1. Prashna Upanishad Hindi & Sanskrit Tika Badri Dutt Sharma 1912
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ग्रन्थाघिकारा: स्वायसा:
-* ओ३म **
पश्नोपनिषद
बदरीदत्तशर्मकृतसरलपदार्थ-
समन्विता
याच
पे० तुलसीराम स्वाभिमा संभो
तदीये
मरठस्थ- स्वामि यन्त्रालये मुद्रापिता
प्रथमवार १००० सूल्य घटिया।) -बढ़िया।-)
संवस् १९६१ वि०
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भूमिका यह मश्नोपनिषद् अपर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत है।इस में सुकेशा आदि ई ऋषिपुत्रों नें (जो ब्रह्मविद्या के परम जिव्वासु थे) पिप्पलाद ऋवि के समीप, जाकर कमश:ई प्रश्न किये हैं, इंस लिये इस उपनियद् का ही प्रश्न नाम पड़गया। तक उहों म्रश्नों में पहिले तीन प्रश्न अपरा विद्या विषयक हैं और पिछले तीन परा विद्या विषयक। जो कि अपरा विद्या का स्ान हुये बिना परा विद्या में प्रवेश दुस्तर रै, इस लिये दीर्घ- दर्शी आाचार्य ने प्रथम प्रश्न में सृष्ट्युत्पत्ति का वर्णन रिया हैं, दूसरे औौर तीसरे में प्रारृतपदार्थों में सर्वोपरि प्राण का माहात्मय दिसलाते हुये अपानादि उस ने विसानों का वर्णन किया है। चौथे में उस के निमि् आसमा का (जहां से पराविद्या का आरम्भ होता है) निरूपण किया है, पांचवे में साचक प्रणव और छठे में वाच्य ग्रह्म का अनुशासन करते हुवे इस उपनिपट् की समाप्ति की है। अनुवाद की सूछपरता और सरलता का अनुभव पाठक स्वयं करेंगे, सस के विषय में कुछ लिखना हमारा काम नहीं है। यह चौथी उपनिषद् है जो हमारे, अनुवाद से परिव्द्टित होकर विद्यारसिकों के दृष्टिगोचर होती है, अतः पश्चात् मुवडकोपनिषद् भी जोदशों!उपनिषदों में मसिंदु है, शोघ्र ही पाठकों के गेचर रोगी॥ अनुवाद:
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ओ३म् -(अथ)- प्रश्नोपनिषत् प्रास्भ्यते तत्र प्रथम: प्रन्नः
सुकेशा च भारद्वाजः शव्यप्त सत्यकाम: सौय्यायणी च गार्ग्य: कौशल्यश्नाश्वला- यनो भार्गवो वैदर्भि: कबन्धी कात्या- यनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं त्र- ह्ान्वेपमाणा एप ह वै तत्सवं वक्ष्य- तीति ते ह. समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १॥ पदार्थ :- (सुकेशा, च, भारड्वाजः ) भरद्वाज का पुत्र सुकेशा, (शैव्यः, ध, सत्यकाम: ) शिविका पुत्र सत्यकाम, (सौर्थ्यायणी, च, गाग्यः) मौय्ये ऋषि का पुत्र गग कुलोत्पक्ष गार्ग्य, (कौशल्यः, घ, आश्वलायनः) अश्वल का पुत्र कौशल्य, (नरागेव:, वैद्भि:) भृगुकुलोत्पनन विदर्भि का पुत्र वैदर्भि, (कबन्धो, कात्यायनः) और कत्व का युवापुन. १ त्यायन कवत्पी (ते; ह,एते,अलपरा:, ब्रह्मनिष्ठाः)वे येब्रक्ठ
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२ प्रश्नोपनिषदि
में तत्पर और ब्रह्मनिष्ठ (परं, ब्रह्म, अन्वेषमाणाः) पर ब्रह्म का अन्वेषण करते हुवे (ह, वै) निश्चय (एषः ): यह (तत, सर्वम्, वक्ष्यति, इंति) जो हमारा असीष है, उस मब को कहेगा, इस आशा से (ते, ह, समित्या- पय: ) वे प्रमिट्ठ समिध हाथ में लिये हुवे ( नगवन्तं, पिप्पलादम्) भगवान् पिष्पलाद ऋषि के ( उपसन्नाः ) समीप नये॥ १॥ प्राचार्थ :- सुकेशा, मत्यकास, गार्ग्य, कौशल्य, वैदर्भि और क्षब्रन्धी ये६ ऋयिपुत्र जो अपरा विद्या में निष्णात होने ने ब्रह्पर और ब्रह्मनिष्ट थे अर्धात् वेद बेदाङ्गों को पढ़ने मे उत्रुट व्रह्म की जिज्ञासा इन को उत्पन्न हुई थी ( इस से इन का ब्रह्मज्ञान के प्रति अनुराग दि: खलाया गया है) परब्रह्म का अन्वेषण (खोज) करते हुवे जिव्वासुभाव से समित्पाणि होकर (यह भाव इन की जिज्नास को सूचित करता है) भगवान् पिप्पलाद ऋषि के (इम आशा मे कि यह हमारी प्यास बुझावेगा) यास पहुंचे ।१॥ तान् ह स ऋषिरुवाच-भूय एव तपसा ब्रह्मचर्य्येण श्रट्ठया संवत्सरं संवत्स्यथ,। यथाकामं प्रश्नान् पच्छथ, यदि विज्ञा- हयाम: सवें ह वो वक्ष्याम इति ॥२॥ पदार्थ :- (तान्) उन को ( सं:, 'ऋषिः) वह.ऋषि (ह) पछ्टम( सर्वीब) शला ईक (सूप:, एव) फिर श्री
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(तपमा) इन्दसहिष्णुतादि तप से (ब्रह्मचर्येण) इन्द्रिय- संयम से (त्टुया)आस्तिक बुद्धिसे युक्त होकर (संवत्मरम्) एक वर्ष तक (संघत्स्यय) नेरे पाम रहो, तदनन्सर (यधाकामम् ) यथेष्ट (मश्नान् ) प्रश्नों को (पृच्छथ ) यूछो (यदि) जो (विजास्यामः) हम जानते होंगे वा तुन को अधिकारी जानेंगे तो ( मर्वम् ) मघ ( ह ) रपष्ट रूप मे (वः) तुम्हारे प्रति (वक्ष्यामः, इति) वर्णन करेंगे॥ २ ॥ झावार्थ :- पिप्पलाद ऋपि ने उन छहों ऋविपुत्रों से कहा कि यदि तुम फिर भी (पाहे पहिले इन का सेवन कर चुके हो) तप, ब्रह्मचर्ष और श्द्धा को धारण करके एक वर्ष तक मेरे पास रहो, इस के अनन्तर अपनी पच्छानुमार प्रश्नों को पूछो, यदि मैं जानता हुंगा (इस से आचार्य अपनी न्यूनता नहीं, फिन्तु निरभिनानता जतलाते हैं) अधवा तुन को अधिकारी सममंगा, तौ तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर दूंगा। आज कल के नवयुरकों को, जो बिना किसी साधन के केवल बातौनी सभाखर्व मे ब्रह्मत्ानी वनना चाहते हैं, तनिक इन पा ध्यान देना चाहिये। २ ॥ अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पमच्छ । भगवन् ! कुती ह वाइमा: प्रजा: प्रजा- यन्त इति ॥३॥
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मन्नोपनिषदि OC:
पदार्थ :- (अथ) एक वर्ष के पच्ात् (कबन्धी, कात्या- वनः) कत्य के युवापुत्र कबन्धीने (उपेत्य ) पास आः कर (पमच्छ) पूछा कि. (भगवन्) हे भगवन् ! ( ह, वै. निश्चयार्थक अव्यय किस से (इमा:, म्रजाः) ये प्रजायें (प्रजाथन्ते, इति) सत्पन्न होती हैं? ॥ ३ ॥ प्रावार्थ :- ऋषि की आज्ञानुसार एक वर्ष तक यघो- दिष्ट नियमों का पालन करते हुवे इन्होंने अपने को अधिकारी सिद्ध कर दिखाया। तब कबन्पी ने ऋषि के पास जाफर यह प्रश्न छिया कि भगवत् । ये म्रजायें अर्थात् चराचर सृष्टि किस से किस प्रकार उत्पन्न हुई है।।३। तस्म स होवाच-प्रजाकामो वै प्रजा- पतिः स तपोऽतप्यत, सं तपस्तप्त्वा मिथुनमुत्पादयते। रयिज्र म्राणज्ेत्ये- तौ से बहुधा प्रजा: करिष्यत इति॥॥ पदार्थ :- (तस्मै ) उस प्रश्नकर्त्ता के लिये (सः) वह ऋंषि विप्पलाद (ह) स्पष्ट (उदाच ) बोला कि (वै) 1 निश्चप (प्रजाकासः) सृष्टि के बनाने की इच्छा करता हुवा (स, प्रंजापतिः) वह प्रजा का स्वामी (तपः, अतप्यत) तप तपता है ( तपः, तप्त्ा) तप को तप कर (सः) वह (रयिं, च, ग्राणं च) रयि और म्राण रूप (निधुनम्) जोड़े को (उत्पादयते) उत्पन्न करता है कि (एतौ )
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ये दोनों (मे) मेरी (बहुधा, मजाः) बहुविध सृष्टि को (करिष्यतः, इति ) उत्पक्ष करेंगे॥ ४ ॥ भावार्थ :- पिप्पलाद ऋषि, उक्त म्रश्न का उत्तर देते हुवे कहते हैं कि जब परमात्मा रुष्टि के बनाने की इच्छर करता है (इष्छा से यहां ईक्षणशक्ति लेनी चाहिये न कि वासना) तौ सब से पहिले ज्ञानमय तप करता है "यस्ं स्ानमयं: तपः- उस का ज्ञान ही, तप है। दूसरे शन्दों में ज्ान और क्रिया के योग का नाम तप है, इस को प्रकृति और पुरुष का संयोग भी कहते हैं। अर्थात मज़ापति परमात्मा अपने गुण विज्ञान को प्रकृति की शक्ति क्रिया में मिलांफर उस से एक जोड़ा उत्पन्न करता है, जिन को रयि और प्राण कहते हैं, जिन से यह सब सृष्टि उत्पन्न होती है। इन दोनों का विशेष व्याख्यान आगे मिलेगा ।४.॥ आदित्यों ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा: ।' रयिर्वा एततसर्वं यन्मूर्त्तज्ञामूर्त्तजु तत्मान्मू- र्निरेव रयि: ॥५॥ पदार्थ :- ( ह, वै) म्रसिद्ि (आदित्यः) सूर्य या अग्नि ही (प्राणः) माणशब्दवाच्य है (चन्द्रमा, एव) सोम वा अन्न ही (रयिः) रयिशव्दवाच्य है (यत्, सूच, च,'अमूत, च) जो स्थूल सूक्ष्म रूप जगत् हैं(एतत्, सर्वम्) यह सव (रयिः) रयिशब्दवाच्य है
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६ मश्नीपंनिवदि
(हस्माल्) इस लिये (रिः') रयि शब्द का विशेष दाच्यार्थ (सृर्चि:, एव ) स्थूल ही है॥ ५ ॥ :दावार्थ :- तंसार में दो प्रकार के पंदार्थ देखने में आते हैं, एफ नोन्य और दूसरे भोका, इन्हीं छो आद्य. औैर असा भी जहते हैं.। इन में भोग्य स्थूल और भो- का. सूक्षम होते हैं और जो भोग्य सूक्ष्म हैं वे भी भोक्त की अपक्षा स्थूल ही हैं। ऊपर की श्रुति में प्राण को आदित्य अर्थात अग्नि रूप से भोक्ता कहा गया है : और रचि को अन्नरूप दे ओग्य, सो इम म्त्यक्ष देखते हैं कि अग्मि ही संतार के सब पदार्थों को पक्षण करता है। यथा-सूर्य रूप से संसार के समस्तरसों को, भौतिक रूंप के. सनीपस्य अनेक मदार्थों को और जाठराग्नि रूप से अनादि विविध पदा्थों को अग्नि अदन करता है। : इसी प्रकार रथि जिस को सोम कहा गया है, नानारूप से उस अग्नि का भक्ष्य वनता है, जैसे-रस रूप से सूर्य का, दव रूप से भौतिक अग्मि का और अन्नरूप से जाउरान्नि का आद्य बनता है। इस प्रकार प्राण अन्निमय होने से भोका और रयि अन्न मय होने से भोन्य है, वस यही दो शह्ियां हैं, जिन के योग से यंह जगत्बना है। •अब रही यह बात कि श्रुति में मारा को आदित्य और रवि को चन्द्रसा क्यों कहा गया? इस का उत्तर यही है कि अग्नि का सूर्य से और अन्नादि ओषधियों का चन्द्रमा से विशेष सम्बन्ध होने के कारण तथा सूर्फ:
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के भोकशक्तिउ त्तेज़क होने से एवं चन्द्रभा के भोन्य- शक्तिवद्दीपक होने से प्राण को आदित्य और रमि को चन्द्रमा कहा गया है। अगछी क्रुतियों में भी इसी का व्यारयान है॥ ५ ॥ अथादित्य उदयन्यत्म्राचीं दिश प्रविशति, तेन आच्यान्म्राणात् रश्मिपु सत्िघत्ते। यद्दक्षिणां चत्प्रतीचीं यदुदीचीं यद्धो य- दूध्वं यदन्तरा दिशो यत्सवें प्रकाशयति, तेन सर्वान्माणान् रश्मिपु सलिधसे॥६। पदार्थ :- (अघ) अब (जादित्यं:) सूर्य (उदयन्) उदय होता हुवा ( यत) जो (म्राची, दिशभ् ) पूर्व दिशा को (प्रविशति) प्रवेश करता है ( तेन) उस से (प्राच्यान्, प्राणान्) पूर्वदियाएप दायुवों को (ररिसछु) किरणों में सम्निधने) रखता है (यत्, दक्षिणास्) नो दृक्षिण दिशा (यत्, प्रतीचीम्) जो पश्चिम (यत्, उदीचीम्) जो उत्तर (यत्, अधः) जो नीचे (यत्, ऊर्ध्वम्) जो ऊपर (यत्, अन्तराः, दिशः) जो बीच की विदि- शाओं को (यत्, सर्वम्) जो सब को (प्रकाशयति). प्रकाशित करता है ( तेन) उस प्रकाश से (सर्वात्, म्रा- णान्) सम्पूर्ण वायुमरडल को (रश्मियु) किरणों में. (सन्निनिंधसे) रखता है।। ६ ।
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प्रश्नोपनिषदि
भावार्थ :- पू्व शोक में प्राण को क्षादित्य कहा गया था, इस श्रुति में उस का आदित्य से संबन्ध दिसलाते हैं :- सू्य अपने प्रकाश से सम्पूर्ण दिशाओं के मत् पदा- थों को व्याप्त करता हुवा वायुसपडल में प्रवेश करता है। शुद्ध हुवा वायु नागाश्रिित भोक्तृशन्ति को ( जो अग्नि- मय है.) उद्दीप्न करता है। जो भोकशक्ति रात्रि में सुपुप्ति के कारण दबी रहती है, वही दिन में सूर्य की किरणों से जाग्रत अवस्या के कारण उद्दीप हो जाती है, इस लिये सूर्य ही उस का उद्दीपक है। अब यह देखना चाहिये कि वह भोकृशक्ति म्राणों से क्ा सम्बन्ध रंखंती है ?. इस के उत्तर में हम ह सकते हैं कि म्राण, ही भोकशक्ि का आधार है, विना प्राण के भोकृशक्ति उहर ही नहीं सकती, अमाियोंमें भोक्तशकि का लभाव इस का प्रत्यक्ष प्रमाण है ! वस इसी लिये श्रुति में. कहा गया है कि सूर्य किरणों द्वारा दायु के साथ म्राणों में प्रविष्ट हो कर उन की शक्ति को उत्तेजित करता है।।६॥ सएप वैश्वानरो विश्वरूपः म्राणोरिन- रुदयते। तदेतट्ुचाय्युच्तस्॥७॥ पदार्थ :- (सः, एपंः) वह यह (वैश्वानरः) सम्. जीवों में प्रविष्ट (विश्वरूपः ) अनेक प्रकार का (ग्राणः) प्राणरूप वायु है, वही ( अग्निः) आदित्य रूप से (उद- यते) उंदय छोता है। (तद्, एतद) यही वात (ऋचा) सम्त्र के द्वारा (अभि, उक्रम्) कहीं गई है ॥। ।।
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ย .
:प्रििार्थ :- वह यही प्राण जिसा ऊपरर्ान किया गया है और जो अनेक रूपे से म्राणियों में विचर रहा है, आदित्य रूप से उदय होता है अर्थात् सूयं के प्रकाश से उत्तेजित होता है, यही बांत अगले मन्त्र में जी कहीं नई हैं किःi विश्वरूपं हरिण जातवेदस परायणं ज्यो- ति रेकं तपन्तम्। सहस्ररश्सि: शतघा वर्तमान: प्राण: प्रजानासुदयत्येष सूर्यः ॥८॥ पदार्थ :- (विश्वरूपम्) सब पदार्थों में व्याप ((हरिणम्) किरणों वाले ( जातवेदसन्) सव को अगाकर सुपुप्ति 'से चेतना में लाने वाले ( परायणम्) सब के परम आश्रय (एकं, ज्योतिः) जगत् के एकमात्र धनुं (तपन्तम्) प्रकाशमान सूर्य्य को विद्वान् लोग जानते हैं। कैसा जानते हैं ? कि(सहस्त्ररषिमिः) हज़ारों किरण वाला (शतधा, वर्तमानः) अनेक प्रकारसे चर्तसान (म्रजानां, प्राणः) प्रजाओं का प्राण अर्थात जीवनाधांर (एषः, सूर्य्यः) यह सूर्य्य(उदयति) प्रकाशित होता है।८ ॥ सावार्थ :- उक्तार्थ की पुष्टि में ही यह मन्त्र दिया गया है। इस में सूर्य का प्राणोत्तेजक होना दिखलाया गया है। जब सूर्य उदित होकर अपनी किरणों से प्र. जाओं में प्राण का संजार करता है, तर्व मव प्राणि
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१० मभोपनिर्वा्छ:
समूह उद्दोघित होकर अपना कार्य करने में संमर्थ होता है, सूर्य के अभाव में प्रामी माणों के होते हुवे भी जीव के सुपुप्तिगंत; होने से नडवत बने रहते हैं, सूर्य: हो अपने प्रकुाश से उन को जाग्रत में लाकर चेष्ठावान् बनाता है। जैसे व्यप्टिगत प्राणों को विकाश देनाः सूर्य का काम है, ऐसे ही समष्टिगत माण अर्थात् वायुनएडल को भी फैलाना और वढ़ाना सूर्य का ही काम है। एस बात को पदार्थविद्या (सा्यन्त) के जानने वाले भळे प्रकार जानते हैं कि गर्मी का हशा पर क्या प्रसाद पड़ता है? वस इस से सिट्ध है कि म्राण (वायु) का पोपक वा उंतेजक एकमात्र अग्ति (आदित्य) ही है। इसी लिये इस प्रसङ्ग में उस को प्राण कहागया है॥ ८॥ : संवत्सरो वैं प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणञ्जो- तरजज। तके ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युः पासते। ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते। तएव पुनरावर्त्तन्ते, तस्मादेते ऋषयः प्रजाकांमा दक्षिणं प्रतिपदन्ते। एप ह वै रयिर्यः पिढृयाण: ।। ६। पदार्थ :- (संवत्मर:, शै) कालरूप संवत्सर ही (प्रभापतिः) अपने में प्रज्ा को धारण करने से प्रजा- पति है (तस्य) नस के (दक्षिणं, च, उत्तरं, च) दक्षिणा चन और उत्तरायण ये (अयने) दोअयन भाग हैं।
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प्रथम: ममं ::
(तद्, ये, ड, वै) सो निश्चय करके जो लोग (तट्, इष्टापूर्ते, रुतम्, इति, उपासते) तपीयन्ञादि-इष्ट और वापीकूप तड़ांगादि-पूर्त इन कंर्तव्य कर्मों को ही कर्त्तव्य की परांकाष्ठा जानकर अनुष्ठान करते हैं, अकर्तव्यों का नहीं (ते,) वे (चान्द्रमसम्, एव, लोकम्) चन्द्रलोक को अंथवा रभि सम्न्धी अन्नादि ऐश्वर्य को ही (अक्षि-जयन्ते), सब ओर से जीत लेते हैं ( ते.एव) वे, ही (पुनः) फिर (आवर्ततन्ते) संसार में लौटते हैं ( तस्मात्) इसलिये (मजीकामा:) सन्तानादि ऐश्वर्य की कामना वाले (एते. ऋपंयः) दृष्टापूर्त के उपासक ये ऋषि लोग ( दक्षिणम्) दंक्षिणायनसम्पन्धी चन्द्रलोक सो (प्तिपद्यन्ते) म्राप्त होते हैं ( यः, पितृयाणः) जो पितरों अर्थात् उक्त इषा पूंर्त की उपासना से पुनः आवृत्त होने वालों का मार्ग है (एप:,इ, वै,रयिः) यही निश्नय करके रयि कहाता हैic भाषार्थ :- चौथे झोक में कहा गया था कि प्रजापति ने सृष्टि खनाने के लिये सब से पहिले ग्राण और रंथि रूप जोड़े को उत्पन्न किया, जन का कि संक्षेप से वर्णन भी हो चुफा है। अब इस झोक़ में इन दोनों के संयोग से सृष्टि की उत्पत्ति दिखलाते हैं :- आदित्य रूंप से प्राण और चन्द्र रूंप से रवि, दोनों मिल कर संवत्मर रूप मन्तान को (जिस के दक्षिणायन और उत्तरायण दो, विभाग हैं। उत्पन्न करते हैं, जिन में से दक्षिकायन में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ जाने से
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१२ मश्नोपनिषदि.
मन्द हो, जाती. हैं, इसी लिये तन का चन्द्रलोक से, विशेष सम्बन्ध माना गया है। दसी में सर्षा ऋंतु के होने से फल, फूल, अन्न, ओषधि और वनस्पति आदि प्राणियों के भोग्य पदार्थ बहुतायत से उत्पन्न होते हैं, जिन के द्वारा इंषापूर्त का अनुष्ठान किया जा सकता है।: यक्ष और प्रंपादानादि फर्मों को दष्टापूर्त कहते हैं, इन का कर्तव्यवुद्धि से आचरण करने वाले अपने पुरयप्रताद् से चन्द्रलोक को (जो रगि का अधिष्ठान है) जीतते हैं अर्थात् चन्द्रलोक में जाकर जन्म लेते हैं अथवा यहीं पर नाना प्रकार के भोग और ऐश्नर्यादि के स्वामी वनते हैं। यही पितृयाण है, जिस का दक्षिणायन से विशेय मम्बन्ध है। इष्टापूर्त के उपासक इसी के द्वारा भोगैश्वर्य को प्राप्त होते हैं। जो कि संवत्सर ही ऋतुपरिवर्तन द्वारा सम्पूर्गां मजा की पुष्टि और स्थिति का अधिकरण है,इमी - लिये श्रुति में उस को म्रजापति कहा गया है। i अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण त्रट्डया, विदयात्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते। एतट्व प्राणानामार्यतनमेतदमृतमभय- मेतत् परायणमेतस्मान्न पुनरावर्त्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष: श्रोकः॥१० ॥ पदार्थः-( अघ) और (उत्तरेण) उत्तरायण द्वारा (तपसा) तप से ( ब्रम्मचर्येण) इन्द्रियदमन
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मंथंम: प्रभ्र:" १३
(श्या) श्रद्धा से (विद्या) परा.विद्या से ( आत्मा नम्) म्राण के भी आधार. आत्मा को (अन्विष्य)खोज कर (आदित्यम् ) सूर्यलोक को (अभ्षि-जयन्ते) सब ओर से जीतते हैं (एतत्, वै) यही (माणानाम्) प्राणों का (आयतनम्) स्थान है (एतत्) यह (अमृतम्) अवि- नाशि (अभरयम् ) मयरहित है ( एतत् ) यह ( पराय- पभ्) परम पद है ( एनस्मात्) इस से (न.पुनरावर्त्तन्ते) 'फिर लौट कर नहीं आते ( इति) इस प्रकार (एष:) यह (निरोध:) पाप और तज्जन्य संस्कारों की रुफावट है ( तत्) सो (एयः) यह(झोकः) अथर्व ८। ५। ९ का मन्त्र भी है कि :- ॥१० ॥ (देखो अगला मन्त्र) भावार्थ :- इस से पहिली शरृति में दक्षिणायन और उस से विशेष मम्बन्य रखने वाले इष्टापूर्त आदि शुभ कमों का फल बंतछाया गया था, अब इस श्रुति में उत्तरायण और उस में होने वाले मानयज्ञ का फल दिखलाते हैं :- तप आदि साधनों से जो विज्ञान के अधि- कांरी वन कर अविनाशी आत्मा को जानते हैं, वे अपने परमंपुरुपार्थ से आदित्य लोक को जीत कर उस परम पद के भागी बनते हैं, जो प्राणों का आश्रय, अमृत, अ्रप्नय और सारे सुखों की पराकाष्ठा है, उस को पाकर फिर वे नीचे नहीं गिरते। अब यहां पर एक मश्न यह होता है कि कर्म के लिये दृक्षिणायन और ज्ञान के लिये सत्तरायण कों विशिष्ट किया गया -? क्या उतरायय में
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१४ मभनोपनिवद्धि:
कोई कर्मयक्न और दक्षिणायन में ज्ञानयंक्ष का अनुष्ठान नहीं कर सकता? इस का उत्तर यह है कि यद्यपि उत्त. ' रायण किसी को इष्टापूर्तादि कर्म करने से और दक्षिणा- - यन किसी को अध्यात्मयोगादि ज्ञान के साधनों की उपलिधि से सर्वथा नहीं रोकते, तथापि दक्षिणायन में भोग्यशक्ति के प्रबल होने से अन्नादि भोग्य पदार्थों से होने वाले यज्ञादि कर्मों के करने में सुगनता होती है, इमी लिये चातुर्मास्यादि याग दक्षिणायन में किये जाते हैं। इसी प्रकार उत्तरायण में भोक्तृशक्ति के उद्दीप्त होने से आत्मज्ञान के उपयोगी स्वाध्यायादि ज्ञानोपलन्धि के साधनों में अनुकूलता प्राप्त होती है। अथवा यहां पर अवरपर्याय दक्षिण शव है.और परपर्याय उत्तर शब्द,अवर कर्म है, इस लिये उस का सम्बन्ध दक्षिणायन से बतलाया. गया. है,और पर ्ञान है इस लिये उसका निर्देश उत्तरायण के साथ किया गया है। दूसरा प्रश्न यह है कि कर्म से चन्द्रलोक और ज्ञान से सूर्यलोक का जीतना क्याबात है? इस का उत्तर यह है कि पांचवीं श्रुति में रयि नाम चन्द्रमा का और आदित्य नाम प्राण का बतला गया था उम के अनुसार इस का तात्पर्य यह भी हो सकता है कि कर्मनिष्ट (पुरुषार्थी) ज़न अपने पुरुषार्थ से रयि (ऐश्वय्य) को-प्राप्त होते हैं. और ज्ञाननिष्ठ (;योगी) लोग अपने विज्ञानबल से आदित्य-(म्राण) को जीत कर मोक्ष के भागी बनते हैं-। अथवा "चदि, आह्वादे" धातु-
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से चन्द्र शब्द बनता है। जिस स्थान में सुख विशेष हो उसे चन्द्रलोक कहते हैं। तथा "नञ्ञ" पूर्षक "दो, अन्र- खडने- धातु से आदित्य शब्द सिद्ध होता है, जिस का खूएडन (नाश) न हो सके, उसे आदित्य कहते हैं, सो यज्जादि कर्मों से स्वर्गपराप्ति और ज्ञान से अखपडनीय मोक्ष की प्राप्ति मर्दतन्त्र सिद्धान्त है॥ १०॥ मन्त्र :- पञ्नपादं पितरं द्वादशाकतिं दिवआहु: परे अर्धे पुरीपिणम्। अथेमे अन्य उपरे विच- क्षणं सप्नचक्रे पडरआहुरर्पितमिति॥११॥ पदार्थ :- (परे) कोई आचार्य संवत्सर को (पञ्चपादम्) पांच ऋतुरूप पैरों से स्थित [ यहां हेमन्त और शिशिर को एक मान कर पांच ऋतु कही गई हैं ] (पितरम्) सब पदार्थों की उत्पत्ति का अधिकरना हंोने से पितृतुल्य (द्वादशाकृतिम्) वारहमासरूप आकृति [सिङ्ग] वाला (दिवः) झुलोक के (अर्घे) बीच में ( पुरीषिणम् ) जल वाला (आहुः) कहते हैं (अथ) और (उ) वितर्क में (परे, इमे, अन्ये)ये.कोई अन्य लोग (सप्तचक्रे) सात लोकरूप चक्रों और (पडरे) वसन्तादि-छः ऋतुरूप अरों में (विचक्षणम् ) विविध प्रकारसे लक्षित (अर्पितम्, इति) जुड़ा हुआ (आहुः) कहते हैं॥ ११ ॥ भावार्थ :- पूर्वलनोक में संवतसर को अजापति कहा -
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मभोपनिवद्धि गया था, अब इस मन्त्र में उस का प्रजापति होना दि- खलाते हैं :- इस मन्त्र में संवत्सर के काल विभाग में दो पक्ष हैं। कोई छोग इस काल रूप संवत्सर को ऐसा मानते हैं कि यह अपने पांच ऋतुरूप पैरों से और बारह मासरूप लिङ्गों से झुलोक के बीच में स्थित है और कोई ऐसा विभक्तक मानते हैं कि यह संवत्मर सात लोकरूप चक्र और छःऋतुरूप अरों में ठहरा हुवा है। जैसे कि अंरों में रथनाभि ठहरी हुई होती है! दोनों पक्षों से क़ाल की व्यापकता और म्जापति होना सिद्ध है॥ ११॥ मासो वै प्रजापतिस्तस्य क्रृष्णपक्ष एव रयि: शुक्क: प्राणस्तस्मादेते ऋषयःशुक्क इष्टिं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२॥ पदार्थ :- (मासु:, वै) भास ही (प्रजापतिः) प्रजापति है (तस्य ) उस का (कृष्णपक्ष:, एवं) रृष्ण पक्ष ही (रयिः) रयि है ( शुंक्कः ) शुक्कपक्ष (मराणः ) म्राण है (तस्मात) इस लिये (एते, ऋषयः) ये आत्म- दर्शी ऋषि लोग (शुक्क) शुक्कपक्ष में (इ्टिम् ) "ज्ञान' यज्ञ को कुर्वन्ति) करते हैं ( इतरे) कर्मदर्शी ऋषि (इतरस्मिन्) रुष्णपक्ष में यागादि इष्टि को करते हैं ॥१२॥ भावार्थ :- अब वही संवत्सर व्यष्टि रूप से मास में जो उस का बारहवां भाग है, परियाम को प्राप्त होता ** 4
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प्रधमः मश्न :: १9
है। जैने संवत्सर के दक्षिणायन और उत्तरायण दो भराग घे, उसी प्रकार उस के परिणाम नास के भी दो सरड हैं, जिन को कष्णपक्ष और शुक्कपक्ष कहते हैं। रष्णपक्ष ही रयि और शुकपक्ष ही प्राण है। ऋपि लोग रुष्णपक्ष में विशेष कर यागादि इष्टि और शुक्ध पक्ष में अधिकतर स्वाध्यायादि का उपयोग करते थे। इस का यह अभिप्राय कदापि न समफलेना कि वे रृष्ण पक्ष में जानयश्न और शक्पक्ष में कर्मयत्त का अनुष्ठान ी नहीं करते थे, किन्तु दंक्षिणायन के तुल्य कर्म के लिये विशेष उपयोगी रुष्णपक्ष को और उत्तरायय के समान ज्ान के लिये विशेष उपयोगी शुक्कपक्ष को मानते थे।। १२-॥। अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयि: प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति। ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्य्यमेव तदद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते॥१३॥ पदार्थ :- (अहोरात्र:, वै) दिन रात ही (प्रजा- पतिः) मजापति है (तस्प) उस का (अहः, एव) दिन ही (म्राणः) पराय है (रात्रिः एव ) रात ही :(रयिः ) रयि है। (एते) वे लोग (म्राणम्)म्राणरूप अग्नि को वा भोकतृशक्ति को (प्रस्कन्दृन्ति ) क्षीण करते हैं ( ये) जो (दिवा) दिन में (रत्या) रति
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पशोप निषदि
कारणभूत स्त्री के साध (संयुज्यन्ते) संयोग करते हैं और (यत; रात्रौ) जो रात में (रत्या) स्त्री के साथ ( संयुज्यन्ते) मंयोग करते हैं (तत) वह (ब्रह्मचर्यम्, पत:) ब्रह्मधरर्य ही है:"१३॥ अगवार्थ :- अध-वही मासात्मककाल अपने अवपव अहोरात में परिणत होता है। उस अहोरात् के भी दो भाग हैं, जिन को दिन औररात कहते हैं। दिन में भोक्त शक्तिमबल होती है इस लिये उस को म्राण कहा गया है। सत्नि में भोग्यशकति प्रधान-होती है, इस लिये उस को. रयि (अन्न) कहागयां है। अतएव जो. लोग दिन में (जव कि भोकतशक्ति के प्रवल होने से माण वेग .पूर्वक अपनी करिया करते हैं) स्त्री के साथ मैथुन करते. हैं, उनके प्राण क्षीण हो जाते हैं अर्थात् वे मन्दाग्नि होकर निर्वल हों जाते हैं। इस के विपरीत जो रात्रि में (जब कि. भोग्य शक्ति के प्रंबल होनें से म्राण ठहरे हुवे होते हैं। स्त्री के साथ संयोग करते हैं, वे ब्ह्मचारी के समान अपने वल की रक्षा करते हैं! इस प्रासङ्गिक विधिनिषेध के उपरान्त अव प्ररुत विषय का प्रतिपादन किया जाता हैं कि ॥ १३ ॥ अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मा- 、 दिमा: प्रजा: प्रजायन्तइति ॥१४ ॥ रद्र्थ :- ( अन्नम्, वै ) अन्न ही (प्रजापतिः ) प्रजा. का रस्षक है ( ततः) उस से (ह, चै) निश्चय तहू, रेतः)
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मथम:प्सः
वह जगत् का कारण वीर्य उत्पन्नहोता है (तस्मात) उस वीर्य से (इमा:, परजाः) ये मनुप्यादि लक्षण वाली विविध मजायें (प्रजायन्ते, इति) उत्पन्न होती हैं॥।१४।। भावार्थ :- इस श्रुति में अपने कथन का उपसंहार करते हुवे पिप्पलाद ऋषि प्रश्न के उत्तर को समाप्त करते हैं :- अब वह संवत्सर ऋतुरूप से अन्न में परिणामको प्राप्त होता है, अन्न से जगत् का कारण वीर्य (बीज) वन- ता है और उस से फिर क्रमशः यह सारी प्रजा उत्पन्न होती है। कबन्धी के एम्न का अव तक जो कुछ उत्तर दिया गया, यहां पर उस का निगमन किया गया है। अर्थात् प्राणरूप आंदित्य और रयिं रूप चन्द्र के जोड़े से संवल्सर की उत्पत्ति, संवल्सर से क्मशः अन्न का विप- रिणाम, अन्न से वीर्य और उस से सारी प्रजा की उत्पत्ति कह कर आचार्य प्रश्न का उत्तर समाप्त करते हैं।१४॥ तदे ह तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुन- सुरपांदयन्ते। तेपामेवैप ब्रह्मलोको थेषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम्ं ।१५॥ पदार्थ :- (तत्) सो (ह) प्रसिद्ध (ये) जो गृहस्य (प्रजापतिव्रतम्) ऋतुकाल में सदारगमनरूप व्रत को ( चरन्ति) पालन करते हैं ( ते) वे (मिथुनम् ) पुत्र पुत्री को (उत्पाद्यन्ते) उत्पन्न करते हैं और (येषास्) ईजन के (तपः) दुन्द्तहन और (ब्रल्लचर्यम्) इन्द्रियदनन
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ये दो साधन हैं (येषु) जिन में (सत्यम्) मन, वाणी और कर्म की एकता (प्रतिष्ठितम्) वर्तमान है (तेषामूं एवं) उन्हीं का (एषः) यह (ब्रह्मलोकः) ब्रह्मलोक है।१५1१ भावार्थ :- इस श्रुति में इष्टापूर्तादिस्मार्त कर्मों और ज्ञान का फल दिखलाया गया हैं। जो गृहस्थ इन्द्रियनिग्ह पूर्वक ऋतुकांल में ही केवल अपनी खत्री से समागम करते हैं, वे अमोघवीर्य होकर यथेष्ट और उत्तम सन्तान को उत्पन्न कंरते हैं और जो लोग अपने जीवन में तप, ब्रह्मचर्य और सत्य का आचरण करते हैं उन्हीं के लिये ब्रह्मलोक है।। १५ ! तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति॥१६ ॥ पदार्थ :- (तेषाम्) उन का (असौ) यहं (विरजः) निर्मल (व्रह्मलोकः) मोक्षाख्य परमपद है (येषु), जिन में ( जिह्म्) कुटिलता और (अनृतम्) असत्य (न) नहीं है तथा (माया, च) कपट भी (न, इति). नहीं है। १६ ॥ भावांर्थ :- इस श्रुति में भी तत्तव ज्ञान का फल प्रति- यादन किया गया है। विना तत्वज्ञान के मनुष्य कुटि- लता, असत्य और माया (मिश्याचार) से सर्वथा नहीं बच सकता और जव तक इन का कुछ भी अंश रहता तब तक उस :विशुद्ध और सर्वोच्चपद् का (जिस की
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द्वितीय: मग्नः
म्रहललोक तथा परमपद भी फहते हैं और नो सारे ऐश्षो की पराकाष्ठा है) अधिकारी नहीं बन सकता। जतएव तश्वज्ञान के मसाद से जिन का हृदय सरल, शुद्ध, सम और निप्कपट रोगया है, वेही महात्मा उस परमपद के भागी होते हैं, इतर नहीं॥ १६ ॥ इति प्रश्नोपनिपदि प्रथम: प्रश्नः॥१॥
त्थ द्वितीय: प्रश्नः अथ हैनं भार्गवो वैदर्भि: पम्रचछ। भगवन्! कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते क पुनरेपां व- रिष्ठ इति ॥ १ ॥ पदार्थ :- ( अथ) इस के उपरान्त (ह) प्रसिद्ध (एनम्) दूम पिप्पलाद ऋषि से ( भागंवः, वैदर्भि:) भृगुकुलोत्पन वैदर्भि ने (पमचछ) पूछा कि-( भगवन् ) हे महाभागं! (कति, एव, देवाः) फितने देव (म्रजाम् ) शरीर को (विधारयन्ते) धारण करते हैं। (कतर) कितने (ए- सत्) इम को (प्रकाशयन्ते) प्रकाशित करते हैं (पुनः) फिर (एवाम्) इन में ( कः ) कौन (वरिष्ठः, दति)
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:पश्नोपनिचदि
भावार्थ :- पहिले प्रश्न के उत्तर में प्राण को अत्ता और भोक्ता कहा गया था, अव इस प्रश्न में उम का ोकृत्य : और अत्तत्व सिद्ध किया जाता है। अव पहिले प्रश्न का उत्तर हो जाने पर भृगुकुलोत्पन् वैदर्भि नामक दूसरा शिष्य चक्त आचार्य से पूछता है कि भगवन् ! इस शरीर कोे (जो आत्मा का अधिष्ठान है) कौन २ से देव धारण करते हैं? और कौन इस को प्रकाशित करते हैं? और चन शरीर के घारक और प्रकाशक देवों में सव से बड़ा कौन है? ॥ १ ॥ तस्मै स होवाचाकाशी ह वा एप देवे वायुरग्निराप: पृथिवी वाङ्गनश्नृक्षुः श्रो- ऋञ्। ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेत- द्वाणमवष्ठम्य विधारयामः ॥२॥ पदार्थ :- (तस्मै) उस पूछने वाले के लिये (स: ). वह आचार्य (ह ), स्पष्ट (उवाच) वोला :- ( ह, वै) प्रसिट्ठ (एषः) यह (आकाशः ) आकाश (वायुः) पवन (अग्निः) पावक (आपः) जल और (पृथिवी ) पृथ्वी ये पज्चमहाभूत और (वाङ्मन:) वाणी और अन (चन्तुः श्रोत्रं, च ) नेत्र और कर्शेन्द्रिय [ ये. उपलक्षणमात्र है, कर्मेन्द्रिय और ज्ानेन्द्रियों के] (देवः) देव हैं (ते) के (प्रकाश्य) शरीर को प्रकाशित करके (अभिवदन्ति) परस्पर स्पर्द्टा करते हुवे कहते हैं कि (वयम्) हम (एतत,
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द्वितीय: मम: तणम्) इस शरीर को (अवष्टम्य) स्तम्पवत् होफर (विधारयामः) धारण करते हैं अर्थात् पृथक् २ विना दूसरे की सहायता के इम इम को धारण करते हैं ॥२॥ भाचार्ध :- अव आचार्य दूसरे म्रश्न का उत्तर देते हैं कि आकाशादि पज्चमहाभूत जो इस शरीर को बनाते हैं तथा वागादि पांच फर्मेन्द्रिय और चक्षुः आदि पांच ज्ा- नैन्ट्रिय, यही मव इम शरीर का धारण और प्रकाशन करते हैं। इनी लिये उन की देघसंज्ञा है। ये सब आपम में एक हूमरे की स्पट्टा करते हुवे विवाद करते हैं# कि हम ही स्वतन्त्रता मे इम शरीर को धारण करते हैं अर्धात् इन में मे प्रत्येक टृमरे की उपेक्षा करता हुवा अपने को डी शरीर का मुख्य आधार कहता है। २॥ तान् वरिष्ठः प्राण उवाच। मा मोह-
ज्यैतद्वाणमवष्टम्य विधारयामीति॥३॥ पदार्ध :- तान्) उन सब से ( वरिष्ठ) श्रेष्ठ (माण:) प्राण (उवाच) वोला कि (मा) मत ( मोहम् ) मोह को (आपद्यथ) प्राप्त होओ (अहम, एव) मैं ही (पज्ञधा) पाणादि पांच भेदों से ( आल्मानम् ) अपने क्षो ( प्रवि- * वहां भी पश्भूतों और इन्ट्रियों का विवाद करना बसा ह।औप- नारिक है जना कि केनोपनियट् में बत्त औ्ररंर अ्रग्न्यादि का संघाद या। पाठकों को इस आ्रख्ान के उद्देश्य पर दृष्टि' - रखनी चाहिये, न कि शब्दार्यं पर ॥।:
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प्रश्नीपनिवदि 使
