1. Nyaya_Darsaana_with_Commentary__Vritti_-_Jibananda_Vidyasagara_1918
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न्यायदर्शनम्।
वात्यायनमुनिककत-भाष्य-
विश्वनाथकृत वत्तिसहितम्।
पाण्डत कम्पतिाव इ उप्रापिधारि
श्रीमज्जोंधानन्द विद्यामागर भट्टाचाय्यातजाभ्या
पांरिडत श्रीआाशबोध-विदाभ्भ्षस-
मसकृत प्रकाशितछ।
चतुथसस्क नगम ।
कनिकातामहानगर्य्याम
वाचस्पत्ययन्त्र
सुाट्रलम्।
स व सत्त मदखचितम।
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पच्छित श्रोआाशुबोध-विद्याभूषग प्रकाशक- तथा र्पाष्त शोनित्यबोध विद्यारन।
२न० रमानाथ मजुमदार क्रोट श्राम्हाष्ट पाप्रिस्थान- ट्रोट पोष्टभफिम। कन्निकाता।
प्रिय्टर-वि, वि, मुखर्जी।
२ म० रमानाथ मजुमदार ट्रोट कलिकाता।
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न्यायदशनस्य सूचोपल्रम्।
- विषय। मासकपज्ञास्तप्रयोज्र मकधन पताथानामुद्दमभ्, १३
प्रमाणनक्षण साडभागस १२ प्नवननषम् ११ पन्मानव्य लखषैण विभागय १५
उपमामन्क्षगम् १७
श्म्दावभागसूत्रम १८ f A प्रमेयम्य लक्षण ।विभागस् भात्मनिरूपणाम् २ शरोव निरूपणम २१
मृतावभागसूवम भरविभागाथलचगम २३
माउलनषम् २१ मनानरुपणम २४ प्रवृत्तिलचय तादभागय् २४
दोषलसगम् २५
प्रत्यभावन् चषम् ११
7 फमलच पम दु खलचपम् २६ १५ सपवर्गन चगम् २७
AY समवस्य लचण विभागय २
३१ टशन्तलकपम् सिद्धान्तलचणम् १२
स द्ा नावभाग
२१
२४
३y भवश्रवविभागसूतम् ३६ ₹
२० २
इतुन् नग स २० व्यतिर्रा क हतुष्सगम् २० ११ उगाहरपलचपम् १
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व्याता का राह गामसपर
एपननलसषम
ननिगम लयमम १२ 20
नञ्ञान पतम १५
विशवानरपमम ४४
वान्लनपम ननबम चनम ेवत सान समा म
1१ २
५ू२
५२ १५
मानममलचनम् ५३ १४
पतांतवालनचपम् पू४
५ू६
इलावभाग भूब न
वाक इन्न ल स गा म ५६ माम कक्कल नरूपगा र
उपचा ममनवगस १
६०
नन्मम चानन
ममाधान नवस
६१ २
नय इस्यान सचगन जाताजयसस्थानवहतम ६२ ग्रथ द्वितोयाध्वाय, ६२
50 मअगयूजपसमूबम मफ्रमगनरवम १२
प्रमाव यृज्जपतमूवम १२
तन्मभाधानम ११ ११
समाषानान्तरम्
पूवपचान्तर म् सम्ममखुचानन २
प्रत्यवलेय साSडचेप २
सन्समाधानम
चाचपानरम
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[ * ]
ममाधानान्नरम मन मिड्री यक्रि १२
प्रन् वाम दान्मूवम मर्नन कषादत् वप्रड्डा १२
तम्ममाधानम ८३
पनसस्थाना मातत्वभङ्गा
सम्ममापानम ८y २
सवया व पुवपस मूठम
तत्सम घानम to
सवपवममि गन्मुवम १४
अन्मा नप्र वे प च मूवम ₹
सन्ममाधानम वत्तमानाड़ नेप ११
सन्ममाषानम १
भपमानपूवप समूवम् १६
सम्ममाचानम सपमानम्यान्माना न्र्भावमतम् स खस न म १४
भव्तपवपनमूबम् सत्पम धानम १ AY A वढपा माखाS्S च्तप १ २
तत्मिद्ान १ ४
वत्वाक्यावभाग १ ६ २
विधिन्न नगाम १०६ चचवादावभाग १ ६ मनवादलचगाम १ ७ १३
वदपामाव यात् प्रमागचत् FSSचषप १११ तन्ममाधानम् ११२ ११
११७ शन्तपरिणाममशय १२१ १
पच्छवक्षा निगकरपम् १३२ २
शन्दविका व्यवहार १३४ प निम्पण १२७ २
पताणरूगय १४१ १४२ १५
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[ * 1
कैब न्वाउडल तिशक्रिमसखण्डनम्, १४४ के वम्म न्रातिश्रतिखण्ड़नम्, १४५ पताशनिरपथमे १४५ १४ व्यत्रिमरथम १४६ १४० १ नातितसगम १४०
प्रमेगपरोचाऽसभ १४८ २४
तवापि डान्द्र रचतन्यवाद,षयम, १४८ मगो IS5म्मव्ाल दूष एम, १५१ १५२ तनम माधा नम १५२ वक्षु इतपरकरयम १५४ तत्स नड न म १५४ मनस पातमलगडा १५७ १८
त ग्वबड न म् बात्मानव्यत्व प्रतिपादनम् १५८ १६४ १२ पााश्वत्वे यृतयन्तव कधनम् १६६ १६६ १०५ पयपरायगम् १८१ १५ वदनित्यतासभय २८८ 8
१८८ १७
तर्ख गड़ नम् माह्ामतान्मरदूषणम् १९
१८१ २
१९२ x
१८४ १ समतमन साफादूषणम् १९५ १२
१८६ २
वृद्ध रात्म गुणत्प्रकरणम १८० १२ बुद्धरून्पन्नापर्वा र्गेत्वकथनम् २११ १५ गुद्ी अररगुप्त्व भावस्य विभ्भिष्यकथनम् २१० १४ मम परोचाबक्करथम् २२ १० यरोरस तत्तत् रषाट्ट्टानप्ाद्यताप्रकरपाम् २२२ १२
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[ x ]
पथ चतुर्थाध्याय २१२ महाततपरीचा २३२ दाषपरीक्षणम २ गषाष्या पसवयकथनम् २३२ ११ प्रत्यभावासद्ान्त २३० २३० १४ शून्य तोपातानप्रक रगम् २३८ अन्मपारणामवा २४१ २४३ मशात्य त्वानगकर गाप्रक र प्यम २४४ मव नत्यत्वानयाकनगाप्र कर्पस २४६ सवप्रथ कत्वनिरा कन गम क र गाम २४८ सवयून्धतनर। क र पाप्रकरगम २५ 54 २५२ फनपरौवाप्रकरगाम् २२४ १५ द ख नरों ना प्रकरनाम २५८ भप वर्ग री चाप्र क रमाम २६१ २०२ 2 २७४ नरवय उप्र के रगाम २६ वाच्यायभड्रान राकर मपकर गम २८४ तत्व ज्ञारनवर्वाद्धप क रणम परथ पञ्चमाध्याय २६७ २ नतविभागसूवम् २ट७
२टड नाविषटरकानरूपगम् RY 20 नातिघट कासव त्तनत्वपीनम् २२ १५ ३ ४ नयारसदुत्तरत्व बौज्रम ३ ४ प्रसङ्गप्रतिदृश्ट लसममिरुयषम् २०५ ३
२ ६ २
३ ६ १२
RY २०
मभयसमनिरपथम
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[ & )
सस्यीस्तवम् ११ मकरणसमनिरुपण् म् ३ ८ 50 अ्रकरणास्षम त्तरम् ३१
भदतममप्रकरणम् १ ११
अथापत्तिस मप्र क रगाम २१२
२१२ उपपतत्तिसमप्रकर ग्म १२ उपलाब्ममप्रकरयम् २१५ १०
२१६ १२
क्रान ममभक वग्रम ३१६
नि 1 ममपर्क पम् ३२ १२
का उममपनरगम २२ y
कथाभाम करणम १३
नप्थान वभाग
५ E 1 लयाम
भातज्ाइन्नर नंज एस
प्रातनावि षिनस ।म ३३ प्रातन मशामलव ।म
हन्वन्तर मस ाम ३२ १२
सथान्तर न कगम ३३२ निष्थ के लच प म अ्रविज्ञाताथल नगम ३३३ अपाथक न चगम् ३२२ 9
चपाप्तका लप चण म् ३ ४
न्धनन्नसषपम् ३२४ सधिकनकणम् ३२५
पुमकतलनणम् ३३५
३२६
व जानल नगम् २२६ पप्रतिमालक्षपम् िसपल चगम् मतानृच्ाल व पम् ३३८
मव नुयाज्यानुयोग लक्षप म् १२
प्त्वाभ ससूयम् ११
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न्यायदर्शनम्।
अध प्रथमाध्यायस्य प्रथमान्रिकभाष्यम् ।
प्रमागताS7प्रतिपत्ता प्रतत्तिमामथ्यादथवत प्रमागाम ।* प्रमागमन्तरण नाथप्रतिपात्त। नाथप्रातप्तिमन्तरेग प्रवृृत्ति मामथ्यम। प्रमागेन खल्वय नाताऽथमुपलभ्य तमथमभीपात िहामात वा। तम्येममाजिहामाप्रयुत्तस्य ममोहा प्रवृत्ति वित्यच्यत मामथ्य पुनरस्या फननााभमस्बन्य। ममीडमान म्तमथमभीप्पन जिहामन वा तमथमाप्नोति जगत वा अपस्तु सुख सुग्रहंतु दुख दुखहेतुश्य। माऽय प्रमागार्धो
प्रमागे प्रमाता प्रमय प्रमितिाव्त्यश्वान्त भर्वान्ति। कस्मात ? -अन्यतमापायेऽथम्यानुपपत्त। ततर यस्येप्साजिहासा प्रयुक्कस्य प्रवान म प्रमाता। सयनाथ प्रमिगातति तत प्रमागम।
जनानामानन्द करमप क नोय विरचयन। म काडाप प्ेमाथ प्रथात मनामान्टर चर वन्नाकोलोकाना सजनजलनप्रा मनतन । १ ।। मयुक्ा युकतरुपामभिनवानारताखक्रकार्5, उकभा मा मध्यापोयषभानीरतिका चक्तगा चब। न्तोमाभ व्याम्। मानव्यामीकनमाच पर प्व श्रियाज्म्यभृषवश भूया भव्य विधातु चरयनखबच मात्रवाम सवा ॥ ॥२॥
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[ २ ] न्यायतप्नम । [१म अध्याय।
याऽर्थ प्रतोयत तत प्रमयम। यटथविज्ञान, सा प्रममिति । चतमषु चेवविधास्वथतत्त्व परिसमाप्यत। कि पुनस्तत्वम ? मतश्न सङ्वावोऽसतश्चामङ्भाव। सत्पदिति मह्यमाग यथाभृत मावपरोत तत्त्व भवतत अ्रमच्चामतिति गहमाग यथाभृतम विपरोत तत्त्व भर्वत। कथमुत्तरस्य प्रमाणेनापलाब्धगिति। मत्यप्यपन्भ्यमान तननुपलब्ध प्र िवत, यथा दूश कन गोपन दृश्य गह्यमाग तादा यन्र मह्यत तन्नास्त। यद्य भविष्यातदामव व्यज्षास्यत विज्ञानाभानान्नासतोति। एव प्रमागेन मात मह्यमाग तादव यन्न करह्त तवास्त। यवा भावव्य ततमिन व्यज्ञाम्यत जिज्ञानामा नानास्वाता तदेव मत प्रका के प्रभागमम 0 प्रकाश न। मच्च खलु पाडशधा वतमुपत यत। तामा खल्वामा मादधानाम- प्रमाय प्रमय सशय प्रयाजन दष्टान्त-मिद्वान्ता वयव तक-निर्गाय वाद जल्प वितगडा तेत्वाभाम
पाकोिर बगानर जा तमन्न 71 मनतामनन्ति मनुपात नमा। श्र गुक रस् जी ब व नम न्म र्प किउ्न पाकव व प्रा व्म्यमग्गातकम् न क पामवा तोगसप नान यागना ।तवश् भावचारपशसुवि म नम ४७ अन्ममातरपान सा न्यायशस्त विहतबहगता नौ नथा वत िज्ञ। इतिववानाइतचता कागल कत्तकामो गुरुचतगारजाऽह कणधारोकर्गामि । ५ ॥ वद्यनवाससना कतिरषा विशनाथय्य
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१म अध्याय ]
कल-जाति-निग्रहम्थानाना तत्त्वज्ञानान्नि श्रेय- माधिगम ।। १ ॥
-निदश यथावचन विग्रह। पाथ द्वन्द समाम। प्रमा गदीना तत्तवामति शषिकी पष्टो। नत्त्वम्य ज्ञान निश्नेयम स्याधिगम इति कममगि षशो। गमक्तया समाम। एता वन्तो विद्यमानजा। एषामावपरोतज्ञानाघमिहोपतश। सोडयमनवयनन तन्ताथ उहिष्टो वेततव्य। आतमात खतु ममयय्य तत्त्वज्ञानाननि पेयमााधगम। तच्चतद त्तर सृतगानूद्यत ति. हंय तस्य निवत्तक हानमात्यान्नक तम्योपायीधि गन्तव्य इत्यतानि चत्वाज्यप्दानि मम्यगवुड़दा निश्रयसमाध गचछति। तव मशयादीना पृथग्वचनमनथकम मगयादयो यथा सम्भन प्रमागषु प्रमयषु चान्तमवन्ता न व्यातास्चयन्त डात। सत्यमतत, इमास्तु चतस्री विद्या पृथकप्रस्थाना प्रागभृता मनुग्रहायोपदिश्यन्ते, यासा चतुथीयमान्वित्षिकी न्यायविद्या।
प्रगेजनमन मसव्धान प्रनावन्ती न प्रवत्तन्ते अत प्रथम प्ररजनमाभधानोम तथा चाह - सद्ाथ सिन्मस्बन्ध श्री मोताप्रवाते। शास्ता तन वत्तव्य सम्बन्ध सप्रयाजन।
सिद्धा नाताऽय प्रयाजन नम्य तनथा एव स सम्वन्वामन्य प पतस्तत््रात पातनाथ भगवानसपात प्रथम सूचयति। अरत् त वनानान शरम ।ा प्रासुतत जानयोश इत्हत्मद्गाब प्रमाणादतत्त्वजा न वा व्ष वि य भिन प्रमा शार म्रासु नर प्रतिपाधम् तपातकमाव शास्निश्रयमनाथ्र मतज्यववजवभव सख्ल। त ज्ञान अननेत ्यत्पया तत्वज्ान शास्तम् तथा व शास्ान जाम रि ।खजान द्वारक हनृहतुमद्ाव एव सम्बन्न द्वात कैचित सम्मटानाबट। सव व मस्यप 1 प्रधाना इन्द सनास बजाप मदे इन्दविधानानव च बहना प ध नाममदान इन्दसम्भय तथाउपि पनाथसाSवच्केकभेतादव इन्द त न दाष इत्यन्यन िक्तर
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[8 ] न्यायटप नम। [१म अ्ध्याय।
तस्या पृथकप्रस्थाना मशयादय पदार्था। तषा पृथग्वचन' मन्तरगाध्यात्मावद्यामावामय स्ात यथोपानवद। तसात मशयातिभि पदाथ पृथक प्रस्थाप्यत। तत्र नानुपलब्धे न निण्ीतऽथे न्याय प्रवत्तते किन्ताहे सर्शयतऽ्थ। यथोक्र -
मशय। पक्षप्रातपत्ी न्यायप्रवृत्त। त्रथावधारगनगठ तत्त्वज्ञानमिति। म चाय किाखादति वस्तुवमशमात्रमनव धारग ज्ञान सशय प्रमयऽन्तभवन्रेवमथ पृथगुच्यत। अ्रत् प्रयोजनम। यन प्रयुत्त प्रवत्तत तन प्रयोजनम। यमथमभा मन जिहामन वा कम्माऽडरभते तनानन मव्व प्रागन सव्ाग कम्मागि सव्वास् विद्या व्याप्ा तताशयश न्याय प्रवत्तत।क पुनश्य न्यान ?- प्रमा गरथपरोल्तग न्याय। प्रत्यचाऽडगमाश्रि
चोता तथा प्रयत्तत इत्यान्वोकिको न्यायविद्या न्यायशास्म
वनितपा गथा वचन तथा विग्रह डात यथाशुतभाष्य नुमारिगा प्रमा च प्रमनत् मशयय प्रयीषनत् दष्टान्तत्र मिन्तत्र अवयवाघ वबनि। वादव जन्पथ्न वितयण हेत्ाभासाय् कनन जाायथ निग्रहस्थानानि विग्रह व्गायन्ति। सम्पतयावतम्तु भाष्यस्थवचनप न क्वापम काचदाथ वर्ष टन्न तत प्रमाय प्रमये च मान नचन मचत सप्रयोजनलात तस वस्यते। न दष्टननानवेकवचन मप्रयी जनम। तथा च टष्टन्त विचनम् बन्व व्यातर्बकि भनन हृशनहविवम्य वत्यमा लवात। मश्यामदराब कनन च बहुवचनम् सपा कृल्म च वावध्यमय सदात उता छस्य व्यमागवात ्र या ज्गातानग्रहस्थान
याबहुवचन तवााप त्याहन्यत एकवचनस्न नक्तगमूत सच्वाा ति वदान्त। नव्यामे मखव प्रथमीपस्थितकवचननय वियरह न वाव बहवचननव प्रभाशदोनाब पारकतन तथा मति किनान भाव रामन न हेषा व धव खादगदी धवन
करणापि सुख ग्वाभाव साधनभनन तम्य महल न विरुधधत पति प्राहु। अत्
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१म अध्याय ] प्रथमाफ्रिकम। [ x ]
• यत्पनग्नुमान प्रत्यक्षाSSगमविरुद्ध न्यायाऽडभाम मडति। तत्न वादजन्पा सप्रयोजनी। वितग्णडा तु पगाच्यत। वितण्डया प्रवत्तमानो वर्तागडक। म प्रयोजनमनयुक्ता यदि प्रातपद्यत माऽम्य पत्त मोडम्य सिद्धान्त इति वैताएडकत जहाति। त्रथ न प्रातपत्त नाय लोकिको न परीनक व्त्वापद्यत। अथापि परपत्तप्रतिषधज्ञापन प्रयोजन ब्रवीति प्तर्तप ताहगेव या न्ापप यो जानाति यच्न जाप्यत यञ् प्रतिपद्यत यि तना वतागडकत्व जहाति। त्रथन प्रातपद्यत परपनप्रात षधज्ञापन प्रयाजनमित्येतदम्य वाकयमनथक भर्पात। नाक् ममूहथ स्थापनाहानाितगडा। तम्य यदाभभिघ्नय प्रति पत्पर माडम्य पत्त स्थापनीयो भवति। अथ न प्रतिपतृत प्रलापनातमननक भवत वितसडात्व निवत्तत इति। अ्रथ दष्न्त प्रत्यक्षाषयाऽ्य यत्र लोकिकपरीतकारा टशान न व्याहन्यते। स च प्रमेय तम्य पृथग्वचनञ्ञताथया वनुमान गमी। तास्न सति म्यातामनुमानागमावर्मत चन स्याताम। तताश्रया च न्वायप्रृ्ति। हष्टातानगधन
नान यमम- पतानवत तप्राप्य् न प्रगत्ान्तवभपासतारा प्रातपार गगा गसपनग। नन प्रमागत पथा द्वात पजत प्रथमम गतव वाबिना कात दाचन्र तपा विशिध ज्ञानहत्त्वजानम तसादशलनगपवानापकाप्राका काम्तातव शास्त्रहिविपश्नुप्राका पतच्ा ायस्वकसम श॥ा कन्तु ताटशप्रकरगासमृ प्रका मन्तु टप्रामवसभू सवन्न साटप वावे ममुह वाकान्त तानभपनममृह व्गन। बव ममूहाबनानकेत्वववाचतम नना।। गाऊकशन यात्मक डाप न चात। पव च गप मासननकनान जजवन पमयमिामह तथाद्ा प्रमागस सक नयन वस्थादक 1 प्राधान्यान प्रथममुहपा। तताद सवता बुभु वातप्रमेयस्य तथ व्यव पनम्य न्यायाधानतया न्याय निरुपयोगव्वहत न्पूवा्डरय सभयप्र जन तवायम्याहततंया समयस प्रथमम्। नय निर्दोतग मननवदानान्न सथस्य
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[ & ] न्यायदश नम। [१म अध्याय।
च परपत्तप्रतिषैधा वचनीयो भर्वत। दृष्टान्तसमाधिना च। सपन् साधनीयो भर्वात। नास्तिकश् दष्टानमभ्युपगच्क न्राम्तिकत्व जहाति। अनभ्यपगच्कन किमाधन परमुपालमे- तति निरुक्न दृष्टन्तेन शक्यम भधातुम। माध्यमाधम्यात तड्म्परभावी दृष्टान् उदाहरग तद्विपरीतााइ्परोतम दतति। अस्त्ययामत्यनुन्ायमानार्डर्थ मिद्ान्त। म च प्रमेय, तम्य पृथग्वचन मत्म मिद्धान्तभतषु वादजन्पवितगडा प्रवत्तन्त नाताऽन्यर्थति। साधनीयाथस्य यावति शब्दममृड्द सिरद् पारममाप्यत तस्य पञ्चावयवा प्रतज्ञातय। ममूहमपेच्या वयवा उच्चन्त। तषु प्रमागसमवाय आगम प्रातज्ञा हतुग्न मानम उताहरण प्रत्यक्षम उपनयनसुपमान मत्वषामेकाथ ममवाये मामथ्प्रदग्न नगमनामति। सोडय पग्मो न्याय इति। एतन वादजल्पवितएडा प्रवत्तन्ते नाताऽन्यरथति तदा प्या च तत््व्यदस्था। त चैतडवयवा शब्दावभ्रेषा सन्त
न्यायास वम् द्वात वाचम शहाय्यम पारण्गकात।ददाप प्र व न नाय इम आप तृत ज्ञान -थाउप सदवा सपबय न त दा द्व्यरद्ात। दशर। यन टट्टनस मूल्लाटनन्र हटकस ह्टन मूलकी न्याय मिद्धान्ष्य ९स इनकतरमडानथय तत1 सकतएिधो स दहाव्य हुपया
न यानुकृतत्वाद्दादस्य अ्पक्ष पिवादकार्यकाविद ना न्य तन विजय रुपक काय्ानुकूलतया वितम या कथावयसापि दूषएसापचतवा न्त दूषय षु मरूपफायपु वाद नपनीयत्वरुपात्कषवत्त्वात् हेतवन्ाभा समा नत्वा जा दो इत्वाभा सा ना ततर इल भासापनीव न छलम्य मव्याघातकलेन उलन्ाम दव्लाद त। जाते कथाऽवसमखन बनन्तर निग्रहस्थानानारमिति। पव व अमयान पार्बुादकपरा मभ्यादवन् जानूय गरुपन्यिह स्मान्त र्प्र्राा नोमरु । उ व दन प्रतिवादन पिछया प्रद्ाशमस्त निग्हस्तरनस पासिना दत्भासना परथगभि धाम्प्रथाजकर्नत भवचपाद एव। आषे तु- वाद-पनायत्या हेता
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१म अध्याय ] प्रथमान्निकम। [o]
प्रमेयेऽन्तर्भूता ण्वमर्थ पृथगुच्यन्त दूति। तर्को न प्रमाग मङ्होत न प्रमागन्तर प्रमागानामनुग्राहकसत्वज्ानाय कल्पात। तस्योढाहरगम। किमिद जन्म क्वतकेन हेतुना निवच्यत आरहोख्विदक्कतकन अ्रथाऽडकास्मकमिति। एवमावज्ञानडप कावगोपपत्या ऊह प्रवत्तत यदि क्वतकन इतुना निर्वत्यत हेतूच्ेदादुपपन्नाऽय जन्माच्केद। अ्रथा तकेन हेतुना ततो हेतूच्छेदस्याशक्यत्वादनुपपन्रोऽय जन्माच्केद। अथाऽडका्रिकम, अतोऽकस्मान्नवत्त्यमान न पुननिवत्स्यताति निव्ृत्तिकारण नापपद्यत, तेन जन्मानुच्छत द्ृति। एतम्मिस्तकावषये कमानिमित्त जनमोनि प्रमाणानि वत्तमानानि तकेणानुग्टह्यन्ते तत्त्वन्ञानविषयम्य विभागात तत्वच्ानाय कल्पात तक दति। सोडयमित्थभ्ूतस्तक प्रमाणसाहती वात माधनायोपालसाय वाS्थम्य भवतोत्येव मथ पृशगुच्यत प्रमयान्तर्भतोऽपीति। निर्गयस्तत्त्वज्ञान प्रमागाना फनम्। तदवमानी वाद। तस्य पालनाथ
भासाना पष्गुपन्याम इन्युक्म्। पव वाात्तक - याद वाद तपानी लात् पृथग म धान तता न्यनाधिकापासद्वान्ताना वाले गनीयलात पृथगभिधान स्यात गत पृथग भिधानायन तेगनीयतव तता सशया सेनामाप वान दशनीयत् म्यात् तम्ा
प्रथग्वचनम दृति। तनप्यसत निग्रहम्थानान्तव्ततवनव ताअ्ररुपणोन प्रस्था भन सनभवात। वरन्त वाभासाना न निग्रहस्थानल तथा मात सव्वत हेव्ाभासम-17 मव्वव्यवनगह्ोतत्वाऽडपते। तम्मात् हत्वामामप्रशगा निग्रहस्थान ताइभाजक सूनष्ष वाभासप पतप्रयोगपरम्। तव व प्रजागस्थ न लक्षमपनगोगम् थार त व्ाभासनाम दयत उतो इत्ाभाना द्वात चग्समूरम। न वं ह वाभामस्ा स क एकप्रवशादेव न पृथ इकयगापनात वाय्यम् तथा मात प्रभा । तक साधनोपा नम् इति वादायतच्तकप्रमागा तयप पृथ वरुपगानाप्तारात मुतप य्राम। श्रव कावर सूवा नी मङल्णकरखेन मंङ्रल न प्राभाधुकमु दत्यद सूवक्ञता
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[=] न्यायदशनम। [ १म अध्याय।
जन्पमितबडे। तविती तकानगयो लोकयात्रा वहत दूति। मोडय निगय प्रमयान्तभत एवमथ पृथगुदिष्ट दति। वाढ खन
नानाप्रपक्क मानो वाकममूड पथगदिष्ट उपनक्षगाथम। उपनक्चितन
व्यव हारम्तत्वज्ानाय भवतोति। तद्विशषो जन्पवितगद़ तत्वा यवमायमरत्तगाथमित्युतम। निग्रहस्थानेभ्य पृथगुाहक्रा हत्वाभामा वाट चोत्नीया भविष्यन्तत। जन्प वितग्डयोस्त निग्रहम्थानानौति। कनजतानग्रहस्थानाना पृथगुपतश उगनत्तगाथ इति। उपलास्नताना म्ववाक्य पसपिज्जनम। कनजतनिग्रहस्थानाना परवाक् पययनुग।ग
आातय्य परण प्रयुज्यमानाया मननभ ममध स्वयन्न सुकर प्रयाग दति। मेयमान्वीन्तिको प्रमागातिभि पताथ
विभज्यमाना-
प्रदाप मव्वावद्यानामुपाय सव्वकमागाम। आथ्चय मव्वधभ्मागा निद्याटेशे प्रकोततिता।
ताथ नि। तनमत क्रतस्याप्यानबव्वनससभ्वा विघ्ासवनि न रु सभभवान। जनु प्रमाग प्रागानिवथ द्वात भगवन्नाभग निपातिप्रमागन
साचार गम:र म नामात ब्रम। भव च उदशलनग परो नाया पत्वपृव्वमाप। ।।
प्रथममुदग अनंन्तर लन्तगाम प्रमाकनपरौक्षात मे टप्ापदामननगच्कलपरता
प्रथमा यागाश तव च मपारकरन्याय्लत्नण प्रथमाडडा काय नव्र चप्ररोजनाभि
धाप्रातपाटक प्रथर्मा अमता यामिक प्रकनगाम् तत प्रमागानगरकरगम
प्रमय नव पप्रिकरगम् ता न्यात इप्रकरगाम तता न्या।मनन्तप्रक्रगम।
न्यानस्वम पप्रक र्पाम न्यायो नगङ्गप्रकरगामात प्रथमाडडा के मत्त प्रकर । ।
ववसवन परथोना नोना उन्नयनन्ाप्रवाहका सेयमा न्वोसको न्यावाद
शन वि यवादजते। तथा च व्याजो मोमामा धमास्ताषि द्वात न्रात शा- सृन। मोमामा गयतकर उपाङ्ग परिकोात्तत दात पुर सम्। बतयय उस्बमें।व या द्ग नतव भाखतीम्। य वासकोचचात्म वद्या
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१म अध्याय ] प्रथमाफ्तिकम। [e]
तादढ तत्वज्ञान निश्चेयमाधिगमार्थ यथाविद्य वेदितव्यम
वगप्राप्ति ॥१ ॥ तत खलुन श्रेयम कि तत्त्वज्ानानन्तरमेव भर्वात ? नेत्य चयते कि ताह? तत्वन्नानात-
त्तगपार्य तदनन्तगपायादपवर्ग ।्। २॥ तवात्माद्यपवगपय्यन्ते प्रमनामथ्याज्ञानम अनकप्रकारक वत्तत। आत्म न तावन्नास्तोति। अनात्मन्यात्मति। दखे सुखामति। अित्येनित्वमिति। अरत्राग तारगमिति। मम] निभयामात।जुगाप्नजाभमतामतति। हातव्येप्रतिहात व्य मिति। प्रवृता नास्त कम नास्त कम्मफनाभति। दाषष नाय ढाषानमित्त मनार द्वात। प्रत्यभाव नाम्त जन्तुजीवा वामत्त्व आत्मा वाय प्रपात प्रत्य च भवतति। अरनिमित्त जन्म आनमित्तो जन्मापरम इत्यातमान प्रेत्यभावाSनन्तशेि। नमित्तक मनन कम्मानामत्त प्रेत्यभाव दति। तेह्हन्द्रियवाद् वेतनामन्तानाक्के प्रतिम धानाभ्या निरात्मक प्रेत्यभाव इति
वारमभान लाका। दवात मनु। तथा यन्तकणनसन्वत स धम्मवन नेतब द्शान भानरम तवीपनिषत तात। पारशषन्तु पाथवर।। मधामि मनम तात रा चान्ोचिकी पराम। दवत्यपानषत्थभान्वाक सवाोएवय म गह्य ग्यकक।त॥१। ननु पज्ञानस्य न साचाद्वान पपसनतव्वम तत्त्वजानना मप्यनवस्थितितभनात अत क्रमाकाइ यामाहखात। अव वा नक-निगनस ताव इविध परापर भगव्। तवापर जोवन्यकलतग तखवनानानन्तरमव तनप्यवधारताऽम्ततत्व नवन्तय्ाम्या सापहृतमिय्याज्वानस्य प्रारख्त कप्पभुञ्वा ्य । परन्तु क्रमेया त प्रादपा नायन सूवम् दात। दुखानोना मध्य उत्त उत्तरातर नषामपाय तन्मन्तगल
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न्यायदशनम । [१म अध्याय।
अपवर्गो भोष। म खल्वय मर्व्वकार्य्योपरम। मव्व वप्रयागेSपवंग बहु च भद्रक लुम्यत दति। कथ बुद्धिमान मव्वसुखोच्केदमचेतन्यममुमपवर्ग गेचयदति। एतस्माकथ्या मानादनुकूलेषु राग, प्रतिकूलेषु द्वेष। रागद्वेषाधिकाराज्चा स्येष्यामायालाभादयो दोषा भवन्ति। दाषे प्रयुत्त शरीरण प्रवत्तमान हिमास्तेयप्रातविद्मैथनान्याचरत। वाचाऽनृ नाहितपरुषसूचनामम्बदानि। मनमा पबद्रीह पदव्या भोप्पा नाम्तिक्ञ्जति। सेय पपात्मिका प्रहत्तिरधम्माय। अथ शुभ प्रयुत्त शजोरग दान परिताग परिचरगञ्। वाचा मत्य फित प्रिय म्याध्यायञ्ज। मनसा दयामस्पृहा त्राञ आचर्रति। मेय धसमाय। अत प्रवत्तमाधनी धर्मावम्ा प्रवत्तिशब्दनोकी। यथाऽन्रमाधना प्राणा अन्न वैप्राणिन प्राग्ा दति। मेय कुम्मितस्याभिपूजितस्य च जन्मन कार गाम। जन्म पुन शरवन्द्रिय बुद्धाना निकायावशिष्ट प्रात्त भाव। तस्मिन सति दखम। तत्पन प्रतिकृलवैदनीय बाधना पीड़ा ताप दूति। त दमे मिथ्याज्ञानादयो दु खान्ता धम्मा अविच्छेदेनैव प्रवत्तमाना मुमार डात। यदा तु त्त्त्व न्वानान्भिथ्याज्ञानसपेति तदा मिध्याज्ञानापाये दोषा अप यान्त। दोषापाये प्रवृत्तिरपैति। प्रवृत्यपाये जन्मापैति।
सन्सत्निद्टितम्य पू्पूव्वव्यापानादपवर्ग प्रयाजकत्व प्रजीज्यत्व वा परम्यर्ष तगग भावाह्याभाव दवातवत सरुपस्न्विशष एव तत तदयमत् -तत्त्वज्ञानेन विरा पितयाऽपनत मिथ्याजाने कारणमावाच् निवृत्त रागहषाऽत्मक षे त भावास प्रवृत्तरम्माधभाडात्मिकाश अतुत्पत्ती तन्भावास् जन्मनी विशिषशरीर समन्वव्याभाव द खाभा वातपरबर्ग। यद्यपि ज्ननोडाप रागात्यास्श्ठान्त तथाऽप्यत्कट राग्द्भ व तान्पय्यम्। उय्ाप गाषाय्ा न धममानिजिनकर््वं व्यनिचागात तथाडाप तरहीषा ण तनइममदिस्तुत्वाद्दोपापाय पममाद्यपाय। वस्तुताविनाडपीकका गग्ाजलसयागादता
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१म अध्याय ] प्रथमाज्किकम। [ ११ ]
जन्मापाये दुखमपैति। दुखापाये चाऽत्यान्तकोऽनवर्गो निश्रेयसमिति। तत्त्वव्ञानन्तु खलु मिथ्याज्ञानविपर्य्ययेस व्याख्यातम्। आत्मनि तावदस्तीति। अनात्मन्य नात्मेति । एव दु खेडनित्येऽवागो सभय जुगाप्तत हातव्ये च यथाविषय वैदि तव्यम। प्रवृत्तो अस्ति कमा अस्ति कमाफनममिति। दाषेषु दोष निमित्तोऽय ससार दति। प्रेत्यभावे खल्वा्त जन्तुजीव मत्त्व आत्मा वा य प्रेत्य भवेदिति। निामत्तवज्जन्म निमित्त वान जन्मापग्म इत्वनादि प्रेत्यभावाऽपवगान्त इति। नेमि त्तक मन प्रत्यभान प्रत्त्तिनिमित्त ति। मात्मक मन दहे द्उवाडवेन्नागन्तानोच्छेप्रतिमन्ध नाभ्या प्रवत्तत दि अपव्रग गान्त। म खल्वय सर्व्वावप्रयोग मव्वापरमाSप नग। बेह च कच्क घार पापक लुप्यत इति। कथ बुद्धि मान मव्वद ख च्तुद मव्वदु खामविदमपवग न गचर्यतति। तदयथा मधुषमम्पृक्तान्मनादयामा्त, एव सुख दुखानु षक्कमनादयामति॥ २॥ बरिवधा चाम्य शास्त्रम्य प्रवृत्ति उद्देशो लत्तग परीना चेति। तत नामधेयेन पदाथमावस्याभिधानमुहदेश। तता हिष्टम्यातत्त्वव्यवच्केदका धर्मो लक्षगाम्। लत्ितस्य यथा नक्षगमुपपद्मत न वेति प्रमागैरवधारग परोक्षा। तत्ो
धम्मदमन्भवा शमचार। तम्मातामध्याज्ञानजवासनवाव तोष तकाब् मिथ्या ज्ञनन भान कानोनत्जानजवासनाती वा नाम इव्याभ इ्त्याव वनान्ता यद्याप खापानाब्रापवर्ग किन्तु स ए्व स तथाऽप्यभद एव तब पत्म्यथ चप वर्गपत वा तद्यवहाग्परम चनन्तरपदन जन्नान्तरसेव परामृश्यत प्रात तुन न्यागव्यानम् दुखपदवत्थ्यापत्त। दुखानुन्पत्तेय्रमट खध्वसप्रयोजकत्व कमप्यत द्रत्याश्यैने-मिन्यपि काशन ॥ २ । इति सूबतत्तो सप्रयाजनाभिधयम्रकरणम्
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[१२ ] न्यायदशनम । [ १म अध्याय।
विष्टस्य प्रविभक्कम्य नक्षगामुच्यत यथा प्रमाग्णना प्रमेयस्य च। उदिष्नस्य लत्तितम्य च विभागवचन यथा कवन्नस्य। 'वचन विघातोऽथावकन्पोपपत्या कवन ततान्रविधम इति। अ्थो हिष्टस्य विभागवचनम- प्रत्यच्तानुमानोपमानशव्दा प्रमागानि ॥ ३ ॥ अस्नम्याक्तम्य प्रतिविषय व्ात्त प्रत्यन्नम। वत्तिस्तु सनन्नि कर्ष ज्ञान वा। यदा मान्नरूष तदा ज्ञान प्रमिति। यदा ज्ञान तदा हानोपादानापेत्ताबुद्य फनम। अनुमानम/- मितन लिद्गेन अथम्य पश्चान्मानमनुमानम। उपमान-सारूप्य ज्ञानम था गो एव गवय इति। मारूध्यन्तु मामान्ययोग । प्राञ्-पब्ततदनन अथ दत्यभिघोयत जाप्यत। उपनब्धि माधनानि प्रमागानीति ममाख््यानिवचनमामथ्या-ड्व्यम। प्रमायतऽननत कग्णाथासिधाना हि प्रमागशब्द र्लद्शष ममाख्व्याया अि तथव व्याख्यानम। कि पुन प्रमागानि प्रमयमाभमपनवन्ते अथ प्रमय व्यवातश्ठन्ते १ दृत्युभगथा दश नम। अक्त्यात्मत्याप्तोपदभात प्रतीयत, तत्नानुमानामच्का दूषप्रयत्नसुखद खज्नानान्यात्मनो निङ्गमिति। प्रत्यक्ष युञ्ज्ा नस्व योगममाधिजमात्ममनमो मयोगविशेषादात्मा प्रत्यक्ष गत।अग्निवापोपदशात प्रतोयत अत्राग्नर्गिति। प्रत्या मोदता धूमदशननानुमोयत। प्रत्यामन्रेन च प्रतन्तत उप नभ्यते। व्यवस्था पुन अग्निोत्र जुहुयात् खर्गकाम (मे उ० ६३६) दूति। लाकिकस्य खग न लिद्गदशन न प्रत्यक्षम। स्तनायतुशब्दे श्रथमाणे शब्दहंतोर्नुमानम। तत्र न प्रत्यक्ष
पम वथाट श लनसस्यापाचततवात प्रथमाइए्प्रमाय लक्ष त विभजते थ। प्त्र त तप्रका कवरूप (प्रकषवायट्ज्ञान) प्रशव्दविभट्टम माधातुना
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१म अध्याय ] [ १२ ]
नाऽडगम । पाणो प्रत्यक्षत उपलभ्यमाने नानुमान नाडडगम दृति। सा चैय प्रमिति प्रत्यचपरा। जिस्नासितमर्थमाप्ोप दभात् प्रतिपद्यमानी लिद्धदर्शनेनापि बुभुक्ते। निङ्गदर्शनानु मितस प्रत्यननतो दिदृक्त। प्रत्यक्षत उपलब्धेऽर्थे जिन्नासा निव्त्तते। पूर्वोक्तमुदाहरणम् प्रग्निरिति। प्रमातु प्रमातव्येऽथ प्रमाखाना सइरोडभिसप्नव। असङ्गरो व्यवस्थेति । ३ । अथ विभन्वाना लक्षगावचनमिति - दन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्न ज्ानमव्यपदेश्यमव्य- भिचारि व्यवसायाऽडत्मक प्रत्यक्षम ॥। ४। इन्ट्रियस्यार्थेन मब्रिकषादुत्पद्यते यत् ज्ञान तत् प्रत्यक्षम। न र्तहि इदानीमिद भवति, आत्मा मनसा मयुज्यते मन इन्द्रियेगा, इन्ट्रियमर्थनेति। नद कार्णावधार गमेतावत प्रत्यचे कारणमिति, किन्तु विशिष्टकारगवचनमति। यत्रत्यच्ष स्ानस्य विशिष्टकारण तदुचते। यत्तु समानमनुमानादि- ज्वानम्य न तन्निवत्तत दति। मनसस्तषि इन्द्रियेण सयोगो वत्नव्य। भिद्यमानस्य प्रत्यक्षम्रानस्य नाय भिद्यत इति समानत्वाब्ोक्त इति। यावदर्थ वे नामधेयशब्दास्तैवर्थसम्प्रत्यय,
प्रथ्थाय्यते तत्करवत्व प्रमाणत्वम् ज्ञान चावानुभवो विवचित तेन म्ृातकरय नाति व्याप्ति लचितामां प्रमाणानां विभाग प्रत्यचानुमानीपमानशब्दा इति विभागस् उदम एवान्तभूतत्वादय विशेषीद्वेश। म्रत्यकलतगन वच्यन॥ ३।। दत विसूबोहात्त समाप्ता। सथ विभक्वानि यथाक्रम वचयितुमारमते।-चव प्रतिगतमय प्रत्यथमिति योगादिन्दिनवाचकलवात प्रत्य्भब्दस्य प्रस्तुतत्वात् करपलसवस प्रममितिलक्षय् यवप्यनुचितं तथापि यत इत्यध्याह्ारेय प्रसप्रमावषत्पलबणे वाच्ये तदकदभ् प्रमासकपे जाते तत्करपातं सुन्षेयमित्याप्रयैन वा सङ्रमनायम्। प्ात्ममन सघीग जन्थसुखादिवारणाय ज्ञानमिति। यद्यपि तव्जन्यत्वात जाममानेतिव्यापनि र्ईवूर न्या-२
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[ १४ ] न्यायदशनम्। [ १म अध्याय।
प्थमम्प्रत्ययाच्च व्यवहार। तत्रदमिन्द्रियार्थस्िकषादुत्न्न सथन्ञान रूपमति वा रम इ्त्येव वा भवति। रुपरमशब्दाय विषयनामधेयम। तन व्यर्पदश्यते ज्ञान रुपमिति नानौते, इस दूति जानोते नामधेयशब्देन व्यर्पदश्यमान सत शाब्द प्रमज्यत अत श्राह-अव्यपदेश्यमिति। यदिदमनुपयुभो शब्दाथमस्बन्वेऽथज्ञान तन्नामधेयशब्देन न व्यर्पाश्यत, गहाने उवि च शब्दाथसम्बन्धेऽस्याय शब्दा नामधेयमिति। यदा तु सोडर्थी गह्यत तदा तत पृव्वस्मादथज्ञानान्न विशिष्यत तदर्थ- विज्ञान ताद्ृगेव भवति तस्य त्वर्थज्ञानम्य अ्न्य समाख्याशन्टो नस्त यन प्रतोयमानी व्यवहाराय कल्पेत न चाप्रतीय मानन व्यवहार। तम्य अन्जयस्याथम्य मन्ाशब्दरनतिकरग युक्रेन निन्ध्यत रूपमति ज्ञान कम इति ज्ञानमात। तदव मथज्ञानकाले म न समाग्व्याशब्ते व्याप्रयते व्यवहारकाले तु
ग्रोषमे मरोचयो भामेनाषणा मसष्टा म्पन्दमाना दूरस्थस्य चक्षुषा सान्नक्वष्यन्ते, तत्रोन्द्रयार्थमान्नकषादतकामात प्ान मुत्पद्यते। तज्च प्रत्यक्ष प्रसज्यत दृत्यत श्राह -प्रव्यभिचा गेति। यदतास्स्तदिति, तद्वभिचारि। यत्त तस्मिस्तदिति तदव्यभिचारि प्रत्यक्षमिति। दूगच्चक्षुषा ह्ययमर्थ पश्यब्रा- वधाश्यति धूम द्वति वा रगविति वा। तदतदिन्द्रियार्थ मन्निकषोत्पन्नमनवधारगज्जान प्रत्यक्ष प्रसज्यत इत्यत श्राह -व्यवमायाऽडत्मकमिति। न चैतन्मन्तव्यम आरत्ममन स्त्रिकर्ष-
मन्यनस तात्ययम यदा-शादथस्रिकर्षातनमिति सावधारकम द्ाम्दरयाथ मावकर्मातिवत्रा नव्यन्म् आतरित चाव जानम तम नाना केरणकामत्य। रमवारममव्याभवारात वमामननामत्यय ददणाशकममस्ानव्यलम सच्यले तु
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१म मध्याय ] [१ ५ ]
जमेव अनवधारगभ्जानमिति। चक्षुषा हयमर्थ पश्यब्ावधार यति तथा चान्द्रयेणोपलव्धमर्थ मनसापनभते एवमिन्द्रियेग अनवधागयन मनमा नावधारयति। यच्चैतदिन्द्रियानवधारगा पूर्व्वक मनप्राऽनवधारण तद्विशेषापेक वमर्शमात्र मशयो न पृव्वममिति। सव्वत्न प्रत्यक्तविषये ातुरिन्द्रियग व्यवमाय
दिति। आत्मादिषु सुख्वादिषु च प्रत्यत्तनक्षण वत्रव्यम। पनिन्द्रियार्थसत्निकर्षज ह्वि तदिति। दृन्द्रियस्य वे सता मनम इन्ट्रियेभ्य पृथगुपदेशो धमेदात्। भौतिकानीान्द्र यागि नियतविषयाण। सगुणानञ्जैषामिन्द्रियभाव दात। मनस्वभोतिक मव्वविषयच् नास्य मगुणस्येन्द्रियभाव द्वात। सति चेन्द्रियार्थमन्निकष सिधिममननिधिन्वास्य युगपजज्ञाना नुत्यात्तकारण वच्याम इति। मनसच्ेन्द्रियभावाब् वाच्च लक्षगान्तरमिति। तन्त्रान्तरममाचाराच्वैतत् प्रत्येतव्यमिति। परमतमप्रतिषिद्मनुमतमिति हि तन्त्रयुतति। व्याख्यात प्रत्यचम ॥४ ॥ अथ तत्पूर्व्वक विविधमनुमान पूर्व्ववच्छेष- वत सामान्यतो ष्टञ् ॥ ५ ॥ तत्पूव्वकमित्यनेन लिड्गलिद्गिनो सम्बन्धदर्शन लिङ्गदशन साभिसम्बध्यते। लिड्गलिद्रिनो सम्बदयोर्दर्शनेन लिङ्गस्मृति- रभिमम्बध्यते। सात्या लिङ्गदर्शनैन च अरप्रत्यक्षोऽर्थोडनुमीयत। सहति तत्् रकषत्वम् निविकत्पकम्य लत्ष्यत्व तदभाववति तदप्रक्रार कत्वमय 5 विभाग अव्यपदेखं व्यवसायाऽत्मकरमिति निविकन्पक सविकल्पकव्तत शिव प्रत्यक्षमित्यय ॥४ ॥ भनुमान लचयति विभवते थ।-पामनर्थ्यबोधकायशब्दो इतृहृतुमन्ायसद़। सूषमाय। तत्पूव्वक म्रत्यक्षपर्व्वकम प्रत्ययष प्रत्ययविभषा व्याप्ादिविषयक नन
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[ १ ६] न्यायदर्शनम। [१म अध्याय।
पूव्वा दति, यत्र कारेन काय्यमनुमीयत। यथा मेघोवतत्या भविष्यति वृष्टिरिति। शेषवत्तत यत्र काय्यग कारणमनुमीयत। पूर्व्वोद कविपरोतमुदक नद्या पूर्गात्व शेघत्वन्न दृद्टा स्रोतसा डनुमोयते भूता दष्टिरिति। सामान्यतो दृष्ट व्रज्यापूव्वकम अन्यव दृष्टस्य अन्यत् दर्शनमिति। तथा चाऽडादत्वस्य। तस्मादस्यप्रत्यच्षाऽप्यादित्यस्य व्रज्येति। अ्रथवा पूर्वववादात यत्र यथा पूव्व प्रत्यन्षभूतयोरन्यतरदश्नन अरन्यतरम्य अप्रत्यक्षस्यानुमानम। यथा धूमनग्नर्विति। शषवन्नाम परिशेष म च प्रमत्तप्रतिषधजन्यत अप्रसङ्गा्किष्यमाय सम् न्यय। यथा सदनित्यामत्येवमादिना द्रव्यगुगकमग्णामाव शषेण सामान्यविशेषसमवायभ्यो विभक्स्य शब्दस्य ताम्मिरिन द्रव्यकम्परगुणसभये न द्रव्यमकद्रव्यत्वात न कमा शब्दान्तरहेतु तवात् यस्तु शिष्यत, सोऽयमिति शब्दस्य गुणत्वप्रतिर्पत्ति। सामान्यतो दृष्ट नाम, यत्राप्रत्यक्षे लिड्गलिड्रिनो सम्बन्धे केन चिदर्थेन लिङ्गस्य सामान्यादप्रत्यच्षो लिङ्गो गम्यते। यथेक्का दिभिरात। इच्छादयो गुणा। गुणास ट्रव्यसस्थाना। तद्यदेषा स्थान, स आत्मेति। विभागवचनादेतत् त्रिविध मिति सिद्धे, व्रिविधवचन-महतो महाविषयस्य न्यायस्य लघी यम्ा सूतेगोपदेशात् पर वाक्यनाघव मन्यमानस्य ब्रन्यस्रिन वाक्यलाधवेडनादर। तथा चायमित्यभ्भूतेन वाक्यविकल्पेन
न्याप्तिविशिष्पचवर्मतात्ञानतनत्व परभ्यतै। च्तुमानम् चनमिति यत इत्यध्याहारय प सस्यलचगम् पथवा करणलचषणमेवेतम् तवानुमानमिात करयल्ुटा बनामात वरयमिति समास्त्यावलादेव लम्म् सत्र व्याप्तिज्ञान प्रत्यसपूष्वक सहचारप्रत्यय पूर्व्वक विभजते विविधमिात। पूव कारख तबत् तक्ित्कम् यथा मेघीव्नतिबिशघ उच्चनुमामम् भष काय्य तक्षिङ्तक शववत् यथा नदीदड्या वथ्चनुमानम् सामान्यतो हद ल्व्यआारणभिन्नलिङ़कम, यथा पृथिवीत्ेन द्रव्यत्वायुमामम् बथवा पूष्वम्
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१म अध्याय ] प्रथमा्किकम। [१' ]
• प्रवृत्त सिद्धान्ते कले शब्दादिषु च बहुन्न समाचार शार द्वात। सद्विषयञ्च प्रत्यचम्। सदसद्विषयञ्चानुमानम। कस्षात - वैकाव्यग्रहणात त्रिकालयुक्ता त्था अनमानेन गह्यन्ते। भवष्यतीत्यनुमीयते भवतोति च अ्रभूदिति च। अ्रसच्व खल्व तोतम रागतञ्चेति ॥ ५ । अथापमानम- प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम् ॥६। प्रन्नातेन सामान्यात् प्रज्ञापनीयस्य प्रज्नापनमुपमानामति। यथा गौरिव गवय दति। कि पुनरत्नापमानन क्रियते १ यदा खरय गवा समानधर्म प्रतिपद्यते तदा प्रत्यक्षतस्तमथ प्रति पद्मत, दति समाख्यासम्बन्धप्रतिपत्तिरुपमानाथ इत्याह। यथा गोरिव गवय इत्युपमान प्रयुत्त, गवा समानधम्मथमिन्द्रियाथ सान्नकषादुपलभमानोऽस्य गवयशब्द सन्नेति सन्नास्निसम्बन्ध प्रतिपद्यत इति। यथा मुद्स्तथा मुद्पर्णी, यथा माषस्तथा माषपर्गोत्युपमाने प्रयुते, उपमानात् सच्जामान्तसस्बन्ध प्रात् पद्यमानस्तामोषधी भैषज्यायाऽडहर्गत। एवमन्योप्यपमानस्य लोके विषयो बुभुत्सितव्य दति ॥ द ॥ पन्वन तग्त कैवलान्वयोव्यय तथा बभधय प्रमेनल्ात इत्यादि गषा व्यतिरक तवत केवलयतिरक्ौत्यथ यथा पृाथवौ द्वतरग्यी भिद्यत गन्धवत्वादित्यात साभा न्यतो दृष्टम् अन्वयव्यतिरकि यथा वाज्मान् धुनादित्यादि॥ ५ ॥ उपमान लच्यात।-प्रसिद्धस् पूव्वप्रमितस् गवाद साधर्म्यात्ाहख्यान तक्जामात् साध्यस्य गवयादपदवाच्त्वस्य साधन सिद्धि उपमानसुपमिात यन दवत्यध्याहरच करयलनग्रम् त्रथवा -साध्यसाधनमिात करयल्युटा करपलसय मेवेदम। चव च वधरम्योपमितिमपि मन्यन्े टशाकता यथा च अतिदौघगोवत्वादि पत्ननतरवधस्यम्ञानादुड् करभपद्वाच्यताग्रह। एवमन्यीऽप्युपमानम्य विषय दममि भाष्यम् यथा मुद्पर्गोसटभ्ी भोषधी विरष इन्ति इत्यतिदेशवाक्याथें ज्ाते मुद्पर्षी साद्वस्यज्नाने जात दयमोषधी विषहरणोत्यपमित्या विषयोक्रियत इत्यादि॥ ६ ।
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[१८] न्यायदशनम। [ १म अ्रध्याय।
श्रथ शब्द - आप्तोपदेश शब्द ।७।
आप्त खलु माक्षात्कृतधम्ा यथादृष्टस्यार्थस्य 1६ ख्यायय षया प्रयोक्ञा उपदष्टा। माच्ात्करगामथम्य आप्ति, तया प्रवत्तत दत्याप्त। ऋष्याय्यस्रेच्छ्ाना समान लचगम्। तथा च सकष व्यवह्ारा प्रवर्त्तन्त द्वात। एवमाभ प्रमागैदवमनुष्यतरस्ववा व्यवहारा प्रकन्पन्ते नाताऽन्यर्थत। ७ ।।
स द्विविधो दष्टादृष्टार्थत्वात् ॥८॥ यस्यह दृश्यतऽर्य सदष्टार्थ। यस्यामुत्र प्रतोयते मोट षाथ। एवमपि लोकिकवाक्याना विभाग दति। ककिमथ पुनारदम१ उच्यत-स न मन्येत दृष्टार्थ एवाऽऽसोपदेश प्रका गम अथस्यावधारणरदिति। अष्टार्थोऽपि प्रमागम अर्थस्यान मानादित ॥ ८ ॥
शब्द लक्ष्यति।-शब्द इति लत्कथनम् तदय प्रमागश्द इति बाप्ापतम पति वचयम् बाम प्रक्कतवाक्याययधायन्नानवान तर्रयापदश इत्वय प्रक्रतवाकाथ यथायमानप्रयुत शब्दइति फलिताथ बघवा-भाप्ती यथाय उपदेश शाब्दबोषा यस्मान् इति बहुत्रौहि। मान्दतख् जातविशष तथा च यथायशाब्दज्ञानकरणत्व मध। अव च विशष्यावत्त्यप्रकारकत्व सदत तत्प्रकार कत्वानिप्रमालक्षणनामक लचसे परख लत्यतावस्कनके निवेशनोयम् बती नामद ।ै।
हष्टाशक हष्टय कतवभदात प्रमाखन्वदस्य है।वध्यमित्र्थ । ८र।
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१म अध्याय ] प्रथमाड्किकम।
कि पुनरनेन प्रमाशेनार्थजात प्रमातव्यमति १ तदुच्यत-
भावफलटु खापवर्गास्तु प्रमेयम ॥ ६ । तव्ाऽडत्मा सर्व्वस्य द्रष्टा सव्वम्य भोत्ता सर्व्वज्त, सव्वान् भवक। तस्य भागाऽ्डयतन शरोरम। भोगमाधनानीन्द्रयागा। भोक्व्या इन्द्रियाथा। भोगा बुद्धि। सव्वार्थापलब्धा नान्द्र यागि प्रभवन्तोति सर्व्वविषयमन्त करण मन। शगेरन्दया। बद्धिसुखवेदनाना निर्वात्तकारण प्रव्यात्तदाषाच्। नाम्य द भरोरमपूव्वमनुत्तरज्ज पूववभगोराणमादिनास्ति उत्तग्षामप वर्गाउन्त दति प्रेत्यभाव। मसाधनसुखद खापभोग फल्म। दु खमिति, नदमनुकूनवेदनोयस्य सुखस्य प्रतोत प्रत्याख्यानम। किन्ताह १ जन्मन एवैदम। सुखमाधनस्य ट खानुषङ्गादू बेग्न अविप्रगेगाइविध बाधनायोगाद खर्मिति समाधि भावनमुप दिश्यत। समाहिती भावर्यात। भावयात्रविद्यत। निविस्मम्य वैराग्यम। विरत्स्यापवर्ग दूति। जन्ममरगप्रबन्धोच्छद सव्वदुखप्रहाणमपवर्ग दूति। अस्त्यन्यदपि द्रव्यगुणकम्म सामान्यविशेषसमवाया प्रमेयम। तङ्वेदेन च अपरिमद्वेशयम। अस्य तु तत्त्वचानादपवर्ग, मिथ्याज्ञानात् ससार, दृत्यत एत दुपददष्ट विशेषेगेति॥ ८।
प्रमय विभजते लचयति चा-भव तु भ्रव्द पुनरये तथा चतषामव प्रमेयल नतु प्रमावषयत्वन सरोगा ैनामपि प्रमनशब्दी[ह वादादिशब््वत परिभाषाविभषैष द्ानभ्रस प्रवन्ते तब च प्रत्रः मेय प्रमेयमात यागाथ। प्रकषश् ससारहेतुमिध्यास्चानावषयत्व मोसहेतृधौविषयत्व वा रुब्बा प तावतन्यान्यतमय लचषमाप तन्व प्रमेय करिम् ? इत्याकाड्ायामात्मदयी दायता इत्यता वचन भेदषपि नानन्वय वदा प्रमाशम् इत्यानवप्यवम बन्चथा पात्सूवे विगत स्थान्
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[ २. ] न्यायदर्शंनम्। [ १म भध्याय।
तत्राऽडता तावत् प्रत्यचतो न ग्टद्यते, स किमाप्तोपदेश मातादव प्रतिपद्यत इति ? नेत्युचते। अनुमानाच्च प्रतिपत्तव्य दति। कथम १- दूच्छाद्वेषप्रयत्रसुखटु खन्नानान्यात्मनो लिङ्ग- मिति ॥ १० ॥ यज्जातोयम्याथस्य सन्निकषात् सुखमात्मोपलब्धवान तज्जातायमवार्थ पश्यन्रुपादातुमिच्छति। सेयमादातुमिच्छा एकस्यानेकाथदशिनो दर्शनप्रतिसन्धानाद् भवा लिद्ग मात्मन।* नियतविषये हि बुद्दिमेदमात्रे न सभ्वति देहा न्तरवदिति।* एवमेकस्यानेकाघदर्शिनी दर्शनप्रतिसन्धा माटु खहेतो द्वेष। यव्जातोयो यस्याथ सुखहेतु प्रसिद्ध तज्जातीयमर्थम्पश्यव्नादातु प्रयतते। सोऽय प्रयत्न एक मनकार्यदशिन दगनप्रतिमन्धातारमन्तरण न स्यात्। नियत विषये बद्धिभेदमात्े न सभ्भवति देह्ान्तरवदिति।- एनन दु खहतो प्रयत्नो व्याख्यात। सुखदु खस्मृत्या चाय तत्साधन माददान सुखमुपलभते दुखमुपलभते, सुखदुखे वेदयत पूर्वात्त एव हतु। बुभुत्समान खल्वय विमृति किखिवदति।
सब वस्चत।-प्रमनत्वेनक्मिति प्रातपादनाय अन्वतमाज्ञानेपि सापवर्ग शत प्रातपादनाज वा प्रमेयामत्येकवचनामत्यन्धे र्ताज्ित्यम्। सवाप चात्मा च पा वविस् दान्द्र गधि च पथाय बुद्धिष मनस प्रहत्तिय दोषात प्रेव्यभावतर फलख्व खच अपवर्गपति यथावचन विग्रह वशयान। चव प्राधानमत् कारणकपप्रमेयषरक मभिधाय काय्यरूपम्मेयषट कमभिद्ितम् तव पूव्वपुव्वस प्राधान्यात् प्रथममुद्दम दति वदन्ति॥८ । तब प्रथमा इिष्टमात्मान सच्यर्या।-पव व चातन प्रत्यचत्वाछ्िप कथममस प्रतम्। न प शरोगतिरिक्षाउडत्मव्यव्पादमार्थ तत् इति वाच्यम् अग्रिमपरीचावयर्थ्या उ5पत। सचपाकयनेम मनत्वख इति चेव्र वित्पदस सचवायतात्। म प
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१म अ्ध्याय ] प्रथमाक्किकम। [२' ]
• विमृशन जानीत दृदमिति। तदिद ज्ञान बुभुत्साविमशा भ्यामभिन्नकर्तृक स्टह्यमागमात्मन््गम। पूर्वोक्ष एव हेतुर्रिति। तत्र देह्ान्तरवदिति विभन्यत। यथाऽनात्मवादिनी देह्ान्त रेषु नियतविषया बुद्धिमेदा न प्रतिसन्धोयन्ते तथेकदेइविषया अपि न प्रतिसन्वोयेरन अविशेषात। सोडयमेकसत्वस्य समा चार खय दृष्टस्य सरगा, नान्यटट्टस्येति। एव खल नाना सख्वाना ममाचार अन्यटष्टमन्ये न स्मरन्तीत। तदेतदुभय मशक्यमनात्मशदिना व्यनस्थापयितुमिति। एवसुपपन्र मस्त्यात्मेति ॥ १ ॥ तस्य भोगाधिष्ठानम्- चेष्टेन्द्रियार्थाSSश्रय शगैग्म ।। ११ ॥ कथ चेष्टाSSश्रय १ ईपिसित जिहामित वाऽथमधिक्कत्येप्सा जिहासाप्रयुक्तस्य तटपायानुष्ठानलन्तगा समोहा चेष्टा मा यत्र वर्त्तत, तच्करौरम। कर्थमन्द्रियाऽडश्य१ यस्थान ग्रहेणानुष्टडोतानि उपघात चोपहतानि स्वविषयेष साध्व
मिग्राम्येकवचनननालताना लक्षगत्व प्रतोयत सच्ायुक वयय्यान इति वायभ कि लचएम इयाकाडायामिक्कादनामभिधानान मिलित लघणार्मात प्रत्यानक। भावात् तथा व प्रत्यकमय लक्षणम् बव ज्ञानेक्काप्रयवानामात्ममावस लघ्षपात्व सुख खरषाषा सक्षरथो लच्षगत्वामति । १ ॥ कमपाप शरीर सचयति।-पव्र घट्टानीमा मिलितानाम् आात्यत्व नलक्षण बैधर्थ्यात् चाप त्वाय्नयपदस्य प्रत्येकमन्वयासेट्टाडत्यत्वादिलसनचयी तात्य्य चेष्टत्वस प्रथमजन्यतावक्ेदकी जातिविशष। मच शवोरावयवेडतिव्यापि अन्यावथवित्वन विगषसात। नच निक्करनशरौरैव्याप्ति ताटभ मानाभावान
मर्चाऽऽम यत्वमित्यवा यभन्ता न पानपिर तदाशयत्वम्य घतादावतिव्यास किन्नु सुख, खान्यतरपर बत एव
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[ २२ ] न्यायदर्नम। [१म अध्याय।
माधुषु वर्त्तन्ते, स एषामाश्रय तच्छरौरम्। कथमर्थाSSश्नरय १ यम्म्रिवायतन द्वान्द्रयाथसवनिकषात् उत्पन्नयो सुखदु खया प्रतिम वेदन प्रवरत स एषामाश्रय, तच्छरोरमिति ॥११॥ भागमाधनानि पुन -
जिघ्रत्यननेति घ्राग गन् गृह्नातोति। रमयत्यननत रमन रम गह्ानीति। चष्डननति चत्त, रूप पश्तोति। म्पृशत्यनेनति म्पगन त्वकस्थानमिन्द्रिय तवक तदुपचार स्थानादिान। शृगोत्यनेनति सरात् शब्द मद्धातोति। एव समाग्यनवचनमामध्याद् बाध्य सवविषयग्रहणलक्षणानोन्द्रया गोति। भूतम्य इति नानाप्रकवतीनामषा सता विषयनयम नेकप्रकतोना सात च विषयनियम सवविषयग्रहपलक्षणत्व भवतीति ॥१२ ॥
भाष्य यन्मिद्चाय न सुखवयी प्रातमवेन प्रवत्तत स पषामारय तक्करौवम् दति। वस्तुतस्वन्यतराऽडथत्रत्वमाप न तक्षचथ किन्तु सुखाऽडप्रत् टखाड श्रनत्ज्जीत बचषम ये तात्पय्यम शरीकसतदामयतमवक्तकतास्बन्वन इसतादरलच्यल तवन्थावयवित्वम विभषगोयम म्वागभरीर नारकिशरोर व्चातीव सुख, ख
तव्याप्यरचाप्य नातिमत्वस्य विवाचतत्वात् ताट्भजातिय मनुष्यवचवत्वद क्पभत न न मिहशरोगया
रन्द्ररयिमजत लचयातिच।-यद्याप मनसोऽपोन्द्रिय वमन्येव तथाडाप वनिव्यादरूपलयसपरत्वाद्र दोष वल्तास्न्द्रियाणीत्यस वाहरिन्द्रियाय्ोत्यय। तन भूनम्य इ्यम्य मासङ्गात। चव चतानीन्द्रियायौति वदता व्राप्ाद्यन्वान्य व ववषणमिति सूचितम् प्रत्यक्षजमकताऽवक्कदकतया इन्द्रिय लम खव्ापा। धकपा म्यन्य घापत्ादक जतिविशेषरूपम् कथष्कुत्वच्किन्न मम व्रापम् घ्रापार्दोनि कि मक्ातक्ान · उत्याकाङयामाह्ट -भूतेम्य इति। तनेन्द्रियाण्ामद्कारम्रततिकत्व
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१म श्रव्याय ] [ २३ ]
कानि पुनरिन्द्रियकारणानि- पृथिव्यापस्तेजो वायुगकाशमिति भूतानि ॥१३। सन्राशब्दे पृथगुपदशो भूताना विभक्काना सुवच कारययें भविष्यतोति ॥१२ । दमे तु खलु- गन्धरसरूपस्पर्शशव्दा पृथिव्यादिगुगास्तदर्या ॥१४।। पृथिव्यादोना यथाविनियोग गुणा इृन्द्रियाणा यथाक्रम मथा विषया द्वात॥ १४ ॥ पचेननस्य करणस्य बुद्धेज्ञान वत्ति, चेतनस्य कत्तरूप लच्िरति युाक्तविरुद्मथ प्रत्याचचाण इवेटमाह -
नाचेतनम्य वर्गस्य बुद्धेज्ञान भवितुमहत, ताड चेतन
मात मन्तव्यम् व्यवानगधन चदतगसयाय। सव प्रणदामा चतुथा
प्रश्यालजन्यल मम्भवात प्रातरम्य कणाशष्क न्यवंक्कसाSकाशस्य कषशष्य्या
जव्वादय जन्यवययवतेग अथवा सामव्रामोति पूरवित्वा भृतभव्ानाति व्याख्याम्। घ्राथ ैसभोप नकणपरत्व तु भूतम्य इि वाहबिन्द्रिजपरम । १२ ॥ध भृतान्यव कानि ? द्या काङ्ाजा माह् I-काय्याइडरसो परस्रामपेक्षत्सूचना
ग्राममामक्करण भूतचन्तु पृथिवौल्वादयब् भातविशषा इति ॥ १२॥ क्रमप्राप्मध वभजते लच्यति च।-वशाषकार्ण द्रव्यगुगाकमस्वयगव्दाभ भगत्वम् अत पश्चाना गनानौनामव कथ तत्त्वम् द गमडानिरामान तदर्था इत्यक्रम सैषमान्द्रयागामर्थाविषया डाड्ष्ा धपि त एवत्याशय इत्यत्त तदयत्व लच्च णमत ममव्यम् तक्कव्दम वाहसि न्याय्र परामृश्यन्ते तथा चकवाहारान्द्र मावग्रा्त
सुपत्वम् सथत्व वाहारान्ट्रा गाह्वाररिान्द्रयग्राश्गुगत्व तदय। प्राथव्याद
यूपा ति न्यानदश। त क गुणा दत्या+्द्वाय गन्धे गान पाथव्यादोन गुष्ा अम षश्ोममासो भष्यानिमिम्मत त उयगावनारभेे नात सूचितम । १४ । बु द्ध लवनितुमा -।-बनथान्र समामायक मतु साध्याममव बुद्द्धतस्वय्य
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[२४ ] न्यायदशनम्। [१म अध्याय।
म्यात्। एकसाय चेतनो दहेन्द्रियसङ्कातव्यतिरिक्क इति।
दिति ॥१५।
प्रत्यवमिच्छादयय मनसो निङ्गानि तष सत्मु दयमपि- युगपजन्ञानानुत्पत्तिमनसो लिङ्गम् ॥ १६ ॥ अनिन्द्रियनिमित्ता सृत्यादय करणान्तरनिमित्ता भवितुमर्ईन्तोति। युगपच्च खलु घ्रागादोना गन्वादीनाज् मन्निकषषु सत्स, युगपद्धानानि नोत्पद्यन्ते। तेनानुमौयत अ्रस्ति तत्तदिन्द्रियम योगिमहकारिनिमित्तान्तरमव्यापि। यम्यामत्रिधेर्नोत्पद्यते ज्ञान सव्रिधेद्यीत्द्यत दति। मन मयागानपेक्षम्य होन्द्रियाथस। ब्रकर्षस्य ज्ञानहेतुत्वे युगपदुत्पद्ये बन ज्ानानोति। १६॥ क्रमप्राप्ता तु-
मनाडव बुद्धिरित्यभिप्रेत, बुध्यतऽनेनति बुह्धि। मइत्ततवापरपर्ाम्य पारणामावशरषा ज्ानम् यथा चतत्तया वत्यत तथा च पुद्शा।-वद्वाच्य चमनूभवसिद्वज्ञानत्वजातिरेव वा उक्षवरामति भाव ॥१५। मनील नघति।-यापत् एककाले एक Sडत्मनौति पूरशोयम ज्ञानानामनुव्पत्ति वस सएव धर्ममा मानकरणगुत मनसो लिद्ध लक्षयमित्वय। तथा 1इ चस् गातपु विषनसम्बद्वष्वपि यम्याSSसच्यभावादक न ज्ञान जनर्यात यत्म्वव्वादपरव ज्ञान ननया। तन्व चाया निाखलज्ञानजनक सुखाददिस्ाच्यात्कारा साधारपकारय नतकमेव लाघवान्सिद्ध मन दत्यथ। ण्वमव्याख्याने य लक्षपाप्रकरये प्रमाकोप माशेडवत म्यादिति। अन्वेतु सति धामियि लययचिन्ता इत्यती मन साधनाय रृगपनिति सूवम् दत्यन्न मन सिद्धौ मिसपशाखत्वादिकं लचण सुकरमित्याशय कति वट न् ॥ १६॥ प्र्। वचनति विभनते च।-भत्र च प्रहत्तित्व रागसव्यताऽव क्केदकी जाति
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१म पध्याय 1 प्रथमाण्रिकम्। [२ ५ ]
सोडयमारभ शरोरेख वाचा मनसा च, पुषय पापच दशविधम्, नदेतत् छतभाष्य द्वितीयसूव दति ॥ १७। प्रवर्त्तनालचगा दोषा॥१८।। प्रवर्त्तना प्रव्ृत्तिहैतुत्वम्। बातार ह्वि रागादय प्रवर्स यन्ति पुसे पापे वा। यत्र मिथ्यान्ञान, तव रागद्वेषाविति। प्रत्यात्मवेदनीया होमे दोषा। कम्मात लक्षणती निर्दिश्यन्त दति १ कर्मालच्णा खलु रक्तद्िष्टमूढा। रक्नो हि तत्कमी कुरुते, येन कमाणा सुख दुख वा भजते। तथा द्विष्टस्तथा मूढ दति। दोषा गगद्वेषमाहा इ्त्युष्यमाने बह्टुनोक्क भवतीति ॥१८॥ पुनरत्पात्त प्रेत्यभाव ॥१६। उत्पन्नस्य क्चित मत्वनिकाये मृत्वा या पुनरुत्यतति स प्रेत्यभाव। उत्पन्नस्य सम्बददस्य। सम्बन्धस्तु देहेन्द्रियमनो विगष सएव लचगम् र्दशरकतरपि लक्यत्वे यवत्वमेव तथा। जीवननीनियवे मिवत्तौ घ मानाभावात् तत्ड्वावडपि प्रवृत्तित्व नित्ययवसाधारय तदावृत्त वा तथा
पन्देनाव मनाडभिप्रेतमिति भाष्यम्। परोगभन्दय चष्टावलेन इसादसाधारय नथा च वचनानकूलो यबी वागारभ शरोरगीपरी यवश्ट्टानुकूलयबी वा मरीरा Sरथ् एतह्यर्मिन्रीयता बुद्धाारम सच ध्यानादयादव पात्मदशनादनुकूल पथ्यवस्यति। पराश्स्तु सामान्यविशषलचणे चाटट्टणनकतव निवश्रयन्त। द्रयभ कारखकपा प्रवत्ति कार्य्यकपातृ धमाधम्ाऽडात्मकति।। दोष लचति।-दीषा इति बहुषचन रागदेषमोह्ाडतकलच्यवयच्ापनाथ प्रवततना प्रत् जनकत्व तनेव लचण येषाम् यद्यपोद अरोराटष्टपरच्कादावतिव्याप्त बचाडनि लौकिक मानसमत्यत्तविषयत्े सतत शेषचोव यागादगाचरप्रमावारकाय प्रमाइन्तवे सतोति विशेषयन्ति ॥ १८ । प्रेत्यभाव सच्यतति।-प्रत्य सत्वा भावी नमनं प्रेत्यभाव। चबर पुनरित्यने नामासकथनात, प्रागुत्यति तती मरयं तत उन्पततिरिति प्रेव्यभावाडयमनादिरप न्या-३
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[२६] न्याय दर्शनम्। [ १म पध्याय।
बुद्िवेदनाभि। पुनरुत्पत्ति पुनर्देह्हादिभि सम्बन्ध। पुन । रित्यभ्यासाभिधानम्। यत्र कचित् प्रागभृविकाये वर्त्तमान पूर्वोपात्तान देह्ादीन जहाति, तत् प्रैति। यत् तवान्यत वा दह्ादोनन्यानुपादत्ते, तङ्जवति प्रेत्यभावो मृत्वा पुनर्जन्म। मोडय जन्ममरणप्रबन्धाभ्यासोSनादिरपवर्गान्त प्रेत्यभावी वेदितव्य दति ॥ १९॥ प्रवृत्तिदोषजनितोऽर्य फलम्॥ २ ॥ सुखद् खमवेदन फलम्। सुखविपाक कर्म दुखविपाकक्ष। तत्पनदेहेन्ट्रियविषयबुद्धिषु मतोष भवतीति मह देहादिभि फन्मभिघ्रेतम। तथा हि प्रवृत्तिदोषजनितोऽथ फलमेतत मवसवति। तदेतत फलमुपात्तमुपात्त हेय, व्यत् त्यक्कमुपा तेयमिनि नास्य हानोपादानयोनिष्ठा पर्य्यवसान वाडस्त। म खल्वय फनस्य हानोपादानस्ोतसोहते लोक इति । २०॥ प्रथैतदेव- बाधनालचय टुखमिति ॥२१॥ बाधना पोड़ा ताप इति। तयाऽनुविद्वमनुषत्ञमवि गान। एतजज्ञानथ वराग्य उपयुज्यत द्वात प्रेन्यति न व्ययम् तदौनमरणख तमीय जौवनाहष्टनाथ त विचरमप्रायामनोगध्वस तदीयप्रायधसी वा तदोनी ननतिम्त तनौयावजातीयभ गैवावाप्राग्ाम रेय इति ॥ १२ ॥ फन लचति।-अव घ मुख्य फल सुखदु सोपभाग तथा व भाष्यम्- सुख खसवदन फनम्। तब च धममडतकप्रहक्ते प्रयाजकतवान तब गोषस हेतृववात् म्वत्तिदोषजनित उत्यत्म् लचपन्तु सुखदु खान्यतरसाक्षात्कार दति। गौप फवन्तु धरोगदिक सवमव। तथा च भाष्यम् - तन्पुनर्देहन्द्रिय बादष सतीष अवति इति मह देहन्द्रियादिमि फलमभिप्रतम् तथ द्ि प्रह्त्त गेषजनितोऽय फनमेततव भवति पति। इत्वस्त अन्यत्वमेव फजत्म् प्रशतत
दुख बचयात।-बाधना पोड़ा तदव लखना खरप वख नत्। तबा चाड़
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१ मे भध्याय ] प्रथमाञ्िकम् [२० ]
निर्भागेय वर्त्तमान दुखयोगाद्दु खमिति। साऽय सर्व दुखे नानुबिद्ध दहन्तमिति पश्यन् दुख जिहासुजन्मनि दुखदशी निवदत। निविसो विरज्यते। विरक्ञो विसुच्यते। २१॥ यत्र तु निष्ठा सोडय, यत्र तु पर्य्यवसानम्।- तदत्यन्तविमोच्षोऽपवर्ग ।। २२ ।। तन दुखेन जन्मनाउत्यन्त विमुक्तिरपवग। अ्न्यथा कथमुपात्तस्य जन्मनो हानमन्यस्य चानुपादानम। एताम
मृत्यपद ब्रह्मक्षेमप्राप्तिरिति नित्य सुखमात्मना मह्त्त्ववन्ात्त व्यज्यत तेनाभिव्यक्ञेनात्यन्त विमुक्त सुखी भवतोति कचित मन्यन्ते। तेषा प्रमागाभावादनुपपत्ति। न प्रत्यक्ष नानुमान नागमो वा विद्यते, नित्य सुखमात्मनो महत्त्ववन्मोच्तेभि व्यज्यत इति। नित्यस्याभिव्यकति सवेदन ज्ानमिति। तस्य हतुर्वाच्य, यत तदुपपद्मत दति। * सुखवन्नित्यमिति चेत ससावस्थस्य मतोनाऽविशेष ।यथा मुक्त सुखेन तत् सवेदनन च सव्वित्येनोपपव तथा मसारस्थोऽपि प्रसज्यत इति। उभयस्य नित्यत्वात्।अभ्यनुन्नान च धमाधमफलेन साहचर्य्य योगपद्य गटह्येत। यदिदसुत्यत्तिस्थानेषु धर्माधर्मफल सुख दुखवा सवेद्यते पर्य्यायेष, तस्य च नित्य खमवेदनस्य च सह भावो यौगपद्य गह्ेत। न सुखाभावो नानभि व्यक्तिरस्ति। उभयस्य नित्यत्वात्।*अनित्यत्वे हेतुवचनम। अथ मोने नित्यस्य सुखस्य सवेदनमनित्यम, यत उत्पद्यत भवासबदु खत्वनातरव सघग्म्। शरौरान्द्रयार्ध्ेषु दुखसाधनलान सुख च् दुखानुषक्रात् दुखन्यवहारी गौध इति अत एवाग्रिमसूव तन्पदन मुख्यदु ख परामथ । २१॥ अपवर्म सचयति।-तख दुखस, सत्यनविमीय खसूमामाधकरयट रा
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[R= ] न्यायदशनम्। [१म सध्याय।
स हेतुर्वाच्।#आत्ममन सयोगस्य निमित्ताम्तरसह्ितस्य हेतुत्म्।* आत्ममन सयोगो हैतुरिति चेत्, एवमपि तस्य सहकारिनिमिनान्तर वचनौयमिति।धर्मास्य कारणवचनम। यदि धर्मो निमित्तान्तर, तस्य हेतुर्वाच्, यत उत्पद्यत दूति।यागसमाधिजस्य कार्य्यावमार्यनरोघात् प्रम्नय सवेदननिवृत्ति। यदि योगममाधिजो धर्मो हेतु, तस्य कार्य्यावसायनिरोधात् प्रच्तये सवेदनमत्यन्त निवत्तत। अमवेदन चाविद्यमानाविशेष । यदि धर्मच्तयात् सवेदना परम, नित्य सुख न सवेद्यत दनि। कि विद्यमान न सवेद्यत, अथाविद्यमानम१ दति। नानुमान विशष्टेडस्तीति। अप्रत्तयश धमास्य निग्नुमानमु्त्यत्तधर्मकत्वात्। योग समाधिजो धमो न चोयते इति नासत्यनुमानम। उत्प्ति धर्मकमनित्यमिति विपर्य्ययस्य तु अनुमानम। यस्य त् सवेदनोपरमो नास्ति तेन सवेदनेन हेतुर्नित्य इृत्यनुमेयम। नित्ये च मुतससारस्थयोरविशेष इत्युत्ताम। यथा मुत्तम्य नित्य सुख तत्सवेदनहेतुद्। सवेदनस्य तूपरमो नास्ति कारणस्य नित्यत्वात्, तथा ससारस्थस्यापौति। एवञ्ज सति धर्माधर्मफलेन सुखदुखसवेदनेन साहचर्य्य ग्टह्येतेति। *परोगदिसम्बन्ध प्रतिबन्धहैतुरिति चेत् न शरीरादोनासुप भोगार्थत्वात विपर्य्ययस्य चाननुमानात्।- स्यान्मत ससारा वस्थशरोरादिसम्बन्धो नित्यसुखसवेदन हेतो प्रतिबन्धकस्तेना विशेषो नास्तीति। एतच्ायुक्कम्। भरीरादय उपभोगार्था ते भोगप्रतिबन्ध करिष्यन्तौत्यनुपपन्रम। न चास्त्यनुमानमशरी रस्याऽडलनो भोग कवविदस्तीति।*दष्टाभिगमार्था प्रवृत्तिरितति चेत् न अनिष्टोपरमार्थल्वात्। दष्टाधिगमार्थो मोच्चोपदेश प्रनत्तिय सुमुक्षणा, नोभयमनर्थकमिति। एतच्ायुक्कम।
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१म भध्याय ] [२2 ]
अ्रनिष्टोपरमार्थो मोचोपदेश प्रष्ृत्तिय् सुमुचूणामिति। नेष्टमनिष्टेनाननुबिद् सभ्भवतीति दष्टमप्यननिष्ट सम्पदते। अनिष्टह्दानाय घटमान दष्टमपि जह्ाति। विवेकह्ानस्या- शक्यत्वादिति। दष्टातिक्रमश्न देहादिषु तुत्य। यथा दृष्टमनित्य सुख परित्यज्य नित्य सुख कामयते, एव टेहेन्द्रियबुद्दोरनित्या दृष्टा अतिक्रम्य मुकतस्य नित्या देहेन्द्रिय- बुद्धय कल्पयितव्या। साधीयसैव मुकस्य चैकात्मा कल्पित भवतोति। * उपपत्तिविरुद्धममिति चेत समानम्।* देहादोना नित्यत्व प्रमाणविरुद्ध कल्पयितुमशक्यमति, समानम्। सुखस्यापि नित्यत्व प्रमाणविरुद्ध कल्पयितुमशक्यमिति। आत्यन्तिके च ससारदुखाभावे सुखवचनादागमेऽपि सत्य विरेध। यद्यपि कवविदागम स्यान्मुत्स्याऽडत्यन्तिक सुख मिति। सुखशब्द आत्यन्तिके दुखाभावे प्रयुक्त इत्येवसुपपद्यते। दृष्टो हि दु खाभावे सुखशब्दप्रयोगो बहुल लोक इति।+नत्य सुखरागम्याप्रहाणे मोक्षाधिगमाभावो रागस्य बन्धन समा ख्यानात्।- यद्यय मोच्षे नित्य सुखमभिव्यज्यत इतति नित्य- सुख गेगा मोचाय घटमानो न मोनतमधिगच्केन्नाधिगन्तु मर्हतोति। बन्धनसमाख्याती हि राग। न च बन्न सत्यपि कश्विन्भक्क दवत्युपपद्यत इति। * प्रहोपनित्यसुखराग स्याप्रतिकूलत्वम्। अथास्य नित्यसुखराग म्रहोयते, तस्मिन प्रहोगे नास्य नित्यसुखराग प्रतिकूलो भवति। यद्येव मुक्स्व नित्य सुख भवति, अथापि न भवति, नास्योभयो पचयो र्मोक्षाधिगमो विकल्पत इति ॥ २२॥
समानकालोनत्वध्वस तसय व नन्मापायादव सम्भव इत्यामयेन "दुखेन जनमा इत्वन्त विमुत्ति चपवर्ग इति भाष्यम्। दुखेन दुखानुषद्रिपत्यय। २२। समाप्त प्रमयखसथप्रयरयम्।
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[ ३० ] न्यायदर्मम्। [१म अ्ध्याय।
सानवत एव तर्हि सशयस्य लक्षण वाच्यमिति तदुच्यते- समानानेकधर्म पपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्धानुप- लव्धाव्यवस्थातस्त विशेषापेक्षो विमर्श सशय ।२३।। समानधर्मोपपत्तेरविशेषापेत्ो विमर्श सय दूति। स्थाग पुरुषयो समान धर्ममारोहपरिणाही पश्यन पूर्वदृष्टत्व तयो- विशेष बुभुष्समान किस्वदित्यन्यतरब्नावधारयति। तदनव धारण ज्वान मशय। समानमनयार्धर्मंसुपन्नमे विशेषमन्यतरस्य नोपलभ इत्येषा बुद्धिरपेक्षा सथयस्य प्रवर्ततिका वर्त्तत। तन विशषापत्तो विमश सथय। अ्र्परनेकधर्मोपपत्तेरिति। समान जातोयमसमानजातोयव्नानेकम्। तम्यानिकस्य धर्मीपपत्े। विशषस्थोभयथा दष्टत्वात। ममानजातीयेभ्योऽसमानजातो यभ्यचाथा विशेष्यन्ते। गन्धवत्वात पृथिवी अबादिभ्या विशिष्यत गुगकमम्यच्च। अस्ति च शब्द विभागजन्यत्व विशेष। तस्मिन द्रव्य गुण कम वेति सन्देह। विभषस्या भयथा दृष्टत्वात। कि द्रव्यस्व सतो गुणकमभ्यो विशेष आह्ोखिङुगस्य सत १ दूति, अथ कर्मण सत १ इति, विशेषा
क्रमप्राप्त सभय लचयात।-समय द्वात लक्यनिर्देश विमश द्रत्यत वि शब्दा विरीधाथ मृभनिरज्जनाथ एकासमन धमिात पूरणीयम तन एकर्धमध्ि विरोधन भावाभावप्रकारक ज्ञान समय। तब कारणमुखेन विशषलक्षणान्याद्टर- समानित्यादि। उपपततिञ्ञान तथा च समानस्य विरुद्कोटिचयसाधारणधर्मस्ष पानादितयय मनेकधमर बसाधारपधर्मा तनञ्ानादित्यध तथा च साधारग
व्यापसापकर भम्द तम्मदित्यय। यद्यपि प्ब्दस न सथायकतव तथाउपि शव्दात्कीटिर्यो पस्थिती मानस सभय इति वदन्ति। उपसब्धेर्त्ञानस बनुपसखे वरयतिरष ज्ञानस्य याद्व्यवस्था सविषय्रवत्वानिर्दारय्य प्रामाष्यसथय इति फखितोष । इन्छे स, उपवब्ाव्यवस्ा प्रामात्तसमय, अनुपसन्धिद्पसन्धिविरोधियमत्व नद्
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१म भध्याय ] प्रथमान्रिकम्। [३१]
पेचा अन्यतमस्य व्यवस्थापक धर्मान्रोपलभे द्ति बुद्धिरिति। विप्रतिपत्तेरिति। व्याहतमेकार्थदशन विप्रतिर्पत्ति। व्याघातो विरोधोऽसहभाव द्वति। अस्यात्मत्येक दर्शनमाह। नाख्या त्मत्यपरम। न च सङ्भावासङ्वावी सहैकत्र सभवत। न चान्यतरमाधकी हेतुरुपलभ्यते। तत्र तत्त्वानवधारण मशय द्ृति। उपलब्धाव्यवस्थात। खत्वपि सच्चोदकसुपलभ्यत तडागादिषु। मरीचिषु वार्डविद्यमानमुदकमिति। तत क्कचिदुपलभ्यमान तत्त्वव्यवस्थापकस्य प्रमाणस्यानुपलब्ध कि सदुपनभ्यते, अथासत१ दूति सशयो भर्वात। अनुपलव्धा व्यवस्थात। सच्व नोपन्भ्यने मूलकोलकोद कादि। असख्वा नुत्पन्न विरुद्ध वा। तत क्वचिदनुपलभ्यमाने सशय। क सन्नापलम्यत उतासत इति सशया भवति। विशेषापक्षा पूववत। पूव समानोऽनकश्च धर्मा नयस्थ। उपलब्धानुपलव्धा पुनन्नातस्थ। एतावता विशेषेगा पुनवचनम। समानधमाधि गमात ममानधर्मीपपत्तावशषस्मृत्यपैच्षा विमभ इति॥ २३॥ स्थानवता लक्षणवचनमिति समानम- यमर्थमधिकृत्य प्रवर्त्तत, तत प्रयोजनम ॥२४ ॥ यमथमाप्तव्य हातव्य वाऽ्ध्यवसाय तदाप्तिहानीपायमनु तिष्ठनि प्रयाजन तद्देदितव्य प्रवृत्तितुहैतात। इममथ व्यवस्था तत्मभा इत्याहु। वस्तुतस्तु प्रानाश्रसशस्य न सभयहतृत्व किन्तग् होता प्रामाय्य क न्ञानस्य विशाधतया साय प्रमाससशय रजज्ञानस् विराष तया साधारपधमनभनादित एवं सशनोत्पत्तरिति उपलभौ गदिक ताटश स्थले सश्यो अवतोत्येतावन्मावपर चकारा व्याप्यसशनम्य व्यापकसशयहेतृत्व समुाधनोतौति वदन्ति। विशषापेच क। अरणसापच। वस्तुतस्तु सुभय धारावाष्टिकतव स्वादत चार-विभषति। विशव विभषनभनम् सपेचते निवत्तक तवन" तथा व विभषदशननिवत्त्यत्व कथनमुखन वशदशनजन्यसन् इृत्युक्तम ।।२३। करमप्राप्त प्रयोगन लचघात।-आधळ्वत्य उिश्व तथा च प्रव्त्तहत्वका
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[ १२ ] न्यायदर्शनम् । [१म पध्याय।
माष्ामि हास्यामि वेति व्यवसायोऽर्यस्याधिकार। एव,
लौकिकपरीचकाणा यम्मिन्नथे बुद्दिसाम्य, स दष्टान्त ॥२५॥ लाकसाम्यमनतीता लौकिका नैसर्गिक वैनयिक बुद्धति शयमपराप्ता तद्विपरोता परीक्षका, तकेग प्रमाशैरथ परो चितुमईन्तोति। यथा यमर्य लौकिका बुध्यन्ते तथा परोचका अपि, मोरडर्थो दृष्टान्त। दृष्टान्तविरोधेन हि प्रतिपच्ा प्रति पेद्व्या भवन्तीति। दृष्टान्तसमाधिना च खपना स्थापनीया भवन्तोति। अवयवेषु चोदाह्वरणाय कन्पत इति ॥ २५॥ त्रथ सिद्वान्त - तन्त्राधिकरगकाभ्युपगमसस्थित सिद्वान्त ।।२६।।
सस्थिति सिद्ान्त। सस्थितिरित्यनभावव्यवस्था। धमनियम ।
विषयत्व प्रयोजनत्वम् विषयत्व साध्यताऽस्यविषयताविशष न तन सुखाss- वारपम् प्रवत्तिहेत्विति स्वरूपकथनम् तक्षकचडामणिसमेवादिप्राप्रिवारक सार्दतति केचित। अव व निरुपधीक्ताविषयत्वात् सुखदु खाभावयीमुख्यप्रयोननत्वम् ततपायम्य तु तदि क्का्डधीनेक्का विषयत्वाद्रौप्याप्र यजन्त्वमति। २४॥
क्र मप्राप् दृष्टान्त प्रातपाद्य इति फलितोऽय परोचक भास्त्रपारशोलनप्राप्तदुद्धिगकष प्रतिपादक दात फालताथ तथा व प्रतिाद्यमतिपादकयोरति पय्यवसन्रम् बह्ुवचन कथा बहुत्वमभिप्रेत्य बुद्धे साध्यसाधनोभयविषयिय्या तदभावविषायख्या वा माम्यम भावराव यतिबरधे सोडथ दश्टन वादप्रतिवादिनी साध्यसाधनीभयप्रकारक तदभावडयप्रकारकान्पतरनिषनावपयी टष्टान्त इति पय्यरवासतोय । २। समाप्त न्यायपूर्वातप्रवरपम्। रमप्राम्त सिद्ान वपयति।-वम्म शाख तदैवाधिकरथ भापवतया यस,
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१म भध्याय ] [ ३३ ]
• स खल्वयम्,-तन्त्रार्थसस्थितिस्तन्त्रमस्थिति। तन्त्रमितर तराभिसम्बचस्यार्थसमूहस्योपदेश शास्त्म्। अधिकरणनु
धारितार्थपरिग्रह तद्िशेषपरीक्षणायाभ्ययगमसिद्वान्त ।२६।। तन्तमेदात्तु खलु स चतुविध - सर्वतन्त्र प्रतितन्त्राधिकर माभ्युपगमसस्थित्यर्था- न्तरभावात ॥ २७ ॥ तच्ैताशतस्त्र सस्थितयोऽर्था स्तरभूता ॥२७॥ तामाम-
सिद्वान्त॥ २८।। यथा घ्रागादीनोन्द्रियागि, गन्धादय इन्द्रियार्था पृथिव्या दोनि भृतानि, प्रमागैरर्थस्य ग्रहगामिति॥ २८॥
ताटभोडस्य मोऽम्यपगम तम्य सभीचौनतयाSमशयरूपतता स्थित तथा च शाम्त ताथानशय मिश्षन्त। अव च अभ्यपगम्यमानीऽय सिद्धान्त दवात भाध्यभ अभ्यपगम पिद्वान्त दवति वातक टोके न चाव वविरोध शडुनीय बचाय् पारहतलात। तथा च ावमूवीनिबन्- बर्थाभ्युपगमत्रा परधानभावस्य विवना तन्तत्व नथाभ्यपगभोडभ्युपगम्यमानी वार्डर्य सिद्धान्त तन सूचमाष्यवात्तिकटोकासु न
सिद्वान्त इति सूवाथ दवात तुन युक्नम् भग्रिम सूवानुत्यानाऽपने तन्त्रसविद्धान्तल्न दयमनृगमय्य तन्वाधिकरणाम्यपगमान्यतम सिव्वान्त पति कषित् । २६॥ विभजते -स चतावध इति शेष सवतन्ताSदिसस्थितोनामर्थान्तरभावास् भेदादि यर्ष ॥२०॥ सवतन्त्रसिद्धान्त लवयति।-सवतन्त्राविरुद्ध सवभास्त्राम्युपगत इति बहव। वस्तुतो यथासुत एबाथ बन्वथा तम्वेविऊ्ञन इत्यस्य वेयर्थ्यापने चतएव नात्ा देरसद्त्तरवमप सवतन्तविद्दान्त। न य "तन्ोषिक्ञत इति स्पठाथ खबसेतुन
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[ ३४ ] न्यायदर्शनम्। [१म प्रध्याय
समानतन्त्रसिद्ध पगतन्तासिद्व प्रतितन्त्र-' सिद्वान्त ॥ २६। यथा नासत आत्मलाभ न सत आत्मद्ान निरतिशया स्ेतना, दहेन्द्रियमन सु विषयेषु तत्तत्कारणेष च विशेष, दति साहनानाम्। पुरुषकमनिमित्तो भूतमग, कमहतवो दोषा प्रदृत्तिश्त, खगुगविभिष्टास्ेतना, असदुत्पद्यत, उत्पन्न निरुध्यत, इृति योगानाम ॥ २८॥ य त्सि द्वावन्य प्रकरगसिद्धि सोडधिकरग- सिद्वान्त ॥३० ॥ यस्थार्थस्य सिद्धावन्येऽर्था अनुषज्यन्ते, न तेर्विना सोडथ मिध्यति तर्डर्था यदविष्ठाना, सोधिकरणसिद्दास्त। यथा दहेन्द्रिय व्यतिरिक्रो आाता दर्शनस्पशनाभ्यामकार्थग्रह्ण्दिति।
दपमव द्वात वाघ मनस दन्द्रिपलवम्याप
मव्यास्तु मूवस्यापल चणमात्रत्वाड्दादिप्रतिवाद्युम याभ्युपगत कथाडनुकूलोऽथ सदास वन्न्त ॥ १5 ॥
पाततन्त्रसिद्वान्त लचात।-समानभब्द एकार्य तनकतम्त्रासङ् इ्त्यध
खतन्त्राउद्ध प्रति पव्यवासतोथ तथा व वादिपतिवादकतरमावास्यपगत
क्नकतरस प्राततन्त्रामद्धान्त दरात फलिताथ यथा मोमासकाना भम
1ित्यत्वम् ॥ २८।। आाधकरणसिदानत लक्यति।-यस्यायस्य सिडी नायमानायामेय सन्यस प्रकर्यस्य प्रस्तुतस्यसज्भवति साषिकरणासद्वान्त रव्यय। यधा चनन्दाथ
व्यतिरिक य तनि साधिते रन्द्रियनानात्वम् तथा म यद्यसिद्धि बिना थाइय म्न्दानयुमानादा न सिध्यति सोधिकरयसिदान दाता वस्तुतस्तु भब्दलमन मानतयविवाचत प्रमायमानमपाचतम् अत एवं प्रत्यकषय स्वसत्सायनाननर
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१म बध्याय ] [ax ]
•पवानुषङ्गिपोडर्या, इन्द्रियनानाल्वम । नियतविषयापीन्ट्रियाणि
व्यतिरिक्ष द्रव्य गुगाधिकरणम, नियतविषयाच्ेतना इति। पूर्वार्थसिद्दावेतेऽर्था सिध्यन्ति, न ते्विना सोऽर्थ सभभाव तोति । ३०॥
अपरौचिताभ्युपगमात् तद्िशेष परौक्षणमभ्य- पगमसिद्दान्त ॥ ३१ ॥ यत्र किञ्जिदर्थजातमभ्युपगस्यते, श्रस्तु द्रव्य शब्द, भतु नित्योथानित्य द्वात। द्रव्यस्य मतो नित्यताऽनित्यता वा सद्िशेष परोच्यते। सोडभ्यपगमसिद्वान्त। स्ववद्यतिपय चिषव्यापयिषया परबद्मवन्नानाञ्ज प्रवत्तत इति ॥ ३१॥
मुतमात्मतखवविवेके- सोडयमधिकरणरमिद्वान्तन्यायेन स्थलत्वसिद्ी सबभद्रभद्र शत तत च वाक्यार्थसडी तदनुषड्रो योय सोऽधिकरयसिद्वानत उति वालिक फाळका खिखित्वा येम केनापि प्रमाधेन वाक्यायासरे नन्वमानायो योडन्योडथ सिष्यति स तथेत्यथ पति व्याख्यात दौघितिक्ता। एव हेतुरोटृश पचत वाक्याथ इति टोकावचने व उपलचयमेतदित्युक तव तब विशिष्ट्य लवय काय्यम्। यस्त अनकौभूतव्यापकताश्ाने व्यापककोटावविषय प्रऊ्मतानुमित्या व्यापककोटौ विषयौग्मत शाव्दजनकपदायन्ञामाविषयत्े सति शाष्दावषयस्ेति दयमचिकरव्वासद्षान्त इति तन्न इन्द्रियनामाल्वाइड़नी भाष्याखुदा हतेडत्याप्त रिति ॥ २ ॥
पथ्यप नासद्वानत वचगति।-पपरोचितस साचादसूवितस विशयपरौचय विभेषधमनकथनम् अभ्युपगमादिात नापकल पक्षमी सभ्यपनमभ्नापकममत्वर्य
समान न्यायसिस्ानल चथपक़रचम्।
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[३६ ] न्यायदर्शनम्। [१म भध्याय।
परथावयवा ।- प्रतिन्ञाहेतू दाहर गोपनयनिगमनान्यवयवा ।।३२ ।। दशावयवानेके नैयायिका वाक्ये सखक्षत। जिन्नामा, सशय शक्य प्राप्ति, प्रयोजन सशयव्युदास दति। ते कस्मावोच्यन्त इति १ तवाप्रतोयमानेऽर्थ प्रत्ययाथस्य प्रवर्तिका जिच्ामा अप्रतीयमानमर्थ कस्माज्जिस्तासती? त तत्वतो जात हास्यामि वोपादास्ये वा, उपेक्तिष्ये वति। ता एता हानोषा दानोपेत्ताबदयस्तत्वज्ञानम्यार्थ तदथमय जिन्तासते सा ख्वि यमसाधनमथस्येति। जिन्नासाविष्ठान मश्यस व्याहतधर्मोप सङ्गातात तत्त्वज्ञान प्रत्याभन्न। व्याहतयोर्ठ धर्मयोरन्यतरत्तर्त्वं भवितुमर्हतीति स पृथगुपदिष्टोऽप्यसाधनमर्थस्येति। प्रमातु प्रमागानि प्रमयाधिगमाधानि, सा शक्यप्राप्तिन साधकस्य वाक्यम्य भागेन युज्यते, प्रतिज्वाडदिवदिति। प्रयाजन तत्त्वाव श्वारणमथसाधकस्य वाक्यस्यफल नेंकदेश इति। मशयव्युदाम प्रतिपत्षापवमन तत्पुतिषेधेन तत्त्वम्वानाभ्यनुन्नानार्थ न त्वयं माधकवाक्ैकदेश इति। प्रकरणे तु जिन्नामाऽडदय समर्था अवधारणीयार्थोपकारा। अर्थसाधकाभावात्तु प्रतिभ्जाऽडदय माधकवाक्यस्य भागा एकदेशा अवयवा इति ॥३२॥ श्रेमप्राप्तानवयवान् लचायत विभजते।-अनेन विभागेन प्रतिज्ञाऽडदन्यतमत्व मवयवत्वमिति लचण सूचतम्। चव च प्रातम्ा डदोना पचानामवयवत्वकाधनाहत्रा बयववादो वयु्य इति मन्तश्यम् ते व यथा दाशता भाष्य-जिग्रासा सभय अवयगाप्ति प्रयोजन सभ व्युन्तसत इति एत प्रतिज्वाडादसहिता दभ। व्याख्याताप न तापयटौका गम् प्रपाजनं हानातिसडय तव्प्रपततिका जिन्नासा तवनक स मय भका 1घ प्रमापाना ज्ञानजननसामय्य सभयव्यदासक्षक। सममेवार्थी नियन्त निवाखत। विव्वासा विप्रतिपत्तिरिति कवित्। पनैषास न न्यायादयवत्व न्ायाघटवलात्। न य न्यायणन्वीधाठकूललनवावयवल्वम्, ६ क नूज सवावि तत्वमसद्ठात् प्रयोजनेडन्यापेव । ३र ।।
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१म अध्याय ] प्रथमान्किकम्। [३' ]
तेषान्तु यथाविभक्कानाम- साध्यनिर्देश प्रतिन्ञा ॥ ३३ ॥ प्रन्नापनीयेन धमेग धर्मिगा विशिष्टस्य परिग्रहवच्चन प्रतिन्ना साध्यनिदश। अरनित्य शब्द दति ॥ २३ ॥ उदाहरगासाधर्म्यात् साध्यसाधन हेतु ।।३४।। उदाहरगेन सामान्यात् साध्यस्य धम्मस्य साधन प्रज्जापन हेतु। साध्ये प्रतिसन्धाय धम्मसुदाहरणे च प्रतिसन्धाय तस्य साधनतावचन हेतु। उत्पत्तिधर्माकत्वादिति। उत्पत्ति वर्मा- कमनित्य दृष्टमिति॥३४॥ किमेतावद्ेतुममचगमिति१ नेत्युच्यते कि तहिं १- तथा वैधर्म्यात्॥ ३५॥ उदाहरगवैधर्म्याच्च साध्यसाधन हेतु । क्धम १ अ्रनित्य शब्द उत्पत्तिधर्मकत्वात्। अनुव्यत्तिधमरक नित्यम्। यथा SSत्मादि द्रव्यमिति॥३५ ॥ प्रतिज्ञा लवर्यति।-साधनोयसार्थद्य योनिर्देश सप्रतिज्वा साधनीनय वाङ्ग मत्ाडदिना पवताSदि तथा च पचतावस्केदकविशिष्टपच साध्यता च्केदक ववाशशव शिष्वबोधकशब्द दत्यर्थ निगमनवारणाय घ साध्याश साध्यताऽवच्कदकाति रिकाप्रकार कत्व वाच्य तदयम साध्यताऽवच्केदक्षप्र कागताविलस्षणप्रकारताशून्यत्वम् मेन प्रमेयवत साध्यत्वे नासिद्धि। उदासीनवाक्यगग्णाय व न्वायान्तर्गतले सतोति विशेषणोयम् न्यायानतर्गतत्वे सति प्रक्ृतपपताऽवच्केदकावाक्कन्रपचक
प्रछ्तपचे म्रऊ्वतसाध्यबोधजमकत्वं वत् प्रतिभ्वाऽवयवत्वादक परिभाषाविशष विषयत्वरूप रततद्यातात्वकपञ्चत्यपि व्दन्ति॥ ३३ ।। कमप्राप्त हेत लक्षयति विभजले च सुवाभ्याम्।-पव साध्यसाधन हतृरिति मामान्यलवगम् साध्यसाधन साध्यसिद्नकूलन्नापकत्वबाधक इत्यथ तथा च साध्य ताऽवच्केद का वच्किकिव्न साध्यान्वितज्ञापकत्वबोधक साध्यान्वितस्वाथबीधकी वा पवि फविताथ। तस्य हैविध्यमाइ,-उदाहरणसाधर््यात् तथा न्या-8
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[३८ ] न्यायदशनम्। [१म अ्रध्याय।
साध्यसाधर्म्यात् तद्वर्मभावी दष्ान्त उदा-
हरगाम ॥ ३६ ॥ माध्येन माधस्य समानधमता। साध्यसाधर्र्यात् कारणात् तद्वर्मभावी दृष्टान्त दति। तम्य धमास्तहमा। तस्य साध्यस्य। माध्यन्न द्विविधम्। धर्मिविशिष्टो वा धर्म शब्दस्यानित्यत्वम। धमविशिष्टो वा धर्मी अनित्य शब्द दृति। दहोत्तर तद्ग्पषेन गह्यत दति। कस्मात१ पृथग्धर्मवचनात्। तस्य धर्म स्तहम तस्य भावस्तवमभाव स यस्िमिन दष्टान्ते वर्सते, स दृष्टान्त साध्यमाधम्यात तवर्मभावी भवति। सचोदाह्रप मथयत। तत्र यदुत्पद्यत तदुत्पत्तिधमक, तच्व भूता न भर्वात आ्रत्मान नहाति निरुध्यत इत्यनित्यम। एवसुत्पत्ति धम्मऋत्व साधनम् अनित्यत्व साध्यम् सोऽयमेकस्मिन कयो धर्मयो साध्यमाधनभाव साधम्याद् व्यवस्थित उपलभ्यते। नें दष्टान्ते उपनभमान शब्दऽप्यनुमिनोति। भब्दोऽप्युत्पत्ति धर्ममकत्वादनित्य। स्थात्यादिवदित्युदाज्जियते। तेन धर्मयी माध्यसाधनभाव इत्युदाहरगम् n ३६॥
माधम्यमन्वय वकम्य व्यतिरेक साठभव्याप्तिरिति फविताय। उदाइक्यसाथम्म् उदाहरपयी यान्वयव्याप्ति ततीडन्वयी सेसुर्न्रातव्य उदाइसवति स्पष्टायम् तथा व मातान्वयश्याप्रिक संसुबाधको इत्ववयय हेत्वयय पति फलितारयें। एवमप्रतौतान्वयव्यापिकहतुबोषकी हेत्ववयवी व्यरिकी दतु पत्यमेव प्रतोतान्व व्यतिन कव्याप्रिकदतृबोधकी इत्ववमवोडन्वयव्यिरेकोव्यपि माचतमिति वदान्त । २४।२५। करमप्रापसुतदरय लक्षयाता-दटाना उदाहरवमिति सबषम दशनो वदानवचन दक्षनकथनयोग्यव्यथ न ट्नस् समयिकले मासाब
तुत् विविषम् अन्वयित्यतिरेकिभेदान, तवान्वय्यदाहरब सच्यति, माध्यसाधम्या तबर्सं
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१म भध्याय ] [३e]
तद्विपर्य्ययाद्दा विपरीतम् ॥३७॥ टष्टान्त उदाह्वपमिति प्रक्ञतम्। साध्यवैधर््यात् भत्थर्मभावी दष्टान्त उदाहरणमिति। भनित्य शब्द, उत्पत्तिधर्माकत्वात
धर्मोडनित्यत्व स तस्मिन न भवतीति। अचाऽडत्माSSदो दृष्टान्त उत्पत्तिधर्मकत्वस्याभावादनित्यत्व न भवतोति उपलभमान शब्द विपर्य्ययमनुमिनोति। उत्पत्तिघमकत्वस्य भावादनित्य शद्द दति। साधर्म्योत्नस्य देतो साध्यसाधर्म्यात् तह्र्मंभावी दृष्टान्त उदाइर गम्। वैधर्म्योक्कस्य हेतो साध्यवैधर्म्यादतबमभावी दृष्टान्त उदाइरगम्। पूर्व्मिन दृष्टान्ते यो तो धर्मो साध्यसाधनभूती पश्यति साध्येऽपि तथो साध्यसाधनभावमनुमिनोति। उत्तरस्मिन दृष्टान्ते ययोर्धमयोरेकस्याभावादितर स्याभाव पश्यति, तयोरेक स्याभावादितरस्याभाव साध्ये अनुमिनोतौति। तदेतदेत्वा भासेषु न सभभवतौत्य द्ेतवो हेत्वाभासा। तदिद हेतृदा हरपयो सामथ्यम्परमसूक्षम दु खबोध पा्डतैरुपवेद नोयमिति॥ ३७॥
भवोनि अन्वव्युदाहरथमिति श्रेष। परै ता सम्पणस्चमन्वय्युदाह्रणलच्ययमव
दित्वर्य तं साध्यरूप धम भावयति तथा व साधमवत्ताप्रयुत्तसाध्यव तानभाषको
व्यतिरेकर एरय सचर्यात।- तडिपर्य्ययात् साध्यसाधनव्यतिरकम्यामि
बचा नीवच्करोय साउडतक, प्रचादिमसान् यत्रैव तब्रब यथा घट उत वाउडबार प्रयोगमपैत्य नतृ वचमामुवर्त्ती तथा चान्वय्युदाहरय व्यतिरिेकुदाहरम
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[४.] न्यायदशनम। [ १म अध्याय।
माध्यस्योपनय॥। ३८ ।। उदाहरणापेच उदाहरणतन्त्र उदाहरणवश। वश सामय्यम। साध्यसाधम्यंयुत्ते उदाहरणे स्थात्यादिद्रव्यमुत्पत्ति धर्मकमनित्य दृष्ट तथा शब्द उत्पत्तिधर्मक दूति, साध्यस्य
हरणे आत्माSडटिद्रश्यमनत्वत्तिधर्मक नित्य दृष्ट नच तथा भब्द
यतेऽनेनेति चोपसहारो वेदितव्य द्वात। द्विविधस्य पुनह्देतो
हित्वपदेशात् प्रतिन्नाया पुनर्वचन निग- मनम ॥ ३६॥ साधर्म्योते वैधर्म्योके वा यथोदाहरणमुपमन्गियते।
क्रमप्राप्तमुपमय बचर्यात।-साध्यस् पबसय उदाहरणापेद उदाहरयानुसतारी मसपसदार उपन्वास मरम्यतोगहरशोपदाशतव्याप्रिविशिष्ट हेतुविभिषटपचविषयक बोधजनको न्यायावयव द्रत्यथ निगमन इतुविभिएलेन म पचबोधक ।किन्तु
इयुगम काय्य उदाहरयापदर्शितेति नु परिचायकमाचमिति तुन वाच्चम् उदाहरएविप रोतव्यापापद््य्य कोपणयवारकल्वात। वस्तुतीऽवयवपट व तड्गादास।
न सथति साध्ययोपसहारी व्यतिरेक्ुपनय चत च तथाशब्दप्रयोगाSडवखकवलव म तात्पय् किन्ु व्याप्तिविनिष्टटतुमख्ववीये तथा च वक्िव्याप्यधमवाच्यायमिति वा तथा चायमिति बोपन्यास। एव व्यतिरेकिय्यपि वहाभावव्यापकौभूताभकत्रतिर्यागि धूमवाथ्यायमिति वा न तर्थेति बोपम्वास ॥ ३८। निगमन जयपति।-इतोर्न्योमिविमिटपचपमस, चपदेश कवन प्तिघ्याया
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१म अध्याय ] [8t]
तस्मादुत्पत्तिधर्मकत्वादनित्य शब्द द्वति निगमनम। निग म्यन्तेऽनेनेति प्रतिभ्वाहेतूदाहरगोपनया एकत्रेति निगमनम। निगम्यन्ते समथ्यन्ते सम्बध्यन्ते। तत्र साधर्म्योक्के तावडेता वाक्यमनित्य शब्द द्वति प्रतिक्षा। उत्पत्तिधर्मकत्वादिति हेतु। उत्पत्तिधर्मक स्थाल्यादिद्र-यमनित्यमित्यदाहरयम। तथा चोत्पत्तिधर्मक शव्द द्वत्युपनय। तम्मादुत्प्त्तधमक त्वादनित्य शब्द दति निगमनम । वेधर्म्योत्तऽपि अ्र्परनित्य शब्द, उत्पात्तिधमकत्वात अनुत्पत्तिधमकमाऽडत्मादिद्रव्य नित्य दृष्ट, न च तथाऽनुत्पत्तिधर्मक शब्द तस्मादुत्य्त्तिधर्मकत्वाद नित्य शब्द दति। अवयवसमुदाये च वाक्ये सभूय इतर तराभिसस्बन्धान प्रमाणान्यर्थ साधयन्तोति। सभ्भव तात्र च्कन्दविषया प्रति्ञा आप्तोपदेशस्य प्रत्यक्षानुमानाभ्या प्रति सन्धानादनृषेश् खातन्ताानुपपत्ते अनुमान हंतु। उदाहरण साटृश्यप्रतिपत्ते। तत्रादाहरग भाष्ये व्याख्यातम प्रत्यन विषयमुताहरग दृष्टेनाटृष्टासद्वे। उपमानसुपनय, तथेत्युप महागात न च तथेत्यपमानघमप्रतिषेधे विपरीतधमीपमह्वार- सिद्ध। सवषामेकाथप्रतिपत्ता मामथ्यप्रतशन निगमनामति।
प्रवत्तरन। अमति हेतौ कस्य साधनभाव प्रदर्श्यंते? उदाहरणे साध्ये च कस्योपमहार स्थात? कस्य जापदशात प्रतिन्नाया पुनर्वचन निगमन स्यादिति१ असत्युदाहरगे केन माधर्म्य वैधमा वा माध्यमाधनमुपादायेत? कस्यवा माधर्म्यवशादुप सहार प्रवत्त।१ उपनयनञ्जान्तरेय साध्येऽनुपसहत साधको धर्मो नाथ साधयेत्। निगमनाभावे वाडनभभिव्यत्तमस्बन्धाना प्रतिभ्ाऽय मायावशिष्टपचस्य वचन निगमनम् तथा च व्यापिविशिष्टपचधम सेतुकधनपूव कमा नविशिष्टपकमतथक व्यापतिवििष्टपचधमहतुप्त व्यसाध्यविभिष्टपच
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[४२ ] न्यायदशनम। [१म अध्याय।
प्रतिप्वादीनामेकार्थे न प्रवर्त्तनम। तथेति प्रतिपादन कस्येति ? *अथावयवार्थसाध्यस्य धमास्य धर्मिणा सम्बन्धोपादान प्रतिच्वार्थ। उदाहरगेन समानस्य विपरीतस्य वा धमम्य साधकभाववचन हेतर्थ। धर्मयो साध्यमाधनभावप्रदशन मेकतोदाहरणार्थ। साधनभूतस्य धर्मस्य साध्येन 177 सामानाधिकरएोपप ट- ्नयाथ। उदाहरणस्थयोधर्मसे साध्यसाधनभावोपा T निगमन्। न चैतस्ा का दरयपरिशुदी सत्या साधर्म्य वैधरम्याभ्या प्रत्यवस्थानस्य विकल्पाज्जातिनिग्रहस्थानबहुत्व प्रक्रमत। अव्यवस्थाय्य सलु साध्यमाधनभावमुदाहरखे जातिवादो प्रत्यनतिष्ठत। व्यवस्थित तु खलु धर्मया साध्य साधनभावे दृष्टाम्तस्े ग्टह्यमाणे माधनभूतस्य धमस्य हेतुत्वे नोपादान न सावम्यमात्रस्य न वैधर्म्यमात्रस्य वेति। ३८ । अत ऊद्ध तर्का लक्षणोय दति। श्रथदमुच्यत-
मूहस्तर्क ॥४० ॥ पविज्ञायमानतत्वेथें जिन्नासा तावज्जायते, नानोयेम मर्थमिति। अथ जिन्नासितस्य वस्तुनो व्याहती धर्मो विभागेन विम्रशति किस्विदित्थम्१ आहोखिन्रेत्थम्१ इति। विमृश्य मानयोधर्मयोरैक कारणोपपत्याऽनुजानाति, सग्भवत्यत्त्रिन् बोधकल्ाटमसाध्यबोधकी वा न्यायावयवी निगमनमिति। सस् त्वन्वयिव्यातरककि मेदान्न सेद रत्याशय। व्यतिरेकियि तु तष्मात्र सथत्येवाSडकार इत्यपर।। ३ । समाप्त न्यायखढपप्रकरयम । क्रमप्राप्त तक लचयति।-तक इति लक््यनिर्देंश कारपोपपत्तित ऊह पति लखगम अरविद्याततस्वेऽय तत्वभानायमिति प्रयोजनकथनम। कारय व्याख सोपपतिरारीप तममात, ऊड्ट आारीप, अथाशापकसय, तथा च व्यापकाभाव
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१म भध्याय ]
•कारण प्रमाण हेतुरिति। कारणोपपत्या स्यादेवमेतव्वेतरदिति। तत् निदर्शनम। योऽय जाता जातव्यमर्थ जानौते तख्व भो। जानोयेति जिन्नासा। स किसुत्पत्तिधर्मकोऽनुत्पत्तिधर्मक इति विमश। विमृश्यमानेडविज्ञाततत्त्वेऽये यस्य धर्मस्याभ्यनुक्षा कारण उुपपद्यते, तम्दुता वा यद्यवमनुत्यत्त क, तत स्वभ्नतस्य कमग फलमनुभ त ।। दय मिध्याज्जानानामुत्तरमुत्तर पूरय पूवस् कारणमुत्तरात्तरापाय तदनन्तराभावादपवर्ग, इति स्याता ससारापवर्गी उत्पत्तिषमाक आातरि पुारनस्ाताम्। उत्पन्न खलु भाता देहेन्द्रियबुड्िवेदनाभि सम्बध्यत इति। नास्येद स्वछ्वतस्य कभागा फनम। उत्पन्नन्न भूत्वा न भवतीति। तस्याविद्यमानस्य निरुदस्य वा स्वक्कतकमर फलोपभोगो नस्त। तदेवमेकस्यानिकशरीरयोग गरोरदि वियोगश्ात्यन्त न स्यादिति। यत्र कारणमनुपपद्यमान पश्यतति, तवानुजानाति। सोडयमेवलचर ऊहस्तक द्वत्युच्यत। कथ पुनरय तत्वन्ञानाथ १ न तत्त्वज्ञानमेवेति, अनवधारणात्। अनुजानात्ययमेकतर धर्म, कारणोपपत्या न त्ववधारयति न व्यवस्यति,न निव्चिनोति एवमेवेदमिति। कथ तत्त्वन्ञानार्थ इति ?
