहाँ 'विलम्बितगति' वृत्त है। विशेष-गायकवाड़ संस्करण में 'विलम्बिगति' का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया जाता है- यवा द्विरुदितौ हि पादमभिसंधितौ ज्सौ त्रिकौ तथैव च पुनस्तयोनिधनमाभितो यो लगौ। तदाष्टिरिति पूर्विका यतिरपि स्वभावाद्यथा- विलम्बितगतिस्तदा निगदिता द्विजैर्नामतः॥

४. ख. पथुविधूर्णहारा। क-भ. प्रसृतहारमालाघरा। ५. क-भ. प्रलम्बवसना चलत्स्खलितगात्रपादक्रमा । ग. हखलत्स्ख लितपादमन्दक्रमा। ६. कनभ, न मे प्रियमसज्जनेति बहुमानरागेण ते। ७. क-म. मदेन तु बिलम्वितगति कृता कदाचित्प्रिये।

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/१२४ नाठयशास्त्रे

पश्चादौ पञ्चदशकं द्वावशैकादशे गुरु'। चतुर्दशं तथान्त्ये द्वे चित्रलेखा धृतौ स्मृता ॥ ९६॥ यथा- नानारत्नाढ्यैबहुभिरधिकं भूषणैरङ्गसंस्थै

केशैः स्नानाद्यैः कुसुमभरितैर्वस्त्ररागैश्च तैस्तैः कान्ते! 'संक्षेपात् किमिह बहुना चित्रलेखेव" भाति॥ ९७॥

"जहाँ पर (जब) दो बार कहे हुए जगण और सगण त्रिक एक पाद में संश्रित हों और फिर उसके अन्त में यगण, एक लधु और एक गुरु हों तथा स्वभावा- नुसार यति हो तो अष्टि जाति का 'विलम्बितगति' छन्द कहलाता है।" जैसे-

जगण सगण जगण सगण यगण ल० गु०

विघूणि तविलो चना पृ थुविको णंहारा पुनः यहाँ पर पाद में जगण, सगण, जगण, सगण, यगण और अन्त में एक लघु तथा एक गुरु है। अतः 'विलम्बितगति' वृत्त है। ४५. चित्रलेखा (धृतिः जातिः, अष्टादशाक्षरा वृत्ति)

अनुवाद-धृति जाति के अष्टावशाक्षरात्मक वृत्त के प्रत्येक पाद में यदि आदि के पांच अक्षर तथा ग्यारहवाँ, बारहवाँ, चौवहवाँ, पन्द्रहवाँ, सत्रहवाँ तथा अन्तिम वर्ण गुरु हों, और शेष वर्ण लघु हो तो 'चित्रलेखा' नामक वृत्त होता है। ९६॥

१. ग. द्वादशं सानगं गुरु। २. ग. तथा पञ्च । ३. क. (भ.) चित्रमाला गुरूणि तु । क. (ड) बुर्घः स्मृता। ४. क. अङ्करागैश्य हृदः। ख. अक्हारैविचित्रः। ५. ख. केशैः स्नानाटैः कुसुमरचितैक्त्ररागैश्च तैस्तैः । ६. ग. संक्षेपः किमिति। ७. क. (टि०) चित्रमालेव।

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३. १२५

अन्त्यं सप्तदशं चैव षोडशं सचतुर्दशम्। त्रयोदशं द्वादशं च षष्ठमष्टममेव च॥ ९८॥ त्रोण्यादौ च गुरूणि स्युर्यस्मिस्त्वेकोनविशके। पादे लघूनि शेषाणि शार्दूलक्रीडितं तु तत् ॥। ९९॥

11.00 उदाहरण जैसे- SSS SS IIII IS SISSIS S नाना र ला ढचै बं हु भिरधिकं भू ष णै र ङ्ग संस्थै-

केशैः स्नानाढयैः कुसुमभरितैवंस्त्ररागैश्च तैस्तैः कान्ते ! संक्षेपात् किमिह बहुना चित्रलेखेव भासि ॥९७॥ अनुवाद-नाना प्रकार के रत्नों से जड़े हुए, शरोर में धारण किये हुए अत्यधिक आभूषणों से, अनेक प्रकार के गन्ध से पूर्ण, कामबर्द्धक मनोहर अङ्गरागों से तथा स्नान करने से स्वच्छ विविध फूलों से सुसज्जित केशों से और रङ्ग-विरङ्गों वस्त्रों के परिधान से हे कान्ते ! अधिक क्या क्या कहें ? तुम चित्रलेखा सी सुशोभित हो रही हो।। १७।। 03 इस वृत्त के पाद में आदि के पाँच वर्ण तथा ग्यारहवाँ, बारहवाँ, चौदहवां, पन्द्रहवाँ तथा अन्तिम दो वर्ण गुरु है, शेष लघु हैं, अतः यहाँ 'चित्रलेखा' वृत्त है।। ९७ ।। ४६. शार्दूलविक्रोडित ( अतिधृति जाति, एकोनविशत्यक्षरा वृत्ति ) अनुवाद-यदि अतिधृति जाति के उन्नीस अक्षर वाले पाद के प्रथम तीन वर्ण तथा छठाँ, आठवाँ, बारहवाँ, तेरहवाँ, चौवहवाँ, सोलहवाँ, सत्रहवाँ तथा अन्तिम वर्ण गुरु हो और शेष लघु हो तो 'शार्दूलविक्रीडित' छन्द होता है॥९१-९९॥

१. क. (टि०) द्वादशं सानुगं चैव। २. इतः परं 'क' पुस्तकेऽघोलिखितं शादूलविक्रीडितलक्षणमधिकं दश्यते- म्मो ज्सौ तौ गुरुच प्रयोगनियता यस्मिन्नि विष्टास्त्रिका आद्या चान्त्ययतिश्चतुस्त्रिकयुता ज्ञेया परा सप्तभिः । नित्यं यत्पदमाश्रिता ह्यतिधृतिरनित्यं कवीनां प्रियं तज्ज्ञेयं खलु वृत्तजातिनिपुणः शादूंलविक्रोडितम्॥

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नाटयेशालन

यथा-

नानाशस्त्रशतघ्नितोमरहताः प्रभ्रष्टसर्वायुधा: निर्भिन्नोदरपादबाहुवदना' निर्णाशिताः शत्रवः । धैर्योत्साहपराक्रम प्रभृतिभिस्तैविचित्रैर्गुणै वृत्तं ते रिपुघाति भाति समरे शार्दूलविक्रीडितम्॥ १००॥

उदाहरण जैसे-

SSSIISI SILIS SSI SSIS ना ना श स्त्र श त घ्नि तो म र ह ता, प्र भ्रष्ट स र्वा यु घाः निर्भिन्नोदरपादबाहुववना निर्णाशिता: शत्रवः । धैर्योत्साहपराक्रमप्रभृतिभिस्तैस्तैविचित्रैः गुणै- वृत्तं ते रिपुधाति भाति समरे शादूलविक्रीडितम् ॥ ९९॥ अनुवाद-हे राजन्! आपके शत्रुगण अनेक शस्त्र, शतघ्नो (तोप), तोमर आदि से आहत होकर समस्त अस्त्र-शस्त्रों को छोड़कर हाथ, पैर, उदर एवं शिर के कट जाने से नष्ट हो गये। हे नृप ! धैर्य, उत्साह, पराक्रम आदि विचित्र गुणों के कारण रिपुघातो आपका चरित्र सिंह को करोड़ा के समान शोभित हो रहा है॥। १०० ॥ इस श्लोक के पाद के प्रथम, द्वितोय, तृतीय, षष्ठ, अष्टम, द्वादश, त्रयोदश, चतुर्दश, षोडश, सप्तदश एवं उन्नीसव्राँ वर्ण दीर्घ हैं, शेष लघु। अतः यहाँ शार्दूलविकोड़ित छन्द है।

१. ख. निभिन्नोदरबाहुवक्रनयना निर्भत्सिता शत्रवः । १. 'क' पुस्तकेऽधोलिखितं शार्दू लविक्रोडितस्योदाहरणान्तरमप्युषलभ्यते यथा- तावत्त्वं विजितेन्द्रियः शुभमते सर्वात्मना प्रत्यहं दाने शोलविधौ च योजय मनः सवर्गापवर्गावहम। यावद् व्याघिजराप्रचण्डनखरो व्यायत्सटाभिभ'शं मृत्युस्ते न करोति जोवितमुगैः शादूलविक्रीडितम् ॥।

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पचन्च दशोडधयाय: ३२७

विशेष-गायकवाड़ संस्करण में शार्दूलविक्रीडित का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया जाता है- TISB

म्सौ ज्सौ तौ गुरुश्च प्रयोगनियता यस्मिन्निविष्टास्त्रिकाः आद्या चान्त्ययतिश्चतुस्त्रिकयुता ज्ञेया परा सप्तभिः। STP नित्यं यत्पवमाश्रिता ह्यतिधूतिनित्यं कवीनां प्रियं तज्ज्ञेयं खलु वृत्तजातिनिपुर्णः शार्दूलविक्रीड़ितम्॥ अनुवाद-अतिधृति जाति के जिस वृत्त के पाद में प्रयोग के नियमानुसार मगण, सगण, जगण, सगण, दो नगण और अन्त में गुरु हो तथा बारह एवं सात अक्षरों पर यति हो तो छन्दःशास्त्र के विद्वान् उसे 'शार्दूलविक्रोडित' कहते हैं॥ उदाहरण जैसे- मगण सगण जगण सगण तगण तगण गु०

SSS IIS SSI SSIS नानाश स्त्रशत घ्नितोम रहता: प्रभ्रष्ट सर्वायु धा: इस छन्द के पाद में मगण, सगण, जगण, सगण, दो तगण और अन्त में एक गुरु है। अतः यहाँ 'शार्दूलविक्रीडित' छन्द है। विशेष-गायकवाड़ संस्करण में शार्दलविक्रोडित का निम्नलिखित उदाहरण अधिक पाया जाता है- तावत्वं विजितेन्द्रियः शुभमते सर्वात्मना प्रत्यहं दाने शोलविधौ च योजय मनः स्वर्गापवर्गावहम्। यावत् व्याघिजराप्रचण्डनखरो व्यायत्सटाभिर्भशं मृत्युस्ते न करोति जीवितमृगैः शार्दूलविक्रोडितम् ॥ अनुवाद-हे शुभमते ! तब तक तुम जितेन्द्रिय होकर सर्वात्मना प्रतिदिन दान और शील में स्वर्ग और अपवर्ग का वहन करने वाले मन को लगाओ। जब तक व्याधि और जरा रूप प्रचण्ड नखों वाला व्यायत विकीर्ण जटाओं से युक्त मृत्यु तुम्हारे जीवन रूपो मृगों से व्याघ्न-क्रीड़ा नहीं करता।

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१२८ नाट्यशास्त्रे

चत्वार्यादौ च षष्ठं च सप्तमं सचतुर्दशम्। तथा पञ्चदशं चैव षोडशं नैधनं तथा॥ १०१॥ एतानि च गुरूणि स्युः शेषाणि तु लघून्यथ। पादे यत्र कृतौ ज्ञेया नाम्ना सुवदना तु सा।१०२।। यथा- नेत्रे 'लीलालसान्ते कमलदलनिभे भ्रूचापविनते' *रक्त्तोष्ठं पीनमध्यं समसहितघनाः स्निग्धाश्च दशनाः । कर्णावंसप्रलम्बौ चिबुकमपि नतं घोणा सुरुचिरा व्यक्तं त्वं मर्श्यलोके वरतनु! "विहितास्येका सुवदना ॥१०३।

४७. सुवदना ( कृति जाति, विशत्यक्षरा वृत्ति ) अनुवाद-कृति जाति के बीस अक्षरों वाले पाद में यदि आदि के चार वर्ण और छठा, सातवाँ, चौवहवाँ, पम्ब्रहवाँ, सोलहवाँ तथा अन्तिम वर्ण गुरु हो और शेष वर्ण लधु हो तो 'सुववना' नामक वृत्त होता है॥ १०१-१०२ ॥। उदाहरण जैसे- SS SSISS IIIIIIS SSIIIS नेत्रे लीलालसान्ते कमलवलनिभे भ्रचापविनते रत्त्ोष्ठं पोनमध्यं समरहितछत्राः स्निग्धाश्च दशनाः । कर्णावतंसप्रलम्बो चिबुकमपि नतं धोणा सुरुचिरा व्यक्तं त्वं म्त्यलोके वरतनु ! विहितास्येका सुवदना ॥ १०३ ॥

१. क. (भ.) पादे यत्र तु सा ज्ेया नाम्ना सुवदना यथा। २. 'क' पुस्तके सुवदनाया अधोलिखितं लक्षणमधिकमुपलभ्यते- म्ररो म्नो उभी ल्गौ च सम्यग्यदि च विरचिता: पादे क्रमवशात् विच्छेद। सप्तभिः स्यात्पृनरपि च यतिः सप्ताक्षरकृता। यद्येषा संश्रिता स्यात्कतिमपि च पुनः श्लिष्टाक्षरपदा विद्वद्भिवृ त्तजातौ तत इह गदिता नाम्ना सुवदना । ३. क. (भ.) नेत्रे नीलालकान्ते। क. (टि०) नेत्रे पर्यन्तताम्रे। ४. ख. ग. भ्रूचापनिहिते। क. (टि०) भ्रचापरुचिरे। ५. ख. ग. गण्डोष्ठं। ६. ख. ग. कर्णों पार्श्वविळम्बौ। ७. ख. सर्वस्मिन् । ८. ख. विदितास्येका।

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३२९

"हे सुन्दरि ! कमलदल के समान तथा भौंह रूपी धनुष के समान विनत तुम्हारी आँखे लोला से अलसाई हुई है, ओठ लाल हैं, कमर स्थूल हैं, वक्ष:स्थ पोन है, दांत सम, घने और चिकने हैं, कर्णावतंस लटके हुए हैं, चिबुक भो नत है, नाक अत्यन्त सुन्दर है। हे वरतनु ! इससे स्पष्ट है कि विधाता ने तुझे सुवदना बनाया है॥ १०३॥ यहाँ पर सुवदना नामक वृत्त है। विशेष-गायकवाड़ संस्करण में सुबदना का निम्नलिखित लक्षण अधिक दिया गया है- त्र्र भ्नौ सभौ ल्गौ च सम्यग्यदि च विरचिता पादे क्रमवशात् विच्छेदः सप्तभि: स्यात् पुनरपि च यतिः सप्ताक्षरकृता। यथेमां संधिता स्यात् कृतिमपि च पुनः श्लिष्टाक्षरपदा विद्वद्धिवृ त्तजातौ तत इह गदिता नाम्ना सुवदना।। "जिस वृत्त के प्रत्येक पाद में मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, भगण, लघु और गुरु हों तथा सात-सात अक्षरों पर यति हों, विद्वानों ने उसे कृति जाति में 'सुवदना' वृत्त कहा है।" उदाहरण जैसे- मगण रगण भगण नगण यगण भगण ल०गु०

SSS SIS SS I IS नेत्रेली लालसा न्ते कम लदल निभेभ्रू चापरु चिरे। रक्तोक्तं पीनमध्यं समरहितक्षत्राः स्निग्धाश्च वशनाः। कर्णावतंसप्रत्नम्बो चिबुकमपि नतं धोणा सुरुचिता व्यक्त्तं त्वं मर्त्यलोके वरतनु विहितास्येका सुवदना॥ यहाँ पर पाद में क्रमशः मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, भगण और अन्त में एक लघु तथा एक गुरु है। अतः यहाँ 'सुवदना' वृत्त है। ना. था०-४२ 0

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१३० नाट्यशास्त्रे

चर्वार्यादौ तथा षष्ठं सप्तमं च चतुर्दशम्। अष्टादशं सप्तदश तथा पञचदश पुनः ॥ १०४॥ अन्त्योपान्त्ये गुरुण्यत्र लघून्यन्यानि सर्वदा। एकविशतिके पादे स्रग्धरा नाम सा यथा2। १०५ ।। यथा- चूताशोकारबिन्दैः कुरवकतिलकैः कणिकारैः शिरोषैः पुन्नागैः पारिजातैर्वकुलकुवलयैः किंशुकैः सातिमुक्तैः । एतैर्नानाप्रकारै: बहुलसुरभिविप्रकीर्णेश्च तैस्तै- र्वासन्तैंः पुष्पवृन्दैनंरवर ! वसुधा स्त्रग्धरेवाद्य भाति ॥ ०६॥ ४८. त्त्रग्धरा (अतिकृति जाति, एकोविशत्यक्षरा वृत्ति ) अनुवाद-यदि इक्कीस अक्षर वाले अतिकृति जाति के पाद में प्रथम चार अक्षर तथा छठा, सातवाँ, चौदहवाँ, पन्द्रहवाँ, सत्तरहवाँ, अठरहवाँ, बोसवाँ, एवं इक्कोसवाँ वर्ण गुरु हों, शेष लघु हों तो 'स्रग्धरा' वृत्त होता है॥ १०४-१०५ ॥ उदाहरण जैसे- SSSSIS SII IIIS SISS ISS चूताशो कारवि न्दैः कुर वकति लकैः क णिकारैः शिरीषैः- पुम्नागैः पारिजातैवंकुलकुवलयैः किंशुकैः सातिमुक्तः। एतैर्नानाप्रकारै: बहुलसुरभिभिविप्रकीर्णश्च तैस्तै- र्वासन्तैः पुष्पवृम्दैनंखर वसुधा स्त्रग्धरेवातिभाति ॥१०६॥ १. क. (भ.) अन्त्यं च विशकं चैव गुरुसंज्ञानि यत्र तु। २. 'क' पुस्तके स्रग्धराया अधोलिखितं लक्षणमधि कं लभ्यते- स्रौ म्नौ थौ यश्च सम्यग्यदि हि विरचिता: स्युस्त्रिका पादयोगे वर्णेः पूर्वोप दिष्टय तिमनुगतं तत्वविद्धि: प्रदिष्ट विज्ञेयं वृत्तजाती कविजनदयिता स्रधरा नामतस्तु १. क. (न.) स्रग्धरेवावभाति ।

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३३१

। अनुवाद-हे नरेन्द्र ! चूत (आम्र), अशोक, अरविन्द, कुरवक, तिलक, कणिकार शिरोष, पुन्नाग, पारिजात, वकुल, कुवलय, किंशुक, अतिमुक्त फूलों आदि नाना प्रकार के बहुत सुगन्ध वाले बिखरे हुए वासन्तिक फूलों से यह वसुन्धरा माला को धारण करने वालो नायिका के समान प्रतोत हो रही है॥ १०६॥ यहाँ पर प्रत्येक पाद में आदि के चार अक्षर तथा छठाँ, आठवाँ, चौदहवाँ, पन्द्रहवाँ, सत्तरहवाँ, अठरहवाँ, बीसवाँ, और इक्कोसवाँ अक्षर गुरु हैं, शेष लघु हैं। अतः यहाँ 'स्रग्धरा' छन्द है॥ १०६॥ विशेष-गायकवाड़ संस्करण में स्रग्वरा का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया जाता है- B स्रौ भ्नौ यौ यश्च सम्यग्यदि हि विरचिता: स्युस्त्रिका पादयोगे 16 fs वर्णेः पूर्वोप दिष्टेयंतिरपि च पुनः सप्तभिः सप्तभि: स्यात्। वृत्तं सभ्यग्यदि स्यात् प्रकृतिमनुगतं तत्त्वविदिभ: प्रदिष्टं विज्ञेयं वृत्तजातौ कविजनदयिता स्रग्धरा नामतस्तु ॥ अनुवाद-यदि इक्कोस अक्षर वाले पाद में नगण, रगण, भगण, नगग और तीन यगण हो और सात-सात अक्षरों पर यति हो तो तत्त्व के जानकार लोग उसे 'स्रग्धरा' वृत्त कहते हैं॥ उदाहरण जैसे- मगण रगण भगण नगण यगण यगण यगण

SSS SIS SII ISSISS चूताशो कार वि न्दैः कुर वकति लकैःक णिका रै:शि री षैः इस श्लोक पाद में मगण, रगण, भगण, नगण और तोन यगण हैं तथा सात-सात अक्षरों पर यति है। अतः यहाँ 'स्रग्धरा' वृत्त है। वृत्त रतनाकार में इसका लक्षण इस प्रकार है- स्रम्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कोत्तितेयम्।

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नाटपशास्त्रे

चतुर्थमाद्यं षष्ठं च दशमं द्वादशं तथा। षोडशाष्टावशे चैव नैधनं च गुरुण्यथ॥ १०७॥ हाविशत्यक्षरे पादे शेषाणि च लघून्यथ । भवन्ति यत्र तज्ज्ञेयं मद्रकं नामतो यथा।। १०८।। उत्प्लुतमेकहस्तचरणं द्वितीयकररेचितं' सुविनतं वंशमृदङ्गवाद्यमधुरं विचित्रकरणानुगं'बहुविधम्"। ए 'मद्रकमेतदद्य सुभगे ! विदग्धगतिचेष्टितैः सुललितै ररनृत्यसि विभ्रमाकुलपदं विविक्तरसभावितं शशिमुखि।।१०९॥

४९. मद्रक (द्वाविशत्यक्षरा वृत्ति )

अनुवाद-यदि बाइस अक्षर वाले पाद में प्रथम, चतुर्थ, षष्ठ, बशम, द्वावश, षोडश, अष्टावश एवं द्वार्विश अक्षर गरु हो और शेष वर्ण लघु हों तो 'मद्रक' नामक वृत्त होता है॥ १०७-१०८॥ उदारण जैसे- SII SI SITIS ISITI SIS TIIS उत्प्लुत मेक हस्तचरणं द्वितीय कर रेचितं सुविनतं वंशमृदङ्गवाद्यमधुरं विचित्रकरणानुगं बहुविधम्। मद्रकमेतदघ सुभगे! विदग्धगतिचेष्टितैः सुललितै- नृत्यसि विभ्रमाकुलपदं विविक्त रसभावितं शशिमुखि !॥ १०९॥

१. इतः परं 'क' पुस्तके मद्रकस्याधोलिखितं लक्षणमधिकं दृश्यते- श्रौ चरणे यदा विनियतौ त्रिको क्रमवशादथाकृतिविधौ नो च ततः परं च रुचिरावनग्तरकृतौ नगावपि पुनः। तच्च दशाष्टवर्णरचिता चतुर्ष्वपि तथा यतिश्च सततं मद्रकवृत्तमेव खलु नाट्ययोगकुशलैबुँधैनिगदितम् ॥ २. ख. उद्यतमेक हस्तचरणं। ग. उन्नतमेकहस्तचरण। ३. ख. ग. द्वितीयकररेचकं सललितं। ४. ख विचित्रकरणास्वितं। ५. क. (भ.) सुचरितं। ६. क. (टि०) मद्रकमेवमद्यसुभगैः । ७. ख. नृश्यसि विभ्रमाकुलपदं वरोरु ललितक्रियं समरसम्। .क. (टि०) नित्यसुविभ्वमाकुलपदं वरोरु ललिताङ्गचेष्टितयृतम्।

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पळन्बदशोष्ध्याय:

"हे सुभगे ! तुम आज एक हाथ और एक पैर को ऊपर उठाये हुए, द्वितीय हाथ को रेचित कर विनत किये हुए, वंशी, मृदङ्ग आदि वाद्यों से मधुर, अनेक प्रकार के विचित्र करणों के अनुगत, विदग्ध गति, एवं सुललित चेष्टाओं के साथ, विभिन्न रस एवं भावों से परिपूर्ण एवं विलासपूर्ण गति से नृत्य कर रही हो ॥। १०९ ॥ यहाँ पर प्रत्येक पाद में प्रथम, चतुर्थ, षष्ठ, दशम, द्वादश, षोडश, अष्टादश एवं द्वाविशति वर्ण गुरु हैं, शेष लघु । अतः यहाँ 'मद्रक' वृत्त है॥ १०९॥ विशेष-गायकवाड़ संस्करण में मद्रक का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया जाता है- भ्रौ चरणे यदा विनियतौ त्रिकौ क्रमवशादथाकृतिविधौ IF त्ौ च ततः परं च रुचिरावनन्तरकृतौ नगावपि पुनः। तच्च दशाष्टवर्णरचिता चतुष्वपि तथा यतिश्च सततं भद्रक वृत्तमेव खलु नाट्ययोगकुशलैबुधैर्निगादितम्॥ "बाइस अक्षर वाले पाद में यदि भगण, रगण, नगण, रगग, फिर नगण, उसके बाद फिर रगण एवं नगण और अन्त में गुरु हो, तथा दश एवं आठ वर्णा पर यति हो तो नाट्य प्रयोग के कुशल विद्वान् उसे 'मद्रक' वृत्त कहते हैं।" 3 उदाहरण जैसे- भगण रगण नगण रगण नगण रगण नगण गु.

SIISIS 111 SIS SIS 5 उत्प्लत मे क ह स्त चर णं द्वितो यकर रेचितं सुविन तं काशो संस्करण में मद्रक का लक्षण निम्न प्रकार हे- भ्रौ चरणे यदा विनियतौ त्रिकौ क्रमवशादथाकृतिविधौ न्न च ततः परश्च नियतौ तथा तवनु चार्षिता नरनगवः। स्थाच्च दशाष्टवर्णरचिता यति पुनरित प्रिया च विदुषां श्रुतिसुखसमर्थसुभगं मद्रकवृत्तमेतदुदितं खलु॥

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नाटयशास्त्रे

अन्त्य मेकोनविंशं च एकादशं सप्तदशं पश्चमं सप्तमं सत्रयोदशम्। च गुरूण्यथ॥ ११० ॥ शेषाणि च लघूनि स्युर्विकृत्याश्चरणे' बुधैः। वृत्तं तदश्वललितं विज्ञेयं नामतो यथा* ॥१११॥ 'विविधतुरङ्गनागरथयौघसंकुलमलं बलं समुवितं शरशतशक्तिकुन्तपरिधासियष्टिविततं' बहुप्रहरणम्। "रिपुशत मुक्तशस्त्ररवभीतशङ्कितभटं भयाकुलदिशं कृतमभिवोक्ष्य संयुगमुखे 'समर्पितगुणं त्वयाइवललितम् ॥११२।

५०. अश्वललित ( त्रयोविशत्यक्षरा वृत्तिः ) अनुवाद-यदि तेइस अक्षर वाले विकृति छन्द के प्रत्येक पाद में पांचवाँ, सातवाँ, ग्यारहवाँ, तेरहवाँ, सतरहवाँ, उन्नोसवाँ तथा अन्तिम वर्ण गुरु हों और शेष वर्ण लघु हो तो 'अश्वललित' वृत्त कहलाता है॥ ११०-१११।।

१. क. (ि०) बिकृतौ चरणेषु घ। २. इतः पर 'क' पुस्तकेऽश्वललितस्याघोलिखितं लक्षणमधिकमुपलभ्यते- यदि च नकार आदिरचितः पदे विरचितोन्त एव च लगौ यदि च जभौ त्रिधा च निहितौ क्रमेण खलु मध्यावपि तथा यदि च समाश्रितं हि विकृर्ति यतिश्च दशभिक्तथैकसहितै- स्तत इह कोतितं मुनिगणविशुद्धचरितैस्तवश्वललितम् । ३. क. (टि०) रथह्यनागयौधपुरुषषैः सुसङ्कलमलं समुद्रितशरा- सनशरपङिक्तकुन्तपरिधासियष्टिविवृत बहुप्रकरणम् । वसुगणमस्यभिन्नहतशत्रुनाशितशिरः प्रमथ्य तरसा ।। कृतमभिबोक्ष्य संयुगमुखे समोक्षितगुणं त्वयाश्वललितम्। रथहयनागयोधपुरुषैः । ४. ख. निवृत्तं। ५. ख. रिपुशतमुक्तशास्त्ररवशद्कितभटं भयाकुलमिटं। ६. ख. समीप्सितगुणं। ७. ख. तदरवललितं ।

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३३५

उदाहरण जैसे- IILISI SITI SISIIIS 1S 11 IS विविध तुरङ्ग नागर य योध सङ़कूल मलं बलं समु दितं शरशतशक्तिकुन्तपरिधासि यष्टिविततं बहुप्रहरणम्। रिपुशतमुक्त शस्त्र रवभीतर्शा्ङ्गितभटं भयाकुलदिशं कृतमभिवीक्ष्य संयुगमुखे समर्पितगुणं त्वयाश्वललितम् ॥ ११२ ॥ "विविध तुरङ्ग, गज, रथ तथा योद्धाओं से परिपूर्ण तथा सैकड़ों बाण शक्ति, भाले, परिघ, असि (तलवार) तथा यष्टि आदि शस्त्रों से विस्तृत सैन्य के बहुत से प्रहरणो से युक्त, शत्रुओं द्वारा छोड़े गये सैकड़ों शस्त्रों के ध्वनि के भय से शङ्ित योद्धाओं एवं भय से व्याकुल दिशाओं को देखकर युद्ध में तुमने जो अश्व क्रोड़ा की है ॥ ११२ ॥ यहाँ पर पांचवाँ, सातवां, ग्यारहवाँ, तेरहवाँ, सत्तरहवाँ, उन्तोसवाँ एवं अन्तिम अक्षर गुरु है, शेष लघु हैं, अतः यहाँ 'अश्वललित' वृत्त है ॥ ११२॥ विशेष-गायकवाड़ संस्करण में अश्वलल्लित वृत्त का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया जाता है- यदि च नकार आदिरचितः पदे विरचितोऽन्त एव च लगौ यदि च जभौ त्रिषा च निहितौ क्रमेण खलु मध्यमावपि तथा। यदि च समाश्रितं हि विकृति यतिश्च दशभिस्तथैक सहितै- स्तत इह कीतितं मुनिगणैविशुद्धचरितैस्तवशाललितम्॥। "यदि तेइस अक्षर वाले पाद में आदि में नगण और अन्त में एक लघु एवं गुरु हो तथा मध्य में तीन जगण और भगण हों और ग्यारह अक्षर पर यति हो तो मुनियों ने उसे 'अश्वललित' वृत्त कहा है।" जैसे- नगण जगण भगण जगण भगण जगण भगण ल०गु० I ISI SII ISI SII ISI SII IS विविध रङ़गना गरथ योधस डलम लंबलं समुरितं यहाँ पाद में नगण, जगण, भगण, जगण, भगण, जगण, भगण और अन्त में एक लघु एक गुरु है, अतः 'अश्वललित' वृत्त है।।

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नाटघशासन्र

षडादावष्टमं चैव ह्यं कादशचतुर्दशे। विशं सप्तदशं चैव त्रयोविशं तथैव च।। ११३।। एतानि च लघूनि स्यु: शेषाण्यथ गुरूणि च। चतुर्विशतिके पादे मेघमालेति सा यथा॥ ११४॥। पवनबलसमाहृता 'तीव्रगम्भीरनादा बलाकावलोमेखला क्षितिधरसदृशोच्चरूपा महानीलधुमाञ्जनाभाम्बुगर्भोदवा। सुरपतिधनुरुज्जवलाबद्धकक्ष्या' तडिद्द्योतसन्नाहपट्टोज्वला" 'गगनतलविसारिणी प्रावृषेण्या दृढं मेधमालाधिकं शोभते ॥११५॥

५१. मेधमाला ( चतुविंशत्यक्षरा वृत्ति: ) अनुवाद-यदि चौबीस अक्षर वाले वृत्त के प्रत्येक पाद में आदि के छः अक्षर और आठवाँ, ग्यारहवाँ, चौदहवाँ, सत्तरहवां, बीसवाँ, तेइसवाँ अक्षर लघु हों और शेष गुरु हों तो 'मेधमाला' वृत्त होता है॥ ११३-११४।। उदाहरण जैसे-

पवन बल स मा हता तीब्र गम्भीर नादा ब ला काव लीमे खला क्षितिधरसदृशोच्चरूपा महानोलधूमाञजनाभाम्बुगर्भोदृभा। सुरपतिधनुरुज्जवलाबद्धकक्ष्या तड़ितघोतसन्नाहपट्टोज्ज्वला गगनतलविसारिणी प्रावृषेण्या दृढं मेधांमालाधिकं शोभते ॥ ११५॥

१. क. (टि०) चतुर्विशाक्षरे पादे। २. क. पुस्तके मेघमालालक्षणमघिकं दृश्यते। यदि खलु चरणस्थितौ नौ त्रिकौ कृतिकारव्यास्तथा राः स्यु क्रमाद्। भवति यदि यतिस्तथा सप्तभिः सप्तभिस्त्रिष्वतोऽन्या यतिः पञ्च विद्यात्तथा॥ सततमभिनिविष्टदेहा संस्कृतौ सूरिभिः सर्वदा दृश्यते। तत हि परिभाषिता शास्त्रविद्धिस्ति्वयं मेघमाला यथा दण्डकः ।। ३. पवनजव । ४. ख. तीव्रमादा बालाकावली मेखला शोभिता। ५. ग. क्षितिघरसदृशोध्वरूपा महाघूपपुज्जायमानाम्बुगर्भोद्वा। ६. ग. शोभा। ७. ग. बन्घोज्वला। ८. ग. गगनतलविचारिणी प्रावृषि प्रोन्नता। ख. प्रावृषेण्योन्नता।

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पञ्चदशोऽ्याय: ३३७

"हवा के वेग से एकत्रित की गई, तीव्र और गम्भीर नाद से युक्त, वक पंक्ति रूप मेखला वाली, पवत के समान उच्च, अत्यन्त नीले धुएँ एव काजल के समान जल से भरे बादल, इन्द्रधनुष से उज्ज्वल कमरबन्ध कसे हुए बिजलो की चमक से कवच के समान उज्जवल, गगन तल में फैली हुई वर्षा ऋतु की मेधमाला अधिक सुशोभित हो रही है।" इस श्लोक पाद में आदि के छः अक्षर और आठवाँ, ग्यारहवाँ, चौदहवां, सत्तरहवां, बीसवाँ, तेइसवां अक्षर लघु हैं और शेष गुरु हैं, अतः यहां 'मेधमाला' वृत्त है।।

विशेष-गायकवाड़ संस्करण में मेघमाला का निम्नलिखित लक्षण अषिक पाया जाता है

यदि खलु चरणस्थितौ नौ त्रिकौ कृत्तिकाल्यास्तथा रा: स्यु: क्रमात् भवति यदि यतिस्तथा सप्तभिस्त्रिध्वतोऽन्या यतिः पञ्न विद्याक्षया। सततममिनिविष्टदेहा तथा संकृतौ सूरिभि: सवंदा दृश्यते- तत इह परिभाषिता शास्त्रविदिभस्त्वियं मेधमाला यथा दण्डकः ॥

"यदि चौबीस अक्षर वाले संस्कृति जाति के वृत्त के प्रत्येक पाद में दो नगण तिक हो, और क्रमशः छः रगण हो तथा सात-सात अक्षर पर तदनन्तर पांच-पांच बक्षरों पर यति हो तो विद्वान् लोग इसे 'मेधमाला' वृत्त कहते हैं।

जेसे-

नगण नगण रगण रगण रगण रगण रगण रगण

III ILISIS SI SSIS SIS SIS SIS

पवन बल समाहता तीव्र गम्भोरनादा बलाकावली मेखला

इसमें दो नगण और छः रगण हैं तथा सात-सात एवं पांच-पांच अक्षरों पर यति है। अतः यहाँ मेधमाला वृत्त है। ना. शा०-४३

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३३८ नाटघशास्त्र

आद्यं चैव चतुर्थ च पञ्चमं षष्ठमेव च। नवमं दशमं चैव नैधनं च भवेद् गुरु' ॥ ११६ ॥ लघून्यन्यानि शेषाणि पादे स्युः पञ्चविंशके। *वृत्तज्ञैः सा तु विज्ञेया क्रौञ्चपादीति नामतः ॥ ११७ ॥ यः किल "दाक्षं विद्रुतसोमं कतुवरमचमसमपगतकलशं। पातितयूपं क्षिप्त चषालं विच यनमसमिधमसमयशुक चरुकम् ॥ कार्मुकमुक्तेनाशु चकार व्यपगतसुरगणपितृगणमिषुणा । नित्यमसौ ते दैत्यगणारि: प्रदहत् मखमिव रिपुगणमखिलम् ।। ११८॥

५२. क्रौञ्चपदी ( पञ्चवशत्यक्षरा वृत्तिः ) अनुवाद-यदि पचीस अक्षर वाले वृत्त के पाद में प्रथम, चतुर्थ, पञ्चम, षष्ठ, नवम, दशम एवं अन्तिम वर्ण गुरु हो और शेष वर्ण लघु हों तो विद्वान् लोग उसे 'क्रौञचपवी' वृत्त कहते हैं॥ ११६-११७।

१. ख. ग. अन्त्यं चैव गुरूण्यथ। २. क. घ. पञ्चर्विशातिके पादे शेषाणि च लघून्यथ । ३. क. (भा) भवन्ति तज्ज्ञैः सा ज्ञेया क्रोञचमालेति नामतः। ४. इतः परं 'क' पुस्तके क्रौञचपदाया अवोलिखितं लक्षणमघिकं दृश्यते- म्मौ यदि पादे स्भावि चेष्टावभिकृतिरपि च हि यदि खलु विहिता नाश्च समुद्रा स्युरविनिविष्टा यदि च खलु गुरु भवति निघनगतम्। पञ्चभिरादौ छेदमुपेता पुनरपि पतिरिह यदि खलु दशभिः कौक्चपदेयं वृत्तविधाने सुरगणपितृगणमुनिगणविहिता ५. क. (टि०) दाक्ष्यं विद्रुमसोमं। ६. क. (टि०) अपशुकमहिताम् । ७. क. (भ). स क्ष्वतिमायो दैत्यगणारिस्तव नृप ! मखमिव दहतु रिपुगणम्।

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३३९

उदाहरण जैसे-

यः किल वाक्ष्यं विद्रुत सोमं क्रतुव रमच मसम पगत कलशं पातितयूपं क्षिप्तचषालं विचयनमसमिधमयशुक चरुकम्। 9P7 :- कार्मुकमुक्तेनाशु चकार व्यगतसुरगणपितृगणमिषुणा नित्यमसौ ते दैत्यगणादि: प्रदहतु मखमिव रिपुगणमखिलम् ॥ ११८॥ अनुवाद-दैत्य गणों के शत्रु जिस भगवान् शिव ने दक्ष के यज्ञ में धनुष से छोड़े गये बाण से सोम को गिरा दिया (नष्ट कर दिया), कलस को फोड़ दिया, यूप को उखाड़ दिया, चमस को फेंक दिया, चषाल (पान पात्र) को फेंक दिया, समिधाओं को नष्ट कर दिया, चरु को फेंक दिया, पशु को भगा दिया, देवता और पितरो को नष्ट कर दिया, इस प्रकार शिव ने यज्ञ की तरह अपने सारे शत्रुओं को वहन कर दिया॥ ११८॥ इस पद्य में प्रत्येक पाद में प्रथम, चतुर्थ, पञ्चम, षष्ठ, नवम, दशम एवं अन्तिम वर्ण गुरु हैं, शेष लघु। अतः यहाँ 'क्रौञ्चपदी' वृत्त है॥ ११८ ॥ विशेष-गायकवाड़ संस्करण में कोञ्चपदा का निम्नलिखित लक्षण अधिक दिया गया है- म्मौ यदि पादे स्भावपि चेष्टावभिकृतिरपि च हि यदि खलु विहिता नाश्च समुद्रा: स्युर्विनिविष्टा यदि च खलु गुरु भवति निधानगतम्। पञ्चभिरादौ छेदमुपेता पुमरपि गतिरिह यदि खलु दशभि: क्रौञचपदेयं वृत्तविधाने सुरगणपितृगणमुनिगणविहिता॥ "अर्थात् जिस बृत्त के पाद में भगण, मगण, सगण, भगण हो तदनन्तर चार नगण हों और अन्तिम वर्ण गुरु हो तथा आदि से पाँच अक्षर पर, फिर १० अक्षर पर यति हो तो अभिकृति जाति में 'क्रौञ्चपदा' तृत्त होता है।" जैसे- मगण मगण सगण भगण नगण नगण नगण नगण 1 गु. S11 SS 11 11 S यः किल दाक्ष्यं विद्रुत सोमं क्रतुव रम चमसमपगतकल सं इस श्लोक पाद में भगण, मगण, सगण, भगण और चार नगण अन्तिम वर्ण गुरु है तथा पांच एवं दस अक्षरों पर यति है, अतः यहाँ 'क्रौञ्चपदा' वृत्त है। गायकवाड़ संस्करण में निम्नलिखित उदाहरण अधिक पाया जाता है।

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१४० नाटयशाएणे

अष्टावादौ गुरूणि स्युस्तथा चेकोनविंशकम्। एक्विशं च विज्ञयं चतुर्विशं शनैधनम्॥११९ ॥ एतानि गुरु संख्यानि शेषाणि च लघून्यथ®। षड्विशत्यक्षरे पादे तद्भुजङ्गविजुम्भितम्" ॥ १२० ॥ रूपोपेतामिति। भुजङ्गविजुम्भितं कृत्वा भगवतो हस्ते न्यस्तम् ॥१५०।१५२।

भगण मगण सगण मगण नगण नगण नगण नगण

SIISS SII SS I IIII5 या कपि लाक्षी पिङ्गल केशो कलिरुचिरनुदिन मनुनयकठिना। दीर्घताराभि स्थूलासि राभिः परिवृतवपुरति शयकुटिलगतिः आयतजङ्घा निम्नकपोला लघुतरकुचयुग परिगत हुदया। सा परिहार्या क्रौञ्चपदा स्त्री ध्रुवमिह निरवधि सुखमभिलषता।। जो कपिल नेत्रों वालो है, पिङ्गल (भूरे) रंग के बालों वाली है, जो नित्य लड़ाई-झगड़े में रुचि रखती हो, और अनुनय-विनय नहीं मानती हो, जो लम्बी और स्थूल नाड़ियों से परिवृत शरीर बलि, हो, जो अत्यन्त कुटिल गति वालो हो, जङ्घा आयत हो, कपोल गड्ढे युक्त हो, जो अत्यन्त छोटे कुचयुगल से परिवृत हृदय वालीं हो उस क्रोञ्चपदा स्त्री को सतत सुख चाहने वाले व्यक्ति को छोड़ देना चाहिए।। १. 'क' पुस्तकेऽधोलिखितमुदाहरणमधिकं दृश्यते- या कपिलाक्षी पिङ्गलकेशी कलिरुचिरनुदिनमनुनयकठिना। दीघंतराभि: स्थूलसिराभिः परिवृत्तवपुरतिशायकुटिलगतिः ।। आयतजङ्घा निम्नकपोला लधुतरकुचयुगपरिगतहृदया। सा परिहार्या कोञचपदा स्त्री ध्र्वमिह निरवधि सुखमभिळषता।। . क. (टि०) एतानि गुरुसंज्ञानि पादे षड्विशकाक्षरे। पत्र नाम्ना तथा ज्ञंयं तद्भुजङ्कविजुम्भितम्। ३. ख. ग. पादे षड्विशकाक्षरे। ४. इतः पर 'क' पुस्तके भुजङ्गविजुम्भितस्य अधोलिखित लक्षणमषिकं दृश्यते- यस्यां मौ तो नाः स्रो नित्यं प्रतिचरणमथ गदितकास्त्रिका ह्यनुपूवशः। षड्विशत्यामेकोनायां च यदि हि खलु यतिरभिधा चतुर्मिरथाष्टभिः ।। पश्चादन्त्यौ लगो संयोज्यौ यदि भवति मनुजदयिता समाश्चितमुक्कृति। नाम्ना वृत्तं लोके ख्यातं कविवदनविकसनपरं भुजङ्गविजुम्भितम् ।।

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पच्चदशोडष्यायं: २४१

यथा- रूपोपेतां' देवैः सृष्टां समदगज- विलसितगति निरीक्ष्य तिलोत्तमां *प्रादक्षिण्यात्प्राप्तां द्रष्टुं बहुवदन- मचलनयनं शिर: कृतवान् हरिः। दोघं विश्वस्यान्तर्गढ स्तनवदन- जघनरुचिरां निरीक्ष्य तथा पुनः 'पृष्ठे न्यस्तं देवेन्द्रेण प्रवरमणि- कनकवलय भृजङ्गविजुम्भितम् ॥१२१॥

५३. भुजङ्गविजुम्भित ( ष्ड्विशत्यक्षरा वृत्ति: ) अनुवाद-छब्बोस अक्षर के पाद वाले जिस वृत्त के पाद में आदि के आठ अक्षर गुरु हो तथा उन्नोसवाँ, इक्कोसवाँ, चौबोसवाँ और छब्बोसवाँ वर्ण गुरु हो और शेष वर्ण लघु हों, उसे 'भुजङ्गविजुम्भित' बृत्त कहते हैं ॥ ११९ ११९।। उदाहरण जैसे- SSSS SS SS IIITIIIIIS ISI ISIS रूपोपेता देवैः सृष्टां समदगजविलसगत निरीक्ष्य तिलो तमा प्रावाक्षिष्यात्प्राप्तां द्रष्टं बहुवदनमचलनयनं शिर: कृतवान् हरिः। दीर्घ निःलस्यान्तगूढं स्तनवदन जघनरुचिरां निरीक्ष्य तथा पुनः पष्ठे न्यस्तं देवेन्द्रेण प्रवरमणिकनकवलयं भुजङ्गविजुम्भितम् ॥१२१ ॥

१. क. (भ.) रूपेऽनिन्दां। २. ख. प्राप्तां द्रष्टुं बहुवदननयनसहितं। ग प्रादाक्षिण्यात् प्राप्तां। ३. एतो श्लोको प्रक्षिप्तौ। उदाहरणं तु जनाश्रय्या विद्यते। तद् ग्रन्थकारेण रुद्रस्वाभिना कुत उद्धारितमिति निर्णेतं न शक्यते। अयं दण्डकश्चित्तवृत्ति प्रयोग इति नाम्ना भासते।

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३४३ नाटयशाल्त्रे

अनुवाद-देवताओं के द्वारा निरमित, मतवाले हाथी के समान गति वाली प्रदक्षिणा करने के लिए आई हुई उस परम सुन्दरी तिलोततमा को देखकर देवेन्द्र ने उसे देखने के लिए सभी मृभों एवं नेत्रों को अचल करके शिर को स्थिर कर दिया। फिर देवेन्द्र ने अन्तर्गूढ़ भाव से दीर्घ श्वास लेकर सुन्दर मुख, स्तन और जघनों वालो उस तिलोत्तमा को पुनः देखकर सर्प के मस्तक से विजम्भित (निःसृत) प्रवर मणि एवं कनक-वलय से युक्त हाथ को उसके पीठ पर रख दिया॥ १२१ ॥

इस उदाहरण के प्रत्येक पाद में आदि के आठ अक्षर तथा उन्नीसवाँ, इक्कीसवाँ, चौबोसवाँ एवं छब्बीसवाँ अक्षर गुरु है और शेष लधु हैं। अतः यहाँ 'भुजङ्गविजृम्भित' वृत्त है ॥ १२१ ॥

अभिनव-'भुजङ्ग' के समान विजुम्भण करके आपके हाथ में रख दिया है। विशेष-काव्यमाला संस्करण में भुजङ्गविजुम्भित का निम्नलिखित लक्षण अधिक पाया जाता है-

यस्या मौतौ नाः स्रौ नित्यं प्रतिचरणमथ गदितकास्त्रिका ह्यनुपूर्वशः षड्विशत्गामेकोनायां च यदि हि खलु यतिरभिधा चतुभिरथाष्टाभि:। पश्चादन्त्यौ ल्गौ संयोज्यौ यदि भवति मनुजदयितां समाभरितमुत्कृति नाम्ना वृत्तं लोके ख्यातं कविवदनविकसनपरं भुजङ्गविजुम्भितम्॥।

अनुवाद-जिस वृत्त के प्रत्येक चरण में दो मगण एक तगण तीन नगण, रगण और सगण तथा अन्त में लघु एवं गुरु हों चार और आठ अक्षरों पर यति हो तो 'भुजङ्गविजुम्भित वृत्त होता है। जैसे-

भगण मगण तगण नगण नगण नगण रगण सगण र० ग०

SSS SSS SSIII SIS IIS रूपोपे तां देवैः सृष्टां स मदग जविल सितग तिनिरी क्यतिलो तमा

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पञ्चदशोक््याय। ३४३

दण्डकं नामविज्ञेयमुत्कृतेरघिकाक्षरम् मेघमालादिकं तत्स्यान्नौ चादौ कागुहा त्रिकाः ॥ १२२॥ यथा- मुदितजनपदाकुला स्फीतसस्याकरा भूतधात्री भवन्तं समभ्यर्चति द्विरदकरविलुप्ताहिन्तालतालीवनासत्वां नमस्यन्ति विन्ध्यादयः पर्वताः । स्फुटित कलश शुक्ति निर्गीर्णमुक्ता फलैरूरमिहस्तैर्नमस्यन्ति वः सागरा: मुदितजलचराकुला: संप्रकीर्णामला: कीर्तयन्तीव' कीतिं महानिम्नगाः ॥१२३॥ ५४. दण्डक वृत्त अनुवाद-जिस वृत्त के पाव में उत्कृति जाति के पाद में अधिक अक्षर हों, उसे 'बण्डक' वृत्त समझना चाहिए। इसके माला आदि प्रभेद होते हैं, अतः गुह आदि आचार्यो ने प्रारम्भ में नहीं बतलाया है॥ १२२ ॥ जैसे- मुदितजनपवाकुला स्फोतसस्याकरा भृतधात्री भवन्तं समभ्यर्चति। द्विरदकरविलुप्तहिन्तालताली वनास्त्वां नमस्यन्ति विन्ध्यावयः पवंताः। स्फुटित कलत्रा शुक्ति निर्गोणंमुक्ताफलैरमिहस्तै्नं मस्यन्ति वः सागराः, मुवितजल चराकुला: सम्प्रकीर्णामला: कोत्तयन्तोव कीति महानिम्नगाः ॥१२३॥ "प्रसन्न जनपद के लोगों से व्याप्त हैं, समृद्ध धान्य से परिपूर्ण यह पृथ्वी आप की अर्चना कर रहो है, हाथियों के सूड़ों से विलुप्त हिन्ताल और तालो वनों से युक्त विन्ध्यादि पर्वत तुम्हें नमस्कार करपे हैं, स्फुटित कलश-सदृश सूक्तियों से निकले हुए मुक्ताफलों वाले तरङ्ग रूपी हाथों से समुद्र भो आपको नमस्कार करते हैं, प्रसन्न जलचरों से आकुल फैले हुए निर्मल जलों वालो ये महानदियाँ आपके यश का मानो गान कर रही हैं॥ १२३॥ इस श्लोक-पाद में छब्बीस से अधिक अक्षर है, अतः यह 'दण्डक' छन्द है॥ १. क. (डि०) कीर्त्तयिष्यन्ति वर्णं।

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३४४ नाटधशास्त्रे

एतानि समवृत्तानि मयोक्तानि द्विजोत्तमा: ! विषमार्धसमानां तु पुनर्वक्ष्यामि लक्षणम्॥ १२४ ॥ यत्र पादास्तु विषमा नानावृत्तसमुद्दवा: । ग्रथिता: पादयोगेन तद् वृत्तं विषमं स्मृतम् ॥१२५॥ 2दौ समौ द्वौ च विषमौ वृत्तेऽर्धविषमे तथा। सर्वपादैश्च विषमैर्वृत्तं विषममुच्यते ॥ १२६ ॥

नानावत्तसमुं्धवा इत्यनेन तुल्यच्छन्दसां वृत्तानां लक्षणं पृथक् पृथक् पादे विरचय्य स्वयं विषमता उह्या इत्याह ॥१२५ ॥ द्वौ समाविति प्रथमतृतीयौ द्वितीयचतुथौं। द्वौ विषमाविति प्रथमद्वितीयौ तृतोयचतुथौं, वीप्सागर्भमेतत् द्वाविति ॥१२६॥

अनुवाद-हे द्विजोत्तमों! ये समवृत्त के लक्षण मैंने आपको बतलाए हैं। अब बिषम और अर्धसम वृत्तों के लक्षण को बतलाऊँगा॥ १२४ ॥ अनुवाद-जहाँ पर अनेकु वृत्तों से समुदभूत पाद विषम हों और पाद के योग्य से रचे गये हों वहाँ विषम वृत्त होता है॥११५॥ अभिनव-नानावृत्तसमुद्धवा का अभिप्राय है कि समान छन्दों वाले बृत्तों के लक्षण अलग-अलग पादों में रचना करके स्वयं विषमता का ऊहा (तर्क) करनी गाहिए।

अनुवाद-जहाँ पर दो पाद (प्रथम और तृतीय) सम हों, और दो पाव विषम हों, उसे 'अधंसम' वृत्त कहते हैं। तथा जहाँ पर चारों पद विषम हों उसे 'विषम' वृत्त कहते हैं ॥ १२६।

१. युग्मौनविषमाणां च संप्रवक्यामि लक्षणम । १. क. (टि०) समावेकान्तरी पादो द्वी द्वावघंसमौ स्मृतौ।

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पञन्मदशोऽ्याय: ३४५

हस्वाद्यमथ दोर्घाद्यं दौघं हस्वमथापि वा। युग्मौजविषमैः पादैवृत्तमर्धसमं भवेत् ॥ १२७ ॥ पादे सिद्धे समं सिद्धं विषमं सार्वपाविकम्। द्योरर्धसमं विद्यादेष छेदस्तु पादशः ॥ १२८॥

सिद्ध इति लक्षिते। सार्वपादिकमिति लक्षणीयमिति शेष: द्वयोरित्यत्रापि। छेद इति पादेषु विभाग इत्यर्थ ।। १२८ ।।

अभिनव-'दो समौ' का अभिप्राय है कि प्रथम और तृतीय तथा द्वितोय और चतुर्थ पाद सम हैं, तथा प्रथम और द्वितीय तथा तृतीय और चतुर्थ ये दोनों पाद विषम हैं। यहाँ द्वौ पद वीप्सा अर्थ में है अर्थात् दो-दो बार कहना अभीष्ट है।

अनुवाद-जहाँ पर आदि पाद लघु (छोटा) या दीर्घ (बड़ा) हो और दूसरा पाद बोघं या ह्रस्व हो तो युग्म, ओज और विषभ पदों से निमित वृत्त 'अर्धंसम' कहलाता है॥१२७ ।

अनुवाद-पादों के लक्षण करने में सभी पादों में समानता होने पर समवृत्त होता है और सभी पादों में विषमता होने पर विषम वृत्त होता है। और दो पावों में समानता या विषमता होने पर अर्द्धसम वृत्त होता है तथा पादों के अनुसार यति होती है। १२८।। अभिनव-सिद्ध इति-सिद्ध का अर्थ है लक्षित अर्थात् जिसका लक्षण कर दिया गया है। सभी पादों में यह लक्षण करना चाहिए। दो पादों में भी यह लक्षण करना चाहिए। छेद का अर्थ है, पादों में विभाग करना ॥ १२८ ॥

१. क-(भ) ह्रस्वाद्यं नैधनादयं वा : २. ख. ग. तद्वृत्तमसमं स्मृतम् । ३. क (भ.) द्वयोश्च पादयोरोज एष च्छेदस्तु वृत्तजः । क. (ब.) पाददवयस्य संसिद्धो सिद्धमद्धसमं पुनः । ना. थ्ा०-४४

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नाटयशास्त्र

छेदास्तु ये मया प्रोक्ताः समवृत्तविकल्पिताः । त्रिकरविषमवृत्तानां संप्रवक्ष्यामि लक्षणम्॥ १२९ ॥ सौ गौ तु प्रथमे पादे स्रौ ल्गौ चापि द्वितोयके। युग्मेऽर्धविषमे पादे ज्ञेया पथ्या तु सा त्रिकैः ॥ १३०॥ प्रियदैवतमित्राऽसि प्रियसंबन्धिबान्धवा। प्रियदानरता पथ्या "दयिते ! त्वं प्रियासि मे ॥१३१ ॥ समवृत्तविकल्पनं समवृत्तेषु विकल्पिता ये चित्राश्छेदा: ते प्रोक्ताः ॥१२९॥ अनुवाद-मैंने यति के आधार पर समवृत्तों का लक्षण कहा है। अब त्रिकों के द्वारा विषम वृत्तों का लक्षण कहूँगा ॥ १२९॥ अभिनव-समवृत्त विकल्पन का अर्थ है समवृत्तों में जो विभाग किये गये हैं, वे यति कहे गये हैं ॥ १२९ ॥ १. पथ्या लक्षणम्- अनुवाद यदि प्रथम पाद में दो सगण और दो गुरु हो और द्वितीय पाद में सगण, रगण लघु और गुरु हों। यही स्थिति तृतीय और चतुर्थ पाद में हो तो 'पथ्या' छन्द कहलाता है॥ १३० ॥ १. क. छेदतस्तु मया प्रोक्तं समवृत्तविकल्पनम्। ख. छेदास्तु ये मया प्रोक्ताः समवृत्तिविकल्पिताः ॥ क. (टि०) छेदकोऽयं मया प्रोक्तः । २. 'क' पुस्तके इत्यघिक दृश्यते- नैधनेऽन्यतरस्यां वै प्रथमे पाद इष्यते। द्वितीये चरणे च स्यादित्यनुष्टप् समासतः ॥ ३. क. ख. ग. एवं युग्मौजकौ ज्ञेयौ पथ्यावृत्त त्रिकौ यथा। क. (टि०) एवं युग्मौजयोज्ञेयं पथ्यावृत्ते त्रिकौ यथा। ४. ख. प्रियदानवारा। ५. ख. यद्यपि। ग दयिता।

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३४७

'स्रौ गौ तु प्रथमे पादे ससौ ल्गौ च द्वितोयके। पादे भौ ल्गौ तृतीये च चतुर्थ तु तसौ लगौ ॥। १३२॥ नैवाचारो न ते मित्रं न संबन्धिगुणप्रिया। सर्वथा सर्वविषमा पथ्या न भवसि प्रिये !॥ १३३॥

उदाहरण जैसे- सगण सगण गु०गु० सगण रगण ल०गु०

IIS SS SIS 1 S प्रियदै वतम त्रासि, प्रियस म्बन्धिबा न्धवा

सगण सगण गु० गु० सगण रगण ल०गु०

IIS IIS SS IIS SIS IS प्रियदा नरता पथ्या, दयिते त्वं प्रिया सिमे ॥१३१॥

"हे दयिते ! नुम देवता और मित्रों से प्रेम कराता हो, सम्बन्धो और बान्धव तुम्हें प्रिय है, तुम प्रिय बहुत देने में रत हो अतः तुम मेरो प्रिय हो ॥ १३१॥

२. सर्वविषमपथ्या

अनुवाद-यदि प्रथम पाद में मगण, रगण और दो गुरु हों, द्वितीय पाद यगण, सगण, लघु और गुरु हों, तृतोय पाद में रगण, भगण, लघु और गुरु हों और चतुर्थ पाद में तगण, सगण, लघु ओर गुरु हों तो 'सवविषमचरण' पथ्या वृत्त होता है ॥। १३२ ॥ उदाहरण जैसे-

मगण रगण गु० गु० यगण सगण ल० गु०

SSS SIS S S ISS IIS नै वा चारो न ते मित्रं न सम्ब न्धिगण प्रि या।

रगण भगण ल० गु० तगण सगण ल० गु० 11 SIS SII I S IIS IS सवंथा सर्ववि षमा पथ्या न भवसि प्रि ये ॥ १३३॥

१. इत आरम्भ क्लोकठूयं ख. ग. पुस्तकयोर्नास्ति।

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३४८ नाट्यशाहणे

अयुजोर्लक्षणं ह्यतद्विपरीतं तु यत्र च। पथ्या हि विपरोता सा विज्ञेया नामतो यथा ॥१३४॥ कृतेन रमणस्य किं सखि ! रोषेण तेऽप्यर्थम्। *विपरोता न पथ्यासि त्वं जडे ! केन मोहिता ॥१३५ ॥

अनुवाद-हे प्रिये ! तुझमें न आचार है, न कोई तुम्हारा मित्र है, और न सम्बन्धियों एवं गुणों से प्रेम करती हो। तुम सब प्रकार से सब के लिए विषम हो। अतः हे प्रिये। तुम पथ्या (प्रिया) नहीं हो॥ १३३ ॥ ३. विपरीतपथ्या

अनुवाद-जिसके विषम अर्थात् प्रथम, तृतोय पाद में उपर्युक्त पथ्या के लक्षण से विपरीत लक्षण हों, उसे 'विपरीत पथ्या' वृत्त समझना चाहिए॥ १३४॥।

उदाहरण जैसे-

जगण सगण ल० गु० सगण रगण ल० गु० 1 IIS S SISIS कृते न रमण स्य कि सखि शेषेण तेऽप्यर्थम्। सगण रगण गु० ल० रगण रगण ल० गु० 11 IIS SIS SIS SISIS विपरोता न प थ्यासि, त्वं जड़े के न मो हिता॥ १३५ ॥

अनुवाद-हे सखि ! प्रिय के प्रति रोष (क्रोध) करने से तुम्हें क्या मिला ? इस प्रकार विपरीत आचरण करने से प्रिय नहीं हो, हे जड़? तुम किसके द्वारा मोहित हो रही हो।। १३५।।

१. ख. युग्मयोः । २. ख बुधः। ३. ख. पुस्तकेऽयं श्लोको नास्ति। ४. क. त्वं जड़े केन मोहिता विपरीता न पश्यासि।

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३४९

चतुर्थादक्षराद्यत्र त्रिलघु स्यादयुक्ततः । अनुष्टुपूचपला सा तु विज्ञेया नामतो यथा ॥१३६ ॥ यथा- न खल्वस्या: प्रियतमः श्रोतव्यं व्याहुतं सख्या। नारदस्य प्रतिकृतिः कथ्यते चपला* हीयम् ॥ १३७।।

४. चपला

अनुवाद-यदि अनुष्टुप् छन्द के विषम पाद में चतुर्थ अक्षर के बाद पञ्चम, षष्ठ एवं सप्तम वर्ण लघु हो तो उसे 'अनुष्टुप्-चपला' नामक वृत्त समझना चाहिए ॥ १३६ ॥

१. ख. ग अनुष्टुप् विपुला । क (टि०) पिङ्गलादयस्तु 'चपलायुजोन्' इत्याहुः। रुद्रस्वामी 'चपला' इति सूत्रयित्वा- 'अस्मिन्नेव वक्रनियमे अयुजोः पादयोरन्त्यात् पूर्व ककारो भवति चेत् चपलानाम भवति ।

यथा- 'भात्यशोक: किसलय कुसुमस्तबकैः रम्यैः । श्रियं हस्ताधरगतां लज्जयन्निव च स्त्रीणाम् ।।" इत्युदाहरणेन विवृतान्। ईशानदेवोऽपि छन्दः स्तुता चपलावक्रस्य- "रोक्ममेन्द्रमभिनवं मण्डपं हृद्गतं ध्यायेत्। हैमवप्रं तु परितश्चपलावक्रशोभाढ्यम् ॥"

इत्याह। सैतवाचार्यमते-इयं नकारविपुला । "चषलावक्रमयुजोः समुद्रान्नगणो"। इति मन्दारमरन्दे च। २. क. (टि०) श्रयते विपुला होयम् ।

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३५० नाट्यशास्त्र

विपुला तु युजि ज्ञेया लघुत्वात्सप्तमस्य तु। सर्वत्र सप्तमस्यैव® केषांचिद्विपुला यथा ॥ १३८॥ संक्षिप्ता वज्मध्ये हि हेमकुम्भनिभस्तनी। विपुलाऽसि प्रिये ! श्रोण्यां 'पूर्णचन्द्रनिभानने! ॥ १३९॥

उदाहरण जैसे- I SSS IIIS SSS SIS SS न खल्वस्या: प्रियतमा ओतव्यं व्याहतं सख्या। SISSIIIS SIS IISSS नारदस्य प्रति कृतिः कथ्यते चपला हीयम् ॥१३७ ॥ अनुवाद-इस कन्या का कोई प्रियतम नहीं है, यह मैंने सखियों के बात- चोत से सुनली थी। वह चपला नारद को प्रतिकृति (झगड़ालू) कही जाती है।। १३७ ॥ ५. विपुला अनुवाद-यदि अनुष्टुप् बृत्त के सम अर्थात् द्वितोय एवं चतुर्थ पाद से सप्तम वर्ण लघु हो तो 'विपुला' वृत्त होता है, कुछ विद्वानों का मत है कि यदि सभी पादों में सप्तम लघु हो विपुला वृत्त होता है।। १३८॥ कीश उदाहरण जैसे- SSSSISSS SISTIS IS संक्षिप्ता वज्त्र वन्मध्ये हेमकुम्भनिभस्तनि। IISS SS S S ISSIISIS विपुलासि प्रिये कटयां शरच्चन्द्रनिभानने ॥ १३९॥ अनुवाद-हे प्रिये ! तुम कटिभाग में वज्र के समान क्षीण हो अर्थात तुम्हारी कमर पतलो है, स्तन सुवर्ण घट के समान है, नितम्ब विपुल (गुरु) है और तुम्हारा मुख शरद् के चन्द्र के समान सुन्दर है॥ १३९॥ यहाँ पर द्वितीय और चतुर्थ पाद में सप्तम वर्ण लघु है अतः यहाँ 'विपुला' वृत्त है ॥। १३९ ।। १. ख. सप्तमस्यैव केषांचित् विपुलंव तु सा यथा। २. सैतवाचार्यादीनां मते। रकारतकारभकारमकार मकारविपुला: प्रसिद्धाः । ३. खग. कस्यां शरच्चन्द्रनिभानने।

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३५१

गङ्गेव मेघोपगमे आप्लावितवसुन्धरा। कूलवृक्षानारुजन्ती स्त्रवन्ती विपुला बलात्॥ १४०॥ आगता मेघसमये भोरु भोरुकुलोद्गते!। एकरात्रौ परिगुहं चोरि बन्धनमहँसि ॥१४१॥

विपुला का द्वितोय उदाहरण- SSI SSIIS SSIIISIS गङ्गेव मेघोपगमे आप्लावितवसुन्धरा। SI SSSISS IISIISIS कूलवृक्षाना रुजन्ती स्रवन्ती विपुलाचलात्॥ १४० ॥। अनुवाद-हे प्रिये ! तुम मेघों के आने पर वर्षा ऋतु में पृथ्वी को आप्लावित करके किनारे के वृक्षों को तोड़ती हुई, विशाल पर्वंतों से नीचे की ओोर बहने वाली गङ्गा के समान हो।। १४०। तृतीय उदाहरण- SIS SITIS SISIISIS आगता मेधसमये भीरु भोरुकुलोदगमे। SI SS IIIS SSSIISIS एक रात्रं परगृहं चोरो बन्घनमहंसि ॥१४१॥ अनुवाद-भीरु कुल में उत्पन्न हे भीरु! (डरपोक !) मेघ के समय अर्थात् वर्षा के समय एक रात के लिए पराये घर में आई हो, अतः चारी में बाधने योन्य हो॥ १४१॥ यहाँ चारों पादों में सातवाँ वर्ण लघु है अतः यह तृतीय प्रकार का विपुला का उदाहरण है।

१. ख. ग. विपुलान् बलान्। २, ख. ग. पुस्तकयोरयं इ्लोको नास्ति ।

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३५२ नाटयशार्न्रे

एवं विविधयोगास्तु' पथ्यापादा भवन्ति हि। युग्मोजविषमैः पादैः शेषैरन्यैस्त्रिकैरथ। १४२।। गुर्वन्तकः* सर्वलघुस्त्रिको नित्य' हि नेष्यते। प्रथमादक्षराद्यत्र चतुर्ात्प्राग्लघुःस्मृः ॥१४३॥ पथ्यापादं समास्थाप्य त्रीण्यन्ते तु गुरुण्यथ। भवन्ति पादे सततं बुधैस्तद्वक्त्रमिष्यते ॥ १४४॥ सगुवन्त इति गुवन्तः स सर्वलघुः नः, त्रिकौ नेष्येते। प्रथमादक्षरावनन्तरः चतुर्थावक्षरादूध्वं तु प्राक्लघुः यकारस्तु नेष्यते। एतानि न प्रयोज्यानि इत्यर्थः । १७५ ॥ अनुवाद-इस प्रकार पथ्या वृत्त के पाद अनेक योग (रूप) वाले होते हैं। सम पाद एवं विषम (अयुग्म) पाद तथा शेष अन्य त्रिकों से बनते हैं। इस वृत्त के अन्त गुरु वाला त्रिक (सगण) अथवा सर्वं लघु वाला त्रिक (नगण) इष्ट नहीं है। प्रथम अक्षर के बाद तथा चतुर्थ अक्षर के पूर्व एक लघु वर्ण होना अभोष्ट है॥ १४२-१४३॥ अभिनव-'सगुर्वन्तः' का अर्थ है गुरु जिसके अन्त में हो वह त्रिक अर्थात् सगण (।I5), सर्व लघु अर्थात् नगण (।।।) त्रिक इष्ट नहीं है। प्रथम अक्षर के बाद और चतुर्थ अक्षर से पूर्व ऊर्ध्व (बाद) या पहिले लघु यकार इष्ट नहीं है इनका प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ १४२-१४३ ।। ६. पथ्याववत्र अनुवाद-यदि पथ्या वृत्त के पाद के अन्त में तीन गुरु हों तो विद्वान् लोग उसे 'पथ्याववत्र' वृत्त कहते हैं॥ १४४। उदाहरण जैसे- SS ISIS SS SISSI SSS दन्त क्षताधरं सुभ्रु, जागरग्लान ने त्रान्तम्। IISSI SS S SISIIS SS रति सम्भोग खिन्नं ते द्शंनीयतमं वक्त्रम् ॥ १४५॥।

१. ग. एवं विविषयोगैस्तु । २. क. सगुर्वन्त: । ३. ख. घु स्मृतम्। ४. क० तद्ववत्रमुच्यते।

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३५३

यथा- वन्तक्षताधरं सुभ्रु ! जागरग्लाननेत्रं' च। रतिसंभोगखिन्नं ते दर्शनीयतरं वक्त्रम् ॥ १४५॥ 'इत्येषा सर्वविषमा नामतोऽनुष्टुबुच्यते। तद्विदां मतवैषम्य त्रिकादक्षरतस्तथा ॥ १४६॥ पादे षोडमात्रास्तु 'गाथांशकविकल्पिताः । चतुभिरंशकज्ञैया वृत्तज्ञैर्वानवासिका ॥ १४७ ॥ असंस्थितपदा सुविह्वलाङ्को मदस्खलित चेष्टितैमं नोज्ञा क्व यास्यसि वरोर ! सुरतकाले विषमा कि ? वानवासिका त्वम् ॥ १४८ ॥

जैसे- अनुवाद-हे सुभ्रु ! तुम्हारे अधर वन्तक्षत से युक्त है, जागने से नेत्रप्राम्त अलसाये हुए हैं, और रति-सम्भोग से खिन्न तुम्हारा मुख दर्शनौय हो गया है।। १४५ ।। इस उदाहरण में सभी पादों के अन्त के तीन व्णं गुरु हैं, अतः यहां 'पथ्यावक्त्र' वृत्त है।। अनुवाद-इस प्रकार ये सर्वविषम वृत्त अनुष्दुप् नाम से कहे जाते हैं। छन्दोवेत्ता विद्वान् एक मत नहीं है कि ये त्रिकों या अक्षरों से लक्षित किये जाते हैं ॥ १४६॥ ७. वानवासिका अनुवाद-वृत्तवेत्ता लोगों को गाथा के अश से कल्पित सोलह मात्राओं के पाद में चार भागों में विभक्त त्रिकों के द्वारा निरूपित 'वानवासिका' वृत्त समझना चाहिए।। १४७॥ १. क. नेत्राश्तं। २. ख. प्रातः सम्भोगखिन्नं ते दर्शनीयतमं वकत्रम्। ३. ख.ग. पुश्तकयोरयं क्लोको नास्ति। ४. ख. त्रिकांशकविकल्पिताः । क-म. यश्यां नित्यं भवन्ति हि। ना. प्रा०-४५

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३५४ नाटयशा्त्रे

स्जौ स्गौ च प्रथमे पादे तथा चैव तृतीयके। केतुमत्यां गणा: प्रोक्ताः भ्रौन्गौ गश्च सदा बुधैः ॥ १४९॥ स्फुरिताधरं चकितनेत्रं रतकपोलमम्बुजदलाक्षम्। किमिदं रुषापहृतशोभं केतुमतीसमं वद मुखं ते ॥ १५० ॥

जैसे- IS IIIS ISISS ISIII SIS ISS असं स्थितपदा सुविह्वलाङ्गी, मदस्खलित चेष्टितै भंनोज्षा ISTI ISI TIISS LIS S SIS IS S क्व यास्यसि वरोर! सुरतकाले विषमा कि! वा न वा सि का त्वम् ।१४८। यहाँ प्रत्येक पाद में सोलह मात्राएँ हैं अतः यह 'वानवासिका' वृत्त का उदाहरण है। अनुवाद-हे वरोर! तुम्हारे पैर लड़खड़ा रहे हैं, अङ्ग विह्वल हैं, मद से स्खलित चेष्टाओं में सुन्वर लग रही हो, है वरोरु! इस सुरत के समय तुम कहाँ जा रही हो ? क्या तुम विषमा (विराग युक्त) वनवासिनी तो नहों हो।। १४८॥ ८. केतुमती अनुवाद-यदि प्रथम और तृतीय पाद में सगण, जगण, सगण तथा एक गुरु हों और द्वितीय एवं चतुर्थ पाद में भगण, रगण, नगण, तथा वो गुरु हों तो 'केतुमती' वृत्त होता है। १४९॥ जैसे- सगण जगण सगण गु०

IS I स्फुरिता ध रंच कितने त्रं

भगण रगण नगण गु० गु० 1 SII SIS रक्त क पोल म म्वुज व लाक्षम्।

१. अतः परमेकादशपद्यानि ग्रन्थान्तरेषु न सन्ति। २. ख. कछितनेत्रं। ३. ख. केतुमतिमुखाकृति मुखं ते।

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३५५

वक्त्रस्यापरपूर्वस्य चादौ नौ रो लगौ त्रिकाः । नजौ जरौ द्वितीये च शेषाग्रं पुनरेव *तु॥ १५१ ॥ 'प्रथमे च तृतीये नौ रलौ गश्च प्रकीतितः । गणाइचापरवक्त्रे तु नजौ जौ द्विचतुर्थयोः ॥१५२॥

सगण जगण सगण गु०

IIS IIS S

किमिदं रषाप ह त शो भं

भगण रगण नगण गु० गु० 7 SIS केतु म तोस मं व दमु खंते॥१५०॥

यहाँ प्रथम और द्वितीय पाद में सगण, जगण, सगण और एक गुरु है तथा द्वितीय एवं चतुर्थ पाद में भगण, रगण, नगण और दो गुरु हैं अतः 'केतुमती' वृत्त है। अनुवाद-हे देवि ! तुम्हारे अधर फड़क रहे हैं: नेत्र चकित (चञ्चल) हैं, कपोल लाल हैं, नेत्र कमलदल के समान बिखरे हुए हैं, क्रोध के कारण शोभा नष्ट हो गई है, कहिये, यह सब क्या है ? तुम्हारा मुख अग्नि को ज्वाला की तरह हो रहा है।। १५० IT

९. अपरवस्त्रा

अनुवाद-अपरवक्त्र वृत्त के प्रथम और तृतीय पाद में नगण, नगण, रगण त्रिक और लघु एवं गुरु हों, और द्वितीय तथा चतुर्थ पाद में नगण, जगण, जगण और रगण त्रिक होता है। १५१॥

१. क. (टि०) अपरवक्रस्यादी तु म्ौगिति त्रिकं त्रिकम् । नजौ जरौ द्वितीये तु चतुर्थे पुनरेव तु। २. क. (भ.) प्राग्वदेव तु। ३. अय क्लोक: 'ग' पुस्तके नास्ति ।

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नाटपशाएने

सुतनु ! जलपरीतलोचनं जलदनिरुद्धमिवेन्दुमण्डलम् । किमिदमपरवक्त्रमेव ते शशिवदनेऽद्य मुखं पराङ्मुखम्।॥ १५३॥ नौ यौं तु प्रथमे पादे न्जौ जौ गश्च तथापरे। यत्र ततपुष्पिताग्रा स्याद्यदि ज्ञेयं तु पूर्ववत्॥ १५४ ॥

जैसे-

नगण नगण रगण ल० गु०

SIS IS सुतनु ! जरप रीत लो च नं

नगण जगण जगण रगण 1 IS I IS I SIS

जलद निरु द्व मिवेन्दु मण्डलम् नगण नगण रगण ल० गु०

111 SIS I S किमिद मपर व वत्र मे व ते नगण जगण जगण रगण

7 7 1 IS I SIS ட

शशिव द नेऽद्य मुखं प राङ्मुखम् ॥ १५२॥ यहाँ पर प्रथम और द्वितीय पाद में दो नगण, रगण त्रिक और लघु एवं गुरु है तथा तृताय और चतुर्थ पाद में नगण, दो जगण और रगण है, अतः 'अपरवक्त्र' वृत्त है ॥ १५२ ।। अनुवाद-हे सुतनु ! तुम्हारे नेत्र आंसुओं से भरे हैं, तुम्हारा मुख मेघों से ढके हुए चन्द्र मण्डल के समान लग रहा है, हे शशिवदने ! आज तुम्हारा पराङ्मुख मुख दूसरे जैसा लग रहा है।। १५२।।

१०. पुष्पिताग्रा

अनुवाद-जहाँ पर प्रथम पाद में दो नगण, रगण, और यगण हों तथा द्वितीय पाद में नगण, दो जगण रगण और गुरु हो, तथा शेष तृतीय और चतुर्थ पाद में यवि पहिले की तरह हो तो 'पुष्पिताय्रा' वृत्त होता है॥ १५३-१५४।।

१. क. (टि०) यर्थतावपरौ तथा।

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३५७

पवनबलविधूतचारुशाखं

hep प्रमुदितकोकिलकण्ठनादरम्यम् मधुकरपरिगीयमानशब्दं वरतनु ! पश्य वनं सुपुष्पिताप्रम् ॥ १५५॥ स्जौ स्लौ चादौ यथा न्सौ ज्गौ भ्नौ ज्लौ गश्च तथा पुनः। रजौ स्जौ गश्च त्रिका होते उद्गतायाः प्रकीर्तिताः ॥१५६॥

जैसे- नगण नगण रगण यगण

111 SIS ISS पवन रय वि धतचा रु शाखं

नगण जगण जगण रगण गु० 7 ISI I SI SIS S

प्रमुदि त कोकि ल कण्ठ नावरम्यम् । नगण नगण रगण यगण

SIS L ISS

मघुक र परि गोयमा न शब्दं नगण जगण जगण रगण गु०

ISI SISS वरत नु ! पश्य वनं सु पुष्पिता ग्रम् ।।१५४।। क 1Pअनुवाद-हे वरतनु ! तुम इस पुष्पों से अलङ्कृत वन को देखो ! इसमें पवन के वेग से वृक्षों को सुन्दर शाखाएँ हिल रहो है, प्रसन्न कोयलों के मधुर कष्ठबाद से रमणोय है, भोरों के गुञ्जार से शब्दायमान है॥१५५॥ ११. उद्गता क्षनदाद-जिसके प्रथम पाद में सगण, जगण, सगण और लघु वणं हों, द्वितीय पाद में नगण, सगण, जगण और गुरु हों, तृतोय पाद में भगण, नगण, जगण लघु एवं गुरु हों, पुनः चतुर्थ पाद में सगण, जगण, सगण, जगण और गुरु हों, वहाँ 'उद्गता' वृत्त होता है॥ १५६ ॥ १. क. (टि०) पवनरथविधूत०।

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"३५८ नाटघशाएने

तव रोमराजिरतिभाति सुतनु ! मदनस्य मज्जरी। नाभिकमलविव रोत्पतिता भ्रमरावलीव कुसुमात्समुद्गता॥१५७॥ स्जौ स्लौच ततो न्सौ ज्गौ नौ सौ चेति तृतोयके। स्जौ स्जौ गश्च चतुर्थे तु ललिताया गणाः स्मृता ॥ १५८॥

जैसे- सगण जगण सगण ल०

IIS IS I IS तव रो मरा जि रति भा ति नगण सगण जगण गु०

11 S सुतनु ! म दन स्य मञ्ञज रो । भगण नगण जगण ल० गु०

11 IS I S नाभिक मल वि वरोत्प ति ता

सगण जगण सगण जगण गु०

II S IS | S भ्रमरा वलीव कुसुमा त्समुदग ता॥। १५६ ।। अनुवाद-हे सुतनु ! नाभिकमल रूपी विवर से ऊपर उठी हुई, पुष्पों से उद्गत भौरों को कतार के समान, कामदेव की कुसुम मञ्जरी रूप तुम्हारी रोमावली अत्यन्त सुशोभित हो रही है॥। १५७।।

१२. ललिता

अनुबाद-जिसके प्रथम पाद में सगण, जगण, सगण तथा लघु हों, द्वितीय पाद में नगण, सगण, जगण और गुरु हो, तृतीय पाद में दो नगण और दो सगण हों तथा चतुर्थ पाद में सगण, जगण, सगण, जगण और एक गुरु हो तो 'ललिता' नामक वृत्त होता है।। १५८।।

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३५९

'ललिताकुलभ्रमितचारुव सनकरचारुपल्लवा। प्रविकसितकमलक्ान्तिमुखी प्रविभासि देवी सुरतश्रमातुरा ॥१५९॥ एवमेतानि वृत्तानि समानि विषमाणि च । 2नाटकाद्येषु काव्येषु प्रयोक्तव्यानि सूरभिः ॥१६० ॥

जैसे-

सगण जगण सगण ल०

  • IIS IIS ललिता कुल भ्र मित चा रु

नगण सगण जगण गु०

ISI S

वसन कर चा रु पल्ल वा।

नगण नगण सगण सगण

II S 1 IS

प्रविक सित क मल का न्ति मखी

सगण जगण सगण जगण गु०

IIS I SI IIS IS IS प्रतिभा सि देवि ! सुरत श्र मातु रा॥ १५९।। अनुवाद-हे देवि ! ललित एवं आकुल हिलते हुए सुन्दर वस्त्र और सुन्दर करपल्लवों वालो बिले हुए कमल के समान कान्त (सुन्दर) मुख वाली तुम सुरतधरम से थकी हुई मालूम पड़ रही हो।। १५९।। अनुवाद इस प्रकार ये सम और विषम वृत्त विद्वानों को काव्य और नाटकों में प्रयोग करने चाहिए॥ १६० ।

१. ब. ललिताकुलभ्रमिबाहवसमकरपल्लवा हि मे। क-भ. ललितावलिभ्रमरज़ासु वदनकरचारुपल्लवा। २. स. नाटकादिषु।

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वाटघशारन्रे

सन्त्यन्यान्यपि वृत्तानि यान्युक्तानीह पिण्डशः'। न च तानि प्रयोज्यानि न शोभा जनयन्ति हि॥ १६१॥ यान्यत्र प्रतिषिद्धानि गोतके तानि योजयेत्। ध्रुवायोगे तु वक्ष्यामि तेषां चैव विकल्पनम् ॥ १६२।। वृत्तलक्षणमेव" तु समासेन मयोदितम्। अत ऊ्ध्वं प्रवक्ष्यामि ह्यार्याणामपि लक्षणम्॥ १६३॥

ननु हतशोभानीति चेतु कथं प्रयोज्यानोत्याह-यान्यत्र प्रतिषिद्धानीति। गीतं पठ्यमानत्वाभावात् न वृत्तगता श्रव्यतापेक्ष्येते केवलं तालयोजनार्थ साम्यमवश्यं कर्तव्यमिति मात्राणां वर्णानां नियमस्तत्राधीयते॥१६२।।

अनुवाद-अन्य भी वृत्त होते हैं जिन्हे समूह रूप में बतलाया गया है। किन्तु उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे (काव्य में) सौन्वयं (शोभा) को नष्ट कर देते हैं॥। १६१॥ अभिनव-अब प्रश्न यह होता है कि यदि वे काव्य में शोभा को नष्ट कर देते हैं तो उनका प्रयोग कहाँ करना चाहिए ? इस पर कहते हैं- अनुवाद-जो वृत्त यहाँ ( काब्य-नाट्य में) प्रतिषिद्ध हैं उनका प्रयोग गीत आदि में करना चाहिए। ध्रुवाओं के प्रयोग के समय उनका सभेद वणंन करं गा ॥ १६२ ॥ अभिनव-गीतों में पाट्यमानता का अभाव होने के कारण वृत्तों में श्रव्यता की अपेक्षा नहीं होती, केवल तालों की योजना के लिए अर्थ-साम्य को अवश्य करना चाहिए, इसलिए गोतों में मात्रा और वर्गों के नियम का आश्रयण किया जाता है॥ १६२॥ अनुवाद-इस प्रकार संक्षेप में मैंने वृत्तों का लक्षण कहा है। उसके बाद मैं आर्या का लक्षण बतलाऊँगा॥ १६३ ॥।

१. क. (टि०) पण्डितैः । २. ग. मयोक्तानि। ३. क. हतशोभानि तानि हि। ४. ख. ग. ध्र वाविधाने ब्याख्यास्ये तेषां चैद विकल्पनम्। ५. ख. ग. एतस्।

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पञ्चदश्ोष्याय: ३६१

पथ्या च विपुला चैव चपला मुखतोऽपरा। जघने चपला चैव आर्याः पञ्च प्रकोर्तिताः'॥ १६४।। आसां तु १संप्रवक्ष्यामि यतिमात्राविकल्पनम् । 'लक्षणं नियमं चैव विकल्पगुणसंश्रयम् ॥१६५॥ यतिश्छेदस्तु विज्ञेयश्चतुर्मात्रो गणः स्मृतः । द्वितीयान्त्यौ युजौ पादावयुजौ त्वपरौ स्मृतौ ॥१६६ ॥ गुरुमध्यविहीनस्तु चतुर्गणसमन्वितः । अयुग्गणो विधातव्यो युग्गणस्तु" यथेप्सितः ॥ १६७ ।।

आर्यावृत्त अनुवाद-पथ्या, विपुला, चपला, मुखचपला, और जघनचपला-ये पांच आर्याएँ कही गई हैं॥। १६४ ।। अनुवाद-अब मैं इन आर्याओं के लक्षण, यति एवं मात्राएँ, उनके भेद तथा विकल्प के गुण के आश्रित नियमों को कहूँगा॥ १६५ ॥ अनुवाद-पाद के विभाग को यति कहते हैं। गण चार मात्राओं का होता है। द्वितीय और चतुर्थ पाद को युज् (सम-पाव) कहते हैं तथा प्रथम और तृतोय पाद को अयुज् अर्थात विषम पाद कहते हैं ॥ १-६॥ अनुवाद-मध्य गुरु अर्थात् जगण से रहित चार गणों वाले अयुज् गणों का विधान करना चाहिए और युज गण का इच्छानुसार प्रयोग करना चाहिए॥ १६७ ॥ १. ख. पञ्चविधा: स्मृताः । २. क. (टि०) चैव प्रवक्ष्यामि। ३. क. (टि० लक्षणे नियतांश्चैव विकल्पान् गुणसंश्रितान। ४. क. (टि०) शेषौ चैव युजौ स्मृतौ। ५. क. (डि०) युग्गण: पक्च चंव तु। ना. था०-४६

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३६२ नाटघशास्त्र

षष्ठो वै द्विविकल्पस्तु नैधनो ह्योकसंस्थितः । पाश्चादर्धें तु षष्ठः स्यादेकमात्रस्तु केवलः ॥ १६८॥ द्विविकल्पस्तु षष्ठो’ यो गुरुमध्यो भवेत्तु सः। "तथा सर्वलघुश्चैव यतिसंज्ञासमाश्रिता ॥ १६९॥ "द्वितोयादिलघुर्ञेयः सप्तमे पञ्चमे यतिः'। प्रथमादिरथान्त्ये च पञ्चमे वा विधोयते ॥ १७० ॥ गणेषु त्रिषु पादस्य यस्याः पथ्या तु सा भवेत्। अतश्च विपुलान्या तु विज्ञेया यतिलक्षणा॥ १७१ ॥

अनुवाद-षष्ठ गण के दो विकल्प (भेद) हैं और अन्तिम अर्थात् अष्टम गण एक भेद वाला होता है। उत्तराद्व में षष्ठ गण केवल एक मात्रा से निरमित होता है।। १६८ ।। अनुवाद-जो षष्ठ गण दो विकल्पों वाला होता है। वह मध्य गुरु वाला होता है तथा वह सवं लघु भी होता है। वे यति संज्ञा के आश्रित होते हैं ॥१६९॥ अनुवाद-जब द्वितीय चतुर्थ आदि अलघु (गुरु) हो तो पञ्चम-सप्तम अक्षर पर यति होती है और यदि प्रथम, तृतीय जक्षर लघु हो तो पञ्चम एवं अन्तिम अक्षर पर यति होती है॥। १७० ।। अनुवाद-जिस वृत्त में तीन गणों के पर यति होती है वहाँ 'पथ्या' आर्या होती है। इससे भिन्न 'विपुला' आर्या होतो है, विपला में कोई यति नहीं होती ॥ १७१ ॥

१. ख. षष्ठस्य। ग. षष्ठर्च । २. कनप. पश्चार्धे यो गण: षष्ठः एकमात्र। स उच्यते। ३. क. (टि०) षष्ठोऽत्र । ४. क. (टिe) सर्वयतिश्चैव यदि संज्ञां समाश्रितः । ५. क. (टि०) सद्वितीया द्विलघुनी सप्तमे सप्तमाच्चदि । ६. क-भ. सप्तमे वा यतिस्तथा। ७. ख. प्रथमादि तथान्ते च । ८. क. (टि०) प्रथमे द्वितीये च सा त्वन्या विपुला मता। द्वितीयश्च चतुर्थश्च जकारो गुरुमध्यगौ।।

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अयुजः सर्वगुरवो गुरुमध्या गणा युजः । यस्या: स्युः पादयोगे तु विज्ञ या चपला' हि सा॥ १७२॥ त्रिशदाद्ये तु विज्ञयाः सप्तविशतिः चापरे। उभयोरधंयोर्ज्ञेयो मात्रापिण्डो विभागशः । १७३ ।। 'त्रिशत्तस्याश्च यदि स्युरेतानि द्विगुणानि तु। त्रीण्यक्षराणि चान्यानि न्यस्य संख्याविभागशः ॥। १७४।। एतानि लघुसंज्ञानि निर्दिष्टानि समासतः । "सर्वेषां चैवमार्याणामक्षराणां यथाक्रमम्॥ १७५।।

अनुवाद-जिसके विषम (प्रथम एवं तृतोय) पाव सवं गुरु हों और सम पाद (द्वितीय-चतुर्थ) मध्य गुरु वाले गणों से युक्त हो ता उसे 'चपला' आर्या वृत्त समझना चाहिए।। १७२।।

अनुवाद-जिसके आदि में तीस मात्राएँ हो और अन्य सतताइस मात्राओं वाला हो। दोनो अर्धों के विभाग के अनुसार मात्राओं के पिण्ड को समझना चाहिए॥ १७३।

अनुवाद-उसके पाद में यदि तोस अक्षर हों तो उसे द्विगुणित कर दे और संख्या के विभाग के अनुसार तोन अक्षर और जोड़ दे। संक्षेप में इसे लघु संज्ञक समझना चाहिए। इसी क्रम के अनुसार आर्याओं के सभो अक्षरों को समझने चाहिए। १७५-१७६ ॥।

१. ख. विपुला च सा। २. ख. त्रिशन्मात्रास्तु पूर्वाद्धें विशतिः सप्त चापरे। ३. ख. अधिकानि यानि त्रिशद्म्यस्तानि द्विगुणितानि तृ । ४. ख. अक्षरत्रययुक्तानि ज्ञेयान्यत्र लघूनि तु। ५. ख. सर्वासामेव चार्याणामक्षराणि यथाक्रमम् ।

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नाडपशास्त्रे

अर्धाष्टमगणार्धा च सर्वैवार्या प्रकीतिता। षष्ठरच द्विविकल्पस्तु नैधने ह्योकसंस्थितः ॥ १७६ ॥ पश्चाद्वा यो गण: षष्ठ एकमात्रः स उच्यते। द्विविकल्पस्तु यः षष्ठो गुरुमध्यो भवेत्तु सः॥१७७॥ यथा सर्वलघुश्चैव यतिः संख्यासमाश्रिता। सा द्वितोया द्विलघुका सप्तमे प्रथमे यतिः ॥ १७८ ॥

अर्धोडष्टमो गणः । अतः सार्धाः सप्त गणाश्च। चतुर्मात्रा यस्माततावृगर्धः यः स्थात्। षष्ठा गणो द्विभेदः । तस्य एकभेदमाह पाश्चावर्षों यः षष्ठो गणस्तस्मिन् कर्तव्ये लघुरेकः कर्तव्यस्तस्य स्थाने गुरुमध्योज इत्यर्थः। सर्वलघुः चतुर्लघुस्तत्र च द्वितोयावारम्य लघोर्यतिरर्घे तवनन्तर पादारम्भ: कर्तव्यः, अन्ते च प्रथमावियतिः, पञ्चमे च गणे समाप्ते यतिः १७७-१७९ ।। अनुवाद-सम आर्याएँ प्रारम्भ में साढ़े सात गणों वाली होती है। षष्ठ गण दो विकल्पों वाला होता है अर्थात् उसके दो भेव होते हैं। तथा अष्ठम गण एक भेद वाला होता है। उत्तरार्द्ध में षष्ठ गण एक मात्रा वाला कहा जाता है। दो भेदों वाला जो षष्ठ गण है वह गुरुमध्य अर्थात् जगण होता है। और दूसरा रूप सर्व लघु वर्ण वाला होता है। ये यति संख्या पर आश्रित रहते हैं। वह द्वितीय वो लघु वाला होता है तो सप्तम और प्रथम पर यति होती है।। १७७-१७९ ।। अभिनव-आठवाँ गण आधा होता है अतः आर्या में साढ़े सात गण होते हैं। आर्या में चार मात्राओं का एक गण होता है अतः उसका आधा गण। षष्ठ गण के दो भेद होते हैं। उसके एक भेद को कहते हैं। आधा जो षष्ठ गण है उसके करने के समय एक लघु करना चाहिए। उसके स्थान में मध्य गुरु जगण होना चाहिए। सर्व लघु अर्थात् चार लघु जहाँ हों, वहाँ द्वितीय लघु से आरम्भ करके आधे में यति करे उसके बाद का आरम्भ करना चाहिए। अन्त में प्रथम लघु पर यति करनी चाहिए और पञ्चम गण की सम्प्राप्ति पर यति करनो चाहिए॥ १७७-१७८ ॥

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१६५

गुरुमध्यविहीनस्तु चतुर्गणसमन्वितः । अयुग्गणो विधातव्यः युग्गणस्तु' स एव च ॥ १७९ ॥ प्रथमतृतोयौ पादौ द्वादशमात्रौ भवेत्तु सा पथ्या। विपुलान्या खलु गदिता पूर्वोदितलक्षणोपेता ॥ १८० ॥

अयुग्गगण इति विषमः प्रथमतृतीयपञ्चमसप्तमरूपः । युग्गणः समः। स एव चेति जगणस्तत्र न वज्यं इति यावत् ॥ १७९॥ अर्धद्वयेऽपि गणत्रये छेद: कर्तव्यः सैव पाद उच्यते तदाह-प्रथमतृतीयौ पादौ द्वादशमात्राविति। प्रथमेऽ्धें गणत्रयं प्रथम: पादः। द्वितीयेऽ्धें चान्यद् गणत्रयं तृतीयपादः ॥१८०।

अनुवाद-मध्य गुरु अर्थात् जगण से रहित चार गणों से युक्त विषम (प्रथम तृतीय) गण का विधान करना चाहिए और उसी प्रकार सम गण वाले पाद भी होना चाहिए॥ १७९ ॥ अभिनव-अयुग्गण का अर्थ होता है विषम गण अर्थात् प्रथम, तृतीय, पञ्चम, सप्तम गण। युग्गण का अर्थ है सम गण अर्थात् द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम गण। स एव का अभिप्राय है जहाँ जगण वर्जित नहीं है॥ १७९ । अभिनव-दोनों आधों अर्थात् पूवार्ध और उत्तरार्द्ध में तीन गणों पर छेद (यति) करना चाहिए। उसे पाद कहते हैं।-इसी को कहते- अनुवाद-यदि प्रथम और तृतोय पाद में बारह मात्राए हों तो उसे 'पथ्या' वृत्त कहते हैं और पूर्व-कथित लक्षणों से युक्त विपुला आर्या भिन्न होती है।। १८० ॥ अभिनव-प्रथमार्ध में तोन गणों का प्रथम पाद होता है। द्वितीयार्ध में तोन गणों का तृतीय पाद है॥ १८० ॥

१. ख. ग. प्रमाणश्चैव पञ्चमः ।

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नाटचवास्त्रे

पथ्या यथा- रक्तमृदुपद्मनेत्रा सितदीर्घ बहुलमृदुकेशो। कस्य तु पृथुमृदुजघना तनुबाह्न सोदरी पथ्या ॥ १८१॥ विपुला यथा- विपुलजघनवदनस्तननयनैस्ताम्राऽध रोष्ठकरचरणैः । आयतनासागण्डैर्ललाटकर्णैः शुभा कन्या ॥१८२॥

/5p पथ्येति पथिसाध्वित्यथः।।१८१।।

पथ्या का उदाहरण जैसे- SIIISI SS IISIIISS रक्त मृ दुप दम ने त्रा, सितदीघंबहुलमृदुकेशी। IS IISSSISSS कस्य तु पृथु मृदुज ध ना, तनुबाह्नंसोदरी पथ्या।१८१॥ अनुवाद-रक्त एवं कोमल कमल के समान नेत्र वाली, काले, लम्बे और अत्यन्त कोमल बालों वाली, विशाल एवं कोमल जांघों वाली और पतले बाँह, अंस और उदर वाली कन्या किसे प्रिय नहीं होती ॥ १८१॥ अभिनव-पथ्या अर्थात् मार्ग में साधु (पथि साधु पथ्या)। अर्थात् व्यवहार में साधु (सुन्दर) पथ्या है॥ १८१ ॥ विपुला का उदाहरण जैसे- IS IIITS SSIS ITIIS वि पु ल ज घ न व द न स्तन न य नै स्ताम्राधरोष्ठकरचरणैः । SIISSSSISSSS IS SS आ यत ना सा गण्डैल लाटकर्णेः शुभा कन्या ।। १८२।। अनुवाद-जिसके नितम्ब, बदन, स्तन, नेत्र विशाल हों, तथा अधरोष्ठ, हाथ और पैर ताम्रवर्ण के हो, नासिका, कपोल, ललाट और कान आयत हो वह कन्या शुभ होती है।। १८२ ।

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पक्चदशोऽव्याय: १६७

द्वितोयश्च चतुर्थश्च गुरुमध्यगतो भवेत्। उह

उभयोरधंयोयंत्र बिज्ञया चपला यथा॥१८३ ॥

यथा- उद्भटगामिनी परुषभाषिणी कामचिह्नकृतवेषा। जानाति मांसयुक्ता सुराप्रिया सर्वतश्चपला ॥ १८४ ।। पूवार्धें लक्षणं ह्यतदस्याः' स च मुखेन तु। `पश्चिमार्धे तु चपला यस्याः सा जघनेन तु ॥ १८५॥ मुखचपला यथा- आर्यामुखे तु चपला तथापि चार्या न में यतः सा किम्। वक्षा गृहकृत्येषु तथा दुःखे भवति दुःखार्ता।। १८६।।

चपला आर्या अनुवाद-जहाँ दोनों अर्धभाग में द्वितीय और चतुर्थ गण मध्य गुरु (जगग) हों, उसे 'चपला' आर्या कहते हैं।। १८३।। उदाहरण जैसे- SIFSIS TIISISSISIIISS उड्ट गामिनो परुष भाषिणी कामचचह्नकृत वेषा। SSISISS ISIS SISIIS जानाति मांस युक्ता सुराप्रिया सर्वतश्चपला। १८४॥। अनुवाद-उद्धत चाल वाली, कठोर वचन बोलने वालो उपभोग के चिह्न से युक्त वेष वालो, अधिक मांस युक्ता, मदिरा-प्रिया नायिका सब प्रकार से 'चपला' होती है।। १८४।। अनुवाद-यदि चपला का यह लक्षण पूर्वार्द्ध में हो तो 'मुखचपला' और यदि उत्तरार्द्ध में लक्षण दिखाई दे तो जघनचपला होती है।। १८५ ।।

१. क. (न) वस्या: सा चपलामुखे। २. क. (न) पश्चिमार्द्धे भवेद्यन्न जघने चपला तु सा।

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११८ नाट यशाएचे

जघनचपला यथा- वरमुंगनयने! चपलासि वरोरु! शशाङ्कूदर्पणनिभास्ये!। कामस्य 'सारभूते ! न पूर्वमदचारुजघनेन ॥ १८७ ॥ सर्वचपला यथा- उभयोरर्धयोरेतल्लक्षणं दृश्यते यदि। वृत्तज्ञैः सा तु विज्ञेया सर्वतश्चपला सखि ।॥ १८८॥

मुखचपला का उदाहरण जैसे- 5 आर्या मुखे तु चपला तथापि चार्या न मे यतः सा किम्।

दक्षा गृह कृत्येषु तथा दुःखे भवति दुःखार्त्ता।।१८६।। अनुवाव-मेरी स्त्री मुख से चपला (वाचाल ) है, फिर भी वह चपला नहीं है, क्योंकि वह गृह कार्य में दक्ष है और मेरे दुःख में दुःखित हो जाती है।। १८७ ॥ जधनचपला का उदाहरण जैसे-

वरमृगनयने ! चपलासि वरोरु ! शशाड्ू दर्पण निभास्ये। SSI SISS I SIII SIIISS कामस्य सारभूते ! न पूर्व मद चारुजघनेन ।। १८८ ।। अनुवाव-हे वरोर! हे मृगाक्षि ! हे चन्द्रमा एवं दर्पण के समान मख वाली, सुन्दरि ! काम के सारभूत पूर्ण मदमस्त सुन्दर जङ्घाओं से तुम चपला हो॥। १८८ ॥ अनुवाद-यदि पूर्वार्द्ध और उत्तरा्द्ध में चपला का लक्षण दिखाई दे तो ह सखि ! वृत्त वेत्ता लोग उसे 'सवचपला' कहते हैं। १८९।। १. अतः परं काशीमुद्रितपुस्तके सार्घचतुष्टयपद्यमघिकम्। २. स. ग. सारभूतेन। ३. क-म. पजरव लक्षणं भवेलु।

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कायों द्वादशमात्रो च पादावाद्यौ तृतोयकौ। अष्टावश द्वितीयं च तथा पञ्चदशोत्तमा ।। १८९।। चतुःपञ्चप्रकाराणां चतुष्काणां विशेषतः । प्रस्तारयोगमासाद्य वाहुल्यं संप्रदर्शयेत् ॥ १९० ॥ पञ्चपञ्चाशवाद्या त त्रिशवाद्या तथैव च। आर्या स्वक्षरपिण्डेन विज्ञेयात्र प्रयोकतृभिः ॥१९१ ॥

आर्यार्णा भेदं दर्शयितुं तत्प्रस्तारमाह- चतुः पञचप्रकाराणां चतुष्काणां विशेषतः। प्रस्तारयोगमासाद्य बाहुल्यं संप्रवर्शयेत्॥ इति ।। अयुकूस्थानगतानां चतुष्प्रकाराश्चतुर्गणाः। समस्थानगता: पञचप्रकारास्तेवां यो विशेष: परस्परसंकीणंता तत्कृतमार्याणां प्रस्तारबाहुल्यं निरूपयेत्॥ १९० । अनुवाद-यदि प्रथम और तृतीय पाद में बारह मात्राएँ हों और द्वितीय पाव में अठारह तथा चतुर्थ पाव में पन््रह मात्राएँ हों तो इसे 'उत्तमा' आर्या कहते हैं ॥। ११० ।। विशेष-श्रुतबोध में कालिदास ने आर्या का लक्षण इस प्रकार बताया है- यस्था: पादे प्रथमे द्वावशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि। अष्टावश द्वितीये चतुर्थके पञचवश साड्डर्या।। अभिनव-आर्याओं का भेद दिखलाने के लिए उनके प्रस्तार को कहते हैं- अनुवाद-विषम स्थान में स्थित चार प्रकार के चार गण हैं और सम स्थान में स्थित पाच प्रकार के होते हैं। प्रस्तार के योग से इसकी बाहुल्य संख्या का निर्देश करे॥ १९०॥ अभिनव -विषम स्थान (पाद) में स्थित चार प्रकार के चार गण हों और सम स्थानगत पांच प्रकार के गण होते हैं। उनके परस्पर सङ्कीर्णतारूप जो विशेषता है, उनके कारण आर्या के प्रस्तार-बाहुल्य का निर्देश करे ॥ १९० ॥ अनवाद-अन्तिम आर्या के पचपन प्रकार है और प्रथम आर्या तीस प्रकार की है। इस प्रकार छन्दप्रयोक्ता विद्वानों को आर्या के अक्षरपिण्ड को समझना चाहिए। १९१॥ ना. था०-४७

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1t. माव्यशारणे

त्रिशतस्त्वथ वर्णेम्यो लघुवणत्रयं भवेत्। शेषाणि गुरुसंख्यानि हावं सर्वत्र निर्दिशेत् ॥ १९२ ।।

अन्त्या सर्वलघुः कार्या तत्र पञ्चपञ्चाशदक्षराणि, प्रथमाधें एकात्रिशत, द्वितीये षड्वशतिः। शिशिरतरकिरणपरिकरसकलकलविरचितकपिशकचनिचय !। समहृव्यतनुविनिहितधरणिधरवरसुत ! जय जय शिव ! । १९१ । लघुद्वयं द्वितीये षष्ठे स्थाने, चतुर्थेऽपि च लघुः तथा च लघुवणंत्रयमिति ॥। १९२ ।।

अभिनव-अन्तिम आर्या को सर्वलघु करना चाहिए, उसमें पचपन अक्षर होने चाहिए, उनमें प्रथमार्ध में उनतीस और द्वितीयार्ध में छब्बीस अक्षर होने चाहिए। जैसे-

शिशिरतरकिरणपरिकरसकलकलविर चितकपिशकचनियचय।

समहृवयतनुविनिहितधरणिधरवरसुत ! जय जय शिव।। "अत्यन्त शोतल किरण वाले चन्द्रमा के परिकर रूप सकल कलाओं से जिसके कपिश केशसमूह विरचित हैं, सुशोभित हैं और सम हृदय वाले शरीर में धरणिधर हिमालय का श्रेष्ठ सन्नाम पार्वती को धारण कर रखा है। उस शिव की जय जय हो"। अनुवाद-इन तोस प्रस्तारगत भेदों में तीन लघु वर्ण होने चाहिए और शेष गुरु होने चाहिए। इस प्रकार सवंत्र निर्देश करना चाहिए।। १९२ ।। अभिनव-द्वितीय और षष्ठ स्थान में दो लघु और चतुर्थ स्थान में भी लघु होने चाहिए। इस प्रकार तीन लघु वर्ण होने चाहिए।। १९२।।

१. इत-परं 'क' पुस्तके सर्वेषामेव चार्याणामक्षराणां यथाकृतम्। इत्यधिकं दृश्यते।

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पष्न्चदशोग्याय: ३७१

सर्वेषां जातिवृत्तानां पूर्वमुत्तरसंख्यया । विकल्पगणनां कृत्वा संख्यापिण्डेन निर्दिशेत ।। १९३ ।। आर्यागोतिरथार्यैव केवलं त्वष्टभिगंणैः । इतरार्धे तुः षष्ठस्तु न लघुर्गण इष्यते॥ १९४॥ अत्र मात्रावृत्तानां संख्याज्ञानार्थमाह-सवॅषामेवेति। पूर्वं कृत्यो यो विकल्पसंख्याभेदः तस्योत्तरसंख्यया सह गुणसंहननं कृत्वा यो भवति पिण्डस्तेन संख्यां ववेत् ॥ १९३ ॥ तत्र समस्तासां पञ्चभेदः विषमश्चतुर्भदः षष्ठो द्विभेद: द्वितीयेडर्धे त्वेकभेव:, अष्टममेकभेदम्। तदत्र पूर्वाङ्गनोत्तराङ्कस्य गुणनं तेनान्याडूस्य षोडश स्थानानि। संख्यालाभः तत्र चतुर्भि: पञ्चानां गुणने विशतिस्तया चतुर्णा गुणने अशोतिस्तया च चतुर्णा गुणने विशत्युत्तरत्रिशदित्यादि मन्तव्यम्। तवाह- आर्या: शतसहस्त्राणि ज्ञया ह्यंकान्नविशतिः। अष्टौ कोट्य: सहस्राणि विशतिश्च प्रमाणतः।

वित्यथं: ।। १९४।। न लघुरिति। अपि तु प्रथमार्धवदपरारधेऽपि षष्ठो द्विभेदो गण: आर्यागीता-

अभिनव अब मात्रिक वृत्तों के संख्या ज्ञान के लिए कहते हैं- अनुवाद-सभी जातियों वृत्तों के पूर्व में विकल्प-भेदों की गणना उत्तर संख्या से करके पिण्ड बनाकर संख्या का निर्देश करे॥ १९४॥ अनुवाद-आर्या गोति के इस पूर्व अर्धंभाग में केवल आठ गण होते हैं। और उत्तरार्द्ध में षष्ठ गण में एक लघु नगण इष्ट है॥ १९५॥ अभिनव-पूर्व में विकल्प के द्वारा जो संख्या-भेद किया गया है उसका उत्तर संख्या के द्वारा गुणन करके जो पिण्ड बनता है, उससे संख्या का निर्देश करे। इनमें जो सम संख्या है, उसके पाँच भेद हैं और विषम के चार भेद होते हैं। षष्ठ के दो भेद और द्वितीय अर्ध में एक भेद होता है तथा अष्टम में भो एक भेद होता है। इस प्रकार यहाँ पूर्ण अङ्क से उत्तर अङ्क का गुणन करे तथा उससे अन्य अङ्क का। इस प्रकार सोलह स्थान होते हैं। इससे संख्या-लाभ होता है।

१. ख. ग. विकल्पं गणयिश्वा तु (च) १. ग. दशंयेत्। ३. ख. ग. विकल्पो भवेद्गण: ।

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१७२ वृत्तैरेवं तु विविधैर्नानाछन्दस्समुद्भवैः। काव्यबन्धास्तु कर्त्तव्या: षट्त्रिशल्लक्षणान्विताः ॥ १९५ ।।

इति भरतीये नाट्यशास्त्रे 2छन्दोविचितिर्नाम पञचवशोऽध्यायः। अध्यायार्थंमुपसंहरन् भाविनं विषयमासूत्रयति वृत्तैरित्यादि। काव्यबन्धा इत्यनेनेवमाह यथा प्रासावकुड्याबिके कतव्ये प्रथमं भूमि:, तद्वत्काव्ये निर्मातव्ये भूमिकल्पः शब्वच्छन्दोविधि: क्षेत्रपरिग्रहं वृत्तसमाश्रयमित्यादि विरचयन् भित्ति- स्थानीयं लक्षणयोजनं चित्रकर्मप्रतिममलङ्कारगुणनिवेशनं गवाक्षवातायनाविदेशीयो वशरूपकविभाग: उपयोगनिरूपणाप्रख्या काक्वादिप्लुतिः, एवंभूतवाचिकाभिनय- स्वरूपं चतुर्दशादिभि: षडभिरध्यायैच्यते। तत्राध्यायद्वयं वृत्तलक्षणविधान तु भविष्यति। उनमें चार से पांच का गुणन करने पर बीस और फिर बीस को चार से गुणा करने पर अस्सी (८०) भेद होते हैं। फिर अस्सी को चार से गुणा करने पर तीन सौ बीस (३२०) भेद होते हैं। इसी प्रकार आगे भी समझना चाहिए। उसी को कहते हैं- "आर्या शतसहस्राणि ज्ञेया हधेकान्निशतिः। अष्टौ कोट्य: सहस्राणि विशतिश्च प्रमाणतः ।।" आर्या गीति में प्रथमार्द्ध के समान उत्तरार्द्ध में भी षष्ठ गण के दो भेद होते हैं ॥। १९५ ।। अब अध्याय का उपसंहार करते हुए भावी विषय को आसूत्रित करते हैं- अनुवाद-इस प्रकार नाना छन्दों से समुद्भूत विभिन्न वृत्तों के द्वारा काव्यबन्धों को छत्तोस लक्षणों से युक्त करना चाहिए। १९६ ।। इस प्रकार भारतीय नाट्यशास्त्र में 'छन्दो विचिति' नामक पन्द्रहवा अध्याय समाप्त हुआ॥ १५ ॥ इस पर डा० पारसनाथद्विवेदीकृत हिन्दी व्याख्या में पन्द्रहवां अध्याय समाप्त हुआ।

१. ग. एवं चतुर्विधंवृत्तैः । २. ग. छन्दोवृत्तविषिः। ३. ख. षोडशोऽष्यायः ।

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  1. 859 यद्यपि रूपकविरचनकाले परिपकवप्रज्ञस्य न क्रमप्रतिभासस्तथाप्यपोद्वारघिया कल्प्यत इत्याहुः। प्रबन्धस्य यो युक्तोऽम्यासः तन्निष्पत्ति: प्रबन्धाम्यासः तत्संपतति: अभिनेयार्थनिवंर्तनं तदभिनयोपारोहणमिति स एव क्रम इत्युपाध्याय: यवाह :-

महाकवीनां पदवीमुपात्तामारुरुक्षताम्। नासंस्मृत्य पदस्पर्शान्संपत्सोपानपद्धतिः ॥ इत्यादि ॥

अभिनव-'काव्यबन्ध' कहने का अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार प्रासाद (महल) के दीवाल आदि के निर्माण में पहले भूमि की अपेक्षा होती है उसी प्रकार काव्य के निर्माण में भूमि-कल्प छन्दों की विधि होती है। इस प्रकार क्षेत्र के परिग्रह के रूप में वृत्तों का समाश्रयण करते हुए भित्ति-स्थानीय लक्षण की योजना, चित्रकर्म के समान अलक्कार एवं गुणों का निवेश, गवाक्ष, वातायन के समान दशरूपक का विभाग, प्रयोग के निरूपण के सदृश काकु, स्वर आदि को प्लुति-इस प्रकार के वाचिक अभिनय के स्वरूप को चौदहवें अध्याय से लेकर छः अध्यायों में कहते हैं। उनमें दो अध्यायों में वृत्त-लक्षण का विधान होगा।

यद्यपि रूपक के रचना-काल में परिपक्व बुद्धि वाले सहृदय को क्रम का प्रतिभास नहीं होता, तथापि अपोद्वार बुद्धि से उसकी कल्पना को जातों है, ऐसा कहा जाता है। प्रबन्ध-निर्माण के समय उचित अभ्यास की निष्पात्त प्रबन्धाभ्यास है। उसकी सम्पत्ति का अभिप्राय है अभिनेय अर्थ का निवर्त्तन अर्थात् अभिनय के लिए आधार तैयार करना। इसी को 'क्रम' कहते हैं, यह उपाध्याय जी का मत है, जैसा कि कहा गया है-

"काव्य-निर्माण में प्राप्त महाकवियों की पदवी पर आरोहण करने की इच्छा रखने वाले विद्वान् जब तक पदों का स्पर्श नहीं करेंगे तब तक सोपान-मार्ग पर आरोहण का क्रम कैसे सम्पन्न होगा ?"

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१७४

क्रमोल्लङ्ने हि सति नाटकादिविरचयतां महान्तः प्रमादापभ्रंशा भवन्ति। न हि सर्वो वाल्मोकिर्व्यास: कालिदासो भट्टेन्टुराजो वा, तेषामपि प्राग्जन्माजित- न क्रमाभ्याससमुदितसंस्कारपाटवोत्पादितः कुलप्रतिभङ्गज्ञानातिशय इति शिवम् ॥ १९५ /

इति पञ्चदशाध्याये ध्यायिना परमेश्वरम्। कृताभिनवगुप्तेन गुप्तार्थ-प्रकटीक्रिया॥ इति श्रीमहामाहेश्वराभिनवगुप्ताचार्यविरचितायां नाट्यवेद- विवृतावभिनवभारत्यां वृत्तविधिर्नाम पञ्चवशोऽध्यायः।

क्रम का उल्लंधन होने पर नाटक आदि का निर्माण करने वालों का महान् प्रमाद एव क्षति हो सकती है; क्योंकि सभी वाल्मीकि, व्यास, कालिदास अथवा भट्टेन्दुराज की तरह नहीं होते। उनके भी पूर्व जन्म में अजित किये गये क्रम पूर्वक अभ्यास से उत्पन्न संस्कार के पाटव से उत्पन्न कुल परम्परागत प्रतिभा के अङ्गभूत ज्ञान को अतिशय रहता है। "इस प्रकार पन्द्रहवें अध्याय में परमेश्वर का ध्यान करने नाले अमिनव- गुप्तपादाचार्य ने गूढ़ अर्थ को प्रकट करने वाली क्रिया को कर दिया।"॥१५॥ इति डा० पारसनाथद्विवेदिविरचितायामभिनवभारत्या हिन्दी व्याकयायां पञ्बदशोड ष्याय: समाप्त ॥ १५॥

इस प्रकार डॉ० पारसनाथद्विवेदीकृत अभिनवभारतो की हिन्दी व्याक्या में पन्द्रहवा। अध्याय समाप्त हुआ । १५।।

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`षोडशोऽध्यायः

अभिनवभारती

विचित्रं रूपकभुवां लक्षणं भूषणं भुवः। भास्यते येन तं वन्दे प्राच्यधीसाधितं शिवम्॥। ननु काव्यबन्धास्तु कर्तव्या: इत्युक्तं, तत्र गुणालङ्कारादिरिति वृत्तयश्चेति काव्येषु प्रसिद्धो मार्गो, लक्षणानि तु प्रसिद्धानि। कि च पुरुषस्येव काव्यस्य लक्षणगुणालड्कारव्यवहारो न युक्तः, पुरुषस्य शरीरचैतन्यभेदात् कटकादीनां तत्तोऽपि भेदात्। काव्यस्य पुनर्ववरचनकाले प्रतिपत्तिकाले प्रापकसत्तायां तेषामगणितत्वाच्च। दण्डिनापि-

अभिनव-भारती इस अध्याय में छत्तीस लक्षणों के निदशंक अंश के दो पाठ मिलते हैं। उनमें एक पाठ को टीकाकारों ने स्वीकार किया है जिसका अनुसरण कीतिधर, धनञ्जय, सर्वश्वर प्रभृति आचार्यो ने किया है। दूसरा पाठ प्राचीन व्याख्याकारों ने ग्रहण किया है जिसका अनुसरण विश्वनाथ, सिंहभूपाल आदि आचार्यों ने किया है। भोजराज ने दोनों पाठों में समानता और विषमता को ग्रहण कर अन्य बारह को और मिलाकर चौसठ लक्षणों का विवेचन किया है। शारदातनय ने उन्हीं के मत का अनुसरण किया है। अतः वृत्तिकार के प्रथम पाठ के अनुसार अध्याय को समाप्त कर द्वितीय पाठ को निर्वचन और उदाहरण के साथ अध्याय के अन्त में अनुबन्ध में दिया गया है। अभिनव-रूपकादि अलङ्कारों के स्थान काव्य रूपी नायिका के अलङ्कार सदृश विचित्र लक्षण जिसके द्वारा भासित होते हैं उस प्राच्य विद्वानों की बुद्धि से साधित शिव को वन्दना करता हूँ।। अभिनव-पिछले अध्याय के अन्त में छत्तीस लक्षणों से समन्वित काव्य- रचना करनी चाहिए' यह कहा गया है। अब प्रश्न होता है कि गुण, अलङ्कार, रीति, वृत्ति आदि काव्य में प्रसिद्ध मार्ग हैं, किन्तु लक्षण प्रसिद्ध नहीं हैं। व्यवहार में तो पुरुष को लक्षण, गुण, एवं अलङ्कारों से सम्पन्न होना उपयुक्त माना गया है, १. ख, अथ सप्तदशोऽध्याय:।

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नाडयशाहये

इति ब्रुवता गुणमध्य एव तत्र प्रसादादीनभिवधता च गुणालङ्कारविभागोऽ- व्यसंभवीति सूचितं भवति। सत्यमेतत्, किं तु कबीनां काव्यविरचनविवेचन- सामथ्यंसमर्थनायावश्यं काल्पनिकोऽपि विभाग आश्यणीयः । तत्र कल्पनायां विप्रतिपत्तयः केचिवाहु :- इह गुणास्ताववात्मनि चिन्मये शृङ्गारादौ वतन्ते शृङ्गारे चावश्यं लक्ष्यत इति पृथक्सिद्त्वालङ्कार:, शरीरनिष्ठमेव यत्पदं पृथक्सिद्धं तल्लक्षणम्, येन शरीरस्य सौन्वयं जायते। तच्च सिद्धरूपं साध्यरूपं वा यथा इ्यामेति, 'मदमन्थरगामिनी' इति च। एतदेव लक्षणं, तच्चालंक्रियते। अल- डकारैयुंक्तं काव्यं लक्षणैविना न शोभते। उपमानोपमेयगत क्रियाक्रियरूपधर्मभेदेन तवेतल्लक्षणं द्विधेति-यथा 'श्यामा विशालाक्षी', मत्तमातङ्गगामिनी इति च।

किन्तु पुरुष के समान काव्य में लक्षण, गुण एवं अलङ्कारों का व्यवहार युक्त नही है। किन्तु पुरुष का शरीर चेतन आत्मा से भिन्न होने के कारण कटक, कुण्डल आदि का इससे भेद है। किन्तु काव्य के निर्माण काल में या अनुभूति-काल में प्रापक-सत्ता में उसकी गणना नहीं की जाती। दण्डी ने भी- "काव्य में शोभा बढ़ाने वाले घर्मो को अलक्कार कहा है" इस प्रकार कहते हुए गुणों का मध्य में प्रसाद आदि का अभिधान करते हुए यह सूचित किया है कि गुग एवं अलङ्कारों का विभाग करना असंभव है। यह बात सत्य है किन्तु कवियों के काव्य-रचना करने और सहृदयों के विवेचन सामर्थ्य के समर्थन के लिए काल्पनिक विभाग का आश्रयण करना चाहिए। किन्तु उस कल्पना में कुछ आचार्य विप्रतिपत्तियाँ प्रस्तुत करते हैं। उनका कहना है कि गुण तो चिन्मय आत्म-स्वरूप शृङ्गारादि रसों में रहते हैं, अतः शुङ्गारादि में उन्हें अवश्य लक्षित करना चाहिए। इससे अलङ्कारों का पार्थक्य सिद्ध होता है और शब्दार्थ रूप शरीर में जो पद पृथक् सिद्ध हैं वह लक्षण है जिससे शरीर का सौन्दर्य बढ़ता है और वह सिद्ध रूप भी होता हैं और साध्य रूप भी। जैसे-'श्याया षोडश वार्षिकी' यह सिद्ध रूप है और 'मदमन्थरगामिनी' अर्थात् 'मद से मन्थर-गति वाली' यह क्रियारूप होने से साध्य है। यही लक्षण है। फिर भी वह अलङ्कारों को धारण करती है। प्रकृत में अलङ्कारों से युक्त होने पर भी काव्य लक्षणों के बिना सुशोशित

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अन्ये मन्यन्ते-इतिवृत्तखण्ड [ल] कान्येव सन्ध्यङ्गकानि वृत्त्यङ्गकानि लक्षणानीति च व्यपदिश्यन्ते। निमित्तभेदात् पूर्वापरसंबन्घेन बीजरूपेणो पक्षिप्तेऽथॅ निवहणे फलतां गते परस्परसन्धायकत्वात् सन्ध्यङ्गतया व्यपवेशः, रस- विशेषोपयोगितया वृत्यङ्गवाचोयुक्ति:, काव्यगतख्यातिप्राशस्त्योपयोगितया महा- पुरुषगतपाशध्वजा दिपादरेखावल्लक्षणशब्दवाच्यता। तदुक्तं तत्रव-

लक्षणान्येव बोजार्थक्रमनिर्वाहकानि च ॥ इति। प्रतिसन्धितदङ्गानि फलसिद्धचुपपत्तितः ॥ इति।

काव्ये धीरोवात्तादिगुणाधानं वस्तुवर्णनाभद्गिर्वेति केचित।

नहीं होता। उपमानोपमेयगत क्रिया (साध्य) अक्रिया (सिद्ध) रूप धर्म भेद से यह लक्षण भी दो प्रकार का होता है जैसे-(श्यामा विशालाक्षी' (यह श्यामा षोडशवर्षीया विशाल नेत्रों वाली है) में द्रव्य (अक्रिया) रूप धर्म है और 'मत्तमातङ्गगामिनी' में क्रिया रूप धर्म है।

अन्य आचार्यो का मत है कि इतिवृत्त के अंशों को हो सन्ध्यङ्ग, वृत्यङ्ग एवं लक्षण कहते हैं। निमित्त भेद से पूर्वापर सम्बन्ध से बीज रूप में उपक्षिप्त और निर्वहण में फलरूप में प्राप्त होने वाले अर्थ में परस्पर सन्धायक होने से सन्ध्यङ्कों का व्यपदेश होता है। अर्थात् सन्ध्यङ्ग कहलाता है' और वही अर्थ रस-विशेष के उपयोगी होने से वृत्यङ्ग कहलाता है और वहा अर्थ काव्यगत महाषुरुष को ख्याति एवं प्रशस्ति के उपयोगी होने से पाश, ध्वज, चक्र आदि पादगत रेखा के समान लक्षण कहलाता है। जैसा कि कहा गया है-'बीज रूप अर्थ का क्रम से निर्वाह करने वाला लक्षण हो है।' 'फल सिद्धि की उपपत्ति के कारण वहीं प्रत्येक सन्धि का अङ्ग है।' कुछ अन्य आचायों का मत है कि धीरोदात्त आदि नायकों में गुणों का आधान करने वाले वस्तु का वर्णन-शेली हो लक्षण है। ना० शा०-४८

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३७८ नाटघशास्त्र

तदत्र प्रथमपक्षे वर्णनीय प्रधानभूताधिकारिपुरुषगतगुणादिविभाग एव काव्ये पयवसीयते । द्वितीयपक्षे तु वर्णनीयः सकल एवेति। वृत्तिलक्षणोऽर्थः काव्य- भेदात् त्रिधा विभज्यते। एकेषां तु दशनं-कवेर्यः प्रतिभात्मा प्रथमपरिस्पन्वः तदव्यापारबलोपनता गुणा, प्रतिभावत एव हि रसाभिव्यञ्जनसामथ्यं माधुर्यादेरप- निबन्धनसामथ्यं न सामान्यकवेः । अनेन शब्देनेदं तु वर्णयामीत्येवंभूतवर्णनापर- पर्यायद्वितीयव्यापारसंपाद्यास्त्वलङकाराः। शब्दानमोभि: शब्दैरर्थानमीभिररथैः संधटयामोत्येवमात्मकस्तु यस्तृतीयः कवेः परिस्पन्दः तदधीनात्मलाभादिशब्दार्थात्मककाव्यशरीरसंश्रितानि वक्ष्यमाणश्लेषादि- गुण दशकसमभिव्यञ्जनव्यापा राणि शब्दार्थोपसंस्कारकल्पानि क्रियारूपाणि लक्षणा- नीति, तदुक्तं तत्रैव-

इनमें प्रथम पक्ष में वर्णनीय प्रधानभूत अधिकारी पुरुषों में गुणादि का विभाग ही काव्य में पर्यवसित होता है। द्वितीय पक्ष में सभ वर्णनीय है। वृत्ति लक्षण रूप अर्थ काव्य-भेद से तीन प्रकार से विभक्तक होता है। एक प्रकार के लोगों का मत है कि कवि का जो प्रतिभा रूप प्रथम परिस्पन्द है, उस प्रतिभारूप व्यापार के बल से गुण उपनत होते हैं। क्योंकि रसादि के अभिब्यञ्जन का सामर्थ्य और माधुर्यादि गुणों के उपनिबन्धन का सामर्थ्यं प्रतिभावान् कवि का ही सामर्थ्य है, सामान्य कवि का नहीं। इस शब्द से इस वस्तु का वर्णन करूँगा' इस प्रकार का वर्णनापरपर्याय द्वितीय ब्यापार से संपाद्य अलङ्कार हैं अर्थात् उनसे अलङ्कारों का सम्पादन करना चाहिए।

'इन शब्दों से इन शब्दों की और इन अर्थों के साथ इन अर्थों को संघटना (रचना) करूँगा' इस प्रकार का कवि का जो तृतीय परिस्पन्द (व्यापार) है, उसी के अधीन शब्दात्मक और अर्थात्मक काव्य-शरीर का लाम होता है। शब्दार्थोभय संस्कारकल्प ये क्रिया रूप लक्षण वक्ष्यमाण श्लेषादि दस गुणों का अभिव्यञ्जन इनका व्यापार है।

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३७९

इति शब्दार्थयोयेयं संश्चितिवॅहभूतयोः। काव्ये तया दशितानि लक्षणानि विदुबुंधाः॥ इति। काव्येऽप्यस्ति तथा कश्चित् स्निग्धः स्पर्शोऽर्थशब्दयोः। यः श्लेषादिगुणव्यक्तिदक्ष: स्याल्लक्षणस्थितः ॥ इति। चेष्टालङ् कारदृष्टान्तचिह्नं ........ । इति च अत्र पक्षे कविव्यापारभेदाद् गणालंकारलक्षणविभागः। अपरे सङ्गिरन्ते-अभिनेयानां काव्यबन्धानां वक्ष्यमाणस्वरूपं च रूपक समभिदध्यात्, कवे: स्वसामर्थ्याधानाय तावदभ्यासो निर्माणविधयो लक्षणं, यस्त- थाऽसंपूर्णश्चादौ, क्रमेण तु तथाभृतोऽभिनेयार्थः काव्यबन्धो लक्षणोन्नीतः तेन च लोकोत्तरहृद्यवर्णनयोगात्, तथा हि किञ्वित् प्रबन्धजातं गुणालङ्कारनिकरप्रधानं, यथा मेधदूताएयं तद्विभूषणम्, एवमन्यदपि, इति।

जैसाकि कहा है- "इस प्रकार क्राव्य के शरोर रूप शब्द और अर्थ का जो यह संश्रयण है, काव्य में उसी प्रकार लक्षण दिखाये हैं, ऐसा विद्वान् लोग जानते हैं।" 'काव्य में भी शब्द अर्थ का ऐसा कोई स्निग्ध स्पर्श है जो श्लेषादि गुणों की अभि्यक्ति कराने में दक्ष है, यही लक्षण है" 'चेष्टा, अलङ्कार, दृष्टान्तों में दिखाई पड़ने वाला चिह्न है, लक्षण है।' इस पक्ष में कवि-व्यापार भेद से गुण, अलङ्कार एवं लक्षण का विभाग है। दूसरे लोग कहते हैं कि अभिनेय काव्य-प्रबन्धों के वक्ष्यमाण स्वरूप रूपक को जो कहे, इस प्रकार रूपक निर्माण में कवि के सामर्थ्य के अभिधान करने के लिए जो आयास है वही लक्षण है। जो लक्षण आदि में असम्पूर्ण है। क्रमशः उस अभ्यास के द्वारा लोकोत्तर हृद्य वर्णन के योग से तथाभूत (सम्पूर्ण) अभिनेय अर्थ लक्षणों के द्वारा उन्नत काव्य प्रबन्ध हो जाता है तथा कुछ प्रबन्धों से गुण एवं अलङ्कारों का प्राधान्य रहता है। जैसे मेघदूत काव्य। यह काव्यों का आभूषण है। इसी प्रकार अन्य भी है।

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३८० नाटयकास्ते

'प्रबन्धर्मा लक्षणानि' इति केचित्तु बुवते। कवेरभिप्रायविशेषो लक्षणमि- तीतरे पुनर्मन्यन्ते। केचिद् यथास्थानविशेषं यद् गुणालङ्कांरयोजनं तल्लक्षणमिति। परे त्वभाषन्त-अलङ्कारादिनिरपेक्षेणैव निसर्गसुन्दरो योऽभिनेयविशेषः काव्येषु वृश्यते, अमरुकश्लोकेष्वपि, तत्सौन्दर्यहेतुर्यो धर्मः सुलक्षणः स एव चार्थ: काव्यशरीरविशेषरूपो लक्षणम्। उपमादोपकरूपकाणामानन्त्याद भेवमाहुः। अन्ये तु शब्देन अर्थेन चित्रत्वं लक्षणमिति। इतरेषां तु मतं यथा तत्रप्रसङ्गबाधातिदेशादि मीमांसाप्रसिद्ध वाक्यविशेषव्य- वच्छेवलक्षणं तथा काव्यविशेषव्यवच्छेदकं भूषणादिलक्षणजातमिति त्वयं पक्षो द्वितोयपक्षान्न भिद्यते। एतेषु तु पक्षेष्वन्यतमग्रहे विशेषणानि न सङ्गच्छन्ते स्पष्टेन यथा। इदं तु वश्पक्ष्यां वस्तु।

'प्रबन्ध के धर्म लक्षण हैं' ऐसा कुछ लोग कहते हैं। 'कवि का अभिप्राय विशेष लक्षण है' ऐसा अन्य लोग कहते हैं। कुछ आचार्य यथा स्थान अर्थात् जिसका जो स्थान है उस स्थान विशेष में जो गुण एवं अलङ्गारों की योजना है वही लक्षण है। अन्य लोग तो कहते हैं कि अलङ्कारादि की अपेक्षा किये बिना स्वभाव से ही सुन्दर जो अभिनेय विशेष काब्य में दिखाई देता है जैसा कि अमरुक के श्लोकों में। वही सौन्दर्य का हेतु जो धर्म सुलक्षित है, वहो काव्य-शरीर विशेष रूप अर्थ लक्षण है। उपमा, रूपक, दीपक आदि अलङ्कारों के अनन्त रूप होने से अनन्त भेद हैं। अन्य लोग तो शब्द और अर्थ से उत्पन्न चित्रत्व ही लक्षण है, ऐसा कहते हैं।

दूसरों का मत है कि जैसे मीमांसाशास्त्र में तन्त्र प्रसङ्ग के बाध एवं अतिदेश आदि वाक्य विशेष के व्यवच्छेदक लक्षण प्रसिद्ध हैं वैसे ही काव्य विशेष के व्यवच्छेदक भूषणादि लक्षण हैं, यह पक्ष द्वितोय से भिन्न नहीं है। यदि इन पक्षों में से एक पक्ष के ग्रहण करने पर विशेषण स्पष्ट सङ्गत नहीं होंगे, यह दश पक्षों की वस्तु है।

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३८१

इह कव्यार्था रसा इत्युक्तं प्राक्। उकतं च वर्णनीयं शब्दनीयं कवे: कर्मेति च व्युत्पत्तित्रयं कविमिति काव्यमिति च। अनेनाभिधेयम्, अभिधानम्, अभिषाञच स्वीकृत्यावस्थीयते, अपि च शब्दव्यापारोऽभिधातृव्यापारः प्रतिपाद्यव्यापारश्चेति त्रिगतः । तत्र शब्दस्य रसाभिव्यक्तिक्षमार्थप्रतिपादकत्वं स्वतः च ओोत्रे च संक्राम्ति- मात्रं नान्तरोयकतया, तद्रसद्शनयोग्यतापादनसामर्थ्याद गुणवाच्यम्, आव्तमानो द्वितीयो वर्णः पदं वा प्राक्तनवर्णपदशोभाहेतुरलद्कारः। एवमर्थस्यापि, यद्रसाभि- व्यक्तिहेतुत्वं सोऽथंगुणः । यस्तु वस्त्वन्तरं वदनस्येव चन्द्रः सोडलड्रार:, यस्तु त्रिविधोऽव्यभिधाव्यापार: स लक्षणानां विषयः ।

ब्र वे इति कविः प्रवर्तते, स यथा-भूतः रसवत्काव्यं विधत्ते। तत्र चित्त-

व्यापारो लक्षणशब्देनोच्यते। इत्येषां सामान्यलक्षणम्। यथा च पीवरत्वं स्तनयोलंक्षणं, मध्यस्य तु कुलक्षणं, एवं किञ्चिवभिधीय मानं केनचिद्रपेण रसोचितेन विभावाविरूपेण तमेव पदार्थक्रमं लक्षयल्लक्षणम्, अन्यत्र तु तत्कुलक्षणं, तेन सर्वेडङकारा गुणाश्च तत्समुदायाद्विलक्षणा भवन्ति। यहां काव्यार्थ ही रस है, यह पहिले कहा जा चुका है और यह भी कहा है कि वर्णनोय अर्थ वाला काव्य है, और 'कु' धातु से निष्पन्न शब्दनीय काव्य है तथा 'कवे: कर्म' इस विग्रह में अण् प्रत्यय होकर 'कवि' बनता है और काव्य भी। इस प्रकार तीन व्युक्ष्पत्तियाँ है। इससे अभिधेय अर्थ, अभिधान शब्द और अभिधा को स्वोकार करके अवस्थित होता है। और भी शब्द का व्यापार शब्द में, अभिधा का व्यापार अभिधा में और प्रतिपाद्य का व्यापार अर्थ में, यह तीन प्रकार का व्यापार है। उनमें शब्द रसाभिव्यक्ति में सक्षम अर्थ का प्रतिपादक है और स्वतः हो श्रोत्र में सङ्क्रमण करता है। वह रस-दर्शन की योग्यता के प्रतिपादन सामथ्यं से गुण पद का वाच्य है वही आवर्त्तमान द्वितीय वर्ण अथवा पद रूप शब्द पूर्ववर्त्ती वर्ण और पद की शोभा का हेतु शब्दालङ्कार है। इसी प्रकार अर्थ के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए, जो रसाभिव्यक्ति का हेतु है वह अर्थ गुण है। जो दूसरो वस्तु को अलङ्कृत करता है, जैसे चन्द्रमा मुख को, वह अलङ्कार है। जो तोन प्रकार का अभिधा व्यापार है वह लक्षण का विषय है।

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३८२ नाटघशास्त्र

तथा ववचिदर्थमात्रं क्वचिदलङ्कारोऽथं: क्वापि चित्रतः । क्वचिदलङ्कारा- दिप्रक्रियाविहीनोऽपि स्वयं सुन्दरस्वभावोऽर्थ: कुत्रचिच्छन्द, इति त्रिविधध्यापारगामी, तद्द्वारेणाभिधानाभिधेयतद्गुणालङ्काराद्यनुग्रहः शब्दानां शब्दैरर्थानामर्थेः शब्दाना- मर्थेस्तथापरैः संघटनां विचित्रां कारयमाणाभिधाव्यापारवती हयुक्तिनिर्वाणप्रधान- घुराधिरोहो लक्षणाख्य एव। अत एव पूर्व "काव्यबन्धास्तु कर्तव्याः षट्त्रिशल्ल- णान्विताः" इति लक्षणान्येव हि प्रधानं तत्प्रसङ्गेन गुणालङ्कारा इति तात्पर्यम्। विशेष लक्षणव्याख्याने चंतत्स्फोट यिष्याम:।

और भी इस शब्द से, इस इतिकर्त्तव्यता से, इस आशय से इस प्रकार की बुद्धि उत्पन्न करने के लिए इस अर्थ को कहता हूँ, इसलिए जो कवि प्रवृत्त होता है, वह कवि उस प्रकार का रस विशिष्ट काव्य की रचना करता है। वहाँ जो चित्त- वृत्यात्मक रस को लक्षित करता हुआ उन उन रसों के योग्य विभावादि-वैचित्र्य का सम्पादन करता है वह त्रिविध अभिधा-व्यापार लक्षण शब्द से कहा जाता है। यह इनका सामान्य लक्षण है, जैसे पीनत्व स्तनों का लक्षण है किन्तु वह कटिभाग का कुलक्षण है। इस प्रकार किसी रूप से अभिधीयमान वस्तु रस के उचित विभावादि रूप से उसी पदार्थ के क्रम लक्षित करती है, वह लक्षण है, अन्यत्र वही कुलक्षण है, इसलिए सभी अलद्कार और सभी गुण उस समुदाय से विलक्षण होते हैं।

और स्वार्थ भो कर्ही अर्थतः केवल अर्थ रूप है तथा कहीं पर चित्रतः अलङ्कार है। कहीं पर अलङ्कारादि को प्रक्रिया से रहित भी अर्थ स्वयं स्वभाव से सुन्दर होता है और कहों पर छन्द है। इस प्रकार त्रिविध व्यापारगामी है। उसी के द्वारा अभिधान, शब्द एव अभिधेय अर्थ और उनके गुण, अलङ्कारों का अनुग्रहण होता है। शब्दों का शब्दों के साथ, अर्थों का अर्थों के साथ और शब्दों का अर्थो के साथ विचित्र संघटना को करा देने वाली अभिधा व्यापारवती उक्ति ही निर्वाण प्रधान धुराधिरोही लक्षण हो है। इसलिए पहिले कहे गये 'काव्यबन्धास्तु कर्त्तव्याः षट्त्रिशल्लक्षणान्विताः' लक्षण ही प्रधान है, गुण और अलङ्कार तो उसके प्रसङ्ग से प्राप्त होते हैं। विशेष लक्षणों के व्याख्यान के अवसर पर इसे स्पष्ट करेंगे।

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षोडशोड्याय: ३८३

विभूषणं चाक्षरसंहतिश्च शोभाभिमानौ गुणकीतनं च। प्रोत्साहनोदाहरणे निरुक्तं गुणानुवादोऽतिशयश्च हेतुः ॥ १॥

तत्र लक्षणान्युद्दष्टुं तावदाह विभूषणमित्यादि यथारसं त्वित्यन्तेन श्लोक- चतुष्टयेन। अब पहिले लक्षणों को नाम मात्र से कथन करने के लिए 'विभूषणम्' इत्यादि से लेकर 'यथारसं' पर्यन्त चार श्लोर्कों से कहते हैं।

१. इतः प्रारम्भ श्लोकचतुषु ग्रन्थान्तरेषु सर्वथा पाठो भिद्यते यथा- भूषणाक्षरसंघाती शोभोदाहरणो तथा। हेतुसंशयदृष्टान्ताः प्राप्तभिनय एव चा १ ॥ निदर्शनं निरुक्तं च सिद्धिश्चाथ विशेषणम्। गुणातिपातातिशयौ तुल्यतर्कः पदोच्चयः ॥ २ ॥ दृष्टं चैवोपदिष्टं च विचारस्त द्विपर्यंयः। अंशर्चानुनयो माला दाक्षिण्यं गहणं तथा।। ३ ।। अर्था्प्त्ति: प्रसिद्धिश्च पच्छा सारूप्यमेव च। मनोरथश्च लेशश्च क्षोमोऽथ गुणकीरतनम् ॥४॥ ज्ञयान्यनुक्तसिद्धिश्च प्रियं वचनमेव च । षट्त्रिशल्लक्षणान्येवं काव्यबन्धेषु निर्दिशेत् ॥। ५॥ क. (टि०) अस्मिन्नव्यायेषट् त्रिशल्लक्षणसमुद्दशनिर्देशयोगुणदशकस्य लक्षणे च द्विविध: पाठो दृष्यते। तत्र वृत्तिकारेणैकः पाठो गृहोतः । कीर्तिघरघनञ्जयसर्वेश्व रादिभिश्च स एव प्रमाणोकृतः । भिन्नः पाठश्चिरन्तनैः कश्चिद व्याश्यातृभिः पठितः। स च विश्वनाथसिंहभूपालादिभिरनुसृतः । वृत्तिकारस्तेषा वैषम्यपरिहरणाय नामनिवंच नयोभिन्नानास्थापयद्। भोजदेवस्तूभयोः पाठयोः समानानि भिन्नानि च गृहोत्वान्यानि द्वादशा संकलस्य चतुष्ष- ष्टिलक्षणानि नामनिर्देशनाभ्यां प्रापञ्चयत्। तन्मतमेव शारदातनयेनानुसृतम्। अतः प्रथमं वृत्तिकारपाठविलसितमध्यायं समाप्यानुबन्घरूपेण पाठान्तरभागो निवच नोदाहरणसहितो महामतीनां चित्तविलासोद्द्योतनाय सूक्ष्मविषयाविवेचनलालसाना हिताय च सभ्प्रयो- जितोऽध्यायान्ते यथा लब्घग्रन्थपरिकरः । (अभिनवभारती टिप्पणी)

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३८४ माट्यशास्त्रे

आशोः प्रियोक्ति: कपटः क्षमा च।

प्राप्तिश्च पाश्चात्तपनं तथैव२ ॥ *अर्थानुवृत्तिह्य पपत्तियुक्ती कार्योऽनुनोति: परिदेवनं च ॥ ३ ॥ षट्त्रिशदेतानि हि लक्षणानि। प्रोक्तानि वै भूषणसंमितानि॥ काव्येषु *भावार्थगतानि तज्जैः। सम्यग् प्रयोज्यानि यथारसं तु॥४॥

अनुवाद-१. विभूषण, २. अक्षर संहति, ३. शोभा, ४. अभिमान, ५. गुण- कोतंन, ६. प्रोत्साहन, ७. उदाहरण, ८. निरुक्त, ९. गुणानुवाद, १०. अतिशय, ११. सहेतु, १२. सारूप्य, १३. मिथ्याध्यवसाय, १४. सिद्धि, १५. पदोच्चय, १६. आक्रन्द, १७. मनोरथ, ६८. आख्यान, १९. याच्जा, २०. प्रतिषेध २१. पच्छा, २२. दृष्टान्त, २३. निर्भासन, २४. संशय, २५. आशो, २६. प्रियोक्ति, २७. कपट, २८. क्षमा, २९. प्राप्ति, ३०. पाश्चात्ताप ३१. अथानुवृत्ति, ३३. उपपत्ति, ३३. सूक्ति, ३४. काय, ३५. अनुनीति, ३६. परिदेबनः ये छत्तीस लक्षण भूषण (अलङ्गार) के सदृश कहे गये है। काव्यों में भाषार्थगत रसो के अनुसार इनका प्रयोग करना चाहिए॥ १-४।।

१. क. (टि०) कपटक्षमे। २.क. (टि०) ग्रहश्च । ३. क. (टि०) अर्थानुवृत्ती उपपत्तियुक्तो। ४. क. टि०) सोदाहरणेषु। ५. क. (टि०) यथारक्षानि।

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षोडशोउष्याय: ३८५

यथारसं ये भावा विभावानुभावव्यभिचारिण:, तेषां योऽ्थंः तं स्थायि- भावरसीकरणात्मकं प्रयोजनाम्तरं गतानि प्राप्तानि, यदभिधाव्यापारोपसंक्रान्ता उद्यानादयोऽर्थास्तद्रसविशेषभावादिभावं प्रतिपद्यन्ते तानि लक्षणानीति सामान्य- लक्षणम्। अत एव काव्ये सम्यवप्रयोज्यानीति विषयस्तेषामुक्तः। भट्टनायकेनापि तानेव शिक्षित्वा अभिधाव्यापारप्रधानं काव्यमित्युक्तं- शब्दप्राधान्यमाभरिन्य तत्र शास्त्रं पृथन्विदुः। अथे तत्त्वेन युक्ते तु वदन्त्याख्यानमेतयोः॥ द्वयोर्गुणत्वे व्यापारप्राधान्ये काव्यगीर्भवेत्। इति॥ भामहेनापि- "सैषा सर्वे वक्रोक्तिरनयार्थो विभाव्यते" (२-७५) इत्यादि।

अभिनव-यथारसमिति-जो भाव, विभाव अनुभाव, व्यभिचारीभाव है, उनके जो अर्थ हैं वे स्थायीभाव को रस रूप में परिणत करने रूप प्रयोजनान्तर को प्राप्त होते हैं और जो अभिधा-व्यापार से उपसङ्क्रान्त उद्यान आदि अर्थ हैं और जो रस विशेष के विभावादि भाव को प्राप्त होते हैं, वे लक्षण हैं, यह सामान्य लक्षण है। इसलिए काव्य में उनका सम्यग् रूप से प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार उनके विषय को कह दिया है। भट्टनायक ने भी उन्हीं की शिक्षा देकर अभिधा-प्रधान व्यापार को काव्य कहा है- "जहाँ शब्द की प्रधानता होती है उसे विद्वान् लोग औरों से पृथक् शास्त्र कहते हैं।" "जहाँ अर्थ को प्रधानता होती है, उसे आख्यान कहते हैं।" "और जहाँ पर शब्द और अर्थ दोनों गुणीभूत होते हैं तथा व्यापार को प्रधानता होती है, उसे 'काव्य' कहते हैं।" भामह ने भी कहा है- "यह वक्रोक्ति हो सर्वत्र है, इसी के द्वारा अर्थ विभावित होते हैं।" ना. था०-४९

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नाट्यशाब्ये

तेन च परमार्थतः व्यापार एव लक्षणं, स तु विषयद्वारेण विशेषलक्षणे तु निरूप्यत इति तत्स्वीकृतत्वादर्थोऽपि लक्षणं, व्यापारोऽपि च तद्विदां तु तवभ्या- सपराणां च तथाभूतकाव्यात्मकविषयावलोकने झटित्येव प्रतिभाति। तदन्यत्रानु- मानेन प्रतिभया स्वसंवेदना इत्यनेन प्रयोजनम्। कुशलशिक्षितव्यापारो हि तत्काव्यज्ञदृशि भात्येव ॥ १।२।३।। षट्तरिशदिति च नान्यदिति वारणपरं कविहृवयवतिनामपराणामरिसंख्येय- स्वात। कि तु बाहुल्येन तावदियता लक्ष्यं व्याप्तम्, इयति व कविनावधातव्यमिति संख्यानिरूपणम्। तथा च मतान्तरेण भरतमुनिरेवान्यथाप्युद्देशलक्षणेन नामान्तरैरपि च व्यवहारं करोति, तत एत पुस्तकेषु भेदो दृश्यते तं च दर्शयिष्यामः। पठितोद्देश- क्रमस्त्वस्मदुपाध्यपरम्परागतः ॥ १-४॥

इस प्रकार परमार्थ रूप में व्यापार ही लक्षण है और वह विषयों के द्वारा विशेष रूप से निरूपण किया जाता है, यह मत स्वीकृत होने के अर्थ की लक्षण है। और व्यापार भी उसके अभ्यास में तत्पर उसके जानकार लोगों में तथाभूत काव्य रूप विषयों के अवलोकन में शोध्र हो प्रतोत हो जाता है। वे अन्यत्र भी अनुमान से, प्रतिभा से स्वयं समझ जाते हैं। यह प्रयोजन है। क्योंकि कुशल विद्वानों के द्वारा शिक्षित व्यापार काव्य ज्ञाताओं की दृष्टि में प्रतिभासित होता है। 'षट्त्रिशत्' अर्थात् (लक्षण छत्तीस ही हैं) ऐसा कहने का तात्पर्य है लक्षण छत्तीस ही है, उससे भिन्न नहीं। इस प्रकार 'षट्त्रिशत्' लक्षण का नि्देश वारण परक है। क्योंकि कवियों के हृदय में रहने वाले अन्य लक्षण अपरिर्सख्येय हैं। किन्तु बाहुल्येन इतने में ही लक्ष्य व्याप्त हैं, इतने में हो कवि को सावधान रहना चाहिए। इस प्रकार संख्या का निरूपण हुआ। और भी स्वयं भरत मुनि ने भी मतान्तर से लक्षणों का नाम से कथन करते हैं और अन्य नामों से भो व्यवहार करते हैं। इसीलिए पुस्तकों में भेद दिखाई देता है। उसे आगे दिखायेंगे। प्रकृत पाठ में जो लक्षणों के नाम का क्रम है वह हमारे उपाध्यायनी की परम्परा से हमें प्राप्त हुआ है॥ १-४।।

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३८७

अलक्कारैगुणैश्चैव बहुभिः समलङ्कृतम् । भूषणैरिव 'विन्यस्तैस्तद् भूषणमिति स्मृतम् ॥५॥ तत्र विभूषणं लक्षितुमाह-अलङ्कारैरिति। भूषणैः कटकादिभि: विभज्य स्थानदेशकालदशापुरुषाविविभागं विचार्य न्यस्तैरिव गुणालङ्कारैयंदलङ्करणं तद् भूषणं नाम लक्षण, कवि्यापारः, तद्- द्वारेण शब्दार्थव्यापारावपि। एतदुक्तं भवति-इह गुणा अलङ्काराइच विषया इत्यनेन निबद्धा: काव्यार्थो कृतानामभिधेयानां रसविशेषविषयं विभावादिभावं विवरीतं समर्था। तथा हि हास्यरसप्रधाने प्रहसनादौ शुष्कश्ोत्रिये वक्तरि प्रयोक्तरि शोतरि वा गुणविनिवेशितं तु लक्षणं भजत्यलङ्कारश्च। तया हि पादताडितके शोत्रियं शरोतारमभिप्रेत्य विट- स्थापि निर्गुणपुरुषस्यैवोक्तिः "मा मुसलेनापकार्षोः, मा कुसूलाग्निनना धाक्षीः" इति शोभां पुष्णाति। अनोचित्यनिबन्धस्तु करुणविप्रलम्भादौ यमकस्य, यथा-

१. विभूषण अब विभूषण का लक्षण करते हैं- अनुवाद-भूषणों अर्थात् अलङ्कारों के यथोचित विन्यास के समान बहुत से अलङ्कारों एवं गुणों से अलङ्कृत लक्षण 'भूषण' कहा गया है॥।५ ।। अभिनव-अभिनव गुप्त का कथन है कि भूषण अर्थात् कटक, कुण्डल आदि आभूषणों को विभक्त करके स्थान, देश, काल, दशा और पुरुष आदि के विभाग का विचार करके न्यस्त अर्थात् धारण किये गये गुण और अलङ्कारों के द्वारा जो अलङ्करण है वह 'भूषण' नामक लक्षण है, यह कवि का व्यापार है। उसके द्वारा ही शब्द और अर्थ भी व्यापार हैं। ऐसा कहा गया है कि यहाँ गुण और अलङ्कार विषय हैं। इनके द्वारा निबद्ध विषय काव्यार्थीकृत अभिधेय अर्थ तथा रस-विशेष के विषय विभाव आदि भावों के। विवरण प्रस्तुत करने में समर्थ हैं। जैसे कि हास्य रस प्रधान प्रहसन आदि में जहाँ वक्ता, श्रोता, प्रयोक्ता नीरस है वहाँ पर निविष्ट गुण लक्षण बन जाता है और अलङ्कार भी। जैसा कि 'पादताड़ितक' नाटक में श्रोत्रिय को श्रोता मानकर "मुझे मुसल से मत मारो" "कुसल की अग्नि से मत जलाओ" इत्यादि निर्गुण पुरुष की तरह विट की उक्ति शोभा को बढ़ातो है॥ अनौचित्य का निबन्धन तो करुण विप्रलम्भ आदि में यमक का उपनिबन्ध होता है। जैसे- १. ब. चित्राथस्तद्।

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नाटपशास्त्र

विना प्रियतमेनाद्य विरहानलतापिता। दहोच्चूतस्य विच्छेदं किन्तु हाऽनलतापिता॥ स्थाने निवेशस्तु यथा- लीनेव प्रतिबिम्बितेव लिखितेवान्तर्निखातेव च प्रोत्कीणॅव च वञ्त्रलेपघटितेव" इति (मालतीमाधवात्) अत्रापि लोके उत्प्रेक्षापरम्परैव होयं सातिशयकामावेशावस्थासमुद्द्योतित- प्रियतमाविषय विचित्र संकल्पगर्भसंभावानामुख्यप्राणत्वाद् विप्रलम्भस्य कामावस्थाना च माधुर्यप्रसादोपेते च काव्ये ओत्रपथमवतरत्येवेति प्रतिपाद्यते। सुकुमारिचित्त- वृत्तिसु मगोऽयमुत्तमश्चेत्येवं समस्तस्य गुणालङ कारवर्गस्यानुग्राहकमिदं कविव्यापार- रूपं तद्वशाच्च शब्दार्थतद्व्यापाराद्यपि स्पृशद्विभूषणा्यं लक्षणम्। एतमेवार्थ सम्यगानन्ववर्धनाचार्योडपि विविच्य न्यरूपयत्-

"प्रियतम के बिना आज बिरहानल से संतप्त नायिका आम के विच्छेद को को जला सकती है, किन्तु हाय ! अनल से संतप्त वह क्या करे?" यहाँ करुण-विप्रलम्भ में यमक का निबन्धन अनुचित है। स्थान-निवेश का उदाहरण, जैसे- "वह प्रियतमा हृदय में लीन हुए के समान, प्रतिविम्बित हुए के समान, लिखित के समान, भीतर खुदे हुए के समान, उत्कीर्ण किये गये के समान, वज्चलेप से घटित के समान मेरे हृदय में वसो है।" यहाँ पर लोक में यह उत्प्रेक्षा परम्परा हो अतिशय कामोद्रेक को अवस्था से समुदोतित प्रियतमा विषयक विचित्र संकल्पों से मिश्रित सम्भावनओं का मुख रूप से प्राणन करने के कारण विप्रलम्भ और कामावस्थाओं में माधुर्य एवं प्रसाद से युक्त काव्य में सुनाई देता है। यह सुकुमार चित्तवृत्ति से सुभग एवं उत्तम है, इस प्रकार समस्त गुणालङ्कार वर्ग का अनुग्राहक कवि-व्यापार रूप है और उसके कारण शब्द और अर्थ तथा उसके व्यापार को स्पर्श करता हुआ 'विभूषण' नामक लक्षण है। इसी को आनन्दवर्धनाचार्य ने भी विवेचन के साथ निरूपण किया है।

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बोडेशोऽडपाय:

यत्राल्पँरक्षरैः श्लिष्टविचित्रमुपवर्ण्यते। तमप्यक्षरसङ्घातं विद्याल्लक्षणसंज्ञितम् ॥ ६॥

ध्वन्यात्मभूते भृङ्गारे समोक्ष्य विनिवेशितः । रूपकादिरलङ्कारवग एति यथार्थताम्।। इत्युक्त्वा क्रमेण- विवक्षातत्परत्वेन नाङ्गित्वेन कवाचन। काले च ग्रहणत्यागौ नातिनिर्वहणैषिता ॥ (ध्वन्यालोके २) इत्यादिना ग्रन्थसन्दर्भेण सोवाहरणेन। तच्चास्माभि: हृदयालोकलोचने तद्विवरणे विस्तरतो व्याख्यातमिति तत्कुतूहलस्तत्रैव गृह्ोयात। इह तु प्रसक्तया ग्रन्थभूयस्त्वादुद्विजते लोक इति विस्तारितम् ॥५॥ अथाक्षरसंहतिमाह यत्राल्पैरिति। 'ध्वनि के आत्मभूत शङ्गार रस में समोक्षा करके विन्यस्त विनिवेशित किया गया है। रूपकादि अलङ्कार वर्ग यथार्थता को प्राप्त करता है।' ऐसा कहकर क्रम से- 'रूपकादि की विवक्षा रस परक करनी चाहिए, अङ्गो अर्थात् प्रधान रूप में नहीं करनी चाहिए। समय के अनुसार इनका ग्रहण और त्याग हों, किन्तु दूर तक निर्वाह करने को इच्छा न हो'। इत्यादि ग्रन्थ सन्दर्भ के द्वारा सोदाहरण विवेचन किया गया है। उसको हमने सहृदयालोकलोचन में नायक उसके विवरण में हमने विस्तार से व्याख्या को है। अतः इस कुतूहल का ग्रहण वहों करनो चाहिए। यहाँ तो प्रसक्ति के साथ लिखने पर ग्रन्थ के विस्तार से लोग ऊब्र न जाय इसलिए उसका विस्तार नहीं किया गया है ॥ ५॥ २. अक्षरसंहति अब अक्षरसंहति को कहते हैं- अनुवाद-जहाँ पर श्लेष युक्त अल्प अक्षरों से विचित्र अर्थं का वर्णन किया जाता है, उसे 'अक्षरसंधात' नामक लक्षण समझना चाहिए॥ ६॥ १. क. (टि०) यत्रार्थेरक्ष रैः श्लिष्टैविचित्रेरुपवर्णितम् ।

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नाटपशास्त्र

अक्षरशब्देन यदृच्छाशब्दप्राधान्यं, यदृच्छाशव्देषु स्वरूपस्यैव प्रवृत्तिनिमित्त- त्वात्। तेनाल्पैरेवाक्षरै: श्लिष्टैः प्रवृत्तिनिमित्तभूतस्वस्वरूपलक्षितत्वेनैव विचित्रं तदरोचितविभावादिभावं प्राप्यमाणोडयं उपवण्यते श्रोतृरणां हृवयमुपसंक्रामयितं

