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1. Pancha Brahma Upanishad

Pancha Brahma Upanishad

[ Sutra 1 ]

अथ पैप्पलादो भगवान्भो किमादौ किं जातमिति । सद्यो जातमिति किं भगव इति । अघोर इति । किं भगव इति । वामदेव इति । किं वा पुनरिमे भगव इति । तत्पुरुष इति । किं वा पुनरिमे भगव इति । सर्वेषां दिव्यानां प्रेरयिता ईशान इति । ईशानो भूतभव्यस्य सर्वेषां देवयोनिनाम् ॥1॥

atha paippalādo bhagavānbho kimādau kiṃ jātamiti । sadyo jātamiti kiṃ bhagava iti । aghora iti । kiṃ bhagava iti । vāmadeva iti । kiṃ vā punarime bhagava iti । tatpuruṣa iti । kiṃ vā punarime bhagava iti । sarveṣāṃ divyānāṃ prerayitā īśāna iti । īśāno bhūtabhavyasya sarveṣāṃ devayoninām ॥1॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — एक बार शाकल के द्वारा पूछने पर कि सर्वप्रथम क्या उत्पन्न हुआ? पैप्पलाद ने उत्तर देते हुए कहा-सर्वप्रथम ‘सद्योजात’ नामक ब्रह्म का आविर्भाव हुआ । शाकल ने पूछा-इसके अतिरिक्त क्या और भी कोई अन्य भेद है? पैप्पलाद जी ने कहा- ‘हाँ, ‘अघोर’ है । शाकल ने फिर प्रश्न किया कि क्या और भी अन्य भेद है? पैणलाद ने उत्तर दिया- ‘वामदेव । शाकल ने पुनः पूछा- क्या यही भेद हैं?’ पैप्पलाद जी ने कहा ‘नहीं, ‘तत्पुरुष’ नामक एक और भी भेद है । शाकल ने पुनः प्रश्न किया- अच्छा तो क्या यही चार भेद है? पैप्पलाद ओ ने कहा नहीं, सभी देवों को प्रेरित करने वाला ‘ईशान’ नामक एक भेद और है । यह सभी भूत, भविष्यत् एवं समस्त देवयोनियों का शासक है ॥1॥

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[ Sutra 2 ]

कति वर्णाः । कति भेदाः । कति शक्तयः । यत्सर्वं ताद्गुह्यम् ॥2॥

kati varṇāḥ । kati bhedāḥ । kati śaktayaḥ । yatsarvaṃ tādguhyam ॥2॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इसके कितने वर्ण हैं? कितने भेद (प्रकार) हैं? तथा कितनी शक्तियाँ हैं? ये समस्त बातें बड़ी । गोपनीय हैं (अतः अनधिकारियों से छिपाकर रखनी चाहिए) ॥2॥

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[ Sutra 3 ]

तस्मै नमो महादेवाय महारुद्राय ॥3॥

tasmai namo mahādevāya mahārudrāya ॥3॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — महारुद्र उन महादेव को नमस्कार है । भगवान् महेश ने पैप्पलाद जी को ये सभी उपदेश प्रदान किये ॥3॥

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[ Sutra 4 ]

प्रोवाच तस्मै भगवान्महेशः ॥4॥

provāca tasmai bhagavānmaheśaḥ ॥4॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — महारुद्र उन महादेव को नमस्कार है । भगवान् महेश ने पैप्पलाद जी को ये सभी उपदेश प्रदान किये ॥4॥

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[ Sutra 5 ]

गोप्याद्गोप्यतरं लोके यद्यस्ति शृणु शाकल । सद्योजातं मही पूषा रमा ब्रह्मा त्रिवृत्स्वरः ॥5॥

gopyādgopyataraṃ loke yadyasti śṛṇu śākala । sadyojātaṃ mahī pūṣā ramā brahmā trivṛtsvaraḥ ॥5॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — हे शाकल! इस लोक में अति गोपनीय बातों में भी जो अति गूढ़ है, उसे सुनो । वह है ‘सद्योजात’ नामक ब्रह्म । सभी तरह को अभीष्ट सिद्धियों को देने वाली मही,पूषा,रमा,ब्रह्मा, त्रिवृत् (सत, रज,तम), अकारादि स्वर, ऋग्वेद, गार्हपत्य(अग्नि),विविध मंत्र (नमः शिवाय आदि) सात स्वर (स, रे, ग, म,प,ध,नि), पीला वर्ण (रंग) तथा क्रिया नामक शक्ति आदि जिसके अनेक स्वरूप हैं ॥5॥

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[ Sutra 6 ]

ऋग्वेदो गार्हपत्यं च मन्त्राः सप्त स्वरास्तथा । वर्णं पोतं क्रिया शक्तिः सर्वाभीष्टफलप्रदम् ॥6॥

ṛgvedo gārhapatyaṃ ca mantrāḥ sapta svarāstathā । varṇaṃ potaṃ kriyā śaktiḥ sarvābhīṣṭaphalapradam ॥6॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — हे शाकल! इस लोक में अति गोपनीय बातों में भी जो अति गूढ़ है, उसे सुनो । वह है ‘सद्योजात’ नामक ब्रह्म । सभी तरह को अभीष्ट सिद्धियों को देने वाली मही,पूषा,रमा,ब्रह्मा, त्रिवृत् (सत, रज,तम), अकारादि स्वर, ऋग्वेद, गार्हपत्य(अग्नि),विविध मंत्र (नमः शिवाय आदि) सात स्वर (स, रे, ग, म,प,ध,नि), पीला वर्ण (रंग) तथा क्रिया नामक शक्ति आदि जिसके अनेक स्वरूप हैं ॥6॥

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[ Sutra 7 ]

अघोरं सलिलं चन्द्र गौरी वेदद्वितीयकम् । नीरदाभं स्वरं सान्द्रं दक्षिणाग्निरुदाहृतम् ॥7॥

aghoraṃ salilaṃ candra gaurī vedadvitīyakam । nīradābhaṃ svaraṃ sāndraṃ dakṣiṇāgnirudāhṛtam ॥7॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — हे शाकल! इस लोक में अति गोपनीय बातों में भी जो अति गूढ़ है, उसे सुनो । वह है ‘सद्योजात’ नामक ब्रह्म । सभी तरह को अभीष्ट सिद्धियों को देने वाली मही,पूषा,रमा,ब्रह्मा, त्रिवृत् (सत, रज,तम), अकारादि स्वर, ऋग्वेद, गार्हपत्य(अग्नि),विविध मंत्र (नमः शिवाय आदि) सात स्वर (स, रे, ग, म,प,ध,नि), पीला वर्ण (रंग) तथा क्रिया नामक शक्ति आदि जिसके अनेक स्वरूप हैं ॥7॥

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[ Sutra 8 ]