निवाजत्वाड रोपाब्निधूमत्वाइडरोप निव्ि स्ान्निधूम स्वादित्यादि। इदी निव्ि शात्रिधूम स्ातित्यादिवारणाय व्यापकाभाववत्वन निर्फात इति। निवा्चि स्ाब चद्रव्य सादित्यादिवारणाय व्याप्यसेति। तब्याप्याऽडरीपाधीनसदारीप पत्ययलाभाय व्यापकैति। न चायुमानादितोऽर्थसिड्ेसर्की व्यर्थ इति वाच्यम चप्रयोजकत्वादि भडाकलद्धितेम इतुनारऽर्थस साधयित्मशक्यलात तदैतदुकम अविज्ञासतखवडयें त्त्व नानार्थम् S।ा-तत्त्वनिषयार्थमित्यय। यच म प्रनोनकत्वाद्याभडा तत नापेचा एवेति भाव। प तृ ऊड् पत्येब लचगम् ऊहत्स् मानसत्वव्याप्यी जातिविशेष तकयामव्यमुभवसिद्ध। तक किं खतएव निर्धायक परम्परया वा दत्यत माह - कारयेति।-कारयस व्याप्तिभ्ानादेवपपाद्मद्ारेत्यय, तथा च धमी यदि वष्रि
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[88] न्यायदर्शनम्। [१म अ्रध्याय।
प्रमागसामय्यात तत्त्वन्वानमुत्यद्यत इ्त्येव तत्वज्जानाथ पति। सोय तक प्रमायानि प्रतिमन्दधान प्रमागाभ्यनुन्जानात प्रमाण सहिती वादे उपदिष्ट दृत्यविज्वाततत्वमनुजानातीति। यथा सोर्ऽर्थो भवति। तस्य यथाभावस्तत्वमविपर्य्यो याथातथ्यम॥४०॥ एतस्मिक तकविषये- विमृश्य पत्तप्रतिपचाभ्यामर्थावधारग निर्गाय ॥।४१।। स्थापना साधन, प्रतिषेध उपालस्ष, तौ साधनीपालसी पच्चप्रतिपचाSडश्यी व्यतषक्ञावनुबन्धेन प्रवत्तमानी पक्षप्रति पच्चावित्यच्येत। तयोरन्यतरस्य निर्वात्तरकतरस्यावस्थानम अवश्यभभावि। यम्यावस्थान तस्यावधारग निणय। नद पचच प्रतिपक्षाभ्यामथावधारण मम्भवतोति। एको हि प्रतिज्ञातमथ ववभिचारी सवात वद्गिन्न्ा न स्ात दय्यनेन व्यमिचारम्डानिराम निरद्धशन शा प्रअाननानामातारति परम्परयवासोपयोग इत्याहु। स चान परविध
एतहत्जन्य स्यात तततारानाधकरणचणत्तरवर्त्तान म्याा। यदय घट पतदरपान सात एतहृटव्याज्यों न खवात। यजय घत पताटम्ानाभिन्न सात ज्ञानसामगोजन्य खात एतदगमत्र स्वादिातवा सववाऽपाद्यम। तदपेक्यपेचित्वा ।वन्नी डनिष्टप्रमखा गेडन्यायय। सादपि पूववत नषा। तनपे यपेस्थपेचितवनिबन्धनी प्निष्टप्रसद् चक्रक्रम् चत कचाद वपि स्वस्य स्वापच्यपत्यपतित्वसत्त्वास्रााक्ाम्। पसापि पववत् वविष्यम्। पयवस्थितपरम्पराड रोपार्धीनाव ट्टप्रसड्ऽनवस्था बधा याद घम्त घतजन्यत्वव्याप्य सात कपालसमवेतत् याप्य न सात। तदन् वाधिताषप्रमङ्गम्त ध्मो याम वायमिवारो सात र्वा्िजन्वो न स्यादि गदि।
सक किन्तु प्रमाणसहकारित्वरूपमाधम्यात् तथा व्यवहार इति सइप ॥४ ॥ क्रमप्राप्त निषय लक्षनति।-विमृश्य सन्दिष्व पचप्रतिपचाभ्या साधनी प्रालजम्पालाम उपालभ्भ परपतदूघणम् पधस्यावधारम तदभावाप्रकारक
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१म पध्याय ] प्रथमान्चिकम्। [8x]
हेतुत स्थापयति प्रतिषिद्स्जोद्दरतीति द्वितीयस्य द्वितोयेन स्थापनाहेतु प्रतिषिध्यत,तस्यैव प्रतिषेधहेतुद्तोद्टियते,स निवरत्तत तस्य निवृत्तौ योऽवतिष्ठत, तेनार्थावधारष निर्षय दति। उभा भ्यामेवाथावधार पमित्याह। कया युक््या। एकस्य सभायो द्वितोय स्वासन्भव तावेती सभ्वासभ्भवी विमर्श सह् निवरत्तयत। सभयसभने सभयासन्भवे त्वनिवृत्तो विमर्श दति। विमृश्येति विमर्श कत्वा। सोडय विमश पत्तप्रतिपचाववद्योत्य न्याय
व्यम्। यत्र तु धर्मिसामान्यगती विरुची धर्मी हतुत सभवत तत् ससुचयह नुतोऽर्थक्ष्य तथाभावोपपत्ति। यथाक्रियावद्द्व्य मिति लक्षणवचने यस्य द्रव्यस्य क्रियायोगो हेतुत सन्भवति तत क्रियावत यस्य न सभ्भवति तदक्रियमिति। एकधर्म्मस्थयोक्व विरुद्धयोरयगपङ्भाविनो कालविकल्प। यथा तदेव द्रव्य क्रियायुती क्रियावत, अनुत्पन्नोपरतक्रिय पुनरक्रयमितति। न चाय निर्गय नियम विसृश्यैव पत्तप्रतिपच्ाय्याम गववारण
निर्गय इति। परीक्षा विषये तु, विमृश्य पक्षप्रतिपचाभ्यामथाव धारष निर्षय, शास्त्रे वादे च विमर्शवर्जम ॥। ४१॥ इूति वात्स्यायनीये न्यायभाष्ये प्रथमाध्यायस्य
तम्परकारकं ज्ञानम्। वद्यप्यताव देव निषयसामान्यलचय तथाऽपि विसश्येत्यादिक अल्पवितर्द्ास्थन्नीयनिवायमधिक्कन्य तदुन भष्ये -"शासत्रे वाद व विमशवनम्" पति। एवं प्रत्यचत नव्दाज्ज निखये न विमर्भपचप्रतिपचापेत्तेति ॥ ४१ ।
मवमाध्यायय प्रथममाण्रिकम्।
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[84] न्यायदर्शंनम्। [ १म पध्याय।
प्रथमाध्यायस्य द्वितीयाSSन्निकम्। तिस्न्न कथा भवन्ति, वादो जस्पो वितरका चेति। तासाम्- प्रमागतर्कसाधनोपालभ्भ सिद्दान्ताविरुष पञ्चावयवोपपन्न पच्तप्रतिपच्तपरिग्रहो वाद ।४२। एकाधिकरणस्थ विरुधी धर्मा पत्प्रतिपची प्रत्यनीक भावात्। पस्यात्मा, नासत्यात्मेति। नानाऽधिकरणी विरुदी न पस्तप्रतिपची। यथा नित्य आत्मा, अनित्या बुद्धिगितति। परिग्रहो उभ्युपगमव्यवस्था। सोऽय पक्षप्रतिपचपरिग्रह्ो वाद। तस्य विशेषण प्रमाणतर्कमाधनोपालस्, प्रमाणैस्तकेंग च साधन मुपालभ्व्यास्िन् क्रियत द्ति। साधन स्थापना। उपालभ्भ प्रतिषेध। एती साधनीपालसी उभयोरपि पक्षयोव्यंतिषक्षा वनुबहीच यावदेको निवृत्त एकतरो व्यवस्थित द्वति। निव्टत्तस्थो पालसो व्यवस्थितस्य साधनमिति। जन्पे निग्रहस्थानविनियोगा
प्रथमा S्त्रिकेन सर्पारकरी न्याय ववचित वादादिलय न्ाय दितो डक्रिकाइड
Sडद्रिकार्य। तब पत्वारि प्रवरणानि पादी कथाप्रकरय तती हत्वा भासप्रकरय कखप्रकर दीषलचनाप्रकरयश्चेति। सव कचासामान्यस्ाय विशेषो वादादि तवाय मिभि सूब्रेक वयामकरयम् सन्वथकसूपस्य प्रकरय भावाभावादसपति सात् उत्याभयनोत्र भाष्यज्ता - तख खलु कथा भवन्ति वादी जन्पो वितन्छा व इति। तव तत्वनिष्ययविजयान्यतरखरूपय ग्यो न्यायानुगत वचनसन्दभ कथा। लोकिकविवाद्वार्थाय न्यायेत्यादि यचकेन न्याय प्रयुक् अपरेय सु मतप रियहीषि न छत तवारथाय बाद्य विशषयमिति। कचा
तब वाद जघयति।-पव प वाद पतति सच्यानिहवेम पचपरतिपची विम्ति पतिकोटो तयी परियद् तत्साधनी हेश्यक्ात्िपरत्यत्िकपवधनसन्दभ, तावन्ावय
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१म बध्याय ] [४9]
द्वादे एनत्प्रतिषेव। प्रतिषेधे कस्यचिदभ्य नुन्नानार्थ सिड्ठान्ताविकृद द्ूति वचनम। "सिद्धान्तम्भ्यात्य तद्िराधी विरुद्ध' इति हेत्वाभामस्य निग्रइस्थानस्याभ्यनुप्ना वाद। पत्लावयवोपपन्न दृति होनमन्यतमेनाप्यवयवैन न्यून हेतूदाहरयाधिकमक- मिति चैतयोगभ्यनुन्ञानार्थममिति। पवयवेषु प्रमाणतर्कान्सर्भावे
प्रन्यथोभावपि पच्ची स्थापनाहेतुना प्रहत्तौ वाद इतति स्यात्। पन्तरेणाम्यवयवसम्बन्ध प्रमाणान्यर्थ साधयन्तीति दष्म् तैनापि कस्पेन साधनोपालभ्ी वादे भवत इति भापयनि। इनजातिनिय्रइस्थानसाधनोपालभो जल्प इति वचनादिनि
मवाइम्तर सावारय्म् पत चाइ-प्रमायेत्यादि। प्रमाणतकाम्या तद्रपत प्ाताभ्या सावनोपाखभी यव्र स। तथा व सभयवापि प्रमार्णा सह्ाव सति कोटिषयस्या्प सिि खात् पतसूद्ूपेय म्ाताभ्यामिति। मानमनाहाय्य विर्वाच्चितम् उपा बच्ी दूषसम् अव्पादी व म्रमाचाउडभासत्वादिना माताव्यामपि साथनीपालकी भषत इति तहारसम्। उत्यउ प्रमाचाऽडभा सलप्रबारक्रामविषयकरचकसाथ नी पायम्योग्यान्यते सतोत्यये तेम नाडभजस्विभषे नातिव्यापि। तव ध
मासावाग्यत वा नियहखान प्रातश्ञाडान्ादोनामवक छृत्वा तटपन्यासायोग्यत्वमिति निषष। तेोअअसविभेषवारयमिव्याड्ट। सिद्धान्ताविरुद्ध दत्यमेमापसियाओो हावनम्। पचावययीपपस् दत्यमेम न्यनािकीह्वावमे मवयवाउडभा ससय दश्टाम्ता सरिक्ा टैपाजञावनम्। प्रमासेव्यमेग व प्रमाषाइडमासले इत्वामासाना सर्काडडभासथ्य चीप
आ्रावनमति वदनति। वस्तुतस्त वादस्य वोतरामकयालेन तत्वनिषयस्ोद्टशतया पुरुष दोष आविध्ार्थादेरिव न्याधिक योरपि नामावनसुचितम्। पत एव पच्चाकयया S5वश्यकत्वमपि भाष्यकारी नानमेने हत्वाभासायुावनेमापि च सदय कषाविध्ेद अदि इत्वनरेमापि साधयित न अकाते दतरथा तु तडेलीरेव टुष्टलम्। इतख पचावययोपपत्र इति मायिजत्वाभिम्रायेयति तत्तम्। वादाधिकारिषस्त त्त्ववुड्व्व
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[४८] न्यायदर्शनम्। [१मभ्रध्याय।
ग्रहा जल्प इति मा विज्ञायि। क्वन्जातिनिग्रहस्थानसाधनी पालस एव जल्प, प्रमागतक साधनोपालस्ी वाद एवेति मा विज्ञायोत्येवमर्घ पृथक प्रमागतकग्रहगमिति । ४२।। यथो कोपपन्नञ्क्क लजातिनिग्रहस्थानसाधनो- पालस्भो जल्प ।। ४३ ।। यथोकोपपव् द्वति, प्रमाणतर्कसाधनोपालभ् सिद्धान्ता विरुद पञ्चावयवोपपन्न पक्षप्रतिपक्षपरिग्रह। छलजाति निग्रइस्थानसाधनोपालभ दूति। छन्जातिनिय्हस्थानै साधनमुपालभ्श्ास्म्रिन क्रियत इति। एवविशेषणो जल्प । न खल वे छलजातिनिग्रहस्थाने साधन कस्यचिदर्थस्य सन्भवति। प्रतिषेधाथज्ञेषा सामान्यनत्षगत् शृनते। वचनविघाती
प्रक्मक्तिका अविप्रलभभका यथाकालसफृतिका अनाचेपका वुत्िसित्वम्रत्यतार। चतुविधेयस्थय सभ्यपुरुषवती जनता सभा अनुावधयो राजा द स्थयान् मध्यस्य सा घ वादे नावश्यकी वीतरामकथात्वाित। ४२॥ नन्य लचनति।-यथाकषु यदपपन्र तनोपपन्न इत्यथ मध्यपदलीपी समास तथा च प्रभाणतक साधना पा लस् पचप्रतिपचपरिग्रह इव्यम्य योग्यया परामभ । अस्था जत्पम्य वातावशषतवाऽपातं प्रमाणतर्कभ्या तनपेय जाताभ्या न तु ज्ाने डमाष्ाध्यत्व विवा चतम् आ्रीपतप्रमाणाऽडमसेि जम्पनिवाहात। द्यपि कुलादिभि दुपाखन्न एवं मतु साधन तथ डाप साधमस्य परकीयानुमानस उपासभी यवेत्यथान दीष। परपक्दूषणे सति खपचासिरत्यत साधन तटपयोग दूति। चन्चे उभयपसस्थापनासखन च विशेषणोयम् अतो वितण्डायाव्रातित्यापि स प्रतिपचस्थापनाहीन इत्यत्तरमूतात् प्रछ्ाते उभयपचस्थापनावतलार सथापनावत्वा देव व पचावयवनियमोडाप जम्यन इति वदान्त। जब च कलातमि सर्वेरपालभी म विशषपम् पव्याप अवि तु तत्योग्यतव योग्यताऽवन्कदकन्तु वादभिन्नकथालमेय। तव चानवादतावास्कम्रभदम्तत्तदाएभदी वा विशेषपमिति कलैत्यादिना बिनि मोघकथालं बोव्यते विजमीर्षाहि कमादक करोति तथा चोभयपसस्थापनावती वितियोपुकथा नव इन्यय, इत्यपि वदन्ति। बमर चाय क्रम, वादिना खपचसाधन
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१म अध्याय ] द्वितोया्किकम। [ 8e ]
ऽर्थविकल्पोपपच्या छन्मिति। साधम्यवैधम्याभ्या प्रत्त्वस्थान जाति। विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिय निग्रहसथानमिति। विशेष लक्षणव्वपि यथास्ामति। न चैताइजानोयात प्रतिपधाथ तयेवार्थ माधयन्तोति। छलजातिनिग्रहस्थानोपालस् इ्त्येव मध्यच्यमाने विच्ायत एतर्दिति। प्रमाणे माधनोपालभभयो म्कूलजातीनामङ्गभावो रक्षग्ाथरत्वात न तु सतन्त्राग माधन भाव। यत्र प्रमागेरथस्य माधन, तत्न क्वलजतानग्रह स्थानानामङ्गभावो रक्षसाथलात। तानिह प्रयुज्यमानन परपचावघातन खपन्न रक्षयन्ति। तथा चोतम - तत्त्वाध्यव मायमरक्षगाथ जन्पवितएडे बोजप्ररोइरक्षगाथ कराटकमाखा- Sवरगवत द्रति। यश्चासी प्रमायै प्रतिपत्तस्योपालभ्ष, तस्य चेतानि प्रयज्यमानानि प्रतिषेधावघातात् सहकारोगि भवन्ति। तदवमङ्गोभूताना छवलादोनासुपादान जल्पे न खतन्त्राण साधनभाव। उपालस्भे तु खातन्त्रामप्यस्तोति । ४ २ ।
प्रगुज्य नाज इत्वाभास तन्नवण्णयागात दवात सामान्यता मायमासड इत्यालि विगषती वा दूगानि निरसनीयानि। तत खपनद्षण उदत प्रातवाादना
उक्रयाध्याण प्रतिनाज्जान प्रतिभ्ञाविरोध प्रतिन्ाऽन्तर प्रातक्षासत्र्यास सेत्वन्तरावित्ञा ताथ विचप मतानुक्षा न्यवाधिक पुनरुक निरनुयज्यानुजोग्यापमिद्धान्तानामलाभे पथ्य नुषाज्यापेच पस्य मध्यम्थाङ्वाव्यत्वादवानपन्यासाहसा यथासन्भव हेल्ाभासेन परीक्र दूषयित्वा स्वपच उपन्यसनौय तवो वादिना ततीयकच्षाउश्रितन परीक्रमनन
भामेन यथासभभव प्रतिपचवादिन स्थापना दूषणोया। अ्रन्वया क्रमविपय्यासे डप्राप्रकालमनवसर दूषणाडावने चनरनुयोज्यानुयाग यथा त्यच््यास चत प्रात्वाहानित्शषयसि चद्धत्वन्तरमित्याद गह्य त्वाविशषेऽपि बधनीषलन प्रधामत्वाज्चरममनसतन्ाना सत्त । ४३ म
न्या-५
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[५0] न्यायदशनम। [१म अध्याय ।
म नन्या ववितगडा भगत।काविसप -प्रातपक्त स्वाना होन। मेतो समानाधकरथो विरुद् धर्मा प नप्रातपात्यक्ी तयारकतर वलागडका न स्थापयतो। पर्पजप्रतषधनेव प्रवत्तत डात। अ्रस्तु तहि स प्रतिपक्ष ाना वितगड़ा। यद खल तत्परप्रातषधननक्षा वाक्य म वेतागडकम्य पत्च। नत्वमी साध्य काजदथ प्रतिज्ञाय स्थापयतीति। तम्माद यथान्यासमवास्त्वात॥।४४।। हेतुनक्षणाभावातह तवो हतुसामान्वाइतुव दा भा सा मा ना ।
न एम - मनभिचार विक, प्रकरनासमसाध्यसमातीत-
काला हेत्वाभामा ॥|०y ॥
वग क्रमपाप्ता नच्त- मि तककबन जल्पोन पराबट भकान जल्पस्य सथापनाइयवत प्रतिपनस्थापनाके नतस्य विनुवात रथाप सापना वव व वि द्वाय न न्प क म परामभ्य। प्रातपमाइतोपन तथा च प्रतिपन स्थपना नाविजगौषुकयाबित त। नच ूस्य स्थापनोयाभावान कथाम।
कथा प्रशतताम्। द्वात वाच्यम पत्पनखगग्नन अपयवाद्देश्यल्वात। पर नु- परपनखणडनेनव वपवासदेवघादव मि तमाघनाभा नप न प्रवृस्यनुपपा रगन
ममाप्त कथाप्ररुनगाम ।
मप्राप्तान हत्वाभावान नचनवि विभजने व।-मच अव नचय न प्रतीयते
द त वागम हत्वाभामशन्ग्य नताभासमा कल व तअचात्। तग्रा - पनम व सप मव विन्धास वारधतत्वामप्रातपनितत्वोपपत्रो दतुगभक तग्ताभ मत इत्यव वन्यय नव मात त मवत्म तथा च पञुपोपपन्रत्वा भाव सति तगण भाममान इति फलिताथ। तत्र च नलगा सन् तम्यव
भूषकताया मृप्या गा म् । न च असाधकताग्रा पजतसस्वाचेक काभावस्यनाग्म कन्सभ्भवे धकवयघम् पतेन पच्चवदन्यत्व लक्षणामत्यपि प्रत्यक्रम द्वात वान्य,
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१म अध्याय ] [५१]
तंषाम- अनैकान्रिक सव्यभिचार ॥ ४६ ॥। व्यभिचार एकत्र व्यवस्थाऽभाव। मह व्यभिचारण वत्तत दूति सव्यभिचार। निदशनम्-नित्य शब्दा स्पर्शत्वात स्यगवान कुशोऽनित्यो दष्ट। न च तथा म्पशवान शब्द तम्मादम्यगत्वान्नित्य श् इति। दृष्टान्ते स्पशवनमानत्यञ्च धर्मो हो न साध्यमाधनसूती दृश्येते स्पशवाक्यारगुत्यचात। आत्माSडदी च दृष्टान्ते उदाहरणसाधम्यात् साध्यमाधन हतुरिति। अस्पशत्वादि त हेतुन्त्यत्व व्यमिरतति। उ्रसाश बुदधिरनित्या चेति। एव ्विनिधेऽ् दृष्टान्ते व्यभिचागत माध्यपाधनभावी नाम्तोति।
पञ्चत्वा क न्नाभावम्य पक्तम वाभा वाद्यघान तत्वन वाय्याभावात। वस्तस्तुप्रा1वो
उतरस्या भियन स्पप्वत्वा प्रमनमाकाशातत्या मपचायपार न सयलनल
तात्पम। परन्तु विपचासत्त्व सपक्षस वाय्यानव्यभ शव्तसामानाचिकर
पक्चमत्त्वसहितस्य चतस्य विशाधत्वविभिलव्म् तन व्याप्ावनाष्टपनघम
विशाधत्व
वत्व तमानभितितत्कारणज्ञानान्यतरविरोधित्व पय्ववर्सत्ति ॥ ४५ ॥ सव्याभचार लन्नयति।-एकस्य साध्यम्य तनभावस्य च यान सहचान
श्व्याभ चारतसहचार दू वाशय। स चाव व्यातराहक तथा चकमानव्याप्ति
ग्राहकसृहचारवान कान्तिक तदन्याडन कान्तिक। उ च साधारणSसाधारया
नुपमहारी चति ावध साधारय रध्यवत तदन्यर्ग। यथा शव्ता नित्य
नि स्पशतात्। न व विरुत्सदोयदीष उपधयसद्ध रम्यपाधरसडगत।अ्रम धारया
सपचवि वव्यावत्त सपनन साध्यव श्वानशयविषय यथा शब्दा निय शव्ततव
तत्यादि पतुपसहारी घ केवलान्वायधन वच्किन्नपचक यथा सव्वनित्य
मयत्वादित्यादि अव च साध्यसन्ेहाछप्ग्रही न भवतीत्याभय। नव्यास्त
प्रमयाधारण साध्यदवत्ति एतथ्य साध्यसहचारग्हप्रातबव्वेन व्यप्तयहप्रातबन्त
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[ ५२ ] न्यायदशनम । [ १म अ्रध्याय
विद्यत इति ऐकान्तिक। िपय्ययादनैकान्तिक। उभयान्त व्यापकत्वादिति ॥४६ ५ सिद्धान्तमभ्यपेत्य तद्विगेधी विरुद्ध ॥ ४9॥ त विरुसदोति तद्विगाधी अभ्युपेत सिद्वान्त व्याहन्तोति। यथा साडय विकारे व्यत्रपैति नित्यत्वप्रतिषेधात। अ्रपेतो- डप्यक्ति विनाशप्रतिषेधात। न नित्यो विकार उपपद्मत इत्येव हतुव्यकेरपेतोऽि विकारऽरतोत्यनेन सवमिद्वान्तेन विरुध्यत। कथम? व्यानगत्मनाभ अपाय प्रचुति यद्यात्मलाभात प्रचुता विकारडस्ति नित्यत्वप्रतिषेवोनोपपद्यन। यद्ातेरपेतस्यापि विकारम्यास्तव तत खन्नु नित्यत्वमिति। नित्वत्वप्रतिषेधी नाम विकार स्याऽडमलाभात प्रच्ु तरुपपत्ति। यदात्म ल्वा भ्रा तात प्रचवर्तत तर्दनित्य टृष्टम। यर्दास्ति न तदात्मनाभात प्रचवत। अ्तित्वञ्चा डडत्मनाभाा प्रुतिरिति विरुद्ावेना न सह सन्नवत इति। सोऽय हतुयत्सिद्वान्तमाश्रित्य प्रवत्तत, तमव व्याहन्तोति ॥४७। यस्मात् प्रकरगचिन्ता स निर्गायार्थमपदिष्ट प्रकर्गसम ॥ ४८॥ विभशाविष्ठानी पक्षपरतिपचावनवसितौ प्रकरणम। तस्य दूषकताबोजम् अनुपसङ्वारी व कवत्ान्वायसाध्यक तस चात्यन्ताभा वाप्रा तयााम साध्यकत्वरपस्य ज्वानाद्यतिर कव्याप्रियह प्रतिबन्वा दूषक ताब् इत्य६॥ क्रमप्राप्त विरुद्ध लक्षति। चत चसिद्धान्त साध्यम्। प्रतिज्ञाया कि पवस चिडम्यान्ते साध्यमामधौयत तथा च साध्यमभ्यपत्य उद्दश्य प्रयुत्तास्ाहराधी साध्याभावव्याप डात फालताय यथा वाङ्रमान पदत्वादिति एतस साध्याभावान मितिसामयोलन साध्यानामातप्रातबन्धा दूषकतायोजम् नयसत्पतिपन्ताविभष तब ह्त्वन्तर माध्याभावसाधकम् दृह्ट तृ हतुत्व साव्याभावसाघक साध्यसाधकलेम त्वयोपन्यक्ष दव्यभाकतायपषाय्रायकत्वेनवभ्षा।।४७। करमपाप्त प्रकरणसम लक्षयति।-स हतु खसाध्यस्य परसाध्याभावस्य वा नि्वियायमपादष्ट प्रयुत प्रकरणसम सच्चते सघक दवत्याकाङयामाह,-यम्ाम
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१म अ्रध्याय ] [५)]
चिन्ता विमर्शात् प्रभृति प्राडनिर्गायाद् यत् समोक्षग मा जिज्नासा यत्कृता, स निणयार्थ प्रयुत्त उभयपच्माम्यात प्रकरणमनतिवर्त्तमान प्रकरणममी निगयाय न प्रकल्पत। प्रज्ञापनतु -अ्र्प्रनित्य शब्दो नित्यधमानुपलब्धे इति अनुपनभ्यमाननित्यधर्मकमनित्व दृष्ट सात्यादि। नित्य शब्द अनित्यवमानुपलब्धे दति अनुपलभ्यमानानित्यधमक नित्य दृष्टम आकाशादि। यत्र समानोधमम सशयकारग हतुत्वे नापादीयत, स सशयमम मव्यभिचार एव। या तु विमशम्य विशेष पेच्िता उभयपक्षविशेषानुपन्नब्धि् मा प्रकरय प्रवत्त यति। कथम १-विपर्ध्ने हि प्रकरगनिवृत्ते। यदि नित्यधम्ा शब्द गह्यत न स्यात प्रकरगम। यदि वा अनित्यधमो गह्येत एवमपि निवत्तेत प्रकरगम। सोऽय हेतुरुभी पच्ती प्रवत्त यन्नन्य 7रस्य निर्गयाय न प्रकल्पत ॥ ४८॥ साध्याविशिष्ट साध्यत्वात साध्यसम ॥०६।। द्रव्य क्वयति साध्यम, गतिमत्त्वादिति हेतु। साध्येना विशिष्ट साधनीयत्वात्साध्यस्म। अ्रयमप्यसिद्त्वात माध्य
प्रकरणचन्तात प्रकरण पत्तप्रातपचावात भाष्यम् साध्यतदभाववन्तवात त व तथा चानगयाय प्रयुता हतुयवनिरन ज ववितुमश्तास्तुव्यवलन परष प्रातबव्वात किन्तु धासण साध्यवत्त्व तदभाववत् वाताचन्त जिज्ञासा प्रवत्तयति म प्रकर ग सम। या-प्रक्रषट करण लिङ्ग परामर्शा वा की हतुत्मत्री साधक पतयी क पगामश प्रमोत वा ? यतर जिन्नासा भवतीत्यय यममातित्याद तु वस्तुस्थितमाल सक्तपन्तु न रलविरोधिपरामन्नकालीनतुल्य बल प रा मश विषयत्व खमाध्यपरामत् कालोनल्यपलविरोधिपरामर्श वा। विरोनिपरामशस म्वहेतुनिष्ठत्वमकज्ञान विषयत्वसम्बन्धन बन्वथा हतोदुष्टत्व न स्ात्। अश दशावगष दोष दवत्यत सद्वेताराप विरोधिपरामशकाले टष्टव्वमिट्टमवत्यवधयम् ।।४८। क्रभप्राप्त साध्यसम लचयति।-साध्यन वझ्मदिनाडविशिष्ट। कुत १ दूत्यत पाइ,-साध्यत्वानितिि साधनीयवादितय। यथा ।ह साध्य साधनीय तमर
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[५४ ] न्यायदर्शनम। [१म अध्याय।
वत्पन्नापयितव्य। साध्य तावदेतत,-कि पुरुषवच्छायाडपि गच्छति ? आहास्विदावरकद्रत्ये समपति आवरणसन्ताना दमन्नधिमन्तानो्य तजमो गह्यत दति। मर्पता खलु द्रव्येग पानाद यो यस्तेजेनाग अव्रियत, तम्य तस्यासननिविर अविच्छिन्नो गह्यत दति। आवरगन्तु प्राप्तिप्रतिषध ॥४८॥ कालात्ययापटिष्ट कालातीत ।। ५ू० ॥ कालात्ययन युक्तो यम्याथस्यैकदश्ाऽपदिश्यमानस्य म कालात्वयापिष्ट कालातौत इत्युच्यत। निदशनम,-नत्य
हतुरप चेत साध्यसम दृत्युच्यत अत एव चासस्तिद् इति व्यर्व।रञ्ा ्त स-स्वरृपामितरिव्वाप्यल्ासाडभदात विविध। भाम् दिश्व पव पचता वछतकाभाव पथा काख्नमत पवता वाड़भानित्या।। खर्पमात पक्ष हतुता रकावाक्कन्नस्वाभाव यथा ह।द्रत्य धमातित्यादी। व्याप्यत्वारसििश्ाव्याभ् चरितिसामानाधकरगस्याभाव न अम्पास र्व मृवाखत्यत्वप्रतीतत
लन्यत्वानात वाच्य हतारात पद पयूत प मै। ापतव गमकहताव्याप्तिवाइ
पन्तधमास्य वाचक व्याप्तिविाभटपचधमा इत्यव वा पृथ्यताम। तथा च तम्य
किच्चित पसाध्णत्वेनव साध्यसमत्वम् अत एव साध्ये साध्यतावक्कूतकभाव माधने
साधनताऽन्तकाभावथ् व्याप्यत्वासिदि। गथा पततावच्कतकाभाव पचताव कतक दतावन्यसमल्ना उप्रयासदित्व यथा च पत हवभाव हतुमदेदादवन्यतम तवेन स्वरूपसदित्व तथा मा यताऽवच्कतकाभावादेरन्यतमलेन व्याप्यत्वासिद्ित्वम्
वदान्त तषामयमाशय- व्यापिह माध्यसम्बान्वताइच्कत करूपा गरुधमाय् साध्य सम्बान्वतानवक्छंक अती नोलह्सत्वाट साध्यसम्बान्त Sनवच्केदकत्ान्र व्या
सरपत्वम् तथा च सायताऽककाभावादिागव साधनताऽव ककदके व्याप्ना Sनव क्कनक वमाप भर्वतत व्याप्य वामा शित ।४ ॥ क्रमप्रापमत तकान नवयति।-अतोतकालस ममानाथकत्वात काला
तीनश्दनाक्म् कालस्य साधनकानम्यात्ययडसावपदि् प्रयुक्तो हत एतन साध्या गवप्रमा लचगाथ द्वातसूाचाम। साध्याभावानयय सति राधना, समवादयमेव बधतसाध्यक इति गोनते तथा वाहरनु ऊतकत्वादिनादौ। नच बाधे
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१म अध्याघ ] [५५ ]
शब्द सयोगव्यद्मलवात रूपवत। प्रागूर्द्न्ज व्यक्ेरवस्थित रूप प्रदोपघटसयोगेन व्यज्यते। तथा च शब्दोऽप्यवस्थिता भेरो दण्डसयोगेन व्यज्यते दारुपरशुमयागन वा। तस्मात सयोग व्यड्मत्वान्नित्य शब्द इत्ययमहेतु कान्ात्ययापदशात। व्यञ्ज्न +स्य मयागस्य काल न व्यङ्गास्य रुपस्य व्यत्तिरत्येति। सति प्रदोपघटसयोगे रुपस्य ग्रहण भवात। न निवृत्त मयाग रूप गह्यत। निवृत्त दारुपरशुमयागे दूरस्थेन शब्द श्रयत। विभागकाले सय शद्र्व्यकंकि सयागकालमत्येतोति न मयाग निमिता भरवत। कम्मात-कार गाभावाडि काय्याभाव द्वात। एवमुदाहरगसाधम्य व्याभवादसाधनमय हेतुहत्वाभास इति। अवयवविपय्यामवचन न सूत्राथ। कस्ात ?- यस्य यनाथमस्बन्धा दूरस्थस्यापि तस्यस । अथता ह्यममथानामा न्तव्यमकावगम। द्वत्येतइननाद विपय्यासनाको हतुरुदाहरगमाधर्म्यात् तथा वैधर्म्यात् साधन हेतुनवग न जह ति। अजहद्दतुलक्षण न हेत्वाभासी भवताति। अवयवविपय्यासवचनमप्राप्तकालमिति निग्रहस्थानमुक्तम। तदेवेद पुनरुचत द्वति, अतस्तन्न सूतार्थ ॥५० ॥
आवश्यकम्य व्यमिचारसरूपाासद्ान्यतरस्व दाषत्वमुचतम् इति वाच्यम् तदप्रातसन्धावेन नावस्य दोषत्वाSडवश्यकवात उपधयसदधर्यपाधरसरतउ्पत काजावावती घटो गव्ववान शखरावाक्कन् पवती वाक्रमानत्यादावसदराच साध्याभानवत्पवताऽवच्केकार्वच्छिन्नकत्वम्य तव सचात। पर तुघट सकतक कावत्वादत्यादौ यव नाघयोपनीतमेकमावकतकलव भासत दलचयते तब तद भावाउस दोर्णदाहरसानात वन्ान्त । ५ । समाप् इत्वाभासप्रकरगम्।
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[ ५ ६ ] न्यायदशनम । [ १म अध्याय।
शथ कलम - वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्त्या कवलम्॥ ५१॥ न सामान्यलत्तणे कल शक्मुदाहर्त्तम। विभाग तूदा हरणान ॥ ५१॥ विभागश्त- तन विविध, वाक्कुल सामान्यच्छलमुप- चार च्लञ्ञ॥ ५२ ॥ तषाम -
कल्पना वाक्कलम ॥ ५३॥ नवकम्बन्कोडय मागवक इतति प्रयोग। अरत् नव कम्बलो जम्येति वक्ुरभिप्राय। विग्रहे तु विशेष, न समासे। तताय कलवादो वक्तुरभिप्रायादविवच्ितमन्यमर्थ नव कम्बला अ्येति तावदभिह्ित भवतेति कल्पयति, कल्पयित्वा चासभ्भवन
क्रमप्राप्त छल लच्यति।-पथरस् वाद्यभिमतस्य यो विकन्पो विरुद्ध कल्प अर्धान्तरकल्पनेति यावत् तदुपपत्या युक्तिविनषेगा ग वचनस् वाद्युक्स्य विघाती दूषयं तच्कलमित्यथ। कावतम् तात्पर्थ्याविषयत्व विगषणे विशष्ये ससग वा। यथा नेपालादागतीडन
व्वादित्यत पुस्यत्वाथकनपनया भागासद्ाभिवानम् वद्निमान् घमादित्यत घमाव।वे व्यमिचासभधानम् ।।५१॥ लक्षित इल विभजते।-तव वाकछल लचयति।-यब शक्याघडये सन्त्न वति एकायनिषकविशषाभावानाभप्रेतमक्याथकल्पनेन द्ृषण्णाभधान तह्ाक कृलवम् वत्तणन्तु- मत्या एकाथभाब्दयोधतात्य्वकभव्दस शक्ताऽयान्तरतात्पय्य कल कल्पनया दूषणाभिधानम्। यथा नेपालादागतीड नवकम्बन्वत्त्वादित्यते कुतोऽख
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१म अध्याय ] द्वितोया्किकम। [x]
प्रतिषेर्धात-एकीऽस्य कम्बल कुती नव कम्बला १ ९ति। तादद सामान्यशब्दे वाचि क्वल वाकक्कनमिति। अस्य प्रत्यव्थानम। * सामान्यशव्दस्यानकार्थत्वेऽन्यतराभिधान कल्पनाया विशेषवचनम्। * नवकम्बनक दत्यनेकाथस्याभ धानम्,-नव कम्बलोऽस्य नवकम्बला अस्येति। एतस्िन प्रयुत्त येय कल्पना नव कम्बना अस्येत्येतङ्ववताऽभिहत तञ्च न मननवतीति। एतम्यामन्यतराभिधानकल्पनाया विगषा वत्व्य। यम्माद्विशेषोथिशषेषु विज्ञायत, अयमथाऽननाभ हित दूति। स च विशेषी नास्ति। तस्मान्मिय्याडभियोग मात्रमतदिति। *प्रसिद्धद्न लोक पब्दार्थमम्बन्धोडभिधानाभि धयनियमनियोग । समान मामान्यशब्दस्य, विशेषो विशिष्टशन्दस्य। प्रयुत्त पूवाश्चेमे गन्दा अथ प्रयुज्यन्ते नाप्रयुक्तपूवा। प्रयोगश्चाथ सम्प्रत्ययाथ। अथप्रत्ययाच्च व्यवहार दति। ततैवमथवत्वथ शब्दप्रयोगसामर्थ्यात् मामान्यशव्दस्य प्रयोगनियम । अजा ग्राम नय, सर्पिराहर ब्राह्मण भोजयेति सामान्यशब्दा सन्तो जर्थावयवेषु प्रयुज्यन्ते, सामर्थ्याद् यत्राधक्रियादशना सभ्भवत तत प्रवत्तन्ते, नार्थमामान्ये, क्रियादेशनाSसभ्भवात्। एवमय सामान्यशब्दो नवकम्बलक द्वति योऽर्थ सभ्भवति, नव कम्बलो ड्स्येति, तत प्रवर्त्तत। यस्तु न सभ्भवति नव कम्बला अस्येति, तन न प्रवर्त्तते। सोडयमनुपपद्ममानार्थकल्पनया परवाक्योपा लन्भस्ते न कल्पत इति । ५३॥
नवमदयका कम्वला ? दति। एव गौ।वषाणीत्युक्त कृती वादणस्य विषायम् मजी विषाणीत्युते कुती गजव्य अङ्रम् १ श्रेती धावतीति सेतरूपवदभिप्रायेषोके स्ेतो न भावतीत्यभिधानमित्यादिवमूद्यम् । ५ू२।
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[५८ ] न्यायदशनम । [१म अध्याय
कल्पना सामान्यच्कलप्॥ ५४ ॥ भहो खल्वमो व्राह्मगे विद्याऽचरगसम्पन्न इत्यक्के कशिदाह-मभवति हि व्राह्मगे विद्याऽडचरगासम्पत इत्यम्य वचनस्य विघातोऽयविकल्पोपपच्याऽमन्भताथकल्पनया क्रियते। यदि ब्राह्मणे विद्याऽडचनगासम्पत् मभ्रवात व्रात्येऽि सश्भवेत। व्रात्योऽपि ब्राह्मण माप्यम्तु विद्याऽऽचनगासम्पन्न इति। यद्विवच्ितमथमाप्ोति चात्यत च तततिमामान्यम यथा ब्राह्मगत्व विद्याऽ्ऽचरगसम्पट क्वचिताप्ति क्वचिगत्येति। मामान्यनक्षण छ्ल मामान्यच्छनममिति। +अस्यच प्रत्यव स्थानम।* अविरवत्तितहेतुकम्य विषयानुवाद प्रशमाऽयत्वात् वाक्यन्य ततत्रासभ्भनाथकल्पनाऽनुपपत्ति ।* यथा सभ्भव न्यन्मिन नेत्र शालय इति। अनियाक्कतसविर्वात्ततञ् बोजजन्म। प्रवृत्तिविषयस्तु क्षेत्र प्रशस्यते। सोऽय चेत्रानुवादो नाम्मिन शालया विधीयन्त दूति। बोजात्त शालिनवृत्ति सता न विवतिता। एव सशभवति व्राह्मण विद्याऽडचरगसम्पदिति। सम्पद्विषयो ब्राह्मगत्व न सम्पदेतु। न चात्र हेतुविर्वाच्तित । विषयानुवादस्वय प्रशसाऽथत्वाद्दाक्यम्य।* सति ब्राह्मगत्वे सम्पद्वेतु समर्थ इति विषयक्ष प्रशसता वाक्यन यथा हेतुत फलनिवृत्तिन प्रत्याख्यायत। तदेव सति वचनविघाती Sसन्भूताथकल्पनया नोपपद्यत इति॥५४॥
सामारक्ल लवयात।-सामान्यावाशट्टसमवदयभप्रायणतस्य ब्ातसामान्य योगादसन्भवदथकत्वकल्पनया दृषणाभिधान सामान्यककलम्। यथा ब्राह्मगोडय विद्याSडचरपसन्पनन इत्युके ब्राह्मपालेनवद्याचरगासम्पद साधयनत कल्पपित्वा रवा तदात कुती ब्राह्मगतवन विद्याऽचरणसम्पत१ व्रात्य व्याचारात्॥ ५४।
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१म अध्याय ] [ye]
व्तन ॥ ५५ ॥ अविधानम्य धमा यपाउमप्रराग। धर्मावकल्पाऽन्यत दृषम्याबल प्रयाग तस्य निदशे धमावकल्पनिदेश। यथा- मच्चा क्रशन्तोत। अथमङ्गावैन प्रतिषेध। मज्जुस्था पुरुषा क्राशान्त न तु मञ्जा क्रोशन्ति। का पुनरत्राथविकल्पापपत्ति ? अन्यया प्रयुत्तम्यान्यथाऽथकल्पनम। भत्या प्रयोगे प्राधान्यन कन्पनम। उपचारविषय क्वलम उपचारच्छलम उपचार नोनाथ। सहचरमादिनिमित्तनातङ्गावे तद्वदभिधानसुपचार इति।रअ समाधि* प्रमिद्वाप्रमिद्ध प्रगागे वतर्यथाऽभिप्राय मन्दाघयावनना प्रातरथो वा न कन्त्त। प्रधानभूतस्य प्ाउ्तव्य भकस्य च गुगभूतस्य प्रयोग उभयोर्लोकनिड। सिद्धे प्रयोग यथा वत्तव भिप्राय तथा शब्दाधावनुत्नेयो,प्रतिषेध्यी वा, न कन्टत। याद वक्ता प्रधानशब्द प्रयुडते यथा भूतस्याभ्यनुन्ना, प्रतिषेधो वा न क्वन्दत। अ्रघ गुगभूत तदा गुगभृतम्य। यत्र तु वक्का गुगभूत शब्द प्रयुडक्व प्रधानभूतमभिप्रेत्य पर प्रतिषेधति, स्वमनोषया प्रतिपेधण्डमी भर्वत, न परोपालव् इति ॥ ५ ५ ॥
उपधार इन लचनात।-शच्तस्यायन सम्बन्ध तन्य िकन्पो विविध कल्प शाक्तनगाउन्यतवरूप तथाच पतलसश्यरक रवित्या प्रयुक्त गब्त तदपरवत्या 1 प्रतिष म उपचारक नम रथा मश्चा क्रोमान्त नौली घर द्रत्यानी मख्स्था ए्व क्राशन्ति न तु मश्चा ए्व घटम्य कथ नौल्पाभन। एवम् यह नित्य द्वात मतशा प्रयुक अ्रमुम प्यन्मव कथनत्य १ द्वार प्रतिषेधोऽप्यपचारक्कलम वार्याि प्रताथम्यादूष गन कनस्याम त्तग्तम। न च प्रष् लाचागकप्रयागझादन ववापराध स्यात द्वात वाच्यम् तनदथबोधकतया प्रासदस्य शब्दस् प्रयोगे वादिनी ्नपरावात। अन्यथा पवतो वाङ्कमानित्य ती पवतोऽय कथमवाङ्कमान् ? कर व्यादि दूष णा ना तु मा नाद्यक्केत सात ।। पू प्ू।
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[4.] न्यायदर्शनम। [ १म अध्याय।
वाकक्वलमेवोपचारच्कल तद्विशेषात्॥ ५६ ॥ न वाककजादुपचारच्कल भिद्यते तस्याप्यथान्तर कल्प नाया आवशषात। द्हापि सथान्यथो गुणशब्द प्रधानशब्द स्थानार्थ दति कल्पयित्वा प्रतिषिध्यत इति॥ ५६॥
न तदर्थान्तरभावात्। ५७ ।
न वाकछ्वनमेवोपचारच्कलम तस्यार्थसङ्भाव प्रतिषेधस्याथा न्तरभावात। कुत -अथान्तरकल्पनातोऽन्याथान्तरमद्ाव कल्पना अन्याथसङ्कावप्रतिषेध द्वात ॥ ५७।।
अविशेषे वा किञ्ञित्साधर्म्यादिकच्छलप्रसङ्ग ।।५८।
कवनस्य ह्ित्वमभ्यनुन्नाय वित्व प्रतिषिध्यत किाप्वत्साघ म्यात। यथा चाय हेतुस्त्ित्व प्रतिषेधति, तथा द्वित्वमप्यनज्ञात प्रतिषेधतति। विद्यत हि किव्वित्ताधर्म्यं दयोरपीति। अथ द्वित्व किञ्चित्साधर्म्यान्न निवत्तत तित्वमपि न निवर्त्स्यतीति॥ ५८॥
प्रमड्राच्कल परोाक्षत पूवपच्यतत। शब्दस्ार्थान्तरकत्पमाविभेषाड्काककूल मवापचारकन् म्यात दवात कुमस्यरउत्वमेव म तु वित्वमिति श्रङ्धाऽ्थ ॥ ५ू६ ॥ समाधत्त।-उपचारक्कलस्य वाकछलामदा न उशोगर्थान्तर गवात भिव्नलात मिव्नतया प्रमायसिडत्वदति फालताथ पूर्वोक्कमे-कधर्मेय भद्सभ्वेडाम यात्कश्रिद्वमणाभेदे सामान्यधमणामदस सवत्र समभवात विभाग कुवाप म स्ादात ॥ ५O H विपचे बाघकमभिप्रेत्य SSई ।-यत्कित्रिवर्मादविशेषे किश्वित्ाधम्याच्कलल्वादि क्पाष्कलस्वक् स्यात् न त् लवदाभमत द्विवमपौति भाव ।५ू८॥ समाप कलप्रकरगम्।
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१म पध्याय ]
अ्रत ऊड्डम - सावम्यवेधम्याभ्या प्रत्यवस्थान जाति । ५ू८ ॥ प्रयुती हि हेतो य प्रमड्गो जायते सा जाति। सच
उदाहरणसाधम्यात साध्यसाधन हेतुरित्यस्यादाहरणसाधम्येय प्रत्यवस्थानम। उदाहरणवधम्यात् साध्यसाधन हेतुरित्यस्यादा हगगुवैधम्येग प्रत्यवस्थानम्। प्रत्यनोकभावाज्जायमा नार्ऽर्ो जातिरिति ॥५ ॥ विप्रतिपत्तिग्प्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम् ॥ ६० ॥ विपरीता कुत्सिता वा प्रतिपत्तिर्विप्रतिपत्ति। विप्रति पद्यमान पराजय प्राप्नोात, निग्रइस्थान खलु पराजयप्राप्ति। अप्रतिपत्तिसत्वारभ्विषये न प्रारभ। परण खथापित न प्रतिषेधति प्रतिषेध वा नोद्रति। असमासाच्च नैते एव मिग्रहस्थाने इति ॥६०॥ क्रमप्राप्ता आात लच्शति।-माधम्यवधम्याभ्यमति सावधारषी नर्देश तन व्यापतिनरपेवाम्या साधम्यवधर्स्याभ्या प्रत्यवस्थान दूषणाभिधान जतारत्यय। द्यप्युभाभ्या प्रत्यवस्थानम्य प्रत्येकप्रत्यवस्थानेऽव्याप् एकप्रत्यवस्थानस्ष लवषते परप्रत्यवस्थानेव्याप्ति न वाऽन्तरप्रत्यवस्थान नियत सवब जातावभावात तथादि व्याप्तिनि्पेचतया दूषणाभिधानमित्येव वाच्य तन च सन्दर्भेय दूषणासमथेत्व खव्याघातकत्व वा दाशत तथा प छम्नादिभिन्नदूषणासमयमुत्तर खव्याघातक मुत्तर वा आतिरिति सूचित साधम्यसमािचतुविशत्यन्यान्यत्व तदय दत्यपि वनन्ति॥ ५ट ॥ कमप्राप् मिगइस्थान लक्यति।-निगइस खलोकारस स्थानम् तञ्ञ विपतिपतिरप्रतिपत्तित्न। विप्रतिपत्तिवरुद्धा प्रतिति अप्रतिपत्ति प्रक्कतान्ञानम यद्प्येतदन्यतरत परनिष्ठ नाहार्वयतुमह प्रातभ्राष्तन्यादनियह्सामत्वानुप
न्या-६
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[ ६२ ] न्यायदर्शनम। [ १म अध्याय।
कि पुनर्दष्टान्तवज्जातिनिग्रहस्थानयारमेद 9 श्रथ सिद्वान्त- वद्धेद १-दत्यत श्राह- तद्विकल्पाज्जातिनिग्रहस्थानबहत्वम ॥ ६१॥ तस्य माधम्यवेधम्याभ्या प्रत्यवस्थानस्य विकल्पाज्जाति
बहत्वम। नानाकन्पा विकल्प विविधो वा कल्पा विकल्प । तत्राननुभाषगमज्ञानमप्रतिभा विच्ेपो मतानुत्षा पर्य्नुयाज्या पेनममित्यप्रतिपत्तिर्नग्रहस्थानम। शेषस्तु विम्रातपत्ति गिति। दम प्रमागादय पदाथा उदिष्टा यथोहेश नच्िता य नलक्षण परीकिष्यन्त नति विविधाइस्य शास्त्रस्य प्रवत्त्ति वढितर्व्येति ॥ ६१॥
द्वात वात्स्यायनोये न्यायभाष्ये प्रथमाध्यायस्य द्वितीयमाक्किकम। समाप्तच्चाय प्रथमोऽध्याय॥ १॥
तानग्रहसानगवभागा नालात सभी मा भूदित्यत ब्रह ।-सविकम्पात् साधम्यादिना प्रत्यवस्थानस्य विप्रतिपत्यायन्नायकव्यापारख व विकल्ादाब्नाना प्रकाग्तवादितत यावत् इत्यय तयाबहुत्वेप प्रमाणदपरीचावषयकाश्यनित्ासया प्रतिबन्ध ब्रणनी ताइभाग क्रियत द्वात भाव ।६१।
समाप् पुरुषाशाकलिड् दीषसामान्यलच्षगप्रकर ग्र म् । प्रथमाध्यायस्य द्वितीयमाक्रिकम् । २ । दवात योविश्वनाथभट्ाचाय्यक्रतन्यायसवततौ प्रथमाध्याय वात्त ममाप्ा ॥ १।
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श्य अध्याय ] [a३ ]
द्वितीयाध्यायस्य प्रथमाSडडिकम।
अत ऊद्ध प्रमागादिपरोचा, सा च विवृश्य पक्षप्रात पचाभ्यामथावधारण निर्गय इत्यग्रे विमर्श एव परोच्यत। समानाने कधर्माध्यवसायादन्यतरधर्माध्यव-
सायाद्वा न सशय । १ ॥
समानस्य धममस्याध्यवसायात मशय न धमाम त्ात। अथवा समानमनयोधर्ममपलभे इति धमधमाग्रहग मश्याभाव दति। अ्रथवा ममानधर्माध्यवसायादथान्तवभूत धामणि
प्रमागा प्रधि दवभिाववातषु परीचित। हषिड्वतीयमध्याय भासमानमह भजे ॥ १ ॥ चथ प्रमाणतिषु लाव्षतमु परोत्षौयेषु मशय बवना परोचाया अ्रसमवान। सशा एव पतोव्षणीय शिष्यजरिनासानुसारत मूचोकटाहन्यायास प्रत मश्यपरो चाया प्रमाणानिपिणेवषापयगत्वात् प्रमागापरोवता यायाथ दात वदान्त। म्न तम्तु छलम्य परोचतलान रतोयचत्थया प्रमयम्य पत्चम च जात पराचष
वातदभन कारव्यमाय्त्वात् तवविभागस्ापेक्षप्रमायप रोच्ाडातरिकोक्तयावन्यनाथ परोचा प्रथमाSड़िकाय तब च नव प्रकरणानि तवाइडती सश्यपरीक्षाप्रकग्यम पन्धानि यथायथ वत्त्यन्ते तव सशयपरीक्षणाय पूवपतस्वम्। भव सूतऊता मशयस्ादशनात् सभयपरीचाया सशयो नाड्रम चनवस्थाभयान दत्याशय सृवक्कती वश्नन्ति तदसत्। न ह्वयव सशयस्रूप परीक्यन बैनानवस्था स्यात यपि तृ लवगसूवीत सषय्कारगम। तथा च सभय समानधमदशनानिजन्या न वेति संभन समननत्येव। परन्तु मूतऊती निषायसत्वात् पूवपचनिगस मावस्यापेवगपत् मधयो न दशित एवमेव प्रमाणातिपरोव्ा यामाप अत ण्वा भिद्टित ष्य-भास्त्र वादे च विमषवजम दति। तब समानादिषमतप्नात्र सभन प्रत्यक व्यमिचारात सन्वतरत्वेमायुर रौऊ्ततह्शमादाप न सभय नाह स्वायुनमसमानधर्माडय पुरुषधमसमानषर्मायमिति या जानन स्यायान वात सन्दिभ समानतवसय भद्गभत्वात, भिन्नधर्मतवन जाते तहोदयहस्यव सम्नरवाम्। यहा-
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[ 4४] न्यायद्शनम। [शय अध्याय।
सपयोऽनुपपन्न दनि। न जातु रूपम्यार्थान्तरभूतस्याध्यव मायादर्थान्तरभूत स्पश सशय दति। अथवा नाध्यवसायादर्थाव धारणादनवधारगज्ञान सशय उपपद्मत, काय्येकारणयो साऊप्याभावादिति। एतेनानेकधर्माध्यवसायदति व्याख्या तम। अन्यतरधर्माध्यवमायाच्च सशयो न भर्वात। ततो
विप्रतिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायाच् ॥२॥
विप्रतिपत्तिमुपन्भमानस्य सशय। एवमव्यवस्थायामपोति। अथवाऽस््यात्मचेके नासत्यात्मेत्यपरे मन्चन्त इत्युपनब्धे कथ सशय स्यादिति। अथोपलव्धिरव्यवस्थिता अनुपलब्धिय्ा व्य वम्थिनति विभागेनाध्यवमिते मशया नापपद्यत दति ॥२ ॥ विप्रतिपत्ती च सम्प्रतिपत्ते ॥ ३ ।। याञ्ज विप्रतिर्पा्त्ति भवान सशयहेतु मन्यते, सा सम्पति पत्ति। मा हि इयो प्रत्यनीकधम्विषया। तत् यदि विप्रतिपत्ते सशय, सम्प्रतिपत्तेरेव सशय इति ॥३ ॥ ममाननिकरधमोपपत्तशित लचगसूव उपपाततपद स्वरूपपरमिति मान्तसेय शङ्डा तथा चायमथ म समय समानधर्मादित खरपमत इति शष यत समान
विप्रतिपत्त्यादिनन्यसशयवय प्रतित्िपति।-न सभय दवत्यनुवसतसे विपात पत्तरूपतव्ात्यवस्थाया सनपलचाव्यवस्थायात् न सप्ायजनकत्वम प्रत्येक व्यभभ वारातियथ यहा-सरुपस चि परतिपत्यातितो न सभय किन्ु तदध्यवसाय दित्यय । २॥ विप्रतियाततसथयमावप्रातत्तपाय मषान्तवम। विभ्रातपत्ती न मगय हेतुत्वम मम्पतिपत्ते िश्नयात वादिनीमध्यस्थस्य च निषयसत्वात् सति पानमये सभनायोगादित भाव ॥३॥
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श्य अध्याय ] प्रथमाच्िकम। [ ६५ ]
ऋ्व्यवस्थाSडत्मनि व्यर्वस्थितत्वाच्चाव्यवस्थाया ॥ ४॥ न सशय। यदि तावादयमव्यवस्था आ्रत्मन्यव व्यव स्थिता व्यवम्थानादव्यवस्था न भवतात्यनुपपत्र सशय । अथा व्यवस्थाS्Sत्मान न व्यवास्थता एवमतादात्मादव्यवस्था न भवतोात मशयाभाव ईति ॥ ४ ॥
यन कल्पेन भवान ममानधर्मोपपत्त सशय इति मन्यत तन खल्वत्यन्तमशय प्रसज्यत। समानधर्मापपत्तेरनचदात् मशयानुच्केद। नायमतद्मा धर्मी विमृश्य(ष)माना गा) गह्यत। मततन्तु तड्मा भवतोात॥ ५ू । अस्य प्रतिषधप्रपज्जम्य मङ्गपेणाद्वार - य रेका जवमाया केत त द्िशेयाषेत्तात् सभय नासगयो नात्यन्सथयो वा॥६॥ मश्या उपपत्ति मणयानुच्ेत्य न प्रमज्यत। कथम /-
उपन ्नुप न्ाव्यवस्थात समायनानगसा सूम।उपल 1ययव र वनुप नव्ाव्यवस्थानाय सशाजनकलव तदा स्यान याद स्वाम्मन्न्यव्यवास्थतत्वया न त्ववम तथाचं स्वाउम न व्यवास्थता वास्तस्या कथम वाज्य्या ला्म नतु सत्यवस्था प्रामारयमशय तस्य चन व्वमपधरुपत्वम् सशयस्य विषय वशष घतत्वात तस्य चान्यस गयजनकत न निरुद्म।अती दूष णन्तरमाह-तला। तथा सति अज्नवस्थाया हतृत्वे सति तथाशव्दो य न सनान्तर्गत श्राप न भाष्यम्य दवत्पन्य अव्यन्तमव सशयानक्कन सात् तडमस् तजजनकस आ्ानल्ाद साधारगवम शनम सात जोपपर्त सवदा सभवात् अथ नानतवाटिस्ाधारय वमपनप करणान्त बेलखान् सनव प्रामाससशन इति यादव्रपात्दा तययविषयसभकपि केतुत्वभम्त इति क प्रानारयमशयस्य साधारपधमदभनादृवा सभाहेतुवेन इवतभाव।५ू। विड्ानमाह।-यध काध्यवसानात् साधारणादिधमद्भनात तस पुरुष
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[ e६ ] न्यायदशनम । [ शय अ्ध्याय।
यत्तावसमानधमाध्यवमाय सशयहेतुर्न समानधमंमावमिति।" एवमतत कम्मादेव नोच्यत दूति -विशेषापेक्ष इति वचनात मिद्े। विशेषस्थापेत्षाऽडकाड्ा सा चानुपलभ्यमाने विशेषे ममथा न चाक ममानधमापेक्ष इति, ममाने च धमे कथ माकाड़डा न भवेत यद्यय प्रत्यक्ष स्यात। एतेन सामथ्यन विच्ञायत ममानधमाध्यवमायातित· उपपत्तिवचनाद्दा ममानधर्मोपपत्तेरत्युच्यत। न चान्या सङ्भावमवेदनादटत ममान धर्मापपत्तरक्ति। अनुपलभ्यमानमद्भावीह ममानो धर्मा विद्यमानवद्धवतोति।* विषयशब्दन वा विषयिगा प्रत्ययस्यभ धानम। यथा लोके वूमनाग्निरनुमीयत दृत्युत्ते धमदर्शन नाग्निरनुमोयत इति सायत, कथम १ दृष्टा हि धूममग्निमनु मिनाति, नादृष्टा। न च वाक्े दर्शनशब्द श्रूयते। अनुजानाति च वाक्यस्याथप्रत्यायकत्वम। तेन मन्यामहे विषयशब्देन विष थिण प्रत्ययस्याभिधान बोद्धाऽनुजानाति। एवमिहापि समानधमशन्देन ममानधमाध्यवसायमाहेति। यदक् समानमनयार्धममुपलभत दति धमधमिग्रहगे सशयाभाव दति। पूवटृष्टावषयमतत। यावहमर्थो पूवमद्राच्, तयो समान धममुपनमे विशेष नापलमे दति कथ नु विशेष पश्यय, ये (त) नान्यतरमवधारयेयम १ दति। न चैतत्समानधर्मोपलब्धी धर्मधर्मिग्रहणमातरेष निवत्तत दवात। यच्चोक नार्थान्तराध्यव सायादन्यत मशय इति। यो हयर्थान्तराध्यवसायमात्र मशय हेतुमुपाददोत, मण्व वाच्य इति। यत्पनरतत्काय्यकारणयी सारुप्याभावादिति। कारणम्य भावाभावयो कार्य्यस्य भावाभावो कार्य्यकारणयो सारूप्यम यस्योत्यादात यदुत्पद्यत,
ववादे पावशष दतरत्यावत्तकी घम तमपगत दून तततगा तत विशषादपमा दित्यय। तथा च विषानभनसद्वितमाधारणमदशनादत समय सोऊ्ृत न
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श्य अ्ध्याय ] प्रथमाड्षिकम। [40]
यस्य चानुत्पादात् यत्रोत्परद्यते तत्कारण कार्य्यमितरत् दत्येतत सारूप्यम्। अस्ति च सशयकारगे सथये चैतदिति। एतनानक धमाध्यवसायादिति प्रतिषेध पारहृत इति। यत्पुनवतदुक्त विप्रतिपत्त्यव्यवस्थाऽध्यवसायाच्च न सशय दति। पृथकप्रवादयो- र्व्याहतमथमुपनभे, विशेषस् न जानामि नापनभे येनान्य तरमवधारयेयम। तत कोडत विशेष स्यात यनैकतरसव धारनेयम १ द्ति सशयो विप्रतिपात्तजनितोऽय (ऽर्थ) न शक्या विप्रतिपत्ति सम्प्रतिपत्तिमात्रेण निवर्त्तयितुमिति। एवमुप लब्धानुपलब्धावस्थाऊ्वत सशने वेदितव्यमिति। यत पुनग्तत विर्प्रातपत्तो मम्म्र नपत्तेरिति। विप्रतिपात्तशब्दस्य याऽर्थ तदध्यवसायो विशेषापक्ष सशयहेतु, तस्य च ममा ख्याउन्तरंग न निवृत्ति समनऽधिकरण व्याहतार्थो प्रवादो विप्रतिपात्तगब्दस्याथ तदध्यवमायय विशेषापेत्त सशयहेतु न चास्य सम्पातर्पत्तिगब्दे समाख्याऽडन्तर योज्यमान सशय हतुत्व निवत्तत। तदिदमक्कतबुद्धिसम्मोहनमिति। यत्पुन रत्यवस्थाऽडत्मनि व्यवस्थितत्वाच्चाव्यवस्थाया दति।-सशयद्ेता रथस्थाप्रतिषधादव्यवस्थाऽम्यनुन्नानाच् निमत्तान्तरेण शब्दा न्तरकल्पना व्यथा।* अव्यवस्था खलु व्यवस्था न भर्वात, श्व्यवस्थाऽडत्मनन व्यवस्थितत्वादिति। नानयोरुपनव्धानुपलब्धो सदसद्विषयत्व विशेषापेक सशयहेतुर्न भवतोति प्रतिषिध्यत। यावता चाव्यवस्थाऽडत्मनि व्यवस्थिता न तावताऽडत्मान जहाति। तावता ह्नुन्नाता भवत्यव्यवस्था। एर्वामय कक्रियमागाऽपि शब्दान्तरकल्पना नाथान्तर साधयतोति। यत्
कारणमावादसशय न वा यात्कश्चित्का गामत्वदत्यन्तसशय इत्यय साधारपधम दशनातेम सशनविगषे जनकत्वात् मशयलावाक्तर्त प्रत व्यभिचारऽपि न सति विमतिपत्तौ च व दिवाक्याभ्या मव्यस्थस्ेव सभयोपममात। यसोक समानधन्मदभ
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[ $=] न्यायदर्शनम्। [ श्य अध्याय।
समानघमादिभ्य ए्व सशय कि तार्ह ?- तत्तव्विषयाध्यव सायाद्दिशषम्मृतिमहितादित्वतो नात्वन्तमशय इति। अन्यतर धर्माध्यवसायाद्ा न सशय इतति तच्व युक्तम, विशेषापत्ता विमश मशय दूति वचनात। विशेषधान्यतरधर्म नच तस्मिन्नध्यवसोयमाने विशेषापेत्षा सभ्वतीात ॥। ६ ।।
यत्र यत्र मशयपूविका परीक्षा शास्त्रे कथाया वा तत् तव्नेव सशये पतग प्रतिषिद्व ममाधिवाच्य इति। अत सव परोत्ताव्यापत्वात प्रथम मशय परो्षित ईति ॥७
अथ प्रमागपरोक्षा,- प्रत्यवाSS दीनाम प्रामारय वेकाल्या सिद्े ॥८।। प्रत्यक्षाऽऽदोना प्रमागत्व नाय्ति तैकाल्यामिद्द पूवापरमह भावानुपपत्तारति॥८ ॥
नात कन समन समानत्वसय भगभत्वादिति तदाप न न हि समानधमलेन तजज्ञान मतु अपि तु उभयसहचार तघम वत््यञान तघव्यतदाष भा बा त्।्।रा ६ । सम्पति समनपरील्षव परषा पताथाना परोचामातातपनाइ।-एवमुतरात्या उत्तरगत्तरषु प्रन ंषु प्रसद्ध प्रह्रष्ट सङ्ग परोचाया सम्बन्धी बादव्य तात् प्रयोजनमाप पतोक्ष जेरम् ? नत्य इ-यत सशय इति। यात तह्वतपायरुभय तदा तनपि परोवगी म्। बरथवा -उत्तरगत्तरम् उक्तप्रत्या त्का रूप उप्र्प्ररसद्र द्र पा परोचा सशयितऽ्य कत्तव्येत्यथ।७। समाप्त सथायपनीक्षाप्रकग्यम्। इतानोमवसरत प्रमाणमामान्यपरोक्षणणय प्रमायात् प्रमायासड्धवत्तमशकालवात प्रत्यचाइदोना न प्रमामित्यय ।।८ ।
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श्य अध्याय ] प्रथमाफ्किकम। [ &e ]
अस्य मामान्यवचनस्याथविभाग - पूर्व हि प्रमागसिद्वी नेन्द्रियाथसन्निकर्षात् प्रत्यच्ोत्पत्ति ॥६ । गन्धाऽडदिविषयक ज्ञान प्रत्यक्ष तदयदि पूर्व, पद्माद्वन्धा- डडलोना मिदि नद गन्धाऽडदिमन्निकषादृत्पद्यत इति ।। ट ।। पश्चात् सिद्धौ न प्रमागोभ्य प्रमेयसिद्दि ॥१०॥ अमतति प्रमाणे कन प्रमोयमाग्ोऽय प्रमेय स्थात ? प्रमागन खलु प्रमोयमागोरऽर् प्रमेयमित्येतत सिर्ध्यात ॥ १॥ युगपत्सिद्ौ प्रत्यर्थनियतत्वात क्रमवत्तित्वा- भावो बुद्दौनाम ॥ ११ ॥ रदि प्रमाग प्रमेयञ्ज युगपङ्गवत, एवमपि गन्धाSडदिष्वि न्द्रियाथेषु ज्ञानानि प्रत्यथनियतानि युगपतभ्भवन्तीति नानाना प्रत्यर्थनियतत्वात क्रमवृत्तित्वाभाव। या इमा बुद्धय क्रमेगाथषु
विमूका वकान्यासद्ृत्व व्यव्पादयति।-प्रमागस्य पूवत्व तावन्न सभ्भवान वि यत प्रभाया पूव प्रमाणसडो प्रमाणसत्ते दान्द्रयाथ सत्निकर्षात् प्रत्यच सिप्रसीात न स्यान प्रउनप्रमागात पूवमेव प्रमाया सवात प्रभागत्व द्वि प्रमाकरगत्वम् पूव प्रमाया पभावे प्रमाकरणत्वमपि कथ स्थात पूवमेव प्रमाया सिखरूपे्वति
परेतुप्रत्यक्ष प्रति करणत्वे खायत तद्रोत्या करणकरमपि खग्डनीयमित्याशय सूवअ्ता वषयान्त प्रमाणस प्रमावाभध्याभाव प्रमाणामात जातडाप प्रमावाशक्वसशय स्यादिति भाव ॥ ट ॥ प्रमाणस्य प्रमात पशात् सिद्धी विषयस्य प्रमेयत्व प्रमाणात् पूवमेव सिद्धमिति न प्रमाणत माया उत्पत्ति प्रमेयस्य व ज्ञातरिति॥ १ ॥ दख सूखड्यम् चनुमानाद्यभिप्रायेय घतश्ीवादे प्रमाऽनन्तर प्रमासमकाल वा सत्वस्यष्टलान उन्पत्ते शाङ्गतुमप्यभकात्वात तदयमघ -प्रमाणप्रमयोयुगपतस्व युगपदत्पती बुद्धोनामयबिप्वानयतत्वान यत् क्रमतात्तत्व तम्र सात् पदधान ा5
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[00] न्यायदर्शैनम। [ श्य अध्याय।
प्रवत्तन्ते, तामा क्रमवृत्तित्व न मभवतीति। व्याघात युगपजज्ञानानुत्पत्तिर्मनमो निद्गमिति। एतावास प्रमाण प्रमेययो मद्धावविषय, म चानुपपव् दति तम्मात् प्रत्यचा Sदोना प्रमागत्व न सभ्भवतोति।*अस्य समाधि * उप ल्धिहेतोरुपलब्धिविषयस्य चार्थम्य पूर्वापरमहभावानियमाद् यथादर्शन विभागवचनमक्किदुपननब्धिहेतु पूव पश्चादुप लब्धिविषय। यथाऽडदित्यस् प्रकाश। उत्पद्यमानाना क्वचित् पूर्वमुपन्नव्धिविषय, पशादुपनाव्धहेतु। यथाऽवस्थिताना प्रदोप। क्वचिदुपन्नब्धिहेतुरुपनव्धिविषयस सह सभभवत। यथा धूमेनाग्नेग्रहगमिति। उपन्नब्धिहेतुश्च प्रमाण, प्रमेय न्तपनब्धिवषय। एव प्रमागप्रमयगो पूर्वापरसहभावे जनियते यथार्डर्या दृश्यते तथा विभज्य वचनीय दति। तवै कान्तेन प्रतिषैधानुपपत्ति। सामान्येन खलु विभज्य प्रतिषेध उक्र दवति। समाख्याहेतोस्तेकाव्ययोगात तथाभृता ममाख्या। यत्पुर्नारद, पद्मात सिद्धे च प्रमागे, न प्रमोयमाणडर्य प्रमय मिति विज्ञायत दति। *प्रमाणमित्येतस्या समाख्याया उपन्ब्धिहेतुत्व निमित्तम तस्य चैकाल्ययोग, * उपनब्धिम कार्षीत उपलब्धि करोति उपलब्धि करिष्यतोति समाख्या हतोस्तैकात्ययोगात् समाख्या तथाभूता। प्रमिताऽननाथ प्रमोयते प्रमास्यते पि प्रमाणम्। प्रमित प्रमोयत, प्रमास्यत इ्वति च प्रमेयम्। एव सात भविष्यत्यस्मिन हतुत उपलबब्ध प्रमास्यतेऽयमर्थ, प्रमेयमिदमित्येतत् सर्व भवतोति। पब्दविषयक सावमप्रत्यत्तरपम् शब्दवीधश पदाथावषयक परोक्षरुपी (परि - र्ईूच) विजातीय दत्यमशीन यौगपद सभत्रति काय्यकारगभावसस्वात् कामकत्वनेव सिडधे पत एवज्मेव ज्ञानमभगविषय कमित्यपि नाड्वनीयं सडरप्रसङ्राच्च एवं व्याप्तिज्ञानान मिन्यादायपि दष्व्यम् परे तु प्रमाणप्रमेगयोन यगपत सिद्धिन युगपजध्ामम्
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श्य अध्याय ]
व्रक्ाव्यानभ्यनुन्ञान च व्यवहारानुपपत्ति।-यशैव नाभ्यनु जानीयात तम्य पाचकमानय पच्यात लावकमानय नविष्य तोत व्यतहारो नापपद्यत इति। प्रत्यक्षाऽडदीनामप्रामाख वेका त्या सिद्वारत्यवमादवाक्य प्रमामाप्रतिषेध। तबाय प्रष्व्य, -अथानन प्रातषेवन भवता कि क्रियते१ दति। कि सभवो निवत्यत अथासन्भवा साप्यत दूति। तद्र्यद सभवो िवत्यत, सति सभ्भवे प्रत्यक्षाऽडदीना प्रतिषेधानुपपात्त। अथासस्भवो चाप्यत प्रमागालक्षण (क) प्राप्तस्ति प्रतिषेध।
किञ्जान चैकाल्यासिंद्व प्रतिषेधानुपपत्ति ॥ १२ ।
अस्य तु विभाग-पूव हि प्रतिषेधसिद्वावसति प्रतिषेध्य किमनन प्रतिषिध्यन। पश्चात सिद्धौ प्रतिषेध्यासिद्वि प्रतिषधा भावादिति। युगपत्सिद्वो प्रतिषध(ध्य)सिद्ाभ्यनुन्ञानादनर्थक प्रतिषेध द्वति। प्रतिषधलक्षगे च वाक्ेऽनुपपद्यमान सिद्ध प्रत्यचाऽडदोना प्रामाखमिति ॥ १२॥
बद्ोनानथविशषनियतत्वात् क्रमहात्तत्वम् तथा सात तन खाम तथा ह चस्तुषो जानमनुमित्यांरूपम घटादश प्रत्यचा वृरपम् न चानयार्योगपद्य सन्भवतीत्यम् इययाह ॥११॥ मिडालमवम्।-यात तका व्यासदा प्रमाणात प्रमेनासाङनपयत तत नतोत्या वद्षीय प्रतिषधाऽप्यनपपन्न द्वात जात्यत्तरमतादात भाव । १२॥ 1 (क) अव षष्ठोसमास म्रमाणस्य लक्षथ प्राप्त प्रमायलचतणक्रान्त । (ख) प्रमाणसिद्कासभ्भवस्त घावत्।
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[02 ] न्यायदर्शनम। [ श्य अध्याय।
सर्वप्रमागप्रतिषेधाच्च प्रतिषेधासिद्वि ॥ १३॥
हंत्वथस्य साधकत्व दृष्टान्ते दशयितव्यम१ दूति। न च र्ताह्
उपादोयमानमप्यदाहरण नार्थ साधयिष्यतौति। सोडय सर्व प्रमागेर्व्याद्वतो हेतुरहेतु। सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विराधो विरुद्ध" दूति। वाक्याथो ह्यस्य सिद्धान्त मचवाक्याथ प्रत्यक्षाऽडदीनि नार्थ साधयन्तोति। इृदञ्जावयवानामुपादानमर्थस्य माधनारयति। अथ नोपादायत अप्रदर्ितहेत्वर्थस्य (ग) दृष्टान्ते न साधकत्व मिति निषेधा नोपपद्यते हेतुत्वामिद्ोरति॥ १३॥ तत्प्रामायये वा न मर्वप्रमायाप्रतिषैध ॥१४।। प्रतिषेधनत्तगे सववाक्य तषामवयवाऽडश्िताना प्रत्यक्षा
प्रामाय प्रसज्यत अविशेषादिति। एवञ्ज न सर्वागि प्रमायानि प्रतिषिध्यन्त दति। विप्रतिषेध द्ति वौत्ययसुपसर्ग सम्प्रतिपत्यर्थे, न व्याघाते अ्थाभावादिति॥१४॥ वैकाल्यप्रतिषेधश्च शब्दादातोद्यसिद्िवत्तत् सिद्दे॥ १५ ॥ किमर्थ पुनरिदमुच्यते -पूर्वोक्कनिबन्धनार्थम। यत्तावत्
किश्-मवप्रमाणप्रतिषेधे प्रनिषधक प्रमायमपि नाभ्यपगन्तव्यम्। तथा च कथ प्रतिषवासद्िारत्याह्॥ १२॥ याद च प्रातषधक प्रमायमुपयते तना कथ सबप्रमाणाप्रतिषेध इत्याह। २४ ॥ ननु मन्मते वस्तविद्नापचिता विश्वस्य शन्यत्वात् प्रमाशप्रमेनभाशऽपि न वासविक् त्वन्मने व चकाल्यासिद्िरुत्तवत्यतस्तदुद्गरतति - वैकास्ये य प्रतिषध उक्र
(ग) सप्तम्यर्थो निष्ठत्वम्।
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श्य अध्याय ] [ o३ ]
पूर्वाक मुपनाउध हैतोकुपननब्धिविषयस् चाथस्य पूर्वापरसहभावा निजमाठ यथातर्शनविभागवचनमिति। तदित समुत्थान यथा विज्ञायत। अियमदशी खल्वयसाषानयमेन प्रतिषध प्रत्याचष्टे वैकाव्वस् चायुक् प्रातषेव द्वति। तत्वैका विधासुदाहतगत। शब्दागताद्यामित्रदित। यथा पशात्सिद्वेन शब्देन पूव सिद्धमातोद्यमनुमीयत, साध्यव्ातोद्य साधनस् भब्द। अ्रन्तहहित द्यातोद्ये खनतोऽनुमान भवतोति। वोगा वाद्यत वेगा पूर्यत द्ूति सवनवविगेषेण आतोद्यविशेष प्रतिपद्यत। तथा पूर्विरमुप न व्धिहेतुना प्रातपद्यत इति। निदर्शनार्थत्वाज्जचान्य शेषयोविधया यथोकमुताहरगवढित्व्यमिति। कस्मात पुनररिह तन्नचते पूर्वाक्तमुपपाद्यत दति। सर्वथा ताव्रत्यमर्थ प्रकाशययतव्य, सढ दह वा प्रकाश्येत तत् वा न कबिद्धिशेष इति ॥१५ ॥ यदा चोपलव्धिविषय कम्यचिदपलब्धिसाधन भवत तढा प्रमाग प्रमेयमिति वेकोरऽर्थाडभिधायत। * अस्यार्थ स्यानद्यानाथमि- मुच्यने- प्रमेयता च तुलाप्रामासवत ॥ १६ ॥ गुरुत्वपरिमागन्ञानसाधन तुना प्रमागम। ज्ञानविषयो मुरुदरव्य सुनगाऽडि प्रमेयम। यदा तु सुवर्णाऽडदिना तुन्नाऽन्तर म न सम्मवात का यत बह पश्गागति।-यया भब्दात पषाक्ञावन पृवास इम्याउडतदयश मरजा नसाहज्वाप्त यथा वा पूवसविद्वात पदाथादत्तर कालीन वा्तप्रकामन यथा वा वाहसमकालोनात समार वाड़ासाद् तथाSवााप प्रमा सव प्रमा पाढत्तग्भवव्रन्धय प्रमागस चचुरादे प्रमात पूवभावत्वमस्यव पूव प्रभावभषन्त तख् नापनते यदा कणाचत् प्रमासम्बन्धनव प्रमायत्वसभ्रवात पग कनाचत पाक्सस्वन्वनव पाचकमान उत्या्दिवदधिात भाव। भव बकारान्त न सूवान्तगतामात त्त्ालोके वलतष्टोकादखर स्ात सूवान्तर्गतमेव । १५ । नव्वनिवतत्वादेव प्रमाणप्रमयव्यवहार म पारमाथक रज्जौ सर्पादव व्यपहारवादयामडडाया रह-यथा ह तुलाया सुवणादिगबत्य तापार कदक न्या-9
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198] न्वायदशनम । [ शय अध्याय।
व्याम्थाप्यन तगतुलनाउन्तरप्रातपत्ता सुनगाडाद प्रमागम तुला, इल्तव प्रमनमात। एनमनवयवन तन्वाय उद्दष्टा वेतितव्य। त्र मा।दिपलाध्धवपनत्वात प्रजत परिपाठत। उपलब्धी सान जात प्रजाता। वुद्धित््पनब्धमावनख्वान प्रमागम। उगल धविषयत्वात्तु प्रमनम। उभयाभावात्त प्रामति। एव मथावशेषे समाख्याममाशे याज्य।तथा च कारकशब्दा ामत्तवशात ममवशेन वत्तन्त दति। छच्तस्तिष्ठतीति स्वस्थिती स्वातन्त्रपात कत्ता। वृत्त पश्यताान तमननाSSसमिष्य मागातमत्वात कम। वनगा चन्द्रमस जापयताति जापकस्य मारकतमलान करगम। वत्तायोतकमामिद्जतीत्वारिय्य मानकन परवषमभप्रेताति मम्परदानम। छत्तात पगा नतोन ध्रवमपायडय दानमित्यपालनम। बने वर्याम मन्तात्वाधाराऽधिकरगसित्यधिकरगम। एवच् मात न द्रव्य मात्र कारक न क्रियामातम। कि ताह ?- क्रियासावन क्रियाविशेषयुत कारकम। यत् क्रियामाधन स्वतन्त्र स कत्ता न दव्यमाव न क्रियामाव्रम। क्रियया ह्ापिष्य मानतम कम न द्रव्यमात्र न क्रियामात्रम एव माधक तमादिव्वपि। ण्वज् कारकाघान्वार्यान यथेनीपत्तित एव नक्षगत। कारकान्वास्यानमपि न द्रन्यमात्रेय न ल्रियया । कि तहि १-क्रियामाधने क्रियाविशषे युत् द्रति। कारक भब्दय्ाय प्रमाग प्रमेयमिति, म चे काबकजम न हातुमहात । अ्म्ति च भो। कार कशब्दाता निमित्तवशात ममावश। प्रत्यनाSडदोनि च प्रमाणानि उपनब्धिहैतुतवात प्रमयन्न पलब्धि लात नमनिवनक ननजनगम व त विगवलय तापार छत अ्रम सत्रदार तथा निमि नहममावशातान्द्रगरपि प्रमाणप्रमे।व्यवहार दवात। रा-प्रमायता अमोवा च प्रमावभिष्दिति यन्पागाभद्वित, तवाइडइ प्रमेय। चति, यथा कदाचिद
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श्य अध्याय ] प्रथमान्िकम । [oy]
विषयत्वात। मनेद्यानि च प्रत्यच्षाऽड्दोनि। प्रत्यक्षेणपलभ अनुमाननोपलसे, उपमाननोपलभे आगमेनोपलभे प्रत्यक्ष म ज्ञानम आनुमानिक मे ज्ञानम शपमानक मे ज्ञानम आगामक म ज्ञानामति ज्ञानविशषा मह्यन्ते। लक्षगतश्च नाप्यमानन ज्ञायन्त विशषेग इन्द्रियाथसन्निकषात्पन्न
मयमुपनब्धि प्रत्यन्ताSडदिविषया कि प्रमागन्तरत ? अथान्तरग प्रमागान्तरससाधना दति। कश्चात् विशेष ?- प्रमायत मिदे प्रमागाना प्रसागान्तर-
यद प्रत्वत्ताऽदोनि प्रमागेन उपलभ्यन्त। वेन प्रमाणे नापलभ्यन्ते तप्रमाणान्तरसङ्गाव प्रमज्यत इति। अनवस्था माह। तम्याप्यन्यनरम्याप्यन्यनति। न चानवस्था शक्ा
अन्तु तर्षिं प्रमाणन्तग्मन्तरगर् माधनेति। तद्विनिवृटत्तर्वा प्रमागान्तरसिद्धिवत प्रमेय सिद्धि ॥१८ ॥ यदि प्रत्यक्षाऽडद्यपनव्धो प्रमाणन्तर निवत्तत आात्मेत्यप लव्धावपि प्रमागान्तर निवत्सयत्यविशेषात॥ १८॥
गुुतापरतकलात् तुनावा प्रमात्यवहार तथान्द्रवघटादराप प्रमाय प्रमयव्यवहार इति ॥ १६॥ धनवस्थना प्र नवस्थानपर पूवपचमूतम्। प्रमाणाना प्रमायत मिद्ध म्वाकार प्रमाणान्तरसीकार स्यात तथा हि प्रमागास्य तावन्र खवत।माद आ्रमऽ5य
SSपत्त S5पात पतस्तवापि प्रभाषान्तरमड्गीकाय्यमत वमनवस्थोत भाव ।१। मन् प्रमागसिद्धि प्रमाण विनय स्ान वादडह।-नवि व प्रमाण वानवत्तित प्रमापन्यतिरेकात् प्रमाणसिद्ध म्वोक्रियते तदा त दव तात्द्ि सोक्रयताम्
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[4] न्यायदशनम । [श्य अ्ध्याय।
एञ्च मक्प्रमामविलोप इत्यत श्र- न प्रदीपप्रकाशवत् तत्सिद्े ॥१६॥
यथा प्रतोपप्रकाश प्रत्यक्षाद्गत्वादृश्यदर्शन प्रमाण सच प्रत्यकषान्तरण चक्षुष मन्निकषण गह्यत। प्रदीपभावाभावय दशनम्य तथा भावादर्शनहेतुग्नुमीयत। तमसति प्रदोपसुपा ददीया इत्याप्रोपदशैनापि प्रतिपद्यत। एव प्रत्यक्षाऽडटीना यथाशन प्रत्यक्षाSडाटभिरवोपनब्धि। इन्द्रियागि तावत स्वतिषयग्रहणेनैवानुमोयन्ते। अथा प्रत्यक्षतो गह्यन्ते। दृन्द्रियाथसान्नकषस्तु आवरगेन लिङ्गनानुणियते। इन्द्रियाथ मत्निकर्षोत्पन्न ज्ञानमात्ममनसा सयोगविरषादात्मममवायाज सुखानविद गद्यत। एव प्रमाणविशेषा विभज्य वचनीय ।- यथा च दृश्य मन प्रदोपप्रकाशा दृश्यान्तराग दपनहेतु
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कि प्रम पारकर। तथा व अत्यन स्थतमेय जगत् स्यानति सून्यताना पच्यवसान मित भाव॥१८॥ मशन्तमुबम। पथा प्रतोपाउडलीकाइवमािभ्रकाश तथा प्रमाकाना प्रमः
प्रकाशकवम बन्धथा प्रतीपस्य घतरकाशकत्व प्रतीपप्रकामक चचर तजजापक
मन्य।दत्यनवस्याम ग्1 प्रदीपा पि न घनप्रकामक ख्वात यदि च घटप्रत्यके तभ्तका काना मापचति मानवस्थन्यच्यन तता प्रळत प तुष्यम न डि प्रमाण्णत् प्रमेयासङी
प्रमाग स द्वरपोचना यता च प्रमा पासदग्पोचता तता तवापि प्रमागमपच्यताम । तज्ञामुमानानिकमेवात न प्रमागान्तर कम्पना न वाSनवस्था सवब प्रमागसिन्द अनवविवात क चहोजाइनवट पेवावि न सतिकरत भाव। प्र पोपस्य प्रदोपा नव विना प्रकायकत्ववत प्रनाग्नामपि प्रमाण् मन्तरर्र्य प्रमेयप्रकाश कत्वमति सूवाथ कैवन मघन्न तान प्रव्याह भाष्यकार। क्वाचास्रव्वात्ततशनानानवात्ततभनादनकान्त कावत प्रतपातो प्रमाणा तरान तदभनात् क चाटादौ प्रमा शन्तर निव्ात्ततशनात् प्रनाषानगप वातभनात् तवदोयो इनुग्नक्रान्न बनियत तथा च प्रगोपटश्न्तात अम पान्तराप त्रा निवास साध्यने घण्टटान्तन प्रभागान्तरापचन कि न साध्यन
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श्य अध्याय ] प्रथमाड्निकम।
रिति दृश्यदरानव्यवस्था लभते। एव प्रमेय मत कित्चिदय नातमुपन्नब्धिहेतुत्वात प्रमागप्रमेयव्यवस्था लभत। मेय प्रत्य ्षाडदिभिरव प्रत्यक्षाऽडदीना यथादर्शनमुपलव्ध न प्रमागा न्तरत न च प्रमागमत्तरग निमाधनेति। तम्याग्रहगमिति चेत न अथभेदस्य लक्षणसामा चात प्रत्यक्षा डडदीना प्रत्यच्ाऽडदिभिग्व ग्रहममितत्तम। अ्न्येन ह्यन्यस्य ग्रहग दष्टमतिन अथमेदम्य लक्षगसामान्यात प्रत्यक्षनक्षमेनाकोडथ सद्गहात। तत् कनचत कस्याचा ग्रहम्णमत्य ेष । एवमनुमि। यथोद्वतंन के नाSड ज पबथस्य ग्रह पमति। श दर्शनात्। ग्र- मुखौ अ टुखा चेति तनव ज्ार तसव ग्रहण दृश। मुगपज्ञ न् ना उत्पा त्तम नसो लिङ्गमितत च तनेव मनमा तस्त्रानुमान हश्या। सातुततयम्य चार्मिदा ग्रह स् ग्राह्मम्य वाभद नान। िनि त्मेतडतेति चेत समारम्। न निमित्तान्तरणना जाताऽडत्मान जानात न च निामत्ता न्तरीग बिना मनमा मनो गह्यत इति। ममानमतन। प्रत्य चाड्डनिभि प्रत्यचाSडदोना ग्रहयमित्यताप्यथभदोन मह्यन दूति। प्रत्क्ष Sदोनाञ्ाविषयस्यानुपपत्ते। : यत स्यात किद्िदयजात प्रत्यच्षाऽडदोनामविषय, यत प्रत्यक्षाऽडदिभिन शक्य ग्रहोत् तस्य ग्रहणाय प्रमागान्तरमुपादीयित। तत्तु न शक्य कनचदुपपादयितुमिति। प्रत्यचाउडदोना यथा दशनमेवेद सच्चामच्च सर्व विषय दूति। केचित्तु दृष्टान्तम परिग्टरत हेतुना विशेषहेतुमन्तरेग साध्यसाधनायोपाददत।