तथाहि मानिनोत्यक्षराणि ईर्ष्याविप्रलम्भे, तरणोत्याभिलाषिके, वरतनुरिति संभागे विभावतां तामेव प्रापयन्ति। अस्तोतिव्पुत्पतिस्तथापि पर्यन्ते मानावि- शब्दानामन्ततो वा धातुप्रत्ययमात्रादेरवश्यं यदृच्छात्वमित्यक्षराणामेव संघातः प्रधानं यदृच्छाशब्दप्राधान्ये उदाहरणं यथा- १वित्र्रम्भादुतमाङ्गं प्लवगबलपतेः पादमक्षस्य हन्तुः। कृत्वोत्सङ्गे सलोलं त्वचि कनकमृगस्याङ्गमाधाय शेषम्।। बाणं रक्षःकुलध्नं प्रगुणितमनुजेनादरात्तीक्ष्णमक्ष्णःः । कोणेनोद्वीक्षमाणस्त्वदनुजवदने वत्तकर्णोऽयमास्ते॥

अभिनव-यहाँ अक्षर शब्द से यदृच्छा शब्द का प्राधान्य बतलाया गया है। यदृच्छा शब्दों में स्वरूप को हो प्रवृत्ति-निमित्त माना गया है। अतः श्लेष युक्त अल्प अक्षरों के द्वारा प्रवृत्ति निमित्तभूत स्वस्वरूप से उपलक्षित होने से विचित्र और प्रकृत रस के योग्य विभावादि भाव को प्राप्त होने वाले अर्थ का उपवर्णन किया जाता है जिसके विषय में श्रोताओं के हृदय का उपसङ्क्ान्त करने के लिए जो कवि-व्यापार होता है वह अक्षरसंघात ही, उस व्यापार का कारण है, हेतु है। जैसे-'मानिनी' आदि अक्षर ईर्ष्या-विप्रलम्भ में, 'तरुणी' आदि अक्षर अभिलाष में, 'वरतनुः आदि अक्षर सम्भोग में विभावता को प्राप्त कराते हैं। यद्यपि इन अक्षरों के संघात में व्युत्पत्तियाँ है तथापि पर्यन्त में (अन्त में) घातु एवं प्रत्यय आदि में अवश्य ही यदच्छा शब्दत्व है, इस प्रकार अक्षरों का संघात ही इसमें प्रधान है। यदूच्छा शब्द की प्रधानता का उदाहरण, जैसे- "वानरों की सेना के अधिपति सुग्रीव के उत्सङ्ग (गोद) में शिर को, अक्षहन्ता हनुमान् के उत्सङ्ग में पेर को और स्वर्णमूग को त्वचा पर शेष अङ्ग को रखकर राक्षसों के कुल का विनाश करने के लिए अपने अनुज लक्ष्मण के द्वारा एकत्रित किये गये तीक्ष्ण बाणों को आँखों के कोण से देखते हुए हे रावण! तुम्हारे अनुज की मुख की ओर कान लगाये यह रामचन्द्र है।" १. क. (टि०) अङ्केन्यस्तोत्तमाङ्कं।

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बोडशोड्ध्याय: १९१

अत्र विस्त्रम्भादित्यादिना मैत्रीप्राधान्याद वालिहननपूर्वकसाम्न्ाज्यदातृत्व- बलाच्चेत्युक्तम्। अक्षस्य यो हन्तेत्येकाकिनापि येनाशोकवनिकाविप्लोषणं राक्षस- बलक्षपणं च कृतं, स यत्र प्रधानकृतिर्भवतोत्युक्तम्। त्वचोति प्रहतमारीचवृत्तान्तः इत्युक्तम्। बाणमित्यादिना तत्रवास्य बहुमान इत्युक्तम्। राक्षसविषये दैववैगुण्य- मित्युक्तम्। अत्र च यत्र यस्य यतयापारस्तत्र प्राधान्यस्य का कथेति। प्रगुणितमिति बहुतररणसंमर्दधुरन्धरतया कुटिलीकृतस्यापि क्षेत्रबहुमाने पुनर्योजनमित्युक्तम्। त्वदनुजवदन इति भेदोपायकृता नीतिसंपत् परपक्षे च बिपयम्। दत्तकर्णं इति तदाकर्णनमात्रमे तत, न तु हृदये निर्व्याजं तेजोजाज्वल्यमानौजसि भेदं प्रति कोऽप्यस्य बहुमानः। अयमिति गम्भीरधीराकृतिः प्रसन्नश्च आस्त इति। यद्यपि प्रकृतेनापि कश्चित्क्षोभोऽत एवोक्तं सलीलमिति। अत्र चार्थस्यालङकारघटनाप्रयासमन्तरेणैव सुन्दरत्वं लक्षणकृतमेव। यहाँ विस्रम्भ आदि के द्वारा मैत्री (मित्रता) की प्रधानता और वालि को मारकर साम्राज्य प्रदान करने की शक्ति का वर्णन है। 'अक्ष का जो हन्ता है' इत्यादि के द्वारा अकेले ही जिसने अशोक वाटिका को नष्ट कर दिया और राक्षस बल का विनाश कर दिया, वह जहाँ प्रधान प्रकृति है, ऐसा कहा है। 'त्वचि' पद का कथन मारीच के मारने का वृत्तान्त बतलाता है। 'बाणभित्यादि' के द्वारा राम को बाण पर ही विश्वास है, अतः उसको ओर देख रहे हैं, इससे उनका बहुमान प्रतीत होता है।' यह कहा गया है। राक्षसों के विषय में दैव की प्रतिकूलता है। यहां जिसमें जिसका जो व्यापार है उसमें उसकी प्रधानता के विषय में क्या कहना है?' यह सुस्पष्ट है। 'प्रगुणित' पद बहुत से युद्धों के समर्थन करने में धुरन्धर होने के कारण कुटिलोकृत का पुनः युद्ध क्षेत्र में बहुमान को योजना को कहता है। 'तुम्हारे अनुज के मुख की ओर' इत्यादि वे द्वारा भेद रूप उपाय के लिए की गई नीतिसम्पत् है और शत्रुओं के विषय में विपरीत अनोति है। 'दत्तकर्ण' पद सूचित होता है कि केवल उसकी बात सुनना मात्र है, निर्व्याज तेज जाज्वल्यमान ओज में भेद के प्रति इसका कोई बहुमान है। 'अयं' पद राम गन्भोर और धोर आकृति वाले राम प्रसन्न होकर बैठे हैं, सूचित करता है। यद्यपि प्रकृत में कोई क्षोभ नही है, अतएव 'सलील' कहा गया है। यहाँ पर अलक्कारों की योजना के बिना ही जो अर्थों का सौन्दर्य है वह लक्षण के द्वारा है।

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१९२ माव्यशाहणे

सिद्धैरर्थेः समं कृत्वा ह्यसिद्धोऽर्थः प्रसाध्यते'। यत्र इलक्ष्णविचित्रार्था सा शोभेत्यभिधीयते' ।। ७॥

ननु साभिप्रायमात्रत्वं नामार्थस्य तु गुण ओज इत्युक्तम्। भो: भो: सहवयाः अर्थो जडस्तस्याभिप्राय इति कथं भाषावक्तृश्रोत्रोः स इति चेतु तद्गोऽर्थस्य गुण इति कथम्। अथ वस्त्वन्तराक्षेपकत्वमेव तस्य स गुण इत्युच्यते तद्वस्त्वत्तरमाक्षिप्यं वक्त्रभिप्रायरूपमेव, आक्षेपकत्वमपि कविमनीषाव्यापारबलादेव तथाविनिवेशनात प्रकारान्तरयोगे तथाभावात। अत एव प्रौढिर्वस्तुतो वक्तृगतैव न त्वर्थे, काममुप- चयंतामित्यलं बहुना। एतेषां च लक्षणानां संकीर्णत्वेन लक्ष्यं दृश्यते बाहुल्यापेक्षया तूदाहरणं मन्तव्यम् ॥। ६।। अथ शोभा सिद्धैरथेरिति। यथा-

अब प्रश्न यह होता है कि अर्थ का अभिप्राय मात्र तो ओज नामक गुण कहा गया है। अरे सहृदयो ! अर्थ तो जड़ है, उसका अभिप्राय, यह कैसी भाषा है। यदि यह कहा जाय कि वक्ता और श्रोताओं का यह अभिप्राय है तो उनमें रहने वाला अर्थ का गुण केसे है? यदि यह कहा जाय कि वस्त्वन्तर का आक्षेपकत्व ही गुण है और वह वस्त्वन्तर वक्ता का अभिप्राय रूप है तथा यह आक्षेपकत्व भी कवि की मनीषा से किया जाने वाला व्यापार के कारण होता है, क्योंकि वैसा ही इसका विनिवेश है और यहाँ प्रकारान्तर का योग होने पर उस प्रकार का निषेध नहीं होगा। अतः प्रौढि वस्तुतः वक्ता का गुण है अर्थ में नहीं रहता, किन्तु उपचार से ऐसा मान लिया गया है, अतः अब रहने दिया जाय। इन लक्षणों का लक्ष्य (उदाहरण ) सङ्कीणं दिखाई देते हैं। अतः बाहुल्य की अपेक्षा से उदाहरण समझना चाहिए ॥ ६ ॥ ३. शोभा अब शोभा नामक लक्षण को कहते हैं- अनुवाद-जहाँ पर सिद्ध पदार्थो से तुलना करके अखिद् पदार्थो को सिद्ध किया जाता है। उस इलक्षण (कमनीय) और विचित्र अर्थ को 'शोभा' कहा जाता है।। ७ ।। १. ख. ग. प्रयुज्यते। २. स. ग. अत्र श्लिष्टं विशिष्टयर्थ।

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षोडशोऽध्याय: ३९३

घार्यमाणस्तु बहुभिवंचनैः कार्ययुक्तिभिः। न यः पर्यवतिष्ठेत सोडभिमानस्तु संज्ञितः ॥। ८।। मेदशछेदकृशोवरं लघुभवत्युत्थानयोग्यं वपुः। सत्त्वानामपि लक्ष्यतें विकृतिमच्चितं भयक्रोधयोः॥ उत्कर्ष: स च धन्विनां यदिषवः सिध्यन्ति लक्ष्ये चले। मिथ्या हि व्यसनं वदन्ति मृगयामीदृग्विनोदः कुतः॥ अत्र पादत्रयेण प्रसिद्धा एवार्था अभ्यसनोयत्वेन शोभमानास्तैः समविकलं मृगयालक्षणमर्थ कृत्वा अप्रसिद्धोऽनुचितोऽपि सोऽर्थ उचितो विचित्रश्च निरूपितः। न चात्रालङ कार: कश्चिदपि तु कविव्यापारेण यः शब्दार्थव्यापारादेवाथंघटनात्मा तत्कृतं हृदं लक्षणमेव। अशोभनोऽप्यर्थोडमुना नयेन शोभेत इति शोभेयमुक्ता ॥ ७॥ अथाभिमान :- धार्यमाणस्तु बहुभिरिति।

जैसे- अनुवाद-मृगया से मेद के काम हो जाने से उदर पतला हो जाता है और शरोर हलका हो जाने से शीघ्रता से उत्थान के योग्य हो जाता है। प्राणियों के भी भय और क्रोध से युर्त चित्त का विकार परिलक्षत होता है, यदि चल लक्ष्य में बाण का निशाना सफल हो जाता है तो धनुर्षारियों के लिए उत्कर्ष का विषय है। लोग व्यर्थ में ही मृगया को व्यसन कहते हैं। ऐसा विनोद अन्यत्र कहाँ है। यहाँ पर तीन पादों में प्रसिद्ध अर्थों का ही शोभनीय रीति से अभ्यास किया गया है। अथवा तोन पादों में प्रसिद्ध अथं ही अभ्यसनीय रूप से शोभायमान है। उनके द्वारा मृगया रूप अर्थ अविकल रूप में निरूपित करके अप्रसिद्ध और अनुचित भी अर्थ उचित एव विचित्र रूप में निरूपित किया गया है। यहाँ पर कोई अलङ्कार नहीं है। अपितु कवि के व्यापार से जो शब्दार्थं व्यापार से ही अर्थ-घटना रूप अर्थ है। तत्कृत हृद हो लक्षण है। अशोभन अर्थ भी इस नीति से सुशोभित होता है अतः इसे 'शोभा' कहा गया है।। ७।। ४. अभिमान अब अभिमान नामक लक्षण को कहते हैं- अनुवाद-अनेक वचनों, कार्यों एवं युक्तियों के द्वारा निर्धारित किया गया जो अर्थं हृदय में पर्यवसित नहीं होता, वह अभिमान नामक लक्षण होता है ॥८॥

१. क. (टि०) घायंमाणस्तु। २. नार्यो यन्नानुतिष्ठन्ति सोऽमिमानः प्रकीतितः। ना. था०-५०

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१९४ नाट्यशासत्रे

यथा ममैव- शीतांशोरमृतच्छटा यदि करा: कस्मान्मनो मे भृश। संप्लुष्यन्त्यथ कालकूटपटलोसंवाससंघुक्षिता:।। कि प्राणान् न हरन्तयुत प्रियतमासंजल्पमन्त्राक्षरै- र्वार्यन्ते किमु यद्धिमोहविवशात्सन्तापतन्त्रा स्थितिः ॥ मत्र हि तादृश्यार्थस्याथॅन घटा कृता यस्यां कार्यमुक्तिभि: फलयोजनाभिर्धायं- माणो हृदये स्वाप्यमानो नावतिष्ठत इति। वार्यमाणोऽपि वा न निवतंते। तत्रैवायं बद्धः। तथाभूतोऽर्थोडलौकिकत्वात्तावानुपायः। कविनालङ कारे उपमानोपमेयभावस्य कर्थंचिदप्यस्वीकारात्केवलं वक्तुरभिमत वदता किमिव ममाप्येवं तदपि नैवेत्यभि- धानमभिधानाव्यलक्षणम्। एतदेव सादृश्यनाम्नाप्ययैरुक्तम् ।

सादृश्यं क्षोभजननं सारूप्यमिति संज्ञितम् ॥ इति ॥

जैसे मेरा ही श्लोक उदाहरण है- अभिनव-"यदि चन्द्रमा की किरणें अमृतमयी है तो क्यों मेरे हृदय को संतप्त कर रहीं हैं, यदि यह कहा जाय कि कालकूट विष के साथ सहवास से विषाक्त है तो प्राणों को क्यों नहीं हरण कर लेतो ? कहते हैं कि प्रियतमा के संजल्प रूपो मन्त्राक्षरों के प्रभाव से उसका निवारण हो जाता हैं, यदि निवारण कर दिया जाता है तो विषजन्य मोह ( मूर्च्छा) के कारण सन्ताप क्यों है?।" यहां पर एक अर्थ के साथ दूसरे अर्थ को घटना इस प्रकार रखी गई है जिसमें कार्य (फल) को युक्तियों से धारण किया जाने वाला अर्थ हृदय में स्थापित किये जाने पर भी स्थित नहीं हो पाता। अथवा निवारण किया गया भी निवृत्त नहीं होता। यह वहीं पर बंध जाता है। तथाभूत अर्थ अलौकिक होने से उपाय है। अलङ्कार में उपमानोपमेय भाव का किसी प्रकार स्वीकार न करके केवल का अभिप्राय कहते हुए कवि के द्वारा क्या होता है? मैंने भी इसी प्रकार कहा है, ऐसा भी नहीं है' इस प्रकार का कथन 'अभिमान' संज्ञक लक्षण है। इसो को अन्य आचार्य सादृश्य नाम से कहा है- "दृष्ट, श्रुत एवं अनुभूत अर्थ के कथन आदि उद्भूत क्षोभजनक सादृश्य को सारूप्य कहते हैं।"

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बोडशोउ्थाय: ११५

कोस्यंमानैर्गुंणैयंत्र विविधार्थसमुद्भवैः दोषा न परिकथ्यन्ते तज्ज्ञयं गुणकीतंनम्॥। ९॥ लोके गुणातिरिक्त्तानां बहूनां यत्र नामभि:। एकोऽभिशब्धते यस्तु विज्ञेयं गुणकीतंनम् ॥१०॥ अमृतकरत्वं हि चन्द्रस्य श्रुतं कालकूट सहोदरत्वं च, मन्त्राणां विषशमनं दृष्टं स्वयमनुभूतं मोहावि तत्समुद्भवं, वृत्तान्तेन यत्प्रकृते सादृश्यं तुल्यं तेन लोकदृष्ट- ध्रुतानुभूतत्वं तत्क्षोभं हृदयेऽनवस्थानं जनयति-यद्यमृतसदृशश्चन्द्रपादाः तत्किमेव- मङ्गं विवध्युरिति। एवमन्यत् ॥८॥ अथ गुणकीर्तनं-कीत्यंमानैर्गुणैरित्यादि। यथा- पृथुरसि गुणमूर्तर्या रामो नलो भरतो भवान् महति समरे शत्रुघ्नस्तवं तथा जनकः स्थितो। इति सुचरितैर्मूति विश्व्चिरन्तनभूभृतां कथमसि न मान्घाता देर्वास्त्रलोकविजय्यपि॥ चन्द्रमा को किरणें अमृतमय हैं और कालकूट (विष) सहोदर है, यह श्रुत अर्थ है। मन्त्रों के द्वारा विष का शमन होता है, यह दृष्ट अर्थ है, विष से मोह (मूर्च्छा) आदि का अनुभव अनुभूत अर्थ है। इस वृत्तान्त से प्रकृत में जो सादृश्य है, उसके द्वारा लोक दृष्ट, श्रुत एवं अनुभूत जो क्षोभ है। वह हृदय में क्षोभ की अवस्थिति उत्पन्न करता है। यदि चन्द्रमा की किरणे अमृत के समान हैं, तो क्यों अड्कों को इस प्रकार विह्वल कर देती है। इसी प्रकार अन्यों को भो समझना चाहिए॥ ८ ॥ ५. गुणकोर्त्तन अब गुणकोर्त्तन का निरूपण करते हैं- अनुवाद-जहाँ पर विविध अर्थो से उद्भूत गुणों के प्रकथन में वोषों की परिकल्पना न की जाय तो उसे 'गुणकोत्तंन' नामक लक्षण समझना चाहिए।। ९॥ अनुवाद-लोक में गुणों के अतिरिक्त गुणों का नाम से किसी एक का कथन किया जाय तो उसे 'गुणकोत्तंन' समझना चाहिए ॥ १० ॥ १. क. (टि०) दोषांश्ान् परिकल्प्यम्ते।

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नाट्यशाल्थ्र

अत्र हि विविधा येडर्याः पृथुरामप्रभृतयस्तत्समुद्भवैर्गुणैः कीत्यंमानैस्तद्गता दोषा न परिकल्प्यते। तथा हि पृथुरसीत्युक्ते तथा दोषा अि केचिद् बलाद भूमि दोहनप्रभृतयः प्रतीयेरन्, नलोऽसीति द्यूतव्यसनितापि। एवमन्यत्र। अतः एव न दोषोडत्र प्रधानम्। गुणैरिति सुचरितैरिति निरूपिते तु चारुत्वमिति गुणकीतंनं नाम लक्षणम्। श्लेषानुग्राहित्वे स्थिति लक्षणानि हयालङ्कारानपि चित्रयन्ति। तदग्र एव वक्ष्यामः । अन्यत्र पाठ: - लोके गुणातिरिक्तानां बहूनां यत्र नामभि:। एको हि शब्द्ते तत्तु विज्ञेयं गुणकीतंनम्॥ इति । अयं स्पष्टार्थः ॥९॥

अभिनव-"हे राजन् ! गुणों से आप राजा पृथु हैं, मूर्ति अर्थात् आकार से आप राम, नल तथा भरत है, महायुद्ध में शत्रुओं को मारने वाले आप शत्रुध्न हैं, स्थिति अर्थात् मर्यादा या घैय पालन करने में आप जनक है। इस प्रकार सुन्दर चरित्रों से प्राचीन राजाओं को मूर्त्ति (स्वरूप) धारण करने वाले आप त्रिलाक विजयी राधा मान्धाता क्यों नहीं है ?" यहाँ पर पृथु, राम प्रभृति जो विविध अर्थ हैं उनके गुणों का कोर्त्तन करने से उनके दोषों की परिकल्पना नहीं की गई है। किन्तु 'आप राजा पृथु हैं', ऐसा कहने पर भूमि-दोहन रूप दोष भी प्रतोत होते हैं। इसी प्रकार 'आप राजा नल हैं' ऐसा कहने पर उनके 'जुआ खेलने' रूप दोष भो प्रतोत होते है। इसो प्रकार अन्यत्र भी समझने चाहिए। इसलिए यहाँ पर दोष प्रधान नहीं है। गुणों के द्वारा, सुन्दर आचरणों के द्वारा पृथु, राम, नल, जनक आदि राजाओं के गुणों का निरूपण के द्वारा प्रकृत के सौन्दर्य का कथन करना 'गुणकीर्त्तन' नाम लक्षण है। यहाँ पर श्लेष अलङ्कार के अनुग्राहक रूप में स्थित होने से लक्षण अलङ्कार को भो चित्रित करते हैं। उसे आगे कहेंगे। अन्यत्र निम्नलिखित पाठ मिलता है- "लोक में अत्यन्त गुणशाली बहुत से राजाओं के गुणों के कोर्त्तन से किसो एक का कथन करना 'गुणकीर्त्तन' समझना चाहिए ?" यह अर्थ स्पष्ट है ॥ १० ॥

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३९७

उत्साहजननैः प्रसिद्धरुपगढञ्च' ज्ञेयं प्रोत्साहनं बुधैः ॥ ११॥

अथ प्रोत्साहनं-उत्साहजननैरिति । औपम्यस्य संश्रयणमन्वेषणं यत्रेति अनेन यत्नान्वेषणेडपि तस्य भाव इति वशितम्। यथा भट्टेन्दुराजस्य- हरवूषभ ! तवेव तस्य माता जयति जगत्यसमानसूतिरेका। निवसति परमेश्वरोऽपि यस्मिन् सहतनयः सगणः सहावरोधः ।। अप्रस्तुतप्रशंसाप्यत्र, यद्वचित्रयं प्रोत्साहनत्वलक्षणकृतमेव, केवलं त्वियं यथा लक्ष्मीरिति, सच भवान् मुरारिरित्यादि। इदमन्यत्र प्रियवचनमिति पठितम्- यत्प्रसन्नेन मनसा पूज्यात्पूजयितुं वचः। हर्षप्रकाशनार्थं तु सा प्रियोक्तिरुदाहुता॥ इति ॥ ११॥

६. प्रोत्साहन अब प्रोत्साहन नामक लक्षण का निरूपण करते हैं- अनुवाद-जहाँ पर उपमा के आधण से उत्साह जनक प्रसिद्ध एवं स्पष्ट अर्थो के द्वारा उपगूहन किया जाय, उसे 'प्रोत्साहन' नामक लक्षण समझना चाहिए॥ ११ ॥ अभिनव-जहाँ पर 'औपम्य (उपमा) का संश्रयण (अन्वेषण ) होता है' इससे यत्नपूर्वक अन्वेषण करने में उनका भाव है' यह दिखाया गया है। जैसे भट्टन्दुराज के इस श्लोक में - "हे हरवृषभ ! संसार में एक मात्र बोजोड़ पुत्र को उत्पन्न करने वाली तुम्हारे जैसी माता की जय हो, जिसका अन्वेषण करके परमेश्वर शिव भो अपने पुत्रों, अपने गणों और अपनी सहधर्मिणी के साथ निवास करते हैं।" यहाँ पर 'अप्रस्तुत प्रशंसा' अलङ्कार भी है। फिर भी यहाँ वेचित्र्य प्रोत्साहन लक्षण का हो है। केवल यह जैसे-'यह लक्ष्मी है' 'यह भगवान् मुरारि हैं' इत्यादि। इसे हो अन्यत्र प्रियोक्ति या प्रियवचन कहा गया है जैसे- "जब प्रसन्न चित्त से हर्ष का प्रकाशन करने के लिए पूज्यजनों के पूजन के लिए, सम्मान प्रकट करने के लिए जो प्रिय-वचन बोला जाता है, उसे 'प्रियोक्ति' कहते हैं ॥"

१. क. (टि०) तु ।

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नाटयशास्त्रे

यत्रकस्यापि' शब्दस्य दर्शनात्सुबहून्यपि। यान्ति सिद्धिमनुक्तानि तदुदाहरणं स्मृतम् ॥ १२ ॥

यथा-

वल्मीकात किमुतोद्धतो गिरिरयं कस्य स्पृशेदाशयं त्रैंलोक्यं तपसा जितं यदि सखे ! दोष्णां किमेतावता। सवं साध्वथवा रुणत्सि विरहक्षामस्य रामस्य चेत्

अत्र उदाहृते हि रावणीयदशनपरिधट्टितवालिकक्षपाटनेन स्वावमाननेड चडवगते सति तदपजयः तत्कक्षाक्षध्यपरिग्रहस्तथैव चतुरर्णवभ्रमणं पुनः कृपामात्रेण त्याग: तत्राप्रतोकार: पुनरभिमानो दर्प इत्यादि गम्यते।

७. उदाहरण

अब उदाहरण को कहते हैं- अनुवाद-वह एक हो शब्द के दर्शन से (ज्ञान से) जहाँ अनेक अकचित अर्थो की सिद्धि हो, उसे 'उदाहरण' नामक लक्षण समझना चाहिए।। १२।। जैसे- "यह वल्मोकि से उखाड़ा हुआ पर्वत है, यह किसके आशय को स्पर्श करेगी अर्थात् कौन इस बात पर विश्वास करेगा? हे सखे ! यदि तुमने तपस्या के द्वारा भुजाओं में बल प्राप्त कर तोनों लोक को जीत लिया है तो इससे क्या हुआ ? हां, ये बातें तभी ठीक हो सकती हैं जब तुम विरह से क्षीण राम के तुम्हारे दांतों से अङ्कित वालि के कक्ष के रुधिर से आर्द्र पुंख के अग्र वाले शर (बाण) को सह सको।" इस उदाहरण में रावण के द्वारा दाँतों से काटने पर बालि के कक्ष फट जाने से अपना अपमान जान लेने पर पराजय, बालि के द्वारा कक्ष में अक्षय परिग्रह, उसी प्रकार चारों समुद्रों का परिभ्रमण, फिर कृपा करके छोड़ देना, फिर उसका प्रतीकार न कर सकना-इस पर भी अभिमान करना इत्यादि ध्वनित होता है।

१. क. (ि०) यननैकस्यैव।

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षोडशोड्याय: ३९९

अथ निरुत्तं- निरुक्तं द्विविधं 'प्रोक्तं तथ्यं चाऽतथ्यमेव वा। सिद्धिप्रसाधितं तथ्यमतथ्यं चाप्रसाधितम् ॥१३ ॥

अक्षरसंहतेश्च विशेष :- तत्रावमोपादातव्यशब्दान्तरस्थाने शब्दान्तरो- पादानं यथा-हनमत इति वक्तव्येऽक्षस्य हन्तुरिति, इह तु त्वद्दन्तेति तदीयधि- व्कारोदाहरणम्। अन्ये पठन्ति- यत्र तुल्यार्थयुक्तेन वाक्येनाभिप्रदर्शनात। साध्यन्ते निपुणैरर्थास्तदुहारणं स्मृतम्॥ इति। ल्यैन्थस्तत्समयभाविभियंदुवतं तट्वाव्यमिति एव फलितोऽर्थ: ॥ ११॥

यहाँ अक्षर संहति से यह विशेष है-उसमें नवम रूप से उपादेय शब्दान्तरो के स्थान में शब्दान्तर का उपादान जैसे-'हनुमान्' यह कहना चाहिए, किन्तु अब रावण पुत्र अक्षय (अक्षय कुमार) का हन्ता कहना और यहाँ पर तो 'तुम्हारे दाँतों से' इस रूप में उसके धिक्कार का कथन, उदाहरण नामक लक्षण है। अन्य लोग इसका लक्षण इस प्रकार करते हैं- "जहाँ पर निपुण लोग समानार्थक वाक्यों के द्वारा किसी अर्थ के प्रदर्शन से अपना प्रयोजन सिद्ध करते हैं, अपने गुण सबको प्रकाशित करते हैं उसे 'उदाहरण' कहा गया है।" यहाँ समान अर्थो से अर्थात् उसे समय होने वाले पदार्थों से जो कहा गया है, वह वाक्य उदाहरण है। वही अर्थ फलित होता है॥ १२ ॥ ८. निरुक्त

अब निरुक्त नामक लक्षण को कहते हैं- अनुवाद-निरुक्त दो प्रकार का कहा गया है-(१) तथ्य (२) अतथ्य। सिद्धि से प्रसाधित अर्थात् प्रसिद्ध अर्थ का वणन 'तथ्य' है और उसके विपरीत अप्रसिद्ध अर्थात् जो लक्षण से सिद्ध न हो 'अतथ्य' है॥ १३ ॥।

१. क. (टि०) ज्ञेयं ।

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माट्यशाल्न्रे

सिद्धिलंक्षणेन स्वीकार:। तया प्रसाधितं तथ्यं, ततोऽन्यवतथ्यम्। उवाहरणं यथा ममव- वोरोत्सवे सङ्गरसीम्नि मूढं यः प्रापयत सत्यपर्थं कथज्चित्। स चार्जुन: सोऽपि च नाम कृष्णः प्रसिद्धिरित्थं वितथैव सर्वा।। परस्परं नाम्नोरन्यत्र तथ्यत्वं स्वविषये त्वतथ्यतेति। न चायमर्घश्लेषः, स हि तुल्यसंख्ययोः । यथा- इति गोशब्दस्य रश्मिषु सुरभिषु चानादित्वेन प्रसिद्धे:। इह त्वेकत्रान्यत्वे कृतः समय इति। एवं पृथक् तथ्यातथ्ययोरुदाहार्यम्। अन्यत्र पाठ: - निरवद्यस्य वाक्यस्य पूर्वोक्तार्थप्रसिद्धये। यदुच्यते तु वचनं निरुक्तं तदुवाहृतम्॥

अभिनव-निरुक्त दो प्रकार का होता है-एक सिद्धि जिसे लक्षण की स्वीकृति से सिद्ध किया जाय वह तथ्य है। दूसरा उससे भिन्न अर्थात् अप्रसाधित अतथ्य है। उदाहरण मेरा हो पद्य है, जैसे- "वोरों के लिए उत्सव रूप युद्ध स्थल में मूढ़ व्यक्ति को जिसने किसी प्रकार सत्य पथ पर पहुँचा दिया, वह पहुँचाने वाला कृष्ण (काला) और पहुँचाने वाला अ्जुन (शुक्ल) है। यह प्रसिद्धि मिथ्या हो है।" यहाँ पर आपस में नामों से अन्यत्र सत्यता है और अपने विषय में असत्यता है। यहाँ अर्थ श्लेष भो नहीं है, क्योंकि अर्थ श्लेष तुल्य-संख्यक पदार्थो में होता है। जैसे- "गावो वः पावनानां" यहाँ पर गो शब्द की रश्मि रूप अर्थ और सुरभि रूप अर्थ में अनादि काल से प्रसिद्धि है। यहाँ पर तो एक का दूसरे में सङ्गेत है अर्थात् जो मूढ़ है उसे कृष्ण (काला) होना चाहिए, किन्तु वह अर्जुन (शुक्ल) है और जिसने सत्पथ पर पहुँचाया, उसे अर्जन (शुक्ल) होना चाहिए किन्तु वह कृष्ण (काला) है। इस प्रकार यह तथ्य और अतथ्य का अलग-अलग उदाहरण है। अन्यत्र यह पाठ है- "जहाँ पर पूर्वोक्त अर्थ की सिद्धि के लिए निर्दोष वाक्य का कथन होता है, उस वाक्य को 'निरुक्त' कहा गया है।"

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४०१

*गुणानुवादौ होनानामुत्तमैरुपमाकृतः पूर्वं यत्प्रोक्तो बाह्यस्य संबन्धो कश्चिदर्थस्तस्य प्रसिद्धयेऽ्नवद्यभावस्य वाचकं यदुच्यते तेन निरुक्तमितोऽन्यथा निरर्थकमेवात्र वाच्यं स्पात्। यथा सत्यं स राजा मतिषु रञ्जनादिति ।। १३।। अथ गुणानुवादः गुणानुवाद इति परिमितस्यापादितोत्कृष्टगुणनयोपमा, तत्कृतो गुणाना- मुत्सेकः। यथा- पालिता चौरिवेन्द्रेण त्वया राजन्वसुन्धरा।

पहिले जो बाह्य अर्थ का सम्बन्धी काई वाक्य कह दिया गया है उसकी प्रसिद्धि के लिए निर्दोष भाव का वाचक जो शब्द कहा जाता है। वह निरुक्त है, इससे विपरीत अर्थ निरर्थक हो जायेगा। जैसे-वह सचमुच राजा है क्योंकि वह मति का रञ्जन करता है।। १३ ॥ ९. गुणानुवाद अब गुणानुवाद को कहते हैं- अनुवाद-जहाँ किसी होन की उत्तमों के साथ उपमा अर्थात् सादृश्य बतलाया जाय, उसे 'गुणानुवाद' कहते हैं॥ १४।। (१) अभिनव-गुणों का अनुवाद (अनुकथन) । परिमित वस्तु की उत्पादित (कल्पित ) उस्कृष्ट गुण से उपमा के द्वारा जो गुणों का उत्सेक है, वह 'गुणानुवाद' है। जैसे- "हे राजन् ! जैसे इन्द्र ने द्युलोक का पालन किया उसी प्रकार आप ने वसुन्धरा का पालन किया।" यहाँ पर राजा की इन्द्र से तुलना उसमें गुणों का उत्सेक सिद्ध किया है।

१. क. (टि०) गुणाभिवादो। नोट-पूर्वं पृष्ठ ४०० पर छठी छाइन के यथा-के बाद छूटा हुआ उदाहरण- वत्तानन्दः प्रजानां समुचितसमयाल्किष्टमृष्टैः पयोभि:। पूर्वाह्न विप्रकीर्णा दिशि दिशि विरमत्यह्नि संहारभागः। दीप्तांशो दीघदुःखप्रभावभवभयोदन्वदुत्तारनावो। गावो वः पावनानां परमपरिमिरता प्रीतिमुत्यादयन्तु ॥ (सूर्यशतकात) ना. थ्ा०-११

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४०२ नाटयशाएचे

ननपमेयमलक्कार:, किमतः, उत्तं हालड्वाराणां वैचित्र्यं लक्षणकृतमेव। एत एव शिक्षितैरपि दण्डिप्रभृतिभियॅ निरूपिता उपमाभेवाः, तत्र यो भेदकोंऽशं: आचिख्यासासंश्यनिर्णयादिरर्थ:, स तादृक पृथगलङ्कारतया गणितः। गणनेऽपि वा संसृष्टिसङ्ूरापत्तिः । अर्थमात्रं तदिति चेतु ताहि तदेव लक्षणम् । यथा हि राजता विभज्य विचार्यमाणा इत्थमवतिष्ठते-मकुटाद्यलडूकार:, शौर्यादिगुणो, व्यूढोरस्क- त्वादिलक्षणसमुदायो राजालड्कार्यश्च गुणवांश्च लक्षणीयश्च, तथा काव्यमपि। तेन गुणालङ्कारव्यतिरिक्ता सर्वे लक्षणमिति मन्तव्यम्। अस्त्युत्तस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाविराजः। इति हि पूर्वार्धे आख्यानं नाम लक्षणम्। क नन्वेवं सवंत्र लक्षणयोगः, क आक्षेपार्थः, प्रियमेवास्माकभदः तत्सवंमल- डकारयुक्तं काव्यम्। ननु गौर्वाहीक इति रूपकयोगेऽपि, किं न काव्यं, दोषपरिवज- नगुणवत्त्वरसवत्वादि वैकल्यादिति चेतु अस्मास्वापादितो दोषस्त्वयैवोन्मूलित इत्यास्ताम् । यहाँ प्रश्न उठता है कि यह तो उपमा अलङ्कार है। इस पर कहते हैं कि इससे क्या हुआ ? यह पहिले कहा जा चुका है कि अलङ्कारों का वैचित्र्य लक्षणों के द्वारा हो होता है। यही बात दण्डो आदि आचार्यों ने उपमा के भेद के रूप में निरूपित किया है। उनमें जो भेदक अंश है, वह कहीं पर अचिख्यासा रूप, कहीं पर संश्रय रूप है और कहीं पर निर्णय रूप है, उसी का अलक्धारों से पृथक् लक्ष ण रूप में गणना की गई है अथवा गणना करने पर भी संसृष्टि और सङ्कर की आपत्ति होतो है। यदि यह कहें कि वह तो केवल अर्थमात्र है, तो वही लक्षण हैं। जेसे-राजता (राजा का स्वरूप) का विभाग करके विचार करने पर इस प्रकार की अवस्था होती है-मकुट आदि अलङ्कार है, शौर्य आदि गुण हैं। विशाल वक्षःस्थल होना (व्यूढोरस्कत्व) आदि लक्षण है, राजा अलङ्कार्य है, गुणवान् है और लक्षण-सम्पन्न है, उसी प्रकार काव्य भी गुणवान्, अलङ्करणोय एवं लक्षण-सम्पन्न होते हैं, इस प्रकार गुण एवं अलङ्कारों के अतिरिक्त सभी लक्षण हैं, ऐसा मानना चाहिए। 'अस्त्युत्तरस्यां दिशि वेवतात्मा हिमालयो नाम नगविराजः'। (कुमारसम्भव) के इस पूर्वार्द्ध पद्य में 'व्याख्यान' नामक लक्षण है।

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४०३

अग्यत्र तु पाठ :-

गणातिपातो मधुरैनिष्ठुरैर्वा भवेदिह।। मधुरैर्गोतैः (गुणैः) निष्ठुरैर्धा विविधैरुपमाभूतैरथैयें प्रयोजिता गुणास्तव- भिधानैरुपलक्षितो गुणातिपात इत्यर्थ: ।। १२ ।। गुणानुवादः स ज्ञेयो यत्राभेदोपचारतः। गोणी वृत्तिमुपाध्ित्य वस्तुनो रूपमुच्यते।। अब प्रश्न होता है कि इस प्रकार तो सर्वत्र लक्षण का सम्बन्ध है, इस पर कहते हैं कि हो, आक्षेप करने का क्या अभिप्राय है ? यह तो हमारा प्रिय विषय है। जो अलङ्कारयुक्त है, वह सभी काव्य है। अब प्रश्न यह हैं कि यदि सभी अलङ्कारयुक्त को काव्य मानें तो 'गौर्वाहीकः' में रूपक अलद्कार का योग होने पर काव्य क्यों नहीं मानते ? इस पर कहते हैं कि यहाँ दोष का परिवर्जन, गुण एवं अलङ्कारों का वैकल्य है, अतः जो दोष हमारे ऊपर लगाया जा रहा था, उसका उन्मूलन आपने ही कर दिया। अतः रहने दिया जाय। अन्यत्र तो यह पाठ है- "विविध अर्थों से प्रयोजित मधुर या निष्ठुर विविध गुणों के अभिधान से उपलक्षित 'गुणातिपात' होता है।" अर्थात् मधुर अथवा निष्ठुर गोत तथा विविध उपमानभूत अर्थों से प्रयोजित जो गुण हैं, उनके अभिधान से उपलक्षित 'गुणातिपात' होता है।

करते हैं- इसके अतिरिक्त कुछ अन्य आचार्य गुणानुवाद का लक्षण निम्न प्रकार

"जहाँ पर अभेदोपचार से गौणी वृत्ति का आश्रय लेकर वस्तु के स्वरूप को कहा जाता है उसे 'गुणानुवाद' समझना चाहिए।" १. क. (टि०) गुणानुवादः स ज्ञेयो यत्राभेदोपचरतः । गौणीवृत्तिमुपाश्रित्य वस्तुनो रूपमुच्यते।। इति गुणानुवादलक्षणमन्यः पठितम्। उदाहृतं च शाकुन्तलात- अनाघ्ातं पुष्पं किसळयमलूनं कररुहै- रनाविद्वं रत्वं मणु नवमनास्वादितरसम् । अखण्डपुण्यानां फळमिव च तद्रूपमनधं। न जाने भोकारं कमिह समुपास्यति विधि:।

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Vov नाटयशाहनें

उत्तमार्थविशेषो यः स चाव्यतिशयः स्मृतः ॥१४॥

अथातिशयः उत्तमार्थाद्विशिष्ट इति उक्तादप्यर्थाद्विशेषो। यथा भट्टेन्वुराजस्य- यावन्त्येव पदान्यलोकपिशुनैरालोजनैः शिक्षिता तावन्त्येव कृतागसो द्रुततरं व्याहृत्य पत्यु: पुरः। प्रारब्धं परतो यथा मनसिजस्येच्छा तथा व्तितुं- प्रेम्णो मोग्ध्यविभूषितस्य सहजः कोऽप्येष कान्तः क्रमः। अत्रेर्ष्यात्मा यः प्रेमण्युत्तमेऽर्थस्ततोऽपि विशेष उत्तः प्रतिपदं चाभिप्रायोऽस्ति स विवेचनोयः । न चेयमतिशयोक्ति: संभाव्यमानत्वात्। सोऽपि वा लक्षण नालङ्कार इति वक्ष्यामः समनन्तरमेव।

१०. अतिशय

अब अतिशय नामक लक्षण को कहते हैं- अनुवाद-जो उत्तम अर्थ से विशिष्ट होता है उसे 'अतिशय' नामक लक्षण समझना चाहिए॥। १४ (२) ।। अभिनव-जो उत्तम अर्थ से विशिष्ट अर्थात् उक्त अर्थ से विशेष अर्थ होता है वह 'अतिशय' नामक लक्षण है। जैसे भट्टन्दुराज का यह पद्य- "झूठी चुगली लगाने वाली सखियों ने अपनी भोली सखी के जितने अक्षर सिखाये उसने उतने ही अक्षरों को अपने अपराधी पति के सामने कह दिया। उसके बाद काम की इच्छा के अनुसार रति (सभ्भोग) भी किया। यह तो भोलेपन से विभूषित प्रेम का एक सहज एवं विलक्षण रमणीय क्रम है।" यहाँ पर उत्तम प्रेम में जो ईर्ष्यात्मा अथं हो सकता है उससे भी विशेष कहा गया है और प्रत्येक पद में जो अभिप्राय है वह भो विवेचनीय है। सम्भाव्यमान होने के कारण यहाँ 'अतिशयोक्ति' नहीं है। वह सम्भाव्यमान अर्थ भी लक्षण है, अलङ्कार नहों। इस बात को हम आगे कहेंगे।

१. क, उत्तमार्थाद्विशिष्टो। क. (टि.) उत्तमार्थविशिष्टो। २. अयं क्लोकोऽमरुककाव्येऽपि दृश्यते-

वृत्तिकारवचनप्रामाण्यादयममरुके प्रक्षिप्त इति संभाव्यते। (गायकवाड़ टिप्पण्याम्)

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बहूनां सिद्धोपमानवचनं हेतुरित्यभिसंज्ञितः ॥ १५ ।।

अभ्यत्र तु पठ्यते- बहून् गुणान् कीतयित्वा सामान्यजनसंभवान्। विशेष: कोत्यंते यत्र ज्ञेयः सोडतिशयो बुधैः ॥ इति ॥१३ ॥ अथ सहेतुः बहूनां भाषमाणानामिति। बहून् भाषमाणाननादृत्यैकस्यासाधारणस्याथंस्य निर्णयं कर्तव्यत्वेनावल्व्य सिद्धस्य प्रमितस्योपमानवचनं प्रक्षेपवचनं मम तावदेवं प्रतिभासते इति सहेतुः। यथा भट्टेन्वुराजस्य-

अन्यत्र तो ऐसा पाठ मिलता है- "जव सामान्य जनों में होने वाले बहुत से गुणों का कोर्तन (वखान) करने के बाद जो विशेष गुणों का कथन किया जाता है उसे विद्वानों को अतिशय नामक 'लक्षण' समझने चाहिए।। ११. हेतु अब हेतु को कहते हैं- अनुबाद-बहुत से बोलने वाले व्यक्तियों के कथन से एक असाधारण अर्थ का निर्णय होने से सिद्ध के उपमानभूत वचन का कथन 'हेतु' नामक लक्षण कहलाता है॥ १४॥ अभिनव-बहुत से बोलने वालों का अनादर कर किसो एक असाधारण अर्थ का निर्णय का कर्त्तव्य रूप से अवलम्बन करके सिद्ध के प्रमाणभूत उपमान का प्रक्षेपण 'मुझे ऐसा प्रतिभात होता है' को 'हेतु' कहते हैं। जैसे भट्टेन्दुराज का इ्लोक- १. क. स्वेकस्यार्थविनिर्णयम्। क. (टि०) अनेकार्थविनिश्चयः । अनेकार्यविनिर्णयात्।

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४०ई नाटयस्ाएथे

अपदेशस्तु परोक्षो यस्मावुत्पद्यतेऽनुकरणेन। लक्षणसमानकरणात् सारूप्यं तत्तु निदेध्यम्॥१५॥ एके वारिनिधिप्रवेशमपरे लोकान्तरालोकनं केचित्पावकयोगिनं निजगदुः क्षीणेडह्नि चन्द्राचिषाम्। मिथ्या चैतदसाक्षिकं प्रियसखि! प्रत्यक्षतीवातपो मन्येऽहं पुनरध्वनीनरमणीचेतोऽधिशेते रविः॥ एकस्येति। एकमसाधारणम्। सिद्धोपमानेति। डुमिज् प्रक्षेपणे इत्यस्योप- मानम्। अन्यत्र पाठ: - यत्प्रयोजनसामर्थ्याद्वाक्यं शिष्टार्थसाधनम्। समासोक्तं मनोग्राहि स हेतुरिति संज्ञितः ॥ इति । सम्यगस्यते हृदि क्षिप्यते येन स समासः उपपत्तिस्तयोक्तम् ॥१४॥ "दिन के क्षीण होने पर चन्द्रमा की किरणों का समुद्र में प्रवेश हो जाता है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं। अन्य लोग कहते हैं कि लोकान्तर में उनका आलोकन होता है, कुछ लोग अग्नि से योग होता है, ऐसा कहते हैं, किन्तु हे सखि ! ये सब झूठ हैं, क्योंकि इनका कोई साक्षो नहीं है। प्रत्यक्ष में इसका जो तोब्र अनुभव किया जा रहा है उससे तो मैं मानतो हूँ कि पथिकों के विरह से संतप्त वियोगिनो नारियों के चित्त में सोया हुआ सूर्य है चन्द्रमा नहीं।" एकस्या अर्थात् एक असाधारण। सिद्धोपमान का अर्थ है सिद्ध उपमान प्रक्षेपण। 'डुमित्र' प्रक्षेपणे धातु से उपमान शब्द बनता है। अन्यत्र निम्नलिखित पाठ है- "जो बाक्य प्रयोजन के सामर्थ्यं से शिष्ट अर्थ का साधन हो, उपपत्ति से कहा गया हो और मनोग्राही हो, उसे 'हेतु' संज्ञक लक्षण कहते हैं।" जिसके द्वारा कोई अर्थ हृदय में सम्यक् प्रकार से क्षिप्त हो वह समास है। उससे कहा हुआ अर्थ समासोक्त है। यहाँ समास का अर्थ 'उपपत्ति' है ॥ १४॥ १. क. (टि०) अपदेशेन परोक्षो योऽर्थों ह्य पपद्ते। २. क. (टि०) लक्षणसमानयोगात् । ३. क. (टि०) निदेध्यम्।

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चोडशोऽध्याथः ४०७

अथ सारूप्यम् अपदेशस्तु परोक्षो यस्मादुत्पद्यतेऽनुकरणेनेति। यथा ममेव-

यत्प्राच्यां विशि वक्रिमास्पदमिदं दृग्द्वन्द्वलेह्यां महः। तत्तेजो जरठांशुतां कलयसा भाविप्रवासावधि सन्ध्यामुग्धवधूकपोलफलके कोर्णो नखाग्राङूर:॥ अत्र यदिति निर्देश्यं परोक्षवस्तु तत्त्वस्यापरिज्ञानात। अनुकरणेन प्रच्छाय- मात्रेण अपदेश्यमालोच्यमिति लक्षणेन सैन्दूरीकृतेत्याविना समानं सप्रमाणकं करणं दर्शनक्रिया यस्य तादृशे वस्तुनि सारूप्यं लक्षणम्। पौणंमास्यामपि वक्ररेखेवेन्दो- र्भागो लक्ष्यते उकयाचलान्तरितत्वात् सन्ध्यासमये। न चेयमुपमा उपमेयस्याभावा- दुपमेयमेव हि पूर्वार्धेन लिंग्यते।

१२. सारूप्य अब सारूप्य को कहते हैं- अनुवाद-अनुकरण के द्वारा जिससे परोक्ष का उपवेश (बहाना) उत्पन्न होता है, लक्षणों के समान कर देने से उसे 'सारूप्य' कहा जाता है॥१५॥ अभिनव-अनुकरण से उत्पन्न होने के कारण अपदेश परोक्ष है जैसे मेरा (अभिनवगुप्त का ) यह श्लोक - "जो पूर्व दिशा में वक्रता का आस्पद अर्थात् टेढ़ा एवं दोनों नेत्रों से लेह्य (देखने योग्य) सिन्दूर स्वरूप गाढ़े कुङकुम रस के सदृश यह दिखाई दे रहा है वह उस तेज की जरठांशुता की भावी अवधि को सूचना देने वाले विधाता ने सन्ध्यारूपी मुग्धवधू के कपोल पर अद्ित नखाङ्कूर है।" "यहाँ पर तत्त्व का परिज्ञान न होने से 'यत्' पद से निर्देश्य वस्तु परोक्ष है। अनुकरण से अर्थात् छायामात्र से अपदेश्य अर्थात् आलोच्य है। सैन्दूरीकृत इश्यादि के द्वारा जिसकी दर्शन-क्रिया समान सप्रमाण वस्तु है उस वस्तु में 'सारूप्य' लक्षण है। पूर्णमासी की रात में भी उदयाचल से अन्तरित हो जाने के कारण चन्द्रमा भाग वक्र रेखा के समान दिखाई दे रहा है। यहाँ पर उपमा अलङ्कार नहीं है, क्योंकि उपमेय को सूचित किया जाना प्राप्त होता है।

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नाट्यशालचे

अभूतपू्वे यंत्रार्थस्तुल्यस्यार्थस्य निर्णयः । स मिथ्याध्यवसायस्तु प्रोच्यते काव्यलक्षणम् ॥ १६ ॥

पुस्तकान्तरेषु तु पाठ :- यथादेशं यथाकालं यथारूपं च वर्ण्यते। यत्प्रत्यक्षं परोक्षं वा दृष्टं तद्वर्णतोऽपि च॥ इति। प्रत्यक्षं वस्तु परोक्षमिव देशकालरूपानुसारेण वण्घते ॥१५॥ अथ मिथ्याध्यवसायः

वव्तृध्यापारे सति निश्चय: सोडयम्। यथा ममैव- यो दुर्जनाटाछतसिद्धिमीहते स नूनमुत्क्रामति तं सुखैधिनम्। जुह्म ज्ज्वलाग्नौ विगतार्थमण्डलं प्रसह्य षष्ठं विषयं प्रसाधयेत्। काव्यलक्षणमित्यनेन काव्येषु लोकविपर्यासबाहुल्यमवश्यं भवतीति वर्शयति।

अन्य पुस्तकों में यह पाठ है- "जहाँ पर देश, काल और रूप के अनुसार वर्णतः दृष्ट प्रत्यक्ष वस्तु का परोक्ष की तरह वर्णन किया जाता है, वहाँ सारूप्य है।" जहाँ पर देश, काल और रूप के अनुसार प्रत्यक्ष वस्तु का परोक्ष के समान वणंन किया जाता है। वहाँ सारूप्य लक्षण होता है॥ १५॥ १३. मिथ्याध्यवसाय अब मिथ्याध्यवसाय को कहते हैं- अनुवाद-जहाँ पर अभूतपूर्व अर्थो द्वारा तत्सदृश (तुल्य) अर्थ का निणंय किया जाता है, उसे 'मिथ्याध्यवसाय' नामक काव्य लक्षण कहा जाता है॥ १६॥ अभिनव-अपारमर्थिक अर्थों के द्वारा तत्तल्य अवस्तुभूत जिस अर्थान्तर का वक्ता का व्यापार होने पर निश्चय होना मिथ्याध्यवसाय है। जैसे-मेरा ही पद्य- "जो दुर्जन पुरुष से अभिलषित अर्थ को सिद्धि चाहता है वह अबश्य ही उस बढ़ने वाले सुख का उल्लंघन करता है और अग्नि में हवन करता हुआ बलात् अर्थ-रहित षष्ठ विषय को सिद्ध करना चाहता है।" १. क. (हि०) अभूतगवें यत्रार्थे तुश्यस्यार्थक्य निर्णयः।

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४०९

`बहूनां तु प्रधानानां मध्ये यन्माम कोस्यते। एकार्थसाधनकृतं सा सिद्धिरिति कीर्त्यते ॥१७॥

अन्ये तु पठन्ति- विचारस्यान्यथाभावस्तथा दृष्टापदृष्टयोः । सन्देहास्कल्प्यते यत्र स विक्षेपो विपर्ययः॥ विचायत इति विचारोऽर्थ: अदृष्टमित्यर्थः । संवेहोऽत्र भ्रमः, अन्यथाभावो विपर्ययः । अथवा संशयोऽपि हि वस्तुतो विषयतत्त्वमन्यथाकारं दर्शयन् विपर्यय एव ॥ १६ ॥

काव्य लक्षण ऐसा कहने का अभिप्राय है कि काव्यों में लोक का विपर्यास अवश्य और अधिक होता है, यह दिखाया गया है। अन्य लोग तो ऐसा कहते हैं- "विचार का अन्यथा भाव तथा दृष्ट और अदृष्ट अर्थों में सन्देह के कारण जहाँ पर विशेष की कल्पना की जाती है, वह 'विपर्यय' कहलाता है। जिसका विचार किया जाय, वह विचार अर्थ है अदृष्ट है। यहाँ पर सन्देह का अर्थ भ्रम है और अन्यथाभाव विपर्यय का वाचक है। अथवा संशय भी वस्तुतः विषय तत्त्व का अन्यथाभाव प्रदर्शित करने के कारण 'विपयय' ही है ॥ १६ ॥ १४. सिद्धि

अब सिद्धि को कहते हैं- अनुवाद-जहाँ पर बहुत से प्रधान (प्रसिद्ध) पदार्थों के मध्य एक अर्थ साधन करने वाले जिस नाम का कथन करते हैं उसे 'सिद्धि' कहते हैं ॥ १७ ॥

१. ख. बहूनां च प्रयुक्तानां नाम यत्राभिकीत्यते। अभिप्रेतार्थसिद्धचर्थ सा सिद्धिरभिधीयते। २. क. (टि०) कृता। ३. क. (टि०) कीचिंता। ना. पा०-१२

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४१० नाटयसास्थ्र

गुर्णैबंहुभिरेकाथै: पदैय: सम्प्रशस्यते पवोच्चयं तु तं विद्यान्नानार्थग्रथनात्मकम् ॥१८॥ अथ सिद्धि: बहूनां च प्रधानानामिति। प्रसिद्धानां मध्ये एकमित्यप्रसिद्धं यन्नाम कीत्यंते तस्यासाधारणत्वस्य प्रयोजनस्य संपत्तये करणं तत्र निवेशनं यस्य तादृक् तत्कीर्त्तनं सिद्धिहेतुत्वात्सिद्धिः। यथा- भद्रेश्वरः सुरसरित्स भवानहं च त्रैलोक्यसारमिह संप्रति जीवलोके। अद्रेश्वरः सुरवरेषु सरित्सु गङ्गा त्वं पार्यिवेष्वहमतीव सुदुःखितेषु।। अत्र भवानहं चेत्यप्रसिद्धमध्ये उपात्तमसाधारण्यसिद्धि विधत्ते ॥ १७॥

अभिनव-बहुत से प्रसिद्ध पदार्थों के मध्य किसी एक अप्रसिद्ध नाम को कहते हैं वह उस अप्रसिद्ध की असाधारण सम्पत्ति के लिए कहते हैं। अतः उसमें जिसका निवेश करके कहते हैं वह कथन सिद्धि का हेतु होने से 'सिद्धि' है। जैसे- "भद्रेश्वर, सुरनदी (गङ्गा), आप और हम सम्प्रति इस जीवलोक में त्रिलोको के सारभूत हैं। देवताओं में भद्रेश्वर, नदियों में गङ्गा, राजाओं में आप और दुःखियों में मैं।" यहाँ 'आप' और 'मैं' इन अप्रसिद्धों का प्रसिद्धों के मध्य में उपादान आसा- धारण्य की सिद्धि का विधान करता है ॥ १७ ॥ १५. पदोच्चय अब पदोच्चय का निरूपण करते हैं- अनुवाद-बहुत से गुणों के द्वारा जहाँ एकार्थक पदों से प्रशंसा की जाती है, नानार्थ प्रथनात्मक उस लक्षण को 'पदोच्चय' कहते है॥१८ ॥

१. क. ग्रथितार्थंकम्।

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बोडशोउध्याय: ४११

आत्मभावमुपन्यस्य परसादृश्ययुक्तिभि:। तीव्रार्थभाषणं यत् स्यादाक्रन्द्रः स तु कीतितः॥ १९। अथ पदोच्चय: गुणैबंहुभिरेकार्थेरिति। एकता एकतात्पर्यार्थनिष्ठैबंहुभिः शब्दैयें वाच्यर्वेन स्वोकृता धर्मास्तदुपलक्षितत्वेनैव यद्वस्तुनः प्रशंसनम्। कथ नानार्थग्रथितात्मकमुप- लम्भितरूपं कृत्वा तत्पदानामुच्चय उत्कषणं चयः बाहुल्यं यत्रति पदोच्चयः। असारं संसारं परिमुषितरत्नं त्रिभुवनं निरालोकं लोकं जननयननिर्माणमफलम्। अदप कन्दप मरणशरणं बान्घवजनं जगज्जीर्णारण्यं कथमसि विधातुं व्यवसितः।। अत्र ह्यवान्तरावगमकारिणामवान्तरवाक्यरूपाणां पदानां तात्पर्यमभिन्नं स्वार्थस्तु भिन्नः । पदोच्चये पदशब्दार्थस्त पादो भाग इति। अन्ये पठन्ति- पू्वंत एवार्थ: ।। १८ ।। अभिनव-एक तात्पर्य विषयीभूत अर्थों के प्रतिपादक बहुत से शब्दों के वाच्य रूप में स्वोकृत जो धर्म है उतना उपलक्षण रूप जो वस्तु का प्रशंसन है वह कैसे ? कहते हैं कि नाना अर्थों से ग्रथित उपलम्भित रूप में करके उन पदों का उच्चय अर्थात् उत्कर्ष रूप में चय बाहुल्येन जहाँ हो वह पदोच्चय है। जैसे- "संसार को असार, त्रिभुवन को रतनरहित, लोक को प्रकाशहोन, जनता के नेत्रों के निर्माण को निष्फल, कामदेव के दर्प से विकल, बन्धुजनों के मरण की शरण और जगत् को जोर्ण अरण्य बनाने के लिए ऐसा व्यवसाय क्यों कर रहे हो ?" यहाँ पर अवान्तर अर्थों के बोधक अवान्तर वाक्य रूप पदों का तात्पर्य अभिन्न है, एक है, किन्तु उन पदों का अपना वाच्य अर्थ भिन्न-भिन्न है। यहां पदोच्चय में पद का अर्थ पाद है, भाग है। अन्य लोग कहते हैं कि प्रारम्भ से हो जो अर्थ है वही अर्थ अन्त तक चलना एकार्थताल्पर्यक होता है ॥ १८॥ १६. आक्रन्द अब आक्रन्द का लक्षण करते हैं- अनुवाद-जहाँ दूसरों से सादृश्य रखने वाली युक्तियों से अपने भाव का उपभ्यास कर तोब्र अर्थ का भाषण किया जाता है। उसे 'आक्रन्द' कहा गया है॥। १९ ॥

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नाटपेश्ार्न्रे

अथाक्रन्दः आत्मभावमुपन्यस्येति। तीव्रः साक्षादवाच्यो योऽथंस्तस्य परं प्रति सावृश्य- योजनप्रकारैरात्माभिप्रायं प्रमुखे वत्त्वा तत्समन्ततः भाषणं स्फुटकथनं तन्निजभावा. विष्करणप्रधानत्वादाक्न्दो नाम लक्षणम्। यथा ममैव- कि पान्थ ! त्वरसे विलोकय निशा या ह्य ममुखी पाण्डुरा चन्द्रं चुम्बितुमीहते प्रकटयन्त्यग्रे सरागां स्थितिम्। यद्वा नागरभोगदुर्ललितकैर्म्यस्तापि न ज्ञायते। ग्रामेऽग्राम्यजनोपभोगसुभगं निर्व्याजरम्यं सुखम्॥ अत्रोत्तरेणार्धेन ग्रामीणो रम्यतभो भोजनशयनादिसंभोग इति वक्या मोह- प्रायोऽवाच्य आत्माभिप्रायः । तदरोचकरोचकमुभयं प्रमुखे निधाय निशाकर- वृत्ताम्तसादृश्येन तोव्रः स्वात्मानुराग आविष्कृतः।

अभिनव-जो अर्थ के तीव्र (कठोर) होने से साक्षात् अवाच्य है, उसे दूसरे के प्रति सादृश्य के संयोजन के द्वारा अपने अभिप्राय को दूसरे के प्रति रखकर फिर उसका जो स्फुट कथन है उससे अपने भाव के आविष्करण की प्रधानता होने से उसे 'आक्रन्द' नामक लक्षण कहते हैं। जैसे-मेरा (अभिनवगुप्त का ही) यह पद्य है- "हे पथिक ! क्यों इतनी शोघ्रता कर रहे हो। इस दिशा को देखो जो उन्मुखी पति को प्रतीक्षा में ऊपर मुख किये हुए और विरह से पाण्डुर (पीली) हो गई है, जो पहिले हो रागमयो स्थिति को प्रकट करती हुई चन्द्र का चुम्बन करना चाहती है। अथवा नागरों के भोग के दुलारों के द्वारा उपेक्षित कर दी गई, यह बह नहीं जानती, किन्तु ग्राम में भी नागरजनों के उपभोग सुभग निर्व्यांज रमणोय सुख है।" यहाँ उत्तरार्द्ध में ग्रामीण भोजन, शयन आदि सम्भोग अतोव रमणीय है। इस प्रकार के अपने मोहक अभिप्राय को नायिका नहीं कर सकती। अतः अरोचक एवं राचक दोनों तत्त्वों को प्रमुख में रखकर चन्द्रमा के वृत्तान्त के सादृश्य से अपने तीब्र अभिप्राय को प्रकट कर दिया।

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बोडशोऽ्याय: ४११

हृवयस्पस्य भावल्य सुरपष्टार्थप्रवर्शनम् । *अन्यापदेशकथनैमनोरथ इति स्मृतः ॥ २० ॥

अन्ये पठन्ति- रूपकैरुपमाभिर्वा तुल्यार्थः सुप्रयोजितैः। अप्रत्यक्षार्थसंस्पर्शस्तुल्यतरक प्रकोतित: ॥

नेत्यथं:।। १९।। प्रथमार्धेन परसादृश्यमुक्तम्। अप्रत्यक्षस्यात्मभावस्य संस्पर्शना ज्ञाप-

अथ मनोरथ: हृवयस्थस्य भावस्येति। यथा- णिग्गंध दुरारोहिं पुत्तअ (मा) पार्डललि समारूढ। आरूढणिपडिमा के इमि ए ण कमा इह गगामो। (निर्गन्धदुरारोहां पुत्रक ! पाटलीं मा समारोह। आरूढनिपतिता: केऽनया न कृता इह ग्रामे ॥ (इति छाया) (गाथासप्तशती ५।६८ )

अन्य लोग ऐसा पाठ मानते है। इसे 'तुल्यतक' कहते हैं- "अच्छी तरह प्रयुक्त किये गये तुल्यार्थक रूपक अथवा उपमा के द्वारा अप्रत्यक्ष अर्थ का संस्पर्श 'तुल्यतर्क' कहलाता है।" यहाँ पर पूर्वा्द्ध में परसादृश्य का कहा गया है और उत्तरार्द्ध से अप्रत्यक्ष अपने भाव को संस्पर्शना ज्ञापना को है ॥ १९ ॥ १७. मनोरथ अब मनोरथ को कहते हैं- अनुवाद-अन्य वस्तु के व्याज के कथन के द्वारा हृवयस्थ भावों का परिमाजित युक्तियों से प्रवशन करना 'मनोरथ' है॥ २०॥ जैसे- अभिनव-हे अबोध बालक! गन्ध शून्य एवं दुरारोह इस पाटली पर आरोहण मत करो। क्योंकि इस ग्राम में इसने किसे ऊपर उठाकर नीचे नहीं गिराया।

१. क. (हि०) सुश्रिष्टायंप्रकाशकम्। सुश्लिष्टार्थप्रद्शकम् । २. क. (टि०) अन्यापदेश कथनं।

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४१४ अपृष्टैरथवा पृष्टेनिणयः क्रियते तु यः। आख्यानमिति तज्ज्ञेयं लक्षणं नाटकाश्रयम् ॥ २१॥ अत्र पादपमारोहन्नेव कश्चिद् दुराशयपुंश्चली सङ्गमोत्सुकः वृद्धविदग्धया स्वाभिप्रायद्योतनेन प्रबोध्यते, तत्प्रस्तुतमेवान्यदर्पदिश्य। अत एवाप्रस्तुप्रशंसा, सापि चात्रवान्तभूंता। नन्वलङ्गारे ह्यालंकार्यत्वं ह्यासत् इति केयं युक्ति, लक्षणं तु भवति लक्षणत्वादेव॥ २० ॥ अथाखयानं पृष्टैरपृष्टैरपि चेत्यादि। प्रश्नपूर्वका यत्र बहवो निर्णीयन्ते यथा- बाले ! नाथ ! विमुञ्च मानिनि ! रुषं, रोषान्मया किं कृतं। खेवोडस्मासु न मेऽपराध्यति भवान् सर्वडपराधा मयि। तत्कि रोदिषि गद्गदेन वचसा कस्याग्रतो रुद्यते। नन्वेतन्मम का तवास्मि दथिता ? नास्मीत्यतो रुद्यते ।। (अमरुशतकस्य) यहाँ पर वृक्ष पर चढ़ने के व्याज से दुष्ट आशय वाली पुंश्चली के साथ समागम के लिए उत्सुक किसी को कोई वृद्ध विदग्धा अपने अभिप्राय के प्रकाशन कर समझा रहो है। वह अन्य के अपदेश से प्रस्तुत हो है, अतः यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा है। वह भी यहीं पर अन्यादेश के अन्तर्गत है। क्योंकि अलङ्कार में अलङ्कायंत्व असत् है, यह कौन सो युक्ति है। यहाँ लक्षणीय होने से लक्षण ही है ॥ २०॥ १८. आख्यान अब आख्यान को कहते हैं- अनुवाद-जो पृष्ठ (पूछे गये) अथवा अपृष्ट (बिना पूछे गये ) किसी बात का निर्णय किया जाय उसे नाटक सम्बन्धी 'आख्यान' नामक लक्षण समझना चाहिए। २१॥ अभिनव-जहाँ पर प्रश्नपूर्वक बहुत से पदार्थो का निर्णय किया जाता है। जैसे- "हे बाले! (नायिका) हे नाथ ! (नायक) हे मनिनि ! क्रोध छोड़ दो। (नायिका) तुम्हारे ऊपर क्रोध करके मैंने क्या किया। (नायक मुझे खेद (कष्ट) हुआ। (नायिका) आपने मेरा क्या बिगाड़ा है। सारा दोष तो मेरा है। (नायक) १. क. पुष्टैरपृष्टैरथवा।

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षोडशोडव्याय: ४१५

इत्यादावुत्तिप्रत्युक्त्ौ, प्रश्नसदृशैर्वा शक्याशक्यवस्त्वभिधानैयंत्र निर्णयः। यथा- रामोऽसौ भुवनेषु विक्रमगुणैर्यातः प्रसिद्धि पराम्। इत्युक्ते यदि प्रसिद्धः कथं मया न ज्ञायत इत्याशंक्याख्यातं- अस्मद्द्ाग्यविपयंयाद्यदि परं देवो न जानाति तम्। किं तस्य प्रसिद्धौ निदानमित्याशंक्य पुनराख्यातं- वन्दीवैष य्शासि गायत मव्दयस्येकबाणाहति- श्रेणीभूतविशालसालविवरोत्कीर्णस्वरैः सप्तभिः ॥ ( राघवानन्दे) नाटकाशयमित्यनेन भूयो लक्ष्यमाणस्येत्याह। तब रँधे कण्ठ से रो क्यों रही हो ? (नायिका) किसके सामने रो रही हूँ? (नायक) यह मेरे सामने रो रही हो। (नायिका) मैं तुम्हारी कौन हूँ ? (नायक) तु मेरी प्राणप्रिया हो। (नायिका) तुम्हारी प्राणप्रिया नहीं हूँ, इसलिए रो रही हूँ।" यहाँ पर उक्ति-प्रत्युक्ति के प्रश्नों द्वारा निर्णय किया गया है। यहाँ पर प्रश्न किये विना ही प्रश्न सदृश वाक्यों द्वारा शक्य और अशक्य वस्तुओं के कथन से निर्णय होता है। जैसे- "यह राम है, जो अपने पराक्रम के गुणों से लोक में अत्यन्त प्रसिद्ध है।" ऐसा कहने पर यदि राम इतने प्रसिद्ध हैं तो मैंने केसे नहीं जाना ? इस प्रकार आशङ्का करके पुनः कहते हैं कि-"भाग्य के विपरीत हो जाने के कारण आप उन्हें नहीं जानते हैं।" उस राम ने प्रसिद्ध होने का क्या कारण है ? इस प्रकार आशङ्का करके पुनः कहते हैं कि- "जिसके एक बाण के प्रहार से पंक्तिबद् विशाल ताल के वृक्षों के सात छिद्रों से निकले हुए सात स्वरों से वायुगण (भाँट, चरण) के समान जिस राम के यश का गान करता है।" 'यह नाटकाञ्चित आख्यान हैं', अतः बार-बार प्रयोग के योग्य है, यह कहते हैं।

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४१६ नाटयशाल्ने

आवौ यत् क्रोधजननमन्ते हर्षप्रवर्धनम्। यत्तु प्रियं पुनर्वाक्यं सा याच्जा परिकीतिता।।२२॥

अभ्ये पठन्ति- वाक्यैः सातिशयैयंक्ता वाक्यार्थस्य प्रसाधकैः। लोकप्रसिद्धैर्बहुभिः प्रसिद्धिरिति कीतिता॥ स्पष्टम् ॥ २१॥ अथ याच्जा आदौ यत्क्रोधजननमिति। प्रथमाधेन हित व्यास्यातम्। तेन प्रथमं यत्तदात्वे परुषमायत्या च सत्फलं वस्तूच्यते, ततश्च प्रियम्। पुनः शब्दात्ततो हतं पुनः प्रियमित्येवं प्रबोध्यस्य प्रबोधनधिया याचनाद्याच्ा। यथा ममैव-

अन्य आचार्य कहते हैं- "वाक्यार्थ के प्रसाधक लोकप्रसिद्ध अतिशायपूर्ण वाक्यों से युक्त प्रसिद्धि है, ऐसा कहा गया है।"।। २१।। १९. याच्जा अब याच्ना का लक्षण करते हैं- अनुवाद-प्रारम्भ में जो क्रोध का जनक है तथा अन्त में हर्षं का प्रबधक जो प्रिय-वचन है उसे 'याच्जा' कहते हैं॥। २२॥। अभिनव-'प्रारम्भ में जो क्रोध का जनक है' इस श्लोक के प्रथमार्द द्वारा हित का व्याख्यान किया गया है। इससे यह सिद्ध होता है। प्रथम अर्थात् उस काल में वह परुष होता है किन्तु परिणाम (उत्तर काल) में वह वस्तु सत् फलवाली होतो है, अतः वह प्रिय है। तथा वह हितकारो होने से भी प्रिय है। इस प्रकार समझाने की बुद्धि से प्रबोधनोय को याच्जा करना 'याच्ता' है। जैसे मेरा (अभिनबगुप्त का) यह श्लोक है-

१. क. आवो च क्रोषजं नित्यं। २. क. (टि०) यत्र । ३. क. (टि०) याच्लाया लक्षणमन्यैः पठितं- लाभोपपत्तिमाख्याय स्वयं दूतमुखेन वा। प्राथ्यते वत्कम्याया सा याच्त्रेत्यभिधीयते।। इति। अत्र कन्याया एव याच्ला एव याच्लालक्षणस्यैकदेशित्वमिति। वृत्तिकारपाठः स्वीकृतोऽन्यैः। सोऽपि प्रियाक्यलक्षणनिवचनस्य संवांद्ेय। अतएव कश्चित् प्रियलक्षणं पाठान्तरेण छक्षितम्।

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४१०

कायेषु विपरीतेषु यदि 'कश्चित् प्रवर्तते। निवार्यते च कार्यज्ञैः प्रतिषेधः प्रकीतितः ॥ २३ ॥

भूमि: कण्टकिनी, पुरो विटपिनः प्रायो बहुपद्रवाः भूयश्चैव दिवाकरो मृगयते सन्ध्याङ्गनासङ्गमम्। तद्विअम्य जनोऽयमत्र सदने प्राम्योचितं सेवतां प्रातः पान्थ ! विचायं चेतसि चिरं स्थातासि गन्तासि वा॥। पाठान्तरं तु-

क्रियते वाक्यचेष्टाभिस्तद्दाक्षिण्यमुदाहृतम् ।। इति ॥२२॥ हितैः प्रसम्नवचनैयत्परस्यानुवर्तनम्।

"यह भूमि कण्टकाकीर्ण है, प्रायः सामने वाले वृक्षों में बहुत से उपद्रव हैं, इधर यह सूर्य भी अपनी सन्ध्या-वधू के साथ मिलने के लिए खोज रहा है। अतः हे पथिक! इस समय इस घर में विश्राम करके ग्राम्योचित क्रिया का उपभोग कीजिये और प्रातः चित्त में विचार करना कि जाना है अथवा ठहरना है।" इसका अन्य पाठ भी मिलता है, इसमें उसे 'दाक्षिण्य' कहा गया है। "हितकारी प्रसन्नतापूर्ण वचनों और तदनुकूल चेष्टाओं के द्वारा जो दूसरे का अनुसरण करना है, उसे 'दाक्षिण्य' कहते हैं।" विमर्श-अन्य आचार्य 'याच्ा' का लक्षण इस प्रकार पढ़ते हैं- "जहाँ पर स्वयं अथवा दूत के द्वारा लाभ की सम्भावना को दिखलाकर (कहकर) किसी कन्या के लिए प्रार्थना को जाय उसे 'याच्जा' कहते हैं।" यहाँ पर केवल कन्या के लिए ही याचमा करना एकदेशी है, यह वृत्तिकार का पाठ है, ऐसा कुछ आचार्य मानते है। और कुछ अन्य आचा्य प्रियवचन होने से 'प्रियोकि' नामक लक्षण का पाठान्तर मानते हैं ।। २२॥

२०. प्रतिषेध अभिनव-'कार्येषु विपरीतेषु' इत्यादि के द्वारा प्रतिषेध नामक लक्षण का निरूपण करते हैं। अनुवाद-यदि कोई विपरीत कार्य में प्रवृत्त होता है। कार्य के विशेषज्ञ लोग उससे जो रोकते हैं, उसे 'प्रतिषेध' नामक लक्षण कहते हैं ॥। २३ ॥

१. क. कन्चित्। ना. था०-१३

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४१८ नाव्यसाह्ने

अथ प्रतिषेध: कायेषु विपरीतेष्विति। यथा अमरुकस्य- लग्ना नांशुकपल्लवे, भुजलता न द्वारदेशेडपिता नो वा पादयुगे तया निपतितं तिष्ठेति नोक्तं वचः। काले केवलमम्बुदालिमलिने गन्तुं प्रवृत्तः शठः तन्थ्या वाष्पजलोपकल्पितनवीपूरेण रुद्: प्रियः॥ अत्र तृतीयपादेन विपरीतकार्यप्रवृत्तिरुक्ता। आद्यार्धेन कार्याज्ञत्वं नायिकाया: तथापि निवारणं तुयंपादेनोक्तम्। अन्ये त्वधीयते- यट्टावयं वाक्यकुशलैरुपायेनाभिधीयते। सदृशार्याभिनिष्पत्त्या: स लेश इति कीतितः॥ इति ॥ वाक्यममिति वाक्यार्थो विधिर्वा निषेधो वा। नवीपूरश्च वर्षासु रोधको इष्ट इति सदृशाभिधानेनोपायेन निषेघ: कृतः ॥२३॥ जैसे, अमरुक के इस श्लोक में- "वह शठ नायक मेघों से मलिन अर्थात् वर्षा के समय जब परदेश जाने के लिए तैयार हुआ तो उसे रोकने के लिए नायिका ने न तो उसके कपड़े को पकड़ा, न तो द्वार देश पर (दरवाजे में ) अर्गला की तरह हाथ को फेलाया, न उसके चरणों पर गिरी और न उसे ठहरने के लिए कुछ कहा, बल्कि वह विरह में रोने लगो और रोने से इतना आंसू बहाया कि आँसुओं की नदी बहने लगी, जिसके प्रवाह से उसका मार्ग अवरुद्ध हो गया और वह नहीं जा सका।" यहाँ पर तृतीय पाद में नायक के विपरीत कार्य में प्रवृत्ति कहो गई है और शलोक के अर्ध भाग से नायिका को कार्य कुशलता की। यद्यपि प्रारम्भ में नायिका की 'किकर्त्तव्यविमूढ़ता' परिलक्षित होती है किन्तु अन्त में चतुर्थपाद से प्रिय की यात्रा का निवारण कहा गया। अतः यहाँ 'प्रतिषेध' लक्षण है। अन्य आचार्य इसे 'लेश' नाम से अभिहित करते हैं- "जहाँ पर वाक्य-विशेषज्ञ (बोलने में चतुर) लोगों के द्वारा उपाय के (चतुराई से) सदृश अर्थ को अभिव्यक्ति के द्वारा जो वचन (वाक्य) कहा जाता है, उसे 'लेश' कहते हैं।" यहाँ पर वाक्य का तात्पर्य वाक्यार्थ है। वह वाक्यार्थं विधि रूप हो अथवा निषेध रूप ही। नदी का प्रवाह वर्षा में रुकावट डालने वाला देखा गया है। अतः नायक के यात्रा-भङ्ग के सदृशकथनरूप उपाय से निषेध कर दिया गया है।

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परम्। `पृच्छन्निवाभिघत्तेऽयं सा पृच्छेश्यभिसंज्ञिता ॥२४।। अथ पृच्छा

किं भीमाद गुरुदक्षिणां गुरुगवांड्गोभप्रियः प्राप्तवान् राजा दुश्शासनावेगुठुरनुजशतस्याङ्गराजस्य मित्रम्। कृष्णकेशोत्तरोयव्यपयनपट्: पाण्डवा यस्य दासा: कवास्ते दुर्योधनोऽसौ कथयत न रुषा द्रष्दुमम्यागतौ स्वः।। (वेणोसंहारे) अत्राकारेणाभिप्रायसूचकेन काव्वादिनोद् भूतानि द्योतितशक्तिकानि वाक्यानोति भावः । यत्र भावरसोपेतैरित्यन्ये प्राच्यं पादमधीयते ॥ २४॥ २१. पृच्छा इसके बाद 'यत्राकारोद्गवेर्वाक्येः' इत्यादि के द्वारा 'पृच्छा' को कहते हैं- अनुवाद-जहाँ पर गूढ़ अभिन्रायों के सूचक वाक्यों के द्वारा अपने को अथवा दूसरे को पूछते हुए किसी अर्थ का कथन किया जाता है, उसे 'पृच्छा' कहते हैं॥ २४॥ अभिनव-अब पृच्छा को कहते हैं। जैसे- "क्या उस भीमप्रिय ने महान् गदा को धारण करने वाले भोम से गुरु दक्षिणा प्राप्त कर ली ? दुःशासन आदि सौ भाइयों में ज्येष्ठ और अब्बराज कर्ण का मित्र, द्रौपदी के केश एवं वस्त्र खोंचने में पटु, पाण्डव जिसके दास थे, बताओ वह दुर्योधन कहाँ है ? हम क्रोध से नहीं, बल्कि देखने के लिए ाये हैं।" यहाँ पर आकार और अभिप्राय के सूचक काकु आदि से उद्धृत शक्ति के पद्योतक वाक्य होने से 'पृच्छा' है। कुछ आचार्य यहाँ पर 'यत्र भावरसोपेतम्' पाठ -मानते हैं॥ २४ ॥ १. क. (टि०) पुण्छस्यभिवेवाथं।

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विद्वान् पूर्वोपलब्धौ यत्समत्वमुपपादयेत्। निदशंनकृतस्तज्ज्ञैः स दृष्टान्त इति स्मृतः ॥२५॥

अथ दृष्टान्त: विद्वान्पूर्वोपलब्धौ यन्समत्वमिति। यथा ममैव- हा हालाहललेहने हतमतिः सोडयं समुत्कण्ठितो गाढ़ाङ्गारगरिम्णि चैष जडधीदेहं निविक्षेप्स्यति। ग्राम्योऽप्याजगरीं गुरुं गलगुहां मोहावयं धावति व्याधूयेतरसङ्गतानि यदयं साधं खलै: खेलति।। यदयमित्यादि कस्य हेतोः। हालाहलकालकूटकवलनादिना येन साम्यं कृतं स दृष्टान्तः। न चेयमुपमा, यतो निवशंनेन प्रत्यक्षोकरणाय साम्यं कृतं, इतोऽप्यमेवं कर्तुमुद्यत इति, न च रूपकं यदेतत्करोति तत इदमस्य भविष्यतीति भिन्नकालत्वात, तवाह पूर्वोंपलब्धौ सत्यामिति॥ २५॥

२२. दृष्टान्त अनुवाद-जहाँ पर विद्वान् निदशंन के द्वारा पूर्वोपलब्ध वस्तु में समता का उपपादन करें, विद्वानों ने उसे 'दृष्टान्त' नामक लक्षण कहा है।। २५॥ अभिनव-जैसा कि अभिनव का कथन है- "अरे! यह केसा दुर्बुद्ध है जो अति भयङ्कर विष को चाटने के लिए उत्कण्ठित हो रहा है। जो जड़ बुद्धि धधकते हुए अङ्गारों से युक्त अग्नि में अपने शरीर को फेकना चाहता है। यह गँवार पुरुष अज्ञानवश अजगर के गले रूपी गुफा में घुसने के लिए दौड़ लगा रहा है। क्योंकि यह भले लोगों की सङ्गति को छोड़कर खलों (दुष्टों) के साथ खेलता है।" यहाँ पर जिस हलाहल कालकूट के साथ साम्य दिखलाया है वह 'दृष्टान्त' है। यहाँ उपमा नहीं है, क्योंकि यहाँ निदर्शन की प्रक्रिया दृष्टान्त द्वारा प्रत्यक्ष करने के लिए समानता प्रद्शित है, इसलिए वह ऐसा करने के लिए उद्यत हुआ है। यहाँ पर रूपक की भी शङ्का नहीं करनो चाहिए, क्योंकि जब ऐसा करता है तब इसका यह फल होगा, इस प्रकार यहाँ पर क्रिया और फल में कालभेद है। इसीलिए 'पूर्व को उपलब्धि होने पर' ऐसा कहा गया है॥। २५ ।। १. क. (टि०) बिद्वन्पूर्वोपलब्धो ।

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बोडशोडब्याय: ४२१

अनेकयुक्तिम द्वाक्यमनेकार्थप्रसाधकम्' तन्निर्भासनमुच्यते' ॥२६॥

अथ निर्भासनम् अथ भासनं अनेकयुक्तिमद्वाक्यमिति। यथा- "कर्ता द्यूतच्छलानां जतुमयशरणोद्दोपनः सोडभिमानो कृष्णाकेशोत्तरोयव्यपनयनमरुत्पाण्डवा यस्य दासा:। राजा दुःशासनावेर्गुरुरनुजशतस्याङ्गराजस्य मित्रम्। क्वास्ते दुर्योधनोऽसी कथयते न रुषा द्रष्टुमभ्यागतौ स्वः। (वेणीसंहारः) भास्यते प्रकृत: क्रोधादियेन। पाठान्तरं- ईप्सितार्थंप्रसिद्धद्यथं कोत्यंन्ते यत्र सूरिभिः । प्रयोजनान्यनेकानि सा मालेत्यभिसंजञिता॥ इति ॥ २६॥

२३. निर्भासन अब अनेक युक्तियों वाले निर्भासन का लक्षण करते हैं- अनुवाद-जो अनेक युक्तियों से विशिष्ट, अनेक वाक्यों का साधक तथा अनेक वाक्यों से संयुक्त वाक्य है, उसे 'निर्भासन' कहते हैं॥ २६ ॥ अभिनव-अनेक युक्तियों वाले वाक्य का उदाहरण देते हैं- "जो जुआ और कपट करने वाला, लाख के घर में (लक्षागृह में) आग लगाने वाला तथा द्रौपदी के केश और वस्त्र खोंचने में पटु और पाण्डव जिसके जुए में जोते हुए दास हैं, दुःशासन आदि सौ भाइयों में ज्येष्ठ और अङ्गराज कर्ण का मित्र वह अभिमानो दुर्योधन कहाँ है ? बताओ, हम क्रोध से नहीं, उसे देखने के लिए आये हैं।" यहाँ प्रकृत में क्रोधादि का जिसके द्वारा भास होता है, वह 'निर्भासन' है। यहाँ पर निम्नलिखित पाठान्तर भी मिलता है। वहाँ इसे माला कहा गया है। "अपने अभोष्ट की सिद्धि के लिए विद्वानों के द्वारा जहाँ पर अनेक प्रयोजनों का कथन किया जाता है, उसे 'माला' संज्ञक लक्षण कहते हैं।" १. क. (टि०) अनेकार्थ प्रकृतिस्थितम्। २. क. (टि०) अनेकवचनैर्युक्तं। ३. क. (टि०) ज्ञेयं निर्भासनं तु तत्। भासनं नाम तद्द्भवेत्।

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४१२ नाट्यसास्न्र

अपरिज्ञातततवाथं यत्र वाक्यं समाप्यते। सोऽनेकत्वाद्विचाराणाँ संशयः परिकीतितः॥२७॥

अथ संशय:

अपरिज्ञाततस्वार्थमित्यादि। यथा- तिष्ठेत्कोपवशात्प्रभावपिहिता दीघं न सा कुप्यति स्वर्गायोत्पतिता भवेन्मयि पुनर्भावाद्रंमस्या मनः। तां हतु विबुधद्विषोऽपि न च मे शक्तः पुरोवतिनीं सा चात्यन्तमगोचरं नयनयोयतिति कोडयं विधि: ॥ (विक्रमोवंशोयम् ४-२) अत्राद्यो भाग: संशयोदाहरणं अनन्तरस्तूपपत्त्युवाहरणम्॥ २७॥

२४. संशय

अब संशय का निरूपण करते हैं- अनुवाद-जहाँ पर तत्त्व किसी के अर्थ को जाने बिना ही वाक्य समाप्त हो जाय, तो विचारों की अनेकता के कारण उसे 'संशय' नामक लक्षण समझना चाहिए। २७ ॥ अभिनव-अभिनवगुप्त 'अपरिज्ञात' इत्यादि के द्वारा 'संशय' का लक्षण करते हैं। जैसे- "मेरे ऊपर कोप करने के कारण वह अपने दिव्य प्रभाव से कहीं छिप कर बैठो होगो। किन्तु देर तक वह कुपित नहीं रह सकती। शायद वह स्वर्ग में उड़ गई हो, किन्तु उसका मन तो मेरे ऊपर पूर्ण अनुरक्त है। सम्भव है कि कोई शत्रु उठा ले गया हो, किन्तु यह भो सम्भव नहीं है क्योंकि मेरे सामने तो देवताओं के शत्रु भी अपहरण नहीं कर सकते, फिर भो वह कसे आँखों से एकदम ओझल हो गई ? यह कौन सा व्यवहार है। यहाँ आधा भाग संशय का उदाहरण है और लोष भाग उपपत्ति का उदाहरण है। १. क. ग्रन्थान्तरे संशयस्य लक्षणमित्थम्- 'परप्रशंसावचनं प्रयुक्तं सोज्म्यसूयते। पूर्वोत्तरार्थव्याघातः संशयः स तु कीतितः ॥ इति ।

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बोडशोउड्याय: यत्र शास्त्रार्थसम्पन्नां मनोरथसमुद्भवाम्। *अप्रार्थनीयामन्यां वा विदुस्तामाशिषं बुधाः ॥ २८॥ अथाशी :- यथाशास्त्रार्थसम्पन्नामित्यादिना। यथा- पादावग्रस्थितया मुहुः स्तनभरेणानीतया नम्रतां। शम्भो सस्पृहलोचनत्रयपथं यान्त्या तदाराधने। ह्रीमत्या शिरसीहित: सपुलकस्वेदोद्गमोत्कम्पया- विश्लिष्यन्कुसुमाडजलिगिरिजया क्षिप्तोऽन्तरे पातु वः॥ सवं वचनं न चाशी:, अलडूकार: ? रक्षणं स्तुत्या एच घर्णनीयरवात् ॥ २८।। विशेष-पाठभेद के अनुसार संशय का लक्षण है- वरप्रशंसावचनं प्रयुक्तं योऽम्यसूयते। पूर्वोत्तरार्थ व्याधातः संशय एव कीत्तित: ।। अर्थात् अन्य पुरुष की प्रशंसा में कहे गये वचन को सुनकर जिसके मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो और पूर्व कथन से उत्तर-कथन का विरोध हो तो वहाँ 'संशय' नामक लक्षण समझना चाहिए। २५. आशीः अब आशी: का लक्षण कहते हैं- अनुवाव-जहाँ शास्त्र के अनुकूल अर्थ से सम्पन्न मनोरथ से समुन्धव विना किसी प्रार्थना के अथवा अन्य कारणों से (प्राथना) से प्राप्त हुई हो, उसे विद्वान् लोग 'आशोः' नामक लक्षण कहते हैं॥। २८॥ अभिनव-'यथाशास्त्रार्थसम्पन्नम्' इत्यादि के द्वारा आशीः का निरूपण करते हैं। यथा- "शिवजी की अराधना में स्थित बार-बार पैरों के अग्रभाग पर स्थित किन्तु पयोधरों के भार से झुको हुई शङ्कर के द्वारा स्पृहा से तीनों नेत्रों से देखी गई रोमाब्च, स्वेद ( पसीने) एवं कम्पन से युक्त होने के कारण लज्जित पावती जी के द्वारा शिव जी के सिर पर चढ़ाई गई किन्तु बीच में ही विखर जाने वाली पुष्पाञजलि आप लोगों की रक्षा करें।" १. क. था शास्त्रार्थसम्पन्नं मनोरथसमुद्धवम् । २. क. अप्रार्थनीयमन्यम् ।

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माट्यसाएये ALA

आदौ यत् क्रोधजननमन्ते हर्षप्रवर्धनम्। तत् प्रियं बचनं ज्ञेयमाशीर्वादसमन्वितम्' ॥२९॥ अभ्ये पठन्ति- यत्रार्थानां प्रसिद्धानां क्रियते परिकोर्त्तनम्। परापेक्षाव्युदासाथं तन्निदर्शनमुच्यते।। प्रसिद्धानां देवतादीनां परापेक्षा साध्याकांक्षा तस्माद व्युवासस्तत्सम्पत्त्या। अत एव दृष्टान्तादस्य भेव: इति ॥ २८॥ अथ प्रियं- आदौ यत्क्रोधजननमिति। यथा- कि वृत्तान्तैः परगृहगतैः किं तु नाहं समर्थ: तूष्णीं स्थातुं प्रकृतिमुखरो दाक्षिणात्यस्वभावः। गेहे गेहे विपणिषु तथा चत्वरे पानगोष्ठ्यां उन्मत्तेव भ्रमति भवतो वल्लभा हन्त कीतिः॥ यहाँ पर 'आशीः' अलङ्कार लक्षण नहीं हैं, क्योंकि यहाँ स्तुति ही वर्णनीय है। जहाँ पर परापेक्षा को दूर करने के लिए प्रसिद्ध आर्यों का परिकीर्तन किया जाता है उसे 'निदर्शन' कहते हैं॥ २८ ॥ विशेष-आशी: के स्थान पर 'निदशंन' पाठभेद भी मिलता है। २६. प्रियवचन ( प्रियोक्ति ) अनुवाद-प्रारम्भ में जो क्रोध का जनक हो और अन्त में हर्ष का वर्धक हो तो उस आशीर्वाद से समन्वित वचन को 'प्रियवचन' या 'प्रियोकि' कहते हैं॥ २९।। अभिनव-अब 'आदो यत्क्रोधजनम्' इत्यादि के द्वारा 'प्रियवचन' को कहते हैं। जैसे- "दूसरे के घर की बातों से मुझे क्या मतलब है किन्तु मैं चुप रहने में समर्थ नहीं हूँ अर्थात चुप नहीं रह सकता। क्योंकि दाक्षिणात्यों का स्वभाव है कि वे स्वभावतः मुखर होते हैं। घर-घर में, बाजार-बाजार में, चौराहों पर, पानगोष्ठियों में आप की वल्लभा कीति उन्मत्त हुई सी धूम रही है अर्थात् सब जगह आप की कीति फैल गई है।' १. क. एतल्लक्षणं याञ्चायाव्च समानकल्पत्वात् केचित्पठन्ति- विनष्टे तुं यदा द्रव्ये हा पलब्धि: पुनश्चया। सुख्मुत्पद्यतेऽतीव सा प्रीतिरिति कीलिता।।

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षोडशोऽष्याय:

अत्र भ्रमति वल्लभेत्यादौ क्रोधजननं हन्त कीतिरिति हर्षकृत। अन्ये पठन्ति- बाच्यमर्थ परित्यज्य दृष्ट्यादिभिरनेकधा। अभ्यस्मिन्नेव पतनावाशु भ्रंशः स उच्यते॥ इति॥ दृष्टिदशंनं, प्रकृतिमुखरादिवाव्यमिति पूर्वोक्तमित्यर्थः। न चेयं व्याजस्तुतिः निन्दाभागे स्तुतेरभावात्। पूर्णायास्तु निन्दाया अभावात्। यथा वा- "प्रद्योतस्य सुता" इत्युक्त्वा वसन्तकं विप्रतारयितुं राजा वसन्तशब्दमाचष्टे। मधोश्च समयः इत्याकणने प्रसूनसमय इत्यनादृत्य निवृत्त्यङ्गरेण हृष्यति विदूषके, समय इतिशब्देनान्यत्र पतनात्प्रणयक्रोधत्वं चेति प्रियवचनम्। प्रियङ्कर इति लोक एतरिसिद्म् ॥ २९॥ आपकी वल्लभा (प्रिया) सब जगह घूमती है, आरम्भ में यह कहना क्रोध का जनक है किन्तु तदनन्तर 'हन्त कीत्तिः' यह ऐसा कहना हर्षजनक है अतः यहां 'प्रियवचन' लक्षण है। अन्य लोग प्रिय-वचन के स्थान पर 'भ्रंश' नामक लक्षण मानते हैं। तदनुसार-"इष्ट आदि के द्वारा अनेक प्रकार से प्राप्त हुए, वाच्य अर्थ को छोड़कर अन्य अर्थ में जो पतन है, उसे 'भ्रंश' कहते हैं।" यहाँ पर दृष्टि का अर्थ दर्द्यन है। प्रकृतिमुखरादि वाक्य पहिले कहा जा चुका हैं। यहाँ व्याजस्तुति नहीं है। क्योंकि निन्दा के अंश में स्तुति नही होती। यहाँ निन्दा का पूर्ण अभाव होने से स्तुति नहीं है। जैसे- राज्यं निजिंतशत्रु योग्यसचिवे न्यस्तः समस्तो भरः सम्यक् पालनलालिता: प्रशमिताशेषोपसर्गाः प्रधाः। प्रद्योतस्य सुता वसन्तसमयसतवं चेति नाम्ना धूर्ति कामः काममुपैत्वयं मम पुनर्मन्ये महानुत्सवः॥ इस श्लोक के तृतीय चरण में 'यह प्रद्योत की सुता' ऐसा कहकर वसन्तक को ठगने के लिए राजा 'वसन्त' शब्द की व्याख्या करता है। मधु (वसन्त) का समय है' ऐसा सुनने पर 'प्रसून का समय है' इस अर्थ का अनादर करके 'अङ्करो का उद्गम समझकर प्रसन्न हो रहे विदूषक का 'समय' शब्द से अन्यत्र भाव के चले जाने पर 'प्रणयकोप प्रमुख प्रियवचन है, लोक में 'प्रियकारी' यह प्रसिद्ध है। ना. घा०- १४

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४२६ नाटयशाल्तरे

छलयुक्स्या त्वन्येषामभिसन्धानाभिभावक कपटम्। द्वित्रिप्रयोगयुक्तौ विज्ञेय: कपटसङ्घातः ॥ ३० ॥

अथ कपटं छलयुक्त्येति। व्याजप्रयोगेण अभि सन्धानं वञचना। अभिभावकं तिरस्कारकं। छलोक्त्या कथितस्यार्थस्यान्यथाग्रहर्ण अपलापो वा कपटं, तस्य सङ्गातो लक्षणम्। कपटो वस्तुक्रमाहैवाच्छत्रोर्वा समुदभूतः । वस्तुक्रमोद्भूतस्य मालतोमाधवे मकरन्वस्य मालतीवेषधारणं, दैविकस्य नागानन्दे जीमूतवाहनस्य शङ्गचूडच्छलनं, शत्रुकृतस्य तु छलितरामे लवणासुरप्रयुक्तयो राक्षसयोमंन्थरा- कैकेय्योवॅषधारणं, सीतया अन्तर्दन्त्या: निर्वासनं च कृतम्। यथा वा कृत्यारावणे प्रथमेऽडके सीतावेषधारिण्या शूर्पणखा लक्ष्मणो वञ्चितोऽभिभूतशच "ता सव्वहा अण्ण एव्व दे अणिद्वं अभिप्पाअं लक्खेमि" इत्यादिना वचनेन।

२७. कपटसङ्कात अनुवाद-छल की युक्ति से अर्थात् किसी व्याज से दूसरे को ठगकर तिरस्कार करने वाले भाव को 'कपट' कहते हैं और उसके दो-तीन बार प्रयोग को 'कपटसङ्धात' कहते हैं ॥। ३० ।। अभिनव-अब 'छलयुक्त्या' इत्यादि के द्वारा 'कपटसङ्घात' का कथन करते हैं। किसी बहाने से अभिसन्धान (वञ्चना) अथवा तिरस्कार अर्थात् छलपूर्वक उक्ति से कहे हुए अर्थ को अन्यथा ग्रहण करना अथवा अपलाप करना 'कपट' कहलाता है और उसका सङ्घात 'लक्षण' है। कपट वस्तु क्रम से अथवा देव से अथवा शत्रु के प्रयोग से उद्भूत होता है। इनमें वस्तु क्रम से उद्भूत कपट का उदाहरण जैसे-मालतीमाधव में मकरन्द का मालती का वेष धारण करना। देवोद्भूत कपट का उदाहरण जैसे-नागानन्द नाटक में जीमूत वाहन का शंखचूड़ को छलना। शत्रुकृत कपट का उदाहरण जैसे -'छलितराम' नाटक में लवणासुर द्वारा प्रेषित राक्षसों का मन्थरा और कैकेयी का वेष धारण करना तथा गर्भवती

१. क. (टि०) छलयुक्श्या यदान्येषां मत्वा नायकभावनम्। द्वित्नि प्रयोगयुक्तेव श्ञेयं कपटसंज्ञितम्। भोजदेव :- चदिव्यं दिव्यमपि वा कृश्वा रूपविपर्ययम्। अविद्वान् बब्न्चयते येन कपटं तदुदाहृतम्।। "छलोक्त्या कचिताथंस्य कपठोन्यादृवग्रहः । इति केचित्।

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४२७

दुजनोवाहृतै रुक्षैः सभामष्येऽतिताडितः । अक्रोष: क्रोधजननैर्वाक्यैर्यः सा क्षमा भवेत् ॥ ३१ ॥ अम्ये पठन्ति- यत्र संकीतंयम्दोषं गुणमर्थेन योजयेत्। गुणातिपाताद्दोषं वा गहणं नाम तद्भवेत्॥ इति। तस्त्रविधमपि वागुपचारसामान्याच्छलमत्र स्वोकृतम् ॥३०॥ अथ क्षमा- दुरजनोवाहृतैरिति। दुजनोक्तैवंचनैः क्रोधजननैः सभायां ताडितोऽपि यः पुरुषोऽक्रोधनः क्रोधहीनः स एव क्षमावान्। तदवणनोचितः कविव्यापारः क्षमेतपर्थः। अनेन च यथोचिताभिग्नवृत्तिसंचयः सर्वो विभावाधयुचितो निवस्यमानः काव्यलक्षणत्वेन सूचितः । सोता का निर्वासन कराना। अबवा जैसे 'कृत्यारामायण' नाटक के प्रथम अङ्क में सीता का वेष धारण करने वाली सूर्पणखा के द्वारा लक्ष्मण को "ता सब्बहा अण्ण एव्व दे अणिबंद्धं अभिप्पाअं लक्खेभि। तत्सवंथा अन्यमेव तेऽनिबन्धमभिप्रायं लक्षयामि" इत्यादि कथन के द्वारा वञ्चित एवं तिरस्कृत करना। अन्य लोग इसके स्थान पर निम्नलिखित पाठ मानते हैं-"जहाँ पर दोषों का कथन करते हुए गुणों के रूप में व्णित कर दिया जाय अथवा गुणों के चाहिए।" अतिपात से दोष का वणन किया जाय, वहाँ 'गर्हण' नामक लक्षण समझना

गया है। इस प्रकार तोनों प्रकारों को वाणी के उपचार सामान्य से 'छल' कहा विशेष-भोज ने कपट का लक्षण निम्नलिख्ित रूप में दिया है- अदिव्यं विव्यमपि वा कृत्वा रूपविपर्यम्। अविद्वान् वञ्चयते येन कपटं तदुदाहृतम्॥ जहाँ पर दिव्य अथवा अदिव्य रूप को धारण कर अथवा रूप का विपयंय (परिवतन) करके किसो अविद्वान् पुरुष को ठगा जाता है, उसे 'कपट' कहा जाता है। २८. क्षमा अब 'दुर्जनोदाहृतेः' इत्यादि के द्वारा क्षमा का लक्षण कहते हैं- अनुवाद-दुर्जनों के द्वारा कहे हुए रूखे और क्रोधजनक वाक्यों से सभा के मध्य में अभिताड़ित (अपमानित) होकर भी क्रोध न करना 'क्षमा' कहलाता है ॥ ३१ ॥ १. क. सतां मथ्येऽभिताडि: ।

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क्षमा यथा ममैव- श्रोत्राय दुष्टवचनं प्रति किं न कोप: क्षोभं करोति हृदये ननु कोप एव। मित्रं ममैष तु निजात्मनि योऽपकारं कृत्वा ममाशुभकलङ्कविघातहेतुः।। अन्येषां पाठ :- सिद्धान् बहून् प्रधानार्थास्त्यवत्वा यत्र प्रयुज्यते। विशेषयुक्तं वचनं विज्ञेयं तद्विशेषणम्। सिद्धानिति लोकप्रसिद्धान्प्रधानभूतानशक्यापजयांस्त्यक्त्वानादृत्य क्रोधाद्य- दवचनं विशेषेण युक्तं, यथा 'ममायं' परिवादः सुहृत्प्रत्ययः इति स्वात्मनि क्षोभः पुण्यादिकमुररीकृत्यापि ममापुण्यसंचयं दुःखोपभोगदानेन शमयति॥ इति॥३१॥

अभिनव-दुर्जनों के द्वारा कहे हुए क्रोधजनक वचनों से सभा में ताड़ित होने पर भी जो पुरुष क्रोध नहीं करता, वही क्षमावान् है। उस पुरुष के योग्य कवि का व्यापार 'क्षमा' है। इससे यह सूचित होता है कि औचित्य के अनुरूप विभावादि के उपयुक्त भिन्न-भिन्न वृत्तियों का सभी प्रकार के सञ्चय काव्य लक्षण के रूप में संग्राह्य है। 'क्षमा' का उदाहरण जैसे मेरा (अभिनवगुप्त का) यह पद्य है- "कानों को बुरा वचन सुनकर क्या क्रोध नहीं होता ? किन्तु जो हृदय में क्षोभ उत्पन्न करता है, वह कोप है और जो अपना उपकार करके भो मेरे अशुभ कलङ्क को विनाश का हेतु है वही मेरा मित्र है।" कुछ लोग इस लक्षण के स्थान पर निम्नलिखित पाठ मानते हैं- "जहाँ पर लोकप्रसिद्ध बहुत से प्रधान अर्थो को छोड़कर विशेषता से युक्त वचनों का प्रयोग किया जाता है, उसे 'विशेषण' समझना चाहिए।" यहाँ 'विद्वान्' का अर्थ है लोकप्रसिद्ध। जहाँ पर लोक में प्रसिद्ध प्रधानभूत जिसे तिरस्कृत करना अशक्य है, ऐसे अर्थों को छोड़कर (अनादर करके) क्रोध से विशेषता से युक्त जो वचन कहा जाता है वह विशेषण है। जैसे-'मेरा यह' परिवाद, मित्र का विश्वास है, ऐसा समझना, इससे अपने आत्मा में क्षोभ होना मेरा पुण्य है। ऐसा स्बीकार करके मेरे दुःख के उपभोग के बाद मेरे पाप का संचय (मेरे पापों) का शमन होता है॥ ३१ ॥

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दृष्टवैवावयवं कञ्चिद्भावो यत्रानुमोयतेर। प्राप्ति तामभिजानीयाल्लक्षणं नाटकाश्रयम् ।। ३२।। अकायं सहसा कृत्वाऽकृत्वा कार्यमथापि वा। सन्तापो मनसो यस्तु पश्चात्तापः प्रकोतितः॥३३ ॥ अथ प्राप्ति :- दृष्ट्वैवावयवं कञ्चिदिति। यथा- अभ्युन्नतां पुरस्तादषगाढ़ा जधनगौरवात्पश्चात्। द्वारेऽस्य पाण्डुसिकते पदपङ्क्तिदृश्यतेऽभिनवा।। अथ पदपडिक्तलक्षणमंशं दृष्टवानयात्र भवितव्यमिति शकुन्तलाया सद्- भावोऽनुमीयत इति ॥३२ ॥ २९. प्राप्ति अब 'दृष्टेवावयवम्' इत्यादि के द्वारा 'प्राप्ति' नामक लक्षण का निरूपण करते हैं- अनुवाद-जहाँ पर किसी अवयव को देखकर भाव का अनुमान कर लिया जाता है, नाटक में उसे 'प्राप्ति' नामक लक्षण समझना चाहिए।। ३२।। अभिनव-अभिनवगुप्त का उदाहरण जैसे- "पोलो रेतों से युक्त इस लता मण्डप के द्वार पर आगे की ओर उठी हुई और जघन के भार से पीछे को ओर गहरो धँसो हुई नवीन पदपंक्ति दिखाई दे रही है।" यहाँ इस पदपंक्ति रूप लक्षण को देखकर यहाँ पर शकुन्तला होगी। इस प्रकार शकुन्तला के सद्ध्ाव (होने) का अनुमान करते हैं, अतः यहाँ पर 'प्राप्ति' नामक लक्षण है ॥। ३२॥ ३०. पाश्चात्ताप अब 'अकार्य सहसा' इत्यादि के द्वारा 'पश्चात्ताप' नामक लक्षण कहते हैं- अनुवाद-सहसा किसी न करने योग्य कार्य को करके अथवा करने योग्य (करणोय) कार्य को न करके जो मन में सन्ताप होता है, उसे 'पश्चात्ताप' नामक लक्षण कहा जाता है।। ३३ ।।

१. क. किञ्विद्भावो। २. क. (टि०) यत्रोपमीयते । ३. क. (टि०) स उच्यते।

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नाठयशाहने

यत्परस्थानुवतंनम् । स्नेहाद्दाक्षिण्ययोगाठ्वा सानुवृत्तिस्तु संज्ञिता॥३४॥

अथ पश्चात्ताप :- अकाय सहसा कृत्वेति। सहसेत्यविचार्य अकायं कृत्वा यथा- मङ्गलिशुकाहमिस इदोसल उप्पन्ना। जस्सकबलजो भूतभूहि भुब ओहिष्णो II कार्यमकृत्वा यथा- मुखमंसविवति पक्ष्मलाक्ष्याः कथमप्युन्नमितं न चुम्बितं तु। इति। शाकुन्तले। अभ्ये पठन्ति- अनेकार्थविचारस्तु विचार: परिकीतितः। इति। अनेकस्य कार्यरूपस्यार्थस्य कृताकृतस्य विचार: किमेतस्कृतमिति ॥३३॥ अभिनव-सहसा का अभिप्राय है कि विना विचार किये किसी न करने योग्य कार्य को करके पश्चात्ताप करना। जैसे-'अंगुलिशुकाहमिस' इत्यादि। यहाँ अर्थ अस्पष्ट है। तथा किसी करने योग्य कार्य को न करके पश्चात्ताप करना। जैसे- "सुन्दर नेत्रों वाली नायिका के कन्धे को ओर मुड़े हुए मुख को किसी प्रकार ऊपर उठाया, किन्तु चूम नहीं सका।" अन्य लोग पाश्चात्ताप के स्थान पर निम्नलिखित पाठ मानते हैं-"अनेक अर्थो के सम्बन्ध में विचार करना 'विचार' नामक लक्षण कहा जाता है।" यहाँ पर अनेक कार्यरूप अर्थ के सम्बन्ध में किया जाना और 'न किये जाने' का विचार क्या मैंने ऐसा किया है ?॥ ३३ ॥ ३१. अनुवृत्ति: अब अनुवृत्ति का लक्षण बतलाते हैं- अनुवाद-जब प्रधय (प्रणय) से, स्नेह अथवा दाक्षिण्य के योग से जो दूसरे का अर्थयुक्त अनुवतंन किया जाता है उसे 'अनुवृत्ति' कहते हैं ॥ ३४ ॥ १. क. (भ.) लक्षणान्तरमुषलम्यते। यथा- लक्षणामनुनिर्देशो विज्ञेयः संग्रहस्तथा। चित्रार्थ समवायो यः सोऽ्थ इत्यमिघीयते।।

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बोडशोङयाय: ४३१

अथानु्वृत्ति :- प्रशयेणार्थसंयुक्तमिति। यथा भट्टन्दुराजस्य- राज्ञा यद्यमुरुष्यसे यदि भवेद्ठाच्यं पुरा मादुरशा 35 पप्र तर्संक्रन्दनगोप ! किञचन मनाक् पृच्छत्यधीरो जनः । अग्रे रोहणचारिणां सरभसं संचूर्यमाणर्चिरं कं प्रश्याययितुं प्रयासरसिको यत्नेन रत्नायसे॥। अप्रस्तुतप्रशंसात्वेऽपि हि यदप्रस्तुतस्य क्षरीरवैचित्र्यं तल्लक्षणकृतमेव, लक्षणं हि शरीरमित्युक्तम्। कटकादयैरपि हि यद्ठचित्र्यं कुशलसुवणकारोत्प्रेक्षितं तल्लक्षणम- हिम्नैव। तत्तेनोपमानशरीरस्योपमेयशरीरस्य वा वैचित्र्यं लक्षणानामेव व्यापारः इत्येवमुपमारूपकादीपकानां त्रयाणामलड्धारत्वेन वक्ष्यमाणानां प्रत्येक षटत्रिशल्ल- क्षणयोगात् लक्षणानामपि चैकद्वित्र्याद्यवान्तरविभागभेवादाननत्यं केन गणयितुं शक्यम्। इदानीं शतसहस्त्रस्त्राणि वैचित्र्याणि सहुवर्येरुत्प्रेक्ष्यन्ताम्।

करते हैं- अभिनव-अभिनवगुप्त भट्टेन्दुराज का पद्य उदाहरण के रूप प्रस्तुत

"राजा यदि अनुरोध करते हों और मेरे जैसे व्यक्तियों के समक्ष कथनीय हो तो हे इन्द्रकीट! यह अधी रजन कुछ पूछता है कि पर्वत पर रोहण करने वालों के सामने सहसा चूर-चूर किये जाने पर भी प्रयास करने में रसिक तुम किसको विश्वास के साथ समझाने के लिए बड़े प्रयत्न से अपने को रत्न के समान मान रहे हो।"

यहाँ पर अप्रस्तुत प्रशंसा के होने पर भी अप्रस्तुत का जो शरीरगत वैचित्र्य है वह लक्षणकृत ही है। क्योंकि लक्षण ही शरीर है, यह कहा जा चुका है। कटक आदि के द्वारा भो जो विचित्रता कुशल स्वर्णकारों द्वारा उत्प्रेक्षित है, वह भी लक्षण की मरिमा से ही है। इसी प्रकार उपमान शरीर का अथवा उपमेय शरीर का जो वैचित्र्य है वह भी लक्षणों का ही व्यापार है। इस प्रकार अलङ्कार के रूप में कहे जाने वाले उपमा, रूपक, दीपक इन तीनों में से प्रत्येक का ३६ लक्षणों के योग से लक्षणों के भी एक, दो तीन आदि अवान्तर भेद होने से अनन्त भेद होते हैं, उनको गणना कौन कर सकता है ? इस समय धारकों प्रकार के वैचित्र्य की उत्प्रेक्षा सहृदय लोग कर सकते हैं।

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नाटयश्ाबधे

प्राप्तानां यत्र दोषाणां क्रियते शमनं पुनः। *सा जञेया हा पर्पत्तिस्तु लक्षणं नाटकाशयम्॥३५॥

परे त्वधीयते- उभयो: प्रीतिजननो विरुद्धाभिनिवेशयोः। अर्थ प्रसादजनको जेयस्त्वनुनयो बुधैः॥ इति॥ उभयोरत्र वक्तृवाच्ययोस्तयोश्च विरुद्धाभिनिवेशः। एकस्य तत्त्वविध्रान्तता अपरस्य त्विषा रत्नवदाचरितमिति॥ ३४॥ अथोपपत्ति :- प्राप्तानां यत्र दोषाणामिति। प्राप्तानामिति वीप्सागर्भो निर्देश: बोषाण- मित्युपपत्त्ययोग दृष्टत्वेनावस्तुभूतानामित्यर्थः। यथा- तिष्ठेत् कोपवशात् प्रभावपिहिता वीघं न सा कुप्यति। स्वर्गायोत्पतिता भवेत् मयि पुनर्भावाद्रभस्या मनः॥ तां हतु विबुरधद्विषोऽपि न च शक्तः पुरोवत्तिनीं। सा चात्यन्तमगोचरं नयनयोयतिति कोऽयं विधि:॥

अन्य लोग तो 'अनुवृत्ति' के स्थान पर 'अनुनय' का कथन करते हैं- "जो परस्पर विरुद्ध अभिनिवेश रखने वाले दो व्यक्तियों के प्रीति का जनक होते हुए अर्थ का साधक लक्षण है, उसे विद्वानों को 'अनुनय' समझना चाहिए।" यहाँ पर 'उभयोः' पद वक्ता और वाच्य का बोधक है। क्योंकि उन दोनों में विरुद्ध अभिनिवेश होता है। उनमें एक को तत्त्व में विश्रान्ति है और दूसरे की कान्ति से रल्न के सदृश आचरण है।। ३४ ।। ३२. उपपत्ति अब 'प्राप्तानां यत्र दोषाणां' इत्यादि के द्वारा उपपत्ति नामक लक्षण का निरूपण करते हैं- अनुवाद-जहाँ पर प्राप्त दोषों का शमन किया जाता है, उसे नाटकाशित 'उपपत्ति' नामक लक्षण समझना चाहिए॥ ३५॥ अभिनव-यहाँ पर 'प्राप्तानाम्' में वीप्सासागर्भ निर्देश है। 'दोषाणाम्' का का अर्थ है उपपत्ति के योग के न दिखाई देने से अवस्तुभूत अर्थ। जैसे विक्रमोर्वशीय नाटक के पद्य में-

१. क. (भ०) प्रोक्तानां। २. क. झेया सा। ३. कनम. सप्तानो ।

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षोडशोऽ्याय: ४३३

यथा वा- कवाकायं शशलक्ष्मण: कव च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा वोषाणां प्रशमाय मे श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम्। कि वक्ष्यन्त्यपकल्मषा: कृतधियः स्बप्नेपि सा दुर्लभा चेतः स्वास्थ्यमुपेहि कः खलु युवा धन्योऽधरं धास्यति॥ इति॥ (विक्रमोवंशीयम्)

अन्ये त्वधीयते- परिगृह्य तु शास्त्राथं यद्वाव्यमभिधीयते। विद्वन्मनोहरं स्वन्तमुपदिष्टं तदुच्यते॥ तहि॥ शास्त्रार्थशब्दः प्रमाणोपलक्षणम्। स्वन्तमिति शोभनोऽन्तो निश्चयो यत्र ॥ ३५॥

"मेरे ऊपर कोप करने के कारण अपने दिव्य प्रभाव से कहीं छिप गई होगी, किन्तु अधिक देर तक वह कुपित नहीं रह सकती। शायद स्वर्ग में उड़ गई हो, किन्तु उसका मन तो मुझमें पूर्णरूप से आर्द्र है, मेरे सामने देवता शत्रु राक्षस भी उसे हरण करने में समर्थ नहों हैं, फिर भी वह मेरे आँखों से एकदम ओझल हो गई, यह कैसा व्यवहार है ?" और भी जैसे- "यहाँ तो अप्सरा में आसक्ति रूप अकार्य और कहाँ चन्द्र का उज्ज्वल वंश ? क्या वह फिर कभी दिखायी देगो ? दोषों के शमन के लिए हमारे शास्त्र हैं। अरे! क्रोध में भो उसका मुख नितान्त सुन्दर है। निष्पाप पूज्यजन मुझे क्या कहेंगे ? किन्तु स्वप्न में भी वह दुर्लभ है। हे चित्त ! तुम स्वस्थता एवं धैर्य धारण करो। कौन युवक है जो उसके अधरामृत का पान करेगा ?" और अन्य लोग तो निम्नलिखित पाठ कहते हैं- "जहाँ पर शास्त्र के अर्थ को ग्रहण कर विद्वानों के मन की आकर्षित करने वाला अन्तःसुखद जो वाक्य कहा जाता है, उसे 'उपदिष्ट' कहते हैं।" यहाँ पर शास्त्रार्थ शब्द प्रमाण का उपलक्षण है। स्वन्तं का अर्थ है सुन्दर (सुखद ) अन्त निश्चय जहाँ हो॥। ३५॥ वा. घा०-१५

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४३४ नाटयशाह्न्रे

साध्यते योऽर्थंसम्बन्धो महद्भिः समवायतः । परस्परानुकूल्येन सा युक्तिः परिकीतिता ॥३६ ।।

अथ युक्ति :- साध्यते योऽथंसंबन्धः इति। यथा- लावण्यसिन्धुरपरैव हि केयमत्र यत्रोत्पलानि शशिना सह संप्लवन्ते। उन्मज्जति द्विरदकुम्भतटी च यत्र यत्रापरे कदलकाण्डमृणालदण्डा:।। अत्र महद्भिरुत्कृष्टैनत्रवदनादिभि: परस्परशोभात्मकानुकूल्योपलक्षितेन समवायेनैकविध्ान्त्यर्थः संबध्यमान उपपद्यमानोऽपूर्वतर्रङ्गणीलक्षणः साधित इति योजनादियं युक्तिः। प्रतीयमानं रूपकमत्रेति चेतु, किं ततः शरीरं लक्षणमयमेवे- स्युक्तमसकृत। एकीय. पाठ :-

३३. युक्ति अब 'साध्यते योऽर्थसम्बन्धो' इत्यादि के द्वारा 'युक्ति' का विवेचन करते हैं- अनुवाद-जहाँ पर महापुरुष परस्पर अनुकूलता के आधार पर समवाय रूप से अर्थ का सम्बन्ध सिद्ध करते हैं उसे 'युक्ति' कहते हैं॥ ३६ ॥ अभिनव-जैसे- "यह कोई दूसरा हो लावण्य-सिन्धु है जहाँ चन्द्रमा के साथ कमल भी तैर रहे हैं जिसमें हाथियों की कुम्भतटी उन्मग्न हो रही है और कदल-काण्ड तथा मृणालदण्ड (कमल नाल) भो बह रहे हैं।" यहाँ पर उत्कृष्ट नेत्र, वदन आदि परस्पर शोभात्मक एवं अनुकूलता से उपलक्षित समवाय (एक विश्रान्ति) से उपपन्न सरिता रूप अपूर्व लक्षण सिद्ध किया गया है। इस प्रकार को योजना के कारण यह 'युक्ति' है। यदि कहा जाय कि यहाँ रूपक प्रतीत हो रहा है तो इससे क्या ? शरीर लावण्यमय होता है, यह तो कई बार कहा जा चुका है। एक अन्य पाठ भी है जिसमें 'युक्ति' के स्थान पर 'अभिप्राय' पाठ मिलता है-

३. क-भ. पुस्तके लक्षणमिदं न परिगणितम्।

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४३५

यत्रापसारयन् दोषं गुणमरथेन योजयेत्। *गुणाभिशादं दोषान् वा काय तल्लक्षणं विदुः१॥ ३७ ।।

अभूतपूर्वो ह्यर्थो यः सादृश्यात्परिकल्पितः । लोकस्य हृदयग्राही सोऽभिप्राय इतीरितः ॥ इति ॥३६॥ अथ कार्यम्- यत्रावसारयन् दोषमिति। दोषमपसायं गुणं यदात्वेऽर्थनीये नियोजयति गुणाभिवादं वापसायं दोषानर्थे योजयति, आधित्य नेतारथं योजयतीत्यर्थः। प्रथम उदाहरणं यथा- "तावत्स्वात्मनि संशितद्रुमलताश्लेषोऽ6वगैवजंनम्" । इत्यादि "जो अभूतपूर्व कोई पदार्थ सादृश्य के कारण परिकल्पित और लोगों के हृदय को आकर्षित करने वाला है, उसे 'अभिप्राय' कहा गया है।" यहाँ पर अभूतपूर्व का अर्थ असत् पदार्थ है। ३४. कार्य अब 'यत्रापसारयन्' इत्यादि के द्वारा 'कार्य' नामक लक्षण का निरूपण करते हैं- अनुवाद-जहाँ पर किसो पदार्थ या व्यक्ति के दोषों को दूर करके उसके साथ गुणों को योजना को जाय अथवा गुणों का अपसारण कर दोषों की योजना को जाय, उसे 'कार्य' नामक लक्षण कहा गया है॥ ३७ ।। अभिनव-जहाँ पर दोष को दूर कर गुण का तात्कालिक अर्थनीय पदार्थ नियोजन करें अथवा गुणों को हटाकर दोषों का किसी अर्थनीय पदार्थ में नियोजन करे अर्थात् दोष का आश्रयण करके उसके साथ अर्थ की योजना करें। इसमें प्रथम का उदाहरण जैसे- "पर्थिक लोग मार्ग में स्थित वृक्ष के साथ लता के आलिङ्गन को कामोत्तेजक होने से देखने को इच्छा नहीं करते, क्योंकि अपने विषय में कामोत्तेजक होना अच्छा नहीं समझते।" यहाँ पर लता-वृक्ष का कामोत्तेजक आलिङ्न देखना दोष है और उसे न देखना गुण है। १. क. (टि०) यत्र संकीतयन् दीषं। यत्र संकोर्त्य दोषास्तु। २. क. (भ.) गुणकीतिते हि दोषं। १. क. (टि०) तदिह को्तितम् । क. (म०) कार्या तल्लक्षणं विदुः।

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४३६ नाटयश्ास्ते

अपूर्वक्रोधजनितमपराधं प्रमृज्य2 यत्। सेवार्थं मधुरं वाक्यमनुनोतिः प्रकीर्तिता॥। ३८।। द्वितीये ममैव- विश्वप्रभो ? वितरतां कमलां किमन्यद् भूयात्स कोऽपि घटितो भवतोपकारः। दूराध्वगेधु पुनरम्बु तथा बिकीर्ण- डो मन्ते तथा त्रिभुवने प्रसृतं यशस्ते।। एतत्कैश्चिद्गह न मित्युक्तम्। अन्ये त्वधोयते- अर्थान्तरस्य कथने यत्रान्योऽर्थः प्रतोयते। वाक्यमाघुर्यसंपन्ना सार्थापत्तिरिति स्मृता॥ इति। अत्र हि महांस्त्ववास्योपकारः कृतः, अध्वगानां च महदम्बु दत्तमित्युक्ते विश्वप्रभो! इति पुनरिति पर्यालोचनादर्थान्तरस्यापत्तिः।। ३७।। द्वितीय का उदाहरण जैसे- "विश्व के स्वामी ! कमला (लक्ष्मो) को ही हमें दोजिए, औरों से क्या प्रयोजन ? क्योंकि कमला (लक्ष्मो ) के देने से आप के द्वारा मेरा महान् उपकार होगा ? हे प्रभो ! दूरस्थ पथिकों के लिए ऐसा जल प्रदान कोजिये जिससे तोनों लोक में आप का यश फैल जाय, यही अन्त में करणीय है।" यहाँ पर आपने इसका महान् उपकार किया, पथिकों के लिए महान् जल प्रदान किया-इस प्रकार कहने के बाद हे प्रभो ! इस अर्थ को पर्यालोचना से 'कार्य' रूप अर्थ की प्राप्ति हो जातो है। कुछ लोग उसे गहन (गहंण) कहते हैं। अन्य लोग ऐसा कहते हैं- "जहाँ पर अर्थान्तर के कहने पर अन्य अर्थ को प्रतीति हो उसे वाक्य के माधुर्य से सम्पन्न 'अर्थापत्ति' कहते हैं।" यहाँ पर आपने इसका महान् उपकार किया, पर्थिकों को बहुत सा जल दिया, ऐसा कहने के बाद हे विश्वप्रभो ! इसके और पुनः इसके पर्यालोचन करने से अर्थान्तर की आपत्ति है॥ ३४॥ ३५. अनुनीति इसके बाद 'अनुनीति नामक लक्षण का निरूपण कराते हैं- अनुवाद-जहाँ पर अपूर्व क्रोध से उत्पन्न अपराध का परिमार्जन करके सेवा के लिए जो मधुर वाक्य कहा जाता है, उसे 'अनुनीति' कहते हैं॥। ३८। १. क. (टि०) अपर्वक्रोध जननं। अपूरवक्षोभजननं। २. क. (टि०) प्रभाजयेत् ।

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पोडशोऽ्याय:

*दोषैयंदन्यनामोक्तैः प्रसिद्धार्थैः प्रयोजयेत् । अन्यत्रार्थेन सम्बद्धं ज्ञेयं तत् परिदेवनम्॥ ३९ ॥

अथानुनीति :- अपूर्वक्रोधजनितमिति। अपूर्वस्य सातिशयस्य क्रोधस्य जननाथ योऽपरा घस्तम्। यथा- प्रसीवेति बरयामिदमसति कोपे, न घटते करिष्याम्येवं नो पुनरिति भवेदम्युपगमः । न मे दोषोऽस्तीति त्वमिदमपि च ज्ञास्यसि मृषा किमेतस्मिन् वक्तुं क्षममिति न वेद्धि प्रियतमे। (रत्नावली २,२०) अन्ये पठन्ति- वाक्यैः सातिशयैर्युक्तो वाक्यार्थः सप्रसाधकैः । लोकप्रसिद्धैबंहुभिः प्रसिद्धिरिति कीतिता॥ इति॥३८॥

अभिनव-'अपूर्व' का अर्थ है अतिशय अर्थात् अतिशय तोव्र क्रोध को उत्पन्न करने के लिए जो अपराध है, उसे दूर करने के लिए जो मधुर वाक्य का प्रयोग है उसे अनुनोति कहते हैं। जैसे- "आप प्रसन्न हो जाँय' यदि ऐसा कहता हूँ तो यह कथन आपके बिना बनता नहीं। यदि यह कहूँ कि फिर मैं ऐसा नहीं करूँगा तो यह कहना अपराध स्वीकार कर लेना होगा। यदि मैं यह कहूँ कि मेरा कोई अपराध नहीं है तो यह भी तुम झूठ समझोगी। हे प्रियतमे! तो इस विषय में क्या कहना उचित है यह मैं नहीं समझ पा रहा हूँ।" अन्य आचार्य इसके स्थान पर निम्नलिखित पाठ मानते हैं- "वाक्यार्थ के प्रसाधक लोक-प्रसिद्ध, अतिशय युक्त बहुत से वाक्यों से कहे गये लक्षण को 'प्रसिद्धि' कहते है।" १. क. (टि०) यट्वोषैरन्य । २. क. प्रसिद्धार्थैः प्रयोजयेत्। क. (टि०) प्रसिद्धार्थप्रयोजवम् । ३. क. (टि०) सम्बन्धं। सम्बन्धो। ४. क. (टि०) परिवादनम् । 'क' पुस्तके टिप्पण्यां यथा- "एतदेव परिवादनमिति भोजेनोक्तम्। उदाहृतं च रत्नावल्यां तृतीयेऽङ्के कुपितवासवदत्ता- निष्क्रमणानन्तरं राजा विदूषक परिवादन्नाह- "षिङ्मूखं ! त्वत्कृतोऽयमनर्थोऽस्माकमापतितः" इति परिवेदनमिति देवेश्वरेणोक्तम्। शारदातनयेन तु 'परिवादो मूषादोष' इति लक्षितम्।

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नाट्यशास्त्रे

अथ परिदेवनम्- वोषैयंदन्यनामोक्तैरिति। यथा बालरामायणे दशरथनाम्ना ये दोषा युक्ता रामनिर्वासनादयस्तैरेव प्रसिद्धार्थः सद्भिर्यत्प्रयोजितं वचनं तस्य परमार्थेन सम्बन्धो राक्षस एव युक्तौ न तु दशरथे। तत्परिदेवितं, "नरेन्द्रे वृद्धे स्त्रोवशः न्यस्तमयशः" इत्यादिना। अर्थेन प्रयोजनेन । येऽन्यनामोक्ता प्रसिद्धार्थाः दोषाः यत्प्रयोजितं संवादितमन्यहृदये संबद्ध संबन्धनं तच्चार्थेन परमार्थत उचितं तत्परि- देवितम्। यथा- एनां पश्य पुरस्तटीमिह किल क्रोडाकिरातो हरो गाण्डीवेन किरोटिना सरभसं चूडान्तरे ताडितः। इत्याकण्यं कथाद्भुतं हिमनिधावद्रौ सुभद्रापतेर्मन्दं मन्दमकारि येन निजयोर्वोवण्डयोमंण्डनम्।।

३६. परिदेवन अब 'दोषयंदन्यनामोक्तैः' इत्यादि के द्वारा 'परिदेवन' नामक लक्षण का निरूपण करते हैं- अनुवाद-दूसरों के नाम से कहे गये प्रसिद्ध दोषों के साथ प्रयुक्त जो वाक्य अन्य अर्थ से संबद्ध कर दिया जाय तो उसे 'परिदेवन' कहते हैं।। ३९ ।। अभिनव-जैसे, बालरामायण में दशरथ के नाम से जो राम निर्वासन आदि दोष कहे गये है उन प्रसिद्ध दोषों के साथ सत्पुरुषों द्वारा प्रयुक्त जो वचन है उसका राक्षसों के साथ सम्बन्ध जोड़ना उचित है, दशरथ के साथ नहीं, ऐसे वाक्यों का प्रयोग करना 'परिदेवन' है। जैसे-"वृद्ध राजा दशरथ ने स्त्रो के वश में हो जाने के कारण अयश को अपने में रख दिया" इत्यादि। इसके अतिरिक्त किसी प्रयोजन से अन्य के नाम से अभिहित जो अर्थ (दोष) है उनका प्रसिद्ध अर्थों (दोषों) के साथ किया गया सम्वाद अन्य के हृदय में स्थित दोषों का सम्बन्ध है, उसका परमार्थतः किसी अन्य अर्थ के साथ उचित है, इस प्रकार के वाक्यों का कथन 'परिदेवन' है। जैसे- "सामने इस तटी को देखो, यहाँ पर क्रोड़ा के बहाने किरातवेषधारी भगवान् शिव के मस्तक पर अर्जुन ने गाडीव से वेग के साथ भारी प्रहार किया। इस प्रकार सुभद्रापति अर्जन के पराक्रम को अद्भुत कथा को सुनकर जिसने हिमालय पर्वत पर धीरे-धोरे अपनो भुजाओं में मण्डन किया।"

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बोडशोषयाय: तटावलोकनेन प्रयोजनेनात्र धनञ्जयव्यापारो य उक्तस्तेन राजनि कस्मिश्चि- द्दोषसंबन्धो हृदये जनितः "किं तुल्ये मानुषत्वेऽर्जुनपराक्रमन्यूनता मम तत्कि मण्ड- नया अधिकारस्थानां मद" इति तत्र परमौचित्य्यापनं प्रयोजनम्। अन्ये पठन्ति- परदोषैविचित्रार्थेयंत्रात्मा परिकीत्यंते। 575 अनुक्तोऽन्योऽपि वा कश्चित्स तु क्षोभ इतीरितः ॥ इति ॥ परस्य दोषो तेम्यस्तादृशा ये विचित्रा अर्थाः परगुणास्तैहँतुभूतैरदृष्टोऽप्यथ आत्मा अन्य इति दृष्टत्वेन कीत्यंते, अन्यो वा कश्चिदात्मव्यतिरिक्त इति क्षोभो हृवयसञचलनात्। इयमेवानुक्तसिद्धि :- प्रस्तावेनैव शेषोऽर्थ: कृतस्नो यत्र प्रतीयते। वचनेन विना जातु सिद्धिः सा परिकीर्तिता॥इति ॥ दोदंण्ड मण्डनाकरणप्रस्तावादेव गम्यते पौरुषातिशयदर्पादि सर्वम्। एष चोत्कुष्टा- नामेवाभिप्रायो भवतीति प्राप्यत्वादन्ते लक्षणमिदमुक्तम्॥। ३९॥

यहाँ पर तट के अवलोकन के उद्देश्य से धनञ्जय का जो व्यापार बतलाया गया हैं उससे किसी राजा के हृदय में दोष का सम्बन्ध (ईर्ष्या) उत्पन्न हो गया- "दोनों में मानुषत्व बराबर होने पर भी मेरी अर्जुन के पराक्रम से न्यूनता है तो इस मण्डन से अधिकार-स्थित लोगों को क्या मद होगा ? इस प्रकार उस विषय में परम औचित्य का ख्यापन रूप प्रयोजन 'परिवेदन है। अन्य लोग इसके स्थान पर निम्नलिखित पाठ मानते है- "जहाँ पर कोई विचित्र अर्थ वाले दूसरों के दोषों के द्वारा अदृष्ट अथवा अन्य वस्तु को अपने विषय में कहा जाता है, उसे 'क्षोभ' कहा गया है।" दूसरे का दोष जिससे ज्ञात हो, उस प्रकार का जो परगुण कथन रूप विचित्र अर्थ है, उसके कारण अदृष्ट आत्मा रूप अर्थ का दृष्ट रूप से कथन है। अथवा आत्मा के अतिरिक्त कोई अर्थ भी है, इस प्रकार हृदय के संचालन से जो 'क्षोभ' होता है, वह 'परिदेवन' है। इसी को अनुक्त सिद्धि भी कहते हैं- "जहाँ विना कहे हो प्रस्ताव के द्वारा हो अवशिष्ट सम्पूर्ण अर्थ को प्रवीति हो जाय, उसे 'अनुक्त सिद्धि' कहा गया है। भुजदण्डों के मण्डनाकरण के प्रस्ताव से ही पौरुष के अतिशय प्राप्त दर्पादि सभी का ज्ञान हो जाता है। इस प्रकार उस कृष्टों का ही यह अभिप्राय होता है, अतः प्राप्त होने को योग्यता के कारण अन्त में इस लक्षण का कथन किया गया है।३९ ।।

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नाटवशास्थे

अथालक्कारनिरूपणम् 'उपमा रूपकं चैव दीपकं यमकं तथा। अलङ्कारास्तु विज्ञेयाशचत्वारो नाटकाश्रयाः॥४० ॥ अलङ्कारविवेचनम्

मित्युक्तम्। एवं कविव्यापारबलाद्यदर्थजातं लौकिकात्स्वभावाद्विद्यमानं तदेव लक्षण-

उपमेत्यादि। तत्र शरीरकल्पस्यालङ्कारा अधुना वक्तव्याः। तन्निरूपयितुमुद्दिशति काव्ये तावल्लक्षणं शरीरं, तस्योपमादयस्त्रयोडर्थभागे, तथा हि पृथग्भूतेन हारेण रमणी विभष्यते तथोपमानेन शशिना तत्सादृश्येन वा कविबुद्धौ चञ्चलतया परिवतमानत्वात्पृथकसिद्धेनैव प्रकृतं वर्णनीयं षनितावदनादि सुन्दरी- क्रियत इति तवेवालङ्कार:। इस प्रकार कवि-व्यापार के बल से प्राप्त होने वाले जो अर्थ ज्ञात है जो लौकिक स्वभाव से विद्यमान हैं। उसे ही लक्षण कहा गया है। विशेष-अन्य पाठों में 'परिदेवन' के स्थान पर 'क्षोभ' तथा 'अनुक्त सिद्धि' पाठ भी मिलते हैं जिनका लक्षण ऊपर दिया जा चुका है। भोज ने 'परिदेवन' को 'परिवादन' कहा है और रत्नावली का उदाहरण प्रस्तुत किया है। रत्नावली के तृतीय अङ्क में कुपित वासवदत्ता के चले जाने पर राजा विदूषक से विलाप करते हुए या दोष देते हुए कहता है-'अरे मूर्ख? घिककार है। तुम्हारे कारण ही यह महान् अनर्थ मेरे ऊपर आ पड़ा है।' (बिङ्मूख ! त्वत्कृत एवायमनर्थोऽस्माकमापतितः) सर्वेश्वर ने परिदेवन के स्थान पर 'परिवेदन' पाठ माना है। शारदातनय ने 'परिवाद' पाठ मानते हुए मिथ्यादोष के उपपादन को 'परिवाद' कहा है। (परिवादो मृषा दोषः)। अलक्कार-विवेचन अभिनव-अब शरीरकल्प लक्षणभूत शब्द और अर्थ के अलङ्कारों का निरूपण करने के उद्देश्य से नामतः उनका कथन करते हैं-उपमा आदि। अनुवाद-उपमा, रूपक, दोपक और यमक ये चार अलडार नाटक के आश्रित समझने चाहिये॥। ४० ॥ विशेष-उपमा, रूपक, दीपक और यमक ये चार नाटकाश्रित अलक्कार कहे गये है। पाठभेद से इन चारों अलङ्कारों को काव्याश्रित कहा गया है। काव्य दो प्रकार के होते हैं-दश्य और श्रव्य। काव्याश्रित अर्थात् दृश्य (नाटक) तथा श्रव्य दोनों प्रकार के काव्यों में ये चारों अलक्कार होते हैं। किन्तु नाटयशास्त्र में नाटय-सम्बन्नो विषयों का विवेचन होने के कारण नाटकाश्रित पाठ अधिक उपयुक्त प्रतोत होता है। १. क, उपमादीपकं चैव रूपक यमकं तथा। काव्यस्यैते हालङ्काराश्वत्वारा परिकोतिंताः ॥

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४४१

तस्य च त्रिधा स्थिति: । सम्पूणॅन स्फुटेन उपमानोपमेयत्वेन, यतोऽत्र वर्ण्यानां संनिधिरुपमानोपमेयद्योतकसाधारणधर्माणां तत्र उपमा। वर्वचिदन्तर्लोनेन तेनोपमानोपमेयमेकीक्रियते तत्र रूपकव्यवहारः। तत्र हि पदार्थ प्रयुज्यमान: शब्द हवाथं गर्भीकरोति न्यायः । क्वचित् एकप्रघट्टकावस्थानबलावुपमागतिः, यथा दोपके। उपमालक्षणं चैतद्वैचित्र्यान्तराणाम्। उपाध्यायमतं तु-लक्षणबलावलडाराणां वैचित्र्यमागच्छति। तथा हि- गुणानुवादनाम्ना लक्षणेन योगात्प्रशंसोपमा, अतिशयनाम्नातिशयोक्ति:, मनोरथा- स्येनाप्रस्तुतप्रशंसा, मिथ्याध्यवसायेनापह नुतिः, सिद्धया तुल्ययोगितेति, एवमन्य- दुत्प्रेक्ष्यम्। लक्षणानां च परस्परवैचित्र्यादप्यनन्तो विचित्रभाव:, यथा प्रतिषेष- मनोरथयो: सम्मेलनादाक्षेप इति। उपमाप्रपञचश्च सर्वोडलद्वार इति विद्ृद्भि: प्रतिपन्नमेव॥।४० ॥ अभिनव-काव्य में लक्षण शरीर-स्थानीय है और उपमा आदि तीन अलङ्कार (उपमा, रूपक और दीपक) उस लक्षण के अर्थभाग में रहने वाले अलङ्कार हैं। जैसे-जिस प्रकार पृथक्भूत हार से रमणी विभूषित होतो है, उसी प्रकार कवि की बुद्धि में चपलता से परिवर्तनीय होने से पृथक् सिद्ध उपमान रूप शशि (चन्द्रमा) अथबा उसके सादृश्य से प्रकृत अर्थात् वर्णनीय वनिता-सुखादि सुन्दर किये जाते है, वे ही अलङ्कार हैं। उस अलक्कार की तीन प्रकार की स्थिति है- १. जहाँ पर उपमानोपमेय भाव की स्थिति सम्पूर्ण या स्फुट रूप में हो, क्योंकि वहाँ पर वर्ण्य, उपमान, उपमान के द्योतक इत्यादि तथा साधारण धर्म की सन्निधि रहती है। २. जहाँ पर उपमानोपमेय भाव अन्तर्लीन अर्थात् अभिन्न हो जाते हैं अर्थात् उपमान और उपमेय अभेद (एक) हो जाते हैं। तब वहाँ रूपक अलङ्कार का व्यवहार होता है। वहाँ पर पदार्थ में प्रयुज्यमान शब्द इत्यादि अर्थ को गभित कर लेता है, यह न्याय है। ३. जहाँ पर दो धर्मियों के एक प्रघट्टक में रहने के बल से उपमा को स्थिति होती है। जैसे दीपक अलक्कार में। ये भिन्न बिचित्रताओं के उपलक्षण मात्र हैं अर्थात इस प्रकार की अन्य विचित्रताएँ भी हो सकती हैं। ना. थ्ा०-१६

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माट्यक्षाएनें

हमारे उपाध्याय जी का मत है कि लक्षणों के योग से अलक्कारों में विचित्रता आती है। जैसे कि-लक्षणों के गुणानुवाद नामक लक्षण के प्रयोग से प्रशंसोपामा अलक्कार होती है, अतिशय नामक लक्षण के योग से अतिशयोक्ति, मनोरथ नामक लक्षण योग से अप्रस्तुतप्रशंसा, मिथ्याध्यवसाय लक्षण के योग से अपह्न ति और सिद्धि नामक लक्षण के योग से तुल्ययोगिता अलद्कार होता है। इसो प्रकार अन्य अलङ्कारों की उत्प्रेक्षा कर लेनी चाहिए। इनके अतिरिक्त लक्षणों के पारस्परिक वैचित्र्य से अनन्त प्रकार के वैचित्र्य हो जाते। जैसे प्रतिषेध और मनोरथ के सम्मेलन से अशेष अलक्कार बनता है। सभी अलङ्कार वस्तुतः उपमा के ही प्रपञच हैं, ऐसा विद्वान् लोग मानते हैं॥ ४० ॥ विमशं-भरत नाटघशास्त्र में उपमा, रूपक, दीपक और यमक इन चार अलड्कारों का विवेचन किया है। ये अलङ्कार काव्य के शरीरभूत शब्द और अर्थ को अलंकृत करने वाले धर्म हैं। इनमें यमक शब्द को अलंकृत करता है और उपमा, रूपक, दीपर-ये तोन अलङ्कार अर्थ-भस्म को अलंकृत करने वाले घर्म हैं। अभिनवगुप्त का कथन है कि जैसे, हार से वनिता (स्मणी) सुशोभित होती है उसी प्रकार जहाँ पर पृथक सिद्ध उपमान से वर्णनीय मुखादि सुन्दर किये जाते है। अब प्रश्न होता है जिस हारादि से रमणी की सुन्दरता बढ़ती है वह रमणो से पथक सिद्ध है और रमणी भी उस हारादि से पृथक सिद्ध है। किन्तु ये उपमादि अलंकार तो शब्दार्थं रूप वाक्याश्मक काव्य से पृथक् सिद्ध नहीं होते। क्योंकि उमादि अलंकार काम्य शरीर शब्द और अर्थ में रहते हैं। इसीलिए शब्दालङ्कार और अर्थालक्वार उपमा व्यवहार की पृथक् परिकल्पना की गई है। इसका उत्तर देते हुए कहते हैं किन्तु शब्द और अर्थ कवि की बुद्धि में चञ्चलता से परिवर्तित होते रहते हैं। इस प्रकार यह परिवर्तन ही पृथक है और शरीर पृथक्। अतः अलंकार भी पृथक हो जाते हैं। अभिनवगुप्त ने अर्थालंकार को तोन वर्गों में विभाजित किया है। प्रथम वह जहां पर उपमान, उपमेय, वाचक शब्द और साधारण वर्म स्फुट रहते हैं। जैसे पूर्णोपमा। द्वितीय वह है जहाँ-जहां पर उपमान और उपमेय अभिन्न (एक) होते हैं। जैसे रूपक अलंकार में उपमान और उषमेय से अभिन्नता (अभेद) का आरोप होता है। तृतोय स्थिति वह है जहाँ पर उपमान और उपमेय दो पदार्थों में एक धर्मामिसम्बन्ध होता है। जैसे-दीपक अलंकार मैं। किन्तु अभिनवगुप्त के उपाध्याय भट्टतौत का कथन है कि लक्षणों के सामथ्यं से बलच्चारों में विचित्रता आती है, अतः लक्षणों की परस्पर विचित्रता के कारण अलक्कार के अनन्त प्रकार हो सकते हैं। किन्तु समान अलक्कार उपमा में ही प्रपञ्च है। ऐश कुछ विद्वान् मानते हैं।

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यर्रिंकञ्चित् काव्यबन्धेषु सादृश्येनोपमोयते। उपमा नाम सा' ज्ञश गुणाकृतिसमाश्रया॥४१॥

(१) उपमा तत्रोपमां लक्षयति यर्तिकञचदिति। काव्यबन्धेवु काव्यलक्षणेषु सतिस्वत्यनेन गौरिव गवय इति हि पर्यायाः। लक्षणं त्वल ङ्गारशून्यमपि न निरयंकम्। भूयांइचात्रो- वाहरणमार्गो वशितः । गुणशून्यं नु न काव्यं किञ्चितपोयति च महापुरुषो दृष्टान्तः अहेत्वप्रवशनार्थम्। एवं हि प्रसादादोनां गुणवाचोयुक्त्या व्यवहार:, तद्विना काव्यरूपत्वाभावाद्। सुन्वरास्पवं तु शरोरमुपलक्षणम्। उपमाद्यन्तरेण तु भवत्येव काव्यमिति प्रकटोकर्तृ- मुपमादोनामलङ्कारत्वेन व्यवहारः, न तु लोक इव स्फुडात्र पृथक् सिद्धिरस्ति।

१. उपमा

काव्य का लक्षण करते हैं- अनुवाद-जहाँ पर काव्य प्रबन्धों में किसो वस्तु को गुण अथवा आकृति पर आित सादृश्य द्वारा उपमा दी जाय, सादृश्य बतलाया जाय, उसे 'उपमा' समझना चाहिये॥। ४१॥ अभिनव-काव्य लक्षणों के रहने पर इससे यह दिखलाया गया है कि 'गौरिव गवयः' इसमें उपमा अलङ्कार नहीं है। यहाँ बन्ध का अर्थ गुम्फ, भणिति और वक्रोक्ति। ये सब पर्याय हैं। लक्षण अलङ्कार शून्य होने पर भी निरथंक नहीं हैं। यहाँ उदाहरणों का मार्ग बहुत दिया गया है। किन्तु गुण से शून्य कोई भो काव्य नहों है, इसमें महापुरुष दृष्टान्त हैं। काव्य में गुणों का अहेयत्व (अनिवायता) दिखलाने के लिए ही प्रसादादि में गुण शब्द को योजना करके व्यवहार किया है, क्योंकि गुणों के बिना काव्य में काव्यत्व सम्भव हो नहीं है। सुनवर स्थल तो लक्षण रूप शरोर हो है। (काव्ये तावल्लक्षणं शरोरम्)। उपमा आदि के विना भो काव्य होता है। इसे बतलाने के लिए उपमावि में अलङ्कार का व्यवहार होता है। अतः स्पष्ट है कि लोक को तरह काव्य में अलंकारों को पृथक् स्थिति नहीं है।

१. ख. बिज्ञेया ।

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माइयश्ादने

एकस्यैकेन सा कार्या ह्यानेकेनाथवा पुनः। अनेकस्य तथेकेन बहूनां बहुभिस्तया ॥। ४२॥। तुल्यं ते शशिना वक्ष्त्रमित्येकेऽनेकसंश्रया। शशाक्वत् प्रकाशन्ते ज्योतोषीति भवेतु या"॥४३॥ 'एकस्यानेकविषया सोपमा परिकोर्तिता। श्येनर्बािणभासानां तुल्यार्थ इति या भवेत् ॥ ४४।। एकस्य बहुभिः साम्यादुपमा नाटकाश्रया। बहनां बहुभिर्ज्ञेया धना इव गजा इति॥४५॥ तथा हि वण्डिना काव्यशोभावहा धर्मा अलङकारा: स्वं उत्ता इति केचित। यतिकचिवित्यनेनोपमीयत इति क्रियार्थः संबध्यते न कर्म। उप समीपे मानं प्रक्षेपणं निमित्तान्तरैरपि संभवतीत्यत आह-सादृश्येनेति। उपमीयत इत्यनेनेति उपमानोपमेये उक्ते सादृश्येनेति साधारणो धर्म:, गुण: संबन्धः आक्रियते अनेनेति गुणाकृतिः इवादि: शब्द: आधोयमाणो यस्यामिति गुणाकृतिसमाथरया॥४१॥ अत्रोवाहरणानि क्रमेण वशयति, तेषु लक्षणयोजनं तुल्यं ते इत्यादिना। दण्डो ने काव्य के शोभाकारक धर्म को अलंकार कहा है, ऐसा कुछ आचार्य कहते हैं। 'यति्कञ्चित्' इस पद का 'उपमोयते' इस क्रिया के अर्थ में अन्वय है, कर्म में नहीं। उप अर्थात समोप में मान अर्थात् प्रक्षेपण निमित्तान्तरों से भो सम्भव है। इसलिए 'सादृश्येन' कहा है। 'उपमीयते' इस पद से उपमेय को कहा है और 'अनेन' पद के द्वारा उपमान का कथन है। 'सादृश्य' पद से साधारण धर्म का निर्देश है। तथा 'गुणाकृतिः' शब्द इत्यादि का बोधक है। उससे आश्रयण जिसमें हो वह 'गुणाकृतिसमाधय' है॥ ४१॥ अनुवाद-एक पदार्थ का एक के साथ तुलना करनी चाहिए। अथवा एक का अनेक के साथ या अनेक का अनेक के साथ अथवा अनेक का एक के साथ तुलना करनो चाहिए।। ४२॥ अभिनव-अब आत्मा के उदाहरणों को क्रमशः दिखते हैं। इनमें उपमा के लक्षण को योजना 'तुल्यं ते' इत्यादि के द्वारा दिखलाते हैं। जैसे- १. ख. ग. वाक्यमिति ह्येककृता भवेत्। २. क. (टि०) चन्द्रवत्सं प्रकाशन्ते ज्योतोषीति द्विजोत्तमाः । ३. क. (टि०) एकेनानेकविषया। एकेन मात्वनेकेषामुपमा परिकोतिता।। ४. क. (टि०) श्येनबहिणगुध्ाणां तुल्याथं इति या भवेत्। ५. क. (टि०) घना इव गजा यत्र बहूनां बहुभिस्तथा।।

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षोडशोडब्याय:

प्रशंसा चैव निन्दा च कल्पिता सदृशो तथा। या किञ्चित्सदृशी ज्ञेया सोपमा पञ्चधा बुधैः ॥४६॥ प्रशंसा थथा- दृष्ट्वा तु तां विशालाक्षी तुतोष मनुजाधिपः। मुनिभि: साधितां 'कृच्छात् सिद्धि मूतिमतोमिव ॥ ४७ ॥ निन्दा यथा- सा तं सर्वगुणेर्हीनं सस्वजे कर्कशच्छविम् । वने कण्टकिनं वल्लो दावदग्धमिव द्रुमम् ॥ ४८ ॥

एवमुपमानोपमेयसंख्याभेदेन तद्भेदानुवत्त्रा तद्गतशरोरभेदेन शरीर- भेदानाह-प्रशंसा चैवेत्यादिना।

अनुवाद-"तुम्हारा मुख चन्द्रमा के समान है" यहाँ एक के साथ एक की उपमा दो गई है। 'चन्द्रमा के समान ज्योतियाँ (नक्षत्र) प्रकाश्ञित हैं'। यहाँ एक चन्द्र से अनेकु नक्षत्रों को उपमा दो गई है। 'येन ( बाज), मोर (पाठभेद से गिद्ध) के समान नेत्र' यहाँ पर एक नेत्र को अनेकों के साथ उपमा कथित है। तथा "हाथो मेधों के सदृश हैं" यहाँ पर अनेकों की अनेक के साथ सादृश्य बतलाया गया है॥ ४३-४५॥ अभिनव-इस प्रकार उपमान और उपमेय को संख्या के भेद से उपमा के भेदों को दिखलाकर अव तद्गत शरीर के भेदों को 'प्रशंसा चैव' इत्यादि के द्वारा दिखलाते हैं- अनुवाद-प्रशंसा, निन्दा, कल्पिता, सादृशो तथा किञ्ित्सदृशी ये उपमा के पाँच प्रकार हैं ।।४६।। १. प्रशंसोपमा अभिनव-उपमान के प्राशस्त्य से प्रशंसोपमा होतो है। जैसे- अनुवाद-मुनियों के द्वारा अत्यन्त कष्ट से साधित (सिद्ध की गई, प्राप्त) मूर्तिमती सिद्धि के समान उस विशाल पक्षो रमगो को देखरुर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ।। ५७।

१. क. (टि०) कृत्वा । २. क. (टि०) संश्रिता पुरुषाघमम्। ३. क. (टि०) वह्निदग्वामिव।

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नाटपचाबने

कल्पिता यथा- १क्षरन्तो दानसलिलं लोलामन्थरगामिन: । मतक्कजा विराजन्ते जङ्गमा इव पर्वताः ।।४९।। सादृशी यथा- यत्वयाऽध कृतं कर्म परचितानुरोधिना । सदृशं तत्तवैव स्यादतिमानुषकर्मणः ॥५०॥ उपमानस्य प्राशस्त्यात्प्रशंसोपमा एव सवंत्र । एवमत्र सदृशेन कल्पितः सः। असदृशोत्यन्ये पठन्ति, व्याचक्षते च सदृश इहोपमेय उच्चते। यथा च व्युत्पत्ति: समान इव दृश्यमानस्तमिवात्मानं पश्यतोति । २. निन्दोषमा अभिनव-उपमान को निन्दनोयता से 'निन्दोषमा' होती है। जैसे- अनुवाद-उस नायिका ने सब गुणों से होन और कर्कश छवि वाले उस पुरुष का उस प्रकार आलिङ्गन किया जिस प्रकार लता कण्टकाकोणं दावाग्नि से दग्ध दृक्ष को आलिङ्गन करतो हैं॥ ४८ ॥ ३. कल्पितोपमा अभिनब-इसो प्रकार जहाँ पर सादृश्य के साथ सादृश्य कल्पित हो, वहाँ 'कल्पितोपमा' होतो है। जेसे- अनुवाद-गण्डस्थल से मदजल का क्षरण करने वाले तथा लीला से मन्थर गति से चलने वाले गजराज जङ्गम पर्वत के समान सुशोभित हो रहे है॥४२॥ विशेष-यहाँ पर जङ्गम पर्वतों की उपमानत्वेन कल्पना की गई है, क्योंकि अन्य के साथ उनका सादृश्य नहीं बनता। अतः सादृश के साथ सदूश को कल्पना की गई है। ४. सद्शोपमा अनुवाद-दूसरों के चित्त का अनुरोध करने वाले आपने जो क्मं किया है वह अतिमानुष कर्म करने वाले आपके ही समान हैं॥ ५० ॥ अभिनव-अन्य आचार्य 'कल्पितासदृशो' में अकार का प्रश्लेष मानकर 'सदृशो' के स्थान पर 'असदृशो' पाठ मानकर उसको व्याख्या करते हैं कि यहाँ पर 'सदृश' पद उपमेय को कहता है। जैसे-व्युत्पति है-जो समान दिखाई देता है उसके समान अपने को देखता है। १. क. (टि०) मदवारिनिषिकाक्का लोला विभ्रमनामिनः ।

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किञ्चित्सदृशी यथा- संपूर्ण चन्द्रवदना नोलोत्पलदलेक्षणा'। मत्तमातक्गमना संप्राप्तेयं 'सखी मम॥ ५१॥ यत्रोपमेयस्यैवोपमानता। सेयं सदृशी। किञ्चित्सदृशमित्थमुपमानं भवति। यत्र सादृश्यगमकं स्फुट पदं नास्ति। न च सर्वात्मना रूपक इव वस्तुद्वयमीलनं तेन समासव्यंग्या किचित्सदृशोत्युक्ता। तदुवाहरति संपूर्णेति। सप्तम्युपमानपूर्वपदस्येति समासबलादुपमानता- प्रतिपत्तिः। तत्र ह्य त्तरपदलोपः सन्नियोगशिष्टत्वात्। क्याड सलोप हव मत्तमा- तङ्गगमनमिव गमनमस्या इत्युत्तरपदलोपोऽपि ।। ५१॥ ५. किञ्चित्स दृशी अभिनव-जहाँ पर उपमेय को ही उपमानता होती है वह यह सदृशी है। इस प्रकार किञ्चित् सद्श उपमान होता है। जहाँ पर सादृश्य का गमक कोई स्फुट पद नही होता है और न सर्वात्मना रूपक के समान वस्तुद्वय का मोलन होता है। इसलिए समास व्यक्त होने वाली उपमा को 'किञ्चित्सदृशी' कहा गया है। इसका उदाहरण है- अनुवाद-पूर्ण चन्द्र के समान मुखवाली, नील कमल के समान नेत्रों वाली तथा मदमत्त हाथी के समान गति वाली यह मेरी सखी आ गई ॥५१॥ अभिनव-"सप्तम्युपमानपूर्वपदस्य बहुब्रीहिरुत्तरपदलोपश्च" इस वार्ततिक के द्वारा समास करने पर उपमानता की प्रतिपत्ति होती है और समास होने पर उत्तर पद का लोप हो जाता है। जैसे-'मत्तमातङ्गगमना' अर्थात् मतवाले हाथो के समान गमन है जिसका। इसमें 'मन्थरगमन' रूप धर्म तथा इत्यादि वाचक शब्द का अभाव है। यहाँ गमन रूप उपमान का लोप हो गया है तथा तद्वाचक इत्यादि का भी अभाव हो गया है। १. क. (टि०) नीलोत्पल निभेक्षणा। २. क. (टि०) मत्तनागेन्द्रगमना । ३. क. (टि०) प्रिया।।

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४४८

उपमाया बुधैरेते भेदा ज्ञेयाः समासतः। शेषा ये लक्षणैनोक्तास्ते ग्राह्याः काव्यलोकतः२॥५२॥ नानाधिकरणार्थानां शब्दानां संप्रदीपकम्"। *एकवाक्येन संयुक्तं तद्दीपकमुच्यते ॥५३॥ प्रसुतं मधुरं चापि गुणैः सर्वैरलंकृतम्। काव्ये यन्नाटके विप्रास्तद्दीपकमिति स्मृतम्॥५४॥

शेषा: लोके काव्ये च ये तद्भेदा: दृश्यन्ते। ते लक्षणद्वारेणोक्ता इति ग्राह्याः स्वयं स्वीकतु शक्याः। अस्मिन्ये नोक्तास्ते लोकात्काव्याच्च ग्राह्या इत्यन्ये, शेषा इत्यत्र पुनरुक्तम्॥ ५२॥

