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प्रश्नोत्तर दीपमाला भाग - ३

स्वामी रामानन्दजी सरस्वती

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प्रश्नोत्तरदीपमाला

भाग- ३

कथं तरेयं भवसिन्धुमेतं का वा गतिरमे कतमोऽस्त्युपायः। जाने न किञ्चित्कृपयाव मां भो: संसारदुःखक्षतिमातनुष्व।। मा भैष्ट विद्वंस्तव नास्त्यपाय: संसारसिन्धोस्तरणेSस्त्युपायः। येनैव याता यतयोऽस्य पारं तमेव मार्गं तव निर्दिशामि।। (विवेकचूडामणि-४२,४५)

एक मुमुक्षु सद्गुरु के पास जाकर विनती करता है - 'हे प्रभो! मैं इस भवसागर को कैसे पार करूँगा, मेरी गति क्या होगी? मैं तो कुछ नहीं जानता। कृपया आप मेरे संसारदुःख के नाश का उपाय करके मेरी रक्षा कीजिए।' सद्गुरु उसे आश्वस्त करते हुए उत्तर देते हैं- 'हे वत्स! तू भयभीत मत हो, तेरा नाश नहीं होगा। इस संसारसागर को पार करने का उपाय है। पूर्व में यत्नशील मुमुक्षुओं ने जिस मार्ग से इसे पार किया है, उसी मार्ग का मैं तुझे उपदेश करूँगा।

श्री मार्कण्डेय संन्यास आश्रम, पो. ओंकारेश्वर - ४५०५५४

स्वामी रामानन्दजी सरस्वती

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प्रकाशक: श्री मार्कण्डेय संन्यास आश्रम पब्लिक ट्रस्ट, ओंकारेश्वर विभिन्न आश्रम C सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन परम पूज्य सद्गुरुदेव ब्रह्मलीन स्वामी अभयानन्द सरस्वतीजी महाराज

प्रथम संस्करण तथा परम पूज्य सद्गुरुदेव ब्रह्मलीन स्वामी रामानन्द सरस्वतीजी महाराज के द्वारा : रविवार, ७ अक्टूबर, २०१२ आश्विन कृष्ण सप्तमी, वि.सं. २०६६ स्थापित एवं पूज्य स्वामी प्रणवानन्द सरस्वतीजी महाराज के संरक्षण में संचालित आश्रमों का विवरण :- महाराजश्री की चतुर्थ पुण्यतिथि १. श्री मार्कण्डेय संन्यास आश्रम प्रतियाँ : ३००० (तीन हजार) ओंकारेश्वर, मांधाता, जिला-खण्डवा-४५०५५४ (म.प्र.) फोन. नं. ०७२८०-२७१२६७, मो .- ०६८२७८१३७११ प्रधान सम्पादक स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती ..

सम्पादक मण्डल : स्वामी आशुतोष भारती २. अभय कैलाश आश्रम, ब्र. किशोर चैतन्य बाराबंकी(उ.प्र.) फोन नं. ०५२४८-२२४८६८, ०७३७६७६७४१६, मुखपृष्ठ संकल्पना ०६०४४२८१२४४ एवं : स्वामी परशुरामानन्द पुरी ३. श्री अभय संन्यास आश्रम, अक्षर संयोजन वनकुटी, बंकी, बाराबंकी (उ.प्र.) मो .- ०६५५४६०३७६६ पुस्तक प्राप्ति स्थान श्री मार्कण्डेय संन्यास आश्रम, पो. ओंकारेश्वर - ४५०५५४. ४. श्री अभय संन्यास आश्रम जिला : खण्डवा (म.प्र.) सी.के.८/१२, गढ़वासी टोला फोन नं. : ०७२८०-२७१२६७, ६८२७८१३७११, ६४२५६३६५६७ वाराणसी-२२१००१ (उ.प्र.) मो .- ०६६८४७४१४६४

सहयोग राशि : ₹ ५०/- ५. श्री अभय साधना कुटीर (ओंकारेश्वर महादेव) मु.पो. केरपानी, तहसील. करेली, नरसिंहपुर-४८७००१, (म.प्र.) मुद्रक : प्रिण्ट पैक प्रा. लि., इन्दौर फोन नं. ०७७६३-२७८५५५, ०६४२४६६४२६१

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विभिन्न आश्रम

६. श्री तुरीय आश्रम, माई की बगिया, अमरकण्टक-४८४८८६, जिला: अनूपपुर-(म.प्र.) श्री मार्कण्डेय संन्यास आश्रम मो .- ०६४२४३५३२६३, ०८६७८७४८६४१ संक्षिप्त परिचय

७. श्री अभयधाम, ब्रह्मलीन परमपूज्य स्वामी रामानन्द सरस्वतीजी महाराज के द्वारा नटवा जंगी रोड, अभय तिराहा, मिर्जापुर-२३१००१(उ.प्र.) नर्मदा तट पर पवित्र ओंकारेश्वर क्षेत्र में स्थापित श्री मार्कण्डेय संन्यास मो .- ०६६१६३२६०२६ आश्रम भारतवर्ष के प्रतिष्ठित आश्रमों में अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है। इस आश्रम की स्थापना की कहानी भी विलक्षण ही है। सन् १६६२ में पूज्य ८. श्रीरामकुटी आश्रम, रामगढ़, जिला: खरगोन (म.प्र.) महाराजश्री एक ब्रह्मचारी के रूप में नर्मदा-तट पर परिव्रजन करते हुए मो-०६००६३६५४८५ ओंकारेश्वर तीर्थ में पहुँचे। वर्तमान में जहाँ आश्रम स्थापित है, उस स्थान के निकट ही एक अर्जुन वृक्ष के नीचे रहकर उन्होंने तीन माह का समय गहन ६. अभयभक्तिराम आश्रम, लक्ष्मीनारायण मन्दिर, कटघड़ा साधना में व्यतीत किया। जिला - खरगोन (म.प्र.) इसके पश्चात् वे माँ नर्मदा को प्रणाम कर आगे भ्रमण के लिए चल दिए। परन्तु इस स्थान के शान्त, एकान्त और पवित्र वातावरण ने उनके मन

**** को कुछ ऐसा आकर्षित कर लिया कि सन् १६६५ में वे पुनः साधना की दृष्टि से यहीं लौट आए। इस बार उनके अभिन्न सखा पूज्य स्वामी श्री कृष्णानन्दजी 'विरक्त' भी उनके साथ थे। दोनों विभूतियों ने एक कच्ची कुटिया बनाकर लगभग छह मास तपश्चर्यापूर्वक इस स्थान पर निवास किया। तत्पश्चात् उन दोनों ने प्रयाग कुम्भ में भाग लेने के लिए प्रस्थान किया। प्रयाग में जब महाराजश्री ने अपने गुरुदेव ब्रह्मलीन परमपूज्य स्वामी श्री अभयानन्द सरस्वतीजी को अपने रेवातट-निवास के विषय में बताया तो उनके मन में भी ओंकारेश्वर-दर्शन का भाव स्फुरित हो गया। अतः महाराजश्री ओंकारेश्वर पहुँचकर गुरुदेव के लिए कुटिया के निर्माण में जुट

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संक्षिप्त परिचय संक्षिप्त परिचय गए। ही है। महाराजश्री इस प्रस्थानत्रयी का विवेचनापूर्ण स्वाध्याय जिज्ञासुओं के कुछ समय पश्चात् पूज्य गुरुदेव पधारे और इस स्थान की नीरवता हितार्थ वर्षों तक अनवरतरूप से कराते रहे। उनके द्वारा पोषित इस शांकरी से आकर्षित होकर तीन वर्ष तक कहीं गए ही नहीं। उनके यहाँ रहने से परम्परा को उनके सुयोग्य शिष्य स्वामी प्रणवानन्द सरस्वतीजी पूर्ण निष्ठा से विरक्त सन्त एवं गृहस्थ भक्त भी आने लगे। उस समय ओंकारेश्वर क्षेत्र में आगे बढ़ा रहे हैं। देश के कोने-कोने से विरक्त एवं गृहस्थ सभी प्रकार के अभ्यागत महात्माओं के लिए भिक्षा आदि की कोई समुचित व्यवस्था नहीं जिज्ञासु साधक यहाँ आकर अपनी ज्ञान-पिपासा को शान्त करते हैं। यहाँ से थी। इस समस्या को देखकर करुणहृदय गुरुदेव के मन में ऐसा संकल्प लब्धज्ञान अनेक सन्त समाज में धर्म तथा ज्ञान का प्रचार कर सनातन धर्म आया कि यहाँ अभ्यागत सन्तों के निवास और भिक्षार्थ कोई स्थायी के रक्षण में सहयोग दे रहे हैं। आश्रम में जिज्ञासुओं के उपकारार्थ एक व्यवस्था बने तो अच्छा हो। अपने गुरुदेव के इस संकल्प को पूर्ण करने के विशाल पुस्तकालय की भी व्यवस्था है। लिए ही महाराजश्री ने इस आश्रम के निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया। आश्रमस्थ गोशाला, वाटिका, मन्दिर, पाकशाला, धर्मार्थ आश्रम के प्रारम्भिक वर्षों में महाराजश्री ने सन्तों के साथ मिलकर चिकित्सालय आदि प्रकल्पों में अनेक प्रकार की सेवा प्रवृत्तियाँ चलती निर्माण-कार्य में अथक परिश्रम किया। सन्तों के परिश्रमरूपी नींव पर खड़े रहती हैं, जिनमें सहयोग करके कोई भी साधक निष्काम कर्मयोग के होने के कारण आज भी इस आश्रम के वातावरण में एक सात्त्विक पवित्रता अनुष्ठान का सुन्दर अवसर प्राप्त कर सकता है। आश्रम के मन्दिरों में प्रातः का अनुभव सभी को होता है। धीरे-धीरे आश्रम में गोशाला, श्री अभयेश्वर एवं सायंकाल आरती-पूजन एवं सामूहिक स्तोत्रपाठ नियमित रूप से होते महादेव मन्दिर एवं भगवान् भाष्यकार मन्दिर की स्थापना हुई। वाटिका, हैं। साथ ही साथ माँ नर्मदा के हर-हर निनाद से गुज्जित आश्रम का शान्त सन्त-निवास, सत्सङ्ग-भवन एवं भक्त-निवास का भी निर्माण हुआ। तीर्थ- वातावरण साधकों के भजन-ध्यान में उत्प्रेरक सहयोगी की भूमिका बखूबी यात्रियों को नर्मदा स्नान आदि की सुविधा उपलब्ध कराने की दृष्टि से एक निभाता है। इस आश्रम को देखकर वैदिक-ऋषिपरम्परा के आश्रमों की विशाल 'अभयघाट' का निर्माण भी कुछ वर्ष पूर्व आश्रम के श्रद्धालु भक्तों स्मृति सजीव हो उठती है। यहाँ ज्ञानयोग, भक्तियोग तथा कर्मयोगरूपी तीन द्वारा कराया गया। धाराओं की त्रिवेणी सतत प्रवाहमान है, जिसमें अवगाहन करके मुमुक्षु पूज्य महाराजश्री शांकर-वेदान्त तथा आगमशास्त्र के मूर्धन्य एवं साधक सहज रूप से अपने कल्याण का सम्पादन कर सकते हैं। अनुभवी विद्वान् थे। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् - इस श्रुति को **** जीवन में आत्मसात् करते हुए उन्होंने यहाँ रहकर मुमुक्षुओं के कल्याणार्थ मुक्तहस्त से अपनी ज्ञान-सम्पदा का वितरण किया। श्रीमद्भगवद्गीता, दशोपनिषद् एवं ब्रह्मसूत्र - इस प्रस्थानत्रयी का शांकरभाष्य आत्मज्ञान- प्राप्ति का मूल आधार है। संन्यस्य श्रवणं कुर्यात् - इस श्रुति के आदेशानुसार परमहंस संन्यासी सम्प्रदाय में तो इसका स्वाध्याय अनिवार्य

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प्राक्कथन अनुराग निश्चित रूप से उसे लक्ष्य तक पहुँचा देते हैं। भगवान् कृष्ण ने गीन, म - मय्येव मन आधत्स्व .... एवं सर्वधर्मान्परित्यज्य .... इत्यादि अनमोल वचनों से मानवमात्र को यही सन्देश दिया है। प्राक्कथन यह तो सार्वजनीन प्रसिद्धि है कि प्राणिमात्र की नैसर्गिक रुचि

ब्रह्मसूत्र के द्वितीय अध्याय के प्रथम पाद में एक सूत्र आया है- अविनाशी आनन्द की प्राप्ति में है। उसी की खोज में उसको प्राप्त होता है

उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च। अर्थात् इस संसार का अनादित्व युक्तियों से परिच्छिन्न आनन्द - जिस में वह सन्तुष्ट सा हो जाता है। जैसे ऊपर फेंका

उपपन्न होता है क्योंकि अकस्मात् बिना कारण कोई वस्तु उत्पन्न नहीं हो गया मिट्टी का ढ़ेला अपने अंशी(पृथ्वी) से मिलने के लिए तेजी से नीचे की

सकती और धाता यथापूर्वमकल्पयत् इत्यादि श्रुतियों से भी अनादित्व ओर आता है, समुद्रगा नदी समुद्र-पर्यन्त अथक प्रवाहित रहती है-बीच में

उपलब्ध होता है अर्थात् जाना जाता है। यह जाना नहीं जाता है कि कब से ठहराव नहीं आता, उसी तरह से यह प्राणी भी जब तक पूर्ण विश्राम को प्राप्त

संसार का प्रादुर्भाव हुआ है। किन्तु इतना तो सत्य है कि यह उसी तरह से न होगा तब तक ठहराव नहीं आयेगा। जिज्ञासामयी उसकी धारणायें उसे

निरन्तर प्रवाहित हो रहा है जिस तरह अपने उद्गम स्थान से निकलकर जिज्ञासु के रूप में ही रखेंगी।

समुद्र-पर्यन्त अनवच्छिन्न रूप से प्रवाहमान नदी की धारा। अनादिकाल से ऐसे ही जिज्ञासु साधकों की जिज्ञासाओं को निमित्त बनाकर प्रस्तुत

संसाररूपी भवाटवी में भटका हुआ यह जीव अपने स्वाभाविक ज्ञान और प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ पूज्य महाराजश्री के श्रीमुख से निःसृत हुआ

कर्म की सहायता से इस धारा को ऊर्जा देता हुआ स्वयं भी इसी धारा में बह है। परम पूज्य गुरुदेव ने अस्वस्थ अवस्था में भी यथासम्भव हर जिज्ञासा का

रहा है। यह जानने के बाद भी कि मुझे इस जीवन में उन शास्त्रीय प्रवृत्तियों पूर्णतः समाधान करने का प्रयास किया है। उनके प्रवचन की शैली-भाषा

को प्रमुखता से अङ्गीकार करना चाहिए जो स्वाभाविक प्रवृत्तियों की तथा भाव को अक्षुण्ण रखते हुए सम्पादन करने का प्रयास किया है। यह

उच्छेदिका तथा आध्यात्मिक जागृती के उन्मेष में कारण है, वह सहजता से कितना सफल हुआ है इसका तो निर्णय विज्ञ पाठकगण ही करेंगे, परन्तु

उन्हें स्वीकार नहीं कर पाता। सम्पादक मण्डल की यही कोशिश रही है कि उपरोक्त बातें और शुद्धता

पुरुषार्थ की सिद्धि का आधार यही है कि व्यक्ति राग-द्वेष से होने सुरक्षित रहे। इससे पहले भी पूज्यश्री की साहित्यसरिता की दो तरंगों के रूप

वाली क्रियाशीलता को अधिक से अधिक नियन्त्रित करते हुए कर्तव्यदृष्टि में प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-१ तथा भाग-२ को श्री मार्कण्डेय संन्यास

से सम्पादित होने वाली प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करे। पुरुषार्थ की गवेषणा आश्रम, ओंकारेश्वर ने प्रकाशित करके जिज्ञासुओं के करकमलों तक

में लगे हुए मुमुक्षु का इस प्रकार का प्रयास आरम्भ में अन्तर्द्वन्द्व को जन्म दे पहुँचाया था उसी की यह तीसरी कड़ी है।

सकता है। परन्तु शास्त्रीय दृष्टि वाला, गुरुमुखी, ईमानदार साधक जल्दी ही पूर्व की भाँति इस प्रकाशन में भी हमारे आत्मीय स्वा. आशुतोष

इस उलझन से बाहर आकर अपेक्षाकृत निर्द्वन्द्वभाव से आगे बढ़ता है। भारतीजी तथा ब्र. किशोर चैतन्यजी का यह अथक प्रयास रहा है कि

जागतिक वैभव से वैराग्य, लक्ष्य के प्रति समर्पण तथा साधना के प्रति पूर्ण आश्रमीय अन्य सेवाओं से समय निकाल कर इस प्रकाशन-कार्य को यथा- समय सम्पन्न करें। उसी का परिणाम है कि यह प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३

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प्राक्कथन प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ आज हम सबके हाथों में है। स्वा. परशुरामानन्द पुरीजी ने कम्प्यूटर पर टाइपिंग और कम्पोजिंग करके प्रकाशन में अमूल्य योगदान दिया है। विषयानुक्रमणिका

भगवान् आशुतोष से प्रार्थना है कि ऐसे निष्काम मुमुक्षुओं को उत्तरोत्तर विषय पृष्ठ

साधनापथ पर आगे बढ़ाते रहें। १. कर्म-सिद्धान्त और गति-विचार १२

पूज्य महाराजश्री की अनुगत शिष्याओं कु. ऋचा टावरी, कु. रानू २. भक्ति-उपासना २३

मोहता, कु. प्रिया मुँधड़ा एवं कु. सोनम चौबे ने कैसेट सुनकर ३. ज्ञान-चर्चा ३७

पाण्डुलिपि तैयार करने के दुरूह कार्य को तत्परता से सम्पन्न करके इस ४. वेदान्त ४६

प्रकाशन में भी पूर्व प्रकाशनों की तरह सहायता पहुँचाई। इनके अतिरिक्त भी ५. मन्त्र-विचार ६६

जिन सन्तों एवं भक्तों ने अपना-अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है वे ६. साधकचर्या ६८

निरन्तर सन्मार्ग की ओर अग्रसर हों। ७. साधना ६०

८. गुरुतत्त्व १०६

इत्यों शम् ६. ईश्वरतत्त्व ११२

रविवार, ७ अक्टूबर २०१२ १०. सन्त तथा सत्सङ्ग १२४

आश्विन कृ. सप्तमी, वि.सं. २०६६ गुरुचरणानुरागी, ११. शरणागति १३३ स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती महाराजश्री की चतुर्थ पुण्यतिथि १२. योग एवं ध्यान १३६ ओंकारेश्वर १३. दोष-विचार एवं निवारण १४२ १४. धर्म-जिज्ञासा १५७ १५. देवपूजन-कर्मकाण्ड १७६ १६. प्रारब्ध, पुण्य-पाप, संस्कार १८६ १७. तीर्थ-महिमा १६७ १८. व्रत एवं पर्व २०१ १६. शास्त्र-समीक्षा २०५ २०. संन्यास २२ २१. सुख-दुःख २२७ २२. ज्ञानी की स्थिति २३१ २३. लोकव्यवहार २३५ २४. विविध २४७

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कर्म-सिद्धान्त और गति-विचार इत्यादि भी होते हैं। **** कर्म-सिद्धान्त और गति-विचार जिज्ञासा :- क्या मनुष्य शरीर में पुरुषार्थ करके पूर्ण कलाओं का

जिज्ञासा :- उत्तरायण में शरीर छोड़ने वाले को ब्रह्मलोक की प्राप्ति विकास किया जा सकता है?

कही गई है। यदि किसी के कर्म ब्रह्मलोक-प्राप्ति के अनुकूल नहीं है तो वह वहाँ समाधान :- शास्त्र में पूर्ण कलाओं की संख्या सोलह बताई गई है।

कैसे जायेगा? मनुष्य शरीर में पुरुषार्थ करके सात कलाओं तक का विकास किया जा सकता है। इससे अधिक कहीं दिखाई देती हैं तो उसे अवतार कोटि का माना जाता है। समाधान :- उत्तरायण में शरीर छोड़ने मात्र से किसी को ब्रह्मलोक की **** प्राप्ति नहीं होती। यहाँ पर उत्तरायण का तात्पर्य काल से नहीं है, अपितु मार्ग से है। यदि काल से होता तो कृष्णपक्ष के अभिमानी देवता के अधिकार में गया जिज्ञासा :- व्यक्ति की गति कर्मों के अनुसार होती है। इस सिद्धान्त के

जीव भी ब्रह्मलोक को प्राप्त करता, क्योंकि उत्तरायण में भी कृष्णपक्ष आता है। अनुसार जिसने कोई पुण्य-पाप किया ही नहीं, ऐसे एक अबोध शिशु की मृत्यु

उत्तरायण मार्ग उस जीव के लिये है जो शास्त्र के अनुसार कर्म करता है और होने पर उसकी क्या गति होगी?

उपासना भी। इस मार्ग से वह कर्म-उपासना के अनुसार ब्रह्मलोक तक क्रम से समाधान :- यह बात आप उस शिशु के केवल वर्तमान जन्म को मान

जायेगा। पहले वह अर्चि-अभिमानी देवता के अधिकार में जायेगा फिर कर कह रहें हैं। मृत्यु के उपरान्त किसी जीव की गति में केवल वर्तमान शरीर के

दिनाभिमानी देवता के अधिकार में जायेगा। वह उसे शुक्लपक्षाभिमानी देवता कर्म और संस्कार ही हेतु नहीं बनते वरन् पूर्व के जन्मों में किये हुए जिन कर्मों

तक पहुँचा देगा। शुक्लपक्ष का अभिमानी देवता उसे उत्तरायण के अभिमानी का फल भोग अभी तक नहीं हुआ है वे सभी कर्म एवं उनके संस्कार भी भावी

देवता के अधिकार में पहुँचा देता है। इस प्रकार वह ब्रह्मलोक तक जाता है। जन्म में हेतु बनते हैं। अतः अबोध शिशु ने वर्तमान शरीर में भले ही कोई कर्म न

इसलिये इस भूल में नहीं रहना चाहिए कि उत्तरायण में शरीर छोड़ने वाला किया हो, उसके पूर्व के कर्म और संस्कार अभी शेष हैं। उनके अनुसार उसकी

ब्रह्मलोक जाता है। उसके लिये बड़ी साधना की आवश्यकता है। गति हो जाएगी। शास्त्रों में इस प्रकार का भी वर्णन आता है कि अमुक पाप करने से व्यक्ति को बहुत से जन्मों तक अल्प आयु में ही मरना पड़ता है। **** **** जिज्ञासा :- कर्म की फलसिद्धि में मुख्य हेतु क्या है? समाधान :- इस विषय में भगवान् भाष्यकार कहते हैं - जिज्ञासा :- शास्त्रों में स्वर्ग जाने के लिये तो धूममार्ग बताया है परन्तु

अधिकारिणमाशास्ते फलसिद्धिर्विशेषतः। नरक में जाने के लिये किसी मार्ग का कथन नहीं किया है। नरक में जीव किस

उपाया देशकालाद्याः सन्त्यस्मिन्सहकारिणः ॥(विवेक चूडामणि-१४) प्रकार जाता है?

कर्मफल की सिद्धि में मुख्य हेतु साधक में रहने वाला अधिकारित्व समाधान :- उपनिषदों में स्वर्ग जाने के लिये धूममार्ग तथा ब्रह्मलोक

(फलप्राप्ति की योग्यता)ही है। सहकारी साधन के रूप में देश, काल, संग जाने के लिये अर्चिमार्ग का कथन किया है एवं जो इन लोकों को प्राप्त नहीं करता उसके लिये तीसरी गति कही है -

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ कर्म-सिद्धान्त और गति-विचार जायस्व प्रियस्व इत्येतत्तृतीयं स्थानम् .... ।(छान्दो.उप .- ५.१०.८) जिज्ञासा :- कर्म करते समय न चाहने पर भी मन में आ ही जाता है कि यहीं बार-बार जन्मो और मरो। अब यदि इसका नाम रखो तो निरन्तर यह कर्म मैं कर रहा हूँ, इसमें क्या कारण है? जन्म-मरणरूप मार्ग हो जाएगा। इस प्रकार तीन मार्गों का कथन किया है। यदि समाधान :- यही माया है। मूल में अहंकार बैठा है जो सचाई को आपके पुण्य और पाप सामान्य हैं, न कोई विशेष पुण्य किया न ही कोई विशेष स्वीकार करने नहीं देता। भगवान् भाष्यकार कहते हैं पूरा संसार इसी में दौड़ रहा पाप तो यहाँ पर ही मनुष्य या पशु-पक्षी, वृक्ष इत्यादि के रूप में उत्पन्न हो है। सचाई को स्वीकार नहीं करता - जाएंगे। देहस्त्रीपुत्रमित्रानुचरहयवृषास्तोषहेतुर्ममेत्थं परन्तु किसी व्यक्ति का बहुत बड़ा पाप है जिसका फल इस पार्थिव शरीर सर्वे स्वायुर्नयन्ति प्रथितमलममी मांसमीमांसयेह। के द्वारा नहीं भोगा जा सकता उसके लिये एक विशेष व्यवस्था है। उसे नरक में एते जीवन्ति येन व्यवहृतिपटवो येन सौभाग्यभाज- ले जाया जाता है। उपनिषदों में नरक में जाने के मार्ग का वर्णन इसलिये नहीं स्तं प्राणाधीशमन्तर्गतममृतममुं नैव मीमांसयन्ति।।(शतश्लोकी-५) किया क्योंकि वहाँ उपासक और कर्मी का प्रसंग है। नरक के मार्ग का कथन दुनिया इसी में दौड़ रही है कि मेरा शरीर बड़ा स्वस्थ है। मेरी स्त्री बड़ी करना इसलिये भी आवश्यक नहीं समझा कि मनुष्य शरीर से ऊपर जाने के लिये सुन्दर है, मेरा पुत्र आज्ञाकारी है, अनुचर सब मेरे वश में हैं, मेरे पास हाथी-घोड़े मार्ग जानने की आवश्यकता पड़ती है, नीचे गिरने के लिये मार्ग जानने की क्या इत्यादि बहुत सारा धन है। मेरी बराबरी कौन कर सकता है? इस प्रकार सभी आवश्यकता है। अरे! पहाड़ पर चढ़ना हो तब मार्ग जानने की आवश्यकता लोग इस मांस की मीमांसा में ही लगे हुए हैं। जिससे ये सभी जीवित हैं-एते पड़ती है जिससे सावधानीपूर्वक, निर्विघ्न ऊपर पहुँच जाएं। अब किसी को जीवन्ति येन, उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। पहाड़ से गिरना हो तो मार्ग जानने की क्या आवश्यकता है, जिधर से जगह जो आज नहीं तो कल छूटने वाले हैं उनमें मन लगाए बैठे हैं कि ये सब मिलेगी नीचे पहुँच जाएगा। नरक में जाने का मतलब है नीचे गिरना। उसे तो मेरे हैं। अरे! जिनको तुम अपने मान रहे हो उनका स्वयं का कोई भरोसा नहीं कि यमदूत गले में फाँसी लगा कर जिस किसी भी रास्ते से ले जाएंगे। कब गायब हो जाएं। अपने आप को व्यवहार में बड़ा कुशल मान रहे हो। पुराणों में नरक जाने के मार्ग का विस्तार से वर्णन किया है। मार्ग में बड़े परमात्मा शक्ति दे रहा है इसलिये तुम व्यवहार में कुशल हो। तुम प्रसन्न हो रहे हो विलक्षण अनुभवों का वर्णन है। किस पाप वाले को किस प्रकार की यातनाएं कि फूल-माला चढ़ रही है, पूजन हो रहा है। अखबार में बड़ी प्रशंसा हो रही है। मिलती हैं यह सब वहाँ विस्तार से कहा है। उस मार्ग का नाम यातना मार्ग रखा पर यह विचार नहीं करते कि वह शक्ति न दे, बुद्धि न दे तो तुम क्या कर लोगे? गया है। उस समय जीव को जो शरीर मिलता है उसे यातना-शरीर या नारकीय- जो हृदय को चलाने वाला है, जो प्राणों को चलाने वाला है उसकी तरफ किसी शरीर कहते हैं। उसे चाहे जितना कष्ट दें वह न तो नष्ट होता है, न ही बेहोश। का ध्यान नहीं जाता। इस सचाई को कोई स्वीकार कर ले कि उस परमेश्वर ने ही उसमें संवेदना बहुत अधिक होती है। कुछ लोग तो इस बात को अर्थवाद इस कार्यकरणसंघात को बनाया है, वही इसमें श्वास चला रहा है, इसलिये यह समझते हैं। वे कहते हैं पाप से निवृत्त करने के लिये ऐसा कहा है, पर ऐसी बात जीवित है तो मैं अभिमान किस बात का करूँ, तब उसकी बुद्धि समर्पित हो नहीं है। शास्त्र में जो बात कही है उसे सत्य ही समझना चाहिए। जाएगी। पर सुनना जितना सरल लगता है यह उतना सरल नहीं है। इस सचाई को **** माया स्वीकार करने नहीं देती।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ कर्म-सिद्धान्त और गति-विचार

**** **** जिज्ञासा :- जीवन में नित्य और नैमित्तिक कर्मों की अनिवार्यता क्यों जिज्ञासा :- यज्ञ, दान और तप को गीता में अवश्य कर्तव्य क्यों है? बताया? इन्हें किस प्रकार करना चाहिए? समाधान :- यह बात सभी जानते हैं कि हमारे कोई प्रयास न करने पर समाधान :- देवताओं से हमें बहुत कुछ प्राप्त होता है इसलिये उसके भी घर में कचरा आ ही जाता है। यदि झाडू न लगाएँ तो कचरा बढ़ता जाएगा बदले में उन्हें भी कुछ देना हमारा कर्तव्य है। गीता में ही कहा - और अन्ततः घर रहने लायक नहीं रहेगा। इस झाडू लगाने के काम में रविवार की इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। भी छुट्टी नहीं होती है, रोज ही करना पड़ता है। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥।(३.१२) इसी प्रकार हम लोग जगत् में व्यवहार करते हैं तो मन में कचरा (जगत् देवताओं का भाग उन्हें दिए बिना भोग करोगे तो चोर कहलाओगे। के संस्कार) अपने आप आता है। उस कचरे को प्रतिदिन निकालने के लिये जो सूर्य, वायु, इन्द्र आदि देवताओं के अनुग्रह के बिना तुम जीवित नहीं रह सकते। कर्म शास्त्र में कहे गए हैं उनका नाम है - नित्य कर्म। जैसे सन्ध्या, अग्निहोत्र, तुम्हारे पास जो कुछ भी आया उसमें पहले देवता का अधिकार हो गया कि नहीं! नियमित गुरुमन्त्र का जप इत्यादि। इन कर्मों का कोई विशेष फल नहीं है परन्तु देवता के प्रति जो कर्तव्य का निर्वाह है वही यज्ञ है। इसमें देवताओं के लिये तुम नहीं करोगे तो पाप लगेगा। जैसे झाडू न लगाने पर घर रहने लायक नहीं रहता आहुति दी जाती है, उनका भाग उन्हें पहुँचाया जाता है। समाज के बिना भी तुम उसी प्रकार तुम नित्य कर्म नहीं करोगे तो तुम्हारा मन किसी देवता के बैठने जीवित नहीं रह सकते, तुम्हारा उत्कर्ष नहीं हो सकता। इसलिये समाज का भी लायक नहीं रहेगा। तुम पर ऋण है। उसे चुकाने हेतु समाज के उत्कर्ष के लिये जो त्याग करते हो किसी देश, काल के निमित्त को लेकर जिन कर्मों का विधान है उनका उसका नाम है- दान। ये यज्ञ और दान जीवन में अनिवार्य हैं क्योंकि इनके बिना नाम है - नैमित्तिक कर्म। जैसे किसी पर्व का अथवा विवाह, जन्म, मरण आदि तुम पर ऋण बढ़ता जाएगा। यज्ञ-दान के बिना अर्थात् देवता और समाज का का निमित्त, इन अवसरों पर कुछ कर्म अवश्य करने पड़ते हैं। इनका भी किसी ऋण चुकाए बिना यदि तुम सम्पत्ति का उपभोग करते हो तो तुमसे जबर्दस्ती फल-विशेष से सम्बन्ध नहीं है, मन के शोधन से ही सम्बन्ध है। इन्हें न करने पर दोष लगता है। अतः मन की शुद्धि के लिये नित्य और नैमित्तिक कर्मों को करना वसूली होगी। तब तुम्हारा पैसा बीमारी में जाएगा, मुकदमे में जाएगा या चोरी ही हो जाएगा। पैसा तो वसूल होगा ही। अनिवार्य है। इसलिये मानलो तुम्हारे खेत में मिर्च का पौधा है, जिसमें १० मिर्च लगे आजकल सन्ध्या, अग्निहोत्र आदि वैदिक नित्य कर्म तो प्रायः कोई हैं। उनको जब तोड़ो तो एक मिर्च को अलग कर दो। वह तुम्हारा नहीं देवता का करता ही नहीं, कई त्र्यक्ति गुरुमन्त्र का जो नियमित जप करते हैं उसे भी कामना है। एक को समाज के लिये अलग कर दो। बाकी ८ मिर्च तुम्हारे हैं, उसका से जोड़ देते हैं। तब आपका जप काम्यकर्म बन जाता है, नित्य कर्म नहीं रहता। उपभोग कर सकते हो। अब जो तुम्हारा है उसमें भी त्याग कर सकते हो तो वह ऐसे में वह जप मन का शोधन नहीं करेगा। आजकल नित्यकर्मों का अभाव हो जाने से लोगों के मन की समस्या बहुत बढ़ गई है। साधक को इस विषय में तुम्हारा तप बन जाएगा। *** भ बहुत सावधान रहना चाहिए। जिज्ञासा :- शास्त्र कहता है कि निष्काम भाव से किए कर्मों से चित्त

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ कर्म-सिद्धान्त और गति-विचार शुद्ध होता है लेकिन चित्त शुद्ध हुए बिना मन में निष्कामता आएगी ही कैसे? तब निष्काम कर्म करना कैसे सम्भव होगा? निष्काम कर्म का फल भी चित्तशुद्धि ही है। चित्तशुद्धि होने पर बड़े-बड़े फल समाधान :- पहले कोई भी साधन प्रयासपूर्वक किया जाता है। इस प्राप्त हो जाएंगे। ज्ञान को धारण करने की योग्यता आ जाएगी। **** प्रकार दीर्घकाल तक करने के बाद उसकी सुदृढ़ भूमिका हो जाती है। जैसे महापुरुषों के जीवन में जो स्वाभाविक व्यवहार होता है वही साधक के लिये जिज्ञासा :- कोई किसान किसी बैल से सेवा ले रहा है, उसे पीट रहा प्रयाससाध्य होता है। पहले निष्काम कर्म का अनुष्ठान प्रयासपूर्वक होगा। है। कर्म सिद्धान्त के अनुसार अगले जन्म में किसान बैल बनेगा और बैल साधक किसी भी कर्म में सावधान रहेगा, मन में कामना तो आएगी ही पर वह किसान बनके अपना बदला लेगा। उस बदला लेने वाले किसान को पुनः उस शास्त्र और गुरु-उपदेश के आधार पर उसे काटेगा। उस कर्म के साथ किसी कर्म से बन्धन होगा क्या? यदि होगा तो यह शृंखला कैसे टूटेगी? प्रकार का संकल्प करने से बचेगा। अपने कर्म को कर्तव्यदृष्टि से करेगा और उसे समाधान :- कर्म से भोग होता है और भोग भी कर्म बनता है। जो कर्म भगवान् के साथ जोड़ेगा। यह सब पहले बहुत प्रयास से होगा, पर जैसे-जैसे के साथ सम्बन्धित होगा उसे कर्म पकड़ेगा। देखो! कोई व्यक्ति देशरक्षा के लिये निष्कामता बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे स्वाभाविक होता जाएगा। पकड़ा गया, उसे फाँसी की सजा हुई। यह सजा उसका भोग है जिसका सम्बन्ध कोई कहे कि पहले साइकिल चलाना आ जाए उसके बाद साइकिल पर पिछले जन्म के किसी कर्म से होगा। लेकिन उसके अन्दर जो भाव आ रहा है कि बैठेंगे तो वह कभी साइकिल चला पाएगा! कोई कहे कि हमको तैरना आ जाए मैं देश के लिये बलिदान हो रहा हूँ तो वह सजारूपी भोग एक विशिष्ट कर्म का तब पानी में उतरेंगे क्योंकि बिना जाने उतरने पर डूब जाएंगे। तो उसको जीवन हेतु बन जाएगा। उसका भाव एक दिव्य कर्म का हेतु बनेगा। कर्म का सम्बन्ध तो भर तैरना नहीं आएगा। यह बात ठीक है कि बिना तैरना जाने पानी में डूबने का अहंता से है, इसलिये इसकी गति बहुत गहन है। एक व्यक्ति कर्म करने पर भी खतरा है, पर यह भी सच है कि बिना पानी में उतरे तैरना नहीं आएगा। कर्ता नहीं बनता और एक चुपचाप बैठने पर भी कर्म कर रहा है। व्यक्ति इसी प्रकार निष्काम कर्म के साधक को पहले प्रत्येक कर्म में प्रातःकाल आलस्य के कारण सन्ध्या नहीं करता तो उसे दोष लगेगा। अतः न विचारपूर्वक कर्तव्यबुद्धि को प्रधान बनाते हुए कामना को गौण कर देना चाहिए। करने पर भी वह दोष का कर्ता बन जाता है। एक अध्यापक कर्तव्य को प्रधान और पैसे को गौण करेगा तभी बालक के संस्कार बदल जाने पर कर्म शिथिल हो जाता है और संस्कार या दृष्टि उत्थान में अपनी पूरी शक्ति लगा पाएगा। पैसा तो उसे तब भी मिलेगा जिससे नहीं बदली तो वह कर्म नहीं बदलेगा। उसका फल फिर चुकाना पड़ेगा। मान उसका व्यवहार चलेगा। धीरे-धीरे जब वह अपने कर्तव्य को परमेश्वर से जोड़ लीजिए आपका कोई ऋणानुबंधी मित्र है जो आपका कर्ज नहीं चुका पाया। देगा तब परमेश्वर ही प्रधान हो जाएगा, पैसे का कोई महत्त्व नहीं रहेगा। उसका शरीर छूटने पर कर्ज चुकाने के लिये वह आपका पुत्र या पशु बनकर आ कोई भी चीज क्रमिक होती है। आप कहो पहले चित्त शुद्ध होकर सकता है। मित्र होने से वह आपको हमेशा सुख देना चाहेगा और आप भी उसे निष्काम हो जाएगा तब निष्काम कर्म करेंगे। ऐसी बात नहीं है। कर्तव्य को प्रधान कष्ट नहीं देंगे। बनाकर कर्म करने से निष्कामता शुरु हो जाती है और चित्त शुद्ध होते-होते जब यदि कोई ऋणानुबंधी शत्रु कर्ज चुकाने के लिये आपका पुत्र बना तो वह कर्तव्य पूर्णतः ईश्वर से सम्बन्धित हो जाता है तब निष्कामता पूरी हो जाती है। आपको दुःख ही देगा। जब तक संस्कारों में परिवर्तन नहीं होता तब तक ऋणानुबंध ऐसे ही चलता रहेगा। पर जिस दिन सत्संग से, शास्त्रचिन्तन से

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ कर्म-सिद्धान्त और गति-विचार संस्कार बदल जाएंगे तो कर्म से सम्बन्ध शिथिल हो जाएगा, अन्यथा यह कर्म इसी प्रकार एक होता है योगी और एक होता है संसारी। संसारी व्यक्ति परम्परा ऐसे ही चलती रहेगी। गीता में भगवान् ने कहा - गहना कर्मणो जब शास्त्र के अनुसार चलता है, केवल कर्तव्यदृष्टि से ईश्वर के लिये कर्म गति:(४.१७)। कर्म की गति बहुत जटिल है इसे सहजता से कोई समझ नहीं करता है तो उसका मन शुद्ध होता है। तब धीरे-धीरे वह जगत् को पढ़ लेता है, सकता। इस परम्परा से पूरा छुटकारा तो तभी मिलता है जब यह ज्ञान हो जाए कि उसे वैराग्य होता है। फिर वह अन्तर्मुख होकर मननशील हो जाता है, उसकी वस्तुतः आत्मा का कर्म से कोई सम्बन्ध ही नहीं है। मुनि संज्ञा हो जाती है। इससे पहले तो जगत् में भटका हुआ है। वह जगत् का ही एक बात यह भी है कि दृष्टि के अनुसार पाप-पुण्य में बहुत अन्तर पड़ चिन्तन करेगा वास्तविकता का नहीं। तब तक बाह्य कर्म ही उसका साधन बनता जाता है। आप एक व्यक्ति का घर उजाड़ देंगे तो आपको पाप लगेगा परन्तु जब है। उसका देवता भी बाहर ही होता है परन्तु मुनि बनने पर देवता बाहर से अन्दर सरकार बाँध बनाती है तो हजारों लोगों के घर उजाड़ देती है पर उसे कोई दोष प्रवेश कर जाता है - मुनीनां हृदि दैवतम्। मुनि होने पर उसको योगी बनने की नहीं लगता क्योंकि उसकी दृष्टि किसी को उजाड़ने की नहीं है। वहाँ तो दृष्टि इच्छा होती है। इसी को कहा - योगं आरुरुक्षोः। योगी वही है जो आत्मदर्शन व्यापक कल्याण की है। जब तक व्यक्ति स्वार्थ-प्रधान रहता है तब तक कर्म से के लिये, भगवत्-प्राप्ति के लिये लगा हुआ है, जगत् के लिये नहीं। आरुरुक्षु दोष होता है परन्तु कर्तव्य-प्रधान होने पर वह दोष नहीं होता। अब इसी बात से योगी बनना चाहता है अभी बना नहीं है। उसकी कामना का विषय जगत् न होकर बैल और किसान की शृंखला को भी समझ लेना चाहिए। भगवान् होता है। **** चाहने मात्र से व्यक्ति कर्म छोड़कर योगी (आत्मध्यानी) नहीं बन जिज्ञासा :- गीता में भगवान् ने एक ओर तो कर्म को कल्याण का सकता। न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।(गीता - ३.४) कर्म साधन कहा है तो दूसरी ओर कर्म के त्याग को कल्याण का साधन बताया है। करना बन्द कर देने से तुम निष्कर्मा नहीं हो पाओगे, तुमसे कर्म नहीं छूटेगा। इसका तात्पर्य क्या है? शास्त्र की विधि से कर्म कर लोगे तो कर्म स्वतः छूट जाएगा। सचाई से पढ़ लोगे समाधान :- इस कथन में कोई विरोधाभास नहीं है। अधिकारी-भेद से तो पास हो जाओगे, कक्षा छूट जाएगी और नहीं पढ़ोगे तो फेल हो जाओगे, दो साधन कहे गए हैं इसे न समझने के कारण विरोध प्रतीत होता है। भगवान् ने कक्षा नहीं छूटेगी। इसलिये आरुरुक्षु पहले कर्मयोगी बनता है। उसका प्रत्येक इन साधनों के अधिकारियों का स्पष्ट रूप से विभाग कर दिया है- कर्म जगत् के लिये नहीं बल्कि ईश्वर के लिए होता है। उसके जीवन में नित्यकर्म आरुरुक्षोर्मुनेर्योंगं कर्म कारणमुच्यते। बढ़ जाता है। वह प्रत्येक कर्म ईश्वर-आराधनारूप से करता है। योगारुढ़स्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।(गीता ६.३) ऐसा करते-करते उसका कर्म छूट जाएगा। वह योगी बन जाएगा। अब आरुरुक्षु अर्थात् चढ़ने की इच्छा रखने वाला। जैसे एक होता है पेड़ पर शास्त्र उसे कहता है कि कर्म छोड़कर संन्यासी बन जाओ, शान्त हो जाओ। चढ़ने की इच्छा रखने वाला और दूसरा है जो पेड़ पर चढ़ गया। इन दो में से जो शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वा ... (बृह.उप .- ४.४.२३)। पेड़ पर चढ़ने की इच्छा वाला है उसे तो कर्म करना ही पड़ेगा, प्रयास करेगा तभी अब उस योगी को शम, दम का अभ्यास करना चाहिए। कर्मों का जो अभ्यास चढ़ेगा, संकल्पमात्र से नहीं चढ़ सकता। जब पेड़ पर चढ़ गया तब भी क्या कुछ पड़ा है उसे छोड़कर उपरत होना चाहिए। उसका तो एक ही लक्ष्य है - करना पड़ेगा? तब तो शान्त बैठना ही काम है। आत्मदर्शन। इसमें तो कर्म बाधक ही बनेगा। इसके लिये तो शम अर्थात्

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग -३ बहिर्मुखता छोड़कर शान्त हो जाना ही साधन है। शान्त हो जाए तो द्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाएगा। जब पेड़ पर चढ़ गए तो शान्त हो जाओ, अन्तर्मुख हो जाओ, बस! जगत् की लीला देखते रहो। ऊपर उठ गए तो कर्म की कक्षा छूट गई। इसलिये भक्ति और उपासना समझना चाहिए कि अधिकारी भेद से ये दो साधन गीता में कहे गए हैं। जिज्ञासा :- कोई भक्त पुराणों में कही हुई भगवान् की लीला, धाम **** जिज्ञासा :- कर्मत्याग का क्रम क्या है? इत्यादि में ज्यादा रुचि नहीं रखता है तो उसकी भक्ति का स्वरूप कैसा होना समाधान :- कर्मत्याग का विधान सभी के लिये नहीं है। इसलिये चाहिये? कर्मत्याग में सभी का अधिकार नहीं है। परमार्थ मार्ग के साधक को पहले सभी समाधान :- सामान्य व्यक्ति के लिये इस प्रकार भक्ति करना कठिन है। कर्म त्यागने का विचार नहीं करना चाहिए। प्रारम्भ में अनावश्यक कर्मों का त्याग भगवान की लीला, गुण इत्यादि के बिना सामान्य व्यक्ति के लिये चिंतन का कोई करे और कर्तव्यरूप से प्राप्त कर्मों को सम्यक प्रकार से करके ईश्वरार्पण कर दे। आधार ही नहीं रहेगा। हाँ ! इस प्रकार की उपासनाएं भी शास्त्रों में देखी जाती हैं उनके फल की इच्छा न रखे। कुछ काल तक ऐसा करने से उसका अन्तःकरण - ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते .... (गीता - १२.३) इतना कहकर शुद्ध होगा। तब कर्मों से मन स्वतः हटने लगेगा और आत्मसाक्षात्कार की प्यास भगवान् ने फिर कहा - बढ़ती जाएगी। उस समय साधक कर्मसंन्यास ले सकता है। क्लेशो ऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।(गीता- १२.५)

**** इसलिये ऐसी उपासना करने से पहले अपने सामर्थ्य को अवश्य जानना चाहिए। देहाभिमानी के लिये ऐसी उपासना कर पाना सम्भव नहीं है। तदेव सक्तः सह कर्मणैति लिङ्गं मनो यत्र निषक्तमस्य। **** प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किंचेह करोत्ययम्। जिज्ञासा :- सामूहिक प्रार्थना या मन्त्रोच्चार में भाव की उत्पत्ति नहीं हो तस्माल्लोकात्पुनरैत्यस्मै लोकाय कर्मण इति नु कामयमानः॥ पाती है। यह कैसे उत्पन्न हो? (बृह.उप .- ४.४.६) समाधान :- चाहे समूह हो या एकान्त, भाव तो एक ऐसी वस्तु है जो इस सकाम संसारी जीव का मनःप्रधान लिङ्गशरीर जिस वहाँ उत्पन्न होती है जहाँ आपका राग है, जिसका महत्त्व आपके चित्तमें बैठा है। स्वर्गादि फल की अभिलाषा वाला होता है वह उसी प्रकार के कर्मों का सम्पादन करके अन्तकाल में उसी फल में आसक्त आपका कोई प्रिय व्यक्ति आपके पास में आए तो आप उससे बात करने के लिये हुआ उसे प्राप्त कर लेता है। इस लोक में जीव जो कुछ कर्म कितने सावधान हो जाते हैं और भगवान् के सामने बैठकर मनोराज्य करते हैं। करता है उसका फल भोगकर उस लोक से कर्म करने के लिए इसका मतलब अभी चित्त में जगत् की अपेक्षा भगवान् का महत्त्व कम बैठा है। पुनः इस मनुष्य शरीर में आ जाता है। सकाम पुरुष निश्चित जिस दिन बुद्धि में यह निश्चय हो जायेगा कि एक समय इस जगत् के बिना ही ही इस प्रकार से संसरण करता रहता है। हमको काम चलाना पड़ेगा, उस समय हमारा साथी भगवान् ही होगा, उसी दिन से भगवान् का महत्त्व बुद्धि में बैठ जाएगा। तब भाव को उत्पन्न करने के लिये 22 23

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ भक्ति-उपासना किसी अन्य प्रयास की आवश्यकता नहीं रहेगी। एक समय होता है जब बालक के चित्त में माता-पिता का बड़ा महत्त्व जिस भक्ति की बात की गई है उसके अनन्तर ही ज्ञान कहा है -

होता है। वह उनके बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता। फिर एक समय ऐसा भी भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।

आता है जब उसके चित्त में स्त्री-पुत्र आदि का महत्त्व अधिक हो जाता है तो वह ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।।(१८.५५)

माता-पिता को ही भूल जाता है। मैं बार-बार कहता हूँ कि जगत् के विषयों में यह है अन्तिम ज्ञान। इसी को कहते हैं ज्ञान की पराकाष्ठा। ऐसी जगहों पर पहले जो तुमको रस मिल रहा है उससे अधिक रस जब भगवन्नाम-जप में मिलेगा तभी तो देखना चाहिए कि प्रकरण कहाँ से प्रारम्भ हो रहा है। यह प्रकरण यहाँ से

तुम्हारे जगत् के संस्कार दूर होंगे। उस दिन जगत् का महत्त्व खत्म हो जाएगा प्रारम्भ हुआ -

और भगवान् का ही महत्त्व जीवन में रह जाएगा। तब जगत् में कहीं भी रहते हुए असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।

भगवान् के प्रति भाव बना रहेगा। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति।।(१८.४६) इस श्लोक में साधक के लक्षण कहे हैं। उसकी जगत् में कहीं आसक्ति **** जिज्ञासा :- दहरोपासना प्रकरण में सगुण-निराकार परमात्मा की नहीं होनी चाहिए, उसकी इन्द्रियाँ और मन वश में होने चाहिए, इस लोक से

उपासना का विधान किया, परन्तु उसका फल सगुण-साकार हिरण्यगर्भ की ब्रह्मलोक पर्यन्त किसी भी पदार्थ की इच्छा नहीं होनी चाहिए। ऐसे साधक को ही

प्राप्ति बताया गया है। इसका क्या कारण है? दहरोपासना और प्रजापति विद्या में संन्यास का अधिकार दिया गया है। इससे पहले तो गुणात्मक साधन बताए हैं।

परस्पर क्या अन्तर है? अब वह संन्यास के द्वारा नैष्कर्म्यसिद्धि को जिस प्रकार प्राप्त करता है उसे

समाधान :- हिरण्यगर्भ समष्टि सूक्ष्म शरीराभिमानी है। जब आपका बताया -

सूक्ष्म शरीर निराकार है तो समष्टि सूक्ष्म शरीराभिमानी हिरण्यगर्भ साकार कैसे हो सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।

सकता है। इसलिये उसे सगुण-निराकार ही समझना चाहिए। प्रजापति विद्या का समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा।।(१८.५०)

विषय आत्मज्ञान है और दहरोपासना में उपासना का प्रसंग है। जब इस प्रकार सिद्धि(ज्ञाननिष्ठा की योग्यता) प्राप्त हो गई, तदुपरान्त ज्ञाननिष्ठा कैसे प्राप्त होती है उसको बताते हैं - **** जिज्ञासा :- शास्त्रों में भक्ति को ज्ञान का साधन बताया है परन्तु गीता में बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। ज्ञान होने के पश्चात् भक्ति की बात कही है - शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ।।

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्कति। विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।

समः सर्वेषु भूतेषु मद्धक्तिं लभते पराम्।।(१८.५४) ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ।।(१८.५१,५२) यहाँ पर यथार्थ क्रम क्या है? ऐसा साधक विशुद्ध बुद्धि के द्वारा शब्दादि विषयों को छोड़कर, मन का

समाधान :- यहाँ पर भी भक्ति को ज्ञान का साधन ही कहा है, परन्तु क्रम निग्रह कर लेता है। नहीं तो रागद्वेषयुक्त होकर मनोराज्य करेगा। उसे विविक्तसेवी को ठीक से न समझने पर बहुत लोगों को यहाँ भ्रम हो जाता है। देखिए, गीता में भी होना है। समुदाय में रहेगा तो इधर-उधर की बातें सुनकर उसको विक्षेप होगा। उसे लघ्वाशी भी होना पड़ेगा, अर्थात् संयमित भोजन करना पड़ेगा, नहीं

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ भक्ति-उपासना तो एकान्त का लाभ सोने के लिये उठा लेगा। फिर कहा - यतवाक्कायमानसः। है। यहाँ पर समझना कठिन इसलिये हो जाता है कि ज्ञाननिष्ठा-प्राप्ति की प्रतिज्ञा वह यत्न करके इन्द्रियों को, मनको संयमित करता है। ऐसा नहीं करेगा तो कभी - समासेनैव कौन्तेय .... (१८.५०) से प्रारम्भ किया और अनुभूति - विशते घूमने की इच्छा हो जाएगी और नहीं तो प्रकृति को देखने की ही इच्छा हो तदनन्तरम् (१८.५५) में पहुँचाकर समाप्त किया। बीच में भक्ति का प्रसंग आ जाएगी। अब तो उसका एक ही कर्तव्य है - ध्यानयोगपरो नित्यम्। इसके लिये जाने से यहाँ यह भ्रम हो ही जाता है कि पहले ज्ञान है या भक्ति। परन्तु इस सम्पूर्ण अत्यन्त वैराग्य की आवश्यकता है क्योंकि कहीं भी थोड़ी सी इच्छा रही तो वह प्रकरण को एक साथ समझने पर विषय स्पष्ट हो जाता है। मन को ध्यान में केन्द्रित नहीं होने देती। इसलिये वह वैराग्य का आश्रय भली- **** भाँति लेता है- वैराग्यं समुपाश्रितः। कभी-कभी व्यक्ति में ज्ञान का भी अहंकार जिज्ञासा :- शक्ति उपासना का प्रचलन कितना पुराना है? हो जाता है। पर वह तो इस विषय में भी सावधान है- समाधान :- शक्ति उपासना की परम्परा अनादि काल से चली आ रही अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। है। यह वैदिक उपासना है। वेदों में शक्ति से सम्बन्धित बहुत से सूक्त हैं। जैसे- विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥(१८.५३) श्रीसूक्त, देवीसूक्त, लक्ष्मीसूक्त इत्यादि। त्रिपुरोपनिषद्, भावनोपनिषद्, वह अहंकार, बल(जगत् सम्बन्धित), घमण्ड, काम, क्रोध और परिग्रह अरुणोपनिषद्, देव्यथर्वशीर्ष इत्यादि उपनिषद् भी प्रसिद्ध हैं जो शक्ति उपासना का त्याग करके ममता से रहित हुआ, शान्तचित्त वाला, ध्यानयोग के द्वारा ब्रह्म की प्राचीनता का समर्थन करते हैं। पुराणों में देखें तो सबसे अधिक विवरण को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। इसके पश्चात् उसका लक्षण कहा - शक्तितत्त्व का मिलता है। देवीभागवत, ब्रह्माण्डपुराण, मार्कण्डेयपुराण और ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्कति। इसे ब्रह्मभूयाय कल्पते की कालिकापुराण में शक्तितत्त्व का भली-भाँति प्रतिपादन किया गया है। अन्य व्याख्या समझना चाहिए। फिर कहा - समः सर्वेषु भूतेषु मद्धक्तिं लभते पराम्। पुराणों में भी शक्ति उपासना का विवरण मिलता है। तन्त्रशास्त्र तो शक्तितत्त्व के इसी भक्ति के विषय में भक्ति प्रकरण में कहा था - ज्ञानी त्वात्मैव मे प्रतिपादन के लिये प्रसिद्ध ही है। इसलिये शक्ति उपासना की परम्परा प्राचीन, मतम्(७.१८)। यही है ज्ञानी भक्त। इस भक्ति को ही पराभक्ति कहते हैं। यह व्यापक तथा शिष्ट लोगों के द्वारा ग्राह्य रही है। पराभक्ति अनुभव में सहायता करती है। इसलिये कहा -भक्त्या मामभिजानाति। इसी भक्ति से भगवत्त्त्व का ज्ञान होगा। अपराभक्ति से भगवत्तत्त्व का यथार्थ ज्ञान जिज्ञासा :- अव्यभिचारिणी तथा अनन्य भक्ति में क्या अन्तर है? नहीं होता। देखिए, नामदेवजी की भक्ति से भगवान् अति प्रसन्न थे। उनके साथ समाधान :- पहले तो अनन्यता और अव्यभिचारिता का अर्थ जानना खाना-पीना, खेलना इत्यादि व्यवहार भी होता था। फिर भी भगवान् ने कहा - चाहिए। अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता, अन्य किसी का आश्रय न ले कर किसी "नामदेव तुम मेरे यथार्थ स्वरूप को अभी भी नहीं जानते। इसके लिये तुम्हें गुरु एक का आश्रय लेना, उसे कहते हैं अनन्यता। यदि वह आश्रय परमात्मा का है तो से उपदेश लेना ही पड़ेगा।" उसका नाम होगा परमात्मा की अनन्यभक्ति। वह हमेशा तदनन्यत्व ही देखता है। इसलिये पराभक्ति से युक्त भक्त ही परमेश्वर को ठीक पहचानता है। वह परमात्मा से भिन्न किसी को नहीं देखता। सभी रूपों में अपने इष्ट को देखता है। उसे अनन्यरूप से जानता है। इसीलिये भगवान् ने कहा - ज्ञानी त्वात्मैव मे यही शुद्ध अनन्यभक्ति है। कुछ लोग इसका दूसरा अर्थ करते हैं कि हमारे इष्ट को मतम्। यह ज्ञानी भक्त है। इसलिये भाष्यकार भगवान् ने भी इसको भक्त ही कहा छोड़कर किसी दूसरे देवता के मन्दिर में नहीं जाएंगे, किसी दूसरे देवता का

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ भक्ति-उपासना प्रसाद नहीं लेंगे। यह विचार उत्तम नहीं है। इससे तो आप अपने इष्ट की व्यापकता इसमें नहीं है कि किसी दूसरे को छोटा मानो। ऐसी बात भी नहीं है कि एक जगह को तोड़ रहे हैं। बुद्धि केन्द्रित करके अन्य जगह व्यवहार नहीं हो सकता। ऐसा आप लोक में व्यभिचारी का अर्थ प्रसिद्ध है। जहाँ सम्बन्ध है उसे छोड़कर दूसरी जगह देखते भी हैं, प्रत्येक स्त्री के लिये उसका पति सर्वोपरि है, उसका लोक और सम्बन्ध बना लेने वाले को व्यभिचारी कहते हैं। अव्यभिचारी का अर्थ हुआ परलोक सम्पूर्णतया उसी के आधार पर टिका रहता है। फिर भी उसको व्यवहार किसी जगह से बने हुए सम्बन्ध को नहीं छोड़ना अर्थात् यथावत् बनाए रखना। अनेकों के साथ करना पड़ता है। सास-ससुर की सेवा करनी पड़ती है। ननद, यदि किसी की इष्ट के प्रति भक्ति यथावत् है, वह उसे छोड़कर किसी दूसरे की देवर इत्यादि की उपेक्षा नहीं कर सकती। इससे उसकी जो पति के प्रति सर्वोपरि भक्ति नहीं कर रहा है तो ऐसी भक्ति को अव्यभिचारिणी भक्ति कहते हैं। इस प्रकार दृष्टि है वह तो नहीं गड़बड़ाती। इस लिये यहाँ पर अपने इष्ट को सर्वोपरि कहने अव्यभिचारिणी तथा अनन्य भक्ति में शब्द मात्र का ही अन्तर लग रहा है। कहीं- का तात्पर्य ठीक से समझना चाहिए। कहीं पर व्यभिचारी का मतलब अभाव भी होता है, तब अव्यभिचारी का अर्थ **** हुआ सदा रहने वाला। अव्यभिचारिणी भक्ति का तात्पर्य हुआ सदा एकरस रहने जिज्ञासा :- प्राणोपासना को ज्ञानोपासना कहें तो क्या आपत्ति है? वाली भक्ति। ऐसी भक्ति किसी निमित्त को लेकर नहीं होती। निमित्त को लेकर समाधान :- प्राणोपासना की चर्चा जहाँ आती है वहाँ प्राण का अर्थ होने वाली भक्ति निमित्त के समाप्त होने पर समाप्त हो सकती है। परन्तु यहाँ पर हिरण्यगर्भ होता है। हिरण्यगर्भ के साथ अपनी अहंता को मिलाकर उपासना ऐसी सम्भावना नहीं है। होती है। यह अहंग्रहोपासना है। इसका फल हिरण्यगर्भ लोक की प्राप्ति है। **** ज्ञानोपासना में ज्ञान की भावना की जाती है, अहं ब्रह्मास्मि की भावना जिज्ञासा :- आप कहते हैं - अनन्य भक्ति में अपने इष्ट को सभी की जाती है। विचारपूर्वक अनुभूति नहीं है, मात्र भावना की जा रही है। इसलिये देवताओं में समान रूप से देखना चाहिए। ऐसे में तो इष्ट के प्रति जो दृढ़ निष्ठा है यह उपासना है। अतः प्राणोपासना और ज्ञानोपासना में अन्तर समझना चाहिए। उसके बिखरने की सम्भावना हो सकती है। **** समाधान :- इसका मतलब आप मेरे कथन को समझे नहीं। आप यह जिज्ञासा :- गीता के बारहवें अध्याय में सगुण और निर्गुण के उपासकों बताइए कि जो इष्ट को सर्वोपरि मानकर उपासना करता है वह अपने इष्ट को में से किसे श्रेष्ठ बताना भगवान् को अभीष्ट है? भगवान् मानता है कि नहीं? सृष्टि का कर्ता भी मानता है। इससे जितने भी रूप समाधान :- गीता में साधना के दो ही मार्ग बताए हैं एक कर्मयोग और हुए वे उसके इष्ट के हुए कि नहीं? यदि वह किसी दूसरे का रूप मानता है तो दूसरा ज्ञानयोग। कर्मयोगी सगुण-साकार परमेश्वर की उपासना करता है और उसका इष्ट बहुत छोटा है, व्यापक नहीं। उसका इष्ट बहुत कमजोर है। ऐसे में ज्ञानयोगी अक्षरब्रह्म अर्थात् निर्गुण-निराकार की। दोनों उपासक हैं। यहाँ अर्जुन उसका अपमान हुआ। फिर तो वह भगवान् भी नहीं हो सकता। यदि तुम उसे का प्रश्न इस प्रकार का है, जैसे कोई बालक अपनी माता से पूछे कि आप मुझसे भगवान् मानते हो तो यह मानना ही पड़ेगा कि सभी रूप उसी के ही हैं। ऐसे में ज्यादा प्रेम करती हैं या पिताजी से? तब माता क्या जवाब देगी? यही कहेगी, दूसरा कहाँ से आएगा जिससे तुम द्वेष करो। बेटा! मैं तुमको सबसे ज्यादा प्रेम करती हूँ और तुम्हारे पिताजी तो मेरी आत्मा यह जो कहा है कि अपनी बुद्धि को एक जगह केन्द्रित करें उसका तात्पर्य ही हैं, उनके विषय में मैं क्या कहूँ। ठीक इसी प्रकार यहाँ भगवान् का उत्तर है।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ भक्ति-उपासना भगवान् ने पहले कहा - मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। और नष्ट हो रहा है। उसमें एक अक्षर तत्त्व ही ऐसा है जो बदलता नहीं, एकरस

श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥(१२.२) बना रहता है। अक्षर कूटस्थ है। कूट कहते हैं माया को, उसमें जो सत्तारूप से

सगुण-उपासक को युक्ततम अर्थात् श्रेष्ठ योगी बताया और आगे अक्षर स्थित है और अचलम्, बिना हिले स्थित है। तीनों कालों में एकरस रहता है।

उपासक के लिये कहा - जैसे पर्दे पर अग्नि दिखती है, बारिश होती दिखती है, परन्तु पर्दा न गर्म होता है

ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।(१२.४) और न गीला। ऐसे अक्षर को- पर्युपासते। संन्यासी इस अक्षर की उपासना करते

उनके विषय में क्या कहा जाए। वे तो मुझे प्राप्त करते ही हैं। तब प्रश्न हैं। इस उपासना का स्वरूप आगे बताते हैं।

होता है कि जब ऐसा है तो सगुण-उपासक को योगवित्तम क्यों कहा? इसका इन्द्रिय और मन के द्वारा ही बाह्य विषयों से सम्बन्ध बनता है। इसलिये

जवाब भगवान् ने दिया - कहा सन्नियम्येन्द्रियग्रामम्। जब इनकी बहिर्मुखता को रोक देते हैं तो अन्दर स्थित अक्षरतत्त्व से सम्बन्ध बन जाता है। यहाँ से अक्षर की उपासना शुरु होती

सामान्य साधक के लिये निर्गुण की उपासना अत्यन्त कठिन है। सगुण है। इसके बाद संन्यासी का अभ्यास बताया- सर्वत्र समबुद्धयः। उसे किसी को

की उपासना सरल पड़ती है, उसे सभी साधक कर सकते हैं। इस सरलता की दृष्टि भी अपने से बाहर नहीं देखना चाहिए। वह एक सम आत्मतत्त्व का उपासक है, से ही भगवान् ने सगुण-उपासक को श्रेष्ठ कहा है। इसलिये कहीं भी उसकी बुद्धि में विषमता नहीं आनी चाहिए। बुद्धि को निरन्तर एक तत्त्व में ही स्थित रखना उसका अभ्यास है। उसका व्यवहार कैसा होगा, तो **** जिज्ञासा :- गीता के बारहवें अध्याय में अक्षरोपासक की चर्चा है। कहा- सर्वभूतहिते रताः। उसके व्यवहार से किसी को भी कष्ट नहीं होता, वह

जिसमें कोई गुण या रूप ही नहीं है ऐसे अक्षरब्रह्म की उपासना किस प्रकार हो पूर्ण अहिंसक होता है।

सकती है? संन्यास संस्कार के समय जल में खड़े होकर प्रतिज्ञा की जाती है -

समाधान :- बात तो ठीक ही है, सगुणोपासक के समान अक्षरोपासक अभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।(नारद परिव्राजक उप .- ४.३७)

की उपासना का स्वरूप नहीं हो सकता। भगवान् ने पहले अक्षर का स्वरूप संसार के सभी प्राणी मेरी आत्मा हैं, मेरे मन में किसी के प्रति विषमता नहीं

बताया - आएगी, सब मुझसे निर्भय हो जायें। ऐसे संन्यासी उपासक का फल भगवान् ने

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। बतायां- ते प्राप्नुवन्ति मामेव, वे उस अक्षर ब्रह्म के साथ एक हो जाते हैं।

सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्।।(१२.३) ****

अक्षर का शब्द से निर्देश नहीं कर सकते। वह अव्यक्त है, उसका कोई जिज्ञासा :- किस प्रकार से भजन करें कि ईश्वर के नजदीक रहें?