तथा घ टष्टानसमा जतारयमिात भाव। सघ्याख्याने कथ नानकान दत्यवाSSस माध्यकार -विभषहवेतृपरियद् सपसुह्ाराम्यनुन्नानादपतिषेध।
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[v] न्यायदशनम । [ श्य अध्याय।
यथा प्रदौपप्रकाश प्रदीपान्तरप्रकाशमन्तरम गह्यते, तथा प्रमागानि प्रमाणान्तरम तरग गृह्यन्त दति। *मचाय ्क्रि नितत्ततशनाननिवत्तिदशनाच क्कनितनैकान्त। यथा चाय प्रमङ्गा निवृ्त्तिदर्गनात प्रमागमाधनायापादोयत एव प्रमय
प्रतोपप्रकाश प्रमयमाधनायोपागजं ए्व प्रमाससाधना याप्यपातया विम्वतत्वभावान। साडन विशवहतुपरिग्रह मन्तरण दष्टान्त एकासमन पनते उपातयो न प्रातपन्त इत्यन कात। अनर्कस्मिव पन्ने दष्टात इत्योकान्ता विशेषत्व भावातिति। विशेषहेतुपतिग्रिहे सति उपमहाराभ्यन प्ागदप्रतषेध। विशेषत्तुपरिगह्नीतम्तु दष्टान्त णकामन पत्त उपमाकपमागा न शक्योऽननुजातुम।-एवच सलनेकान्त इत्य प्रातषधो न भर्वति। प्रत्यत्ताउडदीना प्रत्यननाडड्ालभ रूपलव्धात्थार पन न मिहिषपनिमित्ता नासपलब्रा
उपमाननाथमुपलजे आरगमनाथमुपलले इूति। प्रत्यक्ष म सनम आनुमारिक म ज्ञानम ओ्पमानिक म न्रानम आगमिक म ज्ञानमति। सविविमित्तज्जोपलभमानस्य धमाथ सुग्वापवग प्रयोजनस्त प्रत्यनीकर्पारवर्जनप्रयोजनश्व व्यवहार उपपद्यत। सोडय तावत्येव निवत्तत न चाक्ति व्यवहागन्तर मनवस्थामाधनोय यैन प्रयुक्तोऽनवस्थामुपाददतिति । १६ ।
विशषहत व्यातिपचधमाता घजस्प पापग्सा। उपनहात समानस बसनुजात् उन्रानकान्त Sन्मरु प्रतयवा न सवातम१- ।
सनाप प्रभायामामान्यय ौचाप्रक यम।
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श्य अध्याय ] प्रथमाड्निकम [se]
सामान्येन प्रमागानि परोच्य विशेषेया परोच्ष्यन्त। तत -
आत्ममन मान्नकर्षो हि कारणान्तर नोतामात। न चामयुके दव्ये म्यागजस्थ गुणम्योत्पात्त ति ज्ञानात्यात्त दर्शनाटात्ममन मत्निकष कारगम। मन मत्रिरुष नपक्षस्य चेन्द्रियाथमान्नकषम्य ज्ञानकारात्वे युगपदत्पद्यरत बुद्धय द्वात मन मन्निकषोडाप कारगाम। तानद सूत्र पुकगत
कतभाषम ॥ २ ॥
नाऽऽत्ममनमो मन्निकर्षाभावे प्रत्यज्नोत्पतति१२१।
गात्ममनम सत्निकप्ामान न त्पन्न प्रत्यक्ष्म डाउ थ मविकरषासववर्लना सा पालपायमा ब र्वे अगला्त दर्शनात कार गभाज द्रवत ॥ २१॥
प्रमाणसामाचयपरेचषा नन्तर प्रसापातरिशपेतरु परीच पोयपु प्रयमोहिए प्रत्यक्ष परीच वीपम् तव चफनरिकमव लक्षग पूवमत्म् या फननकण वथायतमाचपति। प्र वम यन्नक्षगामिान्पायसान्व रूर्पत्नवव तननस्।य थ प्रवचय कारपघर लनगाभभिद्ित तव कारयकलापघताया सामय तिनिवेभममातव्या तनिगासके तम नाभिहितम् वसमयम् द्वान् पायसत्निकष मववमाव ह्यतरिाह। श मन मयोगीन्द्रपपन वजोगानिकन्तु नमहितम्
मताा नीनग।र कारगलमेन नानी गगरडाशामा है।- भरौरावकन्
खा मना मनभा मनिकष त भावन प्रत्यनात्या वत छत व्ात्ममन
वयोगस्य कारमवनवशवकम्। प्रबीम ।रत प्रऊवंत व् नोन्पनिरिति दिवानाग्॥२॥
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[८0] न्यायदशनम। [शय ध्याय।
दिग्देशकालाSडकाशेष्वप्येव प्रसड्ग ॥ २२ ॥ दिगािषु सत्स जानभावात् तान्यि कारणानीति।
यदाऽप्यकारण दिगादोनि ज्ञानोत्पत्ती तदाडपि सत्मु िगादिषु ज्ञानन भवितव्यम। नाह दिगादाना साब्नाध शक्य पाव वर्जायतुमिति। तत्न कारणभाय हेतुवचनम एतस्मादवेतोढिगा- दोनि ज्ानकारगनत । २ २ ॥ आत्ममन सात्कषस्तह्युपमङ्वशय डात। तवदमुच्यन - न्ार्नालदलवादात्ानो नानवरोध।। २३॥ म्ञानमामनो निङ्ग तदगुणत्वात। न चामयुक द्रव्य सयोगजम्थ गुाम्योत्पतिरस्ात । २३ । तदयोगपर्द्याल, त्वाच्च न मनम ॥ २४ । अनवगेध ति वत्तत। युगपजज्जानानुत्पत्तिमनसालद्ग मित्य वमान मिध्यत्यत्र मन मन्निकषापन इन्द्रियार्थसन्निकर्षा
कपस्य शब्देन वचनम प्रत्यत्तानुमा सेपमानशब्दाना निमित्त मातममन सन्निकर्ष प्रत्यन्तस्येवेन्ट्रियाथमन्निकष उ्त्यममा न नन्वव दिगादौनामपि कारगत स्ादिन्याभ्दन।- यथाकथश्चित् पौव्वापय्यस्य सवापि सत्वात् तेषामन्यथासिधिश्ेत प्रव्व तेऽप्यवम् । २२। अनोत्तरमभिधात्माह।-भात्मनी नावरीधीऽसङ्र कारणलेनत न कृत न्ानालङ्गलवात -न्ञान सिद्र रस तस्तथा ज्ञान कि भावकाय्य समवा प्रकारक साधवति तच परिषजादात्मव दिगादीनाखर कारगले न मानमित भाव दृत् व समवायिकारणस्याऽडत्मनी मनसा सयोगोऽसमवायिकारणमत्यप्यर्थांव विद्म् ॥ २३॥ शामपरोरनिमिगोगस्य कुतो नासमवायिकारणत्वम्, इत्यती मनस प्राधाओे ध्धिमाह।-नानवरोध दृत्यनुवत्तते इन्द्रियमनोयोगद्दारा ज्ञानायोनपद्यनिया
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श्य त्ध्याय ] प्रथमाड्िकम। [5]
अममानत्वात तस्य ग्रहगम।सुप्तव्यामक्तमनसाच्जेन्द्रियार्थयो
मन्निकषस्येति। एकदा खल्वय प्रबोधकाल प्रागाधाय सुप्त प्रणिधानवशात प्रबुध्यत। यदा तु तोव्रो ध्वनिस्पर्शो प्रबाध कारण भवत, तदा प्रसुप्तस्येन्द्रियाथमन्निकर्षनामत्त प्रबाध ज्ञानमुत्यदयते। तत्र न जातुमनमश्च सन्निकषस्य प्राधान्य सर्वत कि ताह दृन्द्रियाचया मन्निकषस्य न हात्मा जिनाममान प्रपत्न मनस्तदा प्रेश्यतोात। एकदा खल्वय विषयान्तवाऽडसक्तमना मद्गल्वशाद्दिषयान्तर जिज्ञाममान प्रयत्नपररतन मनसन्द्रिय सयोज्य तत्तद्दषयान्तर जा तति। गरतातु खल्वम्य नसङ्गन्पम्य निर्जिज्ञामस्य च व्यामत्मनमा
प्रावायम। छ्यवनासी जिन्नाममान प्रयत्नेन मन प्रेश्यतत प्राधान्याच्चन्द्रनाथमन्निकषस्य ग्रहग काय्यम्। गुगत्वात नाऽSन्म मनमो सन्निकर्षस्येति ॥ २४ । प्राधान्चे च हत्वन्तग्म - प्रत्य क्षनिमित्तत्वाच्चेन्द्रियार्थयो सब्निकर्षस्य पृथग्वचनम् ॥ २४ ॥ क
मकवाननसादाप ह1वमावश्य कामति शरोरमनायोगालय न साख्रयामकत्वममिति भाव दृत्य श्राऽऽत्ममन सयागसमवायकारसत्व युत्म । २४ ।
प्रन्यचनूव द्ान्द्रवार्यसन्निकषासधान हि न कारणामिधित्सया यनाउडन्मम। यागायन भवानेन कयानत्वम् अपि तु खक्षणाभप्ायम तब च सामरैघाटतस्ेव पमाधार वकरणाघाटतरयापि लव्षसम्य सुवचत्वात द्ान्द्र मर्थसात्कषस्य चासाका रयनन पृथग्वनमम् आरात्ममन समोगादिस धासणकारपाट व्यवक्किद लचन घनकतया वचन युत्नम्। पय भावद द्रययसानकषत्वावाक्कम्रकरणताप्रति
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न्यायदशनम । [रय अध्याय।
सुप्रव्यासक्तमनमा वेन्द्रियार्थयो सन्निकष- निमित्तन्वात् ॥ २६ ॥ ग्व तैव्ञापदेशी ज्ानवि: शागाम ॥ २५॥ तारान्ट्रयरथ् व्यर्पातशयन्ते ज्ञानावगषा। कथम १- प्राणेन जिघ्रात चक्षुषा पश्यतति रमनया रमयनीत घ्रागा विज्ञान चन्षावज्ञान रमनाविज्ञानामात गन्यावज्ञान रूपविज्ञान रसविज्ञासामति च दारयतरिषयावशषाच पञ्जघा
आत्ममनमा सन्निकषस्येति, कम्मात? सुप्तन्यामकमनसामिन्द्रियाजयो मन्निकषम्य ज्ञाननिमित्तत्वदात। मोग्यम,- व्याहतत्वादरतु॥ २६॥ यदि तावत क्वचिदात्ममनसी सत्तिकषस्य ज्ञानकार गात्व नैषत तदा युगपजज्ञानानुत्पत्तिमनमा निद्गमिात व्याह
वालतगम्य मम्यक कतमातमना नागा नुपवगनात पारष्कत चतमघस्ात। द न सूतकिन्तु आप्यमित कचचित्। द्रात वासममतम् आधकमूबम।२४॥क ममाजलरमाह।-नानसात प्राष। सुपाना व्यासतमनसास घनगाजताडा ना ऋवमाननकरषा झदना तकसान्नकर्षास दागव ज्ञानोत्यत्तारान्द्रपा रसतनिव षम्य प्राधान्यम। द्वात व्ात्तसमातम् अधिकमूनभ ॥ २४ । ग्व यत नव्माह।-ज्ञरनावशेषाण तारान्द्र वायमन्रिकर्षेत्पतभे वप्रषण व्याप्राल आमममनालागानिक हिन व्यावत्तकम तञ्जव्वत्वम्य ज्ञानीन्तरसावा ्र ख लात। न् ममिन्दि रमना नाग जत्वमाप न नक्षया मानमययप। पर तनारा मनानावश्रषागा प्रथ्यवावगषाणामपतथो भाषय । तनन्द्रियाथसान्नकषय प्र धान्यम् भाषन्त ाह सासुष प्रत्यस शसन प्रत्यवभित्याए। नव्याम्त -प्रत्यचावशषाण्णामान्द्र पदन
मत्वादीन मसगान्तरगयपि दरष्टव्यानीत्याभ्रय वयनाल।। २५।
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भय अध्याय ] प्रथमा्निकम। [ =: ]
खवत। नदानी मनस सन्निकष मान्द्रपार्थमतिकर्षोऽपच्षत। मन मगामानपत्तापाञ्ज यु।पजक गेत्मात्तग्रमङ् ॥ २६॥ नरथ मा भूद व्यावात दवात मवावज्ञानानामात्मम रसा सतत्रिकष कार गासप्यत तन्वस्थमवद भवात। ज्ानकारगत्ा- दात्ममनसा म्रिकषस्य ग्रहण काय्यामात।- नार्थाविशेषप्राजल्यात ॥ २० ॥ नाम्ति व्याघात। न ह्यात्ममन मान्नरुषस्य ज्ञानकार गात् व्याभचरात, इन्द्रियाथमान्नकषस्य प्राधान्यमुपादौयत। अ्रथ वशेपप्राबव्यद् सुप्नव्यासक्तमनसा ज्ञानात्पत्तिरकदा भवात। अथावशष कश्चितवे्द्रयाथ तम्य प्राबल्य तोव्रतापटन, नाऽडन्ममनमा साननकषविषयम। तम्मादिन्दिरियाथमान्नकष प्रधानमात। पमात प्रगिधान मङ्गन्पे चासति सुप्व्यामक्तमनसा यादन्द्रियाथ मन्निकषादत्यद्यत ज्ञान तत् मन मयागोरऽपि कारणममिति। मनमक्रिया कारण वाच्यमित। यथेव नातु खल्चर्यामच्छा जनित प्रग्रहो मनम प्ररक आ्रत्मगुग ए्वमात्मान गुगान्तर सवम्य साधक प्रहात्तदाषजानतमास्त येन प्रारत मन नान्द्रयेगा मम्बध्यत तन ह्प्रयमागे मर्नास मयागाभावात
य्र॥ा कानेचचूघटस बगादौ अय्मान प चासुषादव्याहतत्व प्ान्द्रवायसर्यागा न हमरचय। २६॥ मुमाधत-्थावशषस्य गौता प्राबन्धात वुभाव्मतत्वाद्ोताा प्रवप्रम तथा व गौतसुप्रानुात प्रब्का्सावस्य पे कायजकनि तस कार वौन्द्याथस नकपस्य हतुर्य रन पृवपजा न मुक इत। पर न- दाद्राथसत्निकषम्य हतलामग न जमना येगादरतृत्वामति ानत प्रद्दत चाइतत्वादत-इन्िय मपकपस् नमित्य जा हतुरूक सनयुक्त कुत :- व्याहत वात्-द्वान्द्रयमनो योगादहतुताया अभ्युम्यपगमात्तद्ाघातापत,
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[<8] न्यायदशनम । [ श्य अध्याय।
ज्वानानुत्पत्तो सवाथता,स्य निवत्तत। णषितव्यच्जास्य गुगान्त अन्यघा।ह चतुावधानामगाना भूतसूक्षमाणा मनसाव तताऽन्यम्य क्रियाहतोरमसभवात भूरो
यादमन्द्रियाथमन्निकषाढत्वद्यते ज्ञान वृक्ष इति एतत् किल प्रत्यक्षम तत खच्चनुमानमव। कस्मात 9-एकदश यहग्पात वक्षम्यापन्। पवाग्भागमय गहोत्वा वत्तम पलभत। 7 चैकतशा वत्त। तब यथा धम गहात्वा र व्ङ्गिमनुमिनोति तादृगेव तद्वति। कि पुनगह्ममागादकटशादथान्तरमनुमय मन्चस।अपयवसमृहपन्रे अवयवान्तगाग। द्रव्योत्पत्तिपच्े तानि चावयवो चेति। अवयवममूहपचे तावत एकदशग्रहपाद्वृक्ष बुद्वरभाव। नाग्टह्यमागामकदशान्तर वृक्ष मह्यमाणेकदभ वदिति।अथकदशग्रहणादकदशन्तरानुमान समुताय प्रतिसन्धा नात तव वत्तबद्धि न तहि वृत्तबद्धिरनमानमव मात भवितुमल तोत। द्रव्यान्तगत्यत्तपत्त नावयव्यनुमय। अ्यैकदशमम्बन्ध स्याग्रहग्णत एकदशमम्बन्धस्याग्रहणे चवशषादनुमयत्वा भाव। तस्मादु वृत्तवद्धिरनुशन न भवति ॥२८॥
मम खण्डवात नविगषप्राबल्यान नास व्याघात कुत-अर्थवशषस अनवायमान्कूषम्य प्राबन्यान तरा चान्द्रयाथसान्रकपप्राधान्याधाह पूवमुत न त्वितरनिषेक्षा्रात । २०। मनु सृनि प्र ।वम्य प्रमाण न्रत्वे तव्वनवपरीचा सद्ग ककत ततेव तु नाक्षोत्या प्द्गन। प्रथ्यनततवनाभिमत घटानज्ञानम अनुमानमनामति एकदशख पुरीभामख
बह्ामातारत्यथ।२८।
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श्य अध्याय ] [= ५]
एकदेगग्रहग माश्चित्य प्रत्यक्षम्यानुमानत्वमुपपाद्यत।तञ्व- न प्रत्यक्षेगा यावत्तानढप्युपलस्भात ॥ २६॥ न प्रत्यक्तमनुमानम। कम्मात १-प्रत्यक्षगोनोपनभभान। यत्तत कतेशग्रहणमाय्तोयरत प्रत्यनेगासावपलस् न चोपलभ्भो निविषयोऽस्ति यावच्वाथजात तम्य विषय तावदभ्यनु स्ञायमान प्रत्यक्षव्यवस्थापक भर्वात। कि पुनस्तत प्रन्यत्थ आातम अवयवो ममुनाया वा। न चैकदेशग्रहगमनुमान भावयित शक्य हेत्वभावादिति।अन्यथाऽप च प्रत्यत्तम्य नानुमानत्वप्रसङ्गस्तत्पूव कत्वात् प्रत्य न्तपूर्वक म नुमान #
मम्बद्वार्वाग्निधूमी प्रत्यक्षतो दृष्टवतो धूमप्रत्यचतशनादग्नावन् मान भर्वात। यञ्च सम्बडयोन्निद्गनिनि्रिनो प्रत्यक्ष रच
चैतदनुमानमिन्द्रियाथसन्निकर्षजत्वात। न चानुमयस्यन्द्रियेगा मन्निकषादनुमान भर्वात। सोडय प्रत्यच्ानुमानयालक्षगमैदा महानाश्यितव्य इति ॥ २८॥
चरितावयव्यपन्नव्धिश्व। कस्मात् १-अव्यावसङ्भावात्। अ्रस्ति ध्वयमेक देशव्यततिरिप्कोऽवयवो तस्थावयवस्थानस्योपलब्धि का रग प्राप्तस्ये क देशोपलव्धावनुपलब्धिर नुपपन्नेति।शकत्स
यावत्तावदुपस्म्भात् वावत्तावतादपि यस् क्रसाचट भागम्य प्रत्यक्षणा न्दरयमरापलस्भान
प्रथवमार्वा षध 5 गप बोध्यम । २८॥ यदपि वच्यादज्ञानस्यानुमितत्वमिति तनाप दूषयनि।-न व मवत्थ म वकटपस वोप लाब् रत्याप युत्रम बत्रनविसह्ञावात यतीह्र अवयर्व्याक्त अतसद न्या-6
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न्यायदशनम । [ श्य अध्याय।
गहगार्निति चेत न कारणतोन्यम्येकदशस्याभावात न चावयवा कत्सा गह्यन्ते अवयवेग्वावयवान्तर व्यवधानात।' नावयवो कत्खा गह्यत इति नाय ग्ह्यमाणव्ववयवेषु परि ममाप्त द्वान। मेयमकदेशोपनब्धियनवृत्तत। कवत्सममिति व खच्वशषताया मत्याभ्भर्वति। अक्रत्स्नामति शषे सति। नजतदवयवषु बहुष्वास्त। अव्यवधान ग्रहगगात व्यवधान चागरहगादिति। अद्ग तु भवान पृष्टो व्याचट्टा गह्यमाग स्यावयविन किमग्टहोत मन्यम येनेकतशापनाब्ध स्यातित। न ह्म्य कारगोभ्याऽन्य एकदेशा भवन्ताति। तवावयवहृत्तं नापपद्यत द्वात। इद तस्य वृत्तम -यर्षामिन्द्रियार्थमान्र कषात ग्रहणसवयवानाम। ते मह ग्ह्यत। येषामवयवाना व्यवधानादग्रहग ते मह न गह्यत। न चतत्कताडास्त भद द्वात। *समुदायाऽप्यशेषता वा समुदायो वत्ष म्यात् तत्प्राप्तिवा उभयथाग्रहगभाव। * मूलस्कव्शाखापनाशा दोनाम अशेषता वा समुदायो वत्त दति स्यात् प्राप्तिवा ममुदायिनामिति उभयथा ममुदायभूतस्य वृक्षम्य ग्रहण नोपपद्यत इति। अवयव तावदवयवान्तरस्य व्यवधानादशेष ग्रहग नोपपद्यते। प्राप्तिग्रहगमपि नोषपद्यत, प्राप्ति मतामग्रहणात। मेयमकदेशग्रहपमहचरिता वृन्नबुद्धि र्द्रव्यान्तगत्पत्ती कस्पते न समुदायमात इति ॥ २ ॥ साध्यत्वादवयविनि सन्देह ॥ ३१ ॥ यदुत्तमवयविमङ्गावान प्राप्तमतामयमहतु माध्यत्वात्। वयवप्रन्यकका नव नावनाडाप प्रत्यव न व्याहतम् तनान सद्ह चतत सयागािसत्वा गत भाव ७ ३ # समान प्रत्यचपरोचाप्रकरयम।
जावगवनि मन्दह साध्यत्वादिति यथासतार्था न सङ्गक्कत वझ्मादौ व्यभ
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श्य अध्याय ] प्रथमाफ्िकम। [८0]
साध्यन्तावदेतत्कारगभ्यो द्रव्यान्तरमुत्पद्यत इति। अरनुप पाग्तिमेनत। एवज् मति विप्रतिर्पत्तिमावभभवति विप्रात पत्तेश्वावयविनि एथय इतति ॥ ३१ ॥
सवाग्रहगामवय्व्यमद्दे ॥ ३२ ॥
यद्यवयवो नास्ति सवस्य ग्रहगा नोपप्यते। कि तत्वम द्रशयगुगकममामान्यावशषममवाया। कथ कत्वा १-परमागा ममवस्थान तावहर्शनविषयो न भवतोत्यतीन्द्रियत्वाटगा। द्रव्यान्तरआ्जावर्यावभृत नाम्ति। दर्शनविषयस्थाश्चेमे द्रव्यादग गह्यन्ते। तन निरधिष्ठाना न मह्येग्न। गहयन्ते तु कुभ्ा प्याम एको महान मयुत्त म्पन्दत आ्रस्त सृन्मयरश्नात। मान् चेम गुगादयो धम्मा दति। तेन सवस्य ग्रहणत पश्यामाडास्त द्रव्यान्तग्भूतोऽवयवोति ॥ ३२॥
चागन्तममादयमथ -सवयविनि साध्यत्वाटमिदत्वात सन्देह क्रवयावमङ्ावाति तो हेतो तथा च सन्दिग्धासिडी हेतारात भाव। तब च न्व्यत्व स्पशवत ना भगत्वन्याप्य न वैन्यानया विप्रतिपत्तय तव व मकम्पत्वाकम्पत्वरकत्वारततत्वाउ्व्त
चटेन कन्प मूननावच्कनन सन्भावोऽप्यपलस्यत न चर्काम्मस्रेव द्रव्ये एकटव विरुद वमद्ाममावश मनवति तम्ादवयवा एव तथाभता न त्वन्योडवययी मानाभावान एव महारपतरतकनेभ्म्याशकम्य दशक्कटनाडनत्ोपलसान ण्वमावतप्रप्ाद वनावृतत्वापन्म्ादवभयम् दति बौद्धाना पृवपक पत च बौद्धाना पूवप नमबा वात्तिकऊत लिाखताान च विस्तवभगाव् लख्यन्ते॥३१ ॥ मिद्वान्तभूवम्। अवयविनाऽसिड्ी तद्गपकम्मादीना सवषामग्रहगम् तगा च सकम्पाकम्पच्वरक्रारत वादिक मपि न माह परमाणगतत्वात प्रत्यचे महत्तवस सेतुलवात् ॥ ३२ ।
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[=८ ] न्यायदशनम। [ श्य अध्याय।
अवयव्यथान्तवभूत द्वात। मङ्गडकारत व धारगाSडकषणे। मङ्हो नाम सयागमहचारत गुगान्तरम। स्नेहद्रवत्व कारतम अपा सयागादाम कुशध अरग्निसङ्गात पक्क यति त्ववयवकारित अभविष्यता पाशराशप्रभृतिष्वप्यत्तास्येताम। द्रव्यान्तरानुत्पत्तो च तगापलकाष्ठादिष जतुमङ्गहीतष्वप नाभविष्यतामित। अपवर्यावन प्रत्याचकागको माभृन प्रत्यत्तलाप दत्यगमञ्चय दर्शनवरिषय प्रनिजानान किमन- योक्रव्य दति। एकमिद द्व्यमित्येकवुद्वर्विषय पयनुयोज्य। किमेकतुन्धिभिन्नायविघया प्राषोन्वित् नानाऽ्यानषजत। अभिन्नायषनेति चेत नाना्यावषयेति चेत मिन्नेष्व कदशनानुपपात्त। अनंकास्मन्नेक द्वात व्याहता बुाड्न दृश्यत इति ॥ ३३ ॥ सेनावनवङ्गहगामिति चन्नातीन्द्रियत्वा- दगनाम्।।३३॥ यथा सनाउङ्रेषु वनाद्गेषु च दूरादग्टह्यमाणपृथकत्वेष्वक मिदमित्यपपद्यत बद्धि। ए्व परमाणष स्चितव्वस्टह्यमाग पृथकत्वेष्वेकमिदमित्युपपद्यत बद्धिरिति। यथा ग्टह्यमागपृथक- त्वाना खलु सेनावनाङ्गानामारात कारण्ान्तरत पृथकत्वस्या ग्रहगम। यथा ग्टह्यमागजातोना पलाश इति वा खदिब इतति वा नाराज्जातिग्रहण भवति। ग्टहयमागप्रस्पन्दानाव्नागत् स्पन्दग्रहगम्। ग्ह्यनाणे चार्थजाते पृथकत्वस्याग्रहगादेक्मिति हवन्तरमाह-अववभ्याव तव्यातारय्यत तथा सात धारणSडकषय रूप पन बन्धया परमायापुन्नत्व चकदभधारयान मकलधारणमेकदभ्ाS्कपान सकला 5sरुषयच न स्यात्त्यय ।३२ ॥ दृदमवयम्- नाकाऽडकषपन नौकास्थाS5कषणवत् कुण्डपारयेम वुर्स्दषि
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श्य अध्याय ]
भाक्त प्रत्ययो भवति। न लगना मह्यमाणपृथक्काना कारगत पृथकत्वस्याग्रहगात भात् एकप्रत्ययोऽतोन्द्रियत्वाटगुनाममत।
सविन्नात अगासञ्चय एव मनावनारङ्गानि न च पराच्यमाग मुदाहरगामति युक्नम। माध्यत्वागित। दृष्टामत चन् ताह्षयम्य परोल्तोपपत्त। यदपि मन्यत दृष्टमिग सना वनाङ्गाना पृथकत्वम्याग्रहणपदभतेनेकमिात ग्रहगम। न च दृष्ट शक्त प्रत्यास्यातुमिति। तच्व उवम त द्वषवस्य परोत्ता। पत्त तशनवषय ण्वाय परोच्यत। योऽयमकमिति पत्य॥। दृश्यत म पराच्यत कि दव्यान्तवावपयो वाऽयागुसज्जया ररय द्वात अत तणनमन्यतरस्य माधक नअतति। नानाभाव चाभना पृथव चञ्याग्रहमपादभदनेकरिनि ग्रहगम अर्ताग ह ति प्रत्य। वथा स्वाम पुरुष गत। तत किमत। स्तादात प्रत्ययम्य प्रवानापतितन्वात प्रवार्नराद्। ग्रा पुरुष इति प्रत्ययस्य कि प्रधानम १ याडमा पुरुषे परषन तम्मिन सति पुरुपसामान्यग्रहगात स्थागा पुरुषायार्मा एव नानाभूतव्वकामति प्रामाखग्रह पन प्रधान मतिभ। मति। प्रजापज्ञ एवस्याग्रहण्णादत्ति नापपद्यत, तम्मारि 1 एवायमभदप्रत्यय एकमिति। प्रधानामति चेत नविशषहेत्वभावात दृष्टान्ताव्यनरथा।
प्रत्ययस्ये त। एवञ्च सात दृष्टान्तोपादान न व्यर्वतग विेषहेत्वभावात। अषु मानूनेष एकप्रत्या किमर्ताम स्तत्प्रय स्थाण पुरुषप्रत्वयवत। अथथस्य तथा। तर्मिस्तदिति प्रत्यय यथा भन्दस्यनात्वा म शब्द द
भारणनचापपत व जात वव नागवलनवादन वाव उभा वा भा युपपते
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[20] न्यायदर्शनम । [श्य अध्याय।
विभेषरतुपरिग्रहणमन्तग दृष्टान्तो एशयमापादयत इति। कुभभवत मञ्नयमात्र गन्धादयोऽपोत्यनुदाहरग गन्धादय इति। एवं प माणमयोगस्पन्द जातिव्शिषप्रत्यया अप्यनुयाक्कव्यास्तष चेव प्रमद्ग दूति। एकत्वर्बु स्तस्तिम्तदात प्रचन डवात विशेषहेतुवष्धतिति प्रत्यवेन सामानाधिकरखात एकमिद महस्ेति एकावषजो प्रत्वया ममानाधिकरगी भवत। तन विज्ञापत यनमहत तद्षकामति। अगसमूदातिशयग्रन्तम महत्प्रत्या टात चेत माध्यमम-त्मगाष महत्प्रत्ययाऽर्नाम्म स्तदिति प्रचयो अनतोति। किञ्चात पताम्मस्तानात प्रत्ययस्य प्रजातापति्वात प्रजानमि्िगित भावतव्य मनत्यव महत्प्रत्वयन त। शगु पन्दो महानात व व्यवमायात
धारगात यजा दव्य। अण शब्दोडक्यो मन्द इत्तम्य यग महान प्ब्द पत तोवर इत्यनम्य ग्रहराम। कमाल? -६यत्ता डनववारणात। न ह्वन महान पञ्त दवात सवस्यन्रियानय मित्यववाग्यात। यत्रा बन्बामन्नकावल्वादा न। म्युके दम दूति चाहत्वममा ॥SSश्रय प्रााप्तग्रहगम। दी समुदायावाश्चय सयागस्येति चेत कोऽय ममुदाय १ प्राप्तिरनकस्य अनेका वा प्राप्तिरकम्य ममुदाय द्वात चेत प्राप्तरग्रहग प्राप्ाश्चताया। सयुक्ने दम वस्तुनी द्वात नात दे प्राप्ता मयुत्त स्टद्यत, अनक ममूह समुतायइनि चेन्न द्वित्वेन ममानाध करगम्य ग्रहणत+ द्ववमो सयुत्ताववात ग्रहगे सति नानकसमुदायाSSसय मयोगा ग्ह्यत। न च इयोरखग्रहणमस्ति। तस्मान्महतो दित्वाSSश्चयभृत द्रव्य सयोगस्य स्थानामात। * प्रत्यामत्ति
पूर्नोता ५ तामतर सामोसी मन्यमानसब पवाते समावानमाक बनात। ब्रातंदूर स्थ कमनुष्य कपरवराद्ध अभ्रयववलपरि सनावनदमत्यसरवत् एकपरमाषा श्परतयसलगाप
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श्य अध्याय] प्रथमाड्रिकम। [2]
प्रताघातावसाना मयोगो नाथान्तरमिति चेत् न, अथान्तर हेतुत्वात मयागम्य शब्दरूपादिस्पन्दान, हेतु सयोग। न च द्रव्ययागुग्न्तगपजननमन्तरण शब्दे रुपादिषु स्पश च कारगात्व गह्यत। तस्मात गुगान्तर प्रत्ययविषयस्ताथान्तव तत्प्रतिषेधा वा कुगडलो गुरु अकुं्डल्क्कात इति सयोग बुद्धय्ध यद्यपान्तर न विषय। अ्र्र्रथान्तरप्रतिपेघस्ताह विषय। तत्र प्राताषव्यमानवचनम। सयुते द्रव्ये द्वात यदथान्तरमन्चत् दष्टामह प्राताषध्यते। तद्वकव्यामात। द्वयामहतागाश्तम्य ग्रहग्णव्नागवाश्य द्वात जतविशषम्य प्रत्ययानवत्तलिङ्गभ्या प्रत्याख्यानम। प्रत्यास्यान वा प्रत्ययव्यवस्थानुपपात्त। ब्याव कर गस्या नाभव्यतराध क रगवचनम । अगु समवम्थार वपय द्वात चेन प्राप्ताप्राप्तमामथ्यव चनस। किम प्राप्त भरर्ग सम व स्थान तदाश्रया जातवपषो मह्यत अथ प्राप्ते द्वात। अप्राप्त ग्रहणामति चेत व्यवाहतस्थागुसमावस्थानस्याप्युप नब्धिप्रगङ्ग। त व्यवहितगसमवस्थान तदाख्या जातावगषा महेत।प्राप्ते ग्रहगमिति चेत् मध्यपरभागयारप्राप्ता वर्नाभव्यात्त यावत प्राप्त भवात तावत्याभव्याक्कारात चेत तावतोऽधिकरणत्वमगुसभवस्थानस्य। यावात प्राप्त जाति विशेषा ग्ह्यते, तावदस्याधिकरगममिति प्राप्त भवात। तव्नैकसमुदान प्रतोयमानऽयमद। एवच्च सति योऽ्यमण समुदाया वत्त इात प्रतोयत तत् वत्तबहुत्व प्रतोयत। यत्र यत्र ह्यणसमुदायम्य भाग वृत्तत्व गह्यत समवृक्ष इति। तस्मान समुदिताग सभवस्थानम्याधान्नरस्य नातिविशषम्याभि व्यकिविषयत्वादवयव्यथान्तरभृत इति ॥ ३४॥ ममू रपन प्रववर सतत चन्न त पत्रननितान्द्रवलानु प्रत्यच म वम् सनात् सत्वात सनावनासप्रत्यच युज्यन न लवगाना महवाभावतति भाव॥४। समातमवयावपरीचाप्रक रपम्।
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[e2] न्यायदशनम । [ य अध्याय।
परान्नित प्रत्यक्षम अनुमानमिदानी पराच्यत,- गेवायवातसादृश्येभ्या व्यभिचागदनुमान-
मप्रमागाम् ॥ ३५॥ अप्रमाणणमात। एकताम्यथम्य न प्रतिपादकामति। गेघातपि नते पणा मह्यत तदा चोपरिष्टानष्टी तव इति मिथ्ाऽनुमानम। नौडापघातालाप पिपनकाऽगडमआग भनति तग च सविष्यति वष्टिर्गित सिध्याऽनुमानमिति। पुरुषोडपि मगववामितमनुकरोव तदााप उद्दसाटशा सथ्या डनुमान भगन ॥ २५ ॥ नंकत- रागसा टष्येप्टेडा तग्सावान॥ ३६॥
नामलनना स्य् सैंचार। नुभान पुर व भुमार्न मिमान। उम नविविक्वनप सावतुमन ।दूश
शातमनमान पत प्रवपमयात। -अुमानमय बति।
वनमा म खम्मा नाभिक न प्रभाग प्रमातकवणसिवबहकिवान तन
वाबघ गमचा न गात र सा न 1-न वि ज पो न 15 स रग मजय
कतन व वगुनमान पनिविषम गहरण न सभभना नताववाषी न व्रिदा बरामभा
पराताधोन पर्पा न राडगन मझ्चारृण्प मनुष्यकत कभ कमतमटप्ररूान ज्याभ चा गा त
पिपनिकाररनाव्यय प्ाशववाभिप्राग्रेणम सथता लयस पुबपन पूबका न
सामानता 2४ 1वभान
सा वयाधनमरजाम थ व्यामय एनन तज्ञ किगाय्ानुमाप कत्वन ससवान
पर तृ पि हलकाड मनारणा न्त म्ानुमान ततI मह्ामृत जीभानमान
वमन्य गपि व्याभचारभड्गा
ममव नयसवा निजययया मति नारव नमलवात तन्प्रामागय न सन्भवर्त
समाघक 1-नुम नाप्रामागय न युतीम् एकन्भर जदोतउस्वासजणि
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शय अध्याय ] प्रथमाड्गिकम। [2:]
दकविशिष्ट खलु वर्षादक गोघ्तरत्व स्नातमा बहुतरफनफन पर्णकाष्ठाSडटिब हल्वोपलभमान पूगतन नद्या उपार हष्टो देव दत्यनुमिनोति गेदरुवृद्विमात्रय।पपोन्काप्रायस्यागड सज्जार भविष्यत वृष्ष्टित्यनुमोयत न कामाव्विदति। नद मयग्वाामत तत्सटृशाजय शब्द इति विशेषापरिच्ञानान्मिथ्या नमनामति। यम्तु मटशात विशिष्टाच्छन्टादिशिष्ट मयर वामित ग्रह्हाति तस्य विाशष्टाथा गह्यमाणो निद्गम। यथा भपाडडटोनरति। मोडयमनुमातुरपबाध नानुमानस्य याज्य विगेषेणानुमयमथमार्वशष्टाथदश नेन बुभुत्सत इति। ॥ ६॥ विकानवषनमनुमान तैकाल्यग्रहण्ादत्युक्रम अ्त्र व- वर्त्तमाना नाव पतत पतितपतितव्यकालोप- पत्ते ॥ ३0 ॥ व्रन्तान प्रचतस्य फनम्य भूमी प्रत्यासोनतो यदूद्ड म पतितोछा तत्सयुक्त काल पतितकाल। योऽधस्तात म पतितन्याऽधवा तत्ष्सयुत्त काल पतितव्यकान। नदानी वतोयोडध्वा वत्तत यत् पतताति वत्तमान कालो मह्येत। तस्माद्वर्तमान कालो न विद्यन दात ॥३७॥
न च सबत व्यामचारमडा सचाघ तस्वा तकया सतपमयनात् दाय इस्याभय ।२६म
चनमानस्य विकालविषयत्वमभिमत तब्र युक्रम् वत्तमानाभावन तदघोभ जाननाग्त न एातनोरभावेन कालवग्रा ताकविषयामावस्त्याशयन वर्मान परीद पकरणमारममाणी वत्तमानमाचिपत। वत्तमानाभाव पतीतानागतभत्र कालत्वाभाव व्यव्पान्यति पतत ति।-पतत फलाढवनावधिक क न दभ पतिवाध्वा भूम्यवधिक कबन पाततव्याध्वा न तु वत्तमानस प्रसड्ापीति भाव ।१॥
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[ex] न्यायदर्शनम। [ शय अध्याय।
तयाग्य्ययावो वर्त्तमानाभावे तदपेक्षत्वात् ॥३८॥ नाध्वव्यड्म काल कि ताह १-ाक्रयाव्यड् पततीति। यदा पतनकक्रिया व्यपरता सवत म काल पतितकान। यदो त्पत्स्यत म पतितव्यकाल। यदा तव्य वत्तमान क्रिया गह्यत स वत्तमान काल। याद चाय द्रव्य वत्तमान पतन न गहाति कम्योपरममृत्पत््मानता वा प्रातपद्यत। पतित कान इति भूता क्रिया पाततव्य कान इनि चौत्यत्स्यमाना क्रिया उभया कालरा क्रियाहान द्रव्यमध पततोत क्रिया मम्बडम। माडय क्रियाद्रव्यया मस्वन्ध गह्णातोति वत्तमान काल। तताशया चेतरो काली तदभाव न स्यातामति॥८॥ त्थापि -
यद्यतातानागतावितरतरापत्षा मिध्यता प्रतिपद्येमि वत्तमानावल्ापम। नातोतापन्तानागतमद्वि। नाप्यना गतापेत्षा अरतोतसिद्धि। कया युतया9-कन कल्पनाडतोत। युत्तया १-कन च कल्पनानागत १-कथमनागतापेक्चाऽनोतमिद्धि १-नैतच्छका निवक्रम। अव्याकरगीय एष वर्त्तमानलोप। यश मन्ेत डसदोघया स्थलनिस््रयोम्कायाऽडतपयोय यथेतरतरापैक्षया भिद्ि। ण्वमतोतानागतयोरिति। तन्नापपद्मत, विशेषहेत्व भावात्। दृष्टान्तवत प्रतिदृष्टान्तोऽपि प्रमज्यत। यथा रूपस्पर्शे गन्धरसी नंतरतरापेक्षो सिध्येत एवमतीतानागताविति।
समाघत्त।-वत्तमानाभाव तरेग्तीतानागतयार य्यभाव स्यात तयाम्तत पनचान वत्तमानध्वमपतियागित्व हयततत्व ह्यनागत नामति भाव ॥३८॥
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श्य अध्याय ] प्रथमाफ्रिकम। [ex]
नतरतगपक्षा कस्यचित सिदिरिति। यस्देकाभावेऽन्यतरा भावादभयाभाव। यद्यकस्यान्यतवापक्तमाड़ अन्वतरस्येदानी किमपच्ा यत्यन्यतव स्वकाय गामदि एकस्दानीकमपक्षा? एवमकम्याभावजन्यतवत्न सिध्यतात्युभयाभाव प्रमज्यत ॥ २६ ॥ अथमद्भावव्यड्मयाय वत्तमान काल विद्यत द्रव्य उद्यत गुगावविद्यते कमति। यस्य चाय नाक्ति तस्य- वर्त्तमानाभावे सर्वाग्रहग प्रत्यक्षानुपपत्ते ॥०॥ प्रत्यक्षर्मिन्द्रियार्थमान्नकषजम। न चाविद्यमानमम्द्र उरण मन्निक्वष्यत। न चाय विद्यमान मत किश्चिदनुजानाति। प्रत्यत्तनमित्त प्रत्यक्षिषय म्रत्यननान सवन्नापपद्मते। प्रत्य क्षानुपपत्तो च तन्प।कत्वात अनुमाना,ड्गमयारनुपर्पात्त, सवप्रमापविलोप सवग्रहग नभवतात। उभयथा च वत्त्मान कालो गह्यत क्विदथसद्भावव्यड्म यथा-द्रव्ये द्रव्यममिात। क्कचित क्रियामन्तानव्यड्य यथा-पचात क्विनत्तीति। नाना विघा चकाथा क्रिया क्रियामन्तान क्रियाभ्यामच्च। नानवधा चकाथा क्रिया पचतोति। स्यात्यधिश्रयगमुदकमचन तगडला वपनमेधोऽपसर्पगम्यभिज्वालन दर्वीमट्टन मगडमावगमधो 5वतारणमिति। छिनत्तोति क्रियाऽभ्याम उद्यम्योद्यम्य परश दारुमि निपातयन छिनत्तीत्यच्यत ।।0 ।।
नन तथी परम्परापवयव सिद्वन वत्मानापचत्यत बाह। घन्वोडन्या्डश्या िति भाव ३९ ॥ तन रप्यभाव का नति१- अरती गुक्ान्तररह।-वत्तमानाभाव प्रथ्वव नोप पदन प्रजवस्य वतमानविषयत्वात् अत एवा Sद - मम्बद वत्तमानस ग्टह्यते चचुरानिना दति। प्रत्यचाभाव च सवमव ग्रहय ज्ञान न सात् मत्यचमूलक व्वादतरज्ञानानाभितत भाव ॥ ४ ।
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[e&] न्यायदशनम । [श्य अ्रध्याय।
यञ्चन पथ्यमान क्वियामानज तत क्रियमाणम ताम्मन क्रियमाग -
प्रयाज सावमान क्रियासन्तानापरमाडतोत काल अपाच्षोतिति। श्रारब्ाक्रममन्ताना वन्तमान काल पचतीत। तब जा उपरता मा कतता। या चिकापिता मा क्त्तन्यता। या विद्यमाना मा क्रियमाणा। तदय कक्रियामन्तानस्थस्त्रीकान्य ममाडार पचात पच्यत इति वस्तमानग्रहगेन सटह्यत। क्रिया मन्तानस्य ह्ववाविच्छन विधोयन नारभी नोपरम ि। माSयमुनयथा वत्तमानो गह्यन अपप्टत्ता व्यपव्त्व अतीताना गताभ्याम। स्थितव्यङ्गो विद्यन द्रयमिति। क्रियासन्तान विच्कताभिधायो च वैकाल्यान्वित पर्चात छिनत्तोति। अन्यस प्रत्यामत्तिप्रभृति थस्व (अ) विवचाया तदभिधायो बहुप्रकारा न्ाकष उत्प्रक्ितय्य। तम्मादस्ति वर्त्तमान काल इति ॥४१ ॥
अत्यन्तमाधम्यादपमान न मिध्यति। न चैव भवति, यथा गोरेव गारिति। प्राय साधम्यादपमान न सिध्यत। न हि
म नय्यव ता वत्तमान ए्व घत कथ श्वाम भासी का भावष्यतात घो चत बाइ।-वसमानशाप घरत श्यामरकपालौमा कतताक्षत्तव्यतयारतौतता
समाप वत्तमामपरौचषाप्रकरगम्। पथावसर क्रमप्रापोपमान परोचत पूवपसयात।-प्रासड्साधर्म्या पमान मुत्र शम् युत्तम् यत साधम्यमाव्यान्तक प्रायक्मकदेश्रिक वान सभभवति न
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श्य अध्याय] प्रथमाज्निकम । [20]
भर्वात यथाऽनडानेव महिष इति। एकदेशसाधर्म्यदुपमान नासध्यति न Iह सवगा मर्वमुपमोयत द्वात ।। ४२ ।।
पत्ति ।४३॥
न साधर्म्यस्य छत्स्नप्रायाल्पभावमाय्तित्योपमान प्रवर्ततत। ईक्र र्ताह १-प्रसिद्धमाधम्यात् साध्यसाधनभावमाश्रित्य प्रवर्त्तते। यव चैतर्दास्ति न तवोपमान प्रतिषेद प्रक्यम। तस्म्ाद्यथोक् द्रोषो नोपपद्यत इतति ॥४३॥
भ्रस्तु तह्यपमानमनुमानम्-
यथा धूमन प्रत्यक्षेणाप्रत्यचस्य व्ञ्चग्रइणमनुमानम एव गवा प्रत्यक्षेणाप्रत्यचस्य गवयस्य ग्रहपमिति नदमनुमाना षिशिय्यत॥ ४४ ॥
ह माव्यान्तक्माधय्यय यौरिव गावतपमन प्रवत्तन न वा प्रााबकसाषम्य गोर्व मदिष इति न व वात्क्वित् सधय्यम मंर्करव सबप पति साघम्यस
सरमापत्त।-प्रसिद्ध प्रकष्य माहषादित्याहत्यासिद् प्रात यम स्ाचम्य साधम्यस प्रकरणदनस्ागत कात किसानत ॥8३॥
सनुमानेज चरिताय नापमान प्रमाणानमात वरषषकमतमाश्रद्त।- प्रथवंय मोसादृशविभषय अम्रनासम्य गवयप वाच्तसान्तामतर्मोपमान माना करमित। ४४॥
न्या-2
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[e5] न्यायदशनम। [ श्य त्रध्याय।
विशिष्यत इत्याह कया युश््या १- नाप्रत्यने गवये प्रमागार्थमुपमानस्य पश्याम दति॥ ४५ ॥ यता ध्ययमुपयुक्तोपमानो गोर्टर्शी गवय गोममानमथे तदाऽय गवय इत्यस्य मन्ताशब्तम्य व्यवस्था प्रति पत। न चैवमनुमानमिति। परार्थञ्जोपमानम। यस्य ह्यरमानमप्रसिद्ध तदथ प्रमि भयेन क्रियत द्रात। परार्थ मुपमानमिति चेत१न स्वयमध्यवसायात। भवति च भो। स्यमध्यवमाय यथा गो एव गनय द्वात। नाध्यवमाय प्रातषिध्यत। उपमानन्तु तन्न भर्वात। प्रामद्माधम्यात् साध्य माधनमुपमानम। नच यस्योभय प्रिद्ध त प्रति साध्य म वनभावा विद्यत इति ॥ ४ ५ ॥ पथा- तथत्युपसहागटुपमान मिद्दर्नाविशिेष ॥ ४६ ॥। तर्थत समानधर्मीपमह्वारादुपमान सिरध्यात नानुमानम्। गव्वानयोविशेष इति ॥४६॥
प्रवातग्यति-पपत्यव व्यायत्तगप्रम अुनित्वनपरमायाय प्रमा परगजनमुपमानस् न पश्याम ह।्य अथना गबा वत्ता सरमरत्यच गवरपत व न उपमामस्यरकगाथ प्रमाम् उपमानजन्या प्रमाम बनुन नत्वेन न पशाम द। यातसााभावदात साव ॥।४५। नम् सयाप्ज्ञान नयम कल्ा तामित्याभ्यन युक त्तरमाह।-पतुमानादुप मानन्य ववाय तउत्युपमहारत् बथ्ाग तथा गवज अात ज्ानादपमानाससे अरमानाधोममिद्वरूपामन तथा व सपज्ञानानपेचसादृश्य जानाघोनापर्मिति विजनभनमिन्म किश्न
जापलापत शकात त्याग ।। ४६।
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श्य अ्रध्याय ] प्रथमाज्निकम। [ee]
शब्दोऽनुमान न प्रमागान्तवम। क स्मात् १-शब्दाथस्यानु मेयत्वात। कथमनुमयत्वम 9-प्रत्यच्तोऽनुपलब्धे, यथाऽनुप लभ्यमानो लिङ्गो मितन लिड्डेन पश्चान्मीयत इति अनुमानम एव मितेन शब्देन पश्चान्यतउर्थोऽनमनुपलभ्यमान दत्यन् मान शब्द । ४9॥ द्वत्चानुमान शब्द /-
प्रमागान्तरभावे द्विप्रव्वात्तरुपलव्धि। अ्रन्यथा द्युपन्धि उनुमान अन्यथापमान। तद्व्याख्यानम -शब्दानुमानयोस्तप लान्धरद्विप्रव्ात्त यथाऽनुमान प्रवत्तत तथा भब्ददि। विशषा भावादनुमान शढ इति ॥ ४८ ॥ सम्बन्धाच ॥ ४६॥ शब्दोऽनुमानमति वत्तते। मम्बद्यो् पब्दाथया सम्बन्ध प्रमिद्ी शब्दोपनब्धेर्थग्रहगम्। यथा मम्बइयोलिड्गान्रिना सम्बन्धप्रतोतो लिङ्गोपनब्धी लिद्धिग्रह्मणमिति ॥ ४2 ॥
क्रमप्राप्त शकत पगीच्तत पूवपचपात।-शब् उनम नामन्यम्य भाब्तवाघा उनामातर्रिि पथ्यवसिताथ तथा च भब्त लिङ्गविध रनमिातकरगाम अन प्रतिपाद्स्य धनुपलच्तम उव्षत्वात चनमंग्रतवातति तथा व शन्दन्वानमन मितिन प्रत्यक्षावषयलात प्र नभिन्नत्वादेश्यव तात्पय्यम ॥ ४७॥ हचन्तरमाह -उपलन्ध भ्राष्टबोधत्वमभमताया पतुमिात्ल्नाभमतायाक भाइप्रवात्तत्व 1 बदिप कान त्वात अनुमिातत्व भाष्दत्वव्न न जातशयम् ममदस्
हेत्वन्तरमाह।-ममन्वसयतसम्बच्ात् जायमानादित व्यापियहसापेचो बोधयात तेन भाव्दबोधोऽनुमितिरिति साव । ४८।
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[१०० ] न्यायतर्शनम। [श्य अध्याय।
आाप्तापदेशमामर्थ्याच्छव्दादथे सम्प्रत्यय । ५० ॥ सग पप्सरस उत्तगा कुग्व, सप्त होपा ममुद्र, लोक मत्निवेश इत्येवमादेरप्रत्यत्तम्याथम्य न अज्तमात्नात प्रत्यय । कि त्हिं-आप्ैरयमुक्त शब्द इत्यत मम्प्रत्यय। विपर्ययेगा मम्परन्ययाभावात। न त्वेवमनुमानमिति। यत पुनरुपलब्धे गद्वप्रवत्तित्वादिति। अयमेव श्दानुमानयारुपलब्धे प्रवात्त मेत। तत विशेषे मत्यहतुविशेषाभावादिति। यत्त पुनव्द मम्बन्ाज्चेति। श्रम्ति शब्दार्थयो मम्बन्धोनुज्ञान। आ्र्रास्त च प्रतिषिद। अम्येतमि त षठ्ठोविशिष्टम्य वाकयम्यार्धदशेषाऽन भात। प्रापपिन्नक्षगस्तु शन्दाषयो मम्बन्ध प्रतिषिद्॥ ५० ॥
कम्मात् १- प्रमागातोऽनुपलब्धे । ५१ । प्रत्यक्षतस्तावच्कन्दार्थप्राप्ते र्नोपनब्धि येनेन्ट्रियेण ग्रह्ते शब्द, तस्य विषयभावमतिववत्तोर्ऽर्थो न गहते। भ्रस्ति चातोन्द्रियविषयभूतोऽप्यर्थ। ममानन चेन्द्रि येग महमापयो प्राप्तिगह्यत इति। प्राप्तिनक्षणे च गह्यमागे शब्दार्थयी शष्टान्तिके वार्डर्थ स्यात, श्रथान्तिके वा शब्द स्यात् उभय वोभयत ॥ ५१ ॥
मिद्धानसूचम।-आापरस्व समा दयून्यम्य व उपद्श गम तब या सामथ्य बाकाड गेग्यतादिमख तत बथता भाप प्राप्त नपतपसामथ्यम् ाकाह्माद मस्वं तत तत्सहकारात सावधारणसाय निदश तन व्वतान पनानाकाइादि ज्ानातर्थ सम्पय शाष्वा मनवतीति नानुमानान्तभाव भव्सेतय भब्दा रसुमध प्रत्याभ न लन्नामनानोत्यनुभवदिति भाव । ५ 2
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श्य पध्याय ] [१]
भ्रथ खल्वयम - पूर गाप्रदाहपाटनानुपलब्धेक्न सम्बन्धाभाव ।।५२।
स्थानकरणाभावादिति चाथ। न चायमनुमानतोऽप्यप लभ्यत शब्दन्तकेय दूति। एतस्मिन पचऽप्यस्य म्थान करणोच्चारणोय शब्द तदन्तिकडर्य इति। अन्रामन्यान भब्दोचारगे पूरमाप्रदाहपाटनानि ग्ह्येरन। न च प्रग्टह्यन्त। अग्रहणान्नानुमेय प्राप्तलत्षग मम्बन्ध अ्रथान्तिक शब्द दूति म्ानकरणामभ्भवादनुच्चारणम। स्थान कग्ठानम करण प्रयत्तावशष प्रतिषेधाच्च नोभगम। तम्मान्न शब्देनाथ प्राप्त इति ॥ ५२।
शब्दार्थव्यवम्थानादप्रतिपेध ॥५३ ॥
प्न्दाथप्रत्ययम्य व्यवस्थातशनाटनुमोयन अस्ति शब्दार
सम्बन्धा कवस्थाारगम। असस्बन्ध ह प्राब्दमावादथमाव प्रत्ययप्रमङ्ग। तस्मादप्रतिषेध मम्बन्धम्यात॥ ५- ॥
पष्थयो सम्बन्धाभाव इन्यप्याह।-प्राबन महाघम्य मन्बव्ाभाव गाप्र भाव तमाह पूरणति।-याद राजम्याधन व्याप्ति स्यात तगात्रायामशन्य मखपूर्णमुखप्रदाइमुखपाटनान म्य शान्दस्य व्याप्यस्य मचनानात्रथया प
सस्वात ॥ ५२ ॥
तन् कि मब्Sमम्ब मेवाथ प्रत्यानयात १ तथा सन्यातप्रसद्ग इत्याशदन।- चमतिबंध ना रे सम्बन्धप्रातषधा न शाब्ताथ्जा सम्बन्वम्य व्यवास्थतत्वान। कौश देवाहगन्द किवाथ बोधयात न सव स मति इत्यत्न सस्बन् सवोकन तन सुम्बन्धेन व्यापिरप्यावस्यकी सप सम्बन्ी न मुखपूरणानिनयामक श्रन
भाव ४५२॥
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[१०२ ] न्यायदशनम। [ शय अध्याय।
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अत्र समाधि । --
न सम्बन्धकारित शब्दार्थव्यवस्थानम। कि तहिि १-समय कारित यत तदवोचाम,-अस्येदमिति षछोवशिष्टस्य वाक्य स्याथविशेषोऽनुज्ञात पृब्दार्थयो सम्बन्ध इति। ममय तम वोचामेति। क पुनग्य समय१ अम्य शब्दस्येदमर्घंजात मभिधेयम इत्यभिधानाभधेयनियमनियोग। ताम्मननुपयुत्त शब्तादर्वमम्प्रत्ययो भवात। विपर्यये हि शबतख्वगाडाप प्रत्यगभाव। मम्बन्धवारिनाडि चापमवजनीग द्वात। प्रयु्य मानग्रहगाज्च ममयापयोगो लोकिकनाम। ममयपालनाथ चेद पदलक्तगाया वाल्गडन्वास्यान व्याकरगाम। वाक्यनक्तगाया वाचारडर्था नल्तगाम पदममृह्ी वाक्ामथपारममाप्तवात। तदेव प्राप्तिलक्षणस्य शब्दाथमम्बन्धम्याथजुषोऽप्यनमान हतुन भवतीति॥ ५४ ॥
जातिविगष चानियमात॥ ५ू५ ।। मामयिक शब्दादर्थसम्प्रत्यय न स्वाभाविक। ऋष्यार्य मेच्कना यथाकाम शब्दविनियोगोऽर्थप्रत्यायनाय प्रवत्तत। स्वाभाविके हि शब्दस्याथप्रत्यायकत्वे यथाकाम न स्यात्।
सार्मायकववात पतिग्रहाधौनल्वात मतिरुपसम्बन्धन पन व्याद्ति तस्ावत्तिनिया
न्दम्यार्थेन स न स्वाभाविक सम्बन्ध जातिविभषेडनियमात शब्दम्या वयताथकतवनधनात चार्यया कि यवशब्दाहोघशूकावभेष प्रतियन्ति मच्ास
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श्य अध्याय । प्रथमान्जिकम। [१०३ ]
यथा तैजसस्य प्रकाशस्य रूपप्रत्ययहैतुत्व न जातिविशष व्यभिचरतीति॥ ५५ ॥
पुत्रकामेष्टिहवनाभ्यामेष। तस्येति शब्दविशेषमेवाधिकुरुत भगवानाष। प्राब्दस्य प्रमागत्व न सन्भवति। कस्मात १-अनरृत दोषात्। पुत्रकामेष्टी पुत्रकाम पुत्रेध्या यजैतति नेष्टो सस्थिताया पुत्रजन्म दृश्यत। दृष्टाथस्य वाक्स्यानृतत्वात् अटृष्टार्थमपि वाक्यम अग्निद्दाव जड्डयात् सवर्गकाम (मतो उप० ६।३६) दत्याद्यनृतमति नायत। विहृत व्याघातदोषाच्। डवन-उदित होतव्यम अनुदित होतव्य ममयाध्याषत होतव्यम इति विधाय विहित व्याहन्ति - पयावाSम्याSSह्ुतिमभ्यवहगत य उतित जन्ाति शबनो डस्या हुतिमभ्यवहरति योऽनुतित नहोति श्यावशबना वम्याSSहुतिमभ्यवहगत य ममयाध्य षते जद्दोति"। पुनरुक्नदोषाच्च। अरभ्यासे देश्य मान- त्रि प्रथमामन्वाह विरुत्तमाम" इति पुनरुतदाषो
कड्रामति ननियम तु सव सब प्रतोयात्। बापाततयदम् - नामाभकारवप यव यम्य पक्ियह तम्य तर्तर्थोपस्थित ॥ ५५ । समाप्त प्रब्दसामान्यप रचाप्रकरगम्। मन्दस टष्टाटष्टथकलवेन द्वावव्यमुत्तम् तव चाटष्टाथकशब्दस वदस्य प्रामायय परीचित पूवपवधति।-तम्य टष्टायकव्यातरित्शब्दम्य वदस् प्रप्रामाय्यम्। कुत ? -पनृतत्वददोपात्। त प पत्रटिकारी यागादा क्चित् फलातुत्पन्तिदभना दनृतत्वम्। वय घात पू्वापरविरोष। यथा- उतिति जुझ्ात बतुदित नुझात समयाछषत जुनााति प्याव उस्वाSडहातमय्य इरतत य सादत जुहोति शवला उस्थाS्ह्ातम्यवहगत ननुान्त जुहोति आ्यावभबलावस्याऽहुतिम्यवहरत समराध्याषत नुशत। पवर चाादताादवा काना निन्दाऽतुमिता नट्टसाधनता बाधक वावयन सह विराध। पौनरुतयादमामाण्म्। यथा,-वव प्रथमामन्वार्
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[१०४ ] न्यायदशनम । [ श्य अध्याय ]
भर्वात। पुनरुक्रञ्ज प्रमत्तवाक्यामति। तस्मादप्रमाग शब्दाऽनृत व्याघातपुनरुक्तदोषेभ्य इति ॥ ५६ ॥
नाननदोष पुत्रकामष्टो। कस्मात १-कमकतृमाधन वैगुस्थात। दृ्यापतरी सयुज्यमानी पृत्र जनयत इात दाष्ट करण माधनम् पितरा कत्तारी मयोग कमा तयाग्ण गुगा योगात पुतरजन्म वैगुगयाद्िप्य। इज्याS्Sश्नर तावत्कम वैगुष्य-ममोहामश। कतृतगुखम-अ्िद्वान प्रयोक्का कपूयाSSचरगथ। साधनवैगुर,-हायवमस्कतमुपन्तामात । उवत्ी न्यरधका सवरवगहोना इति। दसगा दगगर। होना निन्दिता चेत। अथापजनाऽडश्रर, कमवैगुग्य- मिथ्यामम्प्रयाग। कतृवैगुस्य-यानिव्यापाद, बोजोपघात अति। साधनवगुरम-इष्टावभिहितम। लाक चागकामा ढारुपो मथोयादिति विधिवाक्म्। तत् कमवैगुरय मिथ्य इिमन्थनम्। कतुनैगुख प्रज्नाप्रयत्नगत प्रमाद । साधनवगुशम-आद्र सुषिर दविति। तब फल नानष्प द्यत द्वात नाटृतदोष। गुगयोगन फलानष्यात्तदर्शनात्। न चेद लोकिकाद्दत पुत्रकाम पुत्रेध्या यजतात॥ ५७॥
विइतमाम् इत्यवत्तमत्वस् प्रथमत्वापय्यवसानेाप व कथनन पौनरुक्राम। पतषानपामाए तटष्टान्तन तनकक कैलवन तनकजातनववन वा सबवदामामाख साधनोयामति भाव॥५ू६। मद्वानमूवम्।-न वदाप्रामागय कन्मरकतसामनवगखान फननाभावपपने कमण क्रियाया वगुग्यम् पयथवधित्वाति कतर्वेगुरगम् बविद्ताद साधनव इविरात वगुखम् चप्रोचितत्वादि यथोनकम्परप्य फनाभाव द्यनृतव न चवमसीत
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श्य अध्याय ] प्रथमा्गिकम्। [१०५ ]
श्रभ्युपेत्य कालभेदे दोषवचनात ॥ ५८॥ न व्याघातो हवन दत्यनुवत्तत। योऽभ्युपगत हवनकान भिनात्त ततोऽन्यत जनात तवायमभ्यपगतकालमेढे लोष उच्यते। श्याजोडम्याऽ5ह्ुतिमभ्यवहरति, य उदित लहोति सदिद विधिभ्नशे निन्दावचनमिति ॥५८ ॥ अनुवादोनपत्तेश्व ॥ ५ू६ ।। पुनकत दोषोडभ्यामे नात प्रक्ृतम्। अ्रनथकोभ्याम पुनरुत। अथवानभ्यासीडनुवाद । याऽ्यमभ्याम,- "वनि प्रथमामन्वाह [विरुत्तमाम" इत्नुवाद उपपद्यते श्रथवत्वान। विवचनन ह प्रथमोत्तमयो पञ्चतशत्व मामिधेनोना भवात। तथा च मन्लाभिवाद -"इममह मातव्य पञतपारग वाग्वञ्ञेणवबाध योऽस्मान डेष्टि यञ्च वय द्विष्म दूति। प्रज्नदशसामिधेनीर्वज् मन्त्रोडभिवदति तदभ्यासमन्तरग न म्यादात ।। ५ट ॥ वाक्यविभागस्य चार्थग्रहणात्॥ ६० ॥ प्रमाण शच्द यथा लोके ॥ ६ ॥ व्याघात पारहगत।-न व्याघात दात शष अमन्याधानकाले उनितिक्षमा दिकम्यपैत्य म्वौकृत्य अनुनितिहमादकरये पूर्वक्रदोषकथनाद् व्याघात
पोनरुनय परिहरात।-च पनरथे चनवादीपपते पनन पानरुकम्।निष्पयो नमत्वे दि पौनरुकय दोष उन्स्यले तवनुवादस्य उपपत्ते प्रयोजनस्य समवात एकाटभमा+मोना प्रथमीत्तमयी विराभधाने हि पसनभत्व सम्वात तथा पश्नभन सूपत-दममष्ट मातव्य पवदभारम वाग्वज्णातबाध बोडसाम् दष्ि यस् वय विष्व दात ।५ट । सनुवातस्य सामकत्व विभकवाक्यस अत्रयप्सपात् प्रयोजनसवोकारात् शिटरिति भूष । शिष्टा 1ड विभाय
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[१०६ ] न्यायदर्नम। [श्य अ्ध्याय।
विभागश्न ब्राह्मगवाक्याना विविध - विध्र्थवादानुवादवचनविनियोगात्॥ ६१॥ वरिधा खलु ब्राह्मगवाक्यानिवानयुक्तानि-विवचनानि पर्थवादवचनानि अनुवादवचनानोोत॥ ६१ । तव - विधिविधायक ॥ ६२ ॥ यद्ाक्य विधायक चोदक स विध। विधिस्त नियेगी इनुमा वा, यथा 'अग्निहात्र जुहयात खगकाम (मेवा उप ६।३६ ) इत्यादि ॥ ६२ ॥ स्तुतिर्निन्दा परक्वति पुगकल्प दरत्यर्थवाद ।।६३। विधे फलवादनक्षगा या प्रशमा मा स्तति मम्प्रत्य यार्थम। स्तूयमान अ्रद्दधोतेति प्रवात्तका च। फनश्रनणात प्रवर्त्तते। सवजिता वै देवा सवमजयन मवम्याSऽमै। सवस्य जित्यै सवमवैतनाSSप्रोति मर्व जय त दत्येवम।।
वाननातकागभगन वाकय विभन्यानृव्ा कम्यापि सप्रयाजनत्व मन्यन्त वदडप्यन मिात माव ॥६ । वत् वाक्यावभाग भजति।-मन्त्रब्राह्मणभत् दादघा वेद तव ब्राह्मगमाय विभायविभिनचनतवनाथवाद्ववनत्व नानृया वचनत्वन च व म् शिनगगात विभजनान बथवावान गगान मदात तथा व विध्यातभन्न ब्ाह्ममभागास्बत
गष ६१ ।
"अग्रिदोय जहगात खगकाम इत्यात । ६२ । पथवाद पथम्य प्रतेजनम्य वदन विध्यथप्रशमापर वचनमितय्र सथवादा दि सुवादिदारा विध्यय बोध प्रतत्तये प्रशसति। तव स्तुत्याादमदादयबाद विभजत ।- खुनि सासाद्ध्यथस प्रथसा्थक वाक्यम् यथा सवाजता देवा सवमनत्म्
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श्य अध्याय ] प्रथमाक्किकम। [१.0 ]
अ्निष्टफनवादो निन्दा वजनाथम, निन्दित न समा चरोदति।-"एष वाव प्रथमो यज्ञाना यज्ज्योतिष्टोम एतनानिष्टाऽन्यन वजत स गत्त पतत्ययमवैतज्जीय्यत प्रमोयत दृत्यवमाद। अ्न्यकतकस्य व्याहतस्यविधेगद परक्वति।- "हत्वा वपामवाग्रडाभधावयन्ति अ्रथ पृषदाज्य तटह चरकाध्वय्यन पृषदाज्यनेवाग्ेडभिधारयन्तग्न प्राणा पृषदाज्य स्ाभमित्येवममिदधति" दृत्येवमादि। ऐतिह्यसमाचरिती वविधि पुशाकल्प दूति। तस्पाद्दा एतेन पुरा ब्राह्मगा वहि पवमान सामस्तोममस्तौषन योने यज्ञ प्रतनवामह दवत्यवमादि। कथ परक्वतिपुराकल्पी अर्थवादाविति ? स्तुतिनिन्दावाक्येनाभिसम्बन्धाद्विध्याश्यस्य कर्स्याचदथस्य द्यात नातथनाद इति ॥६३॥ विधिविहितस्यानुवचनमनुवाद ।। ६४ ॥ विध्यनुवचनञ्जानुवादा विहितानुवचनञ्। पूर्व शब्दानु बाद, अपरोऽथानुवाद। यथा पुनरुतद्दावधम् एवमनुवादो दपि। किमर्थ पुनर्विहितमनूद्यते -अ्धिकारार्थम्। विह्ित
सवस्य पात्ा सवस्य मित्य सवमेवनेनाऽडप्रात सव जयात इत्याद। अनिष्टबोधनद्वारा विध्ययप्रवत्तक मिन्दा-एष वाब प्रथमी यज्ञाना यवोतिष्टाम एतेनानिष्टा अ्न्धेन यअते स गत्तें पतत्ययमेवतज्जीय्यते प्रमौयत इत्याद।
पषदाज्य तदुह चरकाध्वय्यव पृषदाज्यमेवारयेभिधारयन्यम्र प्राया पृषदाव्य सामामन्यवमभिद्धति इत्यादि। ऐतिदसमाचरिततया कोत्तन पुराकस्प यथा- तमादा एतेन पुरा ब्ाह्मया वाह पवमाम सामसोममलीधन योने यर्भ् प्रतनवामहे" इत्यादि।६२ । धनुवादलचयमाह।-प्राप्स्य अदु पसात् कथन सप्रयोजनमनुवाद उति मामान्यअचगम् तदिप्रेषी विधिविद्ितस्यवि विध्यनवादी विद्ितातवादयवय।
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[१ .= ] न्यायदर्शनम । [ श्य अ्रध्याय।
मधिकृत्य स्तुतिर्वोच्यते निन्दा वा विधिशेषा वाडभिधोयन। विहितानन्तवर्थोऽषि चानुवादो भर्वात। एवमन्यदप्यत्प्रक् गोजम्। लोकडि च तिवग्थवाढाऽनुनाढ दतति च विवध वाक्यम्। शदन पचदिात विधवाक्म्। अधवादवाक्म - आायुवचो बल सुख प्रतिभानज्जान्ने प्रतिष्ठितम। अनुवाद,- पचतु पचतु मवानित्यभ्यास च्िप्र पच्यतामिति वा। बङ्ड। पच्य तामित्य ध्येषणाथम। पच्य तामरवेति वाडवधारगाथम। यथा लोकिके वाक्ये विभागेनाथग्रहणात् प्रमाणत्वम, एव वेदवाक्यानामषि विभागेनाथग्रहण्पात् प्रमागत्व भवितुमईं वोात ॥ ६४ ॥ नानुवादपुनरुततायोविशेष शब्दाभ्यासोपपत्ते ।६५। पुनरुत्तमसाधु साधुरनुवाद इति त्रय विभषो नोपपद्यत। कम्मात् १-उभयत हि प्रतोताथ शब्दाऽभ्यस्यत। चरिताथस्य
शौघ्रतरगमनोपदेशवदभ्यासान्नाविशेष । ६ई। मानुवादपुनरप्योरविशेष। कस्मात् १ अर्थवदभ्याम स्थानुवादभावात्। समानेऽभ्यासे पुनरुतमनर्थकम। अ्रथवान भ्यामोऽनुवाद। शोघ्रतरगमनापदेशवत्। शोघ्र भोघ्र गम्यता भोघ्रतर गम्यतामति क्रियातिशयोऽभ्यासेनेवीच्यते। उदा रणर्थंञ्ेदम एवमन्योऽप्यभ्यास। पचत पचतोति क्रिया
पम्न वाथवादामुव नावभागा विशविसमभिव्याप्गमवाक्यान म तम भू।यवादकपाय रदानवाक्यानामपरियहाद् न्यनता । ६४ । गदुत। -श्न्दन बाधतायकशन्दम्य याऽ्भ्यास पुन प्रतीय तथ्ीपपभे ससातृ चनवाद पुनषन्राम् भिदत प्रन्यय ।६५। समापत-पनुपादस उनयकायाविभष पम्यासात् सव्यासस समयोजन
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श्य अध्याय ] प्रथमाफ्रिकम्। [१02]
नुपरम। ग्रामो ग्रामी रमगीय द्ति व्याप्ति। परिपरि विगत्तम्यो वष्टो दव द्वात परिवर्जनम। अध्यधि कुद निषम- मिति मामोप्यम। तिक्न तिक्रमिति प्रकार । एवमनुवातस्य स्तुतिनिन्दारशषविधिष्वधिकाराथता विदिताथता चोत॥६६। कि पुन प्रातषेधहेतूद्ागातेव शब्दस्य प्रमागात्व सिध्यति ? अतथ्य -
प्रामाखात । ६७।। कि पुनरायुवदम्य प्रामाश्म यढायुवेदनोपदिश्यते-पद क्वत्वेष्टपाधगच्कति, दूद वर्जायत्वाडानट जहति तम्यान छ्ठोयमानम्य तथाभाव सत्यार्थताडावपय्यय। मन्त्रपदानाच विषभरराS्शनिप्रातषधाधाना प्रयोगडर्थस्य तथाभाव। एतत प्रामारयम। कि कवतमेतत् १-आप्तप्रामाखऊतम। कि पुत गप्ताना प्रामाशम १-माचात्कृतधर्मता भूतदया यथाभूताथ- चिख्यापयिषेति। आप्ता खलु साचात्कृतधमाण इद द्ातव्यम अयमस्य हानिहेतु इदमस्याधिगन्तव्यम अरयमस्याधिगम देतुर्रिति भूतान्यनुकम्पन्ते। तेषा खलु वै प्रागाभृता खय मनवबुध्यमानाना नान्यदुपदेशादवबोधकारगमस्ति। न चानवबोधे समोहा वर्जन वा, न वाडकत्वा खस्तिभाव, नाप्यस्यान्य उपकारकोऽप्यस्ति। हन्त। वयमेभ्यो यथादशन यथाभूतमुपदिशाम, त इम शृत्वा प्रतिपद्यमाना हेय हास्य
तान। त दृश्षन्तमाह शोघ्रत।-यथा खोक गम्यतामत्यक्वा पुनगम्यता गस्ताम् इव्यदकमावन्नम्वादियाधायसुच्यत तथा प्रतड ति। ६द। एवमप्रामाययसाधक निरस प्रामायय साधयात।-आप्थ बेदकर्तत प्रामा खाद् घयार्थीपद्भकत्वात् वेदस तद्तत्वमयाक्ञन् तन इतुमा वेदस्य प्रामाध्यम् न्या-१०
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[११.] न्यायदर्शनम। [ श्य अ्ध्याय।
स्यधिगन्तव्यमेवाधिगमिष्यन्तोति ए्वमाप्तापदेश। एतेन,
भर्वात। एवमाप्तापदेश प्रमागम, एवमाप्ता प्रमागाम। दृष्टाथ नाSडप्तापदर शेनाऽडयुवदनाटृट्टाथा वेदभा गोऽनुमातव्य प्रमाग मिति। आप्तप्रामाखस्य हता समानत्वादिात। अस्याप वकदशे 'ग्रामकामो यजेत इ्त्येवमादिदृष्टार्थ तेनानुमातव्य मिति। लोक च भूयानुपदशाऽडस्यो व्यवहार। लोकिक
चिख्यापयिषया च प्रामाख्यम। प्रमागामति। प्वाSSपता वेदार्थाना दष्टार प्रवकारश् त एवाऽ्डयवद
नित्यत्वाद्ृददवाक्याना प्रमाणत्वे तत्पामाएयमाप्तप्रामाखादित्य युत्ताम्। शब्दस्य वाचकत्वादर्थप्रतिपत्तो प्रमागात्व न नित्यत्वात्। नित्यत्वे हि सवस्थ सवण वचनाच्कष्दाथव्यवस्था इनुपपात्त। नानित्यत्वे वाचकत्वमिनि चेत्१ न, लोककष्वदशनात। * तर्ऽप नित्या दति चेत् ? न पनापोपदेशादर्थविवादीइ़नुपपत्र।* नित्यत्वादि शब्द प्रमाणमिति अ्रनित्य स इतति चेत् १ पविशेषवचनम। अनाप्तोप देभा लौकिका न नित्य इति कारणं वाच्यमिति। यथानियोग साथस्य प्रत्यायनाव्ामधेयशब्दाना लोके प्र माख नित्य त्वात्मामाखानुपपत्ति। यत्रार्थे नामधेयश्रब्दा नियुज्यत, लोके तस्य नियोगसामथ्यात् प्रत्यायकी भर्वत न नित्यत्वात। मन्व
जयुमेत्रम्। तव दष्टान्तमाद् मन्ताऽडयुर्वेदप्रामायवदिति।-मन्ती वविषादिमाशय, सायुर्वेन्भागय वेदस एव तब सवाद्म प्रामाययगङ्टात् तहष्टान्तन वेदतावकतस
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श्य भध्याय ] [१११ ]
न्तरयुगान्तरेषु चातोतानागतेषु मम्प्रदायाभ्यामप्रयागाविच्छेदा वेदाना नित्यत्वम। आप्तप्रामाखाच्च प्रामाशयम् लौकिकषु भब्देषु चैतत ममानमिति ॥ ६७ । इति वात्स्यायनोये न्यायभाष्ये द्वितोयाध्यायस्याद्यमाण्रिकम्।
द्वितीयाध्यायस्य द्वितौयान्निकम्।
प्रयथाथ प्रमाणोदेश द्ति मत्वाऽडह।-
न चत्वाय्यव प्रमाणानि। कि ताह १-ऐतिहयम अथा पात्ति सभ्भव अभाव द्त्येतान्यपि प्रमाणानि। डात होचुरित्यनिदिष्टप्रवक्त कम्प्रवादपारम्पव्यमैतिह्यम्। प्थादार्पात रथाऽडपात। आपात्त प्राप्ति प्रसद्ग। यत्राभिधीयमानऽय
प्रामाश्यम चनमयम् पाप्त गृहीत प्रमाण यत्र स वदसाटशन वेदलेन प्रामायमन् मेयमति कैचित् । ६७।
इतति शोविश्वनाथभट्टाचाय्यक्वताया न्यासूबबत्तौ विभागपरीक्षा
माड़कम॥ १॥
थथ विभागसापेच्ष्रमाणपरीचय तदेव चाडडक्रिकाय। घलर चाव प्रकगयानि तवाइडटो चतुरपरौचाप्रकरपम्। पन्धानि व तव तव वच्यम् तवाSSच्षपसूवम्। प्रमाणमा न चतुष्टम् प्रमाधत्व नोकचतृष्कान्यतमत्वव्याष्यम उत्तान्यववत्तितवात् तवान्यवृत्तित्व व्यत्पादयात ऐतिहेत्यादि।-ऐतहम् दवात डोडु रत्यनेन प्रकारेण यदव्यनै तद्ि पनिादत्टप्रवत्तक परम्पराजगत वाक्यम् बथा -वट
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[ ११२ ] न्यायदशनम । [श्य बध्याय।
योऽन्याऽर्थ प्रमज्यत मोऽयाSSपात्त, यथा-मघेष्वसत्ु हष्टन भवताति किमत्र प्रसज्यत ? मत्स भवतोति। मन्वो नाम- पविनाभाविनाऽथम्य सत्ताग्रह्मादन्यस्य सत्ताग्रहगम यथा - द्रोणस्य सत्ताग्रहगादाढकस्य सत्ताग्रहगम। श्ाढकस्य मत्ताग्रहणात् प्रस्थस्येति। अभावो विगाधो, अभृत भूतम्य। प्रविद्यमान वर्षकम विद्यमानम्य वायस्म योगस्य प्रतिपादकम। विधारक हि वायसमयोग गुरुत्वादपा पतनकमा भवतीति॥ १ ॥ सत्यमतान प्रमाणान न तु प्रमागान्तगाग प्रमामान्त रक्ष मन्यमानेन प्रतिषेध उच्यते मोयम-
अनुपपन्र प्रतिषेध। कथम१ "आप्तोपदेश शञ्तइति नच पब्दलक्षणमैतिह्याद्ावर्त्तत। साडय भेद सामान्यात सङ्गह्यत इति। प्रत्यचेगाप्रत्यक्षस्य सम्बद्धस्य प्रतिपत्तिग्नुमानम। तया
वटे गथ हत्याति तम्य चाडडती क्तत्वानिययाव्र शब्दडन्तर्भाव प्ति भाव। ब्रथा Sपत्ति रुपपद्ममानना्थेनपपालककल्पनम् ग्रथा -वथ्चा मेघज्ञान वथा मह मेघस्य मेघाधकरण्यान्न व्याप्तिविति नानमानडन्तर्भाव। सनभवो भूय सहचराधीनञ्ञानम् यधा-सन्नवात ब्राह्मय विना मननवति महसते भत्षम चव व व्या प्नापाचतत्याभय। सभावम्त विगोध्यभावज्ञानाघोनावरो नन्तरकन्पनम ग्था - नकुलाभव्ञानेन मकुल विशेधिनो व्यातस्य कन्पनम सवापि न्याप्तिनापे्त्तितत्याशय पथवा कारणाभावा दिना वाय्यामावानव्ञानम प्रभाव भावनिष्रव्याप्तरवान्मानाङ्गाान्यापय। १॥ मिद्धान्तमूयम्।-न प्रमाणचत्ष्टतम्य प्रतिषध ऐसिह्म्यानथानर आयादम्तभावात सामान्वत चापीततञ्ञानसभ्भवास् वस्तुत पाप्ताकृत्वग्वाम न शाख
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श्य अध्याय ] [११३ ]
प्रत्यनोकभावाद ग्रहणसथाSSपत्तिर नु मा न मे व । अपविनाभ व वृत्त्या मम्बदयो ममुतायममुदायिनो ममुदायनतरस्य ग्रहण मन्ा। ततस्यनुमानमेव। अ््मिन मतोद नोपपद्यत दति विरोोधतवे प्रासद् काय्यानुत्पन्या कारगस्य प्रातबन्धकमन मोयत। सोऽय यथार्थ एव प्रमागाददेश इति। सत्यमतानि पम्मणान न तु प्रमागान्तरगात्यक्म ।। २ ।। अताथाऽSपत्ते प्रमागभावाभ्यनुन्ञा नापपद्यत तथा होयम-
अमत्स मघषु वष्टिन भवतोप्त। मत्स भवतोत्येततथा ाप द्यत। मत्म्ाप चकदा न भवा। सयसथाऽडपत्तिरप्रमाग मिा7॥ ३ ॥
द्यत द्वाल वाज्यात प्तना नामताडथ मात कारगे कायमुत्य द्यत इत्यथादापद्यत। अमावस्य किमाव प्रत्यनाक द्वात। सोऽय काव्यताद सति कारउेधालपद्यमाना कारणस्य
करण किन्तु आकाह्वादनानम् गग्यताप्रनानाना प शाब्दप्रमात प्रथाऽप। दरमुमनडन्तभाव। उपपात ककत्पनबिना व्यातन न सम्वात शटलान्रा षाप मेघजन्यत्वच्ाप्तरस््यन सनवाजप व्यातमूक वातनुमानम् व्याशनपावत् प व्याभचारा-प्रमागाम ण्वमनावा सातसाय 17. नुमानम मानाङ्ृतव न विराध अास भाव॥ २। सत्यया तक प्रामाश्य वाहमावान्तभावाचनता सत्व ने नाफार नटस्थ पदत- पसात मेध वाटन भवता यमन मानन टसनी बथापर 1
तव च म श्रामागय म गप म न व् वमाब नका व जान॥३ ॥
नन सति भघ शार्शित। तब उथ्वा म ज्ानमासम् यत्र प मघन ।
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[११४ ] न्यायदर्शनम । [ श्य भ्रध्याय।
सत्ता व्यभिचरति। न खल्वसति कारणे कार्य्यमुत्पद्यते। तस्माव्रानैकान्तिको। यत्तु मति कारणे निमित्तप्रतिबन्धात कार्य्य नोत्पदात दति, कारणधर्मोडसी न त्वर्थाऽऽपत्े प्रमेयम्। कि तह्स्या प्रमेयम ? सति कारणे कार्य्मुत्पद्यत इति। योऽसी कार्य्योत्याद कारणस्य सत्ता न व्यभिचर्रत एतदस्या प्रमेयम। एवन्तु सति अनर्थाऽडपत्तावथाऽSपच्यभिमान ऊ्वला प्रतिषेध उच्चते दूति। दृष्टस कारगधमो न शक्य प्रत्याख्यात् मिति ॥ ४ ।
अर्था.डपा्त्तिन प्रमागमनैकान्तिकत्वादिति वाक्य प्रतिषेध । तेनानेनाथाSSपत्ते प्रमागात्व प्रतिषिध्यत न मद्भाव। एवमनै कान्सिको भवत। अनेकान्तिकत्वादप्रमागेनार्नेन न किदर्थ प्रतिषिध्यते दतति ॥५ ॥ अ्रथ मन्यसे नियतविषयेष्वथेषु सविषये व्यभिचारो भवति, न च प्रतिषेधस्यामद्भावो विषय। एव तर्ह्िं- तत्प्रामारये वा नार्थाऽऽपत्त्यप्रामाखयम् । ६॥ प्रथाऽडपत्तेरि कार्य्योत्पादेन कारणसत्ताया भ्रव्यभिचारो
ज्ानं तवानर्थाऽडपत्तावर्थाऽऽपनिश्म। न चतावता प्रामाखविरीभ व्याप्ादियमात् न नकान्तिकत्वमर्थाऽडप सरिततिति भाष्यस्यावतरयिका सूवादौ कैचिल्िखन्त॥ ४ ।
स्वात्NXI पर बत कुवचिदनवान्तिकत्व न दोषायवन्य खविषये इति यदि वदाडर्या
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श्य ध्याय ] [११x]
विषय, न च कारणधर्मो निमित्तप्रतिबन्धात् काय्यानुत्पादत्व मिति ॥ ६॥ परभावस्य र्ताई प्रमाणभावाव्यनुन्ना नोपपद्मते। कथमिति १- नाभावप्रामाय्य प्रमेयासिदे ॥७॥ पभावस्य भूयसि प्रमये लोकसिद्वेवैथात्यादुच्यत नाभाव प्रामाष्य प्रमेयासिद्देरिति ॥७। प्रथायमथबहुत्वादर्थेकदेश उदाङ्गियत-
प्रमेयासिद्दे ॥ ८ ॥ तस्याभावस्य सिध्यति प्रमेयम। कथम -लच्ितेषु वामस् धनुपादयेषु लन्षगाभावेन लक्तितत्वादिति। उभयसब्निधावलक्चतान वासास्थानयेति प्रयुक्ो यैषु वासस्स नत्तणानि न भवान्त तानि लक्षगाभावेन प्रतिपद्यत प्रतिपद्य चाऽडनर्यन। प्रतिपत्तिहेतुव प्रमाणामति ॥। ८ ।
SSपस्तरपि नामामाययामव्याह।-अनैक्रान्तिकत्वस्य खविषय साधकत्वाद यदि खहता प्रामाक्य मन्यसे तदाSथाऽऽपसतरपि खावषये म्रामास्मिति। ६। समावस न प्रमाखडन्तर्भाव इति तटख भडत।-सभावनामक प्रमाय तदा स्वात् यदि तम्य प्रमेय सिध्ेत् तदेब तुनासि। सभावस तुच्कलान्न तव
सिद्ान्तसूवम्।-तस्याभावप्रमायस प्रमेयसिद्वि भावप्रधानो निर्देध। कि वत्पमेयम् पूक ISSE सचितवु इति।-वचितेषु घटादियु सत्यु चलचिताना तम्ममेधत्वयिद्धि। चखचितानां कथ प्रमेगत्वम्? वत बाड अलचषसचितत्वा दि।-यदप्यभावस गुयकर्न्ादिभिसचम न सम्भवत तथाप्यलचमेनेव तखच्चित भवति। चनोलमानयेत्युत नोषाभावी हि इतरव्यावत्तकतया सचयम, चतोडभावा नामामाधिक इति भाव 1८।
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[ ११६ ] न्यायदशनम । [ य अ्रध्याय।
असत्यर्थे नाभाव दति चैन्नान्यत लक्षगोपपत्ते ।।६, यत्र भूत्वा किज्ञिन्न भवत, तत्र तम्याभाव उपपद्मत। अलत्तितषु च वामस्मु लक्षणान भूत्वा न भवान्त (घ) तस्मात् तषु लक्ष माभावोडनुपपत्र द्वात चेत ? न अन्यन्क्षगापपत्त । यथाऽयमन्येष वामस्म लक्षणानामुपपात्त पशति नैवमलास् तष। साडय लक्षग्ाभाव पश्यप्रभावनार्थ प्रतिपत्यृत दतति ॥-। तत्सिद्वेग्लच्षितेष्व हेतु ।। १ ॥। तषु वामस्मु नाक्ततष सिद्धावद्यमानता वैषा भरवति न तेषामभानो लक्षणानाम्। यान च लाक्षतव विद्यन्त लच पान तषामलातनष्वमान इत्वहतु यानि खश्यु भनान्त नंषामभावी व्याहत इात ॥ १ ॥