अज्य) विभक्त करके (एतत्, वाणम्) इस शरीर को (अवष्टम्य) स्तम्भवत् होकर (विधारयानि, इति) धारण : करता हूं॥३ ॥ प्राशाथ :- जब इस प्रकार पज्ञभूत और इन्द्रियगण आपस में विवाद कर रहे थे, तब उन सघ में सुरुय और उन मव का नेता प्राण उन से कह़ता है कि तुम कहों मोह (अज्ञान) को म्राप्त होते हो? तुम में मे फोई भी सवतन्त्र रूप से इस शरीर को धारण करने में समर्थ नहीं है। केवल मैं ही हूं जो अपने पांच विभाग करके अर्घात् म्राण, अपान, समान, उदान और व्यान रूप से शरीर में प्रविष्ट होकर शरीर को धारण करता और तुम को भी चलाता हूं। यदि मैं न हूं तौ तुम सब मिल कर की कुछ नहीं कर सकते॥ ३'॥ तेऽम्र्द्धाना वभूवुः सोऽभिमानादूर्ध्व- मुत्क्रमत इव तस्मिन्ुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मि &श्र प्रतिष्ठमाने सर्व. एव प्रातिष्ठन्ते। तद्ाथा मक्षिका मधुकर- राजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिथश् प्रतिष्ठमाने सर्वाएव प्रातिप्ठन्त एवं, वाड्मनश्नक्षुः श्रोत्रज्ज ते प्रीता: प्रा- णं सतुन्वन्ति ॥ ४ ।
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द्वितीयः प्रन्न: २५
मदार्थ :- (ते) वे पछ्सूत और इन्द्रियें (अश्रद्ृधाना:) श्रद्धारहित (वभूदुः) हुवे तव (मः) वह म्राण (अभि- मानात) क्रोध से (ऊध्वम्) ऊपर को ( उत्क्रमते, इव) निकलता हुवा सा दीख पड़ा (तस्मिन्, उत्क्रामति) उस के निकछसे हुवे (इतरे, मर्घे, एव) अन्य सब ही (उत्कामन्ते ) निकलंने लगते हैं (च) और ( तस्मिन्, प्रतिष्ठमाने) उस के प्रतिष्ठित होने पर (सर्वे, एव),रुब ही (प्रातिष्ठन्ते ) स्थित होने लगते हैं। (तत्, यया) सो जैसे (सर्वा:, एव, मक्षिकाः) सारी ही मक्खियें (इत्क्रा- मन्तम्, मधुकरराज्जानम्) निकलते हुवे अपने राजा [राजा मक्खी] के पीछे (उत्कामन्ते) निकल जाती हैं (च) और (तस्मिन्, म्रतिष्ठमाने) उस के स्थित होने पर . (नर्थाः, एघ) सब ही (प्रातिष्ठन्ते) स्थित हो.जाती है (एमम्) इसी प्रकार म्राण के आधीन वागादि को जानो। (अथ) तब् (ते) वे (वाङ, मनः, चन्ुः, श्रोन्रं, च) वाणी, मन, आंख और कान आदि इन्द्रिय (प्रीताः) प्रमन्न हुये (पराणम्) प्राण की (स्तुन्वन्ति) स्तुति करते हैं४ भाषार्थ :- म्राण के उक्त कथन को चक्षुरादि इन्द्रियों ने उपेक्षा से टाल दिया अर्धात् उस पर विश्वास नहीं किया, तब प्राण क्रोध में आकर शरीर से निकलने लगा, उम के निकलते ही सघ इन्द्रिय* भी शरीर से पृथफ् हो गये, फिर म्राण का मजार होने पर सब इन्द्रिय भी * दन्द्रिय शब्द से उन की सूक्ष्मश्ति का तहगा कग्ना चाहिये न कि मौतिक गोलकों का।।
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२६ म्रश्नोपनिषदि
अपना २ काम करने लगे। जैसे मधुमकिखियां अपने राज़ा का अनुसरण करती हैं अर्थात् वड़ मक्खी जो उन की राजा होती है, जब किसी स्थान को छोड़ देती है तो उमी समय मारी मक्खियां वहां मे उड़ जाती हैं और जहां जाकर वह सर्दार मक्सी बैठती है, वहीं पर सब जाकर वैठ,जाती हैं। इमी प्रंकार प्राण मब इन्द्रियों का राजा है, वह जब इस शरीर को छोड़ देता है तो फिर उन के अनुचर वाणी मन आदि शरीर में कैसे और किस के आधार पर रहसकते हैं ? जव सव इन्द्रियों . ने प्राण का यह नाहात्म्य देखा, तघ मब पमन्न होकर प्ण की स्तुति फरने लगे ।४ ॥ एषोऽगरिस्तपत्येप सूर्य एप पर्जन्यो मघ- वानेष वायुरेप पृथिवी रयिदेवः सढ़सच्चा- मृतञ्ज यत् ॥ ५ ॥ पदार्थ :- ( एषः) यह प्राण (अग्निः) अत्ता होकर अग्नि रूप से (तपति) प्रकाशमान है ( एपः) यह शरीररूप जगत् का (मूर्यः) सूर्य है (एपः) यह (नघवान्) ऐश्वर्य का हेतु (पर्जन्यः) मेघ है (एषः) यह (वायुः) वेगवान् होने से वायु है ( एषः ) यह ( पृथिवी). शरीर. को धारण करने अथवा शरीर में फैछा हुवा होने से पृथिवी है (रयिः) शरीर का पोपक होने से चन्द्रमा है (देवः) शरीर और इन्द्रियों का प्रकाशक होने ने देव है
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द्वितीयः प्रश्नः
(यत, सत्) जो सूक्ष्म कारिण है (च) और (अमत्) जो स्थूल कॉर्य है (च) और (अमृतम्) विनांशधर्मरंहित है।५। भांवार्थ :- अय यहां से द्वितीय प्रश्न के अन्त सक प्राण की स्तुति को गई है। यथार्थ गुणकीर्तन का नाम स्तुति है सो म्राण में जो यथार्ध गुण हैं, उन का इन झोकों में वर्णन किया गया है :- अत्ता होने से प्रांण को अग्नि कहा गया है। जैसे संसार में अग्नि के बिना पदाधों का भक्षण और परिपाक नहीं हो सकता। ऐसे ही शरीर में प्राण के विना अन् का अदन और पाचन नहीं हो सकता। प्राण के शिथिल हों जाने से ही मन्दाग्नि हो जाती है इस लिये प्राण को उपचार से अग्नि कहा गया है। एवमेव जैसे सूर्य संसार को प्रकाशित करता है ऐसे ही प्राण इस शरीर को प्रकाशित करते हैं। सूर्य के विना जैसे संभार अन्धकारमय हो जाता है ऐमे ही म्राण के बिना शरीर सूना हो जाता है। इसी कारण म्राय को सूर्य कहा गया है। तथा जिस प्रकार मेघ वर्षा से संसार को जीवनदान देता है इसी प्रकार प्राण के सजार से शरीर जीवित कहलाते हैं, विना वर्षा के जो संसार कों गति होती है, वही बिना प्राण के शरीर की भी दशा समकनी चाहिये। इसीखिये म्राण को भेघ बत- लायां गया है। इसी प्रकार वेगवान् और जीवनाधार होने से वायु, शरीर को धारण करने वाला और उस
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प्रश्नोपनियदि
में फैला हुवा होने से पृघिवी, शरीर का पोषक होने से चन्द्र और इन्द्रियादि का प्रकाशक होने से माण को देव कहा गया है, तथा कारणरूप सूक्ष्म तन्मात्राओं और कार्यरूप स्थूल इन्द्रियों का चलाने वाला होने मे. सतः और असत् एवं देहसे निकलने पर. न मरने वाला होने से ग्राण को अमृत कहा गया है.।। ५ ॥ अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वें प्रतिष्ठितम् । ऋचो यजूथषि सामानि यज्ञ: क्षत्रं ब्रह्म च६ पदार्थ :- (रथनाभौ) रथनाभि में (अरा इव) अराओं के.समान (आ्रणे) प्राण में (सर्वम्) सब कुछ (म्रति- ष्वितम्) प्रतिष्ठित है। (ऋचः) ऋग्वेद (यजशषि). यजुवेद (सामानि ) सामवेद ये तीनों प्रकार के मन्त्र (यज्ञ:) इन से होने वाला यश् (क्षत्रम्) शारीरिक बलः (च) और (ब्रम्म) आत्मिक वल ये सब प्राण के आ: श्रिंत हैं ॥ ६ ।। भावार्थ :- समस्त कर्मकारड़ (मनुष्यकर्सव्य) के विधाय ऋग्यज: माम ये तीन प्रकार के मन्त्र हैं। इन्हीं तीनों के अन्तर्गत होने से अथर्व का समावेश भी इन्हों में हो जाता है. इस लिये उस का पृंथक् निर्देश नहीं किया। उक्त-तीनों प्रकार के मन्त्रों से विधेय जो यज्ञादि कर्म हैं उनका यथाविधि अनुधान,प्राण के ही, आश्रित प्रथम प्रश्न में सिट्ध कर चुके हैं कि भोकृशक्ति ... या कर्त
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द्वितीयः मरश्न:
शक्ति प्राण के ही आधीन है, विना प्राण के जब कर्मृत्व ही नहीं तौ फिर फर्म फैसे सिद्ध हो सकता है। हं, प्रायारहित जड़ पदार्थ मन्त्र या यज्ञादि के उपयोग्य हो सकते हैं, न कि उपयोका। उपयोग्यसे उपयोग लेना उपयोकशक्ति के आधीन है जो कि म्रांणके :आश्रित है। यत् शब्द से यहां सामाजिक वल का ग्रहण करना चाहिये कोंकि मामाजिक अभ्युदय के लिये ही यत्ञ किया जाता है, इस में शतपथ ब्राह्मण का प्रमाण भी है :- "यतोउपि तस्यै जनतायै प्रवतीत्यादि" यश जनता (जनससुदाय) के लिये होता है न कि किसी व्यक्ति विशेष के लिये, अतएव ग्राण ही सामाजिक वल के (जो यज्ञादि फर्मों के द्वारा बढ़ाया जाता है) आधार हैं। इसी प्रकार क्षत्र शब्द मे शारीरिक और ब्रह्म शब्द से आत्मिक बल का ग्रहण होता है, शारीरिक और आ- त्निक वल भी प्राण के ही आश्रित हैं। प्राण ही, अनुकूछ ोकर शरीर को पुष्टि पहुंचाते हैं और प्राण ही वश में होकर आत्माको वलिष्ठ बनाते हैं। यहा अग्न्यादि ५ वीं श्रुति के और ऋक आदि ६-ी के कहे सव पदार्थ प्राण में प्रतिष्टित हैं। यह दोनों का एक अन्वय भी. हो सकता है॥ ६। प्रजापतिश्वरसि गर्भे त्वमेव-प्रति जायसे। तुभ्यं प्राण ! प्रजास्त्विमा वलिं हरन्ति यः प्राणः प्रतितिष्ठसि॥७॥
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पश्नोपनिषदि
पदार्थ :- ( मजापतिः) म्राणियों का अध्यक्ष होकर (गभे) शरीर में (चरसि) विचरता है (त्वम्, एव ) तू-ही (प्रति, जायमे) उन में प्रकट होता है (म्राण) हे म्राण ! (यः, जो तू । प्राणेः) म्राणादि पांच भेदों से (प्रतितिष्ठसि) शरीर में रहता है उस (तुम्यम्) तेरे लिये ( इमाः, ग्रजाः) ये सव प्रणी बलिम्:) भ्राग 'को (हंरन्ति ) आहरण करते हैं अर्थात् देते हैं॥9॥ भावार्थ :- इस झोक में प्राण को सम्बोधित करके इन्द्रियादि उस की स्तुति करते हैं :- हे प्राण ! तूही प्रजा का जीवनसूछ होने से सब, प्रांखियों के शरीरों में विचरता है और नाना रूप से शरीर के भ्षिन्न २ अंङ्गों में प्रकट होता है अर्थात् प्राण- रूप से हृदय में, अपानरूप से गुदा में, समानरूप मे नापि :मैं, उदानरूप से कगठ में और व्यानरूप से समस्त शरीर मैं व्यापक है। तेरी ही रक्षा और स्थिति के लिये सब प्राणी अन्नादि विविध भोग्य पदार्थों की भेंट करते हैं अर्थात् तुभ को शरीर में सुरक्षित रखने के लिये नाना प्रकार के उपायों को काम में लाते हैं, क्योंकि तू ही केवल अत्ता है और सब आद्य हैं। निस्सन्देह संसार में तुभ से प्रिय और कोई वस्तु नहीं है। 9 ॥ देवानामसि वहितम: पितृणां प्रथमा स्वधा। ऋपीणां चरितं सत्यमथवाङ्गीरसामसि॥८।। पदार्थ :- तू (देवानाम्) सूर्यादि देवों का (वहितमः)
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द्वितीय:प्रश्नः ३१
अग्निरूप से हव्य का वाहक (असि) र, ( पितृणाम्) अग्निष्वासतादि पिवृग़णों का (म्रथमा) पहिला अर्थात् मुख्य (स्वधा) कव्य है। (ऋषीणाम्) चक्षरादि इन्द्रियों का (सत्यम् ) अमन्दिग्ध (चरितम् ) चरित्र हे (अद्गिरसाम्) शरीर के अङ्गों का (अघर्वा) न सुखाने वाला (असि) ३े॥८ ॥ प्रावार्थ :- इस लोक में चार बातें कही गईं हैं, उन में से पहिली बात यह है कि म्राण-सूर्यादिदेवों को ठन का भाग (हव्य) पहुंचाता- है, मो यह फ़ाम तौ अग्नि का है और एम लिये उस को हव्यवाट कहते हैं, प्राण से इम का क्या सम्बन्ध ? इस का उत्तर यह है कि अग्नि में केवल दाइक शक्ति है, जिस से वह पदार्थों को जलाकर सूक्ष्म और इलका कर देता है, अघ उन की एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाना, यह काम वायु का है, जो कि प्राण का दूसरा नाम है। अच्छाती फिर वैदादि शास्त्रों में अग्नि को हृव्यवाट्, क्ों कहा गया है ? इस का उत्तर यह है कि वायु से उत्पन्न होने के कारण अधवा वायु के सहचार से अग्नि में हव्यवाहकता मानी गई है, वास्तव में वहनक्रिया का कर्ता वायु हीहै। अस्तु यदि इम स्वतन्त्र रूप से अग्नि को ही हव्यवाहक नान लेवें, तव भी उक्त कथन में कोई दोष नहीं आता क्योंकि म्राण की अग्निरूपता प्रथम प्रश्न में भले प्रकार सिट्ध कर ही चुके हैं। दूसरी बात यह है कि प्राण ही पितृगणों की पहिली स्वधा है, इम का तात्पर्य यह है
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मश्रोपनिषदि
कि शाद्ध में जब पितृगण भोजन करते हैं तब म्राण ही. :के द्वारा अननम्रवेशन और अन्नपाधनादि क्रिया सिद्ध होती हैं इस लिये म्राण ही पितरों की स्वधा है। तीमरी बात यह है कि इन्द्रियों का सत्यचरित भी प्राण है (ऋषीगतौ) ऋष धातु के ज्ञानार्थक होने से ऋषि नाम इन्द्रियों का है, म्राण के स्वस्थ होने पर. ही इन्द्रिय अपने अर्थों को निर्भान्त रीति पर ग्रहण कर मकते हैं, तात्पर्य यह कि इन्द्रियों की मत्यता (सार्थकता) ग्राण के ही कारण है। इसी लिये प्राण की उन का मत्यचरिंत कहा गया है। चौथी बात यह है कि प्राण को शरीर के अङ्गों का न सुखाने वाला कहा गया है, सो म्रत्यक्ष है कि प्राण ही की गति से सब अङ्ग हरे भर् रहते हैं, प्राण के अभाव में शरीर के सब अङ्ग सूख जाते हैं, इँसी लिये उन का. नाम अंद्गिरम है, तम अङ्गों का न सुखाने वाठा होने से म्राण का नाम अथरवा है। इन्द्रस्त्वंप्राण! तेजसा रुद्रोसिपरिरक्षिता। त्वमन्तरिक्षेचरसि सूर्यसत्वं ज्योतिषां पतिः पदार्थ :- (म्राण) हेम्राण! ('त्वम्) तू (तेजमा ) अपने तेज से (रुद्र:) भयंकर है(परिरक्षिता) रक्षा करने वाला (इन्द्रः) ऐश्वर्य का देने वाला (अभि) ह (त्वम् ) तू (अन्तरिते) आकाश में (चंरसि) विचरता है (त्वम् ) तू ( ज्योतिषाम्) नक्षत्रों का (पतिः) स्व्रामी छोने से (सूर्य:) आदित्य है ॥ e ।
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द्वितीय: प्रश्नः ३३
भ्ावार्थ :- प्राण ही इन्द्र रूप से सब जगत की रक्षा करता है अर्थात प्राण के ही आश्रय से सब म्राणी सांसारिक और पारमार्थिक सुख का अनुभव करते हैं, म्राण का इन्द्रत्वयही है कि वह ऐश्वर्य का भोग कराने में मुख्य हेतु है। इसीप्रकार अपने तेजसे प्राण दी रुद्र भी. है रोदयति जनानिति रुद्र :- " रुलानेवाले को रुद्र. कहते हैं,सो प्राण ही शरीर से निकलता हुवा लोगों को रुलाता है, यही उस में रुद्रत्व है। म्राण ही आकाश में अव्याइतगति होकर विचरता है इस लिये वायु है और वही अग्नि रूप होने से सब का म्काशक है। जैसे सूर्य अपने प्रकांश से सम्पूर्ण नक्षत्रों को प्रकाशित करताः है, ऐसे ही प्राण अपने तेज से शरीर के सब अंङ्गों को प्रकाशित कर रहा है।। e । यदा त्वमभिवर्षस्यथेमा प्राणते प्रजा:।. आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति का मायानं भविष्यतीति ॥१ ॥ पदार्थ :- (माण) है माण। (यदा) जब (त्वम्), तू. (अभ्रिवर्षसि। मेघ हो कर वर्षता है (अथ.) तब (ते) तेरो (इमी:, प्रजाः) ये प्रजायें (कामाय) यथेष्ट(अन्नम्) अन्न (भविष्यति, इति) होगा इस आशा से (आनन्दरुपाः) आनन्दरूपडोकर (तिष्ठन्ति) ठहरती हैं ॥१० ॥ भावार्थ :- प्राण की मेघ रूपता कह चुके हैं, भौतिक विज्ञान से भी यह बांत सिट्ध है कि वर्षा के कारण
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३४ प्रश्नोपनिषदि
वायु और अग्नि ये दोही पदार्थ हैं। सो इन में से वायु तौ म्राण का ही दूसरा नाम है, रहां अग्नि सो वह भी (वांयोरग्निः) इस प्रमाण के अनुसार वायु से ही उत्पन्न होता है और इसी लिये प्रथम प्रश्न में अग्नि वा मूर्य को प्राणरूपता कही गई है, तौ म्राण ही वर्षा का भी मुख्य कारण ठहरा। जब भोक्ता प्राण मेघरूप होकर पृथिवी पर वर्षता है तब अनेक प्रकार के भोग्य अन्नादि पदार्थ यथेष्ट उत्पन्नं होते हैं, जिन से सारी प्रजा (जो ग्राण की अध्यक्षता में रहती है अर्थात् भोक्तशक्तिसम्पन्न है,) तुहिः और पुष्टि को प्राप्त होती है॥ १० ॥ व्रात्यस्त्वं प्राणकऋृषिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः । वयमादास्य दातारः पिता त्वं मातरिश्वनः ॥ ११॥ पदार्थ :- (प्राण ) हे प्राय! (त्वम्) तू (व्रात्यः) सब से पहिला होने से संस्कार नहीं किया गया है अर्थात् स्वभाव से ही शुद्ध है ( एक ऋषिः ) एकर्षिनाम' अग्नि होकर (अत्ता) सब का भक्षण करने वाला है (विश्वस्य, सत्पतिः। विद्यमान जगत् का पति है (वयम्). हम संब (आद्यस्य ) तेरें भक्षणीय अन्नादि के (दातारः) देने वाले हैं ( मातरिश्व) है मांतरिश्वन्! (त्वम्) तू. (नः) इमारा (पिता) रक्षक है, अथवा त्वम्=तू मातरिश्वन :- वायु को पिता-उत्पादक हैं॥ ११॥ भावार्थ :- जिस का संस्कार न मुंवा हो उसे ब्रात्यः
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द्वितीयः प्रश्नः ३५ कहते हैं, यहां म्राण को व्रात्य इस लिये कहा गया है कि वह सृष्टि में सब मे पहिले उत्पन्न हुवा, फिर उस का मंस्कार कौन फर सकता था? इम लिये वह स्वभाव- शुद्ध होने से संस्कार की अपेक्षा नहीं रखता। प्राण का अग्ति और अत्ता होना सिद्ध हो चुका है, विद्यमान मम्पूर्ण जगद का पति अर्थात् पालक होना भी सिद्ध ही है। इन्द्रिय म्राण से कहते हैं कि जैसे होताओं से हव्य पाया हुवा अग्नि सन की रक्षा का हेतु होता है, वैसे ही हम से अवनादि भोग्य पदार्थों को प्राप्त हुवा तू हमारा रक्षक होता है। अतएव हम होता (देनेवाले) और तू पिता (रक्षा फरने वालां) है। या तू अन्तरिक्ष में श्वास लेने वाले वायु का पिता अर्थात् उत्पादक है॥ ११॥ या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुपि। या च मनसि संतता शिवां तां कुरु मोत्क्रमी: ॥१२॥ पदार्थ :- (या) जो (ते) तेरी (तनूः) फैली हुई शक्ति (;वाचि) वाणी में (या ) लो (श्रोन्े) कान में (च) और (या) जो (चक्षुपि) आंख में (प्रिष्ठिता) प्रतिष्ठित है (या, च ) और जो (ननमि) मन में (मंतता ) फैला हुई है (ताम् ) उम को ( शिवास् ) मङलकारिणी (कुरु) कर (मा) मत (उत्क्मी:) . निकल ॥१२ ॥
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प्रश्नोपनिवदि
भ्रावार्थ :- इस श्लोक में इन्द्रिय प्राण से प्रार्थना करते हैं। है म्राण! तेरी जो शक्ति वाणी में प्रतिष्ठित है जिस से हम वोलते हैं, जो कान में अधिष्ठित है जिस से हम सुनते हैं, जो आंख में उपस्थित है जिम से इम देखते हैं और जो मन में व्याप् है जिस से हम संकरूप विकल्प करते हैं, उस शक्तिको हमारे लिये मङ्गलकारि- की कर और तू हमारे शरीर से मत निकल अर्पात् हम तेरी उपस्थिति में तेरी शक्ति का प्रयोग ऐसे कामों में करें कि जिस मे सर्वेदा हमारा कल्याण हो और हम को तेरा वियोग न हो।। १२ ॥ प्राणस्येदं वशे सवें त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम् । मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्न प्रज्ञां च वि- धेहि न इति॥१३ ॥ पदार्थ :- (त्रिदिवे) तीनों लोक में । यत्, प्रतिष्ठितम् जो कुछ वर्तमान है (इदम् सर्वम्। यह मव (प्राणस्य) माण के (वशे) वश में है (माता, दव) साता के समान (पुत्रान्) पुत्रों की ( रक्षस्व ) रक्षा कर (च ) तथा (श्रीः) विज्ञान और ऐश्वर्यरूपिणी शोभा को (प्रस्ाम्, च) और उस की निमित्त सदसद्विवेकिनी बुद्धि को (नः) हमारे लिये (विधेहि, इति) नस्पादन कर।१३H प्रावार्थ :- इस श्रोक में भो म्राण से प्रार्थना कोगई है। पुषिवी अन्तरिक्षि और झुलोक में तो कुछ है, वह मब
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तृतीय: मश्नः ३9
म्राण के ही आधार में स्थित है। जङम ही नहीं किन्तु स्यावर भी बिना वायु के न बढ़ सकते और न जीवित रह सकते हैं, अतएव यह सव चराचर जगत् भ्राण के ही आधीन है। प्राण ही नाता के समान प्राणियों की रक्षा करता है। जैसे माता आप कष्ट उठाकर भी पुत्रों को सुख पहुंचाती है इसी प्रकार प्राया अपानादिरूप में परणत होकर भी प्राणियों के लिये हितकर ही होता है। प्राण की ही स्थिरता और वश्यता से मनुष्य शारीरिक और आत्मिक वल तथा धारणावती बुद्धि को प्राप्त करता है। अतएव इम शरीर के धारक और प्रकाशक देवों में प्राण देव ही सब से श्रेष्ठ और प्धान है.। ऐसा जान कर जो इस को तप और, योगादि साधनों के द्वारा वश में करते हैं वे ही मनुप्यजीवन के उदृश्य को पूर्ण करते हुवे मोक्ष के भागी बनते हैं॥१३॥ इत्यथर्ववेदीयप्रश्नोपनिषदि द्वितीय: प्रश्न:२
अथ तृतीय: प्रश्न: अथ हैनं कौशल्यश्राऽशलायनः पग्रच्छ। भगवन् ! कुतएष प्राणो जायते कथमाया- त्यस्मिन् शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोक्क्रमते कथं वाह्यमभिधत्ते कथमंध्यात्ममिति ॥१॥
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प्रश्नोपनिषदि
पद्ार्थ :- (अध) इस, के, उपरान्त (ह) प्रसिद्ध (एनम्) इत पिम्पलाद ऋपि से (आव्वलायनः," कौशल्यः) अख्वल के पुत्र कौशल्य ने ( पम्रच्छ) पूछा कि (भगवन्) हे भगवन् ! (एप:, म्राणः ) यह म्राण ( कुंतः ) किस कारण से (जायते) उत्पन्न होती है ( कथन् ) पशोंकेर (अस्मिन शरीर) इस शरीर में (आयाति आती है आरंमालस्, वा) और अपने को ('प्रविभज्य) घि- भाग करके (कथम्) किस प्रकार (प्रातिष्ठते) स्थिंत होता है ( केन ) किस हेतु से (उत्क्रमते) निकलता है और (कंथम्) क्योंकर ( बांह्यम्) वांह्य जंगत को (असिधते) धारण करता है और (कथम्) वंचोंकर अध्याल्मम्,इृति) अध्यात्म जगत को !'?॥ भावार्थ :- पहिले प्रश्न के उत्तर में प्राण का अग्नि रूप से अत्ता होना और दूसरे प्रश्न के उत्तर में वायु रूपें से सब से प्रथम और श्ेष्ठ होना सिद्ध किया गया, अब तीसरे प्रश्न के उत्तर में उस की उत्पत्ति और विभाग का वर्णन किया जायगा। भार्गव वैदर्भि के प्रश्न का उत्तर हो चुकने पर आश्वलायन कौशल्य पिप्पलाद ऋि से चूछता है कि-भंगवन्: एक्त म्राण जिस का अंतृत्व और मुख्यत्व आपसिद्ध फर चुके हैं, कहां से उंत्पन्न होता है अर्थात् उस का निमित्त कारण क्या है? और उत्पन्न रेकर केमें इस शगीर में आता है और कितने भागों में विभक्त होकर ठहगता है? किम प्रकार शरीर से नि कलता है? कैसे बाह्य ज़गत को (जिस, में, पजुस्तानेन्द्रिय
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वृंतीय: मंसः
रूप आधिदेविक और अग्न्यादिपज्ञभूत रूप आधिसौ- तिक सृष्टि सन्निविष्ट (शामिल) है, धारण करता है और कों कर आभ्यम्तर जगत को (जिस में आल्मा से स- म्बन्ध रखने वासी माणादि पांध सूत्मवुत्तियां संयुक् हैं) धारण करता, है१॥२॥ तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पच्छसि ब्रह्मि- ष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं व्रवीमि ॥२॥ पदार्थ :- ( तस्मै ) उस मन्नकर्ता के लिये (सः) वह आचार्य (ह) स्पष्ट (उवाघ) वोला कि (भतिप्रश्नांन्) तू बहुत गम्भीर प्रश्नों को (पृच्छसि) पूछता है, (व्र- सिष्ठ:) त्रह्म में निष्ठा वाला (असि, इति) है (तस्मात्) इस लिये (ते) तेरे अर्थ (अहम्) मैं (त्वीमि) कहता हूं ॥ २ ॥ सावार्थ :- फौशल्य का प्रश्न सुन कर पिप्पछाद ऋषि उस से कहते हैं कि-हे कौशल्य।तू बढ़े विषम प्रश्नों को चूछता है। प्रथम तो प्राण का जानना ही वड़ा कठिन है, उम पर उस की उत्पत्ति और विभाग, संक्रमण और उल्कमण, शरीर के बाहर और भीतर सजरण; ये ऐसे गूढ़ और सूक्ष्म विषय हैं कि जिन को विद्वान् भी सुग- मता से नहीं जान सकते। जोकि इन विषयों का जानना ब्रह्मज्ञान के लिये उपयोगी है, इस लिये इन की जित्तासा रखता हुया तू ब्रह्मनिष्ठ प्रतीत होता है अतएव मैं प्रशन्न होकर तेरे मश्न का उत्तर देता हूं।२॥
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प्रभोपनिषदि आत्मन एष प्राणो जायते। यथैपा पु- रुषे छायैतस्मिन्ेतदाततं मनोकृतेनाऽड- यात्यस्मिन् शरीर ॥३-1 पदार्थ :- (आत्मनः) आत्मा से(एव,मराण:ः) यह प्रांण (जायते) उत्पन्न होता है। (यथा) जैसे (पुरुषे) हाथ, पैर आदि आकति वाले शरीर में:(एपा., छाया) यह छाया संबद्ध है, तह्त् (एतस्मिन्) इस आत्मा में ( एतत) यह माण (आततम्) फेला हुवा है (मनोकतेन) इच्छाजन्य कर्मरूप निमित्त से (अस्मिन् शरीरे) इस शरीर में (आयाति) आाता है। ३॥ भावार्थ :- इस झोंक में आत्मा से माण की उत्पत्ति कही गई है, इस से कोई आत्मा को म्राण का उपादान कारण न समझ बैठें। क्योंकि उपादान की केल्पना तौ शरीर और छाया के दृष्टान्त से ही कट जाती है जैसे शंरीर ढाया का उपादान नहीं किन्तु निमित है अंथोत जैसे शरीररूप निमितत के होने से छायारूप नैमित्तिकं वस्तु होती है, ऐसे ही आत्मा भी प्राण का निमित्त है अर्थात् आत्मरुप निमित से ग्राणरूप नैमि- तिंक पदाथे उत्पन्न होता है। इस दूष्टान्त मे एक यह बांत भी ध्नित होती हैं कि जैने ढाया और शरीर का साथ है अर्थात जहां शरीर जाता है वहां उस की छाया भी जाती है, इसी प्रकार म्राण और आत्मा,
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वृतीय: प्रश्मः का भी माथ है मर्घात् जहां आत्मा जाता है वहीं उस का म्राण भी। यही कारण है कि साधारण पुरुष इन में ननेद भी नहीं कर सकते किन्तु घनिष्ठ मम्बन्ध होने के कारण म्राण को ही आत्मा ममझने लगते हैं। असंतु, श्रति में स्पष्ट कहागया है कि जैसे साकार वस्तु से ाया उत्पन होती है यैसे ही निराकार आत्मा से प्राण की उत्पत्ति होती मै, जब कोर्ई साकार वस्तु छाया का उपादान नहीं तय आस्मा प्राण का उपा- दान कपोंकर हो सकता है ? आत्मसत्ता से उस का मकट होना ही म्राण की उत्पत्ति है। अब रडा उस का शरीर में प्रवेश करना सो. यह आत्मा के इच्छाजन्य कर्म रूप निमित्त के आधीन है अर्थात् आत्मा जिस २ इच्छा से जैसे २ कर्म करता है प्राण वैसे २ ही शरीरों में उस को लेजाता है। तत्पर्य यह कि कर्मानुसार आत्मा का किसी शरीर में जन्म लेना ही प्राण का उस में प्वेश करना है। प्राश किस से उत्पन्न होता है और कैसे इस शरीर में आता है, इन दोनों प्रश्नों का उत्तर इन श्रुति में होगया ॥३ ॥ यथा संवाडेवाधिकृतान् विनियुङ्क्े। एतान् ग्रामानेतान् ग्रामानधितिष्ठस्वेत्ये- वमवैप प्राण इतरान्प्राणान् पृथक पृथ- गैव संनिधंत्ते।४ ॥
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पमोपनिवदि पदार्थ :- (यथा) जैसे (मचाट्, एव) राजा ही (अविरुतान्) अरधिकारियों को (विनियुङ्क्त्े) नि. शुक्त करता हे कि ( एनान्, ग्रामान्, एतान्, ग्रामान्) इन ग्रामों को (अधितिष्टस्व्र) अधिकार में ले (एवम्, एव) इस ही प्रकार. (एप, प्राणः)यह प्राण (इत- रानूं, पाणात्), चक्षुरादि बन्द्रियों को अथवा अपानादि अपने मेदों को (पृधक, पृथफ, एवं अलग अलग (संति- पत्ते) नियुक्त करता है॥ ४ ।: भावार्थ :- इस श्रुति में राजा के द्रष्टान्त से म्राण का कर्त्तव्य वतलाया गया है। जैसेराजा अपने, देश के मघ- नघार्थ अधिकारियों को नियुक्तक करता है और उन के अधिकार की सीमा भी निर्धारण कर देता है अर्थात् अमुक २ प्रान्त अमुक २ अधिकारों के साथ अमुफ २ अधिकारी के शासनाधीन हैं। इसी प्रकार इस शरीर रूप देश का राजा प्राण भी शारीरिक प्रबन्ध के लिये चक्षुरांदि इन्द्रियों को एवं अपानादि म्राण मेदों को उन२ का काम और उस की सीमा निर्धारण करके नियुक्त करता है। जैसे वे अधिकारी राजा के नियमानुसार अपने २ कर्त्तव्य का पालन करते हैं, ऐसे ही समस् आणों के भेद, इन्द्रिय और अन्तःकरण आदि म्राण की योजना से अपना २ काम करते हैं। ४ ॥ पायूपस्थेऽपानं चक्षुः त्रोत्रे मुखनासि- काभ्याँ प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते सध्ये तु
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तृतीय: मश्र: ४३
समान: । एपहयेतडुत्मन्नं समंनयति तरमा देताः सप्तार्चिषोभवन्ति ॥५॥ पदार्थ :- (पायूपस्धे) गुदा और उपस्य में (अपानम्) अपान को नियुक्त करता है ( मुखनासिकाभ्याम्) मुस नामिका के महित (चक्षुःश्नोत्रे) आंख और फान में (माणः) प्राण (स्वयम् ) आप (प्रातिष्ठत्ते) ठहरता है (तु) और (मध्ये) म्रोण और अपान के वीघ में अर्थात् नापि देश में (ममानः ) संमान वायु रहता है (हि) निश्य (एपः) यह समान वायु (एतंत, हुतम्, अन्नम्) इस साये पींये अन्नादि के रसको (समम्) परिपाक को (नयति) पहुंचाता है (तस्मात्) उस जाठराग्नि को प्रदीपत करने वाले समान वायु से (एताः सप्तारचिपः) दो आंख की, दो कान की, दो नाक की और एफ मुस की; ये सात ज्वालायें, जिन मे ग्राण का प्रवेश और निर्गम होता है (भंवन्ति) उत्पन्न होती हैं॥५॥ प्रादार्थ :- अब यहां मे इम प्रश्न का कि अपने को विभ्रक करके किस प्रकार प्राण शरीर में रहता है, वत्तर प्रारमभ किया जाता है। सुदा और उपस्थ इन्द्रिय में अपान वायु रहता है, जिस का काम मलसूत्र का उत्सर्ग कराना है। आंख और कान उपलक्षण है शिर के। मुख, नासिका, आंख और कान के द्वारों से प्रवेश करता हुवा शिर नें म्राण वायु रहता है, जिस का काम श्वास
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प्रशनोपनिर्षदि
म्रश्ास के द्वारा शरीर को सवस्थ रखंना है। प्राण और अपान के बीच अर्थात् नाभि देश में समान वायु रहता है, जिम का काम जाठराग्नि को प्रदीप्त करके भुक और पीत अन्नादि के रस को परियाक करना है, उस ही समान वायु से आंख की दो, कांन की दो, नाक की दो और मुंह की एक, ये सात ज्वालायें प्रत्वलित होती हैं; अर्थात् जब वह जाठराग्नि के द्वारा रस का परिणाम कराता है तब उस से परिपक् और पुष्ट दोकर चक्षुरादि ज्ञानेन्द्रिय अपने२ अर्थों के ग्रहण करने में समर्थ होते हैं, उन की समर्थता दिखलाने के लिये ही"अचिः- - शब्द का प्रयोग किया गया हैं॥५॥ हृदि ह्येष आत्मा। अत्रैतदेकशतं नाड़ीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्नतिद्वास- प्रतिः प्रतिशाखानाड़ीसहस्राणि भवन्त्वासु व्यानश्ररति ॥६ ॥ पदार्थ :- (हृदि) ह्ृदय में ( हि) निश्चय (एषः) यह (आत्मां) सब इन्द्रियों का राजा आत्मा रहता है (अत्र) इम हृदय में (एतत्) यह (नाड़ीनाम्) नाड़ियों का (एकशत्तम्) एक सौ एक १०१ का संघात है (तासाम्) उन १०१ में ( एकैकस्याम्) एक एक में (शतम्, शतम्) सौसौ [भेद हैं (ह्वासपतिः, द्वासप्तिः, प्रतिशाखा- नाड़ीसहस्त्राणि) फिर उन में भी प्रत्येक शाखारूप़
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वृतीय: मश्रः ४५
नाड़ी के बछत्तर २ हज़ार भेद (पतस्ति) होते हैं ( आमु ) इन में (व्यान:) व्यान वायु ( चरति ) विघरता है। ६॥ नाधार्थ :- हृद्य में जो पुंपढरीकाकार स्थान है, जिसमें कि शरीर का अधिष्टाता और दन्द्रियों की राजा-आत्मा रहता है, 'उम के पाम ही ना सिकमल मे १०१ नाड़ियें निकल कर शरीर में फैलती हैं। फिर उन में से एक एक की सी मौ शाखायें फूटती है, जिन की मंखया मिलकर १०१८० होती है, अब इन १०१०० में से प्रत्येक की १२००० असायें होती हैं, जिन को गुणा करके ६२९२०००८० हुई और पिछली सूल १०१ तपा १२१२० नाड़ी निलाकर नव नाडियों की संख्या को इम शरीर में फैली हुई हैं १२ छरोड़ 3२ लाउ [० हजार र होती हैं। इन नव ना- हियों में रुधिर का सज्जार फरता हुदा व्यान वायु विचरता है। शरीर में व्यापक होने से ही इस का नाम व्यान है। यद्यपि सानान्यरूप से शरीर के सब अङ्गऔर ए त्यङ्गों में ध्यान रहता है तथापि सन्धि और नर्म स्यानों में इस की विशेय रूप से स्थिति नानी गई है प्योंकि वहीं से रुधिरादि का तिभाग होफर शरीर के मर्ब अङ्गों में पहुंचता है॥६॥ अथकयोर्ध्व उदान: पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पावेन पापमुमास्यामेव मनुष्य- लोकम्॥७॥
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४६ प्रभोपनिर्षदि पदार्थ :- (अथ) अब (एकया) उन २०१ नाडियों में से एक के द्वारा (ऊर्ध्यः) ऊपर को जाने वाला ( उदानः) उदान वायुरेजो (पुरयेन) पुरयकर्म से (युरयलोकम्) खर्गलोक को (पापेन.) पाप कर्म से, (पापम्) नरक लोक को और (उपाभ्याम्, एव) पाप पुराय दोनों से ही (मनुष्यलोकम्) मनुष्यलोक को (नयति) लेजाता है॥9। भावार्थ :- अब उन १९१ नाड़ियों में से एक सुषुम्णा नाम नाड़ी है जो पैरों से लेकर मस्तक तक चली गई है, उस में विचरता हुवा उदान वांयु विशेष कर कराठ देश में रहता है, जो भुक और पीत अन्न पानादि को कएठ से नीचे उतार कर आमाशय में पहुंचाता है। इसी के द्वारा शरीर की पुष्टि होने से मनुष्य कर्म करने में समर्थ होता है, अतएव यही शुभकर्म के द्वारा मनुष्य को खर्ग में पहुंचावा है अर्थात् देवत्व को म्राप्त कराता है और यही अशुभकर्म के द्वारा नरक में ले जाता है अर्थात् असुरत्व को म्राप्त कराता है और यही शुझा- रशुभ मिश्रित कर्मों के द्वारा मनुष्यत्व की प्राप्ति कराता है। तात्पर्य यह कि इसी के द्वारा मनुष्य को पाप, पुराय और मिश्रित कर्मों के करने का सामर्थ्य म्राप्त होता है, अत- एव यही उन के उत्तम, अधम,औौर मध्यम फल की प्राप्ति का निमित्त भी है। इस का दूसरा अर्थ यह भी है कि उक्त सुपुर्णा नाड़ी के द्वारा ही (जिस में उदान वायु रहता है) मनुष्य का प्राण निकलता है। यदि वह अच्के
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वृतीच: प्त् ::
कमों के सांथ निंकले तो अच्छी गति को, वुरे क्मों के साथ निफले तो वुरी गति को और अच्छे वुरे निले हुदे कर्मों के साघ निकले तो बीघ की गति को म्राप्त कराता है। इस पक्ष नें यह उस प्रश्नांश की उत्तर है, जिस में श्िव्य ने आचार्य से यह पूछा था कि प्राण किस प्रकार शरीर से निकलता है? ॥ 9 ॥ आदित्यो ह वै वाह्यः प्राण उदयत्येप ह्येनं चाक्षुपं प्राणमनुगह्लानः। पृथिव्यां या देवता सैपा पुरुपस्यापानमवष्टम्यान्तरा यदाकाश: स समानो वायुर्व्यान: ॥ ८॥ पदार्थ :- (इ) म्रमिट्ठ (आदित्य:, चै') सूर्य ही (बांत्यः, प्राणः, सन्) वाहय म्राणरूप हुवा (उद्यति) प्रकाशित होता है ( हि) निश्य (एपः ) यह सूर्यरूप वा्स्य म्ाण (एनम् ) इस (चाक्षुयम्, माणम्), चक्ष में रहने वाल प्राण को (अनुगृह्नानः) अनुग्रह करता हुआ स्थित है। (प्रथिव्याम्) पृंथिवी में (या ) जो (देवता) आकर्षण शच है (मा, एपां) वह यह शक्ति (पुरुपस्य). पुंरुष के (अपानम्-) अपान वायु को (अवष्वभ्य ) सींचकर उस को धारगा किये हुवे है (अन्तरा) सूर्य और पृथ्वी के वीच में ( यद्) जो (आकाशः-) आकाशस्य वायु है (सः) वह ('समानः ) समान वायु है (वायुः) सामान्य रूप से जो बाह्य वायु डै (सः) वह (व्यांनः) व्यान है॥I.
