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1. Patanjala Yoga Hindi Translation (From Internet)

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पातञ्जल योग समाधिपाद पातञ्जल योग समाधिपाद

समाधिपाद वृत्ति - वृत्तियों (का) निरोध: - रुकना अर्थात् वृत्तियों का अन्तर्मुख हो कर चित्त में लीन हो जाना (है)। संगति - समाधिपाद में समाहित-चित्त वालों के लिए समाधि के उपाय बतलाते हैं। संगति - वृत्तियों के निरोध होने पर पुरुष की क्या अवस्था होती है?

अथ योगानुशासनम् ॥१॥ तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥३॥ अथ - अब (आरम्भ करते हैं) तदा - तब (वृत्तियों के निरोध होने पर) योग - योग (की) द्रष्टुः- द्रष्टा अर्थात् पुरुष की अनु-शासनम् - पहले से विद्यमान (लक्षण, भेद, उपाय और फलों स्वरूपे - अपने ही रूप अर्थात् चेतन-मात्र में

सहित) शिक्षा (देने वाले ग्रन्थ को)। अवस्थानम् - स्थिति (होती है)।

संगति - योग की क्या परिभाषा है ? संगति - वृत्तियों के निरोध से भिन्न व्युत्थान-अवस्था अर्थात् निरोध के विरोध में पुरुष का क्या स्वरूप होता है ? योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: ॥२॥ योगः - योग वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥४।।

चित्त - चित्त अर्थात् अन्तःकरण (की) इतरत्र - दूसरी अर्थात् वृत्तियों के निरोध से भिन्न अवस्था में (पुरुष) वृत्ति - वृत्ति (के) सारूप्यम् - समान रूप (होता है)।

संगति - वृत्तियाँ कितने प्रकार की होती हैं ? १ अन्तःकरण - चित्त अर्थात् भूत और भविष्य स्मरण, अहंकार अर्थात् अहं और मम, बुद्धि अर्थात् निश्चय और अवधारण, मन अर्थात् सङ्कल्प और विकल्प । अन्तःकरण की पाँच अवस्थाएँ - मूढ़ अर्थात् तमस् प्रधान, क्षिप्त अर्थात् रजस् प्रधान, विक्षिप्त अर्थात् तमस् और रजस् प्रधान, मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त अन्तःकरण का धर्म - काम, क्रोध, लोभ, एकाग्र अर्थात् सत्त्व प्रधान, निरुद्ध अर्थात् गुणातीत । मोह, अहंकार और मात्सर्य ।

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पातञ्जल योग समाधिपाद पातञ्जल योग समाधिपाद

वृत्तयः पञ्चतय्यः क्रिष्टाक्रिष्टाः ॥५॥। आगमा: - वेद, शास्त्र तथा आप्त-पुरुष के वचन, (ये तीन प्रकार वृत्तयः- (उपर्युक्त) वृत्तियाँ की इन्द्रियों और विषय के सम्बन्ध में) पञ्चतय्यः - पाँच प्रकार (की होती हैं, जो) प्रमाणानि - प्रमाण (वृत्तियाँ हैं)। क्रिष्टाः - क्रिष्ट अर्थात् राग-द्वेष आदि क्लेशों की कारण (और) अक्लिष्टाः - अक्किष्ट अर्थात् राग-द्वेष आदि केशों का नाश करने वाली संगति - विपर्यय-वृत्ति क्या है ?

(होती हैं)। विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥८॥।

संगति - उक्त पाँच वृत्तियों के क्या नाम हैं ? विपर्ययः - विपर्यय (पदार्थ का) मिथ्या - भ्रामक प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ॥६॥ ज्ञानम् - ज्ञान (है, जो) प्रमाण - प्रमाण, अतद्रप - उस (पदार्थ के वास्तविक) रूप में नहीं विपर्यय - विपर्यय, प्रतिष्ठम् - प्रतिष्ठित (है) । विकल्प - विकल्प, निद्रा - निद्रा (और) संगति - विकल्प-वृत्ति के क्या लक्षण हैं ?

स्मृतयः - स्मृति, (ये पाँच प्रकार की वृत्तियाँ हैं)। शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥९। संगति - प्रमाण-वृत्ति के क्या भेद हैं ? शब्द- (जो ज्ञान) शब्द (से उत्पन्न) ज्ञान - ज्ञान (के) प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥७॥ अनुपाती - पीछे चलने वाला (और) प्रत्यक्ष - यथार्थ ज्ञान, (कार्य और कारण के सम्बन्ध से उत्पन्न) वस्तु - वस्तु (की सत्ता से) अनुमान - अप्रत्यक्ष पदार्थ का ज्ञान (और) शून्यः - शून्य (हो, वह) विकल्पः - विकल्प अर्थात् कल्पना (कहलाता है)।

२ कार्य और कारण - प्रत्येक कार्य (पदार्थ) अपने कारण में संगति - निद्रा-वृत्ति क्या है ?

अव्यक्त और व्यक्त रूप से विद्यमान रहता है। वस्तुतः कोई भी पदार्थ पूर्ण रूप से नष्ट नहीं होता है। कारण से कार्य की होना कार्य का अभाव है। सांख्य के इस सिद्धान्त को अभिव्यक्ति कार्य का उत्पन्न होना है और कार्य का कारण में लय सत्यकार्यवाद कहते हैं।

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अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा॥१० ॥ तत्र स्थितौ यव्नोऽभ्यासः ॥१३॥ अभाव - (जाग्रत और स्वप्र अवस्था की) अनुपस्थिति (के ज्ञान तत्र - उन (दोनों, अभ्यास और वैराग्य, में से चित्त की) की) स्थितौ- स्थिरता के लिए (निरंतर) प्रत्यय - प्रतीति (को) यव्रः - प्रयत्र (करना) आलम्बना - आश्रय देने वाली अभ्यासः - अभ्यास (है) । वृत्तिः - वृत्ति (को) निद्रा - निद्रा अर्थात् सुषुप्ति (कहते हैं)। संगति - अभ्यास दृढ़ कैसे होता है ?

संगति - स्मृति-वृत्ति क्या है ? स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढ़भूमिः ॥१४॥

अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः ॥११॥ तु - किन्तु सः - वह (अभ्यास) अनुभूत - (प्रमाण, विपर्यय, विकल्प और निद्रा के) अनुभव किए दीर्घ- बहुत हुए काल - समय (तक), विषय - विषय (का) नैरन्तर्य - निरन्तर (और) असम्प्रमोष: - न खोया जाना अर्थात् किसी सहायक विषय को पा सत्कार - सत्कार से (ठीक ठीक) कर संस्कार का फिर से प्रकट हो जाना आसेवित: - सेवन किया हुआ स्मृतिः - स्मृति (कहलाता है) । दृढ़ - दृढ़

संगति - उक्त पाँचों प्रकार की वृत्तियों के निरोध के क्या उपाय हैं ? भूमि: -अवस्था (वाला हो जाता है)।

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥१२॥ संगति - दो प्रकार के वैराग्य, अपर और पर, में से सम्प्रज्ञात

अभ्यास - अभ्यास (और) समाधि के साधन अपर-वैराग्य के क्या लक्षण हैं ?

वैराग्याभ्याम् -वैराग्य से दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥१५।। तत् - उन (पाँच प्रकार की वृत्तियों का) दृष्ट - देखे हुए अर्थात् लोक में दृष्टिगोचर होने वाले (और वेद निरोध: - निरोध (होता है)। शास्त्रों द्वारा)

संगति - अभ्यास क्या है ? आनुश्रविक - सुने हुए विषय - विषयों (में, जो) ५ ६

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वितृष्णस्य - तृष्णा रहित (है), उसका रूप - स्वरूपों (के) वैराग्यम् - वैराग्य अनुगमात् - सम्बन्ध से (जो चित्त की वृत्तियों का निरोध है, वह) वशीकार - अपर-वैराग्य सम्प्रज्ञातः - सम्प्रज्ञात (समाधि है)। संज्ञा - नाम वाला (है) । संगति - अब पर-वैराग्य वाली असम्प्रज्ञात अर्थात् निर्बीज समाधि संगति - असम्प्रज्ञात समाधि का साधन पर-वैराग्य क्या है ? का लक्षण बतलाया जाता है।

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥१६।। विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ॥१८॥ तत् - वह (वैराग्य) विराम - (सब वृत्तियों के) निरोध (के) परम् - पर अर्थात् सबसे श्रेष्ठ (है, जिसमें) प्रत्यय - कारण अर्थात् पर-वैराग्य (के) पुरुष-ख्यातेः - प्रकृति-पुरुष के विवेकज्ञान अर्थात् विवेकख्याति (के पूर्वः - पुनः पुनः उदय होने से पुरुष) अभ्यास - अभ्यास (से जो) गुण - गुणों (से) संस्कार - संस्कार (मात्र) वैतृष्ण्यम् - तृष्णा रहित (हो जाता है)। शेषः - शेष (रह जाते हैं, वे)

संगति - अब अपर-वैराग्य वाली सम्प्रज्ञात अर्थात् सबीज समाधि के अन्यः - दूसरी अर्थात् असम्प्रज्ञात (समाधि हैं)।

चार अवान्तर भेद अर्थात् वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता संगति - किस प्रकार के साधक का योग शीघ्र सिद्ध होता है ? स्वरूप को बतलाते हैं। भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥१९।। वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् सम्प्रज्ञातः ॥१७॥ विदेह - योगी जो पिछले जन्म में वितर्कानुगत और विचारानुगत वितर्क - पाँच स्थूलभूत-विषयक तथा स्थूल इन्द्रिय-विषयक ग्राह्य समाधि सिद्ध कर चुके हैं और आनन्दानुगत समाधि का अभ्यास कर भावना, रहे हैं (और) विचार - सूक्ष्मभूत-विषयक तथा सूक्ष्म इन्द्रिय-विषयक ग्राह्य भावना, प्रकृतिलयानाम् - योगी जो पिछले जन्म में आनन्दानुगत समाधि आनन्द - तन्मात्राओं तथा इन्द्रियों के कारण सत्त्व-प्रधान अहंकार- सिद्ध कर चुके हैं और अस्मितानुगत समाधि का अभ्यास कर रहे हैं, विषयक केवल ग्रहण भावना (और) (उन दोनों को अगले जन्म में) अस्मिता - चेतन से प्रतिबिम्बित चित्तसत्त्व बीज रूप अहंकार- भव - जन्म (से ही असम्प्रज्ञात समाधि की) विषयक ग्रहीतृ भावना, (इन से सम्बद्ध) प्रत्यय: प्रत्ययः - प्रतीति (होती है) । ७ ८

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संगति - भवप्रत्यय से भिन्न उपायप्रत्यय वालों के लिए असम्प्रज्ञात तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥२१॥ समाधि के क्या उपाय हैं ? तीव्र - तीव्र

श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ॥२०॥ संवेगानाम् - गति अर्थात् वैराग्य (और श्रद्धा, वीर्य आदि उपायों की

इतरेषाम् - दूसरे (योगी जो विदेही और प्रकृतिलय नहीं हैं), उनको अधिमात्र) से (समाधि)

श्रद्धा - श्रद्धा, आसन्नः - निकटतम (होती है)।

वीर्य - उत्साह, संगति - उक्त तीव्र संवेग के क्या भेद हैं ? स्मृति - ज्ञान के संस्कारों के जाग्रत होने, समाधि - समाधि (और) मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः ॥२२॥ प्रज्ञा-पूर्वकः - प्रज्ञा अर्थात् विवेक, (इन पाँचों से असम्प्रज्ञात समाधि ततः - उस

सिद्ध होती है)। मृदु - हल्के (तीव्र संवेग) और

संगति - उपायप्रत्यय वालों की सबसे अन्तिम श्रेणी अर्थात् अधिमात्र मध्य - मध्यम (तीव्र संवेग से) अपि - भी उपाय और तीव्र संवेग वाले योगियों को शीघ्र समाधि लाभ होता है। उन्हीं का वर्णन अगले सूत्र में करते हैं। अधिमात्रत्वात् - अधिमात्र (तीव्र संवेग) में (समाधि लाभ में) विशेष: - विशेषता (होती है)।

संगति - क्या पूर्वोक्त अधिमात्र उपाय और अधिमात्र तीव्र संवेग से ही शीघ्रतम समाधि लाभ होता है अथवा कोई और भी सुगम उपाय

उपायप्रत्यय - श्रद्धा, वीर्य आदि उपाय तीन प्रकार के अर्थात् मृदु, है?