न ब्रूमो याान लक्षग्णान भवान्त, तषामभाव दतति। किन्तु कषचिल्वत्तगान्यवस्थितानि अनर्वस्थितान केषुचित अपक्षमागो येषु लक्षणाना भाव न पश्यति तानि लक्षगा भावेन प्र तपद्यत इति ॥११॥ भाचिम्य समाधत्त-अमात प्रतयागिन्यभावा वता न मकाते सति च प्रतिर्योगिन कथ तदभाव द्वात चत् न चन्यव लक्षषेन सख्वनाधान् प्रातयोगिन उपपत्ते सभावव्यवहारापपत। न हि तवब प्रतियोागित सत्त्मपास्यतम् । < । भदरन।- लवितषु लवगस्य तातद्वे व्यावत्तकव्वासड् ममचतवु सभावष पहतु महतुतव व्याहत्यहतृत्वम्। अभावसय लचयाभावाात् सरूपम्य न व्यावत्तकत्वामात भाव। १ ॥ समाधत्त।-पूवपवा न युन। प्रतियोगिनो लसपम्य यदवासतमवस्थान तखापचया यव ताहभसिड। अरमन-प्रतिगागस्वरुपच्ानादवाभावखरूप
(घ) ९ चतपु वासस्मु भूचा द्वात वावत्।
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श्य घध्याय ] [११७]
अभावद्वैत खलु भवति। प्राक चात्पत्तरविद्यमानत उत्पन्नम्य चाSडन्मनो हानादविद्यमानता। तवाल्तितेष वामस् प्रागुत्यत्तेरविद्यमानतालच्षगो लक्षणानामभावो नतव इति । १र । आप्तोपदश शब्द इति प्रमागभावे वर्शेषगा बवता नाना प्रकार शब्द इति जाप्यत। तम्मिमन मामान्येन विचार - कि नत्वोऽयानित्य १ इति - विमर्शहैत्वनुयोगे च विप्रतिपत्ते सशय ॥। १३ ।। आकाशगुण शञ्दा विभुनित्योडभित्यक्रिधर्मक द्ृत्येक। गन्धाटिम हवृ्तिद्रव्यष मननिविष्टो गन्धातिवित स्थिताडभ व्यक्तिधर्मक इत्यपर। आकाशगुग शब्द उत्पात्तनिराधधमका वुद्धिवाटन्यपर। महाभूतमङ्गोभज शब्दाSनाश्रित उत्पात्त धर्मकोनिरोधधर्मक इत्यन्ये। अत मशय -किमत तत्त्वम? इति॥१३ । शरानत्य शन्द इत्युत्तगम्। कथम १- आ्दिमत्त्वादेन्द्रियकत्त्वात् कतकवट्पचाराच्च॥१४॥ आरदिर्योनि कारगम आदोयतSस्म्ार्दिति। कारगवढ़ नित्य दृष्ट मयोगविभागजश्न शब्द कारणवत्त्वादनित्य इति।
प्रमय साइशित मण्डकप् गSनुव त्तत। प्रतियागन उत्पन्न प्राक सभावस उपपत्ते उपलभ्भात् घगा भावष्यतीत्यादिपागभावावषयक प्रत्यक्षस्य सावलीकिक त्वारनिति भाव चकारेष ध्वसादैराप प्रत्यनसिदत्व समुच्ौन। चशया निव्याप लवन म प्रामाख वस्तुतो लिम्यादवत साङातकत्वात तसाय्यनुमाने भरष्ट बाडनर्भाव इति ॥ १२।
वे दसय प्रामाख्रमाप्तपामाय्यात् सिड्म्। म चेद युव्यते वतसानत्यत्वादित्याबद्ध या
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[११=] न्यायदर्शनम। [ श्य अ्ध्याय।
का पुनरियमथदेशना कारणवदिति१ उत्पत्तिधमकत्वादनित्य शब्द इति। भूत्वा न भर्वात विनाशधमक इति। साशयिक मतत-विमुत्पतत्तिकारग सयागविभागो शब्दस्य शहोस्विदभि व्यक्रिकारगम १ इत्यत श्रह - - ऐन्ट्रियकत्वात, द्रान्द्रयप्रत्या मत्तिग्राह्य ऐन्द्रिय । किमय व्यञ्जकन ममानदशेऽभिव्यज्यते रूपदिवत १ अ्रथ मयोगजाच्छव्दाच्क्दसन्ताने सति नात प्रत्यामन्री गह्यत द्ति ? * मयोगनिव्ृत्ता शब्दग्रहणात्र व्यचकेन ममानदेशम्य गहगम। * दारुब्रखने दारुपरशुमयाग निवत्तौ दूरस्थेन शब्दा गह्यत न च व्यन्काभावे व्यड्गाम्य ग्रहग भवत तम्मान्न व्यञ्जक सयोग। उत्पादके तु मयागे मयोगजाच्कन्दाच्छन्दसन्तान सति शोतप्रत्यामन्स्य ग्रहग मिति। द्तश्न शब्द उत्पद्यत नाभिव्यज्यते क्वतकवदपचारात तोव्र मन्दमिति कवतकमुपचर्य्यत तोव्र सुख मन्द सुख तोव्र दुख, मन्द दुखमिति। उप्रचर्य्यत च तोव्र शब्द, मन्द शब्त पति।*व्यञ्नकम्य तथाभावात ग्रहपस्थ तोव्रमन्दता रूप वदिति चेत् १ न अभिभवापपत्ते। सयोगस्य व्यन्तकम्य तोव्रमन्दतया शब्दग्रहणस्य तोव्रमन्दता भर्वात न तुशब्दा भिद्यते यथा प्रकाशस्य तोव्रमन्दतया रूपग्रहणस्येति। तन्च नैवम अ्भिभवोपपत्ते। तोव्रो भेरोशब्दो मन्द तन्त्रीशब्दमभ
वषानामानन्यत्वात कथ तन्ममुनयरूपम्य वनस्य नित्यत्म१ त्याथतन शबदानित्यत् प्रकत्यमारमत। तव सिद्धा नमूतम।-भब्दोडनित्य इन्या पूरणोयम्। भादिमत्वातृ सकाग्णकलवात। नन न सकारयकत्व कगठताल्वाद्यभिातादव्यन्नकत्वनाभ्युपपत्त
विषयत्वातित्यथ। परे त ऐन्ट्रियकत लौकिक प्रत्यच। वशव्यत्व सामान्यसमवायतोम्त न तथालवम जातत्वानिमा विशय्यत्वसभवैपि जातित्वादरप्रत्ययाव्रा व्याभचार । मनच इन्ट्रियत्वाभावास् नाऽडत्मनि व्यभिचार बात्मन ऐन्ट्रियकल्वाभावाइत्याडु।
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श्य अध्याय ] [११e]
अअवति न मन्द न च शब्दग्रहणमभिभावकम, शब्दय न भिद्यन शब्द तु भिद्यमान युक्नोऽभिभव तम्मादुत्पद्यत शब्द नाभितयज्यन दति। शभभवानुपपत्तिश्व व्यन्नकममानदश ग्याभित्यक्ी प्रात्थभावात व्यञ्जकन ममानदेशोऽभिव्यज्यत शञ इति एतास्मन पने नापपद्यतर्डभिभव नहहि भेरोशब्दन त सोखन प्राप्त द्ति।अप्राप्ते अ्र्भिभव दति चेत् १ शब्द मातराभिभवप्रसड्ग।अ्रथ मन्येतामत्या प्राप्तावभिभवी भर्वत दूति१ एव सति यथा भेगैशब्द कवित्तन्त्रीखनमभिभवति, एव मन्ति कुम्यापाढानमिव दवोयस्थापा दा न न पपि तन्वोख नार न भ भवेत अप्राप्तेरविशेषात। तत् क्वाचदेव मेर्या प्रणादिताया मवलाकेषु ममानकालास्तन्तीखना न य्ूयेग्न इति। नाना भृतष शब्दसन्तानेषु सत्सु श्रोत्प्रत्यामत्तिभावेन कस्यचि च्कन्दस्य तोव्रेग मन्दस्याभिभवो युत्ता दूति। क पुनरयमभि
यथोल्काप्र काशस्य ग्रहणाहस्याऽडदित्यप्रकाशनत।। १४ ॥ न घटाभावसामान्यनित्यत्वात् नित्येष्वप्य- नित्यवट्पचागच्च ॥ १५॥ न खलु आदिमत्त्ादनित्य शब्द । कम्मात् १-व्यभिचारात्। भादिमत खलु घटाभावस्य टष्ट नित्यत्वम्। कथमादिमान 1-
सप्रमानकत्वमाशनइ्ाऽद् कतकेति।-ऊतके घटादौ यचा सपचारी ज्ञान तथव काय्यवप्रकारकप्रर क्षविष उत्वादित्यय तथा च काय्यतेनानाहाय्यसावलीकिक प्रत्यचवता नत्यन्वमेव सिध्त। कचित्त उपचा हिनाशतात् कतकवत् ति दश्न दात। परेतु कतकवदुपचागत ऊतकसुखदु खादिवद्यवडागत। यथा दि हुखादौ तोव्रमन्दादिव्यवहार गब्देडप्येव म त नित्ये तथेत्याह ॥१४॥ मथानते हेतूनां व्याभचारमान्ङता-गोता इतब घटाभावस्य घटससय
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[१२0 ] न्यायदशनम। [ श्य अध्याय।
कारपविभागेभ्यो हि घटो न भर्वतत। कतम श्रम्य (ड) नित्यत्वम? याडमो कारगविभागभ्या न भवति न तम्य (च) भावा भावन कणाचाननवत्यत ह।। यतप्यन्द्रिगकत्वान मदाप व्याभचरात। ऐन्ट्रयकञ्ज मामान्य नित्यक्जति। यदाप छतकवतपचारादिति तदाप व्याभचरत नित्यव्वानत्यवद्पचारो दृष्ट यथा हि भवात वत्तम्य प्रदश कम्बनम्य प्रतभ एव माकाशम्य प्रदेश आत्मन प्रदश दति भवतीत ॥ १५ ॥
नित्यामत्यत कि तावत्तत्वम१ आरत्मान्तरस्यानुन्पात्त धमकम्याS तमहानानुपपत्तिनित्यत्वम। तच्चाभावे नोपपद्यत मात्न्तु भवात यव तवाऽडत्मानमहासोत यद्गत्वा न भवान न आतु तत्पुनभवात ततानत्य दूव नित्या घराभाव इत्यय पदाथ दति। तत्र यथानातोयक शब्द न तथाजातीयक कार्य्यं कि।ञ्वाव्नत्य दृश्यत इत्वत्यभिचार । १६।।
िलत्वाविनाशित्वान आ मव व्यभिचार शन्न्यकत्व सामान्य व्यनिचार मित्यष्वप्यानत्यय पचारात सखो बात
प्रथमे व्यनिचार पात्मवतति-त्त्वसव पारमाथिकस् भातस्य व मानात्वख भन्क् विभागात। वेकात न व्यामचार। धवस हि स्पत्तिम्त्लत्मम् चात
पतों न व्यामचार। चात्मित्व प्रागभावारवच््किन्नमत्त्व न चेतनभावे द्वात
(ड) ध्वसस। (च) दिनएटस वस्तुन।
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शय अध्याय ] [१२१ ]
यदपि सामान्यनित्यत्वादिति इन्द्रियप्रत्यासत्तिग्राह्य -' मान्द्रयकमिति न तु द्ान्द्रयजन्यप्रतोतिविषयत्वम- सन्तानानुमानविशेषणात् ॥ १७॥ नित्ये व्यभिचार इति प्रक्वतम। नन्ट्रियग्रहणसामथ्या-
मन्तानानुमान तेनानित्यत्वमिति ॥ १७। यदपि नित्येष्वप्यनित्यत्ववदुपचारादिति नैवम।- कारगद्रव्यस्य प्रदेशशब्देनाभिधानाव्नित्य- ध्वप्यव्यभिचार दति ॥ १८॥ आकाशप्रदश आत्मप्रदश इति नावाSडकाशाSSलना कारगद्रव्यमभिधायत यथा कतकस्य। कथ द्यावदमानभ धोयत अविद्यमानता च प्रमागताऽनुपलब्धे, कि ताह तताभिधीयत? सयोगस्याव्याप्यव्वात्तत्वम, परि्किन्नेन ट्रव्यण SSकाशस्य सयोगो नाऽडकाश व्याप्नाति, अव्याप्य व्त्तत इति, तदस्य कतकन दव्यग सामान्य न ह्यामलकयो सयाग आख्तय व्याप्नात सामान्यकता च भक्तिगाकाशस्य प्रदेश इति। अननाऽडत्मप्रदशो व्याख्यात। मयागवच्च शब्दबुद्दादोनाम व्याप्यवृत्तित्वमिति। पशच्ता च तोव्रमन्दता शब्दतत्त्व न भक्िक्वतति। कस्मात् पुन सूतरकारस्यास्रिन्नथ सूत्र न शूयत दृति १-शोलमिद भगवत सूत्रकारस्य बहुष्वधिकर ग्रोप
द्वतोये गामचार मुदरति।-सन्तानस्यातुमानेऽनुमितिकरण लिद् विशषणात् सन्तान सन्तन्यमान एररुधमावाच्न्रत्वन न्ायान तन सामान्यवत्ते मनात विगष यौयमिात H १O। वतोये व्यिचार वारयति।-म्राकाश इ्तुमास्येव प्ाकाश प्रादशक व्यवहारम्तु गोप प्रदभभव्दन कारपद्रव्यस कारणयती द्रव्य स्याभिचानात न
न्या-११
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[१२२ ] न्यायदशनम। [ श्य अ्रध्याय।
दौ पच्ो न व्यवस्थापर्यात तव शास्त्रसिद्धान्तात् तर्वावधारण प्रतिपत्तुमहतीात मन्यते। शास्त्रासद्वान्तस्तु न्यायसमाख्यात मनुमत बहभाग्वमन्मानामति॥१८॥ अथााप खाल्वदमास्त इद नास्तत कुत एतत् प्रतिपत्तव्य मिति१ प्रमागत उपलब्धरनुपलव्ध्ेति। अविद्यमानस्ताई शव्ध 9- प्रागुच्चार गादनुपलब्धेगवरगाद्यनुपलब्वंश्च ।। १६। प्रागुच्चारगाव्नास्त शब्द। कस्मात् १-अनुपलब्धे। सतो- नुपन्नब्धिरावरणादभ्य, एतन्नोपपद्त। कस्मात 9-आवरगा दोनामनपल व्वकारणनामग्रहणात। अननाउडह्ृत शब्दो नोपलभ्यत अतन्निकष्टश्ान्द्रयव्यवधानात इत्येवमादि अनुप नाव्धकारण न गह्यत द्वात मोऽयमनुच्चारिता नास्तोति। रव्चारगसम्य व्यञ्त्रक तदभावात प्रागुच्चारगादनुपलव्धिरात। कामदमुच्चारख नामति १ विवक्षाजनितन प्रयत्नेन कोष्ठास्य आाया परितस्य कछठताल्वादिप्रतिघात यथास्थान प्रति प्ाताइ्वणाभव्यत्िरिति। सयोगविशेषो वै प्रतिघात प्रति वडञ्ज सयोगस्य व्यक्षफलवम, तम्मा्न व्यञ्जकाभावादग्रहगम नाप त्वभावादेवेति। साइयमुच्चाय्यमाण श्रूयत श्रूयमाणक्ा भूत्वा भवतोति अनुमोयत, ऊद्ध चोच्चारगान्न श्रयत म भूत्वा न भवतोति अभावान् शुयत द्वात। कथम १-आवरणाधनुप बव्धार्त्युक्तम्, तस्मादुत्पा ततिराभावधमाक शब्द द्वात ॥ १८॥ चाइडकाश तानपम् ताटशत् वा सायमत्ान् व्याभचान। एव सुखी जात तो मुखागत्यासरवविषय द्वात भाव ॥१८। न चमहेतृनामप्रयोनरवैल िपसबाधकसखा व्याह/-भन्ी याद नित्य स्रान ससारणात् प्रागप्युपलभ्यन म्ावसान्रकषसत्त्वान्न चाव प्रातबन्कमस्तो व्या्ड्द सादग्बात।-श वरमाद् प्रातब्कस्यानप उद्ा सभावान्यात्। दशान्तर
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श्य अध्याय ] [१२३ ]
एवच् सति तत्त्व पाशभिरिवावकिरन्रिदमाह- तदनुपलब्धेरनुपलम्भादावरगोपप्ति ॥ २०॥ यद्यनुपलभ्ादावरण नास्ति सर्द्नुपलभ्नाब्नास्तोति, तस्या अभावादप्रतिषिड्मावरगामित। कथ पुनजानीत भवाबाऽवरगानुपन्ाब्धरुपलभ्यत इति ? कमत्र ज्नेय प्रत्यात्मवेदनोयत्वात् समानम। खल्वावरगमनपलभमान प्रत्यात्ममव सवेदयते नाऽडवरगा मुपलभ् इति। यथा कुदयेनाSडवृतस्याSडवरणमुपलभमान प्रत्यात्ममेव सवेदयत सेयमावरगोपल्धिवदावरणानुपर्नब्धगप सवैद्यैवति। एवञ् मत्यपहतविषयमुत्तरवाक्यमस्तीति ॥ २॥ भ्रभ्यनुज्ञावादेन तृच्यत जातिवादिना।-
नुपपत्तिग्नुपलस्भात् ॥ २१॥
मानमप्यावरणमस्तोति। यद्यभ्यनुजानाति भवाननुपलभ्यमाना
यद्यभ्यनुजानाति न चानुपल्यमाना नाऽडवरणनुपलाब्ध रस्तोति अभ्यनुन्नाय च वदति, नास्यावरणमनुपलभ्भादिति। एतस्मिन्नप्यभ्यनुन्नावादे प्रतिर्पा्त्तिनियमो नोषपद्यत इति ॥।२१॥
शब्दानि्यत्वकन्पन : लघीयसात भाव । १२ । भानत पूवपसपर सवदयम्।-यथा त्या पानरवस्यानुपलखा बभाव दस्य यते तथा भावरयानुपलब्धेरनपलभ्ात् तदभाव भावरथोपलन्धरव स्यात्। याद वा अवरणानपलव्ेरतुपलमऽपि माऽडव रणानुपलव्धेरभाव तदा भवरपस्ानुपमव्वादपपि
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[१२४ ] न्यायदर्शनम। [श्य अध्याय ।
यदपनभ्यत तर्दा्ति यन्नोपलभ्यत तब्रास्तीति। अनुपलश्ाऽउत्मकममदिात व्यवस्थितम। उपलब्धभानश्चानप लाव्धगित। सयमभावत्वान्नापलभ्यते मच्च खन्जावरग तम्योपलब्धा भवितव्यम न चोपलभ्यते तम्मान्नास्तात। तन्न यदुक्त - नाऽडवरगानपपात्तवनपलभ्भात इत्ययुकमिति ॥२२॥ अथ शब्तस्य नित्यत्व प्रतिजानान कम्माड्वेतो प्रतिजानाते ? अरस्पर्शत्वात ॥ २३ ॥ अम्पशमाकाश नित्य दष्टमिति तथा च शब्त इति ॥ २३॥ मा्यमुभयत सव्याभचार कमानिला दृष्टम। अस्पशत्वातत्येतस्य माध्यमाधम्येणोदा हगगम /- न कर्मानित्यतात् ॥ २४ ॥ साध्यवैधम्यणोदाहरगम - नागुर्नित्यत्वात् ॥ २५॥ उभयस्तमिमुदाहरणे व्यभिचाराव्न हेतु २५ ।
जात्यस्तरम
दपलभ्भाभावाऽइम्मकलवान तम्य चे मनसव मुगहत्वान तश्नपभभिगामद्ात भाव ।२२॥
म मत्प्रतिपन लवैवयहेतोग्नकान्तकत्वादिव्याह।-अस्पशव न श्रन्दानत्यत माधक कमाय व्यमचारात॥ २४ । पनकन्तकमपि साधक म्यादवाद्डष्।-धनकान्तिकम्य माधकतवडगो पर
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श्य अध्याय ] [१२ x ]
प्रय र्ताह हेतु,- सम्प्रदानात् ॥ २६॥ सम्प्रदीयमानमवस्थित दृष्ट सम्ादीयते च शब्द
आ्राचाय्येगन्तेवासिने, तस्मात्वस्थित इति ॥ २६॥
यम मम्परदोयते यसमै च तयोरन्तरालेऽवस्थानमस्य क्न लिद्गेनोपलभ्यते१ सम्प्रदीयमानी ह्यवस्थित मम्प्रदातुग्पेति सम्प्रदानज् प्राप्तोतोत्यवर्जनीयमेतत । २ ।
अध्यापनादप्रतिषैध ॥ २८। अध्यापन निङ्गम अमति सम्प्रदानऽ्वध्यापन न स्यादिति॥ २८॥
भदत।-गुरुणा भव्यायविद्याया सम्प्रदानात तथा व प्रब्दस प्राक्न पिद्रमथा च- तावत्कालस्थि चनक पताम्ाम्यत दात व्यायनस
मथासक्मात भाव ॥२६॥ सिद्वान्तसनम्।-शिप्ये उपसब्े गुरुरध्यापयति यदि व शब्तो नित्य स्थान नदा विष्याऽडगममानन्तरमध्यापनात् पूवमाप शब्द उपलभ्येतत्यनुपलब्ा च नााम गम
पत्यतख्वदुक्तो न हेतु ।।२०।। पूवपससवम्।-मदौयहतो प्रतिपैधा न युत्त कुम-अध्यापनान। याद चन्तरालकाल शब्दी न स्यात् कथमध्यापन घटेत : अनुपलाब्धस्त शब्दस्य कगताल्ा घामघातरपव्यञ्र काभावादपपद्यत इवि भाष। बाचाय्यास्तु सवदयमव प्रचनत विर्भानर वमादहतीमदनन्तगलानूप नाअ्रयसथा व छतो स वस्पाभावान
तदन्तरालस् खवत्वध्वसम्यामपल्चि तो न दानमित्यथ। प्रातपेधा ग युक्र। महि दान ममाभिप्रेत कित््वध्यापनम् तथ् विद्यमानस शष्तस्यवेनि
भाव |२८।
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[१२६ ] न्यायदशनम। [ भ्य अध्याय ]
उभयो पच्तयोरन्यतरस्याध्यापनादप्रतिषेध ।२६।
समानमध्यापनमुभया पच्चयो मशयानतिवत्त किमाचाय्यम्थ तदध्यापनम
मध्यापनमन्निङ्ग सम्प्रदानस्येोत । २८॥ अय ताह हेतु -- अभ्यासात्। ३०॥ अभ्यस्यमानमवस्थितं टष्टम पञ्चकत्व पणयतोति रूप मवास्थन पुन पुनदृश्यत भवत प शष्तभ्याम दशकत्वा इधोलोडन एका विशतिकल्वाउघात दात नय उस्थितम्य पुन पुनरुचारगमभ्याम नति॥२॥ नान्य वेऽजन्यासस्योयचागत्। ३> । अनवस्थानप्वभ्यासस्याभिधान भवात 1इनत्यतु भवार तरिनत्यनु भवनात िसनत्यत विसनृत्यत हिरग्निद्दात्र जुहोति द्विभुडक एव व्यभिचारात प्रतिाषद्वहती (छ) अन्यशब्दस्य प्रयोग प्रतिषिध्यत ॥ २१ ।
स न मभवाि। उभयो पचय अध्यापनस समानत्वालत गप। अ्रध्यापन ा
म अन्दमित्यताया साहायकविघातमन म अध्यानन दन यन व स्वत्वध्वसपर खन्वा Sपादनाथ तख स्य्यभाशडनीयम्। न वा दान मुभवात। यहनामकदा सत्व विरोधात पर सवतामासभवाच। श्रप। वृत्याध्यापनादा विवोपतशमा वार्मत भाव मर पूवपचसूयम-यद्ि स्थिर तदय्यसम टष्टम् यथा -- शकत्वी रुप मश्ति ए्व शतकत्वा नुवाकमधौत इत्यव्यासात् स्थय्य शब्दस्येति भाव ॥ २ ॥ उत्तर्यति।-पूवपचो न युक्त। कुत - भरन्यत्व भेदैषि पब्दानाम् क) चम षष समाम।
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श्य अध्याय ] [१२७]
यदिदमन्यदिति मन्यसे तत सार्थेनानन्यत्वादन्यन्न भवति, एवमन्यताया अभाव। तत्र यदुत्रम्-"अरन्यत्वे
शब्दप्रयोग प्रतिषेधत शब्दान्तरप्रयोग प्रतिषिध्यते।- तदभावे नाख्त्यनन्यता तयोरितरेतगपेक्ष सिद्दे॥ ३३ ॥ अन्यस्मादनन्यतामुपपादयति भवान, उपपाद्य चान्यत प्रत्याचष्टे, अनन्यदति च शब्दमनुजानाति, प्रयुडके चानन्य दिति। एतत समामपदम, अन्यशब्दोज्य प्रतिषेधन मह्त समस्यते। याद चात्रोत्तर पद नास्ति, कस्याय प्रतिषेधेन सह समाम १ तस्मात् तयारनन्यान्यशब्दयीरितिवाऽनन्यशब्द इतरमन्यशब्दमपेक्षमाण सिध्यतीति। तत्न यदुतम "अन्यताया अ्रभाव इति एतदयुक्तमिति ॥३२॥ पस्तु तर्हीदानी शब्दस्य नित्यत्वम् १- विनाशकारणानुपलब्धे।। ३४ ।। यदनित्य, तस्य विनाश कारणाङ्गवति, यथा,-लोष्टस्
मध्ययनाव्यासस्य उपचारात् सन्नवात् न ह्यभ्यास स्थय्य साधयात दिजदाति विनत्यतौव्यादी भेनडप्यभ्यासद्शनार्दिति भाव ॥ ३१। चच्चतव अर्गात नासौति कथमन्यत्वेऽप्यम्यासोपपनि ? वति तटस्व पामडते।- यदन्वममदव्यदुचयन तत् खस्मादनन्यादभिन्रम, तत्कथमन्यइदाभद्यीर्विरोधादिति भाव। खासेदस्याऽडवश्यकत्वमिति हदयम् ॥ ३२॥ समाधन्त।-तदभायउन्यत्वस्याभवे अनन्यता पे नाकि तवीभेंदाभेदयी रसिद् परस्रसापेचत्वात् वस्तुतस्तु तयोमध्य इवतरस्य एकतरस् समन्यत्वस्, इतरापेरथसन् इतरतस भेदस ज्ञानापेचासिडियस् साटभत्वादित्यय । ३२।
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[१८] न्यायदशनम । [ श्य अध्याय ]
कारणद्व्यविभागात। शब्दयेदनित्य तस्य विनाशो यस्ात कारणाङ्वति तदुपलभ्येत, न चोपलभ्यत, तस्माव्तित्य इति ॥३४ ॥
कारणानुपनब्धे सतत श्रवणप्रसङ्ग। व्यञ्काभावादयवगामात चेत १ प्रातषिड व्यन्नकम। अथावद्यमानस्य नार्नमित्तम अवगमात विद्यमानस्य निनिमित्तो विनाश दति समानस् दृष्टविरोधो निमित्तमन्तरण विनाश चाश्तवगे चात॥ ३५ ॥ उपलग्यमाने चानुपन्नव्धेरसत्त्वादनपदेश ।३६॥ अुयानव पलस्यमान शन्दस्य विनाशकारग विनाश कारगानुनब्धरसत्वाा त्यनपतम। यस्ाद्विषागी, तस्ा दश्व द्वाताजमनुमानामान चेत मन्तारोपपत्ति उपपादत शन्दमतान मरोगावभागजाच्छव्दराच्छव्दान्तरम्, ततोऽप्यन्यत् ततो ष्यन्यादात। तत्र काय शब्द कारगाशब्दनरुगद्वि प्रातवातित्व्यसयागस्त्वन्त्यस्य शज्दस्य निरोधक। दृष्टहि तिर प्रातवु दर्मा ना। सनाप्यश्रवग शब्दस्य शवसज्ज दूरस्थेनाप्य- मात व्यवधा।। घसटायामामहन्यमानाया तारस्ान तरो मन्दा मन्दतर द्वात अुतिमेद न्रा।शब्दसन्तानोडावच्छेदेन श्रयत, तन्न नित्ये श-। दयटास्थमन्यगत वा्डवस्थित मन्तानतस्यभज्यातिका रण वय यन गुतिस त्ानो, भवतीति।
शूद्धत1- गथ।जित्य दला? म१8 म प्रमुपन्नान्रप्र चमन्ञाम वा। आराद्य वातबन्दोमाह।-यदप्रत्यचत्वादभार्यससिि मदा श्रवय कारगासाप्रत्य वत्वादप्रवय न सागत सततप्रवय्भ्रसद्द उत्यथ। ३५ ॥ इताय वाह।-बतमानादिना उपल्यमाने विनाशकारये मनुपसभ्
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श्य अध्याय ] [१२e ]
शब्दभेदस्ामति शुतिभेद उपपादयितव्य दनि। अनित्ये तु शब्दे घएटास्थ सन्तानवृत्ति सयोगसहकारि निमित्तान्तर सस्कारभूत पटु मन्दमिति वर्त्तत तस्यानुव्वत्या शब्दसन्तानानुदृ्त्ति। पटु मन्दभावाच तीव्रमन्दता शब्दस्य, तत्कृतश् श्रुतिभेद इति ॥३ ६।। न वै निमित्तान्तर सस्कार उपलभ्यते, अनुपनब्ध नास्तीति चेत १- पागिनिमित्तप्रश्नेषाच्छव्दाभावे नानपलब्धि।। ३७।। पागिकमण्ण पाणिघरटाप्रश्नेषो भवति, तस्रिक्व मति शब्दसन्तानो नोपलभ्यते अत त्रवणानुपपत्ति। तत प्रति घातिद्रव्यसयोग शब्दस्य निमित्तान्तर सस्कारभूत निरुणडी त्यनुमोयत। तस्य च निरोधाच्छब्दसन्तानो नोत्पद्यते अन त्पत्ती श्ुतिविच्छेद। यथा,-प्रतिघातद्रव्यमयोगादिषो क्रियानतो सस्कार निरुडे गमनाभाव इति, कम्पमन्तानम्य स्पशनन्द्रियग्राह्यम्य चोपरम कास्यपात्रादिषु पाागमस्नषा निद्ग मम्कारमन्तानस्यत। तस्वमित्तान्तरस्य सस्कारभूतस्य नानुपनब्धिर्गित ॥ ३७ । पभावात वग हतरनपदप पसाधक पासडलवान। नन्यम वत्वन विनाशकल्पनमिति भाव ॥२६। सिद्धान्तन मतान्तरम-शन्दाय्माने काम्यादौ पाणिरपानामतस प्रश्ेषात मयोगाच्कव्भावे उपलभ्यभाने शब्दाभावकारणम्य नानुपलाव्र्ित। यथाशुतानुयानिन परे तृ पाषिरपानमित्तस्य प्रशेष सम्बन्धी यव स पाबज शब्द धथात् उत्तरशब्द तत शब्भावे शब्दध्वसे सति न विनाशकारणानप लाव्धारत्यय इत्याहु। ब्रन्थ त् पूवसवे शक्तस्य तावदेगाऽडत्मक सस्कारविशषा हतुस्तम्य तोव्रतीवतर नन्दमन्दतवत्वाच्कन्लीडाप ताहृय। तव चीत्तरात्तरप्नव्दाना पूवपूव भुक्तनाशकत्व कल्पात दन्यथ। नन ताटशसस्कव एव नासित्यवाSSS पार्गोति।- नानुपन्नन्धि मस्कारसयात शेष। पायनिमत्तम्य प्रश्ननात घयटातिसयोगात सस्कान रूपकारण्भाव र मव्दाभावे शब्दानुपती नानुपलस्ध सम्कारस्वेत्यय इत्याडू ।३०।
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[१३. ] न्यायदर्शनम। [श्य अ्रध्याय।
विनाशकारगानुपलब्धेख्चावस्थाने तन्नित्यत्व-
प्रसड़ ॥ ३८॥ यदि यस्य विनाशकारण नोपलभ्यते, तदवतिष्ठत, श्रव स्थानाच् तस्य नित्यत्व प्रसज्यते। एव यानि खल्विमानि पब्दत्रवगानि शब्दाभिव्यक्तय इति मत न तेषा विनाश कारण भवतोपपादते अनुपपादनादवस्थानम, अरवस्थ नात तषा नित्यत्व प्रसज्यत द्ति। अथ मैवम तहि न विनाशकार जानुपलब्धे शब्दस्यावस्थानान्नत्यत्वमिति ॥३८॥ कम्पसमानाSSश्नयस्य चानुनादस्य पाणिप्रश्नेषात कम्पवत कारणोपरमादभाव, वैयधिकरसे हि प्रतिघातिद्रव्यप्रश्नेषात ममानाधिकरणस्यैवीपरम स्यादिति अस्पर्गत्वादप्रतिषेध ॥३६॥ यादतमाकाशगुण शब्द दति प्रतिषिध्यत अयमनुपपन्
शब्दसन्तानोपपत्तेर स्पर्शव्यापिट्रव्याSSश्रय शब्द दति नायत न कम्पसमानाSSश्य दति ॥३८॥ प्रतिद्रव्य रूपदभि सह मन्रिविष्ट शब्द समानदशो व्यन्यत इति नोपपद्यते, कथम १- विभक्तन्तगोपपत्तेश्च समासे ॥ ४० ॥ सन्तानापपत्तेस्रेति चाय तद्यास्यातम। यदि रुपादय शब्दाश्च प्रतिदव्य ममस्ता समुदिता ताम्म्िन ममासे समुदाये मनु घमटादपागिम नागन्य शब्र नवतकले घगटानाग्रथ एव शस्द स्वादत्या प्रद्ायासाह।-उक्र प्रात्षेधो न सनवात बस्पशववान शब्दाऽडन्रयस्ेति पष।
गुषपूवक काय्यत्वानिित्याशय । ३८ ।
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श्य अध्याय ] [१३१ ]
थो यथाजातीयक सब्रिविष्ट, तस्य तथाजातोयस्यैव ग्रहणन भवितव्यम्, शब्दे रुूपादिवत। तन्र योऽय विभाग एकद्रव्ये नाना रूपा भिन्नशुतयो विधमाण शब्दा अभिव्यज्यमाना श्र्यन्ते यच्च विभागान्तर सरूपा समानशुतय मधम्माण शब्दास्तीव्रमन्द धर्मातया भिन्ना श्रूयन्ते तद्भय नोपपद्यत। नानाभूताना सुत्पद्यमानानामय धर्म, नैकस्य व्यज्यमानस्येति। भ्रस्ति चाय विभागो विभागान्तरज् तेन विभागोपपत्तेम न्याम है, न प्रतिद्व्य रूपादिभि सह शब्द सबरिविष्टो व्यज्यत इति ॥ ४० ॥ द्विविधश्चाय शब्दो वगाऽडत्मका ध्वानमावय, तन्र वर्षा S5त्मनि तावत,- विकागSडदेशोपदेशात् सशय ।। ४१ ॥ दध्यवेति कचिदिकार दत्वाहत्वा यत्वमापद्यत इरति विकार मन्यन्त। केचिदिकारस्य प्रयाग विषयक्वत यदिकार स्थान जहाति तत् यकारस्य प्रयाग ब्रुवत। सहिताया विषन इकारो न प्रयुज्यत, तम्य स्थान यकार प्रयुज्यत स आतश इतति। उभयमिटमुपदिश्यत, तत्न न जायत किं तत्त्वम ? इति। आदेशीपदशस्तत्त्वम।विकारापदश अ्वन्वयस्या ग्र टगाद्विकाराननुमानम सत्यन्वये किव्विन्रिवर्त्तत,किव्निदुप-
पतव व्युत्पादयितुमाइ।-समासे स्पशादिसमुनाये साहत्यन शब्दा वत्तत द्वात न युक्तम् विभक्वन्तरस्य विभागन्तरसय तारमन्दान उपपत। प्रयमय - ए्कम्मिन्रव पज्ञानी तारमन्दादि नानाशन्दा जायन गन्वाSडदयस्तु वनाग्रिसयोम ज परावत्तन्त इति भाव । ४ ॥ समाप्त भ्ब्दानित्यत्वप्रकरगम्। प्रमड्ाककदपरिण्णामवाद दूर्षा त समय प्रदशयति।-"इकी यच्ाच" दत्यादिन। दकाराद्विकारी यकागदिरिति कोचत सार दा व्यापचते पर तु डकारे प्रयोनाव्ें बकार प्रयोक्रव्य इत्यादेवमादिभन्वि वतय वर्षा विकारियो न वेति सभय।
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[१३२ ] न्यायद्शनम। [श्य अ्ध्याय ]
जायत दवात शक्येत विकारोडनुमात, न चान्वयो ग्टह्यते। तम्माद्विकारो नास्तोति। भिन्नकरगयोश्व वगायोरप्रगोगे प्रयो गापपत्ति। वविवृतकरण ूकार दूषतस्पृष्टकरणे यकार। ताविमो पृथक करणाSडख्येन प्रयत्नेनीच्चारणोयो तयोर कस्या प्रयागऽन्यतरस्य प्रयाग उपपन्न इति।अविकार चाविशेष । यत्रमाविकारयकारी न विकारभूतों-यतत यच्कति प्रायस्त इति, दरकार ददमति। यत्र च विकारभूतो-इद्टा दध्याहरति। उभयत्न प्रयोक्कुगविशेषो यत्र श्रोतुश्व श्रुतिरित्यादेशोपपत्ति । * प्रयुज्यमानाग्रहणाच्च नखाल्वकार प्रयुज्यमानो यकारता मापद्यमाना गह्यते कि तर्ह्नि-इकारम्य प्रयोगे यकार प्रयुज्यत तम्मादावकार दति।*अविकार चन शब्दान्वा ख्यानलोप न विक्रियन्ते वगा दति। * न चैतस्मिन पचे गष्दान्वाव्यानस्यामस्भव येन वगाविकार प्रतिद्येमहीति। न खन्ु वगस्य वगणान्तर काय्य न हौकाराद यकार उत्पद्यते यकारदिकार। पृथकस्थानप्रयत्नात्याद्या होम वग्ास्तेषा मन्याऽन्यस्य स्थान प्रयुज्यत इति युक्नम। एतावच्चतत पार गामा विकार स्यात् काय्यकारगभावो वा उभयन्न नास्ति। तम्मान्न मन्ति वर्गवकारा।*वर्णसमुदायविकारानुपर्पात्त वच्च वर्गविकारानुपर्पात्त 'अम्तर्भृ" बुवो वचि' द्ूति यथा वगममुदायस्य धातुनन्तगस्य क्वचिद्विषये वणान्तर समुदायो न परिणामो न कार्ययम, किन्तु शब्दान्तरम्य स्थाने शब्दान्तर प्रयुज्यत, तथा वर्णस्य वग्णन्तरमिति ॥ ४१॥
वकावश सरूपम्य विनाशडविनाश वा द्रव्यान्तरारभकत्वम् यथा-दन्वादे नध्यारभकत्वे बोजातवच्ताद्यारमकत्वख । सुवणादराप लोहाघात मन्यावयव सथा। ।शात प्रवयावनो नाशे सत्यव कुख्डलारभाकत्म् कपालादय सरूपविनाशेन बटावारभकलवम् ॥ ४१ ॥
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शय अ्ध्याय ] द्वितोया्रिकम 1 [e३३ ]
दृतश्न न मन्ति वर्गविकार - प्रक्ृतिविवृद्वी विकारविवृद्दे ॥ ४२ ॥ प्रऋत्यनुविधान विकार्य दृष्टम यकार डस्वदोवानु विधान नास्ति यैन विकारत्वमनुमीयत इति ॥ ४२ ॥ न्यूनसमाधिकोपलब्धेर्विकाग णामहेतु ।।४३ ।। द्रव्यविकारा न्यूना समा अधिकास गह्यन्ते तद्दटय विकारी न्यन स्यादिति। डिविधम्यापि हेतोरभावादमाधन दष्टान्त। अत्र नोदाहरगसाधम्यादवेतुगस्त न वैधम्यात् अनुपमहत् हतुना दष्टान्तो न साधक दति। प्रतिदृशन्त चानियम प्रमन्येत। यथाऽनडुह खानऽखो वाढ़ नियुक्तो न तदिकारो भवति एवमिवर्गास्य स्थान यकार प्रयुक्तो न वकार दति। न चात्र नियमहंतुरसति दष्टान्त साधक, न प्रतिदृष्टन्त इति ॥ ४३ ॥
तत्र विकारनिराकरणय मून्म्।-न वगा विकारिया तथा सति तप्रक्रे वपादानव्ाभिमतस्य विवद्वा विकारस्याप विवदापत्त। महदन्यावगवा Jरखावयावनी महन्न्यववत इम्वेकाराऽडग बगका रापेचया दौध काराऽडबब्धयकारस्य विवृद्वि स्वान्त्यथ। तम्माटाटेशपच शेशनिाति भाव ।४२ ।। पाचिपति।-उक्ो हतून युक्र विकारया प्रक्त्यपन्नय नयानत्वम्य समत् स्याधिकतए् चोपपनेदभनात। यथा तृल कपरिमाणापेनया ताडकारप्तन्तुवल्व ्नरि मान ररुजन्यते। वनकातिममपरिमाख कटकानि य। यथा वा कनाषकनाव केजी बौचाय्या समो वनो। न्यनपरिमायाज बटबोजात महान वटतरुरिति॥ ४३॥ न्या-१२
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[१३४ ] न्यायदर्शनम । [ शय अध्याय।
द्रव्यावकाराताहर गाज्त - नानुल्यप्रक्ृतौना विकारविकल्यात ॥। ४४ ॥ अतुव्याना दव्याग्ा प्रक्तिभावा विकल्पात विकारस प्रकतारनुाववोयत न तु दूवगामनुविधायत यकार तम्ा तनुगाहरण द्रव्यविकार इति ॥ ४४ । द्रव्यविकार्र वैषम्यवद्दर्गाविकारविकल्प॥४५॥ यथा द्रव्यभवन तुन्याया प्रकृतविकारवेषम्यम एव अगभावेन तुन्वाया प्रकतार्वकारविकल्प डात । ४५ ।। न विकारधर्मानुपपत्त ॥ टई । अ प् विकार वमी द्रव्यसाम न्या यतत्पव दृव्य मुद्दा सरगा वा तस्याऽडनमनाडवोपूर्वा व्यहनवत्तत व्यहान्तर च्वापजायत नवकारमाचक्षमहे। न वणसामाच्य किच्कब्दाSडत्माSन्वयो य दवत्व जहाति यत्वच्नाउडपद्यत तत्र यथा सति द्रव्यभावे विकारवैषम्य नानडछोडशी विकान ववक्ारधमानुपपत्ते एवभिवणस्य न यकारे विकारी निकार वमानुपपत्त रिति ॥ ४ ६। ममाघत।-नोक समाहन वुत्रम। अतन्मप्रतरनें भन्नप्रक्रतीन 78 कोग पा विकन्प बलाययर मनदााहनम् न ह बौजान फ्ामत दगनम मव्र द्शगाटकम्। प्रक्रान्तमकवनम तु तवाप्याक्ष य वव त मुपचार कर्नामात भाव।४४ ॥ श - सत्वन का सकतोन 1ग वमोव मम्य पथा 01मA अण वनात न्य वरपि हव्व वशय वविकाय वक्षावस्स अविकन्प ऐकमप्य न नृपपद्रामत्यन । ४५।।
मुमाधत्त ।- नाव द्रव्यावकारतृल्यता वविकारयािक धर्मी प्रतायन् नषा। तहरे भद दति। प्रऊ्ञते तदनुपपति। इावदौघत्वादिना प्रक्ातमन पि का अदाभावात्। ४६
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श्य अध्याय ] [ १३y ]
दूत्च न मन्ति वगविकाग - विकारप्राप्तानामपुनगवत्ते ।। ४9।। अनुपपत्रा पुनवापत्ति। कथम १-पुनरपत्तेव ननुमाना तिति। इकारे यकारत्वमापन्न पुनरिकाग भर्वत न पुनरिकारम्य स्थाने यकावस्य प्रयोगोऽप्रयोगवत्यवानुमान भ्स्त ॥89॥ मुवर्णादीना पुनगपत्तेगहेतु॥। /८ ।। अननुमानाटिति न। इत हयनुमानम मवर्ग कुगडन्नतव हित्वा रुचकत्वसापद्यत रुचकत्व हित्वा पुन कुगडन्त्वमाप द्यन एवमिकारोऽपि यकारत्वमापन्न पुनरिकारे भवतर व्यभिचावाटननुमानम्॥ ४८ ॥ यथा पयो दधिभावमापन्न पुन पयो भर्वात किम ? एव वगाना न पुनगपत्ति। अथ सुवगावत्यनगापत्तिगिति।
अवस्थित सुवर्गा होयमानेनोपजायमानन धमेग धम
यत्वेन धर्मी गह्यते। तम्मात सुवर्गादाह्रय नोपपद्यत दतति ॥ ४2 ।
दूतय म विकार दत्याह।-विकारप्राप्तम्य न पुन प्रक्ृतिरूपता दषा न खन्े दधि वरता पुनरपयाने कारस् र्कारता प्रात्त पुनविकारतामापद्यते त यवलक् पुनराप दषि प्रवेत्यच्यत ्वैत भाव ।। ४७। भाचिपात।-उता हतन यत सुवशादिक हि कटकौभारव विद्वाय कु लतामापन्न पुन कटकतामापद्यत एवति भाव ॥ ४८॥ निशकरोति।-सवणविकारसले हि सुवणत्वादिना प्रक्वतिता न तु कटक
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[१३६ ] न्यायदशनम । [ श्य अध्याय।
वर्गात्वार्व्यातिर का द्वर्गाविकारगामप्रतिषेध ।५०।।। वर्गावकारा आप वग्गत्व न व्यभिचरान्त-यथा सुवगा विकार सुवगात्वमिति॥ ५ ॥ सामान्यवतो धर्मयोगो न सामान्यस्य ।। ५१॥ कुगडन्रुचकी सुवर्गस्य धमो न सुवगात्वस्य एवामकार यक्रारी कस्य नगाऽडत्मनो धमो। वग्पत्व मामान्य न तस्यमो वर्गो भवितुमहंत न च निवत्तमानो धम उपजायमानम्य प्रक्ति तव निवत्तमान इकारो न यकारस्योपजायमानस्व प्रक्कतिरगिति॥ ५१॥ द्तश्व वर्गाविकावानुपपत्ति - नित्यत्वेSविकागदनित्यत्वे चानवस्थानात् ।५२।। नित्या वगणा इत्वेतम्मििन पने इकारयकारो वर्गो इत्य
कम्य विकार १ द्वात। अथानित्या वग्ाद् तपन्त एवमप्यनव स्थान वग्णनाम। किमिदमनवस्थान वगानाम१ उत्पद्य निगेध। उत्पद्य निरुदधे दकार बकार उत्पद्यत यकार चोत्पद्य निरुडे इकार उत्पद्यते दरति क कस्य विकार। तदतदव गह्य सन्धाने मन्धाय वावग्रहे वेदितव्यमिति ॥ ५२॥
वटना तनोभयमाप सुक्सभ न जहति नदिह मुवयतामवहाय कटकता मापवस्य पुन भवणता भवत तना व्याभचार एकात न चवम् प्रक्रत नु दकारता हिला पकारता प्रानस्यापोकारताऽपातवस््यतात दोषा ढयपरिहर डाल भाव ॥४ट ॥ वकार मूलयुकिमाह।-वघ्ाना नियते विकारासन्वादानत्यत् चाचिय
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श्य अध्याय ] द्वितोयाड्गिकम। [१३ ]
नित्यपने तु तावत्समाधि ।- नित्यानामतीन्द्रियत्वान्तद्वर्मविकल्पाच्च वगा- विकारगामप्रतिषेध ।। ५३ ॥ नित्या वग्ा न विक्रयन्त द्वात विप्रातषेध। यथा नित्यत्वे मति दान्द्रयग्ाह्याथ्च वणा। एव नित्यत्व मति किज्ञिन्न विक्रियत वग्णास्तु विक्रियन्त डात। विषाधादहतुस्तडमविकल्प । * नित्यरजायते नापैति अनुपजनापायधमकम। अनित्य पुनरुपजनापाययुक्रम। न चान्तरगोपजनापाया विकार सप्भरवात। तत्यदि वग्गा वाक्रयन्ते ननित्यत्वमप्रा निवत्तत अथ नित्वा विकारवमत्वमषा निवत्तत। मोडय विरुदा हत्वाभामा धमनक्ल्प इाति ॥ ५ ३ ॥ आनत्यपच्े ममाध ।- अनवस्थायित्वे च वर्गोपलब्धिवत्तद्दिका गेपपत्ति।। ५४ ॥ यथाऽनवस्थाायना वणाना श्रवग भवति एवमेषा विकान भवतोति।*असम्बन्धादममर्था अ्रथप्रतिप्रादिका वर्णोप्नन्धन * विकरेग सम्बन्धादसमर्था या मद्यमागा वर्षविकार मनुपपादयेदिति। तब याटगिद गन्धगुणा पृथथिवी एव शब्दसुखादिगुगाडपोति, ताटृगेतङ्ववतोति। न च वर्गोप अत विकारवाती नियत्वमतमालम्बा परिहरति।-विकाराण प्रा बर्घा न युत्त निव्याना धर्मविकल्पाइमस्य नानवधत्वादतान्द्रयत्वम चकारन्करवे समुचोनते यथा हि नित्यानामाकाशादौनामती न्यत्वम र्एन्द्रिरक रडाप गोत्वादौना मित्यत्वम् एवमन्धेषां निव्यानामविकारि डाप वर्णाना विकाित् सानिति ॥ ५३॥
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न्यायदर्शनम। [भय अध्याक
लब्धिवगानहत्ती वग्णन्तवप्रयोगम्य निर्वत्तिका योऽ्यमि वर्ग्नव्ृत्ती यकारस्य प्रयोग यनय वर्शोपल्ा निकत्तत तदा ततोपनभमान दवगा दत्वमापद्यत दरति गह्त। तम्मादवर्वाय व्धिवहेतुर्वण्ावकार स्यातति । ५ ४ । विकारधर्मित्वे नित्दत्वाभनात् कालाकर
तड्रमावकव्पातिति न युक्त प्रातषध। न खलु विकार धमक किाञ्जित नित्यमुपलभ्यत इति। वग्ापलाब्नदति न युता प्रातुषघ। अवग्रहदवि अति प्रयुन्य चिर।मदत्वा तत गहताया प्रयुक वतत चितानवत्त चार्गमवगा यकर प्रगुखमान कस्यविकान इति प्रतोपत कावणाभारान काजाभाव नववनु ग प्रभज्यन डात ॥५५ ॥ इतस क्णवि कागनुपपति/- प्रक य नियमाद्वर्गाविकागगाम । ५६ ।। इूकारस्थान यकार श्ूयत, दध्यत। यकारस्थान खत्वि कागे विधीयत, विध्यन। तद् यदि स्वात् प्रक्ृतिावकारभावरेे
आनत्यतवमालखा स बह।-अनवस्थ पतप वखोना यथा प्रत्यन भवात वव विकाराजप स्यतात भाव।५ृ४॥ उभवानवर्यत -त प्रिषषा युत विकारधमित्व नत्यत्वासभ्भव्ान। विकाग हवब सव्पपरित्यागेन बगालेरा पा। तना व नित्यत्वावराधात् नहिघगने कपालावपाद उत्ववन प्रकन भभ्व त यक रकाने प्रकारातुपलभ। भानयत्वपचदाप प्रतिषधा न युते प्रत्यत्तहि वगय्यइितनय युजात िकारम्तु क नातर मो न युज्यत द्वोति भब्तनन्तरभवत्याद शब्दन तम्य नाभादति मा ५५॥ पवकाणमुपतातारत्य ह।-विकागणा द्वि प्रक्ञतिनियम यथा सौर ध्ो
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श्य अध्याय ] [१३८]
वगणाना, तम्य प्रक्रतिनियम स्यात। दृष्टो विकारधर्मित्व प्रक्वतिनियम इति ॥ ५६॥ अ्नियमे नियमान्नानियम ॥ ५७ ॥ योऽय प्रक्मतरनियम उक्र, म नियतो यथाविषय व्यवस्थित, नियतत्वान्नियम इति भवति एव सत्यनियमो नास्त तत् यदुकत - प्रक्ृत्यनियमात् इत्यतदयुक्त मिति ।५श॥ नियमानियमविगोधादनियमे नियमाच्चा प्रतिषेध॥५८।। ायभ इत्ववाथाभ्यनुत्षा अ्रनियम इति तम्य प्रतिषेध अनुज्ञातनिाषद्याथ्त व्याघाताननथान्तवत्व न भर्वात। अ्रनि यमश्ानयतत्वात्रियमा न भवतोति। नाव्राथम्य तथाभाव प्रतषिध्यत, कि ताह-तथाभूतम्याथम्यानियमशब्दनाभ धोयमानस्य नियतत्वान्नयमशब्द एवोपपद्यत साडय नियमा दनियम प्रतिषेधी न वतीति॥ ५८ ॥
प्रक्लातावकारभाव न त् वपशोन्यम्। प्रक्रते तु दध्यवेत्यादी दकार यकारप्रक्रात विध्वतोत्यादौ तु प्रकार द्रकारप्रक्वातारात भाव ।५ू६॥ पत कननवदो शकत।-अनियमो म उत्र सन युता। कुत-
समाधत्ता- पराननम नियमात वस्वनाऽनि मप्रतिषध कत सन युत। कुत १-नियमानियम गविरोधात। अनियमोह नियगभाव तामन् सत
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[१४० ] न्यायदर्शनम्। [श्य अध्याय।
न चेय वगविकारोपपत्ति परिगामात् काय्यकारणभावाद्दा। कि ताह -
विकागेपपत्तेवर्गाविकार ।।५ू६ ।। स्थान्यादशभावादप्रयोग प्रयोगो विकारशव्दाथ, सभिद्यत, गुणान्तराऽडपत्ति उदात्तस्यानुदात्तभाव दत्येवमादि । उपरमर्दा नाम एकरूपननिवृत्तौ रुपान्तगेपजन। डामो दाघस्य डख । वद्विङ्रस्वम्य दोघ। तयावा पत। लेशा लाघव स्त इत्यस्तर्विकार। ऋरष आगम प्रकृत प्रत्ययस्य वा। एत एव विशेषा विकाश इति। एत एवाउडदभा एत चेोदवकारा उपपद्यन्ते ताह वर्गावकार द्ात। ५ुट॥ ते विभत्न्ता पदम् ॥ ६० ॥ यथादशन विक्वता वगा विभत््यन्ता पदमन्ना भर्वन्ति। विभकिईयो-नामिक्ाख्यातिकी च "ब्राह्मण पर्चात' दृत्युदाहरगम। उपसर्गनिपातास्तर्ह्वि न पदसन्ना लक्षणान्तर
तुशब्द पनरथ एतम्य पुनवषावकारापपत्तेवयविकावस्य एकवसप्रयाग वग्रान्तव प्रयोगस्य उपपत्तेवसविकार द्वात व्यर्वाह्रयत तानेवाऽडह गुपान्तरति।-गुगान्तश 5 पत्ति -वामगि सत्यव धमान्तराडपति यथोदात्तनृतात्तत्वम्। उपमद - धमिनवृत्ती धम्यन्तरप्रयोग यस्तभ। ड्राम - दोघम्य इस्वत्वम। वद्धि - 6 हव्वम्य दोघत्वम्। लैश -अन्य : यथा) सेरकारनीप। श्रेष -पागम। पत
समाप् शब्दपरिण्ामप्रकरगम्। शाव्दबाधे पदजन्यपतार्थोपस्थितर्हेतृत्वात् तद्पपाननाय पदार्थे निरूपणीय प नादौ निरृप्यति।-ते वर्षा विभवयन्ता पदम। बहुत्वमविवाचतम्। विभक्कय सचमनपोचतम्। विभतिय सुत्तिडरूपा। वस्तुतस्तु नेद पद भाब्दबोषोपनाग,
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श्य अध्याय ] [१४१ ]
वाच्यमिति शिष्यते च खलु नामिक्या विभक्नेरव्ययालोप तयो पदमन्ना्थमिति। पदेनाथसम्प्रत्यय दति प्रयोजन, नामपत ज्ाधिक्वत्य परोक्षा, गौरिति पद खाल्वदमुदाहरगम ॥ ६०॥ तदर्थे व्यत्त्याकतिजातिस्निधावुपचागत् सशय ॥ ६१ ॥ अविनाभाववृत्ति सन्निधि अविनाभावेन वत्तमानासु व्यत्याक्वतिजातिषु गौरिति प्रयुज्यत तब न नायत किमन्य तम पदाथ उत मर्व दति ॥ ६१॥ शब्दस्य प्रयोगमामर्थ्यात पदार्थावधारण तम्मात्-
ममासानुबन्धाना व्यक्तावुपचारद्यति ।। ६२।। व्याक्रव पढाथ। कम्मात /-याशब्दप्रभृतोना व्यक्ा वृपचारादुपचार प्रयोग या गोस्तिष्ठति, या गोनिषसति। नद वाक्य जातर भिधायकममेतात्, भदात्त द्रव्याभिधायकम्।
किनु दृदमा काड्रा ववरुपम। अथवाविभानो अन सम्बन् तन हात्तमस पतमिति। दत्यक् पत निरप्य तदयानरपण सङ्न्कृत। यत्त प्रसङ्गान प 1प निरुपम तनपनानरुपणसामतल्वात्त एकमूनस्य प्रकरण्वाभावस।६ । तब पते निदापन तच्यित पताथत निकापतम्। तवाप धालाय्यथस्य आाक्मातरवसवमस्थान वभष जाति गोलवान तामा मनिध सामोस्य मेननम् तव सति उपचारात मानात्। नथा च वयाणा युगपत्पत्ययान किमेतासा प्रत्यक पदान। एत समस्न द्वात सशय हत्यथ। दन भाष्यामात केचित्। वम्तुतम्तु ब्धानिसरसान सूवमेव। तन्घें दवन्यभम्तु भाष्यक्वत पूरणमिात प्रतिभाात । ६१ ॥ तव व्र्याकशत्रिवादिना मतमाह।-पनाथ दवात पाय। उत्तानाम् उपचारान व्यवहारात प्रतुवन् पजननम यथा मौतन्पतीत्यानि व्यवहारो व्यकावन
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[ १४२ ] न्यायदशनम। [श्य अ्ध्याय।
गवा समूह दति भेदात द्रव्याभिधान न जातेग्मेदात।, वैद्याय गा दढ़ातोति द्रव्यम्य त्याग न जातेर्मूर्त्तलात। प्रतिक्रमानुक्रमानुपपत्तेश्। परिग्रह कोणिडन्यस्य गौब्राह्मगास्य गोविति। द्रव्याभिधाने द्रव्यभदात मम्बन्धमेट दति उपपन्नम। अभिव्ना तु जातिर्गित। सद्दगा - तप गावो विशतिगाव इति। भिन्न द्रव्य मझ्रायत न जातिर्भेदातिति। वृष्धि कारगवतो द्व्यस्यावयवोपचय अवर्द्धत गौरिति। निर्वयवा तु जातिगिति। एतनापचया व्याख्यात। वग -शुका गो कपिना गौरिति। द्रव्यस्य गुणयोगो न मामान्यस्य। समाम,-गोहित गो सुखमिात। द्रव्यम्य सुख्ातियोगो न जातेरिति। अनुबन्ध मरुणप्रजनन सन्तान-गोगा जनयनोति। तदत्यत्तिघमत्वाड्रव्ये युत्त न जातो विपय्ययादिति। द्रव्य व्यत्िर्गित हि नाथान्तरम ॥६२। अम्य प्रतिषेध /- न तदनवस्थानात्॥ ६३ ॥ न व्यक्रि पढाथ। कस्मात १-अनवस्थानात। याशन् प्रभातभियो विशिष्यत म गोशब्दाथ या गोस्तष्ठति या गौनिषसति न द्रव्यमाव्रमविशिष्ट जात्या विनाडभिधीयत ककि तहि जातिविाशष्टम् तम्मान्न व्यत्ति पदाथ। एव समूहादिषु द्रष्टव्यम ॥ ६३॥
नान्याऊ्मन्यारमूतववात्। एव गवा समूह गा ददात गा प्रातगरद्भात नश गाव गोब्इन कथा गो कापला गो गहित मौ प्रमृता इत्यादिव्यवह्ागण व्यक्ता वब सभभवान। समाम सम्यगासन सम्बन्धो्नुब्न्ध दन्यय गाराम्त गोमग्व मिचयुन्ाहरणौयम् । ६२ ।। नदपयात-न व्यनी शात वयक्तिमावस्यानवस्थानात कन्यवस्थानात।। ६।
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श्य अरध्याय ] [१४३ ]
यदि न व्यक्ति पदाथ, कथ त्हहिं व्यक्तावुपचार १ दति । निमत्तादतङ्वावेडपपि तदुपचारे दृश्यत खलु।-
चार ।। ६४ ।।
अतङ्वावेऽपि तदपचार इति अतच्छन्दस्य तेन शब्दनाभि धानमति। सडचरगात-यष्टिका भोजनति,र्यष्टिकासहचरिता ब्राह्मपाडाभघोयत दात। स्थानात-मन्चा क्रोशन्तीन, मज्जस्था पुरुषा शभधोयन्त। तादर्थ्यात्-कटायेषु वीररष राद्यशनष कट करोगेत। वत्तात-यमो गजा कुबेरी रजात तदद्वत्तत डवात। मानात-आढकन मिता सक्तव आढकमक्कव इति। धारणात तुनया घृत चन्दन, तुन्नाचन्दनामति। मा्माप्यात्-गङ्गाया गावश्रन्तीति
व्यानमास्य शकला गनादपदात यात्ककपकरुपास्थात स्थात् पता माव वाभश व्यकिवाच्या। तथा व नागहोतवि शेषया र यु वभाष्यमपमदामात द्वात न्याना जातावव शतिरम्त कथ ताह व्यातबाध ? इत्या मसृवम्। व्यक्ती चतड्ावडपि तन्पना मकात्वदपि ततपचार तक्कृवदयपनेप्रा। यथा सहसरणणादती ब्राध्मगानी उ तिपित प्रयोग। सहचरणात मनोगावशेषात यष्टि माजयेन्यव वाष्टवतब्राह्मये याष्टमन्प्रमोग। एव म्यानान्पक्षा कोशन्नीत मसस्थपुरुषे। तादथ्यात कत कटस्यासइ्त्वेम कारकलायागात्। यमस्य
पस्तानृशासनाादत रार्जाि जम दात। मानान चाढकेन मिता सकाब आातक्ञमतव ति। धारणात तुनया छत चन्दन तृम्नाधन्दनमिति। सामोप्याद्ाया गानगरन्तोात। क्म्तव्ययोगान कष शाटक दृत्यताह्रणयम्। प्राय्यसाधनादन्न प्राणण द्वात। भाधिपत्याद्राजवास कुन्तमिति कुलाधिपति प्रतोयते। तथा घ यथा
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[ १४४ ] न्यायदर्शनम्। [शय सध्याय।
दशोऽभिधीयत सन्निकवष्ट। योगात्-कषपेन गगेगा युत्त शाटक, क्ृष इत्यभिघोयत। साधनात-अन्न प्रागा इति। आधपत्यात्-अय पुरुष कुन्नम अय गोवामति। तवाय सहचरसाद्यागाद्वा जातिशब्दो व्यक्की प्रयुज्यत इति॥६४ ॥
यदि गौरित्यस्य पदम्य न व्यक्तिरथ अरस्तुर्ता्ि,-
आक्ृति पदार्थ। कस्माततदपेक्षत्वात सत्त्व व्यवस्थानसिदधे। सत्त्वावयवाना तदवयवानाल् नियता वयू् आ्क्मति तस्या ग्ह्यमाणया सत्त्वव्यवस्थान मिध्यति अय गोग्यमख दति, नाग्ह्यमाणयाम। यस्य ग्रहणात भत्त्वव्यवस्थान सिध्वति त शब्दाऽभिधातुमर्हति सोऽस्याथ दृूति। नेतदपपद्मते यस्य जात्या योगम्तदत्र जातिविशिष्ट अभिधोयत गोगिति। न चावयवव्यहस्य जात्या योग, कस्य तहि -निवतावयवव्यूहस्य द्रव्यस्य तम्मान्नाऽडक्रति पदार्थ।। ६५ ॥
गई्ग पतादड्गातीर त्वानिना बोध तथा गोपनादता गोलवशिष्स वयत लवया बोध। एतन युगपनव्रात्त यविराष एकपदाथय। परस्रानन्वव प्रत्यत्। गात्वत्वन रपय पगतग्रहान तयवानास्थात पता निष्कारणपदार्थापास्थतिगय नासोति मन्तलम न ६४ ॥ आक्ृतिरव भक्वत मतमपन्वस्यति।-आ्रक्मात पदाथ कुत १-सखस मराम् गव्ात व्यवस्थानमिध्धे
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श्य अध्याय ] [ १४x ]
अ्रस्तु तड्नि जाति पदाथ १-
वके जाति ॥ ६ ६ ॥ जाति पदाथ। कम्मात १-व्यक्ताक्कतियुत्तपि मृह्वके प्राच्तमदोनामप्रमग्गादिति। गा प्राज्ञय गामानय ग गनि नतानि मृद्गवक प्रयुख्धन्ते। कम्मात १- जातरभावात। प्रास्तह तत व्याक् अख्याक्वात यदभावात तत्नामम्रत्यय म पदाथ द्वान ॥ ६६।। न ाSSकृवतिव्यतय पेचषत्वाज्जात्यभिव्यते ॥ ६७। जातगाभय्य कराकातचकी उपदत नाग्टह्यमामायामाऊ्वती व्यती जातिमाल शुद्ध ग्टह्यत तस्ान्न जाति पदाथ इति ॥६७। न व पदाथन न भवित शक् क खत्विदानी पदार्थ ? दति/- व्यत्त्याकृतिजातयस्तु पदार्थ ।। ६८ ॥ वुशन्दा विशेषणार्थ। कि विाशष्यत -प्रधानाङ्गभावस्य अ्रनियमेन पदाथत्वमिति। यदा हि मेनविवचा विशषगातस्व
कलतसदषयति।-मद्रवक व्यक्याक्तियुक्तप प्रोचयालौनामप्रसङ्गाउ्जाति पदाथ
केवन्नय्य ताक तम निपय निराक्कत्य कवल जाततपव निराकशाता-न-जातमाव न पदाथ नात्यमित्यतेज्ञतशब्दबोधस्य ब्राक्मातव्यत्यपसत्वात आ्ऊ्कतिव्यतिविषय वात्वानयमात तयोगधि वाय्यत्वमावश्यक शत्ति विना तञ्ञ्वानासभवात। नच
तथा सात गवातिपिदस घटत्वादावपि शातपसङ्ग,त् तम्मात् पद स्ववाच्यमेवोप स्थापयात । ६०। दरतश वयाषामपि वाघ्यतव सिद्धमित्याह।-दननव्दनक कमानपदायतव्यव
न्या-१२
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[ १४६ ] न्यायदर्शनम्। [ श्य भध्याय।
तदा व्यकति प्रधानम अद्गन्तु जात्याऊ्ततो। यदा तु भैदोऽविव वत मामान्यगति तदा जाति प्रधानम अङ्गन्तु व्यत्या हवतो सोऊतत। तदेतदड्डुन्न प्रयोगेषु आ्रक्मतस्तु प्रधानभाव उत्प्रचितव्य ॥६८ ॥ कथ पुनन्नायत नाना व्यक्याक्कतिजातय१ द्रति।- लच्षपभदात तव तावत्- व्यक्तिर्गुगविशेषाऽडश्रयो सूर्तति ॥।६६॥ व्यज्यत इति व्यत्तिरिन्द्रियग्राह्यति न सव द्रव्य व्यक्ति। यो गुगवशषाया स्पान्ताना गुरुत्ववनत्वद्रवत्वसस्कारगाम व्याापन पारमागास्याउश्यो यथामभव तड्ट्रव्यम मृात्त मृच्छितावयवत्वाादात॥ ६८।
कर पताथ इत्यकवचनन्तुतसृष्वप्यकव श्ाक्कशित सूचनाय कदाचत कस्याच पास्ति स्यात्। आकस्तुन्यत्व व्यकावशव्यत्ात प्राधान्यम्
वायम तथानियमे मानाभावात् ददगवादिपदमभप्रत्य तन पमािपट्ख जात्यवाचकलवडाप न चात। आतिपद या धमपर तथव सघपख वच्य माषत्वात् ॥ ६८। तब के व्यक्ष्यादय पत्याकाड्डायामाह।-यद्याप वव्यादरवि व्यकतितात् पमयत्वमव व्यततित्व तथाडाप जात्याऊ्वतिभक्तिविषयव्यक्तरिद लघणम् तथा च गृषावशषा नात्याप्ञातसमानाचिकरणी गुख सड्यादिभिय्न तदाश्रय मूति व्याक्रारात सुमानाथकमित्यथ। परेतु-गुथा रपादय भषा सविभषा उत्वपणान्य त सहित पाश्या द्रव्य तन जात्यात्रयी व्यततिरित्याशय। विशव लचयमार मृतरित।-मृात्त ससानविभष तद्दान्" दत्याडु। धव प मध्यपदलापा समास इत्याभय। चन्य तु-व्यतलचय मूचिशित। सव का? दवाह गुपावशषाऽश्रय इति।-गृपविभषसव्कित्नपारमायास्य मात्रय इत्यव
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श्य भध्याय ] द्वितोयाड्डिकम। [४७]
यया जातिर्जातिलिङ्गानि च प्रख्यायन्ते तामाक्ृति विद्यात। मा च नानामत्वाना तदवयवानाज्ज नियताहूहादिति। नियतावयवव्यूहा खलु सत्त्वावयवा जातिनिङ्गम। शिरमा पादेन गामनुमिन्वन्ति। नियत च सत्वावयवाना व्यूहे मति गोत्व प्रख्यायत इति। अनाककतिव्यद्याया जाती मृत सुवग रजतममित्येवमादिष्वाक्कतिर्निवर्त्तत, जहाति पदाथत्वमिति ।।। समानप्रसवाऽडत्मिका जाति ।। ७१। या समाना बुद्धि प्रसूत भिन्नेष्वधिकरगोषु यया बहनात- रतरतो न व्यावर्त्तन्ते योऽर्थोडनकत प्रत्ययानुष्टात्तनिमित्त तत मामान्यम यच्च कषान्निद्वेद कुतश्निद्वेद करोति तन सामान्यावशेषो जातिरिति ॥ ७१॥ दति वात्स्यायनोये न्यायभाष्ये द्वितोयाध्यायस्य द्वितीयसा्किकम। ममाप्तश्चाय द्वितोयोऽध्याय । साक्कात लचरति।- जतलिङ्गामत्याख्या। यथ्या नानर्गोलवार्दह्ि माम्ान सस्थानविभषो लिङ्ग तथ्य च परम्परया द्रव्यहान्तत्वम्। "जातिद्वव्यसमशायकारपाता अककादका लिङ्ग धर्मो यस्या सेत्यथ इति कशित्॥ ॥ जात नव्षमत।-समानाSडकारक प्रसवी बाइजननम नात्मा स्वरूप यस्। सा तथा व समानाSडकर बुद्धिजनन ग्यतमय। समानाSकबुडजननरवक विभषी नित्यानेकसमवेतकपाथ इत्यपि वदन्ति। दृदन्तु बोष्यम्-एव सत्यात्रत्यविष बका गवानपदात् न भम्बबोध अनुभनबलन तथव कार्यकारणभावकल्पनात् भन्यया लाववाद्वापदम्य गोत्वविाशिष्टे शक्तिरैव स्यार्दिति ।७॥ समाप्त शब्दभकरिपरीचाप्रकरणम्।
प्रमाणपरौचख नाम द्वितीयाध्यायव्त्ति समाप्ता ॥२।
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[ १४८] न्यायदशनम। [ शय सध्याय।
हृतीयाध्यायस्य प्रथमाड्िकम्।
परोचितानि प्रमाखानि, प्रमेयमिदानी पराच्यते तच्ा S5त्मदि इत्यात्मा विविच्यत। कि दहान्द्रयमनोबुाद्दवेदना सद्वातमात्रमात्मा १ आरहोस्वित्तव्ातरिक्र १ इतति। कुत मशय 9-व्यपदेशस्योभयथासिद्। क्रयाकरगयी कत्रा सम्बन्धस्याभिधान व्यपदप । म द्विविध,-अवयवेन समुतायस्य -मूलवृक्षास्तष्ठात स्तसे प्रामातो ध्रियत दतति। अ्न्यनान्यस्य व्यपतश -परशुना व्ात प्रतोपन पखति। अ््ति चाय व्यपतश -चन्तुषा पश्यति मामा विज्ञानाति बुद्दा विचारयति शरोर्ण सुखदु खमनुभवतोति। तत नावधाय्यत किमवयवन समुदायम्य दह्दादिमङ्कातस्य अ्रथान्यनान्यम्य तद्मतिरिकस्य वा इति। अन्येनायमन्यस्य व्यपदश। कस्मात ? -
दशनन स्वित्था गृह्ोत सपशननापि सोडर्या ग्वद्यते यम हमद्रान्तन्नक्षुषा त स्पशननाप सपृशमोति। यन्ास्पार्स्न स्पशनेन त चक्षुषा पश्यामोति। एकविषयाविमी प्रत्ययावेक कर्त्तृकी प्रतिसन्धोयेत। न च सङ्वातकत्तकी नान्द्रयेशैक
तरुप्रभाततुल्यता भवात यत्कपामन्तरा वदीय करुणाकपात्तरात मोइजाल जन। विधाय हृदयामुज कुचिरवाकप्रचाराय ता नमामि परदेवता सततमेव वागोमहम्। बथावसरत प्रमेयष परोचणौयेषु प्रथमाद्दिट्टमात्मादिषटक दतीये परीकषण यम्
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शय मध्याय ] [ १४e ]
कर्त्तको। तद्योऽसो चन्षुषा त्वागन्द्रियेगा चेकाथस्य मड्ड ह्ोता भिव्ननिमत्तावनव्यकत्तुको प्रत्वयो ममानावषया प्रतिमन्दधाति मोडथान्तरभूत आत्मा। कथ पुननान्द्रपर क कत्तृको १-इन्द्रिय खलु स स विषयग्रहगमनन्यकत्तृक प्रति मन्धातुमर्हति नेन्द्रियान्तरस्य विषयान्तवग्रहणमिति। कथ न सद्वातकर्त्तृको १- एक खल्वय भिन्ननमित्तो स्वाऽडन्मकर्नृका प्रत्ययो प्रनमहिती वेदयते, न मद्वात कस्मात१-अरनिवृत्त हि सङ्कात प्रत्येकम विषयान्तरग्रहणस्याप्रतिसन्धानमिन्दिया न्तरगैवेति ॥ १ ॥ न विषयव्यवस्थानात ॥ २ ॥ न दहातिमद्वातादन्यश्ेतन। कस्मात 9-विषयव्यवस्थानात। व्यवस्थितविषयागौन्द्रियागि। चक्षुष्यमति रूप ग्ह्यत मात चग्ह्यते। यञ्च यम्मिन्नसतति न भवति मति भर्वात तम्य तदिति वजञायते। तस्ाद्पग्रहग चक्षुष चत्त रूप पर्श्यात। एव घ्रागादिष्वपोति। तानीन्द्रियागोमानि सस्विषयग्रहगा च्तनान दन्द्रियाणा भावाभावयोविषय ग्रहणस्य तथाभावात । एव सति किमन्येन चेतनेन -सन्दिग्धत्वाद हेतु । ा यार्यर््ममिि न्द्रि याणा भावाभावयोविषय ग्रहगास्य तथाभाव, स कि चेतनत्वा
तन्र च व प्रकरणानि। तवाऽदाविन्दियभेदप्रकरणम्। तवान्द्रव नामवत्र वात मशये करगलेन सिद्धानमान्याणा चतन्यमस्तु लाघवात् तथा चाउडम्मशकस्य न तब्निराकरणा मूवम्।-एकस्व दशनस्पशनाम्यामथस्य गहणपात नमनस्पन्न मानावशयी (ततोया च प्रकार)। तन वासुषस्ाश्नमीभयवत्वेनकम्य धामक् प्रतिमन्धानादित्यर्थ। तथा च यीह घटमद्रास सोऽइ सृभामोत्नुभवालान्मा दन्द्रियव्यतिारत् एक इति ॥१॥
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[१५० ] न्यायदर्श नम । [शय अध्याय।
दाहोखिवच्चेतनपकरगाना ग्रहगनिमत्तववातनि मान्दह्यत चेत नोपक रगल्दऽपान्द्रियण्ा ग्रय्गनिामत्तत्वा्वावतुमर्ित॥ यच्चाक विषयव्यवस्था नत द्रात-
याि खल्वकमिन्द्रियमव्यवास्थतविषय सवन्त सववषय ग्राहि चेतन स्यात कस्ततोऽन्यत चेतनमनुमातु शक्रुयात यम्मात्त व्यवस्थितनिषयागो्रियागि तम्मात्तम्या न्यवतन मवज् सवविषयग्राहो विषयव्यवस्थितिम तोनानमोयत ।
रस गध वा पूवग्ट छोतमनुमिनाति गन्वप्रतिमातो च रूप रमाननुमिनोत। एव वविषयपषेदपि वाच्यम। कप दृष्ट्रा गन्ध जिघ्रति घ्रात्वा च गन्न रूप पश्ात तत्वमानयत पव्याय मवविषयग्रसामकचेतनाविकरगमनव्यक्तक प्रात सन्न्ते प्रत्यक्षानमानाSडगममप्यान प्रत्ययाय नानाविषयान स्वाSडन्मकत्तकान प्रातमन्धाय वेन्यत मवाथवषयज शास्त्र प्रतिपद्यत अय्रमविपयभूत म्रात्म्य क्रमभाविना वगान सुत्वा पढवाकाभाव प्रतिमन्धाय शन्ताश्व्यनस्थात्त बुध्यमानाऽनक
जम्य जया व्यवस्थानुपन न शाक्या पारक्रमितुम। आ्र्क्ृति
अव शह्धते।-वसम्माटोना पस्पनतावष्यतवाच राद् गघ्ुषात समवानित्वम दयस्राभतप्रन्य मात्त त भाव ।२॥
रिक्रा त्मकुन्पना त नथ शय भाव -नात द्वयाया तत्ा घथकप्रयस प्रात समवा उव वाच्च ने तु प्रत्यचत्वावाच्कन्न प्रति अनामत्यादजनकर तुावान मिकामाव तेन जन्यचानवारवच्किन्नजनकताडवच्कदकमात्मत्वम् चचुरा दब नित्यत्वा
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३य अध्याय ] प्रथमाड्निकम। [१५१ ]
माचन्तूताहतम तत्न यदक्तामान्ट्रयचेतन्य मति किमन्यन तनन तत्युक्त भर्वत ॥ ३ ॥ इतय दहाटिययतिवत्र आत्मा न देहादिसद्वातमात्रम।- शगेरदाहै पातकाभावात॥ ४ ॥ शरोरग्रहगेन शवर्वन्द्रियबुद्धिवेदनामङ्कात प्राासभृती मनगते प्रागिभूत शरार दहत प्रगहिमाकत पाप पातक मित्यच्यत तस्याभाव तत्फलेन कत्तुरसम्बन्धात अकत्तस सम्बन्धात्। पगेगन्द्रयबुद्धिवेदनाप्रबन्ध खत्वन्य सङ्वात उत्प द्यतऽन्या निरुध्यत उत्पादानगधनत्तताभूत प्रबन्धा नाव्यत
ह्यमा प्रस्यायत दूति। ण्व मात या दहतरद्वात प्रागभूता िसा कगत नामो हमाफलेन मम्बव्यत, यथ सम्बध्यत, न ननडसा कता। तदव मत्वमेद कतहानमकताभ्याम प्रमज्यत सति तु मत्वोत्वात सत्वानगध चाकमनामत्त म्त्वमग प्राप्नाति तव मुत्यर्था ब्रह्मच्य्यवामी न स्यात। तदयाद दहातिमद्वातमाचर स्यात शवरदाहे पातक न
नित्य इति ॥४ ॥
दात्मनश् नव्यताया वन्यमाणत्वास् शवनागदाप सग्याज्नुग म गद्यप्रतान नानयाऽडमवादो युग्यत दवात॥ ३ ॥ समापमिन्द्रियभेदप्रकरगम् । नन गोह जानामोव्याति पतोतवम्त् पशोरमात्मत्याशङ्मा दूषत।-
पातकाभावात कितरभावप्रसङ्गा। तथा पात्तरकालकखनकन स्ान्त नथा शगरना सन कनताव पावोरविनष पातक न
11 भृतचतन्यवा ना पातकादिक नापरते तथापि तस्य
प्साध्याद न पूवपाचत्वादा न षत भाव ।8।
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[१५२ ] न्यायदर्शनम। [भय अध्याय।
तदभाव सात्मकप्रदाहैऽपि तव्नित्यत्वात्॥ ५ ॥ यम्यापि नित्यनाSडत्मना सात्मक शगेर दह्यत, तम्यााप शरोरदाहे पातक न भवद्ग्धु कस्मात् -नित्यत्वादातन न जातु कश्विव्नित्य हिसतुमर्हति। अथाहस्यत, नत्यत्वमस्य न भर्वात। मेयमेकस्िन पच्ते हिसा निष्फला अन्यस्मिसत्वनुप पन्नेति ॥ ५ ।। न का र्याऽडश्रयकर्त्तृबधात ॥ ६॥ न ब्रूमो नित्यस्य सत्त्वम्य बधो हिसा अपि त्वनुच्कित्ति धमकम्य सत्त्वस्य काय्याSSन्यस्य शवारस्य सवविपयोपलव्धेख् कत्तृग्ामुपधात घौड़ा वेकव्वयलक्षग प्रबन्धाच्केदो वा प्रमापगलक्षगो वा बधा हिसात। काय्यन्तु सुखद खमवेतन
रस्य स्वविषयापलव्धेध कत्तगामिन्द्रयागा बधो हिमा, न नित्यम्याऽडत्मन। तत्र यदुक- तदभाव सात्मकप्रताह्डि ताव्नत्यत्वात इत्येतदयुक्तम यम्य सत्त्वाच्कदा हिमा, तम्य कनहानमझताभ्यागमशनत दाष। एतावच्चेतत स्यात। सत्त्वो कदो वा हिमा शरनु्कित्तिधमकस्य सत्त्वम्य काय्याSSश्रय
तशात तृष्यनाष इत्याथडत-भाव पातकामाव सात्मक गगस प्रहप प्रसती तान्रसयत्वात उम्य अ ममन निन्यवातनित्यत्वन निविकारत्वम् तन जन्यधमानाथयत्वमाभमतम् दति वे चत्। ताम्नन्यत्वात रोरनाश शनौर विमिटटाडत्मनागसय निग्तत्वात इन्यपि काशत।क सात्मकशरोरनाश्डाप इन्त पातकाभाव स्थात तस्याउडत्मनोनित्यत्वन तम्राशकत्वाभावात् ॥५॥ परिहरति।-काव्याSडश्रयस्य चट्टाऽडप्रनम् कम कवक्कदकस मरोरसव नाभ न ल्वाम्मन द्वति न पातकाभाव या-न हन्तु पातकाभाव काय्याऽत्रम कततबधन् भरौरस नाशात् ब्राह्मणलवादे शरोरहात्तववात्तम्राणाव पापोप्पात्तरित
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श्य भध्याय ] प्रथमाक्किकम। [१५३ ]
कर्त्तृबधो वा न कन्पान्तरमन्यदस्ति सत्त्वोच्केदय्व प्रतिषह, तव किमन्यच्केष यथाभूतमिति। अघवा काय्याSडश्नयकप्र बधादिति काय्याSSश्नया देहेन्ट्रियबुद्धिसद्वाता ित्यस्थाSत्मन तव सुखदुखप्रतमवेदन तस्यधष्ठानमाश्रय तदायतन तङ्गवति न ततोऽन्यदिति स एव कत्ता तान्नामत्ता हि 4ुखट खमवेदनस्य निर्वृत्ति न तमन्तरगोति, तस्य बध उपघात पोडा प्रमापग वा हिसा, न नित्यतवेनाऽडन्मो चद। तत्र यदक् - तदभाव सात्मकप्रदाहैडपि तान्नत्यत्वात एतननेति॥ ६ै। द्वतय देहादिव्यतिवित्ता आ्रत्मा/- सव्यदृष्टस्येतरेगा प्रत्यभिज्ञानात् ॥ ।
पूवापग्योविज्ञानयोरकविषये प्रतिसन्िज्जान प्रत्यभि ज्ञान तमवैताह पश्यामि यमन्नासिष, म ण्वायमथ दूति। मव्येन चन्षुषा दृष्टम्यतरगाप चक्षुषा प्रत्यभिन्ञानात, यमद्राक्ष तमवेतार्व पश्यामोति। दृन्द्रियचेतन्ये तु नान्यदृष्ट मन्य प्रत्यभिजञानातोति प्रत्यभिन्नाऽनुपपत्ति। अस्ति त्विद प्रत्यभिज्ञान तस्मादिन्द्रियव्यतिरिक्रिवेतन ।।७।।
भाव। वम्तुतम्तु पपूवभरोगवाच्कम्रप्रापासयोगड तकोन्पात्तवन शरोगवाक्कत्रप्राप् सयागध्वमविशषाऽSत्मक मरगभप्या अन सन्भवात बन्यथा भवीराविनाशिनो बन्न मुखानरोध तोह साल न म्यात्। पातकानभ्यपम न्चा्वा कादिमत शरोरभदसाधनन्तु वत्यमाणयुत्रिभिरिति ध्येजम् ॥ ६ ॥ समाप्त देहभेदप्रकरगम् । प्रसन्नाच्चसुरवतप्रकरणमारमने।-वामेन पन्षुषा टष्टस्य दाययेन चक्षुषा स्थिग Sत्मासाडरिति केषाचिन्मतम् न्यासH O H
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[ १५४ ] न्यायदशनम्। [ शय अ्रध्याय।
नैकस्मिव्नासाSम्घिव्यवहिते द्वित्वाभिमानात् ।८" एकमिद चक्ष मध्ये नासाऽस्थिव्यवहितम, तस्यान्ती गह्यमागौ द्वित्वाभिमान प्रयोजयत, मध्यव्यवाहितस्य दोघ स्येव ॥ ८ ॥
एकस्मिव्रपहते चोडते वा चक्षषि द्वितीयमवतिष्ठत चक्ष विषयग्रहगान्निङ्गम। तस्मादेकस्य व्यवधानानुपर्पात्त । ८ ।
एकविनाश द्वितीयाविनाशादत्यहेतु, कम्ात -हचस्य हि कासुचिच्छाखासु किव्नासूपन्भ्यत एव वक्त ॥१०॥ दृष्टान्तविगेधादप्रतिषैध ॥ ११ ।। न कारणद्रव्यस्य विभागे कार्य्यद्रव्यमवतिष्ठत नित्यत्व प्रमङ्गात। बहुष्ववयविषु यस्य कारगानि विभन्ञानि तस्य विनाश। येषा कारगान्यविभक्कानि, तान्यवतिष्ठन्त। अथवा दृश्यमानार्थविरोधो दृष्टान्तविरोध मृतस्य हि शिर कपाले द्वाववटी नासाऽस्थिव्यवहिती चक्षष स्थान भेदन गह्यते न चैतदकस्पमिरिवासाऽस्थिव्यवहिते सभवति। अरथवेंकविनाशस्या
किव्नतया इतप्रत्ययी भम इत्यथ ॥८। भतपात।-चततुर का एकचचुर्नाश्रेऽन्वत्व म्यादिति भाव । ट । पवेक्कनभी परिहरति।-पवयवस्य शाखान नाथ्डप्यवयवनी वक्तस्य प्रत्यभि जञानाव्ाधयत्माशे सववाव्यविनाशमयम तथा चकनाथडाप नान्वत्वमिति॥ १। एक दाशमतम्य पूर्वीक्ाडचेपस्य च समाधानाय सिद्धानतन सूतम् -उत्तप्रतिषेधी नयुक्र टष्टन्तम्य विरोधादयुलवात्। न दि माखाक्कदे सब्तस्तिष्ठति तथा सति तच स्या नाभ प्रसङ्वात पतोडवस्थितावयवस्त्र खण्डवची नत्तर्नैंकदशिमत युश्नम्।
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शय अध्याय ] प्रथमाड्टिकम। [ १५५]
नियमाहाविमावर्थौ तौ च पृथग वरणोपघाती अनुमोयेते विभिन्नाविति अरवपोडनाच्चैकस्य चन्षुषो रश्मिविषयसत्रि कर्षस्य मेदात् दश्यभेद द्वव ग्टह्यते तज्चैकत्वे विरुध्यते श्रव पोडन निवत्तो चाभिन्नप्रतिसन्धानामति तस्ादेकस्य व्यवधा नानुपर्पात्त । ११ । अनुमीयत चाय दहहादिसद्वातव्यतिरित्नसेतन दति/- दन्द्रियान्तरविकारात ॥ १२ ॥ कस्याचदम्ववफन्स्य ग्हीततद्रमसाहचर्य्ये रुपे गन्व वा कनचिदिन्द्रियेण ग्टह्यमागे रसनस्योन्द्रयान्तरस्व विकार वमानुसाती रमगद्िप्रवत्तितो दन्तोदकसप्रवभूतो ग्ह्यत, तस्ये न्द्रियचैतन्यऽनुपपात नान्यदृष्टमन्य स्परति ॥१२।। न स्मृत स्मर्तव्यविषयत्वात ॥ १३ ॥ स्पतिनाम धर्मो निमित्तादुत्पद्यते तस्या स्मर्त्तव्यो विषय तत्कृत इन्द्रियान्तरविकार, नाऽडत्मऊत इति ॥ १३ ॥
एननक ना श द्तोवाविनाशद्वेटसाधनमपि प्रयुक्षम् चतुर्नाशपि गावका नरावाच्कन्नावयव सम्षनु समभवात। उत्यस्न साघवाच्न्नवडतमिति टौका ज्वरससविड्वम। पर त - चसुर्देतमेव सूवाथ मन्यमाना व्याघघत सिद्धान्तिन जूव -सव्यति। प्रङ्गत-नकसतियिति। समाधने-एकेति। पदत-भवयवेति। निरकरोति-दशनेति। शाखानाथ वचनाशाऽवश्यकतात् इष्टान्तोन युत्त वह्ा- टष्टन्स्य गोलवभेन्स विराधादन्यथाऽनुपपस्नतवात् टष्ट हि मतस चचुर्गधिष्ठानभोखकषय भेदेमवीपलभ्यत इति वर्दन्ति॥ ११ ॥ भात्मन दन्द्रयमदे युक्यन्तरमाद्ट।-चिरवित्ादयसदव्ये टष्टे तद्रसख्रणा
भाचिपति।-सिदि अत्षव्यविरषयधोति नियम तस्याय दननादिना सामानाधिकरकय मामाभावात्। चक्ष वा विषयतरयव सामामाविवरसमिति भाब ।१२!