अनुवाद-इस प्रकार विद्वानों को संक्षेप में उपमा के इन भेदों को समझना चाहिए। शेष जिन भेदों को लक्षणों द्वारा नहीं कहा गया है, उन्हें लौकिक काव्यों के द्वारा समझना चाहिए॥ ५२॥ अभिनब-शेष लोक और काव्य में जो उपमा के भेद दिखाई देते हैं वे लक्षण के द्वारा कहे गये हैं, ऐसा ग्रहण करना चाहिए और यहाँ इस शास्त्र में जिन्हें नहीं कहा गया है, उन्हें लोक और काव्य से ग्रहण करना चाहिए। ऐसा अन्य लोग कहते हैं। 'शेषः' यह पद यहाँ पुनरुक्त है ॥ ५२॥ दीपक अनुवाद-भिन्न-भिन्न अधिकरण के कारण भिन्न-भिन्न अर्थों वाले शब्दों का जो प्रकाशक (आकांक्षा पूरक) और एकवाक्यता से संयुक्त हो, उसे 'दीपक' अलङ्कार कहते हैं ॥। ५३॥ पाठान्तर अनुवाद-हे विप्रो ! जो काव्य और नाटकों में मधुर रूप से प्रसृत हो तथा समस्त गुणों एवं अलंकारों से अलंकृत हो, उसे 'दीपक' अलंकार कहते हैं॥ ५४ ॥

१. क. (टि०) ये शेषा लक्षणे नोक्तां। २. क. (टि०) संसाध्यास्तेऽपि लोकतः । ३. क. (टि०) नानाघिकरणस्थानां । ४. क. (टि०) सम्प्रकीतितम्। संप्रदीपकः । ५. क. (वि०) एकवाक्येन संयोगो यस्तहीपकमुच्यते। एकवाक्येन संयोगो यस्तु दीपकमुच्यते।

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षोडसोष्ड्याय:

यथा- सरांसि हंसै: कुसुमैश्च वृक्षा मत्तैद्विरेफैश्च सरोष्हाणि। गोष्ठोभिरुद्यानवनानि चैव तस्मिन्न शून्यानि सदा क्रियन्ते ॥५५॥ स्वविकल्पेन रचितं तुल्यावयवलक्षणम्। किञ्चित्सादृश्यसम्पन्नं यद्रूपं रूपकं तु तत्॥ ५६॥ *नानाद्रध्यानुरागाद्यैर्य दौपम्यगुणाश्रयम् रानिर्वर्णनायुक्तं तद्रूपकमिति स्मृतम् ॥५७॥ अथ दीपकम् - नानाधिकरणार्थानामिति। नाना ये शब्दान्तरवाक्यपदात्मानस्तेषां अधि- करणार्थानामाशये अर्थोऽथंता येषां तथाभूतानां साकांक्षाणाभिति तेषां यत्सम्यक् प्रकर्षेण दोपकमाकांक्षापूरकक्रियागुणजात्यादि तद्दोपकम्, यत एकेनावा- न्तरवाक्येनासंयुक्तं सत्तथा करोति ततो दीपप्रकृतित्वात्तथोक्तमित्यर्थः।।५३। अभिनव-अब दीपक को कहते हैं-नाना अर्थात् अनेक जो वाक्य रूप या पद रूप भिन्न-'भन्न शब्द है उनके अधिकरण में अर्थात् अधिकरण अर्थों के आश्रय में जो अर्थता, तथाभूत साकांक्ष पद उनका सम्यक रूप से जो दोपक है अर्थात् आकांक्षा- पूरक क्रिया, गुण एवं जाति आदि जहाँ हो, वह 'दीपक' अलक्कार है। क्योंकि एक अवान्तर वाका के द्वारा असंयुक्त वाक्य भी संयुक्त को तरह कर दिया जाता है। अतः दीपक के समान प्रकृति होने से इसे दोपक अलङ्कार कह दिया है॥ ५३॥ यथा- अनुवाद-उस नगर में सरोवर (तालाब) हंसों से, वृक्ष फूलों से, कमल मतवाले भौरों से तथा उद्यान गोष्ठियों से कभी शून्य नहीं रहते हैं ॥ ५५॥ रूपक- अनुवाद-जो अपने विकल्प से रचित हो, जो समान अवयवों वाला और किञ्चित (थोड़े) सादृश्य से सम्पन्न हो, वह 'रूपक' कहलाता है ॥५६॥ पाठान्तर- अनुवाद-अनेक द्रव्यों के सम्पर्क से औपम्य के गुणों का आश्रय लेकर जो रूप वणन से युक्त हो, उसे 'रूपक' कहते हैं॥।५७। १. क. (भ.) स्वविकल्पैविरचिते।

वा० च्रा०-५७

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माटयशाहतरे

यथा- पद्माननास्ता: कुमुदप्रहासा 2विकासिनीलोत्पलचारुनेत्राः। वापोस्त्रियो हंसकुलैर्न स्वना्द्रिविरेजुरन्योन्यमिवाह्वयन्त्यः१ ।५८।।

अथ रूपकम्- स्वविकल्पेन रचितमिति। स्वविकल्पेन यद्रपं वदनस्य रचितं चन्द्रात्मकं तद्रपयति परमिति रूपकम्। तस्य द्वौ भेदौ तुल्यैरवयवैः सर्वेरेवान्यरूपोकृतैर्युक्तं, यदि] वा किश्चित्सादृश्ययुक्तं रपितम् । यत्रापि किञ्चिदन्यरूपसादृश्याद्युक्तं रूपान्तररूपितं यत्रैकदेशविर्वत प्रसिद्धं द्रव्याद्यस्ति। या इति युक्त: पाठः। ततो हि समासोपमात्वं पद्मानना इत्यावेर्निवार्यते। हंसकुलानां नर्भसचिवत्वमरूपितमपि गम्यत इत्ययमंशो द्वितीयस्योदाहरणम्। अन्योन्यमिहेति पाठः, इव शब्दे तूपमाशक्योत्प्रेक्षा वा। सा त्विह कल्पितोपमा। उपमांशस्यास्फुरणादाभिमानाव्यं लक्षणं सैवं यस्यालक्कारकारैरल ड्वारतयोक्ता तत्रोपमोद्भेवश्च तग्युकतालङ्वारता भूष्यभूषकयो: पृथग्भावात्। नो चेत्तल्लक्षणमेव। अब रूपक का (लक्षण) करते हैं-अपने विकल्प से अर्थात् अपनो कल्पना से मुख को चन्द्र के रूप में रूपित करना अर्थात् दूसरे को अपने रूप से युक्त करना 'रूपक' कहलाता है। उस रूपक के दो भेद हैं-(१) वह समान अववव वाले सभी अवयिवों को अन्यों के रूप से रूपित करना। (२) अथवा किञ्चित् सादृश्य से युक्त रूप वाला करना। यहाँ पर से कुछ दूसरे के रूप के सादृश्य से युक्त अर्थात् रूपान्तर से रूपित करना होता है। जहाँ एकदेशविरवत्ति नामक प्रसिद्ध द्रव्यादि रूपक है। उदाहरण जैसे- अनुवाद-वे कमलरूपी मुख वालो, कुमुद रूपी हास वालो खिले हुए नील कमल रूपी नेत्रों वाली, वापी रूपो स्त्रियाँ हंसों के कूजन रूपी वाणी से परस्पर बात करती हुई सुशोभित हुई ॥५८॥

१. क. कुमुदप्रयासां। कुमुबाग्रहासा। २. ख. विकासिनीलोत्पलचारुसनेत्रा । ३. क. (टि०) वापीतरुण्योऽघिकमवभान्ति। शोभामिवान्योन्यमषिक्षिपन्त्यः। ४. क. इहालपन्त्यः । इवालपन्त्य:। 07101.05

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तर्केचित्पठन्ति-

रूपनिवर्णनायुक्तं तद्रूपकमिति स्मृतम्॥ व्याकुर्वते च-रूपकशब्दस्यान्वर्याख्यायकमेतत्, औपम्यस्य गणत्वेनाप्रधान- तथा संश्रयो यत्र तथा कृत्वा रूपस्य यान्यरूपेण निश्चिस्य वणना तद्रूपकम्। कथं तग्निश्चयः इत्याह-नानाभूतेन पृथन्भूतेनापि द्रव्येण योऽनुरागः स्फोटकस्येव लाक्षया तत आदिग्रहणाद् भ्रान्तिगौणलाक्षणिकादिभेदानां ग्रहणम् इति ॥५८॥

अभिनव-यहाँ पर 'ताः' को जगह 'याः' यह पाठ युक्त है। इससे 'पद्माननाः' इत्यादि में समासोपमा का निवारण करते हैं। 'हंसकुले:' में अरूपित भी नर्म- सचिवत्व व्यक्त होता है, इतना द्वितीय भेद का उदाहरण है। यहाँ पर 'अन्योन्यमिवालपन्त्यः' यह पाठ ठोक नहीं है, अपितु 'अन्योन्यमिह' यह पाठ ठीक है। क्योंकि इव घटित पाठ मानने में 'उपमा' अथवा 'उत्प्रेक्षा' की आशङ्का होगी, अतः 'अन्योन्यमिह' पाठ हो उचित है। यहाँ पर तो 'कल्पितोपमा' है। केसे ? यहाँ उपमांश के अस्फुरण होने से अभिमानाख्य लक्षण है, वह उसे अलङ्कारिकों ने अलक्कार के रूप में कहा है। वहाँ उपमा का उद्भेद (व्यञ्जन) है। अतः अलङ्कारता है। क्योंकि भूष्य-भूषक भाव में पृथक्त्व नहीं है, अतः लक्षण ही है।

जैसा कि कुछ लोग कहते हैं कि- "नाना द्रव्यों के अनुराग से औषम्य (उपमा) के गुणों के आश्रय से जो रूप-वर्णना से युक्त है, वह 'रूपक' है।"

इसकी व्याख्या करते हैं कि यह पठन रूपक शब्द के अन्वर्थ का आख्यापक है। औपम्य के गुण-रूप से अप्रधान रूप से संश्रयण है जहाँ, वैसा करके रूप का अन्य रूप से निश्चय रूप से जो वर्णन है, वह रूपक है। यह निश्चय कैसे होगा ? इस पर कहते हैं-नानाभूत अर्थात् पृथग्भूत द्रव्य के द्वारा जो अनुराग है। जैसे लाक्षण के द्वारा स्फटिक मणि को रक्त कर देना। यहाँ पर 'आदि' पद के ग्रहण से भ्रान्ति, गौण, लाक्षणिक आदि भेदों का ग्रहण होता है ॥५८॥

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४५२ नाटयशाएणे

शब्दाभ्यासस्तु यमकं पदादिषु विकल्पितम् । विशेषदशनञ्चास्य गदतो मे निबोधत ॥५९॥ एवमर्थविषयलक्षणप्रसङ्गेनार्थालङ्कारान् प्रदश्यं शब्दालङ्गारस्वरूपमाह- शब्दाभ्यासस्तु यमकमिति। तुरर्थालङ्कारेभ्यो व्यतिरेकमाह। शब्दशब्देन वाक्यं पदं तदेकवेश वर्ण इति सवं गृह्यते तेनानुप्रासस्य लाटीयादेरनेनैवोपसंग्रहः। यमौ दवो समजातावुच्येते तत्प्रकृतित्वाद्यमकम्। तेनेकस्याक्षरस्य पदस्य वा द्वितीयं सदृशं निरन्तरं सान्तरं वा शोभाजनकमलङ्कारः। यथा मुक्ताफलस्योचितमुक्ता- फलान्तरं पद्मरागावेर्वोपाशयविशेषः समुचितसहासीन सत्पुरुष मध्यपतनं वासत्पुरुष- न्तरस्य। पादादिषु आविग्रहणं तवा मध्यान्तराविषु विकल्पितवचनान्नास्त्यपि स्थापननियमोऽनुप्रासलाटीयाविसंग्रहायेत्याह। विशेषदर्शनमिति विशेषाणामुद्दश- लक्षणानामित्यर्थः॥ ५९॥ ४. यमकालङ्कार अभिनव-इस प्रकार अर्थविषयक लक्षण के प्रसङ्ग से अर्थालङ्कारों के स्वरूप को बतलाकर अब शब्दालङ्कार के स्वरूप को कहते हैं-'शब्दाभ्यासस्तु यमकमित्यादि' । अनुवाद-शब्दों कोी अभ्यास अर्थात शब्दों को आवृत्ति यमक है, जो पाद के आदि अर्थात् पाद के आदि, मव्य एवं अन्त में विकल्पों से युक्त है। अब इसके विशेष स्वरूप को जानकारी मैं बतलाता हूँ, आप समझें॥ ५९॥ अभिनव-यहाँ पर 'तु' शब्द का प्रयोग अर्थालङ्कारों से शब्दालङ्कारों का भेद बताने के लिए कहा गया है। यहाँ 'शब्द' पद से वाक्य, पद, पदैकदेश तथा वर्ण सभी का ग्रहण हो जाता है। अभिनव-'यम' का अर्थ है युगल अर्थात् जहाँ दो बालक साथ उत्पन्न हों अर्थात् जुड़ने आदि। उसके प्रकृति (स्वभाव) के समान होने के कारण इसे 'यमक' कहा जाता है। इसलिए एक अक्षर, पद अथवा वाक्य के सदृश सान्तर अथवा निरन्तर में प्रयुक्त हुआ। द्वितीय वर्ण, पद और वाक्य के शोभा-जनक हो जाने से अलङ्कार कहलाता है। जैसे, मोती के सजातोय मोती या पद्मराग आदि मणियों का उपाश्रय विशेष तथा जैसे सत्पुरुषों के मध्य में योग्यता के साथ आसीन द्वितीय सत्पुरुष को शोभा होतो है। 'पादादि' में आदि पद के ग्रहण से मध्य और अन्त का भी ग्रहण होता है। 'विकल्प' के कथन से मध्य और अन्त में स्थापन या नियम नहीं है अर्थात् विकल्प से लाटानुप्रास का भी संग्रह हो जाता है। विशेष दर्शन का अर्थ है उद्देश्य एवं लक्षणों का दर्शन । ५९॥ १. क. (टि०) शब्दाभ्यासं तु।

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पादान्तयमकं चैव काञ्चीयमकमेव घ। 'समुद्गयमकं चैव विक्रान्तयमकं तथा ॥ ६०॥ यमकं चक्रवालं च सन्दष्टयमकं तथा। *पदादियमकठचैव ह्याम्रडितमथापि च॥६१॥ चतुर्व्यवसितञ्चैव मालायमकमेव च। `एतददृशविधं ज्ञेयं यमकं नाटकाशयम्॥ ६२॥ चतुर्णां यत्र पादानामन्ते स्यात्सममक्षरम्® । तद्वै पादान्तयमकं विज्ञेयं नामतो यथा ॥६३ ॥ यथा- दिनक्षयात् संहुतररमिमण्डलं दिवीव लग्नं तपनीयमण्डलम्। विभाति ताम्र्र' दिवि सूर्यमण्डलं यथा तरुण्याः स्तनभारमण्डलम् ॥६४॥

अक्षरमिति एकमनेकं च संहृतम् ॥६३॥ रश्मीनां मण्डलमोघो यस्य। तपनीयमण्डलम् सौवर्णं चक्रम्॥ ६४॥।

अनुवाद-पादान्तयमक, काञ्चीयमक, समुदगयमक, विक्रान्तयमक, चक्र- वाल यमक, संदष्ट यमक, पादादि यमक, आस्रेडित यमक चतुर्व्यवसित यमक, और मालायमक ये नाटकाश्रित यमक दस प्रकार के हैं॥ ६०-६२ ।। १. पादान्त यमक अनुवाद-जहाँ पर चारों पादों के अन्त में समान अक्षर (या पद) हो, तो उसे 'पादान्त यमक' समझना चाहिए ॥ ६३॥ अभिनव-यहाँ पर अक्षर पद से एक अथवा अनेक अक्षरों का ग्रहण होता है॥। ६४ ।। उदाहरण जैसे- अनुवाद-दिन के क्षीण हो जाने पर आकाश में सूर्य का रक्ताभ मण्डल अपने रश्मिमण्डल को समेट कर आकाश में लगे हुए स्वणिम मण्डल जैसा लग रहा है अथवा तरुणी के स्तन मण्डल जैसा प्रतीत हो रहा है॥ ६५ ।। १. क. (टि०) समुद्रयमकर्चैव । २. ग. पादादियमकरचैव। ३. क. ग. एतादृशविधं ज्ञेयम् । ४. क. (टि०) यमकाक्षरम् ।

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नाटपशाएत्रे लोकानां प्रभविष्णुर्दैत्येन्द्रगदानिपातनसहिष्णुः । जयति सुरदैत्यजिष्णुर्भगवानसुरवरमथनकारो विष्णुः ॥ ६५॥ पादस्यान्ते तथा चादौ स्यातां तत्र समे पदे। तत्काञ्चीयमकं चैव विज्ञयं सूरिभिर्यथा॥६६॥ यामं यामं चन्द्रवतोनां द्रवतीनां व्य क्ताव्य क्तासारजनीनां रजनोनाम्। फुल्ले फुल्ले सम्भ्रमरेवाभ्रमरे वा रामा रामा विस्मयते च स्मयते च ॥ ६७ ॥ अभिनव-उपसंहृत रश्मियों का मण्डल जिसका तपनीय मण्डल का अर्थ है स्वर्णिक (सुनहरा) चक्र ॥ ६५ ॥ विशेष-यहाँ पर श्लोक के प्रत्येक पाद के अन्त में 'मण्डलम्' पद आया है अतः यहाँ 'पादान्त यमक' है। अन्य उदाहरण- अनुवाद-लोगों को प्रभावित करने वाला दैत्यराज हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के गदाओं के प्रहार को सहज करने वाला देवताओं एवं दैत्यों को जीतने वाले असुरों का मन्थन करने वाले भगवान् विष्णु सबसे उत्कृष्ट हैं ॥ ६६॥ अन्त में 'ष्णु' आया है, अतः यहाँ 'पादान्त यमक' है। २. काञ्ची यमक अनुवाद-जहाँ पर इ्लोक के पाद के आदि तथा अन्त में समान पद हों, उसे विद्वानों को 'काञची यमक' समझना चाहिए ॥ ६६ ॥ उदाहरण जैसे- अनुवाद-चाँदनो वालो रात्रियों के प्रत्येक प्रहर में दौड़ने वालो सारभूत वधू के मध्य में अतिशय व्यक्त होकर रमण करने वाली रामा (नायिका) भ्रमर- युक्त फूलों पर गर्व करती है, अथवा हँसती है और भ्रमर-रहित पुष्प के विषय में विस्मय करती हैं॥ ६७॥ १. पादल्यादो तथा चान्ते स्यातां यब् समे पदे। २. ख. मायामाया। क. (टि०) यामा यामा यामवतो यामवती य।

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अर्घेनैकेन यद्वृत्तं सर्वमेव समाप्यते। समुद्गयमकं नाम तज्ज्ञेयं पण्डितैर्यथा॥६८॥ केतकोकुसुमपाण्डुरदन्तः शोभते प्रवरकाननहस्ती। केतकीकुसुमपाण्डुरदन्तः शोभते प्रवरकाननहस्ती ॥६९॥

सारभूतानां जनीनां बधुनां युवतोनां संवन्धिनी। परिवारत्वेन स्थिता रामारामा सर्वैव स्त्री व्यक्ता ईषत् स्फुटाकारा। चन्द्रवतीनां रजनीनां रात्रीणां संबन्धिनी। यामं यामं सर्वप्रहरम्। स्मयते यतः पुष्पे विकसिते सभ्रमरके। तद्विना वा विस्मयते॥ ६७ ॥ केतकीकुसुमवद्भासुरौ दन्तावस्य सोडयं। प्रकारकमाननं यस्य तादृक शोभते हस्ती। तथा केतकीकुसुमात्मकौ पाण्डुरौ दन्तौ यस्य तत्प्रवरकाननं हस्तिरूपं शोभते। "अत्र चार्थभेदो मुनिना नादृत" इति तवप्रसिद्धम्। व्युत्पत्त्यादिना पर- हृवयं वेदितमस्माभि: ॥ ६९।। अभिनव-सारभूत (श्रेष्ठ) युवती बहुओं से सम्बन्धित, परिवार रूप से स्थित सभी रामा (स्त्रियाँ), 'व्यक्ता' पद का अर्थ है जिसका आकार ईषत्स्फुट हो। चन्द्रवती अर्थात् चाँदनी युक्त रजनी (रात्रि) । 'यामं यामं' पद से सभी प्रहरों का ग्रहण होता है। भ्रमरयुक्त विकसित (खिले हुए) फूलों को देखकर हँसतो हैं और भ्रमर-रहित फूलों को देखकर विस्मित होती हैं॥ ६७ ॥ ३. समुद्ग यमक अनुवाद-जिस वृत्त के एक ही अर्थ से अर्थात् पूर्वाद्धं से सम्पूर्ण वृत्त को समाप्ति हो जाती है। उसे विद्वान् लोग 'समुद्ग यमक' कहते हैं ॥ ६८ ॥ उदाहरण जैसे- केतकी के फलों जैसे सफेद दाँतों वाला प्रवर जंगल का हाथी सुशोभित हो रहा है। केतकी के फूल जैसे सफेद दाँतों वाले हाथो के रूप में यह जंगल सुशोभित है॥ ६९ ॥

१. ख. अर्थनैकेन । १. क. समुद्गयमकं तत्तु विज्ञेयं कामतो था। ३. ख. पाण्डरदन्त: । ४. ख. पाण्डरदन्त:।

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नाटयशा्त्रे

एकैक पावमुत्क्रम्य' द्वौ पादौ सदृशौ यदि"। विक्रान्तयमकं नाम 'तद्विज्ञेयमिदं यथा ॥ ७० ॥ स पूर्व वारणो भूत्वा द्विशृ्ज एव पर्वतः। इव पर्वतः ॥ ७१॥

द्वे शुङ्गे यस्य तथा विगतं शुङ्गं यस्य ।। ७१॥

अभिनव-केतकी के फूल जैसे देदीव्यमान है दाँत जिसके वह यह। प्रवरक श्रेष्ठ है आनन (मुख) जिसका ऐसा हाथी शोभित हो रहा है। तथा केतकी के फूल ही हैं पीले दाँत जिसके, ऐसे हाथियों से युक्त श्रेष्ठ कानन शोभित हो रहा है। 'यहाँ पर अर्थभेद का मुनि ने आदर नहीं किया, किन्तु यह सिद्धान्त अप्रसिद्ध है अर्थात् सर्वमान्य नहीं है। व्युत्पत्ति आदि के द्वारा हमने दूसरों के हृदय को समझा है ॥। ६९ ।। बिमर्श-यहाँ पर पूर्वाद्ध के समान हो उत्तरारद् क्लोक है, अतः यही 'समुद्ग- बमक' है।

४. विक्रान्त यमक अनुवाद-जहाँ पर एक-एक पाद का उत्क्रमण कर (छोड़कर) दो पाद समान हो तो उसे 'विक्रान्त यमक' कहते हैं॥ ७० ॥ जैसे- अनुवाद-यह हाथी पहिले द्विशुङ्ग (दो चोटियों) वाले पर्वत जैसा मालूम पड़ता था, जब वह दन्त विहोन हो गया, अर्थात् उसके दाँत टूट से गये तो वह शुङ्ग-विहोन पर्वत जैसा लग रहा है।। ७१।। अभिनव-दो शृङ्ग (शिखर) है जिसके, वैसा अथवा जिसके शृङ्ग (दाँत) विकल हो गये हैं, टूट गये हैं, ऐसा ॥ ७१॥ विशेष-यहाँ पर प्रथम और तृतीय पाद को छोड़कर द्वितीय और चतुर्थ पाद समान है अतः यहांँ 'विक्रान्त थमक' है। १. ख. उरिक्षण्य। २. क. यदा। ३. ग. तब्ज्ञेयं नामतो यथा। ग. सम्पूर्णवानरो भूत्वा।

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बोडशोउव्यायः

पूर्वस्यान्तेन पादस्य परस्यादियंदा समः। चक्रवच्चक्रवालं तु विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ७२॥ तुल्यात्पादद्वयादन्त्यावेकेनादिर्यदा सम:॥ पव सर्वत्र चक्रवालन्तु तद्विज्ञेयं बुधैर्यथा ॥७३॥ शैला यथा शत्रुभिराहता हता हताशच 'भूयस्त्वनुपुङ्कगः खगैः। खगश्च सर्वैर्युधि सन्चिताश्चिता- श्चिताधिरूढा निहितास्तलैस्तलै: ॥ ७४॥

एते युधि संचिता: सङ्गीभूता: चितामघिरूढाः । शत्रुभिः कतृभि: खगैः शरैः अनुपुद्गैः पुद्गान्तमग्नैः आहताः हताः। आहतप्रकारमाह-ताः छिन्नपक्षाः शैला इव खगैः गुघ्नादिभि: तलैः पक्षबाहुभि: निहताः भूयः एतेरैव चिता व्याप्ताः। "निहतानामस्तं मरणं लान्ति तैनिहतास्तलैः" इति क्लिष्टत्वादुपेक्ष्यम् ।।७४॥

५. चक्रवाल यमक अनुवाद-जहाँ पर पूर्व पाद का अन्तिम शब्द जब दूसरे पाद आदि में आवृत्त हो तो उसे 'चक्रवाल' यमक समझना चाहिए।। ७२॥। अथवा- अनुवाद-जहाँ पर समान दो पदों के अन्तिम भाग की अपेक्षा से एक के साथ पाद का आवि भाग जब सब जगह समान हो तो विद्वानों ने उसे 'चक्रवाल' यमक कहा है।। ७३ ।। अनुवाद-जैसे 'शैला यथा' इत्यादि इलोक के प्रथम पाद का अन्तिम पद 'हताः' द्वितीय पाद के आदि में, द्वितीय का अन्तिम पद 'खगैः' तृतीय पाद के आदि में तथा तृतीय पाद का 'चिताः' अन्तिम चतुर्थ पाद के आदि में आवृत है, अतः यहाँ 'चक्रवाल यमक' है॥ ७४॥

१. ख. वाणैरनुपुंखपुंखै।। ग. भूयोऽप्यनुपुंखगैः । २. ख. सबन्चिताश्चिताः । ग. संचिताश्चिताः । ३. ख. हता नराः। ग. निहता फलैः कलैः । ना. था०-१८

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नाटश्चास्त्रे

आदौ द्वौ यत्र पादौ तु भवेतामक्षरैः समौ। सन्दष्टयमकं नाम विज्ञेयं तद् बुधैरयंथा॥ ७५॥ पश्य पश्य रमणस्य मे गुणान् Fe येन येन वशगां करोति माम्। येन येन हि समेति दर्शनं तेन तेन वशगां करोति माम् ॥ ७६॥

अभिनव-ये युद्ध में सञ्चित (एकत्रित) हुए। चिता पर आरूढ़ हो गया। शत्रुओं ने पुद्ध तक मग्न खगों अर्थात् बाणों से आहत किया। आहत होने के प्रकार को कहते हैं-वे छिन्न पक्ष अर्थात् कटे हुए पंख वाले शैल (पर्वतों) को तरह खग अर्थात् गृद्ध आदि पक्षियों तलों अर्थात् पक्ष-बाहुओं से आहत किया, फिर इन्हीं से ही चित (व्याप्त) हो गये। कुछ लोग 'निहतस्तलंः' का अर्थ 'निहतों अर्थात् मारे गये लोगों के अस्त (मरण ) को लाने वाला करते है। किन्तु यह क्लिष्ट-कल्पना होने से उपेक्षणीय है। ७४॥

६. सन्दष्ट यमक अनुवाद-जहाँ पर पाद के आदि में दो समान पदों की आवृत्ति हो, विद्वानों को उसे 'सन्दष्ट यमक' समझना चाहिए॥ ७५॥ जैसे- अनुवाद-देखो, मेरे प्रियतम के गुणों को देखो, जिससे वे मुझे वश में कर रहे हैं। जैसे-जैसे मेरे दशन (दृष्टि) में आते हैं वैसे-वैसे मुझे वे वश में कर लेते हैं।। ७६ ॥ विशेष-प्रस्तुत उदाहरण में प्रथम पाद के आदि में 'पक्य, पश्य' द्वितीय और वृतोय पादों के आदि में 'येन-येन' का तथा चतुर्थ पाद के आदि में 'तेन-तेन' की आवृत्ति है छतः यहाँ 'सन्दष्ट यमक' है॥ ७५-७६ ॥

१. स. ग. यस्य य्य। २. ग, येन पेन दिनमेति।

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बोडशोऽध्याय:

आदौ पावस्य तु यत्र स्यात् समावेशः समाक्षरः। पादादियमकं नाम तद्विज्ञेयं बुधैयंथा॥७७॥ विष्णुः सृजति भूतानि विष्णुः 'संहरते प्रजाः । 2विष्णुः प्रसूते त्रैलोक्यं विष्णुर्लोकाधिदैवतम् ॥७८ ॥ पादस्यान्तं पदं यत्र द्विद्विरेकमिहोच्यते। ज्ञेयमाम्र डितं नाम यमकं तत्र सूरिभिः ॥ ७९॥ विजुम्भितं निःश्वसितं मुहुमुंहुः कथं विधेयं स्मरणं पदे पदे। यथा च ते ध्यानमिदं पुनः पुन- ध्रुवंगता ते रजनी विना विना॥। ८० ।।

७. पादादि यमक अनुवाद-जहाँ पर प्रत्येक पाद के आदि में समान पदों को आवृत्ति हो, वहाँ विद्वानों को 'पादादि यमक' समझना चाहिए॥७७॥ जैसे- अनुवाद-विष्णु ही समस्त प्राणियों को सृष्टि करते हैं। विष्णु प्रजाओं का संहार करते हैं, बिष्णु ही त्रैलोक्य को रचना करते हैं और विष्णु समस्त लोकों के अधिदेवता हैं॥ ७८॥ विशेष-यहाँ पर प्रत्येक पाद के आदि में 'विष्णुः' समान पद की आवृत्ति है, अतः यहाँ 'पादादि यमक' है। ८. आम्र्र डित यमक अनुवाद-जहाँ पर प्रत्येक पाद के अन्तिम पद को दो-दो बार आवृत्ति हो, वहाँ विद्वानों को 'आम्रेडित यमक' समझना चाहिए॥ ७९॥ जैसे- अनुवाद-पद-पद पर बार-बार इवांस-प्रश्वांस बढ़ गया है तो उसका स्मरण कैसे किया जाय ? जिस प्रकार तुम्हारा ध्यान मैंने बार-बार किया, इस प्रकार रजनी ( रात्रि ) तुम्हारे विना बीत गई ।। ८० ॥

१. ख. संहरति। २. ग. विष्णुप्रसूतं। ३. ख. पादन्त्वाम्रेडितं नाम विज्ञेय निपुर्णयथा। ४. ख. यथाभिषानं। ५. ख. ग. तथागता।

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१४६० नाठ्यशास्त्र सर्वें पादाः समा यत्र भवन्ति नियताक्षराः । TP चतुर्व्यवसितं' नाम तद्विज्ञयं बुधैर्यथा।८१॥ यथा- वारणानामयमेव कालो वारणानायमेव कालः । वारणानामयमेव कालो वारणानामयमेव काल: ॥। ८२ ।। वारणपुष्पाणां संबन्ध्यर्थ कालः शरल्लक्षणः। वारणानां हस्तिनाम्। अनामये आमयाभावे सति समदत्वे सति वारणानां वारणं निवारणं विद्यते येषां तेषां शत्रणामयं काल: कृतान्तोऽथवा समयः। रणानां संग्रामाणां काल: क्षेपः चिन्ताप्रवर्तथितेत्यर्थः॥८२॥ बिमर्श-प्रत्येक पाद के अन्त में क्रमश 'मुहुमुहुः' 'पदे-पदे' 'पुनः पुनः' 'विना-विना' की आवृत्ति है, अतः यहाँ 'आम्रेडित यमक' है॥ ७९-८० ॥ ९. चतुर्व्यवसित यमक अनुवाद-जहाँ पर नियत अक्षरों वाले सभी पाव समान हों, वहाँ बुधों को 'चतुव्यंवसित यमक' समझना चाहिए ॥ ८१ ॥ जैसे- जनुवाद-वारण पुष्पों का यही समय है, हाथियों के मद के निगरण का यही काल है, वारणीय शत्रुओं का यही काल है अथवा रण (युद्ध) का यही समय है॥ ८२॥ अभिनव-वारण पुष्पों के विकास का यहो शरदृतु का समय है, वारण (हस्तियों) के अनामय होने अर्थात् मदोन्मत्त होने का यही समय है। वारणों का निवारण होता है जिनका उन शत्रुओं का यह काल है रण (युद्ध) का यह कालक्षेप है अर्थात् चिन्ता का प्रवर्त्तक है॥ ८२॥ शक्स विशेष-इस ्लोक में चारों पाद सभान है, अतः यहां 'चतुर्व्यवसित यमक' है।। ८१-८२॥ १. ख. न्यवसितं । १. सावारणानामिति चतुष्वपि पादेषु वर्तते।

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षोडयोऽव्याय:

नानारूपैः स्वरैयंत्र1 यत्रकं व्यञ्जनं भवेत्। तन्मालायमकं नाम विज्ञेयंपण्डितैर्यथा ॥ ८३॥ लली बली हली मालो खेलो माली सली जली। खलो बलोडबलो मालो मुसली त्वाभिरक्षतु॥ ८४ ।। असौ हि रामा रतिविग्रहप्रिया रहः प्रगल्भा रमणं मनोगतम्। रतेन रात्रि रमयेत् परेण वा न चेदुदेष्यत्यरुणः पुरो रिपुः ॥ ८५॥। स पुष्कराक्ष: क्षतजोक्षिताक्षः क्षरत्क्षतेव्यः क्षतजन्दुरीक्षः। क्षतैर्गवाक्षैरिव संवृताक्षः साक्षात् सहस्राक्ष इवावभाति ॥ ८६॥

लक्षणानां प्राधान्यमित्युक्तपूर्व तत्तथैवोवसंहरति-एभिर्लक्षणैरिति।

१०. माला यमक अनुवाद-जहाँ पर स्वर नाना रूप हों और व्यञ्जन एक रूप हों, उसे विद्वानों को 'माला यमक' समझना चाहिए।। ८३ ।। जैसे- लली बली हली मालो खेलो, मालो, लली, जली, खलो बलोडबलो मालो मुसली त्वभिरक्षतु, यह माला रूपक का उदाहरण है ॥ ८४॥ अनुवाद-यह रामा रतिरूपी विग्रह में रुचि रखने वाली है, एकान्त में प्रगल्भ यह रमणी रात्रि में मनोगत रमण (प्रिय) को उत्तम रत से तब तक रिझाती रहेगो तब तक शत्रु अरुण सामने उदित नहों होगा ॥ ८५ ॥ अनुवाद-पुष्कर कमल के समान नेत्र वाला, रक्त से (खून से) नहाये हुए नेत्रों वाला, घावों से बहते हुए खून से दुर्निरोक्ष्य, गवाक्षों (झरोखों) के समान घावों से संवृत अङ्गों वाला यह वोर सहत्राक्ष इन्द्र के समान प्रतोत हो रहा है।। ८६ । अभिनव-लक्षणों का प्राधान्य है, यह पहिले कहा जा चुका है, अब उसका उसी प्रकार उपसंहार करते हैं-

१. ग. युक्तं। २. ख. पाठकैः।

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नाध्यशारने

एभिरर्थक्रियापेक्षेः कायं काव्यं तु लक्षणैः । अतः परं प्रवक्ष्यामि काव्ये दोषान् गुणास्त्रथा॥ ८७ ॥ गूढार्थमर्थान्तरमर्थहोनं भिन्नार्थमेकार्थमभिप्लुतार्थम्। न्यायादपेतं विषमं विसन्धि शब्दच्युत वै दश काव्यदोषाः ।। ८८ ।।

अर्थक्रियायां रसचर्वणायां युक्तं योगो येषां, विभावादित्वं ह्योतत प्रसादादीत्युक्त- मषस्तात्। अतः परमिति वक्व्यान्तरमाह। केषुचित्पुस्तकेषु चैतद्ग्रन्थः पश्चाद्दृश्यते, बाहुल्येन प्रथमं दृश्यत इति तथैव व्याचक्ष्महे।। ८७।। अनुवाद-अर्थ क्रियाओं से युक्त इन लक्षणों से काव्य का निर्माण करना चाहिए। इसके बाद अब मैं काव्य के गुणों और दोषों का वर्णन करंगा।। ८७।। अभिनव-अर्थ को क्रिया में अर्थात् रस-चर्वणा में योग है जिनका। इस प्रकार ये विभावादि रूप है और प्रसाद आदि भी हैं, यह नोचे कहा जा चुका है, इसके बाद अन्य वक्तव्य को कहते हैं। कुछ पुस्तकों में यह ग्रन्थ पीछे के भाग में दिखाई देता है किन्तु बहुत से ग्रन्थों में यह पहिले दिखाई देता है, उसी प्रकार हम पहिले इसकी व्याख्या करेंगे।। ८७ ॥ काव्य-दोष भरत ने नाट्यशास्त्र में दोष का लक्षण नहीं दिया है किन्तु उनकी दृष्टि में कोई भी वस्तु सर्वथा दोषहीन नहीं है। (दोषेः परिवर्जित न वा किब्चित्)। इसलिए नाट्य में इसका विस्तार से विचार नहीं किया गया है। मम्मट ने इसकी परिपक्व परिभाषा को है। उनके अनुसार दोष रस के अपकर्षक है। मानव-शरीर में काणत्व, वधिरत्व आदि को तरह काव्य के शब्दार्थ-शरीर में गूढ़ार्थ आदि दोष होते हैं। भरत ने दस दोषों का निरूपण किया है। अनुवाद -गूढ़ार्थं, अर्थान्तर, अर्थहोन, भिन्नार्थ, एकार्थ, अभिलुप्तार्थ, न्यायावपेत, विषम, विसन्धि, और शब्दच्युत-ये दश काव्य-वोष हैं॥ ८८ ॥

१. ग. एभिरयक्रियायुक्तैः । २. क. (टि०) अत ऊध्वं । ३. ख. काव्यदोषांस्तथाविषान। ग. काव्यदोषा] समासतः । ४. क. (टि०) व्युतं च शब्दात्। शब्दाच्युतं।

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षोडशोऽयाय: ४६३

पर्यायशश्वाभिहितं गूढार्थमभिसंज्ञितम्'। अवण्यं वर्ण्यते यत्र तदर्थाग्तरमिष्यते ॥८९॥ पकरी

गढार्थं यथा-पर्यायशब्देति तत्र शब्दानां पदानां वाक्यस्य तवर्थानां च यथा दशरथ इति वक्तव्ये बलात्परिकल्पितेन वस्तुनः पर्याय-शब्देनाभिधानं 'अधिक नवविमान' इति। न हि यदृच्छाशब्दा: पर्यायभाजः । अर्थान्तरं यथा- "चिम्तामोहमनङ्गमङ्ग तनुते बिप्रेक्षितं सु्रुवः"। इति अत्र काम स्वीकृतः चिन्तादिशव्देनावर्णनीयमपि वणितम्। यत्तु प्रसक्तानुप्रसक्तिकया बहुतराप्रकृतव्णनं तत्प्रबन्धदोषरूपं सन्धितवङ्गविधानेन परा- कृतमिति नेह निरूपर्णाहम् ।८९ ॥

१. गूढ़ार्थ अनुवाद-जहाँ पर पर्याय-वाचक शब्दों द्वारा किसी विषय को कहा जाय, वहाँ 'गूढ़ार्थ' दोष होता है। ८८ । अभिनव-पद, वाक्य और उसके अर्थ को पर्याय शब्दों से कहना 'गढ़ार्थ' दोष है। जैसे-'दशरथ' यह कहना है, वहाँ बलात् अर्थ की कल्पना करके पर्याय शब्द से कहना अर्थात् दशरथ के लिए 'एकाधिकनवविमान' पद का प्रयोग करना। क्योंकि यदूच्छा शब्द पर्यायवाचक शब्द नहीं होते हैं।

२. अर्थान्तर अनुवाद-जहाँ पर अवर्णनीय विषय का वर्णन किया जाय उसे 'अर्थान्तर' वोष कहते हैं ।। ८९॥। अभिनव-अर्थान्तर का उदाहरण जैसे-'चिन्तामोहमनङ्गमङ्ग तनुते विप्रेक्षित सुभ्रुवः' अर्थात् 'सुन्दर भ्रुकुटियों वाली, रमणी का सकटाक्ष निरीक्षण चिन्ता और मोह को उत्पन्न करने वाले कामदेव को उत्तेजित करता है। यहाँ पर कामदेव को स्वीकृत है। किन्तु चिन्ता, मोह आदि अवर्णनीय का भो वर्णन कर दिया है। जो कि प्रसक्तानुप्रसक्ति बहुत से अप्रकृत का वर्णन प्रबन्ध-दोष रूप है। सन्धि और तदङ्ग के विधान से ही पराकृत हो गया, अतः यहाँ वह निरूपण के योग्य नहीं है॥ ८९॥

१. क. (टि०) गूढार्थमिव संज्ञितम्। २. क. पतु।

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नाटयशास्थे अर्थहोनं *त्वसम्बद्धं सावशेषार्थमेव भिन्नार्थमभिविज्ञेयमसभ्यं ग्राम्यमेव च॥ ९०।। अर्थंहीन यथा-अद्यापि स्मरसि रसालसं मनो मे मुग्धाया: स्मरचतुराणि। अत्र पूर्वापरण्याघातादसंबन्धता। यथा वा "स महात्मा भाग्यवशान्महापथमुपा- गतः" इति। अत्र हि सावशेषः प्रकरणापेक्षो वस्तुनिश्चयः, अभाग्यवशञादित्यपि संभाव्यत्वात् ॥ ९० ॥ भिन्नार्थ त्रिधा यथा-तत्र मृष्यो दूरसंबन्धव्यवधाने सति यत्रार्थो यथा- ज्वरं भुञ्जीत सञ्जातमलपाकं चिरस्थितम्। अजादुग्धोदनं हन्यात त्रिदोषोत्कोपसंभवम् ॥ इति॥

३. अर्थहीन अनुवाद-जहाँ पर असम्बद्ध अथं हो अथवा अवशेष अर्थ हो, वहाँ 'अथहीन' दोष होता है। अभिनव-अर्थहीन जैसे-'हे रस से मन्थर (अलस) मेरा मन आज भी तु उस मुग्धा काम के विषय में चतुर वाक्यों को स्मरण कर रहे हैं।' यहाँ पर पूर्वांपर में व्याघात होने से अर्थों में असम्बद्धता है॥ ९०॥ अथवा जैसे-'वह महात्मा भाग्यवश महापथ में पहुँच गया' यहाँ पर प्रकरण-सापेक्ष वस्तु निश्चय है, अतः सावशेष होने से 'अर्थहीन' दोष है। 'अभाग्य- वशात्' भी हो सकता है॥ ९०॥ ४. भिन्नार्थ अनुवाद-असम्य एवं ग्राम्य अर्थ के सूचक अर्थ को 'भिन्नार्थ' दोष समझना चाहिए॥ ९० ॥ अभिनव-भिन्नार्थ दोष तोन प्रकार का होता है। जैसे- (१) जहाँ पर अर्थ दूर का सम्बन्ध होने से व्यवधान के कारण अर्थ मृष्य (अविज्ञेय) अर्थात् अर्थ समझने में कठिनाई हो। जैसे-"बकरी के दूध के साथ चावल (भात) खाया जाय तो चिरकाल से स्थिति जिसमें मल का परिपाक हो गया है, ऐसे त्रिदोष से उत्पन्न ज्वर (सन्निपात ज्वर ) नष्ट हो जायेगा। १. क. (टि०) अथहोनमसम्बद्धं। २. क. (टि.) भिग्नार्थमपि। 7 जाट (057) व,9

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षोडशोऽघ्यायः ४१५

'विवक्षितोऽन्य एवार्थो यत्रान्यार्थेन भिद्यते। भिन्नार्थं तदपि प्राहुः काव्यं काव्यविचक्षणाः।।९१।। अविशेषाभिधानं यत् तदेकार्थमिति स्मृतम्। ग्राम्यं यथा-"भद्रं भजस्व मामिदं ते दास्यामि" इति। तृतीयं भिन्नार्थ यथा-"स्याच्चेदेष न रावणः" इत्युक्त्वा, "वव नु पुनः सवंत्र सवे गुणाः" इति। उद्दिष्टं ह्यत्र रावणस्यानुपादेवत्वं वव नु पुनरत्येननान्यथाकरणाद्भेदितम् ॥९१॥ एकार्थ यथा-कुन्देन्दुहारहरहाससितमिति। एकप्रयोजनं हि सर्वमेतत्। न काव्यं शास्त्रवदुपदेश्यं किञ्चित्कश्चिज्जानीयादिति प्रवतते। (२) जहाँ ग्राम्य या असभ्य अर्थ का कथन हो, वहाँ भी 'भिन्नार्थ' दोष होता है। जेसे-'हे भद्रे ! मेरी सेवा करो, मैं तुझे यह वस्तु दूंगा'। (३) विकसित अर्थ को भिन्न अर्थ का कथन। जैसे -- "यदि यह रावण न होता" यह कहकर फिर 'सभी गुण सब जगह नहीं होते'। यहाँ 'रावण का अनुपादेयत्व उद्दिष्ट था' 'क्त नु पुनः' इस कथन से अन्यथा कर दिया। जिससे उद्देश्य से भिन्न हो गया । ९१॥ अथवा अनुवाद-जहाँ पर विवक्षित अर्थ अन्य हो और उससे अन्य अर्थ का (अविक्षित का) कथन किया जाय वहाँ भो विद्वान् लोग 'भिन्नार्थक' दोष मानते हैं ॥ ९१ ॥ ५. एकार्थ अनुवाद-अविशेष अर्थात् विलक्षणता-होन अर्थ का कथन 'एकार्थ' दोष कहलाता है। अभिनव-जैसे, 'कुन्देन्दुहारहरहासहसितग' यहाँ पर कुन्द, चन्द्र, हार, शिवजी का हास ये सभो राजा के यश को श्वेत (शुभ्र) बतलाने के लिए कहो गई है, ये सब एक प्रयोजन वाली हैं। अतः यहाँ 'एकार्थ' दोष है। काव्य, शास्त्र की तरह उपदेश्य है। कोई कुछ जान जाय, इसलिए प्रवृत्त नहीं होता। १. क. (टि०) विरवक्षितान्य एवार्थों यत्रान्यार्थेन भिद्यते। २. क. (टि०) कान्यविदो जना: । ना. मा०१९

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४१६ माट्यशास्त्रे

अभिप्लुतार्थ विज्ञेयं यत् पदेन समस्यते ॥६२॥ न्यायादपेतं विज्ञेयं प्रमाणपरिवर्जितम् ।

अभिप्लुतार्थ यथा- स राजा नीतिकुशला:, सरः कुमुदशोभितम्। सर्वप्रिया वसन्तश्रीर्ग्रीष्मे मालतिकागमः ॥। अत्र प्रतिपादमर्थस्य परिसमाप्तत्वादभिप्लुतत्वं, एकवाक्यत्वेन निमज्जना- भावात् ॥। ९२ ।। न्यायादपेतं देशकालविरुद्धं कलाशास्त्रादिविरुद्धं च यथा- सुवीरेष्वस्ति नगरो मथुरा नाम विश्रुता। अक्षोटनालिकेराढया यस्या: पर्यन्तभूमयः ॥ इत्यादि।

६. अभिलुप्तार्थ अनुवाद-जहाँ पर पाद में अर्थ समाप्त हो जाय, (एकवाव्यता न रहे) वहाँ 'अभिलुप्तार्थ' दोष होता है।। ९२।। अभिनव-जेसे-'वह राजा नीतिकुशल है। तालाब कुमुदों से सुशोभित है, वसन्त की शोभा सबको प्रिय है। ग्रीष्म में मालती का उद्गम है'। यहाँ प्रत्येक पाद में अर्थ समाप्त हो जाता है। अतः 'अभिलुप्तार्थ' दोष है। क्योंकि यहाँ पर एकवाक्यता नहीं है ॥ ९२॥ ७. न्यायादपेत अनुवाद-प्रमाण से वजित (रहित) विषय का कथन 'न्यायादपेत' नामक दोष समझना चाहिए। अभिनव-न्याय से अपेत (प्रमाण रहित) अर्थात् देश, काल के विरुद्ध और कला एवं शास्त्र के विरुद्ध कथन 'न्यायादपेत' दोष होता है। जैसे- "सुवीर में मथुरा नाम की एक प्रसिद्ध नगरी है। जिसके पास की भूमियाँ अखरोट और नारियल से समृद्ध हैं"। यह वर्णन देश-काल विरुद्ध है।

१. क. (टि०) समाप्यते। १. क. (डि०) परिवर्तितम्।

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षोडशोऽ5पाय: ४१७

वृत्तभेदो भवेद्यत्र विषमं नाम तद्भवेत् ॥ ९३॥ अनुपश्लिष्टशब्दं यत् तद्विसन्धीति कोतितम्। शब्दच्युतञच विज्ञेयमशब्दस्वरयोजनात् ॥६४ ॥

विषमं थथा-"अयि पश्यसि सौधमाश्रितामविरलसुमनोमालभारिणोम्" इत्यादि ॥९३॥ विसन्धिदोषोऽनेनैव संगुहोतः। सन्धानं, द्वयोनरन्तयं विचारयोग: अन्योन्य- लयो वेति त्रिधा। तवनुपारूढमयुक्तं पारुष्याद्युत्पादकं वा यत्रापशब्दः स्मृतो मुनित्रयेणादृत: ।

८. विषम अनुवाद-जहाँ पर वृत्तभेद हो, वहाँ 'विषम' नामक दोष होता है।। ९३ ॥ अभिनव-जैसे-"अये पश्यसि सौधमाश्रितामविरलसुमनोमालभारिणीम्' इत्यादि में प्रथम पाद में नव अक्षरों से प्रारम्भ किया और दूसरे पाद को बारह अक्षरों पर समाप्त किया। अतः 'वृत्तभेद' होने से 'विषम' दोष है ॥ ९३ ॥। ९. विसन्धि अनुवाद-जहाँ पर शब्द उपश्लिष्ट न हो वहाँ 'विसन्धि' दोष होता है। १०. शब्दच्युतक अनुबाद-जहाँ पर विना शब्दों और स्वरों को योजना हो, वहाँ (शब्द- च्युत) दोष समझना चाहिए।। ९४॥ अभिनव-विसन्धि दोष का इसो से संग्रह हो गया। सन्धान तोन प्रकार का होता है-(१) दो वर्णों या पदों का नैरन्तर्य (२) विचार का योग (३) परस्पर एक का दूसरे में लय होना। जहाँ पर शब्द अनुपारूढ़ अर्थात् अयुक्त है अथवा पारुष्य का उत्पादक है वहाँ भो 'विसन्धि' दोष होता है, यह मुनित्रय के द्वारा आदृत है ।। ९४।।

१. ख. ग. वृत्तदोषो। २. ख. ग. अनुतिप्रतिष्ठाशब्दं यत् तद्विसन्धोति काशितम्। शब्दहोनं च विश्ञेयमशब्दस्य च योजनाव। क. (टि०) अनुपारूढ़शब्दश्च विसन्धिः परिवर्जितः । ३. क. (टि०) शब्दाच्युतं। ख. शब्दहोनं च विज्ञेयमशन्दस्य योजनात्।

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४६८ नाटयशास्त्रे एते दोषास्तु विज्ञेयाः सुरिभिर्नाटकाश्रयाः। पाठान्तरं यथा- एते दोषास्तु काव्यस्य यथा सम्यक् प्रकीततिताः ।। ९५।। एते वोषा:, एतन्मध्ये तु केचित् नित्यदोषा:, यथा अपशब्दः। केचिदनित्या यथा-ग्राम्यं, हास्यादौ तस्पेष्टतमत्वात। एतवाह यथा स्थूलमिति आनुपूर्व्यमिति चात्र अव्ययेनाव्ययीभावः । तेनोतरोत्तरं स्थूलाः । यथा च गूढार्थं गूढलेखप्रहेलि- कादि पताकास्थानकादिषु प्रयोज्यम्, अर्थान्तरमनुवादे, अर्थहोनादि हास्ये, भिन्नार्थ शत्रियादौ वक्तरि, एकार्थ परप्रत्यायने, अभिप्लुतार्थमुन्मादादौ, भिन्नवृत्तं विसन्धि च स्वविषये। एवमेते दोषा: क्रमेणापातविषयाः। इह यतोऽ्यं- प्रतोतिस्तावदस्ति। अपशब्दस्तु दोष एव ततः कस्याश्चिवर्थप्रतीतिरभावात्। स हि न कांचिद् भाषामनुपतति संकेताभावात्तमर्थं प्रतिपादयेत् ॥९५ ॥ अनुवाद-विद्वानों को ये वस दोष नाटक के आश्रित समझने चाहिए। पाठभेद से- अनुवाद-इस काव्य के दोषों को मैंने अच्छी तरह बतला दिया है। अभिनव-एते दोषा इति। ये दस दोष हैं। इनमें कुछ दोष नित्य हैं। जैसे, अपशब्द। कुछ दोष अनित्य हैं, जैसे-ग्राम्यता दोष। किन्तु ग्राम्यता दोष हास्य आदि में अत्यन्त इष्ट है। इसी बात को कहते हैं-यथास्थूलम् अर्थांत् आनुपूर्व्यम्। यहाँ अव्यय पद के साथ अव्ययोभाव समास है। इससे उत्तरोत्तर स्थूल है, यह अर्थ होता है। जैसे-गूढ़ार्थ दोष गूढ़लेख बाली प्रहेलिका (सहेलियों) आदि में होते हैं, इनका प्रयोग पताकास्थानक आदि में करने चाहिए, अर्थान्तर दोष का प्रयोग अनुवाद में, अर्थहीन का प्रयोग हास्य में, भिन्नार्थ का श्रोत्रिय आदि वक्ता होने पर एकार्थ दोष का दूसरे को समझाने में, अभिलुप्तार्थ दोष का प्रयोग उन्माद आदि की दशा में, भिन्नवृत्त और विसन्धि दोष का अपने विषय में क्रमशः आपात विषय हैं। परिणाम में ये दोष नहीं भी हो सकते हैं, क्योंकि यहाँ अर्थ को प्रतीति है। अपशब्द तो दोष ही है, क्योंकि उससे किसी अर्थ की प्रतीति नहीं होती। वह किसी भाषा का अनुगमन नहीं करता। अतः संकेत के अभाव में कैसे उस अर्थ का प्रतिपादन करें ९५।। 6१. क. एते दोषा हि काव्यल्य मया सम्यक प्रकीतिताः ।

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गणा विपर्ययादेषाँ माधुयौदार्यलक्षणाः। श्लेषः प्रसाद: समता समाधि: माधुर्यमोज: पदसौकुमार्यम्। अर्थस्य च व्यक्तिरदारता च कान्तिश्च *काव्यस्य गुणा दशैतै ॥९६॥

अथ गुणेषु प्रतिजानीते-एषां विपर्ययाद् गुणा भवन्ति, एतद्दोषविधात एव गुणो भवतीत्यर्थः । किमविशेषेण, नेत्याह-माधुयौदार्यलक्षणमङ्गो येषाम्। एतदुक्तं भवति-एतद्दोषविहोनं श्रुतिसुखं दीप्तरसं च यदि भवत तावता गुणान्तरैरलङ्कारैश्च होनमपि काव्यं लक्षणयोगाव्यभिचारोत्युक्तम् ॥। ९५॥ अन्येऽपि गुणा: सन्तोति दर्शयति श्लेष: प्रसाद इत्यादि। काव्यस्येति पदस्य वावयस्य तदुभयगतस्यार्थस्य वेत्यर्थ: ।।९६।।

होते हैं ॥। ९५ ॥ अनुवाद-इन दोषों के विपर्यय से माधुर्य, औदाय लक्षण वाले गुण

अभिनव-अब गुणों के सम्बन्ध में प्रतिज्ञा करते हैं-इन दोषों के विपयय से गुण होते हैं अर्थात् इन दोषों के विघात से हो गुण होते हैं। क्या ये सामान्य प्रकार से होते हैं ? उत्तर देते हैं नहीं, माधुर्य और औदार्य लक्षण है (अङ्ग है) जिनका यह कहा गया है-इन दोषों से रहित, श्रुति-सुखद, प्रदीप्त रस वाला यदि होता है तो गुणों एवं अलङ्धारों से रहित भी काव्य हो सकता है। लक्षणों का योग नियत होने से, ऐसा कहा गया है।। ९५।। बिमर्श-भरत मुनि ने गुणों का कोई विशेष लक्षण नहीं किया है। उन्होंने वीष के विपर्यय के रूप में गुणों का उल्लेख किया है। अभिनवगुप्त ने विपर्यय का अर्थ विषात किया है, अतः दोष-विधातक तत्त्व गुण हैं। भरत के अनुसार दोष काव्य के अपकर्षक हैं तो गुण उत्कर्षक। इस प्रकार उनके मतानुसार गुण काव्य के उत्कर्षक तत्त्व है। अभिनव-इनके अतिरिक्त और भो गुण होते हैं, यह बात 'श्लेषः प्रसाद' इत्यादि के द्वारा दिखते हैं। अनुवाद-इ्लेष, प्रसाद, समता, समाधि, माधुयं, ओज, सौकुमायं, अर्थ- व्यक्ति, उदारता, और कान्ति ये दस काव्य के गुण होते हैं ॥ ९६ ॥ अभिनव-'काव्यस्य' इस पद के कहने का अभिप्राय है कि ये गुण पद, वाक्य और दोनों के अर्थों में रहते हैं। १. ख. एस एव विपर्यस्ता गुणा काव्येषु दशिताः । २. ग. काव्यार्थगुणा।

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४७० नाटयशाहपे

'ईप्सितेनार्थ जातेन सम्बद्धानां परस्परम्। श्लिष्टता या पदानां हि श्लेष इत्यभिधीयते ॥। ९७ ॥

तत्र शलेषमाह-ईप्सितेनार्थजातेनेति अर्थभागानां कविसमुत्प्रेक्षिततया परस्पर- संबद्धया योजनया संपत्न यदीप्सितमर्थजातं तेनोपलक्षितार्थस्योपपद्यमानस्योपपद्य- मानतात्मा गुणः शलेषः। यथोदाहुतं वामनेन - दृष्टवैकासनसंस्थिते प्रियतमे पश्चादुपेत्यादरा- देकस्या नयने निमोल्य पिहितक्रोडानुबत्वच्छल:। ईषद्वक्रितकन्घरः सपुलकप्रेमोल्लसन्मानसा- मन्तर्हासलसत्कपोलफलका धूर्तोडपरां चुम्बति॥ विशेष-दण्डो ने काव्य के दस गुण बताये हैं और वामन दस शन्द गुण और दस अर्थगुण मानते हैं किन्तु उनके लक्षणादि भरत से भिन्त प्रतोत होते हैं। भोज प्रभृति विद्वानों ने चोवोस गुण प्रतिपादित किये हैं। मम्मट और बिश्वनाथ ने गुणों की बढ़ती हुई संख्या को स्वोकार न कर तोन गुणों को हो हवोकार किया है और उनमें से कुछ गुणों को अपने तोन गुणों में अन्तर्भाव कर लिया है। कुछ को दोषाभाव के रूप में स्वोकार किया है और कुछ को दोषरूप माना है। केचिदन्तर्भवन्त्येषु दोषत्यामातरे श्रिताः । अन्ये भजन्ति दोषत्वं कुम्भचिन्न ततो दश॥ १. श्लेष अनुवाद-ईप्सित (इष्ट) अर्थों के द्वारा परस्पर सम्बद्ध पदों की जो श्लिष्ठता है, उसे 'इलेष' गुण कहते हैं ।। ९७ ।। आभनव-श्लेष को कहते है-ईप्सितेनार्थजातेनेत्यादि। कवि के द्वारा समुत्प्रेक्षित अर्थों का परस्पर सम्बद्ध योजना से सम्पन्न जो ईप्सित अर्थ है उनसे उपलक्षित अर्थ की उपपद्यमानता (उपपत्ति) हो 'इलेष' गुण है। जैसा कि वामन ने कहा है- "एक हो आसन पर बैठो हुई अपनी दोनों प्रियतमाओं को देखकर पोछे से आकर आदरपूर्वक क्रोड़ा के व्याज से एक नायिका के आँखों को ढँककर फिर कन्धे को (ग्रीवा को) थोड़ा टेढ़ा करके पुलकित एवं उल्लसित मन वाली आन्तरिक मुस्कान से जिसके कपोल फड़क रहे हैं, ऐसी दूसरी नायिका का उस धूर्त ने चुम्बन कर लिया। १. ख. पद्यमेतत् 'ख' पुस्तके नास्तोि ।

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षोडशोऽण्याय:

विचारगहनं यत्स्यात् स्फुटञचैव स्वभावतः। स्वतः सुप्रतिबद्धञ्च२ श्लिष्टं तत्परिकीत्यते ॥९८॥

अत्र मनोरथातीतोऽप्येककालनायिकायुगलहृदयग्रहण लक्षणार्थस्तथोपपादितो येनासंभावनास्पवं न भवति। तेन कुटिलोऽप्ययं क्रमो न हृदये उल्वणत्वं भजते। मज्जति हृदये यतः सर्वस्येति॥९७॥ अथ शब्दगुणमाह-ईप्सितार्थ योनिः पदानां श्लिष्टता परस्परं सन्धि- बन्धनतयाऽनेकमेकपदमिव भाति तदेव मासृण्यमुच्यते। अतश्च पदान्तरपाठस्या- वश्यापेक्षतायां यथा ब्रह्मसूत्रमिति। उक्तं चैतच्छन्दोऽध्याये। तथा सन्धीय- मानयोस्तथासन्घेः साजात्यं सावण्यं च संपद्यते वस्त्रखण्डयोरिव सूत्रस्येव च।

यहाँ पर एक ही समय में एक साथ दोनों नायिकाओं के हृदय को ग्रहण करने के लिए मनोरथ से परे था, फिर भी इस प्रकार उपपादित किया कि जिससे असम्भावना का थोड़ा भी अवकाश नहों रहा और किसो के हृदय में उल्बणता प्रकट नहीं हुई, अपितु सबके हृदय में यह क्रम पैठ गया। ९७ ।। अनुवाद-जो रचना विचार करने पर गहन हो किन्तु स्वभाव से स्फुट हो और परस्पर अच्छो तरह प्रथित हो, उसे भी 'शलेष' कहते हैं ॥ ९८ ॥ अभिनव-अब शब्द गुण को कहते हैं-ईप्सित अर्थ के कारणभूत पदों को परस्पर जो श्लिष्टता अर्थात् परस्पर सम्बन्ध होने के कारण अनेक पद एक पद के समान जो प्रतीत होता है, उसे 'मसृणता' कहते हैं। अतः भिन्न-भिन्न पदों के पाद की अपेक्षा में जैसे ब्रह्मसूत्र (यज्ञोपवीत)। यह बात छन्दोऽध्याय में कही जा चुको है। जैसे वस्त्र (कपड़े) के दो टुकड़ों में सूत्र (सूत) के द्वारा सन्धि करने पर उस सन्धि के कारण सूत्र का साजात्य और सावर्ण्य हो जाता है। जेसे-

१. ख. विचार्यग्रहणं वृत्या। २. ख. सुप्रतिबद्धश्च। ३. क. तत्परिकीतितम्।

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४७२ नाटपशास्न्रे

'अध्यनुक्तो बुधैयंत्र शब्दोऽर्यों वा प्रतोयते। *सुखशब्दार्थसंयोगात् प्रसादः 'परिकीर्त्यते ॥ ९९॥

घषा- "अस्त्युत्तरस्यां दिशि देबतात्मा हिमालयो नाम नागाधिराजः" (कुमा० १-१) इत्यत्र 'अस्ति' क्षब्दस्योत्तरशब्दस्य सन्धीयमानयोस्तकारस्य तकारेण संयोगे तयोश्च साजात्यं 'स्पान्विशि' इत्यनयो: सन्घेनंकारस्य वर्ग्यत्वाद्दकारेण सावण्यं, 'विशि देवता' इति सान्तर्यसन्धौ दकारेग दकारस्य साजात्यं, इकारैकारयोस्तालव्यांशत्वेन सादृश्यं 'देवतात्मा' इत्यत्र तकारेणाकारोत्तरतकारस्य च। न चानुप्रासमात्रमेतत् एकपवानु- प्रासेऽपि प्रामाण्यभावात्-'इन्विन्दिराणां ललितो निनादः' इत्यनुप्रासे च सावण्यें- नोपयोगीति। अन्ये पठन्ति-विचारगहनं यत्स्यात् स्फुट चँव स्वभावतः । इत्यरथंश्लेषः। वक्रघटना वेत्यथं:। सुप्रतिबद्धश्च इ्लेष इति पदश्लेषः ।। ९८ ।। 'अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः (कु. १।१ )' में 'अस्ति' शब्द और 'उत्तर' शब्द में सन्धि कर देने पर तकार का तकार के साथ संयोग होने पर दोनों में 'दन्तस्थानीयतवेन' साजात्य है और 'स्यान्दिशि' में सन्धि होने से नकार का दकार के साथ सवर्गीय होने के कारण सावर्ण्य हैं। 'दिशि' देवतात्मा' में सान्तर सन्धि में दकार का दकार के साथ साजात्य है। 'दि' में इकार और 'दे' में एकार तालव्यत्वेन सादृश्य है। 'देवतात्मा' में तकार का आकारोत्तर तकार के साथ सावण्यं है। यह नहीं कहा जा सकता कि यहाँ अनुप्रास नहीं है। क्योंकि एक पद में भी अनुप्रास होता है। प्रामाण्य का सद्भाव होने से। जैसे-'इदिन्दिराणां ललितो निनादः' यहाँ पर अनुप्रास में सावर्ण्य है। अन्य लोग कहते हैं कि 'विचार करने पर गहन है किन्तु स्वभाव से स्फुट है' यह अर्थ श्लेष है अथवा वक्रघटना ? श्लेष तो प्रसिद्ध ही है। इस प्रकार यह पद श्लेष है ।। ९८ ॥। २. प्रसाद अनुवाद-जहाँ पर सुखजनक शब्द और अर्थों के संयोग से विना कहे ही शब्द अथवा बर्थ को प्रतोति हो जाय, उसे 'प्रसाद' गुण कहते हैं ॥ ९९।। १. ग. अथानुक्तो बुधैयंत्र शब्दार्थः । २. ग. मुखुयशब्दाथंसंयोमात्। ख. सुखशब्दार्थसंबोषात्। ३. क. स तु कोत्यंते।

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बोडशोडधयाय: ४७२

प्रसादमाह-अप्यनुक्तो बुधैरिति। यत्राथे अनुक्तेऽपि बुधैः कष्टकल्पनया अव्याख्यातस्याऽप्यर्थस्य प्रयोजनं स्वयं भासते सो्थो वैमल्याश्रयोऽपि वैमल्यमुपचा- रात सोजर्थो वा काव्यस्य वैमल्यं स्वयं जानंश्चानुपयोगिपरिवर्जनात्। वैमल्यशब्द वाच्याज्जलस्येव पांसुभिरसंपर्काद भवतोति वैमल्यमर्थस्य प्रसादः। यथा-'सवर्णा कन्यका रूपयौवनारम्भशालिनी' इति विवाहयत्वं प्रापणी- यता हृद्यत्वं संभोगयोग्यता गृहस्थसहधमंचारिणोत्वमित्युपयोगी सर्वोडयमर्थः। तेनाबुध्वैतदुदाहरणान्तरं वृथा भ्रमणम्-"आविलपयोधराग्र" मिति (विक्रमो० ५-८) । एतदपि तूदाहरणं, पददूषणं तु सम्यगज्ञाने प्रयुक्तम्। अप्रसादस्तु "उपास्तां हस्तो मे विमलमणिकाञचोपदमिदम्" अत्र विमलमन्यथोपयोगात् पांसुरिव जलेऽप्रसन्नतां करोति। सुख इति न प्रयत्नमपेक्षते यः शब्दो, योडर्थो, यः संयोग: शब्दविषय इत्यर्थ:, कला मात्ररूप एव यत्र सब्धिः, अत एव शैथिल्यात्मा स शब्दगुणः प्रसादः। प्रसन्नता स्फुटत्वं लक्षणीयविभागता पदानाम्। अभिनव-प्रसाद गुण को कहते हैं-जहाँ पर विद्वानों के द्वारा अर्थ विना बतलाये ही क्लिष्ट-कल्पना से भी जो अर्थ ब्याख्यात नहीं है, उस अर्थ का प्रयोजन स्वयं भासित हो रहा है, वह अर्थ विमलता का आश्रय होते हुए भी लक्षणा से वह वेमल्य कहा जाता है। अथवा काव्य का वह अर्थ अनुपयोगी पदार्थों के त्याग देने से उसका वैमल्य स्वयं भासित होता है। जल का धूलिकणों के असम्पर्क से जिस प्रकार वैमल्य अर्थ होता है उसो प्रकार काव्य के अर्थ का अनुपयोगो का परिवर्जन रूप वैमल्य प्रसाद है। जैसे- 'रूप, यौवन के आरम्भ से युक्त (सुशोभित) यह कन्या सजातीय है' अतः 'यह विवाह के योग्य, प्रापणीय, हृद्य, सम्भोग के योग्य और गृहस्थ की सहधर्मिणी है' इत्यादि उपयोगी सभी अर्थ स्वतः प्रतिभासित हैं। इसलिए इस बात को न समझकर दूसरा उदाहरण देना वृथा भ्रमण है-'आविलपयोधराग्रं' (पयोधर का अग्रभाग आविल है) यह भी तो उदाहरण है। पददूषण तो विना जाने प्रयुक्त है। अप्रसाद का तो उदाहरण है-'उपास्तां हस्तो मे विमलमणिकाञ्चीपद- मिदम्' (विमल मणि से घटित काञ्चो के स्थान की उपासना मेरा हाथ करे)। विमल मणि हो काञ्ची (करधनी) में जड़ी जाती है। काञची का मणि में विमलत्व ना. प्ा०-६०

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नातिचूर्णपदर्युक्ता न च व्यर्थाभिधायिभिः । *दुर्बोधनश्च न कृता समत्वात् समता मता ॥ १०० ॥ यथा- अथ स विषयव्यावृत्तात्मा यथाविधि सूनवे। नृपतिककुदं वत्त्वा यूने सितातपवारणम्॥ मुनिवनतरुच्छायां देव्या तथा सह शिशिये। गलितवयसामिक्ष्वाकूणामिदं हि कुलव्रतम्॥ इत्यादि। अत्र निरन्तरतां मुक्त्वा नान्योन्यलयो नान्योन्यापत्तिसन्धिरस्तीति शिथि- कता। एकरच गुण: क्वापि शोभत इति स्वानुभवसिद्धः, तेन व्यावृत्तात्मेति गाढ़ता कता, ककुदं वत्त्वेति चापरः सवणंपक्षे ।। ९९ ।। विशेषण निरर्थक है। जैसे-जल में धूलि अप्रसाद करता है वैसे ही अन्यथा उपयोग के कारण विमल शब्द भी अप्रसन्नता करता है, सुख शब्द प्रयतन की अपेक्षा नहीं करता। जो शब्द, जो अर्थ, जो संयोग प्रयतन की अपेक्षा नहीं करता। कलामात्र रूप ही जहाँ सन्धि है। अत एव शैथिल्य रूप शब्द का गुण 'प्रसाद' है। प्रसन्नता का अर्थ स्फुटत्व है। जैसे- "सांसारिक विषयों से निवृत्त मन वाले राजा ने अपने युवा पुत्र को विधि के अनुसार राजचिह्न शवेतच्छत्र को देकर देवो के साथ मुनियों के आश्रम के वृक्षों की छाया ये अपना निवास बनाया। वृद्धावस्था में इक्ष्वाकुवशीय राजाओं का यही कुलव्रत है।" यहाँ पर निरन्तरता को छोड़कर न तो एक दूसरे में लय है, न परस्पर मिल जाने रूप सन्धि है। अतः शिथिलता है। एक भी जहाँ कहीं भो हो, शोभित होता ही है। यह अनुभव सिद्ध है। अतः व्यावृत्तात्मा में गाढ़ता गुण है और 'ककरुद दत्वा' में अपर गाढ़त्व है ।। ९९॥ ३. समता अनुवाद-जो अति समास रहित पदों से युक्त हो और न व्यर्थ का अथ प्रकट करने वाले और न दुर्बोध शब्दों से युक्त हो, इस प्रकार समानता के कारण 'समता' नामक गुण कहा जाता है॥। १००। १. ख. पुरकेऽयं क्लोको नास्ति। तत्र टिप्पण्यामुपळम्पते। २. ख. न दुर्बोधातैश्चकृता।

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अन्योन्यसद्शा यत्र तथा ह्यन्योन्यभूषणाः। अलड्कारा: गुणाश्चैव समा: स्युः समता 'मताः ॥१०१ ॥ समतामाह-नातिचूणंपदैरिति। शब्दानां समत्वात्समः चूणपदैरसमास- सोऽत्यन्तसमासश्च विषमता, तद्विपर्ययेण समता उपक्रान्तमार्गापरित्यागरपेत्युक्तं भवति। यथा- गाहन्तां महिषा निपानसलिलै: शुङ्गमुहुस्ताडितं छायाबदकदम्बकं मृगकुलं रोमन्थमभ्यस्यतु । विस्रब्धैः क्रियतां वराहृपतिभिर्मुस्ताक्षतिः पल्वले विधान्ति लभतामिदं च शिथिलज्याबन्धमस्मखनुः॥इति। अत्र अवान्तरवाक्ये समस्तद्विपदा हि नातिदीर्घा वृत्ति:। अनुवाद-जहाँ पर गुण और अलङकार परस्पर एक दूसरे के सदृश हो तथा परस्पर शोभा-बर्द्धक हो, उसे 'समता' गुण कहते हैं ॥ १०१ ॥ अभिनव-अब समता को कहते हैं-शब्दों को समानता के कारण 'समता' गुण है। चूर्णपद अर्थात् असमस्त रचना जहाँ पर अतिशय युक्त नहीं होती। यहां अतिशय प्रतियोगी की अपेक्षा करता है। रचना दोर्घसमास वालो, अति समास वाली, अल्प समास वाली और समास रहित इस प्रकार चार प्रकार की होती है। इसमें समास-रहिता को अपेक्षा समासा में समासगत दोर्घत्व, अत्यन्तसमासा में समासगत अत्यन्तत्व, अल्पसमासा में समासगत अल्पत्व रूप अतिशाय है। इस अतिशय से शून्य रचना यहाँ अपेक्षित है-इसो बात को कहते हैं कि दीर्घ समास और अत्यन्त समास विषमता है और तद्विपरोत समता है। उपक्रान्त मार्ग का अपरित्याग रूप समता है। ऐसा कहा गया है। जैसे- "भैसे शृङ्गों से बार-बार ताड़ित जलाशय के जल से स्नान करें। छाया में झुण्ड बनाकर बैठे हुए मृग-समूह जुगा की करें, सुअर विश्वस्त होकर छोटै तालाबों में मोथा खाये, मेरा यह धनुष भी प्रत्यञ्चा के उतार देने से विश्राम करें।' यहाँ पर अवान्तर वाक्यों द्विपद समास वालो तथा अत्यन्त लम्बे-लम्बे पदों वाली वृत्ति नहीं है। १. ख. अन्योन्यमदूशं वत्र तथा ह्यन्योन्यभूषणम् । २. क. (टि.) समा स्याद। ३. ख. समासावु समता यथा।

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वाटयशार्त्रे

'प्रसोद चण्डि ! त्यज मन्युमञ्रजता जनस्तवायं पुरतः कृताञ्जलिः'। किमित्थं- इति चूर्णपदैरपक्र्यासमाप्त एव वाक्यार्थे; वाक्यान्तरे दीर्घः समासः कृतः।

पूवंत्र ('गाहन्ता' मित्यत्र त्ववान्तराथंसमाप्तावर्यान्तरोपक्रम एव समासेन 'छायाबद्धकइम्बक' मित्युपक्रान्तोऽपि न चैत्यात्कूपपतनमिव चूर्णपद प्रयुक्त 'मृगकुल' मिति। सेयं समता जाता शब्दगुणः। अथाऽपि समत्वात्सा। कि तत्समत्वं आह व्यर्थाभिधायिभिरिति निष्प्रयोजनमर्थडभिदघति ते व्यर्थाभिधायिनस्तेषां शब्दानां न त्वेतदवैमल्यमिति प्रसादेन निरस्तत्वात। नैतत, नहि सवथा निष्प्रयोजनता, अपि तु सदपि प्रयोजनं दुर्बोधम्, तदाह-दुर्बाधनैरिति। अभिधोयतेऽस्मै इत्यभिधानं प्रयोजनम् । यथा- च्युतसुमनसः कुन्दा पुष्पोद्गमेष्वलसा द्रुमा: मलयमरुतः सर्पन्तोमे वियुक्तधृतिच्छिदः । अथ च सवितुः शोतोल्लासं लुनन्ति मरीचयो न च जरठतामालम्बते क्लमोदयदायिनीम्॥

"हे चण्डि? प्रसन्न हो जावो, क्रोध को छोड़ दो, यह जन तुम्हारे सामने हाथ जोड़कर खड़ा है। स्थूल स्तनों के उतकम्पन से जिसमें सुप्त विलास उन्मिषित हो रहे हैं, ऐसी तुम क्यों बैठी हो।" यहाँ पर चूर्ण पदों से उपक्रम करके वाक्यार्थ के समाप्त न होने पर उत्तराद्व वाक्य में दीर्घ समास किया गया है। पूर्व के 'गाहन्ताम्' इत्यादि वाक्य अवान्तर अर्थ को समाप्ति के बाद अर्थान्तर का उपक्रम 'छायाबद्ध कदम्ब के' इस रूप में समास से हो किया गया है। तथापि चंत्य से कूप में गिरने के समान रूप चूर्णपद का प्रयाग नहीं किया है। इस प्रकार यह समता 'शब्द गुग' हो गया। अर्थ में भी समत्व होने से 'समता' हे। कहते हैं कि अर्थ में समत्व क्या है ? इस पर कहते हैं-व्यर्थाभिधायिभिरिति अर्थात् जो निष्प्रयोजन अर्थ का कथन करते हैं वे व्यर्थाभिधायो शब्द है। ऐसे शब्दों का प्रयोग नहां करना चाहिये। यहाँ अथ वैमल्य नहीं है, क्योंकि प्रसाद से उसका निरास हा गया। किन्तु यह कथन भो ठोक नहीं है, क्योंकि शब्दों को सवथा निष्प्रयोजनता नहों हाती अर्थात् शब्द सर्वथा अर्थहीन (निष्प्रयोजन) नहीं होते। यदि होते भो हैं ता अर्थ दुर्बोध होता है। इसी बात को 'दुर्बोधनैः' पद से कहते हैं। जिसके लिए कहा जाय वह अभिधान प्रयोजन है। जैसे-

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बोडशोछ्याय: ४७७

*अभियुक्तैविशेषस्तु योऽर्थस्येहोपलक्ष्यते। तेन चार्थेन सम्पन्नः समाधिः परिकोर्त्यते ॥ १०२॥ *उपमास्विह दृष्टानामर्यानां यत्नतस्तथा। "प्राप्तानां चातिसंक्षेपात् समाधिनिर्णयो यतः ॥१०३॥।

इत्यत्र ऋतुसन्धिवणन्रकमे मलयमारतः प्रक्रमं भिनति, न च सवंथा निरर्थको विप्रलम्भोद्दीपनत्वात्। किन्तु प्रक्रमं स्फुटं न पुष्णातीति विषमता। समता तु "मनसि च गिर गृह्न्तोमे किरन्ति न कोकिलाः" इति द्वितोयपादस्थाने यदि पठेतु॥ १००-१०१ ॥

"कुन्द के फूल झड़ गये हैं, वृक्ष फूलों के उद्गम में अलसाये हुए हैं अर्थात् वृक्षों में फूल नहीं निकल रहे हैं। कामिनियों के धैर्य का तोड़ देने वाले मलय- मारुत बह रहे हैं। सूर्य को किरणें शोत के उल्लास (वृद्धि) को रोक रही है। किन्तु थकावट करने वाली कठारता का आलम्बन नहीं कर रही हैं।1 यहाँ पर ऋतुओं के सन्धि-वर्णन के प्रक्रम में मलय मारुत प्रक्रम छोड़ रहा है। किन्तु विप्रलम्भ का उद्दीपक होने के कारण वह सर्वथा निरर्थक नहीं है। किन्तु प्रक्रम को स्फुट रूप में पुष्ट नहीं करता, इसलिए विषमता है। समता तो यदि द्वितीय पाद के स्थान पर "मनसि च गिरं गृह्तीमे किरन्ति न कोकिलाः" ऐसा पाठ मानने पर हो हो सकतो है॥ १००-१०१ ॥ ४. समाधि अनुवाद-जहाँ पर अभियुक्तों (प्रतिभाशाली व्यक्तियों) के द्वारा विशेष अर्थ उपलक्षित होता है, उस विशेष अर्थ से सम्पन्न गुण को 'समाधि' कहते हैं॥ १०२॥ अथवा अनुवाद-उपमा आदि में दृष्ट तथा यत्न से प्राप्त अर्थों को अति सक्षेप के कारण 'समाधि' कहा जाता है॥ १०३ ।।

१. ख. पुस्तके- उपमास्विहदृष्टानामर्थानां यत्नतस्तथा । प्राप्तानां चातिसयोग: समाधिः परिकोत्यते॥ इति पाठः। २. क. (टि०) एवोपलभ्यते। ३. क. परिकीतितः। ४. क. उपमाध्युपदिष्टानां। ५. ख. प्राप्तानां चातिसंयोग: समाधि। परिकोत्यते।

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नाट्यवाल्ने

समाधिमाह-अभियुक्तैविशेषसिति्वति। यस्या द्वितीयस्यार्थस्य अभियुक्तैः प्रतिभातिशयवद्भिः विशेषो अपूर्वः स्वोस्लिखित उपपद्यते स समाहितममः संपाद्यविशेषत्वादर्थो विशिष्टः समाधि:, यत्र कवेः स्वप्रतिभयोल्लेखस्तत्सवंमिहो- दाहरणम्। यथा- आश्वपैहि मम सीधुभाजनाद्यावदग्रदशनैन दृश्यते। चन्द्र ! मद्दशनमण्डलाङ्टितः रवं न यास्यसि हि रोहिणीभयात्।। अयोनिरन्यच्छायायोनिश्चेति, एतदेव ज्ञानं प्रातिभं यस्य विषयः अयोनिः। सारस्वतस्य हि सर्वोडयमनिमितत एव। तदन्यस्य सर्वोऽन्यच्छायायोनिः। व्यक्त- भध्यभावनावास्यत्वादपि कविहृव्यगतप्रतिभातिशयतारतम्यादनवस्थितम्। अभिनव-अब समाधि की कहते हैं-जहाँ पर अतिशाय प्रतिभाशाली अभियुक्तों के द्वारा द्वितोय अर्थ का उल्लिखित विशेष एवं अपूर्वता का प्रतिपादन किया जाता है। वह विशिष्ट अर्थ समाहित मन से विशेष रूप से संपाद्य होने से 'समाधि' है। यहाँ पर कवि की अपनो प्रतिभा का उल्लेख है। वह सब इसका उदाहरण है। जैसे- "हे चन्द्र ! तुम शोघ्र ही मेरे मद्य-पात्र से दूर हो जाओ, जब तक दाँतों से तुम्हें काट न लूँ। क्योंकि यदि काट लूँगा तो मेरे काटने के चिह्न से अद्कित तुम रोहिणो के भय से आकाश में नहीं जाओगे।" अर्थ दो प्रकार का होता है-अयोनि और अन्यच्छायायोनि। यह प्रतिभा- जन्य ज्ञान है जिसका विषय अयोनि है। क्योंकि सारस्वत कवि का सभी अर्थ अयोनिज होता है। उससे भिन्न सभी अर्थ अन्यच्छायायोनिज होते हैं। व्यक्त भव्य भावना से वासित होने से भी कवि-हृदय-गत प्रतिभातिशय के तारतम्य से अर्थ अनवस्थित है। विमर्श-भरत ने विशिष्ट अर्थ से युक्त गुण को 'समाधि' कहा है। वामन ने अर्थ दृष्टि को समाधि कहा है। (अर्थदृष्टिः समाधिः)। वह अर्थ दो प्रकार का होता है-अयोनि और अन्यच्छायायोनि। अयोनि का अर्थ है अकारण अर्थात् कवि किसी दूसरे कवि की छाया न लेकर स्वयं जिस अर्थ का वर्णन करता है वह अयोनिज कहलाता है और कवि किसी दूसरे कवि के काव्य को छाया लेकर अर्थ का वणन करता है बह 'अन्यच्छायायोनि' है। इन होनों अ्यों के वर्णन को समाधि कहते हैं।

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शोडषोञ््याय:

शब्दगुणश्च समाधि:, तमाह-तेन चेति। समाधिशब्दस्य योऽथं: परिहार- लक्षणस्तेन यः परिकीतित: परितः समन्तादाकरान्त्या उच्चारणे संपन्न:। स च समाधि: । आक्रान्त्या उच्चारणे आरोहावरोहक्रमः आक्रमणेन गतितुल्यः। आरोहश्चोध्वंगमनद्वारः प्राणरूपमारुतस्य उच्चरूप:, अपक्रमणमवरोहो विपयंयः। उच्चत्वं स्थानकरणवशात् बाह्याभ्यतरप्रयत्नवशाच्च। तथा हि- निरानन्वः कौन्दे मधुनि परिभुक्तोज्झितरसे न साले सालम्बो लवमपि लवड्गे न रमते। प्रियङ्गौ नासङ्गं रचयति न चूतेऽपि चरति स्मरंल्लक्ष्मोलीलाममलमधुपानं मधुकर:॥ तत्र नकाराद्दन्त्यान्मूधंन्यो रेफ उच्चस्थानस्थितो यद्यपि, नकारदकारयोः तथापि दन्त्यसंयोग: निरन्तरप्रयत्नाधिवयेन न विबृततमेन चाकारद्वयेन द्विवार- प्रयत्नकेन च जिह्वामूलीयेन चोच्चत्वभाजा आरोहणमस्फुटीकरणमिति न शब्देना- रोहणं संपन्नमप्यसंपश्नकल्पम्। आरोहणसौकर्यायैव प्रत्युत मध्ये ह्यात्र का विश्ान्तिः। अभावे उच्चतमसक्कलनसोपानारोहखेदायैव भवति निरास्वाद्य कौन्द इति।

अभिनव-समाधि शब्द का गुण है, इस बात को 'तेन च' इत्यादि के द्वारा कहते हैं। समाधि शब्द का जो अर्थ परिहार रूप से परिकीतित है, वही 'समाधि' है। आक्रान्ति से उच्चारण करने पर आरोहावरोह क्रम आक्रमण की गति के तुल्य है। आरोह ऊर्ध्वगमन का द्वार प्राणरूप वायु का उच्च रूप है और अवरोह अर्थात् अपक्रमण आरोह का विपयय है। स्थान और बाह्य एवं आभ्यन्तर प्रयत्न के कारण ही उच्चत्व है। जैसे- "लक्ष्मी के लीला स्थल कमल के मधुपान का स्मरण करने वाले भौंरे ने जिसके रस का आस्वाद लेकर छोड़ दिया, ऐसे कुन्द पुष्प के पराग में कुछ भी आनन्द का अनुभव करता है, न साल का आलम्वन करता है, न लवङ्ग में लेशमात्र भो रमण करता है, न प्रियङ्ग में आसक्ति करता है और न आम के बौर पर भ्रमण करता है।" यहाँ पर 'निरानन्दः' में दन्त्य नकार के बाद मूर्धन्य रेफ यद्यपि उच्च स्थान में स्थित है तथापि नकार का दकार के साथ निरन्तर संयोग अधिक प्रयतन वाले विवृततम आकार द्वय का उच्चत्व भाव और दो बार के प्रयत्न वाले जिह्वामूलीय १. क. (टि०) विधुरो बालवकुले।

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नाटपशाइन्रे

यथा वा निरानन्द इत्यत्र यावन्महाप्राणो जिह्वामूलीयशच श्वासानुप्रदानो द्विवारयुक्तस्ताववारीहयत औकार अकारमवेक्ष्य विवृतरूप औकारतोऽपि नकार: ततोऽपीकारोकारयो: ऊनं विवृतत्वं, अकारस्तु संवृतः इत्यवरोहः। औकारस्तु मध्येऽ्वरोहसौकर्यायैव दूरारोहाद्धि दूरावरोहणं चेति चूलिकाया: कूपपतनकल्पम्। खेवों यथा- "कुर्वाणा: परमं महच्च मनस" इति अकारोपध्मानोयेम्यो झटिति संवृतेऽ- कारे निपातनात। "निवेशः स्वः सिन्धोः"-इत्यत्र क्रमेण विवृततर स्पश इति क्रमेणारोहः। "तुहिनगिरिवीथीषु जयति" अत्र विवृतेभ्यः उकारादिभ्यः संवृतेऽकार- द्वये पातः इकारस्त्वन्यत्वान्न च विध्ान्तिस्थानमिति नारीहः। यदि वा सिन्धोरिति विवृततरापेक्षया आरोहसंस्कारे उकारेऽनरोहबुद्धिरेव स्फुटत्वेऽवरोहः। जयतिमपास्य तदयममिति पाठः। अनुस्वारो हि संवारप्रयत्नः । के साथ आरोहण स्फुट नहीं है। अतः न शब्द से आरोहण सम्पन्न होकर भी असम्पन्न हैं। यहाँ पर आरोहण के सौकर्य के लिए मध्य में विश्रान्ति करने से क्या होगा ? विश्रान्ति के अभाव में अत्यन्त ऊँची बनाई गई पीढ़ी के अरोहण में खेद हो होगा, सुख नहीं। और जैसे 'निरानन्द', इसमें महाप्राण और जिह्वामूलीय और श्वासानुप्रदान वर्ण आरोहण करते हैं। 'कौन्दे' में औकार अकार को देखकर अपने को विवृत रूप कर दिया और औकार के बाद नकार फिर उसके भी बाद इकार, उकार ईषद्विबृत है और अकार संवृत है। औकार मध्य में अवरोहण के सौन्दर्य के लिये है। इस प्रकार दूरारोहण से दूरावरोहण है। यह चूर्णिका के कूपपतन के समान है। खेद का उदाहरण जैसे- 'कुर्वाणा: परम महच्च मनसः' इसमें आकार और उपध्यानीय से शीघ्र ही संवृत आकार में निपात होने से खेद है। 'निवेश: स्वः सिन्धोः' में क्रमशः विवृततर स्पर्श है। अतः इस प्रकार क्रम से आरोहण है। 'तुहिनगिरिवीथीषु जयति' इसमें विवृत उकारादि के बाद संवृत अकारद्वय में पात है। इकार तो इनसे भिन्न होने के विश्रान्ति-स्थान नहीं है। अतः आरोहण नहीं है। यदि 'सिन्धोः' में विवृततर को अपेक्षा से आरोह का सस्कार होने पर उकार में अवरीह बुद्धि हो है और 'तुहिनगिरित्रोथीषु जयति' में 'जयत को हटाकर 'तदयम्' यह पाठ कर देते। ऐसा करने पर अवराह स्फुट है। क्योंकि अनुस्वार का प्रयतन संवार है।

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'नराः शोलभ्रष्टा व्यसन इव मज्जन्ति तरवः' इति अकार+इकार+ अकारेभ्योऽवरोहमयेभ्यो विवृते इकारे आरोहः, अन्ते च विसजनीये आरोह एव। तेन स्वभावप्रतिभादर्शनानुबिद्वा भगवती वाणी स्वरसोपनिपतिता स्वरसंभार- प्रभावानुरोधेनैवारोहावरोहक्रमं भजते प्रतिभादृष्टिशून्यत्वात अन्धपवववा- रोहादि न भजेत। नन्वियता पाठसौकयं स्थात्, ओोतुस्तु किमायातम्, अनभिज्ञो देवानां प्रिय:, यथा हि कर्कशशर्करानिकरककण्टकिते देशे दुस्सञ्चरे संचरज्जनं पश्यन्त्या अपि सुकुमारहृदयायाः प्रमदायास्तदात्मानुप्रवेश इव जायमानं खेदमतितरामादत्ते प्रहार- खेदो वा, यथा सहृदयस्य स एव मार्ग:, सुकुमारता हि वैमल्यापरपर्याया, सहृदयत्वं हृवयस्य हि कविहृदयतादात्म्यापत्तियोग्यतैव उत्कर्ष: । तत एवोक्तम्।

'नराः शोलभ्रष्टाः व्यसन इव मज्जन्ति तरवः' अर्थात् शोलभ्रष्ट मनुष्य के व्यसन में डूबे हुए के समान वृक्ष जल में डूब गये। यहाँ पर अवरोहमय, अकार, इकार और उकार के बाद विवृत इकार आने से आरोह है और अन्त में विसर्जनीय होने से आरोह है। इससे स्वाभाविक प्रतिभा के दर्शन से अनुविद्ध भगवती बाणी स्वरस से प्राप्त होकर स्व-सम्भार के प्रभाव के अनुरोध से ही आरोह और अवरोह क्रम को प्राप्त करती है और प्रतिभा दृष्टि से शून्य होने मे अन्धे के पद की तरह आरोहावरोह को नहीं प्राप्त होती।

अब प्रश्न यह होता है कि इससे ( आरोहावरोह के रहने से) पाठ (पढ़ने) में सुविधा हो गई, किन्तु श्रोता को क्या मिला। कहते हैं कि अनभिज्ञ (अज्ञानी) देवानां प्रियः अर्थात् मूर्ख हैं। जैसे कठोर कंकरीली और कटीलो स्थान के होने से दुःसञ्चर स्थान में संचरणशोल मनुष्य को देखने वाली सुकुमार हृदय वाली प्रमदा को उस संचरणशोल (चलने वाले) मनुष्य के चित्त में अनुप्रवेश से जायमान (होने वाले) के समान अत्यन्त खेद का अनुभव होता है अथवा गिरने पर अधिक खेद होता है। इस प्रकार सहृदय का भी यही स्थान है। सुकुमारता जो वैमल्य का अपर पर्याय है वहो सहृदय को सहृदयता है। कवि के हृदय के साथ तादात्म्यापत्ति को योग्यता हो उत्कर्ष है। इसलिए कहा है- वा० शा०-६१

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४८२ नाटयशाब्त्रे बहुशो 'यच्छू तं वाक्यमुक्तं वापि पुनः पुनः। नोद्वेजयति यस्माद्वि तन्माधुर्यमिति स्मृतम्'॥ १०४॥। शब्दार्थंशासन-ज्ञानमात्रेणैव न वेद्यते। वेद्यते स हि काव्या्थंतत्त्वज्ञेरेव केवलम्। (ध्वन्या १-७ ) इति । अभिधानकोश्षमपि हि पठतां सुप्तिङ्विभक्तीशच विदुषामपि न काव्यतत्त्वाव- बोष: तस्मादवर्णोच्चारणप्रयत्नेन परुषस्पशंपठनजनितो यः खेव उच्चारयितु: स एब श्रोतुरपि पारव्यमाधतें। "सैरन्ध्रधध्ववधूनिबन्ध्यनुगतप्राणैकबन्धकमः" इत्यादौ। भगंगतं च लालित्यपावथ्यादि पुष्कराध्यायेऽपि (अ-३४) बक्ष्यते। अन्वैरप्युक्तं "तेन वर्णा रसच्युतः" इत्यादि। स्वभावतो हि केचन वर्णाः सन्तापयम्तीव निकृन्त- न्तोव रेफरकारावय इव परुषवृत्तिपू्वकाः, अन्ये तु निर्वापयन्तीवोपनागरिकोचिता:। लोक्षगोचर एवायमर्थ: स्वसंवेद्योऽपीति न वितत इत्यास्तां तावत् ॥ १०२-१०३॥ "केवल शब्द और अर्थ के अनुशासन के ज्ञान मात्र से हो उस प्रातिभ अर्थ का ज्ञान होता है, वह तो काव्यार्थं तत्वज्ञ लोग हो जान सकते हैं।" (ड्वन्यालोक १।७ )। अभिधान कोश के पढ़ने वालों को तथा सुप तिङ् विभक्तियों को जानने वालों को भी काव्य के तत्त्व का अवबोध नहीं होता, इसलिए वर्णो के उच्चारण के प्रयश्न से कठोर स्पर्श संज्ञक वर्णों के पढने से जो खेद उच्चारण करने बालों को होता है, वही खेद सुनने वाले श्रोता को भी होता है। जैसे "सैरन्ष्यध्ववधू- निबन्ध्यनुगतप्राणैकबन्धक्मः" इत्यादि में वर्णों के लालित्य और पारुण्य आदि को पुष्कराध्याय में कहेंगे। अन्य लोगों ने भी कहा है 'तेन वर्णा रसच्युतः' (इस हेतु से वर्णों में रस चूता है)। वस्तुतः परुषा वृत्ति से घटित रेफ, ककार आदि के समान कोई-कोई वर्ण संतप्त सा करते हैं, कर्त्तन जैसा करते हैं। अन्य लोग उप नागरिका वृत्ति के अनुसार रचना करने के उचित वर्ण सन्ताप का निर्वाण करते हैं। यह सब बात स्ब-संवेद्य होने से विस्तार से नहों लिखते हैं, अतः रहने दिया जाय ॥। १०२-१०३ ॥ ५. माधुर्य अनुबाद-जो वाक्य अनेक बार सुने हुए अथवा बार-बार कहे जाने पर भी उद्वेग उत्पन्न नहीं करता, उसे 'माधुर्य' गुण कहा गया है ॥। १०४॥ १. ग. यत्कुतं। २. क. (हि०) तस्मात् । १. ग. उदाहृतम्।

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माधुर्यमाह-बहुशो यच्छ, तमित्यादि। यदिति यस्माद्वेतोर्वाक्यं श्रुतं संशय- विपर्यययोरास्पद न भवतोति तन्माधुर्यम्। द्राधीयसि समासे ताववश्यं भवत इति तद्विरिह एव माधुयं शब्बगुण इत्युक्तं भवति यथा- गाहन्तां महिषा निपानसलिलं शुङ्गमुहुस्ताडितं छायाबद्धकदम्बकं मृगकुलं रोमन्थमभ्यसतु। विस्रब्धैः क्रियतां वराहपतिभिर्मुस्ताक्षतिःपल्वले विशान्ति लभतामिदं च शिथिलज्याबन्धमस्मद्नुः ॥(शाकु २-६) पुनः पुनरप्युक्तमर्थजातं यस्माव्वेतोरपनोतमवगाहेन वैरस्यं तद्वचनवैचित्र्या- तमकं माधुर्यमर्थगुण: वचनास्तराभिधेयता हि स एवार्थो विचित्रो भवति। यथा- रसवदमृतं कः सन्देहो मधून्यपि नाम्यथा मधुरमधुरं चूतस्यापि प्रसन्नरसं फलम्। सकृदपि पुनभंध्यस्थः सन् रसान्तरविज्जनो वदतु यविहान्यत्स्वादु स्यात्प्रियादशनच्छदात्॥

अभिनव-माधुर्य गुण को कहते हैं-जिस कारण से सुना हुआ वाक्य संशय और विपर्यय का आस्पद नहीं होता, वह 'माधुय' गुण है। दो्घ समास वाले पद तथा वाक्य में तो संशय अथवा विपयय हो सकता है, अतः उसके अभाव में ही शब्द का माधुयं हो सकता है। जैसे- गाहन्तां महिषा निपानसलिलं शृङ्गेमुंहुस्ताडितं छायाबद्धकदम्बकं मृगकुलं रोमन्यमभ्यसतु॥ विस्नब्धै: क्रियतां वराहपतिभिर्मुस्ताक्षतिः पल्वले विश्रान्ति लभतामिदं च शिथिलज्याबन्धमस्मद्धनुः। (अभिज्ञानशाकुन्तले २६) बार-बार कहे हुए अर्थ के अवगाहन से जिसके कारण वैरस्य दूर हो जाता है वह वचनगत वेचित्र्य रूप माधुर्य अर्थगुण है। अन्य शब्दों से अभिधेय होने से भी वह अर्थ विचित्र ही होता है। जैसे- रसवदमृतं कः सन्देहो मधून्यपि नान्यथा। मधुरमधुरं चूतस्यापि प्रसन्नरसं फलम् ॥ सकृदपि पुनर्मध्यस्थः सन् रसान्तरबिज्जनो। वदतु यदिहान्यत स्वादु स्यात प्रियादशनच्छदात्॥

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४८४ नाटपशाहवें

समासवद्भिविविधैविचित्रेश्च पदैर्युतम्। सानुस्वारैरुदारश्च तदोजः परिकोत्यंते ॥१०५॥ 2अवगीतोऽपि होनोऽपि स्यादुबात्तावभासकः । यत्र शब्दार्थसम्पत्तिस्तदोज: परिकीतितम् ॥१०६॥

अत्र रसवदमृतमिति य एवार्थ: स एव कः सन्देह इत्युक्तया विचित्रया परि- निश्चयस्थैर्याभिधायित्या निश्चयोकृतः निश्चयस्थैयमेव च नान्यथेति वचनान्तरेण विपर्ययनिराकरणसंभावनान्तरनिरासं च क्रमेण विबधता विचित्रोकृतमिति मधुरोऽयमर्थंः।।१०४।।

"अमृत भी रसवत् (रसकाल) है, इसमें क्या सन्देह है ? शहद भी अन्यथा (अमधुर) नहीं है। आम का भी प्रसन्न रस युक्त फल अतिमधुर है। किन्तु रसों के तारतम्य को जानने वाले लोग मध्यस्थ (तटस्थ) होकर एक बार भी कहें तो यही कि प्रिया के ओठों से अधिक स्वादु (मधुर) कोई अन्य वस्तु हैं क्या ?" यहाँ पर 'रसवदमृत' में जो अर्थ है वही है, इसमें क्या सन्देह है ? निश्चय स्थर्य को कहने वाली विचित्र उ्ति से निश्चय कर दिया है। निश्चय-स्थेयं को 'नान्यथा' इस वचनान्तर से विपर्यय के निराकरण की सम्भावना के निरास को क्रम से करते हुए विचित्र बना दिया है। ऐसा यह मघुर अर्थ है ॥ १०४॥। ६. ओज अनुवाद-जहाँ समासयुक्त, विविध, विचित्र, सानुस्वार और उदार बहुत से पदों से युक्त काव्य हो, वहाँ ओजो गुण कहलाता है॥ १०५ ॥

अन्य लक्षण अनुवाद-जो रचना निन्दित होने पर भी तथा हीन होने पर भी तथा शब्दार्थ सम्पत्ति से उदात्त अर्थ का अवभास कराने वाली है। उसे 'ओज' गुण कहते हैं॥। १०६।।

१. अयं श्लोकः 'ख' पुस्तके नोपलभ्यते। टिप्पण्यांतूपलम्यते। २. ख. अवगोताविहोनोऽपि। क. (टि०) अवगीतविहोनोऽपि । स्यादुत्तावभावकः । ३. क. यत्र शब्दार्थसम्पत्या। ४. क. (टि०) परिकीत्यंते।

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ओजो लक्षपति-समासवद्भिवंहुभिरिति। दहुमिरेकसमाससंजञायुक्तैरथ न विचित्रैयंमकैः पदैयंदुक्तो यो बन्धस्तवोजः। यथा- मन्थायस्तावणवाम्भ: प्लुतिकुहरवलमन्दरध्वानघोर: । कोणाधातेषु कृष्णाक्रोधाग्रदूतः कुरुकुल निधनोत्पातनिर्धातवातः। केनास्मतिसिंह नाव प्रतिरसितसखो दुन्दुभिस्ताडितौऽसौ।। यथा सानुराग: अनुरक्तं तथा वर्णो वर्णान्तरमपेक्षते तत्र सानुरागत्वम्। "विलुलितमकरन्दा मञ्जरोनंतंयन्तो" अत्र र इति शब्दो न्वशब्दं स्वगुरुत्वायापेक्षते न इत्ययंशब्दः तशब्दं य इत्ययं थ न्तो शब्दं च, इत्ययं शब्दो न्ते गुरुत्वात्। स्वविधान्तिजनितकालोपचयलभ्यं गुरुत्वं च नाकांक्षतीति द्वितीयपादपाठं समनन्तरमेवापेक्षते। "विलुलितमधुधारा मञ्जरीर्लोपयन्तः ।" इति पाठे लिशब्दो धाशब्दो लोशनदश्व जात्यापेक्षत इति। तदेव गाढत्व- मुच्यते निविडावयवतैव सा। अभिनव-ओज गुण का लक्षण करते हैं-बहुत से एक समास संज्ञा से युक्त विचित्र और यमक पदों से युक्त जो बन्ध है, वह 'ओज' है। जैसे- "मन्थन से क्षुब्ध समुद्र जल से परिपूर्ण गुहा वाले चञ्बल मन्दराचल की ध्वनि के समान गम्भीर वामनदण्ड (कोण) से आघात होने पर गरजते हुए प्ररय कालोन बादलों की घटनाओं के परस्पर संघर्ष से प्रचण्ड, द्रौपदी के क्रोध का अग्रदूत कौरव कुल के निधन का सूचक उत्पात युक्त वायु वाला, हमारे सिंहनाद की प्रतिष्वनि के समान इस दुन्दुभि को किसने बजाया ?" जैसे अनुरागो व्यक्ति अतुरागयुक्त पुरुष की अपेक्षा करता हैं उसी प्रकार वर्ण वर्णान्तर की अपेक्षा करता है, यहाँ सानुरागत्व है। "विलुलितमकरन्दा मञ्जरीनर्त्तयन्तो" यहाँ पर 'मकरन्द' में 'र' शब्द गुरुत्व (गुरुवर्ण होने के) के लिए 'न्द' को अपेक्षा करता है। इसी प्रकार 'नर्त्त' में 'न' गुरुत्व के लिए 'त' की और 'यन्तो' में 'य' वर्ण 'न्तो' की अपेक्षा करता है। और 'न्तो' पद में गुरु होने से स्व-विश्रान्ति से उत्पन्न काल के उपचय से लभ्य गुरुत्व को आकांक्षा नहीं करता, किन्तु द्वितीय पाद के पाठ को अपेक्षा तो करता है। "विलुलितमधुधारा मञ्जरोर्लोलयन्तः"।

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माटपचाहने

यत्र खलु समासेन संक्षेपेण युक्तानि पदानि, यत्रार्थो भूयानिति संक्षेपो नामाथंगुण ओज: । ओजस्वी किमतोऽपि यः खलु युवा भूत्वा समापेक्षते, तथा एकमपि वस्तु उदारैबहुभि: पदैर्पनिबध्यते विस्तरात्मकत्वमप्योजोऽर्थगुणः। संक्षेपो यथा- ते हिमालयमामन्व्य पुनः प्रेक्ष्य च शूलिनम्। सिद्धं चास्मै निवेद्यार्थ तद्विसृष्टाः खमुद्ययुः ॥ (कुमा ६९३) विस्तरस्तु अथ नयनसमुत्यं ज्योतिरत्रेरिव द्यौः। सुरसरिदिव तेजो वह्निनिष्ठयूतमैशम्॥ (रघु० २-७५) १०५११०६।।

इस प्रकार के पाठ में 'लुलित' में 'लि' शब्द 'त' को धारा मे 'धा' शब्द 'रा' की और 'लोलयन्तः' में 'लो' शब्द 'ल' की अपेक्षा करता ही है। इसी को गाढ़ता कहते हैं जिसमें अवयव निबिड़ है। जहाँ पर षद संक्षेप से युक्त हैं और अर्थ बहुल हैं, यह संक्षेप नामक ओज अर्थ गुण है। और 'वह ओजस्वो कैसा? जो युवा होकर भो दूसरे की अपेक्षा करता है।" इस प्रकार जब एक वस्तु को बहुत से पदों से उपनिबन्धन करते हैं। और विस्तारपूर्वक वर्णना करते हैं तो विस्तारात्मकस्व भी ओज शवद गुण है। संक्षेप का उदाहरण जैसे- ते हिमालयमामन्त्रय पुनः प्रेक्ष्य च शूलिनम्। सिद्ध चास्मे निषेधार्थ तद्विसृष्टाः खमुद्ययुः ॥ (कुमार ६।९३) यहाँ पर संक्षेप में शिव-पार्वती के विवाह सम्बन्धो वृत्तान्त को पूरा करके वर्णन किया गया है। विस्तार का उदाहरण जैसे- अथ नयनसमुत्थं ज्योतिरत्रेरिव द्यौः । सुरसरिदिव तेजो वह्निनिष्ठघूतमैशम्॥ (रघु २।७५) अर्थात् अत्नि के नेत्र से समुद्भुत ज्योति को आकाश के समान और अग्नि से उदभुत ईश के तेज को सुरसरित के समान सुदक्षिणा के दिलीप के द्वारा आधान किये गये गर्भ को धारण किया। यहाँ विस्तार का उदाहरण है।

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षोडसोषच्याय:

सुखप्रयोज्यैयंच्छब्दैर्युक्तं सुश्लिष्टसन्धिभिः । सुकुमारार्थसंयुक्तं "सौकुमायं तदुच्यते॥। १०७॥ सौकुमार्यमाह-सुखप्रयोज्यैरिति। ववचित्पदस्य स्वयं पारुण्यं भवति यथा बाढा, अजड्ढा, निर्द्वैतं, सदृक्त्वं व्यवसितिः, इति। कवचित्संहितया -दर्व्याख्योर्वी- बिधूयते। तदुभयरहितत्वं सौकुमार्यं शब्दगुण:। यथा- गाहन्तां महिषा निपानसलिलं शृङ्गमंहुस्ताडिते। छायाबद्धकदम्बकं मृगकुलं रोमन्यभ्यसतु। विस्त्रन्घैः क्रियतां वराहपतिभिर्मुस्ताक्षतिः पल्वले॥ विश्ान्ति लभतामिदं च शिथिलज्याबन्धमस्मद्नु:।। अत्र च यद्वक्तव्यं तत्समाधिलक्षणे निर्णोंतम्। परुषेऽपि चाथे सुकुमारेणाथॅन या संपत्तिस्तवर्थगुणः सौकुमार्यमपारुष्यरूपम्। एकाकिनि देवतासहाय इति मृते यशशोष इति, जडे देवानां प्रिय इति ॥१०७॥

७. सौकुमार्य अनुवाद-जो सुश्लिष्ट सन्धि वाले सरलता से प्रयोज्य (प्रयोग के योग्य) शब्दों से युक्त तथा सुकुमार अर्थों से युक्त हो उसे 'सौकुमार्य' गुण कहते हैं॥१०७॥ अभिनव-सौकुमार्य गुण को कहते हैं-कहीं-कहों पर पद स्वयं पुरुष होता है। जैसे-द्राढ़ा, अजड्ढ़ा, निद्वैर्त सदृक्तवं, व्यवसितिः। कहीं पर सन्धि के कारण पारुष्य होता है। जैसे 'दर्व्याख्योर्वी विधूयते'। इसमें सन्धि के कारण परुषता है। इन दोनों से रहित सौकुमार्य शब्दगुण होता है। जेसे- "गाहन्तां महिषा निपानसलिल शृङ्गेस्मुहुस्तड़ितम्" इत्यादि। यहाँ पर जो कुछ कहना था वह समाधि गुण के निरूपण में कह दिया है। पदार्थ के परुष होने पर भी सुकुमार अर्थ से जो सम्पत्ति होती है वह अपारुष्य रूप सौकुमार्य अर्थगुण है। जैसे-एकाकी (अकेले) के लिए 'देवतासहाय', मरे हुए के लिए 'यश:शेष' तथा जड़ (मूर्ख) के लिए 'देवानां प्रियः, शब्दों का प्रयोग सुकुमार हो गया। १०७॥ ५. क. (टि.)सुकरुमारं।

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नाठ्यशास्थ्रे

सुप्रसिद्धाभिधाना तु लोककर्मव्यवस्थिता। या क्रिया क्रियते काव्ये सार्थण्यक्ति: प्रकीर्त्यते॥ १०८॥ यस्यार्थानुप्रवेशेन मनसा परिकल्प्यते। अनन्तरं 'प्रयोगस्तु साऽर्थव्यक्तिरुदाहृता" ॥१०९॥ अर्थंव्यक्तिमाह-सुप्रसिद्धाभिधानेति। प्रसिद्धमभिधानमभिधाव्यापारो वस्यां काव्यक्रियायां सार्थव्यक्ति: शब्दगुण: यथा- गाहन्तां महिषा निपानसलिलं शृङ्गर्मुहुस्ताडितं छायाबद्कदम्वक मृगकुलं रोमन्थम्यसतु। विस्रग्धैः क्रियतां वराहपतिभिर्मस्ताक्षतिः पल्वले। विश्रान्ति लभतामिदं च शिथिलम्याबन्धमस्मवनु:।। विपयंये तु किरातादिनिदशनं यच्चार्थे वण्यते स तथैव लोके प्रसिद्ध इत्यर्थस्य गुणोऽयंव्यक्तिकिः। यथा-

८. अर्थव्यक्ति अनुवाद-जहाँ पर लोक में व्यवहार के योग्य कमं से व्यवस्थित अर्थ का सुप्रसिद्ध शब्वों द्वारा अभिधान किया जाय, उसे 'अर्थव्यक्ति' कहते हैं॥ १०८ ॥ अथवा अनुवाद-जिस शब्द के प्रयोग के अनन्तर जिस अर्थ का चित्त में ततकाल प्रयोग हो जाय, उसे 'अर्थव्यक्ति' कहते हैं॥ १०९॥ अभिनव-अर्थव्यक्ति को कहते है-जिस काव्य क्रिया में अभिधा व्यापार का प्रसिद्ध वस्तु के अभिधान किया जाय, वह 'अर्थव्यक्ति' शब्द गुण है। जेसे- "भेंसे सींगों के बार-बार ताड़ित जलाशय के जल में अवगाहन करें। छाया में झुण्ड बनाकर बेठे हुए मृग जुगाली करें। सुअर विश्वस्त होकर तालाबों में मोथा खाय। जिसको डोरी शिथिल (ढोलो) कर दी गई है, ऐसा मेरा यह धनुष विश्राम करें।" १. ग. सुप्रसिद्धा ातुना तु। 'ख' पुस्तके नोपलस्यते। २. क. (टि०) यस्यार्थोडनुप्रवेशेन मनसः परिकल्प्यते। ३. क. प्रयोगस्य। डशनन्तरप्रयोगस्तु । ४. क. (टि०) साथव्यक्ि: प्रकीतिता ।

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बोडशोऽ्व्याय:

'दिव्यभावपरीतं यच्छङ्गाराद्भुतयोजितम्। अनेकभावसंयुक्तमुदारतवं प्रकीतितम् ॥११० ॥ अनेकार्थविशेषैर्यत् सूक्तैः सौष्ठवसंयुक्तैः। उपेतमतिचित्रार्थैः उदात्तं तच्च कीत्यंते ॥ १११॥

पृष्ठेषु शङ्ङशकलच्छविषु च्छदानां राजीभिरञ्जतमलक्तकलोहिनी भि:। गोरोचनाहरिबभ्रुवहिः पलाश- मामोदते कुमुवमम्भसि पल्वलस्य।। १०८-१०९।। उदारतामाह-दिव्यभावपरीतं यविति। यत्रमानुषोचितमपि विव्यतया, करुणादियुक्तमपि शुङ्गारेण, वीरतास्थानमप्यद्भुतेन युक्तं वण्यते। तद्गतैर्वा विभा- वानुभावादिभि: यदुदीरितं तत्रौदार्यमर्थगुणः। एतदेवाग्रम्यत्वमित्यन्यैरुक्तम्। ग्राम्यं हि वस्तु यथास्थितमयोजितरचनाविशेषं प्रसिद्धिमात्रप्रमाणमुच्यते, ततोऽ्यवग्राम्यम् यथा- विपर्यय में किरात आदि निदर्शन है, वहाँ जिस अर्थ का व्णन करते हैं वह उसी प्रकार लोक में प्रसिद्ध है। इस प्रकार अर्थ का गुण अभिव्यक्ति है। जैसे- "शंख के टुकड़े के समान कान्ति वाले पत्तों के पृष्ठ पर महावर के समान लाल रङ्ग की रेखाओं से आश्रित, गोरोचना से रञ्जित हरित एवं पिङ्गल वर्ण के पत्तों वाले कुमुद तालाब के जल में सुगन्धित है, खिल रहे हैं।" ९. उदारता ( उदात्त) अनुवाव-जो रचना दिव्य भावों से प्राप्त हो, शृङ्गार एवं अद्भुत रस की योजना से युक्त हो तथा अनेक भावों से पूर्ण हो उसे 'उदारता' गुण कहते हैं। ११० ॥ अथवा अनुवाद-जो अनेक विशेष अर्थों से सौष्ठव युक्त सुन्वर वचनों से तथा अतिविचित्र अर्थों से युक्ति हो, उसे 'उदात्त' गुण कहते हैं ॥ १११ ॥ १. ख. पुस्तकेऽयं श्लोको नास्ति । २. क. (टि०) सोष्ठवसंज्ञितैः । ३. क. (टि०) उपेत्षमनतिग्राह्यैरुदारं तच्च कीत्यंते। ना. शा०-६२

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४१० नाटयचारय

स्वमेवं सौन्दर्या स च रुचिरतायाः परिचितः कलानां सीमानं परमिह युवामेव भजथः। अपि हुन्दूं दिष्टया तदिति सुभगे! संववति वां अतः शेषं चेत्स्याज्जितमथ इवानीं गुणितया॥ इति ॥ यत्राद्भुतत्वेन चमत्कृतोऽथंः। अनेकभावसंयुक्तमिति। शब्दगुणस्य लक्षणम्। एकभाषाचित्रत्वस्यानेकताचित्रतवं पदस्यैकस्यानेकपदव्यक्ति रक्षर संख्या वै चचित्र्यं सन्धा न साजास्यं च पिण्डीबन्धनृत्तसावृश्येन, तत्र हि गुल्मजातशृद्ध्लिकाविभेदेनेतथंभृतो नतंकीसंनिवेशो भरते तदुक्तं विकटस्वं नरीनृत्यमानत्वमिति पदानामौवार्यमिति। यथा- स्वरचरण विनिविष्टैरनुपुरैनतंकीनां झटिति रणितभासीत्तत्र चित्रं कलं च।। अभिनव-उदारता को कहते हैं-जहाँ मानुष भाव के योग्य होकर भी दिव्यता से युक्त है, करुणा से युक्त होकर भी शृङ्गार से युक्त है, वीरता-युक्त होकर भी अद्भत से युक्त वर्णन है। उन-उन रसों के विभाव, अनुभाव से जिसका उद्गार किया गया है, वह औदार्य (उदारता) नामक अर्थगुण है। इसी को कुछ लोग अग्राम्य कहते हैं। यथास्थित वस्तु तथा जो पूर्व नियोजित रचना-बिशेष न हो तथा केवल प्रसिद्धिमात्र प्रमाण वाली वस्तु ग्राम्य होती है। इससे भिन्न वस्तु अग्राम्य होती है। जैसे- तुम इस प्रकार की सुन्दर हो और वह सुन्दरता का प्रेमी है। तुम कलाओं की पराकाष्ठा हो और वह कलाओं का पारखी। हे सुभगे ! तुम दोनों की जोड़ो भाग्य से मिल रही है, अब अवशिष्ट यह है कि तुम दोनों का मिलन हो जाय, तो तुम्हारे गुणों की विजय हो गई।" जहाँ पर अद्भत रूप से अनेक भावों से युक्त चमत्कृत वर्णन हो, वह उदारता शब्द गुण का लक्षण है। जैसे एक भाषा में चित्रित अर्थ का अनेक रूप में चित्रण। एक पद में अनेक परदों को अभिव्यक्ति, अक्षरों की संख्या का वैचित्र्य, और सन्धियों का साजात्य। इनमेंपिण्डीबन्ध नुत्य का सादृश्य है। उनमें संघात रूप में शुङ्खलादि के भेद से इस प्रकार का नर्त्तकी के सन्निवेश को भरत ने जो विकट एवं अतिशय नृत्य का प्रयोग बताया है। वह पदों का आदार्य गुण है। जैसे- "वहाँ नत्तंकियों की अपने पैरों में पहिने हुए नूपरों की झिति आश्चर्यंजनक ध्वनि हुई।"

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४९१

यन्मनः श्रोत्रविषयमाह्लावयति होन्दुवत्। लोलाद्यर्थोपपन्नां वा तां कान्ति कवयो विदुः ॥ ११२।। अत्र प्रथमपादे एकाक्षरत्र्यक्षरचतुरक्षरमिति विचित्राणि पदानि, रेफे तद्- द्वितीयपदाक्रमणाद्वचाप्ति: तकारयोः सन्धानात्सन्धिसाजात्यं, तकारसकारयोः संस्थाननैकटयं च। विपर्ययस्तु- "चरणकमललग्नैर्नपुरैनतंकीनां झटिति रणितमासीन्मञजु चित्रं च तत्र" अत्र द्वे अपि पदे उपक्षरे। तावेव पादौ। इद भाषितविचित्रत्वम्। यथा- "अथ यदि तव वक्त्रं चण्डि ! भूयोऽपि नाम" इति न हृद्ं क्वणितरणितमासोन्मञ्जु चित्रं च तत्र" इति तकारमकारयोरसाजान्यं सकारमकारयोश्च संस्थानमिति ॥१११॥ यहाँ पर प्रथम चरण में एकाक्षर, त्र्यक्षर चतुरक्षर इस प्रकार विचित्र पद है, रेफ से सुन्दरता बढ़ गई। द्वितीय पाद में आक्रमण से व्याप्ति हो गई। 'तन्न' में तकारों के सन्धान से सन्धि में साजात्य है, 'सीत्तत्र' में सकार, तकार का संस्थान नैकठ्य है। विपयंय तो- "नर्त्तकियों के चरण कमल में पहिने हुए नूपुरों की मञ्जु एवं चित्र झड्कार शीध्र हो गई।" इसमें दो पद तीन अक्षरों वाले हैं। ये ही दो पाद हैं। यह भाषितविचित्रता है। जंसे- "हे चण्डि ! यदि तुम्हारा वक्त्र फिर होगा' यह हृद्य नहीं है। 'क्वणित- रणितमासोन्मञ्जु चित्रं च तत्र च' में तकार और मकार का असाजात्य है। 'सीन्म' में सकार मकार संस्थान नैकठ्य है।" १०. कान्ति अनुवाद-जहाँ पर लोला आदि अर्थों से उत्पन्न (युक्त) रचना चन्र की तरह ओत्र और मन को आह्लादित कर दे, उसे 'कान्ति' गुण कहते हैं। ११२ ॥ ४. क. (टि०) यन्मनः शोत्रविषयं प्रह्लादजनकं भवेत्। शब्दबन्घार्थयोगेन तत्कान्तिरिति भण्यते।। यन्मनः श्रोत्रविषयं प्रह्लावजननं तथा। शब्दतत््वारथंसंयोगे तत्कान्तिरिति कोत्यंते ।

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४९२ नाटयशास्त्रे

यो मनशधोत्रविषय: प्रसादजनको भवेत्। शब्दबन्धः प्रयोगेण स कान्त इति भण्यते ॥११३ ॥ कान्तिमाह-यन्मनः शोत्रविषयमिति। यम्मनोविषयमाह्लावयति यथा श्रुङ्गारविभावरूपं लोलाविचेष्टालड्कारसुन्वर काव्यार्थरूपं तत्कान्तिगुणयुक्तं तदेव दीप्तरसत्व मित्युक्तमन्यैः'। विभावादीनां दीप्तत्वमिति यावत्। यथा- प्रेयान् सोडयमपाकृत: सशपथं पदानतः कान्तया द्वित्राण्येव पदानि वासभवनाद्यावन्न यात्यात्मना तावत्प्रत्युत पाणिसंपुटगलन्नीवीनिबन्थं घृतो धावित्वैव कृतप्रमाणकमहो प्रेम्णो विचित्रा गतिः। अत्र होर्ष्या्यस्य रत्यनुभावस्य, औत्सुक्य स्वभावस्य च दोप्तत्वमित्यर्थगुणः। श्रोत्रविषयीभूतमिव यदाह्लावि काव्यं तत्कान्तिर्नाम शब्दगुणः । कुरङ्गीनेत्रालीस्तबकितवनालीपरिसर :-

अन्य लक्षण- अनुवाद-प्रयोग के द्वारा जो शब्द बन्ध भोत्र और मन का विषय होकर प्रसावजनक हो, उसे 'कान्ति' कहते हैं ॥ ११३ ।। अभिनव-कान्ति को कहते हैं-जो चित्त को आल्हादित करता है। जेसे शुङ्गार के विभाव रूप नायिका को लोलादि चेष्टा रूप अलङ्कार से सुन्दर काव्यार्थ रूप वह कान्ति गुण से युक्त है, दीप्तरसत्व है, ऐसा अन्य लोग कहते हैं। विभावादि की दीप्ति। जैसे- "यह वही प्रिय है जो शपथपूर्वक आपके चरणों में झुका हुआ था, उसे कान्ता ने फटकार दिया था, किन्तु खिन्न होकर वासगृह से जब तक दो-तीन ही पग चला था कि तब तक प्रणाम करतो हुई नायिका ने दौड़कर उसे पकड़ लिया। उस समय हाथ से पकड़ा हुआ नीवी का बन्धन खिसक गया। अहो प्रेम की गति विचित्र है।" यहाँ पर ईष्या नामक रति का अनुभाव का और औतसुक्य भाव का दीप्ति है, अतः यह कान्ति नामक अर्थ गुण है। श्रोत्र का विषयोभूत जो आह्वादि काव्य है, वह कान्ति नामक शब्द गुण है। जैसे- "कुरङ्गो को नेत्राली (नेत्रपंक्ति) से वनालि (वनपंक्ति) का परिसर स्तबकित है। १. क. (टि०) वामनभोजादिभि: ।

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बोडशोऽघयाय:

एवमेते ह्यालड्कारा गुणा दोषाश्च कोतिताः । प्रयोगमेषां च पुनः वक्ष्यामि रससंश्रयम्॥ ११४॥

काव्यं कायं 'नाट्यजैः वोररौद्राद्भुताअयम् ॥ ९१५॥

अत्र हि समासवत्यपि रचना ओत्रेन्द्रियैकतानतामावहति। तदेतल्लोके मधुरकाव्यमिति प्रसिद्धम्। माधुर्यमस्यस्तपवत्वमुक्तम्। अन्ये त्वौदायंकान्त्योलंक्षण- द्वयंविपर्यासेन पठन्ति ॥ ११२ ।। एतदुपसंहरति-एवमेत इति। चकाराच्छन्दांसि वृत्तानि जातयश्च। एषा- मिति। वृत्तच्छन्दः प्रभूतोनां दोषान्तानाम्। अनित्यदोषा हि विनियुज्यन्तेऽपी- त्युक्तम् ॥ ११४ ॥ लध्वक्षरप्रायेति। अत्र अतनुवाही चित्तवृत्तिपरिस्पन्वः, तत्र लध्वक्षरप्रधानं वृत्तं वीरादावुपमारूपके ॥ ११५ ॥

यहॉँ पर समासयुक्त भी रचना श्रोत्रेन्द्रिय को एकतानता का आवहन करती है। इसलिए लोक में यह मधुर काव्य के रूप में प्रसिद्ध है। माधुर्य को अभ्यस्त पद कहा गया हैं। अन्य लोग ओदार्य ओर कान्ति दोनों के लक्षणों को विपर्यय रूप में पढ़ते हैं अर्थात् वे कान्ति के लक्षण को औदार्य का लक्षण और औदार्य के लक्षण को क्रान्ति का लक्षण मानते हैं ॥ ११३ ॥ अनुवाद-इस प्रकार इन अलङ्ार, गुण और दोषों का व्णन किया गया है। अब इनके रसाश्रित प्रयोग को कहूँगा ॥ ११४ ॥ अभिनव-इनका उपसंहार करते हैं-'दोषाश्च' में कथित चकार से छन्द, बृत्त और जातियों का ग्रहण होता है। 'एषाम्' पद से छन्द प्रभृति दोष पर्यन्त का ग्रहण है। अनित्य दोषों का भो इसमें बिनियोग है, ऐसा कहा गया है ॥ ११४॥। अनुवाद-नाट्य-वेत्ताओं को लघु अक्षरों से युक्त, उपमा, रूपक आदि अलङ्कारों के आशय तथा वोर, रौद्र और अद्भुत रसों के आधय काव्य का निर्माण करना चाहिये॥ ११५॥ अभिनव-जहाँ पर हृदय का परिस्पन्द सूक्ष्मवाही न रहे, वहाँ पर वीर आदि में उपमा रूपक जैसे अलङ्कारों में लघु अक्षर प्रधान वृत्त रहते हैं॥। ११५॥

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नाटपथ्ा में

गुर्वक्षरप्रायकृतं बोभतसे करुणे तथा। कदाचिद्रौद्रवोराभ्यां यदाधर्षणजं भदेत्॥ ११६ ।।

शुङ्गारे च रसे कार्य मृदुवृत्तं तथैव च ।। ११७ ।। उत्तरोत्तरसंयुक्तं वीरे 'काव्यं तु यद्भवेत् । जगत्यातिजगत्या वा संकृत्या वापि योजयेत्* ॥ ११८॥

मसृणवाहिनि तु हृदवस्पन्दे गुर्वक्षरप्रायं करुणादौ। रौद्रादावपि कदा- चित्तद्भवति। यवा विलम्ब्य परखलीकारं स्मृत्वा ब्रवोति 'कर्ता द्यूतच्छलाना' इति तथा 'यो यः शस्त्रं विर्भात' इत्यादौ।

अनुवाद-वीभत्स और करुण रस में गुरु अक्षरों वाली रचना करनी चाहिए। कभी-कभी वीर और रौद्र रस में जब किसी आघर्षण हो, गुर अक्षरों वाली रचना करनी चाहिए । ११६ ।। अभिनव-मसूणवाही हृदय के स्पन्दन में करुण आदि में गुरु अक्षर प्रधान वृत्त होते हैं। रोद्र रस में भी कभी-कभी ऐसा होता है। जैसे, ठहर-ठहर कर शत्रु के आघर्षण को याद करके कहता है-'कर्त्ता द्यूतच्छलानां' (दूत दलों का करने बाला) तथा 'यो यः शस्त्रं विर्भतत्ति' (जो-जो शस्त्र को धारण करता है)। इत्यादि में ॥ ११६ ॥ अनुवाद-भुङ्गार रस में रूपक तथा दोपक अलङ्कारों से युक्त आर्यावृत के आभय कोमल वृत्तों का प्रयोग करना चाहिए॥। ११७।। अनुवाद-वीर रस में उत्तर-प्रत्युत्तर से युक्त जो काव्य होता है, उसमें जगती, अतिजगतो और संकृति छन्दों का प्रयोग करना चाहिए।। ११८।।

१. क. (टि०) शास्त्रज्ञै:। २. ख. रूपकदोपक संयुक्तं नार्यावृत्तसमाश्रयम् । ३. ख. शङ्गारे रसकायं तु। क. शुद्धारे च रसे वोरे काव्यं स्यालटकाग्रमम्। ४. क. पाठ्यं। ५. ख' ग. वापि तद्धवेत्। क. युद्धसंफेटयोस्तज्ज्ञरुत्कृतिः सम्प्रकोतिता। ५. ग. तथा चाषिधृतः स्मृता। क. तथा चातिषुतिभंवेत्।

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४९%्र

तथैव युद्धसम्फेटा उत्कृत्यांँ सम्प्रकीतितौ। करुणे शक्वरी ज्ञेया तथैवातिधृतिर्भंवेत् ॥ ११९॥ यद्वोरे' कीरतितं च्छन्दः तद्रौद्रेडपि प्रयोजयेत्। शेषाणामर्थयोगेन च्छन्दः कार्यं प्रयोक्तृभिः ॥ १२० ॥। यच्छन्दः पूर्वमुद्दिष्टं विषमार्धसमे समम् । "उदारमधुरैः शब्दैस्ततकार्यं तु रसानुगम् ॥। १२१ ॥ अत एव भयानके हास्ये शान्ते वा यथायोगं संवेदनस्नन्दता-चव्यंमाणता- स्वाद्यताश्चर्यंकृतो विभागो वृत्तानां मन्तव्यः ॥ १२० ॥। उदारमधुरैरिति। औदाय शब्दगुणो दीप्तेषु प्राधान्येन तदनुयायि च गुणान्तरं माधुयं, स्वानुयायि गुणसंहितमसृणेषु रसेषु ॥। १२१ ।। अनुवाद-उसो प्रकार युद्ध और संफेट के वर्णन में उत्कृति छन्द का प्रयोग करना चाहिए और करुण रस में शक्वरी तथा अतिधृति छन्दों की योजना करनी चाहिए॥ ११९।। अनुवाद-वीर रस में जिस छन्द का प्रयोग बताया गया है रौद्र रस में भी उसी की योजना करनी चाहिये। शेष रसों में अर्थ के अनुसार प्रयोक्ताओों को छन्द की योजना करनी चाहिए।। १२० ।। अभिनव-शेष अर्थात् भयानक, हास्य और शान्त रस में यथायोग संवेदन की स्पन्दता, चर्व्यमाणता, आस्वाद्यता के कारण आश्चर्यकृत वृत्तों का विभाग मानना चाहिए।। १२० ।। अनुवाद-जिन विषम, अर्धसम और सम छन्दों को पूर्व में बतळाया जा चुका है, उनमें उदार और मधुर शब्दों द्वारा रसानुकूल रचना करनी चाहिए ।। १२१ । अभिनव-औदाय शब्दगुण प्रधानतः दीप्त रसों में रहता है। उसका अनुयायी अन्य गुण माधुयं है। ये अपने अनुयायी गुणों के साथ-साथ मसृण रसों में रहते हैं।। १२१ ।।

१ ग. कत्यंते। २. ग. सम्प्रयोजयेत्। ३. ग. तथा रसः । ४. क, यण्छवदः पूर्वमेवोक्तं । क. (टि०) ये बन्धा: पूर्वमुहिष्टा विषमार्धसमासमा । ५. क. (टि०) उदारशन्दैर्मधुरैः कार्यस्तेऽर्वज्ञानुगाः ।

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नाटपशाहणे

शब्धानुदारमधुरान् प्रमदाभिधेयान्' नाट्याश्रयेषु कृतिषु प्रयतेत कर्त्तुम्। तैभूषिता बहु विभान्ति हि काव्यबन्धा: पद्माकरा विकसिता इव राजहंसैः ॥ १२२॥ त्रिविधं ह्यक्षरं कायं कविभिर्नाटकाश्रयम्। 'ह्रस्वं दोघं प्लुत्चैव "रसभावविभावकम् ॥ १२३ ॥ एकमात्रं भवेद् ह्रस्वं द्विमात्रं दीर्धमिष्यते। प्लुतं चैव द्विमात्रं स्यादक्षरं स्वरयोजनात् ॥ १२४॥

अर्थगुणास्तु यथायोगं सवत्र, तदाह प्रमदाभिधेयानिति। प्रमदो हर्षः हषंजनको गुणसाकल्यवानभिधेयोऽर्यो येषाम् ॥ १२२॥ अनुवाद-हर्ष जनक अर्थ वाले उदार और मधुर शब्दों का नाट्याशरित रचनाओं में विन्यास के लिये प्रयास करना चाहिये। ऐसे शब्दार्थों से विभूषित बहुत से काव्यबन्ध राजहंसों से सुशोभित कमल सर के समान शोभायमान होते है । १२२। अभिनव-अर्थगुण तो यथायोग सब जगह रहते हैं। उसी को 'प्रमदाभि- भिधेयान्' इत्यादि के द्वारा कहते हैं। प्रमद का अर्थ हर्ष है। हर्षजनक गुण से युक्त अभिधेय अर्थ है जिनका ॥ १२२॥ अनुवाद-कवि लोग नाटकों की रचना में रस और भावों को अभिव्यक्ति के लिए ह्रस्व, दीघं, प्लुत संज्ञक त्रिविध अक्षरों का प्रयोग करना चाहिये। १२३ ॥ अनुवाद-स्वर योजना के अनुसार एक मात्रा का वर्ण ह्स्व होता है, दो मात्रा वाले वर्ण को बीघं कहते हैं और तीन मात्रा वाला वर्ण प्लुत कहलाता है॥। १२४।

१. ख. प्रमदाभिनेयान्। २. क. (टि० नाट्याधयान्। नाट्याश्रितान् । ३. ख. ग. काब्ये विज्ञेयं। ४. क. ज.) प्लुतं हस्वं च दीर्घ था। ५. क. पदबन्मसमाअ्यम्। ६. क. दीर्घमुभ्यते। ७. क, वर्णसंखयम्।

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षोडशोउ्याय: ४९७

स्मृते 'चासूयिते चैव तथा च परिदेविते। पठतां ब्राह्मणाना्च प्लुतमक्षरमिष्यते॥ १२५ ॥ अकारस्तु स्मृते कार्यं ऊकारश्चाप्यसूयिते। परिदेविते तु हाकार' ओङ्कारोऽध्ययने तथा ॥१२६॥ हस्ववोर्घप्लुतानोह यथाभावं यथारसम्। काव्ययोगेषु सर्वेषु "ह्यक्षराणि प्रयोजयेत् ॥ १२७ ॥।

॥। १२५ । भावार्थो हृवयगतोडभिप्रायः क्रियाविशेषश्च तं दर्शयति स्मृते चेत्यादि एतदेव च क्रमेण विभजति आकार इत्यादि। द्वावेतावनुस्वारेणानुनासिक्येन वा युक्तो कार्यों आण्डवण्डावि ॥ १२६॥ हस्वदोघंप्लुतानोह यथाभावं यथारसम् काव्यबन्घेष्वेषेशैष्विति वचनादन्यत्र विषये दूराहुत्याविषु प्लुप्त उक्तः यत्रासौ प्रयोज्य एवेति दशितम् ॥१२७ ॥

दिखाते हैं- अभिनव-भावार्थ अर्थात् हृदयगत अभिप्राय और क्रियाविशेष को बनुवाद -- किसी वस्तु के स्मरण में, असूया (ईर्ष्या) करने में तथा परिवेवन (रोवन) में और ब्राह्मणों के वेद पाठ करने में प्लुत अक्षर इष्ट है। १२५ ॥ अभिनव-इसी का क्रमशः विभाग करते हैं- अनुवाद-स्मरण में अकार का, असया में ऊकार का, परिदेवन (रोदन) में 'हा' का और वेवाध्ययन में 'ओम्' का प्रयोग करना चाहिये॥ १२६ ॥ अभिनब-ये दोनों अनुस्वार और अनुनासिक से युक्त करने चाहिए। जैसे- आण्ड, दण्ड, बण्ड आदि ॥ १२६ ॥ अनुवाद-सभी प्रकार के काव्य-बन्धों में रस और भावों के अनुसार हस्व, दीघं और प्लुत अक्षरों का प्रयोग करना चाहिए।। १२७ ।। अभिवन-'हरस्ब, दोर्घ और प्लुत अक्षरों का रस और भावों के अनुसार समस्त काव्य-बन्धों में प्रयोग करना चाहिए' इस बचन के अनुसार अन्यत्र दूर से बुलाने आदि में प्लुत का प्रयोग कहा है, जहाँ पर इनका प्रयोग करना चाहिए।। १२७ ।। १. ग. बासूचिते। २. ग. आकारश्तु। ३. ग. हुकार। ४. ग. काव्ययोगेष्वक्षराणि यथाशोभं विवेशयेत्। क. काव्यवन्घेष्बयेषु। ५. ब. हाकाराणि कुतो जयेत्। ना० पा०-६१

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४९८ चेक्रीडितप्रभृतिभिविकृतैस्तु शब्दै- र्युक्ता न भान्ति ललिता भरतप्रयोगा: । यज्ञक्रियेव रुरुचुर्मधुरैः कृताक्तै- वैश्या द्विजैरिव कमण्डलुदण्डहस्तैः ॥ १२८॥

चेक्रीडितं यङन्तम्। आदिग्रहणेन ्यन्ता एते नटोचिता: प्रयोगा: न भान्ति। ते यतो ललिता। यथा वेश्यापरिग्रहे द्विजैसृंगाजिनदण्डकमण्डलुघृताभ्यङ्गादि धरैः संभवद्भिरपि यज्ञक्रिया न भाति। एवं तद्वयाख्याने रौद्रादिस्वविषये यत्पुरुष स्याम्यनुज्ञानं तद्वियुक्तं स्यादितीत्यं व्याख्या-ललिताः सुकुमारप्रयोगास्ते परुषैः पदैन भान्तीति विशेषनिषेध: शेषाभ्यनुज्ञापक इति न्यायादन्यत्र तत्प्रयोग इत्युक्तं भवति। अनुवाद-चेक्रीडित प्रभूति विकृत शब्दों से युक्त नाट्य-प्रयोग ललित (सुन्दर) नहीं लगते। जैसे मृगचमंधारी घृत से सने हुये कमण्डलु तथा दण्ड हाथ में लिए द्विज ब्राह्मणों का यज्ञक्रिया के समान वेश्या का संसर्ग अच्छा नहीं लगता ॥ १२८ ॥ अभिनव-यहाँ 'चेक्रीडित' पद यङन्त है। आदि पद के ग्रहण से ण्यन्त, सन्नन्त पदों का ग्रहण है। ये प्रयोग नटों के लिए उचित नहीं है। क्योंकि नटों के प्रयोग ललित होते हैं। जिस प्रकार वेश्या के परिग्रह में मृगचर्म, दण्ड, कमण्डलु, धृताम्यङ्ग आदि को धारण करने वाले ब्राह्मणों के द्वारा संभव होते हुए भी यज्ञ- क्रिया सुशोभित नहीं होती। इस प्रकार इसकी व्याख्या करने पर रौद्रादि के विषय में जिन पुरुषों का अभ्यनुज्ञान है, वह छूट जायेगा। इस प्रकार व्याख्या करनी चाहिए। ललित अर्थात् जो सुकुमार प्रयोग हैं वे परुष (कठोर ) पदों के प्रयोग से अच्छे नहीं लगते। इस प्रकार विशेष का निषेध शेष का अभ्यनुज्ञापक होता है, इस न्याय से अन्यत्र उनका प्रयोग होता है, यह कहा गया है।

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मृदुललितपदार्थ' गूढशब्दार्थहीनं बुधजनसुखभोग्यं 'युक्तिमन्नृत्तयोन्यम् । बहुरसकृतमागं सन्धिसन्धानयुक्तं भवति जगति योग्यं नाटकं प्रेक्षकाणाम् ॥ १२६॥ इति भारतोये नाटघाशास्त्रे वागभिनये काव्यलक्षणो नाम षोडशोऽध्याय॥१६॥ तथाहि-"चयोद्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम्" इत्येवमादिरपि विधि: प्रयोज्य एवं, (आख्यातामर्ष तष्य" इत्यादौ (?) एतवेव साधम्यंवैधम्यंद्वारे- णोपपादर्यत यथा तैरेव यज्ञक्रिया भाति न तैस्तथा वेश्या, तदनङ्गत्वात्। बहुब्रीहेर्वा यज्ञक्रिया पत्न्यप्युच्यते। इति शिवम् ॥१२८॥ इति महामाहेश्वराभिनवगुप्ताचार्यविरचितायां नाट्यवेदविवृतावभिनवभारतयां लक्षणालद्वारदोषगुणाध्याय: षोडशः समाप्तः ॥१६॥ जैसे-'पोष्करसादि के आचार्य के मतानुसार शर् से अन्यवहित चय् को द्वितोय अक्षर हो जाता है' इत्यादि विधियाँ भो प्रयोज्य हैं। इस अनुशासन से सिद्ध का साधर्म्य वैधर्म्यं के द्वारा उपादान करते हैं कि जिस प्रकार मृगचर्मादिधारो द्विजों से यज्ञक्रिया शोभित होती है, वैसे द्विजों से वेश्या सुशोभित नहीं होती। क्योंकि वह उसके अङ्ग नहीं हैं। यज्ञक्रिया में बहुब्रोहि समास करने पर यज्ञक्रिया से द्विजों की धर्मपत्नियों का ग्रहण होता है॥ १२८॥ अनुवाद-जिसमें मृदु और ललित पदार्थ हो, जिसमें गढ़ शब्द और अथ न हो, जो बुधजनों द्वारा सुख से बोध्य हो, जिसमें युक्तिपूर्वक नृत्त को योजना हो, जिसमें रस के मार्ग बहुत हों और जो सन्धियों के सन्धान से युक्त हो, ऐसा नाटक जगत् में प्रेक्षकों के देखने योग्य होता है॥ १२९ ॥ अभिनव-इस प्रकार यशोराशि यशोराग के दौहित्र से उत्पन्न ग्रन्थ का अनुबन्ध में सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १६ ॥ इस प्रकार नाट्यशास्त्र में डा० पारसनाथ द्विवेदो रचित हिन्दी-व्याखया में काव्य लक्षण नामक सोलहवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ १६ ।।

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१. ग. पदाळ्वयं । २. ग. जनपदसुखबोष्यं। ३. बुद्धिमत् ।

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षोडशोऽध्यायः

अनुबन्ध:

भूषणाक्षरसङ्कातौ शोभोदाहरणे तथा। हेतुसंशयदृष्टान्ता: प्राप्ताभिप्राय एव च । १ ॥ निदर्शनं निरुक्तं च सिद्धिश्चाथ विशेषणम्। गुणातिपातातिशयौ तुल्यतर्कः पदोच्चयः ॥ २॥ `दृष्टं चैवोपदिव्टं च विचारस्तद्विपर्ययः। भ्रंशश्चानुनयो माला दाक्षिण्यं गर्हणं तथा ॥ ३ ॥ अर्थापत्तिः प्रसिद्धिश्च पृच्छा सारप्यमेव च। मनोरथशच लेशशच क्षोभोऽय गुणकीतंनम्॥४॥ ज्ञयान्यनुक्तसिद्धिश्च प्रियं वचनमेव च। षट्त्रिशल्लक्षणान्येव काव्यबन्धेषु निर्दिशेत् ॥। ५॥

षोडश अध्याय

अनुबन्ध अनुवाद-भूषण, अक्षरसंघात, शोभा, उदाहरण, हेतु, संशय, दृष्टान्त, प्राप्ति, अभिप्राय, निदशन, निरुक्त, सिद्धि, विशेषण, गुणातिपात, अतिशय, तुल्य- तर्कं, पदोच्चय, दिष्ट, उपदिष्ट, विचार, विपयंध, अरंश, अनुनय, माला, दाक्षिण्य, गहण, अर्थापत्ति, प्रसिद्धि, पूच्छा, सारूप्य, मनोरथ, लेश, संशोभ, गुणकीत्तंन, अनुक्तसिद्धि, प्रियववन (प्रियोक्ति)-इन छतीस लक्षणों का काव्य-बन्धों में निर्देश करना चाहिए॥ १-५॥

१. क. दिष्टं।

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५०१

बशो्तिरपा लक्षणशव्देन व्यवह्नियन्ते। लक्षणानि गुणालङ्कारमहिमानमनपेक्ष्य स्वसौभाग्येनैव शोभम्ते। लक्षणं महापुरुषस्य पद्मादिरेखादिवतकाव्यशरोरस्य सौन्यं- दायि। अलंकारस्वु रत्नाभरगादिवदेव, येन विनावि स्वसौन्ययॅणैव पुरुषः प्रविभासते ॥१॥ गुणस्तु प्रवृत्तिद्योतितो धैर्यादिवत्काश्यस्य शब्दार्थरचनामाश्यति। यथा लक्षणरहित: पुरुषो न सुन्दरशब्दवाच्यस्तथा लवणवज कथाशरोरं गुणालङ्कारो- ज्ज्यलमपि नीरसत्वं भजत्प्रौढकाव्याभिधानं नाहंति कथाशरोरसंपग्नेषु काग्येष्वेव लक्षणानि निर्वत्यन्ते न तु मुक्तकाविषु खण्डकाव्येधु। अतएव 'काव्यबन्धास्तु कतं्या' इति मुनिनैव मुक्तकाविवारणपरमुक्तम्। २॥। लक्षणान्यसंख्येयानि, तेषां चमत्कृतिविशेषगरिष्ठानि षट्त्रिशदेव मुनिना संगृहीतानि। कोहलादिभिस्तच्छिष्यैः प्रकोतितान्यपराणि कानिचिल्लक्षणबेन प्रसिद्धिमुपगतानि कालप्रवाहेन भरतग्रन्थ एव पाठान्तरनिबन्धरूपेण प्रक्षिप्तानि स्युः। सौन्दयंजनकत्वकारेण भोजाविभिरुभयपाठगतान्यपि लक्षणानि स्वीकृत्यान्यैरपि कैश्चिच वमत्कृतिभू तैर्लक्षण: सह चतुःषष्टित्वेन प्रकटितानि ॥३ ॥ अभिनव-समस्त अर्थालङ्कारों के बोजभूत एवं कथाशरीर (इतिवृत्त) में वैचित्र्य लाने वाले वक्रोक्ति रूप चमत्कार लक्षण शब्द से व्यवहृत किये जाते हैं। लक्षण, गुण और अलक्कारों की महिमा की परवाह न करके अपने सौभाग्य से ही शोभित होते हैं। महापुरुषों की पद्मादि रेखा के समान लक्षण काव्य-शरीर सोन्दर्य प्रदान करते हैं। अलङ्कार तो रत्नों के आभूषण के समान ही है, जिनके बिना भी पुरुष अपने सौन्दर्य ही सुशोभित होते हैं। गुण तो धैर्यादि के समान प्रवृत्ति से घोषित होता हुआ काव्य के शब्द ओर अर्थ की रचना का आश्रय से रहता है। जैसे लक्षण रहित पुरुष सुन्दर नहीं कहा जाता, उसो प्रकार लक्षण-रहित कथाशरोर, गुण और अलङ्कारों से उज्जवल होते हुए भो नोरसता को प्राप्त होने के कारण प्रोढ़ काव्य नहीं कहलाता। कथा-शरीर से सम्पन्न काव्यों में हो लक्षण सम्पन्न होते हैं, मुक्तक आदि खण्ड काव्यों में नहीं होते। अत एव मुनि ने 'कथाबन्धास्तु' कर्त्तव्या इत्यादि वाक्य को मुक्तक आदि के वारण के लिए कहा है।

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५०२ वाटपश्या्वे

यद्िवेचितमतिगम्भोर प्रोढवाचा भगवता वृत्तिकारेण लक्षणान्यसंख्यानीति तदुपष्टम्पैव भिन्नपाठोऽवि बालानां समुपवेध इत्यम्पूह्य तन्मध्य एव संक्षेपेण प्रकाशितः ॥। ४-५ ।।

लक्षण तो असंख्य हो सकते हैं किन्तु भरत मुनि ने उनमें से चमतकार विशेष से गरिष्ठ (श्रेष्ठ) ३६ लक्षणों को हो संग्रह किया है। भरतमुनि के शिष्य कोहल आदि आचार्यों ने इनके अतिरिक्त कुछ अन्य बातों को कहा था, वे लक्षण के रूप में प्रसिद्धि को प्राप्त हो गये तथा कालप्रवाह से भरत के ग्रन्थ में ही पाठान्तर निबन्ध के रूप में प्रक्षिप्त कर दिये गये। सौन्दर्यजनक कारण से भोज आदि ग्रन्थ- कारों ने दोनों प्रकार के पाठों में प्राप्त लक्षणों को स्वीकार कर लिया। अन्य आचार्यो ने भो चमत्कार के मूलभूत लक्षणों को ६४ प्रकार से प्रकाशित किया है। और जैसा कि वृत्तिकार ने अत्यन्त गम्भोर और प्रौढ़ वाणी में असंख्य लक्षणों का विवेचन किया है, उसी का उपष्टम्भन करके बालकों को भो समझना चाहिए, ऐसा स्वोकार करके मूल पाठ के मध्य में हो संक्षेप में प्रकाशित कर दिया॥ १-५॥। विशेष-अभिनवगुप्त ने अर्थालद्कारों के बीजभूत तथा कथाशरीर में वैचित्य प्रदान करने वाले वक्रोक्ति रूप चमत्कार को 'लक्षण' कहा है। लक्षण गुण और बलङ्कारों की अपेक्षा न करके स्वयं प्रोद्धासित होते हैं। लक्षण काव्य में सोन्दर्य का आधान करते है और अलङ्कार रत्नाभूषण के समान है। क्योंकि नारी का शरीर अलङ्कारों के विना भी शोभित होते हैं। उसी प्रकार काव्य में लक्षण होने पर अलद्वारों के विना भी शब्दार्थ शरीर शोभित होते हैं। जैसे लक्षणहोन पुरुष सुन्दर नहीं कहा जा सकता, उसो प्रकार काव्य-शरीर भी गुणालङ्कारों से युक्त होने पर भो नीरसता के कारण काव्य नहीं कहा था सकता। इसी लिए काव्य में लक्षणों का सम्पादन अवश्य करना चाहिए, मुक्तक आदि खण्ड- काव्यों में उसकी आवश्यकता नहीं है। अभिनवगुप्त का कथन है कि यद्यपि लक्षण वसंक्येय है तथापि भरतमुनि ने चमत्कार-विशिष्ट ३६ लक्षणों का हो नि्देश किया है।

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५०३

अलङ्कारैर्गुणैश्चैव बहुभिः समलंकृतम्। भूषणैरिव चित्रार्थेस्तद् भूषणमिति स्मृतम् ॥ ६॥

भूषणं लक्षयति-अलङ्कारैरिति। भरतोक्तैरुपमादिभिर्गणैश्च यत्र कथा- शरीररचना समुल्लासिता तद भूषणं नाम लक्षणम्। चित्रार्थेरिति विभावादि- सामप्रोप्रत्यायकतया रसोद्वचोतकैरथंविशेषैः मतान्तरे वक्रोक्तिरूपैः। यथा - कृत्यारावणे सप्तमेडङ्के कञ्चुकिनं दृष्टवा लक्ष्मणविभीषणौ-आयं, कथय कथय। काञचु-का गतिः श्रयता-आर्या खलु सीता रावणाज्ञया किङ्करोपनोतं भर्तुर्मायाशिरोऽवलोक्य सखीभिराश्वास्यमानापि निवृत्तप्रयोजना नाहमात्मानं कलेशयामि। इति (इत्यर्धोक्तौ तिष्ठति)। सरवें-किं कृतवती। काञचु-यत्र शक्यते वक्तुम्। शशिन इव कला दिनावसाने कमलवनोदरमुत्सुकेव हंसी पतिमरणरसेन राजपुत्री स्फुरितकरालशिखं विवेश वह्निम्।

१. भूषण अनुवाद-भूषणों की तरह विचित्र अर्थ वाले बहुत से गुणों एव अलङ्कारों से अलङ्कृत काव्य 'भूषण' नामक लक्षण कहा गया है॥। ६ ।। अभिनव-भूषण का लक्षण करते हैं-जहाँ भरतोक्त उपमा आदि अलङ्कारों और श्लेषादि गुणों से जहाँ पर कथाशरीर की रचना समुल्लसित होती है वह 'भूषण' नामक लक्षण है। 'चित्रार्थेः' पद के द्वारा विभावादिरूप सामग्री के प्रत्यायक होने के कारण रस के उद्योतक अर्थविशेष से मतान्तर में वक्रोक्ति से कथाशरीर का समुल्लसित होना सूचित किया गया है। जैसे- कृत्यारावण के सप्तम अङ्क में कञ्चुको को देखकर लक्ष्मण और विभोषण ने कहा-'आयं! कहिये, कहिये। कञ्चुकी-क्या उपाय है ? सुनिये-आर्या सोता (पति) राम के मायामय सिर को देखकर सखियों के द्वारा आश्वस्त किये जाने पर भी प्रयोजनों से रहित मैं अब अपने को अधिक कष्ट नहीं दूंगो। (इस प्रकार आधी बात कहकर चुप हो जाती है)। सभी लोग-क्या किया? काञ्चुकी-जिसे कहा नहीं जा सकता।

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नाटयसाबने

यथा वा रत्नावल्यां प्रथमेऽङके यौगन्धरायणस्य वचनं विधान्तविप्रहेति शलोक: भूषणाख्यलक्षणेन काव्यं सामान्यवचसो भिद्यते। "तात्पयमेव वचसि ध्वनिरेव का्ये," यत्रालङ्कारवर्गोडयं सर्वोऽप्यन्तर्भविष्यति" शब्दप्राधान्यमाश्रित्य तत्र शास्त्रं पृथग्विदु:" "अर्थेतत््वेन युक्ते तु वदन्त्याख्यानमेतयोः। द्वयोर्गुणत्वे व्यापारप्राधान्ये काव्यगीभंवेत्" "द्वूं वत्मंनी गिरो देव्या शास्त्रं च कविकर्म च। प्रज्ञोपज्ञन्तयोरायं प्रतिभोद्भवमन्तिमम्" इत्यादिना भोजकुन्तलभट्टनायकतौताविभिरुत्तरीत्या गुणालङ्कारवर्गः सरवं एव कक्षणशब्देन परिगृहोतः । गुणालङ्कारैरेव यत्र कथारूपा वक्रोक्तिरतिशयिता तत्र भूषणम् ॥ ६।। 'पति के मृत्यु से खिन्न राजकुमारो सीता चन्द्रकला के सदृश दिन के अन्त में कमल वन के मध्य जाने के लिए उत्सुक हँसी की तरह चमकती हुई कराल ज्वाला बाले भग्नि में प्रवेश कर गई।' अथवा जैसे रत्नावली नाटिका के प्रथम अङ्क में यौगन्धरायण का- विश्रान्तविग्रहकथो रतिमाञ्जनस्य चित्ते वसन् प्रियवसन्तक एव साक्षात्। पर्युत्सुको निजमहोत्सवदशना वत्सेश्वरः कुसुमचाप इवाभ्युपैति॥ यह शलोक वाक्य भूषण नामक लक्षण से सामान्य-कथन से काव्य का भेद दिखाई देता है। 'वाणी में तात्पर्य ही रहता है और काव्य में ध्वनि की प्रधानता होती है जिसमें समस्त अलक्कार वर्ग अन्तर्भूत हो जाते हैं। शब्द की प्रधानता का आश्रय लेकर शास्त्र को पृथक् समझते हैं। तत्त्व से युक्त अर्थ में दोनों की प्रधानता का कथन है। दोनों (शब्द और अर्थ) के अप्रधान होने पर और व्यज्जना ब्यापार के प्रधान होने पर काव्य कहा जाता है। वाग्देवी के दो व्यापार है-(१) शास्त्र और (२) कविकम काव्य। इनमें पहला प्रज्ञोपज्ञ है और दूसरा प्रतिभाजन्य। इत्यादि के द्वारा भोज, कुन्तक, भट्टनायक, भटटतौत आदि आचार्यों के द्वारा कथित रीति से गुण एवं अलक्कार वर्ग सभी का लक्षण शब्द से ग्रहण होता है। गुण और अरद्कारों के द्वारा जहाँ पर कथा रूप वक्रोक्ति का अतिशय होता हे, वहां 'भूषण' नामक लक्षण होता है।। ६ ।।

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५०%

यत्राल्पैरक्षरैः श्लिष्टेविचित्रमुपवण्यंते। तमप्यक्षरसङ्कातं विद्युल्लक्षणसंज्ञितम् ।।७॥

अक्षरसंधातो-विविधश्लेषोक्तथा वा अक्षरविपयाेन बोक्तिप्रत्युक्तिवैचित्र्यं यथा उभयाभिसारिकायाम्। विटः-भगवति ! वैशिकाचलोऽहमभिवादये। परिब्राजिका-न वैशिकाचलेन प्रयोजनं न च वैशेषिकाचलेन। विटः-अस्त्येतत्कारणं .. परि-षट्पदार्थबहिष्कृतैः सह संभाषणमस्मद्गुरुभिनिरुद्धम्। विटः-युक्तमेवैतत्। कुत :- द्रव्यं ते तनुरायताक्षि ! दयिता रूपादयस्ते गुणा: सामान्यं तव यौवनं युवजन: संस्तौति कर्माणि ते। त्वय्यथें समवायमिच्छति जनो यस्मादविशेषोडस्ति ते योगस्ते तरुणैमंनोऽभिलषितैर्मोक्षोऽप्यनिष्टा्जनात् ॥।

२. अक्षरसंघात अनुवाद-जहाँ पर श्लेष से युक्त थोड़े अक्षरों से विचित्र अर्थ का वर्णन किया जाता है उसे 'अक्षरसंघात' नामक लक्षण समझना चाहिए।।७।। अभिनव-जहाँ विविध श्लेषमयी उक्तियों से अथवा अक्षरों के विपर्यास से उक्ति-प्रत्युक्ति में विचित्रता आये, उसे 'अक्षरसंघात' कहते हैं। जैसे-उभय- सारिका में- विट-हे भगवति! मैं वैशिकाचल आपका अभिवादन करता हूँ। परिवाजिका-मुझे न वैशिकाचल से प्रयोजन है और न वैशेषिकाचल से। विट-क्या इसका कोई कारण है? परिव्राजिका-छः पदार्थों का बहिष्कार करने वालों के साथ सम्भाषण करना हमारे गुरुजी ने रोक दिया है। बिट-यह ठोक ही है। क्योंकि- "हे आयताक्षि ? तुम्हारे लिए द्रव्य (पदार्थ) तुच्छ है, तुम्हारे लिए रूपादि गुण प्रिय है, तुम्हारा यौवन सामान्य है, युवक वर्ग तुम्हारे कर्म (कार्यों) की प्रशंसा करते हैं। यह जन तुम्हारे साथ समवाय (प्रगाढ़ सभ्बन्ध चाहता है)। क्योंकि तुम्हारे में विशेष (विशेषता) है, मनोऽभिलषित तरुणों के साथ योग है और अनिष्टजनों से तुम्हारा मोक्ष है, छुटकारा है। वा० थ्ा०-६४

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५०६ नाटघशास्त्रे

सिद्धैरर्थैः समं कृत्वा ह्यसिद्धोऽर्थः प्रयुज्यते। यत्र सा श्लिष्टा विशिष्टार्था सा शोभेत्यभिधीयते ॥। ८॥ परि-सांख्यमस्माभिर्ज्ञायते अलेपको निर्गुण। क्षेत्रज्ञः पुरुषः। विट :- हन्त निरतरा: स्म:। यथा वा शाकुन्तले सप्तमेऽड्डे. "तापसी-सवदमन ! शकुन्तलावण्यं पश्य" इत्यत्र शकुन्तलाशब्द: सूचितः ॥।७॥ शोभा-सिद्धेः प्रयोजनैरसिद्धस्य शुभसंघटनं यत्र निर्णोयते सूच्यते वा श्लेष- वक्रोक्तिध्वनिविशेषमहिम्ना चमत्कृतोऽर्थः। केचित्स्वभावस्य प्रकटनमित्याहुः, अपरे तु यूनो: प्रभावप्रकटनमित्याचक्षते। अर्थप्रधाने वस्तुन्येषा परं शोभते। यथा रस्नावल्यां प्रथमेऽडके यौगन्धरायण :- (दवीपादित्यादिपठित्वा) क: सन्देहः। परिब्राजिका-हम भी सांख्यशास्त्र को जानते हैं, वहाँ पुरुष निर्लेप, निर्गुण एवं क्षेत्रज्ञ है। विट-हम निरुत्तर हो गये हैं। अथवा जैसे अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक के सप्तम अङ्क में- तापसी-'सर्वदमन ! शकुन्तलावण्य' पश्य' अर्थात् यहाँ 'शकुन्तलावण्य' में शकुन्तला शब्द सूचित किया गया है।। ७।। ३. शोभा अनुवाद-जहाँ पर सिद्ध अर्थों से तुलना करके असिद्ध अर्थ का प्रयोग करते हैं, इ्लेष के कारण विशिष्ट अर्थों वाली उसे 'शोभा' कहते हैं॥। ८ ॥ अभिनव-जहाँ पर सिद्ध प्रयोजनों के द्वारा जहाँ पर असिद्ध का शुभ संघटना शलेष, वक्रोक्ति, ध्वनि विशेष की महिमा से चमत्कारी अर्थ का निर्णय किया जाता है अथवा सूचित किया जाता है, वहाँ 'शोभा' होती है। कुछ लोग स्वभाव के प्रकटन को 'शोभा' मानते हैं। अन्य लोग तो युवक-युवतियों के मनोभाव के प्रकटन को 'शोभा' कहते हैं। अर्थप्रधान वस्तु में यह परम शोभा प्राप्त करती है। जैसे, रतनावली नाटिका के प्रथम अङ्क में-

सन्देह है? यौगन्धरायण-'दीपादन्यस्मात' इत्यादि पढ़कर कहता है कि क्या

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षोडशोऽष्याय: ५०७

यत्र तुल्यार्थयुक्तेन वाक्येनाभिप्रदर्शनात् । साध्यन्ते निपुणैरर्थास्तदुदाहरणं स्मृतम् ॥ ९॥

प्रारम्भेऽस्मिन् स्वामिनो वृद्धिहेतौ दैवेनेत्थं दत्तहस्तावलम्बे। सिद्धेर्भ्रान्तिर्नास्ति सत्यं तथापि स्वेच्छाचारी भीत एवास्मि भर्तुः॥ यथा वा कथाशरोरसंघटनवैचित्र्वरूपशोभया अभिज्ञानशकुन्तलायां मधुर- रसप्रसवितः ॥८॥ उदाहरणम्-परेषां दुर्भेद्यपरमार्थन तुल्यार्थप्रयुक्तेन वाक्येन निगूढाशयः कस्मैचिन्निपुणैयंत्र प्रकाश्यते तदुवाहरणं, यथा देवीचन्द्रगुप्ते प्रावेशिकी ध्रुवा कुमारचन्द्रगुप्तस्य संशयाकुलमानसस्य प्रवेशावसरसूचकमर्थमुद्दघोतयति- एसो सिअकरवित्थरपणासिआसेसवेरितिमिरोहो। निअविहवरोणचन्दो मअणगिहं लंधिऊं विसई।

"स्वामी की वृद्धि-हेतु इस कार्य के प्रारम्भ में भाग्य के द्वारा इस प्रकार हाथ का सहारा दिये जाने पर उसकी सिद्धि में सन्देह नहीं है, फिर भी स्वेच्छा से आचरण करने में स्वामी से डरता हूँ।" अथवा जैसे कथा-शरीर की संघटना के वैचित्र्य रूप शोभा से अभिज्ञान- घाकुन्तल में मधुर रस को प्रसक्ति है॥ ८॥

४. उदाहरण अनुवाद-जहाँ पर निपुण लोग समानार्थक वाक्यों द्वारा अपने अभिप्राय के प्रदशन से अर्थ को सिद्ध करते हैं, उसे 'उदाहरण' नामक लक्षण कहते हैं । ९॥ अभिनव-जहाँ पर दूसरों के दुर्भेद्य परम रहस्य को समानार्थक वाक्य द्वारा निगढ़ आशय को निपुण जन किसी दूसरे के लिए प्रकाशित कर दें, वह 'उदाहरण है। जैसे देवीचन्द्रगुप्त नाटक में प्रावेशिकी ध्रुवा संशय से व्याकुल चित्र वाले कुमार चन्द्रगुप्त के प्रवेशावसर अर्थ को द्योतित करता है- एष शोतकरविस्तरप्राणाशिताशेषवेरितिमिरौघः । निजविभाववरश्चन्द्रो गगनगृहं लङघितुं विशति॥ 'यह चन्द्र अपने शोतल किरणों के विस्तार से समस्त शत्रुरूपी अन्धकार को नष्ट करके आकाश रूपी गृह को पार करने के लिए प्रवेश कर रहा है।

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५०८ नाठयशारत्र

यत् प्रयोजनसामर्थ्यात् वाश्यमिष्टार्थसाधकम् । समासोक्तं मनोग्राहि स हेतुरिति संज्ञितः ॥ १०॥

यथा वा प्रद्युम्नाम्युदये तृतोयेङ्केऽर्नाटिकायां सूत्रधारववनम्- देव ! वनुजाघिप ! त्वां त्रिभुवनलक्ष्मोरिव स्वयं रागात्। अभिरूपमभिसुतवती नलकूवरमत्र नाटके रम्भा। सामाजिको मूतयो: सखोप्रभावत्यो: सखो "पिमसहि एसो एव्व मग्गो मअणपर- वसाणं इत्थिआणं" इत्युपदिशति। अत्राभिसरणमेव प्रद्युम्नसङ्गमोपाय इत्यर्थः साध्यते ॥ ९॥ हेतु :- फलसाधनशक्तियुक्तं मितशब्दार्थ विचित्रभङ्ग्युक्तं वचनम्। यथा- तापसवत्सराजे षष्ठेऽङके कृतमरणनिश्चर्यां वासवदर्त्तां परिबोधयन् यौगन्धरायण मह-देवि ! प्रसीद, अथवा जैसे प्रद्यम्नाभ्युदय नाटक के तृतोय अङ्क में अन्तर्नाटिका (विष्कम्भक) में सूत्रधार का कथन- "हे देव ! दनुजाधिप! त्रिभुवन लक्ष्मी ने जैसे आपको अपने अनुराग से स्वयं अभिसरण किया उसो प्रकार इस नाटक में रम्भा ने राग से अभिरूप (प्रिय) नलकूबर का अभिसरण किया।" सामाजिक के रूप में स्थित सखो और प्रभावतो दोनों में सखी 'हे प्रिय सखी! काम के परवश स्त्रियों का यही मार्ग है' इस प्रकार उपदेश देती है। यहाँ प्रद्ुम्न से मिलने का उपाय एकमात्र अभिसरण ही है।

५. हेतु अनुवाद-जहाँ पर प्रयोजन के सामथ्यं से इष्ट अर्थ के साधक हृदय- ग्राही संक्षिप्त वाक्य कहा जाय, वहाँ 'हेतु' नामक लक्षण होता है॥ १०॥ अभिनव-फल-साधन की शक्ति से युक्त, परमित पदार्थ वाला, विचित्र- भङ्ङ्गिमाओं में कहा गया 'बचन' कहा जाता है, जैसे, तापसवत्सराज के षष्ठ अङ्क में मरण का निश्चय करने वाली वासवदत्ता को समझाते हुए यौगन्धारणा कहता है- देवि ! प्रसन्न होओ,

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५०९

अपरिज्ञाततत्त्वार्थं वाक्यं यत्र समाप्यते। अनेकत्वाष्टिचाराणां स संशञय इति स्मृतः ॥११॥ आसृष्टेः प्रतिपार्थिवं युवतयो जाता मनोवल्लभाः मग्नास्ते व्यसनार्णवे च बहवस्ताभि: सहैवेश्वराः। देव्या यत्तु कृतं तदाविकलतामुत्सृज्य लोकोत्तरं तस्यैषा कृपणोचितेन विधिना कि ग्लानिरुत्पद्यते।। देव्या यत्कृतं तदिष्टार्थसाधनमेव अचिरेणैव शुभफलमनुभवसीति ॥९॥ संशयोऽसमाप्तवाक्यत्वात्साधनीयविषयस्वरूपे सन्दिन्धावस्था। एषोड्थं- कामप्रधानेषु रूपकेषु निपुणं प्रयुज्यते। कुन्दमालायां षष्ठेऽङ्के रामायणकथा- वाचकौ कुशलवौ सोतावृत्तान्तं पठन्तौ- सीतां निर्जनसंपाते चण्डश्वापदसङ्कुले। परित्यज्य महारण्ये लक्ष्मणोऽपि न्यवतंत। ततः प्राणैः परित्यक्ता निराशा जनकातमजा। इति तूष्णींभवतः। "सृष्टि के प्रारम्भ से ही प्रत्येक राजा के मन के अनुकूल रहने वालो युवतियाँ प्रिय रहो है! धोर संकट रूपो सागर में निमग्न बहुत से राजा लोग भी उनके साथ डूब गये। किन्तु देवी ने जो उस समय विकलता को छोड़कर लोकोत्तर कार्य किया, उसके विषय में अब दोनता से ग्लानि क्यों उत्पन्न हो रहा है।" यहाँ पर देवी ने जो किया वह इष्ट अर्थ का साधक है। शीघ्र ही आप शुभ फल का अनुभव करेगी। ६. संशय अनुवाद-जहाँ पर विचारों की अनेकता के कारण तत्त्वार्थं के ज्ञान हुए विना ही वाक्य समाप्त हो जाय उसे 'संशय' नामक लक्षण कहते हैं॥ ११॥ अभिनव-वाक्य के समाप्त न होने से साध्य विषय के स्वरूप में सन्दिग्ध अवस्था का होना 'संज्ञक है। अर्थ और काम प्रधान रूपकों में इसका निपुणता से प्रयोग किया जाता है। जैसे कुन्दमाला के छः सौ अङ्क में रामायण कथा के वाचक लव-कुश पढ़ते हैं। "प्रचण्ड हिंसक प्राणियों से व्याप्त निर्जन महारण्य में सोता का परित्याग करके लक्ष्मण भी लौट गये। तब प्राणों से भी प्रिय जनों के द्वारा छोड़ी गई निराश हुई सोता ने .... "।

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५१० नाडयशास्त्रे

सर्वलोकमनोग्राहि यस्तु पक्षार्थसाधकः । हेतोनिदर्शनकृतः स दृष्टान्त इति स्मुतः ॥ १२॥

अप्रियाख्यानभोतेन कविना संहृता कथा। किमितः कल्याणमावेदयति । एवं तावदनुयोक्ष्ये इति पृच्छतः। संशयाल ङ्कारस्तु संशयाल्यलक्षणाद् भिन्नचमत्कारतया भिद्यते। संक्रुद्धस्य ललाटलोचनभुवा सप्ताचिषा धूर्जटे- नि्दग्धे मकरध्वजे रतिरसौ किं स्याद गृहीतव्रता। संवादाद्वनदेवता मुनिवधवेषप्रपञचे मनः कृत्वेत्थं रमतेऽत्र विग्रहवती कि वा तपश्धीरियम्॥ इत्याविषु संशयोऽल द्वार एव न तु संशयाख्यलक्षणम् ॥ १० ॥

इतना कहकर चुप हो जाते हैं। तब राम और लक्ष्मण कहते हैं- "सम्भव है, अप्रिय आख्यान के कथन से डरकर कवि वाल्मीकि ने कथा का उपसंहार कर दिया हो।" इससे बढ़कर और कल्याण का क्या आवेदन करें। अच्छा तो अब पूछेंगे, ऐसा कहकर पूछते हैं। संशयालङ्कार तो संशय नामक लक्षण से भिन्न चमरकार जनक होने से भिन्न है। जैसे- "करुद्ध हुए शङ्कर जी के ललाटस्थ नेत्र से उत्पन्न अग्नि के द्वारा कामदेव के जला दिये जाने पर क्या रति ने व्रत ग्रहण कर लिया था। परस्पर के संवाद से मुनिवधू के वेष रचना में मन लगाकर क्या वन देवता इस प्रकार यहाँ रमण करती है अथवा साक्षात् शरीर धारिणी तपःश्री यह है।" इत्यादि में संशय अलङ्कार है, संशय नामक लक्षण नहीं है ॥ ११॥ ७. दृष्टान्त अनुवाद-जो सभी लोगों के मन को आकृष्ट करने वाला पदार्थ का साधक और हेतु का निदशंनकारी लक्षण है, उसे 'दृष्टान्त' कहा गया है ॥ १२ ॥

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षोडशोऽण्याय: ५११

दृष्ट्वैवावय न्' कांश्चिद् भावो यत्रानुमीयते। प्राप्ति तामपि जानोयाल्लक्षणं नाटकाशयम्॥ १३ ।।

दृष्टान्त :- धर्माविरुद्धतया सवलोकमनोग्राहि वचनं निदशंनोपष्टम्भं दृष्टान्तसंज्ञकं लक्षणम्। यथा धूतंविटे "स्त्रीषु प्रसङ्गो न कर्तव्यः" इत्यत्र "भावः किं पश्यतीत्युक्ते "विटः-भोः उपदेशमात्रं खल्वेतत्। तमहं न पश्यामि यः स्त्रीषु प्रसङ्गं न गच्छेत, श्रयन्ते महेन्द्रादयोऽप्यहल्याद्यासु विकृतिमापन्नाः" इति। यथा वा पद्मप्राभुतके स्वसोदरीप्रेयसोऽनुयोगे संदिग्धमानसां देवसेनामाह शश :- दक्षात्मजा: सुन्दरि ! योगतारा: कि नैकजाता। शशिनं भजन्ते। आर्ह्यते वा सहकारवृक्षः किं नैकमूलेन लताद्वयेन ॥१२॥

अभिनव-धर्म का अविरोधी होने के कारण सभी लोगों के मन का आकर्षक निदर्शन सहित वचन 'दृष्टान्त' संज्ञक लक्षण कहा जाता है। जैसे धूर्त विट में 'स्त्रियों का प्रसङ्क (संसर्ग ) नहीं करना चाहिए' यहाँ पर 'भाव का क्या विचार है ?' ऐसा पूछने पर विट कहता है-'अरे भाई ! यह सब उपदेश मात्र है, मैं तो ऐसा किसी को नहीं देखता हूँ, जो स्त्रियों के प्रसङ्ग में नहीं जाता हो, सुना जाता है कि महेन्द्र आदि देवों ने अहल्या आदि के विषय में विकृत हो गये थे।" अथवा जैसे पद्मप्राभृतक में अपनो सहोदरा बहिन के प्रेमी के पूछने पर सन्दिग्ध मन वालो देवसेना से शश कहता है- "हे सुन्दरि ! दक्ष से उत्पन्न अनेक कन्याओं ने क्या योगतारा के रूप में चन्द्र की आश्रय नहीं लेती। अनेक मूलवाली दो लताएँ क्या सहकार के वृक्ष पर आरोहण नहीं करती ?"