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प्रंश्नोपनिषदि भावार्थ :- इस श्रुत्ति के द्वारा प्रश्न के अन्तिम स्ाग का, जिम में यह पूछा यया है कि वाह्य और आध्या त्मिक जगत् को प्राण क्योंकर धारण करता है?, उत्तर दिया गया है। सूर्य (जो कि वहां चपलक्षण है पङ्चभूतों का) बाह्य प्राण है और चक्षु जो कि यहां उपलक्षण है यङ्, ज्ञानेन्द्रियों का) आध्यात्मिक प्राण । * जैसे तैजस प्राण चाक्षुप प्राण को रूप ग्रहण करने की शक्ति देता है, ऐसे ही आकाशस्य प्राण श्रोत्रस्य म्राण को, वायव्य प्ाणा स्पर्श- गत प्राण को, आध्य म्राण रसनास्य म्राण को और पा- थिंव प्राण घ्राणस्य प्राण को प्रकाशित करते हुवे उन्हें यथाकम शब्द, स्पर्श, रस और गन्ध के ग्रहण करने की शक्ति पदान करते हैं अर्थात् विना सूर्य के रूप, विना आकाश के शब्द, विना वायु के स्पर्श, बिना जल के रस और विना पृथिवी के गन्ध का ग्रहण हो नहीं सफता। इस से सिद्ध है किआध्यात्मिकम्राण (जो पक्तज्ञानेन्द्रियों का प्रदर्तक है। आधिप्तौतिक प्राण के (जो पज्चुमहा- भूंतों में प्रविष्ट है) आश्नित है, अतएव यह म्राण अपने सरमष्टिरूप से व्यह्टिरूप को धारण कर रहा है। अवरष अपान वायु जो म्राण की अधोगारमिनी वृत्ति का नाम है, उस को पृथिवी अपनी आकर्षण शक्तिसे रोके हुवे है। * वाह्य और आधुयात्मिक शब्द यहां शरीर की अपेचा से है अर्थात् जो प्राय, शरीर के बाहर हो वह बाहय और जो उस के भीतर हो वह आध्वात्मिक है॥
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तृतीय: मश्नः
अन्यघा शरीर भ्ारी होने से गिर पड़ना चाहिये या अवकाश होने से ऊपर को उठ जाना चाहिये, क्योंकि इन देखते हैं कि प्रत्येक भारी वस्तु नीचे को गिरती है या अवकाश मिलने पर ऊपर को उठती है, परन्तु यह शरीर स्तम्भवत् न तौ नीचे ही को गिरता है और न वृक्षशासावत् ऊपर ही को उठता है किन्तु जैने का तैसा (जैसा किसी स्तम्भ को चारों ओर तनाव बांध कर खड़ा कर देते हैं) खड़ा है। इस का कारण पृथिवी की आकर्षण शकति है, जो वाह्य म्राण से (जो उस में रहता है) शरीरस्य अपान को खींचे हुवे है, अतएव वाह्य मराश ही शरीरस्थ अपान को भी धारण करता है। अबरहा बाह्य समान वायु (जो मूर्यरूप प्राण और पृथिवीरूप अपान के वीच में है) वह शरीरस्थ सनान वायु पर (जो आध्यात्मिक प्राण और अपान के वीघ में है। अनुग्रह करता हुवा वर्ततता है अर्थात् समष्टिरूप सनान वायु के प्रसाद से ही व्यष्टिरूप समान वायु अनुकूल होता है। इसी प्रकार बाह्य व्यान से (जो सनस्त व्रह्माएड में फेलं रहा है। शरीरस्थ व्यान (जो नख से लेकर शिखापर्यन्त शरीर में वयापक है) अनुगहीत होता हुआ सम्पूर्ण प्राणियों के लिये उपयोगी होता है। निदान-संक्षेप से इस मन्त्र का तात्पर्य यह है कि सर्माष्टगत प्ाया ही व्य- ्टिगत प्राण को आश्रय और अवकाश देता हुवा अधि-
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५० प्रश्नोपनिषदि
भूत और अध्यात्म (वाह्म और अन्तःस्थ) इन दोनों प्रकार के जगत् को धारण कर रहा है। ८ ॥ तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजा:। पुनर्भवसिन्द्रियैर्मनसि संपदामानैः ॥६॥ पदार्थ :- (ह) प्रसिद्ध (तेजः, वै) तेज ही (उदानः) उदांन वायु है ( तस्मात्) इस लिये ( उपशान्ततेजा:) 'शान्त हुवा है स्वाभाविक तेज जिस का अर्थात् सरणा सन्न पुरुष (मनसि, संपद्यनानैः ) मन में लीन हुए । - . न्द्रियैः ) इन्द्रियों के साथ (पुनर्भवस्) पुनर्जन्न को "" प्राप्त होता है" ।९।। भ्ावार्थ :- इसी प्रकार वाह्य उदान भी जो तेज नें व्यापक है, अन्तस्य उदान का (जो सुयुम्णा नाड़ी में रहता है) प्रवर्तक है। इस शोक में तेज ही को उद्ान कहा गया है। इस का कारण यह है कि शरीर में जो एक प्रकार की उष्णता है (जिस के काररा शरीर चलता फिरता और काम करता है) वह उदान वायु के ही आश्रित है। उदान वायु का निरोध होने पर वह उष्ण- ता शान्त हो जाती है और उस के शान्त होने पर जीवात्मा उम शरीर को त्याग कर मन में लीन हुए इन्द्रियों के साथ दूसरे शरीर में प्रविष्ट हो जाता है,इती को चुनभव या पुनर्जन्म कहते हैं। तात्पर्य यह कि जव तक शरीर में उदान वाबु अपना काम करता है तब तक उस में उष्णता बनी रहती है जो कि जीवन का कारण
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वृतीय: प्रश्नः ५१ है, उदान की नति का निरोध होते ही शरीर ठगहा, पड़जाता है और अन्यम्राण भी उमको छोड़ देते हैं औौर .. यही मरण है॥ ९॥ यजचित्तस्तेनैप प्राणसायाति प्राणस्ते- जसायुक्त। सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति॥ १० ॥ पदार्थ :- (यच्चित्तः) मरण समय में जिस में चित्त वाला होता है अर्थात् जिन २ संस्कारों से युक्त होता है (तेन) उसी संकल्प से अर्थात उन्हीं संस्कारों से (एपः) यह जीवात्मा (प्राणम्) इन्द्रियों के साथ प्राणवृत्ति को (आयाति) प्राप्त होता है। (म्रापाः) माणवायु (तेन- सा) उदानवायु से (युक्त: ) मिला हुवा (जात्मना, सह) नोक्का आत्मा के नाघ (तम्) उस आत्मा को (यंघासंकल्पितं, लोकम्) पाप पुरय की वासनाओं के. अनुसार यथेष्ट योनि को (नयति) पहुंचाता है। १० ॥: भावार्थ :- इम शोक में जीवात्ना की उत्कान्ति का कम दिखलाया गया है। मरण समय में अपने अनुष्ठित शुपाशुभ कमों की वासना के अनुसार जीवात्मा के जैसे संस्कार होते हैं, उन नंस्कारों से युक्त हुवा जीवात्मा मुख्य करके प्राणवृत्ति का आश्रय करता है। अर्थात् उस समय सब इन्द्रियों की शक्तिक्षीण हो जाने पर केवल प्राण के आधारं जीवात्मा रहता है क्ोंकि जब तक श्वास लेता.
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प्रश्नोपनिषदि है, तब तक लोग कहते हैं कि अभीयह जोवित है। उस समय म्राण उदान से युक्त हुवा अर्थात् उदान को भी अपने साथ लेकर उस जीवास्मा को (जो अपने किये हुवे का फल भोगने वाला है) उस की पाप पुरयरूप वासनाओं के अनुमार यथेष्ट योनि को पहुंचांता है। इस से िट्ठ है कि जीवात्मा के कर्म ही नम की शुभाशुभ् गति के निमित हैं।। १० ॥ य एवं विद्वान् प्राणं वेद। न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष श्नलोकः॥ ११ ॥ पदार्थ :- ( यः, विट्वान्) जो बुट्धिमान् (एवम्) इस प्रकार (प्राणम्) प्राण को (वेद) जानता है (ह) म्सिद्ध (अस्य) इस म्राणवित् की (प्रजा) इस से उत्पक्ष होने वाली सन्तानादि (न, हीयते) क्षीण नहीं होती (अमृतः) अन्ममरय रहित (प्रवति) हो जाता है (तट्) इस मसङ्ग में (एषः) यह (झोक: ) झोक है। ११ ॥ भावार्थ :- इस झोक में आचार्य म्राणविद्या के फलको वर्णन करते हैं। उक्र प्रकार से जैसा कि वर्णन हुवा है, जो विद्वान् ग्राण की विद्या को जानते हैं, उन को ऐडिक और आमुष्मिक दोनों फलों की प्राप्ति होती है अर्थात् प्रांण की अनुकूलता से उन का शरीर नीरोग और मन स्वस्थ होता है, शरीर के आरोग्य और मन की स्वस्थता से शुद्ध एवं पुष्ट वीर्य उत्पन्न होता है, उस
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वृतीयः प्रंश्नः
से उसम और बलिष्ठ रुन्तान उत्पन्न होकर दीर्घायु होती है। यह तौ ऐहिक फल हुआ। अछ रहा आ- भुष्मिक फल, सो ग्राण को ही वश में करके मनुष्य समाधि का लाभ कर सकता है। जिस को पाकर जी- वात्मा यह मरणशील शरीर रखता हुवा भी उस में ममत्व वुद्धि नहीं रखता और यही अमृतत्व है। अगला झोक भी इसी के फल को प्रतिपादन करता है :- ॥११॥ उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पज्जधा। अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायाSमृतम- श्नुते विज्ञायाऽमृतमश्नुत इति ॥१२ ॥ पदार्थ :- (प्राणस्य) प्राण की (उत्पत्तिम् ) आत्मा से उत्पत्ति को (आयतिम्) कर्मानुसार शरीराभ्निगमन को (पझचधा) पांच प्रकार से अपना विभाग करके (स्थानस्) अपानादिरूप से पायपस्यादि स्थानों में स्थिति को (विभुत्वम् ) स्वामित्व की वा व्यापकत्व को (अध्या- त्मम्) चक्षुरादि इन्द्रियों में प्राणादि रूप से अध्यात्मिक स्थिति को (च) सूर्यादि रूप से अग्न्यादि अधिभूतों में 4 आधिभौतिक स्थिति को (विज्ञाय) जानकर (अमृतम्) 4 मोक्ष को (अश्नुते) प्राप्त होता है। द्विर्वचन तृतीय प्रश्न की समाप्ति का सूचक है। १२॥ प्रावार्थ :- इस शोक में भी प्राणविद्या का माहात्म्य वर्णन किया गया है। इस प्रकार जो मनुष्य प्राण की उत्पत्ति को कि यह आत्मरूप निनित्त से उत्पन्न होता
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प्रश्नोपनियदि
है (अथति) शरीगंसिगमन को कि स्वरत कमानु- मार शरीर में प्रवेश करता है ( स्थान ) स्थिति को कि अपने पांच विभाग करके पांच स्थानों में निवास करता है अर्थात् प्राणरूप से चक्षु औौर श्रोत्र में, अपान रूप से गुदा और उपस्थ में, समान रूप ने नाति में, व्यान रुप से. समस्त शरीर में और उदान रूप से सुषुम्णा नाड़ी में रहता है, एवं उत्क्रान्ति को कि उदान के द्वारा यह शरीर से निकलता है तथा प्राण के समष्टि और व्यष्टि रूंप भेद और इन के परस्पर सम्वन्ध को यथार्थरुप से ज्ानता है, वह प्राणाग्नि में अपने सम्पूर्ण शारीरिक और मानसिक दोषों को भस्म करता हुवा मोक्ष का अधिकारी बनता है। द्वि्वचन यहां तीसरे मन्न की समाप्ति अथवा अपरा विद्यासन्वन्धी प्रश्न की समाप्ति के लिये समफना चाहिये। १२ ॥ इत्यथववेदीयप्रश्नोपनिषदि ततीय: प्रश्नुः३
अथ चतुर्थः प्रश्न: अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पम्रच्छ। भगवनेतस्मिन् पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिन् जाग्रति कतर एप देवः स्व-
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चतुर्थ: मन्नः
मान् पश्यति कस्यैतत् सुखं मवति कस्मिन्तु सवैंसम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति॥१॥ पदार्थ :- ( अथ) इस के अनन्तर (ह) प्रसिद्ध (ए- नम्) इस आचार्य से (सौय्यांयणी गार्ग्यः) मौर्च के पुत्र गार्व्य ने (पम्रच्क) पूछा कि (भगवन्) हे ब्रह्मन् : (एत- स्मिन, पुरुषे) इस शिरहस्तपादादि आकृति वाले पुरुष में (कानि) कौन करण (स्वपत्ति) सोते हैं ( कानि) कौन (अस्मिन्) इम में (जाग्रति) आगते हैं (एषः,देवः) जो यह देव (स्वप्नान ) स्वप्नों को ( पश्यति) देख. ता है (कतरः ) सो कौन है ? ( कस्य ) किस को ( ए- तत्, सुखम्) यंद सुख (भवति) होता है ( नु) प्रश्ना- र्थक (कस्मिन्) कित में (मर्वे) सब (सम्प्रतिष्ठिताः, प्रवन्ति, दति) स्वित होते हैं॥ १॥ भावार्थ :- पूर्व तीन प्रश्नों के द्वारा अपराविद्या विप- यक कार्यमय जगत् की उत्पत्ति और समष्टि और व्य्टि रूप से प्राण की स्थिति आदि, आधिमौतिक विषयों का वर्णन किया गया, अब अगले तीन प्रश्नों के द्वारा पराविद्यागम्य, अतीन्द्रिय, सत्य और शान्त आध्या- त्मिक विषय का प्रतिपादन किया जाता है। जब मनुष्य कार्यरूप जगत की अनित्यता को जान कर वैराग्यवान् होता है और फिर म्राण की उपासना से चित्त की एकाग्रता और पवित्रता को प्राप्त कर
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५६ प्रश्नोपनियदि लेता है, तब वह पराविद्या का अधिकारी होता है, इम िये अब वध्यमाण तीन प्रश्नों के द्वारा पराविद्यागम्य अक्षर ब्रह्म का प्रतिपादन किया जाता है। अव दृतीय प्रश्न के समाधान होने उपरान्त सौर्य का पुत्र गार्व्व पिप्पलाद ऋतय से पूछता है। हे नगवन्! इस इस्तपाटा- दि आकृति वाले शरीर में नन आदि अन्तःकरणों में ने और चक्षुरादि वाह्यकरणों में से कौन २ से करण सोते हैं अर्थात अपने २ व्यापार से उपराम करते हैं? तथा कौन २ इस में जागते हैं अर्थात् अपना २ व्यापार करते हैं। और कौन सा देव स्वप्नों को देखता है? जाग्रदव स्था के वाह्म अनुभव से निवृत्त होकर जाग्रत के ही समान जो शरीर के भीतर अनुभव होता है, उस को स्वप्न कहते हैं, सो उस स्वप्न को कार्यरूप प्राणादि देखते हैं अथवा करणरूप मन आदि? और यह सुख किस को होता है अर्थात् जागत और स्वच्न अवस्या के निवृत्त होने पर जो अनायास और निर्वाध सुरू होता है वह किस को और क्ोंकर होता है? और किस में यह सब कार्य करण एक होकर स्थित होजाते हैं? इस झोक में शिष्य ने पांच म्रश्न किये हैं। १-इसशरीर में कौन सोते हैं" इस प्रथम प्रंश्न द्वारा जागरण का धर्मी पूछा गया है क्योंकि जागने वाला ही सोता है। २-" कौन जागते हैं" इस द्वितीय प्रश्न द्वारा जाग्रतं स्वप्न और सुबुप्ति इन तीनों अवस्याओं में शरीर की रक्षा करना किस का धर्म है? यह पूछा गया है, क्योंकि
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चतुर्थः म्रश्न: ५9
जागने वाला ही रक्षा कर सकता है न कि सोने वाला। ३-"कौन स्वप्न को देखता है" इस वृतीय प्रश्न द्वारा स्वम् का धर्मी पूछा गया है।४-"किस को यह सुख होता है" इस चतुर्थ प्रश्न द्वारा सुदुप्ति का धर्मी पूछा गया है, क्योंकि सुषुप्ति के बिना संसार में और कोई सुख का लक्षण नहीं है, दुःखी मनुष्य कभी सुषुप्ति के आनन्द का अनुभव नहीं कर सकता और ५-"किस में ये सब स्थित होते हैं" इस पज्चम प्रश्न द्वारा तीनों अवस्थाओं से रहित जहां सब कार्य और करणों का अवसान होजाता है, उस तुरी- ।यावस्थागम्य आत्मा को पूछागया है। अब इन का क्रम से आचार्य उत्तर देते हैं।१॥ तस्मै स होवाच। यथा गार्ग्य ! मरी- चयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिं- स्तेजोमण्डल एकीभवन्ति। ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सवं परे देवे मनस्येकीभवति। तेन तह्यैष पुरुषो न ऋणोति न पश्यति न जि- घ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नाउडदत्ते नाऽडनन्दयते न विसृजते ने- यायते, स्वपितीत्याचक्षते ॥२॥
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प्रन्नोपनिषदि
पदार्थ :- (तस्मे ) उस प्रश्नकर्त्ता के लिये (सः) वह आचार्य (ह) स्पष्ट (उवाच) वोला। ( गार्व्य ) हे गर्गकुलोत्पन्न ! (यथा) जैसे (अस्तं, गच्छतः ) अस् छोते हुवे (अर्कस्य) सूर्य की (नर्वाः) सव (मरीचयः) किरणें (एतस्मिन्, तेनोमएडले ) इस तेजःपुञ्ज में (एकीअरवन्ति ) अविशेपरूप से एक हो जाती हैं। (पुन पुनः उदयतः) फिर फिर उदय होते हुवे उस सूर्य की (ताः) वे किरणें (प्रचरन्ति ) फैलती हैं ( एवम). इसी प्रकार (ह, वै) निःसन्देह (तत्, सर्वम्) वह : सब इन्द्रियादिजन्य ज्ञान (.परे, देवे, मनसि) मरष्टता से प्रकाशनान मन में (एकीभवति) लीन द्ो जाता है। (तेन ) इस कारण से (तर्हिं) उस निद्दा की न. दस्ा में (एव:, पुरुषः ) यह पुरुष (न, ऋणोति) नहीं सुनता (न, पश्यति) नहीं देखता (न, जिघ्ति) नहीं संघता (न, रसयते) नहीं चखता (न, स्पृशते) नहीं छूता (न, अप्निवद्ले ) नहीं वोलता (न, आदत्ते) नहीं पंकड़ता (न, आनन्दयति) नहीं सुख का अनु- सव करता (न, विसृजते ) नहीं छोड़ता और (न डया- यते) नहीं चलता (स्वपिति, इति) किन्तु तव सोता है ऐसा (आचक्षते) फहते हैं॥ २ ॥ भावार्ष :- इस झोर में पहिले प्रश्न का उत्तर दिया गया है जिस में यह पूछा गया था कि इस शरीर में कौनर ने करण सोते हैं अर्थात् निद्धा कब और क्यों होती है? इस के उत्तर में आचार्य शिष्यके प्रति कहते हैं कि हे
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चतुर्थः मश्न:
गार्थ्य : जैसे सायंकाल को अस्त होते हुवे सूर्य की सब किरणैं सिमट कर उस की तेजोराशि में (जोउन फ्िरणों का केन्द्र है) लीन हो जाती हैं, जिस से वह अंर्ध भू- भाग जिस में सूर्य अस्त होता है अन्वकारमय हो जाता है और वे ही किरणें फिर म्रातःकाल को ( जव सूर्य का उदय होता है। तो उन में से निकल कर सर्वत्र फैल जाती हैं। जिन ने प्रकाश होफर दर्शनादि व्यवहार प्रवृत्त होते हैं। वम इसी प्रकार जव निद्रासमय में इन्द्रिय रूप किरणों का ज्ञान रूप प्रकाश उत्कष्टता से प्रफाशमान मन रूप सूर्य में (जो उन का केन्द्र है) ठीन हो जाता है (इन्द्रियों का नेता होने से मन को परम देव कहा गया है) तब निद्रारूप रात्रि प्रवृत्त होती है जिस में यह पुरुप न सुनता है, न देखता है, न सूंघना है, न चखता है, न छूता है, न बोलता है, न पकवता है, न छोड़ता है, न सुख का अनुभव करता है और न चलता फिरता है किन्तु "सोता है" ऐसा कहा जाता है। पुनः निद्रा के उपरत होने पर जब जागरण का समय आता है तव जैसे मूयनरडल नें से किरणैं निकल कर संसार को प्काशित कर देती हैं, ऐमे ही नन में से एकीभूत इन्द्रियों की शक्ति निकल कर उन सब को पृथक् २ ग्रकाशित कर देती है, जिस से श्रवण दर्शनादि सम्पूर्ण व्यवहार प्रवृत्त होने लगते हैं। तात्पर्य यह कि जैसे किरणों का सूर्य में लीन हो जाना रात्रि कहलाती
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६० प्रश्नोपनिपदि है, इमी प्रकार इन्द्रियों का अपनी शक्िरुप ने मन में लीन होजाना ही निद्दा या स्वप्ञावत्था है । २ ॥ प्राणाग्मय एवैतस्मिन पुरे जाग्रति। गा- हपत्यो हवा एपोडयानो व्यानोऽन्वाहार्य- पचनो यदगार्हपत्वात्ग्रणीयते प्रणयना- दाहवनीय: म्राणः ॥३॥ . J .. पदार्थ :- ( एतस्मिन्, पुरे) इस नवट्वार वाले पुर अर्थात शरीर में (प्राणाग्नयः, एव) प्राणादि रूप पांच अन्नि ही ( जाग्रति) जागते हैं। (एपः, अपानः) यह अपान वायु (ह, वै) निश्चय (गार्हपत्यः) नार्हपत्व. अन्नि है। (व्यानः) व्यान (अन्वाहार्यपचनः) दक्षिणा ग्नि है। (यत्) जो (गार्हपत्यात्) गार्हपत्व अग्नि से (ग्रणीयते) बनाया जाता है ( मरणयनात् ) गाईपत्य अग्नि से निष्पन्न होने से ( म्राणः) ग्राण वायु (आहव- नीयः) आहृवनीय अग्नि है.॥ ३ ॥ भावार्थ :- इस श्नीफ में "कौन जागते हैं" इस दूसरे प्रन्न का उत्तर देते हुवे आचार्य कहते हैं कि इस नवद्वार वाले शरीर में निद्धा के सनय जब ओ्न्रादि इन्द्रिय सोते हैं अर्थात् नन में लीन हुवे अपने २ व्या : पार से उपरस होते हैं तव पञ्च प्राण रूप अग्नि ही जागते हैं अर्थात् अपना २ व्यापार करते हैं। जागरण-
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घतुर्थः प्रश्नः
शील होने से ही प्राणों को अग्नि कहागया है, क्योंकि निद्रा एक प्रकार का अन्धकार है, जैसे अन्धकार अपना प्रभाव और सब पदार्थों पर डाल सकता है अर्थात् उन को तिरोहित कर सकता है, परन्तु अग्नि को नहीं छिपा सकता। ऐसे ही निद्रा अन्य सब करणों को सुला सकती है परन्तु प्राणों पर अपना कुछ प्रसाव नहीं डाल सकती। वे निद्रारूप अन्धकार के होने पर भी अग्निवत् रादा जागते ही रहते हैं। अब प्राणों की अग्नि से सनानाधिवरणता दिखलाते हैं। अपांन वायु ही गार्हपत्य अग्नि है, जैसे गार्हपत्य अग्नि से नैनि- सिक यज्ञों में आहवनीय अग्नि संवृत्त होता है, इसी प्रकार सुपुप्ति में उपान वायु से प्राण वायु का संवरण होता है अर्घात् सोते हुवे पुरुष का अपान वायु ही सुर नामिका के छिद्रों से प्राण रूप होकर निकलता है अतएव आहवनीय अग्नि प्राण वायु है। क्योंकि वह अपान रूप गार्हपत्य अच्नि से सत्पन्न होता है। अव रहा दृक्षिणाग्नि, सी उस की समानाधिकरणता व्यान के साथ है। व्यान यद्यपि समस्त शरीर में व्यापक है तथापि हृदय के दक्षिणदेशस्य छिद्रों के द्वारा उस का निर्गम होने से तथा आहार के परिपाक में उत का उपयोग होने से उन को दक्षिणाग्नि या अन्वाहार्यपचन कहागया है। ३॥ यदुच्छूासनिश्वासानेतावाहुती समं नय- सीति स समानः। मनो ह वाव यजमान
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प्रशनोपनिषदि
इष्टफलनेवोदान: स एनं यजमानमहरह- र्ब्रह्म गमयति ॥४॥ पदार्थ :- (यत्) जो ( एतौ) इन (उच्छवासनि पवातौ) श्वास और प्रश्वासरूप (आहुती) दो आ- हुतियों को (सम, नयति, इति) समता को प्रास्त क- राता है इस से (सः) वह (सनान:) समान वायु है-(इ) प्रेसिट्ु (मनः, वाव) मन ही (यजनान: ) यघ्व का कर्सा है ( इएफलम्, एव ) यक्न का फल ही (उदान:) उदान वायु है। (सः) वह उदान ( एनं, यजनानम्.) इंरु मन रूप यजनान को (जहरहः) प्रतिदिन (ब्रझ्म) परम:खुख को (गमयति) पहुंचाता है।।४ । भावार्थ :- पूर्व शोक में प्राण, अयान और व्यान की सुमानाधिकरणता क्रमशः आहवनीय, गाईपत्य और दक्षिणान्नि के साथ दिखला चुके हैं, अव इत झोक में समान और उदान की समानाघिकरयता कहते हैं। न्वांस और प्रववास रूप दो आहुतियों को समान रूप से ओ प्राण में हवन करता है, वह होतस्थानीय समान वायु है। जैसे होता आहवनीय अग्नि में अग्नि और सोम के लिये दो आज्य- भागाहुतियों को समान रूंप से पहुंचाता है इसी प्रकार समान वायु श्वास और प्रश्यास रूप दोआहुतियों को समभाग से प्राणाग्नि में हवन करता है, अंतएय वह छोवस्यानीय है। संकल्प्र विकतपात्मक मन ही यजनान अर्थात् इस आध्या तमिंक यज् का कर्त्ता है और उंस यंज् का फल ही उंदान
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चतषुर्थ: प्रश्नः
वायु है जो कि मन रूप यजमान को प्रतिदिम सुषुप्ति में लेजाकर परम झुख का अनुभव कराता है। तात्पर्य यह कि होदा रूप समान वायु, अपनी श्वास और मशास रूप दो आहुतियों के द्वारा सन रूप यजमान को उदान रूप जो इस आध्यात्मिक यक् का फल है, उसे आप कराता है। जोफि अग्नि तीन ही प्रकार का है और ग्राण के पांच भेद हैं, इस डिये शेष समान औौर उदान की समानाधिकरणता होता, और यज्ञफल के साथ की गई है। होता के द्वारा नफल की प्राप्ति यपमान को होती है, इस लिये मन को यजमान कहा गया है। जो कि ये सव पूर्वोंक्त तीनों अग्नियों के साथ सम्बन्ध रखते हैं, इस लिये एक प्रकार से अग्नि के ही साथ इन की समानाधिकरणता सनकनी चाहिये ॥ ४ । अत्रैप देवः स्वप्रे महिमानमनुभवति। यहुट्टष्ठं दृष्टमनुपश्यति श्चुतं श्रुतमेवार्थ मनुष्णोति देशदिगन्तरैश्न प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृषं च शुतं चाश्न तं चानुभूतं चाननुभूतं.च सच्चासच्च सवें पश्यति सर्वः पश्यति।५। .यदार्थ :- (अन्र ) श्रीत्रादि इन्द्रियों के उपरत होने पर' एवं शुरीररक्षार्थ प्राणादि वायुओं के जागने पर जर्थात्
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ई: प्रश्नोपनिषदि नाग्रत और सुबुप्ति के बीच में (एंषः, देवः) यह मन" रूप देव (स्वप्ने ) स्वप्नावस्था में (महिमानम् ) अपनी विभूति को अर्थाद विषय रूप अनेक वस्तुओं को (अ: मुझवति) अनुभव करता है। (यल) जिस को (दृष्टम्) पहिले देखा है उस को (दूष्टम्, अनुपश्यति) देखे हुवे के समान पुनः देखता है (त्रुतं, अर्थम्) सुनी हुई बाद की (त्रुतम्, एव, अनुम्ृणोति) सुने हुवे के समान फिर सुनता है (देशदिगन्तर, 'च, प्रति, अनुभूतम्) देशान्तर और. दिगन्तर में अनुभव किये हुवे को ( पुनः, पुनः, प्रति, अनुभवति) वार २ अनुभव करता है (च) और, (दृष्टम्) देखे हुवे को (.च) और (अदृष्टम्), नहीं देखे हुवे को (च) औ़र (श्रुतस्) सुने हुवे को ( च) औ़र (अश्रुतम् ) तहीं सुने हुवे को ( च ) और (अनु- ूतम्) अनुभव किये हुवे को (च) और (अननुभूतम्) अनुकव न किये गये को (चं) और (सत्) विद्यमान को (च) और (असत्) अविद्यमान को ( सर्वम् ) उक्त अनुक्त सव को (पश्यति) देखता है ( सर्वः ) सब करणों - को अपने में लीन करके मन ( पश्यति) देखता है।५॥। भावार्थ :- इस शोक में "कौन सा देव स्वप्रों को' देखता है" इस तीसरे प्रश्न का उत्तर दिया गया है। जब श्ोत्रादि सब इन्द्रिय .अपने २ काम से उपरत हो जाते। हैं अर्थात् उन की वृत्ति मन में लीन हो जाती है, केवल। प्राणादि पांच वायु इस शरीर में जागती हैं अर्थात् अपना अपना काम करते हैं, उस समय जांग्रत् और सुषुप्ति कै
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दतुर्थ: प्रश्नः
दीच में यह मनरूप देव पूर्व दृष्ट या शुत अर्थों को तथा देशान्तर और कालाम्तर में अनुभूत अर्थों को उन के यासनाजन्य संस्कारों से वदोधित हुआ अपने में उन को देखता, सुनता और अनुभद करता हे, इसी को खप्रावस्था कहतते हैं। यही नहीं कि केवल इसी जन्म या इसी शरीर में देखे, सुने और अनुभव किये अर्थों को देखता, सुनता और अनुभव करता है किन्तु इस जन्म यर शरीर में कभी न देखे, न सुने और न अनुपव शिये अथों को भी पूर्वजन्म और पूर्वोपात्त शरीरों के वासना- जन्य संस्कारों के प्रभाव से देखता, सुनता और अमुभव करता है। कभी सत्=जो वस्तु जैसी है उस को वैसी ही देखता है, जैसे मनुष्यों का दौड़ना और पक्षियों का उड़ना इत्यादि। कभी असत्=जो जैसी नहीं है, उसको भी वैसी देखता है, जैसे मनुष्यों का उड़ना और पशुओं का बोलना इत्यादि अनेक व्यवहारों को ख्प्न में मनरूप दैव सम्पूर्रा वाह्य और अन्तःकरणों का अपने में समा- वेश करके देखता है।। यहां पर यह शङ्डा होती है कि समस्त इन्द्रियजन्य ज्ञान की उपलन्धि में मन तौ आत्मा का एक करण. मात्र है, इस ज्ञान का स्वतन्त्रता से अनुभ्रव करनेवाला तो केवल आत्मा है। फिर यहां श्रुति में खप्नज्वान का अनुभव करने वाला मन को क्यों कहा गया है? इसका उत्तर यह है कि यद्यपि म्रत्येक दशा में ज्ान का अधि-
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प्रश्नीपनिषदि
करण केदल आत्मा ही हो संकता है तथापि मन के संयोंग के विना केवल आतमा में जाग्रदादि अवस्थायें दन नहीं सकतीं। आत्मा अपने स्वरूप से न कभ्ी सोता है और न जागता है, वह तो मदा सुकरस है, मन की ही उपाधि से उस में सोना और जायना आदि व्यवहार होते हैं, अतः नन को ही इन का निमिस मान फंर (इस न्याय से कि "चेन विना यदनुत्पन्नं ततेनास्षि- एंयते जिप के होने से जो होता है वह उस का शे माना जावा है) स्वाप्नज्वान का अनुभविता मन को कहूर यया है। ५ ॥ स यदा तेजसाडनिझूती भवति। अंत्रैष देवःस्वप्नान्त पश्यत्यथ तदैत- स्मिन् शरीरएतत्खुखं भवति ॥६॥ पदार्थ :- ( सः) वह मन (यदा) जव (तेजसा) वेगसे (अभिशूतः, भवति) हीन हो जाता है (अन्न) इस दशा सें (एषः, देषः) यह सन (स्वम्ञान्) स्वप्नों को ( न, पश्चति) नहीं देखता (अथ) इस के अनन्तर (तदा) तब (एतस्मिन्, शरीरे) इस शरीर में (एतव, सुखम्) यह सुस (अवति) होता है।६ । भांवार्थ :- इस प्रुति में आचार्य "किस को यह सुख होता है" इस चौथे प्रश्न का उत्तर देते हैं। जब वह मन सेज से अभिभूत (वेगरहित=एकाग्र ) होकर निश्ेष्ट हो आता है, तब सुषुप्ति या समाधि की अवस्था होती है।
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पतुर्ष: मश्नः ६७
इन में इतना भेद है कि जय सांसारिक सुख से दप्त होकर मन शान्त होता है, उस को सुपुप्ति और जव पारमार्थिक अगाथ सुख का अनुसय करके निशचल और निश्ेष्ट हो जाता है, उस को समाधि या तुरीयादस्था कहते हैं। इन दोनों अवस्थाओं में मन की गति का निरोध होने से न कोई स्वप्न दीखता है और न किसी दुःख का अनुभव होता है। यद्यपि सुयुप्ति में टुःख का अभ्राव क्षणिक है, तथापि चाहे घोड़ी देर के लिये ही क्यों न हो, संसार में दुःख से छुटकारा केवल सुपुप्तिमें ही जाकर मिलता है। बरु इन्हीं दोनों अयस्थाओं में जव मन अनात्मवस्तुओं के संसर्ग से रहित होकर निश्षेष्ट हो जाता है (और यही उस का वेग से अभिभूत होना है) तब उन की इस शरीर में ही उस निरायाध सुख की (जो पूछा गया है) उपलब्धि होती है। ६। स यथा सोस्यचियांसि वासोवृक्ष संप्रतिष्ठन्ते। एवंह वै तत्सवें परआत्मनि संप्रतिषते।७। पदार्थ :- ( सः, यथा) सो जैसे ( सोभ्य) हे ग्रिय- दर्शन ! (वयांसि) पक्षिगण (वानोदृक्षम्) निवासार्थ वृक्ष में (संग्रतिष्ठन्ते) ठहरते हैं (ह, वै) निश्चय (एवम्) इसी प्रकार (तत, सर्वम्) वह वक्ष्यमाण सब कुछ (परे, आल्मनि) इन से सूक्ष्म आत्मा में (संग्रतिष्ठते ) स्थिति पफड़ता है.। 9 ॥
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प्रशनोपनिषदि प्रावार्थ :- अब इष् ्रुति में पांचवें प्रश्न का उत्तर दिया गया है, जिस में पूछा गया था कि "किस वस्तु में यह सब पदार्थ स्थित होते हैं- पिप्पलाद ऋषि कहते हैं कि है सोम्य। जिस प्रकार रात्रि में पंक्षिगण निवास के छिये वृक्ष का आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार म्रलयरूप महारात्रि में यह सब कुछ जिस का विवरण अगली श्रुति में किया गया है,उस अक्षर परमात्मा में लीन हो जाता है 9 पृथिवी च पृथिवीमात्रा चाऽडपक्षा- S5पोमात्रा च तेजश्र तेजोमात्ना च
मात्रा च चक्षुश्र द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं चघ्राणं च घ्रातव्यं च रसघ्न रसयितव्यं च त्वक् च स्पर्शयितव्यं च वाकू च व्तव्यं च हस्ती चाउडदा- तव्यं चोपस्थश्नाऽडनन्दयितव्यें च पा- युश्र विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्त- व्यं च मनष् सन्तव्यं च बुद्धिश्न चो- दुव्यं चाहंकारश्राहंकर्तव्यं च चित्तं व चेतयितव्यं च तेजश्र विदोतवि- तव्यं च प्राणश्त विधारयितव्यं च॥८॥
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चतुर्थ: प्श्नः
पदार्थ :- ( पृघिवी, घ, पृथिवीमात्रा, च ) पृषिशी और उम की मात्रा गन्ध (आपा, च, आपोमात्रा, च ) जल सीर उस की मात्रा रस (तेगः, च, तेजोमात्ा, छ) तेज और उस की मात्रा रूप (वायुः, च, वायुमान्ा, च) वायु और उस की मात्रा स्पर्श (जाकाशः, चः आकाशमात्रा, घ) आकाश और उम की सात्रा शब्द [ यहां तफ स्थूल और सूक्ष्म अर्घात् कार्य कारण रूप से पछ्महासूत हुवे ] (चक्षुः, घ, दृषव्यं, प) आांख और देखने योग्य स्तु (न्ररोनं, च, श्रोतव्यं, च) कान और सुनने योष्प वस्तु (भ्राणं, च, घ्रातव्यं, च) नाक और मंघने योग्य वन्तु (रसः, च, रसयितव्यं, च) रसना और रस लेने योग्य वस्तु (त्वक्, च, स्परशयितवयं, च) त्वचा और छूने योग्य वस्तु (वाकू, ध, वक्तव्यं, घ) वाणी और कहने योग्य वस्तु (हस्तौ, च, आदातव्यं, च) दो हाथ और उन मे ग्रहण करने योग्य वस्तु (इप- स्थः, च, आतन्दयितव्यं, च) उपस्य इन्द्रिय और उम के द्वारा प्राप्त होने वाला रतिजन्य सुख (पायु:, च, विमरजयितव्यं, च) गुदेन्द्रिय और उस का काम विस- र्जन (पादौ, च, गन्तव्यं, च) दो पैर और उन का कार्य गमन [यहां तक ५ ज्ञानेन्द्रिय और ५ कर्मेन्द्रिय जिन को घाह्यकरण कहते हैं, पूर्ग हुवे ] (मनः, च, मन्तव्यं, छ) मन और मनन करने योग्य वस्तु (बुद्धिः, च, बोद्धव्यं, च) वुद्धि और जानने योग्य वस्तु (अहंकार?, न, अहंकर्त्तव्यं, च) अहंकार और महं करने योग्य वस्तु
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95 प्रश्नोपनिषदि
(चित्तं, च, चेतयितव्यं, च ) चित्त और चिन्तन करने योग्य वस्तु [यहां तक चार अन्तःकरण पूरे हुचे ] (तेशः, च, विद्योतयितव्यं, च) तेज और प्रकाश करने योग्य वस्तु (माणः, च, विधारयितव्यं, च) प्राण और धारण करने योग्य वसतु ॥८ ॥ भावार्थ :- वह सब कुछ दया है? वस इमी का विव- रया इस ग्रुति में किया गया है। यों तो संसार में अनेक और असंख्य पदार्थ हैं जिन का कोई सैकड़ों वर्ष पर्यन्त नामनिर्देश मात्र ही करता रहै तो भी घार नहीं पासकता। परत्तु महर्पि पिप्स्लाद् निम्न लिखित चार श्रेगियों में उन सब का समावेश करके सागर को गागर में भर देते हैं। पहिली श्रेणी में पृथिवी, अपू, तेज, वायु और आकाश; ये पज्तमहाभूत और गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द; ये पांच तन की सूक्मतन्मात्रायें निदिष्ट हैं, सारा प्राकृत जगत् ममंषटि रूप से इन में आजाता है! दूसरी श्रेणी में पांच ज्ानेन्ट्रिय और पांच उन के विषय एवं पांच कर्मेन्द्रिय और पांच ही उन के कर्म सन्निविष्ट हैं। सम्पूर्ण जगंत् के होते हुवे श्री यदि प्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय न होते तो का ज्ञान और कर्म के विना एक दिन भी यह सुष्टि का प्रवाह चल सकता था? कदापि नहीं। तीसरी कक्षा में मन आदि चार अन्तःकरण हैं, आंख के होते हुे भी यदि मन न होता तो क्या हम उस से कुछ देख सकते से?