पञ्चाशद्वर्णसंयुक्तं स्थितिरिच्छाक्रियान्वितम् । शक्तिरक्षणसंयुक्तं सर्वाघौघविनाशनम् ॥8॥

pañcāśadvarṇasaṃyuktaṃ sthitiricchākriyānvitam । śaktirakṣaṇasaṃyuktaṃ sarvāghaughavināśanam ॥8॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जल, चन्द्र,गौरी, यजुर्वेद, नीरदाभ (मेघ की आभा वाले), स्वर (उकार), स्न्निग्ध, दक्षिणाग्नि आदि ये सभी अघोर के स्वरूप बतलाये गये हैं । ये तथा इनके अतिरिक्त पचास (अ से लेकर क्ष तक जो) वर्ण है, उनमे युक्त स्थिति, इच्छा तथा क्रिया शक्ति से युक्त (अपनी विकल्पित) शक्ति के रक्षण से युक्त जो अघोर का स्वरूप है, वह सभी तरह के पापों के समूह का शमन करने वाला, सभी दुष्टों का विनाश करने वाला तथा सभी तरह के ऐश्वर्य के फल को प्रदान करने वाला है ॥8॥

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[ Sutra 9 ]

सर्वदुष्टप्रशमनं सर्वेश्वर्यफलप्रदम् ॥9॥

sarvaduṣṭapraśamanaṃ sarveśvaryaphalapradam ॥9॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जल, चन्द्र,गौरी, यजुर्वेद, नीरदाभ (मेघ की आभा वाले), स्वर (उकार), स्न्निग्ध, दक्षिणाग्नि आदि ये सभी अघोर के स्वरूप बतलाये गये हैं । ये तथा इनके अतिरिक्त पचास (अ से लेकर क्ष तक जो) वर्ण है, उनमे युक्त स्थिति, इच्छा तथा क्रिया शक्ति से युक्त (अपनी विकल्पित) शक्ति के रक्षण से युक्त जो अघोर का स्वरूप है, वह सभी तरह के पापों के समूह का शमन करने वाला, सभी दुष्टों का विनाश करने वाला तथा सभी तरह के ऐश्वर्य के फल को प्रदान करने वाला है ॥9॥

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[ Sutra 10 ]

वामदेवं महाबोधदायकं पावकात्मकम् । विद्यालोकसमायुक्तं भानुकोटिसमप्रभम् ॥10॥

vāmadevaṃ mahābodhadāyakaṃ pāvakātmakam । vidyālokasamāyuktaṃ bhānukoṭisamaprabham ॥10॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — वामदेव’ महान् ज्ञान प्रदायक एवं तेजस्वी अग्नि के स्वरूप, विद्या के आलोक से आलोकित, करोड़ों सूर्यों के सदृश तेजोमय तथा सर्वदा आनन्द स्वरूप हैं । अष्टगान (सामवेद के कहे गये सात गान एवं एक भरत शास्त्र निष्पन्न गीति) से समन्वित मन्द स्वर (आ, आ, आम्) के अधीन तथा सर्वोत्तम आहवनीय (अग्निसदृश), ज्ञान एवं संहार शक्ति से समन्वित उनका (वामदेव का) स्वरूप है । वह शुक्ल वर्ण, तमोगुण युक्त तथा स्वयं ही पूर्णज्ञाता, (जाग्रत् आदि) तीनों धामों के नियामक, तीनों धामों (विश्व, तैजस, प्राज्ञ) से युक्त, सभी को सौभाग्य प्रदान करने वाले, मनुष्यों के सभी कर्मों के फल प्रदाता तथा (अ, क, च, ट, त, प, य, श) इन आठ अक्षरों (अथवा आठ क्षरित न होने वाले तत्वों अथवा ॐनमो महादेवाय के आठ अक्षरों ) तथा अष्टदल (पंखुड़ियों) से युक्त कमल अर्थात् हृदय रूपी कमल में निवास करने वाले हैं ॥10॥

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[ Sutra 11 ]

प्रसन्नं सामवेदाख्यं गानाष्टकसमन्वितम् । धीरस्वरमधीनं चाहवनीयमनुत्तमम् ॥11॥

prasannaṃ sāmavedākhyaṃ gānāṣṭakasamanvitam । dhīrasvaramadhīnaṃ cāhavanīyamanuttamam ॥11॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — वामदेव’ महान् ज्ञान प्रदायक एवं तेजस्वी अग्नि के स्वरूप, विद्या के आलोक से आलोकित, करोड़ों सूर्यों के सदृश तेजोमय तथा सर्वदा आनन्द स्वरूप हैं । अष्टगान (सामवेद के कहे गये सात गान एवं एक भरत शास्त्र निष्पन्न गीति) से समन्वित मन्द स्वर (आ, आ, आम्) के अधीन तथा सर्वोत्तम आहवनीय (अग्निसदृश), ज्ञान एवं संहार शक्ति से समन्वित उनका (वामदेव का) स्वरूप है । वह शुक्ल वर्ण, तमोगुण युक्त तथा स्वयं ही पूर्णज्ञाता, (जाग्रत् आदि) तीनों धामों के नियामक, तीनों धामों (विश्व, तैजस, प्राज्ञ) से युक्त, सभी को सौभाग्य प्रदान करने वाले, मनुष्यों के सभी कर्मों के फल प्रदाता तथा (अ, क, च, ट, त, प, य, श) इन आठ अक्षरों (अथवा आठ क्षरित न होने वाले तत्वों अथवा ॐनमो महादेवाय के आठ अक्षरों ) तथा अष्टदल (पंखुड़ियों) से युक्त कमल अर्थात् हृदय रूपी कमल में निवास करने वाले हैं ॥11॥

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[ Sutra 12 ]

ज्ञानसंहारसंयुक्तं शक्तिद्वयसमन्वितम् । वर्णं शुक्लं तमोमिश्र पूर्णबोधकरं स्वयम् ॥12॥

jñānasaṃhārasaṃyuktaṃ śaktidvayasamanvitam । varṇaṃ śuklaṃ tamomiśra pūrṇabodhakaraṃ svayam ॥12॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — वामदेव’ महान् ज्ञान प्रदायक एवं तेजस्वी अग्नि के स्वरूप, विद्या के आलोक से आलोकित, करोड़ों सूर्यों के सदृश तेजोमय तथा सर्वदा आनन्द स्वरूप हैं । अष्टगान (सामवेद के कहे गये सात गान एवं एक भरत शास्त्र निष्पन्न गीति) से समन्वित मन्द स्वर (आ, आ, आम्) के अधीन तथा सर्वोत्तम आहवनीय (अग्निसदृश), ज्ञान एवं संहार शक्ति से समन्वित उनका (वामदेव का) स्वरूप है । वह शुक्ल वर्ण, तमोगुण युक्त तथा स्वयं ही पूर्णज्ञाता, (जाग्रत् आदि) तीनों धामों के नियामक, तीनों धामों (विश्व, तैजस, प्राज्ञ) से युक्त, सभी को सौभाग्य प्रदान करने वाले, मनुष्यों के सभी कर्मों के फल प्रदाता तथा (अ, क, च, ट, त, प, य, श) इन आठ अक्षरों (अथवा आठ क्षरित न होने वाले तत्वों अथवा ॐनमो महादेवाय के आठ अक्षरों ) तथा अष्टदल (पंखुड़ियों) से युक्त कमल अर्थात् हृदय रूपी कमल में निवास करने वाले हैं ॥12॥