मध्यम और अधिमात्र होते हैं। इन तीनों के भी तीन प्रकार के संवेग अर्थात् मृदु, मध्यम और अधिमात्र होते हैं। इस प्रकार ईश्वरप्रणिधानाद्वा ।।२३।।

उपायप्रत्यय वालों के नौ भेद अर्थात् मृदु उपाय और मृदु संवेग, वा - अथवा

मृदु उपाय और मध्यम संवेग, मृदु उपाय और तीव्र संवेग, मध्यम ईश्वर-प्रणिधानात् - ईश्वर के गुणों का पुनः पुनः चिन्तन करने और

उपाय और मृदु संवेग, मध्यम उपाय और मध्यम संवेग, मध्यम कर्म और कर्म-फल ईश्वर के प्रति समर्पण करने से (शीघ्रतम समाधि

उपाय और तीव्र संवेग, अधिमात्र उपाय और मृदु संवेग, अधिमात्र लाभ होता है)।

उपाय और मध्यम संवेग, अधिमात्र उपाय और तीव्र संवेग होते हैं। संगति - ईश्वर के क्या लक्षण हैं ?

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पातञ्जल योग समाधिपाद पातञ्जल योग समाधिपाद

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥२४॥ तस्य वाचकः प्रणवः ॥२७॥ क्लेश - क्लेश, तस्य - उस (ईश्वर का) कर्म - कर्म, (कर्मों के) वाचकः - बोधक शब्द अर्थात् नाम विपाक - फल (और वासनाओं के) प्रणवः - ओरम् (है) । आशयैः - आवास अर्थात् वासनाओं से अपरामृष्टः - स्पर्श रहित संगति - ईश्वर-प्रणिधान का क्या लक्षण है ?

ईश्वरः - ईश्वर (अन्य) पुरुष-विशेषः - पुरुषों (से) विशेष (चेतन है) । तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥२८। तत् - उस (प्रणव का) संगति - ईश्वर की क्या विशेषता है ? जपः - जप (और)

तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ॥२५॥ तत् - उस (ईश्वर के) अर्थ - अर्थस्वरूप (का) तत्र - उस (ईश्वर में) भावनम् - ध्यान करना अर्थात् पुनः पुनः चिन्तन करना (ईश्वर- सर्वज्ञ - सर्वेज्ञता (का) प्रणिधान है)। बीजम् - कारण अर्थात् स्रोत निरतिशयम् - अतिशय रहित अर्थात् सीमा को प्राप्त (है) । संगति - असम्प्रज्ञात समाधि से पूर्व ईश्वर-प्रणिधान के क्या विशेष फल हैं ? संगति - ईश्वर की और क्या विशेषता है ?

पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात् ॥२६॥ ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥२९॥ ततः - उस (ईश्वर-प्रणिधान से पुरुष को) पूर्वेषाम् - (वह ईश्वर) पूर्व उत्पन्न (गुरुओं) का प्रत्यक्-चेतना - जीवात्मा (की) अपि - भी अधिगमः - प्राप्ति अर्थात् साक्षात्कार गुरु: - गुरु (है, क्योंकि वह ईश्वर) अपि - भी (होता है) कालेन - समय से अनवच्छेदात् - सीमित नहीं अर्थात् सर्वकाल में विद्यमान (है) ।

संगति - ईश्वर का वाचक नाम क्या है ? ४ परिशिष्ट - ॐ तालिका ।

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च - और दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः ॥३१॥ अन्तराय - विघ्यों (का) दुःख-दुःख, अभावः - अभाव (भी) । दौर्मनस्य - इच्छा पूर्ति न होने पर मन में क्षोभ,

संगति - ईश्वर-प्रणिधान से जिन विघ्रों का अभाव बतलाया गया है, अङ्गमेजयत्व - शरीर के अङ्गों का काँपना, (बिना इच्छा के)

उन विघ्रों का क्या स्वरूप है ? श्वास - साँस का अंदर आना (और बिना इच्छा के) प्रश्वासाः - साँस का बाहर जाना, (ये पाँच उप) विक्षेप - विक्षेप (पूर्वोक्त नौ अन्तरायों के) वस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥३०॥ सहभुवः - साथ होते हैं। व्याधि - रोग, स्त्यान - चित्त की अकर्मण्यता अर्थात् इच्छा होने पर भी योग में संगति - विक्षिप्त चित्त वालों के लिए नौ विक्षेपों और पाँच

सामर्थ्य न होना, उपविक्षेपों के निरोध के क्या उपाय हैं ?

संशय - शंका, तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥३२।। प्रमाद - समाधि के साधनों का अनुष्ठान न करना, तत् - उन (विक्षेपों को) आलस्य - आलस्य, प्रतिषेधार्थम् - दूर करने के लिए अविरति - विषयों में तृष्णा बनी रहना, एकतत्त्व - एक तत्त्व अर्थात् इष्ट (का) भ्रान्ति-दर्शन - मिथ्या ज्ञान, अभ्यासः - अभ्यास (करना चाहिए)। अलब्ध-भूमिकत्व - रुकावट के कारण समाधि में न पहुँच पाना, अनवस्थितत्वानि - समाधि में पहुँच कर उस में चित्त का न ठहरना, संगति - चित्त के मल को दूर करने का क्या उपाय है ?

ते - ये चित्त - चित्त (के नौ) मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां

विक्षेपाः - विक्षेप, (योग के मूल) भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥३३।

अन्तरायाः - विघ्र (हैं) । सुख - सुखी, दुःख-दुःखी, संगति - पूर्वोक्त नौ विक्षेप अगले पाँच उपविक्षेपों को उपस्थित करते पुण्य - पुण्यात्मा (और) हैं। अपुण्य - पापात्मा (के)

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विषयाणाम् - विषयों में (यथाक्रम से) संगति - चित्त-स्थिति का तीसरा उपाय क्या है ? मैत्री - मित्रता, करुणा - दया, विशोका वा ज्योतिष्मती ॥३६। मुदिता - हर्ष (और) वा - अथवा

उपेक्षाणाम् - उदासीनता (की) विशोका - शोक रहित (सात्त्विक) भावनातः - भावना (के अनुष्ठान) से ज्योतिष्मती - प्रकाश वाली (प्रवृत्ति भी मन की स्थिति को बाँधने चित्त-प्रसादनम् - चित्त निर्मल और प्रसन्न (होता है)। वाली होती है)।

संगति - निर्मल और प्रसन्न चित्त वाले उत्तम अधिकारियों के लिए संगति - चित्त-स्थिति का चौथा उपाय क्या है ? चित्त-स्थिति का पहला उपाय क्या है ? वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥३७॥ प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥३४। वा - अथवा

वा - या तो राग - राग

प्राणस्य - प्राण को (नासिका द्वारा प्रयत्न विशेष से) वीत - रहित प्रच्छर्दन - बाहर फेंकने (और) विषयम् - विषय वाला (महान् योगियों का) विधारणाभ्याम् - रोकने से (मन की स्थिति को बाँधा जाता है)। चित्तम् - चित्त (मन की स्थिति को बाँधने वाला होता) है।

संगति - चित्त-स्थिति अथवा निरोध का दूसरा उपाय क्या है ? संगति - चित्त-स्थिति का पाँचवाँ उपाय क्या है ?

विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनी ॥३५॥ स्वप्रनिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥३८।।

वा - अथवा (दिव्य गन्ध, रस, रूप, स्पर्श अथवा शब्द) वा - अथवा

विषयवती - विषयों वाली स्वप्न - स्वप्न (और)

प्रवृत्तिः - प्रवृत्ति निद्रा - निद्रा (के)

उत्पन्ना - उत्पन्न (हो कर) ज्ञान - ज्ञान (का)

मनसः - मन की आलम्बनम् - आश्रय (करने वाला चित्त मन की स्थिति को बाँधने स्थिति - स्थिति (को) वाला होता है)। निबन्धिनी - बाँधने वाली (होती है)। १५ १६

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संगति - चित्त-स्थिति का छठा उपाय क्या है ? ग्राह्येषु - ग्राह्य अर्थात् स्थूल भूत तथा सूक्ष्म तन्मात्रा (विषय) में

यथाभिमतध्यानाद्वा ।।३९।। तत्स्थ - एकाग्र स्थित (हो कर)

वा - अथवा (जिसको) तदञ्जनता - उसी (विषय के) स्वरूप को प्राप्त हो जाना (सम्प्रज्ञात) यथा - जो अभिमत - इष्ट (हो, उस के) समापत्तिः - समाधि अर्थात् चित्त का विषय के साथ तदाकार हो

ध्यानात् - ध्यान से (मन की स्थिति बँध जाती है) । जाना (है) ।

संगति - अब इस समापत्ति अर्थात् सबीज-समाधि के चार भेदों में से संगति - चित्त-स्थिति का क्या फल है ? पहले भेद का वर्णन करते हैं।

परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥४०॥ अस्य - (पूर्वोक्त उपायों से स्थिर हुए चित्त) का (सूक्ष्म पदार्थ) तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥४२।।

परमाणु - परमाणु (आदि से ले कर) तत्र - उन (समापत्तियों में से)

परम-महत्त्व-अन्तः - परम महान् (पदार्थों में) शब्द - शब्द,

वशीकारः - वशीकार (हो जाता है)। अर्थ - अर्थ (और विषय) ज्ञान - ज्ञान (के तीनों) संगति - स्थिर चित्त की क्या स्थिति होती है ? विकल्पैः- भेदों से संकीर्णा - मिली हुई (समाधि) क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता सवितर्का - सवितर्क अर्थात् विशेष तर्क सहित (अथवा सविकल्प) समापत्तिः ॥४१।। समापत्तिः - समापत्ति (कहलाती है)। क्षीण - क्षीण (रजस् और तमस् गुण) वृत्तेः - वृत्ति (वाले चित्त का) संगति - समापत्ति का दूसरा भेद क्या है ?

अभिजातस्य - उत्तम जाति की (स्फटिक) स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥४३॥ मणेः - मणि (की) स्मृति - स्मृति (के) इव - भाँति ग्रहीतृ - ग्रहीता अर्थात् अस्मिता, परिशुद्वौ- शुद्ध अर्थात् आगम और अनुमान के शब्द और ज्ञान से रहित (हो जाने पर) ग्रहण - ग्रहण अर्थात् इन्द्रिय (और) स्वरूप - अपने रूप (से) १७ १८

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शून्या - शून्य वाली गुणों की साम्यावस्था) इव - जैसी (केवल ध्येय) पर्यवसानम् - पर्यन्त अर्थात् सीमा तक (फैली हुई है)। अर्थ - अर्थ मात्र - मात्र (सी) संगति - अतः सवितर्क, निर्वितर्क, सविचार और निर्विचार, ये चारों निर्भासा - भासने वाली (चित्त वृत्ति) समापत्तियाँ सबीज-समाधि हैं। निर्विचार की उच्चतर और उच्चतम

निर्वितर्का - निर्वितर्क अथवा निर्विकल्प (समापत्ति कहलाती है)। अवस्थाएं, क्रमशः, आनन्दानुगत और अस्मितानुगत कहलाती हैं।

संगति - समापत्ति का तीसरा और चौथा भेद क्या है ? ता एव सबीजः समाधिः ॥४६॥

एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥४४। ता - ये (पूर्वोक्त चारों समापत्तियाँ) एव - ही एतया - इन अर्थात् पूर्वोक्त सवितर्क और निर्वितर्क समापत्तियों (के सबीजः - सबीज निरूपण) से समाधिः - समाधि (कहलाती हैं)। एव - ही सविचारा - सविचार (और) संगति - सबसे श्रेष्ठ निर्विचार-समाधि का क्या फल है ?

