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1. Pasupata Brahmana Upanishad

Pasupata Brahmana Upanishad (Part 1)

[ Sutra 1.1 ]

अथ ह वै स्वयंभूर्बह्मा प्रजाः सृजानीति कामकामो जायते कामेश्वरो वैश्रवणः ॥1.1॥

atha ha vai svayaṃbhūrbahmā prajāḥ sṛjānīti kāmakāmo jāyate kāmeśvaro vaiśravaṇaḥ ॥1.1॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — एक बार स्वयंभू भगवान् ब्रह्माजी के मन में यह आकांक्षा प्रादुर्भूत हुई कि “मैं प्रजा का सृजन करूँ” । उसी सृष्टि क्रम में कामेश्वर (रुद्र) एवं वैश्रवण की उत्पत्ति हुई ॥1.1॥

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[ Sutra 1.2 ]

वैश्रवणो ब्रह्मपुत्रो वालखिल्यः स्वयंभुवं परिपृच्छति जगतां का विद्या का देवता जाग्रत्तुरीययोरस्य को देवो यानि कस्य वशानि कालाः कियत्प्रमाणाः कस्याज्ञया रविचन्द्रग्रहादयो भासन्ते कस्य महिमा गगनस्वरूप एतदहं श्रोतुमिच्छामि नान्यो जानाति त्वं ब्रूहि ब्रह्मन् ॥1.2॥

vaiśravaṇo brahmaputro vālakhilyaḥ svayaṃbhuvaṃ paripṛcchati jagatāṃ kā vidyā kā devatā jāgratturīyayorasya ko devo yāni kasya vaśāni kālāḥ kiyatpramāṇāḥ kasyājñayā ravicandragrahādayo bhāsante kasya mahimā gaganasvarūpa etadahaṃ śrotumicchāmi nānyo jānāti tvaṃ brūhi brahman ॥1.2॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तदुपरान्त ब्रह्मपुत्र वैश्रवण वालखिल्य ऋषि ने स्वयंभू ब्रह्माजी से प्रश्न किया- हे भगवन्! यह जगत् विद्या क्या है? जाग्रत् और तुरीयावस्था के देवता कौन हैं? यह जगत् किसके वश में है? काल का क्या प्रमाण है? सूर्य एवं चन्द्रादि ग्रह किसकी आज्ञा से प्रतिभासित (प्रकाशित) होते हैं? किसकी महिमा गगन के सदृश विशाल है? हम इन सभी प्रश्नों के उत्तर आपसे सुनना चाहते हैं । आपके अतिरिक्त अन्य और कोई इन प्रश्नों का ज्ञाता नहीं है, अतः हे ब्रह्मन्! आप कृप करके इन प्रश्नों को बताने का अनुग्रह करें ॥1.2॥

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[ Sutra 1.3 ]

स्वयंभूरुवाच कृत्स्नजगतां मातृका विद्या ॥1.3॥

svayaṃbhūruvāca kṛtsnajagatāṃ mātṛkā vidyā ॥1.3॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — स्वयंभू (ब्रह्मा) ने कहा-सम्पूर्ण जगत् (उत्पन्न) करने वाली मातृका विद्या (अक्षर विद्या) है ॥1.3॥

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[ Sutra 1.4 ]

द्वित्रिवर्णसहिता द्विवर्णमाता त्रिवर्णसहिता । चतुर्मात्रात्मकोङ्कारो मम प्राणात्मिका देवता ॥1.4॥

dvitrivarṇasahitā dvivarṇamātā trivarṇasahitā । caturmātrātmakoṅkāro mama prāṇātmikā devata ॥1.4॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — वह दो वर्ण (हंस) से युक्त तथा तीन वर्ग (प्रणव) वाली है । दो वर्ण वाली भी तीन वर्ण के सहित (प्रणव) ही है । चार मात्राओं से युक्त ओंकार मेरा प्राण रूप देवता है ॥1.4॥

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[ Sutra 1.5 ]

अहमेव जगत्रयस्यैकः पतिः ॥1.5॥

ahameva jagatrayasyaikaḥ patiḥ ॥1.5॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — मैं ही एकमात्र तीनों लोकों का पति (भरण-पोषण करने वाला) हूँ ॥1.5॥

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[ Sutra 1.6 ]

मम वशानि सर्वाणि युगान्यपि ॥1.6॥

mama vaśāni sarvāṇi yugānyapi ॥1.6॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — समस्त युग मेरे ही वश (नियंत्रण) में रहते हैं ॥1.6॥

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[ Sutra 1.7 ]

अहोरात्रादयो मत्संवर्धिताः कालाः ॥1.7॥

ahorātrādayo matsaṃvardhitāḥ kālāḥ ॥1.7॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — मेरे द्वारा ही अहोरात्र अर्थात् दिन-रात्रि आदि काल संवर्धित (प्रादुर्भूत) हुए हैं ॥1.7॥

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[ Sutra 1.8 ]

मम रूपा रवेस्तेजश्चन्द्रनक्षत्रग्रहतेजांसि च ॥1.8॥

mama rūpā ravestejaścandranakṣatragrahatejāṃsi ca ॥1.8॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — रवि. चन्द्रमा . समस्त नक्षत्रों एवं ग्रह आदि में ओ तेज विद्यमान है, वह मेरा ही स्वरूप है ॥1.8॥

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[ Sutra 1.9 ]

गगनो मम त्रिशक्तिमायास्वरूपो नान्यो मदस्ति ॥1.9॥

gagano mama triśaktimāyāsvarūpo nānyo madasti ॥1.9॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — यह आकाश त्रिशक्ति युक्त (सत, रज, तम) मायारूप में मेरा ही स्वरूप है । मेरे सिवाय अन्य और कुछ भी नहीं है ॥1.9॥

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[ Sutra 1.10 ]

तमोमायात्मको रुद्रः सात्त्विकमायात्मको विष्णू राजसमायात्मको ब्रह्मा । इन्द्रादयस्ताम-सराजसात्मिका न सात्त्विकः कोऽपि । अघोरः सर्वसाधारणस्वरूपः ॥1.10॥

tamomāyātmako rudraḥ sāttvikamāyātmako viṣṇū rājasamāyātmako brahmā । indrādayastāma-sarājasātmikā na sāttvikaḥ ko'pi । aghoraḥ sarvasādhāraṇasvarūpaḥ ॥1.10॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तमोगुणी मायारूप- रुद्र हैं, विष्णु सतोगुणी मायारूप हैं और ब्रह्मा रजोगुणी माया रूप हैं । इन्द्रादि देवता रजोगुण एवं तमोगुण से ओत-प्रोत हैं । इनमें से कोई भी देव सात्त्विक नहीं हैं । एक मात्र केवल अघोर (शिव) ही सर्वसाधारण सामान्य रूप वाले हैं ॥1.10॥

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[ Sutra 1.11 ]

समस्तयागानां रुद्रः पशुपतिः कर्ता । रुद्रो यागदेवो विष्णुरध्वर्युर्होतेन्द्रो देवता यज्ञभुग् मानसं ब्रह्म महेश्वरं ब्रह्म ॥1.11॥

samastayāgānāṃ rudraḥ paśupatiḥ kartā । rudro yāgadevo viṣṇuradhvaryurhotendro devatā yajñabhug mānasaṃ brahma maheśvaraṃ brahma ॥1.11॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — समस्त यज्ञों के कर्ता-पशुपति रुद्र भगवान् हैं, भगवान् विष्णु यज्ञ के अध्वर्यु हैं तथा इन्द्रदेव होता (मंत्र बोलने वाले हैं । महेश्वर-ब्रह्म के मानस रूप ब्रह्म ही इस यज्ञ के भोक्ता हैं ॥1.11॥

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[ Sutra 1.12 ]

मानसो हंसः सोऽहं हंस इति । तन्मययज्ञो नादानुसंधानम् । तन्मयविकारो जीवः ॥1.12॥

mānaso haṃsaḥ so'haṃ haṃsa iti । tanmayayajño nādānusaṃdhānam । tanmayavikāro jīvaḥ ॥ ॥1.12॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — उस मानस ब्रह्म का रूप ही “हंस:-सोऽहं” है । इस तन्मयता की प्राप्ति हेतु जो यज्ञ सम्पन्न किया जाता है, वही नाद-अनुसंधान है । तन्मय (उस चैतन्यमयता) का विकार ही जीव है ॥ [हंस साधना और सोऽहं साधना एक ही कही गई है । एक ओर से हंसः यही नाद दूसरी ओर सेऽ भाषित होता है । भाव रूप मैं वही ही हूँ(हं-सः ) तथा वह मैं ही हूँ(सोऽहं) यह दोनों भाव तत्वतः जीव और ब्रह्म के एकत्व के ही बोधक है ॥1.12॥

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[ Sutra 1.13 ]

परमात्मस्वरूपो हंसः । अन्तर्बहिश्चरति हंसः । अन्तर्गतोऽनवकाशान्तर्गतसुपर्णस्वरूपो हंसः ॥1.13॥

paramātmasvarūpo haṃsaḥ । antarbahiścarati haṃsaḥ । antargato'navakāśāntargatasuparṇasvarūpo haṃsaḥ ॥1.13॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — (वह ‘हंस' परमात्मा का स्वरूप है । (वह) हंस बाह्य एवं अन्त: में विचरण करता रहता है । अन्तः के अनवकाश वाले स्थल में यह हंस सुपर्णमय (ईश्वर-परब्रह्म) रूप में विद्यमान रहता है ॥1.13॥