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चतुर्थे: म्रश्न: :98
कान के होते हुवे भी यदि बुद्धि न होती तो क्या हम उस से कुछ सुन सकते थे? वाणी के होते हुए भी यदि चित न होता तौ क्ा हम उस से कुछ लाभ उठा सकते थे? कुछ नहीं, कदापि नहीं।। चौधी कक्षा में वही तेग रूप माण रकखे गये हैं कि जो इस शरीर के प्रकाशफ और विधारक हैं। मन आदि अन्तःकरणों के होते हुवे भी यदि प्राण न होते तौ क्या हम उन से मनन, चिन्तन आदि कर सकते थे? कदापि नहीं। बस यह चारों प्रकार का जगत् जो उत्तरो- त्तर एक दूसरे की अपेक्षा रखता है, सुषुप्ति वा सनाधि में (जैसे रात्रि में पक्षिगण वृक्ष का आश्रय लेते हैं) सतसा में जाकर (जो इस का एक सात्र आधार है) स्यिति पकड़ता है॥ ८ ॥ एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा त्रोता घाता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्त्ता विज्ञानात्मा पुरुषः। स परेऽक्षर आत्मनि संग्रतिष्ठते ॥९। पदार्थ :- ( हि) निश्चय ( एषः ) यह (द्रष्टा) देखने वाला (स्प्रष्टा) स्पर्श करने वाला (ओता) सुनने वाला (प्राता) सूंघने वाला (रसयिता) चखने वाला (मन्ता) मनन करने वाला (वोद्ा) जानने वाला (फर्त्ता) अपनी स्वतन्त्रता से शुभाउशुक्त कर्मों को करने. वाला (विज्ञा- नात्मा) ज्ञान का अधिकरण अर्थात स्ानस्वरूप (पु- रुब:) कार्यकरणसंघात का पूरक होने से जीवात्मा
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अश्नोपनिषदि
है। (सः) वह ज्री (परे, अक्षर, आत्मनि ) अपने से; पर अक्र परमात्मा में (संप्रतिष्ठते) ठहरता है । ८ ॥ प्रावार्थ :- पहिली श्रुति में जो चार कोटि वर्णन की नईं थों, वे चारों प्रामृत जगत् से ही सम्बन्ध रखती हैं जीवात्मा इन सब के अतिरिक्त है, जित को आचार्य इस त्रुति के द्वारा पांचवीं कोटि नें वर्णन करते हैं। पञ्चमहा- भून, ज्ञानेन्द्रिय, कर्नेन्द्रिय, अन्तःकरण और प्राण इन मब के होते हुचे कल्पना करो कि यदि जीवात्मा न होता तो क्या ये सब के तब व्यर्य न हो जाते? अवश्य- मेव वयर्थ हो जाते। बन जो आंखों से देखता है, त्वक् से स्पर्श करता है, न्रोत्र से सुनता है,प्राण से सूंघता है, रसना से चख़ता है, मन से मनन करता है, सुद्धि से जानता है और अपनी स्वतन्त्रता से समस्त शुभाशुप्त कर्मों को करता है, वह ज्ञान का अधिकरण (जिस में ता- दाल्म्य सम्बन्ध से ज्ञान रदता है) जीवात्मा है। वह परी उसी अक्षर परव्रह्म में, जिस में. यह सारा प्राकत जगत् कारण रूप से लीन होता है, अपने वास्तविक रूप से अवस्थित होता है। ९। परमेवाक्षरं प्रतिपदाते स यो ह वै तद- चछायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यसं्तु सोम्य।स सर्वज्ञः सर्तो भंवति तदेष श्लोक: ॥ १०॥
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चतुर्ष: मश्रः 93
मदार्थ :- (सोभ्य) हे म्रियदर्शन। (यः, तु) और जो (ह, वैं) निस्सन्देह (यः ) जो (तदू) उस (अच्छायम्) तमस्' अर्थात् अज्ञान से वर्जित (अशरीरम्) तीनों प्रकार के शरीर से रहित एवं तदनुयायिनी तीनों अव- स्थाओं से वर्जित तथा तम्निमित तीनों गुणों से शून्य (अलोहितिम्) रकादि सब गुणों से रहित (शुभ्रम् ) निर्मल (अक्षरम्) अविनाशि ब्रह्म को (वेदयते) जान- ता है (मः) वह (परम्, एव, अक्षरम्)परन अविनाशी ब्रल्म को (प्रतिपद्यते) प्राप्त होता है (सः) वह (सर्वज्चः) सब जानने वाला (सर्वः) सर्वत्र (भवति) होता है (तदू) इसी विषय में (एपः) यह (झ्रोकः) झोक है। १० ॥ पावार्थ :- अब इस श्रुति में आचार्य ब्रह्मज्ञान का फल प्रतिपादन करते हैं। सत्व, रगस, तमस् इन तीनों गुणों से अतीत ; जाग्रत, स्वप्न, सुपुप्तिइन तीनों अव. स्याओं से वज्जित; कारण, सूक्ष्म,स्थू इन तीनों प्रकार के शरीरों ये रहित; रक्तंपीतादि वर्ष और गुणों से शून्य "अतएद अतीन्द्रिय शुद्ध अविनाशी ब्रह्म को [जिस में यह सारा प्रहायड स्थूल पज्चमहाभूतों से लेकर सूक्षम जीवात्मा पर्यन्त प्रलय में डीन हो जाता है] जो पुरुष जानता है उस को फिर क्या जानना शेष रह जाता है? "तस्नित्नेव विज्वाते सर्वमिदं विव्वातं प्रवति" उस ही के जानने पर मह सम कुछ जाना जाता है अतएव वह ब्रह्मम्वानी पुरुष सर्वत् (अग्रतिहतज्ञान ) होफर जीव- 9
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नमुक हुवा सर्वत्र व्रह्मानन्द में रमण करता है" नवो भ्रव्व- ति" यहां "मज्चा: कोशन्ति" के समान लाक्षणिक अर्थ की योग्यता है। १० ॥ विज्ञानात्मा सह देवैन्र सवैंःप्राणा भूदानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र। तदक्षरं वेढयते यस्तु सोस्य!स सर्वज्ञः सर्वसेव्राऽडविवेशेति ।११। पदार्थ :- ( सोम्य) हे मियदर्शन ! (प्राण) पांचों पार (भूतानि) सृथिध्यादि पङ्चनाभूत (नर्व:, देवैः, सह) चक्षुरादि इन्द्रियों तथा नूक्म तन्मात्राओंके साघ (यत्र) जिस विराट् पुरुष में (संप्रतिष्ठन्ति) ठहर्ते सैं (तटू, अक्षरम्) उस अक्षर को (या, विज्वानाला) जो जीवाला (वेदयते) आानता है (सः) वह (सर्वक्ः) त्रिकाउत होकर (सर्वम्, एव, आविवेश, इति) रुब कदे ही प्रवेश करता है।। ११ ॥ भावार्थ :- कार्थ को ही यह मन्त्र भी पुष्ट करता है। सिस भूना पुरुष में प्राण उन्द्रियों और पृथिव्यादि भूत अपनी सूक्षम तन्मात्राओं के सहित संप्रतिष्ठित होनाते हैं अर्थात् जो कार्य कारण दोनों दशाओं में सारे विष्व का अधिष्ठान है, उस अविनाशी ब्रस्म को जो पुरुष यथार्थ रूप से जान लेता है उसके लिये कौन सी वस्तु अज्ञातं और कौन ता देश अयाव्य है? कोई भी नहीं। ११॥ इत्यथर्ववेदीयप्रश्नोपनिषदि चतुर्थःप्रश्न: ॥8॥
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पुम: मसः
ग्रथ पञ्चम: प्रश्न: अथ हैन शैव्यः सत्यकाम: पम्रच्छ । स यो ह वै तङ्गगवन् ! मनुष्येषु प्रायणान्त- मोंकारमभिध्यायीत। कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति ॥ १ ॥ पदार्थ :- (अथ) इस के उपरान्त (ड) मसिद्ठ (एनम्) इस विष्पलाद ऋपि से (शैव्य, सत्यकामः ) शिवि के पुत्र सत्यकांम ने (पसच्छ) पूछा कि (भगवन्) हे ब्रह्मन्। (ह, वै) प्सिट्ठ' (सनुष्येषु) मनुष्यों में ( सं:2 यः) जो कोई ( प्रायणान्तस्') नरणपर्यन्त (तदु) उस ब्रह्न के वाचक (ओंकारम्) प्रणव का (अभिध्यायीत) समाहितचित छोकर ध्यान करे (वाव) निश्चय (सः) वह ध्याता (तेन) उस प्रणव के ध्यान से (कतमं, लोकस्) फौन से लोक को (जयति, इति) जीतता है।१ ॥ :नावार्थ :- चतुर्य प्रश्न द्वारा उत्तमाधिकारियों को द्रव्वशु दवे और साधनपूर्ति पूर्वक ब्रल्म को प्राप्ति कह कर अव मन्दवैराण्य वाले मध्यमाधिकारियों को प्रणव की उपासनाके द्वारा कमशः द्रसप्राप्ति करने के लिये इस पछ्चुम ग्रश्न का प्रारम्भ करते हैं। सौर्यायणी गार्व्य के प्रश्न का समाधान होने उपरान्त शैव्य सत्यकामने पिप्पलाद ऋषि सेप्रश्न किया कि नगवन्। सनुष्यों में जो कोई शुद्ध संस्कार
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७६' प्रश्नोपनिषदि
वान् मरणपर्यन्त अर्थात् यावज्जीवन समाहितचिस होकर वाच्य और वाचक की अभिन्नता से ब्रह्म के4 वाचक ग्रणव का ध्यान करे तौ इस ध्यान रूप कर्म के करने से वह ध्यान का कर्तता कीन से लोक को जीतता है अर्थात् किप गति को म्राप्त होता है? ॥ १॥ तरुमै स होवाच। एतद्वै सत्यकाम ! परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारः।तस्मा-
पदार्थ :- ('तस्मै) उस प्रश्नकर्ता के लिये (सः) वह आचार्य (ह) स्पष्ट (उवाच) बोला कि (सत्यकाम) है सत्यकाम । (यत्) जो (परं, च, अपरं, च, ब्रक्म ) पर औौर अपर ब्रह्म है ( एतट्, वै) यही ( ओंकारः) ओंकार है (तस्मात ) इस लिये (विद्वान्) सदसद्टि- वेकी पुरुष (एतेन, एव, आयतनैन) इस ही अवलम्ब से (एकतरम्) पर और अपर इन दोनों पद़ों में से स्वाप्ीष्ट एक को (अन्वेति) प्राप्त होता है। २ ।। भावार्थ :- उक्त प्रश्न का उत्तर देते हुवे पिप्वलाद ऋषि कहते हैं कि हे सत्यकाम ! पर और अपर रूप से दो प्रकार का जो ब्रह्म है अर्थात् वाचक (शब्द) रूप से अपर ब्रह्म और वाच्य (अर्थ) रूप से परब्रह्म, सो यह दोनों प्रकार का ब्रह्म ओंकार ही है। वाच्य वा- चक की अभिन्नता मानकर यह कहागया है, लोक में भी ऐसा व्यवहार देखने नें आता है। यथा "देवद्सत
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'पन्चुनः' मत्रः
वहां जायगा, यज्दृत्त यह काम करेगा * इत्यादि। देव- दृत्त और यम्दृत्त संज्ञा हैं, तथा जाना और काम करना ये संभी के धर्म हैं, नकि संक्ञा के। परन्तु संक्षा के साथ संकी का अमेदान्वय होने से वे केवल संज्ञा से निर्देश किये जाते हैं। इसी प्रकार संजी ब्राह्म का संज्ा प्रणव के साथ अमेद होने से तद्ंद्वारा उस का निर्देश किया गया है। अतएव ध्यानशील विद्वान् इस ही ओंकार का अंवर्लम्बन करने से अभ्युदये और नोक्ष इन दोनों फलों में से जिस को चाहता है, ले सका है। कठोप- निषद् में भी निम्नलिखित झोकों के द्वारा इसी भोंकार का माहात्म्य वर्णन किया गया है। "एतटय वाक्षरं ब्रह्म एतदेवाक्षर परम्। एतट्ठ वाक्षरं सात्वा यो यदिच्छति सस्य तस्॥ एतदालम्वनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्। एतदा- उम्यनं सात्वा ब्रह्मलोके महीयते यह ही अक्षर. (ओ३म्) ब्रह्म है, यह ही अक्षर (पर) सब से तहकुष्ट है, इस ही अक्षर (ओ३म्) को जानकर जो, जो चाइता है वह उस का है। यह आलम्वन श्रेष्ठ है, यह अन- उम्वन सर्वोत्तम है, इस ही आलम्बन को जानकर ब्रश्न- लोक में महत्तव को पाता है॥२॥ स यक्षेकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवे दितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसंपदाते। तमृचो मनु प्यलोकसुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्म- पर्येण शट्डया संपन्नो महिमानमनुभवति॥३।
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मशनोपनिषदि
पदार्थ :- (ख) वह ध्यान करने वाला (यदि) जो (एक- मानम्) ओंकार की एक मात्रा [अकारमात्र ] को (अश्निष्यायीत) ध्यान करे (सः) वह एक मात्रा का ध्यान फरने वाला (तेन, एव) उस ही एक नातरा के ध्यान से (संवेदितः ) सम्यग् बोघित हुवा (तूर्णम्, एव) शीघ्र ही (चगत्याम् ) पृथिवी में ( अभिसंपद्यते) सभ ओर से सम्पन्न होता है। (तम्) उस को (ऋचः) ऋग्वेद के मन्त्र (मनुष्यलोकम्) मनुष्यलोकमन्बन्धी सम्पूर्ण सुखों को (चपनयन्ते) समीपता से माप्त कराते हैं (-सः) वह ऋग्वेद के मन्त्रों से मनुष्यलोक के सनस्त सुखों को प्राप्त हुवा मनुष्य (तत्र) उस मनुष्यलोक में (तपसा) धर्म के आचरण से (म्रह्मचर्येण) इन्द्रियनिग्रह . से और (अट्ठया) आस्तिक्यबुद्धि से ( संपन्नः) युक्त हुवा (महिसानम्) व्रह्म के महस्व को (अनुभवति) अनुभव करता है।३॥ प्राथार्थ :- समष्टिरूप से सम्पूर्ण प्रणम के ध्यान का फल कहकर अब व्य्िरूप से उस की एक २ नात्रा के ध्यान फा फल कहते हैं। भोंकार में तीन मात्रा (अक्षर) हैं-अ, उ, स्। इन का विस्तारपूर्वक व्याख्यान मायडू- क्योपनिषद् में किया नया है, यहां पर केवल इन की उपासना का फल वर्णन किया गया है। पहिली सात्रा 'अकार हैं। जो मनुष्य यम नियमादि साधनों से संपन्न होकर एवं प्रणव के वाच्य पर प्रद्धा और विश्वास को
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पक्षुम: 'मश्न: धारण करके पहिसी मात्रा का ध्यान करता है[आत्म मत्यय के दृढ़ होने से तद्गिय प्रत्ययों का विलीन होना ही यहां ध्यान शब्द का अभिम्राय है] वह तन्मय होकर एकमात्राषिशिष्ट भोंकार के ध्यान करने से ही विच्छिन तमआवरण होकर विज्वान से प्रकाशित हुवा चृथिवी मैं सुशोित होता है। उम को ऋग्वेद के मन्त्र ननुष्यलोक और नम के सम्पूर्ण अम्युदय को प्राप्त कगते हैं। तब वह इम मनुप्यलोक में श्रेष्ठगति को पाकर तप, ब्रह्म- चर्य और प्रट्ठा से संपन हुधा व्रश् के महत्व का अनुस्व करता है। ३ ॥ अथ यदि द्विमात्रेण मनसि संपदते, सो- इन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम्। स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते॥8। पदार्थ :- (अघ) और (यदि) जो (द्विमात्रेण ) अकार, उकार दो मात्राओं से (मनसि) मन में (संपद्यते) प्राप्त होता है अर्धात् ध्यान करता है (सः) वह (अ- न्तरिक्षम्) अन्तरिक्षस्य (सोमलोकम्) चन्द्रलोक को (यजुर्सि:) यजुर्वेद के द्वारा (उकीयते) ले जाया जाता हे (मः) वह (सोनलोके) चन्द्रलोक में (विभूतिम् ) ऐश्वर्य को (अनुभूय) अनुभव करसे (पुनः) फिर (आवर्तते) एत पृषिवी पर आता है। ४ ॥ ।परावार्थ :- इसी प्रकार जो अकार उकार दो मात्राओं से मननपूर्वक ब्रह्म का ध्वान करता है वह यजुर्वेद के द्वारा
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CO प्रय्नोपनिषद्ि चन्द्रलोक को पहुंचाया जाता है। वहां अनेक प्रकार के दिव्य भोगों को भोग कर फिर वह इस मर्त्यलोक में जन्म लेता है। यद्यपि मनुष्यलोक की अपेक्षा चन्द्रलोंक विशेष नाना गया है, तंथापि ब्रलमलोक की अपेक्षा [जी वक्षयमाण त्रिमात्र ओंकार की उंपासना से प्राप्त होता है] कुछ भी नहीं ॥४ ॥ यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतैनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत, स तेजसि सूय्ये संपन्नः। यथा पादोदरसत्वचा विनि र्मुच्यत एवं ह वैस पाप्मना विनिर्मुक्त: स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एत- स्माज्जीवघनातपरात्परं पुरिशयं पुरुष- मीक्षते, तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥५॥ पदार्थ :- (पुनः) फिर (यः) जो (त्रिमात्रेण ) अ, उ, स् तीन मात्रा वाले (ओम् इति, एतेन, एव, अक्षरेण) "ओ३म्" इस ही अक्षर से ( एतं, परं, पुरुषम्) इस परब्रह्म को (अभिध्यायीत) ध्यान करे (सः ) वह (तेजसि, सूये) सेभवाले सूर्यलोक में (संपननः) म्राप्त होता है ( यथा) जैसे (पादोदर: ) सदर ही पैर हैं, जिस के ऐसा सर्प (त्वधा) कैंघुठी से (विनिर्सुध्यते) पृष्क' हो जाता, है (ह, वै) निरुसन्देह ( एवम्) उस
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पङ्चुमः प्रत्रः
ही प्रकार (सः) वह त्रिमात्र भो३म् का छयाता (रापसना( पापरूप नल में (विनिर्मुक्त) छूट जाता है. (सः) वह (सामलिः) नामवेद से गन्त्रों से (म्रहलोफन्) प्रस्मलोक को (उन्नीयते) नघ से ऊपर ले जञाया साता है (सः) वह व्रस्मलोक को प्राप्त हुवा (एतस्मात, परात, जीवघनात्। इस ससस्त जीवोंके सूक्ष्म संघात से (पग्म्) सूक्ष्म (पुरिशयम्) समस्त विद्व में व्यापकु (पुरुषम्) प्रूणं पुरुष को (ईक्षते)देखता है (तद) दन विपय में (एती, लोकी) वश्यमाण ये दो शोफ (भवतः) पस्तुत हैं॥५ प्रावार्थ :- अद जो शस दमादि साधनों से युक हुया समग्र ओंकार से अर्धात् अ, उ, म् उन तीनों मा- दाओं से विधिपूर्धक उम परम पुरु का ध्याप करता है, प्रथम वह तेज से सम्पन्न होकर सूर्य लोफ में जाता है, पुनः कैंचुली छोड़े हुवे सर्प के समान पाप रूप मल के आवरण से मुक्त हुवा मानवेद के द्वारा सर्वोपरि ब्रह् ठोक को प्राप्त होता है। जिस ब्रह्मलोक को पाकर फिर वह इस सीवर्सघातरूप कार्यकारणात्मक जगत में भिवाय उस परस पुरुष के कि जो चराचर दिस्व में सोत प्रोत हो रहा है और किसी को नहीं देखता अर्धात् केवल व्रह्मनय और ब्रह्मपर होजाता है, इमी को पुष्टि अगले दो होक भी करते हैं॥ ५॥ तिस्रो मात्रा मृत्युमत्य: प्रयुक्ता अन्यो- त्यसक्ता अनविप्रयुक्ता:। क्रियासु
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बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यकूप्रयुक्तासु न कम्पते झः ॥६॥ पदार्थ :- (अन्योन्यसक्ताः) परस्पर सव्वद्ध (अनविम्र- सुक्ा:) स्ेय में प्रयोग न कर के केवल शठद में ही प्रयोग की गईं (तिस्त्रः, नात्रा:) अकार, उकार, सुकार ये तीन मात्रायें (मृत्युमत्यः ) सरणधर्म वाली (प्रयुक्ता: ) कही गई हैं। (वाह्यास्यन्तरनध्यमासु, क्रियासु) जा- पत, स्वप्न, सुपुप्ति रूप क्रियाओं में अथवा यध्य, प्राणा- याम और नानसजपादि क्रियाओों में (सम्यक, प्रयु- करखु) भलीभान्ति प्रयोग करने पर (5् ) दुट्िमान् प्रयोफ्ता (न, कम्पते) नहीं चलायमान होता ।। ६। सावार्ष :- परस्पर संबद्ध अर्थात् एक दूसरे से सम्बन्ध रखने वाली तीन सात्रायें यदि जेमवर्जित हों अर्थात् केवल उन, का उच्चारण मात्र किया जाय किन्तु उन से जेय ब्रह्म का मनन एवं निदिध्यासन न किया साय, तौ वे मनुष्य को जन्म मरण के चक्र से नहों वचा सकतीं प्रस्युत और इस में फंक्षा देती हैं। हां जो वुद्धिमान् जाग्रत् स्प्न, सुषुपि इन तीन अवस्थाओं में क्रमशः यप्, प्राणायान ओर मानस जप इन तीन वाह्य, मध्यम और आभ्यन्तर क्रियाओं के द्वारा इन तीनों मात्राओं का समावेश कर- ता है अर्थात् अकार से यक्ञादि का अनुष्ठान करता हुवा जाग्रत अवस्था को जीलता है, नकार से प्राणायाम करता हुवा स्वपन को वश में करता है औौर सकार से मानस जए करता हुवा डुपुति को जीत
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पत्चुम: प्रश्नं:
लेता है, वह ध्येय नें समावेशित पित्त इन मात्राओं के ठीक २ प्रयोग करने से चलायनांन नहीं होता। तात्पर्यं यह कि जहां इन का यचार्थप्रयोग मनुष्य को अमृत पढ़ का भागी बनाता है, वहां इन का अन्यपा प्रयोग और भी मृत्यु की दउदल में फंसा देता है। इस लिये शास की विधि और विह्वान् आचार्य के उपदेशानुमार ही इस मार्ग में मनुष्य को प्रवृत्त होना चाहिये, नकि स्वेच्छाघार मे ॥६॥ ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत्त- त्कवयो वेदयन्ते। तमोंकारेणैवाऽडय- तनेनान्वेति विद्वान्यत्तच्छान्तमजरमसृ- तमभयं परं चेति ॥७॥ पढ़ार्थ :- (ऋग्भिः) ऋग्वेद मे (एतम्) इस मतुष्य लोक फो (यजुर्भिः) यजुर्वेद से (अन्तरिक्षम्) अन्त- रिन्ष सम्बन्धी सोमलोक को (सामभिः) सामवेद से (यत् तत् ) शिस्ष उस को (कवयः) विद्वान् लोग (देदयन्ते) जानते हैं ( तम्) उक्त तीनों लोक को (विद्वान्) सद्स- ज्वाता (ओंकारण, एव, आयतनैन) ओंकार ही के अ- खलम्त्र से (अन्वेति ) म्राप्त होता है ( यत्) जो. कि (शान्तम् ) रागादि दोषरहित (अजरम् ) जरंरहित (अमृतम्) भरणवर्जित (अन्नयम्) अद्वैत होने से प्रय- रहित (परम्) सर्वोत्कष्ट है (तस्) उस ब्रम्म को (अन्वेति) ग्राप्त होता है। 9 ॥
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eg . ावार्थ :- इस मन्न के द्वारा उपसंहार करते हुवे आ- चार्य कहते हैं कि इस ओंकार के ही विधियूर्वक अव लम्बन करने से ध्याता यथेष्ट फल को ग्राप्त होता है, अर्थात् एक मात्रा के ध्यान से ऋग्वेद के द्वारा समुप्य- लोक के सर्वोत्तम सुखों की प्राप्ति होती है, दो मात्राओं के ध्यान मे यनुर्वेद के द्वारा चन्द्रलोक के समस्त सुखों को प्राप्त करता है, एवं तीन मात्राओं के विधिपूर्वक ध्यान से सामवेद के द्वारा सस ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है जिस को विद्वान् लोग ही जानते हैं और जो शान्त, अजर, अमृत, अभय और पर नानों से निर्देश किया जाता है। 3 ॥ इत्यथर्ववेदीयप्रश्नोपनिषदि पज्जम: प्रश्नः५
त्रथ पष्ठः प्रश्न: अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः पत्रच्छ। भगवन् ! हिरण्यनाभ: कौसल्यो राज- पुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत। षो- डशकलं भारद्वाज ! पुरुषं वेत्थ ? तमहं कुमारमब्रुवं, नाहमिमं वेद, य- दहमिममवेदिषं, कथं ते नावक्ष्यमिति,
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समूलो वा एप परिशुष्यति योऽनृ- तमभिवदति, तस्मान्नार्हम्यिनृतं वक्तुं; An 4 स तूष्णों रथमारुह्य प्रवव्राज। तं रवा पृच्छामि क्वासी पुरुषइति ॥१ ॥ पदार्थ :- ( अप) इस के उपरान्त (ह) मसिद्व (एनम्) इन पिप्पलाद ऋपि से (चुकेशा, भारह्वाजः) सरहवाज के पुत्र सुभेशा ने (पमच्छ) पूछा कि (भग- पन्) हे भगवन् ! (हिरययनाभः, कौमल्य:, राणपुत्रः) कोमउदेशीय हिरययनाम नामक राजपुत्र ने (नामू उपेत्य) मेरे पास आकर (एतं, प्रश्नम्) इस प्रश्न करे (भएच्छत ) पूछा था कि (भारदवाज ) हे भरद्वाज के पुत्र ! (चोड़शकलं, पुरुपम् ) सोलह फला घाले पुरुष को (वेत्प) जानता है?, (अहम्) मैंने ( तं, कुना -- रम्) उस राजकुमार मे ( अन्रुवम् ) कहा कि (अह्षम्) मैं (इमम् ) इस पुरुय को (न, वैद) नहीं जानता, ( यदि) जो (अहम्) मैं (इमम्) इस को (अवेदियम्) कानता होता तो (कथम्) क्पोंकर (ते) तेरे लिये (न, अवकष्यम्, इति) नहीं कहता। (वै) निश्चय (एपः) यह (समूछः ) सूउत्तहित (परिशुष्यति) सूख जाता है (बः) जो (अनृत्म्) भूंठ (भतिवदति) योलता है, (तस्माद) इस लिये (अनृतं, वकुम्) भूंठ कहने को (न, अर्शनि) समर्थ नहीं हूं। (पः) वह राजकुमार U
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मश्नेपनियदि
(तूष्णीम्) चुपचाप (रथम्, आरुह्य) रप में सवार होकर (प्रवव्राज) चछा गया। (तम् ) उस पुरुष को (त्वा)तुभ से (पृच्छामि) पूछता हूं कि (असी, पुरुषः) यह पुरुष (क्, इति) कहां है। १ ॥ भावार्थ :- अब पज्चम प्रश्न का उत्तर हो जाने के पश्चात् भरदवाज का चुत्र सुकेशा भगवान् पिप्यलाद से - पूछता है-हे भगवन् ! पहिले कभी कोसलदेशीय हिरययनाभ नामक राजपुत्र ने मेरे पास आफर यह प्रश्न किया था कि हे भारहवाजं ! तू उस बोहश कला वाले पुरुष को जानता है? मैंने इस के उत्तर में कहा कि मैं नहीं जानता, मेरें सच २ कह देने पर भी जब उसे वि- श्वास न हुषा तब मैंने कहा कि यदि मैं ज्ानता होता तो भला तुभ से अधिकारी को पाकर क्यों न कहता। जब इस पर भी मैंने उत को सन्तुष्ट न पाया, तब शवथ पूर्वक कहां कि जो फूंठ बोलता है वह समूल नष्ट हो जाता है, इस लिये मैं तुझ से कभी मूँठ नहीं वोल स- कता। यह सुन कर वह राजकुमार चुपचाप अपने रथ में सवार होकर जहां से आयाथा वहीं को चंला गया। इस लिये हे आचार्यमवर।अव मैं आय से पूछता हूं कि वह ोडश कला वाला पुरुष क्ा है और कहां है? कपंया मेरे प्रति उपदेश कीजिये ॥१ ॥ तस्मे स होवांच। इहैवानतः शरीरे
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मष्ः मश्ः c9
सोम्य! स पुरुषो यस्मित्रेता: पोडश कला: प्रभवन्तीति ॥ २ ॥ पदर्थ :- (तस्सै) उस म्रश्नकर्तता के लिये (स) वह पिप्पछाद ऋषि (ह) स्पष्ट (ठवाघ) वोला कि (सोख्य) हे मियद्शन! (इद, एव, अन्तःशरीरे) इम ही शरीर के भीतर इट्पुरहरीक देश में (सः, पुरुषः) वह चुरुष है (यस्मिन्) जिस में (एता:, पोटश, कलाः) ये वक््यमाण. सोलह कलायें (मतवन्ति, इति) उत्पन्न होती हैं। २ ॥. भावार्थ :- अब आचार्यप्रवर पिष्पलाद ऋषि सुकेशा के प्रश्न का उत्तर देते हुवे कहते हैं-हे सोम्य ! वह पुरुष कि जिस में ये सोलह कलायें (जिन का दर्गन आने आवेगर) सत्पन्न होती हैं, इसी शरीर के भीतर हत्युवडरीक देश में निवास करता है। यद्यपि वह पुरुष. पूर्ण होने से सवत्र ही व्यापक है, तथापि जीशत्मा को मावात् होने से हृत्पुवडरीक देश में उस की स्थिति कही जाती है, इसी स्थान में योगिजनों को समाधि के. द्वारा उस का साक्षास्कार होता है। जो लोग अपने प्रीतर उस को न खोज कर बाहर ढूंढते फिरते हैं, चन को इम श्रुति के सात्पर्य पर ध्यान देना चाहिये। यद्यपि स्वरूप से वह पुरुष निष्कल हैअर्थात् सर्वत्र पूर्ण और विभु होने से व्रस में फोई कला वा करिया ठहर ही नहीं सपतती, तथापि अध्यारोप से ये वक्यमाण सोलह कलायें
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प्रश्नोपनिषदि
उस में आरोपित की जाती हैं, क्योंकि ऐवा कियेबिना इन ब्रल्म के महस्व का जनुकव नहीं कर सकते और न प्रतिपाद्य और प्रतिपादनादि व्यवहार प्रवृश हो सकते हैं, अतः जगत को सकर्सृक सिट्ध करने के सिये और प्रत्यक्ष दूष्टान्त से परीक्ष दार्श्टान्त की प्रतिपत्ति के लिये हमें इस अध्यारोप का आश्रय लेना पड़ता है। संथात् अंचल और निष्कल ब्रह्म में करिया और कला गामनी पढ़ती हैं। इस की पुष्टि यजुवेद के चालीसवें अध्याय का पांचवा सन्त्र भी करता है। वह यह है :- "सदजति तम्नैजति तद्दूरे तद्ृदन्तिके। तदन्तरस्य सर्व- स्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥इस नन्त्र में व्रह्म को एजन कियां का कर्सा और अकर्ता दोनों माना गया है। तात्पर्य यह कि वह अपने वास्तविक स्वरूप से तौ अचल है, परन्तु इस चछायमान जगत् में व्यापक होकर इस का चलरने वाला है, इस लिये रुस में भी'चलत्व धर्म आरोपित किया गया है। वस बसी के अनुसार यझं भी अध्यारोप से वक्ष्यमाण सोलह कढाओं की सल्पत्ति, स्थिति और लप ब्रह्म में माने गये हैं, वस्तुतः यह इन से पृथक है। २।। स ईक्षाजुक्रे। कस्मिव्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्याभि कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामि ॥ ३ ॥
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पदार्प :- (सः) उस पुरुष मे (ईक्षाङुके) ्दक्षण अर्थात विवार किया। (अहय्) अहंतत्व से युक मैं (कस्मिन्) किम वस्तु के (उत्फ्रान्ते) निक्छ जोने पर (तत्कान्तः, हविष्यामि ) निकल सा जाऊंगा (वा) और (कस्मिन्) किस के (प्रतिष्ठिते) प्रतिष्ठित होने पर (प्रतिष्ठास्यानि) प्रतिष्ठित सा होऊंगा । ३ ॥ भावार्थ :- परमात्मा जव सष्टि बनाना चाहता है तब सब से पहिले यह ईक्षा (विचार) करता है और इस्ो को उस का "तप" भी कहते हैं "यस्य ज्ञानमयं सपः रम का विचार ही तप है अर्थात सृष्टि बनाने से पूर्व वह यह सोधता है कि मैं जिस आधेयरूप जगत् को बनाना चाहता हूं. उस का आधार का हो सकता है? अर्यास् वह कीन सी वस्तु है? कि जिस के निवालने पर शरीर सें अहृंतरत्र निकन जाता है और जिस के प्रति- म्रित होने पर ही वह भी शरीर में प्रतिष्ठित रहता है। सत्क्रान्नि और स्थिति अहंतत्व के धर्म हैं, यहां व्रह्म में जो उन का आरोप किया गया है, वह केवल सह- चार से है। जैसे देह के सहचार से जीवात्ा का जन्मे मरण कहा जाता है, जो कि अनर और अमर है। इूधी प्रकार यहां प्ररुति के कार्य अहंतत्व के सांहघर्य से पर- मात्मा में सत्काम्ति और स्थिति आदि धर्म आरोपित किये गये हैं। ३ * स प्राणमसूजत प्राणाच्छट्ठां खं वायुज्यों-
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प्रश्नोपनिषदि
तिरप: पथिवीन्द्रियं मनः। अननमन्नाद्टीयें तपो सन्त्रा: कर्म लोका लोकेषु नाम च॥थ प्रदार्थ :- (मः) उस परसात्ा ने (माणम्) ग्राण को (अरृजत) उत्पन्न किया (प्राणात्) प्रांण से (त्रट्ठाम्) शुभ कर्म में प्रवृत्त कराने वालो निश्वयात्मिका बुद्धि को, उम से (सं,वायुः, ज्योतिः, पृथिवी, इन्द्रियं,ममः) आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ये पञ्ट महाभूत और इन्हों के विकार प्ानेन्ट्रिय और कर्मेन्द्रिय और इन का नायक संकश्पविकल्पात्मक मन, इन सब को उत्पन्न किया। इस के पद्चात् (अनम्) अस्र (अवात्) अन से (वीर्यम्) मल, फिर (तपः) द्वन्दंमहिष्णुतादि तप (नन्त्रा:) ऋग्यजुःसामाथर्व के मन्त्र (कार्म) यज्ञादि कम (लोका: ) कर्मफल के अधिष्ठान सोमादि लोक (लोकेषु) उन लोकों में (नाम, च) संज्जादि व्यवहार भी उत्पन्न किये ॥४ ॥ भावार्थ :- अञ्र क्रमशः सोलह कलाओं की उत्पत्तिं का वर्णन करते हैं। ईक्षा (विचार) करने के पश्चास् ईशर ने सब से पहिले जगत् के आधार जीवात्ा के उपयोगी प्राण को उत्पन्न किया। म्राण की उत्पत्ति के पदाव् सत्य को धारण करने वाली, विश्वास की जननी तथा मनुष्यों को शुभकर्म में प्रवृत्त कराने वाली श्रट्धा (निव पात्मिका बुद्धि) को उत्पन्न किया। इस के पक्षात् आकांश, वांयु, अग्नि, जल और पृथिवी इन पञ्च महां-
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पछ: मश्रः
भूतों को जो कर्म और उन के फलमोग के अधिष्ठान हैं, बनाया; तद्नन्तर इन्हीं भूतों की सात्राओं से इन्द्रिय (जों दो प्रकार के हैं-एक ज्ञानेन्ट्रिय दूंसरें कर्मेन्ट्रिय) बनाऐं, ततपश्चात् 'इन का नायक (चलाने वाला) संर्कलैप विकल्पात्मक मंन बनाया। फार्य और करण की उत्पत्ति कें पश्चात् प्राणियों की स्थिति के छिये प्राण का आधार अन्नबताया गया। अन्न से फिर बल की उत्पत्ति हुई, बल से तप, तप से कर्म के साधन भूत ऋगादि के मन्त्र, उन से यस्ादि कर्म, कर्म से लोक अर्थात् उन के भोगा- घिट्टान और फिर लोकों में नाम अर्थात् संज्ञादि व्यवहार प्रवुत्त हुवे। इस प्रकर प्राणसे लेकर नामपर्यन्त सोलह कला कहलाती हैं, जोकि ये सर्गारम्म में ईश्वर से सेत्पन्नहोकर मलंय में अंपने नाम रुंपादि को छोड़ कर ससी में ठीन हो जाती हैं, इस लिये उस की "बोड़शी" कहते हैं ॥४॥ स यथेमा नदाः स्यन्दमाना: समुद्रायणा: संमुद्र प्राप्यास्त गच्छन्ति, मिझ्ेते तासां नामरूपे, समुद्र इत्येवं प्रोच्यते। एवमे- वास्य परिद्रषठुरिमा: षोडश कला: पुरुषा- यणा: पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति, मिदोते चाउड़सा नामरूंपे, पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एपोडकलोऽमृतो भवति, तदेष झलोक: ।1
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प्रश्नोपनिषदि
पदार्थ :- (सः) दूषान्त-( यथा) जैमे (इमाः नद्यः) ये नदियां (स्यन्दमानाः) चलती हुई ( ममुद्रायणा:) समुद्र ही है. अयन [स्थान] जिन का, ऐमी (ममुट्रम्) समुद्र को (प्राप्य) पाकर (अस्त, गच्छन्ति) अस्त से जाती हैं, (तासाम्) उन के (नानरूपे) नाम और रूप (भिद्येते) टूट जाते हैं (समुद्र:, इति, एयम्) समुद्र है इृस प्रकार (मोच्यते) कहा जाता है। (एव. भेव) इसी प्रकार (भस्य, परिद्रषुः) इम सर्वमाक्षी पुरुष की (इमा:, पोडश, कलाः) ये सोखह कलायें (पुरुपायणा:) पुरुष ही है अयम [स्थान] जिन का ऐसी (पुरुषम्) पुरुष को ( प्राव्य) पाकर (अस्तं, गच्छनित) अस्त हो जाती हैं (च) और ( आपाम्) इन के (नामरूपे ) नाम और रूप (मिद्यते) टूट जाते हैं (पुरुयः, इति, एवम्) युरुष है इम प्रकार (म्रारूप़ते) कहा जाता है (स:, एषः) वह यह सर्वपाक्षी चुरुप (अकनः) वास्तव में कलारहित (अमृतः) अविनाशी (भवति ) है (तदू) उस के विषय में (एपः, झोकः)यह झोक है।५॥ भावार्थ :- उक्त सोलह कलायें । जिन का वर्सन चौथे ोक में होचुका है.) किस प्रफार ईश्वर में अस्त होती हैं. इस का दृष्टान्तपूर्वकु दिसलाते हैं। जैसे गङ्गा सिन्धु आदि नदियां समुद्र की ओर जाती हुई उसको पा- कर अस्त होजाती हैं अर्थात् अपने नाम और रूप को त्याग कर समुद्र ही कहलाने लगती हैं, फिर गङ्गादि के नाम से
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पछठः प्श्:
उन को कोई नहीं पुफारता किन्तु समुद्र के नाम ने ही "व्यधदार किया आाता है। इमी प्रकार उम सर्वमाक्षी चेतम पुरुप की ये सोलइ़ कलाये जो सर्गारम्त में ससी मे उत्पक्न होती हैं, प्रलय में सम को पाकर अस्त होष्षानी हैं सर्धात् अपने नाम रूपादि को त्याय कर उसमें लीन हो जाती हैं, तब सिवाय पुरुष के और कोई निर्देश्य वस्तु ही नहीं रहती, जो व्यवहार में आसके। यद्यपि ये कलासें औपचारिक रीति पर पुरुष से तत्पन्न होकर उसी में लीन होजाती हैं, तघांप वह अपने वास्तविक स्वरूप से निष्कल और अपरिणानी है, इसी वात की पुष्टि निम्नलिखित झोक भी करता है। ५॥ अराइव रथनाभी कला यस्मिन्प्रति छ्ठिताः। तं वेदं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्यु: परिव्यथा इति ॥६॥ पदार्थ :- (रथनाभी) रथचक की नाभि में (अरा. हव) दग्डों के समान (यस्पिन्) जिस में ( कलाः ) मोलह कलायें (प्रतिष्ठिताः ) iस्थत हैं (तम्) उसत (वेद्यम्) जानने योग्य (पुरुयस् ) पुरुष को (वेद) ज्ञाना (बधा) जैसे (वः) तुन लोगों को ( मृत्यु:) मौस ( ना. पग्व्यया:, इति) न मतावै ।। ६। 1 प्रावार्थ :- जैसे उ्घचक्र की नाभि में सब अरे ठहरे हुछे होते हैं, इमी प्रकार जगदाधार ईस्वर में ये सोलह कलामें ठहरी हुई हैं अर्थात् वह रवयं जिए्कल भी इन
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प्रश्नोपनिवदि
सोलह कलाओं के द्वारा इम समस् बह्लावड का रचन, . पारन, और वारण कर रहा है। हे मनुचो! यदि तुच सृत्यु के यानक आक्रमण से बघना चाहते हो तौ नम कलानाथ विज्ञेय पुरुष का शास्त्रोक्त श्रवणादि सा- धनों के द्वारा यथार्थ ज्ान ग्राप्त करो, ए्योंकि "समेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेज्यनाय केवल उस ही को जानकर तुम मृत्यु का उह्ाङ्गन कर सकते हो और कोई मार्ग (उपाय) संसार के बन्धन से छूटने का नहीं है। ६।। तानू होवाचैतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेढ। नातः पर मस्तीति॥७॥ पदार्थ :- (तानू) उन छहों शिष्यों से (इ) स्पष्ट (उवाच) पिप्साद ऋषि बोला कि (एताषत, एव) इतना ही (अहम्) मैं ( एतत्, परं, व्रम्म ) इस परम्रह्म को (वेद) जामता हूं (अतः, परम्) इस से परे वा सूक्ष्म (न. अस्ति, इति) कुछ नहीं है।। ।। भाधार्थ :- अब छठे प्रश्न का उत्तर समाप्त करते हुते पिदपलाद ऋषि उन खहों शिष्यों को संबोधन क- रते हुवे कहते हैं कि मैं इतना ही जितना तुन्हारे प्रति ब्रह्मविद्या का उपदेश किया है, उस परम्रह्म को जानता हूं (इस से ऋषि की निरभिनानिता और ब्रह्म की अगाधता सपएतया अभिलक्षित होती है) तात्पर्य यह किव्रह्म तौ अगाध और अनन्त है, मेरा द्वान इस
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पह: प्रस:
के विषय में हतना ही है।"यनी दायो निवर्तन्ते अ- प्राध्य मनमा राड् नहां से वाणियां नन के साथ उम की पाह को न पाकर लीट आती हैं, वह अनन्त और अतोन्दिय वस्तु ग्रम्म है, उम से सूक्ष्म या परे और कोर्ई वन्तु नहीं है, वही मव साताज्रात वस्तुओं की पराकामा है ॥। 3 । ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽ- स्माकमविदाया: परं पारं तारय- सीति। नमः परमत्रषिम्यो नमः परमऋृपिस्यः॥८॥ पढ़ार्थ :- ( ते) वे छहीं शिप्य (तम्) उस आचार्य को (अचंयन्तः) पृजते हुवे कहते हैं कि (त्वम्, हि) नू ही (नः) हमारा (पिता) ब्रह्लदाता पिता है (यः) सो (अस्माफम्) एन लोगों को (अविद्यायाः) अ. विद्या के (परं, पारम्) परली पारं (तारयति, इृति) तराता है (परमतपिभ्यः ) व्रह्मविद्या के सम्प्रदायप्रव- तंक ऋषियों के लिये (नमः) नमस्कार है। द्विर्वचन. वीप्मा और ग्रन्थसनाप्तिसूचक है॥८॥। भावार्थ :- अव वे कहों शिप्प कृतशवतापूर्वक गुरु का पूजन करते ुवे कहते हैं कि हे ऋपिम्रवर ! आप हनारे पस्नदाता मिता हैं "उत्पाद्कब्रह्दांत्रोगरीयान् त्रह्मादः
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९६ प्रश्नोपनिषद्ि
पिता" इस जनु के वचनानुंसार ब्रह्मदाता पिता उत्पा- दक पिता से भी बढ़कर है, क्योंकि उत्पादक पिता से तौ इम विनश्वर शरीर की उत्पत्ति होती है परन्तु व्रह्मदाता पिता उम आत्मा का माक्षाल्कार कराता हैं जोन कभी उत्पन्न होतां है और न मरता है, इसलिये उत्पादक, उपनेता, अव्नदाता, भयन्नाता और विद्या- (ब्रह्म) दाता इन पांचों प्रकार के पिताओं में ब्रह्म- दाता पिता सब से बढ़कर है, सो आाप हमारे ब्रह्मदाता पिता हैं अर्थात् आपने कृपा करके हम को उस अविद्या के समुद्र से (कि जिस की मिथ्याज्ञान की तरङ्गों में हम वहे जारहे थे) निकाला है, हम आप के उपकार सार से इस जन्म में तो क्या आकल्प भी मुक्त नहीं हो सकते। सिवाय नमस्कार के उपहार के और हनारे पास क्या है जो हम आप के चरणों में भेट करैं, इस. लिये हम अत्यन्त भक्ति और त्रद्ठा से आप जैते ब्रह्म- विद्यासम्प्रदायप्रवर्त्तक महर्षियों के चरणों में पुनः युनः ननस्कार करते हैं।८ ॥ इत्यथर्ववेदीयप्रश्नोपंनिषदि षष्ठःप्रश्नः॥६। समापा चेयमुपनिषट् ।
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अवलासन्ताप आजकल भारतवर्म में खरोजाति की जैमी कुछ दुर्दशा जो रही है, जर्पात् शाखत्र वा लोकवृत (रिवान) की आड़ में जो २ मत्याचार इन पर हो रहे हैं, मस ठमी का निद- शंन इम पुलम में किया गया है। इस में ५ नियन्ध है, पडिटे में की पुरुंषों का साम्य नष्टिकम, युक्ति और शास्त्र के मनाणों मे दिखलाया गया है। दूमरे में ओ- शिक्षा के ससाव से गहस्याश्रम की जैसी दुर्दशा और स मान की जैमी होनती हो रही है उम का चित्र (फोटो), हौया गया हैऔर खोशिसा का सर्वशाखसम्मत होमा और उम की सब के अधिक आवश्यकता श्री प्रमाण पूर्षक दिसलाई गई है। तीसरे में बासविवाह और उस से जो २ मनर्य उत्पम हुम हैं और हो रहे हैं और रन का तो श्रीनति पर प्रभाव पड़ा है और पढ़ रंहा है, रम को बड़ी उत्तमता के साथ दिसलाया गया है। बीधे में अनमेउ विवाह और रस का स्यागक परि- नाम दिसठाया गया है और पांचये में उस सघ से भढ़े अनर्थ का (जिस को वैधय्य कहते हैं और जिस के का- रहं भाज यह म्रंसर्षि देश न केवल सन्तापाग्न में ही जल रहा है, किन्तु पाप और दुराधार के मंछिन प्रवाह में भी वह रहा है) दुसड़ा रोया गया है, जिस को पढ़- करं या मुन जर एक यार तो वजहूटय भी पिंघल ही जावेगा । मूल्य केवल ) निम्रलिखित संपनिषट् तयार ईश- बेन -)रठ।) म्रश्न i) बढ़िया i-