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[ १५4 ] न्यायदशनम् । [ श्य अध्याय।
तदात्मगुगसङ्गावादप्रतिषेध।। १४ ।। तस्या आरत्मगुगत्वे सति मद्भावादप्रतिषेध आरत्मन यदि स्मृतिरात्मगुगा ए्व सति स्मृतिरूपपद्यत नान्यदष्टमन्य सर तोति। दृन्द्रियचेतन्ये तु नानाकत्तृकाणण विषयग्रहयानाम प्रतिमन्धानम प्रातमन्धान वा विषयव्यनस्थाऽनपर्पात्त। एकस्तु चेतनोऽनेकाथदशी भिव्ननिमित्त पूर्वटृष्टमथम अनुमभरतोति एकस्यानकाघतार्श्नो दशनप्रातमन्धानात् म्मृसरत्मगुगत्व मात मद्धाव विपर्य्ज चानुपपान। स्मयापया प्रागभृता मत्र सयहागा श्रात्मलििङ्गम। उताकर्णमार्प मन्यान्तरा वकार दति । १४ । अर्मवद गानाच्च स्मतिविषयस्य॥ १५ । अस शव स्मातनिषयामदसुच्यत न सात स्त्तव्य विषनत्वाति। वैस स्पतिरम्ह्यमागोऽथ अभ्ामिषमहममु मशामति प्तम्या पातज्ञानविभिष्ट प्रवज्नातोऽयो विषय, नाथमात्रम। नातवानहममुमथम अमानर्था मया प्ात, नातम अ्रमिन मम ज्ञानमभूदिनि चतुविधमततवाक्य सनविष: अापक ममानाथम। मवत खलु माता प्ान पयघ् गृहन: ग-यन,ष्या स्प्ति (ज) तया वोगि ज्ञानान्ये कस्मिन प्राशज व समानकत्तकायि न नानाकतृकायि नाकत्ता। । -एककत्तकागि। बद् तममुमथ
समावत्त २ 1ग न क्ठ धमिवाषकमानन अतेरात्मगुथत्वात्रि छगभौत्यनभवान विषयनिष्ठकार्य्यकारयभावे चवस्य मानानवस्य सारणाउप ।।। आात । १४ । विषसर्सा सातज्राना का तममनाउत स्वार्दितयामड्ड समाघन्ते ।-चपरि
(क) प्रत्याभ जति वाबत।
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शय अध्याय ] प्रथमान्िकम 1 [१५७ ]
यमेवेतहि पश्यामि, अद्राक्षमिात दशन, दशनसविच्च न खल्व सविदित सवे तशन स्यादेतटद्र चमिति। त खल्वेत दे ज्ञान। यमवैताईन पश्यामोति ततीय न्वानम। एवमेकोर्ऽर्थस्तिरिभिज्ञान यंज्यमानो नाकत्तक न नानाकर्तृक कि त्हि १-एककत्तक दति। मोडय विद्यमान नापाऽश्र प्रतिाषध्यत नासत्यात्मा स्पत सत्तव्यविषयत्वादिति। न चे सपतिमात समर्त्तव्यमात्रावषय वा दत खल ज्ञानप्रति मन्धानवत स्मतिप्रातसन्धानम पकस्य सर्वषयत्वात्। एकाडय ज्ञाता मववषय सानि शनन प्रातमन्धत्ते, अ्रमुमत् जाम्यामि अमुमथ विजानामि अ्रमुमथमन्तामिषम अ्मुमथ जिज्षा ममानसितमज्ञा वाउध्यवस्यत्यन्नासििषमिति। एव स्पति मपिक लविशिष्टा सुनमूषविष्टाञ्च प्रतिमन्धत्त। मम्कार- सन्ततिमातरे तु सत्त्वे उत्पतोत्पद्य मम्कारस्तिरोभर्वन्ति, स नास्य कोऽपि मस्कार यस्त्रिकालविशिष्ट ज्ञान स्पृतिन्जानुभवेत न चानुभवम अन्तरण ज्ञानस्य स्प्रतश् प्रतिमन्धानमह समति चात्पय्यत दहान्तरवत। अतोऽनुमोपते अस्येक सवविषय प्रतिदेह सज्ञानप्रबन्ध स्मृतिप्रबन्धन्न प्रतिमन्धत्ते इति। यस्थ दहान्तरषु वृत्तेरभावान्न प्रतिसन्धान भवतोति॥ १५॥ नाऽऽन्मप्रतिपत्तिहेतूना मनसि सम्भवात् ॥ १६ ।। न देहादिमद्वातव्यतरिक्त आ्रत्मा। कस्मात ? -आ्रत्मप्रति पत्तिहेतूना मनमि सनवात। दर्शनस्र्शनाभ्यामेकार्थग्रहण दित्येवमाटी रामात्म प्रतिपादकाना हेतूना मनसि सभव
मदानात पानव्यात् तथा च चाघवादातरिक्ताऽडत्मसिद्ि। इन न सूब किन्दु व्यमिति कोचत्। १५॥ समाप चसुरहेतम्रकरषम्। न्या-१४
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१५८ ] न्यायदशनम । [ श्य अध्वाय।
यत मनोहनि सर्वववषयममात, तम्मान्न शगोर न्ट्रयमनोबुद्धि मङ्ठातव्यातवित्त आरत्मति ॥ १६॥ न्वातु व नमाधनोमपत्ते सज्जाभेदमालम् ॥१9॥ ज्ञातु खलु ज्ञानसाधनान्मुपपद्यत्त चनुषा पश्यात घ्रागेन जघ्र त सगनन स्पृशात ववम्ान्नु सवावपयस्य मातमाधन मन्त करगभूत मवावपय विद्यत नाय मन्यत दति। एव मात वातयालमज्ञा 1 मधर मनमड़ा,र -था मनम न मामज्रा1 मपत एतिमन न त्व नुडा ा तादद मनु पत्माल गतडान डवाता प्रथाय्या उयासा क्त
प्रथाय अशर पा रवक्पटकम मालाजाल
न स मजन्द्रनान स। प्र, चन i।।१-।। नियमत्र निर्नुमान ॥ /5 । योऽय नियम दृप्यत रुपादग्रहणसाधनान्यस्य सान्त मतिसावन स्वनिषय नास्तात। अयसनुग न नावान् मानमास्त यन नियम प्रातपद्यामह दवाता कपादम्यय विपयान्तर मुखाल्य तत्पलव्धा करगान्तरमङ्गाव। यथा वनुपा गन्वा न मह्यतर्गत करगान्ता घ्रागम एनजन
नन् मा।। वागभव्वम हग- वतरे प्रामा श्रत्मसाषक म नाना म स स मवान मनमा नारान्तासात भाव । १६। मुमत-गर मनग ग े मपादनार करण तरमव कम तथा चक़ा जाता का साम पके मम्ा मन कामााखात सजा जा्किश रामपदकरा ननसा गवदधम् वात्मनश्ष ्रयनापपादक ।। मह्त्वामात भद आवशक इति भाव ॥१७। जन स्पार्इनप्रत्यव मकरणकमस्तु न त सखा।दपत्यचम् एव परमाखन्तरसातो
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शय अध्याय ] प्रथमाफ्गिकम। [१५e]
घ्रामाभ्या रमो र गटह्यत इति करणान्तव रमनम एन गपेषु। तथा चनुगनभ सुखात्यो न मन्त इति करणन्तरण भवितव्यमतच्च ज्ञानायोगनद्यन्निङ्गम। यच्च मुखादुपलख्ा करग तज्च चानायोगपनयलिड्गम तम्येन्द्रिर्यमिन्द्रिय प्रमि मन्नििधग्मन्निरेन रुगपजनानान्वत्द्यन्त। तव यतक्रम - ात्मयाउपत्तिहेतूना मर्नाम मन्वात इति तट्युकुम ॥२=। कि पुनग्य तहादिमङ्गातात्न्यो नित्य उतानित्य । गत कुत मशय ?- उभयथा दृष्टत्वात मथय।विद्यमानमुभनथा भनति नित्यमनित्वञ्ज प्रतिपादित चाउडमद्धाने मशया निवृत्तेगिति। आत्ममङ्भावहतुभिरवास्य प्राग दहमेदादवस्थान सिद्म। ऊद्गमपि दहभेदादवतिष्ठत। कुत - प्ृवाभ्यस्तस्मृत्यनुबन्धात् जातस्य हर्षभय- शोकमम्प्रतिपत्त ॥ १६ । जात खल्चय कुमारकोर्डस्म्रिन जन्मन्वमह्ोतेषु हषभय शोकहतुषु हषभयशोकान प्रतिपद्यते लिड्गानुमेयान त च स्मत्यनुबन्वादत्पद्यन्ते नान्यथा सत्यनुबन्धव प्रवाभ्यासम अन्तवेग न भर्ात पूर्वाभ्यासय पूवजन्मननि मति नान्यथा दूति मिध्यत्येतत-अर्वतिष्ठतऽयमूद्द शगेरभेदाढिति ॥१६ ॥ निगित्वेडाव मनस प्रत्यन स्यानवाह।-उको निामावगषो निरनुमान निष्पमा सक गारवाइपरौत्य च विनिगभकाभावाचचात भाव 0१८॥ समाप्त मनाभतप्रकरणम्। एव साधितपि तेहातिभिन्न आात्मनि विना तव्रित्यता न पर नोकाधन प्रव्ृत्ति नत आात्मानत्यताप्रतिपातनाय सूबम्।-नातम्य बालस्य एतज्जन्माननुभते अषि हर्षानिहितृष सत् हषाउडलोना सम्पातपान उत्पत्ति तम्या पूवपूवान्भवा धोनस्मातसम्बन्वादेव समवात्। दत्य चटानौन्तनस्याऽSत्मन पूवपूवसिद्धौ तम्या नादित्वम् बनादेश भावस्य न नाथ इति नित्यत्वसिद्धिरिति भाव ।१८।
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[१६० ] न्यायदर्शनम । [ श्य अध्याय
पद्माऽर्डादषु प्रबोधसम्मोलनविकारवत्तदि कार ।।२०। यथा पद्माऽडदिष्वनित्येषु प्रबोधमम्मरोलन विकारो भवति
हत्वभावात्युक्तम। अ्र्प्रनेन हेतुना पद्माऽडदिषु प्रबोधसस्ोक न विकार वदानत्य म्याऽडन्मनो हषाऽडिमम्प्रतिपत्तिरगिति। नावोढा हरगसाधम्यात साध्यमाधनहेतुन वेधम्यार्दस्ति हेत्वभावात असम्बदार्थकमपाथकमच्यत पति। दष्टाताज् हषाऽडटिनिमि त्तस्यानव्ृत्ति या चेयमामेवितष विषनष हषाऽडटिमम्प्रति पत्ति समत्यनुबन्वक्वता प्रत्यात्म गह्यते सय पम्माऽडदसग्मोलन- दृष्टान्तेन न निवत्तते यथा चेय न निवत्तते तथा जातम्या पोति। क्रियाजानो च पर्गविभागसयोगी प्रबोधममोलने क्रियाहेतुश्नानुमेय। एवञ्च मति कि दृष्टान्तेन प्रति षिध्यत॥ २०॥ अथ नि्नमित्त पद्माऽडदिषु प्रबोधसम्ोलनविकार द्ति मतम एवमात्मनोऽपि हर्षाऽडदिमम्प्रतिर्पात्तरिति तज्ञ- नोष्णशोतवर्षाकालनिमित्तत्वात् पञ्चाSडत्मक विकागगाम् ॥ २१॥ उष्णादिषु सत्मु भावात् अरसत्मु अरभावात् तव्रिमित्ता पन्नभूतानुग्रहेग निर्वृत्ताना पद्माऽडदोना प्रबोधसमोनन विकार, द्वात न निनिमित्ता। एव हृषाऽडदयो विकार निमित्ताङ्ववितुमर्हन्ति, न निमित्तमन्तरेण, न चान्यत्
चव भङते।-बालस्य हर्षानयी मुखविकासादमुमेना न व तत्श्रव पम्ाइडटोना प्रयाधातवितटृष्टविशषाधीनाक्रयावशाटव तउपपत्तेगति भाव । २ ॥ सिदानसूवम्।-रक न युकं यत पचाइडन्मकाना पासमोतिकामा पझ्माइडदीबां
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छख अध्याय] [१६१ ]
पूर्वाभ्यम्तम्मृत्यनुबन्धात निमित्तमस्तीति। न चोत्पत्ति निगेधकारणनुमानमात्मनो दृष्टान्तात् न हर्षाडडटोना
53दोना, तम्माद्युक्तमतत् । २ १ ॥ द्ूतक्व नित्य आ्रत्मा - न्याSSहागभ्यासक्कतात् स्तन्याभिलाषात्।। २२।। जातमातरस्य वत्सस्व प्रव्वात्तििद्ग सतन्याभिन्नाषा गद्यत स च नान्तरणाSडहाराभ्यासम्। कया युत्या -दश्यत शरोरिया क्षुधापोद्यमानानामाहाराभ्यासछ्कतात सपरणन् बन्धादाहाराभिन्नाष न च पूवशरोरमन्तरेणामी जातमात्र स्थोपपद्यत, तनानुमोयते भूतपूर्व शगोर यत्रानेनाSडहार। ड्भ्यस्त दूति। म खचयमात्मा पूवभररात् प्रेत्य शरोरान्तर मापन्र चत्पोडित पूर्वाभ्यस्तमाहारमनुस्मरन् सतन्यमाभ न्षत तस्माव देद्मेदादात्मा मिद्यते, भवत्येवोई देह भेदादिति ॥ २२॥ अयसोऽयस्कान्ताभिगमनवत् तटुपसर्पगम् ॥२३॥ यथा खल पय अभ्यासमन्तरेगायस्कान्तमुपसर्पति, एवम माहाराभ्यासमन्तरेग बाल स्तन्यमभिलषति। २२॥
ये विकाश तषाम् उचकाखाडदिनिमस्तत्ात्। मनुष्यादीनान्तु इरषाडडदिनिमिसक मुखविकासादय द्वात न सुल्यतति भाव ॥ २१॥ सात्मनित्यन हेतन्तरमाह।-प्रेत्य सत्ा जातमावस्य य सन्याभिलाष स सावनार राभ्यासज्ञानत जन्मान्तरौप्ाSडह्ारट्ट साध नता धोजन्य जव ना टट्टा डा घ ि न सम्काराधोनेष्टसाधनतासारखेनड बाल खन्यपान प्रवत्तत इत्यनााद्ृत्वमिति । २२॥ भडते।-यथाऽय स्कान्तस बिद्ितस्यायसीऽयस्कान्ताभिसुखतया गमन तथव वस
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[ १६२ ] न्याउदशन [ इय अध्याय।
किमिटमयमोऽयम्कान्त भिमर्पगा नितिमित्तम श्रत्र निमित्तात इति। निर्निमित्त तावत- ना चत्र प्रवृत्त्यभावात् ॥ २१ ॥ र्यादनर्निमित्त लोष्टाऽडदयोऽप्ययम्कान्तमुपमपयु नजातु नियम कारणमस्तीति। अथ निमित्तात तत्केनोपनभ्यत ? दूति। क्रियानिनिङ्ग क्रियाहेतु क्रियानियमन्निङ्गश्व क्रिया हतुनियम तनान्यत् प्रवृत्त्यभाव। बानस्यापि नियतमुपसपग
सरणाानुबन्धात निमित्त दृष्टान्तेनोपपाद्यत न चार्मत नहि ने कव्यचिदत्पत्ति न च दष्टान्तो दृष्टमभिल्ाषहत वाधन तस्पादयमोऽयम्कान्ताभिगमनमदश्टान्त दति। अ्रयम ख्वदि नान्यन प्रव्नत्तिभवति न जात्वयो लोष्टसुपसपति कि कतोडम्य नियम दूति, यदि कारणयमात म उ क्रया नियमन्निद्ग। एव बालस्यापि नियतनिषयोऽभिननाप कारणनियमाङवितुमहति तञ्व कारणमभ्यस्तस्रगम अन्यदति दृष्टेन विशिष्यते दृष्टो हि शरोरिगामभ्यस्तममरग्ाढाह्तराभि लाष इनि ॥ २४॥ दूतश्च नित्य श्रात्मा। कस्मात - वीतरागजन्मादर्शनात ॥ २५॥ सरागो जायत इत्यथादापद्यत। अय जायमानो रागानु बडो जायते। रागस्य प्रवानुभूतविषयानुचिन्तन योनि, पूवानु
समाधत्ते।-सन्यपान एव बाल प्रवत्तन न खन्यवात नियम कथ स्थात दस्तुतस्त बन्यन पर्यासस प्रवृत्यभावात् प्रवततिा्ट चट्टाडय्ामता लिङ्र नतु क्रिया न नम अतो न व्यभिधार इति भाव ॥२४ ॥
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शय अध्याय ] [१६३।
वैवश्च विषयागामन्यन्ितिन जन्मनि शरोग्मन्तरेग नोपपता साडयमात्मा पवगगवनुभतान विषयाननुसवन तेषु तप रज्यत तथा नाय वजो ससिस प्रतिमन्चि। एव पतमनरस्य पूवतरण पूरतरम्य पूवतमनत्यादिनाऽनाटि्ेतनस्य शगोर योग अनात्थ्वि रागानुबन्ध, इतिमिद् नित्यत्वामति ।२५ कथ पुनजायते प्रवनिषयानुचिन्तनजनितो जातम्य राग न पुन - सगुगाद्रव्योत्पत्तिवत् तटुन्पत्ति ॥२६ ।। यतोत्पत्तिधमकम्य दजम्य गुगा कारगत उत्पयन्त नथा त्वात्तवम क्याप मना सग कुतदत्पय्य अ्रयमुदि तानुवा निदर राय ॥। न सदल्पनिमि।। हागा कय २॥
nस्मत -मद्व्वमितलाल गाल,दर। यय सपु प्रायि जषयां आमवमानाना म र्पजनता श्न, मदृ । वकक पूवानुभूतविषयानुचिन्तनयर्ग त नहउगधतं- भातव् हि
काय्यद्रव्यगुगावत न चाउतमाचात शिद् नापि सद्ग पातन्ट द्रागकारगभस्ति, तम्मादपुत्ता सगुगद्व्योत्यत्तिव तयारुत्यात्त नआान्त रोट्टसाधनताज्ानावोनसर। हतारात पूव सयाम लाष उक् सन्मातु पतगादोना अ णदिमत्रणाभि न्ाषसा्धारयारागमातामत्यपा /कतामृ२५। शद्धते-वस वनद रथा मम्गस्य रदिविरशिष्टस्य उत्पात्त घगदि वत एव रुपाल्मान भवात तरवाउडत्मडाप स्वत एव सरागी भवत प्रयोभकत्व त्वदौयहतूनामिति भाव । २६॥ समात्ते।-सदल्वो आनम् इष्टसाधनतानानम् दति यावत् तन्रिमित्तका ि
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[१६४ ] न्यायदशनम। [ श्य अ्ध्याय।
मुपादीयन तथाडाप पूर्वशरोक्यागोऽप्रत्यास्व्यय। तत्र हि तस्य निर्वृत्ति नास्मिन जन्मनि, तन्मरयत्वाद्राग इति। विषया भ्याम खल्वय भावनाहेतु तन्मरयत्वमुच्यत दात। जातिविशे षाच्च रागविशेष इति। कर्म खस्विद जातिविशेषनिर्वर्त्तकम तादर्थ्यात्ताच्कव्दा विच्वायते, तम्मादनुपपन्र सड्स्वादन्य द्रागकारगमिति । २७॥ 'अ नादिस्ेतनस्य शरोरयोग' इत्युत्तम्। खऊ्कतकर्मनिमित्त चास्य शरोर सुखदुसाधिष्ठानम, तत् परोच्यते,-कि प्राणादिवदेकप्रक्ृतिकम १ उत नानाप्रक्वति १ इतति। कुत सशय १-विप्रतिपत्ते सशय, पृथिव्यादोनि भूतान सड्ठया विक ल्पेन शरोरप्रप्नतिरिति प्रतिजानत इति। कि तत तत्त्वम- पार्थिव गुणान्तरोपलब्धे।। २८ ।। तत मानुष शरोर पार्थिवम्। कस्मात् १-गुणान्तरोपनन्ध। गन्धवतो पृथिवो गन्धवच्करोरम, अबादोनामगन्धवत्वात् तन्परकवत्यगन्ध स्यात्, न व्विदमबादिभरसम्पृत्तया पृथिव्याऽडरब्ध चेर्ष्टान्द्रियार्थाSSस्रयभावेन कल्पते इत्यत पञ्चाना भूताना सयोग सति शरोर भवति, भूतसयोगो हि मिथ पच्चाना न निषित दृति। आप्यतेजसवायव्यानि लोकान्तर शरोराणि, लेष्वपि भूतसयोग पुरुषार्थतन्त्र दति। स्थात्यादिद्ररनिष्पत्तावपि नि सथया नाबादिसयोगमन्तरेग निरष्पात्तरिति। *पार्थिवा Sडप्यतेजस तहुगोपलब्धे। ** निखासोकासोपलव्वेव्वातुर्भौति रायाद्य तथा चेटसाधनतान्ञानत्वनेक्कालादिना कार्य्यकारणभावात म्रहत्तितवेन पेटालेन च कार्यकारणभावाब्रामरयीजकत्वमिति भाव ।२०। समाप्तमनादिनिधनप्रवरयम्। कमश्र से अरोरपरीचये मानुषाSडदिनरीर पाश्भीतिकमित्यके। तव सिद्ान्त
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श्य भध्याय ] [eax]
क्रम। ** गन्धक्वेदपाकव्यू हावकाशदानेम्य पाश्भौतिकम।=्र त इमे सन्दिग्धा हेतव इत्युपे्ितवान सूत्रकार। कथ सन्दिग्धा -सति च प्रक्वतिभावे भूताना धर्मोपलब्धि असति च सयोगाप्रतिषेधात् साबहितानामिति, यथा स्थाल्यामुदक तेजोवारवाकाशनामिति। तदिदमनेकभूतप्रक्रतिशरोरम् (भ) अगन्धमरसमरूपमस्पर्शञ्ज प्रक्ृत्यनुविधानात स्थात, न वििद मित्थभ्भूत तस्मरात् पार्थिव गुगान्तरोपलब्धे।। २८। पार्थिवाऽडप्यतैजस तह्गुगोपलब्धे । २८॥। क॥
पाच्चभौति-
कम् ॥ २८ ॥ ग ॥
सूवम्।-मानुषाSडदिशरोव पायिव पृथिवोसमवायिकारयक गुप्ान्तरस् मन्
मतान्तराभिधानाय विसूवो।-तद्रयाना पृथिव्यप्जोगुणाना गव्वसहोष्त स्पर्शानाम् उपलब्धे। एतावता विभौतिकतवे सिडे निश्वासादतय्रातुर्भीतिकत्वम्। निश्वासी कासी प्राय्वाघीर्व्यपार विशवी। केदा जलावशेष नलविशिए्टपृथियौ बा इत्युभयथाऽपि जलमावश्वकम्। भुकाव्रादजठरानले पाकस्य तन सयागाधोमत्वात्तेज सिद्धि। व्यडा निशवासादि। सककाप्दान किद्रम्। एताान मतानि सुवकता तुष्ळतान्न दाषतानि। तथा डि एकस्मिन् शरोरे पृवियोत्वादिनानाजात सडरा SSपत्तेवसनभवात् न वा नानापादानवत्व विज्ञातोयमामनारमाकतवात तथात्व वा मलाद्यारव्वस्य न पृथिवोत्वं व्यभिचारात् न वा चितद्रव्य गन्धवस्वविदाधात नन्वायोनामानाशममपायास् पार्यिवत्वमित्यत्ञप्रायम् यहा पार्यिवत्व कथ नलाद सम्बन्१ उत्याशनडायो नसदि मिमिशव श्ासैभीतिकत्वादिव्यपदेश दत्यामयेन बिसूवी ॥ २८॥क।ख॥ ग ॥ इति वृत्तिसत्ततानि चधिकसूवायि।
(र) भूसाना परखरोपमदकलवेनेति वावतू।
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[१६६ ] न्यायदशनम । [ शय अध्याय।
प्रुतिप्रामाखाच्॥ २६॥ सूर्य्यन्ते चनुर्गच्छतात" इत्यत्न मन्त्रे "पृथिवोन्ते शरोरम" द्रति श्रयत नदिद प्रक्ृतौ विकारस्य प्रन्याभिधानमिति। "सूय्य ते चक्षु सगोमि' इत्यत्र मन्त्रान्तर पृथिवोन्ते शवोगम दति सूयते, मेय कारगाद्विकारम्य स्पृतिवभिधोया दूति। स्थाल्यादिषु च तुन्यजातोयानामेककाय्याऽSरभदर्शनात
अथेदानोमिन्द्रियागि प्रमेयक्रमग विचाय्यने किमाव्यक्रि कानि आहोख्विद्वौतिकानि१ दति। कुत सशय १- कृष्णसारे सत्यपलम्भाद्यतिरिच्य चोपलभभात सशय ॥ ३० ॥ कृष्णमार भौतिक तस्मिन्ननुपद्दते रूपोपलव्धि, उपहते चानुपन्नब्धििति। व्यतिरिच्य क्वष्णसारमवस्थितस्य विषय स्योपालभ्भ, न कवष्सारप्राप्तस्य न चाप्राप्यकारित्वमिन्द्रि
पााथवत्व युतत् तरमाह।- सूध्यनत चत्तु मग्णाम दति मत्रान्त प्रथिवी ते मरौगम् इत्याभधानात् एव प्रकमती विकारस लशाभधाने सूय्यन्न चक्षमच्कतात द्वात मन्तान्ते प्राथवीं ते शरीरम् दति। इवमा चतु मूत्री कचन भाष्यतया वर्षयन्त तन्न तथा सत्येकसूवस्य प्रकरणत्वानुपपत्ते भत ए्व चत्थ मतमवेत्यपर। मन्धे मूनीयवानुपपत्या आप्यतजमवायव्यान लोकान्तरभरीशाग तप्वाप भूतसयाग पुरुषाथतन्त्र दति भाष्य सूवतया वण्यान्त तद्यम्न्-भ्राप्य दौनि लोकान्तरेष वरुगलोकानिष प्रमिद्वानि भूरोरायि। जलादरूपतवे कथमुपभोगक्षमता १ दत्यत तष्वपीति।-भूतसयोग पृाथव्युपष्टस् पुरुषायतन्त्र उपभीगसम्यादक ।। २८।
पथेन्द्रिय परोक्ष णोयम्। तव लच्षणसुवीता भौतिकत्वमिन्द्रियार्या परोचित भयमाड।-कणसारे चत्तुर्गोलके सति घटायुपलभ्ाडालकस्यान्द्रयत्वमिति बौद्धा । व्यतिरिचय विषय म्राप्य उपल्भ्भात् उपलभ्भनमात् गोलकातरितामोत्यपरे। तव
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श्य अध्याय ] प्रथमात्रिकम्। [१६]
यागाम, तदिदमभौतिकत्वे विभुत्वात् सभ्वति। एवसुभय- धर्मोपनब्धे मशय ॥३० ॥ अभोतिकानि दत्याह। कस्मात - महदगाग्रहगात ॥ ३१॥ महदिनि महत्तर महत्तम चोपलभ्यते यथा,-न्यगोध पबतादि। आग्वत्यगतरमगुतमख्त गह्यत, यथा-न्यग्ाध वानादि। तव्मयभुपन्भ्यमान चक्षुषो भोतिकत्व बाधन भातिक नि यावन नानदव व्याप्नाति अभोतिकन्त विभुखान मनव्यापकी गत ॥ १॥ म म ठ ग पछु डग मात्रा दभोतिकत्व विभुत्वञ्ान्द्रय,गा शक् प्रतिपत्तुम। दल खुल - रउमा पमाजके नभवाक् तहहगम् ।३॥ तयोमहदगव ग्रहण चन्तुरश्मेवर्थस्य च सन्निकर्षविशेषाद् अपात, यया-प्र-पदश्मेग्यस्य चेति। रश्मार्यमन्रिकषश्चा SSवरगालिन चालुषा हि रश्म कुद्यादिभिरावृतमर्थ न प्रकाशयति यथा -प्रदोपरिभारति॥ ३२॥
दान्द्रपाणि गा नकतारक्र निनवात सश्। गालकतरक्रमोति नमानकाडदय। तवाप गोरकान्या हझार का शरति साध्मा भतिका नो त्य पर । ३ । तव साझमतन बौद्धमतमुत्सलाह-मनक ना यम प्प्राप्यकारत्वतति प्रमनम् दथश् गालकतारती भातकामात वाच्यम् दप्यनदतम्। चत्ुषा हि वनपविनाथा महत्वविभायक गृद्यत। नचकनन महत व्याप सभ्वात न सत्य प्य गहगाम वनाडभोतिकानोन्यागाहद्गार कार्गोति । २१।। माझ्ा नरस्यति।-राश्मगलकावा कम् तज तमाधम्य घटात य सत्िकष विभष सनोगविशष सम्मात तथामहनखा गरहणसुपवध्त भोतकडाप प्रदोपादी महदराप्रकाशकतव टष्टम् श्रभौतिकत्व तु पर पश्ाह्ात्तना सवषाम्य भष्त सात ॥ १२ ।
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न्यायदर्शंनम्। [ शय पध्याय।
श्रवरणनुमेयत्वे सतोदमाह,- तदनुपलब्धेरहेतु ।।३३ ॥ रूपस्पर्भवद्धि तेज, मह्त्वादनेकद्रव्यवत्त्वाद्ूपवत्वाच्चोप नव्धिविति। प्रदोपवत् प्रत्यक्षत उपनभ्येत, चक्षुषो रश्मिर्यदि स्यादिति ॥ ३३॥ नानुमोयमानस्य प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धिर- भावहेतु ।३४ । लिनिङ्गे नानुमौयमानस्य रश्मेया प्रत्यक्षत नुपनव्धि नासावभाव प्रतिपादर्यात, यथा -चन्द्रमम परभागस्य, पृथिव्याश्चाधोभागस्य । ३४ । द्रव्यगुगधर्मभेदाच्चोपलब्धिनियम।। ३५ ।। भिन्न खत्वय द्रव्यधर्मो गुगधर्मथ महदनेकद्रव्यवञ्च विभ कावयवमाष्य द्रव्य प्रत्यक्षती नोपल्यते सर्शस्तु भोतो ग्टह्यते, तस्य दव्यस्यानुबन्धात् हेमन्तभिशिरी कल्पोते। तथाविध मेव्र च तजस दव्यमनुदूतरूप सह रुपेग नोपलभ्यत सर्शं र्वश्योष्ण उपन्भ्यत, तस्य द्रव्यस्यानुबन्धात ग्रोष्मवसन्तौ कल्पेनत । ३५ ।
तजसे चनुष्यनपर्साख्बाध बौड्ध भङ्ते।-रपाथसत्रिकर्षों न िन गालकाति रकम्य रशसरनुपलख् ।। ३२ ।
सधिर्नाभावनिर्यायिके न्यर्ष । २४। कथ तहि नोपलमय १ दव्यत चाड।-द्रव्यस धमभेदी महस्वादि बुरख धम सद् उन्रतत्व तदधोनत्वात् म्रत्यचस द्रव्यमाव उपर्बासन नियम, यबोहूतकड महसादिकं तख प्रत्यय वट्मावाजपरटेरप्रत्ययम्। २५।
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क्य ऋ्रध्याय ] प्रथमान्ञिकम्। [१६]
यत्र त्वेषा भवति - अनेकद्रव्यसमवायाद्रूपविशेषाच्च रूपोपलब्धि॥३६॥ यत्र रूपस् द्रव्यन्न तदाश्रय प्रत्यक्षत उपलस्यत रूप विशेषस्तु, यङ्मावात् क्वचिदूपोपनब्धि यदभावाच्च द्रव्यस्य काचिदनुपलब्धि, स रूपधर्मोऽयमुद्गवसमाख्यात इति।अनुद्धूत रु/श्ाय नायनो रश्मि, तस्मात्पत्यचतो नोपनभ्यत इति। दृष्टस् तेजसी धममेद। उद्धतरुपस्पश प्रत्यक्ष तेज यथा,- पादत्यवशमय। उङ्वतरुपमनुद्वतस्पर्शञ प्रत्यक्षम यथा- प्रदोपरश्मय। उद्भूतस्पथमनुद्भतरूपमप्रत्यक्षम, यथा - श्रबादिमयक् तज। अ्रनुदतरूपस्पर्थोडप्रत्यक्ष -चान्षुषो रश्मिशित ॥ ३६॥ कर्मकारितिश्चेन्द्रियाया व्यूह पुरुषार्थतन्त्र ।।३७।। यथा चेतनम्यार्थो विषयोपन्ब्धिभूत सुखदु खोपनब्धि भूतश्च कल्पाते तथेन्द्रियागि व्यूढानि। विषयप्राप्यर्थस् रश्मे वान्तषस्य व्यूह, रुपस्पर्शानभिव्यक्ञिस् व्यवहारप्रक्कस्यर्था, द्रव्यविशेषे च प्रतीघातादावरणोपपत्तित्यवहारार्था मर्व द्रव्याखा विश्वरूपो व्यूह इन्द्रियवत्कर्मकारित पुरुषार्थतन्त्र । कम तु धर्माधर्मंभूत चेतनस्योपभागार्थमिति । ३७। अव्यभिचाराच्च प्रतोघातो भौतिकधर्म ।। ३८ ।। यस्चाऽ5वरगोपल्दिन्द्रियस् द्रव्यविशेषे प्रतोघात, स भौतिकधर्मो न भूतानि व्यभिचरति, नाभौतिक प्रतिघात धर्मक टृष्टमिति। अप्रतिघातस्तु व्यभिचारी, भौतिकाभौति
चसुरादावुद्धूतवपमेय न कुत इत्यामडाया भाष्यम्।-प्ट्टष्टविभषाधीन इन्द्रियाणा व्यही रचनाविशरेष उपभोगसाधनामति। सूवमेवेदमिति कचित् ।२०॥ न्या-१५
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[१७ ] न्यायदर्शनम। [ श्य पध्याय। 11
कयो समानत्वादिति। यदपि मन्यत प्रतिघाताङ्गौतिकानी- न्द्रियागि अ्प्रतिघातादभीतिकानीति प्राप्तम, दृष्टय्ाप्रति घात काचाम्तपटलस्फटिकान्तरितोपनब्ो, तब् युत्म, कम्मात १-यस्मद्वोतिकमपि न प्रतिहन्यते काचास्नपटत स्फटिकान्तरितप्रकाशत् प्रदीपरश्मोनाम्, स्थाच्यादिषु पाचकस्य तेजसोऽपरतिघात ॥३८॥ उपपद्मते चानुपतनब्धि कारगमेदात्।- मर्ध्यन्दिनोल्काप्रकाशानुपलव्धिवत्तदनुप- लबधि ॥३६ ॥ यथाऽनक द्रव्येग समवायादू पविशेषाचोपल्धिरिति, मत्युपनाब् कारणे मध्यन्दनाल्काप्रकाशा नापलभ्यत शदत्व प्रकाशनाभिभूत, एव महदनेकद्रव्यवत्वाटपिशबाच्चोप लव्धिरित। सत्युपलब्धिकारणे चानतुषो राश्मर्नोपलभ्यत निामत्तान्तरत, तच् व्याख्यातम् अनुद्भतरूपस्पशद्रव्यस्य प्रत्य
यो हि ब्रवीात लोष्टप्रकाशे मध्यन्दिन श्रदित्यप्रकाशाभि भवाबोपलम्यत इ्ति, तस्यैतत् स्ात्,- न रावावप्यनुपलब्धे ॥४० ॥
प्रकाश नास्त, न तवेव चच्ुषो रश्मिरिति । ४०॥
महता रुपयताऽसुपलब्ा दष्टानमाह।-महता रपयतशोस्काप्रकाशख
तात भाव ॥ ३८। नन्ववं घटादरपि रश्मि सान् सोराइडलाकेनाभिसवात् पुनरग्रह् इत्यसाइड्। नेववस घटादो रश्मिरिति प्रष । ४० ॥
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शय सध्याय ] प्रथमाफ्किकम।
उपपन्ररुपा चेयम /-
तोऽनुपलब्धि ॥ ४१ ॥ वाह्येन प्रकाशनानुग्टह्ीत चक्षुविषयग्राइक तदभावे इनुपन्नब्धि सति च प्रकाशनुग्रहे शोतस्पर्शोपनब्धी च सत्या तदाश्तयस्य दश्यस्य चक्षुषाऽग्रहग रूपस्यानुन्ूतत्वात सेय रूपानभिव्यत्नितो रूपाSडन्वयस्य द्रव्यस्यानुपन्नब्धिटश्टा, तव यदुक्क -"तदनुपलब्धेरहेतु" इत्येतदयुक्तम ।। ४१। कस्मात् पुनरभिभवाऽनुपनव्धिकारण वान्तुषस्य रश्म नौचयते१ दति।- अभिव्दक्तौ चाभिभवात् ॥ ४२ ॥ वाह्यप्रकाशानुगहनिरपेत्तायाज्जति चार्थ। यद्रूपमभि व्यक्तमुडगूत वाह्यप्रकाशानुग्रहत्न नापेचते, तद्विषयोडभिभव, विपर्य्ययेडभिभवाभावात् अ्रनुद्ध तरूपत्वाच्चानुपनभ्यमान वाह्य प्रकाशानुग्रहाच्चोपलभ्यमान नाभिभूयत इति। एवसुपपन्रम् श्रस्ति चान्तुषो रश्मिरिति ॥ ४२ ॥
वस्ुषोडनपलान्ध । कुत १- वाचयप काशानुग्रहात् सौरालो कादिसाद्िित्यात् विषयोपलभ तस्योष्त रूपवत्वे वाह्पकाशपेचा म स्यात् अभिभूतत्वे व तत्साद्विश्ेनापि प्रत्ययभ्ञनन न स्यात घभिभृतस्त् कार्य्याच्यमत्वादिति भाव । ४१ ॥ बतु चसुषो नालिभव किन्तु तद्रपस्य तम्य प प्रत्यचजनकते मानाभाव। किशाभिभवात् तसय म प्रत्यक्षम् इतरप्रत्ययजनने व विरोधाभाव इत्याणडाया माह।-वपम्य भभिव्यक्ी प्रत्यसे उहतत्व इति यावत् उहूतकूपस प्रत्यचाभावे अमिभवकरपना। न त्वेवं परक्मने सुवर्णादिवत् सवदाभिभावकद्रव्यान्तरकरपने व गौरवमिति भाव । ४२ ।
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[१७२ ] न्यायदशनम। [ शय अ्रध्याय।
दृश्यन्ते हि नक् नयनरश्मयो नत्वराणा व्षदशप्रभृतौना, तन शेषस्यानुमानमिति। जातिभेदवदिन्द्रियभेद दति चेत धर्ममात चानुपपत्रम। आवरणस्य प्राप्तिप्रतिषेधार्थस्य दर्शनादिति ॥४३।।
अप्राप्यग्रहण काचामपटलस्फटिकान्त- रितोपलब्धे॥ ४४ ॥ उगादिमपड्रव्य काचेऽम्तपटले वा प्रतिहत दृष्टम शव्यव ह्वितेन सन्निक्वष्यते व्यवहन्यते वै प्राप्तिर्व्यवधानेनेति। यदि च रश्मार्थसन्निकर्षो ग्रहगाहेतु स्यात्, न व्यवहितस्य सन्निकष इत्यग्रहण स्यात्। अ्रस्ति चेय काचा्त्रपटलस्फटिकान्त रितोपल्धि सा स्ापयत्यप्राय्यकारोषि इन्द्रियाषि, अरत एवा भौतिकानि, प्राम्यकारित्व हि भौतिकधर्म दति॥ ४४ । न कुद्यान्तरितानुपलब्धेरप्रतिषैध ।। ४५ ।। अपराप्यकारित्वे सतोन्द्रियाया कुद्यान्तरितस्यानुपलब्धिरन स्ात ॥ ४५ ॥
पन्तुषि प्रमाणन्तरमाह।-नतवराणा उषदशाडदोना मोलके रश्मिदमनात् तहष्टान्तेन परेषामपि रशानुमानमिति भाव पन्यथा तमसि तस्य प्रत्यक्षम स्ारदिति हदयम् ॥ ४३॥ भप्राप्यकारित्व चसुष स्ादित्याशङ्ते।०४ । समाधन् ।-परे तु उततसूवस्य वूवपचपरत्वं मन्यमानस्य भाष्यकारस्ावतरिका वस्तुत सिदान्नसूबमेव। तम्प्रदोपहष्टान्तेन काचाबन्त रितम्रकाशकलेम तैजसत्व सिध्यतौति। नन्वमाप्यकारित्व किं न सात बवाSडड् कुदति।-उतस्य तैजसत्स प्रतिषेधी गीसकाऽतकत् न सनभवति कुध्धानरिन
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शय अध्याय ] [१o३ ]
लब्धिन स्ात /- अप्रतिघातान् सन्निकर्षोपपत्ति ॥४६ ॥ न च काचोऽम्तपटत् वा नयनरश्मि विष्टभाति सोऽप्रति हन्यमान साव्निक्वष्यत इति ॥ ४६ ।। यश्च मन्यत न भौतिकस्याप्रतोघात दति, तन्र - आदित्यरश्मे स्फटिकान्तरेऽपि दाह्येऽवि घातात ॥। ४०॥ आदित्यरश्मेरविघातात, स्फटिकान्तरितेऽप्यविधातात
भेद दूति। यथा वाक्यच्चार्थभेद दति। प्रतिवाक्य वाक्याथमद। आदत्यरश्मि कुश्भादिषुन प्रातहन्यते, अवघातात कुभ्भस्थ मुदक तर्पात प्राप्तो हि द्रव्यान्तरगुणस उष्पास्पशस्य ग्रहण तन च शौतस्पशाभिभव दति। स्फटिकान्तरितडाप प्रकाशनोय प्रदोपरश्मोनामप्रतिघात, अप्रतिघातात् प्राप्तस्य ग्रहणमिति। भर्जनकपालादिस्थन्न द्रव्यमाम्नयेन तजसा दह्यत तवाविघातात प्राप्ति प्राप्ती तु दाह, नाप्राप्यकारि तज इति। अविधातादिति च केवल पदमुपादोयते। कोऽयमविघाती नाम 9 अव्यू ह्यमानावयवैन व्यवधायकेन द्रव्येण सर्वंतो द्रव्य स्वाविष्टन्ध क्रियाहेतोरप्रतिबन्ध प्राप्तरप्रतिषेध पति। दृष्ट हि कनशनिषत्ञानामपा वहि शेतस्पशंस्य ग्रहणम्, नच
ननु कदान्तरित दब काचान्सरितेऽपि सन्निकर्षी न सभभवतौति कथ प्राप्प कारित्वम् सव्रिकष उपपद्यत इति भाव । ४६ ।
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[१७४ ] न्य यदशेनम। [भ्य सध्याद।
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दृन्द्रियेगामान्नकष्टृम्य द्रव्यम्य स्पशोपनाव्ध, दृष्टी च प्रस्यन्द
दाथन मह सावकषादुपपक ग्रहथमिति । 8 9 । नेतरेतरधर्मप्रसङ्गात् ॥४८॥ काचाम्पटलादिवद्दा कुद्यादिभिरप्रतिघात, कुद्यादि वदा काचाम्पटलादिभि प्रतिघात, दति नियमे कारष वाच्यमति॥४८R आदर्शोदकयो प्रसादखाभाव्याद्रपोप- लब्धिवत् तदुपलन्धि।। ४६ ।। आदर्शीदकयो प्रमादो रूपविशेष खा धर्मो नियमदर्श नात प्रसादस्य वा स्ो धर्मी रूपोपलभनम यथाऽडदर्श प्रतिहतस्य परावृत्तस्य नयनरश्मे खेन मुखेन सब्रिकषे सति समुखोपलअन प्रतिविम्बग्रहणS्डस्यमादर्शरु पा नु ग्रहात् तन्नमित्त भर्वात आदर्शरूपोपघात तदभावात् कुद्यादिष च
रश्मे कुद्यातिभिस्न प्रतिघाता द्रव्यसभावनियमार्दिति 182। तत्र दश्न्तमाह।-दाह रात वस्तुमातोपखचयम् परे नु दाहे कपालादो वझादरावधातपर सददित्याय्टुर॥४७ भाक्षिपति।-चप्रतिघातो न युत इतरम्य सफाटबाद पतरस् कुख्ादे यो धम प्रतिघातकत्व वत्मसद्राम् सफाटकादिकमपि कुआादवत्रातियन्पक भके दित्यय ॥ ४८ ॥ समाधने।-बादनें उदके च प्रसादखाभाध्यात् खच्छम्वभावखवात् मुसादि उपोपलनिवि न तु मित्याती एव सफटिकादनरितसोपलाव् न त् कुखावन रितस्ेति साभाव्यान्न दोष। एतेन वजादेघदिनाSप्रतिघातषञ्ञयुषोपि प्रविघाती म स्वादिति प्रत्युताम् ववयास्प्रतियन्वेषि दोपाइडलोकदे प्रतिबव्धसनवादिति
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कय अध्याय ] प्रथमाफ्रिकम। [१0]
दृष्टानुमिताना नियोगप्रतिषेधातुयपात्त ॥५० ॥ प्रमाणम्य तत्त्वावषयत्वात् न सलु भो। पराक्षमागेन हष्टानुमिता अथा शक्या ियोकमत भवतात नापि प्रति षेडमेव माभवतेति। न होदसुपपद्यत रूपवद्रन्वोऽपि चान्तुषो भर्वत्वति, गन्धवद्दा रुपस्चासुष मा भूर्दिति। अ्र्पग्निप्रतिर्पा्ति बडूमेनोदकप्रतिर्पात्तिरपि भर्वात्वति, उदकाप्रतिर्पत्तिवद्दा धूमे नाग्निप्रतिपत्तिरपि मा भूर्दिति। कि कारगम् १-यथा खल्वर्था भ्वन्ति य एषा सोभाव सोधर्म इ्ति तथाभूता प्रमाणेन प्रतिपद्यन्त इति तथाभूतविषयक हि प्रमागमिति। इमी खलु नियोगप्रतिषैधी भवतादेशिती काचामपटनादिनद्ा कुद्या Sदिभिग्प्रतिघातो भवतु कुद्याऽडदिवद्दा काचाम्तपटलादिभि रप्रतिघातो मा भूदिरति। न दृष्टानुमिता खल्विमे द्रव्यधर्मा, प्रतिघाताप्रतिघातयोर्घ्चुपनब्धानुपलब्धी व्यवस्थापिके, व्यव द्वितानुपनव्धाऽनुमीयते कुद्यादिभि प्रतिघात व्यवह्ितोप
प्रथापि खल्वेकमिदमिन्ट्रियम् १ बहनीन्द्रियागि वा ? कुत सथय १- स्थानान्यत्वे नानात्वादवयविनानास्थानताच्च सशय । ५१ ॥ बहनि द्रव्यासि नानाखानानि दशने, नानास्थानय
चचुषस्ाट्भत्व कस्पने कि मानम्? इ्वाऽडह। -दि यममात् हट्टानामनुमितान वा पदाथाना दटनायुमितानामिति वाडय तेषामव भवतत नियोग एव मा भवतति प्रतिषेधो या नीपपद्यत युव्यमुस्तारची क्ि कस्पनेति भाव । ५ ।
दयनय्थनाम्यामत्यादि यमिन्द्ियनानाल युन्यत दन्यपोड्ातमेन्द्रिय नानाल
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[१७६ ] न्यायदशनम । [ शय अध्याय।
मन्नेकोडवयवो चेति। तनन्द्रियेषु भिन्नस्थानेषु सभय
एकमिन्द्रियम् - त्वगव्यतिरे कात॥ ५२ ॥ त्वगेकमिन्द्रियममित्याह। कस्मात १-अ्यतिरेकात्। न त्वचा किश्विदिन्द्रियाधिष्ठान न प्राप्तम। न चासत्या त्वचिति कि्चिद्विषयग्रहण भवति। यया मवन्द्रियस्थानानि व्याप्तानि, यस्याष्व सत्या विषयग्रहण भवति मा लगकमिन्ट्रियमिति॥५२॥ नेन्द्रियान्तगर्थानुपलब्धे ।। ५३ ॥ स्यशोपलब्धिलत्तणाया मत्या त्वचि ग्टह्यमाणे लवगिन्द्रियेग स्पश इन्द्रियान्तरार्था रूपाउडदयो न ग्ह्यन्ते अन्धादिभि न
रूपादय, न च ग्ह्धन्ते तम्माव्नेकमिन्ट्रिय त्वर्गिति ॥ ५३ ॥ त्वगवयवविशेषेग धूमोपल्धिवत्तटुपलब्धि ।५४।। यथा त्वचोऽवयवविशेष कविच्चन्तषि सरिक्वष्टो धूमस्पर्श गकाति नान्य, एव त्वचाऽवयवविशेषो रूपादिग्राहक तषामुपघातादन्वादिभिन गहन्ते रूपादय इति ॥५४ ॥ व्या इतत्वादहेतु ॥ ५५ू ॥ त्वगव्यतिरेकादेक मिन्द्रिय मित्युक्का तगवयवविशेषेण धमोपलब्धिवद्रूपोपनब्धिरित्युच्यते, एवच् सति नानाभूतानि परोचणोयम् तव सभयमाइ।-स्थानान्यले स्थानभेदे घटपटाइडदीना नामात्वदभ्र नाव्नानाऽवयवस्थितस्यावयविन एकत्वद्शनाच्च इन्द्रियाणां मानालमेकत वात सशय ।५१। पूव पथसूवम् ।- सर्वेष्विन्द्रिय प्रदेशेष्वव्यतिरकात् सत्ात्, सवनेवेकमिन्द्रिय मसु n ५र ॥
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शय अध्याय ] प्रथमान्िकम। [10]
विषयग्राहकाणि विषयव्यवस्थानात् तङ्वावे विषयग्रहणस्य भावात तदुपघाते चाभावात, तथा च पूर्वो वाद उत्तरग वादेन व्याहन्यत दति। सन्दिग्ध्ाव्यतिरेक। पृथिव्यादिभि वपि भूतेरिन्द्रियाधिष्ठानानि व्याप्तानि, न च् तेव्वसत्सु विषयग्रहण भवतोति। तस्मान तगन्यड्दा सवविषयकमेक मिन्द्रियमिति ॥५५ ॥ न युगपदर्यानुप लब्धे।। ५ूई ।। आत्मा मनमा सम्बध्यते, मन इन्द्रियेगा, इन्द्रिय सवाथ सव्निक्वष्टमिति, आत्मेन्द्रियम नोरऽर्थसन्रिकर्षेम्यो युगपद्रहृपानि स्यु, न च युगपद्रूपाऽडदयो ग्टह्यन्ते, तम्मान्नैकमिन्द्रिय सर्वविषयमस्तीति। असाहचर्य्याच्च विषयग्रहणाना नैकमिन्द्रिय सर्वविषयक साहचर्य्ये हि विषयग्रहणानामन्वाद्यनुपपत्ति रिति ॥ ५ू६॥ विप्रतिषेधाच्च न लवगेका॥ ५७॥ न खलु त्वगेकमिन्ट्रिय, व्याघातात्, त्वचा रुपाप्राप्तानि गद्यन्त इति। अप्राप्यकारित्वे स्पर्शाSडदिष्वप्येव प्रसद्ग । स्पर्श दोनाज्ज प्राप्ताना ग्रहपादूपादोनामप्राप्तानामत् हपमिति प्राप्तम्।* प्राप्याप्राप्यकारित्वमिति चेत् आवरणानुपपत्ते विषयमातस्य ग्रहणमभ्रथापि मन्येत प्राप्ता स्पर्शाऽडदयस्वचा गह्यन्ते, रूपागि त्वप्राप्तानोति। एव सति नास्यावरगम आवरणानपपत्तेय रुपमात्रस्य ग्रहणं व्यर्वाितस्य चाव्यव हितस्य चेति। दूरान्तिकानुविधानस् रूपोपलव्धानुपलब्धोनं
उत्तरयति।-युगपत् एकदा बर्धाना मन्वरुपाऽडदोनाम् मनुपसखेन लवगे वैकमिन्ट्रियम् बन्थथा तस्य व्यापकत्वाय्ञाचुषादिकाली व्रायजाइदिकमपि स्वादकि भाव ॥५६॥
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[e=] न्यायदर्मनम । [ ३ अ्ध्याय।
स्थात प्रप्राप्त त्वचा म्ह्यते रूपमिति दूरे रुपस्याग्रहगन मन्तिके च ग्रहगामित्येतव्न स्यार्दिति ॥५७। एकत्वप्रतिषेधाच्च नानात्वसिस्ी स्थापना हेतुरप्युपादीयंत,-
अर्थ प्रयोजनम, तत् पञ्चविधमिन्द्रियाण, स्पर्शननेन्द्रि येष स्र्शग्रहणे सति न तनैव रूप ग्ह्ते इति रूपग्रहणा प्रयोजन चत्तुरनुमीयत। स्पर्शरूपग्रहणे च ताभ्यामेव गन्धो न गहाते, दूति गन्धग्रहणाप्रयोजन घ्रागमनुमोयत। तयागा ग्रहसे न तैरेव रसी गज्ते इति रसग्रहणप्रयोजन रसनमनु मोयते। न चतुर्णा ग्रहणे तैरव शब्द स्ूयते, इति शब्दग्रहग प्रयोजन प्रात्मनुमोयत। एवमिन्द्रियप्रयोजनस्थानितरेतर साधन साध्यत्वात् पञ्चेवेन्द्रियागि॥ ५८ ॥ न तदर्थबहुत्वात्॥ ५६॥
कस्मात् ?- तेषामर्थाना बहुत्वात् बहव ख्विम इन्द्रियार्था स्पर्शास्तावच्छोतोष्णानुषाभोता इति, रुपाणि शुक्कहरिता दोनि, गन्वा इ्टानिष्टोपेक्षगोया, रसा कटुकादय, शब्दा वर्णाऽडत्मानो ध्वनिमावास भिव्ना, तद्यस्येन्द्रियार्थपस्वत्वात्पञ्ने प्रसज्यन्त इति ॥५2 ॥
इन्द्रियापा नामालवे काय्यमदमानमार।-इन्द्रियार्थानामिन्द्रियय्राख्यार्या कपा इडलोनां पञतवात पञ्चविषत्वात् रुपाडडदोनों हि चस्ुरादोक केन्द्रियमावय्रा द्यत्वा हैे सदस्य तक्केन्द्रियपसे न सभभवति चव्वाडडदोना रुपायुपलन्धिप्रसप्रसेति भाव १५८% भहते।-इन्ट्रियार्थाना नोखपोताऽदोना बहुत्वादिन्द्रियाया बहुत्वप्रसभ् दिन्द्रि पाथपसल्वािन्द्रियमेदी न युक्न ॥ ५ट ।
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श्य प्रध्याय ]
गुन्ध त्वाद्यव्यतिरेकात् गन्धाऽऽदीनामप्रतिषेध ॥६०॥ गन्वत्वादिभि खसामान्ये कवतव्यवस्थाना गन्वाऽइदोना
कान्तरागि प्रयोजयन्ति। अर्थसमूदोनुमानसुत्त, नाथैक देश, तथैकदशच्ाऽडत्य विषयपश्सत्वमाव भवान प्रतिषेधति, तस्मादयुक्ोऽय प्रतिषेध इति। कथ पुनर्गन्वत्वादिभि खमा मान्ये कवतव्यवस्था गन्वादय्र १ इति।-सश खल्वय तिविध, शोत उपगोदनुषाशोतस स्पर्शत्वेन खसामान्येन सड्द्ोत एह्मासे च शेतस्पर्भे नोषस्यानुष्णाशेतस्य वा ग्रहग ग्राहकान्तर प्रयोजयति, स्पर्शमिदानामेकसाधनसाध्यत्वात, यनैव शोतस्पर्शा ग्ह्यते तेनैवेतरावपोति। एत गन्ध्वेन गन्धाना रुपलन रुपाणा ररुत्वेन रसाना, शब्दलेन शब्दानामिति। गन्धादिगहणानि पुनरसमानसाधनसाध्यत्वात् गाडकान्तराषा प्रयोजकानि, तस्मादुपपब्मिन्द्रियार्थपत्चत्वात्
यदि सामान्य सड्काहक, प्राप्तमिन्ट्रियाग्राम्- विषयत्वाव्यतिरकादेकत्वम् ॥ ६१॥ विषयत्वेन द्वि सामान्येन गन्वादय सङृहोता इति ॥६१॥
समाधत्े।-नउप्रातषधो न गन्वाडडगोना सौरभाइइदोना गन्वत्वादावयसिरेकात् गन्धत्वाऽडदसलात् तथा च गुयविभाजयगन्वत् वष्किव्रग्राइकत्वमभिप्रेत न त्ववान्तरधमा्वन्क्किव ग्राहकत्वमिति भाव । ६ ॥ यदि मन्धत्वाऽडदिना सुरभ्यादीनामका तदा विषयत्वन गन्वरसादोनामम्य क्वादिन्दियक्त स्यादिवि शङ्रते ।-विषवयत्वाव्य तिरेकात् विषय त्वेभ कवात् । ६्१ ॥
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[१८] न्यायदर्शनम्। [श्य भ्रध्याय।
त्वे्य ।। ६२ ।। न खलु विषयत्वेन सामान्येन कवतव्यवस्था विषया ग्राह कान्तरनिरपेक्षा एकसाधनग्राह्या अनुमोयन्त अ्रनुमोयन्ते च पञ्च गन्धाSड्दयो गन्धत्वादिभि खसामान्ये छवत व्यवस्था इन्द्रियान्तरग्राह्या तस्मादमम्बद्दमेतत। अयमेव चाथोऽमूद्यते बुद्धिनन क्षम पत्जत्वारदिति।-वुद्वय ए्व लक्षगानि विषयग्रहग लिड् त्वादिन्द्रियागाम सूते कवतभाष्यमिति। तम्माह्ुडिन्क्षणपज्जत्वात पञ्चन्द्रियागि। अधिष्ठानान्यपि खलु पञ्च इृन्द्रियागाम, सवशरोराधिष्ठान स्पशन स्पशग्रहणन्निङ्गम, क्वष्णमाराधिष्ठान चस्षुर्व्िर्निहत रूपग्रहग्पलड्गम, नासाऽविष्ठान घ्रायम, जिद्वाषिष्ठान रसनम कर्मच्छद्राषिष्ठान ोतम, गन्धरसरूपस्पर्शशब्दग्रहग
पत्षव हर्नि सृत्य रूपाधिकरगानि द्रव्यागि प्राप्तोति। स्पर्शना टोनि व्न्ट्रियाणि विषया एवाश्तयोपसर्पगात् प्रत्यासोदन्ति। सन्तानवृत्त्या शब्दस्य श्रोतप्रत्यासत्तिरिति। आक्ृति खलु परि
नानि विषयग्रहणेनानुमेयानि। चन्नु क्वष्णसाराऽऽश्रय र्व्निनसृत विषयव्याप। श्रोच नान्यदाका पात् तञ्व विभु
अहचय चासषत्वादि तत्पश्नत्वेन तत्वकिकिम्नकरणाना पत्तत्वम् एवमषिष्ठान रपादि विषय तत्पच्लवान मति दूरादी गमनम् इद चसुरविक्वय्य यहा-गात प्रकार तथा प प्रवाराया पक्तत्वात् वसतुद्टि मल्ा गङाति, लम्देहावच्लेदेन, त्रीमं
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श्य अध्याय ] [१5१ ]
शब्दस्य व्यञ्नकमिति। जातिरिति योनि प्रचव्त, पक्ष खाल्वन्द्रिययोनय पृथिव्यादोनि भूतानि तस्मात् प्रक्रति पत्चत्वादपि पश्चेन्द्रियागीति मिडम । ६२ ॥ कथ पुनन्नायते भूतप्रक्ततीनोन्द्रियागि, नाव्यक्प्रक्वतोनि ? इति/- भूनगुग विशेषोपलव्धेस्तादात्म्यम् ॥ ६३॥ दृष्टोह वारवादोना भूताना गुणविशेषाभित्यक्रिनियम वाघु स्पशव्यञ्क आपो रमव्यन्नका तेजो रूपव्यपक पााथव किश्रिट्रव्य कस्यचिह्व्यस्य गन्धव्यन्ज्नकम। श्रस्ति चारयमन्द्रियागा भूतगुगावशेषापन्नब्धिनियम, तन भूतगुग विषोपलव्धमन्चामहे भूतप्रकतानीन्द्रियाणि नाव्यत्तप्रकृती नोति b६३ ॥ गन्धादय पृथिव्यादिगुणा इवत्यपदिष्टम उद्देशस पृथि- व्यादोनामेकगुपत्व समान, इत्यत श्राह- गन्धर सरूपस्पर्शशब्दाना म्पर्शपय्यन्ता पृथिव्या अप्रेजोवायूना पूव पूर्वमपोह्याSSकाशस्योत्तर ॥६४।। स्पशपर्य्यन्तानामिति विभक्कविपरिगाम आकाशस्योत्तर शब्द स्पर्भपय्यन्तेभ्य इति। कथ तरप्निर्देश १सवतन्त्नविनि
कणवच्कतनय्यतप्रकारमदात बाज्ात गोलकाइडदोना सस्ानावशेष जाति अथवात्वाद व तुता जात धम तन प्रातलवसडइ । ६२। प्रापाद पाथर्वालवतसत्व मानमाह।-भृताना शथव्यादीना ये गुमविभषा गव्वाउडदय तदपलथ्धकत्वा कुडमगन्वाभिव्यच्नकषृत देटश्टन्तेन पृाथवीलवादिसाधन मिात भाव ॥ ६३॥
कमप्रात्ताथपरीचणाय सिद्धान्तसूवम्।- सथपर्य्यन्तेतु मध्ये पूव पूव न्यका त्या-१६
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[ १८२ ] न्यायदर्भनम्। [ शय पध्याय"
योगसामर्थ्यात्, तेनोत्तरशब्दस्य परार्थाभिधान विभ्वायते उद्देशसूत्र हि स्पर्शपर्य्यन्तेभ्य पर शब्द दति। तन्त्र वा स्पर्गस्य विर्वास्ततत्वात् स्पर्शपर्य्न्तेषु नियुत्रेषु योऽन्यस्तदुत्तक शष्द दति ॥६४ । न सवंगुमानुपलब्धे । ६५ ॥ नाय गुम्पानयोग साधु। कस्मात् १-यस्य भूतस्य ये गुणा, न ते तदात्मकेनन्द्रियेग सव उपन्भ्यन्त पाधिवेन हि व्राणेन स्पशपर्य्यन्ता न ग्टह्यन्ते, गन्ध एवेको गद्यत, एव शषैष्व पोति॥ ६५ ॥ कथ तर्हीम गुगा वानयोतव्या इति १-
तदनुपलब्धि ॥ ६६ ॥ गन्धाउडदी नामेकेको यथाक्रम पृथिव्यादोनामेकेकस्य गुग, पतस्तदनुपनब्धि तेषा तयास्तस्य चानुपनन्धि व्राणेन रस रपस्पभाना, रसनैन रूपस्पशयो, चक्षषा स्पर्शस्योत । ६६ ।।
अतजोवारना गुण सातव्या उत्तर श्ब्द बाकाशख गुख तथा व स्पर्नान्ता पशिव्या रसदपम्पभा जजस रूपस्पर्भी तनस खरभो वाना शब्द बाकाशस्य n ६४ माचपति।-उका गुपनियमी न युक् पुधिव्यादगुण्न्ाममताना स षा ब्रापाSडादग्राह्त्वाभावास्र पााथवत्वादिकम् प्राश्ेन पृथिव्या रसाय
इत्य व पुथि त्यादायपलभ्यमानाना रसाडदीना का गति ? दत्यव खमतमार् /- उत्तरात्तरायाम् पमादोनाम, एककशन एककक्रमेय तदुश्तरीत्तरगुनासन्गावात् रसाडा गुगसत्ावात, तन्नुपसन्विस्ेषा रसाइदोनों प्राणणादनाइयपलास
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शय बध्याय ] प्रथमात्रिकम्। [१"]
कथ तह्यनेकगुगानि भूतानि ग्टह्यन्त इति - ससर्गाच्चानेकगुग ग्रहगाम्॥। ६७।। शबादिसमर्गाच्च पृथिव्या रसाऽडदयो ग्टह्यन्ते, एव शषेष्व पीति ।६७॥ नियमस्त्हि न प्राप्नोति, ससर्गस्यानियमात, चतुर्गणा पृथिवो, त्रिगुगा आप, द्विगुग तेज, एकगुगो वायुविति नियमश्चोपपद्यते कथम १- विष्ट ह्यपरम्परेग ॥ ६८॥ पृथिव्यादोना पूर्व पूर्वमुत्तरेगोत्तरेग विष्टम अपत ससर्ग नियम दूति। तच्चेतहूतसष्टौ वेदितव्य, नैतर्हीति॥६८॥ न पार्थिवाऽडम्ययो प्रत्यक्त्वात्॥ ६६॥। नेति विसूत्री प्रत्याचष्टे। कम्मात्-पायिवस् द्रव्यस्या SSप्यस्य च प्रत्यच्ततात्। महत्वादनेकद्रव्यवत्वाद्ूपाच्ोपननब्धि रिति तैजसमेव द्रव्य प्रत्यक्ष स्यात्, न पार्थिवमाप्य वा, रूपाभावात्, तैजसवत्तु पार्थिवाऽडप्ययो प्रत्यस्त्वात न ससगादनेकगुगग्रहय भूतानामिति। भूतान्तररूपक्वतन्न पार्थिवाऽडप्ययो प्रत्यच्षत्व ब्ुवत प्रत्यचो वायु प्रसज्यत। नियमे वा कारणमुच्यताम् दति। रसयोर्वा पाथिवाऽडप्ययो प्रत्यच्त्वात् पार्थवो रस षडविध आ्प्यो मधुर एव न चैतत् ससर्गाङ्ववितुमर्ह्ति। रूपयोरवा पार्थिवाऽडम्ययो प्रत्यच्त्वात तेजसरूपानुग्टद्ोतयो ससर्गे ह्ि व्यख्तरकमेव तड्ि कथ पृथिव्यादी रसादियदयम् तवा Sह।-नपर पाथव्याति परंच् नखाSड दना हि यममात् विष्ट सम्बद्म् तथा व पृथित्र्याद्यवक्कित्नजलाऽडदिना
सिद्ानसुवम्।-उती गणमनियमी न युक्न कुत 9-पावयवस्याडप्यस प
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न्यायदर्शनम । [ श्य अ्रध्याय।
रूप न व्यड्ममस्तोति। एकानेकविधत्वे च पार्थिवाSडप्ययो प्रत्यत्तत्वात रूपयो पार्थिव हरितिनोहितपताद्यनकविध रूपम आ्प्यन्तु शक्तमप्रकाशकम, न चेतटेकगुणाना सममे मत्यपन्भ्यत दति। उदाह्वरगमावच्जैतत। अ्रत पर पपञ्न। स्यशयोर्वा पार्थिवतैजसयो प्रत्यत्तत्वात पार्थिवो जनुष्णाशेत स्पर्श, उप्ास्तेजम प्रत्यक्ष, न चैतदेकगुणना- मनुष्णशोतस्पशन वायुना समर्गेणोपपद्यत द्वति। अ्र्रथवा पार्थिवाSडप्ययाद्रव्ययोर्व्यर्वस्थितगुणयो प्रत्यक्षत्वात चतुर्गगा पार्थिव द्रव्य विगुणमाम्य प्रत्यक्षम तन तत्कारगमनुमोयते तथाभूतमिति। तस्य कार्य्य लिंड्गम, कारगभावाद्वि काय्यभाव दति। एव तैजसवायव्ययोर्द्रव्ययो प्रत्यक्षत्वाद गुगाव्यवस्थाया तत्कारणे द्रव्ये व्यवस्थाऽनुमानमति। दृष्टव्न विवेक पार्थि वाऽडप्ययो प्रत्यनत्वात पार्थिव द्रव्यमबादिभिवियुत्त प्रत्यक्षती स्टहते आप्यञ्च पराभ्या, तैजमच्च वायुना, न चैकेकगुग गह्यत दति। निरनुमानन्तु विष्ट ह्यपर परेगोत्येतदिति, नात लिङ्गमनुमापक ग्टह्यत दति येनेतटेव प्रतिपद्येमह्नि। यञ्चोक्त,-"विष्ट ह्पर परेण" दति भूतसष्टौ वेदितव्य न साम्प्रतमिति नियमकारपाभावादयुक्तम्, टृष्टस् माम्य्रतम परम्परेण विष्टमिति, वायुना च विष्ट तेज इति। विष्टत्व सयोग, सच इयो समान, वायुना च विष्टत्वात स्पर्शवत्तेज न तु तेजसा विष्टत्वादूपवान वायु इति नियमे कारण नास्तोति। दष्टस् तैजसेन स्पर्शेन वायव्यस्पर्शस्याभिभवाद ग्रहणमिति, न च तेनैव तस्याभिभव दति ॥ ६ट ।
द्रव्यस म्रत्यच्तत्वाटूपम्पशसिद्धे तथय रूपसशशून्यत्वे चन्तुषा तचा च ग्रहण् न सात् रपादेय कपिक्ाचानम्वव्वेन कचिच परम्परया हेतुत्वे मौरवमिति भाब ।६८॥
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इय अध्यतय ] प्रथमास्निकम। [१८५]
तदव न्यायविरुड प्रवाद प्रतिषिध्य "न सर्वगुणानुपलब्ध" ्त चो दत समाधीनते।- पूव पूर्व गुगोत्व प्रात्तत्ततप्रधानम ।।७० । तस्मान्त सवगुणापनाव्ध ब्रागाउडदोन, पूव पूर्व गन्धादेगुग त्वषात तत्तत्धानम । का प्रधानता १-विषयग्राडकत्वम, का गुणात्कष १-अभव्यक्री समर्थत्वम। यथा वाह्याना
सवगुणव्यञ्जकत्व गन्धरमरूपोत्कषात्तु यथाक्रम गन्धरसरूप व्यञ्जकत्वम एव घागारसनचन्ुषा चतुर्गुगात्तिगुगद्दिगुगना न सर्वगुगग्राहकत्व गन्वरसरूपोत्कषात्तु यथाक्रम गन्धरसरूप ग्राहकत्वम, तस्मात प्रासाडडटिभिन सवषा गुण नामुपलाब्ध गिति। यस्तु प्रतिजानोत गन्धगुगत्वाद्व्राग गन्वग्राहकम एव रसनादिष्वपीति, तस्य यथागुगयाग व्राणाऽडदिाभगुगग्रइग्य प्रसज्यत इति ॥९0 ॥ कि कवत पुनर्व्यवस्थानम१-किच्वित पार्थवमिन्द्रिय, न सवागि, कानिचिदाप्यतैजसवायव्यानोन्द्रियागि, न सर्वागोति।- तद्यावस्थानन्तु भूयसत्वात ॥ ७१ ॥ अर्थनिर्वृतिसमथस्य प्रविभत्तस्य द्रव्यस्य ससग पुरुष- सस्कारकारित भूयसत्वम, दृष्टो हि प्रकर्षे भूयस्त्वशब्द प्रक्रष्टे
रसाउदे पाथव्यदगुगत घ्राणदिमापि तम्सथ्यमसद् इत्यवनयम कभाह।- पूष पूव घ्रामाद तत्तत्प्रधान गन्वाजडादप्रधानम्। प्र वान्य बीजमाह्।-गुणास्कषात् गुथन्य गन्धाउडदे सकषात् तधवस्थापक्लात् तथा च गव्वाउडदिष मय्य खव्यवस्थापकगुयास्व ग्राहव त्व व्राथ्ाउदानाम त । मयु पृथव्यन्तरसााप गन्वपाधान्धात् किामान्दन करिम नन्द्रिगम् १ इत्यवा ह।-
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न्यायदर्शनम। [ शय अध्याय"।
यथा-विषयो भूगनित्यच्यते। यथा पृथगथक्रियासमथानि पुरुषमस्कार वशाद्िषीषधिमाणाप्रभृतोनि द्रव्यागि निर्वत्यन्त न मर्व मवार्थम, एव पृथगविषय ग्रह्हणसमर्थानि ब्रासाSडदोनि निरवर्त्यन्ते न सर्वविषयग्रहणसमथानोति ॥ ७१ ॥ खगुगन्नोपलभन्ते द्वान्द्रयाागा कस्मात्१ दति चेत- सगुणानामिन्द्रियभावात् ॥ ७२॥ केन कारगेन दति चेत खगुणै सह व्रासाऽदोनामिन्द्रियभावात घ्राग खन गन्धेन समानार्थकारिगा सह वाह्य गन्ध गृद्ात तस्य स्वगन्धग्रहण सहकारिवैकस्थात् न भवति एव शेष गार्माप॥ ७२॥ यदि पुनगन्ध सहकारी च स्यात घ्रागस्य ग्राह्यव्वेत्यत पाह- तेनैव तस्याग्रहणाच॥ ७३॥ न गुणोपलव्धिरन्द्रियायाम। यो बूते यथा वाह्यद्रव्य चन्षुषा गह्यत तथा तनव चन्ुषा तदेव चचगृह् तामिात ताटगिदम, तुखो हुभयत्र प्रततिपात्तहेत्वभाव इति ॥ ७३॥
भूयस्वात नवाऽडयविभट्पाथव्याद्यारमलात तद्यावस्थान प्राषीदीान्द्रयत्वव्यव स्थिति ॥0: म प्राषाडदोना गन्वाडदिगुणवखे नानमाइ।-सगुपाना गव्वाडडदिबाजट्टना
पृता डनौ तथेव दशनात् । ७२।
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श्य अध्याय ] प्रथमान्िकम।
न शब्दगुगोपलब्धे ।। ७४ ॥ खगुगान्नीपलभन्ते द्वान्द्रयागोत्येतत न भवति, उपलभ्यते हि खगुस शब्द श्रोत्ेगेति॥७४ ॥
न शब्दन गुगेन मगुणमाकाशमिन्द्रिय भवति न शब्द शब्दस्य व्यञ्जक न च घ्रागादीना खगुराग्रहगा प्रत्यक्ष नाप् नुमोयत अनुमोयते तु श्रात्ेगाSडकाशन शब्दस्य ग्रहण शब्द गुग्त्वन्चाSडकाशस्येति परिशेषञ्चानुमान वेदितव्यम आ्रात्मा तावत् श्ोता, न करगम्, मनम श्रात्त्वे बधिरत्वाभाव प्ृथिव्यादोना घ्राणाऽडदिभावे सामथ्य प्रातभावे चासामथ्यम। भ्रास्त चेद त्रात्रम आाकाशच्च शिष्यत, परिशषादाकाश आार्तामात ॥ S५॥ दति वात्स्यायनोये न्यायभाष्ये ततोयाध्यायस्याद्यमा्रिकम।
नन्विन्द्रिय गुण्नामप्रत्यक्षत्वानयमी नेव्याशड्त।-उत्नियमो न युत्ता शब्दस्य आावगुषस्य उपलब्ध।७४ । समाघत्ते-द्रव्यगुखाना रूपशब्दाइदीना परस्पर ववम्याच्छन्द्साप नाम न चसरुपाSडदोना भम्दाऽडम्रगम्य लाघवेनक्यासडोर्गत भाव Hर५I समाप्तमयपरोसाप्रकरगम्।
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[166] न्वायदशनम। [. य अरध्याय।
वतोयाध्यायस्य द्वितीयाङ्रिकम्।
परीचितानोन्द्रियाएर्थाश। बुरिदानी परोनाक्रम। साकिमनित्या नित्या वा१ दति। कुत सशय - कर्माS5काशसाधर्म्यात् रुपय ॥१॥ अस्पर्शवत्त्व ताभ्या समानो धम उपलभ्यते बुड्धो, विशेष सापजनापायधर्मवत्त्व विषव्ययस यथासमनित्यनित्वयोस्तस्था बुद्दी नोपनभ्यते तेन मशय इति॥ १ ॥ अनुपपत्नरूप खल्वय सशय। सवशरारिगा हि प्रत्यात्म वेदनीयाऽनित्या बुाद् सुखादिवत् भवात च सवित्तिर्ज्जाम्यामि नानामि अज्राममषामति, न चोपजनापायी अन्तरेग तेकाल्य रव्यात्ति ततश् तेकाल्यव्यत्तेरनित्या बुद्धिरित्येतत्ासडम।
युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिमनमो निङ्गम् इ्त्येवमादि। तस्मात मशय मक्रियाऽनुपर्पात्तरिति। दष्टिप्रवादापालभ्भायन्तु प्रकरणम। एव हि पश्यन्त प्रवदन्ति साझ्वा पुरुषस्यान्त करणभूता नित्या बुाद्धररिति साधनञ् प्रचक्षत।- विषयप्रत्यभिन्नानात्॥ २ ॥ कि पुर्नारद प्रत्यभिच्नानम १-य पूर्वमन्तामिषमर्थ, तमिम - अथ क्रमप्ाप्ततया बुद्धमनसय परोचा सप्तभि प्रकरय तनरौसव चाडडाड्रकाय, परे तु शरौराकदव्याप्यभागानुकूमसम्बन्वत्परोक्षा शरोरा नवत्तिप्रमय परासा ऋ कार्य पति। तन्सत इन्द्रियपराचायामातव्यापे तत च बुद्धिपरीचा पचाभ प्रकरय तवाउडदी बुदधामित्यताप्रकवयाम् तव सभयद्भनाय सूतम् (-कमय भाकाशसय च साधम्यात्निस्परशत्वात् बुाद्धपदार्थ नित्यत्वसशय बुद्धिपद नित्य न वा उति सभय पथ्यवसत्न ।१। तव उुंद्वेनित्यत्व साइ्य साधयति।-वुड्िनित्येति श्ेष, योड घटमद्रान, सोडर्ड
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शय अध्याय ] [१८2]
जानामाति ज्ानयो समानेऽर्ये प्रतिसन्विज्ञान प्रत्यभिज्ञानम। एतच्चावस्थिताया बुद्देरुपपन्रम। नानात्वे तु बुद्धिमेदेषूत्पन्नाप वर्गिषु प्रत्यभिन्ञानानुपर्पात्त नान्यन्नातमन्य प्रत्यभिजाना तोति । २ ॥ साध्यसमत्वादहेतु ॥३॥ यथा खलु नित्यत्व बुद्धे साध्यम एव प्रत्यभिज्ञानमपोति। कि कारगम -चेतनघमस्य करगानुपपात्ति पुरुषधर्म खल्वय सान दर्शनमुपन्न्धिर्बोध प्रत्ययोऽध्यवसाय दति, चेतनो हि पृवज्ञातमर्थ प्रत्यभिजानातोति तस्वैतस्माद्वेतार्नित्यत्व युक्तमिति। * करणचैतन्याभ्युपगमे तुचेतनस्रूप वचनीयम,*नानिदिष्ट सरूपमात्माऽन्तर शक्यमस्तौति प्रतिपत्तुम ज्ञानव्वेत बुद्ेरन्त करणस्याम्यपगम्यते चेतनस्येदानी कि सवरूपम ? को धर्म ? कि तत्त्वम १ ज्ञानेन च बुद्दी वत्तमानेनाय चेतन कि कगेति ? दूति। *चैतयत दवति चेत न ज्ञानादर्थान्तववचनम। + पुरुषश्ेतयत बुद्धिजानातोति नद ज्ञानादान्तरमुच्यते, चेतयते जानोते बुध्यत पश्यत्युपलभ्यत इत्येकोऽयमर्थ द्तति। वु दर्ज्चापयतोति चेत श्रदा जानीत पुरुष बुद्धिज्ञापयतीति। सत्यमेतत् एवच्चाभ्युपगम ज्ञान पुरुषस्येति सिद्ध भवति, न बुद्धेरन्त करणस्य इतति। प्रतिपुरुषञ्ज शब्दान्तरव्यवस्था प्रतिम्जान प्रतिषेधहेतुवचनम। * यश् प्रतिजानौते, कश्वित् पुरुषस्ेतयते कश्विद्बुध्यते, कषिदुपन्नभते, कश्चित पश्यतोति पुरुषान्तर्गाण खस्विमानि, चेतनी बोगोण्लब्धा द्रष्टेति नैकस्थेते घट स्पशमोति प्रत्यभिज्ञानमेक वत्तिमन्त विषयोकरोत न चाडडत्मा तथा तसय नन्य धर्मानधिकरणस्य कूटस्वत्वात् तम्मात् वत्तिमतौ बाङ्वरेव। वृत्तिस्तु तम्या परिषाम
परिष्रति।-साध्यसमत्वात् भसिद्त्वात, प्रतिसन्ातत् न हेतु, चह जानामो
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[220] न्यायदशनम। [ श्य अ्रध्याय
धर्मा दति। अत् क प्रतिषेधहेतु १ दति। अर्थंस्याभेद इत्कि चेत ममानम अभिवार्था एते शब्दा दति। तब व्यवस्थाऽनुप पत्तिरित्यव नत् मन्यसे, समान भवति, पुरुषश्चेतयत बुद्धि जानौत इत्यताप्यर्थो न भिद्यते, तत्रोभयोस्तेतनत्वादन्यतरलोप द्ृति। यदि पुनर्बध्यतनयेति बोधन बाद्धमन एवोच्यते तञ्च नित्यम। अ्रसत्वेतदेव न तु मनमो विषयप्रत्यभिज्ञाना वित्यत्वम। दृष्ट हि करणमेदे नातुरेकत्वात प्रत्यभिन्ञानम, मव्यदृष्टस्येतरेग प्रत्यभिस्वानात इतति चत्तर्वत। प्रदीपवच्च प्रदोपान्तर दृष्टस्य प्रदोपान्तरेग प्रत्यभिच्वानमति। तस्ाज्नातुरय नित्यत्वे हेतुरिति ॥ ३ ॥ यञ्च मन्यते बुद्देरवस्थिताया यथाविषय वृत्तयो ज्ञानानि निशर्रन्ति वत्तिस्व वत्तिमतो नान्येति।- न युगपद्ग्रहगात् ॥ ४ ॥ वृत्तिरवृा्तिमतोरनन्यत्वे दत्तिमतोऽवस्थानादु वृत्तोनामव स्थानमिति, यानीमानि विषयग्रहणानि, तान्यवतिष्ठन्त दति युगपद्विषयाग्ा ग्रहगा प्रसज्यत इति ॥ ४ ॥ अप्रत्यभिन्ञाने च विनाशप्सङ्ग ।। ५ ॥ अतोते च प्रत्यभिज्वाने वत्तिमानम्यतीत इत्यन्त करणस्य विनाश प्रसज्यते विपय्यये च नामात्वमिति ॥५ ॥ व्यदमा बात्मन एवं प्रतिसव्वात त्ययात्। चनादिनिधनत्वमेव तस कौटख्यम् मन्याटभ त्वसिड्डमिति भाव॥२॥ युद्धरीव स्थानिन्या यथावषय मानाऽडात्मका वत्तरो उत्तिमदभिन्ना वह्रिव स्फलिद्रा वि सरनत साध्य्रमत निरस्यति।-वानवत्तिमतोरमदे उत्तिमदवस्तिरित्या उत्तरप्यम सिथतर्वाच्ा तथा च सवपदाथग्रहण युगपत् स्थात् न चब तखा ब्राभेद इति।४ ॥
बिनाशे वत्तिमतोपवनाश खान बतो न इयीरे क्यम्। ५ ।
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श्य भध्याय ]
अविभु बैक मन पर्व्यायेगेन्द्रिये मयुज्यत इति।-
इन्द्रियार्थाना वत्तिवृत्तिमतानानात्वमिति, एकत्वे च प्रादुर्भावतिरोभावयारभाव इति ॥् ६ ॥
अप्रत्यभिन्नानमनुपनाब्ध, अनुपनब्धिस्न कम्याचदथस्य विषयान्तरव्यासत्र मनस्युपपद्मते, वत्तिवृत्तिमतोनानाल्वात्। एकत्वे ह्यनर्थको व्यामद्र इति ॥ s। विभुत्वे चान्त करणस्य पर्य्यायर्गेन्द्रिये सयाग,- न गत्यभावात् ॥८ ॥ प्रास्यथस्य गमनस्य सभाव, तत्र क्रमहात्तत्वाभावादयुगपद्र हणातुपपा्त्तगिति। गत्यभावाच्च प्रतिषिद्ध विभुनोऽन्त करणस्यायुगपद्रहण न लिङ्गान्तरगाउमीयत। यथा चचषो गात प्रतिषिद्वा सन्ि
धातेनानुमोयत दति। सोडय नान्त करणे विवाद न तस्य नित्यत्वे, मिड ह मनोऽन्त करण नित्यञ्जेति। क्व तर्ह्टिं विवाद १ तस्य ववभुत्वे त्व प्रमागतोऽनुपलब्धे प्रातषिड्
पयुगपट्गइप खमते व्युत्पादावि ममस इगदि।-मनसोडणत्वािन्द्रवे सह क्रमेय सम्बन्धात् मा नाना क्रमिकत्म् तथा च-"सविभु चक् मन पर्य्यायम सर्वारन्ट्रिय सम्बध्यत इन्यवतारभायम् तर्त्तादान्द्रयमन सनाग साब ज्ञानसुप पद्यतN ६॥
विषयान्तरय इन्द्रियान्तरेय् मनस सम्बन्धादित्यय।०। वन्सत चेद मोपपदयत हत्याह।-बवते मनस कमेशन्द्रियस्म्बन्व म, मनद,
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न्यायद्शनम । [शय अध्याय।
मिति। एकञ्ञान्त करग नाना चैता ज्ञानाऽडत्मिका वृत्तय चत्तुर्विज्ञान, प्रागाविज्ञान रूपविज्ञान गन्धविज्ञानम, एतच्च वत्तिवृत्तिमतारकत्वSनुपपन्नमिति। एतेन विषयान्तरव्यासङ्ग प्रत्युक्। विषयान्तरग्रहगालत्षणा विषयान्तवव्यामड्ग पुरुषम्य, नान्त कगणस्येति। केनचिदिन्द्रियेग साबधि कर्नाचदसन्रिधि रिि, अ्रयन्तु व्यामङ्गोऽनुच्जायते मनम पति ॥८ ॥ एकमन्त करण नाना वृत्तय (ञ) द्वात सत्यभेद वृत्तेरिद मुच्यत।- स्फटिकान्यत्वाभिमानवत्तदन्यत्वाभिमान । ६। तम्या वत्तो नानात्वाभिमान यथा-द्रव्यान्तरोपहिते स्फटिक अन्यत्वाभिमानो नोला लोहित दति। एव विषया न्तरोपधानादिति । ६ ।। न हेत्वभावान्॥ १० ॥ स्फ टिकान्यत्वाभिमानवदय ज्ञानेषु नानात्वाभिमानो गोप न पुनर्गन्वादयन्यता जमानवदिात हतुनास्ति हेत्वभावादनुप पत्न इति। समाना हेत्वभाव दति चेत न बानाना क्रमणोप जननापायदर्शनात क्रमण होन्द्रियार्थेषु ज्ञानान्यपजायन्ते
वभुल्वन गव्यभावात पर न नकारी न सूवान्तगत किन्तु विभुत्व चान्त करयम्य पष्याउणान्द्र सयोगा नेति आष्याननवासकाशम इत्यह ।८॥ वात्तवृत्तिमतोवस्तुतोऽभपि भेदप्रत्ययप्रतिपादनाय भदत।-यथा जवा कुमुमाSडदिसान्रधानादकस्याप सफटिकम्य तत्तदूपाममान तथा वत्तिमदभिव्नापि शत्तसतनषयसव्रिकषवशाव्वानेव प्रतिभासत इति ॥ २ ॥ दूषयत।-समते साचकाभावाओोत युत्नमित्यय केचित् न हेत्वभावादिति
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श्य अध्याय ] [१६३ ]
वापयन्ति चेति दृश्यते, तस्माद्रन्वाद्यन्यत्वाभिमानवदय ज्ञानेषु नानात्वाभिमान परति ॥ १० ॥ स्फटिकान्यत्वाभिमानवदित्येतदमृष्यमाग न्षिक वाद्याह -
नामहेतु ॥११॥
मविद्यमानहेतुक पक्ष। कस्मात१-स्फटिकेऽप्यपरापरोस्पत्ते, म्फटिकेऽप्यन्या व्यत्तय उत्पद्यम्ते अन्या निरुष्यन्त दवात। कथम १-तषिगिक त्वा छ्य क्ो ना म न्गशाल्यौयान काल, कषगस्थितिका चासका। कथ पुनर्गम्यते क्षणिका व्यक्रय ? दृति।- उपचयापचयप्रबन्धतर्नाच्छगीरादिषु पतिनिवृत्तस्या SSदारा सस्य शवोररुधिवाSडदिभाविनोपचयोऽप चयश्व प्रबन्धेन प्रवत्तन उपचयाद्यक्कानामुत्पाद एवञ् मत्यवयवपररिणाममेटन वृद्दि शरोरस्य कालान्तरे ग्टह्यते द्ृति माऽ्य व्यक्िमातरे वेदितव्य दति ॥११॥
भाष्यमिति टोकाइभनामनत मूव किन्तु तुच्कतया सूवकताऽदूषपान्नानतापरि हाराय भाष्यक्वता तटक्रमिति मन्नन्ते ॥ १ । समाप्त बुदानित्यताप्रकरगम्। सफाटक दूष गामात्वसम इत्यसडमाम सौगत भडते।- स्फाटकान्यत्वाभि मानवदित्य हेत। कुत -स्फटिकैम्यपरापरीत्प त्ते नखसदिलनणसफटिकाव्पत्त। तम मानमाह व्यक्षोमा भावाना चायकलवात। तत्माघनाय भाष्यम - उपचयाप चयप्रबन्धदभनाक्करोराSडादृघ प्रतिचष शरोरवपचयापच यद्भनाम्ानात्वम् इद सूत्र मेवनि - क्रेचित् । ११ । न्या-१७
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[ (&8 ] न्यायदर्शनम्। [ शय अ्ध्याय।
नियम हेत्वभावाद्यथा दर्शनमभ्यनुन्जा ॥ १२ ॥ ' पदाथाना सर्वासु व्याक्तषूपचयापचयप्रबन्ध शरीरवदिति नाय नियम। कस्मात १-हेतभावात्। नात्र प्रत्यक्षमनुमान वा प्रतिपादकमस्तीति। तम्माद्यथादशनमभ्यनुन्ना। यत् यत्रापचयापचय प्रबन्धो दृश्यते, तत्र तत्र व्यत्रीनामपरापरात्यात्त
यत्र यत्र न दृश्यत तत्र तत प्रत्याख्यायत यथा ग्रावप्रभृतिषु। स्फटिकऽप्यु पचयापचय प्रबन्धा न दृश्यत, तम्मादयुक्त स्फटिके उपपरापरात्पत्तिगिति। यथा चार्कस्य कटुकिस्त्रा सर्वद्रव्यागा कटकिमानमापादवित तादृगेतदिति ॥१२॥ यथ्ा गवनिरोवेनापूर्वोत्यादनिरन्वय द्रव्यसन्ताने नगििकाना मन्यत तस्यैतत - न, उत्पत्तिविनाशकारगोपलब्धे।। १३ । उत्पात्तिकारय तावदुपनभ्यते अवयवोपचयो बल्मोका दोनाम। विनाशकारणज्जोपलभ्यते घटादोनामवयवविभाग। यस्स त्वनपचितावयव निरुध्यते, अनुपाचतावयनज्जोत्पद्यते, तस्वाशषनिरोधे निरन्चने वाडपूर्वात्पादे न कारणमुभयत्ाम्युप लभ्यत इति ॥ १३ ।
मद्ान्नसूबम।-पदार्थाना विनाशसाम योवभि्वानयमे मानाभावात् अम्मुपेता 53ई पधातपनमिति।-वदि वम्यचििनामसामय्ोवभिश्वे मान खात् तदा चाथकत्व तस्थाभ्यनुज्ञाजत एव य्थाऽन्त्यभ्रब्द द्ातज १२ । युन्धन्तरमाह।-म साटकादे चधिकत्वम् यत उत्पत्तिविनान्कारवानुप
जन पूवविनाओऽपरोत्यचित्र सादिति भाव ।१२।
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श्य भध्याय ] [१e५]
वीरविनाशे कारणानुपलब्धिवद्दध्यत्पत्तिवच्च तटुप्प्त्ति॥ १४ ॥ यथाऽनुपलभ्यमान चौरविनाथकारण दध्युत्पत्तिकारपज्जा भ्यनुन्नायते तथा स्फटिकेऽपरापरासु व्यात्तिषु विनाशकारगा
लिङ्ग तो ग्रहगान्नानुपलब्धि ॥ १५॥ नोरविनाशलिद्ग चोरविनाशकारगम। दध्युत्पत्तिलिद्ग दध्युत्पत्तिकारणस्ज म्टह्यते पतो नानुपलब्धि। विपर्य्यस्त स्फटिकाSडदिष द्रव्येषु, अपरापरोत्पत्ती व्यक्कोमा न निङ्गमस्तो त्यनुर्व्टात्तरवेति॥ १५ ॥ अत कश्वित् परिहारमाह।- न पयस परिणामो गुणान्तरप्राटुर्भावात् ॥ १६ ॥ पयस परिणामो न विनाश इत्यक बाह। परिणाम सावस्थितस्य द्रव्यस्य पूवधर्मनिव्ृत्ती धमान्तरात्यत्तिरिति। गुणान्तरप्रादुर्भाव इत्यपर श्राह्। गुणान्तरप्रादुभावस सतो द्रव्यस्य पूर्वगुपनिव्ृत्तौ गुणान्तरमुत्पद्यत इति, स खल्वेकपत्ो भाव दष ॥१६॥
पूव
भाव ॥१४ ॥ सद्वान्तसूवम्।- दध् चौरविनाशस्य व प्रत्यथसिद्धत्वात्तत्कारण कर्पाते न त्व सटिक विनाशोन्पादायुपलभ्येते यैन तत्वारणकल्पनम्।। १५।। सोगतमते साह्दूषससुपन्यस्यति।- नचौरस नाभो दघ्रयोत्पत्ति किन्तु चोरस परिणाम परिणामशव्दार्थी गुणानरप्रादुर्भाव विद्यमानस चोरस पूव
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[१८६] न्यायदशनम। [ शय अध्याय।
अत्र तु प्रतिषेध ।-
ममच्कन लक्षसादवयवव्यूहात द्रव्यान्तरे दघ्ुात्पन्ने ग्टह्य माग् पूव पयाद्रव्यमवयववभागभ्यो निव्ृत्तमित्यनुमोयत यथा मृदवयवाना व्यहान्तराड्ट्रव्यान्तरे स्थाल्यामुत्पन्नाया पूव मृत्पिएडद्व्य मृदवयवविभागभ्यो निवत्तत दति। *मृददद्दावयवान्वय / पयादधार्नशिषनिरोधे निरन्वयो द्रव्यान्तरात्यादो घटत इति अभ्यनुन्नाय च निष्कारण क्षोरविनाश दध्युत्पादञ्ज प्रतिषेध उच्चते इति ॥ १७। क्वचिद्दिनाशकारणानुपलब्धे क्वचिच्चोपलब्धे- रनेकान्त ॥। १८ ।। वोरदधिवन्निष्कारणी विनाशोत्पादी स्फटिकादिव्यक्री नामिति नायमेकान्त दति। कस्मात १-हेत्वभावात। नाव्र हतुरक्ति अकारणी विनाशोत्पादो स्फटिकादिव्यक्कोना चौर दधिवत, न पुनयथा विनाशकारणभावात् कुन्भस्य विनाश
दष्टान्तवचनम गह्यमाययोर्विनाशोत्पादयो स्फाटकाSडदिषु स्यादयमाञ्चयवान दृष्टान्त चौरविनाशकारणानुपलब्धिवद्ृष्युत्प - एताव्रराकरोति सूबकार।-व्यहान्तरात रचनान्तरात् पूर्वावयवस रोगनाशी
दोषान्तराभिधानाय सिद्धान्तिना सूवम्।-चौरदघिटश्टान्तेन विनाशेव्यादा बकारथकाववति न युनम् -घटाइ) दो सवारथकत्वीपसव्ेव्यमिचाराम्। वस्तुत
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३य अध्यतय ]
नरिवच्चति, तो त् न गह्येत, तम्माननिवधिष्ठारोष्य दष्टान्त दति। अभ्यनुन्नाय च स्फ टकस्योत्पादविनाशी योडन साधक तस्थाभ्यनुम्ञानादप्राता। कुश्वन्न निष्कावणो विनाशोत्ाटा स्फ टकाSड टो नास रथ्य नेवाडय दृष्ान्त र प्रानेहमशक्यत्वात। नौरदधिवत्तु निष्कावयीिनाभोत्पादावित शक्ाजय प्रात षेड़ कारगतो विनाशा पात्तदशनात। चोरतधाविनाशोत्पत्ता पश्यता तत्कारणमनुमयम कार्य्यद्ग हिकारा मित्युपपन्र मित्वा बुद्धिरिति ॥१८॥ ददन्तु चित्यत कस्येय बुद्धि आत्मेन्द्रियमनोर्ऽर्याना गुग दूति १-प्रमिद्वापि च वल्वयमथ परोक्ताशष प्रवत्तयामा त प्रक्रियत सोऽय बुद्धो मत्निकषोत्पत्ते सशय विशेषस्या- ग्रहगारदिति। तवाय विगेप - नेन्द्रियार्थयोस्ह्विनाणैडषि ज्ञानावस्थानात ।।१६।। नन्द्रियागामर्थाना वा गुगो व्ञानम तेषा विनाशे ज्ञानस्य भावात्। भर्वात खल्विदमिन्द्रियेऽये च विश्े ज्ञानमद्राक्षमिति, न च नातरि विनष्टे ज्ञान भावतुमहतति। अन्यत् खलु चेत दिन्द्रियार्थसन्निकर्षज ज्ञान, यदिन्द्रियार्थविनाश न भवति इदमन्यदात्ममन सन्निकर्षज, तस्य युक्तो भाव इति। स्मृति दल्चियमद्राचममिति पूवटृष्टविषया न च विज्वातरि नष्ट
समाप्त नषभङ्प्रवरगम्। युद्धरात्मगुथ्त्व वद्यप्यात्मपरौचात एव सिद्धप्राय तथाडाप विभिष्य व्यत्पादनाय
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[१2८] न्यायदर्शनम्। [ शय अध्याय।
पूर्वोपनब्धे म्रग युक्तम, न चान्यदृष्टमन्य स्परतति न च मर्नाम ज्ञातय्यम्यपगम्यमान प्रतिपालायतुम ॥ १८॥ अ्रस्तु तह मनोगुगो ज्ञानम :- युगपज्ज्ञेयानुपलब्धेश्च न मनस ॥ २०॥ युगपञ््ज्ेयानुपनब्धिरन्त करणस्य लिङ्गम, तत्र युगपज सेयानुपलब्धाऽनुमोयते अ्रन्त करगम, न तस्य गुगो ज्ञानम, कम्य ताहि १-सम्य वशित्वात। वशे साता वश्य करगम, ज्ञानगुगत्व च करणभावनिवृत्ति। व्रामाऽडादसाधनस्य च मातुगन्धाऽडदिज्ञानभावादनुमोयत अन्त करगासाधनस्य सुखा ssh ज्ञान स्पतिसेति। तत यञ्जानगुग स आत्मा, यत्त सुखादयुपलाव्धमाधनमन्त करग मनस्तत् दति सज्ञामेतमात्र, नाथभद दूति। युगपउज्ञेयानुपलब्धेख्वायागिन दति चाथ। योगो खलु ऋद्दौ प्रादुर्भूताया विकरगधमान निमाय सन्द्रियागि शगेरन्तर्गाणि तषु तेष युगपनत्जेयानुपलभते तच्चैतद्विभौ चातय्यपपद्मते नागो मनमोति। विभुत्वे वा मनसो ज्ञानम्य नाऽऽत्मगुणत्वप्रतिषेध। विभु मन, तदन्त करग भूतरामति तस्य सवान्द्रयैर्युगपत सयोगाद्युगपज्न्नानान्युत्पद्येर विति ॥ २०॥
नेन्द्रियस्थ न वाडयम्य गुपा तन्नाशपि जानस्य सरणस्य मवस्थानात उत्पत्न न अवनुभावतुरभाव सरयसुपपद्यतडात्प्रसङ्भागगत भाव ।१८। मनागुयात्व निरस्यति।-युगप आातुपलवह्ेंता सिद्धस् मनसी न कत्तलम् - वाल्पाड्क्मानेन करणत्वनव सद्धे। वस्तुता युमपत्ेयानुपलव्धरित्यनेन मनसो डखुत्व मूचितम् तथा च तद्गतमुखाद्यप्रत्ययता स्ात, एव कायन्यूह्ष तत्तहेशवचदन नानाइदिक न स्ादिति॥२ ॥
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श्य भध्याय ] [xe2]
तदात्मगुगात्वेऽपि तुल्यम् ॥ २१॥ विभुरत्मा सवेन्द्रयै सयुत्ता, द्रति युगपज्न्ननोत्पत्ति प्रमङ्ग इति ॥ २१॥ दून्द्रियैर्मनम सन्निकर्षाभावात तदनुत्पत्ति ।।२२।।
कारण तस्य चायोगपद्यमगुत्वात मनस अयोगपद्यादनु
यांि, पुनरात्मे न्द्रियाथम न्निकष मा व्रा दन्ध दि ्वा मु त् य्ते- नोत्पत्तिकारगानपदेशात॥ २३ ॥ आात्मेन्द्रिय सन्निकषसात्रान्वा ्SS् ्वा न सुत्या्ते,ति नावोत्पत्तिकारणमपदिश्यते, येनैतत प्रतिपद्येमहौति ॥ २३ ॥ विनाशकारणानुपलव्वंश्चावस्थाने तव्नित्यत्व- प्रसङ्ग ॥ २४ ॥ तदात्मगुणत्वेपि तु्यमित्येतदनेन समुच्जीयते। द्विविधो हि गुणनाशहेतु,-गुणानामाश्रयाभाव विरोधीच गुण, परभावो नित्यत्वादात्मनीनुपपन्र, विरोधी च बुद्देगुगो न ग्टह्यते, तस्मादात्मगुगत्वे सात बुद्देनित्यत्प्रसद्ग।। २४ ।।
भद्धते।-तस्ा बुद्धरात्मगुश्वेऽपि ज्ानयोगपण तुल्यम् भात्मन सर्वेान्द्रय सयोगात् तथा चस वघलदवस्थ एवोत कथ तया युक्या मन सिध्द्धिरिति भाव ॥२१। उत्तरयात।-युगपन्नानेन्द्रिय सह ममस साम्रकषामवान्न युगपन्रामाविषयोप वन्धिरिति भाव । २२॥ आवपति।-बद्माव्पत्ती कारणस्यानपद्भात् चकथनात् नाऽडत्गुणी बाड भात्ममन सयागस्य कारणत्वे ज्ञानस्य सावादकप्रसप् प्वात भाव ।२२।
रपलब्धखस्ा बुद्ानत्यता प्रसद् ।२४।
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[२०.] न्यारदशनम [शव अध्याय
अनित्वग्रश दनुद्यन्तगादिनाम गब्दवत्।२५।। आनत्वा वुाषादात सवशरोवगा प्रत्यात्मनदनीजमतत मसन च बुवसिन्तान, तत्र बुद्बुधन्तर विगधो गुण इत्यनु मोयत यथा शब्दसन्तान शद वध्दान्तगवरोबीात। असद्वेन येषु ज्ञानकारतष मस्कारषु सतिहतुष्व त्ममन सोद्याया सान्नकुष ममान स्पृतिहती मात न कारगम्यायोगपद्यमम्तोति युगपत स्मतय प्रादुभनेयु, र्याद बुाद्धरात्मगुग स्यादिात । २५।
त्पत्तेन युगपदुपत्ति॥२६ ॥ ज्ञानसाधन मस्कारो ज्ानामत्यव्यते ज्ानमस्कतैगत्म प्रदेशे पय्याकम मन सावक्वष्यन, आ्रत्ममन स्निकषात् स्मृतयोडप पय्याये ग भघन्तोति॥ २६। नान्त शवीर्वत्तित्वान्मनस ।।२७। सदहस्याऽडत्नो एनमा सयोगो विपच्यमानकमाऽऽशय सद्वितो जोवमिषयते। ततास्य प्राक प्रायणादन्त शरोरे
कत्पनय आत्मम न ्यंंगिद रुत्पाद्य वमनन्तस्पम्नबुद सस्कारावा नाशकत्व कल्प ते चरममुद्स्तु अट्ट्टमाशात कालाड़ा नाम। बद्धबद्मन्तरनाशलनुरूप टष्टानमाह पन्दवादात।-प्रब्दस पथा प्रब्दान्तराम्माणथरमशव्दस् निामत्तनाशनाश्यत्व तथा मछतडपोति भाव ।२५। मनु युद्धेरात्मगुशत्व सस्काराऽडत्मममोयोगयो सत्त्वात् सपतौना योगपद्य सात् अवकदशिन पारहारमाशदना-ज्ञान सरस्कारकारण समवेत यदवक्कदेन तदयक्केदन मन सत्निकषस सत्युस्ादकत्वात् तख व क्रमिकत्वान्न स्पतियोगपद मत्वर्थ। जायतऽनेनात व्युत्पच्या ज्वानपद सस्कारपरमित्यन्धे। २६। तम्मत दूषयति।-उत म युक्तम्, -मनस् धन अरीरवत्तित्वात् चन्त भरौरे
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शय अध्याय ] [२०१]
वर्त्तमानस्य मनम शरोराइहिर्ज्जानसस्कृतैरात्मप्रदेशे सयोगो नोपपद्यत दति ॥२७। साध्यत्वादहेतु ॥२८ ॥ विपच्यमानकमाSSशयमान्न जीवनम, एवच्च सति साध्य मन्त शरारव्टत्तित्व मनम इति ॥२८॥ स्मर्त शगीग्धारगोपपत्तेप्रतिषेध ॥२६॥ सु्षमषया खल्वय मन प्रगिदधान चिरादि किदथ समर्रात, सरतथ् शरीरधारण दृश्यत आत्ममन साव्रकषजथ प्रयत्नो द्विविध -धारक, प्रेरकश्न, निसृते च शरीराद्ाह मनसि धारकस्य प्रयत्नस्याभावात् गुरुत्वात्पतन स्यात् शरोरस्य स्मरत दति ॥२८॥ न तदाशुगतित्वान्मनस । ३०॥ आशर्गत मन तस्य वहि शरोरादात्मप्रदशन ज्ञानसस्क तेन सव्निकष, प्रत्यागतस्य च प्रयत्नोत्पादनम उभय युज्यत द्ति। उत्पाद्य वा धारक प्रयत्न शरोरान्रि सरख मनस, अतस्तत्ोषपव धारणमिति ॥ ३ ॥
वनतिर्ज्ञानजन कौभृती व्यापारी यम्य तत्तात शरोशातरिक्ावक्केदनाऽडत्ममनायोगस ज्ञनासेतृत्वाच्करोावाच्छन्नस्य हेतृत्व तद्दोषतादवस्थामितत भाव ।२७॥ एक देशे शद्ते। -शरौरावन्किव्नाऽडम्ममनोयोया न इतु साध्यतवात बासद स्वात् मानाभावादिति भाव ॥२८॥ सिद्धान्तमूत-उत्तपतिषेधा न युक्त अरत शरोरधारयरूपाया उपपस यत्े पनथा मनसी वाहर्मव शगेरावाचकस्राऽडतमनोदोगाभावन प्रयताभाव शगेर धारय न स्ादिति भाव ।। २८॥ पुन शहते-अरोराधारय न मनस पराहत्ते ॥२ ॥
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[२०२ ] न्यायदर्श नम। [ शय भध्याय।
न स्परगकालानियमात् ॥ ३१॥ किश्चित चिप्र सय्यते, किप्नि्चरेग, यदा चिरेग तदा सुस्मरषया मर्नास धार्य्यमाणे चिन्ताप्रबन्धे सति कस्यचदर्थस्य लिङ्गभूतस्य चिन्तनमाराधित स्मृतिहेतुर्भवति तवैतच्चिरनिव्व रिते मनसि नोपपद्यते दति। शरोरसयोगानपेत्तसाऽडत्मन मयोगो न स्पतिहेतु शवीरस्य भोगाऽ्डयतनत्वात उपभोगा Sयतम पुरुषस्य मातु शरोरम, न ततो निश्वारितस्य मनम आत्मसयोगमात ज्ञानसुखाउडदोनामुत्पत्ती कल्पाते, कृप्तौ वा
आत्मप्रेरगायटच्छा-नताभि् न सयोग- विशेष ।। ३२।। आत्मप्रेरणेन वा मनसो वहि भरोरात् मयोगविशेष स्वात यटच्छया वाऽडकस्मिकतया पतया वा मनस सर्वथा चानुपर्पात्त। कथम -समर्त्तव्यत्वादिक्छात सरगज्जाना सन्भवाञ्ज * यदि तावदात्मा "अ्रमुष्यार्थस्य स्मृतिहेतु सस्कार असुषिव्ात्मप्रदेशे समवेत, तेन मन सयुन्यताम इति मन प्रेश्यति, तदा सपत एवासावर्थो भवति न समत्तव्य। न
दूषयति।-मनस शेघ्रमागमन न युन्नम् -सरखे कालनियमाभावार कदाचिक्कोत् अव्यते कदाचित पविधानात विलम्बनापात। नच प्रविधान शरोशान स्थितमनस एव वहिनि।मस्तु अरणाव्यर्वह्ितपूवमेवति वाच्यम् वद्धि निर्ममानन्त प्रवेभानुकूलक्रिया विभागाSडदि कालकलाप यावक्करौरवारय न स्यादिति भाव । ३१ ॥ एकदेशिमतमन्त एकदैशो दूषयति।-वद्ि प्रद्भविभषे मन सनोगविशषी न सभवति सडिन सव्ययमाव्ाप्रेरख्रेन तस्य अरथोयज्ञामपूवकतया प्रागेव खात्या पत्ते। नपि यहक्कया चकममात भाकष्मिकत्वस निषेधात्। नापि मनशी
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श्य अध्याय ] [२०१ ]
चाउउत्म प्रत्यच आ्त्मप्रदेश सस्कारो वा, तचानुपपन्राऽडत्म प्रत्यन्षेण सवित्तिरिति। सुस्मूर्षया चाय मन प्रणिदधानसिरा दपि क्विदर्थ स्रति नाकम्मात्। सत्वन्न मनसो नास्ति, ज्ञानप्रतिषैधादिति ॥३२ । एतस़- व्यासतामनस पादव्यथनेन सयोगविशेषेग समानम् ॥ ३३ ॥ यदा खल्वय व्यासक्मना कचिहेशे शर्करया कपटकेन वा पादव्यथनमाप्नोति तदाऽडतममन सयोगविशेष एषितव्य, दृष्ट ि दुख टुखवेदनक्तेति। तवाय समान प्रतिषेध। यटच्छया तु विशेष, नाऽडकस्मिका क्रिया, नाऽडकस्िक सयोग दतति। * कमाटृष्टमुपभागार्थ क्रियाहतुरिति चेत् समानम, * कर्मा दृष्ट पुरुषस्थ पुरुषोपभोगार्थ मर्नास क्रियाहेतु। एव दुख दु खसवेदनक्न सिध्यतोत्येवञ्वेवन्यसे समानम्, स्मृति हेतावपि सयोमविशेषो भवितुमहंति। तत यदुश्म,- "आत्मप्रेरपयटृक्का वताभिख न सयोगविशेष" द्त्ययम प्रतिषेध दति, पूवस्तु प्रतिषेध,-"नान्त भगेरहत्तित्वानानस" इति A३३ ।
सवया घावतया मनसो शाळत्वानभ्यपनमान। प्रेसवयटच्छा प्तामि प्रयनेक्का ननरित्यथ पति कच्वित तव् प्रयबेनव चरितामत्वाऽडपत्त ।२२। एतव्विराकरोति।-द्थादिक प्रश्त वास्टकाSदिना पादव्ययनेन तदबन्करदैन मन सयोगी यचा जायते तथतदपोति भाव दतरया तव मन सथाे डप्युक्रदोषा सु। भट्टविशेषाधोनकमवशादसाविवि चक्, बुल्य प्रम्कतेपोति भाब ४ २९॥
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[२० ४ ] न्यायदर्शनम् । [ शय अध्याय।
क खल्विदानी कारणयोगपद्यसङ्भावे युगपदसरगस्य हतुरिति :-
युगपट्स्गगाम।३ठ॥ यथा खल्वात्ममनमो सन्निकर्ष सस्कारख् स्पतिहेतु ए्व प्रगिधान लिड्गाSडदिज्ञानानि तानि च न युगपद्धर्वन्ति, तत् कता स्मतीना युगपदनुत्पत्तिरिति॥३४॥ प्रातिभवत्त प्रणिधानाद्यनपैचे ममार्ने यौग- पद्यप्रसङ्ग ॥ ३५ ॥ यत खस्विद प्रातिभमिव ज्ञान प्रगगिधानाद्यनपेत्त समात्त मुत्पद्यत, कढाचित तस्य युगपदत्यत्तिप्रसद्गा हेत वात *सत स्मृतिहेतोरमवेदनात प्रातिमेन समानाममान * बहनथविषये वै चिन्ताप्रबन्धे कव्चिदेवाथ कसचिन स्तिहेतु तस्यानुचिन्तनात तस्य स्पतिमवत न चाय सत्ता मर्व स्मृतिहेत मवेदयते एव मे स्मतिरुत्पन्नेत्यमवेदनाव गातभमिव नार्नामद स्मात्तमिति।प्रातिभे कर्थामति चत पुरुषकर्म- विशेषादुपभोगवन्नियम । प्रातिभमिदानी म्वान युगपत् कम्मात नोत्पद्यते १-यथोपभोगा्थे कर्म युगण्दुपभोग न करोति ण्व पुरुषकर्मविशेष प्रतिभाहेतुन युगपदनेक प्रातिभ ज्ञानसुत्पादयति। हेत्वभावादयुक्तमतदिति चेन्न,
अरवायोमपद खयमुपपादर्यति।-प्रविधान चित्तकाया सुस्पूर्षेति बावत विसम्नानम् उद्ोधकम् उबोधकानामानन्यादादपद प्ानात्परती याजनीयम् तस कमात् अरयक्रम । यदि प युमपद्दीधकानि, तदा तावाहमयकअरयमिष्ठत एव, ज्चा पदन्ञानादाविति मनन्मम् । २४ ।
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श्य अध्याय ] [२०५]
करमास्य प्रत्वयपय्याये सामथ्यात * उपभोगवन्नियम प्त्यस्ति दष्टान्त। हतुनास्तोति चेवमन्यस न करगस्य प्रत्ययपय्याये सामध्यात नैकस्म्िन सेये युगपदनेक ज्वानमुत्यद्यत न चानेकस्तिन, तदिद दृष्टेन प्रत्ययपर्य्याधेणानुमेय करणमामर्थ्य मित्थन्धनममिति। न जञातु विकरणधार्मगो दहवनानतवे अ्रत्यययोगपक्यादिति, अ्रयक्ष द्वितीय प्रतिषेध। अरवास्थत- शरोरस्य चानेकम्मानममवायादकप्रदेशे युगपटनेकाथस्मरय
नरनमनकमकस्रिव्ाम्मप्रदशे ममवैति तन यदा मन सयुज्यत, तदा पातपूवस्यानेकस्य युगपत सारगा प्रमज्यते, प्रदशम्य मयागपर्य्यायाभावादित।* आ्रत्ममदभानामद्रव्या न्तरत्वा देकार्थसमवायस्वाविशेषे प्ति शब्दसन्ताने तु श्रोषाधिष्ठानप्रत्यासत्या भब्द सवथवत सस्कारप्रत्यासत्या मनस स्पृत्युत्वस्तेरन युगपदुत्प्ति प्रसङ्ग। पूर्व एव तु प्रतिषेध, नानेकञ्जानसमवायादेकप्रदेशे युगपत् स्मृतिप्रसङ्क इति ॥ ३५॥ यत् पुरुषधर्मो मानम् शन्त करणय्येक्काद्वेषप्रयत्नसुख दु खानि धर्मा इति कस्याचहर्शन, तत् प्रतिषिध्यते-
घय खलु जानीते तावत्-इद मे सुखसाधनम्, दद मे दुखसाधनमिति, पात सुखसाधनमासुमिच्छति दुखसाघन हासुमिच्कति, प्राप्ुम इच्छाप्रयुत्तस्यासत सुससाधनावापये समोह्ाविशेष आरभ्, जिह्ासाप्रयुत्तस् टुखसाधनपरिवर्जन
नन्विच्छाइदोनों मनोषमत्वातेषा ज्ञानजन्यलवात् सामानाविनरख्न व तव
न्या-१८
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[२'] न्यायदशनम । [ शय सध्याय।
निवृत्ति, एव ज्ञानेच्ाप्रयत्तसुखदु खानामेकेनाभिसम्बन्ध,
स्यच्छाद्वेषप्रयन्नसुखदु खानि धर्मा, नाचेतनस्येति आरभ्भ- निवृत्त्योक्च प्रत्यगात्मनि टष्टत्वात परचानुमान वेदितव्यमिति ।२६॥ अत्र भूतचैतनिक श्राह्- तह्िङ्गत्वादिच्काद्वेषयो पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेध ।३७।
तस्येच्छाद्षौ, तस्य ज्वानामति प्राप्त पा्थिवाज्डप्यतेजसवाय
दति चतन्यम । ३७॥
र्योग इतति प्राप्त परखादे करणस्याSडरभनिवृत्तिदशनाच्चतन्य मिति। प्रथ शरोरस्ेक्काSडदिभिर्योग, परखादस्तु करणस्या SSरशनिवृत्तो व्यभिचरत न तर्ुभय हेतु पाथिवाऽडप्यतैजस
इति। प्रय तर्ह्यन्योऽथ "तश्निइ्वत्वादिक्काद्वेषयो पार्थिवा
जामवत वात्मन इक्काउडदय। हेतुमाइ-पारभनिद्वम्यरक्ादेषनिमित्तत्वादिति पहात्तानवत्तारिच्क्रावेषजन्यलात् तव सामानाविकरयेन जानस इतुल्यमिति भाव वश्-सस्य ज्ञानवत याविक्कादेषी तक्षिामत्तत्वादित्यय तथा प घ्ानेक्प्रयबारना सामानािकरयय नासडम् ॥ २६। नव्वस्तु तषा सामानधवारस परन्तु तेषामाधकरख् कायाकार पाविवादि परमायपु्त एवति चावाक भहते।-पायवादाषु देहेषु ज्ानादेन प्रविषेध । कुत - इक्काहषयोस्तलित्र लवादारभ्ामउत्तिखद् कत्वात् तयो चष्टाविभेषबित्मला अशावाए शरोर प्रत्यचासतत्वादिति भाव ।२७।
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शय भध्याय ] [२.]