व्यक्त स्वरूप हमारे सामने नहीं है। पर एक बात है- सर्वत्रगम्, वह सब जगह है, समाधान :- तुम जप, ध्यान, स्तोत्रपाठ, देवपूजन किसी भी प्रकार से

केवल उसे पहचानना पड़ता है। यदि कहो बुद्धि से पहचान लेंगे, तो यह सम्भव ईश्वर का भजन कर सकते हो। जिसमें तुम्हारी श्रद्धा हो, मन लगता हो उस प्रकार नहीं क्योंकि वह बुद्धि का विषय नहीं है- अचिन्त्यम्। यह सारा जगत् उत्पन्न से भजन करो। पर दो बातें समझ कर रखना। ईश्वर का भजन ईश्वर के लिये करोगे तो ईश्वर के नजदीक रहोगे और यदि ईश्वर का भजन जगत् के लिये

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ भक्ति-उपासना करोगे तो जगत् के नजदीक रहोगे। का ज्ञान करा देगा। **** भक्त्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वतः।(गीता-१८.५५) जिज्ञासा :- भगवान् का अनन्य भक्त होने में बाधा क्या है? बिना भक्ति के आप भगवान् के यथार्थ स्वरूप को समझ नहीं सकते। समाधान :- चाहे व्यक्ति ज्ञान मार्ग में जाए अथवा भक्ति मार्ग में, चाहे भक्ति करने से ज्ञान प्राप्ति के प्रतिबन्ध बहुत जल्दी क्षीण हो जाते हैं। कर्म योग का अनुष्ठान करने का प्रयास करे सब जगह मुख्य बाधक तो कामना ही "अद्वैतसिद्धि" के रचनाकार मधुसूदन सरस्वतीजी अपने समय के है। यह कामना ही भगवान् के प्रति अनन्य नहीं होने देती। न ज्ञान में प्रतिष्ठित होने देती है, न भक्त बनने देती है और न कर्मयोगी। माया जगत् में व्यक्ति को कभी वेदान्त के सर्वश्रेष्ठ विद्वान् थे। भगवान् की कृपा से एक बार एक अवधूत ज्ञानी

निश्चिन्त नहीं होने देती। एक न एक समस्या इसके जीवन में रखेगी। चाहे गरीबी महात्मा उनके पास पहुँच गए। उनसे कहा - "मेरे प्रश्न का सच्चा जवाब दे सकते

की समस्या हो, चाहे स्वास्थ्य की, या यश की, कोई न कोई समस्या आ ही हो?" उन्होंने कहा - पूछिए। महात्मा ने कहा - शास्त्रार्थ में जब तुम्हारा पक्ष कमजोर होता है तो मन में कुछ ग्लानि होती है या नहीं? कहा - होती है। फिर जाती है। कोई समस्या बाहर की होती है तो कोई मन की। समस्याग्रस्त व्यक्ति की साधना में समस्या-निवृत्ति की कामना निमित्त बन जाती है। यह कामना जब उन्होंने पूछा - जब तुम्हारा पक्ष उत्कर्ष को प्राप्त होता है तो मन में प्रसन्नता होती है या नहीं? कहा - होती है। तब महात्मा ने कहा - पुस्तक में तो तुमने अद्वैत तक रहेगी तब तक वह शुद्ध भाव से, अनन्यता से साधना नहीं कर सकता। सिद्ध कर दिया, पर तुम्हारे जीवन में अद्वैत कहाँ सिद्ध हुआ? यदि हो जाता तो यदि कहो कि समस्या रहने पर साधक क्या करे? तो इसका उपाय है कि मन में हर्ष और शोक नहीं होते। उस समस्या को भगवान् के चरणों मे अर्पित कर दो। तुम क्यों चाहते हो कि भगवान् उसे दूर कर दे। तुम्हारा हित भगवान् अधिक जानते हैं या तुम? तुम तो तब मधुसूदनजी ने महात्मा से कोई उपाय बताने के लिये प्रार्थना की।

हमेशा अपना मन भगवान के ऊपर लादना चाहते हो। भगवान् ऐसा कर दे, वैसा उन्होंने कहा - तुम्हारा 'विद्या का अहंकार' ही ज्ञान में प्रतिबन्ध है। यह उपासना

कर दे। तुमने तो भगवान् को नौकर ही बना दिया। जो अनन्य भक्त होता है वह से ही दूर होगा। फिर उन्होंने कृष्ण-उपासना की एक विधि उन्हें समझा दी। उस विधि से उपासना करने पर उनका प्रतिबन्ध नष्ट होकर अपरोक्ष साक्षात्कार हो सब कुछ सह लेता है, भगवान् से कुछ भी नहीं माँगता। वह केवल भगवान् के गया। मेरा तात्पर्य यही है कि अहंता का नाश करने में सगुण उपासना का बहुत लिये ही भजन करता है। उन्हीं को चाहता है। ऐसे भक्त की जिम्मेदारी भगवान् बड़ा उपयोग है। को लेनी पड़ती है। **** जिज्ञासा :- परमेश्वर की प्राप्ति के लिये जैसा प्रेम और भक्ति जिज्ञासा :- वेदान्त-अध्ययन करने के बाद भी मेरे मन में ऐसी वृत्ति आवश्यक है उसका जीवन में आविर्भाव कैसे हो? बार-बार उठती है कि मुझे सगुण ईश्वर की भक्ति करनी चाहिए। क्या ऐसा करना समाधान :- परमेश्वर तो सर्वत्र है - हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। उचित होगा? (मानस बाल .- १८४.३) उसकी प्राप्ति का अर्थ यही होगा कि उसका प्रत्यक्ष समाधान :- भक्ति करने में तो किसी प्रकार का दोष नहीं है। आप सगुण दर्शन हो जाए, ज्ञान हो जाए, वह हमारे सामने प्रकट हो जाए। उस व्यापक की भक्ति करेंगे तो भी आपका परमेश्वर तो समर्थ है, वह अपने निर्गुण स्वरूप परमेश्वर का दर्शन कैसे हो इसका उपाय शिवजी ने देवताओं को बताया - प्रेम

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ भक्ति-उपासना तें प्रगट होहिं मैं जाना।(मानस बाल .- १८ ४.३) इस प्रेम और भक्ति के भी कल्पना कर लेता है और इन्द्रियों की भी, साथ ही उनके द्वारा सारा व्यवहार आविर्भाव के लिये वल्लभाचार्य ने एक सूत्र बताया है-महत्त्वश्रवण। भगवान् भी कर लेता है। मन विषयों को भी रच लेता है और उनको ग्रहण करने के लिए के गुण, लीला एवं सामर्थ्य का श्रवण करने से उनके महत्त्व का ज्ञान होगा। इन्द्रियों को भी। इसलिए मन की सामर्थ्य तो कमजोर नहीं दिखाई देती। जैसा इसीलिये आश्रम में हमलोग रोज 'शिवमहिम्न स्तोत्र' का पाठ करते हैं अर्थात् भोग जाग्रत में होता है, उसी प्रकार का स्वप्न में भी हो जाता है। ऐसा नहीं होता उनकी महिमा का, ऐश्वर्य का गान करते हैं। उनकी महिमा के गान से उनके प्रति कि स्वप्न में आपको भूख लगे और स्वप्न के अन्न से आपका पेट न भरे। स्वप्न हमारा प्रेम बढ़ेगा। में कोई आपको माला पहनाता है तो आपको प्रसन्नता होती है और गाली देता है परमेश्वर की दो बातों का श्रवण और गान करना चाहिए। पहला उनका तो दुःख भी होता है। इसलिए केवल मन से भोग होने में कोई विसंगति तो नहीं प्रभाव और दूसरा स्वभाव। प्रभाव -जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय उनके दिखती। संकल्प से ही हो जाते हैं। दुष्टों का नाश करके धर्म की रक्षा करते हैं। उनका स्वप्न में आपका मन रज-तम से युक्त होता है, इसलिए इष्ट-अनिष्ट स्वभाव -सबको अपना आत्मरूप समझना। वे सबसे अहैतुक प्रेम करते हैं। न विभिन्न प्रकार के स्वप्न दिखाई देते हैं। परन्तु जो उपासक ब्रह्मलोक में पहुँचता है किसी की जाति देखते हैं न लिङ्ग, न पाण्डित्य, बस जो भी उनके प्रति भाव रखे उसका मन तो शुद्ध-सात्त्विक होता है, उसमें बड़ी ताकत रहती है। इसलिए वह उससे प्रेम करते हैं। वे तो सबसे प्रेम करने के लिये तैयार बैठे हैं पर दुनिया ही केवल मन से कैसे भोग करेगा, इस प्रकार से हमें संशय नहीं करना चाहिए। यहाँ प्रेम नहीं करती तो क्या करें? उनका तो कहना है कि तुम मेरे लिये एक कदम भी कोई-कोई योगी पचास मील दूर तक देख सकते हैं क्योंकि उनकी बढ़ाओ तो मैं दस कदम तुम्हारी ओर बढ़ाऊँगा। वे सबका उद्धार करने के लिये इन्द्रियशक्ति वहाँ तक पहुँच जाती है। ब्रह्मलोक पहुँचे उपासक की सामर्थ्य तो सदा तत्पर रहते हैं- सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता (दुर्गासप्तशती-४.१७), ऐसे योगियों से बहुत अधिक होती है। इसलिए वह केवल मन से वहाँ सम्पूर्ण लोकोपकार के लिये उनका हृदय पिघला रहता है। भुवनभयभङ्गव्यसनिन :- विषयों का उपभोग कर सकता है। संसार के भय का नाश करना ही उनका व्यसन है। इस प्रकार जब उनके कृपामय स्वभाव का निरन्तर श्रवण करेंगे तो उनके प्रति प्रेम का प्राकट्य होगा। जिज्ञासा :- ब्रह्मलोक में पहुँचे उपासक के विषय में छान्दोग्य उपनिषद् **** में कहा गया है - जिज्ञासा :- ब्रह्मसूत्र में आता है कि जो उपासक ब्रह्मलोक जाते हैं वे संकल्पादेव अस्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति ... (८.२.१) वहाँ इन्द्रियों से रहित होकर केवल मन से ही वहाँ के विषयों का उपभोग करते यहाँ प्रश्न होता है कि पितर लोग तो पितृलोक में रहते हैं, उसके संकल्प हैं। केवल मनरूप से रहना कैसे सम्भव है? से तुरन्त ही वहाँ उपस्थित कैसे होंगे? समाधान :- अच्छा यह बताइए कि स्वप्नावस्था में आप शरीर और समाधान :- उस उपासक के लिए देश, काल कल्पित हैं। हमारी इन्द्रियों के साथ रहते हैं या उनके बिना? वहाँ तो शरीर निश्चेष्ट पड़ा है और कल्पना से हमें दूर या नजदीक मालूम होता है। हमें लगता है कि ब्रह्मलोक से इन्द्रियाँ भी लीन हैं। अतः स्वप्न में जितना भी आपका व्यवहार होता है वह पितृलोक बहुत दूर है। परन्तु उस उपासक के लिए देश, काल का कोई व्यवधान केवल मन से ही होता है। वहाँ आप मनस्वरूप ही रहते हैं। आपका मन शरीर की नहीं है, कोई दूरी भी नहीं है। वे पितर वहीं मौजूद हैं, इसलिए उसके संकल्प मात्र

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग- ३ से उपस्थित हो जाते हैं। **** जिज्ञासा :- श्रद्धा का स्वरूप क्या है? हम श्रद्धावान् हैं यह कैसे जानें? समाधान :- जब गुरु और शास्त्रवाक्य आपकी बुद्धि से ऊपर रहें अर्थात् ज्ञान-चर्चा

आपको जब ऐसा निश्चय हो जाए कि इनका कथन ही सत्य है, हमारा अनुभव झूठा हो सकता है, तब समझना चाहिए कि मुझमें श्रद्धातत्त्व है। जिज्ञासा :- सुषुप्ति में अज्ञान स्वीकार किया गया है और ज्ञानी को भी सुषुप्ति होती है। फिर ज्ञानी की नित्य ज्ञान में स्थिति रहती है यह कैसे सम्भव **** जिज्ञासा :- भगवान् की भक्ति करते समय भक्त को भगवान् के साथ कैसा होगा? समाधान :- सुषुप्ति में अज्ञान कहने का तात्पर्य जाग्रत को लेकर है। सम्बन्ध बनाना चाहिए? समाधान :- भगवान् के अनेक भक्त पहले हुए हैं, उनमें से किसी ने जैसा जाग्रत में विषयों का ज्ञान रहता है वैसा सषुप्ति में नहीं रहता। पर ज्ञानी के लिये तो जाग्रत और सुषुप्ति दोनों ही बाधित हैं इसलिये जिस प्रकार जाग्रत में दास्यभाव से भक्ति की तो किसी ने सख्य, वात्सल्य, शान्त, माधुर्य भावों से भी भक्ति की। किसी ने गुरुरूप में माना तो किसी ने आत्मरूप से भी भगवान् को इन्द्रियों के द्वारा होने वाले विषयज्ञान का उसके साथ सम्बन्ध नहीं बनता उसी प्रकार सुषुप्ति में रहने वाले अज्ञान का भी उसके साथ कोई सम्बन्ध नहीं बनता। माना। जैसा जिसने माना भगवान् ने वैसा ही स्वीकार किया। इसलिए भगवान् तो इसीलिये ज्ञानी के नित्य ज्ञान का विलोप नहीं हो सकता। कुछ भी बनने के लिए तैयार हैं, पर आपको हृदय से बनाना पड़ेगा, मात्र वाणी से **** नहीं। जिज्ञासा :- जिनको केवल परोक्ष ज्ञान हुआ है प्रलय काल में उनकी **** क्या स्थिति होगी? समाधान :- जैसे किसी परोक्ष ज्ञानी को सुषुप्ति आए तो उठने के पश्चात् उसके परोक्ष ज्ञान में कोई अन्तर नहीं पड़ता, उसी प्रकार प्रलय के पश्चात् जब पुनः सृष्टि होगी तब भी उसका परोक्ष ज्ञान बना ही रहेगा। द्रुतस्य भगवद् धर्माद् धारावाहिकतां गता। सर्वेशे मनसो वृतिर्भक्तिरित्यभिधीयते॥(भक्तिरसायन) **** जिज्ञासा :- अभाव को किस इन्द्रिय से जाना जाता है?

भागवत धर्मों का अनुष्ठान करने से द्रवित हुए मन की समाधान :- आपके पास पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और छठा मन है। बहुत से वृत्ति जब सर्वकाल में निरन्तर धारावाहिक रूप से एकमात्र लोग मन को भी इन्द्रिय मानते हैं। इस प्रकार छः ज्ञानेन्द्रियाँ हो गईं। श्रवणेन्द्रिय सर्वेश्वर परमपुरुष परमात्मा को ही विषय करती है तो वही से जो ज्ञान होगा उसे श्रावण ज्ञान कहेंगे, चक्षु से जो ज्ञान होगा उसे चाक्षुष ज्ञान भक्ति कहलाती है। कहेंगे, त्वक् से जो ज्ञान होगा उसे त्वाच ज्ञान कहेंगे, रसना से जो ज्ञान होगा उसे रासन ज्ञान कहेंगे और घ्राण से जो ज्ञान होगा उसे घ्राणज ज्ञान कहेंगे। इसी

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ प्रकार मन से होने वाले ज्ञान को मानस ज्ञान कहते हैं। ज्ञान-चर्चा

नैयायिक लोगों के अनुसार जिस विषय का ज्ञान जिस इन्द्रिय से होता है ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहम्।(१४.२७) जब कहा- प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय .. ।(४.६) उसके अभाव का ज्ञान भी उसी इन्द्रिय से होता है। येनेन्द्रियेण या व्यक्तिर्गृह्यते ऐसी जगह पर ईश्वररूपता के लिये प्रयोग किया है। जहाँ पर अर्जुन को सखा तेनैवेन्द्रियेण तद्गता जाति: तदभावश्च गृह्यते। कहकर पुकारा है वहाँ तो वसुदेव के पुत्ररूप में प्रयोग हुआ है। व्यवहार में यदि इसलिये वे अभाव को भी प्रत्यक्ष प्रमाण का ही विषय मानते हैं। पर मैं शब्द का भेद नहीं करेंगे, मात्र पारमार्थिक अर्थ ही लेंगे तो बड़ी विसंगति हो वेदान्ती और मीमांसक लोग अनुपलब्धि नाम का एक प्रमाण भी मानते हैं। वे जाएगी। किसी ने आपसे पूछा- 'कहाँ से आये', आपने उत्तर दिया- 'आत्मा में कहते हैं - यदि स्यात्तर्हि उपलभ्येत नोपलभ्यतेऽतो नास्ति। यदि होता तो आना-जाना कैसे होगा' तो वह क्या समझेगा! अब भोजन के समय आपको दिखाई देता, नहीं दिखाई दे रहा है तो नहीं है। यह अभाव कैसे जाना जा रहा है? कोई कहे जब आत्मा में आना-जाना नहीं होगा तो खाना-पीना कैसे होगा। अनुपलब्धि प्रमाण से जाना जा रहा है। इसलिये ऐसी जगह पर मैं का अर्थ शरीर ही होता है।

**** **** जिज्ञासा :- शास्त्रों में मन को अन्तःकरण कहा है। ऐसे में मन को शरीर जिज्ञासा :- यह जीव यदि ब्रह्म है तो स्वयं को जानता क्यों नहीं? स्वयं के अन्दर ही रहना चाहिए। पर प्रक्रिया ग्रन्थों में मन की वृत्ति का बाहर जाना को जानने के लिये किसी अन्य की क्यों आवश्यकता है? स्वीकार किया है और अनुभव में भी आता है कि मेरा मन अमुक जगह गया। समाधान :- यह जीव ब्रह्म ही है। यदि यह स्वयं ब्रह्म नहीं होता तो कभी वास्तविकता क्या है? किसी को ब्रह्मज्ञान नहीं हो सकता था। इसलिये कि ब्रह्म किसी का विषय तो बन समाधान :- यद्यपि मन का नाम अन्तःकरण है, फिर भी वह इन्द्रियों के नहीं सकता, हमारे पास जितने साधन हैं उनका विषय ब्रह्म नहीं बन सकता है। माध्यम से बाहर जाता हुआ मालूम पड़ता है। जैसे किसी घट में प्रकाश हो तो परन्तु ऐसा देखा गया है कि महापुरुषों को ब्रह्मज्ञान हुआ है। सभी को इसका ज्ञान वह छिद्रों के माध्यम से बाहर जाता है उसी प्रकार मन को समझ लेना चाहिए। न होने में कारण यह है कि इसके साथ दूसरा मिश्रित हो गया है। शुद्ध मैं के साथ विषय को समझाने के लिये कोई प्रक्रिया तो अपनानी पड़ेगी। कुछ लोग कहते हैं शरीर आ गया। इसी को कहा है - अज्ञानेनावृतं ज्ञानम् (गीता-५.१५)। ज्ञान कि मन की वृत्ति इन्द्रियों के माध्यम से बाहर जाती है और वही विषयाकार बन तो है ही केवल आवृत हुआ है। कैसे आवृत हुआ है? तब कहा - जाती है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि विषय ही अन्दर आता है। इस प्रकार से धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च। समझाने के लिये ये भिन्न-भिन्न प्रक्रियाएं हैं। यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्।। **** आवृतं ज्ञानमेतेन ...... ।(गीता- ३.३८,३६) जिज्ञासा :- भगवद्रीता में भगवान् मैं शब्द का बार-बार जो प्रयोग करते इस प्रकार जो आवरण हुआ है इसी को हटाने का काम वेदान्त करता है। हैं उस मैं का क्या स्वरूप है? कोई ज्ञान कराने का काम वेदान्त नहीं करता। समाधान :- गीता में भगवान् ने अलग-अलग प्रकरण में मैं शब्द का * भूभभ कई बार प्रयोग किया है। इसीलिये उसका अर्थ प्रकरण के अनुसार ही करना जिज्ञासा :- साधनचतुष्टय में वैराग्य को रखा है और फिर षट्सम्पत्ति में चाहिए। कहीं पर तो मैं शब्द का प्रयोग शुद्ध स्वरूप के अर्थ में किया है, जैसे- उपरति को रख दिया। वैराग्य और उपरति में क्या अन्तर है? समाधान :- दोनों में कुछ अन्तर है। वैराग्य विवेक से उत्पन्न होता है। 38 39

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग -३ ज्ञान-चर्चा

विवेक द्वारा बहुत समय तक विचार करने पर वैराग्य उत्पन्न होता है और वह दृढ़ प्रकाश का रंग सिद्ध करना या ज्ञानकाल में त्रिपुटी सिद्ध करना नहीं है। होता है। ** भ* उपरति में ऐसा नहीं होता। किसी घटना के द्वारा, किसी स्थान से मन झट जिज्ञासा :- शास्त्रों में कहा गया है कि आत्मदर्शन अत्यन्त सुलभ है। से हट जाता है। तब व्यक्ति उससे उपराम हो जाता है, उदासीन हो जाता है। यही क्या वास्तव में ऐसा है? हमें तो यह संसार का सबसे कठिन कार्य मालूम पड़ता उपरति है। है। वैराग्य प्रारम्भ में द्वेषज होता है पर विचार करते-करते वह विवेकज हो समाधान :- हाँ! सुलभ तो है परन्तु जगत् में कई चीजें सुलभ होने पर जाता है। अब उस वस्तु के प्रति द्वेष नहीं रहता, उपेक्षा रहती है। पर प्रारम्भ में भी कठिन मालूम पड़ती हैं। मकान बनाना सरल है या छोड़ देना? छोड़ना सरल लक्ष्य के प्रति राग और अलक्ष्य के प्रति द्वेष होता है। तभी वैराग्य पुष्ट होता है। होने पर भी कठिन मालूम पड़ता है। जैसे गृहस्थ के लिये मकान छोड़ना कठिन है उपरति भी द्वेषज ही होती है लेकिन कभी-कभी निमित्त हटने से शान्त भी हो वैसे ही देहाभिमान छोड़ना साधु के लिये भी कठिन हो रहा है। विचार से तो जाती है। निश्चय हो जाता है कि हम चेतन हैं शरीर नहीं, फिर क्यों देहाभिमान करते हो?

**** एक बार याज्ञवल्क्यजी जनक की सभा में आए। मिथिला का जो भी जिज्ञासा :- ज्ञान होने के समय जो अनुभव हुआ उसके विषय में राजा होता था उसका नाम जनक हो जाता था। ज्ञानी-अज्ञानी बहुत से जनक हुए जनकजी ने कहा - "एक ऐसा प्रकाश दिखाई दिया जिसके तेज से बारह सूर्यों के हैं। जनक ने याज्ञवल्क्य से पूछा कि ज्ञान होने में कितना समय लगता है? तेज की तुलना नहीं हो सकती।" उनको प्रकाश दिखाई दिया इससे तो द्रष्टा, याज्ञवल्क्य हँसे और बोले, "अरे! दूसरे को जानना हो तो वहाँ पराधीनता है, दृश्य और दर्शन की त्रिपुटी सिद्ध हो रही है जब कि अन्य शास्त्रों में ज्ञानकाल में उसमें समय लग सकता है पर अपने को जानने में क्या समय लगेगा! फूल को त्रिपुटी का अभाव कहा है। दूसरी शंका यह होती है कि उस प्रकाश का रंग कैसा मसलने में जितना समय लगता है, ज्ञान होने में उतना भी समय नहीं लगता।" था? जनक ने कहा, "हमें ज्ञान करा दीजिए।" याज्ञवल्क्य ने कहा, "ज्ञान तो समाधान :- जनकजी ने उस चैतन्य प्रकाश के विषय में कहा जिसके मैं करा दूँगा लेकिन ज्ञान होने पर तुम ज्ञानी हो जाओगे, तब मैं तुमको कुछ बोल बिना सूर्य प्रकाशित नहीं हो सकता अर्थात् वह सूर्य के प्रकाश का भी कारण है। नहीं सकूँगा। मैं जो ज्ञान कराऊँगा उसकी दक्षिणा मुझे पहले दे दो।" जनक ने जैसे विद्युत के द्वारा अनन्त बल्ब प्रकाशित हो रहे हैं। सभी का केन्द्र विद्युत है। कहा, "आप जो कहें वह दक्षिणा देने को मैं तैयार हूँ।" उन्होंने कहा, "जो कितना बड़ा प्रकाश होगा विद्युत में! पर आप से कोई पूछे कि उस प्रकाश का रंग तुम्हारा हो वह हमको दे दो।" जनक ने कहा, "मैं अपना सारा राज्य आपको कैसा होता है तो आप नहीं बता सकते। अर्पित करता हूँ।" आप घोर अंधकार में बैठे हैं आँखें भी बन्द कर रखीं हैं। उसी समय आप याज्ञवल्क्य बोले, "राज्य में तुम्हारा क्या है? इस राज्य को पहले के मन में एक संकल्प हुआ। आपने उसको जान लिया। वह किस प्रकाश से तुम्हारे पिता कहते थे कि यह मेरा है। उनके साथ तो राज्य गया नहीं, तुम्हारे साथ जाना? उसे चैतन्य प्रकाश की ही महिमा मानना चाहिए। कितना बड़ा होगा वह भी नहीं जाएगा। एक राजा जाता है, दूसरा राजा बनता है, पर राज्य-प्रजा सब प्रकाश? संसार के सम्पूर्ण प्रकाश मिलकर भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते वैसे ही चलते हैं। जो वस्तु तुम्हारी हो वह दो।" अब तो जनक संकट में पड़ क्योंकि वह सब का कारण है। जनकजी के कहने का तात्पर्य इतना मात्र है, किसी गए, बोले, "मैं अपना महल और सम्पूर्ण परिवार आपको सौंपता हूँ।"

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग- ३ ज्ञान-चर्चा याज्ञवल्क्य ने कहा, "इसमें तुम्हारा क्या है? दूसरे की वस्तु देकर क्यों छल करते हो?" जनक ने कहा, "मैं अपना शरीर आपको अर्पित करता हूँ।" उन्होंने दिनरात व्यक्ति इसी चिन्ता में रहता है कि मेरा शरीर कैसा है, स्त्री-पुत्र कहा, "शरीर भी तुम्हारा कहाँ है, वह तो यहीं चिता पर जलने वाला है। तुम्हारे अ:, मानते हैं या नहीं, मेरे पास घोड़ा है, कार है, मकान है, कोई कमी नहीं है। साथ तो जाएगा नहीं। जो तुम्हारी वस्तु हो उसे दो।" अब तो जनक बहुत संकट जन्म से मृत्यु पर्यन्त इसी मीमांसा (विचार) में लगा रहता है, मांस की मीमांसा में में पड़ गए। उन्होंने कुछ देर विचार किया और कहा, "मैं अपना मन आपके लगा रहता है। परन्तु जो इसके प्राणों को चला रहा है - प्राणाधीशम् अन्तर्गतम् चरणों में अर्पित करता हूँ।" तब याज्ञवल्क्य चुप हो गए, कुछ बोले नहीं। अमुम् आत्मानम्, जो इसे अन्दर से सम्भाल रहा है उस आत्मा के विषय में इतने में एक ब्राह्मण सभा में आया और बोला, "महाराज! आपकी जय विचार ही नहीं करता। तुम मनुष्य हो और मैं की जिज्ञासा तुम्हारे अन्दर नहीं हो हो। मैं गरीब ब्राह्मण हूँ, बहुत दूर से आया हूँ। अपनी कन्या के विवाह के लिये रही है तो बड़ा दोष है। आपसे पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ चाहता हूँ।" जनक ने सोचा कि जब मन ही गुरुजी आत्मा है तो अत्यन्तदर्शनगोचरताप्राप्तम्, परन्तु उसकी ओर किसी को दे दिया तो इससे कैसे बोल सकता हूँ? वे चुप रहे। ब्राह्मण कुछ देर तो स्तुति का ध्यान ही नहीं है। इसमें हेतु बताया- दृष्टादृष्टविषयभोगबलाकृष्टचेतस्तया। करता रहा, कोई जवाब न मिलने पर वह नाराज हो गया और राजा को भला-बुरा जगत् के दृष्ट(इस लोक के) और अदृष्ट(परलोक के) भोगों ने इसके चित्त को कहने लगा। तब याज्ञवल्क्य ने मंत्री से कहा, "इस ब्राह्मण को यथेष्ट धन दे खींचकर बाहर फेंक दिया है। इसलिये आत्मा का विचार करने की फुर्सत ही नहीं दो।" मिलती। इस विषय में - अनेकधा मूढ़ा नानुपश्यन्ति, बहुत प्रकार से मोहित अब याज्ञवल्क्य ने जनक से पूछा, "जब उसने पहले तुम्हारी स्तुति और होने के कारण अपने को ही नहीं जान पाते, शरीर को ही मैं मान लेते हैं। कोई बाद में निन्दा की तब तुम्हें कैसा लगा?" जनक ने कहा, "जब मैंने अपना मन थोड़ा विचार करता है तो सूक्ष्म शरीर को मैं समझता है। कोई कहता है सबका ही आपको अर्पित कर दिया तो निन्दा-स्तुति किसे लगनी है?" याज्ञवल्क्य आत्मा एक कैसे हो सकता है, अलग-अलग होगा। भाष्यकार भगवान् कहते हैं बोले, "बस! यही ज्ञान है। मन सहित जितना कुछ अपना था वह सब तुमने - अहो! कष्ट वर्तते बड़ा भारी कष्ट है कि इतना सरल होने पर भी मनुष्य छोड़ दिया, यही ज्ञान है। इसको हमेशा ध्यान रखना। अब तुम मेरी आज्ञा से आत्मदर्शन के लिये प्रयास नहीं करता। जगत् की ओर खिंचाव इसे कठिन बना राज्य का शासन करो।" देता है। इसीलिये भगवान् भाष्यकार ने ज्ञान को सरल कहा क्योंकि अपने को ही **** जानना है। परन्तु जब तक प्राणी मोहाविष्ट है तब तक दुनिया भर का इतिहास पढ़ेगा, सब कुछ जानना चाहेगा, बस! अपने को जानने की बात ही मन में नहीं जिज्ञासा :- ज्ञानयोग क्या है? उसका अनुशीलन किस प्रकार करना

आती। भगवान् भाष्यकार बड़े दुःख से कहते हैं- चाहिए?

देहस्त्रीपुत्रमित्रानुचरहयवृषास्तोषहेतुर्ममेत्थं समाधान :- वैसे तो शास्त्रों में बहुत से योगों की चर्चा है, परन्तु

सर्वे स्वायुर्नयन्ति प्रथितमलममी मांसमीमांसयेह। परम्परागत रूप से दो ही योग मुख्य हैं। ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन

एते जीवन्ति येन व्यवहृतिपटवो येन सौभाग्यभाज- योगिनाम्।(गीता- ३.३) जब आप मोक्षप्राप्ति के लिये वेदान्त में कहे गए ज्ञान

स्तं प्राणाधीशमन्तर्गतममृतममुं नैव मीमांसयन्ति।।(शतश्लोकी-५) का श्रवणादिपूर्वक अभ्यास करते हैं तो इसे ज्ञानयोग कहते हैं। परन्तु इसके अनुशीलन के लिये एक योग्यता की अपेक्षा होती है। इसके लिये भगवान् ने

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग- ३ ज्ञान-चर्चा गीता में बताया कि अपने कर्म को योग बनाओ। अपने कर्म को भगवान् से जोड़ो, जगत् से नहीं। भगवान् की आज्ञा का पालन समझ कर कर्म करो। दूसरी अपरा। अव्यक्त, महत्त्त्व, अहंकार और पञ्चतन्मात्राएँ यह सब मिलकर अपरा प्रकृति है। इसी से पञ्चभूतों और सभी प्राणियों की सृष्टि होती है, परन्तु यह स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।(गीता-१८.४६) अपरा प्रकृति जीव के बिना सृष्टि नहीं कर सकती। तेरहवें अध्याय में भगवान् ने अपने कर्मों के द्वारा भगवान् की आराधना करने से सिद्धि प्राप्त होगी। अपरा प्रकृति को क्षेत्र नाम से कहा और जीव को क्षेत्रज्ञ बताया। आगे कहा - यहाँ सिद्धि का अर्थ ज्ञानप्राप्ति की योग्यता है, कुछ और नहीं। तुम्हारा यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्। अन्तःकरण शुद्ध होकर तुम्हें ज्ञानयोग का अधिकार प्राप्त हो जाएगा। जब तक क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् तद्विद्धि भरतर्षभ।। (१३.२६) मन शुद्ध और एकाग्र नहीं है तब तक ज्ञानयोग में प्रवेश नहीं होता। ज्ञानयोग में संसार में जितने भी चर और अचर पदार्थ उत्पन्न होते हैं, वे क्षेत्र (अपरा जाने का सर्टिफिकेट है - साधनचतुष्टय-सम्पन्नता। अब कहो, क्या इसके प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (जीव) के संयोग से ही उत्पन्न होते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि पहले ज्ञान की चर्चा भी नहीं कर सकते? अरे! जिस चर्चा से जीवन न बने उस सृष्टि में हेतु क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ संयोग ही है। जीव संज्ञा भी उपाधि से युक्त चेतन की ही चर्चा से क्या फायदा है। है क्योंकि उपाधि को छोड़ दें तो जीव संज्ञा ही नहीं रहेगी। इस उपाधि में यदि तुम्हारे पास योग्यता है, साध्य-साधन-एषणा का परित्याग हो गया अभिव्यक्त चेतना को लेकर ही सृष्टि होती है। सम्पूर्ण प्राणियों में प्राणधारण भी है तो तुम्हारा यही कर्तव्य है कि बाह्यकर्मों से शान्त हो जाओ। उपनिषद्, गीता, इस जीव को लेकर ही होता है, अतः बिना जीव के केवल जड़ प्रकृति सृष्टि नहीं ब्रह्मसूत्र आदि ग्रन्थों का श्रवण करो। श्रवण भी ऐसे महापुरुषों से करो जिन्होंने कर सकती। चेतन होने के कारण जीव अपरा प्रकृति से श्रेष्ठ अर्थात् पर है। इसी गीता को, उपनिषद् को जीवन में पचा लिया है। उस सुने हुए के मनन और दृष्टि से गीता में जीव को परा प्रकृति कहा गया है। निदिध्यासन में लग जाओ, यही तुम्हारा कर्तव्य है। तब तुम्हें उस ज्ञान की **** अनुभूति हो जाएगी जिससे सर्व संशय निवृत्त हो जाते हैं। पर यह बात ध्यान रखने की है कि योग्यता से पहले श्रवण करके तुम परोक्ष ज्ञान प्राप्त कर सकते हो, जो बुद्धि का वैभव होगा, जीवन नहीं बना सकता। उस ज्ञान का प्रवचन करके तुम पैसा कमा सकते हो, यश कमा सकते हो, लाखों लोगों को भक्त भी बना सकते हो। इसमें कोई बाधा नहीं आएगी। पर यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत्। अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥ तुम ज्ञानयोगी नहीं बन सकते। ज्ञान सीख लेना अलग बात है और ज्ञानयोगी (श्वेताश्वतर उप .- २.१५) बनना अलग है। तुम क्रोध पर बोल सकते हो पर उसे जीत नहीं सकते। योगी उसे जिस अवस्था में ज्ञानयोगी अपने प्रकाश स्वरूप आत्मा से जीत लेता है। ब्रह्म का साक्षात्कार करता है अर्थात् परमात्मा को आत्मरूप से जान लेता है, उस समय अजन्मा, अच्युत, अविद्या और उसके **** जिज्ञासा :- गीता में जीव को परा प्रकृति क्यों कहा है? कार्यों से असंस्पृष्ट स्वयंप्रकाश परमात्मा को जानकर अविद्या आदि सम्पूर्ण पाशों से मुक्त हो जाता है। समाधान :- गीता में भगवान् ने दो प्रकृतियाँ बताई हैं - एक परा और

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वेदान्त योगवासिष्ठ में कहा है - चित्तं चिदिति जानीयात्। यहाँ चित्त को चैतन्य बताया है। यथार्थ में मन का क्या स्वरूप है?

वेदान्त समाधान :- केवल छान्दोग्योपनिषद् में ही नहीं, प्रकरण ग्रन्थों में भी मन को सूक्ष्म पञ्चमहाभूतों का कार्य बताया है। पृथक-पृथक महाभूत के

जिज्ञासा :- व्यष्टि का सम्बन्ध समष्टि से जोड़ने की क्या प्रक्रिया सात्त्विक अंश से पञ्चज्ञानेन्द्रियों की उत्पत्ति और सभी के सात्त्विक अंश को

है? मिलाकर मन की उत्पत्ति बताई है। इसी प्रकार पृथक-पृथक महाभूत के रजोगुण अंश से पञ्चकर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति और सब को मिलकर प्राण की उत्पत्ति बताई समाधान :- व्यष्टि का सम्बन्ध समष्टि के साथ पहले से ही है, है। मात्र इसे समझना है। समष्टि उपाधि की अंशभूता उपाधि का नाम व्यष्टि उपाधि है। जैसे समष्टि उपाधि पंचमहाभूत की अंशभूता व्यष्टि उपाधि योगवासिष्ठ में जो कहा है- चित्तं चिदिति जानीयात् तकाररहितं यदा। तकारो विषयाध्यासो जपारागो यथा मणौ।। आपका यह पाञ्चभौतिक कार्यरूप स्थूल शरीर है। जैसे मिट्टी के घड़ों में मिट्टी व्यष्टि रूप है और सम्पूर्ण पृथ्वी की मिट्टी समष्टि रूप है। कहने का चित्त जब तकार से रहित होता है तो चैतन्य स्वरूप ही हो जाता है। यहाँ

तात्पर्य है कि सम्बन्ध का ज्ञान ही करना है, सम्बन्ध तो है ही। इसलिये पर विषयाध्यास ही तकार है। विचार कीजिए कि मन यदि कोई संकल्प नहीं कर

कहा- वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् (छान्दो.उप .- रहा हो उस समय उसका स्वरूप चैतन्य के अतिरिक्त क्या होगा? मन ही नहीं,

६.१.४) मिट्टी और घड़े में शब्द के अतिरिक्त भेद कहाँ है। इस प्रकार की सम्पूर्ण विश्व ही कल्पित है। अब कल्पित वस्तु का अधिष्ठान के अतिरिक्त क्या

समझ हो जाए तो समष्टि के अतिरिक्त व्यष्टि का कोई अस्तित्व ही नहीं स्वरूप होगा। अधिष्ठान तो सभी का चैतन्य ही है। इसलिये मन का पृथक्

रहता, पर भ्रम से भेद मालूम पड़ता है। विद्युत को भूलकर बल्ब अहंकार अस्तित्व तभी तक मालूम पड़ता है जब तक उसका विषयों के साथ सम्बन्ध

करे कि मैं प्रकाश कर रहा हूँ तो वह अहंकार मिथ्या ही होता है। इसी प्रकार रहता है। मन विषयसम्बन्ध से रहित हुआ कि अधिष्ठानरूप चैतन्य ही रह जाएगा।

शरीर से लेकर अन्तःकरण तक व्यवहार हो रहा है। आप सोचते हैं कि मैं मन को भौतिक मानें तो भी कोई विरोध नहीं क्योंकि प्रत्येक भौतिक पदार्थ का अधिष्ठान भी चैतन्य ही है। कर रहा हूँ पर सचाई तो यह है कि तुम्हारा हृदय, तुम्हारा प्राण कोई दूसरा ही **** चला रहा है, तुम क्या क, सकते हो? पर देखो अहंकार कितना है। जिज्ञासा :- अन्नमयं हि सोम्य मनः।(छान्दो.उप .- ६.५.४) यहाँ पर मन इसी प्रकार अपञ्चीकृत पञ्चमहाभूत का अभिमानी हिरण्यगर्भ समष्टि होता है और अपञ्चोकृत पञ्चमहाभूत के कार्य सूक्ष्म शरीर के अभिमानी हम का उपादान कारण अन्न को क्यों बताया है?

व्यष्टि हैं। इस प्रकार का विचार पक्का करना है। कोई नया सम्बन्ध स्थापित समाधान :- यहाँ पर अन्न को मन की उत्पत्ति में हेतु नहीं कहा है बल्कि उसके पोषण में हेतु बताया है। अन्नमशितं त्रेधा विधीयते।(छान्दो.उप .- करना नहीं है। ६.५.१) जो अन्न हम भोजन करते हैं वह तीन भागों में विभाजित हो जाता **** है। एक मल-मूत्र के रूप में बाहर निकल जाता है दूसरा रसादि क्रम से जिज्ञासा :- छान्दोग्योपनिषद् में मन को पाञ्चभौतिक कहा है और सप्तधातु बनकर स्थूल शरीर का पोषण करता है। तीसरा जो ऊर्जा भाग है

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ वेदान्त वह मन-इन्द्रिय में जाकर सूक्ष्म शरीर का पोषण करता है। इसलिये अन्न ग्रहण न करने पर मन कमजोर मालूम पड़ता है। नहीं किया वह मोक्षार्थी नहीं हो सकता। वेदान्त के तात्पर्य को तो मोक्षार्थी ही समझ सकता है। यहाँ पर संन्यास का मतलब लिङ्ग (गैरिकादि वस्त्र तथा इसी बात को दृष्टि में रखकर मैं बार-बार कहता हूँ कि भोजन के शिखा-सूत्र का त्याग) से नहीं है। जिसने एषणात्रय त्याग किया है वही समय प्रत्येक ग्रास में मंत्र की व्याप्ति करें। इससे उसका ऊर्जा भाग संन्यासी है। उसे परोक्ष ज्ञान है और वह अपरोक्ष का प्रयत्न कर रहा है। अतः संस्कारित होकर मन को शुद्ध करेगा। यह एक विज्ञान है। शरीर छूटने पर वह ब्रह्मलोक में जाकर मुक्त हो जाता है। **** (टिप्पणी :- यद्यपि भगवान् भाष्यकार ने इस मन्त्र का अर्थ सद्योमुक्तिपरक जिज्ञासा :- किया है, परन्तु कैवल्योपनिषद् में भी यह मन्त्र उपलब्ध होता है। दीपिका वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वा:। टीका में उसकी व्याख्या करते समय स्वामी शंकरानन्दजी ने परोक्ष ज्ञानी की ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे।। ब्रह्मलोक में मुक्ति होती है ऐसा अर्थ किया है। पञ्चदशी के ध्यानदीप प्रकरण

(मुण्ड.उप .- ३.२.६) के श्लोक ५२ में स्वामी विद्यारण्यजी ने भी इस मन्त्र को परोक्ष ज्ञानी की यहाँ कहा है - "संन्यासयोग के द्वारा शुद्ध अंतःकरण वाले क्रममुक्ति में प्रमाणरूप से उद्धृत किया है। अतः यहाँ दिये गये समाधान को ब्रह्मलोक में मुक्त हो जाते हैं।" क्या संन्यास के बिना ब्रह्मलोक में गये लोग दीपिका टीका के अनुसार समझना चाहिए।) लौट आते हैं? ****

समाधान :- इस मंत्र का तात्पर्य है वेदान्त-विज्ञान के द्वारा जिन्होंने जिज्ञासा :- क्या वेदान्त-चिन्तन के लिये भी आसनसिद्धि की अर्थ का निश्चय कर रखा है, संन्यास के द्वारा जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो आवश्यकता है? गया है वे साधक ब्रह्मलोक में जाकर निवास करते हैं और महाप्रलय के समाधान :- किसी भी आसन में तीन या इससे अधिक घण्टे तक समय जब सृष्टि का विलय होता है तब ब्रह्माजी के साथ मुक्त हो जाते हैं। बिना किसी कष्ट के सहजता से बैठने का यदि आपका अभ्यास है तो समझो ब्रह्मलोक में तो अनेक साधनों से बहुत लोग जाते हैं। उनमें से आपका आसन सिद्ध है। यदि आपका आसन सिद्ध है तो वेदान्त-चिन्तन में जिनको यहाँ परोक्ष ज्ञान हुआ है वे लौट कर नहीं आते, उनको वहाँ अपरोक्ष बहुत लाभ होगा। शरीर की स्थिरता का मन तथा प्राण के साथ सम्बन्ध ज्ञान हो जाता है। जो ो या पञ्चाग्नि उपासक वहाँ जाते हैं उनमें तो परोक्ष होता है। इससे प्राण सूक्ष्म होगा और मन स्थिर होगा जिससे ध्यान धारणा ज्ञान का संस्कार नहों है, इसलिये वे लौट आते हैं। प्रश्न यह होता है कि इत्यादि में बहुत लाभ होगा। यहाँ परोक्ष ज्ञान किसको होगा? तब कहा - संन्यासयोगात् - संन्यासयोग **** से परोक्ष ज्ञान होगा। संन्यास के बिना व्यक्ति श्रवण कैसे करेगा। संयमित जिज्ञासा :- अथातो ब्रह्मजिज्ञासा(ब्रह्मसूत्र-१.१) का अर्थ नहीं होगा तो वह अपने चित्त का शत-प्रतिशत भाग श्रवण में नहीं लगा करते समय कुछ लोग कहते हैं -"साधनचतुष्टयसम्पन्नता के पश्चात् ही सकेगा, इससे वह वेदान्त के तात्पर्य को धारण करने में समर्थ नहीं होगा। ब्रह्मजिज्ञासा करनी चाहिए"। क्या अपेक्षित योग्यता के पहले ब्रह्मजिज्ञासा इसलिये उसे परोक्ष ज्ञान होना सम्भव नहीं है। जिसने एषणात्रय का परित्याग करना अनुचित है?

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ वेदान्त समाधान :- जिज्ञासा शब्द का अर्थ है जानने की इच्छा। इस सूत्र की व्याख्या करते समय बहुत विद्वानों ने जिज्ञासा शब्द का जो अर्थ प्रसिद्ध दिखता जगत् है पर वेदान्ती लोग कहते हैं - "यह जगत् वस्तुतः अधिष्ठान है वही किया है। इसलिये भामतीकार कहते हैं "साधनचतुष्टय सम्पन्नता के चैतन्य स्वरूप ही है।" यहाँ पर जगत् का बाध कर चैतन्य अधिष्ठान को ही बाद ही साधक में ब्रह्मजिज्ञासा होती है।" जिसे भूख ही नहीं है वह भोजन देख रहे हैं। इसलिये यहाँ बाध सामानाधिकरण्य कहा है। कैसे पाएगा? इसी विषय में विवरणकार कहते हैं - "साधनचतुष्टय - जीव को जगत् के समान कल्पित नहीं कहा बल्कि उसे ब्रह्म की ही सम्पन्नता के अनन्तर ही ब्रह्म को जानने के लिये विचार करना चाहिए। तभी एक औपाधिक संज्ञा बताया है। जैसे ईश्वर, हिरण्यगर्भ, विराट् हैं वैसे ही वह विचार फलीभूत होगा।" यहाँ पर जिज्ञासा का अर्थ विचार किया है। जीव भी ब्रह्मरूप है। अतः उसका बाध नहीं होता। इसलिये इसका ब्रह्म के इसलिये उन्होंने कहा - 'साधनचतुष्टयसम्पन्नता के पहले यदि कोई विचार साथ मुख्य सामानाधिकरण्य बताया है। करेगा तो वह अनुचित होगा। उसका विचार फलपर्यावसायी नहीं होगा **** अर्थात् वह ज्ञान प्राप्ति में हेतु नहीं बनेगा।' जिज्ञासा :- वेदान्त में पद-पदार्थ के ज्ञान पर विशेष बल दिया ब्रह्म को जानने की इच्छा भले ही किसी में किसी अन्य साधन से जाता है। यहाँ पर पदार्थ ज्ञान का क्या तात्पर्य है? उत्पन्न हो गई पर विचार के लिये तो साधनचतुष्टयसम्पन्नता होनी ही चाहिए। समाधान :- वेदान्त दर्शन का एक ही लक्ष्य है - आत्मदर्शन। कोई साधक आत्मदर्शन का जिज्ञासु है तो सर्वप्रथम उसको आत्मा के स्वरूप का **** जिज्ञासा :- जीव का ब्रह्म के साथ मुख्य सामानाधिकरण्य बताया निर्धारण करना पड़ेगा। वह शास्त्र से ही होगा। जगत् प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा गया है वहीं जगत् का बाध सामानाधिकरण्य बताया है। जब जीव और है तो इसके विषय में निर्धारित करना पड़ेगा कि यह माया से ही दिखाई दे जगत् दोनों ही कल्पित है तो उनका ब्रह्म के साथ सामानाधिकरण्य भिन्न- रहा है। उस माया का क्या लक्षण है, यह जानना पड़ेगा। वह किसके आश्रय भिन्न क्यों कहा है? रहती है? ईश्वर के आश्रय ही रहती है। उस ईश्वर का लक्षण क्या है? यह

समाधान :- इसके लिये पहले इन शब्दों का अर्थ जान लेना भी शास्त्र से ही जानना पड़ेगा। इसी प्रकार जीव का क्या लक्षण है, क्षेत्र का

चाहिए। मुख्य सामानाधिकरण्य किसे कहते हैं? जैसे राजा दशरथ, यहाँ क्या लक्षण है, क्षेत्रज्ञ का क्या लक्षण है? इन सारे पदों के जो अर्थ हैं, हमें पर राजा और दशरथ दोनों भिन्न-भिन्न पद होते हुए भी एक ही वस्तु को अपने साध्य तक पहुँचाने वाली प्रक्रिया के उपयोग में आने वाले पदों के कहते हैं। इसलिये इन दोनों का मुख्य सामानाधिकरण्य है। यहाँ पर समान जो अर्थ हैं, उनका ज्ञान शास्त्र से ही होगा। उन अर्थों को सामान्यतः विभक्ति वाले दोनों पदों में से किसी एक का बाध नहीं करना है। बाध जानकर फिर उनका संशयरहित ज्ञान करना ही पद-पदार्थ का ज्ञान प्राप्त सामानाधिकरण्य इससे भिन्न है। जैसे किसी ने कहा-"अयं सर्पो रज्जुः, जो करना है। इसे परोक्ष ज्ञान भी कहते हैं। सर्प दिखाई दे रहा है वह रज्जु है।" वहाँ आप सर्प को हटाकर रज्जु को ही जिज्ञासा :- वेदान्त प्रक्रिया में त्वम् पदार्थ के शोधन की देखते हैं। जब समान विभक्ति वाले दोनों पदों में से एक का बाध करके अनिवार्यता तो समझ में आती है। तत् पदार्थ के शोधन की अनिवार्यता दूसरे को देखा जाता है, उसे बाध सामानाधिकरण्य कहते हैं। यहाँ पर क्यों है? समाधान :- त्वम् पदार्थ (जीव) की उपाधि जो अविद्या है वह तत्

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ वेदान्त पदार्थ (ईश्वर) की उपाधि माया की अंशभूता है। इसलिये त्वम् पदार्थ को तत् पदार्थ का अंश समझना चाहिए। मूल में उपाधि का यदि शोधन नहीं रूप में नहीं। साधन की उपयोगिता तब तक है जब तक साध्य की प्राप्ति नहीं होगा तो उतनी कमी रह जाएगी। उससे आप सांख्य के पुरुषतत्त्व तक होती। साध्य की प्राप्ति होने पर साधन व्यर्थ हो जाता है। पहुँचेंगे। वेदान्त के ज्ञान को प्राप्त नहीं कर पाएंगे। इसलिये वेदान्त में त्वम् दूसरी बात परमेश्वर के जिस नाम-रूप की हम बात करते हैं उसका पदार्थ के शोधन के साथ-साथ तत् पदार्थ के शोधन को भी अनिवार्य वह नाम-रूप विशेष तो है नहीं। विशेष होता तो एक ही होता। परन्तु ऐसा बताया है। नहीं है। उसके अनन्त नाम हैं, अनन्त रूप हैं। आप किसी एक को आधार बनाकर उसे प्राप्त कर सकते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि सभी नाम-रूपों से **** जिज्ञासा :- वेदान्त में नाम-रूप को मिथ्या कहा है। ऐसे में वही एक गृहीत हो रहा है। यही नाम-रूप का मिथ्यात्व है। यहाँ ऐसा नहीं भगवत्नाम भी मिथ्या हो जाएगा। परन्तु भक्तिदर्शन के ग्रन्थों में नाम की बहुत समझना कि इससे नाम-रूप के साधनत्व में कमी आ जाएगी। अतः यहाँ महिमा बताई है - कलौ तद्धरिकीर्तनात्।(भागवत-१२.३.५२) समर्थ तात्पर्य नाम-रूप की उपेक्षा में नहीं है। जब सत्य की परिभाषा की जाती है- श्री रामदासजी ने भी कहा है - "सिद्ध पद पर बैठ कर जो भगवन्नाम का जिसका तीनों काल में बाध नहीं होता वही सत्य है त्रिकालाबाध्यत्वं निरादर करता है वह सिद्ध नहीं गँवार है।" ऐसे में किसको सत्य मानें? सत्यत्वम्, तब कहना पड़ता है कि यह नाम और रूप बनने और मिटने वाले अर्थात् बाधित होने से मिथ्या हैं। यह सब कहने पर भी इनका आधार समाधान :- वेदान्त मानता है कि जिसकी उत्पत्ति होती है उसका कमजोर नहीं हो जाता। नाश होता है। नाम-रूप की उत्पत्ति हुई है इसलिये ये नाशवान् हैं। जहाँ पर इनकी महिमा की बात आई है वह अलग प्रसंग है। बृहदारण्यक उपनिषद् के उपनिषद् कहती है - इदम् अग्रे आसीत्। इदम् का अर्थ है यह 'याज्ञवल्क्य और जारत्कारव आर्तभाग संवाद' में एक आख्यान है। जब नाम-रूप वाला जगत्। यह जगत् सृष्टि के पहले भी था परन्तु इस रूप में ज्ञान का प्रसंग आया तो याज्ञवल्क्य ने कहा चलो एकान्त में बात करेंगे। नहीं ब्रह्मरूप में, आत्मरूप में, सद्रूप में था। इसके अस्तित्व का अपलाप (निषेध) नहीं हुआ, नाम-रूप का अपलाप हुआ है। इसलिये नाम-रूप का हाथ पकड़कर एकान्त में ले गए, ज्ञान चर्चा किये और कहा- देखो! यह मूल वह तत्त्व ही हुआ। मन्त्र प्रकरण में मन्त्र को पहले शब्दरूप, फिर चर्चा सभा में करने लायक नहीं है। सभा में तो कर्म की ही प्रशंसा करनी है, चित्तरूप और अन्तिम में चैतन्यस्वरूप कहा। इसके बिना उसमें शक्ति कहाँ नहीं तो लोग कर्म करना ही छोड़ देंगे। ऐसा करने पर वे आगे नहीं बढ़ से आएगी। नाम-रूप को मिथ्या कहने में विवाद तब होता है जब हम पाएंगे। उसका अर्थ गलत समझ लेते हैं। मिथ्या शब्द का अर्थ है - व्यावहारिक है, इसीप्रकार ज्ञान प्रसंग में नाम-रूप को मिथ्या कह कर भक्ति के प्रसंग पारमार्थिक नहीं। इसलिये कहते हैं जगत् व्यावहारिक है, पारमार्थिक नहीं। में उसकी प्रशंसा की है, तो विरोध नहीं है। तुलसीदासजी कहते हैं-मोरें व्यवहार में इस शरीर का जो नाम है वही बोलना पड़ेगा। किसी ने मत बड़ नाम दूहु तें। (मानस बाल .- २२.१) यहाँ पर नाम को सगुण- जाति पूछी तो जाति बतानी पड़ेगी। सारा व्यवहार इसी से करना पड़ता है। निर्गुण परमात्मा से बढ़कर बताया है। नामदेवजी ने कहा, जिसने नाम का यह भी सत्य है कि तुम किसी प्रकार से शरीर नहीं हो सकते, पर सारा आधार लिया वही सुखी है - सो सुखिया जो नाम आधारा। यहाँ पर व्यवहार मिथ्या प्रतीति को लेकर ही हो रहा है। इसलिये इसे व्यावहारिक समझने की बात है कि नाम को हम साधन के रूप में ग्रहण करते हैं साध्य के सत्य कहें तो कोई आपत्ति नहीं। जब नाम-रूप का जगत् से सम्बन्ध होता है 52 53

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ वेदान्त तो ये हमें जगत् में ही रखते हैं और भगवान् से सम्बन्धित होने पर भगवान आदि सत्तावान् हो रहे हैं। वह घट, पट से अतिरिक्त है तथा विशिष्ट नहीं बन की तरफ ले जाते हैं। परमतत्त्व की प्राप्ति के लिये नाम-रूप को उत्कृष्ट पाती इसलिये आप उसे ग्रहण नहीं कर पाते। वही आत्मसत्ता है। इसी प्रकार व्यावहारिक साधन समझना चाहिए। इसीलिये नाम की महिमा कही है। चैतन्यता में भी समझना चाहिए। चिद् कहने से अभिव्यक्त चेतन को ही नाम का उस मूल तत्त्व से किस प्रकार सम्बन्ध बनता है इसमें भी समझते हैं, अन्तःकरण में प्रतिफलित विशिष्ट चेतन को समझ लेते हैं। पर एक रहस्य है। जैसे आपने गौ शब्द सुना, इसे सुनकर आपके मन में एक ऐसा नहीं है। वह अभिव्यक्त चेतन नहीं है, इससे उसकी तुलना नहीं कर विशेष अर्थाकार(पिण्डाकार) वृत्ति बनती है। यह मानना पड़ेगा कि गौ सकते। बल्ब के प्रकाश से विद्युत में रहने वाले प्रकाश की तुलना नहीं कर शब्द से उसके अर्थ का घनिष्ठ सम्बन्ध है। कोई शंका करे कि गौ को हमने सकते। ऐसे ही आनन्द के विषय में समझना चाहिए। लोगों को जो आनन्द देखा है, ईश्वर को तो देखा नहीं। उसके आकार की वृत्ति कैसे बनेगी। ठीक की अनुभूति होती है वह आनन्दमय कोष की है। ऐसे में मूल को कैसे है! मान लो किसी ने अमेरिका के राष्ट्रपति को देखा नहीं है। उसके विषय में समझेंगे। मूल तो लक्षणावृत्ति से उपलक्षित हो सकता है। इन शब्दों के अर्थ पढ़ा-सुना है। उस व्यक्ति के सामने कोई अमेरिका के राष्ट्रपति के नाम का को समझे बिना सत्, चित्, आनन्द(सच्चिदानन्द) समझ में नहीं आएगा, उच्चारण करेगा तो उसके अन्दर एक अर्थाकार वृत्ति बनेगी। इसमें क्या हेतु क्योंकि हमारे अन्दर जो व्यवहार का संस्कार है वह इनमें घटेगा नहीं। ऐसे है? वहाँ यही मानना पड़ता है कि उस नाम के साथ उस अर्थ का घनिष्ठ में शंका होना स्वाभाविक है। सम्बन्ध है। **** इसी प्रकार जब हम भगवन्नाम लेंगे तब भगवान् के विषय में जो जिज्ञासा :- चरमवृत्ति क्या है? यह प्राप्त होने पर तत्त्वज्ञान के लिये हमारा ज्ञान है कि वह जगत् की उत्पत्ति, पालन तथा संहार करने वाला है, क्या कर्तव्य है? तदाकार वृत्ति हमारे मन में बनेगी। वह हमें मूल कारण में ले जाएगी। इससे समाधान :- मन किसी विशिष्ट पदार्थ को न पकड़े और निद्रा में भी कार्यरूपी जगत् की सत्यता का संस्कार दूर हो जाएगा। यही नाम में न जाए, कल्पना कीजिए उस समय मन का क्या स्वरूप होगा। मन तो रहेगा विलक्षणता है। इसलिये गोस्वामीजी कहते हैं, भगवान् का नाम लेते ही पर वह व्यापक हो जाएगा, आत्मरूप हो जाएगा। इसे वृत्तिव्याप्ति कहते हैं, संसार सागर सूख जाता है- नाम लेत भवसिंधु सुखाहीं। (मानस बाल .- यही चरमवृत्ति है। इससे बड़ी कोई वृत्ति नहीं बनती। सविशेषवृत्ति चाहे २४.२) मैं बार-बार कहता हूँ कि दो अलग-अलग प्रसंगों में कही गई जितनी बड़ी हो, उससे बड़ी भी वृत्ति बन सकती है। पर मन यदि निर्विशेष बातों में विरोध मानकर विवाद नहीं करना चाहिए। हो गया तो उससे बड़ी कोई वृत्ति नहीं बनेगी। इसलिये इसे चरमवृत्ति कहते **** हैं। यहाँ तक पुरुषार्थ है इससे आगे कोई पुरुषार्थ नहीं। चरमवृत्ति आवरण जिज्ञासा :- आत्मा का लक्षण सच्चिदानन्द कहा है। ऐसे में वह को भंग कर देती है। तत्त्व तो स्वयंप्रकाश है। अतः तत्त्वज्ञान स्वतः हो जाता निर्गुण कैसे हो सकता है? है। समाधान :- सच्चिदानन्द का अर्थ आप नहीं समझे इसलिये यह **** शंका हो रही है। सत् का तात्पर्य लोक में प्रसिद्ध है - सत्ता गुण से युक्त। जिज्ञासा :- वेदान्त में ब्रह्म को व्यापक कहा है और ऐसा भी कहा है जैसे घट की सत्ता, पट की सत्ता। पर एक सत्ता ऐसी है कि जिससे घट, पट 55 54

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ कि ब्रह्माकारवृत्ति बनती है। क्या वृत्ति भी इतनी व्यापक हो सकती है ज वेदान्त व्यापक ब्रह्म को पकड़ ले? प्रज्ञान मानते हैं। ऐसा प्रज्ञान सबको सत्ता नहीं दे सकता। समाधान :- जब आप कहते हैं कि वृत्ति जगदाकार है तब क्या आ **** शंका करते हैं कि वृत्ति जगत् के आकारवाली कैसे हो सकती है! वेदान्त े जिज्ञासा :- वेद, पुराण और स्मृति को अविद्यावस्था में ही प्रमाण ब्रह्माकारवृत्ति कहने का तात्पर्य अखण्डाकारवृत्ति से है। अर्था बताया गया है। इसका क्या तात्पर्य है? संसर्गानवगाही बोध - धर्म, धर्मी तथा उनका सम्बन्ध इन तीनों के भान से समाधान :- शांकर भाष्य में कहा है और युक्ति के द्वारा भी समझ में रहित केवल विशुद्ध का भान होना ही ब्रह्माकारवृत्ति है। विशिष्ट वृत्तियों क आता है कि तत्त्वज्ञान होने पर इनकी कोई आवश्यकता नहीं रहती। जब वहाँ अभाव होने पर वृत्ति अपने अधिष्ठान में लीन हो जाती है, तब उसे कोई कर्तव्य नहीं, विधि नहीं, निषेध नहीं, तो इनके उपदेश की भी ब्रह्माकारवृत्ति कहते हैं। ब्रह्माकारवृत्ति का तात्पर्य यह नहीं समझना चाहि आवश्यकता नहीं। तत्त्वज्ञान अविद्या के नाश होने पर ही होता है। इसलिये कि वह ब्रह्म को गृहीत करती है या ब्रह्म उसमें समाहित हो जाता है। उनकी उपयोगिता अविद्यावस्था में ही समझनी चाहिए। **** **** जिज्ञासा :- उपनिषद् में आता है कि प्रज्ञान के अतिरिक्त कोई वस्तु जिज्ञासा :- क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।(गीता- नहीं है। यहाँ पर प्रज्ञान का क्या तात्पर्य है? १५.१६) यहाँ अक्षर शब्द का क्या तात्पर्य है? समाधान :- वेदान्त को समझते समय एक बात सिद्धान्त के रूप में समाधान :- इससे पहले कहा - द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि सारी सृष्टि के मूल में एक सत्ता है। वह एव च। बाद में कहा - ... उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः। (१७) यहाँ पर क्षर और चेतन है। उसी से जगत् को सत्ता मिल रही है क्योंकि दूसरी सत्ता तो कोई है अक्षर इन दोनों को पुरुष कहा। फिर कहा इन दोनों से एक अन्य है। वह है नहीं। इसलिये जगत् के प्रति जो सत् के संस्कार पड़े हैं उनको निकाल देना पुरुषोत्तम। क्षर क्या है? सभी भूतजात को क्षर कहा। अक्षर क्या है? तब चाहिए और यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि जिससे सबको सत्ता मिल रही है कहा - कूटस्थोऽक्षर उच्यते। कूटस्थ के विषय में मतभेद है। कुछ लोग वह सत् है। कूटस्थ का अर्थ कारण(अविद्या) करते हैं तो कुछ लोग जीवात्मा मानते हैं। जिस चेतन से सबको चेतनता मिल रही है वह चेतन है। वहाँ तो भाष्यकार भगवान् ने कूटस्थ का अर्थ अविद्या ही माना है। इसलिये यही जगत् के समान सत् और चेतन का विभाग भी नहीं है। इसलिये एक वही उचित लगता है। पुरुषोत्तम के अर्थ में तो कोई विवाद नहीं है। वह तो सभी सत् है, वही चेतन है। यहाँ जो विभाग दिखते हैं वे तो प्रतिफलन को लेकर ने परमात्मा को ही माना है। दिखाई देते हैं। वह जो सत्ता है उसे ही प्रज्ञान कहते हैं। उसमें ही सम्पूर्ण ** भभ जगत् कल्पित है। अब अधिष्ठान से अतिरिक्त कल्पित को खोजो तो नहीं जिज्ञासा :- कठोपनिषद् में तद् विष्णोः परमं पदम्(१.३.६) इन मिलेगा। इसलिये प्रज्ञान के अतिरिक्त कुछ नहीं है यह बात जहाँ कही है वहाँ शब्दों से जिसका वर्णन आता है वह पद क्या है? विष्णु शब्द का वहाँ क्या प्रज्ञान का अर्थ ब्रह्म समझना चाहिए। बौद्धों का प्रज्ञान नहीं। वे क्षणिक अर्थ है? समाधान :- वहाँ इस परम पद को कार्य-कारण से परे बताया है 56 57

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वेदान्त प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ अर्थात् वह पद माया से भी परे है। यह भी कहा कि ज्ञानी लोग उस पद क लगा दो परन्तु उसका विद्युत से सम्बन्ध मत बनाओ तो वह जल नहीं प्राप्त करते हैं। ऐसा पद तो आत्मा ही है। इसलिये आत्मतत्त्व को ही व सकता। दोनों का जब सम्बन्ध होता है तभी व्यवहार की प्रतीति होती है। परम पद शब्द से कहा है। यहाँ विष्णु का अर्थ चतुर्भुज सगुण-साका ऐसा होने पर भी उपकरण विद्युत नहीं है और विद्युत उपकरण नहीं है। विग्रह नहीं है। विष्णोः यहाँ षष्ठी विभक्ति अभेदार्थ में है, अर्थात् जो विष हमारे साथ भी यही स्थिति है। जो भी व्यवहार चल रहा है उसके है वही परम पद है। अतः विष्णु शब्द से भी आत्मा को ही कहा है। कर्ता आप अर्थात् चेतन ही बन रहे हैं। 'मैंने यह किया, मैं ऐसा काम कर दूँगा, मैंने पहले पाप किया है पर अब पुण्य ही करूँगा', यह सब आप के **** जिज्ञासा :- ब्रह्मसूत्र के अध्यास-भाष्य में एक पंक्ति है -सत्यानृत अन्दर ही आता है। परन्तु बुद्धि से शरीरपर्यन्त जो कार्यकरणसंघात है उसके मिथुनीकृत्य अहमिदं ममेदमिति नैसर्गिकोऽयं लोकव्यवहारः। यह बिना आप में कोई व्यवहार सम्भव नहीं है। सारा क्रियात्मक व्यवहार इस अनृत शब्द का क्या अर्थ है और सत्य एवं अनृत के मिथुनीकरण का क्य संघातरूपी प्रकृति में ही होता है और उसका आरोप पुरुष में हो जाता है। तात्पर्य है? प्रकृति भी जड़ है, बिना पुरुष के उसमें व्यवहार नहीं हो सकता। इन दोनों को मिलाकर ही सारा व्यवहार चलता है। समाधान :- अनृत शब्द का प्रसिद्ध अर्थ है- झूठ। परन्तु आप इस पंक्ति का अर्थ यह समझ लें कि संसार का व्यवहार झूठ और सच के अब विचार करें कि व्यवहार में सच क्या है और झूठ क्या है? आप मिलाकर ही चलता है, व्यवहार में झूठ बोलना ही पड़ता है इसलिये उसमें ही सच हैं। जो आपका शुद्ध मैं (चेतन) है वही सत्य है क्योंकि वह तीनों कोई पाप नहीं, तो यह भ्रमात्मक समझ है क्योंकि यह इस पंक्ति का अर्थ काल में एक समान रहता है। बुद्धि से शरीरपर्यन्त जो आपका मैं जुड़ा है नहीं है। इसका ठीक अर्थ समझने का प्रयास करते हैं। यही अनृत(झूठ) है क्योंकि इसका बाध होता है। आप कहेंगे 'मैं जाता हूँ।'

एक तो शुद्ध चेतन है जिसमें व्यवहार सम्भव ही नहीं है। शास्त्र पर जब आप शरीर हो ही नहीं सकते तो कौन जाता है? आपका यह मैं

कहता है - असङ्गो हि अयं पुरुषः।(बृह.उप .- ४.३.१५) असङ्ग पुरुष में बाधित हो गया। स्थूल और सूक्ष्म शरीरों में जो मैं का सम्बन्ध बन रहा है

कर्तृत्व, भोक्तृत्व का व्यवहार हो ही नहीं सकता। प्रकृति जड़ है उसमें भी यह अनृत सम्बन्ध है। पर यह भी आपके आधार पर टिका है। आप सत्य हैं

कर्तृत्व, भोक्तृत्व नहीं रह सकता। प्रकृति में क्रिया होती है पर कर्तृत्व नही और यह संघात अनृत है। आपने जो अपने मैं को संघात के साथ जोड़

होता क्योंकि उसमें ज्ञान नहीं है। जैसे पंखे में क्रिया है परन्तु 'मैं कर रहा हूँ लिया, यही सच और झूठ का घाल-मेल(मिथुनीकरण) है। इसी से सारा

ऐसा ज्ञान न होने से उसमें कर्तृत्व नहीं होता। पुरुष में ज्ञान है पर क्रिया नही व्यवहार चलता है। चाहे वैदिक व्यवहार हो चाहे लौकिक, चाहे साधक का

है इसलिये वहाँ भी कर्तृत्व नहीं है। पुरुष को भोग का ज्ञान तो होगा पर व्यवहार हो अथवा असाधक का, ज्ञानी में दिखने वाला हो चाहे अज्ञानी में

असङ्ग होने के कारण उसके साथ सम्बन्ध नहीं बनेगा, तब भोक्तृत्व कैसे होने वाला, सब का आधार यही है।

आयेगा। फिर व्यवहार कैसे चलता है? यह एक समस्या है। इतनी बात समझने की है कि ज्ञानी का व्यवहार नाटककार के समान

इसे विद्युत के दृष्टान्त से समझिए - विद्युत और उपकरण को होता है। नाटककार व्यवहार करता है पर पार्ट के साथ जुड़ता नहीं। उसका न

मिलाकर ही सारा व्यवहार करना पड़ता है। आप बल्ब आदि उपकरण मत राजा के पार्ट से सम्बन्ध है और न सिपाही के पार्ट से। उसका सारा व्यवहार

लगाओ तो तार में बहने वाली विद्युत से कोई व्यवहार नहीं होगा और बल्ब बाधित है। इतना होने पर भी जब तक वह पार्ट के साथ अपने मैं को मिलाएगा

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ वेदान्त नहीं तब तक व्यवहार नहीं कर पाएगा। सत्य और अनृत के मिथुनीकरण क यही तात्पर्य है। व्यवहार में झूठ चलता है ऐसी छूट भाष्यकार भगवान् ने नहं महात्मा ने पेट पर हाथ रखकर कहा, "दर्द यहाँ पर है?" बालक ने हामी भरी। दी है। महात्मा बोले, "देखो! यह उसका मुख मालूम पड़ रहा है और यह पूँछ। ओहो! लगता है बहुत कष्ट है। यह दवा से कैसे ठीक हो सकता है! इसके **** लिए साँप को या तो निकालना पड़ेगा या फिर अन्दर ही मारना पड़ेगा।" ऐसा जिज्ञासा :- उपनिषदों में संसार की उत्पत्ति और अनुत्पत्ति दोनों क कहकर बालक को जुलाब दे दिया। अब तो बालक रात भर शौच ही जाता एकसाथ कथन मिलता है। सृष्टि का भी कहीं पर पञ्चीकरण से तथा कहीं पर रहा। त्रिवृत्करण से, कहीं क्रम से तो कहीं व्यतिक्रम रूप से कथन भी किया गया है उधर राजा को कहा किसी नौकर के द्वारा एक मरा साँप वहाँ डलवा दो, इस प्रकार के कथनों से भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसका समाधान जहाँ बालक शौच जाता है। राजा ने ऐसा ही किया। सुबह जब बालक को कैसे हो? पूछा, "कुछ लाभ हुआ?" बालक को अब तो समस्या दूसरी थी। समाधान :- उपनिषदों के कथन का तात्पर्य जब तक नहीं समझते तब पहलीवाली समस्या को तो वह भूल ही गया था। कहा, "महाराज! पेट में दर्द तक भ्रम की निवृत्ति कैसे होगी! उपनिषदों में जहाँ भी सृष्टि-प्रकरण आया है, तो नहीं हो रहा है, पर शौच रात भर जाता रहा।" महात्मा ने कहा, "चलो, वहाँ यह समझना चाहिए कि सृष्टि सिद्ध करना लक्ष्य नहीं है, अपितु जो सृष्टि देखते हैं शायद साँप बाहर निकल गया हो।" वहाँ जाकर देखने पर मरा हुआ शब्द मन में बस गया है, उसे निकालना लक्ष्य है। कोई शंका करे कि निकालने साँप पाया गया। बालक ने कहा, "महाराज! यह देखो, निकल गया।" के लिए उसे स्वीकार क्यों करना! स्वीकार इसलिए करना पड़ता है कि यह महात्मा ने कहा, बस, अब समस्या समाप्त हो गई। संसार प्रत्यक्ष दिखता है। यदि श्रुति एकाएक कह दे कि यह उत्पन्न नहीं हुआ देखिए! न तो साँप घुसा और न ही निकला, पर समस्या उत्पन्न भी हुई तो कौन मानेगा! इसलिए इसे पहले स्वीकार करके फिर युक्ति के द्वारा मिथ्या और निवृत्त भी। ऐसी ही समस्या श्रुति के सामने भी है। इसलिए पहले कहा सिद्ध करके मन से निकालना ही उपनिषद्-वचनों का तात्पर्य है। कोई शंका जगत् उत्पन्न हुआ है और इस क्रम से विस्तार को प्राप्त हुआ है। ऐसा करने से करे कि उत्पन्न नहीं हुआ, ऐसा क्यों स्वीकारना? इसका समाधान है कि संसार पाप होता है और वैसा करने से पुण्य होता है। उत्पत्ति के पहले भी था। किस का आत्मा के साथ कार्य-कारण-सम्बन्ध ही नहीं बन सकता। इसलिए ऐसा रूप में था? आत्मरूप में था। फिर माया के द्वारा जगत्रूप में दिखने लगा। कहना पड़ता है। इस समय भी उसी रूप में है। फिर प्रलय होता है तो उसी (परमात्मा) में लीन एक राजा का लड़का था। उसने एक दिन स्वप्न देखा कि मेरे मुख में हो जाता है। इस प्रकार विभिन्न युक्तियों के द्वारा समझाना पड़ता है। सम्पूर्ण साँप घुस गया। जब वह उठा तो पेट में दर्द होने लगा। बहुत दवाई की, पर प्रक्रिया का तात्पर्य है - अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते। (गीता कोई लाभ नहीं हुआ। अन्त में एक महात्मा के पास उसे ले गए। महात्मा ने शांकर भाष्य- १३.१३) एकान्त में उससे पूछा, "क्या तुमको पहले कभी कोई स्वप्न हुआ था?" परमात्मा में सृष्टि का आरोप और फिर निषेध करने से ही तत्त्व का ज्ञान बालक ने कहा, "महाराज! कुछ दिन पहले एक स्वप्न हुआ जिसमें मेरे मुख सम्भव है। ऐतरेय उपनिषद् में भी शुरु किया - आत्मा वा इदमेक एवाग्र में साँप घुस गया।" महात्मा समस्या समझ गए कि जो स्वप्न में देखा उसे आसीत् (१.१.१) से, और समाप्त किया- प्रज्ञानं ब्रह्म (३.१.३) में। अब इसने सत्य समझ लिया। फिर कहा, "थोड़ा लेट जाओ।" बालक लेटा तो कोई शंका करे कि इसकी उत्पत्ति क्रम में भेद देखने को क्यों मिलता है! तो

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ वेदान्त इसका समाधान है कि जो वस्तु केवल मायिक है, उसे चाहे इधर से कहें या उधर से, क्या अन्तर पड़ता है! चाहे पहले मिट्टी लाकर घड़ा बनाए या मिट्टी के पर यदि किसी भी रूप में जानना नहीं होता तो जागने पर स्मृति भी नहीं होती

बिना लाए ही घड़ा बनाए या घड़ा बनाकर पानी पीने वाले व्यक्ति को बनाए, कि 'मैं सुख से सोया' क्योंकि स्मृति अनुभवपूर्विका ही होती है। इसलिए

क्या अन्तर पड़ता है! अब यहाँ कोई शंका करे कि जब पानी पीने वाला पहले वहाँ किसी-न-किसी रूप में अनुभव मानना ही पड़ेगा। अतः दोनों के मत में

नहीं था तो घड़ा बनाने की आवश्यकता क्यों हुई? इस प्रकार की शंका तो विरोधाभास नहीं है, अपितु कथन की प्रणाली भिन्न है। **** तब होती है, जब घड़ा वास्तविक हो। जब मायिक हो तो शंका के लिए स्थान ही नहीं रहता है। इसी प्रकार जब सृष्टि हुई ही नहीं तो प्रक्रियावाले चाहे उसे जिज्ञासा :- यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति ... (बृह. उप .-

पञ्चीकरण से सिद्ध करें या त्रिवृत्करण से, इससे क्या अन्तर पड़ता है? शास्त्र ४.४.२३)- यहाँ पर कहा है सुषुप्ति में वह नहीं देखता हुआ भी देखता है।

का सृष्टि में कोई तात्पर्य नहीं है। यदि वह देखता है तो नहीं देखता हुआ कैसे कहा? यदि नहीं देखता है तो

वस्तुतः तो आत्मा शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव है; बस, यही समझना है। उसमें नित्यद्रष्टत्व कैसे रहेगा?