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वेदप्रकाश यह मासिकपत्र प्रसिद्ध पं० तुलसीराम जी की संपादकता में स्वामिप्रेस मेरठ से रायल अठपेजा साइज़ में पूरे ३२ पेज में निक- लता है। इस में वैदिकधर्म से सम्वन्ध रखने वाले बड़े २ गम्भोर और शास्त्रीय लेख मुद्रित होते हैं। वैदिकधर्म और आर्यसि- द्ान्तों पर जितने आक्षेप होते हैं, उन सब का बड़ी गम्भीरता और सभ्यता के साथ इस में समाधान होता है, विशेष कर ब्राह्मण सर्वस्व के आक्षेपों का युक्तियुक्त और प्रमाणगर्भित उत्तर दिया जाता है। इस के अतिरिक्त सामाजिक दशा और उस की उन्नति के उपायों पर भी इस में बड़े उत्तम २. लेख होते हैं। सामयिक उपयोगी समाचार और टिप्पणियां भी दोजाती हैं। इतने पर भी सर्वसाधारण के सुमीते के लिये मूल्य केवल,१) वार्षिक है। नमूना मंगाकर देखिये
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मुट्णाधिकारी ग्रन्थकर्त्रा स्वायतीकत:
ओ३म्
कठोपनिषद्
आयोपटेशक पण्डित बदरीदत्त शर्मकृत सरल पद़ार्थसंक्षिप्तभावार्थाभ्यां समन्विता या च पं० तुलसीराम स्वामिना शोधयित्वा तदीये मे रठस्थ-(मेशीनयुक्ते)स्वामियन्त्रालये मुद्रापिता:
मधसवार १०००] . [ मूल्य ।) संवत् १८६० ज्येछ
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सूचना पाठयवर्ग! यह फठोपनिषदर क्वा नरम भाषानुवाद भी आप कीसेघा में यमर्पित किया जाता है। प्रशा है कि साप इसे सादर स्वीकार करेंगे।। न्रन्धकार मिलने का पता (१) पं० मुकुन्दराम जोशी काशीपुर ज़िला-नैनीताल वा (२) स्वामिम्रेत 'मैरठ घ्य (३) ग्रन्थकर्ता
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ओोइंस् कैठोपनिषद की भूमिका यहं उपनिष्द् यजुर्वेद की कठ शाखा के अन्तर्गत है। इस में अलङ्कार की रीति पर मृत्यु और नचिकेता के संवाद द्वारा ब्रह्मविद्या का उपदेश किया गया है। इस पर बहुत से लोग यह शङ्टा करते हैं कि सृत्यु, जिस के पास नचिकेता को उस के पिता ने भेजा था, वास्तव में कोई ऋषि था या मृत्यु को ही एक व्यक्ति कल्पना कर लिया गया है? जहाँ तक इस विषय में विचार किया गया है वहां तक यही जाना गया है कि मृत्यु कोई व्यक्ति विशेष नहीं है। मृत्यु को ही अलद्कार की रीति पर मनुष्य मान कर कल्पित आख्यान द्वारा ब्रह्मविद्या का उपदेश किया गया है। क्योंकि इस उपनिष्द में कहीं मृत्युको यम और कहीं अन्तक नाम से निर्देश किया गया है और यह असमंजस विदित होता है कि ऋषि का नाम मृत्यु हो और फिर वह यमादि टूरुरे नामों से भी (जो मृत्यु के पर्याय हैं) प्रसिद्ध हो। इस के अतिरिक्त १२ वें झोक में नचिकेतां स्पष्ट कहता है कि 'सवर्ग में कोई भ्षय नहीं है, न वहां तू है और न.बुढ़ापे क़ा डर इस से स्पष्ट अवगत होता है कि नचिकेता का सक्ेत मृत्यु की ओर है न कि.मृत्यु नाम वाले किसी, व्यक्ति विशेष की ओर। परन्तु यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि नचिकेता के पिता का यह कहना कि मैं तुझ़े मृत्यु को टूंगा और फिर नचिकेता का मृत्यु के पास जाना और तीन दिन रात उस के द्वार्र परं भूख पड़े रहना, फिर मृत्यु, ने आ़कर उस का आतिथ्य करना और तीन दिन तक उस के द्वार पर खपवास करने के आायदित्त में तीन वर उस को देना,
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(₹) इत्यादि।इन सब बातों का कंया अत्निप्रीय है? इस के उत्तर में यहीं कहा जा सकता है कि मृत्यु को ऊंब एंक व्यंकि मान लिया गया तो यह भी आवश्यक हुआ कि उस का इस रीति पर दर्सान किया जावे कि जिस से पढ़ने वाले को यह प्तीत हों कि मृत्यु वास्तव में कोई मनुप् है और वह मनुष्यों के समान घर में रहता है और कु- टुम्ब भी रखता है इत्यादि॥ दूसरी कल्पना इस उपनियद् की यह भी हो सकतीं कि न वाजम्रवस कोई व्यक्ति है, न नचिकेता उस का पुत्र है और न मृत्यु ही कोई ऋषि है किन्ते यह मारी उपनिषद् एक अलङ्कार है। "वाजश्नवस" एक यौगिक शुंब्द है जो "वाज " और " प्रवस् " इन दो शब्दों से मिल कर बना है। वाज नांम यक् का है और शरवस कीर्ति को कहते हैं। यज ही जिंस की कीतिहो अर्धात ओं यज्न के द्वारा प्रसिद्ध हुवा हो, उसे "वाजश्रवस्" कहते हैं। यहां वाजश्रवस से अक्निमाय उम मन्तव्य से है जिंस के अनुसार केवल यज्जादि कर्मकारड ही नोक्ष का देने वाला है। इसी प्रफार "नचिकेता" शब्द का अर्थ हैं "न जानने वाला" अर्थात् संदिग्ध या जिंज्ञासु। इस दशा में इस उपनिषद् की सङ्गति इस प्रकार होगी कि मनुष्य केवल कर्मकाएंड से मो्क्ष का भागी केदापि नहीं हो सक्ा, चाहे वंह कितना ही बड़ा भारी यक् क्ों नं करे, जब तक उस को आत्मज्वान नहीं होता तब तक उंस को सच्चीं शान्ति नहीं मिलती। इस का यह तात्पर्य नहीं है कि यश्नादि कर्म अनावश्यक और व्यर्थ हैं, किन्तु ज्ञान की अपेक्षा दूंसरी कोटि में हैं। पहिले ममुष्य स्रान्ति से कर्म
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( ३ ) को ही संक्षात मोक्ष का साधन संसता है, अम्तमें जाकर जब उंस को ज्ान होता है तब वह कर्म की भव- रतों और ज्ञान की परता को अनुभव करता है और इसं लिये इस विंचार को यंज का पुत्र कह सकते हैं क्योंकि पधादि कर्म करने से ही ज्ान उत्पन होता है। इस विचार को सृत्युं के पांस भेजने का आशय यही है किजोलोग कर्मकारंड ही को संरवोपरि मानते, हैं वे ऐसे विचार मे (जिस में ज्वान का सत्कर्ष पाया जावे ) अंग्रसन्त होतेहैं और चाहते हैं कि ऐता विचार उत्पन्न ही न हो और यदि कथव्वित उत्पन्न हो लावे तौ तुरन्त सृतम्राय हो जावे। नचिकेता का सृत्यु के पास जाना और सृत्यु का उस को उपदेश करना वास्तव में सिवाय इस के और कुछ भी नहीं कि मनुष्य तव यह अनुभव कर लेता है कि असार संसार और उस के सन ठाठ सामान सुख सम्पत्ति और विषय भोगों की वासना सब जलतरङ्गवत् अस्यिर हैं, एक दिन अवश्य इस संसार से प्रस्थान करना है और यह सब ठाठ बाठ छोंड़ जाना है औैर यह भी कोई नहीं जांन सकता कि किस समय मौत का वारयट अा जावे, केवल आत्मा ही अज्ञर अमर है, यदि नित्य आत्मा इन अनित्य पदार्थों के मोह में फंसा रहा और अपनीं वासतविक उम्नति और मलाई के लिये उस मे कुछ यत ने किया तौ यह जीवन ही व्यर्थ हुवा। एतादूश संस्कारों के उद्य होने पर ही तस को आत्मतत्व की मबलं
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-- (:)। निश्वासा होती है, उस समय वह संसार के समंस् सुखों कों आत्मज्ञान के सममुंख तुच्छ समझता है। नचिकेता ने जो तीन वर मांगे वे ऐसे गम्भीर हें, जिन में मनुष्य का भारा कर्त्तव्य आजाता है। पहिला वर यह है कि मेरा पिता मुंझ से प्रसन्न रहे। इस से प्रकरट होता है कि माता पिता और वृद्धों की सेवा मनुष्य का पहिला कर्त्तव्यं है। दूंसरा वंर यह है कि स्वर्ग को दिलानें वाला अग्नि कौन है। जिम के उत्तर में मृत्यु ने कहा है कि तीनों आश्रमों के धर्म का टीक२ पालन करना ही स्वमे 'का देने वाछा अग्नि है। तीसरावंर आत्मस्ञान के विषय में है, जिस को पाकर मनुष्य के मारे शोक, नौह और भय निवृत्त हो जाते हैं और वह पैरमानन्दका अंनुभव करताहै।। सारांशं यह है किं जिस मनुष्य की मृत्यु का निश्चयं हो जाता है कि एक दिन अवश्य इस संसार को छोड़ना है. वंह अपने कर्त्तव्य पालन में कटिबद्ध हो जाता है और उंस नित्य वस्तु की खोज में अपना तारा पुरुषाथे नगाता है, फिर कोई प्रलो्न आत्मज्ञांन की प्राप्ति मे उसे विमुख नहीं कर सकता। सारी उपनिवद् इसी बातं का उर्पदेश करती हैं कि केवल यस्षादि कमे से मुक्ति नहीं मिल सकती, किन्तु ठंस के लिये आत्मध्ान.का हेना परमवश्यक है। परन्तु मनुष्य आत्मस्ञाने का अधिकारी तभी हो सकता है जब कि नियमानुसार वर्णा- अ्रमधर्म का अनुष्ठान करता हुवा अपने कर्त्तव्य का पालन करे। इत्यसम् पज्ञवितेन। बदरीदृस् शर्मा
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भोइम् अथ कठोपनिषत् प्रारभ्यते प्रथमा चल्ली उश्न् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ। तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र भास ।।१।। [सरनार्थ: ]-(इ, वे) सुना जाता है कि. (वाजश्र- वसः) वाजन्रवा के पुत्र ने (उशन्.) फल् की कामना करते हुवे (मर्ववेदभम् ) सर्वस्व को (ददी) दान किया। (नस्) उम वाज्ग्वम का (इ) मसिट् (नचिकेता नाम) नषिकेना नाम वामा (पुत्रः) बैटा (शाम) था ।१॥ (भावार्थ:)-वाजश्नवा नामक एक ऋषि या और यह नाग उस्त का इस लिये हुवा कि वह अ्रन्न औ्रर विद्वान के (जो वाज शब्द के वाच्यार्थ हैं) दाग करने से म्रख्यात- फीर्तति घा। उस के पुत्र वाजश्रवम ने फल की कामना से सर्ववेदस नाम यज्ञ किया (जो संन्यास धारण करने के ममय किया जाता है) और उस में सर्वस्व को सुपात्रों के लिये दान किया। उस का एक पुत्र था, जिस का नाग नचिकेता था ।। १। त8्ट ह कुमार४ ह सन्तं दक्षिणासु नीय- मानासु श्रद्धाऽडविवेश सोऽमन्यत ॥२॥
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कठोपनिषदि-
[सरलार्य:]-(कुमारं सन्तम् ह) बालक होने पर भी (तम् ह) उप नचिकेता को (दक्षियास) दान किये हुवे पंदार्थीं के (नीयमानासु) यवायोग्य विभाग भरते सनय (त्रट्ंा) आस्तिकीं बुद्धि (भाविवेश) प्रविष्ट हुई (स:) वह (अभन्यत) सोचता था ॥२।। (भावार्थ:)-यह् में जब ऋत्वितों को वाजश्रवस यथा- योग्य दान का विभाग कर रहा था, उस समय नचि- केता को (यद्यपि सभी वह कुमार ही या तथापि पिता के उपदेश और ज्ानियों के संसर्ग से संस्कर्मों में उस की निष्ठा चतपत्र हो गई थो) यह ध्यान आया :- ।।२।। पीतोंदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियांः। भनन्दा नाम ते लोकास्तान् स मच्छति ता ददत्३ [सरलार्थ:]- जो गायें (पौतोदकाः) जल पी चुक्ी हैं (जग्धतृसाः) तृण भक्षण कर चुकी हैं (दुग्घदोहाः) दूध जिन का दुहा जा चुका है ( निरिन्द्रियाः) सन्ता- नोतपत्ति करने में असमर्थ हो गई हैं, (ताः) उन की जो (ददत) दांम करता है (सः) वड (अनन्दा नाम ते लोका:) आनन्दरहित जो लोक हैं (तान्) उन को (गच्छति) जाता है॥३॥ (भावार्थ:)-जो पहिले खा पी चुकीं और दूध भी दे चुर्की, अब् वुड्ढी हो जाने से न तो सा पी सकतीं हैं औौर न दूध ही दे सकतीं हैं। एवं सन्तान उत्पम्न करने में
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मथमा वक्षी॥
भी असमर्घ हो गई हैं, ऐसी गायों को दान करने से दाता को अनिष्ट फल की प्राप्ति होती है। फिर मेरा पिता क्यों ऐसी गौवों को दाण कर रह़ा है? मैं उस को जहां तक हो सफेगा, इस अनिष्टापत्ि से निवृत्त करूंगा। चाहे इस में मेरा शरीर भी लग जावे। यह सोध कर वह दिता के सनीप जाकर बोज़ा-।।३॥। स होवाच पितरं तत कस्मे मां दास्यसीति हितीयं तृतीयम्। तछ्ठुंहोवाच मृत्यवेत्वा ददामीति॥४। [सरलार्थ:]-(सः इ) वह नचिकेता (पितरम्) पिता से (उवाच) बोना-(नत)हे सात।(मामू) मुझ को (कस्मै) किस के लिये (दास्यभि) दोगे ? पिताने वालक समझ कर उपेक्षा की, तय उस ने (द्वितीयम्) दोबारा(वृतीयम्) तिवारा उक वाक्य कहा कि मुझे किम के लिये दोगे? तथ पिता कुट्ध होकर (तम् ) उम से (उवाघ) बोला कि (मृत्यवे)मीत के लिये(स्वा)तुभ को (ददाभि इति) दूंगा।४।। (भावार्थ:) नचिकेता ने पिता से कहा कि आरापने सर्यवेद्स (जिस में रब कुछ दान कर दिया जाता है) यस्त किया है और इसी लियेभाप सबकुछ दान कर चुके हैं। अब एक मैं शेष रहा हूं,सो सुझे आराप किस के लिये दोगे? पिता ने बालक समझ कर उपेक्षा की। तब उस ने पुनः पुनः भनुरोधपूर्वक कहा कि मुझको किस केलिये
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४ । कठोपनिषदि-
दोगे? तब पिता ने कुद्ध हेकर कहा कि तुझे मौत के लिये दूंगा॥४i नचिकेता ने ससंकोच पिता से कहा कि- बहूनामेमि प्रथमो बहुंनामेमि मध्यमः । कि४ु- स्विंदमस्य कर्तव्यं चन्मयाद्य करिष्यति॥।५॥ [सरसार्थ:] (बहूनाम्) बहुत से शिप्यों में मैं (प्रथमः) सुख्य (एमि) समफ़ा जाताहूं।(बहूनां) बहुतसों में (मध्यमः) मध्यम (एमि) मानाजाता हूं (यंभस्य) मृत्यु का (किं. स्वित) क्ा (कर्तप्यम्) करनेयोग्य काम हैं (यत) जो (मया) मुझ से (अद्य ) आ्रमरात्र (करिप्यति) करावेगरय्। (भावार्थः) पिता की यह कर प्ात्ता सुनकर नषिकेता कहने लगा कि मैं बहुत से शिष्यों में मुख्य भीर बहुत सों में मध्यम हूं, किन्तु किन्हीं की पेक्षा निकृष्ट नहीं हूं, फिर मौत का क्पा काम अटका पड़ा है, जो वह भ्राज्ञ मुफ से करावेगा। ५॥ भनुपचंय यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथा परे। सस्य- मिव मंर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः॥६। [सरलारथे:] पिता ने उत्तर दिया कि (यथा) जैसे ( पूर्वें) पहिले लोग सृत्यु को माप्त हुवे हैं तम को (अनुपश्य) पीछे देख (तथा) ऐसे ही (परे) अंगले लोगों की गति को (प्रतिपश्य) भागे देख कि (मत्यः) प्रायी (सस्यम् दव) यवादि के सदूश (पच्यते) जीरो होकर मरता है (पुनः)
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मथमा वह्ली।
फिर (सस्म् इव) घान्य के ही सदूश (भाजायते उत्पन्न होता है।६।। (भावार्थ:) वाजश्रवस नचिकेता से कहता है कि हे पुत्र! पिछूले तथा अंगलेलोगों की गति (परियाम) को देख क्योंकि यह संसार अनित्य है। इसमें जैसा अन्त क्षेत्र में पक कर वृक्ष से अलग हो जाता है, ऐसे ही पराणी वद्ध एवं जीस होकर चोला छोड़देता है और जैसे फिर बीज क्षेत्र में पड़ कर उत्पन्न होता है, ऐसे ही गर्भाशय में आकर यह भी जन्म धारणा करता है।इस लिये तू इस अनित्य शरीर का मोह मत कर क्योंकि इस के नाश के पश्चात् दूसरा देह अवश्य मिलता है। ६।। वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिरब्राह्मणो गहान्।तस्यै तारछ्शान्तिं कुर्वन्ति । हर वैवंस्वतोदकम् ।।७।। [सरलार्थ:] हे (वैवस्वत !). विवसवान् के पुत्र यम ! आाप के (गृहान्) घरों में ( वैश्वानरः ) अप्रग्नि के ममान तेजसी (ब्राह्मराः) विद्या औौर तप से युक् (अरतिथिः) अभ्यागत (प्रविशति) आाया हुवा हि, (तस्य) ऐसे ब्रह्मधारी की सज्जन धर्मात्मा लोग इस सल्कारपूर्वक (शान्तिम्) प्रसन्नता को (कुर्वन्ति:) करते हैं,अतः मांपर पाद्यादि के लिये जलादि को (हर) प्राप्त कीजिये।। 9॥ (भावार्थः) इप प्रकार पिता के वाक्य को सुनकर 1
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पठोपनिषदि-
नचिकेता मृत्यु के द्वार पर पहुंचा, वहां पहुंच कर तीन रात तक आतिथ्य की प्रतीक्षा करता हुवा विना सक्ष जल के रहा। जब किंसी ने इस की बात न पूंछी तौ. भौथे दिन उस ने स्वयं मृत्युदेव से कहा कि ह वैवस्वत !* प्राप के घर में अब्मि के समान तेजस्वी, वर्धस्वी, ब्रह्म- चारी पतिथिरूप से आाया है। उस के पातिथ्य के लिये आाप जलादि का आ्ाहरस कौजिये,क्योंकि सज्जन पुरुष पतिथिसत्कार को अपना मुख्यकर्तव्य समझते हैं।।9।। भाशाप्रतीक्षे सङगत&ं सूनृ तात्चेष्टापूर्ते पुत्र- पशूच सवान्। एतदृङक्ते पुरुषस्याल्प- मेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे।।८।। [सरलार्थ:] (यस्य पुरुषस्य ) जिस पुरुष के (गृह) घर में (ब्राह्मरः) ब्रह्मषित् पतिथि (अ्र्रनन्नन् ) निशा- हार (वस्ति).रहता है (तस्य अतपमेघसः) उस अल्प- बुद्धि के (आाशाप्रतीक्षे) ज्ञात वस्तु की चाहना झाशा और भज्ञात वस्तु की कामना प्रतीक्षा कहलाती है। इन दोनों (सङ्गतम्) सत्सद्गति से होने वाले फल (मनृताम्) मिय वाणी (च) उस की निमित्त दयादि (उष्ापूते) यज्ञादि औ्रत कर्म के फल को इष और अनाथरक्षयादि * विवखान् नाम सूर्य का है उस का पुत्र मृत्यु को इस लिये कहा कि सूर्य हो अपने सदयास्त से आायुका प्र- दान करता है और एमीलिये उच को भादित्य भी कहते हैं।।
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प्घगा वह्नी। स्मार्त फर्म के फन,को पूर्त कहते हैं, इन दोनों को भी (च) और (सर्वान्) सब (:पुत्रपशन्) पुत्र और पशु ( एतव) इस सब को (वड्से) [ सक्कार न किया हुवा अपरतिथि] नाश करता है।। ८।। भावार्थ :- इस शोष में तो अत्तिषि का सत्कार नहीं फरते उन से प्रति अनिष्ट फल का निर्देश किया गया है। पारिषद्गया पुनः मृत्यु से कहते हैं कि जिस के घर से स्तिधि भूखा जाता है, उस के तक शुभ कर्मो के फल को भी वह अपने साथ लेगाता है। ऐसा ही अन्यत्र भी कषा है-गतिधिर्यस्य भ्ग्नाशर गृहात्मतिनिवर्तते। च तस्मे दुष्कृतं दृशवा पुरायमादाय गच्छति॥"मर्थ-प्रिस् के घर से प्ातिथि निराण छोफर लोटता है, वह उस का पुथय लेकर और पाप उसे देकर जाता है।। इस लिये इप पतिथि का यथायोग्य सत्कार करना चाहिये। शिससे कि सुकत का विलोप न हो ॥८। तिस्रो रात्रीर्यंदवात्सी गृहे मेऽनवनन् ब्रह्मन्न- तिथिर्नमत्यः। नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन ! स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व।।९॥ मरलार्थ :- (ब्रह्मन्।) हेव्रह्मवित् । आप (अतिथिः) आगमनतिथि से नियत न होने से अतिथि हैं सतएच (नमस्यः) नमस्फार करने के योग्य हैं (ते) आप के लिये (नमः) म्रणान (अस्तु) छ्ो। (मे) मेरा (स्वस्ति ) कल्याया'
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5 कठोपनियदि- (भततु) हो। ह (ब्रह्मन् !) आ्रास्ण। (यत्) जो श्राप (मे) मेरे (गृहे) घर में (तिसत्रः रात्रीः) तीन रात्रि (भनश्नन्) भक् वल के विना (प्रथात्सीः) वसे (तस्मात) इस कारस (म्रति) प्रति रात्रि एक २ के विसाम से (त्रीत् वरान्) तीन वरों को (वृगोष्व) अङ्गीकार करें॥ भाषार्थ :- पारिषदों के इसप्रकार निवेदन करने पर भृत्यु न चिकेताफो सम्बोधन करके कहता है फि-हे ग्रह्मन्। आाप प्र्तिथि होने से नमस्करणीय हैं, अतः आाप के लिये मैं प्रगाम करता हूं। भराप के आाशीर्याद से मेरा कल्ाया हो। पुनः अपने अपराध की क्षमा चाहता हुया मत्यु नचिकेता से यह साशीष करता है कि-हे ब्रह्मन्! आाप मेरे घर में तीन रात्रि बराबर (उपोपित) विना आाहार के रहे हैं, इस लिये आाप प्रतिरात्रि एक एक के हिसाब से तीन वर (जो मैं आप को देना चाहता हूं) अङ्गीकार कीलिये।। शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्यादीतमन्यु- गैतमो माभिमृत्यो। त्वत्प्रसष्टं माभिवदे- ट्प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥१०। सरलार्थ :- ( सृत्यो !) है मृत्यु । (गौतनः) गोतमगो- त्रीय मेरा पिता (ना अभि) मेरे प्रति (शान्तसङूल्प:) शान्तचित्त, (सुमनाः) मसनमन, (वौतमन्युः) विगस- रोष (यथा) जैसे (स्यात्) दोवे,(त्वत्म्रसएं) आप के भेजे
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मथमा बज्ी॥ P3
हुछे (ना भरभ्ति) मुफ को देख कर (प्रतीतः संन्) ल्धस्मृति होकर कि यह वही मेरा पुत्र नचिकेता है, जिस को मैंने मृत्यु के पास भेजा था बोले। (एसन) यह ( त्रयाणं ) तौन में से (ग्रथमम् ) पहिला (वरम्) वर (वरो) चाहता हूं।। १०॥। साषार्थ :- मृत्यु के सक वचन को सुन कर नचिकेता ने कहा कि जैसे मेरा पिता सुझ पर प्रसन्नं औौर कृपालु हो जावे,सर्थात इस बोच के उत्पन्न हुवे क्रोध को त्याग पार पूर्वषत वर्तने लगे और भाप के भेजे हुवे मुझ को परचान कर कि यह वही मेरां पुत्र नचिकेता है, जिस को मैंने सृत्यु के पास भेजा था, मीतिपूर्वक सम्भाषण करे और कुशल क्षेनादि पूंछे।यश मैं उन तौन वरों में से (जो भाप सुझे देना चाहतेहैं) पहला वरभाप से मांगता हूं।।१०।। यथा पुरस्ताद्भविता प्रतीत औद्दालकिरारु- णिर्मत्प्रसृष्टः। सुखछरात्रीः शञयिता वीतम- न्युसत्वां ददशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ।।११। सरलार्थ :- (शौहालकिः) उद्दालक वंशी(भारुणिः)झरु. या* का पुत्र तेरा पिता (यथा) जैसा (पुरस्तात) पहले था वैषा छो (मत्मसष्ः) सुफ से प्रेरित वा बोधित होकर (मतीत: ) तुझ पर विश्वास करने वाला (भविता) अवश्य होगा, (रात्री:) शेष रात्रियों में भी (सुखम् ) * यह वाजश्रंवा का दूसरा नाम था
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.कढ़ो पनियदि- सुखसे (शयिंता) मोवेगा औौर(वौतनम्युः) विगंतरोष हो कर (स्वाम्) तुंकको (मृत्युमुखात) जौत के मुंह से (ममुक्म्) कुटा हुवा (दददशिवान्) देखेग:॥ा.११॥ x भावार्थ :- इस) मार्यना को सुत कर मृत्यु नचिकेता से कहता है कि तेरा पिता जिया, पहले तुफ से र्नेह आाव रखता था बेपा हो अब-भुफ मे प्रेरितः होकर तुफ सपरद्यालु होगा और मब विगतरोप होंकर शेव रात्रियों में सुखपूं्वक सोवेगा और तुझे मौत के मुंह से छुटा हुवा पाकर अत्यन्त दर्षित होगा ii ११-।।. :सवर्गे लोके न भयं किश्नास्ति न तत्र त्वंन जरया विभेति। उभे तीत्वीडइानायोपि पासे शोकांतिगो मोदते स्वर्गलोके.।१२।। चरलार्थ :- (सवगें लोके), स्वरगलोक=मोक्षमें (क़िज्ञुन) कुछ भौ (भयम्) भय, (न अस्ति) नहीं है, (न तत्र) न वहां पर (त्वं) तू=मृत्यु है और (नं) न कोई (जरया) बुढ़ापे 1_ से (बिभति) हरता है,(अशनांयापियासे) भूख औरप्यास (चंभे) दोनों को (तौतव) तरफर(शोकातिगः) शोकसे वर्जित पुरुष (स्वर्गलो के) मोक्ष में (मोदते)भानन्द करता है।।२।। :क्षावार्थ :- नचिकेता द्वितीय वर की याचना करता हुया मृत्युमे कहताहै कि सवर्गलोक में कुबमी मय नहीं है। वहां पर न रोंग होंहोते हैं और न बुढ़ापा ही किसी को सताताहै औरतू-मृत्यु भी वहां पर आाकमय नहीं करता।
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प्रथमा वज्ी। ११ एस स्वर्गलोक्ष में जीवात्मा भूस प्यास, शीत सप्पा, सुख दुःख इत्यादि इन्हों को जीत कर शोफरहित हो आानन्द पारता है॥ १२ ॥ स त्वमग्निछठुस्वर्ग्यमध्येपि मृत्यों! प्रबूहि त४ श्रद्दघानाय मह्याम्। स्वर्गलोका पमृतत्वं भन- न्त एतद् हितीयेन वृणे वरेण ॥ १३॥ सरक्षार्थ :- (मृत्यो।) हे मृत्यु !(पः त्वम्).सो तू (स्वर्ग्यंम्) स्वर्ग के साधनभूत्त (अग्निम्) प्वनाग्नि क्षी ( अध्येषि ) जानता है (तम्) उस को (त्रह्धानाय) श्रद्गा रखते हुवे (नह्यम्) मेरे लिये ( मन्रूहि) वर्सन कर [जिस के यथायोग्य प्रानुष्ान परने से] (स्वगलोकाः) स्वर्ग के अधिकारी अन (अमृततत्वम्) शमरत्व को (अजन्ते ) सेवन करते हैं। ( एसद्) यह (द्वितीयेन) दूसरे ( वरेपा) वर से (दृसे) नांगता हूं।१३ ॥ माधार्घ :- नंचिकेता पुनः कहता है, कि तम स्वर्ग के साघनभूत स्ानाग्नि को आप भले प्रफार जानते है। कृपया मुफ श्रद्धालु के प्रति भी उस का उपदेश कोशिये,िस:से मैं भी अमरत्व को म्राप्त होफर स्वर्ग का अधिकारी बनूं। यह मैं दूसरे वर से मांगता हूं। १३,॥ .प्र ते त्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्तिन्न- चिकेतः प्रजानन्। अ्नन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेनन्निहितं गुहायाम्॥१४॥
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कठोपनिषदि- सरलार्थ :- (नचिकेत:) हे नचिकेताः (स्वग्यम्) स्वर्ग के साधनभूत (अग्निम्) ज्ञानातनिको (मजानन्) जा- गता हुषा (ते) तेरे लिये (तस) तस विद्या को (म्रंब्र. वौमि) मैंकहता हूं (मे) मेरे वचन क्ो (निबोध) सुन वा जान (परथो.) इस के अनन्तर (त्वम् ) तू. (एनम्) इस अग्नि की (अनन्तलोकापिम्) विविध सथानों में म्रापत करानेवाला (प्रतिष्ठाम्) जगत की स्थिति का हेतु, (गुहायाम्) बुद्धि में (निहितम्) स्थित वा व्याप्त (विद्टि) जान ॥ १४ ॥ भावार्थ :- मृत्यु नचिकेता से कडता है कि मैं जाना- रिनको. जिस का सुझे पूर्ण मनुभव है, तेरे म्रति उपदेश करता हूं तूं सांवधांन शेंकर सुनाजिस अग्ति को जानने मे मनुष्य पतिवोस्य वा अन्तरिक्षस्य भनेक स्थानों में अनायासजा आसकता है और जो सार् जगत् की स्थिति का हेतुहै। यह बुद्धिसें जाना जाता है.।।१४।। लोंकादिमग्नि तमुवाच तर्मै या इष्टका यावतीर्वा यंथा वा। स चापि: तत्प्रत्यवदद्यथोक्त मथास्य मृत्यु: पुनरेवाह तुछः ॥१५॥ सालार्थ :- (तस्मै) उस नचिकेता के लिये (लोका- दिम्) सृष्टि की आदि में उत्पन्न अथवा दर्शन के हेतु(वम्) सस (भग्निंम्) अग्नि का (उवाष), व्याख्यान किया औौर सस अग्नि से सिंट् होने वाले मानय म्ादि मे
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मंथभा वही।। १३ जो (बा) या (यावतीः) जितनी (वा) या (यथा) जिस मफार से (सष्टकाः) इटें चिननी चाहियें या जिस म्रफार .:
अग्निचयन फरना चाहिये, यह सब वर्सान किया (स प. अपि) उस नचिकेता ने भी (यथा) जिस प्रकार(चक्म्) मृत्यु ने सपदेश किया घा (तत्) तस फो (मतिअवदृत) प्रत्याक्ष अनुवाद करके सुनाया (अथ) इस के अनन्तर (शंस) इस के ऊंपर (मृत्यु:) मृत्यु (तुष्टःसन्) प्रसन्न शेता हुआ (पुनः एव) फिर भ्ी (झाइ) बोला।। नांवार्थ :- उपनिपल्फार कठऋषि कहते हैं कि मृत्यु नें नचिकेता के मति उक अग्ति का सविस्तर व्याख्यान किंया और ज्ञानयन्न के लिये उपयोगी वेदि तघा अग्नि- चयन की विधि सी मतलाई,जिस को उस ने घारण करके प्रत्यक्ष अनुवाद भी कर दिया। जिस से मसन छोकर सृत्यु फिर उस से कहता है।। १५.॥. तमन्नवीत्परीयमाणो महात्मा वरन्तवेहाद्य दृदामि भूयः तवैव नाम्ना भविताऽयमग्निः सृङनं चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १६ ॥ सरलार्थ :- (महात्मा) उद्भाव से भावित मृत्यु (मौथ- माय:) प्रसत होकर (तम्). उस नचिकेता से (अव्- वीत) घोजा फि(भूयः) फिरभी (इद) इस टूसरे वर के म्सङ्ग में (तव) तुम्हारे सिये (गद्य) इस समय
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१४ कठोपनियदि- (वरम्) वर को (ददामि) देता हूं (प्रयम्) यह दि- घान किया हुआ (भग्मिः ) भव्ति (तव, एव) तेरे ही (नाम्ता) नाम से मसिद्धु (भविता) होगा (घ). और (इमाम्) इस (अनेकरुपाम् ) चित्र विचित्न (सुङ्काम) माला वा प्रतिष्ठा को (गृहास) सवीकार कर ।१६। भावार्थ :- नचिकेता की योग्यता से मसन् होकर मृत्यु उस से कहता है कि मैं इस दूसरे वर के साथ ही एक और घर तुझे देना चाहता हूं और यह यह है कि यह अ्स्ति जिस का मैंने तेरे मति उपदेश किया है, तेरे ही (नाचिकेत) नाम से प्रसिद्ध होगा। अव तू मेरी दो बुई इस प्रतिष्ठा वा माला को ग्रहणा कर ॥१६॥ त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत्त- रति जन्ममृत्व। ब्रह्मजज्ञन्देवमीडयं विदि-
संरल्षार्थ :- (त्रिमाधिकेतः) नचिकेता के प्रति जिस का विधान किया गया वह "नाचिकेतै अग्ति कहलाता है उस को जो तीन वार चयन करे वह पुरुष ( त्रिभि:) तीन से (सन्धिम्) सम्धन्ध को (एत्य) ग्राप्त शेकर (त्रि- कर्मकृत) तीन धर्म करने वाप़ा (जन्ममृत्य) जन्म और मररा के (तरति) पार होजाता है ( ब्रह्मनत्तम्) वेद रूप ज्ञान के उत्पन्न और धारण करने वाले (ईड्यम) स्तुति के योग्य (देवम्) परमात्मा को (विदित्वा) नान
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प्रथमा वल्ली।। १५ कर और (निचाय्य) निश्षय करके (अत्यन्तम्) अतिशय (शान्तिम्) शान्ति को (सृति) माप्त होता है॥। १७ ।। भावार्थ :- ब्रस्मपयं, गृहस्य और वानप्रस्य इन सीन साश्रमों में आष्वनीय, गाईपत्य और दक्षिसाग्नि नाम से ३ अस्तियों को चयन करने वाला पुरुप गाता, पिता एवं मवार्य एन तीन उमदेष्भों के सत्सङ्ग तथा उपदेश से वस्, अध्ययन गौर दान इन तीन कर्गों का यथायोग्य मनुछान करता हुबा जन्म और मरय के बन्घनों को शिथिन करता है, तत्पश्वात् मध्ानमय ब्रह्म को जान कर परमशान्ति (सुक्ति) का अधिकारी, बनता है॥११॥ त्रिणाविकेतस्त्रयमेतहिदित्वा य एवं विह्ां- रिचिनुते नाचिकेतम्। स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ।।३८। सुरकषार्थ :- (यः) जो (विट्वान्) त्ञानवान् (त्रिणाधिकेतः) उक विधि से तीनवार चयन फरने वाला पुरुप (एतत, त्रयम्) इस तिगह्ठ को ( विदित्वा) न्ञान कर (एवं) इस प्रकार (नाधिकेतम्) नाधिकेत अग्ति को (चिनुते) थयन करता है (म:) वद (मृत्युपाशान्) भौत के बन्धनों को (पुरतः) भागे से ( प्रयोद्य) बिन भिन्न फर (शो. कातिग:) शोक से रह्षित होषर (स्वर्गलोके) स्वर्गलोक में (मोदते) आानन्द फरता है॥१८ ॥
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१६ कठो पनियदि- भावार्थ :- शो,मनुष्य चक्त तीनों आाश्रमों में तम तीनों शिक्षकों से ज्ञान म्रास्त करके ठक् तीनों प्रकार के कभों का यथाविधि सेवन करता हुआ नाचिकेत भग्ति का सघ्ल्यम करता है, वह,भागे होने वाले मौत के बन्घनों तोड़ कर स्वर्ग में आनन्द करता है॥ १८ ॥ एष तेड्ग्निर्नचिकेतः ! स्वर्ग्यो यमवृणीधा दि- तीयेन वरेण। एतमग्निन्तवैव प्रवक्ष्यन्ति ज- नासस्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीज्व॥। १९ ॥ सरलार्थ :- (नचिकेतः ) हे गचिकेता i (एपः) यह (पग्निः) प्ानाग्नि (स्वर्ग्यः) सवर्ग का उपयोगी (ते) तुम्हारे लिये कहा गया (यम् ) जिस को (द्वितीयेन वरे) दूमरे वर मे (अवृशीयाः) तुमने मांगा घा ( ए- तम्) इस (भग्तिम्) द्रग्मि को (तव एव) तुम्हारे ही नाम से (जनासः) मनुष्य लोग (प्रवक््यन्ति) क- हेंगे। (नचिकेतः) हे नचिकेता । (वृतीयम् वरम्) ती- सरे वर को (वृशोष्ष) मांग ॥१९॥ भावार्थ :- मृत्यु कहता है कि ह नचिकेत: ! यह स्वर्ग का सोधान भप्रव्ति, जिस को तैंने दूसरे वर से मांगा था, मैंने तेरे लिये दिया और इस अग्ति को तेरे ही नाम से प्रसिद्ुभी किया। श्रध तू तौसरा वर मांग ।१९॥ येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके
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.मथमा वह्ली,॥। PS नायमस्तीति चैके। एतदिद्यामनुशिष्ट- हत्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥२०।। सरलार्थ :- (मनुष्ये म्ेते) मनुष्य के मरने पर (झ• यम्) यह आात्मा (भस्ति प्ति एके ) है ऐसा कोई मानते है (घ) और ( न अस्ति इ्ति, एके) नहीं है, ऐसा अनेक लोग मानते हैं, इस प्रकार (या) जो (इयम्) यह (विचिकित्सा) सन्देह है सो (त्वया) आप से (भनु. शिष्टः) उपदेश पाया हुवा (महम्) , मैं ( एवत) इस मात्मसत्ता फो (विद्याम्) जानूं। (बराणाम्) वरों में (एषः ) यंह (वृतीयः ) तीसंरा (वरः) वर है॥२०॥ भावार्थ :- उता दोनों वरों को पाकर नचिकेता मृत्यु से पाहता है कि मनुष्य के मरने पर जो यह संशय होता है कि देहादि से व्यतिरिक् कोई आात्मा है या नहीं? इस को मैं झाप से उपदेश पावर जागना चाहता हूं। यही मेरा तौसरा वर (अभीष्ट) है॥ २॥ देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुवि- ज्ञेयमणुरेष धर्म: अन्यंवर नकिकेतोवृणीष्व मा.मोपरोत्सीरति मा सजैनम्॥२ ॥ सरलार्थ :- ( पुरा) पहले (अत्र) इस भ्ात्मिक वि- षय में (देवैंः अपि) देघताओं ने भी ( विचिफित्सि- तस्) सन्देह किया था (हि) निश्चय (एषः) यह
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कठोपनिवदि-
आात्मज्वानरूप (धर्मेः) धर्म विषय (अयुः) प्रति सूक्ष होने से (सुविज्ञेयम् ) सुगमता से जानने योभ्य (न) नहीं है, अत एव (नचिकेतः) हेनचिकेता ! तुम (अन्यं वरम्) औौर वर को (वृगीव्व) मांगो (मा) मुझ को ( मा, सपरोदसी:) ऋशी के तुल्य मत द्या ओो (मा) मेरे मति (एनम्) इस वर को (अति सन्न) त्याग दो ॥न१॥ भावार्प :- इस तीसरे वर को सुन वार सृत्यु नधि- केक्ा को परीक्षा करने के लिये कि यह आात्मम्ान का अधिकारी है वा नहीं ? सस से कहता हैकि-इसी विषय पर पहले बड़े २ विद्वानों के मन्देह और वाद होचुके हैं, वे भी पूर्णरूप से इस की मीमांसा न कर सके,क्योंकि यह विषय भततिसूद्षम होने से दुर्श्ेय है और यह भी सम्मव नहीं कि इस में प्रवृत्त होने से म्रत्येक मनुष्य कृनफार्य हो हो जावे। अतएव हे नचिकेता! तुम और कोई वर, जिस के फल में सन्देह न हो, मुझ से गांगो। मुझे अधमररा के समान मत दृबाओ और इस वर की इठ छोड़ दो।। २१॥ देवैस्त्रापि विचिकित्सितं किल त्वञ्च मृत्यो ! यन्न सुविज्ञेयमात्थ। वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित्॥।२२।। सरलार्थ :- ( मृत्यो 1) हे अन्तक । (भत्र) इस विषय पर (देवैः अपि) बड़े २ विद्वानों ने भी (विचिकितिसितम्)
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मथना घली॥ १९
सन्देह का मन्वेषण किया है (त्वं घ करिल) शीर तू भौ (यत् सुधिशेयं न) जो सुगनता से जानने के योग्य नहीं है ऐसा (भात्य) कहता ह(अस्प)दम विपय का (पक्ा)कछने वाना (त्वादृक् ) तेरे तुतम (अन्यः) शीर (न लभ्यः) नहीं मिल सफता (घ) फर (एतस्य) इस घर को (तुल्यः)वरा- यर (अन्यः पाषधित् पर: न) सौर सोई चर नहीं है।।२२।। भायार्ष :- उक् वर्शन सुन पार नचिकेता घोला सि- हे मृत्यु ! जय बड़े २ विहानों ने इस विषय की मोमांसा और पलोधना सी है औीर तू भी उसफो अततिसूक्षम शीर दुशेय बतलाता है इसीसे उसका परमोत्तम औौर सर्वोपरि होना धनुमाग किया जाता है और सेरे समान उपदेष्ा मुझे कहां गिलेगा? जो ऐसे गहन औीर पठित विपयको मेरे हृदयमुम शीर सुहिगोघर गरेगा। शतः मेरी सम्मति में इम के बराधर और फो्ट घर नहीं है॥। २॥ शतायुपः पुत्रपौत्रान् वृणीप्व बहून् पशून हस्तिहिरण्यमशवान्। भूमर्महदायतनं वृ- णीष्व स्वयं च जीव ह्ारदो यावदिच्छसि।।२३।। मरकार्थ :- (गतायुपः) सी वर्ष पर्यन्त जौने वाले (पुत्र- पौत्रान) वेटेपोशों को (वृगीष्य) मांग घीर (बहून् पशून्) महुनमे गाय बैल आदि पशु(शरश्वात्) घोड़े (इस्तिदिरयायम्) हाथी और सुधर्र सादि तथा (भूमेः) पृथिवी के (नहत) बड़े (आायतनम्) माएउलिक राज्य क्षो (वृशीष्त) नांग (खयं
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२० कठोपनिषदि-
घ) और तू भी (यावत्) जितने (शरद्ः) वर्ष (इच्छसि) चाहता है (जीव) जीवन घारया कर ।। २।। भावार्थ :- नचिकेता का तद्विषयक शाग्रह सुनकर फिर भी मृत्यु उसको मलोभन देता हुवा कहता है कि-दौर्घ- जीवी पुत्र, पोत्र,गौ, शश्व,हस्ती सादि उत्तम २ पशु, सुबर आादि बहुमूल्य पदार्थ, पृथिवी के एक मर्डल का राज्य; यह सब मुझसे मांग,मैं तुझे दूंगा। यदि इस में यह शङ्का हो कि अपने बिना यह सब तुच्छ हैं तो अपना जीवन भी जिसना चाहता है, मांग ।। २३।। एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिर- जीविकां च। महाभूमो नचिकेतस्त्वमेधि कामानान्तवा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥ सरलार्थ :- (यदि) जो (एतत्) इस उक वर के (तुल्यम् ) बराबर (वरम्) वद्यमाय वरको (मन्यसे) मानता है तो (वित्तम् ) ऐश्वर्य के साधन धन (च ) औौर (चिरणीविकाम्) सदा की झाजीविका को (वृ गोष्व) मांग । ( नचिकेतः ) हे नचिकेता । (त्वम्) तू (नहाभूमौ) बड़ी पृथिवी पर (एघि) बढ़ने वाला हो अर्थात् सार्वभीम राज्य को म्राप्त झे (त्वा) तुफ को (कामानाम्) सम्पूर्णकामनाओं का (कामभाजम्) भोग करने वाला (करोमि) करता हूं॥ २४ ॥ भावार्थ :- पुनः मृत्यु कहता है कि यदि तू चक्र वर के तुल्य सदर की झजीविफ्ा और प्रभूत धन को समझता है
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मथमा रली॥ २१
तो उस को भी मांग और यदिइन सब से बढ़ कर सार्वभीम राज्य का अभिलाप है तो वह भी मैं तेरे लिये दे सकता हूं और तेरी जो कामना हो उसे पूर्ण कर सकता हूं॥।२४।। ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके स्वीन् कामाइछ- न्दतः प्रार्थयस्व।इमारामाः सरथाः सतूर्या नही- हशा लम्भनीया मनुष्यैः । आ्रभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो! मरणं मानुप्राक्षीः।२५। सरलार्थ :- (मत्यलोके) पृथिषी में (ये ये) जो जो (कामाः) कामनायें (दुर्भाः) दुर्लभ हैं उन (सर्वान्) सम (कामान्) कामनाओं को (इन्दतः) यथेष्ट (मार्थयस्व) मांग। (इमाः) ये (सरथा:)रथादि यानों सहित (सतूयाः) वादित्रादि सहित (रामा:) रमगीय स्त्रियां हैं (आभिः) इन (मत्म्रताभिः) मेरी दीहुई युवत्ियों से (परिचारयरव) अपनी सेवा शुभ्नषा कराओ। (द्ि) निर्सन्देस (ईट्ट- शरा:) ऐसी स्त्रियां (मनुष्यैः) साधारण सनुष्यों से (न सम्मनीयाः) अम्नाप्य हैं। (नचिकेतः) हे नचिकेता ! (मर- गाम्) मीत को ( मा अनुपाक्षीः) मत पूंळ॥२॥ भावार्थ :- पुनः मृत्यु कहता है कि जो २ कामनायें इस मर्त्य लोक में दुष्माप्य हैं, उन सब को यथारुचि मांग सौर ये विविध यान एवं वादित्रादि सहित जो मनोहारियी खितरयां हैं इन के साथ रमगा कर। ऐसी रूपवती
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२२ कठोपनिषदि-
खियां मनुष्यों को दुर्लभ हैं। हेनचिकेता! ऐसे दिव्य पदा- रथों को छोड़ कर मौत का म्रश्न क्यों करता है? ॥। २५।। इबोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्सवेन्द्रियार्णां जश्यन्ति तेजः। अपि सर्वै जीवितमल्प- मेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६ ॥। सरलार्थ :- ( शन्तक !) हे मृत्यु ! (यत) क्योंकि (,श्वोभाया:) कल ही फल (मर्त्यस्य) मनुष्य की (स- बैन्द्रियागाम्) सब इन्दिरयों के ( एतत्) इस (तेअः) वेन का (जरयन्ति), नाश करे देती है। (स्वस् भपि जीवितम्) सब जीवन सों (अल्पम् एव) अल्प ही है अतएव म्राशीतेरेही(वोबाः) वाइन रहे[ और] (नृत्यगौते) नाघना, गाना भी (तव) तेरा ह रहन६।। भावार्थ :- इस प्रकार बहुविघ मलोभित किया हुया भी नचिवोतां अपने शभीष्ट वर को नहीं त्यागसा और सृत्यु से महता है कि यह सब कल ही कल में वीतने वाले समय, इन्द्रियों की शक्ति को नष्ट करने वाले हैं औौर सनस्त जीवन भी चाहे उस कौ पूर्स अवधि ही क्यों न हो, मुक्रिसुख की शपेक्षा अल्प ही है क्यों कि यह सब मिलने-पर भी अन्त में सौ तेरे ही आधीन रहना पड़ा औौरतू ( सृत्यु) ही शिर पर नाचता रहा ।।२६।। न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्त-
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मथमा वल्ली ॥ २३.