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[ Sutra 13 ]

धामत्रयनियन्तारं धामत्रयसमन्वितम् । सर्वसौभाग्यदं नृणां सर्वकर्मफलप्रदम् ॥13॥

dhāmatrayaniyantāraṃ dhāmatrayasamanvitam । sarvasaubhāgyadaṃ nṛṇāṃ sarvakarmaphalapradam ॥13॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — वामदेव’ महान् ज्ञान प्रदायक एवं तेजस्वी अग्नि के स्वरूप, विद्या के आलोक से आलोकित, करोड़ों सूर्यों के सदृश तेजोमय तथा सर्वदा आनन्द स्वरूप हैं । अष्टगान (सामवेद के कहे गये सात गान एवं एक भरत शास्त्र निष्पन्न गीति) से समन्वित मन्द स्वर (आ, आ, आम्) के अधीन तथा सर्वोत्तम आहवनीय (अग्निसदृश), ज्ञान एवं संहार शक्ति से समन्वित उनका (वामदेव का) स्वरूप है । वह शुक्ल वर्ण, तमोगुण युक्त तथा स्वयं ही पूर्णज्ञाता, (जाग्रत् आदि) तीनों धामों के नियामक, तीनों धामों (विश्व, तैजस, प्राज्ञ) से युक्त, सभी को सौभाग्य प्रदान करने वाले, मनुष्यों के सभी कर्मों के फल प्रदाता तथा (अ, क, च, ट, त, प, य, श) इन आठ अक्षरों (अथवा आठ क्षरित न होने वाले तत्वों अथवा ॐनमो महादेवाय के आठ अक्षरों ) तथा अष्टदल (पंखुड़ियों) से युक्त कमल अर्थात् हृदय रूपी कमल में निवास करने वाले हैं ॥13॥

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[ Sutra 14 ]

अष्टाक्षरसमायुक्तमष्टपत्रान्तरस्थितम् ॥14॥

aṣṭākṣarasamāyuktamaṣṭapatrāntarasthitam ॥14॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — वामदेव’ महान् ज्ञान प्रदायक एवं तेजस्वी अग्नि के स्वरूप, विद्या के आलोक से आलोकित, करोड़ों सूर्यों के सदृश तेजोमय तथा सर्वदा आनन्द स्वरूप हैं । अष्टगान (सामवेद के कहे गये सात गान एवं एक भरत शास्त्र निष्पन्न गीति) से समन्वित मन्द स्वर (आ, आ, आम्) के अधीन तथा सर्वोत्तम आहवनीय (अग्निसदृश), ज्ञान एवं संहार शक्ति से समन्वित उनका (वामदेव का) स्वरूप है । वह शुक्ल वर्ण, तमोगुण युक्त तथा स्वयं ही पूर्णज्ञाता, (जाग्रत् आदि) तीनों धामों के नियामक, तीनों धामों (विश्व, तैजस, प्राज्ञ) से युक्त, सभी को सौभाग्य प्रदान करने वाले, मनुष्यों के सभी कर्मों के फल प्रदाता तथा (अ, क, च, ट, त, प, य, श) इन आठ अक्षरों (अथवा आठ क्षरित न होने वाले तत्वों अथवा ॐनमो महादेवाय के आठ अक्षरों ) तथा अष्टदल (पंखुड़ियों) से युक्त कमल अर्थात् हृदय रूपी कमल में निवास करने वाले हैं ॥14॥

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[ Sutra 15 ]

यत्तत्तत्पुरुषं प्रोक्तं वायुमण्डलसंवृतम् । पञ्चाग्निना समायुक्तं मन्त्रशक्तिनियामकम् ॥15॥

yattattatpuruṣaṃ proktaṃ vāyumaṇḍalasaṃvṛtam । pañcāgninā samāyuktaṃ mantraśaktiniyāmakam ॥15॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो यह ‘तत्पुरुष’ हमने कहा है, वह वायुमण्डल से आपूरित पाँच अग्नियों से संयुक्त होकर मंत्र शक्ति का नियामक अर्थात् नियमन करने वाला है । वे स्वर एवं व्यञ्जन के रूप में पचास संख्या से प्रसिद्ध, अथर्ववेद के स्वरूप वाले, अनन्त कोटि गणों के अध्यक्ष तथा अखण्ड अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड रूप शरीर वाले हैं । उन (तत्पुरुष) का वर्ण लाल है, वे समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाले तथा सब प्रकार की आधि-व्याधियों (मानसिक एवं शारीरिक रोगों) को अनुपम औषधि हैं । ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, पालन एवं संहार के एक मात्र कारण हैं और समस्त शक्तियों को धारण करने में समर्थ हैं । इसके अतिरिक्त वे (जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति) तीनों अवस्थाओं से परे तुरीयावस्था (चतुर्थ अवस्था) स्वरूप एवं ब्रह्म की संज्ञा से युक्त हैं । वे (ब्रह्म) ही सभी को प्रादुर्भूत करने वाले, ब्रह्मा एवं विष्णु आदि के द्वारा सर्वदा सेवित होने वाले हैं ॥15॥

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[ Sutra 16 ]

पञ्चाशत्स्वरवर्णाख्यमथर्ववेदस्वरूपकम् । कोटिकोटिगणाध्यक्षं ब्रह्माण्डाखण्डविग्रहम् ॥16॥

pañcāśatsvaravarṇākhyamatharvavedasvarūpakam । koṭikoṭigaṇādhyakṣaṃ brahmāṇḍākhaṇḍavigraham ॥16॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो यह ‘तत्पुरुष’ हमने कहा है, वह वायुमण्डल से आपूरित पाँच अग्नियों से संयुक्त होकर मंत्र शक्ति का नियामक अर्थात् नियमन करने वाला है । वे स्वर एवं व्यञ्जन के रूप में पचास संख्या से प्रसिद्ध, अथर्ववेद के स्वरूप वाले, अनन्त कोटि गणों के अध्यक्ष तथा अखण्ड अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड रूप शरीर वाले हैं । उन (तत्पुरुष) का वर्ण लाल है, वे समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाले तथा सब प्रकार की आधि-व्याधियों (मानसिक एवं शारीरिक रोगों) को अनुपम औषधि हैं । ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, पालन एवं संहार के एक मात्र कारण हैं और समस्त शक्तियों को धारण करने में समर्थ हैं । इसके अतिरिक्त वे (जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति) तीनों अवस्थाओं से परे तुरीयावस्था (चतुर्थ अवस्था) स्वरूप एवं ब्रह्म की संज्ञा से युक्त हैं । वे (ब्रह्म) ही सभी को प्रादुर्भूत करने वाले, ब्रह्मा एवं विष्णु आदि के द्वारा सर्वदा सेवित होने वाले हैं ॥16॥