८. प्राप्ति

अनुवाद-जहाँ पर किसी एक अवयव (अंश) को देखकर किसी के भाव का अनुमान कर लिया जाय, वहाँ नाटक से सम्बन्धित 'प्राप्ति' नामक लक्षण समझना चाहिए।। १३ ।

१. क. एष्टैवावयवं किञ्चित् भावो यत्रोपभोयते। प्राप्ति तामभिजानोयाल्लक्षणं वाटकाश्रयम् ।। क. (टि०) प्राप्ति नाम जानोयाद्।

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५१२ नाट्यशाब्ते

अभूतपूर्वो योऽप्यर्थः सावृश्यात्परिकल्पितः । लोकस्य हृवयग्राही सोडभिप्राय इति स्मृतः ॥ १४॥ प्राप्तिर्यथा-कुन्दमालायां तृतोयेडके लक्ष्मणः कानिचित्पदचिह्वानि सैकते दृष्टूवा राममाह- विलासयोगेन परिश्रमेण वा स्वभावतो वा निभृतानि मन्थरम्। पदानि कस्याश्चिदिमानि सैकते प्रयान्ति तुल्यं कलहंसविभ्रमम्॥ राम :- (निर्वष्यं सहषं ) किमुच्यते कस्याश्चिविति, ननु वत्तव्यं सीतायाः पदानीति। पश्य- समानं संस्थानं निभृतललिता सैव रचना तवेवैतद्रेखा कमलरचितं चारतिलकम्। यथा चेयं दृष्ट्वा हरति हृवयं शोकविधुरं तथा हयस्मिन् देव्या सपदि पदर्षा्ङिविनिहिता॥ इति ॥१३॥ अभिनव-जैसे कुन्दमाला के तृतीय अङ्क में लक्ष्मण रेत पर कुछ पद चिह्नों को देखकर राम से कहता है- "विलास के योग से (क्रीड़ा करते हुए) अथवा परिश्रम से अथवा स्वभाव से मन्थरता से रेत में निभृत धँसे हुए ये किसी के पैर कलहंस के विलास को समता कर रहे हैं। राम-(देखकर, प्रसन्नता के साथ) क्या कह रहे हो किसी के पैर, ऐसा कहना चाहिए कि सीता के पैर देखो- "पैरों का विन्यास समान है। विनीत और ललित वहीं रचना है, तिलक और कमल बड़े सुन्दर रूप से बने हुए वहो देखा है। जिस प्रकार देखने पर यह पदपंक्ति शोक-विधुर हृदय को हर रही है, ऐसा लगता है कि देवी ने अभी तुरन्त अपने पेरों को रखा है।। १३ ।। ९. अभिप्राय अनुवाव-सादृश्य से परिकल्पित अभूतपूर्व जो अर्थ लोगों के हृवय का प्राही है, उसे 'अभिप्राय कहते हैं ॥ १४ ॥

१. क. योगप्यर्थ:।

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५१३

यत्रार्थानां प्रसिद्धानां क्रियते परिकोर्तनम्। परापेक्षा व्युवासार्थं तन्निदर्शनमुच्यते॥ १५॥ अभिप्रायः-अभूतपूवं इत्यसत्पदार्थ: केवलकल्पितः। केचित्स्वाद्यवस्तुन्यभिषान इत्याहुः तद्वैचित्र्यरहितत्वादुपेक्ष्यम्। यथा तापसवत्सराजे चतुथेऽड्के सांकृत्यायनी यौगन्धरायणोद्योगं विमृश्य प्रणिरषि प्राह- दूरमुदीणॅं रिपावेवमकिञ्चितकरे च विजिगोषौ। भवता तु नयगुणशतैः सोऽयमसूत्र: पटः क्रियते॥ यथा वा वत्सराजचरिते द्वितीयेडङके चोर :- भूमि: कराग्रेण विर्वाताद्य श्वासेन भग्नो हिमवान्महाद्रिः। आसारवृष्टया शमितोऽग्निरौर्बो विनिहंतः कोटशतैरनन्तः ॥१४॥ अभिनव-अभूतपूर्व का अर्थ है असत् पदार्थ, जो केवल कल्पित हो। कुछ विद्वान् आस्वाद्य वस्तु में अभिमान को अभूतपूर्वता मानते हैं। किन्तु यह विचित्रता रहित होने से उपेक्षणीय है। जैसे, तापसवत्सराज के चतुर्थ अङ्क में सांकृत्यायनी योगन्धरायण के उद्योग को देखकर गुप्तचर से कहती है- "शत्रु अत्यधिक उठा हुआ है, ऐसो स्थिति में विजिगीषु अकि्चित्कर है। आपने तो सैकड़ों नीतिरूपी उपायों से विना सूत के कपड़ा बुन रहे हैं।" अथवा जैसे वत्सराजचरित के द्वितीय अङ्क में चोर कहता है- "आज उँगुलियों से भूमि को विवत्तित कर दिया है, श्वाँस से महान् हिमालय पवत को भग्न कर दिया हैं, धाराप्रवाह दृष्टि से बाड़वाग्नि को शान्त कर दिया है और सैकड़ों कोड़ों से शेषनाग को विनिरहंत कर दिया है।" १०. निदर्शन अनुवाद-जहाँ पर दूसरे की अपेक्षा (आकाङ्क्षा) को दूर करने के लिए प्रसिद्ध अर्थो का परिकीत्तन किया जाय, उसे 'निदशंन' कहते हैं॥ १५ ॥ १. क. (टि०) परोपेक्षा। पराक्षेप। ना. शा०-६५

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५१४ नाटपशास्त्रे निरवद्यस्य वाक्यस्य पूर्दोक्तार्थप्रसिद्धये। यदुच्यते तु वचनं निरुक्तं तदुदाहृतम् ॥ १६॥ निदरशनं-प्रसिद्धानां देवतादीनां, तत्सम्पत्या परापेक्षा साध्याकांक्षा, तस्माद व्युवास:। अत एव दृष्टान्तादस्य भेदः। यथा उभयाभिसारिकायां- शान्ति याति शनैरमहोषधिबलादाशीविषाणां विषं शक्यो मोचयितं मदोल्कटकटादात्मा गजेन्द्रादने। ग्राहस्यापि मुखान्महाणवजले मोक्ष: कदाचिद्भवेद वेशस्त्रोवडवामुखानलगतो नैवोत्थितो दृश्यते॥ १५॥ निरुक्तं-यथा वत्सराजचरिते प्रथमेऽक्क भरतरोहक: राजानमाह- प्रसह्य हरणे केवलं प्रमादिताख्यातिः। राजा-किमेतत्। भर-सदोषेषु कार्येषु यदल्पदोषं तत्प्रारब्घव्यम्। अभिनव-प्रसिद्धानाम् अर्थात् देवता आदि का। परापेक्षा अर्थात् साध्या- काङक्षा। व्युदासार्थं=दूर करने के लिए। इसीलिए दृष्टान्त से इसका भेद है। जैसे उभयाभिसारिका में- "महषधियों के प्रभाव से साँपों का विष शान्त हो जाता है, जङ्गल में मदोन्मत्त हाथी से अपने को छुड़ाया जा सकता है। महासागर के जल में ग्राह के मुख से भी कदाचित् मुक्ति मिल सकती है। किन्तु वेश्याङ्गना रूपी वड़वारिनि में पड़ा हुआ व्यक्ति कभी उठा हुआ नहीं दिखाई देता॥ १५॥ ११. निरुक्त अनुवाद-पूर्व कथित अर्थ को सिद्ध करने के लिए निरवद्य वाक्य का जो कथन किया जाता है, उसे 'निरुक्त' नामक लक्षण कहते हैं॥ १६ ॥ अभिनव-जैसे वत्सराजचरित के प्रथम अङ्ड में भरतरोहक राजा से कहता है- बलात् (जबर्दस्ती) हरण करने में प्रभावी होना केवल ख्याति है। राजा-यह क्या कहते हो। भरतरोहक-सदोष कार्यों के रहने पर जिसमें अल्पदोष हो, उस कार्य का आरम्भ करना चाहिए। १. क. (टि०) तदप्यागमसम्भूतं निरुक्तमभिनिर्विशेत्।

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षोडशोष्ध्याय: ५१५

बहूनां च प्रधानानां नाम यत्राभिकीत्यंते। मनती अभिप्रेतार्थसिद्धचर्थं सा सिद्धिरभिघीयते ॥ १७॥ सिद्धान् बहून् प्रधानार्थान् उक्त्वा यत्र प्रयुज्यते। विशेषयुक्तं वचनं विज्ञेयं तद्विशेषणम् ॥१८ ॥ वसुवर्मा-स्वामिन् ! तत्राप्यहं वाच्यदोषं न पश्यामि। कुतः ? नीता बलात्प्रकृतिभद्रतरा सुभद्रा यद्वा सुभद्रभगिनी कपिकेतनेन । देवस्य तेन समभूद्ूचनीयता किं तेज: प्रकाशयशसां यदुदन्तिनां वा॥ शालं-साधु, निरुक्तमभिहितं वसुवर्मणा । १६॥ सिद्धि .- प्रधानानां स्पृहणोयानां प्रयोजनान्तराणामतकतोपलब्धानां परिकी- तंनम्। यथा कौमुदीमहोत्सवे चतुर्थेऽङ् के मन्त्रगुप्तवचनं- सङ्गतिश्चिरमचिन्तितपूर्वा निर्वृतप्रणयिनो मिथुनानाम्। आधिराज्यमधिरोहति तस्या: षोडशीमपि कलां न मधोनः ॥१७॥ वसुवर्मा-उनमें भी मैं कोई वाच्य दोष नहीं देख रहा हूँ। क्योंकि- "स्वतः कल्याणकारी जो वासुदेव श्रोकृष्ण को वहिन सुभद्रा को बलात् अर्जुन ने अपहरण कर लिया था तो क्या अर्जुन को निन्दा हुई थी ? अथवा तेज के प्रकाश से चमकते हुए यश वाले यदुवंशियों के हाथियों को क्या निन्दा हुई ?" शालड्कायन-अच्छा, वसुवर्मा ने निरुक्त को कह दिया॥ १६ ॥ १२. सिद्धि अनुवाद-जहाँ पर अपने अभोष्ट अर्थ को सिद्धि के लिए बहुत से प्रसिद्ध नामों का आख्यान किया जाता है उसे 'सिद्धि' नामक लक्षण कहा जाता है॥१७॥ अभिनव-'प्रधानानां' का अभिप्राय है स्पृहणीय तथा अतर्कितोपलब्ध अन्य प्रयत्नों का कथन (परिकीर्त्तन ) सिद्धि है। जैसे कौमुदीमहोत्सव के चतुर्थ अङ्क में मन्त्रगुप्त का वचन- "जिसका पहिले कभी चिन्तन नहीं किया, ऐसे दोनों की सङ्गति (मिलन) परम आनन्ददायिनी होती है, जिसको सोलहवीं कला को इन्द्र का अधिराज का पद भी प्राप्त नहीं कर सकता।"

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५१६ नाठपकाने

गुणाभिधानैविविधैविप रीतार्थयोजितैः गुणातिपातो मधुरैनिष्ठुरार्थैर्भवेदथ' ॥ १९॥

विशेषणं-यथा तापसवत्सराजे तृतोयेऽङके राजा विदूषकमाह-अयि मूढ! वृत्तिर्मूलफलादिभि: क्षितितले शय्या जटाधारणं वासो वल्कलमोदृशं कृतमिदं सामान्यमन्यैरपि। संवेगाभिभवे बिमूढमनसा यन्नानुयाता प्रिया तन्मिथ्यापरिबोधितेन न कृतं स्नेहानुरूपं मया॥ इति ॥ १८॥ गुणातिपातो-यथा धूतविटे विट :- जात्यन्धां सुरतेषु दोनववनामन्तर्मुखाभाषिणीं हृष्टस्यापि जनस्य शोकजननीं लज्जापटेनावृताम्। निर्व्याजं स्वयमप्यदृष्टजघना स्त्रोरपबर्द्धा पशु कतव्यं खलु नैव भो: कुलबधूकारां प्रवेष्टुं मनः॥

१३. विशेषण अनुवाद-जहाँ पर बहुत से प्रधान अर्थों को कहकर विशेताओं से युक्त वचन कहा जाय, उसे 'विशेषण' कहते हैं ॥। १८ ॥ अभिनव-जेसे तापसवत्सराज के तृतीय अङ्क' में राजा विदूषक से कहता है-अरे मूढ़ ? "कन्दमूल फल आदि से जीविका का निर्वाह, पृथ्वी पर शयन, जटाओं का धारण तथा वल्कल का वस्त्र धारण करना ऐसा आचरण तो सामान्य लोगों ने भी किया है किन्तु विक्षेप अभिभूत विमढ़-चित्त मैंने प्रिया का अनुनय नहीं किया, वह मिथ्या ज्ञान के कारण मैंने सनेह े, अनुरूप नहीं किया ।। १८॥ १४. गुणातिपात अनुवाद-जहाँ पर महर एवं निष्ठुर अर्थो से युक्त विपरीत अर्थों से योजित विविध गुणों क कथन किया जाय, वहाँ 'गुणातिपात' लक्षण होता है।। १९ ॥ अभिनव-जैसे धूर्त्तविट में विट का कथन- "जाति से अन्धी, सुरत में दोनवदना, मुख के भीतर बोलने वालो, प्रसन्न जन को भो शोकाकुल करने वालो, लज्जारूपी कपड़े से आबृत, विना व्याज (बहाने ) के स्वयं जवन-स्थल को न देखने वालो कुलवधू के आकार में स्त्रो के रूप में बँधे हुए पशु के पास जाने के लिए कभी भी मन नहीं करना चाहिए। १. क. निष्ठुरार्थो भवेद्यथा।

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बोडशोडण्यायः

बहून् गुणा कोतयित्वा सामान्यजनसम्भवान्। विशेष: को्त्यंते यत्तु ज्ञेयः सोडतिशयो बुधैः ॥ २०॥ 'रूप केरुपमाभिर्वा तुल्यार्थेः सुप्रयोजितैः । अप्रत्यक्षार्थसंस्प शस्तुल्यतर्कः प्रकोतितः ॥। २१ ।।

अत्र कुलस्त्रासमुचिता विनयलज्जादयो गुणा विपरीतार्थयोजिताः ॥१९॥ अतिशयो यथा-विलक्षकुरुपतौ धृतराष्ट्रं प्रति भोष्म :- एतत्ते हदयं स्पृशानि यदि वा साक्षी तवैवात्मजः संप्रत्येध तु गोग्रहे यदभवत्तत्तावदाकर्ण्यताम् । एक: पूर्वमुदायुरधः स बहुभिर्दृष्टस्ततोऽनन्तरं यावन्ता वयमाहवप्रणयिनस्तावन्त एवार्जुनाः ॥ इति २० ॥ तुल्यतर्कों-यथा वत्सराजचरितेऽ्टमेऽङके राजा- नवार्कभापल्ल वितामलोदरे सुगन्धि रेणूत्कर केस रोजज्वले रसामृतज्ञो : मरः सरोब्हे किमकंपुष्पे प्रणयं करिष्यति ॥ इति २१ ॥ यहाँ पर कुलस्त्रो के योग्य लज्जा, विनय आदि गुण विपरीत अर्थ में योजित होने से 'गुणातिपात' है ॥ १९॥ १५. अतिशय अनुवाद-जहाँ पर सामान्य लोगों में रहने वाले बहुत से गुणों को बतला कर विशेष का कोतंन किया जाय वहाँ 'अतिशय' नामक लक्षण समझना चाहिए॥ २० ॥ अभिनव-कुरुराज के लज्जित होने पर धूतराष्ट्र के प्रति भोष्म का कथन- "यह तुम्हारे हृदय का स्पर्श करके कहता हूँ अथवा तुम्हारा आत्मज (पुत्र) हो साक्षी है। अभी-अभो गो-ग्रहण के समय जो कुछ हुआ, उसे सुनिये। पहिले तो अस्त्र-शस्त्रों को उठाये हुए हम लोगों ने एक अर्जुन को देखा, बाद में जितने युद्ध के प्रेमी हम लोग थे, उतने अजुंन दिखाई देने लगे ॥ २० ॥ १६. तुल्यतर्क अनुवाद-जहाँ पर समान अर्थ वाले रूपक अथवा उपमा के द्वारा प्रयुक्त किये गये परोक्ष (अप्रत्यक्ष ) अर्थ संस्पर्श हो, उसे 'तुल्यतक' कहते हैं ॥ २१ ॥ १. क. (टि०) रूपकेरुपमानैरवा तुल्यार्थाभिः प्रयोक्तामिः। अप्रत्ययार्थ संम्पृष्ठः तुल्यतर्क इति हमृतः ।।

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५१८ नाटयशास्त्रे

बहूनां च' प्रयुक्तानां पदानां बहुभिः पदैः। उच्चयः सदृशार्थो यः स विज्ञेयः पदोच्चयः ॥ २२॥ यथादेशं यथाकालं यथारूपं च वर्ण्यते। यत्प्रत्यक्षं परोक्षं वा दृष्टं तद्वर्णतोऽपि वा॥ २३॥

पदोच्चय :- यथा वत्सराजचरिते षष्ठेऽङके राजोत्तमसचिवं वणयति- खड्गो रक्षान्यकारै रविररितिमिरे कार्यभारेषु धुर्यः दीपो मन्त्रा्धकारे सुरगुरुरनये सङ्क्मी व्यापदोषे। उत्कण्ठायां सभागो गतिरनवसरे चन्दनं शोकतापे संक्षेपान्मानुषाभो हितशिवसुखदो भव्यचिन्तामणिर्मे।। २२॥ अभिनव-जैसे, वत्सराजचरित के अष्टम अङ्क में राजा का कथन- 'सूर्य की नवोन किरणों से पल्लवित निर्मल उदर वाले, सुगन्धित परागों से युक्त केशरों से उज्जवल कमल के रसामृत मर्मज्ञ भौंरा क्या मन्दार के फूल में प्रणय (प्रेम) करेगा ? ॥। २१ ॥ १७. पदोच्चय अनुवाद-जहाँ पर बहुत से पदों का अनेक पदों के साथ समानता बतलाते हुए प्रयोग किया जाय, उसे 'पदोच्चय' नामक लक्षण समझना चाहिए॥ २२ ॥ अभिनव-जैसे वत्सराज नाटक के षष्ठ अङ्क में राजा उत्तम सचिव का वर्णन करते हुए कहता है- "रक्षारूप अन्धकार में खड्ग, शत्ुरूपो अन्धकार को दूर करने में सूर्य, कार्यभार को वहन करने में बृषभ, मन्त्रणा के समय उस्थित कठिनाइयों को दूर करने में दीपक, अनीति के समय बृहस्पति के समान विपत्तियों को दूर करने वाला, उत्कण्ठा के समय सहभागी, अनवसर में गति, शोकरूपी ताप को दूर करने में चन्दन, संक्षेप में मनुष्य के समान हित, मङ्गल एवं सुख को देने वाला अमात्य मेरे लिए भव्य चिन्तामणि हैं॥ २२ ॥ १८. दृष्ट अनुवाद-जहाँ पर देश, काल एवं रूप के अनुसार प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष अर्थ का वर्णन किया जाता है, उसे 'दृष्ट' नामक लक्षण कहते हैं।। २३ ।। १. क. (टि०) बहूनां सम्प्रयुक्ताना पादानां।

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षोडशोऽयाय: ५१९

परिगृह्य तु शास्त्रार्थं 'विद्वन्मनोहरं स्वन्तमुपदिष्टं तदुच्यते ॥ २४ ॥

दृष्टं प्रत्यक्षं यथा मालविकाग्निमित्रे- वामं सन्धिस्तिमितवलयं न्यस्य हस्तं नितम्बे कृत्वा श्यामाविटपसदृशं स्रस्तमुक्तं द्वितीयम्। पावाङ्गष्ठालुलितकुसुमे कुट्टिमे पातिताक्षं नृत्तादस्या: स्थितमतितरां कान्तमृज्वायताक्षम् । इति। परोक्षं यथा पादताडितके मदनसेनाया वर्णनं- उत्क्षिप्तालकमीक्षणाम्तगलितं कोपान्चितान्तभ्रुवा दष्टार्धोष्ठमधीरदन्तकिरणं प्रोत्कम्पयस्त्या मुखम्। शिञ्जम्नुपुरया विकृष्य विगलद्रक्तांशुकं पाणिना मूर्धन्यस्य सनुपुरः स मदया पादोडपितः कान्तया ॥। इति २३ ।। अभिनव-दृष्ट प्रत्यक्ष जैसे मालविकाग्निमित्र में नायिका का वर्णन- TFP "इस नायिका का वलय सन्धियों में निश्चल होकर वामहस्त नितम्ब पर रखकर दूसरे हाथ को श्यामा लता के शाखा के समान खुला छोड़ दिया है और पेर के अंगठे से चञ्चल (ठुकराये गये) कुसुम वाले फर्श पर आंखें गड़ाये हुए इस नायिका का कान्त, कोमल और आयत नेत्र नृत्त के बाद अत्यन्त स्थिर हैं।" परोक्ष दृष्ट का उदाहरण जैसे पादताड़ितक में मदनसेना का वर्णन- "नेत्रों के समीप तक गिरे हुए बालों को ऊपर उठाये हुए क्रोध से अञ्चित (धनुषाकार) भौंहों वाली, दबे हुए आधे ओष्ठ वाले तथा स्वच्छ दन्त किरणों से अधीर मुख को कम्पित करने वाली, झङ्गारयुक्त नुपरों वाली, खिसकते हुए रक्ताशुक को हाथ से ऊपर की ओर खोंचकर मदमस्त कान्ता ने उसके मस्तक पर नुपुर-सहित पैर रख दिया।" ।।२२।। १९. उपदिष्ट अनुवाद-जब शास्त्र के अर्थ को लेकर विद्वानों के मन को हरने, वाले और परिणाम में सुखद जो वाक्य कहा जाय, उसे 'उपदिष्ट' नामक लक्षण कहते हैं॥। २४॥ १. क. (टि०) विदुर्यनोहर'।

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नाटयशाहने पूर्वांशयसमानार्थेरप्रत्यक्षार्थसाधनैः 'अनेकोपाधिसंयुक्तो विचारः परिकीतितः ॥२५।। उपदिष्टं-यथाविभारके प्रथमेडके राजा- धर्म: प्रागेष चिन्त्य: सचिवमतिगति: प्रेक्षितव्या स्वबुष्या प्रच्छाच रागरोषौ मृदुपरुषगुणौ कालयोगेन कायौं। ज्ञेयं लोकानुवृत्तं परचरनयनैमण्डलं प्रेक्षितव्यं रक्ष्यो यत्नादिहात्मा रणशिरसि पुनः सोऽपि नावेक्षितव्यः। यथा वा तम्त्रान्तरविषये धूतंविटे- शून्ये वासं प्रमद्यं द्विरव इव लतां यो हरत्याशु नारों वामां वा यो विदित्वा ह्यभिभवति शनै रञ्जयन् वाक्यलेशैः। अभ्यं कृत्वोपवि वा छलयति कुरुते भावसङ्गहनं वा। तस्यैतचचेष्टितं भो न भवति विफलं वामशोला हि नायंः ॥ २४॥ अभिनव-जैसे अविमारक के प्रथम अङ्क में- "सर्वप्रथम धर्म का चिन्तन करें, फिर सचिवों को बुद्धि को गति को अपनी बुद्धि से देखना चाहिए। राग और द्वेष को छिपाना चाहिए, समय-समय पर मृदुता और कठोरता का कार्य करना चाहिए, गुप्तचरों के नेत्रों से लोकवृत्त का ज्ञान करना चाहिए और मण्डलों का निरोक्षण करना चाहिए। यत्नपूर्वक अपनी रक्षा करनी चाहिए, किन्तु रणभूमि में उसकी भी परवाह नहीं करनी चाहिए।" अथवा जैसे तन्त्रान्तर के विषय में धूर्त्तविट में- "जिस प्रकार हाथी लता को खींचकर नष्ट कर देता है। उसी प्रकार शून्य घर में घुसकर नारियों का अपहरण कर लेता है। यह वामा (मानिनी) है, ऐसा जानकर मधुर वचनों से धीरे-धीरे प्रसन्न करके अपने वश में कर लेता है, फिर छल करके छलता है और अपने भावों को छिपाता है, उसकी ये सब चेष्टाएँ विफल नहीं होती, क्योंकि स्त्रियाँ स्वभाव से विपरीत आचरण वाली होती हैं ॥ २४॥ २०. विचार अनुवाद-पूर्व में प्रवृत्त अर्थ के समान अर्थं वाले परोक्ष अर्थ के साधक तथा बनेक उपाधियों से संयुक्त वचन 'विचार' कहा जाता है॥। २५ ।। १. र. (हि०) अनेकोपायसंपुक्तो। तिरस्कृतार्थविषयो।

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षोडशोडध्यायः ५२१

विचारस्यान्यथाभावस्तथा दृष्टोपदिष्टयोः। जमम्णा सन्वेहात्कल्प्यते यस्तु स विज्ञेयो विपर्यंयः ॥ २६॥ प्रवृत्तार्थानुसारि परोक्षार्थंसाधकं बहूपायोपाघिदर्शनं वाक्यं विचार: यथा मुद्राराक्षसे पञ्चमेडक्के राक्षसवाक्यं- साध्ये निश्चितमन्वयेन घटितं बिभ्रत्सपक्षे स्थिति व्यावृत्तं च विपक्षतो भवति यत्तत्साधनं सिद्धये। यत्साध्यं स्वयमेव तुल्यमुभयो: पक्षे विरुद्धं च य तस्याङ्गीकरणेन वादिन इव स्यात्स्वामिनो निग्रहः॥२५॥ अथवा विज्ञातापरागहेतुभि: प्राक्परिगृहीतोपजापैरापूर्णमिति न विकल्पि- तुमर्हामि ॥ इति ॥२५॥ विपयंयो-यथा रावणं प्रति सचिव :- उदकंसिद्धिमिच्छन्ध्: सदभिनं खलु दृश्यते। परस्त्रीफालपट्टिका॥ अभिनव-प्रवृत्त अर्थ का अनुगामी, परोक्ष अर्थ का साधक अनेक उपाय एवं उपाधियों का दर्शक वाक्य 'विचार' है। जैसे मुद्राराक्षस नाटक के पञ्चम अङ्क में राक्षस का वाक्य- "साध्य में निश्चित रूप वाला अन्वय से घटित सपक्ष में स्थित और विपक्ष से व्यावृत्त साधन (हेतु) साध्य की सिद्धि में समर्थ होता है। किन्तु जो स्वयं साध्य है और अनुकूल एवं प्रतिकूल दो स्थितियों में समान है और पक्ष में विरुद्ध है, उसके स्वीकार करने में वादी के समान स्वामी का भी निग्रह हो जाता है।" असन्तोष (विराग) के हेतुओं (कारणों) से जिन्हें जान लिया है तथा शत्रु के भेद नीति को स्वीकार किये हुए लोगों से यह मण्डल भरा हुआ है, अतः विकल्प करना उचित नहीं है॥ २५।। २१. विपर्यय अनुवाद-जहाँ पर दृष्ट अथवा उपदिष्ट लक्षणों में सन्वेह के कारण विचार के विपरीत कल्पना की जाय, उसे 'विपयंय' लक्षण समझना चाहिए॥ २६ ॥ अभिनव-जैसे रावण के प्रति उनका सचिव कहता है- "परिणाम में उत्तम फल के इच्छुक सज्जनों को भाद्रपद की चतुर्थी के चन्द्र के समान पराई स्त्रो के भालपट्ट को नहीं देखना चाहिए।" १. क. (टि०) दिष्ठोपदिष्टयोः । दृष्टोपदृष्टयोः । वा० शा०-६६

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५२२ नाट्यशास्त्रे

वाच्यमर्थं परित्यज्य दृष्टाविभिरनेकषा। अन्यस्मिन्नेव पतनादिह भ्रंशः स 'इष्यते ॥ २७ ॥

रावण :- परस्त्रीकुच कुम्भेषु कुम्भेषु वरदन्तिनाम्। निपतन्ति न भीरूणां दृष्टय: श्ञरवृष्टय:॥ यथा वा मत्तविलासे शक्यभिक्षु :- 'परमकारुणिएण भअवदा तहागएण पासादेसु वासो पज्जंकेषु पुव्वण्हे भोअणं एदेहिं उवदेसेहिं भिक्खुसङ्घस्य अणुग्गहं करन्तेण कि णु हु इत्थिआपरिग्हो सुरापाणविहाणं अणादिहं। अहवा सग्वञ्चो एदंउणपेक्खदि। अवस्सं एदेहि वुद्टबुद्धत्थविरेहि णिरुच्छा गह्माणं तरूणजणाणं मच्छरेण पिड्अपुल्थएसु इत्थिआसुरापाणविहाणाणि प्ठामुहाणि इति तककेमि'॥ २६॥

रावण- "पराईं स्त्री के कुचों पर भोरओं को दृष्टि नहीं पड़ती और न उत्तम हाथियों के गण्डस्थल पर भीरूओं की शर-वृष्टियाँ हो सकती है।" अथवा जैसे मत्तविलास में शक्यभिक्षु कहता है- "तथागत ने उपदेश दिया है कि 'प्रासाद (महलों) में वास नहीं करना चाहिए, न पलङ्ग पर सोना चाहिए और न पूर्वाह्न में भोजन करना चाहिए। इन उपदेशों के द्वारा भिक्षुओं पर अनुग्रह करते हुए परमकारुणिक भगवान् तथागत ने कहा है कि स्त्री-परिग्रह और सुरापान भी नहीं करना चाहिए अथवा सवज्ञ को इसकी उपेक्षा करनी चाहिए। ऐसा लगता है कि निश्चय ही किसी दुष्ट निरुल्साह बुद्ध स्थविर ने हमारे तरुणजनों के ईर्ष्या के कारण पाठ्यपुस्तकों में स्त्री- परिग्रह, सुरापान का परामर्श दिया है। यह मेरा अनुमान है॥ २६ ॥ २२. भ्रंश अनुवाद-जहाँ पर दृष्टादि के द्वारा अनेक प्रकार के वाच्य अर्थ को छोड़कर किसी अन्य में पतन होता है, उसे 'भ्रश' नामक लक्षण कहते हैं।। २७ ।। १. क. (टि०) इह भंशः स उच्यते। तद्भ्रंशितमिहोच्यते।

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बोडशोश्याय: ५२३.

उभयोः प्रोतिजननो विरुद्धाभिनिविष्टयोः'। अर्थस्य साधकश्चैव विज्ञेयोऽनुनयो बुधैः ॥ २८॥

भ्रंशो-यथा वेणोसंहारे द्वितीयऽङके कञ्चुकिनमाह-दुर्योषनः! सहभृत्यणं सवान्धवं सहमित्रं ससुतं सहानुजम्। स्वबलेन निहन्ति संयुगे न चिरात्पाण्डुसुतः सुबोधनम् कञ्चु-कर्गों पिघाय सभयं शान्तं पापं प्रतिहतममङ्गलम् ॥२७ ॥ अनुनयो-यथा रामाम्युदये द्वितीयेऽङके रामपराक्रमस्तुतिव्यग्रं मारीचमाह रावण :- आ: प्रतिपक्षपक्षपातिन् ! क्षुद्र ! राक्षसापसद? कि बहुना- तवैव रुधिराम्बुभि: क्षतकठोरकण्ठस्तुतैः। रिपुस्तुतिभवी मम प्रशममेतु कोपानलः ।। सुरद्विपशिरस्सथलोदलनदष्टमुक्ताफल: स्वसुः परिभवोचितं पुनरसौ विधास्यत्यसिः॥ अभिनव-जैसे वेणीसंहार नाटक के द्विवीय अङ्क में कब्चुकी से दुर्योधन कहता है- "भाई, मित्र, पुत्र, बन्धु और भृत्यगणों के साथ दुर्योधन को पाण्डपुत्र अर्जुन युद्ध में अपनो सेना के द्वारा शोघ्र ही मार देगा।" कञ्चुकी-(दोनों कानो को बन्द कर भय के साथ) पाप शान्त हो, अमज़ुल दूर हो।। २७ ॥ २३. अनुनय अनुवाद-परस्पर विरुद्ध अर्थों में आसक्ति रखने वाले दोनों पक्षों के प्रोति- जनक अर्थ (कार्य) का साधक 'अनुनय' कहा जाता है।। २८।। अभिनव-जैसे रामाभ्युदय के द्वितोय अङ्क में राम के पराक्रम की प्रशंसा में व्यग्र मारीच से रावण कहता है- अरे ! शत्रुओं के पक्षपाती क्षुद्र, अधम राक्षस ! अधिक क्या, कहे- "तुम्हारे द्वारा को गई शत्रुओं की प्रशंसा से उत्पन्न मेरो क्रोधाग्नि तुम्हारे कण्ठ के कठोर घाव से चूने वाले खून (रुधिर) रूपी जल से शान्त होगा। फिर इन्द्र के ऐरावत हाथो क गण्डस्थल मौक्तिक को खण्डित करने वाला यह मेरा तलवार बहिन के तिरस्कार को दूर करने योग्य कार्य करेगा।" १. क. विशेषयोः ।

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नाटपशारने

ईप्सितार्थंप्रसिध्ययं कोत्यंते यत्र सुरिभि: । प्रयोजनान्यनेकानि सा मालेत्यभिसंजञिता॥२९॥ हृष्टैः प्रसन्नवद नैर्यत्पर स्यानुवर्त्तनम्2। क्रियते वाक्यचेष्टाभिस्तद्दाक्षिण्यमिति स्मृतम्'॥३०॥ इति खङ्गमाकर्षति। तदा प्रहस्तः (उभयोर्मध्येऽनिपत्य) प्रसोदतु प्रसीवतु महाराजः, नेदमनुरूपं स्वामिनः । देव- लोकत्रयक्षयोद्वृत्तप्रकोपाग्रेसरस्य ते। ईदृशश्चनद्रहासस्य भृत्येष्वनुचितः क्रमः॥ इति ॥ २८॥ माला-यथा तापसवत्सराजे राजा- दृष्टा यूयं निर्जिता विद्विषन्तः प्राप्ता भूतषात्री च भूय:। संबन्धोऽभू दर्शकेनापि सारथं किं दुष्प्रापं यन्न लब्धं भवन्दघः ॥ २९ ॥ इस प्रकार तलवार को खोंचता है। तभी प्रहस्त (उन दोनों के बीच आकर) महराज ! प्रसन्न हों, प्रसन्न हों, यह कार्य आपके अनुरूप नहीं है। देव- क "तीनों लोकों के क्षय के लिए उद्वेलित क्रोध का अग्रेसर आप का यह चन्द्रहास (तलबार) का यह क्रम भू्यों पर अनुचित है।"॥ २८ ।। २४. माला अनुवाद-जहाँ पर अभीष्ट अर्थ की सिद्धि के लिए विद्वानों द्वारा अनेक प्रयोजनों को कहा जाय, उसे 'माला' नामक लक्षण कहा जाता है। २९ ॥ अभिनव-माला का उदाहरण जैसे तापसवत्सराज में राजा- "आप लोगों ने शत्रुओं को पराजित होते हुए देख लिया, तथा देबी और पृथ्वी को पुनः प्राप्त कर लिया, दर्शक के साथ आपका सम्बन्ध हो गया, अब कौन सी ऐसी वस्तु दुष्प्राप्य है जो आप ने नहीं पाया है ॥ २९ ॥ २५. दाक्षिण्य अनुवाद-जहाँ पर हर्षित एवं प्रसन्न मुख जनवाणो और चेष्टाओं के द्वारा दूसरे का अनुवर्तन करते हैं, उसे 'वाक्षिण्य' कहते हैं॥ ३०॥ 1. क. (ट०) अभिप्रेतार्थसिद्धध्थ। अभिष्टार्थसिद्धयर्थ। २. क. (टि०) अनूव्णनम्। ३. क. उदाहृतम् ।

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बोडशोउध्याय: ५२५

यत्र संकीतयन् दोषं' गुणमर्थेन दशयेत्। गुणातिपाताद् दोषाद्वा' गर्हणं नाम तद्भवेत् ॥ ३१॥

दाक्षिण्यं यथा रत्नावल्यां द्वितीयऽङ्के शोषवेवनाव्याजेन गन्तुमुद्यतां वासव- दत्तां पटान्तेन गृहोत्वा निरुन्धन् वत्सराजः "प्रिये, प्रसीदेति बूयाम्" इत्यादि वद- न्निष्क्रान्तार्या प्रेवस्यां "अलमरण्यरुदितेन" इति ब्रुवन्तं विदूषकमाह-"मूढ़ ? न लक्षितस्त्वया देव्या: कोप: तत्सवंथा देवोप्रसादनं मुक्त्वा नान्यमत्रोपायमाकलयामि तबेहि, देवों प्रसावयितुमम्यन्तरमेव प्रविशावः" इति। अत्र राज्ञोऽनुवर्तनं वाक्षिण्यम्॥ ३०॥ गहणं-दोषस्य गुणीकृतत्वं यथा धुर्तविटे- प्रणष्टा न व्यक्तिर्भवति वचसा सैव मृदुता न रागा नेत्राब्जे त्यजति न च लज्ला व्यपगता। स्मृतिः प्रत्ययिता परिहृषितमद्यापि न मुखं मदो दोषांस्त्यवत्वा त्वयि परिणतस्तिष्ठति गुणैः ॥

अभिनव-दाक्षिण्य का उदाहरण जैसे रत्नावली के द्वितीय मङ्क में शिरो- वेदना के व्याज (बहाने ) से जाने के लिए उद्यत (तैयार) वासवदत्ता को आञ्चल पकड़कर वत्सराज उदमन रोकते हुए कहता है-"प्रिये ! तुम प्रसन्न होओ, ऐसा मैं कहता हूँ।" इत्यादि वचन कहने पर भो प्रेयसी के चले जाने पर "अरण्य में रोदन करना व्यर्थ है" इस प्रकार कहने वाले विदूषक से कहता है-"मूढ़! तुमने देवी के क्रोध को नहीं देखा। अतः देवी को प्रसन्न करने के अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं देख पा रहा हूँ। तो आवो, महारानी को प्रसन्न करने के लिए हम लोग भीतर ही चलें। यहाँ पर राजा का अनुवर्त्तन करना 'दाक्षिण्य' है। २६. गर्हण अनुवाद-जहाँ पर दोषों का कीतंन करते हुए किसी प्रयोजन के गुणों को प्रद्शित कर दे अथवा गुणों का अतिक्रमण (उपेक्षा) करके दोष को प्रदर्शित कर दे वहाँ 'गर्हण' नामक लक्षण होता है। ३१ ॥ अभिनव-दोष को गुण कर देना 'गर्हण' है। जैसे-धूर्तविट में-

१. क. (टि०) दोषान्। २. क. (ढि०) गुणाभिवाक्षत्। ३. दोषाम्या ।

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नाट्यशास्त्रे

अर्थान्तरस्य कथने यत्रान्योऽर्थः प्रतीयते'। वाक्यमाधुर्यसम्पन्ना सार्थापत्तिरुदाहता ॥ ३२॥

गुणातिपाते वोषा यथा वत्सराजचरिते द्वितीयेऽ्ङ के विष्णुत्रातः- नृपः प्रभुत्वात्प्रतिषेधवामा जिह्वो विधिस्तद्वशर्वाति कार्यम्। साचिव्यतो नापरमस्ति पुंसां विषाददुःखापशसां निवानम्॥ यथा वा तापसवत्सराजे तृतीयेऽडके लामकायन :- पूर्वाह्ले कृतभोजनव्यतिकरान्नित्यैव नीरोगिता कण्डूतिर्वपनावपैति शिरसः स्नानं यदा रोचते। जात्याचारकदर्थनाविरहितं ब्राह्मण्यमातमेच्छया धूर्तः सत्त्वहिताय कैरपि कृतं साधुब्रतं सौगतम् ॥३१ ॥ "मद्यपान के मद से वचन की स्पष्टता नष्ट नहीं हुई, अपितु वही मृदुता रही। राग (लालिया) नेत्र कमल को नहीं छोड़ रहा है, लाज भी दूर नहीं हुई। स्मृति पुनः लोट आई, मुख आज भी प्रसन्न है। इस प्रकार यह मद आपके रहने पर दोषों को छोड़कर गुणों में परिणत होकर स्थित है।" गुणों के अतिपात में दोष का वर्णन। जैसे वत्सराजचरित के द्वितीय अङ्क में विष्णुत्रात का यह कथन- "राजा लोग अपनी प्रभुत्व के कारण वाम भाव से प्रतिषेध करते हैं, दैव भी कुटिल होता है, कार्य भी उसी दैव के अधीन है, इसलिए पुरुषों के लिए राजा ने मन्त्रित्व पद के अतिरिक्त विषाद, दुःख और अयश को निवारण करने का अन्य कोई कारण नहीं है।" अथवा जैसे तापसवत्सराज के तृतीय अङ्क में लामकायन कहता है- "पूर्वाह्न में नित्य भोजन का अवसर निश्चय कर लेने से निरोगिता होती है। शिर मुड़ा लेने से खुजलाहट दूर हो जातो है, जब अच्छा लगे स्नान करना चाहिए। जाति और आचार को कदर्थना से रहित अपनी इच्छा से ब्राह्मणत्व है। कुछ धूर्त्तों ने अपना व्यवसाय चलाने के लिए सौगत व्रत को धारण कर लिया है।" २७. अर्थापत्ति अनुवाद-जहाँ अर्थान्तर के रहने पर अन्य अर्थ की प्रतोति हो वाक्य की मधुरता से सम्पन्न उसे 'अर्थापत्ति' कहते हैं॥। ३२ ॥ १. क. (डि०) प्रकाश्यते। २. ख. वाक्यमाधुर्यसंयुक्त।

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बोडशोऽधयायः १२०

वाक्येः सातिशयरुक्ता वाक्यार्थस्य 'प्रसाधकैः। लोकप्रसिद्धैबंहुभिः प्रसिद्धिरिति कीतिता ॥ ३३॥। अर्थापत्तियंथा धर्तंविटें- आदष्टस्फुरिताधरे भवति यो वक्त्रारविन्दे रसः प्रीतिर्या च हृतांशुके च जघने काञ्चीप्रभोद्दयोतिते। लक्ष्मीर्या च नखक्षताङ्करधने पोने कपोले स्त्रियो। रक्तं तेन विरज्यते न हृवयं जात्यन्तरेऽपि ध्रुवम्॥ अत्र जम्माम्तरेऽपि तस्या अनुरक्तिरनुर्वतंत एवेत्युक्ते जन्मान्तरेव्वपि विरागो न प्रभवतत तस्मादृभवबन्धविमुक्तिनं स्थावित्यर्थापत्तिर्नाम लक्षणम्॥। ३२॥। प्रसिद्धिः-प्रसाधकैः प्रकृष्टसाधकैः, प्रसिद्धैः पूर्वनेव सिद्धः। यथा गवा- युद्धे बलदेव: वुर्योधनमाह-भोमसेन इदानों तव युद्धवञ्चनामुत्पाद्य स्थास्यति। दुर्यो-न चाहं भोम सेनेन वञ्च्तः। बल-अथ केन भवानेवंविध: कृतः। अभिनव-अर्थांपत्ति का उदाहरण जैसे धूर्त्तविट में- "सुरत काल में अधर का दंशन कर लेने पर जिसमें अधर फड़कने लगता है, ऐसे कमलमुख में जो रस है, वस्त्र के हरण कर लेने पर करधनी की प्रभा से उद्योतित जङ्घों में जो प्रीति होती है, नखक्षत के अड्कर को धारण करने वाले स्त्रियों के माँसल कपोलों में जो शोभा होती है, ऐसी भावना से अनुरक्त हृदय जन्मान्तर में भी विरक्त्क नहीं होता।" यहाँ जन्मान्तर में भी उसकी अनुरक्ति (अनुराग) अनुवत्तंन करती है, ऐसा कहने पर जन्मान्तर में भी विराग नहीं होता, इसलिए भव-बन्धन से मुक्ति नहीं हो सकती, अतः यहाँ 'अर्थापत्ति' नामक लक्षण है॥ ३२॥ २८. प्रसिद्धि अनुबाद-वाक्यार्थं के प्रसाधक बहुत से अतिशय पूर्ण वाक्यों के द्वारा कथित रचना को 'प्रसिद्धि' कहते हैं॥ ३३ ॥ अभिनव-प्रसाधक का अर्थ है प्रकृष्ट साधक और प्रसिद्धि का अर्थ है पहिले से ही सिद्ध। जैसे गदायुद्ध में बलदेव दुर्योधन से कहता है-अब भीमसेन तुम्हें युद्ध में वश्चित कर स्थिर हो जायेगा। दुर्योधन-क्या भोमसेन ने मुझे ठग लिया है। बलराम-तब किसने आप को ऐसा कर दिया? ७१. क. (टि०) एववाक्यारथं प्रकाशकैः ।

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५२८ नाटपशास्त्रे

यत्राकारोदुभवैर्वाक्यैरात्मानमथवा परम्। `पृच्छ्यते चाभिधत्तेऽरथं सा पृच्छेत्यभिसंज्ञिता॥। ३४।।

दुर्यो-भरूयतां, येनेश्व्रस्य च पारिजातकतरुर्मानेन तुल्यं हृतो दिव्यं वर्षसहस्त्रमणंवजले सुप्तश्च यो लोलया। बीप्स्या भीमगवां प्रविश्य सहसा निर्व्याजयुद्धप्रिय: तेनाहूं जगतां प्रियेण हरिणा मृत्यो: प्रतिग्राहितः॥ बत्र वाक्यार्थस्य साधका एव भगवतो विष्णो: पारिजाताहरणलोलावटपत्र- शयनादयः । अन्ये तु प्रसाधकैरलङ्कारैरिति गृहन्ति॥ ३३॥ पृच्छा-शोकाविपरवशतयात्मानं वा परं परोक्षे संबोध्य पृच्छन्निवाभि- धानम्। तग्नोत्तरमपेक्षते तस्यैव प्रत्यायकत्वात्। यथा रामचरिते हनुमान् सोतां दृष्टवाह- दुर्योधन-सुनिये- "जिसने अभिमान के साथ इन्द्र से पारिजात के वृक्ष को हरण कर लिया था। जिसने हजारों दिव्य वर्षों तक लीला के साथ समुद्र के जल में शयन किया था, उस जगत् के प्रिय हरि ने सहसा दीप्ति से भीम की गदा में प्रवेश करके निर्व्याज युव्धप्रिय मुझे मृत्यु के लिए ग्रहण करा दिया।" यहाँ पर भगवान् विष्णु के पारिजात हरण, लीलापूर्वक वटपत्र पर शयन आदि वाक्यार्थ के साधक हैं। अन्य आचार्य तो वाक्यार्थ का प्रसाधक अलङ्कार मानते हैं॥ ३३ ॥ २९. पृच्छा अभिनव-जहाँ पर गूढ़ अभिप्रायों के सूचक वाक्यों के द्वारा स्वयं को पूछते हुए किसो अर्थ को कहा जाता है, उसे 'पृच्छा' कहते हैं॥ ३४॥। अभिनव-शोक आदि के कारण परवश हो जाने से अपने को अथवा दूसरे को सम्बोधित कर पूछते हुए की तरह कथन है। जहाँ उत्तर की अपेक्षा नहीं होती उसी का यह प्रत्यायक है। जैसे उत्तररामचरित में हनुमान् सीता को देखकर कहते हैं- १. ब. पृण्छयते वाभिवतेध्यं। क. (टि०) पृच्छेशयुप्रज्ञापन्नार्थं।

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पोडशोऽध्याय: ५२९

दृष्टश्रुतानुभूतार्थकथनाविसमुद्भवम् `सादृश्यं क्षोभजननं सारूव्यमिति संज्ञितम्॥ ३५॥ स्थानेऽवसीदसि रघूदृह ! किं विषातः ! अस्यास्त्वयेक्षितमलक्षणमङ्गकेषु। यद्यपि जोवसि वशानन ! हे हनुमन् ! केयं तवाभिमुखवतिरिपोः प्रतीक्षा ॥ इति ॥ ३४॥ सारूप्यं-आविशब्देन दशनअवणानुभवनान्युपलक्षितानि। अत्र रूपविभ्रा- मत्या न क्षोभजननमेव लक्षणस्य चमत्कृतिः । यथा छलितरामे लक्ष्मणेन बध्वानीतो लवो रामयज्ञशालायां हिरण्मयों सोतां दृष्टवाह- "अये कथमियमम्बा राजद्वारमागता" इति सहसोत्याय प्रणम्य तदनन्तरं काञ्नमयोति निर्वर्ष्योपसृत्योपविशति। "हे रघूदृह ! आप ठीक (उचित ) ही दुःखी हो रहे हो। हे विधातः ? आपने सीता के अङ्गों में कौन सा दुर्लक्षण देखा है। हे दशानन! इस बेचारी को कष्ट देकर आज भी जो रहे हो। हे हनुमन् ! सामने शत्रु को देखकर तुम्हारी यह कैसी प्रतीक्षा है?॥ ३४ ॥ ३०. सारूप्य अनुवाद-जहाँ पर दृष्ट, श्रत एवं अनुभूत अर्थ के कथन, दशन, श्रवण तथा अनुभव आदि से समुद्भूत क्षोभ-जनक सादृश्य हो, उसे 'सादृश्य' नामक लक्षण कहते ॥। ३५॥ अभिनव-यहां पर 'कथनादि' में आदि शब्द से दर्शन, श्रवण और अनु- भवन उपलक्षित है। यहाँ पर रूप की विशिष्ट भ्रान्ति से क्षोभ को उत्पन्न कर देने में ही लक्षण का चमल्कार नहीं है। जैसे छलितराम में लक्ष्मण के द्वारा बाँधकर लाये गये लव ने राम की यज्ञशाला में हिरण्यमयी सोता को देखकर कहा- "अये ! यह अम्बा राजद्वार पर कैसे आ गई?" सहसा उठकर प्रणाम कर और उसके बाद यह तो हिरण्यमयी है, ऐसा अनुभव कर पास में जाकर फिर बैठ गया। १. ख. सादृश्यक्षमजनितं। ना. शा०-६७

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५३० नाटपशाबचे

हृदयस्थस्य वाक्यस्य गूढार्थस्य' विभावकम्। अन्यापदेशैः कथनं मनोरथ इति स्मृतः ॥३६॥ यथा वा वेणीसंहारे-वुर्योधनं हत्वागच्छन्तं भीमसेनं दुर्योषनमिति चार्वाक- बातंयैव भ्रान्त्वा धर्मसूनुस्तं गाढं गृहोत्वाह .. आशैशवादनुदिनं जनितापराधो मत्तो बलेन भुजयोहंतराजपुत्र: । आसाद्य मेऽन्तरमिदं भुजपञ्जरस्य जीवन् प्रयासि न पदात्पदमद्य पापः ॥ इति ॥३५॥ मनोरथो-यथा विकटनितम्बाप्रहसने विकटनितम्बाह- अन्यासु तावदुपमर्दसहासु भृङ्ग ! लोलं विनोवय मनः सुमनोलतासु। मुग्धामजातरजसं कलिकामकाले बालां कदर्थयसि किं नवमालिकाया:॥ अत्रात्मानमेव सुमनोलतात्वेनापदिशति॥३६॥ अथवा जैसे वेणीसंहार नाटक में-"दुर्योधन को मारकर आते हुए भीमसेन को यह दुर्योधन है, इस चार्वाक की बात से भ्रान्त होकर युधिष्ठिर ने उसे दृढ़ता से पकड़कर कहा- "शेशव काल से ही प्रतिदिन अपराध करने वाले भुजाओं के बल से मत्त हुए राजपुत्र भीम को मार डाला। आज मेरे इस भुजपक्जर के बीच में पहुँचकर जीते हुए एक पग भी आगे नहीं जा सकते।" ३१. मनोरथ अनुवाद-यहाँ पर हृदयस्थ भाव एवं गूढ़ अर्थ के विभावक बात को दूसरे के बहाने से कथन किया जाय, उसे 'मनोरथ' नामक लक्षण कहा जाता है।। ३६ ।। अभिनव-मनोरथ का उदाहरण-जैसे, विकटनितम्बा प्रहसन में विकट- नितम्बा कहती है- "हे भ्रमर ! सम्भोगकालोन रतिश्रम को सहन करने वाली किसी अन्य पुष्पलताओं में अपने चञ्चल मन को बहलावो। इस नवमालिका की मुग्धा, जिसमें पराग नहीं है, ऐसी नवीन कली को क्यों कदर्यित कर रहे हो।" २. सन्यापदेशकम्।

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५३१

यद्वाकयं वाक्यकुलैरुपायेनाभिधोयते। ·सदृशार्थाभिनिष्पत्या स लेश इति कोतितः ॥ ३७।। लेशो यथाविमारके द्वितीयेऽडके धात्री नायकमाह-अय्य? कि चिंतीअदि। अविमारक :- भवति ? शास्त्रं चिन्त्यते। ात्री-कि णाम एवं रमणिज्जं सत्यं चिंतीअदि अवि-भवति ! योगशास्त्रं चिन्त्यते। धात्रो-(सस्मितं) पडिग्होदं मंगलवअणं ओअसत्थं एव होदु। अवि-को नु खलु वाक्यार्थः। अन्यदप्यभिलाषवशावन्यथा संकल्पयामि। इत्यादि। अन्ये तु लेख इति पठन्निङ्गितज्ञानाभिधानमिति च लक्षयन्ति॥३७॥

३२. लेश अनुवाद-जहाँ पर वाक्य प्रयोग में कुशल लोग उपाय से सदृश अर्थ की अभिनिष्पत्ति के जिस वाक्य को कहते हैं, उसे 'लेश' नामक लक्षण कहा गया है॥। ३७ ॥। अभिनव-उदाहरण जैसे, अविमारक के द्वितोय अङ्क में धात्री नायक से कहती है-अरे क्या चिन्तन कर रहे हैं ? अविमारक-भगवति ! शास्त्र को चिन्ता कर रहा हूँ। घात्री-किस रमणोय शास्त्र की चिन्ता कर रहे हैं? अविमारक-योगशास्त्र की चिन्ता कर रहा हूँ। धात्रो-(मुस्कराकर) मैंने मङ्गल-बचन को स्वीकार किया। यह शास्त्र ही हो। अविमारक-वाक्यार्थ क्या है ? और अभिलाष के कारण अन्यथा भी संकल्प करता हूँ। इत्यादि। अन्य लोग तो लेश के स्थान पर 'लेख' पढ़ते हैं और इङ्गित ज्ञान का अभिधान, यह लक्षण करने हैं।

१. छ. वाक्यकुशलैः। २. ख. सादृश्यार्थाविनिष्पन्नः ।

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५३२ नाटपशालचे

परदोषैविचि त्रार्येर्यत्रात्मा परिकोत्यंते'। अदृष्टोऽन्योऽपि वा कश्चित् स तु क्षोभ इति स्मृतः ॥३८ ॥ क्षोभो-्यथा रत्नावल्यां तृतीयेऽड के सागरिकैवेति मत्वा वासववत्तामुपला- लवतो राजः सा स्वावगुण्ठनमपनोय वैलक्ष्यमुत्पादितवती। राजा (अञ्जललि बध्वा)-प्रिये ! वासवदत्ते! प्रसीद प्रसीद। वासववत्ता-(अश्रु निपातयन्तो)-मा एग्वं भण। अण्णगदाइ एवाइ अक्खराइ। विदू-भोदि, महाणुभावा खु तु्मं ता ववमीअदु दाव एक्को अवराहो पिअवअस्सस्स। वास-णं पुढमसंगमे विग्धं करन्तीए मए जेव्व एवस्स अवरद्धं ण अज्ज- पुत्तस्स। अन्ये तु "आत्मन्यभूततद्गावभावन" मिति। परे तु "अन्यगते हेतावन्यस्मिन् कार्यकल्पनम्" इति च लक्षयग्ति ॥३८ ॥

३३. क्षोभ अनुवाद-विचित्र अर्थ वाले दूसरों के दोषों के द्वारा जहाँ पर अपने को कहा जाय अथवा अदृष्ट किसी अन्य को कहा जाय, वह 'क्षोभ' नामक लक्षण कहा गया है॥। ३८ ।। अभिनव-क्षोभ का उदाहरण जैसे रत्नावली के तृतीय अङ्क में यह साग- रिका है ऐसा समझ कर वासवदत्ता से प्रेम करने वाले राजा उदयन को वासवदत्ता अपना घुंघट खोलकर लज्जित कर देती है। राजा-(हाथ जोड़कर) प्रिये! वासवदत्ते ! प्रसन्न होओ, प्रसन्न होओ।

दूसरों के लिए है। वासवदत्ता-(आँसुओं को गिराती हुई) ऐसा मत कहिये। ये अक्षर तो विदूषक-देवि ! आप महानुभाव हैं, प्रिय मित्र के एक अपराध को क्षमा कर दें। वासवदत्ता-अरे! इस प्रथम मिलन में विघ्न डालने वाली मैंने अपराध किया है, आप के प्रिय मित्र ने नहीं। अन्य लोग तो 'आत्मन्यभूततद्धावनम्' (अपने में अभूतपूर्व भावना रखना) लक्षण करते हैं। दूसरे लोग 'अन्यगत कारण से दूसरे में कार्य को कल्पना करना, लक्षण करते हैं ॥ ३८॥

१. क. (टि०) चाभिधोयते।

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बोडशोडडयाय: ५३३

लोके गुणातिरिक्ानां 'गृणानां यत्र नामभिः । 2एकोऽपि शब्दते तत्तु विज्ञेयं गुणकोर्त्तनम् ॥३९॥ गुणकोर्तनं-यथा वत्सराजचरिते चतुर्थेऽके. शालङ्कायन :- नीलनागव्यपदे- शेन समन्ततः शस्त्रप्रभाभासुरैरस्मद्योधैः परोतेन महति भयस्थाने विगतसंभ्रमं- तेन प्रोक्तं धैयंगाम्भोर्यंशौर्यप्रज्ञातेजोनीतिवाक्षिण्यगभम्। वाक्यं सामाद्यं सोजित आत्ररम्यं शास्त्रीकर्तव्यं तद् बुधैः स्वार्थकामैः ॥ भरतरोहक :- एसो संक्षिप्तविस्तरो नाम। राजा-ततस्तत :- शाल-देव, यस्तस्य युद्धे महति प्रवृत्ते पराक्रमः साहसलाञ्छनः सः। राजा-अहो नु खलु स्वभावसिद्धानां गुणानामव्यभिचारिता। कुत :- अविदित इति नैकधा प्रयत्नाद् बहुदिवसं बहुधा परीक्षमाण:। द्विगुणमभिविराजते गुणैः स्वैर्मणिरिव जातिविशेषवान्महारहः॥३९।। ३४. गुणकीर्त्तन अनुवाद-लोक में गुणों के अतिरिक्त गुणों का नाम से किसी एक का कथन किया जाय, उसे 'गुणकीतंन' लक्षण कहते हैं॥। ३९ ।। अभिनव-जैसे वत्सराजचरित के चतुर्थ अङ्क में शाल ङ्कायन कहता है- "काले सर्प के बहाने से चारों ओर शस्त्रों को प्रभा से देदीप्यमान हमारे योदाओं से घिरे हुए महान् भय का स्थान हाने पर भी व्याकुलता को छोड़कर- धैर्य, गाम्भीर्य, शौर्य, प्रज्ञा, तेज, नोति तथा दाक्षिण्य से युक्त सामप्रधान ऊर्जस्वी एवं कर्णसुख वचन को कहा। विद्वञ्जन अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए इसे शास्त्र-वचन के रूप में ग्रहण करें। भरतरोहक-यह संक्षिप्त भो है और विस्तृत भी। राजा-इसके बाद। शालङ्कायन-महाराज! तब महान् युद्ध के आरम्भ होने पर उसने जो पराक्रम दिखाया वह साहस के पूर्व था। उसे प्रद्युम्न, बलराम, अर्जुन, भोम, कर्ण, साम्ब और अभिमन्यु के विषय में सोचा भी नहीं जा सकता। राजा-अहो! स्वभावसिद्ध गुण अव्यभिचारी भी होते हैं। क्योंकि- "यह अविदित है (जाना-पहिचाना नहीं है), यह कहकर अनेक बार प्रयत्न से बहुत दिनों तक बहुत बार परीक्षा लेने पर यह जातिविशेष बहुमूल्य मणि जैसा अपने गुणों से दुगुना शोभित हो रहा है।। ३९।। १, ख. अदृष्ठान्योऽपि। २. क, (टि०) बहूनां। १. क. एकोहि।

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नाटंपशारत्रे

प्रस्तावेनेव शेबोऽर्थ: कुरस्नो यत्र प्रतीयते'। वचनेन विनानुकसिद्धिः सा परिकौतिता॥४० ।।

अनुक्तसिद्धियंथा-तापसवत्सराजे यौगन्धरायणो डोलायितचित्तां वासववत्तामाह- कौशाम्बीं परिभूय न कूपणकैविद्वेषिभि: स्वीकृता जानास्येव तथा प्रमादपरतां पत्युनंयद्वेषिणः। स्त्रीणां च प्रियविप्रयोगविधुरं चेतः सदैवात्र मे वक्तुं नोतसहते मनः परमतो जानातु देवीं स्वयम्॥ यथा वा तत्रेव द्वितोयेऽडङ के विनोतभद्रो देवोप्रस्थानं वर्णयन्नाह- मामुददिश्य तथा देव्या वाष्पसंरुद्कण्ठया। आ्यंपुत्रं प्रतोत्युक्तं वत्तव्यं न समाहितम् ॥४० ॥

३५. अनुक्तसिद्धि

मनुवाद-जहाँ पर बिना कहे ही प्रस्ताव मात्र से ही शेष समस्त अर्थ की प्रतोति हो जाय, उसे 'अनुक्तसिद्धि' कहते हैं ॥ ४० ॥ अभिनव-अनुक्तसिद्धि का उदाहरण जैसे तापवत्सराज में योगन्वरायण दोलायित (चञ्चल) चित्त वासवदत्ता से कहता है- "इन नीच शत्रुओं ने हम लोगों को तिरस्कृत कर (अथवा पराजित कर) कौशाम्बी नगरो को ले लिया है। इस प्रकार नीति से द्वेष रखने वाले अर्थात् · नोति से चलने वाले महाराज की अनवधानता (लापरवाही) तो आप जानती हैं। स्त्रियों का चित्त प्रिय के वियोग में दुःखो (व्याकुल) रहता है, अतः इस विषय में कुछ कहने के लिए मेरा मन उत्साह नहीं कर रहा है। इसके बाद स्वयं देवी ही जानें। अथवा जैसे वहीं पर अर्भात् तापसवत्सराज के द्वितीय अङ्क में विनीतभद्र महारानी के प्रस्थान का वर्णन करते हुए कहता है- "वाष्प के अवरुद्ध कण्ठ से देवी ने मुझे लक्ष्य कर आर्यपुत्र के प्रति जो कुछ कहा, वह समाधान के योग्य नहीं है।

१. क. (टि०) प्रदोयते । २. ब. विजानातु।

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बोडशोडव्याय: ५३५

यत्प्रसन्नेन मनसा पूज्यं पूजयितुं वचः। हर्षप्रकाशनाथं तु सा प्रियोक्तिरवाहृता॥ ४१ ॥

प्रियोक्तियंथा वत्सराजचरिते सप्तमेऽङ्के भरतरोहको वत्सराजाय वासवदत्तां बीणाभ्यासार्थमर्पयितुकामस्तं वृष्टवाह- या शेते कौस्तुभस्य द्ुतिकिसलयिते शारदग्योमनीले विष्णोर्वक्षस्युवारे रज निकरकराकारहारोपहारे। साभ्येत्यालिङ्गतु स्वां प्रशिथिलगलितेनोत्तरीयेण लक्ष्मी- हंर्षादापीड यन्ती नवकमलरजोरोच्नाम्यां स्तनाभ्याम् ॥इति॥४१॥

३६. प्रियोक्ति अनुवाद-जहाँ पर प्रसन्न चित्त से पूज्यजनों के सम्मान के लिए तथा प्रसन्नता को प्रकट करने के लिए जो वचन कहा जाता है, उसे 'प्रियोक्ति' कहते हैं।। ४१ ॥ अभिनव-प्रियोक्ति का उदाहरण जैसे वत्सराजचरित में सप्तम अङ्क में भरतरोहक बल्सराज से बासवदत्ता को वीणा सिखाने के लिए अर्पण करने की इच्छा से उन्हें देखकर कहता है- "जो लक्ष्मी कौस्तुभमण को कान्ति से किसलयित शरत्कालोन आकाश के सदृश नीलवर्ण, चन्द्रमा की किरणों के सदृश हार से सुशोभित उदार विष्णु के वक्षःस्थल पर चयन करती है। वह शिथिल एवं खिसके हुए उत्तरीय से युक्त लक्ष्मी स्वयं आकर प्रसन्नता से नये कमल के पराग से सुशोभित स्तनों से स्वयं आपीड़ित करती हुई आपका आलिङ्गन करें।"॥ ४१॥ विशेष-अभिनवगुप्त ने इसका 'भ्रंश' नामक लक्षण के स्थान पर भी डल्लेख किया है।

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१३६ नाडयसा्थ

एतानि काव्यस्य च लक्षणानि षट्त्रिशदुद्द शनिदर्शनानि। प्रबन्धशोभाकरणानि तज्ज्ञैः सभ्यक प्रयोज्यानि रसायनानि ॥ ४२॥ इति भारतीये नाट्यशास्त्रे षोडशोऽनुबन्धाध्याय:॥१६॥ एवमेव अव्यप्रबन्धे्वपि कथाशरीरसंविधानसंभाषणवैदग्ध्यरूप: कविव्यापारो लक्षणाख्यो द्रष्टव्य: ।। ४२। इत्यभिनवभारत्यां बोडशाध्यायनुबन्धः समाप्तः ।

अनुवाद-इस प्रकार उद्देश्य क्रम से काव्य के इन ३६ लक्षणों को कह दिया है। विद्वानों के प्रबन्ध काव्य की शोभा करने वाले इन लक्षणों का रसों के अनुसार अच्छी तरह प्रयोग करना चाहिए।। ४२।। अभिनव-इसी प्रकार श्रव्य प्रबन्धों में भी कथाशरीर के संविधान, सम्भाषण एवं वैदग्ध्य रूप लक्षण नामक ध्यापार को समझना चाहिए।। ४२॥ इस प्रकार डॉ० पारसनाथद्विवेदी द्वारा रचित हिन्दी व्याक्या में सोलहवें अध्याप का अनुबन्धाउध्याय समाप्त हुआ।।

१. क. एतानि वा काव्यविभूषणानि। २. ख. काव्येषु सोदाहरणानि तजहः। ३. ख. बलानुरूपम्। क. रसानुरूपम् ।

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सप्तदशोऽध्यायः

अभिनवभारती

रसाक्षपक्षगं वन्दे तद्रपु: परमेश्वरम्।। चतुदंशाध्याये वाचिकोक्तकमे संस्कृतं प्राकृतं च वाक्यमित्युक्तम्। तत्र संस्कृतप्रसङ्गेन छन्दोवृत्तलक्षणादिनिरूपितम्। अनेन त्वध्यायेन प्राकृतस्य स्वरूपं निरप्यते। शास्त्र प्रसिद्धसंस्कृत विप रीतप्राकृतप्रसङ्गेन नामधेयिभागरूपरूपर्ण शास्त्र- विहितानां विपरीतरपस्वात्, नाठयसमयपातिनो भावमारिषादिनामसमूहस्य पठन- धर्माश्च प्राकृतेऽपि किमन्यथा संस्कृतवद्वेति चिन्तायां प्रसङ्गेन कार्यस्वरूपं निरूपितम्-वशरूपकनिर्णयान्तरं समुचितनिर्णयमपि तथा- अलङ्कारा विरामाश्च ये पाठ्ये संस्कृते मताः। त एव यत्नतः कार्या: स्त्रीपाठ्येऽपि त्वसंस्कते ॥ (१७-१४८) अभिनवभारती अभिनव-जिसके विना रसास्वादन और काकु-विश्रान्ति नहीं हो सकती, सुन्दर अर्थात् रसान्वित रसनेन्द्रिय रूप परमेश्वर के वपु (शरीर) की मैं अभिनव- गुप्त वन्दना करता हूँ। अभिनव-पिछले चौदहवें अध्याय में वाचिक अभिनय के निरूपण के प्रसङ्ग में संस्कृत और प्राकृत पाठ्य का उल्लेख किया जा चुका है। इनमें संस्कृत पाठ्य के सन्दर्भ में छन्दोवृत के लक्षण आदि का निरूपण पिछले अध्याय में किया गया है। अब इस अध्याय में प्राकृत के स्वरूप का निरूपण करते हैं। शास्त्र-प्रसिद्ध संस्कृत भाषा के विपरोत प्राकृत भाषा के प्रसङ्ग से संस्कृत के विपरीत रूप होने के कारण शास्त्र के द्वारा जिनका विधान नहीं किया गया है, ऐसे नामधेयी (शब्दों) के भाग रूप का निरूपण और नाट्य-सिद्धान्त के अनुसार भाव, मारिष आदि नाम समूह के पढ़ने का नियम क्या संस्कृत के समान प्राकृत में भी होने चाहिए अथवा अन्य प्रकार से ? इस चिन्ता के कारण प्रसङ्गतः कर्त्तव्य दश रूपकों से स्वरूप का निरूपण किया जायेगा और दश रूपों के निरूपण के अनन्तर समुचित निर्णय भी किया जायेगा। जैसे- "अलद्वार और विराम जो संस्कृत पाठ्थ में माने गये हैं उन्हों का स्त्नियों के द्वारा कहे जाने वाले प्राकृत पाठ्य में भी करना चाहिए।" ना. घा०-46

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५३८ नाटय शाब्त्रे

एवं तु संस्कृतं पाठ्यं मया प्रोक्तं समासतः। 'प्राकृतस्य तु पाठयस्य संप्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥। १॥ एतदेव विपर्यस्तं संस्कारगुणवरजितम् । विज्ञेयं प्राकृतं पाठ्यं नानावस्थान्तरात्मकम्॥ २॥ इत्यध्यायोपाम्ते प्राकृतपाठयमेवोपसंहरिष्यामोत्यध्यायसङ्गतिः । एतामेव वशयति-एवं तु संस्कृतमित्यादि। पाठविशेषमहंति यतनेन वा पठनीयं, विशिष्टेन रूपेण वा पठनार्हे आन्तर- चित्तवृत्तिवशादेव वा तथा पठितुं शक्यम्, आचार्ययतेन वा पठनोयमिति पाठ्यम् ॥ १ ॥ तत्र प्राकृतस्य सामान्यलक्षणमाह-संस्कारेति। संस्कृतमेव संस्कारगुणेन यत्नेन परिरक्षारूपेण र्वणतं प्राकृत, प्रकतेर- संस्काररूपाया आगतम्। इस प्रकार अध्याय के अन्त में प्राकृत पाठ का उपसंहार करूँगा, इस प्रकार अध्याय की सङ्कति भी है। इसी बात को दिखाते हैं- अनुवाद-इस प्रकार पिछले अध्यायों में मैंने संक्षेप में संस्कृत पाठघ के विषय में कहा है। अब प्राकृत पाठ्य का लक्षण कहँगा (बतलाऊँगा) ।। १ ॥ अभिनव-जो पाठ-विशेष के योग्य है अथवा प्रयत्न-पूर्वक पढ़े जाने योग्य हो अथवा विशेष रूप से पढ़ने योग्य हो अथवा आन्तरिक वृत्तियों के कारण जो पढ़ा जा सके अथवा आचार्य के द्वारा प्रयत्नपूर्वक जो पठनीय हो, वह 'पाठ्य' है।। अब प्राकृत का सामान्य लक्षण कहते हैं- अनवाद-इसके विपरीत जो संस्कार के गुणों से रहित नाना अवस्थाओं वाला है, उसे प्राकृत पाठच समझना चाहिए।। २।। अभिनव-संस्कृत भाषा ही संस्कार के गुणों से रहित होने प्राकृत है, क्योंकि प्राकृत संस्कार-रहित प्रकृति से आई है। विशेष-प्रकृति स्वभाव से ही जो भाषा आती हो, उसे 'प्राकृत' कहते हैं (प्रकतेः स्वभावादागतं प्राकृतम्, व्याकरणाविभिः संस्कारेण संस्कृता भाषा संस्कृतभाषा) अर्थाद व्याकरणादि के द्वारा संस्कार की गई भाषा 'संस्कृत' है। १. क. (भ.) पाठ्यं तु संस्कृतं विप्रा: । २. ग. द्विजोत्तमा।। ३. क. (टि०) प्राकृतस्यापि।

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सप्तदशोऽ््याय:

त्रिविधं तच्च विज्ञेयंनाट्ययोगे समासतः । समानशब्दं विभ्रष्टं देशीगतमथापि च॥ ३।।

नन्वपभ्रंशानां को नियम इत्याह नाना यान्यवस्थान्तराणि देश्ञविशेषास्तें- व्वात्मा नियतस्वभावो यस्यां, वेशविशेषेषु प्रसिद्धया नियमितमित्येव संस्कृता एव वाचका: अनुमानात्वन्ये ते त्वन्यत्वे प्रसिद्धि गता इत्युक्तम्। अवतिष्ठन्तेऽनन्या- स्मिम्नित्यवस्था देशाः॥२॥ संस्कृते समेऽपि प्रातिपदिके विभक्तौ भवितव्यं विपयाेन स्वरेण वा देशीपदमपि स्वरस्यैव प्रयोगावसरे प्रयुज्यत इति तवापि प्राकृतमेव अव्युत्पादित प्रकृतेस्तज्जनप्रयोज्यत्वात् प्राकृतमिति केचित् ॥ ३ ॥

अभिनव-अपभ्रंश भाषा के सम्बन्ध में क्या नियम है ? इस पर कहते हैं- नाना अर्थात् विभिन्न अवस्थायें जो देश विशेष से सम्बद्ध हैं। उसमें जो नियत स्वभाव जिसमें हो प्रसिद्धि कारण जो देश विशेष में नियत को गई हो। इस प्रकार प्राप्त संस्कृत भाषा के शब्द ही वाचक हैं, अन्य अर्थात् प्राकृत भाषा के शब्द तो अनुमान से वाचक है। इसलिए अन्यतवेन प्रसिद्धि को प्राप्त हुए, यह कहा गया है। जिसमें लोग रहते हैं। वह देश विशेष अवस्था ही है। क्योंकि रहना तो देश विशेष में ही होता है ।। २ ।। अनुवाद-इस प्राकृत को नाटय प्रयोगों में संक्षेप में तीन प्रकार की समझना चाहिए। समान शब्दों वाला, विभ्रष्ट और देशोगत ।। ३ ।। अभिनव-संस्कृत और प्राकृत में प्रातिपदिक शब्द के समान होने पर भी विभक्ति में स्वर का विपर्यास होना चाहिए। देशी पर भी प्रयोग के समय स्वरगत सम्बन्ध से ही प्रयोग किया जाता है, अतः वह भी प्राकृत ही है। कुछ लोग तो

कहते हैं।। ३ ॥ अव्युश्पन्न प्रकृति से प्राप्त तथा अव्युत्पन्न लोगों से प्रयोज्य भाषा प्राकृत है, ऐसा

१. (भ.) नाट्ययोगं । २. क. शब्दैविनष्ट। ख. शम्दैविभ्रष्टं।

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५४० नाट्यशार्ये

पाठ्यमेकं तु विज्ञेयं संस्कृतं प्राकृतं यथा। 2 कमलामलरेणुतरङ्गलोलस लिलादिवाक्यसंपन्तम् प्राकृतबन्धेष्वेवं संस्कृतमपि' योगमुपयाति॥४॥ ये वर्णाः संयोगस्वरवर्णान्यत्वमूनतां 'चापि। "यान्त्यपदादौ प्रायो विभ्रष्ठांस्तान् विदुविप्राः ॥।५। संस्कृतेन समानशब्दानुदाहरति कमलामलेति विभक्तौ लिङ्गस्य प्राकृते स्वातन्त्र्यादवश्यं भेदेन भाव्यमित्याह वाक्ये समासोपपन्नं योजितम् एतत्परिज्ञानस्य फलमाह एवं संस्कृतमपि योगमिति। भाषाइलेषे पताकास्थानकादौ चास्य प्रयोग उत्तः। अपि शब्बनेवमाह प्राकृतप्रयोगे समासेपि न संस्कृतसमतेति कमल अमल इन्दु इत्यादौ ॥५॥ अब संस्कृत और प्राकृत के समान शब्दों का उदाहरण देते हैं- अनुवाद-अमल, कमल, रेणु, तरङ्ग, लोल, सलिल आदि शब्बों से निमित वाक्यों, प्राकृत काव्यों को तरह संस्कृत में भी किया जाता है।। ४।। अभिनब-प्राकृत में विभक्तियों में लिङ्गगत स्वातन्त्रय होने से संस्कृत और प्राकृत अवश्य भेद होने चाहिए। इसलिए कहते हैं कि वाक्य में समास से सम्पन्न योजना की है। इस परिज्ञान का फल कहते हैं-इस प्रकार संस्कृत भाषा का भी योग को प्राप्त होता है। भाषा शलेष और पताका स्थानक आदि में इसका प्रयोग कहा गया है। यहाँ अपि शब्द से यह भो कहा गया है कि प्राकृत के प्रयोगों में समास होने पर भो उन शब्दों में संस्कृत से समानता नहीं होती, जैसे-कमल, अमल, इन्दु इत्यादि में ॥ ४ ॥ अब विभ्रष्ट का उदाहरण देते हैं- अनुवाद-जो वर्ण पदन्यस्त है और संयुक्त होने से स्वर या वर्णों के सम्बन्ध से भिन्नता को प्राप्त होते हैं, उन्हें 'विभ्रष्ट' समझना चाहिए॥ ५ ॥ १. क्लोकावमिदं ख. ग. पुस्तकयोर्नास्ति । २. क. (भ.) कमलदछरेणुकेसरतरङ्सळिलादि। ३. क. संस्कृतमिद प्रयोगमुपयाति । ४. ख. न्यूनतां बापि। ५. ख. ग. गच्छन्ति पदन्यस्तास्ते विभ्रष्टा इति ज्ञेया।

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सप्तबशोउ्यायः

'ये वर्णा वर्णगता व्यञ्जनयुक्ताश्च ये स्वरा नियताः। तानपरस्परवृत्ते प्राकृतयुक्त्या प्रवक्ष्यामि ॥ ६॥ *एओआरपराणिअ 'अंआरपारं अ'पाअए णतत्थि।

अनुवाद-जो वर्ण वर्णगत हैं और व्यञ्जनयुक्त जो नियत स्वर है, परसपर वृत्ति से रहित उन वर्णों को प्राकृत को युक्ति से वर्णन करूंगा ॥ ६ ॥ अनुवाब-ए ओो से परे ऐ, औौ हों, और अनुस्वार (अं) से परे बिसगं (अ: ) हो तथा व तथा स के बोच में श, ष वर्ण और क वर्ग, च बर्ग, त वर्ग के अन्तिम वर्ण ये वर्ण प्राकृत में नहीं होते ॥। ७ ।।

१. ख.ग. पुस्तकयोर्नास्त्ययं क्लोक:। २. संस्कृतच्छाया- एओोकारपराणि च अकारपरं च प्राकृते नास्ति । वसकारमध्ये च कचवगतवर्गनिघनानि। 'क' पुस्तके टिप्पण्यां 'एओआरपराणि' इत्यादि लक्षणश्लोकानां स्थाने गद्यरूप: पाठ्यभेदोऽपि यथा-कख घतथ घ भ सा हत्त्वं यान्ति। यथा-कलिह, मुह, नेह, वसहि, रह, दहि, सोहा विशहेसु। शषो सकारौ मवतः। यथा-ससंक विसमेसु। टतदा डत्वं याग्ति। यथा-विड, पडि, अदण्डासु। ट ठ ड द य रा लत्वं यान्ति। यथा-तिन लालिअ तुल पवितुला विहलयदीसु। थकारो ढत्वं प्राप्नोति। यथा-बुड्ढो। नकारो भवति णकारः। यथा -जयणं। पकारो फतवं याति वस्वं था यथा-फरुसं कबह च। धकारः ढत्वं याति। यथा-वढि। लकारो रत्वं याति। यथा- किर। टठौ ढत्वं प्राण्नुतः । यथा-सढः फढमं दलिअं। तजौ यत्वं प्राण्नुतः। यथा- कयं घयं। क्ष च ज त द प य वा: स्वविशेषा भवन्ति ! यथा-पियुण, पउप, राइ, वईं गई कई दइआा जयेसु। योगं याति। पथा-अच्छरिअं उच्छाहो अच्छरसा, पच्छं। तुभ्थं-तुज्झं। सह्यं-सज्झं विन्वो बिज्झो। इलक्षणं-सहू। ग्रोष्मो-गिहमो। दृष्टो-विष्टो हस्तो-हत्थो। यक्षो-जक्खो। ब्रह्मा-बहमा। वृहस्पतिः-वुहप्पइ यज्ञो-जन्नोति। एवमेतन्मया प्रोक्तं किश्चित्प्राकृतलक्षणम् । घेष' देशोप्रसिद्धं च ज्ञेय विप्राः प्रयोगतः ॥ ३. क. अंकारपरं। ४. क. पाइये। ५. क. मज्झि आइ। यंखु आइ। मर्रिसबाइ। ६. क. कच्चवग्ग । ७. क. ह गणाइ।

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५४२

'वच्चंति कगतदयवा लोपं अत्यं च से वहंति सरा। खधथधभा उण हत्तं उवेति अत्थं अ मुंचंता ।।८।।

एतवेव प्रपञच्यते 'एओोआरपराणि अ' इत्याविना एकारात्परः ऐ, ओकारात्पर: औ, ऐकारौ च, येम्यस्तानि च। कियन्ति आह पाअए पदसंख्यया चत्वारीत्यथंः। ऋ ऋ ल लृ। अंकारपरो विसर्जनीयः । वसकारयोमंष्ये शषौ। (कचवग्गेति)-कचतवर्गाणां अन्त्यवर्णा: ङ ज न इति द्वादशवर्णा न सन्ति॥।७। (कगेति)-कगादयो लुप्यन्ते तवीयश्चा्द्धः स्वराणामेव। खघेति- खादीनां हत्वं, खेट, परिष, अथ, धान्य भाव्यादीनां व्यञ्जनस्य न भ्वति॥ ८॥

अभिनव-एकार से परे 'ऐ' ओकार से परे औ, इस प्रकार ऐकार और ओकार वर्ण ! ये किनसे परे और संख्या में कितने हैं ? इस पर कहते हैं-वे चार हैं-ऋ ऋ ल ल और अनुस्वार (अं) से परे विसर्ग है। व कार और स कार के बीच में श और ष। कवर्ग, चवर्ग, तवर्ग के अन्तिम वर्ण ङ, ञ्, न-ये बारह वर्ण प्राकृत में नहीं होते ।। ७।। अनुवाद-क, ग, त द, य और व का लोप हो जाता है और इनका आधा भाग स्वरों में मिल जाता है। ख, घ, थ, ध, भ ये वर्ण अर्थ को न छोड़ते हुए हत्व को प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् इनके अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं होता ।। ८ll अभिनव-क, ग, न, द, य और व वर्णों का लोप हो जाता है। उनका आधा भाग स्वरों में मिल जाता है। ख, घ, थ, ध, भ को प्राकृत में 'ह' हो जाता है। जैसे-मुख-मुह। मेघ-मेह। कथा-कहा। वधू-वहू आदि। किन्तु खेट, परिघ, अथ, धान्य, भाव्य आदि शब्दों के खादि व्यञ्जन को हत्व नहीं होता है।। ८ ॥।

१. संस्कृत छाया- प्राप्नुर्वन्ति कगतदयवा लोपं अर्घं च तेषां वहन्ति सबराः। सववषभा: पुनः हत्त्यमुपेयन्ति अर्थक्यामुख्चमाना:।।

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उप्परहुत्तरमरो हेटाहुत्तौ अ पाअए णत्थि। मोत्तूण भद्रचोद्रह पद्रह्नवचन्द्रजाई स॥९॥ खधथधभाण हआरो मुहमेहकहावहूपह्वएसु। कगतदयवाणं णिच्चं वौयम्मि ठिओो सरो होई॥ १० ॥ *छ इति षकारो नित्यं बोद्व्यः षटपदादियोगेषु। *किलशब्दान्त्यो रेफो भवति तथा खु त्ति खलुशब्दः ॥ ११ ॥ भद्राविषु न भवति । अपि च चोद्रहह्लददुःखादीनामिति ॥ ९ । अत्रोवाहरणानि मुखं मुहं इत्याविकानि ॥ १० ॥ अनुवाव-प्राकृत में र् (रेफ, का) ऊपर (ऊध्वंगमन) तथा नीचे (अधोगमन) नहीं होता, किन्तु भद्र, चोव्रह, हद, धात्रो में यह नियम नहीं लागू होगा ।। ९। अभिनव-भद्र आदि शब्दों में रेफ का ऊध्वंगमन या अधोगमन नहीं होता अपितु इनका लोप हो जाता है, किन्तु चोद्रह, ह्रद, दुःख आदि में लोप नहीं होता है॥ ९ ॥ अनुवाद-ख, ष, थ, ध, भ को प्राकृत में 'ह' हो जाता है। जैसे- मुख=मुह, मेध -मेह, कथा=कहा, वधू=वहू होता है। तथा क, ग, त, व, य, व में नित्य द्वितीय स्वर हो जाता है॥ १० ॥ अभिनव-इसका उदाहरण मुख का मुंह, मेघ का मेह होना आदि है। अनुवाद-षट्पद आदि शब्दों में प्राकृत में ष को छहो जाता है, 'किल' शब्द के अन्तिम वर्ण को 'र' हो जाता है और खलु शब्द को खु हो जाता है।। ११ । १. संक्कृत छाया-उपरिस्थो रकारो ह्यघस्पः च प्राकृते नास्ति । भुक्त्वा भद्र चोद्रह हरदचन्दघात्रीष्। २. संस्कृत छाया-खघथघमानां हकारो सुखमेधकथावधूप्रभतेपु । कगतदयवानां नित्यं द्वितीये स्थितः स्वरो भबति। ३. क. (च.) छे इति षकारो नित्यं बोत्व्यः षट्पदादियोगे तु । क. (ज.) च इति चकारो नित्यं बोद्धव्य: षट्पदादियोगे तु। क. (द. इत्ति थ आरो नित्यं बोद्व्य षट्पदादियोगे तु। क. (टि० छ इति षकारो वित्यं बोद्व्या अपदादियोगे तु। ४. क-द. किलशब्दान्तो रेफो भवन्ति तथा खुत्ति खलुशब्दा। क (इ.) कृतिशब्दो रेफान्तेन भवन्ति तथा पुत्रि खलुशब्दः। क. (टि०) किल शब्दो कोरे भवति तथा खुत्ति खलुशब्दः।

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नाट्यशास्त्र

*४ इति च भवति टकारो भटकटककुटीतटाद्येषु। सश्वं च भवति शषयोः सवंत्र तथाहि स स आदेशः२॥ १२ ।। अस्पष्टश्च वकारो भवत्यनादौ तकार इतराध:। वडवातडागतुल्यो भवति डकारोऽपि च 'लकारः ॥ १३ ॥ वर्धनगते च भावे धकारवर्णोडपि ढत्वमुपयाति" । सवंत्र च प्रयोगे भवति नकारोऽपि च णकारः ॥ १४॥ 'आपानं आवाणं भवति पकारेण वत्वयुक्तेन। अयथातथादिकेषु तु धकारवर्णो ब्रजति हत्वम्॥ १५॥ अनावौ स्थाने रकारो उकारश्च अस्पष्टो लघुप्रयत्न उच्चार्य:। येन क्रमाद्द- कारवच लकाराच्छायो भवतः । यथा उवरं उबलं ।। १३ ।। अनुवाद-प्राकृत में भट, कटक, कुटी एवं तट आदि शब्धों के ट को 'ड' हो जाता है और सवंत्र श, ष के स्थान पर 'स' हो जाता है। जैसे-विष=विस। शङ्का = संका। आदि ॥ १२ ॥ अनुबाद-इतर आदि शब्दों त को अस्पष्ट 'व' हो जाता है। और रकार को लकार हो जाता है। जैसे-बड़वा=चलवा, तडाग-तलाव ।। १३ ॥ अभिनव-अनादि स्थान में रेफ और डकार अस्पष्ट होने से लघु प्रयतन से उच्चायं वर्ण और क्रमशः दकार लकार का छाया वाले हो जाते हैं।/जैसे- उदरं=उदलं ॥ १३ ॥ अनुवाद-भाव में वर्धन के धकार के स्थान पर ढकार हो जाता है और सभी प्रयोगों में नकार के स्थान पर णकार हो जाता है तथा पकार को वकार हो जाता है। जैसे-आपानं=आवाणं। और यथा, तथा को छोड़कर थ के स्थान 'है हो जाता है। जैसे-कथा=कहा ॥ १४-१५।। १. क. (टि०) त इति च भवति टकाते भटकटकुटोकुटावडाद्येषु। क. द-न ड इति भवति टकारो भटकटककुटी कुटावटाद्ेषु। २. क. यथा विस संका। क. (ख.) यथा हिविससंका। क. (ङ-प.) तथापि स सकादेशः। ३. क. (टि०) इतरा घे। इतरा घाः। ४. क. ककारः । ५. क. (टि०) वकारतवणों हकारतां याति। टकारवर्णोडपि उत्वमुपथाति। ङ. नकारोऽपि णत्वमुपयाति। ६. क. (टि०) आवाणं अधाणं भवति वकारेण व वायुक्ेन। ७. ख. ग, धकारव्णों ब्रजति हत्त्वम्। वकारवर्णों ब्रजति पत्वम्।

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सप्दशोऽष्याय: ५४%

'परुषं फरुसं विद्यात्पकारवर्णोऽपि फत्वमुपयाति" । 'यस्तु मृतः सोऽपि मओ यश्च मृगः सोऽपि हि तथैव ॥ १६॥ ओकारत्वं गच्छेदौकारश्चौषघादिषु नियुक्त:। 'प्रचलाचिराचलादिषु भवत चकारोऽपि तु यकारः ॥ १७॥ "अपरस्परनिष्पम्ना होवं प्राकृतसमाश्रया वर्णाः। संयुक्तानां तु पुनर्वक्ष्ये परिवृत्तिसंयोगम् ॥ १८॥

तथैवेति ॥१६॥ अपरहपरनिष्पन्ना इत्यम्योग्यमश्लिष्टा असंयोगरपा इत्यर्थ:। यत्र संयुक्ता- स्तेषामिति षष्ठीबहुवचनम् ।। १८ ।। अनुवाद-प्राकुत भाषा में 'प' को 'फ' हो जाता है। जैसे-परषं=फरषं। 'मृत' शब्द 'मओ' हो जाता है और 'मृग' शब्द भी उसी प्रकार 'मओ' हो जाता है।। १६ ।। अनुवाद-औषध आदि में प्रयुक्त 'मौ' के स्थान पर 'औ' हो जाता है और प्रचल, अचिर, अचल आदि में स्थित 'च' को 'य' हो जाता है। जैसे-प्रचल= प्रयल। अचिर = अयिर। अचल - अयल ॥। १७ ॥ अनुवाद-इस प्रकार असंयुक्त वर्णों वाले प्राकृत शब्दों के नियम बताये गये हैं अब संयुक्त वर्णों के परिवर्तन के नियमों को बतलाऊँगा ॥ १८ ॥ अभिनव-अपरस्परनिष्पन्ना का अर्थ है-परस्पर सश्लिष्ट न होने वाले असंयोग रूप वर्ण। यहाँ जो संयुक्त वर्ण हैं उनके विषय में कहूँगा। यहाँ 'संयुक्तानां' में षष्ठी बहुवचन है॥ १८॥

१. क. (ि०) परुषं हरषं। २. क. (टि०) पकारवर्णोऽपि हत्त्वमुपयाति। ३. ख. ग. यस्तु मृगः सोऽपि मओ वस्तु मृतः सोऽपि सथैव। ४. ख. ग. प्रचयचराचरादिष् चकारवर्णोपि च बकारा। ५. ख. ग. अपरस्वरनिष्पन्नाः । ना० शा०-६९

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५४६ नाटयशालय

इचप्सत्सथ्याः छ इति तथाभ्यह्यध्या

*ष्टः ट्ठ:, स्तः स्थः, ष्मौ म्ह, भवन्ति तु झकारा:।

क्ष्णो हः ष्णो पहः क्षः खकाररूपोऽपि ॥ १९॥ *आश्चर्य अच्छरियं निश्चयमिच्छन्ति णिच्छयं च यथा। "वत्सं वच्छं च यथा अप्सरसं तदवदच्छरअं।। उत्साहो उत्छाहो पथ्यं च पच्छं विज्ञेयम्॥ २०॥ तुभ्यं तुज्झं मह्यं मज्झं विन्ध्यश्च भवति विज्झ इति। वष्टो वट्ठोति तहा हस्तोऽपि च भवति हत्योत्ति ॥ २१ ॥

क्रमेण स्वयमुवाहरति वच्छं च इत्यादि २०॥

अनुवाद-इच, प्स, तस और थ्य को 'छ' हो जाता है। और स्य, हा, ध्य को 'झ' हो जाता है। इसी प्रकार ष्ट को ष्ठ, स्त को त्थ, षमः को रह, ह्ण को ह्ल, ष्ण को व्ह तथा क्ष को ख हो जाता है॥ १९॥ अनुवाद-प्राकृत में आचार्य को अच्छरियं, निश्चय को निच्छय, वत्स को वच्छ, अप्सरसं को अच्छरअं, उत्साहो को उच्छाहो, पथ्य को पच्छ हो जाता है॥ २० ॥ अनुवाद-इसी प्रकार तुम्यं को तुज्झं, महां को मज्झं, विन्ध्य को विज्म, दष्ट का दट्ठ, हस्त का हत्त्थ हो जाता है॥२१ ॥

१. क. (टि०) झप्सब्च । २. क. (टि०) व्रजति वै झत्वम्। ३. क. (टि०) ष्टो होस्तोव: शेषो लक्षमक्ष्यो हु ण्णः खकाररूपौऽपि। ष्टः ष्ठः स्थः व्थः षम हा सोहः खकाररूपोहि। ष्टः षठः स्तः त्था क्रमो हनः ह्णो ह्ः क्षणः ल इति चेव स्यात्। ख. ग. ष्टः ट्ठः स्तः स्थः ण्णस्नक्ष्णां ण्हः क्षः खकाररूपो हि। ४. ख. ग. आश्चय महयपि चेत्यनयोयंस्य रियं च तथा। ५. ग. पुस्तकयो श्लोकाघ नास्ति । ६. क. (टि०) विष्शन्ति । विज्झोन्ति। विज्झोत्ति ।

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सप्तदशोऽध्याय: ५४७

ग्रोष्मी गिम्होत्ति' तथा इलक्षणं सहं सदा तु विज्ञेयम् । 'उष्णं उह्हं यक्षो जक्खो पर्यड्को भवति पल्लंकु ॥२३ ॥ "विपरीतं हमयोगे ब्रह्मादौ स्याद् बृहस्पतौ फत्वम्"। 'यज्ञो भवति न जन्नो भीष्मो खिम्होत्ति विज्ञेयः ॥ २४॥ उपरिगतोऽधस्ताद्वा भवेश्ककारादिकस्तु यो वर्णः । स हि संयोगविहीनः "शुद्धः कार्यः प्रयोगेऽस्मिन् ॥ २५॥

विपरीत इति। ब्रह्मा बम्हावत् हत्वमिति ॥२४ ॥ उपरिगतोऽधस्तादिति शक्र अर्कः इति। द्वितीयं सयुज्यमानमपास्य स उपरिगत एव चावेश: क्रियते सक्को अकको। अनुवाद-इसी प्रकार ग्रोष्म को गिम्ह, इलक्षण को सह समझना चाहिए। उषण को उह्ध, यक्ष को जक्ख, पयंङ्ग को पल्लंकु हो जाता है ।। २३ ।। अनुवाद-ब्रह्मादि में 'ह्म' के योग में विपरीत हो जाता है। जैसे-ब्रह्म= वम्ह। बृहस्पति में प को फ हो जाता है। जैसे-बुहप्फई। यज्ञ को जण्ण और भीष्म को भिम्ह हो जाता है।।। २४।। अभिनव-विपरोत इति। ब्रह्म में विपरोत ह को 'म' तथा म को ह हो जाता है। जैसे -ब्रह्मा=बम्हा। अनुवाद-ककारादि से संयुक्त जो वर्ण ऊपर होते हैं या नीचे हों, नाटध प्रयोग में उन्हें संयोग रहित शुद्ध कर देना चाहिए॥ २५॥ अभिनव-रेफ ऊपर हो या नोचे, उसका लोप हो जाता है। यहाँ संयुज्यमान द्वितोय वर्ण को छोड़कर उपरिगत लुप्त रेफ के स्थान पर आदेश होता है। जैसे- शक्र-सक्क, अर्थ=अक्क। १. ख. ग. णिम्हो थ। क. (टि०) गिह्य इति। गिहमत्ति। २. ख-ग. छण्हं। ३. ख-ग. कुण्ण: कण्हो च भवेत् यक्षो जक्खो च पल्लंक पर्यच्धु। ४. ख. ग. विपरीतमयोगेन। ब्रह्मा च भवति बम्हो वृहस्पतिर्वे बुहष्फइ भवति। ५. क. (टि०) हस्वम् । ६. ख. ग. यज्ञश्व भवति जह्वो भाष्मो भिम्मोति विज्ञेय:। ७. खना. शुद्ध काय।

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५४८ नाटयशाहते

एवमेततु विज्ञेयं प्राकृतं संस्कृतं तथा। अत ऊध्वं प्रवक्ष्यामि देशभाषाविकल्पनम् ॥ २६॥ भाषा चतुर्विधा जञेया वशरूपे "प्रयोगतः । संस्कृतं प्राकृतं चैव यत्र पाठ्यं प्रयुज्यते ॥ २७ ॥

मुनिना च दिग्वशिता, विस्तारविजिज्ञासुः प्राकृतवीपिकादिकमवलोकयेत्। उत्पलविरचितायां च सूत्रवृत्तौ पढ्धतौ च स्फुटं पूर्ण च सर्वमस्तीति तत्रावर: कार्य: ।। २५।। संस्कृत प्राकृतरूपैव भाषा वक्तुभेदाच्चतुर्धा संपन्नेति वशयति संस्कृत प्राकृतं च पाठ्यमिति।

मुनि ने यहाँ एक मार्ग दिखा दिया है। विस्तार के जिज्ञासु प्राकृत दीपिका आदि ग्रन्थों को देखें। उत्पलाचार्य विरचित सूत्रवृत्ति एवं पद्धति में स्पष्ट और पूर्णरूप से सब बातें प्रतिपादित है। उसमें आदर करना चाहिए॥ २५॥ अनुवाद-इस प्रकार संस्कृत और प्राकृत भाषा के पाठ्य को समझना चाहिए। इसके बाद अब देशी भाषाओं के विकल्प को कहूँगा ॥ २६॥ अभिनव-संस्कृत और प्राकृत रूप भाषा वक्ता के भेद से भाषा चार प्रकार की होती है, यह 'संस्कृत प्राकृत' इत्यादि श्लोक के द्वारा दिखाते हैं- अनुवाद-दश रूपकों में प्रयोग के अनुसार भाषाएँ चार प्रकार की समझनी चाहिए। जहाँ पर संस्कृत तथा प्राकत भाषा के पाठ्य का प्रयोग किया जाता है। २७ ॥

१. ख. ग. एवमेव तु विज्ञेयं प्राकृतं संस्कृतं तथा। क. (भ.) एवमेतन्मया प्रोक्तं किश्चित्प्राकृतलक्षणम्। शेषं देशीप्रसिद्धं च ज्ञेयं विप्राः प्रयोगनः । पाट्यमेतत्तु विज्ञयं संस्कृत प्राकृतं तथा। प. ग. देशरूपप्रयोग: । .प दशरूपेषु योकवुभिः ।

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ससदशोउ्याय:

अतिभाषार्यभाषा व जातिभाषा तथैव च। तथा योन्यन्तरो चैव भाषा नाट्ये १प्रकोनिता ।।२८।। 'अतिभाषा तु देवानामार्यभाषा तु भुभूजाम् । *संस्कारपाठ्यसंयुक्ता सम्यङ् "न्याय्यप्रतिष्ठिता॥।२६।। 'द्विविषा जातिभाषा च प्रयोगे समुदाहृता। म्लेच्छशबदोपचारा च भारतं वर्षमाश्रिता ॥ ३०॥ संस्कतैव भाषा स्वरभेदादिपूर्णसंस्कारोपेता संस्कृतभाषा भावाभेवानां (मध्ये ) उक्ता। वैदिकशब्वबाहुल्यादार्यभाषातो विलक्षणत्वमस्या इति॥२७ ॥ उपचारो व्यवहारः॥ ३० ।। अभिनव-संस्कृत हो भाषा है, इसमें स्वर भेद आदि से समस्त संस्कारों से युक्त संस्कृत भाषा है। भाषाओं के भेद से इसके कटने का अभिप्राय है कि यह भाषा वह है जिसमें वैदिक शब्दों का बाहुल्य है अतः यह आर्यभाषा से विलक्षण है। अनुवाद-नाट्य में अतिभाषा, आर्यभाषा, जातिभाषा तथा योन्यन्तरी भाषा ये चार भाषाएँ प्रयुक्त को जातो हैं॥ २८॥ अनुवाद-इनमें अतिभाषा देवताओं को, आयंभाषा राजाओं को भाषा होती है। इनमें यह आर्यभाषा संस्कार सम्पन्न पाठ्य से युक्त नाट्य में प्रतिष्ठित है।। २९॥ अनुवाद-नाट्य प्रयोग में दो प्रकार के जातिभाषा के प्रयोग के उदाहरण मिलते हैं। उनमें म्लेच्छ शब्द से व्यवहार में आने वालो भाषा भारत वर्ष में बोली जाती है॥ ३० ॥ अभिनव-यहाँ उपचार का अर्थ व्यवहार है॥ ३०॥

१. क. (टि०) अभिभाषा । २. ख-ग. भाषा नाट्यप्रकोतिता: । क (भ.) भाषा बै नाटकाथ्याः। ३. ख. अभिभाषा। ४. क. (भ.) संस्कारगुणसम्पन्ना । ५. ग. ग्रामप्रतिष्ठिताः । क. (टि०) नाट्यप्र तिष्ठिताः । न्यायप्रतिष्ठिता। राज्ये प्रतिष्ठिता। ६. क. (टि०) बिबिधा । ७. क. (भ.) म्लेक्छदेशप्रयुक्ता च तथा भारतसंभया:।

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नाटपशास्त्रे

अथ योन्यन्तरो भाषा ग्राम्पारण्यपशद्भवा नानाविहङ्कजा चेव नाट्यधर्मोप्रतिष्ठिता॥३१॥ जातिभाषाश्यं पाठ्यं द्विविधं समुदाहृतम्। प्राकृतं संस्कृतं चैव चातुर्वर्यसमाश्रयम्" ॥ ३२॥ धोरोद्ते 'सललिते धोरोदात्ते तथेव च। धोरप्रशान्ते च तथा पाठ्यं योज्यं तुसंस्कृतम् ॥ ३३॥ एषामेव तु सर्वेषां नायकाना प्रयोगतः। कारणव्यपदेशेन प्राकृतं संप्रयोजयेत् ॥३४ ॥

पशुपक्षिप्रभृतोनां यद्रुतं तत् नाटधप्रयोगे कुत्राप्यवसरे संभाव्यमित्याह- नाटयधर्मोति ॥३१॥

अनुवाद-योन्यन्तरो भाषा वह है जो ग्रामीण एवं जंगली पशु एवं विविध पक्षियों को भाषा है। जिसका प्रयोग नाट्यवर्मो रूप में किया जाता रहा होगा॥ ३१ ॥ अभिनव-पशु-पक्षी आदि का जो शब्द है, उसका भो नाट्य-प्रयोग में किसी अवसर पर सम्भाषित है, इसलिए कहते हैं-नाट्यधर्मी प्रतिष्ठिता ॥ ३१॥ अनुवाद-चारों वर्णों से सम्बद्ध जातिभाषा के पाट्य दो प्रकार के बताये गये हैं-संस्कृत और प्राकृत॥। ३२।। अनुवाद-धोरोदात्त, धोरललित, धोरोद्वत और धोरप्रशान्त नायकों में संस्कृत भाषा की योजना करनो चाहिए।। ३३ ॥ अनुवाद-इन सभी प्रकार के नायकों में किसी कारणवश आवश्यकता पड़ने पर प्राकृत भाषा की योजना करनी चाहिए । ३४ ।।

१. ग. ग्राभारण्यपशूद्धवाः । २. ख. नानाविहगजा। ३. ख. नाट्यघर्मी प्रयोगता। ४. क-द. चातुरवर्ण्यादिसंखयम् । ५. ख. ग. घोरललिते। ६. क. एतेषामपि। ७. क. (भ.) गायकानां। ८. क. प्रयोगजम् ।

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सपदश्ोउष्याय:

*ऐश्वर्येण प्रमत्तानां दारिद्रचेण प्लुतात्मनाम्। अनधीतोत्तमानां च संस्कृतं न प्रयोजयेत् ॥ ३५।। व्याजलिङ्गप्रविष्टानां श्रमणानां तपस्विनाम्। भिक्षुचक्रचराणां च प्राकृतं संप्रयोजयेत् ॥ ३६ ॥ कारणव्यपदेशेनेति अवस्थादिवशात् तथा अर्जुनस्य वृहन्नलारूपेण प्रच्छन्नस्य कारणान्याहरते ॥ ३४ ॥ ऐश्वर्येणेति धुताध्ययनशून्यत्वमनेन लक्ष्यते। क्रीडापीत्यन्ये ॥ ३५॥ व्याजलिङ्ग ये प्रविष्टा जीविकाद्यर्थम् चक्रचरा चक्रेण जोवन्ति ॥३६॥ अभिनव-किसी कारण के व्यपदेश से अर्थात् अवस्था आदि के वश से, जैसे-वृहन्नला के रूप में प्रच्छन्न होना अर्जुन के लिए प्राकृत भाषा बोलने में कारण था॥ ३४॥ अनुवाद-दारिव्रध अध्ययन का अभाव और स्वेच्छाचारिता होने से संस्कृत भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए।। अनुवाद-ऐश्वय से उन्मत्त, वरिद्रता से अभिभूत तथा अध्ययन का अभाव होने से उत्तम पात्र को भो संस्कृत का प्रयोग नहीं करना चाहिए॥ ३५ ।। अभिनव-'ऐश्वर्येणप्रभत्तानां' पद के द्वारा यहाँ वेद-शास्त्र के अध्ययन से शून्य होना, लक्षित होता है। कुछ लोग क्रीड़ा भी अर्थ करते हैं॥ ३५॥ अनुवाद-किसी बहाने से साधु-सन्यासियों का वेष धारण करने वाले को, भरमण तपस्वियों, भिक्षुओं तथा चक्र धारण कर भ्रमण करने वालों को प्राकृत भाषा का प्रयोग करना चाहिए॥। ३६॥ अभिनव-जीविका आदि चलाने के लिए जो सन्यासी हो गये हैं तथा जो चक्र के आश्रय से जीविका चलाते हैं ॥ ३६ ॥ १. खग, पुस्तकयोरघंश्लोको नास्ति। २. बन. ऐश्वर्येण प्रमत्तस्य दारिद्रयेण प्लुतश्य च। ३. ख-ग. उत्तमस्यापि पठतः प्राकृतं सम्प्रयोजयेत । क. (टि०) उभ्मत्तस्यापि पठतः प्राकृतं सम्प्रयोजयेत्। ४. क. (टि०) ऋतुलिङ्गप्रतिष्ठानां श्रवणानां तर्पास्विनाम्। ४. स. ग. भिक्षुचाष्टचराणा्च। क. (टि०) मिक्षुचक्रवाराणाञ्च।

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वाटयशास्थे

*भागव ततापसोन्मत्तबालनीच ग्रहोपसृष्टेषु स्त्रीनोचजातिषु तथा नपुंसके प्राकृतं योज्यम् ॥ ३७ ॥ परिब्राण्मुनिशाक्येषु चोक्षेषु2 श्रोत्रियेषु च। 'शिष्टा ये चैव लिङ्गस्था: संस्कृतं तेषु योजयेत्॥३८।।

भागवता इह देवलकाः । उत्तमग्रहैः देवगन्धर्वादिभिराक्रान्तानां संस्कृत- भाषेत्यभिप्रायेणाह नोचग्रहेति। नोचग्रहैः पिशाचादिभिरुपसृष्टेषु स्वीकृतेष्विति। नोचजातयश्चण्डालाद्या:॥।३७। लिङ्कस्था यतिप्रभृतया ॥३८ ॥ अनुवाद-भागवत, तापस, उन्मत्त, बालक, नोच प्रहों से आक्रान्त व्यक्ति, स्त्री, नोध जाति तथा नपुंसकों को प्राकृत भाषा का प्रयोग करना चाहिए॥३७ ॥ विशेष-कुछ प्रतियों में इसके स्थान पर निम्नलिखित इलोक मिलता है। बाले प्रहोपसृष्टे च स्त्रोणं स्त्रीप्रकृतौ तथा। नीचे मत्ते सलिक च प्राकृतं पाठ्यमिष्यते।। अर्थात् वालक, भूतादि ग्रहों से आक्कान्त, स्त्रो तथा स्त्रो प्रकति के पुरुप, नीच, उन्मत्त तथा लिङ्गी साधुओं को प्राकृत का प्रयोग करना चाहिए। अभिनव-यहाँ पर भागवत का अर्थ है देवलक। उत्तम ग्रह अर्थात् देव, गन्धर्व आदि से आक्रान्त व्यक्तियों की भाषा संस्कृत होती है, इस अभिप्राय से कहते हैं-नीचग्रहेति। नीच ग्रह से पिशाचादि का ग्रहण होता है, उनसे अभिभूत अर्थात् स्वीकृत। नीच जाति चाण्डाल आदि हैं॥ ३७ । अनुवाद-परिव्राजक सन्यासी, मुनि, शाक्य (बौद्ध भिक्षु), वेवपाठी और ओन्रिय और यति सन्यासी आदि को संस्कृत भाषा का प्रयोग करना चाहिए॥३८ ॥ अभिनव-लिङ्गस्थ का अर्थ यति आदि॥३८ ॥

१. स. ग.ध.ङ. पुस्तकेषु क्लोकल्यास्य स्थाने- बाले ग्रहोपसृष्टे च स्त्रीणां स्त्रोप्रकुतौ तथा। नीचे मस्ते सिक व प्राकुतं पाठ्यमिष्यते।। इति पाठो दृश्यते। १. द. वैक्षव,। क. (भ.) मुख्येषु ब्राह्मणशोत्रियादिषु। ३. ख. ग. हिजा।

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५५३

'राइ्याश्च गणिकायाश्च शिल्पकार्यास्तर्थैव च। कलावस्थान्तरकृतं योज्यं पाठ्यं तु संस्कृतम् ॥। ३६॥। सन्धिविग्रहसंबन्धं तथा च प्राप्तवाग्गतिम् । ग्रहनक्षत्रचरितं खगानां रुतमेव च॥ ४० । सर्वमेतत्तु विज्ञेयं *काव्यबन्धे शुभाशुभम् । नृपपतन्या स्मृतं तस्मात्काले पाठ्यं तु संस्कृतम् ।। ४१।। शिल्पकारिका: कलासु विदग्धाः । राज्ः स्त्री महादेवीरूपा उपचाराद्राज- शब्दवाच्येति "अन उपधा लोपिन" इति डीपि राज्ी। यदि पुंयोगादित्यत्र अत इति वर्तते ॥३९ ॥ राज्या: संस्कृते निमित्तं दशयति सन्धिविग्रहेति- अनुवाद-रानो महारानी, गणिका, शिल्पकारिणी आदि स्त्रीपात्रों को संस्कृत भाषा का प्रयोग करना चाहिए।। ३९ ।। अभिनव-शिल्पकारिका का अर्थ है कलाओं में विदग्ध। राज्ञी का अर्थ है राजा की स्त्री अर्थात् महादेवी। लक्षणा से राज शब्द से कही जाती है। अन उपधालोपिनः' सूत्र से डोप (ई) प्रत्यय होने पर 'राज्ञी' शब्द बनता है। यदि 'पंयोगादाख्यायाम्' इस सूत्र में 'अतः' का अनुवर्त्तन करते हैं तो तभो उक्त सूत्र का अवसर है॥ ३९॥ महारानी को संस्कृत में संवाद (पाठ्य) करना चाहिए, इसका हेतु का निर्देश करते हैं- अनुवाद-सन्धि और विग्रह से सम्बन्धित बातों में, वाणो की गति प्राप्त होने पर (विदुषी होने पर), ग्रह और नक्षत्रों के गति के ज्ञान में और पक्षियों के शुभ और अशुभ शब्दों को जानकारी में, काव्य-बन्ध में शुभ और अशुभ की कल्पना में राजपतनी को संस्कृत में संवाद (पाठ्य) करना चाहिए ।। ४०-४१।। १. क. (म.) देव्याश्च। ख. राज्ञवच। २. ख. कार्यावस्थान्तरकृतं। ३. ख. तथा चाप्यशुभाशुभम् । क. (टि०) तथा चापि शुभाशुभम् । ४. ख. कार्यबन्धे। ५. ख. नुपपत्या भवेत्पाठ्यं संस्कृतं द्विजोत्तमाः। वा० शा०-७०

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५५४ नाडथथाएचे

क्रीडार्थं सर्वलोकस्य प्रयोगे च सुखाश्रयम् । कलाभ्यासाश्रयं चैव पाठ्यं वेश्यासु संस्कृतम् ॥। ४२।। कलोपचारज्ञानारथं क्रोडार्थं पार्थिवस्य च। निर्दिष्टं शिल्पकार्यास्तु नाटके संस्कृतं वचः ॥४३॥

यस्माद्राज्ञ: सन्धिविग्रहसंबन्धं षाड्गुण्यादि तथा ग्रहनक्षत्रचेष्टितं, शुभाशुभ- रूपं पक्षिकतं च शुभाशुभमितोयत्सर्वं नृपपतन्या ज्ञेयं, तस्माद्राज्ञः सा प्रतिशरीर- कल्पा कदाचित्संस्कृतयोग्यापि॥४०-४१॥ सुखाश्यमिति। अनेन विशेषलक्षप्रयोगादि निरस्यति ॥ ४२॥

अभिनव-राजा के सन्धि और विग्रह से सम्बन्धित षाड्गुण्य का प्रयोग ग्रह और नक्षत्रों की चेष्टा-ज्ञान, (पक्षियों के शुभ और अशुभ शब्दों के ज्ञान इन सब का ज्ञान राजपत्नी को होना चाहिए। इसलिए राजा के बराबर शरीर अर्थात् राजा के द्वितीय शरीर रानी भो कभी-कभी संस्कृत बोलने के योग्य होती है।। ४०-४१ ॥। अनुवाद-समस्त लोक (जनता) के मनोविनोद के लिए, प्रयोग में सुखानुभूति के लिए तथा कलाओं के अभ्यास को प्रदर्शित करने के लिए वेश्याओं को संस्कृत में पाठय करना चाहिए॥ ४२॥ अभिनव-सुखाश्रयमिति। इसके कहने से विशेष लक्षणों से सम्पन्न प्रयोगादि का निरसन हो गया। अनुवाद-कलाओं के विशिष्ट ज्ञान के उपचार के लिए, राजाओं के मनोविनोद के लिए शिल्पिकाओं को नाटक में संस्कृत भाषा का प्रयोग निर्दिष्ट है ।। ४३ ॥

१. ख. प्रयोगस्य । २. ख. ग. क्रीडालीलार्थकञ्चैव। ३. ख-ग. लोकोपचारज्ञानाथं। ४. ख.ग. शिल्पकार्येषु। क. (टि०) दिस्पकार्येषु तु।

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सप्तदशोऽध्यायः ५४%

आम्नायसिद्धं सर्वासां शुभमप्सरसां' वचः । संसर्गा्वतानां च तद्धि लोकोऽनुवर्तते ॥४४॥ "छन्दतः प्राकृतं 'पाठ्यं स्मृतमप्सरसां भुवि। मानुषाणां च कर्तव्यं कारणार्थव्यपेक्षया ।४५॥। न बर्बरकिरातान्ध्रद्रमिलाद्यासु जातिषु । नाट्यप्रयोगे कर्त्तव्यं पाठ्यं भाषासमाश्रयम्॥४६॥

आम्नायः पुराणादि: लोकोऽनुवतंते अनुमन्यत इति यावतृ॥४४॥ द्रमिडकादि पूर्वविधानादिनिषेधो विशिष्टेष्विति पयंग्तवासिषु द्रमिडेषु द्रष्टव्यो, बबरान्ध्रादिसाहचर्याद जा ङगलदेशादिगतेषु॥४५॥ शुद्धास्विति अनुलोमवशेन संस्कारवत्सु जातिष्वपीति पाठः॥४७ ॥ अनुवाद-देवताओं से संसग (सम्बन्ध) होने से सभी अप्सराओं के वचम शुभ है, यह आम्नाय सिद्ध अर्थात् शास्त्रानुमोदित है अतः लोक भो उसका अनुवत्तंन करता है।। ४४।। अभिनव-यहाँ पर 'आम्नाय' पद का अर्थ पुराणादि है, लोक उन्हीं पुराणादि का अनुवर्त्तन करता है॥ ४४ ॥। अनुवाद-लोक में अर्थात् पृथ्वो पर अप्सराओं का पाठय (संवाद) स्वभावतः प्राकृत में कहा गया है और कारणवश प्रयोजन को अपेक्षा से मनुष्यों को भी प्राकृत में संवाद (पाठ्य) करना चाहिए। ४५ ।। अनुवाद-बबर, किरात, आन्ध्र, द्रमिल आदि जातियों की नाट्य-प्रयोग में अपनो जातोय भाषा में पाठय नहीं करना चाहिए॥ ४६॥ अभिनव-द्रमिड़ादि में जो पूर्व में भाषा के विपथ में कहे गये विधान का निषेध कहा गया है उसे पर्यन्तवासी द्रामिड आदि विशिष्ट लोगों में भी समझना चाहिये। वर्बर, आन्ध्र आदि के साहचर्य से जाङ्गल देश आदि के लोगों में भी समझना चाहिये ॥ ४६॥ १. ब. शुभंचाप्सरसां वचः। २. क-भ. छन्दसां। ख. वाक्यं। ३. ख.ग. जातिष्वतासु सर्वासु श्रद्धासु च द्विजोत्तमाः । ४. ख. सौरसेन समाश्रिश्य भाषा कार्या तु नाटके। ख. पुस्तके तु इकः प्रभृति श्लोकचतुष्टयं नास्तीति॥

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नाटयशास्ने

सर्वास्वेह हि शुद्धासु जातिषु द्विजसत्तमाः । शौरसेनी समाश्रित्य भाषां काव्येषु योजयेत्॥४७॥ अथवा छन्दतः कार्या देशभाषा' प्रयोक्तृभिः। नानादेशसमुत्यं हि *काव्यं भवति नाटके ॥ ४८ ॥ मागध्यवन्तिजा प्राच्या शौरसेन्यर्धमागधी। बाह्लोका दक्षिणात्या च सप्तभाषाः प्रकोर्तिताः।।४९।। *शकाराभीर चण्डालशवरद्र मिलान्ध्रजा: होना वनेचराणां च विभाषा नाटके स्मृता॥ ५०॥ देशभाषां संक्षिप्याह मागधोत्यादि। भाषा संस्कृतापभ्नंशः ।।४९।। अनुवाद-हे द्विजसत्तम ! सभी शुद्ध जातियों को काव्य में शौरसेनी का आधय लेकर अर्थात् शौरसेनी भाषा का प्रयोग करना चाहिए।४७। अभिनव-यहां शुद्धा का अर्थ है अनुलोभ के कारण संस्कार युक्त जातियों में भी संस्कृत पाठ्य होता है॥४७॥ अनुवाद -अथवा नाट्य में प्रयोक्ताओं को अपनो इच्छानुसार देश भाषा का प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि नाटद में विभिन्न देश की भाषाओं में रचित काव्य होता है॥। ४८ ।। विशेष-जिस प्रदेश में नाट्य प्रयोग करना हो, नाट्य में उसी देश की भाषा का प्रयोग करना चाहिए। अब देश भाषा का संक्षेप में वर्णन करते हैं- अनुवाद-मागधो, अवन्तिजा, प्राच्या, शोरसेनी, अर्धमागधो, बाह्लोका और दक्षिणात्या ये सात भाषायें हैं।। ४९।। अभिनव-यहाँ भाषा से तात्पर्य है संस्कृत की अपभ्रंश भाषाएँ॥४९॥ इनके अतिरिक्त सात भाषाएँ भी हैं- अनुवाद-शकार, आभोर, चाण्डाल, शबर, द्रमिल, आन्ध्र तथा वनेचरों को भाषायें-नाटक में ये सात विभाषायें कही गई हैं ॥।५० ।।

१. क. (टि०) दवीभाषा । २. क. कार्य। ३. क. (टि०) शुरसेना। शूरसेनो। ४. ग. शवराभोरचण्डालसचरद्रविगेद्रजाः।

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५५७

मागधी तु 'नरेन्द्राणामन्तःपुरस माश्रया। चेटानां राजपुत्राणां श्रेष्ठिनां चार्धमागधी ॥ ५१ ॥ प्राच्या विदूषकादोनां धूर्तानामप्यवन्तिजा। नायिकानां सखोनां च शुरसेन्यविरोघिनी । ५२॥ यौधनागरकादोनां दक्षिणात्याथ दोव्यताम्। वाह्लोकभाषादीच्यानां 'खसानां च स्वदेशजा ॥ ५३ ॥ भाषापभ्नंशस्तु विभाषा सा तत्तददश एव गह्नरवासिनां प्राकृतवासिनां च. एता एव नाट्ये तु। अन्ये तु निदर्शनार्थत्वादस्य पैशाच्यादयोऽपि प्रयोज्या इत्याहुः।।५०। नरेद्राणां यदन्तःपुरं तन्निवासिनामिति संबन्धः ।।५१।। दोव्यतामिति कितवानाम् ॥ ५३॥ अभिनव-भाषा की अपभ्रंश भाषाएँ विभाषा होती है। वह अपभ्रंश भाषा उन-उन देशों की गह्र गुफाओं में रहने वाले साधारण लोगों की भाषा है। ये नाटय में प्रयुक्त होती है। अन्य लोग तो यह निदर्शन के जिए है, ऐसा कहते हैं। नाट्य में पैशाची आदि भाषाओं का भी प्रयोग करना चाहिए॥ ५०॥ अनुवाद-मागधो भाषा तो राजाओं के अन्तःपुर में रहने वाले सेवक आदि लोगों की भाषा है और चेट, राजकुमारों एवं श्रेष्ठिजनों को भाषा अर्धंमागधी है॥ ५१॥ अभिनव-राजाओं के अन्तःपुर में रहने वाले लोगों को भाषा अर्धमागधी है।। ५४ ॥ अनुबाद-विदूषक आदि की भाषा प्राच्या और धूर्तों की भाषा अवन्तिजा, नायिका और उनको सखियों को अविरोधिनी शौरसेनी भाषा होती है॥५२॥ अनुवाद-जुआरियों, योद्धाओं और नागरकों आदि को दक्षिणात्या भाषा और उदोच्यों अर्थात उत्तर भारत के निवासियों और खसों की अपने देश को भाषा वाह्लोको होतो है॥ ५३॥ अभिनव-'दोव्यताम्' का अर्थ है जुआ खेलने वालों का।

१. ख. नराणां । २. ख. ग. पुरनिवासिनाम् । ३. ख. ग. भाषा अवन्तिजा। ४. ख. सौरसे्या विरोघिनी। ५. ख. योषमागरिकादीनां। ६. क. (टि०) खस्थानां च स्वेदशजाः।

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नाट पशास्त्रे

शकारघोषकादोनां तत्स्वभावश्च यो गणः । शकारभाषा योक्तव्या चाण्डालो पुल्कसादिषु ॥ ५४॥ अक्कारकारकव्याधकाष्ठयन्त्रोपजोविनाम् योज्या 'शकारभाषा तु किंचिद्वानौकसी तथा ॥ ५५ ॥ गजाश्वाजाविकोष्ट्रादिघोषस्थाननिवासिनाम् । आभोरोक्ति: शावरो वा द्रामिड़ो वनचारिष॥ ५६॥

शकारा नोचाभिजना: अर्थयुक्तत्वेन सदर्पाः । शकारबहुला भाषा शकार- भाषा। पुल्कसो डोम्बः सृतप इत्यन्ये।। ५४।। वनौकसामियं वनेचरीत्यथ:।।५५।।

अनुवाद-शकार, धोष आदि तथा उसी स्वभाव के जो और वर्ग है, उन्हें शकारो भाषा का प्रयोग करना चाहिये और पुल्कस अर्थात् डोम आदि जातियों को चाण्डालो भाषा का प्रयोग करना चाहिये ॥। ५४॥ अभिनव-शकार का अर्थ है नोच अभिजन वाले, जा अर्थयुक्त अर्थात् धन सम्पन्न होने से घमण्डो होते हैं। शकारबहुल भाषा को शकारो भाषा कहते हैं। पुल्कस का अर्थ है डोम। अन्य लोग मृतप अर्थात् मुर्दों का सेवक अर्थ करते है॥। ५४॥ अनुवाद-कोयला के व्यवसायो, बहेलिये, लकड़ी बेचने वाले तथा पत्तल बेचकर जोविका चलाने वाले मुसहर आदि को भाषा शकारी होनो चाहिये और वनेचरों की भाषा जंगलो होनो चाहिये ।। ५५॥

अभिनव-वन ही जिसका घर है ऐसे वनेचरों को भाषा वनौकसी होती है॥ ५५ ॥ अनुवाद-हाथो, घोड़े, बकरे, भेड़, ऊँट आदि के निवास-स्थान में रहने वाले व्यक्तियों को भाषा आभीरी अथवा शाबरी होती है और वनेचरों की भाषा ब्राबिड़ी होती है ॥५६॥

१. ख. ग. शबराणां शकादोनां। २. कनड. पाञ्चाली। ३. ख. शेया चवरभाषा। ४. ख. दाविड़ा द्रविड़ादिषु। द्रामिड़ो द्रमिलादिषु।

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सप्तदशोऽयाय: ५५९

'सुरङ्ाखनकादीनां सन्धिकाराश्वरक्षताम्। व्यसने नायकानां चाप्यात्मरक्षासु मागधी ॥ ५७॥ गङ्गासागरमध्ये तु ये देशा: संप्रकीतिताः । `एकारबहुलां तेषु भार्षां तज्ज्ञः प्रयोजयेत् ॥५८ ॥ सुरङ्गाखनका: सन्धिच्छेदकृतः। कारा वन्धनगृहम्। व्यसनं कस्यांचिदापदि जातायां मा मां लोको ज्ञास्यतीतित्यभिप्रायेणात्मनो रक्षार्थ नयोऽपि मागध्या व्यवहरेत् ॥५७॥ गङ्गासागरमध्य इति पूर्वदेश उपलक्षितः॥५८॥ अनुवाद-सुरङ्ग खोदने वाले, सेंध लगाने वाले, घोड़ों के रक्षक सईसों तथा व्यसन में पड़े हुए नायकों को आत्मरक्षा के प्रसङ्ग में मागधी भाषा का प्रयोय करना चाहिए। ५७॥ अभिनव-सुरङ्ग खोदने वालों को, सन्धि स्थलों का छेद (भेदन) करने वालों की। कारा अर्थात् कैदियों का बन्धन गृह। किसी आपत्ति में पड़ने पर 'मुझे लोग न पायें' इस अभिप्राय से अपनो रक्षा के लिए नायक को भी मागधी भाषा का प्रयोग करना चाहिए॥५७॥ अनुवाद-गङ्गा और समुद्र के मध्य में जो देश कहे गये हैं, उन देशों में विद्वानों को एकार बहुल भाषा का प्रयोग करना चाहिये ।। ५८।। अभिनव-'गङ्गा और सागर के मध्य' इस पद से पूर्व देशों के निवासो लोग उपलक्षित है ॥ ५८ ॥

१. ख. सुरङ्गवनकादोनां सौण्डोकाराश्च रक्षिणाम् । ग. सुरङ्गाखनकादीनां अमोष्ट्रिकाणां व रक्षसाम्। २. ख. ग. नायिकादीनां। ३. न बबरकिरातान्ध्रप्रमिलाद्यासु जातिषु। नाट्यप्रयोगे कर्तव्यं काव्यं भाषासमाश्रितम् । अत्यधिकं दृश्यते। ख. ग. पुस्तकयोर्नास्ति । ४. क-म. षकारबहुलां।

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१६० नाट्यशारत्रे

विन्ध्यसागरमध्ये तु ये देशा: श्रुतिमागताः । `नकारबहुलां तेषु भाषां तज्ज्ञः प्रयोजयेत् ॥५९॥ सुराष्ट्रावन्तिदेशेषु वेत्रवत्युत्तरेषु ये वेशास्तेषु कुर्वीत चकारप्रायसंश्रयाम्॥ ६०॥ हिमवत्सिन्धुसौवीरान्ये 'जनाः समुपाश्रिताः । उकारबहुलाँ तज्ज्ञस्तेषु भाषां प्रयोजयेत् ॥६१॥ चर्मण्वतीनदीतोरे ये चार्बुदसमाश्रिताः। "ओकारबहुलां नित्यं तेषु भाषां प्रयोजयेत् ॥ ६२॥ बिन्ध्यसागरमध्य इति दक्षिणसौराष्ट्राः। सुराष्ट्रावन्तिवेशे्विति पश्चिमः वेत्रवत्यादिनोत्तर: ॥ ६० ।।

अनुवाद-विन्ध्य और समुद्र के मध्य में जो देश सुनाई देते हैं, वहाँ के विद्वानों को नकार बहुल भाषा का प्रयोग करना चाहिए॥ ५९॥ अभिनव-'विन्ध्यसागरमध्ये पद से पश्चिम सौराष्ट्र आदि देशों का ग्रहण है॥ ५९॥ अनवाद-सौराष्ट्र और अवन्तिका देशों में और नेत्रवती नवी के उत्तर- उत्तर में नो देश है, उनमें चकार बहुल भाषा का प्रयोग करना चाहिये॥ ६० ॥ अभिनव-'सुराष्ट्रावन्तिदेशेषु' पद से पश्चिम सौराष्ट्र और वेत्रवती नदी के उत्तर सौराष्ट्र का ग्रहण है ॥ ६० ॥ अनुवाद-हिमालय, सिन्धु और सौवीर देश के जो निवासी हैं, उन्हें उकार बहुल भाषा का प्रयोग करना चाहिए ।। ६१ । अनुवाद-चर्मण्वती (चम्बल ) नदी के तट पर और अरावली पहाड़ियों के समोपवरत्तों जो प्रदेश हैं उसके निवासी लोगों को ओकार बहुल भाषा का प्रयोग करना चाहिए॥ ६२॥ १ क-भ. तकारबहुलां। क. (टि० शकारवहुलां। २. ख. वेत्रवत्यन्तरेषु च। ३. ख. ग. चकारबहुलामिह। कनन. चकारबहुलामिव। ४. ख. येन्यदेशान् समाश्रिताः । ग. ये च देशा: समाश्रिताः । ५. क. ओकारबहुलां। ढकार बहुलां। थकारबहुलां। ६. क. सरल्वतो नदीतोरे पारिनात्राबु दाश्रिताः । ७. क. (डि.) तकारबहुळां।

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सप्तदशोउष्याय: ५६१

एवं भाषाविधानं तु कर्तव्यं नाटकाश्रयम्। अत्र नोक्तं मया यत्तु लोकाद् ग्राह्मं बुघैस्तु तत्॥। ६३।। एवं भाषाविधानं तु मया प्रोक्तं द्विजोत्तमा:। पुनर्वाक्यविधानं तु लौकिकं संनिबोधत॥ ६४॥ उत्तमैमंध्यमैर्नोचैयें संभाव्या वथा नराः। समानोत्कृष्टहीनाश्च नाटके तान्निबोधत ॥। ६५॥ वाक्यविधानमित्येकेनापि पदेन सकलो वाक्यार्थं: स्फुटीक्रियते, अन्योन्य- रूपताऽडनीयत इत्यभिप्रायेण वाक्यग्रहृण पदविधानं हि भविष्यति ॥६४॥ अनुवाद-इस प्रकार नाटकों से सम्बन्धित भाषा का विधान करना चाहिए। यहाँ पर मैंने जो नहीं कहा है उसे विद्वानों को स्वयं समझ लेना चाहिये । ६३ ॥ विशेष-काशी सोरिज संस्करण में यहीं पर अध्याय की समाप्ति है। इस प्रकार नाट्यशास्त्र में भाषा विधान नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ। (इति नाट्यशाएचे भाषाबिधानं नामाष्टादशोध्याय:)। इसके बाद उन्नीस्वाँ अध्याय प्रारम्भ होता है॥ अनुवाद-हे द्विजोत्तमों ! इस प्रकार मैंने भाषाओं का विधान कहा है। अब लौकिक वाक्य-विधान को कहता हूँ। आप लोग समझे॥। ६४॥ अभिनव-वाक्यविधानम्। इस एक पद से समस्त वाक्यार्थ का स्फुटीकरण होता है, क्योंकि भाषा वाक्य के आश्रित होती है और वाक्य का प्रयोग किसी संवाद के लिए नाटय में किया जाता है। इस प्रकार वाक्य और भाषा में अन्योऽन्यरूपता आती है, इस अभिप्राय से पद का ग्रहण पद-विधान भो हो जाता है।। ६४ ।। अनुवाद-उत्तम, मध्यम और अधम पात्रों के द्वारा अपने समान, अपने से उत्कृष्ट तथा अपने से छोटों के साथ नाटक में किस प्रकार सम्भाषण करना चाहिए, उन्हें आप लोग समझें।। ६५।।

इति भारताये नाट्यशास्त्रे भाषाविधानं नामाष्टादशोऽध्यायः । २. क. (टि०) भ. यथावद् द्विजसत्तमाः । ३. क. (टि०) पुनर्वाक्यप्रचारकं। ख. पुनर्वाक्यविचारं। ४. क-म. समानो वाल्पहोनो वा। ना. शा०-७१

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५६२ माट्यशाइ्चे

देवानामपि ये देवा महात्मानो महर्षयः। भगवन्निति ते वाच्या यास्तेषां योषितस्तथा ॥६६।। वेवाश्च लिङ्गिनश्चैव 'नानाश्रुतघराशच ये। भगवन्निति ये वाच्या: पुरुषैः स्त्रीभिरेव च।६७।। आर्येति ब्राह्मणं ब्रयान्महाराजेति पार्थिवम्। उपाध्यायेति चाचार्य वृद्धं तातेति चैव हि॥ ६८॥ नाम्ना राजेति वा वाच्यो ब्राह्मणैस्तु नराधिपाः। तत्क्षाम्यं हि महीपालैयंस्मात्पूज्या द्विजा: स्मृताः॥६९॥ देवानां देवा: स्तुत्याः । तथेति स्त्रीत्वेन भगवतोति ॥६६॥ नानाश्रुतधरा: बहुधरुताः ॥ ६७ ।।

अनुवाद-जो देवताओं के भी देवता, महात्मा और महर्षि हैं उन्हें 'भगवन्' शब्द से और उनकी पत्नियों को 'भगवति' शब्द से सम्बोधित करना चाहिए॥६६ ॥ अभिनव-देवानां देवाः अर्थात् देवताओं के भो जो स्तुत्य है। 'तथा' पद से यदि स्त्री हो तो उसे 'भगवति' शब्द से सम्बोित करना चाहिए॥ ६६॥ अनुवाद-इसी प्रकार जो देवता, सन्यासी तथा जो अनेक शास्त्रों के ज्ञाता विद्वान हैं, उन्हें स्त्री और पुरुषों के द्वारा 'भगवन्' शब्द से सम्बोषित करना चाहिए।६७।। अभिनव-'नानाश्रुतधाराः' का अर्थ है बहुश्रुत अर्थात् नाना शास्त्रों के ज्ञाता विद्वान् ॥ ६७ ।। अनुवाद-ब्राह्मण को 'आय', राजा को 'महाराज', उपाध्याय को 'आचार्य' और वृद्ध को 'तात' कहकर सम्बोधित करना चाहिये।। ६८। अनुवाद-ब्राह्मण राजा को नाम लेकर अथवा 'राजन्' शब्द से सम्बोषित करें, ऐसा करने पर राजा उसे क्षमा कर दें, क्योंकि ब्राह्मण सवा पूज्य होते हैं।। ६९।।

१. ख. नानाश्रुतिषारश्व ये। क. (टि०) नानाइमश्रुषराबच। नानाव्रतघराश्च । २.३ स. ग. छन्दतो नामभिर्वाच्या। ३. ख. ग. द्विजोत्तमाः ।

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सप्तदेशोऽ्यायः

ब्राह्मणेः 'सचिवो वाच्यो ह्यमात्यः सचिवेति'वा। होनैरार्येति नित्यशः ॥७० ॥ समैः संभाषणं कारय येन नाम्ना स संजञितः । होनैः 'सपरिवारं तु नाम्ना संभाव्य उत्तमः ॥। ७१॥।

क्षाम्यमित्य ङ्गीकतव्यम् ।।६९।। सचिव इति राजो मन्त्री ।। ७० ।। सपरिवारं नाम्नेति उत्तमो राजा होनै: स्वनाम परिगृह, यद्यन्नाम वत्सराज सोमबंश मौक्तिकमणे इत्यादि तेन माव्य: सपरिहासमिति वा पाठः परिहासः परितोषोपलक्षणं तेन चाटुकाराभि: परितोषावसरे होनैरपि राजा नाम्ना संभाव्य:। "उदयने महीं शासति को विपदामवकाशः" इत्यादौ॥ ७१॥ अभिनव-'क्षाम्य' का अर्थ है ब्राह्मणों के कथन को स्वीकार करना चाहिये। अनुवाद-ब्राह्मणों के द्वारा मन्त्री को 'अमात्य' या 'सचिव' शब्द से सम्बोघित करना चाहिये और शेष जन उन्हें 'आय' शब्द से सम्बोधित करें॥ ७० ॥ अभिनव-सचिव का अर्थ है राजा का मन्त्री अर्थात् राजा का परामशदात्ता, सलाहकार सचिव। अनुवाद-समवयस्कों को जिसका जो नाम है, उस नाम से सम्बोधित करना चाहिए और होन-पात्र सपरिवार उत्तम पुरुष को अपना नाम लेकर सम्बोषित करें॥७१॥ अभिनव-हीन पात्र अपना नाम लेकर उत्तम पुरुष तथा राजा को सम्बोधित करें। जिसका जो नाम है, जैसे-सोमवंश के मोक्तिकमणे वत्सराज इत्यादि नाम से सम्बोधित करना चाहिये। अथदा सपरिवार के स्थान पर 'सपरिहास' पाठ है तो परिहास परितोष का उपलक्षण है, इससे चाटुकार होन लोग भी परितोष के अवसर पर राजा का नाम लेकर सम्भाषण करें। जैसे उदयन पृथ्वी पर शासन करते हुए विषाद का अवकाश कहाँ है। ७१॥ १. क. (टि०) सचिवैर्वाच्यम्। २. स. हयमात्यसचिवेति। १. क. (टि०) सपरिहासं।

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५६४ नाटयशाए्ने

नियोगाधिकृताश्चैव पुरुषा योषितस्तथा। कारुकाः शिल्पिनशचैव संभाष्यास्ते तथैव हि ॥ ७२॥ मार्षो भावेति वक्तव्यः किंचिदूमस्तु मार्षक:। समानोऽथ वयस्येति हं हो हण्डेति वाषमः ॥७३॥ आयुष्मन्निति वाच्यस्तु रथी सूतेन सर्वदा। तपस्वीति प्रशान्तस्तु साधो इति च शब्धते ॥ ७४॥

कारकाः स्तूपकारावयः शिल्पिनश्चित्रकारावयः ।। ७२॥। भावेत्यामन्त्रणं विवक्षित मित्यन्यविभवल्तो न प्रयोज्य इत्येतत्वयुक्तम्। वयस्ये- त्येवमादावपि प्रसङ्गात्संभाषणोपक्रमकुताद्यामन्त्रणविभक्ति: सवंत्र विवक्षितैव। अधमैर्जनैः समानोऽधम एव, हंहो हण्डे इति वा संभाव्यः।। ७३।। अनुवाद-जो कारक (स्तूपकार) शिल्पी तथा उनकी स्त्रियों एव पुरुषों को उनके कार्यों के अनुसार सम्बोषित करना चाहिये।। ७२।। अभिनव-कारुक का अर्थ स्तूपकार है और शिल्पी का अर्थ दीवाल पर चित्र बनाने वाला है॥ ७२ ॥ अनुवाद-सूत्रधार को 'भाव' उससे कुछ छोटे को 'माषं' या मारिष, समान अवस्था वाले को 'वयस्य' और अधम पुरुष को हंहो, हण्डे शब्दों से सम्बोधित करना चाहिये॥। ७३ ॥ अभिनव-यहाँ भाव पद से 'आमन्त्रण' विवक्षित है, इसलिये अन्य विभक्त्यन्त पद का प्रयोग नहीं करना चाहिए, यह कहना अयुक्त है। 'वयस्य' इत्यादि में भी प्रसख्ब से सम्भाषण के उपक्रम में की गई आमन्त्रण विभक्ति सभी जगह विवक्षित है। अधम जनों के समान अधम ही है, अतः उनसे हंहो, हण्डे इत्यादि सम्बोधनों से भाषण करना चाहिए। ७३ ॥। अनुवाद-सूत रथी (रथस्थ पुरुष ) को 'आयुष्मन्' शब्द से सम्बोधित करें तथा तपस्वी एवं शान्त मनुष्यों को 'साधो' शब्द से सम्बोषित करना चाहिये।। ७४ ॥।

१. ख. कारकाः । २. ख मषौ। ग. मान्यो। ३. ख. मर्षकः। ग. मारिषः । ४. ख. हो हं वा इति वाघमः। ग. हं हो हन्तेति चाघमैः। ५. ख. तपस्बीव प्रशान्तः सन्। ग. तपस्वी च प्रशास्तव्च।

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५६५

स्वामीति प्रशान्तस्तु कुमारो भर्तृदारकः । सौम्य ! भव्रमुखेत्येवं हे पूर्व चाषमं ववेत्॥ ७५॥ यद्यस्य कर्म शिल्पं वा विद्या वा जातिरेव वा। स तेन नाम्ना भाष्यो' हि नाटकादौ प्रयोक्तृभिः ॥७६ ॥ वत्स ! पुत्रक ! तातेति नाम्ना गोत्रेण वा पुनः । वाच्य: शिष्यः सुतो वापि पित्रा वा गुरुणापि वा। ७७॥ संभा्या शाक्यनिर्ग्रन्था भदन्तेति प्रयोक्तृभिः । आमंत्रणैस्तु पाषण्डाः शेषाः स्वसमयाध्रितैः ॥ ७८ ॥ चकाराद् विनापि हेशब्देन।। ७५ । कमं पाकादि, विद्या त्रथ्यादि। जातिर्गोत्रं देशो वा ॥। ७६। अनुवाद-युवराज को 'स्वामिन्' और राजकुमार को 'भतृवारक' शब्द से तथा अधम पात्र को सोम्य ! हे भग्रमुख ! आदि शब्दों से सम्बोषित करे। ७५ ॥ अभिनव-चकार से यह सूचित होता है कि 'हे' सम्बोधन के विना भो सम्भाषण किया जा सकता है।। ७५॥ अनुवाद-नाटक आदि में नाटघ-प्रयोक्ताओं के द्वारा जिसका जो कम (कार्य) शिल्प, विद्या, जाति हो, उसी के अनुरूप नाम से पुकारना चाहिए। ७६॥ अभिनव-कर्म अर्थात् पाकादि कार्य। विद्या से त्रयी (वेद) आदि का ग्रहण है। जाति से गोत्र अथवा देश का ग्रहण होता है॥। ७७।। अनुवाद-पिता अपने पुत्र को तथा गुरु अपने शिष्य को वत्स ! पुत्र ! तात! अथवा गोत्र के नाम से सम्बोघित करें॥ ७७॥ अनुवाव-नाटय-प्रयोक्ताओं के द्वारा शाक्य (बौद्ध) एवं जैन सन्यासियों को 'भदन्त' शब्द से सम्बोषित करना चाहिये। शेष पाशुपतों को उसके आचार के अनुसार सम्बोधित करना चाहिए।। ७८ ॥