ज्यादा प्रक्रिया में उलझने में कोई लाभ नहीं है। मुख्य तत्त्व को ही समझने का समाधान :- इस मन्त्र में आगे कहा है - न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो

प्रयास करना चाहिए। विद्यतेऽविनाशित्वाद् (४.४.२३)। अर्थात् द्रष्टा की दृष्टि का लोप नहीं होता है, वह अविनाशी होती है। सुषुप्ति में द्रष्टा नहीं देखता है, इसमें कारण यही है **** जिज्ञासा :- भामतीकार सुषुप्ति अवस्था में अभाववृत्ति को मानते हैं कि उसके अतिरिक्त वहाँ कोई वस्तु ही नहीं है, जिसे वह देखे। वेदान्त को

और विवरणकार वहाँ वृत्तित्रय मानते हैं। इस विरोधाभास का परिहार कैसे हो हमेशा वेदान्त की दृष्टि से ही समझना पड़ता है। शक्ति को कार्यानुमेया ही

सकता है? समझना चाहिए। अर्थात् शक्ति का ज्ञान कार्य रूप में परिणत होने पर ही होता है। पर वह शक्ति कार्यरूप में परिणत होने से पहले भी वहाँ थी, भले ही उसको समाधान :- इन दोनों मतों में विरोधाभास है ही नहीं, इसलिए परिहार की आवश्यकता भी नहीं है। सुषुप्ति में वृत्ति का अभाव कहने में भामतीकार कोई नहीं जानता था।

का तात्पर्य यही है कि जाग्रत और स्वप्न के समान वहाँ विशिष्ट वृत्ति नहीं है। दूसरी बात, जैसे सूर्य नित्य है तो सूर्य का प्रकाश भी नित्य ही मानना पड़ेगा क्योंकि प्रकाश उसका स्वरूप है। वह अलग नहीं हो सकता है। व्यवहार विवरणकार सुषुप्ति में तीन वृत्तियाँ मानते हैं - आत्माकारवृत्ति, में लोग भले ही कहे कि सूर्य प्रकाश करता है, पर वस्तुतः वह इस प्रकार की सुखाकारवृत्ति तथा अज्ञानवृत्ति, इसका विरोध तो भामतीकार नहीं करते हैं। अपने अनुभव के द्वारा भी देखना चाहिए कि जागने के पश्चात् कोई ऐसा नहीं क्रिया का कर्ता नहीं बनता है। उसकी उपस्थिति मात्र से वस्तु प्रकाशित होती है। सूर्य के प्रकाश का ज्ञान हमें उसके प्रतिफलित होने पर ही होता है। इसका कहता कि मैं नहीं था। इसलिए वहाँ आत्माकारवृत्ति सिद्ध होती है और सभी तात्पर्य यह नहीं है कि प्रतिफलन के पहले सूर्य में प्रकाश नहीं था। का एक ही अनुभव होता है कि मैं सुख से सोया। इससे सुखाकारवृत्ति भी माननी पड़ेगी। साथ-साथ सभी को यह अनुभव होता है कि सुषुप्ति के समय तीसरी बात, दृश्य रहेगा तो द्रष्टा से प्रकाशित होगा। यदि नहीं रहेगा तो

मैंने कुछ भी नहीं जाना। इसीलिए अज्ञानवृत्ति भी माननी पड़ेगी। प्रकाशित नहीं होगा। पर तब भी उसकी प्रकाशरूपता की कोई हानि नहीं होती है क्योंकि दृश्य नहीं है तो वह दृश्य-अभाव को प्रकाशित करेगा। इसलिए तात्पर्य यह है कि जाग्रत के समान विशिष्ट साक्षीभाव होकर नहीं जाना, उसके नित्यद्रष्टत्व का अभाव नहीं होता है।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग -३ वेदान्त जिज्ञासा :- द्रष्टा (ब्रह्म) की दृष्टि (शक्ति) को पारमार्थिक मानें तो फिर जिज्ञासा :- भूतसूक्ष्म को आगामी शरीर का आरम्भक (बीज) कहने माया का अध्यारोप-अपवाद करने की क्या आवश्यकता है? का क्या आशय है? समाधान :- जैसे विद्युत में प्रकाश है, पर उसको अभिव्यक्त करने के समाधान :- भूतसूक्ष्म को आगामी स्थूल-शरीर का उपादान मानते हैं। लिए बल्ब की आवश्यकता पड़ती है। इसी प्रकार माया के बिना द्रष्टा (ब्रह्म) जैसे आपने किसी वृक्ष को छोड़ दिया पर उसका बीज रख लिया। उसे दूसरी की दृष्टि (शक्ति) की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। यदि सृष्टि की व्यवस्था नहीं जगह जाकर बो देंगे तो वृक्ष पैदा हो जाएगा। इसी प्रकार से पूर्व के स्थूल- करनी है - एकमेवाद्वितीयम् में ही रहना है तो माया की कल्पना करने की शरीर से जो भूतसूक्ष्म आता है, वही अगले स्थूल-शरीर का उपादान बनता है। आवश्यकता नहीं है। अब शंका करो कि अच्छा मान लिया तो अपवाद क्यों इसीलिए इसे आगामी शरीर का आरम्भक कहते हैं। करना? अपवाद इसलिए करना कि वह है ही नहीं। जैसे प्रकाश उपकरण का **** धर्म नहीं है, उसे विद्युत का धर्म बताना है तो यह कहना पड़ेगा बल्ब विद्युत नहीं है, पंखा भी विद्युत नहीं है क्योंकि यदि इनका निषेध नहीं करेंगे तो कोई जिज्ञासा :- वेदान्त मत में कहे जाने वाले दृष्टि-सृष्टिवाद का तात्पर्य क्या है? इनको ही विद्युत समझ लेगा। पर हमको तो बल्ब में रहनेवाले प्रकाश को विद्युत का धर्म कहना है। इसी प्रकार सच्चिदानन्द परमात्मा को समझाना है तो समाधान :- दृष्टि-सृष्टिवाद का वर्णन वेदान्त के योगवासिष्ठ इत्यादि

इन लौकिक (परिच्छिन्न) सत्-चित्-आनन्द (माया और उसके कार्य) का ग्रन्थों में मिलता है। इसका तात्पर्य यह है कि जो वस्तु जैसी आपको दिखाई दे रही है वैसी अन्य को भी दिखाई दे, यह आवश्यक नहीं है। व्यक्ति का जैसा अपवाद करना ही पड़ेगा। संस्कार होता है उसी के अनुसार उसको वह वस्तु दिखाई देती है। इसलिए * *** कोई ऐसा नहीं कह सकता है कि इस वस्तु का यही स्वरूप है। आप व्यवहार जिज्ञासा :- सूक्ष्मभूत और भूतसूक्ष्म में क्या अन्तर है? में भी देखिए -एक ही स्त्री पुत्र को माता दिखाई देती है, किसी कामी पुरुष समाधान :- सूक्ष्मभूत तन्मात्रारूप हैं अर्थात् अपञ्चीकृत भूत हैं। को सुन्दरी दिखाई देती है, योगी को हाँड़-मांस की पुतली दिखाई देती है भूतसूक्ष्म पञ्चीकृत स्थूलभूतों का अत्यन्त सूक्ष्म रूप है। जब जीव इस शरीर से और बाघ को भोजन दिखाई देती है। अब बताइए उसका वास्तविक स्वरूप दूसरे शरीर में जाता है तो सूक्ष्म-शरीर को ले जाने के लिए भूतसूक्ष्म की कौन-सा है? दृष्टि-सृष्टिवाद प्रक्रिया सभी लोगों के समझ में नहीं आ सकती। आवश्यकता होती है। सूक्ष्म-शरीर करणरूप है उसे कार्य करने के लिए कोई- इसके लिए तीव्र वैराग्य और अभ्यास की आवश्यकता है अन्यथा गलत न-कोई आधार चाहिए। सूक्ष्म-शरीर करणात्मक होने से शक्तिरूप है, उसे समझ भी हो सकती है। इसलिए वेदान्त में कुछ ही जगह पर इसकी चर्चा रहने के लिए कोई आधार चाहिए, उसके बिना वह बिखर जाएगा। मरणकाल मिलती है। में जब सूक्ष्म-शरीर स्थूल-शरीर को छोड़ देता है, उस समय सूक्ष्म-शरीर का **** आधार क्या रहेगा? उस समय भूतसूक्ष्म ही उसका आधार बनता है। इन्हीं के सहारे सूक्ष्म-शरीर अगले स्थूल-शरीर में जाता है। ****

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मन्त्र-विचार ही श्रेष्ठ बताया है। मन्त्र-विचार जिज्ञासा :- रामचरितमानस में लिखा है- नाम लेत भवसिंधु सुखाहीं जिज्ञासा :- मंत्रजप करते समय उसके अर्थचिन्तन की बात कही जाती है। (बाल .- २४.२)। नाम तो लेते हैं फिर भी संसार से आसक्ति नहीं छूट रही है। ऐसा ऐसे में निर्गुण-निराकार ब्रह्म के द्योतक प्रणव के अर्थ का क्या स्वरूप होगा? क्यों? समाधान :- पतञ्जलिजी महाराज ने भी ऐसा ही कहा है- समाधान :- तुलसीदासजी जानते थे कि मेरी बात पर कोई विश्वास नहीं तज्जपस्तदर्थभावनम्(योगसूत्र-१. २८)। करेगा इसलिये आगे कहा - करहु बिचारु सुजन मन माहीं। आप सज्जन हैं थोड़ा प्रणव सविशेष (अपरब्रह्म) का वाचक है और निर्विशेष(परब्रह्म) का विचार कीजिए। मैं तो अपने अनुभव की बात कह रहा हूँ। लक्षक है। इसलिये प्रणव का परब्रह्म और अपरब्रह्म दोनों के साथ सम्बन्ध है। आप व्यवहार में ही समझिए- एक बालक रो रहा है उसकी माता अपना अर्थात प्रणव का अर्थ परब्रह्म और अपरब्रह्म दोनों ही होता है। यदि आप अपरब्रह्म काम कर रही है। बालक का एक रोना ऐसा है जिसे माता समझती है कि उसे कोई की उपासना करते हैं तो अपरब्रह्म के विषय में जो आपका ज्ञान है वही प्रणव का समस्या नहीं है, वह ऐसे ही रो रहा है। वह उसपर ध्यान न दे कर अपना काम करती अर्थ हुआ। यदि आप परब्रह्म की उपासना करते हैं तो परब्रह्म के विषय में जो रहती है। ज्यादा हुआ तो एक खिलौना फेंक देती है, वह चुप हो जाता है। उसी आपका ज्ञान है वही प्रणव का अर्थ होगा। अब यहाँ कोई शंका करे कि परब्रह्म का बालक का एक ऐसा रोना है, ऐसी चीख है जिसे सुनकर माता बरबस कूद पड़ती है। ज्ञान कैसा है? तो इसका निर्धारण शास्त्र में किया है। वहाँ से यह ज्ञान प्राप्त करना चाहे लाखों का नुकसान हो जाए, चाहे उसका पैर भी टूट जाए क्योंकि उसकी चाहिए। चीख- पुकार ही ऐसी है। तात्पर्य यह है कि अपरब्रह्म और परब्रह्म के साथ प्रणव की अभेद भावना यही गणित भगवान् के यहाँ भी है। अभी तो हम इसलिये नाम ले रहे हैं कि करनी पड़ती है। यही प्रणव का अर्थचिन्तन है। एक रिवाज बन गया है नाम लेने का। परन्तु चाह रहे हैं जगत् को। गोस्वामीजी

**** कहते हैं - मोर दास कहाइ नर आसा करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा।(मानस जिज्ञासा :- ऐसा सुना है कि गायत्रीमन्त्र को रात्रि में जपना निषिद्ध है। तो उत्तर .- ४५.२) भगवान् का भक्त कहलाता है और आशा करता है कि जगत् ऐसा क्या इसे सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय के पहले नहीं जपना चाहिए? हो जाए तो सुखी हो जाऊँ। भक्त बनता है राम का और आशा करता है जगत् से, तो समाधान :- ऐसा तो शास्त्र में कहीं निषेध नहीं किया है कि सूर्यास्त के बताओ उसे भगवान् पर विश्वास कहाँ है। ऐसी स्थिति में नाम लेने से भवसिन्धु बाद और सूर्योदय के पहले गायत्रीमन्त्र को नहीं जपना चाहिए। मान लो, आपको नहीं सूखता। पर देखो! मार्कण्डेय की एक पुकार सुनकर महादेव त्रिशूल ले कर शाम की सन्ध्या करनी है जिसमें आपको ग्यारह सौ गायत्रीमन्त्र जप करना है। ऐसे खड़े हो गए, उनकी रक्षा की। उन्होंने जगत् के सारे आधार छोड़ दिए थे, इसीलिये में रात्रि तो हो ही जाएगी। आकाश में नक्षत्र रहते हुए की गई सुबह की सन्ध्या को नाम लेते ही भगवान् को आना पड़ा। व्यक्ति यदि जगत् का सारा आधार छोड़कर उत्तम बताया गया है। ऐसे में सूर्योदय से पहले गायत्रीमन्त्र के जप का निषेध कैसे भगवान् का नाम ले तो संसारसागर उसी क्षण सूख जाएगा। नाम में अचिन्त्य शक्ति कह सकते हैं! रात्रि में निषेध का मतलब यही है कि जैसे कुछ साधनाएं रात्रि में की है। उसमें अविश्वास नहीं करना चाहिए।

जाती है उस प्रकार से गायत्री साधना नहीं करनी चाहिए। इसके लिये ब्रह्ममुहूर्त को

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साधकचर्या परीक्षण करना चाहिए कि हमारा मन शास्त्रीय व्यवहार कर रहा है कि अशास्त्रीय। तभी आप जीवन में आगे बढ़ेंगे। एक बालक भी यदि शास्त्र के साधकचर्या अनुकूल और युक्तिसंगत बात कहे तो उस बात को महत्त्व देना चाहिए न कि उस बालक की आयु को। जिज्ञासा :- आजकल आचार्य लोगों का आचरण भी कहीं-कहीं पर शास्त्रविरुद्ध दिखाई देता है। ऐसे में जिज्ञासु साधकों का क्या कर्तव्य है? जिज्ञासा :- कैसे परीक्षा करें जिससे जान सकें कि हम साधक हैं या समाधान :- आचार्य का शास्त्रविरुद्ध आचरण दिखाई दे तो उनके नहीं? प्रति लोगों की अश्रद्धा होना स्वाभाविक बात है। यहाँ तक कि गुरु का समाधान :- साधक की सर्वप्रथम परीक्षा है कि वह किसी बाह्य घटना अशास्त्रीय आचरण देख कर शिष्य में भी मतभेद उत्पन्न हो जाता है। ऐसे में से अन्तर्मुख होता है या नहीं। यदि आप किसी घटना से अन्तर्मुख हुए तो साधक का एक ही कर्तव्य है - उसे उसकी तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए। दूसरी समझो आप साधक हैं। बात, वह क्यों कर रहा है यह बात अन्य तो कोई नहीं जानता। मान लो वह मान लो, आपको किसी ने गाली दी, उस समय यदि आपके अन्दर कोई अशास्त्रीय वस्तु भोजन के साथ ग्रहण कर रहा है तो हो सकता है किसी यह विचार आया कि मुझसे क्या गलती हुई है जिससे इसने हमें गाली दी। उस ने औषधि के रूप में उसे बताया है। गलती को मुझे सुधारना चाहिए। फिर आपके अन्दर यह विचार आया कि इस विषय में शास्त्र बहुत सावधान है। वह कहता है, 'यदि गुरु बनाना इसके द्वारा दी गई गाली का मुझसे क्या सम्बन्ध है? किसी ने आपका कहना हो तो इन बातों पर पहले से ही अच्छी प्रकार से विचार कर लेना चाहिए नहीं माना उस समय आप के अन्दर यदि यह विचार आता है कि इसने मेरा क्योंकि यदि बाद में कहीं गुरु का आचरण देखकर आपको अश्रद्धा हो गई तो कहना क्यों नहीं माना। इसका मतलब मेरे ज्ञान में कोई कमी थी जिससे मैं इसे आपका परमार्थ-मार्ग ही अवरुद्ध हो जायेगा। तब आप क्या करोगे?' ठीक से कह नहीं पाया। इससे आपको अपने अन्दर का अज्ञान दिखाई देने इसलिये शास्त्र ने आचार्य के लक्षण बताये हैं - श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं। वह शास्त्र लगेगा। आप उसे सुधारने का प्रयास करेंगे। के तात्पर्य को भली प्रकार से जानने वाला हो, शास्त्र के अनुसार आचरण क जब व्यक्ति इस प्रकार अन्तर्मुख होता है तो समझो वह साधक है। यदि करता हो तथा तत्त्व में निष्ठा रखता हो। अतः गुरु बनाने से पहले इन बातों पर वहाँ झगड़ा करने लगे कि इसने मुझे गाली क्यों दी, इसने मेरी बात क्यों नहीं विचार कर लेना चाहिए। यदि उपरोक्त लक्षण आपको किसी में पूर्ण रूप से मानी तो समझो अभी उसमें साधकत्व नहीं आया। दिखाई न दें तो अन्य लक्षणों के आधार पर उसे महापुरुष मान सकते हैं, **** ब्रह्मज्ञानी मान सकते हैं पर आचार्य नहीं। जिज्ञासा :- नित्य पूजा के समय आवश्यकता पड़ने पर वार्तालाप कर मेरा कहना तो यही है कि आपको कहीं पर भी किसी में भी अश्रद्धा सकते हैं या नहीं? उत्पन्न करने वाला आचरण दिखाई दे तो वहाँ अपने मन को बहिर्मुख नहीं समाधान :- नित्य पूजा तन्मयता के साथ करनी चाहिए। उस समय करना चाहिए। यदि आप साधक हैं तो अपने मन को अन्तर्मुख करके उसका किसी भी प्रकार की वार्तालाप का निषेध है। अब यदि कोई कहे - "बहुत

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग- ३ साधकचर्या आवश्यक बात हो तो?" फिर तो उसको ही विचार करना पड़ेगा कि वह पूजा को महत्त्व देता है या वार्तालाप को। स्वरूप के विषय में जान लेना चाहिए। इन्द्रियाँ करण हैं। करण का अर्थ होता

आजकल तो यह फोन ही बहुत बड़ी आफत है। व्यक्ति दस मिनट के है - जो किसी क्रिया में कर्ता का सहायक बने। हम जो भी शब्द, स्पर्श, रूप,

लिये भजन करने बैठता है तो भी मोबाईल फोन पास में रखकर बैठ जाता है। रस, गंध का अनुभव करते हैं वह ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से करते हैं। इसी

इसका मतलब यह हुआ कि भजन के प्रति आपका कोई विशेष महत्त्व नहीं है, प्रकार बोलना, लेना-देना, चलना, मल-मूत्र त्यागना इत्यादि कर्मेन्द्रियों की

फोन के प्रति है। ऐसे में वह क्या भजन-पूजन कर सकता है। सहायता से करते हैं। मन से संकल्प करते हैं और बुद्धि से निर्णय करते हैं। इस

पूजा का सम्बन्ध अध्यात्म से है, परलोक से है। पूजा से अधिक प्रकार ये सभी करण हैं।

महत्त्व वार्तालाप को देने का तात्पर्य है कि परलोक या अध्यात्म का आपके शास्त्र कहता है - यह शरीर रथ के समान है। इन्द्रियाँ घोड़ों के समान

जीवन में कोई स्थान ही नहीं है। इस भय को मन से निकाल देना चाहिए कि हैं। जैसे घोड़ा रथ को खींचता है वैसे ही इन्द्रियों के माध्यम से आपका शरीर

फोन आ गया या कोई व्यक्ति आ गया और हमने बात नहीं की तो हमारा कार्य चलता है। मन को लगाम बताया जाता है और बुद्धि को सारथि। शब्द-स्पर्श-

बिगड़ जाएगा। क्या आपका भजन उस फोन से कमजोर है? मेरे जीवन का रूप-रस-गंधरूपी विषय मार्ग पर यह शरीर-रथ चलता है। यहाँ पर समस्या

अनुभव है - जब यहाँ आश्रम में ट्रस्टी लोगों ने फोन लगाने की बात की तो इसलिये हो जाती है कि हम रथ को ही अपना स्वरूप मान लेते हैं इसलिये

मैंने कहा - "फोन लगा सकते हो पर मेरी दो शर्तें हैं! मुझे कभी फोन की विचार नहीं कर पाते। विचार करने के लिये पहले अपने को रथ से अलग

घण्टी सुनाई नहीं देनी चाहिए और न ही मुझे कोई फोन पर बात करने मानना पड़ेगा। तभी इन्द्रियरूपी घोड़ों पर विजय प्राप्त की जा सकती है। यदि आप ही रथ बन गए तो जीतने का संकल्प कौन करेगा? पहले तो यह मानना बुलाएगा।" लोगों ने बात मान ली और फोन लग गया। पर मैंने अपने जीवन में पड़ेगा कि इस रथ का मुख्य स्वामी परमेश्वर है और उसने हमें व्यवहार करने

कभी भी किसी से फोन पर बात नहीं की। इस नियम से मेरे जीवन में किसी के लिये यह रथ दिया है। इसलिये हम इसके व्यावहारिक स्वामी हैं। यह रथ

प्रकार की कोई रुकावट नहीं आई। व्यवहार भी ठीक चलता रहा। कई आश्रमों किसलिये दिया है? जिससे हम अपनी उन्नति कर सकें और संसारसागर को

की जिम्मेदारी ठीक प्रकार से निभाई। इसलिये इस भ्रम को मन से निकाल देना पार कर सकें। विचार कीजिए इतने बड़े कार्य को पूरा करने के लिये दिया है।

चाहिए कि भजन के समय वार्तालाप नहीं करेंगे या फोन नहीं उठाएंगे तो कार्य अब यह निर्णय आप की बुद्धि को करना है कि आप संसारसागर से

बिगड़ जाएगा। तुम भगवान् के सामने बैठे हो, तुम्हारा कार्य कैसे बिगड़ेगा? पार होना चाहते हैं या नहीं। यदि नहीं होना चाहते तो विचार करने की आवश्यकता ही नहीं। पार होना चाहते हैं तो विचार करना पड़ेगा। जैसे घोड़े **** जिज्ञासा :- जितेन्द्रिय कैसे बनें? सिखाए न गए हों तो वे मार्ग पर चल नहीं सकते। वे आपको किसी भी समय गड्ढ़े में गिरा सकते हैं। यदि सिखाए हों और सारथि के नियन्त्रण में हों तो समाधान :- जिस पर आपको विजय प्राप्त करनी होती है उसके गन्तव्य स्थान तक पहुँचा देते हैं। यही स्थिति आपकी इन्द्रियों की है। वे स्वरूप और बल के विषय में पहले जानना चाहिए। इसलिये यदि आपको इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना है, उनपर नियन्त्रण करना है तो इन्द्रियों के आपके नियन्त्रण में हैं तो आप अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं अन्यथा पता नहीं कब किसी गड् ढ़े में गिरा दें। यह नियन्त्रण बुद्धि से ही करना है। जैसे मान

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ साधकचर्या

लीजिए आप को भूख लगी है, आप के सामने लड्ड आ गए तो आपके मन में शास्त्रीय दृष्टि ग्रहण किए बिना, इन्द्रियों की जो बहिर्मुख होने की आदत हो उन्हें खाने की इच्छा उत्पन्न हो गई। उसी समय आप को ज्ञान हो जाए कि इसमें गर्ट 6 उसे आप दूर नहीं कर सकते। विष है तो आप नहीं खाएंगे। वह निर्णय बुद्धि में ही हुआ। आप किसी मार्ग से जा रहे हैं, बीच में कहीं किसी के दस लाख रुपये कहने का तात्पर्य यह है कि ज्ञानेन्द्रियाँ जो शब्दादि विषयों का ग्रहण पड़े दिखाई दिए। आप के मन ने कहा उठा लो। उसी समय आपके हृदय में कर रही हैं उसका बुद्धि में निर्णय ठीक से नहीं हुआ तो लक्ष्य भी ठीक नहीं बैठे शास्त्र ने कहा - यह उचित नहीं है। अब यदि शास्त्र प्रधान हो जाएगा तो बनेगा। इसलिये जिसको संसार के विषयों में रस मिल रहा है उसके विषय में जो इन्द्रिय रुपये उठाने में प्रवृत्त हो गई थी वह रुक जाएगी। यदि हृदयपक्ष किसी प्रकार की शंका नहीं कि वह इन्द्रियनिग्रह नहीं कर सकता। उसे तो प्रबल नहीं हुआ तो मन कहेगा उठा लो कहीं काम आएंगे, तब आप उठा लेंगे। इन्द्रियों में दोष ही दिखाई नहीं दे रहा है तो वह उनका नियन्त्रण क्यों करेगा? पर आप अन्दर से जानते हैं कि यह गलत है। इसलिये छुपाने में लग जाएंगे, इसलिये वह जैसा मन कहता है वैसा करता है। शास्त्र कहता है - जब तक बचने के लिये झूठ भी बोल देंगे। एक गलती को छुपाने के लिये दुनिया भर आप जगत् की परीक्षा नहीं कर लेंगे तब तक उसमें रस दिखेगा ही। ऐसे में की गलतियाँ करेंगे। इसलिये व्यक्ति पहले शास्त्रदृष्टि वाला हो, बुद्धि में निर्णय आप उससे सम्बन्ध नहीं तोड़ सकते। लेकिन जिस दिन यह विचार आ जाएगा ठीक हो तभी इन्द्रियसंयम का अभ्यास कर सकता है। यदि ऐसा नहीं हो रहा है कि इतने दिन से जैसा मन माँग रहा है वैसा इसे खिला रहा हूँ, रबड़ी खिला तो विचार करना ही चाहिए कि हमारी इन्द्रियाँ जो हमारे करण हैं हमारे वश में रहा हूँ, दूध पिला रहा हूँ फिर तृप्ति क्यों नहीं हो रही है? खाने-पीने की प्यास क्यों नहीं हैं? दोष कहाँ है? उसको जानकर जब उसे हटाएंगे तब आप बढ़ती ही क्यों जा रही है? इसका मतलब कोई धोखा हो रहा है! रूप देखते- जितेन्द्रिय बन जाएंगे। देखते आँखें जवाब दे गई, पर रूप देखने की इच्छा समाप्त नहीं हुई। जरूर **** कोई धोखा हो रहा है। यह परीक्षा बुद्धि से ही करनी पड़ेगी। पर इसके लिये जिज्ञासा :- मैं एक वृद्ध हूँ, अधिक पढ़ा-लिखा भी नहीं हूँ। ऐसे में सबसे पहले व्यक्ति को शास्त्रदृष्टि वाला होना चाहिए। इससे पहले तो उसका मुझे तपस्या किस प्रकार करनी चाहिए। जीवन प्रकृति से परिचालित होता है। ऐसे में उसकी बुद्धि भी निर्णय ठीक नहीं समाधान :- सर्वप्रथम तो जो परिस्थिति सामने आवे उसे परमात्मा कर सकेगी। जब वह शास्त्रदृष्टि वाला हो जाता है तो कोई भी निर्णय लेने से का उपहार समझकर हाय-हाय किये बिना सहन करो। मन और इन्द्रिय का पहले यह विचार करता है कि शास्त्र इसका समर्थन करता है अथवा नहीं। निग्रह तो चाहे जवान हो चाहे वृद्ध, करना ही पड़ेगा। शरीर वृद्ध होता है, यद्यपि शास्त्र हमारे हृदय में भी है पर उसकी सुनता कौन है! शास्त्र इन्द्रियाँ और मन वृद्ध नहीं होते। इसलिये उनपर विश्वास किये बिना ध्यान कहता है सत्य बोलो, उस समय आपके हृदय से भी आवाज आनी चाहिए कि रखना पड़ेगा। इसके साथ-साथ जितना सहन हो सके उतना तीर्थ-स्नान करें। सत्य बोलना हमारा स्वभाव है, झूठ के लिये कोई निमित्त चाहिए। तब शास्त्र रोजाना सम्भव न हो तो अमावस्या, पूर्णिमा इत्यादि पर्वों पर करें। आलस्य और हृदय का मिलान हो जाएगा। फिर दिखेगा कि शास्त्र जो कहता है वही को किसी प्रकार से आश्रय न दें। किसी की निन्दा-स्तुति से प्रयास करके बचें। उचित है, वही न्याय है और वही हमारे हित में है। इस प्रकार जब उसे ये परमार्थ मार्ग में बहुत बड़े बाधक हैं। चौबीस घण्टे में कितना समय व्यर्थ शास्त्रवचन में हित दिखेगा तब अहित की ओर प्रवृत्त नहीं होगा। इसलिये जा रहा है इसका गणित लगाकर उस समय को संकुचित करें। अधिक से

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ साधकचर्या अधिक समय जप-भजन और सत्संग में लगाएं। आप साधक हैं, आपका लक्ष्य परमार्थ है तो दुनिया भर की बातें करने की क्या जरूरत है। जितना आदि का निषेध क्यों किया जाता है?

आवश्यक हो, हमारे परमार्थ मार्ग में सहायक बनता हो उतना ही बोलें। इस समाधान :- भाष्यकार भगवान् ने विवेक चूड़ामणि में कहा है - शरीरपोषणार्थी सन् य आत्मानं दिदृक्षति। प्रकार अन्य भी बहुत सी सावधानियाँ हैं जिनका पालन करते हुए अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। तब आप बहुत बड़ी तपस्या कर लेंगे। ग्राहं दारुधिया धृत्वा नदीं तर्तुं स इच्छति॥। (८६) जो दिन रात शरीर के पोषण में लगा हुआ है, कहीं बीमार न हो जाए, ** भ* जिज्ञासा :- उद्धरेद् आत्मना आत्मानम्।(गीता-६.५) यहाँ पर कहीं मर न जाए इसी चिन्ता में लगा रहता है और आत्मदर्शन भी करना चाहता

किस आत्मा के द्वारा किस आत्मा का उद्धार करने को कहा है? है, उसकी दशा को भाष्यकार भगवान् एक दृष्टान्त से समझाते हैं। एक व्यक्ति

समाधान :- शास्त्र में आत्मा शब्द जहाँ भी आये समझ लेना चाहिए नदी पार करना चाहता था। नदी के किनारे पर एक ग्राह (मगर) पड़ा था, उसने

कि मेरी कथा चल रही है। समस्या यही हो जाती है कि हम लोग अपने से समझा यह कोई लकड़ी है, इससे मैं नदी पार कर जाऊँगा और वह उस पर बैठ

बाहर चले जाते हैं। 'आत्मा का उद्धार करो' इससे समझना चाहिए कि गीता गया। क्या वह कभी नदी पार कर पाएगा!

कह रही है - अपना उद्धार करो। इसका मतलब आप कहीं फँसे हुए हैं। नहीं इसी प्रकार इस संसाररूपी नदी को पार करने में मुख्य बाधक

तो निकालने की बात गीता क्यों कहती? अब यह जानना पड़ेगा कहाँ फँसे हैं। देहाध्यास ही है। शरीर का अधिक पोषण तथा उसका शृंगार देहाध्यास को

इसका समाधान है - आपका जो मैं है वह चेतन है। उसको आपने जड़ में बढ़ाते ही हैं। इसलिये इन सबका साधक के लिये निषेध किया गया है। **** फँसा दिया। मैं कहने पर शरीर ही आता है, जबकि मैं का अर्थ शरीर हो ही नहीं जिज्ञासा :- सकता। यह शरीर तो व्यवहार के लिये साधन है। आपने साधन को ही मैं मान लिया। इस प्रकार मानना ही अनेक दुःखों का कारण बन गया? अब आप फँस गीता के निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या ...

गये। (१५.५) इस श्लोक के भाष्य में 'अध्यात्मनित्या' शब्द का अर्थ लिखा है

यहाँ से निकलें कैसे? तो कहा - फँसे आप स्वयं हैं तो निकलना भी परमात्मस्वरूपालोचननित्याः तत्पराः। आश्रम में रहने वाले साधु को

आपको ही पड़ेगा। जो वस्तु अविचार से उपस्थित हुई हो उसके निवारण का काफ़ी समय सेवा आदि व्यवहार करना पड़ता है। तब २४ घण्टे

उपाय विचार ही हो सकता है। इसलिये निष्काम कर्मयोग और उपासना से परमात्मस्वरूप का चिन्तन कैसे करे?

सुसंस्कृत हुई बुद्धि के द्वारा जब आप विचार करेंगे तब आपका मैं इस समाधान :- इस श्लोक में ज्ञानी महापुरुष का लक्षण कहा गया है।

कार्यकरणसंघात से निकल कर शुद्ध स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाएगा। तब आप ज्ञानी का तो शरीर से होने वाले किसी कर्म या व्यवहार से कोई सम्बन्ध ही

आत्मा के द्वारा आत्मा का उद्धार कर लेंगे। नहीं रहता क्योंकि वह जिस ब्रह्मतत्त्व में प्रतिष्ठित है वह अक्रिय है। ज्ञानी शरीर आदि के व्यवहार को अपने में आरोपित नहीं करता। इसलिये उसका कोई **** जिज्ञासा :- साधक के लिये देह-शृंगार, अधिक पौष्टिक भोजन व्यवहार उसके परमात्मचिन्तन में बाधक नहीं बन सकता। जैसे नाटक के पार्ट का कोई व्यवहार अभिनेता के वास्तविक ज्ञान में बाधक नहीं बनता।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ साधकचर्या हाँ! साधक के लिये भी गीता में भगवान् ने ज्ञान के साधनरूप से से सम्बन्ध ही टूट जाएगा। जैसे हाथ-पैर स्वाभाविक हिलते हैं ऐसे ही उसके अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् को कहा है। साधक के लिये अवश्य समस्या है लिये व्यवहार स्वाभाविक हो जाएगा। हमारे अनुभव के अनुसार तो यही एक क्योंकि वह जिस मन से व्यवहार करता है उसी मन से उसे निरन्तर उपाय दिखाई देता है, साधक यदि निरन्तर इसे अपनाता है तो उसको धीरे- परमात्मचिन्तन का अभ्यास करना पड़ेगा। इसमें भी जो साधक विविदिषु धीरे अध्यात्मज्ञाननित्यत्व का अनुभव हो जाएगा। संन्यासी है, जिसने पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा तीनों को त्याग दिया है, भिक्षावृत्ति से जीवननिर्वाह करता है और निरन्तर परमात्म-चिन्तन करता है जिज्ञासा :- आश्रम में रहकर सेवा करने वाले साधुओं को अपना उसके लिये यह समस्या नहीं आएगी क्योंकि उसने व्यवहार ही छोड़ दिया है। व्यवहार कैसा रखना चाहिए जिससे वे लक्ष्य की ओर बढ़ सकें? जो साधक इस प्रकार के चिन्तन की निष्ठा में जीवन नहीं बिता पा रहा है, जिसके अन्दर इस प्रकार का बल नहीं है उसके लिये यह समस्या आती है। समाधान :- साधुओं को चाहिए कि सचाई को कभी न भूलें क्योंकि हम सत्य के उपासक हैं। हम तो कई बार आश्रम के प्रबन्धक सन्तों को भी भोजन बनाते समय साक्षी भाव तो रहेगा नहीं, मैं भोजन बना रहा हूँ यह भाव कहते थे कि व्यवहार में तो विषमता रहती ही है, परन्तु हम आत्म-उपासक हैं, रहेगा। उस समय यदि साक्षी भाव में केन्द्रित रहे तो भोजन ही बिगड़ जाएगा। कभी किसी को थप्पड़ भी मारना पड़े तो अपने से बाहर करके नहीं मारना। आटा लेकर बैठे तो रोटी सेंकना ही भूल जाएगा। बड़ी जटिल समस्या है! इस अरे! कभी अपनी अंगुली काटनी पड़ती है, पर शत्रुता से नहीं शरीर के हित की समस्या के लिये दो उपाय हैं- दृष्टि से काटते हैं। इसी प्रकार हम आत्म-उपासक हैं, सब हमारी आत्मा हैं। (१) इस प्रकार का अभ्यास करता रहे जिससे कर्म के साथ वास्तविक इसलिये हमारे मन में कभी विषमता नहीं आनी चाहिए। हम अपने लक्ष्य को न सम्बन्ध मालूम न हो, अथवा भूलते हुए सावधानी से व्यवहार करेंगे तो व्यवहार हमें स्पर्श नहीं कर पाएगा। (२) उसका प्रत्येक कर्म स्व से सम्बन्धित न रह कर ईश्वर से यह कला भी व्यवहार करके ही मिलेगी क्योंकि साधु बनने से पहले तो हमने सम्बन्धित हो जाए। निरन्तर ध्यान रखे कि इस कार्यकरण-संघात को बनाने वाला ईश्वर है, उसने यह कर्तव्य दिया है, उसकी शक्ति से मैं इसे पूरा कर रहा इस दृष्टि से व्यवहार किया नहीं था।

हूँ। हमारे महाराजश्री कहते थे, ईश्वर से साचे रहो और सद्गुरु से

ऐसे साधक का जीवन ईश्वर-प्रणिधान के आधार पर चलता है। जहाँ सद्भाव। साधक को हमेशा यह समझना चाहिए कि ईश्वर हमारी एक-एक चेष्टा को, एक-एक संकल्प को जानता है। साथ ही गुरु से कभी कुछ भी उसे सत्संग, वेदान्तश्रवण तथा चिन्तन की सुविधा मिलेगी वहाँ रहेगा। वहाँ जो कुछ कर्तव्य आएगा उसे गुरुसेवा अथवा ईश्वर की पूजा मान कर करेगा छुपाना नहीं चाहिए क्योंकि गुरु से छुपाओगे तो दोष दूर कैसे होगा? इस प्रकार संसार में अपने पार्ट को पूरा करो। तो उसका सीधा सम्बन्ध उससे नहीं बनेगा। बाकी समय वह अध्यात्मचिन्तन **** में लगा रहेगा तो वही संस्कार उसे २४ घण्टे सम्भालेगा। इस प्रकार धीरे-धीरे जिज्ञासा :- गीता में भगवान् ने कहा है - बहूनां जन्मनामन्ते व्यवहारकाल में भी उसका चिन्तन बना रहेगा। यदि साधक प्रत्येक व्यवहार को ईश्वर या गुरु से सम्बन्धित करने में समर्थ हो जाएगा तो उसका व्यवहार ज्ञानवान् मां प्रपद्यते।(७.१६) क्या एक जन्म में ज्ञान नहीं हो सकता? समाधान :- अरे भाई! साधक की व्यवस्था कोई एक जन्म में नहीं

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ साधकचर्या होती है, उसमें अनेक जन्म लगते हैं। यदि पूर्वजन्म का संस्कार नहीं है तो नैष्ठिक ब्रह्मचारी के लिये गैरिक वस्त्र पहनना कोई अनिवार्यता नहीं व्यक्ति को अध्यात्मविषयक जिज्ञासा ही कैसे होगी? साधक का विकास क्रमिक होता है, उसके सभी पूर्व संस्कार साथ में आते हैं। सत्संग का भी है। वह चाहे तो सफेद वस्त्र पहन सकता है। पर प्रायः वह गैरिक वस्त्र पहनता है क्योंकि इससे संन्यास की ओर बढ़ने की आन्तरिक प्रेरणा प्रबल होती है। संस्कार रहता है और जगत् का भी, दोनों साथ-साथ चलते हैं। धीरे-धीरे **** सत्संग के संस्कारों का बल बढ़ता जाता है। इसका कारण यह है कि असत् का जिज्ञासा :- कल्याण प्राप्त करने का सहज उपाय क्या है? संस्कार सत् के संस्कार को ढ़क तो सकता है पर नष्ट नहीं कर सकता। जबकि समाधान :- महाभारत में कहा है - सत् का संस्कार बलवान् होने पर असत् के संस्कार को नष्ट कर देता है। सर्वं जिह्यं मृत्युपदमार्जवं ब्रह्मणः पदम्। साधक के सत्-संस्कार प्रबल होने पर अगले जन्म में प्रारम्भ से ही उसका अध्यात्म की ओर झुकाव रहता है, उसमें संसार की वासना रहती ही एतावान् ज्ञानविषयः किं प्रलापः करिष्यति॥(आश्वमेधिकपर्व-११.४) जो अपना कल्याण चाहता है उसे इधर-उधर की बातों में उलझने की नहीं है। उसका शम, दम, उपरति आदि स्वाभाविक ही सिद्ध हो जाता है क्योंकि मन और इन्द्रियों को तो संसार ही खींचता है, पर उसमें तो संसार का आवश्यकता नहीं है। यदि तुम्हारे व्यवहार में कहीं भी कुटिलता है तो समझो

आकर्षण है ही नहीं। वह मोक्ष के लिये ही छटपटाता है, इसलिये वह ज्ञान को तुम मृत्यु अर्थात् जन्म-मरण के चक्र का वरण कर रहे हो। आजकल तो

प्राप्त कर ही लेगा। इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है। जब ज्ञान प्राप्त करेगा व्यवहार ऐसा हो गया है कि व्यक्ति दिखावे के बिना रह ही नहीं पाता। परन्तु

तो समझेगा - वासुदेवः सर्वम्। यह ध्यान रखो कि तुम्हारे जीवन में थोड़ा भी दिखावा है तो तुम मृत्युपद में जा रहे हो। **** जिज्ञासा :- नैष्ठिक ब्रह्मचारी किसे कहते हैं? वह गैरिक वस्त्र क्यों तुम्हारा जीवन एकदम दिखावा-रहित हो जाए, कुटिलता से रहित हो जाए तो तुम ब्राह्मण हो जाओगे, ब्रह्मपद को प्राप्त कर लोगे। एतावान् पहनता है? ज्ञानविषय :..... , इतना ही जानने की और जानकर करने की जरूरत है, समाधान :- हमारे यहाँ शास्त्रीय परम्परा में दो प्रकार के ब्रह्मचारी होते हैं - उपकुर्वाण और नैष्ठिक। जो गुरुकुल में विद्याध्ययन के लिये बहुत बकवाद करने से क्या फायदा है। कोई व्यक्ति जीवन को सभी प्राणियों के प्रति सरल-सहज बना ले तो वह ब्रह्मपद को प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्य का पालन करता है परन्तु समावर्तन संस्कार होने के बाद गृहस्थाश्रम **** में प्रवेश करने का इच्छुक है उसे उपकुर्वाण ब्रह्मचारी कहते हैं। वह मुख्य जिज्ञासा :- कोई साधक आश्रम की सेवा ही करे और जप न करे तो ब्रह्मचारी नहीं है क्योंकि उस ब्रह्मचर्य का विद्याध्ययन के साथ सम्बन्ध है, व्रत क्या उसका कल्याण हो सकता है? के साथ नहीं। एक ब्रह्मचारी ऐसा भी है जो समावर्तन संस्कार होने के बाद समाधान :- वह साधक जप क्यों नहीं करता? सेवा करते समय मन विचार करता है कि मैं गृहस्थाश्रम स्वीकार करके जगत् में क्यों फँसूं? मनुष्य शरीर मिला है तो मैं स्वाध्याय करूँगा, भजन करूँगा। वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहीं-न-कहीं तो जाता ही होगा, उसे जप में लगा सकता है। आप कहो कि जप में मन लगाने पर सेवा ही बिगड़ जाती है तो पहले यहाँ से शुरू करो - कहलाता है क्योंकि ब्रह्मचर्यपालन में उसकी निष्ठा हो गई है। सोचो कि हम भगवान् और गुरु की सेवा कर रहे हैं, ऐसा सोचने पर सेवा के

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ साधकचर्या समय भगवान् और गुरु का स्मरण होगा। यदि आपके अन्दर पक्का निश्चय का अभ्यास बनाओगे तो विवेक प्राप्त हो जाएगा। जब विवेक प्राप्त हो हो जाए कि भगवान् ने ही मुझे इस कार्य में नियुक्त किया है और मैं इसके द्वारा जाएगा तो तुम जगत् को पढ़ने में समर्थ हो जाओगे। जगत् को पढ़ लोगे तो भगवान् की और गुरु की सेवा कर रहा हूँ तो आपको उनका स्मरण सेवा के समय होता रहेगा। गुरु का स्मरण आने पर मन्त्र का स्मरण भी आने लगेगा। इससे वैराग्य हो जाएगा। स्कूल में ठीक से पढ़ लोगे, पास हो जाओगे तो स्कूल छूट जाएगा। जगत् को पढ़ोगे तो जगत् छूट जाएगा। हमलोग जगत् की उसपर आप ध्यान देंगे तो धीरे-धीरे आपके लिए वह सहज हो जाएगा। परीक्षा ही नहीं करते। परीक्षा करोगे तो पता चलेगा कि यहाँ केवल धोखा है। आपके विशेष ध्यान दिए बिना ही मन्त्रजप चलता रहेगा और आपकी सेवा में तब मन एकदम से हट जाएगा। कोई विघ्न भी नहीं होगा। नचिकेता ने यमराज से यही तो कहा था - श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः। (कठ उप. - १.१.२६) जिज्ञासा :- साधक का सबसे बड़ा शत्रु कौन है? हे धर्मराजजी! आप हमें जो विषय दे रहे हैं ये तो शरीर, इन्द्रिय और समाधान :- आलस्य और प्रमाद से बढ़कर साधक का कोई शत्रु नहीं मन के तेज को क्षीण करने वाले हैं। जो हमारे तेज को क्षीण करें ऐसी चीजें है। अपने कर्तव्य का भान न रहना प्रमाद है और कर्तव्य का भान होने पर भी हमें क्यों दे रहे हैं। यदि नचिकेता जैसी समझ हमारी बन जाए तो जगत् से तामस सुख के लोभ से उसे न करना आलस्य है। साधक को रोज रात्रि में वैराग्य अवश्य हो जाएगा। सोने से पहले यह विचार करना चाहिए कि जो २४ घण्टे बीते उन्हें मैंने कर्तव्य में बिताया अथवा कहीं प्रमाद किया। सनत्कुमार ने धृतराष्ट्र से यही कहा था- जिज्ञासा :- कार्यालय में कार्य करते हुए भगवान् को कैसे याद रखें? प्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमि।(सनत्सुजातीय-१.४) शरीर छोड़ने का नाम समाधान :- तुम ऑफिस में काम करने जाते हो, उस समय घर में मृत्यु नहीं है, प्रमाद ही मृत्यु है। अपने कर्तव्य को भूल जाना ही मृत्यु है। तुम्हारा लड़का बीमार हो तो मन में उसकी याद क्यों आती है? ऑफिस में मनुष्य शरीर किसलिये मिला है? मैं के अर्थ को तुम ठीक से जान पत्नी की याद क्यों आती है? एक सम्बन्ध तुम्हारे अन्दर बना है तभी याद लो, भगवद्-दर्शन कर लो इसी के लिये मिला है। दूसरे किसी शरीर में यह आती है। जिसके प्रति जितना गहरा लगाव है उसकी उतनी ही अधिक याद काम नहीं हो सकता। इस कर्तव्य को व्यक्ति भूल गया तो मृत्यु के मुख में आती है। यदि भगवान् से गहन सम्बन्ध हो जाए तो उनकी हमेशा याद जाएगा ही, जन्म-मरण का चक्र चलता रहेगा। आयु का एक क्षण हम करोड़ आएंगी। यह स्त्री-पुत्र का सम्बन्ध तो व्यावहारिक है, क्षणिक है। पिछले जन्म रुपये में भी नहीं खरीद सकते। इतना कीमती समय यदि प्रमाद से व्यर्थ जा रहा में भी तुमने ऐसे सम्बन्ध बनाए होंगे पर आज उनकी स्मृति भी नहीं है। जिस है तो इससे बड़ी हानि कोई नहीं हो सकती। सम्बन्ध को आज बहुत बड़ा मान रहे हो वह एक दिन याद भी नहीं रहेगा। **** भगवान् से तो तुम्हारा सनातन सम्बन्ध है। यह शरीर, यह आँख, यह जिज्ञासा :- विवेक और वैराग्य को कैसे प्राप्त करें? बुद्धि सब उसने ही बना कर दिया है। इन्हीं को लेकर तुम कार्यालय में और समाधान :- हमारा सिद्धान्त तो एक ही है। सचाई को झुठलाते रहोगे बाहर भी अपना कार्य करने में सक्षम हो रहे हो। पिछले जन्मों में भी तुम्हारे तो विवेक कभी प्राप्त नहीं हो सकता और जीवन में सचाई को स्वीकार करने शरीर की रचना उसी ने की थी और आगे के जन्मों में भी वही करेगा। तुम्हारे

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ साधकचर्या प्राणों को वही चला रहा है, प्रतिक्षण तुम्हें चेतनता प्रदान कर रहा है। भगवान् से बड़ा हमारा सम्बन्धी और कौन हो सकता है। पर माया इसे भुला देती है। चाहिए। शास्त्र की आज्ञा तो यही है कि भगवद्भजन जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है। उसके समय में यह काम कर लें, वह काम कर लें ऐसी तुम इस बात को मन में बैठाओ कि जगत् से हमारा सम्बन्ध केवल व्यवहार बहानेबाजी नहीं करनी चाहिए। यदि कहो जानते हुए भी नहीं बैठ पाते, इसका के लिये है। हमारा पारमार्थिक सम्बन्ध तो परमेश्वर से ही है। इस सम्बन्ध को अर्थ मन में कमजोरी है। मन को दृढ़ करना चाहिए। चलते-फिरते भजन करना मन में मजबूत करोगे तो कार्यालय में भी उसकी याद बनी रहेगी। भी अच्छा है पर वह नियमितरूप से एक निश्चित समय बैठकर किए जाने वाले भजन का विकल्प नहीं हो सकता। इसलिये सुबह जल्दी उठकर भजन तो जिज्ञासा :- सन्त लोग बताते हैं, "प्रातःकाल बैठकर भजन करना करना ही चाहिए। यदि सुबह देर से भजन में बैठोगे तो मन नहीं लगेगा क्योंकि चाहिए"। गृहस्थी में जिम्मेदारी बढ़ने पर सुबह प्रायः समय नहीं मिलता। ऐसे जितना प्रातःकाल का समय बढ़ता जाता है उतना ही मन में रजोगुण भी बढ़ता में क्या करें? जाता है। इसीलिये ब्रह्ममुहूर्त का समय भजन के लिये श्रेष्ठ कहा है। सबसे समाधान :- आप लोगों ने व्यावहारिक कार्यों को अधिक महत्त्व दे मुख्य बात तो यह है कि शास्त्र जिस कार्य को जिस समय करने के लिये दिया है और भजन को कम। इसीलिये भजन के लिये समय नहीं मिलता। कहता है उसे उसी समय करना चाहिए, उसमें तर्क-वितर्क मत करो। उपाय भजन को महत्त्व देंगे तो उसके लिये समय अपने आप निकाल लेंगे। आपके यही है कि आप भजन का महत्त्व मन में बैठाएं। सामने बहुत काम है और भोजन करने का समय हो गया तो क्या भोजन नहीं *** भ करोगे? कोई कहे कि हम भोजन छोड़कर काम ही करेंगे तब तो काम करने जिज्ञासा :- साधक के व्यवहार करने की सीमा कहाँ तक होनी की शक्ति ही नहीं आएगी। जीवन में कौनसा काम अधिक महत्त्वपूर्ण है इस चाहिए? कौन-सी सावधानी बरते कि अनावश्यक व्यवहार कम होता जाए? विषय में शास्त्रों में समझाया है - समाधान :- जितना व्यवहार उसके परमार्थ में सहायक बनता है, उतना शतं विहाय भोक्तव्यं सहस्रं स्नानमाचरेत्। ही करना चाहिए। ऐसा व्यवहार न करे जो बहिर्मुख बनानेवाला हो। पर साधक आपके सामने सैकड़ों काम पड़े हों और भोजन का समय हो जाए तो चाहे कि एक दिन में ही सावधान हो जाए, ऐसा तो कठिन है। पहले उसको सब छोड़कर पहले शान्ति से भोजन कर लेना चाहिए। हजार काम भी आप के प्रतिदिन सावधान रहकर व्यवहार करते हुए सोने से पहले चौबीस घण्टे का सामने हों पर स्नान-सन्ध्या का समय हो गया तो सब छोड़कर पहले स्नान स्मरण करना चाहिए कि आज कितनी बार झूठ बोला, मन कितनी बार करना चाहिए। स्नान से ही तनशुद्धि होती है। अशान्त हुआ, कितनी बार जगत् सम्बन्धी अनावश्यक चिन्ता हुई, भजन में आगे कहा - लक्षं विहाय दातव्यं .... दान देने का निमित्त उपस्थित मन लगा कि नहीं लगा? इस प्रकार लाभ-हानि का स्मरण करने पर चौबीस हो जाए तो चाहे लाखों काम तुम्हारे सामने हों फिर भी पहले दान दे दो फिर घण्टे की गलतियाँ पकड़ में आ जाएँगी। आज क्रोध आया तो क्यों आया! अन्य काम करो। धनशुद्धि दान से ही होगी। पर अन्तिम में बता दिया - सर्वं क्षोभ हुआ तो क्यों हुआ! किसी के प्रति राग या द्वेष हुआ तो क्यों हुआ! इस त्यक्त्वा हरिं भजेत्॥। प्रकार जैसा भी अपना व्यवहार हुआ, वह भगवान् के सामने रखकर उनसे सारे काम छोड़कर भी नियमित भजन के लिये तो समय निकालना ही प्रार्थना करे कि हे भगवन्! यह हमारा हिसाब है।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ साधकचर्या व्यवहार में भी आप देखते हैं - यदि दुकानदार अपनी दुकान का प्रतिदिन हिसाब नहीं रखेगा तो कभी भी धोखा हो सकता है क्योंकि उसको जिज्ञासा :- आत्मसाक्षात्कार में उपस्थित रहनेवाले प्रतिबन्ध को कैसे हानि-लाभ का ज्ञान ही नहीं रहेगा। इस प्रकार साधक भगवान् के सामने अपना दूर किया जाए ? हिसाब रखकर प्रार्थना करे कि क्या करें, आज हमसे यह गलती हो गई। आप समाधान :- प्रतिबन्ध को दूर करने के लिए पुरुषार्थ ही मुख्य रूप से हमें बल दें कि पुनः यह गलती न हो। जब इस प्रकार प्रतिदिन अपने व्यवहार साधन है। जब आपका पुरुषार्थ उस प्रतिबन्ध से अधिक हो जाएगा तो वह का हिसाब रखेगा तो धीरे-धीरे उसमें सुधार आ जाएगा और जितना प्रतिबन्ध दूर हो जाएगा। सर्वप्रथम तो आत्मसाक्षात्कार में जो प्रतिबन्ध आवश्यक है, उतना ही व्यवहार होने लगेगा, अर्थात् व्यवहार सीमित हो उपस्थित है, उसे पहचानना चाहिए। फिर विचार करना चाहिए कि देखो, इसी जाएगा। प्रतिबन्ध ने पूर्व में भी मुझे आत्मसाक्षात्कार से वञ्चित रखा था, इसीलिए जन्म लेना पड़ा। यदि यह वर्तमान में भी बना रहा तो फिर से जन्म लेना पड़ेगा। **** जिज्ञासा :- साधक को कोई अनुष्ठान गुरु के सान्निध्य में ही करना इसलिए पहले उसे पहचानना चाहिए कि जगत्-सम्बन्धी वासना का आधिक्य चाहिए अथवा दूर रहकर भी कर सकता है? है या बुद्धिमान्द्य है अथवा गुरु, शास्त्र के वचनों पर विश्वास नहीं हो रहा है समाध समाधान :- साधक अनुष्ठान दूर रहकर करे अथवा समीप, मुख्य बात क्योंकि मुख्य रूप से ज्ञान में ये तीन ही प्रतिबन्ध बनते हैं। इस प्रकार पहचान है कि गुरु के द्वारा मार्गदर्शन लेकर ही करे, मनमानी न करे। मात्र पुस्तक में कर उचित साधन के द्वारा इनका निवारण करना चाहिए। **** पढ़कर अनुष्ठान कभी भी नहीं करना चाहिए। यदि परम्परा के अनुसार गुरु से मन्त्र लेकर अनुष्ठान करता है तब गुरु तो मन्त्र बनकर हृदय में बैठा रहता है, जिज्ञासा :- साधक के लिए ब्रह्मचर्य की रक्षा करना आवश्यक क्यों है फिर दूरी कहाँ से हुई! और रक्षा करने के उपाय क्या-क्या हैं? समाधान :- ब्रह्मचर्य की रक्षा करने में प्रश्नकर्ता का तात्पर्य वीर्यरक्षा से जिज्ञासा :- पुरश्चरण काल में प्रतिग्रह (भेंट) लेने का निषेध किया है। है, तो शास्त्र में वीर्य को प्राण ही माना है। वीर्य का मन-बुद्धि से प्रत्यक्ष यदि कोई आश्रमधारी साधक पुरश्चरण करे तो उसे प्रतिग्रह के विषय में क्या सम्बन्ध रहता है। यदि वीर्य रक्षित है तो मन भी स्थिर रहता है और बुद्धि भी निर्णय लेने में समर्थ होती है। मन-बुद्धि वश में हैं तो वीर्य भी रक्षित हो जाता करना चाहिए? है। इसलिए परमार्थ मार्ग में बढ़नेवालों के लिए ब्रह्मचर्य-पालन का विशेष समाधान :- पुरश्चरण करनेवाला साधक आश्रम से सम्बन्धित नहीं रहेगा, इसलिए उसे पुरश्चरण काल में किसी से किसी प्रकार का प्रतिग्रह नहीं महत्व है। अरे! वीर्यहीन व्यक्ति क्या करेगा! वह तो कुछ भी सहन करने में लेना चाहिए। चाहे वह आश्रम के लिए ही क्यों न हो! जब उसका आश्रम से समर्थ नहीं होता। यहाँ तक कि शारीरिक सामर्थ्य के लिए भी शरीर में वीर्य की सम्बन्ध ही नहीं है तो प्रतिग्रह क्यों लेना! व्यवस्था चलाने के लिए अनिवार्यता है। व्यवस्थापक लोग लेते रहें, पर पुरश्चरण करनेवाले साधक को तो उससे 5 हठ मात्र से तो ब्रह्मचर्य-पालन करना कठिन है। इसके लिए आहार- अलग रहना चाहिए। व्यवहार को सन्तुलित करना पड़ता है। शास्त्रों में अष्ट प्रकार का मैथुन बताया गया है। जो साधक इनके प्रति सावधान रहेगा, वही ब्रह्मचर्य का पालन कर

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ साधकचर्या

सकता है। करके उस मिथ्या आरोप से उन्हें मुक्त किया। इस प्रकार साधक को भी बहुत ब्रह्मचर्यं सदा रक्षेदष्टधा लक्षणं पृथक्। ज्यादा सफाई देने की अपेक्षा भगवान् पर ही विश्वास रखना चाहिए। स्मरणं कीर्तनं केलि: प्रेक्षणं गुह्यभाषणम्।। **** संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिर्वृत्तिरेव च। जिज्ञासा :- ब्रह्मचारी को भिक्षा लेते समय वर्णाश्रम का विचार करना एतन्मैथुनमष्टाङ्गं प्रवदन्ति मनीषिणः॥(दक्षसंहिता) चाहिए अथवा नहीं? स्त्री-विषयक स्मरण, उनके साथ वार्ता-चर्चा, क्रीडा(चौपड़ इत्यादि समाधान :- हाँ, ब्रह्मचारी को भिक्षा लेते समय वह घर शास्त्रीय है खेलना), उन्हें रागपूर्वक देखना, उनसे एकान्त में बातचीत करना, अथवा नहीं, इस पर तो विचार करना ही चाहिए क्योंकि वह अभी साधक है। कामविषयक संकल्प करना, रतिविषयक प्रयास करना और रतिक्रिया के लिए साधक को भक्ष्य-अभक्ष्य का भी विचार करना पड़ता है। यदि घर शास्त्रीय प्रवृत्त हो जाना - मैथुन के ये आठ अङ्ग मनीषियों ने बताए हैं। नहीं है तो शास्त्रीय भिक्षा भी नहीं मिलेगी। ऐसी अवस्था में उसे कच्चा अन्न साधक को इन सबसे बचना चाहिए। कामविषयक उपन्यास का लेकर स्वयं भोजन बना लेना चाहिए। संन्यासी के लिए तो कहीं-कहीं चारों अध्ययन साधक के लिए सर्वथा वर्जित है। अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़निश्चय वर्णों के घरों से भिक्षा लेने का भी विधान मिलता है। होकर लगे रहें और मन्त्रजप, शास्त्राध्ययन में अधिक-से-अधिक समय इस विषय में एक बात विशेष रूप से विचार करने की है कि ढाँचा प्राण बिताएं तो ब्रह्मचर्य का पालन हो सकता है। केवल हठ के द्वारा वीर्य रोकने से के लिए होता है। ढाँचे में बहुत बुद्धि लगाने की आवश्यकता नहीं है। बुद्धि मन में अन्य विकृतियाँ आ जाती हैं। इसलिए साधक को प्रारम्भ में ही यहाँ लगानी चाहिए कि मैं सत्य बोलता हूँ कि नहीं, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सावधान रहना चाहिए जिससे कि काम का बीज अंकुरित ही न हो। अपरिग्रह इत्यादि में सावधान रहता हूँ या नहीं, शौच, सन्तोष इत्यादि गुण मेरे अन्दर हैं अथवा नहीं, अन्य आचार तो इनके लिए सहायक हैं। आहार- जिज्ञासा :- यदि कोई साधक निर्दोष है और समाज में उसपर किसी व्यवहार में अधिक उलझना नहीं चाहिए। बस, लक्ष्य के प्रति सावधान रहना प्रकार का दोषारोपण हो जाए, तो उसे प्रतिकार करना चाहिए या नहीं? चाहिए और भूख लगने पर अभक्ष्य को छोड़कर जो भी मिले उसे ग्रहण करके समाधान :- यदि साधक निर्दोष है तो वह समाज में अपनी निर्दोषता अपनी भूख को शान्त कर लेना चाहिए। न मिले तो भी ज्यादा क्षोभ नहीं करना सिद्ध कर सकता है, इसमें कोई हर्ज नहीं है। यदि ऐसा न कर सके तो भी अन्दर चाहिए, समझे कि आज उपवास हो गया। से उसे निश्चिन्त रहना चाहिए और भगवान् पर विश्वास करना चाहिए कि वे **** जो करेंगे वह ठीक ही होगा। उसे ज्यादा उपद्रव में पड़ने की आवश्यकता नहीं जिज्ञासा :- कोई साधक कैसे समझे कि मैं पूर्ण हो गया? है। समाधान :- जब वह पूर्ण हो जाएगा तो उसको स्वतः ही पता लग एक बार ईर्ष्यावश कुछ ब्राह्मणों ने गौतम ऋषि पर गोहत्या का झूठा जाएगा। आपका भोजन से पेट भर गया यह बात अन्य कोई कैसे बताएगा! पर आरोप लगाकर उन्हें दण्डित करना चाहा, पर गौतम ऋषि को भगवान् शिव एक निश्चय कर लीजिए कि यदि किसी में कोई इच्छा या प्रवृत्ति है, तो वह पर पूर्ण विश्वास था। वे अन्दर से निश्चिन्त थे। तब भगवान् शिव ने कृपा पूर्ण नहीं हुआ।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ साधकचर्या जिज्ञासा :- आज के युवा साधकों के सम्बन्ध में उनकी कमजोरियों को दूर करने के लिए क्या मार्गदर्शन हो सकता है? भगवान् ही करता है, वही लेता है और वही देता है, मैं कुछ नहीं कर सकता समाधान :- आज भी यदि कोई साधक है तो वह अपना कर्तव्य जानता हूँ। इस प्रकार का निश्चय रखते हुए वह धर्म का आचरण करता है। कर्तव्य से ही है, पर जानना अलग बात है और पालन करना अलग। आज के साधकों में विमुख भी नहीं होता और न ही अनधिकार चेष्टा करता है। वह किसी अप्राप्त भी ज्ञान का अभाव नहीं है। एक बालक से भी पूछो कि मन किसमें लगता है वस्तु की इच्छा भी नहीं करता और दूसरे की वस्तु के प्रति उदासीन बना रहता तो वह कहता है - "खेलने में।" फिर पूछो, लगना किसमें चाहिए? तब वह है। इस प्रकार का जो साधक है, उसमें असङ्गता प्रतिष्ठित जानना चाहिए। कहता है - "पढ़ने में।" देखिए! उसमें ज्ञान का अभाव नहीं है, पर उसे द्वितीय :- इस असङ्गतावाले साधक का निश्चय इस प्रकार का होता स्वीकार करने के लिए उसमें बल नहीं है। यही समस्या आजकल के युवा है कि मैं भी आकाशरूप हूँ और यह जगत् भी आकाशरूप है, मुझमें कोई साधकों की है। उन्हें बचपन में गर्भाधान से लेकर उपनयन पर्यन्त संस्कारों का क्रिया नहीं हो सकती। इन्द्रियाँ गुणों का कार्य हैं और गुणों में वर्तन कर रही हैं, जो आधार मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। आज युवा साधक को न मुझे इस क्रिया से कुछ लेना-देना नहीं है। जो साधक इस प्रकार के निश्चय से माता-पिता से, न समाज से और न ही विद्यालय से कोई संस्कार मिलता है। युक्त होकर उपरोक्त कहे गए धर्माचरण इत्यादि का पालन करते हुए विचरण इसलिए वह इस विषय में कमजोर रह जाता है। परिणाम यह होता है कि वह करता है उसमें भी असङ्गता प्रतिष्ठित समझनी चाहिए। अपने लक्ष्य का दृढ़ निश्चय करने में समर्थ नहीं हो पाता। इसलिए वह मन को **** बहलाने के लिए आधुनिकता (भौतिकता) का आधार अधिक लेने लगता है। बढ़े हुए बुद्धिवाद ने आज के युवा में उपासना की योग्यता को ही समाप्त कर दिया है और विज्ञान ने सहनशक्ति (तपस्या) को। तब उसमें बल कहाँ से आएगा क्योंकि बल के स्रोत तो ये दो ही हैं। अब तो वह पढ़कर या सङ्ग: सत्सु विधीयतां भगवतो भक्तिर्दृढ़ाSडधीयतां श्रवण करके केवल प्रवचन दे सकता है, जो परमार्थ मार्ग में बाधक ही है। पर शान्त्यादि: परिचीयतां दृढ़तरं कर्माशु सन्त्यज्यताम्। आज भी यदि कोई युवा साधक अपने को कमजोर समझकर बलवान सद्विद्वानुपसर्प्यतां प्रतिदिनं तत्पादुकां सेव्यतां ब्रह्मैकाक्षरमर्थ्यतां श्रुतिशिरोवाक्यं समाकर्ण्यताम्।। परमात्मा का आश्रय ग्रहण करे, मन्त्र का अधिक-से-अधिक अवलम्बन ले, (साधनपञ्चकम्-२) प्रतिदिन जीवन का हिसाब परमेश्वर को अर्पित करे और उससे प्रार्थना करे तो हे साधकों! सत्पुरुषों एवं सत्-शास्त्रों का ही सङ्ग करो। उसका कल्याण हो जाएगा। भगवान् की दृढ़ भक्ति प्राप्त करो। शम, दम आदि साधनों का संचय करो। बहिर्मुखी प्रवृत्तियों का शीघ्र त्याग करो। ब्रह्मनिष्ठ जिज्ञासा :- साधक असङ्गता से कैसे रह सकता है? गुरु के पास जाकर प्रतिदिन उनके चरणों का सेवन करते हुए उनसे अद्वितीय अविनाशी ब्रह्मतत्त्व के उपदेश की प्रार्थना करो। समाधान :- शास्त्र में दो प्रकार की असङ्गता बताई है- उनके द्वारा उपदिष्ट वेदान्त वाक्यों का समाहित चित्त से श्रवण प्रथम :- इसमें साधक का निश्चय होता है कि जो कुछ करता है वह करते रहो।

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साधना करनी है। ऐसा विचार यदि दृढ़ हो जाए तो धन छोड़ना सहज हो जाता है। **** जिज्ञासा :- प्रणव को आधार बनाकर जो साधन किया जाता है उसको साधना उपासना कोटि में रखा जाए या ज्ञान कोटि में?