द्येष्वप्रतिषेध'। पृथित्यादीना भृतानामारभस्तावत त्म (ट) स्थावरशगेरेष, तत्वयवत्य हन्निद्ग प्रवृत्तिविशेष लोष्टाऽडटिष च लिङ्गाभावात् प्रव्ृतिविशेषाभावो निवृत्ति, आरभनिव्ृत्ति निङ्गाविच्छाद्वेषावित पाथवाऽडप्येष्वगषु तहर्शनाटिच्छा द्वेषयोस्तद्योगाजज्ञानयोग दति मिद्ध भूतचैतन्यामति॥२८॥ कुम्भाऽडदिष्वनुपल श्रेगहेतु ॥३६॥ कुभ्भाSडटिमृगवयवाना व्यहलिङ्ग प्रवृत्तिविशेष आ्रभ् सिकताऽडदिषु प्रवृत्तिविशेषाभावो निवृत्ति न च मृत्सिकताना मारभनिवृत्तिदर्शनाटिच्छा द्वेषप्रयनन्ननैर्योग, तम्मात् तविङ्ग त्वादिच्छाद्वषयोरित्य हैतुरिति ॥३६ ॥ नियमानियमी तु तद्विशेषकौ ॥ ४० ॥ तयोरिच्छ्ाद्वेषयोर्नियमानियमौ विशेषकौ भेदको, नस्येष्का द्वेषनिमित्त प्रव्ृत्तिनिव्वत्ती न साऽ्ऽन्नये, कि र्ता्ि १- प्रयोज्याSSस्वये। तत्र प्रयुज्यमानेष भूतेषु प्रष्यत्तिनिद्टत्तो स, न सवषु दृत्यनियमापपत्ति। यस्य तु ज्ञानाब्भुतानामिच्काद्वेष निमित्त आरसनिव्ृत्तो स्वाद्डन्नय, तस्य नियम स्थात्, यथा भूताना गुगान्तरनिमित्ता प्रवृत्तिगुगप्रतिबन्धाच्च निवृत्ति र्भूतमावे भवति नियमेन एव भूतमात्रे भ्ानेष्काद्वेषनिमित्ते प्रवृत्त्तिनिव्टत्तो साऽडन्नये स्याताम। तस्मात् प्रयोजकाSडश्रिता
सिद्धम। * एकशरोरे तु नाटबहुत्व निरनुमानम्। * भूतचैत- दिष चानाऽडादासाइप्रसद्ध। तम्मात् क्रियाविक षाणा प्रयवद जन्यत्व सम्बन्धान्तरय न तु समवायैन व्यमिचारादिति भाव ॥३८॥ खमते व्युत्पादयति।-त डमषश्ी तयोश्वेतनाचेतनयी विशष की उतरव्यावसकौ नियमानियमी सुमवाचेन जन्यतानियमतदभावी समवायेन प्ञानेक्क्ाइडदोना चतन (ट) वसशब्दसय जन्म द्त्यय नङ्रमस्यावरमरोरोष्वत्र्य।
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[२०८] न्यायदशनम । [ शय अ्ध्याय।
निकघदाथस्यैकशगीरे बहनि भूतानि ज्वानेच्काद्वेषप्रयत्नगुग- नोति जातटबहुत्व प्राप्तम, शमिति त्रुक्त प्रमाग नास्ति यथा नाना शगोरेष नाना जातारो बद्दादिगुगव्यवस्थानात एव मेकगरोरडपि बुदादिव्यवस्थाऽनुमान स्यात चाटबहुत्वस्येति। टृष्सान्यगुगनिमित्त प्रव्ृत्तिविशेषो भूतानाम सोऽनुमान मन्यतापि दृष्ट करणनक्षपेषु भृतेष परखादिषूपादान- लक्षणेष च मृतभृतिष्वन्यकगानिमित्त प्रवृत्तिवशेष, मोडनु मानम् अन्यतापि च तमस्थावरशरीरेषु तदवयवव्यूहन्निद्ग प्रव्ृत्तिविशेषो भूतानामन्यगुगानिमत्त दूति, मच गु प्रयत्न समानाSSश्रय सस्कारी धर्माधमममाग्यात सर्वाथ पुरुषार्था- SSराधनाय प्रयोजको भूताना प्रयत्नवदिति। आ्रत्मास्तित्व हेतुभिगत्मनित्यत्वहैतुभिश्व भूतचैतन्यप्रतिषेध कवतो वेदितव्य, नेन्द्रियार्थयो तद्विनाशपि ज्ानावस्थानादिति च समान प्रतिषेध दति। क्रियामात क्रियोपरममातञ्ज प्रवत्तिनिव्ृत्ती दृव्यभिप्रेत्योक्-"तल्िद्गत्वादिच्काद्वेषयो पार्थिवाद्येष्वप्रति षेध' अन्यथा तिविमे आरभनिव्वत्ती आख्यात, न च तथाविधे पृथिव्यादष दृश्येत तस्मादयुत्त पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेध' दात॥ ४० ॥ भूरतेन्द्रियमनमा समान प्रतिषेध, मनस्तूदाहरगमात्रम,- यथोत्तहेतुत्वात् पाग्तन्वादक्ताभ्यागमाच न मनस ॥ ४ १। इच्का द्वेषप्रयतसुखदु खन्नानान्यात्मनो लिङ्गमित्यत प्रभृति
धमलात सवच्कदकतवा व शरौरे तेषा जन्चजनकभाव। परवादौ बवावषय तथाक्रिया वस्तुतम्तु चष्टव परशादाकयाजानका यवादसतद्वेतुत् मानाभाव ५४० रक्काउदोना मनागुसत्वाभावे युश्यन्तरमाह।-इक्कादव इति शेप बधोक
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श्य अध्याय ]
यथाक् मङ्द्मते तेन भूतेन्द्रियमनमाञ्जैतन्यप्रतिपेध। पार तन्त्रपात-परतन्त्रागि भृतेन्ट्रियमनामि धारगाप्रेरगवहन क्रियासु प्रयत्नवभात प्रवर्त्तते चैतन्ये पुन स्वतन्त्रि स्युगिति। अजताभ्यागमाच्च प्रव्ृत्तिव गनु निशगोगाऽडरभ इति चैनन्ये भून्द्रियमनमा परकत कम पुरुषेग सुज्यत दति म्यात अ्रचेतन्ये तु तव्साधनस्य स्वकतकर्मफन्ोपभोग पुरुषस्यत्यप- पद्यत इति ॥ ४१ ॥ अथाय मिडोपमङ्गह,-
आत्मगुगो ज्ञानमिात प्रक्ृतम। परिशेषो नाम प्रसक्नप्रति वधेऽन्यताप्रमङ्गाच्किष्यमागे सम्प्रत्यय भृतन्द्रियसनमा प्रतिषेधे द्रव्यान्तर न प्रमज्यत शिष्यत वाउडत्मा, तम्य गुगो न्ञानमिति च्वायत।
हतृवात नानचाउडगोना सामानधक एन काय्यकारयाभावास पारतन्वा त मममश्ुममहका स्त्वान इच्काडतत्रो न तद्प्ा वस्तुतस्तु 5क्काइदीना पाव कगन पराधीनावषयताभानितवात इककाडडदोना हि सम नाधिकरगास्वजम कज्ञानावष रव विषयता ज्ञानवर्याधकरणे च तम्न स्ादिात भाव। खऊ्कतात खयक्तान कनाय भभ्यागमा भीग स मनसी यवाऽडदिसत्त्वे न स्वात् न ह्यन्यऊवतात्कम्पणी भोग न वा भोगोपि मनस भोक्तषन्वमाचाSदादभगन एवाऽडत्मत्वात् तड्निब्ने भात्मान मामाभावास् आत्मन सुखाSडादसाचात्कारामुरेधान्मइत्म् ममसय धामग्राइक मानादयृत्वम् अतोऽपि नक्म्। न च मनस परमाणृत्वाल्लाघवाज् नित्यत्व त्वननतम तथा चाऽडतममनसनत्यतात् सदा जानादिप्रसब्रादनिर्मोत सात बतोऽन वर्य स्थानत्यत्व तन्रामय मोघ इति वाष्यम् पट्ष्ट य्यभावन नित्यवीरपि बध्ययीरिव फलाजमकत्वात्। न च ज्ञानाऽडिक प्रक्रम्य इत्येतत्सव मन एवति झुनममस 0व सामानिकिम् अभेदसुखैनापादानोपादेयभावकथनदति वाच्यम् परद्न व प्राम दत्यादी निमित्तेऽपि थभेदोलखनभनात् कारणत्वमावे तात्पर्य्या।दति तत्त्वम् ।।४१ । नातगुणत्वमुपसह्रति।-उक्काSडदिकमान्मगुण इत्यादि। सेतुमा-परि
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[२१० ] न्यायदशनम। [ शय अध्याय।
ग्रहणादित्येवमादोना मात्माय प्रत्ति ्प त्ति हे तु ना म म प्र्तति षैधा दिति, परि शेषच्ञापनार्थ प्रकृतस्थापनाऽडदिज्ञानार्थक्ज यथोक्हेतूपपत्त वचनामति। अथवापपत्ते्नति हेतवन्तरमेवेदम्,-नित्य खल्वयमात्मा यस्मादेकस्मिन शरोरे धर्मज्जरित्वा कायमेदात सगे देवेषूपपद्यते अ्रधमन्जरित्वा देहभेदान्नरकषूपपद्यत इति उपपत्ति शरोराब्तरप्राप्तिनत्षगा, सा सति सत्वे नित्ये चाSडश्नयवती बुद्धिप्रबन्धमाचे तु निरात्मके निरात्तरया नोपपद्यत दति। एकसत्त्वाधिष्ठानव्ानिकशरोरयोग ससार उपपद्यत,
त्वकसत्वानुपपत्तेन कश्विद्दीर्घमध्वान सन्वावति न किच्करीर प्रबन्धाद्विमुच्यत दति ससारापवगानुपर्पात्तरिति। बुद्धिसन्तति मात्रे च मत्त्वभेदात सर्वममिद प्रागिव्यवहारजातमप्रातसह्ित
मन्य सपरतोति, सरगञ्ज खतु पूर्वभ्वातस्य समानेन बावा ग्रहगम अभ्ाभिषममुमर्थ न्नेयमिति, सोयमेका ज्ाता पूर्वज्ञातमर्थ गङ्गाति, तत्चास्य ग्रहष स्रपमिति, तत् बद्धि प्रबन्धमाचे निरात्मक नोपपद्यते । ४२ । स्मरगन्त्ात्मनो न्खाभाव्यात् ॥ ४३ ॥ उपपद्यत इति। भात्मन एव स्पारण, न बुद्िसन्ततिमात्र स्येति। तुशब्दोऽवधारणे। कथम् 9-नखभावत्वात, इत्यस्य सभाव सो धर्म अय खलु जास्यति जानाति पभ्नामी
भषात् भरोराइडा इतुनिरासात यधाक्सेतूना दशनम्पणवाभ्यामेकायममादता दौनाम् उपपतत उपपन्नववात् ।४२।
प्रस्ानज्यात् ज्ञानव स्वासाव्यात म्ानत्वावाच्कप्रवत्व व्यातमन खभाव अतेभ
(ठ) मपारानश्नस इ्त्याप पाठ।
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श्य अध्याय ] [२११ ]
दिति त्रिकालविषयेगानिकेन न्वानेन सम्बध्यते, तञ्चास्य त्रिकालविषय ज्ञान प्रत्यात्मनेदनोय साम्यामि जानामि अन्नामिषमिति वत्तत तत यस्थाय सोधम तस्य स्रग न बुद्विप्रबन्धमात्रम्य निरात्मकस्येत। ४३। स्पतिहेतूनामयोगपद्यात् युगपदस्मरणमित्युक्म। अ्रथ कभ्य स्मृतिरुत्पद्यते इति -स्मृात खलु - प्रगिधाननिबन्धाभ्यासलिङ्ग लक्षरासादृश्य-
काय्य विगेधातिगयप्राप्तिव्यवधानसुखटु खेच्1द्देष- भयार्थित्वक्रियारगधर्माधर्मनिमित्तेभ्य ।। ४४ ।। सुस्मूषया मनसी धारण-प्रसिधान, सुस्मूर्षताल्ङ्गचिन्तन- चाथस्मृातकारणम। निबन्ध खलु-एकग्रन्थोपयमोजयानाम
ज्ञानत्वाव च्म्रत्वात् तद्मत्वमथात सिद्म् यदा - पसाभाव्यात् वतहेतुष्तामस्या SSत्महात्तत्वे सिद्ध समतेरात्व्त्तित्वमपिसिद्म् परतु- द्वानस्याऽडग्रविमामित्वात्कय असिहेतुतत्यवाSडइ अरयामत्याद।- ज्ञानवत सभाव सस्कार तव्मादित्यय इत्याहु ॥ ४३ ॥ सतिर्योगपद्यसमाधानाय प्रतिधामाडदोनामुबोधकाना क्रमो हेसुरुत तब प्रतिधामाऽ्दोनि दशर्यत।-सरयमित्यनुवत्षत। मिमित्तमब्दस इन्दातर सुतस प्रत्यकममदेनाव्वय। प्रगिधान मनसो वविषयान्वससारवारबम् निबन्त एकगन्बाप निबन्मम् यथा प्रमाशेन प्रमेयाडडिस्यरयम्। नभ्यास सस्कारवाउत्यम् एतख वद्यपि मोबोधवर्त्वं तथाउपि साटथ शोव्रमुषोषकसमवधान स्ादिव्याभयैनतद्रपन्वास। अ्भ्यासो दढतरसस्कार उद्योधकत्वेमोक इति के चत। बिङ्ग व्याप्यम् व्यापवास आरकम् लक्षणा यथा कपिध्वजाडाद बजुनादी। सादस देहादे। परियद
राजाऽडदितव्पारजनी परस्परसर कौ। सम्वन्धो गुरुभिष्यभावादि मोळषच्यायात् पृथगृक्त। मामन्तय्य प्रोचषणावघातादे। वियोगी यथा दारादी। एककार्य्या
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[२१२ ] न्यायदर्शनम। [शय अध्याय।
एकग्रन्योपरता खल्चर्या अन्यान्यस्ामहतव त्रानुप्रव्वेातरथा वा भवन्ताति। धावणाशास्त्रमतो ना प्रन्नातषु वस्तुष सत्त व्यानामु निवेपा निबन्ध दवात। अ्रभ्यामस्तु-समान विषये नानानामभ्यावृत्तिव्भ्यासजानत मस्कार आ्रत्मगुगोऽभ्याम शब्देनोच्यते, म च स्मृतिहेतु ममान इति। लिद्ग पुन -मयोगि समवाय्येकार्थममवायि (ड) विरोधि चेति। मनगी यथा- धमोडग्ने गो्विषाण, पाणि पादस्य रूप स्पशम्य, अ्रभूत भूतस्येति। लक्षण-पशवयवस्थ गात्रस्य स्पतिहतु विदाना मिद गगाग्णामतमिति। मादृश्य-चित्रगत प्रतिरूपकम, देवदत्तस्यत्यवमादि। पारग्रहात-खन वा खामो स्वामिना वा स्व सय्यत। आश्रयात्-ग्रामरवा तदधोन स्मर्रात।
गुरु स्मरन ऋात्वजा याज्यामति। श्ानन्तव्यात दात-करगो यष्वथषु। वियागात-येन विप्रयुज्यत तद्वियोगप्रतिमवेदो भृश सपरात। एककाय्यात्-कवन्तरदशनात कर्वन्तर समात।
पतिभयात-यैनातिशय उत्पादित। प्राप्ते,-यतो येन किञ्चित्
वन्तवाासप्रभृतय परस्परस्मारका। विराधादाइन कुलादर न्यतर्व्रापर सार य्राम् । नतिशय सस्कार उपनयनाSदादरायाय्यादिस्मारय। प्राप्तिचनादेदासार आर्नात। व्यवधानमावरयम् यथा खब्ाउडद कीषाऽडदि। सुखदु खयोरव्यतरेप्परस्य ताम्यां तन्प्रशोनकस्य वा अरप्म्। इच्काहषी यविषयकतया गटहोती तसय आरकौ। भय मरणाद्माइ्तोवो आरकम्। बयतव दातु। कक्रिया शाखादे बायाद। रागात् प्रोत प्रवाद अरयम्। धमाधर्मान्या जन्नमान्तरायभूमसुखदु खसाधनना
वडब्रोहिसमासी।
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कय अध्याय]
प्राष्तमाप्तव्य वा भवति तमभोक्ष्ा सरति। व्यवधानात्- कोशाऽडदिभिरमिप्रभतोनि सार्य्यन्ते। सुखदु खाभ्या-तडेतु सर्य्ते। इच्छाद्वेषाभ्या-यमिच्कति यञ्च देष्टि, त सरतत। भयात्-यतो बिभेति। भर्थित्वात्-येनार्थी भोजनेनSSच्छा- दनन वा। क्रियाया-रथेन रथकार सरत। गगात-यस्या स्त्रिया रक्ो भर्वतत, तामभोदय सपरति। धर्मात्-जात्यन्तर- स्पमरणम दह चाधोतम्ुतावधारगमिति। अधमात- प्रागनुभूतद खमाधन स्परति। न चैतेषु निमित्तेषु युगपत्मवेद नानि भवन्तीति युगपदस्त्मरणममिति। निदर्शनश्वेद स्मतिहेतूना न परिमङ्ानमिति ॥४४ ।।
नित्याना सशय,-किमुत्यन्नाऽपयगिगो बुद्धि शन्दवत १- श्रहोख्वित कालान्तरावस्थायिनी कुश्भवदिति ? उत्पब्नाऽपवर्गि नोति पक्ष परिग्टद्यते। कस्ात :- (ढ) कर्मानवस्थायित्वग्रहणात॥। ४५। कर्मगोऽनवस्थायिमो ग्रहगादिति। चिप्रस्येषोरापतनात् क्रियासन्तानो ग्ृह्यते, प्रत्यर्थनियमाच्च बुधोना क्रियासन्तानवत् बुद्िसन्तानोपपत्तिरिति।* अवस्थितग्रहणे च व्यवधीय मानस्य प्रत्यवनिव्ृत्ते । भवस्थिते च कुमभे ग्टहमागेन भ्ामनुभृतसुखादेश्र सरभममिति। उत्रेषुव विश्वित्सरप सत्किथ्रिय मातमुशोधक शिष्यव्यात्पादनाय पाठ प्रपथ् ।8४।
(ट) खिरनोचरा बुदय वयिका, सुद्धिल्ात् कर्मादियाहकन इनि नानर्यटोका।
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[२१४ ] न्यायदशनम। [ -य अध्याय।
सन्तानेनैव बुद्धिरवरत्तते प्राग्व्यवधानात तेन व्यवहिते प्रत्यन्न ज्वान निवनतत, कालान्तरावस्थाने तु बद्देर्दश्यव्यवधानेऽपि प्रत्यक्षमवतिष्ठेतेनि। स्मृतिश्चान्निद्ग बडावम्थाने सस्कारम्य बुद्िजन्यम्य स्मृतिहेतुत्वात्। यश् मन्येतावतिष्ठते बुद्धि दृष्टा डि बुद्धिविषये स्पति सा च बुद्धावनित्याया कागणाभावाब् म्यादिति तटित्मलिङ्गम। कम्मात 9-बुडिजी हि सस्कागे गुण्ान्तर स्पतिहेतु न बुडिरिति। ४५ । हेत्वभावादयुत्तमिति चेत - बुद्दावस्थानात प्रत्यतत्वे स्मृत्यभाव ॥। ४ ६ ।। यावदवतिष्ठत बुद्धि तावदसी बोडव्योऽर्य प्रत्यक् प्रत्यस्षे च स्पृतिरतुपपन्रेति ॥ ४ ६ । अ्व्यतत ग्रहगामनवस्थायित्वात विद्युत्सम्पाते रूपाव्यताग्रहपवन् । ४७॥ यद्युत्पन्नाऽपवर्गिणो बुद्धि प्राप्तमव्यक्त बोद्धव्यम्य ग्रहगाम यथा विद्युत्सम्पाते वैद्यतस्य प्रकाशस्यानवस्थानादव्यत रूप ग्रहगमिति। व्यक्त तहव्यागा ग्रहण तस्ाद्युत्मेर्तादति।89। हेतूपादानात प्रतिषेद्व्याभ्यनुज्ता॥ ४८॥ उत्पव्नाऽपवर्गिगो बुद्धिरिति प्रतिषेद्व्य तदेवाभ्यनुन्नायते विद्यत्म्पाते रूपाव्यक्तग्रहगावदिति। * यत्राव्यक्ष ग्रहण, धारान बनवस्थाउन्ा प्रत्ययधाराSाप वाच्या न चा डद्यबुडमशतरीत्तरग्राइकत्व विरम्य न्यापाराभावात् पूवपृवस्य व पगपर ेडननुभवादिमाशसिद्वावात्रयनाश्रा दे रभावाद्िरोधिगुवस्येय नाशकत्वासति कमवदरमवस्था यित्वग्रइ्ण्णादात वाय ।४ ५। पङते।-वुद्धियद्याशावनाश्िनी स्थात गेग्याशषविशेष धमविशष्टवमिग्राह्िकी न स्थात् विद्युस्सम्पातकालीनवस्तुगरहणवत् न चव तम्म्र तथत्यथ।। ४०। बड्े गशावनाशित्दसाभ्यनज्ञा त्या क्वमा
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श्य मध्याय ] [२१५ ]
न बुद्धिविकन्पात्, * यदिट क्वाचदव्यत्त ग्रहगम अ्रय विकम्पो ग्रहणाहैतुविकल्पात्, यत्रानवस्थितो ग्रहणहेतु तत्राव्यता ग्रडग यत्रावस्थित, तत्र व्यत् न तु बुद्देरवस्थानानवस्था नाभ्यामिति। कस्मात ?- अर्थग्रहग हि बुद्धि यत्तदर्थग्रच्चण मव्यत व्यत्त वा, बुद्धि सेति। विशेषाग्रहणे च सामान्यग्रहण मात्रमव्यत्ग्रहगम्, तत्न विषयान्तरे बुद्न्तरातुत्प्तिनिमित्ता भावात्। यत्र समानधमयुक्तव धर्मी ग््द्यते विशषधर्मयुत्तथ्य, तडात ग्रहगाम्, यत्र तु विशेषऽ्ग्टह्यमाये सामान्यग्रहगमाव तदव्यक्क ग्रहणम। समानधर्मयोगाच् विशिष्टधर्मयोगी विषया न्तव तत्र यत् ग्रहगं न भर्वत तत् ग्रहगनिमितताभावात् न वड्रनवस्थानादिति। यथाविषयध ग्रहगा व्यत्तमेव प्रत्यर्थं नियतलाच् बुद्दीनाम मामान्यविषयक्च ग्रहण स्वविषय प्रति व्यत्त विशेषविषयन्न प्रत्यव्यक्तम, विशेषविषयन् ग्रहण स्वविषय प्रति व्यक्तम् प्रत्यर्थनियता हि ब्रच्मय, तदिदमव्यत्ा- ग्रहम देशित क विषये बुद्धानवस्थानकारित स्वादिात। धर््मगास्तु धर्मभेद बुद्िनानात्वस्य भावाभावाभ्या तदुपर्पात्त धमिष सत्वर्थस्य समानाव् धमाविशिष्टास् तेष प्रत्यर्थनियता नानाबुद्दय, ता उभय्यो यदा धर्मि वत्तन्ते, तदा व्यक् ग्रहषं धर्रमणमभप्रेत्य, यदा तु सामान्यग्रहणमात्र तदाऽव्यत ग्रहम मिति। एव धर्मिगसभिप्रेत्य व्यक्षाव्यक्तयोग्रहणयोरुपर्पत्ति रिति, न चेदमव्यत ग्रहण बुद्देर्बोद्दव्यस्य वाडनवस्थायित्वादुप पद्यत इति ॥४८ ॥ - विद्यतृसम्पातटष्टान्ूपस हेतो साधकस सपादानात्, तथा चांशती बाघ हदि
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[२१६ ] न्यायदशनम् । [ श्य मध्याय ।
इद डि न,- प्रदोपार्चि सन्तत्यभिव्यतग्रहगावत्तङ्गहगाम ।।४६।। अनवस्थायित्वेऽवषि बुद्देस्तेषा द्रव्यागा ग्रहण व्यक्ष प्रतिपत्त व्यम, कथम १-प्रदीपार्चि मन्तत्यभिव्यत्वग्रहणवत्। प्रदोपा रचिंषा सन्तत्या वर्त्तमानाना गहगानवस्थान ग्राह्यानवस्थानन प्रत्यथनियतत्वात् बुद्धोना यावन्ति प्रदोपाचौषि तावत्यो बुद्धय इति दृश्यत चात व्यक्र प्रदोपार्चिषा ग्रहगमिति ।82। चेतना शरीरगुय, सति शरोर भावादसति चाभावा दिति - द्रव्ये खगुगपरगुगोपलब्धे सशय ।। ५० ॥ साशयक द्रति भाव। खगुपोऽपु द्रवत्वमुपल्भ्यत, परगुगशोष्णता तेनाय सशय,क शरोरगुदसेतना शरीरे ग्टह्यव, अथ द्र्व्यान्तरगुग १ इति । ५० ॥
न शरीरगुगसतना, कम्मात १-न रूपाSडदिद्ीन शरीब गरह्त चतनाहीनन्तु गद्यत यथोष्णताहोना श्राप, तप्राब्ब
चिषा सन्तन्यमानानामनवस्ायित्वेडप्यभिव्यळ्ग्रहय तथाऽन्यवापि सात् विययुनान्पात स्थल या बुद्धिषव्यम्ा सा खनिषय व्यक्वास भाव :हर ।
मोरोडह नानामोव्ाययुमवेन तव्साचयञानामालासोकरयात् बती विज्निय तड्ुा व्यादनाय सभययोजमाह।-दव्ये चन्दनाइडदी खगुपस इपाइडटे परमुवस मेवादेब महात् एव अरोरे रपाउदेरीपाथ्र व महात् पुददि अरोरगणी न बात वश्य । ५ । तब सिसानदूबम् ।- 'न अरोरमुबसेवना" इति चादी भाचजव पूरष, न
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श्य अध्याय ] द्वितोयाष्िकम। [२१७ ]
शरोरगुगव्वेतनेति। सस्कारवढिति चेत न कारणानुच्छेदात। यथाविध दरव्ये सस्कार तथाविधे एवापरम, न तत्र कारण कछदात अत्यन्त सस्कारानुपपत्तिभवति, यथाविधे शरीरे चेतना गह्यत तथाविध एवात्यन्तोपरमशेतनाया गह्ते नस्मात मस्कारवदित्यमम समाधि। अथाषि शगरस चेतनात्यत्तिकारण स्थात द्रव्यान्तरस्थ वोभयस्थ वा तन्न, नियम हे त्वभावात। शगीर्स्थेन कदाचिच्चतनोत्पद्यते कताचिन्र द्वति ननियमहेतुनास्तीति, द्रव्यान्तरस्थेन शगेर एव चेतना- त्यदते न लोष्टऽडदिषु इत्यत्न न नियमहेतुरस्तीति। उभयम्य निमित्तत्व शरोवममानजातीये द्रव्ये चेतना नोत्मद्यत शरोर एव चात्पद्त दति नियम हेतुनास्तीति ।॥ ५१ ॥ यश्च मन्येत सति श्यामादिगुणे द्रव्ये श्यामाधयुपरमो दृष्ट, एव चेतनोपरम स्वादिति - न पाकजगुगान्तगोत्पत्ते ।। ५२॥ नात्यन्त रूपापरम द्रव्यस्य श्यामे रुपे निवत्ते पाकज गुगान्तर रत रूपमुत्यद्यते, शरोरे तु चेतनामातोपरमो Sत्यन्तमिति॥ ५२॥
प्रगेशवशषगुय दत्यय। चथ तर्काडडकार बुझ्धाादक शरोरावशषगुख ख्थात् यावच्करौरभव स्यान कपाऽडदिवत् तत्पारष्काय्य चानुमानम् बुद्मादिक न शरोर विभषगुथ पयावट्व्यभावित्वात भब्दवत् व्यतरिक रुपवद्ा। प्रयावट्वव्यभावत्वस्ष
पठरपाकमत व्यनिवारमाइडता-शरोव पाकाधोनरूपाडादमा व्याभचारा वात साधन युनमित्यथ। पर तु सिश्ान्तसूवमवदम। तथा 8 पाकजरुपे न व्यानवार प्रङनीय पाकजगुथान्तरख्य रपान्तरस्ान्पत्त। तथा च खसमानाच करणखसमानतातीय समानकालोनत् पूर्वोताद्ेतो नाभप्रतियागत्े ववभषषोय सित्यय इत्याड ॥ ५२ । न्या-११
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[२१= ] न्यायदर्शनम्। [ श्य भध्याय।
प्रतिद्ृन्द्िसिद्दे पाकजानामप्रतिषेध ॥५३।। प्रथापि यावत्ु द्रव्येषु पूर्वगुणप्रतिर्द्वन्दिसिद्धि, तावतु पाकजीत्पत्तिदृश्यते, पूर्वगुणे सह पाकजानामवस्थानस्था म्रहणात, नच शरीर चेतनाप्रतिद्वन्दिसिद्टी सहानवस्थायि गुणान्तर गद्यते, येनानुमोयेत, नेन चेतनाया विराध तस्मादप्रतिषिद्या चेतना यावच्करीर वत्तत, न तु वर्त्तते, तस्ान्न अरोरगुणव्वेतना इति ॥ ५३ ॥ इतक् न शरोरगुणस्ेतना- शगेर्यापित्वात्॥ ५४ ॥ शरोर शरोरावयवास सर्वे चेतनोत्पत्या व्याप्ता दतति न क्कचिदनुत्पत्तिकतनाया, शरोरवच्करोरावयवासेतनाइति प्राप्त चेतनबहुत्वम्, तव् यथा प्रतिभरीर चेतनबहत्वे सुख दुखन्नानाना व्यवस्थालिङ्गम् एवमेकथरीरेडपि स्यात् नतु भवति, तम्माब्र शरीरगुगसेतनेति।५४ ॥
विद्रान्तसूपम्।-पावजाना प्रतिबन्तिमि पूवशरौरप्रतिकूपके शरोशान्र सिद्ध घटाSडदो पाकलर्पसन्भवेपि शरोरे न तत्सभाव धरोदावयवानां चर्माडदीनामत्रि सयोमविशषेद्य माश्राऽडवश्यकत्वात्। परे तु पाकमारमा प्रतिबन्दिमडग्रिसयोगात् सिस्े
वन वयमिचार इत्याहु। चन्े सु अरोरगृणत्वाभावे हेत्वम्रमाड प्रतिब्न्धौति।- पावनाना पूवरपाऽइदिक प्रतिदाम विशोषि एवत्िमन् रुपरे विद्यमाने उपान्तसा भावात् पछ्ाते तववत्तिन् जाने सत्यपि द्वितीयवये ज्ञानाम्मरोत्पत्ेरश्रानादिक न श्रोरविशषगुधा इत्यय इत्याड्ु ॥ ५२॥
न्वापयम् उद्यायवकेदेम तदानभविवात्वादिति भाव । ५०।
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श्य भध्याय ] द्वितौया्रिकम्। [२१2]
यदुक्न न कचिष्करौरावयवे चेतनाया अनुत्यत्तिरिति, सा,- न केशनखाSडदिष्वनुपलब्धे । ५ू५ू ॥ केशेषु नखाऽडदिषु चानुत्पत्तिखेतनाया इति सनुपपन्र घरीखव्यापित्वमिति॥ ५५॥ त्वकपर्य्यन्तत्वा च्करौरस्य केशनखाS5दिष्व प्रसङ्ग ॥५ ६।। दन्द्रियाऽSश्रयत्व शरोरलच्षण त्वकपर्य्यन्त जौवमन सुख दु खसवित्यायतनभूत शरोरम्, तस्माब्न केशाऽडदिष चेतनी त्पद्यते। अर्थकारितस्तु भरीरोपनिबन्ध कैथाऽSदोनामिति ॥५६॥ दतस् न शरोरगुणश्चेतना-
द्विविधन शरौरगुण, घप्रत्यक्षत् गुरुत्वम् इन्द्रियग्राह्लन्न रूपाडर्डाद विधाउन्तरन्तु चेतना प्रत्यचा सवद्यत्वात्, नेन्द्रिय ग्राव्या मनोविषयत्वात, तम्मात् द्रव्यान्तरगुग इति । ५७ । न रूपाSSदोनामितरेतरवैधर्म्यात॥ ५८ ॥ यथेतरेतरविधर्माणो रूपाडदयो न शरोरगुगत्व जद्दति एव रूपाSडदिवैधर्म्याच्चेतना शरौरगुणत्व न हास्यतोति॥ ५८ ॥
नखादावनुपलब्धरित्यय ।। ५५ । दूष्याति।-स्पट्टम्। चन्धेतु-चेतना न अरोरगुय अरोरव्यापित्वात् शरोर तदवयवेषु सवध्वेकेम सम्बन्धन सत्ात् शरोरगुपस्तु न सावयववत्ति *डते न कशेति।-पतन्यस्यातुपलखे। समाने त्वगितीत्याइ । ५ूद।
सति मनसा वेदत्वात्। ५०। पाचिपति।-नोक युत्नं रपाइडदोनां परस्परवैधव्यात् तथा च तद्रीत्या व्वर्श इदोनां मरीरगुषत्व न सयात, वचानूषत्वात् तथा चोत्रमप्रयोनकमिति भाव IE।
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[२२० ] न्यायदशनम । [ ३य अध्याय।
यथेतरतरविधमाणी रूपाऽडदयो न द्वैविध्यमतिवत्तन्ते, तथा चेतनाउि नातिवसत ्याद शगोरगण स्यर्दिति। अ्र्प्रतिवत्तत तु, तम्ान्र शरोरगग द्वात ॥५६॥ भृतन्द्रियमनसा ज्ञानप्रतिषेधात् मिद्धे सत्याऽ्डरभो विशेष सापनाथ बहुधा परोच्यमाय तत्त्व सुनिश्चिततर भवतीति परोचिता बाद्ध। मनस इदानी परीचाक्रम। तत् कि प्रतिशरोरमकमनकम१ इति विचार - ज्ञानायौगपद्यादेक मन ॥ ६० ॥ आरस्ति खलु व ज्ानायोगपद्यमकेकस्येन्ट्रियस्य यथाविषय करणस्येक्प्रत्ययानवृत्ती सामर्थ्यान्न तदेकतवे मनसी लिंड्गम, यत्तु खल्चिदामन्द्रियान्तराणा विषयान्तरेषु म्ानायोगपदय मिति तालङ्रम्, कस्म्ात १-सम्भवति खलु वै बहषु मनस्ु दन्द्रियमन सयोगयोगपद्यमति ज्ञानयोगयद्य स्वात न तु भर्वात, तस्माद्विषये प्रत्ययपर्य्यायादेक मन । ६॥
समाधने।-पाडइदोमा न शरोगगुयात्वप्रातर्पेध। कृत १-प्रेनन्द्रियकलात्।
ग्राह्त्वे सात याह्यत्वव्याभावात् बुद्धी व तम्सत्वाादात भाव ।पूर॥ समाप्त बड शरोरगुपभदप्रकरथम्। मथ क्रमप्राप्ता मन परीका तब प्रतिभरोग्मेक मनश्भुरादिमहकारितया मन पसक बात समये मनपश्कमवोचितम् तेन व प्रत्वेक सकलमन सम्बन्धासम्बस्धाभ्यां व्याससजोगपदो उपपदाते पति पूवपसे सिद्धान्तसूवम्।- प्रतिशरीरं मनोनामात्वे व्यासव्स्थलैपि योगपद स्यात् पती न मनोनानात्वमिति भाव R द ।
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श्य अध्याय ] [२२ १ ]
न युगपटनेकक्रियोपलब्धे ।। ६१ ॥ अय खल्वध्यापकोऽधात व्रजति कमएडल् वार्याति पन्थान पश्यति शृगोत्यरएजान शब्दाम बिभ्यत् व्यान निङ्गन बुभत्सत सर्गत च गन्तव्य स्या ैयामि क्रमस्या गहगात युगपदता क्रिया, दूति प्राप्तं मनसा बहत्वमिति॥६१।।
प्राशुमञ्जारादनातस्य मश्भुमतो विद्यमान क्रमा न ग्टह्यत क्रमम्याग्रहगातविच्छेतबुद्या चक्रवहुडिर्भवतीति, तथा बुद्ोना क्रियागाजाऽSशव्ृत्तित्वाद्विद्मान क्रमी न गह्यत, क्रमस्या- प्रद्ग्पत् युगपत क्रिया भवन्तीत्याभमानो भर्वात। कि पुन क्रमम्याग्रहण्पत् युगपत् क्रियाडभिमान १-अथ युगपद्जावादव युगपदनकाक्रयोपल्धिरति? नात्र विशेषप्रतिपत्त कारया मुच्त दृतति। उत्तमिन्द्रियान्तराणा विषयान्तरषु पय्यायग वडयो भवन्तोति, तच्जाप्रत्याख्ययमात्मप्रत्यन्तत्वात। प्रथााप दृष्टश्रुतानथाश्चिन्तयत क्रमण बुहयो वत्तन्ते, न युगपत अननानुमातव्यमिति। वणपदवाकबुद्दोना तदथबुद्दोनाज्जा SSुवृत्तित्वात् क्रमस्याग्रहणम्, कथम् १-वाक्यस्थेषु खलु वर्गेषूच्चरत्मु प्रतिवरण तावत् त्वण भवति, शुत वर्मकमनेक वा पदभावेन स प्रतिसन्वत्ते प्रतिसन्धाय पढ व्यवस्थति, पदव्यवसायेन स्मृत्या पदार्थ प्रतिपद्यते, पदसमूहपतिसन्धानाच्च वाक्य व्यवस्यति, सम्बदास पदार्थान महोला वाक्यार्थ प्रतिपर्दात न चाSऽसी क्रमेण वर्समानाना बुधोनामाशहत्त्तित्वात
दोघशष्कु लोमबपाइडटौ ज्ञानयोगप बाब्रामाल सादित्याभड ते।-न एव मन नमेकक्रियाणाम् मनेकज्ञानानाम, उपवब्धरित्यय । ६१ ।
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[२२२ ] न्यायदशनम। [ श्य अध्याय।
क्रमो गरह्यते, तदेतदनुमानमतन्त्र बुड्िक्रियायोगपद्याभि मानस्येति, न चास्ति मुकसशया युगपदुत्पत्तिरबुद्दोना, यया मनसा बहुत्वमेकशरीरऽनुमीयत इति॥ ६२॥ यघोत्त हेतुत्वाच्चाया ॥ ६३ ॥ ऋणु मन एकश्नेति धमसमुचयो मानायोगपद्यात्, मह्त्वे मनस सर्वन्द्रियसयोगात् युगपद्दिषयग्रहण स्यार्दिति ॥ ६३ ।। मनस खलु भो। सेन्द्रियस्य शरोर वत्तिलाभ नान्यत्न शरीरात्, जातुक्न पुरुषस्य शरीराजडयतना बुड्ाादया, विषयोप
व्यवहारा। तत्र खन्नु विप्रतिपत्ते सथय -किमय पुरुषकम निमित्त शरीरसर्ग १-आहोखित भूतमावादकमानमित्त ? इति। स्रूयते खल्वत्न विप्रतिपत्तिरिति। तव्ेद तत्त्वम,-
पूर्वशरोर या प्रव्ृत्तिवाग्बुद्विशरीराऽडरभलन्षया, तत् पूवक्ृत कमोक्र तस्य फल त्जनितो धमाधर्मी, तत्फल स्थानुबन्ध आत्मसमवेतस्यावस्थान, तेन प्रयुत्नेभ्यो भूतेभ्य- स्तस्यात्पात्त शरोरस्य, न स्वतन्त्रेभ्य इति। यदधिष्ठानो डयमात्माऽयमहमति मन्यमानी यत्ाभियुत्तो यत्रोपभोग तष्णया विषयानुपलभमानो धर्माधर्मी सस्करोति, तदस्य राउडन्म कदाषात् यथा बलातचक्र व्गातिशयेन आग्यमायक्रियासन्तानस भेदना उपलाब्धरिति ॥६२॥ मनु योगपद्योपपादकतया मनसो वभव म्यादवाइडड।-मन इति श्रेष यधीकस्य ज्ञानायोगपद्यस इतुत्वान्ानोऽणृत्वसाधकत्वादित्यय । ६२।। समाप्त मन परोचाप्रकरयम्। अथ प्रसक्गा करोरसय वतमपुरुषाट्त्टनिव्याद्यताप्रकस्यम्, धथवा एबतब मरोरे मनस सर्वेरात्मभि सह सयोमात् सवबैव मनसा म्ञान नव्यताम्, पतसद्हरनुबता
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शय भध्याय ] [२२२ ]
शरोर, तेन सस्कारेग धर्माधर्मलक्षणेन भूतसह्नितेन पतितडस्म्रिन शरोर उत्तर निष्पाद्यते निष्पव्स्य चास्य पूर्वभरौरवत् पुरुषार्थ क्रिया पुरुषस्य च पूर्वशरोरवत् प्रव्ृत्तिरिति कर्मापेच्ेभ्यो भूतेभ्य शरीरसर्गे सत्येतदुपपद्मत इति। दष्टा च पुरुषगुणेन प्रयतेन प्रयुत्तभ्यो भूरतम्य पुरुषाथक्रयासमर्थाना द्रव्यागा रथप्रभृतोना मत्पत्ति, तथाऽनुमातव्य-भरोरमपि पुरुषार्थक्रियासमर्थमुत्य दयमान पुरुषस्य गुणान्तरापेत्तेम्यो भूतैम्य उत्पद्यते इति ॥ ६४ ॥ भत नास्तिक श्राह- भूतभ्यो मूर्त्यपादानवत् तटुपादानम् ॥ ६५॥ यथा कर्मनिरपच्ेम्यो भूत्या निर्वृत्ता मूर्तय सकता शर्करापाषागगेरकान्जनप्रभृतय पुरुषाथकारित्वादुपादोयन्ते, तथा कर्मनिरपेच्तेभ्या भूतम्य शवीरमुत्पन्न पुरुषाथकारित्वा दुपादायत इति ॥ ०५ ॥ न साध्यसमत्वात्॥ ६६॥ यथा शरोरोत्पत्तिरकर्मनिमित्ता साध्या तथा सिकता
साध्यममत्वादसाधनमिति। भूतभ्यो मूर्त्युपादानवत तदिति चानन साध्यम् ॥ ६६। प्रतिपादनप्रकरगम। तब शरोब तत्तत्परुषसमवेताइट्टनिमित्तक न वा इति
भातसमवायाभावाद्ा। तवाऽडद्य पक्ष निरस्यति।-पूबकतस्य यागदार्नाड्टिसाSडदे फलस्य धर्माधमरुपस्य चनुबन्धात् सहकारिभावात्, तस्य शरोरस उन्पतति । ६४ । भाषिपति -भूतेभ्य इति सावधारणम् तथा चाटट्टनिरपेकस्यी भूतेभ्य परमाशुख्य मू्त्तेमदादे उपादानमारभी यथा तथय तस मरोरस उपादान मारन्न परमायुभ्योऽडट्टनिरपेनेम्य इत्यथ । ६५ । समावने।-नोकं युत दष्टामस साध्यसमत्ात् पचसमत्वात्, सदादेरम
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[२२४ ] न्वायदर्शेनम्। [ श्य श्रध्याय
नोत्पत्तिनिमित्तत्वान्मातापित्रो । ६७ ।। विषमशायमुपन्यास। कस्मात् ?- निर्बीजा इमा मूर्त्तय उत्पद्यन्त, बोजपूर्विका तु शरोरोत्पात्त। मातापित् शब्देन लाहितरतसो बोजभूते ग्ठह्येत तत सतम्य गभवामानुभवनीय कम पत्ास् पुत्रफनानुभवनाये कर्मणो मातुगभाSडशये शमोरो न्यात्त भूतेम्य प्रयोजयन्तौत्युपपन्न बीजानुविधानमिति॥६२। तथाSS्हारस्य ॥ ६८॥ उत्पत्तिनिमित्तत्वादिति प्रक्ृतम। भुक्न पीतमाहार, तस्य पतिनिवृत्त रसदव्य माटशरीर चापचायत बीज गभाSडशयस्थे बोजममाउपाक मात्रया चापचन बाज यावदूाहसमथ च्चय इति। पाणिपादादिना च व्यूहेनन्द्रियधष्ठानभदन व्यूह्यत व्यूहे च गभनाद्याऽवताारत रसद्रव्यसुपचोयत यावत्सवममथामात, न चायमन्रपानस्य स्थान्यादिगतस्य कल्पात द्वात, एतस्मात् कार पात कमनिमित्तत्व शरोरस्य विन्वायत इति ॥ ६८॥ प्राप्ती चानियमात् ॥। ६६ ।। न सर्वो दम्पत्यो सयोगो गर्भाऽड्धानद्वेतुदृटश्यत, तवासति कर्माण न भवति, सति च भवतीत्यनुपपन्नी नियमाभाव इरति।
म मृदादिसाम्यमित्याह सवाभ्याम्-शरोरे म मदादसाम्य मातापिवो कमष
पिताम इपिस्डभीजनाटेव्टट्टव्ारा पुवजनकत्वाहित्यय इत्यन्ये।। ६।। ६८ ।। माहारस्वाद्सर्कारित्व विपये वाधयमाह।-पाती दम्पत्यो सम्मनोने
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शय अध्याय ] [२२५]
कर्मनिरपेक्षष भूषु शरोरोत्पत्तिहेतुषु प्रनियम स्यात न ह्यव कारणाभाव इति ॥हट ॥ प्रथापि -
कर्म॥ ७0॥ यथा खल्विद शरोर धातुप्रागसवाहिनीना नाडोना शुक्रान्ताना धातूनान्न स्नायुस्थिशिरापेशेकननकरडरागास शिरोबाहदरागा मकथाल् काछ्ठगाना वातपित्तकफानाज् मुख क राठ हृदयाSSमाSSशयपक्वाSSप्याध स्रोतसाख् परमद् खसम्पा दनोयेन सन्निवेशेन व्यृहनमशक् पृथिव्यादिभि कर्मनिरपेच्े रुत्यादयितुमिति कमनिमित्ता शरीरोत्पत्तिरिति विज्ञायन, एवञ्ज प्रत्यात्मनियतस्थ निमित्तस्याभावाननिरतिशयै आ्रत्मभि सम्बन्धात सर्वाऽडत्मनाख् समानै पृथिव्यादिभिरुत्यादित शरोर पृथिव्यादिगतस्य च नियमहेतोरभावात मर्वाडत्मना सुखदु ख मवित्यायतन ममान प्राप्तम् , यत्तु प्रत्यात्म व्यवतिष्ठत तत्र शरोगोत्प्त्तिनिमित्त कर्म व्यवस्थाहतुर्गित विज्ञायत। परि पच्यमानो हि प्रत्यात्मनियत कर्माSडशयो यस्तिव्ात्मन वत्तत, तस्येवोपभोगाऽडयतन शवीरमुत्पाद्य व्यवस्ापयति। तदेव शरोरोत्पत्तिनिमित्तवत् सयोगनिमित्त कमेति विज्ञायते।
तु गभधारपास यतो न नियम ततोड एथय सहकारित्वमावश्यकामात भाव ॥६८॥ नन्वटट्टरवेदैरेव मूते कैचित् खभावविशेषाच्रोर जन्यता खभावानभ्यप गमे व मरोरख सर्वाडभसयुत्ततवात् साक्षारखवाड पत्ति पत बाह ।-पयमय -
तक्करौर सयोगविशेष एव कृत -इत्यत ब्राइ सनोगेति।-सयोगविशेषीत्वसो नम पटटविशेष, निमित्तम् यथा शरोरोत्पत्तावटए्टविशेषी निमित्तमिति। सयोग
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[२२ ] न्यायदर्शनम । [ शय अध्यारय।
प्रत्यात्मव्यवस्थानन्तु शरोरस्याऽडत्ना सयोग प्रचस्षह,
एतेनानियम प्रत्युता ॥०१॥ योऽयमकर्मनिमित्ते शरौरसगे सत्यनियम इत्युच्यते, धय भरीरोत्प्तिनिमित्तवत् सयोगोत्पत्तिनिमित्त कर्मेत्यनेम प्रत्युता। कस्तावदय नियम १-यथेकस्थाऽडत्मन शरोर, तथा सर्वेषामिति नियम, धन्यस्थान्यथेत्यनियमो भदो व्यावृत्तिविशेष दूति। दृष्टा च जन्मव्यावृत्ति उच्चाभिजनो निक्वष्टाभिजन दृति, प्रशस्त निम्दितमिति व्याधिबड्ुलमरोगमिति समग्र विकलमिति पौडाबहुल सुखबहुलमिति, पुरुषातिशयलच्तणो पपव्र विपरीतमिति, प्रशस्तलक्षण निन्दितलच्षणमिति, पटि न्द्रिय मृद्िन्द्रियमिति। सूक्षमश्च भेदोऽपरिमेय। सोडय जन्ममेद प्रत्यात्मनियतात् कर्ममैदादुपपद्मत, असति कर्ममेदे प्रत्यात्म नियते निरतिशयित्वादात्मना समानत्वाज्च पृथिव्यादोना पृथिव्या दिगतस्य नियम हेतोरभावात् सर्व सर्वाजडत्मना प्रसज्यत न त्वद- मित्यश्त जन्म तस्ात् कर्मनिमित्ता भरोरोत्पत्तिरिति ॥॥
वशषस्दात्म ज्ञाननममनिय्ामकी जातिवशष एव। सयोग शरोपावयवसख्यान विभुष इति कचित० । पथ शरोर माहष्टनन्य प्रह्यातरारथ्सभावत्वादेव तदुपपत्ते प्रतिबन्धकपूव भरीरापनमस्वटट्टाषीम जखस्य निवानुसरण्सभावस्ेव बन्वापगमाधौनल्वम् द्वात द्वितीयपस साउ्ासमत निरस्यति।-एतेन घटश्टटतुवत्व्यवस्थावनेन बनियमस्तु पातन कदायिम्मानुषनौरसब्बन्ध कदािदन्याटम किशिस्स शरीब सकसा बयन किश्चित्त विकलावयवमित्यादि। मटट्टहतुत्वानम्युपगमे त्वयमानयम न त्वममन्ते किसाटए्टनिरपेसप्रऊतिमावाSSरल सर्वाइतसाधारय्य शरोरसय खात् इति भाव। सन्चे तु बटष्टमप्यनियत स्वादित्यबाऽद एतनेनि।-तवाप्यटद्दान्र मिन्य नादित्व मेवति भाव इत्याद् ।०१।
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श्य पध्याय ]
उपपन्नस्न तद्वियोग कर्मचयोपपत्ते ।।७२। कर्मनिमिसे शरोरसर्गे तन शरोरपाऽडल्नो वियोग उपपन्र। कस्मात् १-कर्मच्योपपत्त, उपपद्ते खलु कर्म चय, सम्यगदशनात्, प्रयोगे मोहे यौतराग पुनर्भवदेतुकर्मा कायवास्जनाभिन करोति, इत्युत्तरस्थानुपचय, पूर्वोपाचचतस्व विपाकप्रतिसवेदनात् प्रचय। एव प्रसवहेतोरभावात पतिते डस्मिन शरोर पुन शरोरान्तरानुषपत्तेरप्रतिसन्धि। प्रकर्म निमित्ते तु भरोरसगे भूतचयानुपपत्तस्तद्ियोगानुपप्त्त रिति ॥ ७२ ॥ तदटष्टकारि्तिमिति चेत् पुनस्तत्पुसङ्गोऽपवर्गे।।७३। पदशन खलु प्रटृष्टमित्यच्यते, घटष्टकारिता भूतैभ्य भरोरोत्पत्ति न जात्वनुत्पने शरीरे द्रष्टा निरायतनो दृश्य पश्यति, तज्चास्य दृश्य द्विविध-विषयस नानात्वक्ष, भव्यता SSत्मनोस्तदर्थ शरोरसर्ग तम्मिन्रवसिते चरितार्थानि भूतानि न शरोरमुत्पादयन्तीत्युपपन्न भरोरवियोग इति, एव चेनन्यसे, पुनस्तत्पसङ्गाऽपवगे, पुन भरोरोत्पत्ति प्रसन्यत दृति। या चानुत्पवे शगरे दर्शनानुत्पत्तिरदर्शनाभिमता, या चापवर्गे शरोरनिव्टत्तौ दर्शनानुत्पत्तिरदर्शनभूता, नैतयोरदश नयो कसिद्विशेष इत्यदर्शनस्थानिवृत्तेरपवर्मे पुन शरोरो स्पत्तिप्रसङ्क इति॥ ०३॥ पाहतास्तु मनपरमाणुगुपमटष्ट मन्यन्े तथा दि पाथिया परमाथव सहिता खाट्ष्टवभाच्करोरमारमन्ते मनश खाहट्प्रयुन्त शरोरमाविर्धात तग्राट्ड्ट खमावादव पुद्रलस सुखदुख साधयतोति तवात्तरमाह।-तनदाव्ाइटटापयड विनय तन्तदात्मपभोनाय परमामवस्ेक्करोरमारमम्से मुनेपि तदात्नि तडानाब अ्रररमारभेरम्। चपवमर इत्युपवचतथ ससारिय्ामपि नर कि तुरमाइडदिमदोरोपम ऐत वितियमक न खादिति सान 1०३।
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[२२८ ] न्यायदशनम । [ शय अध्याय।
चरिताथाविशेष इति चेत्,-
चरिताथान भूतानि दशनावसानान्न शरीरान्तरमारभन्त दत्यय विशेष, एव चेदुय्यते करगाकरणयोररव्दशनात् चरिताथाना भूताना विषयोपन्न्धिकरणात् पुन पुन
वरिग्यक शरीराऽडरना पुन पुनटृश्यत, तम्मादकमानमित्ताया भूतसृष्टो न दर्शनाथा शरोरोत्पत्तिर्यक्ता, युक्का तु कमनिमित्त सग दशनार्था शरोशत्पात्त। कर्मविपाकसवेदन द्शनमति तदटष्टकारितामति चेत् कस्यचिददशनम- प्रट्ृष्ट नाम परमागाना गुगविशेष क्रियाहेतु तन प्रेरिता परमाणव सम्मार्च्छता भरोरमुत्यात्यन्तोति, तन्मन ममाविर्भात, खगु सेनाटृष्टेन प्रेरित समनस्के शगेरे द्रषटुरुपलाव्धभवतीति" एर्तर्म्मिन वै दशने गुगानुच्छेदात् पुनस्तत्प्रमङ्गोऽपवगे, अ्रपवग दिति॥६४ ॥ मन कर्मनिमित्तत्वाच्च सयोगानुक्केद॥। ७५।। मनोगुगेनाटृष्टेन समावेशिते मनसि सयोगव्युच्कदो न स्यात् तब किकवत शरीरादपसर्पण मनस दति १-कर्माSSभय
ण्वापसर्पणह्ैतुरपोति न, एकस्य जीवनप्रायणहेतुत्वानुपपत्ते,
बटए्स मनोगुषत्वमपि दूषयति।-सयोगस् अरोगडरम्ाकस्य न्ञानाऽडदि जनकस न, उच्केदी न सात्। कुत -मनसी यत् कर्म बटट, तत्निमित्तलानू
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शय अध्याय ] द्वितोया्किकम। [२२ ]
एवस मति एकमटृष्ट जीवनप्रायणयोह्वतुरिति प्राप्तम, नेत दुपपद्मत॥ २५ । नित्यत्वप्रसङ्गश्व प्रायगानुपपत्ते । ७६। विपाकसवेदनात कम्माSSभयनये शरोरपात प्रायगम कमाऽड्थ्रयान्तराच् पुनर्जन्। भूतमावात्तु कर्मनरपेच्षात् शरागित्पत्तो कस्य चयात शरीरपात प्रायगाम १ इ्रति प्राय यानुपपत्त खलु वे नित्यत्वप्रसङ्ग विद्य यादृच्किक तु प्रायम
पुनस्ततप्रमङ्गाऽपयग इत्वेतत समाधित्सुराह-
यथाऽणे श्यामता नित्या अग्निसयोगेन प्रतिावद्दा न पुनरत्पद्यत एवमष्टकारत शरोरमपवग पुनर्नोत्यद्यत दात।७0। नाकृताभ्यागमप्रसङ्गात ॥। ०८ ॥ नायमस्ति दष्टान्त । कस्पात १-श्ळ्वताभ्यागमप्रसङ्गात्।
एतच्क्रहधानन प्रमाणतोऽनुपपन्र मन्तव्यम, तम्माब्राय दष्टान्त,
तम्य निन्यत्वात तादृमसयोगधारा मोक्कदत तथ्यानित्वत्ेपि व्यधिकरमभोगस बनाभ्कत्वेडतिप्रसद्र इति भाव ॥e। सयोमानक्केदे का घति? पत बाह।-तथा सति प्रायमस्य मरपख
नाषिपति।-यथा परमाणी खामता मित्वाड न निवसते तथा भरोरादिक मपि निवसते तथैब परमायुमिष्ठ नित्वमप्यटछ्ट मिवसते तदभावाज नापवमें भरोरमात60 । सिदानमूवम्।-बअतख प्रमाणाविषवस, प्रभ्यागस सोक़ार, नत्रसक्ान् न्या-२०
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[२३०] न्यायदर्शनम्। [ श्य भध्याय ।
न प्रत्यक्ष, न चानुमान कि्निदुच्यत इति। तदिद दष्टान्तस्य साध्यममत्वमभिधौयत दति। प्रथवा नाह्ृताभ्यागमप्रसङ्गात् अपृश्यामतादृष्टन्तेनाकर्मनिमित्ता शवोरात्पत्ति समादधान स्याऊ्वताभ्यागमप्रसद्ध अक्रत सुखदुखहेती कमण पुरुषस्व सुख ट खमभ्यागच्कतोति प्रपज्घेत श्रमति बुवत प्रत्यचानु मानाऽडगमविरोध। प्रत्यक्षविरोधस्तावत-भिन्नमिद सुख द ख प्रत्यात्मवेदनोयत्वात प्रत्यक्ष सर्वशरोग्गाम। को मेद १- तोव्र मन्दाव्विरमाशु नानाप्रकारमकप्रकारमिति ण्वमादि विशेष, न चास्त प्रत्यात्मनियत सुखट खहेतुविशेष न ामत हतुविशेषे फलविशेषो द्वश्यत कमनिमित्ते तु सुखदु ख याग कमग्ण तोव्रमन्दतोपपत्त कमसन्जयानाज्जोत्कषापकष भाशन्नानाविधैकविधभावाज् कम्णा सुखदु खभेदोपपत्ति। साय हतुभदाभावात टष्ट सुखट समतो न स्यादिति प्रत्यच
सुखदु खव्यवस्थानम य खलु चेतनावान साधननिर्वर्त नीय सुख बुद्धा तदोप्सन तदाप्तिमाधनावाप्ये प्रयतते स सुखेन युज्यते न विपरोत , यश साधननिवर्त्तनोय दुख बुद्धा तब्जिहासु साधनपरिवर्जनाय यतत, सदुखन परित्यज्यत न विपरोत, त्रस्ति चेद यत्रमन्तरेण चेतनाना सुखदु ख व्यवस्थान, तेनापि चेतनगुणान्तरव्यवस्थानक्वतेन भवितव्य मित्यनुमानम। तदेतदकमनिमित्ते सुखदु खयोगे विरुध्यत इति, तञ्च गुषान्तरमसवेद्यत्वादद्ृष्ट विपाककालानियमाच्चा
इत्यय बाह परमाधुनिष्ठाइत्टस्य बारयस सत्े मरोरोच्छेद सात् एनमनुश्या मतानित्यत्वस्यापि प्रमाणागाचरस्य खोकार सात् तथा प टष्टानासिद न वाडमादे सवल बात सनरवति, नन्वभावलवन सडेतुलवात्, बदा,-निव्ाइटक्क्रोरसनली
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श्य अध्याय ] [ २३१ ]
व्यवस्थितम बुद्धादयस्तु मवैद्यास्ापवर्गिगस्ेति। प्रथाऽडगम विराध-बड़ु खल्विदमार्षमृषोगामुपदेश जातमनुष्ठानर्पर
श्ाननचक्षण प्रवृत्ति परिवर्जनलच्षणा निवृत्ति तज्ञोभयमेतस्या हशै नाम्ति कम सुचरित दुशरित वा कर्मनिमित्त पुरुषाया सुखट खयोग दरति विरुध्यत सेय पाषिष्ठाना मिथ्या दृष्टिरकरमानमित्ता शरोरसृष्टि अ्रकर्मनिमित्त सुखदु खयोग दति।७८। इति वात्स्यायनोये न्यायभाष्ये ततीयाध्यायस्व द्वितीयमाफ्किकम। समाप्तयाय ततोयोऽध्याय ॥३ ॥
सगमे चळ्वतरत व्वयम्रानतात कमय्य सभ्यागम फमसम्बन्ध स्थात् तथा च साऊ्कतत्वाविभषात क शरोब कम्य भविष्यतीत्यव नियामकाभाव इति भाव /0८ ॥
समाप्रव्व वतोयाध्यायस्य द्िलोयमाह्िकम् ॥२॥
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[२३२ ] न्यायदर्शनम। [४थं अध्याय।
चतुर्थाध्यायम्य प्रथर्मा्िकम्।
मनमाऽनन्तर प्रृत्ति परीकितव्या तव खलु यावदर्मा धमाSडथयश गौराडदि परोचित, सर्वा मा प्रषटत्ते परीक्षा इत्याह,- प्रवत्तिर्यथोक्ता ॥ १॥
तथा परीच्ितंति ॥१।
मूबकाशिवजयिप्रभाभर योगिमानसचर पर मह। श्वामल किमपि धाम कामद कामकाटि कमनौयमाश्रये। ततोये तावतातम Sडप्रमेनषटक कारणरुप परक्षतम च्रथ कार्य्रप प्रतृत्यादि प्रमेषटकमवसरतो इतृछृतुमज्भावन च परोकषगोग्रम यद्यपि प्रथमा क्विके षतक परोचयरीयतोयाSडकिके त तत्वज्ान तथाडाप तस्यपवगहत्तवातपाह्ातन च परैचयोयत्वादपबग परोवान पााततया घटकपरौस्षवाध्यायाय तव चाहिष्टधमवसया घट कपरोचा प्रथमाSडाङकाय। तब प्रथमाSडाङ्गके चनुत्भ प्रकरणान। तव पाक्तरूप वसा प्रवासतदोषयो परीचा प्रथमप्रकरणाथ। न चाथभदात प्रकत्यभद। यथा
प्रहात्त
परोचायामाकाहिताया मूतम्।-प्त तथवात शष पूरयन्ति तदयुत्तम् तथा
पूरणौयतया प्रकरणभदाउडपस्े तम्मादयिमसूवस्थतयाश्नब्दमान्वयी युत्त प्रवृत्तियषा उक्सधनपवती तथा दोषा सप्यत खचपरवन्त इन्यग्रिमसूयसवलितोऽय। "प्रतत्तियांग युडिशरोराऽडरन" इत्यनवक्षयसस्वात विद्ध लच्षवामति भाव। प्रर्शशस्तु कयौ - कारयरपा काय्यकपा च दे सप्यात्मसमवत सवाऽडय्ा-नन्लवनाविभिष्ट। विभिष्टा व यबत्वजातिमती मानसप्रत्ययस्द्वा द्वितीया तु-धमाधमकपा यागाहे रवन्यायमनादेय चिरध्सस व्यापारतया कमनाशाजलसनाउडदे प्रायमितादेन वाश्यतया सिध्यनोति। १।
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४थ अध्याय ] प्रथमाफ्किकम। [२३३ ]
प्रवृन्यनन्तरास्ताह दोषा परीक्यन्तामित्यत श्रह,- तथा दोषा ॥ २ ॥ परोचिता इति। बुद्धिममानाSSश्रयत्वादात्मगुणा प्रवृत्ति हतुत्वात पुरभवप्रतिमन्धानसामथ्याच्च ममावहतव मसार स्यानादितवादनादिना प्रबन्धेन प्रवत्तन्ते मिथ्याज्ञाननिवत्ति स्तत्ज्ञानात तब्रिवृत्तौ गगद्वेषप्रबन्धोच्केदेऽपवग इति प्रादु भवनिरोधधर्मका द्वत्यवमादयुत्त दोषागामिति ॥ २ ॥ प्रवर्त्तनालत्तणा दाषा इृत्युत्तम, तथा चेमे मानष्या
श्राह - तच्चैगश्य रागद्वेषमोहार्थान्तरभावात॥। ३ । तेषा ढाषागा वयो राशयस्तय पत्ता। रागपक्ष -कामो मत्सर म्पहा तष्णा लोभ दति। द्वेषपत्त -क्रोध दब्याऽसूया दाषपरासाया प्राप्तायामाह।-तथा दोषा चप प्रवत्तनालच्णा दलना लचषवन्त एवति नासिद्धिरति भाव । २ ॥
चथ वराश्येन विभषेय दोषपरोचणाय तत् वराश्यम्रकरयम् तव सिद्धान्त सूनम्।-तेषा दोषाणं वयो राशय वय पच्षा न तु रागदेष मोह्ानामकबल
र्भावात्त विभागन्यमत्वम् इक्कात्वद्वेषत्वमिध्याच्जामत्वरपविरुद्धधमवत्वात्र विभागा SSचिक्वम् इच्कात्वाSडदिकन्तु रागादावनुभवसिद्धम। तव रागपच -कामी मवर महा तथा लोभो माया दश इति। काम -रिरसा रतिय विजातीय सवोम नारोगताभिल इति तुन युत्त स्रिया कामेडव्याप। मत्सर -खपयोजनप्रतिसन्धान बिना पाभिमतनिवारपेच्छा यवा राजकीयाददपानावोदक पयम् इत्यादि वव परमुयनिवारयेच्कापि। सृङ्गा-धर्मावरोधेन प्राप्ोच्छा। था-इद मे न चौयता मितोष्का उचितव्ययाकरणेमापि वनरक्षय्क्कारूप कापसमाप तष्पाभद एव। धमविरोधेन परद्रव्यक्का खीभ। परवननेक्ा माया। कपटन धामिकत्वािना
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[२३४ ] न्यायदशनम् । [४र्थ अध्याय।
द्रोहोडमष दति। माहपक्ष -मिथ्यान्ञान विचिकित्सा मान प्रमाद द्वात वैराश्यान्ोपमह्वनायन्त इूति। लक्षगस्य तर्थ्वमैदात् तरित्वमनुपपन्रम। नानुपपत्र रागद्वेषमोहार्थान्तरभावात। आसत्ञिलत्तणो राग अमर्षनक्षण द्वेष मिथ्याप्रिरपति लच्षणे मोह दति। एतत् प्रत्यात्मवेदनीय सवशरोरिगाम, विजानात्यय शरोगे रागमुत्यन्नम्, अ्रस्ति मेध्यात्म रागधर्म द्वति, विरागन्ज विजानाति नास्ति मेऽध्यात्म रागधर्म इति। एवमितरयोग्पीति। मानेष्याऽसूयाप्रभृतयस्तु तैराश्यमनु पतिता इति नोपमङ्जायन्ते ॥ ३ ॥ नेकप्रत्यनीकभावात् ॥ ४ ॥
नाथान्तर रागादय। कस्मात १-एकप्रत्यनोकभावात् । तत्वस्नान सम्यप्ातराय्यप्रज्जा सम्बोध इन्यकमिद प्रत्यनाक व्याणामिति॥ ४ ॥
खात्कवसयापनक्का दमा। द्वेषपक -क्राध ईष्याऽमृया द्रा-5मर्षीडभिमान पात। क्राध - नेत्रलोहित्याडडनिहतुर्हैषावभरष। दूप्या-साधारया वस्तान परम्वर्ासङ्गही तारि इ्वष यथा दरनदानदानाम्। अरसूया-परगुसाडदी दष। द्राह-नाशाय देष। हिसा तु द्राहजन्या पर तुत द्रोह मन्यन्त। अमष -कवतापराध म समथस देष। साभमान -अपकारिखाकास्षत्करस्याउडन्मान डष। माहपच -तविपय्यय
एकधमिकविरुदभावाभावञ्ञान सभय स ए्वावचिकत्सत्यच्त। व्याप्याऽरा गुगवात निगणत्वधोरपअयोऽपि मानेडनभवति। प्रमाद -पूवकत्तव्यतया निसतेऽ्यकत्तव्य
शोक -दष्टवियीगे तल्वाभानहताञ्ञानम्। २॥ भडते।-रागाउडदोना भदो म एकप्रत्यनोकमावात् एकम्िमिन् पत्यनोकभावो विरीधित्व यम्य तत् तथा तनकनाश्यत्वाहित्यध एक कि तत्वञ्ञानमेषा विराधि ॥४।
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४र्थ प्रध्याय ] प्रथमाण्किकम्। [२३५ ]
व्यभिचारादहेतु ।५।। एकप्रत्यनोका पृथिव्या श्यामाSSदयाSग्निमयागेनेकन एक योनयख पाकजा इति ॥ ५ ॥ सति चाथान्तरभावे- तेषा मोह पापोयान्नामूढस्येतगत्पत्ते।। ६।। मोह पाप पापतरा वा द्वावभिप्रेत्याक्रम, कम्मात 1- नामूढस्येतरात्पत्ते। अमूदस्य रागद्देषो नोत्पद्येते, मूढस्य त यथासङ्गल्पमुत्पात्त विषयषु रख्जनोया सङ्गत्वा रागहतव, कोपनीया सङ्गन्पा द्ृषहेतव उभये च सङ्खल्पा न मिथ्या प्रतिर्पत्तिलच्षणत्वान्मोहादन्ये, ताविमी मोहयानो रागद्वषा विति। तत्ज्ञानाज्च माहनिवृत्ती रागद्वषानुत्यत्तिरित्येकप्रत्य नोकभाजापपात्त। एवच् कत्वा तत्त्वभ्ञानात् दु खजन्ाप्रद्टा्त दोषामथ्यान्जानानामुत्तरात्तरापाय तदनन्तराभावादपवर्ग द्वात व्याख्यातमिति । ६॥
समाधने।-एकविरोधित्वं भेदनिषेधे न हेतु व्यमिचारात् एकाग्रिसयोग नाम्सत्वऽपि रुपाउडदोमा भेदात । ५ । किश नतषामेकानवत्यत्व तत्त्वत्ञामस मोहनिवतवत्वात् तब्रिवच्या रागाऽडाद निवतेरित्याशयेनाऽडइ।-वद्याप वहना निर्दारणे ऋठन् तमपोविधानात् पापिष्ठ पापतम इति वा युक्त तथाऽपि को इावाघन्वत्य निद्वारय क्यनर्द्वारणे ईयसुना विषानात् तेन रागमोडयोर्डैषमोडयार्वा मोह पापोयाननर्थमूल बखवद्ष्य इति यावत्। हेतुमाइ नामूदस्ात।-मोडशून्यस रागदेपयोरमावाढत्यय। नय त्त्व आनिनोऽपि द्विताहतगोचरप्रा्तानव्वत्ती रागदेषाधोने इति तव व्यभिचार डात वाच सकांडाइषन मुत इत्यादिकमपीत भाव I द।
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[ २३६ ] न्यायदर्शनम। [४थ अध्याय।
प्राप्नस्तहिं निमित्तनैमित्तिकभावारदर्थान्तव- भावो दोषेभ्य ।।७।। अन्यद्टि निमित्तम अन्यच्च नैमित्तिकमिति दोषनिमित्त त्ान्न दोषो मोह इति ॥ ७H
न दोषलच्णावरोधात् (सत्त्वात्) मोहस्य॥ ८ ॥ प्रवत्तनालक्षणा दोषा' दत्यनन दोषलक्षणेनावरुध्यत दोषेषु माह इ्वात ॥ C H निमित्तनैमित्तिकोपपत्तेश्च तुल्यजातीया- नामप्रतिषेध ॥६ ।l द्रव्याणा गुखाना वाऽनकविधविकल्पो निमित्तनैमित्तिक भावे तुत्यजातीयान, दृष्ट इति H ८ M
भङ्ते।-दाषनिमित्तत्वान्ोदस दाषाभन्नत्व सान् अ्रभदन काय्यकारयभावा भावात्। दाषेव्य इत्यान्नर्गायकभदाइडुवचनम्। प्राप्तततर्श्वीत्यभस्तु न सूव किन्तु भाष्यळ्वत पूरषामत्याप वर्दन्ति॥ ७। िरकरोति।-मोहस दोषणचयसत्वादाषत्म् व्यात्मदाज हेतुहेतुमद्रावी न विरुध्धत द्वात भाव 1८H
निमित्तनामतिकोपपत्त इतुहतुमनावसोकारात तुखनातोयत्वप्रतिषेषा न युक्
समाप दोषपरोचाप्रकरयम्।
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४थं अ्ध्याय ] प्रथमाफ्रकिकम । [२३७ ]
दोषानन्तर प्रेत्यभाव, तस्यासिद्वि, आत्मनो नित्यलात, न खल नित्य विञ्विज्जायते, सियते वा, इति जन्ममरणयो नित्यत्वादात्मनोऽनुपपत्ति, उभयक्ष प्रेत्यभाव इति। तत्राय सिद्धानुवाद- आरत्मनित्यत्वे प्रेत्यभावसिद्धि ॥ १० ॥ नित्योऽयमत्मा प्रेति पृवशरोर जद्ाति सियत दति, प्रेत्य च पूर्वशरीर हित्वा भवत जायते, शरोरान्तरसुपादत्त द्वति तज्ञैतदुभयं 'पुनरुत्पत्ति प्रेत्यभाव इत्यत्रोत्तम, पूवशरोर हित्वा शरोरान्तरोपादान प्रेत्यभाव दूति, तख्जैतन्नित्यतवे सन्भवतीति। यस्य तु सत्त्वोत्याद सत्वनिरोध प्रेत्यभाव तस्य कतहानमकताभ्यागमन्न दोष, उच्छेदहेतुवाद ऋष्युपदेश ञ्वानर्थका इति ॥ १०॥ कथमुत्पत्तिरिति चेत- व्यक्ताद्यकाना प्रत्यक्षप्रामाखात् ॥ ११ ॥ कैन प्रकारेष किधर्मकात कारगाद्यक्र शरीराधुत्पद्यते ? इति। व्यक्तात् भूतसमाख्यातात पृथिव्यादित परमसूक्ष्मान्नि
क्रमप्राप्ततया प्रत्यभावे परौचयौये प्रत्यभाव शरोरसय बुदरात्मानो वा इति मजय पुनरुत्पत्ति प्रेत्यभाव प्रात लचषस्वाडिनट्टस्योत्पाद प्रतोयते न चासी नित्वस्धा Sडन सनवतोति शरोरादे खात्। म च मृतस्य शयोरादरुत्पत्तिविरोधाब्वेद युक्रामति वाचम् प्रेत्यभाव इत्स्व मुख व्यादाय खपिति प्ातवत् व्यत्वयैन भृत्वा प्रायम मित्वर्धादव सिद्धान्तस्बम्।-पात्मन पूर्वोत्तयुत्या नित्यत्े प्रेत्यभावसल सिध्यति एकनातोयगरोराऽडदयसम्बन्ध चरमसम्बन्धना भयोरप्पादप्रायपयोरात्न सन्भवात्। सम्मन्वसवच्छेद्याव क्केदकमावलचय म च खबपसम्म्विशेषोडतिरित्ी वैत्न्देतन्। पनरुन्पति द्त्यन पुन पदस प्रत्वभावप्रवाहयानादित् प्वापनाय तञ्म्रानक् वैराग्य सपयुज्यत इति ॥ १ ॥ ननु प्रेत्यभाव उत्पत्तिनरप्य सापन सन्नातोवादिणातोयादा सभवात
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[२३८ ] न्य.यदश नम। [४थं प्रध्याय।
त्वादरक्ष भगेरर्द्रियविषयापकरण्ाSSधार प्रस्वात द्रव्यमुत्पद्यत। व्यतन्न खल्विान्द्रयगाह्य, तत्सामान्यात कारगमप व्यक्तम। कि मामान्यम -रुपारडडटिगुगयाग। रूपाडडिगुगयुक्ेम्य पृथिव्यातिभ्यो नित्येभ्यो रुपाऽडटिगुयुक्त शगेराद्यत्पद्यत प्रत्यक्षप्रामाखात् दष्टो ह्ि रूपाऽडदिगुगयुत्ेय्या मृत्पभृतिभ्य म्तथाभृतस्य द्रव्यस्यात्पात, तन चादृष्टम्यानुमानमात रुपा Sदोनामन्वयदर्शनात् प्रक्कतिविकारयो पृथिव्यादीनामतो न्द्रियाणा कारणभावोऽनुमोयते इति। ११॥ न घटाइटानिष्पत्ते ।। १२ ।। इूदमपि प्रत्यक्षम -न खन्नु व्यक्ताइटाद्यक्ो घट उत्पद्य माना दृश्यत पतति व्यक्षाद्यतस्यानुत्पत्तिदशनाब व्यक्त कारख मिति ॥ १२॥ व्यक्ता द्वट निष्पत्तेग प्रतिषेध ।। १३ ।। न बूम सर्व सर्वस्य कारणमिति किन्तु यद्त्पद्यत व्यत्त द्रव्य, तत् तथाभूतादेवोत्पद्यत इति। व्यक्तन्व तनप्ाह्व्य
वातपाथखादी व्याचागत ताव्वत्यत्व मानाभावान बत प्रत्यभावाडास्व इन्यपा दातान प्रसद्ध हात्पात्तपकाय दपपात।-व्यत्ञानाम् उत्पात्तागत शव। व्यकाद्यक नातीयात पृथिव्यादत व्यज्ञाना व्यताजातोयाना अन्यपायव्या नाम उन्पातत। दयय पाथव्वाद प्रतित्यादती रुपयदादितम् रुपवदादीनामुन्पने प्रत्यचासहत्वान्पर सायगप कल्पान समनद्ारपक्ष्टमद्त्वम साययबावयवत्वस्सिड् (पा) तदवयवावयवस् साघवाम्रन्यत्वमिात भाव ॥ ११। पवुडा गङत।-विभष काव्यकारवभावाभाव सामान्यतीहाप न तर्घेत भाव A९२॥ विशवती व्यनिवारी न विरोधी सामान्यतम्त् माख्यवत्याभ्यनवान समापने।-
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४थ भध्याय ] प्रथमात्किकम्। [२३८ ]
कपालसननक यतो घट उत्पद्यत, न चैतननिष्वान क्कचि दभ्यनुन्ना लब्ुमर्हताति तदेतत तत्त्वम ॥ १३ ॥ अत पर प्रावादुकाना दृष्टय प्रदश्यन्त - अभावाङ्कावोत्पत्तिर्नानुयमृद्य प्राटुर्भावात् ॥ १४ ॥। त्मत सदुत्यद्यत द्वत्यय पच। कम्मात्-उपमृद्य बोजमङ्गर उत्पद्यत नानुपसृद, न चेद्योजापमद,श्रडुरोत्पत्तिर्न स्दात॥ '४ ॥ प्रवाभिधीयत - व्याघातादप्रयोग ॥। १५ ॥ उपमृता प्रादुभावादित्ययुत्त प्रयोग व्याघातात यदुप मदात न तटयसृद्य प्रादुभावतुमहत विद्यमानत्वात, यच प्राव्भव त न तनामादुर्भतनाविद्यमाननापमढ डात॥ १५ ॥ नातीतानागतवो कारकशव्दप्रयोगात ॥ १६।। अतोते चानागत चाविद्यमान कारकशब्दा प्रयुज्यन्ते, पुत्तो जनिष्यते जनिष्यमाण पुत्तमाभनन्दति पुत्रस्य जनिष्य माणस्य नाम करोति अ्रभूत कुश् भिन्न कुश्मनुशोरचत, सजातोगात् सजातायात्यत्तन प्रातषेध प्राथवोजालयात् कपालादिता घटाऽदि निप्पुस सक्ताइडपादन चाप्रया जक्मात भाव । १२॥ समाव प्रत्यभावपरीचाप्रकरयम् । प्थावाष्टा प्रकरणामि प्रसकराद्यनानामन्यताव्डथसुपोद्दाताडा तवाऽडदौ गन्यतापादानप्रवरमम् तय पृवपचमूस्म्।-समावादपादामात काय्यांचा भावाना सत्पात यतोएसदर्योन्राइदिकमनुपसद न प्रादुर्भावाभाव तथा व बोजाऽडाद विभाशा इराधुपादावमिति : १४॥ पवास्तरम्।-उपसद्य म्रादुभवतोवित युक प्रयोग व्याघातात् उपमद्वस सूवमसस्व उपमदकत्वायोबात् पूर्वे सत्वे व पर्त प्रादुभावानीगात । १५। पूबपचो दूषयवि।-नायुक प्रयाय, पवोतडनागत व कारममष्दपयोगान्
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[२४० ] न्यायदशनम। [४ध सध्याय।
भिन्नस्य कुन्भस्य कपालानि अ्रजाता पुत्ता पितर तापय ललोोत बहुल भाता प्रयोगा दृश्यन्ते। का पुनरिय भत्रि १ आ्ानन्तय्य भत्रि। आ्नन्तर्ययसामर्थ्यादुपमृद्य प्रादुर्भावार्थ प्रादुर्भवष्यनद्डुर उपमृद्गातीति भात कर्तृत्वमिति ॥ १६॥
न विनष्ाहीजादडुर उत्पद्यत इति, तम्माबाभावात भावोत्पत्तिरिति । १७।
उपमदप्रादृभावयो पौर्वापर्व्यनियम क्रम स खब्वभावा द्वावोत्पत्तेहतुनिर्दिश्यत सचन प्रतिषिध्यत इति। व्याहत
नाभावात। बोजावयवा कुतविन्रिमित्तात प्रादुर्भूतक्रिया पूव व्यूह जइति व्यूडान्तरज्चाऽडपद्यन्ते व्यूहान्तरादड्डर उत्पद्यत। दृशन्ते खत्ववयवासत्सयागाश्चाङ्डुरोत्पत्तिहेतव। न चानिवृत्ते पूवव्यूहे बौजावयवाना शक्त व्यूहान्तरेण भवितुम इत्युपमर्दं
कतत कमाSडाद बोध वभ्नव्दपयोमान बवा अनिष्यते पुच अनिष्यमाय पुषमभिनन्दति ्रभृत कुमध भिद्न कृश्रमनुनीचात।१६। मन्वाप्तामौपचारिक प्रमी तवाऽपि ककि बोजाइडद्विनष्टसोपादानत्व मन्चसे, बोमाइडदिविनाशस वा बन्चे वि तखोपादानल निमित्तत् वा तवाइडदी उत्तरम्।-विनटाना मोबाउदोनामुपादानत्वायोबात् चत एव न द्ितीय तब विनष विनात बशे नोव्यचि द्रव्वत्ख भावकायसमवाविकारणताSनच्छेद कसात्। १०॥ दवोये लाह।- पनाकस कारवल प्रतिमिध्यते प्रैतिबन्वाभावस देतु वापगमातू, इवाड कर्माव।-बोजे विनटेडहुरी आायव पतति प्ब्ययात बोजसय प्रति
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8रथं भ्रध्याय ] प्रथमाज्किकम्। [२४१ ]
भादुर्भावयो पौर्वापर्य्यनियम क्रम, तस्मावाभावाङ्कावोत्पत्ति रिति। न चान्यद्ोजावयवैभ्योऽड्डुरोत्पत्तिकारणम, इत्युपपद्यते बौजोपादाननियम दति ॥ १८॥ अथापर श्रह- रदश्वर कारग पुरुषकर्माफल्यदर्शनात् ॥ १८॥ पुरुषोऽय समोहमानी नावश्य समोड्ठाफलमाप्नोति, तनानुमायते पराधौन पुरुषकर्मफलाSडराधनमिति। यदधोन स दूश्वर, तस्मादोखर कारगमिति॥ १९॥ न पुरुषकर्माभावे फलानिष्पत्ते ॥२० ॥ दशवराधौना चेत् फलनिष्पात्ति स्थात अपि तहहि पुरुषस्व समोहामन्तरग फन्न निष्पद्येतेति । २०॥
बारभ्यत अभावमाचम्य कारणत्व चूर्गाक्ञतादपि बोजादहुरोप्ात साम् ब्रभावख निविभषवाटनि भाव ॥१८॥ समाप्त सून्यतोपाढाननिराकरणप्रकरगम् । मतान्तरमाड्।-पनेम ब्रह्मपरिणामवादी ब्रह्मविवत्तवादी वा दश्नित इति वर्दन्ति तथा हि ब्रहव नामरूपप्रपथभेदन विपरियमते मृत्तिकबोदस्माSडादभावन भत एव प्राकृतरुपस्य मत्त्वस्यापरित्याग प्रपम्नेषु उदञ्माटाविव सृत्तिकात्वसति पारणामवाद। ब्रह्मय चानाद्यनिवचनीयावद्यावभासानादपथ विवरूत मुखमिक तत्तव्लाद्यालमनभेदादित विवत्तवाद। ननु पुरुषकर्मेव कारणमस्तु कमोमरख कारखत्वन १ उत्यत प्रह पुरुरषेति।-पुरुषकमष्त्ी सि वफल्यमपि हशने सडकार्य न्तरमनश्य वाच्यम् तथा च बूनर एव यथा यथेष्कति तथा अगदिपरिवत्तन दत्येवास्तु वि पुरुषकमण्ण इति भाव। वस्तुतस्तु केवलेअरवारणतापर प्रकरख तटपादानतापर रे तु न किमपि मालमाकलयाम इति । १२ । समाधत्त ।-केवल न ब्रह्मण परन्तु बमरसैव हेतुले तदिक्काया चप्यतिरिकाया सिषयतायात्रानय्युपगमात सभ्युपगमे हवताइडपत्ति चत सब सवदा म्यात न स्यान काध्यवाचनामिति पुरुषकमण्ोपि सहकारिताऽडवस्की ब्रह्मम उवादानत्वम् न सन्नवात, चसमवायिकारण्ासम्पवात् तख कारणतामाव त्विष्यत एवति साव N२०।
न्ा-२१
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[२४२ ] न्यायदर्शनम्। [४र्थं भ्रध्याय।
तत्कारितत्वादहेतु ।। २१।। पुरुषकारमोखरोडनुग्ज्वाति फननाय, पुरुषस्य यतमानस्ये- खर फन सम्पादयताति। यदा न सम्पादयत तदा पुरुष कमाफल भवतीति, तम्मदोखरकारतत्वादहेतु पुरुषक्मा भावे फनानिष्पत्तेरिति। गुगविशिष्टमात्मान्तरमौखर तस्याऽडत्मकल्पात कल्पान्तरानुपप्ति*। परधममिथ्याज्ञान प्रमादहान्या धर्मच्ञानसमााधसम्पदा च विभिष्टमात्मान्तरमो खर तम्य च धमसमाधिफलमायमाद्यष्टावधमश्वर्य्यम्, मदन्पानुविधायी चास्य धम प्रत्यातमव्टन्तीन धर्माधर्मसन्नयान् पृथिव्यादोनि च भूतानि प्रवत्तयात, ण्वच्च सक्कताभ्यागमस्या नापन निमागप्राकाम्यमौश्रस्य स्क्कतकमफन वदितव्यम आत्मकन्पशाय यथा पितापत्याना, तथा पितभूत ईखरो भूतानाम, न चाउडम्मकल्पादन्धं कम्प सभ्भवत न तावदस्व वुाद्धवना काशद्र्मानङ्गभूत शक्त उपपादयितुम भ्रागमाच्च, दशट बोदा सर्वज्रातेश्वर द्वति बुद्दादिभिसाउडत्मिक्टे (त)
नन्वेव पुरुषत्यापारम्य फले व्यभिचारी म स्वादित चदवाऽह ।-फस्ाभावस पुरु्पक माभावकारितलवात पुरुषय्य कम बटष तदभावाधीनलात पुरुषकार रहेतु फलानुपचायक। मन्वीसर एवक इत्यव भाष्य-गृगविशिष्टमाव्ास्षर
ित्र बात्ा जमताराध्य सप्यान्वित्ता वदवारा दितााहतोपदेशको जमन पितात। परेतु-प्रमङ्तेशनरपातपाठमायषा बिसूती तथा हि ईशर वारयम् वर्वाव्व्यनातस्य सनुमाननु सित्यादक सकतक काय्यत्वाइटवदित्यह्तम्। गज् मोबागामेव कत्तत्व स्वाट्वाऽSड पुरुर्षेति।-पुरुषकमर्णा वफस्य दश्यते तथा व बिकनी वमवि प्रवत्तमानत्वादघत नीवाना यत उपादानगाचरापरीष पामादमती हि कसतव
(ब) विवेनि योज्यम् ढतोया विनानाने।
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४थ अध्याय ] [२४३ ]
निखरूपाSSग्यमीर प्रत्यत्तानुमानाSSगमविषयातीत क शक्क उपपाणपतुम१ स्वकताभ्यागमन्नोपेन च प्रवर्त्तमानस्याम्य यदत् प्रतिषेधजातम अ्करमनिामत्ते शरोरभमे तत मर्व प्रसज्यत ईति ॥ २१॥ अपरमितानोमाह- अनिमित्ततो भावोत्पत्ति करटकतैचषा- Sऽदिदर्शनात् ॥ २२ ॥ अनिमित्ता शरोगद्युत्पत्ति, कस्ात :- करटकतैचणा Sददिदशनात कएटकस्य तेच्या पवतधातूना चित्रता ग्राव श्क््णता निर्निमित्तव्वापादान दृष्ट, तथा शरोरमर्गोडपीति ।२२। अ्निमित्तनिमित्तत्वान्वानिमित्तत ॥।२३ ।। अनिमित्तती भावोत्पत्तिरित्वच्यते, यतसोत्पद्यत तविमित्तम अनिमित्तस्य निमित्तत्वाव्नानिमित्ता भावात्यत्तिरिति ॥२३॥
भाव। मन्व टशरा जवाना कत्तचमास्वयाभदन न पुरुषेति।-फल्स्य काय्यस्य कमाभावर्अनिष्पत्त तत्तत्यरुषापभोगसाथनत्वात तत्कम्ाजन्यत्वामति स्फोस्थाय पुरुषान। समाधसे तदिात।-कमणी,प तत्कारितत्वादोखरकारित्वात बचेतमस चतनाि 8 तस्यव जमकत्वातिति भाव ॥ २१॥
याद घ कार्य्यागामाकासवत तदान परमाखादोनामुपादानत न वेभनखव निमित्तत्वम् अत आकत्मिकत्वनिगकरणप्रकरयमारभते तव पृवपसमूवम्।- अनिमित्तत इति प्रथमाऽन्त त् तससिल आनमित्ता भवोत्यत्तिरित्यय भावेति स्पष्टाथम घगयपतिम कारणनियम्या उत्पत्तिमख्वान कय्टरकृतवायाव्पत्तिवत् यहा - घटाSडदिक म सकारणक भावत्वात् कस्ट्रकतघादिवत्। तैष्ा सस्यानविभय। चान्पिदान्यूचित्राSडदिपरियह तदकारणकमेवत्याभय । २२। एकदेशी बानी दूषयत।-वनिमत्तत इति हेतुपश्मोनि्देमादनिमिततसन निमित्ततवात् कथमनिामत्तत इति । २।
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[२४४ ] न्यायदशेनम । [४थ अ्रध्याय ।
निमि नानिमितयोग्थान्तरभावाद तिषेध ॥२४।। अन्य द् निसित्तम अन्यस्न निमत्तप्रत्याखयानम नच प्रत्याग्य नमव प्रत्याख्ययम वथाऽनुतक कमगलुागत नादक प्रतपन उनक भवतोति स खल्चय वानोड्कमनिमित शगेशातमर्ग इत्येतस्रान्त भिद्यत, अभेदात तव्रतिषेधनैव प्रतिषिडो वैदितव्य दृति ॥ २४ ॥ अन्गेड, मन्यन्ते -
किमनित्य नाम १-यस्य कदाचिद्ावस्तदनित्यम उत्पत्ति धमकमनुत्पन्र नास्ति विनाशधर्मकमावनष्ट नास्ति। कि पुन मतम १ -भीतिकञ् शरोरादि अभोतिकञ्ज बुद्दादि तदुभय
दूयति।-अनिमित्तस्य निमित्तम्य व अ्रथान्तरभावात भगन उत प्रतिघेत्रो ने वुक्र आनमित्तम्य निमित्तासन्नवात गगैवम्याकमनिामत्तत्वदूषयनव व तनपतप्रागामन्ाशवन नाव दूषितामति। नव्र्ाम्तु सूवडयोमव व्यचकत- समातत्ते अनिमित्तेति-पानामततम्य अनामत्तत्वसाधकम्य निमित्तल्वातनिमन व्वामामति जनकव्वात अनिमित्तत ध व्याहतम् मानामत्तवानासति जमका मभ्युपगमेऽनिमित्तत्व न सध्यन्गित कसटकतच्रानिकिमाप नानमिरकम् प्रष् विशवमहद्वतरस्ाभसदुन्या नादिति हदयम। दोषान्तरमाह निमिस्तति।-दमव निमित्तमिमनिभित्तमिति प्रतोन्या तयोरभेंदसिज्ञनमित्तप्रातषेधी न युक्न दतरया व सावलोकको प्रतोतिर्नीपपदनेति भाव। २४।।
सवस्यवानित्यत्वे नाऽडम्मादैरपि नित्यत् स्यात् पत सर्वानत्यत्वनिराकरम प्रकरथम् तत प्रमेयत्वम् चानत्यत्वव्याय्य न वा इति सभये पूवपचमूषम्।- पनित्वं विनाभि उन्पत्तिमती विनाशधमवत्वात् उम्पनतिमत्वस्चाऽकाशार्टेरपि मेगलान सिदमिति भाव तेन परमते तव नासिदि यहा,-सन्पत्तिविनाशथमकतात्
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४ यं अध्याय ] प्रथमाफ्किकम। [ २४५]
सुत्यत्त वनाशधर्मक विज्वायते तस्मात् तक्षर्वम श्रित्य मिति॥ २५॥ नानित्यतानित्यत्वात्॥२६ ॥ यदि तावत सवस्थानत्वता नित्या तव्रित्यत्वान्न मव- मनित्यम, अथानित्या तस्यामविद्यमानाया सर्व नित्य मिति॥२६॥ तदनित्यत्वमग्नेर्दाह्य विनाश्यानुविनाशवत॥न।। तस्या अनित्यताया अप्यनित्यत्वम, कथम१-यथाडग्निदाह् विनाश्यानुविन्श्यात ए्व सवस्यानित्यता सव विनाश्यानु विनश्यतोति ॥ १श। नित्यस्थाप्रयाख्यान यथोपलब्धिव्यवस्थानात ॥।२८।। अय खनु वादा नित्य प्रत्याचष्टे नित्यस्य च प्रत्याख्यान मनुपपत्रम कस्मात ?- यथोपतब्धिव्यवस्थानात। यस्यात्पत्ति विनाशधमकत्वमुपलभ्यते प्रमागत, तदनित्यम, यस्य नोप लभ्यत, नद्विपरीतम्। न च परमसूक्षमाणा भूतानामाकाश कानदिगात्ममनसा तहुगानाज्ज केषाच्वित् सामान्यविशेषसम उत्पास्तविनाशधमकाण मानसिद्धत्वात् तव्विन्रमप्रमायकमिति हदयम् पर तु शनित्यत्व कादाचित्कत्वम् उत्पत्तिघमकत्वाह्िनाभधमकत्वदवि हेतुब्ये तान्पर्थ मित्याहु ॥ २५।। दूषयति।-उत्पत्तिमत् न विनाशित्वसाधकम् चनित्यताया ध्वसस्य निन्य स्वादविनाशित्वात् तब व्यभिचारात। २६।। चाचिदात।-तस्या अनित्यताया चम्यनित्यत्वम् यथाऽग्रिर्दाहसेवनाद विनाशनन्तर खयमपि नश्यति मतुदाद्योयजनं तथा घटादराप नाभी नखवान न घटायुन्पज्न ध्वसध्वसस्थापि प्रतियागिध्वसत्वात् ध्वसप्रागभावानाधार कालख
समाधत।-नित्यस नित्यत्वविगिष्टस नित्यत्वस्य, न प्रत्याख्यनमिति फनितम्
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[ २४६] न्यायदर्शनम। [ ४ध बध्याय।
वायानाज्जात्पत्तिविनाशधर्मकत्व प्रमागत उपलभ्यत, तम्माान्र त्यान्येतानीति॥ २८॥
अ्यमन्य एकान्त - सर्व नित्य पञ्चभूतनित्यत्वात् ॥ २६॥ भूतमात्रमिद सर्व तानि चानत्यान, भूतोक्केदानुपपत्ते रिति ॥ २८॥
उत्पत्तिकार गाज्जोपलभ्यत विनाशकारगन्न तत मर्वनत्यत्व व्याडन्चत इति ॥ ३ ॥
नक्षण दानमथान्तर ग्रह्यत, भूतलक्षणवरोधान्वूतमावमिद मित्ययुक्ताऽय प्रतिषेध इति ॥ २१ ॥
कारगसमानगुगस्योत्पत्ति कारगप्नोपलभ्यते न चैतदुभय
सथोपाअ उपनब्ामातक्रमेया तथा च धामग्राहकमानन लाघनमइकत नाइडका शदानत्यत्वव्वयस्थापनार्दिति॥२८॥ समाप् सर्वामित्यलामराकरयम्रकरयम । सर्वनित्यत्व म प्रत्यभावाऽडदिसिद्ि पतम्तत्निगकरचप्रकरयम् तवाS्डचषप सूमम्।-सव नित्य भूतत्वान्मयत्वाद्ा वव दश्टनप्रदभनाय पत्तभूतानत्यत्वादित्यत्राम्
समावत्त।-सवानत्यत्व न युक्त घटाडदोनाम् उत्पात्तविनाभकारपाना कपास सबीगमुद्रपाताऽडदोनाम् उपलब्धे तथा चोत्पात विना भावावश्यकावित । ३ । पुन साध्य वाइ।-उळप्रतिषधी म नित्यख परमाक्ा देवव्ववयय भूतत्वााद घठाउडदी तद्वरोधान तत्सखान तथा चोत्पादादिप्रत्यया बान्त इति भाव ॥२१॥ दूषयति- मानन्यत्वानषेषी न युक्न उन्पत्ेदत्कारपात तन्पमापकान उपलभ्ध
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४ थ अ्रध्याय] [ >89]
अनित्यविषय, न चोत्पत्तितत्कारण पन्धि शक्या प्रत्या ख्यात न चाविषया काचिदुपन्धिविति उपनाव्धमामथ्यात कारणेन ममानगुण काय्यमुत्पद्यत दत्यनुभीयत सा खलूपत्नब्धे विषय पति। एवस तल्नक्षणावरोधोपर्पात्तरति उत्पात्तिवनाश कारणप्रयुत्तस्य मातु प्रयत्नो दृष्ट दति। प्रासदद्ावयवी तदर्मा 3 पातविनाशधमा चावयवो मिद् इति। शब्दकमवुद्या
चेत्यनेन शब्दकर्मबुद्धिसुखट व्वेच्छाद्वेषप्रयतनाख न व्याप्ता
भृतोपन्नब्छो तुन्यम।* यथा खपे विषयाभिमान एवमुत्पात्त विनाशकारगाभिमान दति एवज्रेतद्वू तपलब्धौ तुन्यम र्वप्नविषयाभिमानवत प्रसज्यत * प्ाथव्याद्यभावे सवव्यवहारविलोप दति चेत् तदितरत्र ममानम व्यवहारविलोपदति सोडय नित्यानामतोन्द्रियत्वादविषयत्वा चोत्पत्तिविनाशयो खप्नविषयाभिमानवदनित्यहैतुरिति ॥३२। अवस्थितस्योपादानस्य धर्ममात निवर्त्तते, धर्ममात्सुपजा- यते, स खलूत्मनिविनाशयोर्विषय, यच्चोपजायते तत प्राग प्युपजननादस्ति, यञ् निवत्तते, तब्निह्टत्तमप्यस्तोति, एवस सर्वस्य नित्यत्वमिति,- न व्यवरथाऽनुपपत्ते ।। ३३ ॥ यमुपनर इ्य निवृत्तिरिति व्यवस्था नोपपद्यते, उप तवा चीत्ादविनाभप्रतोत प्रामाधिकत्वात् न ताव्रिल्प् इतरथा कादाचत्त्वप्रती व्वनुपपते न चाडडविभावात् तदुपपास तस्यवाामत्यत सवनित्यत्वव्याघातान्।
बान्तलव सादितयाभ्ाइडड ।-पाकलोनिक
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[२8८ ] न्यायदर्शनम् । [ ४थ अध्याय।
जातनवृत्तयोरविद्यमानत्वात्। त्रय धम उपजात, शरय निवृह् पति सद्धावाविशेषादव्यवस्था, इदानीमुपजननिवृत्ती नतानो- मित कालव्यवस्था नोपपद्यते सर्वता वद्यमानत्वात अ्म्य धर्म स्योपजननिवृत्तो नास्वति व्यवस्थाऽनुपपात्त उभयोरविशेषात्। पनागतोऽतात पति कालव्यवस्थाऽनुपर्पत्त वर्त्तमानस्य मङ्भाव लक्षणत्वात्, अ्रविद्यमानस्थाऽडत्मलाभ उपजन विद्यमानय्या S5त्मनन निर्वात्त इत्येतस्मिन मति नैत दोषा तम्मात यदक्र-प्रागम्यपजननादस्ति निवृत्तज्वास्ति तदयुक्तमिति॥३=।। अयमन्य पकान्त - सर्व पृथक् भावलक्गापृथक्लात ॥ ३४ ॥ सव नाना न कसिदको भावा विद्यत करात् -भाव नक्षसपृथक्कात भावस्य लक्षगामभधान येन लच्यते भाव, स ममाग्व्याशब्द, तस्य पृथग्विषयकत्वात सर्वो भाव ममाख्याशन्द समूहवाचो, कुम इति सन्नाशब्दो गन्वरस- रूपस्पशसमूहे वुध्रपाशग्रोवाऽडादसमूह च वत्तते। निदर्शन मावच्ेदमित॥३४॥
प्रमालवन सिद्धस्यापि वमतभडाया स्यादि त्यय ॥२३ ॥ समाप्त सवमित्यत्वामराकरखप्रकरयम्। अय प्रसङ्गात सवपृथक्मकरयम् तव पूवपसस्बम ।-सव वस्तु पृथक नामा सत््यतऽनेनेति लक्षण समाख्या तस्या पृथक्न पृथगथकत्वम् तथा च प्रयोग घटाउडदि समूइकृप वाच्यल्वात् सेनावमाडडदिवत् पतौन्द्रिये गगनाऽडदी मानाभावात् नातमन मरोरामािरकात् गुणकमन्ारात्रयाभदात विभवसमवाययोर्मानाभावात् पभावख नुच्कतवात्र वयभिचार यहा-घटाऽडदिक खव्मादपि शृ्थक भाव सयमाना गन्वरसाउडदोना तत्तदवयवादौनात पृथक्ात घटाउडदेब तदभदादिति भाव 1 २४॥
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४थ मध्याय ] [२४८]
नानेकलचगौरेकभावनिष्पत्ते ॥ ३५ ॥ अनकविधनक्षणैशिात मध्यमपदन्ोपी समास। गन्धा SSटमिख्च गुगैबुध्राSडदिभस्ावयवै सम्बद्द एको भावा निष्पद्यत, गुग व्यातरिक्रञ्ज द्रव्यम, अवयवातिरिक्कयावयवोति विभक्नन्याय स्नैतदुभयमात ॥ ३५ । अथााप- लक्षमाव्यवस्थानादेवाप्रतिषेध । ३६॥
न काशदेका भाव इत्ययुतता प्रतिषेध। कस्मात १-लक्षण व्यवस्थानादव, यिह लक्षण भावस्य सन्नाशब्दभूत तदक सिमिन व्यवस्थितम य कुभभमद्राक्ष त स्पृशामि यमेवास्पाक्ष त पश्यामोति नागममूहे गह्यते इति।प्रगुसभूह चाग्ह्य मागे यदस्टह्यत तदकमेवेति। अथाप्येतदनूक्र नासत्येको भाव यस्नात ममुदाय एकानुपपत्तेर्नासत्यव समूह नास्त्येका भाव यस्प्ात् समूहे भावशब्दप्रयोग एकस्य चानुप पत्ते ममूहो नापपद्यत, एकममुच्चया हि समूद् इति व्याहत ल्वादनुपपन्नम, नास्त्यको भाव दति यस्य प्रतिषेध प्रतिच्नायत समूहे भावशब्दप्रयोगादिति हेतु ब्ुवता स एवाभ्यनुन्नायते,
स्यय भावस्य निष्पत्तवत्पत्तेरित्यय तथा चकम्य घामणा प्रत्यचाS दपमाणसिद्धत्वात्
तख कारणत्वात् कालपकारययोरभदासभ्रवास् न तत्तदात्मवत्व घटाउदे सनवतौति भाव हेतुमाह।-सवसस् सथाडावाना घटपटाउडदोनां व्यवस्थानाडवस्थितत्वाटैव अप्रतिषेध पृथन्व्यवस्थापन नेत्यथ सचप कपाले घट इत्यादिप्रत।तसिडम् न चन् समूहाउडत्मकल सन्भवति। 0व
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[२५० ] न्यायदर्शनम । [४र्थ अ्रध्याय।
एकममुचयो हि ममूळ इति। ममूडे भावशञ्दप्रयोगादिति चेत ममूहमाश्रित्य प्रत्येक ममूह्िप्रतिष्धो नास्त्येको भाव इति, मोडयमुभयतो व्याघातात् र्यात्किज्जनवाढ इति । ३५ । अयमपर एकान्त,- सर्वमपावो भावेष्वितरेतगभावसिद्दे । ३७॥ यावद्वावजात तत्र्वमभाव कम्मात -भावेष्वितरतरा भावमिडे। असन गौरखाऽडत्मनाSनख्ो गो प्सब्नखो गवा त्मनाडगोरख द्ृति।* अमत््रत्ययस्य प्रतिषेधस्य च भावशब्देन सामानाधिकरख्यात मर्वमभाव पति प्रतिन्जावाक्े पदयो प्रतिज्वाहेत्वोक व्याघातादयुक्र्मअनेकस्याशेषता मर्वशब्द स्याथ निरुपाख्यम तत्र समुपाख्यायमान कथ निरुपाख्यमभाव स्यादिति१ न जात्वभावो निरुपास्योनेकतयाऽशेष तया शक्त प्रतिक्षातुमिति। सवमतदभाव इति चेत याटिट सव मिति मन्यमे, तदभाव इति एव चेत अनिव्ृत्ता व्याघात अनंकमशेषञ्जेति नाभावप्रत्ययेन शक्य भवितुम प्र्पस्ति चाय प्रत्यय मर्वमिति तम्ान्नाभाव दृति। प्रतिज्ञाहेत्वोच् व्याघात सवमभाव पति, भावप्रतिषेध प्रतिन्ना भावेष्वितरतराभाव सिद्धेरिति हेतु, भावव्वितरेतराभावमनुन्तायाऽडश्रित्य चेतरे तराभावमिद्दया सर्वमभाव दृत्युच्यते, यदि सवमभावी भावेष्वित
सचवथ् घत जदातस्वकपस् यमइमद्राख स सृभामीत प्रत्यतेय व्यवस्थतत्वात्। परमायीद्ताप्रत्ययताम्न तत्भ्व विस् समूहलक्षणव्यर्वास्थतरव नोत् युक्रम समूरो ईि नानाव्याक्ससुदाय सघ नैकव्यकेरनभपगमे ।सध्यतात भाव : २६। समाव सवपृथकृनिवाकरणपकरयम्। मवसून्यत्वेन काय्यकारष्भाशासप्भव तव अवावम नत्वमभावत्वत्याय्य म ना. इति समये पूवपससूमम्।-सब वविवाद्पद्म्,
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४र्थ अ्रध्याय ] प्रथमाञ्किकम्। [२५१ ]
पतराभावसिष्ठेरिति नोपपद्यते, अथ भावैष्वित रेतराभावसिद्धि, सर्वमभाव इति नोपपद्यते, सूत्रेग चाभिसम्बन्घ । ३७॥ न खभावसिद्वेभावानाम ॥ ३८॥ न सवमभाव कस्मात् १-खन भावेन सङ्भावात भावा न म, खेन धमेण भावा भवन्तोति प्रतिन्ायते कथ खो धर्मी भावानाम १-द्रव्यगुगकर्मणा सदादिसामान्य द्रव्याखा क्रिया वातत्यवमादिविशेष स्पर्शपर्य्यन्ता पाथव्या दरति च प्रत्येक ज्वानन्तो भेद सामान्यविशेषसमवायानाथ् विशिष्टा धमा ग्टह्यन्त मोडयमभावस्य निरुपास्यत्वात् सम्प्त्यायकोर्ऽर्थभेदा न म्यात अस्ति त्वय, तस्मान्न सर्वमभाव इति। अ्रथवा न स्भाव मिद्वेर्भवानामिति सवरूपमिद्वारति गौरिति प्रयुज्यमान शब्दे जतिवाउष्ट द्रव्य ग्टह्यत नाभावमात्म र्याद च सर्वमभाव, मौतत्यभाव प्रतोपत गाशव्देन चाभाव उच्चेत यस्मातु गोशब्दप्रयोग द्व्यवशेष प्रतोयत, नाभाव, तम्मादयुत्ता मिति। अथवा न सभावसिह्वतिति-अ्सन् गौरखाऽडत्मनति गवात्मना कम्पमान्नोच्यते-अवचनात् गवात्मना गौरस्ोति स्वभावसिद्धि, भनशोऽख दृति वा भगोगौरिति वा कस्माबो चते :- अवचनात खेन रुपेण विद्यमानता द्रव्यस्येति विच्रायते, भ्रव्यतिरेकप्रतिषेधे च भावानामसयोगाऽडदिसब्बन्धो व्यतिरेक सदा असत्प्रत्ययमामानाधिकरणयम्, यथा न मन्ति कुण्डे वदरागोति, बसन गोरखाSडतना अनखे गौरिति च मवाश्योरव्यतिरेक प्रतिषिध्यते गव खयोरेकत्व नास्तोति, सभावस्तुक्कम् तव प्रत्यय मानमाद्ट भावे प्वात।-भावत्वालमतेपु घटाडडदड नभावत्वसिद्े घट पटा नेत्यानिप्रतोत्या सवेषामभावत्वसिर्ठ ॥३७। शिदान्सूवम्।- भशना पषिव्यादोना, सलावस बवादे म्रता
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[२५२ ] न्यायदर्शनम्। [४थं भध्याय।
तस्मिन प्रतिषिध्यमाने भावेन गवा सामानाधिकरस- मसत्यत्ययस्यासन गोरखाऽडत्मनति यथा न सन्ति कुण्डे वदरागोति कुणडे वदरसंयोगे प्रतिषिध्यमाने सद्धिरसष- वत्ययस्य सामानाधिकर एमिति॥ ३८॥
अपेक्षाऊृतमापेतिकम, डसवापेच्षाऊृत दोघ दाघापेक्षा ऊत इसम न सेनाऽडत्मनावस्थित किञ्ञित् कस्मात - अपेचासामर्थ्यात तम्मान्न सभावसिद्विभावानामिति ॥३2 ॥ व्याहतत्वादयुत्तम ॥ ४० ॥ यदि इसापेक्षाऊत दोर्घ किमिदानीमपेच्य इस्वमिति मह्ते -अथ दोघापेचाऊत इख, दोघमनापेतिकम
स्वभावसिद्वावसत्या समया परि- मण्डलयोर्वा द्रव्ययोरापेतिक दीर्घत्वङ्कखवत्वे कस्मान्न भवत ?- अपेकायामनपेकायाप्ट द्रव्ययोरमेद। यावती द्रव्ये अपचमाये, तावतो एवानपेचमाये, नान्यतरत्र भेद, पपेचिकत्वे तु सत्यन्यतरत् विशेषोपजन स्वादिति। किमपेचासामर्थ्यमिति चेत् :- इयोग्रहषेडिशयग्रहृणोपपत्ति, इ् द्रव्ये पश्यवेकत्
SSदेय सिद्धे न हि नुष्कस्य बन्रूपाइडदिक सलेग मतोतिवां सम नति।३८॥ पुन शहते।-न ड्ि सर्वेंषा मावानामेक खभाव सभवति चापेचिकलवात् िन्नत्वान, मिन्नस एकसभावत्वे खव्मादपि भेदाऽडपसे यदा -इतरसापेचल्ात् एतदपेचयाडयं नोखवर एवदपेचमा इख इति प्रतोते यत्र सापेच तदवम् यषा नवासापेय फाटवामखम् १८॥
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४थ मध्याय ] प्रथमान्किकम। [२५३ ]
विद्यमानमतिशय गह्ाति, तह्ीरघमिति व्यवस्यति, यच्च होन महाति, तड्खमिति व्यवस्यतीति, एतच्चापेचासामथ्य मिति॥ ४० ॥ अथेमे महैरकान्तवादा। सर्वमेक,-सदविशेषात्, सव हेधा-नित्यानित्यभेदात, सर्व वेधा,-नाता ज्ान प्ेय मित सर्व चतुदा-प्रमाता प्रमार्य प्रमेय प्रमिति्रिति एव यथामन्तवमन्येडपीति। तव परीक्षा -
यदि साध्यमाधनयोनानात्वम, एकान्तो न मिध्यति, व्यतिरेकात् अ्रथ माध्यमाधनयोरमेद ण्वमप्यकान्तो न मिध्यति साधनाभावात्, न ह्वि तमन्तरेग कस्यचचित् सिद्धि रिति ॥४१ ॥
मापतत् सनभवति किश्व मापेसत् सापस न वा बाद्य तस्य तृष्कतवात्र साधकत्वम पनत्थे तस्यव सत्यत्वात् कुन सवशून्यत्वमति भाव ॥ ४ ॥ समाप्त सवशून्यतामिराकरणप्रकरगाम। चथ महाकान्तवाद नगकरगप्रकरगम्। तब भाष्यम -प्रथम महाकानवाढ़ा सवमेक -मनविशेषान मर्वे इषा-नित्यामित्यभेदान सव वषा -जाता झय न्ानर्मिति सवे चतदा -प्रमाता प्रमाय प्रमेय प्रमितिरगिति एव यथासभभव मन्यदपि। तत् यथा निन्यत्वानिग्त्वलचण्तधर्माभ्या बध तथा मत्वनकमिति स्ष्टोऽय। पर त्वव व्यापनने-पकमित्यसतवात तथा घ ब्रहमवकानावभर्ष सत्य सवमन्य अिथ्या यशा-मर्वेप्रपञ्चनातम एक उतयन्ध सर्दावभषान घट मन् पट सबिति प्रतोने घगभित्नसदभिन्नपठम्य घनाभदसिड। सुतिरपि - एकमेवादय ब्रह्म। "नेई मानाडास किसन" (तह् उप ४ प्रध्या ४ ब्राह्म १२ मन्) इत्यादि। बन्धडपोत्यनेन कपमंज्ञामस्कारवटमाइनुभवा पत्च स्न्वा इति सौवान्तिका इत्यादि समुखय पतष्वाक्षपेष मिद्ानतसूवस।-सदाकान्ता न सिध्यन्ति कार्यसय प्रमाषस् सतुपपत्त उपपत्ती वा म सद्यकान्त, साधनथ साध्यातिरितख्यापसितल्ात् ।४१। न्या-२२
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[२५४ ] न्यायदर्शनम्। [४र्थ पध्याय।
म कारणावयवभावात् ॥ ४२ ॥। न सझ कान्तानामसिद्धि, कम्मात् १-कारवस्यावयक भावात। पवयव कवित् साधनभूत इत्यव्यतिरेक, एव द्वेता Ssदोनासपोति ॥ ४२॥ निरवयवत्वाद्हेतु ॥४३ ॥ कारणस्यावयवभावादित्यहेतु, कम्मात् १-सर्वमेक मिसनपवगेग प्रतिज्ञाय कस्यचचिदेकत्वमुच्यते, तव व्यपावृत्तो डवयव साधनभूतो नोपपद्मत, एव द्वैताऽडदिष्वपीति। त खस्विमे सह्ेाकान्ता विशेषकारितस्यार्थविस्तारस्य प्रत्याख्याने न वर्त्तन्ते, प्रत्यक्षानुमानाइडगमविरोधान्मिथ्यावादा भर्वन्ति। अथाभ्यनुन्नानेन वत्तन्ते, समानधर्मकारितोऽयसड्गहो विशेष कारितसाथभेद इति एवमेकान्तत्व जह्तोति। ते खल्वेते तत्वन्ञानप्रविवेकार्थमेकान्ता परोकिता दात ।। ४३ ।। प्रत्यभावानन्तर फनम्, त्तमिन - मद कालान्तरे च फलनिष्पत्ते सशय ।। ४४ ।। पचत दोग्धीति सद् फलमोदनपयसी, कर्षति वपतीति कालान्तरे फल शस्याधिगम इति। भस्ति चेय क्रिया आासपाता-न सहयकान्तस्यासिदि कारणस प्रमाशस्य सवयवमावात उतम्यकद मत्वाद् वयवावयावनाय सदाभाव ।। ४२। दृषगात।-उका हेतुन युनत सवस्यय पपत्ववावशिष्स्याभावात् पसकदमख उतृत्वासपशादास भाव सातम्ु ब्रह्मकपरति। पतथ् नाअ्भ्य रोचत सख्मज्वख
हवर धाभावात् वथामतरथा षटपदार्थी सप्तपदार्थो घ सिष्यादात ? तम्मादशत वाहानराकरयपुरत्व पत म्रकर्य सत्च्कत इनि सहप ॥४२॥
स्यावसरत कब परोचलोये सभयमाह।- प्राकाउड़ादाकपाया सब फलक
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४थं सध्याय ] प्रथमाक्िकम्। [२५ ५ ]
"अन्निहोत्र जुड्ुयात् खर्गकाम" (मैतो० उप० ६।३६) इति। एतस्या फले सशय॥ ४४ ।। न सद्, फल कालान्तगोपभोग्यत्वात् ।। ४५ ॥ खर्ग फल स्रूयते, तथ् मिस्नेडस्मिन देहमैदादुत्यद्यत इतति,
ध्वस्ताया प्रवृत्तौ प्रवृत्ते फन म कारगमन्तरेगोत्यत्तुमहति, न खलु वै विनष्टात् कारणात् किश्विदुत्पद्यत इति ॥ ४६ ।। प्राडिष्पत्तर्वृक्षफलवत् तत्स्यात्॥। ४७ ॥ यथा फलार्थिना वक्तमूले सेकाSSदिपरिकर्म क्रियत तस्मिस प्रध्वस्ते पृथिवोधातुरब्धातुना सङ्गहीत भ्रन्तरेय तेजसा पच्मानो रसद्रव्य निर्वत्तयति, स द्रव्यभूती रमो वृक्षानुगत पाकविशिष्टो व्यूहविशेषेग सविविशमान पर्णाSडदि फन निर्वत्तयति, एव परिषेकाऽडदिकर्म चार्थवत् न च विनष्त् फननिष्पत्ति, तथा प्रहत्या सस्कारो धमाधर्मनत्तगो जन्यते, स जातो निमित्तान्तरानुग्टहोत कालान्तरे फल
काखान्तरोय वेति समय॥४४ ॥ तवदिक कौच्यकोर्थ्यादोनामेव फमत्वसभ्वे माइष्टादिकल्पममिति पूवरते सिह्ानसूचम्।-क्रामन् पिभोग्यत्वेन प्रतिपादनादित्यय सवर्गो हि फल त्रयत से स दु खासाधनमुख न चडिक सुखं तथा एव हिसाइइन सततबरकापभोग फन्न सूयते न सेह तत्सन्भव द्रात भाव । ४५॥ भहते।-वाखानरेय तत्तत्कमय फल न समवात हेतोसत्ामय बिना आ्ात स :द ॥ समावन।-समाउदिनिय्यने प्राक तहार थान्। दटानमार,-उचफननवन,
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[२५६ ] न्यायदभनम। [४ अध्याय।
निष्पादयतोति। उत्रज्जेतत-"पूर्वक्वतफलानुबन्धात् तदुत्पत्ति" द्वात ॥४७॥
नासन्न सन्न सदसत्मदसतोर्वेधर्म्यात्॥ ४८॥ प्राड्िष्पत्तरनिष्पात्तधर्मक नासत, उपाताननियमात कस्यचिदुत्पत्तये कित्निदुपादेय न सर्व सर्वस्थेत्यसङ्गावे नियमो नोपपद्यत दूति। न सत प्रागुत्यत्तेविद्यमानस्थोत्पत्ति रनुपपननेति न सदसत मदसतोरवैधम्यात मदित्यर्थाभ्यनुक्षा अ्रसदित्यर्थप्रतिषेध एतयोव्याघाती वैधर्स्यम, व्याघाताद व्यतिरकानुपपत्तिरिति ॥ ४८॥ कस्मात ?-
दर्शनात ॥ ४६ ॥
यथा मूम्यसेकाडडनिमागडपि तद्धमावययोपचयाSडदवार बमन फमोन्पत्ति तथा
मयु काय्यकारणभाव एव न विचारसह इत्यामदत।-प्राडष्पश्तरत्यनु वत्तत फममित्यध्याहत्तव्यम तथा वान्पते प्राक फल मासत् ससत नत्पर्त्तो भग एद्राउ रप्युम्पास व्यात् स्वास सिकतानवाप सलम् न वा सन सत उन्पात विनोधात चत एव न सदसत सदसती सत्वाम्त्वमक्षणवधम्यात।। ४८ । समाधत्े।-उत्पात्तथमकम् उत्पत्तिषम कत्वनीपल्यमान पटाइडदिकम सत्पसे प्रागसादति बह्ा तत्तम उत्पादनाथयी प्रमिततात् ददानीं घट उत्पन्न उदानों घटीविनष्ट दात प्रत्ययात सतस्तु मोत्यत्तिसश्व उत्पन्रपनकुत्पादप्रसद्वात बद्याप नाधस्य न तव इतृत्व तथाऽप्यमुत्पन्नभावस नाम्ायोगाढत्ादसाधकलेन नात्र
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8थ अध्याय ] प्रथमाष्िकम्। [२५७ ]
यत्पुनरुता-प्रागुत्पत्ते कार्य्य नासदुपादाननियमादिति,- बुद्विसिद्वन्तु तदसत् ॥ ५ू० ॥ दृदमस्योत्पत्तये समर्थ, न सर्वमिति प्रागुत्पन्तेनियतकारगा कार्य्य बुद्धा सिद्धसुत्यत्तिनियमदर्शनात् तस्मादुपादाननियम स्योपपत्ति, सति तु काय्यें प्रागुत्पत्तेरृत्पत्रिरेव नास्तीति ।५० ॥
मूनसेकाऽडदिपरिकर्म फनल्ोभय वच्ताऽऽन्नय कम
प्रौतेगत्माSSश्रयत्वादप्रतिषैध ।। ५२।। प्रोतिरात्मप्रत्यचत्वादात्माSSन्रया तदाश्रयमेव कम धम-
रिति ॥ ५२॥
मसतत्पत्ती नियमा न स्वादित्यवाऽडह।-तत्काय्यम् चस्त प्रागभाव प्रतिगाग बुाद्धासख बुद्धा विषयोऊ्कतम् तथाह दूद तनुषु पटो भविष्यतात नावा कुविन्द प्रवततत म तु पटीननोति जात्ा तथा सति सिडतवन ज्ञात उछछाSभावात् म्मृत्यनुपपत्त सिकताइडदौ पटी भविष्यतीति न चायत किन्न न भविष्यतात जायत एव कुत इति चेत् १-अनुभव पृक्क। किस् त्वम्यतऽपि कुता न नायत तव पटाभवा्दिति चत् कर्थमद निरणायि पटात् पूव तन्तुसिकतयास्ल्य त्वात् तन्तुत्वेनाऽडन्रयतति चन तन्तुलवन कारणतत्येव स्यात् प्रवृत्यतुरीधात्॥ ५ ॥ मन्वस्तु हेतुफलभाव तथापि तद्तफलवर्दिति दट्टान्तवषम्याब्राटए्टसिड्धिरित्या
कायेन कम ऊत तस्य नाभात् हत्तस्थल तु सखय उचतसय सखात् सलिलसेकाSडनिक परिकर्भोपयुन्यत इत्यमिमान ।५१ ॥ समाधते।-आाश्रयव्यतिरकार्दति हेतुम युक्त प्रोते सुखस सान्भरोराव केदेन जायमानम्य बातर्व्वात्तलात् यागाऽडदिसामानाधिकरखादित्यय। ५२।
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[२५८] न्यायदर्शेनम । [४थे अ्ध्याय।
निर्देशात्॥ ५३ ॥ पुच्ताSSदि फल निर्दश्यते,न प्रोति ग्रामकामो यजेत, पुत्त कामो यजैतति, तत् यदुक,-प्रोति फनमित्येतदयुक्रमिति ॥५३। तत्सम्बन्धात् फलनिष्पत्तेस्तेषु फलवटुपचार ।५।। पुच्ताSडदिसम्बन्धात फल प्रोतिन् चषमुत्पद्यत इति पुत्तराऽडदिषु फनवदुपचार, यथान्ने पाणाशब्द "अन्न वे प्रागा दति ॥५४।। फलानन्तर दुखमुडिष्टिम उत्तन,- बाधनालक्षग द खम दूति ततकामढ प्रत्यात्मवेदनीयस्य सवजन्तुप्रत्यक्षस्य सुखम्य प्रत्याख्यानम १-आहोखिदन्य कन्य इति? अ्न्य इत्याह कथम -न वै सर्वलोकसान्षिक सुख शक् प्रत्याख्यातुम गयन्तु जन्मसरगप्रबन्धानुभवनामत्ताह खा्निविसम्य तुख्जिद्ासती दु खमज्जाभावनोपदशे दुखहानार्थ दति। कया युत्ा ?- मव खलु सत्वनिकाया सवासतुत्यत्तिस्थानानि सव पुनवो वाधना उनुषक, द खसाहचय्यात्, बाधनानचग दुखहम' दृत्युक्म ऋषिभिद खसन्नाभावनमुपदिश्यते, अत् च हेतुरुपादायत- विविधबाधनायोगाह्ु समेव जन्मोत्पत्ति । ५५।। जायत दति शगेरन्ट्रियबुद्दय शगोराऽदोनाख् आचत्सामानाषिकरखसमवदाप सवब म तथात शदत,-पुवाऽड ोमा फलनिहशात् सामानााचकरसय न सन्भवनौति भाव । ५२ । बद्याप पुचाउ ामचिकफसत्वात् तबाSमयव्यातरेक्ाभावात् मडन न तथादाप यव जन्मान्तरौयवनाऽडदिकमपि फर्ल स्थान् तवापि नानुपपत्ति रत्याभसे माSडह/-तपस्बन्ान पचाSदिसन्व्वात फमनिप्यसे प्रोत्यम्पसत तपु पुसाऽडादड फलवदुपचार फलतन व्यपदेश यथा- भव्रं व पात्चिमा प्राय्ा इति ॥ ५४ ॥ समाप फसपरीचाप्रकरणम् । उय क्रमप्रापत दुख परोक्षयोयम्, तब व "बायनात्वष दुखम्" इत्युक,
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४र्थ श्ध्याय ] प्रथमा्किकम। [२५2 ]
सस्थानविशिष्टाना प्रादुर्भाव उत्पत्ति, विविधा च बाधना - होना मध्यमोत्कष्टा चेति। उत्कष्टा नारकिगा, तिरश्ान्तु मध्यमा, मनुष्याणान्तु होना देवाना हौनतरा वीतरागा खात्न, एव सर्वमुत्पत्त्तिस्थान विविधबाधनानुषत पश्यत सुखे तत्साधनेषु च शरोरन्द्रियबुाद्दषु दुखमन्ना व्यवतिष्ठत, खम ज्राव्यवस्थानात अनभिरतिमन्रामुपामोनस्व सर्वलोकविषया तष्णा विच्कि द्ते टग्पाप्रहागात सवद्खाद्दिमुच्यत इति। यथा विष यागात पया विषमिति बध्यमानी नोपादत्त, अनुपाददानी मरगद ख नाप्रोति ५ू५॥ टु खोद्देशस्तु न सुखस्य प्रत्याग््यानम कस्मात 9- न मुखस्या तगलनिष्पत्ते ॥ ५ ६ ॥ म खस्वय दुखोदेश सुखस्य प्रत्याख्यानम कस्म्ात - सुखस्यान्तराननिष्पत्ते, निष्पद्यते खलु बाधनाउन्तरालेषु सुख प्रत्यात्मवेग्नीय शरोरिया, तदशक् प्रत्याख्यातुमिति॥ ५६॥ प्रथापि,- बाधनाऽनिवृत्तवेद्यत पर्य्येषगादोषादप्रतिषेध ॥५७।। सुखस्य दुसोद्देशेनेति प्रकरणात्, पय्यषग प्रार्थना विषयाजनतष्णा, पर्व्येषगास्य दोष -यदय वेदयमान तद्शमतु दुखत्जाातम्त्वम् इत्युत्त तज् भरारा,डदो दु खेव्याप्तामत्याभTISS।- ननमयोगाज्जन्म मरौराऽडादक तदुत्पातसत्सम्बन्ध विविधवाचनानोगात् दुखमिात व्यपदिश्ते न त वासवमेव तत् दुखम तथा च, विविधद् खाननषततया डेयत्वाख दु खमिति आवनोयमुपदिश्यते । ४५॥ मयु दु खभावनेन कि सुख प्रत्याख्यायते • न चैतच्कम, पत बाह।-दुखाना मध्ये सुखस्वाप्युम्प त्तस्त्रत्याख्यानस्याभ्न्क्यत्वात् ।। ५ू६। मयु सुखट खसम्बन्वाविशेषात् सुखभावनमेव कि नेव्यते इत्यवाSऽड्।-दुम
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[ २६० ] न्यायदर्श नम्। [४्थं अ्ध्याय।
प्रार्थयत, तस्य प्रारथित न सम्पद्यते, सम्पद्य वा विपद्यत, न्यून वा सम्पद्यत बहु प्रत्यनोक वा सम्पद्यत द्त्येतस्मात् पर्य्येषग- दोषाब्नानाविधो मानस सन्तापो भवति, एव वेदयत पय्येषणदोषाडाधनाया अनिव्ृत्ति बाधनाऽनिवृत्तेर्द खसक्वा भावनमुिश्यते, भनेन कारपेन दुखजन, न तु सुखस्या भावादिति। भ्रथाप्येतदनूत्ञम ,- काम कामयमानस्य यदा काम समृध्यति। अथैनसपर काम चिप्रमेव प्रबाधते।' * धपि चेदुदनमि समन्ताङ्गमिमिमा लभते सगवाखा, न स तेन धनेन धनैषी टप्यति किन्तु सुख धनकाम इति ॥ ५७ ॥ टु खविकल्पे सुखाभिमानाच्च॥ ५ू८ ॥ द खसन्नाभावनोपदेश क्रियत। अय खलु सुखसवेदने व्यवस्थित सुख परमपुरुषार्थ मन्यते न सुखादन्य्ति श्रेयम मास्ति, सुखे प्राप्ते चरितार्थ कवतकरणोयो भर्वात मिथ्या सङ्गल्पात् सुखे तत्साधनेष च विषयेषु सर्ज्यत सरक सुखाय घटत घटमानस्यास्य जन्मजराव्याधिप्रायणानिष्टमयोगट्ट- वियोगप्राथितानुपप्तिनिमित्तमनकविध यावद्द समुत्वद्यते त ट खविकल्प सुखमित्यभिमन्यत। सुखाङ्गभृत दख, न दु खमनापाद्य शक्य सुखमवासुम्, तादथ्यात सुखमवर्दामति सुखमन्ोपहतप्रभ्जो जायस स्यख चेति सन्धावतीति ससार नातिवर्त्तत, तदस्या सुखमन्नाया प्रतिपचो दुखसन्नाभावन- सुपददिश्यते। ट खानुषङ्गात् दुख जन्न्ेति, न सुखस्याभावात्,
भावमस्य न प्रतिषेध वत्यत सुखसाधनर्त्वं जानत पव्ेषणदाषात पथ्चेषने सखाथप्रवत्तन दोषात् सुखाथ प्रवत्तमानो हि बजनपालनाSडदौ विविधाभबांधना भिरुपतप्यत पतो ट सभावन वराग्यहतुतयीपदिश्यत॥ ५७॥ मयु दुखमनुभवत खत एव निदात्तसन्भवात् दुखभावनोपदैभी व्यय, पत्यन
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र्थ अध्याय ] प्रथमाङ्डिकम। [२६१ ]
वयद्येव कम्मात दुख जन्मेति नोच्यत साऽ्यमेव वाचे यदेवमाह, - टखमेव जन्मति, तेन सुखाभाव नापयतोति। जन्मनिग्रहार्थीयो (थ) वे खल्वयमेवशब्द, कथम १-न दुख जन्म सरूपत किन्तु दुखापचारात्, एव सुखमपोात, एतदनैनेव निर्वत्यंत न तु दु खमेव अन्नमेति॥ ५८ ॥ टु खोदेशानन्तरमपवर्ग स प्रत्याख्यायत-
ऋणानुबन्धाव्ास्त्यपवर्ग। जायमानो इ वै ब्राह्मगस्तिरिभि ऋग्ैऋपवान जायते ब्रह्मचय्यण ऋषिभ्य, य्ेन दवैभ्य प्रजया पितम्य (तैत्ति० स० ६।३।१०।५) इति ऋणनि तषामनुबन्ध स्वकमभि सम्बन्ध, कमसम्बन्धवचनात्- जरामय्य वा एतत् सत्र यदग्निहोत्र दशपूर्गमासी च' दति, 'जरया इ वा एष तम्मात सत्राद्दिमुद्यत मृत्युना ह च' दति, ऋगानुबन्धादपवगातुष्ठानकाला नास्तोत्यपवगाभाव। करेशा नुबन्धावास्त्यपवर्ग क्ेशानुबद्दद्य जायते, नास्य करेशानुबन्ध
बाह।- खस्य विवध कल्पो यव ताटभ प्रातषिरड्ा्िसाभाननमथुनाउS प्रवृत्तिमा भूतित्ययसुपदेभ इति भाव॥५८ ॥ समाप्त ९ खपरोषाप्रकरणम्। सय कमप्राप्ततयाSपवर्ग परोचणीय। तव च तदयकप्रहात्तकालाभावात
सात तवाच सयते-जारमाना ह वे ब्राह्मपस्िविमि कष ऋषवान जा।ते महयय्येंग काषभ्य यक्षेन दवम्य प्जया पितम्य (तत्ति स हाशर ।X) दवान ऋषिभ्य कष्यपभ्यी ब्रह्मचव्येग सुच्यत दैवभ्य देवगग्य यक्षेम सुच्यत प्रजया चपत्येन पि श्ेम्या मुखते ऋणापाकरपेनव च जोवनापगम तथा घ त्रयत-अरामय्य
(घ) नम्मनिग्रहार्थीय उत्यस्य प्रयोगस् मत्वर्थीयप्रयोगवत् साधुत्वम् नन्म नियह एव बथ प्रवत्तते इत्यथ।
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[ २५] न्यायदर्भंनम। [ ४थं पध्याय'।
विच्छेदो ग्टहते। प्रष्टत्नुबन्धावास्यपवर्ग, जन्मप्रभृत्यय यावत्, प्रायम वाम्बुद्िशरीराऽडरभोगविमुक्रो ग्टद्यते, तत्र यदुत - "दु खजना प्रहृत्तिदोष मिष्याञ्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरा भावादपबग इति, तदनुपपन्रमिति ।५८।। पत्नाभिधोयते, यत्तावद्ृणानुबन्धादिति ऋगैरिव ऋगेरिति - प्रधानशब्दानुपपत्तरगुग शब्देनानुवादो निन्दा- प्रशसोपपत्ते।ई. 1 ऋगौरिति नाय प्रधानशब्द, यत्र खलेक प्रत्यादेय ददाति, द्वितीयय प्रतिदेय ग्टज्वाति तत्रास्य दृष्टत्वात् प्रधान मृणशब्द, न चैतदिशेपपद्यते, प्रधानशब्दानुपपत्ेगणशब्दे-
वा एतत्सव वदग्रिहीयं दशपुषमासी चअरया द क एष तम्मात् सवाषिमुच्यते मतना ह " इति छणापाकरयमनरेय व न तव प्रवत्त तथा व साय्यत - ऋवानि बौख्यपाऊ्त्य मनो मोचे निवेधयीत्। चमपाऊ्कत्य मोचन्तु सेवमानी पतन्यथ।" एवं क्रेमानुवन्वादपि पुदषो द्वि रागाऽडदिभिक्षतत्कर्मारयारभमाय कभानुविज एव दश्यते तत् कथमपवर्ग एव प्रवृत्यनवन्वादपि पुरुषी।ह बाग्युा द मरोरेससतत्कामाय्यारममाची धर्मापर्मी यावञजोवसुपाजयन् वथमपठज्यताम्?