१. ख. संभाषे। २. क-भ. नाटकाविषु योक्तृभि।। ३. क. भद्रं ते। :11g ४. ख-ग. शेषास्तु समयाश्रितैः ।

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५१६ नाठचशारन्रे

वेवेति नृपतिर्वाच्यो भृत्यैः 'प्रकृतिभिस्तथा। भट्ठेति सार्वभौमस्तु नित्यं परिजनेन हि॥ ७९॥ राजन्नित्युषिभिर्वाच्यो हयपत्यप्रत्ययेन वा। वयस्य ! राजन्निति वा भवेद्ठाच्यो महीपतिः ॥८० ॥ विदूषकेण राज्ञी च चेटी च भवतीत्यपि। नाम्ना वर्यस्येत्यपि वा राज्ञा वाच्यो विदूषकः ॥।८१ ॥ सर्वस्त्रोभिः पतिर्वाच्य आर्यपुत्रेति यौवने। अन्यवा पुनरार्येति महाराजेति भूपतिः ॥ ८२ ॥ शाक्या: सौगताः । निग्रंन्थाः क्षपणकाः। शेषाः पाषण्डाति पाशुपतावयः। स्वसमयो यथा पाशुपतानां भापूषन्, भासवंज्ञ, इत्यादि संभाषणम्, तथा क्वचचि- दवाक्यादिशब्देन॥ ७९। अपत्यप्रत्यवेनेति कौरवेत्यादिना महाराजेति॥ ८० ॥ अभिनव-शाक्य का अर्थ सौगत बौद्ध भिक्षु है, निर्ग्रन्थ का अर्थ क्षपणक है शेष पाखण्ड से पाशुपत सम्प्रदाय के साधुओं का ग्रहण होता है। स्वसमय शब्द से पाशुपतों के भासर्वज्ञ, भापूषन् आदि के सम्भाषण (सम्बोधन) का ग्रहण है। कहीं पर सम्पूर्ण वाक्य का भाषण करना चाहिए॥ ७८॥ अनुवाद-भृत्य (नौकर) तथा प्रजाजन द्वारा राजा को 'देव' शब्द से सम्बोधित करना चाहिए। सावभौम राजा को परिजन 'भट्ट' शब्द से सम्बोषित करें। ७९॥ अनुवाद-ऋषियों के द्वारा राजा को 'हे राजन् !' अथवा अपत्याथंक बंशागत नाम से सम्बोधित करना चाहिये और विदूषक राजा को 'वयस्य' अथवा 'राजन् शब्द से तथा महारानी एवं चेटी को 'भवति' शब्द से सम्बोधित करें। तथा राजा भी विदूषक को उसके नाम से अथवा 'वयस्य' शब्द से सम्बोधित करें॥ ८० ॥ अनुवाद-युवा अवस्था में सभी स्त्रियाँ अपने पति को 'आर्यपूत्र शब्द से सम्बोधित करें। अन्य अवस्थाओं में 'आर्य' शब्द से सम्बोषित करें और राजा को 'महाराज' शब्द से सम्बीधित करें॥ ८१॥

१. क. (टि०) परिजवेन वा । २. ग. चेटघा। ३. क-म. पतिर्वाच्यो ह्यायंपुत्रेति। ४. ख. वाच्यो राज्ापि भूपति: ।

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ससदशोष्याय:

आर्येति पूर्वजो भ्राता वाच्य: पुत्र दवानुजः । योषिदुभिरघ काम्येति राजपुत्रेति योधनैः ॥८३ ॥ पुरुषाभाषणं हांव कायं नाट्ये प्रयोक्तृभिः। पुनः 'स्त्रीणां प्रवक्ष्यामि यथाभाव्यास्तु नाटके॥। ८४॥ तपश्विन्यो देवताश्च वाच्या भवतीति गुरुभार्या तु वक्तव्या स्थानीया भवतीति च ॥ ८५ । यौवनावन्यत्रार्यपुत्रेति श्वशुरेण व्यपवेशः, तस्य यौवनं शृङ्गारोचितमुक्तं भर्वति॥८२॥ अनुजो ज्येष्ठेंन पुत्रवत् वत्स तात पुत्रकेति संभाष्य:।।८३।। पुरुषाभाषणमिति भूयस्त्वाक्षेप उपसंहारः।।८४।। अभिनव-अभिनव गुप्त का कथन है कि यौवन में स्त्रियाँ अपने पति को 'आर्यपुत्र' कहकर सम्भाषण करें किन्तु यौवन से भिन्न अवस्था में इवसुर वंश के नाम से सम्बोषित करें। जैसे हे महाराज ! यहाँ योवन पद से तात्पर्य है श्रङ्गार के उपयुक्त अवस्था ।। ८२।। अनुवाद-बड़े भाई को 'आर्य' शब्द से तथा छोटे भाई को पुत्र के समान वत्स, तात आदि शब्दों से सम्बोघित करें। स्त्रियाँ कामनानुसार और योद्ा 'राजपुत्र' शब्द से सम्बोषित करें॥ ८३॥ अभिनव-छोटे भाई को बड़ा भाई पुत्र के समान वल्स, तात, पुत्रक शब्द से सम्बोधित करें॥ ८३॥ अनुवाद-नाटक में नाट्य प्रयोक्ताओों ने पुरुष पात्रों के सम्भाषण का यही विधान बताया है। अब स्त्रियों के लिए नाटक में सम्बोधन के प्रकार को बतलाता हूँ॥।८४ ।। अभिनव-यहाँ पर 'भूयस्त्व' बहुवचन का आक्षेप है अर्थात् यहाँ पुरुषों के सम्भाषण विषयक प्रकरण का उपसंहार कर दिया है। अनुवाद-तपस्विनी स्त्रियों तथा बेवी को 'भगवति' शब्द से सम्बोषित करना चाहिए और गुरु भार्या और ज्येष्ठा (पूज्या) स्त्रियों को 'भवति' शब्द सम्बोषित किया जाना चाहिए ।। ८५ ।।

१. बनग. पुनस्त्रोणां च वक्ष्यामि संभाषा नाटकाश्रयम्। ९. रु. (टि०) गुरुरायेति ।

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५६० नाट्यशाए्त्रे

गम्या भद्रेति वाच्या वै 'वृद्धाम्बेति च नाटके। राजपत्न्यस्तृ® संभाष्या: सर्वाः परिजनेन वै॥ ८६॥ भट्टनो स्वामिनी देवोत्येवं वै नाटके बुधैः। देवोति महिषो वाच्या राज्ञा परिजनेन वा॥ ८७॥ भोगिन्यः परिशिष्टास्तु स्वामिन्य इति वा पुनः। कुमार्यश्चेव वक्तव्याः प्रेष्याभिभंतृदारिकाः ॥ ८८ ॥ स्वसेति भगिनी वाच्या वत्सेति च यवोयसी। ब्राह्मण्यायेंति वक्तव्या लिङ्गस्था ब्रतिनी च या ।। ८९॥ स्त्रीसंभाषणं त्वयि मध्ये निरूपितं तपस्विन्य इति पूर्व तेषां योषित इति अत्र स्वयमतपस्विन्योऽपोत्युक्तमिति न पुनरुक्तम्। गुरुभार्या मान्या अन्या वा स्त्री, स्थानीया पूज्या ईषद्वृद्वा।। ८५ ॥ अभिवन-स्त्रियों के सम्भाषण के विषय में भी बोच में निरूपण कर दिया है। पहिले वहाँ योषित इत्यादि कहा है। यहाँ स्वयं अतपस्विनी स्त्रियाँ भी तपस्विनी के समान सम्भाषण करें, अतः पुनरुक्त नहीं है। गुरुभार्या का अर्थ है गुरुपतनी और मान्य अन्य स्त्रियाँ। स्थानीया का अर्थ है पूज्या तथा ईषद् बृद्धा ।। ८५ ।। अनुवाद-नाटक में ग्राम्या स्त्री को 'भद्रे' तथा वृद्धा स्त्रियों को 'अम्बा' कहकर सम्बोधन करें तथा समस्त राजपतनयों को परिजन लोग 'भट्टिनी, स्वामिनी देवी' आदि शब्दों से सम्बोधित करें। और राजा अथवा परिजनों के द्वारा महिषी (पटरानो ) को 'बेवी' शब्द से पुकारना चाहिए।। ८६-८७ ।। अनवाब-शेष स्त्रियों को भोगिनी अथवा स्वामिनी शब्द से सम्बोषित करना चाहिए। नौकरानियाँ राजकुमारियों को 'भतृदारिके' शब्द से सम्बोधित करें॥ ८८ ॥ अनुवाद-बड़ो बहिन को 'भगिनी' तथा छोटी बहिन को 'वत्से' कहना चाहिए तथा ब्राह्मणो, सम्यासिनो और व्रतधारिणी स्त्रियों को 'आयें ?' शब्द से सम्बोधित करना चाहिए।। ६९ ।। १. त. वृदा वाच्येति नाटके। २. ख. राजपल्यश्च। क-म. राजपुतर्यस्तु। ३. ब. ग. ज्येष्ठा वत्सेति चानुजा।

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पत्नी चार्येति संभाष्या पितृनाम्ना सुतस्य सा। समानाभिस्तथा सख्यो हलेति स्यात्परस्परम्॥ ९० ॥ प्रेष्या हज्जेति वक्तव्या स्त्रियो या तूत्तमा भवेत्। अज्जुकेति च वक्तव्या वेश्या परिजनेन च॥ ९१। अत्तति गणिका माता वाच्या परिजनेन हि। प्रियेति भार्या शृङ्गारे वाच्या राज्ेतरेण वा ॥। ९२।। पत्नीति सहधमंचारिणी, अत एव नटी नाट्यवेवमहासत्रवीक्षितेन सूत्र- धारेणार्येणार्ये इश्यामस्त्यते । वितुनाम्नेति माठरपुत्रि। सुतस्येति सोमशर्म- जननि॥ ९० ॥ वेश्या स्वेन परिजनेन अज्जुके इति संभाव्या ॥९१॥ अनुवाद-धर्मंपल्नी को 'आये' अथवा उसके पिता या पुत्र के नाम से सम्बोन्धित कर आह्लान करें तथा समान अवस्था वाली स्त्रियों को 'हले' कहकर पुकारें।। ९० । अभिनव-पत्नी का अर्थ है सहधर्मिणी। इसलिए नाटयवेद के महासत्र में दीक्षित सूत्रधार नटी पतनी को 'आर्य' कहकर बुलाये है। अथवा पिता के नाम से बुलाये, जैसे-हे माठरपुत्नि ! आदि, अथवा पुत्र के नाम से बुलाये जैसे-हे सोम- शर्मजननि आदि॥ ९० ॥ अनुवाद-उत्तम स्त्रियाँ वासी (सेविका) को 'हञ्जे' शब्द से सम्बोघित करना चारिये और परिजनों के द्वारा वेश्या को 'अञ्जुके' शब्द से पुकारना चाहिये। ९१॥ अभिनव-अपने परिजनों द्वारा वेश्या को 'अज्जुके' कहकर सुलाना चाहिए। अनुवाद-अपने परिजनों के द्वारा गणिका के माता को 'अत्ता' कहकर बुलाना चाहिये। शुङ्गार के समय राजा अथवा अन्य लोग अपनी पत्नी को 'आये' कहकर सम्बोधित करें॥९२॥ १. ख. ग, हला भाष्या: परस्परम् । २. ग. भवेद्वाच्याः । ख. वेष्या वाच्या। ३. ख. ग. या त्वत्र वृद्धा सा त्वत्ता भाष्या नाट्यजनेन तु । ना. शा०-७२

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५७० नाडयसाने पुरोधः सार्थवाहानां भार्यास्त्वार्येति सवंदा। तल्लिङ्गार्थानि नामानि कार्याणि कविभि: सदा'॥ ९३॥ औत्पत्तिकानि यानि स्युर्न प्रख्यातानि नाटके। *ब्रह्मक्षत्रस्य नामानि गोत्रकर्मानुरूपतः ॥ ९४॥ काव्ये कार्याणि कविभिः शर्मवर्मकृतानि हि। वत्तप्रायाणि नामानि वणिजां संप्रयोजयेत् ॥ ९५॥ सवदेति यौवनेऽपि पुरोहितादिभिरायेति भार्या वाच्या ।। ९३॥ औत्पत्तिकानोति स्वयं वा येन कल्प्यन्ते, अत एवास्यातानि तल्लिङ्गार्थानि प्रकृतार्थसूचकाभिधेयमुक्तानि कार्याणि। एतदेव निवशंनेन स्फुटयति ब्रह्मक्षत्रस्ये- त्यादिना॥ ९४॥ अनुवाद-पुरोहित और सार्थवाह को स्त्रियों को 'आये' कहकर सम्बोषित करना चाहिये।। अभिनव-पुरोहित आदि को यौवन में भो भार्या का 'आये' कहकर बुलाना चाहिए।। ९३ ।। अनुवाद-कवि लोग नाटकों में गुण और कार्य के अनुसार नाम से सम्बोधित करें और जो अप्रख्यात पात्र हैं, उसे कल्पित नाम से बुलाना चाहिये ॥। ९३-९४॥ अभिनव-औत्पत्तिकानि अर्थात् जिसकी स्वयं कल्पना की गईं हो, इसोलिए वह आख्यात है। तल्लिङ्गार्थानि का अभिप्राय है-प्रकृत अर्थ के सूचक अभिधेययुक्त अर्थात् नामों के साथ सम्बोधित करने चाहिए। इसी को निदर्शन द्वारा स्पष्ट करते हैं-ब्रह्मक्षत्रस्येत्यादि। अनुवाद-कवियों को काव्य में ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों के नाम उनके गोत्र एवं कर्म के अनुसार रखने चाहिये। और उनके नाम के सामने शर्मा तथा वर्मा लगाना चाहिये अर्थात् ब्राह्मणों के नाम के साथ 'शर्मा' तथा क्षत्रियों के नाम के सामने 'वर्मा लगाना चाहिए। और बनियों के नाम के सामने 'दत्त' लगाकर पुकारना चाहिए।। ९४-९५ ।। १. ख. ग. दिजाः । २. ख. ब्राह्मक्षत्रस्य।

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ससदेशोऽड्यायः ५७१

कापालिकास्तु घण्टान्तनामानः समुदाहृता। शौर्योदात्तानि नामानि तथा शूरेषु योजयेत् ॥ ९६॥ विजयार्थानि नामानि 'राजस्त्रीणां तु नित्यशः । दत्ता मित्रा सेनेति वेश्यानामानि योजयेत्। ९७ ॥ नानाकुसुमनामानः प्रेष्या: कार्यास्तु नाटके। मङ्गलार्थानि नामानि चेष्डानामपि योजयेत्।। ९८ ।। शौर्योदात्तानोति। भीमपराक्रम इति यथा ॥ ९६।। विजयार्थानीति शुभलक्षणविजयवतोत्यादीनि। वेवदत्तावसन्तसेनाविदग्ध- मित्रेत्यादि वेश्यानाम्॥९७॥ नानाकुसुमनामानोति मालती-मल्लिकेत्यादि कुसुमग्रहणं तम्मञजर्याद्युप- लक्षणं चूतलतिकेत्याद्यपि हि दृश्यते नाम। मङ्गलार्थानीति सिद्धार्थका इत्यादीनि ॥९८ ॥ अनुवाद-कापालिकों को घण्टान्त नाम से सम्बोधित करना चाहिये, और शूरबोरों को शौर्य, औदायं आदि गुणों के सूचक नामों से बुलाना चाहिये॥ ९६॥ अभिनव-जैसे भीमपराक्रम। बनुवाद-राजपत्नियों के नाम विजय अर्थ के सूचक होने चाहिये और वेश्याओं के नाम में वत्ता, सेना, मित्रा की योजना करें॥ ७॥ अनुवाद-नाटक में दासियों के नाम भिन्न भिन्न पुष्पों पर रखने चाहिये। तथा चेट के नामों में मङ्गल-सूचक शब्दों को योजना करनो चाहिए। ९८ ॥ अभिनव-विजय के लिए शुभ लक्षणों वाली विजयवती आदि। वासवदत्ता बसन्तसेना, विदग्धमित्रा इत्यादि वेश्याओं के नाम होने चाहिए। ९७।। अभिनव-दासियों के नाम विभिन्न फूलों पर होने चाहिए। जैसे, मालतो, मल्लिका इत्यादि। कुसुम पद का ग्रहण पुष्पों को मञ्जरियों का उपलक्षण है। क्योंकि दासियों के चूतकलिका, चूतलतिका इत्यादि नाम भी दिखाई देते हैं। मङ्कलार्थक नाम जैसे सिद्धार्थक आदि है॥ ९७॥ १ ख. राश स्त्रीणां च कारयेत्। ग. राजस्त्रोणा च कारयेत्। २. क-म दत्तां मित्रां च सेनां च।

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नाटंपशाहने गम्भोरार्यानि नामानि ह्य. तमाना प्रयोजयेत्' । यहमान्नामानुसवृशं कर्म तेषां भविष्यति ॥ ९९ ॥ जातिचेष्टानुरूपाणि शेषाणामपि कारयेत्। नामानि पुरुषाणां तुस्त्रीणां चोक्तानि तत्त्वतः ॥ १०० ॥। एवं नामविधानं तु कर्तव्यं कविभिः सदा। 'एवं *भाषाविधानं त् ज्ञात्वा कर्माण्यशेषतः ॥१०१ ॥ गम्भोरार्यानि अक्षोभ्य इत्यादोमि। नास्ति संकेतको भार इत्याशयेन पृच्छति अत्रोत्तरं नामानुहपमिति। नाम किलेश्वरेच्छावशात्स्वरूपक्रोडीकारेणव जायते। तथा हि नामाक्षरे प्रहामिचारयन्त्रकर्मादिपोडिते शान्तिकपौष्टिकाययुपचारभोजि वा तथैव पुरुषस्य फलोदय इत्यभिप्रायः ॥९९॥ अनुवाद-उत्तम पात्रों के नाम गम्भीर अर्थ के धोतक होने चाहिये। क्योंकि उनके कर्म उनके नाम के अनुरूप ही रहते हैं ॥। ९९ ॥ अभिनव-उत्तम पात्रों के नाम गम्भीर अर्थ के सूचक होने चाहिए जैसे- अक्षोभ्य इत्यादि। संकेत करने में कोई भार नहीं है, इस आशय से पूछते हैं- क्या नाम होने चाहिए? उत्तर देते हैं-नाम के अनुरूप कर्म होने चाहिए। क्योंकि ईश्वर की इच्छा के वश होकर नाम रखा जाता है। और भी नाम के अक्षर ग्रहों के अभिचार एवं यन्त्र-तन्त्र आदि के कर्मों से पीड़ित होते हैं, अतः शान्तिक, पौष्टिक उपचार किये जाते हैं। तभी पुरुष के फल का उदय होता है ॥ ९९॥ अनुवाद-इनके अतिरिक्त शेष स्त्री-पुरुषों के नाम उनकी जाति एवं चेष्टा के अनुरूप होने चाहिए॥ १०० । अनुवाद-इस प्रकार कवियों को नाटक में नामों का विधान करना चाहिये। इस प्रकार पात्रों के समस्त कर्मों को समझकर भाषा का विधान किया गया है। १०१ ॥ १. ख. ग. याजयेदुत्तमेषु च। २. क. (टि०) नामाभिधानं। ३. क. (टि०) एवं भाषाविषानादि। . एवं भाषाविधानादि। क. म. भषाविधानं विज्ञेयं ततः प्रकृतिसम्भवाम्। ततः पाठ्यस्य वक्ष्यामि गुणाश्च द्विजसत्तमाः । स्वरैः षड्जादिभियुक्तं वानारससमन्वितम। तद्यथा- ४. ख. ज्ञात्वा सवंभशेषतः।

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पाठ्यगुणानिदानों वक्ष्यामः । तद्यथा सप्तस्वराः, त्रीणि स्थानानि, चरवारा वर्गाः, द्वितिया काकुः, षडलक्वारा:, षडङ्गानोति। एषामिदानों

तत्र सप्तस्वरा नाम-षडजर्षभगान्धारमव्यमधैवतनिषादाः। त- एते रसेषूपपाद्याः॥।१०२॥

कवित्वयुक्तो नट इत्यभिप्रायेणाह भाषाविधानं जञात्वा, तत इति, तत्परि- ज्ञातपूर्वकं काव्यं कृत्वा प्रयोगे पाठ्यं प्रयुञ्जोतेत्यर्थः। यदि त्वन्यः कविस्तदा पाठ्यस्य संज्ञा च मूलभूतत्वात् प्रयाक्तृत्वेनोक्तो द्रष्टव्यः । षडलङ्गारसंयुतमिति स्वरस्थानवर्णकाववलड्काराङ्गानि षट्। अन्नालङ्कारशव्देन विवक्षितानि, एतैहि भूषितं काव्यं पाठ्यमुच्यते ॥ १०१ ॥ एवं हि वत्तव्यमुपादानस्य यदि सकलस्वविवक्षाविशिष्टार्थप्रतिपादकतवं पठनाहं च पाट्यं तत्स्वराद्यायत सवमिति। अत एवाह पाठयगुणानिति गुणा: उपकारकाः यदुपकृतं काव्यं भवतीत्यर्थः । अभिनव-नट कवित्व से युक्त भी होता है, इस अभिप्राय से कहते हैं कि भाषा विधान को समझकर अर्थात् परिज्ञान पूर्वक काव्य का निर्माण कर पाठ्य का प्रयोग करें। यदि कवि कोई दूसरा है तो पाठ्य की संज्ञा प्रयोग मूलभूत तत्त्व होने के कारण तदनुसार प्रयोक्ताओं को व्यवहार देखना चाहिए। स्वर, स्थान, वर्णं, काकु, अलक्कार तथा अङ्ग ये छः अलङ्कार शब्द से विवक्षित है। इन छः अलद्कारों से युक्त काव्य पाठ्य होता है॥ १०२॥ अभिनव-उपादान के विषय में इस प्रकार वक्तव्य है कि यदि समस्त प्रकार को विवक्षाओं से विशिष्ट अर्थ के प्रतिपादक काव्य पाठ्य है, वह स्वरादि छः अलङ्कारों के अधीन है। अतः पाठथ के गुणों को बतलाऊँगा। यहाँ गुण का अर्थ उपकारक है जिससे उपकृत काव्य पाठय होता है। अनुवाद-अब पाठ्य के गुणों को कहूँगा। वह जैसे-सात स्वर हैं, तोन स्थान हैं, चार वर्ण हैं, दो प्रकार के काकु है, छः अलद्कार और छः अङ्ग हैं। अब इन पाठय गुणों का उद्देश क्रम से व्याख्यान करूँगा।। १. स्वर अनुवाद-षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद- ये सात स्वर हैं। रसों में इनका उपयोग करना चाहिए। १. क-न. लक्षणाग्यभिधास्यामः। स. लक्षणान्यभिव्याख्यास्यामः ।

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५७४ नेटिपशास्त्रे उद्द शक्रमेण व्याबष्डे तत्रेत्यादि। स्वरगतं वितत्य गेयाधिकारे प्रकटयिष्यामः इह का कुषु स्वरा एव वस्तुत उपकारिणः। तत्परिकरभूतं तु स्थानादि। स्वरेषु प्रकतिभूतेषु काकुरूपता जन्यते। तत्र स्थानशब्देनैषां स्वरूपनिष्पत्तेराधयो वशितः। उदात्तानुवात्तस्त्ररितकम्पितरूपतया स्वराणां यद्रक्तिप्रधानत्वमनुरणनमयं तत्त्यागे- नोच्चनीच मव्यमस्थानस्पशित्वमात्रं पाठ्योपयोगिति वशितम्। यदि हिस्वरगता रक्ति: पाठ्ये प्रधान्येनावलम््येत तवा गानक्रियासो स्यात्, न पाठः। पूर्णस्वरत्वा- भावादङ्गानां भेव इति चेतु, न, अपूर्णस्वरतवेऽपि गानत्वप्रतिज्ञानात्, षाडवौडुवितयोः त्रिचतुरस्वरत्वेऽि गानप्रतीतिरभवत्येव, यथा कृत्रिमवंशिकायां त्रस्वर्ये, भिग्नषड्रज- भाषायां च कालिन्य्यां चातु स्वयें। तस्माद गानवैलक्षण्याय रक्तिलक्षणं धर्ममनावृत्यो- च्वादिस्थानस्पर्श एवात्र प्रवानमिति वक्तुं वर्णोपादानम्। अन्यथा स्वरसप्तकाति- रिक्तस्योदातावेर्भावादनथंकं तदुपावानम्। अभिनव-पाठ्य गुणों में प्रथम स्वरों के विषय में आगे गेयाधिकार प्रकरण में प्रकट करेंगे। स्वर हो काकु में भो उपयोगी होते हैं तथा स्थानादि उसके परिकर हैं। इन स्वरों में हो काकुरूपता उत्पन्न होती है। वहाँ स्थान शब्द से काकुओं के अपने स्वरूप को निष्पत्ति हतु आश्रय दिखाया गया है। उदात्त, अनुदात्त, स्वरित और कम्पित नाम से विख्यात स्वरों में जो अनुरणन रक्ति (अनुर्जन) की प्रधानता है, उसको छोड़कर जो उच्च, नोच, मध्यम स्थान का स्पर्श है, वही पाठय में उपयोगो है, यह दिखाया गया है। यदि स्वरगत रक्ति का पाठय में प्रधानतः आश्रय (आलम्बन) लेते हैं ता यह गान क्रिया हागो, न कि पाठ्य, यदि यह कहा जाय कि यहाँ स्वरों की पूर्णता का अभाव होने से अङ्गों में भेद होगा, किन्तु ऐसा नहीं है। क्योंकि स्वरों को अपूर्णता में भी गान को स्वीकार किया गया है। षाडव और औडुवित में क्रमशः तीन और चार स्वरों के होने पर भी गान की प्रतीति हाती है। जैसे कृत्रिम बाँसुरो में तीन स्वर हैं और भिन्न षड्ज की भाषा कालिन्दी में चार स्वर है, फिर भो यहाँ गान है। इसलिए ज्ञान की विलक्षणता के लिए रक्ति लक्षण धर्म की अपेक्षा न करके यहाँ उच्चादि का स्पर्श ही प्रधान है। इसी बात को बतलाने के लिए वणों का उपादान है, अन्यथा सात स्वरों के अतिरिक्त उदात्तादि के सद्भाव से उन वर्णों का उपादान व्यर्थ हो जायेगा।

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यत्त किचचिवुदात्ताविधर्माणां गात्रस्य निग्रहः कण्ठविवरस्य संवृतेत्यादि शिक्षापठितोदात्तादि धर्मप्राप्तेवच्वाद्यल क्वारेषु यथा स्यादिति प्रयोजनमुक्त, तत्राप्य स्मदुक्तं चेन्न प्रयोजनं कि तद्मंप्राप्त्या कृतमिति न विद्यः॥ नन्वेवं स्वराभिधाने कि प्रयोजनं, उच्यते-प्राणभूतं तावद्ध्रुवागानं प्रयोगस्य, तत्र जात्यंशकविनियोगो भविष्यति तविदानो पाठावसरे कि स्वथैव त्यस्तव्यमित्याशङ्काशमनाय तत्स्थायिस्वराश्यणं प्रमुखोकृत्य पाठः कर्तव्य इत्येत- त्स्वराभिधानस्येह प्रयोजनम्। एवमुपगानवैलक्षण्ये संपन्ने बाह्यार्थसमर्पणेन चित्तवृत्तिसमपंणया वाभिन- यानुभावरूपतालाभाय काकुरर्थरसभेदाभिधीयते। तत एव काकुरूपत्वमेव सवत्रा- नुर्यायि अतिशायित्वे मुख्योपयोगात। तथा चोच्चवोप्ताद्यलड्गारेष्वप्युत्तरत्र काकु- शब्वैनैव मुनिव्यंवहरिष्यति। काकोरेवोपकारसंपादकाः परिपूर्णतायायिनोऽलङ्गारा:, अलमिति पर्याप्त्यर्थ:, इह न भूषणार्थः। अङ्गानि तु विच्छेदादीनि रसमथंम् शोभादि कर्मं च पोषयितुं काकोरेवोपकारीणीति, एवं परमार्थतः काकुरेवायं पञ्चमो रपान्तरै: पूर्णोक्रियते। काक्वा च पाठ्यमानस्य स्वोचितचिज्जडस्वरूपार्थाभिमुख्येन नयनेनाभिनतया नोयत इति काकुरेवात्र प्रधानम्। तथा चैतवध्यायान्ते चोपसंह रिष्यति "उक्तं काकुविधान" मिति। अन्यथाङ्गषट्कमध्यपतितस्योपसंहारोऽन्यङ्ग- निरूपणं चाभिधानमिति सर्वमसमञ्जसं स्यात्। तस्मात्काकुरेवात्र प्रधानमिति उपाध्याया हि वचनस्य संकेतितमर्थमण्यथाकारं समर्थयन्ति। जो कि किसी ने कहा है कि उदात्तादि धर्मों के धर्मी (शास्त्र, शरीर) का निग्रह, कण्ठ विवर को संवृत्तता इत्यादि शिक्षादि ग्रन्थों में पठित उदत्तादि उच्च धर्म की प्राप्ति षट् अलङ्कारों में जैसे भी हो, वही प्रयोजन कहा गया है, फिर भी उसमें मेरा कहा हुआ यदि प्रयोजन नहीं है तो उस धर्म की प्राप्ति से क्या होगा, इसको हम नहों जानते। अब प्रश्न होता है कि धर्म की प्राप्ति को प्रयोजन नहीं मानेगे तो स्वरादि के कथन का क्या होगा ? इस पर कहते हैं कि 'ध्रुवागान प्रयोग का प्राण है' उसमें जाति के अंशों का विनियोग होगा तो क्या इस पाठ के अवसर पर सर्वथा छोड़ देना चाहिए। इस आशक्का के शमन के लिए स्थायी स्वरों के आश्रयण प्रमुख मानकर पाठ करना चाहिए, इस प्रकार स्वरों के कथन का यहाँ प्रयाजन है।

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५०६ नाटपशास्ये

ननु श्रुतमथंमनादृत्य कथं काकुरेवं कुर्यात। तत्रोक्तमम्यैः वस्तुस्वभावोऽत्र द्रष्टव्यो न हि दृष्टेऽनुपपन्नं नामेति। वयं तु ब्रूम :- इह येयं प्रथमेन संवित्स्पन्वेन प्राणोल्लासनया वर्णाविरूपविशेषहीना वाग् जन्यते सा नावरूपा सती हर्षशोकादि- चित्तवुर्त्ति विधिनिषेषाद्यभिप्रायं वा तत्कार्यलिङ्गतया वा तावात्म्येन वा श्रुत्यन्तादि गमयतीति तावस्थितम्। इस प्रकार ध्रुवा गान की विलक्षणता सम्पन्न हो जाने पर बाह्य अर्थ के समर्पण के द्वारा अथवा चित्तवृत्ति के समपंण द्वारा अभिनय क्रिया की अनुभाव- रूपता की प्राप्ति के लिए रसों के भेद से काकु का अभिधान करते हैं, कथन करते हैं। इसीलिए स्वर के आधिक्य में मुख्य उपयोग होने के कारण काकुओं का सर्वत्र अनुभव रूप होता है। इस प्रकार भरतमुनि आगे उच्च, दोप्त अलङ्कारों में काकु शब्द के द्वारा ही व्यवहार करेंगे। क्योंकि परिपूर्णता को प्राप्त ये अलक्कार काकु के ही उपकार के सम्पादक हैं। यहाँ अलङ्कार में 'अलम्' शब्द पर्याप्ति अर्थ का वाचक है, भूषण अर्थ का वाचक नहीं है। विच्छेद आदि अज्भ तो रस, अर्थ और शोभा आदि कर्मों को पुष्ट करने के लिए काकु के ही उपकार करने वाले हैं। इस प्रकार परमार्थतः काकु ही रूपान्तरों (भिन्न-भिन्न रूपों से) पाँचवी की पूर्त्ि करता है। काकु के द्वारा ही जड़ और चेतन अर्थों के अभिनयन से अभिनेयता लाई जाती है। इसलिए काकु को यहाँ प्रधानता है। और 'उक्तं काकुविधानम्' इत्यादि के द्वारा इस अध्याय अन्त में उपसंहार करेंगे। अन्यथा छः अङ्गों के मध्य में पठित उपसंहार तथा अन्य अक्कों का निरूपण आदि सब असमञ्जस हो जायेगा। इसलिए यहाँ पर काकु ही प्रधान है, ऐसा उपाध्याय जी ने अपने कथन के संकेतित अर्थ का अन्यथा करके समर्थन करते। अब प्रश्न होता है कि श्रुत अर्थ का अनादर करके काकु को इस प्रकार क्यों प्रधान मानते हैं। इस विषय में अन्य लोगों का कहना है कि वस्तु के स्वभाव को ही यहां देखना चाहिए। क्योंकि प्रयक्ष दृष्ट वस्तु में अनुपन्नता नाम का कोई तत्व नहीं है, हमारा तो कहना है कि यहाँ जो प्रथम संवित् स्पन्दन रूप प्राणोल्लसन के द्वारा वर्णादि रूप विशेष से रहित वाणी उत्पन्न होती है, वह नाद रूप होती हुई हषशोकादि चित्तवृत्ति को अथवा विधि-निषेधादि अभिप्राय को भिन्न कार्यों के लिङ्ग द्वारा अथवा तादारम्य के द्वारा श्रतिपर्यन्त पहुँचा देतो है।

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ततः पाठर्य प्रयुग्जीत षडलड्कारसंयुतम्। हास्यशुङ्गारयोः कायौं स्वरौ मध्यमपठचमौ ॥ १०३॥ बड्जर्षभौ तथा चैब वोररौद्राद्भुतेष्वथ। गान्धारश्च निषादश्च कतव्यौ करुणे रसे।। धैवतश्चैव कतंव्यो वीभत्से सभयानके॥१०४॥ यथा घ प्राण्यम्तरस्य मृगसारमेयादेरपि नादमाकण्यं भयरोषशोकादि प्रतिपद्यते, तदयं नावाच्चित्तवृत्त्याद्यवगमोऽनुमा्न तावत् । ये त्वेते वर्णविशेषास्ते तत एवान्यत्रानभिप्रेतेऽन्यथापि प्रयोक्तं शक्याः, अत एव द्रष्टव्यभिचाराः। नावस्तु झटित्युद्भिन्नमुखरागपुलकस्थानीयो नान्यथासिद्धोऽन्यथासिद्धं शब्दार्थं बाघत एव वा। यथोक्तं "भोर न मे भयम्" इति ब्रुवन्नाशयते भयमित्यन्यप्रकारतां वा वाक्यार्थस्य विशेवापंणेन विधत्ते। एतच्च वक्ष्यामोडय् इत्यास्ता तावत्। सर्वथा पाठ्ये काकु: प्रधानमिति स्थितम्। और जिस प्रकार मृग, कुत्ते आदि अन्य प्राणियों के नाद को सुनकर भय, क्रोध, शोक आदि होते हैं। वहां नाद (व्वनि) से चित्तवृत्ति आदि का अनुमान होता है और जो ये वर्ण विशेष हैं वे नादरूप सामान्य पद तन्तुओं की ग्रन्थियों के समान प्राचीन प्रयत्नों के अतिरिक्त निमित्त की अपेक्षा है, इसलिए अन्यत्र अनभिप्रेत मर्थ में अन्यथा प्रयोग किया जा सकता है। नाद तो शोघ्र हो उद्धिन्न हुए मुखराग एवं पुलकस्थानीय है। अन्यथासिद्ध शब्दार्थ को बाधित नहीं करता, जैसा कि कहा गया है कि 'हे भीरू! मुझे किसी से कोई भय नहीं है' ऐसा कहता हुआ भय को नष्ट कर देता है। इस प्रकार विशेष के अर्पण के द्वारा वाक्यार्थ के प्रकार को आगे कहेंगे, अतः रहने दिया जाय। अतः पाठ्य ये काकु प्रधान है, यह सिद्धान्त हुआ।। अनुवाद-छः अलद्कारों से युक्त पाठ्य को प्रयोग करना चाहिए। हास्य और भृङ्गार रस में मध्यम और पञ्चम स्वर का प्रयोग करना चाहिये। वोर, अद्भुत और रौद्र रसों में षड्ल और ऋषभ स्वर का और करुण रस में गान्वार और निषाद स्वरों का तथा वोभत्स एवं भयानक रस में धैवत स्वर का प्रयोग करना चाहिये॥ १०३-१०४।। १. क. (भ.) षड्जर्षभी च कर्तव्यौ। २. क-भ. निषादश्चैव गान्धार: करुणे संविषोयते। ना. शा०-७३

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५७६ नाटपश्ास्थ्रे

त्रीणि स्थानानि-उरः कण्ठः शिर इति। भवत्यपि च"। शारोर्यामथ वीणायां त्रिभ्यः स्थानेभ्य एव तु। उरसः शिरसः कण्ठातस्वरः काकुः प्रवर्तते ॥ १०५॥

अत्र हास्यशृङ्गारयोरित्यादिना जात्यंशकविनियोगं भविष्यन्तमनुवदंस्तद् हतस्थायिस्वरानुसारेण काको: प्रयोग इति दर्शयति॥१०३-१०४॥ अथैषां स्वराणामाश्रयान् वशंयति त्रीणि स्थानानीति। ननु पाठावसरे वर्णा यत्र मूर्धन्यास्तत्र कथमुरःस्थानस्वरनिष्पत्तिः? एवमन्यत्र वाच्यम्। उक्तं मखनादात्मिकाया वाचः स्वरसप्तकं रूपं, सा चोरःस्थाननिष्पम्ना सती मूर्धानमभिध्नन्ती सूर्धन्यं वर्ण तद्रूपं मन्द्रस्वरानुविद्धं दशयति। यहाँ पर 'हास्यश्ृङ्गारयोः' भविष्य के जात्यशकों के विनियोग का अनुवाद करते हुए द्रुत स्तर के अनुसार काकु का प्रयोग होता है, यह दिखाते हैं॥ १०३-१०४ ॥ २. स्थान अब 'त्रीणि स्थानानि' के द्वारा स्वरों के आश्रयों को दिखाते हैं-

भी है। अनुवाद-स्थान तोन हैं-उरस, कण्ठ और शिरस्। इस विषय में इलोक

अनुधाद-शारीरी वोणा में उरस, कण्ठ और शिरस् इन तीन स्थानों से काकु स्वर प्रवृत्त होता है॥ १०५ ।। अभिनव-यहाँ प्रश्न होता है कि पाठ के अवसर पर जहाँ मूर्धन्य वर्ण हैं वहां उरःस्थानीय स्वर की निष्पत्ति कैसे होगी ? इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिए। इस पर कहते हैं कि मन्द्रनादात्मिका वाणो के सात स्वर हैं। वह वाणी उरःस्थान से निष्पन्न होती हुई मूर्धा से टकराती हुईं मूर्धन्य वर्ण को मन्द्र स्वर से अनुविद्ध दिखाती है। १. ख. ग. त्रीणि स्थानाग्युर: कण्ठशिरांसोति भवनयपि। ९. क. भवति चात्र इ्लोक: । ३. क. (टि०) उरसा शिरसा।

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न च मूर्धस्थानत्वेपि तस्योच्चताकृतं तारत्वमापद्यते । अन्यदेव हि वर्ण- निष्पत्तिस्थानं, मूर्धान्तवंत्यनुविवरमात्रं स्थानान्तरम्। स्वरनिष्पत्तिस्तु विततवितते सूर्धकाये निष्पद्यमाना तारत्वं संपादयन्ती एव तारमन्द्रमध्यता सवर्णानां सरव स्वरस्थानभेवसंपाद्यमानवपुषामप्युपपद्यते तत्र स्वरग्रहणादेवाक्षिप्ते स्वानभेदे पुनः स्थानोपादानं षट्षष्टिस्थानभेवनिवृत्त्यर्थम्। तथा हयुरःस्थाने दाविशतिस्थानानि यत्र शुतयः स्वराइच। एवं कण्ठें सू्दिनि च। तावतां च स्पर्शे स्फुटं गानमेव स्यात, न पाठयमित्यवोचाम। अत एव गुणशब्दो न धमवचनः पाठ्यगुणानिति, किं तु उपकरणवचनः । स्थानं च तद् यदेवोपकरणं भर्वत ।। १०५।। किन्तु मूर्धा स्थान होते हुए भो उसके उच्चता रूप तारत्व को प्राप्ति नहीं होती और भो वर्णों को निष्पत्ति का स्थान अन्य हो है और वह अन्य स्थान मूर्धा के अन्तर्वर्ती अनुविवर मात्र है। किन्तु स्वरों को निष्पत्ति तो अत्यन्त वितत मूर्धा स्थान में निष्पन्न होतो हुई तारत्व को सम्पादन करती हुई इस प्रकार स्वर और स्थान के भेद से संपाद्यमान शरीर वाले सभी वर्णों को तारता, मन्द्रता और मध्यता भी उपपन्न होती है। वहाँ स्वरों के ग्रहण से हो स्थान- भेद का आक्षेप हो जायेगा, पुनः स्थान पद का ग्रहण ६६ प्रकार के स्थान भेदों से निवृत्ति के लिए है। उनमें उरःस्थान में २२ स्थान है, जहाँ श्रुतियां एवं स्वर हैं। इसी प्रकार कण्ठ में २२ स्थान और मूर्धा में भो २२ स्थान हैं। इन स्थानों के स्पर्श से गान ही स्पष्ट होता है, पाठ्य नहों। यह कह चुके हैं। इसलिए पाठय- गुणान् में गुण पद धर्म का वाचक नहों है, अपितु उपकरण वाचक है और स्थान बही है जो उपकरण होता है॥ १०५.॥ विशेष-स्वरों को उत्पत्ति के सम्बन्ध में बताया गया है कि आत्मा बुद्धि के साथ मिलकर मन को प्रेरित करता है, मन कायाग्नि को आहत करता है, वह आहत अग्नि वायु को प्रेरित करती है, और वह वायु नाभि स्थान से उठकर उरल्थान में सब्वारित होता हुआ 'मन्द्र' स्वर को उश्पन्न करता है, वहों वायु कण्ठ स्थान में सब्चारित होता हुआ 'मध्य' स्वर को उत्पन्न करता है और वहो वायु शिरःस्थान से सञ्चारित होकर 'तार' स्वर को उत्पन्न करता है और वही वायु मूर्धा से आहत होकर मुख में पहुँच कर वर्णों को उत्पन्न करता है। इस प्रकार उरस, कण्ठ और मूर्धा ये तीन स्वरों के स्थान हैं। इन्हीं तीन स्थानों से भन्द्र, मध्य और तार ये तोव व्वनियाँ उत्पन्न होती हैं।

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५८० नाटयशाबये अपि च श्ञारोर्यमय वोणायामित्यादि केचिद् व्याचक्षते-हहार्थकाकुस्ताव- द्विधिनिषेधाद्यार्यावगमिका, स्वरकाकुस्तु चित्तवृत्तिसूचिका। एतद् व्यापारदवय- शुग्या नेनथ्यपाठवैतालोयपाठादिविषया दूरस्याभावणादिविषया च शोभासंपादन- दूरभवणादिप्रयोजना स्वरकाकुः सा तेन वक्ष्यत इति। एवं प्रष्टव्यास्तावत्-योडयं स्वरकाकोविषय उत्कसतत्र यद्यर्थरूपं किचिदभिवेयं तत्रावश्यमर्थकाकोर्वा पृथक् स्वरकाकु: । तथा हि नेपथ्यपाठेडवि कञचुको पठति "वोरोऽयमङ्गदः पठति", यौगन्ध- रायण: पठति इति, एवं भूतवृत्तचितवृत्यादि विशेषप्रतिपादकेनैव पाठेन भवितव्यम्। वैतालोयपाठेडवि समुचितावसरावेदनप्रवानेऽवश्यमर्थ आदातव्य एव। उत्तं चैतत् - अर्थानपेक्षया किमभिनयनमव्यचिम्तया, पुस्तकवाचकपाठो ह्यानुक्रियमाणोडभिनयता- स्वरातोद्यगानाविवैलस्ण्ये व चिम्तयैव कि प्रयोजनमिति। न स्यात्काकुसामान्य- लक्षणमेतेन कि घटत इत्यन्ये। और भो 'शारीर्यमथ वोणायां' को जो कुछ लोग व्याख्या करते हैं-यहां जो अर्थ काकु है वह विधि और निषेधादि रूप अर्थो को अवगमिका है और स्वर एवं काकु चित्तवृत्ति को सूचिका है। वह स्वर काकु विधि और निषेध रूप व्यापार से शून्य, नेपथ्य पाठविषया तथा वैतालीय पाठबिषया, दूरस्थ आभाषणादि विषया तथा शोभा-सम्पादन करना एवं दूरस्य श्रवण रूप प्रयोजन वालो स्वर काकु है, उसे आगे कहेंगे। उनसे यह पूछना है कि जो यह स्वर काकु का विषय कहा गया है उसमें यदि अर्थरूप कुछ अभिधेय है वहाँ अवश्य हो अर्थ काकु से भिन्न स्वर काकु है। और नेपथ्य पाठ में कञ्चुकी कहता है कि 'यह वीर अङ्गद पढ़ता है' यह 'योगन्धरायण पढ़ता है' इस प्रकार चित्तवृत्ति आदि के विशेष का प्रतिपादक होना चाहिए और बैतालीय पाठ में भो समुचित अवसर का आवेदन करना प्रधान है, अर्थ का अवश्य आदान करना चाहिए। और यह भी कहा गया है कि अर्थ की अपेक्षा किये विना अन्य विषय का चिन्तन करना क्या अभिनय होगा? अथवा पुस्तक के वाचक के पाठ का अनुकरण करना क्या अभिनय का अवलम्बन करेगा ? अभिनयरूपत्व के अभाव में उसके उपकरण धर्म्यादि तथा अभिनय के फल रसादि से भिन्न होने और स्वर, आतोद् (वाद्य) एवं गान आदि से बिलक्षण होने से अन्यथा चिन्तन से क्या प्रयोजन सिद्ध होगा ? इसमें काकु का सामान्य लक्षण नहीं होगा, अतः इसको चिन्तन व्यर्थ है।

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५८र

एवमपि भवतोत्यसमर्यितं स्यात् तद्धि पूर्वप्रक्रान्तवस्तु समर्थनेन प्रयुख्जत इति मुनेः शैलो। तस्मात्पूर्वोक्तस्थानत्रयसमर्थंनार्थोडयं इ्लोकः। तवयमथं :- शारोयां वोणायां केवलमुरःशिर:कण्ठलक्षणेभ्यः त्रिम्य एव स्थानेम्यो न तु षट्षष्टिस्वरप रिव्यक्तरञजनात्मकगानोप योगिव्यापार: काकुभूतः सूचकरूपः संप्रवतंते। अथ शब्दोडवधारणे बाह्यायां हि प्रतिबिम्बितार्यां वोणायां रञ्जनात्मक- स्वरस्वरूपव्यतिरेकेण न काकुसंपत्तिः। वीणाग्रहणं शरोरगतविवृतमध्याकाशदेश- परिग्रहार्थ, न शरोरमात्र स्वरनिष्पत्ति:, अपि तु तत्रव। येयं बाह्यवीणादण्डस्थानीया उतरोत्तरस्थानपरम्पराविशिष्टा, सा स्थानसोपानपंक्तिस्वरनिष्पत्तिस्थानम्, अत एव काकुस्वरमपि लक्षितम् -कक लोल्ये, लौल्यं च साकांक्षे यया स्वरवैचित्र्यं लक्ष्यते ईषद्यतो वाच्यभूमिः संपद्यते सा काकुः ईषदर्थे कुशव्वस्य कादेशः। काकुर्वा जिह्वा तद्व्यापारसंपावत्वात् काकुः ॥ १०५ ॥ यदि यह कहा जाय कि ऐसा भो होता है तो वह समर्थथित नहीं हुआ। वह तो पूर्व प्रक्रान्त वस्तु से समर्थन से प्रयुक्त होता है, यह मुनि को शेलो है। इसलिए पूर्वोक्त स्थानत्रय के समर्थन से यह श्लोक है। उसका यह अर्थ है कि शारोरो बोणा में केवल उरस, शिरस् एवं कण्ठ इन तोन स्थानों से न कि ६६ स्वरों से परिव्यक्त रञ्जनाश्मक गान के उपयोगो व्यापार काकु के सूचक रूप में प्रवृत्त होता है।। प्रतिबिम्बित स्थानीया बाह्य वीणा में काकु की सम्पत्ति बिद्यमान होतो है जो र्जनात्मक स्वर रूप से भिन्न होतो है। 'शारोयां वीणायां' में वोणा पद का ग्रहण शरोर के मध्य में विवृत हृदयाकाश के परिग्रहण के लिए है। क्योंकि विना आकाश के शरोर मात्र में स्वर को निष्पत्ति नहीं हो सकती, अपितु हृदयाकाश में ही होगी। जा यह तुम्बीघटिता दण्डस्थानीया उत्तरोत्तर स्थान परम्पराओं से विशिष्ट बाह्य वोणा है। वह सोपान पंक्ति के समान स्वरों के निष्पत्ति के स्थान हैं। अत एव इनसे काकु स्वर लक्षित होता है। 'कक लोल्ये' धातु का अर्थ लौल्य जो सांकाङ्क्ष स्थल में होता है, जिससे स्वर-वेचित्र्य लक्षित होता है जो वाच्य को भूमि बन जाती है, वह काकु है। यहाँ पर ईषत् अर्थ में कु शब्द को 'क' आदेश हो गया है। अथवा काकु का अर्थ जिह्वा है, अतः जिह्वा के व्यापार से संपाद्य होने से यह 'काकु' है।

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५६२ नाट्यशाल्तरे

आभाषणं च दूरस्थे क्षिरसा संप्रयोजयेत्। नातिदूरे च कण्ठेन ह्युरसा चैव पार्श्वतः ॥ १०६ ॥ उरसोदाहृतं वाक्यं शिरसा दोपयेद् बुधः। कण्ठेन शमनं कुर्यात्पाठ्ययोगेषु सर्वदा॥ १०७॥

एवं स्थानस्वरूपं विभज्य तस्य विषयभेवमाद्शयितुमाह-आभाषणं दूरस्थ इत्यादि। शिरसेति ज्ञिरानिष्पन्नेन तारेण नावेनेत्यर्थः। नातिदूरे कण्ठेनेति मध्येन, उरसा समीपे मन्द्रेणेति यावत्॥ १०७ ॥ एवं स्थानत्रयस्य पृथगुपयोगमभिधाय युगपद्दशंयति-उरसोदाहृतं वाक्य- मित्यादिना।

इस प्रकार तीनों स्थानों के रूपों का विभाग करके अब उनको विषय भेद दिखलाने के लिए कहते हैं- अनुवाद-दूरस्थ व्यक्ति से बात करने में शिर हिलाना चाहिए, अधिक दूर न होने पर कण्ठ से तथा समोपस्थ व्यक्ति से उरस् से (मन्द्रनाद से) संकेत करना चाहिये॥ १०६॥ अभिनव-यहाँ 'शिरसा' से तात्पर्य शिरोनिष्पन्न तार नाद से है। 'कण्ठेन' पद से मध्यनाद का ग्रहण होता है। इसका प्रयोग नातिदूरस्थल में होता है। 'उरसा' पद का तात्पर्य मन्द्र नाद से है। इसका उपयोग समोपस्थ सम्भाषण में होता है। १०६ ॥। इस प्रकार इन तीनों स्थानों का अलग-अलग उपयोग कहकर अब एक साथ उपयोग दिखाते हैं-उरसादाहृतमित्यादि। अनुवाद-पाठच के प्रयोग में सर्वदा उरस् से उवाहृत वाक्य को विद्वान् शिर से दीप्त करें और कण्ठ से शमन करें॥ १०७।।

१. क-भ. आभाषणं च दूरस्थं शिरस्थेन स्वरेण हि। २. . नाविदूरेऽपि कण्ठेनाप्युरसा चापि पाश्वंतः । ग. नातिदूरेऽपि कण्ठे च हा रसा च समीपतः । क=भ; कण्ठेन नातिदूरे स्यादुरसा चंव पार्श्ववतः। ३. ग. शिरसोद्दोपयेद्बुषः। ४. क. (हि०) कण्ठेन वामयेच्चैव।

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मन्द्रस्वरेण वा पाठमारभ्य क्रमेण तारं गत्वा मध्येन परिसमाप्नुयादिति श्लोकार्थः। यदा हि न दोप्तेन क्रोधादिना नापि मन्दरूपेण शोकादिना आविष्ट- हृवयो भवति तदा क्रमेण वक्तव्यवस्तुविषयोत्साहविसफारणात् तारान्तं गच्छन्नुप- संहारे मध्य एव विशाम्यतीत्यनवशिष्टस्यायं सामान्येन पाठधमः। अत एव शास्ते व्यभिचारिबलावेशशून्यतायामयमेव पाठधमः । वेतालोयपाठे चायमपि सामान्य- धर्मोडस्तु। न तद्विषये स्वरकाकु: । कस्ताह तस्या विषयः उच्यते-कदाचिदर्थस्य धमपुञ्जवाच्यस्थ धर्मान्तरा- धानं काकुरुच्यते, कदाचित्स्वरजनकचित्तवृत्त्यपण करोति। यत्र रसस्वरजनक- काकुष्यवहार: कवाचिद्वा नादात्मनि स्वरसूत्रे सुगुम्फितस्य स्वग्रन्थ्यात्मनो वणराशेवरशवणं किचिच्छवणमश्रवणं वेत्यस्मिन्नर्थे व्याप्रियते। तथापि स्वरकाकुवच्यते। तत्रोक्तमाभाषणं दुरस्थमित्यादि तदेवं व्यतिरिक्ते स्वसेवाव्यापाराद् व्यतिरिक्तजडचिद्भेदेन भेदात् तदर्थरसस्वरभेवात् त्रिधैव काकु:।। १०७॥

अभिनव-मन्द्र स्वर से पाठ का प्रारम्भ करके तार स्बर तक ले जाकर मध्य स्वर पर उसे समाप्त कर देना चाहिए, यह श्लोक का अर्थ है। जब न तो दोप्त रूप क्रोधादि से और न मन्द्र रूप शोकादि से हृदय आविष्ट होता है तो क्रमशः वत्तव्य वस्तु विषयक उत्साह के विस्मारण से स्वर को तार तक ले जाकर उपसंहार के समय विश्राम लेता है। यही सामान्यतः अनवशिष्ट पाठ का धर्म है। अत एव शान्त में व्यभिचारो भावों के आवेश से शून्य अवस्था में यही पाठ धर्म है। वैतालोय पाठ में भो यहो सामान्य धर्म है। उस विषय में स्वर काकु नहीं है। अब प्रश्न उठता है कि जब उसमें काकु स्वर नहीं होता तो उसका विषय क्या है? इस पर कहते हैं कि कभी धर्मपुञ्ज के वाच्य अर्थ का धर्मान्तर में आाधान काक कहा जाता है। कभी स्वर जनक चित्तवृत्तियों का अर्पण करता है, जहाँ रस जनक स्वर काकु का व्यवहार होता है और कभी नादात्मक स्वात्मभूत पद एवं वाक्यरप ग्रन्थियों वालो वर्णराशि का दूर से श्रवण होता है अथवा कि्चित् श्रवण होता है। अथवा कुछ भी नहीं होता, इसी अर्थ में काकु व्यापृत है। वहाँ भी स्वर काकु होता है। इस प्रकार स्व सेवा व्यापार से भिन्न तथा जड़ एवं चेतन के भेद से भिन्न तदर्थ रस और स्वर के भेद से तीन प्रकार की काकु है।। १०७ ।।

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नाट्यशास्त्रे

उदात्तइचानुवात्तशच स्वरितः कम्पितस्तथा। वर्णाश्चर्वार एव स्युः पाठ्ययोगे तपोधनाः ॥ १०८ ।। एवं स्थानभेवमुक्त्वा क्रमप्राप्तं वर्णस्वरूपमाह-उदात्तश्चेति । उच्चता नोचता मध्यमता उच्चनीचोभयडोलावलम्बनमिति चत्वारः स्वरधर्माः। वर्णा गुणा यदि वा पाठक्रियाविस्तारका विवृण्वते प्रकटयन्ति स्वार्थविशेषमिति वा। पाठ्ययोगे काव्ये स्वरस्य रक्तिभागमपहाय वर्णा एव वत्त्याः । रक्तिभागा- भिनिवेश तु गानयोगो, न पाठ्ययोग: स्यावित्यवादिषुः। तत्रान्वयव्यतिरेकाम्यां रक्तिभागेडनुवात्ताविवर्णभाग: कादिवर्णभागः। तस्य स्फुटत्वास्फुटत्वमित्याह-यो धमंस्तन्त्र्यामनुरणनप्रधानायामरक्तकण्ठें गातरि यथाकर्थचिद्वक्तं प्रवृत्ते हडुक्कामु- रजादौ च पृथग्लक्ष्यत एव। एवं प्रधानतया धर्मान्तराणि मग्नत्वेन तत्रापि सत्येव अत एवाह तपोधना: सूक्ष्मवेदिनो यूयमत्राधिकृता विचार इत्याशयः। ३. वर्णं इस प्रकार स्थान-भेद क्रम से प्राप्त वर्णों के स्वरूप को कहते हैं- अनुवाद-हे तपोधनों ! पाठय के प्रयोग में उवात्त, अनुदात, स्वरित और कम्पित थे चार वर्ण होते हैं॥। १०८ ॥ अभिनव-उच्चता, नोचता, मध्यमता और उच्च-नीच रूप दोनों के अव- लम्बन रूप ये चार स्वरों के धर्म है। इस प्रकार पाठविशेष की क्रिया का विस्तार करने वाले वर्ण गुण है अथवा स्वार्थ विशेष को विवृत या प्रकटन करने वाले वर्ण गुण हैं। अभिनव-पाठ्य के उपयुक्त काव्य में स्वर के रतिभाग का परित्याग कर वर्ण ही कहना चाहिए, क्योंकि रतिभाग का अभिनिवेश करने पर तो काव्य गान के उपयोगो हो जायेगा, पाठ्य के उपयोगी नहीं होगा। यह कहा जा चुका है। वहाँ अन्वय-ग्यतिरेक के द्वारा यह सिद्ध किया है कि रतिभाग में कादि वर्ण रूप अनुदात्तादि वर्ण भाग का उपयोग होता है। उसकी स्फुटता और अस्फुटता को कहते हैं। जो धर्म अनुरणन प्रधान तन्त्रो में अरक्त कण्ठ वाले गायक के जिस किसो प्रकार गान में प्रवृत्त होने पर हुडुक्का, मुरज आदि में पृथक् लक्षित होता है। इस प्रकार प्रधान रूप से अन्य धर्म वहाँ मग्न होकर प्रतीत होने वाले धर्म अस्फुट हैं। अत एव यहां 'तपोधनाः' सम्बोधन कहने का तात्पर्य है कि आप सूक्ष्मवेदी हैं और इस विषय के विचार में अधिकारी हैं। १. ख. उवाचाा।

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तत्र हास्यभ्पुङ्गारयोः स्वरितोदात्तैवणे: पाठ्यमुपपाडयं, वीर- रौद्राद्भुतेष्दात्तकम्पितेः करुण'वीभत्सभयानकेष्वनुदात्तस्वरितकम्पित- रिति®। एषां वर्णानां विषयमाह-हास्यशृङ्गारयोरित्यादिना । मध्यपञ्मावित्यावौ प्रकरणे यथासंख्यं न विवक्षितमित्येवं हास्ये मध्यमायाः पञचम्या वा जातेः स्थायि- स्वरत्वं गृहोत्वा तत्रैवोच्चमध्यमस्थानस्यर्शेन पठेतु। एवं शुङ्गारवीराविषु त्रिषु षाड्ज्या आर्षभ्या वा स्वांशं गृहोत्वा तत्रेवोवात्तकम्पितैः पाठः, करुणे निषादवत्या गान्धार्या वा स्थायिनमालम्व्यानुवात्तेन पाठ:, वोभत्से धैवत्यंशस्वराधयेण स्वरित- कृत: पाठः। भयानके तत्स्वरावलम्बनेनैव धैवतांशकम्पितप्रधानः पाठ :- इत्येवं भविष्यत् (अ-२९) जातिविनियोगानुसारिस्वरानुवादेन वर्णेषूदात्तादिषु तात्पयं, न तु स्वरेधु। तेषां तु पृथगुद्वेशप्रयोजनं षष्ठे दशितमन्तरालापपरिग्रहमिति। मब उन वर्णों के विषय में कहते हैं-हास्यश्रृङ्गारयोरित्यादि। अनुवाद-उनमें शुङ्गार तथा हास्य रस में स्वरित और उदात्त स्वरों से, वोर, रौद्र और अद्भुत रसों में उदात्त एवं कम्पित स्वरों से तथा करुण, बीभत्स और भयानक रसों में अनुवात्त, स्वरित और कम्पित स्वरों से पाठ्य करना चाहिये। अभिनव-'हास्य और शङ्कार में मध्यम और पञ्चम स्वरों को रखना चाहिए' इत्यादि प्रकरण में जिस क्रम में पाठ है उस क्रम से योजना विवक्षित नहीं है। अतः हरास्य में मध्यमा अथवा पञ्चमी जाति के स्थायी सवरों को ग्रहण कर उसी अवसर पर उच्च मध्यम स्थान का स्पर्श करके पाठ करें। इसी प्रकार शृङ्गार वीर और हास्य इन तीनों रसों में षड्ज्या अथवा आर्षभी के अंश को लेकर उसी में उदात्त और कम्पित स्वरों से पाठ करना चाहिए। इसी प्रकार करुण रस में निषादवती अथवा गान्धारी के स्थायो स्वर का अवलम्बन करके अनुदात्त स्वर से पाठ करें, बोभत्स रस में धैवती के अंश स्वर का आश्रय लेकर स्वरित वर्ण से पाठ करें और भयानक रस में उसी घैवती के अंश स्वर का आश्रय कम्पित स्वरों से पाठ करना चाहिए। इस प्रकार आगे को जातियों के विनियोग के अनुसारी स्वरों के अनुवाद के द्वारा उदात्तादि वर्णों में तात्पर्य है, न कि स्वरों में। उन स्वरों का उद्देश प्रयोजन षष्ठ अध्याय में अलग दिया गया है-अन्तरालाप- ग्रहणमिति॥ १. ख. ग. वात्सल्य। २. ख. ग. कम्पितैवणीः पाठ्यमुपपादयेदिति। ना० शा०-७४

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वाठपशास्वरे

द्विविधा काकुः साकाक्षा निराकांक्षा चेति वाक्यस्य साकाक्ष- निराकांक्षत्वात् ॥ १०९॥ अनियुक्तार्थकं वाक्यं साकांक्षमिति संज्ञितम्। नियुक्तार्यं तु यद्वाक्यं निराकांक्षं तदुच्यते ॥ ११० ॥

एवं काको: स्वरूपोत्पत्ति प्रतिपाद्य तस्या अर्थविषये व्यापारं बशंयम्मुद्वेश- क्रममप्यनुसर्तुमाह-द्विविधा काकुरिति । वाक्यस्येति-साकाक्षं यत्र वाक्यं तत्र साकाक्षा काकु:, तथा वक्तृगता वाकाक्षा वाक्य उपचयंते। सा च प्रकरणादिबलान्निश्चीयते। विशिष्टविषयत्वं चाकांक्षायास्तत एवागम्यते। तवाह-अनियुक्तार्थकं वाक्यमिति। यादृशो वाक्यात्स ङ्गेत बलेनार्थ: प्रतीयते तादृश एव यत्र न्यूनाधिक: प्रमाण- वलेन निर्णययोग्यस्तदवावयं निराकांक्षं तद्विपरीतं साकाङ्क्षम्॥ ११०॥

४. काकु अभिनव-इस प्रकार काकु के स्वरूप और उत्पत्ति का प्रतिपादन करके अब उसके अर्थ के विषय में व्यापार दिखलाते हुए उद्देश क्रम का अनुसरण करने के लिये कहते हैं- अनुवाद-वाक्य के साकाङ्क्ष और निराकाङ्क्ष रूप होने से काकु दो प्रकार की होती है-साकाङ्क्षा और निराकाङ्क्षा। अनुवाद-जहाँ पर वाक्य साकाङ्क्ष होता है वहाँ साकाङक्षा काकु होती है, और वक्तुगत आकाड्क्षा का वाक्य में उपचार रहता है, उस आकाड्क्षा का प्रकरणादि के बल से निश्चय होता है और आकाङ्क्षा की विशिष्ट विषयता की अवगम प्रकरण के बल से होता है। इसी बात को हम कारिका के द्वारा कहते हैं- अनुवाद-जहाँ पर पूर्णरूप से अर्थ प्रकट नहीं होता अर्थात् जहाँ संकेत के बल से अर्थ की प्रतोति होती है, वहाँ साकाङ्क्ष काकु होती है। और पूर्णरूप से अर्थ प्रकट करने वाला वाक्य 'निराकांक्ष' कहलाता है॥ १११ ॥ अभिनव-जिस प्रकार के वाक्य से संकेत बल के आधार पर अर्थ की प्रतीति होती है, उसी प्रकार का वाक्य जहाँ पर न्यून या अधिक रूप से प्रमाण के बल से नि्णय के योग्य है, वह वाक्य निराकाङक्ष है और उसके विपरीत अर्थवाला वाक्य साकाङ्क्ष है॥ १११ ॥ १. ख. साकाङ्क्षकमिति।

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समदशोउ्याबः ५८७

*तत्र साकांक्षं नाम तारादिमन्द्रान्तमनियुक्तार्थमनिर्यातितवर्णा- लड्कारं कण्ठोरस्थानगतम्। निराकांक्षं नाम नियुक्तार्थ निर्यातितवर्णा- लक्कारं शिरःस्थानगतं मन्द्रादितारान्तमिति ॥१११॥ एवं वाक्यस्य स्वरूपं प्रतिपाद्य तन्निष्ठां काकुमभिधातुमाह-तत्र साकाङ्क्ष- मित्यादि। अनियुक्तार्थं यत्साकांक्षमुक्तं तन्मन्व्रोपक्रमं तारसमाप्तिकं पठनोयमिति। सर्वाणि क्रियाविशेष णानि कियन्ति यत्र तारतेत्याह कण्ठोरःस्थानगतानोति। तथा वर्णा उवात्तावयोऽल क्वाराइचोच्चनी बदोप्तादयो परिसमाप्ता अर्घस्पृष्टयैव त्यक्ता यत्रेति क्रियाविशेषम्। एवंभूतो यः क्रियाविशेषणत्वेन वाक्ये पाठ्यमाने ध्वनिधमं- विशेषः सा काकुः। यदि वा सामाधिकरण्येनैव व्याख्येयम्। धर्मो हि न स्वतन्त्रो भाति अपि तु धर्ममिनिष्ठ एवेति, तत्राकांक्षा अर्थान्तर एवातदथगत एव विशेषे तवर्थाभावे। तथा च-यद्रामेण कृतं तदेव कुरुते द्रोणात्मजक्रोधनः। इस प्रकार वाक्य के स्वरूप का प्रतिपादन करके अब वाक्यनिष्ठ काक का अभिधान करते हैं- अनुवाद-उनमें साकाङ्क्ष काकु तार स्वर से लेकर मन्द्र स्वर पर समाप्त हो जाता है और अनियुक्ताथंक वाक्य जिसमें वर्ण और अलद्कार अनिर्यातित है वह कण्ठ एवं उरःस्थानगत होता है और निराकाङ्क काकु नियुक्तार्थक एवं निर्यातित वर्णालङ्कार से युक्त शिरःस्थानगत मन्दांदि से प्रारम्भ कर मन्द्राम्त पर्यन्त होते हैं। अभिनव-जिस अनियुक्तार्थक वाक्य को साकाङ्क्ष कहा गया है उसे मन्द्रादि स्वर से प्रारम्भ करके तार स्वर से समाप्ति करते हुए पढ़ना चाहिए। यहाँ समस्त क्रिया विशेषण कितने हैं जिन पर तारता है, इस पर कहते है कि कण्ठ और उरस स्थान में है। उदात्तादि वर्ण और उच्च, नोच, दोप्त अलक्कार जहाँ अपरि समाप्ति दशा में अर्ध स्पष्ट रूप में छोड़ दिये जाते हैं वे क्रिया विशेषण हैं। इस क्रिया-विशेषण के रूप में पाठ्यमान वाक्य में ध्वनिगत जो धर्म-विशेष है, वह 'काकु' है। अथवा ध्वनिरूप है, इस प्रकार सामानाधिकरण्य से हो व्याख्येय है। धर्म स्वतन्त्र नहों होता, अपितु धर्मि में हो रहता है, वहाँ आकांक्षा अर्थान्तर अर्थात तदर्थगत होतो है अन्यथा अतदर्थगत होतो है अथवा विशेष अर्थ में अथवा विशेष अर्थ में न रहने पर भी होती है। जैसे- "जो राम ने किया था, वही क्रोधी द्रोण पुत्र अश्वथामा करता है।" १. ग. अत्र साकाड्क्षं भन्द्रादितारान्तम्। क-भ. तब साकांक्षा नाम वाच्यम्। २. क. (डि०) विशाकांक्षा नाम नियु कार्थ।

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नाटपशाएच्रे

अत्र काकुः। कृतमित्युदातकम्पितवर्णस्योच्चदोप्तालड्कारस्य चासमाप्त्या अतोऽप्यधिक कुर्त इति काकुप्रभावादर्थान्तरे गतिः। 'स एष दशकन्धरमिति' इलोके 'तवात्मन इहाङ्गव' इत्यत्र साकाक्षा काकु: स्वगतान् वालिपुत्रोचितान्वि. शेषानपंयति। 'स्वस्था भवन्ति मयि जीवति' इत्यत्र साकांक्षा काकुर्भावनारपं स्वभावमाह, वचनोच्वारणं त्वर्ये संभावनां विवषतावश्यं निषेधात्मनो विषयमपंयति। तदिय मर्थाभिप्रायसमर्पकामितवरूवार्थकाकु। साकांक्षा। एतट्विपरीता निराकांक्षा, तस्या: शिरस्यान एव मन्दत्वं तारताप्रतिस्थानं, ह्यत्तरोत्तरतारत्वमधराधरमन्व्रत्वं च वक्ष्याम: । यहाँ काकु है। 'कृतम्' यह उदात्त और कम्पित वर्णों की उच्च और दीप्त अलद्वारों को परिसमाप्ति नहीं है। अतः राम से भी अधिक द्रोणपुत्र करता है, इस प्रकार काक के प्रभाव से अन्य अर्थ को प्रतीति होती है। 'स एव दशकन्धरं कृतवतोऽपि कक्षान्तरे गतः स्फुटमबन्ध्यतामघिपयोषि सान्ध्यो विधिः। तदात्मज इहाङ्गदः प्रहित एष सौमित्रिणा क्व स क्व स दशाननो ननु निवेद्यतां राक्षसाः॥ इस श्लोक में 'वालि के पुत्र अङ्गद को' इस अंश में साकांक्ष काकु है जो स्वगत वालिपुत्र के उचित विशेषताओं का अर्पण करतो है। इसी प्रकार- 'स्वस्था भवन्ति मयि जीवति धार्तराष्ट्रा:' अर्थात मेरे जीते जी धृतराष्ट्र के पुत्र स्वस्थ हों, यह कैसे हो सकता है। यहाँ साकाङ्क्ष काकु है। जो भावना रूप अपने भाव को कहती है। यहाँ पर वाक्य का कथन अर्थ के विषय में सम्भावना करते हुए अवश्य हो निषेधरूप विषय का अर्पण करता है। इस प्रकार यह अर्थ के अभिप्राय का समर्पक अभिनय रूप साकांक्ष अर्थ काकु है। इसके विपरीत निराकाङ्क्ष काकु है। उसके शिरः स्थान में तारता का प्रतिष्ठापक मन्द्रत्व है। इसमें उत्तरोत्तर तारता और अपराधर मन्द्रता है, यह आागे कहेंगे। १. स एष वशकन्बरं कृतवन्तोऽपि कक्षान्तरेशगतःसफुटमबन्ध्यतामथयोषिसान््यो विधिः। तदात्मज अङषा प्रहित एव सौमित्रिणा। कव स वव स दशाननो वनु विवेध्यतां राक्षसः।

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ससदशोउ्याय:

अथ षडलक्वारा नाम- उच्चो दोप्तश्च मन्द्रश्च नोचो द्रुतविलम्बितौर। पाठ्यस्यैते हयालड्वारा लक्षणं च निबोधत ॥ ११२ ॥ उच्चो नाम शिरःस्थानगतस्तारस्वरः' ।स च दूरस्थाभाषण- विस्मयोत्त रोत्तरसं जल्पदू रा ह्वा न त्रा स न बा घ द्ये षु । अल पर्याप्तं काको: स्वरूपं येन संपाध्ते सोडलक्कारः। तत्स्वरूपं च स्थान- त्रयस्य प्रत्येकमूर्ध्वाधोमध्यकल्पनया उदात्तानुवात्तस्वरितकम्पितनिर्वाहाद। तत्र मध्यो भागस्ताववनावेशे सर्वत्र स्थित एव। इत्यावेशेनोर्ध्वमधरं वा स्थानत्रयस्य प्रत्येकमवलम्ब्यत इति षडलङ्कारा भवन्ति ॥ ११२ ॥ ५. अलङ्कार अनुवाद-अब छः अलद्धारों के नाम कहते हैं- उच्च, दोप्त, मन्द्र, नीच, द्रुत और विलम्बित ये छः पाठय के अलङ्कार हैं। अब इनके लक्षणों को समझिये ॥ ११३॥ अभिनव-जो पर्याप्त रूप में काकु के स्वरूप का सम्पादन करता है, वह अलद्कार है। उन तीनों स्थानों में प्रत्येक की ऊर्ध्व, अधः एवं मध्य की कल्पना के द्वारा उदात्त, अनुदात्त, स्वरित और कम्पित स्वरों के निर्वाह से उसका स्वरूप निष्पन्न होता है। उनमें मध्य भाग आवेश के अभाव में सभो स्थानों में विद्यमान है। किन्तु आवेश के द्वारा ऊर्ध्व भाग अथवा अधो भाग तीनों स्थानों में प्रत्येक का अवलम्बन करने से छः अलङ्कार बनते हैं ॥ ११३॥ १. उच्च अनुवाद-शिरः स्थानगत तारस्वर उच्च कहलाता है। वह दूरस्थ पुरुषों से सम्भाषण, विस्मय, उत्तर-प्रत्युत्तर के संजल्प, दूर से आह्वान, त्रासन तथा बाषा आदि में उसका उपयोग किया जाता है। १. क. (ट०) अथालङ्काराः । ख. अथ षडलंकारा। २. क. (टि०) नोच द्रुतविलम्बिताः। ३. ग. तारः श्वरः । ४. क. भ, बाषाक्रृष्टकलहाभिवानेषु भावेषु।

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नाटयचारवें

दोप्तो नाम शिर:स्थानगतस्तारतरः, स 'चाक्षेपकलहविवादामषं'- क्रुष्डावर्षण क्रोष शोर्य दर्पतोक्ष्रक्षाभिधान निर्भतर्सनाक्रन्दितादिषु। मन्द्रो नाम 'उरःस्थानगतो निर्वेदग्लानि"चिन्तौत सुक्यदैन्प- व्याधिक्रोडागाढरास्त्रस्तमूर्छा म वगु ह्यार्थव चनादिषु। नोचो नाम उरःस्थानगतो मन्द्रतरः, स च स्वभावा-

द्रुतो नाम कण्ठगतः स च त्वरितः, लल्लनमन्मनभयशोत ज्वरत्रासायस्तात्ययिक कार्या वेद नाविषु। २. दोप्त अनुवाद-दोप्त स्वर शिरःस्थानगत तारतर अर्थात् अधिक तार होता है, इसका उपयोग आक्षेप, कलह, विवाद, अमर्ष, क्रष्ट, आकर्षण, क्रोष, शौयं, वर्प तीक्ष्ण, रुक्ष, अभिधान, निर्भत्सन तथा आक्रन्वन आदि में होता है। ३. मन्द्र अनुवाद-मन्द्र स्वर उरः स्थान से उत्पन्न होता है इसका उपयोग निर्वेद, ग्लानि, चिन्ता, औसुक्य, दैन्य, व्याधि, क्रोड़ा, गाढ़ शस्त्रक्षत, मूर्च्छा, मद, एवं गुह्यार्थ कथन में होता है। ४. नीच अनुवाद-नीच स्वर उरःस्थान गत मन्द्रतर होता है। इसकी योजना स्वाभाविक भाषण, व्याधि, शम, अमार्त, त्रस्त, पतित, मूच्छित आदि में की जाती है। ५. द्रुत अनुवाद-द्रुत नामक स्वर कण्ठस्थानगत त्वरित उच्चारित किया जाता है, इसका उपयोग बच्चों को लाड़-प्यार करने में, मनाने में, भय, शीत, ज्वर, त्रास, आयस्त, अत्ययक कार्य तथा आवेदन आदि में किया जाता है। १. क-न. चाक्षेपवादविवाद। २. मर्षोत्कुष्टा। ३. ख. निभत्सनादिषु। ४. क. (टि०) उरसि मन्द्रस्वरः । ५. ख. ग. शङ्काचिन्ता। ६. क. उरःस्थानस्थो ।

  1. क. (टि०) कण्ठगतः । मण्डगतस्वरितोच्चगतस्वरकृतिः । स च सखछितवल्गनमद्बशोतज्बरात्तन्रस्तायस्तान्यैक कार्या वेदनादिष्।

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विलम्बितो नाम 'कण्ठस्थानगतस्तनुमन्द्रः, स चशृङ्गार- करुणवितर्कित विचाराम ' र्षासूयिताव्यक्कार्य प्रवादलज्जाचिन्तातर्जन'विस्म- यदोषानुकीतंनवीर्घरोग "निपीडनादिष् ॥ ११४ ॥

तभ् शिरस्यधोभागे तार उच्यते दूरस्थाभाषणादौ, स विषयोऽत्र स्वरका- कोरित्युक्तम्। विस्मयावगतौ तु सैव रसकाकु:, परस्य त्रासनाभिप्रायेण तु सैब विभावकाकु: । स्वरकाकोरेव श्रुतिकाकुश्चेति भेदेन शिरस्येव ऊर्ध्वंस्तारतम आक्षेपादौ, तारशब्द: प्रकर्षोपलक्षणम्। अत्र ह्याक्षेपादौ यथावस्थं श्रुतिविभावरसकाकुभेवत्रयं विभजनीयम्।

६. विलम्बित

अनुवाद- विलम्बिस स्वर कण्ठ स्थानगत क्षीण मन्द्र होता है। शृङ्गार, करुण, वितर्क, विचार, आमर्ष, असूया, अव्यक्तार्थ प्रवाव, लज्जा, चिन्ता, तजन, विस्मय, दोष-कथन, लम्बी बीमारी, निपीड़न आदि में इसकी योजना की जाती है॥ ११४॥ अभिनव-उनमें शिर के अधोभाग में दूरस्थ व्यक्ति के साथ आभाषण में 'तार' स्वर कहा जाता है। वह स्वर काकु का विषय है, यह कहा जा चुका है। विस्मय का ज्ञान होने पर वही रस काकु है और दूसरों के त्रासन करने के अभिनय में वही विभाव काकु है। स्वर काकु से हो श्रुतिकाकु होता है जो उससे भिन्न होने से आक्षेप आदि में ऊध्व अर्थात् तारतम होता है जिसका स्थान शिरस् है। यहाँ तार शब्द प्रकर्ष का उपलक्षण है। यहाँ आक्षेप आदि में अवस्थाओं के अनुसार श्रुति, विभाव एवं रस के भेद से तीन रूप में काकुओं का विभाग करना चाहिए।

१. ख. कण्ठस्थानगतः मन्द्रः । ग. कण्ठस्थानस्थो । २. ख. शरृङ्गारवित्तर्कितः । ग. शुङ्गार वितर्क। ३. क. (टि०) मर्षाश्वसित। ४. क. (डि०) विस्मित । ५. क. (वि०) बोघंरोष।

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नाटयसास्ने

उरस्यूध्वंभागे स मन्द्रः, उरस्येव नीचभागे मन्द्रतमो नीचः। दैन्ये काकुत्विरूपतामेति-स्वचित्तवृत्तचर्पणाद्रसकाकुः, परस्य रूपोत्पावनाद्विभाव- काकु:। उभयस्यापि तत्र प्रधान्येनादरणात्, अभ्यत्र तूभयस्यानावरणात्प्रधानाशिनेव व्यपदेशः । स्वभावाभाषणं यत्र कश्चिदावृत्तकण्ठस्वर एव वक्ता भवति, त्रासेन पतितः त्रस्तपतितः त्रासावसरे तु दीप्तैव काकुभवति। कण्ठगत इति कण्ठस्थाने उर्ध्वभागे निष्पन्नः तेन स्थानभेद एवालङ्कारतवे प्रयोजकः। अत एव त्वरित इत्यनेन पुनलंयविधानम् । लल्लं सविलासं, लडं विलासं लातिति विविबन्ते कर्मण्युपपदे लडयोरैक्यमिति। मम्मनमव्यक्तं अहमेव मनो म्ता यत्रेति, अनेनाधूयमाणानुनासिकोपलक्षितमित्यपरे। "लल्लमन्मनौ नायिकागतौ बालविनोवनसान्त्वनादौ, मुञ्चेत्येवं प्रायपराभि- योगान ड्गोकरणादौ च" इत्युपाध्यायाः। मन्द्रापि काकुशचात्र भवतीति संग्रहश्लोके वक्ष्यते।

जो उरस् के ऊर्ध्व भाग में है वह मन्द्र स्वर है और जो उसी उरस् के अधोभाग में है। वह अत्यन्त मन्द्र (मन्द्रतम) नीच स्वर है। दैन्यावस्था में वही काकु दो रूपों को प्राप्त करती है-अपनी चित्तवृत्ति के अर्पण करने से रसकाकु तथा दूसरे के रूप में उत्पादन करने पर विभाव काकु होती है। प्रधान रूप से यहाँ दोनों का आदर अन्यत्र (अन्य स्थानों पर) इन दोनों का आदर न किये जाने से प्रधान के अंश से व्यपदेश होता है। जहाँ पर आवृत्त कण्ठ स्वर वाला (संवृत स्वर से युक्त कण्ठ वाला) वक्ता होता है वहाँ स्वाभाविक आभाषण होता है। 'त्रस्तपतित' का अर्थ है भय से गिरा हुआ। त्रास के समय दोप्त काकु होतो है। कण्ठगत का अभिप्राय है कण्ठभाग में ऊर्ध्व स्थान में निष्पन्न। इस सिद्ध है कि स्थान भेद ही अल्ारता का प्रयोजक है। अत एव 'त्वरित' इस पद के द्वारा पुनः 'लय' का विधान है। लल्ल का अर्थ विलास से युक्त है। 'लड़ विलास लाति' इस अर्थ में क्विबन्त कर्म के उपपद होने पर लल्ल शब्द बनता है। ल और ड का ऐक्य है। 'मन्मन' का अर्थ अव्यक्त है, मैं ही जहाँ मानता हूँ। कुछ लोग कहते हैं कि यह अश्रयमाण से उपलक्षित है। हमारे उपाध्याय जो कहते हैं कि "लल्ल और मन्मन शब्द नायिका गत बालकों के मनोविनोद एवं सान्तवना देने आदि के उपयोगी हैं। यहाँ काकु मन्द्रा भी होती है। यह संग्रह इलोक में कहेंगे।

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अत्रानुवंध्या इलोका भवन्ति- च। तीक्ष्णरुक्षाभिनये आवेगे कन्दिते तथा॥११५॥ परोक्षस्य समाह्वाने तजने त्रासने तथा। दूरस्थानभाषणे चैव तथा निर्भर्त्सनेषु च ॥ ११६ ॥ "भावेष्वेतेषु नित्यं हि नानारससमाश्रया' । उच्चा वीप्ता दुता चैव काकुः कार्या प्रयोक्तृभिः।। ११७।। आयस्तमावेगः। आत्ययिकं शोघ्रसंपादं यत्कायंम्। कण्ठस्थाने तु नोचभागे निष्पन्नो विलम्बितः । मन्व्रत्वमविवक्षितमेव। अव्यक्तार्थ: प्रवाद :- अन्तरङ्गत इति कोके प्रसिद्धो यत्र। परे बुध्यर्ता वा न बुध्यतां वेति वक्तुरभिप्रायो भवत यम्न स्वगतं न परगतमत्रेति ॥११४॥ आयस्त का अर्थ आवेग है और आत्ययिक का अर्थ शोघ सम्पाद्य कारय है। कण्ठ स्थान में नीच भाग में निष्पन्न विलम्बित स्वर है। यहाँ मन्द्रत्व अविवक्षित है। अव्यक्त का अर्थ 'मन्मन' प्रवाद है। यह अन्तरङ्ग है, यह लोक में प्रसिद्ध है। दूसरे लोग समझें अथवा न समझे, वत्ता का अभिप्राय यहाँ न स्वगत है न परगत॥ ११४ ॥ इस विषय में कुछ आनुवश्य श्लोक है- अनुवाद-उत्तरोत्तर कथोपकथन में, परष अर्थात् कठोर वचनों के आरोप- प्रत्यारोप में, रूखे एवं तोखे (सोक्षण) विषयों के अभिनय में, आवेग में, कण्दन में, परोक्ष व्यक्ति के बुलाने में, तजन, में त्रासन (डराने) में, दूरस्थ व्यक्ति के साथ संभावण में इन भावों को प्रकट करने के लिए नाट्य-प्रयोक्ताओं के नाना रसों के आश्रित उच्च, दोप्त एवं त्रुत काकु का प्रयोग करना चाहिए ॥ ११५-११७॥ १. क-भ. अन्र इलोकाः। २. ख. ग. उतरोत्तरसंजल्पे परुषाक्षेपणे तथा। ३ क-भ. तथाक्रन्दे च नित्यशः। क-न शोते चाक्रन्विते तथा। ४. क-भ. परोक्षह्वयने चंव तर्जनत्रासनेषु च। ५. क-भ. एष नानारसोपेता नित्यमर्थप्रदर्शिका। ६. स. समाश्रयातु। ना. था०-७१

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५१४ नाटपशाए्त्रे

व्याघिते च ज्वरातें च भयातें शोतविप्लुते' नियमस्थे वितर्के च गाढ़शस्त्रक्षतेषु च ।। ११८॥ गुह्यार्थवचने चैव चिन्तारयां तपसि स्थिते। 'मन्द्रा नीचा च कर्तव्या काकुर्नाट्यप्रयोक्तुभिः॥११९॥ लल्ले च मम्मने चैव भयातें शीतविप्लुते। मन्द्रा द्रुता च कर्तव्या काकुर्नाट्यप्रयोक्तृभिः॥ १२०॥ "दृष्टनष्टानुसरणे इष्टानिष्टश्रुते तथा इष्टार्थंख्यापने चैव चिन्ताध्याने तथैव च ।। १२१।। उन्मादेऽसूयिते चंव उपालम्भे तथैव हि। अव्यक्तार्थप्रवादे च कथायोगे तथैव न ॥ १२२ ॥।

अनुवाद-व्याधि से युक्त, ज्वर से पोड़ित, भयातं, शोत से त्रस्त, नियमस्थ वितर्क, शस्त्र के द्वारा किये गये गाढ़ (गहरा) क्षत (घाव), गुह्यार्थ-कथन, चिन्ता, एवं तपस्या की स्थिति में नाट्य-प्रयोक्ताओं को मन्द्रा एवं नोच काकु का प्रयोग करना चाहिए।। ११८-११९।।

अनुवाद-लल्ल अर्थात् बाल-विनोद में, मनाने, भयातं तथा शोस से पीड़ित वशा में नाट्य-प्रयोक्ताओं को भन्द्रा एवं द्रुता काकु का प्रयोग करना चाहिए॥ १२० ॥

१. ख. चित्तविप्लुते। २. क. (टि०) गढ़ाथंवचने। ३. क. भन्दा। ख. विलम्विता चैव। ४. क. (टि०) मल्ले च मवने। ५. स. ग. दृष्ठनष्टानुसारेण इष्डानिष्टश्रुतौ तथा। ६. क. (ब) दृष्टाथं। ७. ब. चिन्तयाने । ग. चिन्ताग्रस्ते। ८. ख. ग. अव्यक्ताये प्रदाने थ। तथा लोके।

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ससवशोडध्याय:

उत्त रोत्तरसंजल्पे कार्येऽतिशयसंयुते। 'विकृते व्याघिते क्रोधे दुःखे "शोके तर्थव च॥। १२३ ।। 'विस्मयामर्षयोश्चैव "प्रहषे परिदेविते। विलम्बिता च दोप्ता च काकुर्मन्द्रा" च वै भवेत् ॥ १२४।। 'लध्वक्षरप्रायकृते गुर्वक्षरकृते तथा। उच्चा दोप्ता च कर्तव्या का कुस्तत्र प्रयोक्तृभिः ॥१२५॥ यानि सौम्यार्थयुक्तानि *सुखभावकृतानि च। मन्द्रा विलम्बिता चैव तत्र काकुविधीयते ॥ १२६॥ अलद्कारेषूच्चा दोप्ता द्रुता चेति यथायोगं स्थानत्रयमत्र स्वोकृत- मित्यर्थ: ॥१२५॥ अनुबाद-दृष्ट-नष्ट के अनुसरण में, इष्ट और अनिष्ट के शरवन में, इष्ट वस्तु के लयापन में, चिन्ता पूर्वक ध्यान में, उन्माद और असूया में, उपालम्भ में अध्यक्त अर्थ के प्रवाद में, कथा के योग में, उत्तरोत्तर सम्भाषण में, अतिशय युक्त कार्य में, विकृत एवं व्याधिप्रस्त अवस्था में, क्रोध, दुःख एवं शोक में, विस्मय और आमर्ष में, प्रहर्ष में, तथा परिदेवन में विलम्बिता, दोप्ता और मन्द्रा काकु का प्रयोग करना चाहिए ॥ १२१-१२४॥ अनुवाद-जहाँ प्रायः लघु अक्षर और गुरु अक्षर हों, वहाँ नाट्य-प्रयोक्ताओं को उच्च और दोप्त काकु का प्रयोग करना चाहिये।। १२५ ।। अभिनव-अलद्ारों में उच्चा, दीप्ता और द्रुता काकु होती है, जिसके लिए योग्यतानुसार तोनों स्थानों को स्वीकृत किया गया है ॥ १२५॥ अनुवाद-जो सौम्य अर्थ से युक्त तथा सुखकृत भावों के हेतु एवं कार्य है, वहाँ मन्त्रा और विलम्बिता काकु होती है॥ १२६ ॥

१. ख. ग. विक्षते व्याघिते खङ्ग। २. ख. ग. दुःखशोके तथैव च। ३. क०म. अयर्षे विस्मये चैव। ४. ख. ग. हषें थ। ५. ख. मन्दा । ६. अयं कलोको ख. ग. पुस्तकयोर्नास्ति । ७. ख. सुक्भावकृतानि च । क-भ. सुखनादकृतानि दै।

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५९६ नाटपचारने

यानि स्युस्लोक्ष्णरुक्षाणि दोप्ता 'चोच्चा च तेव्वपि। एवं नानाश्रयोपेतं पाठ्यं योज्यं प्रयोक्तृभिः ॥ १२७ ॥ हास्यश्ुक्कारकरुणेप्विष्टा काकुविलम्बिता। वोररौद्राव्भुतेषूच्चा दोप्ता वापि® प्रशस्यते ॥ १२८॥ भयानके सवीभरसे द्रुता नीचा च कीतिता। एवं भावरसोपेता काक: कार्या प्रयोक्तृभिः ॥ १२९॥ अथ सर्वसंग्रहार्थमाह-यानि सोम्यार्थंयुक्तानोति। सोम इव ह्ादकः सौम्य।, शाखादित्वाद्यः । सुखस्य हेतवः कार्यश्चेति सुखभावकृतशब्देन सुखस्य मावेः हेतुभि: कृतो जन्यः । स येषु तानोति समासभेदात्संगृहोतम् ॥ १२६॥ नानाअपोपेतमिति नानास्थाननिबिष्टं कृत्वेत्यर्थ:, स्थानभेव: काकूनां पर्याप्त- ताकारोत्युक्तम्॥१२८-१२९।। अभिनव-सर्व संग्रह के लिए कहते हैं कि जो सौम्य अर्थ से युक्त है। यहाँ 'सौम्य' का अर्थ सोम को तरह आह्लादक है, यहाँ 'शाखादिभ्यो यत्' से यत् प्रत्यय हो गया है। यहाँ सुख के हेतु और कार्य दोनों का सुखभावकृत शब्द से समास भेद से संग्रह हो गया है ॥ १२६ । अनुवाद-जो तीक्ष्ण एवं रक्ष भाव है, वहाँ उच्च एवं दोप्त काकु का विधान होता है। इस प्रकार नाटय-प्रयोक्ताओं को नाना आशयों से युक्त पाठय को योजना करनो चाहिये।। १२७ ।। अभिनव-'नानाश्रयोपेतम्' अर्थात् नाना आश्रयों से युक्त का नाना स्थानों में निवेश करके पाठ्थ का विधान करना चाहिए। आश्रयों या स्थानों का भेद काकुओं को पर्याप्त कर देने में कारण है॥ १२७ ॥ अनुवाद-शुङ्गार, हास्य और करुण रसों में विलम्बिता काकु इष्ट है। वीर, रौद्र और अद्भुत रसों में उच्चा और दीप्ता काकु प्रशस्त है। वीभत्स के साथ भयानक रस में नोच और द्रुत काकु स्वर कहा गया है। इस प्रकार नाट्य प्रयोक्ताओं को नाना भाव एवं रसों से युक्त काकु का प्रयोग करना चाहिये । १२८-१२९ ।।

१. क (टि०) दोप्तमुच्चं थ। दोप्तमुन्चैश्च। २. क. (टि०) चापि चंद। ३. ख. काकुयोज्या।

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सम्तदशोगध्यायः अयाङ्गानि षट्-विच्छेदोऽर्पणविसर्गोडनुबन्धो दीपनं प्रशमनमिति। तत्र विच्छेदो नाम विरामकृतः । अर्पणं नाम 'लोला- प्रमानमतुरवल्गुना स्वरेण पूरयतेव *रङ्ग यत्पठ्यते तदर्पणम्। विसर्गो नाम वाक्यन्यासः"। अनुबन्धो नाम 'पदान्तरेष्वपि विच्छेदः, अनुच्छ्- वसनं वा। दोपनं नाम त्रिस्थानशोभि वर्धमानस्वरं चेति। प्रशमनं नाम तारगतानां "स्वराणां प्रशाम्यतामवैस्व्येंणावतारणमिति"। अतः काकोरेव प्राधान्यात्तामेवोपसंहरति। अथा्गानोत्यादिना। अतः काकु को ही प्रधानता होने के कारण अर्थ उसका उपसंहार करते हैं- ६. अङ्ग अनुवाद-अङ्गछः होते हैं-विच्छेद, अपण, विसर्ग, अनुबन्ध, दीपन और प्रशमन। इनमें विच्छेव विराम के लिये होने वाला अङ्ग है। लोला से पूर्ण मधुर एवं मनोहर स्वरों से रङ्गभूमि को पूरण करते हुये जो पाठ किया जाता है वह 'अर्पण' है। वाक्य का विन्यास 'विसग' है। पदान्तर अर्थात् पदों के मध्य में विच्छेद अथवा उच्छ्वसन न हाना 'अनुबन्ध' है। तोनों स्थानों में शोभायमान वर्धमान स्वर 'दोपन' कहलाता है। तारगत अर्थात् तार में उच्च व्वनि में पहुँचकर प्रशान्त अवस्था में आये हुये स्वरों का बिना विस्तर के उतार देना 'प्रशमन' है। १. क-न. अथ षडङ्गानि। ख. अथाङ्गानि। २. ख. प्रशममिति षङ्गानि।

क. (टि०) छोलायमासानुवणॅन स्वरेण। ४. क. टि०) रसं । ५. कनन. वावयस्योसन्यासः । क. (टि०) वाक्योपन्यास: । ६. ख. पादान्त रेष्व विचछेशनुच्छासनं वा। कनभ. पदस्य विच्छेदमन्तरेणानुच्छासन। ७. क. (टि०) स्वराणामेकस्वर्यण । ८. ख. स्वरेणावतरणभिति।

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५९० नाटयशाहमे

प्रस्तावास्तरं वशयति-तत्र वर्णोच्चारगे वर्णष्वनिशुम्यो यः काळस्तवाधयो- 5ङ्गव्यवहार इति वृद्धा:, स हि षोढा काल: "ततश्च भूयान् पुनरादिमध्यौ" भयान् पुनरित्ययं हि विच्छेदः। आदौ मध्यः स्वल्पो मध्यान्ते चार्पणं वाक्ये पूर्व भयाम्मध्ये द्रुतश्च विपरोतको यः स विसर्गः । बहुषु द्रतोऽथ मध्यो मनाग् त्रुतोऽम्तेऽनुबन्धः स्पातृ।, त्रिस्याने त्रुतमध्यविलम्धितयुग्दोपनं सवारोहि विपरीतं प्रशमनं स्यात, लयत्रयं चंकरूपनिर्वाहादिति संग्रहकार:। एतम्मतेनैव लक्षणानि व्याचक्षते। एतच्चासत्। ब्रुतमध्यादिलयैरेवास्यार्थस्य न तत्वाम्न च लयव्यवहारसाम्पे कालस्येति नियमकारणमस्ति । किच लयवैषम्यस्य वाक्यचंतन्यापेक्षया च भागत्रयकल्पनयैव भेवा उत्तका:, भुजङ्गविजुम्भितादिवाकयेड- नग्तभागसंभावनात्। भागत्रये च द्रुतमध्यविलम्बितानां द्विभेदत्रिभेवत्वानन्त्ये षट्- संख्यानियमविप्लवः। "क्वाकाय" इति हि इलोकप्रथमखण्डेवु मध्यमलयो भूयोपि

अभिनव-अब दूसरे प्रस्ताव को दिखाते हैं कि वहाँ वर्गों के उच्चारण में वर्ण ध्वनन से शून्य जो काल में उसका आश्रय अङ्ग है, ऐसा वृद्धों का ध्यवहार है, वह काल छः प्रकार का होता है। "ततश्च भूयान् पुनरादिमध्यौ" यहाँ 'भूयान् पुनः' यह विच्छेद है। आदि में वर्ण मध्य है और मध्य के बाद अन्त में पुनः उनका अर्पण है, वाक्य में पहले 'भूयान्' वर्ण है, मध्य में द्रुत है, और जो विपरीत है बह 'विसर्ग' है। जहाँ बहुतों में पहिले द्रुत है, बीच में मनाक् द्रुत है। वहाँ अन्त में अनुबन्ध होना चाहिए। तोनों स्थानों में द्रुत, मध्य और विलम्बित से युक्त दीपन अर्थात् सदा आराही स्वर होनी चाहिए और इसके विपरीत प्रशसन होना चाहिए। इस प्रकार तीनों कयों का युगपत् निर्वाह होना चाहिए। यह संग्रहकार का कथन है।

इस पर आचार्य कहते हैं कि यह ठोक नहीं है, क्योंकि द्रुत, मध्य आदि लयों से ही इस अर्थ का न तत्त्व से और न लय एवं व्यवहार के साम्य होने पर काल का अङ्कतवेन व्यवहार होता है, इस प्रकार नियम में कारण है। और भो लय वैषम्य के वाक्य-चेतन्य को अपेक्षा से, न कि भागत्रय को कल्पना से भेद कहे गये है। क्योंकि भुजङ्गविजुम्भितादि वाक्यों में अनन्त भाग हो सकते हैं। उक्त भागत्रय मानने पर द्रुत, मध्य, विलम्बित में प्रत्येक के कभी दो भेद और कभी तीन भेद होने से अनन्त भेद हो जाने से छः संख्या के नियम में विप्लव हो जायेगा। "क्वाकाय शशलक्ष्मणः" इस क्लोक के प्रथम खण्ड में मध्य लय अधिक दिखाई देता

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५९९

एषां च रसगतः प्रयोग :- तत्र हास्यभृङ्गारयोराकांक्षायाम- पंणविच्छेददीपनप्रशमनयुक्तं पाठ्यं कार्यम्। दीपनप्रशमनयुक्तं करुणे। विच्छेवप्रशमनदीपनानुबन्धबहुलं वीररौट्राद्भुतेषु, विसर्गविच्छेदयुक्तं बोभरसभयानकयोरिति। दृश्यते। सेत्यादिषु पाइचात्यखण्डेषु तत्स्मरणजनितसुखविश्रान्तिवायिषु विलम्बित इति द्विलयभेद: प्रयोग: । भागत्रयकलनायामपि साम्येन वैषम्येण चानस्तप्रकारता भवतीति कथं स्यात्। कस्मावेतत्सवं लयाभिधानेनैव संगृहीतम्। तस्मात्सूत्रस्था- नोयपवरस्नानां पाठकाले स्वादावुक्ततद्ुमंषट्कमङ्गषट्कमुच्यते। तथा च मध्ये त्रुटितत्वमत्रुटितत्वं वा तावन्तौ विच्छेवानुबन्धौ वा, पोवरत्वमपीवरत्वं वा, इमावर्पणविसगों वा, आरोहणमवरोहणं वा, एते दीपनप्रशमने। एवं भावाभावत, उपचयोपचयतः, आरोहावरोहतश्च षड्भेदो नादः। वाक्यस्य श्यासं व्यजनमनावरणं तम्नादस्येति यावत्। वैस्वयं स्वरत्वेन विहितेषु अन्तरालश्रुतिविशेषेषु ध्वनिवि- संवावनाद्भवतीति सवंत्राम्यूह्यम्। है, और 'सा बाला वयमप्रगल्ममनसः' इस पाश्चात्य खण्ड में 'उसके स्मरण से उत्पन्न सुख में विश्रान्तिदायी' अंश में विलम्बित लय है। इस प्रकार विलय भेद है। भागत्रय को साम्य और वैषम्य के द्वारा आकलन करने पर अनन्त भेद हो जायेंगे यह कैसे होगा ? क्यों नहीं इन सबका लय के कथन से ही संग्रह हो गया। इसलिए सूत्रस्थानीय पद रत्नों के पाठ-काल में आदि में कथित धर्म षटक को अङ्गषट्क कहा जाता है। तथा मध्य में त्रुटितत्व या अत्रुटितत्व है, उतने ही जो विच्छेद और अनुबन्ध हैं, अथवा पीवरत्व और अपीवरत्व है। अथवा अर्पण एवं विसर्ग है अथवा आरोहण और अवरोहण है। वे सब दीपन और प्रशमन है। इस प्रकार भाव-अभाव, उपचय-अपचय, आरौहावरोह के कारण नाद छः प्रकार के होते हैं। वस्तुतः वाक्य का जो न्यास, त्यजन एवं अनादरण है वह नाद का हो न्यास, त्यजन और अनादरण है। स्वर के रूप में विहित अन्तराल विशिष्ट श्रुतियों में जो वैश्वयं है वह ध्वनिगत विसम्बाद से होता है। यह सवंत्र समझने चाहिए। १. ब. वाक्यं। १. ख. ग. करुणवीराद्भुतेषु समाकाङ्क्षाविच्छेदप्रक्षमनार्पणदीपनानुबन्धनबहुलं पाठ्यं प्रयोज्यम्। क-न. वोररौद्रादुभुतेषु सत्त्वाकांक्षयाविच्छेदोछेवन।

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नाटपशाइणे

सर्वेषामप्येषां मन्द्रमध्यतारकृतः । प्रयोगस्त्रिस्थानगतः। तत्न दूरस्थाभाषणे तारं शिरसा, नातिदूरे मध्यं कण्ठेन, पाश्वतो मन्द्रमुरसा प्रयोजयेत्यपाठ्यमिति मन्द्राततारं न गच्छेत्, ताराद्वा मन्द्रमिति ॥१३०॥

हास्यावय: शब्दास्तववथभिचारिणोऽपि स्वीकुयते। ततशच तद्वभिचारिणोड न्यरसान, रसान्तरेऽपि तदा व्यभिचार्याधये वा काकुरिति मन्तव्यम्। सर्वेषामित्यादिनाङ्गानां मूलमूतं स्थानभेदं स्मारयति। तत्र दूरस्थ इत्याबिना विनियोगवाच्यानां लक्ष्ये एकवाक्यतां सूचयति।

अनुवाद-इसका रसगत प्रयोग होता है-उनमें शुङ्गार और हास्य रस में आकाङ्क्षा में अपंण विच्छेद, दीपन, एवं प्रशमन से पाठय करना चाहिये। करण रस में दीपन एवं प्रशमन से युक्त तथा बीर, रौद्र और अद्भुत रसों में विच्छेद प्रशमन, बीपन और अनुबन्ध बहुल पाठ्य करना चाहिये। बोभत्स और भयानक रस में विसगं और विच्छेद युक्त पाठ्य होना चाहिये। अभिनव-हास्यादि शब्दों से रस और उनके व्यभिचारी भावों का ग्रहण होता है उससे भो उनके व्यभिचारी भावों तथा अन्य रसों को तथा रसान्तर में भी अथवा व्यभिचारिभावों के आश्रय में काकु होता है, ऐसा मानना चाहिये। मनुवाद-इन सभी अङ्गों का मन्द्र, मध्य और तार इन तीन स्थानों में प्रयोग होता है। उनमे किसो दूरस्थ व्यक्ति के साथ आभाषण में शिर से उद्भूत तार स्वर का, अत्यन्त दूर न होने पर कण्ठ से उद्भूत मध्य स्वर का और पाइवं अर्थात बगल के व्यक्ति के साथ उरस् से उद्भृत भन्द्र स्वर से पाठघ करना चाहिये। मन्द्र से तार स्वर अथवा तार से मन्द्र स्वर पर नहीं जाना चाहिये ॥। १३० ॥ अभिनव-'सर्वेषाम्' इत्यादि के द्वारा अङ्गों के मूलभूत स्थान भेद को दिखाते हैं। 'तत्र दूरस्थ' इत्यादि के द्वारा विनियोग वाक्यों के लक्ष्य में एकरूपता को सूचना देते हैं।

१. ख. ग. मनयमध्यता रव्यवस्थारयामिश्यानगतः प्रयोग: । २. ब. मखातारं गच्छेतारावा मन्द्रमिति। ग. मन्द्रात्ारं गण्छेतु।

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६०१

काएषा च द्रतमध्यविलम्बितास्त्रयो लया 'रसेषूपपाद्याः। तत्र हास्यशृङ्गारयोमंध्यलयः, करुणे विलम्बितो, वीररौद्राद्भुतवीभत्सभ- यानकेषु द्रृत इति। तथा हि शृङ्गारे यदुवात्तस्वरितमुक्तमपणविच्छेदाद्यङ्गजातं विलम्बित चालङ्वार: तद् दूरस्थाभाषणे कर्त्तव्ये शिरस्थाने षड्पञ्चमयोरम्यतरस्थायिस्वरा- अयेणांशस्वरविभावचतुश्चतुष्कसम्मिअं कतव्यमित्येवं तात्पर्यॅणेवं व्याख्येयम्। अन्यथाभाषणं दूरस्थे शिरसेत्यादिना पौनकलय स्यात्। अथ दोपनप्रशमनयो- बंवतव्यशेषमाह-मन्द्रातारं न गच्छेदिश्यादि। मन्द्रतरात्तारं तारतमाम्मन्वरं चेत्यथं:। उद्देशग्रन्थ एव केचिल्लया विरामाश्चेत्यभिधीयन्ते । अभिनव-शृङ्गार रस में जो उदात्त और स्वरित को अपण एवं विच्छेद आदि अङ्गों को तथा विलम्बित को अलक्कार कहा गया है, वह दूरस्थ पुरुष के साथ आभाषण में कर्त्तव्य हैं। शिर:स्थान में षड्ज और पञ्चम में से किसी एक के स्थायी स्वर के आश्रय के द्वारा अंश स्वर के विभाग से चार-चार को मिलाकर करना चाहिए। इस प्रकार के तात्पर्य में इसकी व्याख्या करनी चाहिए। अन्यथा तो दूरस्थ व्यक्ति के साथ आभाषण शिर से करना चाहिए, इत्यादि सभी कथन पुनरुक्त हो जायेंगे। अब दीपन और प्रशमन के विषय में अवशिष्ट वक्तव्य को कहते हैं कि-मन्द्र से तार पर नहीं जाना चाहिए इत्यादि। इसी प्रकार मन्द्रतर से तार को और तारतर से मन्द्र को भी नहीं करना चाहिए॥। १३०।। अनुवाद-इनमें द्रुत, मध्य और विलम्बित इन तोनों लयों का रसों में उपयोग करना चाहिए। उसमें शृङ्गार और हास्य रस में मध्य लय, करुण रस में विलम्बित लय तथा वीर, रौद्र, अद्भुत, बीभत्स और भयानक रसों में द्रुत लप का प्रयोग करना चाहिए॥ १३१॥ अभिनव-कुछ लोग उद्देश ग्रन्थ से ही लय और विरामों को कहते हैं।

१. क-भ. रसेषूपयोज्याः । २. कनम. वीभत्सकरूणयोषिषम्बितः। वा० शा०-७६

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६०२ नाटयकाने

अथ विराम: अर्थसमाप्तौ कार्यवशान्न छन्दोवशात्। कस्मात्, 'दृश्यन्ते ह्योकष्वित्रिचतुरक्षरा विरामाः। यथा- किं ! गच्छ, मा विश सुबुर्जन ! वारितोऽडसि काय स्वया न मम सर्वजनोपयुक्तं। सूचासु चाङ्कुरगते तथोपचारे- व्वल्पाक्षराणि हि पदानि भवन्ति काव्ये ।। १३२।। अन्ये स्वाहु :- कालस्य सर्वस्यापरिभाव्यत्वान्नोद्दशेन प्रयोजनं मतिमन्तस्तु मन्यम्ते। विच्छेदेनैव च एष लय एतत्स्वीकृतः । विच्छेदो विराम:, स थ कियन्तं कालं यावदीति लयोऽपि तेनैव स्वोकृतः । तेन विच्छेवस्य परोक्षेयं कवितेति। अन्य लोग तो कहते हैं कि-काल के सर्वथा अपरिभाव्यमान होने से उद्देश से कोई प्रयोजन नहीं है, ऐसा बुद्धिमान् लोग मानते हैं। विच्छेद से हो इस लय को स्वीकार कर लिया है। विच्छेद का अर्थ है विराम। यह विराम कितने समय तक रहता है ? इस प्रश्न से लय भी मान लिया गया है। इससे विच्छेद को यह परीक्षा कह दी गई। अनुवाद-अर्थ को समाप्ति के लिए काय के अनुसार विराम किया जाता है, केवल छन्द के अभिप्राय से विराम नहीं किया जाता है। क्योंकि एक, दो, तीन, चार अक्षरों पर भी विराम देखे जाते हैं। जैसे- कि, गच्छ, मा विश, सुदुर्जन, वारितोऽसि, कार्य, त्वया न, मम सर्वजनोपभुक्तम्। सूचासु, चाङ्कुरगते च तथोपचारेष्व- ल्याक्षराणि हि पदानि भवन्ति काव्ये।। "क्या है, जाओ, आगे मत बढ़ो, हे दुर्जन ! तुम रोक दिये गये हो, सब जनों के उपयोगी मैरा काय तुमसे नहीं होगा। काव्य में सूचा और अक्कर अभिनयों में तथा उपचार में स्वल्प अक्षरों वाले पद होते हैं।" यहाँ एक, दो, तीन, चार अक्षरों पर विराम देखे जाते हैं। १. ख. दृश्यते। २. ग. शोक शु्च कुर गते च तथोपचारे। कनन. सूचाडकुरामिनयतेषु। ३. ग, कायें।

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तश्रेति विच्छेदे अर्थसमाप्तिनिमितं विरामो वास्य कार्यः। अर्थोग्वान्तर- वाक्यार्थ। न चछम्दोवशादित्येन कविना प्रयोगपरतन्त्रेण भाव्यम्। तवा तेन स तदवसरोचितविरामवति बृत्ते ग्रहणप्रयत्नः कार्यः। प्रयोगेन कविपरतन्त्रेण न भाव्यमित्यत्रापि तेनाथवशाद्विराम: कार्य इत्याल्यातम्। संख्यात्र नियमोपलक्षणं एकद्वित्रीति। किमित्येतावत्यथान्तरवाक्यार्थे विच्छेदः । किं गच्छेति। नन्वेवमेकवाक्यत्वाभावो दूषणमित्याशंक्य प्रत्युत भूषणमेतदित्युपपाद- यन्नाह-"सूचासु चाङूरगते च यथोचारेव्ल्पाक्षराणि हि पदानि भवन्ति काव्ये" इति। बहुप्रकारैः सूचाभिनयैः अङ्करप्रकारैश्च युक्तमित्यं काव्यं भवति यदि स्वल्पा- क्षराणि पदान्यसमस्तानि भवन्ति। बह्वक्षरपदे, दरिद्राशच कियन्तस्ते इत्यादौ न मध्ये सूचाङ्रयोरुपर्पत्ति:।। १३२।। अभिनव -विच्छेद में अर्थ की समाप्ति के लिए काय के निमित्त विराम किया जाता है। अर्थ पद से अभिप्राय है अवान्तर वाक्य का अर्थ। 'न छन्दोवशात्' इससे यह कहा गया है कि कवि को प्रयोग के परतन्त्र नहीं होना चाहिए। यदि कवि परतन्त्र हो तो उसे उस अवसर के उचित विराम वाले वृत्त में विराम के लिए प्रयत्न करने चाहिए। प्रयोग कवि के अधीन नहीं होना चाहिए, यहाँ इसलिए अर्थ के अधीन बिराम करना चाहिए, यह कहा गया है। यहाँ पर एक, दो, तीन आदि संख्या का निर्देश नियम का उपलक्षण है। 'कि, गच्छ, मा विश, सुदुर्जन, वादितोऽसि' इत्यादि श्लोक में इतने अवान्तर वाक्य के अर्थ में विराम का विधान है।

अब प्रश्न होता है कि 'कि गच्छे' इत्यादि में एक वाक्यता न होने से 'वाक्यभेद' रूप दूषण हो जायेगा, इस प्रकार आशङ्का करके कहते हैं कि यहाँ एकवाक्यताभाव दूषण नहीं, अपितु भूषण है, इसके उपपादन में यही कहा जा सकता है कि किसी वस्तु की सूचना देने में अथवा अङ्करगत अर्थ के कहने में तथा उपचार में अल्प अक्षर वांले पदों का काव्य में प्रयोग करना चाहिए! क्योंकि काव्य में अनेक प्रकार के सूचाभिनय तथा अङ्कर के प्रकारों से युक्त काव्य होता है यदि वह स्वल्पाक्षर वाले असमस्त पद हो तो। क्योंकि बहु अक्षर वाले 'दरिद्रश्च कियन्तएते' इत्यादि पदों के मध्य में सूचा और अड्कर की उपपत्ति नहीं होती है।

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६०४ नाटपशाह्ने

"तस्यास्तन्मुखमस्ति सौम्यसुभगं कि पार्वणेनेन्दुना। सौन्दर्यस्य पदे दृशौ च यदि कि ते नाम नीलोल्पलैं:।। किं वा कोमलकान्तिभिः किसलयैः सत्येव तत्राधरे। हो धातुः पुनवक्तवस्तुरचनारम्भेष्वपूर्वो ग्रहः॥ इत्यादौ तु तस्या इत्युक्त्या मध्ये सूचया तदित्यसाधारणविशेषस्मरण स्वात्मनि तच्चावलोकने तथाकणने व प्रच्छम्नस्थिताया नायिका निवृत्यङ्गुरे- वैचित्र्यं पुनः परिचुम्बनाभिकावसूचायोगपूर्वकं मुखमिति पाठस्तत्कृतो नायिकाया रणरणकादरदशंको निवृत्यङ्गुर इत्यादिवैचित्र्ये उत्प्रेक्षणीयम्। अङ्गरसत्वनिवंधन एवेति निवृत्यड्गर एवात्र मन्तथ्यः। यत्राङ्करो भविष्यति तद्विषयमेतविति त्वसत्, पुष्पापचयनाटने यदोचितपरिक्रमणादौ पूर्वभाविना स्वल्पाक्षरे पदयोगेन वैचित्र्या- भावात्। अथास्य विच्छेवल्याङ्कल्य प्रधान्यं दर्शयति-एवं विराम इत्यादि। "तस्यास्तम्मुखमस्ति सौम्यसुभगं किं पार्वणेन्दुना, सौन्दयंस्य पवं दृशौ च यदि ते कि नाम नीलोत्पलैः। किं वा कोमलकान्तिभिः किसलयैः सत्येव तत्राघरे, ही धातुः पुनरुत्तवस्तुरचनारम्भेष्वपूर्वो प्रहः ।।" इत्यादि में 'तस्याः' इस कथन से मध्य में सूचा के द्वारा 'तद' इस असाधारण विशेष का स्मरण करना अपने आप में उस अवलोकन तथा श्रवण में प्रच्छन्न रूप में स्थित नायिका के निवृत्यक्कर में वेचित्र्य, फिर परिचुम्बन के अभिलाष की सूचक 'मुख' इस प्रकार का पाठ और उसके कारण नायिका के सम्बन्ध में प्रेम या उल्कण्ठा के साथ आदर दिखाने वाला निवृत्यक्कर इत्यादि वैचित्र्य की उत्प्रेक्षा करनो चाहिए। क्योंकि अङ्कुर तो अनिर्वचनीय है, अतः यहाँ निवृत्यङ्कर हो मानना चाहिए। जहां अङ्कुर होगा तद्विषयक यह अङ्कुर पर्व है, ऐसा कहना ठोक नहीं क्योंकि पुष्पों के अपचयन के अभिनय में जब उचित परिक्रमण आदि में, पहिले कहे जाने वाले स्वल्पाक्षर पदों के प्रयोग में वेचित्र्य का अनुभव नहीं होगा। अतः अङ्कुर प्राह्य नहीं है। अब विच्छेद के मङ्ड की प्रधानता को कहते हैं-

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ससवचोउषथाय: ६०५ एवं 'विरामे प्रयत्नोऽनुष्ठेयः। कस्मात्, 'विरामो हयार्थानु- दर्शकः, अत्र श्लोक:'- 'विरामेषु प्रयत्नो हि नित्यं कार्यः प्रयोक्तृभिः । "कस्मादभिनयो ह्यस्मिन्नर्थापेक्षी यतः स्मृतः' ॥१३३॥ अस्मिम्निति विरामे सत्यभिनयस्थितो यथाविषयं प्रयोक्तं शक्यः। सच विरामाद गम्यते। विरामे सत्यर्थ व्शयति अभिनयेऽन्यथा असमञ्जसत्वं स्यादिति तात्पयंम्। यदि वाभिनयो विरामे स्थित इत्यभिनयकायं विराम एवोदृहतीति तात्पयंम् ।१३३ ।। अनुवाद-इसलिये विराम में प्रथत्न करना चाहिए, क्योंकि विराम अर्थ का अनुदशंक होता है। इस विषय में श्लोक है- अनुवाद-नाट्यप्रयोक्ताओं को विराम के विषय में नित्य प्रयत्न करना चाहिये। क्योंकि अभिनय अर्थापेक्षी कहा गया है अर्थात् अभिनय अर्थ को अपेक्षा करता है ।। १३३ ॥ अभिनव-'अस्मिन्' अर्थात् विराम के होने पर अभिनयस्थ पदार्थ का विषयानुरूप प्रयोग किया जा सकता है। यह विराम से अवगत होता है और विराम किसी कार्य को समाप्ति पर होता है। विराम के होने पर अभिनय अर्थ को दिखाता है अन्यथा अर्थात विराम के अभाव में असमञ्जस हो जायेगा। यह तात्पर्य है। अथवा यदि अभिनय विराम में स्थित है। अत एव अभिनय के कार्य को विराम ही वहन करता है, यह यहाँ तात्पर्य है।। १३३ ।। इसी बात को कहते हैं- १. त. विरामः प्रयत्नतोऽनुष्ठेयः । २. ग. विराम इहार्थानुदशंको भवति। अपि च। ख. बिरामार्थानुवर्शक: अवति। ३. अपि च श्लोकः । ४. ख. विरामे तु प्रयत्नस्तु । ५. ख. तस्मादभिनये ह्यस्मात्। ६. ख. ग. स्थितः । क-भ. प्रतिष्ठितः ।

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६े०६

यत्र व्यप्रावुभो हस्तौ तत्र दृष्टिसमन्वितः'। वाचिकाभिनयः कार्यो विरामैरर्थदर्शकैः ॥१३४॥ "प्रायो वीरे च रौद्रे च करौ प्रहरणाकुलौ। बोभतसे "कुतिसतत्वाचच भवतः कुन्चितौ करो ॥ १३५॥ हास्ये चोद्दशमात्रेण करुणे च प्रलम्बितौ। अद्भुते 'विस्मयात्सतब्धौ भयाचचैव भयानके ॥ १३६ ॥

पूर्वं दृष्टिप्राधान्यतात्पर्येणेत्यपौनदवत्थम् ।। १३४।। व्यापकत्वमस्या दशयति- प्रायो वीरे च रौद्रे चेति। कुञ्चिताविति सङ्क्ोधवन्तावित्यर्थः। भयाच्चेति इलथावेव ॥ १३५-१३६।।

अनुवाद-जहाँ पर दोनों हाथ व्यग्र हों, वहाँ अर्थदशक विरामों के द्वारा दृष्टि से समग्वित वाचिक अभिनय करना चाहिए॥ १३४॥ अभिनव-इसी बात को पहिले दृष्टि की प्रमुखता के तात्पयं से कहा था। अब दृष्टि समन्वित हाथों को प्रमुखता से बतलाने से पुनरक्ति नहीं है ॥ १३४॥ अब इसकी व्यापकता को दिखाते हैं- अनुवाद-प्रायः वीर और रौद्र रस में दोनों हाथ शस्त्र प्रहरणन में व्यस्त रहते हैं और बोभत्स रस में कुत्सित होने के कारण दोनों हाथ कुश्त हो जाते हैं। हास्य और करुण रस में उद्देशमात्र से दोनों हाथ प्ररम्बित होते हैं और अद्भुत रस में विस्मय के कारण स्तब्ध तथा भयानक रस में भय के कारण स्तब्ध रहते हैं ।। १३५-१३६ ।। अभिनव-'कुब्चितौ' पद का अर्थ सक्कोच युक्त होना है और 'भयाच्च' कहने से अभिप्राय है कि दोनों हाथ शिथिल हो जाते हैं॥ १३५-१३६ ॥

१. क. (टि०) दृष्टितमन्धितैः। २. क. (टि०) वाचिकोडभिनय: । ३. ख. दशिभि: । ४. इतः त्रयो श्लोका: च पुस्तकेन सन्ति। ५. क. (टि०) कुम्चितत्वाकच। ६. ग. विष्मयाविष्डो।

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एवमादिषु 'चान्येषु 'प्रविचारेऽय हस्तयोः । अलड्कारविरामाभ्यां 'साध्यते हार्थनिश्चयः ॥ १३७ ॥ ये विरामा: स्मृता 'वृत्ते तेष्वलद्कार दृध्यते। समाप्तेऽर्थे पदे वापि तथा प्राणवशेन वा॥१३८॥ पदवर्णसमासे च द्रुते वह्वर्थसंकटे। कार्यो विराम: पादान्ते तथा प्राणवशेन वा। शेषमर्थवशेनैव विरामं सम्प्रयोजयेत् ॥ १३९॥ उच्चादीप्तादिरलड्कारः। स च वृत्तिविरामेषु यथा "योः यः शास्त्रं विर्भत" इत्यत्रोच्चवीप्तकाकु: पदाग्तेन, वोररौद्रयोरपि स्त्रग्धराविवृत्ते अर्धादौ विरामो न कायं:, अपि तु पावान्ते पठितस्तावत् प्राणसंवेवाभावात्। प्राणवशेन वेत्यगतिका गतिरिति वृखाः । तच्चासत। शिक्षावशेनाहरणोयो हि तत्राविच्छेद: ॥। १३८ ।। अनुवाद-इस प्रकार के तथा अन्य प्रकार के कार्यों में हाथों के संचालन में अलड्ार और विरामों के द्वारा अर्थ का निश्चय किया जा सकता है।। १३७। अनुवाद-वृत्तों (छन्दों) में जो विराम कहे गये हैं, उनमें अलद्वार इष्ट है औौर अर्थ को समाप्ति पर, पद में अथवा प्राण वायु के कारण या रसभावादि के औचित्य से, वर्णं, पद और समास में, शोघ्ता से उच्चारण में, अनेक अर्थों के सङ्कट के समय, पाद के अग्त में अथवा प्राणवायु के आधार पर विराम करना चाहिए। शेष स्थानों पर अर्थ के अनुसार विराम करना चाहिए ॥। १३८-१३९ ॥ अभिनव-उच्च, दोप्तादि रूप अलङ्कार है, उसे वृत्त के विराम रखना चाहिए। जैसे- यो यः शस्त्रं विर्भात्त स्वभुजगुरुमदः पाण्डवीनां चमूनां यो यः पाञ्चालगोत्रे शिशुरधिकवया गभशय्यां गतो वा। यो यस्तर्कमंसाक्षी चरति मयि रणे वश्च यश्च प्रतोप: क्रोषान्घस्तस्य तस्य एवमपि जगतामन्तकस्यान्तकोऽहम्।। (वेणोसंहार ३३२ )

१. र. सवेंषु। २. ग. विचारेषु। स. अधिकारेषु। ३. प. साध्यन्ते हार्थनिष्चया:। ४. क=भ. चुत्ते।

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६०८ नाटपशाहत्रे

'अत्र च भावगतानि 'रसगतानि च कुष्याक्षराणि बोद्धव्यानि, तद्यथा-

व्य्जनं यद्भवेद्दीघं कृष्यं तत्तु विधीयते" ॥ १४० ॥

तस्मावयमर्थ :- पवान्ते विच्छेद: कार्यो, यदि वा प्राणवशेन प्राणा रस- भावाद्याः, तवौचित्येन छेदः। पावादावपि तावदनेनानुबन्धोडपि विच्छेद उपयोगीति बशितम् ॥१३९ ।

इसमें किया गया है। उच्च-दीप्तादि काकु को वीर और रौद्र रस में भी स्रग्धरा अदि वृत्तों में अर्थ या आदि में विराम नहीं रखना चाहिए, किन्तु पद के अन्त में करना चाहिये। क्योंकि अर्ध में और आदि में प्राण वायु का संवेग नहीं होता, अतः पद के अन्त में ही विराम करना चाहिए। वृद्ध लोग तो कहते हैं कि 'प्राणवशेन' यह पाठ अगतिक गति है। किन्तु यह कथन ठीक नहीं है। वहाँ शिक्षा के कारण ही विच्छेद-अविच्छेद होता है। इसलिए यहाँ यह अर्थ है कि पद के अन्त में विच्छेद करना चाहिए। अथवा 'प्राणवशेन' में प्राण शब्द का अर्थ रस- भावादि है। अतः रस-भावादि के औचित्य से यहाँ विच्छेद है। अतः पाद के आदि में विराम किया जा सकता है। इससे अनुबन्ध (आरम्भ) भी विच्छेद में उपयोगो है, यह दिखा दिया है। शेषमिति-जहाँ चित्तवृत्ति की प्रधानता नहीं है, अपितु विभावादि की प्रधानता है वहाँ अर्थवश (अर्थ के अनुसार) विराम करना चाहिए। १३८-१३९।। अनुवाद-यहाँ पर भावगत और रसगत कुव्याक्षरों को भी समझ लेना चाहिये। जैसे- अनुवाद-जो व्यख्जन आकार, ऐकार, ओकार, औकार के संयोग से बीघ होते हैं, उन्हें कुष्याक्षर कहते हैं॥। १४०॥

१. ख. क्षत्रानूगतानि चत्वारयंक्षराणि रसभावानुगतानि कृष्टान्यक्षराणि चोद्बोध्यानि। २. ग. रसजातानि कृष्याण्यक्षराणि। कुष्याद्यक्षराणि। ३. स. अकारे करसंयुक्तमेकारे कारसंयुतम्। ग. एकारैकारसंयुक्तमीकारीकारसंयुतम्। v. कनम, एकारोकारसंयुक्तं बीर्च पद्रचञ्जनं भवेत्। ५. ख. ग. भवेविह्।

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ससदशोउण्याय:

विषादे च 'वितर्के च प्रश्नेषयामर्ष एव च। कलाकालप्रमाणेन पाठ्यं कायं प्रयोक्तुभिः ॥ १४१॥ शेषाणामर्थयोगेन विरामे 'विरमेविह। एकद्वित्रिचतुःपञ्चषट्कलं च विलम्बितम् ॥१४२॥ कष्याक्षराणीति कृषतीति कृषो विलम्बितो लय: तत्र साधूनि कृष्याणि सन्ध्यक्षराणि, यथा आ,ई, ऊ इति वीर्घा: कलालक्षणो यः काल: ततप्रमाणेन विलम्बितेन पाठ्यं कायमिति विच्छेदस्यैव प्रमाणं दशितम् ।।१४१। शेषाणामिति हस्वानाम्। अर्थयोगेनेति यथा स्फुटा प्रतीतिभँवति तथा विच्छेद: कार्यो न स्वतिविलम्बितं पठेदित्यर्थः। ननु कियत्कलाप्रमाणमित्याह- विलम्बितमिति ॥१४२॥

अनुवाद-विषाद, वितर्क, प्रश्न और अमर्षं में नाट्यप्रयोक्ताओं को कलात्मक काल के प्रमाण के अनुसार पाट्य करना चाहिये।। १४१ । अभिनव-कृष्याक्षर का अर्थ है सन्ध्यक्षर अर्थात् जो कर्षण करता है वह कुष है, कुष का अर्थ विलम्बित लय है। उसमें जो साधु है वह कृष्य है। इस प्रकार कुष्य अक्षर सन्ध्यक्षर हैं। जैसे-आ, ई, ऊ, ये दीघ अक्षर हैं। कला के प्रमाण वाला जो काल है तदनुसार विलम्बित लय में पाठ करना चाहिए। इस प्रकार विच्छेद ही प्रमाण है यह दिखा दिया है॥ १४१॥ अनुवाद-शेष अक्षरों के अर्थ के योग से विराम के अवसर पर विराम रखें, विलम्बित काकु में एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः कलाएँ होती हैं।। १४२ । अभिनव-'शेषाणाम्' का अर्थ है ह्रस्व अक्षरों का। 'अर्थयोगेन' पद का तात्पर्य है, जिस प्रकार स्फुट अर्थ को प्रतीति हो, उसी प्रकार विच्छेद करना चाहिए, न कि अतिविलम्बित लय से पाठ करें। अब प्रश्न होता है कि कला का प्रमाण कितना हो, इस पर कहते हैं कि विलम्बित एक, दो, तोन, चार, पाँच, छः कलाओं तक होता है ।। १४२॥

१. ख. विवर्ते च। २. ख. शेषाणामघंयोगेन विरामो। ३. विभिद्ध वः। ना० था०-७७

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११० नाटयशाहने

विलम्बिते विरामे हि सदा गुवक्षरं भवेत्। षण्णां कलानां परतो विलम्बो च विधोयते॥ १४३ ॥ अथवा कारणोपेतं प्रयोगं कार्यमेव च। समीक्ष्य वृत्ते कर्तव्यो विरामो रसभावतः ॥ १४४॥ ये विरामा: स्मृताः 'पाठ्ये वृत्तपावसमुद्भवाः। उत्कम्यापि क्रमं तज्ज्ञैः कार्यास्तेऽर्थवशानुगाः॥१४५॥

गुथक्षरमिति कृष्यं। वा शब्दावधिकमनुजानाति कारणोपेतमिति कारणं बोघंकालं स्मरणमिति चिन्तनाविभि:, व्याध्यपस्माराविभिर्वा कारणैरपेतं, स्पष्टा- स्पष्टादिभिरित्यम्ये।। १४४॥ वृत्तविरामावर्यविराम: प्रथममिति। वर्शयितुमाह-ये विरामा इति। अनुवाद-विलम्बित विराम (काकु) में सदा गुरु अक्षर होने चाहिये। किन्तु छः कलाओं के बाद विलम्ब (विराम) नहीं होना चाहिए । १४३॥ अभिनव-यहाँ गुर्वक्षर का अर्थ है कृष्याक्षर अर्थात् सन्ध्यक्षर ॥ १४३॥ अनुवाद-अथवा कारण के अनुसार प्रयोग करना चाहिए और रस एवं भावों को समीक्षा करके वृत्त में विराम करना चाहिए ॥। १४४॥ अभिनव-'अथवा' में वा शब्द से अधिक के लिए अनुज्ञा देने का संकेत है। 'कारणोपेतम्' में कारण पद का अर्थ है चिन्तन आदि के द्वारा दीर्घ काल तक स्मरण। अथवा अपसमार आदि व्याधि रूप कारणों से उपेत। अन्य लोग स्पष्ट और अस्पष्ट कारणों से उपेत यह अर्थ करते हैं ॥ १४४॥ वृत्त विराम से अर्थ विराम प्रथम है, इस बात को दिखलाने के लिए कहते हैं- अनुवाद-पाठय में वृत्त के पादों से समुदभुत जो विराम कहे गये हैं, उन्हें वृत्त के जानकार लोग क्रम का उल्लंघन करके अर्थ के अनुसार विराम करें॥ १४५ ॥

१. ग विरामे च बिलम्बे च। २. ग. लम्बनं। क. लङ्धनं। ३. कर्शव्या विरामा रसभावतः । ४. ख. ग. काव्ये। क-द, वाक्ये। ५. ख. तेष्यंवशास्तदा। ग, अर्थंषशाब्याः ।

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ससबश्ोडव्याय: नापशब्दं पठेतज्ज्ञो भिन्नवृत्त' तथैव हि। विश्रमेन्नाविरामेषु दैन्ये काकुं न दोपयेत् ॥ १४६ ।। तज्ज्ञैहतद्विरामात्मकं बुत्तगतं वस्तु। उत्क्रव्यापोति विशेषोपक्रमेऽपीति सामान्योपसंहारः। तादृशा विरामेण, पठेतु, येनावगतो विवक्षितः शब्दो भवति 'वरदं ध्यायति' इत्यत्र वरद शब्दे यदा विच्छेद: क्रियते तवा मध्य इतिशब्दान्तर- प्रतिभया ध्यायति शब्दोऽवगतो भवतीति ॥१४५॥ भिन्नवृत्तं च कृत्या न पठेतु तथा विच्छेदं न कुर्याद्येनान्यवृत्तभ्रान्तिभवति। तथा हि-'भव शंकर भाजनं ये जगतीह भवन्ति केचन' इत्यत्र ये इति शब्दस्य पू्वंपादेन सह पाठें उपवेद उपजातिवृत्तभेदो यद्यपि भवति तथापि द्वितीयपादे वृत्तभङ्ग:। तेन भिन्नवत्तं न पठेदिति विच्छेदस्यैध प्राधाम्यज्ञापनार्थमेतद्युक्तमिति शब्दच्युतभिन्नव त्तदोषाभिघाने न पौनरुकत्यम्। इह वस्तुतस्वभावेऽपि विच्छेदवशैन तस्प्रतिभोदयास्। अभिनव-'तब्ज्ञेः' में 'तत्' पद का अर्थ विरामात्मक बृत्तगत वस्तु है। 'उतक्रम्य' का अर्थ है कि यद्यपि विशेष का उपक्रम है किन्तु उपसंहार सामान्य में है। अतः विराम को इस प्रकार पढ़े जिससे विवक्षित शब्द की प्रतीति हो जाय। जैसे 'घरदं ध्यायति' में यदि 'विरद' शब्द में विच्छेद करते हैं तो मध्य में शब्दान्तर के प्रतिभान से 'ध्यायाति' का ज्ञान होता है ॥ १४५॥ अनुवाद-नाटधवेत्ता लोग अपशब्द का पाठ न करें और न वृत्तों को तोड़कर पढ़े। विराम-स्थान से भिन्न स्थान पर विराम न करें और हैन्य अवस्था में काकु को दौप्त न करें॥ १४६॥ अभिनव-वृत्त को तोड़कर नहीं पढ़ना चाहिए और ऐसा विच्छेश न करें जिससे किसी दूसरे वृत्त की भ्रान्ति होने लगे। जैसे- "भव शङ्कर भाजनं ये जगतीह भवन्ति केचन" यहाँ पर 'ये' इस पद का प्रथम (पूर्व) पाद के साथ पाठ करने पर यद्यपि उपजाति छन्द का भेद हो जाता है तथापि द्वितीय पाद में छन्दोभङ्ग हो जाता है। इसलिए 'भिन्नवृत्त न पठेत्' अर्थात् भिन्नवृत्त का पाठ न करें, इसे वृत्त की प्रधानता को ज्ञापित करने के लिए कहा हैं। शब्दच्युत तथा भिन्नवृत्त दोषों के कहने से पुनरक्ति नहीं समझना चाहिये। क्योंकि यहाँ वस्तुतः उसके अभाव में भी विच्छेद के बश उसकी प्रतीति हो जाती हैं। १. भिन्नबृत्ते न चैव हि। १. स. ग, न काकुरसहोनकम्। न काकुरसदोपवम्।

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६१२ नाठपश्ारनें

वजितं काव्यदोषैस्तु लक्षणाढ्यं गुणान्वितम्। स्वरालड्वारसंयुक्तं पठेत्पाठ्यं यथाविधि॥१४७॥

एतदेव तात्पर्येणाह-विशरमेन्नाविरामेष्विति। एवं विच्छेदस्य भूयो विषय- व्यापकत्वमभिधाय तम्म्यूनां दोप्तां दर्शयितुमाह-दैन्ये काकुं न दोपयेदिति शोकादि- मग्नचित्तवृत्ति विमुच्यान्यत्र दीपनं सवंत्र शोभावहमिति भावः ॥ १४६ ।। एवं स्वरा: क्रमो मर्यादा स्थानत्रयमाअयः उदात्तावयः स्वरूपं अलङ्गाराः स्वरूपपरिपूरका: इति कतव्यतारूपाण्यङ्गानी। स्वरभेदाच्च काकोर्विशेष: स्वरभेदो हि तस्यामेव काकौ विवक्षितायां रसभावादिधर्मान्तरोवयो, न हि स्वराणां स्थान- भेदोऽलड्ारोडङ्गाविकृतः । वजितं काव्यदोषैरित्यादिना प्राक्तनाध्यायार्थेन सह सङ्गतिमस्याध्यायस्य वर्शयति॥१४७॥

इस अभिप्राय से कहते हैं कि अविराम स्थल पर विराम नहीं करना चाहिये। इस प्रकार विच्छेद की व्यापकता बतलाकर न्यूना और दीप्ता को दिखलाने के लिए कहते हैं कि दैन्यावस्था में काकु को दीपन न करें, इससे यहाँ यह बतलाया गया है कि शोकादि से मग्न चित्तवृत्ति छोड़कर अन्य प्रसङ्गों में सवत्र काकु का दीपन शोभाधायक होता है॥ १४६ ॥ अनुवाद-काव्य के दोषों से रहित, लक्षणों से समन्वित, गुणों से युक्त, स्वर एवं अलङ्कारों से संयुक्त पाठ्य को यथाविधि पढ़ें ॥ १४७॥ अभिनव-इस प्रकार स्वर, क्रम, मर्यांदा, स्थानत्रय, उनके उपयोगो उदात्तादि वर्ण, उनके स्वरूप, स्वरूप के परिपूरक अलङ्कार, इतिकर्त्तव्यता रूप अङ्गों को यहाँ कहा गया है। स्वर-भेद से काकु का भेद होता है और स्वरभेद तब होगा जब काकु की विवक्षा होगी और काकु की विवक्षा होने पर रस-भावादि धर्मान्तरों का उदय होता है, स्वरों के स्थानों का भेद अलङ्कारों एवं अङ्गादि के के कारण नहीं होता है। यहाँ पर 'वरजितं काव्यदोषेश्च' इत्यादि के द्वारा यह दिखाया गया है कि पूर्व अध्याय के साथ इस अध्याय की सङ्गति दिखाते हैं।। १४७॥

१. व्यपेतं वाक्यपदोर्षस्तु। २. स. ग. का्यं।

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ससवशोड्याय:

'अलक्वारा विरामाशच ये पाठ्ये संस्कृते हमृताः। 'त एव सर्वे कर्तव्या स्त्रीणां पाठ्ये त्वसंस्कृते ॥। १४८ ।। एव मेतत्स्वरकृतं' कलाताललयान्वितम्। दशरूपविधाने तु पाठ्यं योज्यं प्रयोक्तृभिः ॥१४९॥

एवं सस्कृते काकुविधानं प्राकृताध्यायप्रमेयभूते प्राकृतेऽप्यतिदिशति अलङ्गारा विरामाश्चेत्याविना। अध्यायार्थमुपसंहरन् भाविनोऽष्यायस्यार्थमासूत्रयति बशरूपेति। दशरूपबिधाने यत्पाठ्यं तदनेन त्रिप्रकारेण योज्यमित्युपसंहारः।

अभिनव-इस प्रकार संस्कृत भाषा के लिए कथित काकु विधान का प्रस्तुत अध्याय के प्रमेयभूत प्राकृत भाषा में भी अतिदेश करते हैं- अनुवाद-संस्कृत पाठ्य में जो अलद्वार और विराम कहे गये हैं, उन सभी का प्रयोग स्त्रियों के प्राकुत पाठ में भी करने चाहिए॥ १४८ ॥ अभिनव-प्रस्तुत अध्याय के अर्थ का उपसंहार करते हुए अगले अध्याय के अर्थ का आसूत्रण करते हैं- अनुवाद-नाट्य-प्रयोक्ताओं को दशरूप के विधान में इस प्रकार स्वरों से युक्त तथा कला, ताल एवं लय से समग्वित पाठ्य को योजना करनी चाहिए॥ १४९॥ अभिनव-दश रूपकों के विधान में जो पाठ्य बताया गया है उनकी योजना इन तीन प्रकारों से करनी चाहिए। इस प्रकार उपसंहार है॥ १४९॥

१. ब. ग. अलङ कारविशेषा ये पाठ्यसंस्कृतसंवरयाः । २. ख. ते सर्वें संप्रकर्त्या स्त्रोणां पाठ्ये तु संस्कृते । ३. ख. स्वरयुतं।

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११४ चाटचशाएत्रे

'उक्तं काकुविधानं तु यथावदनुपूर्वशः। "अत उध्चं प्रवक्ष्यामि दशरूपविकल्पनम् ॥ १५० ॥ इति भरतीये नाट्यशास्त्रे वागभिनये 'काकुस्वरव्यव्जनो नाम सप्तवशोऽध्यायः४।

तु शब्दो व्युत्कम सूचयति। प्रसङ्गादक्रमप्राप्तमपि काकुविधानमुक्तम्। अनुपूर्वश इत्यादि। यत्तु क्रमापन्नं तद्दशरूपं विकल्प्यमानं वक्ष्यामीति शिवम् ॥ १४८-१५० ।

प्रकटोकुक्ते स्म चन्द्रमोलेरमिनवगुप्तसमाल्य एकदेशम्। इति श्रोमम्महामाहेश्वराभिनवगुप्ताचार्यविरचितार्यां नाट्यवेव- विवृतावभिनवभारत्या काकुविधानं नाम सप्तदशोऽध्याय: ।।

अनुवाद-इस प्रकार मैंने यथावत् क्रमशः काकु विधान को कहा है। अब इसके बाद दश रूपकों के स्वरूप को कहूँगा॥ १५० ॥ इस प्रकार भरतमुनि कृत नाटय शास्त्र में वागभिनय में काकु-स्वर व्यञ्जन नामक सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १७॥ अभिनव-यहाँ पर 'तु' शब्द से व्युत्क्रम को सूचना दो गई है। इस प्रकार प्रसङ्ग से जो क्रम प्राप्त नहीं है, उस काकु-विधान को भी कह दिया। 'अनुपूर्वशः' का अभिप्राय है जो क्रम प्राप्त दशरूप विधान है, उसके विकल्पों को कहूँगा। शिवम् ॥ १५० ॥ अभिनव-इस प्रकार अभिनव भरतमुनि से समर्थित काकु विकल्प नामक इस अध्याय में चन्द्रमोलि के एकदेश जिह्वा रूप अर्थ को प्रकट कर दिया है अर्थात् कह दिया है॥ १७।। इस प्रकार अभिनवगुप्तपादाचार्य विरचित अभिनवभारती का सत्तरहवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ १७ ॥ इति डा० पारसनाथद्विवेदिविरचितायां नाट्यशास्त्रस्याभिनवभारत्याबच हिन्दोव्याख्यायां सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥

१. ग. थथा। २. क-भ. अतः परं ३. म. स्वरकाकु।

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'अष्टादशोऽ्ध्यायः वर्त्तयिष्याम्यहं विप्रा! दशरूपविकल्पनम्। नामतः कर्मतश्चैव तथा चैव प्रयोगतः ॥१॥ अभिनवभारती रपं यवेतद्बहुषा चकास्ति तद्येन भावी भविता न जातु। तच्चक्षुरर्का्मकमीश्वरस्य वन्दे वपुस्तैजससारघाम्नः ॥ १८॥ अभिनवभारती गत अध्याय में दशरूपकों काकु के विधान की योजना बताई गई है। अब दश रूपकों के स्वरूप का अभिधान करेंगे। दृश्य होने के कारण नाटय को 'रूप' कहते हैं। नाटय को रूपक भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें आरोप पाया जाता है। अनुवाद-हे विप्रो ! अब मैं उद्देश (नाम), कार्य और प्रयोग के अनुसार दश रूपकों के विधान का व्णन करता हूँ।। १॥ अभिनव-जो यह रूप बहुथा प्रकार से प्रकाशित होता है, जिसके कारण वह न कभी भावी होता है और भविता (अनदन भविष्य)। ईश्वर का वह अर्कात्मक चक्षु जो तेज रूप ईश्वर का वपु (शरोर) है, उसको मैं बन्दना करता हूँ ॥ १८॥ विशेष-दशरूपविकल्पनमिति-नाट्यशास्त्र में दश रूपकों का विधान बताये गया है-नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार, वीथी, प्रह्सन, डिम, ईहामृग और अच्। इनके अतिरिक्त भरत ने नाटक और प्रकरण के मिश्रण से रूपक का एक अन्य भेद 'नाटो' का उल्लेख किया है, िसे परवर्ती काल में 'नाटिका' संज्ञा प्राप्त हुई। बनब्जय ने दश रूपकों औौर भोज तथा रामचन्द्र गुणचन्द्र ने बारह रूपकों का निरूपण किया है। घनञ्जय ने अवस्थानुकृति को 'नाट्य' कहा है यही नाट्य दृश्य होने से 'रूप' कहणाता है और पही रूप का आरोप होने से 'रूपक' कहलाता है। इस प्रकार 'रूप' और 'रूपक' दोनों शब्द नाट्य के वाचक है। १. ग. ड. विशोध्यायः । ३. ख. ग. कथयिष्यामि।

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१११ नाटयशास्थे

वशरूपोपकारिकाव्वादियोजनमिति तत्स्वरूपं व्तव्यमिति सङ्गतिरुक्तैव तहवतंविष्यामोति किमनेनोच्यते, तवस्य प्रयोजनं प्रवश्यते । कश्चिदेवमाशङ्कते, "रसा भावा" (अ-६-१०) इत्यादि सूत्रसार- सङ्ग्रहे वशरूपशब्वस्य नामापि न श्रुतं, तत्कथमुक्तं वशरूपविधाने पाठ्यमिति तं प्रत्याह-वर्तयिष्यामीति। रृप्यते प्रत्यक्षीक्रियते योऽर्थं: तद्वाचकत्वातका्यानि रूपाणि दशानां रपाणां विभाग: कल्प्यते अस्मादिति दशरूपविकल्पनं सूत्रं तेनायं षष्ठी समासः वशरूपमिति। तेन बहुबोहौ वशरूपं काव्यमिति भेदान्तरापाकरणं स्वादित्याशंक्य द्विगु:, पात्रावि प्रक्षेपश्च यो व्याख्यातस्तत्प्रयासमाक्रमेव। तवयमर्थ :- यतः सूत्रादाङ्गिको वाचिकशब्दे प्रकुतिप्रत्ययार्थविभाग: कल्प्यते तत्र वाग्भाग एवायं वितत्य वर्ण्यते, तेन तदेव सूत्रं र्वणतम्। विवरणेन प्रपञ्चितं भवतीति नानिर्दिष्टं निरुप्यते किञ्चिदिति।

अभिनव-अभिनव गुप्त का कथन है कि दश रूपकों का उपकारी होने के कारण काकु आदि की योजना की गई है। इसलिए उसके स्वरूप को कहना चाहिए, इसकी सङ्गति तो आपने कह हो दिया है, तो 'वर्त्तिष्यामि' इसके द्वारा आप क्या कहना चाहते हैं ? उसी का प्रयोजन दिखाते है। अभिनव-कुछ लोग तो ऐसी आशङ्का करते हैं कि 'रसा भावा ह्यभिनयाः' इत्यादि संग्रह श्लोक में 'दशरूप' शब्द का नाम भी नहीं पढ़ा गया है तो आपने कैसे कहा कि दशरूपकों के विधान में पाठ्य की योजना करनी चाहिए, उनके प्रति कहते हैं-'वर्त्तमिष्यामि'। अभिनव-जिस अर्थ का रूपण करते हैं अर्थात् प्रत्यक्ष करते हैं उस अर्थ के वाचक होने से काव्य भी 'रूपक' कहलाता है। इसलिए दशरूपकों का विभाग जिससे किया जाय वही 'दशरूपविकल्पन' सूत्र है। इसलिए यहाँ षष्ठी समास है। अतः बहुव्रीहि समास करने पर (दश हैं रूप जिसके) जो एक अन्य भेद होता है उसका अपाकरण हो जायेगा, इस प्रकार आशङ्का करके द्विगु और पात्रादि-प्रक्षेप है, इस प्रकार जो व्याख्या की गई है वह प्रयास मात्र है। इसलिए यह अर्थ है कि जिससे सूत्र के वाचक शब्द में आज्गिक प्रकृति-प्रत्यय एवं अर्थ के विभाग की कल्पना करते है, वहाँ वाणी का ही यह विस्तृत वर्णन है। इससे उसी सूत्र का वर्णन किया है अर्थात् विवरण करके प्रपञ्चित किया है, अतः अनिर्दिष्ट का निरूपण करते है-किञन्चिदिति।

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६१

नाटकं सप्रकरणमड्को व्यायोग एव च। भाण: समवकारश्च वोथी प्रहसनं डिमः ॥ २ ॥ ईहामृगश्च 'विज्ञेयो दशमो नाट्यलक्षणे। एतेषां लक्षणमहं व्याख्यास्याम्यनुपूर्वशः ॥३॥

नामत इत्युद्दशेन, कमंत इति लक्षणेन, क्रियते, तेन विजातीयाद्व्यावृत्ति:, कमलक्षणं, प्रकृष्ट उचितो योग: परस्परसंबन्धो यथा प्रकरणनाटकलक्षणयोगात् नाटिकेतिवृत्तिविभागस्तु लक्षण एवानुप्रविष्ट इति। नासौ प्रयोग: । तथा चेति तेनैव प्रयोगप्रकारेणाग्योऽपि परस्परसंबन्धवैचित्र्यकृती भेद: उत्प्रेक्ष्य इत्यर्थः । प्रयोगाय ग्रयोगत इति व्याल्याने प्रयोगत इति विकलमेव। उत्तव्याख्याने तु कोहलादिल- झ्षितनोटकसटकरासकादिसंग्रहः फलं नाटिकाया: उदाहरणरवादि ॥ १॥ तत्रोद्देशं तावदाह-नाटकमित्यादि।

'नायतः' इस पद से उद्देश (नाममात्र से कथन) का तथा 'कर्मतः' पद से लक्षण का कथन किया गया है। यहाँ इसी कारण विजातीय से व्यावृत्ति रूप कर्म लक्षण है। 'प्रयोगतः' का अर्थ है प्रकृष्ट योग अर्थात् परस्पर सम्बन्ध। जैसे, प्रकरण और नाटक के लक्षणों के योग से नाटिका बनती है, इतिवृत्त विभाग तो लक्षण में ही अनुप्रविष्ट है। किन्तु यह तो प्रयोग नहीं होता, तो 'प्रयोगतः' की व्याख्या के द्वारा नाटिका का ग्रहण कैसे करेंगे? क्योंकि नाटिका तो प्रयोग है। इस पर कहते हैं कि कारिका में 'तथा' और 'च' पदों के प्रयोग के प्रकारों से पारस्परिक सम्बन्ध के वचित्र्य के द्वारा अन्य भेद की भी कल्पना कर लेनी चाहिए। 'प्रयोगतः' की व्याख्या यदि 'प्रयोग के लिए' करते हैं तो 'प्रयोगतः' कथन ही व्यर्थ हो जायेगा। क्योंकि उक्त व्याख्यान में तो कोहलादि आचार्यों के द्वारा लक्षित, तोटक, सदृश, रासक आदि का संग्रह ही फल है, नाटिका ही इसका उदाहरण है ॥। १ ॥ अब उद्देश को कहते हैं- अनुवाद-नाटक, प्रकरण, अङ्क, व्यायोग, भाण, समवकार, वोथी, प्रहसन, डिम और ईहामृग, लक्षण के अनुसार नाट्य के ये दश भेद हैं। अब मैं क्रमशः इनके लक्षणों को कहूँगा ॥ २-३॥

१. क. (टि.) ईहामूगं च विज्ञेयं वशमं नाटयलक्षणम्। ङ. ईहामृगदच विश्नेया वषेमे नाठ्यलक्षणे ना. शा०-७6

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६१८ नाटपशास्थ्रे

सप्रकरणमिति सशब्देनाङ्कप्रवेशकसन्ध्यादिसाम्यं नाटकेन प्रकरणस्याह। नाम्नामर्थो लक्षण एव व्याख्यास्यते। सत्यपि च पुराणादावुपदेशवायिनि कर्मफल- संबन्धप्रवर्शके तत्रोच्चावचमनियतकविकथाप्रायमिह तु किञ्चित्प्रयोज्यं किन्चित् सूच्यं किञ्चिदुह्यं किञ्चिवुपेक्ष्यमित्येवं वैचित्र्ययोगः । "सन्ध्यादिव्यवस्थे"ति "दशकपं सप्रयोजन" मिति -एतत्तु फल्गुप्रायं, फलं तत्पूर्वमेवोक्तम्। प्रत्यक्षभाव- नोदितरसावेशजनितवृ तिसारत्वावस्येतिहासावेविशेष इत्यूह्यम्। सूच्याविविभाग- सिस्वितिहासावावप्यस्त्येवेति न च पाठफलं दशरूपकमपि तु प्रयोगपर्यन्तमेतवित्युक्त- प्रायम्। तत्र महासामान्यरूपं काव्यलक्षणेऽध्याये कृतमित्यवान्तरसामान्यलक्षणमुद्दे- शानग्तरं वक्तव्यमिति दशयति। प्राक् च सामान्यलक्षणं ततो विशेषलक्षणानि उद्वेशक्रमेणेति चानुपूर्व्यार्थः ।। २-३।।

अभिनव-यहाँ 'सप्रकरणम्' में सह शब्द से यह बतलाया गया है कि प्रकरण का नाटक के साथ अङ्क, प्रवेशक, सन्धि आदि में साम्य है। इन रूपकों के नामों की व्याख्या लक्षण बतलाने के समय की जायेगी। कर्म के फलों के प्रदर्शक एवं उपदेशप्रद पुराणों आदि के होते हुए भो कवियों की कथा प्रायः अनियत और उच्चावच होती है। यहाँ तो कुछ प्रयोज्य है, कुछ सूच्य है, कुछ ऊह्य है और कुछ उपेक्ष्य है। इस प्रकार यहाँ अनेक विचित्रताओं का योग है। "सन्धि आदि की व्यवस्था" तथा "दशरूप प्रयोजन है' इत्यादि कथन निःसार है, निष्फल है, क्योंकि फल को तो मैंने पहिले हो कह दिया है। प्रत्यक्ष की भावना से उदित रसावेश से जनित आनन्द रूप सार (फल) होने के कारण नाटक में इतिहास आदि की अपेक्षा विलक्षणता है, यह समझना चाहिए। सूच्य, ऊह्य आदि विभाग तो इतिहास आदि में भी होते हैं। अतः वह इसका फल नहीं है। दशरूपकों की स्थिति पर्यन्त होती है, इसे भी कहा जा चुका है। महासामान्य रूप काव्यल क्षण को भी उक्त अध्याय में कहा जा चुका है। अब उद्देश के अनन्तर अवान्तर सामान्य लक्षण कहना चाहिए, यह दिखाते हैं। उद्देश क्रम के अनुसार पहिले सामान्य लक्षण और बाद में विशेष लक्षण कहना चाहिए, यही 'अनुपूर्वशः' पद से दिखलाया गया है ॥ २-३॥॥

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६१९

सर्वेषामेत्र काव्पाना मातृका वृत्तयः स्मृताः। आभ्यो विनिस्सृतं ह्योतददशरूपं प्रयोगतः ।। ४ ।। तत्र सामान्यलक्षणमाह-सर्वेषामेव काव्यानां मातृका इति। तत्र केचिदाहु :- वृत्तिप्रभवत्वं दशरूपकस्य सामान्यलक्षणं, वृत्तीनां तदङ्गानां चाभिनयो न, काव्ये्वसंभवात्। एतच्चासत्। आस्तां काव्यार्थः। सर्वो हि संसारो वृत्तिचतुष्केण व्याप्त इत्युक्तं प्रयम एवाध्पायेऽस्माभिः। यदि चाभिनेयविषय एव वृत्तिव्यतहारस्तदा वृतत्यध्याये यद्वतीनां समुत्याननिर्कपणं "यां यां वत्तिषु संधिता" (२०-१५) मित्यादि तत्सवंमसङ्गतं, भगवतो हि नाभिनेतृता, किन्तु स्वचेष्टावेश- मात्रम्। सवंशब्दे च प्रकृतनाटकादिविषये वण्यंमाने प्रथमश्लोकार्ध पुनरुक्तार्थमेव। विशेष-भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में रूपक के दस भेद बताये हैं। इनके अतिरिक्त भरतमुनि बे नाटक ओर प्रकरण के मिश्रण से रूपक के एक अन्य भेद 'नाटी' का उल्लेख किया है। परबर्ती काल में जिसे 'नाटिका' संज्ञा प्राप्त हुई। वनञ्जय ने भरत के अनुसार दश रूपकों का उल्लेख किया है और 'नाटिका' नामक एक संकोर्ण भेव भो ाना है। अग्निपुराणकार ने दस रूपकों के अतिरिक्त सत्ह उपरूपक भी माने हैं। साहित्यदर्पणकार विश्बनाथ दस रूपकों के साथ अठारह उपरूपकों को भी चर्चा की है। शारदातनय बस रूपकों के साथ तोटकादि चोर भावात्मक रूपकों का भो उल्लेख किया है। नाट्यदपंणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने नाट्यदर्पण में बारह रूपकों का व्णन किया है। उन्होंने भरतोक्त वस रूपकों के अतिरिक्त 'नाटिका' और 'प्रकरणा' नामक दो रूपक भेद और जोड़कर रूपकों को संख्या बारह बताई है ।। २-३ ।। इनमें प्रथम सामान्य लक्षण को कहते हैं- अनुवाद-वृत्तियाँ सभी काव्यों की मातायें कही गई हैं। इन वृत्तियों के प्रयोग से ये दश रूपक विनिःसृत है॥। ४ ।। अभिनव-वृत्तियां सभी काव्यों को माताएँ हैं। इस विषय में कुछ लोग कहते हैं कि वृत्ति प्रभवत्त्व दश रूपकों का सामान्य लक्षण है। वृत्तियाँ और उसके अञ्ज अभिनय में होते हैं, काव्य में उनका होना असम्भव है। इस पर कहते हैं कि यह कहना असत् है। काव्यार्थ को रहने दोजिए। सारा संसार ही वृत्तियों में व्याप्त है, यह प्रथम अध्याय में मैं कह चुका हूँ। यदि हम कहें कि वृत्ति व्यवहार अभिनेय विषयक है तो वृत्यध्याय में जो वृत्तियों का निरूपण 'यां यां देवः समाचष्टे कियां वृत्तिबु संत्रिताम्' इत्यादि के रूप में किया जायेगा। वह सब असङ्कत हो १. क. (हि०) नाटयानां। २. ख. विनिसृत । क. (थ.) विनिर्गतं।