जिज्ञासा :- ऐसा लगता है कि धन साधना में विक्षेप करता है। इसे बिना समाधान :- प्रणव को आधार बनाकर आप उपासना भी कर सकते हैं

कष्ट छोड़ने का उपाय क्या है? और विचार भी। भावनात्मक प्रक्रिया बनती है तो उपासना की कोटि में होगी, इसे ब्रह्मोपासना भी कहते हैं। प्रणव का आधार लेकर जो विचारात्मक शोधन समाधान :- विक्षेप में हेतु धन ही है यह बात आवश्यक नहीं है। किसी को ऐसा भी लग सकता है कि धन का अभाव विक्षेप करता है। यदि आप गृहस्थ आदि प्रक्रिया है वह ज्ञान की कोटि में आएगी। **** हैं तो परिवार का पालन करना भी आप का कर्तव्य है। ऐसे में आपको धन की आवश्यकता होगी ही और उसके अर्जन के उपाय को भी भजन समझना पड़ेगा। जिज्ञासा :- शास्त्रों में कामनाओं को दबाने की बात आती है, पर

उसे भगवान् के साथ जोड़ना पड़ेगा कि भगवान् ने हमको यह सेवा दे रखी है। आजकल डॉक्टर लोग कहते हैं- इच्छाओं को दबाने से बीमारी हो सकती है।

अपने कर्तव्य कर्म के द्वारा हम परमेश्वर की आराधना करते हैं- स्वकर्मणा ऐसे में क्या करना चाहिए?

तमभ्यर्च्य ..... (गीता-१८.४६)। हमारा तो परमेश्वर से सम्बन्ध है। समाधान :- कामनाओं को दबाने से बीमारी हो जाती है यह आजकल

इस प्रकार आप चिन्तन करेंगे तो धन आपके विक्षेप में हेतु नहीं बनेगा। के मनोविज्ञान की धारणा है। कामनाओं को दबाने का तात्पर्य समझना चाहिए।

बल्कि धन के अभाव में कर्तव्य से विमुख होना भी आपके विक्षेप में हेतु बन आप उन्हें ऐसे ही दबा नहीं सकेंगे, उसकी एक विधि है। उन्हें धीरे-धीरे उखाड़ने

जाएगा। जीवन में कभी-कभी छोटी-छोटी बातें भी साधना में विक्षेप का हेतु बन की प्रक्रिया है। जैसे आप ध्यान में बैठे हैं और कोई वृत्ति मन में आ जाए तो उसे

जाती हैं। हाँ, यदि आपका परिवार के प्रति कोई कर्तव्य नहीं है, आपने केवल हटाने के लिये दूसरी वृत्ति लानी चाहिए जो शास्त्रीय हो। इस प्रकार उसे दबाना

मोह से या लोभ से धन को पकड़ रखा है तो आपको उसे छोड़ना ही चाहिए। भी नहीं पड़ेगा और उसका मार्ग बदल जाएगा। जब कोई वृत्ति इच्छा के रूप में बार-बार उठे तो उसको महत्त्व नहीं देना चाहिए। उस इच्छित वस्तु में दोष देख आपको विचार करना चाहिए कि जितना हमारी साधना में कम से कम आवश्यक है उतने ही धन की अनिवार्यता है। उससे ज्यादा धन की अपेक्षा क्यों रखें? कर वहाँ से वृत्ति को हटाकर अन्य जगह लगाना चाहिए। तब धीरे-धीरे वह कामना शान्त हो जाएगी। परमात्मा के प्रति साधक का विश्वास दृढ़ होना चाहिए। जो परमात्मा बालक के उत्पन्न होने से पहले माता के स्तनों में दूध उत्पन्न कर देता है, उसको एक बात का ध्यान अवश्य रखें कि कामनाओं का शमन भोग के द्वारा

बालक की जीवनरक्षा के प्रति कितनी चिंता है! वह हमको भूखा कैसे रहने देगा। नहीं हो सकता। भोग से तो कामना और बढ़ती जाएगी।

यदि किसी प्रकार भोजन नहीं मिलेगा और शरीर छूट भी जाएगा तो मेरा क्या न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति।

बिगड़ेगा। यह शरीर तो एक दिन छूटना ही है। इसलिये इसकी चिंता मुझे क्यों हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥(भागवत-६.१६.१४) जैसा आज का मनोविज्ञान कहता है कि यदि किसी वस्तु की इच्छा है तो

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ साधना पहले उसका उपभोग कर लो, उसके पश्चात् दूसरा कार्य करो, यह धारणा बिल्कुल गलत है। तरह देखना चाहिए? समाधान :- जब अन्तर्दृष्टि हो जाएगी उस समय मालूम हो जाएगा कि **** जगत् कैसा दिखाई देता है। अभी से उसकी चिंता क्यों करना। कोई पति-पत्नी जिज्ञासा :- अनादि काल से चली आ रही कामनाओं का किसी उपाय थे, किसी के मकान में किराये से रहते थे। वे रोजाना भोजन बनाने के बाद से शमन क्या सम्भव है? झगड़ा और तर्क-वितर्क करते। कभी-कभी तो झगड़ा इतना बढ़ जाता था कि समाधान :- भले ही कामनायें अनादि काल से चली आ रही हों परन्तु भोजन भी नहीं करते थे। एक दिन उनका झगड़ा सुनकर मकान मालिक उनके युक्ति से उनका शमन किया जा सकता है। शास्त्र में प्रत्येक कामना की पाँच पास गया और कहा-"बहुत हल्ला-गुल्ला करते हो। क्या समस्या है? यदि आप अवस्थाएं बताई हैं- प्रसुप्त, उदार, विच्छिन्न, तनु और दग्ध। बालक में कामना कहो तो हम कोई समाधान करें।" पत्नी ने कहा - "ये कहते हैं लड़के को अभी प्रकट नहीं हुई परन्तु ऐसा नहीं कह सकते कि है ही नहीं। इसलिये उसे डॉक्टर बनाना है, पर मैं उसे वकील बनाना चाहती हूँ।" मकान मालिक ने कहा कामना की प्रसुप्त अवस्था कहते हैं। फिर कुछ बड़ा होने पर जगत् की हवा लगी - "तुम लोग उसपर अपनी-अपनी रुचि क्यों थोपते हो? लड़के को ही बुला कि वे प्रसुप्त कामनाएं अपना प्रभाव दिखाने लगती हैं। यह उनकी उदार अवस्था है। अधिकांश संसारी व्यक्तियों की कामना की यही अवस्था होती है। वे लोग लो, उससे पूछ लेते हैं कि वह क्या बनना चाहता है?'उन्होंने कहा- "लड़का तो अभी पैदा ही नहीं हुआ।" मकान मालिक ने कहा -"अरे! जब पैदा ही नहीं कामना को अपना मित्र समझकर उसमें ही फँसे रहते हैं। हुआ तो अभी से क्यों झगड़ रहे हो! जैसा उसका संस्कार होगा वैसा बन यदि व्यक्ति साधक होगा तो वह कामना के दोषों का विचार करेगा। विचार करने पर पहले वे विच्छिन्न होंगी। कामनाओं की जो धारा लगातार चल जाएगा।"

रही थी वह अब टूटने लगती है, यह उनकी विच्छिन्न अवस्था है। इस प्रकार दीर्घ इसी प्रकार जब आपकी अन्तर्दृष्टि हो जाएगी तो अपने आप पता लग जाएगा। जैसा भीतर देखोगे वैसा बाहर दिखाई देगा। काल तक विचार करते-करते धीरे-धीरे कामनाएं कमजोर हो जाएंगी अर्थात् **** तनुता को प्राप्त हो जाएंगी। उस अवस्था को तनु कहते हैं। अभी वे कमजोर जिज्ञासा :- विभिन्न ग्रन्थों में परमात्मा का निवास स्थान हृदय बताया जरूर हुई हैं परन्तु उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। साधन छोड़ देने पर वे है। परन्तु ध्यान लगाने के लिये आज्ञाचक्र को ही बताया जाता है। कुछ लोग फिर बलवान् हो सकती हैं। साधक दृढ़ता से अभ्यास करता रहेगा तो ज्ञान प्राप्त सहसार में भी परमात्मा का स्थान बताते हैं। सत्य क्या है? कर लेगा। इसके बाद कामना दग्ध अवस्था को प्राप्त हो जाएगी। उसके पुनः जीवित होने में कोई निमित्त नहीं रहेगा। परन्तु यह काम कोई एक, दो दिन या समाधान :- हृदय चेतन की अभिव्यक्ति का स्थान है। भले ही आज का विज्ञान ज्ञानशक्ति का केन्द्र मस्तिष्क को मानता हो, शास्त्र के अनुसार महीने, दो महीने का नहीं है। दीर्घ काल तक सतत अभ्यास करना पड़ता है तभी क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति की अभिव्यक्ति का स्थान हृदय ही है। वैज्ञानिकों को सफलता प्राप्त होती है। यह समझना चाहिए कि प्राण के बिना कहीं ज्ञान दिखाई नहीं देता। इसलिये ज्ञान **** विशिष्ट रूप में भले ही मस्तिष्क में अभिव्यक्त हो पर उसका केन्द्र तो हृदय ही है। जिज्ञासा :- किसी की अन्तर्दृष्टि हो जाए तो उसे बाह्य जगत् को किस ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति का केन्द्र होने से चेतन की अभिव्यक्ति का स्थान हृदय

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ साधना

ही हो सकता है। इसलिये बहुत जगहों पर हृदय का अर्थ मांसपिण्ड न करके जिज्ञासा :- आप कहते हैं कि अहंता-परिवर्तन करो तो हर व्यवहार चैतन्य ही करते हैं। इसलिये परमात्मा का निवास स्थान जो हृदय को बताया है भजन हो जाएगा। परन्तु यह काम तो कठिन लगता है। इसका क्या उपाय है? उसमें कोई दोष नहीं है। समाधान :- अहंता-परिवर्तन करना सभी के लिये सरल नहीं है। प्रारम्भ आज्ञाचक्र में ध्यान लगाने के लिये अलग दृष्टि से कहा जाता है। मन की में तो व्यक्ति जब वह माला लेकर बैठता है तभी उसे लगता है कि भजन हो रहा विशिष्ट अभिव्यक्ति का स्थान आज्ञाचक्र है। आपके सभी साधनों में मन की ही है। उसे पहले तो क्रिया में परिवर्तन करना पड़ेगा फिर भाव में परिवर्तन होगा। समस्या है। आज्ञाचक्र में ध्यान लगाने के लिये कहने का तात्पर्य मन को एकाग्र उसके बाद अहंता में परिवर्तन होता है। एकाएक अहंता में परिवर्तन कठिन करने में है, आत्मा को एकाग्र करने में नहीं। दूसरी बात, हृदय में ध्यान लगाने के लगेगा ही। लिये नहीं कहा गया है ऐसी बात नहीं। हृदय में भी ध्यान करने की प्रक्रिया है, ** भभ

जिससे सम्पूर्ण ज्ञान वहीं जाकर एकीभूत हो जाता है। यद्यपि हृदय में ध्यान करना जिज्ञासा :- भगवान् ने कहा - श्रद्धावाल्लँभते ज्ञानं तत्पर: सरल है, पर यह बात सबके बस की नहीं। हृदय चेतन है, वहाँ बैठ जाओ तो संयतेन्द्रियः। (गीता-४.३६) श्रद्धा तो सामने के विषय या व्यक्ति के महत्त्व को और कोई समस्या नहीं। आत्मसत्यानुबोधेन न संकल्पयते यदा। (माण्डूक्य देखकर उत्पन्न होती ही है। फिर यहाँ श्रद्धावान् कहने की क्या आवश्यकता है? कारिका-३.३२) यह हृदय सम्बन्धित प्रक्रिया है। पर सबका इसमें प्रवेश समाधान :- भगवान् ने यह बात ब्रह्मज्ञान के प्रसंग में कही है जो बुद्धि सम्भव न होने से यह कठिन लगती है। कुछ लोग सहसत्रार में भी ध्यान लगाने के का विषय नहीं बन सकता। बुद्धि चाहे कितनी भी तीव्र हो वह श्रद्धासमर्पित नहीं लिये कहते हैं। कोई बात नहीं! आप का मन एकाग्र होना चाहिए। योग दर्शन में है तो वेदान्त-प्रतिपादित ज्ञान नहीं हो सकता। तीव्र बुद्धि हो और उसमें श्रद्धा न तो यहाँ तक कह दिया - "अन्दर ध्यान नहीं लग रहा है तो बाहर लगाओ।" हो तो वह काटने-छाँटने में लग जाएगी क्योंकि बुद्धि का यह स्वभाव है कि वह चित्त को पकड़ना है तो कोई न कोई आधार लेना पड़ेगा। इसलिये इस विवाद में किसी के सामने झुकना स्वीकार नहीं करती। वह कोई भी शब्द सुनते ही पूरी नहीं पड़ना चाहिए कि कहाँ ध्यान लगाना श्रेष्ठ है। ताकत के साथ, तर्क के द्वारा उसे काटने में लग जाती है। जबकि वेदान्त तो श्रद्धा परमात्मा की अभिव्यक्ति सहस्रार में होती है यह भी सत्य है। कुछ लोग किये बिना, केवल तर्क के द्वारा ग्रहण होने वाला नहीं है। इसमें पहले यह कहते हैं हृदय का जो पोल है उसमें अंगुष्ठमात्र प्रमाण वाला पुरुष है। यह भी सत्य स्वीकार करना पड़ता है कि शास्त्र और गुरु जो कहते हैं वही ठीक है भले ही है। समझ ठीक हो तो सब सत्य है। समझ ही गलत हो जाए तो कोई भाषा सत्य हमारी बुद्धि में न बैठे। इसीलिये शास्त्र ने यहाँ तक कह दिया कि श्रद्धा के बिना प्रतीत नहीं होती। इसलिये कहते हैं शास्त्र गुरु से पढ़ना चाहिए, किताबी ज्ञान से वेदान्त सुनने का अधिकार ही नहीं है। वेदान्त ज्ञान को पहले सुनकर उसको भ्रम हो सकता है। किसी शब्द का प्रयोग किस तात्पर्य से किया गया है यह यदि स्वीकार करना चाहिए, फिर उसको आधार बनाकर बुद्धि को लगाना चाहिए। आप नहीं समझे तो उसका दूसरा अर्थ लग सकता है। इसलिये अधिक जानने की तब बुद्धि उसको काटने में नहीं अपितु समझने में लगेगी। यह तभी होगा जब अपेक्षा जो साधन करना है उसकी समझ अच्छी प्रकार से करके रख लें। तभी आपकी बुद्धि में श्रद्धातत्त्व की प्रधानता हो। साधन के लिये अग्रसर होना चाहिए। आप श्रुति को व्यवहार की दृष्टि से देखिए। एक व्यक्ति को चालीस- **** पचास वर्षों का अनुभव है। उसके सामने एक बुद्धिमान् युवक है। उसका अनुभव

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ साधना तो उस वृद्ध के बराबर नहीं है। वह बुद्धि के बल पर उसके अनुभव को कैसे तत्परता की होती है। जीवन में तत्परता होगी तो व्यक्ति पूरा का पूरा ज्ञान प्राप्त समझ सकता है। पर यदि वह वृद्ध उसका हितैषी है तो उसके अनुभव के साथ कर सकता है। संयमित इन्द्रियों से बाहर का विक्षेप समाप्त होता है और तत्परता चलने से युवक को लाभ होगा ही। जगत् में यही विडम्बना है कि व्यक्ति में जब के द्वारा बुद्धि लक्ष्याभिमुख होती है। इसलिये ज्ञान प्राप्त करने में श्रद्धा, तक शक्ति रहती है तब तक अनुभव नहीं आता और जब अनुभव आता है तब इन्द्रियसंयम और तत्परता तीनों की आवश्यकता है। शक्ति क्षीण हो जाती है। श्रद्धातत्त्व हमारे अन्दर जन्मजात है, बुद्धिवाद तो बाद में **** आता है। आजकल तो इस अंग्रेजों की शिक्षा ने श्रद्धातत्त्व को अन्धविश्वास जिज्ञासा :- गुरु, शिष्य को अपनी साधना के विषय में दूसरों को बताने कहकर उड़ा ही दिया जिससे समाज की बहुत बड़ी हानि हो रही है। श्रद्धा हमारी के लिये निषेध करते हैं। ऐसा क्यों? बहुत बड़ी सम्पत्ति थी। चाहे व्यवहार हो या परमार्थ, श्रद्धातत्त्व की आवश्यकता समाधान :- शास्त्र में साधनक्रिया को गुह्यतम बताया है। ऐसा इसलिये सर्वत्र है। श्रद्धा के अभाव को आगमशास्त्र अपराधवासना मानता है। पञ्चदशी कहा है कि बताने से साधनक्रिया में विघ्न आता है, साधन नष्ट होता है। यह में भी कुतर्क, विपर्यय और दुराग्रह को ज्ञान में प्रतिबन्ध कहा है। ये तीनों श्रद्धा शास्त्र का वचन है। इसलिये गुरु, शिष्य के हित को दृष्टि में रखकर यह बात के अभाव में उत्पन्न होते हैं। इसलिये गीता में जो कहा- श्रद्धावाल्लँभते ज्ञानम्, कहते हैं। वह उचित ही है। सार रूप में कहें तो चाहे कितना भी बड़ा विद्वान् हो, श्रद्धा नहीं **** है तो उसे ज्ञान नहीं होगा। जिज्ञासा :- साधना काल में साधक के अन्दर कभी-कभी कुछ **** विलक्षण सद्भाव उत्पन्न होने लगते हैं। ऐसे में उसका क्या कर्तव्य है? जिज्ञासा :- उपदेश को श्रद्धा से स्वीकार कर लेने मात्र से तत्त्वज्ञान का समाधान :- उन्हें आने देना चाहिए। अपनी साधना में और अधिक बल अधिकारी हो जाता है या और कुछ करना पड़ता है? लगाना चाहिए। ऐसे भाव कभी-कभी किसी सफलता का पूर्वाभास कराते हैं। समाधान :- यदि मात्र श्रद्धा से काम बनता तो यह कहने की क्या इसलिये उन्हें अन्दर छुपाकर रखना चाहिए। किसी के सामने प्रकट करने से आवश्यकता थी - तत्परः संयतेन्द्रियः। इन्द्रियों पर संयम नहीं है तो श्रद्धा से उनका आना रुक सकता है। फिर वह स्थिति लाने के लिये बड़ा इन्तजार करना स्वीकार करने पर भी काम नहीं बनने वाला। आपने ग्रहण तो कर लिया पर उसे पड़ता है। पचाने के लिये ताकत कहाँ से आएगी? ज्ञान तो एक बालक में भी हो सकता है। किसी बालक से पूछो कि 'मन पढ़ने में लगता है कि खेलने में?' वह कहता है- जिज्ञासा :- किसी से व्यवहार न करने पर भी संसर्ग का प्रभाव पड़ "खेलने में।"अब पूछो 'लगना किसमें चाहिए?' तब वह कहता है- "पढ़ने सकता है क्या? में।" देखो! ज्ञान की उसमें कमी नहीं है, उस ज्ञान में संशय भी नहीं है पर उसे समाधान :- हाँ। प्रत्येक व्यक्ति के मन और शरीर से प्रतिक्षण पचा नहीं पाता। किसी ज्ञान को स्वीकार करना अलग बात है और पचाना परमाणुओं का उत्सर्जन होता रहता है। वे परमाणु एक वातावरण का निर्माण अलग। ज्ञान को पचाने का बल उपासना से आता है। उपासना के लिये इन्द्रिय- करते हैं। उसमें जो भी व्यक्ति आएगा उस पर उसका प्रभाव पड़ता है। आप निग्रह की आवश्यकता होती है। इन्द्रियनिग्रह से भी अधिक आवश्यकता अनुभव कर सकते हैं कि किसी महापुरुष के समीप में बैठने मात्र से ही मन में

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग - ३ साधना अच्छे विचार आने लगते हैं और किसी दुष्ट व्यक्ति के समीप में बैठने से मन में जिज्ञासा :- गीता के बारहवें अध्याय में कर्मफलत्याग को ध्यान आदि स्वाभाविक ही अशान्ति का अनुभव होने लगता है। यह आपके मानसिक स्तर पर निर्भर करता है कि उसका प्रभाव आप पर कितना पड़ता है। तीर्थों में रहने का साधनों से श्रेष्ठ क्यों बताया है?

यही रहस्य है। वहाँ पर बहुत से महापुरुषों ने तपस्या की है। अतः वहाँ एक ऐसा समाधान :- इस बारहवें अध्याय को आप ठीक से पढ़ेंगे तो आपको

वातावरण रहता है जो साधना के लिये सहयोगी होता है। पता लगेगा कि इसमें सरलता की दृष्टि से ही उत्कृष्टता कही है। वहाँ निर्गुण- उपासक तो एक ही प्रकार का है परन्तु सगुण-उपासकों की कई श्रेणियाँ हैं। प्रथम श्रेणी में बताया - जिज्ञासा :- कोई साधन किस प्रकार किया जाए कि वह निश्चित ही ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः। लक्ष्य तक पहुँचा दे? अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।(१२.६) समाधान :- पहले तो यह स्वीकार करें कि इस संसार में मनुष्य के लिये कुछ भी असाध्य नहीं है। परमात्मा ने इसमें बहुत शक्ति भरकर रखी है। कोई यह उपासक सगुण भगवान की शरण में है, अपने सम्पूर्ण कर्मों को

सोच भी नहीं सकता कि मनुष्य में कितनी शक्ति है। आवश्यकता है उसे भगवान् में समर्पित कर देता है और भगवान् से अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहता,

पहचानने की। लक्ष्यप्राप्ति के लिये सर्वप्रथम तो उपयुक्त साधन चुनना चाहिए अनन्य भक्त है। व्यक्ति जिसको चाहेगा उसी का निरन्तर ध्यान होगा - मां

तभी परिश्रम करने से सफलता मिलती है। जैसे आप किसी गन्तव्य स्थान पर ध्यायन्त उपासते। वह तो भजन में लगा रहता है पर चिन्ता मुझे होती है। जब

जाने के लिये सर्वप्रथम उसके मार्ग के विषय में संशयरहित होना पसन्द करते हैं। वह पूर्णतः मेरी शरण में आ गया तो उसकी जिम्मेदारी मेरी हो जाती है।

फिर वहाँ जाने के लिये किसी साधन का चयन करते हैं। यहाँ पर भी लक्ष्यप्राप्ति तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्। के लिये मार्ग कई हो सकते हैं। एक-एक मार्ग में साधन भी कई हो सकते हैं। भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।(१२.७) इसलिये आपको मार्ग और साधन दोनों को ठीक-ठीक चुनना पड़ेगा। इस ठीक जिसने अपना चित्त मुझमें ही लीन कर दिया, अब उसका संसारसागर से

चयन के लिये साधन किसी गुरु परम्परा से ही लेना उचित होता है। उद्धार करना मेरा काम है। परन्तु सब लोग ऐसी उपासना नहीं कर सकते, उनके

इसके उपरान्त यह दृढ़ निश्चय करना चाहिए कि मनुष्य शरीर में हार लिये कुछ सरल उपाय बताया - मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। मानने के लिये कोई जगह नहीं है। सत्कर्म में बाधा आने की सम्भावना हमेशा (१२.८) बुद्धि में मेरे महत्त्व को बिठाकर मन से मेरा ही ध्यान करो। परन्तु मन रहती है - श्रेयांसि बहुविघ्नानि। उस समय घबराकर मुख नहीं मोड़ना चाहिए। का समाधान करना इतना आसान नहीं है। इसलिये और भी सरल उपाय बताया -

मुख्य बात यह है कि अपने लक्ष्य को गौण नहीं समझना चाहिए। लक्ष्य गौण हो अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।(१२.६) मेरे चिन्तन, नामजप, जाएगा तो साधन शिथिल पड़ जाएगा। साथ ही साधन की अवहेलना नहीं करनी कीर्तन एवं कथाश्रवण का अभ्यास बढ़ाओ। चाहिए। नहीं तो साधन के समय इधर-उधर देखते रहेंगे। उस समय दुनिया भर के तब अर्जुन ने कहा, "व्यवहार में रहते हुए यह अभ्यास भी बहुत कठिन ज्ञान को जानने की क्या आवश्यकता है? अहंकारशून्य होकर, परमात्मा का दिखता है। सवेरे से शाम तक कर्म में लगा रहना पड़ता है।" भगवान् ने कहा, आश्रय लेकर यदि कोई साधना करता है तो उसको लक्ष्यप्राप्ति अवश्य होती है। "तू कर्म करना तो जानता है लेकिन जगत् के लिये करता है। अब तू मेरे लिये कर्म कर, जिससे तुझे मेरी प्राप्ति हो जाए।" अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ साधना मत्कर्मपरमो भव।(१२.१०) अर्जुन ने कहा, "यह भी कठिन दिखता है। कोई जिज्ञासा :- परमात्मा को प्राप्त करने के लिये कैसी दृढ़ता होनी सरल साधन बताइये।" तब भगवान् ने कहा, "ठीक है! अपने घर का मालिक चाहिए? मुझे बना दो। जो भी कर्म करो उसका फल अपने लिये मत चाहो, मुझे अर्पित समाधान :- मन में एक दृढ़ निश्चय होना चाहिए कि चाहे जो भी हो कर दो। यह अन्तिम उपाय है।" जाए हम परमात्मा को पाकर ही रहेंगे। उन्हें पाए बिना अपनी साधना से उपरत अब देखिए, प्रशंसा तो पहली श्रेणी वाले उपासक की करनी चाहिए थी, नहीं होंगे। जैसे भगवान् बुद्ध ने निश्चय किया था- परन्तु कर रहे हैं अन्तिम वाले की - इहासने शुष्यतु मे शरीरं त्वगस्थिमांसानि लयं प्रयान्तु। ध्यानात् कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्। (१२.१२) अप्राप्य बोधं बहुकालदुर्लभं नैवासनात् कायमिदं चलिष्यति॥। कर्मफल की इच्छा ही दुःख देती है। उसे छोड़ने पर शान्ति अपने आप इस आसन पर हम बैठ गए हैं तो परमात्मा का ज्ञान प्राप्त किए बिना मिल जाएगी। यहाँ समझना चाहिए कि सरलता की दृष्टि से ही कर्मफलत्याग को उठेंगे नहीं। इस ज्ञान को प्राप्त किए बिना हमारे बहुत से जन्म व्यर्थ ही बीत गए। ध्यान से श्रेष्ठ बताया है। अब तो चाहे यह शरीर सूख जाए, इसकी हड्डी-मांस सब नष्ट हो जाएं पर अपना **** कार्य किए बिना यहाँ से हिलेंगे नहीं। आज के युग में शरीर के विषय में भले ही जिज्ञासा :- कैवल्योपनिषद् में रुद्राध्याय के द्वारा अभिषेक को मोक्ष के ऐसी धारणा न बनावें पर उनके समान निश्चय की दृढ़ता तो रखनी ही चाहिए। लिये उत्तम साधन बताया है। वहीं पर यह भी कहा है - न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।(२) एक ही स्थान पर मोक्ष के लिये पहले जिज्ञासा :- ऐसी कौन-सी दृष्टि अपनाएँ कि अध्यात्मकथा सुनने में चित्त एक साधन को उत्तम बताकर फिर कहा मोक्ष केवल त्याग से ही होता है। यहाँ लग जाए और सुनकर उसे भूलें भी नहीं? क्या तात्पर्य है? समाधान :- यहाँ पर सीधा-सा गणित है कि आप उसे अपनी कथा नहीं समाधान :- वहाँ पर जो त्याग की बात आई है वह स्थूल शरीर से मानते, इसलिए उसमें चित्त लगाना कठिन लगता है। समाचार-पत्र जब किसी के लेकर अहन्तापर्यन्त त्याग के लिये कही है। पर अहन्ता का त्याग कहने मात्र से सामने आता है तो सभी के लिए, सभी समाचार एक समान नहीं होते। कुछ लोग नहीं होता। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर के साथ जो अध्यास बना शेयरवाला पन्ना झट् से पहले ही निकाल लेते हैं तो कुछ खेलपृष्ठ को ही देखते हैं है वह कहने मात्र से नहीं टूटता। प्रतिदिन वेदान्त सुनते हैं पर मैं कहते ही शरीर और कुछ लड़ाई-झगड़ावाला ही देखना पसन्द करते हैं क्योंकि जिसके अन्दर का स्मरण आता है। इसलिये अभिषेकरूपी जो साधन बताया है वह त्याग की जिसका अधिक महत्व है, वह उसी को पढ़ना-सुनना पसन्द करता है और सामर्थ्य प्राप्त करने के लिये ही बताया है। उस साधन के द्वारा जब आप अपनी उसका विस्मरण भी नहीं होता। अहन्ता को भगवान् शिव के चरणों में समर्पित करेंगे तब आप शिव के हो मान लो, आप अपने गुरुजी के कमरे के बाहर खड़े हैं। गुरुजी किसी अन्य जाएंगे। आपको ऐसा लगेगा कि हमारा सम्बन्ध केवल भगवान् शिव से है। इस व्यक्ति से बात कर रहे हैं। वह बात आपके कानों में थोड़ी-थोड़ी सुनाई दे रही है, निश्चय से आपका चित्त शुद्ध हो जाएगा। अब त्याग की सामर्थ्य उत्पन्न हो उसी समय आपको सुनाई दिया कि मेरे विषय में बात हो रही है, तो कल्पना जाएगा। इसी त्याग से अमृतत्व की प्राप्ति होगी। कीजिए कि आप उसे कितना तन्मय होकर सुनेंगे। इसी प्रकार जब यह समझ में

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग - ३ साधना

आ जाएगा कि यह अध्यात्म-चर्चा मेरे विषय में हो रही है तो आपका मन भाष्यकार ने भी गीताभाष्य में तप का यही अर्थ किया है। तपस्या करो और उसको सुनने में लग जाएगा और आप उसे भूलेंगे भी नहीं। भावपूर्वक ईश्वर को पकड़ कर रखो। ऐसा करने पर ही विचार को जीवन में **** धारण करने की सामर्थ्य प्राप्त होगी। जिज्ञासा :- यह कैसे समझें कि इन्द्रियाँ हमारे वश में हैं? सबसे पहले तो शरीर की नश्वरता का विचार करना चाहिए। रोज कुछ समाधान :- आपकी इन्द्रियाँ वश में हैं या नहीं, इसमें प्रमाण अपने काल ऐसा अभ्यास करो कि मेरा शरीर छूट गया है, इसे लोग चिता पर जला रहे अनुभव को ही मानना पड़ेगा कि शास्त्र में जैसा कहा है, हमारी इन्द्रियाँ क्या उसी हैं। मनरूपी नेत्र से शरीर को जलते हुए देखो और सोचो कि मैं शरीर को जलते के अनुसार विचरण करती हैं या अन्य प्रकार से! ऐसा विचार करोगे तो स्वयं हुए देख रहा हूँ, इसलिये मैं शरीर नहीं हूँ, इससे अलग हूँ। शरीर के जितने समझ जाओगे कि इन्द्रियाँ वश में हैं या नहीं। सम्बन्धी हैं उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसा अभ्यास दीर्घकाल तक करने

**** पर शरीरसम्बन्धी मोह दूर होगा और देहाध्यास शिथिल हो जाएगा। यह सत्य का जिज्ञासा :- प्रतिकूल परिस्थिति में तो यह समझ में आता है कि जगत् में अभ्यास है, मैं कोई झूठ का अभ्यास नहीं बता रहा हूँ। जो घटना घटने वाली है धोखा है, अनुकूल परिस्थिति में कैसे समझें कि जगत् में धोखा है, उस समय तो उसी का ध्यान करने को कह रहा हूँ।

जगत् में आनन्द ही दीखता है? ****

समाधान :- परिस्थिति चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल, विचार करके देखा जिज्ञासा :- जब तत्त्व एक ही है तो उसको समझाने के लिए अलग-अलग

जाए तो जगत् में धोखे के अतिरिक्त और है ही क्या! प्रतिदिन आप अनुभव करते मत क्यों हुए और उसको प्राप्त करने के लिए अलग-अलग साधन क्यों कहे गए हैं कि भोजन करने पर तृप्ति होती है। पर यदि कल्पना मात्र से आपने भोजन हैं?

किया तो आपको तृप्ति नहीं होगी। तब आप विचार करेंगे कि यह भोजन सत्य समाधान :- एक विषय का कई प्रकार से कथन किया जा सकता है, इसमें

था अथवा मायारचित। इसी प्रकार संसार में तृप्ति के लिए आप जीवन लगा देते किसी प्रकार का विरोध नहीं है। व्यवहार में भी आप देखते हैं कि एक विषय को हैं और आज तक हमें संसार के भोगों से कोई तृप्त मिला ही नहीं। इसका तात्पर्य यदि दो व्यक्ति समझाएँगे तो उनका समझाने का ढंग अलग-अलग होगा। विद्युत हुआ कि भोग धोखा है। यदि वे सत्य होते तो सच्ची तृप्ति देनेवाले होते। अतः को कोई पंखे से समझाए तो कोई बल्ब से, क्या अन्तर पड़ता है! जिसको जगत् के भोगों में कहीं क्षणिक आनन्द का अनुभव किसी को हो रहा है तो उसे जिसका अभ्यास है वह उसी प्रक्रिया से समझाता है। पर एक बात ध्यान में रखें भ्रम ही समझना चाहिए। जिसे कि गौड़पादाचार्यजी ने कहा है - मनसो निग्रहायत्तमभयं सर्वयोगिनाम्

**** ... (माण्डूक्य कारिका-३.४०) जिज्ञासा :- इस मायिक जगत् से जागने की युक्ति क्या है? सभी साधकों का एक ही उद्देश्य है - मनोनिग्रह, यही सभी साधनाओं का समाधान :- इस विषय में दो बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। एक फल भी है क्योंकि परमार्थ मार्ग में मुख्य तत्त्व मनोनिग्रह ही है, चाहे वह किसी विचार और एक उसको धारण करने के लिये ताकत। ताकत प्राप्त करने के लिये भी विधि से प्राप्त हो। कहीं पर पुरुषार्थ की प्रधानता है तो कहीं पर कृपा की। तपस्वी बनो। इन्द्रियनिग्रहपूर्वक शरीरशोषण ही मुख्य तपस्या है। भगवान् कोई भी साधना हो, वह या तो प्राणशक्ति को अथवा ज्ञानशक्ति को केन्द्र

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ साधना बनाकर ही की जाती है। प्राणशक्ति को केन्द्र बनाने का तात्पर्य योगमार्ग से है और ज्ञानशक्ति को केन्द्र बनाने का अर्थ हुआ बुद्धि को माध्यम बनाकर साधना कोई अपराध किया होगा और उसका प्रायश्चित्त नहीं कर पाए। इसलिए भगवान्

करना। ये भी दो प्रकार से होती है - एक भावप्रधान (भक्ति) और दूसरी स्वयं ह, कृपा करके उसका भोग करवाकर हमें पाप से शुद्ध कर रहे हैं। अब

विवेकप्रधान (विचार)। इस प्रकार सभी साधनाओं को मिलाकर तीन विभाग अच्छा ही है कहीं बाहर भी जाना नहीं पड़ेगा, लेटे-लेटे ही भगवान् का भजन

किए जा सकते हैं, पर इन सभी का फल मनोनिग्रह ही है। इसलिए अलग-अलग करेंगे। यदि आप ऐसा विचार करते हुए लेटे-लेटे जप करेंगे तो शारीरिक

ढंग से कथन करने पर भी इनमें कोई विरोध नहीं है। अस्वस्थता में भी आपकी बहुत बड़ी तपस्या हो सकती है। **** **** जिज्ञासा :- शास्त्रों में कहा है - "तमोगुण को रजोगुण नष्ट करता है और जिज्ञासा :- कुछ लोग मध्यरात्रि में साधना करते हैं। क्या इसका कोई

रजोगुण का नाश सत्त्वगुण करता है।" सत्त्वगुण का नाश कैसे होगा क्योंकि विशेष महत्व है ?

साधक को तो गुणातीत अवस्था में पहुँचना है? समाधान :- कुछ साधनाएँ मध्यरात्रि में करने से विशेष फलदायक होती

समाधान :- गुण साधन है और साधन की आवश्यकता तभी तक रहती है हैं। पर ऐसा करने से पहले गुरु से इसकी आज्ञा लेनी चाहिए क्योंकि सभी

जब तक साध्य की प्राप्ति नहीं होती। अतः साध्य जो गुणातीत अवस्था है उसे साधनाएँ मध्यरात्रि में नहीं होती हैं। विशेषकर तन्त्रोक्त साधनाओं को ही

प्राप्त करने के लिए गुणत्रय का लय आवश्यक ही है। लय का क्रम इस प्रकार से मध्यरात्रि में करने का विधान है। कुछ साधनाओं को ब्रह्ममुहूर्त में करने का

है -तमोगुण का नाश रजोगुण करता है क्योंकि रजोगुण से व्यक्ति में प्रवृत्ति होती विशेष रूप से विधान किया गया है। इसलिए इस विषय में व्यक्तिगत रूप से

है और प्रवृत्ति से ही तमोगुण का नाश होता है। अब धीरे-धीरे उस रजोगुण का विचार करना चाहिए।

मुख सत्त्व की ओर होगा, फिर वह रजोगुण शान्त हो जाएगा तब प्रवृत्ति भी शान्त हो जाएगी। अब केवल सत्त्वगुण ही शेष रहता है, पर साधक को तो इससे भी ऊपर जाना है। इसलिए वह इस सत्त्वगुण का मुख स्वरूप की ओर करेगा। स्वरूप तो गुणातीत है, अतः सत्त्वगुण का उसमें लय हो जाएगा। यहाँ लय का तात्पर्य है प्राणायामं प्रत्याहारं नित्यानित्यविवेकविचारम्।

कि स्वरूप में स्थित साधक का सत्त्वगुण से भी सम्बन्ध नहीं रहेगा। जाप्यसमेतसमाधिविधानं कुर्ववधानं महदवधानम्।। (मोहमुद्गर-३०) **** प्राणायाम, प्रत्याहार, नित्य और अनित्य वस्तुओं जिज्ञासा :- शरीर की अस्वस्थता में भजन कैसे करना चाहिए? को अलग-अलग समझने के लिये शास्त्रानुसारी विचार समाधान :- भजन मन से होता है, इसलिए शरीर अस्वस्थ रहने पर भी और जप के सहित समाधि इन सभी साधनों का मुमुक्षु भजन अच्छा हो सकता है। बस! मन अस्वस्थ नहीं होना चाहिए। शरीर अस्वस्थ पुरुष को बड़ी सावधानी से जागरुक होकर अनुष्ठान होने पर भले ही स्नान न कर सकें, एक आसन पर भले ही न बैठ सकें, फिर भी करना चाहिये।

लेटे-लेटे जप तो कर सकते हैं। उस समय यह विचार करना चाहिए कि हमने

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गुरुतत्त्व अभिव्यक्त होती है। वह नाद स्थान और प्रयत्न के सहयोग से मध्यमा और बैखरी नाणी के रूप में क्रम से बाहर प्रकट होगा। पहले वर्ण के रूप में, वर्ण से

गुरुतत्त्व पद और पद से वाक्य बनेगा। वाक्य में एक अर्थ निहित होगा। वह वाक्य श्रोता के श्रोत्र से टकराएगा तब वह उसे ग्रहण करेगा। अब जो गुरु के अन्दर वृत्ति थी

जिज्ञासा :- किसी शिष्य की गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा है परन्तु कुछ विषयों वह शिष्य में आ जाएगी। वही ज्ञानात्मिका वृत्ति है, वही संकल्पात्मिका वृत्ति है।

में परस्पर वैचारिक मतभेद है तो क्या शिष्य अपराध का भागी होगा? इसी को कहा - तत्संकल्पात्मिका तद्भाविता वृत्तिः। इस प्रकार गुरु के अन्दर जो मानसी वृत्ति है वह श्रोता तक पहुँचने में कई प्रकार की प्रक्रिया से गुजरती है। समाधान :- श्रद्धा तो ऐसी वस्तु है जो मतभेद को समाप्त कर देती है। फिर भी गुरु-शिष्य में यदि कोई वैचारिक मतभेद हो जाए पर वह कार्यरूप में इसलिये कहा - न सोडस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते।(वाक्यपदीय

परिणत न हो पाए अर्थात् शिष्य गुरु से किसी प्रकार का विवाद न करे तो वह ब्रह्मकाण्ड-१२३) संसार में कोई भी ज्ञान ऐसा नहीं है जिसमें शब्द का

अपराध का भागी नहीं बनेगा। उसमें श्रद्धा तो है पर विचार करने से बुद्धि में नहीं अनुगमन न हो तथा कोई भी शब्द ऐसा नहीं है जिसमें ज्ञान का अनुगमन न हो।

पट रहा है। सुरेश्वराचार्यजी की अपने गुरु आद्य शंकराचायंजी के प्रति अटूट जब ज्ञान में शब्द का अनुगमन होता है तो वही शब्द के माध्यम से फिर ज्ञान रूप होता है। इस प्रक्रिया को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए। श्रद्धा थी फिर भी दोनों की प्रक्रियाओं में भेद दिखाई देता है। वस्तुतः प्रक्रिया अलग होने पर भी सुरेश्वराचार्यजी ने मूल सिद्धान्त का खण्डन नहीं किया है। जिज्ञासा :- क्या गुरुमन्त्र देते समय गुरु के द्वारा शिष्य की परीक्षा करना **** जिज्ञासा :- विषय स्पष्ट न होने पर शिष्य को गुरु से कई बार तर्क- अनिवार्य है? यदि है तो परीक्षा किस प्रकार करनी चाहिए?

वितर्क करना पड़े तो क्या वह कर सकता है? समाधान :- शास्त्रों में मन्त्रदीक्षा से पूर्व शिष्य की परीक्षा पर बहुत बल दिया है। तन्त्रशास्त्र में तो विशेष तौर से बल दिया है। वहाँ कहा है- समाधान :- विषय को समझने के लिये शिष्य गुरु से चर्चा कर सकता है चाहे वह जिज्ञासा हो या तर्क-वितर्क, पर गुरु से कभी कुतर्क नहीं करना परीक्षिताय दातव्यं वत्सरार्धोषिताय च। (योगिनीहृदय- १.५)

चाहिए अर्थात् किसी सिद्धान्त को काटने के लिये अन्यायपूर्वक चर्चा नहीं करनी शिष्य की कम से कम छः महीने परीक्षा करके ही मन्त्र देना चाहिए।

चाहिए। तन्त्रशास्त्र में और भी बताया है- न देयं परशिष्येभ्यो नास्तिकेभ्यो न चेश्वरि। **** जिज्ञासा :- यह प्रसिद्धि है कि गुरु के अन्दर जो संकल्पात्मिका वृत्ति है न शुश्रुषालसानाञ्च नैवानर्थप्रदायिनाम्।।(योगिनीहृदय- १.३)

वह शिष्य के अन्दर प्रवेश करके उसके अज्ञान का नाश करती है। फिर शब्द को गुरु को देखना चाहिए कि किसी अन्य का शिष्य तो यह नहीं है। ्यदि अन्य जगह

ज्ञान के लिये मुख्य प्रमाण क्यों कहा है? से दीक्षा ले रखी है तो पुनः मन्त्रदीक्षा लेने में इसका क्या प्रयोजन है? आजकल देखते हैं लोग गुरु बदलना भी एक फैशन के समान समझते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं समाधान :- गुरु के अन्दर जो ज्ञानात्मिका वृत्ति है वह नाद के रूप में है। जो शास्त्र की बात को नहीं मानता, उसमें कुतर्क करता है ऐसे व्यक्ति को भी

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ गुरुतत्त्व दीक्षा नहीं देनी चाहिए क्योंकि उसमें श्रद्धा का अभाव है जो उसे आगे नहीं बढ़ने जाती है। हाँ! यदि गुरु को शरीर ही मान रहे हैं तो हो सकती है। इसलिये गुरु को देगा। किसी सेवा के लिये बोला तो बहाना बनाकर बच गया ऐसा व्यक्ति क्या शरीर नहीं मानना चाहिए। ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्तिभेदविभागिने। इस श्लोक साधना करेगा। इसलिये सेवा में आलस्य करने वाले व्यक्ति को भी दीक्षा नहीं का रोजाना पाठ करने वाले भी चिन्तन नहीं करते कि ईश्वर, गुरु और आत्मा इन देनी चाहिए। तीनों का स्वरूप एक है, ये तत्त्वदृष्टि से एक हैं। भले ही किसी को इनकी मूर्ति में कुछ लोग जानते हुए भी शास्त्र के अर्थ का अनर्थ करते हैं ऐसे लोग अपने लिये और अन्य लोगों के लिये बहुत घातक होते हैं। इस प्रकार के लोगों भेद दिखाई दे। किसी ने गुरु को सच्चिदानन्द स्वरूप में नहीं देखा, सामान्य

को मन्त्रदीक्षा नहीं देनी चाहिए। अन्य भी छोटी-बड़ी बहुत सी बातें हैं, उनका शरीरधारी के रूप में ही देखा है उसके बारे में तो हम कुछ नहीं कह सकते। नहीं

भी गुरु को अच्छी प्रकार से विचार कर लेना चाहिए। इसलिये कम से कम छः तो गुरु का सङ्ग आसक्ति कैसे बढ़ा सकता है? शास्त्र कहता है -

महीने तो देखना ही चाहिए। सङ्ग: सर्वात्मना त्याज्यः स चेत्यक्तुं न शक्यते।

आजकल तो लोग तर्क देते हैं कि श्रद्धावान् है तो बिना परीक्षा लिये ही स सद्धिः सह कर्तव्यः सतां सङ्गो हि भेषजम्।।

दीक्षा दे सकते हैं। पर श्रद्धावान् है या नहीं, यह इतनी जल्दी कैसे जान लेंगे। (मार्कण्डेय पुराण-३४.२३)

इसलिये इन बातों पर विशेष रूप से विचार कर लेना चाहिए। सङ्ग को सर्वथा त्यागना चाहिए। यदि नहीं त्याग सकते तो सज्जनों का सङ्ग करना चाहिए। वह सभी आसक्तिओं का त्याग करवाने वाला है। अतः गुरु *भभभ और ईश्वर के प्रति जो आसक्ति है उसे भक्ति ही समझना चाहिए। वह बहुत जिज्ञासा :- शिष्य में साधनचतुष्टय-सम्पन्नता का निर्णय करना गुरु का लाभकारी सिद्ध होती है। कर्तव्य है या शिष्य का? समाधान :- यह कर्तव्य दोनों का है। जब शिष्य वेदान्त-श्रवण के लिये जिज्ञासा :- क्या गुरुजी के शरीर को अवलम्बन बनाकर ध्यान कर गुरु के पास जाएगा तो उसे यह विचार करना पड़ेगा कि मैं वेदान्त-श्रवण का सकते हैं? अधिकारी हूँ या नहीं। ऐसा निर्णय करके वह गुरु के पास जाएगा। तब गुरुजी उसकी परीक्षा लेंगे। एकाएक थोड़े ही उपदेश कर देंगे? कुछ दिन तक सेवा में समाधान :- यद्यपि गुरुतत्त्व व्यापक है, ईश्वरतत्त्व और गुरुतत्त्व एक ही

रखेंगे। इससे उसकी परीक्षा हो जाएगी कि उसमें विवेक, वैराग्य इत्यादि हैं कि है, फिर भी गुरु कहते ही यदि आपका मन व्यक्तिविशेष में जाता है तो गुरुजी के शरीर को अवलम्बन बना सकते हैं। साथ-साथ गुरुजी का जो ज्ञान है, स्वभाव नहीं। सेवा में रखने का यही तो रहस्य है। नहीं तो कोई भी उपदेश के लिये चला है, उनका जो प्रभाव है, उनकी जो महत्ता है, इन सब का भी चिन्तन करना जाएगा। चाहिए। यह भी चिन्तन करें कि हमारे जीवन में जो कुछ उत्कर्ष हो रहा है वह **** गुरुजी की कृपा से ही हो रहा है। ऐसा करने पर आपको गुरुतत्त्व से कृपा का जिज्ञासा :- गुरु के साथ सत्संग करने से संसार की आसक्ति छूटती है। अनुभव होने लगेगा। किसी की गुरु के प्रति आसक्ति हो जाए तो उसे क्या करना चाहिए? *** भ समाधान :- यह बात समझ में नहीं आई कि गुरु के प्रति आसक्ति हो जिज्ञासा :- गुरुकृपा को कैसे समझें?

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ गुरुतत्त्व समाधान :- शिष्य का सच्चा हित तो गुरु ही जानता है, दूसरा क्या जानेगा। इसलिये कभी-कभी गुरु का व्यवहार बहुत कठोर दिखता है तो भी कहा, "गुरुजी, गलती हो गई।"

श्रद्धालु शिष्य जानता है कि यह हमारे ऊपर बहुत बड़ी कृपा हो रही है। हमने १५ दिन बाद फिर पूछा, "तू अब तक स्वस्थ कैसे है?" उसने कहा,

अपने जीवन में स्वयं इसका अनुभव किया है। एक बार हम अपने महाराजजी के "बछड़े जब दूध पीते हैं तो उनके मुख से काफी झाग नीचे गिरते हैं। मैं उन्हें पत्तों

साथ उत्तरकाशी के आश्रम में ठहरे थे। वहाँ एक महीने तक हमें डाँटते ही रहे। पर इकठ्ठा करके खा लेता हूँ।" गुरुजी बोले, "अरे बेटा! बछड़े बड़े दयालु होते

उनका ऐसा स्वभाव हमने पहले कभी नहीं देखा था। गलती कोई भी करे, डाँट हैं। तुझे ऐसा करता देखकर वे अपने हिस्से का दूध नीचे गिरा देते हैं। तुझे ऐसा

हमको ही पड़ती थी। हम ऊपर छत पर घूमते तो तुरन्त डाँट पड़ती थी। वे कहते, नहीं करना चाहिए।" बालक ने आज्ञा का पालन किया। सब ओर से उसका

"क्या धम-धम की आवाज करते हो। नीचे कोई महात्मा ध्यान-भजन कर रहा भोजन बन्द हो गया।

होगा तो उसको विक्षेप होगा या नहीं? चलना भी नहीं आता तुम्हें।" इस तरह उसे बहुत भूख लगी तो एक दिन मदार (आक) का फूल ही खा गया।

एक महीना डाँटते ही रहे। फूल के जहर के प्रभाव से आँख से दिखना बन्द हो गया। एक जगह कुँए में गिर

आज उस घटना को याद करके हमको रोना आता है कि इतनी बड़ी कृपा गया। इतना आज्ञापालन उस बालक ने कैसे किया होगा, कितनी श्रद्धा उसकी

हो रही थी! उस समय यह बात अनुभव में तो नहीं आती थी, पर श्रद्धा के कारण रही होगी! अब गुरुकृपा को देखो। गुरुजी उसे खोजते-खोजते उसकी आवाज

उसे सह लेता था इसलिये कोई दुर्भावना मन में नहीं आती थी, लेकिन कभी- सुनकर कुँए के पास पहुँचे और पूछा, तो उसने सब घटना बताई। गुरुजी ने उससे

कभी लगता था कि देखो बिना बात ही हमें डाँटते हैं। आज लगता है कि यह इन्द्रसूक्त का पाठ कराया। इन्द्र आए, उसे एक मालपूआ दिया और कहा इसको

उनकी विशेष कृपा थी क्योंकि उनकी प्रकृति किसी को टोकने की नहीं थी। खा ले, सारी विद्याएं तुझे प्राप्त हो जाएंगी। उसने कहा, "मैं गुरुजी को दिए बिना

ब्रह्मचारी लोग - बजे तक सोए रहते थे तब भी कुछ नहीं बोलते थे। कुछ नहीं खाऊँगा।"

इसी प्रकार उपमन्यु के ऊपर गुरुजी की विशेष कृपा हुई थी। वह बालक इन्द्र ने कहा, "मैंने पहले तेरे गुरुजी को भी दिया था। उन्होंने तो अपने

गाँव से भिक्षा लाकर गुरुजी को दे देता था और अध्ययन करके गाय चराने चला गुरु से पूछे बिना ही खा लिया था।" उपमन्यु ने कहा, "उन्होंने क्या किया यह मैं

जाता था। गुरुजी उसे उस भिक्षा में से कुछ देते ही नहीं थे। १५ दिन बाद गुरुजी ने नहीं जानता पर मैं उन्हें दिए बिना खा नहीं सकता।" उसकी निष्ठा और गुरुभक्ति

पूछा, "तुझे तो मैं खाने के लिये कुछ देता नहीं, फिर तू मोटा-ताजा कैसे से इन्द्र प्रसन्न हो गए। उसी समय सारी विद्या उसे प्राप्त हो गई। गुरु का व्यवहार

दिखता है?" उसने वहा, "गुरुजी, भूख लगती है तो फिर से भिक्षा माँग लेता ऊपर से तो बड़ा कठोर दीखता था, परन्तु इसे क्रूरता कहेंगे अथवा कृपा। डॉक्टर

हूँ।" वे बोले, "गृहस्थ के ऊपर इतना भार डालना ठीक नहीं, अतः ऐसा मत पेट फाड़ता है तो उसमें कृपा ही रहती है, क्रूरता नहीं। गुरु के किस व्यवहार में कैसी कृपा अनुस्यूत है इसे समझना बड़ा कठिन हैं। कोई श्रद्धालु गुरुभक्त ही इसे करना।" बालक मान गया पर भूख तो लगती ही थी। १५ दिन बाद गुरु ने फिर समझ सकता है। कहा, "बेटा! तू दुबला तो नहीं हुआ। क्या खात्ता है?" उसने जवाब दिया, **** ""गुरुजी, भूख लगती है तो गायों का दूध पी लेता हूँ।" उन्होंने कहा, "अरे! बहुत बड़ी गलती कर रहा है। दूध पर तो बछड़ों का अधिकार है, तेरा नहीं।"

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ईश्वरतत्त्व जिज्ञासा :- गीता के चतुर्थ अध्याय में कहा है - अजोऽपि सन्नव्ययात्मा ..... सम्भवाम्यात्ममायया।(६)

ईश्वरतत्त्व इस श्लोक की आनन्दगिरि टीका में सगुण-साकार ईश्वर के शरीर को प्रातिभासिक कहा है। ऐसा कैसे हो सकता है?

जिज्ञासा :- शास्त्रों में ब्रह्माजी कि उत्पत्ति बताई गई है परन्तु शिवजी समाधान :- कौन सी बात किस प्रसंग में कही है इसे ध्यान में रखना

तथा विष्णुजी की नहीं। ऐसा क्यों? चाहिए। वेदान्त का सिद्धान्त है कि एक ही मूल तत्त्व है, उसके अतिरिक्त किसी

समाधान :- आपने एक पुराण में यह बात पढ़ी होगी। अठ्ठारह पुराण हैं दूसरे की सत्ता है ही नहीं। नाम-रूप ही सृष्टि है। सृष्टि के पहले नाम-रूप का

उनमें बहुत स्थानों पर विष्णु तथा रुद्र की उत्पत्ति बताई गई है। यहाँ पर एक अस्तित्व नहीं है। जो भी नाम-रूप होगा वह प्रातिभासिक ही होगा क्योंकि वह

सिद्धान्त है जिसे समझना चाहिए। इसे समझे बिना संशय समाप्त नहीं होता। माया के द्वारा कल्पित है। भगवान् भी कहते हैं- प्रकृर्ति स्वामधिष्ठाय

वैदिक वाङ्गमय में एक मूल तत्त्व है, जिसे हम ब्रह्म कहते हैं। वह निर्गुण- सम्भवाम्यात्ममायया, आत्ममायया सम्भवामि अर्थात् मैं अपनी माया के द्वारा

निराकार है, पर व्यवहार में सृष्टि दिखाई देती है। जब यह जिज्ञासा होती है कि प्रकट होता हूँ। जैसे लोक में भी कोई मायावी(जादूगर) अपनी माया के द्वारा जो

निर्गुण-निराकार ब्रह्म से यह सृष्टिरूपी बवण्डर कहाँ से उत्पन्न हो गया, तब यह भी वस्तु प्रकट करता है वह वास्तविक नहीं बल्कि प्रातिभासिक ही होती है,

स्वीकार करना पड़ता है कि यह उसमें रहने वाली मायाशक्ति से हुआ है। उसमें क्योंकि माया हटाते ही उसकी सत्ता नहीं रहती। प्रातिभासिक पदार्थ में आपको

माया का आरोप करना पड़ता है। सत्यत्वबुद्धि हो जाए यही व्यवहार है।

उस मायोपाधिक ब्रह्म का नाम ईश्वर हो जाता है। ईश्वर भी सगुण- जब एक ही सत्ता से सब सत्तावान् हो रहे हैं तो जितने भी दिखने वाले

निराकार है, जबकि व्यवहार तो साकार में होता है। जैसे निराकार विद्युत से नाम-रूप हैं सभी प्रातिभासिक ही हैं। आनन्द गिरिजी ने सगुण-साकार ईश्वर के

व्यवहार करने के लिये किसी साकार उपकरण की आवश्यकता होती है। वह शरीर को प्रातिभासिक कहा उसमें यही दृष्टि है। वे यह भी कह सकते थे कि

ईश्वर व्यापक है, अनाम-अरूप है, परन्तु उस तक पहुँचने के लिये किसी नाम भगवान् का शरीर चिन्मय है। ऐसा कहने में भी कोई दोष नहीं होता। वह शरीर

या रूप का आश्रय लेना ही पड़ता है। इसलिये शिवपुराण में उस ईश्वर का नाम ब्रह्माजी की सृष्टि का नहीं है। ब्रह्मा की सृष्टि यदि व्यावहारिक है, पाञ्चभौतिक है

शिव रख दिया तो विष्णु और ब्रह्मा की उत्पत्ति उससे बताई। इसी प्रकार तो वह शरीर चिन्मय हुआ। सारे जगत् को भी हम नाम-रूप की दृष्टि से मायिक

विष्णुपुराण में उसका नाम विष्णु रख दिया तो शिव और ब्रह्मा की उत्पत्ति विष्णु या मिथ्या कहते हैं और अधिष्ठान-दृष्टि से यह भी कह सकते हैं कि सारा जगत्

से बताई। देवीपुराण में उसी का नाम देवी रख दिया तो इन तीनों की उत्पत्ति देवी ब्रह्म है। इसलिये वेदान्त में हमेशा कहने वाले की दृष्टि को समझना चाहिए।

से बताई। वस्तुतः उस ईश्वर के ही ये भिन्न-भिन्न नाम हैं। तब क्या कहा जाए कि ****

किसकी उत्पत्ति हुई और किसकी नहीं हुई अथवा किससे किसकी उत्पत्ति हुई। जिज्ञासा :- ईश्वर तथा प्रकृति की सत्ता निरपेक्ष कही जाती है। यहाँ पर निरपेक्षता का क्या तात्पर्य है? समाधान :- जो अपने अस्तित्व के लिये दूसरे की अपेक्षा न रखे उसे

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ ईश्वरतत्त्व निरपेक्ष कहा जाता है। जैसे ईश्वर की प्रकृति से उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत् की सत्ता उस ईश्वर से है। ईश्वर की सत्ता से ही सारा जगत् सत् मालूम पड़ता है। परन्तु और जब चाहे लय कर लेता है।

ईश्वर को अपनी सत्ता सिद्ध करने के लिये किसी अन्य की आवश्यकता नहीं जिज्ञासा :- भगवान् ने ऐसी सृष्टि क्यों की जो जीवों के बन्धन में हेतु बन होती। इसलिये ईश्वर की सत्ता निरपेक्ष है। प्रकृति को वेदान्त में निरपेक्ष नहीं मानते। ईश्वर की सत्ता से ही प्रकृति की सत्ता मानते हैं। इसलिये वह स्वतन्त्र नहीं गई ? समाधान :- भगवान् की सृष्टि जीव के बन्धन में हेतु नहीं है, अपितु जीव है। सांख्यमत वाले प्रकृति को भी निरपेक्ष मानते हैं, परन्तु यह मत वेदसम्मत ने जो उसमें मिथ्या मैं और मेरा किया है, वही बन्धन में हेतु है। भगवान् ने सृष्टि नहीं है। की और जीव ने कहा यह मेरा है, तो वह इसमें फँसेगा ही। एक बार एक व्यक्ति रेल से मद्रास पहुँचा। वहाँ पहुँचने पर रेल के डिब्बे में जिज्ञासा :- वेद को परमात्मा का निःश्वास कहने का क्या तात्पर्य है? उसको एक लावारिस सन्दूक पड़ी दिखाई दी। वह उसके पास पहुँचा कि इतने में समाधान :- यहाँ पर निःश्वास कहने का तात्पर्य है कि परमात्मा के टी.टी.ई. आ गया और बोला, "यह सन्दूक किसका है?" तब उसने कहा, अन्दर जो ज्ञानराशी है वह सृष्टि के आदि में वेद के रूप में उससे स्वाभाविक ही प्रकट हो गई। जैसे रत्न में प्रकाश स्वाभाविक ही होता है, वह प्रयत्न करके प्रकट "मेरा है।" टी.टी.ई. ने पूछा, "लगेज करवाया है?" उसके ना करने पर

नहीं करता। ऐसे ही परमात्मा ज्ञानस्वरूप है, वेदस्वरूप है। उसका स्वभाव ही टी.टी.ई. ने पचास रुपये लेकर लगेज बना दिया। अब उसने कुली को बुलाया

ज्ञान है, वेद उसका स्वभाव है। परमात्मा ने किसी प्रकार का प्रयत्न करके उसे और कुछ रुपये देकर वह सन्दूक उसके सिर पर रख दिया। इतने में सामने से एक

प्रकट नहीं किया। जैसे हमारा प्रश्वास-निःश्वास बिना प्रयास चलता रहता है, पुलिसवाला आ गया। उसने पूछा, "इसमें क्या है?" तब कहा, कुछ नहीं घर

उसी प्रकार सृष्टि के लय के समय वह ज्ञान(वेद) परमात्मा में विलीन हो जाता है का थोड़ा-सा सामान है। जब पुलिसवाले ने जाना कि उसमें बहुत वजन है तब

और उत्पत्ति के समय बाहर प्रकट हो जाता है। कहा, "इसे खोलिए।" अब वह इधर-उधर चाबी खोजने लगा, पर चाबी कैसे मिलेगी! देखिए, शुरू से अभी तक झूठा ही नाटक कर रहा है। पुलिसवाले ने **** जिज्ञासा :- अद्वितीय परमात्मा से यह सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई? किसी प्रकार उस सन्दूक को खुलवाया तो देखा उसमें एक मुर्दा रखा हुआ है। पुलिसवाले ने उसे पकड़ लिया। विचार कीजिए! यहाँ पर उसके पकड़े समाधान :- आप जब सो जाते हैं तो स्वप्न कैसे उत्पन्न हो जाता है। वह जाने में हेतु सन्दूक को कहा जाए या उसने जो मिथ्या मेरा किया, उसे। इसी जबरदस्ती ही कहीं से आ जाता है। यहाँ अन्तर इतना ही है कि आपके अन्दर उत्पन्न होने वाला स्वप्न आपके अधीन नहीं होता और परमात्मा में जो उत्पन्न प्रकार परमात्मा की सृष्टि में आप यदि मैं और मेरा करेंगे तो बँधेंगे ही।

होता है वह उसके अधीन होता है। आप भी चेतन हैं इसलिये स्वप्न में सब उत्पन्न कर लेते हैं। पर आपकी उपाधि अविद्या है, इसलिये वह भुला देती है कि आपने जिज्ञासा :- कभी-कभी तो परमात्मा पर बहुत क्रोध आता है कि उसने

उत्पन्न किया। ईश्वर की उपाधि माया है और वह उसके अधीन रहती है। इसलिये ऐसी माया को क्यों बनाया जिसने सम्पूर्ण जगत् को बाँध रखा है। क्या यह ठीक है? ईश्वर की स्मृति का लोप नहीं होता। अतः वह जब चाहे सृष्टि प्रकट कर देता है समाधान :- यह अज्ञान की महिमा है कि व्यक्ति अपनी गलती नहीं

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ ईश्वरतत्त्व मानता और दूसरे पर दोषारोपण करता है। आप माया में बँधे हैं तो परमात्मा का इसमें क्या दोष है, जिससे आपको उनपर क्रोध आ गया। जीव कर्म करता है का पैसा लेकर उनके कल्याण के लिये तो अनुष्ठान करते हैं पर अपने लिये कभी नहीं कर पाते। स्वयं गरीब ही रह जाएंगे पर सेठों को धनी बनाने के लिये अनुष्ठान और उसके बदले भोग चाहता है। भोग माया के बिना हो नहीं सकता। परमात्मा ने तो जिम्मेदारी ले रखी है कि तुम कर्म करो, मैं तुम्हारी कामना के अनुसार फल कर देते हैं। यह सब महामाया का ही प्रभाव है। **** दूँगा। ऐसे में परमात्मा को माया की रचना करनी पड़ती है। आप अपनी जिज्ञासा :- क्या भगवान् को भी कभी क्रोध आता है, वे भी दुःखी होते कामनाओं को समेटो तो माया का आप के लिये कोई काम नहीं रहेगा और न वह आपको बाँध पाएगी। हैं? समाधान :- हाँ! भगवान् को भी क्रोध आता है और वे दुःखी भी होते **** हैं परन्तु जीवों के समान नहीं, उसमें हेतु दूसरा है। गीता में एक जगह भगवान् ने जिज्ञासा :- क्या भगवान् की कृपा न होने पर भी कोई केवल पुरुषार्थ कहा है - करके परमार्थ में आगे बढ़ सकता है? अवजानन्ति मां मूढ़ा मानुषीं तनुमाश्रितम्। समाधान :- पहले तो यह बताओ कि असम्भव की सम्भावना क्यों परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।(६.११) मान रहे हो? भगवान् की कृपा क्यों नहीं होगी? इसमें कोई कारण बता सकते हो? अरे! उसकी कृपा तो चौबीस घण्टे बरसती रहती है। क्या सूर्य किसी के भगवान् बड़े आक्रोश से कहते हैं कि, "इन जीवों की बुद्धि को इस

बारे में सोचता है कि मैं अपनी प्रकाश-किरणें उस पर नहीं डालूँगा। फिर भी कोई जगत् ने खा लिया है। मुझ परमात्मा को भी ये शरीर वाला मानते हैं। मुझे भी

छतरी लेकर चले तो सूर्य क्या कर सकता है? इसलिये भगवान् की कृपा को शरीर बना दिया। समझते हैं कि यह वसुदेव का लड़का है।" भाष्यकार भगवान् ने गीताभाष्य में एक जगह लिखा है- एवंभूतमपि परमेश्वरं धारण करने वाला होना चाहिए। उसके लिये कर्म करना पड़ेगा, पुरुषार्थ करना पड़ेगा। फिर कृपा के लिये कहीं जाना नहीं पड़ेगा। नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं सर्वभूतात्मानं निर्गुणं संसारदोषबीजप्रदाहकारणं मां नाभिजानाति जगद् इति अनुक्रोशं दर्शयति भगवान्।(७.१३) देखो! **** जिज्ञासा :- दुर्गा सप्तशती में कहा गया है - भगवान् कहते हैं कि मैं शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वभाव वाला हूँ, सब प्राणियों की आत्मा हूँ, निर्गुण हूँ, संसार के बीज अज्ञान को नष्ट करने वाला हूँ। ऐसा होने पर ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा। भी यह मनुष्य मुझे शरीर समझता है। मुझे नहीं जानता तो अपने को क्या बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।।(१.५५,५६) जानेगा? तो क्या ज्ञानी के चित्त को भी भगवती मोह में डाल देती है? जगत् में भी माता-पिता बच्चे के हितैषी होते हैं। उन्हें कभी-कभी बच्चे समाधान :- भगवती महामाया सबका चित्त तो हर ही रही है उसमें तुम पर क्रोध आता है कि हम इसके जीवन को दिव्य बनाना चाहते हैं, इसके हित की क्या करोगे ? पर इस श्लोक में ब्रह्मज्ञानी के लिये नहीं कहा गया। यहाँ ज्ञानी का बात कहते हैं पर उसे मानता ही नहीं और जो इसके जीवन को कुसंग में डालकर अर्थ है शास्त्र पढ़ा-लिखा पण्डित। ऐसे बड़े-बड़े पण्डितों के चित्त का हरण तो नाश करने वाले हैं उन्हीं की बात सुनता है। इसी प्रकार भगवान् को भी क्रोध भगवती कर ही रही है। वे लोग अपनी विद्या को पैसे के लिये बेच रहे हैं। दूसरों आता है कि देखो! इस जीव के हित के लिये इतना उपदेश किया पर यह मानता