मद्राक्ष्म चेचवा। जीविष्यामो यावदीशिष्य- सि त्वं वरस्तु मे वरणीय: स एव ॥ २७ ॥ सरलार्थ :- (मनुष्यः) ग्राणी (वित्तेन) धन से (न सर्पगीयः) वृप्त नहीं छोपयता (चेत)जो (त्वा) तुभ सौत जो (झद्राक्षम) एन ने देखा तो (वित्तम्) ऐश्वर्यभोग क्षो (लप्स्यामहे) मास होंगे(यादव)गध तफ (त्वम्) लू (ईशिष्यसि)चाहेगा तंख तक (जोधिष्यामः) जौवेंगे शतः (ने) मुझ को (वरः तु) चर तो (स एव) वह हो (वरणीयः) मांगना है।२। भावार्ष :- पुनः नधिकेता कहता है कि धन से मनुष्य कौ वृप्ति नहीं होली और यदि तुक को देखेंगे तो धन मिलेगा, इस सिये सुके धन की रुपषा नहीं है सौर जोवन सौ जब सध तू (मृत्यु) न हो तभी तक है, सतएब इसकी भौ झापाइक्षा नहीं है। वर तो मेरा शेवल वही मापणीय है, णिस की याचना मैं कर चुष्ा हूं।। २। मजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यःक धःस्थः प्रजानन्। अभिध्यायत्वर्णरतिप्रमो- दानतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥। सरलार्थ :- (पजीर्यताम्) नर से जोर्स न होने वाले (अमृतानाम्) युक्ञ पुरुषों क (सपेत्य) मापत होकर (कघःस्यः) 'पृंथिवी के अघोभाग में स्थित (भर्त्यः) मरया- धर्मा मनुष्य (जीर्यन्) शरीरादि के नाथ का अंनुभव
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२४ कठोपनिषदि-
करता हुआ (वर्गारतिप्रमोदान्) सुन्दर वर्सा औरसुरत- जन्य विनश्वर सुखो को (शमिध्यायन्) शोघता हुवा (कः) कीन (म्जानन्) जानता हुवा (भतिदीर्घे जीवते) बहुत बढ़े जीवन में (रनेत) रमरा फरे ।।२८।। भावार्थ :- नचिकेता पुनः कएता है कि नरकरषित मुक पुरुषों को पाकर एवम् सांसारिक सुखभोगों की षिनश्वरता को देखता हुवा कौन ऐेसा निकृष्ट दशा में स्थिल माणी है, जो सुक्ति जैसे उचकक्षा के सुख को छोड़ कर पततिदीर्घक्ालीन जीवन की (नो नाना प्रकार के आाध्या- त्मिक, सधिनौतिष और झाधिदैविक दुःखेर से परिपर्य है) इच्छा करे।। २८ ।। यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्प- राये महति ब्रूहि नस्तत्।योऽयं वरो गूढमनु- प्रविष्टो नान्यन्तर्मान्नचिकेता वृणीते ॥२९॥l सरलार्थ :- (मृत्यो I) हे मृत्यु ! (यस्मिन्) जिस भ्ात्म- ज्ानविषय में (इदम् ) भात्मा कोई है वा नहीं ? यदि है तो कहां है? और कैसा है? उत्यादि प्रकार से (वि- षिकित्सन्ति) सन्देह फरते हैं (यत्) जो (महति) अनन्त (साम्पराये) परमार्थ दशा में मापत किया जाता है उस आात्मज्ञान का (नः) हमारे प्रति (ब्रूहि) उपदेश कर (थः) जो (अयम्) यह म्रसङ्गप्राप्त (गूढम्) गुप्त (वरः)
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मथमा वही।। २५
यर (अनुमरविष्टः) मेरे मन में समाया हुआा है (तर्मात्) उस से (शन्यम्) भिन्न वर को (नचिकेता) मैं (न वृणीते) नहीं चाहता॥। २९। भावार्थ :- नविवेतर पुनरमि कहता है कि से मृत्यु ! जिस आत्मा के विषय में लोग अनेय प्रसार से सन्देह करते है शीर जो केवल पारमार्थिक दशा में जाना जाता है, उसी सात्मतत्य का मेरे म्रति उपदेश कर। यह मेरा गढ़ सभीए, जो मेरे हृदय में समाया हुशा है, इस से भिन्न और फोई घर मैं नहीं चाहता॥२९ ॥ इति कठोपनिपदि प्रथमा वल्ली समाप्ता -- अथं द्वितीया वल्ली अन्यच्छे योऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पु- रुपकठसिनीतः। तयोःश्रेयआाददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थीद्य उ प्रेयोवृणीते॥ १ ॥ सरनार्थ :- (श्रेयः) निःश्ेयमरूप फल्याय का मार्ग (अन्यत्) और है ( उत ) और (प्रेय:) अभ्युद्यरूप रोचक मार्ग (अन्यत् एव)औरही है (ते) वे श्रेय औौर प्रेय (सभे) दोनों (नानार्थे) भिन्न २ मयोजन वाले (पुरुषम्) मनुष्य को (सिनीतः) वासनारूप रज्नु में बांधते हैं (तयो:) उन दोनों में मे (श्रेयशाददानस्य) श्रेय ग्रहर
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२६ कठोपनिषदि-
करने वाले फा (साधु) कल्याण (भषति) दोक्षा है (यत) .1 औौर जो (प्रेघः) प्रेय को (वृसीते)ग्रहस परता है वह (अर्थात) परमार्थ रूप प्रयोजन मे (हीयते) भ्रष्टहो जाता है ।१।। भाषार्थ :- जब ऐसे २ मलोभन देने पर भौ नचिकेता अपने सङकूसप से न हटा, तघ मृत्यु उस को आात्मज्जान का अधिकारी समक कर उपदेश करता है फि-हे नषिकेता! इस संसार में मनुष्यों के लिये दो नार्ग हैं। १ श्रेय, न प्रेय। इन्छींको प्रवृत्तिमार्ग औरर निवृत्तिमा्ग भी कहतेहैं। श्रेय सार्ग-जिस में चलने से मनुष्य का कल्यारा होता है, प्रेय मार्ग से-शिस में फंस कर मनुप्य लोलुप औौर अघीर हो जाता है, अत्यन्त विशक्षण है। इन में से प्रेय कषो ग्रहय करने खाला श्रेय से व्धित रहजाला है।।१। श्रेपश्च प्रेयशच सनुष्यमेतत्तौसन्परीत्व वि- विनक्तिधीरः। श्रेयो हिधीरोऽनिप्रेयसो वृ- णीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते॥ २ ॥ सरलार्थ :- (श्रेयः) जरोघक परन्तु कल्यारा का मार्ग (च) और (ग्रेय:) रोघक परन्तु अफतयारा का मार्ग यह दोनों (मनुष्यम्) मनुष्य को (एतः) म्राप्त होते हैं (घौरः) बुद्धिमान् (तौ) उन दोनों को ( सम्परीत्य) सम्पक प्राप्त शेकर (विविनक्ि) विवेचन करता है (धीरः हि) विद्वान् ही (प्रेयसः) प्रवृत्ति मार्ग से (श्रेयः) निवृत्ति मार्गको (अभिवृणीते) सब और से ग्रहया करता है (मन्दः)
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दितीया वसी। 29
भूरखं (योगक्षेमात्) धनादि के उपार्जन और रक्षरा से (भेपः) प्रवृत्ति मार्ग की ही (पृमीते) खवीकार फरता है।।।। प्राषार्थ :- यद्यपि श्रेय मार्ग कष्टवाध्य होने,से आदति मैं अरोचदा और नीरर मा मतीत होता है,तटिरुट्ठ प्रेय सुखमाध्य ऐोने से प्रथम रोघक औौर सरस प्रतीत होता है, तथापि वुद्धिमान् पुरुष"यत्तदये विपमिय परिणामे मृतोपममू"जो पछसे विष के ममान प्रतीत होता है, परि- गाम में वही अमृत के तुल्य हो जाता है। इस के तत्व क्षी जानसा सुवा परमार्थ के झानन्द का शनुभव पारता है, परन्तु मन्दबुद्धि जन पहले दी सुखालास में लिप होयर सदा के लिये वास्तधिफ सुख से छाथ धो बैठता है॥२।। स त्वं प्रियान् प्रियरूपांशच कामानभिध्या- यन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षी:। नैताथसङ्गगं वित्तमयी- मवाप्तों यस्याम्मज्जन्ति बहवो मनुष्याः।।३।। नुर्सार्थ :- ( गचिकेवः !) हे नधिकेता । (स त्वम्) सो तैने (म्रियान्) पुत्र पौन्रादि (मियरूपान्)सुन्दरी फामिनी आादि (कामान्) भोगों को ( अम्निध्यायन्) उन की पसारता को विवार कर ( छत्यस्नाक्षीः) छोड़ दिया (एताम्) इम भोगैश्वर्व्यरूप (सङ्कास्) शुद्गतता में (न पवाप्ः) नहीं फंसा (यस्याम्) जिस में (बहवः) महुत (मनुप्या) मनुष्य (मज्जन्ति) फंस जाते हैं।। ३। भाषार्थ :- मृत्यु कहता है मि-ऐे नचिकेता। तैने सांसा-
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कठोपनिपदि-
रिक्र सुख भोगों को अनित्य औीर ससार समझ कर त्याग दिया। अर्थात प्रेय नार्ग का, जिस में सांमारिक मायः मनुष्य फेंसे रहते हैं, अनुसरग नहीं किया। इस लिये तू भ्रात्म- ज्ञान का अधिकारी है।३॥ दूरमेते चिपरीते विपूची भविद्या या च वि- देति ज्ञाता। विद्याऽभीप्सिनन्नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवो लोलुपन्त ।।४ ॥ सरलार्थ :- (एते) चक् दोनों श्रेय और प्रेय मार्ग (वि- परीते) परस्पर विरुद्ठ (विपूची) वैधर्म्यसूचक (दूरम्) भिन्न २ हैं [विद्वानों ने उक दोनों भार्ग] (अविद्या या व विद्या इति) अषिद्या और विद्या के नाम से (जाता) जाने हैं। मैं (नचिकेतसम् ) तुझ नचिकेता को ( षि- द्याभीप्सिनम्) विद्या का चाहने वाला अर्थात् श्रेयःपथ- गामी (मन्ये) मानता हूं इस लिये कि (त्वा) तुझ को (बहवः कामाः) बहुत सी कामनायें (न लोलुपन्त) मलोमित नहीं कर सकों४॥। भावार्थ :- मृत्यु कहता है कि जैसे दिन रात, सुख दुःख इत्यादि परस्परविरुद्ध होने सेमहान् सन्तर रखते हैं। इसी प्रकार उक श्रेय और प्रेय नार्ग भी परस्पर प्रति- कूल हैं। विद्वान् लोग इन्हीं का विद्या औौर अविद्या के नाम से निर्देश करते हैं। तुफ को बहुत सी कामनायें(जो अविद्या से उत्पन्न होती हैं) प्रेय मार्ग में न लेजा सकीं,
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हितीया वह्ली॥ २९
इस िये मैं तुझे विद्यानुरागी सर्थात श्रेयःपथानुगामी समकमा हं॥४॥ आविद्यायामन्तरे वर्त्तमानाः स्वयन्धीराः पण्डितम्मन्यमाना:। दन्द्रम्यमाणा: परिय- न्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्ा:।।५।। नरसार्थ :- (सविद्ायाम् भन्तरे/अविद्या के बोध में (वर्तमाना:) पढ़े हुचे (स्वयं) अपने को (धीराः) धीर और (पगिडतं मन्यमाना: ) पगिहत मानते हुवे (द. नट्रम्यमागा:) कुटिलपथगामी प्रथवा दूघर उधर घूमते हुवे ( मृढराः )वित्िप्तचित्त'(मन्घेन एव नीयमाना: यथा सन्धा:) जैसे अन्घेसे सेजाये गये सन्धे(परियन्ति)घूमतेहैं।५। प्रावार्थ :- प्रेयमार्ग में शनुधावन करने वाले कामुफ पुरुष वद्यपि चारों ओर से अविद्यामें पसेहुवे होतेहैं, तथापि अपने को धीर औौर पसिडत मानते हुवे कुटिल पथ में प्रवेश करते हैं और मोह के धक्र में पड़कर इूधर सधर घमते हैं। ऐमों के शनुयायियों की वही दशा होती है, जो अन्धे के पीछे घल्षने वाले प्रन्थों को ॥। ५॥ न साम्परायःप्रतिभाति वालं प्रमाद्यन्तं वित्त- मोहेन मूढम्। भयं लोको नास्ति पर इंति सानी पुनः पुनर्वशमापदते मे ॥ ६॥ सरक्षार्थ :- (वित्तमोहेन) घन के मोछ से (मूढम्)
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कठोपनिपदि-
मुग्घ (ममाद्यन्तम् ) म्रमत्त (वालमू) विवेकरह्विस पुरुय को (साम्परायः) परलोफ वा परमार्थमम्वन्धी वि- चार वा अन्वेषय (नम्रतिमाति) नहीं भाता। (प्रयम्) लोफ:) यही लोफ है (परः नारति) परलोक वा पर- मार्थ नहीं है (इृति ) ऐसा (गानी) मानने वाखा पुनः पुनः) वारंघार (से) मुक मृत्यु के ( षशम्) वश.में (आापद्यते) प्राप्त होता है॥ ६॥ भावार्थ :- मृत्यु चधिकेता से कहना है कि-शो पुरुप धनादि पदारथों के गोह से उन्मत्त और विवेकरष्षित हो रहें हैं, उन की परनार्थ शी घातें नहीं सुहातीं। वे इस प्रत्यक्ष संसार को दी अनन्य सुख् का साधन नानकर पर- मार्थ को तिलासषि देवैठते हैं, ऐसे लोग वारंवार मेरे वश में पड़कर मरय के दुःखों दो भोयते हैं॥६॥ अवणायोपि बहुमियों न लभ्यः शृएवन्तोपि बहवो चन्नविद्युः। आश्चर्य्योऽस्य वक्ता कुशलो- डस्य लब्धाऽS चर्य्यो ज्ञाता कुशलानु शिष्ट:।।७।। सरलार्थ :- ( यः ) जो परमात्मा (वहुमिः) बहुतों फो (श्रवसाय अपि) खुनने के लिये भी (न सभ्यः) नहीं मिलता (शरवन्तः अपि) सुनते हुए भौ (घहवः) अनेक जन (वं) जिस को (न विद्युः) नहीं जानते (अस्य) इस परमात्मा का (वक्ा) प्रवघन करने वासा (शाश्चर्यः) कोई बिरता ही होता है, (छस्य) उसका
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द्विंतीया वक्ली। ३१ (मठ्घा) पानेवाला (कुशलः) कोई बड़ा विवेकशीलष ही हाता है। (कुशलानुशिष्:) विवेकी पुरुष से सप- देश पाया हुया (नाता) जानने वाला (भांघर्य:) फोई ही हेता है। ७ । भाषार्थ :- प्रात्मशाग की दुरूडता कहते हैं। को पर- मात्मा सहुत से सांसारिक कामों में आसक पुरुषों को सुनने के लिये ती नहीं मिलता और बहुत से अनधि- कारी सुनते हुचे भी जिस को नहीं नान सकते अतएब उम का मशचन घरने वाला कोर्ड बिरता ही होता है योसायों में सी ठंस कर यथार्थरूप से समझाने वाला कोई विचेकी ही पुरुष (को संस्कृतातमा सर परमार्थ के माधनों से सम्पक्ष है) मिसा सफसा है। 9॥ न नरेणवरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुछा चिन्त्यमानः। भनन्यप्रोक्ते गतिरत्र ना- सत्यणीयान् हयतर्क्यमणुप्रमाणात्ं॥८। सरसारथ :- (भवरेय) साधारण (नरेण) मनुष्य मे (पोक:) रपदेश किया हुवा (बहुधा) भनेक प्रकार से (चिन्त्यमान:) विचार किया हुषा भी (एषः) यह आात्मा (सुविन्नेप: न) सम्यक जागने के योग्य नहीं है-(अनन्यम्रोक्) जो अनम्यभाव से पर- मात्मा की उपासना करते हैं ऐसे तम्मय और तल्परायया आषार्यों के उपदेश किये हुवे (अत्र) इस घातमा में
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३२ कटोप निषा- (गसिः) विकल्प वा सम्देष (मारति) गहीं है। वर ब्रक्म (मशुममानात्) मूक्ष से भी (भयोमान्) भतिसूक्ष्म है() इसी लिये (अतक्पंम्) तर्क करने योग्य नहीं हे ॥ ॥ भावार्थ :- इस सोक से भी सकार्थको दो पुष्टि की न्रनी है। शिंग की बुद्धिप्राकृत पदार्थों में रमया बरती है ऐसे साधारस पुरुषों के वारंबार सपदेश करने मे भी वड़ ब्रक्म मुम्यक नशें जाना जाता किन्तु को भनन्यभाव सेसम्मय और सत्परायय को कर उसकी उपासना में रस हैं ऐमे प्राचार्थो के सपदेश मे ही असन्दिग्ध रीति पर वह मूक्षम-से भी मूक्ष्म और अमतर्क्य ब्रह्म जामा जाता है।।-। नैपा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्वेनैव सुज्ञा नाथ प्रेष्ठ!। यान्त्वमापः सत्यघृतिवंतासि त्वाहङ् नो भूयान्नचिकेतः प्रष्ा ॥ १ ॥। मरलार्थ :- हं(प्रेष्ट!) प्रियतम । (एपा) यह श्ागम प्रमूता (मतिः) बुद्धि (तर्केरा) खयुटटिकसियत हतुओं मे (न, पापनेया) नहीं विगाड़नी वाहिये (अ्भ्येन, एष) शाखयित् आाचार्य से ही (मोका ) उपदेश की हुई उल वुद्धि (सज्ञानाय) सम्यकुम्तान के लिये होसी है (सत्यधृतिः) तू शिश्वल धेर्य वाला (अमि) है ( त्वम्) तू ( याम् ) शिसबुद्धि को (आपः) पास तुंधा है (बत) [अनुकम्पा सचयं अ्रव्यय है] ह (नचिकेतः !) नचि- केक्षा ! (त्वाट्टक) तेरेम्षमान दी (नः ) इमसे (प्रष्टा) पूछने वाला (भयास्) हो॥९ ॥
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द्वितीया वली॥ सादाषं :- पद्यपि धर्मादि विषयों के निर्राय में मन्या दि आहर्षियों ने सर्क का सपयोग भामा हैं यथा प्रस्तं- कैदामुसन्धते स धर्म वेद नेतर:" अर्थात् जो तर्क से अनु- मन्धान बरती है वह धर्म को जान सर्मता है इतर नंीं ४त्यादि। सथापि आात्मवान के विषय में (जो मिश्या- रिमिका बुद्धि की अपेक्षा रखता है) तर्क से कुछ काम नहीं चमता क्योंकि जहां सनदेह हेता है वशीं सर्क की प्रयृति होती है। प्त्मतत्व के जानने पर सारे सन्देह औीर धिकल्म शान्त हो जाते हैं फिर महा वहाँ तर्थःका म्वेश फ्योंकर को सकता है? इम बात को लक्ष्यमें रख कर मृत्यु सचिनेता मे कहता है कि है प्रियतन! यह शा- सषित् भाषायों के उपदेश मे उत्पक हुईे वुद्धिजिप को तू म्राप्त हुवा ऐ क्षेषण दर्थ के आधार पर न लगानी घाषिये शिन्तु आगम पर श्रद्धा रखते हुवे शपरा, सनण और निदिध्यामन मैब्रह्म का साक्षाल्फार करना चाहिये ॥॥ जानाम्यह७ शेवधिरित्यनित्यं न हंध्रुवैः प्रा- प्यते हिध्रुनन्ततू। ततो मया नाचिकेलश्चितो ग्निरनित्यैर्द्रवयेःप्राप्तवानर्सि नित्यम् ।१०।। मरकार्थ :- (प्रर म्) मैं (शेषधिः) धर्म, फान, जन्य स्वर्गादि(क्रनित्यम्) अनित्य मैं (इहि)सा (प्राप्तामि.प्- नता हूं (छि) निर्पन्देड (बधाषेः) अनित्य र अस्यिर साधमों से ( तद) वर (घुशम्.) नित्य. जोर अपल ब्रह्म (न, मादयह) नहीं पाया जता (सतः )इसी,
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३४ कठोपनिवदि- लिये (नया) मैंने(ंनोचिकेत:) जिव का अभो तुझारे मशि विधान किया हे वह (अग्निः) शक्ति ( सिरु:) कर्मफलबासमा से रहित हेकर चयन किया है। अतः (अनित्येः दरव्येः) अनित्य पदार्थो से (नित्यम्) मित्य ब्रल्म; को (पापवान्, पस्मि) पररपरासे म्राप्त ुषा मूं॥० भावार्थ :- सृत्यु नधिकेता से कहता है कियेदपियद मैं जानमा हूं कि सथाम कर्मरे स्वर्गादि अनित्य, पदार्थों को माप्ति हेती रे-परन्तु इन अनित्य साधनों से वह नित्य ब्रह्म पम्नाप्य रे, इसौ लिये मैंने कर्म फल की बासना को त्यागकर यज्चादि कर्मों का अनुष्ान किया है जो साम्षात् नहीं वी परम्पर से मेरे मोक्ष का भारय हुये हैं। इस ग्ोक का तात्पर्य्य यह है किजो कर्म फम की वासना से किये जाते हैं वही मनुष्य को बन्धन में डाशत हैं केवल निष्कान कर्म करने से ही मनुष्य भोक्ष का अधिवारी बनता है।। १० ॥ कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरनन्त्यमम- वस्य पारम्। स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्रावृं- त्या धीरो नंचिकेतो ऽत्यस्राक्षीः ।।१९॥ .... सरलार्ष :- स (नचिकेतः ) नचिकेता ! तैने (कामस्य) भोनादि कामनाओं की (श्राप्िम्) म्ापि को, (जगतः) संसार की (मसिहाम्) सो संमोगादि रूप से स्थिति को, (कतो:) पंज्ादिके (अनंत्त्वम्) अखबड राज्यादि फम को, (अभयस्य)सांस्ारिक निर्भयंता त्ी (पारस्)पराकाष्टा को, (वसगायम्)नमुधा नमुष्य जिस कामानंकरते है ऐसे (हगोम
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द्वितीया वह्नी।। ३५ गहत्ं।रंतुतिमसूह और (प्रतिष्ठास्)मशंमा की (टृष्टृवा) प्वाम चसु मे इन नब को प्मार देख कर (धृंत्या ) धेयं में (अत्यगस्राक्षीः) त्यांग दिया अतएव (घौरः) तू बड़ा सुद्धिमान है॥११ ॥ भाषार्थ :- मृत्यु कहना है कि ह नचिवेषा ! तुभ को मंसार की बड़ी से बड़ी कामनायें मी न खुमा सकीं। जस. एव तू धीर है और म्रह्ज्ञान का अधिकारी है। ११॥ तन्दुर्वश गूढमनु प्रविष्टं गुहाहितं गह्नरेष्ठम्पुराणम्। मध्यात्मयोगाधिगमेन देवम्मत्वा धीरो हर्पशोकौ जहाति ॥ १२ ॥ भरलार्थ :- (घीग:) विद्वान् (अध्यास्म योगाधिग- मेन। ब्रान्य विषयों से विरतवृति को इंटा कर झत्मा में लगाने से (तम्) उस (दुर्दशंम् ) दुःख से नामने योग्य (गुढ़म् ) असौन्द्रिय होने से गुप्त (अनुमरविष्टम्) प्रन्तःकरस और जीवात्मा में भी व्यास (मुहाहितम्) बुद्धि में स्पिंत (गहूरे४्ठम् ) दुर्गम होने से विपमस्थ (पुराणम्) सनातन (देवमू्.) मफाशमय आत्मा, को (मस्दा) जान कर (मर्वंशौकी.) सुख दःस को (जहाति) त्पाग देवा रे। १२॥ भावार्थ :- सृत्यु नचिकेता को प्त्मतत्व का उपदेश करता है कि यब पात्मा अत्यन्त सूक्ष और व्यापक होने मे दुदरथ हे, वह किसी इन्द्रिय का विषय नहीं। यहां सक कि अम्राप्त देश में पहुंचनेवाला मन भी वड़ां तक जाने
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कठोपनिषदि-
में चक जाता हैं। वहं केवल धारयावनी बुद्धि में स्थिम होनें मे (जो विना अध्यात्म योग के अम्राप्य है) वि. पमस्थ कंहमाता है। उस का योगीजन अध्यात्मयोय़ मे (नो बाह्य विषयों से चित्त को इटाक्षर अ्न्तरात्मा में कीन करने से सिंद् होसा है, मास शेकर वर्ष शोक को त्याग देते हैं ॥ १२॥ 'एतच्छुत्वा सम्परिगृह्य मत्य: प्रवृह्य धर्म्यमणु- मेतमाप्यस मोदत मादनीयछ हि लब्व्ा विवृतछ सद् नचिकेतसम्मन्ये॥ १३ ॥ सरसार्थ :- (मर्त्यः) मनुष्य (एतस्) इस वश्यमाय (घर्म्यम्) धर्म के अधिकरण शात्मा को (श्ुत्वा) सुनक्षर तथा (सम्परिगृद्य) ड़्के प्रकार ग्रहण करके एवं (प्र. वृह्य) वारसु्वार प्रभ्यास करके (एतस्) इस (अयुभ्.) सूत्म ब्रह्म को ( भाष्य) प्राप्त होकरे (सः) वह (मोद नीयम्) आनन्दरूप को (ल०्छवा) ग्राप्त होकर (मोदते) आानन्दिंत होता है। ऐसे ब्रझ्मको (नचिकेतयम्) तुक नचि- केता के प्रति (विवृतम, संदं) सुला हे द्वार जिस का ऐवे स्थान के सदूय ( मन्यें) मोलता मूं।१॥ भावार्थ :- मृत्यु पहंता ऐ-से नविकेता । इस ब्रहत को अवरा, ननन और निदिध्यासन कें द्वारा जो मनुष्य ग्रहय करते हैं वह आमन्द्रमयमद् कों ग्रपत होफर मब बंन्धनों से विनिर्मुक् हो जाते है तेरे लिये भीं इस गुप्त मन्दिर में (जिस्ट का पंता लगगा बड़ीं कठिन है) प्रवेश भरने के लिये दवार सुला हुवा हैं।। १ज
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द्विंतीया वल्लों॥ अन्यत्रध मदन्य त्राघ मदिन्यत्रास्मात्कताकतात्। अन्यत्रभूताञ्त भव्याज्ञ यत्तत्पश्यसि तहदृ॥:। सरसार्थ :- (घर्मात) कर्तव्यरुप भाचरय मे (अन्यत्र) पृथक (पधर्मात्) भफतंव्य से (अन्यत्र) असग (बस्मात्) इस (कृलाकृतात्) कार्य्य और कारण से (अन्यत्र) भिन्न (सूसात्) भम काम से (भव्यात्) भविष्यंत् से (च) वर्तपान से भी (अन्यन्र) प्तिरिक्र (यत) शिस फो (पश्यसि) देखते ही (सत ) तम को (वद) कहो॥१४॥ मावार्थ :- नचिकेता मशकरता है। हे मृत्यु :! जो पदार्थ धर्म और पधर्म और सन के शुभाउशुन फल् से रहित, एवं कार्य्य, कारत और उन के उत्पत्ति और विनाश धर्म से भिन्न तथा भूत, भविष्यस, वर्ततमाम इन तीनों सालों के बन्धन से पृथंक है उस का मेरे प्रति उपदेश क़र॥ १४ ॥। सर्वे वेदा वत्पदमामनन्ति तपाधसि सर्वाणि च यहदन्ति। यदिच्छन्तों ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्तेपद४ सङग्रहेण त्रवीम्योमित्येतंत् ॥।१५ ॥ .: ४: सरलार्य :- ( सर्चे, वेदाः) पारों, वेद (यत्, पद्म्) जिस पद का (आमनस्ति) बारंभवार वर्यान बरते हैं (सर्वाशि,समांद्ति, च) सारे लप और नियमादि: भी (यत) जिंस पद का (वदनति) कथन करते हैं (यत) जिस पद को (इच्छन्सः) इच्छा करते हुवे ( ब्रह्मचस्यम्)
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३C कठोपनिषदि- ब्रह्मचर्याश्रम, का (चरन्ति) प्राधरम करते हैं (रतें, 1 पदम्) उम पंद को (ते) तेरे लिये (मड़ग्रहेच) मंस्षप मे (ओोम्ं, फति, एतस्) "मोम्" है यंह (व्रवीमि ) कहता हूं॥ १५ ॥ भावार्ण :- अम्र मृत्युं नषिकेता को आ्रात्मनत्व का सर्प देश करसा है, कि है नधिकेना। भारों वेदों का मुख्य सात्पर्य जिस पद की प्राप्ति करने का है। अर्थात् उक् वेद कहीं मासात् और कहीं परम्परा से जिस पद का चिन्तन करते हैं और ब्रह्मचर्यादि व्रंत तथा अन्य धर्गा- नुष्ठान भी जिस पंद की प्राप्ति के लिये ही किये जाते हैं, उस पद का'वाचक अनन्यरूंप से केवल से ओोम् मै यह शब्द है, जिस का मैं तेरे मति उपदेश करता हूँ॥१५॥ एतद्येवाक्षर ब्रह्म एतदेवाक्षरं परम्। एतद्धये वाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत्। १६। सरन्तार्थ :- एसत, हि, एव) यह प्रो३मू दो (परक्ष र सू) नाश न होने वाता( ब्रह्म )बरिझं, है (एंतत्,एव ) यह ही (परम् ) सब से उत्तम (अक्षरम् ) भक्षर है (एसत्. हि, एष) इम डी (अक्षरस्) अक्षर को (स्ात्वा) जानकर (यः) ज (यत्) जिस अर्थ को ( इृच्कति ) चाहता दे। (तस्य, तत्) उस को वह प्रर्थ भवशय म्राप्त होंता है। १ई ॥ आावार्थ :- वाच्य और वाचक की अभिक्रता कहते है। वश्चक हो से वारुप का निर्देश किया जाता है। संमार
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द्वितीया वह्ीं। में कोरे पदार्थ ऐसा नहीं है जिंस का कोई वाचक नं हों। परभात्मा के वषिक यद्यपि अग्ति सादि और भी अनेक शब्द हैं तथापि वे अन्य पदार्थों में भी वाचम हैं। केवम यही एक शव्द है जो अनन्यमाव से उस की मत्ता का बोंध बंशता है और किमी अ्रन्य पदाथं का वाचक नहीं। इसी लिये वाक्य ग्रश्त से इम की अभिव्नता प्तिपादन की गई है ॥ १६ ॥ एनदालम्बन8्ट श्रेष्ठमेतदालम्बनं परंम्। एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते॥ १७.॥ मरलार्थ :- (एनत्) यह (भालम्घनम्) साघन (श्ेछ्मू) मशस्त है (एतव्) .यह ( भामस्वनम् ) आाश्रय (पर्म्) मर्धोपरि है (एतस्) इस्ष (आगम्बन्रम्) भालम्मन को (तात्ा) ज्ञान कर (ब्रह्ममोके) त्र. सर्नन्द में (महोयसे) मानन्द करता है॥ १ ॥ भाषार्थ :- फिर उमी के महात्म्य को कहते हैं। ब्रह्मत्ञान से साघनों में "भोइंम् मेकी उपामना करना सर्योत्तम है। अर्थात् इसी परमोश्तम साधन से वाच्य ब्रह्म की सपासना करमा ब्रह्मामन्द का अनमय कराता है।११। न जायते म्रियते वा विपितन्नायं कुतत इिचन्नवभूव कश्चित्।अजोनित्य: शाउवतो- ऽयम्पुरणों न हन्यते हन्यमाने झरीरे।।१८।।: मरलार्थँ :- (विपश्रिस्) भवंद्र (अयम्) यह भात्मा
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कठोप्रनिपदि- (न, जायते, वा, खियते) न उत्पत होता औ़ीर न बरता ह (कुतश्चित) किसी उपादान से (न, वभून) उत्पनन नहीं हुषा (कश्नित) कोईएस से सौ उरपक नहीं हुवा (अयम् ) यह आात्मा (पजः) जन्म नहीं लेता (नित्यः) विकाररहित (शाश्तः) अनादि (पुराणः) उनातन है (शगीरे ) देब के (इन्यमाने ) नरश होने हर (न, इन्यते ) नहीं नष्ट होता ।। १८ ।। भावार्थ :- अब रस "ओो३म्" के वाक्य का निरूपस करते हैं-वह साला जन्म मरसा से रहिस है। उस का कोई उपादान नहीं (जिस से वह सत्यन्न हुवा सो) और न वह किसी का उपादान है (जिस से कोई नत्पन् हो) वह अजन्मा, निर्विकार, सनातन और अज्ञादि होने से सदा एक रस रहता है। जिस प्रकार, घट म. दादि के टूटने फूटने पर आकाश में कोर्ई विकार नहीं झाता रसी प्रकार शरीरों के विनाश होने पर आात्ा का कुछ नहीं बिगड़ता॥ १८ ॥ हन्ताचेन्मन्यते हन्तुछु हतइचेन्मन्यते हतम्। उभौ तौन विजानीतांनायछहन्ति नहन्यते।१९॥ सरलार्थ :- (चेत) यदि ( हन्तुम् ) आारने को (इन्सा) सारने वाणा (मन्यते) मानता है तथां (चेत) यदि (इतः) पारा हुवा (इतम्) प्रा. त्माको मरा हुआ (अन्यते ) नानता है ( तो, उसौ) वे दोनों (न, विजानीतः) कुछ नहीं जानते (अयम्)
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द्वितीया वकी॥ ४१
यह आात्मा (ग,'हन्ति ) फिसी को नहीं गारता (ग, इन्पते) और न किसी से भारा जाता है। १८॥ भावार्ष :- मारने वाफा यदि यह सभझता है कि मैं ात्मा को मार सकता हूं और मारा हुवा यह नानसा है कि आत्मा मारा गया। यह दोनों दुछ नहीं जानते धरोंकि माला न किमी को भारता है और ग जिसी से मारा जासा है॥१९॥ भणोणीयान् महतो महीयानात्माध्य जन्तो- निहितो गहायाम् । तमक्रतुः पश्यति वीत- झोको धातु:प्रसादान्महिमानमात्मनः ॥२०।। मरसार्थं :- (पात्मा) व्रस(पयोः) सूक्षम जीवात्मा से भी (अयीयान्) अत्यन्त मूक्ष हे (महसः) बड़े आाका- शादि से श्री (गहीयान्) बड़ा है यह (वस्थ,जन्तोः) इस प्राणी की (गुहायाम्) बुद्धि नें (निदिततः) स्थित रै (तम्) इस (भात्ममः ) भात्मा की ( महिमानम्) महिपा को (घातुःममादात्) बुट्धि से िमल होने से (भकतु:) कामना रहित (वीसंशोक:) विगतशेक मायी (प्रशयति) देखता है। २0॥ भावार्थ :- जो आत्मा व्यापक होनेसे सूक्षम से मी सूक्ष्मऔर भनस्त होने से बड़े से भी घड़ा है वह मनुष्य की घा- रमावती युद्धि मेंस्यित है। शिन की बुद्धि वास्य विषयों से उपरन्त होफर घिमसा दोगई है ऐसे काम, शोक से
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४२ कठोपनिषदि- विधज्जिस घिरक जन की रछ् की मडिणा की सुखत्र देखते हैं। २0 ॥ ! भासीनी दूरं व्रज्ञति इयानो याति सर्वतः। कस्तं मदामदन्देवं मदन्यो ज्ञातुमहति ॥२१। सरलार्थ :- (भगमीनः) बैठा हुषा (दूरम्) दूंर (त्रमति) पहुंचता है (प्यानः ) सोता हुया (भर्वनः) सघ और (याति) जाता है (तं) उम (मदामद्म्, देवभ्) सनन्दरूप देष को (मदन्यः) मुफ से सिवाय (ज) कोन (ज्ञातुं) जानने को (अदति) योग्य है। न॥ भावार्थ :- "आासीन" शठ्द से अवल और "पयान" से व्यापक लिया जाता है। हमारे पाठक आाश्मयेंकरेंगे कि अचल का दूर पहुंचना और व्यापक का सब ओर जाना कैसे होसकता है? इस का उत्तर यह है कि य- दपि ब्रह्म स्वरूप से अघल औीर ठपापक है तथापिव्याप्य पदार्थों में गत्यादि क्रियाओं के होने से ब्रह्म में भी उन का अध्यास किया जाता है क्योंकि बिना ब्रह्म को सत्ता के किसी पदार्थ में भी गति और घेष्टा आदि क्रियायें नहीं रह सफतीं एतरदर्थ व्याप्य के धर्मों का व्यापक में आरोप करके वर्णन किया जाता है और ऐसा किये बिना उस अचल और अखसद ब्रह्म को इम समझ नहीं सकते ।। मृत्यु नचिकेता की श्रद्धा बंढाने के लिये कडता है फि मेरे सिवाय उस सांसारिक विनश्वर सुख से रहिंस और पारमार्थिक नित्यानन्द से पूरित ब्रह्म को औौरं कीम जान सकता है?।। २१॥
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द्वितीया वलली। :४३
महान्तं विमुमातमान मत्वा धीरोन शञोचति।२२। सरसार्थ :- (शरीरेपु) विनाश घर्म वाले पदार्थों में (अशरीरम्) विभाशरहित (अनवस्येषु) चलायमान पदार्थों में ( अवस्थिक्षम्) परघत (महान्तम्) अनन्त (षिभुम्) व्यापण (लहमानम्) झातमा को (सत्वा) जान कर (धीरः) घौर पुरुष (न शोघति) शोष नहीं करता ॥२२। भावार्ष :- उकार्थ को इस लोफ में स्पष्ट करते हैं। यद्यपि परमातम अनित्य, चलायमान और विनाशशीस पदाथों में व्यापक्ष होने से उन में अवस्थित है तथादि स्वयम् मित्य, अचल और अविनाशी होने से उनके धर्म में लिस नहीं होतााउस सब में और सब से सलग पात्मा के यथार्थ स्वरूप को जानवर घीर पुरुष शोक से मुक होताहै ।२२ नायमातमा प्रवचनेन लम्घो न मेघया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष:वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष भात्मा वृणुते तनू ७ स्वाम् ॥ २३॥ सरलार्थ :- '(खयस्) यंह (भात्मा) ब्रह्म (प्रव- धनेन) उंपदेश से (नं, सभ्यः) माप नहीं होता, (मे- घया) घुद्धि से ( न) नहीं मिलता (बहुना, श्रुतेन) बहुत सुनने ऐ भी (न) नहीं जाना जासा ( एषः) जौवात्मा (बम्, एव) जिस आाला को ही (वसुते)
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कठवेपॅनिषदि- स्वीकांर करता है(तेनः). उस.से(लम्गः) प्राप्त होने योग्य है। एषप आत्मा) यह आत्मा (तस्य) इस के सिये (स्ाम, तनूम) अपने, यथारथरूप को (वृखुते) प्रफाश करता है॥ २३॥ भोषार्थ :- पवय, मनन/ और प्रवधम अदि यद्यपि परम्परा सें तौ ब्रह्मपाप्ति के साघन माने ही जोते हैं। परन्तु साक्षात इंस से ब्रह्म की प्राप्ति नहीं हो सकती तब साधक वो जिलासु अनन्य माव से आत्मो की ओोर झुकता है अर्थात् तन्मय और सतप्रवर हो जाता है। तथ इंस को आत्मतत्व का बोध होता है और वड सॉटंमा इस के लिये अंपने यथार्थे पारमार्थिक सुप को प्रकाशित कर देता है॥ २३ ॥ नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ।
।सरलार्षे :- (टुर्शरितात्) अपकमो से (न, परविरंसः) जोउपरत नहीं हुषा वह ( एनं) इस आतमा की (नं) नंहीं प्राप्त होता (अान्व:) पसलचित भी (न) नहीं पाता (असमाहितः) संशयात्मा भी (न) नहीं पाता (वा) और (अशान्तमानस, अवि) जिस ने बात्य इन्ट्रियों को तो विषयों में जाने से रोक लिया है परन्तु मन जिस को तृष्यां में फंसांहुवा है वद भी (न) नहीं, प्राप्त रेता केवल (प्रज्ञानेन) यथाथे ज्ञान से (भांप्र- यातू) ब्रल्म की मास होता है। २४॥
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द्वितीया वही.॥ भादार्थ :- जो मनुष्य हिंसा,स्तेय, अनृत भाद्ति मंति: पिट कर्मों सेसपरत नहीं हुषा वह भात्मज्ञान: का अधि: कारी नहीं है। उक अविहित करमों से पृथक हो कर भी जिस का चित गान्त नहीं हुवादे अर्थात संशय भीर: वियरूप की तरत्ों में घूम रहा है वह भी, उष का अधिशारी नहीं। उब्घ शान्ति छोषर पर्थात वाचे: न्द्रियों को विपयों से रोंक कर भी जिस की वासना रूप दृष्णा नहें बुर्फी वह भी भात्मतत्व को नहीं ज्ञान सफता, किन्तु जो सारे अपकर्मी से समरत होकर शान्त- चिश्त औौर समल् विषय वासनाओं से वितृपय शोकर पात्मपरायण होगया हे वह केवल यपार्थ स्ान से बल् को ग्राप्त हो संकता है। २४ ॥' पस्य ब्रह्म च क्षत्रं व उभे भवत भोदनम्। मृत्युयंस्योपसेचन क इत्था वेद यत्र स: ॥२॥ संरलाथ :- यस्.) जिस ब्रम के (ब्रह) ब्रहष (च) औीर (क्षत्रम्ं 'च) क्षत्रिय भी (उमै) दोनों (मोद- नमू) भक्ष्य (अवतः) होते हैं। (यस्) जिसकेर (ठप- सेवनसू) उपसेवन (मृत्यु:) मौंस है (स: ) वह परम मातमा (बत्र) जिस दशा मेंवा जेषा है (पत्था1.) इस प्रशार (कवेद) कीगजान सकता है?n॥ नावार्थ :- ब्राहांधर्म और सात्रंधर्म पह। दोनों मौ नगत् को स्थिति के मुख्य कोरंग है मुख्यगोरायो मुँख्ये सम्प्रत्यय:"इस के अनुसार वैश्य 'और' शूंट्र के ध्मों: क्ा भी इन्हीं में समावेश हो जाता है, पर्यात म्रशय में
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४६' कठोपनिषदि- चारोंवर्स जिस का मश्य हो जाते हैं। और मृत्यु भी जो एन सब को. मश्य बनाता है, स्वयं जिस का उपसे- चन (भाज्य) बनजता है, अर्थात् सृष्टि के प्रभाव में मृत्यु भी 'अनांवशयक्र हो नाने से जिस परमारमा में लोन होजाता है। उम प्बाद ब्रह्म को वरं ऐवा ही है इंस प्रकार कीन जान सुकता है? अर्थात् कोई भी नहीं॥२५॥ इति द्वितीया वल्ली समाप्ता॥
अथ/ढतीया वल्ली प्रारभ्यते॥ ऋतं पिबन्तौ स्वकतस्य लोके गुहां प्रविष्टी प- रमे पराद्े। छायातपौ, ब्रंह्मविदो वदन्ति पञ्चा- गनयो: ये च त्रिणाचिकेताः।।।। -सरलाथ :- ( परमे) सब से उत्तम (परार्द्े) हृदया- काश में तथा (गुहां) बुद्धि में ( प्रविष्टी) स्थिस (नोके), शसेर में (स्वकृतस्य-) अपने, किये मुवे कर्मों के (ऋतम्। फल को (पिबन्ती) भोगते हुबे:( डायातपी.) अन्धकार औौऱ प्रकाश के तुल्य (ब्रह्मविद्:) म्रह्म के जानने वाले (वद्नित) कहते हैं ( च ) और (ये ) जो ( त्रिया- चिकेता:) तीन, वार, जिन्हों ने नाचिदेत भग्तिका सेवन किया ऐडे कर्मझायडी (पल्लाग्नयः) पछ्चु यत्ञों के करने वाले गहस्य, भी ऐसा जी,कहते हैं ॥ १ ॥ प्रवार्थ :- इस सोक में जीवात्मो और परभातमा