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६२० नाडचचारचे

यतु "सवनामवेयैर्भरतैः" (२०-१५) इति "बहुगोतनुतव्राद्ये"ति (२०-४७) "वाग ङ्गाभिनयवतोति (२०-३९) व भरतव्यवहारो गोताभिनयाभियोगश्च नाना- भिनये इति तदप्यकिञ्वित्करम्। तावध्धि वृत्तोनां लक्षणं "या वावप्रधाना" (अ-२०) इत्येतावदेव भारत्या लक्षणम्। अन्यत्र प्रयोगप्रदर्शनमिति तत्रैव व्याख्यास्यामः । वृत्त्यङ्गान्यपि सर्वकाग्येषु सन्त्येव। नग्वेवं वृत्तिजतवं कथं बशरूपकलक्षणम्, उच्यते, प्रयोग इत्येतदर्थकमेव। तदयमर्थ :- प्रद्यपि सर्वेषामभिनेयानभिनेयानां च काव्यानां वृत्तय इष्टा मातर इव, ताम्योऽपि वाच्यरूपरवेन कविहृदये व्यवस्थिताभ्यः काव्यमुत्पदयते। तथापि प्रयोगं प्रयुज्यमानत्वात्प्रयोगयोग्यत्वमभिसन्धाय वृत्तिभ्यं विनिस्सृतमभिनेयकाव्यं प्रत्यक्ष- भावनायोग्यवृत्तिच तुष्टयाभिधायकस्तवं दशरूपसामान्यलक्षणमित्यर्थः । दशानां नाटकादीनां रूपमिति षष्ठीसमास: ।

जायेगा। भगवान् अभिनेता नहीं हैं, किन्तु उनमें अपनी चेष्टाओं का आवेश मात्र होता है। सर्व शब्द से प्रकृत नाटकादि का विषय वर्ण्यमान होने पर प्रथम श्लोक का अर्धमात्र पुनरुक्त ही हे। और जो 'स्वनामधेयेः भरतेः प्रयुक्ता' इति और 'बहुगीतनृत्यवाधेति' तथा 'वाङ्गाभिनयवतो' यह जो भरत का व्यवहार है और गोत एवं अभिनय का अभियोग है और जो नाना अभिनय है वह सब अकिञ्चित्कर है, उतना ही वृतियों का लक्षण है। "या वाक्यप्रधाना पुरुषेः प्रयोज्या" इतना ही भारतो का लक्षण है। शेष सब प्रयोग प्रदर्शन है। इन सबको वहीं व्याख्या करेंगे। वृत्तियाँ और वृत्तियां के अङ्ग भी सभो काव्यों में होते हैं। अब प्रश्न होता है कि यदि वृत्तियाँ और उसके अङ्ग सभी काव्यों में हाते हैं तो वृत्तिप्रभवत्व दश रूपकों का लक्षण कैसे सम्भव होगा? इस पर कहते हैं कि 'प्रयोगतः' अर्थात् प्रयुज्यमान अर्थ के लिए है। इसका यह अर्थ है कि यद्यपि वृत्तियाँ सभी अभिनेय और अनभिनेय सभी काव्यों की जननी की तरह हैं। वाच्य के रूप में कवियों के हृदय में स्थित उन वृत्तियों से काव्य का उद्धव होता है, तथापि प्रयुज्यमान होने के कारण प्रयोग की योग्यता का अभिसन्धान कर वृत्तियों से विनिःसृत प्रयोग अभिनेय काव्य होता है। अतः प्रत्यक्ष भावना के योग्य चारों वृत्तियों का अभिघायक दशरूपक है, यह दश रूप का सामान्य लक्षण है। 'दशानां नाटकादीनां रूपम्' यहाँ षष्ठी समास है।

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'जातिभिः श्रुतिभिश्चेत्र स्वरा ग्रामत्वमागता। यथा तथा वृत्तिभेदैः काव्यबन्धा भवन्ति हि ॥ ५॥ अन्ये त्वाहुः। एकैकस्य रूपकस्य दश दश रूपाणि संभवन्ति। तथा च वोथ्यङ्गानां सतत्र संभव्वः। परगनवचनानुराभावणरूपभागयोगश्च कि व्रवोषो- त्याकाशभाषिते। एवमन्यदपि। तेन दज्ञ रूपाणि यस्य तादृशरूपं काव्यमित्यथः। अत एव न सकल: प्रबन्धो नाटकम्, अपितु प्रबन्धस्य किञ्चिद्रुपं, तल्लक्षणांश- बाहुल्यात्तु तव्दपदेशयोगः । अत एव न दशसंख्याविभागार्थो येन सट्टकादीनां त्याग: स्थात्। तत्रापि हि दशरूपलक्षणयोगोऽस्त्येव। एतच्च स्वावसरेषु वितनि- ष्यामः ॥४ ॥ ननु प्रयोगयोग्यचेष्टाप्रतिपादकत्व चेतु सामान्यलक्षणं, तहि चेष्टातिरिक्तस्य कस्यचिदसं भाव्यत्वान्तास्त्येव विशेषलक्षणमेवामित्याशङ्काशमन विशेषलक्षणवकाश वर्शयितुमाह-जातिभिः श्रतिभिश्चेत्यादि। अन्य लोग ता कहते हैं कि एक-एक रूपक के दश-दश रूप सम्भव है, अतः वीथी के अङ्गों को सर्वत्र सम्भावना है। दूसरे के वचन के अनुरूप भाषण भाण है, इसका सम्बन्ध 'कि ब्रवोषि' इस आकाशभाषित में है। इसी प्रकार अन्य भी हैं। इसलिए दश रूप हैं जिसके वह दशरूप काव्य है। अत एव सकल प्रबन्ध (सभी रचनायें) नाटक नहीं है, अपितु प्रबन्ध का कुछ रूप है, उसके लक्षणों का आंशिक बाहुल्य होने से उसका यह व्यपदेश है, नाम है। इसलिए दश सख्या का विभाग है, ऐसा अर्थ नहीं है। जिससे सदृक आदि का त्याग हो जाय, उन सदकादि में भो दश रूप के लक्षण का योग है हो, उसका निरूपण पक्षावसर करेंगे।। ४ ॥ अभिनव-यहाँ पर प्रश्न यह होता है कि प्रयोग के योग्य चेष्टाओं का प्रतिपादन यदि सामान्य लक्षण है और चेष्टा के अतिरिक्त अन्य किसी क्रिया के असम्भाव्य होने से क्या इनका विशेष लक्षण नहीं है ? इस प्रकार को आशङ्का के शमन और विशेष लक्षण के अवकाश का दिखाने के लिए कहते हैं-ज्ञातिभि- रित्यादि। अनुवाद-जिस प्रकार जातियों एवं श्रुतियों से स्वर ग्रामत्व को प्राप्त होते हैं उसी प्रकार वृत्तियों के भेद से काव्यबन्ध (रूपक-रचना) हो जाते है॥ ५॥ १. ग. एतेषां चातिभि: । २. क. (टि०) स्वरग्रामत्वमागतैः । ३. क. (भ.)-यद्वतथैव वृत्तिम्यः काव्यबन्वाः प्रतिष्ठिताः।

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६२२ नाटघशाहत्रे

दृष्टान्तेन प्रकृतं घटयन् व्युत्पादनोयमपि व्युत्पादयतीति समानतन्त्रसिद्ध- मेव दृष्टान्तमदीदृशत्। स्वरेषु ग्रहादिवशकविभाग नियता जातिः। रक्त्ोऽरक्तो वा ध्वनिः। ध्वनिः स्थानं तवन्तरालं च शुतिः, कर्माधिकरण- करणव्युत्पत्त्याश्यात्। स्त्रियाः खलनाविति हि नादृतं लक्ष्ये। तत्र षाड्जोप्रभृतयो जातयः सप्त, पञ्चमस्य चतत्रः अ्रतयो, धैवतस्य तिस्रः, इति षड्जग्रामः । गां्धार्याध्या एकादश जातयः, पञ्चमस्त्रिश्ुतिः धैवतस्तु चतुःश्रुतिरिति मध्यमग्रामः।

वस्तुतस्तु षड्जादिस्वरसमुदायो ग्रामः । तत्र स्वरा इति श्रुतिपक्षे बहुवचनं लक्ष्यविदः समर्थयन्ति-मध्यग्रामे पञ्चमपरित्यक्ता श्रुति-घवत एवोपभुङ्क इत्यत्र प्रमाणाभावात् सवं एब वित्निश्रुतिकाः (श्रुत्युत्कृष्टतः) या समधिकधुतयः क्रियन्ते, काकस्यन्तराभ्यां च चतुस्त्रिश्रुतयो न्यूनधुतय इति सर्वस्वराणां श्रुतिकृतं वैचित्र्य- मस्तीति। एतच्च स्वावसरे वक्ष्याम इत्यास्ताम्।

अभिनव-दृष्टान्त के द्वारा प्रकृत का संघटन करते हुए व्युत्पादनोय का व्युपादन करते हैं, अतः समान तन्त्र सिद्ध दृष्टान्त दिखाया है। स्वरों में ग्रहादि दश लक्षणों से युक्त जाति रहतो है। ध्वनि रक्षक और अरब्जक भेद से दो प्रकार की होती है। क्रिया, क्रिया के अधिकरण और उनके साधन तथा व्युल्पत्ति के आश्रय में निष्पन्न ध्वनि, स्थान और उनका अन्तराल श्रुति होती है 'स्त्रियाः खलनौ' यह पाठ प्रकृत में आदरणोय नहीं है अर्थात् असङ्गत है। उनमें षाडजी प्रवृत्ति सात जातियाँ है। षड्ज ग्राम में पञ्चम की चार श्रुतियाँ, धैवत की तोन श्रुतियाँ होतो हैं। मध्यम ग्राम में गान्धारो आदि ग्यारह जातियाँ, पञ्चम की तीन श्रुतियाँ और धैवत की चार श्रुतियाँ होती हैं।

अभिनव-वस्तुतस्तु षडज आदि स्वर-समुदाय को 'ग्राम' कहते हैं। यहाँ श्रुतियों के विषय में 'स्वराः' इस बहुवचन का लक्ष्यवेत्ता लोग समर्थन करते हैं- मध्यम ग्राम में पञ्चम को छोड़कर श्रुति का उपभोग धैवत ही करता है इसमें कोई प्रमाण नहीं है, सभो दो-्तोन श्रुति वाले और जो अधिक श्रुति वाले हैं, काकलो और अन्तरा के द्वारा कभी चतुःश्रुति, कभो त्रिश्रुति और कभो न्यून श्रुतियाँ होती हैं। इस प्रकार सभी स्वरों में श्रुतिकृत वैचित्र्य देखा जाता है। इसको यथावसर कहेंगे। इसललए रहने दिया जाय।

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अष्ादशोऽयाय: ६२३

ग्रामौ 'पूर्णस्वरौ द्वौ तु यथा वै षड्जमध्यमौ। *सर्ववृत्तिविनिष्पन्नौ काव्यबन्धौ तथा त्विमौ॥ ६॥

इह त्वनेन दृष्टान्तेनैतदुक्तं भवति-स्वरसमुवायरूपत्वाविशेषेऽपि स्वराणा

विभागभेवः, यथान्यषड्जग्रामोऽन्यो मध्यमग्रामः, तथैव वृत्तीनां स्वरस्थानीयानां प्राथम्यप्राधान्यादिना बशकेन रूपकं रूपकान्तरा्रिद्यते यथा चतुःश्ुतिः पञ्चम- स्त्रिश्रुतिश्च भवन् ग्रामान्यत्वं करोति तथा सेव वृत्ति: श्रुतिस्थानीयैरङ्गं- ववचित्संपूर्णा क्वचिन्यूनेतयेवपि रूपकविभाग इत्येतज्जातिभि: श्रुतिभिरिति द्वयेन दशितम्॥ ५॥ अथ वृत्तिविभागं संक्षेपतोऽभिघत्ते-ग्रामौ पूणंस्वराविति।

यहां पर तो इसी दृष्टान्त के द्वारा यह कहा गया है, कि स्वरों के समुदाय रूप से किसो वेचित्र्य के न आने पर पर्याय रूप से प्राथम्य, प्राधान्य, अल्पल्व, भूयस्तव, पूर्णत्व, अपूर्णतव, आरोहत्व, अवरोहत्व, अन्त्यत्व, मध्यत्ब आदि प्रविभाग के भेदों से जैसे षड्ज ग्राम अन्य है और मध्यम ग्राम अन्य है। उसो प्रकार स्वर स्थानीय वृत्तियों के प्राथम्य प्राधान्यादि दशक के कारण एक रूपक दूसरे रूपक से भिन्न होता है। जिस प्रकार चतुःश्रुतिक पञ्चम त्रिश्रुति होने पर ग्राम भेद करता है, उसी प्रकार वही वृत्ति श्रुति-स्थानीय अङ्गों से कहीं सम्पूर्ण और कहीं पर न्यून इस प्रकार रूपक का विभाग होता है, तोन प्रकार श्रुति और जाति इन दोनों भागों से दिखाया गया है ॥५ ॥ अब बृत्तियों के विभाग को संक्षेप में कहते हैं- अनुवाद-जिस प्रकार षड्ज और मध्यम दोनों ग्राम पूर्ण स्वर होते हैं उसो प्रकार काव्यबन्ध भो सम्पू्ण वृत्तियों से निष्पन्न होते हैं ॥ ६॥

१. क. (टि०) पूर्वस्वरी । २. क. (टि०) सवंतृतविनिण्वन्नं काठ्यइण्धं हवयं समृताः।

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नाटथशास्त्रे

ज्ञेयं प्रकरणं चैव तथा नाटकमेव च। नानाबन्धसमाश्यम् ॥। ७॥ वोथी समवकारश्च 'तथेहामृग एव च। उत्सृष्टिकाड्को व्यायोगो "भाणः प्रहसनं डिमः ॥ ८ ॥ जात्याधययोर्जातिद्वारेण षाडवौडुविकाशयोगे न्यूनस्वरताप्यस्तीति षडज- ग्रामरागो मध्यमग्रामरागश्चेह ग्रामशब्देन व्यपविष्ट इति केचित। तदसत्। इह हि ग्रामशब्देन जातिसमुदायोऽभिधोयते। तत्र यद्यप्यंशके न्यूनस्वरतापि भवति, तथापि समुदायस्य पूर्णताया: का हानिः। तस्मावयमत्रार्थः-यथा विचित्रसन्नि- वेशतालम्बनसुन्दरतमसंपूर्णस्वरसमुवायरूपात्। ग्रामद्वयाद्विभागकल्पनया जातंशकानां पूर्णांपूर्णादिस्वरभेवभाजां प्रसवः, एवं नाटकप्रकरणाम्यां पूर्णवृत्तिवृत्त्यङ्गा्म्यां वृत्ति- न्यूनानों च रूपकभेवानां परिकल्पनम् ॥७॥ तत्र वृत्तिम्यूनानि रूपकाण्याह-वीथोत्यादि । अभिनव-जाति के द्वारा जाति के आश्रय में षाडव और औडुविक के अंशों के योग में स्वरों की न्यूनता भी है, अतः षड्ज ग्रामराग तथा मध्यम ग्रामराग को यहाँ पर ग्राम शब्द से अभिहित किया गया है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं, किन्तु यह कथन ठीक नहीं है। क्योंकि यहाँ ग्राम से जाति समुदाय का कथन है। वहाँ अंश में यद्यपि स्वरों की न्यूनता है तथापि समुदाय को पूर्णता मानने में क्या हानि है ? इसलिए यहाँ यह अर्थ होगा कि जैसे विचित्र रूप से सन्निवेश के अवलम्बन से सुन्दरतम सम्पूर्ण स्वर-समुदाय रूप दो ग्रामों के विभाग की कल्पना से पूर्ण और अपूर्ण स्वर वाले जात्यंशकों को उत्पत्ति होती है उसी प्रकार नाटक, प्रकरण के द्वारा पूर्ण वृत्ति और वृत्यच्कों और वृत्तियों की न्यूनता वाले रूपक भेदों की कल्पना की गई है ।। ६ ।। अनुवाद-नाटक और प्रकरण को समस्त वृत्तियों से विनिष्पन्न और नाना प्रकार के बन्धों (रचनाओं) के आधय समझना चाहिये।। ७॥ १. ग. पूर्ववृत्तविनिष्पन्नं । २. ख. नाट्यावस्थासमाश्रयम् । ३. ल. ग. भाष: । ४. ख. वीथीचेहामृगस्तथा। ५. ग. वीथो। ख. भाण: प्रहसनं तथा ।

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केशिकीवृत्तिहोनानि रपाण्येतानि कारयेत्। अत ऊ्भ्वं प्रवक्ष्यामि काव्यबन्धविकल्पनम् ॥ ९॥ शेषाणि रूपाणीति वत्तव्ये प्रतिपद नामग्रहणं ज्ञापयति। एतदनुक्तान्यपि रूपकाणि संभवन्ति, अत एव रूपकविशेषगणनमाम्यो विनिस्सृतमिति लक्षणस्यो- दाहरणमात्रम्। तेन वृत्तीनां विनियोगविकल्पसमुच्चयैः वृत्त्यङ्गानां च बहवो रूपकभेदा भवन्ति। तेषां परं कोहलाविभिर्नाममात्रं प्रणीतम्। लक्षणेन त्विह संगृ- होता एव ते। तत्र नाटकप्रकरणे एव सर्ववृत्तिपूर्णे इति नियमः, न तु विपर्ययः। मुद्राराक्षसस्य कैशिकोहोनस्य कृत्यारावणस्य च नाटकस्य दर्शनात, वेणीसंहारे च सात्त्वत्यारभठीमात्रं दृश्यत इति केचित। अब न्यून वृत्ति वाले रूपकों को कहते हैं- अनुवाद-बोथी, समवकार, ईहामृग, उत्सृष्टिकाड्ू, व्यायोग, भाण, प्रहसन और डिम नामक रूपकों में कौशिकी वृत्ति से रहित प्रयोग होने चाहिए। अब इसके बाद काव्य-बन्ध दोनों को फहूँगा।। ८-९।। अभिनव-नाटक और प्रकरण में समस्त वृत्तियाँ होती हैं। किन्तु वीथी, प्रहसन, समबकार, ईहामृग, उत्सृष्टिकांक, व्यायोग, भाण, डिम में केशिकी वृत्ति से रहित अन्य वृत्तियां होती हैं। कहते हैं कि यहाँ 'शेषाणि रूपाण' कहना चाहिए था, प्रत्येक रूपकों के नाम ग्रहण से यह सूचित करता है कि इनसे भिन्न भी रूपक सम्भव है। अतः इन वृत्तियों से रूपक विशेष का विनिर्गमन हुआ, अतः लक्षण का कथन एक उदाहरण मात्र हैं। इससे वृत्तियों के विनियोग, विकल्प और समुच्चय के द्वारा बृत्यड्कों से बहुत से भेद होते हैं किन्तु कोहल ने उनके नाममात्र गिनाये हैं जिनका यहाँ सामान्य लक्षण से संग्रह कर लिया गया है। उनमें नाटक और प्रकरण में समस्त वृत्तियाँ होती हैं, यह नियम है न कि विपर्यय। जैसे मुदाराक्षस नाटक में कैशिकी बृत्ति नहीं होती, कृत्यारावण में नाटक को वृत्तियाँ दिखाई देती हैं। कुछ लोग तो कहते हैं कि वेणीसंहार नाटक में सास्वती और आरभटी हो दिखाई देते हैं।

१. क. (भ.) काव्यान्येतानि योजयेदु। ना० श्ा०-७९

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अभ्ये तु तत्राप्यवश्यं वृत्त्यन्तरानुप्रवेश्योऽस्ति। यदि परिमितवृत्तिव्यापकश्वात् लक्ष्यते, अपूर्णवृत्तित्वेऽपि विरूपकतैव स्यात। सकलाङ्गप्रक्रियापरिपूणत्वावेव नाटकातप्रकरणं च प्रधानम्। तथा हि कश्चिद्विनेयः प्रसिद्धिमनुव्ष्यमानो दृष्ट इति सप्रसिद्धेतिवृत्ते नाटके विनेयः । कश्चित्तु किमेतवपूर्वमिति प्रसिद्धे वस्तुनि रुपकान्तरमेव तु तदाभासं तत्सवंविनेयोऽभिनववस्तुवृत्तकौतुकपरतन्त्र इति समुत्पाद्यवस्तुना प्रकरणेन विनीयते। विनयश्चास्य धर्मार्थंकामेषु सर्वपुरुषार्थेष्य- पवर्गेडपि च तथाभवति, यदि सकलं तदुपयोगिव्यापाराश्यणं सवंव्यापाराक्षिप्तं पूर्णवृत्तिकत्वमिति । द्विवृत्तित्निवृत्त्याविकं न नाटकं भवति। रूपाश्तरमेव तु तवाभासं, तत्कैशिकीवि होनत्वेऽपि यथा शुङ्गारयोगस्तथा समवकारे तथा तल्लक्षणं वर्णयिष्यामः ॥।८।। ननु पूर्णवृत्तिकत्वाविशेषे नाटकप्रकरणयोः को भेद:, कैशिकीहीनत्वे चाविशिष्टे वोथ्यादे: मिथः को विशेष इत्याशड्डां वारयन् कर्म (इ्लो १) शब्दाक्षिप्तविशेषलक्षणार्थं वशयति-अत उध्वंमित्याविना काव्यस्य बन्धनं परस्परा शयसंबन्धेनैव एकवाक्यताकरणसंबन्धः स विकल्प्यते येन तद्विशेषलक्षणं वक्ष्यामीति॥ ९॥ अन्य लोग तो उनमें भी बृत्यन्तरों का अनुप्रवेश है, ऐसा मानते हैं। यदि परमित बृत्ति के व्यापक होने से लक्षण करते हैं तो अपूर्ण वृत्ति वाले रूपक निरूपक हो जायेंगे। सकल अङ्गों को प्रक्रिया से पूर्ण होने के कारण नाटक से प्रकरण प्रधान होता है। जैसा कि कोई विनेय प्रसिद्धि का अनुरोध करता हुआ देखा जाता है। अतः सुप्रसिद्ध इतिवृत्त वाले नाटक में वहो विनेय होता है। कोई तो इसमें अपू्वंता क्या है ? इस प्रकार प्रसिद्ध वस्तु में रूपक नहीं, अपितु रूपकाभास है, ऐसा मानने वाला विनेय अभिनव वस्तु के कौतुक के परतन्त्र है, होने से समुत्पाद्य वस्तु वाले प्रकरण से वह विनेय होता है और विनय धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप पुरुषार्थ चतुष्टय में वैसा तभो सम्भव है जब सभी नाटक उनके उपयोगो व्यापारों के आश्रय से निबद्ध हों तथा समस्त व्यापारों से समस्त वृत्तियाँ आश्रित हों। दो, तोग, चार वृत्ति वाले नाटक नहीं होते, अपितु उनसे भिन्न रूपक का भास होंगे। इसलिए कौशिको बृत्ति के अभाव में भी जिस प्रकार शुङ्गार का योग है, उसी प्रकार समवकार में भी, उसका लक्षण आगे वणन किया जायेगा।

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प्रख्यातवस्तुविषयं1 प्रख्यातोदात्तनायकं चैव। राजषिवंश्यचरितं तथैव विव्याश्रयोपेतम् ॥ १०॥

अङ्कप्रवेशकाढयं भवत हि तन्नाटकं नाम ॥ ११ ॥

नाटकं प्रकरणादपि प्रधानं प्रसिद्धधुपजोबिनो हि कल्पना वस्तुसंभावना, अनुभवमूलत्वात् तस्या, उत्प्रेक्षा अपि हि प्रमाणगतेष्वेव वस्तुषु स्वातन्त्र्येण योजना- मात्रेण व्याप्रियन्ते, षड्दन्तो हस्ती खे धावतीति तेनेतिहासादिप्रमाणवस्तुसिद्ध- प्रदशकं नाटकं तावल्लक्षयितुमाह-प्रख्यातवस्तुविषयमित्यादि। अब प्रश्न यह होता है कि जब नाटक और प्रकरण में सम्पूर्ण वृत्तियाँ होतो हैं तो दोनों में परस्पर भेद क्या है ? यदि यह कहते हैं कि कौशिको वृत्ति से हीन होना विशेष है ता वोथी आदि से क्या भेद होगा ? इम प्रकार की आशङ्का का निवारण करते हुए कर्म शब्द से आक्षिप्त विशेष लक्षण को 'अत ऊर्ध्वम्' इत्यादि के द्वारा दिखाते हैं। काव्य का बन्धन परस्पर आश्रय के सम्बन्ध से एकवाक्यता से प्राप्त सम्बन्ध में विकल्प होता है जिससे विशेष लक्षण को कहूँगा। नाटक प्रकरण से भी प्रधान होता है, क्योंकि उसमें प्रसिद्धि का उपजीवन करने वालो कल्पना-प्रसूत वस्तुओं को सम्भावना रूप उत्प्रेक्षायें होती हैं और उत्प्रेक्षा भी प्रमाण प्राप्त वस्तुओं में स्वतन्त्र रूप से योजना मात्र से व्याप्त हो जातो है। जैसे छः दातों वाला हाथी आकाश में दौड़ रहा है। इसोलिए इतिहासादि प्रमाणों से सिद्ध वस्तु के प्रदर्शक नाटक का लक्षण करने के लिए कहते हैं- १. नाटक अनुवाद-जिसमें कथावस्तु का विषय प्रल्यात हो, और नायक प्रल्यात एवं उदात्त हो, जिसमें राजषि वंश का चरित वणित हो, तथा जो विव्य के आश्रय से उपेत हो और जो नाना विभूतियों से समृद्धि और विलासादि गुणों से युक्त हो, तथा जिसमें अङ्क, प्रवेशक आदि विद्यमान हों, उसे 'नाटक' समझना चाहिये।। १०-११ ॥

१. ग. विषये। १. ख. तथा प।

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प्रख्याते भारतादौ यद्वस्तु तद्विषयोऽस्य, तत्रापि किञ्चिवप्रसिद्धं भवति, तन्निराकरणाय प्रख्यातोदात्तेति शरोशङ्ककः। एतत्तु प्रश्यातंवस्तुविषयोऽस्येति इयता गतार्थमित्युपाध्याय इत्यमाहुः । इह त्रिविधया प्रसिद्धधा प्रसिद्धत्वं भवति, अमुक एवंकारो अमुत्र देश इति। तत्र प्रकर्षेण ख्यातं वस्तु तथा विषयो माळवपाञचालादिदेशो यस्मिन् चक्रवर्तिनोऽपि हि वत्सराजस्य कौशाम्बो- व्यतिरिक्ते विषये कार्यान्तरोपक्षेपेण विना यन्निरन्तरं तद्वरस्याय भवति, तत्र प्रसिद्धिखण्डनेन प्रतोतिविधातात्, का कथा रसचर्वणाया:। एवं तावद द्वे प्रसिद्धी उक्ते प्रख्यातोवात्तेत्यनेन तृतीया प्रसिद्धिरवता। उदात्त इति वोररसयोग्य उक्तः । तेन धोरललितधोर प्रशान्तघोरोद्वतघोरोदात्ता: चत्वारोऽपि गृह्यन्ते। राजषिवंश्येत्यनेन प्रख्यातमपि यद्वस्तु ऋषितुल्यानां राज्ञां वंशेन साधु- नोचितं, तथा प्रश्यातत्वेऽपि देवचरितं धरप्रभावाविबहुलतयोपायोपदेशायायायोग्य- मिति नैतदुभयं निबन्धनोयमिति फलतः प्रतिषेधो द्शितः। राजानः ऋषय इवेश्युपमितसमास:। तदवंशे साधु चरितं यस्मिग्निति बहुब्रोहिः। न च सबंथा वेषचरितं तथाऽव्णनीयम्। किन्तु दिव्यानामाधयत्वेन प्रकरीपताकानायकादि रपेण, उपेतमुपगमोऽङ्गेकरणं यत्र। तथा हि नागानन्दे भगवत्याः पूर्णकरुणा- निर्भराया: साक्षात्करणे व्युत्पत्तिर्जायते। निरन्तरभक्तिभावितानामेतन्नाम देवताः प्रसीदन्ति, तस्माद्द वतारावनपुरस्सरमुपायानुष्ठानं कार्यमिति।

अभिनव-प्रश्यातवस्तुविषयमिति अर्थात् महाभारत आदि प्रख्यात ग्रन्थों में जो कथावस्तु है वह विषय (प्रतिपाद्य) है जिसका। कदाचित् इसमें भी अप्रसिद्ध वस्तु हो सकतो है उसके निराकरण के लिए प्रख्यात एवं उदात्त नायक कहा गया है यह आचार्य शंकुक का मत है। और जिसका प्रतिपाद्य प्रख्यात वस्तु होतो है, उसका नायक उदात्त होने से गतार्थ हो जाता है। यह हमारे उपाध्याय भट्ट तौत कहते हैं। यहाँ तोन प्रकार को प्रसिद्धि से प्रसिद्धि मानी गई है। उनमें प्रथम है- अमुक ने अमुक देश में ऐसा किया। इसमें वस्तु प्रकर्प रूप से ख्यात होता है और विषय मालव पाञ्चाल आदि देश हैं। जहाँ चक्रवर्ती राजा वत्सराज आदि के कौशम्बी से अतिरिक्त प्रदेश में कार्यान्तर के उपक्षेप के विना जो निरन्तर वर्णन है वह वरस्य के लिए होता है। वहाँ प्रसिद्धि के खण्डन करने से प्रतोति का बिधान हो जाता है, तो रस-चर्वणा की कथा हो क्या है ? इन दो प्रसिद्धियों का कथन किया जा चुका है। 'प्रख्यातोदात्तमापक' के द्वारा तृतीय प्रसिद्धि को कहा गया है। उदात्त यह विशेषण वोर रस के योग्य कहा गया है। इससे धीरललिनत, धोरोदात्त, धीर प्रशान्त और धोरोदत चारों नायकों का ग्रहण होता है। 'राजर्षिवशचरितम्'

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यदि तु मुख्यतवेनैव वेवचरितं वर्ण्यते तत्तावद्विप्रलम्भकरुणाद्भुतभयान- करसोचितं चेश्निबध्यते तन्मानुषचरितमेव संपद्यते, प्रत्युत देवानामबियाधानं प्रसिद्धिविघातकम् । तत्र चोको बोष:, विप्रलंभाद्यभावे तु का तत्र विचित्रता रख्नाया एतस्प्रमाणत्वात्। अत एव हृवयसंवादोऽपि देवचरिते वुर्लभः,न च तेषां दुःखमस्ति। यत्प्रतीकारोपाये व्युत्पादनं स्यात। नायिका तु विव्याप्य- विरोधिनी यथोवंशो नायकचरितेनैव तद्बृत्तस्यापक्षेपात । १० ॥

इस कथन से प्रख्यात वस्तु ऋषितुल्य राजाओं के साधुवंश के योग्य हैं। और देवताओं का चरित यद्यपि प्रख्यात है, तथापि वर-प्रभाबादि की बहुलता से उपाय के रूप में उपदेश के योग्य नहीं है। इसलिए दोनों विशेषणों का प्रकृत में उप- निबन्धन नहीं करना चाहिए। इस प्रकार फलमुखेन यहाँ निषेध दिखाया गया है। 'राजा लोग ऋषियों के समान हैं' यह बहुब्रीहि समास है। देवचरित सर्वथा उस रूप में अवर्णनीय है, ऐसी बात नहों है। किन्तु जहाँ दिव्य कथाओं का आश्रय होता है वहाँ यताका और प्रकरी के रूप में उनका उपगम अङ्गोकरण के योग्य हैं। जैसे-नागानन्द नाटक में पूर्ण करुणा से निर्भर भगवतो के साक्षातकार करने में व्युल्पस्ति होती है। यहाँ यह बतलाया गया है कि निरन्तर भक्ति-भावना से भावित प्राणियों पर देवता प्रसन्न हो जाते हैं, अतः देवाराधन पुरःसर उपायों का अनुष्ठान करना चाहिए।

यदि मुख्य रूप से देवताओं के चरित का वर्णन करते हैं, और विप्रलम्भ, करुण, अद्भुत, भयानक और रौद्र रस के योग्य यदि निबन्धन किया जाता है तो 'मनुष्य का चरित हो सम्पन्न होता है।' ऐसा मानना होगा। प्रत्युत अबुद्धिपूर्वक किया गया देवचरित का आधान प्रसिद्धि का विघातक होगा। वहाँ दोष भी कहा जा चुका है, विप्रलम्भ आदि के अभाव में क्या विचित्रता होगो? क्योंकि रख्जना उसका प्रमाण है, इसलिए देवताओं के चरित में हृदय का संवाद भी दुलभ होगा, क्योंकि उनमें दुःख ही नहीं है जिसके प्रतीकार के उपायों के सम्बन्ध में व्युत्पादन किया जा सके। नायिका के दिव्या होने पर भो उसके चरित में विरोध नहीं है, क्योंकि नायक के चरित्र के अनुसार नायिका के चरित्र का आक्षेप कर लिया जाता है। जैसे पुरुरवा के चरित से उरवशो का चरित।

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डिमादौ तु दिथ्यानां नायकत्वेऽभिप्रायमावेदयिष्याम इति प्रसिद्धित्रययुत्तमपि वस्तु न निष्फलं व्युत्पतये भवतोत्यत आह-नानाविभूतिभिर्युतं। धर्मार्थकाममोक्षविभवैः फलभूतैविचित्ररपैर्युक्तम्। तत्राप्यर्थंकामौ सर्व- जनाभिलषणीयाविति तद्बाहुल्ये दशनोयमिति कथयति ऋद्धिविलासादिभिरति ऋद्विरथंस्य राज्यादि समृद्धिः विलासेन कामो लक्ष्यते, आदिशब्द: प्रधानवाची, ततप्रधानाभि: फलसंपत्तिभि: युक्तमित्यथः। तेन राजा सवं राज्यं ब्राह्मणेम्यो दत्त्वा वानप्रस्थं गृहोतव्यमित्येवंप्रायं फलं नोपनिबन्धनोयम्। तत्फलमवि दृष्टसुखार्थो हि लाको बाहुल्येनेति तत्रास्य प्रतोतिविरसीभवेत्। गुणैरित्यप्रधानभूतानि चेष्टितानि हेयानि प्रतिनायकगतानि अपायप्रधानानि तैर्युक्तम्। तेषां पूर्वपक्षस्थानीयानां प्रति- क्षेपेण सिद्धान्तकल्पस्य नायकचरितस्य निर्वाहाज्जनपवकोशिसपत्ति समृद्धिः कौमुदीमहोत्सवादयो विलासा: सन्घिविग्रहादयो गुणा इति व्याख्यानं चाणक्यशास्त्र- परिचयवेवनमात्रफलं, वस्तुशब्देन राजषिवश्यचरितशब्देन च सवस्यार्थराशे: संग्रहात। अवान्तरवस्तुसमाप्तौ विश्रान्तये ये विच्छेदा अङ्का: ये च निमित्तवलात अप्रत्यक्षदृष्टानां चेष्टितानामावेदकाः प्रवेशकाः तैराढ्यं नाटक नाम रूपकम्॥। ११॥ इस प्रकार डिम आदि रूपकों में दिव्य नायकों के मानने में अभिप्राय विशेष है, उसे आगे बतायेंगे। इस प्रकार प्रसिद्धित्रय अर्थात् प्रसिद्ध वस्तु, प्रसिद्ध विषय और प्रसिद्ध नायक इन तोन प्रसिद्धियों से युक्त रूपक निष्फल नहीं होता, अपितु व्युत्पत्ति के लिए होता है। इसलिए कहते हैं-नानाविभूतिभिर्युतमित्यादि। अभिनव-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप विभाव वाले विचित्र रूप फलों से युक्त नाटकों को करने चाहिए। इनमें भी अर्थ और काम सभी के अभिलषणीय होने से उन्हें अधिक दिखलाना चाहिए। इस बात को 'ऋद्धिविलासादिभिः' के द्वारा कहते हैं। 'ऋद्धि' पद से राज्यादि समृद्धि और 'विलास' पद से विलास लक्षित होता है। 'आदि' शब्द प्रधानवाची हैं। अतः इसका अर्थ होगा-अर्थप्रधान और कामप्रधान फल सम्पत्ति से युक्त। इसलिए राजा को सारा राज्य ब्राह्मणों को देकर वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण कर लेना चाहिए, इस प्रकार के फल का उपनिबन्धन नाटकादि में नहीं करना चाहिए। क्योंकि दृष्ट सुख ही नाटकादि का फल होता है, इसमें यदि वानप्रस्थान का उपनिबन्धन करते हैं तो नाटक विरस हो जायेगा। लोक इसको देखने में प्रधृत्त नहीं होगा। गुणेः' पद से अप्रधानभूत चेष्टायॅं को हेय हैं और अपाय-प्रधान होने से इनका सम्बन्ध प्रतिनायक गत समझना चाहिए।

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नृपतीना यच्चरितं नानारसभावचेष्टितं' बहुधा। सुखदुःखोत्पत्तिकृतं 'भवति हि तम्नाटकं नाम ॥ १२॥ तस्मादस्य तग्नामेत्याह-नृपतीनां यच्चरितिमिति। यद्यस्मान्नूपतीनां संबन्धि व्युत्पाद्यानां सामर्थ्यात् नृपतीनामेव नाटकम्नाम तच्चेष्टितं प्रह्लीभावदायक भवति, तथा हृदयानुप्रवेशरञ्जनोल्लासनया हुवयं चोपायव्युत्पत्तिपरिषट्टितया चेष्टया नर्त्तयति। नट नृतौ नुत्तें इत्युभयथा हि स्मरन्ति तदिति तस्माद्वेतो: नामास्य नाटकमिति।

क्योंकि उनके पूर्वपक्ष स्थानीय होने से उनका प्रतिषेध करके सिद्धान्त कल्प नायक के चरित का निर्वाह करना है। अतः जनपदों और उनके कोशादि की समृद्धि, कौमुदीमहोत्सव आदि विलास, सन्धि-विग्रह आदि गुण हैं, इस प्रकार का व्याख्यान है, चाणक्य शास्त्र के परिचय से नीति-परिज्ञान फल है। वस्तु शब्द से और राजषि वंश चरित शब्द से समस्त अर्थराशि का संग्रह है। अवान्तर वस्तु की समाप्ति में विश्राम के लिए जो विच्छेद हैं, अङ्क हैं और जो निमित्त बल से प्राप्त है, अप्रत्यक्ष चेष्टितों के आवेदक अर्थात् प्रवेशकों से युक्त नाटक नामक रूपक होता है॥ १०-११ ॥ अब नाटक नाम की सार्थकता बतलाते हैं- अनुवाद-राजाओं का जो चरित नाना प्रकार के रसों और भावों के अनुसार अनेक चेष्टाओं से युक्त हो, और जो सुख-दुःख को उत्पत्ति का वर्णन हो, उसे 'नाटक' कहते हैं॥ १२।। अभिनव-अभिनवगुप्त का कथन है कि व्युत्पाद्य अर्थात् विनेयों के सामर्थ्य से राजाओं से सम्बन्धित इतिवृत्तात्मक रूपक ही नाटक कहलाता है। उनकी चेष्टायॅ विनय-भाव को देने वालो हैं जो हृदय में प्रवेश करके रक्जन के उल्लासना के द्वारा हृदय और शरोर को नचा देता है, अतः वह नाटक है। 'नट' धातु से 'नाटक' शब्द बनता है। 'नट्' धातु के दो अर्थ होते हैं-'नृति' और 'नुत्त'। इन दो अर्थों में इनका स्मरण किया जाता है। इसलिए इसका नाम 'नाटक' है।

१. ख. नानारसभावचेष्टितैः । ग. नानारसभावसम्मतम् । २. ल. तज्ज्ञेयं नाटकं नाम । क. (भ.) नानाविघभन्वयं थितं च। क. (प.) वाच्यं यन्नाटके भर्वति।

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नाडयशाहने

ननु पुराणाध्युपनिबद्धोऽपि तदर्थ: कस्मान्नटानेवेवं भावयतीत्याह-नानेति। बहुप्रकारा:। मत्र संभावयन्ति संपावयन्ति यानि चेष्टितानि नटव्यापारा- त्मानोडभिनया: तैरेततप्रह्वीभावदायक हृद्यतमरसास्वावसूचोद्वारप्रवेशितं तत्कतंव्य- सूत्रं हृवयारोहणरूढशौर्यादिधर्मरत्नप्रथनकारि भवतीति हघुक्तमसकृत। ननु नुपतिचरित एव किमित्ययमास्वावो न वेवचरित इत्याह-बहुधेति। प्रकारा: उपायवैचित्र्याद्या: सुखबुःखोत्पत्तयस्तासां कृतं संपादनं यत्र, बेवचरिते तु तम्नास्तोत्युक्तम्। अत एव प्रतोतिविधातस्य वैरस्यदायिनः संभवो यत्र वत्र तन्नाटके नोपनिबद्धव्यम्। तेन वर्तमानराजचरितं चावणंनोयमेव, तत्र विपरीतप्रसिद्धिबाधया अध्या- रोपस्याकिञ्चित्करस्वात, योगानन्वरावणादिविषयचरिताध्यारोपवत्। एतदर्थमेव प्रश्यातग्रहणं प्रकर्षद्योतकं पुनः पुनरपात्तम्। अत एव वेदशास्त्रं न नाटकं नियोगेन हि तत्र पुमान् प्रवत्तंते, न फलोत्पत्या। फलप्राधान्यपक्षेऽरपि तत्र सन्वेहः। एवं पुराणादारवपि। इह तु बाघोदयासहिष्णुप्रत्यक्षायमाणा चिरविलम्बितप्रतीतिसिद्धा सुखदुःखोश्पत्तिरिति। अनेन वावयेनैतदुक्तं भवति-यद्यपि सवरूपकाणामर्थो हृदये प्रविष्टो विनेयांश्च विनोतान् करोति। तत एव नाटकशब्दः सामान्यवचन इति

नाटक का इतिवृत्तभूत अर्थ पुराणादि में उपनिबद्ध है जिसका उपयोग सभी लोग कर सकते हैं तो यह अर्थ नटों को ही क्यों भावित करता है? इस पर कहते हैं, 'नानारसेत्यादि'। यहाँ पर जो चेष्टायें हैं वे नाना प्रकार के नट-व्यापार रूप अभिनयों का सम्पादन करते हैं, उन्हीं के द्वारा प्रह्वोभाव के प्रदायक है जो हृद्यतम रसास्वाद रूप सुई के द्वारा प्रवेश कराया गया कर्त्तव्य सूत्र है जो हृदय पर आरोहण कर शौर्यादि धर्मरत्नों का ग्रथन करता है। इस बात का हम बार-बार कह चुके हैं। अब प्रश्न होता है कि राजाओं के चरित में ही ऐसा आस्वाद क्यों है? और देवताओं के चरित में क्यों नहीं है ? इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि अनेक प्रकार के उपायों के वैचित्र्य से जो सुख-दुःख की उत्पत्ति होती है उनका सम्पादन इनमें होता है, देवचरित में नहीं होता। यह भी पहिले कहा जा चुका है। इसलिए प्रतोति के विद्यातक वेरस्य की सम्भावना जहाँ हो उनका नाटक में उपनिबन्धन नहों करना चाहिए।

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"कार्योत्पम्नानि नाटके" इत्यादिषु स्थानेषु दशितः । तथापि ह्यवश्यव्युत्पाद्या राजानो यद्व्युत्पत्तिद्वारेण बिश्वं व्युत्पन्नं, तेन तवीयहृवयसंवावयोग्यन्पतिचरित- प्रवशनेन प्रधानतया प्रधानेऽर्थे व्युत्पाद्यन्ते, अमात्यावयः तवङ्गत्वेनैव प्रयोगस्य च यथोचितसमुद्गकस्थगनवद्व्युराद्यभाबात्तेंन प्रधानपुरुषाथे प्रधानविनेयानामन्य- त्राम्येषां वेदयतोऽवनति व्युत्पत्ति दवाति तत एव नाटकमुच्यते। श्री शङ्ुकस्तु व्याचष्टे विजिगोषुररिमंध्यमोदासोनौ मित्रं मित्रमित्रमिति। एषां चरितर्मिति बहुवचनेन लम्यते। अन्ये त्वाहु :- पूर्व राजषिवंशप्रभवा नायका उत्ता अनया स्वारयंया चन्त्रगुप्तबिन्वुसारावयोऽपि संगृहयम्त इति। व्याख्यातमयप्ठय- मेतत्पूर्वंयार्ययैवं सङ्गृहीतमिति प्रथमव्याल्यात एव युक्तयुक्तोऽर्थ:। इस प्रकार वर्तमान कालिक राजा का चरित अवणंनीय हे उसमें विपरोत प्रसिद्धि के बाध के द्वारा अध्यारोप करना अकिन्चित्कर होगा। जैसे-योगानन्द एवं रावणादि के चरित के समान अध्यारोप करना अकिश्चित्कर है, व्यर्थ है। इसी लिए प्रकर्ष के द्योतक प्रख्यात शब्द का ग्रहण बार-बार किया गया है। इसलिए कहते हैं कि यह वेदशास्त्र नहीं, अपितु नाटक है। विनियोग होने से हो उसमें लोग प्रवृत्त होते हैं न कि फलोत्पत्ति से। फल को प्रधानता के पक्ष में भी उसमें सन्देह रहता है। इसो पुराण आदि के विषय में भी समझने चाहिए। यहाँ नाटक में तो बाध के उदय को न सहन करने वाली प्रत्यक्ष अनुभूयमान दुःख को उत्पत्ति शोघ्र विलम्ब से होने वाली प्रतोति से सिद्ध है। इस वाक्य से यह कहा गया है कि यद्यपि सभी रूपकों का प्रयोजन हृदय में प्रविष्ट होकर विनेयों को विनोत करना है। इसलिए नाटक शब्द यह सामान्य कथन 'कार्योत्पन्नानि नाटके' इत्यादि स्थलों में दिखाया गया है, तथापि उन राजाओं को अवश्य व्युत्पन्न करना है जिनको व्युत्पत्ति के द्वारा विश्व व्युत्पन्न होता है। अतः व्युत्पादों के हृदय में संवाद के योग्य राजाओं के चरित प्रधान रूप से प्रदर्शन के द्वारा प्रधान अर्थ में विनेयों को व्युत्पन्न करते हैं, तदङ्क अमात्यादि को प्रयोग के औचित्य के अनुसार कभी व्युत्थान और कभो तिरोधान के अनुसार व्युर्पाद्य-व्युपादक भाव होने से प्रधान पुरुष के अर्थ में प्रधान विनेयों को अन्यत्र अन्यों (अप्रधानों) को विनीत करते हुए अवनति की व्युत्पत्ति देता है, अत एव नाटक कहा जाता है। ना. पा०-60

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६३४ नाट्यशार्ने

यत्तु कैशिचि वभिधीयते- देवा धोरोद्ता जञेया: स्युर्धोरललिता नपा:। सेनापतिरमात्यश्च धीरोदातती प्रकीतितौ।। धोरप्रशान्ता विज्ञेया: ब्राह्मणा वणिजस्तथा॥ इति बचने पर्यालोच्यमाने वेवादीनां नाटकनायकत्वानुपपत्ते:, धोरललित एक एव नायक इति। तदसत्, न हि जनकप्रभुतीनां रामादीनामपि वा धोरललितत्वम्, यवाह-"धीरोवात्तं जयति चरितं रामनाम्नश्व विष्णोः" इति । यत्तु पठित तत्र घोरललितत्वं राज्ञ एव वर्णनोयं नान्यस्य, सेनापत्यमात्य- योरधोंरोवात्तत्वमेव, देवानां धीरोद्वतत्वमेव, द्विजातीनां धोरप्रशान्तत्वमेवेति, एवं परं द्रष्टव्यं-अत एव प्रख्यातोदारेत्यत्र चत्वारोऽपि नायका: स्वीकृता इति व्याख्येयम्।

श्री शङ्कक व्याख्या करते हैं कि 'नृपतीनाम्' इस बहुवचनान्त शब्दों के प्रयोग से विजिगीषु, विजिगोषु का शत्रु, मध्यस्थ, उदासीन, मित्र और मित्र का मित्र- इन छः का ग्रहण होता है। अन्य आचार्यों का मत है कि पहिले राजर्षि वंश में उत्पन्न नायक को कहा है किन्तु इस आर्या से चन्द्रगुप्त, विन्दुसार आदि का भी संग्रह होता है। व्याख्यात इन दोनों अर्थों का पूर्व आर्या से ही संग्रह हो गया है, अतः हमारे व्याख्यान का प्रथम अर्थ ही युक्त है। जैसा कि कुछ लोग कहते हैं कि "देवताओं को धीरोद्धत नायक समझना चाहिए, राजा धीर ललित होते हैं, सेनापति और अमात्य धोरोदात्त नायक कहे गये हैं और ब्राह्मण तथा वणिक धोर प्रशान्त होते हैं।" इस कथन के पर्यालोचन करने पर ज्ञात होता है कि देवता आदि नाटक के नायक नहीं हो सकते। केवल धीरललित हो नायक हो सकता है, किन्तु यह कथन असत् है, क्योंकि जनक आदि अथवा राम आदि धीरललित नहीं थे। जैसा कि कहा है कि-'राम नामक विष्णु का धोरोदात्त चरित सर्वोत्कृष्ट है'। जैसा कि कुछ लोगों ने कहा है कि राजा का ही धोरललित के रूप में वणंन करना चाहिए, अन्य का नहीं। इस प्रकार सेनापति और अमात्य का धोरोदात्त के रूप में, देवताओं को धोरोद्धतत्व के रूप में, द्विजातियों का धीरप्रशान्तत्व के रूप में वर्णन करना चाहिए। इस प्रकार आगे भी देखना चाहिए। इसलिए 'प्रख्यातोदात्त' पद से चारों को ही उदात्त नायक समझने चाहिए। इस प्रकार व्याख्या करनी चाहिए ।। १२ ।।

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'अस्यावस्थोपेतं कार्य प्रसमीक्ष्य बिन्दुविस्तारात्। 5कर्तव्योऽड्ूः सोऽपि तु गुणान्वितं नाट्यतत्त्वज्ञैः ॥१३ ॥ एवं निर्वचनमनयार्यया वशितम्। ग्रख्यातवस्तुप्रभुतिरर्थोऽम्यत्र सुप्रसिद्ध: अ ङ्ूप्रवेशको त्वप्रसिद्धौ, इत्यङ्कस्वरूपं तावद्वितत्त्य कथयति-अस्यावस्थोपेतमिति । अस्य नाटकस्य यत्कायं विन्दुकृतया विस्तारणया विततीकरणरूुपया अननु- सन्धानजननबलादेकावस्थानुरूपमाधिकारिकमितिवृत्तं सम्पाद्यम्, तववस्थया प्रारम्भाविकयोपेतं परिपूर्ण प्रकर्षेण संबन्धं प्रेक्ष्य अङ्क: कर्तव्यः। एतबुक्तम्-इति वृत्तस्य बिन्दुसूत्रस्यूतस्य प्रारम्भाद्यवस्थापञचकचारिणो य पारम्भवस्थपूर्ण- स्वमेति तवा अडडूछेदो बिन्दुद्वारानुसन्धीयमानद्वितीया ङ्काभिधेयरूपो विधेय: । एवं प्रयत्नाद्यवस्थाचतुष्टयेऽपि वाच्यमिति पञ्च तावदङ्का इति मुख्यः कल्पः। अभिनव-इस प्रकार इस आर्या के द्वारा इस प्रकार का निवंचन दिखा दिया। प्रख्यात वस्तु प्रभृति अर्थ अन्यत्र सुप्रसिद्ध है किन्तु अङ्क और प्रवेशक अप्रसिद्ध है। इसलिए अड्क के स्वरूप को विस्तार से कहते हैं- अनुवाद-नाट्यतत्वेत्ताओं से नाटक के विभिन्न अवस्थाओं से उपेत कार्यों को देखकर बिन्दु के विस्तार से गुणों से आशरित अंकों की रचना करनी चाहिए॥१३ ॥ अभिनव-इस नाटक के जो कार्य है, वह विन्दु के द्वारा किये गये विवतीकरण रूप विस्तारण से अनुसन्धान के बल से अवस्थादि के अनुरूप आधिकारिक इतिवृत्त का सम्पादन करना चाहिए। अतः प्रारम्भादि अवस्थाओं से उपेत परिपूर्ण इतिवृत्त का प्रकर्ष से सम्बन्ध को देखकर अङ्क का विधान करना चाहिए। यह कहा गया है कि बिन्दु रूप सूत्र से अनुस्यूत प्रारम्भादि पाँच अवस्थाओं में सञ्चरण- शील इतिवृत्त को प्रारम्भावस्था जव पूर्ण हो जाय तब अङ्कच्छेद बिन्दु के द्वारा अनुसन्धीयमान द्वितीय अङ्क के अभिधेय रूप विधान करना चाहिए। इसी प्रकार प्रयत्नादि चार अवस्थाओं में भी कहना चाहिए। इसीलिये नाटकों में पाँच ही अङ्क होते हैं। यह मुख्य कल्प है।

१. ख. ग. अङ्कावस्थोपेतं । क. (प०) तत्रावस्थोपेतम्। क. (टि०) नानावस्थान्तरितां संहारमात्रमधिकृत्य। २. क. (टि०) समप्रेक्यसप्तवेक्ष्य। ३. ग. कर्तव्योऽ्कुस्त्जीः स तु सम्पङ, नाटके विषिवद्।

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१२६ माट्यशारने

नम्वेवं न्यूनत्वे आधिक्ये बाङ्कानां कथ निबन्ध इत्याह -नाट्यतस्वज्ञैरनयैव दिशा सोडङकः, अपिशब्दावन्यथा कतव्यः । तुर्विशेषं द्योतयति। यदा प्रारम्भाव- विप्रधानं भवलोति तदा तस्या एवोपक्रमोपसंहारावस्थाद्वयापेक्षया द्वावङ्कौ, अथ्या- सामेकेकाङ्कतेति यावत् सर्वासतामवस्थाठ्वययोगेन संपावनमिति वडङ्कात् प्रभृति सप्ताष्टप्राप्तौ दशाङ्कत्वम्।

काञ्िदवस्थां प्रधानोकृत्य यदा अवस्था्तरेण मिशोकृत्य वध्नाति तवा नाटिकाया न्यूनाङ्कत्वमिति। एतत्तुशब्देन तत्त्वज्ञशब्देन च वशितम्। तत्रावस्था: "प्रारम्भरच प्रयत्म" शचेत्याविना वक्ष्यम्ते (अ-१९) "प्रयोजनानां विच्छेदे यदाविच्छेदकारण" मिति बिन्दुः वक्ष्यते, "यदाधिकारिकं सम्य" गिति (अ-१९) कार्यम् ॥ १३॥

अब प्रश्न यह होता है कि जब अवस्थाओं के अनुसार अड्कों का निर्माण करना है तो इन अङ्कों का न्यूनत्व तथा आधिक्य में उपनिवन्धन कैसे होता है? इस पर कहते हैं कि नाट्यतत्त्ववेत्ता इस दिशा से अङ्कों को अन्यथा भो कर लेते हैं यह बात 'अपि' शब्द से कही गई है। और 'तु' विशेष को द्योतक करता है। जब प्रारम्भ की अर्वाध प्रधान होती है तो उसी के उपक्रम और उपसंहार रूप दो अवस्थाओं की अपेक्षा से दो अङ्क होते हैं और अन्य के लिए एक-एक अङ्क होते हैं। इसी प्रकार सभो में उक्त दोनों अवस्थाओं का सम्पादन हो तो छः अङ्क से लेकर सात, आठ, दस भङ्क तक हो सकते हैं। इनमें किसी अवस्था को प्रधान करके जब अन्य अवस्थाओं से मिलाकर निबन्धन करेंगे तो नाटिका में न्यून अङ्क होंगे। इस बात को 'तु' शब्द से तथा तत्वज्ञ शब्द से दिखाया गया है। उनमें अवस्थाओं को 'प्रारम्भरच प्रयत्नश्च' इत्यादि के द्वारा कहेंगे। इसी प्रकार 'प्रयोजनानां विच्छेदे यदविच्छेदकारणम्' इत्यादि में 'विन्दु' को कहेंगे और "यदाधिकारिक वस्तु सम्यग्" इत्यादि से कार्य को कहेंगे । १३ ।।

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अङ्क इति 'रूढिशब्दो भावैश्च रसेश्च रोहयश्वर्थान्"। नानाविधानयुक्तो अङ्कसमाप्तिः कार्या काव्यच्छेदेन बोजसंहारः। वस्तुव्यापी बिन्दुः काव्यसमुत्थोऽत्र नित्यं स्यात् ॥१५॥ अथ कस्मावड्क इत्याह-अङ्क: इति रूढ़िशब्द इति। भावैः रसैश्च गूढश्छन्नः व्याप्तोऽर्योडङकशब्देन यादृच्छिकेनोच्यत इति भट्टलोल्लटाद्याः गूढ इति पाठं व्याचक्षिरे। अन्ये रोहयत्यर्थानिति पठन्ति, व्याचक्षते च रूढी रोहणं तेनोत्सङ्ग उच्यते यो नाटकांश: शृङ्गारादिरसैविभावव्यभिच्वारिणोऽर्ान् तथा भावैरविभा- वादयः यथास्वं भावादीनर्थान् हृदयमारोपयति अर्थात् वहति, नानाप्रकारैश्व वक्ष्यमाणैः 'ये नायका निगदिता' इत्यादिभि: विधानैर्पेतः तत्मादुत्स ङ्गयवा- रोहणसंबन्धावङ्क इत्युच्यते। एतत्पुष्कलमिव अजाविना रढ़रत्राथेर्वृत्त्यवशं- नात। तस्मादयमत्रार्था-अङ्क इत्पय लक्षणे रूढ़: शब्दा, अन्यतो व्यवच्छेदकं लक्षनम्। एतदपि च नाटघरूपकस्य नानात्वमन्यतो भेदं बिषसे अनभिनेयात्। अनुवाद-'अङ्ढ' यह रूढ़ि शब्द है जो भाव और रसों के द्वारा अर्थो को रोहित करता है, क्योंकि वह नाना विषान से युक्त होता है, इसोलिए वह 'अङ्क' होता है।। १४ ॥ अनुवाद-काव्य के विच्छेद से जहाँ बोज का संहार हो वहाँ बङ्क को समाप्ति कर देनो चाहिए और कथावस्तु व्यापक रूप से स्थित बिन्दु काव्य का समुत्यापक नित्य हो ॥। १५ ॥ अभिनव-अब प्रश्न होता है कि इसे 'अङ्क' क्यों कहते हैं? इसका उत्तर देते हैं कि अङ्क यह रूढ़ि शब्द है। यहाँ पर भट्टलोल्लट प्रभूति आचार्य 'रूढ़ि' शब्द के स्थान पर 'गूढ़' शब्द पाठ मानकर अर्थ करते हैं कि 'जो रसों और भावों से गूढ़ या छन्न है' यह अर्थ यादच्छिक अङ्क शब्द से मिलता है। अन्य इस आर्या के द्वितीय पाद में 'रोहयत्यर्थान्' यह पाठ मानते हैं और व्याख्या करते हैं कि 'रूढ़ि' का अर्थ राहण है और रोहण से उत्सङ्क को ग्रहण करते हैं। अतः जो नाटक का अंश शृङ्गारादि रसों के द्वारा विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारो भाव रूप अर्थों को तथा भावों अर्थात् विभावादि के द्वारा यथास्व अर्थाव योग्यता के अनुसार भावादि अर्थों का सामाजिकों के हृदय पर आरोपण कर देता है अर्थात स्वयं बहन करता है। १. क. (प.) गृढ़शब्दो। २. क. (भ.) चिह्नयत्यर्थान्। ३. अरप दखोक: ग, द, भ, च. पुस्तकेषु दृश्यते।

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६१८ बाखयशारत्रे

यत्रार्थस्य समाप्तियंत्र च बीजस्प भवति संहारः। किञ्चिदव लग्न बिन्दुः सोऽडू' इति सदावगन्तव्यः ॥ १६।। अभिनेये हि य एकदेश: स रसभावैर्पलक्षितानप्यर्थान् रोह्यति हृदयसंवाद- साधारणताकरणेन प्रत्यक्षोभावनया रसाध्यायोक्तयाभिरोहणं बोजस्येवाड्कराकार- तया रसाकारोदप्ररोहो भवति। स चानभिनेयरूपकांशैरेव संपाद्यत इत्यनभिने यात् भेवमादधानोऽभिनेयस्य रूपकस्य लक्षणं भवत्येव। एथमङ्कशब्दव्यान्वर्थो व्याख्यातः ॥ १४। स्वरूपन्तु वत्तव्यं तद्दर्शयन्ति-पत्रार्थस्य समाप्तिरिति।

वक्ष्यमाण 'ये नायका निगदिताः' इत्यादि नाना प्रकारों से विधानों से युक्त हैं। अत एव उत्सङ्ग की तरह आरोहण सम्बन्ध से 'अङ्' कहा जाता है। यह तथ्य अज और अवि शब्द बकरो और भेड़ अर्थ में रूढ़ है, प्रसिद्ध है, क्योंकि वृत्ति में यह अर्थ दिखाया नहीं गया है। इसलिए इसका यह अर्थ है-'अङ्क' यह शब्द लक्षण में रूढ़ है और लक्षण दूसरे प्रकृत अर्थ का व्यवच्छेदक होता है। ऐसी स्थिति में अङ्क भी दृश्य रूपक नानात्व को कहता है और अनभिनेय काव्यों से उनका भेद दिखाता है। अभिनेय में जो एकदेश है वह रस और भावों से उपलक्षित अर्थों का रोहण करता है अर्थात् रसाध्याय हृदय संवाद के द्वारा साधारणीकरण रूप प्रत्येक भावना से अभिरोहण करता है अर्थात् बीज की अङ्कराकारता के समान रसाकारता के भावों का उदय एवं प्ररोह होता है और वह अङ्क अनभिनेय रूपक के अंशों से ही सम्पादित होता है। इस प्रकार अनभिनेयों से भिन्न यह अङ्क अभिनेय रूपक का लक्षण होता ही है। इस प्रकार अङ्क शब्द के अनुगत अर्थ को व्याख्या कर दो गई है।। १४-१५ ।। अब अङ्क के स्वरूप को दिखाते हैं- अनुवाद-जहाँ पर अर्थ की समाप्ति हो और जहाँ पर बीज का संहार हो तथा जहाँ पर बिन्दु किञ्चित् अवलग्न हो, उसे सदा अङ्क समझना चाहिए॥१६॥

१. क. (डि०) योहड्ु इति सोश्वगन्तम्य: ।

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अटाव शोउप्याय:

प्रारम्भाद्यवस्थालक्षणोडयों यत्र समाप्यते सोडङ्कः। अङ्कसमाप्तायामपि वा अवस्थायां यदा बोजस्य संहरणं यथास्वं सन्धिभेवेनोचितं भवति तदाप्यङ्कच्छेद: तत्रोत्पत्तिरद्धाटनमुद्भेदो गर्भनिभेदः फलसमानयनमिति मुखादिषु यथाक्रमं बोजस्य दशाविशेषा: संहारशब्दवाच्या:। अङ्कविच्छेदे चार्याविछेदो माभूदित्य- बलग्न: संबन्धो बिन्वुयंत्र तादृगङ्क क्तव्यः। तथा तापसवत्सराजे तृतीयाङ्क- समाप्तौ- आदौ मानपरिग्रहेण गुरुणा दूरं समारोपितां पश्चात्तापभरेण तानवकता नोतां परं लाघवम्।

सर्वाङ्गप्रणयप्रियामिव तरच्छार्यां समालम्बते।। इति राज्: उक्तथा पद्यावत्या: परिणयाम्युपगमभनुसन्वधत्या प्राप्तिसंभवाल्य तृतीयावस्थाप्रवशिनि भाविनि चतुर्थेऽड्के बिन्दुर्योजितः।

अभिनव-जहाँ पर आरम्भादि अवस्था लक्षण अर्थ की समाप्ति होती है, वह 'अङ्क' है। अवस्था को समाप्ति होने पर भी सन्धियों के भेद से उचित बीज का संहरण जब होता है तब भी 'अक्कच्छेद' होता है। मुखादि सन्धियों में क्रमशः उत्पत्ति, उद्भेद और फल को समापन रूप जो बीज की दशा विशेष है उसे 'संहार' कहते हैं। अङ्क का विच्छेद होने पर भो अर्थ का विच्छेद न हो, इसलिए जहाँ पर बिन्दु का सम्बन्ध बना रहे, ऐसे अङ्ढ को करना चाहिए जैसे तापसवत्सराज में तृतीय अङ्क को समाप्ति में- "आरम्भ में महान् (लम्बे) मान के परिग्रह से बहुत दूर तक पहुँची हुई, बाद में क्षीण कर देने वाले सूय के ताप से भार से अत्यन्त छोटी (लघुता) करा दो गई, इस प्रकार अनुगमन से सम्पिण्डित (संक्षिप्त) करके उत्सङ्ग गोद (वृक्ष की जड़) में पहुँची हुई वृक्ष की छाया सर्वाङ्ग में प्रणय करने वालो प्रिया की तरह समालम्बन करती है।" इस प्रकार पद्मावती के परिणय के स्वीकृति का अनुसन्धान करने वाली राजा की उक्ति से प्राप्ति सम्भव रूप तृतीय अवस्था को दिखा देने वाले चतुर्थ अङ्क में बिन्दु की योजना की है।

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६४० नाट पश्शास्त्रे

एवमङ्कस्वरूपमनेन निरूपितमिति चिर्तनाः। तच्चैतरपुनरुक्तं "अस्या- वल्थोपेतं काय प्रसमोक्ष्ये" त्येतेन हि कियन्नोकतं यदनेन लक्षणेनाभिधीयते। च "अङ्क इति रूढिशब्द" इत्यनेन दशितम्। अनया स्वायंया अङ्कस्य त्रेविध्य- मुध्यते तथा चोक्सं कोहलेन- त्रिधाङ्कोऽड कावतारेण चूडयाङ कमुखेन वा। अर्थोपक्षेपणं चृडा बह्नर्षे: सूतवन्दिभिः॥ अड्कूश्याङ्काम्तरे योगस्त्ववतार: प्रकीर्तित:। विश्लिष्टमखमङ्कस्य स्त्रिया वा पुरुषेण वा।। ययुपल्षिप्यते पूर्वं तवङ कमुखमिष्यते। अत्रार्थंस्य कस्यचित् सम्यगन्यत एवानभिसन्धानपूर्विकाप्ति: प्राप्तिरिति चूडा दशिता। तद्यथा रत्नावल्यां वैतालिकपाठाद् 'दृशामुदनयनस्य' इत्यम्तः इस प्रकार इसके द्वारा अङ्क के स्वरूप का निरूपण कर दिया, ऐसा चिरन्तनों का मत है। किन्तु यह पुनरुक्त है, यहाँ 'अस्यावस्थोपेतं कार्य प्रसमीक्ष्य' इस कथन से कितना अंश नहीं कहा है जिसे 'यत्रार्थस्य' इस लक्षण से कहा गया हो। इसलिए इसका यहाँ यह अर्थ है कि 'अस्यावस्थोपेतम्' इससे 'अद्क' का स्वरूप लक्षण कहा गया है और 'अङ्क इति रूढ़ि शब्दः' इस कथन से नाम निर्वचन अर्थात् तटस्थ लक्षण दिखाया गया है। इस आर्या के द्वारा अङ्ढ के त्रेविध्य को कहा गया है, जैसा कि कोहल ने कहा है- "अङ्कावतार, चूड़ा और अङ्कमुख भेद से अङ्क तीन प्रकार का होता हैं, इनमें जहाँ पर एक अङ्क में दूसरे अङ्क का योग हो उसे 'अङ्कावतार' कहते हैं, जहाँ पर सूत और बन्दियों के द्वारा बहुत प्रकार के अर्थों से विशिष्ट अर्थ का उपक्षेपण होता है, उसे 'चूड़ा' कहते हैं और जहाँ अङ्क के विश्लिष्ट मुख का स्त्री अथवा पुरुष के द्वारा उपक्षेप किया जाता है उसे 'अङ्कमुख' कहते हैं। यहाँ पर किसी अर्थ को अन्य प्रकार से अनुसन्धान किये विना ही प्राप्ति होती है, इस प्रकार चूड़ा को दिखाया है। जैसे रत्नावली में बैतालिक के पाठ से 'दृशामुदयनस्य' यहाँ तक सम्यक उपयोगी अर्थ प्राप्त हो गया, क्योंकि सागरिका

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उपयोगी सम्यगर्थ: प्राप्त ततप्रत्यभिज्ञामूलत्वात् सागरिकानुरागस्य, तथा चाह 'अगं सो राआा उदमणो (अयं स राजा उदयन:) (१-२३ ) इत्यादि। तदर्थमेव च वसम्तक्रोडादिसर्वमुपक्षिप्तम्। तदेव व राजानुरागस्य शय्याफलकादिकृतस्य मूलमिति चूलिकेत्युक्तम्। तेन प्रथम: चूलिकाङ् कः। यत्र त्वङ्गे सर्वेषामङ कानां योऽ्थो बोजलक्षणस्तस्य संहारः समिलितत्वेन प्राप्तिभंवति सोवताराङक, यथा रत्नावल्यां द्वितीयोऽङ कः। तत्र हि 'ईरिसरस कण्णआजणस्स ईरिस एव वरे अहि- लासेण होदव्वम्। ( ईदृशस्य कम्यकाजनस्येवृश एव वरे अभिलाषेण भवितव्यम्।) इत्यादि प्रकृतमेव सवं वण्यंते। यत्र त्वनुसं्धानमात्रप्राणत्वेन तदुपयोगिता वृत्तान्तमुच्यते तदुपश्लिष्टमङक- मुखम्। स एवेह किञ्चिववलग्नाबिन्दुरित्यनेन तृतोयो भेव उक्तः। यथा रत्नावल्यां तृतीयेऽङ के ऐन्द्रजालवृत्ता्तनिरूपणं चूलिका तस्याश्च भेव:, चूलिकाङ कस्यापि तवभिसन्धानाभावात्। इह स्वभिसन्धानं यौगन्वरायणादीनामसत्येव। तेनायं संक्षेप :- अङ के यह्वर्णनोयं वस्तु तत्तावत् द्विषा-प्रधानं तदुपयोगि च, तदुपयोग्यपि किश्िहं ववशादपयोगं याति किञ्चिदभिसन्धिबलादिति त्रिविधोऽड कार्थः। स कवाचिदेकस्मिन्नङ के मिश्रभावेनापि निबध्यत इति चूलिकाड कमुखयोरङ कभेवयो: प्रधानार्थंस्पर्शो नैवास्तीति ॥१५-१६॥ के अनुराग का बह प्रत्यभिज्ञा मूल है। जैसा कि कहते हैं 'अयं स राजा उदयनो' (यह वह राजा उदयन है) इत्यादि। इसीलिए बसन्तक्रोड़ा आदि सभी अर्थों का उपक्षेप किया गया है। शय्या, चित्रफलक आदि देखने से राजा के अनुराग का वही मूल है, इसलिये उसे 'चूलिका' कहा है। इसलिये यह प्रथम चूलिकाङ़क हैं। जहाँ पर अङ्क में सभी अङ्कों का बीज लक्षण रूप जो अर्थ है इसका संहार सम्मिलित रूप में प्राप्ति होती है वही अवताराङ्क है। जैसे रत्नावली का द्वितीय अङ्क है। वहाँ इस प्रकार की कन्या का इस प्रकार के वर में अभिलाष होना चाहिए इत्यादि सब प्रकृत का ही वर्णन है। जहाँ पर तो अनुसन्धान मात्र हो प्राण है तदुपयोगो वृत्तान्त को कहते हैं, वह उससे उपश्लिष्ट अङ्कमुख है। उसी को यहाँ 'किञ्चिदबलग्न विन्दु' इस शब्द से तृतीय भेद कहा है। जैसे-रतनावली के तृतीय अङ्क में ऐन्द्रजालिक के वृत्तान्त का निरूपण। उसो का भेद चूलिका है, क्योंकि चूलिका के अङ्क का उसमें अभिसन्धान नहों है। यहाँ पर तो यौगन्धरायण आदि का अभिसन्धान है। ना. पा०-८१

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नाटयश्ालये ये नायका मिगदितास्तेषा प्रश्यक्षचरितसम्भोगः'। नानावस्थोपेतः कायंस्त्व ड्कोऽविप्रकृष्टस्तु ॥१७ ॥ तथा प्रवेशकद्वारेण मुख्यचरितमपि शङ्का वारयितुमाह-ये नायका इति। धोरोवात्तावयो विजिगीषुतन्मित्रप्रभृतयो वा ये नायकाः प्रतिनायकाश्च तेषां चरितं, तबुपायानुष्ठानं तथा संयोग: प्रत्यक्ष: सन्मिहित: साक्षाद् वृश्यमानो, न तु सूच्यमानो, यत्र ताद्गङ कः। नयात प्राप्नोतीनिवृत्तंफलं वेति नायकचरितप्रत्यक्ष- तया व्युत्पत्ति: प्रेक्षकाणां संभोगाप्रत्यक्षत्वं च तद्गतकेवलक्लेशवशंनात् वैरस्यं सामाजिकस्य स्यात। किमनेन महता कष्टेनेति तत एवोक्तं न निस्सुखः स्यादिति। नानाप्रकारावस्थौ प्रतिनायकगतौ चरितसंभोगावमुपादेयावविषये चेति हेयावस्थौ। नायकगतौ तु तह्टैपरीत्यादुपावेयावस्थाविति तुशब्दस्यार्थंः । अविप्रष्ठ इत्यबीर्घ:। बीर्घो हि प्रयोक्तृप्रेक्षक्ाणां खेदाय स्यात्।। १७ ॥ इसलिए यहाँ पर यह संक्षेप है-अङ्क में जो वर्णनीय वस्तु है वह दो प्रकार का है-प्रधान और तदुपयोगो। तदुपयोगी भी दो प्रकार का है-एक तो दैववश उपयोगी हो गया है और दूसरा जो अभिसन्धि के बल से उपयोगी उपयोग में आया है। इस प्रकार अङ्कार्थ तीन प्रकार का होता है। वह कभी एक अङ्क में मिश्र भाव से उपनिबन्धन किया जाता है, इस प्रकार चूलिका और अङ्कमुख नामक अङ्क के भेदों में प्रधान अर्थ का स्पर्श नहीं होता है ॥ १६ ॥ अब प्रवेशकों के द्वारा मुख्य चरित में भी आने वाली शड्का का निवारण करने के लिए कहते हैं- अनुवाद-नाटकों में जो नायक कहे गये हैं उनका चरित और सम्भोग प्रश्यक्ष हो, ऐसे नाना अवस्थाओं से युक्त संक्षिप्त अङ्क को करना चाहिए॥ १७॥ अभिनव-धीरोदात्तादि विजिगीषु अथवा उनके मित्र प्रभूति जो नायक एवं प्रतिनायक हैं उनके चरित, उनके लिए अनुष्ठेय उपाय तथा सम्भोग जो कि प्रश्यक्ष अर्थात साक्षात् दृश्यमान हो, न कि सूच्यमान जहां हो, वह अङ्क इतिवृत्त अथवा फल की तथा नायक के चरित की व्युश्पत्ति प्रत्यक्ष तथा दशकों (प्रेक्षकों) को करता है क्योंकि सभ्भोग का प्रत्यक्ष न होने पर नायक के क्लेश बाहुल्य का यदि दर्शन हो तो सामाजिक को वैरस्य हो जायेगा जिससे कि इस महान् कष्टों के सहने से क्या लाभ ? इत्यादि। इसलिए कहा गया है कि निःसुख नहीं होगा। १.ख. ग. संयोग: । १. ख. भ. नानाथल्थास्तरितः=।

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नायकदेवीगुरुजनपुरोहिता मात्यसार्थवाहानाम्। नैकरसान्तरविहितो ह्यड्ढ इति स वेदितव्यस्तु ॥ १८ ॥ 3पञचाक्षरा दशपरा ह्याड्काः स्युर्नाटके प्रकरणे च। निष्काम: सर्वेषां यस्मिन्नड्कः स विज्ञेयः ॥ १९॥

एवं प्रधानवर्णनोयस्य वृत्तमुक्त्वा तदुपयोगि बृत्तस्य दिशं दर्शयितुमाह- नायकदेवीत्यादि। नायका मुख्या: नायिकाः वेव्यो महावेवीभोगिनोप्रभृतयः । गुवजनो मातृ- पितृभ्रात्राचार्यादि:। सार्थवाहोऽत्र सेनापतिः । इतिवृत्तवशाद्वणिगेब वा, एषां संबन्धो अङ्क एतवर्थाभिधायक इति यावत्। अत एव नैकेन विचित्रेण रसविशेषेण युक्तस्तथा हि दैवोयोगो शुङ्गारः नायके वीर इत्येवमन्यदुत्प्रक्ष्यम्। नाटकानां वेष्यादय इत्यन्ये। अङ्क इति। अनेकरसाङि्कतत्वादपि अङ्क इति नामेत्यथ: ।। १८-१९।।

प्रतिनायक में स्थिति नाना प्रकार के अवस्था वाले चरित और सम्भोग अनुपादेय और अविषय होने से हेय हैं। और नायक में तो उसके विपरीत अर्थात् उपादेय होते हैं, यह 'तु' शब्द का अर्थ है। अविप्रकृष्ट का अर्थ है अदोर्घ अर्थात् जो लम्बा हो। क्योंकि जो दीर्घ अभिनेय होता है वह प्रयोक्ता अभिनेताओं और दशकों को खेद उत्पन्न करता है॥ १७ ॥ इस प्रकार वर्णनोय प्रधान वृत्त को कहकर अब तदुपयोगो वृत्त को दिशा दिखलाने के लिए कहते हैं- अनुवाद-नायक, देवो, गुरजन, पुरोहित, अमात्य तथा सेनापति के अनेक रसों से विहित इतिवृत्त को 'अङ्क' समझना चाहिए॥ १८ ॥ अनुवाद-नाटक और प्रकरण में पाँच से लेकर दस अङ्क तक अङ्ड होने चाहिए, जिसमें सभी पात्रों का निष्क्रमण होता है उसे 'अङ्क' समझना चाहिये॥ १९॥

१. कन्न. परिजन । गुणजम । २. ग. हाड्ढ: खलु वेवितम्यः सः । ३. ह. व. पुस्तकयोरयं क्लोक: नास्ति।

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'क्रोधप्रसादशोका: शापोत्सर्गोडय विद्रवोह्वाहौ। प्रत्यक्षजानि स्यु: ॥२०॥ न केवलं चरितसंगोगावेव प्रत्यक्षौ किम्तवन्यवपि थत्र रक्षनातिशयोऽस्तीति दशंयम्नाह-क्रोधप्रसावशोका इति। शापोत्सगं: शापकृतस्यानयंस्य नाशः, यथोक्तस्यानर्थकाभावस्य शङ्काभयत्रा- सकृतो विद्रव इति गर्मसग्बो वक्ष्यते। उद्वाहो विवाहः। अद्भुतस्य संभवोऽभ्युपगमः। उपक्रमो दशन न निर्वाह इत्येतचचान्यस्यापि रख्क्वगंस्योपलक्षणम्। अक्षजं ज्ञानं प्रति गतानोति प्रत्यक्षजानि। प्रत्यक्षशब्देन तदेकवेश उच्यते तत्र जातानोत्यम्येन्व्रिय वगंस्य प्रत्यक्षता ताव.द्ुवति, कदाचित्व प्रत्यक्षमपि॥ २०॥ अभिनव-नायक मुख्य और पताका नायक अमुख्य होता है, देवी महादेवी, भोगिनी आदि हैं, गुरुजन माता, पिता, ज्येष्ठ भ्राता और आचार्य आदि हैं, सार्थवाह पद यहाँ सेनापति का वाचक है अथवा इतिवृत्त के कारण वणिक् है। इनका सम्बन्धी अङक अर्थात् इसी अभिप्राय वाला अङक है। इसलिए यह किसी एक ही विचित्र रस से युक्त नहीं है, जैसे देवी के सम्बन्ध में शुङ्गार रस, नायक के सम्बन्ध से वीर रस है। इसकी स्वयं उत्प्रेक्षा कर लेनी चाहिए। अन्य लोग कहते हैं कि देवी आदि नायकों की होती है। अङ्क का तात्पर्य है कि यह अनेक रसों से ङ्कित है, इसलिए 'अङ्क' यह नाम है॥ १८-१९।। केवल चरित और सम्भोग ही प्रत्यक्ष नहीं हैं, अपितु अन्य भी प्रत्यक्ष होते हैं, अतः रञ्जनातिशय को दिखलाते हैं- अनुवाद-क्रोष, प्रसाद, शोक, शापोत्सग, विद्रव, विवाह तथा संभाव्य अद्भुत वस्तु का विखलाना-ये सब अङ्क में प्रत्यक्ष होने चाहिए॥ २०॥ अभिनव-शापोत्सर्ग का अर्थ है शापकृत अनर्थ का नाश। जैसा कि अनर्थ के अभाव का कहा जा चुका है। शङ्का, भय, त्रास से होने वाला विद्रव को गभ सन्धि में कहेंगे। उद्वाह का अर्थ विवाह है, अद्भुत रस का सम्भव (उत्पत्ति), उसका अभ्युपगम, उपक्रम, दर्शन और निर्वाह आदि रक्जक वर्ग के उपलक्षण हैं। अक्ष अर्थात इन्द्रियों से होने वाले ज्ञान के प्रति अनुगत हैं वह प्रत्यक्षज है। यहां प्रत्यक्ष शब्द से उसके एकदेश को कहा गया है अतः उसमें होने वाले कहने का अभिप्राय है कि अन्य इन्द्रिय वर्ग की प्रत्यक्षता भी होती है और कभी-कभी तत्त्व प्रत्यक्ष भी होता है ॥ २० ॥ १. ख. ग. प्रमादः क्रोष: । २. ग. अष्व: । ३. ख. ग. अद्भुतसंभयः।

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अष्ठा दशोडण्याय: १४५

'एकदिवसप्रवृत्तः कार्यस्वकोऽयंबोजमधिकृत्य'। आवश्यककार्याणामविरोधेन प्रयोगेषु४ ॥ २१ ॥ एकाङ्केन कदाचिदृहूनि कार्याणि योजयेद्ोमान्"। आवश्यकविरोधेन तत्र कार्याणि कार्याणि' ॥ २२॥

अथाङ्कस्य प्रयोगकालपरिमाणमियदिति दशयति-एकविवसप्रवृतमिति। तादृशमन्वान्तरेणाथॅन प्रयोजनेन युक्तं बोजमुपायानुष्ठानं वणंनीयताया अधिकृत्याङ्क: कतंव्यो यस्य प्रकृष्ठ च यत्ठतंनं प्रयोगरूपं तदेकविवसेनेति मुहतंपञ्च- दशकेनैव, यतस्तावन्तं कालमावश्यकानि भोजनादीनि अशक्यनिरोधनानि। ततः परन्तु प्रयोगकालश्चेत ततप्रेक्षकप्रयोक्तणां तवाप्यावश्यकस्य सन्ध्यावन्दनभोजना- देरविरोधेनेत्येवं कार्यानेकत्वमेकत्राङके निषिद्धम् । क्वचित्त्वम्युपगतमपि। अन्ये तु सर्वामेवार्या निषेधपरतवेनाहुः। अन्ये त्वेकाङ्कनेति तृतीयां मन्यमाना: सर्वेयमार्या विषिपरेत्याहुः ॥ २१-२२।

अब अड्क के उपयोगी काल को जो कि इसमें इतना काल अपेक्षित है, बतलाते हैं- अनुवाद-नाट्य प्रयोग में आवश्यक कार्यों का बिना विरोध किये एक बिन में होने वाली बीज रूप अर्थ का आय करके अल्ढू को करना चाहिए ॥ २१॥ अनुवाद-बुद्धिमान् को कभी एक अङ्ढ के द्वारा बहुत से कार्यों की योजना करनो चाहिए, किन्तु वहाँ आवश्यक वस्तुओं का विरोध किये विना आवश्यक कार्यों को करना चाहिए।। २२।। अभिनव-इस प्रकार के अवान्तर प्रयोजन से युक्त बीज को अर्थात् अनुष्ठान के उपाय की वर्णनीयता को एवीकार कर अङक को करना चाहिए, जिसका प्रकृष्ट प्रयोग रूप जो वर्णन है उसका सम्पाद एक दिन में १५ मुहूर्त में करना चाहिए, क्योंकि उतने समय तक जिनका विरोध (निषेध) नहीं किया जा सकता, ऐसे आवश्यक कार्य भोजनादि है। उसके बाद भी यदि प्रयोग करना हो तो प्रेक्षक

१. क. (टि० एकदिवसप्रयोज्य। एकविवसप्रवर्त्यः। २. क. (टि०) कार्यस्वड्कोऽत्र । ३. ख. आश्रित्य । ४. क. (प.) प्रबन्धेषु। 4. ख. (न.) यौजयेद्वापि। ६. ख. ग. काव्यानि।

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नाव्यसास्ने रङ्गं तु प्रविष्टा: सर्वेषां भवति तत्र निष्क्रामः। बोजार्थयुक्तियुक्तं कृत्वा काव्यं यथार्थरसम्॥ २३॥ न बहूनीह कार्याणि त्वेकाङ्के विनियोजयेत्। आवश्यकानां कार्याणां विरोधो हि तथा भवेत् ॥ २४॥ यान्यवश्यंभावेन कार्याणि भोजनादीनि तानि किं प्रश्यक्षेणव दशंनीयानीति यः शङ कते तं प्रत्याह-रङ्गन्विति। तत्रेत्यावश्यके कतव्ये न चासमाप्तावुपक्षिप्तावाम्तरकार्ये पात्रनिष्क्रमणमिति वर्शयति। बोजार्थेति उपक्षेपातमनो बीजस्य यत्प्रयोजनं तेन या युक्ति: संबन्धस्तत्र युक्तमुपायभुतं कार्य प्रयोजनानुसारि विशिष्टरससम्पदोपेतं विधाय त्परिसमाप्तौ यवनिकमा तिरोधानरूपं निष्क्रमणं दर्शनीयम्। बीजार्थयुक्तिवत्पत्युद्धाटनोदुभेदगर्भ- निभंदफलसमानयनात्मेत्यन्ये।। २३।।

और प्रयोक्ताओं (अभिनेताओं) के सन्ध्या-वन्दन, भोजनादि कार्यों को अविरोधी स्थिति में करने चाहिए। इस प्रकार अनेक कार्यो का एक अङ्क में करने का निषेध भो किया है किन्तु कहीं पर स्वीकार भी किया है कि एक अङ्क में अनेक कार्य हो भी सकते हैं। किन्तु अन्य लोग तो समस्त आर्या को निषेध परक ही मानते हैं। अन्य आचार्य तो यहां अङ्केन में तृवीया विभक्ति मानते हुए समस्त आर्या को विधिपरक कहते हैं ॥ २१-२२।। अश्यन्त आवश्यक जो भोजनादि है, उन्हें क्या प्रत्यक्ष अभिनय पर दिखाना चाहिये? जो इस प्रकार जो आशङ्का करते हैं उनके प्रति कहते हैं- अनुवाव-बीज भूत अर्थ (प्रयोजन) से युक्त यथाथं (उचित) रस के अनुकूल कार्य करके रङ्ग में जो पात्र प्रविष्ठ हैं उन सभी का रङ्ग से निष्क्रमण होता हैं।। २३ ॥ अनुवाद-नियमानुसार एक अङ्क में बहुत से कार्यों को योजना नहीं करना चाहिए। क्र्योंकि ऐसा करने पर आवश्यक कार्यों से विरोष होता है।। २४॥ १. कनम. पत्र निष्क्राम:। १. ख. ग. धुवसं।

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जञाश्वा 'दिवसावस्थां क्षणयाममहूतलक्षणोपेताम्" । विभजेत्सवंमशेषं पृथवपृथवकाव्यमङ्केषु ॥। २५॥ एवमितिवृत्तनियममङ्के प्रवश्यं तवितिवृत्तकालनियमं व्शयति- क्षणयाममुहर्तानां यानि लक्षणानि क्तव्याभ्यस्मिन् क्षणे सन्ध्यानुष्ठेयेत्या- बीनि तैर्पेतां दिवसस्यावस्थां ज्ञात्वा सवं कार्य प्रत्येकं सर्वांत्मना परिपूर्णरूपमत एवाशेषं विभजेत विभागेन दर्शयेत। नाडिकाभिरष्टधा दिनं रात्रि विभज्य छायाप्रमागेन वेति तेन एकविवससंपादितमुपयोगि चेष्टितमङ्क बध्नोयादिति तात्पयंम्॥।२५। अभिनव-यहाँ अवश्य कर्त्तव्य कार्य के समाप्त हुए विना तथा उपक्षिप्त अवान्तर कार्य के प्राप्त किये विना निष्क्रमण नहीं होता है, इसलिये आवश्यक कत्तव्य की समाप्ति में ही निष्क्रमण होना चाहिए, इसको दिखाते हुए कहते हैं- बीजार्थेति। उपक्षेपात्मा बीज का जो प्रयोजन और उसकी युक्ति में जो उपायभूत कर्त्तव्य है उसे प्रयोजन के अनुसार विशिष्ट रस-सम्पदा से युक्त (पूर्ण) करके उसकी परिसमाप्ति होने पर यवनिका के द्वारा तिरोधान रूप निष्क्मण दिखलाना चाहिए। अन्य आचार्य कहते हैं कि बोजभूत अर्थ की युक्ति, या उत्पत्ति, उद्घाटन, उद्भेद, गर्भ, निर्भेद एवं फल को समानयन है॥ २३-२४॥ इस प्रकार इतिवृत्त के नियम को अङ्क में दिखलाकर अब उसी इतिवृत्त के काल के बिषय में नियम को दिखलाते हैं- अनुवाद क्षण, याम, मुहूर्त्त के लक्षणों से युक्त दिन की अवस्था को जानकर अवशिष्ट समस्त कार्यो का अङ्कों में अलग-अलग विभाग करना चाहिए॥ २५॥ अभिनव-क्षण, याम, मुहूर्त्त जिन लक्षणों को करना है कि इस क्षण में सन्ध्या करनी चाहिए, इत्यादि। उनसे युक्त दिवस की अवस्था को जानकर सबको करना चाहिए जो सर्वांत्मना प्रत्येक परिपूर्ण हो, तब सबका विभाग करके दिखलायें। नाड़िकाओं से दिन और रात को आठ प्रकार से विभक्त कर अथवा छाया के प्रभाण से विभाग करके एक दिवस सम्पाद्य उपयोगी अभिनय का अङ्क में निबन्धन करें, यह तात्पर्य है।। २५।।

१. ख. दिवसांस्तान्। २. ख. उपेतान्। ३. ख, विभजेम्वाटपाभिसो हयक्कण्छेदेश्यंममिवीशव।

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१४८ वाटघशाहते विवसावसानकार्य' यद्यङ्के नोपपद्यते सर्वम्। अड्कच्छेदं कृत्वा प्रवेशकैस्त्विधातव्यम्*॥ २६॥ *विप्रकृष्टं तु यो देशं गच्छेरकार्यवशानुगः। अड्कच्छेवेऽय संक्षेपान्निदिशेत्तं प्रवेशकैः ॥ २७॥ ननु तम्मध्ये तत्कायं मध्याह्वस्नानभोजनादि तद्िवसमध्य एव वा यद्वृत्तं दूरस्थं वशरथमरणादि तत्कयं वाच्यमित्याह-विवसावसानकार्यमिति। दिवसेऽवसानं समाप्तियंस्य तत् सर्व कार्य यद्यक्क प्रत्यक्षेण प्रवर्शयितुं न युज्यते तवाकुच्छेदं कृत्वा प्रवेशकै: चूलिकाङ्कावताराङ कमुखप्रवेशकविष्कम्भका इहाभिप्रेताः । तथा च कोहलोऽर्थोपक्षेपपञ्चकमुक्तवान्॥ २६-२७।। एवमङ्कलक्षर्ण वितत्याभिहितमर्घेनोपसंहरत्मर्धान्तरेणाङ कसन्धानरूपस्य प्रवेशकस्य सामान्यलक्षणं दशयन्नार्या पठति-सम्निहितनायक इत्यावि। जो कार्य मध्याह्न स्नान, भोजन आदि हैं, उन्हें दिन के मध्य में करना अथवा जो कार्य दूरस्थ है। जैसे-दशरथ-मरण आदि, उसे कैसे कहना चाहिये ? इस पर कहते हैं- अनुवाद-जब कार्य दिन के अन्त में पूरा न हो सके तब अङ्कच्छेद करके प्रवेशकों के द्वारा उनका विधान करना चाहिए॥ २६॥ अनुवाद-जो कार्य अपनी अवस्था के अनुसार बहुत दूर तक जाता हो, उसे अङ्कच्छेद में प्रवेश के द्वारा संक्षेप में बिखाये ॥। २७ ।। अभिनव-दिन भर में जिसको समाप्ति हो सके, उन सब कार्यो को यदि अङ्क में प्रत्यक्ष दिखाना युक्त नहीं है तो अङ्कच्छेद करके प्रवेशकों के द्वारा दिखाना चाहिए। यहाँ प्रवेशक पद से अङ्कावतार, अङ्कमुख, प्रवेशक एवं विष्कम्भक अभिप्रेत है और कोहल ने अर्थोपक्षेपक पञ्चक अर्थात् पाँच अर्थोपक्षेपकों को कहा है। प्रकेशक इस प्रकार अड्क के लक्षण का विस्तार करके तथा कथित अर्थ का आधे से उपसंहार करके शेष अर्धभाग से अङ्कानुसन्धान रूप प्रवेशक के सामान्य लक्षण को दिखलाते हुए आर्या को पढ़ते हैं-'सन्निहित नायक' इत्यादि- १. (टि०) यद्येकेन। २. ग. तद्विषेयं हि। २. अयं क्लोक: ख. पुस्तके नासत ।

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सन्निहितनायकोडकू: कर्तव्यो नाटके प्रकरणे था। परिजनकथानुबन्धः प्रवेशको नाम विज्ञेयः ॥ २८॥ नायकशब्वेन तच्चरितसंभोगौ तौ सम्निहितौ प्रत्यक्षौ यत्रेकाङ केऽपि रूपकेऽङ को नायकचरितप्रत्यक्षताशून्यः कार्यः किंपुनरम्यश्रेति प्रकरणे नाटके वेत्युकतम्। अन्ये त्वेतदुत्तरार्धेन संबन्धयन्तो रूपकान्तराणि प्रवेशकशूग्यानि भवन्तीत्या- चक्षते। परिजनकथानुबन्ध इति चतुर्णा लक्षणं सूतमागधादेश्चलिकाङ कस्य स्त्रीपुरुषादेर्वाङ्कमुखोपकरणस्य चेष्टोकञचुकावेर्वा प्रवेशकविष्कम्भोपयोगिन: परिज- नस्य कथयैव परस्परश्लिष्टयानुबद्धोऽङ कावतारः। यथोक्तम्- अड्ान्तर एवाडको निपतति यस्मिम्प्रयोगमासाद्य। नाट्यार्थंकथायोगाढ विज्ञेयोऽलङकावतारोऽसौ ॥। इति २८॥ अनुवाव-जहाँ पर नाटक और प्रकरण के अङ्क में नायक सम्निहित हो और परिजन की कथा का अनुबन्ध हो तो उसे 'प्रवेशक' समझने चाहिए॥२८॥ अभिनव-यहाँ पर नायक शब्द से उसके चरित और सम्भोग ये दोनों जहाँ सन्निहित अर्थात् प्रत्यक्ष हों, ऐसे एकाड्क रूपक में अङ्क में नायक के चरित को प्रत्यक्ष दिखाना चाहिए, अर्थात् प्रत्यक्षता से शून्य अङ्क नहीं करना चाहिए। अन्यत्र नाटक और प्रकरण में कहना हो क्या ? अन्य लोग तो इसे उत्तरार्द्ध से जोड़ते हुए रूपकान्तर प्रवेशकों से शून्य होते हैं, ऐसा कहते हैं। 'परिजनकथानुबन्धः' यह चारों अर्थोपक्षेपकों का लक्षण है। चूलिका के अङक सूत-मागधादि अङ्,कमुख के उपकरण स्त्रो-पुरुषादि अथवा प्रवेशक और विष्कम्भक, चेटी, कञन्चुकी आदि परिजनों के परस्पर श्लिष्ट कथा से अनुबद्ध होना 'अङकावतार' है। जैसा कि कहा गया है- "जहाँ पर नाटय के अभिनेय अर्थ सम्बन्धी कथा के योग के प्रयोग के अनुसार अड्क के मध्य में ही जब अङ्क का निपतन होता है उसे अङ्कावतार समझना चाहिए।" 1. स. प्रवेशके वाषि कर्ततव्य:। वा०, सा०-6२

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१५० प्रकरणनाटकविषये पठ्चाद्या दशपरा भवन्यड्टा। अङ्कान्तरसन्धिषु च प्रवेशकास्तेषु तावन्तः ॥ २९॥ तत्रायं प्रवेशकौऽड्कार्थसन्धनाय भवतीति पूर्वोपक्षिप्तमङकं संख्यानुबाद- द्वारेण दशंयति-प्रकरणनाटकविषय इति । सन््यवस्थानपरिपूर्णोपनिबद्धा एवाङ्का उपक्रमोपसंहारवैतत्ये वश, कस्य- चिर्त्सक्षेपेण षडित्येवम, अन्यतो न्यूनाधिकत्वमनुचितमित्यथः। अङकमध्येषु तु सम्धानानि षट् चित्राणि संपावयितं पञ्चविध: प्रवेशकः कार्य: अङ् कान्तरसन्धिष्विति निभित्तात कर्मसंयोगे सप्तमी। अपिशब्देन प्रवेशक शव्वस्यावृत्ति: सूच्यते। चो हेसौ। प्रवेशकशन्वश्च महासामान्यवचनः पञ्चसु वृत्तः, हह तु मध्यमसामाम्ये प्रवेशकविष्कम्भकढ्ृये वर्तते ॥ २९॥ जहाँ यह प्रवेशक अडक के अर्थ के अनुसन्धान के लिए होता है, अत एव पूर्व में उत्क्षिप्त अङ्डक को संख्या के अनुवाद के द्वारा दिखाते हैं-प्रकरणेत्यादि। अनुवाद-प्रकरण और नाटक में पाँच से दस अड्क तक होते हैं और अङ्कान्तर सन्धियों में उतने ही प्रवेशक होते हैं ॥ २९ ॥ अभिनय-सन्धि और अवस्थाओं से परिपूर्ण रूप से उपनिबद्ध रूपकों में होने वाले अ्क उपक्रम और उपसहार के विस्तार से दश और किसी रूपक के संक्षेप से छः अङ्क होते हैं। इससे कम और अधिक अङ्क होना अनुचित है। अड्कों के मध्य में छः प्रकार के अनुसन्धानात्मक चित्रों को सम्पादन करने के लिए पाँच प्रकार के प्रवेशक करने चाहिए। 'अड्कान्तरसन्धिषु' के निमित्त से कर्म के योग में सप्तमी है। 'अपि' शब्द से प्रवेशक शब्द की आवृत्ति सूचित होती है। 'सन्धिषु च' में 'च' शब्द हेतु में है। प्रवेशक शब्द महासामान्य का वाचक है, अतः पाँचों में रहता है। यहाँ पर तो मध्यम विष्कम्भक के अर्थ में और सामान्य प्रवेशक के अर्थ में है। दोनों में है॥ २९ ॥ १. इतः प्रारम्य पद्चदवयं ख. पुस्तके वास्ति। ग. प्रकरणविषयेदशपरास्तया चैव। बड्का: कर्तव्या: स्पुर्ना नारसभावसंयुक्ताः॥ इति पाठः।

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'अनयोरण्तरविहितः प्रवेशकोऽर्थंक्रियां" समभिवोक्ष्य। संक्षेपार्थः सब्धिष्वर्थानां संविधातव्यः ॥३०॥ अङ्कच्छेवं कृत्वा मासकृतं वर्षसंचितं वापि। तत्सवं कर्तव्यं वर्षादूर्ध्व न तु कदाचित्॥ ३१।। तद्यमर्थ :- यस्माम्मासकृतं वर्षसन्चितं वा यच्च तत्कायं सामानिकारनां हृवयगतं तस्मात् प्रवेशकविष्कम्भौ कतब्यौ। परिमितन्तु यवनुसन्धेयं तत्राङ्क- मुखमल्पानुसन्धेये चूलिका, अल्पतमे अङ्क कावतारः। तत्र केचित् वनवासादयो- द्वधाप्रवेज्ञानन्तरं रामानुसन्धानमनुसन्धानीर्य मा भूवित्याशयेन व्याचक्षते मासेन मासाम्यां मासैवर्षेण वर्षाम्यां वर्षेः इति कदाचितु वर्षादूष्वंन्तु ये महाप्रभावा- श्चिरातोतमप्यनुसन्वधते रामावेस्तेषां बहुतरो हि कालः प्रवेशकैवणनोयः। ये तु पुरुषप्रायास्तेषां वर्षादूध्वमनुसन्धानं नैवास्ति। तथा च मार्गशीर्षी तैषों चान्तरेण दीरधं कालयात्रा आवर्षारात्रान्मासाष्टकमुक्तेति सङ्गिरन्ते। अनुवाद-अर्थ को क्रिया को देखकर इन दोनों के अन्तगंत सन्धियों में अर्थों के संक्षेप के लिए प्रवेशक का विधान करना चाहिये॥। ३०॥ अनुवाद-एक मास तक अथवा एक वर्ष तक संचित घटना हो, उन्हें अडकच्छेद करके करना चाहिए। एक वर्ष के बाद का समय कभी भी नहीं होना चाहिये॥ ३१ ॥ अभिनव-इस लिए यहाँ यह अर्थ है कि मास में सम्पाद् अथवा वर्ष में सञ्चित जो है, वह कार्य सामाजिकों के हृदय में स्थित है इसलिए विष्कम्भक और प्रवेशक को करना चाहिए, किन्तु जो अनुसन्धेय परिमित है वहाँ अङ्कमुख होता है, अल्प अनुसन्धेय में चूलिका है और अल्पतम में अङ्कावतार होता है। यहाँ कुछ लोग कहते हैं कि वनवास से अयोध्या में प्रवेश करने के पश्चात् राम का अनु- सन्धान अनुसन्धानीय न हो, इस आशय से व्याख्या करते हैं कि एक मास से, दो मासों से, बहुत से मासों से अथवा एक वर्ष से, दो वर्ष से, बहुत से वर्षों से करणीय है। कभी तो एक वर्ष के ऊपर रामादि के महाप्रभावशाली चिरकाल से अतीत बातों का अनुसन्धान करते हैं उनके बहुत से काल का वर्णन प्रवेशकों के द्वारा करने चाहिए। जो साधारण पुरुष हैं उनके कार्यों का वर्ष भर के ऊपर अनुसन्धान नहीं है। जैसाकि मार्गशीष और पौष मास को छोड़कर वर्षा की रात्रि तक आठ महीने की दीर्घकाल यात्रा कही है। १. क. (टि०) अङ्कान्तरालसहितः। अङ्कान्तरालविहितः । २. क-भ. अडकक्रियां। ३. ख. कुर्यात् नामकृतं। क०म. अङकच्छेदे काय।

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एतच्चासत, मासवर्षादोनां स्वोकृतनियतपरिमाणानां द्विवचनबहुबचना्तत्वे वृतत्ययोगस्य वशितत्वात्। सौयंके मासजाते च परिमाणं स्वभावतः। उपाधिभतमाशित्य संख्याभेदेन व्तते॥ वयरिस्वति परिच्छेद: क्रियतेऽपि न गभ्यते। इष्टो भेवावृते तत्र परिमाणमनर्थंकम्।। इत्यादिबहु च वर्षादुष्वमिति च निषेधः फल्गुफल एव स्यात्। तस्मावेक- वचनान्तेनैव समासः। न च रामायणभारताविचरितत्यागप्रसङ्ग: कार्यग्रहणं होतवथ मुनिना कृतं, यत्र हि यत्ननिष्पादयं सञ्चितं तदेव वर्ष गण्यते। वर्षान्तराणि तु तत्र विद्यमानान्यपि अविद्यमानकल्पानि। रामचरिते हि चतुवशवर्षाण्यर्यनि- वासा यद्यपि कार्य:, वर्षाणि त्रिचतुराणि भवन्ति यत्र मारोचवधसुग्रीवराज्यवाना द्वान्तरकाय संभवति। तस्मादवर्षादूर्ध्वमित्यनेन कायं वषंद्वयादि निषिध्यत इत्येवं वर्षसहत्त्रायुषोऽपि वर्षशताम्तरालवृत्तचरितव्याख्यानेऽपि न किञ्चिद् दुष्यति। तेन पञवाक्कू नाटके पञच कार्यदिनानोति संक्षेपः, वशाङ्के तु वशेति विस्तरः ॥ ३१॥ किन्तु यह सब असत् है। मास, वर्ष आदि के रूप स्वीकृत नियत परिमाणों के द्विवचनान्तत्व और बहुवचनान्तत्त्व में वृत्तियों का याग नहीं दिखाई देता है। "सौर मास में जो परिमाण स्वभावतः होता है वह उपाधियों का आश्रय लेकर संख्या के भेद से होता है। अवस्था है, इस प्रकार परिच्छेद किया जाता है, गम्य नहीं होता। वहाँ भेद के अतिरिक्त परिमाण निरर्थक है।" इत्यादि बहुत वर्षों के ऊपर जो निषेध है, उसका फल निरर्थक हो होगा। इसलिए मास, वर्ष में एकवचनान्त से ही समास करना चाहिए। इस प्रकार शङ्का नहीं करनो चाहिये कि एकवचनान्त समास करने पर बहुकाल साध्य रामायण और महाभारत के चरितों के त्याग का प्रसङ्ख हो जायेगा। जहाँ पर सञन्चित कार्य वर्ष यत्न साध्य है उसी को वर्ष के रूप में गणना करते हैं। क्योंकि अन्य वर्ष रहते हुए भी नहीं के समान हैं। जैसे रामचरित में राम का चौदह वर्ष का यद्यपि वनवास है। तथापि मारीच के वध, सुग्रीव को राज्य प्रदान आदि अवान्तर कार्य सम्भव है वहाँ तीन-चार वर्ष हो होते हैं इसलिए एक वर्ष के ऊपर नहीं करना चाहिये। इसोलिये वर्षद्वय आदि का निषेध लिया जाता है और इसोलिये एक हजार वर्ष को आयु वाले के चरित्र को सौ वर्ष के अन्तराल में घटित करने में कोई दोष नहीं है। इसलिये पाँच अङ्क के नाटक में कार्य करने के लिए पाँच दिन संक्षेप हैं और दश अङक के नाटक में दस दिन होना विस्तार है॥ ३१॥

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यः कश्चितकार्यवशादृगच्छति पुरुषः प्रकृष्टमध्यानम्। तत्राप्यक्कच्छेदः कर्तव्यः पूर्वचत्तजज्ञं: ॥३२॥ *अड्कान्तरानुसारी संक्षेपार्थमषिकृत्य बिन्दुनाम्। प्रकरणनाटकविषये प्रवेशकः संविषातव्यः॥३३॥

अङ्ढूछेदे निमित्ताम्तरमप्याह-यः कश्चित्कायवशादिति। कार्यवशात्कार्यस्य तन्रायतत्वात् या पुरुषो नायकः सोऽनेकयोजनव्यहित- मध्वानं यवा गच्छति तवा प्रतिदिनं गमनं विशान्ति: शय्येत्येवमादि कथं रङ्ग प्रवर्श्या:, तदन्तेनाङ्च्छेद: कार्य:। डिमादिनायकस्य तु दिव्यस्याकाशयानकादिना सवं युज्यते। अनायकपुरुषस्त्वविच्छिग्न एवाड्ू निष्क्रामति। ननु दिवसावसानकाय केनोपपद्यत इति आवश्यकाविरोधेनेत्यादिना यदुक्तं ततस्तिलमात्रेणाप्यधिकं वाच्यमस्य न लभ्यते वाक्यस्य। अत एवैतत् भट्टलोल्लटाद्यनं पठितमेव।

अब अङ्कच्छेद के अन्य निमित्तों को कहते हैं- अनुवाद-यदि कोई पुरुष कार्यवश लम्बे रास्ते पर जाता है तो वहाँ पर भो ततत्ववेताओं को पूर्ववत् अङ्कच्छेर करना चाहिये ॥ ३२ ॥ अनुवाद-'पूवं अङ्क के अनुसार बिन्दु के अर्थ को संक्षेप में करके प्रकरण और नाटक में प्रवेशक का विषान करना चाहिए ॥३३ ॥ अभिनव-कार्यवश अर्थात् कार्य आयत (विस्तृत) होने से जहाँ पुरुष नायक है वह जब अनेक योजन लम्बे मार्ग पर जाता है तब प्रतिदिन का गमन, मध्य में विश्राम एवं चयन आदि कार्यों को रङ्ग के मध्य में कैसे दिखाना चाहिए ? इसलिये अन्त में अङकच्छेद करना चाहिये। डिम आदि रूपका में दिव्य नायक के आकाशयान आदि के द्वारा सब युक्तिसङ्गत है। नायक से भिन्न पुरुष तो अवि- च्छिन्न अङ्क में यदि निकल जाता है ता दिन के अवसान में होने वाला कार्य विना पात्र के किस प्रकार उपपन्न होता है? इस प्रकार 'आवश्यकाविरोधेन' इत्यादि जो कहा गया है अर्थात् जब किसी आवश्यक कार्य का विरोध नहीं होता तभी पात्र का निष्क्रमण हाता है उससे तिल मात्र भो अधिक इस वाक्य का अर्थ नहीं मिलता अन्यथा नहों, इत्यादि। इसोलिए भट्टलौल्लट आदि इसे नहों पढ़ा है।

१. क-य. यदि। २. क-प. पूर्वतन्त्रज्ञैः । ३. क (टि०) अङ्कान्तराधिकारी संक्षेपमधिकृत्य विन्दूनाम्। ४. ख. प्रवेशको भवति काव्येषु।

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६५४ नाडच श्ाब्ने उपाध्यायास्त्वाहु :- नेवं निमित्तान्तरं अपि तु पूर्व तावस्कथितं पद्ङ्क- नोपपद्यत इति तस्यैवोवाहरणमनयैवायंया वशितम्। यथा नायकस्य प्रकृष्ठाध्व- गमनमिति पूर्ववदिति तवहमिति भवति पूर्वलक्षणाहोऽङ्कच्छेबोऽयमिति यावत्। अपि शब्द उदाहरणान्तरमपि सूचयति। अङ्कार्थंसन्धानप्रयोजनस्य प्रवेशकस्य स्थानं वाच्यम्। विषयं चाह अङ्कान्तरानुसारीति अङ्कमध्ये भवतीति यावत्। मङ्काम्तरं पूर्वाङ्कान्तरमनुसरति तस्प पश्चाद्गवतोत्यर्थः। प्रत्यङ्कान्तं यो बिन्दुः अनुसन्धानाभि- धायिवाक्यं यत्सक्षिप्तं प्रयोजनं तवधिकताकरणं विस्तारमुद्दिव्येति वाच्यमुक्तं, प्रकरणे नाटके चावश्यं प्रवेशकसतस्पावश्यमुत्तमकृतिविषये उपदेशाय प्रवृत्तोऽपरिमि- तेनोपायेन भूयस्तरावास्तरकार्ये प्रत्युत्पत्तिबहूनां चामात्यादोनामपि स्वकार्यनिरुप- णाय प्रबेशकः, अन्यत्र रूपके परिमितकार्योपदेशात न तथा प्रवेशकोपयोग इति वितनिष्यामः ॥।३२।। उपाध्याय जी तो कहते हैं कि यह निमित्त नहीं है, अपितु पहले कहा जा चुका है कि यदि कोई कार्य अङ्क में उपपन्न नहीं होता इत्यादि। उसी का उदाहरण इस आर्या के द्वारा दिखाया गया हैं। जैसे नायक का प्रकृष्ट अध्वगमन, पूर्ववत् इत्यादि। इसलिए होता है कि यह अङ्कच्छेद पूर्वकथित लक्षण के योग्य है। अपि शब्द उदाहरणान्तर को सूचित करता है। बङ्कार्थ के सन्धान के प्रयोजनार्थ प्रवेशक का स्थान कहना चाहिए। अब विषय को कहते हैं कि अङकान्तर के अनुसार आदि भाव यह है कि यह अंक के मध्य में होता है। अगला अंक पूर्व अंक का अनुसरण करता है अर्थात् बह उसो के पश्चात् होता है। प्रत्येक अंक के अन्त में जो बिन्दु है तथा जो अनुसन्धान करने वाले वाक्य के प्रयोजन का संक्षिप्त तत्त्व है वह अधिकता- करण रूप विस्तार के उद्देश्य से कहा गया है। इसलिए नाटक और प्रकरण में प्रवेशक अवश्य रहता है क्योंकि अपरिमित उपाय से उत्तम प्रकृति के विषय में उपदेश के लिये प्रवृत्त होता है। अतः भूयस्तर अवान्तर कार्य के विषय में प्रत्युल्पन्न मति वाले बहुत अमात्य आदि के स्वकार्य के निरूपण के लिये प्रवेशक होता है। अन्यत्र रूपकों में परिमित कार्य का उपदेश होने से वहाँ उस प्रकार प्रवेशकों का उपयोग नहीं होता, यह आगे विस्तार से कहेंगे ॥ ३२-३३॥

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प्राकुतभाषाचार: प्रयोगमाधित्य' कतंव्यः ॥ ३४ ॥

अथ विष्कम्भकादभेदमस्य द्शयन् प्रवेशकशब्दोऽतिविशेषशब्दवाच्यपि

उत्तमादयोऽपि भवन्ति परिजनास्तम्निवृत्त्यर्थमेतत्। उदातं संस्कृतवचनं तस्य निषेष: । अन्ये त्वाह :- उदात्तं स्वात्मकार्यविश्रान्तं वचनं निषिध्यते, "आणत्तंमि भट्टिवारि आये" इत्यादिना हि स्वकृत्यं प्रधानोपयोग्येव दृश्यते, न स्वतन्त्र। तत्र प्राकृती भाषा आचारशच व्यवहारः प्राकृतः एव। प्रयोग- माधित्येति ववचित्त प्रयोगवशारसंस्कृतभाषाचारो विष्कम्भकेऽपि कर्तव्य इति बशंयति ॥३४॥

अब विष्कम्भक से प्रवेशक का भेद दिखाते हुए प्रवेश शब्द अतिविशेष शब्द का भी वाचक है, इस बात को दिखाते हैं- अनुवाद-नाटयप्रयोग का आभय लेकर जहाँ उत्तम तथा मध्यम पुरषों का आचार हो, न उदात्त वचनों में व्यवहार हो, ऐसे अभिनय करें। प्राकृत भाषा का उच्चारण करना चाहिए॥ ३४ ।। अभिनव-परिजन भी उत्तम होते हैं अथवा उत्तम परिजन होते हैं, आशंका की निवृत्ति के लिए यह कथन है। उदात्त का अर्थ संस्कृत वचन है और उसका निषेध है। अन्य लोग तो कहते हैं कि उदात्त का अर्थ अपने कार्य से विश्रान्ति होने वाले वचन का निषेध है। 'आज्ञप्तास्मि भतृंदारिकया' इत्यादि के द्वारा उनका अपना कृत्य प्रधान के उपयोगी दिखाई देता है, स्वतन्त्र नहीं। वहाँ पर प्राकृती भाषा और आचार-व्यवहार प्राकृत हो है। प्रयोग का आश्रय करके। कहीं तो प्रयोगवश संस्कृत भाषा का आचार विष्कम्भक में भी करना चाहिए, यह दिखाते हैं॥ ३४ ॥।

१. ख. प्रयोगयासाद्य कतव्य: ग. प्रयोशको नाम विशेय:।

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नाटपशारये

अर्थाभिषानयुक्त: प्रवेशकः स्यादनेकार्थः ॥ ३५॥

संक्षेपार्थमधिकृत्येति यदुक्तं तदेव विभजति-कालोत्थानगतिरसाविति। कालोदयस्य गतिरवगमो यतः कालोदयसूचकः कश्चित् प्रवेशकः। यथा- "अज्ज वसन्दमहूसवे सबहुमाणमाहूय" इत्यादि (रत्नाः १)। अर्थाभिधानेति प्रत्येकं संबध्यते, तेन व्याल्यादीनां विषयान्तानां चतुर्णां योऽथंस्तवभिधाने युक्तस्तवुद्देशेनप्रवृत्त इति पञ्चप्रकार: प्रवेशक: इति याबत्। व्याख्यायत इति व्याख्या।

मनवाद-संक्षेप का आधय लेकर यह जो कहा था, अब उसी का विभाग करते है- अनुवाद-नहाँ पर काल के उत्थान (उदय) की गति (ज्ञान) हो तथा जहाँ पर व्याल्या, संरम्भ, कायं एवं विषय का अर्थाभिधान हो ऐसे मनेक अर्थो बाला 'प्रवेशक' होता है।। ३५ ।।

अभिनव-काल के उत्थान (उदय ) की गति (ज्ञान) जिससे हो, ऐसा कालोदय का सूचक कोई 'प्रवेशक' होता है। जैसे-रल्नावली में "आज वसन्तोत्सब में बड़े आदर के साथ बुलाकर .... " इत्यादि। यहाँ अर्थाभिधान का प्रत्येक के साथ सम्बन्ध है, इसलिये व्याख्या से लेकर विषय पर्यन्त चारों का जो अर्थ है उसके अभिधान से युक्त, उस उद्देश से प्रबृत्त, इस प्रकार पाँच प्रकार का 'प्रवेशक' है, ब्याख्यान करना ही व्याख्या है। जैसे किसी प्रवेशक के द्वारा गूढ अर्थ का व्याख्यान किया जाता है।

१. र. कालार्थान्तरसक्व्यत्यासारम्भ कार्यविषयाणाय । २. ब. न. अर्थाभिधानपूर्वः । ३. क-म. प्रवेशको नाम विज्ञेष:।

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यथा तापसवत्सराजे अमात्यप्रणिधिः "मामिज्जई मसवासएहि हालाहलस्स पमादसंकिा (भ्राम्यते पाश्वकैः प्रमादशङिकतैः।)" तापस-अ-४ (इत्यादि), अनेन हि नातिव्यवधानोक्तं पद्मावतोगुहे च यद्वासवदत्तास्थापनं तस्य गूढं प्रयोजनं व्याख्यातम्। संरम्भ: कार्यविशेष: विषयः अभिप्रायस्तस्यार्थ उपा- यान्वेषणादि तदभिधानयुक्त: प्रवेशको, यथा नृत्तपा (वा) रे गति.उपस्थित- मिदं ततप्रयोजन" मित्यादि। अनेन वासवदत्तामपहृतयोज्जोयनीं निनोषोवंत्स- राजस्य प्रयोजकत्वं प्राप्तानाममात्यानां संरम्भ: शालड्कायनेनोक्त। कायं तु यदाधिकारिकमित्यादि (१९-३), तस्यार्थ: पञ्चाङ्गस्यानुष्ठानम्। तद्यथा- कर्मणामारम्भोपायः, पुरुषद्रव्यसंपद्, वेशकालविभागः, विनिपातप्रतोकार:, कार्यसिद्धिरिति तथाभताभिधानयुक्तच प्रवेशको बाहुल्येन तापसवत्सराजप्रतिभा- चाणक्यमुद्राराक्षसाविषु। विषयस्तु भाविनोऽङ्कावतारस्पेतिवृत्तं तस्यार्थो विशेष- रूप:, तदभिधानेन युक्तः प्रवेशको यथा नागानन्दे द्वितोयेऽक्के चेटिकाद्वयेन मदना- वस्थेतिवृत्तस्य विशेषवणनं चन्दनलतागृहादि दशितम्। अन्यान्यपि प्रवेशकस्य प्रयोजनानि सन्ति। न त्वेत्परिगणनमित्याह-अनेकार्थ इति ॥ ३५॥

जैसे-तापसवल्सराज में अमात्य का प्रणिधि (दूत) "प्रसाद से शङिकत पारश्वक भ्रमण करते हैं" इत्यादि व्याख्या करते हैं। इससे अत्यन्त व्यवधान से रहित कहे हुए पद्मावतो के घर में जो वासवदत्ता का स्थापन किया गया है, उसका गूढ़ प्रयोजन व्याख्यात है। संरम्भ का अर्थ कार्य-विशेष है, विषय अभिप्राय है, उसका अर्थ उपायान्वेषण इत्यादि है, उस अभिधान से युक्त प्रवेशक है। जैसे-तापसवत्सराज में नृत्त को समाप्ति पर "गतिवश यह उसका प्रयोजन उपस्थित हो गया" इत्यादि। इससे शालङ कायन ने वासवदत्ता का अपहरण कर उज्जयिनी ले जाने के इच्छक वत्सराज को प्रेरणा देने वाले अमात्यों का संरम्भ कह दिया। कार्य तो आधिकारिक है, इत्यादि। उसका अर्थ है पञ्चाङ्ग का अनुष्ठान। जैसे-(१) कर्मों के आरम्भ का उपाय अर्थात् किस उपाय के आश्रय से कर्मों का अनुष्ठान हो। (२) पुरुष और द्रव्य को सम्पत्ति की परिपूर्णता (३) देश और काल का विभाग (४) विनिपात का प्रतीकार (५) कार्य को सिद्धि। इस प्रकार के अभिधानों से युक्त प्रवेशक अधिकतर ताप- सवल्सराज, प्रतिभाचाणक्य, मुद्राराक्षस आदि में है। विषय तो भावी अङ कावतार का इतिवृत्त है उसका अर्थ विशेष रूप। उसके अभिधान से युक्त प्रवेशक जैसे नागानन्द के द्वितीय अंक में दो चेटियों के कामावस्था रूप इतिबृत्त का। विशेष वर्णनीय चन्दनलता गृह को दिखा दिया। इनके अतिरिक्त प्रवेशक के और भी प्रयोजन है, केवल परिगणना नहीं है, इसीलिए अनेकार्थ कहा है॥ ३५॥ ना. था०-८३

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नाटपशास्य्रे

'वह्वाश्रयमपि कार्य प्रवेशकैः संक्षिपेच्च सन्धिषु वा। बहुचूर्णपदैर्युक्तं जनयति खेदं प्रयोगस्य ॥ ३६॥।

नन्वेवंभूतोऽर्यो यः प्रवेशके प्रवश्यते समासेन विस्तरेण वेत्याशंक्याह-बह्ना- अयमपीति। सन्धि चिकोषंव इति अङ्कार्थसन्निवेशनिमित्तं ये प्रवेशकाः पञचाप्युक्ताः चूलिकावयस्तैर्वाङ्काश्यं बहुवक्तव्यं विततमपि कायं संक्षिपेत् यावतसन्धानोपयीगि तावत्तत्र बयात। यतो, बहुभिगंद्यगतैरसमस्तैः पदैरसंस्कृतप्रायैः खेदो भबति। अनेन प्रवेशकादौ उत्कलिकाप्रायं बहुतरसमाससङ्कोणमभिनयशाखाङ्गत्रोटनकारि स्वात् समाससंशयेनार्थानिश्चायकत्वाच्च न कतव्यमित्यपि वर्शयति। दिवसावसानकायं यद्यक्के नोपपद्यते सवम्। अङ्कच्छेदं कृत्वा प्रवेशकेस्तद्विधातव्यम्॥१८-२६॥ इस प्रकार का कौन सा अर्थ है जो प्रवेशक में संक्षेप या विस्तार से दिखलाया जाता है, इस प्रकार आशंका करके कहते हैं- अनुवाद-बहुतों के आधय पर निर्भर कार्य को अथवा सन्धियों में विद्यमान कारय को प्रवेशकों के द्वारा संक्षेप में करना चाहिये। अनेक चूणंपदों से युक्त प्रयोग का विस्तार खेद को उत्पन्न करता है॥ ३६॥ अभिनव-सन्धि-विधान करने का इच्छुक अर्थात् जो नाटकादि में मुखादि सन्धियों की योजना करने का इच्छुक हो उसके लिए अङ् कार्थ के सन्निवेश के लिए जो चलिका आदि पाँच प्रवेशक कहे गये हैं उनके द्वारा अंकों में कथनीय विस्तृत कार्य को संक्षेप में कहे जितना जहाँ सन्धान के उपयोगी हैं, वहाँ उतना कहे, क्योंकि गद्य में असमस्त (समास-रहित) असंस्कृत अनेक पदों के कथन से सामाजिकों को खेद होता है। इनसे यह सूचित किया गया है कि नाट्य उत्कलिका- प्राय गद्य का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि बहुतर समास से सकीणं होने से वह अभिनय की शाखा के अंकों को तोड़ने वाला है और समास में संशय होने से अर्थ का अनिश्चायक भी है। "जो दिन के अवसान में पूरा होने वाला कार्य पूरा न हो सके तो उसे अड्कच्छेद करके प्रवेशकों के द्वारा दिखाना चाहिए ?" १. बह्वाश्रयमप्बर्थ प्रवेशक संक्षिपेतप्रबन्धेषु अङ्केषु संयुक्तो जनयति खेदं प्रयोगस्य। २. स. ब्रह्माश्रयमप्यर्थं ।

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यत्रार्थस्य समाप्तिन 'भवत्यङ्क प्रयोगबाहुल्यात्। वृत्तान्तस्वल्पकर्थः प्रवेशकै: सोऽभिधातव्यः॥३७ ॥

इति यदुक्तं तत्रानुपपत्तिबंहुप्रकारा भवतीति वर्शयितुमाह-यत्रार्थस्य समाप्ति- रिति। यत्प्रत्यक्षप्रयोज्यमपि प्रयोगवशाबङ्के समाप्तं भवति तत्प्रवेशकेन कतव्यम्, बहुतज्ञत्वं प्रयोगस्य बहुमानास्पवत्वम्॥३६॥ तदयमत्रार्थ :- यत्र दिवसकार्याण्यनेकानि तत्र तन्मध्ये यत्सुन्दरप्रयोगकमुपदे- शोपयोगि च तत्प्रत्यक्षेण वशनोयम्। अन्यत्सर्व प्रवेशकेन वृत्तान्तारथां तदवशिष्टेनेति वृत्तनिर्वाहफला अल्पा संक्षिप्ता कथा यस्य प्रवेशकस्य। एवं प्रत्यक्षप्रयोज्यप्रवेशकोप- योगो दशितः ॥। ३७।। अन्यत्रापि दर्शयति-युद्धं राज्यभ्रंश इत्यादि।

अनुवाद-जहाँ पर अङ्क में प्रयोग को बहुलता से अर्थ की समाप्ति नहीं होतो, वहाँ बृत्तान्त घटित स्वल्प कथा वाले प्रवेशकों के द्वारा सम्पन्न करना चाहिए।। ३७ । इस प्रकार जो कहा गया है, उसमें बहुत प्रकार की अनुपपत्तियाँ हैं, इस बात को दिखाने के लिए कहते हैं-जहाँ पर अर्थ को समाप्ति है अर्थात् प्रत्यक्ष में प्रयोज्य होने पर भी अंक में समाप्त नहीं होता है, उसे प्रवेशक के द्वारा सम्पन्न करना चाहिए। प्रयोग की बहुलता बहुमान का आस्पद है। अभिनव-इसका अर्थ यह भी है कि जहां पर दिन भर में पूरे होने वाले कार्य अनेक हैं वहाँ मध्य में हो सुन्दर प्रयोग वाले और उपदेश के योग्य कार्यों को प्रत्यक्ष दिखाना चाहिए। और शेष कार्य को प्रवेशकों के द्वारा पूरा करें। अवशिष्ट अर्थ का फल है, केवल इतिवृत्त का निर्वाह करना। अतः प्रवेशक में संक्षिप्त कथा रहतो है, इस प्रकार प्रत्यक्ष प्रयोग के योग्य प्रवेशक की उपयोगिता दिखलाया गया है॥ ३६-३७ ॥

१. ख. भवेदङू। १. ख. बहुवृत्तान्तोऽल्पकर्थः प्रवेशकै संविघातव्यः । ३. 'ख' पुस्तके इत्यनन्तरं श्लोकत्रयी अधिका डश्यते।

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नोटयशाल्त्रे

युद्धं राज्यभ्रंशो मरणं नागरोपरोधन चैव। प्रत्यक्षाणि तु नाडू प्रवेशकैः संविधयानि॥३८ ॥

युद्धे शस्त्रसंपातस्य बाहुल्यं, राज्यभ्रंशेऽषि पतनमरणादेः, नगरोपरोधे बलस्य यन्त्रसुरङ्गादिदानस्य। इह केचिदाहु: मरणं द्विविषम्। किञ्विदन्यसंबन्धिन्या क्रियया संपाधं यथा चक्रेण दैत्यस्य शिरश्छेदं, किश््वदन्यसंबन्धिक्रियानैरपेक्ष्येणव व्याध्य- भिधाताविप्रभवम्। तत्राद्यस्यैव निषेधः क्रियते। एतदर्थमेव कृतग्रहणं तद्वचन्य- क्रियावाचरुम्। न च तद्युद्वेन संगृहोतम्। अयुद्धे पूर्वस्याप्यश्ि्तशिरश्छेदस्य दशितत्वादिति। त एवं प्रष्टव्या :- इदं मरणं प्रयोज्यमिदमप्रयोज्यमिति न ताववत्र विषयविभागे निदानमुत्पश्यामः। मृतस्य करथं निष्क्रम्णं कथ वावस्थानं, तता नाट्योपयोगिसमस्तध्रुवागानादिप्रक्रियाविलोपः सामाजिकानां विरसताप्रतिपत्तिरिति तु सवंत्र मरणं समान तस्माव्रङ्ग मरणप्रयोज्यमेव। ननु मरणानुभावव्णननेवानीं कि कृत्यं, युद्धवोररौद्रादावप्येतवनुभाववर्णने कि प्रयोजनं तवनुभावापरिज्ञाने प्रवेश कैरपि कथं वर्णनं स्यादिति चेम्मरणेऽपि समः समाधि:।

अभिनव -अन्यत्र भी उन्हें दिखाते हैं- अनुवाद-युद्ध, राजभ्नंश, मरण, नगर का उपरोध आदि अङ्कक में प्रत्यक्ष नहीं विखलाना चाहिए, उन्हें प्रवेशक के द्वारा प्रस्तुत करना चाहिये॥।३८॥ अभिनव -युद्ध में शस्त्रों के सम्पात का राजभ्रंश में भी पतन, मरण आदि का, नगर के उपरोध में सेना का और सुरङ् आदि के निर्माण का बाहुल्य होता है। इस विषय में कुछ लोग कहते हैं कि मरण दो प्रकार का होता है-प्रथम किसो अन्य सम्बन्धो क्रिया से सम्पाद्य, जैसे चक्र से देत्य के शिर का छेदन (काटना) और दूसरा किसी अन्य सम्बन्धी क्रियाओं से निरपेक्ष, जैसे व्याधि, चोट आदि से होने वाला। उनमें प्रथम मरण का ही निषेध किया गया है। इसीलिए 'कृत' का ग्रहण है, क्योंकि वह अन्या क्रिया का वाचक है। इसलिए युद्ध में उसका संग्रह नहीं

१. क. (टि०) समरस्यरोधनं। २. क-भ. अप्रत्यक्षकृतानि।

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किञ्च यत्र प्रत्यापत्तिशुम्यं मरणं तत्प्रतिक्रियाविलोपकतवाम्न प्रयोज्यम्। यत्तु ववचित्ततप्रत्यापत्ति: यथा जीमूतवाहनस्य तदेव क्षणमात्रानिश्चितचेष्टात्मकं प्रयोज्यमेवेति सोऽपि मरणानुभावसाक्षात्करणस्य विषयः। यद्वाहिनीनामपि साटोप- परिक्रमणं शास्त्रवर्णनादिप्रारम्भरूपमदा प्रयोज्यमपि तु तन्निर्वाही न प्रदशनीयः । एतदेव, तन्न प्रत्यक्षेण प्रयोज्यं, प्रवेशकैरिति उपक्षेपपञ्चकमध्यादन्यतमेनोपक्षेपे- णेत्यथः । अन्ये त्वाहु :- व्याधिजमभिधातजं च मरण रङ्गे प्रयोज्यं, अपुनर्जनि- निष्क्रान्तिरहितप्रकृतिविधेयेति ॥३८ ॥

किया गया है। युद्ध के अभाव में अपूर्व और अशकिङ्त शिरः छेद दिखाया गया है। उनसे यह पूछना चाहिये कि यह मरण प्रयोज्य है और यह अप्रोज्य है, इस विषय के विभाग में कारण नहीं देख रहे हैं। क्योंकि मरे हुए का निष्क्रमण कैसे होगा और कैसे अवस्थान होगा ? क्योंकि इससे नाट्य के उपयोगी समस्त ध्रुवा, गान आदि क्रियाओं का लोप होगा और सामाजिक के लिए विरसता आदि की प्रतिपत्ति होगो, इस प्रकार मरण सर्वत्र समान होगा, अतः रङ्ग में मरण का प्रयोग नहीं दिखाना चाहिए। अब तो प्रश्न है कि मरण के अनुभावों के वर्णन से इस समय क्या प्रयोजन है और युद्ध, वोर, रौद्र आदि रसों में उनके अनुभावों के वर्णन से क्या प्रयोजन है और मरण के अनुभाव के जाने विना प्रवेशकों के द्वारा उनका वर्णन कैसे होगा ? इसका उत्तर होगा कि यह समाधि है तो वही उत्तर वहाँ भो होगा कि वह भी समाधि होगी। अतः दोनों जगह समान समाधि है। और भी जहाँ पर मरण प्रत्यापत्ति से शून्य है, उस मरण को क्रिया-विलोपक होने से नहीं दिखाना चाहिये। और जहाँ कहीं प्रत्यासति होती है, वहाँ पुनर्जीवन होता है जैसे, जोमूतवाहन का। उसे क्षण भर के लिए चेष्टा से शून्य होने से दिखाना चाहिये। तथा वह मरण के नियमों का साक्षात्कार का विषय है। और जो वाहिनी का साटोप परिक्रमण है तथा शास्त्र-सम्पात के वर्णन का प्रारम्भ रूप है वह प्रयोज्य होते हुये भी उसके निर्वाह का प्रदर्शन नहीं करना चाहिये। इसो बात को मूल में स्पष्ट कर दिया गया है कि निर्वाहपर्यन्त युद्ध को और अचिर प्रत्यासत्ति शून्य मरण को प्रत्यक्ष नहीं दिखाना चाहिए। 'प्रवेशकैः' पद के कथन का अर्थ है कि उपक्षेप पञ्चक में से किसी एक के उपक्षेप से। अन्य लोग तो कहते हैं कि व्याधि (रोग) और अभिघात से होने वाला मरण रङ्ग में दिखाना चाहिये। क्योंकि वह पुनर्जन्म और निष्क्रान्ति से रहित प्रकृति वाला होने से विधेय है॥ ३८ ।

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६६२ नोटयशास्त्रे

अड्ढू प्रवेशके च' प्रकरणमाश्रित्य नाटके वापि। न वधः कर्तव्यः स्याद्योऽभ्युदयी नायकः ख्यातः ॥ ३९॥

अथ सवंथा यद्विषयं मरण नाल्येयं, तद्दर्शयति अङ्के प्रवेशके चेति। प्रकरणे नाटके वा नायकस्य प्रत्यक्षेण वा वर्णनया वा न मरण वर्णनोयम्। अङ्क इति प्रश्यक्षेण, प्रवेशक इति वर्णनया। ननु प्रत्यक्षेण ये न कस्यचित्मरणं प्रयोज्यमिच्छन्ति तन्मते अङ्कग्रहणं किमर्थ, तत्राहुः वधशब्देन (न) मरणमुच्यते, अपि तु परकृतद्यातदानादि तत्रान्यघात- वानादपि प्रत्यक्षेण रङ्गे प्रवश्यते। अचिरप्रत्यापत्तौ समाश्वासे यस्तु नायकस्तस्य खयातस्य न घातदानादि प्रदर्शनोयम्। अन्ये तु ख्यातं नायकं पताकानायकाविक मिच्छन्ति ॥३९॥

अब यहाँ पर मरण का सर्वथा नहीं कहना चाहिए, उसे दिखाते हैं- अनुवाद-नाटक और प्रकरण के अङ्क और प्रवेशक में अभ्युदयशाली नायक्र का वध नहीं दिखाना चाहिये। अभिनव-प्रकरण अथवा नाटक नायक का प्रत्यक्ष रूप से अथवा वर्णना के द्वारा मरण का वर्णन नहीं करना चाहिए। अङ क का निर्देश प्रत्यक्ष से और प्रवेशक का वणना से है। अभिनव-अब प्रश्न होता है कि जो प्रत्यक्ष रूप में किसी का मरण नहीं दिखाना चाहते, उनके मत में अङ क का ग्रहण किस लिए है? इस पर कहते हैं कि वध शब्द से मरण नहीं कहा है, अपितु वध शब्द से परकृत घात-दानादि का ग्रहण है अतः अन्य कृत घातदानादि प्रत्यक्ष रूप से रङ्ग में दिखाया जाता है। अचिर प्रत्यापत्ति समाश्वासन में जो नायक हैं। उसके घात-दानादि को भी नहीं दिखाना चाहिए। अन्य लोग तो ख्यात नायक के पताका नायक आदि चाहते हैं।

१. क०भ. वा । २. क-म. न च बन्धः । ३. क. (टि०) यस्तत्र स नायक: क्यातः । क-भ तत्रापि हिनायमस्थैव।

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'अपसरणमेव कार्य 'ग्रहणं वा सन्धिरेव वा योज्यः। काव्यश्लेषैब हुभियंथारसं नाट्यतत्त्वज्ञै: ॥।४० ।। अपसरणमिति पलायनम् यथोक्तं-अशक्ये सर्वमुत्सृज्यापगच्छेत। अदृष्टा हि जीवतः पुनरावृत्ति: इति। ग्रहणं वा कार्य सनिबन्धनमिति। यथा वासवदत्ता- नृत्तधारे (पारे? ) वत्सराजस्य। सन्धिरेवेति सन्घानं, यदुक्तम्- प्रवृत्तचक्रेणाक्रान्तो राज्ञ: वलवताऽबलः। सन्धिनोपनमेत् ......... । (अर्थंशास्त्रे ७-३ अध्या) अपसरणबन्धनसन्धीनां विषयविभागसूचनायाह। प्रधानरसानुसारेण यत्काव्यं यत्काव्यार्थस्तस्य शलेषा बन्धनाद्युपपत्तयः तैरु्पलक्षितमपसरणादिकार्यमिति यावत्। कार्यविशेषैरिति केषांचित्पाठः।। ४० ।।

अनुवाद-अभ्युदयशाली नायक का अपसरण (भाग जाना), या पकड़ा जाना मथवा सन्धि कर लेना आदि का नाट्यतत्त्ववेत्ता को रस के अनुसार बहुविध काव्य-लेष के द्वारा प्रयोग करना चाहिये॥। ४० ॥ अभिनव-अपसरण का अर्थ है कि भाग जाना। जैसा कि कहा गया है कि अशक्य होने पर सब कुछ छोड़कर चला जाना चाहिये, क्योंकि मरे हुये का पुनरावर्त्तन नहीं देखा गया है अथवा किसी कारणवश उसका ग्रहण किया जा सकता है। जैसे-वासवदत्ता में नृत्त के समापन में वत्सराज का निग्रह। सन्धि का अर्थ सन्धान है। जैसा कि कहा गया है कि- जैसे कोई दुर्बल राजा बलवान् राजा के द्वारा सेना आक्रान्त हो अर्थात् सेना के घेरे में आ जाय तो सन्धि (सुलह) करके झुक जाना चाहिए। अपसरण (भाग जाना), बन्धन और सन्धि (सुलह) के विषय-विभाग को सूचित करने के लिये कहते हैं कि प्रधान रस के अनुसार जो काव्यार्थ है उसका श्लेष अर्थात् बन्ध आदि उपपत्ति है, उससे उपलक्षित अपसरण आदि क्रियाओं को करना चाहिए, कुछ लोग कहते हैं कि काव्य श्लेष की जगह कार्यविशेष पाठ है॥ ४० ॥ १. क. (टि०) अपसरणं। अवतरणं । २. क. (टि०) सोधर्वा ग्रहणमेव वा निश्यम् । ३. क-न. बहुभिः काव्यविशेषैः प्रवेशकैः सूचयेद्वापि। क. भ. तैस्तैः काव्यक्लेषैः प्रवेशकंः नाटयतत्वशैंः ।

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माटयशास्थरे

न महाजनपरिवारं कर्तव्यं नाटकं प्रकरणं वा। ये तत्र कार्यपुरुषाश्चत्वारः पञ्च वा ते स्युः ॥४१॥ अथ यद्यदप्रयोज्यं प्रत्यक्षेण तस्य सामान्यद्वारक संग्रहं वर्शयितुमाह-न महाजनपरिवारमिति। महाजन: संख्यया तेन परिवारः परिवारणं यत्र यत्र वस्तुनि तन्नाटकमिति तद्यवतं तत् प्रकरणम्। वाग्रहणादन्यदपि न कार्यम्। एतदुक्त भवति-बहुतरपुरुष- साध्यं यत्कञ्चित्तद्यथा समुद्रे सेतुबन्धनमित्यादि तत्सवं प्रत्यक्षेण न प्रदर्शनीयम् तथा महतो जनस्य पितापुत्रश्वश्रस्नुषागुरुशिष्यादे: परितो वरणं व्रोडातड्रादियोगेन यत्र जायते वैरस्यं वा महाजनस्य सभ्यस्य च यत्र परिवरणं चित्तसंकोच: तत्सर्वं परिचुम्बनादयपि न प्रत्यक्षं प्रयोज्यम्। यदि च प्रत्यशप्रयोज्यं तत्र पञ्च कार्यपुरुषा: यदि चत्वारः प्रकरोपतकादिरूपा तेषां च परिवारस्वभावास्तावन्त एवेति। यदि प्रकर्षस्तवा दशाष्टो वा रङ्गे प्रविष्टा भवन्ति। ततोऽधिकेषु त्वभिनय चतुष्टयं सम्यगविभावनीयं स्यात वेवयात्रापरिदृश्यमानजनसमाजवत् ॥। ४१ ॥ जो प्रत्यक्ष रूपसे दिखाने योग्य नहीं है उसका सामान्य संग्रह दिखाते हैं- अनुवाद-नाटक और प्रकरण को परिवार के अधिक जनों से युक्त नहीं करना चाहिये। और वहाँ चार-पाँच से अधिक संख्या नहीं होनी चाहिये।। ४२॥ अभिनव-संख्या के कारण महाजन है। अतः जिस-जिस वस्तु में उससे परिवारण होता है वह नाटक है तथा उससे युक्त प्रकरण है। 'वा' ग्रहण से यह बतलाया गया हैं कि महाजन से संख्याधिक्य का कारण तो होता ही है, इसके अतिरिक्त अन्य भी जो कुछ हैं उसे भी नहीं करना चाहिए। यह कहा जाता है कि अनेक पुरुषों से साध्य जो कुछ हैं। जैसे- समुद्र में सेतुबन्धन आदि। यह सब प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखाना चाहिए। महाजन अर्थात् पिता, पुत्र, सास, ससुर, बह, गुरु, शिष्य आदि परिजनों का चारों ओर से वरण अर्थात् लल्जा एवं आतकू के कारण जहाँ वैरस्य है अथवा महाजन अर्थात् सभ्य का जहाँ परिवरण अर्थात् चित्त-संकोच है वह सब परिचुम्बन आदि को प्रत्यक्ष रूप से नहों दिखाना चाहिए। यदि प्रत्यक्ष दिखाना भी हो तो चार-पाँच प्रकरी और पताकागत तथा उनके जो परिवार हो उतने हो अथवा उससे भी प्रकर्ष बतलाना हो तो आठ-दस कार्य पुरुषों को रङ्गमञ्च पर प्रवेश होना चाहिये। क्योंकि इससे अधिक रहने पर चारों प्रकार के अभिनयों का सम्यक रूप से अवबोध नहीं होगा। क्योंकि वह केवल देवयात्रा में दिखाई देने वाला जन-समुदाय हो जायेगा। १. ग. येनात् ख. ये तत्र कार्याः ।

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अष्टाद शोडध्याय: ६६४

कार्य गोपुच्छाग्रं कर्तव्यं काव्यबन्धमासाद्य। ये चोदात्ता भावास्ते सवें पृष्ठतः कार्याः ॥४२॥

एवमङ्डू प्रवेशकस्वरूपं वितत्याभिहितम्, अधुना तत्समुदायस्य नाटकस्य यादूग्रपं तद्दशर्यति-कार्य गोपुच्छाग्रमिति। क्रमसूक्ष्माङ्गमिति केचित । अन्ये तु यथा गोपुच्छाग्रे केचिद्वाला: हुस्वाः केचिद्दोर्घाः। एवं कानिचित्कार्याणि मुखसन्धौ परिसमाप्तानि कानिचित प्रतिमुख- पर्यन्तानि कानिचिदवमर्शावसानानि पराणि निर्वहणपर्यवसायोनि, तद्यथा रत्नावल्यां प्रमोदोत्सवो मुखसन्धावेव निष्ठित इत्यादि यावत् बाभ्रव्यवृत्तान्तौ मुखोपक्षिप्तो निवंहणनिष्ठां प्राप्तः । साररूपाशच पदार्थाः पर्यन्ते क्तंव्याः ।। ४२॥

अभिनव-इस प्रकार प्रवेशक का स्वरूप विस्तार से कहकर अब उस समुदाय रूप नाटक जैसा रूप है उसे दिखलाते हैं- अनवाद-काव्य-बन्ध को अपेक्षा करके गोपुच्छ के अग्रभाग से समास कारय को छोटा या बड़ा करना चाहिए। और जो उदात्त भाव हैं उन्हें पीछे करना चाहिये।। ४२ ॥ अभिनव-कुछ लोग गोपुच्छाग्र का अर्थ करते है-जिसमें अङ्क क्रमशः सूक्ष्म हों। अन्य लोग तो कहते हैं कि जैसे गाय के पूछ के कुछ बाल छोटे होते हैं और कुछ दीर्घ होते हैं, उसी प्रकार नाटक और प्रकरण में कुछ कार्य मुख सन्धि में समाप्त होते हैं और कुछ कार्य प्रतिमुख सन्धि में समाप्त होते हैं और कुछ कार्य अवमर्श सन्धि में समाप्त होते हैं, शेष कार्य निर्वहण सन्धि पर्यन्त होते हैं। जैसे रत्नावलो नाटिका में मदन महोत्सव मुख सन्धि में ही निष्ठित है और वाभ्रव्य का वृत्तान्त मुख सन्धि में उपक्षिप्त होकर निर्वहण सन्धि में निष्ठित होता है। भाव यह कि सारभूत तत्त्वों को समाप्ति तक रखना चाहिए।। ४२॥

१ क, काव्यं। २. क. (टि०) गोपुच्छाग्रे। गोपु्छाभत्। ३. क. (टि) काव्यबन्मुत्पाद्यनाटकादिषु प्राज्ञः । ना. शा०-८४

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सर्वेषां काव्यानां नानारसभावयुक्तियुक्तानाम् । 'निर्वहणे कतव्यो नित्यं हि रसोऽद्भुतस्तज्ज्ञैः ॥ ४३॥ अत्र हेतुमाह सवेषां काव्यानामिति। नाटकावीनां निवंहणेऽद्भुतरस: कर्तव्यः। एवं हि तानि काव्यानि रसभावानां युक्त्या परस्परसंबद्धानि युक्तानि भवन्ति नान्यथा एकवाक्यतां च विना क: प्रबन्धाथ:। तथा च शृङ्गारवीररौद्रैः स्त्रीरत्नपुथिवीलाभशत्रुक्षयाः करुणादि- भिस्तन्निवृत्तिरितीयता क्रमेण लोकोत्तरासंभाव्यमनोरथप्राप्तौ भवतिव्यमद्भुतेन। असाधारणलाभो हि यदि फलत्वेन कल्प्यतेऽवश्यं क्रियाया: किञ्चिदस्त्येव फलमात्र- बुद्धिर्जायते-अहो दुष्करमध्युपायक्रमेण सिद्धधयति" इति, "उपायेन वर्तितव्यं" इति ॥४३॥ सारभूत पदार्थों को समाप्ति तक क्यों करना चाहिए ? इस पर कहते हैं- अनुवाद-नाना प्रकार के रस, भाव, परिपूर्ण सभी काव्यों के निर्वहण सन्धि में नाट्य तत्त्ववेत्ता अव्भुत रस की योजना करें॥४३॥ अभिनव-नाटक आदि काव्यों के निवहग सन्धि में अद्भुत रस की योजना करनी चाहिए। इस प्रकार वे काव्य रस और भावों की युक्ति से परस्पर सम्बद्ध एवं युक्त हो जाते हैं, अन्यथा उपयुक्त नहीं होते, क्योंकि परस्पर एकवाक्यता के विना प्रबन्धार्धं कैसा ? अतः शृङ्गार, हास्य, वीर, रौद्र रसों में क्रमशः स्त्रीरल्न लाभ, पृथ्वी लाभ, तथा शत्रु का क्षय तथा करुण, भयानक, वोभतस आदि उनकी निवृत्ति। इस प्रकार क्रमशः लोकोत्तर असम्भाव्य मनोरथ की प्राप्ति होने पर निर्वहण सन्धि में अद्भुत रस दिखाना चाहिये। असाधारण लाभ की यदि फल के रूप में कल्पना करें तो क्रिया का अवश्य कोई फल होगा। अतः उपायों के व्युत्पत्ति के अधीन होने से अद्भुत में अवसान नहीं करना चाहिये। ऐसी स्थिति में किस साधन से व्युल्पाद्य जन की ऐसी बुद्धि होगी। "अहो ! उपायों के क्रम से (अनुष्ठान से ) दुष्कर कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं"। अतः 'उपायों को करना चाहिये' ।। ४३।। १. क. (टि०) निर्वहणं कर्त्तव्यम्।

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नाटकलक्षणमेतन्मया समासेन कीतितं विधिवत्। प्रकरणमतः परमहं लक्षणयुवत्या प्रवक्ष्यामि॥ ४४॥। यत्र कविरात्मशक्त्या® वस्तु शरोरं च नायकशचैव। औत्पत्तिकं प्रकुरु्ते प्रकरणमिति तद् बुधैज्ञैयम्*।। ४५।। पूर्वोक्तमुपसंहरति वत्तव्यान्तरं नाटकलक्षणमेतदित्यादि। क्वचिल्लक्ष्यं प्रसिद्धम्, इह तु लक्षणबलेन तस्यैव यत्नप्रसाध्यत्वमिति दर्शरयति। लक्षणयुक्त्या लक्षणद्वारेण युक्तिस्तया हृदयानुप्रवेशनया हेतुभूतया

तत्र प्रकरणस्य सभेदस्य सलक्षणं नामनिनंचनं चाह-यत्र कविरात्मशक्त्येति। वस्ति्वति साथ्यं फलं, शरीरमिति तदुपायं वस्त्वादिकं काव्याभिघेयमात्म- शक्त्या प्रकुर्ते यत्काव्येन तत्प्रकरणमिति बुधैर्ज्ञेयमिति संवन्धः ॥४५॥ अभिनव-अब पूर्वोक्त का उपसंहार करते हैं और अन्य वक्ताओं पर आक्षेप करते हैं- अनुवाद-इस प्रकार मैंने संक्षेप में नाटक के लक्षण को विधिवत् कहा है। इसके बाद अब लक्षण को योजना करते हुये प्रकरण को कहूँगा॥ ४४॥ अभिनव-कहों पर लक्ष्य प्रसिद्ध है। यहाँ पर तो लक्षण के बल से वह प्रयत्न साध्य है, इसके दिखाते हैं-लक्षण रूप द्वार से जो युक्ति (योजना) है, उसके द्वारा अर्थात् बस्तु के साध्य अर्थ को हृदय में प्रवेश कराने में हेतुभूत सम्पाद्य युक्ति से ॥४४।। अब भेदों के साथ प्रकरण के लक्षण-सहित नाम निर्वचन करते हैं- अनुवाद-जहाँ पर कवि अपनी शक्ति (प्रतिभा) से वस्तु (इतिवृत्त) शरोर और नायक की ओत्पत्तिक कल्पना करता है उसे विद्वानों को प्रकरण समझना चाहिए । ४५ ॥ अभिनव-यहाँ पर साध्य फल को ग्रहण करते हैं। शरीर का अभिप्राय फल के उपाय से है। काव्य के अभिवेय वस्तु आदि को जो आत्मशक्ति से काव्य के द्वारा प्रकर्षयुक्त करता है, विद्वानों को उसे प्रकरण समझना चाहिये॥। ४५॥

१. क. (टि०) प्रकोतितं विविधम् । २. ख. ग. बुद्धया। ३. ख. ग. नाटकं। ४. ख. प्रकरणमेतद् बुधश्ेयम् ।

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नाटेपशास्त्रे

यदनार्षमथाहायं काव्यं प्रकरोत्यभूतगुणयुक्तम्। उत्पन्नबोजवस्तु प्रकरणमिति तदपि विज्ञेयम् ॥४६॥ यत्र समुत्पाद्यं न भवति तत्र योऽनुत्पाद्योऽश: न कुत्रस्थो ग्राह्य इति वर्शयितु- माह-यदनार्षमित्यादि। अनाषमिति पुराणादिव्यतिरिक्तबृहत्कथाद्युपनिबद्धं मूलदेव चरितादि। आहायमिति पूर्वकविका्यद्वाहरणीयं समुव्रदत्तचेष्टितादि। ननु च तत्रांशे कविकृतत्वाभावात्कर्थ प्रकरणवाचोयुक्तिरित्याह-उत्पन्ने पूर्वसिद्धे बीजं वस्तु च यत्र तादृशमपि तत, यविति वस्तुभूतैः वृहतकथादौ काव्यान्तरे वा प्रसिद्धर्गुणैर्युक्तं प्रकरोति तविति तस्माद्धेतोरेतदपि प्रकरणम्। तेन वृहत्कथाविसिद्धस्य मूलवेवादेरविकावापं कविशक्तियंदा विधत्ते तदा प्रकरणम्। विदधत्कविः प्रकरणं कुर्याविति तात्पयंम् ॥४६॥ अभिनव-जहाँ पर सनुत्पाद्य कुछ भो न हो, वहां अनुत्पाद्य अंश कहीं से भी नहीं लेना चाहिये। इस बात को दिखलाने के लिए कहते हैं- अनुवाद-जहाँ पर कथावस्तु अनाष हो अर्थात् ऋषि-प्रणीत ग्रन्थों से न लिया गया हो, आहार्य अर्थात् कल्पित हो, अभूतपूर्व गुणों अर्थात् नवीन कल्पनाओं से युक्त हो, तथा जहाँ बोज और वस्तु कृत्रिम हो, उसे भो 'प्रकरण' समझना चाहिए । ४६॥ अभिनव-अनार्ष का अर्थ है जो पुराणादि से भिन्न बृहत्कथा आदि में उपनिबद्ध मूलभूत देवचरित। आहारय का अर्थ है प्राचीन कवियों के काव्य से उद्धूत (आहृत)। जैसे समुहृदत्त की चेष्टायें आदि । अब प्रश्न होता है कि जहाँ वस्तु उत्पाद्य नहीं है वहाँ अनुत्पाद्य अंश में कवि के द्वारा कृतत्व का अभाव होने से प्रकृष्ट करण रूप वाणी को युक्ति कैसे सङ्गत होगी ? इस पर कहते हैं कि वहाँ पर उतपन्न अर्थात् पूर्वसिद्ध काव्य में बोज और वस्तु जैसा रहे बहाँ 'यत्' पद का अभिप्राय है कि वृहत्कथा आदि में प्रसिद्ध वस्तुभूत गुणों से युक्त जो प्रकर्ष करता है, वह भी प्रकरण है। अतः कवि शक्ति के द्वारा वृहत्कथा आदि में प्रसिद्ध मूलभूत देवादि के सम्बन्ध में अधिक आवाप करता है वह भी प्रकरण होता है। इस प्रकार पूर्व कवियों के द्वारा समुतप्रेक्षित समुद्रदत्त की चेष्टाओं के वर्णन में भो प्रकृष्ट स्वरूप की योजना करके कवि प्रकरण की योजना करें॥ ४६॥ १ ग यदनर्थभवाहार्य काव्यं कुरुते प्रभूतगुणयुक्तम् । स. यदनायकहार्यकार्य प्रकरेत्यद्भूतगुणयुक्तम् ।

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यग्नाटके' मयोक्तं वस्तु शरोरं' च वृत्तिभेदाश्च। तत्प्रकरणेऽपि योज्यं सलक्षणं सर्वसन्धिषु तु॥४७ ॥

नव्वस्येति वृत्तस्य एवं योजनेत्याशंक्य पूर्वोक्तमेवातिदेशद्वारेण स्मारयितुमाह- यन्नाटके मयोक्तमिति। नानाविभूतियुक्तमृद्धिविलासादिभिरित्यादिनायकफलत्वमुक्तं तत् वस्तु- शरोरमिति "अङ्कप्रबेशकाढघं" "वृत्तिभेदाश्चेति" "नानारसभावचेष्टितैर्वहुधा। सुखदुःखोत्पत्तिकृत" मिति, सलक्षणमित्यङ्कप्रवेशकयोलंक्षणयु क्तमिति॥४७॥ केचित्त शरोरग्रहणेन गतार्थ तस्माल्लक्षण मित्य ङ्परिमाणमङ्कान्तरसन्धान- हेतुषु च प्रवेशकेषु यत्प्रयोज्यमुक्तं 'विवसावसानकारय यद्यङ्के नोपपद्येत'। यश्ङ्क- नोपपद्येत इत्यादि तत्सर्व प्रकरणेडपि योज्यम् इति। अतिदेशायातमतिप्रसङ्ग वारयत्यार्याद्वयेन विप्रवणिगित्यादिना।

अब प्रश्न होता है कि इस इतिवृत्त की योजना कैसे करें? इस प्रकार आशङ्का करके पूर्वोक्त को ही अतिदेश के द्वारा स्मरण कराने के लिये कहते हैं- अनवाद-नाटक के लिए मैंने जिन वस्तु, शरीर और वृत्तियों के भेदों को कहा है, प्रकरण में भो लक्षण सहित समस्त सन्धियों में भो उनको योजना करनी चाहिए॥ ४७ ॥ अभिनव-ऋृद्धि, विलास आदि से नाना विभूति युक्त है, इत्यादि से नायक को जो फलवान् कहा गया है, 'वस्तुशरोरम्' से अङ्क को प्रवशक से युक्त होना कहा गया है, 'वृत्तिभेदाश्च' नाना रस, बहुविध भाव और चेष्टाओं से युक्त होना तथा सुख एवं दुःख की उत्पत्ति करने वाला तथा 'सलक्षणम्' से अङ्क एवं प्रवेशकों को लक्षणादि से युक्तता कही गई है।। ४७।। अभिनव-कुछ लोग कहते हैं कि शरोर के ग्रहण से गतार्थ हो गया था, तो फिर 'सलक्षण' क्यों कहा है ? कहते हैं कि सलक्षण अर्थात् अङ्क का परिणाम और अङ्कान्तर के सन्धान के हेतु प्रवेशकों में जो प्रयोज्य कहा गया है "दिवसाव- सानकार्यं यद्यङके नोपपद्येत" अर्थात् "यदि दिन के अवसान कार्य पूरा न हो सके तो अङ्कच्छेद करके प्रवेशकों के द्वारा उसका विधान करना चाहिए" इत्यादि। उन सबकी प्रकरण में भी योजना करनी चाहिये। इस प्रकार अतिदेश से प्राप्त अतिप्रसङ्ग को 'बिप्रवणिक्' आदि दो आर्याओं से वारण करते है।

१. क-न. प्रयोक्तं। २. क. व, शरीरं राजाश्रयोपेताम्। ३. ग कार्य केवलमुन्पाद्यवस्तु स्यास्। ख. योज्य केवलमुलावस्तुस्यात् ।

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विप्रवणिक्सचिवानां पुरोहितामात्यसार्थवाहानाम्। चरितंमन्नैकविधं ज्ञेयं तत्प्रकरणं नाम ॥ ४८ ॥ नोवात्तनायककृतं न विव्यचरितं न राजसम्भोगम्'। बाह्यजनसंप्रयुक्तं 'तज्ज्ञेयं प्रकरणं तज्ज्ञैः ॥४९॥