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ ईश्वरतत्त्व ही नहीं। उल्टे मेरा ही अपमान करता है। मुझे भी जीने-मरने वाला समझता है। भागवत में प्रसंग आता है कि जब उद्धव भगवान् से अन्तिम उपदेश प्राप्त पहचान पाए परन्तु ब्रज के लोगों ने पहचान लिया। भगवान् तो कण-कण में हैं, करके प्रभास से चले तो वृन्दावन में विदुर से भेंट हुई। दोनों भक्त रातभर जिसमें योग्यता होगी वह पहचान लेगा, चाहे वह भाव की योग्यता हो या ज्ञान भगवत्-चर्चा करते रहे। बीच में उद्धव रो पड़े कि देखो! भगवान् को कोई समझ की। उसी के हृदय में भगवान् का विशेष प्रकाश होता है। ही नहीं पाया। उन्होंने एक दृष्टान्त दिया कि समुद्र-मन्थन से चन्द्रमा निकला और ****

उसे शिवजी ने अपने सिर पर धारण किया। जब वह समुद्र में था तब मछलियों ने जिज्ञासा :- भगवान् व्यापक हैं, सबके हृदय में बैठे हैं। भगवान् के

कभी नहीं समझा कि यह चन्द्रमा है। यही समझती थीं कि यह भी हम जैसी एक हृदय में रहते हुए भी मनुष्य मांस क्यों खाते हैं? मछली है, थोड़ी चमकदार है। इसी प्रकार यादव लोग भी कृष्ण के बारे में यही समाधान :- प्रश्न बड़ा विलक्षण है। हृदय में भगवान् रहे और मनुष्य

समझे कि यह भी एक यादव है, थोड़ा चमकदार है। यदुवंश में कोई भगवान् को मांसाहारी हो जाए यह कैसे हो गया? अब भगवान् तो बाघ के हृदय में भी है पर

समझ ही नहीं पाया। उसका भोजन तो मांस ही है, क्या किया जाए! पर यहाँ प्रश्न तो मनुष्य के विषय

भगवान् ने मनुष्य शरीर इसलिये दिया है जिससे यह अपने मैं को जान में हैं। तुलसीदासजी भी ऐसा ही एक प्रश्न करते हैं- ले, भगवान् को पहचान ले। पर मनुष्य खाने-पीने में ही लगा हुआ है। अपने ब्यापकु एक ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनँदरासी।। लक्ष्य को पाने के लिये उसके पास फुर्सत ही नहीं है। यह देख कर भगवान् भी अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी।।

दुःखी हो जाते हैं। (मानस बाल .- २२.३) आमन्द का सामर परमात्मा हृदय में बैठा है और जीव दुःखी हैं, बड़ा ौ* जिज्ञासा :- पतितपावन कैसे रीझें? आश्चर्य हैं! व्यवहार में देखते हैं कि कोई चीज रहने मात्र से लाभ नहीं होता,

समाधान :- पतितपावन की आज्ञा का पालन करोगे तो वे रीझ जाएँगे। उसका ज्ञान होना चाहिए। भगवान् ने आपको आँख दी है जो करोड़ रुपये में भी

भावपूर्वक उनकी आज्ञा का पालन करते रहो। नहीं मिल सकती। इतनी बड़ी सम्पत्ति आपके पास है पर आपके सुख प्राप्ति में कोई सहायता नहीं दे रही क्योंकि उसके महत्त्व का ज्ञान ही नहीं है। भगवान् **** जिज्ञासा :- राम चरित मानस में कहा है- पतञ्जलिजी भी कहते हैं - आनन्दसिन्धौ हि सर्वोऽपि लोको मग्नोऽपि

जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया। नाचामति नेक्षते च। एक आनन्द सागर में सभी डूबे हैं परन्तु दृष्टि उधर नहीं है,

(अयोध्या-१२६.१) क्या अन्य लोगों के हृदय में भगवान् नहीं रहते ? दृष्टि बाहर है। बाहर रेगिस्तान है। वहाँ सूर्य की किरणें पड़ रही हैं तो जल की

समाधान :- भगवान् ने जब वाल्मीकीजी से पूछा कि हम चित्रकूट में धारा दिखाई दे रही है। लोग सोचते हैं कि उस पानी से हमारी प्यास बुझ जाएगी।

कहाँ रहें, तो उस प्रसंग में यह चौपाई आई है। भगवान् तो सभी के हृदय में हैं पर वहाँ से प्यास कैसे बुझेगी? आश्चर्यमेतद् मृगतृष्णिकायामेवाम्बुराशौ रमते

उनको वही लोग पहचान पाते हैं जिनमें कपट, दम्भ और माया नहीं है। जिनमें मृषैव। जहाँ पर खड़े हैं उस सागर में अनन्त जन्मों की प्यास बुझा देने की ताकत

कपट आदि हैं वे नहीं पहचान सकते। देखो! कृष्ण को द्वारिका के लोग नहीं है, पर उधर ध्यान ही नहीं है। यही आश्चर्य है। मृग दौड़ते-दौड़ते मर जाता है पर पानी नहीं मिलता। जगत् में दौड़ते-दौड़ते यह जीव भी मर जाता है पर सुख प्राप्त

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ ईश्वरतत्त्व

नहीं करता जबकि सुख इसके हृदय में है। तात्पर्य यह है कि भगवान् के रहने पर है। उत्पन्न होने से हिरण्यगर्भ को जीव कहा जाता है। इसलिये जहाँ अवतारों की भी जब तक उसका ज्ञान नहीं है, तब तक लाभ नहीं होता। उत्पत्ति की चर्चा आती है वहाँ भाष्यकार भगवान् उद्भूत इव ऐसा कहते हैं। अब कहो कि ज्ञान का क्या काम, भगवान् है तो उसे मन को सुधार देना उत्पन्न हुआ सा मालूम पड़ता है, परन्तु वास्तव में उत्पन्न होता नहीं। अतः चाहिए। अरे! ऐसा नहीं होता। चिन्तामणि पास में हो, पर तुम कोई संकल्प न अवतार जीवकोटि में नहीं आता। शास्त्र में जैसा बताया गया है उस प्रकार से करो तो फल प्रकट नहीं होगा। तुम संकल्प करोगे तभी फल मिलेगा। कोई कहे कर्म और उपासना यदि कोई जीव कर लेता है तो वह अगले कल्प में हिरण्यगर्भ भगवान् दयालु है, उसे हमारे चाहे बिना भी मन को सुधारना चाहिए तो तुम्हारा पद को प्राप्त कर लेता है। यह सर्वोच्च पद है, जीव के अभ्युदय की अन्तिम सीमा नियम भगवान् पर नहीं चलेगा क्योंकि जगत् जैसा तुमको दिखता है वैसा है। वह प्रथम उद्भव है इसलिये बाकी सब का कारण बन जाएगा। उसका जो परमात्मा को नहीं दिखता। परमात्मा के ज्ञान में तो तुम्हारे पास कोई समस्या ही शरीर है वही हम सब के सूक्ष्मशरीरों का कारण है। इसलिये सामर्थ्य की दृष्टि से नहीं है, केवल अज्ञान से समस्या लाद रहे हो। उसको तो दिख रहा है कि न तो उसमें ईश्वरत्व भी है। उसकी उपाधि हमसे बहुत बड़ी और शुद्ध है। कोई मर रहा है, न कोई जी रहा है, न कोई मार रहा है, न मरवा रहा है, सब जीव **** माया से स्वप्न देख रहे हैं। भगवान् तो अपनी ओर से तब करे जब उसे कोई जिज्ञासा :- भगवान् राम कहाँ रहते हैं? समस्या दिखे। अतः वह शान्त रहता है। समाधान :- राम कहाँ नहीं रहते? शास्त्र में कहा है कि यह जगत् कार्य जब हम भगवान् के अस्तित्व को स्वीकार करके जागना चाहते हैं तब है और राम उसके कारण। श्रुति कहती है कि नाम-रूप ही जगत् है और यह वह हमारी सहायता कर देता है। जब जीव आँखें बन्द ही रखना चाहता है तो उत्पन्न होने के पहले भी था पर जिस रूप में हम देखते हैं उस रूप में नहीं था। भगवान् भी चुप रहता है। इसी प्रकार समझना चाहिए कि मांसाहारी व्यक्ति जब घड़ा उत्पन्न होने से पहले भी था पर घड़ारूप में नहीं, मिट्टीरूप में था। वही मिट्टी तक मांस के दोष को समझ कर उसे छोड़ना नहीं चाहेगा तब तक हृदय में बैठा घड़े के रूप में प्रतीत हो रही है, मिट्टी के अतिरिक्त घड़ा नाम की कोई वस्तु नहीं भगवान् चुप ही रहेगा। जीव की प्रवृत्ति में हेतु उसके संस्कार हैं, अन्दर बैठा है। भगवान् नहीं है। एक व्यक्ति कुम्हार के घर के सामने से जा रहा था। कुम्हार ने बर्तन **** बनाने के लिये मिट्टी का ढ़ेर तैयार करके रखा था। व्यक्ति की उसपर दृष्टि पड़ी जिज्ञासा :- ईश्वर ही हिरण्यगर्भ बना है अथवा कोई जीव कर्म और और वह आगे चला गया। शाम को लौटा तो वह ढ़ेर दिखाई नहीं दिया। कुम्हार उपासना के फलस्वरूप हिरण्यगर्भ बनता है? से पूछा - वह ढ़ेर कहाँ गया? कुम्हार ने उस ढ़ेर से बर्तन बना दिए थे। उसने समाधान :- एक बात समझकर रखना चाहिए कि उपाधि को लेकर जो उनकी ओर इशारा करके कहा - यही है। रात में बरसात हो गई तो सारे बर्तन गल भी चेतन उत्पन्न होता है उसका नाम जीव है। ईश्वर को तो उत्पन्न करने वाला गए। कुम्हार ने उन्हें इकट्ठा करके फिर मिट्टी का ढ़ेर बना दिया। सुबह वह व्यक्ति कोई दूसरा है नहीं, वह तो कभी जीवकोटि में नहीं आ सकता। हाँ! हिरण्यगर्भ फिर आया तो पूछा - वे बर्तन कहाँ गए? कुम्हार ने मिट्टी की ओर इशारा करके को उत्पन्न करने वाला ईश्वर है, वह उसका प्रथम संकल्प है। उसकी उपाधि कहा - यही हैं। पूछा मिट्टी के विषय में तो दिखाया बर्तनों को और पूछा बर्तनों सूक्ष्म पञ्चमहाभूत है, वही उसका शरीर है। इसलिये उसे प्रथम शरीरी कहा जाता के विषय में तो दिखाया मिट्टी को। इसका अर्थ है कि मिट्टी से अलग बर्तन

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ ईश्वरतत्त्व वास्तविक वस्तु नहीं है। वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्। (छान्दो.उप .- ६.१.४) चाहते हुए भी भक्त को संसार से मुक्त करने हेतु प्रतिज्ञा कर लेता है-

वास्तविक दृष्टि से कारण के अतिरिक्त कोई कार्य नहीं है। इसी प्रकार मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।

जगत् राम का संकल्प है इसलिये राम के अतिरिक्त उसका अस्तित्व नहीं है। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥(गीता-१२.८)

शिवमहिम्नः स्तोत्र में भी कहा है - न विद्यस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत्त्वं न ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।

भवसि।(२६) हे महादेव! हम तो जगत् में वह तत्त्व जानते ही नहीं जो आप न अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।(गीता-१२.६)

हो। एक कण भी आप से भिन्न नहीं है। चाहे उसे राम कहो या शिव। सब रूपों में तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ......... (गीता-१२.७)

वही दिखाई दे रहा है। इसलिये राम सर्वत्र हैं। सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥(गीता-१८.६६) **** जिज्ञासा :- यह बात लोकप्रसिद्ध है कि ईश्वर बड़े दयालु हैं और यह भी यहाँ पर कहाँ कर्म हैं! इस प्रतिज्ञा में दया के अतिरिक्त और क्या हेतु हो प्रसिद्ध है कि ईश्वर जीव को उसके कर्मानुसार फल देता है। यहाँ ईश्वर में सकता है! उस परमात्मा की अनुग्रहशक्ति जीवों के कल्याण के लिए निरन्तर दयालुता का क्या सम्बन्ध है, जैसे कोई जज न्यायालय में न्याय करता है तो उसे योजना बनाती रहती है अन्यथा किसमें सामर्थ्य है कि उसकी माया का पार पा दयालु तो नहीं कहते? सके! अतः ईश्वर की दयालुता के प्रति किसी प्रकार का संशय नहीं करना समाधान :- कर्मी के लिए तो ईश्वर जज के समान है और भक्त के लिए चाहिए। माता-पिता के समान है। जैसे जज न्यायालय में खड़े अभियुक्त का न्याय बिना *** भ पक्षपात किये करता है, चाहे उसे फाँसी दे अथवा बरी करे। पर पुत्र से कोई गलती हो जाए तो माता-पिता उसे घर से नहीं निकालते। वे थप्पड़ भी मारें तो भी उनका हृदय दया से ओतप्रोत रहता है। इसी प्रकार ईश्वर अपने भक्त को सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम्। उसके कर्मफल का भोग करवाता है तब भी उसका हृदय भक्त के प्रति दया से विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति।।

ओतप्रोत ही रहता है। (श्वेताश्वतर उप .- ४.१४)

दूसरी बात, ईश्वर की दयालुता सभी के प्रति इस बात से भी सिद्ध होती है कि उसने आपको शरीर बनाकर दिया और वही आपका श्वास चला रहा है। अव्याकृत से भी सूक्ष्म, अविद्या और उसके कार्यरूप दुर्गम स्थान में स्थित, सम्पूर्ण जगत् के सृष्टिकर्ता, अनेक रूप वाले और अपने स्वरूप उसके बदले वह आपसे कुछ भी नहीं चाहता है। फिर भी कर्म का फल देनेवाला से विश्व को व्याप्त करके स्थित परमात्मा शिव को जानकर जीव परम शान्ति होने से ईश्वर में दयालुता आपको नहीं दिखाई दे रही है, तब कोई क्या कर प्राप्त करता है। सकता है! उसमें सभी के प्रति स्वाभाविक ही दया है। बालक के उत्पन्न होने से पहले माता के स्तनों में दूध भर देता है। कितनी चिन्ता है उसको! वह कुछ न

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सन्त तथा सत्सङ्ग जगह से, वह परमार्थ मार्ग के लिये बाधक ही होती है। यह हमने अनुभव करके देखा है कि व्यावहारिक सुविधा महापुरुषों से भी कभी मिली हो तो वह जीवन में

सन्त तथा सत्सङ्ग आगे बढ़ाने वाली सिद्ध नहीं हुई। पारमार्थिक सुविधा किस प्रकार से शिष्य को दी जाती है यह महापुरुष ही जानते हैं, दूसरा नहीं समझ सकता।

जिज्ञासा :- आजकल कुछ महात्माओं के नाम के साथ भगवान् शब्द हमने अनुभव करके देखा कि महापुरुषों ने जीवन में कभी डाँटा,

जुड़ा हुआ देखा जाता है। क्या यह उचित है? सावधान किया, किसी तपस्या के लिये लगाया अथवा हमारे मन के प्रतिकूल हमें चलाया उस समय भले ही हमको वह बात समझ में नहीं आई पर अन्त में समाधान :- भक्त लोग किसी महात्मा के नाम के साथ भगवान् शब्द जोड़ देते हैं तो महात्मा क्या कर सकता है। उनकी श्रद्धा है। गुरु तथा श्रेष्ठ पुरुषों हमने देखा, ओहो! यह तो उनकी बड़ी भारी कृपा थी। एक बार उत्तरकाशी में मैं

के लिये भगवन् सम्बोधन सुना भी जाता है। पर यदि कोई महात्मा स्वयं अपने महाराजजी की सेवा में था। प्रायः वे किसी को डाँटते नहीं थे, पर उस समय मुझे दिनभर डाँटते रहते थे। चलते समय मेरे पैरों से यदि थोड़ी भी आवाज होती तो नाम के साथ भगवान् जोड़ता है तो उसे पहले यह जान लेना चाहिए कि भगवान् का लक्षण क्या है। फिर वे लक्षण अपने अन्दर घटा कर देखना चाहिए। यदि वे मुझे बुलाकर बोलते -"देखो! तुम धम्म से आवाज करते हो, यह विचार नहीं

लक्षण विद्यमान् हैं तो वह अपने नाम के साथ भगवान् शब्द जोड़ सकता है। करते कि कोई महात्मा ध्यान कर रहे हैं। उनको जो विक्षेप होगा उसका दोष

शास्त्र में भग शब्द ऐश्वर्यादि छः अर्थों में प्रयुक्त होता है - किसको लगेगा? चलते समय यह विचार क्यों नहीं करते कि जहाँ मैं पैर रखता

ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। हूँ वहाँ भगवान् हैं। तुम साधक हो तुम्हें इस प्रकार की सावधानी सतत रखनी

वैराग्यस्याथ मोक्षस्य षण्णां भग इतीङ्गना ।।(विष्णुपुराण-६.५.७४) चाहिए कि जहाँ मैं पैर रख रहा हूँ वहाँ भगवान् हैं।" उस समय श्रद्धा थी, सुन लेता था पर मन को उतना अच्छा नहीं लगता। आज यह बात समझ में आती है इन छः में से एक, दो, तीन या चार नहीं बल्कि छः के छः जिसमें हों वही की उनकी डाँट में कितनी कृपा थी। भगवान् हो सकता है। इसलिये महापुरुष इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि पारमार्थिक **** सुविधा किसे देना है और व्यावहारिक सुविधा किसे देना है। दूसरी बात व्यक्ति जिज्ञासा :- महापुरुष किसी शिष्य को सुविधा देते हैं और किसी को का अपना प्रारब्ध भी होता है। वह जहाँ जाता है वहाँ उसके प्रारब्ध के अनुसार उससे वञ्चित रखते हैं। इसका क्या कारण है? व्यावहारिक सुविधा मिल जाती है। उसने आज नहीं तो पहले कभी वैसी कामना समाधान :- दो प्रकार की सुविधाएं होती हैं। एक व्यावहारिक सुविधा की होगी। और दूसरी पारमार्थिक सुविधा। आप किस सुविधा की बात कर रहे हैं? यदि वह **** साधक है तो उसका लक्ष्य परमार्थ ही है। ऐसे में यदि वह व्यावहारिक सुविधा जिज्ञासा :- मैं बहुत वर्षों से वेदान्त का प्रवचन सुनता हूँ। यथाशक्ति चाहता है तो बहुत विचारणीय बात है क्योंकि व्यावहारिक सुविधा जगत् के रस जप-चिन्तन करता हुआ जगत् की परीक्षा करता रहता हूँ तो कोई विरक्त साधु से सम्बन्धित होती है। इसलिये चाहे वह गुरुजनों से मिल रही हो या किसी अन्य नहीं दिखता। फिर अपना आदर्श किसे मानें?

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग - ३ सन्त तथा सत्सङ्ग

समाधान :- आप जगत् की परीक्षा मत कीजिए, स्वयं की परीक्षा विलक्षण होता है। हमने कई वर्षों तक उत्तरकाशी में देखा कि अवधूत महात्मा कीजिए, आत्मपरीक्षा कीजिए। आप कह रहे हैं, "मुझे कोई विरक्त साधु दिखाई जा रहे हैं, सामने से माताएँ और लड़कियाँ आ रही हैं, परन्तु उन्हें देखकर उनके नहीं दिया।" विरक्त साधु दिखाई देने से आप को क्या लाभ होगा? आप यह मन में कहीं भी विकार नहीं आता था। चित्त श्रद्धा से अभिभूत हो जाता था। देखिए, इतने सालों से वेदान्त का चिन्तन कर रहे हैं तो आपके अन्दर विरक्ति नागाओं के शाही स्नान को देखने का बहुत बड़ा पुण्य भी माना जाता है। आई है या नहीं। रही बात विरक्त सन्त की, आपने कहीं एक तो देखा होगा। नहीं **** भी देखा है तो किसी विरक्त के विषय में सुना होगा। आप उसे आदर्श मान सकते जिज्ञासा :- महात्माओं में प्रसिद्धि है - युक्ति से मुक्ति। इसका क्या हैं। दुनिया की परीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। सन्त के सत्संग में जो आप तात्पर्य है? सुनते हैं उसका पालन कीजिए। उसका व्यवहार क्यों देखते हैं। समाधान :- हाँ! बात तो ठीक है। कई परिस्थितियों में हठ से मुक्ति नहीं समावर्तन संस्कार में गुरु शिष्य को कहता है- "देखो! मेरा जो व्यवहार मिलती, किसी युक्ति से ही मुक्ति मिल पाती है। एक गाँव के बाहर एक साधु रहते शास्त्र के अनुकूल हो उसको मानना और जो शास्त्र के अनुकूल न हो उसको थे। गाँव का एक युवक उनसे धीरे-धीरे सम्बन्धित हो गया। उसके माता-पिता नहीं मानना। हो सकता है किसी परिस्थितिवश या दवाई के रूप में मैं कोई चीज नहीं थे, बड़े भाई-भाभी थे। वह दिन भर खेती में काम करता और शाम को ग्रहण करूँ जो शास्त्रसम्मत न हो। मुझे देखकर तुम वह वस्तु ग्रहण मत करना।" सत्संग के लिये महात्मा के पास आ जाता था। साधुता के जीवन के प्रति उसका इसलिये सन्त के आचरण की परीक्षा न करें। यह तो उन्हीं पर छोड़ दें। लगाव बढ़ गया, घर-बार से मन हट गया तो वह महात्मा से दीक्षा लेने के लिये

**** तैयार हो गया। उसके भाई ने सोचा यह तो खेती में सब काम करता है, साधु बन जिज्ञासा :- जल में नग्न स्नान करना शास्त्र-निषिद्ध है किन्तु कुम्भ मेले गया तो अपने हाथ से चला जाएगा। उसने पंचायत बैठा ली और कहा- यह साधु में नागा संन्यासी नग्न स्नान करते हैं। क्या यह परम्परा उचित है? गाँव का अन्न खाता है और हमारे लड़के को ही साधु बना रहा है। यह तो गलत समाधान :- परमहंस संन्यासी जब वस्त्र ही नहीं पहनता तो वह नग्न बात है।

स्नान ही करेगा। संन्यास संस्कार के समय संन्यासी जल में खड़ा होकर सम्पूर्ण लोगों ने उसकी बात का समर्थन किया तो महात्मा घबरा गए। उन्होंने वस्त्रों का त्याग कर देता है। बाद में गुरु उसे लोकमर्यादा के लिये वस्त्र देता है। कहा तुम ले जाओ अपने लड़के को, हम तो किसी और गाँव में चले जाएंगे। इसलिये अनेक विरक्त महात्मा कहते हैं कि संन्यासी को नग्नस्नान में कोई दोष जाने से पहले उन्होंने लड़के के कान में एक सूत्र छोड़ दिया। लड़का भी खुशी से नहीं है। जो अखाड़ों के नागा साधु होते हैं वे हमेशा नग्न ही रहते हैं। वे भभूति घर चला गया। घर पर पहले से भी अधिक काम करने लगा। परन्तु जब भी कोई लगाकर रहते हैं, इसलिये वही उनका वस्त्र है। वे जल में तो क्या बाहर भी नग्न ही माँगने वाला घर पर आ जाता तो उसे खूब सामान दे देता। ६ महीने में उसके निकलते हैं और दुनिया बड़ी श्रद्धा की दृष्टि से उन्हें देखती है। कुछ लोग यह भी भाई ने कहा कि भइया तुझे साधु बनना हो तो बन जा, मेरा घर बर्बाद मत कर। कहते हैं कि शाही स्नान में नागाओं को नग्न अवस्था में नहीं निकलना चाहिए। अब देखो! आज्ञा मिल गई या नहीं। बिना युक्ति के मुक्ति नहीं मिलती है। आज के युग में नग्न पुरुष को देखने से स्त्री का मन बिगड़ेगा। परन्तु हमारा तो इसी प्रकार किसी गाँव का एक युवक वैराग्य होने पर घर छोड़कर चला अनुभव है कि जनता उनका दर्शन बहुत श्रद्धा से करती हैं। यह श्रद्धातत्त्व बहुत गया और एक महात्मा का शिष्य बन गया। एक साल बाद उसके गुरुजी ने किसी

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ सन्त तथा सत्सङ्ग कार्य से उसे उसके गाँव भेजा। उस गाँव के लोग बड़े विद्वान् तथा कर्मकाण्डी थे। उसके आने पर पंचायत बैठ गई, लोग उसे कहने लगे माता-पिता की सेवा प्रतिदिन जब काशी नरेश पहुँच जाते तो महात्मा कथा शुरु कर देते थे। एक दिन

छोड़कर, उन्हें दुःखी करके कोई साधु बने तो इससे क्या लाभ होगा? शास्त्र में राजा पहुँच गए पर महात्मा ने कथा शुरु नहीं की। राजा ने इशारा किया,

ऐसा कहाँ लिखा है? शास्त्र में तो यही लिखा है कि पुत्र को माता-पिता की सेवा स्वामीजी! कथा आरम्भ करें। महात्मा ने कहा, "अभी श्रोता आने वाला है।"

करनी चाहिए। पहले तो वह घबरा गया। फिर भगवान् का स्मरण किया तो बुद्धि राजा सहित सभी लोगों के मन को धक्का लगा कि क्या हम लोग श्रोता नहीं हैं?

में एक युक्ति आ गई। उसने खड़े हो कर कहा- शास्त्र केवल मेरे लिये नहीं है, इतने में एक व्यक्ति जो कभी भी देर नहीं करता था दौड़ते हुए आ गया। उस दिन

आप सब को भी शास्त्र की बात माननी चाहिए। उसे किसी विशेष कारण से दो मिनिट की देरी हो गई थी। उसके पहुँचते ही

पण्डित लोग नाराज हो गए। बोले- हम तो शास्त्र के अनुसार ही चलते महात्मा ने कथा आरम्भ कर दी। कथा पूर्ण होने पर राजा ने पूछा, "स्वामीजी!

हैं। सन्ध्योपासना, अग्निहोत्र, देवपूजन, उपासना सब कुछ शास्त्रीय विधि से आपने कहा था कि श्रोता अभी आया नहीं। हम लोग जो बैठे थे क्या श्रोता नहीं थे?" करते हैं। साधक ने कहा - शास्त्र में तो यह भी लिखा है कि जब व्यक्ति की आयु ५० वर्ष से अधिक हो जाए, घर की जिम्मेदारी समाप्त हो जाए तो उसे महात्मा ने कहा, "आपकी बात तो ठीक है, परन्तु आप लोग यह बताइए कि तीन दिन पहले हमने कौन सी कथा कही थी?" अब सभी लोग सिर वानप्रस्थ-आश्रम स्वीकार करके जंगल में जाकर तपस्या करनी चाहिए। यहाँ जितने लोग इस प्रकार के हैं वे कल हरिद्वार चले जाएं और मैं यहाँ रहकर बाकी खुजलाने लगे, तीन दिन पहले क्या बोले थे यह किसे ध्यान था। जब कोई नहीं

लोगों की सेवा करूँगा। यदि आपलोग नहीं जाएंगे तो आपके बदले तपस्या बोला तो महात्मा ने उस व्यक्ति को खड़ा किया और उससे वही प्रश्न किया।

करने मुझे ही जाना पड़ेगा। अब बताओ घर छोड़ने के लिये कौन तैयार होगा! उसने झट बोलना शुरु कर दिया "पाँच दिन पहले आपने यह कथा कही थी, चार

उसे साधु बनने की आज्ञा मिल गई। यही है युक्ति से मुक्ति। दिन पहले यह कही थी, तीन दिन पहले यह, दो दिन पहले यह, कल यह और आज यह कथा सुनाई है।" महात्मा ने कहा, "आप सभी लोग देख लो कि **** जिज्ञासा :- कथा-सत्संग किस प्रकार से सुनें जिससे जीवन में लाभ श्रोता कौन है?"

हो? सत्संग में जो सुना है उसे जब आप धारण करेंगे तभी उसका मनन कर

समाधान :- तुलसीदासजी ने कहा है - श्रोता बकता ग्याननिधि कथा पाएंगे। यदि धारण नहीं करेंगे तो उसका मनन नहीं होगा, फिर निदिध्यासन का तो

राम कै गूढ़।(मानस बाल .- ३०) वक्ता तो ज्ञान की निधि अर्थात् ज्ञान का सवाल ही नहीं उठता। कथा ठीक से सुनी इसकी परीक्षा यही है कि सुनने के बाद

खजाना होना ही चाहिए तभी वह आपके सब संशयों को दूर कर सकेगा। पर जब आप बाहर निकलते हैं तो वही बात आपके मन में घूमती है अथवा कोई

साथ में श्रोता भी ज्ञाननिधि होना चाहिए। ज्ञानं निधिर्यस्य अर्थात् ज्ञान को ही अन्य बात आ जाती है। यदि वही बात घूमे तो उसे आप याद रख पाएंगे। तभी

निधि(खजाना) समझने वाला होना चाहिए। उसके लिये ब्रह्माण्ड में दूसरी कोई वह कथा-श्रवण आपको कुछ लाभ दे सकेगा। **** निधि ही न हो। जब ऐसा होगा तो वह कथा का एक अक्षर भी नहीं भूलेगा। काशी में गंगाजी के दूसरी ओर रामनगर में एक महात्मा कथा कर रहे थे। जिज्ञासा :- सत्सङ्ग या भगवत्कथा को सुनने के लिए क्या नित्यकर्म का त्याग कर सकते हैं?

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ सन्त तथा सत्सङ्ग समाधान :- सत्सङ्ग या भगवत्कथा अवश्य सुननी चाहिए। पर नित्यनियम की उपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए। आप अपने अन्य समय में से कटौती करके उस समय अर्थाभाव भी था। मैं किसी को पत्र तो लिखता नहीं था क्योंकि इसी

सत्सङ्ग सुनिए अथवा प्रातःकाल उठने का समय जल्दी रखिए तो आपको दृष्टि से यहाँ आया था कि किसी को समाचार न मिले कि मैं कहाँ पर हूँ। मेरे पास

नित्यनियम नहीं छोड़ना पड़ेगा। नित्यनियम परिस्थितिवश संक्षेप में कर सकते पाँच-सात दिन की व्यवस्था तो थी, पर उसके आगे की नहीं थी। उसी समय

हैं, पर उन्हें छोड़ना नहीं चाहिए। नर्मदा के तट पर बैठा हुआ मैं विचार कर रहा था कि अभी तक तो नर्मदा ने किसी प्रकार काम चलाया, पर सात दिन के पश्चात् क्या होगा? **** जिज्ञासा :- उच्च कोटि के सन्तों के देहत्याग के अनन्तर भी कई भक्तों इतने में मुझे प्रत्यक्ष रूप से एक अनुभव हुआ कि किसी माता ने आकर

को एक साथ उनका दर्शन होता है। इसमें क्या रहस्य है? जोर से मुझे एक थप्पड़ मारा और कहा, "साधु बने हुए कितने वर्ष हुए हैं?"

समाधान :- एक साथ दर्शन होता है ऐसी बात नहीं है। पर आप विचार हमने कहा, "लगभग बारह-तेरह वर्ष तो हो गए।" फिर पूछा, "अच्छा, यह

करके देखिए कि जो महापुरुष होता है उसका अपने स्वरूप के विषय में क्या बता कि इतने समय तक कभी भूखा रखा?" अब मेरे पास तो कुछ शब्द ही नहीं

निर्णय है। वह अपने को शरीर नहीं बल्कि व्यापक समझता है। उसके शरीरत्याग रहा। फिर कहा, "देख! इतने वर्ष हुए साधु बने, मैं तेरे लिए प्रतिदिन भोजन की

के अनन्तर यदि कोई भक्त सावधान है तो उसका चित्त एकबार उस स्वरूप से व्यवस्था कर रही हूँ। किसी कारणवश सुबह नहीं तो शाम को कर ही देती हूँ।

टकराता है। भक्त का मन उसमें तल्लीन है इसलिये उसकी व्यापकता प्रकट हो आज तक कभी भूखा नहीं रखा। तेरे अविश्वास के कारण सात दिन आगे तक

जाती है। अब उसके दर्शन के लिये उसे कहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। का प्रबन्ध कर रखा है और तुझको अभी-भी विश्वास नहीं है। सात दिन पहले से ही चिन्ता कर रहा है।" फिर एक थप्पड़ और मारा। मैं समझ गया कि यह माँ **** जिज्ञासा :- साधु लोग प्रायः किसी देवता या देवी का नाम लेकर कहते नर्मदा ही है। उस थप्पड़ और उपदेश ने मेरे जीवन में इतनी गहरी छाप छोड़ी कि

रहते हैं कि उनकी प्रेरणा से कार्य कर रहा हूँ। यहाँ प्रेरणा का तात्पर्य क्या है? उसके पश्चात् तो मेरे अन्दर से यह चिन्ता हमेशा के लिए ही निकल गई कि

कृपया अपने अनुभव से बताएँ। आगे क्या होगा!

समाधान :- साधु हो या गृहस्थ, यदि परमात्मा के प्रति सच्ची आस्था है प्रारम्भ में इस आश्रम को चलाने के लिए बहुत मुश्किल होती थी। कभी-

तो वह किसी-न-किसी रूप में उसे प्रेरणा देता है क्योंकि वह तो हृदय में रहता कभी तो सुबह भोजन बना तो शाम के लिए नहीं रहता था। पर मुझे कभी इसकी

है, कहीं दूर नहीं है। व्यक्ति की बुद्धि में एक प्रकार का विचार उत्पन्न कर देता है, चिन्ता नहीं हुई। मुझे पक्का भरोसा रहा कि माँ नर्मदा व्यवस्था करेंगी। यदि वह

उसी को साधु लोग भगवत्प्रेरणा कहते हैं। दूसरी बात, यदि आपकी निष्ठा पक्की थप्पड़ नहीं लगा होता तो ऐसी परिस्थिति में अवश्य ही चिन्ता होती। उस थप्पड़

है तब तो वह प्रत्यक्ष होकर भी किसी रूप में आपको प्रेरणा दे सकता है। ने ऐसा काम किया कि मैंने कभी किसी भक्त को आश्रम की व्यवस्था के लिए

मेरे जीवन की एक घटना है। एक बार एक महात्मा को साथ लेकर मैं प्रेरित नहीं किया और न ही किसी महात्मा को जाने के लिए कहा। कभी-कभी

ओंकारेश्वर आया। महात्मा का शरीर अस्वस्थ था। मैं उनकी सेवा करता था। देवता इस प्रकार की प्रेरणा भी दे देता है।

उनके लिए दूध, दवाई और भोजन इत्यादि की व्यवस्था भी करनी पड़ती थी। जिज्ञासा :- महात्मा लोग कहते हैं कि शरीर जहाँ रहे रहने दो, मन

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ भगवान् में रख दो। क्या शरीर कहीं भी रहते हुए मन भगवान् में रखना सम्भव है ? समाधान :- हाँ, सम्भव है यदि लक्ष्य स्पष्ट हो तो। अर्जुन से भगवान् ने कहा, "जहाँ पर शरीर रहता है वहाँ मनुष्य नहीं रहता है, मनुष्य वहीं रहता है जहाँ शरणागति

उसका मन रहता है। इसलिए हे अर्जुन! तुम अपना मन मुझमें रख दो।" अर्जुन ने कहा, "यह तो ऐसे ही हुआ जैसे कोई कहे कि मैंने सम्पूर्ण लोक तुम्हें दान में जिज्ञासा :- कामनायुक्त व्यक्ति क्या भगवान् के शरणागत हो सकता

दे दिया। अरे! यह तुम्हारा था ही कहाँ जो तुमने दान में दे दिया! इसी प्रकार है?

हमारा मन हमारे साथ कहाँ है कि उसे हम भगवान् में रखें!" तब भगवान् ने समाधान :- हाँ! ऐसा व्यक्ति भी शरणागत हो सकता है पर कामना पूर्ति

कहा, "देखो, अर्जुन! जब तुम छोटे थे तब तुमने मन को खिलौनों में रखा। जब के लिये। यह शुद्ध शरणागति नहीं है। जो वस्तु नैमित्तिक होती है वह निमित्त के

कुछ बड़े हुए तब अध्ययन में रखा और उसके उपरान्त अध्ययन से भी हटाकर समाप्त होने पर समाप्त हो जाती है -

धन कमाने में रखा। जिन माता-पिता के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकते थे, निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः। (व्याकरण महाभाष्य)

विवाह के पश्चात् उन्हें भी भूलकर पत्नी में रखा। इस प्रकार तुम अभी तक मन इसलिये ऐसे व्यक्तियों की शरणागति तब तक ही रहती है जब तक उनका

को एक जगह से हटाकर दूसरी जगह रखते आए हो और मुझ में रखने में कंजूसी प्रयोजन पूरा नहीं हो जाता।

करते हो।" ****

अर्जुन ने कहा, "भगवन्! मैं नहीं जानता कि मेरा मन एक वस्तु को जिज्ञासा :- मैने अपने जीवन में भगवान् का भजन ही किया है और

छोड़कर दूसरी वस्तु में कैसे और कब चला जाता है।" तब भगवान् ने कहा, भगवान् से कुछ नहीं माँगा। एक दिन किसी कारणवश भगवान् से छोटी सी वस्तु

"तुम्हारी बुद्धि जिस वस्तु को इस प्रकार स्वीकार कर लेती है कि हमें इससे सुख माँगी पर उन्होंने मेरी एक न सुनी। मुझे शंका होती है कि भगवान् बहुत कठोर

प्राप्त होगा, मन उसमें स्वतः चला जाता है।" दिल वाले हैं?

जैसे, यहाँ भी व्यवहार में जब तुमको लगता है कि स्त्री से सुख मिलेगा तो समाधान :- एक बार भगवान् वैकुण्ठ में बैठे थे। नारदजी वहाँ पहुँचे

तुम्हारा मन स्वतः ही माता-पिता से हटकर स्त्री में चला जाता है। इसी प्रकार और कहा भगवन्! एक शंका है। भगवान् ने कहा - 'पूछो!' नारदजी बोले -

जिस दिन तुम समझ लोगे कि एक दिन मुझे इस जगत् के बिना ही काम चलाना 'भगवन्! मैं तो आप का ही हूँ। इस संसार में आपके अतिरिक्त मेरा और कोई

पड़ेगा और भगवान् के बिना काम नहीं चलेगा, तब तुम्हारी बुद्धि भगवान् का नहीं है। एक बार मेरे मन में विवाह करने की इच्छा हुई और मैंने अपनी इच्छा

महत्व स्वीकार कर लेगी, इससे मन को भगवान् में रखना सहज हो जाएगा। पूर्ण करने के लिये आप से प्रार्थना की। परन्तु आपने मेरी बात नहीं सुनी। इसका

इसलिए महात्मा लोग जो कहते हैं कि मन भगवान् में रखकर व्यवहार करो यह कारण मैं जानना चाहता हूँ।'

बात उचित ही है। भगवान् ने कहा - "नारद! कारण यही है कि तुम केवल मेरे हो। इसीलिये मैंने अपने हृदय को वज्र के समान कठोर करके तुम्हारा विवाह नहीं ****

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ शरणागति

होने दिया। यदि तुम भिखमँगे होते तो मैं तुम्हारा विवाह अवश्य करवा देता। जिज्ञासा :- शरणागत यदि अपराधी है तो उसको शरण देना क्या अब तुमने तो मेरे सिवाय दूसरा भरोसा रखा ही नहीं इसलिये मुझे विचार करना अपराध नहीं है? पड़ा कि इस विवाह से तुम सुखी होगे या दुःखी। मेरा तो वचन है - समाधान :- शरणागत की रक्षा के विषय में हमारा शास्त्र बहुत जोर देता सुनु मुनि कहउँ तोहि सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा। है। कोई अभिमान छोड़कर शरण में आ जाए तो कितना भी बड़ा अपराधी हो करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी।। उसकी रक्षा करनी पड़ेगी। शरणागति की मर्यादा तो भारतीय परम्परा में ऐसी रही (मानस अरण्य- ४२.२/३) है कि कोई शरण में आ गया तो चाहे पूरा राज्य बर्बाद हो जाए पर राजा शरणागत मैं अपने बच्चे को दुःखी नहीं करना चाहता। पर क्या करूँ जब देखता हूँ की उपेक्षा नहीं करेगा। यदि कोई सचाई से शरण में आ जाता है तो उसका कि यह विष खाने जा रहा है तो कैसे खाने दूँ। जब वह हठ करके रोता है उस अपराध खत्म हो जाता है। हाँ! कोई छल करे तो अलग बात है। वह शरणागत समय मैं प्रसन्न नहीं होता परन्तु मुझे हृदय को वज्र के समान बनाना पड़ता है। नहीं है। जैसे कलि ने छल किया। जब परीक्षित मारने के लिये तैयार हो गए तो माता जब बालक को थप्पड मारती है उस समय भी वह उसे दुःखी करना नहीं वह यह सोचकर उनके चरणों में गिर गया कि इन्हें छू लूँगा तो मेरा कुछ प्रभाव चाहती। उसका हृदय कृपा से ओत-प्रोत रहता है। नारद! बस यही बात थी कि इनपर पड़ ही जाएगा। उसने कहा, "हम भी आपकी प्रजा हैं। हमें भी कुछ स्थान मैंने तुम्हारी एक न सुनी।" मिलना चाहिए।" जब स्वर्ण में स्थान मिल गया तो उन्हीं को पकड़ लिया। उसने इसलिये आप यदि साधक हैं तो आपको भगवान् पर कठोरहृदय होने का छल किया था। उसे उसी समय मार दिया होता तो आगे समस्या नहीं आती। आरोप नहीं लगाना चाहिए। आप अल्पज्ञ हैं, किसी भावना के वश में आकर **** भगवान् के सामने अपनी कामना को रख तो देते हैं परन्तु उससे लाभ होगा या यः स्रष्टारं निखिलजगतां निर्ममे पूर्वमीश- हानि यह आप नहीं जानते। भगवान् सर्वज्ञ हैं इसीलिये वह भक्त की हर बात नहीं स्तस्मै वेदानदित सकलान् यश्च साकं पुराणैः ।

मानता। उसके हित में जो होता है वही करता है। तं त्वामाद्यं गुरुमहमसावात्मबुद्धिप्रकाशं

**** संसारार्तः शरणमधुना पार्वतीशं प्रपद्ये।।

जिज्ञासा :- कभी-कभी भगवान् का आश्रय लेकर क्रिया प्रारम्भ करते (आत्मार्पणस्तुति :- १६)

हैं फिर भी नुकसान उठाना पड़ता है। भगवान् सहायता क्यों नहीं करते? जिन्होंने सृष्टि के आरम्भ काल में सम्पूर्ण जगत् समाधान :- आप पक्का निश्चय कर लीजिए कि भगवान् का आश्रय के स्रष्टा ब्रह्मा को उत्पन्न कर उन्हें पुराणों सहित सकल लेने से मंगल ही होगा। चलते चलो, पीछे मुड़कर मत देखो। धनहानि भी हो वेद का उपदेश किया उन आत्मबुद्धि के प्रकाशक, जाए तो चिन्ता मत करो। समय पर प्रभु सब ठीक कर देंगे। समस्या यही है कि आदिगुरु, उमापति की संसार से त्रस्त मैं दीन भक्त

आप धन के नुकसान को ही हानि मान लेते हैं। ऐसी बात नहीं है। कभी-कभी शरण ग्रहण करता हूँ।

भगवान् नुकसान में भी कृपा कर देते हैं। ****

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योग एवं ध्यान ध्वनि हें है। शरीर के भीतर एक बिन्दु है जिसमें कम्पन होता है तो उस कम्पन से एक ध्वनि उत्पन्न होती है। वह ध्वनि बाहर श्रवणेन्द्रिय से सुनाई नहीं

योग एवं ध्यान देती। अन्तर्मुख होने पर साधक उसका अनुभव सुषुम्ना नाड़ी के भीतर करता है। उसी को अनाहत नाद कहते हैं।

जिज्ञासा :- ध्यान में बैठते समय किसी को भ्रूमध्य में प्रकाश दिखाई यह साधना करने की कई प्रकार की विधियाँ हैं। हठयोग तथा मन्त्रयोग

दे या ध्वनि सुनाई दे तो ये किस बात के द्योतक हैं। उस समय साधक को क्या वाले साधक विशेषकर इसका अनुभव करते हैं। इसकी प्रगति की पहचान यही

करना चाहिए ? है कि आपको नाद स्पष्ट सुनाई देने लगे।

समाधान :- ध्यान करने वाले साधक की साधना यदि ठीक चल रही ****

है तो उसे इस प्रकार की अनुभूतियाँ होना स्वाभाविक है। साधक अपनी जिज्ञासा :- तन्त्रपद्धति से कुण्डलिनी जागरण करने के लिये क्या

साधना में प्राण को आधार बनाता है अथवा मन को, इसबात पर भी उसे होने योगपद्धति की भी सहायता ले सकते हैं?

वाली अनुभूतियाँ निर्भर करती हैं। प्राण क्रियाशक्ति का केन्द्र है और मन समाधान :- आसन-प्राणायाम के रूप में योग की सहायता ले सकते

ज्ञानशक्ति का। यह सारा जगत् नामरूपात्मक है। नाम का मूल नाद है और रूप हैं। परन्तु तन्त्रपद्धति और योगपद्धति इन दोनों का सिद्धान्त अलग-अलग है।

का मूल प्रकाश(बिन्दु) है। यदि साधक प्राण को आधार बनाकर साधना योगपद्धति में प्राणायाम की प्रधानता रहती है। प्राणायाम के द्वारा मणिपूर

करता है तो उसे विभिन्न प्रकार की ध्वनियाँ (नाद) सुनाई देती हैं और मन को चक्र (नाभिस्थान) में अग्नि प्रज्वलित करते हैं। दूसरी ओर तन्त्रपद्धति में

आधार बनाकर साधना करता है तो उसे प्रकाश आदि के दर्शन होते हैं। ऐसे में भावना की प्रधानता रहती है। भावना के द्वारा स्वाधिष्ठान चक्र(नाभिस्थान से

साधक को अत्यन्त सावधान रहना चाहिए, अन्यथा कभी-कभी ये दर्शन चार अंगुल नीचे) में अग्नि प्रज्वलित करते हैं। उसी अग्नि से मूलाधार चक्र में

साधना में बाधक बन जाते हैं। इसलिये इनकी उपेक्षा करते हुए आगे बढ़ना सोयी हुई कुण्डलिनी को जाग्रत करके सुषुम्ना मार्ग से चक्रों का भेदन करते

चाहिए। हुए सहस्रार चक्र तक ले जाते हैं।


जिज्ञासा :- अनाहत नाद का क्या अर्थ है? यह साधना कैसे की जिज्ञासा :- तन्त्रपद्धति तथा योगपद्धति में सरल कौनसी है?

जाती है और इसकी प्रगति की पहचान क्या है? समाधान :- यह साधक के संस्कारों पर निर्भर करता है। यदि साधक

समाधान :- आहत का अर्थ है किसी से टकराना। अनाहत का अर्थ में भावना की प्रधानता है तो उसे तन्त्रपद्धति सरल लगेगी क्योंकि इस पद्धति में

है नहीं टकराना। अनाहत नाद का अर्थ हुआ किसी से बिना टकराए उत्पन्न होने बैठ कर मात्र भावना ही करनी पड़ती है। योगपद्धति इससे कुछ जटिल है।

वाली ध्वनि। सामान्य बोलचाल में जब प्राणवायु तालु, कण्ठ आदि स्थानों में उसमें सावधानी की बहुत अपेक्षा रहती है। योगपद्धति के द्वारा उत्पन्न की जाने

आकर टकराती है तब ध्वनि बाहर प्रगट होती है। अनाहत नाद इस प्रकार की वाली अग्नि की अपेक्षा तन्त्रपद्धति के द्वारा उत्पन्न की जाने वाली अग्नि

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ योग एवं ध्यान मूलाधार चक्र (जो सुषुप्त कुण्डलिनी का स्थान है) के समीप होने से अपेक्षित नहीं है। साधना के पूर्व संस्कारों के बल पर उस वृत्तिप्रवाह से भी कुण्डलिनी-जागरण का कार्य जल्दी हो जाता है। वैरा+ हो जाता है जिसे परवैराग्य कहते हैं। इसके बाद वह वृत्तिप्रवाह धीरे- **** धीरे समाप्त हो जाएगा, तब निर्विकल्प समाधि लग जाएगी। यह ध्यान का ही जिज्ञासा :- ध्यानकाल में जैसा अनुभव होता है वह जब हम क्रमिक विकास है। क्रियाशील होते हैं उस समय क्यों नहीं रहता? समाधान :- अरे! मन की एक समान वृत्ति तो हमेशा नहीं रहती है। जिज्ञासा :- ज्योति का ध्यान करना, निराकार का ध्यान है अथवा मन की एक ही वृत्ति रहे तब तो यदि वह जगत् में लग जाए तो निकले ही नहीं, साकार का? भगवान् में कैसे लगेगा? ध्यानकाल में मन एकाग्र होता है इसलिये अलग समाधान :- आकार जो भी होगा, चाहे वह ज्योति हो या कोई अन्य, प्रकार की अनुभूति होती है। परन्तु कभी-कभी क्रियाशील रहने पर भी वैसी वृत्ति आ जाती है। अन्दर स्मृति तीव्र हो जाए तो व्यवहार करते हुए भी वैसा वह साकार ही होगा।

अनुभव हो सकता है। कभी आप वृक्ष में जल दे रहे हों और आप का भाव बन जाए कि जिज्ञासा :- बाह्य कुम्भक किस प्रकार करें?

महादेव को जल चढ़ा रहे हैं तो आपको रोमांच हो सकता है। जब व्यक्ति का समाधान :- बाह्य कुम्भक का कोई क्रम नहीं होता। आपका श्वास

अभ्यास सुदृढ होता है तब वह जो ध्यान करता है उसका स्मरण चलते-फिरते बाहर गया उसे रोक दीजिए तो बाह्य कुम्भक हो जाएगा। जब तक आपकी

भी बना रहता है। जब वृत्ति दृढ़ हो जाए तो वह आपके अधीन हो जाती है। सामर्थ्य है तब तक उसे धीरे-धीरे रोकने का अभ्यास बढ़ाना चाहिए। इसके लिये कोई रेचक-पूरक का क्रम नहीं है। लेकिन रेचक-पूरक के क्रम से **** जिज्ञासा :- सविकल्प समाधि और ध्यान में क्या भेद है? दीर्घकाल तक अभ्यास करके जब प्राणायाम सिद्ध होगा तभी यह कुम्भक हो पाएगा। बाह्य कुम्भक में श्वास को जब तक रोक सकते हैं तब तक रोकिए, समाधान :- ध्यान के समय साधक एक लक्ष्य पर मन को एकाग्र करता है परन्तु बहुत लम्बे काल तक एक सी वृत्ति नहीं रह पाती, बदल जाती इसमें समय का कोई नियम नहीं है। प्रारम्भिक अभ्यास में समय का नियम

है। ध्यान का अभ्यास करते-करते जब वह सुदृढ़ हो जाता है, लगातार एक होता है कि पूरक से चार गुना कुम्भक का समय और दो गुना रेचक का समय

वृत्ति का प्रवाह चलने लगता है तो उसे सविकल्प समाधि कहते हैं। ध्यान ही होना चाहिए। जब यह अभ्यास सिद्ध हुआ तो श्वास स्वाभाविक बाहर जाता है, उसे रोक देंगे तो बाह्य कुम्भक हो जाएगा। श्वास अन्दर गया उसे रोक देंगे पुष्ट होकर सविकल्प समाधि का रूप धारण करता है। इसमें भी त्रिपुटी बनी तो आन्तर कुम्भक हो जाएगा। अब बाहर श्वास रोककर बैठे हैं तो वहीं रहती है। समाधि लग सकती है, परन्तु पहले सामान्य प्राणायाम से श्वास शुद्ध हो अभ्यास करते-करते एक ऐसा आन्तरवैराग्य हो जाता है जिससे सविकल्प समाधि से भी मन हट जाता है। इसमें साधक का कोई प्रयास जाएगा तभी यह कुम्भक बनेगा। ****

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ योग एवं ध्यान जिज्ञासा :- योग के विषय में बहुत सुनते हैं। वास्तव में योग किसे उपदेश है वह आपको निष्कामता की ओर, स्वरूप की ओर ले जाने के लिये कहते हैं? है। इसलिये गीता के अनुसार योगी वही हो सकता है जिसका लक्ष्य जगत् नहीं समाधान :- योग को ठीक से समझना चाहिए। आजकल तो लोग बल्कि परमात्मा है। आसन, प्राणायाम, पेट हिलाना इसको ही योग समझ लेते हैं। पर शास्त्र में तपस्वी का लक्ष्य अलग हो सकता है। वह तपस्या करके सिद्धियाँ, योग इसे नहीं कहा है। आप का रोना भी योग हो सकता है यदि वह परमात्मा स्वर्ग या ब्रह्मलोक की प्राप्ति करने की इच्छा रख सकता है। यहाँ ज्ञानी शब्द से सम्बन्धित हो जाए। यदि जगत् से सम्बन्धित हो जाए तो आपका ध्यान भी का अर्थ शास्त्रों का पण्डित समझना चाहिए। उसके पाण्डित्य का उद्देश्य भी योग नहीं बनेगा। आपका प्रत्येक कर्म योग बन सकता है यदि उसका सम्बन्ध धन या यश कमाना हो सकता है। कर्मी का लक्ष्य भी प्रायः स्वर्ग, धन आदि ही परमात्मा से, स्वरूप से हो जाए। भगवद्गीता के पहले अध्याय का नाम होता है। परन्तु इस अध्याय में तो आत्मसंयमयोग की चर्चा है। यह तो उस अर्जुनविषादयोग है। बताओ! विषाद भी कहीं योग होता है? दुनिया में सब साधक के लिये बताया जो निष्काम कर्म की कक्षा पास कर चुका है। उसे बाहर लोग विषादग्रस्त हैं ही, तब तो सब योगी हो गए। पर ऐसा नहीं है। अर्जुन को से संयमित करके स्वरूपस्थ बनाने के लिये यह योग है। यह ज्ञान का अन्तरंग जो विषाद था उसका सम्बन्ध परमात्मा से था, वास्तविकता को जानने से, साधन है। इस योग का अनुष्ठान वही कर सकता है जिसका लक्ष्य केवल स्वरूप के ज्ञान से था। इसलिये उसकी योग संज्ञा हुई। परमात्मप्राप्ति है। इसीलिये इस योगी को सर्वश्रेष्ठ कहा है। आपका कोई भी व्यवहार जब परमात्मा से सम्बन्धित हो जाता है तब ****

आप योगी हो जाते हैं। दूसरी ओर आप भजन कर रहे हैं, वेद पढ़ रहे हैं, ध्यान कर रहे हैं, उपनिषदों पर प्रवचन भी कर रहे हैं, परन्तु इनका सम्बन्ध जगत् से हो जाए तो आपकी योगी संज्ञा नहीं हो सकती। शास्त्र के इस मर्म को समझना ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्ति स्वगुणैर्निगूढ़ाम्। यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः॥ चाहिए। (श्वेताश्वतर उप .- १.३) *** भ जिज्ञासा :- गीता में कहा है - तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। उन योगियों ने ध्यानयोग का अनुसरण करके अपने

कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।।(६.४६) गुणों से आच्छादित परमात्मा की शक्ति का साक्षात्कार किया। वह परमात्मा स्वयं ही काल से लेकर आत्मा(जीव) पर्यन्त यहाँ किस योगी को तपस्वी आदि से श्रेष्ठ कहा है और क्यों? समस्त कारणों का अधिष्ठान है। समाधान :- पहले तो यह समझना चाहिए कि गीता के प्रत्येक अध्याय के नाम में योग शब्द जुड़ा हुआ है - अर्जुनविषादयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग आदि। गीता में कहीं भी सकामता के लिये स्थान नहीं है। इसमें तो जितना भी

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दोष-विचार एवं निवारण धैर्य को दबाकर उसे अपने वश में कर लेता है। जैसे प्रेत किसी के सिर पर सवार होता है तो व्यक्ति को होश नहीं रहता, अर्थात् वह प्रेत के द्वारा नियन्त्रित दोष-विचार एवं निवारण हुआ ही चेष्टा करता है। इसी प्रकार क्रोधाविष्ट व्यक्ति की भी चेष्टा समझनी चाहिए। जिज्ञासा :- मैं अखबार पढ़ना और समाचार सुनना छोड़ना चाहता हूँ ****

पर छूटता नहीं। कृपया छोड़ने का उपाय बताएं? जिज्ञासा :- समाधान :- छोड़ने के लिये कोई उपाय नहीं करना पड़ता। किसी शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्। वस्तु को छोड़ने में व्यक्ति परवश नहीं होता, बनाने में परवश होता है। कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः।(गीता-५.२३) अखबार पढ़ने में परवशता है, उसको खरीदने के लिये रुपए चाहिए, लाने के यहाँ भगवान् ने कहा - "जो काम, क्रोध आदि को सहन कर लेता है वही लिये कोई व्यक्ति चाहिए। फिर भी पढ़ने की अपेक्षा छोड़ना कठिन लग रहा है योगी है, वही सुखी मनुष्य है।" इससे सिद्ध हुआ कि योगी को भी काम, तो कोई अन्य कारण है जिसे खोजना पड़ेगा। व्यक्ति का जिसमें राग होता है क्रोध आदि का आवेश आता है। फिर इससे बचता कौन है? उसे छोड़ना कठिन होता है। इसका मतलब आपका अखबार के प्रति जो राग समाधान :- काम, क्रोध आदि बीज रूप या किसी न किसी रूप में है उस राग को समाप्त करना पड़ेगा। सभी जीवों में रहते ही हैं। ये हमेशा अभिव्यक्त रूप में नहीं रहते। इनका एक किसी वस्तु के प्रति राग को समाप्त करने के लिये आपका दृढ़ वेग आता है। यहाँ पर भगवान् कहते हैं - "मनुष्य शरीर जब तक है तब तक संकल्प चाहिए और उस वस्तु में क्या दोष है यह दिखाई देना चाहिए। आप इसमें काम, क्रोध आदि रहे तो कोई आश्चर्य नहीं।" अरे! मनुष्य शरीर मिला प्रयास कर रहे हैं फिर भी छूट नहीं रहा है, इसका मतलब आपको उसमें दोष है तो मूल में अज्ञान है यह मानना ही पड़ेगा। जहाँ अज्ञान है वहाँ काम, क्रोध दिखाई नहीं दे रहा है। जिस दिन यह लगेगा कि अखबार पढ़ना हमारे लक्ष्य में रहता ही है। पुरुषार्थ क्या है? इनको सहन करना, विचार के द्वारा अन्दर ही बहुत बड़ा बाधक है तो उसमें रस नहीं मिलेगा। जैसे किसी को लड्डू में विष शमन कर देना। यहाँ ध्यान देने की बात है कि जब तक शरीर है तब तक ये दीख जाए तो वह लड्ड नीं खाएगा। अरे! अखबार तो एक दिन छूटना ही है। कभी भीं आ सकते हैं। अहंकार करके कोई इन्हें रोक नहीं सकता। हाँ, मनुष्य तुम नहीं चाहोगे फिर भी एक दिन छूट जाएगा। जो वस्तु छूटने वाली है उसे इनके वेग को सहन कर सकता है। आज छोड़ने में किप बात की कठिनाई है? एक महात्मा थे जिन्होंने काष्ठमौन का व्रत ले रखा था। वे किसी मार्ग

**** से जा रहे थे। उनको भूख लगी। रास्ते में एक खेत में उन्होंने मूली देखी तो जिज्ञासा :- क्रोध का स्वरूप क्या है? उखाड़कर खा ली। इतने में उनको किसान ने देख लिया और बहुत मारा। वे समाधान :- क्रोध एक आवेश है, तमोगुणी वृत्ति की एक अभिव्यक्ति कुछ बोले नहीं और क्रोध भी नहीं आया, क्योंकि व्रत ले रखा था। काम, है। जब यह व्यक्ति पर सवार हो जाता है तो उस व्यक्ति के विवेक, विचार और क्रोध को शान्त करने की शक्ति ईश्वर ने मनुष्य में दे रखी है। ऑफिस में अपने

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ दोष-विचार एवं निवारण से बड़े अधिकारी की डाँट चुपचाप सुन लेता है। इसलिये कि नौकरी छूट महापुरुष हैं आप जो जवाब आज दे रहे हैं वह पहले भी दे सकते थे।" जाएगी यह भय अन्दर बैठा है। सीमा पर सैनिक काम का वेग सहन कर लेता महात्मा ने कहा - "उस समय नहीं दे सकता था क्योंकि कभी मेरा मन है। कारण कि पैसे का लोभ है। इसी प्रकार किसी में परमार्थ का महत्त्व बैठ गड़ बड़ा जाता तो क्या करता। अब मैं जाने वाला हूँ। मेरे जीवन में अभी तक जाए और उसका लोभ आ जाए तो सहन क्यों नहीं कर सकता? कभी काम, क्रोध का वेग नहीं आया और अब आगे आने की सम्भावना भी वे महात्मा तीन साल पश्चात् फिर उसी रास्ते से लौट रहे थे तो वह नहीं है। इसलिये अब मैं कह सकता हूँ कि मैं सच्चा साधु हूँ।" घटना याद आ गई और क्रोध आ गया। कहा - "हमने तो उस समय कोई तात्पर्य यह हुआ कि भले ही काम, क्रोध पर आप का नियन्त्रण है पर गलती नहीं की थी। भूख लगी थी, दो मूली खा ली तो किसान ने मुझे बहुत अहंकारपूर्वक कार्य होने वाला नहीं। इसलिये कहा - "जो इस विषय में पीटा। मेरे साथ बहुत बड़ा अन्याय किया।" यहाँ पर विचारणीय यह बात है सावधान है वही योगी है, वही मनुष्य सुखी है।" ज्ञानी के शरीर में भी काम- कि उस समय मौन व्रत ले रखा था, परमार्थ का एक महत्त्व बैठा हुआ था, क्रोध दिखाई दे सकता है, पर ज्ञानी का उससे सम्बन्ध नहीं बनता। इसलिये इसलिये क्रोध सहन कर लिया। परन्तु वह नष्ट नहीं हुआ था। यदि बीज रूप में कह सकते हैं कि ज्ञानी में काम, क्रोध का वेग नहीं आता। नहीं रहता तो आज प्रकट कैसे होता? हमने ऐसे कई लोगों को देखा है जिनमें **** चालीस-पचास वर्षों तक काम की अभिव्यक्ति दिखाई नहीं दी, फिर एकाएक जिज्ञासा :- किसी घटना को देख कर भय उत्पन्न होने में क्या कारण दिखाई दी। यदि बीज रूप में नहीं होता तो कैसे आता। है? कहते हैं भय उत्पन्न होने के समय इष्ट मन्त्र का जप करना चाहिए। इसमें इसलिये इस विषय में महात्मा लोग मृत्युपर्यन्त सावधान रहते है। क्या रहस्य है ? भाष्यकार भगवान् ने प्राक्शरीरविमोक्षणात् का अर्थ मृत्युपर्यन्त ऐसा किया समाधान :- भय का विषय सामने उपस्थित होने पर जीव के शरीर में है। उन्होंने कहा - जीवितोऽवश्यम्भावी। तात्पर्य है जीवित पुरुष में ये दोष विभिन्न प्रकार के परमाणुओं का संघर्ष होता है। उससे मन में एक प्रकार की अवश्य ही रहते हैं। इसलिये कहा - यावत् मरणं तावत् न विश्रम्भणीयः। विषम अवस्था उत्पन्न होती है। वह बढ़ती जाती है तो मन में बेचैनी होने शरीर पर्यन्त इनका विश्वास नहीं करना चाहिए। जब तक मर नहीं जाए तब लगती है। जैसे शरीर में कम्पन होना, निद्रा न आना, रोम खड़े होना इत्यादि, तक विश्वास न करे कि काम, क्रोध का वेग नहीं आएगा। इसे ही भय कहते हैं। इष्ट देवता के मन्त्र का जप करने से तत्सम्बन्धी परमाणु एक युवक था। वह एक महात्मा से मजाक में हमेशा पूछता रहता था बाहर से आकर्षित होकर शरीर में प्रवेश करने लगते हैं जिससे भय को उत्पन्न -"महाराज! क्या आप सच्चे साधु हैं?" महात्मा कुछ बोलते नहीं थे, चुपचाप चले जाते। इस प्रकार बहुत समय बीत गया। महात्मा की मृत्यु का करने वाले परमाणु शान्त हो जाते है। साधक के भाव की प्रबलता से कभी-

समय आया तो उन्होंने किसी से कहा -"उस युवक को बुलाओ"। जब वह कभी वे परमाणु इतने घनीभूत हो जाते हैं कि उससे इष्ट का दर्शन भी हो जाता है। आया तो महात्मा बोले -"भाई! मैं सच्चा साधु हूँ।" युवक ने कहा - **** "महाराज! मैंने गलती की, मुझे ऐसा नहीं पूछना चाहिए था। पर आप तो जिज्ञासा :- जीवन में दीनता न आये इसके लिये क्या करना चाहिए?

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ दोष-विचार एवं निवारण समाधान :- इसके लिये पहले दीनता के कारण को पकड़ना पड़ेगा। कर आता है और एक तिनका अग्नि और वायु के सामने रख देता है। अग्नि पूरा जब कारण पकड़ में आ जाएगा तो उसे नष्ट करने का उपाय करना पड़ेगा। जब जोर लगा कर भी उस तिनके को जला नहीं पाया और वायु उड़ा नहीं सका। कारण नहीं रहेगा तो कार्य भी नहीं रहेगा। दीनता में मुख्य रूप से दो कारण हैं उनका अहंकार कहाँ चला गया! परमात्मा की शक्ति से ही वे अपना काम कर - संसार की कामनाएं और अहंकार। कामनाएं रहते हुए आप दीनता से मुक्त पाते हैं। इसी प्रकार हमें नेत्र, श्रोत्र बनाकर उसी ने दिए हैं, वही हमारे प्राणों को नहीं हो सकते। वे आपको किसी के भी सामने झुका सकती हैं। दीनता में दूसरा चला रहा है। सारी शक्ति हमें उसी से मिल रही है और हम व्यर्थ अहंकार करते कारण है- अहंकार। अहंकारी व्यक्ति में दीनता रहेगी ही। जब वह अपने से हैं। जिस दिन इस सचाई को स्वीकार कर लोगे उसी दिन तुम्हारा अहंकार टूट छोटे को देखकर अहंकार करता है, तो बड़े को देखने से दीनता महसूस करेगा जाएगा। ही। हमने देखा है, यहाँ आश्रम में फॉरेस्ट का रेज्जर आता था तो वह जिज्ञासा :- परशुरामजी तो भगवान् के अवतार थे। फिर उन्होंने बैठने के लिये कुर्सी चाहता था। एक दिन उसका बड़ा अधिकारी कञ्जर्वेटर अपनी माता का सिर काटने जैसा जघन्य कार्य क्यों किया? आश्रम में आया तो हमने देखा कि वह रेज्जर जो हमेशा बैठने के लिये कुर्सी समाधान :- उनके पिता जमदग्निजी महर्षि थे। किसी कारण से उनकी चाहता था आज बाहर गेट के पास खड़ा है। अन्दर आने की हिम्मत नहीं हो पत्नी से कोई मानसिक अपराध हो गया था। उन्होंने उस अपराध को अपनी रही है। देखो! यह दशा होती है अहंकारी की। इसलिये यदि दीनता से मुक्त योगसामर्थ्य से जान कर अपनी पत्नी का सिर काटने की आज्ञा पुत्रों को दी। होना चाहते हो तो अहंकार को त्यागना पड़ेगा। अपने से छोटों के सम्मान का अन्य पुत्रों ने तो मना कर दिया, परन्तु परशुरामजी ने पिता की आज्ञा को ध्यान रखना पड़ेगा और इच्छाएं समेटनी पड़ेंगी। सर्वोपरि मानकर माता का सिर काट दिया। अब बताओ चाहे लोकदृष्टि से हो **** या शास्त्रदृष्टि से, इस कार्य को कोई अच्छा कह सकता है? इससे कोई पुण्य जिज्ञासा :- सन्तों से सुनते हैं कि अहंकार हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। बन सकता है? यह तो बड़ा निकृष्ट कार्य दीखता है। परन्तु परशुरामजी के इसे मिटाने का उपाय क्या है? अन्दर तो एक ही बात है कि पिता की आज्ञा का पालन पुत्र को अवश्य करना समाधान :- अरे! पहले विचार करके देखो कि तुम्हारा अहंकार चाहिए। उन्होंने अपने कर्तव्य का पालन मात्र किया तो उस सिर काटने के सच्चा है या झूठा। एक लाख पावर का बल्ब है जो बहुत प्रकाश कर रहा है, कार्य से उनका क्या सम्बन्ध बना? कोई सम्बन्ध नहीं बनता क्योंकि उनका दूसरी ओर एक जीरो पावर का बल्ब टिमटिमा रहा है। लाख पावर के बल्ब माता के प्रति कोई विपरीत भाव नहीं था। को बहुत अहंकार हो रहा है कि मैं इतना प्रकाश दे सकता हूँ। पर क्या उसका जब पिताजी ने प्रसन्न होकर उनसे वर माँगने को कहा तो उन्होंने अहंकार सच्चा है? स्विच ऑफ कर दो और उससे कहो, "अब प्रकाश कहा- "माता जीवित हो जाए और उसे यह ज्ञान न रहे कि मैंने उसका सिर करो!" काटा था।" उनके मन में माता के प्रति लेशमात्र भी द्वेष नहीं था। इसलिये कर्म केनोपनिषद् की आख्यायिका में देख लो। परमात्मा यक्ष का रूप ले की गति अत्यधिक गहन है। किसी कर्म में ऐसी दृष्टि होती है जो तमाम दोषों

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग -३ दोष-विचार एवं निवारण को पीछे छोड़ देती है। पाप जानकर भी लोभवश अथवा शरीर-पोषण के लिये मांस खाने में प्रवृत्त

जिज्ञासा :- जो व्यक्ति मांसाहार करते हैं उन्हें तो दोष लगता है। होता है उसे तो बहुत पाप लगेगा।

परन्तु उनमें से कई व्यक्तियों का भाव बड़ा अच्छा देखा जाता है, वे भजन भी जो व्यक्ति मांस खाने के माहौल में ही जन्मा है, शास्त्र-संस्कार से

करते हैं। यह कैसे होता है? रहित है उसे मांस खाने का दोष नहीं लगता परन्तु वह यदि किसी के उपदेश

समाधान :- यह विषय बहुत सूक्ष्म विचार करने का है। केवल बाह्य को मान कर मांस खाना छोड़ दे तो उसे बहुत बड़ा फल मिलता है। जो व्यक्ति

कर्म देखकर हम कोई निश्चय नहीं कर सकते। हम एक बार मुंबई के पास त्रैवर्णिक है, यज्ञोपवीत धारण करता है, जिसे शास्त्र का, गुरु का आदेश है कि

समुद्र किनारे एक आश्रम में रहे थे। जिन लोगों का समुद्र किनारे जन्म हुआ है अपना भोजन ऐसा बनाओ जो भगवान् को भोग लगा सको, वह यदि

वे मछली पकड़ते हैं, बेचते हैं और खाते भी हैं। मछली बेचना ही उनकी अभक्ष्यभक्षण करेगा तो भारी दोष का भागी होगा।

जीविका है तो उन्हें मछली खाने का पाप लगेगा या नहीं? हमने यह भी देखा ****

कि उनके अन्दर ईश्वर के प्रति और सन्तों के प्रति इतनी सुन्दर भावना थी जो जिज्ञासा :- आज कई लोग कहते हैं हमें नर्मदा का दर्शन हो गया,

शाक-पात खाने वालों मे भी नहीं दीखती। वे हमारी भाषा नहीं समझते थे शिवजी का दर्शन हो गया। परन्तु उनके व्यवहार में छल-कपट-झूठ स्पष्ट

परन्तु प्रत्येक भाव, प्रत्येक इशारे को समझते थे। कोई बच्चा भी स्नान किए दिखाई देता है। यह सब कैसे सम्भव है?