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वतीया वज्जीं। दोनों का वर्शन ई। मनुष्य के हृदयाकाश में काया जर :लालप के समान जौवासमा और परंमात्मा दोनों, निवाम करते हैं एक इन में से अपने कर्म फल का भोका भीर दूमरा भुगधाने वाला होने से दोनों का कर्म फल के साथ परबन्ध हे। यद्यपि ब्रह्म स्वयं कर्म, या उूस के फल में लिप्त नहीं होता, तथापि जीव को कर्म का फल भुगाता है। इस अपेक्षा को नाग कर दोनों के लिये "पिब़न्सी" क्रिया रक्खीं गई है। इस प्रकार शरीरों में दोनों आात्माभों की सत्ता केल कर्मकायंडी हो नहीं, बिन्तु ज्ञानकापठी भौ-मानते हैं,।१॥ यःसेतुरीजानानामक्षर ब्रह्म यत्परम्। भमयं तितीर्ष ताम्पार नाचिकेत छुशकेमहि ॥२॥ सरलार्थ :- (:) जो (ईजानानाम्) यह्शीलों का (सेसुः.) पुप्त से समान है उस नाचिकेतम्) नायिकेस भ्रग्ति को (अकेमंडिः) इंमजान) सकते हैं औोर (यतू) जोः(पारम्:) भवसिन्धु के पार( तितीर्षताम्) [तरने की इच्छा करने वाओों(का (अरमयम् ) भयरहित सांधन रै एस (परसूः) संघ से उल्कृष्ट (म्रिक्षरंभ् ) नाशरमित (बल्म): परसात्मा को भौ (शमेमदि) जान, सकते हैं.।२) भावार्थ :- इस कर्मनासा (नदीसे जिसमें सांपा; रिंक लोग अज्जित होते हैं, तरने के दो मार्ग हैं। पहला यज्तादि कर्मकावड है, जो पुल के समान इसें,इस नृदी
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ye कठोपनिपदि- के पार ले नाबर विज्ञान के सट पर बिठा देता है। दूसरा वागकाऍड है जो इमें एस अवसागर के पार पहुं घाता है (कि जिस में यह कर्ममासा नदीं सहस्रधारा होकर मिलंती है) जो लोग कर्मकांयड की उपेक्षा था निन्दा करके ज्ानफावड के अधिकारी बनना चाहतेहैं वह आंख खोल कर ज़रा इस खोक ने आशप पर ध्यान टेवें ।२1 आतमानं रथिनं विद्धि रीरं स्थमेव तु। बुद्धिनतु सारथिं, विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥३।। इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाध स्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रिय मनोयुक्त भोकेत्याहुर्मनीषिणः।8। सरलार्थ :- (आात्मानम्') आात्मा को (रथितम्) रयी विद्धि) जाम (मु) और ( शरीरम्, एष). शरीर क्ो ही (रथम्) रय जांन (तु) और (बुद्धिम् ) बुद्धि को (सारयिम्) सारंयि (विद्धि) ज्ञान (तं) और (बनः, एव) मन जो. ही (मेग्रहम्) रशिसि, नाम ।।.३।(शेष्टिरि यादि) इन्द्रियों को (इयान्) घोड़े (आाङुः) कहते हैं (तेषु) इन इन्द्रियों में (विषयान्) शब्द रपशादि को ('गोंघराज्) नाग बहते हैं (मनीषिय:) परिडत लोग (शांल्मेंन्ट्रियमनोयुक्म्·) शरीर इन्टिरिय और मन से युक्र लला को (भोका) भोगने वाला (इति, आाहुः) ऐसा कहसे ह४४॥
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वृतीया वक्षी। माषार्ष :- एण झोकों में रथ के अलङ्वार से शरीर का वरन फियर गया है। जैमे यह रथी जिस का रथ दृढ़, सारधि चतुर, लगाम मलबूत्ष और खिंची हुई, घोड़े मखे + हुवे और मड़क साफ़ और संवारी हुई है। निश्शङ्क अपने निर्दिष्ट स्पान में पहुंच जाता है। ऐसे दी बड पा- त्मा जिस का शरीर भारोग्य, बुद्धि शुट्ध,मन अक्षब्ध, इन्द्रि- मगरा वश्य सौर उन के शव्दादि भर्थ अक्षुस है गि- भयता के साथ अपने प्राप्तव्य पद को पंहुंधता है।। ४॥ यहत्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसासदा ।' तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाइ्वा इव सारथेः॥५ यस्तु विज्ञानवान् मवति युक्तेन मनसा सदा। तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथे:॥६॥ सुरलार्थ :- (या, तु) जो ( अविद्ानवान्) विषयों में लम्पट मनुष्य (अयुलेन, मनसा) अनवस्थित नेंग मे (मदा) सर्वदा युक्त (मवसि) होता है (सस्म) रस के (इन्द्रियाणि) इस्ट्रियां(पारये) सारधि के (दुषाश्ा रव) दुष घोड़ों के समान (अवश्यानिः) वश में नहीं होते ॥५॥ ( या तु) और जो (वित्ानवान् ) विवेंक समपक्ष (युक्ेन, मनसा) समाहिस मम से (सदा) सर्वेदा युक (भबति) होता है (तस्य) उस के (इन्द्रियासि) चक्षुरादि (पारपेः) सारंधि: के (सदवा इव ) शिक्षित घोढ़े के सभाम (वंश्यामि) वश में होते हैं।६ै॥
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कठोपनिषदि- नावार्थ :- जिस मनुष्य की ित्तवृत्ति विषेयों से नहीं इटी हैं और जिम का मन अभी अनवस्थित दशा में है उस के इन्द्रिय दुष घोड़ों के समान ससे विषयों को खाई में डाल देते हैं॥ ५॥ और जो मनुष्य विवेक के शजसे विषय के जाल की छित्र मिन्न कर देता है। एवं जिस का मन सख ओर से इट कर परमार्थ में युक्त हो गया है,उम के इन्द्रिय शिक्षित घोड़े के समान ससे अपने निर्दिष्टस्थान पर ले जाते हैं। ६॥ यस्त्वविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाजांचिः। न स तत्पदमाप्नोतिस४, सारं चाधिगच्छति।७।। यसतु'विज्ञानवान् भवति समनस्कः संदा शुचिः सतु तत्पंद माप्नोति यस्मादृंभूयो न जायते।८।। सरलार्थ :- (य:, तु) नो ( अविज्ञानवान्).विवे रहित (अमनरतः ) मन के; पीछे चलने बाका, (सदा) सर्वदा (अशुषिः) अपवित्र (भवति ) होता है (सः) वह (तत्, पद्म् ) इस शास्त पद् क्ो-(त, आाप्रोति ) नहीं प्राप्त होता (च) किन्तु (संसारम्), जन्म.भरय के प्रवाह को (अधिगच्छूति ) म्राप्त होता है॥9I ( यः, तु) और ओो (विज्ञानवान् ) विवेशसम्पन्न (समनस्कः) मम को जीतने वाला (सदा) निरन्तर (शुचिः) शुद्ध भावयुक्त ('भवतति) होता है (स, तु) वह-तो (तत,
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तृतीया वक्षी॥ ५१
पद्म) इम अरतन्द पद को (अप्रोति) म्राप्त होता है (बस्मास्) ग्रिस मे (शृय:) फिर (न, जायते) उत्पन्न नहीं हेता II ८ ।I. भावार्थ :- जिम मनुष्य का सन वश में नहीं है औौर संस्कार तथा संसर्ग के दोपों से शिर् के भाव भी मलतिन हो गे हैं। ऐसा विवेकशून्य पुरुष नस पेरनमद को नहीं पासकता किन्तु इस, संसार- में ही जन्म मरया के चक्र में घूमता रहता है।। 3॥ इस के विपरीत जो म- नुष्य इम चनुल नम को वश में करलेता है और जिस के संस्कार तंथा माव भी शुह्धं होगये हैं। ऐसा विवेकी पुरुष रस आनन्द पद को म्राप्त होता हैं जिस से फिर जन्म मरण के चक्र में नहीं पढ़ता॥८॥
पारमाप्नोति तहिष्णो: परमं पदसू ॥ ९॥। सरलषार्थ :- ( यः, तु) जो ( नरः) मनुष् (विज्ञान- सारधि:) विवेक सारधि वाला एवम् (मनः मग्रहवान्) मन की लगाभ को रोकने वाजा है (,सः) वह (भध्व- नः) सांगं के (वारम्) पार (षिष्णोः) व्यापक ब्रश् के - (परनम्) सर्वौत्कृष्ट'(सस, पद्म् ) उस पद को (भा प्रोसि) प्राप्त होता है॥ e । : भाषार्थ :- जिस सनुष्यने विवेक को अपना सारधि
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५२ कठोपनिषदि-
बमा कर नम की लगाम को मज़बूत पकड़ा हुवा है। वह सस विव्स के परम पद क्री (नहां उस की यात्रा समाप् हो जाती है) प्राप्त होता है। e।' इन्द्रियेम्यः पराहर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसश्च परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः॥१०।। महतःपरमव्यक्तमव्यक्तातपुरुषः पर:। पुरुषान्न परं किश्चित्सा काष्ठासा परा गतिः॥।११॥ सरलार्थ :- ( इन्द्रियेम्नः ) मौतिक इन्द्रियों से (हि) विक्षय (अर्थाः) गमदादि विषय (पराः) सूक्षम हैं (च) औीर (अर्थेम्पः) विषयों से (नमः) मन ( परस्) सूक्षम है (च) तथा (मवसः) मन से (वुट्धिः) बुद्धि (परा) सूक्षम है (बुट्धेः) बुद्धि से (महान्, जात्मा) महत्तत्व (परः) सूषम है। १० ॥ ( महतः) महत्तत्व से (मव्यक्रम्) भ्र- व्याकृत प्रकृति (परस्) भूक्ष्म है ( अव्यक्ात् ) अ्रष्यक् मकृति से (पुरुषः) सर्वत्र परिपूर्र ब्रह्म (परः) अत्यम्त सूक्ष्म है (पुरुषात्) पुरुष से ( परम् ) सूक्षम (किद्धित, न) कुद भी नहीं है ( सा) वह (काष्ठा) स्थिति की सीमा (सा) वही (परागतिः) अन्तिम अवधि है॥१॥॥ भावार्थ :- इन दोनों झोकों में परमातमा का सब से सूक्ष्महोनादिखनाया गया है।चक्षुरादि इन्द्रियों की भपेक्षा
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वृतीया वह्ली।।
उन के रुपादि विषय कुछ सक्षम हैं। विषयों की अपेक्षा मन कुछ सूक्ष्म है और मन की अपेक्षा बुद्धि और बुद्धिसे उस का कारया महतत्व और महत्तत्व से भी उस का कारय प्रकृति (भो अव्यक्त और प्रधानादि नामों से प्रख्यात है) सूक्ष्म है। उस मकृति से भी पुरुष (ओो समस् अरड़फ- टाह में व्यापक है) अत्यन्त सूक्ष्म है। पुरुष से परे या सूक्ष्म फोई पदार्थ नहीं है, वही सारे वगत की परनगति और अन्तिम सीमा हैं।११॥ ए सर्वेषु भूतेषु गूढात्मा न प्रकाशते।
सरसार्थ:( सर्वेषु, भूतेषु) सब पदार्थों में (एष:) यह (गढात्मा) गुप्त आत्मा (न प्रकाशते) स्थूलदृष्टि से नहीं देखा आाता (तु) किन्तु (अग्था) तीव्र (सक्षमया) सूक्ष्म (बुट्धा ) बुद्धि से (सूक्ष्मदर्शिभिः) सूक्ष्मदर्शियों से (दृश्यते)देखा जाता है॥१२॥ नावार्थ :- जिस की वृत्ति ाह्य, विषयों में सीन होने से फैली हुई है उस को वह अन्तरात्मा (जो गुपरूप से मब पदार्थों में ओोत मोत शेरहा है) नहीं दोखसा किन्तु वह तो तत्वदर्शियों से उस सूक्षम बुद्धि द्वारा (शो मानसिक वृत्तियों के समाधान से म्राप्त होती है) जाना जाता है। १२ ॥ यच्छेद्दाङमनसि प्राजस्तयच्छेज्ज्ञानं आ-
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कठोपनियदि , हमनि। ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्त- दच्छेच्छान्त आत्मनि ॥१३ ॥ सरसार्ध :- (मान्ः) धीर पुरुष (मनसि) मन में (वाक्) घाणो को (यच्छेत) सब भोर से हटा कर लगा देवे (सत्) उस मन को (साने, भात्मनि) स्ान के सपकरया बुद्धि में ( यच्छंत्) ठहराचे (ज्तानम्)वुद्धि को (महति, आात्नि) उस के कारस महत्तत्व में (नियच्छेत) युक करे (नत) एरुं महत्तत्व को (ग्रान्ते, मात्मनि) प्रशान्त आात्मा में (यच्ळेतु).ठहरा देवे। १३॥ भावार्थ :- शित्षासु के लिये अध्यात्म योग का क्र्म बनलाते हैं। पहिले वागी, को ( जो बाह्य व्यापारों को उत्पन्न करंती है) मन में रोंके फिर मन को (जो भीतर हो भीतर बाह्य व्यापारों का चित्र सौंचता रहता है) बुद्धि में ठहरावे। तत्पद्वात् बुद्धि को (जो बाख वस्तुओं का बोंध कराती और एन में फंबाती है) म- इत्तत्व (अहङकार) में लीन करें और महतत्व को (जिंस से रागद्वेष आदि दोष कत्पत्र होते हैं) उस आात्मा में (जहीं सारे विकार और उपाधि 'शान्त रोजाते हैं) युक कर देवें॥ १३ ॥ उत्तिष्ठत जाग्रत प्रांप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गम्पथ- स्तत्कवयो वदन्ति।ी १४ ।।
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वृतीया वल्ली । सरलाथं: (रतिष्ठत) एठो (जागत) आगो (वराम्) श्रैष्ठ आचारयों को (प्राम्) प्राप्त शेमर (निबोधव) भनो- (निशिता) तोह्ण (दुरत्यया ) अ्रति कठिश (क्षरस, घारा) बुरे की धारा के सनान (कश्यः) कविलोग (तह) एस (पथ:) साग को (दुर्गम) दुःख से प्राप्त होने योग्य (वदन्ति) कहते मैं । १४ ।. मावार्थं :- र ममुष्वो। एस अनामय पढ़ की प्रापति मे लिये रठी! जागी।। महात्मा भचार्यो के उप- देश से ज्ान को बढ़ासो। क्लोंकि जैसे साम पर चड़े हुवे करे को घार तीधय और कठिन होती है ऐसे सी यह श्रेय मार्ग भी बड़ा दुर्गेम और र्काठन है। इस में कोई विरला ही मनुष्य (को धम दमादिसांधनों से युझहे) चल सकता है॥ १४॥ अशव्दमस्पर्शमरूषमव्ययं तथाऽरस नित्य मगन्धवञ्च यत्। भनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुव निचाय्य तं मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥१५ ॥ सरलार्थ :- यत) जो ब्रह्म (अशवद्म्) शब्द नहीं को काम से नाना नावे (अस्परशम्) सपर्श गही को त्वचा से ग्रहण किया जावे (मरुपम्) रुप नहीं जो वक्षु का विषय हो (तथा) सैसे ही' (अरसम्) रस नहीं जो रसना का विषय हो (च) और (अगन्ययत्) गन्ध वांमा नहीं ज प्रारामम्य हर।अतमुत्र यह्ष ('अव्ययम्) अविनाशी (मित्यम्) सदा एगरस (अनादि) मनुश्पत
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- चकटी पतिवद्रि, :(अगनतम्)(सीमातड्रिंत (लइत: परम्) अषवत्व से भी सूकम (प्रुवस्:). अक र (न्म) तब को (निवाय्न) सृस्यक, जानकर (:अश्युसुख्ात) मीत के मुखं म्े (म्रमु- क्रयते! छूट जाता ै। १५ ॥ 1 भावार्ष:नो वास्म किसी बन्दिरिय का विषय न् छोने से अत्यन्त सूत्ष्म और अनस्तादि विशेषक्र युक्र के उभ 'ही को नानकर मनुष्य मौत के मुघ से बूटता है। वेद भगवान् भी कहते हैं"तमंधविदित्वाति मृत्युमेति नान्पः - पन्था विद्यतेऽयर्नाय, अर्थात् केवना नस ही को ज्ञानकर मनुष्य मौत को जीत सकता है और कोड नाग मुकि के लिये नहीं, है। १५ ॥ नाचिकेतमुपाखव्यांनं मृत्यु प्रोक्त सनातनम्। उकत्वा श्रुत्वा चमेध।वी ब्रह्मलोके.महीयते॥१६॥। परतार्य :- (नाचिकेतम्) नचिकेता से ग्रहण मिये गये (मृत्युप्ोघ्तम्) मृत्यु से नपदेश जिये रये ( सना- तनस्) माचीन ( उपास्यानम्) मंख्यान को (नकत्ा) क्रइकर (त्रुंत्वा, प्र) सुनकर भ्री (मेघावी) विचेकी सुरुष(ब्रह्मभोके-) ब्रह्म से पद में (मशीपते) घढ़ाई को मास होता है। १६॥ .मावाश् :- अव दो झोफें में उक सपास्याम का फल वर्णन फरते हैं। जो जिनाड़ शकि मोर श्रद्धा के साथ इस उपाखंन को ( नो सृत्यु ने नव्िकेता के प्रति, उप-
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वृतीया वही। हेश किया है) सुनत ब सुंभाति हैं वे कालारतर में मधसार्म ने अधिमार बमबरी बैसे के पंढे को म्रोप
य इम परमं गुह्यं श्रवफेट त्रह्मसंसदि। प्रयंतः श्राद्वकाले वा तदानरस्याये कल्पते तदानन्त्याय कपत इति ॥ १७ ॥ मरणारषं :- (यः) जो पुरुम (प्रदः) सवधाम भर (इसमू) इम (परगभ्, गुद्धम्) परणशुप्त भरास्वानको (प्रश्ममंभदि) बास्नों की सभा में (था)-या (थाटक़ासे)) श्ट्टा मे किये जाने वालेसल्फाय्य के, अवसर पर (श्रवयेत-) समाये (तत) वह (भागरत्याय): अन्त फन क्री माप्ति के सिये (करपते) सपर्य होता है॥ कारयाथं :- जी पुरुय दद पविच उमास्यान बोजसजान के अधिकारियों की सभा वा शहादिसतकमई के अनुछान के अवसर पर सुरति, सुनाते हैं, पने को सात्मी उत्तरी- तर'पवित्र संस्कानीं मे यी हीया हुवा अनिस्त'फर्ल को' प्राप्ति के लिये संदर्ष होता है। द्विर्वधन वोष्सा और वह्ों को समापति पताने के लिये है.॥ १७ ! इवि दतीया वल्ली समाप्ता.।
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अथ चतुर्थी वल्ली .. पराध्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तरमारपराङ् पशयति नान्तराटमन्। कश्चिद्धीर: प्रत्यगा- र्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृत्तत्वमिच्छन् ।१॥ परलार्य :- स्वयमम:) परमात्मा ने (नानि )इद्रि वों सो (पराद्ि) वास्त विषयों पर गिर्ने वाल (व्यवनद्) किया है (तरमात) इस. पारव मनुब्यं (पराड्) ब्राह् विषयों की (पश्वति) देखता है।त अंन्तरास्मन्) अन्तरात्ा की नंतीं, (बश्रित) को (आंवृत्तचक्ष:) ध्यानशील (चीरः) विवेनीपुरम (जस- संत्वम्) मोक्ष को (रडडन्), चाइता हुवा (मत्यगात्मा. नमू) अनतःकरवस्ववाता को (ऐसत्) ध्याजयोग के देखता ह॥११ :मवाई :- पम प्रास्मज्ञान नें प्रतिबन्धों को कहते हैं। पस्षुरदि इन्ट्रिय स्वमाब से ही रुपादि विषयों पर िर्ने वाले हैं। एस लिये इन का अनुगामी पुरुष नेवल बाल् बिष्यों की देखता है, भन्तरात्मा को नहीं। कीई घीर पुर्न हो जिस ने. सपने इन्द्रियों को वाह् विषयों से इटा लिया है, मोल्ष की इचका परता हुव ईंयानयीग से इस पनरात्मा को देखता है-।१॥ पराचः कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम्। भथ धीरा श्रमृत्तत्वं विदित्वा धुवमध्नुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥। २ ॥
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चतुर्थी वह्ली। सरसार्य :- जो (वालाः) अग्नामी पुरुष (महाच:) वास पदाथों के संयोग से उत्पसन हुवे (कामान्) वि- पयवासनाओं के ( अनुवन्ति) पीछे भागते हैं (ते) वे (विसतस्य) फैले हुे ( मृत्यों: ) मृत्यु के ( पाशमं) दांसे की (यन्ति) मास होते रैं, (संथ) और (घौरा:) विवेकी पुरुष (अेंवम् ) निश्ल (अमृतत्वम्) भोक्ष को (बिदित्वा) जानकर (इद) यहां (अरध्रुवेषु) अमित्य पदार्थों में सुख क्रो (न; प्रार्थमन्ते) नहीं चाहते ॥२॥ मावाणं :- पगानी पुरुव इन्द्रिय और विषयों से संयोग होने पर वासना रूप रज्जु से आकषित हुये हनपर टूंट पढ़ते हैं। परन्तु वे सँप मृंत्यु के पाश को जो इन विषयों के भोतर पैला हुवा हैं,उन पक्षियों के समा जो दाने के सोभं से व्याध से जाल में गिर पड़ते हैं, नहीं देय एकते-परिकाम यह होता है कि वे मृत्यु रूपव्याध के साद्य( शिकार) बनते हैं। परन्तु विवेकी पुरुंष जो भ्रागदृष्टि से इनं के परियांम की देखते हैं, यह संसार के इम भमित्य पदाथों में (जिम में सुख का प्रामास मात्र है, वास्तविक सुंख नहीं) जो नहीं लगाते। बिन्तु एस अनामय पढ की प्रप्ति के लिये शहां न शोस ऐैन मोइ, न मय हैन दुःख, सर्वदा यत्र करते हैं। २ ॥. येन रूपं रसं गन्ध शव्दान् सपर्शावंच मैथुनान्। एंतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते। एत- है तत् ॥ ३ ।।
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"कठोपनिषदि- सरलारथ :- (येन) जिश् (एतेन, एवं) इपडी आला की सत्ा से:प्राणी (रूपम्)रूप (रंक्ष्म्) एस (गन्पम्) गन्ध ( सपर्शन्) संपर्श ((च). और (मेथुनान्) रंति- 'नन्य सुखों की मी (विजानासि) जानता है, तव (अत्र) वहां (दिम्.),का (परिशिष्यते.) शेष, रहजाता है? (एवत/ वै,चतू) पड्ी वा ब्राह्म है-।। ३।। : भावार्थ :- इन्द्रियां व्ानोपलठिति में स्वतन्त्न नहीं है किन्तु जिस को सत्ता वा शक्ति से यह सपने नियत अर्थो। को ग्रहंय करती हैंवही ब्रह्म है। जब सारे अ्रत्ययों का निमित्त वही है तत उस के जान लेनेपर क्पा शेष रह- जाता है? कुछ भी नहीं। यदि कही नि संक प्रत्ययों का, निमित देहाप्षिमतनी झत्मा है नकि परमात्माह सौ 'इस का उत्तर यह है कि देहाभिसानी आात्मा भी तम प्रात्म- शक्ति के परष्नित होने से (ओ चराइशवर पदार्थों में व्याप्त, हुई संब को नियमपूर्वक चसारी हैं।उछ् प्रत्ययों का रवतन्त्न कारण नतीं है क्योंकि स्वतन्त्र या अनपेक्षय कार तौ वही, दो सफता है जो शिसी की सपेक्षा नहीं रख- ता। सो पेशा केवल ब्रह्म है॥ ३। सवप्तान्तं जागरितान्तं चोमौ, येनानुपश्यति। मदान्तं विभुमात्मानं मख्वा धीरो न शोचचत्ि.।8। सरलार्थ :- (मेन) जिस से (रवप्रामतम्) खप्नावस्ा के अन्त (च) और ( जागरितान्तम्) जागत्अ-
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चलुर्पोवद्ो।। वस्था के अम्त (समी') इन दोनों को (अनुप- रपति) जनक्रम देखता है। उूप (महानेंतम्) बंष से बड़े (विनुम्) व्यापक (आत्मानम्) सांत्माक्ों (मस्वा) नानकर (घीर:) विचेकशील (न, शोरघसि) शोक से व्याकुल नहीं ऐेता॥ ४॥ भावार्ष :- उकार्थ की ही पुंष्टि फरते हैं। संसार समस्त उपवहार खप्न और नाग्रत अवस्थां के मीत्षर ही होते हैं, मनुष्य, जाग्रत् के व्यवहारों की स्वंप्र में मान- चिक रचना कंरता है और स्वाप् भर्थों की जाग्रत् में समान्तोघना करता है। अस इन्हीं के चक्र में पंढ़ा हुषा ठोकरें साता है और कहीं शान्ति नहीं 'पाता' यह दोनों अवस्यायें को मनुष्य को रातंदिन मर्य औरे 'संशय के आवर्श में घुमा रही हैं केवल परमात्मा, की दया से हो श्रान्त और अमुकूम को सकती हैं अर्थाव कारमरत पुरुष प्रतिदिन इन अ्रवस्थाथों में प्रवेश करला हुषा भी, संसार के व्ययहारों में लिप् नहीं होता।' किन्तुवह सदा एन को ब्रह्म के साथ औरव्र्हमं को इनो के साथ देखसा हुवा शोक से मुझ हडतर है॥ ४॥॥ य इममध्वद वेद, भाटमानं जीवमन्ति- कोत। ईशान मृतमव्यस्य न ततो. विजुर्गुप्सते। एतंदै तत् ॥ ५॥ :)
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६२ कठोपनिषदि- सरसार्थ :- (प:) ओो पुरुष (इमस् ) इस (भर्छेत्दम्) कर्मेफल भोगने वाले (जीवम्) जीवात्मा के (अन्तिवात) समोपवर्सी (भूतश्व्यस्य) हुवे और होने वाले जगत् के (ईशानम्) स्वामी (आत्मानम्) परशास्मा को (खेद)' जानता है ( ससः) उंद मे (न, विजुसुप्सते) अ्रय जो मासत नहीं होता (एक्त, वे, वस) यही उच ब्रह्मध्चान जा फल है ।। ५ । भावार्थ :- जो जन दस कर्मफल भोगने वाले जीवात्मा के समीप ही विद्यमाल अर्थात् इम में अनुमरविष्ट हुये इस पराबर औोर भृत नव्य जगत् के अधिष्ठाता परमास्मा की बामते हैं उन को फिर किस का और क्या भय शो- बनता है? कुछ भी नहीं ।५ ॥ यः पूवै तपसोजातमद्भ्यः पर्वमनायत। गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभि्व्यपशयत। एतहै तत् ॥ ६ ॥ सरलार्थ :- (य:) जो जीवालां (बडम्पः) पङ्रुभू- तोसे (पूर्वम् ) पहले, (अनायव ) मकट डुवा (तपसः) दवान वा. प्रकाश से.भी (पूर्वन्) पहले (मातम्) वर्शनान (नुहाम्) वुद्धि में (प्रविश्व) प्रवेश कर (भूतेन्षिः) कार्यकारण के साथ (सिष्ठुन्तम्).स्वित परमात्मा जो (व्यपश्यत) देखता है ( एवस,के,रल) यही वह ब्रह्मदै।
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चतुर्थी वह्ली॥ भांवार्थ :- पञ्तभूतों की सत्पत्ति से पइले ज्वान, वाम- बाथा या वह ज्ञान औोर प्रकाशनी जिन से प्रफट होता रे, जो सार्य और कारय दोनों में व्यास होकर बुद्धि में र्वित हे अर्थाव बुद्धि दो जिस को जांतसफती है वहीँ
या. प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी। गुहां प्रविश्य तिश्ठन्तीं या भुतेभिध्यजायत।एत- है तत् ।। ७ । 'सरलार्थ :- (या) त (डेवसानधी) मकाशयुक्त (भ्. दिति:) वसस्हित सर्यात खम भोर सन्देट रहित म- हि (प्रालेन). माणणे संयम से (सतभवति) सत्पप दोषी है और (प्रा) जो (तिष्ठनतीम्) उहरे हुवे (गुहा) अन्तःपरय में (मविश्य) प्रवेशकर (भूत्तेशिः) शरीरादि के साथ (व्यंजायत) मकट होती है। (एव्ट्रैयव)यही वलधान का साधन रै।७ । भावार्थ :- जो बुट्धि यम नियमादि के सेवम से शुट्ध फर खमरित एवं प्राण के संय से विभाशित हेती है और ती अम्तःकरत में प्रकष्ट हुई शरीरादि के साथ प्रमट होती है रस के द्वारा ही योगी लोग चच ब्रस् को ग्राप्त कर सरते है॥ स परसयोनिहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो
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६४ कठोपनिषदि- .गर्भि णीभिः। दिवे दिव ई ड्योजा गर व द्गिंहवि
कर्म का वंही मनुष्यों से भो (अंग्निः) परंमात्मा (गर्मिणीभिः) गभिसी प्रियों से (सुमृतः) भष्के प्रकार चारंस किये मुवे (गर्भहथ) गर्म के समान तथा (अरययोंग)दोनी अंरेखियों में (निहितः) व्याप (जतवेदा,एव) भौतिक प्रग्मि केसंमान (दिवे, दिवे) प्रतिदिन (ईडूयः) उपासना करनें के योग्य है ( एतत, वे, तत्) वहे ब्रहमं हैं।। ८ ।। भावार्थ :- पैसे अग्ति दोनों पाषों में व्यापक रे परन्तु विमा संघर्षण के उत्पंक नहीं होता : एव नर्मिदी: को कुषि में गर्म विद्यमान है परन्तु बिना ययोचितंभाहः आफर के वह सुरतित गहीं रहसपंता इसी अफर पर- मात्मा मी वद्यपि सर्वत्र व्यापक है,तयापिजो अ्पने हृदय मनिदिर में प्रति दिन और प्रतिक्षरा उस बी चेपासना नहीं करते वन को वह सम्राप्य है। ताहपर्य यह सैर जैसे-गर्भिगी, का ध्यान प्रतिक्षण गर्म में हो लगा रहता है इसी प्रकार सुमुक्षजणों को ब्रह्म परायगो होना चापियेत।। यतवचादेति सू्य्योऽस्तं यत्र च. गच्छति।.तं.,, देवा :. सर्वेडर्पितास्त दुनात्येति कश्चन।एत है तत् ॥ ९ ॥ सर्रलार्थ :- (मत) जहां से (सूर्य:) सूर्य (1पदेवि)
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घतुर्थी चही। रदय-होता है (बा) और (यत्र,च) जिससमो ही (भस्तं) दीन (गष्कति) हो आठा है। (तम्) इस परमात्मा को (सबे, देवा: )-सरंदेवता(अर्पिताः) मास. ऐ (सतू, स) एस व्रश्म का (बम) कोई भी (अ, अत्येति) उल्ट्टन नहीं कर सफसा (एसत, व, तत्) यही वह ब्रह्म है ।। ।। भावार्थ :- सब देषताओों में घड़ा और प्रधान होने से सूर्य य हां पर उपलक्षय माना गया है। पर्थात् जिर् के साभरथर्य मे सूर्य उत्पनन होत्ा मोर उस मेंदी विलोन भी डोजा- ता है।-अन्य भी वायु भादि सारे देवता रथनामि में अराओों की मान्ति जिस में अर्पित है सर्थात् उसी की दी हुई शकिसे अपनी२ परिधि में काम करते हैं वही ब्रह्म है और उस का ठलटून कोई भी नहीं कर सफता ॥ए। यदेवेह तदमुत्र यदमुन्न, तदन्विह। मृत्योःस .मृत्युमाप्नोति य इद नानेव पश्यति॥१०।। सरसार्थ :- (यत्) जो ब्रझ् (हह) इस जन्म में हमारे कमों का व्यवस्थापक्ष है(सवं,एव)वह दी (असुत्र)पर जन्म में भी इुमारा तियनता है और (पव)लो (असुत्र) पर जन्म में हमारा ईशिता है (तंत) वह (भनु, इह) यहां पऱ भी अध्यक्ष है। (मः) जोपुरुष (इष) इस,ब्रझजें (,नाना, इष) भिन माय की सी (पश्यति) दृष्टि 5- रता है (सः)-सह (,मृत्यो:) मृत्यु से (सत्युम्. मृत्यु को (झाप्रोति) पाता है॥१०॥॥
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कठोपनिवदि- पीवार्थ :- जैसे योनिभेद भचवा प्वंस्थाभेद् से जौवे गुफ,कर्म,स्वभाव अद्ख जाते हैं,ऐसे ब्रह्मं के नहीं। वह तो सदा एकरस होने से जैसा अम है वेषा ही पहते बा और वैपर हीझागे रहेगा। जो उस एक बर बदवैत ब्रह्म में नानात्व की कसपना करते ऐैं अर्थात् अ्नेष भाव और बुद्धि रस में रखते हैं वे बारम्बार सृत्यु का ग्राह् बनते हैं॥१० ॥ -
मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन। मृत्यो: स मृत्युं गच्छति यइह नानेव पशयति११ सरसार्थ :- ( इदम्) यह ब्रस्म (ममघा, एव) जान- पूता बुद्धि से ही (आप्रव्यम्) जानने योग्य है (दर) एस प्रह् में (नाना) भेद भाव (विसन) कुंड भो (न, असिति) नहीं हे (यः) जो भेदवादी (बम) इस ब्रह्म में (नाता ईंव) मनेवत्व की सी (पश्तति) बरपना बरता हे(सः) वषु (सृत्योः) मृत्यु से (मृत्युम) मृत्यु को (नस्कृति) जाता हैn ११ ॥ माशार्थ :- रकार्थ की ही वुष्टि करते हैं। जो ब्रह्मं के पस द्वान से पवित्र की हुई खुद्धि से नाना जाता है उस में नगनात्व बुद्धि होने से मनुष्य उम सेवक की भान्ति जिस के कई खाभी में श्रान्ति में पड़ जाता है। इस डिये संत में गानात्व की करपना करने 'वाला अर्याव देस में मिन २ बुंद्धि रखने वाला पंझीशान्कि को नहीं पासा ॥ ११ ॥ :८
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चतुर्थी वह्ली।।
अङगप्ठमात्र: पुरुषो मध्य भत्मनि तिष्ठति। ईशानो भृतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते। एतहे तत् ॥१२ ॥ उत्लार्य :- (भूनमध्यस्य) भूत और मविष्यत् का (ईशानः) अध्यक्ष (पुरुषः) पूर्व परमात्मा (अङ्गुषनात्रः) अंगठे से घरायर ह्दय पुयडरीफ में रहने वाला (झां. त्मनि) शरीर के (मध्ये) बोष में ( तिष्ठति ) रहता ै (ततः) उस के प्वान मे (न विमुगुप्सते) फोई ग्ागि को नहीं पाता (एनय, के, तत) यही वह ब्रह्म हे।१२ भवार्घ :- इत्पुएढ रीपा जो शोवात्मा का निवासस्यान ऐ उस का पररिमाण मङ्गुष्ट के घरावर है। यद्यपि पुरुष होने मे व्रस्न उस में यद् नहीं होममता क्योंकि यह एकरस होने मे सवत्र परिपूर्णा है तथापि नीघात्मा के सादात्मय सम्बन्ध ने और उस ही देश में ध्यान योग द्वारा सस के प्राप्ति होने ने शरीर के मध्य में उस की स्थिति कही गई है। इस से मोई उसे एकदेशीयन समक बैठे प्योंकि नामान्य प्रकार मे सी, इस की सत्ता सभी पदा्थों में है। फिन्तु हत्पुखरीक में दम लिये कहा है कि वहां रस की घाहि शोधात्मा को सहय है। वस जिस का शहां पर दर्शन शेसा हे वहीं उस की स्थिति कही जाती है। १२॥ अङ्कुष्ठमात्र: पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः।
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कठोपतिषदि-
ईशानो भृतभव्यस्य स एवाद्य स.उश्वः। एतहै तत् ॥ १३ ॥ सरलार्य :- (मङुष्ठमात्रः) वही प्रखुष्ट नात्र स्थानीय (पुरुष:) परिपूर्ण भात्मा (भधुमकः) घूमरहित (ज्योति: खव) ज्योति के समान (सूतभव्यस्य) सतीत्ष और अ नागत का (ईशानः) स्वामी है (र एव) वष ही (अद्म) भाज और (स: म) वही (य) कल है (एसत, वै, तत्,) वही वह ब्रह्म है।। १३ ।। यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेपु विधावति। एवं धर्मान् पृथक पश्यंस्तानेवान्विधावति ॥ १४ ॥ सरलार्थ :- ( यथा) जैसे (दुर्गे ) विषम देश में !वृ. ष्टम्) वर्षा हुषा (उद्कम्) जम (पर्वतेषु) निस्नस्थनों में (विघावति) बड़ता है (एवम्) इसी प्रकार (धर्मान्) जुों को गुणी से (पृचक) अलग (पश्पन् ) देखता हुआ ( तानू, एष) उन्हों गुगों का (अनुविघावति ) अनुधावन करता है। १४ ॥ भावार्थ :- जैपे मलष का स्वमात नोचें बहने का है। ऐसे ही गय अपने गुगी का प्नुधावन करते हैं। प रयात समवाय सम्बन्ध मे गुख सदा अपने गुयोमें रहते है। नो मनुष मुकों को मुखी मे पृयक् जानता है.भ- र्थांत गुण में ही ट्रव्य बुद्धि रखत्षा है यह जात्सत्व को नहीं जान सकता, किन्तुसन गुषों में हो स्मय फरता-है।१४॥
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चतुर्ची वह्ली।।। यधोदकं शुद्धे शुद्धमासिकं ताहगेव भवति।, एवं मुनेर्विजानत भातमा भवति गौतम ॥१५॥ मरलार्य :- है (गौतम) नचिकेता! (यया ) जैसे (शुद्धे) खब्छ और सम देश में (शुट्धम् ) स्वच्छ (उद. नमू) नस (प्राहिसम्) सौंचाहुदा (साटूगू, 'एव ) वेमा ही (भवति) होता है (एवम्) इसो प्रकार (विज्ा- नतः) जानने वाले (मुने:) मननगोल का (झात्मा) प्राता (भवति) होता है।१५ ॥ सादार्थ :- सृत्यु नचिकेता से कहता है कि हे गोक्षम के दुग! जैसे स्वच्छ और चम घरातल भूमि में सींभा कुष जम तहत हो जाता है, ऐसे ही वित्ानी पुरुष का आत्मा डरल और समदर्शी हो जाता है घर्णाव जल में ममिनवा और कुटिलता समीत्षक है जवसस वह शुद्ध भीर समभूमि में माह जहीं छोता इसी पसार तीवत्मा में भी मालिन्यऔर कौटिस्प उमीयफ रमता है, नहतर यह उस शुट्ध भर शान्त द्रह्त का आात्रय नहीं लेवास इति चतुर्थी वल्ली समाप्ता।
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1 अथ पञ्जुमी वल्ली परमेकांदशहारमजस्यावक्रचेतसः । मनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते। एतहै तत् ॥१॥ सरलार्ष :- (सवक्रचेतमः) सरल चिस्त वाले (अजस्य) अमुत्पन्न जीवात्मा के (एकादशद्वारम्) ग्यारह दरवाजे वाले (पुरस्) शरीर को (भनुष्ठाय) अनुष्ठान करमे (ग, शोषति ) नहीं सोचता (च) और (विमुक्:) मुक हुषा (विमुच्यते) छूटता.है (एतत, वे, तत) यही उस विज्ञान का फल है। १ । भावार्थ :- जो राजा अपने पुर के दरवाज़ं को (जिम में होरर नगर में प्रवेश किया जाता है) दृढ़ औौर सुर- पित रखता है, उस को शत्रु का पय नहीं होता। इसी प्रकार जो मनुष्य इस ग्यारह दरवाजे वाले शरीर को वर्णाश्रम सस्बन्धी धर्म के पालन और अनुष्ठानं से दृढ़ और पवित्र बना लेते हैं, वे तीनों भणों मे ईमुक शेकर नोक्ष के अधिकारी बनते हैं। १ ॥ हंस:शुचिषद्दसु रन्तरिक्षसद्वोता वेदिपदतिथि- र्दुरोणसत्। नृषहरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतम्बृहत् ॥ २ ॥ * शरौर के ग्यारह दरवाज़े ये हैं। दो भांख के, दो कान के, दो नाम के, एक मुंह का, एक पायु का, एक उपस्य का, एक नाभि का और एक कपाल का। 5 सोन ऋष ये हैं। देवऋण २ ऋ षित्रण ३ पितृत य।।
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पछ्मी वक्ी।। सरलार्थ :- (इंसः) एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने बाला जीवात्मा ( शुचिषंद्र) शुद्ध देश में स्यित (बसुँः) अनेक योनियों में वास परने वाला (अन्सरिक्षसत्) हृदयाकाश में स्थित(होता)पक्तादि का सेवन करने वाला (वेदिषद्) स्थणचारी (अ्र्तिषिः) अम्यागत के समान एकत्र स्थिति न रखने वाला ( दुरोणसत) कुटीचर (नृपत्) मनुष्य शरौरधारी (वरसत्) देव और ऋषि शरीरधारी (ऋनमत्) ब्रह्म अथवा मत्य में प्रतिष्ठित (व्योममत्) नभवारी (अठंगाः) जतघर (गोजा:) पृथिवी में नत्पन्न होने वाले वनस्पत्यादि (ऋतणाः) यव्विय मोषध्यादि (अद्रिजाः) पर्वतों में नत्पन्न होने वाला मी (ऋनम्, वहत्) अपने स्वरूप से अविचल है।२।। भावार्थ :- जीवात्मा अपमे पर्मानुसार अनेक गतियों को ग्राप्त होता है, वही एस झोक ने दिखलाई गई हैं। कहीं यह स्थलधर होफर पृथिकी में विकरता है और कहीं गलचर हेकर जल में निवास करता है। एवं कहों नमचर होकर आकाश में गमन करता है। कंहीं नस्पति और भषध्यादि में नानर मकट होता हैं और कहीं मनष्य, देष, ऋषि आादि के शरीर में प्रविष्ट होंकर जन्म लेता है। यद्यपि कर्मानुसार नीवात्मा अनेक योनियों को प्रांप्त होता और भिन्न २ दशाओं का अनुभंध करता है, तथापि अपने स्वरूप से नित्य औौर अपरियामी है॥२॥ ऊर्ध्व प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति। मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासतें ॥ ॥
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कठोप निषदि-
सरलार्थ :- जो सामन (प्रागम्) ग्राय वायुको (ऊर. ध्वम्) हृदय से ऊपर मसतक में (,ससयति ) से माता है (पपानम्) अपान यायु को (मत्यक) हृदय से मौचे उद्र में (अ्यति) फैंकता है (मध्ये) बौध में (ब्ासोनम्) स्थित (वामनस्)सेवनीय जीवात्मा को (विश्वे,देवाः) समस्त म्राण और इन्ट्रियां (सपामते) सेवन करते ह ॥३५ मावार्थ :- करठ और नामि के बीच नें इट्पुसडरीक देश है, जहां जीवात्मा अपने परिपद्वर्ग सहित विराज- मान ३।वहां उस की सेवा में समस्त प्रायऔौर इस्दििय (जैसे मृत्यजञन अपने स्वामी की सेवा में तत्पर होतेहै) सपर हैं। मास वायु को हृदय से ऊपर और अमान वायु को नोचे ले जाने से आत्मा को अवकाश मिलता है,जिस में वह उस प्रकाश को देखता है, शिसव से यह सारा जगत प्रकाशित हो रहा है।। ३। अस्य विस्त्रंस्यमानस्य शगीरस्थस्य देहिन: । देहादिमुव्य मानस्य किमत्र परिशिष्य ते।एत है तत् सरलार्थ :-- (अस्य) इस (शरीरस्घस्य) शरीरस्थ (देहिनः) आांत्मा के (विस्तरंस्यमानस्य) विषरंवस्त होते युवे भर्थात (देवत ) देह से (विसुच्यमानस्य) पृथक् रोते हुवे (अन्र) यहां (किस्) नंबा (परिशिव्यते) शेष रह जता है ( एसत, वे.तत) यही उस ब्रह्ममापिका साघन भावार्थ :- जो जिस मे होने से रोता और न होने का सनका जाता है। यह अ