निर्विचारा - निर्विचार (समापत्तियाँ) निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः ॥४७॥ च - भी सूक्ष्म - सक्ष्म निर्विचार - निर्विचार (की)

विषया - विषयों (में) वैशारद्ये - प्रवीणता से

व्याख्याता - वर्णन (की हुईं समझनी चाहिएं)। अध्यात्म - प्रज्ञा (की) प्रसादः - निर्मलता (होती है)। संगति - सूक्ष्म विषय कहाँ तक हैं ? संगति - इस प्रज्ञा का सार्थक नाम क्या है ? सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ॥४५।। ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥४८।। च - तथा सूक्ष्म - सूक्ष्म तत्र - उस (अध्यात्म-प्रसाद से)

विषयत्वम् - विषयता ऋतम्भरा - सत्य को धारण करने वाले (और अविद्या से रहित)

अलिङ्ग - लिङ्ग-रहित अर्थात् मूलप्रकृति (किसी में न लीन होने प्रज्ञा - ज्ञान (की उत्पत्ति होती है)।

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संगति - ऋतम्भरा प्रज्ञा की क्या श्रेष्ठता है ? निरोधात् - निरोध से

श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥४९।। निर्बीज: - निर्बीज

श्रुत - आगम (और) समाधिः - समाधि (की उपलब्धि होती है)।

अनुमान - अनुमान (की) प्रज्ञाभ्याम् - प्रज्ञा से (ऋतम्भरा प्रज्ञा का) विषया - विषय अन्य - भिन्न (है), विशेष - विशेष (रूप से) अर्थत्वात् - अर्थ को साक्षात्कार करने के सन्दर्भ में।

संगति - ऋतम्भरा प्रज्ञा का क्या फल है ?

तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥५0॥ तत्-जः - उस (ऋतम्भरा-प्रज्ञा) से उत्पन्न होने वाला संस्कारः - संस्कार अन्य - दूसरे (सब व्युत्थान के) संस्कार - संस्कारों (को) प्रतिबन्धी - रोकने वाला (होता है)।

संगति - अब निर्बीज-समाधि अर्थात् कैवल्य अवस्था क्या है ?

तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ॥५१॥ तस्य - (पर-वैराग्य द्वारा) उस (ऋतम्भरा-प्रज्ञा-जन्य संस्कार) के अपि - भी निरोधे- निरोध (हो जाने पर) सर्व - सब (पुरातन और नूतन संस्कारों के)

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पातञ्जल योग साधनपाद पातञ्जल योग साधनपाद

साधनपाद अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥३॥ अविद्या - अविद्या,

संगति - अब विक्षिप्त-चित्त अर्थात् जिन के लिए अभ्यास और अस्मिता - अस्मिता,

वैराग्य कठिन हैं, उन के लिए समाधि के उपाय बतलाते हैं। राग - राग, द्वेष - द्वेष (और)

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥१॥ अभिनिवेशाः - अभिनिवेश, (ये पाँच)

तपः - तप, क्लेशाः - क्ेश (हैं)।

स्वाध्याय - स्वाध्याय (और) संगति - अविद्या किन क्लेशों का उत्पत्ति-क्षेत्र है ? ईश्वर-प्रणिधानानि - ईश्वर-प्रणिधान, (ये तीनों) क्रिया-योगः - क्रियायोग (है) । अविद्याक्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ।।४।।

संगति - इस क्रियायोग का क्या प्रयोजन है ? अविद्या - अविद्या उत्तरेषाम् - अगले अर्थात् अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश क्लेशों

समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥२॥ का (उत्पत्ति)

समाधि - (यह क्रियायोग) समाधि (की) क्षेत्रम् - क्षेत्र है, (जो)

भावना - भावना प्रसुप्त - बीजरूप में दबे हुए,

अर्थः - के लिए तनु - शिथिल कर दिए गए,

च - और विच्छिन्न - बलवान् क्लेशों से दबे हुए (और)

क्लेश - केशों (को) उदाराणाम् - सहायक विषयों को पाकर अपने कार्य में प्रवृत्त, (इन

तनू - दुबले चार प्रकार की अवस्थाओं वाले होते हैं)।

करण - करने (के) संगति - अविद्या जो अन्य चारों क्लेशों का मूल कारण है, उस का अर्थः - लिए (है) । क्या स्वरूप है ?

संगति - यह क्लेश कौन से हैं ? अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ।।५।। अनित्य - अनित्य, अशुचि - अपवित्र, ४२ ४३

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दुःख - दुःख (और) दुःखानुशयी द्वेषः ॥८।। अनात्मसु - अनात्मा में (यथाक्रम से) नित्य - नित्य, दुःख- दुःख (भोग के) अनुशयी - पीछे (दुःख को न भोगने की इच्छा) शुचि - पवित्र, द्वेषः - द्वेष (क्लेश है)। सुख - सुख (और) आत्म-ख्यातिः - आत्म-भाव (की प्रतीति) संगति - अभिनिवेश क्या है ? अविद्या - अविद्या (क्लेश है)। स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढ़ोऽभिनिवेशः ॥९॥ संगति - अब अस्मिता का क्या स्वरूप है ? स्वरसवाही - (मरने का भय,) जो स्वभाव से ही बह रहा है

दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥६॥ (और) विदुषः - विद्वानों (के लिए) दृक् - (द्रष्टा पुरुष की) दृक् (और प्रकृति की) अपि - भी दर्शन - दर्शन तथा - ऐसा (ही) शक्त्योः - शक्तियों का आरूढ़: - प्रसिद्ध है (जैसा मूर्खों के लिए, वह) एकात्मता - एक स्वरूप अभिनिवेश: - अभिनिवेश (क्लेश है) । इव - जैसा (भान होना) अस्मिता - अस्मिता (क्लेश है)। संगति - पाँच क्ेशों की चार अवस्थाओं अर्थात् प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार के बाद अब पाँचवीं अवस्था दग्ध-बीज क्लेशों को त्यागने संगति - राग क्या है ? की क्या विधि है ?

सुखानुशयी रागः ॥ ७॥ ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥१०॥ सुख - सुख (भोग के) ते - वे (पूर्वोक्त पाँच क्लेश, जो क्रियायोग से) अनुशयी - पीछे (सुख को भोगने की इच्छा) राग: - राग (क्लेश है)। सूक्ष्माः - सूक्ष्म (और विवेकख्याति की अग्नि से दग्ध-बीज हो गए हैं, असम्प्रज्ञात समाधि द्वारा)

संगति - द्वेष क्या है ? प्रतिप्रसव - चित्त की प्रलय अर्थात् अपने कारण में लीन होने से (अपने आप) हेयाः - निवृत्त (हो जाते हैं) । ४४ ४५

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संगति - तनु क्लेशों को त्यागने की और क्या विधि है ? संगति - कर्माशय का फल किस किस रूप में प्राप्त होता है ?

ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः ॥११॥ सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ॥१३॥ तत् - (कलेशों की) वे (स्थूल) मूले - (क्लेशों की) जड़ (के) वृत्तयः - वृत्तियाँ (जो क्रियायोग से तनु कर दी गई हैं, सति - विद्यमान (रहने तक) विवेकख्याति) तत् - उस (कर्माशय का परिपक्व) ध्यान - ध्यान (द्वारा) विपाक: - फल हेया: - त्यागने योग्य (हैं जब तक वे दग्ध-बीज सदृश न हो जाति - जन्म, जाएँ)। आयुः - जीवन-सीमा (और)

संगति - कर्माशय का क्या फल है ? भोगा: - भोग (के रूप में प्राप्त होता रहता है)।

क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥१२॥ संगति - जाति, आयु और भोग के क्या फल हैं ?

क्लेश - क्लेश (जिस की) ते ह्रादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥१४।। मूल: - जड़ (है, ऐसे) ते - वे अर्थात् जाति, आयु और भोग कर्म - कर्मों (का) ह्राद - सुख (और) आशयः - आवास अर्थात् वासनाओं का समुदाय परिताप - दुःख (रूपी) दृष्ट - वर्तमान (और) फला: - फल (देते हैं, क्योंकि) अदृष्ट - आने वाले पुण्य - पुण्य (और) जन्म - जन्मों (में) अपुण्य - पाप (उन के यथाक्रम से) वेदनीयः - भोगने योग्य (है) । हेतुत्वात् - कारण (हैं) ।

संगति - योगी के लिए सुख और दुःख का क्या स्वरूप है ?

१९ जन्म-मरण चक्र - वासना, फल (जाति, आयु और भोग), परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विपाक (नियत और अनियत), सकाम कर्म (शुक्ल, कृष्ण, विवेकिन: ॥१५॥। कृष्णशुक्ल), कर्माशय, वासना ... । परिणाम - परिणाम,

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ताप - ताप (और) संस्कार - संस्कार, (इन तीन प्रकार के) द्रष्टदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥१७॥

दुःखैः - दुःखों के कारण द्रष्ट - द्रष्टा (और)

च - और (परिणामी) दृश्ययोः - दृश्य का संयोग: - संयोग (उक्त त्याज्य) गुण - गुणों (की) हेयः - दुःख (का) वृत्ति - वृत्तियों (के परस्पर) हेतुः - कारण (है) । विरोधात् - विरोधी स्वभाव के कारण विवेकिन: - विवेकी (पुरुष) के लिए संगति - अब दृश्य क्या है ? सर्वम् - सब कुछ अर्थात् सुख भी दुःखम्-दुःख प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्

एव - जैसा (ही है)। ।।१८।। प्रकाश - सत्त्व, संगति - कौन सा दुःख त्यागने योग्य अर्थात् हेय है ? क्रिया - रजस् (और)

हेयं दुःखमनागतम् ॥१६॥ स्थिति - तमस् (जिसका प्रकट)

दुःखम्- (वह) दुःख शीलम् - स्वभाव (है),

हेयम् - त्यागने योग्य (है, जो भविष्य में) भूतेन्द्रिय - भूत और इन्द्रियाँ (जिसका)

अनागतम् - आने वाला है। आत्मकम् - स्वरूप (है, पुरुष के लिए) भोग - भोग (और) संगति - दुःख का मूल कारण अर्थात् हेय-हेतु क्या है ? अपवर्ग - स्वरूपस्थिति अथवा कैवल्य (जिसका) अर्थम् - प्रयोजन (है, वह) दृश्यम् - दृश्य (है) ।

२० तीन प्रकार के दुःख - परिणाम अर्थात् विषय सुख भोग के बाद संगति - गुणों की क्या अवस्थाएँ हैं ? सुख के वियोग की सम्भावना का दुःख, ताप अर्थात् सुख की अपूर्णता और सुख प्राप्ति में विघ्नों का दुःख, संस्कार अर्थात् सुख विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ।।१९।।