बिना आश्रम में नहीं आता था। महिलाएँ बाजार में मछली बेचकर आतीं तो समाधान :- हो सकता है किसी को स्वप्न में दर्शन हो जाता हो या

स्नान करके बाजार में जो सबसे अच्छा फल होता उसे खरीद कर हमारे पास अन्य प्रकार से, पर इससे उनके जीवन में कोई बहुत बड़ा अन्तर आता हो यह जरूरी नहीं। वे लोग चाहे सच बोलते हों या झूठ, पर विचार करके देखें तो लाती थीं। वह दर्शन कोई वास्तविक दर्शन नहीं है। भागवत में हम पढ़ते हैं कि अक्रूर उनका भाव देखकर हमने सोचा कि हे भगवन्! इन मछली खाने वालों को तुमने ऐसा भाव कैसे दे दिया। फिर हमें ध्यान आया कि गीता में जिस समय कृष्ण को वृंदावन से मथुरा लाते हैं उस समय रास्ते में यमुना में

भगवान् ने कहा है - स्नान करते हैं। जब वह डुबकी मारते हैं तो भगवान् उन्हें अपना दिव्य स्वरूप

स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।(१८.४७) दिखातें हैं। अक्रूर ने वहाँ बड़ी लम्बी स्तुति भी की है। उसी अक्रूर की बुद्धि

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।(१८.४८) द्वारिका में कैसे खराब हो गई? स्यमन्तक मणि और सत्यभामा के निमित्त से

उन लोगों को जन्म से ही मछली खाना प्राप्त है। उनके माता-पिता उसी अक्रूर ने भगवान से द्वेष किया, झूठ भी बोला।

सभी खाते हैं तो उन्हें खाने से क्या पाप लगेगा। वे तो जानते ही नहीं कि यह भगवान् के दिव्य स्वरूप का दर्शन होने के बाद भी उनकी बुद्धि में

पाप है। परन्तु जिस व्यक्ति के सामने ऐसी स्थिति नहीं है, मान लीजिए कोई दोष आ गया। अतः वह दर्शन वास्तविक दर्शन नहीं है, एक चमत्कार है। वह

ब्राह्मण है, वह यदि मांस खा लेगा तो उसे बहुत बड़ा पाप लगेगा। जो व्यक्ति भी कभी लाभ देता है परन्तु उसमें दोष भी आ सकता है। जब तक भगवत्- तत्त्व का दर्शन नहीं होता तब तक दोषों की निवृत्ति पूर्ण रूप से नहीं होती।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ दोष-विचार एवं निवारण

इसलिये भगवत्-तत्त्व का दर्शन अलग है और किसी रूप में भगवद्-भावना हो जाना या किसी की कृपा से सगुण रूप का दर्शन करना अलग बात है। यहाँ स्पृशतः॥(छान्दो. उप .- ८.१२.१) ज्ञान के द्वारा शरीर का सम्बन्ध छूटने

सार यह है कि हमें दूसरों की ओर ध्यान न देकर अपनी स्थिति को देखना पर सुख-दुःख का स्पर्श नहीं होता। यही मोक्ष की स्थिति है। इस प्रकार तर्कों के द्वारा हमलोग बुद्धि से निश्चय करते हैं, परन्तु बुद्धि चाहिए। इस बात पर विश्वास रखना है कि कपट, दम्भ से रहित हुए बिना हम में निश्चयात्मक ज्ञान होने मात्र से काम नहीं बन सकता जब तक वह ज्ञान भगवत्-तत्त्व को पहचान नहीं सकते। इसलिये हमको सरल बनना चाहिए। जीवन में न आए। ज्ञान को जीवन में लाने के लिये साधनों की अपेक्षा रहती निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। है। मनुष्य शरीर में यही विशेषता है कि इसमें ज्ञान की कमी नहीं है। किसी के (मानस सुन्दर .- ४३.३) मन में नहीं आता कि क्रोध करना अच्छी बात है, झूठ बोलना अच्छा है; शास्त्र जितने उपाय बताते हैं वे सब मन को निर्मल करने के लिये ही सबको ज्ञान है कि यह गलत है। परन्तु गलत जानकर भी छोड़ नहीं पाता, हैं। सगुण-साकार का दर्शन तो दुर्योधन आदि को भी हुआ था पर उनका इसका मतलब दृढ़ता और वैराग्य की कमी है। यदि बौद्धिक ज्ञान से काम चल कल्याण कहाँ हुआ। इसलिये दर्शन का स्वरूप समझना चाहिए और वह तभी जाए तो विवेक, वैराग्य, शम, दम, तितिक्षा आदि साधनों की क्या प्रकट होगा जब मन शुद्ध होगा। आवश्यकता रहेगी। बुद्धि से जान लिया कि ब्रह्म का यह स्वरूप है पर इस ज्ञान **** से कुछ लाभ नहीं होगा, वह तो बुद्धि का वैभव बन जाएगा। इस वैभव का भी जिज्ञासा :- मनुष्य जीवन का लक्ष्य मोक्षप्राप्ति है, संसार नश्वर है, अहंकार हो जाएगा जो बन्धन का हेतु बनेगा। इन बातों का पूरा ज्ञान होने पर भी लोग जाने-अनजाने में संसार की ओर क्यों शास्त्र कहता है कि तुम्हें मन को एकाग्र करके समाधि लगाने का मुड़ जाते हैं? अभ्यास होने पर वहाँ जो सुख मिलेगा वह भी बन्धन का हेतु बन सकता है। समाधान :- हम कई बातों को शास्त्र से सुनकर बुद्धि से समझते हैं। वहाँ तो एकाग्रता के अभ्यास से मन की सात्त्विक दशा के कारण तुम्हें सुख मनुष्य जीवन का लक्ष्य मोक्षप्राप्ति है और संसार नश्वर है ये दोनों ऐसी ही का अनुभव हो रहा है, जो निरन्तर एकरस आनन्दतत्त्व है उसका अनुभव कहाँ बातें हैं। इनको समझने के लिये हम तर्क का सहारा भी लेते हैं। मनुष्य शरीर है। यदि इस समाधि-सुख में व्यक्ति रस लेने लगे तो वह भी मोक्ष का नहीं के अलावा दूसरे शरीर में मोक्षप्राप्ति नहीं हो सकती इसलिये मनुष्य जीवन का बन्धन का हेतु बन जाएगा। यही लक्ष्य है। फिर प्रश्न उठता है कि मोक्ष प्राप्त करना क्यों जरूरी है। इसका सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ।।(गीता - १४.६) उत्तर है कि जन्म लेने वाला कभी पूर्ण सुखी नहीं रह सकता। न वै सशरीरस्य इसलिये बौद्धिक ज्ञान से मोक्षप्राप्ति की ओर जाना हो तो विवेक, सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति।(छान्दो. उप .- ८.१२.१) जब तक शरीर वैराग्य आदि साधन-सम्पत्ति का अर्जन करना अत्यावश्यक है। का सम्बन्ध है तब तक सुख-दुःख का सम्बन्ध टूट नहीं सकता। इसलिये जब ****

तक जन्म-मरण का चक्र चलता रहेगा तब तक नित्य सुख की आशा नहीं की जिज्ञासा :- यदि जगत् असार है तो इसको प्राप्त करने की इच्छा क्यों जा सकती। नित्य सुख का एक ही उपाय है - अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये होती है?

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग- ३ दोष-विचार एवं निवारण समाधान :- जगत् असार ही है, इसमें तो किसी प्रकार का संशय नहीं है। इसको प्राप्त करने की जो इच्छा होती है, उसमें हेतु असावधानी ही करो कि आप को जो वचन दिया है उसे अभी नहीं चुका पाए तो फिर जन्म

समझना चाहिए क्योंकि लोग जगत् की परीक्षा नहीं करते। जिस दिन आप लेकर चुकाएंगे। इस प्रकार से रोज प्रार्थना करोगे तो कम से कम भगवान् से

इसकी परीक्षा कर लेंगे उसी दिन समझ में आ जाएगा कि जो शान्ति हम चाहते कुछ परिचय तो हो जाएगा।

हैं वह इस जगत् से मिलनेवाली नहीं है। ****

परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान् नास्त्यकृतः कृतेन ... जिज्ञासा :- मन को परमात्मा ने चञ्चल क्यों बनाया है?

(मुण्डक उप. - १. २.१२) समाधान :- परमात्मा ने मन को चञ्चल बनाकर ठीक ही किया। यदि

तब इसकी इच्छा कैसे करेगा! अब उसकी कामना की दिशा ही बदल मन चञ्चल नहीं होता और इसका स्वभाव स्थिर रहना होता तब वह जगत् में

जाती है और वह विचार करता है कि ऐसा कौन-सा उपाय है जिससे सदा बना कहीं स्थिर हो जाता तो बड़ी मुश्किल हो जाती, क्योंकि वह वहाँ से हटता ही

रहनेवाला सुख मिले। इससे यह सिद्ध हुआ कि हमारी असावधानी ही जगत् नहीं। अब यह आपका काम है कि उस मन की चञ्चलता का सदुपयोग करके

की इच्छा में कारण है क्योंकि हम अभी अपना लक्ष्य ठीक से निर्धारित नहीं उसे जगत् से हटाकर परमात्मा की ओर ले जाओ। बस, यही आपका पुरुषार्थ

कर पाए हैं। है।

**** जिज्ञासा :- जीवन में कभी संकट के समय भगवान् से कोई मनौती जिज्ञासा :- मन में प्रश्न उठना कब समाप्त होगा? कोई अचूक दवा

करें, संकट शान्त होने पर किसी कारण से उस मनौती को पूरा कर न पाएं तो बताएँ।

इसका क्या समाधान है? समाधान :- जब आपके अन्दर कोई संशय नहीं रहेगा तो प्रश्न उठना

समाधान :- तुम दुनिया भर का सब काम कर रहे हो तो भगवान् की बन्द हो जाएगा। संशय कब समाप्त होगा? जब आप जीवन के लक्ष्य को,

मनौती पूरी क्यों नहीं करते? भगवान् के साथ चालाकी नहीं करनी चाहिए। तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर लेंगे तो कोई संशय नहीं रहेगा। समर्थ गुरु रामदास ने

यदि कोई बड़ा कारण है जिसकी वजह से पूरा नहीं कर पाते तो रोज भगवान् कहा- "ज्ञानी वही है जिसे कोई संशय न हो।"

के चरण पकड़ कर रोया करो। ऐसा मत कहो कि पूरी नहीं कर पा रहा हूँ तो उत्तरकाशी के ऊपर संग्राली नामक एक गाँव है। पहाड़ में प्रत्येक गाँव

क्षमा कर दें। ऐसी प्रार्थना करो कि मुझे शक्ति दें जिससे मैं अपना वचन निभा का देवता होता है। साल में एक बार उस देवता का आवेश पुजारी पर आता है। उस समय सभी लोग पुजारी से अपने-अपने प्रश्न पूछते हैं और वह जवाब पाऊँ। देता है। ऐसे ही समय उत्तरकाशी के एक महात्मा उस गाँव में पहुँचे। उन्होंने प्राचीन काल में यदि कोई गरीब व्यक्ति किसी का कर्ज चुका नहीं पाता था तो मरने से पहले उससे कहता था - यदि मेरे लड़के ने कर्ज चुकाया तो उस देवता से पूछा, "तू सच्चा देवता है या झूठा?" उसने कहा, "मैं सच्चा

ठीक है, नहीं तो मैं अगले जन्म में चुकाऊँगा। तुम भी रोज भगवान् से प्रार्थना देवता हूँ।" महात्मा ने कहा, "तब बता मुझे ज्ञान है या नहीं?" देवता बोला, "तुमको ज्ञान नहीं हुआ है।" वे बोले, "तू सच्चा देवता नहीं है, मुझे तो ज्ञान

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ दोष-विचार एवं निवारण

है।" अब देवता बोला, "तुमने पूछा कि मुझे ज्ञान है या नहीं, इसका मतलब जाता है। मन को जीतेगा कौन क्योंकि मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार एक ही तुम्हें संशय हुआ। जिसको संशय हो उसे ज्ञान नहीं हुआ है। यदि ज्ञान हो तो तत्त्व के नाम हैं? इनमें से किसी एक से जीतने का अर्थ हुआ अपने द्वारा अपने संशय नहीं रहेगा और संशय न रहने पर कोई प्रश्न नहीं उठेगा।" को ही जीतना, यह कैसे सम्भव हो सकता है क्योंकि कोई कितना ही बलवान् इसलिये प्रश्न उठना समाप्त करना हो तो ज्ञान प्राप्त कर लो, यही क्यों न हो, वह अपने कन्धे पर नहीं बैठ सकता? अचूक दवा है। ज्ञानरूपी अग्नि सभी संशयों को भस्म कर देती है। अभी तो समाधान :- प्रत्येक व्यक्ति यह अनुभव करता है कि आज मेरा मन ठीक बुद्धि श्रुतिविप्रतिपन्ना है, इसलिए नई-नई बातें सुनकर संशय होता रहता है। है अथवा नहीं। यहाँ पर जाननेवाला कौन है? यदि कोई कहे कि मन जान रहा भगवान् गीता में कहते हैं - है, तो मन नहीं जान सकता क्योंकि मन जड़ है। तब यहाँ यही निर्णय करना श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। पड़ता है कि विचार-विवेक करनेवाला जो जीव है, वही जान रहा है अर्थात् समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यतति।।(२.५३) मन का प्रकाशक जीव है। इसलिए यहाँ पर अनुभव के साथ जोड़कर देखें तो बहुत कुछ सुनने से बुद्धि में संशय रहते हैं। जब बुद्धि एक आत्मतत्त्व इस बात को समझना कठिन नहीं है और शब्दों के चमत्कार में पड़कर तो को पकड़कर निश्चल हो जाएगी तब संशय समाप्त हो जाएँगे। समझना कठिन है। **** उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। जिज्ञासा :- चाहकर भी हमारा मन शान्त और प्रसन्न क्यों नहीं रह परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥ पाता? (गीता-१३.२२) समाधान :- इसीलिये शान्त नहीं रह पाता कि तुम जगत् से कुछ यहाँ पर जिसको उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता इत्यादि कहा है, वही चाहते हो। जिसके पास कुछ न हो उससे तुम कुछ चाहो तो तुम्हारी चाह कभी मन को वश में करता है। पूरी होने वाली नहीं है। जब तक चाह रहेगी तब तक अशान्ति दूर नहीं होगी। तेज धूप के समय रेगिस्तान में एक नदी दिखती है, उसमें जल दिखता है, पेड़ जिज्ञासा :- विषयों को दूर करना आसान है, पर उनका राग दूर करना *** भ

और पक्षी भी दिख जाते हैं, पर वास्तव में वहाँ जल का नामोनिशान भी नहीं कठिन है- नासति सम्यग्दर्शने रसस्य उच्छेद:(गीता शां.भाष्य-२.५६)। रहता। उस जल से यदि किसी की प्यास बुझी होगी तो इस जगत् से भी प्यास यदि सम्यक् दर्शन से पहले राग नहीं जाता है तब शास्त्र में साधक को उसके बुझ जाएगी। तुम तो यह परीक्षा ही नहीं करते कि इतना काल बीत गया फिर भी त्याग के लिए क्यों कहा है ? जगत् की चाह पूरी ही नहीं होती। यदि शान्ति प्राप्त करनी है तो जगत् से समाधान :- सम्यक् दर्शन होने तक राग-द्वेष आदि वृत्तियाँ नष्ट नहीं चाहना छोड़ दो। होती हैं, पर इनकी अवस्थाएँ बदलती जाती हैं। इसलिए कहा है - **** ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः (योगसूत्र-२.११)। रागात्मिका, द्वेषात्मिका वृत्तियों जिज्ञासा :- शास्त्रों में मन को जीतने के ऊपर विशेष रूप से बल दिया को ध्यान-भजन द्वारा नष्ट करना चाहिए। परन्तु इतना होने पर भी भीतर जो

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ संस्कारात्मक रूप में राग बैठा हुआ है, वह तो परमात्म-दर्शन होने तक नष्ट नहीं होगा। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश - इन पञ्चक्लेशों की पाँच-पाँच अवस्थाएँ होती हैं। १) प्रसुप्त, २) विच्छिन्न, ३) उदार, ४) तनु धर्म-जिज्ञासा

और ५) दग्ध। प्रसुप्त :- यह वातावरण न मिलने पर अभी प्रकट नहीं हुई है, पर अन्दर जिज्ञासा :- किसी को लगे कि हमारी परम्परा शास्त्रविरुद्ध है तो उसे

विद्यमान है, जैसे बच्चों में। क्या करना चाहिए?

विच्छिन्न :- कभी वृत्ति दूसरी तरफ गई तो उस समय वर्तमान वृत्ति कुछ समाधान :- यदि ऐसी शंका किसी को होती है तो उसे उस परम्परा

कमजोर लगती है। ऐसे में इसको विच्छिन्न कहते हैं। की समीक्षा करनी चाहिए। हो सकता है कि वह परम्परा शास्त्र के अनुकूल ही उदार :- वृत्ति के प्रबल रूप से प्रकट होने को उदार कहते हैं। हो क्योंकि शास्त्र का बहुत बड़ा भाग हम नहीं जानते। समीक्षा करने पर यदि

तनु :- वृत्ति विद्यमान तो है, पर वह कमजोर है। ऐसी अवस्था को तनु निश्चय हो कि हमारी परम्परा का शास्त्र से विरोध है तो उसे त्याग देना चाहिए

अवस्था कहते हैं। क्योंकि शास्त्रसमर्थित परम्परा ही व्यक्ति को लक्ष्य तक पहुँचा सकती है। धर्म दग्ध :- यहाँ पर वृत्ति सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो जाती है। यह तो ईश्वर- के विषय में भी कहा है - श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः। दर्शन होने के पश्चात् ही सम्भव है। ध्यान-भजन इत्यादि करके वृत्तियों को (याज्ञवल्क्यस्मृति-१.७) यहाँ पर भी श्रुति, स्मृति, सदाचार आदि को क्रम तनु कर सकते हैं, दग्ध नहीं। शास्त्र में राग को त्याग करने की बात जहाँ कही से महत्त्व दिया गया है।

है, वहाँ उसको तनु (क्षीण) करना समझना चाहिए। ****

**** जिज्ञासा :- गीता में अर्जुन ने पूछा -

पुंसां कलिकृतान् दोषान् द्रव्यदेशात्मसम्भवान्। ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः .. ।(१७.१)

सर्वान् हरति चित्तस्थो भगवान् पुरुषोत्तम:।। जो श्रद्धावान् व्यक्ति शास्त्रविधि को छोड़कर यजन करते हैं उनकी

(भागवत-१२.३.४५) श्रद्धा का क्या स्वरूप है। यहाँ पर शास्त्रविधि को छोड़ने वाले के लिये

कलियुग के प्रभाव से द्रव्यों में, स्थानों में और श्रद्धावान् शब्द का प्रयोग क्यों किया? मनुष्यों के अन्तःकरणों में अनेक प्रकार के दोष आ समाधान :- यहाँ पर श्रद्धावान् का तात्पर्य ऐसे साधक से है जो शास्त्र जाते हैं। यदि भक्ति के द्वारा पुरुषोत्तम भगवान् चित्त में के प्रति, गुरु के प्रति श्रद्धा तो रखता है उसमें आस्तिक्यबुद्धि भी है पर वह स्थित हो जायें तो इन सभी दोषों का हरण कर लेते हैं। शास्त्र को नहीं जानता। परम्परा से उसे जैसा बता दिया वैसा ही कर रहा है। वह नहीं जानता है कि मैं शास्त्रविधि का उल्लंघन कर रहा हूँ। हाँ! यदि कोई जानबूझ कर अपनी हठधर्मिता के कारण शास्त्र का उल्लंघन करता है तो ऐसे

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ धर्म-जिज्ञासा

व्यक्ति के लिये श्रद्धावान् शब्द का प्रयोग नहीं होता है। यहाँ पर अर्जुन का जिज्ञासा :- मैं एक जज के पद पर कार्य करता हूँ। कई बार मेरे मन में

प्रश्न है - तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः। (गीता १७.१) इस सन्देह उत्पन्न हो जाता है कि मैं जो फैसला कर रहा हूँ उससे वास्तव में न्याय

प्रकार शास्त्र का उल्लंघन करके उपासना करने वाले साधकों की निष्ठा का हो रहा है या नहीं। कृपया मेरे लिये ऐसा मार्गदर्शन कीजिए जिससे मैं वर्तमान

प्रकार सात्त्विक, राजस या तामस में से कौन सा होगा। भगवान् ने उत्तर दिया स्थिति में सत्य और धर्म की रक्षा कर पाऊँ तथा मेरा कर्म ही पूजा हो जाए।

  • "यह तो उनकी उपासना का विषय जानने से ही जाना जा सकता है कि वह समाधान :- आप साधक हैं इसलिये ऐसा सन्देह होना स्वाभाविक

देवता की उपासना कर रहा है या किसी भूत की। देवताओं की उपासना भी है। यहाँ पर सन्देह करने की आवश्यकता नहीं है, आवश्यकता है कर्तव्य को

कर्तव्यदृष्टि से कर रहा है या कल्याण के लिये, जगत् के लिये कर रहा है या समझने की। संसार में प्रत्येक व्यक्ति को कोई न कोई पार्ट मिला है, जिसमें से

किसी को मारने के लिये।" आप को जज का पार्ट मिला है। उस पार्ट के माध्यम से आपको जीविका

वस्तुतः श्रद्धा भी व्यक्ति की प्रकृति पर निर्भर करती है। व्यक्ति जैसी चलाने के लिये धन भी मिलता है। यह भी कोई बुरी बात नहीं क्योंकि

प्रकृति वाला होता है उसकी श्रद्धा भी वैसे ही देवता में और वैसी ही उपासना व्यावहारिक जिम्मेदारियाँ निभाने के लिये धन की आवश्यकता होती ही है।

में उत्पन्न हो जाती है। आप जिस पद पर हैं वहाँ आपके साथ दो वस्तुओं का सम्बन्ध है। एक धन का जो व्यावहारिक है और दूसरा धर्म का जो पारमार्थिक है। उस पद **** जिज्ञासा :- शास्त्रों में कहीं पर यह कहा है कि भोजन के उपरान्त के साथ आप का कर्तव्य निहित है। यह आप पर निर्भर है कि उस पद पर रहते

विश्राम करना चाहिए और कहीं पर दिन में सोना निषेध भी किया है। शास्त्र की हुए आप के अन्दर कर्तव्य की प्रधानता है या धन की। यदि धन की प्रधानता है

इन दो बातों में विरोधाभास लगता है। इसका क्या समाधान है? तो आपका व्यवहार न्यायपूर्वक नहीं हो पाएगा क्योंकि धन के द्वारा आपको

समाधान :- यहाँ पर किसी भी प्रकार का विरोधाभास नहीं है। कभी भी खरीदा जा सकता है। यहाँ पर धन के साथ-साथ लोभ, भय, मोह

विरोधाभास वहाँ समझना चाहिए जहाँ पर एक ही विषय पर दो विरोधी बातें इत्यादि को भी समझ लेना चाहिए। इनके दबाव में आकर व्यक्ति ठीक निर्णय

कही गई हों, यहाँ ऐसा नहीं है। जो भोजन के उपरान्त विश्राम करने की बात नहीं कर पाता। यदि आपके जीवन में इस प्रकार का सम्बन्ध नहीं है, केवल

कही है वह आरोग्य को ध्यान में रखकर आयुर्वेद की दृष्टि से कही गई है। जो धर्म का सम्बन्ध है तो आप कर्तव्य के आधार पर ही निर्णय लेंगे। वह निर्णय

दिन में सोने का निषेध किया है वह व्रत-नियम को ध्यान में रखकर धर्म- आप भारतीय संविधान के अनुसार ही लेंगे। वही आपका धर्म है। आप उसकी

शास्त्र की दृष्टि से कहा है। जैसे आप कोई अनुष्ठान कर रहे हैं या कोई उपवास उपेक्षा नहीं कर सकते।

कर रहे हैं तो उस अन्तराल में आपको दिन में नहीं सोना चाहिए। यहाँ पर भी एक बार काशी में कोई हरिजन किसी मन्दिर में प्रवेश कर गया।

दिन में निद्रा के लिये निषेध किया है, विश्राम के लिये तो निषेध नहीं है। करपात्रीजी महाराज ने विरोध किया तो पुलिस उनको पकड़ कर ले गई और

अनुष्ठान काल में भी आप दो घड़ी(४८ मिनट) लेटकर विश्राम कर सकते हैं। जज के सामने पेश किया। उन्होंने मनुस्मृति आदि बहुत सारे धर्मग्रन्थों के प्रमाण देकर कहा- मैंने धर्म के विरुद्ध कोई काम नहीं किया तो मैं अपराधी ****

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग -३ धर्म-जिज्ञासा कैसे हो सकता हूँ? जज ने कहा- "महाराज! आपकी बात ठीक है। आप समय सूर्योदय तो होता नहीं, फिर उसे पिछले दिन का माना जाए या आज जिन ग्रन्थों को प्रमाण के रूप में बता रहे हैं, हो सकता है कभी वे हमारे समाज का? के लिये संविधान के रूप में मान्य रहे होंगे लेकिन आज हम वर्तमान संविधान समाधान :- भारतीय परम्परा में अरुणोदय से पहले तक रात्रि मानी के बाहर निर्णय नहीं ले सकते। हम यह जानते हैं कि आप अपने धर्म के जाती है। अरुणोदय काल में सूर्य का उदय प्रारम्भ हो गया ऐसा मानते हैं। अनुसार ही लड़ रहे हैं पर आज के संविधान के अनुसार आप ने अपराध किया इसलिये साधक लोग इस काल में जो भजन-पूजन करते हैं वह पिछले दिन है। इसलिये आपको एक महीने की सजा दी जाती है।" का नहीं बल्कि अगले दिन का माना जाता है। सुबह तीन बजे के बाद का जो देखिए, यहाँ जज ने रागद्वेष-पूर्ण कोई निर्णय नहीं लिया, बल्कि काल है उसे अगले दिन से सम्बन्धित मानते हैं। इसीलिये अमावस्या, अपने कर्तव्य का पालन किया। कई बार जानते हुए भी कि यह अपराधी नहीं है संक्रान्ति आदि पर्वों का पुण्यकाल अरुणोदय से ही माना जाता है। उस काल पर प्रमाण मिल जाते हैं तो उसको अपराधी मानना पड़ता है। ऐसी परिस्थिति में स्नान करने पर आपको पर्व-स्नान का फल अवश्य मिलेगा। ऐसा नहीं है में जज उसे छोड़ नहीं सकता। तात्पर्य यह है कि आपके सामने आदर्श के रूप में संविधान है, आप उसी के अनुसार निर्णय कीजिए। किसी लोभ, मोह या कि सूर्योदय के बाद स्नान करने पर ही पर्व का स्नान माना जाएगा।

भय से प्रभावित होकर निर्णय मत कीजिए। जिज्ञासा :- क्या रात्रि में नदी, तालाब आदि में स्नान कर सकते हैं? सामने वाले अभियुक्त को यदि आपने समझ लिया कि यह मेरे मामा समाधान :- शास्त्र में ऐसा कहा गया है- रात्रि में नदी, तालाब आदि का लड़का है, उसके प्रति आपको मोह उत्पन्न हो गया तो आप ठीक निर्णय में स्नान नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे वरुणदेव का अपमान होता है। पर नहीं कर पाएंगे। उस समय आप अपना कानून का सम्पूर्ण ज्ञान उसे बचाने में मान लीजिए आप कहीं बाहर से घर तब पहुँचे जब सूर्यास्त हो चुका हो और लगा देंगे। आप ठीक निर्णय तभी ले सकते हैं जब समझें कि न यह हमारा शत्रु स्नान करना आवश्यक हो, तो उस समय स्नान करने में कोई दोष नहीं है। यदि है और न ही सम्बन्धी, यह केवल अभियुक्त है। ऐसे में आपका निर्णय कभी रात्रि में ग्रहण पड़े तो उस समय भी स्नान करने में दोष नहीं लगता। शास्त्रदृष्टि से निर्दोष होगा। आप सत्य और धर्म की रक्षा कर सकेंगे। आप **** कर्तव्यपूर्वक कर्म करते हुए ईश्वर को समर्पण करते जाएंगे, तब आपका प्रत्येक कर्म ईश्वर से सम्बन्धित हो जाएगा। ऐसे में वह कर्म पूजा बन जाएगा जिज्ञासा :- सूर्योदय से पहले जलपान करना उचित है अथवा नहीं? समाधान :- इस विषय में एक विचारणीय बात यह है कि सूर्योदय -स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य।(गीता - १८.४६) आप उस कर्म के द्वारा परमात्मा कब से माना जाए। अरुणोदय से मानें अथवा जब सूर्य का दर्शन हो जाए तब की आराधना का फल प्राप्त कर लेंगे जिससे धीरे-धीरे परमात्मा की कृपा का से मानें। अरुणोदय के बाद अन्धकार चला जाता है। बिना सूर्यप्रकाश के तो अनुभव आपको होने लगेगा। अन्धकार जाएगा नहीं। अतः कुछ लोग मानते हैं कि उस समय सूर्योदय हो **** जिज्ञासा :- साधक लोग सुबह चार बजे से जप-ध्यान करते हैं। उस चुका है। वे लोग कहते हैं कि हम अरुणोदय काल में ही सन्ध्या, गायत्री-जप, सूर्य को अर्घ्य देना आदि नित्य कर्म कर लेते हैं। इसके बाद जलपान करने में

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग - ३ धर्म-जिज्ञासा

कोई दोष नहीं है। उनका अध्ययन भी यज्ञोपवीत संस्कार के बाद ही कर सकते हैं। यही शास्त्र परन्तु कई सन्तों का कहना है कि सूर्योदय से पहले जल-पान करना की दृष्टि है।

उचित नहीं है। पहले सूर्य को अर्घ्य दो, प्रणाम करो इसके बाद जल-पान आज तो कॉलेजों में कुर्सी पर बैठकर, जूता-चप्पल पहन कर भी वेद करना चाहिए। अपना नित्य कर्म पूर्ण किए बिना जलपान नहीं करना चाहिए। और उपनिषद् पढ़ाए जाते हैं। उनकी दृष्टि में तो जैसे गणित, अंग्रेजी आदि **** विषय हैं वैसे ही यह भी एक विषय है। पर ऐसे अध्ययन से वेद का ज्ञान होने जिज्ञासा :- क्या त्रैवर्णिकों को यज्ञोपवीत और शिखा अनिवार्य रूप वाला नहीं है। वह तो शास्त्रीय ढ़ंग से अध्ययन करने पर ही हो सकता है।

से धारण करना चाहिए? *** भ समाधान :- शास्त्र ऐसी आज्ञा देता है इसलिये अनिवार्य रूप से जिज्ञासा :- आजकल लोग वेद सीखने के लिये आधुनिक संसाधनों धारण करना ही चाहिए। शास्त्र की बातों में अपनी बुद्धि नहीं लगानी चाहिए। जैसे टेपरिकॉर्डर आदि का उपयोग करते हैं। क्या यह उचित है? हमारा हित किसमें है यह शास्त्र ही जानता है। इसका व्यावहारिक पक्ष भी समाधान :- शास्त्र जोर दे कर कहता है कि वेदाध्ययन गुरु परम्परा से देखिए। यज्ञोपवीत संस्कार और शिखा हमारे जीवन का आधार बनता है। ही करें। वेदस्याध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम्।(श्लोकवार्तिक वाक्या .- जैसे राष्ट्रिय ध्वज दिखता तो कपड़ा ही है परन्तु उसके साथ पूरे राष्ट्र का ३६६) गुरु-मुख से वेदाध्ययन करने पर परम्परा से कृपाशक्ति प्राप्त होती है स्वाभिमान जुड़ा रहता है। इसी प्रकार शिखा-सूत्र पहले सनातनी हिन्दुओं के जो जीवन में वेद को धारण करने के लिये विद्यार्थी को बल देती है। वह शक्ति स्वाभिमान का केन्द्र था। शिखा-सूत्र वाला व्यक्ति नित्य गायत्री जप करता है आधुनिक संसाधनों के द्वारा वेदश्रवण करने वालों को नहीं प्राप्त हो सकती। जिससे उसकी बुद्धि का विकास होता है, चरित्र में, जीवन में एक दिव्यता इसलिये गुरु-मुख से सुना गया वेदाध्ययन ही हितकर समझना चाहिए। आती है। वह व्यक्ति सामान्य व्यक्ति के समान व्यवहार नहीं कर सकता। ****

इसलिये इस संस्कार का बहुत बड़ा महत्त्व है। जिज्ञासा :- हमारे घर में किसी बुजुर्ग की अपमृत्यु हो गई है। उनके

**** कल्याण के लिये हमें क्या करना चाहिए? जिज्ञासा :- क्या यज्ञोपवीत संस्कार के पहले वेद और उपनिषद् का समाधान :- उनके लिये भगवान् से प्रार्थना कर सकते हो तथा जप, अध्ययन कर सकते हैं? भगवत्कथा-श्रवण आदि कर सकते हो। अपने पूर्वजों की सबसे बड़ी सेवा तो समाधान :- क्यों करना? यज्ञोपवीत संस्कार तो घर में होने वाले यही है कि ऐसा कोई कार्य मत करो जो उन्हें दुःख देने वाला रहा होता। ऐसा जातकर्म आदि संस्कारों के बाद बालक का प्रथम संस्कार है। गुरुकुल में जब व्यवहार जिससे उन्हें प्रसन्नता मिलती रही होगी वही करो। कोई ऐसा व्यवहार बालक जाएगा तो पहला काम यज्ञोपवीत संस्कार ही होगा और गायत्री मन्त्र न करो जिससे उनकी अपकीर्ति हो। यदि ऐसी सेवा तुम करते हो तो अपने मिलेगा। तभी उसे वेदाध्ययन का अधिकार प्राप्त होगा, उसके पहले पितरों का उद्धार कर लोगे। अपने जीवन को ठीक बनाने से तुम उनका उद्धार वेदाध्ययन कैसे कर सकता है? उपनिषद् भी वेद के अन्तर्गत ही हैं इसलिये कर सकते हो, पैसे से नहीं।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग - ३ धर्म-जिज्ञासा जिज्ञासा :- भगवान् भाष्यकार लिखते हैं - भवति हि अस्माकम् ऊँची बातें करने में कोई सार दिखाई नहीं देता। अप्रत्यक्षमपि चिरन्तनानां प्रत्यक्षम्। तथा च व्यासादयो देवादिभि: **** प्रत्यक्षं व्यवहरन्ति इति स्मर्यते। तस्माद् धर्मोत्कर्षवशात् चिरन्तना जिज्ञासा :- शास्त्र कहता है- अवध्या ब्राह्मणा गावो ज्ञातयः देवादिभि: प्रत्यक्षं व्यवजहुः इति श्लिष्यते।(ब्रह्मसूत्र भाष्य-१.३.३४) शिशवः स्त्रियः। (महाभारत उद्योगपर्व-३६.६६) क्या ब्राह्मण कितना भी "अस्माकम् अप्रत्यक्षमपि" ऐसा कहने से क्या हम लोगों के लिये देवताओं अपराध करे फिर भी अवध्य है? से व्यवहार करना असाध्य है? धर्मोत्कर्ष का क्या अर्थ है? समाधान :- शास्त्र में ब्राह्मण शब्द जिसके लिये प्रयोग किया है समाधान :- असाध्य तो कुछ भी नहीं है परन्तु इस युग में अत्यन्त उसका लक्षण और उसके कर्तव्य भी वहाँ कहे गए हैं। जो शास्त्रवर्णित ब्राह्मण दुःसाध्य है। असाध्य इसलिये नहीं है कि आज भी कोई ऐसा अधिकारी हो है वह इस प्रकार का अपराध नहीं कर सकता जैसा आप सोचते हैं। कई विषयों सकता है जिससे देवता बातें करते हों, जिसके लिये प्रत्यक्ष हो जाएँ। में शास्त्र की दृष्टि समझनी पड़ती है। ब्रह्मसूत्र में विचार आया कि नैष्ठिक आज के युग में तुम धर्मोत्कर्ष क्या करोगे! कोई शास्त्र को पढ़ता ब्रह्मचारी यदि ब्रह्मचर्य व्रत को तोड़ता है, स्त्रीसम्बन्ध करता है तो उसके लिये नहीं, कहीं से शास्त्र की बातें सुन ले तो मानता नहीं। शिखा, सूत्र, तिलक सब प्रायश्चित्त है अथवा नहीं? वहाँ बताया कि प्रायश्चित्त है। पर जब यह प्रसंग गायब हो गए हैं। माता-पिता कहना छोड़कर मम्मी-पापा कहना शुरु कर आया कि संन्यासी यदि पतित होता है तो क्या प्रायश्चित्त होगा? वहाँ कहा दिया। जन्मदिन छोड़कर बर्थडे मनाना, केक काटना शुरु कर दिया। भारतीय कि संन्यासी पतित हो सकता है ऐसी कल्पना ही शास्त्र नहीं कर पाता। शास्त्र संस्कृति को कोई जानता ही नहीं। अपनी परम्परा छोड़कर पाश्चात्त्य संस्कृति संन्यास का अधिकार उसी को देता है जो एषणात्रय से रहित है। शास्त्र ऐसा की अन्धी नकल कर रहे हैं। यह हाल उन लोगों का है जो वर्षों से सत्संग सुन सोचता ही नहीं कि एषणायुक्त व्यक्ति संन्यासी हो सकता है। इसलिये वहाँ यही रहे हैं, अन्यों का तो कहना ही क्या? लोगों का व्यवहार पागल के समान हो कहा कि उसके लिये अनशन करके शरीर छोड़ देने के अतिरिक्त और कोई गया है। कोई पागल सामने से आ रहा हो तो तुम रास्ता बदलकर चलते हो कि प्रायश्चित्त नहीं है। नहीं? इसी प्रकार हमारा व्यवहार देखकर देवता डरकर दूर चले जाते हैं कि आजकल तो न शिखा है न यज्ञोपवीत, केवल ब्राह्मण के घर जन्म पता नहीं क्या कह दें। ऐसे में तुम धर्मोत्कर्ष क्या करोगे? लेने से ब्राह्मण कहलाते हैं। शास्त्रदृष्टि से वह ब्राह्मण कहाँ हुआ? जिसके पास व्यासादियों के जीवन में धर्मोत्कर्ष यही था कि उन्होंने शास्त्र की शिखा-सूत्र नहीं है वह तो व्रात्य है, उसे किसी शास्त्रीय कर्म में अधिकार नहीं आज्ञा का उल्लंघन कभी नहीं किया। उनके हृदय में जो धर्म था उसका सदा है। यहाँ पर जिस ब्राह्मण को अवध्य कहा है वह शास्त्रीय ब्राह्मण है। वह आदर किया। सत्य का कभी त्याग नहीं किया, इसलिये देवता उनके लिये वेदाध्ययन करता है, गायत्री जपता है, तपस्या करता है। यदि किसी पूर्व प्रत्यक्ष थे। तुम लोग तो हृदय में बैठे धर्म को मानते ही नहीं, न शास्त्र को संस्कारवश उससे कोई बड़ा अपराध हो जाए तब भी वह वध करने योग्य नहीं मानते हो, फिर धर्मोत्कर्ष कहाँ से करोगे। भगवान् को पकड़कर अपने को है क्योंकि वह वेदज्ञ है उसका समाज में बहुत बड़ा उपयोग है। यही शास्त्र की बचा लो, पहले ठीक से मनुष्य बन जाओ, यही बड़ी बात है। बड़ी ऊँची- दृष्टि है।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग -३ धर्म-जिज्ञासा दूसरी बात यह है कि वध के विषय में भी शास्त्र में बहुत विचार है। जिस समय रामजी को सूचना देने के लिये कालभगवान् आए तो उन्होंने न्याय के वेत्ता (जानकार) हुए या नहीं? परन्तु केवल धर्म के वेत्ता होने से, धर्म

कहा, "हमारी बात-चीत के समय बीच में कोई नहीं आना चाहिए।" रामजी का उपदेश करने से काम नहीं चलता है। स्वार्थ सामने आने पर व्यक्ति धर्म को

ने कह दिया जो भी बीच में आएगा वह वध्य होगा। काल ने सूचना दी कि भूल जाता है।

अब अपने लोक जाने का आपका समय आ गया है। इसी बीच दुर्वासा आ भीष्मपितामह के समान धर्म का वेत्ता कौन था। इसीलिये उनके

गए और कहा हमें अभी रामजी से मिलना है। लक्ष्मणजी पहरे पर थे, उन्होंने अन्तिम समय में भगवान् सभी पाण्डवों को धर्म का उपदेश प्राप्त कराने के

सोचा इन्हें रोका तो अनर्थ हो जाएगा। इसलिये लक्ष्मणजी समाचार देने लिये उनके पास ले गए। उन्होंने सभी प्रकार के धर्मों का बड़ा सुन्दर उपदेश

रामजी के पास चले गए। कालभगवान् तो चले गए पर रामजी के सामने भारी किया। उस समय द्रौपदी को हँसी आ गई। पाण्डव कुल की मर्यादित कुलवधू

संकट आ गया। उनकी प्रतिज्ञा थी कि जो भी बीच में आएगा उसे हम मारेंगे। धर्मोपदेश के बीच में हँस दे यह बड़ी गम्भीर बात थी। पितामह ने पूछा," बेटी क्या बात है? यह तो उचित मर्यादा नहीं है।" द्रौपदी ने कहा, "क्षमा अब बिना अपराध के लक्ष्मण जैसे भाई को कैसे मारें! तब वशिष्ठजी ने कहा, "शिष्ट या सम्मानित व्यक्ति का अपमान कर कीजिए मुझे एक बात याद आ गई। आप धर्म के इतने बड़े ज्ञाता हैं तो जब

देना ही उसके लिये मृत्युदण्ड है। आप लक्ष्मण को कह दो कि हमारे राज्य से सभा में मेरा अपमान हो रहा था उस समय आप चुप क्यों रहे, उसका विरोध

निकल जाओ। यही उनके लिये मृत्युदण्ड है।" इसी प्रकार ब्राह्मण से अपराध क्यों नहीं किया।" भीष्म ने कहा, "बेटी! तुम्हारी बात ठीक है। मुझे धर्म का

होने पर उसका अपमान कर देना और स्थान से बाहर निकाल देना यही उसके ज्ञान था पर मैं दुर्योधन का नमक खाता था इसलिये मेरे अन्दर उसके विरोध में

लिये मृत्युदण्ड है। इसलिये जब शास्त्र कहता है कि ब्राह्मण अवध्य है तो हमें बोलने की ताकत नहीं रही।" इसलिये जो धर्म को जानता है उन्हें धर्मवेत्ता

वैसा ही मानना पड़ेगा। उसको मारने से क्या अदृष्ट बनेगा हम नहीं जानते, कहने में तो कोई दोष नहीं है परन्तु धर्म को जीवन में धारण करना अलग बात है। शास्त्र ही जानता है। इसी प्रकार शास्त्र की मर्यादा है कि स्त्री अवध्य है। उससे कितना भी बड़ा अपराध हो जाए तो उसे सुधारने का प्रयास करना चाहिए पर ****

वह मारने योग्य नहीं है। जिज्ञासा :- कई बार धर्मसंकट सामने आ जाता है कि सत्य बोलें तो सामने वाले को कठोर लगता है। सामने वाले के अनुकूल बोलें तो असत्य **** जिज्ञासा :- एक श्लोक में कहा है- स्वार्थे सर्वे विमुह्यन्ति येऽपि हो जाता है। ऐसे में क्या करें?

धर्मविदो जना:।(महाभारत विराटपर्व-५१.४) जो स्वार्थ में मोहित हो समाधान :- इस विषय को लेकर धर्मसंकट में पड़ने की आवश्यकता

जाए उसे धर्मवेत्ता कैसे कहा जाए? नहीं है। निर्णय लेने के लिये शास्त्र आपके सामने है वह जैसा कहता है वैसा

समाधान :- कौन नहीं जानता कि सत्य बोलना चाहिए, कौन नहीं करो। शास्त्र कहता है-

जानता कि क्रोध नहीं करना चाहिए। जब सभी लोग जानते हैं तो धर्म तथा सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥(मनु .- ४.१३८)

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ धर्म-जिज्ञासा सत्य वचन बोलना चाहिए और वह सत्य के साथ-साथ प्रिय और हितकर भी होना चाहिए। सत्य होने पर भी कठोर हो तो नहीं बोलना चाहिए। हित से कोई सम्बन्ध नहीं है, बल्कि उसे दुःखी करने से सम्बन्ध है। यदि कोई

किसी काणे व्यक्ति को काणा कहना सत्य है, फिर भी इस प्रकार नहीं बोलना लाभ नहीं है और दूसरे को कष्ट होता है तो वहाँ चुप रहना चाहिए। यदि आप

चाहिए। यह कठोर होने के साथ-साथ हितकर भी नहीं है। किसी को प्रसन्न अपना दोष प्रकट करना नहीं चाहते तो दूसरे के दोष को प्रकट करने का

करने के लिये ऐसी मधुर वाणी भी न बोलें जिसमें सत्यता न हो। अधिकार आपको कहाँ से मिला। इसीलिये अन्यत्र कहा है-सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् **** जिज्ञासा :- शास्त्र एक तरफ तो सत्य का त्याग न करने के लिये सत्यमप्रियम्।(मनु- ४.१३८) अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए। परन्तु ऐसा

कहता है। दूसरी तरफ कहता है किसी की प्राणरक्षा के लिये एक बार बोला नहीं है कि तुमको गवाही देने के लिये बुलाया गया और तुम झूठ ही बोल दो।

गया झूठ सौ सत्य से श्रेष्ठ होता है। इन दो वाक्यों में कौन सा सत्य है? झूठ बोलने का तो निषेध है - प्रियं च नानृतं ब्रूयात्। किसी को अच्छा लगने

समाधान :- दोनों ही सत्य हैं। यहाँ बात समझने की है। किसी के लिये, खुश करने के लिये झूठ बोलने का विधान शास्त्र नहीं करता। अब

निरपराधी की हत्या हो रही हो और वह आप के असत्य बोलने से टल जाए तो कहो कि हमारे सत्य बोलने से किसी को दण्ड मिलेगा तो उसका सम्बन्ध जज

वह असत्य सौ सत्य से बढ़कर है। किसी की प्राणरक्षा के लिये असत्य बोलने से है, न्याय से है, तुमसे नहीं। तुम्हारे झूठ बोलने से वह छूट भी जाए तो

का तात्पर्य यह नहीं है कि किसी अपराधी को मृत्युदण्ड मिलने वाला हो और उसका हित होगा ऐसी बात नहीं है। गवाही में कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। हाँ! शास्त्र में कुछ ऐसे आख्यान आते हैं जिनसे पता लगता है कि कहीं-कहीं आप उसकी प्राणरक्षा करने के लिये गवाही में असत्य बोल दें। घुमा-फिरा कर बोलने से किसी की रक्षा होती हो, कोई बड़ी विपत्ति टलती हो **** तो बोल सकते हैं पर वह झूठ नहीं होना चाहिए। इसलिये भूतहित का सम्बन्ध जिज्ञासा :- महाभारत में कहा है- अहिंसा से होता है। आप विचार कीजिए कि आप अपने प्रति कैसा व्यवहार यद् भूतहितमत्यन्तं तत् सत्यमिति धारणा। विपर्यये कृतोऽधर्मः पश्य धर्मस्य सूक्ष्मताम्।।(शान्तिपर्व) चाहते हैं। इससे आप दूसरों के प्रति अपने व्यवहार को मिलाइए तो समझ में

भूतहित क्या है तथा इसका निर्धारण कैसे हो? आ जाएगा कि भूतहित कैसे निर्धारित हो। · यह बात भी ध्यान रखने की है कि व्यक्तिगत हित की अपेक्षा व्यापक समाधान :- भारतीय परम्परा का धर्म बहुत सूक्ष्म है। सत्य का हित का महत्त्व अधिक होता है। इसलिये सरकार कुछ गाँवों को उजाड़कर सम्बन्ध हमेशा हित और अहिंसा से होता है। जिसमें हित निहित न हो वह बाँध बनाती है तो उसमें दोष नहीं मानते क्योंकि उसका सम्बन्ध व्यापक हित सत्य नहीं हो सकता। प्रश्न यह है कि भूतहित को कैसे निर्धारित किया जाए। से है। शास्त्र यह कहता है कि यदि एक व्यक्ति को हटाने से परिवार सुखी होता व्यावहारिक सत्य यही है कि आप जैसा जानते हैं वैसा ही बोलिये, उसमें कोई है तो उसे हटा देना चाहिए। एक परिवार को हटाने से गाँव सुखी होता है तो चालाकी मत करिए। मान लीजिए आप जानते हैं कि अमुक व्यक्ति ने चोरी उसे हटा सकते हैं। एक गाँव को हटाने से राज्य सुखी होता है तो उसमें दोष की, अब आप सब जगह इस बात की चर्चा करें इससे क्या लाभ है। इसका नहीं है। इसीलिये अवतारी पुरुष भी कई बार ऐसे व्यवहार कर देते हैं जो गलत

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ धर्म-जिज्ञासा मालूम पड़ते हैं पर उन लोगों को दोष नहीं लगता क्योंकि उस व्यवहार का सम्बन्ध उनके स्वार्थ से न होकर व्यापक हित से होता है। श्रेयस्कर होता है क्योंकि एक ही धर्म किसी एक वर्ण के लिए धर्म हो जाता है

कृष्ण ने द्रोणाचार्य, भीष्म और कर्ण को मरवाने के लिये क्या-क्या तो दूसरे के लिए अधर्म।

बोल दिया परन्तु उन्हें असत्य का दोष नहीं लगा। वे ऐसा न बोलते तो ये तीनों ****

नहीं मरते, अधर्म जीत जाता। कृष्ण का तो अवतार ही अधर्म के नाश के लिये जिज्ञासा :- अहिंसाधर्मपालन करने के लिए क्या सर्प-बिच्छू इत्यादि

हुआ था। उनकी दृष्टि धर्म की है, व्यापक हित की है, अतः कोई दोष उन्हें नुकसान पहुँचानेवाले कीटों को भी नहीं मार सकते?

स्पर्श नहीं करता। अवतारी पुरुष या ज्ञानी सन्त ही ऐसा बोल सकता है क्योंकि समाधान :- नहीं। यदि आपने अहिंसाधर्मपालन का नियम लिया है, तो

उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं होता। सामान्य मनुष्य ऐसा नहीं बोल सकता। आप सर्प-बिच्छू आदि को भी नहीं मार सकते। आप उनको बिना कष्ट

मेरा तात्पर्य यही है कि भूतहित का निर्धारण तो बुद्धि से होगा पर पहुँचाए अपने निवास-स्थान से केवल हटा भर सकते हैं या किसी अन्य उपाय

आधार शास्त्र को ही बनाना पड़ेगा। दूसरी बात यह है कि जिसके हृदय में से अपना बचाव कर सकते हैं।

शास्त्र-श्रद्धा है, धर्म प्रतिष्ठित है उसका हृदय भूतहित क्या है इसका ठीक ****

निर्णय दे देगा। जिज्ञासा :- निवृत्ति मार्ग के नैष्ठिक ब्रह्मचारी को माता-पिता के दाहसंस्कार में जाना उचित है या नहीं? **** जिज्ञासा :- धर्मपालन करने के लिए भी क्या वर्णाश्रम का विचार करना समाधान :- निवृत्ति मार्ग के नैष्ठिक ब्रह्मचारी को माता-पिता के दाहसंस्कार

अनिवार्य है? में नहीं जाना चाहिए क्योंकि अब उसका कुल ही बदल गया है, इसलिए

समाधान :- धर्मपालन दो प्रकार से होता है - एक सामान्य और दूसरा उसका पुराने रीति-रिवाजों से कोई सम्बन्ध ही नहीं रहा। यहाँ तक कि दत्तक-

विशेष। सामान्य धर्मपालन के लिए वर्णाश्रम का विचार करने की पुत्र का भी अपने वर्तमान माता-पिता से ही सम्बन्ध होता है। नैष्ठिक ब्रह्मचारी

आवश्यकता नहीं है। जैसे - का सम्बन्ध संन्यास-मार्ग से हो गया है क्योंकि उसने भले ही विरजाहोम

अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। करके शिखा-सूत्र का त्याग नहीं किया है, पर है तो वह निवृत्तिमार्गी ही। अतः

एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः॥(मनुस्मृति-१०.६३) उसे भी संन्यासी के समान नियमों का पालन करना चाहिए।

अहिंसा का पालन करना, सत्य बोलना, चोरी न करना, शुद्धता रखना, ****

इन्द्रियनिग्रह इत्यादि धर्म सभी वर्णों के लिए मनुस्मृति में कहे गए हैं। इसलिए जिज्ञासा :- धार्मिक व्यक्ति को किन लक्षणों से पहचाना जा सकता है?

यहाँ पर वर्णाश्रम का विचार करने की आवश्यकता नहीं है, सभी को पालन समाधान :- धर्म के दस लक्षण मनुस्मृति में गिनाए गए हैं-

करना चाहिए। पर विशेष धर्मपालन करने के लिए वर्णाश्रम का विचार करना धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।

आवश्यक है। जिस वर्ण के लिए जो धर्म विहित है उसी का पालन उसके लिए धीर्विद्यासत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।(६.६२) धृति :- धृति का अर्थ होता है - धैर्य। धर्म का एक लक्षण धैर्य भी होता

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग - ३ धर्म-जिज्ञासा

है। जिस व्यक्ति में धैर्य होगा वह किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होगा। तीक्ष्ण बुद्धि नहीं है, अपितु शुद्ध बुद्धि है। शुद्ध बुद्धिवाला व्यक्ति झट पहचान क्षमा - क्षमा शब्द क्षमु-सहने धातु से बना है। सामर्थ्य होने पर भी लेता है कि क्या करना है अथवा क्या नहीं करना है। अपना मन किसी के प्रति नहीं बिगड़ने देना ही क्षमा है। जिस व्यक्ति में धैर्य सत्यम् - जीवन में धर्म-प्रतिष्ठा के लिए सत्यवचन का आश्रय अत्यन्त होता है, उसी में क्षमा हो सकती है। आवश्यक है। सत्य का तात्पर्य है जैसा सुना है या जैसा देखा है, वैसा ही दम: - दम का अर्थ सामान्यतः तो इन्द्रिय-निग्रह ही होता है, किन्तु वचन बोलना। यहाँ पर इन्द्रिय-निग्रह का अलग से ग्रहण होने से इसका अर्थ मनोनिग्रह ही अक्रोधम् - उपरोक्त धैर्य, क्षमा इत्यादि गुण आने पर क्रोध का अभाव लेना चाहिए। जीवन में धर्म-प्रतिष्ठा के लिए मन का वश में होना अत्यन्त उसमें स्वाभाविक ही हो जाता है। आवश्यक है। विद्या - शास्त्रज्ञान भी तात्पर्य के सहित उसमें रहता है। इन्द्रिय-निग्रहः- जीवन में सहनशीलता तभी हो सकती है जब आपकी उपरोक्त दस गुण जिस व्यक्ति में प्रतिष्ठित हैं वह धार्मिक है। यदि कोई इन्द्रियाँ निगृहीत हों। जिस व्यक्ति की इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, उसके जीवन में व्यक्ति अपने को धार्मिक समझता है तो उसे अपने जीवन में देखना चाहिए कि धर्म की प्रतिष्ठा नहीं हो सकती। इन्द्रिय और मन को वश में करने की शक्ति तो उपरोक्त लक्षण घटते हैं या नहीं। यदि घटते हैं तो वह धार्मिक है अन्यथा नहीं। सभी में है। तभी तो रुपये के लोभ से व्यक्ति काम-क्रोध सहन कर लेता है। *** भ इसी प्रकार यदि परमार्थ का लोभ हो जाए तो क्यों नहीं सहन कर सकता! जिज्ञासा :- व्यवहार में कहीं-कहीं नीतिशास्त्र और धर्मशास्त्र के भगवान् ने कहा है - त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं ... (गीता-१६.२१)। इसलिए वचनों में विरोध दिखता है, वहाँ किसे माना जाए। धार्मिक होने से जीवन में यदि व्यक्ति इनको सहन नहीं कर सकता है तो समझना चाहिए कि उसमें लाभ क्या है? परमार्थ का महत्व नहीं है। धार्मिक व्यक्ति पुरुषार्थी होता है, पर प्राप्त भोग में समाधान :- धर्मशास्त्र में और नीतिशास्त्र में भेद है। धर्मशास्त्र प्रत्येक सदा सन्तुष्ट रहता है क्योंकि सन्तोष से अत्युत्तम सुख प्राप्त होता है- व्यवहार का सम्बन्ध स्व से ही मानता है। जैसे किसी ने आपको गाली दी तो सन्तोषादनुत्तम: सुखलाभः।(योगसूत्र - २.४२) उस गाली का सम्बन्ध गाली देनेवाले से ही हुआ, आपसे नहीं। पर यदि अस्तेयम् - धार्मिक व्यक्ति दूसरों की किसी वस्तु को अनधिकार रूप आपके मुख से गाली निकल गई तो उसका सम्बन्ध आपसे हो जाएगा। एक से कभी नहीं लेना चाहता, दूसरों की वस्तु के प्रति सदा उदासीन रहता है। बार युधिष्ठिर आदि पाण्डव बैठे थे। कौरव आकर झगड़ा करने लगे और बहुत शौच :- वह सत्य और मधुर वचनों से वाणी को, सद्विचार से मन को गालियाँ दीं, परन्तु युधिष्ठिर ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। तब कौरवों ने कहा, और जल, मिट्टी इत्यादि से शरीर को शुद्ध रखता है क्योंकि शुद्धता जिसके "क्या तुम नपुंसक हो? हमने इतनी गालियाँ दीं, तो भी तुम कुछ नहीं बोले।" अन्दर है उसी में वैराग्य रहता है। शुद्धता जिसमें नहीं है उसकी इन्द्रियों को तब युधिष्ठिर ने कहा- ददतु ददतु गाली गालीमन्तो भवन्तः। हे भाइयो! खूब भूत-प्रेत आदि अशुद्ध कर देते हैं। गाली दीजिए क्योंकि आप गाली के विषय में सम्पन्न हो। जिसके पास जो धी: - उसकी बुद्धि विवेकवती होती है। यहाँ पर धी: का अर्थ मात्र होगा, वही देगा। विद्वान् विद्या देता है, धनवान् धन देता है और गालीमान्

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ धर्म-जिज्ञासा

गाली देता है। हम लोग तो गाली के विषय में दरिद्र ठहरे, तो कहाँ से गाली अभाव लगने लगा। देखिए, पहले से अधिक अशान्ति हो गयी कि नहीं!

दें!" ऐसे में शास्त्र कहता है तुम ऐसा धन क्यों चाहते हो जो अशान्ति का देखिए! युधिष्ठिर का मन धर्म की कितनी गहराई में है। उनको गाली कारण बने? धर्म पर खड़े होकर अर्थ को पकड़ोगे तो तुम सूखी रोटी से भी गृहीत ही नहीं हो रही है। परन्तु नीतिशास्त्र ऐसा नहीं कहता, वह कहता है यदि तृप्त हो जाओगे। तुम्हारे अन्दर बहुत बड़ा बल आ जाएगा। शास्त्र तो जीवन कोई तुम्हारे सामने बहुत गर्जना कर रहा है तो तुम भी उसके सामने बढ़- की शुरुआत ही यहाँ से मानता है कि तुम्हारा जीवन शास्त्रानुसार चल रहा है चढ़कर गर्जना करो, तब वह चुप हो जाएगा। इसीलिए कहा - शठे शाठ्यं या नहीं!

समाचरेत्। शठ को शठ के समान व्यवहार करके ही दबाना चाहिए। एक मजदूर काम करने के बदले में वेतन लेता है और वह यह भी जानता नीतिशास्त्र का भी कथन अपने स्थान पर ठीक ही है, पर धर्मशास्त्र है कि हमने वेतन लिया है तो हमें इतना काम करना ही चाहिए। अब यदि वह आपको एक अगाध धैर्य की ओर ले जाता है। मृत्यु के समय विजय उसी अपना कर्तव्य समझकर उस कार्य को करेगा तो अन्त में स्वर्ग को प्राप्त कर व्यक्ति की होती है जिसमें धर्म प्रतिष्ठित होता है क्योंकि धर्म की यह प्रतिज्ञा है लेगा। यदि कोई मुख्यमन्त्री या बड़ा विद्वान् आचार्य भी अपने कर्तव्य का कि तुम मुझे धारण करो, मृत्यु के समय मैं तुम्हारे साथ रहूँगा। यही धर्म की पालन नहीं कर रहा है, उसकी दृष्टि पैसे में लगी है तो वह अन्त में नरक में ही महिमा है। जगत् की यह प्रतिज्ञा है कि तुम चाहे मेरे लिए झूठ बोलो, चोरी जाएगा। भारतीय परम्परा बड़ी विलक्षण है। यहाँ यह नहीं कहा है कि ब्राह्मण करो या अन्य कुछ भी करो, मृत्यु के समय आपके साथ मैं नहीं रहनेवाला हूँ। स्वर्ग में जाएगा और शूद्र नरक में जाएगा। अपना कर्तव्य-कर्म करके शूद्र भी स्वर्ग में जा सकता है और कर्तव्य-कर्म से दूर होगा तो ब्राह्मण भी नरक में **** जिज्ञासा :- आप प्रायः कहते हैं -धर्म पर खड़े होकर अर्थ को पकड़ो। जाएगा। इसलिए शास्त्र व्यक्ति के कर्म को पहले कर्तव्य के साथ जोड़कर फिर

यदि व्यक्ति ऐसा करेगा तो अर्थ ही नहीं आएगा या फिर बहुत कम आएगा। ईश्वर से जोड़ देता है, तब वही कर्म उपासना बन जाता है और ईश्वर-प्राप्ति

ऐसे में धर्म पर खड़े होने का क्या औचित्य है? करवाने में समर्थ हो जाता है। इसलिए हमारे शास्त्रों में जो धर्म पर खड़े होकर समाधान :- अच्छा, यह बताइए कि आप धन क्यों चाहते हैं? शान्ति अर्थ को पकड़ने की बात कही गई है, वह उचित ही है।

के लिए चाहते हैं अथवा अशान्ति के लिए, तृप्ति के लिए चाहते हैं या अतृप्ति ****

के लिए। आपके पास धन आ जाए और उससे तृप्ति न होकर अतृप्ति बढ़ती जाए तो ऐसे धन से क्या लाभ होगा! मान लो, आपको एक लाख रुपये कहीं से मिले और आपने देखा पड़ोसी के पास दस लाख रुपये हैं। तब आपका चिन्तन हुआ कि मेरे पास तो इससे नौ लाख रुपये कम हैं, तो आपके पास नौ लाख का अभाव हो गया। फिर आपने प्रयत्न करके कहीं से एक करोड़ प्राप्त किए और देखा पड़ोसी के पास दस करोड़ हैं। तब आपको नौ करोड़ का

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देवपूजन-कर्मकाण्ड समाधान :- फलश्रुति को पढ़ें तो अच्छा है क्योंकि वह भी उस स्तोत्र के अन्तर्गत ही आती है। यदि अधिक संख्या में स्तोत्र का पाठ करना हो तो

देवपूजन-कर्मकाण्ड प्रथम और अन्तिम आवृत्ति में फलश्रुति सहित स्तोत्र पढ़ लें और बीच में केवल स्तोत्र का पाठ करें ऐसा शास्त्रीय विधान है।

जिज्ञासा :- किसी स्तोत्र का पाठ मन ही मन करना चाहिए अथवा ****

जोर से उच्चारण करके भी कर सकते हैं? जिज्ञासा :- किसी स्तोत्र का पाठ यदि अनुष्ठानरूप से करना हो तो

समाधान :- सामान्यतः तो नियम है कि स्तोत्र पाठ वैखरीवाणी (जो कितनी संख्या में करना चाहिए?

वाणी समीप में बैठे हुए व्यक्ति को स्पष्ट सुनाई दे) में ही किया जाता है। एक समाधान :- यदि स्तोत्र, कवच या सहस्रनाम का अनुष्ठान करना हो

बात का ध्यान अवश्य रखें कि हमारे द्वारा होने वाले शब्द से किसी अन्य तो उसके १,१०० पाठ करने पड़ते हैं, यह सामान्य नियम है। किसी-किसी

साधक को विघ्न तो नहीं हो रहा है। इसलिये स्तोत्र पाठ करने के लिये एकान्त स्तोत्र में अनुष्ठान के लिये आवृति की संख्या के विषय में बता दिया जाता है।

स्थान का चयन करें। यदि समीप में अन्य लोग हों तो उपांशुस्वर (मात्र होंठ- वहाँ पर तदनुसार ही संख्या समझनी चाहिए। कलियुग में उसका ४ गुना करना

जिह्वा हिले, लेकिन समीप में बैठे व्यक्ति को सुनाई न पड़े) में पाठ कर सकते चाहिए अर्थात् आप ४ बार १,१०० पाठ करेंगे तब वह स्तोत्र सिद्ध होगा।

हैं। यदि व्यक्ति निष्काम भाव से केवल भगवान् की प्रसन्नता के लिये पाठ इसके बाद आप उसका प्रयोग कर सकते हैं चाहे वह जगत् के लिये करें या

करता है तो उसे यह प्रयास करना चाहिए कि शब्दों के उच्चारण में जीभ तो मोक्ष के लिये वह आपके हाथ में है।

हिले परन्तु शब्द बाहर न निकले। हमने अनुभव किया है कि ऐसे पाठ में ****

तन्मयता अधिक होती है, अधिक भाव बनता है और अधिक आनन्द भी प्राप्त जिज्ञासा :- क्या श्राद्धकर्म में मित्रों को निमन्त्रण दे सकते हैं?

होता है। ऐसे पाठ के साथ अर्थचिन्तन ठीक प्रकार से हो सकता है। समाधान :- श्राद्धकर्म में विशेषकर विद्वान् तथा सत्कर्म करने वाले

जो व्यक्ति जगत् की कामनाओं को मन में रखकर सकाम भाव से ब्राह्मणों की ही प्रधानता होती है। इसलिये अपनी सामर्थ्य के अनुसार मित्र या

स्तोत्र का पाठ करते हैं उ हें तो जोर से उच्चारण करके ही पाठ करना चाहिए। शत्रु भाव को त्यागकर ग्यारह, इक्कीस अथवा अधिक संख्या में ब्राह्मणों को

इसमें भी ध्यान रखें कि पाठ को जल्दी-जल्दी न करें, गायन न करें, सिर न बुलाएं। ब्राह्मणों को भोजन करवाकर उन्हें दान-दक्षिणा देकर विदा करना

हिलाएं, अपने हाथ से लिखा हुआ पाठ न करें, अर्थ जाने बिना पाठ न करें चाहिए। तदुपरान्त मित्र-सम्बन्धियों को भोजन करवा सकते हैं। श्राद्ध में

और अस्पष्ट उच्चारण भी न करें। दौहित्र को निमन्त्रण के लिये विशेष विधान किया है- व्रतस्थमपि दौहित्रं श्राद्धे यत्नेन भोजयेत्। (मनु .- ३.२३४) **** जिज्ञासा :- किसी स्तोत्र का पाठ करने के बाद उसकी फलश्रुति को ****

पढ़ना चाहिए अथवा नहीं? जिज्ञासा :- सन्ध्याकर्म के लिये सुबह और शाम के समय का ही

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ देवपूजन-कर्मकाण्ड विधान क्यों किया गया है? समाधान :- कोई भी कर्म हो उसके फल में काल का बहुत योगदान फल नहीं तो कुछ मिलेगा।

होता है। उपयुक्त काल में किया गया कर्म ही पूर्ण फल देने में सफल होता है। ****

शास्त्र में आठ प्रहर(चौबीस घण्टे) को चार भागों में विभाजित किया है। जिज्ञासा :- लिङ्ग शब्द का क्या अर्थ है? ज्योतिर्लिङ्ग बारह ही क्यों

जिनमें चार सन्धियाँ हैं- प्रातः, मध्याह्न, सायं और निशीथ(मध्य रात्रि)। इन हैं?