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[ Sutra 1.14 ]

षण्णवतितत्त्वतन्तुवढ्यक्तं चित्सूत्रत्रयचिन्मयलक्षणं नवतत्त्वत्रिरावृतं ब्रह्मविष्णुमहेश्व- रात्मकमग्नित्रयकलोपेतं चिद्ग्रन्थिबन्धनम् अद्वैतग्रन्थिः ॥1.14॥

ṣaṇṇavatitattvatantuvaḍhyaktaṃ citsūtratrayacinmayalakṣaṇaṃ navatattvatrirāvṛtaṃ brahmaviṣṇumaheśva- rātmakamagnitrayakalopetaṃ cidgranthibandhanam advaitagranthiḥ ॥1.14॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — छियानवे तत्त्व तन्तुओं के रूप में व्यक्त होने वाला, चित् के तीन सूत्रों (सत्, चित्, आनन्द) से चिन्मय लक्षणों वाला त्रिगुणित होने से नौ तत्त्वों वाला, ब्रह्मा, विष्णु और महेश रूप तीन अग्नियों से संयुक्त, चिद् ग्रन्थियों से बँधा हुआ, अद्वैत ग्रन्थि (ब्रह्मग्रन्थि) से युक्त यज्ञ के सामान्य अंग-रूप में बाह्य एवं अन्त:करण को प्रकाशित करने वाला यज्ञोपवीत, ब्रह्म के लक्षणों से युक्त हंस रूप है ॥ [यहाँ यज्ञोपवीत की व्याख्या ब्रह्मसूत्र के रूप में की गई है । स्थूल यज्ञोपवीत का निर्माण जिने चेतन तत्वों के आधार पर किया जाता है, यहाँ उनका उल्लेख ऋषि कर रहे हैं । यज्ञोपवीत बनाने में चार अंगुलों अथवा उस माप को किसी वस्तु पर कच्चे सूत्र के तीन तारों को १६ बार लपेटा जाता है । उसे बटकर तिहरन करके पुनः घटते हैं । इस प्रकार एक लड़ में १ तार हो जाते हैं । इसे तीन लड़ों वाले यज्ञोपवीत रूप में ग्रथित किया जाता है । प्रारंभिक ग्रंथियों के बाद अंत में ब्राग्रन्थि लगाई जाती है । इन्हीं का विश्लेषण-ऋषि ने किया है । अन्य बातें तो मन्त्रार्थ में स्पष्ट हैं, केवल ९६ तत्वों का उल्लेख नहीं है । इसका स्पष्टीकरण सामवेदीय छान्दोग्य परिशिष्ट में इस प्रकार दिया गया है-‘तिथिवारञ्च नक्षत्र तत्त्ववेदगुणान्वितम् । कालत्रयं च मासाश्च ब्रह्मसूत्रं हि षण्णवम्' अर्थात् तत्त्व २५, गुण ३, तिथि १५, वार ७, नक्षत्र २७, वेद ४, काल ३ तथा मास १२ इस प्रकार कुल १६ तत्त्व वाला ब्रह्मसूत्र है ॥1.14॥

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[ Sutra 1.15 ]

यज्ञसाधारणाङ्गं बहिरन्तर्ज्वलनं यज्ञाङ्गलक्षणब्रह्मस्वरूपो हंसः ॥1.15॥

yajñasādhāraṇāṅgaṃ bahirantarjvalanaṃ yajñāṅgalakṣaṇabrahmasvarūpo haṃsaḥ ॥1.15॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — छियानवे तत्त्व तन्तुओं के रूप में व्यक्त होने वाला, चित् के तीन सूत्रों (सत्, चित्, आनन्द) से चिन्मय लक्षणों वाला त्रिगुणित होने से नौ तत्त्वों वाला, ब्रह्मा, विष्णु और महेश रूप तीन अग्नियों से संयुक्त, चिद् ग्रन्थियों से बँधा हुआ, अद्वैत ग्रन्थि (ब्रह्मग्रन्थि) से युक्त यज्ञ के सामान्य अंग-रूप में बाह्य एवं अन्त:करण को प्रकाशित करने वाला यज्ञोपवीत, ब्रह्म के लक्षणों से युक्त हंस रूप है ॥ [यहाँ यज्ञोपवीत की व्याख्या ब्रह्मसूत्र के रूप में की गई है । स्थूल यज्ञोपवीत का निर्माण जिने चेतन तत्वों के आधार पर किया जाता है, यहाँ उनका उल्लेख ऋषि कर रहे हैं । यज्ञोपवीत बनाने में चार अंगुलों अथवा उस माप को किसी वस्तु पर कच्चे सूत्र के तीन तारों को १६ बार लपेटा जाता है । उसे बटकर तिहरन करके पुनः घटते हैं । इस प्रकार एक लड़ में १ तार हो जाते हैं । इसे तीन लड़ों वाले यज्ञोपवीत रूप में ग्रथित किया जाता है । प्रारंभिक ग्रंथियों के बाद अंत में ब्राग्रन्थि लगाई जाती है । इन्हीं का विश्लेषण-ऋषि ने किया है । अन्य बातें तो मन्त्रार्थ में स्पष्ट हैं, केवल ९६ तत्वों का उल्लेख नहीं है । इसका स्पष्टीकरण सामवेदीय छान्दोग्य परिशिष्ट में इस प्रकार दिया गया है-‘तिथिवारञ्च नक्षत्र तत्त्ववेदगुणान्वितम् । कालत्रयं च मासाश्च ब्रह्मसूत्रं हि षण्णवम्' अर्थात् तत्त्व २५, गुण ३, तिथि १५, वार ७, नक्षत्र २७, वेद ४, काल ३ तथा मास १२ इस प्रकार कुल १६ तत्त्व वाला ब्रह्मसूत्र है।] ॥1.15॥

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[ Sutra 1.16 ]

उपवीतलक्षणसूत्रब्रह्मगा यज्ञाः । ब्रह्माङ्गलक्षणयुक्तो यज्ञसूत्रम् । तद्ब्रह्मसूत्रम् । यज्ञसूत्र-संबन्धी ब्रह्मयज्ञः तत्स्वरूपः ॥1.16॥

upavītalakṣaṇasūtrabrahmagā yajñāḥ । brahmāṅgalakṣaṇayukto yajñasūtram । tadbrahmasūtram । yajñasūtra-saṃbandhī brahmayajñaḥ tatsvarūpaḥ ॥1.16॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस प्रकार यह उपवीत के लक्षणों से युक्त सूत्र (ब्रह्मसूत्र) यज्ञ-रूप है अर्थात् यह ब्रह्म का प्रतीक रूप है । ब्रहा के लक्षणों से युक्त यह यज्ञसूत्र (यज्ञोपवीत) है, वही ब्रह्मसूत्र है । अतः यज्ञोपवीत एवं ब्रह्मयज्ञ दोनों एक दूसरे के स्वरूप ही है ।। ॥1.16॥

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[ Sutra 1.17 ]

अङ्गानि मात्राणि । मनोयज्ञस्य हंसो यज्ञसूत्रम् । प्रणवं ब्रह्मसूत्रं ब्रह्मयज्ञमयम् । प्रणवान्तर्वर्ती हंसो ब्रह्मसूत्रम् । तदेव ब्रह्मयज्ञमयं मोक्षक्रमम् ॥1.17॥

aṅgāni mātrāṇi । manoyajñasya haṃso yajñasūtram । praṇavaṃ brahmasūtraṃ brahmayajñamayam । praṇavāntarvartī haṃso brahmasūtram । tadeva brahmayajñamayaṃ mokṣakramam ॥1.17॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इसके अंग मात्राएँ हैं । यह ब्रहासूत्र ही इस मनोयज्ञ का हंस है । ब्रह्मयज्ञ से युक्त यह प्रणव भी ब्रह्मसूत्र ही है । प्रणव का अन्तःवर्ती हंस भी ब्रह्मसूत्र है । यह ब्रह्मयज्ञ मोक्ष का साधन रूप ही है [बाहर ब्रह्मसूत्र धारण करने का वास्तविक उद्देश्य अन्तःवर्ती ब्रह्मसूत्र को जाग्रत्-जीवन्त बनाना होता है । जब अतःवर्ती ब्रह्मसूत्र परिपक्व अवस्था में पहुँच जाता है, तो बाह्यसूत्र को त्यागकर ‘ संन्यास' में प्रवेश किया जाता है।] ॥1.17॥

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[ Sutra 1.18 ]

ब्रह्मसंध्याक्रिया मनोयागः । संध्याक्रिया मनोयागस्य लक्षणम् ॥1.18॥

brahmasaṃdhyākriyā manoyāgaḥ । saṃdhyākriyā manoyāgasya lakṣaṇam ॥1.18॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ब्रह्मसंध्या मानसिक यज्ञ की क्रिया है, संध्या-क्रिया मानसिक यज्ञ का लक्षण है ॥ [जो लोग ब्रह्मसंध्या को स्थूल कर्मकाण्ड के रूप में ही दुहरा कर अपना दायित्व पूरा मान लेते हैं, मानसिक यज्ञ के रूप में उसे जाग्रत्-विकसित नहीं करते, उन्हें सन्ध्यावन्दन का शास्त्रोक्त लाभ प्राप्त नहीं होता।] ॥1.18॥