वियोग के बाद सुख भोग के संस्कारों का दुःख। विशेष - विशेष,

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अविशेष - अविशेष, कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ॥२२। लिङ्गमात्र - लिङ्गमात्र (और) अलिङ्गानि - अलिङ्ग, (ये चार) कृतार्थम् - (जिस पुरुष का) प्रयोजन अर्थात् भोग और अपवर्ग सिद्ध

गुण - गुणों (की) हो गया है, (उस के) प्रति - लिए (उक्त दृश्य) पर्वाणि - अवस्थाएँ अर्थात् परिणाम (हैं) । नष्टम् - नष्ट (हो कर)

संगति - अब द्रष्टा का क्या स्वरूप है ? अपि - भी अनष्टम् - नष्ट नहीं होता, (क्योंकि) द्रष्टा दृशिमात्र: शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥२०॥ तत् - वह (दृश्य) द्रष्टा - (चेतन-मात्र) द्रष्टा, (जो) अन्य - दूसरों अर्थात् जिन पुरुषों का प्रयोजन अभी सिद्ध नहीं हुआ, दृशिमात्र: - देखने की शक्ति मात्र (है, वह) (उन की) शुद्धः - निर्मल अर्थात् निर्विकार (होता हुआ) साधारणत्वात् - साझे की वस्तु (है) । अपि - भी (चित्त की वृत्तियों के) संगति - द्रष्टा और दृश्य का क्या कारण है ? प्रत्ययः - अनुसार अनुपश्यः - देखने वाला (है) । स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥२३॥

संगति - दृश्य का प्रयोजन किस के लिए है ? स्व - (प्रकृति-रूप) स्व (और पुरुष-रूप) स्वामि - स्वामी, (इन दोनों) तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥२१॥ शक्त्योः - शक्तियों (के) तत् - उस (द्रष्टा पुरुष के) स्वरूप - स्वरूप (की) अर्थ - लिए उपलब्धि - प्राप्ति (का) एव - ही हेतुः - कारण

दृश्यस्य - दृश्य का संयोग: - संयोग (है) । आत्मा - स्वरूप (है) । संगति - इस संयोग का क्या कारण है ? संगति - क्या द्रष्टा का प्रयोजन सिद्ध होने पर दृश्य नष्ट हो जाता है? तस्य हेतुरविद्या ।।२४।। तस्य - उस (अदर्शनरूपी संयोग अर्थात् अविवेक) का ५० ५१

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हेतुः - कारण सप्तधा - सात प्रकार की अविद्या - अविद्या (है) । प्रान्तभूमिः - सबसे ऊँची अवस्था वाली

संगति - अविद्या और संयोग के अभाव अर्थात् हान से क्या होता है? प्रज्ञा - बुद्धि (होती है)।

तदभावात् संयोगाभावो हानं तद् दृशेः कैवल्यम् ॥२५॥ संगति - इस प्रज्ञा की प्राप्ति का क्या उपाय है ?

तत् - उस (अविद्या की) योगाङ्गाऽनुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥२८॥ अभावात् - अनुपस्थिति से (अदर्शनरूपी) योग - योग (के) संयोगः - संयोग (का) अङ्ग - अङ्गों (के) अभावः - अभाव (ही) अनुष्ठानात् - अनुष्ठान से हानम् - हान अर्थात् दुःख का अभाव (है और) अशुद्धिः - अशुद्धि (के) तत् - वही क्षये - नाश होने पर दृशे: - द्रष्टा अर्थात् चितिशक्ति (का) ज्ञान - ज्ञान (का) कैवल्यम् - कैवल्य अर्थात् केवल हो जाना (है) । दीप्तिः - प्रकाश

संगति - हानोपाय अर्थात् दुःख निवृत्ति का क्या उपाय है ? आविवेकख्यातेः - विवेकख्याति पर्यन्त (हो जाता है)।

विवेकख्यातिरविप्तवा हानोपायः ॥२६॥ अविप्नवा - (संशय और विपर्यय रहित) शुद्ध २१ सात प्रकार की प्रज्ञा - हेय-शून्य अर्थात् दृश्य को जान लेना, विवेकख्यातिः - विवेकज्ञान हेयहेतु क्षीण अर्थात् द्रष्टा और दृश्य का संयोग दूर कर लेना, हान - हान (का) प्राप्यप्राप्त अर्थात् स्वरूप को प्राप्त कर लेना, चिकीर्षाशून्य अर्थात् उपायः - उपाय (है) । विवेकख्याति का सम्पादन कर लेना, यह चार प्रकार की कार्य

संगति - विवेकख्याति में उत्पन्न प्रज्ञा का क्या स्वरूप है ? विमुक्ति प्रज्ञा है और चित्तसत्त्व-कृतार्थता अर्थात् चित्त का भोग और अपवर्ग देने का काम पूरा कर लेना, गुणलीनता अर्थात् चित्त का

तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥२७॥ अपने कारणरूप गुणों में लीन हो जाना, आत्मस्थिति अर्थात् पुरुष

तस्य - उस (निर्मल विवेकख्याति वाले योगी) की का परमात्मा के स्वरूप में स्थित हो जाना, यह तीन प्रकार की चित्त विमुक्ति प्रज्ञा है।

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संगति - योग के अङ्गों के क्या नाम हैं ? संगति - यम किन किन अवस्थाओं में पालन करने योग्य हैं ?

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥३१॥ ।।२९ । जाति - जाति,

यम - यम, देश - स्थान, नियम - नियम, काल - काल (और)

आसन - आसन, समय - विशेष नियम (की)

प्राणायाम - प्राणायाम, अनवच्छिन्नाः - सीमा से रहित (और) प्रत्याहार - प्रत्याहार, सार्वभौमा: - सब अवस्थाओं में पालन करने योग्य, (ये पाँच यम) धारणा - धारणा, महाव्रतम् - महाव्रत (हैं) । ध्यान - ध्यान (और) समाधयः - समाधि, (ये योग के) संगति - वैयक्तिक नियम क्या हैं ?

अष्टौ - आठ शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥३२॥ अङ्गानि - अङ्ग (हैं)। शौच - स्वच्छता,

संगति - व्यावहारिक यम क्या हैं ? संतोष - संतुष्टि, तपः - तप, अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा: ॥३० ॥ स्वाध्याय - स्वाध्याय (और) अहिंसा - शरीर, वाणी और मन से समस्त प्राणियों के साथ वैर ईश्वर-प्रणिधानानि - ईश्वर-प्रणिधान, (ये पाँच) भाव छोड़ कर प्रेम पूर्वक रहना, नियमा: - नियम (हैं) । सत्य - यथार्थ ज्ञान, अस्तेय - अपहरण का अभाव, संगति - यम और नियम में विघ्रों को दूर करने के क्या उपाय हैं ?

ब्रह्मचर्य - इन्द्रियों पर संयम कर के वीर्य की रक्षा करना (और) वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥३३॥ अपरिग्रहाः - वस्तुओं का आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना, (ये पाँच) वितर्क - वितर्कों (द्वारा यम और नियमों में) बाधने - रुकावट होने पर यमा: - यम (हैं) । प्रतिपक्ष - विपरीत (भाव का)

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भावनम् - चिन्तन (करना चाहिये)। भावनम् - भावना (है) ।

संगति - प्रतिपक्ष-भावना क्या है ? संगति - अहिंसा में स्थिति होने से क्या होता है ?

वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्संनिधौ वैरत्यागः ॥३५॥ मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् अहिंसा - अहिंसा (में) ।।३४। प्रतिष्ठायाम् - दृढ़ स्थिति हो जाने पर वितर्काः - वितर्क (यम और नियमों के विरोधी) तत् - उस (अहिंसक योगी के) हिंसा - हिंसा संनिधौ - निकट (सब का)

आदयः - आदि (भाव) हैं, (जो स्वयं) वैर - वैर

कृत - किए हुए, (दूसरों से) त्याग: - छूट (जाता है)। कारित - करवाए हुए (और दूसरों से) अनुमोदिताः - समर्थन प्राप्त किए हुए, (इन तीन प्रकार के हैं); संगति - सत्य में स्थिति होने से क्या होता है ?

लोभ - लोभ, सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥३६॥ क्रोध - क्रोध (और) सत्य - सत्य (में) मोह - मोह (जिन के) प्रतिष्ठायाम् - दृढ़ स्थिति हो जाने पर (उस योगी की) पूर्वकाः - कारण (हैं); क्रिया - क्रिया अर्थात् कर्म मृदु - मृदु, फल - फल (का) मध्य - मध्यम (और) आश्रयत्वम् - आश्रय (बनती है) । अधिमात्राः - तीव्र (जिन के भेद हैं); दुःख - दुःख (और) संगति - अस्तेय में दृढ़ होने से क्या होता है ?

अज्ञान - अज्ञान (का) अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥३७॥ अनन्त - अनन्त (होना जिन का) फला: - फल (है); अस्तेय - अस्तेय (में)

इति - ऐसा (विचार करना) प्रतिष्ठायाम् - दृढ़ स्थिति हो जाने पर

प्रतिपक्ष - प्रतिपक्ष (की) सर्व - सब

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रत्न - रत्नों (की) जुगुप्सा - अरुचि अर्थात् राग और ममत्व रहित हो जाना (और) उप-स्थानम् - प्राप्ति (होती है)। परैः - दूसरों से

संगति - ब्रह्मचर्य में दृढ़ होने से क्या होता है ? असंसर्ग: - संसर्ग का अभाव (होता है) ।

ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥३८॥ संगति - आभ्यन्तर शौच का क्या फल है ?

ब्रह्मचर्य - ब्रह्मचर्य (में) सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ॥४१॥ प्रतिष्ठायाम् - दृढ़ स्थिति हो जाने पर (शारीरिक, मानसिक और सत्त्व - (आभ्यन्तर शौच की सिद्धि से) चित्त (की) आत्मिक) शुद्धि - शुद्धि, वीर्य - सामर्थ्य (का) सौमनस्य - मन की स्वच्छता, लाभ: - लाभ (होता है) । ऐकाग्रूय - एकाग्रता,

संगति - अपरिग्रह में स्थिति होने से क्या होता है ? इन्द्रिय - इन्द्रियों (पर) जय - जीत (और) अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोधः ॥३९॥ आत्म-दर्शन - आत्म दर्शन, (यह पाँच प्रकार की)

अपरिग्रह - अपरिग्रह (की) योग्यत्वानि - योग्यता

स्थैर्ये - स्थिरता में च - भी (प्राप्त होती है)।

जन्म - जन्म (के) कथन्ता - कैसे-पन अर्थात् भूत और भविष्य (का) संगति - संतोष का क्या फल है ?

सम्बोधः - साक्षात् (होता है)। संतोषादनुत्तमसुखलाभ: ॥४२॥

संगति - बाह्य शौच से क्या होता है ? संतोषात् - संतोष (से) अनुत्तम - परम शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्ग: ॥४०॥ सुख - सुख शौचात् - शौच से लाभ: - प्राप्त (होता है)।

स्व - अपने संगति - तप का क्या फल है ? अङ्ग - अङ्गों (से)

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कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्विक्षयात्तपसः ॥४३॥ सुखम् - सुखदायी (हो, वह) तपसः - तप द्वारा आसनम् - आसन (है) । अशुद्धि - अशुद्धि (के) क्षयात् - नाश होने से संगति - आसन की सिद्धि के क्या उपाय हैं ?

काय - शरीर (और) प्रयत्नशैथिल्यानन्त्यसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥ इन्द्रिय - इन्द्रियों (की) सिद्धिः - सिद्धि (प्राप्त होती है)। प्रयत्न - (उक्त आसन में) प्रयत्न (की) शैथिल्य - शिथिलता (से और)

संगति - स्वाध्याय का क्या फल है ? आनन्त्य - अनन्त अर्थात् आकाश आदि (में) समापत्तिभ्याम् - समापत्ति द्वारा (आसन सिद्ध होता है)। स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥४४॥ स्वाध्यायात् - स्वाध्याय से संगति - आसन का क्या फल है ?