सन्धियों में किया गया भजन-ध्यान उत्कृष्ट माना जाता है। यहाँ पर यह शंका समाधान :- शास्त्र में लिङ्ग शब्द का अर्थ किया गया है - लीनम्

नहीं करनी चाहिए कि इन्हीं कालों को महत्त्व क्यों दिया गया है। सृष्टि के आदि अर्थं गमयति इति लिङ्गम्। जो छुपे हुए अर्थ को बताए वह लिङ्ग कहलाता में कृपाशक्ति ने कुछ विशेष काल निर्धारित किए हैं। जैसे सन्ध्याकाल, है। जैसे हम कहीं धूम देखते हैं तो समझ जाते है कि वहाँ अग्नि है। इसी प्रकार सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, संक्रान्ति इत्यादि। इन कालों में किया गया कोई भी कर्म शिवलिङ्ग कारणतत्त्व का अर्थात् जगत्कारण का बोधक है। कार्यरूपी जगत् प्रबल फल देने में समर्थ होता है। सूर्यग्रहणकाल में किसी मन्त्र का जप किया हमें दिखाई दे रहा है परन्तु उसका कारण परमेश्वर दिखाई नहीं देता। उसका

जाए तो वह एक पुरश्चरण का फल देता है। क्यों देता है? इसलिये कि सृष्टि बोधक होने से इसे लिङ्ग कहते हैं। इसलिये इसकी उपासना सभी के लिये के आदि में कृपाशक्ति ने यही नियम बनाया जो आज भी चल रहा है। इसलिये अनिवार्य है क्योंकि लिङ्ग की उपासना कारण की उपासना है, बाकी सभी

सनातन परम्परा में त्रिकाल सन्ध्या का विधान किया गया है। तन्त्रशास्त्र में तो उपासनाएँ कार्य की होती हैं। मानस में रामजी ने कहा है-

निशीथकाल की सन्ध्या का भी विधान है। औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि।

**** संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि।।

जिज्ञासा :- सन्ध्या आदि नित्यकर्म किसी दिन समय पर नहीं होने से (उत्तरकाण्ड- ४५)

बाद में कर सकते हैं क्या? यहाँ पर गोपनीयता यही है कि यह उपासना कारणतत्त्व की है।

समाधान :- यहाँ पर विचारणीय बात यह है कि समय पर क्यों नहीं जहाँ कहीं भी किसी निमित्त से ज्योति के रूप में शिव प्रकट होते हैं,

हुआ? उस समय सो रहे थे या किसी से गप्प लड़ा रहे थे। यदि ऐसी बात है तो बाद में वहाँ लिङ्ग की स्थापना होती है उसे ज्योतिर्लिङ्ग कहा जाता है। जैसे मैं पहले इस आलस्य और प्रमाद को दूर करने के लिये कहूँगा। हाँ, यदि उस ओंकारेश्वर के विषय में देखिए, विन्ध्याचल की इच्छा हुई कि मेरे ऊपर

समय आप यात्रा में थे या शरीर स्वस्थ नहीं था अथवा अन्य कोई परिस्थिति महादेव का निवास हो, तो उसने कठोर तपस्या की। महादेव प्रसन्न होकर

थी जिसे आप टाल नहीं सकते थे तो चिन्ता करने की बात नहीं। इस बात को ज्योतिरूप से प्रकट हुए, तब सभी देवता और ऋषि वहाँ पहुँचे और महादेव सिद्धान्त के रूप में धारण करना चाहिए कि कोई भी शास्त्रीय क्रिया समय पर की स्तुति की। सबने प्रार्थना की कि जीवों के कल्याणार्थ आप यहाँ निवास किये जाने से ही पूर्ण फल देती है। समय का उल्लंघन होने पर वह ठीक प्रकार करें। तब वह ज्योति दो भागों में विभक्त हो गई, एक तो जिस लिङ्ग की पूजा से फल नहीं देती, परन्तु न करने की अपेक्षा देरी से करना भी उचित है। पूर्ण विन्ध्य करता था उसमें लीन हुई और दूसरी ओंकार पर्वत में। सभी ज्योतिर्लिङ्गों की कथाओं में यही बात आती है कि पहले महादेव ज्योतिरूप

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ देवपूजन-कर्मकाण्ड से प्रकट होते हैं, फिर वह ज्योति लिङ्ग में लीन हो जाती है। इसीलिये इनका प्रबल होता जाता है। इसलिये साधु अपने शरीर को चन्दन-वस्त्र इत्यादि से न नाम ज्योतिर्लिङ्ग पड़ा। हमारे शरीर में बारह ज्योतियाँ हैं जिनके द्वारा हमारा सारा व्यवहार सजाये। **** होता है - पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि। व्यष्टि में ये बारह ज्योतियाँ हैं। इन्हीं के अनुरूप समष्टि में भी बारह ज्योतियाँ हैं, वही बारह जिज्ञासा :- क्या पार्थिवशिवलिङ्ग-पूजन प्राचीन आराधना है?

ज्योतिर्लिङ्ग हैं। इसका महत्त्व और सामान्य विधि क्या है? समाधान :- हाँ! पार्थिवशिवलिङ्ग - पूजन बहुत प्राचीन परम्परा है, **** जिज्ञासा :- शिवजी के पूजन में भस्मी के स्थान पर चन्दन का प्रयोग यह एक वैदिक आराधना है। इस पूजन का बहुत बड़ा महत्त्व है। शिवपूजन तो

कर सकते है क्या? क्या ब्रह्मचारी या संन्यासी चन्दन धारण कर सकते हैं? सब कुछ दे सकता है। इहलोक भी देता है, परलोक भी देता है, आत्मज्ञान भी

समाधान :- जिस देवता को जो वस्तु प्रिय होती है उसकी पूजा में दे देता है। अब तुम पूजन किसलिये करते हो यह तुम्हारे मन की बात है। महादेव तो सब कुछ दे सकते हैं। घुश्मा की पार्थिवलिङ्गपूजन की निष्ठा के उस वस्तु का तो प्रयोग करना ही चाहिए। इसके अतिरिक्त जो वस्तु निषिद्ध नहीं है उसका भी आप प्रयोग कर सकते हैं। भस्मी और बिल्वपत्र भगवान् कारण घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग का प्राकट्य हुआ।

शिव को बहुत प्रिय है। इसलिये शिव पूजा में इनका प्रयोग अवश्य ही करना पार्थिवलिङ्ग-पूजन सभी लोग कर सकते हैं। विधियाँ सबके लिये अलग-अलग हैं। किसी के लिये वैदिक विधि है और किसी के लिये चाहिए। चन्दन या अष्टगंध यदि उपलब्ध है तो आप चढ़ाएं, पर भस्मी की पौराणिक, योग्यता के अनुसार विधियों का भेद है परन्तु पूजन सभी लोग कर कटौती करके नहीं। सकते हैं। पार्थिवलिङ्ग के लिये मिट्टी ग्रहण करना, लिङ्ग बनाना, उसकी देवता का पूजन करके बचा हुआ चन्दन ही प्रसाद के रूप में संन्यासी स्थापना करना इन सबके अलग-अलग मन्त्र और विधियाँ हैं जिन्हें शास्त्र में या ब्रह्मचारी को धारण करना चाहिए, शरीर सजाने के लिये नहीं। शरीर सजाना तो संन्यासी के लिये निषिद्ध है और ब्रह्मचारी के लिये भी। आजकल देख लेना चाहिए। इसी मिट्टी से पञ्चदेव भी बनाए जाते हैं क्योंकि महादेव के

तो एक नई परम्परा देखने को मिलती है। साधु लोग चन्दन, भस्मी दर्पण पूजन में गणपति, पार्वती, विष्णु और सूर्य का पूजन तो सदा होता ही है। **** देखकर लगाते हैं। यह सुन्दर दिखने की जो वासना है इसे साधु को छोड़ना चाहिए क्योंकि उसको तो शरीर की उपेक्षा करने का अभ्यास बढ़ाना है, जिज्ञासा :- नर्मदेश्वर शिवलिङ्ग के पूजन के लिये प्राण-प्रतिष्ठा

देहाध्यास समाप्त करना है। देहाध्यास ही परमार्थ मार्ग में सबसे बड़ा बाधक आवश्यक है अथवा नहीं?

है। समाधान :- स्कन्दपुराण के काशी खण्ड में वर्णन आता है कि नर्मदा

यह देहाध्यास इतना मजबूत है कि जल्दी छूटता ही नहीं क्योंकि ने काशी में जाकर दीर्घकाल तक तपस्या की और महादेव को प्रसन्न किया।

सम्पूर्ण व्यवहार का आधार तो यही है। शरीर का अधिक ध्यान रखने से यह महादेव के प्रकट होने पर उनसे अनेक वरदान प्राप्त किये जिनमें से एक यह भी था कि हमारे जल के अन्दर रहने वाले पत्थर साक्षात् शिवरूप माने जाएं।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ देवपूजन-कर्मकाण्ड

उनके पूजन के लिये प्राणप्रतिष्ठा की आवश्यकता न रहे। कोई भी व्यक्ति मेरे जिज्ञासा :- आजकल लोग देवी-देवताओं के चित्रों को फ्रेम में जल से पत्थर निकाल कर उसका पूजन प्रारम्भ कर सकता है। इसके अनुसार मढ़वाकर उनकी पूजा करते हैं, क्या यह भी मूर्तिपूजा के समान शास्त्रीय है? तो यही मालूम पड़ता है कि नर्मदेश्वर के पूजन के लिये प्राणप्रतिष्ठा की कोई समाधान :- हाँ, इसे शास्त्रीय ही मानना चाहिए। यद्यपि उनमें प्राण- आवश्यकता नहीं है। प्रतिष्ठा आदि नहीं की जा सकती, फिर भी भावना का फल तो मिलता ही है। परन्तु आजकल कई बातें व्यावहारिक हो जाती हैं। आप ने पत्थर उन्हें देखकर देवता-विषयक जो स्मृति बनती है, उससे लाभ होता है। इसलिए निकाल कर पूजन शुरु कर दिया उसमें तो कोई दोष नहीं है पर जब दूर कहीं इस पूजा को अशास्त्रीय नहीं कह सकते। मन्दिर बनता है तो नर्मदा से आप शिवलिङ्ग वहाँ ले जाते हैं। नर्मदा से **** निकालते ही तो उसका पूजन शुरु नहीं होता। ऐसे नर्मदेश्वर की प्राणप्रतिष्ठा जिज्ञासा :- आर्य-समाज कहता है कि आज से पैंतीस सौ वर्ष पूर्व करनी चाहिए। दूसरी बात, आजकल लोग चाहते हैं कि नर्मदेश्वर सुन्दर हो। मूर्तिपूजा नहीं होती थी। आपका इस विषय में क्या विचार है? वह तो सीधे नर्मदा से प्रायः नहीं मिलता। इसलिये नर्मदा से पत्थर लेकर समाधान :- आर्य-समाज के कहने से इस बात को हम कैसे सत्य मान मशीन से सुन्दर नर्मदेश्वर बनाया जाता है। उसकी तो प्राणप्रतिष्ठा अनिवार्य है। सकते हैं! क्या आर्य-समाज के कहने से पुराणों को मानना भी हम छोड़ देंगे? **** यदि छोड़ देंगे तो जीवन में कोई आदर्श ही नहीं रहेगा। इसलिए पुराणों को हम जिज्ञासा :- कुछ प्राचीन मन्दिरों में देखते हैं कि खण्डित शिवलिङ्ग का नहीं नकार सकते और पुराणों को मानें तो उनमें जगह-जगह आता है कि भी पूजन किया जाता है। क्या उस पूजन का भी कोई महत्व है? क्या उन्हें सत्युग, त्रेतायुग इत्यादि में भी मूर्तिपूजा होती थी। विचार करके भी देखिए बदलने का विधान नहीं है? कि उस निराकार ईश्वर की पूजा करने के लिए आपके पास मूर्ति के अतिरिक्त समाधान :- एक बात ध्यान में रखने की है कि ऐसे क्षेत्र में एक शक्ति और क्या आधार है! इसलिए चाहे आर्य समाज हो या और कोई समाज, रहती है, वह उस शिवलिङ्ग तक ही सीमित नहीं रहती। इसलिए उस क्षेत्र का किसी से भी भ्रमित न होकर अपनी निष्ठा में स्थित रहना चाहिए। माहात्म्य होता है। शिवलिङ्ग खण्डित हो जाए तो भी उसकी शक्ति कहीं जाती **** नहीं है। वह शक्ति ही वहाँ रहकर जीवों को अपनी ओर आकर्षित करके उनका जिज्ञासा :- मन्दिर में घण्टा क्यों बजाया जाता है? इससे क्या लाभ कल्याण करती है। रही बात शिवलिङ्ग बदलने की, तो शास्त्रों में इस विषय में है? कहा है कि देवताओं, ऋषियों, मुनियों एवं सिद्धों के द्वारा स्थापित जो मूर्तियाँ समाधान :- घण्टा बजाने पर एक विलक्षण नाद की अभिव्यक्ति होती हैं, उनको आप बदल नहीं सकते। यदि वे खण्डित हो गई हैं और पूजा करने है। आप कभी जोर से घण्टा बजाइए और उससे जो ध्वनि निकलती है उसपर योग्य नहीं रहीं, तो उन्हें आप किसी बहुमूल्य धातु में मण्डित करके दर्शन के मन और श्रोत्र को केन्द्रित कर दीजिए। वह ध्वनि धीरे-धीरे सूक्ष्म और व्यापक लिए यथास्थान पर अवश्य रखें और पूजा के लिए उसके प्रतिनिधि के रूप में होती जाती है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को व्याप्त कर लेती है। हम कुछ दूर तक समीप में ही एक अन्य मूर्ति स्थापित कर सकते हैं। ही सुन पाते हैं, यह अलग बात है। हमारी बातचीत से या अन्य बाजे बजाने पर

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ देवपूजन-कर्मकाण्ड

इस प्रकार के नाद की अभिव्यक्ति नहीं होती। नाद का शास्त्रों में बहुत महत्त्व लक्षण देशी गाय में तो मिलता है, परन्तु जर्सी में नहीं मिलता। इसलिये शास्त्र कहा गया है। विशिष्ट नाद का अभिव्यंजक होने से घण्टावादन को पवित्र माना के अनुसार तो जर्सी को गाय ही नहीं कह सकते। उसके दान से गोदान का गया है। फल नहीं मिलेगा। उसे पालने से आपको दूध बहुत मिलेगा परन्तु गोसेवा का पूजन के समय जब घण्टा बजाया जाता है तो पण्डित एक मन्त्र बोलते पुण्य नहीं मिल सकता। हैं उसके अर्थ पर भी जरा ध्यान दीजिए - ****

आगमार्थं च देवानां निर्गमार्थं तु राक्षसाम्। जिज्ञासा :- आज के युग में दान का फल दिखाई क्यों नहीं देता? घण्टानादं करोम्यहं देवताह्वानलाञ्छनम्।। समाधान :- दान के विषयों में हमने महात्माओं से सुना है - देवताओं और अन्य सात्त्विक वृत्ति वाले लोगों को मन्दिर में बुलाने सतयुग मान समेत घर त्रेता घरहि बुलाय। के लिये तथा बुरी वृत्ति वाले राक्षस, प्रेत आदि को भगाने के लिये मन्दिरों में द्वापर मांगे देत है कलियुग काम कराय। घण्टा बजाया जाता है। ये घण्टा, नगाड़ा, शंख आदि जो वाद्य हैं इनको बजाने सतयुग में जिसको दान देना होता था उसके घर जाते थे और बहुत से अनिष्ट दूर होता है और मंगल की प्राप्ति होती है। सभी उपद्रव शान्त हो प्रार्थना करते थे कि महाराज! मेरी यह वस्तु आप स्वीकार करें। बड़ा पूजन- जाते हैं। देहात में लोग कहते हैं - शंख बाजे बलाएं भागें। सत्कार करके दान देते थे। अभी सौ वर्ष पहले तक ऋषिकेश में महात्माओं इसके अलावा शास्त्रों में भी कहा है कि देवताओं के पूजन के समय के पीछे सेठ लोग कम्बल लेकर घूमते रहते थे- महाराज! मेरा एक कम्बल घण्टा, मृदंग आदि वाद्य बजाने से, नृत्य करने से देवता प्रसन्न होते हैं। हमारा स्वीकार कर लो। उस समय ऋषिकेश में सतयुग का ही वातावरण था। उसके मन भी आनन्द में डूब जाता है। आरती के समय यदि लय-ताल के साथ बाद त्रेता आ गया तो "घरहि बुलाय", गुरुजी को घर बुला लो तब दान देंगे। घण्टा आदि वाद्य बजाये जाएं तो एक ऐसा वातावरण बनता है कि मन उसमें द्वापर में मांगने पर दान दिया जाता था। अब तो "कलियुग काम कराय", तल्लीन हो जाता है, बाहरी जगत् में नहीं जाता यह भी इसका एक लाभ है। काम कराए बिना एक पैसा भी दान नहीं देंगे। पण्डितजी मेरा यह अनुष्ठान कर **** देना, इतना जप कर देना फिर पैसा देंगे। इसके अलावा दान देने में देश, काल, जिज्ञासा :- यदि गोदान करना हो तो क्या जर्सी गाय का दान कर पात्र का जैसा ध्यान रखना चाहिए वह आज के लोग नहीं रख पाते। इसलिये सकते हैं? दान का फल जैसा प्रकट होना चाहिए वैसा नहीं होता। समाधान :- शास्त्र दृष्टि से तो नहीं हो सकता क्योंकि वह वर्णसंकर **** जाति है। हमने लोगों से पता लगाया है कि जर्सी की दो ही प्रजातियाँ हैं। एक सूअर के बीज से बनाई गई है और दूसरी गधे के बीज से। दोनों वर्णसंकर हैं। शास्त्र में गाय का लक्षण किया है - सास्नादिमत्त्वम्। जिसके गले में सास्ना अर्थात् गलकम्बल(गले के नीचे लटकती हुई खाल) हो वही गाय है। यह

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प्रारब्ध, पुण्य-पाप, संस्कार "मुझे भिखारी बनाना चाहते हो।" उन्होंने कहा - "अरे भाई! रात्रि में तो रो रहे थे।" उसने कहा - "इसमें क्या हुआ। अपमान किया तो मेरे लड़कों ने

प्रारब्ध, पुण्य-पाप, संस्कार किया, पत्नी ने किया, किसी पराये ने थोड़े ही किया।" यह सुनकर वे हँसे और चल दिए। देखो, यह स्थिति है संसार की। ऐसे ही कोई घर थोड़े छोड़

जिज्ञासा :- महात्मा घर-बार सब छोड़कर जब भगवान् का ही हो देता है। मान लो कोई घर छोड़ भी दे तो वह डाकू भी बन सकता है, चोर भी जाता है तो उसका प्रारब्ध के साथ सम्बन्ध नहीं रहना चाहिए। यदि परमात्मा को प्रारब्ध का भोग करवाना ही है तो वृद्धावस्था में क्यों करवाता है? बन सकता है पर यदि कोई ऐसा न करके महात्मा बनता है तो वहाँ पूर्वजन्म का सम्बन्ध मानना चाहिए। इसलिये कहा - पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्ियते समाधान :- प्रारब्ध से ही तो वह घर छोड़ता है, नहीं तो बचपन में ही घर कैसे छोड़ देता। उसके पूर्वजन्म के संस्कार और प्रारब्ध को छोड़कर ह्यवशोऽपि सः।(गीता- ६.४४)। वह पूर्वजन्म के अभ्यास से जबरन ही घर छोड़ देता है। जब प्रारब्ध आपका इतना कल्याण कर रहा है, जगत् से निकाल अन्य क्या हेतु बन सकता है? बचपन में वैसे संस्कार और विचार कहाँ से कर परमात्मा की ओर ले जा रहा है फिर आप उससे क्यों डरते हैं? प्रारब्ध उत्पन्न होते हैं। मात्र इस जन्म के पुरुषार्थ को हेतु मानें तो उसे बहुत काल लगेगा। यदि कोई घर छोड़ने में हेतु विक्षेप को माने तो भी उसे प्रारब्ध और कोई मामूली वस्तु नहीं है। जिन कर्मों को लेकर यह शरीर मिला है उन्हें प्रारब्ध कहते हैं। उनका भोग भी होगा। अब वह आपकी इच्छानुसार तो नहीं आयेगा। संस्कार ही समझना चाहिए क्योंकि घर छोड़ने का बल सभी में नहीं देखा बचपन का भोग बचपन में आएगा, जवानी का भोग जवानी में आएगा। इसी जाता। प्रत्यक्ष देखते हैं कि लोगों में विक्षेप भी हो रहा है, जगत् के थप्पड़ भी प्रकार वृद्धावस्था भी प्रारब्ध से ही आती है तो वृद्धावस्था का भोग भी उसी लग रहे हैं, दुःखी हो रहे हैं फिर भी घर नहीं छोड़ रहे हैं। यदि कोई घर छोड़ने समय आएगा। को कहे तो उल्टा उसे ही डाँट देते हैं। हाँ! यदि आप महात्मा हैं तो आपका आश्रय परमेश्वर ही होना एक बार अपने महाराजजी(स्वा.दिव्यानन्द सरस्वतीजी) हिमालय- चाहिए। आपको सुख-दुःखात्मक सभी प्रकार के प्रारब्ध में परमेश्वर की कृपा भ्रमणकाल में रात्रि के समय किसी गाँव में ठहरे थे। रात्रि को एक वृद्ध उनके ही दिखाई देनी चाहिए। पास आया। वह बहुत दुःखी दिखाई दे रहा था। उन्होंने पूछा - "भाई! इतने **** दुःखी क्यों हो?" उसने कहा - "लड़का और बहू मेरा बहुत अपमान करते जिज्ञासा :- भगवद्भक्त के संचित और प्रारब्ध कर्मों का क्या होता रहते हैं। आज तो लड़के की माँ भी उनके साथ हो गई और सभी ने मिलकर है? मुझे घर से निकाल दिया। भोजन तक नहीं दिया।" यह सुनकर उनको दया आ समाधान :- लोक में देखा जाता है कि जब आप अपना घर किसी गई और कुछ खाने को दिया। फिर कहा - "रात्रि को यहीं सो जाओ।" वह को दान दे देते हैं तो उसमें रहने वाले साँप, बिच्छू, चूहे, मच्छर आदि आपके वहीं सो गया। जब सुबह हुई तो उन्होंने कहा- "चलो मेरे साथ, क्या रखा है साथ तो नहीं आते। घर के साथ ही रह जाते हैं। इसी प्रकार जब किसी भक्त ने संसार में।" इतना सुना कि वह बहुत बिगड़ गया और उन्हें डाँटने लगा -

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ प्रारब्ध, पुण्य-पाप, संस्कार शरीर तथा शरीर से सम्बन्धित वस्तुओं से लेकर अहंकारपर्यन्त सब को जिज्ञासा :- क्या नागरिक नियमों का पालन न करने पर पाप लगता परमात्मा के लिये समर्पित कर दिया तो शरीर के साथ रहने वाले कर्म चाहे वह है? संचित हों अथवा प्रारब्ध या फिर क्रियमाण हों किसी के साथ भी उसका समाधान :- भले ही नागरिक नियमों के उल्लंघन करने से उत्पन्न दोषों सम्बन्ध नहीं बनेगा। का कथन शास्त्र में नहीं किया, पर उनका पालन करना चाहिए, नहीं तो उस लापरवाही का फल तो मिल ही सकता है। मान लो, आपने सड़क पर चलते जिज्ञासा :- शास्त्र में मदिरापान को महापातक की श्रेणी में रखा है। समय अपने कर्तव्यों का ध्यान नहीं रखा तो जो दुर्घटना होगी वह नागरिक ठण्डे प्रदेश में रहने वाले सैनिकों के लिये मदिरापान अनिवार्य जैसा हो जाता नियमों के उल्लंघन का फल है। है। ऐसे में उनकी क्या गति होगी? समाधान :- शास्त्र में जो धर्म निर्धारित किया है वह वर्णाश्रम और जिज्ञासा :- कुछ व्यक्ति चोरी का सामान ले जा रहे थे। उन्होंने मुझे परिस्थिति विशेष को ध्यान में रख कर किया है। मदिरापान जहाँ ब्राह्मण के सहायता के लिये कहा। मैंने यह जानते हुए भी कि यह चोरी का सामान है लिये घोर पाप कहा है वहीं अन्य वर्णों के लिये इतना घोर पाप नहीं बताया। मानव धर्म समझ कर उनकी सहायता की। ऐसे में मुझे पाप लगा या पुण्य? शूद्र के लिये तो यहाँ तक कह दिया कि वह मदिरापान का त्याग करता है तो यदि पाप लगा तो इसका प्रायश्चित क्या है? महान् फल है और ग्रहण करता है तो पाप नहीं है क्योंकि वह वैसी ही प्रकृति समाधान :- आपने मानव धर्म समझकर उनकी सहायता की तो जो में पैदा और पोषित हुआ है। उसके लिये उसे त्यागना बड़ा पुरुषार्थ है। इसी हुआ उसको भूल जाइये। भविष्य में यह जानते हुए कि यह चोरी का सामान प्रकार ठण्डे प्रदेश में रहने वाले सैनिक के लिये भी समझना चाहिए। उसका है, किसी की सहायता नहीं करना चाहिए। नहीं तो उसमें दोष के भागी आप भी मुख्य कर्तव्य है देश की रक्षा के लिये लड़ना। वह जिस वातावरण में रहता है होंगे। धर्म-अधर्म तो बाद की बात है, मानलो उन चोरों की खोज करते हुए उसमें यदि मदिरापान अनिवार्य है तो उसे पाप नहीं लगता। हाँ! मदिरापान का पुलिस वहाँ पहुँच जाये तो उनके साथ आप फँसेंगे या नहीं? आपने पहले त्याग करता है तो महान् फल है। किया है उसका प्रायश्चित्त यही है कि भविष्य में सावधान रहें। **** जिज्ञासा :- अज्ञान से हुआ पाप कितना प्रबल होता है? उसका जिज्ञासा :- पञ्चदशीकार ने कहा है कि ब्रह्म के परोक्ष ज्ञान से पापों प्रायश्चित्त क्या है? का नाश हो जाता है, यह कैसे सम्भव है? समाधान :- जो पाप अज्ञान से हो जाता है वह कमजोर होता है। समाधान :- पञ्चदशी में कहा है - उसके लिये अलग से प्रायश्चित्त करने की जरूरत नहीं। वह अपने वर्णाश्रम परोक्षं ब्रह्मविज्ञानं शाब्दं देशिकपूर्वकम्। धर्म का पालन करने तथा भगवान् से प्रार्थना करने पर समाप्त हो जाता है। बुद्धिपूर्वकृतं पापं कृत्स्नं दहति वह्निवत्॥।(१.६३) * % ** परोक्ष ज्ञान बुद्धिपूर्वक किए गए पापों का नाश कर देता है। यह है तो

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ प्रारब्ध, पुण्य-पाप, संस्कार जटिल बात परन्तु पहले समझना चाहिए कि परोक्ष ज्ञान क्या चीज है। ब्रह्म के असन्दिग्ध ज्ञान को परोक्ष ज्ञान कहते हैं। आपकी बुद्धि में ब्रह्म के विषय में था। एक शिव मन्दिर के पास से गुजर रहा था तो वहाँ आरती हो रही थी।

कोई सन्देह न रहे तभी कहा जाएगा कि आपको परोक्ष ज्ञान हो गया। तत्त्व के उसका ध्यान उधर चला गया, ठोकर लगकर गिरा और सिर फट गया, सारी

विषय में ठीक-ठीक निर्णय हो जाने पर बुद्धि के दोष तो इस ज्ञान से समाप्त सामग्री बिखर गई। उसे आभास हुआ कि अब मरने ही वाला हूँ तो पता नहीं

हो जाते हैं परन्तु उसके पीछे जो अज्ञान है वह समाप्त नहीं होता। इसी दृष्टि से कहाँ से मन में आ गया - "ओहो! जीवन भर तो मैंने कुछ पुण्य नहीं किया

पञ्चदशीकार ने यह बात कही है, हालाँकि अन्य ग्रन्थों में ऐसी बात नहीं परन्तु अब यह सब सामग्री मैं महादेव को अर्पित करता हूँ।" इसी विचार में

आती। उसका शरीर छूट गया।

एक विचारणीय बात यह भी है कि अबुद्धिपूर्वक और बुद्धिपूर्वक जब धर्मराज के पास पहुँचा तो उन्होंने कहा - "तुम्हारे जीवन में तो

होने वाले पाप क्या हैं? जो पाप अनज़ान में हो जाए वह अबुद्धिपूर्वक और पाप ही पाप है, केवल एक पुण्य है। किसका फल पहले भोगोगे?" उसने

जो पाप जानबूझकर करते हैं वह बुद्धिपूर्वक कहलाता है। यहाँ उनका आशय प्रार्थना की कि उस अन्तकाल के पुण्य का फल मुझे पहले मिल जाए उसके

यही मालूम होता है कि अबुद्धिपूर्वक कृत जो पाप हैं वह स्वाभाविक होता है, बाद में मुझे नरक में छोड़ दीजिएगा। धर्मराज ने विचार करके कहा - "इस

अतः उसका दोष नहीं लगता है। परन्तु जिसको परोक्ष ज्ञान नहीं है उसे पुण्य से तो तुम्हें दो घड़ी के लिये इन्द्र का पद मिल सकता है।" उन्होंने

बुद्धिपूर्वक कृत पाप का दोष अवश्य लगेगा। परोक्ष ज्ञान होने पर बुद्धि में संकल्प से इन्द्र को बुलाया और कहा -"आप दो घड़ी के लिये स्वर्ग से

निर्णय हो जाता है कि इस पाप से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। इसलिये उस बाहर घूम आएँ, तब तक यह जीव आपके पद पर रहेगा।"

पाप से वह छूट जाता है। यही ग्रन्थकार का तात्पर्य दिखाई देता है। परन्तु वहाँ बैठते ही बलि ने दो घड़ी में संकल्प करके स्वर्ग की सब वस्तुएँ

हमको तो यह बात जँचती नहीं है। दान कर दीं। स्वर्ग में तो लोग भोग के लिये जाते हैं, पर महादेव ने उसे ऐसी बुद्धि दे दी तो क्या करे! उसी दान के प्रभाव से उसका सारा पाप दब गया। **** जिज्ञासा :- अत्यन्त पापी व्यक्ति अपने जीवन के अन्तकाल में कोई स्वर्ग में दान करने की विधि नहीं है इसलिये उसका जन्म दैत्यकुल में हुआ,

शुभ कर्म कर दे तो क्या उसका कल्याण हो सकता है? परन्तु उसका ऐश्वर्य कितना बड़ा था। उसी दान का संस्कार रहा कि उसने गुरु

समाधान :- वैसे तो किसी अत्यन्त पापी मनुष्य से अन्तकाल में शुभ का भी कहना नहीं माना और सारा राज्य विष्णु को दान कर दिया। अब देखो!

कर्म होने की सम्भावना बहुत कम होती है परन्तु यदि किसी प्रकार उससे कोई उसके द्वारा शिवजी को किया गया अर्पण उसे कहाँ से कहाँ ले गया। इस तरह

शुभ कर्म बन जाए और उस कर्म का सम्बन्ध ईश्वर से हो जाए तो उस व्यक्ति पापी व्यक्ति भी अन्त में यदि किसी प्रकार भगवान् से जुड़ जाए तो उसका कल्याण सम्भव है। का भी कल्याण हो सकता है। बलि के विषय में आता है कि वह पिछले जन्म में बहुत बड़ा पापी ****

था। एक दिन वेश्या के लिये बहुत सी सामग्री लेकर शाम के समय जा रहा जिज्ञासा :- आनन्दरामायण में कहा है - वाल्मीकीजी ने रामायण पहले लिख दिया और रामावतार बाद में हुआ। इसका अर्थ यह हुआ कि

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ प्रारब्ध, पुण्य-पाप, संस्कार प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की प्रत्येक घटना पहले से निर्धारित है। फिर व्यक्ति का दृष्टि मिलती है जिससे सुख-दुःख का भोग पीछे छूट जाता है। एक भक्त पुरुषार्थ क्या बनेगा? प्रत्येक घटना को भगवत्कृपा के रूप में ग्रहण करता है। किसी ने अपमान समाधान :- बात तो सुनने में ठीक लगती है। भृगुसंहिता के अनुसार यदि कोई ज्योतिषी बता सके तो आप के पूर्वजन्मों की और इस जन्म में घटने किया उसमें भी वह कृपा देख रहा है तो उसे दुःख कहाँ से होगा। दूसरा परिवर्तन यह होता है कि उसकी प्रवृत्ति बदलती है जिससे उसके नवीन कर्म वाली सभी घटनाओं को बता सकता है। भृगुजी समर्थ थे, उन्होंने जो लिखा बदल जाते हैं। हम कई बार देखते हैं कि सत्संग मिलने पर कुछ लोगों की वैसा हो जाता है। परन्तु उस संहिता में कई साधन भी लिखे हुए हैं। उन साधनों प्रवृत्ति एकदम बदल जाती है। इसलिये समझना चाहिए कि प्रारब्ध भाग की को करने से जीवन में बदलाव भी हो सकता है। किसी की मृत्यु का समय अपेक्षा जीवन में पुरुषार्थ भाग बिलकुल अलग है। इसलिये मानव जीवन में निश्चित है पर कोई विशेष प्रयोग करने से मृत्यु टल भी जाती है। पुरुषार्थ का अवसर नहीं है यह एक गलत सोच है। एक बात समझनी चाहिए कि ज्योतिषशास्त्र जब भी कुछ कहेगा **** प्रारब्ध को लेकर कहेगा। किसी घटना के साथ सुख-दुःख का सम्बन्ध है उसे जिज्ञासा :- एक सत्संगी व्यक्ति के पुत्र की दुर्घटना हो गई। उसका लेकर कथन करेगा। आपका शरीर पुण्य और पाप कर्मों से मिलकर आरम्भ डॉक्टर से इलाज हुआ और बहुत से धार्मिक अनुष्ठान भी कराए गए। परन्तु हुआ है। उनका फल जो सुख और दुःख है वह आपको किसी घटना के उसे बचाया नहीं जा सका। प्रश्न है कि ऐसा उसके साथ ही क्यों हुआ? निमित्त से भोगना पड़ेगा। यह प्रारब्ध कर्मों का फल है। परन्तु आपके अन्दर जो इच्छा उत्पन्न होती है उसमें केवल प्रारब्ध कर्मों का ही नहीं अपितु पूर्व के समाधान :- महाभारत के युद्ध में जिन पाण्डवों के रक्षक स्वयं भगवान् थे उनका पुत्र अभिमन्यु छोटी अवस्था में मारा गया। क्या भगवान् सभी कर्मों का सम्बन्ध रहता है। सभी कर्मों के संस्कार मन में रहते हैं। उनमें नहीं जानते थे कि अर्जुन दूर चला जाएगा तो यह घटना घट जाएगी? क्या शुभ संस्कार भी हैं और अशुभ भी। शुभ संस्कारों को जगाना, उन्हें बलिष्ठ करना यह हमारा पुरुषार्थ है। भगवान् उसे बचा नहीं सकते थे? जीवों के संस्कार हम नहीं जान सकते। जीव तो अल्पज्ञ है, वह नहीं जानता कि मरने के बाद पुत्र अच्छी जगह गया या बुरी, पुरुषार्थ का सम्बन्ध ही अलग है। पुरुषार्थ का सम्बन्ध घटनाओं से न होकर सुख में गया या दुःख में, वह तो बस अपने दुःख से अभिभूत हो जाता है। संस्कार-परिवर्तन से है। इसीलिये हमारे यहाँ गर्भाधान से ही संस्कारों की जो व्यवस्था है, वह बालक के शुभ संस्कारों को बलवान् करने के लिये ही है। द्रौपदी के पाँचों पुत्र एक रात में मार दिए गये। बड़ी दुःख की घटना लगती है।

बालक की प्रकृति कोमल होती है। वहाँ अच्छे संस्कारों का वातावरण मिलने पर जब हम अन्वेषण करते हैं कि वे पुत्र कहाँ से आए थे और कहाँ गए तो

पर वे शीघ्र जग जाते हैं। इसी प्रकार सत्संग का महत्त्व भी संस्कार-परिवर्तन के कुछ और ही मालूम पड़ता है।

लिये ही है। प्रारब्ध में परिवर्तन नहीं होता परन्तु संस्कार बदल जाएँ तो आगे जब विश्वामित्र ने हरिश्चन्द्र से सब कुछ दान में ले लिया तो उन्हें राज्य से बाहर जाने को कह दिया। जब हरिश्चन्द्र काशी जाने के लिये निकले आपकी प्रवृत्ति में परिवर्तन हो जाएगा। संस्कार-परिवर्तन से जीवन में दो परिवर्तन होते हैं। पहला- एक ऐसी तो प्रजा ने घेर लिया। लोग रोने लगे तो राजा थोड़ा रुक गए। विश्वामित्र ने उन्हें डण्डा मारा कि निकलते क्यों नहीं? ऊपर से कुछ देवता देख रहे थे, उन्हें

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ प्रारब्ध, पुण्य-पाप, संस्कार

बड़ा खराब लगा। उनमें से पाँच देवताओं ने ऊँची आवाज में बोला, "आप माता-पिता, पुत्र आदि की याद नहीं रहेगी। जो याद नहीं रहेगा उसी के विषय ऋषि होकर इतना अत्याचार करते हो!"ऋषि ने उन्हें श्राप दे दिया कि तुम में कितना बड़ा चक्र तुम्हारे मन में घूमता है। मनुष्य योनि में चले जाओ। अब उन्होंने बड़ी प्रार्थना की कि हमें संसार में मत यह भी सचाई है कि सब कुछ तुम्हारे मन का नहीं हो सकता। तुम भी फँसाईये, विवाह से पहले ही हम वहाँ से आ जाएँ ऐसी कृपा कीजिए। अपने बालक की सब बातें नहीं मान सकते। वह साँप को पकड़ना चाहे तो विश्वामित्र को दया आई और उन्होंने कहा "ऐसा ही होगा।" वे ही देवता पकड़ने दोगे? बालक अज्ञानी है और तुम उसके हितैषी हो इसलिये उसकी द्रौपदी के पुत्र बने थे और ऋषि के वरदान से ही छोटी अवस्था में उनकी मृत्यु सब बातें नहीं मानते। इसी प्रकार परमेश्वर तुम्हारी सब बातें नहीं मान सकता हुई। क्योंकि तुम अज्ञानी हो और वह तुम्हारा हितैषी है। सब बातें कैसे मानेगा? यह सोचो कि अभिमन्यु का विवाह हो गया था तो उन पुत्रों का विवाह पुत्र का हित हुआ या अहित, वह दुःख में गया या आनन्द में, तुम नहीं जानते। क्यों नहीं हुआ। उन्होंने स्वयं विवाह से पूर्व संसार छोड़ने का वरदान माँगा केवल अपने मोह के कारण दुःखी हो रहे हो। था, उसी का पालन हुआ। स्थूल दृष्टि से देखें तो यह बड़ी दुर्घटना दिखाई दे **** रही है परन्तु उन्होंने तो स्वयं वह दुर्घटना माँगी थी। उनका तो उससे कल्याण जिज्ञासा :- श्रुति कहती है- शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः। ही हुआ। (श्वेताश्वतर उप .- २.५) तुम सब अमृत के पुत्र हो, नाशवान् नहीं हो। यह अल्पज्ञ जीव नहीं जानता कि कौन किस सम्बन्ध से आया है, कब परन्तु कर्मकाण्ड के समय पण्डित लोग कहलवाते हैं - पापोऽहं पापकर्माऽहं तक रहेगा, किस निमित्त से चला जाएगा, यह तो केवल मोह करता है। न कोई पापात्मा पापसम्भवः। क्या ऐसा कहना ठीक है? किसी का पुत्र होता है न पत्नी, सब ऋणानुबन्ध है। उसी के अनुसार कोई समाधान :- यह जीव अमृत का पुत्र है, अमृतस्वरूप है, पर अपने जीव हमारे साथ कुछ काल रहता है और फिर अपने निमित्त से दुःखी करके को पाप का कर्ता मान रहा है तो क्या किया जाए? अब जो तुम्हारी स्थिति है चला जाता है। तुम व्यर्थ रोते हो कि हमारा सम्बन्धी चला गया। बड़े-बड़े उसको भगवान् के सामने सचाई से स्वीकार करो, झूठ बोलने से तुम्हारा काम सिद्ध-महात्मा हुए हैं पर किसी ने आज तक पूरे गाँव को आशीर्वाद नहीं दिया नहीं चलेगा। जब तुम अपने आप को पुण्य कर्मों के कर्ता मानते हो तो पाप कि तुम्हारे यहाँ कोई दुर्घटना नहीं होगी, कोई मरेगा नहीं। ऋणानुबन्ध के योग होने पर उसके कर्ता भी तुम्हीं बनोगे। इसलिये अपने दोष को सचाई से से सम्बन्धी बनते हैं और चले भी जाते हैं। स्वीकार करो। भागवत में प्रसंग आता है कि राजा चित्रकेतु के छोटे से पुत्र की मृत्यु तुम सारा व्यवहार अपने को शरीर मानकर कर रहे हो अथवा होने पर नारदजी ने आकर उसकी जीवात्मा को बुलाया और कहा- तुम शरीर अमृतपुत्र मानकर? जब शरीर को मैं मानते हो तो उससे होने वाले पापों का में आकर अपने माता-पिता को सुखी करो। तब उस जीवात्मा ने कहा, "मेरे कर्ता तुमको ही माना जाएगा। अपने हृदय पर हाथ रखकर देखो कि क्या तुमने तो हजारों जन्म हुए हैं, किस जन्म के माता-पिता के विषय में आप कह रहे हैं। जीवन में कभी झूठ नहीं बोला, कभी हिंसा नहीं की, किसी को दुःख नहीं मेरे माता-पिता कौन हैं मुझे याद भी नहीं।" इसी प्रकार तुम्हें भी इस जन्म के दिया, माता-पिता की अवज्ञा नहीं की, शास्त्र का विरोध नहीं किया? जब तुम

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ सब प्रकार के पाप कर ही रहे हो तो यदि पण्डित कहता है "पापोऽहं ..... " बोलो, तो कुछ गलत तो नहीं कहता। सत्य को स्वीकार करो। हाँ! यह अलग तीर्थ-महिमा बात है कि यह श्लोक व्यावहारिक है, पारमार्थिक नहीं। पारमार्थिक तो वह श्रुति है जो हमें अमृतपुत्र कहती है। परन्तु स्वयं को भी इसका अनुभव होना चाहिए, तभी पापों से सम्बन्ध का अभाव होगा। **** जिज्ञासा :- नर्मदाष्टक में कहा है -

जिज्ञासा :- दूसरों को कष्ट देना इसे हिंसा कहा गया है। यदि किसी के त्वदम्बुलीनदीनमीनदिव्यसम्प्रदायकम् (२) धार्मिक अनुष्ठान करने से किसी अन्य को कष्ट पहुँचे तो क्या उस धार्मिक "तुम्हारे जल में रहने वाली मछलियाँ आदि दीन, हीन जीव भी दिव्य गति को

अनुष्ठानकर्ता को हिंसा का फल मिलेगा? प्राप्त होते हैं।" नर्मदा के आश्रय में रहने मात्र से ही दिव्य गति प्राप्त होती है समाधान :- यह बात सत्य है कि दूसरों को कष्ट देना हिंसा है। ऐसा या उसके लिये कुछ अतिरिक्त करना पड़ता है?

कहा भी गया है- समाधान :- जहर खाने के उपरान्त मरने के लिये कुछ अतिरिक्त श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः। उपाय करने की आवश्यकता है क्या? अरे! सृष्टि के आदि में परमात्मा ने परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।। जिस वस्तु के अन्दर जो गुण रख दिया वह गुण वहाँ रहकर अपना काम करता (समयोचित पद्यमालिका-६५) है। चाहे उसके सम्पर्क में कोई जान कर आए या अनजाने में। जैसे अग्नि का करोड़ों ग्रन्थों के कथनों को मात्र आधे श्लोक में कह दिया कि दूसरों काम है उसके सम्पर्क में आने वाले को जलाना और जहर का काम है मारना। का उपकार करना पुण्य है और उनको पीड़ा देना पाप है। यहाँ पर एक बात उसी प्रकार नर्मदा में एक ताकत है कि वह उसके आश्रय में आने वाले को ध्यान में रखने की है कि कोई व्यक्ति धार्मिक कार्य करता है और किसी दुष्ट दिव्य गति प्रदान करती है।

प्रकृतिवाले व्यक्ति को उससे कष्ट होता है तो यहाँ हिंसा का प्रसंग नहीं है। उसे उसने बड़ी कठिन तपस्या करके भगवान् शिव को प्रसन्न किया तथा कष्ट अपने स्वभाव से हो रहा है न कि उस धार्मिक अनुष्ठान से। इसलिए ऐसे बहुत से वरदान प्राप्त किये। उनमें से एक यह भी है कि हमारे जल के अन्दर व्यक्तियों को प्रसन्न रखने के लिए अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। जैसे कोई भी जीव प्राण त्यागे उसकी दुर्गति न हो, वह ऊपर के ही लोकों में जाए। आपके जप करने से किसी नास्तिक को कष्ट हो तो क्या आप जप करना छोड़ अब उसमें रहने वाले जो जीव हैं उनका आश्रय तो नर्मदा को छोड़ कर दूसरा देंगे! ऐसा ही धार्मिक अनुष्ठान के विषय में भी करना चाहिए। कोई है ही नहीं। इसलिये नर्मदा उनका कल्याण करती ही है। पर मनुष्य के

**** लिये एक विशेषता है कि वह यदि नर्मदा की महिमा स्वीकार करेगा तभी कल्याण करेगी, मछली मारने वाले तो दिन भर उसी में रहते हैं फिर भी उनका कल्याण नहीं होता। जैसे किसी-किसी व्यक्ति में सामर्थ्य होती है कि वह जहर को पचा लेता है, उसका प्रभाव उस पर नहीं पड़ता। वैसे ही जो नर्मदा की

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ तीर्थ-महिमा महिमा को स्वीकार न करने वाले मनुष्य हैं, उन पर उसकी कृपा का प्रभाव केन्द्रित हो गई है, परन्तु हमने तो अनुभव किया कि गंगा की शक्ति अपनी नहीं दिखाई देता। जगह यथावत् है। हम उसके किनारे घूमे तो गंगा ने समर्थ माता के समान हमें सम्भाला। लोग कहते हैं कि गंगा में बहुत प्रदूषण है पर हम तो गंगाजल ही जिज्ञासा :- लोक में 'गंगा और नर्मदा' इन दो नदियों को ही इतना पीते थे और हमें कोई समस्या नहीं हुई। आज भी गंगाजल की सामर्थ्य बहुत श्रेष्ठ क्यों माना जाता है? विलक्षण है। समाधान :- इन सब विषयों में शास्त्र ही प्रमाण है। जो हम अपनी **** बुद्धि से नहीं जान सकते उसे शास्त्र बताता है - अज्ञातज्ञापकं शास्त्रम्। जिज्ञासा :- काशी को महाश्मशान क्यों कहा जाता है? हम अपनी बुद्धि से इनकी महिमा नहीं समझ सकते हैं, परन्तु शास्त्र समाधान :- एक बार किसी ने यही सवाल करपात्रीजी महाराज से जो बताता है उसे जब मान लेते हैं तो कुछ काल बाद बुद्धि से भी समझ जाते किया, उस समय मैं भी वहाँ उपस्थित था। उन्होंने जवाब दिया कि जहाँ केवल हैं। हम तो नर्मदा के किनारे भी घूमे और गंगा-किनारे भी। उस समय यह स्थूल शरीर जले उसका नाम श्मशान है और जहाँ इसके साथ-साथ सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर भी जल जाए उसका नाम महाश्मशान है। काशी तो ठीक समझ में आ जाता है कि शास्त्र इनकी इतनी महिमा क्यों कहता है। आज नर्मदाजी की परिक्रमा करने वालों की संख्या हर वर्ष बढ़ती जा रही है। ज्ञान की नगरी है। यहाँ मरने वाले जीव को भगवान् शिव ज्ञान का उपदेश करते हैं जिससे उसका अज्ञान नष्ट हो जाता है, अर्थात् कारण शरीर(अज्ञान) जल अन्य किसी नदी की परिक्रमा होती हो ऐसा तो नहीं सुना। हमने अनुसन्धान करके देखा, गृहस्थ लोग मनौती लेते हैं कि हमारा अमुक काम हो जाये तो जाता है। सूक्ष्म शरीर अज्ञान का ही कार्य है। उसके नाश होने पर यह भी नष्ट हो

परिक्रमा करेंगे। इतने गृहस्थ परिक्रमा कर रहे हैं इसका अर्थ यही है कि उनका जाता है। स्थूल शरीर तो चिता पर जल ही जाता है। इस प्रकार तीनों शरीर नष्ट

काम नर्मदा ने किया है। हमारे पास ऐसे सैकड़ों लोगों के उदाहरण हैं जिनके होने पर जीव मुक्त हो जाता है। उसे पुनः कभी श्मशान में नहीं आना पड़ता। इसीलिये काशी को महाश्मशान कहा जाता है। बड़े-बड़े काम नर्मदा ने पूरे किये हैं। इसलिये नर्मदा की महिमा शास्त्र भी एक दृष्टि से देखें तो यह शरीर भी महाश्मशान ही है। इसके अन्दर रोज बताता है और यह प्रत्यक्ष भी है। इसी प्रकार गंगा के विषय में हमारा अनुभव है। पहले तो गाँव की अनगिनत छोटे-छोटे जीव उत्पन्न होते हैं और इसी में दफनाए जाते हैं। श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः(शिवमहिम्नः- २४) इसमें पंचायत ही क्या कोर्ट में भी कोई व्यक्ति गंगाजल उठाकर कुछ बोलता था तो चैतन्य परमात्मा इन्द्रियों और मन के साथ क्रीड़ा कर रहा है। उसे प्रमाण माना जाता था। यदि उसने झूठ बोला हो तो उसका अनिष्ट हो **** जाता था। ऐसी घटनाएँ हमनें अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देखी हैं। शास्त्रों में तो सभी नदियों की अपेक्षा गंगा की महिमा अधिक कही गई है। कुछ सन्त कहते जिज्ञासा :- उत्तमा सहजावस्था मध्यमा ध्यानधारणा।

हैं कि कलियुग के पाँच हजार वर्ष बीत जाने पर गंगा की शक्ति नर्मदा में अधमा शास्त्रचिन्ता च तीर्थभ्रान्त्यधमाऽधमा। यहाँ पर तीर्थयात्रा को अधम से भी अधम साधन बताया है, ऐसा क्यों?

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३

समाधान :- तीर्थयात्रा अधम साधन नहीं है, पर हमेशा प्रकरण को देखना चाहिए। यहाँ ज्ञान का प्रकरण है। सहजावस्था का मतलब स्वरूप में स्थित हो जाना। इसलिये सहजावस्था साध्य है और अन्य जो अवस्थाएं व्रत एवं पर्व बताई गई हैं वे साधन हैं। साधन से साध्य उत्तम होता ही है। इसलिये सहजावस्था को उत्तम कह दिया। सहजावस्था प्राप्त नहीं है तो आपको ध्यान- धारणा करने पड़ेंगे। यह सहजावस्था के अन्तरंग साधन हैं। इसलिये इनको जिज्ञासा :- प्रदोष व्रत कभी द्वादशी को पड़ता है तो कभी त्रयोदशी

द्वितीय स्थान पर रखा है। कोई ध्यान भी नहीं कर सकता तो कहा शास्त्रचिन्तन को। इसका निर्णय किस प्रकार किया जाता है?

करो। ध्यान के लिये मन स्थिर नहीं रहता तो उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र, उनका भाष्य, समाधान :- इसका निर्णय धर्मशास्त्र में किया गया है। धर्मशास्त्र के

या अन्य आत्मसम्बन्धी ग्रन्थों का अध्ययन करो। इसको तृतीय श्रेणी में रखा द्वारा वह निर्णय करके पंचाग में दिया जाता है। इसलिये पंचाग में जिस दिन हो

है। उसी दिन मान लेना चाहिए। अब द्वादशी और त्रयोदशी में से किस दिन हो

अब कोई कहे अध्ययन भी नहीं कर सकते तो कहा तीर्थयात्रा करो। इसके लिये यह निर्णय किया है कि सूर्यास्त से लेकर आकाश में नक्षत्र दिखाई

इसलिये तीर्थयात्रा को चतुर्थ श्रेणी में रखा है। यहाँ अधमाधम कहने का देने लगें तब तक का समय प्रदोष काल कहलाता है। उस काल में त्रयोदशी

तात्पर्य श्रेठता के तारतम्य में लेना चाहिए। तीर्थयात्रा अच्छा साधन है। जिस दिन पड़े उसी दिन प्रदोषव्रत मानना चाहिए। इसलिये वह कभी द्वादशी

तीर्थयात्रा से आसक्ति कम होती है, तपस्या भी हो जाती है। सुविधा- को तो कभी त्रयोदशी को पड़ता है।

असुविधा के समय परमात्मा की स्मृति होती है। चलते रहते हैं तो राग-द्वेष से ****

भी बच जाते हैं। इसलिये तीर्थयात्रा को किसी प्रकार से कम नहीं मानना जिज्ञासा :- संक्रान्ति, पूर्णिमा, अमावस्या आदि पर्वों पर क्या

चाहिए। सावधानी रखनी चाहिए ? समाधान :- पर्व के दिन अपने इष्टदेव का विशेष पूजन करें। जैसे **** विद्यातीर्थे जगति विबुधा: साधवः सत्यतीर्थे महादेव का रुद्राष्टाध्यायी, शतरुद्रीय अथवा अन्य विशिष्ट वैदिक मन्त्रों या

गङ्गातीर्थे मलिनमनसो योगिनो ध्यानतीर्थे। पौराणिक मन्त्रों से अभिषेक करें। जो प्रतिदिन नहीं कर पाते वे ऐसा विशेष धरातीर्थे धरणिपतयो दानतीर्थे धनाढ्या पूजन करें। प्रायः लोग ऐसे पर्वों पर अधिक जप-ध्यान करते हैं। पर्वकाल में लज्जातीर्थे कुलयुवतयः पातकं क्षालयन्ते॥ इन सब से विशेष लाभ प्राप्त होता है, यह काल का माहात्म्य है। पूर्णिमा के इस संसार में विद्वान् लोग विद्यारूपी तीर्थ में, साधुजन सत्यरूपी तीर्थ दिन सत्यनारायण की कथा सुनने की भी परम्परा है। में, अशुद्धचित्त वाले लोग गङ्गादि तीर्थों में, योगीजन ध्यानतीर्थ में, राजा लोग पृथ्वीरूपी तीर्थ में, धनवान् लोग दानरूपी तीर्थ में और यदि व्यक्ति विशेष कुछ न कर सके तो ४ घण्टा, ६ घण्टा, ८ घण्टा या

कुलीन स्त्रियाँ लज्जारूपी तीर्थ में अपने-अपने पापों का मार्जन करते हैं। जितना अधिक हो सके मौन रहकर गुरुमन्त्र का जप करे। पर्वों पर विशेष सावधानी यही है कि उस दिन हम व्यर्थ की बातें न करें, झूठ न बोलें, किसी

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ व्रत एवं पर्व के प्रति ईर्ष्या न करें। हम किसी के दुःख का निमित्त न बन जाएँ, हमसे किसी समाधान :- शंका तो अच्छी है। रविवार के दिन आँवला खाना और प्रकार का प्रतिग्रह न हो जाए अर्थात् किसी प्रकार का प्रमाद उस दिन न करें। आँ, ले के पेड़ के नीचे से निकलना भी शास्त्र में निषिद्ध है। दूसरी ओर अक्षय यथाशक्ति उपवास करें और भगवान् का ध्यान करें। यही बातें महत्वपूर्ण हैं। नवमी को आँवले के वृक्ष के नीचे भोजन करने का और आँवला खाने का **** विशेष महत्त्व शास्त्र में कहा गया है। रविवार को अक्षय नवमी पड़े तो क्या जिज्ञासा :- संक्रान्ति के दिन पर्वकाल का निर्णय कैसे किया जाए? किया जाए? यहाँ शास्त्र का एक नियम समझना चाहिए कि विशिष्ट विधि से समाधान :- सामान्यतः सभी संक्रान्तियों में संक्रमण काल से २० सामान्य विधि बाधित हो जाती है। जैसे किसी की हिंसा न करना यह सामान्य घड़ी पूर्व और २० घड़ी पश्चात् पर्वकाल माना जाता है। परन्तु मकर संक्रान्ति विधि है और यज्ञ में पशुबलि विशिष्ट विधि है। इसलिये यज्ञ में दी गई पशुबलि के लिये शास्त्र की व्यवस्था थोड़ी अलग है। मकरे विशति पराः मकर में में दोष नहीं माना जाता। संक्रमण काल के २० घड़ी बाद वाला जो समय है वह मुख्य पर्वकाल माना इसी प्रकार रविवार को आँवला-वृक्ष के नीचे न जाना यह सामान्य जाता है क्योंकि पूर्व वाली २० घड़ी दक्षिणायन में चली जाती है। विधि है और अक्षय नवमी को उसके नीचे भोजन करना यह विशिष्ट विधि है। एक बात ध्यान देने की है कि संक्रमणकाल यदि दिन में आए तो उसी इसलिये रविवार की अक्षय नवमी को आँवला-वृक्ष के नीचे भोजन करने से दिन पर्वकाल होगा। यदि संक्रमणकाल रात्रि में आ जाए तो पर्वकाल दूसरे कोई दोष नहीं लगेगा। दिन प्रातः काल से अर्थात् तीन बजे से माना जाएगा। **** जिज्ञासा :- क्या नक्तभोजन को उपवास माना जाएगा? जिज्ञासा :- हमने सुना है एकादशी तिथि को आँवले का सेवन नहीं समाधान :- हाँ! माना जाता है। आप दिनभर कुछ न खाएँ और रात्रि करना चाहिए। क्यों? में एक बार हविष्यान्न का भोजन करें तो शास्त्र दृष्टि से उसे उपवास ही माना समाधान :- हमें तो शास्त्रों में एकादशी के दिन आँवले के सेवन का जायेगा। निषेध कहीं मिला नहीं, अपितु आमलकी एकादशी के दिन आँवला खाने का विशेष महत्त्व शास्त्रों में बताया गया है। इससे यही प्रतीत होता है कि एकादशी जिज्ञासा :- शास्त्र में स्त्रियों के लिये व्रत-उपवास इत्यादि करने का के दिन आँवला खाने में कोई दोष नहीं है। कहीं-कहीं निषेध मिलता है- नास्ति कश्चित् स्त्रिया यज्ञो न श्राद्धं **** नाप्युपोषणम्। (महाभारत विराटपर्व-१६.४२) परन्तु आजकल स्त्रियाँ ही जिज्ञासा :- रविवार के दिन आँवले के पेड़ के नीचे जाने के लिए अधिक व्रत-उपवास करती हुई देखी जाती हैं। क्या यह उचित है? निषेध किया है। दूसरी ओर अक्षय नवमी के दिन आँवले के नीचे बैठकर समाधान :- शास्त्र को ठीक से समझें तो बात साफ हो जाती है। जब भोजन करने का विधान किया है। यदि उस दिन रविवार पड़े तो क्या करना कन्या घर पर रहती है तब माता-पिता की आज्ञा से वह कोई भी व्रत-उपवास चाहिए? कर सकती है, जप-तप कर सकती है। इसका कहीं निषेध नहीं है। पार्वती ने भी

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ माता-पिता की आज्ञा से शिव-प्राप्ति के लिये तपस्या की थी। कात्यायनी व्रत का विधान कन्याओं के लिये ही है। ब्रज की कुंआरी गोपिकाओं ने भी कात्यायनी व्रत किया था। गुरुकुल में जाने का अधिकार इसलिये नहीं था क्योंकि उसका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं होता। परन्तु जब उसका विवाह होता शास्त्र-समीक्षा

है तो पति द्वारा किए गए वेदाध्ययन, गुरुसेवा आदि में वह स्वतः भागीदार बन जाती है। जिज्ञासा :- पुराणों में कहा गया है कि अमुक तीर्थ में स्नान करने से

वह गुरुकुल जाकर वेद नहीं पढ़ती परन्तु विवाह-संस्कार होते ही यज्ञ अथवा निवास करने से, अमुक वस्तु का दान करने से मुक्ति प्राप्त होती है।

में बैठने का वैदिक अधिकार उसे प्राप्त हो जाता है। उसके बिना पुरुष यज्ञ कर दूसरी ओर उपनिषद् का वाक्य है - ज्ञानादेव तु कैवल्यम्, मुक्ति केवल ज्ञान

ही नहीं सकता। पुरुष जितना भी धर्मानुष्ठान, तपस्या आदि करता है उसका से ही होती है। इस विरोधाभास का समाधान कैसे हो?

आधा भाग धर्मपत्नी को मिल जाता है तो स्त्री का अपमान कहाँ हुआ? आज समाधान :- पुराणों में यदि ऐसा कहा है तो इसका उपनिषद् वाक्यों

सहशिक्षा का समाज में प्रभाव सब देख रहे हैं। पैसा कमाने में भले ही इसका से कोई विरोध नहीं है। मुक्ति तो ज्ञान से ही होती है परन्तु तीर्थ-स्नान, तीर्थ-

लाभ हो पर जीवन की उन्नति में क्या लाभ हो रहा है। विवाह के बाद भी स्त्री निवास, दान इत्यादि हृदय को पवित्र करने के साधन हैं यदि ये निष्काम भाव

पति की सहमति से व्रत कर सकती है। माताएँ अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के से किये गये हों तो। यदि कोई तीर्थ-निवास करेगा तो उसके नियम का पालन

लिये तमाम व्रत करती हैं। पति के, परिवार के कल्याण के लिये व्रत करती हैं। करना ही पड़ेगा। वह प्रातः उठकर स्नान, जप, देवदर्शन करेगा, ऐसे में शम-

उनका कहाँ निषेध है? दम-तितिक्षा इत्यादि उसके जीवन में स्वतः ही उत्पन्न हो जाएँगे जो ज्ञान

पति से विरोध करके व्रत करने का निषेध है क्योंकि विवाह होने के उत्पन्न करने में सहायक हैं। तीर्थ में निवास करने के लिये सावधानी की बहुत बाद उसके लिये पतिसेवा मुख्य है। उसका सीधा सम्बन्ध स्त्री के कल्याण से आवश्यकता है। अन्य जगह पर किया गया अपराध तीर्थ में आने से नष्ट हो

है। उसको स्वतन्त्र रूप से यज्ञ का अधिकार नहीं है परन्तु पति के साथ यज्ञ, जाता है पर तीर्थ में किया गया अपराध नष्ट नहीं होता। जो साधक है वह इस

श्राद्ध आदि तो वह करती ही है। स्त्रियाँ आज भी जो कुछ व्रत, पूजन आदि बात को जानता है इसीलिये वह प्रयत्न करके अपराधों से बचेगा। ऐसे में

करती हैं वे सब प्रायः पति के हित के लिये ही करती हैं। उसका पतिसेवा से उससे तपस्या स्वतः ही हो जाएगी।

कहाँ विरोध है? शास्त्र में ऐसे बहुत से व्रत कहे गए हैं जो स्त्रियों के लिये ही अब यदि कोई तीर्थ में रहकर ज्ञान का अन्य साधन कर रहा है जैसे

हैं। इस श्लोक का तात्पर्य इतना ही है कि स्त्री का मुख्य कर्तव्य पति को प्रसन्न शास्त्र-चिन्तन, प्राणायाम आदि तो भी कोई विरोध नहीं है बल्कि उस तीर्थ के

रखना है, उससे विरोध करके या छुपाकर कोई कार्य न करे। देवता उसे ज्ञान में सहायता करते हैं। इसलिये यह निश्चित समझ लेना चाहिए

**** कि पुराणों में कहीं कोई बात वेदविरुद्ध लग रही हो तो उसका अर्थ है हम उसे समझ नहीं पा रहे हैं। ****

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ शास्त्र-समीक्षा

जिज्ञासा :- भगवान् भाष्यकार ने ब्रह्मसूत्र के देवताधिकरण में छोड़ दिया। आज भी बहुत लोग इस भ्रम को नहीं निकाल पा रहे हैं।

स्फोटवाद का खण्डन किया है। उसी प्रसंग में सिद्धान्त दिया है-वर्णा एव तु ****

शब्दः। वर्ण को नित्य कहा। इस विरोधाभास का क्या समाधान है? जिज्ञासा :- भाष्यकार भगवान् ने अपने भाष्य में प्रमाण के रूप में

समाधान :- स्फोटवाद वेदान्त के कुछ हद तक नजदीक है। अन्य पुराणों के श्लोक उद्धृत किये पर श्रीमद्भागवत पुराण के श्लोकों को

भाष्यकार भगवान् ने स्फोटवाद का जो खण्डन किया है वह ध्वनि को दृष्टि में कहीं भी प्रमाण के रूप में नहीं कहा। इसका क्या कारण है?

रखकर किया है। भाष्यकार भगवान् की दृष्टि बड़ी सूक्ष्म है। जैसे उन्होंने समाधान :- भाष्यकार भगवान् ने अपने भाष्य में श्रीमद्भागवत पुराण

सांख्य दर्शन का खण्डन करने के लिये बहुत जोर लगाया हालाँकि सांख्य के श्लोकों को कहीं भी प्रमाण के रूप में क्यों नहीं दिया इसका उत्तर तो

सिद्धान्त वेदान्त के बहुत नजदीक है। इसलिये खण्डन किस प्रसंग में किया भगवान् भाष्यकार ही ठीक-ठीक से दे सकते हैं। हमें तो ऐसा लगता है कि

गया है उसे जाने बिना हम उसे विरोधाभास नहीं कह सकते। श्रीमद्भागवत में जिस पाञ्चरात्र (चतुर्व्यूह) सिद्धान्त का प्रतिपादन है, भाष्यकार

**** भगवान् ने ब्रह्मसूत्र भाष्य में उसका खण्डन किया है। जिस ग्रन्थ में प्रतिपादित

जिज्ञासा :- भगवान् भाष्यकार ने अपने भाष्य में प्रमाण के रूप में किसी एक सिद्धान्त का खण्डन जिस व्यक्ति के द्वारा किया गया हो वह उस

महाभारत के श्लोकों को बहुत स्थानों पर दिया है। इससे महाभारत की श्रेष्ठता ग्रन्थ को प्रमाण के रूप में कहीं उद्धृत नहीं कर सकता। शायद इसी दृष्टि से

सिद्ध होती है। परन्तु आजकल महाभारत को पढ़ने और पढ़ाने की परम्परा भाष्यकार भगवान् ने श्रीमद्भागवत के श्लोकों को प्रमाणरूप से कहीं नहीं

नहीं रही। इसमें क्या कारण हो सकता है? कहा।

समाधान :- महाभारत श्रेष्ठ ग्रन्थ है इसमें किसी प्रकार का विवाद नहीं ****

है। भगवान् भाष्यकार महाभारत के श्लोकों को केवल प्रमाण के रूप में ही जिज्ञासा :- कुछ लोग देवीभागवत को उपपुराण मानते हैं। क्या यह

नहीं देते बल्कि ब्रह्मसूत्र के भाष्य में तो उन्होंने यहाँ तक कहा है कि मान्यता ठीक है?