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[ Sutra 1.19 ]

यज्ञसूत्रप्रणवब्रह्मयज्ञक्रियायुक्तो ब्राह्मणः । ब्रह्मचर्येण चरन्ति देवाः । हंससूत्रचर्या यज्ञाः । हंसप्रणवयोरभेदः ॥1.19॥

yajñasūtrapraṇavabrahmayajñakriyāyukto brāhmaṇaḥ । brahmacaryeṇa caranti devāḥ । haṃsasūtracaryā yajñāḥ । haṃsapraṇavayorabhedaḥ ॥1.19॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो मनुष्य यज्ञोपवीत, प्रणव एवं ब्रह्मयज्ञ की क्रिया से सम्पन्न हैं, वही ब्राह्मण हैं । ब्रह्मचर्य में ही देवता विचरण करते हैं । सूत्ररूप हंस एवं प्रणव दोनों एक ही हैं । इन दोनों में कोई भेद नहीं है ॥1.19॥

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[ Sutra 1.20 ]

हंसस्य प्रार्थनास्त्रिकालाः । त्रिकालास्त्रिवर्णाः । त्रेताग्न्यनुसंधानो यागः । त्रेताग्न्यात्मा-कृतिवर्णोङ्कारहंसानुसंधानोऽन्तर्यागः ॥1.20॥

haṃsasya prārthanāstrikālāḥ । trikālāstrivarṇāḥ । tretāgnyanusaṃdhāno yāgaḥ । tretāgnyātmā-kṛtivarṇoṅkārahaṃsānusaṃdhāno'ntaryāgaḥ ॥1.20॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — हंस की प्रार्थना त्रिकाल अर्थात् तीन समय में सम्पन्न की जाती है । तीन काल, तीन वर्ण (अकार, उकार, मकार) होते हैं । यह यज्ञ तीन अग्नियों के अनुसंधान द्वारा सम्पन्न करने का है । तीन अग्नि रूप आत्मा की आकृति एवं वर्ण वाले ॐकार रूप हंस का अनुसंधान ही अन्तः का यज्ञ है ॥1.20॥

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[ Sutra 1.21 ]

चित्स्वरूपवत्तन्मयं तुरीयस्वरूपम् । अन्तरादित्ये ज्योतिःस्वरूपो हंसः ॥1.21॥

citsvarūpavattanmayaṃ turīyasvarūpam । antarāditye jyotiḥsvarūpo haṃsaḥ ॥1.21॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — चित् स्वरूप में तन्मय (तल्लीन) होना ही तुरीयावस्था का स्वरूप है । अन्तः के आदित्य में हंस ही ज्योति रूप में अवस्थित है ॥1.21॥

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[ Sutra 1.22 ]

यज्ञाङ्गं ब्रहासंपत्तिः । ब्रह्मप्रवृत्तौ तत्प्रणवहंससूत्रेणैव ध्यानमाचरन्ति ॥1.22॥

yajñāṅgaṃ brahāsaṃpattiḥ । brahmapravṛttau tatpraṇavahaṃsasūtreṇaiva dhyānamācaranti ॥1.22॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — यज्ञाङ्ग ही ब्रह्म-सम्पत्ति है । अतः ब्रह्म-प्राप्ति के निमित्त प्रणवरूप हंस की साधना में ही ध्यान द्वारा विचरण करना चाहिए ॥1.22॥

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[ Sutra 1.23 ]

प्रोवाच पुनः स्वयंभुवं प्रतिजानीते ब्रह्मपुत्रो ऋषिर्वालखिल्यः । हंसस्त्राणि कतिसंख्यानि कियद्वा प्रमाणम् ॥1.23॥

provāca punaḥ svayaṃbhuvaṃ pratijānīte brahmaputro ṛṣirvālakhilyaḥ । haṃsastrāṇi katisaṃkhyāni kiyadvā pramāṇam ॥1.23॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ब्रह्मपुत्र वालखिल्य ने पुन: स्वयंभू ब्रह्माजी से पूछा-हे भगवन् ! ‘हंसूत्रों की संख्या कितनी है तथा उनके प्रमाण कितने हैं? आप तो सभी कुछ जानने में समर्थ हैं, कृपा करके बताने का अनुग्रह करे' ॥1.23॥

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[ Sutra 1.24 ]

हृद्यादित्यमरीचीनां पदं षण्णवतिः । चिसूत्रघ्राणयोः स्वर्निर्गता प्रणवाधारा षडङ्गुलदशाशीतिः ॥1.24॥

hṛdyādityamarīcīnāṃ padaṃ ṣaṇṇavatiḥ । cisūtraghrāṇayoḥ svarnirgatā praṇavādhārā ṣaḍaṅguladaśāśītiḥ ॥1.24॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तदनन्तर स्वयं भू ब्रह्माजी ने उत्तर दिया- ‘हृदय- आदित्य की छियानवे रश्मियाँ हैं । चित्-सूत्र घ्राण से स्वरसहित निकलने वाली भारा भी छियानवे अंगुल होती है' ॥1.24॥

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[ Sutra 1.25 ]

वामबाहुदक्षिणकट्योरन्तरति हंसः परमात्मा ब्रह्मगुह्यप्रकारो नान्यत्र विदितः ॥1.25॥

vāmabāhudakṣiṇakaṭyorantarati haṃsaḥ paramātmā brahmaguhyaprakāro nānyatra viditaḥ ॥1.25॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — बायीं भुजा (कंधा) और दक्षिण कट्यन्त (दाहिनी ओर कटि के छोर पर) के मध्य (हृदय क्षेत्र) में परमात्मा हंस का निवास है; किन्तु इस गुह्य विषय की जानकारी किसी को नहीं हो पाती है ॥1.25॥

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[ Sutra 1.26 ]

जानन्ति तेऽमृतफलकाः । सर्वकालं हंस प्रकाशकम् । प्रणवहंसान्तर्ध्याप्रकृतिं विना न मुक्तिः ॥1.26॥

jānanti te'mṛtaphalakāḥ । sarvakālaṃ haṃsa prakāśakam। praṇavahaṃsāntardhyāprakṛtiṃ vinā na muktiḥ ॥1.26॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जिन्हें अमृतत्व की प्राप्ति हो गई है, वे ही उस सर्वकाल प्रकाशमान हंस को जानते हैं । प्रणवरूपी हंस का अन्तर्ध्यान किये बिना मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो पाती ॥1.26॥

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[ Sutra 1.27 ]

नवसूत्रान्परिचर्चितान् । तेऽपि यद्ब्रह्म चरन्ति । अन्तरादित्यं न ज्ञातं मनुष्याणाम् ॥1.27॥

Navasūtrānparicarcitān । te'pi yadbrahma caranti । antarādityaṃ na jñātaṃ manuṣyāṇām ॥1.27॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो मनुष्य रँगे हुए इस नौ सूत्र वाले यज्ञोपवीत को धारण करते हैं । वे भी इसकी उपासना ब्रह्ममय मान कर ही करते हैं; किन्तु इन मनुष्यों को अन्त: में स्थित आदित्यरूप ब्रह्म का ज्ञान( आत्मबोध)नहीं होता ॥1.27॥

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[ Sutra 1.28 ]

जगदादित्यो रोचत इति ज्ञात्वा ते मर्त्या विबुधास्तपनप्रार्थनायुक्ता आचरन्ति ॥1.28॥

jagadādityo rocata iti jñātvā te martyā vibudhāstapanaprārthanāyuktā ācaranti ॥1.28॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — आदित्य जगत् को प्रकाशित करता है, यह जानकर वे बुद्धिमान् मनुष्य पवित्रता एवं ज्ञान के लिए उसकी प्रार्थना करते हैं ॥1.28॥

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[ Sutra 1.29 ]

वाजपेयः पशुहर्ता अध्वर्युरिन्द्रो देवता अहिंसा धर्मयागः परमहंसोऽध्वर्युः परमात्मा देवता पशुपतिः ॥1.29॥

vājapeyaḥ paśuhartā adhvaryurindro devatā ahiṃsā dharmayāgaḥ paramahaṃso'dhvaryuḥ paramātmā devatā paśupatiḥ ॥1.29॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — वाजपेय यज्ञ (विशिष्ट ज्ञानयज्ञ) पशुहर्ता (पशुत्वभाव-अज्ञान भाव का हरण करने वाल) है । इस यज्ञ के अध्वर्यु एवं देवता इन्द्र (परमेश्वर) हैं । यह अहिंसात्मक धर्मयज्ञ (मोक्षय) है, इसके अध्वर्यु परमहंस तथा देवता पशुपति परमात्मा हैं ॥1.29॥

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[ Sutra 1.30 ]

ब्रह्मोपनिषदो ब्रह्म । स्वाध्याययुक्ता ब्राह्मणाश्चरन्ति ॥1.30॥

brahmopaniṣado brahma । svādhyāyayuktā brāhmaṇāścaranti ॥1.30॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — वेद एवं उपनिषद् में जिस ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है, उसी (परमात्मतत्त्व) की ये स्वाध्याययुक्त, ब्रह्मज्ञानी उपासना करते हैं ॥1.30॥