इष्ट- इष्ट ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८।। देवता- देवता (का) सम्प्रयोगः - साक्षात् (होता है) । ततः - उस (आसन की सिद्धि) से द्वन्द्वाः - द्वन्द्वों अर्थात् भूख-प्यास, हर्ष-विषाद आदि (की)

संगति - ईश्वर-प्रणिधान का क्या फल है ? अनभिघातः - चोट नहीं (लगती) ।

समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥४५।। संगति - प्राणायाम क्या है ?

समाधि - समाधि (की) तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥ सिद्धिः - सिद्धि ईश्वर-प्रणिधानात् - ईश्वर-प्रणिधान से (होती है)। तस्मिन् - उस (आसन के) सति - स्थिर (हो जाने पर)

संगति - आसन क्या है ? श्वास - साँस भीतर लेने (और) प्रश्वासयोः - साँस बाहर छोड़ने (की) स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥ गति - गति (का) स्थिर - (जो) स्थिर (और) विच्छेदः - रुकना

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प्राणायामः - प्राणायाम (है) । संगति - प्राणायाम का पहला फल क्या है ?

संगति - प्राणायाम का क्या स्वरूप है ? ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥५२॥

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ततः - उस (प्राणायाम के अभ्यास से)

।।५० | प्रकाश - प्रकाश अर्थात् विवेकज्ञान (पर पड़ा अज्ञान का)

बाह्य - साँस बाहर निकाल कर उसकी स्वाभाविक गति का रुकना आवरणम् - आवरण

अर्थात् रेचक, क्षीयते - नष्ट हो जाता है।

आभ्यन्तर - साँस अंदर खींच कर उसकी स्वाभाविक गति का संगति - प्राणायाम का दूसरा फल क्या है ? रुकना अर्थात् पूरक (और) स्तम्भ - साँस की इन दोनो गतियों का रुकना अर्थात् कुम्भक धारणासु च योग्यता मनसः ॥५३॥

वृत्तिः - वृत्ति (वाला, यह तीन प्रकार का प्राणायाम) च - और (प्राणायाम की सिद्धि से)

देश - देश, धारणासु - धारणाओं में

काल - समय (और) मनसः - मन की

संख्याभिः - संख्या द्वारा योग्यता - योग्यता (भी हो जाती है)।

परिदृष्टः - देखा अर्थात् नापा हुआ दीर्घ - लम्बा (और) संगति - अब प्रत्याहार का क्या लक्षण है ?

सूक्ष्म: - हल्का (होता है)। स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां

संगति - चौथे प्रकार का प्राणायाम कौन सा है ? प्रत्याहारः ॥५४॥ इन्द्रियाणाम् - इन्द्रियों का बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥५१॥ स्व - अपने

बाह्य - बाहर (और) विषय - विषयों (के साथ) आभ्यन्तर - अंदर (के) असम्प्रयोगे - सम्बन्ध से रहित होने पर

विषय - विषय (को ज्ञानपूर्वक) चित्तस्य - चित्त के आक्षेपी - त्याग कर देने से (अपने आप होने वाला) स्वरूप - स्वरूप (की) चतुर्थः - चौथा (प्राणायाम है) । अनुकारः - नकल

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इव - जैसी (करना) प्रत्याहार: - प्रत्याहार (कहलाता है)।

संगति - प्रत्याहार का क्या फल है ?

ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥५५॥ ततः - उस (प्रत्याहार) से इन्द्रियाणाम् - इन्द्रियों का (सबसे) परमा - उत्तम वश्यता - वशीकरण (होता है)।

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विभूतिपाद निर्भासम् - भासना (और निज) स्वरूप - स्वरूप (से)

संगति - अब अश्रद्धालु को श्रद्धापूर्वक योग में प्रवृत्त करने के लिए शून्यम् - शून्य

योग की विभूतियाँ बतलाई जाती हैं। यम, नियम, आसन, प्राणायाम इव - जैसा (हो जाना)

और प्रत्याहार के बाद धारणा की व्याख्या की जाती है। समाधिः - समाधि (कहलाता है) ।

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥१॥ संगति - पूर्वोक्त धारणा, ध्यान और समाधि को क्या कहते हैं ?

चित्तस्य - चित्त का (किसी) त्रयमेकत्र संयम: ॥४॥ देश- स्थान (विशेष में) त्रयम् - तीनों अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि (का एक ही ध्येय बन्धः - बाँधना विषय में) धारणा - धारणा (कहलाता है)। एकत्र - एक साथ (होना)

संगति - ध्यान क्या है ? संयम: - संयम (कहलाता है) ।

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥२।। संगति - संयम को जीत लेने का क्या फल है ?

तत्र - उस (धारणा) में तज्जयात्प्रज्ञालोकः ॥५॥

प्रत्यय - वृत्ति का तत् - उस (संयम के) एकतानता - एक सा बना रहना जयात् - सिद्ध होने से ध्यानम् - ध्यान (कहलाता है)। प्रज्ञा - प्रज्ञा (का) आलोकः - प्रकाश (होता है)। संगति - समाधि क्या है ?

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ॥३॥ संगति - संयम का क्या उपयोग है ?

तदेव - उस (ध्यान में केवल ध्येय का) तस्य भूमिषु विनियोग: ॥६॥ अर्थ - अर्थ तस्य - उस (संयम का चित्त की स्थूल से सूक्ष्म) मात्र - मात्र (सा) भूमिषु - भूमियों में

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विनियोग: - प्रयोग (करना चाहिए) । संस्कारयोः - संस्कारों का (क्रम से)

संगति - धारणा, ध्यान और समाधि का योग के पहले पाँच अंगों से अभिभव - दबना (और)

क्या सम्बंध है ? प्रादुर्भावौ - प्रकट (होना), चित्त - चित्त (का इन दोनों संस्कारों से) त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥७॥ निरोध- निरोध

पूर्वेभ्यः - पहले पाँचों अङ्गों अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम क्षण - काल (में)

और प्रत्याहार (की अपेक्षा ये) अन्वयः - सम्बन्ध (होना)

त्रयम् - तीनों अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि निरोध - निरोध

अन्तरङ्गम् - अंदर के अङ्ग (हैं) । परिणामः - परिणाम'२ (है) ।

संगति - धारणा, ध्यान और समाधि का निर्बीज समाधि से क्या संगति - निरोध-संस्कार का क्या फल है ?

सम्बंध है ?

तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ॥८।। तत् - वे (धारणा, ध्यान और समाधि) २२ धर्म-परिणाम - पूर्व धर्म की निवृत्ति और नये धर्म की प्राप्ति की अपि - भी संभावना। निर्बीजस्य - असम्प्रज्ञात समाधि के लक्षण-परिणाम - अनागत अर्थात् धर्म का वर्तमान में प्रकट बहिरङ्गम् - बाहर के अङ्ग (हैं) । (उदित) होने से पहले भविष्य में छिपा रहना, वर्तमान अर्थात् धर्म

संगति - असम्प्रज्ञात समाधि जो सम्प्रज्ञात समाधि के बाद की का भविष्य को छोड़ कर वर्तमान में प्रकट होना, अतीत अर्थात्

अवस्था है, उस में निरोध-परिणाम क्या है ? धर्म का वर्तमान को छोड़ कर भूतकाल में छिप जाना।

व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षणचित्तान्वयो अवस्था-परिणाम - धर्म के अनागत लक्षण से वर्तमान लक्षण

निरोधपरिणामः ॥९॥ और वर्तमान लक्षण से अतीत लक्षण में जाने तक उसकी अवस्था को क्रम से दृढ़ अथवा दुर्बल करने में प्रतिक्षण परिणाम होना। व्युत्थान - एकाग्रता अथवा सम्प्रज्ञात समाधि (और) निरोध - पर-वैराग्य (के) इस तरह आधार स्वरूप धर्मी का धर्मों से, धर्म का लक्षणों से और लक्षणों का अवस्था से परिणाम होता रहता है।

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तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥१०।। प्रत्ययौ - वृत्तियों (का एक ही ध्येय विषय में) तस्य - उस (चित्त का) तुल्य - समान (हो जाना) प्रशान्त - प्रशान्त चित्तस्य - चित्त का वाहिता - बहना (निरोध) एकाग्रता - एकाग्रता संस्कारात् - संस्कार से (होता है) । परिणामः - परिणाम (है) ।

संगति - सम्प्रज्ञात समाधि में समाधि-परिणाम क्या है ? संगति - चित्त के सदृश ही भूत और इन्द्रियों के क्या परिणाम हैं ?

सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥११॥ एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ॥१३। सर्व-अर्थता - (चित्त की) सब प्रकार के विषयों (और) एतेन - इस (चित्त के परिणाम के समान ही) एकाग्रतयोः - किसी एक ही ध्येय विषय को चिन्तन करने वाली भूत - भूत (और) वृत्ति का (क्रम से) इन्द्रियेषु - इन्द्रियों में क्षय - क्षय (और) धर्म - धर्म, उदयौ - उदय होना लक्षण - लक्षण (और) चित्तस्य - चित्त का अवस्था - अवस्था (के) समाधि - समाधि परिणामाः - परिणाम परिणामः - परिणाम (है) । व्याख्याताः - व्याख्यान (किए हुए जानने चाहिएं)।

संगति - चित्त की समाहित अवस्था में एकाग्रता-परिणाम क्या है ? संगति - धर्मों के आधार में कौन विद्यमान है ?

ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ॥१४। ।।१२ । शान्त - (उन परिणामों के) अतीत,

ततः - तब उदित - वर्तमान (और)

पुनः - फिर (उक्त) अव्यपदेश्य - भविष्यत्

शान्त - शान्त (और) धर्म - धर्मों (में आधाररूप से) उदितौ - उदित हुई अनुपाती - विद्यमान धर्मी - धर्मी (है) । ६९ ७०

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पातञ्जल योग विभूतिपाद पातञ्जल योग विभूतिपाद संगति - एक ही धर्मी के अनेक धर्म किस प्रकार हो सकते हैं ? अध्यासात् - मिथ्या आरोपण से

क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥१५।। संकर: - अभेद (भासना होता है);

क्रम - क्रमों (की) तत् - उन (शब्द, अर्थ और ज्ञान) के प्रविभाग - विभाग (में) अन्यत्वम् - भिन्नता परिणाम - परिणाम (की) संयमात् - संयम करने से

अन्यत्वे - भिन्नता में सर्व - सब

हेतुः - कारण (है) । भूत - भूत (प्राणियों की) रुत - वाणी (का) संगति - परिणामों में संयम करने से क्या होता है ? ज्ञानम् - ज्ञान (होता है)।

परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ।१६।। संगति - पूर्व जन्म का ज्ञान कैसे होता है ?

त्रय - तीनों अर्थात् धर्म, लक्षण और अवस्था संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम् ॥१८।। परिणाम - परिणामों (में) संयमात् - संयम करने से संस्कार - (संयम द्वारा) संस्कारों (का)

अतीत - भूत (और) साक्षात् - साक्षात्

अनागत - भविष्य (का) करणात् - करने से

ज्ञानम् - ज्ञान (होता है)। पूर्व - पूर्व जाति - जन्म (का)

संगति - सब प्राणियों के शब्द का ज्ञान कैसे होता है ? ज्ञानम् - ज्ञान (होता है)।

शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभागसंयमात् संगति - पर-चित्त का ज्ञान कैसे होता है ?

सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥१७। प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ॥१९।। शब्द - शब्द, अर्थ - अर्थ (और) प्रत्ययस्य - (संयम द्वारा) दूसरे के चित्त की वृत्ति (को साक्षात् करने से) प्रत्ययानाम् - ज्ञान के पर - दूसरे (के) इतर-इतर - परस्पर चित्त - चित्त (का) ७१ ७२

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पातञ्जल योग विभूतिपाद पातञ्जल योग विभूतिपाद

ज्ञानम् - ज्ञान (होता है)। असम्प्रयोगे - संयोग न होने पर (योगी)

संगति - पूर्वोक्त चित्त-संयम का क्या भेद है ? अन्तर्धानम् - अन्तर्धान (होता है)।

न च तत् सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ॥२०। संगति - मृत्यु का ज्ञान कैसे होता है ?

च - किंतु सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्तज्ञानमरिष्टेभ्यो वा तत् - वह (दूसरे का) ।।२२ । आलम्बनम् - विषय सहित (चित्त) सोपक्रमम् - आरम्भ सहित अर्थात् तीव्र वेग वाले कर्म जिनका फल स - विषय सहित (साक्षात्) आरम्भ हो चुका है न - नहीं (होता, क्योंकि) च - और तस्य - वह (चित्त) निरुपक्रमम् - आरम्भ रहित अर्थात् मन्द वेग वाले कर्म जिनका फल भूतत्वात् - उस संयम (का) अभी आरम्भ नहीं हुआ, (इन दो प्रकार के) अविषयी - विषय नहीं (था)। कर्म - कर्मों

संगति - योगी अन्तर्धान कैसे होता है ? तत् - में संयमात् - संयम करने से, कायरूपसंयमात् तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुःप्रकाशा वा - अथवा, सम्प्रयोगेऽन्तर्धानम् ॥२१॥ अरिष्टेभ्यः - उल्टे चिह्नों से,

काय - शरीर (के) अपरान्त - मृत्यु (का)

रूप - रूप (में) ज्ञानम् - ज्ञान (होता है)।

संयमात् - संयम करने से (और) संगति - मैत्री आदि बल कैसे प्राप्त होते हैं ? तत् - उसकी ग्राह्य - ग्राह्य मैत्र्यादिषु बलानि ॥२३ ।। शक्ति - शक्ति मैत्री - मैत्री स्तम्भे - रोकने से (दूसरे की) आदिषु - आदि में (संयम करने से मैत्री, करुणा और मुदिता) चक्षु: - आँखों (के) बलानि - बल (प्राप्त होते हैं)। प्रकाश - प्रकाश (का) ७३ ७४

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पातञ्जल योग विभूतिपाद पातञ्जल योग विभूतिपाद संगति - हाथी जैसा बल कैसे प्राप्त हो ? संयमात् - संयम करने से

बलेषु हस्तिबलादीनि ॥२४॥ भुवन - भुवनों अर्थात् भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्य,

बलेषु - (भिन्न-भिन्न) बलों में (संयम करने से) (इन सात लोकों का)

हस्ति - हाथी ज्ञानम् - ज्ञान (होता है)।

आदीनि - आदि के (बल के सदृश भिन्न-भिन्न) संगति - नक्षत्रों का ज्ञान कैसे होता है ? बल - बल (प्राप्त होते हैं)। चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ॥२७॥ संगति - सूक्ष्म, आड़ वाली और दूर की वस्तुओं का ज्ञान कैसे होता चन्द्रे- चन्द्रमा में (संयम करने से) है ? तारा - ताराओं अर्थात् नक्षत्रों (के)

प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम् ॥२५॥ व्यूह - व्यूह (का)

प्रवृत्ति - (ज्योतिष्मति) प्रवृत्ति (का) ज्ञानम् - ज्ञान (होता है)।

आलोक - प्रकाश संगति - ताराओं और नक्षत्रों की गति का ज्ञान कैसे होता है ? न्यासात् - डालने से सूक्ष्म - सूक्ष्म अर्थात् इन्द्रियातीत, ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ॥२८।

व्यवहित - व्यवधान अर्थात् आड़ वाली (और) ध्रुवे - ध्रुव तारा में (संयम करने से) विप्रकृष्ट - दूर की (वस्तुओं का) तत् - उन (ताराओं की)

ज्ञानम् - ज्ञान (होता है)। गति - गति (का)

संगति - भुवन-ज्ञान कैसे होता है ? ज्ञानम् - ज्ञान (होता है)।

संगति - अब संयम की आभ्यन्तर विभूतियों का वर्णन करते हैं। भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् ॥२६। सूर्ये - सूर्य (सुषुम्ना '२) में नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ।२९॥ नाभि - नाभि

२२ तीन मुख्य नाड़ियाँ - मेरुदण्ड में सुषुम्ना (सुषुम्ना में वज्रा, वज्रा में चित्रिणी और चित्रिणी में ब्रह्म नाड़ी), इड़ा और पिंगला ।

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पातञ्जल योग विभूतिपाद पातञ्जल योग विभूतिपाद चक्रे- चक्र में (संयम करने से) मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ॥३२॥ काय - शरीर (के) मूर्ध - मूर्ध (कपाल में ब्रह्मरन्ध्र की) व्यूह - व्यूह (का) ज्योतिषि - ज्योति में (संयम करने से) ज्ञानम् - ज्ञान (होता है)। सिद्ध - सिद्ध (पुरुषों के)

संगति - भूख और प्यास की निवृत्ति कैसे होती है ? दर्शनम् - दर्शन (होते हैं)।

कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ॥३०॥ संगति - प्रातिभ-ज्ञान से क्या हो सकता है ?

कण्ठ - कण्ठ (के) कूपे - गड्ढे में (संयम करने से) प्रातिभाद्वा सर्वम् ॥३३। वा - अथवा (योगी बिना संयम के भी) क्षुत् - भूख (और) पिपासा - प्यास (की) प्रातिभात् - प्रातिभ (ज्ञान से)

निवृत्तिः - निवृत्ति (होती है) । सर्वम् - सब कुछ (जान लेता है)।

संगति - कूर्म नाड़ी में संयम करने से क्या होता है ? संगति - चित्त का ज्ञान कैसे होता है ?

कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ॥३१॥ हृदये चित्तसंवित् ।।३४।।

कूर्म - (कण्ठ कूप के नीचे छाती में कछुवे के आकार वाली) कूर्म हृदये - हृदय में (संयम करने से) चित्त - चित्त (का) नाड्याम् - नाड़ी में (संयम करने से) स्थैर्यम् - स्थिरता (होती है)। संवित् - ज्ञान (होता है)।

संगति - सिद्धों के दर्शन कैसे होते हैं ? संगति - पुरुष का ज्ञान कैसे होता है ?

सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थान्यस्वार्थसंयमात् पुरुषज्ञानम् ॥३५।। सत्त्व - चित्त (और) २४ सात चक्र - मूलाधार (कुण्डलिनी का स्थान), स्वाधिष्ठान, पुरुषयोः - पुरुष मणिपूरक, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा (तीसरा-नेत्र) और सहस्रार । अत्यन्त-असंकीर्णयोः - परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं; (इन दोनों) की

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पातञ्जल योग विभूतिपाद पातञ्जल योग विभूतिपाद

प्रत्ययः - प्रतीतियों (का) समाधौ- समाधि अर्थात् पुरुष दर्शन में अविशेष: - अभेद (ही) उपसर्गा: - विघ्र (और) भोग: - भोग (है); (उनमें से) व्युत्थाने - व्युत्थान में परार्थ - परार्थ (प्रतीति से) सिद्धयः - सिद्धियाँ (हैं) । अन्य - भिन्न (जो) स्वार्थ - स्वार्थ (प्रतीति है, उसमें) संगति - चित्त का पर-शरीर में आवेश कैसे होता है ?

संयमात् - संयम करने से बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः पुरुष - पुरुष (का) ज्ञानम् - ज्ञान (होता है)। ।३८ ॥ बन्ध - बन्ध (के) संगति - पूर्वोक्त स्वार्थ-प्रत्यय के संयम की क्या विभूतियाँ हैं ? कारण - कारण अर्थात् सकाम कर्म और उनकी वासनाओं (को)

ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते ॥३६॥ शैथिल्यात् - शिथिल करने से च - और (चित्त की) ततः - उस (स्वार्थ में संयम करने से) प्रातिभ - सूक्ष्म, व्यवहित, विप्रकृष्ट, अतीत और अनागत वस्तुओं का प्रचार - गति (के मार्ग को) संवेदनात् - जानने से प्रत्यक्ष, चित्तस्य - चित्त अर्थात् सूक्ष्म शरीर का श्रावण - दिव्य शब्द, वेदना - दिव्य स्पर्श, पर - दूसरे शरीर- शरीर (में) आदर्श - दिव्य रूप, आवेशः - प्रवेश (हो सकता है)। आस्वाद - दिव्य स्वाद (और) वार्ता - दिव्य गंध, (ये छः प्रकार के ज्ञान) संगति - उदान प्राण को जीत लेने से कौन सी विभूतियाँ प्राप्त होती जायन्ते - उत्पन्न होते हैं। हैं?

संगति - पूर्वोक्त छः प्रकार के ज्ञान के क्या फल हैं ? उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च ॥३९॥

ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ॥३७॥ उदान - (संयम द्वारा) उदान (प्राण को)

ते - वे (छः प्रकार के ज्ञान) जयात् - जीतने से जल - जल, ७९ ८०

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पङ्क - कीचड़ (और) कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाशगमनम् कण्टक - काँटों ।४ २ ॥ आदिषु - आदि में (योगी के शरीर का) असङ्ग: - संयोग नहीं होता काय - शरीर (और)

च - और आकाशयोः - आकाश के

उत्क्रान्तिः - ऊर्ध्व गति (होती है)। सम्बन्ध - सम्बन्ध (में) संयमात् - संयम करने से संगति - समान प्राण को जीत लेने से क्या उपलब्ध होता है ? च - और लघु - हल्की (वस्तु, जैसे) समानजयाज्ज्वलनम् ॥४० ।। तूल - रूई (आदि में) समान - (संयम द्वारा) समान (प्राण को) समापत्तेः - समापत्ति (करने से) जयात् - जीतने से (योगी) आकाशगमनम् - आकाश-गमन (सिद्धि प्राप्त होती है)। ज्वलनम् - दीप्तिमान् (होता है)। संगति - प्रकाश के आवरण का क्षय कैसे होता है ? संगति - दिव्य-श्रोत्र कैसे प्राप्त होता है ? बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः ॥४३॥ श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद्दिव्यं श्रोत्रम् ॥४१।। बहिः - (शरीर से) बाहर (मन की स्थिति जो) श्रोत्र - श्रोत्र (और) अकल्पिता - कल्पना न की हुई हो, (वह) आकाशयोः - आकाश के वृत्ति: - वृत्ति सम्बन्ध - सम्बन्ध (में) महाविदेहा - महाविदेहा (कहलाती है); संयमात् - संयम करने से ततः - उस (से) दिव्यम् - दिव्य प्रकाश - प्रकाश (के) श्रोत्रम् - श्रोत्र (प्राप्त होता है)। आवरण - आवरण अर्थात् अज्ञान (का)

संगति - आकाश-गमन विभूति कैसे प्राप्त होती है ? क्षयः - नाश (होता है)।

संगति - भूत-जय कैसे प्राप्त होता है ?