सचिवो मन्त्री, आमात्योऽधिकृतः सारथवाहस्तावत्पण्यानामाहर्ता तद्देशक्रय- विक्रयकृतो वणिजोऽम्य एव। नैकविधमित्यनेकरसयुक्तमित्यर्थः 'नैकरसान्तरविहित' इति तवतिवेशमात्रमिति सूचितम् ॥४८ ।। प्रख्यातोदात्तेति प्रसक्तं निषेधति नोदात्तेति।

अनुवाद-जहाँ पर विप्र, वणिक, सचिव, पुरोहित, अमात्य और सार्थवाह (व्यापारो या सेनापति) के अनेक प्रकार के चरित का वर्णन किया जाता है, उसे 'प्रकरण' समझना चाहिए॥ ४८ ॥ अभिनव-सचिव का अर्थ मन्त्री, अमात्य का अर्थ अधिकारी, सार्थवाह का अर्थ आहर्त्ता, देश में क्रय-विक्रय करने वाला वणिक् कहलाता है। इस सार्थवाह से भिन्न होता है। 'नैकविधम्' का अर्थ है अनेक रसों से युक्त 'नैकरसान्तरविहित' से अतिदेश मात्र सूचित होता है॥ ४८॥ प्रख्यातोदात्त इत्यादि से प्रसक्त का निषेध करते हैं- अनुवाद-जहाँ पर उदात्त नायक न हो, न दिव्यपात्र का चरित हो और न राजसम्भोग का वर्णन हो और जिसमें बाहय (बाहरी) पात्र हों, उसे विद्वान् लोग 'प्रकरण' समझें ॥ ४९॥

१. क-भ. सचिवश्रेष्ठब्राह्मण। २. ख. यदनेकबिधं तज्ज्जेयं प्रकरणं नाम। ३. ग. राजसम्भोग: । ४. ख. विज्ञेयं ग. ज्ञेयं तत्प्रकरणं नाम ।

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अष्टादशोडण्याय: ६७१

बासविटशरेष्ठियुतं वेशस्त्रयुपचारकारणोपेतम् । मन्वकुलस्त्रीचरितं काव्यं कारयं प्रकरणे तु॥ ५० ॥

तम्निषेधे चार्थाम्माटके वेपरौत्यमायातम्। नाटके च देवो नायकत्वेन निषिद्ध इति प्रकरणे कर्तव्यत्वेनापाद्यत इत्याह-

न दिव्यचरितमिति। तथा न विव्याशयमिति यदनावेशाद देवानां प्रयोज्यत्वं प्रसवतं तदप्यनेन निषिद्म्। नाटके देवनामिवेहापि राज्ञः प्रबेशे शङमाने निराकरोति न राजसंभोगमिति। यदि वा औत्पत्तिकत्वेऽपि न राजोचितसंभोगोत्प्रेक्षा विप्रादिषु करणीयेत्यनेन शिक्षयति, अतएव राजनियमः । उचितोऽम्तः पुरजन: कञ्चुकिप्रभृतिः तद्वघतिरिक्तो बाह्यजनोऽत्र चेटदासादि: प्रवेशकादौ कायं इत्यर्थ: ।। ४९।। एतवेव दशंयति।

अभिनव-प्रस्यातोदात्त के निषेध करने पर अर्थात् नाटक में वैपरीत्य प्राप्त होता है। नाटक में देवता नायक के रूप में निषिद्ध है। अतः प्रकरण कर्त्तव्य- ल्वेन प्राप्त होता है, इसलिए कहते हैं- 'न दिव्यचरितम्' इति अर्थात् 'न दिव्यश्रयम्' इति। आदेश के विना देवताओं में जो प्रयोज्यत्व प्रसक्त है, वह इससे निषिद्ध हो गया। नाटक में देबताओं के समान यहाँ प्रकरण में भी राजा के प्रवेश की शङका का निराकरण करते हैं- 'न राजसम्भोगम्' अथवा औत्पत्तिक (नायक) होने पर भी राजोचित सम्भोग की उत्प्रेक्षा विप्र आदि में नहीं करनी चाहिए। उससे यह दिखाता है कि राजा के लिए यह नियम है और कञ्चुकी आदि अन्तःपुर के जो उचित जन हैं, उनसे अतिरिक्त यहाँ प्रकरण में बाह्य लोग चेट दास आदि प्रवेशक में करना चाहिए॥। ४९ ।। इसी बात को यहाँ दिखाते हैं-

अनुवाद-प्रकरण में दास, बिट, श्रेष्ठि से युक्त तथा वेश्या स्त्री के उपचार (व्यवहार) के कारणों से उपेत तथा नीच कुल की स्त्रियों के चरित से युक्त (अथवा कुलीन स्त्रियों चरित अल्प ) हो चाहिए॥ ५० ॥

१. कन्भ. करणैयूंक्तम्। क, (टि०) प्रकशणेउपि।

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१७२ नाट्यशास्थ्रे

वास विटश्रेष्ठियुतमिति कञ्चुकिस्थाने दासः विदूषकस्थाने विटः अमात्य स्थाने श्रेष्ठीत्यर्थः। वेश्यावाटो वेश, तत्र या स्त्री तस्या: य उपचारो वैशिक (अ-२३) वक्ष्यते सकारणं यस्य शुङ्गारस्य तेनोपेतं, कुलस्त्रीविषयं चेष्टितं मन्दं यत्रेति। उपाध्यायास्तु मन्कुलानां स्त्रीणां चरितं यत्रेत्याहुः तेन कुलाङ्गनापि तत्र मन्दकुलैवेति दशितं भवति। एतदेवाभिमन्यमानेन पुष्पदूषितकेऽशोक- दत्तादिशब्दाकर्णनेन समुद्रवत्तस्य शङ्केवोपनिबद्धा सा न दोषाय निर्वहणान्तो पयोगिनी हि नन्वयन्तीनिर्वासनं तस्याश्च गृहान्तरावस्था। इवमेव मुखसन्धौ मूलं परपुरुषसंभावनामूलत्वात् एवमनभ्युपगमे तु श्वशुरेण बध्वा असन्निहिते पुत्रे निर्वासनं शवरसेनापतिगृहेश्वस्यान मित्युत्तमप्रकृतीनामनुपपन्नमेव। तस्मात् स्ववर्गा- पेक्षयेदमुत्तमत्वमद्यतने राजोचितानामुत्तमप्रकृतीनां वणिङ्मात्रे समारोप्य तद्दूषणं यत्कृतं न तेन ब्रह्मयशः स्वामियशः खण्डितं अपि तु स्वयश एवं। ये हि मिथ्यायशो मिथ्याकलङयितुमुद्यतास्तेषां स्वयश एवेति यशोमात्रावशेषता न हि नायकशब्द- मात्रादेव दुर्योधनवदेव शङ्काद्यनुचितम्। प्रकरणे हि तादृश एव नायकः केवलमन्यवणिगपेक्षया स उत्तमोऽस्तु, व्युत्पाद्यश्च तत्रैर्वविध एवेत्यलम- वान्तरेण ॥। ५० । अभिनव-'दासविटश्रेष्ठियुतम्' आदि से अभिप्राय है कि यहाँ प्रकरण में कञ्चुकी के स्थान पर दास, विदूषक के स्थान पर विट तथा अमात्य के स्थान पर श्रेष्ठी को योजना करनी चाहिए। वेश्याओं का वाट वेश है, उसमें जो स्त्री है उसका जो उपचार वैशिक अध्याय में कहेंगे, वह कारण है जिस शृङ्गार का, उससे परिपूर्ण जहाँ कुलीन स्त्री की चेष्टायें बहुत कम हो। उपाध्याय जी तो कहते हैं कि अधम कुल की स्त्रियों के चरित जहाँ व्णित हों वहाँ इसलिए कुलाङ़ना भी वहाँ नीच कुल वाली ही है, यह दिखाया गया है। इसी अभिप्राय को मानने वाले 'पुण्यदूषितम्' अशोक, दत्त आदि शब्दों के सुनने से समुद्रदत्त की जिस शङ्का का उपनिबन्धन किया है, वह दोषपूर्ण नहीं है, निर्वहण सन्धि में उपयोगनी है। जैसे नन्दवन्ती का अपने घर से निष्कासन तथा उसका नीच कुल में निवास। यही वस्तु परपुरुष की सम्भावना मूल होने से मुख सन्धि में मूल है। इस प्रकार न मानने पर पुत्र के धर में न रहने पर शवसुर के द्वारा वधू

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सचिवश्रेष्ठिब्राह्मणपुरोहितामात्यसार्थवाहानाम् । गृहवार्ता यत्र भवेन्न तत्र वेश्याङ्गना कार्या ॥। ५१ ॥ अथास्य सप्तविधस्यापि प्रकरणस्य प्रत्येकं भेवत्रयं दर्शयितुमार्यात्रयं पठति सचिवेत्यादि। सचिवादीनां सम्बन्धिनी यत्र गाहंस्थोचिता वार्ता पुरुषार्थंसाधकमितियसं न तत्र वेश्याङ्गना नायिकाशवेन निबन्धनीया, विटादोनां तु नायकतवेन कृता या गाहंस्थ्यचिन्ता सापि निबन्धनोयेतयुक्तं भवति। यदि गृहस्थचिन्तावणनं न भवति श्रेष्ठिसाथंवाहादीनां च विप्रादिवदविरुद्धो वेश्यायोग इति सापि प्रदर्शनीयेति लब्घमर्थात। तत्र न तु कुलस्त्रीसंगमः कर्तव्यः ।।५१। का निष्कासन और उसका शबर सेनापति के घर में अवस्थापन यह सब उत्तम प्रकृति के उत्तमत्व का अपने वर्ग की अपेक्षा से यह उत्तमत्व वणिक् मात्र में आरोपित कर जो दूषण बतलाया गया है उससे ब्राह्मण का यश एवं स्वामो का यश खण्डित नहीं हुआ। अपितु अपने ही यश को उसने खण्डित कर दिया। जो मिथ्या यश वाले ढोंग करके शूठे यशस्वी बनकर दूसरे को कलङ़िकत करने के लिए उद्यत है उनका अपना यश ही कलंकित हुआ अर्थात् वे यशःशेष हो गये ( मर गये)। जैसे दुर्योधन के समान नायक शब्द मात्र के कारण दूसरे को कलंकित मानना अनुचित है। प्रकरण में वैसा ही नायक होता है, केवल अन्य वणिजों को अपेक्षा से वह उत्तम है और इसी प्रकार का व्यक्ति हो व्युत्पाद्य भी होता है। अब अवान्तर अर्थ चिन्ता न करिये॥ ५०॥ अब सात प्रकार के प्रकरण के प्रत्येक के तीन भेद दिखलाने के लिए कहते हैं- अनुवाद-जहाँ पर सचिव, श्रेष्ठि, ब्राह्मण, पुरोहित, अमात्य एवं साथंवाह के घर को बात जहाँ हो वहाँ वेश्याङ्गनाओं को उपस्थिति नहीं होनी चाहिए॥ ५१॥ अभिनव-जहाँ पर सचिव आदि से सम्बन्धित गार्हस्थोचित वार्त्ता पुरुषार्थ साधक इतिवृत्त हो वहाँ पर वेश्याङ्गना नायिका के रूप में उपनिबन्धन नहीं करना चाहिए और विट आदि का जहाँ नायक के रूप में निबन्धन हो वहाँ गार्हस्थ्य चिन्ता में वेश्या का उपनिबन्धन हो सकता है, इसी प्रकार यदि श्रेष्ठि, सार्थवाह आदि के गृहस्थ चिन्ता का वर्णन न हो तो विप्र आदि के समान वहाँ वेश्या का सम्बन्ध दिखाया जा सकता है, यह अर्थ निकलता है। किन्तु वहाँ कुलोन स्त्री का सङ्गम नहीं करना चाहिए॥ ५१॥ ना. शा०-८५

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१७४ नाठप चाएचे

यदि वेशयुवतियुक्तं न 'कुलस्त्रीसन्गमोऽपि स्यात्। अथ कुलजनप्रयुक्तं न वेशयुवतिर्भवेत्तत्र ॥ ५२॥ यदि वा कारणयुक्त्या 'वेशकुलस्त्रीकृतोपचार: स्यात्। "अविकृतभाषाचारं तत्र तु 'पाठ्यं प्रयोक्तव्यम् ॥५३॥ तवाह यदि वेशयुवतीति। अथ कुलजनप्रयुक्तमिति। एवं श्रेष्ठिसचिवादिविषयं शुद्धं भेदद्रयमुवतं, बिटाविविषयस्तुसड्गीणं एव वेश्याकुलजाम्यां भवति ॥५२॥ तदाह यदि बा कारणयुक्तयेति। विटे वेशस्त्री प्रधानत्वात पूर्वमुक्ता कुलस्त्रो तु तत्रापि पितृपिता- महाद्यमुरोधादिति कारणशब्देनोक्तम्। अविकृता भाषा कुलस्त्रिया: शौरसेनी, वेश्याया: संस्कृता, आचार: कुलस्त्रियां विनयप्रधानः, अन्यस्यां तद्विपरीत । तथा च देवीचन्द्रगुप्ते माघवसेनामुद्दिश्य चन्द्रगुप्तश्योक्ति :- अनुवाद-यदि प्रकरण में स्त्रियों का योग हो तो वहाँ कुलीन स्त्रियों का सङ्गम नहीं करना चाहिए और यदि कुलीन स्त्रियों का योग हो तो वहाँ वेश्या स्त्रियों का सङ्ग्म नहों होना चाहिये ।। ५२।। अभिनव-इस प्रकार श्रेष्ठि एवं सचिव आदि के विषय शुद्ध दो भेद कहे गये हैं और विट आदि के विषय में वेश्या और कुलीन अङ्गना के कारण सङ्कोर्ण भेद होता है।। ५२।। अनुवाद-यदि किसी कारण जहाँ के्या और कुलाङ्गना का एक साथ सङ्गम हो तो वहाँ अविकृत अर्थात शुद्ध भाषा और विशुद्ध आचार से युक्त पाठ्य का प्रयोग करना चाहिए ॥ ५३ ॥ अभिनव-विट के यहाँ वेश्या प्रधान रहती हैं, यह पहिले बताया जा चुका हैं किन्तु कुल स्त्री का सम्बन्ध माता, पिता, पितामह आदि के अनुरोध से होता है। यह बात कारण शब्द से कही गई है। कुलीन स्त्री की भाषा अविकृत संस्कृत है और वेश्या की भाषा शौरसेनी प्राकृत हो सकती है। कुलीन स्त्रियों का आचार विनय प्रधान है। तथा अन्य स्त्रियों का आचार उससे भिन्न है। जैसाकि देवीचन्द्र गुप्त में मानव सेना को लक्ष्य करके चन्द्रगुप्त का कथन है- १. क-म.यति वेक््यायुवतियुतं। क-म. यदि वेश्याधुवतियुतं। २. ख. कुलस्त्रोसंगमो भवेत्तत्र । ग. कुलस्त्रीसङ्गमहति ततः। क-भ. कुलस्त्रीसङ्गमाद्। ३. क-म. कुलवधप्रयुक्तं। ४. ब. वेशकुलस्त्रोसंगमो न स्यात्। क-प. वेशकुलस्त्रोसक्कयोऽपि स्यात् । ५. क-भ, अधिकृतभाषाचारं। ६. क, (टि०) काव्यं।

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मध्यपुरुषैनित्यं योज्यो विष्कम्भकोऽत्र तत्त्वज्ञैः । संस्कृतवचनानुगतः संक्षेपार्थः प्रवेशकवत् ॥ ५४॥ आनन्दाधु सितेतरोत्पलरुचोराबघ्नता नेत्रयोः। प्रत्यङ्गेषु वरानने पुलकिषु स्वेवं समातन्वता ।। कुर्वाणेन नितम्बयोरुपचयं संपूर्णयोरप्यसौ। अत्र हि व्युत्पाद्यस्तथाविध एव तादृश एव च वृत्तन्तोऽङके एवमेतत एक- विशतिःप्रकरणे भेदाः ॥।५३॥ प्रकरणे नागकापेक्षया प्रायशः उपयोगिनोऽपि मध्यमा एव संभवश्तीति तत्र विष्कम्भकं लक्षयति-मध्यमपुरुषैरिति। विष्कम्भयत्युपस्तम्भयतीति विष्कम्भकः। संस्कृतेन वचनेनानुगतं च सङ्कीर्णोऽप्यस्त्येवेति प्रवेशकेन वार्थक्रियाकर्तव्यतामेव कर्तव्यत्वेनाभिसम्बाय विष्कम्भकः कार्यः ॥। ५४॥ "सित से इतर वर्ण वाले नील उत्पल के समान कान्ति वाले तुम्हारे नेत्रों के आनन्दाश्रुओं से पुलकित प्रत्येक अङ्ग में पसोने को बहा देना और इन सम्पूर्ण नितम्बों के उपचय को करने वाले किस पुरुष ने स्पर्श किये बिना हो तुम्हारे अधोवस्त्र को गाँठ ढीली कर दी।" यहाँ इसी प्रकार वृत वाले अङ्क में उसी प्रकार का व्यक्ति व्युतपाद्य है। इस प्रकरण के २१ भेद होते हैं। ५३॥ विष्कम्भक अभिनव-प्रकरण में नायक को अपेक्षा उपयोग में आने वाले पात्र प्रायः मध्यम हो होते हैं, इसलिए विष्कमाक को बाहुल्येन सम्भावना होने से प्रकरण में विष्कम्भक का लक्षण बताते हैं- अनुवाद-नाटक तथा प्रकरण में नाट्यतत्त्ववेत्तादि को मध्यम पात्रों के द्वारा विष्कम्भक को योजना करनी चाहिये। तथा प्रवेशक के समान संस्कृत भाषा के वचनों में अनुगत संक्षेप अर्थ वाले वाक्य होने चाहिये॥ ५४॥ अभिनव-जहाँ विष्कम्भक (उपस्तम्मन) होता है वह विष्कम्भक है। संस्कृत वाक्यों के अनुगत वह सङ्कोर्ण भी होता है। अथवा अर्थक्रिया का कर्त्तव्यरवेन अनुसन्धान करके प्रवेशक से भी विष्कम्भक को करना चाहिए॥ ५४॥ १. क. (टि०) पात्रः कार्यों नित्यं विष्कम्भकस्तु विज्ञेयः । २. ग. अपि विज्ञेय: ।

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नाटेबशास्त्रे

शुद्धः संकोर्णो वा द्विविधो विष्कम्भकोऽपि कर्तव्यः । मध्यमपात्रः शुद्धः संकीणो नीचमध्यकृतः ॥५५॥ अड्कान्तरालविहित: प्रवेशकोऽर्थक्रियां समभिवौक्ष्य। संक्षेपात्सन्धोनामर्थानां चैव कर्तव्यः ॥ ५६।।

तामेवारथंक्रियां स्पष्टयति संक्षेपात्सन्घोनामर्थानां चेति। सन्धोनां यः संक्षेपो युद्धराज्यभ्रन्शादीनां चार्थानां यः संक्षेपस्तमभिसन्घाय शङस्याङ्कयोर्वा्तिराले मध्ये विष्कम्भको योज्य: ।। ५५॥ ननु कोहलेन मुखसन्धेरङ्कस्य चायमन्तराले विहित:। "मध्यपुरुष नियोज्यो नाटकमुखसन्धमात्रसख्नारः। विष्कंभको हि कार्यो नाटकयोगे प्रवेशकवत् ॥" इति । तत्कथमुक्तमङ्काम्तरामुसारीति, उपलक्षणारथमेत वित्यदोषः ।

अनुवाव-विष्कम्भक शुद्ध और संकीर्ण भेद से वो प्रकार का होता है। मध्यम पात्रों से युक्त विष्कम्भक शुद्ध होता है और नीच और मध्यम पात्रों से युक्त संकीर्ण (मिश्र) विकम्भक कहलाता है॥५५॥ अनुवाद-अथ क्रिया को सम्यक रूप से देखकर अंक में सन्धियों अर्थों के अन्तराल में विहित प्रवेशक को संक्षेप में करना चाहिये ॥ ५६॥ अभिनव-अर्थाक्रया को स्पष्ट करते हैं-'संक्षेपात् सन्धीनाम्' अर्थात् सन्धियों का जो संक्षेप है। युद्ध, राज्यभ्रंश आदि अर्थों का जो संक्षेप है, उनका अभिसन्धान कर अङ्ग और सन्धि के मध्य में विष्कम्भक की योजना करनो चाहिए॥ ५५-५६॥ नाटिका अब प्रश्न होता है कि कोहल ने मुखसन्धि और अङ्क के मध्य में विष्कम्भक का विधान किया है। "मध्यम के द्वारा नियोज्य मुख सन्धि में केवल सञ्चार के योग्य नाटक में प्रवेशक की तरह नाटक की योजना करनो चाहिए"। तव आप ने कहा कि अङ्क के अन्तराल में विष्कम्भक की योजना करनो चाहिए। कहते हैं कि यह उपलक्षण है, अतः दोष नहीं है।

१. ग. मध्यमपा*ैः । २. ग. प्रवेशकार्थक्रिया। ख. प्रवेशि कार्थक्रियामभिवोक्ष्य । ३. ख. संक्षपार्थः सन्घिष्वर्थानां संविघातव्यः ।

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अनयोश्च बन्धयोगादन्यो भेद:' प्रयो+तृभिः कार्यः। प्रख्यातस्तिवतरो वा नाटकयोगे प्रकरणे वा ॥ ५७॥

तथाहि बीजं विन्दुश्च प्रथममुपक्षिप्येते, तत्र च पृथग्जनस्पालब्धनिवेशत्वात् सचिवादिगोचरत्वाच्च तदुपक्षेपे विष्कम्भकस्यैवावसर इति यदुच्यते तवङ्कान्तरेष्वपि मन्त्रगुप्ततायां तुल्यमिति तत्राप्यनिवारितो विष्कम्भकप्रवेशः। पृथग्जनोऽपि वा यत्र मन्त्रचिन्तायामनुप्रवेश्यते तत्र प्रवेशकोऽपि प्रथमोपक्षेपे न योग्य इति युक्तम्। सामान्येनाड्कान्तरानुसारोति अङ्कस्य मध्य इत्यनेन प्रस्तावनाङ्कमध्य- वतिताप्युक्तैव। प्रवेशक विष्कम्भकविषये लिङ्गवचनयोरतन्त्रत्वात् स्त्रोणामप्यनु- प्रवेश: संख्याधिक्यं च।

और भी पहिले बीज और बिन्दु का उपक्षेप करते हैं, उसमें भी पृथक् जन का निवेश नहीं होता, किन्तु सचिवादि का विषय होने से उसके उपक्षेप में विष्कम्भक का हो अवसर है, ऐसा जो कहा जाता है वह अङकान्तर मैं भी मन्त्र को गुप्तता (गोपनोयता) के समान है, इसलिए वहाँ पर भी विष्कम्भक का प्रवेश अनिवारित है। जहाँ पर मन्त्रचिन्ता में पृथक् जन का निवेश कराया जाता है। वहाँ प्रथम उपक्षेप में प्रवेशक भो योग्य नहीं है, यह उचित हो है, सामान्य रूप से अङ् कान्तरानुसारी यह अंक के मध्य में इससे प्रस्तावना और अङक के मध्य में स्थिति को कह ही दिया है। प्रवेशक और विष्कम्भक के विषय में लिङ्ग और वचन के अतन्त्र होने से स्त्रियों का प्रवेश और (पात्रों को) संख्या का आधिक्य भी हो सका है।

अनुवाद-नाटक और प्रकरण के रचना के योग से नाट्यप्रयोक्ताओं को एक अन्य भेद को कल्पना करनी चाहिये, जिसमें प्रख्यात अथवा इतर अर्थात् अप्रसिद्ध नायक होने चाहिये।। ५७॥

१. ख. एको प्रयोक्तृभिः ज्ञेयः । २. ख. प्रत्याख्यातस्त्वितरो वा। ३. ग. नाटीसंज्ञाश्रिते काव्ये।

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प्रकरणनाटकभेदादुत्पादयं वस्तु नायकं तृपतिम्। अन्तःपुरसङ्गोतककन्यामधिकृत्य कतंव्या॥।५८ ।। स्त्रीप्राया चतुरक्का ललिताभिनयात्मिका सुविहिताङ्गी। "बहुनृत्तगीतपाठ्या रतिसम्भोगात्मिका चैव ॥५९॥ "राजोपचारयुक्ता प्रसादन क्रोधदम्भसंपुक्ता। 'नायकदेवीदूतो सपरिजना नाटिका ज्ञैया॥ ६० ॥

एवं सकलपुरुषार्थविषया व्युत्पत्ति: नाटकेन प्रधानस्य राजप्रायस्य क्रियते, प्रकरणेन च मध्यमप्रायस्य, अपूर्वकुतू हलवतस्तत्रापि चैकविशकस्याभितानात् चित्र- व्युत्पत्तिः। तत्र रूपकलक्षणस्य संकोणतया बहवो भेदा: सन्तीत्युक्तं सामान्यलक्षणे। तत्र प्रधानभतयोः सर्वरूपकप्रसरणकारिणोः नाटकप्रकरणयोलंक्षणसाङकयें वशिते सर्वरपकाणां दशनं तद्भवतीत्यभिप्रायेण तदेव दर्शनीयम्। उद्वेशक्रमानुसारेण तु तल्लक्षणविस्तरणं पुनस्तल्लक्षगपरामशें च गौरवमित्यभिप्रायेणार्यात्रयं पठति प्रकरणनाटकभेदादित्यादि।

इस प्रकार नाटक के द्वारा राजप्रधान पुरुष को सकल पूरुषार्थ विषयक व्युल्पत्ति की जाती है। प्रकरण के द्वारा अपूर्व कुतूहल वाले मध्यम पुरुष की व्युत्पत्ति की जाती है उसमें भी प्रकरण के इक्कीस प्रकार होने से चित्र व्युत्पत्ति की जाती है, उसमें रूपक के लक्षणों से संकीर्ण होने से अनेक भेद होते हैं। यह बात सामान्य लक्षण में कही गई है। समस्त रूपकों के प्रसारण करने वाले प्रधान- भूत नाटक और प्रकरण के लक्षणों में साङ्कर्य दिखाकर समस्त प्रकार के रूपकों का दर्शन करा दिया गया है। इस अभिप्राय से सभी रूपकों को दिखाना उचित है।५७।। उद्देश क्रम के अनुसार तो उनके लक्षण के विस्तार फिर उनके लक्षणों के परामर्श करने पर गौरव होगा, इस अभिप्राय से तोन आर्याओं को पढ़ते हैं- १. ख. प्रकरणनायकभेदादुत्पन्न वस्तु नायको नृपतिः । क-प. प्रकरणसमुद्धवा पुनरुत्पाद्यं वस्तु नायक नूपतिर्बा। २. ख. वार्त्तामधिकृत्य। क. (टि०) कन्यामसित्य । ३. ख. सुविहितार्था। ४. ख. प्रनृत्तगीतपाठ्या। ग. बहुनृत्यगोत्वाधरति। ५. ख. कामोपचारयुक्ता प्रसाघनक्रोघसंयुतापि। ६. ख. नायकदूतोचापि देवी सम्बन्धा नाटिका शेय।

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प्रकरणनाटकाभ्यां भेदात लक्षणान्यत्वान्नाटिका ज्ञयेतिदूरेण संबन्धः। उत्पादयं वस्तु चरितं च नायकं च नुपतिमन्तःपुरकन्यां सङ्गीतशालाकन्यां वाषिकृत्य प्राप्यत्वेन अभिसन्ाय कतंव्या। स्त्रियः प्रायेण बाहुल्येन यत्र चत्वारोऽङकाः यस्या: कस्याश्चिदवस्थायाः सरसोऽवस्थासमवापः काय इति यावत। ललिताभिनयात्मिकेति कैशिकीयं बद्धेत्यथः। सुष्ठु पूर्णतथा विहितानि चत्वायपि कैशिक्यङ्गानि यत्र "अङ्गगात्रकण्ठेम्य" इत्यत्र स्वाङ्गविशेषण- भावात् वा डीप् प्रयोग:। एतवपि न मुनित्रयमतमित्यनादृत्यमिति त्वन्ये। रति- पुरस्सरः संभोगो राज्यप्राप्त्याबिलक्षण आत्मा प्रधानभूतं फलं यस्याम्। अत एवाह

अनुवाद-नाटक और प्रकरण के भिन्न एक अन्य रूपक बनता है जिसे 'नाटिका' कहते हैं। जिसकी कथावस्तु उत्पाद्य होती है और नायक राजा होता है। जिसमें अन्तःपुर के सङ्गोत कला से सम्बद्ध नायिका होती है। प्रायः स्त्रियों की प्रचुरता रहती है, इसमें चार अङ्क होते हैं। तथा ललित अभिनयों से युक्त अङ्गों का सुन्वर विधान होता है। यह अनेकविध नृत्य, गीत, पाठ्य और रति एवं सम्भोग क्रियाओं से युक्त होती है। जो राजाओं के योग्य उपचार और क्रोध, बम्भ और प्रसाव से युक्त होती है। इस प्रकार नायक, देवी, दूतो और परिजनों से युक्त नाटिका समझनी चाहिए॥ ५८-६०॥ अभिनव-लक्षण के भेद होने से नाटिका नाटक और प्रकरण से भिन्न होती है, ऐसा समझे। इसका सम्बन्ध दूर से है। नाटिका की कथावस्तु उत्पाद्य (कल्पित) तथा नायक कल्पित होता है। और नायक अन्तःपुर को अथवा सङ्गोत का अभ्यास करने वालो कन्या को प्राप्त करता है, ऐसी नायिका होती है। नाटिका में प्रायः स्त्रोपात्र अधिक होते है और चार अङ्क होते हैं। इसमें किसी अवस्था का सरस योग होना चाहिए। इसमें ललित अभिनय होने से कैशिको वृत्ति होतो है और चार अङ्गों वाली कैशिको का सुन्दरता और पूर्णता से विधान होता है। 'सुविहिताङ्गी' में 'अङ्गगात्र- कष्ठेम्यः' इस वार्त्तिक से स्वाङ्गविशेषण होने से डोप् होता है। कुछ लोग कहते हैं कि मुनित्रय (पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि) के मत से विपतीत होने से यह अनादरणीय है। इसमें रतिपुरःसर राज्य प्राप्ति रूप सम्भोग प्रधान फल की योजना होतो है। इसलिए कहा गया है कि नाटिका

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१८० नाटपसास्थ्र

राजगतैर्पचारै: व्यवहारैयुंक्ा, अभ्या चेवुद्दिश्य तत्र व्यवहार।, तत्पूवंनायिकागतैः क्रोधप्रसादवञ्नैरवश्यं भाव्यमिति वर्शयति प्रसावनेति, आर्यानुरोधात्क्रोधस्य पश्चात्पाठः। ननु यस्या: क्रोधो भ्वतत सा न काचिदुक्तेत्याशंक्याह नायकेति। नायकस्य येयं देव्याद्या नायिका तथाभिलषितनायिकान्तरविषये दूरोकृतं सपरिजनं परिजनसमृद्धियंस्यां। एतदुभयप्रधानं सर्व तन्त्रेत्यर्थः। अन्यसन्ध्यङ्गादि सर्वं पूर्वदेव। तत्रका नायिका तावद् व्याल्याता भवति। षट्पदेयं नाटिकेति संग्रहा- नुसारिणो भट्टलोल्लटाद्या:।

राजकीय उपचारों से युक्त होती है। इसमें यदि अन्य नायिका के साथ प्रेम- व्यवहार रखा जाता है तो पूर्व नायिका के क्रोध, प्रसादन और वञ्चना का वर्णन अवश्य होना चाहिए, इस वात को प्रसादन आदि के द्वारा दिखाते हैं। अब प्रश्न होता है कि क्रुद्ध को मनाया जाता है तो आचार्य ने पहिले प्रसादन फिर क्रोध लिखकर क्रम परिवर्तन क्यों कर दिया ? इसका उत्तर देते हैं कि आर्या छन्द के अनुरोध से ऐसा पाठ है, वस्तुतः पहिले क्रोध तब प्रसादन होती है। पुनः प्रश्न होता है कि क्रोध और प्रसादन का होना तो बताया गया है किन्तु किसे हो, यह नहीं बताया गया है, इस पर कहते हैं कि नायिका को यहाँ 'नायक' यह पाठ अशुद्ध है। 'नायिका' पाठ शुद्ध प्रतीत होता है अर्थात् नायिका महादेवी आदि। अथवा नायक को देवी (महारानी) प्रथम नायिका। तथा देवी से अन्य नायिका के सम्बन्ध में जब अभिलाष हो तो दूती प्रभृति परिजनों की सहायिकाओं की समृद्धि जिसमें हो। इन दोनों (देवी और दूती) की प्रधानता जहाँ हो। सन्धि के सभी अज्गादि पहले की तरह होते हैं। इसमें एक नायिका होती है, जिसको व्याख्या कर दी गयी है। देवी और कन्या नायिका ख्यात और अख्यात भेद से चार प्रकार को होती है, कन्या अन्तःपुरिका और सङ्गोतशालगता दो प्रकार की होतो है। इस प्रकार छः प्रकार की नायिका होती है, यह सङग्रह के अनुयायो भट्टलोल्लट प्रभृति आचार्यों का मत है।

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अष्टादशोऽ्वाय:

अन्तर्भावगता हयेषा भावयोश्भयोर्यंतः। अत एव दशैतानि रूपाणत्युदितानि वै॥ ६१॥

धरीशङ्गकस्त्वयुक्तमेतदित्यभिघायाष्टघेति व्याचष्टे। घण्टकावयस्त्वाहु :- नायको नपतिरित्येतावन्मात्रं नाटकावावुपजीवितः न तु प्रख्यातत्वमपि तद्भेदद्वयादम्येऽष्टाविति बोडशभेदा इति। नायको नुपतिरिति ये प्रथमां पठन्ति तैयं त्रेत्यध्याहृत्यैकवाक्यताया तूभयस्य कार्यम्। अन्ये प्रथममार्यार्धं पृथगेव च वाक्यं योजयन्ति। प्रकरणभेवातप्रकरणलक्षणांशात् उत्पाद्यं वस्तु नाटक- लक्षर्णाशाच्च नृपतिर्नायक: स्थिते यत्रेत्यभिप्राये नाटिकैवंभूतेति ॥ ६०॥ अन्ये तु प्रकरणनाटकभेदात नाटिका भिद्यते नाटकशब्देनाभिनेयं रूपकमात्रं तस्यां सौकुमार्यप्रवर्शनाय स्त्रीत्वेन निर्देश इति प्रकरणिकापि सार्थवाहादिनायक- योगेन कैशिकोप्रधाना ल्यत इत्याहुः । यद्यपि च नाटिकेवमुक्ता, तथापि प्रकरण- नाटक लक्षणे एव तथा स्थिते तत्रेत्यभिप्रायेण उपसंहरति-प्रकरणनाटकलक्षणमिति अन्यवासूत्रयति वक्ष्याम्यतः परमिति। श्री शङ्कक तो यह मत ठीक नहीं है, ऐसा कहकर नायिका के आठ प्रकार कहते हैं। घण्टक आदि आचार्य कहते हैं कि इसका नायक नूपति होता है। केवल इतना हो नाटक आदि से उपजीवितत्त्व है, प्रख्यातत्त्व भी नहीं है। उन दो भेदों से अन्य ये आठ भेद होते हैं, इस प्रकार सोलह भेद बन जाते हैं। और नायक नुपति होता है, ऐसा जो प्रथम कारिका (आर्या) में पढ़ते हैं उनका 'यत्र' यह अध्याहार करके दोनों की एकवाक्यता करनी चाहिए और अन्य लोग तो प्रथम आर्या के अर्द्धभाग की पृथक करके वाक्य की योजना करते हैं। प्रकरण के भेद से अर्थात् प्रकरण के लक्षण के अंश के ग्रहण से नायक नुपति (राजा) होता है ऐसा जहाँ हो, इस अभिप्राय के स्थित होने पर 'नाटिका' इस प्रकार की होती है ॥ ६० ॥ अनुवाद-क्योंकि यह नाटिका नाटक और प्रकरण दोनों भावों के अम्तगंत भाव वालो हैं, उनसे पृथक नहीं। अतः वस हो रूपक कहे गये हैं ॥। ६१ ॥ अभिनव-अन्य लोग तो कहते हैं कि नाटक और प्रकरण के भेद से नाटिका भिन्न होती है। नाटक शब्द से यहाँ सभी अभिनेय रूपकों का ग्रहण हो जाता है किन्तु उसमें भो सौकुमार्य प्रदर्शन के लिए स्त्री रूप से निर्देश किया है। अतः प्रकरणिका भी सार्थवाहादि नायक के योग से कौशिकी वृत्ति प्रधान हो सकती है। यद्यपि यहाँ ऐसी नाटिका बतलाई गई है तथापि नाटक और प्रकरण के स्वरूप में किसी प्रकार वह स्थित है, इस अभिप्राय से उपसहार करते हैं- ना० शा०-८६

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१८२ नाट पशास्त्रे

प्रकरण 'नाटकलक्षणमुक्तं विप्रा ! मया समासेन। वक्ष्याम्यतः परमहं लक्षणं युक्त्या समवकारम् ॥ ६२॥ ननूद्देशक्रमत्यागे कि फलं, उद्देशस्ताववत्र न परिगणनार्थ इत्युक्तं, तेनास्य प्राधाभ्यान्नाटिकया च विच्छिन्नोऽसावुद्देशक्रमः। यथा च नाटकप्रकरणयो व्यत्पाद्यभयस्तवं तथा समवकारेऽपि तत्र त्रिवर्गोपायप्रदर्शनात्। केवलं तत्तदेवता- भक्तानां तच्चरितपुरस्सरतया तस्य तस्योपायस्यादरणोयत्वं भवतोत्यनेनाभि- प्रायेण विग्योऽत्र नायक्वेन निषिध्यते। तदीयं च भूयस्तरं न भूयस्तरं विततवृत्त- मनुक्रियया प्रदश्यते, तेन तन्मध्यपतितानां भवति निर्वेदादीनामभावे प्रयोगस्या- रञ्जकत्वं नाटकगताङ्गकदेशवत्, नाटकादौ तु भूयस्तरं चरितमनेकाङ्गरञ्जकवर्गेण बिना न रञ्जकमेवेति नाटकादौ दिव्यनायकनिषेध उक्तः । (नोक्त ?) तत्र हि राज- प्रभृतबो बहुतरफ लानुबन्धिनि महति फले संप्रयाससाध्ये व्युत्पाद्यन्ते, न तथेह किन्तु त्रिवर्गोपायमात्रे। अनुवाद-हे विप्रों! मैंने संक्षेप में नाटक और प्रकरण के लक्षणों से युक्त नाटिका को कह दिया है। इसके बाद अब मैं नाट्य लक्षण की योजना से समय- कार का लक्षण कहूँगा ॥ ६२॥ अभिनव-अब प्रश्न होता है कि उद्देश क्रम के परित्याग का क्या फल है? कहते हैं यहां उद्देश परिगणनार्थ नहीं है, इसलिए इसकी प्रधानता से नाटिका के द्वारा यह उद्देशक्रम विच्छिन्न भी है। और भी जैसे नाटक और प्रकरण में अधिकतर तथ्य व्युल्पाद्य है वैसे ही समवकार में भी है तथा इसमें भी त्रिवर्ग को उपाय के रूप में दिखलाया गया है। केवल उन-उन देवता भक्तों के चरित को पुरः सर करके वे उपाय आदरणीय हैं, इस अभिप्राय से यहाँ नित्य पात्र को नायक के रूप में निषेध किया गया है। उसके भूयस्तर विततवृत्त को अनुकरण के रूप में नहीं दिखाया जाता है। इसलिए तन्मध्यपतित अर्थात् उसके मध्य में आने वाले निर्वेदादि के अभाव में प्रयोग में वैसी उपरञ्ज- कता नहीं है जैसे नाटक के एकदेश में उपरञ्जकता नहीं होती। किन्तु नाटक आदि में भूयस्तर चरित अनेक अङ्गों वाले उपरब्जक वर्ग के विना उपरञ्जन नहीं होता, अतः नाटक आदि में दिव्य नायक बनाने का निषेध नहीं है। क्योंकि जैसे वहाँ पर राजा आदि बहुतर फलों का अनुबन्धन करने बाले सम्यक प्रयास से साध्य महान् फल के सम्बन्ध में व्युत्पाद्य है वसा यहाँ समवकार में नहीं होता। किन्तु वहाँ त्रिवर्गोपाय मात्र से विनेय है। १. ख. ग, नाटकनाटोलक्षमुक्तं यथा समासेन। २. ख, लक्षणयुक्तं । ग, लक्षणयुकत्या।

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६८३

देवासुरबीजकृतः' प्रख्यातोदात्तनायक इचैव। डयड्कस्तथा त्रिकपटस्त्रिविद्रवः स्यात्त्रिशृङ्गारः ॥६३। द्वावशनायकवहुलो ह्यष्टादशनाडिका 'प्रमाणश्च। वक्ष्याम्यस्याङ्कविरधि यावत्यो नाडिका यत्र।। ६४।।

अन्यरूपकाणां तु त्रिवर्गोपायत्वं नास्ति एकाद्वत्वात, डिमस्तु चतुरड्गोपि पश्चान्निदिष्ट इत्यत्र तल्लक्षणे कारणं वक्ष्यामः। तस्मात् त्रिवर्गव्युत्पावकत्वावने- काङ्श्वाच्च तादृशरूपकानन्तरमेवाभिधानं युक्तमित्यलं बहुना ॥ ६२॥ देवासुरस्य यद्वीजं फलसंपावनोपायस्तेन कृतो विरचितः। देवासुरा अपि चाप्रख्याता वृहत्कथादौ अरयन्ते स्वयं वा केवचिदूह्यन्त इति तग्निरासार्थ प्रख्यातपवम्। यद्यपि देवा पुरुषापेक्षयोद्वतास्तथापि स्वापेक्षया गाम्भीयंप्रधान- तयोवाता उच्यते भगवस्त्रिपुाररिप्रभृतयः । प्रशान्ता: ब्रह्मादयः । उत्ताः नसिहावयः। अत्र यत्र तावत्येव समाप्न्न त्र्यञ्क इत्युक्तम्। अथंत्रयं च कपट- विद्रवश्ुङ्गाराः प्रत्येक त्रिविधास्तत्र प्रत्यङ्गम् विद्रवादयस्त्रयस्तथाहि कपट उपार्याशे विद्रवोव्यापत्तिसंभावनाशे शुङ्गार फलांशे, एवं द्वितीयेऽङ्के तृतोये घ ॥ ६३॥ अन्य रूपक त्रिवर्गोपाय नहीं है, क्योंकि वे एकाक्को हैं। डिम यद्यपि चार अड्कों का होता है, तथापि उसका पीछे निर्देश है। इसलिए उसका लक्षण बताते समय उसके कारण को कहेंगे। इसलिए त्रिवर्ग का व्युत्पादक होने से तथा अनेक अङ्कों वाला होने से उस प्रकार रूपकों के अनन्तर ही उसका (नाटिका का) अभिधान करना उचित था। अतः अधिक कहने से रहने दिया जाय ॥ ६३॥ समवकार अनुवाद-देवता और असुरों के वस्तु के बीज से जिसकी रचना हो, जिसका नायक प्रख्यात और उदात्त हो, जिसमें तोन अङ्ग, तोन प्रकार के कपट, तोन प्रकार के बिद्रव और त्रिविष शुङ्गार हो, जिससे बारह नायक और अठारह नाड़ो प्रमाण का अभिनय का समय हो, वह समवकार कहलाता है। अब इसके अङ्गों में, जिसमें जितनी नाड़ियाँ होती हैं उक्त विधि को बतलाऊँगा ॥ ६३-६४ ॥

१. ख. कृतं। २. ख. नायकं। ३. ख. प्रमाणं। ४. इतोऽग्रे पद्दवयो ग्रन्थान्तरे अधिका।

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६८४ नाटपशास्त्रे

अङ्कस्तु सप्रहसनः सविद्रवः कपटः सवीथीकः । द्वादशनाडीविहित: प्रसवः कार्यः क्रियोपेतः ॥ ६५ ॥ कार्यस्तथा द्वितीय: समाशितो नाडिकाश्चतस्रस्तु । वस्तु 'समापनविहितो द्विनाडिकः स्वाततुतोयस्तु ॥ ६६ ॥ द्वावशनायकबहुल इति प्रत्यक्कमिति केचित्। अन्ये तु प्रत्यङ्कम् नायक- प्रतिनायको तत्सहायो चेयि चतुराहु: समुवायापेक्षया हि द्वाकशेति ॥६४॥ अभिनव-देवता और असुरों का जो बीज है अर्थात् फल के साधन का उपाय है, उससे विरचित बहुत से अप्रख्यात देवता और असुर भी वृहत्कथा आदि में सुनाई देते हैं तथा कोई स्वयं उसका ऊहन करते हैं, उनका निरास करने के लिए प्रख्यात पद का उपन्यास है। यद्यपि देवता पुरुषों की अपेक्षा उद्धत होते हैं तथापि अपनी अपेक्षा देवता होने के कारण उनका प्रधान गुण गाम्भीर्य होने से उदात्त भी होते हैं। जैसे भगवान् त्रिपुरारिप्रभृति। ब्रह्मादि प्रशान्त है और नुसिंहादि उद्धत हैं। यहाँ इतिवृत्त उतने में ही समाप्त हो जाता है अतः श्र्यङ्क कहा है। तीन अर्थ है-कपट, विद्रव और श्रङ्गार। ये प्रत्येक तोन-तीन प्रकार के होते हैं। ये प्रत्येक अङ्क में ये बिद्रवादि तीन प्रकार के होते हैं। जैसे, कपट उपायांश में, विद्रव व्यापत्ति सम्भावना में और शुद्कार फलांश में। इसी प्रकार द्वितीय तथा तृतीय अङ्क में समझना चाहिए। द्वादशनायकबहुल-कुछ आचार्य कहते हैं कि ये सभी नायक प्रत्येक अङ्क में होते हैं। अन्य आचार्य कहते हैं कि प्रत्येक अङ्क में नायक, प्रतिनायक और एक-एक उनके सहायक इस प्रकार चार नायक होते हैं और समुदाय की अपेक्षा बारह होते हैं॥। ६४॥ अनुवाद-समबकार का प्रथम अङ्क प्रहसन, विद्रव, कपट और वीथी के साथ क्रियाओं से युक्त बारह नाडिका के प्रमाण का होना चाहिए। इसी प्रकार द्वितीय अङ्क चार नाड़िका का करना चाहिए। तृतीय अङ्क दो नाड़ियों का होना चाहिए, जिससे कथावस्तु की समाप्ति हो जाय ॥६५-६६॥

१. ख. बस्तु प्रमाणथिहितो।

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सप्रहसन इति वचनात् प्रथमेऽङके कामश्ृङ्गारः प्रयोज्य इत्याह-तत्रैव हास्यस्यागमनात् । क्रियोपेत: (स्त्रियोपेतः) इति काम शृङ्गारात्मकं द्वादश- घटिकामध्यसंपाधं: कपटविद्रवप्रहसनलक्षणैरुपायैः प्राप्ते प्रथमाङ के निबध्नीयादिति तात्पयंम्। द्वितीये त्वङ् के घटिकाचतुष्टयगामिभि: कपटाविभिरुपायैः, तृतीये त्वङ्के सवं वस्तुसमाप्यते द्विघटिकान्तरसंपाह्येरुपायैः यद्यपि प्रत्यङ्कम् वस्तुपरिसमाप्तिरस्ति तथापि तृतीये वस्तुसमाप्तिग्रहणेनेदमाह बीजे तावदङ्कत्रयार्थ उपक्षेप्तब्य:, तद- नन्तरमङ्कद्वयेऽवान्तरवाश्यार्थसमाप्तिरन्योन्यविशिष्टव विधेया। तृतोयेत्वङ केड- वान्तरवाक्याथः। तृतोयस्ताम्यां प्रतिसंबद्धः। एवं महावाक्यार्थनिर्वाहहेतुसंबद्धतैव सर्वस्य जायते। एवं हि सानुसन्धाना विततदृशोऽपि त्रिवगं सिद्ध्युपायव्युत्पत्त्य- नुगृहोता भवति, निरनुसन्धानापि तावत्तावत्त परिसमाप्त्या तावत्युपाये निजहृवय- संवादबलादिति । अत एव संबद्धोऽवकोणंशच यथाथः समवकारः ॥६६॥।

अभिनव-यहाँ 'स प्रहसनः' पद के कथन से यहाँ प्रथम अङ्क में कामशृङ्गार का प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि यहीं पर हास्य भी आ जायेगा। 'क्रियोपेतः' पद के कहने से कामशुङ्गारात्मक यह है, यह दिखलाया गया है। बारह नाड़िका में सम्पादन होने से इसमें कपट, विद्रव, एवं प्रहसन रूप उपायों से युक्त प्रथम अङ्क का निबन्धन करना चाहिए। द्वितीय अङ्क चार नाड़िका में सम्पाद्य कपटादि उपायों का निबन्धन करना चाहिए। तृतोय अङ्क में सम्पूर्ण वस्तु को समाप्त कर देना चाहिए। दो घटिका के बोच में सम्पादनीय उपायों से यद्यपि प्रत्येक अङ्ट में वस्तु को समाप्ति होती है तथापि तृतोय अङ्क में वस्तु-समाप्ति के ग्रहण से यह कहा गया है कि बीज के विषय में तो तीन अङ्कों के अर्थ का उपक्षेप करना चाहिए। तदनन्तर दो अङ्कों में परस्पर विशिष्ट अवान्तर वाक्यार्थ की समाप्ति का विधान है और तृतीय अङ्क में अवान्तर वाक्यार्थ की भो समाप्ति कर देनी चाहिए। क्योंकि तृतीय अङ्क उन दोनों से सम्बद्ध है। इस प्रकार महावाक्यार्थ के निर्वाह के हेतु से सबकी सम्बद्धता हो जाती है, इस प्रकार व्यापक दृष्टि रखने वाले त्रिवर्ग को सिद्धि के उपायों के सम्बन्ध में सानुसन्धाना व्युत्पत्ति भी अनु- गृहीत हो जाती है। स्वहृदय के संवाद के बल से उतने उपायों में वाक्यार्थ की परिसमाप्ति होने पर निरनुसन्धाना व्युत्पत्ति भी उतनी हो जाती है। इसलिए जहाँ अर्थ सम्बद्ध है तथा अवकोर्ण भी है वहाँ समवकार है ॥ ६५-६६॥

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६८१ नाटयशारतरे

'नाडीसंज्ञा ज्ञेया मानं कालस्य यन्मुहूर्तारम्। तन्नाडिकाप्रमाणं यथोक्तमङ्कषु संयोज्यम् ॥ ६७॥ या नाडिकेति संज्ञा कालविभागे क्रियाभिसंपन्ना। कार्या च सा प्रयत्नाद्यथा क्रमेणैव शास्त्रोक्ता ।। ६८।। अड्कोऽड्स्तवन्यार्थः कर्तव्यः काव्यबन्धमासाद्य अर्थ हि समवकारे "ह्यप्रति सम्बन्धमिच्छन्ति ॥ ६९॥ युद्धजलसंप्लवो वा वाय्वग्निगजेन्द्रसंभ्रमकृतो® वा। नगरोपरोधजो वा विज्ञेयो "विद्रवस्त्रिविधः ॥। ७० ।।

तवाह-अड्डोडङ्कू इति।

अनुवाद-मुहूर्त्त का आधा भाग जो काल का मान (प्रमाण) है, उसे नाड़ी समझना चाहिए। उस नाड़िका के प्रमाण के अनुसार अङ्कों की योजना होनी चाहिए॥६७ ॥ अनुवाद-काल के विभाग में क्रिया से अभिसम्पन्न जो नाड़िका यह यह संज्ञा है उस शास्त्रोक्त नाड़िका बड़े प्रयत्न से क्रम से करना चाहिए॥ ६८ ॥ अभिनव-अङ्कोऽङ्क इत्यादि के द्वारा उसी बात को कहते है- अनुवाद-काव्य-रचना को आसादित कर उन-उन अङ्कों में अन्य अर्थ करने चाहिए, सवकार में अर्थ वाच्य अप्रतिसम्बन्ध है अर्थात् अतिसम्बद्ध नहीं है ॥। ६९ । अनुवाद-विद्रव तोन प्रकार का होता है-(१) युद्ध और जल संप्लव कृत २. वायु, अग्नि और हाथी के सम्भ्रम से होने वाला, ३. नगर के अवरोध से होने वाला विद्रव। ७०॥

१ ख. ज्ञेयं तु नाडिकालयं मानं कालश्य यन्मुहूर्त्तमिति। २. ग. यथोत्तमाझ्म षु। ३. कनन. अङ्कूऽक्क सम्बन्घः । ४. कर-भ. काव्यबन्धतत्त्वज्ञः । ५. ख. ग. हयाप्रतिसन्धानमिच्छन्ति । ६. ख. ग. जलेन्द्रसम्भवो वापि। क-भ. विद्रवकृतो वा। ७. क. टि0) विज्ञेया विद्रवास्त्रिघा।

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अष्टादशोऽड्याय: ६८७

वस्तुगतक्रमविहितो दैववशाद्वा परप्रयुक्तो वा। सुखदुःखोत्पत्तिकृतस्त्रिविधः कपटोऽत्र विज्ञेयः ॥ ७१॥।

तुध्यंतिरेके अङ्कत्रयसंबन्धो भवति, न त्वङ्कोऽङ्क: परस्परमित्यर्थः। काव्यबन्ध- मिति। सवं वस्तु काव्यबन्धोपश्लिष्टमित्यथः। अन्यथा हि समवकार एकं कार्यमिति केयं भणितिः। एतदेव निरवचनेनाह अर्थं हि समवकार इति। समवकार इत्यस्मिन् शब्देऽथं वाच्यमप्रतिसंबन्धमिति नातिसंबद्धं किञ्चित्संबद्धं वस्त्वच्छन्ति। संशब्द- बलादवशब्दबलाच्च। प्रतिशब्देनातिशय उक्तः स निषिद्धः। त्रिविद्रव इत्युक्तं ततुत्रयं वक्तव्यमचेतनकृतमन्यकृतमुभयकृतं वा यदनर्थात्मकं वस्तु यतो बिद्रवन्ति जना: स विद्रव इति त्रिविधः । तत्राचेतनकृतमुदाहतु' जलवाध्वाविग्रहणम्। चेतनकृते गजेन्द्र उवाहरणम्। द्वयकृते नगरोपरोधस्तस्य युद्धाग्निवानादिसंपाद्यत्वात् ॥६९-७०।।

अभिनव-यहाँ पर 'तु' का अभिप्राय व्यतिरेक होने से तीनों अङ्कों का सम्बन्ध है न कि प्रत्येक अङ्क का परस्पर सम्बन्ध है। सभी वस्तु काव्यबन्ध से उपश्लिष्ट है अन्यथा समवकार में एक कार्य है, वह कौन भणिति है? इसी बात को निर्वचन के द्वारा कहते हैं-समवकार इस शब्द में अर्थं (वाच्य) अप्रतिसम्बन्ध है अर्थात् अतिसम्बद्ध नहीं है, कि्चित् सम्बद्ध है। संशब्द के बल से और अवशब्द के बल से यह अर्थ प्राप्त होता है। अप्रतिसम्बन्ध शब्द में पठित प्रति शब्द से जो अतिशय कहा है वह निषिद्ध है, उसका निषेध कर दिया है। त्रिविद्रव शब्द जो कहा है उससे तीन अनर्था तक वस्तुओं को कहना चाहिये । १. अचेतनकृत अनर्थ २. अन्यकृत अर्थात् चेतनकृत अनर्थ और ३. उभयकृत अनर्थ। जिससे लोग भागते हैं वह विद्रव तोन प्रकार का होता है। उनमें अचेतनकृत विद्रव का उदाहरण देने के लिए जल, वायु आदि का ग्रहण है। चेतनकृत विद्रव का उदाहरण गजेन्द्र है। उभयकृत विद्रव का उदाहरण नगरोपरोध है। जो युद्ध एवं अग्निदाह आदि से सम्पाद्य है ॥ ६९-७० ॥ अनुवाद-कपट भी तीन प्रकार का होता है-१. वस्तुगत से बिहित २. दैववश अथवा दूसरे (शत्रु) के द्वारा प्रयोग करने के कारण ३. सुख दुःख को उत्पत्ति के कारण ॥ ७१॥

१. ख. ग. वस्तु गतिक्रमविहितो । २. ख, ग, कपढाश्रयो ज्ञेयः ।

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६८८ नाटथशास्त्र

त्रि विधश्चात्र विधिज्ञैः पृथकपृथवकार्ययोगविहितार्थः। शृङ्गारः कर्तष्यो धमें चार्यें च कामे च।। ७२।।

कपटो वञचना तस्याअयणमङ्गीकरणम्। त्रिधा तत्र वञ्चना, बुद्धघें कदाचित्केवलया कपटो भर्वत स हि वस्तुगतक्रमविहितः वस्तु फलं ततप्राप्तौ वस्तु- गतः फलसाधकः कर्त्ता तस्य यः क्रम उपायचिग्तनादि: तेन विहितः यत्रानपराज एव वञचकेन वञ्च्यते स एवमुक्तः । यत्र तु वञ्चनोयोऽपि सापराधः स परयुक्तः कपटः तदपराधे तु वञ्चनकस्य वञ्चनेच्छा नास्तीति नायं भेद: संभवति वञ्चनेष्छाभावे वञचनाया: संपत्त्ययोगात्। यत्र तु दवयोरपि न कश्चिदभिसन्धिवोषः काकतालोयेन तुल्यफलाभिसन्धानवतोरप्येक उपचयेनापरस्त्वपचयेन युज्यते तत्र वञ्चना सा दैवकृता। न च कस्याचित्सुखमन्यस्य दुःखमुत्पादयतीति ॥७१॥

अभिनव-कपट शब्द का अर्थ वञ्चना, छल है, उसका आश्रयण अङ्गी- करण है। वह वञ्चना तीन प्रकार की होती है। कभी-कभी केवल बुद्धि के द्वारा ही वञ्चना (कपट) होती है। उसका वस्तुगत क्रम से विधान होता है। वह वस्तुगत क्रम विहित फल को प्राप्त करने में वस्तुगत फल साधक कर्त्ता है उसका क्रम उपाय-चिन्तनादि से किया गया। जहाँ अनपराधी ही (अपराध न करने वाला ही) वञ्चकों के द्वारा वञ्चित किया जाता है। उसे इस प्रकार कहा गया है। जहाँ पर बञ्चनीय भी अपराधी है वहाँ वह परप्रयुक्त कपट होता है, उसके अपराध करने पर वञ्चक की वञ्चना करने की इच्छा नहीं होती, तब यह भेद सम्भव नहीं है, क्योंकि वञ्चना करने की इच्छा न होने पर वञ्चना करने की सम्पत्ति नहीं होती। जहाँ दोनों में कोई अभिसन्धि कृत दोष नहीं है, वहाँ काकतालोय न्याय से तुल्यफल का अभिसन्धान होने पर एक का उपचय (समृद्धि) और दूसरे का अपचय (हानि) होता है, तो वह वञ्चना दैवकृत होती है। वहाँ किसी को सुखी और किसी को दुःखी उत्पन्न नहीं करता ॥ ७१॥ अनुवाद-पृथक्-पृथक् कार्थ के योग से प्रयोजन के लिए विहित (प्रस्तुत किया जाने वाला) शुङ्गार को विधिबेत्ताओं ने तीन प्रकार का माना है जिसका उपयोग धर्म, अर्थ और काम में किया जाता है।। ७२॥

  1. कनम. त्रिविषश्च विविर्ज्ञेयः । १. स. निविषाकृतिशृद्धारो ज्ञेयो धर्मार्थकामकृतः । क. (टि०) कर्त्तव्य शृङ्गारो।

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मष्शदक्ोव्यायः ६८९

यस्मिन् धर्मप्रापकमात्महितं भवति साधनं बहुया। बरतनियमतपोयुक्तो ज्ञयोऽसौ' घ्मंशृङ्गारः॥७३॥ अर्थस्येच्छायोगाद् बहुधा चैवार्थतोऽर्थंभृङ्गारः। वा रतियंत्र ।।७४।। धर्मेडयें काम इति सप्तम्या कायत्वं कारणत्वं नोच्यते। तेन धर्मो यत्र हेतुर्वा साध्यो वा नायिकालाभे स धमंशृङ्गारः। एवमर्थकामयो र्वाच्यम् ॥७२॥ यत्र शृङ्गार इति तद्विषयः प्रमदा व्यपविश्यते, वतादियुक्त्या प्राप्यो यत्र च प्राप्ते धर्मप्रार्थनारूपमात्महितं यज्ञादि पत्नीसंयोगकृतं सिध्यतीति संबन्ध: अनेकधेति राज्यभूमिगोसुवर्णादिभेदेनेत्यर्थः। रतिबहुमानोऽर्थार्थमिति योषितां पुरुषाणां च॥ ७३ ॥ अभिनव-धर्म, अर्थ, काम में प्रयुक्त सप्तमो विभक्ति कार्य और कारण भाव को सूचित करती है, जहाँ नायिका की प्राप्ति में धर्म हेतु अथवा साध्य होता है वहाँ धर्मशृङ्गार होता है। इसी प्रकार अर्थ और काम शृङ्गार को भी समझना चाहिए॥। ७२। अनुवाद-जहाँ पर धर्म के प्रापक और आत्महितकारी बहुधा साधन होते है उसे ब्रत, नियम और तप से युक्त धमंशङ्गार समझना चाहिए॥ ७३॥ अभिनव-जहाँ शृङ्गार का विषय अच्ना (नारी) होती है वहाँ नायक ब्रतादि तपोऽनुष्ठान से प्राप्त होता है, जिसके प्राप्त होने पर 'आत्महित के साधक' धर्म और प्रार्थना के फलस्वरूप पत्नी का संयोग करा देने वाले यज्ञादि का अनुष्ठान किया जाता है, यह सम्बन्ध राज्य, भूमि, गौ, सुवर्ण आदि के भेद से अनेक प्रकार का होता है। अर्थ के लिए रति का बहुमान स्त्री और पुरुष दोनों को होता है।। ७३॥ अनुवाद जहाँ पर अभोष्ट अर्थ की इच्छा से बहुषा अर्थ की प्राप्ति हो तथा जहाँ स्त्रियों के सम्प्रयोग (सम्भोग ) के विषय में अर्थ के लिए जहाँ रति हो, उसे 'अर्थशृङ्गार' समझना चाहिए॥७४ ॥ १. स. यत्र तु धमें प्रार्थितमात्महितं भवति साचितं बहुधा। ग. यत्र तु धर्मसमापकमाशमहितं। २. ख. प्रतिनियमतपोयुक्तं। ३. क-म. स ज्ञयो। ४. क-भ. अथंस्येप्सा यत्र तु नैकविधो भवति सोऽर्थशुङ्गारः। क. प० अर्थस्याप्राप्तिर्यस्मिन् भवति च बहुषा स चार्थशुङ्गार:। ५. ब. सम्प्रयोगविषयेष्वयथार्थयामपोष्यते हि रतिः । ना० शा०-८७

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६९० नाट पशास्नरे

कन्याविलोभनकृतं प्राप्तौ स्त्रीपुंसयोस्तु रम्यं वा। 'निभृतं सावेगं वा 'यस्य भवेत्कामशृङ्गारः॥ ७५॥

ननु च वेवेषु कथमर्थार्यित्वं गन्धवंयक्षाविषु संभवतयेवेति केचित। यदर्थनीयं तदर्थो वेवेष्वपि चैतत्संभवतीत्यग्ते। उपाध्यायास्त्वाहु :- तत्र नायकयोरमुप्राप्ति- रप्यन्यगतैव। यथा भगवतो भवानीपतेः गिरिराजपुत्रीसङ्गमनमिन्द्रादीनां तारका- क्रान्तनिजराज्यसमुन्मोचनाय भवतीति॥७४॥ कन्यारयां विलोभो नायकस्य तस्याश्च तस्मिन्निति परस्परानुरागकृत इत्यर्थ:। स्त्रीपंसयोत्द्यानस्थानादि प्राप्तौ निभृत इति प्रच्छावनपूर्वकं यदि चासा- वेवास्मीति प्रकटं कृत्वा यः श्रृङ्गार स कामप्रयुक्त एव। स्त्री परस्त्री पुनरत्र विवक्षिता, यथा शक्षस्याहल्या।

अभिनव-अब प्रश्न होता है कि देवताओं में अर्थिता कैसे होगी ? इस पर कुछ आचार्य कहते हैं कि गन्धर्व और यक्ष आदि में यह होती ही है। अन्य लोगों का कहना है कि अर्थनीय अर्थ को देवताओं में भी सम्भावना रहती है। उपाध्याय जो कहते हैं कि यहाँ नायक-नायिका की अनुप्राप्ति अन्यगत फल प्राप्ति के लिए होती है। जैसे भगवान् भवानीपति का गिरिराज पुत्री पावंती के साथ सङ्गमन के फल रूप कार्तिकेय की प्राप्ति का तारकासुर से आक्रान्त अपने राज्य की समुन्मोचन रूप अर्थात् पुनः प्राप्ति रूप फल इन्द्र आदि को मिला, यह अर्थशृद्गार है॥ ७४॥ अनुवाद-कन्या के विलोभन के लिए रम्य वस्तु की प्राप्ति में स्त्री और पुर्व के ऐकान्तिक या प्रकट विहार जहाँ हो, वह 'कामशुङ्गार' कहलाता है।। ७५ । अभिनव-कन्या में नायक का और नायक में कन्या का लोभ परस्पर अनुराग से होता है। उद्यान आदि एकान्त स्थान में स्त्री-पुरुष की प्रच्छादन पूर्वक जो मिलन होता है वह प्रच्छन्न कामशङ्गार है और यह वह 'यह मैं हूँ' इस प्रकार प्रकट रूप में जो शृङ्गार होता है वह प्रकट कामशृङ्गार है। 'स्त्री' से यहाँ परस्त्री विवक्षित है। जैसे इन्द्र का अहल्या में।

१. ख. कम्या विलोभनं वा प्राप्य । २. स. विभृतं वा सावेगं जानीयात्। क. (डि०) निभृत: साबेगो वा विज्ञेयः। ३. ह. जानीयात् कामशृ गारम्।

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अष्टादशोष्यायः ६९१

*उण्णिग्गायत्रयादोन्यन्यानि च यानि बन्धकुटिलानि। "वृत्तानि समवकारे कविभिस्तानि' प्रयोज्यानि ॥७६॥

नन्वेवं शृङ्गारयोगे काव्ये कैशिकीहोनता। कैशिक्यां वृत्तौ हौनतेति तत्र समासः, तेन नर्माद्यङ्गवतुष्कतबुपरञजकगोतनृत्यवाद्याद्यभावात् कंशिक्या होनात्र भवति। उपाध्यायास्त्वाहु :- न कामसद्भावमात्रादेव केशिकोसंभवः, रोद्रप्रकुतोनां तदभावात्। विलासप्रधानं यशूपं सा कैशिकी, न च चरितम तद्रपामुप्रवेशेऽपि तद्वघबहारः प्रधान्यकृतो हासावित्युल्तम्। तेन तत्र विषये भारत्यादिवृत्यम्तराभि- धानमेव युक्तमिति॥७५॥ उष्णिक्सप्तभिः, गायत्री षड्मिः। बन्धकुटिलानि विषमार्धसमानि तान्यत्र समवकारे सम्यग्योज्यानोति। नैव प्रयोज्यानोत्युद्भटः पठति। स्रग्धरादीग्येव प्रयोज्यानि नाल्पाक्षराणीति स व्याचष्टे। एवं अद्धालवो देवताभक्ताः तद्देषयात्रा- दावनेन प्रयोगेणानुगृह्यन्ते, निरनुसन्धानहृदया: स्त्रोवालमूर्वाशच विद्रवािमाहृत- हृबया: क्रियन्ते इत्युक्तः समबकारः ॥७६॥

अब प्रश्न होता है कि इस प्रकार शृङ्गार के योग में काव्य केशिको वृत्तिहोन क्यों होता है। कैशिकीवृत्ति होनता में 'कैशिक्या' बृत्तो होनता' यह समास है। इसलिए नर्मादि चार अङ्गों के उपरल्जक गीत, नृत्य, वाद्य का अभाव से कैशिको को होनता होतो है। उपाध्याय जी तो कहते हैं कि केबल काम की सत्ता होने से हो कैशिको वृत्ति का होना सम्भव नहीं है क्योंकि रौद्र प्रकृति में उपरब्जक सामग्रो के अभाव के कारण कैशिकी को होनता रह सकती है। जो विलास-प्रधान रूप है, वह केशिकी है न कि चरित। जिस रूप का अनुप्रवेश होगा उसो से व्यवहार होगा। क्योंकि व्यवहार प्राधान्यकृत होता है, यह कहा जा चुका है। अतः ऐसे स्थानों पर भारती वृत्ति अथवा भिन्न वृत्तियों का अभिधान ही युक्त है, उचित है॥ ७५॥ अनुवाद-उष्णिक् और गायत्रो आदि छन्दों से भिन्न कुटिल बन्ध वाले जो विषमवृत्त हैं उनका प्रयोग समवकार में नाट्यकारों को करना चाहिए।। ७६॥ ४. न. उष्णिग्णायत्रो वा वृत्तानि। ख. उष्णिग्गायन्रो वा यामि तथान्यानि। ५. ग. तान्यत्र। ६. ख. नैब । ग. सम्यक्।

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३९२ नाटपशास्त्रे

एवं कार्यस्तज्ज्ञैर्नानारससंश्रयः' समवकारः। *वक्ष्याम्यतः परमहं लक्षणमीहामगस्यापि ।।७७॥ दिव्यापुरुषाश्रयकृतो दिव्यस्त्रोकारणोपगतयुद्धः। सुविहितवस्तुनिबद्धो' विप्रत्ययकारकशचैव ।। ७८ ।। *उद्धतपुरुषप्रायः स्त्रोविरोधग्रथितकाव्यबन्धरच। संक्षोभविद्रवकृतः "संफेटकृतस्तथा चैव ।। ७९॥ स्त्रीभेदनापहरणाव 'मर्दनप्राप्तवस्तुशृङ्गारः - ईहामृगस्तु कार्तः सुसमाहितकाव्यबन्धशच ॥ ८० ॥

अथेहामृगमाह-विग्येति। अभिनव-उष्णिक सात अक्षरों का और गायत्री छः अक्षरों का वृत्त है। है। बन्ध कुटिल का अर्थ है विषम और अर्द्धसम वृत्त । समवकार में इन्हीं की सम्यक रूप से योजना करनी चाहिए। उङ्धट का मत है कि समवकार में इनकी योजना नहीं को जानी चाहिए। वे लोग व्याख्या करते हैं कि स्रग्धरा आदि अधिक अक्षरों वाले छन्दों का प्रयोग हो यहाँ होना चाहिए, अल्प अक्षरों वाले छन्दों का प्रयोग नहीं होना चाहिए। इस प्रकार श्रद्धालु, देवभक्त देवयात्रा आदि में इस प्रयोग से अनुगृहीत होते हैं और अनुसन्धान से शून्य हृदय वाले स्त्रो, बालक और मूर्ख के हृदय विद्रव आदि से आकृष्ट किये जाते हैं, इस प्रकार समवकार की कह दिया गया ॥ ७६ ॥ अनुवाद-इस प्रकार विद्वानों को नाना रसों से पूर्ण समवकार की रचना करनी चाहिए। अब इसके बाद ईहामृग का लक्षण कहूँगा।७७॥ अब ईहामृग को कहते हैं-

१. ख. ग. सुखदुःखस्माश्रयः । क. (टि०) नानारससंज्ञकः । २. कनन. अत ऊर्ष्व व्याख्यास्ये। ३. ख. ग. निबन्धो वा। ४. क. तद्टसुरूपपरायः ५. क. (टि०) संफोटकृतवच सज्ञेयः । ६. ख. अमर्दसंप्राप्त। ग. अयमदंन संप्राप्ता। ७. ग. चतुरङ्कविभूषितव्चंव। चतुष्कविभूषिततज्ज्ञ ।

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अषठादशोडड्यायः

विव्याना पुरुषाणां आश्रयणं नायकतया तेन कृतः विव्यस्त्रीनिमित्तमुपगतं युद्धं यत्र। दिव्यानुप्रवेशात्समवकारवत् असंबद्धाथंता मा प्रसांक्षीवित्याह सुविहितेन संश्लिष्टेन वस्तुना निबद्धः, विगतानि प्रत्ययकारणानि विश्वासहेतवो यत्र। मध्ये च तत्र विव्यानामपि प्रवेशो भवतीति वशयति-उद्धतपुरुषेति स्त्रीनिमित्तको रोष: संक्षोभ आवेगः। स्त्रोनिमि त्तानि यानि भेवनाहरणावमवनानि यथायोगं स्त्रीविषयाणि अन्यविषयाणि तैःप्राप्तं वस्त्वधिष्ठानं प्रमवालक्षणं यस्य तादृशः शृङ्गारो यस्मिन्। अवमर्दनं दण्डः। सुसमाहितः काव्यबन्ध इत्यनेन वीथ्यङ्गान्यत्र योज्यानीति दर्शर्यत॥७८-८0॥

अनुवाद-ईहामृग में दिव्य पुरुष नायक होते हैं और दिव्य स्त्री के कारण इसमें युद्ध होता है। इसकी कथावस्तु सुविहित रूप से निबद्ध होतो है और वह अविश्वास का कारक होता है। इसमें उद्धत पुरुष प्रायः अधिक होते हैं और काव्यबन्ध स्त्री के रोष से ग्रथित होता है जो सङ्क्षोभ, विद्रव और संकेत का जनक होता है। इसमें स्त्री के निमित भेदन (तोड़-फोड़), अपहरण और अव- मदन के कारण प्राप्त होने वाली वस्तु के विषय में शुङ्गार रस के आघार पर सुसमाहित काव्य रचना अच्छे ढंग से रखनी होती है॥। ७८-८० ॥ अभिनव-ईहामृग में नायक के रूप में दिव्य पुरुष का आश्रय लिया जाता है तथा उसी के कारण दिव्य स्त्री के निमित्त यहाँ युद्ध प्राप्त होता है। दिव्य के अनुप्रवेश से समवकार की तरह असम्बद्धार्थता से विमुक्त यह संश्लिष्ट वस्तु से निबद्ध करना चाहिए। यहाँ प्रत्यय अर्थात् विश्वास के कारक विश्वास के हेतुओं का अभाव रहता है। मध्य में दिव्य पुरुषों का भी प्रवेश होता है, इस बात को दिखाते हैं। इसमें उद्धत प्रकृति के पुरुष होते हैं-स्त्रियों के निमित्त रोष होता है। संक्षोभ का अर्थ आवेग है। यहाँ स्त्रियों के निमित्त जो भेदन (तोड़-फोड़), अपहरण और अवमर्दन (दण्ड) कभी स्त्री-विषयक और कभी अन्य विषयक होते हैं। उनके कारण जिसे प्रमदा रूप वस्तु और उद्यानादि अधिष्ठान प्राप्त होते हैं, इस प्रकार के शृद्धार का जहाँ उपनिबन्धन रहता है। अवमर्दन का अर्थ दण्ड है। 'सुसमाहितकाव्यवन्ध' इस कथन से यहाँ वीथी के अङ्गों की योजना करनी चाहिए, यह दिखाया गया है॥ ७८-८० ॥

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१९४ नाटघ शास्त्रे

यह्ट्यायोगे कार्य ये पुरुषा वृत्तयो रसाश्चैव। ईहामृगेऽपि 'ते स्युः केवलममरस्त्रिया योगः ॥ ८१ ॥ यत्र तु वधेप्सितानां वषो ह्य दग्रो भवेद्धि पुरुषाणाम्। किञ्चिइचाजं कृत्दा तेषां युद्धं शमयितव्यम्॥ ८२॥

इति। अ कपरिमाणं नायकसंख्यां वृत्तिरसविभागं च व्यायोगातिवेशेनाह-यद्वच्ायोग

कारयशब्देनाडू उच्चते। तेनैक एवाङ्क: नायकास्तु द्वादश समवकारातिदेशेन व्यायोगे तल्लाभात्। अत्र तु समवकारातिदेशेन सर्वसंपत्तेगौरवं स्यात् ।।८१ ।। नतु युद्धमवमवनं चेत्युक्तं तत्रास्य प्रत्यक्षप्रयोज्यता मा भूविति बशंयति- यत्र स्बात। अड्कों का परिमाण, नायकों की संख्या, वृत्तियों और रसों का बिभाग व्यायोग के अतिदेश से कहते हैं- अनुवाद-जितने पुरुष, वृत्ति और रस व्यायोग में रहते हैं, वे हो ईहामृग में भी होते हैं। किम्तु ईहामृग में केवल देवस्त्रियों का योग ही होता है ।। ८१ ॥ अभिनव-यहाँ कार्य शब्द से अङ्क को कहा गया है। इसलिए यहाँ अक्क एक ही होता है, किन्तु नायक बारह होते हैं। समवकार के अतिदेश से व्यायोग में भी यह प्राप्त होता है। यहाँ पर तो समवकार के अतिदेश से सभी सम्पत्तियों का गौरव होगा ॥ ८१॥ अभिनव-युद्ध और अवमर्दन यह जो कहा गया है उसका यहाँ प्रत्यक्ष प्रयोग न हो, इस बात को दिखाते हैं- अनुवाद-जहाँ पर पुरुषों का वष ईप्सित है उनका वहाँ उत्कट बष होता है, ऐसी स्थिति आ जाय तो किसी बहाने से युद्ध को शान्त कर देना चाहिए॥ ८२ । १. श. यद्वा योगे कार्य ये पुरुषा ये रसाशच निर्दिष्ठा।। २. ग. तरस्पात्। ३. ख. केवलममरस्त्रियो हास्मिन्। ग. केवलमत्र स्त्रिया थोग: ।

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६९५

ईहामृगस्य 'लक्षणमुक्तं विप्रा: ! समासयोगेन। 2डिमलक्षणं तु भूयो लक्षणयुक्त्या प्रवक्ष्यामि ।। ८३ । प्रश्यातवस्तुविषयः प्रख्यातोदात्तनायकरचैव । `षड्रसलक्षणयुक्तचतुरक्को वै डिमः कार्यः॥ ८४ ॥ शृङ्गारहास्यवर्ज शेषैः सर्वे रसैः समायुक्तः। ॥ ८५ ॥

वधेप्सितानां वाध्यानां भवेदिति संभाव्यत इत्यर्थः। तत्रेति येषामिति चाधंमाहायं। व्याजमिति पलायनादि ॥ ८२॥ ईहा चेष्टा मृगस्येव स्त्रीमात्रार्थं यत्र स ईहामृगः ।। ८३ ।। अथ डिममाह-प्रख्यातवस्तुविषय इति। अभिनव-जिसका वध ईप्सित है उसके वध की सम्भावना होतो है। यहाँ 'यत्र' के उत्तर में 'तत्र' का और 'तेषां' के उत्तर में 'येषां' का अध्याहार कर लेना चाहिए। व्याज का अर्थ पलायन आदि है ॥ ८२॥ अनुवाद-हे विप्रो ! इस प्रकार मैंने संक्षेप में ईहामृग का लक्षण कह दिया है। अब लक्षण को युक्ति से डिम का लक्षण बतलाऊंगा ॥ ८३ ॥ अभिनव-स्त्री के लिए मृग के समान ईहा (चेष्टा) जहाँ होती है। वह 'ईहामृग' होता है।। ८३ ।। डिम का लक्षण कहते हैं- अनुवाद-डिम का इतिवृत्त (कथावस्तु ) प्रत्यात होता है, और नायक प्रख्यात एवं उदात्त होता है। छः रसों के लक्षणों से युक्त चार अङ्क वाले डिम की रचना करनी चाहिए॥ ८४॥ अनुवाद-डिम शूङ्गार और हास्य रस को छोड़कर शेष सभी रसों से युक्त होता है तथा इतिवृत्त (कथावस्तु) दोप्र रसों और नानाभावों से सम्पन्न होता है। ८५॥ १. ख. लक्षणमिदमित्युक्तं समासयोगेन। २. ग. अब वै डिमस्य लक्षणमतः प्रवश्यामि । ३. षट्त्रिशल्लक्षणयुक् चतुरहको वै डिमा काय। ४. ख. व. नानाभावान्विताशचैव। न. नानामावादिकावचैव ।

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नाट्यश्ास्त्रे

युद्धनियुद्धाघर्षण संफेटकृतश्च कर्तव्यः ॥ ८६ ।। मायेन्द्रजालबहुलो *बहुपुस्तोत्यानयोगयुक्तइच। देवभुजगेन्द्र राक्षसयक्षपिशाचाव कीर्णइच । ८७ ॥ षोडशनायकबहुलः सात्त्वत्यारभटीवृत्तिसम्पन्नः । कार्यो डिमः प्रयत्नान्नानाश्रयभावसम्पन्नः । ८८ ।। नाटकतुल्यं सवंमभ्यत्केवलं सन्धीनां रसानां चासमग्रता च शृङ्गारहास्यवजं षड्रसत्वम्। पर्यायेण शान्तस्य प्रयोग: स्यादित्याह वीप्तरसेति। काव्ययोनि: काव्यवस्तु। देवादयो बाहुल्येनात्र सात्त्वत्यारभटोति। "जातिरप्राणिनाम्" इति केचित। सात्वत्यारभटीवृत्तिसंपन्नं वृत्तिदवयं यत्र वृत्तिसमूहे वा वृत्तिशब्दः सात्त्वत्यारभटीलक्षणव्यावृत्त्या संपन्नः । डिमो डिम्बो विद्रव इति पर्यायाः तद्योगादयं डिमः। अन्ये तु डचन्त इति डिमः उद्धतनायकास्तेषामात्मना वृत्तियंत्रेति। "इको ह्रस्वोऽडधो गालवस्य" इति ह्रस्वः। नानाश्रयभावसंपन्न इत्यनेन सर्वभावयुक्तत्वादिति वृत्तवैचित्र्यमाह। अनुवाद-निर्धात, उल्कापात, सूर्य और चन्द्रमा के ग्रहण से युक्त और युद्ध, नियुद्ध (मल्लयुद्ध ) आकर्षंण तथा संफेट से युक्त डिम करना चाहिए।। ८६। अनुवाद-डिम में माया और इन्द्रजाल की अधिकता तथा पुस्त (पुत्तलि- काओं या पलस्तर आदि) उत्त्थान से सम्पन्न देवता, नाग, राक्षस, यक्ष, पिशाच आदि सोलह नायकों से युक्त सार्वती, आरभटी वृत्तियों से सम्पन्न डिम को नाना प्रकार भावों से सम्पन्न बड़े प्रयत्न से डिम करनी चाहिए।। ८७-८८ ।। अभिनव-डिम में सब कुछ नाटक के समान होता है केवल सन्धियां और रस समग्र नहीं रहते हैं। शृङ्गार और हास्य रस को छोड़कर शेष छः रस होते हैं। पर्याय से क्रमशः शान्त रस की योजना हो सकती है, इसोलिए कहते हैं- दोप्तरसेति। काव्य योनि का अर्थ है काव्य की कथावस्तु। देवादि की बहुलता होने से यहाँ सात्त्वती और आरभटी वृत्तियाँ होती हैं। कोई आचार्य कहते है कि 'जातेरप्राणिनाम्' में अप्राणी वाचक छन्दों के उपन्यास से यहां जाति का ग्रहण होता है। अतः सात्वती और आरभटी वृत्ति से सभ्पन्न दो वृत्तियाँ जहाँ हो या १. ख. ध. निर्धातचन्द्रसूर्योपरागोल्कापातसंयुक्त:।

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नाटकादनम्तरं डिमलक्षणं यद्यप्युचितं तथापि तद्गतप्रवेशिकादिसंभवनिरा- करणाथं सत्प्रकरणादपकृष्यास्याभिधानं, तेन विनचतुष्टयवृत्तमेवात्र प्रयोज्यम्। अङ्कावतार: एव चात्र भवति। चूलिकाङ्गमुखयोस्त्वत्रापि युद्धादिवणने समुपयोगोऽ- स्तयेध। ततश्च वस्तुतः प्रवेशकाद्यनिषिद्धमेव, प्रवेशकस्य ह्यसंभव एव। सरसेतिवृत्त वशाद्वा यथाङ्कष्वन्योन्यासंबन्धात् यथा समवकारे बह्ङ्कड्पि तस्मातप्रकरणोत्क र्षोडस्य तस्यावसरभावात्। तत्र हि नाटकान्तरमस्याभिधाने प्रकरणस्य न तत्स्परधित्वमुक्तं भवेत्। तदनन्तराभिधाने नाटिकाविभेद: कथं स्वाप्यः। नाटिकायां च स्त्रीप्रधानत्वात्, त्रिशुङ्गाररसमवकाराभिधानमेव ततः परं न्याय्यम्। तत्प्र- सङ्गेन च विव्यपुरुषसंबन्धादोहामृग उक्तः, तदनन्तरं च दिव्यपुरुषाधिकारेण रूपकाणोति पूर्वमनेकरसयुक्ततवेन विततेतिवृत्तत्वादयमभिवातं युक्तमित्यलं बहुना॥ ८८ ॥ वृत्ति समूह में हो। वृत्ति शब्द सात््वती और आरभटी के लक्षण की व्यावृत्ति से सम्पन्न है। डिम, डिम्ब, विद्रव ये पर्यायवाची है, इनके योग से डिम होता है। अन्य लोग कहते हैं कि जो उड़ते है, वे उद्धत नामक डिम है। उनकी अपनी वृत्ति जहाँ हो, वह डिम हैं, "इको ह्रस्वोऽडन्थो गालवस्य" सूत्र से 'डी' में ह्रस्व होता है और मन् प्रत्यय होकर 'डिम' शब्द बनता है। नानाश्रयगत भावों से सम्पन्न होने के कारण समस्त भावों से युक्त होने से वृत्तों में वैचित्र्य कहा गया है। नाटक के बाद डिम का लक्षण बताना यद्यपि उचित था, तथापि नाटक में होने वाले प्रवेशक आदि को सम्भावना का निराकरण करने के लिए प्रकरण से अपकर्ष करके इसका कथन किया है, इसलिए चार दिन के वृत्तान्त का हो इसमें प्रयोग करना चाहिए। यहाँ पर अङ्कावतार हो होता है, इसलिए युद्धादि के वर्णन में चूलिका, अङ्कमुख का समुपयोग यहाँ भो होता है। इसो प्रकार प्रवेशक आदि असिद्ध हो है, तथापि प्रवेशक का होना यहाँ असम्भव है। सरस इतिबृत्त के वश से जैसे अङ्कों में परस्पर सम्बन्ध न होने के कारण, जैसे समवकार में बहुत अड्कों में भी उसका अवसर प्राप्त होने से प्रकरण का उत्कर्ष होता है। वहाँ नाटक के बाद उसके कथन में प्रकरण को इसका स्पर्द्धो नहीं कहा जा सकता, और भो नाटक के बाद प्रकरण के कहे जाने पर नाटिकादि का भेद कैसे कहा जायेगा ? क्योंकि नाटिका में स्त्रियों की प्रधानता है। अतः इसके बाद तीन शृद्गार वाले समवकार का कथन हो उचित है। इसी के प्रसङ्ग से दिव्य पुरुषों के सम्बन्ध से ईहामृग कहा है और तदनन्तर दिव्यपुरुषाधिकार से अन्य रूपकों को कहा। अतः उसके पहिले अनेक रसों से युक्त विस्तृत इतिवृत्त होने के कारण यह कथन उचित है, अधिक कहने से क्या काभ ?॥ ८४-८८ ॥ ना० ग्रा .- 66

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६९८ नाटघशास्त्रे

डिमलक्षणमित्युक्तं मया समासेन लक्षणानुगतम्। व्यायोगस्य तु लक्षणमतः परं संप्रवक्ष्यामि॥ ८९॥ व्यायोगस्तु विधिज्ञैः 'कार्य प्रख्यातनायकशरोरः। अल्पस्त्रीजनयुक्तस्तवेकाहकृतस्तथा चैव ॥ ९० ॥ बहुवश्च तत्र पुरुषा 'व्यायच्छन्ते यथा समवकारे। *न च दिव्यनायकयुक्तः कार्यस्तवेकाड्कू एवायम् ॥। ९१।। न च दिव्यनायककृतः कार्यो राजषिनायकनिबद्ध:। युद्धनियुद्धाघर्षणसंघर्षकृतश्च कर्तव्यः ॥ ९२।

व्यायोगस्तु डिमस्यैव शेषभूतो, विव्यनायकाभावात् केवलमत्रोदात्तस्य राजावेः नायकता, अपि त्वमात्यसेनापतिप्रभृतेर्दीप्तरसस्य, अत एवाह- प्रख्यातनायकेति। उदात्तग्रहणमपाकतव्यमित्यथं:।।१०।।

अनुवाद-इस प्रकार संक्षेप में मेंने डिम का लक्षण कहा है इसके बाद अब मैं व्ययोग का लक्षण कहूँगा ।। ८९॥ अनुवाद-नाटघवेत्ताओं को व्यायोग को रचना इस प्रकार करनी चाहिए, जिससे नायक और इतिबृत्त प्रख्यात हो और स्त्रीपात्र अल्प हों, तथा एक बिन को अभिनेय घटना हो, समवकार के समान इसमें भी बहुत से पुरुष पात्र नायक होते हैं, किन्तु विष्य नायक नहीं होता। इसमें एक ही अङ्क करना चाहिए। इसमें रा्जषि नायक होता है, किन्तु विव्य नायक नहीं होता। इसमें युद्ध, नियुद्ध आकर्षण एवं संघर्ष होते हैं॥। ९०.९२॥ अभिनव-व्यायोग डिम का ही अङ्गभूत है, यहां पर केवल दिव्य नायक के न होने से उदात्त राजा आदि नायकता रहती है। तथा दोप्त रस वाले अमात्य सेनापति प्रभृति की नायकता भो रहती है। इसोलिए कहा है-'प्रख्यातनायक शरीरः'। उदात्त शब्द का ग्रहण नहीं करना चाहिए॥ ९०॥

१. ख. ग. कर्तव्य: रूपातनायकशरोरः । २, क. (टि०) स्त्रीजनयुक्तस्तु डिमः । स्यादेकाहप्रयोज्यर्च । ३. ख.ग. कविभि: कार्या। क-भ, नित्यं कार्य यथा। ४. ख. न च तत्प्रमाणस्तु तदेकाक्कः संविधातव्यः । ग, न च ततप्रमाणयुक्तः कार्या एकाचू एवायम्।

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अष्टादशोऽध्याय: ६९९

एवंविधस्तु कार्यो व्यायोगे दोप्तकाव्यरसयोनिः । वक्ष्याम्यतः परमहं लक्षणमुत्सृष्टिकाङ्कस्य ॥ ९३॥ यथा समवकार इति द्वादशेत्यर्थ:ः। तावदङ्कपरिमाणशङ्कामतिदेशात प्रत्यासत्या प्रसक्तां वारयितुमाह-एकाङ्क एवेति। एवकारेणैकाहचरित विषयत्वाम्न्यायप्राप्तमेवा त्रैका ङत्वमित्याह ।। ९१ ।। ननु प्रख्यातनायकशब्देन किमत्र गृहोतमित्यप्रतिप्रसङ्गं शमयति-न चेति। चो भिन्नक्रमः। दिव्यैदवैः तृपैः ऋ षिभिश्च नायकेः न निबद्धोऽयं भवतीत्यर्थः। ननु कस्मादयं व्यायोग इत्याह-युद्धं नियुद्धेति व्यायामे युद्धप्राये नियुध्यन्ते पुरुषा यत्रेति व्यायोग: इत्यर्थः। नियुद्धं बाहुयुद्धं संघर्षः शोर्यविद्याकुलरूपादिकृता स्पर्धा ॥ ९२॥ दोप्तं काव्यमोजोगुणयुक्तं, दोप्तरसाद्या वोररौद्राद्याः तबुभयं योनि: कारणमस्य ॥९३॥ अभिनव-जैसे समवकार में बारह नायक होते हैं। अतिदेश की प्रत्यासत्ति से प्रसक्त होने वालो अङ्क परिमाण को शङ्का का निराकरण करने के लिए कहते हैं कि इसमें एक अङ्क होने चाहिए। यहाँ एवकार से एकाह चरित की विषयता होने से यहाँ एकाङ्कत्व न्याय प्राप्त है, इस प्रकार कहा है। अभिनव-अब प्रख्यात नायक शब्द से यहाँ किसका लिया गया है? इस अतिप्रसङ्ग का शमन करते हैं-न चेति ! यहाँ चकार का क्रम भिन्न है। यह दिग्य देवता, नूप, ऋषि नायकों से निबद्ध नहों होता। अभिनव-पुनः प्रश्न होता है कि इसे व्यायोग क्यों कहते हैं? कहते हैं कि इसमें युद्ध, नियुद्ध और युद्धप्राय होता है, यहाँ पुरुष नियुद्ध (बाहुयुद्ध) करते हैं-इसलिए इसे व्यायोग कहते हैं। नियुद्ध का अर्थ बाहुयुद्ध है। और संघर्ष का अर्थ शोर्य, विद्या, कुल तथा रूप आदि से होने वालीस्पर्द्धा है॥ ९०-९२।। अनुवाद-इस प्रकार दोप्त काव्य और दोप्त रस दोनों जिसकी योनि है, उस व्यायोम को रचना करनो चाहिए। इसके बाद अब उत्सृष्टिकाङक का लक्षण कहूँगा ।। ९३ ।। अभिनव-दोप्त काव्य का अभिप्राय है ओजोगुण से युक्त काव्य और दोप्त रस आदि अर्थात् रौद्र, वीर आदि रस ये दोनों गुण और रस जिसकी योनि (कारण) है॥ ९३॥

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७०० नाटघशास्त्र

प्रख्यातवस्तुविषथस्त्वप्रख्यानः कदाचिदेव स्यात्। विव्यपुरुषैवियुक्त: शैषैर्युक्तो भवेत्पुंभिः ॥ ९४।। करुणरसप्रायकृतो "स्त्रीपरिदेवितबहुलो निरवेंदितभाषितश्चैव'।। ९५।। नानाव्याकुलचेष्टः सात्त्वत्यारभटोकैशिकोहीनः। 5काय: काव्यविधिज्ञैः सततं ह्य तसृष्टिकाक्कस्तु ॥। ९६।।

रौद्राद्यनग्तरं "रौद्रस्य चैव यत्कम स ज्ञेयः करणः (६-४५)" इत्युक्तत्वात्त-

अभिनव-रौद्र रस के अनन्तर "रौद्र का जो कर्म है उसे करुण रस समझना चाहिए" इस कथन के अनुसार करुण रस प्रधान उत्सृष्टिकाङ्क को इसके बाद कहते हैं- अनुवाद-उत्सृष्टिकाङ्क की कथावस्तु प्रल्यात होनी चाहिए और कभी- कभी अप्रख्यात भी हो सकती है। यह दिव्य पुरुष को छोड़कर शेष सभी प्रकार के पुरुषों से युक्त होता है। इसमें प्रायः करुण रस होने से युद्ध और उद्धत प्रहार इसमें नहीं होते। तथा इसमें स्त्रियों के विलाप अधिक होने से निर्वेदयुक्त भाषण अधिक होते हैं। इसमें व्याकुलमय अनेक चेष्टायें होती हैं, इसमें सात्त्वती, आरभटी और कैशिकी वृत्तियाँ नहीं होती। इस प्रकार नाटयतत्ववेत्ताओं को उत्सृष्टाङ्क की रचना करनी चाहिए ।। ९४-९६।। १. क-प. तेष्वप्ररूयातं वस्तु वा। क-भ. अप्रख्यातोऽपि वा क्वचित्कायं। २. ख. ग घ. शेषरन्यैभंवेत्। व-प. समन्वितः पुंभिः । ३. क-द. करुण रसार्थप्रायो। ४. क-भ. बद्धोद्वतप्रहारशच । ५. ख. ष. स्त्री देवन ." । ६. ख. ष. निर्वेदितवाक्यभाषाश्च । ७. क. (द.) नानाध्याकुलचेष्टः ।

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अष्टादशोप्याये: ७०१

प्रख्यात भारतावियुद्धे विषये निमित्ते सति यत्तत्करुणबहुलं चेष्टितं वण्यंते तस्खतं स्त्रीपर्ववृत्तान्तवत्, माभूदित्यप्रख्यातग्रहणनोक्तम्। तेनोभयोपादानस्य पर- स्परविरुद्धार्थत्वादकिञ्चित्करत्वं नाशङ्ूनीयम् ॥९४॥ निवृत्तयुद्धा उद्धतप्रहारा: पुरुषा यस्मिन्। परिदेवितं दैवोपाल- म्भातम निम्दारूपमनुशोचनं यत्र। निर्वेदितानि श्रुतेषु निर्वेदो जायते तादृंशि भाषि- तानि यत्र व्याकुला चेष्टा भूमिनिपातविवतिताद्याः। सातत्वत्यारभटीकेशिकोहीन इति समाहारद्वन्द्वान्तरद्वन्दवगर्भस्तृतीयासमासः। उत्क्रमणीया सृष्टिर्जोवितं प्राणा यासां ता उत्सृष्टिकाः शोचन्त्यः स्त्रियस्ताभिरङ्ित इति तथोत्ताः। वृत्ति भिर्तसृष्टत्वादित्यन्ये तवा द्वित्वं च त्रित्वमुद्वेशस्यैकदेशेन। अयमङ्क इति निर्दिष्टो वृत्तानुरोधात। इह च करुणरसबाहुल्यादेव देवैवियोग: रौद्रबोभत्सयानकसंबन्धो विव्ययोगे न भवत्यप तु करुणयोगः ।।९६।।

अभिनव-प्रख्यात अर्थात् महाभारतादि युद्ध के निमित्त होने पर जो करुण बहुल चेष्टाये वणित करते हैं, वह स्त्रीपर्व के वृत्तान्त की तरह ख्यात न हो, यह बात प्रख्यात शब्द के ग्रह से कही गई है। इसलिए उभयापादान के परस्पर विरुद्धार्थ होने से अकिञ्चित्करत्व को शक्का नहीं करनो चाहिए।

'निवृत्तयुद्धोद्धत प्रहार' का अर्थ है-युद्ध से एवं उद्धत प्रहारों से निवृत पुरुष जहाँ हों । 'स्त्रोपरिदेवितबहुलः' का अर्थ है परिदेवित अर्थात् देवोप- लम्भात्मक आत्मनिन्दा रूप अनुशोचन जहाँ हो। 'निर्वेदितभाषित' का अर्थ है जिसके सुनने पर निर्वेद हो जाय, ऐसे भाषण जहाँ हों। 'व्याकुलचेष्टः' अर्थात् व्याकुल करने वाली चेष्टायें भूमि पर गिरना एवं लोट-पोट करना आदि। 'सात्त्वत्यारभटीहीनः' में समाहार द्वन्द से भिन्न द्वन्दवगर्भ समास है। 'उत्सृष्टिकाङ्क' का अर्थ है उत्क्रमण करने योग्य सृष्टि अर्थात् जीवित प्राण जिनके वे उत्सृष्टिका हैं अर्थात् शोक करने वालो स्त्रियाँ जिनमें अङ्कित हों, वह उत्सृष्टिकाङ्क होता है। जो बृच्तियों से उत्सृष्ट है वह उत्सृष्टिकाड्क है, ऐसा अन्य लोग कहते हैं। ऐसी स्थिति में वृत्तियों का द्वित्व या त्रित्व उद्देश के एकदेश के अनुसार होगा। वृत्त के अनुरोध से यहाँ 'यह अङ्क हैं' यह निर्देश है। उत्सृष्टिकाङ्क में करुण रस का बाहुल्य होने से देवताओं से वियोग होता है। रौद्र, बोभत्स, भयानक रस का सम्बन्ध दिव्यों के योग में नहीं होता, अपितु करुण रस का योग रहता है । ९४-९६ ।।

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७०२ नाट पशास्त्रे यदिव्यनायककृतं काव्यं संग्रामबन्धवधयुक्तम्। तद्भारते तु वर्षे कर्तव्यं काव्यबन्धेषु ॥। ९७ ।। कस्माद्भारतमिष्टं वर्षेष्वन्येषु देवविहितेषु"। हृद्या सर्वा भूमि: शुभगन्धा काठचनो* यस्मात् ।। ९८।। उपवनगमनक्रोड़ा विहारनारीरतिप्रमोदा: स्युः । तेषु" हि वर्षेषु सदा न तत्र दुःखं न वा शोक: ॥ ९९॥ नन्वेवं देवानां युद्धमप्यनुचितमित्याशंक्य प्रसङ्गात्समवकारादौ देशविशेषोप- यागं द्शयति-दिव्यनायककृतमिति। तेषां भारतवर्षावतोर्णानां युद्धादिकं प्रदर्शयेदित्यर्थः।।९७।। अत्र राज्ञ: पृच्छति कस्माद्गारतमिष्टमिति। अत्र प्रयोगे प्रतिर्वक्ति वर्वेष्ब- न्येष्विति देशत्वेन भोगभूमित्वे विहितेष्वपीत्यर्थंः ।। ९८।। अभिनव-इस प्रकार यहाँ देवताओं का युद्ध भी अनुचित है ऐसी आशङ्का करके प्रसङ्गवश समवकारादि में देश विशेष का उपयोग दिखाते हैं- अनुवाद-जो दिव्य नायकों द्वारा किये जाने वाले युद्ध, वध एवं बन्घन से युक्त काव्य है, उसे भारतवर्ष में काव्य रचनाओं में करना चाहिए।।९७।। अभिनव-उन भारतवर्ष में अवतीर्ण उन देवताओं के युद्ध आदि का प्रदर्शन करना चाहिए। ९७ ॥ अनुवाद-देवताओं के द्वारा निर्मित अन्य वर्षों (देशों) के होने पर भी भारतवर्ष ही क्यों इष्ट (अभोष्ट) है। क्योंकि यहाँ की भूमि हृद है, शुभ गन्बों बाली है और काञ्नो (सुवर्णमयी) है।। ९८ ॥ अभिनव-यहाँ राजा से पूछते हैं कि भारत हो क्यों इष्ट है? उत्तर देते हैं कि अन्य देश भोग भूमि है। अनुवाद-अन्य वर्षों (प्रदेशों) में सदा उपवन-गमन क्रोड़ा, विहार, स्त्रियों के साथ रति और प्रमोद (आनन्द) होते हैं, वहाँ न दुःख है न शोक ॥ ९९॥ १. ख. तस्मात्। २. ख. नित्यकालं हि। ३. क-प. हेमरत्नमयो यस्मात् । ४. क. (टि) भ. तस्मिन्नित्यं वर्षे। ५. ख. न भवति दुःखं न वा तयेकम्।

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अष्टादशोषधयायः ७०३

ये' तेषामधिवासा: पुराणवावेषु पर्वताः प्रोक्ताः । सम्भोगस्तेषु भवेत्कर्मारम्मो भवेदस्मिन् ॥ १०० ॥ उपवनं गत्वा क्रोडा जलक्रोडाविका: विहरणमुपवन एव सञ्चरणं नार्या सह रतिः संभोग: प्रमोदो दिव्यपानाविकृतम् ॥९९॥ नग्वेवमिलावृ तकुरुप्रभृतिषु वर्षषु मा तेषां देवानां वृत्तं व्याख्यायि तथापि स्वनिवासेषु व्यावण्यंतामित्यत आह-ये तेषामधिवासा इति । वसन्ति तेष्विति वासाः। पवता इति कैलासादयः, संभोग इति सा हि तेषां भूमिः भोगस्थानं, अस्मिन्निति भारतवर्ष कर्मारम्भः आरम्भग्रहणेनेवमाह-न तेषां दुःखं पूर्ण कदाचिद् भवति। दुखपूर्णतायां देवत्वस्यैव विघातोऽनवस्थानप्राप्त्या स्वरूपलोप इति युक्तमुक्तम्। करुणारसबाहुल्यादुतसृष्टिकाङ्क: दिव्येवियोग एव तेषां सुखबाहुल्यात्तत्सन्निधाने अन्यस्यापि शोकावसर पराकृतेरिति गाढदुःखाभि- भता, एवंभृतप्रयोगदर्शने सति 'दुःखी दुःखाधिकान् पश्ये' दिति नोत्या प्रतन्भूत- दुःखभारा: सुखेन विनेया भवन्ति, यथोक्तं प्राक् स्थैर्यं दुःखादितस्य च (१.१११) इत्युत्सृष्टिकाङ्ूप्रयोग: ॥। १०० ।। अभिनव-उपवन में जाकर जल क्रीड़ा करना, उपवन में विहार करना (घूमना), स्त्री के साथ सम्भोग और दिव्य सुरा का पान करना चाहिए ॥ ९९।। अभिनव-अब प्रश्न यह है कि इस प्रकार इलावृत कुरु प्रभृति वर्षों (प्रदेशों) में उन देवताओं का वर्णन वृत्त नहीं करना चाहिए, किन्तु अपने निवासों में वर्णन करना चाहिए, इस पर कहते हैं- अनुवाद-पुराण और इतिहास में जो पर्वत उनके अघिवास कहे गये हैं उनमें सम्भोग होता है और उसमें कर्मारम्भ है॥ १०० ॥ अभिनव-जिसमें वे रहते हैं वे वास हैं, पर्वत कैलास आदि हैं। सम्भोग का अथं है वह भूमि जो उनकी भोग भूमि है। 'अस्मिन्' का अर्थ है भारतवर्ष में कर्म का आरम्भ होता है। आरम्भ पद से यह बताया गया है कि भारत में पूर्ण दुःख कभी नहीं होता, क्योंकि पूर्ण होने पर देवत्व का हो विधात हो जायेगा। यहाँ अवस्था दोष होने पर देवताओं के स्वरूप का लोप हो जायेगा, यह ठोक हो कहा गया है। करुण रस को बहुलता से उत्सृष्टिकाङ्क में देवताओं का वियोग १. ख. ग. न तेषामपि वासाः । पुराणवादे च पर्वता गदिताः। २. क, कर्मारमभस्तथा ह्यस्मिन्।

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७०४

अड्कस्य लक्षणमिदं व्याख्यातमशेषयोगमान्नगतम्। प्रहसनमतः परमहं सलक्षणं संप्रवक्ष्यामि॥ १०१॥ प्रहसनमपि विज्ञेयं द्विविधं शुद्धं 'तथा च सड्कोर्णम्। वक्ष्यामि® तयोर्युवत्या पृथवपृथग्लक्षणविशेषम् ॥ १०२॥

एवं रञ्जनाप्रधानेन करुणेन युक्तं रूपकमभिधाय रञ्जनप्रधानं हास्यप्राप्यं प्रहसनं लक्षति विभागमुखेन प्रहसनमपि विज्ञेयमिति द्विविधमिति। विभाग: शुद्धं संङ्कीणं चापीति। अपिशब्दोऽतिक्रमार्थः । तथेति सामान्य- लक्षणम्। तवयमयं: लक्षणविशेषं विशेषलक्षणम् ।

होता है और देवताओं के सुख बहुल होने से उनके सन्निधान में दूसरों के शोक के अवसर दूर हो जाते हैं, हट जाते हैं। इस प्रकार के प्रयोगों के देखने से गाढ़- दुःखाभिभूत पुरुष "दुःखी अपने से अधिक दुःखी को देखॅ" इस नीति के अनुसार दुःख का भार क्षीण हो जाने से वे सुखपूर्वक विनेय हो सकते हैं। जैसा कि पहिले कहा जा चुका है कि "दुःख से पीड़ित को नाट्य धैर्य प्रदान करता है। इस प्रकार उत्सृष्टिकाङ्क का प्रयोग पूर्ण हुआ॥ १००॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने अङ्क (उत्सृष्टिकाङ्क) का लक्षण व्यवस्थित रूप में बतला दिया है, इसके बाद अब प्रहसन के लक्षण बतलाऊँगा ॥ १०१॥ अभिनव-इस प्रकार रञ्जन की अप्रधानता वाले करुण रस से युक्त रूपक का लक्षण बतलाकर अब रञ्जन प्रधान, हास्य बहुल विभाग के द्वारा प्रहसन का लक्षण बतलाते हैं- अनुवाद-प्रहसन दो ग्रकार का होता है-शुद्ध और सड्कीणं। अब मैं युक्ति के साथ अलग-अलग विशेष लक्षण को बतलाऊँगा॥ १०२॥ अभिनव-प्रहसन के विभाग को बतलाते हैं-शुद्ध और सङ्कीणं। यहाँ अपि शब्द का अर्थ अतिक्रमण 'तथा' पद से सामान्य लक्षण। का कथन है। लक्षण विशेष का अर्थ विशेष लक्षण है ॥ १०२॥

१. स. तथब।

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अष्टावशोष्ध्याय: ७०५

भगवत्तापसविप्रैरन्यैरपि हास्यवादसंवद्धम् । *कापुरुषसंप्युक्त परिहासाभाषणप्रायम् ॥१०३॥ अविकृतभाषाचारं दिशेषभावोपपन्नचरितपदम्। नियतगतिवस्तुविषयं शुद्धं ज्ञेयं प्रहसनं तु ॥ १०४ ॥

भगवत्तापसविप्रा: यतिवानप्रस्थगुहस्थाः, अन्ये शाक्यावयस्तैरूपक्षक्षितम्। हास्यप्रधानवचनसंबग्घशोलनाविना कुत्सितैः पुरुषैरत एव प्रहत्यमानैः सामर्थ्यात्तैरेव भगवदादिभिर्युक्तम् ।। १०३॥ तथापि च भाषाचारौ यत्र न विकृतावसत्याश्लीलरूपौ तथा विशेषेण भावैः व्यभिच्ारिमिरुपपन्नानि पदानि कथाखण्डानि यस्मिन्। नियतगतिः एकप्रचारं यत्स्तु तद्विषयः प्रहसनीयलक्षणो यत्र, तच्छुद्धं प्रहसनम्। जत्र निरवचनं यतः परिहासप्रधानाम्याभापणान्यत्र बाहुल्येन भवन्ति तेन यत्रैकस्यैव कस्यचित् चरितं दुष्टल्वात्प्राधाग्येन प्रहस्ते तच्छुद्धमित्यर्थः॥१०४॥

शुद्ध प्रहसन अनुवाद-भगवत्तापस जर्थात् भगव्दक्त तपस्वी, विप्रों तथा अन्य पुर्षों के हास-परिहास पूर्ण सम्वाद से युक्त तथा कुस्सित पुरुषों के द्वारा सम्प्रयुक्त परिहासपूर्ण आभाषणों से युक्त, अविकृत भाषा और आचार (व्यवहार) से सम्पन्न विशेष भावों और चरितों से उपपन्न नियतगति और बस्तु विषयक शुद्ध प्रहसन समझना चाहिए॥ १०३-१०४॥ अभिनव-'भगवत्तापसविप्राः' का अर्थ है-यति, वानप्रस्थ, गृहस्थ और दूसरे शाक्य बौद्धभिक्षु उनसे उपलक्षित। हास्य-प्रधान वचनों के सम्बन्ध का शोलन करने से कुल्सित पुरुषों के द्वारा प्रहस्यमान उन्हीं लोगों से भगवत्तापसादि से युक्त शुद्ध प्रहसन होता है। तथापि भाषा और आचार जहाँ पर विकृत इलील रूप न हों, तथा विशेष रूप से व्यभिचारी भावों से उपपन्न पद कथाखण्ड जिसमें हों, नियतगति तथा एक प्रचार जो वस्तु हो वह विषय प्रहसन के योग्य लक्षण हो जहाँ, वह शुद्ध प्रहसन है। यहाँ प्रहसन पद का निर्वचन करते हैं, क्योंकि यहाँ परिहास प्रधान आभाषण बाहुल्येन होते हैं। इसलिए जहाँ पर किसी एक व्यक्ति का चरित दुष्ट होने से प्रधान रूप से हास्य का विषय बने, वह शुद्ध प्रकार है॥ १०३-१०४॥

१. ख. नोचजन: .। २. ख. विशेष भाबोपहास""। ना. शा०.८९

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७०६ नाटपशास्त्रे

वेश्याचेटनपुंसकविटधूर्ता' बन्धको च यत्र स्युः । अनिभृतवेषपरिच्छदचेष्टितकरणैस्तु संकीर्णम् ॥ १०५॥ लोकोपचारयुक्ता या वार्ता यश्च वम्भसंयीग: । स प्रहसने प्रयोज्यो धूर्तप्रविवादसम्पन्नः ॥१०६॥

यत्र तु वेश्यादिभिर्योगोऽत्युल्बणं चाकल्पादि तदेकद्वारेणानेकवेश्याविचरितेन हसनीयेन सङ्कीणंत्वात सङ्कोणंम्। अन्ये त्वाहु :- येषां स्वभावत एव चरितं शिष्टमध्ये सभ्येतरतमत्वेन प्रहसनाहं तवविशुद्धत्वात्सङ्कोणम तद्योगाच्च रूपकम्। ये तु स्वभावतो न गहिता भगवत्तापसाविचेष्टाविशेषास्तेषां प्राकृतपुरुषसंक्रान्ति- दौरात्म्योवितामन्यसंबन्धदूष्यमाणतया प्रहृसनोयतां यातास्ते स्वभावशुद्धाः तद्योगा- द्रूपकं शुद्धमिति॥१०५ ॥ उभयसाधारणोमपि कबे: शिक्षामाह-लोकोपचारेति। अनुवाद-जहाँ पर अत्यन्त अस्य वेश-भूषा, वस्त्र, चेष्टा तथा विचित्र उपकरणों के साथ जहाँ पर वेश्या, चेट, नपुंसक, बिट, धूर्त तथा बन्धकी स्त्री की स्थिति हो, उसे 'मिश्' (सङ्कीर्ण) प्रहसन कहते हैं॥ १०५ ॥ अभिनव-जहाँ पर वेश्यादि का सम्बन्ध हो और वेष-भूषादि अत्यन्त उज्व्वल हो वहाँ एक के द्वारा अनेक वेश्याओं के चरित हास्य का विषय बनने से सङ्कीणं होने से सङ्कीण प्रहसन होता है। अन्य आचार्य कहते हैं कि-जिनका चरित स्वभावतः शिष्ट जनों के मध्य अत्यन्त असभ्य होने से प्रहसनीय हो, वह विशुद्ध न होने से सङ्करोर्ण भेद होता है। और उनके योग से रूपक भी सङ्कीणं होता है। और जो भगवत्तापस आदि की चेष्टाये स्वभाव से गहित नहीं है, किन्तु प्रावृत पुरुषों के सङ्क्रमण के संसर्ग से दौरात्म्य से उदित अन्यों के संसर्ग से दूषित होने से प्रहसनीयता को प्राप्त होते हैं वे स्वभावतः शुद्ध और उनके योग से रूपक भी शुद्ध होता है॥ १०५ ॥। काव्य और लोक में उभय साधारणी शिक्षा को कवि के लिए कहते हैं- अनुवाद-जो वार्ता लोक व्यवहार से युक्त है तथा जो वम्भ का संयोग धूरत्तों के वाद-विवाद से सम्पन्न हो उसे प्रहसन में प्रयोग करना चाहिए॥ १०६।

१. ख धतंबिटा। २. ख. करणात्तु। ३. ख. तत्प्रहसने प्रयोज्य। ग. तत्प्रह्सनेषु योज्यं।

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बोथ्यङ्ग: संयुक्तं कर्तव्यं प्रहसनं यथायोगम्। भाणस्यापि तु लक्षणमतः परं संप्रवक्ष्यामि॥ १०७॥ वार्ता प्रसिद्धिर्यदि सा लोकव्यवहारसिद्धा भवति, यथा शाक्यानां स्त्रोसंपर्क: प्रहसनोयो भर्वति, न चौयम्। एवं भाविप्रसिद्ध एवोपहसनीयः । अत्राधिकरणं स्वयमेवाह-धूतप्रविवादेति। धूर्ताः कृत्रिमतापसावयः विटावयश्च। तद्विषयो यः प्रकृष्टौ विवाद: विरु्दतयावभासस्तेन फलभूतेन संपाद्यतया यदुक्तं प्रहस्यमानं तथाभूतचरितावलोकनेन हि संस्कृतमिति व्युत्पाद्यो न भूयस्तात्वञचकानु- पसर्पतीति ॥१०६॥ वोथ्यङ्गरिति वक्ष्यमाणैः यथायोग्यमिति तेषां संप्रयोगे संख्यायाः क्रमस्य तु न कश्चिन्नियम इति दशयति। प्रहसनस्याङ्कनियमानभिधानात शुद्धमेकाङ्कं, सङ्कीणं- त्वेनेकाङकम् वेश्यादिचरितसंख्याबलादिति केचित्। अन्ये त्वेकाङकप्रकरणमध्यपातित्वादेकाक्कमिति मन्यन्ते प्रथमसंख्यातिक्रमे भेवाभावपरित्यागे च प्रमाणाभावात्॥ १०७।

अभिनव-जो वार्ता, प्रसिद्धि) लोक व्यवहार से सिद्ध होती है। जैसे- बौद्धों का स्त्री संसर्ग प्रहसनीय होता है किन्तु चौर्य प्रहसनीय नहीं होता। इस प्रकार प्रसिद्धि को प्राप्त वृत प्रहसनोय हाते हैं। वृत्त के अधिकरण को स्वयमेव कहते हैं धूर्तप्रविवादिति। धूर्त कृत्रिम तपस्वी आदि ओर जो विट आदि हैं। उनके सम्बन्ध में जो प्रकृष्ट विवाद हैं, विरुद्ध रूप से अवभास है। उस फलभूत विवाद से सम्पाद्य होने से जो प्रहस्यमान कहा गया है, उस प्रकार के चरित के अवलोकन से संस्कृत व्युत्पाद्य फिर कभी वञ्चकों के जाल में नहीं फँसता ॥ १०६ ॥ अनुवाद-प्रहसन को यथायोग वोथो के अङ्गों से संयुक्त करना चाहिए। इसके बाद अब भाषा के लक्षण को कहूँगा॥ १०७ ॥ अभिनव-वीथ्यङ्गेः अर्थात् वक्ष्यमाण वीथी के अङ्गों से। यथायोग उनके सम्प्रयोग में संख्या के क्रम का कोई नियम नहीं है, इसको दिखाते हैं। प्रहसन में अक्कों के नियम का कथन न होने से शुद्ध प्रहसन एकाढ्को होता है और वेश्यादि के चरित को संख्या के बल से सङ्कोणं प्रहसन अनेक अङ्गों वाला होता है, ऐसा कोई आचार्य कहते हैं।

४. ख. उद्घात्यकाविभिरिदं वोष्यङ्ये मिश्चित भवेन्यिश्रम्।

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नाटघशास्त्रे

आत्मानुभूतशंसी विविधाश्रयो हि भाणो विज्ञेयस्त्वेकहायशच ॥ १०८ ॥

अथ हास्यरसोचितविटधूर्ता्यनुप्रवेशेन समानयोगक्षेमं भाणं लक्षयितुमाह- आत्मानुभृतसंसीति। एकेन पात्रेण हरणोयः समाजिकह्वयं प्रापयितव्योऽर्थो यत्र स भाण:। एकमुखेनैव भाण्यन्ते उक्तिमन्तः क्रियन्ते अप्रविष्टा अपि पात्रविशेषा यत्रेति भाण: । तत्र स प्रविष्टः पात्रविशेषः आत्मानुभूतं वा शंसति परगतं वा व्णंयति॥१०८॥

अभिनव-अन्य लोग कहते हैं कि प्रथमोक्त संख्या के अतिक्रम में और भेदाभाव के परित्याग में प्रमाण का अभाव होने से एकाड्की प्रकरण के मध्यपाती होने से एकाड्की मानते हैं॥ १०७॥ अब हास्य रस के योग्य विट, धूर्त आदि के अनुप्रवेश से प्रहसन के समान योगक्षेम वाले भाण का लक्षण बतलाते हैं- अनुवाद-आत्मानुभूत बात को कहने वाला और दूसरों के विषय की बातों का वर्णन करने वाला एक पात्र के द्वारा अभिनेय 'भाण' कहलाता है। १०८ ॥ अभिनय-एक पात्र के द्वारा हरणीय (सम्पादनीय) सामाजिक के हुबय में प्रापर्यितव्य अर्थ जहाँ कहा जाय, वह 'भाण' है। रङ् में अप्रविष्ट पात्र विशेष भी जहाँ एक पात्र के मुख से कहते हैं अर्थात् अपने कथन को श्रोता के अन्तःकरण में पहुँचा देते हैं, वह 'भाण' है। वह प्रविष्ट पात्र विशेष आत्मानुभूत अर्थ को कहता है अथवा दूसरे की बात का (चरित का) वर्णन करता है॥ १०८ ॥

१. ग. विशेषेषु। २. ग. द्वि विषाश्रयो .. ।

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परवचनमात्मसंस्थं प्रतिवचनैर्तरोत्तर ग्रथितैः । आकाशपुरुषकयितैर ङ्गविकारैरभिनयैश्चैव' ॥१०९॥ धूर्तविटसंप्रयोज्यो नानावस्थान्तरात्मकशचैव। 2एकाड्को बहुचेष्टः सततं कार्यो बुधैर्भाणः ॥ ११० ॥ तत्र च प्रयोगप्रयुक्तिमाह-परवचचनमिति। परसन्धिवचनं स्वयमङ्गविकारैर- भिनयेतु। ननु तत्परवचनमयुक्तं कथमभिनयेत् आह-आकाशे शूग्ये यानि पुरुषकथितानि दृष्टानि यत्र शून्धे तेन वण्यंन्ते वा कश्चित्पश्यत्याकणयति च तत्र च तद्वचनं स एवानुवदन् सामाजिकान् बोषपति। यथा "भो बाडव ! अले किं ब्रवीषि" इत्यादौ न केवलं परवचतमभितयेत्, किन्तु प्रतिवचनैः स्वोवतैः सह, अत एवोत्तरोत्तरप्रथित- योजनाभिरुपलक्षितैः॥१०९॥

अनुवाद-आत्मानुभूत दूसरे के वचनों को आकाशभाषितों के द्वारा उत्तरोत्तर ग्रथित प्रतिवचनो के द्वारा आङ्गिक अभिनयों से शारीरिक चेष्टाओं को प्रदर्शित करते हुए धूर्स एवं विटों द्वारा प्रयोज्य नाना अवस्थाओं वाले तथा बहुत चेष्टाओं वाले एकाड्की भाण का विद्वानों द्वारा अभिनय करना चाहिए ॥ १०९-११०॥ अभिनव-प्रयोग की युक्ति को कहते हैं-पात्र दूसरों के कहे वचन को स्वयं अपने अङ्गविकारों से अभिनोत करें। अब प्रश्न होता है कि युक्तिरहित दूसरे के वचनों का अभिनय कैसे करें? इस पर कहते हैं कि शून्य आकाश में परपुरुष के कथित अथवा दृष्ट वचनों को शून्य में वर्णन करें अथवा जैसा कोई देखता है, या सुनता है वहाँ उसके वचन का अनुवाद करता हुआ सामाजिकों को बोध करायें। जैसे- "भो वाड़व ! अले, किं ब्रवोषि" इत्यादि स्थलों में केवल दूसरों के वचनों का अभिनय न करें। किन्तु अपने कहे हुए वचनों के साथ तथा उत्तरोत्तर ग्रथित योजनाओं से उपलक्षित कर अभिनय करें।

१. ख. अभिनयेत्तत्। २. ख. ग. एकाङ्गो।

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७१० नाडयशास्पे

ननु योऽसावेकोऽत्र प्रविशति स क इत्याह-धूतविटेति। नानाप्रकारा- वस्थाविशेषात् लोकोपयोगिव्यवहार एव आत्मा वाच्यं यस्य, अत एव बहुचेष्टः सततं कार्य इति सकलसामान्यपृथग्गतोपयोग्यस्तु लोकव्यवहारो वेश्याविटादि वृत्तान्तात्मा निरूव्य इति बाहुल्येन पृथग्जनव्युत्पत्तियोनिरूपकमिदं राजपुत्रा- दोनामपि शम्भलीवृतान्तो ज्ञेय एवावञ्चन र्थमिति संप्रयोज्य इत्यर्थः ॥ ११० ॥ इदमिह मोमांस्यं-य एते उत्सृष्टिकादयो रूपकभेदा: ते तावदेकरसा एव यद्यपि नाटकावयोऽयेवमेव। तथापि सर्वरसयोग्यतायामपि नाटके प्रकरणे च धर्मार्थादिवीर एव प्रधानं परमार्थतः सर्वेषु नायकभेदेवु वोरत्वानुगमवशंनात्। समवकारे तु यद्यपि हि शरुङ्गारादित्वमुक्तं तथापि वोर एव प्रवानं रौद्रो वा। डिम- व्यायोगयोरप्येवम् । ईहामृगेऽपि रौद्रप्राधान्यमेव, नाटिकायां तु श्रुङ्गार एव प्रधानम्।

अब प्रश्न होता है कि जो यह अकेला रङ्गमञ्च पर प्रवेश करता है वह कौन है ? इस पर कहते हैं कि धूर्त, विट होता है। अनेकविध अवस्थाओं के वैलक्षण्य से लोकोपयोगो व्यवहार हो आत्मा अर्थात् वाच्य है जिसका, इसलिए बहुचेष्डा वाले भाण को सतत प्रस्तुत करना चाहिए, क्योंकि यह सकल सामान्य जन के उपयोगो वेश्या तथा विट के वृत्तान्त रूप लोक व्यवहार का निरूपण करते हैं। इस प्रकार यह रूपक बाहुल्येन सामान्य जन की व्युत्पत्ति की योनि है, अतः धोखा न हो जाय, इसलिए राजकुमारों की शम्भली के वृत्तान्त को जानना चाहिए, इस प्रकार धोखा न खा जाय कुट्टिनी के वृत्तान्त का भी नाट्य में प्रयोग करना चाहिए। यहाँ यह विचारणीय है कि ये जो उत्सृष्टिकाङ्क आदि रूपकों के प्रभेद हैं वे सब एक रस है और यद्यपि नाटक आदि भो इसी प्रकार है तथापि नाटक और प्रकरण में सभी रसों की मोग्यता होने पर भी धर्मवीर, अर्थवोर, युद्धवीर आदि वोर रस हो इसमें प्रधान होता है, वस्तुतः नायक के सभी भेदों में वोरता का अनुगम देखा जाता है। समवकार में यद्यपि शृङ्गारादि रस कहा गया है। तथापि वीर अथवा रौद्र रस हो वहाँ प्रधान होता है। डिम और व्यायोग में भी इसी प्रकार होता है। ईहामृग में रौद्र रस की प्रमुखता है किन्तु नाटिका में शृङ्गार रस की प्रधानता होतो है।

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७११

एवं तावद् वीररौव्रशुङ्गारा यथास्वं पुमथंत्रयप्राणभूततवैन वर्तमाना एतेषु प्रयोगेषु शान्तबोभत्सरसौ तु चरमपुम्थयोगात्तत्र च सवस्य नाधिकारोऽपि कस्यचिदपश्चिम जम्मनोऽघिकारान्नाट के यद्यपि तत्फलप्रधानतया प्राधान्यमवलम्बे यातां तथापि नासौ प्रचुरप्रयोग इति तयो: पुरुवार्थप्रवरशणितयोरपि वीरादिरसान्त राध्यावापेनावस्थापनम्। एवं तावत्पुमर्थविषयो रूपकरसविषय एव परमाथंतः, तथापि त्वितिवृत्तवैतत्याव्रसान्तरप्रयोगोऽपि तदङ्गतया तत्र भवति। एवं तत्प्रधान- चेष्टायोगाद वृत्तिवैचित्र्यमत्रोचितमेव। उत्सृष्टिकाङ्कप्रहसनभावास्तु करुणहास्य- विस्मयप्रधानत्वाद रञ्जकरसप्रधानाः, तत एवात्र स्त्रीबालमूर्खादिरधिकारी। न च विततमत्रेतिबृत्तम्, इतिवृत्तवैचित्यमपि तत्रनास्ति। तथाहि-उत्सृष्टि- काढ्ढू तु वृत्तित्रयं तावदवचसा निषिद्ध, भारती चात्र कथं वृत्ति चेष्टा हि करुणेSप्रधानं तदुपकरणं तु परिदेवितात्मिका भारती, तस्मात, फलसंवित्याख्या वृत्ति:, वाक्चेष्टयो: फलानुभव इति यस्या लक्षणं, साम्युपगन्तव्या। अवश्यं चैतत्, अभ्यथा मूर्छा- मरणादौ वाक्येष्टयोरभावे निर्वृत्तिकतैव स्यात। किञच यदि तावत्पुमर्थकामोद्दशेन कैशिक्यभिधीयते धर्ममर्थ चोद्दिश्य बृत्तिद्वयं वत्त्यम। तस्माच्चेष्टात्मिका न्याय- वृत्तिरन्यायवृत्तिर्बाग्रूपा तत्फलभूता फलसंवित्तिरिति वृत्तित्रयमेव युक्तमिति भट्टो- दभटो मण्यते।

इस प्रकार वीर, रौद्र और शङ्गार रस यथाक्रम प्रत्येक धर्म, अर्थ और काम त्रिवर्ग के प्राणभूत होकर इन प्रयोगों में विद्यमान है और शान्त तथा वीभत्म रस तो चरम पुरुषार्थ मोक्ष के योग से सम्बद्ध होने से नाटक में सबका अधिकार न होने से किसी अग्रजन्मा ब्राह्मण का ही अधिकार है। मोक्ष- रूपी फल को प्रधानता से यद्यपि शास्त्र और वीभत्स प्रधानता का अवलम्बन कर सकते है तथापि मोक्ष का प्रचुर प्रयोग नहीं होता। अतः चतुर्विध पुरुषार्थों में पुरुषार्थ प्रवर मोक्ष से अनुप्राणित शान्त और वोभत्स रस का वीरादि से भिन्न रसों के अध्याय से अवस्थापन होता है। इस प्रकार रूपकों में रस का स्थान परमार्थतः पुमर्थ के आश्रय से ही होता है, तथापि इतिवृत्त विस्तृता के कारण रसान्तरों का प्रयोग तदङ्गभूता होता है। अत एव इतिवृत्त के प्रधान रूप (नाटक) की चेष्टा के सम्बन्ध में वृत्ति-वैचित्र्य उचित ही है। उत्सृष्टिकाड्ू प्रहसन और भाण करुण, हास्य और विस्मय रस प्रधान होने के कारण रञ्जन ही फल है, अतः इनके अधिकारी स्त्रो, बालक और मूर्ख हैं।

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७१२ माळघ शास्त्रे

यवाह- आद्ये वाक्चेष्टाम्यां पुरुषाथंचतुष्टयेन चाष्टविधे। षोडशधा फलवुत्तिस्तदृद्वयतोऽनेकधा तु रसभेदात। तवत्र केचिवाहु :- सात्त्वत्यां यद्यपि कैशिकी शक्यान्तर्भावा तथापि रक्षक- स्वातिशयात, पृथगुपात्तात्, स्वरव्मुखजाभिनयतश्च, न चा-यायवत्ती (वृत्तित्वं) पुमथंचतुषकयोगोपपत्तिविप्रतिषेधात्, फलवृत्तौ च वृत्तिसामान्यलक्षणं व्यापाररपत्वं यवि नास्ति तत्कथ वृत्तित्वम् । अस्ति चेद्वाक्चेष्टातिरिक्तो मानसो व्यापारो न कश्चित् लोकसिद्ध इति सूक्ष्मो वाक्चेष्टागत एवोपेत्यः। ततश्च मरणमूर्छादावपि प्राणात्मकायोयग्यापारसंभव एव यदनुस्मरणे लयतालगानानि प्रवर्त्ते संवेदनमपि च मूर्छादी नास्तोति शक्यं वक्तुमिति फलवृत्तिरपि तत्र कथम्। तस्मात्तत्र सात्वत्येव वृत्ति:। यदि बाहुल्यापेक्षया वृत्तिमयं काव्यमिति व्यवहारो रूपकसमुदायापेक्षया खण्डस्यावृत्तिकत्वेऽपि समुदितस्य रूपकस्य वृत्तिमयत्वात्।

इसमें इतिवृत्त भी विस्तीर्ण नहीं होता और इतिवृत्त में वैचित्र्य भी नहीं होता। जैसे-उत्सृष्टिकाङ्क में तोनों बृत्तियों का वाणी से ही निषेध है तो यहाँ भारती वृत्ति भी कैसे होगी? चेष्टा तो करुण रस में अप्रधान है, परिदेवि- तात्मिका भारती वृत्ति तो उपकरण है अतः यहाँ फलसवित्ति नामक बृत्ति रहती है। वाणो और चेष्टा फल का अनुभव है जिसका लक्षण है वहाँ फलानुभवरूपा वृत्ति का अभ्युपगम करना चाहिए। यहाँ यह आवश्यक है, अन्यथा गूरच्छा और मरण आदि में वाक् और चेष्टा के अभाव में कोई वृत्ति नहीं रहेगी। और भी यदि काम रूप पुरुषार्थ के उद्देश से केशिको वृत्ति का अभिधान करेंगे तो धर्म एवं अर्थ के उद्देश्य से दो वृत्तियों को कहना पड़ेगा। इसलिए चेष्टात्मिका अन्यावृत्ति और वाक् रूपा अन्या वृत्ति तथा तल्फलभूता फलसंवित्ति तोसरी वृत्ति माननी पड़ेगी, ये तीन वृत्तियाँ ही युक्त है, यह भट्टोद्द्ट का मत है। जैसा कि कहा है- "वाणी और चेष्टा का चारों पुरुषार्थों के साथ सम्बन्ध होने पर आठ प्रकार को वृत्तियाँ होगी, फिर फलवृत्तियाँ होने से उसके दुगुने सोलह प्रभेद वृत्तियों के होंगे। फिर रसों के भेद से वृत्तियां अनेक प्रकार की होगी।"

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बष्ादशोगष्याय: ७११

यच्छाकलोगर्भमतामुसारिणो मूर्छादावातमसंवित्िलक्षणां पञ्चमीं वृत्ति सकलकार्यनिवृत्यनुमेयां मूच्छाकर्मानुभावेन च फलेनावच्छिम्नामातमव्यापाररूपां मन्यन्ते, न च परिस्पन्ध एवैको व्यापार इति मनसिकृत्य तम्मतं भावाना बाह्यप्रहृणस्वभावत्वमुपपादयद्भि: भट्टलोल्लट प्रभृतिभि: पराकृतमिति न फलवत्तिरवा काचिदिति चतस्र एव वृत्तय: इति। इस विषय में कुछ आचार्य कहते हैं-यद्यपि सार्वतो में कैशिकी का अन्त- र्भाव सम्भव हैं तथापि मनोरञ्जन की अधिकता के कारण तथा वागभिनय के कारण स्वरों की तरह कैशिकी का पृथग् उपादान होने से इन स्वीकृत वृत्तियों से भिन्न वृत्तियों में वृत्तित्व कैसे रहेगा? क्योंकि इन चारों पुरुषार्थों के योग की उपपत्ति न होने से इन स्वीकृत वृत्तियों से भिन्न वृत्तियों में वृत्तित्त्व कैसे रहेगा ? यदि वृत्तियों का सामान्य लक्षण व्यापारत्व उनमें नहीं हो तो फलवृत्ति में वृत्तित्व कैसे रहेगा? यदि यह कहा जाय कि वृत्तियों का सामान्य लक्षण व्यापार उनमें है तो वाणी और चेष्टा से भिन्न मानस व्यापार लोकप्रसिद्ध नहीं है तो वाणी और चेष्टा में कोई सूक्ष्म व्यापार मानना पड़ेगा। अतः मरण और मूर्च्छा आदि में प्राणोय और कायिक (शारोरिक) व्यापार सम्भव होगा। जिसके अनुस्मरण करने पर ताल, लय एवं गायन की प्रवृत्ति होती है। यदि मूर्च्छा आदि में संवेदन नहीं है तो वहाँ फलवृत्ति कैसे होगी? अतः वहाँ सात्त्वती वृत्ति है। यदि बाहुल्य की अपेक्षा के अनुसार रूपक समुदाय की अपेक्षा से सभी काव्य वृत्तिमय है तो खण्डकाव्य के वृत्तिरहित होने पर भी समुदित रूपक वृत्तिमय होंगे। जो शाकली गर्भ के मतानुयायी विद्वान् मूच्छा आदि में सकल कार्यों की निवृत्ति से अनुमेय मूच्छा कर्म के अनुभाव रूप फल से युक्त आत्मव्यापाररूपा आत्मसंवित्ति लक्षणा पञ्चमो वृत्ति स्वीकार करते हैं उनके मत में परिस्पन्द ही एक व्यापार नहीं है, यह बात मन में रखकर उनके मत को भावों में बाह्येन्द्रिय ग्राह्यत्व रूप स्वभाव का उपपादन करने वाले भट्टलोल्लट आदि ने निराकृत कर दिया, अतः फलवृत्ति काम की कोई अतिरिक्त वृत्ति नहीं है। अतः वृत्तियाँ चार हो हैं। ना० शा०-९

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७१४ नाट पशास्ये

वयन्तु ब्रमः। कोऽयमस्थानसन्त्रासः ? यत्किञ्चिदिह नाट्ये समस्ति तच्चेद् वुत्तिष्वम्तर्भाव्यं तवा भवेदेतत-न चवम्। रङ्गो हि नाम का वृत्तिः, सृदङ्गपणव- वंशाद्ा का वृत्तिरपि हि भवेत। तस्माद व्यापारः पुमर्थसाधको वृत्तिः। स च सर्वत्रैव वर्ण्धत इत्यतो वृत्तयः। काव्यस्य मातृका इति न हि किञ्चिद्वधापारशून्यं वर्णनीयमस्ति। मदमूर्छांदिवर्णनायामपि मनोव्यापारस्य सात्त्वत्याल्यस्य संभवात्, करुणादावपि च मनोवेहव्यापारसंभवेऽपि बाहुल्येन वाग्व्यापारसंभवाद भारती- वत्तिरच्यते। वत्त्यन्तरनिषेधस्तु तवङ्गानामपरिपूर्णत्वात। न च कायवाङ्मानस- व्यापारं तद्वचित्र्यं वान्तरेणान्य: कश्चिद व्यापारः संभवतोत्यसकुदुक्तम्। तस्मारक- वणप्रधाने भारती वृत्ति: परवेवितबाहुल्यात्। यत्त् 'शृङ्गारहास्यकरुणैरिह कंशिको स्यात' इति कोहलेनोक्तं तन्मुनिमत- विरोधादुपेक्ष्यमेव, तस्य यत्र यत्रानुल्वणा चित्तवृत्ति: सा सा कैशिकोत्याशयः। एवं प्रहसनभाणयोरपि वाग्व्यापारप्राधान्यावेव भारती वृत्ति:, मूर्छादौ तु ध्यापारा- भावे वृत्त्यभाव एव। न हि सवं नाट्यं वृत्तिमयव्रतया समर्थनोयमित्यलमति- प्रसवत्या।। ११२ ।। हम तो कहते हैं कि यह कौन सा अकारण उत्पन्न संत्रास है? क्योंकि जो कुछ भी यहाँ नाट्य में है वह सब वृत्तियों में अन्तर्भाव्य है तब तो चौथी या पाँचवी वृत्ति मानना सामान्य है। किन्तु ऐसा रोष नहीं, क्योंकि रङ्गमञ्च कौन सी वृत्ति है ? मृदङ्ग, प्रणव, वंशी आदि कौन वृत्ति हो सकता है ? अतः पुरुषार्थ साधक व्यापार हो वृत्ति है, उसका तो सभी जगह वर्णन है, इसलिए वृत्ति है और वे वृत्तियाँ काव्य (नाट्य) की मातायें हैं (वृत्तयो नाट्यमातरः) क्योंकि कोई कार्य व्यापार शून्य नहीं होता। मदजनित मूर्च्छा आदि के वर्णना में सात्त्वती नामक मनोव्यापार हो सकता है तथा करुणादि में भी मानसिक एवं देहिक व्यापार होने पर भी अधिकतर वाणी का व्यापार होने से भारती वृत्ति कही जाती है। वृत्यन्तर का निषेध तो उनके अङ्गों से पूर्ण न होने के आधार पर होता है। कायिक, वाचिक और मानस व्यापार अथवा उनके वैचित्र्य के विना अन्य कोई व्यापार नहीं हो सकता, इसे बार-बार कह चुके हैं। इसलिए करुण प्रधान काव्य में परिदेवन (विलाप) को बहुलता होने से भारती वृत्ति रहेगी।

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अष्टावशोध्याय: ७१%

भाणस्यापि हि निखिलं लक्षणमुक्तं तथागमानुगतम्। वोथ्या संप्रति निखिलं कथयामि यथाक्रमं विप्राः !॥ १११।। सर्वरसलक्षणाढया युक्ता ह्यङ्गस्त्रयोदशभिः । वोथी स्यादेकाड्का 'तथेकहार्या द्विहार्या वा॥११२॥ अथ सर्वान्ते सर्वरसमयत्वादविनतस्त्रभावत्वाच्च संक्षेपेण शक्यव्युत्पत्तिदायि- नोत्वेन प्रधानभतत्वालवङगानां च नाटिकादिभाणान्तसमस्तरूपकोपजीव्यत्वाद् बीथों लक्षयतति। एकहाथेरित्याकाशपुरुभाषितैरित्यथा, द्विहार्येति उत्तिप्रत्युक्ति वैचित्र्येणेत्यर्थः। और जो "शृङ्गार, हास्य और करुण के योग से यहां केशिकी वृत्ति होतो है" ऐसा कोहलाचार्य ने कहा है, वह मुनि के मत से विरुद्ध होने के कारण उपेक्ष्य हो है, उसका आशय यह है कि जहा-जहाँ अनुल्वण चित्तवृत्ति है वहाँ-वहाँ कैशिकी वृत्ति है। इस प्रकार प्रहसन और भाण में भी वाणो के व्यापार की प्रमुखता होने से भारतो वृत्ति ही है। मूच्छा आदि में व्यापार का अभाव होने से वृत्ति का अभाव हो है। समस्त नाट्य वृत्तिमय होने से समर्थनीय है, ऐसी बात भी नहीं है। अनुवाद-इस प्रकार आगम (शास्त्र) के अनुसार भाण का निखिल लक्षण मैंने कह दिया है। हे ब्राह्मणों ! अब मैं यथाक्रम वीथी के निखिल लक्षण को कहूँगा ॥ १११ ॥ अभिनव-अब सभी रूपकों के अन्त में सर्व रसमय होने से अतिविस्तृत स्वरूप न होने से संक्षेप में व्युत्पति प्रदान करने में समर्थ होने से और प्रधान होने से उनके अङ्गों के नाटिका से भाण पर्यन्त समस्त रूपकों के उपजीव्य होने से वोथी का लक्षण बतलाते हैं- अनुवाद-समस्त रसों के लक्षणों से सम्पन्न तथा तेरह अङ्गों से युक्त और एक पात्र अथवा दो पात्रों के द्वारा अभिनेय एक अङ्कू वाली वोथी होती है।। ११२ ॥ अभिनव-एकहार्या का अर्थ है एक पात्र के द्वारा प्रयुक्त आकाशभाषित के द्वारा। द्विहार्या का अर्थ है दो पक्षों के उक्ति-प्रत्युक्ति के वैचित्र्य से ॥ ११२॥ १. ख. द्विपात्रहार्यातथैकहार्या वा।

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०११ नाटधशारमे

अधमोत्तममध्याभिर्युक्ता स्यात्प्रकृतिभिस्तिसृभिः । 'उद्धात्यकावलगितावस्यन्दितनाल्य सतप्रलापाश्च ॥। ११३ ॥ वाक्केल्यथ प्रपञ्चो मृदवाधिबले छलं त्रिगतम्। व्याहारो गण्डश्च त्रयोदशाङ्कान्युदाहृतान्यस्याः ॥११४॥ त्रयोदशसदाक्कानि वोथ्यामेतानि योजयेत्। लक्षणं पुनरेतेषां प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥।११५।।

अङ्गाम्युद्दिशति- उद्धात्यकावलगितावस्यन्वितनाल्यसतप्रलापाश्च । वाक्केल्यथ प्रपञ्चो मृदवाधिवले छलं त्रिगतम्। व्याहारो गण्डशच त्रयोदशाङ्गान्युवाहृतानीति। इत्युदाहरणमात्रमेतदिति यावत् ॥ ११३-११४।।

अब वीथी के अङ्गों का निर्देश करते हैं- अनुवाद-वथो में उत्तम, मध्यम, अधम तोन प्रकार के पात्र होते हैं। बुद्धघात्मक, अवलगित, अवस्यन्दित, नालो, असतप्रलाप, बाक्केली, प्रपञ्न, मृदव, अधिबल, छल, त्रिगत, ब्याहार और गण्ड ये चोथी के तेरह अङ्ग कहे गये हैं।। ११३-११४॥ अभिनव-वोथी के अड्कों का कथन करते हैं। उद्धात्यक, अवलगित, अवस्यन्दित, नाली, असत्प्रलाप, वाक्केली, प्रपञ्च, मृदव, अधिवल, छल, त्रिगत व्याहार और गण्ड ये तेरह अङ्ग गिनाये गये हैं॥ ११३-११४॥ अब क्रमशः इनका लक्षण कहते हैं- अनुवाद-वीथी में इन तेरह अङ्गों को सवा योजना करनी चाहिए। अब क्रमशः मैं इनके लक्षणों को कहूँगा ॥ ११५ ॥

१. क. ग. उद्धाश्यकावलगिते क्वबस्पन्दितमेव च । असतप्रकापश्च तथा प्रप्धो नालिकापि वा। वाक्केल्यिबलं चैव चछलं व्याहार एव च। मृदवं त्रिगतं चैँब शेयं गण्डमथापि वा। प्योदश सदाङ्गानि वोध्यामेतानि योजयेव्। लक्षणं पुनरेतेषां प्रवक्याम्यनुपूर्वशः ।

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पदानि 'त्वगसार्थानि ये नराः पुनरावरात्। योजयन्ति पदैरन्येस्तदुद्धात्यकमुच्यते ॥ ११६ ॥

एतानि क्रमेण लक्षयति-पदानि त्वगतार्थानीति। नन्वेषामुक्तिवैचित्र्रूपत्वं चेल्लक्षणाल द्वारादिम्य: को भेद: १ इतिवृत्तोप- करणरूपत्वे तु सन्ध्यङ गेम्य: कथमन्यता, रसोपकरणतायां वृत्त्यङ् गेष्वन्तंभावः। न चैतद् व्यतिरिक्तमेषां सामान्यलक्षणमस्ति। तत्र केचिदुक्तलक्षणादिविशेष रूपत्व- मेवेषां प्रतिपादयन्ति, विवेचकास्तु तद््यतिरिक्ताग्येवैतानोत्याहुः। तथाहि प्रश्नप्रतिवचचनयोरन्याभिप्रायरूपेण योगेन यद्वचित्र्यं तद्वोथ्यङ्गम्, अत एवोदाहृतानोत्येषां सामान्यलक्षणम्। उदाहृतानि प्रतिवचनानीत्यर्थः। तानि च सर्वाणि प्रतिवचनशून्यस्य काव्यस्याभावात् तेन विचित्राणोति लभ्यन्ते। अत एव वीथो पडिवतरन्योत्तरासहिष्णुत्वात विचित्रोक्तिप्रत्युक्तिगभंत्वात, लक्षणालद्वारा- दीनां तुनोक्तिनियतं रूपमिति विशेषः । तत्र यदा विवक्षितमुत्तरं दातुं शक्तोऽयं स्यादिति यन्मम मनसि वर्तते तदेव वक्ति न वेत्येवमाबिना निमित्तेन यवा प्रष्टैव

१. उद्घात्यक अब क्रम से इनका लक्षण करते हैं- अनुवाद-जो मनुष्य अगतार्थ पदों के अर्थ प्रतीति के लिए अन्य पदों के साथ आदर पूर्वक योजना करते हैं, उसे 'उद्वात्यक' कहते हैं ॥ ११६ ॥ अभिनव-अब प्रश्न होता है कि वोथो के ये उद्घात्यकादि अङ्भ यदि उक्ति के वैचित्र्य रूप हैं तो लक्षण और अलद्धारों से इनका भेद क्या होगा? यदि इन्हें इतिवृत्त का उपकरण मानते हैं तो सन्ध्य ङ्गों से इनकी भिन्नता कैसे रहेगो ? रयाि रस का उपकरण मानते हैं तो वृत्ति के अङ्गों में इनका अन्तर्भाव हो जायेगा और इनके अतिरिक्त इनका कोई सामान्य लक्षण नहीं है। उत्तर देते हैं कि कोई आचार्य उक्त लक्षणों के उनका विशेषरूपता प्रतिपादन करते हैं, किन्तु विवेचक लोग तो इन्हें लक्षणों से व्यतिरिक्त (अलग, भिन्न) हो कहते हैं।

१. क-म. हि गतार्थानि। तु गतार्थानि। २. ग. यैर्नरा:। ख, यन्नराः। कन्न. ये नरा। स्वल्पबुद्धयः । १. क-न. पर्यायैरव बाध्यन्ते। क-म, पर्चात् पर्दैः प्रपद्मन्ते ।

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७१८ नाट्यघामे

प्रतिवचनं वैचित्र्मभिसं्धाय पृच्छति, प्रतिवक्तोचितमभिधत्ते तवा तदुत्तर- मुद्धात्यकम्। प्रश्नात्मके उद्धाते साध्विति यत्, तत्राज्ञातार्थे कन्। पदान्यगतार्थानि प्रश्नरूपाण्यावरात्कृतानि पर्यायैः पवान्तरैकत्तररूपैः नराः सुधियो योजयन्ति। तदुत्तरपदसमूहात्मकमुद्धात्यकम्। यथा पाण्डवानन्दे- का भूषा बलिनां क्षमा, परिभवः कोडयं सकुल्यैः कृतः, किं दु।खं परसंधयो, जर्गात कः इलाध्यो य आश्रोयते। को मृत्युर्व्यसनं, शुचं जहति के यैनिजिता: शत्रवः, कैविज्ञातमिदं विराटगरे च्छन्नस्थितैः पाण्डवैः॥११५॥

और भी प्रश्नोत्तर से भिन्न अभिप्राय के योग में जो वैचित्र्य है वह वोथी का अङ्ग है। इसलिए 'उदाहृतानि' यह इनका सामान्य लक्षण कहा गया है। 'उदाहृतानि' पद का अर्थ है प्रतिवचन अर्थात् प्रत्युत्तर। अत एव प्रतिवचनों से शून्य का्य में इनका अभाव होने से विचित्रता है, यह मिलता है। इसीलिए अन्य के उत्तरों को सहन न करने के कारण तथा विचित्र उक्ति-प्रत्युक्ति से मिश्रित होने के यह वोथी है, पंक्ति है। किन्तु लक्षण और अलङ्कारों का उक्ति-प्रत्युक्ति कोई रूप नियत नहों है। इसका उससे विशेषता है। वहाँ यदि प्रतिवक्ता विवक्षित उत्तर देने में समर्थ होगा अथवा मेरे मन में जो है वह कहता है या नहीं ? इत्यादि कारणों से जब प्रष्टा व्यक्ति अपने मन में विचित्र उत्तर का अनुसन्धान करके पूछता है और प्रतिवक्ता उचित उत्तर देता है तो वह उत्तर उद्घात्यक कहलाता है, प्रश्नात्मक उद्धात में जो साधु है वह 'उद्घात्यक' है। यहाँ अज्ञात अर्थ में कन् प्रत्यय है। अगतार्थ पद (अज्ञातार्थ) और आदर से किये गये प्रश्न रूप पदों के उत्तर रूप पर्याय पदान्तरों की योजना जहाँ नट करते हैं वह उत्तरभूत पद समूहात्मक वाक्य उद्घात्यक है। जैसा कि पाण्डवानन्द में-

"बलवानों का भूषण क्या है? क्षमा। परिभव क्या है? जो कुटुम्बियों द्वारा किया जाय। दुःख क्या है ? दूसरे के आश्रय में रहना। संसार में श्लाध्य कौन है ? जिसका आश्रय लिया जाय। मृत्यु क्या है ? व्यसन। शोकयुक्त कौन है ? जिसने शत्रुओं को जीत लिया है। इस तथ्य को किसने जान लिया है? विराट नगर में छिपकर रहने वाले पाण्डवों ने ।"।। ११६ ।।

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अष्टाक्षोड्याय: ०१९

यत्रान्यस्मिन् समावेश्य कार्यमन्यत्प्रसाध्यते' । तच्चावलगितं नाम विज्ञेयं नाट्ययोक्तृभिः ॥११७॥ आक्षिप्तेऽ्यें तु कस्मिश्चिच्छुभाशुभसमुत्थिते । भवेत् ॥ ११८॥ यत्रान्यस्मिम्निति। यत्रोत्तरे दीयमाने अन्यानुसन्धानपूर्वकेऽप्यन्यत्कायं सिध्यति तान्यन्यकार्यावलगनादवलगितम्। यथा "अवि सुहाअदि दे लोअणाणा" मिति विदूषकेण पृष्टे (राजः) "सुखयतोति किमुच्यते" इति "कृच्छेणोहयुग" मित्या- द्युत्तरं वसन्तकप्रत्यायनोद्वेश्येन प्रवृत्तमपि सागरिकागतमास्थाबन्धजीवितं मुख्यं शृङ्गारास्यं कार्य साधयतीति॥११७ ॥ २. अवलगित अनुवाद-जहाँ पर किसी अन्य कार्य का समावेश कर दूसरे कार्य को सिद्धि को जाय, उसे नाट्यप्रयोक्ताओं को 'अवलगित' समझना चाहिए॥ ११७ ।। अभिनव-जहाँ पर उत्तर दिये गये पर अन्य के अनुसन्धान पूर्वक उत्तर देने में दूसरा कार्य सिद्ध हो जाय, तो वहाँ अन्य कार्य के अवलगन होने से वह 'अवलगित' वीथ्यङ्ग कहलाता है। जैसे -रत्नावली में विदूषक ने राजा से पूछे जाने पर कि 'अरे मित्र! आपके नेत्र सुख दे रहे हैं।' (अयि मित्र ! सुखयति ते लोचने) राजा उत्तर देता है कि 'सुखयति, इति किमुच्यते?' यह कहकर 'कृच्छ्र णोरुयुगम्' इत्यादि उत्तर यद्यपि वसन्तक को विश्वास दिलाने के उद्देश्य सेै हुआ तथापि सागरिका के आशाबन्ध जीवन मुख्य कामशृङ्गार को सिद्ध कर रहा है॥ ११७ ।। ३. अवस्पन्दित अनुवाद-जहाँ पर विना सोचे समझे अनजान में किसी आक्षिप्त अर्थ के विषय में कुशलता से अन्य अर्थ को कहा जाता है वह 'अवस्पन्वित' कहलाता है।। ११८। १. ख. प्रशस्पते। २. क-न. परानुरोधात्तज्ज्ञेयं नाम्नावगलित बुछः। ३. ख. आक्षिप्य कंचिदर्थ शुभाशुभसमृत्थितम्। ४. स. वत्सृजेत्बुद्धिवंशद्यात्। क. उत्सृजेदबु द्धिवेकल्पा त् ।

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नाटघशास्वे

आक्षिप्ते स्विति। शुभाशुभं दैवं तेना्बुद्धिपू्वकं कुत्रचिदर्थे आक्षिप्तेऽपि कौशलात्ततप्रच्छादनेच्छया यत्रोत्तरोडन्योऽथं उच्यते तववस्पन्दितं चक्षुःस्पन्दना- दिवदन्तगंतसूचनोय संभवात्। यथा- सत्पक्षा मधुरगिरः प्रसाधिताशा मदोद्तारम्भा: । निपतन्ति धातंराष्ट्राः कालवशाम्मेदिनीपृष्ठे। अत्र दैववशादयमर्थ आयातः सत्पक्षे अमधुरा गोर्येषान्ते, तथा प्रकर्षेण साधिता: आधिसहिता: यैदिशः कृतः धृतराष्ट्रात्मजा: पतन्तीति। तत्रोत्तरं प्रति- हतममडलम। पुनः सूत्रधारः। ननु शरत्समयव्णनया धातराष्ट्रा हंसा नभस्तलात इति व्यपविशामीत्यावि अवस्पन्वितत्वमेव सूचर्यात "न खलु न जाने किम्त्यमङल- त्वात शा्धितमेव मे हृवय" मिति ॥११८॥ अभिनव-'शुभाशुभम्' का अर्थ है देव। जहाँ अबुद्धि पूर्वक अनजान में किसी अर्थ का आक्षेप होने पर भी कुशलता से उनके अर्थ को छिपाने की इच्छा से जहाँ दूसरा ही उत्तर कहा जाता है। उसे नेत्र के स्फुरण (फड़कने) से किसी अन्तहित (अज्ञान) अर्थ की सूचना मिलने के समान जहाँ अज्ञात अर्थ सूचना मिलती है, उसे 'अवस्पन्दित' या 'अवस्यन्दित' कहते हैं। जैसे वेणीसहार नाटक में- "जैसे सून्दर पक्ष (पंख) वाले, मधुर स्वर वाले मद से उद्धत प्रसन्नता से चपल गति वाले दिशाओं को सुशोभित करने वाले राजहंस समय के अनुसार पृथ्वी पर उतर रहे हैं, उसी प्रकार सुन्दर (उत्तम) पक्ष (सहायकों) वाले, मधुर- भाषी, अपने पक्ष की आशाओं को सिद्ध करने वाले अथवा सम्पूर्ण दिशाओं अधिकार जमाये हुए मद से उद्धत अर्थात् उद्दण्ड स्वभाव वाले ये धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन आदि काल के वश मरकर पृथ्वी पर गिर रहे हैं।" यहाँ देक्वशात् का यह अर्थ आशा है। प्रत्यक्ष में मधुर है, वाणी जिसकी, जिन्होंने दिशाओं को अच्छी तरह साधित कर लिया है अर्थात् वहाँ के लोगों को आन्तरिक व्यथा से ग्रस्त कर दिया है, ऐसे धृतराष्ट्र के लड़के गिर रहे हैं। इस पर नट का उत्तर है कि अमङ्गल नष्ट हो गया। पुनः सूत्रधार कहता है अरे! शरत् समय (शरदतु) का वर्णन होने से राजहंस नतमस्तक पृथ्वी पर उतर रहे हैं, ऐसा में कह रहा हूँ, इत्यादि अवस्पन्दित को ही सूचित करता हूँ। मैं इस बात को नहीं जानता हूँ, ऐसो बात नहीं, किन्तु अमङ्गल होने से मेरा हृदय शङ्ि्कत सा हो रहा है।। ११८।।

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७२१

हास्येनोपगतार्थप्रहेलिका नालिकेति विश्ञेया। 'एकद्विप्रतिवचना वाक्केली स्यात्प्रयोगेऽस्मिन् ॥ ११९ ।।

हास्येनोपगतार्थेति प्रहेलिका परवितारणकारि यदुत्तरं, अत एव हास्ययुक्ता सा नालिका प्रणालिका व्याजेत्यर्थ । प्रकर्षण हेलिका नर्मादिक्रीडारूपं यस्या सा प्रहेलिका। यथा- सुसंगता-"जस्य किदे तुमं आअदा सो एत्थ एव्व चिठ्ठदि।" सागरिका-"सहि ! कस्स किदे।" सुसङ्गता-(सहासम्) "अइ अप्पर्साङ्किदे ! णं चित्तफलअस्स।" अनया भङ्गया आच्छादितं च गर्भगतं चास्य वस्ति्वति। एकठ्ठिप्रति- वचनेति। एकं ह्वयो: प्रतिवचनमस्याम्। द्विग्रहृणमनेकोपलक्षणम् । तदमुना सर्वं प्रश्नोत्तरवग: स्वीकृत।। यथा- ४. नालिका तथा ५. वाक्केली मनुवाद-हॅसी, मजाक में जहाँ अर्थ उपगत (प्रतीत) हो, उस प्रहेलिका को 'नालिका' कहते हैं और जिस प्रयोग में एक, दो उत्तर-प्रत्युत्तर हो, उसे 'वाक्केली कहते हैं। ११९।। अभिनव-जहाँ परिहास में अर्थ की उपलब्धि हो जाय वह 'प्रहेलिका' है। जिसका उत्तर दूसरे के वितारण करने वाला या छलने वाला होता है। इसलिए हास्य से युक्त होने से वह 'नालिका' या प्रणालिका का बहाना है। प्रकर्ष से हेलिका अर्थात् नर्मादि क्रोड़ामय रूप है जिसका वह प्रहेलिका है। जैसे रत्नावली में- सुर्सगता-सखि ! जिसके लिए तुम आई हो, वह यहीं पर है। सागरिका-सखि। कस्य कृते (किसके लिए?) सुसङ्गता-(सहासम्) अरे ! आत्मशङ्िते ! चित्र फलक के लिए। इस प्रकार ब्याज से (शैली से) मन की बात छिपा दो जाती है और जहाँ पर दोनों के लिए एक हो उत्तर हो वह वाक्केली है। यहाँ 'द्वि' पद अनेक का उपलक्षण है। इसलिए इससे समस्त प्रश्न वर्ग और उत्तर वर्ग का ग्रहण होता है। जैसे- १. ख. हास्येनावगतार्था । ना. शा०-९१