समावत।-आायमान रत्वादमुवादी हि प्रधामशब्द न हि जायमान कमनयविक्रियते तथा व भाष्यम -यदा तु मातती जायते कुमार न तदा कमानराधक्रियते पयिन मजस वाचिकारदिति। जायमान इत्यनेन की बा व्यावतनोय-न छनातस्य प्रसतिरसि यैनासी व्यावतनीय तव भाष्यम् - आायमान पति गुयभब्द विपर्य्ययीडनविक्तारादिति। तथा य जायमान इत्यनेमोपनोत उचने तस्य बह्मवय्याणवधिवारात् बाग्रहोवाड गहसद्याचिकार, "चौमे बसानी वाडधीयताम् उति मुने एवमवशन्द्रोषि न मुख्झ। न हवब मत्थादेय कमन ददाति परन्ु ऋणापावरमवदावश्यजत्वख्यापनाय तथोश्रम्। आार्चमक
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भर्थ अध्याय ] प्रथमान्किकम्। [ २३ ]
नायमनुवाद ऋगेरिव ऋणेरिति, प्रयुत्लीपमच्चैतत् पग्निर्माय वक इति, अन्यत दष्टवायसृणशब्द दह प्रयुज्यते, यथाडग्नि शब्दी माणवके। कथ गुणभब्देनानुवाद :- निन्दा प्रथसोपपत्ते। कमलापे ऋणोव कपादानाविन्दते, कमानुष्ठाने च ऋणीव ऋणदानात् प्रभस्थते। *जायमान डात गुपभब्द विप्रय्ययेऽनधिकारात्। * 'जायमानो इ वे ब्राह्मग" (तैत्ति० स० ६३१०।५) इति च शब्दो गटहम्य सम्पद्यमानो जायमान इति, यदाडयं मृहस्यो जायत तदा कर्मभिरधिक्रियते, माळती जायमानस्थानधिकारात, यदा तु माळतो जायते कुमार न तदा कर्मभिरधिक्रियत, * चर्थिन शत्तस्य चाधिकारात * पर्थिन कमभिरधिकार, कर्मविधौ कामसयोगस्मृते, "अग्निहोत् जहुयात् खगकाम" (मेतो० उप० ६।३६) इत्येवमादि। शक्स्व च प्रवृ्त्ति स्भवात् शक्षस्य कमभिरधिकार, प्रद्ृ्त्तिसन्नवात्, मत खलु विद्विते कर्मि प्रवत्तते, नेतर इति। * उभयाभावस्तु प्रधानशब्दार्थे * माळतो जायमाने कुमारे उभयमर्थिता पक्तिस न भवतौति। न भिद्यते च लौकिका- डाक्वाडेदिक वाक्य प्रेच्ापूर्वकारिपुरुषप्रगोतल्वेन, तब लोकिकस्तावदपरौच्तकोऽपि न जातमाव्र कुमारकमेव ब्रूयात्-प्रधोष्व यजसव ब्रम्मचर्य्य चरति, कुत ए्वम ऋषिरुपपवानवद्यवादो उपदेशार्थेन प्रयुत्न उपदिर्भात ? म खलु वे नककोऽन्धेषु प्रवत्तत, न गायको बधिर्राष्ति।
त प्रत्युपदेश क्रियते, न चैतदस्ति जायमामकमारक इतति। होवादकरथलत्करवार्म्या निन्दापथसे उपपर्रेते न पाववानकालाभाव महया विसुष्यत उत्युत्ते, न य जरयामकिकपवत्यने, "सम्मवासो या बुडयाद्
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[२६४ ] न्यायदशनम्। [४थं प्रध्याय।
गाहस्थ्यन्ङ्गस्स मन्त्रब्राह्मण कमाभिवदति यच मन्त्रव्राहर्ग कमाभिवदात तत् पत्नोसम्बन्धिना गार्स्थ्यन्निड्गेनापपन्रम, तस्माङ्गृइस्थोडय जायमानाऽभिधोयत इति। अरर्ित्वम्य चाविपरिणाम जरामर्य्यवादोपपत्तयावच्चास्य फलेनाथित्व न विपरिगमते न निवत्तत तावदनैन कमानुष्ठेयम् इत्युपपद्यते जगमर्य्यवादस्त प्रतोति, जरया ह वैत्यायुषस्तुरीयस्य चतुर्थस्य प्रव्रज्यायुत्तस्य वचनम्, जग्या ह वैष ण्तस्ाद्िसुच्यत द्ति, भायुषम्तुरोय चतुर्थ प्रव्रज्यायुत्ता जरेत्यच्यत तत्र ह्वि प्रव्रज्या विधोयते, अन्यन्तजरासयोगे जग्या ह वेत्यनर्थकम्, अ्रभक्रो विमुच्यत दत्येत्दपि नोपपद्यते स्यमशततम्य वाह्या पत्ति माह-"अन्तेवामो वा जुहुगाङ्गह्वणा स परिक्रौत", "नोर होता वा जुहुयादनन म परिक्रोत इति। अ्थापि विहित वाडनूद्येत, कामाह्वाऽर्थ परिकल्पात, विहितानुवचन न्याय्य मिति ऋणवाानवाखतन्त्री स्टडस्थ कमसु प्रवत्तते इत्युप पव्र वाक्यस्य सामथ्यम, फन्नस्य हवि माधनानि प्रयत्नविषय न फननम तानि मम्पन्नानि फनाय कल्पान्ते विद्ितञ्च जाय मान, विधोयते च जायमानम तन य सम्बध्यते, साइ्य नायमान दूति।* प्रत्यक्षविधानाभावादिति चेतु न, प्रति षधस्यापि प्रत्यन्तविधानाभावादिति। * प्रत्यच्ती विधोयत गारईस्थ्य ब्राह्मगेन यदि चाSडश्नमान्तरमभविष्यत तदपि व्यधा स्यत प्रत्यत्तत, प्रत्यच्षावधानाभावान्नासत्यात्तमान्तवामति न प्रतिषधस्य प्रत्यक्षविधानाभावात् न प्रतिषेधोऽपि वै ब्राह्मगेन प्रत्यचती विधोयते, न मन्यात्रमान्तरायि एक एव
सहया स परिकीत इत्यादिनाऽमक्रभ्याप विधानात् तव्मादायुषयतर्यभागी मरत्यचने। किस् नरामय्यवाद काममामिप्रायेय तथा च भाष्यम्-ववित्वस्ष
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8ये अध्याय ] [२६५]
मृहसथाSडन्म इति प्रतिषेधस्य प्रत्यवतोऽच्तवणादयुत्तमेत- दिति ॥ ६० ॥ अधिकारच् विधान विद्याऽन्तग्वत् । ६१ ॥ यथा शास्त्रान्तरागिि से स्वेधिकार प्रत्यव्षतो विधाय ानि, नार्थान्तराभावात् एवमिद ब्राह्मम महस्यशास्त्र सऽधिकार प्रत्यक्षती विधायक नाऽSश्रमान्तराष्षमभ वार्दिति। क ऋग्ब्राह्मगक्षापवर्गाभिधाय्यभिधोयते। *ऋचन्न ब्राह्मगानि चापवर्गाभिवादोनि भवन्ति। कचश् तावत्,- कमभिर्मृत्य मृषयो निषेदु प्रजावन्तो द्रविगामिच्कमाना। अ्रथापरी ऋषयो मनोषिस पर कर्मभ्योऽमृतत्वमानश ॥'। "न कर्मपा न प्रजया धनेन त्यागनेके अृतत्वमानश' (केव० उप० २ झोक )। "परंग नाक निह्धित गुहाया विभ्राजते यद्यतयो विभन्ति' (कैव० उप० ३ ख्ोक )। 'वेदाइ्ममेत पुरुष महान्तमादित्यवर्ण तमस पवस्तात्। तमेव विदित्वा श्रतिमृत्युमति नान्य पन्या विद्यतडयनाय॥ (खेता० उप० ३ अध्या० ८ मन्त)। अथ ब्राह्मणानि-"त्रयो धमस्कन्वा,- यन्जोऽध्ययन दानमिति, प्रथमस्तप एव, द्वितोयो ब्रह्मचार्य्या चार्य्यकुलवासी, ढतोयोऽत्यन्तमामानमाचार्य्यकुलेडवसादयन, सव एवैते पुथयनोका भर्वन्ति, ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमत" (क्ान्दो० उप० २ भध्या० २३ खगड़ • २ मन्त )। "एतमैव प्रव्ाजिनो लोकमिच्कन्त प्रब्रजन्तोति' (हह० उप० ४ पध्या० ४ ब्राम्म० २२ मन्त्र )। "भ्रथो खखाह््, काममय एवाय पुरुष दति, स यथ्राकामो भर्वत, तत्क्रतुभवति, यत्कतु
भापरियिामे नरामय्यवादीपपततेरिति। घग्रित्व कामना तदपरियामी तदनाभे, रुम क रपाभिप्रायेय जरामर्ग्रावार उपपखते।। ६० । न्या-२१
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[२'] न्यायदर्शनम्। [४थं अध्याय।
भवति, तत्कर्म कुरुते यत्कर्म कुरुते, तदभिमम्पद्यत,' (छृद्द• उप० ४ पध्या० ४ व्राह्म० ५ मन्त्र) दति कर्मभि समर्णमुक्षा प्रक्ृतमन्यदुपदिशन्ति, "-इति नुकामयशनोऽथाकामयमानो याऽकामो निष्काम आ्प्तकाम आ्रत्मकाम न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति, अवेव समवनौयन्ते, (द) ब्रह्मैव सन ब्रह्माप्येति" दाति (छृह्० उप० ४ अध्या० ४ ब्राह्म० ६ मन्त्र )। तत्र ग्रदुकम- ऋणा नुबन्धाद पवगाभाव द्त्येतद्युक्क्मिति। ये 'चतार पथयो देवयाना दति च चातुराश्चम्यत्ततेरेका S5श्रम्यानुपपत्ति, फनाथिनसेद ब्राह्मगा,-जरामर्य्य वा एतत् सत् यदग्निहोत दर्शपूर्णमासी च'दति ॥६१॥ कथम १- समागेपगादात्मन्यप्रतिषेध ॥ ६२॥ "प्राजापत्यामिष्टि निरुष्य तस्या साववेदस हुत्वा आ्रत्मन्य मनोन ममाराम्य ब्राह्मण प्रव्रजेत' इति त्रयत, तेन विजानीम प्रजावित्तलाकेषगाभ्या व्युत्ितम्य निव्ृत्त फनार्थित्वे ममारोपण विधीयत दति। एवज्ज ब्राह्मणान "-अथ ह याज्जवल्काा मैवेयोति होवाच याज्ञवल्का, प्रव्रजञिय्यन वा अरे महमसात्स्थानादस्पिरि इन्त तडनया कात्वायन्चाउन्त करवागि' (वन्० उप० ४ अध्या० ५ ब्राह्म०
मनु काम्याना कामनाविरदय त्यागसनवदपि निन्याना कथ त्याग-व्रते -यावजजीवमग्रिडाव नुडयान् इति। तवाइडद्-चपवर्गप्रतिषधा न युक् वग्रानाम सामान समारोपविधानान। त्रथन- प्राज्तापत्यामिाष् निरम्य सस्या
(द) समवनीयन्त-एकीभावन समवसज्यन्त प्रलोनन्त इत्यय दवात भाष्यम्। पतव समवनोयन्े" इत्यपस्तु मृसिद्ठात्तरतापन्या प्रथमापनिवाद पूम खखान्े
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४ध भ्ध्याय ] प्रथमा्किकम्। [२]
१२ मन्ती)। *दत्युक्तानुमासनाऽसि मैतयि एतावदरी खल्व मृतत्वम इति होका याम्तवल्का विजहार" (वृह्० उप० ४ भध्या० ५ ब्राह्म० १५ मम्त्र) ॥ ६२ ॥ पात्रचयान्तानुपपत्तेश्च फलाभाव ॥ ६२ ॥ क ॥ जरामर्य्ये च कर्मस्यविशेषेग कन्पामाने सवस्य पात्र चयान्तानि कर्माणि इति प्रसज्यते, तत्र एषणा व्यत्थान न स्रूयते,-"एतद सम वै तत्पूवे विद्वाम प्रजा न कामयन्ते, कि प्रजया करियाम। येषा नोडयमात्माइय लोक द्ति त इ सा पुत्रैषणायाच्च वित्तेषणायास नाकेषणायाच् व्युत्थायाथ भित्ता
साववत्स हुत्वाउडम्मन्यगीन समानाप्य ब्राह्मग प्रवजन् द्वात पत एव चलार पथमो दवयाना दत पातुरामम्यन्नातराप सङ्गककते । ६२॥ नव्वग्रिह्ावस्याप्राततमन्वकत्वेपि त फलम्वर्ग एवापवगप्रतिबन्धक साटवाड।- जानिन फलस् खगन्य प्रभाव पाग्रहीवाह पावचयान्त पाताखाग्रहानपातायि तषाच्य प्रमोतस्य यञ्रमानसयादरपु विन्धास मुखे छतपूण पुचमति करमेप भिवोन मुपपत्त तन तत्पारत्यागात अ्रगग्रिहोतफम्ाभावडाप ज्योतिष्टमगङ्गा खानारदिह्टिसादिफनाना पातबन्धकत्व खात अ्ती इलन्रसमुखायचकार उप न्यस्त तथा व प्राशथ्ातिरित्कमणा ज्ानादेव चय इत्याभय यूमते हि - तदा विशान पुस्पापे विधय मिरख्चन परम साम्यमुपात (मुं्ड उप देमु १ खगड़ ३ मन्त्र) एवं - चौयन्ते चासय कमार तम्मिन् दृष्टे परावर (मुण् उप रमु रखणड़ ४ मन्तर)। मय्यन - ज्ञानाद्र सवकमायि भग्गम त कुरुत तथा इति (गौता ४ गध्या ३० त्ीष)। इत्यख् कामनागन्यस्य प्रजाऽनुम्पा डपि नापवर्गविरोधी तथा प श्रूयन-वतह् का व तन्दव विदास प्रत न कामयन्ते किं प्रजया करिष्याम येर्षा नोडयमात्सान लोक डात तेहक पुत्रषणायाम वित्तषणायास लोकषण्वात् व्युत्याय भिवाचय्य चवन्ति पति (छृह उप ४ मध्या ४ ब्राम्म २२ मन्त्र) बन्धे तु- "फलामात कमस मुमुचम् प्रति पग्रिसोषाइडली प्रयोनकत्वाभाव तथा सति भिचण्ामाप पावचयान्त स्ात् इत्यथ हत्याड्ु। अत उत्तिसमातम् भविकसूवम् । ६२ ।। क 1
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न्यायदर्शनम। [४थ अ्रध्याय।
चय्य चरन्ति" (बह० उप० ४ अध्या० ४ ब्राह्म० २२ मन्त्र) दति एषगाभ्यस् व्यत्थितस्य पात्रचयान्तानि कर्मापि नोपपद्यन्त पति, नाविशषेष कर्त्तु प्रयोजकफल भवतीति। चातुराश्तम्य
प्रमाणमिति चेत न, प्रमाशेन प्रामास्थाभ्यनुन्नानात्, प्रमागेन
खल्वेत अथर्वाडडद्गिरस एतदितिहासपुराषमभ्यवदन, इतिहास पुगणा पञ्चम वेदाना वेद दति तस्मादयुक्तमेतदग्रामासयमिति। श्रप्रामासे च धर्मशास्तस्य प्रागभृता व्यवहारत्ोपाल्लोकोच्छेद
एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टार प्रवकारख, ते सत्वितिहास पुराणस् धमशास्त्रस्य चेति। विषयव्यवस्थानाच्च यथाविषय प्रामाश्यम खन्धो मन्त्रबाह्मगस्य विषय, अन्ययेतिहासपुराणधर्मशास्ताणा मिति, यज्नो मन्त्रब्राह्मगस्य, लोकवृत्तमितिहासपुराणस्य, लोकव्यवहारव्यवस्थान धर्मशास्त्रस्य विषय, ततैकेन सर्व व्यवस्थाप्यत द्रतति, यथाविषयमेतानि प्रमाणानीन्द्रियादिवदिति। यत् पुनरतत् केशानुबन्धस्याविच्छदादिति,- सुषुप्तस्य खप्नादर्शने केशाभावादपवर्ग ॥ ६३ । यथा सुषुप्तस्य खलु खप्नादशने रागानुबन्ध सुखदु खानु बन्धव विच्किद्यते, तथाऽपवर्गेडपोति। एतच्च ब्रह्मविदा सुक स्याउडतनो रूपमुदाहरन्तोति । ६२ ।
वैमनुबन्ध दूषयति।-खप्रादमनकाले सषुप्तस्य यवा हेत्भावेन दुखाभाव., सथाऽपवर्गेडपि रामाद्यभावैन दुखाभाव खात्।। ५२३
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४र्थ भध्याय ] प्रथमाज्किकम। [२६८]
यदषि प्रवृत्यनुबन्धादिति- न प्रवृत्ति प्रतिसन्धानाय हौनक्रेशस्य ॥ ६ठ ॥ प्रननोगेष रागद्वेषमोहेषु प्रव्ृत्तिन प्रतिसन्धानाय पूव- सन्धिस्तु पूवजन्मनिव्ृत्ती पुनर्जन, तच्चादष्टकारित तम्या प्रहोपाया पूवजन्माभावे जन्मान्तराभावोडप्रतिसन्धानमपवग । *कमवैकव्यप्रसद्ग द्वति चत न कर्मविपाकप्रतिमवेदन- स्याप्रत्याख्यानात पूवजन्मनिव्टत्ती पुनजन्म न भवतीत्यच्यत न तु कमविपाकप्रतिसवेदन प्रत्यास्यायते, सवाशि पृवकमागि धवन्त जन्मनि विपच्यन्त दति ॥६४॥ न क्रेशसन्तते खाभाविकत्वात॥ ६५ ॥ नोपपद्यत क्रेशानुबन्धविच्छेद, कस्मात 9-क्वेशसन्तन साभातरिकत्वात अनादिरिय क्रेशसन्तति, न चानादि गकतरा उच्छेत्तामति ॥ ६५ ॥ परत्र कव्वित् परिहारमाह- प्रागुत्पत्तेरभावानित्यत्ववत् स्वाभाविकेऽप्य- नित्यत्वम ॥ ६६ ॥ यथाऽनादि प्रागुत्यत्तेरभाव उत्पब्नेन भावेन निवच्न, एव साभाविको क्रेशसन्ततिरनित्येति ॥ ६६॥
हर्सनुषक दपवनाभाव दूष्यात ।-सिख्न्नेडनेनेति केशी रागानि साडवाइथ या महा: सा प्रतिसन्ानतन प्रातबन्ाय र भवाव धमाधर्मी न जनयती न्यय ॥ दU । छोआरामावमसरमान महते।-हेमवनतेस केदो न युक, साभाावक् त्वात् । <५ ।
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[२७० ] न्यायदर्शनम्। [४र्थ अ्ध्याय।
अपर श्राह - सा श्यामताऽनित्यत्ववद्दा ।। ६७ ।।
क्रेशमन्ततिरपोति ॥ ६७ ।। सत खन्नु धर्मो नित्यत्वमनित्यत्वन्न तत्त्वभावे (तत्त अभावे) भाक्तमिति अनादिरणश्यामतेति हेत्वभावादयुक्तम अनुत्पत्तिधममनित्यामति नात्र हेतुरस्ताति। अ्रय तु समाधि - न सङ्गल्पनिमित्तत्वाच्च गगादीनाम ।। ६८॥
सङ्न्पभ्या रञ्जनीय कापनोय मोहनोयम्य रागइपमाहा उत्प द्यन्त कम च सच्वानकार्यानवन न निकन रागदेषणोहान निवत्तया नियमदशनात दृशवत ह्वि कश्वित्सत्वनिकायो रागबहल कविदेषवडल कश्विन्मोहबहुल द्वात। इतरेतर निमित्ता च रागदोनासुत्पत्ति सूढो रज्यति, मूढ कुप्यत, रको मुह्यात कुपितो मुद्यति। मवमिध्यामइन्याना तत्त्व ज्वानादनत्यात्त कारगानत्पत्तो च काय्यानुत्यत्तविति रागा
युक्तम, सर्व दम खल्वाध्यात्मिका भावा अनादिना प्रबन्धेन प्रवत्तन्ते शरोराऽडदय न जात्वत्र क्विदनुत्पन्नपूव प्रथमत
पर्मामव्यामताया विनाशवड़ा विभाश H EEEH मानत्वत्व विनाभिभावत्व न चतत मागभावे न वाऽयख्वामताऽडनविमादि तथा व भाष्यम् -बनादिरणश्वामतति हेत्वभावादयुश्रम्। इत्यता मतदनमुपेत्य ससदा वनाह।-नोत युक्तम् कुत-रागाउडदीना सङ्निमि नस्वात् सडष्पो
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४र्थ अध्याय ] [२9१ ]
उत्पद्यते अन्यत् तत्त्वन्ानात। न चैव सत्यनुत्पत्तिधमक किञ्रिद्यधर्मक प्रतिक्वायत दूति, कर्म च सत्वनिकाय निवर्त्तक तत्त्वज्ञानक्वतात मिथ्यासद्गल्पविघातान्न रागाद्यत्पत्ति निमित्त भवति, मुखदु खसवित्तिफलन्तु भवतोति॥ ६८ । इूति वात्स्यायनीये न्यायभाष्ये चतुथाध्यायस्याऽडद्यमाफ्गिकम।
चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयमाङ्गिकम्।
किनु खलु भो यावन्तो विषया, तावत्ु प्रत्येक ज्ञान मुनयन१ अथ क्वचिदुत्यद्यत दति। कश्चात् विशेष १-न तावदकऊत यार्वद्िषयमुत्पद्यत ज्यानामानन्त्यात नापि क्वचितत्यद्यते, यत्र नोत्पद्यते तत्नानिवृत्तो मोह इति मोहशेषप्रसद्ग न चान्यविषयेगा तत्त्वन्ञानेनान्यविषयो मोह शक्य प्रतिषेदुमिति। (ध) मिथ्याज्ञान वे खलु मोह, न तच्च मिथ्यान्जान यत्र विषये प्रवर्त्तमान ससारबीज भर्वात, स विषयस्तत्वतो च्ेय दति। कि पुनस्तन्मिध्यान्ञानम्१ -अ्रनालन्यात्मग्रह, अ्रह्मत्र्योति
मिष्याज्ञान निमित्त येषाम् नथा च तत्ज्ञानेन मिथ्याज्ञानानवत्तौ रागाऽडदिनिदन यज्यत एवति भाव ॥ ६८।
समाप्त चतुर्थाध्यायस् प्रथममान्रिकम् ॥ १ ॥
(ध) सिद्ान्तो बदति।
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[२०२ ] न्यायदर्शनम । [४थं त्रध्याय।
मोहोडहद्दार दति अनात्मान खल्वहमस्रोति पश्यता दष्टिर हद़वार दरति। कि पुनस्तदर्थजात यद्िषयोऽइड्ार १-शरीर- न्दिरियमनोवेदनाबुद्दय अर्थजातम। कथ तद्विषयोडहदार समार बाज भर्वात १-अय खलु मरोराद्यथजातमहमस्रीति व्यव
पुन पुनस्तदुपादत्ते तदुपाददानो जन्ममरणाय यतते तना विदोगान्नात्यन्त दुखाद्विमुच्यत इति। यस्तु दुख दुखाड्डयतन दु खानुषत सुखच्न सवमिद द खमिति पश्यात स टरह परि जानाति पारभ्नातञ्ज टुख प्रहोष भवत्यनुपादानात स वषान्न वत एव दाषान कम च दुखहतुरिति पश्यति, न चाप्रहोगापु दोषेषु द गप्रबन्धाच्कदेन शक्य भवितुमिति दाषान जहात, महोगेष च दोषेषु न प्रव्ृात्त प्रातमन्धानायेत्युत्तम, प्रत्वभाव फलदु खानि च नेयानि व्यवस्थापयति कर्म च दोषाश्च प्रहेयान, अपवर्गाधिगन्तव्य तस्याधिगमोपायस्तत्वन्ञानम एव चत सभिावधाभि प्रमेय विभक्तमासेवमानस्याभ्यस्यता भावयत सम्यग्दशन यथाभूतावबोधस्तत्त्वज्ञानसुत्पद्यत, एवस- दोषनिमित्ताना तत्त्वज्ञानादहद्कारनिर्वात्त ।१। शरा्गदि द खान्त प्रमय दोषनिमित्त, तद्विषयत्वान्मिय्या ज्वानस्य, तदिद तत्त्वज्ञान तद्विषयसुत्पन्महद्दार निवत्तयत,
सय भास्तस परम प्रनाजममपवर्ग स चाइष लाचत परोचिताऽप्य किस्रित्कर कारणानउपणात् मन्वाभद्ितमव ट खाडड दमूबे-कारयनाशकमेव दुखाभावाऽपयम इति इति चक्सत्य मिथ्याज्ञानापगमहतुनामहित तत्वञ्ञान तव इतुररिति चत् १कख तत्व ज्ातव्यामत्यभिधानीयमित्वाशयेम तत्त्वन्ानपरोचा सब चाडडाफकाय। तम्र प षट मकरमान-भानी तत्ज्ञानान्यात्तपकरथम्,
नरोरा उदिविषनकी मिष्बान्ञानमुच्यते, तब दीषनिमित्ताना भरोराइडदोम, तल्स
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४र्थं अध्याय ] [२७३ ]
समानविषये तयोविरोधात्, एव तत्त्वभ्ानाहु खजन्मप्रवृत्त
स चाय शास्त्रार्थसङ्गहोऽनुद्यत नापूर्वी विधीयत इति ॥ १ ॥
ोषनिमित्त रुपादयो विषया सङ्खल्यक्वता ॥२॥ कामविषया इन्द्रियार्था इति रूपादय उच्चन्ते ते मिथ्या सङ्ग्पामाना गगद्ेषमोद्दान प्रवर्त्तयन्ति, तान पूर्व प्रसनच्ीत ताथ् प्रसवनक्षागास्य रूपाऽडदिविषयो मिथ्यासङ्गल्पो निवत्तन तव्िव्वत्तावध्यात्म शरोराऽडदि प्रमननच्तीत तग्रसहरनादध्यात्म विषयाऽहद्वारो निवर्त्तत सोडयमध्यात्म वहिस् विविक्रचित्तो विहरन मुत्ता इत्युच्त ।२॥ अत पर काचित सन्ा हैया, काचिद्ावथितव्येत्युपदिश्यते, नार्थनिराकरणमर्थोपादान वा, कथमिति १- तव्निमित्तन्त्ववयव्यभिमान॥३॥ तेषा दोषाणा निमित्तन्त्ववयव्यभिमान, सा च खलु स्तोमन्ता सपरिष्कारा पुरुषस्व, पुरुषसन्ता च स्त्रिया, परि ष्कारस निमित्तसज्ञा अनुव्यस्जनसन्जा च। निमित्तसन्ा-
मनात्मवम्य म्ञानात्रिवततते सात्मल्वन हि गरोराऽडदा सुझन् रभ्ननोयत्वात् रन्यात
निशन्वान्वत्वञ्ञानात् चहद्वारम्याभलावस्य निर्दात्तरित्यय इत्याडुम१॥ मनु के तावननुरख्नोया विषया येषु रज्यन् ससरति इत्यती विवेकाय तानूप दिशत।-सहल्प एेमोचोनलेन भावन तदिपयोक्कता कृपाऽडत्य दोषस्य रामाडदे निमित्तम् सृन्दरीयमिति जानन् रज्यति शसुत्यमिति बेटि ते रपाउडदय हेयतवेन भावनीया प्रथम तत मरोराऽडमविवक । २ ॥ नयु सौन्दर्थ्याडदिक पश्वती रामाऽडदिवमथडपि दुथयरिहर तदुझं-"चडसं हिमन छाथ प्रमाधि बलवह्टम् इत्यती रागाऽदिनितत्युपार्य दभायष्यत्रार।-
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[२७४ ] न्यायदर्शंनम्। [४्थ भध्याय।
रसनाश्ररोत दन्तोष्ठ चत्तुर्नासिकम। अ्रमुव्यन्न्रनसज्षा-इत्य दन्ता इतथमोष्ठाविति। सेय सच्जा काम वद्यत तदनुपक्ञाब दोषान विवजनोयान, वर्जनन्तस्था, भेदेनावयवसन्ना, केश
ुभसननलाचच्त तामस्य भावयत कामराग प्रहीयत मत्ये च द्विविधे विषये काचित मन्जा भावनीया काचित परिवर्ज नौयत्युपदिश्यत यथा विषसम्पृक्तडबेऽबसन्नोपादानाय विषसन्जा प्रहागायेति ॥३॥
विद्याऽविद्याद्वैविध्यात् सशय ॥४॥ सदसतोरुपलव्भाद्विद्या द्विविधा, सदसतोरनुपलव्वाद विद्याऽपि द्विविधा उपलभ्यमानऽ्वयविनि विद्याद्वेविध्यात्
अशयवान तृरुा शगेर बभिमान परिष्कारबाद्ध सम्रामत रागाSडादनिमित्तम् तथा प सा बादधर्हेया। अत एव भाष्या। पारष्कारसुद्िरतुरञ्जनसन्रा सा हया दोष अनमशुभसजा सा भावनोयेति। अनुरअ्वनसत्वा यथा - खलत् खच्चननयमा परिणतविम्बाधरा पृथमराणी। कमलमुकुलस्नीय पूर्वेन्टसुखी सुखाय मे सविता॥ इति। पग्नमसत्ञा यथा - चमानामतपावोय मासासरकपूय पूरिता। धथ्या रज्यति यी मृत पिभाच कसतीडाघक १। म्वनरौराऽडदो सव्यशरभमश्नय भावनीया एवं कापनायप समसना। मां डए्टसी दुरावार दष्टो निहठव्चष्टित। कगठरोठ कुठारण कित्वाऽस्य सा सुखौ कदा १ अगभसत्ञा तु- मासासक्योकसमयो देह कि मेपराध्यति। एतमदपर कर्ता कत्तनीय कर्थ मया ॥ पति ॥ २ ॥
चत्र प्रससद्वयविप्रकरणम् वस्तुतस्तु शरौरे धमदयस सम्बन्वपि एर्क स्येयमपर सयमिात नियुत्िकम् पताऽवयवी नासि बिन्ु परमायपुत्त दवात मख्व तदेब तन्मसुसमिभावनोयम् पतमाणपुञ्ज हत्यप्यापातत परमाधारप्यग्रे निशकारय्यमायत्वाद्ित स्ौमतनद्ामपाकसतुमयमारन्। वद्यपि दितोया थाये
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४ वं भ्रध्याय ] [२०५ ]
संभय, अनुपनभ्यमाने चाविद्याद्ेविध्यात् सय, सोडयम वयवी यद्यपन्भ्यत, अथापि नोपलभ्यते, न कथसन सभ यात् सुच्यत इति ॥ ४ ॥ तदसशय पूर्वहेतुप्रसिद्त्वात्॥ ५ ॥ तस्मिन्ननुपपत्र सशय कस्मात् १-पूर्वोत्ता हेतूनाम प्रतिषेधान अस्ति द्रव्यान्तराऽडरश दरति॥ ५ ॥ वृत्त्यनुपपत्तेरपि तहिं सशयानुपपत्ति ॥६।। वृत्यनुपपत्तेरपि तहि सथयानुपपत्तिनास्ति प्रवयवोति H4M ता्विभजते-
पकेकोडवयवो न तावत् कत्सेडवयविनि वत्तते, तयो परिमाणभदादवयवान्तर सम्बन्धाभावप्रसङ्गाच्च। नाम्यवयव्येक देगेन न ह्यस्यान्येऽवयवा एकदेशभूता सन्तौति ।।७।। व्यवस्थापित एवावनवो तथापि व्वयुातादाक्यन सौवान्तकस्य वभाषिकस्य चाव प्रत्यवस्थानमिति तव सभयप्रतभनाथ सूवम्।-सभय इत्यस्य ववनविनीत्याि सवयावन प्रत्यचासडत्वात तत्पलापी दुशक्य इत्यत उत्त वि्द्यत।-प्रमामममदन जानशवध्यात् ज्ञानतववसपसाधारपधमभवात् ज्ञाने म्रामारसभयाद्वयविनि सभय दत्यय ॥:॥ पूवहतुप्रसिद्धत्वात द्ितोघाष्यायात्र युत्िाभरक्यावन प्रकर्षेश्िउत्ात् । X । सव्याान बाघक् पहुत।- आपरवधारये त्ि सभयानुपपतिक्यनुष पत्तितोऽतयव्यभावादव सादन्यथ। वत्यनुपपततिविद्णीति भाष्यकार -शरसक दशवात्तत्वादवयवानामवयत्यभाव। मवयवी दि एककावयव कार खेनएकदशन वा7-नाइय्र विष्रमपारमाण्लात् धनमेपि मवावयवनान्यम वा -माSय्य खत्मिन् वत्तिवराधात् नान्य सवयवान्रसावयवान्तराउत्त। तथाहाप कथमवद्यव्य भाव उत्यच भाष्यम्-तपु चाहत्े रवयव्यलाव देषु ववयवेषु पूर्वाक्युत्या बभावा वययी नास, न ससावर्शततसव मपनत इति भाद। सपमेवे्निव्याप वदान्त ॥द्।
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[204 ] न्यायदर्भनम्। [४थं प्रध्याय।
तेष चाहत्तेग्वयव्यभाव ।। ८ ।I न तावत प्रत्यवयव वर्तत, तयी परिमागमिदात द्रव्यस्य चैकद्रव्यत्वप्रमङ्गात। नाप्येकदेशेन सवष अ्रन्यावयवाभावात् तदव युक्न मशयो नास्त्यवयवोत॥८ । पृथकचावयवैभ्योऽवृत्ते॥६।। पृथक चावयवैभ्य, धर्भिभ्यो धमस्याग्रह्ृगादिति समा नम 1 2 | न चावयव्यवयवा॥ १० ।
रप्रथ् ॥११ ॥ कि प्रत्यवयव कवत्स्त्रोऽवयवो वर्ततते 9-अथैकदेशैन १ इति नोपपद्यते प्रश्न, कस्मात् 9-एकस्मिन् मेदाभावान्वेदशब्द
नन्वाकामहतचिरेवावययी इति प्रङाया पूवपसिसृचम्।-पवयवैभ्य पृथक अवयवी मासतौति शेष। तेषु चातृत्तेरियस मूत्रत्वे अययत्यभाव दत्यनुवत्तते; कुत १-मइसे वृत्यमावइवयविनी नित्यत्वप्रसद्र न घ नित्यावयव्यपल्यने तती माम्न्यवावयवोति भाव यहा कत्सकदेशाभ्यामवयवी न वत्रते किन्ु खरपेषवति मड़ाया पूवपचिय सूत पृथागति।-सवयवेभ्य पृथगवयवी नाकि कुत १-न्रस्ते सहततित्वपसङ्ूत् तथा सति नित्य सारदिति भाव। कित्त -"अवय वातिरििक्र्ी वय यो वत्ततामित्यव पूवर्पाच्तण सूब परथगिवि।-पूर्वीकायुक्ावयवैम्य पृथगप्यवत्त ।। नन्ववयवावयमिमासादाक्षामेव सम्बन्ध व्वाट्वाह-न हि तन्तु पट सभी रसमिति कशितत्यति न बाइमदेवाइडधाराउडधेयभाव उपपद्राते । १ ॥ िद्ानस्वम्।- सवयवी कारसेडन एकद्रभय वा बत्रत इति मत्री न
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8वं भध्ाय ] [२०० ]
पयोगानुपपत्ते। छत्खमित्यने कस्याशेषाभिधानम, एकदेश इ्रतति नानात्वे कस्यचिदमिधानम ताविमी छत्खेकदेशशब्दो भेद विषयों नेकस्प्िव्वर्यवन्युपपद्येते मदाभावादिति। ११। अन्यावयवाभावाचैकदेशन वत्त दत्यहेतु - अवयवान्तरभावेऽप्य हत्तेर हेु ।।१२।। सवयवान्तराभावादिति। यद्यप्ये कदेशोऽवयवान्तरभूत स्थात् तथाऽप्यवयवेडवयवान्तर वत्तत नावयवोति, अन्यावयव भावेऽप्यवत्तरवयवनो नेकदेशेन वृत्तिरन्यावयवाभावादित्य हेतु। वृत्ति कथमात चेत १-एकस्थानकत SSऋ्रयाSश्चित मम्बन्धलत्ग प्राप्ति। आश्नवाडश्रितभाव करथमतति चेत् - यस्य यतोऽन्यत्नाउडत्मलाभनुपपाति स आश्रय, न कारण द्रव्येभ्याऽन्यत काय्यद्व्यमात्मान लभते विपय्ययस्तु कारग द्रव्याष्वति। नित्येषु क्रथमिति चेत् -अनित्येषु दशनात् सिडम। नित्यवु द्रव्यषु कथमात्त्रयाSडश्रायभाव इतीात चेत् :- अनित्येषु द्रव्यगुगोषु दर्शनादाञ्रयाS्नितभावस्य नित्येषु मिदिरिति। तस्मादवयव्यभिमान प्रातषिध्यत निश्चेयस- कामस्य, नावयवो, यथा रपाSड्ादषु मिथ्यासडल्प न रूपाइडटय इति ॥ १२॥
शेप्रता कि वात्ा समुदायिना किश्वित्वमेकदैशत न चकस्य तम्मभ्रव इति
दवय वत्तिविकष्यो न युक्र इत्याह।-पवयवी सावयवेतु मकइजैन वस्ते सवयवान्तराभावादति य परषा हतु सन युक् कुत १-सवशवान्तरभावडप्य सवयवान्तरसस्वमि तखव पर बत्तिरायाति न तयवयवभाडपोति यक - भवृत्तवसमाभावस्य अत्यकदेभनिकसी न हेट वुत -सवयवाम्रस्य सवयवि भिद्रस्य सवनवस्य आवेपि सख्डाप सम्वात् घटत्वादियत खरपेषवावय्बिनी हसे सत्रतात इत्ते कत्तका देशावतरालयमा घटलाइड़दी व्यममिचाय्यम्ररोजकसात भाव ।१२। न्या-२४
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[२७८] न्यायदशनम । [ ४च सध्याय।
केमसरूरे तेमिरिकोपलब्धिवत् तटुपलन्धि॥१३॥ यथेकैक केशस्तेमिशकिण नोपन््यत कथममूहस्तप ववम्यते तथेके कोडयामोपलम्यत प्रशुमक्चयस्तपलभ्यत, तादद मणुममूडविषयं गहणासात॥ १३॥ सविषयानतिक्रमेगेन्ट्रियस्य पटुमम्दभावाद्- विषयग्रहगास्य तथाभावो नाविषये प्रवत्ति ॥१४।।
मन्दभावी भर्वात चन्षु खन्न प्रत्वष्यमाग नाविषय गन्ध ससाति निक्वव्यमागञ्ज 1 सावषयात् प्रचवत सोडय तैमि एवक कायच्सुवषय केश न रक्ाति, काखत गह्ाति कशममूडम उमय ह्यतमिरकय चन्तुषा ग्ह्यत परमाणव स्वतोन्द्रया द्ान्द्रयाविषयोभूता न कनाचादान्द्रयण गद्यन्ते ममुदतास्तु स्टह्न्त इत्यावषय प्रवात्तारान्द्रयम्य प्रमज्येत न जात्वयान्तरमगभ्या मटह्यत इात, त खल्विम परमागव सहहिता (न) गह्यमागा अतन्द्रियत जहात वियुत्ताखा मह्यमाण्ा न अतोन्द्रयख् जहति इतति सऽय दरव्यान्तरानु त्यत्तावतिमहान व्याघात इत्यपपद्मते द्रव्यान्तर, यत् ग्रहणस
तदसथय पूवहतुपासडत्वातए पूथयनेन सवागरदणमवयव्यासख दवात पूर्वोक्त यात् आरता पूवप्रची ता दूषयित्सुपक्रमत।-यथा तमिरकस तिमितयस्वसुषो नैंक कथ प्रत्यय कन्दु तत्समूर , एवमक परमापुरप्रत्यद तव्समूहकपा घटादि प्रत्यव सात् ॥ १९ ॥ उत्तरनति।-हन्द्रियार्थां पाटवे विषययहपस पाटव मकष्न इन्टियाथां मान्य तहुद््बस मान्ामपकष न तु पटुतन चसु शन्द गक्षात तदिदसुत-
*) चव "सन्विता दत्यपि पाठ।
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8य भध्याय ] [२७2]
विषय इति। सचयमात् विषय इति वेत् न, सक्षयम्य मयोगभावात, तस्य चातोन्द्रियस्याग्रउ्ण्पादयुतताम, मक्षुय खल्वने कस्म सयोग, म च ग्द्मागाS5व्चयो ्टद्यते, नातोन्ट्रिया SSश्य, सर्वात होदमनेन सयुक्मिति तत्मादयुल्तमेतदिात। म्टदमाखम्य चन्द्रियेग् निषयस्याऽडवरगाद्यनुपनाब्धकारगमुप
य खच्चवयविनोऽवयवेषु व्तिप्रतिषेधादभाव सोडयम वयवस्यावयवेष प्रमज्यमान सवप्रन्याय वा कल्पात ? निर वयवाड्ा परमाणतो निवत्तत उभयथा चोपनाब्धविषयस्या भाव नदभावाद्पलव्धाभाव उपलव्धाश्रयश्ाय वत्ति प्रतिषेध म पाश्चय व्याघ्रस्नाऽडत्मद्याताय कल्पात इति ॥ १५॥ प्थापि - न प्रलयोऽगासद्ावात ॥। १६ । अवयवविभागमास्तत्य वत्तिप्रातषेधादभाव प्रसज्यमानो निरवयवात् परमाशोनवर्त्तते, न सवप्रलयाय कन्पाते, निर वयवत्वन्तु खलु परमाशोर्विभागैरल्पतरप्रसङ्गव, यतो नाल्पीय
- सविषयानतिकरमेष दवात। फलितायमाह नावषये प्रहत्ति रति।-तथा च साविषय परमाथ समूहत्वाउSपव्रमाप कथ चनुष्टह्ौघात्१ दात भाव ।१४ ॥
च मसत या प्रसयान् म्रसयनेडभाष तथा प सनाभाष एव सात न करशापि गहषमिति साधक -"सर्वागररगमवय्रव्यमिद्धे रति॥१४। वख्तु सनाभाब इत्यवाSSइ ।- माश्रय मामाद्यभावम परमायोनायाभावेन वतभनात्, यश,-नव्ववत् त्रयविप्रवाइमवर प्रखयपथ्यन्त सौक्ाथ्य, प्रसनेय
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[२८०] न्यायदर्शनम । [४थं भ्रध्याय।
स्तवावस्थानात लोष्टस्य खल प्रतिभन्यमानावयवस्वाल्पतर मल्यतममुत्तरमुत्तर भवति, स चायमत्यतरप्रमङ्ग यस्ान्नाल्प तरमास्ति, य परमोऽल्पस्तत निवर्न्तते यतख् नाल्योयाडस्ति, त परमाग प्रचस्षमह इति ॥१६॥ पर वा चुटे ॥१७॥ ब्रुटि निव्टात्तशिति । १०। अथेदानीमानुपलाभ्क सर्व नास्तीति मन्यमान ब्राह- आकाशव्यतिभेदात् तदनुपपत्ति ॥१८॥ तस्याणोर्नरवयवस्यानुषपात्त, कम्मात 9-आकाशत्यति भेदात। अन्तर्विसापराकाशन ममाविष्टो व्यतिाभन्र, व्यततभदात् मावयव, सावयवत्वादनित्य इति ॥ १८॥ आकाशासर्वगतत्व वा ॥ १६॥ अथैतब्रेष्यत, परमाशोरन्तनास्याकाशमित्यरुवमतत्व प्रस ज्यत इति ॥१ ॥
निखलपृथव्यादनाभान पुन सर्गा न सानियिाभनन शवत- भयवात। समावत्त नेति।-न मकलवाथव्यादनाश परमायामन्नाकान््न्यथ।। १६। परमाखुरव क इन्यवाऽह।-वजे पर यदातमूक्ष तत्वरमाया। वाशब्दाडव धारण चथवा- टावयवस वगवा वा पत्माकारति बिकल्वार्थोवाशबद यक्ा- घुटे पर सूचय परमाणु व्गवव वा विप्राम वात विकल्याझाममत 1१७। समाप्रमवद्रवाबय विप्रकरयम्। सय वितस्य सूच्तात् क्व परमाएसभाबना? इति मतनिस करचाय निरक्यवप्रक रयम् तम पूवपचन्तम्।-तस निरवयवस्थाय्ा अनुपपतरि कुत -चाकान व्यतिमदात मन्नवडिय्ाउडय्राशसमातभात तथा व साकयव ततयानित्य इति म१८
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४र्घ अध्याय ] [२६१ ]
भन्तर्वहिश्च काय्यद्रव्यस् कारगान्तरवचनाद- कार्य्ये तदभाव ॥२० ॥ अन्तविति पिहत कारणान्तरे कारणमुच्यते, वहनिर्गिति च व्यवधायकमव्यर्वहहित कारगमेवाच्यत, तदेतत्कार्यद्रवसस्य मअरवति नागो अकाय्यत्वात् अकाय्य हि परमागावन्तर्वाह रित्यस्याभाव। यत्र वास्यभातर,-पगाकाय्य तत् न परमाग यतो हि नान्पतरमस्ति म परमाणुर्गिति ॥ २०॥ श ब्दमयागविभवाच्च सर्वगतम ।। २१॥ यत क्वाचढत्पन्ना शब्दा विभवन्तयाकाशे, नदाश्रया भर्वान्त मनाभ परमागभिस्तत्काय्यय सयोगा विभवन्तयाक्काश
मरतामात। २१॥ अव्यूहाविष्टम्विभुत्वानि चाऽडकाशधर्मा ॥ २२॥ सयतप्रतिघातिना दरव्यण न व्यह्यते, यथा काछ्ठेनोदकम कस्मात् १-न्रिवयवत्वात्। सपच् प्रतिघाति द्रव्य न वष्ट भाति, नास्य क्रियाहत् गुप प्रतिबधाति, कस्मात् १-प्रस्पश- त्वात्, विपर्य्यये हि विष्टमा दृष्ट दूति, स भवान स्पर्शवति
समाघत् ।-पत प्रब्ो वाह शब्दष न माकाय्यडचयवसब्षव इत्यय। वद्िगात हष्टान्ताथ्रम् ।। २०।। पकापसासवमतत्व स्ादत्यवाSह।-भ्रम्दस्य सशोमस्य वयो विभव सथवा - गष्दजनकामिधातवनोगस्य यो विभव साबाबकतव सव्मात पुन मवगनम भकाशामदि शष सवदग अाञतत्पच्या तञ्नकस रेगानुमानात सवमूत्तसयागन्व रपसवगतत्व तस्य ससिड्डम् । २ १ । बाकाजस् सवसनामित्व व्यहनविटओ्री सवताम् चत वाह।-व्यह प्रातह्नम् एसरतन, विट्न उत्तरद्शगतिप्रविवन्त, भाकाशे वयोरभाव विशन्नत्वात् विभुत्व
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[₹८२ ] न्यायदशनम । [४र्थ अ्रध्याय।
द्रव्ये दृष्ट धर्म वियरोत नाऽडशद्धितुमहति, श्ववयवस्यागा तरत्वप्रसङ्गादगकाय्यप्रातषेध, सावयवत्वे चागोरखवयवा डगुतर इति प्रसज्यत, कम्मात १-कार्यकारगद्रव्ययो परि मागमेदतर्शनात, तस्मादगववयवस्यागतरत्वम। यस्तु माव्यव अगुकार्य्य तदिति तस्मादणुकार्यमिट प्रतिषिध्यत इति। कारगविभागाज्ज काय्यस्यानित्यत्, नाSSकाशव्यातभेदात, लाष्टस्यावयवावभागादनितत्व नाऽडकाणसमावेशादिति ।२२।। पर्त्तिमताञ् सस्थानोपपत्तेग्वयवसड्ाव ॥२३॥ पाराच्न्नानाड स्पशवता मस्थान त्िकोग चतुरसर मम परिमएडलमित्युपपद्यत, यत तत्सथान सोदकयवमात््रवेश परिमसडन्ाख्ागव तस्मात् मावयवा इति ॥२३॥ सयोगोपपत्तेश्च ॥ २४॥ मध्ये मन्र्ग पूवापराभ्यामगुभ्या सयुकस्तयोर्वर्यवधान कुरूत व्यवधाननानुमायत-पूवभारेण पूवेगागुना रुयुज्यते परभागनापरणागना मयुज्यते इति यो तो पूगापे भागो तावस्यावयनो एव सवत सयुज्यमानस्य मवतीभागा त्वयवा इति। यत्तावन्मत्तमता सस्थानोपपत्तरवयवसङ्गाव इति, प्रत्ना क्रम किमुनाम 9-विभागाल्पतरप्रमङ्गखव, यतो नाल्ीयस्तत समगतत्वम् वधन मूत्र सून्यमा्वादिभत न सत्रच्कृत भाकाशादकरनम्यपममात तथाडाप त्वम्त द्वात पूशयत्वा व्यास्घेद ।। २२॥ पूवपथा युत्धन्नरमाशङृत।- परमाणाशित गय। इतुमाह -सम्यानापपर सस्यामवस्वात परमार्याष् परिमखलाउडकार। सस्थानवत्त्व मान भख्जजा वदतति मूर्तमतमति।-मृतत्वात् सस्थामवत् नव्यथ। व पूर्वातहम ससुाच्चम ति मूततत्वम्य हतृत्समुचचयाथी वा चकार ०२२॥ युनयन्तरमाह।- सवयवसद्वाब इत्यनुव्तत। स्यामवत्वादिति इत्य, सयोग वर्ात् कध सावयवत्वम् दति चत्, दूत्य सदागस्ाव्याव्यर्तात्तत्वात, भव्याम्यउत्तिलखा
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४थं भ्रध्याय 1 द्ितीयान्किकम। [२८३]
निवृसेरमवयवस्य चालुतरत्प्रसङ्गादणकार्य्यप्रतिषेध इति।
चाव्यास्या भागभाति, उत्ज्ञात्-सपशवानग, स्पर्शवतोरगी प्रतिघाताद्ववधायक न सावयवत्वात, किन्तु स्पशवत्वात्, स्पशवत्वाच्च व्यवधान सत्यगुसयोगा नाऽडन्रय व्याप्रोतोत भागमक्िर्भवति, भागवानिवायमति उत्तख्वान-वभागेडल्प तरप्रसङ्गस्व यता ना्पोउस्तवावस्थानात तदवयवस्य
मूत्तिमताञ्ज सस्थानोपपत्ते सयोगोपपत्तव परमागना मावयवत्वामति हेत्वो -
यावन्भात्तमत यावच्च सयुज्यत तत्सव सावयवमित्यनवस्था कारिणवमी हेतू सा चानवस्था नापपद्यत, सत्यामवस्थाया सत्यो हेतू स्याताम तस्मातप्रतिषैधाऽयनिरवयवत्वस्येति। विभागश् भज्यमानहानर्नोपपद्यत, तस्मात प्रनयान्तता नाप पद्यत द्ति, अनवस्थायाञ्ज प्रत्यधिकरण द्रव्यावयवानामान न्त्यात परिमागमेदाना गुरुत्वस्य चाग्रहगम, समानपारमाणत्व चावयवावर्यावनी परमागवयववभागाटूड्डामति ॥ २ ५ ॥ वच्छदकमद िना नापपदत अवचदकस्यवयव इति। नतु परमासवयवऽप्यय दाष सत तथा ानवास्थतपरम्पराप्रसद्ग द्वात चेत् त्यन वाह परमागव्यसन, खोकुरु शूधताबाद निरवयव का गाडडान कुमाप नालात भाव।।२४॥
भनवस्थाकारत्वात। प्रमाधिकावमनवस्था स्वादत वाह अनवस्थानुपपत्तथात।- सवषामनवास्थताव्यवत्व मेरुसषपया स्ुत्यपार माणत्ाउ्डपास् प्रत्यक्ष ततयागावक्करे दकादिग्वभागा न वा शून्तायुक्ता निष्यम सत्वात् प्रमायसत्व यून्यत्वविराधात् निष्युमाणक यून्यताऽभ्युपगम किमपराड पूवतया ? दातदिक । २५।।
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[२=४ ] न्वायदशनम । [४र्थ प्ध्याय।
यात्द भवाम बुद्धोराश्वित्य बुद्धिविषया सन्सोति मन्यते, मिथ्यावुद्दय छता, यदि ि तत्त्ववुड््य स्यु बुद्धा विवेचनें क्रियमाणे याधात्म्य बुद्धिबिषयाणामुपन्भ्येत, बुद्या विवेचनात्तु भावाना याथात्म्यानुप-
लब्धि ॥ २६॥ यथाऽय तन्तुश्य तन्तुरिति प्रत्येक तन्तुषु विविच्चमानषु नाथान्तर किच्चिदपलभ्यत यत्पटवुडरविषय म्यात याथात्मय नुपलब्धे अमनि विषय पटबुाद्भवतोति मिष्याबुाड्भरवति, एव सवतति ॥ २द॥ व्याहतत्वादरेतु ॥२७॥ यद वुद्दम वविवचन भावाना, न सवभावाना याथातानु पननब्धि अ्रथ सर्वभावाना याथात्यानुपनब्धि, न बुद्रा विवे चन भावानाम, बुद्धा विवेचन याथात्मनुपनब्धिश्नतत व्याह न्यत, तदुशम - अवयवावर्यविद्रमङ्गसैवमाप्रा ्वयांत त तति२ । मनु वाह्याशम वात् कुताइननवावयव्भ्यवस्थाति मतम्पाक वाह्यायमत्र निराकरणमारभत। प्रमनत् ज्ञानत्वय्याप्य न बात समय तव पूवपचसूबम।-तु प्रकरणवक्कनय भावाना बुद्धा विवचनातदाबखात याथा म्यस ज्ञानमत लवपस अनुपलाखरनुपपात घ शात म्वान मन जातामात हामुभूयत तब छग दत व्ानामत्यनेन घानघट सरमद अलिख्यत तता न ज्ञानातिरिकी विषय यधा पढ वाविचमाने तन्तनामेवापनषणादावातारक न वम्तु एव तनुराप नाशुव्यविारत इत घटतार्डा स्ु आमसवाड,कारविभष दस भाव म २ह्। समापन।-उस्ा रतुन युक् व्याहतलात् न हि सुधा िबचने पटस्य तन्तुरूपता सिष्यति तनुत पट उतिह्प्रतोयत मतुतन्तु पट पात एव पटन प्रावरख न तुतनाभ किस, तनुनटविवेयनादय वात्तायसिाद् बानेन तु खाखन् पटाभेदो शोशिकने, साविषन जलान, पदुव्यपसायेग सु पटावषय कत्व न्यवसायी ससासग्लने।२०
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४ध भध्याय ] [२८५ ]
तदाश्रयत्वादपृथगगुहगाम ।२८॥ कार्य्यद्रव्य कारणद्रव्याSडश्ित, तत् कारणेभ्य पृथडनोप स्नभ्यत विपर्य्यये पृथमगद्गात्, यत्राSSन्नरयाSSन्नतभावी नास्ति तव पृथमहणमिति, बुद्धा विवेचनात्तु भावाना पृ। माहगम तोन्ट्रिय ष्वगष, यदिन्द्रियेग ग्टह्यत, तदतया बुद्दा।
प्रमागतश्चार्थप्रतिनत्ते ॥२६॥ बुद्या विवचनाङ्वावाना याथात्मयोपनन्धि। यदस्ति यथा च तत मर्व प्रमागत उपलब्धा सिध्यति या च प्रमाणत उपनब्धि तत् बुद्या विवेचन भावानाम्, तेन सव शास्तागि सर्वकर्मागि सवे च शरारिणा व्यवहारा व्याप्ता। परोन्तमाणो हि बुद्धाऽध्यवस्यात इदमस्तीद नास्तोनि, तत्र न सर्वभावानुपपात्त । २८। प्रमागोपपत्यनुपपत्तिभ्याम् ॥ ३०॥ एवच् सति सव नास्तीति नोपपद्यते, कस्मात १-प्रमाशो पपत्यनुपपात्तिभ्याम् यदि सर्व नास्तोति प्रमायामुपपद्मत, मनु तन्तुपट्यारभेंन पाथकन ग्रशम स्वदत्यवाइ।-परण्व्गरहण याद तन्व विषयकप्रत्यचविषयत् पटस्या्डनाद्यत। तनोततर् तनरत्वादित।-पटा । तन्वाश्रित तन सामयोसत्वात्यटप्रत्यचस तन्तावषयकत्व याद च भेदप्रत्यय चापाद्त तदा भवत्येवति भाव । २८ नयु ज्ञानस्योभयवादिसिसत्वात तन्नावपदाथकल्पने लाघबात सदतिरिक्रपतार्था भावसिद्ि स्यादित्यत वाड।- पूर्वाकहेतु समुच्चिनीात चकार बथस घटाद् प्रतिपसें प्रमाषाधीनत्वात् तथा प प्रामामतकडचें गौरवं न बाघकनिात भाव
सेष। वाहां नालोत्यत यदि प्रमायमकि तदा ममाबस वाझ्स सखात् वाक्षा
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[=] न्ायदर्शनम्। [४ ध प्रध्याय।
सर्व नास्तोत्येतद्याहय्यते, श्रथ प्रमाग नोपपद्यते सव, नास्तोत्यस् कथ सिधि १-अथ प्रमाणमन्तरैग मिद्धि, मत्र मस्तोत्यस्य कर्थ न सिद्धि १॥३०॥ खन्नविषयाभिमानवद्य प्रमागप्रमेयाभिमान ।।३१।। यथा खप्रे न विषया सन्ति अथ चाभिमाना भवति एव न प्रमाणानि प्रमयागि च सन्ति अथ च प्रमागप्रमयाभि मानो भर्वा ॥ ३१ ॥
हेत्वभावादसिद्धि ॥३३ ॥ स्वप्रान्ते विषयाभिमानवत प्रमाणप्रमयाभिमान न पुन जागरितान्ते विषयोपलब्धिवत, इत्यत हेतुर्नास्ति हत्वभावाढ सिद्धि स्वप्नान्ते चासन्तो विषया उपनभ्यन्त इत्यवापि हत्वभाव प्रतिबोधेनुपनव्ादिति चेत प्रतिबोधविषयोप नवादप्रतिषैध। यदि प्रतिबोधेऽनुपलभ्भात खप्रे विषया न सन्तोति तार्ड दमे प्रतिबुद्देन विषया उपनभ्यन्ते, उपनभ्भात सन्तोति, विपर्य्यये हि हेतुसामर्थ्यम उपनभ्भाभावे सत्यनुप नश्भादभाव सिध्यति, उभयथा त्भावे नानुपनस्स्य सामथ्य
- भरव सथ मास तन निष्यमाखकलाव्र तन्सिाद्वारत्यय किश्व घटाऽडदो यदि प्रमायमस्ति तगा तत एव वाह्यायासाड सथाप्रमाम सदा कय घट इति स्ानसव घटाइड कारख मन्बसे ? ज्ञानसवायुत्यस्तारति ॥ २ ॥ ममु प्रमामप्रमेयव्यवहारी न पारमाथतक परन्ु विज्ञाणानि तव्तदाकाराति
ममाधते।-वाश्ाभावक्ासाह हत्भावात् प्रमाधाभावात् चचबा -देती
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४र्थं पध्याय ] [२=]
. सस्ति, यथा प्रदोपस्याभावादूपस्यादर्शनमिति, तब भावे नाभाव समर्थ्यत दति। सप्नान्तविकव्पे च हेतुवचनम। खप्नविवयाभिमानवदिति सुवता सप्नान्तवविकल्प हेतुवाच् कवित् सप्नोभयोपसहित कव्वित् प्रमोदोपमाित कि दुभयावपरेत कदााचत खप्नमेव न पश्यताति निमित्तवतस्तु
स्मृतिसङ्ग ल्यवच्च खप्नविषयाभिमान ॥।३४ ।। पूर्वापनब्धो विषय। यथा स्मृतिय सङ्गत्यक पूर्वोपलव्ध विषयो न तस्य प्रत्याख्यानाय कल्पते तथा खप्ने विषय ग्रहग पूर्वीपतव्धावषय न तस्य प्रत्याग्यानाय कन्पते ए्वं दृष्टविषयय खप्नान्ता जागरितान्तेन, य सुप् खप्न पश्यति, म एव जाग्रत् खप्नदर्शनानि प्रातमन्धत्ते-इदमद्राचमात, तत्र जाग्रदुादव्टात्तवभात् सप्नावषयाभमाना मिथ्योत व्यवसाय, सति च प्रातसन्धान या जागती बुद्धिदृत्ति, तद्दशादय व्यव माय -खप्नविषयाभिमाना मिथ्यति, उभयाविशेषे त साधनाSइन नक्यम । यस्य स्वप्नान्तजागरितान्तयोरविशेष, तस्य खप्नविषयाभिमानवदिति साधनमनर्थक, तदाश्चयप्रत्याख्या- मात, अतम्मिस्तदिति च व्यवसाय प्रधानाऽड्न्य अ्रपुरुषे
आदति वाच्य वासनाया पतिरित्त्वे वाधयापतमप्सङ्गात, वासनाया सन्तन्यमाल तथा यासुषादर्रप सन्तानाऽडपाततशितदिक । २२॥ मन्वसडिषया चहतुका चाप सापपत्यया दव भावताप्रत्यया द्व पवदपि प्रत्वया अवयुारत्यत बाह।-पूर्वोपलव्धावषय इत्ति भ्रष। सडस्य उपनोतमानम् यधा सन्याद पूर्वीपसव्ाववयक तथा खामवत्ययोपीरत न निविषयक। कय सप्रे समाव सादति ितार खखनमाव पखसति न लिदं पूर्वोपणब्ामात नाच खब्य सादमख च निर्नानरस सनस म पूर्वीपमम्ल्वा ससर्गमामख श्र आामत्वात्, न वाइइ्युकत्व अव्ादिहशन्न, सस्कारख सुती सृतब T41A5
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[२=८] न्यायदशेनम। [ 8र्थं पध्याय।
स्थानी पुरुष इति व्यवसाय म प्रधानाSडश्वय, नखलु पुरुषे, इनुपनब्धे पुरुष इत्यपुरुषे व्यवमाया भवति एव खप्नविषयस्य व्यवमाया इस्तिनमद्राक्ष पर्वतमद्रान्तमिति प्रधानाऽडच्तया भवितुमहतति । ३४ ।। ण्वञ्ज मति -
याभिमानप्रगाशवत प्रतिबोधै॥ ३५ ॥ स्थागो पुरुषोडयमिति व्यवमायो मिथ्योपन्ब्धिवतस्ि स्तादति न्वानम स्थागो स्थागविति व्यवसायस्तत्त्त्व ब्रानम ततत्वज्ञानन च मिथ्योपलाव्धर्निवत्तते नार्थ स्थगा पुरुषमामान्यनक्षण, यथा प्रतिबोधे या ज्ञानवत्ति तथा खपावषयाभिमानो निवत्तत, नार्था विषयसामान्यनक्षण,
दिति व्यवनाया तवनाप्यनेनेव क्रल्पेन मिथ्योपनब्धिविनाश स्तत्वज्ञानात नार्घप्रतिषेध दति। उपादानवच्च मायाऽडदिषु मिष्दान्नानम। प्रज्नापनीयखरूपञ्च दव्यमुपादाय साधनवान् परम्य मिथ्याऽध्यवसायं कराति सा माया नौहार प्रभृतीना नगर- सरुपसननिवश दूगन्रगरबुद्धिरुतरद्य्त, विपर्य्यये तदभावात्, सूर्य्यमरोचिए भोमनोष्णा ससूष्टेषु खन्दमानेषूदकबुडिसर्वत, सामान्यगहणात अन्तिकस्वस्य, विपर्य्यये तदभावात्, क्चित् कदाचित् कस्यचिच्व भावान्रानिमित्त मिध्यान्जानम्।
बुदी प इतुतयाभिमतत्वात् वत्यम्बदतत । ३४॥ नमु अमस्यापि सविषयकले सत्प्रातरीय जथ स्यात् • इम्याज्साउद ।-मिथ्ो
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४य सध्याय ] [२८e ]
• नुच्िद्वेत मायाप्रयोतु परख्य च दूसन्तिकस्थयोगन्वर्वनगर- मृगष्मिकासु सुप्रप्रतिबुद्धयोख्य खप्नविषये, तदतत् सवस्था भावे निरुपाऽडग्व्यताया निरात्मकत्वे नोपपद्षत इति॥३५॥
मिथ्याबुद्देद्याथवदप्रतिषध, कस्मरात १-निमित्तोपनभात सद्वावापनव्याच्च। उषनभ्यत मिथ्याबुद्धिनिमित्तम मिथ्याबडिस्व प्रत्यात्ममुत्पत्रा गटद्यत सवेद्यत्वात, तम्मात् मिष्याबद्धिरम्य स्तीति ॥ ३६H
तत्व स्वासुरिति प्रधान पुरुष इति तत्त्वप्रधानयोरलीपा- मेदात् स्थामो पुरुष इति मिथ्याबद्विरुत्पद्यते, सामान्यग्रहगात् एव पताकाया बलाकति, लोष्टे कपोत इति, नतु समाने विषये मिध्याबुद्दोना समावेश, सामान्यग्रहणाव्यवस्थानात। यस्य तु निरात्मक निरुप्राज्डस्थ सर्व तस्य ममावेश प्रमज्यते
प्रातरोधा ममत्वभ्ान वा। एव मवप्नमत्यवस्यापि पयमुखावक्रमस्य तत्वन्तानेना प्राततघडाप समत्वज्ञाम भवत्यवति भाव ॥ ३५ । माध्यनिकस्तु वाह्यामत्व प्रसाव्य तहषान्तव बुद्धरप्यसत्व सापयति त प्र्ाह।-एव वाह्यवमुसुरपि न प्रतिषेध मिमत्तमदावापनस्ात सदेत्कत्वस प्रमितत्वात न हालोक सहेतुक सम्भवति चहेत्वत्वे व वादाचित्कतवव्याकाप। कचित-समस्य सविषय वे प्रमात्व सयादित्यवाऽऽद्त बुद्हारति।-एव प्रमात्व गिमिततस्य प्रकारय्य सहाव सत्व यत्र तथा व प्त्िरजतयो मत्यत्वेऽपि गक्कौ रजतत्ववाध्यश्याभावास तहुदे प्रमात्वमिात भाव उत्याहु। चम चोपलभपदमगति प्रयाजनयम् ।२६ । न वा मिष्यायुड्धिटष्टामेन ज्ञानमावसय सन्मावविषयवत्व सविषयकत्वाभावी का समवतोत्याह।-तत्व धममिस्वरूपप्रधानम् धारोप्यम् तथा घ समे धम्येश पमात्वयारीस्य रततत्वा इयथे प अ्रमत्वमितति दश्नासिद्विरिति भाव । कोवजु - न्या-२५
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[२20] न्यायदर्शनम। [४थं त्रध्याय।
गन्धाउडदो च प्रमये गन्धाSडदिबुच्दयो मिथ्याडभिमता, तत्व. प्रधानयो सामान्यग्रहणस्य चाभावात तत्ववद्दय एव भर्वान्त, तस्मादयुक्तमेतत् प्रमागप्रमयबुद्या मर्थ्यात ।३७।। दाषानामत्ताना तत्त्वन्नानादहड्कारानव्ात्त' इत्युत्तमिति। अथ कथ तत्त्वज्ञानमुत्पद्यत इति १- समाधिविशेषाभ्यासात् ॥ ३८॥ स तु प्रत्याहृतस्यान्द्रयेभ्या मनसो धारकगा प्रयत्नन धार्य मागस्थाऽडत्मना सयोगस्तत्ववभुत्सावाशष्ट सात हि र्ता्तम्रिाब् न्द्रियाथषु बुद्यो नात्पदन्त तदभ्यासवशात् तत्ववुाद्द रकत्पद्यत ॥३८॥ यदुक - सात हि तास्मन्निन्द्रयाथषु बुद्दयो नोत्पद्यन्ते" इत्यतत - नार्थवशेषप्राबल्यात् ॥ ३६॥ अनिच्छतोडाप बुद्धात्पत्तनेतदयुत्तम, कम्मात -अर्य- विशषप्राबच्यात। अ्बुभुत्ममानस्थााप बडात्पात्तटृष्टा,
प्रमात्वाप्रमात्वयविराधा कब समावेश इत्यत बाह तखात।-तथा च विषय मदान्न विराध द्वात भाव इत्याहु ।३॥
ननु शाम्त धान तल्ज्ञान चायकम पतस्तन्राणामथ्याच्ान सादव नर दि वाहश किरश्द्य प्वा दढभामगवासनामथ्याज्ञानममुन्लनच्तमम् पतमख्वप्ञान
नामनाथ। तब तत्तन्ञानावबड्ी इतुमाह।-समावि चित्तसाभिभर्तबषय निष्वत्व तस्य विशष प्रवर्षो।विषयान्तरानभिष्वव्रलव्ण तस्याभ्यास्ात पौन पुन्यात् तत्व व्ञानावरवध्धि तदव व निन्धियासनमामर्मान्त। तत्वन्वानाववद्या चामथ्याज्ञान वासना तिगभाव तथा च यागसूच- तव्ब सस्काराऽन्यसस्कारप्रतिबन्धी (याब सू सर६५ सू)। प्रततिबन्ध काव्यासमतासम्पादन विनाशा वा ॥३८।
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४ अध्याय ] द्वितोयाक्िकम। [२८१]
.यथा स्तनयित्रशव्दप्रभृतिषु तत्र समाधिविशेषी नोप पद्यत ।३६॥ तुढादिभि प्रवर्त्तनाज्च॥४० ॥
बुध्य प्रवत्तन्ते तम्मादेकाग्रानुपपत्तिरतति ॥ ४० ॥ अ्रम्त्वतत ममाधिव्युत्थाननिमित्त ममाधिप्रत्यनोकञ्ज, मति त्वेर्तर्ा्मिन,- पूर्वकृतफ लानुबन्धात् तदुत्पत्ति ॥४१ ॥ पूव क्रतो फलानबन्धो योगाभ्यामसामर्थ्यम निष्फले हि अ्रभ्यामे नाभ्यामा आट्रियेवन (प) दृष्ट हि लौकिकेषु कमखभ्याम ामथ्यम ॥ ४१॥
नम रागाउडान्ल प्रतिबन्धात समाधिरव मोदेतोत्याविपति मूवास्याम/- अथविशषन्य तननवनिताऽडदिरामस् प्रामन्याचिर क्षलानुवन्वा तनुसन्धानमवज नानामात तन्भाव स्थासत घनगाजता5 िज्ञानन मतिबन्ध एवं सुत्तवाभ राडडनगम प्रातकइक्ततपशमात् प्रयतत H३८ ॥४ #
एवं वानेकनमपससिद्ध इय्याद सब्र्कते वयन्-पूवऊतस्य प्रथमत तातम्यशगाद्डग घनम्य फन् धमावश्य तम्षस्बन्धान्त्वय तथा व नोगमूत - समाधिमडिगेव्वर प्रणिधा ।म" (थो सूसापा ४५ सू)। सूवान्वख् तवैव-तत प्रत्यक वतमाउधगभोडप्यनतर राभावत्र (यो मू स पा रटमू)। तत दूयर प्रयिधानात् विषयमरातकूल्यन चितावस्थान प्रत्यक्षभावय्ेत्यय म४।।
(प) "नाभ्यासमाद्रवेरन् इति पाठान्तरम्।"
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[२2२] न्यायटर्शनम्। [४र्थ अध्याय"।
अरख्गुहापुलिनाSडदिषु योगाभ्यासोपदेश ।।४२। योगाभ्यामजनितो धर्मो जन्नन्तरप्यनुवर्स्तते प्रचयकाष्ठा गते तत्त्वचानहतो धमे प्रक्ष्टाया समाधिभावनाया तत्त्वञ्ञान- मुत्पदत इति, दृष्टव समाधिनाऽर्थविशेषप्राबस्थाभिभव, नाह मेतदशीष नाहमेतदम्ासिषम अन्यत्र मे मनोडभूत् इत्याह लोकक दति ॥ ४२॥
अपवर्गेडप्येव प्रसङ्ग ॥ ४३ ॥
कर्मवशािष्पबशरीर चेष्टेन्द्रियार्थाSS्ये निमिन्तभावा दवश्यभ्ावी बुद्धीनामुत्पाद, नच प्रबलोऽपि सन वाज्ाछ आत्नो बुड्धात्पादे समथो भवति, तस्येन्ट्रियेग सयोगादु बुद्ुत्पादे सामथ्य दृर्ष्टमति॥४४॥ तदभावश्चापवर्गे ।। ४ ५ । तस्व बुडिनिमित्ताऽडयस्थ शरोरेन्ट्रियस्य धर्माधर्माभावाद भावोऽपवगे तत्र यदुशम-"अपवगेडप्येव प्रसद्ग द्ूति, तदयुक्कम, तम्मात् सर्वदु खविमोचोऽपवर्म। यस्मात् सर्वं-
योगाम्यासस्थानमुपदर्यात।-तव सिरचित्तता स्वादिति भाव। इद न सूत्र भाष्यमिति केचित । ४२ ।
समापने।-निपपवस महोरादे, चवसभावलवात् ारणन्ात, प्रामाउडदि प्विति पे ५४४॥
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४र्थ अ्रध्याय ] द्वितोया्किकम। [२९३ ]
दु खबोज सर्वद् खाऽडयतन चापवगे विच्क्द्यते, तत्मात् सरवेण दुखेन विमुक्िरपवग न निर्बीज निरायतनक्व दुससुत्पद्यत इति ॥४५ ॥ तदर्थ यमनियमाभ्यामात्मसस्कागे योगा-
तस्यापवर्गस्याधिगमाय यमनियमभ्यामात्मसस्कार, यम मनुकमेतावता, दूत्यत भ्राड।-तस भरोसडडद पभाव तदारभकषमाघ विरझदिात भाव ॥४ ५ू स ननु समाधिमावादव निष्पन्युक्दाऽपवम स्थाल् -साधनान्तव वाऽपस्षगौयम् श्रव चाड यशा-समाधिसाधना व्याप।-वदयभपवगायमविभ प्याडडतौ तन
समाध्ययमाव वा। यमानाह योगसूबम् - भाहसासषत्यमलयन्रहमच व्ापाररह्या
यमा (यो मू सा पा ३ मू)निवमाना -चिसन्तावतप खाध्यावेश्वरप्राप्धानानवियमा (या सूसा पा ३२स्)। खाध्याय खानमत मन्तरजप।नाषद्वानाधरयतत्तदायमावद्विताचरये यमानयमा दत्यन्ये। न्ान्म
सस्कार आत्मनाउपवगाधिगमचमता। नतु यमानयमावेव साधने उताहा
अन्दास? उत्यत चाड योगादिति।-पात्मावधि मात्मसाक्षात्ासवधायक बाक्यम्-"भात्मा वा बर द्रषव्य (छह उप 8 बध्या ५ूब्राह्म ६ मन्त्र) "सात्मान चाइनानोयात्" (उद उप 8 बध्या ४ ब्राम्म १२ मन्त्र) इव्यादि। योगादिति प्रतिपाद्यत्व पत्चम्यथ तथा च योगभासीक्ताइत्मत्त्वा घ ममसाधनस्चाSSम्मसस्कार कत्तव्य इत्यय तथा प योगसूत्र- योगाड्रागुश्नानाद अद्िचने पानदीप्तिशाववकख्याते (यों स् सा पा २८ सू०) तन्यय-
सति ज्ञानस्य दोक्ष प्रकष स विषेकख्यातिपय्यन्तो जावत साय सत्पुरुषानाता साचास्कार। बमन्मत तु-देहाइडदिभन्रामसाचास्कार सप नेगनोमावद्या प्रतिबन्वाइडामनोमनयद्युराद्ययाग्यलास, भर्वात चासी योगनधमात योगाड्ा न
पृति (यी सू सा पा रटसू) भासन पम्माओसमाउि कुमासनादि च "वमाजमकुभाचरम्" (गो० ६ अध्या ११ प्०) अव भगवचनात्।
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[२८४ ] न्यायदशनम । [४थं ब्ध्याय।
समानमात्रामगण धर्मसाधन, नियमस्तु विशिष्टम श्रात्म सस्कार पुनरधर्महान धमापचयस, योगशास्त्राज्चाध्यात्म विधि प्रतिपत्तव्य म पुनस्तप प्रागायाम प्रत्याहारी ध्यान धारणा इूति। दृन्द्रियावषयष प्रसङ्वनानाभ्यासो रागद्वेषप्रहा गाथ, उपायस्तु यागाऽ्डचारविधानमिति॥४६ । ज्ञानग्रहगाभ्यासस्तद्विदौश्च सह सवाद ।। ४७।। तदर्थामात। प्रकृत नायतडननति ज्ञानमात्मविद्या शास्त्र तस्य ग्रहणामध्ययनधारग अ्रभ्याम सततकक्रिया उ्ध्यनश्रव्णचचिन्तनानि ताहयेश मह सवाद इति प्रज्ञापरि पाकाथम परिपाकस्तु सशयच्कदनमविच्चाताथावबाधाऽध्य वमिताव्यनुन्नानामति। समया वाद सवाद ।। ४७।
प्राथारममाह यागमूतम् -"ताखन् सात श्रासप्रश्वासयोमतविच्छद प्राणागाम" (यो मृ सा पा ४९ मू)। ताखन् सासनस्थय्य प्राणवारारव नि० मप्रवभ रुपाक्रयवशषात मासप्रशासत्यपदथ्। वाह्ारान्द्रयया स्वम् वषमुख्यमावस्थान प्रत्याहार। धारणमाह योगसूयम्-एभयन्यित्तसय धारखा (गा सू ब पा १ सू)। दश नाभिचक्राऽडदा, चित्तस्य बन्चा विषयान्सरवमुख्यनावस्थानम्। ध्वानमाह-तत प्रत्ययकत नता ध्यानम् (वी सू वि० पा २ सू०)। धारयव वारावमहनी ध्यानमिवय। सवरपशून्यामय समाधि (या सू वि पा ३मू)। सथस्य धर्मो ज्ञानम्वरुपत् याद ध्याम न भाछत तदा समााधारत्वय। मृबान्तरम् - वयमन्तरङ् पूर्वेष्य (या सू वि पा७सू) चरममय साचादुपकारकामतय।४६॥ नन्वव किमा न्वोचिक्या१ दत्यत वाह।-तदयामत्यनुवत्तत। जायतऽननत भ्राम माख प्रअत तखय ग्रहममध्यननधारये तवाभ्यासी टढतररुस्कार ताइय सदाबती मवाद खानुभवदाब्याय न हि यागाड़न्वानाय तत्तापेचलन न परमातभादवफल्य ययनखरुपव अमख्यात।8 ।
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४थ अध्याय ] [२2५]
'तद्वियेस्व सह सवाद" द्ृत्यविभक्कार्थ वचन विभज्यते,-
ग्नसूयिभिग्भ्युपेयात्॥ ४८ ।। प्तन्निगदेनैव नोताथमिति ॥ ४८॥ यतित मन्ेत पक्षप्रतिपचपरिग्रह प्रतिकून्न परस्थेति- प्रतिपच्षहोनमपि वा प्रयोजनार्थमर्थित्वे॥ ४६॥ तमभ्युपेयातिति अनुवर्त्तत। परत प्रज्नामुपादितमान स्तत्ववभुत्साप्रकाशनेन खपक्षमनवस्थापयन् सदर्शन परि शाधयढढिति ।।82 ।I अन्यो न्वप्रत्यनोकानि च प्रावादुकाना दशनानि खपक्ष रागेग चेक न्यायमतिवत्तम्ते तत्,- तत्त्वाध्यवसायरुरचगार्थ जल्पवितएडे बीज- प्रगेहसरक्षगार्थ करटकशाखाऽडवरगावत । ५० ॥ अनुत्पन्नतत्तच्वानानामप्रहापदाषाय तदर्थ घटमानाना मेतदिति। विद्यानिवेदाऽदिभिख परेणावज्ञायमानस्य ताभ्या
सवादप्रकार दशायतमाह।-त तादय सतपचारो सहाध्यायी वाशष प्रक्ञष्ट ज्ञनवान शरग्थों मुमुच विभिष्ट पूर्वोत्ताभन् इत्यय शात कायत्। बाजगोष व्याहत्यथ अनमूयिाभरित । ४८।। सवादप्रकारमाड्ट।-वाशव्दा निवयाथ। माथत्वे तत्त्वमुभत्साया सत्या प्रयाजनाथ तखवानव्ययाथ प्रतिपदहोन प्रातकूलप्वक्ीन यथा स्यात तथाऽ्म्यपेयात तथा घ भाष्यम् - सपक्षमनवस्थापयन् खदभन परिभाधनेत इतति तस्वानर्थीषुतया न पच्नपात इति भाव ।४८॥ समाप्त तत्वध्ानावहाइप्रकरगम। तविद मह संवाद प्त्यव बयोवाह सह सैवाद म कत्तव्य दवात धमा मा
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न्यायदर्शनम। [ ४थं अ्रध्याथ।
विष्टह्य कथनम, विग्टद्येति विजिगौषया न तत्त्वबुभुत्येति, तदेतदविद्यापालनारथ न लाभपूजा ख्यात्यथमिति । ५० ॥ ताभ्या विग्टद्य कथनम् ॥ ५० ॥ क ॥
द्रति वाक्यायनीये न्यायभाषे चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयमाफ्चिकम। समाप्रचाय चतुर्थोडध्याय । ४ H
जत्पावतण्ड पूवमुत्ते ५ति
शष।५॥
मतु ताम्याक काव्यम् दृत्यत आ्रह्।-अगमय् - वतिवाह्य तदशनाव्यासता हतकुद्ञानरपरवा याद व्वपन बात्िप्यत तता तास्या जन्पवितं्डाभ्याम् सावधारथ
चतत। वय्यन्त परातनामाचप तु वादजव्पतितम्ाभियथक्क कथनादात भाव।
वस्ृतम्तु मुमुचान ताहृभ सह सवाद वोतरामत्वात् नाए भ्ास्त्पानपालनमाप सटहेश न वा तन्पेययेव शास्त्र गच्कति किन्तु श्रास्त्रमम्यस्यतति तखामात। प्रति वत्तिसम्पतम् सधिकसूवम् । ५ ॥ क ॥
पति चतुथाध्यायस्य दितीयमाश्रिकम्। २॥
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पूम पध्याय ] [220]
पञ्चमाध्यायस्य प्रथममान्निकम् ।
साधर्म्यवैधर्म्याभ्या प्रत्यवस्थानस्य विक्स्पाज्जातिबहुत्व- मिति सहपेगोक्कम तद्िस्तरेय विभज्यते। ता खल्विमा जातय स्थापनाहेती प्रयुन्ने चतुविभात प्रतिषधहैतव ।
नित्यानित्यकाय्यसमा ॥१॥
साधम्यण खथापनाहेतुत
1 नत्वा शङ्रचरय शरम दोनस टर्गमे तरयम्। सन्पति निरप ाम परममध्यायमातगद्दमम् ॥
बहुतम इत्यनेम सूचित बलवाककव्यनिज्ासानसारिप्रमायाडडा परोचवाडमारल सम्प्रत्यवसरत प्रपय्तनोयम तब नातपरोकासहित जतानयकस्य नवश्र घल ्ब्वस मध्यायाथ। जातिपरीचासडितजतविभेषलचय पसमाSडाक्काघ सप्रदभ चाव प्रकरयानि तबाइडदी सम्पतिपचद्य्यमाभासाप्रकरयम् सन्यानि व यथास्थान वच्चन्े तब च विशषसनपाय जात विभनत। चत व साधम्याइडनोनां काय्यान्तानां इनेत सा हत्ययात् साधन्यसमादय वसुविधयतिन्ातय इत्यय चव प जातविभेष्यतवात् खोलत समाशब्द मन्धन्ते भष्य वाशिजाऽडदो समशब्द पगरिमस्वध् तु समशब्दो निरववाद एवं तब जातिशब्दस स्वीखिद्रतया वद्यपि नान्वय तथाषि प्रतिषेषो वभ्व्य इति भष्याऽडदय। बयनु - तहिकस्पात्" इति सूवस्थायवत्पस्ेव विभव्यत्म् विशवय कन्प प्रकारो विकस्प तथा चते साथ्यसमाSऽदयी जातविकस्या एवमग्रिमस्वन्वपि। इत्यस जातेविशेष्यले साधम्यस्षमेव्यपीति दूम। "समोकरयाथ प्रयोम सम दत नातिकम्।
Uttarpare
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[225] न्यायदर्शनम । [ ५म भध्याय।
माधर्म्यमम अविशेष तत तवोदाइरिष्याम। एव वेधम्य समप्रभृतयोऽपि निर्वक्क्या ॥१॥ नक्षणन्तु - साधर्म्यवैधर्म्याभ्यामुपमहारे त्वर्मविपर्य्ययोप- पत्ते माधम्यवैधर्म्यसमौ॥२॥ साधम्येगापसहार साध्यधमविपर्य्योपपत्ते माधम्येगेव प्रन्यवस्थानमविाशष्यमागा स्थापनाहेतुत माधर््यमम प्रतिषेध। निदशनम -क्रियावानात्मा, द्रव्यम्य क्रियाहेतुगुणयोगात द्रव्य लोष्ट क्रियाहेतुगुणयुत्त क्रियावान तथा चाऽडत्मा तस्मात क्रियावानिति। एवमुपसहृत पर साधम्येगैव प्रत्यवतिष्ठत निष्किय आत्मा विभुनो दरव्यम्य निष्कियत्वात विभु चाSडकाश निष्कियञ्च तथा चाऽडन्मा तम्मान्निष्किय दूति। न चा्ति विशेषहेतु क्रियावत्ाधर्म्यात क्रियावता भवितव्य, न पुनर क्रियमाधम्यात निष्किधेमा दृति विशेषहैत्वभावात माधम्यमम
यद्याप मनावता समाकरण तथादाप समोकरणाहृश्वयकत्वमसयय त्रथवा साधम्यमेव सम नव स साधम्यसम एकव व्यामेशाधक्ाडाप साकम्य सममवति भाव । १॥ माधम्यवधम्यममी सचयात-उपसहाव साव्यथयापमद्रप वादिना कत तद्म्य साध्यरुपघमन्य याविपय्यती व्यतिरक नम्य साधग्यवधस्यास्या कवल्ाभ्या व्याप्तानपवाय्या यटपपादन तता हती साधम्यवधम्यसमावृव्यत सदयमश्र - शात्ना सव्वजेन व्यातरकेथय वा साध्य सावत प्रतिवादिन साधम्यमावप्रवत्तहतुना तदभावाउडपान्न साधम्यसमा वधव्यमावप्रव्त्तहतुना तदभावाइडपादम वधम्यसमा तब साधम्यसमा यथा - प्रब्दादानत्य ऊतकत्वादम्वम व्यातरकम वा ओ्योमवादतयुप सहम नतर्दबम यदनित्यधतसाधम्यास्रत्याकाश्वध्यववन्य स्ात् नित्याक साधम्यादमूसतत्वााब्रन्य सात् विशषो या वत्रव्य। वैषव्यसमा यथा -भ्रष्दाडानत्य अतकत्वाहटवत वकाशवड प्रात स्यापमानाम् भनित्यघटवधम्यादमूत्तत्ाख्रत्य सात् विभषो वा वत्रव्य दात। अव साधम्यत्मावं वषम्यत्वमार्व वा गमकतोपयिक
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५्रम भ्रध्याय ] प्रथमान्किकम।
प्रतिषेधो भर्वात। त्रथ वैधर्स्यस्म,-क्रियाहेतुगुगयुक्तो लोष्ट पार्राच्कन्नो दृष्ट न स तथाऽडत्मा, तस्माब्त लाट्टवत् क्रियावा- निति, न चाक्ति विशेषहतु, कक्रियावत्साधम्यात् कक्रियावता भावतव्य, न पुन क्रियावद्दैधम्यादाक्रयेण, द्वात विशेषहत्व- भा देधर्म्यसम। वैधस्येग चापसहार निाष्क्य आ्रत्मा, वभुत्वात, क्रियावङ्रव्यमावभु दृष्टम्, यथा लोष्ट न च तथा SSत्मा, तस्माविषष्कय द्वात वैधस्येण प्रत्यवस्थानम, निष्कियं द्रव्यमाकाशक्रियाहेतुगुगराहित दष्ट, न तथाऽइत्मा तस्मान्न निष्किय दवात, न चास्ति विशषहतु क्रियाव द्वैधम्यािष्कि येग भवितव्य न पुनरक्रियवैधर््यात् क्रियावतत विशेष हत्वभावाद्वैधम्यमम। ्क्रियावान लाट्ट क्रियाहतुगुसयुक्ता हृष्ट, तथा चाइडत्मा तम्मात् क्रियावानिति न चास्ति विशष
क्रियावानिति विशेषहेत्वभावात् साधर्म्येसम । २ ।। अनयोकुत्ताम - गोत्वाद्वोसिदिवत तत्सिददि ॥३॥ साधर्म्यमावरेष वेधम्यमात्रेग च साध्यमाधने प्रतिच्चायमाने स्यादव्यवस्था सा तु धर्मावशेषे नोपपद्यते, गोमाधम्यात् गोत्वाज्जातिविशेषान्नी सिध्याल न तु सास्त्राडादमम्बन्धात (फ) पश्वाऽडदिवैधम्यादोत्वादेव गौ सिध्यति, न गुग्ादिमेदात्, मित्यभिमामात् सम्प्रातपयदयनाभास चमे। चनकान्तिकदभमाभासा इात वात्तक तनकान्तकपद यागात् सम्प्रतिपस्तपरम् वकान्तत साध्य धिकत्वाभावात ।। २ ।। अनयोरसद्त्तरत्व बीजसाह।-गालात् गासिद्धिरगान्यवदार इवि सम्प्रदाय।
गशत गोर्गोत्वम्य तादात्नन गारव वा सिखयथा, तथेब हतकत्वादयि व्याप
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[३०० ] न्यायदर्भनम। [५म पध्याय।
सेकार्थकारित्व समान वाक् दति, हेल्वाभासाऽडच्र्या खाल्वयम व्यवस्थेति ॥ ३ ॥
कर्षा पकर्षवर्स्यावर्स्यविकल्पसाध्यसमा ॥४॥
दृष्टान्तधम माध्यन समासन्न्रयमतुत्कर्षसम। यदि क्रिया हेतुगुषयोगाल्ञोष्टवत् क्रियावानेवाSडला, लोष्टवदेव स्पर्शं
सति पटूषकसाधम्यात प्रमेयत्ववादतत्वडचममष्यदूषक स्वदत्यय ।विशष ॥। ३ ॥ इ्ति सम्पातपच्तद्भनाभा मापकरमम्। क्रमप्राप्त आतिघटक निरपयति।-उ0्कषय मम उत्कषसम समोदपि। वष्यावगय माध्येति भावप्रधानी निर्देध वरचादिना समी वययसमाि। स्ावद्यम नधमाडगप उत्कृष वियमानवमापचत्रोडपक्षत्र वण्यत्व वणनोयल तज् सन्दिग्ध साध्यवत्वाड् सदभायीववत्वविकस्ी वविध्य साध्यत्व पचावयय साधनोयत्वम् सायटश्टान्तयार्थमविकत्वादिति पसामामुख्ानवोजम् उभवसाध्य ब्यदति षष्ठथ्य। तदयम -साध्यतडवेति साध्य पचव तवा व साध्यसष्टनयो रित्यस पच ट्ानग्ोरन्यतरतिव्नित्यय वमविकस्ी पमस्य वाघ्रवाम् तब कत्रि्ख कचिदसस्वम् प्रळ्वते साध्यसाधनान्वतरपस्य वमख्य विय्यास्ात्ससवादयाडावद्यमान वर्माडडराप सउत्काषसम व्याप्तिमपुरसत्य पयदट्न्तान्तरन्िम् साध्यसाधनान्य तरीष्ाविद्यमानधमपसस्नमम् उत्कषसम पति कविनाथ यथा भब्दोनित्य ऊतकता र्निति मवापनायाम् बनित्यत्वन छातवत्व घने रपसरचरितम् अत मव्दापि रूपवान् खात तथा व विवसत विपरोतसाधनावित्वावकतो हेतु तह्मनाभास्ा चयम्। एव सावणभव्ृसाधर्म्यात् अतवत्वाइटोडपि न्रावम स्वादविभषात् वस्तुतस्तु घटे नाबम श्रम उत्वचय दृटनपद साध्यपदस न दयम्। चपकम समायाम्तु धमविकस्प धमख सहचरितयसथय विकत्पोSसख्व तत चपकष साध्य सायमान्यतर स्याभावम्रसञ्नम् तथा व पच ष्ान्तान्यतरम्मिम् व्याप्तिमपुरस्कय
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भूम भध्वाव प्रथर्मा्रिकम् । [ ३०१]
वानपि प्रापोति, मथ न खशवान लोष्टवत क्रियावानपि न प्रापोति, विपर्य्ये वा विशषो वळ्ळन्य इति। साध्ये धमाभाव
कतकत्वरादन्यच वद्माम उ्त्वमदचारतवटधमान कतकलातमिन्य पथ् तन केसका
श्रा
संथावणवमत्वतऊतवत्वसर्चितयुम् त्वस्य व व्याहत्या घट्डानन्यत्व हतमत्वच
व्यावतनति। टष्टान्म साध्यसाध्रमवककाभ्मामासडपौयम् यत्त वाश्क - भ्रम्न
नोरप शतवत घटाड़ाप मोरम स्यादित्यपकत्र दवात बदमत घट नोरपलाइडपादन
म्यायान्तन त्वाल आ्रचाय्यस्वरसाइप्सवम् यल्त वधम्यसमाया प्रववान्नभाव स्वादति
तन्न उपघयमद्धग्डफपाधमदगात। वख्यसमाय्रान्तु साध्य मिद्वाभाववान् सान्दमभ साव्यक्राइड तवा तस्य धम नन्दिग्धसाध्यकाडडावावहेतु तस्य विकल्यान्मखवाल टश्टन्त वष्त्वस्य स्ान्टग्वमाध्य कत्वस्या्उपादन वख्समायप्रसव्वानतुहि
गमक पक्षथ सान्दग्घसाध्यक तथा च सन्दिग्धसाध्यकवान ्हैतस्वया टष्न्तेडाप खोकाय तथा व दष्टान्तस्ीप सान्दग्वसाध्य कत्वात्सपचवात्तत्ामत्र पद्द्यभ्ारण हतु तदभवाभासा चय इतु मान्दवमसाध्यकतासतवदिन टष्टान्त तद्ा गमक्रहेत आवात् साधनायकसपी टष्टान्त सादति भाव। पवमयसमायान्तु टष्टन्त सिइसाध्यक्र या धर्मा इतु तस्य सरात परत शब्दाद्ावसान्दग्घसाध्यकलाSपातनमखममा
दष्टान्त इताजागभल ताटभा इतुग्व ममक इन्यलिमानेन एबमापादनम टष्ान्त या हेतु सिद्वसाध्यकवाक्त स चेत्र पत्ने तद ममकहेत्वभाबात म्वकप्रासद्ि म्यात् सतसाइथा इतुरवश्य पत्त्वाभिमत स्वौक्राय्य तथा व सान्दत्व्रमाध्यकलनखया
प्रथत्वामावाद्रापथासाड पासद्िदभ्वाभासा चयम्। इकमसमायात्तु पच टष्टन्ने
प या धरम तस विबसी विरुद्ध कलो व्यमिवारिलम उपलत्तय वतत सन्यवात धमस्यापि बाध्मम्। व्यभिचारोड़प देतोपर्माकर प्रति धर्मान्तरस साध्य प्रात
धमान्तरस धमान् पवि वा तथा य वसविष्मस्य क्चिद्यभिपारदशनेन
घ्रमत्वाविशषात् प्रकृतदतो प्रम्ञवसाध्य प्रति व्यभिचान उपादन विकलसमा बबा
न्या-२६
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[३०२ ] न्वायदर्शनम। [५म पध्याय।
दष्ान्सात प्रमख्जयतोऽपकषमम। लोष्ट खलु क्रियावान- वभुदष काममात्माSाप क्रियावानावभुरस्तु विपर्य्ये वा विशेषो वक्रव्य इृति। स्यापनोयो वस्थ, विषर्य्यादवए, तावेतो साध्यदृष्टान्तधमी विपर्य्यस्य तो वस्यावसयसमो भवत। माधनधमयुतर दष्टान्ते धमान्तरविक्ल्यात माध्यधम िकल्प प्रसख्जयता वविकल्पसम। क्रियाहैतुगुणयुक्ककाज्मगरु यथा लोष्ट, किश्चिल्नघु यथा वायु। एव क्रिया हैतुगुणयुक्त किज्ञित् क्रियावत स्यात् यथा लाष्ट, किाश्जुदाक्रय यथाऽडत्मा विशेषा वा वाच्य इति। हेत्ाद्यवयवमामथ्ययागी धम साध्य त दृश्टन्ते प्रसन्नयत साध्यसम। यदि यथा लोष्ट तथाऽ्डत्मा प्राप्त तहि यथाउडत्मा तथा लोष्ट दवात माध्ययायमात्मा क्रियावानिात, काम लाष्ाडपि साध्य, अथ नैव, न तर्हहि यथा मोष्ट तथाऽत्मा ॥४ ॥ एतषामुत्तरम -
अन्नम्य सिदस्य निक्कव, मिदञ्त किज्नत्साधम्यादुप तथ्ा व पचाजदग्तामात वव्यतात् साध्यवदतनर गगसान्यत्वम् चत साध्यसमा तथ हि पचा पूव सिद्धत् एतन्प्रयोग माध्यत्वालावास्ानुामतिावषयत्वम् पृतमासहत्वे पचाउडलवज्जानादात्नयासिआयदय तदयनाभामा चयम्। मूवाथस्तु उभववाष्यत्वात उमय पचटश्टनी तउ्मा इत्वता तत्माध्यत्व तदर्धानासुभिात विषयलम् साध्यस्व पचाउडदरपाति तुल्यताउपादनम् दात लिक्रापाइतमानमत बिज माययनामातविसक्ञात् साध्यसमत इतीय साधल हतुमाम टट्टन्ाडाप सामर पत्याभय एताबामसदुतरलवे बोजमाह।-कश्वित्साघम्यात सधम्यायशबात् व्यत्त तान् उपसद्ारासस साध्यासद वधम्याद्ताहपरोतात व्यामिनयप्रचात क स्यमाबात् भवता ऊत प्रातषंा न सथ्वतोल्यय सन्पथा प्रमेयत्वरपासाघक स धम्यक तहषनमप्यसम्पक स्ादात भाव तथा चाय क्रम -मानव्यत्वत्याप्यात्
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५म भध्याय ] प्रथमान्रिकम । [v]
म नम, यथा गौप्तथा मवय पति, तब न लभ्यी गोगवयया धर्मववकम्पयोदयितुम, एव साधके धमे टष्टन्तादिसामष्ययुत्त न लभ्य साध्यटृष्टान्तयार्धर्मविकल्पाद्वेधर्म्यात् प्रतिषैधा वल्ु मिति ॥ ५ ॥
साध्यातिदेशाज्जच दष्टान्तोपपत्ते ॥ ६ । यत्र लौकिकपरोचकागा बुद्धिसाम्य, तनाविपरोतोडर्या पतिदिश्यत प्रचापनार्थम्, एव साध्यातिदशाइश्टान्त उपपद्य मान माध्यत्वमनुपपनमति।। ६॥
सतकत्वात शर्दानन्यव्वसुपमध्गम न तुअतकतव कपस्याप व्याप्य उन तता
रपमप्यापादना। पम्त ए्वम् चानत्यत्व न रपन्यास्य यन रुपासावादनित्यत्वाभाय
प्रथ स्यात एव वायमम पिकाखसाधम्यात व्याप्यताऽवच्छनकायाककवडता
सायामाह तामगहतुमखवस टष्टान्ततामयाशक मतु पव यावाददशषथावाच्
हतृ तोवदधाकक्रहतूमत्वम् बन्वथा त्वयादाप दूषगीग दश्ना कत्तय्य मा5प
मान्यामाद न तु दटान ततियोवडनावाच्कसय्य पन सस्वम एव बिकन्पसमर
प्रकतमाध्य याप्यात प्रत्ातहता साध्यामाति तबवस्थान वात्कास्ध्ामचागत लेन
प्रतिषणा म मश्रवात महि यात्कास््ामयारादव प्रक्तहता प्रभतसाध्यामाथकत्दम
गातप्रमद्गान व्व सान्यसमS व्याप्याद्ता ससिदे पक्ष माध्यासाड नत्पने
हश्नादयाप्यनन साध्यन्त तथा सति कायदाप साध्यासाइन सान् वमारद्भय
भाप विलीयत । ५ ।
सटाल ह माध्य नातनखवत ताबतब हटानतमुपपदात न त्वगवा धम पद्द
हशनयारसगाऊपसे पसाड,दराप साध्यक्षमत्वमितन प्रतयक्म। इटाडन्ा टुशन पय तम्मादाफनानत्यत पचास्यात्तमात् तथा साध्यव्यातिदेभात साधमान न
सव्वच्चत न नु पचाडाय साध्या आातमसड़रादात भात । ६। 4
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[३०४ ] न्यायदर्शनम। [५म अध्याय
प्राप्य साध्यमप्राम्य वा हेतो प्राप्ता अवि- शिष्टत्वादप्राप्ता असाधकत्वाच्च प्राप्ताप्राप्ति- समी॥थ। हेतु प्राप्य वा माध्य माधवेत् १-अप्राप्य वा १ न तावत् प्राप्य प्रास्यामविशिष्टत्वादमाधक, डयाविद्यमानया प्राप्ती मत्या कि कम्य माधक साध्य वा ? अप्राप्य माधक न भवत नाप्राप्त प्रतीप प्रकाशयतीति प्रास्या प्रत्यवस्थान प्राप्तिसम, अप्रास्या प्रत्यवस्थानमप्राप्तिमम ।। अनयोरुस्तरम - घटाSऽददिनिष्पत्तिदर्शनात् मोडने चाभि- चागदप्रतिषेध 1C I उभयथा खृत्वयुत्त प्रतिषेध कर्तृकरणाधिकरमानि प्राप्य
क्रमप्राश्ती प्रातामाप्तसमो लवयात।-इततावत माककत्वमिवत शय। ५वय दापमाह प्राप्तमाडावाशत्वदति।-धोराप प्रशत्वभ्यात् कि कम्य साधक्रम चप्राप्िपच दापमाह अमप्रपति-चप्परय्य साबकलर्ेतप्रमख्रात् सधकासच्चात कारकज्ञापकसाचा गाम उवस् कारवन्नापकलचग माछन वायवज्ञासलसनन साध्येन सम्बद्ध सत्साछ्षक चेत तका सत्वाविभ्षान् वाय्जवारसभाव तकन्बन्म्य प्रगेव प्राततवाम आष्वसापकभाद प्राशयान जन्जनकभाव। प्रातलन लवग्ा दकयरवामेददत्वाश्य इत्यन्य तक्षा च प्राम्तजवप्षादानट्टाषादनम प्रत्वयखान प्राप्तिसमा। यदि चाप्राम्यलिद्ध साव्याद् जनयति सन्याभावबुद्धिमेव कि तन जमयत् ? समापत्ववशयात् तथा चापाजया साकत्वाणन्टाSपादममश्राप्तसमा। प्रातकूषतकद्शनाभार चमे ।र @ । अनरोर,तरखे योतमाा-दण्डादिती वटापादानवसदभनात् सबलीक अत्यचसिहत्वात् बनिचारात् खनारदत मतुपोखने व व्यभिचाराम्र तदुक प्रतिषेध सनवात, न दि कारख दखाइजद प्रामेन घटाडटिना सम्पडम् अवितु मदादिना
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पूम पध्याय ] प्रथमा्किकम्।
सृद घटाउsिकाय्य िष्पादयान्त, पभिचाराच् पोडन काति दृष्टमप्राम्य माधकत्वमात। ८॥ दष्टान्तस् कार्मानपदेशात् प्रत्यवस्थानाच प्रतिदष्टान्तन प्रसङ्गप्रतिदष्टान्तसमी । ट ।
माधनस्वापि साधन वत्ताव्यमिति प्रसद्क प्रत्ववस्थान प्रमङ्गसम प्रतिषेध। क्रयाह्मतुगुगयागी क्रियावान नाष्ट इति हतुनापादश्यत, न च हेतुमन्तरख मिद्धिरस्तोात। प्रतति दृष्टान्तन प्रत्यवस्थान प्रातदृश्टन्तमम । क्रियावानात्मा, क्रिया हतुगुव्योगात लाटवादतुक्त प्रतिदृष्टान्त उपादोयत, क्रिश हेतुगुगयुत्तमाकाश निाष्कयमित।क पुनराकाशम्य क्रिय हतुगुस १ वायुना सयाग सस्कारापेक्ष वायुवनस्पतिसयोर वादात 12A
ग्यनाडज रध्यदश्यतया पौडा जननात बन्धथा साकवदासद्काय्यकारय्माव सद
व्वं ता हतुरय्साधक स्ादा।८।
दात प्राम्तापसससमजता तडत्रमकरपम्।
क्रमप्राम्त प्रसुहप्रातदृशनममे नातो सचयात।-हटलस काप्य प्रमय
तन्नपदभाडन भधानम् भाभवानसानातप्रयाजनकम् तथा च दष्टानतस साध्यवत्वे
प्रमाणभावात् प्रत्यवस्थानमय बवपौद सटुत्तरमेव तथाडप दष्टान् प्रमाय
वाच्च तवाप प्रभावान्तरामत्यनवस्थया प्रत्यवस्थाने तान्पय्यम् तदुक्माचाय्य-
मनवस्थामासप्रसद् प्रसद्धसभ द्वात। एतन्मत इताउतवन्रामत्यनवस्थाप
पसड्सभ एव पूवमत तु इत्वनवस्थाऽादक वत्चमाखाऽ्डऊनिगचष्वन्तभत्ताकात
विशेष। चनवस्ताद्भनाभासा चयम्। प्रातहक्षन्तन प्रत्यवस्थामात् प्रात्तट्ष्टन्नस्षम
एतम सावधारगम्, तम प्रातद्स्टन्तमावयल्न व्यत्मपुरखत्य प्रत्यवस्थानमघ तन
साधम्यसमाव्यदाष। यान घटटृट्टानवलनानल भब्द तदाउड काभटद्टन्तबन्न र
मित्य एवं खात् नित्य कि न खा दात बाघ प्रतराषा वाउपादनाय इतुरनद्न
साध्य सहारतभमान।
चयम्। ८ ।
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[ ३०६ ] न्य.यदश नम । [५म पध्याय।
अनयोकुत्तरम् - प्रदोपाS दानग्रसङ्गनिव्ृत्तिवत्तद्विनिरवृत्ति ॥१०। दूद तावदय पृष्टो वहुमर्हात, अथ के प्रदोपमुपददते १- किमथ वा -इति, दिद्क्मामा दृशदर्शनार्थमिति। अरथ प्रदोप दिदनमाणा प्रदापान्तर कस्पाब्रापाददत अन्तरेगापि प्रतोपान्तर दृश्यत प्रदोप तत प्रदीपदशनार्थ प्रदोपोपादान निरथकम। अथ टष्टान्त किमर्थमुच्यत पात -अ्रप्रज्नातस्य चापनाथामति। अ्रथ दष्टान्त कारणापदश किमर्थ दृश्यत? यदि प्रज्ञापार्थ प्रजाता दष्टान्त म खलु लोकिकपरास काग र्यास्मिन्थ बुद्धिमाम्य स दष्टान्त द्वात तत्रज्ञानाथ कागणापदशा निव्थक दति प्रसङ्गसमस्योत्तरम॥ १० ।
प्रातदृष्टान्त बुवता न विशेषहेतुरपदिश्यते-अनन प्रकारण प्रतिदृष्टान्त साधक, न दृष्टान्त दति, एव प्रति
प्रसङ्समे प्रत्युत्षरमाइ-दष्टानता ह निदशनस्थानत्वन साध्यनित्याथमपेक्यत नत ष्टनदश्नाद्यनर्वा्थितपरमरा लाफासडा यातासद्ा वा मवयधा घटाडादप्रन्यचाय प्रदोप दव प्रदोपप्रत्यवाकमनवास्थतमरोपरम्र प्रस्यत य माधनमाप व्याहन्येत N १ ॥ प्रसिदष्ट नस्म प्रत्युत्तरमाह।-प्रवायमुत्तरक्रम -प्रातदश्टन्तख्रया किमथ सुपा नत१-मदोन दृतोबाषार्य सम्परातपावतलाथ वा नाइय यत प्रातट्श्न्नस इतुते स्वायसाधकतव मदौया टट्टानी माहत् नासाधक तथा च तुल्यबलतान् बाध म या दितोयोडप यत प्रातदष्टनक्य खाघसाधवत्े उच्चमान नाहतु दशन मदोयो दद्टन्स् समेतुकचादाधकबल। मस्ता इतुबना दटान
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५ूम सध्याय ] प्रथमाफ्किकम। [३०७ ]
दृष्टान्तहैतुत्वे माहितुर्द्ष्टान्त इत्युपपद्मत, स च कथमर्हतुर्न स्यात् १ यद्यप्रतिाषद्ध साधक स्यार्दिति । ११ । प्रागुत्पत्ते कार्माभावादनुत्प्त्तिसम ।१२।। अनित्य शब्द प्रयत्तानन्तरोयकत्वात् घटवदित्युक्ते अपर
कारण नास्ति, तदभावाननित्यत्व प्राप्त, नित्यस्य चोत्प्तिनास्ति अ्नुत्पत्या प्रत्यवस्थानमनुत्प्तिसम ॥१२॥ अस्यात्तरम्- तथाभावादुत्पन्नस्य कारगोपपत्तेन कारगप्रति- षेध ॥ १३ ॥ तथाभावादुत्यन्नस्येति उत्पन्न खल्वय शब्द इति भर्वात
हतृपान! म तरत्मनात भाव अातम ११॥
भावात् इत्वभावात तथा च साधनाङपनहेतुटश्टन्तानामुत्पत्त प्राक डेलभाव दस्यमुत्यच्या प्रत्यवस्थानमनुत्पत्तिसम यथा घटो रूपवान् गव्वात् पटवनितता घतत्पत्तेगन्वाव्य सस् पूव इत्भावादसिद पट व गन्वात्पस्त पूर्व इत्वभावन दृष्टन्तासिदि एवम् बाध्चर्णे कपाभावाहाधत् अनुत्पस्या प्रत्यवस्यानस्य तबााप सच्वात् उत्पत्ते पूव हेत्ाद्यभावैन प्रत्यवस्थामस्न लक्षणत्वात् जातत्वे सतोति च विभषणोपम् तमात्पात्तकालावाक्कत्ा घटी गन्ववानित्यम वाधन प्रत्यवस्थाने नातिव्या प । असिदादददेभनाभासा चय्रम् ॥ १२ ।। तथाभावात् घटायार कलात् तव कारणस्य हेतो उपपसे सत्वात् कथ कारणप्रातषध १ पयमाश् -पघ्य हेत्वभ वोर्डासाक न त्वनुत्पन्न हेत्वभाव सभभवात भावकरणाभावात् म ह्ि इलभावमावासाड ववदीय हेतोरपि कचिदमावसस्वात्, एतन हट्न्तासि्ित्यास्याता, यदा कदाचिसेतु
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[२०८] न्वायटर्शनम । [ ५म अध्याय।
आ्रगुत्पत्ते शब्द एव नाम्त उत्पननम्य शब्दभावात, शब्दस
पपत्तेग्युक्ताऽय दाष, प्रागुत्पत कारमाभावादिति । १३। सामान्यदष्टान्तयोरेन्ट्रियकत्वे समाने नित्या- नित्यसाधर्म्यात सशयसम ॥१४॥ अनित्य शब्द प्रयब्वानन्तरोयकत्वात घटवत इत्यते हेता मशयेन प्रत्यवातष्ठत मति प्रयत्नानम्तगेयकत्वे अस्येनास्य नित्येन सामान्यन साधम्यमान्द्रयकत्वम ्प्रस्ति च घटेना नित्यन, अतो नित्यानित्यसाधम्यादानव्ृत्त मशय द्वात ।।। ४। प्रस्यात्तरम - साधम्यात सशय न सशयो वैधर्म्याद्भयथा वा सशया य)उत्यन्तसशयप्रसङ्गा नित्यत्वानभ्युप- गमाच सामान्यस्याप्रतिषेध ।। १५ । विशेषाद्वेधम्यादवधाय्यमागेऽय पुरुष दरति न स्याणुपुरुष
सत्त्वनव दष्टान्त्वोपपत ब इवा नि वदा कनारत्व सखानव मेंवार भाव नतु सानाबका तनपचात । '३ म
कमप्राप्त सभनवस्षम लच्षगात।-नित्यामत्यसाधम्यदाा संगनकार गपनक्षगम तेन समानधमदशनाSडाद्या काउतसअयकारणवलात् रुश्वम प्रव्यवस्थान समयसभ बाधकन्ु उदाहरपपरम्। तथा हि शब्दोजनत्य काय्यत्वाइटवादत्यक्र सामान्य गोल्वाSडदो टष्टने घट ऐोन्द्रयकत्व तुल्यम् यथा काय्यत्वव्णयकादानत्यत् निर्धी यत तथा रन्द्रयकतवान सभयकारणदानत्यत्व सन्दव्वताम् एव मब्दत्वाडय्यसाधम् दममारदाप सथयो बोष्य तथा च हेतुन्वानेडमामाखश्रडाउडधानद्दारा साध्यसशवात्
घवोत्तरम्।-साध्यात् साम्यद्भनात् समये आपाद्यमानेपि न सभय,
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पूम भध्याय ] प्रथमा्किकम।
साधर्म्यात सशयोऽवकाप लभते एव वैधम्याद्विशेषात प्रयता मन्तरीयकत्वाढवधार्य्यमाये शब्दस्यानित्यत्वे नित्यानित्य माधम्यात् संशयोऽवकाश न मभते, यदि वें लमेत तत स्थाखपुरुषमाधम्यानुच्छेदाढत्यन्त संशय स्थात् ग्टह्यमागे च वशेषे नित्यमाधर्म्य सशयहैतुविति नाभ्युपगम्यते न हि गहमागे पुरुषस्य विशेषे स्वापुरुषमाध्म्य सशयहेतु- र्भवति ॥१५॥ उभयसाधम्यात् प्रक्रियासिच्चे प्रकगगासम ॥१६।। उभयेन नित्यन चानित्येन साधर्म्यात पत्चप्रतिपक्चयी प्रवृा्ति पक्रिया, अनित्य शब्द प्रयत्ानन्तरोयकत्वाइटर्वि त्यक पक्ष प्रवर्त्तयति, द्वितोयश्च नित्यमाधम्यात् प्रतिपत्त प्रवत्तयात, नित्य शब्द श्रावगत्वात शब्दत्ववत् द्वात। एवळ
प्रकरणमतिवस्तत, प्रकरणानतिव्वत्ते निर्गयानतिवर्त्तनम समानञ्जैतवित्य साधम्यणाच्यमाने हेतो, तदिद प्रकरण
वधम्या इधम्य भनात याद य काय्यत्वकपायप्रषदपभेडाप मनय स ा5न्यम्स रपय प्रसद्ध सशयानृचछ प्रसङ्क । न य तथाउ्म्यपगन्त मक्यामन्याह निम्खति।- सामान्यम्य समामधमदशनम्य नित्यत्वानभ्युपगमात् मित्यसभयजनकत्वानम्य पगमात , तथा सात त्वमोहतुरपि म परपचप्रतिषंधक स्वादिात भाव। सामान्यम्य गात्वाSडद
सधय एव स्या-त कचित् N १५।
क्रमप्राप्त प्रवारपसम बचयति।-उमवसाधस्यात् बन्वयसडचारा इतिरेक रचाराषा प्रक्मिया प्रकषय क्रियासाधन विपरीतसाधनमिति फालताय, तत्सिस सस्य पूवमेव सिद तथा चाकमसल्ेमाइडरोपितप्रमापान्तरव बावेल
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[२१ . ] न्यायदर्शनम । [ ५म भ्ध्याय।
नतिव्ृत्त्या प्रत्यवस्थान प्रकरणसम। ममानश्ेतद्वैधम्येऽपि, डभयवैधम्यात प्रक्रियासके प्रकरणसम इति ॥ १५॥ अस्यात्तरम - प्रतिपक्षात प्रकग्गमिद्वे प्रतिषैधानुपपत्ति प्रतिपत्तोपपत्ते ॥ १७ । उभयसाधम्यात प्रक्रियमदि बवता प्रतिपच्तात प्राक्रया मिद्धिरुत्रा भवात यद्युभयमाधम्य, तत्नैकतर प्रतिपच दृति एव सत्यपपव्न प्रातपत्ता भर्वात प्रतिपत्षापपत्त गनुपपस्न प्रतिषध, यत प्रतिपचोपपत्ति प्रतिषेधापपात्त सत विप्रतिषिदमिति, त्त्वानवधारगाच्च प्राक्रयामिद्ि विपरय्यय प्रकरण्णवसानात् तत्त्वावधारगे ह्ववामत प्रकरग भवतोति ॥ १७ ॥ वेकाल्यासिद्दे्ैतोर हैतुमम ॥ १८।। हेतु माधनम तत साध्यात पूव पश्चात् सह वा भवेत् ?