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पज्षमी वह्षी।
समदादि का शरीर प्राण एवं इन्ट्रिय मलापसहित आात्मा को विद्यमाणता मे ही विघेित होता है। जब माला एस विशरय होने वाले शरीर मे पृथक हो जाता है तब इस में कुछ भी शेप नहीं रहता, अर्थात् न म्रास पेश कर सकते हैं और न रन्ट्रियां अपने भर्थों को ग- इट कर सकती हैं, पर्थात् पारी शक्तियां और उन के नाम इम के शरीर से लमग होते ही वन्द हो जाते हैं। अतः सात्मक ही शरीर म्रह्मज्ञान की प्रासति का भी साधन को सकता ३॥४॥ न प्राणेन नापानेन मत्येो जीवति कश्चन। इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥५।। मरलार्थ :- (कशन) कोई भो (मत्यः) मनुष्य (म, माखेन) न प्राण से न, अपानेन) न अ्रपान से (जीवति) जीता है ( तु ) किन्तु (यस्मिन् ) जिसर में ( एती ) यह दोनों (उपाशिती) भश्नित हैं (इतरेण) एस प्राय ममान से भिन्नर भात्मा से (जीधन्ति) जीते हैं॥५ ॥ भावार्ष :- प्रास और मपान से कोई भ्रायी नहीं जीता क्योंकि वे सपनी क्रिया के करने में स्वतन्त्र नहीं हैं किन्तु ये सब जिस के आश्रित हैं अर्थात् जिस के होने से सपनी २ क्रिया करते हैं और न होने से नहीं वही इन सूब का अधिषठासा आत्मा हे सौर कसी से, सब घ्ाखी नीवन घारख करते हैं। ५।।
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कठोपनिपदि- हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् चथा च मरणे प्राप्य भातमी भवति गौतम!॥६।। सरकार्थ :- वे (गौतंग)गोस्षम वंशोत्पन्न। (हन्त)कृपा- पुवंक (तें) तेरे लिये (यदम्) दम (गुह्यंम्)' अप्ररट (सनातनम्) अनादि (ब्रह्म) छात्मा को (प्रमव्वशमि) कहंगा (घ) और (यथा) जैसे (मरणम्) सृत्यु को (म्रांध्य) ग्राप्त होकर (आत्मा) श्रीयात्मा (सवति) होता है॥ ६ ॥ भावार्थ :- वृत्यु नचिवेता से कहसा है कि हे गोतम! मैं तेरे मिये छस मनातन क्रल का उपदेश करूंगा जिम के जानने से मनुष्य मुझ को जीत लेता है और नस को न जानने की दशा में जिस प्रफार, यह जीशंत्मा बाररुधार नेरे वश में होकर गन्न धारण काता है वह भी तेरे प्रति कहता हूं॥६॥ योनिमन्ये प्रपद्यन्ते इरीरत्वाय देहिनः । स्थाणमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्॥७।। सरलार्थ :- ( नन्ये ) कोई (देडिनः) प्रागी (यंधा फर्ष, यथात्रुंतम्) अपने न कर्म और तज्जनित वासना- ओों के अनुसार (शरीरतवाय) शरीर धारया करने के लिये (योनिम्) नङन योतियों को (प्रवद्यन्ते) म्राप्त होते हैं ( अन्ये ) कोई घोरं पांपाचारी ( स्थायुभ्) ग्घावर योनियों को (अनुसंयनति) मरयाननतर म्राप्त होतें हैं। 9 ।।
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पक्चमी वह्ली। मावार्षं :- शो बंग ब्रल्मक्वाण से विसुख हैं वे सेश, फर्म, विषाक और भाशय की रज्जु में बन्धे हुवे नाना प्कार के जाति, आायु औौर भोगरूप फलों को प्राप्त होते हैं। जिनके शुभ कर्म अधिक हैं वे देषत्व वा ऋपित्व को, जिन के शुप्ताशुभ दोनों वराबर हैं वे मनुष्यत्व को धीर जिन के अशुभ कर्म अघिश हैं वे सिय्यंक योनियों को माप होते हैं। जघतक वे उस शुद्ध और निर्विकसप पढ के अधिकारी नहीं घनते तथ तक इमी प्रकार जन्म मरया के चक्र में घूसते हैं।9॥ य एष सुप्तेषु जागर्ति काम कामं पुरुषो निर्मि- माण: १ तवेव शुक्रं तद्बह तदेवामृतमुच्यते। तस्मिंल्लोका: श्रिताः सर्वे तुनत्येति कश्चन । एंतहै तत्ं ॥८॥ सरलार्थ :- ( य:एपः ) श्री यह अन्तवर्पामी (पुरुषः) सक में व्याप्त (फीसं, कामम् ) यथेच्छ (निर्मिमाण:) सघ पगत् को रचता हुध (सुपेषु) सोतेहुवे जीषों सें (जागर्ति) भागता 'है (तत, एव), वही (शुक्रम्) शुद्ध (सटू, व्रश्) घहे सब से बड़ा (सट्, एघ वही (भमृतम्) अपरिगानी ( उच्यते) कहाजाता है:(स- स्मिन्) उप्ी ब्रह्म में (मर्वे, लोफा: )पघ लोक़ (प्रिताः) ठहरे हुवे हैं ( ,सद्, उ.) वम को (कशन,) कोर्ई मी (व, पत्येति), उल्लङ्कन नहीं, फर सपत्ा ! (एसत्,वै,सत् ) यही वह ब्रहम है।८
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कठोपनिषदि- भावार्थ :- अ्रम इस ग्रोष में पुनः परनात्मा का वर्षन है। जो पुरुष त्रिगुद्ात्म प्रकृति से सारे जगत् को नि- नाख करता हुवा सस, रन, तभ इन तीन गुखों का अथा- योग्य विभाग करता है और आप उम गुखों में लिस नहीं होता तथा उक मुखों की गय्या में सोते मुने जो- वास्मामों को भी कर्मानुसार फल देवर जो जगाता रहता है। वही शुद्ध और सनानन ब्रह्म है। रसी मेंये पृषिव्या- दि समस्त लोक आम्रिरित हैं। रस का कोई सौ पदार्थ असिकमण नहीं कर सरता ॥C ॥ अग्नियथैको भुवनं प्रविश्ठो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो, वहिश्च । १ ॥ सरलार्थ :- (यथा) जैसे (एक:, अग्मिः) एक को औतिक अग्नि (भुवनम्) लोब में (प्रविष्टः) व्याप् हुवा (रूपं, रूपन्) प्रत्येक रूपवान् वस्तु के (प्रतिरूपः ) तुल्य रूप वाला (बभूब) हो रहा है ( तथा) वैसे ही (एर:) एक (सर्वभतान्तरात्मा) सब का अम्तर्थामी परमात्मा (रुपं, रूपम्) प्रत्येक वस्तु के ( प्रतिरूप: ) तुल्य रूप वाला या प्रतीत होता हे (प) किन्तु (बहिः) उन के रूपादि घर्मों से वह पृथकुं है। ९ ।। महवार्थ :- मब सग्नि के दूष्टान्त से परमात्मा की ठया- पकता का निरूपण करते हैं। जैसे एक ही अग्नि भिन्र २ पदार्थों में प्रविष्ट हुवा तततदाकार में प्रतिमाम्ित होक्षा
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पछ्ुमी यह्ली॥ 95 है। वस्तुतः पग्ति सन के पृथक है। इसी प्रकार वह अन्सर्यामी परमात्मा भी सम्पूर्ण पदार्थों में व्यापक हुवा प्रगानी पुरुषों को तत्तदाकारवान् सा प्रतीत होक्षा है। वास्तव में वह पन से प्त्यन्त भिन्न व विलक्षरा है॥ वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टा रूप रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभुतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो वहिश्य।। १० ।। मरलार्थ :- (यथा) लैसे (एक:, वायुः) एक ही वायु (भुघनम्) लोक में (प्रषिष्टः ) फैला हुवा (रूपं,रूपम्) प्रत्येक रूप के ( मतिरूपः ) सुख्य रूप वासा (बभूष) हो रहा है। (तथा) वैसे ही (एक:) एक ( सर्वभू- सान्तसात्मा) मम प्राग्रियों का आर्मा (रूपं, खपम्) मत्येक रूप के (प्रत्िरूप: ) तुल्य रूप वाला सा मतीत दोता है (च) किन्तु (घहिः) वह ए्म से पृथक है॥१०। सावार्थ :- पव उनी आातमसत्ता को वायु के दृष्टान्त मे निरुपया परते हैं। एस का आाशय भी पूर्ववन समभ- ना नाहिये॥ १० ॥ सुर्योयथा सर्वलोकस्य चक्षुन लिप्यते चाक्षु- पैर्बाहदेषैः। एकस्तथा सर्वभृतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्याः ॥ ११:॥ सरमार्ष :- (तधा) जैये ( सूर्य:) सूर्य (रर्वलोंकदंय) ममग संसार को(चक्षः)आंख है। पर(यासुक, बाह्दोषः) वकषुः सम्बन्धी बाह दोपों से( न, सिप्यते) ्जिस नी
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94 कठोपनिषदि- होता (तथा) ऐसे सो (एकः) एफ (सर्वभूनान्तरात्मा) सघ प्रागियों का अन्सर्यामी आात्मा (वाहः) उन से अलग (लोकदुःखेन) संसार के दुःख. से (न, लिप्यते) 1 लिस नहीं होता।। ११ ॥ भावार्थ :- अम ससी विषय को सूर्य के दृष्टान्त से पुष्ट करते हैं। जैसे मूर्य दर्शनहेतु होने से मारे जगत् को भांख है अर्धात् सर्य के ही प्रकाश से अर्मदादि की। आंखें भी प्रकाशित होती हैं। आांखों में व्याप्त हुधा भी सर्य का प्रषाइश आांखों के दोषों मे दूपित नहीं होता। इसी प्रकार समय्र संसार में व्याप हुषा भात्मा भी सां- सारिक दोषों में िस नहीं होता, किन्तु सदा उन से पृथकू रहता है। ११॥ एको वशी सर्वभृतान्तरात्मा एक रूपं बहुधा य: करोति। तमांत्मस्थं येनुपश्यन्ति धीरास्तेर्षा सुखं शाइवतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥ सरसार्थ :- (एफः) एक (बशौ) मय जगत को वश में रखने वाणा ( सर्वभूतान्तरात्मा) इस का मन्तर्यामी है (यः) जो (एकं रूपम्) समष्टि रूप से एक प्रधान कारण को (बहुघा) व्यष्टिरूप से नागा प्रफार का (करोलि) करता है (ये ) जो (घीरा:) ध्यानशील (तम्) उस (आतमस्थम्) जोघात्मा में स्थित परभातमा को (झ- नुपश्यन्ति) देखते हैं ( तेषाम्) पत को (शाश्वतम्) सुनरसन (सुखम्) मुक्ि का सुख ग्रहप होता है (इसरे- घामू, न) अन्य संसारी पुरुषों की नहीं। १२॥
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पछुमी वह्ी॥ मावार्थ :- जो एफ इस अनन्त ब्रह्माएड को भपने भटम नियमों से चला रहा है, जिस की आाध्ा वा नियम के विन्टु कोई काम जगत् में नहीं हो सकता और न कोई पदार्थ जिस्व का अत्तिक्रणणा पर सकता है, जो सृष्टि करी आादि में एक प्रकृति को नाना नाम रूपों में परियत पारके इस कार्यरूप जगत् को विस्तार देता है। उस अन्तर्यागी रूप से सबमें अधस्थित परगात्मा को ध्यान- योग से तो घीर पुरुष देखते हैं वह मुक्ि को मास्त होक्र उस परमागम्द का अनुगध करते हैं, जिस को संसारी पुरुष पदापि उपपब्ध नहीं कर सफते॥१२॥ नित्योऽनित्यानां चेतनशचेतनानामेको बहूनां वो विद्धाति कामान्। तमात्मस्वं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्ति: शाइवती नेतरेषाम् ।१३।। सरक्षार्थ :- (मनित्यानाम्) अनित्य पदार्थों में (नित्यः) नित्य (चेतनानाम् ) चेतनों में मी ( चेतन: ) चेत्षन (बहनाम्) वहुतसों में (एफ:) एफ है ( य: ) जो. शोषों के प्रति (कामान्) कर्सफलों को ( विद्धाति) विधान करता है (सम्) उस (सात्मस्थम्) अन्तर्यामी फो (ये) जो ! घौराः) ध्यानशीस (अनुपश्यन्ति) देखते हैं (तेषाम्) तन को (शाश्वतीशन्तिः) परमशान्ति है (दूतरेपास्, ऩ ) सोरों को नहीं।। १३।। भावार्थ :- जो परमात्मा अनित्यों में नित्य, चेतनों में चेतन औीर बहुससों नें एक है और जो जीघों के लिये
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कठोपनियदि- यथायोग्य कर्मफलों का विधान करता है। उस को जा ध्यागयोग से देखते हैं वे परमशान्ति के भागी बनते हैं, अन्य नहीं॥१३॥ तदेतदितिमन्यन्तेSनिर्देश्यं परं सुखम्। कथन्नु तहिज़ानीयां किमु भाति विभाति वा ॥१४॥ सरलार्थ :- जिस (परमं,सुखम्) परमानन्द को (तत्, एतत्, इति) "वह यह " इस प्रकार (अनिर्देश्यम्) मङुःली निर्देश से कहने पयोग्य (मम्यन्ते) गानते हैं। (तत्) उस को (कथंन) कैसे (बिजानीयाम्) ज्ञानूं (फिस्, उ) क्या वह (भालि) प्रकाशित होता है (वा) या (विशाति) स्वयं प्रकाश करता है॥ १४ ॥ ! भावार्थ :- जो सुख अनिर्देश्य है अर्थात "वह यह है"। इस प्रकार अङ्गुतो से निर्देश नहीं किया जा सकता, उस को इम किस, प्रफार जान सकते हैं? क्या वह ब्रह्म जो उस मनन्द का कारण माना जासा है, प्रकाश के तुल्य भासित होता है अथवा सूर्यादि के सदृश स्वयं झ्ार- नान है? यह प्रश्न है॥ १४॥ न तन्न सूर्य भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयलग्निः । तमेव भान्तमनभाति सर्वे तस्य मासा सर्वं मिदं विभाति॥१५ ॥ "चरसार्थ: (तत्र) उस ब्रह्म में ( सूर्यः) कूर्चं ( न, भाति) नहीं पफाश कर सकता (न, चन्द्रतारकम्) धन्द्र
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पक्चमी वक्षी॥I ८१ और तारागय का प्रकाश भी वहां मन्द पड़ शाता है(इमाः विद्यम:) यह बिशलियाँ भी (न, भानिति) वहा नशीं चनक सफसीं(अयम्) यह( भ्रग्निः) भौतिक अग्नि (कुतः) कहा से प्रकाश फरे, किन्तु (सम्, एध, भान्सम्) उस ही रुषयं प्रकाशनान से (सर्षम्) सघ सूर्यादि (भनुभासि) म्रक्ा- शिवष होते हैं (तस्य) तप के (मासा) प्रफाश से(इद,सर्बस्) यह सघ (विसाति) स्पष्ट रूप से प्रकाशित होता है।।१५। भावार्थ :- हच से पहलं पलोष में पंछा गया था कि यह व्रह्म सर्यादि मे समान प्रकाशित होता है सथवा स्वयंप्रशाश हे।इस रशेक में उस का उत्तर दिया जाता है कि रस व्रह्म में यह सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, बिशुली आदि कुछ भी प्रकाश नहीं कर सकते फिर अग्नि की तो कथा ही क्या है किन्तु ये सघ सर्यादि उसी से प्रकाशित हो कर प्रकाशक बनते हैं, वह स्वयं प्रकाश होने से किसी के प्रकाश की भपेक्षा नहीं रखता क्ोंकि म्रलय में भी जब सर्यादि का प्रकाश नहीं रहता यह हिरणयगर्म रूप मे (जिस से सारे प्रकाश सत्पम्न होते हैं) अवस्यित रहता है।।१५।। इति पझ्लुमोधल्ली समाप्ता
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अथ पष्ठी वल्ली प्रारभ्यते ऊर्ध्वमूलोऽवाकशाख एषोऽश्वंतथ: सना- तनः। तदव शुक्रं तद्रह्म तदेवामृतमुच्यते। तस्मिन्लोका: श्रिताः सर्वे तदु नात्येति क- शचन ॥ एतद्वे तद् ॥ १ ॥ सरलार्थ :- उर्ध्घसूलः) ऊपर को सूल्ष है जिस्व का (अषाकशाखः) नीचे को शाखा है जिस को ऐसा (एपः) यहं (अंश्वत्थः) अनित्य संसार रूप वृक्ष (सनातनः) प्रवाई से अनादि है। उक अनित्य परंतु अनादि वृक्ष जस के आघार में स्थित है वह ब्रह्म (तट्, एव,शुकम्) इत्यादि पूर्ववत्॥१॥ भावार्थ :- कार्य के देखने से कारंय का ज्ञान होता है 3 इस लिये इस कार्यरूम जगत् को अघिष्ठान मानकर इस के अघिष्ठाता ब्रम्म का निरूपण किया जाता है। इस समस्त सृष्टि में मनुष्य के मधान होनेसे उस के शी शरौर का वृक्षालङ्कार से वर्रन करते हैं। जैये वृक्ष का सूर्ष नीचे को और शाखा ऊ़पर को होती हैं इस के विपरीत इंस मनुष्य शरीररूप वृक्ष का सूल अरर्थात शिर नौचे को और हस्तपादादि शाखायें ऊपर को होती हैं। अश्वत्थ इस को इस लिये कहागया है कि यह कल को ठहरेगा या नहीं इस का कुछ भी मरोसा नहीं। सनातन इस लिये है कि
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थष्ठी वही।
प्वाह से मनादि है अर्थात् जगत् के, साध साथ यह भी चसा आसा है। वस यह मनुष्यशरीर जिस में प्रधान है ऐसे इस विचित्र गगत् को रघकर जिस ने अपनी अमित महिना का मकाश किया है यह ब्रह्म है। उसी में यह द्ारा संसार ठहरा हुवा है। उस के गियमों का सल्पङ्न फोई भी सहों कंर सफसा।१॥ यदिदं किश्च जगत्सर्व प्राण एजति: निःसतम् महद्भयं वजुमुद्यतं य एतहिदुरमृतांस्तिभवन्तिाश सरलार्थ :- (यत्, बिंदु) लो कुछ (जगत्') संसार. है (रदम्, भर्वम्) यह सब (मारो) परमात्मा को विद्यना- नसा में (एजति)वेष्टा करता हैऔर संसीसे(निस्सवम्ं) उत्पव हुआ है वह ब्रह्म (उद्यतम्, वजम्, इ) हाथ में शख लिये बुचे के समान (नहद्रयम्) भय का हेतु है। ये: जो मनुष्य (एसत्) इस ब्रंह्म कों (विदुः) जानते है (त) वे (पमृताः) मृत्यु से रंहित (मवन्ति) होते हैं ।२ मावार्थ :- यह सब जगत् व्रम्म से उत्पन्न होकर उसी की सत्ता से चेष्टा करता है और उसी कें मय से संक्ार के समस्त पदार्थ नियनानुसार मपना रशाम कर रहे हैं फोई उस की मर्यादा को जो सर्गारमूम में उसने स्थापिस को हे उल्लङ्कन नहीं कर सकता।इस प्रकार जों उस कों सता और नहिमा को जानते हैं वे मृत्यु को चौंस कर अमर छोणाते हैं।२ ॥
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८४., कठोपनिषद़ि- भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः। भयादिन्द्रश्च वायुइच मृत्युधीवति पञ्चमः॥।३।। छरलार्घ :- (अस्) इस ब्रह्म के (पयात् ) भय मे (पव्ति:) भग्नि (तपति) जलता है (भयात्) भय से (सूर्य:) सूर्य (तपति) तपता है (भयात्, च) मय दे हो (रन्द्रः) विद्युत (च) और (वायुः) पवन चमकते और चलते हैं तथा (पक्षुमः) पांचवां (सृत्युः) काल (घार्वति) दोड़ता है। ३ ॥ भावार्थ :- अब ब्रह्म की भयडेतषुसा दिखलाते हैं। प्रग्ति, मूर्य, इन्द्र, वायु और मृत्यु यह पांघों सती के भय से गिरन्तरअपना २ काम कर रहे हैं। इमारे पाठक यहां भय शब्द को देख कर चौकेंगे और अपने मन में कहेंगे कि क्या अग्नि आादि जढ़ पदार्थ भी किसी से डरा करतेहैं? इस का उत्तर यह है कि यहां पर मय शव्द केवल इन की नियमानुकूमत्ता बवलाने के लिये मयुक् हुवा है नकि प्रस्मदादिके समान भय से शङ्किमवाव्ययत होनेमें ।३।। इहू चेदशकद्ोद्ु' प्राक्शरीरस्य विस्रसः। ततः सर्गेषु लोकेपु शरीरत्वाय कल्पते ॥8॥ सरलार्थ :- (चेत) यदि (इह) इस जन्म में (शरीरस्) शरीर के (विस्त्रसः) नाश होने से (प्राकू) पहिले (बोद्धुम्) जानने को (अरशफत) समर्थ होवेती संसार के बन्धनसे छूट जाता है, नहीं तो (ततः) आात्मा के न जानने से
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पष्टी वही । (सगेयु, लोकेषु ) विरचित लोफों में (शरीरत्वाय) शरीर धारण करने के लिये (करपले) समर्घ होता है ॥.४.॥ भायार्थ :- जो मनुष्य इस शरीर के नाश होने से पूर्व हो उस भय के कारय व्रह्म के जानने में समर्थ होते हैं, वे भय से मुक हो जाते हैं। इतर अद्वानी पुरुप वारंवार सृष्टि में नम्म धारण कर मृत्यु परादिके मय से कांपते रहतेहैं।।।।। यथाऽडदर्शे तथाऽSत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके। यथाप्सु परीव ददूशे तथागन्धर्व लोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥५॥ सरलार्थ :- (यथा) जैसे (आदर्शे) दूर्परा में प्रति विम्ध दीखता है (तथा) तैसे ( झ्ात्मनि) शुद्धअन्तःकरय में आत्मा प्रतिभासित होता वै (यथा) जैसे (स्वप्र) स्वप्रावस्था में जागृत वायनोद्गत्त संस्कार अविस्पष्ट होते हैं (तथा) तैसे ( पितलोके) सकाम कर्म बरने वालों में भात्मा का दर्शन अविषिक है (यथा) जैसे.(अ् प्सु) जलों में (परीव) धारों भोर से स्पष्ट नवयव (दददशे ) दीखते हैं ( तथा ) तैसे (गन्धवशोके) विज्ञा नो पुरुषों में आंत्मा का दर्शन स्पष्ट रूप से होता है। (छायासपयो:, इष) छाया और आतप के समान विस्पष्ट (ब्रह्मणोके) सुकि दशामें ब्रम्म का दर्शन होता है ।।। भावार्थ :- जैसी और गितनी स्पष्टमतिबिम्ध देखने के लिये स्वच्छ मदर्श की आवश्यकता है, वैसी और
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कठोपनियदि- उतनी सी पवित्र आात्मा का दर्शन करने के लिये निर्मेक्ष एवं शद्ध माद से भावित अन्तःनेरय की भपेक्षा है। जैसे स्वम्रावस्या में जागृत के व्यवहार स्पष्ट रूप से नहीं दोखते इची प्रकार सकाम कर्म करने वासों को गयार्थ रूप से आत्मा का दर्शन नहीं हेया।जैसे जल में प्रति- विन्थ स्पष्ट दीखता है ऐंसे ही पानी पुरुषों को स्पष्ट रुप से आात्मा का दर्शन होता है। और जैसेछाया और आतप भिन्र २ और स्पंटट भवगत होते हैं इसी प्रकार मुमुक्ष पुरुष को ब्रह्म धौर प्रकृति (जिसे माथा भी कहते हैं) का भेद और स्वरूप स्पष्टतया अवगत होंता ह॥५॥ इन्द्रियारणावृथाभावमुदयास्तमयौ च यत्। पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति।६।। सरसार्थ :- (पृथगुस्पद्यमानामास्) अपने २ रुपादि प्रथों को ग्रहण करने के ठिये अपने २ अग्न्यादि कारस से कृथक २ सत्मन्न हुवे (इन्द्रियासाम्) चक्षरादि इन्द्रि- यों का उस चेशन स्वरूप सांत्मा से (पृर्थक, भावम् ) मत्यन्त पार्यक्प है (यत) जो( उदयास्तमपौ) उत्पत्ति और विनाश एवं म्रादुर्भाध या तिरोभाव आदि धर्म मौ शरीर और इन्द्रियों के दी है आात्मा के नहीं। इस प्रकार (मत्वा) ज्ञान पर (घीरः ) विवेशी (न, शोघति) शोक नहीं करता ॥६॥ भावार्थ :- जो लोग देहेन्द्रिय के व्यततिरिक्क कोई आत्मा, नहीं मानते, वे दैहादि के नाश में अपना विनाश समकले
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पछी वली । 29
हुए रात दिन शोप्सागर में हूरहते हैं, औीर यह सनभते हैं कि मरते ही सारे सुसों का विशोप होआायगा। दिप- रीस इप के को शात्मा को शरीर और इन्द्रिय तथा इन के वहपतति और विनाश आादि घर्मो से पृषक मनफते हैं, वे शोक मे मुक् हेनाते हैं। ६ । इन्द्रियेभ्यः परं मनी मनसः सत्वमृत्तमम्। सत्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥७। अव्यक्तातु परः पुरुपो व्यापकोSलिङ्ग एव च। यज्जात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति॥८॥ सरसार्थ :- (इन्द्रियेभ्यः) शव्दादि अर्थ मर उन के ग्राहक शोतादि इन्ट्रियों से (मनः) उन का प्रेरक मन (परस्) सृक्षम है (मनसः ) गन से (सत्वम्) रत्वगुया विशिष्ट वु्धि (उत्तभम् ) उत्तम है (सत्वात्) वुद्धि से (अधि) ऊपर (गहान्, भात्मा) महत्तत्व है (महतः) महत्तत्व से (अव्यक्षम्) प्ररतिनामक प्रधान कारंय (उत्तनम् ) सूक्ष्म है ।9I। (अव्यक्ात्) सब के उपादान कारया प्रकृति से (तुं) निश्चय (व्यापकः) गव में व्यापक (च) और (अलिङ्क:, एव) जिस का कोई चिन्द नहीं ऐसा (पुरुष:) परमात्मा (परः) अत्यन्त सूदन है (यत्) जिस को (झात्वा) जानफर (जन्तुः) प्राणी (मुच्यते) छूट आाता है। (च) और (भमृतत्थम्) गोक्ष फो (गच्छति) म्राप्त होता है।5॥
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कठोपनिषदि- मावार्थ :- इन्द्रियों से मन, नम से बुद्धि, वुट्धि से भह- तत्य, महत्तत्व से प्रकृति भीर प्रकृति से भी अत्यन्त भूक्षम वह ब्रह्म है जो सब में उपापक और शिङ्गवर्जित है रस हो को जान कर प्रायी देहादि बन्धन से कूटकर सुक होता है।।। न सन्दशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुपा पश्यति कश्चनैनम्1 हदा मनीपा मनसाभिक्ृप्तो य एतदिदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९॥ सरसार्थ :- (मस्य) इस प्रतिन्त्व और प्रव्यक्त ब्रह्म का (सन्दुशे) समक्ष में (रुपम्) कोई रूप (न, सिष्ठति) नहीं ठहरता (एवम्) इस को (कश्चन ) कोई भी (घ- क्षुषा) आांख आदि इन्द्रिपों से (न, पश्यति) महीं दंख सकता (हृदा) हृदयस्य (मनीषा) मनन करने वाली (ननसा) बुद्धि से (अभिक्कृप्तः) प्रकाशित हुवा जाना जासकता है। (ये) जा (एतव) इस को (विदुः) जानते हैं (ते) वे (अमृक्षाः) नमर (भवन्ति) होते हैं ॥॥ भावार्थ :- जब वह ब्रह्म अलिंङ्ग और भ्रव्यक्र है तब उम का दर्शन कैसे हो सकता है? प्रत्यक्ष में उस ब्रह्म का कोई रूप नहीं है जो रन्द्रियों से ग्रहय किया का सफे इस लिये स्यूलदृष्टि से कोई पुरुष उस को नहीं देख स. कता। हां अन्तःस्य बुद्धि को मननात्मिका वृत्ति से (जो समस्त सङूरूप विकलपों के गान्त होने से उत्पन्न होती है) इस आत्मन्योति का दर्शन होता है। इस प्रकार जो योगी
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षष्ठी वक्षी॥ लोग उस ब्रह्म का दर्शन करते हैं वे अमृत होक्षर उदा भानन्द पद में रनंगा करंते हैं॥ ९। यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुःपरमां गतिम्॥१॥ सरलार्थ :- (यदा) जब (पत्च, ज्ञानानि) पांध-ज्ञाने- न्ट्रिर्या (मनसर, सब) मन के साथ (अवतिष्ठन्ते) ठहर जाती हैं ( घ ) और (बुट्धिः) बुद्धि भी (न, विचेष्टते) विरुट्ठ वा विविध चेष्टा नहीं करती(ताम्) उस क्षो घि. द्वान् लोग (परमां, गत्िस्) सब से उत्कृष्ट मुक्ि की दशा (जाहुः) कहते हैं॥ १० ॥ भावार् :- वह मनौषा बुद्धि क्योंकर ग्राप्त हो सकती है? यह कहते हैं। जय पांचों म्ञानेन्द्रियां मनसहित ठहर जाती हैं अर्थात् अपने२ विषयों से उपरत होकर निस्तव्ध हो जाती हैं और बुद्धिभी आत्मविरुद्ठ विविध घेषाओों से निवृत हो जाती है। उसको योगोजन परम गति कहते हैं ॥१० ॥ तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्। अरप्रमत्तस्तदा भवति योगो हिप्रभवाध्ययो।।११।।. सरलार्थ :- (ताम्) एस (स्थिराम्) सघलं ( इन्द्रिय- धारगाम्) इन्द्रियों के रोफने को (योगम्', इति) योग (नन्यन्ते ) मानते हैं ( तदा) तब (श्रम्रमत्तः) प्रभाद- रहित (सवति) होता है (हि) शिस कारण (योगः)
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कठोपनिषदि- यह योग (ममवाप्ययी) शुद्ध और शुभ संस्कारों का प्रवं- र्तक् तथा प्रशुभ और मलिन संरकारों का निवर्तक हे॥११॥ भावार्थ :- उस स्थिर इन्द्रियधारया को ही योग कहते हैं। पातस्ुल शास्त्र में भी योग का यही लक्षता किया गया है।"योगश्विप्षवृत्तिनिरोध: घित्त की वृत्तियों को जो इंन्द्रियों के द्वारा बहिर्गंत होती हैं, रोवने का नामयोग है। इस योग दशा को प्राप्त हो कर मनुष्य विषयों से सदा- सीन हो जाता है शर उस का हृदय शुद्ध भाव और पवित्र संस्कारों से भावित होकर मलिन और नीध संस्कारों से शून्य हो जाता है। ११ ॥ नैव वाचा न मनसा प्राप्तु शवयो. न चक्षुषा। अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथ तदुपलभ्यंते॥१२॥ अस्तीत्ये वोपलब्धव्यस्तत्वभावेनं चो भयोः।
सरलार्थ :- ( न, चक्षुषा) न आंख से ( न, मनसा) न मन से (नैध, वाघा) न वोगो से ही (प्राप्तुं, शक्यः) पाने योग्य है (अस्ति, इति ) है ऐसा (त्रुवतः) कहते हुवे पुरुष से (अन्यत्र ) असिरिक् ( तत्) वह (कघस्) क्योंकर (उपलभ्यते) ग्राप्त हो सकता है॥१२॥ (मयोः) अ्ति नास्ति इन दोनों में (तत्वभावेन) तत्व की सावना से (मस्ति, इति, एव) है ऐसा ही (उपलब्धव्यः) ': पानता चाहिये (अस्सि, इति, एव ) है ऐष ही (उप
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पष्ठी वली।। उठ्घस्प) जानने थाले को (तर्वभाषः) सरघमाव (ममीदृति) मसन शेता है। १३ ॥ भाषार्थ :- वह ब्रह्म न तो वाणी से और न घक्षुरादि इन्ट्रियों से ग्रहण किया जा सकता है। इूसी लिये वेह आागम पर भट्टा न रखने वाले फेवल म्रत्यक्षवादियों को सपलब्प नहीं होता किन्तु जिनका "है"ऐरसा सप पर विश्वांस है वही उस को जान सकते हैं। है भीर, नहीं है। इन दोनों में से "नहींहै" ऐस जो विश्वास रखते हैं। वह इस नगत को निर्मून और निराधार मानते हैं। जो स्षभी हो नहीं सकता। इस लिये "है" ऐसा विश्वास रखकर ही उस को पाना चाहिये क्योंकि उस के विना कमीतत्वों की सफलता अर्थात् जढ़ परमाराओं में कार्य बनने की योध्यता स्वयमेध रोडी गहीं सकती।। १३।। चदासर्वेप्रमुच्यन्ते कामायेऽस्य हदिश्रिता। भथमत्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समशनुते॥१४॥ मरलार्थ :- (यदर) अाघ (सचे,फामाः) सम्पूर्य काम औौर उन की वासगायें (ये) जो (पस्य) इस पुरुष के (दृदि) हुदय में ( प्रिताः) वसी हुई हैं (प्रमुंच्यन्ते) छूटती हैं ( भय) तव (मत्यः ) मनुष्य (ममृतः') मुक. - (भघति) होता है (अंत्र ) इस दृशा में (ब्रह्म) धरम - पुरुष को (समक्ुते) सम्यक् म्राप्त होता है॥१४॥ भावार्थ :- णव मारी कामनायें और उन को वासनायें
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टर कठोपनिवदि- जो दिर्नाशीन संसकारों से जीवात्मा के हृदय में बंदी हुई हैं आत्मोपलठिध से विशीगं हो जाती हैं तब, गह अनुष्य शुक्ध हेता है क्योंकि वासना रखनु के,कट जाने से फिर कोई अन्पन का हेतु नहीं रहता। इस दूशर में आात्म दर्शन की पूरी २ योग्यता:इस को म्रासत होती है । १४.५ यदासर्वेप्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थय
संरसषार्थं :- (पदा) जव (हस) इस संसार में (हृदयकष्य) हृदय की (सर्वेप्रम्थ:) सारी गोँठें (ममिद्यग्ते) टूट जानो १ै (बद) तब (भर्त्यः), मनुष्प (अ्रमृतः) मुक् (भ- यवि) होता है (एतावत्) रतनाही (अमुशासनम्) शात् का सपदेश हे # १५ । भावार्थ :- जामनाओों की जड़ कस उसड़ती है? यह नहते हैं। जम इस मनुष्य के हृदय की यह शरीर मेरा रै एम जेरा है, मैं झुसी हूं, मैं दुःखी हूं; इत्यादि प्रंकार मे. भसंत् पत्ययों क्रो उत्पन कराने वाली भारी गाढे(भी प्रविद्या से पडनाती है.) विद्या, अर्थात्, यधार्य ज्ञान के, बस्म से किस मिन्र होजाती हैं तब यह अनुष्य कामना ओों के नटिश एवं गहनपक से निकल कर मुझ हो जाता है। बस यही शाख्तों का स्वार रूप सपदेश है#१५॥ इतं चैका च हदयस्य नाड्यस्तासाम्मुद्धा- नममिनिस्सतैका। तयोर्ध्वभायन्नमृतत्व- मेति विष्वङ्ङनन्या उत्क्रमेण भवन्ति॥१६।।
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पष्ठी वह्लो।
सरलार्थ :- (हृदयस्प) हृदय की (शतम्, एफा, च)एक सोएक (नाड्यः) नाह़ी हैं (तामाम्) सन मेंसे (एका) एक (मुट्टानम्) मस्तक में (अभि शिस्सुता) जानिकली है (तया) एस नाड़ी के साथ (ऊर्ध्वन्) मस्तक के छिद्र से (भायन्) निकलता हुषा जीवात्मा (भमृत्त्वम्) गोक्ष को (एति ) प्राप्त होता है (अन्या:) भन्य शत मड़ियें (पतकमसे) म्राण मे निकलने में (विष्वड्) नमाविघ गतियों की हेसु (.भवन्ति) होती हैं।१६॥ सावार्थ :- योगियों के माय कैसे निकलते हैं? यह कहते हैैं। ममुध्य के हृदय में सब एकसीएक नाड़ियां हैं उन्हीं की शाखा म्शासायें सारे शरीर में फैली हैं। उन में से एक नाड़ी (जो सुंयुम्धा के नाम से मरुयात है) हृदय से सोधी मस्तप को चलोगई हैं। योगियों के प्रायं इषी नाड़ी के द्वारा मस्तक के छिद्र में होकर निकसते हैं, जिस से वे.पुनः संसार में लौट कर नहीं भाते। इथ के विपसेत जो आत्मतत्व से बहिर्मुस हैं ऐसे संसारी जन अन्य नाडियों के द्वारा अन्य शरीर मे लिट्रो से माण छोड़ फर नानाविध योगियों में घूमते हैं। १६ ॥ अङ्गुष्ठमान्न: पुरुषोऽन्तरांत्मा सदाजना- नां हृदये सन्निविष्टः। तं. स्वाच्छरीरात्प्रवः हेनमुत्जादिवेषीकां धैर्येण। तं. विद्याच्छुक्र-
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कठोपनिषदि- सरलार्थ :- (अन्तरात्मा) जो अन्तस्यभ्रात्मा (पुरुषः) शरीर में व्यापक (मङुष्ठमात्रः) भङुष्ठमात्र स्थान में रहने वाला है वह (सदा) निरन्तर (जनानास्) मनुष्यों के (हृदये).हृद्य में ( सम्निविष्टः ) अवस्वित है (सम्) उस को (चैर्येरा) धैर्य से (मुज्जात्, इषोकाम्, इव) मंभ से जैसे सौंस को निकालते हैं ऐडे (साद, शरीरास) अपने शरीर से (मवृहत) पृथक करें (तम्) उस को (प्रमृत्षम्) न सरने वाला (शुकम्), पित्र (विद्यात्) जाने। १७ ॥ सावार्थ :- अव ग्रन्थ का उपसंदार करता हुया कहता है। मनुष्य को सब से अधिक अपना शरीर म्िय है इसी से उस में राग भो अधिक है अर्थात् वह उपास शरौर को शिसी प्रकार छोड़ना नहीं चाइवा किन्तु छोड़ने के नाम से उस को दुःख और उट्ग उत्पन्न होता है। बस यही बड़ा भारी बन्धन है जिस में फंसा हुवा ननुष्य भ् नेक प्रकार के दुःख उठाता है। इस लिये मुमुक्षु पुरुष को उचित है कि वह अपने मात्मा को शनैः२ शरीर के बन्धन से पृथक करे। इस का यह आ्ाशय नहीं है कि आा- त्मघात करडाले। नहीं २ किन्तु शरीर के होते हुवे उसके सुख दुःखादि घर्मों से आात्मा को पृथक सभकं अर्घात् शरीर मलायसन होने से अपवित्र और अनित्य होने से अपायी है परन्तु आत्मा प्रषद्ग होने से शुद्ध और नित्य होने से अविनाशी है। इस लिये यह शरीर और उस के
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पहठी वही। धर्षों में लिप्स नहीं होता। ऐया समकने ही, से ननुष्य प्रन्धनों को फाट सफता है, अन्यया नहीं॥ १७ ॥ मृत्यु प्रोक्तां नविकेतोऽध लब्ध्ा विद्यामेर्ता 1 योगविधिस्न कत्स्नम् ।ब्रह्म प्राप्तो विरजो- डसुदि मृत्युरन्वो ए्येवं जो विदध्यात्ममेव॥१८।। मरमर्प :- (अय) अय दम का फन दिखाते हैं (मृत्पु मं'कान्) मृत्यु मे कही गई (एना, विद्याम्) इस विद्या को (घ) घीर (कुत्स्नस्, यरेगषिधिम्) मम्पर्स योग विधि की (मठ्ध्वा) माप्ण होस (नचि्ेतः) नधिकेसा (नम्, प्राप्तः)व्रस् शोप्रापृहुषा जर(विरशः)िरक(विसृत्यः) मृत्यु मय मे रह्षिन (पभूत्) हुवा (अन्य:, क्षपि ) अन्य भी (यः) जो (मध्यात्मम्, एव) अध्यात्मविद्या को क्षी (एवं, बिट्) एम प्रकार जानता है वह भी संसार से विरक दोफर सृत्युरहित होमाता है। १८॥ भावाय :- अरएम विद्या का फन वर्दन करते है। मृत्युभोक इप विद्या को मम्पर्र योगविधि सहिस प्राप्त होक्षर नधिकेता मंमार से विगक शर जीवनमुक्त हुवा। प्रन्य भी जो इस अध्यात्मविद्या को इम प्रकार ग्ाप्त छषेगा यह सदार के सब सन्धनों से छूट कर ब्रह्मं के अ- "नानय पढ् को ग्रास होमा।। १८ । सह नाववतु सह नौ भुनक्त सह वीच्ष कर- वावहै। तेजस्विना वधीतमस्तु माविहिषा-
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कठोपनिषदि- वहैं॥ पो३म् शान्ति: शान्तिः शान्तिः ।। सरलषार्थ :- परमेश्वर (नी) एम दोनों गुरु शिष्यों .(रह) एक साथ (अवतु') रक्षा करे (मो) इम दोनों, का (सह) साथ २ (सुनक) पालग करें। इंम दोर्नो (बीर्यम्) भ्रात्मिक बल को (कह) साथ ( करवावद) माप्त करें (नो) इम दोनों का (अघोतम्) पढ़ा पढ़ाया (तेग स्वि) प्रभावोत्पादक वा फलदायंक (बस्तु) ही। इम दोंनो (मा, विद्विषासहै) कभी आयम में द्वेष न करे और ईश्वर की कृंपा से हमारे आध्यात्मिक, साधिनौतिक और आधिंदेविक तोनों प्रकार के ताप शान्त हों ॥१९॥ भावार्थ :- अव भन्त में प्रमादकृत दोषों की शान्तिके लिये गुरु शिष्य दोनों ईश्वर की प्राथमा करते हैं। है पररमात्मन् इस दोमों की एक सांध रस्ा और पालेन कीजिये आापकी कृपा से हम दोनों अपन आत्मिकबल ...
को साथ २ बंढावें तथा हमारा पढ़ा पढ़ाया और सुना सुनाया संघ कलदायम हो और कभी हम प्पस में द्वेष न करें। एवं आध्यात्मिम, साधिभौतिक, गविदेविक इग तोनों तापों से सदा हमारी रक्षा कीजिये । ओो३ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।. इति षष्ठी वल्ली समाप्ता इसि श्रीबंदरीदतशर्मकृता कठो पनिषद्धापावृत्ति: समोप्ा