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स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् भूतजय: ॥४४॥ प्रादुर्भावः - प्रकट होना, स्थूल - आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी; काय - शरीर स्वरूप - आकाश में शब्द, वायु में स्पर्श, अग्नि में रूप, जल में रस सम्पत् - सम्पदा (की प्राप्ति) और पृथ्वी में गन्ध; च - और सूक्ष्म - शब्द-तन्मात्रा, स्पर्श-तन्मात्रा, रूप-तन्मात्रा, रस-तन्मात्रा तत् - उन अर्थात् पाँचों भूतों (के) और गन्ध-तन्मात्रा; धर्म - धर्मों (से) अन्वय - सत्त्व, रजस् और तमस् का मिला हुआ धर्म (और) अनभिघातः - रुकावट का न होना, (ये तीनों फल प्राप्त होते हैं)। अर्थवत्त्व - प्रकृति का पुरुष के लिए भोग और अपवर्ग; (इन में, क्रम से,) संगति - काय-सम्पत् क्या है ?

संयमात् - संयम करने से (पाँच) रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्पत् ॥४६।। भूत - भूतों (पर) रूप - रूप, जयः - विजय (प्राप्त होती है)। लावण्य - लावण्य, संगति - पूर्वोक्त भूत-जय का क्या फल है ? बल - बल (और) वज्र - वज्र (के समान) ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसम्पत्तद्वर्मानभिघातश्च ॥४५॥ संहननत्वानि - संगठन, (ये चारों) ततः - उस (भूत-जय से) काय - शरीर की अणिमा - अणिमा सम्पत् - सम्पदा (कहलाते हैं)। आदि - आदि (आठ सिद्धियों " का) संगति - ग्रहण-इन्द्रियों में संयम का क्या फल है ?

ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः ॥४७॥ २५ आठ सिद्धियाँ - अणिमा अर्थात् शरीर का सूक्ष्म होना, लघिमा ग्रहण - इन्द्रियों की विषयाभिमुखी वृत्ति, अर्थात् शरीर का हल्का होना, महिमा अर्थात् शरीर का बड़ा होना, प्राप्ति अर्थात् इच्छित भौतिक पदार्थ की प्राप्ति होना, प्राकाम्य अर्थात् इच्छा पूर्ण होना, वशित्व अर्थात् पाँच भूतों और पदार्थों का और विनाश का सामर्थ्य होना, यत्रकामावसायित्च अर्थात् संकल्प वश में होना, ईशितृत्व अर्थात् पाँच भूतों और पदार्थों की उत्पत्ति का पूरा होना। ८३ ८४

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स्वरूप - स्वरूप, ख्याति - जानने अस्मिता - अस्मिता, मात्रस्य - वाला (योगी) अन्वय - अन्वय (और) सर्व - सारे अर्थवत्त्व - अर्थवत्त्व, (इन पाँचों अवस्थाओं में) भाव - भावों (का) संयमात् - संयम करने से अधिष्ठातृत्वम् - मालिक इन्द्रिय - इन्द्रियों (पर) च - और जयः - विजय (प्राप्त होती है)। सर्व - सब का

संगति - इन्द्रिय-जय का क्या फल है ? ज्ञातृत्वम् - जानने वाला (होता है)।

ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च ॥४८॥ संगति - विवेकख्याति से आगे की अवस्था क्या है ?

ततः - उस (इन्द्रिय-जय से) तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ॥५०॥ मनोजवित्वम् - मन के सदृश वेग वाला होना, तत् - उस (विवेकख्याति) में विकरणभावः - बिना शरीर के इन्द्रियों में विषयों को अनुभव करने अपि - भी की शक्ति का आना वैराग्यात् - वैराग्य होने से च - और दोष - दोषों (के) प्रधान - प्रकृति (के विकारों पर) बीज - बीज (का) जयः - वशीकरण (होना, ये तीनों सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं)। क्षये - नाश होने पर

संगति - ग्राह्य और ग्रहण के बाद ग्रहीतृ अर्थात् चित्त में संयम का कैवल्यम् - कैवल्य (होता है)।

क्या फल है ? संगति - अब साधकों को सावधान किया जाता है।

सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् ।।५१॥ स्थानि - (साधक को) स्थान वालों अर्थात् वितर्कानुगत, सत्त्व - चित्त (और) विचारानुगत, अस्मितानुगत और विवेकख्याति वालों (के) पुरुष - पुरुष (के) उपनिमन्त्रणे - आदर भाव से अन्यता - भेद (को) सङ्ग - लगाव (और) ८५ ८६

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स्मय - घमंड संगति - विवेकज-ज्ञान की पूर्ण परिभाषा क्या है ? अकरणम् - नहीं करना चाहिए, (क्योंकि इस से) पुनः - फिर (से) तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् अनिष्ट - अमंगल (होना) ।।५४ ॥ प्रसङ्गात् - सम्भव (है) । तारकम् - बिना निमित्त के अपनी प्रभा से स्वयं उत्पन्न होने वाला,

संगति - विवेकज-ज्ञान कैसे उत्पन्न होता है ? सर्व - सब (को) विषयम् - जानने वाला,

क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ॥५२॥ सर्वथा - सब प्रकार (से)

क्षण - क्षण (और) विषयम् - विषय को जानने वाला

तत् - उसके च - और

क्रमयोः - क्रमों (में) अक्रमम् - बिना क्रम के अर्थात् एक ही साथ ज्ञान उत्पन्न करने

संयमात् - संयम करने से वाला,

विवेकजम् - विवेक इति - यह

ज्ञानम् - ज्ञान (उत्पन्न होता है)। विवेकजम् - विवेकज ज्ञानम् - ज्ञान (है) । संगति - विवेकज-ज्ञान कहाँ प्रयुक्त होता है ? संगति - कैवल्य कैसे होता है ? जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात् तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः ॥५३॥ जाति - (जब दो समतुल्य वस्तुओं का) जाति, सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति ॥५५॥

लक्षण - लक्षण (और) सत्त्व - चित्त (और)

देशैः-देश (के) पुरुषयोः - पुरुष की

अन्यता - भेद (से) शुद्धि - शुद्धि

अनवच्छेदात् - निश्चय न हो (सके, तब उन) साम्ये - समान (होने पर)

तुल्ययोः - तुल्य (वस्तुओं) का कैवल्यम् - कैवल्य (होता है और यहाँ तीसरा पाद)

ततः - उस (विवेकज्ञान से) इति - समाप्त (होता है)।

प्रतिपत्तिः - निश्चय (होता है) । -ॐ-

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कैवल्यपाद संगति - निमित्त कारण अर्थात् औषधि, मन्त्र आदि प्रकृतियों की पूर्णता कैसे कर देते हैं ?

संगति - कैवल्यपाद में उपयोगी-चित्त के निर्णय के लिए पाँच प्रकार निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् ॥३॥ की सिद्धियाँ और उन से उत्पन्न पाँच सिद्ध चित्तों का वर्णन है। निमित्तम् - निमित्त कारण अर्थात् औषधि, मन्त्र आदि

जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजा:सिद्धयः ॥१॥ प्रकृतीनाम् - प्रकृतियों के अप्रयोजकम् - प्रेरक नहीं होते, जन्म - जन्म, तु - किंतु औषधि - औषधि, ततः - उस (निमित्त कारण से) मन्त्र - मन्त्र, क्षेत्रिकवत् - किसान की भाँति (पानी भरने के लिए खेत में मेढ़ तपः - तप (और) जैसी) समाधिजाः - समाधि, (इन पाँचों) से उत्पन्न (होने वाली) वरणम् - रुकावट (को) सिद्धयः - सिद्धियाँ अर्थात् शरीर और इन्द्रियों आदि में विलक्षण भेदः - तोड़ने (से प्रकृतियों की पूर्ति अपने आप हो जाती है) । शक्तियों का उदय होना (हैं)। संगति - इन चित्तों का निर्माण किस से होता है ? संगति - शरीर और इन्द्रियों आदि में विलक्षण शक्ति का आ जाना अर्थात् एक आन्तरिक स्थिति से दूसरी स्थिति में बदलना किस प्रकार निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ॥४॥ होता है ? निर्माण - (जन्म, औषधि, तप, मन्त्र और समाधि के अनुष्ठान से) निर्मित (किए गए) जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् ॥२॥ चित्तानि - चित्त जाति-अन्तर - (शरीर और इन्द्रियों का औषधि, मन्त्र, तप और अस्मिता - अस्मिता अर्थात् चित्त के अहं-भाव (के कारण) समाधि के अनुष्ठान से) एक जाति से दूसरी जाति (में) मात्रात् - मात्र से (होते हैं)। परिणामः - बदल जाना अर्थात् सिद्धियों का आ जाना प्रकृति - प्रकृतियों (के) संगति - एक चित्त किस प्रकार अनेक चित्तों को नाना प्रकार की आपूरात् - भरने अर्थात् पूर्ण होने से (होता है)। प्रवृत्तियों में नियुक्त कर सकता है ?

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प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ॥५॥ संगति - साधारण चित्त द्वारा किए गए तीन प्रकार के कर्मों का क्या प्रवृत्ति - (निर्मित किए गए चित्तों के) कार्य फल है ? भेदे- भिन्न (होने पर भी) एकम् - एक (अधिष्ठाता) ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम् ॥८।।

चित्तम् - चित्त ततः - उन (तीन प्रकार के कर्मों अर्थात् शुक्ल, कृष्ण और शुक्लकृष्ण अनेकेषाम् - अनेकों (चित्तों का) कर्मों से)

प्रयोजकम् - प्रेरक (होता है)। तत् - उन्हीं (के) विपाक - फल (के) संगति - अब इन पाँच प्रकार की सिद्धियों से उत्पन्न चित्तों में से अनुगुणानाम् - अनुकूल समाधि-जन्य चित्त की क्या विलक्षणता है ? एव - ही

तत्र ध्यानजमनाशयम् ॥६॥ वासनानाम् - वासनाओं की

तत्र - उन (पाँच प्रकार के निर्मित सिद्ध चित्तों में से) अभिव्यक्तिः - अभिव्यक्ति (होती है)।

ध्यानजम् - ध्यान से उत्पन्न (होने वाला चित्त) संगति - अनेक जन्मों की वासनाएँ जन्म-जन्मान्तर के बाद भी अनाशयम् - वासनाओं से रहित (होता है)। वर्तमान जन्म की वासनाओं के रूप में कैसे प्रकट हो जाती हैं ?

संगति - समाधि-जन्य चित्त वासना-रहित कैसे हो सकता है ? जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्

कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ॥७॥ योगिन: - योगी का जाति - (जन्म-मरण चक्र में) जन्म,

कर्म - कर्म देश - स्थान (और)

अशुक्ल - न पुण्य (होता है और) काल - समय (के)

अकृष्णम् - न पाप, अर्थात् निष्काम होता है (और) व्यवहितानाम् - व्यवधान अर्थात् अन्तराल (रहने पर)

इतरेषाम् - दूसरों का (पाप, पाप-पुण्य मिश्रित और पुण्य, इन) अपि - भी (वर्तमान जाति के अनुसार वासना के संस्कारों के प्रकट

त्रिविधम् - तीन प्रकार (का होता है)। होने में) आनन्तर्यम् - रुकावट नहीं होती, (क्योंकि) स्मृति - स्मृति

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संस्कारयोः - संस्कारों के संगति - यदि वासनाएं अनादि हैं तो वासनाओं और उन के हेतु का एकरूपत्वात् - एक रूप (हो जाती है)। सर्वथा अभाव कैसे हो सकता है ?