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[ Sutra 17 ]

वर्णं रक्तं कामदं च सर्वाधिव्याधिभेषजम् । सृष्टिस्थितिलयादीनां कारणं सर्वशक्तिधृक् ॥17॥

varṇaṃ raktaṃ kāmadaṃ ca sarvādhivyādhibheṣajam । sṛṣṭisthitilayādīnāṃ kāraṇaṃ sarvaśaktidhṛk ॥17॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो यह ‘तत्पुरुष’ हमने कहा है, वह वायुमण्डल से आपूरित पाँच अग्नियों से संयुक्त होकर मंत्र शक्ति का नियामक अर्थात् नियमन करने वाला है । वे स्वर एवं व्यञ्जन के रूप में पचास संख्या से प्रसिद्ध, अथर्ववेद के स्वरूप वाले, अनन्त कोटि गणों के अध्यक्ष तथा अखण्ड अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड रूप शरीर वाले हैं । उन (तत्पुरुष) का वर्ण लाल है, वे समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाले तथा सब प्रकार की आधि-व्याधियों (मानसिक एवं शारीरिक रोगों) को अनुपम औषधि हैं । ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, पालन एवं संहार के एक मात्र कारण हैं और समस्त शक्तियों को धारण करने में समर्थ हैं । इसके अतिरिक्त वे (जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति) तीनों अवस्थाओं से परे तुरीयावस्था (चतुर्थ अवस्था) स्वरूप एवं ब्रह्म की संज्ञा से युक्त हैं । वे (ब्रह्म) ही सभी को प्रादुर्भूत करने वाले, ब्रह्मा एवं विष्णु आदि के द्वारा सर्वदा सेवित होने वाले हैं ॥17॥

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[ Sutra 18 ]

अवस्थात्रितयातीतं तुरीयं ब्रह्मसंज्ञितम् । ब्रह्मविष्ण्वादिभिः सेव्यं सर्वेषां जनकं परम् ॥18॥

avasthātritayātītaṃ turīyaṃ brahmasaṃjñitam । brahmaviṣṇvādibhiḥ sevyaṃ sarveṣāṃ janakaṃ param ॥18॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो यह ‘तत्पुरुष’ हमने कहा है, वह वायुमण्डल से आपूरित पाँच अग्नियों से संयुक्त होकर मंत्र शक्ति का नियामक अर्थात् नियमन करने वाला है । वे स्वर एवं व्यञ्जन के रूप में पचास संख्या से प्रसिद्ध, अथर्ववेद के स्वरूप वाले, अनन्त कोटि गणों के अध्यक्ष तथा अखण्ड अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड रूप शरीर वाले हैं । उन (तत्पुरुष) का वर्ण लाल है, वे समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाले तथा सब प्रकार की आधि-व्याधियों (मानसिक एवं शारीरिक रोगों) को अनुपम औषधि हैं । ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, पालन एवं संहार के एक मात्र कारण हैं और समस्त शक्तियों को धारण करने में समर्थ हैं । इसके अतिरिक्त वे (जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति) तीनों अवस्थाओं से परे तुरीयावस्था (चतुर्थ अवस्था) स्वरूप एवं ब्रह्म की संज्ञा से युक्त हैं । वे (ब्रह्म) ही सभी को प्रादुर्भूत करने वाले, ब्रह्मा एवं विष्णु आदि के द्वारा सर्वदा सेवित होने वाले हैं ॥18॥

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[ Sutra 19 ]

ईशानं परमं विद्यात्प्रेरकं बुद्धिसाक्षिणम् । आकाशात्मकमव्यक्तमोंकारस्वरभूषितम् ॥19॥

īśānaṃ paramaṃ vidyātprerakaṃ buddhisākṣiṇam । ākāśātmakamavyaktamoṃkārasvarabhūṣitam ॥19॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘ईशान’ को परमात्मतत्त्व के रूप में प्रेरणा प्रदान करने वाला जानना चाहिए । (वे) बुद्धि के साक्षीरूप, आकाश स्वरूप (सर्वत्र व्यापक), अव्यक्त एवं ॐकार के स्वर से (ध्वनि से) विभूषित हैं । वे समस्त देवों के स्वरूप वाले, शान्त, शान्ति से भी परे अर्थात् अत्यन्त शान्ति से सम्पन्न, स्वरों से परे (अर्थात् स्वरों से जिनका ज्ञान सम्भव नहीं), ‘अकार’ आदि स्वरों के जो अधिष्ठाता स्वरुप हैं तथा जो आकाशमय (व्यापक) शरीर से युक्त हैं । (वे) सृष्टि आदि पाँच (सृष्टि, स्थिति, ध्वंस, विधान और अनुग्रह) कृत्यों के नियन्ता एवं सर्वव्यापक विराट पंच ब्रह्मस्वरूप हैं । वे (ईशान) पंचब्रह्म का उपसंहार (निर्वाण) करके अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित होकर अपनी माया के वैभव-प्रभाव से सबका संहार करके अपनी ही आत्मा में प्रतिष्ठित रहने वाले हैं । वे (ईशान) पंच ब्रह्म से परे रहकर स्वयं अपने ही तेज से प्रकाशित हैं और आदि, मध्य एवं अन्त में भी किसी अन्य कारण से भासित नहीं होते, वरन् (वह) स्वयं प्रकाश स्वरूप एवं स्वयम्भू हैं ॥19॥

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[ Sutra 20 ]

सर्वदेवमयं शान्तं शान्त्यतीतं स्वराद्वहिः । अकारादिस्वराध्यक्षमाकाशमयविग्रहम् ॥20॥

sarvadevamayaṃ śāntaṃ śāntyatītaṃ svarādvahiḥ । akārādisvarādhyakṣamākāśamayavigraham ॥20॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘ईशान’ को परमात्मतत्त्व के रूप में प्रेरणा प्रदान करने वाला जानना चाहिए । (वे) बुद्धि के साक्षीरूप, आकाश स्वरूप (सर्वत्र व्यापक), अव्यक्त एवं ॐकार के स्वर से (ध्वनि से) विभूषित हैं । वे समस्त देवों के स्वरूप वाले, शान्त, शान्ति से भी परे अर्थात् अत्यन्त शान्ति से सम्पन्न, स्वरों से परे (अर्थात् स्वरों से जिनका ज्ञान सम्भव नहीं), ‘अकार’ आदि स्वरों के जो अधिष्ठाता स्वरुप हैं तथा जो आकाशमय (व्यापक) शरीर से युक्त हैं । (वे) सृष्टि आदि पाँच (सृष्टि, स्थिति, ध्वंस, विधान और अनुग्रह) कृत्यों के नियन्ता एवं सर्वव्यापक विराट पंच ब्रह्मस्वरूप हैं । वे (ईशान) पंचब्रह्म का उपसंहार (निर्वाण) करके अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित होकर अपनी माया के वैभव-प्रभाव से सबका संहार करके अपनी ही आत्मा में प्रतिष्ठित रहने वाले हैं । वे (ईशान) पंच ब्रह्म से परे रहकर स्वयं अपने ही तेज से प्रकाशित हैं और आदि, मध्य एवं अन्त में भी किसी अन्य कारण से भासित नहीं होते, वरन् (वह) स्वयं प्रकाश स्वरूप एवं स्वयम्भू हैं ॥20॥