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[ Sutra 1.31 ]

अश्वमेधो महायज्ञकथा । तद्राज्ञा ब्रह्मचर्यमाचरन्ति । सर्वेषां पूर्वोक्तब्रह्मयज्ञक्रम मुक्तिक्रममिति ॥1.31॥

aśvamedho mahāyajñakathā । tadrājñā brahmacaryamācaranti । sarveṣāṃ pūrvoktabrahmayajñakrama muktikramamiti ॥1.31॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस महायज्ञ का ज्ञान ही अश्वमेध यज्ञ है । इसके आश्रय से ही वे (ज्ञानीजन) ब्रह्मज्ञान का आचरण करते हैं । पूर्व में वर्णित समस्त ब्रह्मयज्ञ-कर्म ही मुक्ति प्रदान करने में समर्थ हैं ॥1.31॥

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[ Sutra 1.32 ]

ब्रह्मपुत्रः प्रोवाच । उदितो हंस ऋषिः । स्वयंभूस्तिरोदधे । रुद्रो ब्रह्मोपनिषदो हंसज्योतिः पशुपतिः प्रणवस्तारकः स एवं वेद ॥1.32॥

brahmaputraḥ provāca । udito haṃsa ṛṣiḥ । svayaṃbhūstirodadhe । rudro brahmopaniṣado haṃsajyotiḥ paśupatiḥ praṇavastārakaḥ sa evaṃ veda ॥1.32॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ब्रह्मपुत्र ने पुनः कहा-‘हंस से सम्बन्धित ज्ञान का प्राकट्य हो गया है । ऐसा श्रवण कर स्वयंभू तिरोहित हो गये । इस उपनिषद् में जिस हंस ज्योति का वर्णन किया गया है, वही रुद्र है और संसार से उद्धार करने वाला प्रणव (ओंकार) ही पशुपति (ब्रह्म) है, उसे ऐसा जानो ॥1.32॥

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[ Sutra 2.1 ]

हंसात्ममालिकावर्णब्रह्मकालप्रचोदिता । परमात्मा पुमानिति ब्रह्मसंपत्तिकारिणी ॥2.1॥

haṃsātmamālikāvarṇabrahmakālapracoditā । paramātmā pumāniti brahmasaṃpattikāriṇī ॥2.1॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ‘हंस' का जप ही वर्ण ब्रह्म है, इसी से ब्रह्म-प्राप्ति की प्रेरणा प्राप्त होती है । यह ब्रह्म ही परमात्मा एवं पुरुष हैं । .यह ब्रह्म सम्पत्ति से युक्त होता है ॥2.1॥

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[ Sutra 2.2 ]

अध्यात्मब्रह्मकल्पस्याकृतिः कीदृशी कथा । ब्रह्मज्ञानप्रभासन्ध्या कालो गच्छति धीमताम् । हंसाख्यो देवमात्माख्यमात्मतत्त्वप्रजः कथम् ॥2.2॥

adhyātmabrahmakalpasyākṛtiḥ kīdṛśī kathā । brahmajñānaprabhāsandhyā kālo gacchati dhīmatām । haṃsākhyo devamātmākhyamātmatattvaprajaḥ katham ॥2.2॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो मनुष्य अपने आत्मिक ज्ञान से ब्रह्म के समान हो गया हो, फिर उसके संदर्भ में कहने के लिए क्या शेष रह जाता है ? ज्ञानी मनुष्य अपना सम्पूर्ण समय ब्रह्मचर्चा एवं उपासना में ही व्यतीत करते हैं । जब हंस एवं आत्मा में एकात्मता स्थापित हो जाती है, तो फिर प्रजा कहाँ हो सकती है ? ॥2.2॥

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[ Sutra 2.3 ]

अन्तः प्रणवनादाख्यो हंसः प्रत्ययबोधकः। अन्तर्गतप्रमागूढं ज्ञाननालं विराजितम् ॥2.3॥

antaḥ praṇavanādākhyo haṃsaḥ pratyayabodhakaḥ । antargatapramāgūḍhaṃ jñānanālaṃ virājitam ॥2.3॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — अन्त:करण से निःसृत होने वाले प्रणव रूपी नाद से जो हंस ज्ञात होता है, वही सम्पूर्ण ज्ञान का बोध कराने वाला है । अन्त में अनुभवगम्य गुढ़ ज्ञान के द्वारा बाह्य जगत् के ज्ञान की प्राप्ति होती है ॥2.3॥

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[ Sutra 2.4 ]

शिवशक्तयात्मकं रूपं चिन्मयानन्दवेदितम् । नादबिन्दुकला त्रीणि नेत्रविश्वविचेष्टितम् ॥2.4॥

śivaśaktayātmakaṃ rūpaṃ cinmayānandaveditam । nādabindukalā trīṇi netraviśvaviceṣṭitam ॥2.4॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — शिव-शक्तिमयात्मकरूप चिन्मय आनन्द से ज्ञात होने वाला है । नाद, बिन्दु एवं कला इन तीनों नेत्रों (जागृति) से ही यह जगत् चेष्टायुक्त है ॥2.4॥

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[ Sutra 2.5 ]

त्रियंगानि शिखा त्रीणि द्वित्रीणि संख्यमाकृतिः । अन्तगूंढप्रमा हंसः प्रमाणान्निर्गतं बहिः ॥2.5॥

triyaṃgāni śikhā trīṇi dvitrīṇi saṃkhyamākṛtiḥ । antagūṃḍhapramā haṃsaḥ pramāṇānnirgataṃ bahiḥ ॥2.5॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तीन अंग, तीन शिखा एवं दो या तीन मात्राओं में उसकी संख्या (आकृति) ज्ञात होती है । जब इस प्रकार से वह अन्तर्धान हो जाता है, तब इस गूढ़ आत्मा का ज्ञान बाह्य जगत् में भी प्रमाण के रूप में प्रकट होता है ॥2.5॥

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[ Sutra 2.6 ]

ब्रह्मसूत्रपदं ज्ञेयं ब्राह्मयं विध्युक्तलक्षणम् । हंसार्कप्रणवध्यानमित्युक्तो ज्ञानसागरे ॥2.6॥

brahmasūtrapadaṃ jñeyaṃ brāhmayaṃ vidhyuktalakṣaṇam । haṃsārkapraṇavadhyānamityukto jñānasāgare ॥2.6॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जगत् के सूत्ररूप ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करके स्वयमेव ब्रह्म के लक्षणों से युक्त होना चाहिए तथा निरन्तर हंस रूपी सूर्य का प्रणव सहित ध्यान करते रहना चाहिए, यही ज्ञानीजनों का उपदेश है ॥2.6॥

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[ Sutra 2.7 ]

एतद्विज्ञानमात्रेण ज्ञानसागरपारगः । स्वतः शिवः पशुपतिः साक्षी सर्वस्य सर्वदा ॥2.7॥

etadvijñānamātreṇa jñānasāgarapāragaḥ । svataḥ śivaḥ paśupatiḥ sākṣī sarvasya sarvadā ॥2.7॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस प्रकार से विशेष ज्ञान-प्राप्ति होने के पश्चात् हौ ज्ञान-सागर के पार पहुँचा जा सकता है । स्वयं भगवान् शिवरूप पशुपति-ब्रह्म ही सर्वदा (इसके) साक्ष्य रूप हैं॥ [अध्यात्म क्षेत्र में जड़-चेतन दोनों प्रकार के ज्ञान के अतिवाद को उचित मी माना गया है, जैसा कि ईशोपनिषद् (१) में ‘अर्थ तमः प्रविशन्ति'………इत्यादि मन्त्र में ‘केवल विद्या की उपासना करने वालों को भी अन्धकार में फँस जाने की बात कही गई है । यहाँ ‘ज्ञान’ को डुबाने वाला सागर तथा उससे पार जाने की बात उक्त तथ्य को ध्यान में रखकर ही कही गयी प्रतीत होती है ।] ॥2.7॥

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[ Sutra 2.8 ]

सर्वेषां तु मनस्तेन प्रेरितं नियमेन तु । विषये गच्छति प्राणश्चेष्टते वाग्वदत्यपि ॥2.8॥

sarveṣāṃ tu manastena preritaṃ niyamena tu । viṣaye gacchati prāṇaśceṣṭate vāgvadatyapi ॥2.8॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — यही भगवान् शिव सभी लोगों के मन को प्रेरित एवं संतुलित-नियमित करने वाले हैं, जिसके प्रभाव से मन विषयों में गतिशील होता है । प्राण चेष्टा-रत रहते हैं तथा वाणी उच्चारण का कार्य करती है ॥2.8॥

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[ Sutra 2.9 ]

चक्षुः पश्यति रूपाणि श्रोत्रं सर्वं शृणोत्यपि । अन्यानि खानि सर्वाणि तेनैव प्रेरितानि तु ॥2.9॥

cakṣuḥ paśyati rūpāṇi śrotraṃ sarvaṃ śṛṇotyapi । anyāni khāni sarvāṇi tenaiva preritāni tu ॥2.9॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — उन्ही भगवान् की प्रेरणा से चक्षु रूपों-दृश्यों को देखते हैं, कान श्रवण करते हैं तथा अन्य समस्त इन्द्रियाँ भी उन्हीं से प्रेरित हो रही हैं । वे निरन्तर अपने-अपने विषयों के उद्देश्य में प्रवृत्त होती रहती हैं । यह विषयों में प्रवृत्त होना ही मायारूप है, यह स्वभाववश नहीं होता, माया द्वारा ही होता है ॥2.9॥