संगति - जब वासनाओं के अनुसार जन्म और कर्मों के अनुसार अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्वर्माणाम् ॥१२।। वासना हो, तो सब से पहले जन्म देने वाली वासना कहाँ से आयी ? अतीत - (उक्त अभाव में भी वासनाएँ और उन के हेतु) भूत

तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ॥१० ।। (और)

तासाम् - उन (वासनाओं) का अनागतम् - भविष्यत् अर्थात् अव्यक्त

अनादित्वं - अनादि होना स्वरूपतः - स्वरूप से (विद्यमान)

च - भी (सिद्ध है, क्योंकि प्राणी में) अस्ति - रहते हैं अर्थात् उन का सर्वथा नाश नहीं होता, (क्योंकि)

आशिष: - अपने बने रहने की इच्छा धर्माणाम् - धर्मों अर्थात् वासना और हेतु का

नित्यत्वात् - नित्य (है) । अध्व-भेदात् - काल से भेद (होता है)।

संगति - जब वासनाएँ अनादि हैं तो उनका अभाव कैसे होगा ? संगति - धर्मों का क्या स्वरूप है ?

हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः ॥११॥ ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ॥१३॥

हेतु - अविद्या; ते - वे (समस्त धर्म)

फल - जाति, आयु और भोग; व्यक्त - प्रकट (और)

आश्रय - चित्त (और) सूक्ष्माः - सूक्ष्म (स्थिति में सदैव सत्त्व, रजस् और तमस्)

आलम्बनैः - इन्द्रियों के विषयों; (इन चारों से वासनाओं का) गुणात्मान: - गुण स्वरूप (ही रहते हैं)।

संगृहीतत्वात् - संगृह (होता है, इसलिए) संगति - जब तीनों गुण ही सम्पूर्ण पदार्थों के कारण हैं तो वस्तुओं एषाम् - इन अर्थात् हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन के का रूप अलग अलग कैसे हो सकता है ? अभावे - अभाव में तत् - उन (वासनाओं) का (भी) परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम् ॥१४।। अभावः - अभाव (हो जाता है)। परिणाम - (तीनों गुणों के) परिणाम (की) एकत्वात् - एकता होने से वस्तु - वस्तु (की)

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तत्त्वम् - एकता (होती है)। अप्रमाणकम् - बिना प्रमाण के, अर्थात् जब वह चित्त का विषय न

संगति - क्या चित्त अपनी वासना के कारण ही दृश्य रूप में प्रतीत रहे,

होने लग जाता है और चित्त से भिन्न कोई वस्तु नहीं है ? तदा - उस (समय) किम् - क्या वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः ॥१५॥ स्यात् - होगी? (अर्थात् चित्त का विषय न रहने पर भी वस्तु की

वस्तु - वस्तु (के) सत्ता रहती है।)

साम्ये - एक होने पर (भी साधारण) चित्त - चित्तों (के) संगति - परन्तु वह वस्तु चित्त को सदा के लिए ज्ञात क्यों नहीं

भेदात् - भेद से होती ?

तयोः - उन दोनों अर्थात् चित्त और उसके द्वारा देखी जाने वाली तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम् ।।१७।। वस्तु के तत् - उस विभक्तः - अलग-अलग वस्तु - वस्तु (के विषय का चित्त में) पन्थाः - मार्ग (हैं) । उपराग - प्रतिबिम्ब (पड़ने की)

संगति - जब साधारण चित्त अपनी वासनाओं के अनुसार वस्तुएँ चित्तस्य - चित्त (को)

भिन्न भिन्न प्रतीत करता है, तो क्या वस्तु की सत्ता चित्त से स्वतन्त्र है? अपेक्षित्वात् - अपेक्षा होती है, (इसलिए चित्त को वह वस्तु कभी) ज्ञात - ज्ञात (और कभी) न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ॥१६॥ अज्ञातम् - अज्ञात (होती है)।

च - और (ग्राह्य) वस्तु - वस्तु (किसी) संगति - इस प्रकार दृश्य वस्तुओं से चित्त की सत्ता भिन्न सिद्ध करके अब द्रष्टा अर्थात् आत्मा की चित्त से भिन्न सत्ता सिद्ध करते हैं। एक - एक चित्त - चित्त (के) सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात् ॥१८।। तन्त्रम् - अधीन चित्त - (उस चित्त के स्वामी को अपने) चित्त (की) न - नहीं (है, क्योंकि) वृत्तयः - वृत्तियाँ तत् - वह (वस्तु) सदा - सदा ज्ञाताः - ज्ञात (रहती हैं, क्योंकि) ९५ ९६

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तत् - उस (चित्त का) चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसंकरश्च ॥२१॥ प्रभोः - स्वामी चित्त - (यदि एक) चित्त (को) पुरुषस्य - पुरुष अपरिणामित्वात् - अपरिणामी अर्थात् परिवर्तन-रहित (है) । अन्तर - दूसरे (चित्त का) दृश्ये - दृश्य (माना जाए, तो)

संगति - तो क्या चित्त अपने आप को प्रकाशित नहीं कर सकता ? बुद्धिबुद्धेः - चित्त के चित्त का अतिप्रसङ्ग: - अनवस्था दोष (होगा) न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् ॥१९।। च - और

तत् - वह (चित्त) स्मृति - स्मृतियों (में भी) स्व - अपने आप (को) सङ्करः - मिश्रण अर्थात् दोष (हो जाएगा)। आभासम् - प्रकाशित न - नहीं (कर सकता, क्योंकि वह चित्त) संगति - तब क्रियारहित और अपरिणामी पुरुष विषय को कैसे ग्रहण

दृश्यत्वात् - दृश्य (मात्र है) । कर सकता है, क्योंकि विषय को ग्रहण करने में क्रिया और परिणाम दोनों होते हैं ? संगति - क्या चित्त अपना और विषय का ज्ञान एक साथ कर सकता है ? चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् ॥।२२।। चितेः - (यद्यपि) चिति अर्थात् चेतन-पुरुष एकसमये चोभयानवधारणम् ॥२०॥ अ-प्रति-संक्रमायाः - क्रियारहित अर्थात् अपरिणामी (है, तो भी वह) च - और तत् - उस (स्वप्रतिबिम्बित चित्त के) एक - एक आकार - आकार (की) समये - समय में आपत्तौ - प्राप्ति होने पर उभय - दोनों अर्थात् चित्त और उस के विषय का स्व - अपने (विषयभूत) अनवधारणम् - ज्ञान नहीं (हो सकता) । बुद्धि - चित्त (का)

संगति - क्या चित्त अपने आप को ज्ञात नहीं कर सकता ? संवेदनम् - ज्ञान (करता है)।

संगति - चित्त क्यों पुरुष और दृश्य जैसा ज्ञात होता है ?

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द्रष्टदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ॥२३। विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ॥।२५॥ द्रष्ट - द्रष्टा (और) विशेष - (विवेकख्याति द्वारा पुरुष और चित्त में) भेद (को) दृश्य- दृश्य (से) दर्शिनः - प्रत्यक्ष कर लेने वाले (योगी की) उपरक्तम् - रंगा हुआ आत्म-भाव - आत्म भाव (की) चित्तम् - चित्त भावना - भावना (की) सर्व - सब विनिवृत्तिः - निवृत्ति (हो जाती है)। अर्थम् - अर्थों अर्थात् आकार (वाला होता है)। संगति - विशेष-दर्शन के उदय होने पर विशेष-दर्शी का चित्त कैसा संगति - परन्तु चित्त की वासनाएँ पुरुष की कैसे हो सकती हैं ? होता है ?

तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् ॥२४।। तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ॥२६॥ तत् - वह (चित्त) तदा - तब (विशेष-दर्शन के उदय होने पर विशेष-दर्शी का) असंख्येय - अनगिनत चित्तम् - चित्त वासनाभिः - वासनाओं से विवेक - विवेक (की ओर) चित्रम् - चित्रित (हुआ) निम्नम् - झुका हो कर अपि - भी कैवल्य - कैवल्य पर - दूसरे (के) प्राग्भारम् - अभिमुख (हो जाता है)। अर्थम् - लिए (है, क्योंकि वह चित्त) संहत्य-कारित्वात् - संहत्यकारी (है) । संगति - विवेक-प्रवाही चित्त में भी बीच बीच में कभी कभी व्युत्थान की वृत्तियाँ क्यों उत्पन्न होती हैं ? संगति - अब आत्मा का वास्तविक स्वरूप कैसे जाना जा सकता है? तच्छ्िद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ॥२७॥ तत् - उस (विवेकज्ञान के) छिद्रेषु - छिद्रों अर्थात् अन्तराल में

२६ संहत्यकारी - अनेक तत्वों के संयोग से बना पदार्थ स्वयं के लिए प्रत्यय-अन्तराणि - दूसरी (व्युत्थान की) वृत्तियाँ (पूर्व के व्युत्थान

नहीं होता अपितु दूसरों के लिए कार्य में समर्थ होता है। के) संस्कारेभ्यः - संस्कारों से (होती हैं) । ९९ १००

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संगति - उन व्युत्थान के संस्कारों के त्याग के क्या उपाय हैं ? संगति - क्लेश-कर्मों की निवृत्ति से क्या होता है ?

हानमेषां ल्लेशवदुक्तम् ॥२८।। तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम् ॥३१॥ एषाम् - उन (व्युत्थान के संस्कारों की) तदा - तब (कर्मों की निवृत्ति होने पर) हानम् - निवृत्ति (भी) सर्व - सब क्लेशवत् - केशों की भाँति (ही) आवरण - आवरण (और) उक्तम् - कही (गई है)। मल - मल (से)

संगति - विवेकज्ञान प्राप्त होने के बाद क्या होता है ? अपेतस्य - अलग हुए (चित्त) के ज्ञानस्य - ज्ञान के प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधि: आनन्त्यात् - अनन्त होने से

।।२९ । ज्ञेयम् - जानने योग्य (वस्तु)

प्रसंख्याने - (जो योगी) विवेकज्ञान में अल्पम् - थोड़ी (रह जाती है)।

अपि - भी संगति - तब पुनर्जन्म देने वाले गुणों के परिणाम का क्या होता है? अकुसीदस्य - विरक्त है, (उस को) सर्वथा - निरन्तर ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम् ।।३२। विवेकख्यातेः - विवेकख्याति के उदय होने से ततः - तब धर्म-मेघ :- धर्ममेघ कृतार्थानाम् - कृतार्थ अर्थात् अपने काम को पूरा कर चुके हुए समाधिः - समाधि (प्राप्त होती है)। गुणानाम् - गुणों के

संगति - धर्ममेघ समाधि का क्या फल है ? परिणाम - परिणाम (के) क्रम - क्रम (की)

ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ॥३०॥ समाप्तिः - समाप्ति (हो जाती है) ।

ततः - उस (धर्ममेघ समाधि से) संगति - प्रसंगवश क्रम का स्वरूप बतलाते हैं। क्लेश - केश कर्म - कर्मों (की) क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः ॥३३॥ निवृत्तिः - निवृत्ति (होती है) । क्षण - क्षणों

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प्रतियोगी - सम्बन्धी (प्रतिक्षण होने वाली) परिणाम - परिणाम (के) अपरान्त - अन्त (में) निर्ग्राह्यः - ग्रहण करने योग्य (गुणों की अवस्था-विशेष) क्रमः - क्रम (कहलाती है)।

संगति - गुणों के परिणाम-क्रम की समाप्ति पर क्या होता है ?

पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ॥।३४।। पुरुष - परुष अर्थ - अर्थ (से) शून्यानाम् - शून्य हुए गुणानाम् - गुणों का प्रतिप्रसवः - अपने कारण में लीन हो जाना वा - अथवा (अपने) स्वरूप - स्वरूप (में) प्रतिष्ठा - अवस्थित (हो जाना) चितिशक्तिः - चितिशक्ति अर्थात् द्रष्टा (का) कैवल्यम् - कैवल्य अर्थात् स्वरूपस्थिति है (और यह पाद तथा योगशास्त्र यहाँ) इति - समाप्त (होता है)।

-ॐ

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