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[ Sutra 21 ]

पञ्चकृत्यनियन्तारं पञ्चब्रह्मात्मकं बृहत् ॥21॥

pañcakṛtyaniyantāraṃ pañcabrahmātmakaṃ bṛhat ॥21॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘ईशान’ को परमात्मतत्त्व के रूप में प्रेरणा प्रदान करने वाला जानना चाहिए । (वे) बुद्धि के साक्षीरूप, आकाश स्वरूप (सर्वत्र व्यापक), अव्यक्त एवं ॐकार के स्वर से (ध्वनि से) विभूषित हैं । वे समस्त देवों के स्वरूप वाले, शान्त, शान्ति से भी परे अर्थात् अत्यन्त शान्ति से सम्पन्न, स्वरों से परे (अर्थात् स्वरों से जिनका ज्ञान सम्भव नहीं), ‘अकार’ आदि स्वरों के जो अधिष्ठाता स्वरुप हैं तथा जो आकाशमय (व्यापक) शरीर से युक्त हैं । (वे) सृष्टि आदि पाँच (सृष्टि, स्थिति, ध्वंस, विधान और अनुग्रह) कृत्यों के नियन्ता एवं सर्वव्यापक विराट पंच ब्रह्मस्वरूप हैं । वे (ईशान) पंचब्रह्म का उपसंहार (निर्वाण) करके अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित होकर अपनी माया के वैभव-प्रभाव से सबका संहार करके अपनी ही आत्मा में प्रतिष्ठित रहने वाले हैं । वे (ईशान) पंच ब्रह्म से परे रहकर स्वयं अपने ही तेज से प्रकाशित हैं और आदि, मध्य एवं अन्त में भी किसी अन्य कारण से भासित नहीं होते, वरन् (वह) स्वयं प्रकाश स्वरूप एवं स्वयम्भू हैं ॥21॥

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[ Sutra 22 ]

पञ्चब्रह्मोपसंहारं कृत्वा स्वात्मनि संस्थितः । स्वमायावैभवान्सर्वान्संहृत्य स्वात्मनि स्थितः ॥22॥

pañcabrahmopasaṃhāraṃ kṛtvā svātmani saṃsthitaḥ । svamāyāvaibhavānsarvānsaṃhṛtya svātmani sthitaḥ ॥22॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘ईशान’ को परमात्मतत्त्व के रूप में प्रेरणा प्रदान करने वाला जानना चाहिए । (वे) बुद्धि के साक्षीरूप, आकाश स्वरूप (सर्वत्र व्यापक), अव्यक्त एवं ॐकार के स्वर से (ध्वनि से) विभूषित हैं । वे समस्त देवों के स्वरूप वाले, शान्त, शान्ति से भी परे अर्थात् अत्यन्त शान्ति से सम्पन्न, स्वरों से परे (अर्थात् स्वरों से जिनका ज्ञान सम्भव नहीं), ‘अकार’ आदि स्वरों के जो अधिष्ठाता स्वरुप हैं तथा जो आकाशमय (व्यापक) शरीर से युक्त हैं । (वे) सृष्टि आदि पाँच (सृष्टि, स्थिति, ध्वंस, विधान और अनुग्रह) कृत्यों के नियन्ता एवं सर्वव्यापक विराट पंच ब्रह्मस्वरूप हैं । वे (ईशान) पंचब्रह्म का उपसंहार (निर्वाण) करके अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित होकर अपनी माया के वैभव-प्रभाव से सबका संहार करके अपनी ही आत्मा में प्रतिष्ठित रहने वाले हैं। वे (ईशान) पंच ब्रह्म से परे रहकर स्वयं अपने ही तेज से प्रकाशित हैं और आदि, मध्य एवं अन्त में भी किसी अन्य कारण से भासित नहीं होते, वरन् (वह) स्वयं प्रकाश स्वरूप एवं स्वयम्भू हैं ॥22॥

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[ Sutra 23 ]

पञ्चब्रह्मात्म कातीतो भासते स्वस्वते-जसा । आदावन्ते च मध्ये च भासते नान्यहेतुना ॥23॥

pañcabrahmātma kātīto bhāsate svasvate-jasā । ādāvante ca madhye ca bhāsate nānyahetunā ॥23॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘ईशान’ को परमात्मतत्त्व के रूप में प्रेरणा प्रदान करने वाला जानना चाहिए । (वे) बुद्धि के साक्षीरूप, आकाश स्वरूप (सर्वत्र व्यापक), अव्यक्त एवं ॐकार के स्वर से (ध्वनि से) विभूषित हैं । वे समस्त देवों के स्वरूप वाले, शान्त, शान्ति से भी परे अर्थात् अत्यन्त शान्ति से सम्पन्न, स्वरों से परे (अर्थात् स्वरों से जिनका ज्ञान सम्भव नहीं), ‘अकार’ आदि स्वरों के जो अधिष्ठाता स्वरुप हैं तथा जो आकाशमय (व्यापक) शरीर से युक्त हैं । (वे) सृष्टि आदि पाँच (सृष्टि, स्थिति, ध्वंस, विधान और अनुग्रह) कृत्यों के नियन्ता एवं सर्वव्यापक विराट पंच ब्रह्मस्वरूप हैं । वे (ईशान) पंचब्रह्म का उपसंहार (निर्वाण) करके अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित होकर अपनी माया के वैभव-प्रभाव से सबका संहार करके अपनी ही आत्मा में प्रतिष्ठित रहने वाले हैं । वे (ईशान) पंच ब्रह्म से परे रहकर स्वयं अपने ही तेज से प्रकाशित हैं और आदि, मध्य एवं अन्त में भी किसी अन्य कारण से भासित नहीं होते, वरन् (वह) स्वयं प्रकाश स्वरूप एवं स्वयम्भू हैं ॥23॥

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[ Sutra 24 ]