मरत्यवस्थान प्रकरणसभ पथा भब्दाड नत्य हातकतवा त्यु नतदव श्रावपखन नत्यत्वसाधकन बाघात। वाधद्भनाभासा चरम । १६ । पवा तब्नाह।-प्रातपचारपग।साध्य सा प्नममताक्कावयला ग त प्रकरपासा डागा मदयसा्यसय य प्रातषध खत कक्रिनत तसानुपपान्त कुत- प्ातपचापपत्त तत्पसापचरा प्रातपचस्य मनतपचम उपपतत साघनात्। सवमापन-शवशतवन पू्व निन्यत्न्य साधन मे या वा उच्त स वापपद्त पूव माषतसय बलवत्वाभावान कदाचत् ऊतकत्वनानित्यत्वस्ााप पूव अधनादति त्वन्प चप्रातषधीजप सात् । १७। द्ात प्रकरयसमप्रकरयम्। कमप्राममहसुक्षम वबवात।-वकाल्य काय्यकासतन्यमापरकाला तन हतार विष इतुलासित्र पयमश - दमराSज क घमाSदन पूववास्ततया कारयम् वक्षमों घटाउदरभावात् कस कारथ सत् ? मत एव न घटायुत्तर कालर्शरतवाSाप
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५म भध्याय ] प्रथमाङ्किकम।
यदि पूर्व साधनम पसतति माध्ये कस्व साधनम १ बथ पथात् अमत साधन कस्येद साध्यम १ अरथ युगपत् माध्य माधने इयावद्यमानया कि कस्य साधनम? किं कस्य माध्यम? इति हंतुना न विशिष्यत, शहेतुना साधम्यात् प्रत्यवस्थानसहतु मर ॥१८॥
अस्यात्तरम - न हेतुत सध्यसिद्देस्तेकाल्यासिद्ि ॥ १६ ॥ न वक्रान्यासिद्ि, कस्मात-हेतुत साध्यमिडे। निवत्तनोयम्य निर्वृ्ति वित्जेयस्य विज्ञानम उभय कारखतो दृश्यत मोडय महान प्रत्यक्षविषय उदाहरणमिति। यत्त खन्नक्रम अमति साध्ये कस्य माधनम् दति १-यत्त निर्वस्यत, यञ्च वज्नाप्यते तस्यति ॥ १६॥ प्रतिषेधानुपपत्ते प्रतिषेद्मव्याप्रतिषेध ॥२०। पूर्व पस्चात युगपद्दा प्रतिषेध दृति नोषपद्यत, प्रतिषेधानुप पत्ते स्थापनाहेतु सिद्ध इति ॥ २०॥
म वा समानका ल वत्तितया तन् क्ाम्वत्तिभा मव्यतकावधा यवोरवाकिसगममाऽडपस्त तथा व क नमन्बन्वख एनेनाहततया प्रत्यवस्था नमहतुमम कारणमावखण्डनन जाप्हतारपि खणड़नाव्र तदमड्रह। प्रातकूलमकदृशमामासा चन्म् ॥ १८॥ पवासतरमाह-उकन्यासाउस्तवाल्यन वाडासाउरता सा न कुत - कतम माध्यमिद वयाडमम्यपममात n १८। पूववात्ततामात्रयय इतुतासन्रवात् बन्चया तवक्ीभडतोरपि साध्य न सिध्ये दित्याह।- उतुफलमा वखण्डन मतवेवथ्ाप्यतुपपत्त प्रातब्रबच्चयख परथोय्ेतार्नं प्रातषय इृत्यय ।२०।
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[२१२ ] न्यायदर्शेनम। [ पूभ अध्याय।
अर्थार्नात्तत प्रतिपचसिद्धेगर्थापत्तिसम ॥२१।। ानत्य शब्द प्रयम्रानन्तरोयकत्वाइटर्वादात खापिते पक्चे पथापत्या प्रतिप्त्त साधयताऽथार्पात्तमम, यदि प्रयत्ता नन्तवीय कत्वादनित्व साधर्म्यादनित्य शब्द इति प्रथादापद्यते नित्य माधम्याव्वित्य इति, अस्ति तु अरस्य नित्यन साधर्म्यंम अपशत्वमात। २१॥ अस्योत्तरम -
दनैकान्तिकत्वाच्चार्थापत्ते ॥ २२ ।। अनुपपाद्य मामथ्यमनुक्मथादापद्यत इति बुवत पच्च हानरूपपात्त अनुक्कत्वात अनित्यपक्तमद्ावथादापक्ष नित्य पत्तम्य हानिरिति अनेकान्तिकत्वाच्चाथापत्ते, उभयपचसमा चयमथापत्ति यदि नित्यसाधम्यादस्पशत्वादाकाशव्च नित्य शब्द, अर्थादापब्रमनित्यसाधर्म्यात् प्रयत्नानन्तरोयकत्वादनित्य दूति, न चेय विपर्य्ययमावादेकान्तेनार्थापत्ति, न खलु वे
कमप्रातमथापरासस्षम लच्यति-अर्थापन्तिरर्यापच्याभास तथा बार्यापत्या आसेम प्रातपचसाघनाय प्रत्यषस्यानमर्थापततिसम प्रयमाशय -प्रयापतिद्धि उत्नेनानुक्नमाचिपात यथा भव्दादानन्य दृत्यक्र्यादापदनडन्यत् निव्यम् तथा च हृष्ट म्लसदि विरावय। अतकत्वातवित्य दव्यतायाद्रापक्रम् अन्यसाङ्ृतीबाधी सन्पतिपचो वा। चनुमानातनत्य इत्यके प्रत्यक्ाव्रित्य इति व बाघ विश्रेषविधे गधामषधफख कत्वमित्यभिमाव। सवदोष देश्यताभासा चेयम् । २१।। पभेत्तरम्।-विमुशन सतुक वात्कविदेवाचाद्राप्रदाते ?- उक्रीप्रपादकं बा? पादे-तव्पवहानिरप्यापाद्ता त्वगामुकतवात् सन्े-पस्ा पथापसेरनकाति कतम् ऐआन्तियत्म् एवपससाघकत बलं, तम्जात्ति नहि सनित्य इत्यलोपपादक
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५स मध्वाय प्रथमा्किकम। [a९२ ]
वनस्य बाव पतनमित्यर्धादापदने द्रवायामधा वतनाभाव ईत ॥ २२॥ एकधर्मोपपन्ेग विशवे सर्वाविशेषप्रसङ्गात्
एको धम प्रयमानन्तरोयकत्व पब्द्घरटयोदप्रपद़मत इत् विशेषे उभयोरनित्यत्वे सवस्याविशेष प्रसन्यते, कथम१- सङ्रावापपत्त, एको धम सङ्वाव सवस्थोप्रपद्मते सङ्ञावोपपते सवाविशेषप्रसङ्गात प्रत्यवस्थानसविशेवसम ।२२। भ्रस्यात्तरम्,- क्वचित्तहवर्मानुपपत्रे कचिच्चोपपत्ते प्रतिषैधा-
भाव।२४ । यथा साध्यटट्टनयोरेकधर्मस्य प्रयमानम्तरोय कत्वसोप
नित्यसिति न कि विधषबिध्रिमान प्रेवनिषेधफनरूम अपि त मति तापयें कचित् न कि जौसी पढ़ इत्युके सयमन्धदमोलमिति क्वचिन प्रातपद्यत ।२२॥ इति पथापततिसममकरषम्। पबिशयसमं सचयति।-एकम्य स्मम्य अतवत्वाSडद शम्द धे चोपपसे सस्ात् वाद मनघटयारमित्वत्वनाविश्य उचते तदा सदवामविभषप्रमत्र कत - सहायोपपसे (व्) सत सन्मावस ये भावा धर्मा सत्वप्रमेव्त्वाडदय, तवासुपपचे मध्वात् तथा व अर्वेगमभदे पचाउदविभान सर्वेषामिक नातोय लेडयानरज्ाव्यस्ट्रेद सर्वेम्राममित्यल जात्यादिविलय उ्त्यादि। तवा थ सन्रायहत्िथ सैवाबरिशीषाSSपादनमविशरेषसम इति फरलितम्। पत ्वाविभषसम उति वत्यानर्देश, सडायोपपणे सवाविषमयदिति सपत् वेर्ष वयुश्पादकम्। प्रतिनूद्ध ववदमनाभाख़ा चवम् । २२। प्रवाचरमाइ्।- वडमलस देवो धर्मो व्याहदि तथ्य कचित् अतकत्वाइडदो
(a) पछोसमाम्ान्। न्या-२७
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[३१४ ] न्यायदशनम् । [ ५म प्रध्याय।
पत्तेरनित्यत्वधसान्तरसविशेष न एव सवभावाना सङ्भावाप पत्तिनिमित्त धमान्तरमस्ति, यनावशेष स्ात्, त्रथ मतम, अनित्यत्वमेव धमान्तर सङ्गावोपपततिनिमित्त भावाना मवत् स्यात इत्येव खलु वे कव्पामान आरनत्या मब भावा सङ्ावोप पन्तगित पक्ष प्राप्तति तब प्रतिज्जाऽथव्यतिरक्तमन्ददाहरगा नस्त अनुदाह्वरणश्त हतुनास्तोति प्रातन्वैकदशम्य क उताहरगसमनुनपब्रम नह् माध्यमुताहर। भवात, ततथ नत्यानित्वभावदनित्यानत्यत्वानुपर्पत्त तम्मात मन्राबाप पत्ते मवावगेपप्रमङ्ग इवि निवाभवेयमतवाक्ामति। मनर भावाना सङ्ावापपत्तेवनियतवमिति बुवता नुन्नात शब्द- स्यानित्यत्व तत्रानुपपत्र प्रातषध इति ॥ २3॥ उमयकारगोपपत्तेरुपप्त्तिसम ॥२५ ॥ यद्यनित्वत्वकारणसुपप्रद्मत शब्दस्यत्यननत्य श्द नित्यत् कारगसप्यपपद्यत अम्यास्पशत्म डात नित्यत्वमप्यपपद्म्त, उभयस्यानित्यत्वस्य नित्यत्वस्ष च कारगोपपत्या प्रत्यवसथान मुपपत्तिसम ॥ २५ ॥
उपपसत सत्वात् कायत सत्ाइडदौ चनुपपसे ब्भावात् तदुक्स्य प्रतिषेधस्याभामा सथव दत्यथ ॥२४।
उपपत्तिसम लचगात।-उभय पचपातपयो तवो कारणस प्रमामम्ब उपपसत सखान तथा व व्याप्तिमपुरस्कन्य यत्किात्रड्मय परपचवृटात्ेन खपस साधनम अत्यवस्ानम उपपात्तिक्षम यथा-प्रच्ादानत्य कतनत्वादत्यता यथा लत्यसडानत्यले प्रमाशमति तथा मन्यचोषि सम्रभागक त्वत्पक्षमत्पचान्यतरत्वात् तवन्चयम्। तथा व बाघ प्रतिरीधी वा तहसमाभासा चेयम । २५।
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शम अध्याय ] प्रथमान्किकम्। [ a१५ ]
अस्यात्तरम,- उनपत्तिकार साभ्यनुन्नानादप्रतिषेध ।।२६।। उभयकारगोपपत्रे' इति बुवता नामत्वत्वकारणापपत्तर नित्यत्वं प्रतिाषध्बत, यदि प्रतिबिध्यन, नाभयकारणापपत्ि स्यात, उभयकारगोपपत्तिवचनादनित्वत्वकार णापपत्तिरभ्यनु नायत अभ्यनुम्नानादनुपपस प्रतिषेध, व्याघातात प्रतिषेध प्ृति चेत् १ समाना व्याघात, एकस्य नित्यत्वानित्यत्वप्रमङ्ग व्याहत ब्रुवतोत प्रतिषेध द्वात चेत १-खपक्षपरपत्तया ममानो व्याघात सच नैकतरम्य साधक इति । २६ ॥ निर्दिष्टकार गाभावेऽप्युमलम्भाटुपलब्धिसम ।२७।
वायुनोतनात वृक्षशाखाभङ्गजस्य प्रब्दस्वानित्यत्मुपनभ्यत नादशम्य साधनस्याभावेऽि साध्यधर्मीपनव्धा प्रत्यवस्थान सुपनाब्धमम । २७॥
पहासगम।-वतवव कपातष्धी न ममभवसि कृत -मत्यसे उपपन्ष कारगस मत्चलाधकपरमानम्य वरामयनत्ञानान तवा 16 मत्चख टश्टान्ो करमम सप्रम पकत्वमनन्ञातम् अत कथ तत्प्रतिषध भक्तरते कत्तम् १ बनुन्वात स्याषि प्रातबध व्वषस इवकि म प्रतिषध्यत १। २६ ॥ इति उपपततिममप्रकरगम्। उ7लन्धिसम लक्षवात।-वाटिना निदिष््सय कारणस्य साधनन्य सभावषि साव्यसोपयसात मग्वस्थानमुपलाख्स्षम दव्य तवा हि पवता वद्िमान पमाात्तयाकि वह्ायधातवाथसुचचन नय तत सनवतत धम बिना भालोका ए5 दतीडाप वक्िसिदे तथा च न तस्य साधकत्वममात प्रततिकूपतक न याधमा दाक्नमेयन्वधावयं दवयत्वादर प धमेन साधमात् नया पवत एव बक्रिमाने वैत्यादिश्म् पवचारनित अवने महाननाद्गप वाकमत्वात बन्चवा दष्टानासान साद्। एव प्ियून्चयमवतस्यापि सत्ादाथ इत्यादि। सहेमनाभासा नेत्रम् :२०।
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न्यायदर्शेनम् [३म बध्वाय
अस्ोत्तरम,- कारबान्तरादपि तड्मौपपत्तेरव्रतिषेध ॥।२८। प्रयज्ञानमरोय कव्वादिति तुवता कारखत उन्पत्तिरि धोयते न कार्यस्य कारयानियिम, यदि च कारशान्तरादप्युप षद्यमानस्व श्ब्दस्य तदनित्यत्मुपयद्त, किमत्र प्रतिाषध्यत दति १ न प्रागुच्वारणात् विद्मानस्य शब्दस्यानुपलन्ध कस्मात् १-पावरसादानुपलब्धे, यथा िद्यमानस्योदकादेरथ
इति ।२८॥
पवोसरमाह।-कारवान्वात् साकमानतगदाख्ाकाठितीजप तख पमर अध्यम उफलसेस्टुत्र प्रतिषेधी न समयति सयमामय -न कि वयमब धारणाम र व्िमान् धमादि्वादिक प्रयुध्नामछ षि तु सद्दिम्स बत्े सिहस्यम पन्क्षा तवदुशमसाघवाताअधनमपि न खात्, पमधकताअसवानरस्यादि
सस्ात् H २८ु । रत उपन्शशसमप्यरपम्। सगुपवनधिमम सचशता- वद्ाप वेध द्ितोयाध्ाये दानता दूषिता तवाउय्य गुपलाव्ममजाति ्वम इति तवायुरञुस्व मामप्राम्मािजोयते तवाय जम-नय्रयिकतावकन्दानित्वत्वमेव अध्यते या नब्दो निस सात उसारपा् अक् कुती भोपसब्यते? न हि घटा,य्ायरणकुमादिय कनदस्याऊवरयम्ति तरमुप पसोरिति। सवय जातिवाली प्रतयपतिधने -वत्याकरपातुपलमेगवस्पमान
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मे मध्याय ] प्रथमाफ्किकम। [३१० ]
स्तीत्यभावोऽस्या सिध्यति, प्रभावसिकी हैत्वभावात् तद्विपरोन-
प्रात-"न प्रागुश्वारणाहिद्यमानस्य शब्दस्यानुपल्धि" इत्येतन मिध्यति सोडय हेतुरावरमाद्यनुपलब्ेरित्यावन्णा- 5 दिषु चाऽSवरणाद्यमुपनब्धी च समयामुपलब्धा प्रत्यवस्थिता- Sमपलाब्धसमो भर्वात । २८। प्रस्यात्तरम् -
आवरसाऽद्यनुपर्लाव्धनास्ति अनुपनभ्ात इत्यहतु कस्मात् :- अनुपनस्ाऽडमकत्वादनुपलब्धे उपलब्ाभावमाच त्वादनुपलब्धे यदास्ति, तदुपलब्धोवषय, उपलब्ध तदस्ताात प्रातन्ञायत, यवास्ति, तदनुपन्धर्विषय, अनुपलभ्यमान नास्तीति प्रतिन्नायत, सोडयमावरणाऽडद्यनुपलधेरतुपलभ्ा भावोऽनुपलब्धी सवविषये प्रवर्त्तमानो न खवविषय प्रतिषेधात। पप्रतिषिडा चाउडवरपादनुपलन्धिहेतुस्ाय कस्पते, भावरग
सिध्यतति तदा भवरणामुपलब्वरव्यमुपलभ्नादावरम्ामुपलव्रप्वभाब सिध्येत् तथा
इति शव्दनित्यत्व मोत्र वाधक युत्तम्। मन्वमुपलब्धरतुपलब्ाप्तरानमच्तथान कथमेवम् इति चत् उत्वम् पमुपसभरमुपलक्धानरानपेचय ब्ववमेद
पत्यय। प्रतिकूम्पतक्ष देशनालासा बेयमु । २२ ।
इपोत चेत भवत्येव स्वावषाव्धनुपलव्धिरित चेत् नेद प्रसत्म् समुपनभरनप पमावस प निविषयकतान्।
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[३१८ ] न्यायदननम । [५म पध्याय"।
Sदोनि तु विद्यमानत्वादुपन्नव्धेर्विषया, तेषासुपन्धा भावतव्यम, यत्तानि नोपनभ्यन्ते, तदुपलब्धे सविषयप्रति पादिकाया अभावादनुपलवादनुपलव्धेविषयो मम्यत, म
दनुप्न्नब्ध सिध्यति विषय स तस्येति । ३० । भावाभावसवेदना- दध्यात्मम ॥ ३१ ॥ पहेतुरिति अनुवत्तत। शरोरे शरीरिगा ज्ञानविकल्पाना भावाभावी सवेदनीयो -अरस्ति म सशयञ्ञान नारिति म सशय ्ञानमिति एव प्रत्यक्षानुमानाऽडगमस्मृतिङ्वानेषु सेयमावरणा उद्यनुपनाव्धरूपनव्याभाव खसवैद्य नास्ति मे शब्दस्याSडब रमादडद्यनुपन्धि दति नाघनभ्यन्ते शब्दस्याग्रइसकारगा-
भावमिडििति, एतब्रोपपछते ।। २१ ।
मड्िटि घट व्वविषयी न अक्तौति नाय घट भावरषाभाव वयममुपलाब्याववय ?
पत्यपचय्वत वत तददुपलक रमुपलभात् पत्यादिकमहेतु मव्वदा लत्साघनमपि दोषानुपलवेरनप्रलभ्नात् सदोषमेव सादति ॥ २ । नन्वसुप ल्य खस्िक्नुपसन्यितवाभावेदनुपव्वरि कैन सिध्धेत ? चत भाइ।- बध्यात्वम् मात्नषि अानविकल्पाना ज्ानविभषार्णा भवाभाकयोमनसा नवेदनात घट सान्राल्करेमि बज्ञिमनुमिनोमि नामुमिनोमि' अबेक ज्ञानविशय तदभावाना मनैम सुबहल्ादिति आाय । ११॥
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५म पध्याय ] [aee ]
साधर्म्यात् तुल्यधर्मोपपत्ते सर्वानित्यत्व- प्रसङ्गादनित्यसम ॥३२ ॥ अनित्यन घटेन साधर्म्यादनित्य शब्द इति व्रुवत, शरस्ति घटेनानित्येन स्वभावान, साधम्यमिति सवस्यानित्यत्वम निष्ट सम्पद्त, साऽयमनित्यत्वन प्रत्ववस्थानादनित्वमम इति ॥ ३२॥ अस्योस्तगम - साधर्म्यादसिद्धे प्रतिषेधासिद्धि प्रतिषेध्य- साधर्म्याच्त॥ ३३॥ प्रतिन्नाऽडद्यवयवयुत्त वाक्य पच्चनिवत्तक प्रतिपक्षलत्तण प्रतिषेध तस्य पक्षेण प्रतिषध्यन साधम्य प्रतिन्वाऽडदियोग
पानत्यसम लचयात।-याद दट्टानघतसाधम्यात् ऊतकत्वात् तन सह तुल्य धमतोपपद्यत उत्यत मब्ददानत्यत् साध्यत तदा सवस्यशानन्यत्व स्थात् सर्वाsा रूपसाधम्यसन्भवात म चैदमथान्तरग्रस्तामात वाच्य सवस्यामित्यन् व्यातरका
ग्रहाननमानदूषणे तात्परय्यान परस्थान्वय्व्यातरक्िय एवामुमानत्वादित्याभय तथा
माध्यपदादविशषसमाता व्यवच्छत तव सवावशेष एवाइडपादत नत् सवन्य साध्य वस्वम्। यत्तु अनित्यलन समाानत्यसमात भावप्रधानी निदन तथा थ अन्वथलवधमेर लचणमात तम्र वक्चिमाम् धमादित्यादी महानससाधम्यात मत्वातवस् व्रिमस्व स्वात दयस्य जान्यनरत्वाउडपसे। मचार्य्यास्त -"साक्षम्य वधम्यस्याय्यपलच्षकम्
मयमेवानित्य स्यात् उत्यस लचमे यत्यिश्िद्ठमेयत्वय वाच्यम् इत्यादु। पवर प
स्यादिति तब चाधान्तरमित्यवधेयम्। प्रतिकूखतकटम्रबाभासा चय्रम् । १२ । पनीततरमाइ।-वदि यत्किसित्साषम्यात सवय्य साध्यवस्वमापादयतलय साधन्यस्यासाधकलमलिमत तदा तवल्वातप्रतिवेषसाय्यसिद्धि वसमांप प्रतिषेध्य
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[३२०] न्वायटर्शनम। [५म भध्याये'।
प्रतिषेधस्याध्यसि्वि, प्रातषेध्येन साधम्यादिति । ३२। दष्टान्त च साध्यसाधनभावेन प्रज्ञातस्य धर्मस्य हेतुत्वात्तस्य चोभयथाभावान्नाविशेष ।३४।। दष्टान्ते य खनु धम साध्यमाधनभावेन प्रभ्नायंत, स हेतुत्वेनाभिधोयत, स चाभयथा भरवतत-केनचित् ममान कुतद्धिशिष्ट, सामान्यान माधर्म्य विशेषाच्च वैधम्यम, एव साधर्म्यविशषो हेतु नाविशेषेगा साधम्यमात्र वैधम्य माव वा, साधर्स्यमात वैधम्यमाच चाSडाश्रत्य भवानाह-
एतदयुक्कामति, अविशेषसमप्रतिषधे च यदुत तर्दप वेदितश्र्यम ॥ ३४ ॥ नित्यमनित्यभावादनित्ये नित्यत्वोपपत्तेर्नित्य-
सम ॥ ३५ ॥ अनित्य शब्द इ्ति प्रतिप्वायत तदनित्यत्व कि शब्द
साधम्यय प्रवत्तत्वात तया ह्य मायत कतक नमबंक टष्ान्तमाधम्यरुपतान सस्वाSादवत भव च सवदीनहतमतरातिषध्येन मलोहतुना कतकतवन सस्वम च सह साधम्यरूप तथा चाजमाम न साधक स्यात॥ ३३। यदि व साधन्यमात न साधकम अतुगपिमहितामन्भिमत तता कतकत् सरदाि म तु सत्व दातवशष इत्याह ।-माध्यमाधनभावन व्याप्यव्यापकभावन ष्टने प्रञ्नातम्य प्रामतम्य घमस्य ततत्वय्य हतुत्वात माधकलवात तम्य इतुत्वस्य उभयथा सन्वयेन व्यतिरकण व सवात मदरहती सत््वात् मस्वाइदिमाडा ब भार्ब इति यदुक्त तव भर्वा ॥ २8 ।
नित्यसम वचयति।-बनित्यस्य भाव चनित्यत्, तस्य नित्य सबकाल, खौकारी
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प्रम भध्याय ] प्रथमान्रिकम्। [२२१]
नित्यम प्रथानित्यम ? यदि तावत् सदा भर्वात, धमस्व सदाभावाद्यार्मब्तोडाध सदाभाव इति नित्य शब्द इति, भ्रथ न सर्वदा भवति, अनित्यत्वस्याभावावित्य शब्द। एवं नित्यतवेन प्रत्यवस्थानानित्यसम । ३५ । अस्योत्तरम,- प्रतिषेध्ये नित्यमनित्यभावादनित्वेऽनित्य- त्वोपपत्ते प्रतिषेधाभाव। ३६ ॥ प्रतिषेध्ये शब्दे नित्य(त्)मनित्यत्वस्य भावादित्युच्मान Sनुप्नात शब्दस्थानित्यत्वम, अनित्यत्वीपपसेव नानित्य शब्द इति प्रतिषेधी नोपपद्ते, भथ नाम्यपगम्यते नित्य(त)मनित्य तवस्य भावादिति हैतुर्न भवतोति हेत्वभावात् प्रतिषेधानुप- पत्तिरिति। उत्पवस्थ निरोधादभाव शब्दस्यानित्यत्वम्, तब परिप्रश्नानुपपत्ति, सोडय प्रत्न,-तदा नित्वत्व कि शब्दे सर्वदा सर्वात ? ग्थ न 9 दत्यनुपपच्र, कल्मात् १-उत्पन्रस्व
बनित्ये शब्दे नित्यत सवदन्वापादन नित्वसमा चयमाशय -बतित्यतम्य नित्यत्म सोकारडनित्यत्वामवद म्ार्या तम्यामत्यत्वम् न तस्ाफ नित्यत्ाप्ति। न हि नचा भावदशाया दग्होत्चन चतोडनित्यत्वस्य नित्वत्मेत्र म्वोकार इत्यम्युपगन्तव्यम् तथा प शम्दस्यापि निव्वत्वाऽडपति तेन बाय सत्यतिपयो का तहमनाभाछ्षा वेग्म व्वमनित्यत्व यदि नित्य कथ शव्दस्यानित्वता कुर्य्यात न कि रस महारजन यरस नोपतां सम्फाद्यति, पघाानत्य तगा तदभावद्तायाम् चनित्यत्व न व्यादि व्वादिकमूळ्यम् एतदन्साहैम सघ्षपमपि काय्यमित्याचायया। वयन-पनित्यस भावी धम नस्य नित्यमभ्यवममेनिम्त्वनाम्यपनतस्य नित्वत्वं स्थान यघा वति सकसका इचब मनित्यसतश्म सकतकत्व त्वता बलो मित्यसुपेयत न ब ? न पैत तदा साध्याभावादमता बाप पथ चितो नित्यनेय सत्तवत्य तदा विववम हेमनाभासा धेर्यमति ग्रम । R४। दवी मस्माह।-प्रतिषध्ये मन्यये भब्द सवदा पनित्वमावात् पनित्वलात् पनके
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[ २२१ ] न्यायदर्शनैम । [ ४ म सरध्याय'।
यो निरोधादभाव, शब्दस्य तदनित्यत्म, एवज् सत्यधिवरग 55धेयविभागो व्याघाताव्ास्तोति नित्यानित्वविरोधाच् नित्वत्वम नित्यत्व चैकम्स धमिगो धर्मा विसुष्येन न सभवत, तत्र यदुत्र- नित्यमनित्यत्वस् भावानित्य एव तढवत्तमानाथमुत्तममिति ॥ , ६।।
प्रयम्ञानम्तरोयकत्वादनित्य शब्द इति यम्ब प्रयत्नानन्त- रमात्मलाभ, तत खल्वभूत्वा भवात, यथा घटाऽडदिकाय्यम, अनित्यमिति च भूत्वा न भवतीत्यत्िच्ायत, एनमवास्थत प्रयत्नकाख्मानकत्वादिति प्रतिषध उच्यते प्रयत्नानन्तरमात्म न्नाभख टृष्टो घटाSSदाना, व्यवधानापा हा ज्चाभिरव्यातरव्रहिताना सत् कि प्रयत्ञानन्तरमात्मलाभ शब्दस्य १ -श्र््राह्रोडभिव्यात् ? इति विशेषा नास्ति। काय्याविशषेग प्रत्यवस्थान काय्यमम ॥३२॥
शव्त आामत्यत्वसुपपवत मह सन्षवात अ्रमत्यत्व नित्यमास वथ व तान्नव्यमिात वयाघातान न व नित्वामति सबक्ानामल्य तथा च शब्दस्वानत्वल कष सबकान मनित्यत्वडम्बन् १ द्वात वाच्च सवकानामत्यस्य यातसत्ामव्यनात बत व्वत्कत प्रतिषधा न सभ्नवात। मतान्तर तु-धानतवत्वेज्ानव्यसवपपत्र इताा य प्रातषध केत म नसम्भवतौत्थ ।२६। इति नित्वममम्रक रगम । कावयमम सक्ति।-पाम्मकाय्यस्ष प्रजमसम्पाटनीउस् बनकत्यात बनक विषयत्वात प।मय -मव्दादानन्य प्ररम्ामननगवकत्वादृत्यते मस्बामन्तरीयकत्व प्रयतकाव्य घटाइउदी प्रयम्ामन्तरापलस्यनाम कोलकालावाय ठमम् सर्बा नोय न रजजन्यन्वसाधकम् आाध्यनतु चसिद्वम् तथा व सामान्यत उसर्हेतोरनाममसवरिशष मिराकरयेन मन्यवस्थान वाय्यसमा। मासवव्मनाभासा चेनम्। पथवा -प्रयन काययाषा प्रममकत्तत्याना कत्तव्यपयबानारमिति वावम ताहशनाम चने क्ावव्वाुक्रका नस्य बयाघातकसुत्तर माव्यसमा तथा चाखा चाहविनयतात् सूवानु ्शितानामपि परिषिद यधा त्न्यसे किाश्दूषण भविष्यतोति भड्ा पिज्ाचीसमा बाय्मबारक #इसयोष कारनियतत्वेडम वसोव्यसुप कारसमा इव्यदि । ३
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५म पध्याय] [२]
पस्योत्तरम,- कार्य्या यत्वे प्रयत्नाहेतुत्सनुपलब्धिकारगोप- पत्ते॥ ३८ । सति काय्यात्यत्वे अनुपनव्धिकारणापपत्त प्रयत्तम्याहेतुत्व शब्दस्याभिव्यतये यत्र प्रयतानन्तरमभिव्यात् तवानुपनाब्- कारण व्यवधानमुपपद्यत, व्यवधानापोहाच्च प्रयतानन्तर
नुपन ब्धकारण किन्नदुपपद्मत यस्य प्रयत्ानन्तरमपोह्दा कन्दस्योपल ब्धिनक्षणाभिव्य क्निर्भवतोति, तस्ुत्पतशब्द, नाभिव्यज्यत द्वात॥ ३८॥
स्यात दति यदि चानेकान्तिकत्वादमाधकत्वम - प्रतिषैऽपि समानो दोष, ॥। ३६।। प्रतिषेधाऽप्यनैकान्तिक, किष्चित् प्रतिषेधति किव्विन्नति अनेकान्तकत्वादसाधक इति। अ्रथवा शव्दस्यानत्यत्पचे प्रयत्नानन्तरमुत्पाद, नाभव्याक्तायति विशेषहेतभाव १
पतान्तरम्।- शृष्दरथ्य काय्यान्यलकाय्यत्व प्रयम्रम्य कत्तपरत्स्य पकारगन्म् इद तदा स्थात् उवयमुपलाअ्कावप्मावरसाSडादकमुपपघ्न नच तच्कन्दडनौन्यथ आऊृतिरमपसे त्-काय्याका जातामाम् चनतवे तानवधते इ सुत्तरम् -प्रव्षन्य तवदौरदूषणप्रयतत्थ वहतृत्वम् बसाधकतासायकत्वास्य, उपलख्ध वारपस्य पमासस निर्दाषवाकम्य या उपपात् र्ेषवाक्ाघीनापपादन तदभावात् तहाक्यख खपचव्याघातकत्वादित्यय। १ृ । हत काय्यसमप्रक्ड़्यम्। पूवं वावजातिवादिन मति सतय सदुत्व्मेतोदार काव्य इत्यारभारित् तम निष्यविजयफमवत्व कथार्या सम्पद्यत बसदुश्तरोड़ावने तु बन्यन सप्रयोगवग्राभि सतकषासिड़रिति यव्पाद्यित् कषाभासकपा षट्पची नियधचाये प्रदशयति।-
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[१२४ ] व्यायदर्भनम्। [५म पध्याय।
नित्यत्वपचऽषि प्रयम्ञानन्तरमभिव्यतति नोत्वाद इति विशेष- देत्वभाव, मोडयमुभयपचप्रमी विशेषहेत्वभाव इत्यभयमप्य नैकान्तिकत्वमिति ॥३८॥ सर्वचैवम् ॥ ४० ॥ सर्वेध साधम्यप्रभृतिषु प्रतिषेधहैतुष यत्र विशेवा टश्वते, तत्ाभया पत्तयो सम प्रमज्यत इति ॥ ४० ॥ प्रतिषैधविप्रतिषेधे प्रतिषेधदोषवह्ोषः ।४ १।। योऽय प्रतिषेधेऽपि समाना दोषोडनैकान्तिकत्वमापाद्यते, सोडय प्रतिषैधस्य प्रतिषेधेऽपि ममान, तनानित्व शब्द अ्रयम्वानन्तरोयकत्वाढिति साधनवादिन खथापना प्रथम पक्ष, "प्रयम्नकाय्वानकत्वात् कार्यसम' इति दूषमवादिन प्रतिषेधहेतुना द्वितीय पक्त, स व प्रतिषेध इत्युच्यते,
प्रथमाननरोयकत्व न शम्दी नित्यस साधयति प्रमेकानितिमल्वादिति यो दीव स
अषक दवि तया प्रतिबेध ऊत तवाप्यय दाप समान न खनकान्तिकत् सवस्येवासाधकत्व साधयति व्वस्ेनासाधजत्वासाधनतात्। श । सेयं मतातृधा कि वाय्यसमायालेय? नेवाड।-एवबरिधमसदुत्तर सबबब वभती सभ्भवतीय्य यथा मन्दोनित्य शदत्वादितयत निन्यानडनाशसाधम्याद
परममडलं म्यादित्यत्वसमा एतमत्यताय्यह्म्। यम्प्ययमतिदेश पटपस्यनमारमेव वर्नसुचित तथााप विपस्यवदयसपि सूयमरितुमवैवाल उसवातुक्त्मोधकल्षादि घटपचो बिपस्यातावपि तत्फमकल सुष्यमिवि भात्र सक्ि विपस्यामेत्र मध्यस्थन पय्यम्यामपेतयसोहावने कघासमामो कृत घट्प्रथी, इवि चेत पुवा
तष्कषिरोधी विप्रतिषेध तथा म प्रतिबेधय वो नरिमतिपेय वन, प्रतिपेष रिमवदोष उतय तथा ि, सव्दार्गित्य मयनातनोयवलािति खापना
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५म सध्याय ] [३२५ ]
तस्यास्थ "प्रतिषेधेऽि समानी दोष" दति ततीय पक्षो विप्रति षेध उच्चते, तस्मिन प्रतिषेधविप्रतिषैधेऽयि समानो दोषो- Sनेकान्तिकत्व चतुर्थ पक्ष ।। ४९ । प्रतिषेध सदोषमभ्युपेत्य प्रतिषेधविप्रतिषेधे समानो दोषप्रसङ्गो मतानुन्ना ।४२॥। प्रतिषेध द्विताय पक्ष मदोषमभ्यपेन्य तदुदाष्मनक्का नुस्नाय प्रतिषधविप्रतिषधे ततोये पच्चे समानमनैकान्ति कत्वमिति समान दूषग प्रसख्जयतो दूषणवादिना मतानुज्ञा प्रसज्यत इति पक्चम पक्च । ४२।। खपनलचगापेक्षोपपत्यपसहारे हेतुनिर्देशे पगपक्षदोषाभ्युयगमात् समानो द्रोष दूति ॥४३।। सापनापसे प्रयन्नकाय्यानेकत्वादिति दोष सथापना हेतुवादिन खपसनस्णो भर्वात, कम्मात् १-खपक्षसमुत्य लात्, सोडय खपचलक्षण दोषमषेयमागाऽनुदन्यानुन्नाय प्रतिषधेडाप समानो दोष इत्युपवद्यमान दाष परपच उप सहरति, इत्य वानेकान्तिक प्रतिषेध इति हेतु निर्दिशति
मन्यनेन परपथोडभ्युयगतो अर्वातत, कथ ऊत्वा १-य परेप,-
वादिन प्रथम पक्न। "प्रथम काय्यानेकत्वात् काव्यसम" रति परतिवादिना डितौय पथ। प्रतिप्नेषेऽण्मैकान्तिवस तुल्यमिति वादिनयतीय पथ। बीडयं विपति वेध तवापि तर्थवालकाम्विवत्व तक्षमानदोषोड्ायनं न चतुर्थ पथ् ॥४१॥ पसमं पथमाह।-प्रतिषेध रितीर्य पक् सदोषमव्यपेन्य तब मदुर्श दोष मनुकम प्रतिषेषविप्रतिषेधे मदोयपणे सोये समान दोवं प्रसन्नयतल्य मतानुभ्जा
मर्ह पचमाद।-ववपय स्ापनारप प्रथम पच, तं बचोल्त्य प्रकत्ती न्या-२८
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न्यायदशनम । [५म सध्वाय।
नुदत्य "प्रतिषेधेद्वपि समानो दोष" इत्याह, एव स्थापना मताषामभ्युपेत्य प्रतिषधेदपि समान दोष प्रसख्नयत परपचा भ्यपगमात् समानी दाषो भर्वात, यथा परस्य प्रतिषेध सदाष मख्यपत्य प्रतिषेधविप्रतिषेधेऽपि समानो दोषप्रसङ्गो मतानुन्जा प्रमज्यत तथाऽस्यााप स्थापना सदोषामभ्युपेत्य प्रतिषेधदपि ममान दोष प्रसख्जयतो मतानुच्ा प्रसज्यत इति स खल्वय पर8 पक्ष। तत् खलु स्थापनाहेतुवादिन प्रथमततीयपन्रम पत्ता प्रतिषधहतुवादिनो द्वितोयचतुर्थषष्ठपत्षा, तषा परवमाधुताया मोमास्मानाया चतुथषष्ठयारविभषात् पुन रुकटोषप्रसङ्ग। चतुर्थपचे समानदाषत्व परस्थाच्यत प्रतिषध व प्रतिषेधे प्रतिषेधदाषवद्दाष दति। षष्ठेऽपि परपचाभ्युपगमात् ममानो दाष दति ममानदोषत्वमवोच्त, नाथविशेष कसिषि तम्ति समानस्तृतोयपञ्चमया पुनरुकदोषप्रसद्ग। दतोयपक्षे वि प्रातषधेडाप समाना दोष दवा ममानत्वमभ्यपगम्यत। पञ्जमपस्चाप प्रतिषेधविप्रातषैधे समानो दावप्रमङ्गाऽ्म्यपगम्यत नार्थावशेष कविदुच्यत दूति, तत पक्चमषष्ठपचयोरथावशेषात पनरुकदोष ततोयचतुथयोर्मतानुच्जा प्रथमद्वितोययाब्रशेष डेत्वभाव दति, षटपस्यामुभयोरमिद्धि। कदा षटपचो - गदा प्रतिषेधेद्षि समाना दोष इत्येव प्रवत्तत तदाभयो पच्वयोरसिद्ि, यदा तु,-'कार्य्यान्यतवे प्रयत्राहेतुलमनुप नव्धिकारगोपपत्ते" इत्पनेन ढतोयपसो गुज्यत, तदा विशेष
दवतोउपय सपभम्क्षथ सखयापेवा समादय तघ दोषानदावनमिति फलिताथ वश व मदीसपसे दोषममुदाव्यय स्वपयोपपानन कामु यख्वया इतुनिद्धिष्ट प्रातवयदाप समानी दोष इति बन्त सवापि मतानुक्ञा उत्तवैत्वय तदैव षट
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५म भध्याय ] [३२७ ]
हैतुवचनात् प्रयम्ञानन्तरमात्मलाभ शब्टस्य, नाभिव्यत्रिर्गित भिद् (डे) प्रथमपक्ष (स) न षटपक्षो प्रवत्तत इति ॥४३॥ इूति वात्सायनोये न्यायभाष्ये पञ्चमाध्यायस्याऽडद्यमा्रिकम।
पञ्चमाध्यायस्य द्वितीयमाज्निकम्।
महेपगोत्त, तदिदानी विभजन।यम। निग्रहस्थानानि खलु परा जयवस्तुन्यपराधाधिक रगानि प्रायेग प्रतिक्षाSडद्यवयवाS प या ग तत्ववादिनमतत्त्ववादिन्वाभिमप्नवन्ते, तषा विभाग ।- प्रतिज्ञाहानि प्रतिज्ञाऽन्तर प्रतिज्ञाविगोध प्रातन्तासयासो हेत्वनरमर्थान्तव निगर्थकम विज्ातार्थमपार्थकमप्राप्रकाल न्यूनमधिक पुनरुत- मननुभाषगमन्नानमप्रतिभा विन्ेषी मतानुज्ता
हेचाभासाश्च निग्रहस्थानानि ॥ १ ॥ तानीमानि डावभतिधा विभव्य नव्चन्ते ॥ १॥
पन्यामुभ रग्प्ययुश् शादित्वातर्ासिद्ि वदि सवापनावादी आतवान सदुत्तरषत्र दूषयति सदा पतपची न प्रवत्तत इति । ४९ । इति कयाभासप्रकरगाम।
पयेदानीं नियसस्यानविशषनवणानिधान सदैव चाउडन्रिकाय सप चद प्रकर्यान मवृरयम् पन्मानि व यथास्थान वन्यनते। तब विशेषसयथायमादी विसनते।-
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[३२८ न्यायदर्शनम। [पूम अध्याय।
प्रतिदष्टानधर्माभ्यनुन्ना रूदश्टने प्रतिन्ता- हानि र ।
माध्यधर्मप्रत्यनाकेन धर्मेस प्रत्यवस्थिते प्रतिद्ष्टान्तधम सट्टानज्यनुजानन प्रतिभ्ा अद्यातीति प्रतिच्ाहानि निदशनम -ऐन्ट्रियकत्वादनित्य शब्दो घटवदिात कत, धपर आह,-हृटमन्द्रयकत्व सामान्ये नित्य कसान शब्दे१ इति प्रत्यवास्थते इदमाह,- य्द्यैन्द्रियक मामान्य नित्य काम घटो नित्योऽास्वति म सल्वय साधकष्य दृष्टान्तस्य नित्यत्व प्रसन्नववरिगमनान्तमेव पत्न जहाति पक्ष जहत प्रतिज्ञा जहातात्युच्धत प्रतिज्राश्थयत्वात प्तस्येति । २ ॥
न वा ऋगित मक्वशन निशाहता व वापोत्यर्थो लव्यत परति प्राश्त मव्य म्तू चकारडनकसमृखये तन टर्टान साधनवकन्बाइजनौमा पारगह । १ । तब क्रमेष प्रतिव्ञाह्यादोमा लच्गंण वत्रन्य प्रथमाहषा सतज्ाहान लचन त।-प्रतिकूलो दष्टनी यव स प्रातट्ट्टान पत्पच स सोय टषटका यव स सग्शम सवपस तथा स्वपचे परपपमाव्यमुत्ता प्रातत्राश्ाम सय विधिष्याभिहतपार्यान दति फव्विताय। मिद्मस्तु वकय विाशव माभि
पचचथा भ्वातत यथा शकदनित्य ऊतवात्वामलिके प्रत्वभित्या कापतविषयीज्य मित्युसविति वस्तु तहि घट एव पक इतति एव तवय ऐन्द्रियत्त्वादृति इती रमकानिततवामात प्रन्श् वम्तु अतकत्ादात हेनरति एव फ्वता वत्रिमान्ु समातृ पयागोलकर्बन्त्यक्रे दटानत साधनविकम् दति प्रत्यक् वस्तु तहि महानम वादति एवम यवन सिहसापने व प्रत्यक्न वस्तु ताड इनवनवामित। चकशानिस्तु विशवणरान्वादि यथा तवय नौवधमादतुते पसुमयविशयबलेन प्रतुर, ध तह्ि धूमादिनि हेतुरियादि : २।
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५म अध्याय ]
प्रतिन्नातार्थप्रतिषध धर्मविकल्पात् तदर्य- निर्देश प्रतिन्ञाऽन्तरम् ॥ ३ ॥ प्रतिव्ञाताथाडानत्य शब्द ऐन्द्रयकत्वात् घटवदित्यक् योऽस् प्रतिषेध प्रतिदृष्टान्तन हतुव्यभिचार सामान्यमैन्द्रयक नित्वमिति र्ता्पिय्व प्रतिच्नातार्थप्रतिषेध धर्मावकल्पािति दृष्टान्तप्रतिदृष्टन्तयो साधम्ययाग धर्मभढात सामान्यमैन्ट्रयक सर्वगतम ऐन्द्रयकस्त्वमर्वगतो घट दति धमविकम्पात तट निदश इति माध्यामद्यथम कथम १-यथा घटाडमवगत एव प्रब्दाऽप्यसवमता घटवद्वानित्य इति, तवानित्य श एति पृवा प्रतिन्ञा अमवगत दति द्वितोया प्रतिघ्ा प्रतिज्ञा इन्तर तत् कथ शनम्रहस्थानामति ? न प्रतिज्जाया साधन प्रतिभ्नाउन्तर किन्तु हेतुदृष्टान्ती साधन प्रति पाया, तदतदसाधनोपादानमनयकमिति सानथकान्रिग्रह्न स्थारनामिति ॥ ३ ॥
समस्य चमान्तवस्प बिगिष्ट कस्यो विकस्य तक्ादिशमण्तानरविभिष्वया प्रातना साथम्य कयनमिति फालताय प्रतिबेध हत्यनेन कटिाल सबरम विलस्बन्ाद स्वय दूषण विभाव्य विभषण म दाब सत्यत्तम् प्रतिश्ातावस्येव्यपलचष हत्वत क्ायस्यति त्त्म् तन उदाहरणान्तरमुपभयान्तरख्य प्रातश्ञाइन्तरवन मद्वड्ात अ्वति। १दस पच्मनाध्यावयवणभेद्ात प्त्येक धवितवधम् यथा शब्दा वित्य इत्यत च वाधन घरमा नत्मुन वर्फ तक भक पथ दाल प्रातज्ाइलवम् न चदमद ना श्ररतोपथागात न चे। प्रातप्रा्टनि पूर्वोक्न्याय रत्वामात् एव पवता वाडमा कुगमभलनवमवत्वादि्यियित्र अममथात्रभषगलन च परेय प्रस्ने कृष गुरुप्ररव बंइ्मा नत्थव एव स टमवड़ साध्य य मुरममालनवमवान स वइमा न्यु दविरणे न्यनत्वेम नत्यत्रो स तान्वाव प्र मानित्यय एवमन्य प्यहम्।। न 1
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[ ३३ ० ] न्यायदर्फनम। [५म अध्याय।
प्रतिन्ाहत्वोर्विगेध प्रतिन्ताविरीध॥ 8 ॥ गुगव्यातरिक्ञ द्व्यामति प्रतिन्ना, रूपाऽडटितोऽथान्तर स्यानुपनव्ररिति हेतु, मोऽय प्रातन्नहतोवविराध कथ्रम ? रयाद गुखव्यातविक्र द्रव्य, रूपाडदिभ्योथान्तकम्यानुपनब्धिनोप
द्रव्यामति नोपपद्यत गुणव्यातरिक्कष्त द्रव्य कपाऽड दभ्यश्ाया न्तरम्यानुपनब्धिरिति विरुष्यत व्याहन्यते न सभावनोोत । ४ ॥ पत्तप्रतिषधे प्रतिन्तातार्थापनयन प्रतिन्नासव्र्ास॥५॥ आनत्य शब्द मान्द्रयकत्वादित्यक्रे पगा ब्रयान - सामान्य मेन्द्रियक न च अनित्यम एव शम्दोऽप्यान्द्रयक, न चानित्व दूति एव प्रप्तषिडे घच्ते यदि बूनत-क पुनराह अनित्य शब्द इति माठय प्रतिव्वाताथानङ्व प्रातज्वासत्राम इतति ।५।। अविशषोतते हेती प्रतिषि्धे विशेषमच्कती हेत्वन्तरम् ॥ ६॥ निदर्शनम-एकप्रक्वतीद व्यक्तमिति प्रतिज्ञा, कस्ष्मा 1 प्रतिभावराध सक्षपति।-वव व प्रतिभ्राहतुपद् कशक्षानमवाकापर। तथा च कथाना व्ववचमायविरोष प्रासन्ाविराध पधाप कास्चनमय पवत वाक्रमान् पवत काशनमत्व प्मान् उदी वष्रिमाम् ऋदत्वात् पवता वाहमान काकनमरमान्थ्ादी इत्वाआमान्तरसादथ्यम् तथाउप्यपघे।सङ्रडपि उपाधर साडर्य्यान्र दोष न चासङ्वीयस्थखाभाव पवता वाङ्मान् धूमात् यो यो धूमवान् स निरागरत्युवहरय निरग्रियायनित्युपमय व तत्सस्वात् एव निगमनडाप बोध्यम्॥४ ॥ प्रतिभ्ञासत्रास लचयात-पवस् सामिाहतस परष प्रातषधे अते साम नवपवाजहोषन। प्रतिम्ातायस्ापनयममपलाप रत्यय यया शब्दानित्य ऐन्ट्रियकत्व दित्युके मार्मान्त व्याभचारम्त परेषष प्रत्युक्त क एवनाह शब्दोमत्थ इति ॥ ५ ॥ हलनर ववपति।-मत्र प इतावतनेन हत्वयवाओो म वविवचित, अि
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५म अध्याय ]
द्वेतो -एकप्रक्वतीना विकारणा परिमागात, मृत्ूवकाण शरावाउडटोना दृष्ट परिमागम् यावान प्रक्ृतव्यूह्दो भवति, तावान वविकार दति, दृष्टव्व प्रतिवविकार परिमागम्, प्रस्ति चेद परिमाण प्रतिव्यत्त, तदकप्रक्वनीना विकाराया परिमागात् पश्यामो व्यक्तमिदमेकप्रक्वतोत। अस्य व्यभिचारण प्रत्यव स्थान, नानाप्रऋतोनामकप्रक्तोनाख् विकारगा इष्ट पार मागमिति, ण्व प्रत्यवस्थित आ्रह्म -एकप्रक्रतिसमन्वय सति शरावाऽडदिविकागण परिमामदशनात्, सुखरदुखमोह्न समन्वित होद व्यक्क परिमित ग्ह्यत, तत प्रह्ृत्यन्तररूप ममन्वयाभाजे मत्यकप्रक्ृतित्वमिति तदिदमविशेषोक्त हेतो प्रातविद् वविशेष बुवतो हतन्तर भर्वात, मतति च हत्वन्तरभाव पूवस्य हतारमाधकत्वान्नग्रहस्थानम हेत्न्तरवचने सति यदि हत्वर्यनिदशनी दष्टान्त उपादीयते नद व्यत्मेकप्रक्ृतिक भवति प्रजत्वन्तगपादानात अथ नोपादोयत, दष्टान्त
निग्रहस्थानमिति ॥ ६॥
मु साधकांश सच हेत्ववयवस्य उदाहरणादिस्यो वा अविभषोक् इति पूर्वात्त इत्थय विभषमिष्कत इतति साभिप्रायम तन परोकदूषणोदिघोषया तचव इतौ विभषणानरप्रतोऽन्यहेतुक्षरण वा दयमपि हेलनरम् तथा व पराक्रदूषण
इतो ववशषणदाम एव हत्न्तरामति प्राध पूर्वोतन्य हेत्ववयव उदाइरणाSड वा यथा भव्दरानित्य वाह्यन्द्रियप्रत्यसत्ादत्युने स्वामान्यमकान्तिकतवन च प्रत्यत्त सामान्यवस्वे सतोति विशेषण्म् एव विभष्टहेनुमुक्का यत् वाहन्ट्रियप्रत्यक्ष तदनित्य मिथुदाहरये न्यमत्वेन मत्थुत्ेवशिष्टीत्तो एवसुपमयविभेषणे,पि। द ।।
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न्यायदर्शनम। [५म भध्याय।
यधोक्नक्षणे पक्षप्रातपत्तपरिग्रहे हेतुत साध्यामडो प्रशताया ब्रूयात, नित्य शब्दोऽस्पशत्वादिति हेतु हेतुनाम हिनोतर्धातोस्तुनिप्रत्यये कदन्तपदम, पदञ्ज नामाS्डख्व्यातोप मगनिपाता, श्रक्रधेयस्य क्रियाऽन्तरयोगाहिशिष्यमाणरूप शब्दा नाम क्रियाकारकममुदाय कारकमझ्विशिष्टक्रिया धात्वथमावञ्च कालाभिधान विशष्टम योगेष्वथादभिद्यमानरूपा निपाता उपसज्यमाना क्रियाऽवद्योतका उपसगा इ्त्येवमादि तदथान्तर वेदितव्य मति । । वर्गाक्रमनिर्देशवन्निर्ग्थकम् ॥८॥ यथा नित्य शब्द कचटतपा जवगडदशत्वात भभञ घढधषवदिति एव प्रकाव निवर्थकम अभिधानाभिधेय भावानुपपत्तो पथगतरभावात् वषा एव क्रमण निदिश्वन्त
पथानत लक्यति।-प्रक्लसात प्रक्ृतोपयक्ञान उ्यबन्नापे पश्चमी तन प्रक्रतोप
साथ घथा शद्दी मख हातकत्वादित्युका मब्दी सुख स चाउडकामखे स्यादि ॥। नित्यक लकयति।-वर्णना क्रमेष निर्देशी नवगडेत्यानिप्रयोग तत्तल्या निहेशा निष्यक निगहस्थानम भवाचकपदप्रयाग द्वात फलििनाथ चाचकत्व शत्या मिरूढलसपया शास्त्रपारमाषया वा बोध्यम् समयबन्त्र्यतिरकिधत विश्षथोयम लेन यतापभशेग विचार कत्तव्य इति समयबन्व तवापवय न दोष मटिति सववश तुम दाष उन्युत्तप्रा म अम्य सभव प्रमाहाहित्व नवम् ॥॥
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५ूम भध्याय ] द्वितोयान्डिकम।
परिषरप्रतिवादिम्या विरमिहितमप्यवित्ञात- मविन्नातार्थम् ॥८॥ यदाका परिषदा प्रतिवादिना च (भ) विरभि्ितमपि न
कारणेन तदविद्यातमविद्याताथममासथ्यमवरणाय प्रयुत्नमिति निग्रडस्थानम # ८॥ पौर्वापय्यायोगाद प्रतिसम्बद्वार्थमपार्थकम् ॥ १०॥ यत्ानेकस्य पदस्य वाक्यस्य वा पौर्वापय्येगान्वययोगी
आवज्ञाताथ सचमति।-ववगर्भाहत व्ा नेति जष दिराभधान चानव धामाउदादन बाधमियासाय परिषत्म्रातवाद्यन्यतरण वज्ञाने त नाविज्ञातारयमति
वाकयप्रयागडविप्राताथामति वाचकन्यनेग निस्थकापाथकव्यनाम। चत्र च पदा ज्ञानाउडपा मममम जया भावप्यतीात समा किसभ्भव। मच ययाकथासत्रा जेतव्य सतज्ञानाउपात्म काययमेनति वाध्म तथा सात भत्र काले पग्मशधयात्कास्नयि वानेनय सवय जयमभभवात् एतस्य वेषा समाव -प्रमाधाउगतन्त्मावप्रसिद्रम यथा पञ्स्कन्याउदन्या बोह्धानाम् तव कपाSड य पच्चान्द्रयाणि व रूपम्कन्व सकिकत्पक
मत्रास्कन् रागइषधभानवतरा सस्कारस्न् सुखख वेदनास्न् ावकन्पक प्ानस्कन्।इतोयम्-परातमसत योगमनपेक्षतदाढ क्रम् ग्रथा वशपतन प्ातहेतु रय विनयनसमाननामधयवान तत्केतुम्त्ानिवादि। तृतीय-प्रिष्टम वया सेती धावतोत्यादि। व्वम पतिद्वुतोआ्ञारताडादकमपोति भाष्यम्। फय नादडग्रस्य सम्ाव उभयतव्ताभिज्ञमध्यक् सति उमयतन्त्रामम्रगहेव विचारमन्वासिति घेत ? सत्यम.
तव नियह स्थान्य तवापि चे यया कयाचित परभिाषयोव्यतारमिति पर मौका वदति न तवाउडद्म्यापादानमिति उत्तस्यीस्तु सवथर्वेति ।। ट ।
सपाथक काव्यकारपभाव
(भ) दादिनेति भष ।
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[३३४ ] न्यायदशनम । [५म अ्ध्याय।
कम, यथा दश दाडिमन षडपूपा कुए्डमजाजिन पनल पिण्ड अथ रोरुकरमतत कुमाय्या पाम्म तस्वा पिता पप्रति गोन इति ॥ १० ॥
म्यानमिति ॥ ११ ॥ हीनमन्यतमेनाम्यवयवेन न्यूनम ॥ १२॥।
निग्रहस्थान साधनाभावे माध्यासिदिरगिति ॥ १२॥
शाव्बाधअनक Sडकाह्ञाज्ञोनाडगभावादिात फालताय चप्रातसष्बडाSमम्वड पथ प्रयाजन माकयापकप यम यव्याप दमदाउमामि षडपूपा कुउमजाजमामत्या नववान्रवाक्यादयबाधसत्वास्व्यप्र तिव्या मरिय्र निर्थके तथाऽप्यभिमतवाक्याथ वाधानकलाडकाइडडन्भून्वाधअनरूपदत् तत् सविज्ञाताय तु व्वम्य बाघा
भवत्यवास मातिव्यााप उदाहवृसणान्तु पयाग्यामासम्नानाकाहवाकाम्। १।।
पमाप्रकाल ल्यत।-सवग्रवथ्य कशकदशम्य।वपय्यासी वपरोत्यम् तथा
4
वादना साधनमुक्का सामान्वती हेत्वाभासा उदगरणौया इत्यक्ष पाद प्रतिवादिनय् तवोपालभी दिताय पार प्रतिवादन स्वपयसाधन तव सेतवाभासीदरपक्ति हतो। पात अयपराजबव्यवस्था चत्थ पाद व्व प्रतिन्नाहेत्वादोनां क्रम -तद
नम लचनति।-यव्यवैन व्वशास्त्रसिद्वेन तन सोगतस् अावयवामिधानेपि न व्यनत्वम्। मन्ववयव होमत्वम् पवयत्रत्वावा क्कव्ाभाव तथा पाययनमेत स्थात् चत
चायमर्फासद्दक सभा बोभाऽडादनाऽनभि संगास । १२ ।
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५ूम बध्याय ] [३३५ ]
हेतूदाइरगाधिकमधिकम् ॥ १३॥ एकेन ऊतत्वादन्यतरस्थाऽडनथक्यमिति, तदेतब्रियमाभ्युप गमे वेदितव्यमिति॥ १३ ॥ श दार्थयो पुनर्वचन पुनरतमन्यवातुवादात ।११।। अन्यवानुवादात् शब्दपुनरुत्रामर्थपुनरुत्ष वा,नत्य शब्दो नित्य शब्द दति शब्दपुनरुक्षम, अर्थपुनरुत्रम्-अनित्य शब्दा निराधधमका ध्वान दति ॥ १४ ॥ अनुवादे त्वपुनरत शब्दाभ्यासादर्थविशेषोप- मत्ते॥ १५ ॥ यथा हेत्वपदशात् प्रतिज्वाया पुनवचन निगमनमिति ।१ ५। अर्थादापन्नस्य खशब्दन पुनर्वचनम् ॥ १६ ॥ पुनरुलामति प्रकतम। निदभनम -उत्पात्तधमकत्वाद- भाधक लनयति।-हतूलाहरप्यपनक्षमा दृष णद्यधिकमाप बाध्यम् तथा च क्तक्तव्यापुनरुक्राभधानाभात फालतम् चनवादम्त न स्षतकत्तय शाभमरत ववात प्रातज्वाडानक्श पुनवुत्रम् धमादालाक्ान महातमवचत्वरवान्त्यानकन्तु विमा समयबन् नाव्याडदियमाटक्कमाधकम् यथा महानम महानसर्वनित नाधिक किन्तु पनरक्रम् । १३ ।।
पनवश अघनति।-पुनवचम पुतरुत तस्य विभागाध शव्दागशित तन
अनुवादान्यत्वे सतोत्यमा। निष्यु रेजन पुनराभधान दि पुनरुत्षम् चनुवादस्त व्याख्या रप सप्रयोजमक पर्वेति भाव तथा च समानाणक पूवाइनपूर्षोक प्रब्दपरयाग ग्रव्दपनदत समानाथकमिन्ना इडनपूर्वोक अनवस्य निष्पुयोज्षन पुनराभवातमथपुनरुक्तम् बाद् यथा-दो बढ़ इति दितीय यथा-चद कलस इति पतस प्रमादा इडटिमा सम्ब ॥१४॥
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[ ३३६ ] न्यायदर्या नम । [५भ अध्याय ।
मित्यमित्यक्का पथादापबम्य योडभिध्रायक शब्द तेन खभब्देन ब्रूमादनुत्त्पत्तिघमक नित्यमिति तञ्ञ पुनरुत वेदितत्र्यम्। अर्थमम्प्रत्वयाथ शब्दप्रयोगे प्रतोत मोर्ऽर्थोऽर्ापत्येति॥ १६॥ वि्ञातह्य परिषदा चिरभिष्टितस्याम्यनुच्चारग- मननुभाषगाम 1 १७।। विज्ञातम्व वाक्ाथस्व पारषदा प्रतिवादिना विराभ हितस्य यदप्रत्यव्वारण तदननुभाषण नाम निग्रहस्थानमिति अभ्रत्युच्चारयव किमाश्चय परपकप्रतिषेध ब्रूयात् १॥१२॥
विच्ाताथस्य परिषदा प्रतिवादिना विरभिद्टितस्य यद
अ्रतिप्रतिभवात तम्य तेन कपेशा पुमरभिधाम पुनरुतम् इतमेव व अथपुमनक्रामति मोयने यवा पाङ्कुष पात पूवप ाडिपोक्तावपम उणा र्बाहरिति इत्तरपता S5चिप्ोतनि एव वहिवास गह मासोति विध्याचिप्ोकि नीवन् मेरे नापिति वहिरसोति निवेधाइडसिप्रोकि पुमरुपवावध्यस्वद भष्याऽडदिममात्म्। चन्चेतु- अव्दपुनकत हिावध तस्य अाष्तम्य पुमतमिधाम पर्य्यावेणाभिध्ानम्, च्न्त् पुनरथ पुनरुतम् रत्याद्ट॥ १६॥ भमनभाषष लकष्पति।-परिषता विज्वासस्य विभिष्य मुहायस् वादिा विभिरमिहितिम्य तथा व प्रथमवचनेननुभावये वारिमा वारजय वाक्मिति यशितम् तथा च त्निरमिधानेशप यवानृभावणविरोधी व्यापार तवाननुभाषण
िरासाय कथामविषकिन्द्र नति व विशेषणोयमित्याचार्य्या। न चाप्रतिभासाङय्यम् उत्तनप्रतिपत्तावपि समावीभाउदिमामनुभाषणसम्वात् तदिदि चतुर्डा - एकदेमानुवादादिपरीतानवादान क्रेवलदूषयोक्या सशेन नैति। सब्मामयदैेनानु
भदेवाश्यम् ।१0। प्रज्ञान पवयत-भावे त। ववार्म परिषदा विभ्ानसेन्याद्यमुवूषचार्य,
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५म प्रध्याय ] द्वितीयास्टिकम। [३३०]
विज्ञान, तदभान निग्रहस्थानमिति। परय सत्वविज्ञाय कस् प्रतिषेध व्रयादिति १॥१८॥ उत्तरस्याप्रतिपत्तिग्प्रतिभा ॥१६॥
परपत्षप्रतिषेध उत्तर, तत् यदा न प्रतिपदयते, तदा निग्ट होतो भवति ॥ १८ ॥ काय्यव्यासङ्गात् कथाविच्छेदो विचेप ॥ २०॥ यत्र कत्तव्य व्यासज्य कथा व्यवच्छिनत्ति,-इद मे करगोय विद्यते, तस्मिव्वमितै कथयिष्यामि, इति वित्यो नाम निग्रह स्थानम। एकनिग्रहावसानाया कथाया खयमेव कथान्तर प्रतिपद्यत दति ॥ २०॥
तथा च परि्षिता विज्ञातस वाहिना विरमिाहतस्याम्यावभ्यानमित्यय। रदख कि ननस सुयत एव नत्ययाऽ वष्करणान ज्ञात भक्यत इति॥ १८॥ पमातमा लचनाता-उत्तरहग परात बुद्ााप यवीत्तरसमये उत्तर न प्रातपादते तवाप्रतिभा निग्रहस्थानम न चावाननुभाषगास्या्वश्यकव्वास तनव दषण्ामास्वात वाघ्य परोक्षामनुवादकितत यव परीक्मनद्यापि नोत्तर प्रन पद्यत तवासाडर्ष्यान खभूचमश्राकपाठछुत्रया पैयम ।। १८।
तन ताटभकथाविक्कनी विकप तम राजपुरुषाडडगिभराकारये ग्टडजनाSडादाभर्व वशककार्य्याथमकरगे स्वग दाह अव पखती गमने वा शिरोरोगाडडाटमा प्रतिबन्ध वा नवकप। मन कायय व्यामप्राग्ववन कुत - सम्पुयोभाSडादना चत अममुभाषगमेव उत्तराम्ातपन्या वैत चप्रतिभवति चेत न उत्तरावसराभावात। व पुतल्त्तरम्फत्तावाप तददषण सन्भावय विद्येपसन्नवात यथा,- चिति सकसका काय्यत्वात् इळक्म् बवाडर व्यमिचारसावन्पया उम्ान्य तव चैदय पससमत् ब्रयात तदा म किमुत्तरम् अतोऽन महार्गवलिखित मया प विचारित किश्चित् काय्यसुद्ाव्य ग्ष गत्वा हृश्यत नत्यव विनेपसन्भवासृ॥ २ ॥ न्या-२
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[३३८ ] न्यायदशनम । [पूम प्रध्याय।
मतानुक्जा ॥ २१॥ य पवेशा चोदित दोष खपच्े्यपगम्यानुडत्य वति, भवत्पने ममान दाष इति म खपच्े दोषाभ्ययगमात्परपसे दोष प्रसञ्जयन पर मतमनुजानातीति मतानुन्ञा नाम निग्रह्द स्थानमापद्यत इति ॥ २१ ॥
पय्यनुयोज्यी नाम निग्रहाषपत्या चादनोय तस्यापक्तग निग्हस्थान प्राप्तोऽमोत्यननुयोग, एतच्च कम्य पराजय ? दृत्यनुयुप्तया परिषदा वचनीयम, न खलु निग्रह प्राप्त खकोपोन विव्ृगयादिति ॥२२॥ अनिग्रहस्थाने निग्रहस्थानाभियोगी निग्नु- योज्यानुयोग ।२३॥ निग्रहस्थानलक्षगास्य मिथ्याऽध्यवसायारदनिग्रहस्थाने निग्ट
मतानृज्ञा सवपात-वा्युपगमात दोषममहृत्यत्यय यथा गयत निन्य सवपत्वातित्यते वनावनकान्तिकलवन इत्ाभामानामव्यक भग्ाजनत्य कतकत्वा दति साधित बनगप पचममलवान् दोष दत्यकौ आस लात सश्रा+ हत्वाभामा इयामन्यका साडव अताननया निगहीत स्ात पमातापङ्मनमत भवनरत सपव दोषाणपगमात ॥ २१ ॥ पछ्यनुनज्य पक्षम लचयात।-निगहस्थान मापवतादानयद् निग्रइस्थानानुद्वावन मित्यथ। यब तनकामग्रहस्थानपात एकतगडावन सब न पय्यन रम्यापचथावसुर नियहस्यानहावनत्वावाच्कम आवसव तखात। नमु वत्ना कथमिदमुद्ाव्य खक्कोपोनाववरमस्ायुन्त्वलात चत ?- सत्यम् अध्यस्थनवतमुह्ाव्य वाद व
गिरनके ननु नग लचयति ।-पवसर यधाथानग्रहस्थान हारवनतारक्ष बनु, निगह्स्था नोड्ावन तन्तिथ एतेनामवसर मिग्रास्थानाड्ञायने एकानयासथान
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५म अध्याय ] द्ितो्या्िकम्। [a३e]
होतोडसोति पर बुवन निरनुयोज्यानुयोगावरिग्टद्दोतो वेदि तव्य इतति ॥ २३॥ सिद्ान्तमभ्यु पेत्यानियमात् कथाप्रसङ्गोऽप- सिद्ान्त ॥। २४॥ कस्यचिदथस्य तथाभाव प्रतिन्नाय प्रतिक्जातार्थविपर्य्या दनियमात कथा प्रसन्नयतोऽपसिद्वान्ती वेदितव्य यथा न मदात्म न जहाति न मता विनाश, नामदात्मान लभते नामदुत्पद्यत दति मिद्वान्तमभ्यपत्य सपक्ष व्यवस्थापयति एकप्रक्वतोद व्यक्न, विकाराणामन्वयदर्शनात, मृतन्विता्ा शरावाऽडदीना दृष्टमेकप्रक्कतिकत्वम, तथा चाय व्यत्तमेद सुख द खमोहान्वितो दृश्यते, तम्मात समन्वयदर्शनात सुखाऽडदिाभ रकप्रकतीद शरोरमिति, एवमुत्तवाननुयुज्यत,-अ्रथ प्रक्लति विकार दति कथ लत्तितव्यमिति१ यस्यावस्वितस्य धमान्तर निवृत्तो धमान्तर प्रवत्तत सा प्रक्ृति यञ्च धमान्तर प्रवत्तत म विकार इति सो्य प्रतिक्वातार्थविषय्यासादनियमात
निगहस्थानान्तरान च ना गमि। साय चतुड्ा-इल आतगाभासा नवमर ग्रहपस् चनवसरग्रहणसाकाम् ण्वोड्रावनम यथा व्यस्यसि चत प्रातत्रास्ान विशषयमि चत इत्त्वन्तरम एधमवसरमतोत्य कथनमपि यथा उच्चमामग्राह्यस्ापभब्दाऽडन पारसमाप्ो एवमन नागाध्ा ज्ञाना दाम नुभाष णावसरनुह्वाव्य बाधाडवप्वरण्ामुभाषय्यप्रत्त वादनि
सपासडान लक्षयति।-विद्धान ववशास्तकाराम्यपगतसथ स्वोह्मन्य बमयमात् कथाप्रसङ्ग इति तथा व कथाया खोऊ्कतासडान्तप्रय्यवाप ास द्वान्त तथा ध साहमतनाह वादप्याभत्य्युपैत्याऽडरन्ाया कथायाम दूष णाडारायाऽा वभा वस्यास त उत्पास यद्भ्यपति, तदापसिदान्त वस्वकदाभभतन कथामारभत तस : काराभ्युप
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न्यायदर्बनम । [पर म परध्याय। 1
कथां प्रसन्जयति, प्रतिच्जार्त खल्बनेन नासदाविभवति, म मत तिराभवतोति सदमतोख तिरीभावाSडविभावमन्तरगा न कस्यचचित प्रवृत्ति प्रवृत्तुपरमश्त भवति, मृदि खख्ववस्थिताया भविष्यति शरावाऽडदिलक्षण धर्मान्तरमिति प्रष्ृत्तिर्भरवति, अ्रभूदिति च प्रछृत्युपरम, तदतम्राडर्माणमपि न स्यात्, एव प्रत्यवस्थितो यदि मतश्ाउत्म हानमसतच्ाऽडम्म ला भ म्यपैति, तदस्यापमिद्ान्तो निग्रहस्थान भवत अथ नाभ्यपैौत, पत्तोऽस्य न सिरध्वति ॥२४। हेत्वाभासाञ्च यथोकता ॥२५॥ हत्ाभामाच्न निग्रहस्थानानि, कि पुनर्नक्षणन्तरयोगात हैत्वाभासा नियह नानत्वमापन्ना, यथा प्रमाणन प्रमयत्वम द्ृत्यत आह यथोती दूति।-हताभासनस्तगेनेव निग्रह् स्थानभाव इरति।त इम प्रमगाउड्दय पदाथा उहिष्टा लचिता परीकितासेति॥- ५ ॥ इति वातस्यायनीये न्यायभाष्े पञ्चमाव्यायस्य द्वितोयाऽडाफ्रकम्। ममाप्रच्चाय पञ्चमोऽध्याय ।। ५ू ॥। गभावरा नापासद्वान्दत विषाधितुमभ्यपत्यलक्रम मागतासुपासद्दान्त वर्षग मनन् इउन्यदतत ॥ २४ ॥ क्रमप्र प्रहत्वाभामलत्य व्रव्ये तदकथनयोअमाह -व मर हतासामा पमयया नन रूपया पूवमुत्ता तनव रपेय नषा निररुस्यनग क न नमगाना मपासतामात। सव चवारन्य दृष्टानत माधनवकन्य 3 समुत्ा अमत काचत तत्र पथाक्ा इत्यम्यानन्वयाउवत्ागस ।। २५॥
एघा मुनिप्रज्गातममूबदास शोविश्वमाथकतिना मुगभाइन्रय।
महाचाय्यऊवताया न्यायसूपतृत्ती पस्मीऽध्याय। समाप्ख्चेद भास्त्रम्।