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७२२ नाटघशास्त्रे मूखंजनसन्निकषें हितमपि यत्र प्रभाषते विद्वान्। `न च गृहयतेऽस्य वचनं विज्ञेयोऽसत्प्रलापोऽसौ ॥ १२० ॥

नवीनां मेघविगमे का शोभा प्रतिभासते। बाह्यान्तरा विजेतव्या: के नाम कृतिनोऽरयः ॥११९॥ मूर्खंजनसम्निकषं इति यदुत्तरं मूखं प्रति वस्तुतो हितमपि शब्वच्छलाध्यथा प्रियं तादृशं च मूर्खे प्रिरयांशेन गृह्यते न तु हितांशेन। तथाभूतभङ्गीव्वयाशयणं च सिद्धत्त्वातकरोति। एवं हि तात्कालिकः कोपोऽपि रक्षितो भर्वत प्रियाभिधायि- त्वात्। यथा व्यसनिना राजपुत्रेण किं सुखमिति पृष्टे तेनोत्तरं वीयते-

"मेघों के चले जाने पर नदियों की क्या शोभा प्रतिभासित होती है। कौन कुती है जिसके लिए अन्तः शत्रु और बाह्य शत्रु विजेतव्य है" अर्थात्-जिसका बाह्य शत्रु और अन्तः शत्रु अभी विजेतव्य है वह कृती कैसे है ? ॥ ११९ ॥ ६. असत्प्रलाप अनुवाद-जहाँ पर विद्वान् पुरुष सूखंजनों के सम्पर्क में अर्थात् धूखंजनों के लिए हित की बात करता है किन्तु मूर्ख उसके वचन को ग्रहण नहीं करता, उसे 'असत्प्रलाप' समझना चाहिए॥ १२० ॥ अभिनव-यदि एक उत्तर शब्दच्छल से मूर्खजन के प्रति वस्तुतः उसके हित के लिए हो जैसे प्रिय और हितकारी वचन कहा जाय और मूख प्रियांश को ग्रहण कर ले और हितांश को छोड़ दें। इस प्रकार शैली से प्राप्त दो में से सिद्ध होने के कारण एक आश्रय लेता है। इस प्रकार प्रिय मधुर कथन (वाक्य) होने से तत्कालिक कोप नहों रहता, किन्तु यथार्थ कथन होने से कालान्तर में कोप का होना सम्भव है। जैसे किसी व्यसनी राजपुत्र के 'सुख क्या है?' पूछे जाने पर वह उत्तर देता है- १. स. वचनं न गुह्यतेऽस्य संज्ञयोऽसतप्रलापसतु।

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अष्टावशोउध्यायः ७२३

यदसद्भूतं वचनं संस्तवयुश्तं द्वयो: परस्परं यत्तु। एकस्य चार्थहेतो: स हास्यजननः प्रपञ्ः स्यात् ॥ १२१॥ सवंथा योऽक्षविजयी सुरासेवनतत्परः। तस्यार्थानां सुयानां च समृद्धिः करगामिनि॥ असतोऽसाधुभूतस्य वस्तुनः प्रलपनमस्मिम्नित्यसत्प्रलाप इति ॥ १२० ॥ यवसद्भतमिति यथा रत्नावल्याम् "सुसङ्गते" कथमहमिहस्थो भवत्या ज्ञातः" इति राजन्युक्तवति सुसङ्गयोच्यते "ण केवलं भट्टा चित्तपलहेण, ता देवीए णिवेवइस्सं" इत्यादौ आभरणदानपर्यन्ते प्रपञ्नः। तथाहि-द्वयोः सागरिकासुसङ्ग तयो: परस्परसंबन्धमाशित्यासद्भूतमसत्यं देव्यै निवेदयामीत्युक्तम्। संस्तवश्च तत्रास्ति "भट्टिणो पसादेण किमिदं मए' इति हास्यभपि परिहासरूपं विद्यते। एकस्य च राजोऽयें प्रयोजने सागरिकासङ्गमे हेतुरभवत्येवेति अन्यथाडभिषा- नास्प्रपञ्चः ॥।१२१।। "जो सवथा अक्षविजयो (इन्द्रियजयो अथवा जुए में विजय प्राप्त करने वाला) है तथा जो सुरासेवन में (देवताओं के आराधना में अथवा सुरा मदिरा के सेवन में) तत्पर है, उसके लिए सुख तथा धन को समृद्धि सदा करगामिनो (हस्तगत) है।" इसमें असाधुभूत ( असत् ) वस्तु का प्रलपन ( कथन ) होने से 'असतप्रलाप' है ॥ १२० ॥ ७. प्रपञ्च अनुवाद-जो परिचय (संस्तव) से युक्त दो व्यक्तियों के परस्पर असद्- भत वाक्य किसी के अर्थ के लिए हो, उसे हास्यजनक 'प्रपञच' समझना चाहिए॥१२१॥ अभिनव-असद्भूतमति। जैसे रत्नावली में-'हे सुसङ्गते ! मैं यहाँ हूँ, कैसे आप ने समझ लिया' इस प्रकार राजा के कहने पर सुसङ्गता कहती है कि "मैं केवल आपको ही नहीं, अपितु इस चित्रफलक के साथ आपको समझती हूँ"। मैं जाकर महारानो से निवेदन करूँगी' इत्यादि में आभरण प्रदान पर्यन्त अंश में 'प्रपञच' है। तथाहि-सागरिका और सुसङ्गता दोनों के परस्पर सम्बन्ध के असद्भूत असत्य अर्थ का आश्रय लेकर देवी से निवेदन करतो हूँ' इस प्रकार कहा इसमें उनको संस्तव (प्रशंसा) भी है। 'भट्टिनी के प्रसन्नता से बहुत पाया है' में हास्य भी परिहास रूप में विद्यमान है। तथा राजा के साथ सागरिका के मिलन रूप अर्थ में वह हेतु भो है। किन्तु अन्यथा अभिधान से यहाँ 'प्रपञच' है ॥१२१ ॥

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७२४ वाडयशाहत्रे

यतकारणाद् गुणानां दोषोकरणं भवेद्विवादकृतम् । दोषगुणीकरणं वा तन्मृदवं 'नाम विज्ञेयम् ॥ १२२॥ परवचनमात्मनश्चोत्त रोत्तरसमुद्भवं द्वयोयंत्र। अन्योन्यार्थविशेषकमधिवलमिति तद् बुघैज्ञैयम् ॥ १२३ ।। यत्कारणादिति गुणानां दोषत्वं दोषाणां वा गुणत्वं यत्र क्रियते तन्मृदबम्। विवा वकुतमित्यनेन लक्षणाद्विशेषमाह, इदं वृत्यन्तरं स्वभावमित्यर्थः । यथा "शिर: इवा काको वा द्रुपदतनयो वा परिमृशेत" (वेणो ३) इत्यत्र दोषस्य गुणीकरणं, विवादाकर्णनेन सह "यदि शस्त्रमुज्झितमशस्त्रपाणय" (वेणी-३) इत्यत्र कर्णवचनेन प्रतिज्ञातपरिपालनस्य गुणस्यापि दोषीकरणं विवादकृतमेव। मृदवमिति मर्दनं मृत्। परपक्षमर्दनेन स्वपक्षमवति रक्षतीति ॥१२२ ।

८. मृदव अनुवाद-कयोंकि जहाँ किसी विवाद के कारण गुणों का दोषीकरण और दोषों का गुणोकरण हो, वहाँ 'मृदय' नामक बीथी समझना चाहिए॥ १२२॥ अभिनब-जहाँ पर गुणों को दोष और दोषों को गुण कर दिया जाय, वहां 'मृदव' होता है। 'विवादकृतम्' इस पद से लक्षण को अपेक्षा विशेष को कहते हैं अर्थात् यह वृत्यन्तर या स्वभाव है। जैसे-'अब इसके शिर को कुत्ता, कोआ अथवा दुपद का पुत्र धृष्टद्युम्न स्पर्श करे"। यहाँ पर किसी महापुरुष के शिर का स्पर्श करना दोष है किन्तु विरागमूलक होने से यहाँ दोष गुण हो गया है। विवाद के श्रवण (सुनने ) के साथ "यदि आपने अस्त्र छोड़ दिया, आपके हाथ में अस्त्र नहीं है"। यहाँ पर कर्ण के वचन से परिज्ञात परिपालन रूप गुण भी दोष हो गया है, क्योंकि यह विवाद के कारण हुआ है। 'मृदवम्' में मृद का अर्थ मर्दन है और 'अव' का अर्थ है 'रक्षण'। अतः जहाँ पर पक्ष का मार्दव करके अपने पक्ष का रक्षण होता है वहाँ 'मृदव' होता है ॥ १२२॥

९. अधिबल

अनुवाद-जहाँ पर अपने तथा दूसरे के वचन दोनों के उत्तरोत्तर उठने वाले दोनों वाक्य परस्पर के सम्बन्ध होने से अर्थ विशेष का लाभ होता है, उसे 'अधिवल' समझना चाहिए ॥ १२३॥

१. ख. ग. नामापि।

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७२५

अन्यार्थमेव वाक्यं छलमभिसन्धानहास्यरोषकरम्। परवचनमात्मनश्चेति परस्य वचनमात्मनश्य वचनं परस्परमर्थविशेषलाभो यत्र भवतीत्युत्तरोत्तरस्याधिकाधिकस्यार्थस्य समुद्भवो यत्र तवधिबलम्। एतदुक्तं भवति-पत्रोक्तिप्रत्युक्तिक्रमे क्रियमाणे परस्परज्ञानोपजोवनबलात्स्वपक्षसुघटिता- दविबलसंबन्घादधिबलम्। यथा नागानन्दे "रागस्यास्पदमित्यवैमी"त्यादित आरम्य विदूषकेग सहोक्तिकिक्रमेण स्वपक्षो द्रढिमानमानोतो याववाह "ननु शरीरतः प्रभुति- सर्वमेव मया परार्थ प्रतिपाल्यते' (अ-१) इति ॥१२३ ॥ अन्यार्थमेव वाक्यमिति यद्वाक्यं प्रयोजनान्तरमुद्दिश्य वचनमुच्यमानं कस्य- चिद्वचनमव्यस्य हास्यमपरस्य रोषं जनयति तच्छलम्। यथा- कस्स व ण होई रोसो वट्ठूण पिआाए सव्वर्ण अहरम्। सब्भमरपदुमग्घाइणि वारिअवामे सहसु एह्िम्॥। अभिनव-पर का वचन और अपना वचन। इन दोनों का परस्पर में सम्बन्ध होने से, जहाँ अर्थ विशेष का लाभ होता है। अतः जहाँ उत्तरोत्तर अधिक अथ का समुद्धव हो तो वहाँ 'अधिवल' होता है। यह कहा गया है कि जहाँ उत्तर और प्रत्युत्तर के क्रम में किये गये परस्पर एक दूसरे को जानकारी के बल से और स्वपक्ष से सुघटित किये गये अधिक बल के सम्बन्ध से 'अधिवल' होता है। जैसे-नागानन्द नाटक में "राग के स्थान को मैं समझता हूँ" यहाँ से विदूषक के साथ उक्तिकम से अर्थात् उत्तर-प्रत्युत्तर में अपने पक्ष को दृढ़ता से रखने पर्यन्त जो कहा है-"मैं तो अपने शरोर से लेकर सब कुछ परोपकार के लिए सुरक्षित रखता हूँ।" इत्यादि ॥ १२३ ॥ १०. छल अनुवाद-किसो अन्य प्रयोजन से अभिसन्धि से दूसरे के लिए प्रयुक्त हास्य और रोषकारक वाक्य को 'छल' कहते हैं। अभिनव-जहाँ एक वाक्य को किसी अन्य प्रयोजन के उद्देश्य से कहा जाय, किन्तु उससे किसी को हास्य होता है और दूसरे को रोष उत्पन्न होता है, उसे 'छल' कहते हैं। जैसे -- "अपनो प्रिया के व्रणयुक्त अधर को देखकर किसे रोष नहीं होता, अतः रोकने पर भी विपरीत काम करने वालो भ्रमरयुक्त कमल के संघने वाली वामे! अब उसके परिणाम को भोगो।"

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७२६ नाटपशास्त्रे

प्रत्यक्षवृत्तिरुक्तो व्याहारो हास्यलेशार्थः ॥ १२४॥

एतद्वचनं सखोसंबन्धि भतृंप्रत्यायनं प्रयोजनमुद्दिश्य प्रयुक्तं तस्य परन्ना अपि संबन्धिनां छलं, विदग्धजनस्य हास्यं, सपत्न्या रोषं जनयति। प्रत्यक्षवृत्तिरिति प्रत्यक्षशब्देन भावी प्रत्यक्ष उच्यते। तदयमर्थ-भाविनि प्रत्यक्षेडयें दैववशाद वृत्तिर्यस्य स व्याहारः विविधोडर्थोडभिनीयते येन। यथा- उद्दामोत्कलिकां विपाण्डुररुचचि प्रारब्धजुम्भा क्षणाद्

अद्योद्यानलतामिमां समदना गौरोमिवान्यां ध्रुवं पश्यन् कोपविपाटलद्युतिमुखं वेव्या करिष्याम्यहम्॥ (रत्नावलो-२ )

११. व्याहार अनुवाद-हास्य के लेश से युक्त अर्थ जहाँ भावी प्रत्यक्ष अर्थ में कहा जाय, उसे 'व्याहार' कहते हैं॥ १२४।। यह कथन सखो के सम्बन्ध में पति को विश्वास दिलाने के उद्देश्य से कहा गया है, किन्तु यह वचन पत्नो के सम्बन्धियों के लिए 'छल' है, अर्थात् सम्बन्धियों के वञ्चना के लिए है, विदग्धजनों के हास्य के लिए तथा सोतों के रोष के लिए है अर्थात् सौतों को रोष करता है। प्रत्यक्षवृत्तिरिति-यहाँ प्रत्यक्ष शब्द भावो प्रत्यक्ष को कहता है। अतः उसका यह अर्थ है। जहाँ भावी प्रत्यक्ष अर्थ में देववशात जिसकी वृत्ति हो वह 'व्यापार' है। जिससे विविध अर्थ अभिनेथ हो, वह 'व्याहार' है। जैसे रहनावली में- उद्दामोल्कलिकां विपाण्डुररुचि प्रारब्धजुम्भां क्षणाद् आयासं 5वसनोद्गमैरविरतैरातन्वतीमात्मनः । अद्योद्यानलतामिमां समदनां गौरीमिवान्यां ध्रुवं पश्यन् कोपविपाटलद्युतिमुख देव्या: करिष्याम्यहम् ॥ ( रत्नावली-२ ) क्षण भर में कलियों से लदी, पाण्डुर वर्ण, विकसित होने वाली, निरन्तर बहने वाले वायु के झकोरों से अपना संचारजन्य खेद को बढ़ाती हुई, मदन नामक वृक्ष से युक्त उद्यानलता को अन्य नारी के समान देखते हुए मैं आज निश्चय ही देवी के मुख को क्रोध से कुछ-कुछ लाल कर दूंगा।" यहाँ राजा का वासवदत्ता के प्रति भावी विषयक अर्थ वाला यह कथन व्याहार है।

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७२७

'श्रुतिसारप्याद्यस्मिन् वहवोडर्या युक्तिभिनियुज्यन्ते। यद्ञास्थमहास्यं वा तन्त्रिगतं नाम विज्ञेयम् ॥ १२५॥ श्रुतिसारूप्याविति शब्दसारप्याद् बहव इति प्रश्नप्रतिवचनस्य स्वभावा यत्र नियुज्यन्ते युक्तिभिरिति काववादीनां तथैवोपपत्तिभिः। त्रिशब्दोऽनेकोपलक्षणम्, अनेकमर्थ गतमिति त्रिगतं वाक्ये मुख्यमुत्तरमनेकप्रश्नासाधारणम्। इह तु य एव प्रश्नस्तवेव प्रतिवचनमिति विशेषः। यथा- स्वक्षितिभूतां नाथ ! दृष्टा सर्वाङ्गसुन्वरी। रामा रम्ये वनान्तेडस्मिन् त्वया विरहिता मया॥ (विक्रमो) अत्रैतदेवोत्तरं साकांक्षाकाकुप्रयोगेपि प्रतिबिम्बे वामदक्षिणवैपरीत्यवन्निराकाक्ष काकुः संबृत्ता यत एतद्धास्यम्। एवमहास्य उदाहायम् ॥।१२५ ।।

१२. त्रिगत अनुवाद-श्रुति सारप्य अर्थात् शब्दों की समानता के कारण युक्ति से जहां अनेक अर्थों को योजना हो उसे हास्य रूप अथवा अहास्य रूप 'त्रिगत' समझना चाहिए॥१२५ ॥ अभिनव-शब्द सारूप्य के कारण बहुत से प्रश्न एवं उत्तर रूप अर्थ जहां काकु आदि को युक्तियों से नियोजित होते हैं वह 'त्रिगत' है। यहां 'त्रि' शब्द अनेक का उपलक्षण है। अनेक अर्थों में जो गत है अतः त्रिगत है। वाक्य में मुख्य उत्तर है जो अनेक प्रश्नों के लिए साधारण है। यहाँ तो जो प्रश्न है वही प्रतिवचन है, यही विशेषण है। जैसे विक्रमोर्वशीय में- "हे क्षितिभृन्नाथ ! (पृथ्वीपति) इस रमणीय वन में मुझसे वियुक्त सर्वाङ्क सुन्दरी रमणी को तुमने देखा है ?" यहाँ जो प्रश्न है वही श्वया, मया और वैपरीत्य कर देने पर वहो उत्तर होता है। यहाँ साकाङ्क्ष काकु के प्रयोग में भो यही उत्तर है। बिम्ब की अपेक्षा प्रतिबिम्ब में दाये-बायें का वैपरीत्य है उसी प्रकार यहाँ निराकाङ्क्ष काकु हो गई, क्योंकि यहाँ हास्य भी है। इसी प्रकार अहास्य का भी उदाहरण समझना चाहिए॥ १२५ ।। १. क. प्रत्यक्षवृत्तिरुक्तो। २. स. ग. श्रुतिसाहुण्यार्थात्मनि। ख. ग, त्रिगतं नामापि विज्ञेयम्।

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७२८ नाटघशास्त्रे

संरमभसंभ्रमयुतं विवादयुक्तं तथापवादकृतम्। बहुवचनाक्षेपकृतं गण्डं प्रवदन्ति तत्त्वज्ञाः' ॥ १२६॥ संरम्भसंभ्रमयुतमिति संरम्भेणाकृतिविशेषेण यः संभ्रम आवेगः तद्युक्तं यद्- विरद्धं वस्तु यवनेन कृत पूर्वोक्तवस्त्वपवदमेव च तद्ववचनं दृष्टार्थंगभंत्वात्। गण्ड इब गण्डा। ईषवसमाप्तं वचनं बहुवचनं तत्कृतेनाक्षेपेण कृतं स्वयं प्रतिवचनतां पू्वं- वचवस्य गतमित्यर्थः । तथा च कोहल :- वचर्सा सम्बद्धानामन्ते यत्स्यात्पवे त्वसंबन्धः । संबद्धमिवाभाति हि तद्गण्डो नाम वोथ्यङ्रम्।। अनेनेषदसमाप्तिरेव वशिता। यथा दुर्योधनेन भानुमतीं प्रत्युच्यते- अध्यासितं एव चिराज्जघनस्थलस्य। पर्याप्तमेव करभोद ! ममोत्युग्मम्। इति (वेणो०)

१३. गण्ड अनुवाद-जहाँ सम्भ्रम, संरूप विवाद, अपवाद तथा आक्षेप से युक्त बहुतों से वचन हो, तत्त्ववेत्ता उसे 'गण्ड' कहते हैं॥ १२६ ।। अभिनब-संरम्भ अर्थात् आकृति विशेष से जो सम्भ्रम या आवेग है उससे युक्त जो विरुद्ध वस्तु जो उसने किया है वह पूर्वोक्त वस्तु अपवदन है, क्योंकि वह वचन पूर्वदृष्ट अर्थ से गर्भित है। गण्ड (फोड़े) को तरह जो हो वह 'गण्ड' है। जो वचन ईषदसमाप्त है वह बहुवचन है। बहुवचन कृत आक्षेप से विहित अर्थात् स्वयं पूर्व वचन की प्रतिवचनता से गत है। जैसा कि कोहल ने कहा है- "अनेक सम्बद्ध पदों के अन्त में जो पद हों उसमें असम्बन्ध जहाँ सम्बन्ध की तरह प्रतीत हो, उसे 'गण्ड' नामक वीथी का अङ्ग कहते हैं॥" इससे वचन की ईषदसमाप्ति दिखाई गई है। जैसे वेणीसंहार में दुर्योधन भानुमती से कहता है- 'हे करभोरु! तुम्हारे जघन स्थल के चिरकाल तक बैठने के लिए मेरा उत्युगल पर्याप्त है।' १. अन मुद्रितपुक्तिकानुसारेण पाठभेदः। तत्र षोडवपद्यान्यधिकानि सन्ति।

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७२९

तत्र प्रविश्य कञ्चुकी- भग्नं भोमसेन मरता भवतो रथकेतनम्॥ इति। तत्रोक्त्म्ममितियुपूर्वविष्ाम्तमपि भग्नमित्यत्र संबन्धयोग्यं जातम्। एतैः त्रयोकशभिरङ्गर्यक्ता वीथी, तस्याश्च सवरसत्वस्याभिधानात् पर्यायेण रसानां प्रधाभ्यादुत्तमो मध्यमोऽधमो वा नायको भवत्येव। तथा च कोहल :- उत्तमाधममध्याभिर्यक्ता प्रकृतिभिस्तथा। एकहार्या ह्िहार्या वा सा वीथीत्यभिसंजञिता॥ इति। अधमप्रकृतेस्तु न नायकत्वमिति ध्रुवं, तहिं प्रहसनकभाणकादौ कि बूया: हास्यादि- रसप्रधानत्वे ह्याषम एव नायकः। कथाशरीरफलेन प्रधानतया संबध्यमानो नायक उच्यते। अनायकत्वेऽहि चास्याधमत्वं नानुपावेयं स्यात। परिवारतया तस्यानु- प्रवेशो हानिवारित एव सबंत्र। अध्यायाथंमुपसंहरन् भाविनमथंमनुसन्धत्ते इति वशरूपविधानमिति।

तदनन्तर प्रवेश करके क्चुकी कहता है-महाराज ! टूट गया, टूट गया, भीम अर्थात् भयङ्कर वायु ने आप के रथकेतन को तोड़ दिया। यहाँ पूर्व में विश्रान्त उरुयुगल का उरु्भङ्ग के सम्बन्ध जोड़ा गया है। अतः यहाँ 'गण्ड' नामक वीथी का अङ्ग है। इस प्रकार तेरह अच्गों से युक्त वीथी होती है। उससे सभो रसों का अभि- धान होता है। पर्याय से (क्रमशः) रसों के प्राधान्य से उत्तम, मध्यम, अधम नायक होता है। जैसा कि कोहल ने कहा है- "उत्तम, मध्यम और अधम प्रकृतियों से युक्त, एक पात्र अथवा दो पात्रों के द्वारा सम्पाद्य जो हो, वह 'वीथी' कहलाता है।" यदि यह कहा जाय कि अधम प्रकृति का नायक नहीं होता, यह ध्रुव है तो फिर प्रहसन और भाण में क्या कहा जायेगा ? इसलिए जहाँ हास्य रस की प्रमुखता रहेगी, वहाँ तो अधम नायक होगा ही। कथा शरीर अर्थात् इतिवृत्त तथा उसके फल से जो सम्बद्ध होता है वह नायक कहलाता है। नायक के न रहने पर भी इसमें अधमत्व उपादेय होगा। क्योंकि, नाटथ में परिवार होने से उसका प्रवेश तो सर्वत्र अनिवायं है, उसे कौन रोक सकेगा ? ॥ १२६ ॥ अब अध्याय का उपसहार करते हुए भावी अध्याय के अर्थ का अनुसन्धान करते हैं- ना० था०-९२

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७३० नाटघशास्त्रे

इति दशरूपविधानं सर्वं प्रोक्त्तं मया हि लक्षणतः । पुनरस्य शरोरगतं संनिविधौ लक्षणं वक्ष्ये ॥ १२७।। इति भारतीये नाट्यशास्त्रे वशरूपनिरूपणं नामाध्यायोऽष्टावशः समाप्तः२। 'लक्षणत' इत्यनेनेदमाह वशैव तानि लक्षणानि त्वाहरणानां तु का गणना एतच्च पूर्वमेव वशितम्। तत्रैषां पुमर्थोपयोगो निजनिजलक्षणावसरे व्शित एवेति पौनरवत्यं नाश्रीयत इति शिवम्। इति विमलशिशिरदीधितिक लितशिरोमण्डनाङिघ्रवास्यचण:। अभिनवगुप्तो गुप्तं वशस्वरूपं सतत्वकं व्यवृगोत्।। इति शरीमम्महामाहेश्वराभिनवगुप्ताचार्यविरचितायां नाट्यवेवविवृताव- भिनवभारतयां वशरूपकविधानं नामाष्टावशोऽध्यायः समाप्तः।।१८।। अनुवाद-इस प्रकार लक्षण के अनुसार दशरूप के समस्त विधान को मैंने कह दिया है। अब उनकी सन्धियों की विधि के विषय में शरीरगत लक्षण को कहूँगा॥। १२७ । इस प्रकार डॉ० पारसनाथद्विवेदीकृत नाट्यशास्त्र की हिन्दी अनुवाद समाप्त हुआ ॥ १८ । अभिनव-'लक्षणतः' कहने का तात्पर्य यह है वे लक्षण दश ही हैं। उदाहरणों की गणना हो क्या है? यह तो मैंने पहले ही दिखा दिया है। वहां अपने-अपने लक्षण कहने के अवसर पर पुरुषार्थ का उपयोग दिखलाया ही है। इसमें यहाँ पुनरुक्ति नहीं होगी अर्थात् कहे हुए को पुनः नहीं करते। इति शिवम् । 'इस प्रकार विमल एवं शिशिर किरणों वाले चन्द्रमा से शोभित शिरोभाग वाले चन्द्रशेखर शिव के चरणों की दासता से प्रसिद्ध अभिनवगुप्त ने दशरूपकों के गुप्त तत्त्वों की व्याख्या की है।' इस प्रकार डॉ० पारसनाथ द्विवेदो कृत अभिनवगुप्तपादाचार्य की अभिनव- भारती को हिन्दी व्याख्या समाप्त हुई ॥ १८ ॥ १. ख. इतिवृत्तद्विविधानसन्धिविलक्षणं वक्ष्ये। ग. इतिवत्तद्विविधानं सन्धिविधो .. । २. ब. इति भारतीये नाट्यशास्त्रे दशरूपविधानं नाम विशोऽयायः ।

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पद्यार्द्धाुक्रमणिका

'अ' अङ्गवाक्यकृतं हास्यं ६५

अंसोपरि शिरः कृत्वा १८ अङ्गसौष्ठव संयुक्त ११८ अक्षरं निचृदिति प्रोक्तं १८२ अङ्गसौष्ठव संयुक्त: ११८

अक्षराभ्यां सदा द्वाभ्याम् १८२ अङ्गहास्यं कार्यहास्यं १०

अका्यं सहसा कृत्वा २३० अङ्गारकारकव्याध २७३

अकारस्तु स्मृते कार्य २५३ अङ्गालङ्कारचेष्टाभि: १९१

अकाराद्ा: स्वरा ज्ञेया १७२ अङ्गा वङ्गा कालिङ्गाश्च १७१

अक्रोधः क्रोधजननैः २२९ अञ्चलमनाश्चैव ४५,११९ अग्न्यादिदेवतं प्रोक्तं १८१ अचिन्तयन्त्यभिनववर्षविद्युतः १९५

अग्रतस्तु समादेया १८३ अज्जुकेति च वक्तव्या २८०

अधोषा इति ये त्वन्ये १७२ अडि्डतं शकटास्यं च ८५

अघोषा घोषवन्तस्तु १७२ अड्डतर्च पुनर्वाम ९१

मङ्ढू इति रूढ़िशब्दा ३०५ अत्यष्टिः स्यात्सप्तदशा १७६

अङ्कच्छेदेऽय संक्षेपान् ३०९ अत्यष्टौ च प्रतिनियमिता १९८

अङ्कच्छेदे कृत्वा ३०९,३११ अत्यायतापदत्वाच्च ६६

अङ्कच्छेदे तमन्यस्मिन् १५६ अत ऊध्वं प्रवक्ष्यामि १०१

असच्छेदे तु निर्वृत्तं १५७ अतः परं प्रवक्ष्यामि १

अङ्कस्तु सप्रहसनः ३२२ अतः परं रङ्गपरिक्रमस्य ९९

अङ्कस्य लक्षणमिद ३३० अत एव दशैतानि ३२१

अङ्कस्माप्तिः कार्या ३०६ अतश्च विपुलान्या तु १०९

अङ्कान्तरसन्धिषु च ३१० अतिकान्ता च कर्तव्या ११२

अङ्कान्तरानुसारो ३११ अतिक्रान्तेन पादेन ५५,१२२

अङ्कन्तरालविहित: ३१९ अतिक्रातपदेः सा तु १०६ अङ्काप्रवेश काढ्यं भवति हि ३०२ अतिक्रान्तैः पदेर्गच्छेत् ११७

अङ्कश ग्रहणान्नागं ५५, १२३ अतिक्रान्तैः पदेविप्रा ४५

अङ्कप्रवेशके च ३१४ अतिक्रान्तेरपक्रान्तैः ११५ ३२३ अतिक्रान्तैः पदैर्गच्छेतु ११७

अङ्गनेपथ्यसत्त्वानि १९६ अतिघृत्यां सहस्त्राणि १७८

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७१२ नाट्यश्ार ने

अतिभाषा तु देवानां २७३ अधमोत्तममध्याभि: ३३४ अतिभाषार्यभाषा च २७३ अधोमुखस्थित चे व ९८,१४१ अतिभाषाश्रयं पाठ्यं २७३ अधोऽवलोकनेनैव १४० अतिरिक्तेऽतिरिक्त च ९५,१३८ अधोऽवलोक नैश्चैव ५१,१२१ अतिवाक्यक्रियोपेत १८४ अध्यर्धमेतद्विज्ञेय १७६ अन्त्यं सप्तदशं चैव ९२ अतिशक्वरी पञ्चदशा १९९ अतोऽधिकाक्षरं छन्दो १७६ अन्त्यं सप्तदशे पादे १९७

अश्यायतपदत्वात् १०७ अन्त्यमेकोनविशं च २०१ अत्र नाभिहिता यास्तु १२६ अन्त्यादु द्विगुणितात् १८४

अत्रोच्यते कथं देब: १८,११० अन्त्ये यदि गकार: १८८

अत्रोच्यते कथं नैषा ९९ अन्त्योपान्त्ये गुरूण्यत २०१

अश्रेति गणिकामाता २८० अन्त्योपान्त्ये च दोर्घाणि १९७

अत्र नोक्तं मया यत्तु २७७ अन्त्योपान्त्ये च शक्वर्या १९५,१९६

अथ कुलजनप्रयुक्तं ३१८ अन्तःपुरसङ्गीतक ३२१

अथ प्रेक्षणिकाश्चापि १५४ अन्तर्भावगता हयेषा ३२१

अथ बाह्यप्रयोगेयु १८० अन्तस्था: संवृतज्ञाः १७३

अथ मध्यमनीचेस्तु १६,१०४ अन्धकारेऽथ याने च

अथ योन्यन्तरी भाषा १७३ अन्धस्येव गति कुर्याद् ४८ १२०

अथवा कारणोपेत अन्यत्रार्थेन सम्बद्धं १९५ २३३

अथवा छन्दतः कार्या २७५ अन्यदा पुनरापेति २७९

अथवाभिनयोपेत अन्यस्मिन्नेव पतनात् ८२ २६३

अथवार्थवशाच्चापि १५३ अन्यापदेशकथनैः २२५

अथ वोथी सप्रोक्ता ३३५ अन्यापदेशैः कथनं २६६

अथ वीरे च कर्त्तव्या ३४ अन्यायतपदत्वाच्च ११६

अथ वृद्धस्य कर्त्तव्या ५८,११४ अन्या या लोकसंस्था तु ११०

अथ स्वभावजश्चैव ११५ अन्यार्थमेव वाक्यं .७२५

अथावतरणचैष्ट ५२ अन्येऽपि देशाः प्राच्यां ये १७२

अथासनविधि: अन्योन्यार्थविशेषक १३३ ७२४

३०७ अन्योन्यसदृशा यत्र अनधीतोत्तमानां च २४६ २७४ अद्भ्ते विस्मयाल्स्तब्धौ २९३ अनन्तर प्रयोगस्तु अनयोरन्तरविहित: २१० अद्य मे सफलमायतनेत्रे १९२ ३१० अदृष्टोऽन्योऽपि वा कश्चित् २६७ अनयोश्च बन्धयोगात् ३२० अधमा इति ये ख्याता ६८,११२ अनर्थकेविकारैश्च ६६

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पद्यार्द्ानुकरमणका

अनर्थंवाक्येविविधेः १०८ अपृष्ठैरथवा पृष्ठेः २२५

अनिबद्धपद छन्दो १७५ अप्यनुक्तो बुधैर्यत्र २४५

अनिभृतवेषपरिच्छद ३३१ अप्रत्यक्षार्थसंस्पश २६१

अनिमित्तप्रकथनो ६२,१२४ अप्रार्थनीयामन्यां वा २२८

अनियुक्तार्थक वाक्यं २८६ अभवद्दन्तवेकल्याद २३८

अनिष्टश्रवणे चैव २३ अभिप्लुतार्थं विज्ञेयं २४२

अनिषण्णेन गात्रेण ४६ अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थ २६०

अनुक्तं श्रूयते वाक्यं १८७ अभिमुखपराङ्मुखाभ्यां ३२

अनुपश्लिष्टशब्दं यत् २४३ अभियुक्तैर्विशेषस्तु २४७

अनुष्टुप् द्वयधिका चैव १८० अभूतपूर्वैर्यत्रार्थें: २२३

अनुष्टुप्चपला सा तु २०६ अभूतपूर्वो योप्यर्थ: २६०

अनुष्टुबुद्भव तदा १८९ अमी गुणा रूपगुणानुरूपा १९१

अनेकत्वाद्विचाराणां २५८ अयं विधिस्तु कर्तव्य: १९,१०३

अनेकभावसंयुक्त २५१ अयथातथादिकेषु तु २७१

२२७ अयुग्मणो विधातव्यो २०८

अनेकवाक्यसंयुक्त २२७ अयुज: सर्वगुरवो २०९

अनेकस्य तथैकेन २३४ अयुजोर्लक्षणं ह्यतव २०५

अनेक्रार्थविशेषैर्यत् २५१ अर्थ हि समवकारे ३२३

अनेकोपाधिसंयुक्त: २६३ अर्थप्रधानं नाम १७३

अनेन कार्यस्थानेन ७८,७९ अर्थस्य च व्यक्तिरुदारिता २४३

अनेन चारीयोगेन ६३,१२५ अर्थस्य साधकश्चैव २६४

अनेनैव विधानेन ५५,१२३ अर्थस्येच्छायोगात् ३२४

अपदेशस्तु परोक्षो २२३ अर्थहीनं त्वसम्बद्धं २४१

अपरस्परनिष्पन्ना २७२ अर्थानुवृत्तिह्य पपत्तियुक्ती २१६

अपराद्वानुसरणे २३ अर्थान्तरस्य कथने २६५

अपरिज्ञाततत्वार्थ अर्थापेक्ष्यक्षरस्यूत १७५

अपसर्पी पुनर्वाम: ९१ अर्थापत्ति: प्रसिद्धर्च २५५

अपसरणमेव कार्य २१५ अर्थाभिधानयुक्त: ३१२

अपसव्य प्रदेशास्तु १७३ अर्धतालोत्यितेः पादेः ५७,११४

अपि कस्यचिद्युवतिरस्ति १९३ अर्धनारोगति: कार्या ८२,२३१

अपि चात्ययिके कार्ये २३ अर्धाष्टमगणार्धा च २०९

अपूर्वक्रोधजनितं २३२ अर्धेनैकेन यद्धत २३८

अपृष्ठभूतलं १३६ अलङ्कारविरामाभ्यां २९३

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नाटयशाइने

अलक्वारा: गुणाश्चेव २४६ अष्टौ चेव तु वृत्तानि १७८ अलक्कारास्तु विज्ञया: २३३ अष्टौ सहस्राणि शतं १७७ अलङ्कारा विरामाश्च २९६ अष्टौ स्थानानि वर्णानां १७२ अलक्कारैर्गणेश्च व २१७,२५६ असंख्येयप्रमाणानि १७७

अलाभलाभात्मुक्तस्य ६८ अस्मिस्ते सिरसि तदा १९० अलोकश्चव लोकरच १४८ असंस्थितपदा सुविह्लाड्गो २७० अलोलचक्षुः स्याच्चव ११९ असंस्थितैः पदेः १८९ अलोलचक्षुश्च भवेत् ४५ असंस्पशच्चि ७२ अल्पस्त्रीजनयुक्त: ३२८ असौ हि रामा रतिविग्रहप्रिया २४० अवकृष्टे पदे चव ६१ अस्पष्टश्च दकारौ २७१ अवगोतोऽपि हीनोऽपि २४९ अस्पृष्टभूतलं चैव १४७ अवर्ण्य वर्ण्यते यत्र २४१ अस्यविविधान् योगान् ३०

अवरुद्धानुसरणे १०९ अस्यावस्थौपत कार्य ३०४

अवलोक्य दिशः कृत्वा ७३ अस्यैव वैपरोल्येन ५०,१२१

अवस्थान्तरमासाद्य २० अस्वराः सस्वराश्चेव २३,१०९

अवस्थान्तरयोगेन तु १०९ अस्वस्थमाभिते २३

अवहित्थं समार्यातं अह्ः प्रमाणं गत्वा १५७

अविकृतभाषाचारं ३१९,३३० अहो श्लाध्यं वृत्त १९७

अविशेषाभिधानं यत् २४२ अहृद्या तु महो यत्न ३३,११७

अवेक्ष्य वृत्तिबाहुल्यं १७३ 'आ' अव्यक्तार्थप्रवादे च २८९ ७१९ अवृद्धस्य प्रयोगज्ञो आक्षिप्तेऽर्े तु कस्मिश्चिद् ५७ आकारैकारसंयुक्तं २९४ अशेषाङ्काकुलाधूत ५४,१२३ आकाशगमने चैव ११,१२१ अश्वयाने गति: कार्या ५६,१२४ आकाशपुरुषकथितेः ३३२

अष्टत्रिका: संस्कृतौ स्यात् १८० आकाशिक्य स्मृता ह्येता: ६९,७६ अष्टाक्षरकृते पादे १८९ आकाशेन विमानेन १५५ अष्टादश द्वितोयं च २११ आकाशस्खलितैः प्रायः १२४ अष्टादश सप्तदश तथा २०० आकुञ्चित पुनश्चेव १४६ अष्टावादौ गुरूणि २०३ आकुञ्चितं समञ्चेव १४८ अष्टाशोति सहस्राणि १७८ आकृत्या चेष्टया चिह्नैः ४६ अष्टो षष्टिश्च बृत्तानि १७७ आख्यातं पाठ्यकृत ज्ञेयं १७४ अष्टाशीतिश्च वृत्तानि १७८ आख्यानमिति तज्ज्ञेय २२५ अष्टिरत्यष्टिरपि च १८२ आख्यानयाच्या प्रतिषेधपृच्छा २१६

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पद्यार्द्धानुक्रमणिका ७१४

आगता मेघसमये २०६ आभीरोक्ति: शावरी वा २७६

आगतासि भवनं यस्य १९२ आभ्यो विनिसृत ह्येतत् २९९

आगमनामाख्यातिनपातः २१२ आभ्यन्तरस्तु नृपतेः आचार्यबुद्धष्या ता नीह ९२ आमंत्रणेस्तु पाषण्डा: २७९

आत्मानुभूतशंशी ३३२ आम्नायसिद्धं सर्वासां २७५

आत्मभावमुपन्यस्य २२५ आयतं चावहित्थ च ७४,१२७ आदित्मांशु स्पर्धिन्येषा १८९ आयतजङ्का निम्नकपोला २०३

आदो द्वे चतुर्थ च १९५ आयातनासाण्डे: २१० आदौ द्वै निधने चैव १८८ आयुष्मन्निति वाच्यस्तु २७८ आदौ दो पञ्चमं चेव १९१ आरोढुमुद्वहेद गात्रं ५०,१२१ आदौ द्वौ यत्र पादो तु २३९ आरोहणावतरणं ५२,१२२ आदौ पञ्चाक्षरच्छेष: १९३ आर्यागीतिरथार्येव २११ आदो पादस्य तु यत्र २३९ आर्याणां तु चतुर्मात्रा १८३

आदो यत् क्रोध्रजनत २२६,२२८ आर्यात्वक्षरपिण्डेन २११ आदो षट्दशमं चैव १९४,१९६ आर्यामुखे तु चपला २१० आद्यं चतुर्थ दशमं १९४ आर्येति पूर्वजो भ्राता २७९ आद्यं चतुर्थमन्त्यं च १९० आर्येति ब्राह्मण ब्रयात् २७८

आद्यं चतुर्थ षष्ठ च १९६,१९८ आलस्यश्रमस्वेदेषु ९९,१४१ आद्यं चारालमुत्तानं ४४,८१,१०६ आलोढस्थानकं कृत्वा ७३,१२६ आद्यं चैव चतुर्थ च २०२ आवन्तिका वैदिशिका १७० आद्यं तृतोयमन्त्यं च १८८,१९१,१९२ आवन्तो दाक्षिणात्या चा १६२,१७३ आद्यं सर्वगुरुज्ञेयं १८४ आवन्त्यां दाक्षिणात्यायां १७३ आद्यः पृष्ठापसर्पी च ९१ आवश्यकवि रोधेन ३०८

आद्यञ्चारालमुत्तानं १३० आवश्यककार्याणं ३०८

आद्यस्तु जनितः कार्यो ८९ आवश्यकानां कार्याणां ३०८

आद्यस्तु जनित कृत्वा ९० आवाहने विसर्गे च ७५,१२७

आद्यस्तु जनितो भूखा ८७,९१ आविष्कृतेषु सर्वषु १३३

आद्या चान्त्यतिश्चतुस्त्रिकयुता २०० आवेगे च तथा हर्ष १०९

आद्या धनुर्नता कार्या २६ आवेगे चैव हर्षे च २३

आद्यात्मराणि वै पञ्च १९७ आशी: प्रियोक्ति: कपटः क्षमा च २१६ आद्ये पुनरत्ये द्वे १८७ आश्चर्य अच्छरियं २०२

आपानं फावाणं भवति २७१ असंस्पर्शाच्च लोकस्य ११८ आभाषणं च दूरस्थे २८४ आसन्नोक्तन्तु यद्वाक्यं १८७

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नाटपशास्त्रे

आसां तु संप्रवक्ष्यामि २०८ उच्चो दीप्तर्च मन्द्रश्च २८७

आसाद्य तु रसं हास्यम् ३६ उत्क्षिप्तपातितकरस्तथा ३७,११३

मासाद्य हास्षं तु ११३ उत्क्षिप्य हस्तं पातेन २८

'इू' उत्कृतिर्द्वयधिका चैव १८०

इतरेण निषीदच्च उत्क्रम्यापि क्रमं तज्ज्ञेः २९१ ६४ इति छन्दांसि यानीह उत्तमाधममध्यानां १९,१३१ १८५ इति दशरूपविधानं उत्तमानां गतिर्या तु २५,१०५ ७३० इत्थं व्यञ्जनयोगै: स्वरैश्च उत्तमानां तु कर्तव्या ३८,११३ १७३ इत्येते पर्वंताः श्रेष्ठा: उत्तमानां तु कर्तव्या १५९ १३६

२०६ उत्तमानां भवेदेषा ४६,१२० इत्येषा सर्वविषमा उत्तमाना मयोक्ता तु १०५ इह प्रकृतयो दिव्या १८ उत्तमानामयं प्रायः ३६ इह भावा रसाश्चेव १६० उत्तमानामियं कार्या १११

'ई' उत्त मार्थविशेषो यः २२२

ईप्सितार्थप्रसिद्धय्थ २६४ उत्तमैर्मध्यमैर्नीचै: २७७

ईप्सितेनार्थजातेन २४३ उत्तरोत रसंजल्पे २८९

इष्टार्थख्यापने चैव २८९ उत्तरोत्तरसंजल्प २८८

ईषत्प्रसारिते जङ्डे ९९,१४१ उत्तरोत्त रसंयुक्तं २५२

ईहामृगेऽपि ते स्यु: ३१६ उत्तानितमुखं चेव ९८,१४०

ईहामृगश्च विज्ञेया २९८ उत्पन्नबीजवस्तु ३१६

ईहामृगस्तु कार्य: ३२६ उत्प्लुतमेकहस्तच रणं २०१

ईहामृगस्य लक्षणं ३२६ उत्साहजननैः स्पष्टैः २२०

'उ' उत्साहो उच्छाहो पथ्यं च २७२ उत्सृष्टिकाङ्को व्यायोगो ३००

उकारबहुलां तज्ज्ञः २७७ उदात्तललितैर्गात्रैः ८२,१३१

उक्तं काकुविधानं तु २९६ उदात्तश्चानुदात्तश्च २८५ उक्तान्यतः पर चैव ९२ उदारमधुरैः शब्दैः २५२ उक्ताद्युस्कृतिपर्य्त १७९ उद्धट्टितेन पादेन ३३४ उक्तो मग्रोहाभिनयो यथावत् १९२ उद्धतपुरुषप्राय: ३२६ उच्च दीप्ता च कर्तव्या २८९ उद्धता येऽङ्गहारा: ८६,१३२ उच्चय: सदृशार्थो'यः २६२ उद्धता ये च पुरुषा: १७९ उच्चा दीप्ता द्रवा चेव २८८ उ्द्धटगामिनी पुरुषभाषिणी २१०

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पद्यार्द्ानुक्रमणिका ७३७

उद्यानारामसरित: १४८ उरसोदाहृतं वाक्यं २८४ उद्वहन्निव गात्राणि ११४ उष्णं उहं यज्ञो जक्खो २७२ उद्वाहितं तु विज्ञेयं ९८,१४१ उष्णिग्गायत्र्यादीन् ३२५ उद्घाहितं नतञ्चैव ९७ उष्णिगुत्थितपादा १८८ उद्वाहिता चूर्णपदेः सा १०७ उष्णे चापि प्रयोक्तव्या ११४

उद्वाह्य गात्रं पादं च १२२ 'ऊ' उद्ाह्य गात्रं पादञ्च ५२ उन्मत्तस्यापि कर्तव्या १२६ ६२,१२४ ऊर्ध्वजानु च विक्षिप्य

उन्मत्ताभिनयस्तवेवं १६३ १२५ ऊष्माणश्च सहसहा:

उन्मत्तो भवति ह्येय ऊष्माणस्तालव्या: १७२ ६२ उन्मादेऽसूयिते चेव २८९ 'ऋ'

उपमा नाम स ज्ञेय: २३४ ऋज्वायतोन्नतनतैः ५१,१२१

उपमा रूपकं चेव २३३ ऋषयस्तापसाश्चैव ११९ उपमाया बुघैरेते २३५ उपमास्विह दृष्टानां २४७ 'ए'

उपरिगतोऽधस्ताद्वा २७२ एओआरपराणिअ २७०

उपवनगमनक्रीडा ३२९ एकजानु यदास्येव १३६

उपवनसलिलानां वालपझ्मै: १९५ एकं भुजमुपाधाय ९८,१४०

उपसर्गाह्य पदिष्टास्तस्मात १७४ एक: खञ्जगतौ नित्यं ६४

उपस्थितस्मृतिश्चैव ४५,१२९ एक: प्रसारितः किंचित् १३३

उप्परहुत्तरआरो हेटा २७१ एक: समस्थित. पादः १२८

उपाध्यायस्य नृपतेः ९६,१३८ एक एव रसस्तेषां ३०,११५

उपाध्यासेति चाचार्य वृद्ध २७८ एकत्रिशत्सहस्राणि १७७

उपेतमतिचित्रार्थे: २५१ एकदिवसप्रवृत्तः कार्यः ३०८

उपेन्द्रवज्ना विज्ञेया १९१ एकद्वित्रिचतुःपञच २९४

उभयो: प्रीतिजननः २६४ एकद्विप्रतिवचना ७२१

उभयोरर्धयोरेतत् २१० एकमात्रं भवेद ह्रस्वं २५३

उभयोरधंयोज्ञेयो २०९ एकमात्रं षट्के स्यात् १८८

उभयोरधंयोर्यत्र २१० एकरात्रौ परिग्रहं २०६

उरःपात हतोत्साह: ३९ एकवाक्येन संयुक्त २३५

उरस: शिरस: कण्ठात् २८३ एकर्विशं च विज्ञेयं २०३

उरसश्चापि चिबुक ६,१०२ एकविशतिके पादे २०१

ना० शा०-९३

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०३८ नाटयशाइतरे

एकस्य चाथहेतोः ७२३ एतानि समबृत्तानि २०४

एकस्य बहूनां वा घातो: १७५ एतान्याविद्धसंज्ञानि १७८

एकस्य बहुभि: साम्या २३४ एतादृशविघं ज्ञेयं २३७

एकस्यानेकविषया २३४ एतेन च विकल्षेन १७९

एकस्यैकेन सा कार्या २३४ एते घोषाघोषा कण्ठ्योष्ठ्या १७२

एकाक्षरं भवेदुक्तं १७६ एते दोषास्तु विज्ञेया: २४३

एकाक्षराघिका पङक्ति: १८० एते मेघा गर्जितनादोज्जवलचचिह्वाः १९५ एकाड्कन कदाचिद् ३०८ एते व्यञ्जनवर्णाः समासतः १७३

एकाडके संविघातव्यो १५७ एतेषां छन्दसां भूय १८३

एकाड्को बहुचेष्टः ३३२ एतेषां लक्षणमहं २९८

एकादशं सप्तदशं २०१ एतेषु ये श्रिता देशा: १६८

एकादशाक्षरा त्रिष्टुप १७६ एतेष्वेवं गतिः प्राज्ञो २३

एकादशाक्षरे पादे १९१ एते ह्यष्टो त्रिका: प्राज्ञैः १७९

एकादिकां तथा संख्यां १८५ एतेरङ्ग: समासैश्च १७१

एकाधिकाक्ष राष्टिश्च १८० एतर्नानाप्रकारैः बहुलसुरभिः २०१

एकारबहुलां तेषु २७६ एभि: शब्दविधानैः १७५

एकार्थसाधनकृतं २२४ एभिरर्थक्रियापेक्षेः २४१

एकीभूता: पुनश्चेता १७४ एभिरेव तु संयुक्ता १८३

एकीभूता: पुनस्त्वेता: १७६ एभिरेव विषर्यस्तेः ४६,१२०

एकेकं पादमुत्क्रम्य २३८ एभि विनिर्गताश्चान्या १७९

एकोनविशतिर्घृति: १७६ एभिर्व्यञ्जनवर्गेन १७३

एकोऽपि शब्द्ते तत्तु २६७ एलकाक्रीडिते: पादेः ४३,१२७

एकोडभिशब्द्यते यस्तु २२० एकालक्रीडतेश्चेव ९१

एतत्कृतब्यलोकानां १३६ एवं कक्ष्याविभागस्तु १६१,१९३

एतरस्थानं विधातव्यं १३६ एवं कार्यस्तज्ज्ञैः ३२५

एतदेव विपर्यस्तं २६९ एवं कृत्वा तु सर्वेषां १८५ एतदेवावतरणं सरित्स्वपि ५३ एवं गतागतैगत्वा १०५,१०९

एतानन्याश्च युञ्जीत ११५ एवं गतागतैकृत्वा: १५

एतानि काव्यस्य च लक्षणानि २२८ एवं तु संस्कृत पाठ्यं २६९

एतानि खण्डानि समण्डलानि ९३ एवं देवानुकरणे दोषो १८

एतानि गुरु संख्यानि २०२ एवं देवतातरणं प्रयोज्यं १२२

एतानि च लघूनि स्यु: २००,२०२ एवं नानाश्रयोपेतं २८९

एतानि लघुसंज्ञानि २०९ एवं नानार्थसंयुक्ते: १७६

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पघार्द्धानुक्रमणिका

एवं नामविधानं तु २८१ एषा स्त्रोणां प्रयोक्तव्या ३७,११७ एवं भावरसोपेतं २८९ एषा स्त्रोषु प्रयोक्तव्या ११३ एवं भाषाविधानं तु २७७,२८१ एषा स्वभावगमने गति: १०९ एवं राजसभां प्राप्य ९२,१३९ एषोऽम्बुदनिस्वतुल्यरवः १९१ एवं लिङ्गस्थितानां हि १२० एवंविधस्तु कार्यो 'ऐ' ३२८ एवं विविधयोगास्तु ऐश्वयॅण प्रभत्तानां २०६ २७४

एवं विन्यस्य वृत्तानां औत्पत्तिकं प्रकुरुते १८५ ३१६

एवं व्यायामसंजातं १०१ औत्पतिकानि यानि स्यु: २८०

एवं व्यायामसंयोगे १ 'क'

एवं स्थानविधि: कार्य: ७८,१२९ कक्ष्याविभागे ज्ञेयानि १४८ एवन्तु भारते वर्षें १५७ कक्ष्गाविभागो निर्देश: १४७ एवमन्तःपुरे ज्ञेयो १३९ कख गघ डा: १६२

एवमर्धार्घं होनं तु २०,१०५ कख चध टठ तथ १७२

एवमादिषु चान्येषु २९३ कगतदयवाण णिच्च २७१ एवमाभ्यन्तरो ज्ञेयो ९४ कचटतपा स्वरिता: १७३ एवमेतस्तु विज्ञेयं २०२ कञ्चुकीयस्य कर्तव्या ५७ एव मे तत्स्व रकृतं २९६ कण्ठेन शमनं कुर्यात् २८४ एवमेतानि बृत्तानि २०८ कठ्योरस्यान् विद्यात् १७३ एवमेता: प्रयोक्तव्याः ७४,१२६ कठयो विसजंनीयो १७२ एवमेते ह्यलङ्कारा: २५१ कथं न्विदं कमलाविशाललोचने १९५ एवमेष प्रयोक्तव्य: १२२ कथं विधेयस्मरण २४० एवमेव तु विज्ञेय: १०४ कदाचिदुपविष्टस्तु शयानः ६२ एष एव तु विज्ञेय: १३ कदाचि दुपविष्टस्तु १२५ एष खञ्जप्रयोगेषु १०७ कदाचिद्रौद्रवोराभ्यां २५२ एषां प्रयोग: कतंव्यो १७९ कदाचिद्धावति जवात् ६२,१२५ एषा कान्ता ब्रजित १९६ कन्दलसेन्द्रगोपर १९७ एषा खञ्जगति: कार्या ४३,११७ कन्याविलोभनकृत ३२५ एषानुकरणे ४३ कमलामलरेणुतरङ्गलोल २७३ एषा भ्रमति मत्ता १८८ कम्पनं चैव गात्राणां ६०,११८ एषामेवानुगैहंस्तैः ४३,११७ कम्पनेन च गात्राणां ११२ एषामेव तु सर्वेषां २७३ करजपदविभूषिता पथ त्वं १९४ एषा स्त्रीणां प्रकर्तव्या ४३ करणनि विचित्राणि १२१

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७४० नाट पेशादमे

करुणरसप्रायकृतो ३२९ कार्यस्त्रिकविवर्तर्च ८८,९०

करुणे शक्वरी ज्ञया २५२ कार्यहार्स्य तु विज्ञयं १०८

करो वक्षसि निक्षिप्य ४१,११४ कार्या च सा प्रयत्नात ३२३

कर्णादष्टाङ्गलस्थे च ७ कार्या चैव तु होनानां ११२

कर्णाभ्यां बाहुशिरसी १०२ कार्या चेव हि नीचानां ६८

कर्णावंसप्रलम्बौ चिद् २०० कार्या पाशुपतानां च ४६,१२० कर्त्तव्योऽडकः सोऽपि तु ३०४ कार्येषु विपरीतेषु यदि २२६ कल्पकालगतः पादैः ३५,३८ कार्यो डिमः प्रयत्नान् ३२७

कलाकालप्रमाणेन २९४ कार्यो विराम: पादान्ते २९३

कलाताऽगते १०५ काल-तोयधरैः सुधीरधन १९७

कलाप्रमाणं मध्ये च १०५ कालातिक्रमणो चैव १०९

कलाभ्यासाश्रय चव २७४ कालोत्थानगतिरसौ ३१२

कलावस्थान्तरकृतं २७४ काव्यं कार्य तु नाटयज्ञं: २५२

कलिकं मध्यमे यत्र २० काव्यनिबन्धाश्च स्यु: १७३

कलोपचारज्ञानार्थं २७५ काव्यबन्धास्तु कर्त्तव्या: २१२

कस्माद्भारतमिष्टं ३२९ काव्ययोगेषु सर्वेषु २५३

कस्मान्मृत इति प्राक्ते ५५ काव्यश्लेषैबंहुभिः ३१५

कस्य तु पृथुमृदुजधना २१० काव्ये कार्याणि कविभि: २८१

कस्मादभिनयो ह्यस्मिन् १९२ काव्ये यन्नाटके चैव २३६

कापालिकास्तु घण्टान्त २८१ काव्येषु भावार्थगतानि तज्ज्ञै २१६

कापुरुषसंप्रयुक्तं २३० काण्ठासनं द्विजातीनां ९२

कामस्य सारभूते २१० काष्ठासनं ब्राह्मणानां १३८

कामस्यापोदं कामाहर्तुकामं १९३ कि गच्छ मा विश १९२

कायो द्वादशमात्रौ च २११ किं त्वया कुमतिसङ्गया सदा १९२

कारणव्यपदेशेन २७३ कि त्वया सुभट दूरवर्जित १९२

कारुका: शिल्पिनश्चैव ३७८ किश्चित्सादृश्यसम्पन्नं २३६

कार्मुकमुक्तेनाशु चकार २०३ किश्चिदवलग्नबिन्दु: ३०६

कार्य आत्यघिके चैव १०९ किचिदाकुञ्चितैः ११८

कार्य: कार्यविघिज्ञैः ३२९ किचिदुन्नमितैर्गात्रैः १३०

कार्य गोपुच्छाग्रं ३१५ किञ्चिद्व्वाजं कृत्वा ३२६

कार्य: प्रवेशः पात्राणां ४,१०१ किञ्चिन्नताग्रकाया तु ५३,१२३

कार्य: शनेश्च कत्तव्यं ४१ किञ्चिन्नतेन गात्रेण ७९

कार्यस्तथा द्वितीयः ३२३ किञ्चिन्नतेन चाङ्गन १२९

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किमिदं कपटाश्रयदुर्किमहं १९२ कोशं तु सर्वलध्वन्त्यं १८४ किमिदं रुषापहृतशोभं २०७ किमिदमपरवक्त्रमेव ते कोशलस्तोशलाश्चैव १६८ २०७ किमिह बहुभिरुक्तैः कोञ्चपदेयं वृनविधाने ३०२ १९६ किमशब्दान्त्यो रेफो कौशलादुच्यतेऽन्यः ३३६ २७१ कोर्णा नानाथेंरवनिरिसमसंबाधा कौशल्यादेकत्वाद्वा १८८ १९६ क्रमशः करणं विप्रा: ५८ कीत्यमानर्गुणेयंत्र २२० क्रमान्नेध नमेकैक १८५ कुब्जः खञ्जोऽथ खलतिः १०७ क्रमेरभिनयेर्यता ११५ कुमार्यश्चैव वक्तव्या: २८० क्रियते वाक्यचेष्टाभि: २६४ कुर्वन्त्यावन्तिकीमेते १७० क्रोडार्थ सर्वलोकस्य २७४ कुसुमस्तवकादानं ७७ कुसुमितमभिपश्यन्ती क्रष्टे मध्यं दिनं प्रोक्त १९० १८१ क्रोधप्रसादशोकाः २०६ ३०७ कूलवृक्षानारुजन्ती कृतिश्च द्वयधिका प्रोक्ता क्वचि दासन्नपतितैः १८० ३३,४७,११७ ८१ कृतिश्च प्रकृतिश्चेव क्वचचदुन्नमितेर्गात्रेः १८२ कृतेन स्मरणस्य कि सखि २०५ क्व यास्यसि वरोरु २०७

कृतो शतसहस्राणि १७८ क्षणो मूहूतों यामो वा १५७

कृत्वा गात्रं ततो १३० क्षतर्गवाक्षेरिव २४०

कृत्वा गात्रं तथा गच्छेत् ४४,८१,१०६ क्षरन्तो दानसलिलं २३५

कृत्वा चारों तथोद्वद्धा १२५ क्षामस्वरकपोलशच ६०,११८

कृत्वा नाभितटे हस्तं ४४,१०६ क्षितिधरसद्शोच्च रूपा २०२

कृत्वावहित्थ स्थानं तु ७८,८१,१२९ क्षणेहः ष्णे ण्हः २७२

कृशस्यात्यभिनेया वै ६० कृशाङ्गानां तु कर्त्तव्या ११८ 'ख'

केतकीकुसुमपाण्डुरदन्ता २३८ खगैश्च सर्वेर्युधि २३९ केतुमत्यां गणाः प्रोक्ताः २०७ खञ्जे गतिस्तु कर्त्तव्या १०६ केवलमूर्ध्वनिक्षेपं ५३ खटकावर्धमानो च ११८ केवल तूर्ध्वविक्षेपं १२२ खटकावर्धमानौ तु ५७ केशपाशच्छदा चक्रवाकस्तनी १९४ खधथधमा उण हत्त २७१ केशै: स्नानाढ्ये: कुसुमभरितेः १९९ खधथधभाण हुआरो २७१ कैशिकोवृत्तिहोनानि ३०१ खलोऽवल लोवो २४० कोटित्रयञ्चाभिकृत्यां १७८ खलोन ग्रहणादश्वं १२३ कोटिश्चैवेह वृत्तानि १७८ खस्थानाञ्चेव नारीणां ८६,१३२

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७४२ नाट्यशास्त्र

खेदालसं तथा चक्षु: १३४ गतिस्तत्र प्रकुर्वीत ११७ ख्यातरूपा वृत्ते २८८ गतौ नमेत चेटानां ६९

'ग' गन्तव्यं विक्रमैविप्रा: ७३ १२६ गज्जासागरमध्ये तु २७६ गन्तव्यं विक्रमश्चेव

गङ्गव मेधोपगमे २०६ गधड़ चझज डढण दधन १७२ गमने च निषण्ण: १०५ गच्छेतं त्यक्त्वा तं १९६ गच्छेत्तथाध्यधिकतया गमनेन निषण्ण: ६४ ३७ गच्छेत् सललिते: २७ गम्या भद्रेति वाच्या वे २८०

गच्छेदथाध्यधिकया ११३ गम्या भूमिष्वगम्या च १८८

गच्छेद्यदि विकृष्टस्तु १५६ गम्भीरार्थानि नामानि २८१

गच्छेत्सललिते: १३४ गर्भिणोव दृश्यसे ह्यनार्ये १९०

गच्छन्ति पदन्यस्तास्ते २७० गश्च तथा च वे भवकि १९६

गजवाजिरथादीस्तु १२६ गाढे प्रहारे कार्या च ४०,११४ २७६ गात्रेविकारविक्षिप्तैः ६९

गणाश्चापरवक्त्रे तु २०७ गान्धारश्च निषादश्च २८३

गणेषु त्रिषु पादस्य २०९ गायत्यकस्माद्सति ६२

मति तत्र प्रयुन्जोत ३३ गायत्रीप्रभृति त्वेषां १७७ गतिः काञचुकिनी प्रोक्ता ११४ गायत्र्यां दो त्रिको ज्ञेयौ १८० गतिरपि चरणावलग्नमन्दा १९४ गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च १८२ गतिर्मन्दा चेयं सुतनु १९७ गोतकप्रभृतीनां तु १८४ गतिः खिन्ना चेयं १९७ २६५ गतिः प्रयोक्तृभिः कार्या गुणातिपाताद् दोषाद्वा ४०,११४ गुणातिपातातिशयौ २५५ गतिः शृङ्गारिणो कार्या २६ गुणातिपाती मधुरैः २६१ गतिः स्थितलया कार्या २१ गुणानुवादो हीनानां २२२ गतिः स्थिरलया कार्या १११ गुणाविधानैविविधैः २६१ गतिप्रचारं विभजेत् ६७,१०८ गुणाभिवार्द दोषान् वा २३२ गतिप्रचारस्तु मयोदितोडयं ९९,१४२ गुणा विपर्ययादेषां २४३ गतिप्रचारानुगतं च पाठर्य १४१ गुणैबंहुभिरेकाथें: २२४ गतिप्रचारानुगतश्च पाठ्यं १८० गतिप्रचारस्तु मयोदितोऽयं गुरुभार्या तु वक्तव्या २७९ १२९ २०९ गतिमेतेषु भावेषु गुरुमध्यविहीनस्तु १०९ गुरुपूर्वो भकारः स्यात् १७९ गतिरेवं प्रकर्तव्या शेषा ये ३१,११६ गुरु दीर्घ प्लुतञ्चेव १७९

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७४३

गुरुयुगमन्त्ये १८७ गुरुलध्वक्षरकृत: १७९ गुरुलध्वक्षराणीह १८५ चक्रवच्चक्रवाल तु २३८

गुरूणि जागते पादे १९२ चतुःपञ्चप्रकाराणां ८११ २० गुरूणि द्वादशे पादे चतुरर्धकलं व स्यात् १९३ चतुर्णा यत्र पादानां २३७ गुरूणि त्रेष्टुभे पादे १९० चतुर्थ च द्वितीयं च १८९

गुरूणि यस्मिन्सा १८९ चतुर्थमन्त्यं दशमं १९४

गुरूणि यस्या: सा १८९ चतुर्थमार्द्य षष्ठं च २०१

गुरूष्यतिजगत्यां तु त्रिभिश्देदेः १९५ चतुर्थादक्ष राद्यत्र २०६

गुरूण्यन्यानि पादे तु १९२ चतुर्दशं तथान्त्ये दे १९८,१९९

गुरूण्यष्टाक्षरे पादे १८६,१८८ चतुर्दरशं पञ्चदशं १९९

गुरूण्येकादशे पादे १९० चतुर्भिरशकेर्ज्ञेया २०७

गुरोरधस्तादाद्यस्य १८३ चतुर्भिस्तस्यैव प्रवरललितस्य १९७

गुर्यावहोनस्तु २०८ चतुर्भिस्तु भवेद्युक्तं १७६

गुर्वक्षरप्रायकृतं २५२ चतुर्विशतिके पादे २०२

गुर्वन्तकः सर्वलघुः २०६ चतुविधा प्रवृत्तिश्च १६२

गुर्वधस्ताल्लघुं न्यस्य १८३ च तुर्व्यवसितञ्चेव २३७

गुर्वेक ग इति प्रोक्तं १८० चतुर्व्यवसितं नाम २४०

गुर्वेकं गिति विज्ञेयं च तुष्कलस्तथाधं १०४ १७९ गुल्मश्छन्ने वनमभिनवैः बतुष्कलं तूत्तमानां १०४ १९६ चतुष्कलमथार्धंञ्च १६ गुह्यार्थवचने चैव २८८ गूढाथं मर्थान्तरमर्थहीनं चतुष्कलश्च द्विकल: १०४ २४१ ११० गूढ़वार्ता यत्र भवेत् चतुष्कलाप्रमाणेन ३१८ चतुष्कलोऽथ द्विकल: ९,१६,१०२ गृहोत्वा वामहस्तेन ४३ चतुष्कलो ह्य त्तमानां ९,१०२

गोष्ठीभिर्द्यानवनानि चैव २३६ चतुष्टयं शतानाञच १७८

ग्रथिता पादयोगेन २०४ १७८

ग्रहनक्षत्रचरितं २७४ चतुस्तालान्तरोत्क्षिप्तैः ३१,११६

ग्रामो पूर्णस्वरौ द्वो तु ३०० चतुस्तालप्रमाणेन १७,१०३

ग्रीवाप्रदेश: कर्त्तव्यो ६,१०१ चतुस्तालस्तु देवानां ८,१०२

ग्रोष्मो गिम्होति तथा २७२ चतुस्तालो द्वितालश्च ८,१०२

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OYY नाटघशास्त्रे

चतुस्त्रिका तु जागती १८० छन्दोहीनो न शब्दोऽस्ति १७६ चत्वारिशत्तथा चाष्टो १७२ छलयुक्त्या त्वन्येषां २२९ चत्वारिशत्तथा द्वे च १७९ छेदस्तु ये मया प्रोक्ता २०५ चत्वारिशत्तथैकक्ष १७८ चस्वारि चेव वृत्तानि १७८ 'ज'

चरवार्यादौ गुरूणि स्यु: १९६ जगति विधाने नित्यसंविष्टा १९३

चत्वार्यादो च दशमं १९८ जगत्यतिजगत्यां वा २५२

चत्वार्यादो तथा षष्ठं २०० जगत्यां समवर्णानां १७७

चराव चृरणितेक्षणं १८९ जगत्यामतिपूर्वायां १७७

चरित यन्नेकविधं ३१७ जघने चपला चव २०८

चर्मण्वतीनदीतीरे २७१ जात्या नीचेषु योक्तव्या ७२

चित्रासने सललिते १२८ जयतिसुरदेत्यजिष्णु २३७

चित्रेवंसन्तकुसुमे: १९५ जलधारवं श्रुत्वा १९८

चिन्तान्विते तथा स्वस्थ: १११ जलप्रमाणापेक्षा तु ५३,१२३

चिन्तायां च तदौत्सुक्ये १३४ जलाशयमृगव्याल १०३

चिन्तायां चावहित्थे च ७५ जाति चेष्टानुरूपाणि २८१ चिन्तायामवहित्थे च १२७ जातिनीचेषु कर्त्तव्या ११३ चिबुकापयौ हस्तौ १२४ २९९ चिबुकोपश्रितौ हस्तौ जातिभि: श्रुतिभिश्चैव ८८

चीरचर्ममषीभस्म ६७,१०७ जातिहोनाश्च या नायं: ८६,१३२ १८९ चूताशोकारविन्दैः कुरवकतिलकैः २०१ जाति यस्य गौ न

चेष्टानां राजपुत्राणां जानाति मांसयुक्ता २७५ २१०

चेकीडित प्रभृतिभिर्विकृतैस्तु शब्देः २५४ जानीत समवृत्तानां १८५ जानुगतं विमुक्त च १३३ 'छ' जानूपरि करं ह्यवं ७३

छ इति षकारो नित्यं २७१ जिह्वामूलीय: क= १७३

छन्दतः प्राकृतं पाठ्यं २७५ १७२ छन्दतो यस्य पादे स्यात् १८२ ज्येष्ठे चतुष्कल ह्यत्र २०

छन्दसां तु तथा ह्ये ते १७७ ज्येष्ठे चतुष्कला कार्या १०५ छन्दांस्येवं हि यानीह १८७ ज्वरार्ते च रुजार्ते च १११ छन्दोज्ञैर्ज्ञे यमेततु ६८९ ज्वरार्ते च क्षुधार्ते च २१ छन्दोयुक्तं समासेन १७६ जौ त्रिको हि पादगौ १९०

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पद्यार्दानुक्रमणका

तत्र चर्णपदस्येह १७५

ज्ञात्वा दिवसावस्थां ३०८ तत्रापि चोलमायेतु १०३

ज्ञेयं प्रकरणं चैव ३०० तत्रापि चोढ्धता ये तु २७

ज्ञेयमाम्रेडितं नाम २३९ तत्रापि वामवेर्ध तु १५,१०९

ज्ञेयाभ्यनुक्तसिद्धिश्च ५०० तत्राप्यङकच्छेद: ३११

ज्ञेया शतसहस्राणां १७८ तत्रोपवहनं कृतवा ४,१०१

ज्ञेयाश्चाष्टो त्रिकास्तत्र १७९ तत्सव कर्त्तव्यं वर्षात् ३११

'ट' तथा च पश्याम्यहमद्य १९३ तथा चर्णपदश्चेव २४१

टठडढणा १७२ तथा चेह सहस्राणि १७८

'ड' तथा चैककलं पातं १०४

ड इति च भवत २७ तथा चेककल: पातो ९७,१०२,१०४

डिम: समवकारश्च १७८ तथा चोत्कटिक स्थानं ८९,१३६

डिमलक्षणं तु भूय: ३२६ तथापि जागती चैव १८२

'त' तथा दक्षिणहस्ते च ११७

तथा द्वितीय: कार्यस्तु ६४,१०६ त एव सर्वे कत्तव्या २९६ तथा पञ्चदशं चेव २००

तकारबहुलां नित्य २७७ तथा पिशितहस्तर्च ३१,११५ तच्च दशाष्टवर्णरचिता २०१ तथा प्लवङ्गमा ज्ञेया १७०

तच्चावलगितं ३३६ तथा भयानके चापि १३७ तच्छन्दी नामतो ज्ञेयं १८२ तथा भयानके चैव ४२,११६ तज्ज्ञैः शतसहस्र द्वे १७७ तथा भावरसोपेतं १६ ततः पाठ्यं प्रयुञ्जीत २८३ तथा योन्यतरी चैव २७३

ततः सललितं पादं ७८,१२९ तथा योन्यतरी चैव ५७

ततो भाण्डोन्मुखो गच्छेत् २५,१०९ तथा लाभे तु कार्यस्य १५७

ततो वामपदं दद्यात् ७९,१२९ तथावतरणञ्चव ११५

तत्काब्चीयमकं चैव २३७ तथावतरणे चैव १२२

तत्क्षाम्यं हि महोपाल: २७८ तथा वीरे च कर्तव्या ११८

तत्पुरुषादिकसज्ञेः १७५ तथा व्रतानुगा च स्याद १२०

तत्प्राहुः सप्तविध २२९ तथा व्रतानुगावस्था ४६

तहप्रकरणेऽपि योज्यं ३१७ तथा शतसहस्त्रञ्न १७७

तत् प्रियं वचनं ज्ञेयं २८८ तथा शतहसस्राणां १७८

ना० था०-९४

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नाटषशासत्रे

तथा शतसहस्राणि १७८ तयोश्चापि प्रविशतोः १५४ तथा षडभिश्चान्यैः १९७ तलिङ्गार्थानि नामानि २८०

तथाष्ठिरपूर्विका यतिः १९९ तव रोमराजिरतिर्भात सुतनु २०७ तथासनविधि: कार्यों विविधो ८७,९१, तस्माच्छीलं साधुहेतो: सुवृत्तं १९२

१३७ तस्माद्देवानुकरणे ११०

तथा सवलघुश्चव २०९ तस्माद्वाचः परं नास्ति २०९ तथास्यं नेत्राढयं भ्रमरसहितं १९७ तस्य तु प्रकृति ज्ञात्वा ज्ञात्वा तथा १०८ तथा स्वगृहबार्तासु ९४,१३९ तस्मास्तु प्रकृति ज्ञात्वा ५७

तथा स्वभावजनश्चव ३० तस्मात्तुभयसंयोगो १७६

तथा सौष्ठव संयुक्ते २७ तांस्तान् पूरयतेऽर्थान् १७५

तथैव मणिबन्धान्ते ५३ तानपरस्परवृत्ते २७०

तथव प्रविशेत गेहं १५३ तानि नाट्यप्रयोगजैर्न १४६

तथैव युद्धसम्फेटा २५२ तानि नाट्यप्रयोगज्ञे ८६,१३२

तथोपान्त्यं जगत्यां च १९२ तामनुष्टुभाश्रयस्थां १८९ तदप्यष्टी नित्यं समनुगतमेवोक्तमन्ये १९७ तारश्चैव हि मन्द्रश्च १८१ तदा दक्षिणहस्ते च ६७ तावत्वं विजितेन्द्रियः शुभमते २०० तथा हि वृत्तं जगतीप्रतिष्ठितं १९३ तालमात्रान्तरे न्यस्त: ७५,१२७ तद्धितसन्धिविभक्ति १७३ तालमात्रोत्थितैः पादैः ११९ तद्भारते तु वर्षे ३२९ तालव्या इचुयशा १७२ तद्वंशपत्रपतितं १९८ तिर्यक् प्रसारितं चैव ५४ तद्विदां मतवैषम्यं २०६ तिर्यक्प्रसारिता चैव १२३ तद्वृत्तिकानि १७५ तिर्यगता क्षिप्ता ६२ तद्वै पादान्तयमकं २३७ तिर्यकस्थितौ चाभिमुखौ ५२ तन्नाडिकाप्रमाणं ३२३ तिस्र: कोटयो दश तथा १७९ तन्मनो मम प्रविष्टं १८९ त्रिस्र: प्रसारिता यत्र ३५ तन्मालायमकं नाम २४० वीक्ष्णरूक्षाभिनयने २८८

तपस्विन्यो देवताश्च २७९ तीव्रगन्धे विकृष्टां तो १३

तपस्वोति प्रशान्तस्तु २७८ तोब्रार्थभाषणं यत् २२५ तमप्यक्षरसङधातं २१०८,२७५ तुभ्यं तुज्झं मह्य® मज्झ २०२ तयोर्भाण्डस्यविन्यासो १४७ तुल्यं ते शशिना २३४ तयोविभागं वक्ष्यामि १७१ तुल्यात्पादद्वयादन्त्याद २३८

तयोविभागस्वराश्चेव १७१ तृतीयसन्स्यं नवम १९३

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तृतीयं चेव षष्ठ च १२९ त्रिविधं ह्यक्षरं कार्य २५३ तृतीयसवनञ्चापि १८१ त्रिविधश्चान्नविधिज्ञः ३२४ तृतोया प्रकृति: कार्या ८४ त्रिविधा तु गतिः कार्या ६३ तेन चार्थेन सम्पन्न: २४७ त्रिष्टुप च जगतो चव १८२ तेनैव समकालञच ७८,१२९ त्रोणि स्थानानि कर: २८३ तेषां कक्ष्याविभागाश्च १५९ त्रीण्यक्षराणानि विज्ञय: १७९ तेषां कार्या गतिर्ये तु ४५ त्रीण्यक्षराणि चान्यानि २०९ तेषां तु दर्शनेच्छुर्यः १५१ त्रीण्यादावष्टमं चेव १९५ तेषां देशानुसारेण ७२ त्रोण्यादौ च गुरूणि २०० तेषां देशानुरूपेण १०३ त्रीण्यादौ यदि हि गुरुणि १५० तेषां न चेष्टितं कारयं १५९ त्रेष्टभमेव हि ततखलु १९० तेषान्त्वनिगिषत्वं यत् १६० त्रेष्टुभे द्वे सहस्रे च १७७

तेषामासनसतकार: ९५,१३८ त्रयक्षरास्तु त्रिका ज्ञेया १८४ तेषामेवानुगैर्हस्तेः ३३ त्रय ङ्कस्तथा त्रिकपटः ३२२ तेषां विभागं विज्ञाय १४६ त्र्यश्रस्त्रिकोटे चतुरस्रङ्ग १०५

तेषु प्रयुज्यते ह्यषा १७२ १४९

तेषु हि वर्षषु सदा ३२९ ल्वं पुनननिरोक्ष्या दुरतिप्रसादा १९१ तर्भूषिता बहु विभान्ति हि त्वमसि मधुरवाक्या देवि १९६ काव्यबन्धा: २५३ तोयेऽल्पे वसनोरकर्षः ५३,१२३,१४१ 'द'

त्यक्त्वा (कृल्वा) समपदं ६४ दक्षा गृहकृत्येषु तथा २१०

त्रयोदशाक्षरे पादे १९५ दक्षिणं च नयेत्पाश्व १४४

त्रयोदशं द्वादशं च १९९ दक्षिणं चैव हस्त तु १०८ त्रयोदशाऽतिजगती १७६ दक्षिणं वामपादस्य ७८,१२९ त्रासने च कुसल्वानां ९० दक्षिणं विनमेल्पाश्व ७८,१२९ त्रिशतस्त्वथ वर्णेभ्यो २११ दक्षिणस्तु समः पादः ७१,१२७

त्रिशतस्याश्च यदि २०९ दक्षिणस्य समुद्रस्य १६८

त्रिरादाद्ये तु विज्ञेया: २०९ दक्षिणाभिमुखः सोथ १५१

त्रिकं सुवतितं कृत्वा ६३,१२५ दक्षिणो नाभिसंस्थस्तु ७,१०२ त्रिकेर्विषमबृत्तानां २०५ दण्डकं नायविज्ञेयं २०४

त्रिलोक्यां गुणाज्यान् १९४ दत्तप्रायाणि नामानि २८१

विविधं तच्च विज्ञेयं २७० दत्तात्रिसेनेति २८१

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नाट पशाएने

दन्तकुन्तकृतास्त्रं १८८ दूतीदशितमार्गस्तु ११०

दन्तक्षताधरं सुभ्रु २०६ दूर वा सन्निकृष्टं वा १५०

दन्तुरः खलतिः कुब्जा ६६ दूराध्वानं गतस्यापि ६०

दन्तोष्ठस्फुरणाच्चेव ११४ दूरस्थाभाषणे चैव २८८

दन्तोष्ठस्फुरणं चेव ४१ दूती शितमार्गस्तु २६

दशरूपविधाने तु २९६ दृप्तानां दैत्ययक्षाणां १०३

दशाक्षरकृते पादे १९० वृष्टं चंवोपदिष्ट च २५५

दष्टौ दट्टोति तहा २७२ दृष्टनष्टानुसरणे २८२

दारिद्रयाध्ययनाभाव २७३ दृष्टश्रुतानुभूतार्थं २६६

दाशार्णास्त्रेपुराश्चेव १७० दृष्टया हि सूचितो भाव: १६१

दासविटश्रेष्ठियुतं ३१८ दृष्ट्या तु तां विशालाक्षीं २३४

दिनक्षयात् संहृतरश्मिमण्डलां २३७ दृष्टच वावयवं कञ्चिद् २२९

दिवसावसानकार्य ३०९ दृष्ट्चैवानयवान् कांश्चिद् २५९

दिविकल्पस्तु यः षष्ठः २०९ देवदानवयक्षाणां १७

दिवौकसां तु सवेषां देवभिगमने ९०

दिवौकसां तु शेषाणां ७,१०३ देवाभुजगेन्द्रराक्षसी ३२७

दिव्यभावपरीतं यत् २५१ देवानामपि ये देवा २७

दिव्यमानुषरत्यर्थ ११० देवाश्च लिङ्गिनश्चेव २७७

दिग्यरूपेवियुक्त: ३२८ देवासुरबोजकृत ३२२

दिव्या तु देवप्रकृती ११० देवीति महिषी वाच्या २८०

दिव्या तु प्रकृतिर्ज्ञेया ११० देवेति नपतिर्वाच्यो २७९

दिव्यानां गमनं कार्य १५५ देशं कालं प्रयोगं च ४७

दिव्यानां छन्दगमनं १५६ देवानां नृपतीनाञच ९२,१३८

दिव्यानां नृपतीनां च ११० देवानां प्रकृतिर्दिव्या २८

दिव्यापुरुषायकृतो १२५ देवाभिगमने चैव १२५

दिव्यो दिव्येतरश्चैव १८२ १३७ दीर्घंतराभि: स्थूलसिराभि: देवाभिवन्दने कार्य २०३ १८ दीर्घनिश्वसिते चैव देवांसजास्तु राजान: ५० १०३ दीर्घ विश्वस्यान्तगूँढ देशजातिसमुल्थेन २०४ देहतोयाशया वक्त्र १९४ दुजनोदाहृतेः रुक्षेः २२९ दैत्यनागालयाश्चेव १४८

दुर्बोधनैश्च न कृता २४६ दत्यानां दानवानां च १५८ दुःशोलं वा निर्गुणं वा १९२ दोषगुणीकरणं वा ३३७

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पद्यार्द्ाुक्रमणका

दोषा न परिकथ्यन्ते २२० द्वितीयान्त्यौ युजौ पादौ २०८ दोषेर्यदन्यनामोक्तैः २३३ द्वितीये चरणे च स्याद् २०५ द्योतयन्त्युपसर्गास्तु १७३ २२९ द्र विडान्ध्रमहाराष्ट्रा १६८ द्विधा क्रिया भवत्यासां १७३ द्रुतप्रचाराधिष्ठानाँ 3४ द्विकला चोत्तमे यत्र १०० द्रुता गतिश्च प्रचुराधमानां १२,१०४ द्विविकल्पस्तु षष्ठो यो २०९ द्रुता गतिस्तु कर्त्या १०५ द्रुतैश्चूर्णपदेशचेव ४२०,४९,११७,५२१ द्विविघं हि स्मृतिपाठ्यं १७१ द्विर्षष्टिश्च सहस्राणि १७८ द्रुमप्रासादशेलांश्च १२३ द्वो द्वो वणौं तु वर्गाद्यौ १७२ द्रुमप्रासादशैलेषु १२२ द्वो समौ द्वौ न विषमौ २०४ दुमे चारोहणं कार्य १२२ द्वयोरघंसमं विद्याद् २०५ 'ध'

द्वात्रिशच्च सहस्राणि १७७ धनुरेकेन हस्तेन १२०

द्वादशनाडीविहित: ३२२ धनुगृहोत्वा चँकेन ४९

द्वादशनायकबहुलः ३२२ धर्मी या द्विविधा प्रोक्ता १८१

द्वादशाक्षरे पादे १९३,१९४ घार्यमाणस्तु बहुभि: २१९

द्वारन्तु यस्मात्समृदङ्गभाण्डं १८० धोरत्रशान्ते च तथा २७३

द्वाराणि षट् चैव भवन्ति १८० धारोद्धते सललित २७३

द्वार्विशत्यक्षरे पादे २०१ धूर्तविटसंयोज्य: ३३२

द्विकला चोत्तमे यत्र २०,१०५ घृत्यामपि हि पिण्डेन १७७

द्विकलार्घप्रयोगेषु १०६ धैर्योदार्येण सरवेन ८५ २०० द्विकौ ग्लाविति वर्णोक्तौ धैर्योत्साहपराक्रमप्रभृति १८३ धंर्योपपन्ना १२ द्विगुणाञच लघो: कृत्वा १८४ धंवतश्चैव कर्तव्यो २८३ द्वितोये चरणे च स्याद् २०१ ध्रुवंगता ते रजनी विना २४० द्वितालश्चेव मध्यानां ८,१०२ १८१ द्वितीयं च चतुर्थं च ध्रवाविधाने चैवास्य १८८,१९० ध्रुवायां संप्रवृत्तायां ४,१०२ द्वितीयं पञ्चमं चैव १८८,१९४ द्वितोयमन्त्यं दशमं ध्रुवायोगे तु वक्ष्यामि २०८ १९३ द्वितीयमन्त्यं षष्ठं १९९ 'न'

द्वितीयश्च चतुर्थश्च २१० नकारबहुलां तेषु २७७

द्वितोयादिलघुर्ज्ञेयः २०९ न खलु तव कदाचित्क्रोधता १९६ द्वितीय चतुर्थ च १९५ न खल्वस्याः प्रियतमः २०६

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७५० माटपशास्त्रे

नखालीढं गात्रं १९७ नाटकादेषु काव्येषु २०८

नगरे वा वने वापि १४९,१५५ नाटके च्छन्नवेषाणां १४५

नगरोपरोधजो वा ३२३ नाट्यधर्मीप्रवृत हि १९०

न च गृह्यतेऽस्य वचनं ३३६ नाट्यप्रयोगे कर्तव्यं २७६

न च तानि प्रयो्यानि २०८ नाट्यप्रयागे खलु १८०

न च दिव्यनायककृत: ३२८ नाडीसंज्ञा ज्ञेया ३२३

न च दिव्यनायकयुक्तः ३२८ नातिचूर्णपदर्युक्ता २४६

नजौ रजो द्वितीये च २०७ नातिदूरे च कण्ठेन २८४

न तत्र सौष्ठवं कार्यं ३८,११३ नात्युत्क्षिप्तैः पदर्गच्छेत् ३९,१२४

न तस्य विक्रम: कार्य: ६५ नानाकुसुमाचत्रे १८८

न तस्यां सौष्ठवं कार्यं ८३,१२० नानाकुसुमनामान: २८१

न तस्यातिक्रम: कार्यो १०७ नानाचोरधर्चैंव ६२,१२५

न ते काचिदन्या समा दृश्यते १९४ नानादेशसमुत्थं हि २७५

न निषण्णं न च स्तब्धं ४४,८१,१०६,१३० नानाद्रव्यानुरागाद्ये: २३६

न बर्बरकिरातान्ध्र २७६ नानाधिकरणार्थानां २३५

न बहूनीह कार्याणि ३०८ नानापुष्पसुगन्धाभि: २७

नमनोन्नमनात्पार्ष्ण: ६२ नानाभावसमायुक्त १३३

न महाजनपरिवार ३१५ नानाभावसमायुक्त: ८७

न मे प्रियमिदं जनस्य १९९ नानारत्नैः कनकखरचितैः १९८

न मे प्रिया ल्वं १९३ नानारूपैः स्वरैयत्र २४०

न यः पर्यवतिष्ठेत २१९ नानावतंसक विभूषितकणंपाशा १९५

नरस्वभावमुत्सूज्य ८४,१३१ नानावस्थोपेता: कार्यः ३०७

नलिनीपद्कोशो तु ५६ नानाविधानयुक्त: ३०५

न बघः कर्त्तव्यः स्यात् ३१४ नानाविभूतिभिर्युतं ३०२

नवमं दशमं चैव ३०२ नानाविहङ्गजा चैव २७३

नवमं सप्तमं षष्ठं १९१ नानावृत्तिविनिष्पन्ना १७६

नवाक्षरा तु बृहती १७६ नानाव्याकुलचेष्ट: ३२९

नवाक्षरकृते पादे १८९ नानाशस्यशतघ्नितो २००

१९० नानाशब्दं पठेतज्ज्ञो रतु५

नाटकं सप्रकरणं १७९ नाभिकमलविवरोत्पतिता २०७

नाटक सप्रकरणमङ्को २९८ नाभिप्रदेशे विन्यस्य ७८,८१,१२९,१३० नाटकलक्षणमेतत् ३१६ नामतः कर्मतश्चैव २९७

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पद्यार्द्धानुक्रमणिका ७५१

नामयेत्त दुगतौ किञ्चित् ११२ निर्घाटनमायस्तं २५

नामाध्यातार्थविषयं १७४ निर्धातोल्कापातैः ३२७

नामाख्यातोपसर्गाश्च १७१ निर्दिष्ट शिल्पकार्यास्तु २७५

नामानि पुरुषाणां तु २८१ निर्देशसम्प्रदानापादान १७३

नाम्ना राजेति वा वाच्या २७८ निर्वहणे कत्तव्य: ३१६

नाम्ना वयस्येत्यपि वा २७९ निर्वाणदीपो नात्यथं २८,१११

नाम्ना वृत्त लोके २०४ निवार्यते च कायज्ञै: २२६

नायकदेवीगुरुजन ३०७ निश्चये परितोषे च ७६,१२८

नायकदेवीदूती ३२१ निःश्वासैरायतोत्सृष्टैः २८,११३

नायिकानां सखीनां २७६ निषष्णदेहा कतव्या १०७

नारदस्य प्रतिकृति: २०६ निषष्णदेहा पङ्गोस्तु ६४

निजां प्रकृतिमुत्सृज्य १३२ निषेधगर्वगाम्भीर्यमौन ७५,१२७ नितम्बे दक्षिणं कृत्वा ७९,१२९ निषेधगर्भगाम्भीर्य १४३ नित्यसंनिविष्टा जगतिविधाने १९२ निष्क्ान्तोऽर्थवशाच्चापि १५३ नित्यं यत्पदमाश्रिता २०० निष्काम: सर्वेषां ३०७

निदर्शनं निरुक्त च २५५ निष्काममेद्यश्च तस्माद्व १५३ निदशंनकृतस्तज्ज्ञैः २२७ नीचानां मध्यमानां च ११९ निन्धमद्य कि त्वं विगतिशोणा १०३ नीले तु वैडूर्यमये १५२

निबद्धं तु पदं ज्ञेयं १७५ नुते गीते च वाद्ये च १२४

निबद्धाक्षरसंयुक्तं १७५ नृत्यते गँस्यते प्रपच्च १८९

निभृत सावेग वा ३२५ नृत्यत्यपि च संहष्टो ६२

निमीलितं यथा चक्षु: १३५ नृपतीनां यच्चरितं ३०३

नियत: पदविच्छेदो १७९ नेत्र संकोचनस्वेदँ ११५ नियतगतिवस्तुविषयं ३३० नेत्रे लोलालसान्ते २००

नियमस्थमुनीनां च ९४ नेपथ्य रौद्रौ विज्ञेय: ३०,११५ नियमस्थे वितर्के च २८८ नैकरसान्तविहिता: ३०७ नियमस्थो मुनीनां तु १४० नैधनेऽन्यतरस्यां वे २०५ नियुद्धसमये चैव ७४ नैव तेऽस्ति संगमो १९० नियुक्तार्थ तु तद्वाक्यं २८५ नैवाचारो न ते मित्रं २०५ नियुद्धे संशये चव १२५ नैवातिरिक्त होनं वा १८१ निरोगाधिकृताश्चैव २७८ नोक्तश्च यः सोऽर्थवशेन १२९ निरवद्यस्थ वाक्यस्य २६० नोक्ता या या मया ह्यत्र ७४ निरुक्तं द्विविधं प्रोक्तं २२१ नोत्तममध्यपुरुषै: ३१२

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नाट्यमासत्रे

नोदात्तनायककृतं ३१७ पदवर्णसकासे च २९३ नोद्वेजयति यस्माद्धि २४८ पदानित्वगतार्थानि ३३५ नोध्वं वर्पात्प्रकर्तव्यं १५७ पम्माननास्ता: कुमुदप्रहासा २३६

नौनागारभवनेषु ९६,१३८ पदादियमकञचैव २३७

नौ यौ तु प्रथमे पादे २०६ पदोच्चयं तु तं विद्यात् २२४ नौस्थस्यापि प्रयीक्तव्या ५५,१२३ गन्नगानां मतिः कार्या ५६,१२५ न्यसेल्लघु तथा सौकं १८५ पफबभमास्त्वोष्ठ्या: १७२ न्यस्येत् प्रस्तरमार्गोडयम् १८३ पफयोरोष्ठस्थानं १७२ न्यायादपेतं विषम विसन्धि २४१ परस्परानुकूल्येन २३१

'व' परापेक्षाप्युदासार्थं २६०

पक्षिणां श्वापदानां च परिक्रमेण रङ्गस्य १४७,१५४ ७२ २६२ पड्वत्यां सहस्रं वृत्तानां परिगृह्य तु शास्त्रार्थं २४१ परिच्छेदविशेषस्तु १६० पञन्चपञ्चाशादाद्या तु २११ परिदेविते तु हाकार २५३ पञ्चभिरादौ छेदमुपेता २०३ पञ्चमं सप्तमं चान्त्यं परदोषेविचित्रारथे: २७८ २६६

पञ्च विशत्यतिकृतिः १७६ परवचनमात्मनश्च ३३७

पञचशतधातुयुक्तं १७४ परवचनमात्मसंस्थं ३३२

पञच षट्सप्ततिश्चैव परिग्रहो निग्रहर्च १७८ ४७

पञन्च षष्टिस हस्राणि परिजनकथानुबन्धः ३०९ १७७ पञ्चाक्षरादी च यतिः १९६ परिधृष्टतलस्थेन २२ परिपतनवक्रमण्डलमभिनेया ३१ पञ्चादौ पञ्चदशकं ३२४ परिमण्डलं भ्रमितया ३३ पञ्चादौ शक्वरी पादे १९६ परिमुदितेन तु नीलं ३६ पञचार्शा्द्ग: सहसत्रश्च २४० परिवर्तात्रिकस्यापि ६१ पठतां ब्राह्मणानां च २५३ परिवाण्मुनिशाक्येषु २७४ पतितोयावली वद्ध १९४ परिवाहितमाधूतं २ पतनी चार्येति संभाष्यां ५६९ परिवृतं तथा चेव ६३ पथ्या च विपुला चेव २०८ परिवृत्य द्वितीयं तु १४ पथ्यापादं समास्थाप्य २०६ परिवृत्य द्वितीयं तु १०८ पथ्या यथा रक्तमृदुपद्मनेत्रा २१० परिवेषणे तथेव हि ३२ पथ्या हि विपरीता सा २०५ परुषं फरुषं विद्याव ५४५ पदबन्धाः कतंव्या १७५ परोक्षस्य समाह्वाने २८८

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वद्याद्ानुक्रमणिका

पर्यायशः सन्नमयेत् ६७,१०८ पादेनाग्रतलस्थेन ६४ पर्यायशन्दाभिहित २४१ पादेनाग्रतलेनाथ १०७ पल्लवो च शिरोदेश: ५७ पादे भौ ल्गौ तृतीये च २०५ पवनबलबिधूतचारुशाखं २०७ पादे यत्र लघूनि स्यु: १९४ पवनबलसमाहृता तीव्रगम्भीरनादा २०२ पादे यदि निविष्टो १८८ पवनश्च स्त्रियर्चव २५ पादे लघूनि शेषाणि २०० पश्चातप्रविष्टा विज्ञेया: १५० पादे षोडरामात्रास्तु २०७ पश्चादन्त्यो ल्गौ संयौज्यौ २०४ पादे सप्ताक्षरे ज्ञेया १८८ पश्चादर्धे तुषष्ठः २०८ पादे सिद्धे समं सिद्ध २०५ पश्चाद्वा यो गणा: षष्ठः २०९ पादेराकु्चिते: किञ्चित् ५७ पश्चिमार्घेतु चपला २१० पादोत्क्षेपश्च कर्तव्यः १०२,८

पश्य पश्य रणमस्य २३९ पार्श्वक्रान्तं पदं कुर्यात ५६

पश्य विलासिनि कुञ्जरमेतं २८३ पाश्वंक्रान्तक्रमं कृत्वा १२४

पाञ्चालमध्यमायान्तु १७३ ३५,११८

पाडचाला सौरसेनाश्च १७२ पार्श्वक्ान्तेः सललितैः १४,१०४

पाञचाल्यमौढूमागध्यां १७३ पार्श्वमेकं शिरश्चापि १०८

पाठयस्येते ह्यलंकारा २८७ पार्श्वमेक शिरशचैव ६७,६८,१०८,११२ पाणिर्लताख्यो यत्रक: ७६ पार्षद देशकालौ १७४

पादः प्रसारितः किचित् ८८ पिण्डीकृत्य च गात्राणि ११४

पादः समस्थितश्चकः पिण्डीकृश्य तु गात्राणि ४१ ७७ पादयो पतनं सम्यक १०३ पितरश्चापि विज्ञेया १५९

पादयोरनुगौ चापि पित्र्ये निवापे जप्ये च २८ ८९,१३६

पादयीरनुगौ हस्तौ २८ पित्रोर्निवापे जप्ये च १४६

पादयोरन्तरं कायं पित्र्ये समाधिजप्ये च १३६ ८,१०२ पुनः स्त्रीणां प्रवक्ष्यामि ५६७ पादश्च पद्यतेर्धातो: १८१ पुनरस्य शरोरमतं पादास्तालान्तरभ्यस्त: ३३९ ७६ पुनरासां प्रवक्ष्यामि १२९ पादस्य पतनं तज्ज्ञ ८०,१२० पुनर्गतिप्रचारस्य १३ पादस्यान्तं पद यत्र २३९ पुनर्वाक्यविधानं तु २७७ पादस्यान्ते तथा चादो २३७ पुनश्च करुणे कार्या ३७,११३ पादादियमकं नाम २३९ पुनश्च वाक्याभिनयं १९२ पादान्तयमकं चेव २३७ पुनश्चासां प्रवक्ष्यामि ७८ पादे तु जागते यस्या: १९४ पुनश्चिन्ता न्विते चेव २३ ना. था०-९१

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नाटधशारत्र

पुनश्चेव प्रवक्ष्यामि १६१ प्रख्यातवस्तुविषयं ३०२ पुरुषवाक्यकशाभिहिता १९४ प्रख्यातवस्तुविषयः ३२६,३२८ पुरुषाणां भवेदेषु १३९ प्रगीत हसितश्चापि १२४ पुरुषाभाषणं ह्येव ५६७ प्रग्रहग्रहणाद्यानं ५५

पुरुषेबंहुभियुक्तं १७८ प्रचलाचिराचलादिषु २७१

पुरोध: श्रेष्ठ्यमाल्यानां १३८ ५१ पुरोध: सार्थवाहानां ५७० प्रच्छन्नकामिते चव २८,१११ पुरोधसाममात्यानां ९२ पञ्चावरा दशपरा ३०७ पुरोधोऽमात्यपतनीनां ९३,१२९ प्रत्यक्षबृत्तिरुक्त: ३३९ पुरो विचलितस्त्र्यश्र: ७६ प्रत्यक्षाणि तु नाङ्के ३१४ पुष्पाणां ग्रहणविधि: ३६ प्रत्ययविभागजनिता: १७५ पुष्पेश्चान्येः सिरसि १९८ प्रथमं गुरुभिर्वणें: १८३ पुलिन्दा: शवराश्चैव १०३ प्रथमं समपादेन ४६,११९ पर्वप्रविष्टा विज्ञेया: १५० प्रथमतृतौयौ पादो २१० पूर्वत्त्यान्तेन पादस्य २३८ प्रथमादक्षराद्यत्र २०६ पूर्वाचार्य रुक्त शब्दानां १७२ प्रथमादिरथान्त्ये च २०९ पूर्वाधं लक्षणं ह्यतद् २१० प्रथमे च तृतीये नौ २०७ पूर्वाशयसमानार्थे २३६ प्रदक्षिणप्रदेशा च १७३ पूर्वो ह्रस्वस्तेषां १७३ प्रबन्धशोभाकरणानि तज्ज्ञैः २६८ पृच्छन्निय भिद्यतेऽर्थ: २२७ प्रयोजनान्यनेकानि २६४ पृच्छ्यते चाभिधत्तेऽथ २६६ प्रयोगजानि सर्वाणि १७७ पृथक्तत्रोपसर्गेभ्यो १७४ प्रयोगज्ञवृ तं प्रवरललित १९७ पृथिवी सागराइचेव १४८ प्रयोगमेषां च पुनः २५१ पृण्ठे कृश्वा कुतपं १८० प्रयोगस्त्वल्पगीतार्थं १७३ पृष्ठे न्यस्तं देवेन्द्रेण २०४ प्रयोगो द्विविधश्चैव १७७ पेशल कुत्सासूयासदोष ३८ प्रलेपितशरीरस्तु प्रकम्पितं तु विज्ञेयं ६० प्रविकसितकमलकान्ति मुखी ११७ २०६ प्रकरणनाटकभेदात् ३२१ प्रवेपितशरीरशच ४२ प्रकरणनाटकलक्षणं ३२२ प्रशंसा चव निन्दा च २३४ प्रकरणनाटकविपये ३१०,३११ प्रश्नयेणार्थंसंयुक्त २३० प्रकर्तव्याध्वगस्यापि ११९ प्रसन्नं वदनं कल्वा ४६,११९ प्रकृतिश्चैकविशत्या १७६ प्रसन्नमाननसुर: ७५,१२२ प्रकृतीनां तु सर्वांसां १३९ प्रसादेषु तथा प्रोक्तं १२२

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पद्यार्यानुक्रमणिका

प्रसार्य बाहुमेकेकं ५४,१२३ प्रियाप्रसादने कार्य ९०,१३७ प्रसार्य बाहु शिथिलौ ८८,१३५ प्रियेति भार्या शृंगारे ५६९ प्रसिद्धरूपगूढञ्च २२० प्रिये श्रिया वणंविशेषणेन १९१ प्रसृत मधुर चापि २३६ प्रेष्याणामपि कर्तव्या ८१,१३० प्रस्खलिता प्रपदप्रविचारं १९० प्रेष्या हज्जेति वक्तव्या ५६९ प्रस्तारयोगमासाद्य २११ प्रोत्साहनोदाहरणे निरुक्त १८३ २१३ प्रस्तारोऽक्षरनिर्दिष्टो प्लुत चैव त्रिमात्रं स्याद् २५३ प्रस्तावेनैव शेषोऽथं: २६८ पौण्ड्रा नेपालकाश्चव १७१ प्रहसनमतः परमहं ३३० प्रहसनमपि विज्ञेयं ३३० 'फ'

प्रहारे तत्प्रयोक्तव्यं १३७ फुल्ले फुल्ले सम्भ्रमरे २३८

प्राकुत संस्कृतं चैव ५५० फुल्मपद्मनना तवं द्विरेफेक्षण १९४

प्राकृतभाषाचार: ३१२ 'ब' प्राकृतबन्धेप्वेवं संस्कृतमपि २७० बद्धां चारी तथा चव ६३ प्राकृतस्यापि पाठयस्य २६९ बलेन विगृहीतस्य रिपुणा १३४ प्राग्ज्योतिषा: पुलिन्दाश्च १७० वसआरमज्झिमाइ अ १७० २७० प्राङ्गा: प्रावृत्तयश्चेव प्राच्या विदूषकादीनां २७६ बह्वश्च तत्र पुरुषा ३२८

प्रातिपदिकार्थयुक्ता बहिः पार्श्वास्थितोऽङ्गष्ठ १७४ ६४

प्रातिपदिकार्थयोगा बहुचारीसमायुक्ता ६२,१२४ १७४ प्रादिपादिकार्थलिङ्ग: बहुचूणपदेयुंक्त १७४ ३१३ बहुनृत्तगोतपाठ्या ३२१ प्रादक्षिण्यातप्राप्तां द्ुष्टं बहुवचन २०४ बहुबाहुवहुमुखा ३१,११६ प्राप्तानां चातिसंलेपात् २४८ बहुरसकृतमार्ग सन्घिसन्धानयुक्त २५४ प्राप्तानां यत्र दोषाणां २३१ बहुवचनाक्षेपकृतः ३३९ प्राप्ति तामपि जानीयात् २२९,२५९ बहुशी यछ तं वाक्यं २४८ प्रायो वीरे च रोद्रे च १९३ बहूनां च प्रधानानां २६० प्रासाददुमशेलेषु १५२ बहूनां च प्रयुक्तानां २६२ प्रासादारोहणं कार्य ५२,१२२ बहूनां तु प्रधानानां २२४ प्रासादारोहणं यत्तु ५३,१२२ बहूनां भाषमाणानां २२२ प्रासादे यन्मया प्रोक्त: ५३ बहूनां बहुभिर्ज्ञेया २३४ प्रियदानरता पथ्या २०५ बहून् गुणान् कोतयित्वा २६१ प्रियदैव तमित्राऽपि २०५ बह्वाश्रयमवि कार्यं ३१३

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बालानामपि कर्तव्या ८३,१३१ भवेद्धि जागते पादे १९४

बाहुशीर्षै प्रसन्ने च ६,१०१ भागवततापसोन्मत्त २७४

बाह्यं वा मध्यमं वापि १५० भाण: समवकारश्च २९८

बाह्यजनसं तज्ज्ञेयं ३१७ भाणस्यापितु लक्षणं ३३१

बाह्यभ्रमरक चंव ६३ भारते त्वथ हैमे वा १५५

बोजार्थयुक्तियुक्तं ३०८ भारते मानुषाणां च १५६

बुधजनवृहतीसंस्था १८९ भावस्थेर्यधुरकर्थेः १९५

ब्रह्मक्षत्रस्य नामानि २८० भावेष्वेतेषु नित्यं हि २८८

ब्रह्मोत्तरप्रभृतयः १७१ भाषा चतुविधा ज्ञेया २७२

ब्राह्मणी तापसीनाञच ९३,१३९ भिक्षुचक्रचराणां च २७४

ब्राह्मणे: सचिवो बाच्यः २७८ भिन्नार्थं तदपि प्राहुः २४२

ब्राह्मण्यायँति वक्तव्या २८० भिन्नार्थमभिज्ञेयं २४१

'भ' भूमौ यदूर्ध्वपतनं १३७

भगवत्तापसविप्रैः भूमो विसर्पिते: पादैः ४८,१२० ३३० भगवन्निति वाच्या २७७ भूम्यासनं तथा कायं २६,१३८

भगवन्निति ये वाच्या: २७७ भूषणाक्षरसङधातो २५५

भग्नं च स्थानकं नृत्ते ७८,१२८ भूषणेरिव चित्रार्थे: २५६

भगिनोनां तु कर्तव्य १३९ भूषणेरिव विन्यस्तेः २१७ भोगिनीनां तथा चैव ९३

भट्टेति सार्वभौमस्तु २७९ भोगिन्यः परिशिष्टास्तु २८० भट्टिनी स्वामिनी देवी २८० भौ तु भगाविति यस्य १९०

भयाकुलितचित्तत्वात ११७ भ्रंशरचानुनयो माला २५५

भयानके सबीभतसे २८९ भ्रममाणस्य चाकाशाद १२१

भयकरि किं रवं १८७ भ्रश्यतश्च तथाकाशाद ५१

भयसंयुक्तया दृष्ट्या ४२ भ्रौ चरणे यदा विनियतौ २०१

भये विलासिते चेव ११२ भ्रौ यदि नाश्च नित्यमिह १९६

भवति च जगतीस्थ: १९५ भवति यदि पतिस्तथा २०२ 'म'

भवति पादे सतत २०६ मङ्गलार्थानि नामानि २८१

भवन्ति यत्र तज्ज्ञेयं २० मतङ्गजा विराजन्ते २३५

भवन्ति यत्र दीर्घाणि १९९ मत्तमातङ्गगमना २३५

भवन्ति यस्मिन्सा ज्ञेया १९८ मत्तानां तु गति: कार्या ६१,१२४

भवेत प्रयोगो नाट्येऽत्र १७० मदनमदविलासै. कामिनीनां १९५

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पद्याद्वांनुकमणिका ०५७

मद्रकमेतदद्य सुभगे २०१ मानुषाणां च कर्तव्यं २७५

मधुकरपरिगीयमानशब्दं २०७ मानुषी चेव मन्तव्या ११०

मध्यं त्र्यक्षरमित्याहु: १७६ मानुषे कारणादेषां १५४

मध्यमपात्र: शुद्धः ३१९ मायेन्द्रजालबहुलं १७८

मध्यमपुरुषेनित्यं ३१९ मार्जने कुट्टिमानां च १३६

मध्यमाङ्गष्ठसन्दंशो ३६,४० मार्षो भावेति वक्तव्य: २७८

मध्यमानां गर्ति चेव १११ मालतीमालया १८८

मध्यमोत्तमनीचानां ८२ मिश्रौ ग्लाविति विज्ञेयौ १८३

मध्यानामधमानां च ३६,१०५ मुक्तजानुकमेर्ताद्ध १३६

मध्यानामपि सत्त्वज्ञा ३९ मुण्डासन तु कर्तव्यं १४८

मध्या वा सन्निकुष्टा १५४ मुण्डासनञ्च दातव्य ९२,१३८

मनोरथश्च लेशश्च २५५ मुदितजनपदाकुला स्फीतसस्याकरा २०४

मन्दकुलस्त्रीचरित ३१८ मुनीनां नियमेष्वेष ९०

मन्द्रा द्रुता च कर्तव्या २८९ मुनिभि: साधितां कृच्छात् २३४

मन्द्रा नीचा च कर्तव्या २८८ मूखंजनसन्निकर्ष ३३६

मन्द्रा विलम्बिता चेव २८९ मूर्च्छामदश्रमग्लानि १३५

मन्मथेन विद्वा सललितभावा १९३ मूर्तिमत् साभिलाषञ्च १८७

मन्मथेष्योदवं कोपं ७५ मूर्तिमन्तः प्रयुज्यन्ते १८८

मन्मथेर्ष्योद्द्धव: कोपः १२७ मृदुनलिनोवापाण्डुवक्त्रशोभा १९३

मरकतबेदूर्यादे: प्रदशनं ३४ मृदुजलितपदार्थ गूढशब्दार्थहीनं २५४ महानद्या भोगं पुलनमिव ते भाति १९७ मृदुसन्नग तिश्चव ८१,१३२

महामेरौ त्रयस्त्रिशद् १५८ मेघरवं निशम्य मुदितः १९९

महीगताभ्यां जानुभ्यां ९०,१३७ मेघमालादिकं तत्स्यात् २०४

महेन्द्रो मलय. सह्यः १३८ मोत्तण मद्रचाद्रह २७१

मागधी तु नरेन्द्राणां २७५ मो म्नौ च स्युश्चरणरचता: १९८

मागध्यवन्तिजा प्राच्या २७५ मोहमूर्च्छामदग्लानि ८८

मात्रागणविभागस्तु १८४ मोहे प्राणमये चैव १३४

मात्रागणो गुरुश्चेव १८३ म्रौ मो चान्त्यौ १८९

मात्रासंख्याविनिर्दिष्टौ १८३ म्रौ गौ तु प्रथमे पादे २०५

मानालोकज्ः सुतवलकुलशीलाढ्यो १९६ म्र्रौ भ्नो यो यश्च सम्यग् २०१

मानुष इति विज्ञेया १८ स्र्री म्नौ यमी ल्गो च सम्यग् २००

मानुषाणां गतिर्या तु १५७ म्मौ यदि पादे स्वभावपि २०३

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७५८ माटयशास्थे

म्सौ ज्सौ तौ गुरु च २०० यत्र वार्ता प्रवर्तेत १४९ म्लेच्छशब्दोपचारा २७३ यत्र शब्दार्थसम्पत्ति: २४९

'य' यत्र व्यग्रावुभौ हस्तौ २९३

यः कश्चित्कार्यवशात् ३११ यत्र शास्त्रार्थसम्पन्नां २२८

यः किल दाक्षं विद्रुतसोमं २०३ यत्र श्लक्ष्णविचित्रार्था २१८

यः समेः संहितो गच्छेत् १६,१०४ यत्र श्लिष्टा विशिष्टार्था २५७

यः ईदृशः प्रवेश: स्याद् ६६ यत्र संकीर्तयन् दोषं २६५

य इमे स्वराश्चतुदशं १६३ यत्रातिशक्वरे पादे १९६

य एकां भूमिकां कृत्वा १८८ यत्रापसारयन् दोषं २३२

यक्षाश्च गुह्यकाश्चैव १५८ यत्रार्थस्य समाप्ति: स्यात् १८१,३०६,३१६

यच्छन्दः पूर्वमुद्दिष्ट २५२ यत्रार्थानां प्रसिद्धानां २६०

यज्ञो भवति न जन्न: २७२ यत्राल्पेरक्षरैः श्लिष्टे: २१८,२५७

यज्ञक्रियेव रुरुचुर्मधुरैः कृताक्तेः २५४ यत्रास्मिन् समावेश्य ३३५ यत्रेकस्यापि शब्दस्य २२० यतः प्राप्तः स पुरुषः १५३ यस्वयाऽद्य कृत कर्म २३५ यतस्तस्य कृत तेन १५३ यत्वया ह्यनेकभावेः १८९ यतिछेदस्तु विज्ञेयः २०८ यत्वाविद्वाङ्गहारन्तु १७८ यतीनां श्रमणानाञ्च ४५ यतो मुखं भवेद्भाण्डं यथा एष यजोऽद्रि १९९ १५२,१७९ यत्कारणाद् गुणानां यथा च ते ध्यानमिद ३३७ २४०

यर्रिकिञ्चित् काव्यबन्घेषु यथा चूर्णपदैश्चित्रेः २३४ ५६

यत्तादृशो भवेद्िप्रा: १०७ यथा तथा वृत्तिभेदेः २९९

यत्तु प्रिय पुनर्वाक्यं २२६ यथादेशं यथाकाल २६२

यत्पलायनपराणस्य १९२ यथा नानारल्नाढ्ये: १९९

यत्प्रत्यक्ष परोक्षं वा २६२ यथा प्रकृति नाट्यज्ञो ११,१०२

यतु प्रयोजनसामर्थ्यात् २५८ यथा मार्गरसोपेत ४,१०१

यत्प्रसन्नेन मनसा २६८ यथा विधूणित विलोचना १९९

यत्र कविरात्मशक्त्या ३१६ यथा सर्वधुलश्चैव २०९ यत्र तत्पुष्पिताग्रा स्याद् २०७ यदनार्षंमथाहाय ३१६ यत्र तु वधेप्सितानां ३२६ यदसद्भूतं वचनं ३३७ यत्र तुल्यार्थयुक्तेन २५८ यदा तु जापरो रलौ १८९ यत्र पञ्च लघून्यादो १९७ यदा तु वकवद् गच्छेत् ६६,१०७ यत्र पादास्तु विषमा २०४ यदा द्विरुदितौ हि षादमभिसंश्रितौ १९९

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पचार्द्धानुक्रमणिका ०५९

यदा स्मौ पादस्थौ १९७ यस्तादृशो भवेद्विप्रा ६७

यदा मनुष्या राजनः १८ यस्तु मृतः सोऽपि मओ २७१ यदा लो गश्चान्ते १९७ यस्मात पूरयतेऽर्यान् १७५

यदा षड्भिश्द्देदो भवति १२७ यस्मान्नामानुसदूर्श २८१

यदा सप्तदशे पादे १९८ यस्मान्निपतन्ति पदे १७४ यदि खलु चरणस्थतौ नौ २०२ यस्मिन् धर्मप्रापक ३२४

यदि खलु पादे न्यौ त्रिको १९३ यस्मिन स्थाने स समो १७३

यदि खलु यतिः षड्भि: १९८ यस्मिन्सम्मानं न सदृशं १९६

यदि च नकार आदिरचितः २०१ यस्यां मौ तो नाः सौ २०३

यदि चरणनिविष्टौ नौ १९५ यस्या: सप्ताक्षरे पादे १८८

यदि च समाश्रितं हि २०१ यस्या: स्यु: पादयोगे २०९

यदि त्रिको ज्सौ भवत १९३ यस्या गुरूणि सा ज्ञेया १९०

यदि वा कारणयुक्या ३१९ यस्यार्थानुप्रवेशेन २५०

यदि विहित स्यादत्यष्टि १९८ यस्यास्तु त्रेष्टुभे पादे १९२

यदि वेशयुवतियुक्त ३१८ या कपिलाक्षी पिङ्गलवेश २०३

यदि सोऽत्र भवेत्तु समृद्रसमस्त्रिषु १९२ या किञ्चित्सदृशी ज्ञेया २३४

यदि हि चरणे न्सौ १९८ या कृता नरसिंहेन ७३,१२५ यदीदृशं भवेन्नाट्यं १८२,१८४ या क्रिया क्रियते काव्ये २५० यदुच्यते तु वचनं २६० या गतिर्मध्यमानां तु २५

यद् गृहाद्वचनरोषकभ्पिता १९२ या गम्या प्रमदा भूल्वा १८८

यद्दिध्यनायककृतं ३२९ यात्राकारोद्भवैर्वाक्ये: २२७,२६६

यद्यस्य कर्म शिल्पं वा २७९ या तवन्या लोकविदित १८ यद्येषा संत्रिता स्याकृति २०० या नाडिकेति संज्ञा ३२३ यद्वाक्यं वाक्यकुशल: २६७ योनि सौम्यार्थयुक्तानि २८९ यद्वीरे कीतित छन्दः २५२ यानि स्युस्तीक्ष्णरूक्षाणि २८९ यद्वयायोगे कार्ग ये ३२६ यान्ति सिद्धिमनुक्तानि २२० यन्नाटके मयोक्तं ३१७ यान्यतः प्रतिसिद्धानि २०८ यन्मनः श्रोत्रविषयं २५१ या पूर्वमेवाभिहिता ८२ यमकं चक्रवाल च २३७ यामं यामं चन्द्रवतीनां २३८ यः समैः संहितो गच्छेत् १३१ या गतिश्चैव मध्यानां १०५ यश्च कक्ष्याविभागोडयं १९० या मायाभिहिता पूर्वं १३१ यश्चेतिहासवेदार्थो १९० यावत् पूर्णस्तु पूर्वेण १८५

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नाट शाब्त्रे

यावद् व्याधिजराप्रचण्डनखरो २०० यो विधि: पुरुषाणांतु ७९,१२९ याइ्चापि तार्सा कर्तव्या ८६,१३२ योषिद्भिरथ काम्येति २७९ युग्मोजबिषमैः पार्दंः २०६ यौधनागरकादीनां २७६ युग्मेऽर्धविषमे पादे २०५ युग्मोजविषमेंपादेवृत्तमर्धसमं २०५ '₹' युद्धं रज्वभ्रंश ३१४ युव्चारीप्रयोगेषु १४ रक्ताक्ष: पिड्गकेशशच ३१,११६

युवचारोप्रचारेषु १०३ रक्तोष्ठं पोनमध्यं समसहितधनाः २००

युद्जलसंभवो वा ३२३ रक्ष: पिशाचभूताश्च १५८

युद्नियुद्धाघर्षणसंघर्षकृतश्च ३२७,३२८ रक्क तु ये प्रविष्टा: ३०८

युद्ास्यमहास्यं वा ३३८ रङ्डकोणोन्मुखं गच्छेत् १४,१०४

ये चोदात्ता भावा: ३१५ रङ्जपीठगतः प्रोक्तो १९०

ये तत्र कार्यपुरुषा: ३१५ रङ्गावतरणारम्भं १२७

ये तु पूर्व मया प्रोक्ता: १४६ रङ्ावतरणारम्भ: ७५

ये तेषामधिवासा: रङ्गे विकृष्टे भरतेन कार्यो ३३० १५,१०५

ये देशास्तेषु कुर्वीत २७७ राजर्षिवंश्यचरितं २०२

ये देशास्तेषु युञ्जीत रतिभोगखिन्नं ते १५८ २०६

येन येन हि समेति दर्शनं रतेन रावि रमयेत् २३९ २४०

ये नायका निगदिता रथस्थस्यापि कर्तव्या ४९,१२० ३०७ ये नेपथ्यगृहदारे रम्ये किंपुरुषे वापि १५६ १४७ ये वर्णा बर्णगता रहः प्रगल्भारमणं २४० २७० ये वर्णा संयोगात् रसे रौद्रे तु वक्ष्यामि ३० २७० २७९ ये विरामा स्मृता पाठ्ये २९५ ये विरामा स्मृता वृत्ते राजपल्न्यस्तु संभाष्या: २९३ २८०

ये श्रिता वे जनपदा राज्याश्च गणिकायाश्च १७२ २७४

येषामन्यस्य बाहुल्यं राजोपचारयुक्ता १७६ ३२१

येषु देशेषु रामा रामा विस्मयते २३८ 150 १७५ राश्य नामभिजानीयाद योऽयस्वभावो लोकस्य १८५ १८९ राश्यूनामर्धविषमां मोजयन्ति पदैरन्ये १८४ ३३५ योज्या शकारभाषा तु रास्त्रिका: सागराख्या २७६ १९४

यो मनश्चोत्रविषयः रिपुशतमुक्तशस्त्ररव भीतश्कितभटं २०२ २५१ यो वागभिनयः प्रोक्तौ रुक्षस्फुटित केशरच ६२ १९६ रक्षस्फुटितके शस्तु १२४

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पद्यार्दानुक्रमणिका ७६१

रुक्षो निभंत्सनपरो रौद्र: ३१ लि ङ्गिनामासनविधि: ९४

रुधिरक्लिन्नदेही यौ ३१ लोलयोढ्वाहितेनाथ ७९,१२२

रूपकैरूपसाभिर्वा २६१ लोलाङ्गहाराभिनयं १८४

रूपदीपकसंयुक्त २५२ लोलायर्थोपपन्नां वा २५१

रूपनिर्वर्णना युक्त ११,२३६ लोला रती रुचि च ३६

रूपोपेतां देवे स्पृष्ट २०४ लुप्तविभक्तिर्नाम्ना १७५

रूरुचमरमहिसुरगज २५ ललू दन्यौ औ मौ १७२

रेचिता विधुतभ्रान्ता १६ लेहन जिह्वया लेह: १५

रेचितो चापि विज्ञेयो ५३ लोकक्रियास्वभावेन ४९

रौद्रनिर्भर्त्सनकथो ११६ लोकप्रसिद्धं द्रव्यन्तु १८७

रौद्रे रसे प्रवक्ष्यामि ११५ लोकप्रसिद्धैबंहुभि: २६५

'रु' लोकवार्ता क्रियोपेतं १८२

लक्षणं तस्य वक्ष्यामि १९६ लोकस्य हृदयग्राहो २६०

लक्षणं नियमं चैव २०८ लोकानां प्रभविष्णु २३७

लक्षणं पुनरेतेषां १३३ लोके गुणातिरिक्तानां २२०,२६७

लक्षणसमानकरणात् ₹२४ लोके प्रकृतिप्रत्ययः १७५

लक्षणं सम्प्रवक्ष्यामि ५,१८,१८३ लोकोपचारयुक्ता या ३३१

लघुगण आदो लौकिको नाट्यणर्मी च १८७ १८१

लघुपूर्वों यकारस्तु १७९ 'व'

लघुमध्यस्थितो रेफ: १७९ वक्रं तु भ्रमणं चैव १२५

लघून्यन्यानि शेषाणि पादे स्युः २०२ वक्त्रं सौभ्यं ते पद्मपत्रायताक्षं १९३

लध्वक्षरप्रायकृतं २५२ वक्त्रस्यापरपूर्वस्य २०७

लव्वक्षरप्रायकृते २८९ वक्ष्यामि तयोर्युंक्त्या ३३०

लध््वेकं लाइति ज्ञेयं १८० वक्ष्याम्यतः परमहं ३२२,३२५,३२८ लतानितम्बगौ हस्तौ ७५,१२७ वक्ष्याम्यस्याङ्कविधि ३११ ललिताकुलभ्रमितचारु २०७ वचनं नामसमेतं १७४ ललितैरङ्गविन्यासै: १८९ वचनेन विना युक्तं २६८

लली वलीहलो २४० वच्चति कगतदयवा २७१ लल्ले च मन्मने चैव २८९ वडवातडागतुल्यो भवति २७१

लाधवार्थ पुनरमी १७९ वणिजां मन्त्रिणां चैव ४४,१०६

लाभे तथा च मुक्तस्य १०८ वणिजां सचिवानां च १०८

लिड्िनां चासनविधि: १४० वश्स वत्छं च यथा २७२

ना. शा०-९६

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७११ नाटघशाइत्र

वल्स पुत्रक तातेति २७९ वामदक्षिणपादाभ्या ६१,१२४ वनमतिशयगन्धाढय १९० वाम: समुन्नतकटि ७५

वने कण्टकिनं वल्लौ २३४ वामवेध ततः कुर्यात् १४,१५,१०५

वयस्य राजम्निति वा २७९ वामो नतः कटीपाइवं १२७

बयोऽनुरूपः प्रथमन्तु १४१,१८६ वामोन्नत त्रिकं यस्मिन् २२८

वरतनुः पूर्णचन्द्रं तव १८९ वाराणानामयमेवाखः २४०

वरतनुः प्रततप्लुतसर्पणैः १९४ वाष्पाम्बुरूद्वनयन: ३४

वरमृगनयने ! चपलासि २१० वाहनानि विचित्राणि ४९

वगें वर्गे समाख्यातो १७८ वाहनार्थप्रयोगेषु ७४,१२६

वजितं काव्यदोषैस्तु २९५ वाह्लीका दक्षिणात्या च २७५

वर्णपदक्रमसिद्ध: १७५ वाह्लीकभाषोदीच्यानां २७६

वर्णः स्वरो विधिवृत्तं १८१ वाह्लीका शल्मकाशचेव १७२

वत्तयिष्याम्यहं विप्रा २९७ विंशं सप्तदशं चैव २०२

वर्णाश्चर्वार एव स्यु: २८५ विकलाङ्गप्रयोगेण ६३

बर्धनगते च भावे २७१ विकला वकसंचारा ११३

वर्धमान: स विज्ञेय: ४६ विकल्पगणनां कृत्वा २११

वर्षाणि सप्तद्वीपाश्च १४८ विकीणवसना चैव ५१,१२१

बस्तुगतक्रमविहितः ३२४ विकूणनञ्च गात्रस्य ६०

वस्तु्यापीं बिन्दुः ३०६ विकूणनेन वक्त्रस्य ११९

वस्तुसमापनविहित: ३२३ विकृतिः स्यात् त्रयोविशा १७६

वल्ताभरणसंस्पर्श १०८ विकृते व्याधिते क्रोधे २८९

वस्त्राभरणसंस्पर्श: ६९ विकान्तयमक नाम २३८ वाक्यमाधुर्यसम्पन्ना २६५ विक्षते च्छन्नगमने १११

वाक्यं हास्यं तु ६६ विग्रहः प्रहसश्चैव ११६ वाक्येःसातिशयैरुक्ता २६५ विघूर्णितवरीरा च ४,६१,११४,१२४ वाक्केल्यथ प्रपञच: २३४ विचारगहनं यरस्यात् २४४ वाङ्मयानीह शास्त्राणि २०९ विचारस्यान्यथाभाव: २६३ वाचिकाभिनयः कार्य: २९३ विच्छेदोऽतिजगत्यां तु १९५ वाचि यशनस्तु कर्तव्यो १९६ विजयार्थानि नामानि २८१ बाक्यमर्थ परित्यज्य २९३ विजम्भित निःश्वसितं २४० वाच्यः शिष्यः सुतो वापि २७९ विज्ञेयं प्राकृत पाठयं २६९ वापी स्त्रियो हंसकुलै: २३६ विज्ञेयं संस्कृतं पाठ्यं १७१

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पचार्धानुक्रमणिका ७६३

विज्ञेया नाट्यतत्वज्ञैः १९२ विभ्रान्ता वाप्युदात्तां वा ४६

विटस्यापि तु क्तव्या ५७,११८ विमानस्थस्य कर्तव्या ५०,१२१

वित्रासनं सललित ७७ विलम्बितगतिः सा तु १९९ विदिक्ष्वपि भवेदज्ग: १८० विलम्बिता च दोप्ता च २८९ विदूषकस्यापि गतिः ६५,१०७ विलम्बिते विरामे हि २९४ विदूषकेण राज्ञो च २७९ विलासलोलाविब्बोक ७६ विद्युन्नद्धा सेन्द्रधनुरञ्जितदेहा १९५ विलिखितमही शृङ्गाक्षेपैः १९८

बिद्वन्मनोहर स्वन्त २६२ विलोलितं शिरः कृत्वा १२६

विद्वान् पूर्वोपलब्धी २७ विवक्षितोऽन्य एवार्थ: २४२

विधानमुत्क्म्य यथा च १८० विवर्तनं समुद्वृत्त १०,११ विथाने छन्दसम्येषु १८१ विवादादिषु चाधेयं १३४

विधिर्गणकृतश्चेव १८१ विविधधतुरङ्गनागरथ २०२

विनीतवेशश्च तथा ११९ विविधा जातिभाषा च २७३ बिनीतवेषश्च भवेत् ४५ विविधाभि: क्रियाभिर्वा ११५ विन्ध्यसागरमध्ये तु २७७ विविधाश्रयो हि भाण: ३३२ विपरीतं हमयोगे २७२ विशिष्टास्तु स्वरा यत्र १७५ विपरीता न पथ्यामि २०५ विशेष: कीत्यते यस्तु २६१ विपर्ययगतैहंस्तेः ६३,१२५ विशेषदर्शनब्चास्य २३७ विपयंयः प्रयोत्तव्य: ८४ विशेषयुक्तं वचन २६१ विपर्ययस्तप्रयोगस्तु १३१ विश्रमेन्नाविरामेषु २९५ विपुलजधनवदनस्तननयनैः २१० विश्रान्तिषु तथेव स्यात् १२८

विपुला तु युजि ज्ञेया २०६ विश्रिामेष्वथ देवानां ७७

विपुलान्या खलु गदिता २१० विश्लिष्टोष्ठं चविवृत १५

विपुलासि प्रिये श्रोण्यां २०६ विषमार्धसमानां तु २०४

विप्रकृष्टं तु यो देशं ३०९ विपादे च वितकें च २९४

विप्रवणिक्सचिवानां ३१७ विष्कम्भकमुत्कटिक १३३

विभक्तान्त पदं ज्ञेयं १७५ विष्कम्भगामिनी चैव ११२

विभजन्त्यर्थ यस्मात् १७५ विष्कम्भगामो च भवेद् ६१

विभजेत्सर्वमशेषं ३०८ विष्कम्भनकृतप्राण: ६०

विभाति ताम्रं दिवि सूर्यमण्डल २३७ विष्कम्भनकृतप्राणा ५८

विभूषणं चाक्षरसंहतिश्च २१३ विष्कम्भनगतप्राणा १३८

विभ्रान्ता ह्यवदाता च १२० विष्कम्भाव्चतो पादौ १३५

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नाटघशाएने

विष्कम्भित पुनश्चैव ८९,१३७ वृत्तानि च चतुष्षष्टि: १७७ विष्कम्भितगतिप्राणा ११४ १७७ विष्कम्भिताञ्चिती पादौ वृत्तानि चैव चत्वारि ८७ वृत्तानि तेषु नाटय स्मिन् १८७ विष्कम्भेनाञ्चितौ पादी १३३ वृत्तानि परिमाणेन १७८ विष्टम्भनगतप्राणः ११८ ६९१ विष्णुः प्रसूतेत्रेलोक्य वृत्तानि समवकारे २३९ ६५९ विष्णुः सृजति भूतानि वृत्तान्तस्वल्पकथनैः २३९ वृत्तान्येतेषु नाट्येस्मिन् १८५ विसरजितजनः स्स्ता २८ वृतैरेवं तु विविधैः ६७२ विसजितजनस्तत्र २११ विस्तरशः पुनरेव वृद्धे वामध्यये ११४ १७३ वृषभललितं चित्रं १९८ विष्फारितचलन्नेत्रो ११७ वृषभललितं वृत्त १९८ विस्फारिते चले नेत्रे ४२ वेद्यो विसर्जनीयो १७३ विस्मयामर्षयोश्चैव २८९ वेप्रमानशरीरश्च २८,१११ विस्मये चैव हर्षे च ३६ विस्मिते चावहित्थे च वेलासदृशवस्त्रेश्च २१ २८,१११ वेश्याचेटनपुंसक ७०६ वीक्ष्य करोत्यसौवृषभगजविलसितम् १९७ वेश्यानाञ्च प्रदातव्यं ९३ वीथो समवकारश्च ३०० वेश्यानामपि कर्तव्यं १२९ वीथो स्यादेकाड्का ७१५ वेतालोयं पुरस्कृत्य २६२ वीथ्यङ्ग: संयुक्त ७०७ न्यक्तं तर्व कमलनिलया १९८ वीथ्या: संप्रति निखिल ७१५ व्यक्तं त्वं मर्त्यलोके वरतनु २०० वीभत्से कुत्सितत्वाच्च ६०६ व्यक्तमेवासौ तवं १८८ वीररौद्राद्भूतेषु ५९६ व्यक्ताव्यक्ता सारजनीनां २३८ वृद्धे वा मध्यमे वापि १३६ व्यञ्जनं यद्भवेद्दीरघ ६०८ वृत्तं तदश्वललितं २०१ व्यञ्जनानि स्वराश्चेव १७१ वृत्तं सभ्यग्यादि स्यात् २०१ व्यसने नायकानां च ५५९ वृत्तज्ञैः सा तु विज्ञेया २०२,२१० ५५१ वृत्तन्तु सर्वछन्दस्सु २५९ व्याजेन क्रीडया वा्डकि ८४ वृत्तमर्धसम २५६ व्याथिग्रस्ते च निद्रायां १४६ वृत्तभेदो भवेद्यत्र ४६७ व्याधिग्रस्ते ज्वराते च ६० वृत्तलक्षणमेवं तु २०८ व्याधिग्रस्तो ज्वरार्तश्च ११८ वृत्तस्य परिमाणन्तु १८५ व्याधिते च ज्वरात च ५९४ वृत्तानां तु समानानां २६४ व्याधिते हर्षिते क्रोधे ११२

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वद्यार्दानुक्रमणका ७६५

व्याधिपोडितोनिद्राय १३५ २५४

व्याधिव्रीडितनिद्रासु शरीराश्रयसम्भूत ८२ शशांङ्कवत् प्रकाशन्ते ४४४

व्यायोगस्तु विधिज्ञेः ६९८ ९८,१४१

व्यायोगस्य तु लक्षणं ६९८ शाखावलम्बने कार्या ७७,१२८

व्याहारो गण्डश्च ७१६ शारीर मन्त्रसंभूत २५४

व्योम्नश्चावतरेद्यस्तु ५१,१२१ शारीर्यामथ वोणायां ५७८

१४० शिर: पार्श्वगतं चैव १३३

ब्रजेत् प्रच्छन्नकामस्तु २८ शिव: पार्श्वनत चैव ८८

ब्रतनियमतपोयुक्त: ६८१ शिर: पुष्पोन्मिश्रं १९७

व्रतस्थानां तपः स्थानां ८६,१३२ शिष्टा ये चव लिङ्गस्था: २७४

ब्रतिनश्चाश्रमस्था ये ११९ शीतेन चाभिभूतस्य ४०,११४

व्रू षीमुण्डासनप्रायं ९५,१४० शुद्धः संकीर्णो वा द्विविध: ६७६

'श' शृङ्गारः कर्त्तव्यो धमे ६८८

शंततोव तवास्यं शृङ्गारहास्यबर्जशेषः ६९५ १८८ शकटास्यस्थितैः पादः ४६,१२० शृङ्गारे च रसे वोरे ४९४

शकारघोष हादी नां ५५८ शृङ्गोरे चैव शोके च २१

शकारभाषा योक्तव्या ५५८ शृङ्गारे ललिते सौम्ये १२

शकाराभीरचण्डाल ५५६ शेषमर्थवशेन ६०७

शकारस्यापि कर्तत्र्या ६९ शेषाणां प्रमदानान्तु ९३,१३९

शङ्कितः पुरुषो गच्छेद् १११ शेषाणामर्थप्रयोगेषु १२६

शक्वरी द्वयधिका पञ्च २४८ शेषाणाभर्थयोगेन ७४,४९५,६०९

शतं विशतिरष्टौ च २४० शेषाणि गुरुसंख्यानि २११

शतत्रयं समाख्यातं १७८ शेषाणि च गुरुणि स्यु: १८८

शतानि त्रीण्यशीतिश्च १७७ शेषाणि तु गुरूणि १८८

शतानि पञ्च वृत्तानां २४१ शेषाणि तु गुरुणि स्यु: ३०३

शनै: शनैश्च कर्तव्या ११४ शेषाणि च लघूनि स्यु: २०१

शनेरुतुक्षेपणं चैव ६० शेषा ये लक्षणेर्नोक्ता: २३५

शब्दच्युतञच विज्ञेयं ४६७ शेषैरन्यैर्जनैर्वाच्यः ५६३

शब्दबन्धः प्रयोगेण ४९२ शैलयानविमानानि १८८

शब्दविषयप्रयोगे १७३ शैला यथाशत्रुभिराहता ४५७

शब्दशक्त्युत्सुकश्च स्यात्, २८,१११ शोकग्लानस्य चौत्सुक्ये १३४

शब्दशाक्त्युत्सुकश्चापि १३५ शोके चाक्रन्दने तीब्रे ६०,१३७

शब्दानुदारमधुरान् प्रमदाभिधेयान् ४९६ शोभतेप्रवरछाननहस्तौ २३८

शब्दाभ्यासस्तु यमक ४५२ शोभते बद्धया १८८

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७१६ नाटयंशास्थ्रे

शोभां स्वां न वहति तां १९० षड्विशतिरिहान्यानि २४६ शोभाढ्येहं रसि मनांसि ३०६ षड्विशत्यक्षरे पादे २०३ शौरसेनो समाश्रित्य ५५६ षड्विशत्यामेकोनाया च यदि हि २०३ शौर्योदात्तानि नामानि ५७१ षष्णां कलानां परतः ६१० इचप्सत्सध्या: छ इति ५४६ षष्ठं च नवमं चैव १९२ श्येनबहिणभासानां ४४४ षष्ठं च सप्तमं चैव ३०७ श्रमग्लानिविषादेषु १४६ षष्ठम्च द्विविकल्पस्तु ३६४ श्रमग्लानौ मदे चैब १३४ श्रमस्वेदाभिभूतश्च षष्ठो वे द्विविकल्पस्तु ३६२ ६१ षोडशनायकबहुल: ६९६ श्रुतिसारूप्याद्यस्मिन् ७२७ षोडशाक्षरके पादे ३१२ श्रुश्वा धनगरजितमद्रितटे १९१ षोडशाष्टादशे चैव २०१ श्लिष्टता या पदानां हि ४७० षोडशेकादशे चेव ३१२ शिल्ष्टा ये चेव ५५२ २७२ श्लिष्टा ललाटपट्टषु ष्टः ट्ट: सत स्थः ३२ श्लिष्टा ललाटे शक्रस्य 'स' ३२ श्लेष: प्रसाद: समता संकृत्यभिकृती चेव ४६१ २५८

इवेतादयस्तथा वर्षा संक्षिप्ता वज्त्मध्ये हि २५५ २०६ संक्षेपात् सन्घीनां ६७६ 'ष' संक्षेपार्थः सन्धिषु ६५१ षट्कलं तु न कर्तव्य ८० संक्षोभविद्रवकृत: ६९२ षट्कलं न प्रयोक्तव्यं १३० संज्ञामात्रेण कर्तव्यानि ५५,१२३ षट्कोटयस्तथोत्कृत्यां २४५ संत्रासने कुसत्वानां १३७ षटत्रिशच्चैव वृत्तानि २४२ संत्यक्तविभूषा १८७ षट्त्रिशदेतानि हि लक्षणानि ३८४ संपरिछ २५१ षट्त्रिशल्लक्षणान्येन ५०० संपूर्णचन्द्रवदना ४४७ षट्त्रिकास्तु धृति: प्रोक्ता २४९ संप्रणष्टेन्द्रियमना ८८,१३४ षट्पञ्चाशच्छते द्वे च २४१ संप्रत्यतीतकालक्रियादि १७४ षडक्षरकृते पादे १८८ संभाष्या शाक्यनिर्ग्रन्था ५६५ षडादावष्टमं चैव २०२ संभ्रमाद्भुतसंदर्शे ११२ षडिह यदि लघुनि १८९ संभ्रमे चेव हषे च १३६ षट्जर्षभो तथा चेव ५७७ संभ्रगोत्थानरोषेषु ३११ षड्रसलक्षणयुक्त: ६९५ संभ्रमोश्पातरोषेषु ९९ षड्विशति: स्मृतान्येभि: १७६ संयुक्तानां तु पुनर्वक्ष्ये ५४५

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संरम्भसंभ्रमयुतं ७२८ सप्तभिः सहितान्येव १७९

संसर्याद्देवानां च ५५५ सप्त वे गतितास्त्वत्र १७८

संस्कारपाठ्यसंयुक्ता ५४९ सप्ताक्षरा भवेदुष्थिक् १७६

संस्कृतं प्राकृतं चेव ५४८ स प्रहसने प्रयोज्य: ७०६

संस्कृतवचनानुगतः ६७५ समं नाम प्रसुप्तस्य ९८,१४०

स एव प्रमदानां तु १२९ १७६

स एव प्रमदानां वै ७९ समपादं तथा स्थाने ४९

सगर्विता चूर्णपदा ६९ समपादन्तथा स्थानं १२०

सचिवश्रेष्ठिब्राह्मण ६७३ समानशब्दविभ्रष्टं ५३९

सततं जगतीविहितं हि तत १९२ समानां विषमाणां च १८५ .

सतेन नाम्ना भाष्य: ५६५ समानाभिस्तथा सख्य: ५६९

सत्वं न विकृतं दृष्ट्वा ११७ समानि गणनायुक्तिम २४६

सत्त्वं च भवति शषयो: ५४४ समानोऽथ वयस्येति ५६४

सत्वं च विकृत दृष्टना ४३ समानोत्कृष्टहीनाश्च ५६१

सदृशं तत्तवैव स्याद ४४६ समाप्तेऽर्थे पदे वापि ६०७ सदृशार्थाभिनिष्पत्याः ५३१ समासोक्तं मनोग्राहि ५०८ साध्यते योऽ्थं सम्बन्धो २३१ समासवद्भिविविधं: ४८४

सनिमित्त प्रकथनो १४२ स मिथ्याध्यवसायवस्तु ४०८ सनिष्पेषकृते चँव ४३ समोक्ष्य वृत्ते कर्तव्य: ६१० सन्तापो मनसो यस्तु ४२९ समुद्गयमकं चेव ४५३ सन्त्यन्यपि वृत्तानि २०८ समुद्गयमकं नाम ४५५

सन्दष्टयमक नाम २३९ समुद्वहनभयिष्ठा ६१

सन्देहात्कल्प्यते यस्तु ५२३ ५७

सन्धिवचनविभक्त्युपग्रह नियुक्ते २१२ समुद्वाहितगात्रा च ११२

सन्घिविग्रहसम्बन्ध ५५३ समुन्नतं समं चेव १०१ सन्धीयते च यस्मात् १७५ समुन्नतकटिर्वाम: ७६ सन्निविष्टा जगत्या: १९४ समे समासनं चेव १२८ ६४९ समे समासनं दद्यात् ९५ सपुष्टकराक्ष: क्षतजोक्षिताक्षः ४६१ समैः सम्भाषणं कार्य ५६३ स पूर्व वारणो भत्वा ४५६ समैश्च सहितो गच्छेत् १५४ सप्तमं ववम चान्त्यं २९८ समो यत्र स्थिती वाम: ७६,१२८ सप्त चैव सहस्राणि २४४ समो पादौ समाधाय १३६

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७८ नाटपशास्त्रे

सम्पद्धिरामपादावच १७१ सर्वेषां चैवमार्याणां ३६३ सम्भोगस्तेषु भवेत् ७०३ सर्वेषां छन्दसामेवं १७९,२४६ सम्भ्रमेत्पातरोगेषु १९ सर्वेषां जातिवृत्तानां ३७१ सम्भ्रमे चैव हर्षे च ११३ सर्वेषामेन काव्यानां ६१९,६६६ सम्भ्रमो स्थानरोषेषु १०३ सर्वेषामेव चार्याणां २४५ सम्यग्प्रयो ३८४ सर्वेषामेव वृत्तानां २५७ सयोवनानां नारीणां ८०,१३० सरवेः पिण्डीकृतैरङ्गे १४६ सरांसि हंसैः कुसुमैः ४४१ स्गर्विता चणपदा सवेराकुञ्चितेरङ्ग: ११८ ९७,१४०

सर्वकदम्बनीपकुटजकुसुमसुरभि: १९७ सवाष्पः साश्रुनयन: ११३

सर्वत्र च प्रयोगे भबत १७८ ५४४ सहस्त्राणि शतं चैकं

सर्वत्र चक्रवा तु सहस्राण्यपि चत्वारि २४१ ४५७ सवत्र सप्तमस्येव २०६ सहासनं न दुष्येत ९६,१३८

स्वथा सर्वविषमा २०५ स हि संयोगविहीन: ५४७

सर्वपादैश्च विषमैः २०४ साक्षाद्वसन्ततिलकेव १९५

सवंपिण्डीकृताङ्गस्तु ८९,१३५ सा चानुष्टुप्छन्दस्युक्ता १८९

सवमेतत्तु विज्ञेयं ५५३ सा ज्ञेयाह्य पपतिस्तु ५३२

स्वरसलक्षणाढया ७१५ सा तं सर्वगुणर्हीनं ४४५

सर्वराकुञ्चितेरजः १४९ सात्वतीं कैशिकीं चव १७०

सर्वलोकमयोग्राहि २१० सात्वत्यारभटीयुक्तं १६८

सर्ववृत्तिविनिष्पन्नं ६२४ सादृश्यं क्षोभजननं ५२९

सर्ववृत्तिविनिष्पनौ ६२३ सा द्वितीया द्विलघुका ३६४

सवसंकोचिताङ्गो च १०७ साध्यतेयोऽर्थ सम्बन्धः ४३४ सर्वसंकुचिताङ्गा च ६५ साध्यन्ते निपुणैरर्था: ५०७ सर्वस्त्रीभि: पतिर्वाच्य: ५६६ साध्वमे च विषादे च ६३ सर्वस्य सहजो भाव: १९१ सानुस्वारविसर्गं च २४८ सर्वांसां प्रकुतीनां तु १९ सानुस्वारैरुदारैश्च ४८४ सर्वास्ववस्थासु च कामतन्त्रे १९१ सा पूर्वा मन्तव्या प्रयोगकाले १८० सर्वारवेह हि शुद्धासु ५५६ सा परिहार्या क्रौञ्चपदा २०३ सर्वे नागाश्च निषेधे १५८ सा मन्तव्या तु दिक् पूर्वा १५२,१७९ सर्व पादा: नमा यत्र २४० साम्भो भारैरानर्दन्द्धि: १८९ सर्व भावाश्च दिव्यानां १६० सारूप्यमिथ्याध्यवसायसिद्धि ३८४

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साथे बाहुल्यमेकस्य १७६ सा विज्ञेया द्विजमुनिगणेः सूचोविद्धमविद्ध वा ७७,१२८ १९८ ५३,११२ सा स्यात्तनुमध्या सूचीविद्धेरपक्रान्तेंः १८७ ११० सिंहर्क्षवानराणां च सूच्या चेवाप्यभिनयं ७३,१२५ सिंहादीनां प्रयोक्तव्या सूतश्चास्य भवेदेवं ४९,१२० ७४ सेवाथं मधुरं वाक्यं ४३६ सिंहादीनां च योक्तव्या १२६ सिहासनन्तु राज्ञोनां सेषांणि ३७० ९३ सिंहासनं महादेव्या सैन्धवास्त्वथ सोवीरा १७० १३९ सिद्धान् बहून प्रधानार्थान् ५१५ सैव भूमिस्तु बहुभि: १५३

सिद्धिप्रसाधिरत तथ्यं ३९९ १८९

सिद्धेरथः समं कुत्वा ३९२,६०७ सोद्वाहिता चूणपदा सा ५५

सिद्धोपमानवचनं २२२ ४२२

सुकुमारप्रयोगाणि १७९ सौ त्रिके यदि पादे १८८

१७७ सौ गो तु प्रथमे पादे २०५

सुकुमारार्थसंयुक्त ४८७ सोम्य भद्रमुखेरयेवं ५६५

सुखदुःखोत्पत्तिकृतं ६३१ सोष्ठवेनाथ सतवेन १३२

सुखदुःखोत्पत्तिकृत: ६८७ सौष्ठवेन समायुक्त: ११०

सुखप्रयोज्येर्यच्छब्दः ४८७ स्खलित घूर्णित चेव ७७

सुखशब्दार्थंसंयोगात् ४७२ स्खलिते घूणिते चैव १२८

सुगन्धिता ११० स्जो स्गौ न प्रथमे पादे २०७

सुगन्धिभिश्च मालाभि: ११० स्जो रजो गश्च त्रिका २०७

सुतनु जलपरीतलोचनं २०७ स्जौ स्जौ गश्त चतुर्थ तु २०७

सुनिषष्णेन गात्रेण ११९ स्जौ स्लौच ततो न्सो ज्गो २०७ सुप्रतिष्ठा भवेत् पञ्च १७६ स्जौ स्लौ चादो यथा सो २०७

सुप्रसिद्धाभिधाना तु ४८८ स्तनाभ्यां ताभ्यां तवं १९७

सुरङ्गाखनकादीवां ५५९ स्तब्धेनोत्थापनं काय ६४

सुरपतिधनुज्जवलाबदकक्ष्या २०२ स्तब्धेन्नोवानं कार्य १०६

सुराष्ट्रावन्तिदेशेषु ५६० स्त्रोणां कामपुरुषाणां च ४२,८२,११६, सुविहितवस्तुनिबद्ो ६५२ १३१ सुसिन्धता चूरणंपदा १३५ स्त्रीणां चेवासनविधि १३९ सूचया चाप्यभिनयं २६ स्त्रीणां तदेव करतव्यं ८२,१३१ सूचासु चाज़ुरगते ६०२ स्त्रीणाञ्च पुरुषापाञच ९१,१३७

9of वा० च्ा०-९७

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९३ स्थूलकायस्तवतिप्रांशुः ११६

स्त्रीपरिदेवितबहुल: ७०० स्थूलस्यापि तु कर्तव्या ६१,११२ स्वीणामेतत् स्मृतं स्थानं ७६ स्थेर्योपपन्ना गतिरतमानां १०४ स्त्रीणां स्थानानि कार्याणि ७४,१२७ स्थान गन्धाधिक्ये १८८

स्त्रीनोचजातिषु तथा ५५२ स्नेहादाक्षिण्ययोगाद्वा ४३०

स्त्रीपुंसः प्रकृति कुर्यात् ८४,१३२ स्नानैश्चूण: सुखसुरभि: १९८

स्त्रोपुमांसं त्वभिनयेत ८५,१३२ स्पृष्टा: काद्या मान्ता: १७२

स्त्रीपुमासं ह्यभिनयेत् १४५ स्फुटित कलश शुक्तिनिर्गीर्णमुक्ता २०४

स्त्री प्राया ६७८ स्फुरिताधर चकितनेत्रं २०७

स्त्रीभेदनापहरणो ६९६ स्मितभाषिणी ह्यचपला ३९३

स्त्रीवेषभाषितेयुंक्तं ८५,१३२ स्मितवशविप्रकाशौ १८९

स्त्रीसं प्रयोगविषयेषु ६८९ स्मृते चासुयिते चैव ४९७

स्थवीयसोनामेषां ८० स्नग्दाममाल्यरचनासु स्थानक तावदेव ७८,१२८ स्यादपि चाष्टिमेव यदि १९६

स्थानं कृत्वावहित्थं तु १३० स्नस्तो हस्ती १३४

स्थानं कृत्वावहित्थञ्च ८१ स्वजनप्रिय सज्जनभेदकरं १९२

स्थानं तु वैष्णवं कार्य ६,१०१ स्वजातिसदृशी चैव ११३

स्थानं प्रसारितं नाम ९८ स्वतः सुप्रतिबद्धञ्च ४७१

स्थानक तावदेव स्यात् ७८ ६८

स्थानमाकुञ्चितं नाम स्वभावजा तु तस्येषा ९७ स्वभावजाता तस्येषा १०८

स्थानमेततु नारीणां १२८ स्वभावजायां विन्यस्य ६७

७६ स्वभावमात्मानस्त्यक्ल्वा ८४,१३१

स्थानान्येतानि नारीणां ७४ १०८

स्थानीया या स्त्रियस्तासां १३० स्वभावजायां विन्यस्य १८२

स्थानीया ये च पुरुषा: स्वभावभावोपगतं शुद्धं ९५,१३८ १३५

स्थानीया ये तु पुरुषा: स्वभावसंस्थया चेव १४८ स्वभावान त्तमगतो १४ स्थानेऽस्मिन् सन्निधीर्यात १२७ स्थानेऽस्मिन् संविधातव्यं स्वभावाभिनये चेव १३३ ७५ स्थानेऽस्मिन् संविधानीयं स्वभावाभिनयोपेतं १८२

७७ स्थानेन समपादेन स्वभावेनोतमगतौ १३० ५०,१२१ १८७ स्थितं मध्यं द्रुतं चेव ११,१०२ स्वयमुपयान्तं भजसि

स्थिल्वा नूपुरपादेन स्वयुवतिवृतो गोष्ठाद १९८ ६३,१२५ स्वरालक्वारसंयुक्त ६१२

स्थूलकायस्तथा प्रांशु: ११ स्वल्पाक्षराणि ६०२

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स्ववक्षोगतया दृष्ट्या १३५ हास्ये चोद्देशमात्रेण ६०६

५७ हास्येनोपगतार्थ ३३६

स्वस्थ मन्दालसं क्लान्त १३३ हा हा कण्ठं किमिदमिति नो १९६

७२ हिक्कादुःखे च तथा स्वविकल्पेन रचितं २३६ हिमवतसंश्रिता ये तु १७२

स्वसेति भमिनी वाच्या ५६८ स्वाद्यधिकार गुणेरथ हिमवत्पृष्ठसंस्थे तु १५८

१७४ स्वाभाविकोत्तम गता १०३ हिमवत्सिन्धुसौवीर ५६०

स्वामीति युवराजस्तु ५६५ होना वनेचराणां च ५५६ हीनैः सपरिवारं तु ५६३

'ह' हृदयस्थस्य भावस्य ४१३

हकारान्तानि कादीनि १७२ हृदयस्थस्य वाक्यस्य ५३०

हर्षप्रकाशनार्थं ५३५ हृद्या सर्वा भूमि: ७०२

हस्तं च चतुरं कुल्वा ३६ हृद्येर्गन्धेस्तथा वस्त्रेः २७

हस्तं चतुरक कृल्वा ११९ हृद्येर्वस्त्रस्तथायन्धेः ११०

हस्तपादस मुर्क्षेपं ११८ हृष्टेः प्रसन्नवदनैः ५२४

हस्तार्पितगण्डा किं १८७ हेतुसशयदृष्टान्ताः ५००

हस्तोपरि शिरः कृत्वा १४१ हेतोनिदशंनकृत: ५१०

हस्तो कट्यूरबिन्यस्तो ८७,१३३ हेमकूटे च गन्धर्वा २५८

हस्ती तथैव कर्तव्यो ७,१०२ होमयज्ञक्रियायाञच ९०,९५,१४०

हस्ती तदनुगौ चापि १२० हरस्वं दशाक्षरे पादे १९०

हासे त्वथ गति: कार्या १०६ ह्रस्वं दोर्घ प्लुतञचेव २५५,४९६

हास्यशुङ्गारकरुणे हफ५९६ ह्यस्वदीर्घप्लुतानीह ४९७

हास्यशृंगारयो: कायों ५७१ हरस्बाद्यमथ दोर्घादयं २०५

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व्याह्यातृ स्मृता ग्रन्था: ग्रन्थकाराइच

अध्व हर: प्रतिज्ञा चाणक्यम् अमरुकाव्यम् प्रतिना चाणक्यम् आनन्दवर्घन: प्रातिशाख्यम् उ्द्रट: बालरामायणम् उपाध्याया विप्दुसार: काल्यायन: वृहस्कथा कामसूत्रस् ब्रह्मयश: स्वामी कुमारसम्भव: भट्टनायक: कत्या रावणम् महेन्दुराज: कोहल: भामहः गोपाल: भोम:

घण्टक: मायापुण्यकम्

चन्द्रगुप्तः मालतीमाधवम्

चाणक्यशास्त्रम् मुद्राराक्षसम्

जयदेव मुनित्रयम्

तापसवत्सराज रहनावली

दुःखलातमज: राजशेखर:

देवीचन्द्रगुप्त लोल्लट: विक्रमोर्वशीयम् नाकुलम् वृदा: नागानन्द: वेणीसंहार: नृत्तवार: शङकूक: पाण्डवानन्द: शाकुन्तलम् पुष्पदूतिका संपह:

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सव्याख्यनाटयशास्त्रोपात्त

शुद्धि-निर्देश

पृष्ठ सं० पंक्ति सं० मशुद्ध वाक्य शुद्ध वाक्य

२७ मस्तक मस्तक आम्चित ७ ११ दूशरा दूसरा ७ २३ खटकामज खटकामुख १४ १४ स्तम स्तन ३५ १५ आविग आवेग ४३ ७ श्रुत्या श्रुत्वा ७४ २८ गतिष्वाभोरणेषु गतिष्वाभरणेषु ७५ २ व्यश्र: त्र्यस्त्:

८१ ९ अघसानां अधमानां १८ ६ शास्त्रक्षतं शस्त्रक्षतं १०३ शबराइ्चेव शबराश्चेव १०४ ११ पारश्नाक्रान्ते पार्श्वक्रान्तेः १३७ २ विष्कम्भिनं विष्कम्भितं १३७ १० तथासनविधि तथासनविधि: १४० १० प्रसुप्तस्थ प्रसुप्तस्य १७० ३ दाशार्णा: दशाषर्णा: २५२ ५ अभिज्ञानशाकुन्तले यथा अभिज्ञानशाकुन्तले २५३ ३ अथ समाप्यभावात अथंसमाप्त्यभावात २५३ १६ उ्छन्द उच्छब्द

४५३ एवददूशबिध एवद्दशविध ४६५ १० एबार्थों एवार्थो ५२० ३ प्रथमेक्के प्रथमेऽ्क ७१६ १७ अड्को अड्गो

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  • संस्कृत-विश्ववि सम्पूणानन्द

ुतम मे गोपाय

श्रीजी कम्प्यूटर प्रिण्टर्स