मायया मोहिताः शंभोर्महादेवं जगद्गुरुम् । न जानन्ति सुराः सर्वे सर्वकारणकारणम् । न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य परात्परं पुरुषं विश्वधाम ॥24॥

māyayā mohitāḥ śaṃbhormahādevaṃ jagadgurum । na jānanti surāḥ sarve sarvakāraṇakāraṇam । na saṃdṛśe tiṣṭhati rūpamasya parātparaṃ puruṣaṃ viśvadhāma ॥24॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — भगवान् शम्भु की माया से मोहित देवगण, सम्पूर्ण जगत् के गुरु एवं समस्त कारणों के कारण उन देवाधिदेव महादेव को नहीं जानते । सम्पूर्ण विश्व को प्रकाश देने वाले उन परात्पर विराट् पुरुष का रूप सामान्य दृष्टि से नहीं देखा जा सकता । जिसके द्वारा यह विश्व प्रकाशित होता है, जिसमें विलय को प्राप्त हो जाता है, ऐसा था पर अविनाशी ब्रह्म शान्त स्वरूप है । वहीं अद्वितीय परमपद स्वरूप में स्वयं हूँ ॥24॥

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[ Sutra 25 ]

येन प्रकाशते विश्वं यत्रैव प्रविलीयते । तद्ब्रह्म परमं शान्तं तद्ब्रह्मास्मि परं पदम् ॥25॥

yena prakāśate viśvaṃ yatraiva pravilīyate । tadbrahma paramaṃ śāntaṃ tadbrahmāsmi paraṃ padam ॥25॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — भगवान् शम्भु की माया से मोहित देवगण, सम्पूर्ण जगत् के गुरु एवं समस्त कारणों के कारण उन देवाधिदेव महादेव को नहीं जानते । सम्पूर्ण विश्व को प्रकाश देने वाले उन परात्पर विराट् पुरुष का रूप सामान्य दृष्टि से नहीं देखा जा सकता । जिसके द्वारा यह विश्व प्रकाशित होता है, जिसमें विलय को प्राप्त हो जाता है, ऐसा था पर अविनाशी ब्रह्म शान्त स्वरूप है । वहीं अद्वितीय परमपद स्वरूप में स्वयं हूँ ॥25॥

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[ Sutra 26 ]

पञ्चब्रह्ममिदं विद्यात्सद्योजातादिपूर्वकम् । दृश्यते श्रूयते यच्च पञ्चब्रह्मात्मकं स्वयम् ॥26॥

pañcabrahmamidaṃ vidyātsadyojātādipūrvakam । dṛśyate śrūyate yacca pañcabrahmātmakaṃ svayam ॥26॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘सद्योजात’ आदि यही पंचब्रह्म हैं, इस चराचर जगत् में जो भी दृष्टिगोचर हो रहा है अथवा सुनाई पड़ रहा है, वह सभी कुछ पंच ब्रह्मात्मक ही है । पांच रूपों में प्रतिष्ठित वह (सद्योजात) ब्रह्मकार्य कहा गया है । इस ब्रह्मकार्य को जान करके ‘ईशान’ को प्राप्त किया जाता है । यदि विद्वान् मनुष्य उन पंच ब्रह्मात्मक को अपनी आत्मा में विलीन करके (अर्थात् मान कर) ‘सोऽहमस्मि’ अर्थात् ‘मैं वही पंचब्रह्म हूँ, स्वयं उन्हीं का रूप हूँ । इस प्रकार समझे, तो (वह) ब्रह्मामृत का रसास्वादन करने वाला हो जाता है । अतः इस प्रकार से जो ब्रह्म के स्वरूप को जान लेता है, वह मुक्ति को प्राप्त कर लेता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥26॥

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[ Sutra 27 ]

पञ्चधा वर्तमानं तं ब्रह्मकार्यमिति स्मृतम् । ब्रह्मकार्यमिति ज्ञात्वा ईशानं प्रतिपद्यते ॥27॥

pañcadhā vartamānaṃ taṃ brahmakāryamiti smṛtam । brahmakāryamiti jñātvā īśānaṃ pratipadyate ॥27॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘सद्योजात’ आदि यही पंचब्रह्म हैं, इस चराचर जगत् में जो भी दृष्टिगोचर हो रहा है अथवा सुनाई पड़ रहा है, वह सभी कुछ पंच ब्रह्मात्मक ही है । पांच रूपों में प्रतिष्ठित वह (सद्योजात) ब्रह्मकार्य कहा गया है । इस ब्रह्मकार्य को जान करके ‘ईशान’ को प्राप्त किया जाता है । यदि विद्वान् मनुष्य उन पंच ब्रह्मात्मक को अपनी आत्मा में विलीन करके (अर्थात् मान कर) ‘सोऽहमस्मि’ अर्थात् ‘मैं वही पंचब्रह्म हूँ, स्वयं उन्हीं का रूप हूँ । इस प्रकार समझे, तो (वह) ब्रह्मामृत का रसास्वादन करने वाला हो जाता है । अतः इस प्रकार से जो ब्रह्म के स्वरूप को जान लेता है, वह मुक्ति को प्राप्त कर लेता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥27॥

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[ Sutra 28 ]

पञ्चब्रह्मात्मकं सर्वं स्वात्मनि प्रविलाप्य च । सोऽहमस्मीति जानीयाद्विद्वान्ब्रह्मामृतो भवेत् ॥28॥

pañcabrahmātmakaṃ sarvaṃ svātmani pravilāpya ca । so'hamasmīti jānīyādvidvānbrahmāmṛto bhavet ॥28॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘सद्योजात’ आदि यही पंचब्रह्म हैं, इस चराचर जगत् में जो भी दृष्टिगोचर हो रहा है अथवा सुनाई पड़ रहा है, वह सभी कुछ पंच ब्रह्मात्मक ही है । पांच रूपों में प्रतिष्ठित वह (सद्योजात) ब्रह्मकार्य कहा गया है । इस ब्रह्मकार्य को जान करके ‘ईशान’ को प्राप्त किया जाता है । यदि विद्वान् मनुष्य उन पंच ब्रह्मात्मक को अपनी आत्मा में विलीन करके (अर्थात् मान कर) ‘सोऽहमस्मि’ अर्थात् ‘मैं वही पंचब्रह्म हूँ, स्वयं उन्हीं का रूप हूँ । इस प्रकार समझे, तो (वह) ब्रह्मामृत का रसास्वादन करने वाला हो जाता है । अतः इस प्रकार से जो ब्रह्म के स्वरूप को जान लेता है, वह मुक्ति को प्राप्त कर लेता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥28॥

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[ Sutra 29 ]