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[ Sutra 2.10 ]

स्वं स्वं विषयमुद्दिश्य प्रवर्तन्ते निरन्तरम् । प्रवर्तकत्वं चाप्यस्य मायया न स्वभावतः ॥2.10॥

svaṃ svaṃ viṣayamuddiśya pravartante nirantaram । pravartakatvaṃ cāpyasya māyayā na svabhāvataḥ ॥2.10॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — उन्ही भगवान् की प्रेरणा से चक्षु रूपों-दृश्यों को देखते हैं, कान श्रवण करते हैं तथा अन्य समस्त इन्द्रियाँ भी उन्हीं से प्रेरित हो रही हैं। वे निरन्तर अपने-अपने विषयों के उद्देश्य में प्रवृत्त होती रहती हैं । यह विषयों में प्रवृत्त होना ही मायारूप है, यह स्वभाववश नहीं होता, माया द्वारा ही होता है ॥2.10॥

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[ Sutra 2.11 ]

श्रोत्रमात्मनि चाप्यस्तं स्वयं पशुपतिः पुमान् । अनुप्रविश्य श्रोत्रस्य ददाति श्रोत्रतां शिवः ॥2.11॥

śrotramātmani cāpyastaṃ svayaṃ paśupatiḥ pumān । anupraviśya śrotrasya dadāti śrotratāṃ śivaḥ ॥2.11॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — श्रोत्र आत्मा के आश्रित हैं तथा स्वयं पशुपति ब्रह्म श्रोत्र में प्रविष्ट होकर उन शिव को श्रवण शक्ति देते हैं ॥2.11॥

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[ Sutra 2.12 ]

मनः स्वात्मनि चाध्यस्तं प्रविश्य परमेश्वरः । मनस्त्वं तस्य सत्त्वस्थो ददाति नियमेन तु ॥2.12॥

manaḥ svātmani cādhyastaṃ praviśya parameśvaraḥ । manastvaṃ tasya sattvastho dadāti niyamena tu ॥2.12॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — मन भी अपनी अन्तरात्मा में अभ्यस्त है एवं परब्रह्म परमेश्वर उसमें प्रविष्ट होकर, उस सत्त्व में स्थित होते हुए उसे नियम में रखते हैं और मनस्विता प्रदान करते हैं ॥2.12॥

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[ Sutra 2.13 ]

स एव विदितादन्यस्तथैवाविदितादपि । अन्येषामिन्द्रियाणां तु कल्पितानामपीश्वरः ॥2.13॥

sa eva viditādanyastathaivāviditādapi । anyeṣāmindriyāṇāṃ tu kalpitānāmapīśvaraḥ ॥2.13॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ऐसे ही वे परम ईश्वर समस्त इन्द्रियों को सचेष्ट करते हैं, परन्तु लोग उन ब्रह्म को जैसा बताते हैं अथवा कल्पना करते हैं, उससे वे महेश्वर सर्वथा भिन्न हैं । परब्रह्म परमेश्वर ही इन समस्त इन्द्रियों को अपने अनुकूल रूप प्रदान करते हैं एवं उनका नियमन भी करते हैं । इस कारण ये चक्षु, मन,वाणी आदि समस्त इन्द्रियाँ परमपिता परमात्मा के स्वयं प्रकाशतत्व (रूप) को प्राप्त नहीं हो सकती अर्थात् उनके ज्ञानरुपी प्रकाश को जानने में समर्थ नहीं हो सकती । जो मनुष्य ऐसा जानता है कि परमात्मा अन्तः के विषयों से भिन्न( अलग) है,यह तर्क एवं प्रमाण के बिना ही उसे अपनी अन्तरात्मा द्वारा जानने का निरन्तर प्रयास करे, उसे यथार्थ रूप में परमात्म तत्व का ज्ञान प्राप्त हो सकता है । यह आत्मा ही परम प्रकाश स्वरूप है,जबकि वह माया महा अन्धकाररूप है ॥2.13॥

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[ Sutra 2.14 ]

तत्तद्रूपमनुप्राप्य ददाति नियमेन तु । ततश्चक्षुश्च वाक्चैव मनश्चान्यानि खानि च ॥2.14॥

tattadrūpamanuprāpya dadāti niyamena tu । tataścakṣuśca vākcaiva manaścānyāni khāni ca ॥2.14॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ऐसे ही वे परम ईश्वर समस्त इन्द्रियों को सचेष्ट करते हैं, परन्तु लोग उन ब्रह्म को जैसा बताते हैं अथवा कल्पना करते हैं, उससे वे महेश्वर सर्वथा भिन्न हैं । परब्रह्म परमेश्वर ही इन समस्त इन्द्रियों को अपने अनुकूल रूप प्रदान करते हैं एवं उनका नियमन भी करते हैं । इस कारण ये चक्षु, मन,वाणी आदि समस्त इन्द्रियाँ परमपिता परमात्मा के स्वयं प्रकाशतत्व (रूप) को प्राप्त नहीं हो सकती अर्थात् उनके ज्ञानरुपी प्रकाश को जानने में समर्थ नहीं हो सकती । जो मनुष्य ऐसा जानता है कि परमात्मा अन्तः के विषयों से भिन्न( अलग) है,यह तर्क एवं प्रमाण के बिना ही उसे अपनी अन्तरात्मा द्वारा जानने का निरन्तर प्रयास करे, उसे यथार्थ रूप में परमात्म तत्व का ज्ञान प्राप्त हो सकता है । यह आत्मा ही परम प्रकाश स्वरूप है,जबकि वह माया महा अन्धकाररूप है ॥2.14॥

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[ Sutra 2.15 ]

न गच्छन्ति स्वयंज्योतिः स्वभावे परमात्मनि । अकर्तृविषयप्रत्यक्प्रकाशं स्वात्मनैव तु ॥2.15॥

na gacchanti svayaṃjyotiḥ svabhāve paramātmani । akartṛviṣayapratyakprakāśaṃ svātmanaiva tu ॥2.15॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ऐसे ही वे परम ईश्वर समस्त इन्द्रियों को सचेष्ट करते हैं, परन्तु लोग उन ब्रह्म को जैसा बताते हैं अथवा कल्पना करते हैं, उससे वे महेश्वर सर्वथा भिन्न हैं । परब्रह्म परमेश्वर ही इन समस्त इन्द्रियों को अपने अनुकूल रूप प्रदान करते हैं एवं उनका नियमन भी करते हैं । इस कारण ये चक्षु, मन,वाणी आदि समस्त इन्द्रियाँ परमपिता परमात्मा के स्वयं प्रकाशतत्व (रूप) को प्राप्त नहीं हो सकती अर्थात् उनके ज्ञानरुपी प्रकाश को जानने में समर्थ नहीं हो सकती । जो मनुष्य ऐसा जानता है कि परमात्मा अन्तः के विषयों से भिन्न( अलग) है,यह तर्क एवं प्रमाण के बिना ही उसे अपनी अन्तरात्मा द्वारा जानने का निरन्तर प्रयास करे, उसे यथार्थ रूप में परमात्म तत्व का ज्ञान प्राप्त हो सकता है । यह आत्मा ही परम प्रकाश स्वरूप है,जबकि वह माया महा अन्धकाररूप है ॥2.15॥

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[ Sutra 2.16 ]

विना तर्कप्रमाणाभ्यां ब्रह्म यो वेद वेद सः । प्रत्यगात्मा परंज्योतिर्माया सा तु महत्तमः ॥2.16॥

vinā tarkapramāṇābhyāṃ brahma yo veda veda saḥ । pratyagātmā paraṃjyotirmāyā sā tu mahattamaḥ ॥2.16॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ऐसे ही वे परम ईश्वर समस्त इन्द्रियों को सचेष्ट करते हैं, परन्तु लोग उन ब्रह्म को जैसा बताते हैं अथवा कल्पना करते हैं, उससे वे महेश्वर सर्वथा भिन्न हैं । परब्रह्म परमेश्वर ही इन समस्त इन्द्रियों को अपने अनुकूल रूप प्रदान करते हैं एवं उनका नियमन भी करते हैं । इस कारण ये चक्षु, मन,वाणी आदि समस्त इन्द्रियाँ परमपिता परमात्मा के स्वयं प्रकाशतत्व (रूप) को प्राप्त नहीं हो सकती अर्थात् उनके ज्ञानरुपी प्रकाश को जानने में समर्थ नहीं हो सकती । जो मनुष्य ऐसा जानता है कि परमात्मा अन्तः के विषयों से भिन्न( अलग) है,यह तर्क एवं प्रमाण के बिना ही उसे अपनी अन्तरात्मा द्वारा जानने का निरन्तर प्रयास करे, उसे यथार्थ रूप में परमात्म तत्व का ज्ञान प्राप्त हो सकता है । यह आत्मा ही परम प्रकाश स्वरूप है,जबकि वह माया महा अन्धकाररूप है ॥2.16॥

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[ Sutra 2.17 ]