इत्येतद्ब्रह्म जानीयाद्यः स मुक्तो न संशयः ॥29॥

ityetadbrahma jānīyādyaḥ sa mukto na saṃśayaḥ ॥29॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘सद्योजात’ आदि यही पंचब्रह्म हैं, इस चराचर जगत् में जो भी दृष्टिगोचर हो रहा है अथवा सुनाई पड़ रहा है, वह सभी कुछ पंच ब्रह्मात्मक ही है । पांच रूपों में प्रतिष्ठित वह (सद्योजात) ब्रह्मकार्य कहा गया है । इस ब्रह्मकार्य को जान करके ‘ईशान’ को प्राप्त किया जाता है । यदि विद्वान् मनुष्य उन पंच ब्रह्मात्मक को अपनी आत्मा में विलीन करके (अर्थात् मान कर) ‘सोऽहमस्मि’ अर्थात् ‘मैं वही पंचब्रह्म हूँ, स्वयं उन्हीं का रूप हूँ । इस प्रकार समझे, तो (वह) ब्रह्मामृत का रसास्वादन करने वाला हो जाता है । अतः इस प्रकार से जो ब्रह्म के स्वरूप को जान लेता है, वह मुक्ति को प्राप्त कर लेता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥29॥

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[ Sutra 30 ]

पञ्चाक्षरमयं शम्भु परब्रह्मस्वरूपिणम् । नकारादियकारान्तं ज्ञात्वा पञ्चाक्षरं जपेत् ॥30॥

pañcākṣaramayaṃ śambhu parabrahmasvarūpiṇam । nakārādiyakārāntaṃ jñātvā pañcākṣaraṃ jape ॥30॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — पंचाक्षरमय उस परब्रह्म स्वरूप भगवान् शम्भु को जान करके प्रारम्भ में ‘नकार’ और अन्त में ‘वकार’ है जिसके, ऐसे पंचाक्षर मंत्र (नमः शिवाय) को जपना चाहिए । समस्त वस्तुओं को पंचात्मक ब्रह्म के रूप में जानकार सर्वत्र पंचब्रह्म तत्त्व का ही दर्शन करना चाहिए । जो भी व्यक्ति भक्ति-भावनापूर्वक पंचब्रह्मात्मक विद्या को पढ़ता है, वह स्वयं ही पंचब्रह्म का साकार रूप होकर पंचब्रह्म की समीपता को प्राप्त कर लेता है ॥30॥

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[ Sutra 31 ]

सर्वं पशात्मकं विद्यात्पञ्चब्रह्मात्मतत्त्वत: ॥31॥

sarvaṃ paśātmakaṃ vidyātpañcabrahmātmatattvata: ॥31॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — पंचाक्षरमय उस परब्रह्म स्वरूप भगवान् शम्भु को जान करके प्रारम्भ में ‘नकार’ और अन्त में ‘वकार’ है जिसके, ऐसे पंचाक्षर मंत्र (नमः शिवाय) को जपना चाहिए । समस्त वस्तुओं को पंचात्मक ब्रह्म के रूप में जानकार सर्वत्र पंचब्रह्म तत्त्व का ही दर्शन करना चाहिए। जो भी व्यक्ति भक्ति-भावनापूर्वक पंचब्रह्मात्मक विद्या को पढ़ता है, वह स्वयं ही पंचब्रह्म का साकार रूप होकर पंचब्रह्म की समीपता को प्राप्त कर लेता है ॥31॥

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[ Sutra 32 ]

पञ्चब्रह्मात्मिकीं विद्यां योऽधीते भक्तिभावितः । स पश्चात्मकतामेत्य भासते पञ्चधा स्वयम् ॥32॥

pañcabrahmātmikīṃ vidyāṃ yo'dhīte bhaktibhāvitaḥ । sa paścātmakatāmetya bhāsate pañcadhā svayam ॥32॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — पंचाक्षरमय उस परब्रह्म स्वरूप भगवान् शम्भु को जान करके प्रारम्भ में ‘नकार’ और अन्त में ‘वकार’ है जिसके, ऐसे पंचाक्षर मंत्र (नमः शिवाय) को जपना चाहिए । समस्त वस्तुओं को पंचात्मक ब्रह्म के रूप में जानकार सर्वत्र पंचब्रह्म तत्त्व का ही दर्शन करना चाहिए । जो भी व्यक्ति भक्ति-भावनापूर्वक पंचब्रह्मात्मक विद्या को पढ़ता है, वह स्वयं ही पंचब्रह्म का साकार रूप होकर पंचब्रह्म की समीपता को प्राप्त कर लेता है ॥32॥

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[ Sutra 33 ]

एवमुक्त्वा महादेवो गालवस्य महात्मनः । कृपां चकार तत्रैव स्वान्तर्धिमगमत्स्वयम् ॥33॥

evamuktvā mahādevo gālavasya mahātmanaḥ । kṛpāṃ cakāra tatraiva svāntardhimagamatsvayam ॥33॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस प्रकार इस ज्ञान को महादेव जी ‘गालव’ मुनि को कृपापूर्वक बताते हुए वहीं आत्मलीन हो गए ॥33॥

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[ Sutra 34 ]

यस्य श्रवणमात्रेणाश्रुतमेव श्रुतं भवेत् । अमतं च मतं ज्ञातमविज्ञातं च शाकल ॥34॥

yasya śravaṇamātreṇāśrutameva śrutaṃ bhavet । amataṃ ca mataṃ jñātamavijñātaṃ ca śākala ॥34॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — हे शाकल! जिसके श्रवण मात्र से ही अश्रुत (अनसुना) श्रुत (ज्ञात) हो जाता है । जाना हुआ, न जाना हुआ सभी प्रकार का ज्ञान प्राप्त हो जाता है और जिन सिद्धान्तों का ज्ञान न हो, वे सभी स्वयं ही ज्ञात हो जाते हैं । हे गौतम ! जिस प्रकार से मिट्टी के एक हो पिण्ड से अभिन्न समस्त वस्तुओं का पूर्ण ज्ञान हो जाता है; क्योंकि कार्य-कारण से अभिन्न होता है, वैसे ही पंचब्रह्म के ज्ञान द्वारा समस्त वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है ॥34॥

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[ Sutra 35 ]

एकेनैव तु पिण्डेन मृत्तिकायाश्च गौतम । विज्ञातं मृण्मयं सर्वं मृदभिन्नं हि कार्यकम् ॥35॥

ekenaiva tu piṇḍena mṛttikāyāśca gautama । vijñātaṃ mṛṇmayaṃ sarvaṃ mṛdabhinnaṃ hi kāryakam ॥35॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — हे शाकल! जिसके श्रवण मात्र से ही अश्रुत (अनसुना) श्रुत (ज्ञात) हो जाता है । जाना हुआ, न जाना हुआ सभी प्रकार का ज्ञान प्राप्त हो जाता है और जिन सिद्धान्तों का ज्ञान न हो, वे सभी स्वयं ही ज्ञात हो जाते हैं । हे गौतम ! जिस प्रकार से मिट्टी के एक हो पिण्ड से अभिन्न समस्त वस्तुओं का पूर्ण ज्ञान हो जाता है; क्योंकि कार्य-कारण से अभिन्न होता है, वैसे ही पंचब्रह्म के ज्ञान द्वारा समस्त वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है ॥35॥