तथा सति कर्थ मायासंभवः प्रत्यगात्मनि । तस्मात्तर्कप्रमाणाभ्यां स्वानुभूत्याच चिद्घने ॥2.17॥

tathā sati kartha māyāsaṃbhavaḥ pratyagātmani । tasmāttarkapramāṇābhyāṃ svānubhūtyāca cidghane ॥2.17॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इसलिए प्रत्यगात्मा एवं माया की एकता किसी भी तरह से सम्भव नहीं है । उसके तर्को, प्रमानों एवं अनुभव से ज्ञात होता है कि चैतन्यमय स्वयं प्रकाशस्वरूप परमात्मा में माया नहीं है । विद्या एवं अविद्या के विषय व्यावहारिक हैं, परमात्मा से उनका कोई भी सम्बन्ध नहीं है ॥2.17॥

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[ Sutra 2.18 ]

स्वप्रकाशैकसंसिद्धे नास्ति माया परात्मनि । व्यावहारिकदृष्ट्येयं विद्याविद्या न चान्यथा ॥2.18॥

svaprakāśaikasaṃsiddhe nāsti māyā parātmani । vyāvahārikadṛṣṭyeyaṃ vidyāvidyā na cānyathā ॥2.18॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इसलिए प्रत्यगात्मा एवं माया की एकता किसी भी तरह से सम्भव नहीं है । उसके तर्को, प्रमानों एवं अनुभव से ज्ञात होता है कि चैतन्यमय स्वयं प्रकाशस्वरूप परमात्मा में माया नहीं है । विद्या एवं अविद्या के विषय व्यावहारिक हैं, परमात्मा से उनका कोई भी सम्बन्ध नहीं है ॥2.18॥

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[ Sutra 2.19 ]

तत्त्वदृष्ट्या तु नास्त्येव तत्त्वमेवास्ति केवलम् । व्यावहारिकदृष्टिस्तु प्रकाशाव्यभिचारतः ॥2.19॥

tattvadṛṣṭyā tu nāstyeva tattvamevāsti kevalam । vyāvahārikadṛṣṭistu prakāśāvyabhicārataḥ ॥2.19॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तात्त्विक दृष्टि से यह सभी कुछ मिथ्या ही है । केवल एक तत्त्व ही वास्तविक सत्य है । व्यावहारिक-दृष्टि से जो भी कुछ जान पड़ता है, वह भी वैसे ही आभासित होता है । प्रकाश ही निरन्तर विद्यमान है । इस प्रकार यह अद्वैत ही है, अद्वैत ही इस प्रकार के प्रकाश के अभेद से कहा जाता है ॥2.19॥

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[ Sutra 2.20 ]

प्रकाश एव सततं तस्मादद्वैत एव हि । अद्वैतमिति चोक्तिश्च प्रकाशाव्यभिचारतः ॥2.20॥

prakāśa eva satataṃ tasmādadvaita eva hi । advaitamiti coktiśca prakāśāvyabhicārataḥ ॥2.20॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तात्त्विक दृष्टि से यह सभी कुछ मिथ्या ही है । केवल एक तत्त्व ही वास्तविक सत्य है । व्यावहारिक-दृष्टि से जो भी कुछ जान पड़ता है, वह भी वैसे ही आभासित होता है । प्रकाश ही निरन्तर विद्यमान है । इस प्रकार यह अद्वैत ही है, अद्वैत ही इस प्रकार के प्रकाश के अभेद से कहा जाता है ॥2.20॥

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[ Sutra 2.21 ]

प्रकाश एवं सततं तस्मान्मौनं हि युज्यते । अयमर्थो महान्यस्य स्वयमेव प्रकाशितः ॥2.21॥

prakāśa evaṃ satataṃ tasmānmaunaṃ hi yujyate । ayamartho mahānyasya svayameva prakāśitaḥ ॥2.21॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस प्रकार से सर्वत्र सतत एक प्रकाश स्थित है । इसके सन्दर्भ में और अधिक कुछ कहने की अपेक्षा मौन ही उत्तम है । जिस मनुष्य को यह महान् ज्ञान स्वयमेव ज्ञात हो गया है, वह न जीव रूप है, न ब्रह्म है और न ही कुछ और है । उसका न कोई ‘वर्ण ' है तथा वह आश्रम भी नहीं है । वह धर्म भी नहीं है और अधर्म भी नहीं है, निषेध एवं विधि भी वह नहीं है । जब उसको सब कुछ ब्रह्ममय ही दृष्टिगोचर होता है, तब उसे इस दुःखादि भेद का आभास बिल्कुल नहीं जान पड़ता । परब्रह्म परमात्मा का इस प्रकार से ज्ञान रखने वाला इस जीवादि स्वरूप वाले विश्व को देखते हुए भी नहीं देखता । वह एकमात्र चिद्रूप ब्रह्म को ही निरन्तर दर्शन करता है । धर्म एवं धर्मों के विषय-भेद के रहते हुए भिन्न ही प्रतीत होते हैं ॥2.21॥

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[ Sutra 2.22 ]

न स जीवो न च ब्रह्म न चान्यदपि किंचन । न तस्य वर्णा विद्यन्ते नाश्रमाश्च तथैव च ॥2.22॥

na sa jīvo na ca brahma na cānyadapi kiṃcana । na tasya varṇā vidyante nāśramāśca tathaiva ca ॥2.22॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस प्रकार से सर्वत्र सतत एक प्रकाश स्थित है । इसके सन्दर्भ में और अधिक कुछ कहने की अपेक्षा मौन ही उत्तम है । जिस मनुष्य को यह महान् ज्ञान स्वयमेव ज्ञात हो गया है, वह न जीव रूप है, न ब्रह्म है और न ही कुछ और है । उसका न कोई ‘वर्ण ' है तथा वह आश्रम भी नहीं है । वह धर्म भी नहीं है और अधर्म भी नहीं है, निषेध एवं विधि भी वह नहीं है । जब उसको सब कुछ ब्रह्ममय ही दृष्टिगोचर होता है, तब उसे इस दुःखादि भेद का आभास बिल्कुल नहीं जान पड़ता । परब्रह्म परमात्मा का इस प्रकार से ज्ञान रखने वाला इस जीवादि स्वरूप वाले विश्व को देखते हुए भी नहीं देखता । वह एकमात्र चिद्रूप ब्रह्म को ही निरन्तर दर्शन करता है । धर्म एवं धर्मों के विषय-भेद के रहते हुए भिन्न ही प्रतीत होते हैं ॥2.22॥

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[ Sutra 2.23 ]

न तस्य धर्मोऽधर्मश्च न निषेधो विधिर्न च । यदा ब्रह्मात्मकं सर्वं विभाति तत एव तु ॥2.23॥

na tasya dharmo'dharmaśca na niṣedho vidhirna ca । yadā brahmātmakaṃ sarvaṃ vibhāti tata eva tu ॥2.23॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस प्रकार से सर्वत्र सतत एक प्रकाश स्थित है । इसके सन्दर्भ में और अधिक कुछ कहने की अपेक्षा मौन ही उत्तम है । जिस मनुष्य को यह महान् ज्ञान स्वयमेव ज्ञात हो गया है, वह न जीव रूप है, न ब्रह्म है और न ही कुछ और है । उसका न कोई ‘वर्ण ' है तथा वह आश्रम भी नहीं है । वह धर्म भी नहीं है और अधर्म भी नहीं है, निषेध एवं विधि भी वह नहीं है । जब उसको सब कुछ ब्रह्ममय ही दृष्टिगोचर होता है, तब उसे इस दुःखादि भेद का आभास बिल्कुल नहीं जान पड़ता । परब्रह्म परमात्मा का इस प्रकार से ज्ञान रखने वाला इस जीवादि स्वरूप वाले विश्व को देखते हुए भी नहीं देखता । वह एकमात्र चिद्रूप ब्रह्म को ही निरन्तर दर्शन करता है । धर्म एवं धर्मों के विषय-भेद के रहते हुए भिन्न ही प्रतीत होते हैं ॥2.23॥

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[ Sutra 2.24 ]

तदा दुःखादिभेदोऽयमाभासोऽपि न भासते । जगज्जीवादिरूपेण पश्यन्नपि परात्मवित् ॥2.24॥

tadā duḥkhādibhedo'yamābhāso'pi na bhāsate । jagajjīvādirūpeṇa paśyannapi parātmavit ॥2.24॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस प्रकार से सर्वत्र सतत एक प्रकाश स्थित है । इसके सन्दर्भ में और अधिक कुछ कहने की अपेक्षा मौन ही उत्तम है । जिस मनुष्य को यह महान् ज्ञान स्वयमेव ज्ञात हो गया है, वह न जीव रूप है, न ब्रह्म है और न ही कुछ और है । उसका न कोई ‘वर्ण ' है तथा वह आश्रम भी नहीं है । वह धर्म भी नहीं है और अधर्म भी नहीं है, निषेध एवं विधि भी वह नहीं है । जब उसको सब कुछ ब्रह्ममय ही दृष्टिगोचर होता है, तब उसे इस दुःखादि भेद का आभास बिल्कुल नहीं जान पड़ता । परब्रह्म परमात्मा का इस प्रकार से ज्ञान रखने वाला इस जीवादि स्वरूप वाले विश्व को देखते हुए भी नहीं देखता । वह एकमात्र चिद्रूप ब्रह्म को ही निरन्तर दर्शन करता है । धर्म एवं धर्मों के विषय-भेद के रहते हुए भिन्न ही प्रतीत होते हैं ॥2.24॥

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[ Sutra 2.25 ]

न तत्पश्यति चिद्रूपं ब्रह्मवस्त्वेव पश्यति । धर्मधर्मित्ववार्ता च भेदे सति हि भिद्यते ॥2.25॥

na tatpaśyati cidrūpaṃ brahmavastveva paśyati । dharmadharmitvavārtā ca bhede sati hi bhidyate ॥ ॥2.25॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस प्रकार से सर्वत्र सतत एक प्रकाश स्थित है । इसके सन्दर्भ में और अधिक कुछ कहने की अपेक्षा मौन ही उत्तम है । जिस मनुष्य को यह महान् ज्ञान स्वयमेव ज्ञात हो गया है, वह न जीव रूप है, न ब्रह्म है और न ही कुछ और है । उसका न कोई ‘वर्ण ' है तथा वह आश्रम भी नहीं है । वह धर्म भी नहीं है और अधर्म भी नहीं है, निषेध एवं विधि भी वह नहीं है । जब उसको सब कुछ ब्रह्ममय ही दृष्टिगोचर होता है, तब उसे इस दुःखादि भेद का आभास बिल्कुल नहीं जान पड़ता । परब्रह्म परमात्मा का इस प्रकार से ज्ञान रखने वाला इस जीवादि स्वरूप वाले विश्व को देखते हुए भी नहीं देखता । वह एकमात्र चिद्रूप ब्रह्म को ही निरन्तर दर्शन करता है । धर्म एवं धर्मों के विषय-भेद के रहते हुए भिन्न ही प्रतीत होते हैं ॥2.25॥

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[ Sutra 2.26 ]

भेदाभेदस्तथा भेदाभेदः साक्षात्परात्मनः । नास्ति स्वात्मातिरेकेण स्वयमेवास्ति सर्वदा ॥2.26॥

bhedābhedastathā bhedābhedaḥ sākṣātparātmanaḥ । nāsti svātmātirekeṇa svayamevāsti sarvadā ॥2.26॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — एक मात्र वह परमात्म चेतना ही है, जो हमेशा से अपने वर्तमान स्वरूप में है और दूसरे अन्य सभी भेद आदि एवं समस्त भेद-अभेद उस (परमात्मा) में ही संव्याप्त हैं ॥2.26॥

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[ Sutra 2.27 ]

ब्रह्मैव विद्यते साक्षाद्वस्तुतोऽवस्तुतोऽपि च । तथैव ब्रह्मविज्ज्ञानी किं गृह्णाति जहाति किम् ॥2.27॥

brahmaiva vidyate sākṣādvastuto'vastuto'pi ca । tathaiva brahmavijjñānī kiṃ gṛhṇāti jahāti kim ॥2.27॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — वस्तु अथवा अवस्तु जो कुछ भी विद्यमान है, वह सभी कुछ साक्षात् परब्रह्ममय ही है । ऐसी दशा में ब्रह्मज्ञान रखने वाला किसी को स्वीकार अथवा परित्याग कैसे कर सकता है ? ॥2.27॥

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[ Sutra 2.28 ]

अधिष्ठानमनौपम्यमवाङ्मनसगोचरम् । यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रं रूपवर्जितम् ॥2.28॥

adhiṣṭhānamanaupamyamavāṅmanasagocaram । yattadadreśyamagrāhyamagotraṃ rūpavarjitam ॥2.28॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो परब्रह्म उपमा-विहीन, वाणी एवं मन से अगोचर, दृष्टि से परिलक्षित न होने वाला, ग्रहण न कर सकने योग्य, गोत्र-रहित, रूप-विहीन है; जो (ब्रह्म) आँख, कान, हाथ-पैर आदि से रहित, नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, अव्यय एवं मृत्यु से रहित है, सबका अधिष्ठाता अथवा आधार रूप है; वह (ब्रह्म उस साधक के) आगे-पीछे, उत्तर एवं दक्षिण सर्वत्र सर्वश्रेष्ठ वेदामृत (वेदज्ञानामृत) स्वरूप ब्रह्मानन्द रूप में विद्यमान है और वह परब्रह्म आनन्दमय रूप में दायें-बायें भी प्रतिष्ठित है ॥2.28॥

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[ Sutra 2.29 ]

अचक्षुःश्रोत्रमत्यर्थं तदपाणिपदं तथा । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं च तदव्ययम् ॥2.29॥

acakṣuḥśrotramatyarthaṃ tadapāṇipadaṃ tathā । nityaṃ vibhuṃ sarvagataṃ susūkṣmaṃ ca tadavyayam ॥2.29॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो परब्रह्म उपमा-विहीन, वाणी एवं मन से अगोचर, दृष्टि से परिलक्षित न होने वाला, ग्रहण न कर सकने योग्य, गोत्र-रहित, रूप-विहीन है; जो (ब्रह्म) आँख, कान, हाथ-पैर आदि से रहित, नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, अव्यय एवं मृत्यु से रहित है, सबका अधिष्ठाता अथवा आधार रूप है; वह (ब्रह्म उस साधक के) आगे-पीछे, उत्तर एवं दक्षिण सर्वत्र सर्वश्रेष्ठ वेदामृत (वेदज्ञानामृत) स्वरूप ब्रह्मानन्द रूप में विद्यमान है और वह परब्रह्म आनन्दमय रूप में दायें-बायें भी प्रतिष्ठित है ॥2.29॥

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[ Sutra 2.30 ]

ब्रह्मैवेदममृतं तत्पुरस्ताद्ब्रह्मानन्दं परमं चैव पश्चात् । ब्रह्मानन्दं परमं दक्षिणे च ब्रह्मानन्दं परमं चोत्तरे च ॥2.30॥

brahmaivedamamṛtaṃ tatpurastādbrahmānandaṃ paramaṃ caiva paścāt । brahmānandaṃ paramaṃ dakṣiṇe ca brahmānandaṃ paramaṃ cottare ca ॥2.30॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो परब्रह्म उपमा-विहीन, वाणी एवं मन से अगोचर, दृष्टि से परिलक्षित न होने वाला, ग्रहण न कर सकने योग्य, गोत्र-रहित, रूप-विहीन है; जो (ब्रह्म) आँख, कान, हाथ-पैर आदि से रहित, नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, अव्यय एवं मृत्यु से रहित है, सबका अधिष्ठाता अथवा आधार रूप है; वह (ब्रह्म उस साधक के) आगे-पीछे, उत्तर एवं दक्षिण सर्वत्र सर्वश्रेष्ठ वेदामृत (वेदज्ञानामृत) स्वरूप ब्रह्मानन्द रूप में विद्यमान है और वह परब्रह्म आनन्दमय रूप में दायें-बायें भी प्रतिष्ठित है ॥2.30॥

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[ Sutra 2.31 ]

स्वात्मन्येव स्वयं सर्वं सदा पश्यति निर्भयः । तदा मुक्तो न मुक्तश्च बद्धस्यैव विमुक्तता ॥2.31॥

svātmanyeva svayaṃ sarvaṃ sadā paśyati nirbhayaḥ । tadā mukto na muktaśca baddhasyaiva vimuktatā ॥2.31॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस प्रकार वह श्रेष्ठ साधक सभी को निरन्तर अपनी अन्तरात्मा में निर्भय होकर देखता रहता है । ऐसा भाव रखने वाला साधक ज्ञानी ही नहीं, वरन् अज्ञानी होने पर भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥2.31॥

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[ Sutra 2.32 ]

एवंरूपा परा विद्या सत्येन तपसापि च । ब्रह्मचर्यादिभिर्धर्मैर्लभ्या वेदान्तवर्मना ॥2.32॥

evaṃrūpā parā vidyā satyena tapasāpi ca । brahmacaryādibhirdharmairlabhyā vedāntavarmanā ॥2.32॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस प्रकार परा विद्या,सत्य,तप और ब्रह्मचर्यादि धर्म की प्राप्ति भी वेदान्त मार्ग के द्वारा ही होती है ॥2.32॥

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[ Sutra 2.33 ]

स्वशरीरे स्वयंज्योतिःस्वरूपं पारमार्थिकम् । क्षीणदोषाः प्रपश्यन्ति नेतरे माययाऽऽवृताः ॥2.33॥

svaśarīre svayaṃjyotiḥsvarūpaṃ pāramārthikam । kṣīṇadoṣāḥ prapaśyanti netare māyayā''vṛtāḥ ॥2.33॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जिनका अन्तःकरण पूर्णरूपेण पवित्र है, समस्त दोषादि विकार क्षीण हो गये हैं, वे ही श्रेष्ठ योगी साधक स्वयं प्रकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मा का दर्शन कर सकते हैं, माया द्वारा आवृत लोग उन परमप्रभु का दर्शन प्राप्त नहीं कर सकते ॥2.33॥

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[ Sutra 2.34 ]