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[ Sutra 36 ]

एकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं यथा । विज्ञातं स्यादथैकेन नखानां कृन्तनेन च ॥36॥

ekena lohamaṇinā sarvaṃ lohamayaṃ yathā । vijñātaṃ syādathaikena nakhānāṃ kṛntanena ca ॥36॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जिस प्रकार एक लोहमणि के द्वारा समस्त लोहतत्त्व ज्ञात हो जाते हैं, उसी प्रकार नाखून को काटने की छुरी से सभी लोहे के बने अस्त्रों की जानकारी प्राप्त हो जाती है; यह स्वाभाविक है कि उससे अपृथक् जितनी भी वस्तुएँ होंगी, वे सभी तदनुरूप होंगी; क्योंकि कारण से अभिन्न जो भी कार्य है,वह कारण रूप ही होता है ॥36॥

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[ Sutra 37 ]

सर्वं कार्ष्णायसं ज्ञातं तदभिन्नं स्वभावतः । कारणाभिन्नरूपेण कार्यकारणमेव हि ॥37॥

sarvaṃ kārṣṇāyasaṃ jñātaṃ tadabhinnaṃ svabhāvataḥ । kāraṇābhinnarūpeṇa kāryakāraṇameva hi ॥37॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जिस प्रकार एक लोहमणि के द्वारा समस्त लोहतत्त्व ज्ञात हो जाते हैं, उसी प्रकार नाखून को काटने की छुरी से सभी लोहे के बने अस्त्रों की जानकारी प्राप्त हो जाती है; यह स्वाभाविक है कि उससे अपृथक् जितनी भी वस्तुएँ होंगी, वे सभी तदनुरूप होंगी; क्योंकि कारण से अभिन्न जो भी कार्य है,वह कारण रूप ही होता है ॥37॥

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[ Sutra 38 ]

तद्रूपेण सदा सत्यं भेदेनोक्तिर्मृषा खलु । तच्च कारणमेकं हि न भिन्नं नोभयात्मकम् ॥38॥

tadrūpeṇa sadā satyaṃ bhedenoktirmṛṣā khalu । tacca kāraṇamekaṃ hi na bhinnaṃ nobhayātmakam ॥38॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — यदि किसी भी वस्तु को (कार्य को) तद्रूप अर्थात् कारण के अनुरूप मान लिया जाए, तो वह सदा सत्य है । जब उसे भिन्न (तद्रूप से भिन्न) कहेंगे, तो वह मिथ्या कथन होगा; क्योंकि सभी कार्यों का कारण तो एक ही है । वह न तो भिन्न है और न ही उभयात्मक है । यह जो सभी जगहों पर भेद की प्रतीति होती है, उसका कारण धर्म के निरूपण का अभाव ही है । अतः कारण तो वस्तुतः एक ही है, वह दूसरा (भिन्न) नहीं । है । इसलिए इस चराचर विश्व का कारण शुद्ध चैतन्यरूप अद्वैत ही है ॥38॥

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[ Sutra 39 ]

भेदः सर्वत्र मिथ्यैव धर्मादेरनिरूपणात् । अतश्च कारणं नित्यमेकमेवाद्वयं खलु । अत्र कारणमद्वैतं शुद्धचैतन्यमेव हि ॥39॥

bhedaḥ sarvatra mithyaiva dharmāderanirūpaṇāt । ataśca kāraṇaṃ nityamekamevādvayaṃ khalu । atra kāraṇamadvaitaṃ śuddhacaitanyameva hi ॥39॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — यदि किसी भी वस्तु को (कार्य को) तद्रूप अर्थात् कारण के अनुरूप मान लिया जाए, तो वह सदा सत्य है । जब उसे भिन्न (तद्रूप से भिन्न) कहेंगे, तो वह मिथ्या कथन होगा; क्योंकि सभी कार्यों का कारण तो एक ही है । वह न तो भिन्न है और न ही उभयात्मक है । यह जो सभी जगहों पर भेद की प्रतीति होती है, उसका कारण धर्म के निरूपण का अभाव ही है । अतः कारण तो वस्तुतः एक ही है, वह दूसरा (भिन्न) नहीं । है । इसलिए इस चराचर विश्व का कारण शुद्ध चैतन्यरूप अद्वैत ही है ॥39॥

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[ Sutra 40 ]

अस्मिन्ब्रह्मपुरे वेश्म दहरं यदिदं मुने । पुण्डरीकं तु तन्मध्ये आकाशो दहरोऽस्ति तत् । स शिवः सच्चिदानन्दः सोऽन्वेव्यो मुमुक्षुभिः ॥40॥

asminbrahmapure veśma daharaṃ yadidaṃ mune । puṇḍarīkaṃ tu tanmadhye ākāśo daharo'sti tat । sa śivaḥ saccidānandaḥ so'nvevyo mumukṣubhiḥ ॥40॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — हे मुने! इस अविनाशी ब्रह्म के आश्रयस्थल शरीर में जो दहर नामक निवास स्थल (हृदय में) है, जिसे पुण्डरीक (कमल) भी कहते हैं, उसी में दहराकाश स्थित है । उसी में ही मोक्ष के इच्छुक साधकों को सत्-चित् एवं आनन्दस्वरूप उस शिव को ढूँढ़ना चाहिए । यह शिव सदैव हृदय कमल में ही प्रतिष्ठित रहता है एवं निर्विशेष (सामान्य) दृष्टि से सभी का साक्षीभूत है । इस कारण से हृदय को शिवस्वरूप कहकर इस (हृदय) को ही संसार का मोचक अर्थात् संसार से मुक्त करने वाला कहा गया है ॥40॥

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[ Sutra 41 ]

अयं हृदि स्थितः साक्षी सर्वेषामविशेषतः । तेनायं हृदयं प्रोक्तः शिवः संसारमोचकः । इत्युपनिषत् ॥41॥

ayaṃ hṛdi sthitaḥ sākṣī sarveṣāmaviśeṣataḥ । tenāyaṃ hṛdayaṃ proktaḥ śivaḥ saṃsāramocakaḥ । ityupaniṣat ॥41॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — हे मुने! इस अविनाशी ब्रह्म के आश्रयस्थल शरीर में जो दहर नामक निवास स्थल (हृदय में) है, जिसे पुण्डरीक (कमल) भी कहते हैं, उसी में दहराकाश स्थित है । उसी में ही मोक्ष के इच्छुक साधकों को सत्-चित् एवं आनन्दस्वरूप उस शिव को ढूँढ़ना चाहिए । यह शिव सदैव हृदय कमल में ही प्रतिष्ठित रहता है एवं निर्विशेष (सामान्य) दृष्टि से सभी का साक्षीभूत है । इस कारण से हृदय को शिवस्वरूप कहकर इस (हृदय) को ही संसार का मोचक अर्थात् संसार से मुक्त करने वाला कहा गया है ॥41॥