एवं स्वरूपविज्ञानं यस्य कस्यास्ति योगिनः । कुत्रचिद्गमनं नास्ति तस्य संपूर्णरूपिणः ॥2.34॥

evaṃ svarūpavijñānaṃ yasya kasyāsti yoginaḥ । kutracidgamanaṃ nāsti tasya saṃpūrṇarūpiṇaḥ ॥2.34॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो योगी साधक अपने स्वरूप को इस तरह से समझ लेता है, वह उस पूर्णता को प्राप्त करके पुनः आवागमन के चक्कर में नहीं पड़ता ॥2.34॥

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[ Sutra 2.35 ]

आकाशमेकं संपूर्णं कुत्रचिन्न हि गच्छति । तद्वद्ब्रह्मात्मविच्छ्रेष्ठः कुत्रचिन्नैव गच्छति ॥2.35॥

ākāśamekaṃ saṃpūrṇaṃ kutracinna hi gacchati । tadvadbrahmātmavicchreṣṭhaḥ kutracinnaiva gacchati ॥2.35॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जिस प्रकार एकमात्र आकाश सर्वत्र उपस्थित रहता है । वह इधर-उधर कहीं गमनागमन नहीं करता, उसी प्रकार शिर योगी साधक ने अपने को ब्रह्ममय जान लिया है, वह कहीं आ-जा नहीं सकता ॥2.35॥

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[ Sutra 2.36 ]

अभक्ष्यस्य निवृत्त्या तु विशुद्धं हृदयं भवेत् । आहारशुद्धौ चित्तस्य विशुद्धिर्भवति स्वतः ॥2.36॥

abhakṣyasya nivṛttyā tu viśuddhaṃ hṛdayaṃ bhavet ।

Pasupata Brahmana Upanishad (Part 2)

āhāraśuddhau cittasya viśuddhirbhavati svataḥ ॥2.36॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — आहार के अन्तर्गत अभक्ष्य-भक्षण का परित्याग कर देने पर पित्त पूर्णतया पवित्र हो जाता है । जब आहार की शुद्धि हो जाती है, तब चित्त की शुद्धि स्वयं ही हो जाती है ॥2.36॥

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[ Sutra 2.37 ]

चित्तशुद्धौ क्रमाज्ज्ञानं त्रुटसन्ति ग्रन्थयः स्फुटम् । अभक्ष्यं ब्रह्मविज्ञानविहीनस्यैव देहिनः ॥2.37॥

cittaśuddhau kramājjñānaṃ truṭasanti granthayaḥ sphuṭam । abhakṣyaṃ brahmavijñānavihīnasyaiva dehinaḥ ॥2.37॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जब चित्त पूरी तरह से शुद्ध हो जाता है, तब क्रमशः ज्ञान प्रवर्द्धित होता चला जाता है तथा अज्ञान की समस्त ग्रन्थियाँ विनष्ट हो जाती हैं, लेकिन भक्ष्याभक्ष्य का विचार मात्र उसके लिए आवश्यक है, जिसे ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति अभी नहीं हुई है ॥2.37॥

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[ Sutra 2.38 ]

न सम्यग्ज्ञानिनस्तद्वत्स्वरूपं सकलं खलु । अहमन्नं सदान्नाद इति हि ग्रावेदनम् ॥2.38॥

na samyagjñāninastadvatsvarūpaṃ sakalaṃ khalu । ahamannaṃ sadānnāda iti hi grāvedanam ॥2.38॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इसका कारण यह है कि सम्यक् रूप से ज्ञानी का स्वरूप अज्ञानी के सदृश भेद-ज्ञानयुक्त नहीं होता । ज्ञानी यह समझता है कि भक्षण करने वाला मैं ‘ब्रह्म' हूँ तथा अन्न भी मैं ही हूँ ॥2.38॥

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[ Sutra 2.39 ]

ब्रह्मविद्ग्रसति ज्ञानात्सर्वं ब्रह्मात्मनैव तु । ब्रह्मक्षत्रादिकं सर्वं यस्य स्यादोदनं सदा ॥2.39॥

brahmavidgrasati jñānātsarvaṃ brahmātmanaiva tu । brahmakṣatrādikaṃ sarvaṃ yasya syādodanaṃ sadā ॥2.39॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो साधक योगी-ब्रह्मज्ञानी होता है, वह प्राणि-मात्र को ब्रह्म के रूप में देखता है । इस कारण ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि की भावना भी उसके लिए भोज्य (ग्राह्म-पाच्य) है ॥2.39॥

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[ Sutra 2.40 ]

यस्योपसेचनं मृत्युस्तं ज्ञानी तादृशः खलु । ब्रह्मस्वरूपविज्ञानाज्जगद्भोज्यं भवेत्खलु ॥2.40॥

yasyopasecanaṃ mṛtyustaṃ jñānī tādṛśaḥ khalu । brahmasvarūpavijñānājjagadbhojyaṃ bhavetkhalu ॥2.40॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — मृत्यु ही जिस ब्रह्म का अन्न (भोज्य पदार्थ) है, ऐसे ब्रह्म को जानने वाला साधक भी तदनुरूप ही हो जाता है तथा यह सम्पूर्ण जगत् ही उसके लिए भोज्य (ग्राह्य) हो जाता है ॥2.40॥

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[ Sutra 2.41 ]

जगदात्मतया भाति यदा भोज्यं भवेत्तदा । ब्रह्मस्वात्मतया नित्यं भक्षितं सकलं तदा ॥2.41॥

jagadātmatayā bhāti yadā bhojyaṃ bhavettadā । brahmasvātmatayā nityaṃ bhakṣitaṃ sakalaṃ tadā ॥2.41॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जब इस विश्व की, आत्मा के रूप में अनुभूति की जाती है, तो वह भोज्य रूप हो जाता है तथा आत्मा रूप से अविनाशी ब्रह्म सतत उसका भक्षण करता रहता है ॥2.41॥

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[ Sutra 2.42 ]

यदाभानेन रूपेण जगभोज्यं भवेत्तु तत् । मानतः स्वात्मना भातं भक्षितं भवति ध्रुवम् ॥2.42॥

yadābhānena rūpeṇa jagabhojyaṃ bhavettu tat । mānataḥ svātmanā bhātaṃ bhakṣitaṃ bhavati dhruvam ॥2.42॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जिसका आभास हो जाने से यह विश्व भोज्य पदार्थरूप हो जाता है तथा वह जब आत्मस्वरूप ज्ञात हो जाता है, तो निश्चय ही वह ब्रह्म के द्वारा भक्षित होता है ॥2.42॥

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[ Sutra 2.43 ]

स्वस्वरूपं स्वयं भुङ्क्ते नास्ति भोज्यं पृथक् स्वतः । अस्ति चेदस्तितारूपं ब्रह्मैवास्तित्वल-क्षणम् ॥2.43॥

svasvarūpaṃ svayaṃ bhuṅkte nāsti bhojyaṃ pṛthak svataḥ । asti cedastitārūpaṃ brahmaivāstitvala-kṣaṇam ॥2.43॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस तरह से ब्रह्म स्वयं ही अपने स्वरूप का भक्षण करता है, इसका कारण यह है कि उससे (ब्रह्म से) भोज्य पदार्थ अलग ही नहीं है । जो अस्तिता का रूप है, वहीं ब्रह्म के अस्तित्व का लक्षण-रूप है ॥2.43॥

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[ Sutra 2.44 ]

अस्तितालक्षणा सत्ता सत्ता ब्रह्म न चापरा । नास्ति सत्तातिरेकेण नास्ति माया च वस्तुतः ॥2.44॥

astitālakṣaṇā sattā sattā brahma na cāparā । nāsti sattātirekeṇa nāsti māyā ca vastutaḥ ॥2.44॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — सत्ता का लक्षण ही अस्तित्व माना जाता है तथा ब्रह्म से सत्ता पृथक् नहीं होती । ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कोई सत्ता है ही नहीं और न माया कोई वास्तविक वस्तु ही होती है ॥2.44॥

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[ Sutra 2.45 ]

योगिनामात्मनिष्ठानां माया स्वात्मनि कल्पिता । साक्षिरूपतया भाति ब्रह्मज्ञानेन बाधिता ॥2.45॥

yogināmātmaniṣṭhānāṃ māyā svātmani kalpitā । sākṣirūpatayā bhāti brahmajñānena bādhitā ॥2.45॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — योगी साधकगण माया की कल्पना अपनी अन्तरात्मा से ही करते हैं । वह ब्रह्मज्ञान से बाधित होती हुई उन (साधक गणों) को साक्षीरूप में प्रतिभासित होती है ॥2.45॥

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[ Sutra 2.46 ]

ब्रह्मविज्ञानसंपन्नः प्रतीतमखिलं जगत् । पश्यन्नपि सदा नैव पश्यति स्वात्मनः पृथक् ॥2.46॥

brahmavijñānasaṃpannaḥ pratītamakhilaṃ jagat । paśyannapi sadā naiva paśyati svātmanaḥ pṛthak ॥2.46॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस प्रकार से जिस ज्ञानी साधक को ब्रह्म के ज्ञान-विज्ञान की सम्पन्नता की अनुभूति हो गई है, वह चाहे इस सम्पूर्ण विश्व का अपने समक्ष दर्शन करता रहे; किन्तु वह उसे अपने से अलग कभी नहीं मानता । ऐसी ही यह उपनिषद् (रहस्यात्मक ज्ञान) है ॥2.46॥