ज्ञानाकांक्षी सभी वर्ण के लोगों को महाभारत का अध्ययन करना चाहिए। समाधान :- किसी के कहने से कोई निर्णय नहीं होता। इसके लिये

महाभारत में चतुर्विध पुरुषार्थ का अद्भुत वर्णन किया गया है। उसमें धर्म, शास्त्र ही प्रमाण है। इस बात में बहुत बड़ा विवाद है कि अठ्ठारह पुराणों के

राजनीति, कूटनीति सबका ज्ञान भरा है। अन्तर्गत देवीभागवत को लिया जाये या श्रीमद्भागवत को। सत्रह पुराणों में तो

जब अंग्रेज भारत में आये तो उन्होंने विचार किया कि यदि भारतीय कोई विवाद नहीं है। विवाद इन्ही दोनों में है कि अठ्ठारहवाँ किसको माना

लोगों को इस ज्ञान से वंचित रखना है तो महाभारत पढ़ने की परम्परा समाप्त जाये। शाक्त लोग देवीभागवत को मानते हैं तो वैष्णव लोग श्रीमद्भागवत को।

करनी होगी। उन्होंने उस समय तीन करोड़ की धनराशि खर्च करके यह प्रचार विचार किया जाये तो भागवत शब्द दोनों में है, श्लोक संख्या भी दोनों में

करवाया कि जिसके घर में महाभारत का अध्ययन, अध्यापन होगा उस घर में अठ्ठारह-अठ्ठारह हजार है। भगवत्तत्त्व का दोनों में ही विशद् रूप से वर्णन 'महाभारत' मच जाएगा। यह सुनकर लोगों ने महाभारत को घरों में रखना ही किया है। ऐसे में निर्णय करना कठिन है। फिर भी बहुत से विद्वान् लोग

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग- ३ शास्त्र-समीक्षा

देवीभागवत की प्राचीनता पर बल देते हैं। की प्रधानता बताई है वहाँ उनका तात्पर्य है कि तुम आलसी मत बनो, पुरुषार्थ अनेक ग्रन्थों में बहुत जगहों पर देवीभागवत के श्लोकों का उद्धरण करो क्योंकि जैसा बीज बोओगे वैसी ही फसल काटोगे। इसलिये तुम अच्छे मिलता है। जैसे सांख्यतत्त्वकौमुदी में वाचस्पति मिश्र ने देवीभागवत के कर्म करो। जहाँ उन्होंने कहा है कि वही होगा जो रामजी चाहेंगे, वहाँ उनका श्लोकों का उद्धरण दिया है। यह बात नवीं शताब्दी की है। इसके बहुत काल तात्पर्य है कि अपना कर्तव्य कर देने के बाद तुम माथापच्ची मत करो। जो बाद तक भी किसी वैष्णव आचार्य ने श्रीमद्भागवत के श्लोकों को उद्धृत नहीं रामजी को करना होगा वही करेंगे। मृत्यु आनी होगी तो आएगी और बचाना किया। यहाँ तक की ग्यारहवीं शताब्दी में विद्यमान् रामानुजाचार्य तक भी होगा तो बचा लेंगे। अनावश्यक चिंता करने से कुछ नहीं होने वाला है। तुम किसी ने श्रीमद्भागवत की चर्चा नहीं की। यह सब कुछ होने पर भी जहाँ अपना पुरुषार्थ मत छोड़ो। दूसरी बात, जहाँ पर अपने को समझ नहीं आये भागवत शब्द आया है वहाँ इन दोनों को ग्रहण करने में कोई आपत्ति नहीं होनी वहाँ पर भी भगवान् पर छोड़ देना चाहिए? इसलिये ऐसा नहीं समझना चाहिए चाहिए। कौन प्राचीन है और कौन अर्वाचीन इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए। कि इस चौपाई में कर्म की उपेक्षा की जा रही है। आजकल श्रीमद्भागवत पर बहुत कथाएं होती है। लोगों की बहुत श्रद्धा है ****

जिससे उनका कल्याण हो रहा है। अतः किसी की श्रद्धा को ठेस नहीं पहुँचाना जिज्ञासा :- शास्त्र कहता है- द्वितीयाद् वै भयं भवति।(बृह.उप .- चाहिए। १.४.२) दूसरे से ही भय को प्राप्त होता है। पर देखा जाता है कि भय प्राप्त होने पर व्यक्ति दूसरे को ही पुकारता है। इस विरोधाभास का क्या समाधान जिज्ञासा :- कहते हैं, पुराणों कि रचना द्वापर में हुई है। ऐसे में है? सत्ययुग और त्रेतायुग में क्या पुराणों की कथा नहीं होती थी? समाधान :- भय प्राप्त होने पर दूसरे को पुकारता है यह बाद की बात समाधान :- सत्ययुग और त्रेतायुग में भी पुराणों की कथा होती थी। है पर शास्त्र के साथ-साथ अपने अनुभव को भी देखना चाहिए कि यदि क्योंकि इससे पहले भी द्वापर कई बार आया था। यहाँ पर कौनसी घटना किस आपके मन में कोई दूसरा न हो तो भय लग सकता है? जब अपने को शरीर कल्प की है इसमें कोई तात्पर्य नहीं है। मान लिया तो दूसरा अपने से बाहर लगता है चाहे वह भूत-प्रेत हो या अन्य **** कोई प्राणी। इसलिये भय देनेवाला द्वितीय उसको पहले दिखेगा तभी वह जिज्ञासा :- रामचरितमानस में लिखा है - होईहि सोइ जो राम रचि किसी को सहायता के लिये पुकारेगा। राखा।(बाल .- ५ १.४) दूसरे स्थान पर लिखा है-करम प्रधान बिस्व करि ****

राखा।(अयोध्या .- १२६.१) इन दोनों बातों में परस्पर विरोधाभास लगता जिज्ञासा :- श्रुतियों में जो आख्यायिकाएं कही हैं उनमें याज्ञवल्क्य, है। कृपया स्पष्ट कीजिए? गार्गी, मैत्रेयी, नचिकेता, सत्यकाम आदि पात्रों का वर्णन आया है। क्या वे समाधान :- कोई दो बातें अलग-अलग प्रसंगों में कही गई हों तो काल्पनिक हैं? यदि उन्हें काल्पनिक नहीं मान्नें और आख्यायिकाओं की उनमें विरोधाभास दिखने पर भी विरोधाभास नहीं समझना चाहिए। जहाँ कर्म घटनाओं को सत्य मानें तो वेद के अनादित्व का खण्डन होता है। इसका क्या

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ शास्त्र-समीक्षा समाधान है? समाधान :- कल्पित तो सारा संसार है। उसमें यदि कोई पात्र कल्पित आगम के अनुसार भी इस दशा में शक्ति का शिव से कोई भेद न होने के कारण हो तो क्या आश्चर्य है! वस्तुतः वेद में जो आख्यायिकाएं हैं उनकी घटनायें तत्त्व एक ही रहता है। घटी अथवा नहीं घटी, श्रुति का इसमें कोई तात्पर्य नहीं है। तात्पर्य तो विषय ****

को स्पष्ट करने में है। अब कोई शंका करे कि मात्र विषय ही समझा देते जिज्ञासा :- श्रुति किसे कहते हैं? श्रुति और उपनिषद् में क्या अन्तर

आख्यायिका कहने की क्या आवश्यकता थी? पर यह शंका ठीक नहीं है। है?

कुछ बातें ऐसी होती हैं जो कथानक के माध्यम से व्यक्ति के अन्दर झट से समाधान :- श्रुतिर्वेदः। वेद का ही नाम श्रुति है। उसे श्रुति इसलिये प्रवेश कर जाती हैं और उसके बिना नीरस मालूम पड़ती हैं। यदि उन घटनाओं कहा जाता है कि वह परम्परा से सुना ही जाता है उसका नया निर्माण नहीं होता को काल्पनिक न मानकर सत्य मानें तो भी वेद के अनादित्व का खण्डन नहीं - श्रूयते एव न क्रियते इति श्रुतिः। श्रुति व्यापक है, उसमें ब्राह्मण भाग भी होता। वेद सर्वज्ञ है। वह भूत, भविष्य तथा वर्तमान सबको जानता है। वह आता है, मन्त्र भाग भी आता है, आरण्यक तथा उपनिषद् भी आता है। भविष्य में होने वाली घटना को भी कह सकता है। इसलिये उपनिषदों में जो उपनिषद् श्रुति का शिरोभाग है। श्रुति के दो विषय हैं - धर्म और ब्रह्म। आख्यायिकाएं सुनने को मिलती हैं वे वेद ने पहले से ही कह दी हैं तो कोई उपनिषद् का विषय है जीव तथा ब्रह्म की एकता को समझाना। आश्चर्य नहीं होना चाहिए। योगवासिष्ठ में वसिष्ठजी रामजी को बताते हैं कि ****

द्वापर में श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश इस प्रकार करेंगे। इसी प्रकार जिज्ञासा :- आप कहते हैं शास्त्र के अनुसार चलना चाहिए। शास्त्र वाल्मीकिजी ने रामायण पहले ही लिख दिया और रामजी ने चरित बाद में किसे मानें ?

किया। समाधान :- ऐसा केवल मैं ही नहीं कहता हूँ महापुरुष भी कहते आये

**** हैं-तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।(गीता-१६.२४) जिज्ञासा :- आगमशास्त्र में प्रतिपादित सामरस्य मुक्ति और वेदान्त- किस कर्म को करें, किसको न करें इसमें प्रमाण शास्त्र ही है। शास्त्र किसे प्रतिपादित मुक्ति में क्या अन्तर है? कहते हैं? शासनात् शास्त्रम्- जो आदेश दे उसका नाम शास्त्र है। समाधान :- वस्तुतः तो कोई अन्तर नहीं है, पर सिद्धान्त-प्रतिपादन वस्तुप्रतिपादन करने वाले को भी शास्त्र कहते हैं। जो वस्तु के स्वरूप का की प्रक्रिया में कुछ अन्तर लगता है। आगमशास्त्र के अनुसार मुक्ति दशा में कथन करे उसे भी शास्त्र कहते हैं। विधिनिषेधात्मक कथन करने वाले को भी शिव के साथ शक्ति का सामरस्य रहता है। यहाँ पर न शिव का अभाव होता है शास्त्र कहते हैं। जो आत्मस्वरूप का वर्णन करे उसे भी शास्त्र कहते हैं। इस न शक्ति का, पर शक्ति को शिव से अलग करके नहीं देख सकते। शिव और प्रकार शास्त्र शब्द का प्रयोग व्यापक रूप में किया जाता है। जैसे श्रुति, स्मृति, शक्ति अभेद रूप में रहते हैं। जबकि वेदान्त के अनुसार मुक्ति दशा में एक पुराण, श्रौतसूत्र (कल्पसूत्र, धर्मसूत्र और गृह्यसूत्र) इत्यादि बहुत से शास्त्र हैं। निर्विशेष ब्रह्म ही रहता है। यहाँ पर इस प्रकार से शक्ति की कोई चर्चा नहीं है। पर सब शास्त्र सब के लिये नहीं होते। ****

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ शास्त्र-समीक्षा जिज्ञासा :- ऋत और सत्य में क्या अन्तर है? समाधान :- ये दोनों वस्तुतः सत्य के ही वाचक हैं परन्तु परम्परा से ज्ञानात्मक होता है। मैंगो वाले और आम वाले दोनों के अन्दर ज्ञानात्मक रूप

इनमें थोड़ा अन्तर मानते हैं। भाष्यकार भगवान् ने कहा है- ऋतं यथाशास्त्रं एक ही है। आम के विषय में ज्ञानात्मक वृत्ति दोनों में समान है और वही नाम

यथाकर्तव्यं बुद्धौ सुपरिनिश्चितमर्थम्। (तैत्ति.उप.भाष्य-१.१) जैसे का वास्तविक स्वरूप है। सृष्टिकर्ता हिरण्यगर्भ के पास जो शब्द है वह

शास्त्र ने निर्णय करके आदेश दिया- सत्यं वद, इसका नाम ऋत है और इस ज्ञानात्मक है। उस ज्ञान को लेकर जब वह भू: इस शब्द का उच्चारण करता है तो भूलोक उत्पन्न हो जाता है। अतः नाम पूर्व में है और अर्थ बाद में आता है, आदेश को आपने जीवन में धारण किया तो उसका नाम सत्य है। पर समष्टि में दोनों एक ही हैं। जब सीमित अहंता में, व्यष्टि भाव में आते हैं तो **** नाम से अर्थ भिन्न मालूम पड़ता है। जिज्ञासा :- शास्त्र कहता है कि सृष्टि नामरूपात्मक है। यहाँ नाम का व्यक्ति या वस्तु के नाश से रूप का नाश होता है, नाम का नहीं। मान स्वरूप क्या है? क्या नाम का नाश नहीं होता? क्या सारी सृष्टि नाम के लीजिए कोई व्यक्ति मर गया, अब जो उसका रूप(शरीर) दिखाई दे रहा था अन्तर्गत है? वह नष्ट हो गया परन्तु नाम तो रहता है। इसीलिये बृहदारण्यक उपनिषद् में समाधान :- बिना नाम के कोई रूप देखा है आपने? नाम माने जहाँ कलाओं की चर्चा आई तो पन्द्रह कलाओं को नाशवान बताया और नाम वाक्(शब्द) और रूप माने अर्थ। चक्षु का विषय तो रूप है ही, उससे भिन्न को नित्य कहा, पुरुष के मरने के बाद भी नाम शेष रहता है। इसका मतलब इन्द्रियों के जो विषय हैं वे भी रूप के अन्तर्गत आते हैं। व्यवहार में हम हुआ कि नाम में ही रूप कल्पित था। वह नाम भी वर्णात्मक नहीं बल्कि समझते हैं कि वस्तु (अर्थ) पहले बनती है बाद में उसका नाम रखा जाता है। ज्ञानात्मक है। ज्ञान से अतिरिक्त न नाम है न रूप। जैसे पहले बालक पैदा होगा और फिर उसका नाम रखा जाएगा यह 'यज्ञदत्त' कोई कुम्हार घड़ा बना रहा है। उसके अन्दर घड़े का ज्ञान न हो तो है। परन्तु सृष्टि के मूल में ऐसा नहीं है। वहाँ तो नाम पहले है और उससे अर्थ घड़ा नहीं बना पाएगा। घड़े का जैसा ज्ञानात्मक स्वरूप उसके अन्दर है वैसा की उत्पत्ति होती है। जब हम कोई शब्द सुनते हैं तो उसकी लिपि ध्यान में ही घड़ा बनेगा। ज्ञान का शब्द से नित्य सम्बन्ध है और यह ज्ञान ही नाम का आती है। पर वह आकृति नाम(शब्द) का स्वरूप नहीं है क्योंकि आकृति नेत्र मुख्य स्वरूप है। सारी सृष्टि नाम के अन्तर्गत है यह बात सही है क्योंकि का विषय है और नाम केवल श्रोत्र से ग्राह्य है। इसलिये जो हम कान से सुनते नामपूर्वक ही सभी अर्थों की उत्पत्ति होती है। हैं वही नाम का स्वरूप है। इसमें और भी सूक्ष्म विचार है। जिस शब्द को हम नाम समझ रहे हैं जिज्ञासा :- वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस के पात्रों के वह भी वास्तविक नाम नहीं है, केवल संकेत मात्र है। जैसे हमने आम शब्द चरित्रों में भेद क्यों दिखाई देता है? का सम्बन्ध एक फल विशेष के साथ समझ रखा है। अंग्रेजों ने मैंगो शब्द का समाधान :- यह सृष्टि अनादि है। अनादिकाल से आज तक कितने सम्बन्ध उसी फल से बना रखा है। अब उस फल का वास्तविक वाचक आम है या मैंगो, यह एक विचारणीय बात है। इसलिये वस्तुतः शब्द का स्वरूप त्रेतायुग हुए, रामजी और सीताजी के कितने अवतार हुए कौन गिन सकता है। कल्पभेद से चरित्रों में भी कुछ भेद हो जाता है। आप वाल्मीकि रामायण पढ़ेंगे

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ शास्त्र-समीक्षा

तो वहाँ एक प्रकार की लीला दिखाई देगी, अध्यात्म रामायण पढ़ेंगे तो अन्य करूँगा। अकेला युवक १४,००० राक्षसों को समाप्त कर देता है। कैसी प्रकार की, मानस पढ़ेंगे तो कुछ अन्य प्रकार की लीला दिखाई देगी। इन ईश्वरता है! मानस में मानव स्वभाव का इतना वर्णन न हो कर राम-सीता के लीलाओं में समानता भी है और विषमता भी। इसका एक कारण तो कल्पभेद आदर्श जीवन तथा उनकी भगवत्ता का वर्णन विशेषरूप से है क्योंकि इसमें से होने वाला लीलाभेद है। दूसरी बात यह है कि ग्रन्थकार के दृष्टिकोण से भी भक्ति की प्रधानता है। इसीलिये दोनों ग्रन्थों के चरित्रों में कुछ अन्तर दिखता कुछ अन्तर आ जाता है। किसी में एक भाव की प्रधानता होती है तो किसी में है। यह अन्तर किसी प्रकार के दोष को नहीं दर्शाता। किसी दूसरे भाव की। रामचरितमानस भक्तिप्रधान ग्रन्थ है और वाल्मीकि **** रामायण इतिहास है। रामजी ने मानवरूप में अवतार लिया था, इसलिये जिज्ञासा :- शास्त्रों में कहा गया है कि स्वर्ण में कलि का निवास है। वाल्मीकि रामायण में मानव स्वभाव का कहीं उल्लंघन नहीं है। इसकी विशेषता दूसरी ओर स्वर्ण को शुद्ध मानकर उसकी पवित्री बनाई जाती है, अंगूठी आदि यह है कि इसमें मानव स्वभाव का प्राकट्य है और साथ ही ईश्वरता का पहनी जाती है और उसके दान को श्रेष्ठ माना जाता है। इस विरोधाभास का अपलाप भी नहीं है। समाधान क्या है? रामायण में वर्णित सीता कभी राम पर नाराज भी हो जाती है। ऐसी- समाधान :- स्वर्ण में कलि का निवास इसलिए बताया है कि यह ऐसी बातें कह देती है जो कि मानस में वर्णित सीता कभी बोल ही नहीं जिसके पास होता है उस व्यक्ति में अभिमान उत्पन्न कर देता है, ऐश्वर्यमय सकती। जब राम ने वन में साथ ले जाने से मना कर दिया तो सीता बहुत व्यक्ति मदमस्त हो जाता है, धर्म की भी उपेक्षा कर देता है। आपके पास सब नाराज हो गई। यहाँ तक कह दिया कि हमारे पिताजी अगर यह जानते कि आप सुख-सुविधा हो जाए, बैंक-बैलेंस हो जाए, बड़े-बड़े लोग सम्मान करने हमारी रक्षा नहीं कर सकते तो आपके साथ हमारा विवाह नहीं करते। यहाँ यही लगें तो आप जल्दी किसी सामान्य व्यक्ति से बात करना भी नहीं चाहेंगे। यही दर्शाया कि मानव क्रोध में कुछ भी बोल सकता है। इसका मतलब यह नहीं स्वर्ण की महिमा है। अधिक स्वर्ण पास में होने से व्यक्ति में बहुत-से दुर्गुण कि उनका भाव रामजी के प्रति बिगड़ गया। दशरथ के अन्तिम समय में आ सकते हैं, इसलिए इसमें कलि का निवास बताया गया है। कौशल्या ने उनको बड़े कटु वचन सुना दिये। कैकेयी ने जो बर्ताव किया जब स्वर्ण का सम्बन्ध भोग से हो जाता है तो उसमें कलि आ जाता उससे कौशल्या का चित्त बहुत व्यथित था। अधिक दुःख में व्यक्ति कुछ भी है। परीक्षित ने स्वर्ण-मुकुट पहना तो कलि उसपर चढ़ बैठा। वह मुकुट बोल देता है, पर दशरथ के लिये उसके भाव में कोई गड़बड़ी नहीं थी। जरासन्ध का था, उसे छिपाकर रखा गया था जिससे कोई उपयोग में न ले। मानव स्वभाव का इस ग्रन्थ में बहुत स्पष्ट चित्रण किया गया है और परीक्षित का उस मुकुट पर अधिकार नहीं था, परन्तु उसने उसे उपयोग में ले साथ में भाव की भी विलक्षण ढ़ंग से रक्षा की गई है। चाहे वह राम का भाव हो लिया तो कलि को मौका मिल गया और उसने उसकी बुद्धि को खराब कर या सीता का, चाहे भरत का। साथ में ही ईश्वरता देखो, जब १४,००० राक्षस दिया। हमला करते हैं तब लक्ष्मण कहते हैं कि मैं आपको अकेला नहीं छोड़ सकता। परन्तु यदि कोई महिमाशाली और उत्कृष्ट वस्तु परमेश्वर या धर्म से पर राम कहते हैं कि तुम सीता को लेकर गुफा में जाओ, मैं अकेला ही युद्ध सम्बन्धित हो जाए तो उसका बड़ा महत्व हो जाता है। जैसे कोई राजा या

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ प्रधानमन्त्री भक्त हो जाए तो लोग आश्चर्य में पड़ जाते हैं, उसका बड़ा महत्व शास्त्र-समीक्षा

हो जाता है। स्वर्ण का सम्बन्ध भी धर्म या ईश्वर से होने पर उसका महत्व एक लक्ष्य को लेकर है।

बहुत हो जाता है क्योंकि वह स्वर्ण स्वभावतः शुद्ध है। इसलिए पवित्री, ****

यज्ञपात्र, भगवान् के आभूषण, मूर्तियाँ आदि स्वर्ण की बनाई जाती हैं। शुद्ध जिज्ञासा :- शास्त्र कहता है कि जीव का मुख्य लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना और महत्वपूर्ण होने के कारण ही स्वर्ण के दान की इतनी महिमा कही गयी है। ही है, इसके लिए ब्रह्मचर्य व्रत को भी आवश्यक बताया है। यदि ऐसा है तो यही समझना चाहिए कि कोई उत्कृष्ट वस्तु अधर्म से सम्बन्धित हो तो बहुत शास्त्र विवाह करके गृहस्थाश्रम में जाने की आज्ञा ही क्यों देता है? बड़ा दोष हो जाता है और वही यदि धर्म से सम्बन्धित हो जाए तो उसका बड़ा समाधान :- पहले तो यह समझना चाहिए कि शास्त्र विवाह करके महत्व हो जाता है। गृहस्थ में रहने की आज्ञा किसको देता है? सभी लोग तो मोक्ष की इच्छा रखते नहीं। यदि कोई इच्छा रखे भी तो जीवनपर्यन्त ब्रह्मचर्य-पालन सभी के **** जिज्ञासा :- गीता में कहा है - व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह लिए सहज नहीं है। इसलिए शास्त्र ऐसे लोगों को आज्ञा देता है कि तुम विवाह कुरुनन्दन ... (२.४१) कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक होती है। यहाँ करके धार्मिक जीवन निर्वाह करते हुए परमार्थ मार्ग में आगे बढ़ो। पर जिनमें पर शंका है कि भिन्न-भिन्न लोगों की बुद्धियों का एक निश्चय कैसे हो सकता तीव्र वैराग्य है उन्हें गृहस्थाश्रम में जाने की आवश्यकता नहीं है। शास्त्र यह भी है? कहता है -

समाधान :- बुद्धि में जब तक एक निश्चय नहीं होता कि हमारा लक्ष्य यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्। क्या है, तब तक कुछ भी निश्चय हो सकता है। जैसे गणित के किसी एक ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद्वनाद् वा।। सवाल का सही हल एक ही होता है चाहे वह कितने ही लोगों द्वारा हल किया (जाबालोपनिषद्-४) हो, पर गलत हल के विषय में यह नहीं कह सकते कि सभी का एक ही होगा। जिस समय व्यक्ति में तीव्र वैराग्य प्रकट हो जाए, उसी समय सब ऐसे ही चाहे वह कर्मयोगी हो या ज्ञानयोगी अथवा भक्तियोगी, उन सभी का त्यागकर घर से चल देना चाहिए। वह ब्रह्मचर्याश्रम से भी संन्यास ले यह निश्चय है कि हमको परमात्म-प्राप्ति ही करनी है, तो उन सभी का एक ही सकता है अथवा गृहस्थाश्रम या वानप्रस्थ से भी। निश्चय है क्योंकि लक्ष्य एक है। पर जगत्-विषयक लक्ष्य सभी का एक नहीं हो सकता क्योंकि कोई पुत्र चाहता है तो कोई धन, कोई शत्रु को मारना जिज्ञासा :- शास्त्रों में देवताओं के विषय में कहा है - अजरा, निर्जरा, चाहता है और कोई श्रेष्ठ लोक प्राप्त करना चाहता है। जगत् तो समान कभी अमरा। परन्तु पुराणों में आता है कि देवासुर-संग्राम में देवता मारे गए। इस हो नहीं सकता। इसलिए सकाम मनुष्यों के लिए कहा है - बहुशाखा विरोधाभास का परिहार कैसे होगा? ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् (२.४१)। समाधान :- देवताओं को अमर कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि उनकी इसलिए भिन्न-भिन्न लोगों की बुद्धियों को एक कहने का तात्पर्य उनके मृत्यु नहीं होती, अपितु इसका आशय इतना ही है कि उनकी आयु मनुष्य की तुलना में बहुत ज्यादा होती है। पुण्य क्षीण होने पर उनको भी स्वर्ग से लौटना

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ शास्त्र-समीक्षा

पड़ता है, उनका शरीर उसी क्षण गल जाता है - क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं याज्ञवल्क्य को नमस्कार किया और अव्यक्त के भी आधार को पूछा। तब विशन्ति ... (गीता- ६.२१)। मृत्यु की जहाँ बात आती है तो ब्रह्मा, विष्णु याज्ञवल्क्य ने बड़े सुलझे हुए ढंग से उत्तर दिया - आदि की भी आयु निर्धारित है, फिर देवताओं की क्या बात करें! एतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्ति अस्थूलमनणु ... **** (बृह. उप .- ३.८.८) जिज्ञासा :- जनक की सभा में जब गार्गी ने याज्ञवल्क्य से प्रश्न पूछे तो तत्त्व को निषेधमुख से बताया ताकि शब्दविषयता का दोष न आए। उन्होंने उसे डाँटकर चुप क्यों करा दिया? वह तो कार्य-कारणभाव को लेकर इसलिए ऐसा नहीं कह सकते कि याज्ञवल्क्य ने स्त्री होने के कारण गार्गी को ही प्रश्न कर रही थी जो कि एक शास्त्रीय पद्धति है, फिर उसे मना क्यों किया? डाँटकर चुप कराया था।

समाधान :- याज्ञवल्क्यजी का अभिप्राय था कि परमात्मा के विषय में वहाँ पर गार्गी ने पहली बार जिस प्रकार से पूछा था, वह ढंग ठीक नहीं किसी को जिज्ञासा करनी हो तो उसका एक शास्त्रीय विधान है। बड़ों को था, बड़ों का अपमान था। आज भी शास्त्रार्थ में मर्यादा होती है, अपना प्रणिपात आदि करके उनकी आज्ञा से प्रश्न करना चाहिए। प्रश्न करने में सिद्धान्त पहले बताना पड़ता है, प्रारम्भ में ही उसके विरुद्ध तुम नहीं बोल समझने की दृष्टि होनी चाहिए। उन्होंने गार्गी से कहा, "तूने पूछा कि इन्द्रलोक सकते। शास्त्रार्थ की मर्यादा का उल्लंघन करने के कारण ही याज्ञवल्क्य ने किसमें ओतप्रोत है, तो हमने प्रजापतिलोक में बता दिया। फिर तूने गार्गी को चुप कराया था।

प्रजापतिलोक का आश्रय पूछा तो हमने ब्रह्मलोक बता दिया। अब तू फिर पूछती है कि ब्रह्मलोक किसमें ओतप्रोत है? इस प्रकार से तो इसका कोई जिज्ञासा :- रजोगुण से तो यज्ञ आदि शुभकर्म भी होते हैं। फिर गीता अन्त नहीं आएगा। केवल अनुमान से इस प्रकार आत्मतत्त्व के बारे में नहीं में रजसस्तु फलं दुःखं।(१४.१६) ऐसा क्यों कहा गया? पूछा जाता। यह अतिप्रश्न है। विद्वानों की सभा में परमात्मा के विषय में ऐसा समाधान :- जब आपकी मनःस्थिति सात्त्विक रहेगी उस समय आप अतिप्रश्न करेगी तो तेरा सिर फट सकता है क्योंकि ऐसे प्रश्नों से विद्वानों का ज्ञान, विज्ञान, ध्यान आदि में लगेंगे तो उससे पुण्य-निष्पत्ति ही होगी। राजसी अपमान होता है।" मनःस्थिति में दो विभाग होते हैं एक सत्त्वपरक और दूसरा तमःपरक। जब एक स्त्री को डाँटकर उसकी जिज्ञासा को समाप्त करने की दृष्टि सत्त्वपरक स्थिति होगी तब यज्ञ, दान आदि शुभ कर्म करेंगे जिससे स्वर्गादि याज्ञवल्क्य की नहीं थी क्योंकि जब उसने फिर से दो प्रश्न पूछने के लिए सभी फल प्राप्त होंगे। तमःपरक स्थिति में अशुभ कर्म होगा जिसका फल स्पष्टरूप ब्राह्मणों से आदरपूर्वक अनुमति ली और याज्ञवल्क्य से भी अनुमति ले ली से नरकादि दुःख की प्राप्ति कहा है। परन्तु जो शुभ कर्म रजोगुण से होंगे उनमें तब उन्होंने उसके प्रश्नों का समुचित उत्तर भी दिया। गार्गी ने याज्ञवल्क्य को भी कामना रहने से अन्त में दुःख की ही प्राप्ति होगी। कर्म का फल अनित्य आदर देते हुए यह भी कहा कि यदि इन दो प्रश्नों का उत्तर इन्होंने दे दिया तो होने से हमेशा दुःख रूप ही है। इसी दृष्टि से गीता में यह बात कही गई है। समझना कि इन्हें कोई नहीं जीत सकता। उसने याज्ञवल्क्य से फिर ब्रह्मलोक के आधार को पूछा तो याज्ञवल्क्य ने अव्यक्तात्मा को बताया। तब उसने

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संन्यास को संन्यास के लक्ष्य की ओर ले जा सकता है। ****

संन्यास जिज्ञासा :- 'जीवनमुक्तिविवेक' नामक ग्रन्थ में विद्यारण्य मुनि ने लिखा है - "आजकल के साधक किसी उपास्य देवता को प्रसन्न किये

जिज्ञासा :- आजकल संन्यासी के लिये सम्पूर्ण रूप से संन्यास- बिना वेदान्त में प्रवेश करते हैं इसलिये वे ईश्वर-अनुग्रह को प्राप्त नहीं कर

धर्म का पालन करना लगभग असम्भव सा लगता है। ऐसे में उसे क्या करना पाते।" ऐसे में किसी ने बिना कोई उपासना किये संन्यास धारण कर लिया

चाहिए? तो उसे क्या करना चाहिए?

समाधान :- यह बात केवल संन्यासी के लिये ही नहीं है अपितु समाधान :- व्यक्ति ने संन्यास धारण किया है तो उसका कोई लक्ष्य

सभी के लिये है। गृहस्थ भी शास्त्रीय-धर्म का पालन कहाँ कर पा रहा है। होगा ही। वह अपने चित्त की वृत्ति को लक्ष्य से न हटने दे। उसके लिये यही

गुरुकुल तो रहा नहीं। इसलिये ब्रह्मचारी को तो पता ही नहीं है कि उसका उपासना है। शास्त्र में बताया है -

धर्म क्या है, तब वह अपने धर्म का पालन कैसे करेगा। जब ब्रह्मचारी और दद्यान्नावसरं किञ्चित् कामादीनां मनागपि।

गृहस्थ ही धर्म का पालन नहीं कर पाते तो संन्यासी पूर्णरूप से कैसे कर आसुप्तेरामृतेः कालं नयेद् वेदान्तचिन्तया।।

पाएगा क्योंकि वह भी तो उसी समाज से आया है, उसकी नींव ही कमजोर (योगवासिष्ठ)

है। आकाश में महल बनाने में तो समस्या होती ही है। तच्चिन्तनं तत्कथनमन्योन्यं तत्प्रबोधनम्।

यह सब कुछ होते हुए भी कोई अपने को संन्यासी मानता है तो उसे एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यासं विदुर्बुधाः॥

प्रयास करके भी संन्यास-धर्म का पालन जहाँ तक हो सके करना चाहिए। (पञ्चदशी- ७.१०६)

भले ही गृहस्थ कहे कि आजकल झूठ बोले बिना काम नहीं चलता पर यही संन्यासी के लिये सबसे अच्छी उपासना है। यदि कोई इसमें संन्यासी के लिये तो झूठ बोलना कोई अनिवार्य नहीं है। इसलिये संन्यासी समर्थ नहीं है तो उसे कोई अन्य उपाय करना पड़ेगा, जिससे सामर्थ्य प्राप्त

को सर्वप्रथम मिथ्याभाषण का त्याग तो करना ही पड़ेगा। यदि वह निन्दा- हो सके।

स्तुति, व्यर्थ बात-चीत, अनावश्यक हँसी-मजाक इत्यादि को नहीं छोड़ जैसे किसी को डॉक्टर बनना हो तो उसे हाईस्कूल आदि की पढ़ाई सकता तो फिर काल पर दोषारोपण करने की आवश्यकता नहीं है। वह से गुजरना पड़ेगा। वैसे ही किसी संन्यासी ने पहले उपासना नहीं की है तो प्रणव का जप तो कर ही सकता है। यदि यह भी न कर सके तो किसी उसे अधिक से अधिक प्रणव का जप करना चाहिए। उसके पास तो बहुत आश्रम में रहकर सेवा करे। भोजन तो आश्रम में बनता ही है, पाँच-सात घर बड़ी ताकत है। कोई साधक प्रणवमन्त्र को अपने जीवन में छः महीने भी

भिक्षा करने की भी आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार धीरे-धीरे अपने जीवन व्याप्त करता है तो उसके जीवन में उपासना का फल उदय हो जाता है। पर

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ संन्यास मन्त्र सचाई से धारण होना चाहिए। तो ५ दिन का पयोव्रत कर सकता है। ५ दिन तक दूध और गोमूत्र छोड़कर **** जिज्ञासा :- संन्यासी के लिये स्त्री की मूर्ति देखना भी वर्जित किया अन्य कुछ ग्रहण नहीं करना चाहिए और गायत्री मन्त्र का २४,००० जप करे। परम्परा के अनुसार यही प्रायश्चित्त है। कोई-कोई महात्मा तो ऐसी है। समाज में रहते हैं तो मूर्ति क्या प्रत्यक्ष स्त्री का दर्शन भी हो जाता है। ऐसे परिस्थिति में संन्यास से पहले चान्द्रायण-व्रत करते हैं, पर इस काल में वह में क्या प्रायश्चित्त करना चाहिए? सब करने की जरूरत नहीं है। जो हमने बताया है उतना करने से प्रायश्चित्त समाधान :- बात विचार करने की है। संन्यासी के लिये जहाँ भिक्षा हो जाएगा, फिर संन्यास ले सकते हैं। का विधान किया है वहाँ ऐसा तो नहीं कहा कि स्त्री वाले घर में नहीं जाना। **** जब वह भिक्षा माँगता है तो कहता है - "भवती भिक्षां देहि"। यहाँ पर जिज्ञासा :- मैं एक संन्यासी हूँ इसलिये मेरे शिखा-सूत्र भी नहीं हैं। स्त्री से भिक्षा माँगना सिद्ध होता है। ऐसे में आप उसे स्त्री क्यों समझते हैं। मैं शिवजी का अभिषेक रुद्राष्टाध्यायी के पाँचवे अध्याय से करता हूँ। शास्त्र उसमें मातृभाव रखिए। अपनी दृष्टि को पवित्र रखेंगे तो प्रायश्चित्त की में कर्म-काण्ड के लिये शिखा-सूत्र की अनिवार्यता बताई है। इससे मुझे आवश्यकता नहीं पड़ेगी। शास्त्रों में जहाँ स्त्री की मूर्ति देखना वर्जित किया भय लगता है कि कहीं मैं दोष का भागी तो नहीं हूँ? है वहाँ शास्त्र का तात्पर्य उसका संग करना, अनावश्यक देखने की चेष्टा समाधान :- आप जो अभिषेक करते हैं वह यदि नित्यकर्म के रूप करना इत्यादि के वर्जन से है। में है, किसी कामना या संकल्प से नहीं करते तो आपको कोई दोष नहीं **** लगेगा क्योंकि आपका किसी कर्म-काण्ड से सम्बन्ध नहीं है। आप तो जिज्ञासा :- कोई साधक घर से निकल कर संन्यास की इच्छा से शिवजी की आराधना कर रहे हैं। शास्त्र में संन्यासी के लिये रुद्राष्टाध्यायी किसी मठ में गया। वहाँ उसकी चोटी काट दी, जनेऊ निकाल दिया और के मन्त्रों से अभिषेक के लिये विधान किया है। इसलिये आप अपनी निष्ठा कुछ सामान्य संस्कार कर दिया। उसको वर्तमान स्थिति से सन्तोष नहीं है, को पक्की रखिए। आपको कोई दोष नहीं लगेगा। अतः वह विधिवत् संन्यास लेना चाहता है। जो हो गया उसका प्रायश्चित्त **** क्या है ? जिज्ञासा :- संन्यासी लोग गेरूआ वस्त्र ही क्यों पहनते हैं? समाधान :- यह एक जटिल स्थिति है, पर इसका उपाय है। अब समाधान :- संन्यासी किसी भी रंग का वस्त्र पहने तब भी आप वह जहाँ से विधिवत् संन्यास लेगा वहाँ उसे पहले यज्ञोपवीत संस्कार प्रश्न कर सकते हैं, लाल ही क्यों, काला ही क्यों? इसलिये मैं प्रायः कहता कराना पड़ेगा। शिखा-सूत्र के साथ कुछ दिन नैष्ठिक ब्रह्मचारी के रूप में हूँ -तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।(गीता- १६.२४) रहना होगा। कम से कम प्रायश्चित्त है कि उसे गायत्री मन्त्र का २४,००० क्या करना, क्या नहीं करना इसमें शास्त्र ही प्रमाण है, आपका मन नहीं। जप अनिवार्य रूप से करना होगा। यदि विशेष प्रायश्चित्त करना चाहता है शास्त्र कहता है संन्यासी गैरिक वस्त्र धारण करे, अतः उसे मानना चाहिए।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ संन्यास

इसमें कारण यह भी है कि गृहस्थ का व्यवहार पञ्चरंगी होता है और साधु पहले परम्परा यह थी कि माता-पिता की आज्ञा लेकर ही संन्यास का एकरंगी। इसी के प्रतीक रूप में संन्यासी एक रंग का वस्त्र धारण करता लिया जाता था। हमने भी माता-पिता की आज्ञा से ही संन्यास लिया था। है। वह गैरिक ही क्यों? यह अग्नि का रंग है। अग्नि का स्वभाव ऐसा है कि हमारी माता ने किसी से कहा था, "मैं माता हूँ इसलिये पुत्र के जाने से उसमें अच्छा-बुरा कुछ भी छोड़ो सबको आत्मसात् कर लेता है। इसी दुःखी हूँ, परन्तु वह साधु बना है इसलिये सुखी भी हूँ।" किसी के अन्दर प्रकार जगत् का अच्छा-बुरा कोई भी व्यवहार संन्यासी को प्रभावित नहीं यदि सच्चा वैराग्य आ गया तो शास्त्र कहता है कि उसका कोई सांसारिक कर सकता। इसलिये जिसके मन ने जगत् को छोड़ दिया है उसी को यह कर्तव्य शेष नहीं रहा, वह उसी क्षण संन्यास ले सकता है- वस्त्र धारण करने का अधिकार है। यह वस्त्र ब्रह्मजिज्ञासा के लिये मिला है। यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्। (जाबालोपनिषद्-४) अतः यह विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षा का प्रतीक है। यही इसकी संन्यासी यदि अपनी निष्ठा में ठीक से रहे तो उसके माता-पिता की महिमा है। वस्तुतः तो शास्त्र कहता है इसीलिये संन्यासी गैरिक वस्त्र धारण सेवा का ध्यान परमात्मा रखेगा, उसकी जिम्मेदारी को परमात्मा सम्भाल करता है। लेगा। अपने अनन्य भक्तों का योगक्षेम वहन करना तो भगवान् की प्रतिज्ञा है। कई गृहस्थ भक्तों के जीवन में आता है कि वे जब भजन में तल्लीन हो जिज्ञासा :- माता-पिता की सेवा से बढ़कर कोई कर्तव्य नहीं है। गये तो उनके कर्तव्य को स्वयं भगवान् ने आकर पूरा किया। संन्यासी यदि पुत्र कभी भी उनके ऋण से मुक्त नहीं हो सकता। फिर संन्यास ग्रहण करना सब ओर से मन हटाकर भगवद्भक्ति में लग गया है तो उसके कर्तव्य को क्या उचित है? भगवान् क्यों नहीं सम्भालेगा। समाधान :- व्यक्ति को कोई बहुत बड़ा काम करना हो तो उसे **** वर्तमान स्थिति का मोह छोड़ना ही पड़ता है। विद्यार्थी को पढ़ना हो तो घर जिज्ञासा :- वानप्रस्थ-आश्रम का विधान शास्त्र में किस दृष्टि से तथा माता-पिता को छोड़कर दूर जाना पड़ता है, उनका मोह छोड़ना पड़ता किया है? इसका क्या महत्त्व है? व्यक्ति को वानप्रस्थ से संन्यास में कब है। इसी प्रकार मानव जीवन का चरम लक्ष्य परमात्मदर्शन किसी को प्राप्त प्रवेश करना चाहिए? करना हो तो माता-पिता का मोह छोड़ना ही पड़ेगा। बिना छोड़े इतना बड़ा समाधान :- गृहस्थ व्यक्ति के ऊपर कुछ जिम्मेदारियाँ रहती हैं। काम कैसे करेगा। यदि सचाई से घर छोड़कर उस काम में लग जाता है तो जब तक माता-पिता जीवित हैं तब तक उनके प्रति जिम्मेदारी है। इसके माता-पिता की उसमें प्रसन्नता ही होगी क्योंकि उसमें उनका भी कल्याण अलावा पत्नी और बच्चों के प्रति जिम्मेदारी रहती है। पुत्रों को योग्य निहित है। शास्त्र कहता है संन्यासी यदि निष्ठापूर्वक अपने धर्म में रहता है तो बनाकर काम में लगा दो और कन्याओं का विवाह कर दो तो तुम्हारी माता-पिता को ही नहीं बल्कि अपनी कई पीढ़ियों को तार देता है। यह तो व्यावहारिक जिम्मेदारी समाप्त हो गई। पत्नी चाहे तो पुत्रों के साथ रहे या माता-पिता की बहुत बड़ी सेवा है। हाँ! यदि संन्यासी अपने धर्म को तुम्हारे साथ। अब तुम्हारा एक ही काम रह गया है - भगवत्प्राप्ति। छोड़ता है तो उससे माता-पिता की न सेवा होगी और न उनकी प्रसन्नता।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ इसके लिये पहले वानप्रस्थ-आश्रम में जाना पड़ता है। इसका कारण यह है कि गृहस्थ में जो प्रमाद हुआ है, शरीर में मोटापा आ गया है उसे तपरूपी अग्नि से हटाना पड़ेगा। गृहस्थ में बहुत से पाप हो जाते हैं अतः सुख-दुःख तप से अपने को शुद्ध करना पड़ेगा। इसलिये वानप्रस्थ-आश्रम तपस्या- प्रधान है। बार-बार स्नान करो, चान्द्रायण या अन्य व्रत करो, धूप-ठण्ड सहन करो। इस अभ्यास से शरीर की खोट निकल जाएगी और वह शुद्ध हो जिज्ञासा :- कुछ लोग बहुत धन होते हुए भी दुःखी रहते हैं। दुःखी रहना क्या उनका स्वभाव माना जाए? जाएगा। साथ में व्यक्ति उपासना भी करेगा जिससे उसका मन शुद्ध हो समाधान :- धन बाहर की सुविधा है। वस्तुतः बाहर की सुविधा से जाएगा। तब व्यक्ति संन्यास का अधिकारी बन जाएगा। किसी को सुख नहीं मिलता। फिर सुख का हेतु क्या है? पतञ्जलिजी ने कहा वानप्रस्थ धारण से कितने वर्ष बाद संन्यास में जाना चाहिए यह है -सन्तोषादनुत्तमः सुखलाभः। (योगसूत्र- २.४२) प्राप्त भोग में जिसको गणित मत लगाओ। जितने वर्ष में अपना काम बने उतना समय आवश्यक सन्तोष है और जो धर्म पर खड़ा है उसको जो सुख प्राप्त होता है वह है। मन शुद्ध हो जाए, एकाग्र होकर आत्मरूपी लक्ष्य में तन्मय हो जाए तो अत्यधिक भोग करने वालों को प्राप्त नहीं होता। अपने आप ही संन्यास की योग्यता आ जाएगी। हमने प्रत्यक्ष देखा है, करोड़पतियों को जितना दुःख है उतना तो **** किसी मजदूर को भी नहीं है। उनके दुःख को दूर से कोई जान नहीं सकता, पास में रहकर ही जाना जा सकता है। किसी मजदूर की लड्डू खाने की इच्छा है और लड्डू नहीं मिला तो उसे दुःख होता है। किसी धनवान् की लड्डू खाने की

वमनाहारवद्यस्य भाति सर्वैषणादिषु। इच्छा है और लड्डू सामने भी पड़ा है, पर डॉक्टर ने कह दिया-"लड्डू खाओगे तस्याधिकार: संन्यासे त्यक्तदेहाभिमानिनः॥ तो मर जाओगे।" अब बताइये, दोनों में से किसको ज्यादा दुःख हुआ? (मैत्रेयी उप .- २.१८) मजदूर तो कभी मिलने पर खा भी सकता है, पर यह तो जीवन भर देख ही सकता है। खाने को तो उबला हुआ साग और सूखी रोटी ही उसके लिये है। जिसे सम्पूर्ण एषणाओं (इच्छाओं) के विषय मजदूर दिन भर काम करता है, रात्रि को उसे सुखपूर्वक निद्रा आ जाती है। उल्टी किये हुए भोजन के समान घृणास्पद प्रतीत होते हैं ऐसे देहाभिमान से रहित पुरुष करोड़पति को इन्जेक्शन के बिना निद्रा नहीं आती। बताइये निद्रा के विषय में

का संन्यास में अधिकार है। कौन सुखी है? अर्थानामर्जने क्लेशः तथैव परिपालने। नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थान् क्लेशकारिणः॥(पञ्चदशी-७.३६)

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ सुख-दुःख धन के अर्जन करने में भी क्लेश है। फिर उसकी रक्षा करो। उसे खर्च सकते। एकलव्य ने कौरवों के कुत्ते के मुख में इतने बाण भर दिये कि उसका करने में भी भय बना रहता है कि गलत जगह पर खर्च न हो जाए। सुख में धन भौंकना बन्द हो गया परन्तु एक बून्द भी खून नहीं निकला। हेतु बन सकता है यह धारणा गलत है। अर्जुन ने कैसे वह शरशय्या बनाई और वह भीष्म को सुख देने वाली **** कैसे हुई इस बात को हम अपनी बुद्धि से समझ नहीं सकते। वह शय्या बाणों जिज्ञासा :- शास्त्र में प्रसिद्धि है कि पुण्यात्मा का प्राण बिना कष्ट के की थी परन्तु उन्हें कष्ट देनेवाली नहीं थी अन्यथा शरीर ऊपर कैसे रहता बाण छूटता है और पापात्मा को प्राण छूटते समय बहुत कष्ट होता है। परन्तु कभी- शरीर में धँस जाने चाहिए थे। उसी शय्या पर लेटे हुए भीष्म ने सम्पूर्ण कभी इसका उल्टा देखा जाता है। इसमें क्या हेतु है ? धर्मशास्त्र का उपदेश पाण्डवों को किया। यदि वह शय्या कष्ट देने वाली होती समाधान :- शास्त्र में जो बात प्रसिद्ध है वही सत्य है। आपका तो इतना उपदेश कैसे कर सकते थे। इस बात को ठीक से समझना चाहिए। अनुभव सत्य हो यह कोई आवश्यक नहीं। कभी किसी आदमी को बेहोश **** पड़ा देखते हैं। बाहर से वह बड़ा शान्त दिखाई देता है पर अन्दर से उसको जिज्ञासा :- सदा बालक के समान आनन्द बना रहे इसके लिये क्या बहुत कष्ट होता है। वह अपने कष्ट को व्यक्त नहीं कर पाता। इसी प्रकार कभी- करें? कभी कोई बाहर से कष्टग्रस्त दिखाई देता है पर भीतर से उसको परम आनन्द समाधान :- आपका तात्पर्य है कि जैसे बालक में काम, कुटिलता, मिल रहा है। इसलिये आप बाहर से देख कर यह नहीं कह सकते कि प्राण सुख चिन्ता इत्यादि विकार नहीं रहते इसलिये वह आनन्द में रहता है, उसी प्रकार से छूटे या दुःख से। उस समय जीव एक क्षण में वर्षों का अनुभव कर सकता हमारे अन्दर वे विकार न रहें तो हम भी सुखी हो जाएं। जब यह जानते हो तो है। उसको परमात्मा ही जान सकता है या फिर कोई योगी। उस विषय में आप क्यों उनको पाल रखे हो, निकालो। वे निकले कि आप बालक के समान हो निर्णय कैसे कर सकते हैं कि शरीर दुःख से छूटा या सुख से। गये। बालक में चिन्ता इसलिये नहीं होती कि वह माता-पिता के आश्रय से **** रहता है। आप भी भगवान् को माता-पिता मान लो। उनका तो वचन है- जिज्ञासा :- भीष्म पितामह इतने बड़े धर्मात्मा थे, फिर उन्हें शरशय्या करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी।। (मानस पर सोने का कष्ट क्यों झेलना पड़ा? अरण्य -४२.३) तो फिर क्यों चिन्ता करते हो। वह थप्पड़ मारे या लड्डू दे समाधान :- वे तो स्वेच्छा से शरशय्या पर सोये थे क्योंकि वे सब में कृपा देखो तो चिन्ता का प्रसंग ही नहीं रहेगा। महावीर थे। जब वे युद्ध क्षेत्र में गिर गये तब दुर्योधन उनके लिये गद्दा-तकिया **** ले आया, जिससे उन्हें आराम मिले। परन्तु उन्होंने कहा- 'यह वीरों की शय्या जिज्ञासा :- सृष्टि के आरम्भ काल में जीव का कोई कर्म तो था ही नहीं है, अर्जुन को बुलाओ।' जब अर्जुन को बुलाया तो उन्होंने अर्जुन को नहीं। फिर प्रथम सृष्टि में जीव के सुख-दुःख के भोग में हेतु क्या बनता है? संकेत किया, उसने इस प्रकार से बाण मारे जिससे उनका शरीर ऊपर उठ गया समाधान :- अनादि शब्द का अर्थ है कि यह सृष्टि-प्रलय का चक्र और बाणशय्या पर लेट गया। उस काल की धनुर्विद्या को हम आज समझ नहीं कब से चल रहा है इसका जवाब आप नहीं दे सकते। अनादि का अर्थ यह नहीं

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग - ३ है कि सृष्टि उत्पन्न नहीं होती, बस इतना अर्थ है कि इस परम्परा में यह नहीं बता सकते कि इसके पहले सृष्टि नहीं थी। मान लीजिए एक ऐसा समुद्र है जो अनादि है। उसमें पहली लहर कब उठी यह आप नहीं बता सकते। इसी प्रकार जो मूल चेतन तत्त्व है उसको तो हम नित्य मानते हैं फिर उसमें पहली सृष्टि ज्ञानी की स्थिति

कब स्फुरित हुई यह नहीं कह सकते। देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा।। (माण्डूक्य कारिका -१.६) जिज्ञासा :- गीता में गुणातीत का लक्षण करते समय जैसे समुद्र का स्वभाव है लहर उठते रहना, ऐसे ही परमात्मा का सर्वारम्भपरित्यागी कहा। ऐसे में ज्ञानी महापुरुषों के द्वारा यदि कोई क्रिया स्वभाव है अनन्तरूपों में भासित होते हुए भी ज्यों का त्यों बना रहना। इसलिये होती हुई दिखाई दे तो क्या समझना चाहिए? पहली सृष्टि कब हुई यह प्रश्न अनिर्वचनीय है। इसका जवाब तो आज तक समाधान :- बात स्पष्ट है कि जितना भी आरम्भ(क्रिया) होगा वह कोई दार्शनिक नहीं दे सका। स्वयं ऋग्वेद भी कहता है- गुणों में ही होगा। गुणों के साथ सम्बन्धित हुए बिना उस आरम्भ का कोई को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः। कर्ता नहीं बन सकता। स्वरूपभूत चेतन गुणातीत है, इसलिये उसके साथ (१०.१२६.६) किसी गुण का सम्बन्ध हो नहीं सकता। वह तो अक्रिय है। अब कोई शंका यह सृष्टि कहाँ से आई, कब और कैसे बनी यह कोई भी निश्चित रूप करे कि गुणातीत महापुरुषों में आरम्भ दिखाई देता है। उस दिखाई देने वाले से कह नहीं सकता। इसलिये पहली सृष्टि नाम की कोई चीज नहीं है। हाँ! आरम्भ का कोई मतलब नहीं है। मतलब इस बात से है कि उसको अपने सिद्धान्त तो यही है कि पूर्व जन्म में किये गये कर्मों के फलस्वरूप ही जीव स्वरूप का क्या निश्चय है। उसे जो निश्चय अपने स्वरूप का है उसका सुख-दुःख भोगता है। गुणों से सम्बन्ध है या नहीं? यदि नहीं है तो आपको जो क्रिया दिखाई दे रही है उसका आप उस गुणातीत पर आरोप कर रहे हैं वह केवल आपकी दृष्टि में है, न उसकी दृष्टि में है और न ही उसकी अनुभूति में। न चेन्द्रस्य सुखं किञ्चिन्न सुखं चक्रवर्तिनः। सुखमस्ति विरक्तस्य मुनेरेकान्तजीविनः ।। उसका उसके शरीर में होने वाली क्रिया से सम्बन्ध क्यों नहीं बन

(भागवतमाहात्म्य-४.७५) रहा है? इसलिये नहीं बन रहा है कि उस शरीर के साथ उसकी जो अहंता- ममता थी वह अज्ञान से उत्पन्न हुई थी। अज्ञान के नष्ट होने से अहंता-ममता सुख न तो देवराज इन्द्र को प्राप्त होता है और न ही भी बाधित हो गई। अब उसका उस शरीर से होने वाली क्रियाओं से पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट को। सुख की प्राप्ति तो केवल पूर्ण विरक्त, एकांतवासी मुनि को ही होती है। सम्बन्ध कैसे बन सकता है। जैसे आप एक शरीर में अहंता करके किसी दूसरे शरीर में होने वाली क्रिया से सम्बन्ध नहीं रखते क्योंकि वहाँ आपकी

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग -३ ज्ञानी की स्थिति अहंता नहीं है। इसलिये ज्ञानी के शरीर में क्रिया दिखते हुए भी वह गुणातीत जिज्ञासा :- ज्ञानी के संचित कर्म तो नष्ट हो जाते हैं। उसके ही है। क्रियमाश पुण्य-पापात्मक कर्मों का सम्बन्ध किससे बनता है? **** समाधान :- कौषितकी उपनिषद् में इस विषय पर विचार किया है। जिज्ञासा :- शास्त्र कहता है- "ज्ञानी के कर्म भस्म हो जाते हैं।" वहाँ उसके कर्मों के २ विभाग कर दिये। जो पुण्य-भाग है वह उसकी इसका क्या तात्पर्य है? सेवा, प्रशंसा करने वाले के पास चला जाएगा। जिसकी जितनी भावना है समाधान :- आप कोई स्वप्न देख रहे हैं। उसमें आपने बड़े-बड़े उसके अनुसार ही बँट जाएगा। इससे उन्हें लाभ होगा। जो थोड़ा बहुत सौ यज्ञ किये और सौ ब्रह्महत्याएं कर दीं। आपने पुण्य किया और पाप भी पापात्मक अंश है वह उसकी निन्दा करने वालों में बँट जाएगा। वहाँ किया। अब आप जाग गये। उस समय आप न तो उन यज्ञों के पुण्य से प्रसन्न उसका फल दिखाई देगा, उन लोगों का कुछ अनिष्ट हो जाएगा। पर यह होते हैं और न ही ब्रह्महत्याओं के पाप से दुःखी। आप कहीं उन हत्याओं स्वतः होता है, ज्ञानी का इसमें कोई संकल्प नहीं रहता। इसके अलावा जो को स्वीकार करके पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने पहुँचें और कहें- लटापटा (कमण्डलु, घड़ी इत्यादि) है वह उसके उत्तराधिकारी अथवा मुझे गिरफ्तार कीजिए, मैंने स्वप्न में सौ हत्याएं की हैं। उस समय पुलिस सेवक के पास रह जाता है। ज्ञानी की तरफ से तो कुछ नहीं हो रहा है पर ये वाला क्या कहेगा? आप विचार कीजिए जिस स्वप्न में यज्ञ करके फूल रहे विभाग अपने-आप हो जाते हैं। थे और पाप से डर रहे थे, वह जागने के पश्चात् एकाएक गायब कैसे हो **** गया। उसमें कारण यही है कि स्वप्न में जिस शरीर से आपने कर्म किये थे जिज्ञासा :- ईशावास्योपनिषद् में कहा है - तत्र को मोहः कः वह बाधित हो गया। इसलिये आपका उससे सम्बन्ध नहीं रहा तो उससे होने वाले कर्म से भी सम्बन्ध नहीं बना। पर यह अनुभूति जागने पर ही होगी। शोक एकत्वमनुपश्यतः।(७) एकत्व के ज्ञान से शोक, मोह का अभाव कैसे हो जाता है? जाग्रत और स्वप्न में अन्तर इतना ही है कि स्वरूप से सो कर समाधान :- देखो! शोक, मोह इत्यादि जो भी होते हैं वे दो में होते जगत्-दृष्य देखने का नाम जाग्रत है और जाग्रत से सो कर दृष्य देखने का नाम स्वप्न है। जैसे स्वप्न से जागने पर स्वप्न का अनुभव बाधित हो जाता हैं एक में नहीं। सुषुप्ति में दो नहीं होते इसलिये न वहाँ शोक की प्रतीति होती है, न मोह की और न अन्य कोई व्यवहार होता है। जब भेद होगा तभी है उसी प्रकार अविद्या के नष्ट होने से जब आप स्वरूप में जागेंगे तब जाग्रत का अनुभव बाधित हो जाएगा अर्थात् वर्तमान में शरीर आदि से जो सम्बन्ध व्यवहार सम्भव होगा। वस्तु का भेद हो या न हो भेददर्शन मात्र से सब प्रकार का व्यवहार हो जाता है, वास्तविक भेद होने की कोई आवश्यकता मालूम पड़ रहा है वह बाधित हो जाएगा। तब शरीर, इन्द्रिय आदि से होने वाले कर्म और कर्मफल से आपका सम्बन्ध नहीं रहेगा। यही है कर्म भस्म नहीं है। इसीलिये श्रुति कहती है -

होने का तात्पर्य। अब कोई वहाँ जले हुए कर्म की राख ढूँढ़ने जाये तो नहीं यत्र द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति, तदितर इतरं जिघ्रति ..... (बृह.उप .- ४.५.१५) मिलेगी।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ जहाँ द्वैत के जैसा होता है, अर्थात् वास्तविक भेद की कोई जरूरत नही। भेद-प्रतीति हो जाए तो देखना, सुनना आदि सारा व्यवहार शुरु हो जाता है। यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येत् तत्केन कं जिघ्रेत् ..... (बृह.उप .- ४.५.१५) लोकव्यवहार जहाँ भेददर्शन का अभाव है वहाँ कोई व्यवहार संभव नहीं। जिस ज्ञानी को एक आत्मा ही दिख रहा है उसमें कोई व्यवहार नहीं हो सकता। ईशावास्य के जिस मन्त्र के विषय में प्रश्न है वहाँ ऐसे ही ज्ञानी की दृष्टि जिज्ञासा :- कबीरदासजी की समाज में अच्छी प्रतिष्ठा थी, फिर

बताई गई है-यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।(७) इस उन्होंने जीविकोपार्जन के लिये कोई अच्छा धंधा क्यों नहीं चुना?

ज्ञानी की दृष्टि में तो एक आत्मा ही है उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं। इस समाधान :- कोई कर्म अच्छा या बुरा नहीं होता। शास्त्र इस बात को

एकत्व-ज्ञान से उसका भेददर्शन समाप्त हो जाता है क्योंकि भेददर्शन का नहीं मानता कि अध्यापन कर्म अच्छा है और कपड़ा बुनने वाला कर्म बुरा।

कारण अज्ञान था, वह ज्ञान से नष्ट हो चुका है। इसलिये इस ज्ञानी के लिये सभी कर्म दोष मिश्रित हैं। फिर किसी विशेष कर्म के बारे में क्या कहा

शोक, मोह आदि संसार का सम्पूर्ण व्यवहार समाप्त हो जाता है। जाये। शास्त्र के अनुसार महत्त्व इस बात का है कि व्यक्ति उस कर्म को भगवान् से सम्बन्धित कर पाता है या नहीं। यदि भगवान् की सेवा के रूप में करता है **** तो उसके मन में क्यों आएगा कि हम कोई दूसरा व्यापार करें। भगवान् ने गीता में कहा है-

भेदाभेदौ सपदि गलितौ पुण्यपापे विशीर्णे सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। मायामोहौ क्षयमधिगतौ नष्टसन्देहवृत्तेः। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।(१८.४८) शब्दातीतं त्रिगुणरहितं प्राप्य तत्त्वावबोधं अपना सहज कर्म जो जन्म से प्राप्त है उसको भगवद्-आराधना समझ निस्त्रैगुण्ये पथि विचरतः को विधिः को निषेधः॥। कर करना चाहिए। भगवान् ने तो यहाँ तक कह दिया कि उसमें कोई दोष हो (शुकाष्टकम्-१) तो भी उसे छोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि उस कर्म के संस्कार त्रिगुणात्मिका माया से रहित, सम्पूर्ण शब्दों के अविषय ब्रह्मतत्त्व साक्षात्कार से जिसके सारे सन्देह नष्ट हो चुके हैं, उसके रक्त में हैं। इसी प्रकार कबीरजी का कपड़ा बुनने का कर्म पुश्तैनी था, जीव और ईश्वर में भेद तथा देह और आत्मा में अभेद इस इसलिये उनके लिये वह सहज कर्म था। उन्होंने भगवान् से सम्बन्धित करके प्रकार के मिथ्याज्ञान बाधित हो गये हैं, पुण्य-पाप समाप्त उस कर्म को किया। हो गये हैं, माया और मोह नाश को प्राप्त हो चुके हैं, ऐसा गुणातीत मार्ग में विचरण करने वाला ब्रह्मज्ञानी महापुरुष ****

शास्त्रों के समस्त विधि-निषेधों से परे हो जाता है। जिज्ञासा :- किसी लड़के-लड़की का परस्पर स्नेह हो जाये और

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग- ३ लोकव्यवहार

दोनों एक ही धर्म के हों तो क्या वे परस्पर विवाह कर सकते हैं? विचार कर लें। यदि इनके साथ कोई विरोध नहीं हो रहा है तो विवाह कर समाधान :- वे परस्पर स्नेह करते हैं उसके विषय में तो हम कुछ नहीं सकते हैं। कह सकते, पर जीवन में एक बात अवश्य ध्यान में रखें कि कामना या वासना **** के आधार पर लिया गया निर्णय ठीक या सफल हो इसकी कोई गारण्टी नहीं। जिज्ञासा :- व्यवहार में शान्ति भंग न हो इसके लिये क्या किया जब भी कामना में विघ्न आएगा वह निर्णय गलत सिद्ध हो जाएगा। इसलिये जाए? आपके विवाह में हेतु कामना-वासना तो नहीं है? पहले तो यह निश्चय कर समाधान :- शान्ति आपका स्वरूप है। वह कहीं बाहर से प्राप्त होने लेना चाहिए। दूसरी बात, मनुष्य जीवन में विवाह का सम्बन्ध मात्र इस लोक वाली वस्तु नहीं है। आप बाहर से शान्ति चाहते हैं और उसके बदले में अन्दर से ही नहीं है, इसका सम्बन्ध परलोक से भी है। इसलिये वह शास्त्रसम्मत की शान्ति बाहर फेंक रहे हैं। यह जो बाहर से शान्ति प्राप्त करने की कामना है होना चाहिए। इसके लिये यह विचार करना पड़ेगा कि हमारे कार्य को माता- यही अशान्ति में हेतु है। कामना वाला व्यक्ति शान्त कैसे रह सकता है? एक पिता, गुरु, धर्म तथा ईश्वर का समर्थन है अथवा नहीं। आपके माता-पिता कामना की पूर्ति हुई कि दूसरी कामना प्रकट हो जाती है। जगत् में शान्ति का प्रसन्न तो हैं। कहीं आप ऐसा करके माता-पिता को थप्पड़ तो नहीं लगा रहे एक ही उपाय है - प्राप्त कर्म को कर्तव्य भाव से करते रहो। उसका फल जो हैं? उनका आशीर्वाद नहीं लिया तो जीवन में सुखी नहीं रह पायेंगे। भी मिले इसकी चिन्ता मत करो क्योंकि आप के हाथ में कर्म करना ही है, हमने कई घटनाएं ऐसी देखी हैं जिनमें युवक-युवतियाँ आवेशवश फल तो ईश्वर के हाथ में है। इसलिये आप की चिन्ता का कोई औचित्य नहीं किसी की न सुनकर प्रेम-विवाह कर लेते हैं। अन्त में उनके जीवन में शान्ति है। इसके साथ ही एक निश्चय आप यह कर लीजिए कि संसार में ऐसा कोई नहीं मिली। माता-पिता के साथ-साथ यह भी देखना पड़ेगा कि समाज इस उपाय नहीं है जिससे हम सभी को प्रसन्न कर पाएं - कार्य को स्वीकार करता है कि नहीं। नहीं तो एक गलत निर्णय के कारण जीवन विद्यते हि न स कश्चिदुपायः सर्वलोकपरितोषकरो यः। भर नीचा देखना पड़ेगा क्योंकि उनके जीवन में न गुरु का आशीर्वाद रहेगा, न (शतगाथा-२८) माता-पिता का और न ही समाज के अन्य बड़े लोगों का। जिसको आप सन्तुष्ट नहीं कर पाये वह आपकी बुराई कर सकता है, इसके साथ-साथ उनको धर्मशास्त्र के अनुसार भी विचार करना गाली भी दे सकता है। उस समय आपकी शान्ति क्यों भंग हो जाती है? उस पड़ेगा कि दोनों की जाति मिलती है या नहीं। कहीं दोनों का गोत्र तो नहीं मिल समय आपको विचार करना चाहिए कि वह जो बुराई कर रहा है या गाली दे रहा है? सजातीय होने पर भी यदि सगोत्र हैं तो विवाह नहीं करना चाहिए, रहा है, उसका सम्बन्ध उससे बन रहा है। हम जो सहन कर रहे हैं उसका इसका विशेषकर उत्पन्न होने वाले बच्चों पर कुप्रभाव पड़ता है। शास्त्र में सम्बन्ध हमसे बन रहा है। दूसरे से सम्बन्धित कर्म की हम चिन्ता क्यों करें? सगोत्र के बीच में भाई-बहिन का रिश्ता बताया है। इसलिये उन्हें परस्पर इस प्रकार का विचार आप करेंगे तो आपकी शान्ति कौन भंग कर सकेगा? विवाह नहीं करना चाहिए। विवाह करते समय ऐसा निर्णय लें जो हमारे इस लोक के साथ-साथ परलोक को भी बिगाड़ने वाला न हो। उपरोक्त बातों पर एक बात पुनः समझ लेनी चाहिए। यह जो प्रत्येक क्षण संसार से कुछ चाहने की आदत पड़ गई है - अशान्ति में मुख्य हेतु यही है।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ लोकव्यवहार

जिज्ञासा :- विपरीत परिस्थिति में विश्वास क्यों डगमगा जाता है? जिज्ञासा :- शास्त्र में कहीं ऐसा देखा है कि गुरु, अग्नि और स्त्री के समाधान :- विपरीत परिस्थिति में भी सभी का तो विश्वास नहीं बहुत नजदीक भी नहीं रहना चाहिए और ज्यादा दूर भी नहीं। ऐसा क्यों? डगमगाता। जो अन्दर से दृढ़ नहीं है, कमजोर है उसी का विश्वास डगमगाता समाधान :- बहुत नजदीक रहने से कई बार खतरा हो जाता है। तुम है। जैसे कोई कहे कि मैंने वर्ष भर अध्ययन किया पर वार्षिक परीक्षा में फेल गुरुजी के बहुत नजदीक रहोगे तो अधिक परिचय हो जाएगा- बहुपरिचयाद् हो गया। इसका तात्पर्य यही है कि उसका अध्ययन ठीक नहीं था। ऐसे ही अवज्ञा। अधिक निकटता होने से अवज्ञा हो जाती है। कुछ ऐसा व्यवहार कर जिसने कामनापूर्वक, स्वार्थपूर्वक परमात्मा को अपनाया है उसे कोई समस्या दोगे जिससे गुरुजी नाराज हो जाएंगे। इसलिये बहुत नजदीक नहीं रहना आएगी या कार्य में विलम्ब होगा तो वह समझेगा कि अभी तक मैंने जो भजन चाहिए, थोड़ा डरकर रहे। यदि बहुत दूर रहोगे तो तुम्हारे ऊपर शासन कैसे किया वह व्यर्थ ही गया। ऐसे में उसकी भक्ति शिथिल पड़ जाएगी। वस्तुतः होगा, तुम मनमानी करोगे, तब तो जीवन ही बिगड़ जाएगा। इसलिये गुरु का होना इसका उल्टा चाहिए, पर क्या करें यही जीव की कमजोरी है। संरक्षण होना चाहिए, न अधिक दूर रहे न अति समीप। गुरु के सामने अधिक **** बोलना भी नहीं चाहिए। यदि तुम्हारे मुख से कुछ गलत निकल गया तो दोष जिज्ञासा :- आजकल घरों में देखते हैं पति-पत्नी साथ में भोजन के भागी बन जाओगे। करते हैं। क्या यह उचित है? इसी प्रकार अग्नि के अत्यन्त समीप रहोगे तो थोड़ा भी असावधान समाधान :- नहीं! शास्त्र में इसका निषेध किया है- नाश्नीयाद् होते ही जल जाओगे। यदि बहुत दूर रहोगे तो भोजन कैसे बनाओगे, ठण्डी में भार्यया सार्धम्।(मनु-४.४३) भले ही यह बात आजकल बहुत लोगों को आग कैसे तापोगे। इसलिये न बहुत पास रहे न बहुत दूर। अच्छी नहीं लगेगी। परन्तु शास्त्र तो कहता है - पति के साथ पत्नी को भोजन इसी प्रकार स्त्री के विषय में भी समझना चाहिए। अब यहाँ पर प्रश्न है नहीं करना चाहिए। कि यह बात गृहस्थ के लिये है या साधु के लिये। स्त्री के विषय में तो साधु का *** भ कोई प्रश्न ही नहीं, यह तो गृहस्थ के लिये समझना चाहिए। परन्तु जब कोई जिज्ञासा :- किसी ने हमारे ऊपर उपकार किया उस समय हमें उसे साधु आश्रम आदि के व्यवहार में हो तो उसे भी इसका ध्यान रखना चाहिए। ईश्वरकृपा समझना चाहिए अथवा उस व्यक्ति की? यदि वह बिल्कुल सम्पर्क नहीं रखेगा तो आश्रम चलाना ही मुश्किल हो समाधान :- ईश्वरकृपा को तो प्रत्येक घटना से जोड़ना चाहिए। जाएगा और अधिक पास जाने पर तो खतरा ही है। उसे बहुत सावधान रहना ईश्वरकृपा के बिना तो कोई उपकार कर ही नहीं सकता। परन्तु आपका कर्तव्य चाहिए।

है कि यदि आप पर किसी ने उपकार किया है तो आप उस उपकार को न भूलें। * * **

शास्त्र में अकृतज्ञता को बड़ा पाप कहा है। इसलिये आवश्यकता पड़ने पर जिज्ञासा :- आज घरों में अशान्ति का वातावरण क्यों है? गृहस्थ-

यथासम्भव प्रत्युपकार करना चाहिए। आश्रम में रहते-रहते जगत् से वैराग्य क्यों नहीं होता?

**** समाधान :- गृहस्थ आश्रम में आज सारी प्रक्रिया ही बिगड़ गई है।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ लोकव्यवहार

पहले तो जितने द्विजाति लोग थे उनके घर में विवाह के साथ ही अग्नि की सन्ध्योपासना, अग्निहोत्र करते-करते व्यक्ति में जगत् को पढ़ने का बल आता स्थापना हो जाती थी। मकान ऐसे नहीं बनता था जैसे आज बनता है। आज तो था। जगत् को पढ़ने से वैराग्य होता था। वैराग्य होने से शान्ति का वातावरण लोग मकान में पुत्र-पौत्रों का तो इंतजाम कर लेते हैं, पर जब बन जाता है तब बनता था। आजकल इन सबका अभाव होने से घरों में अशान्ति का वातावरण सोचते हैं कि भगवान् को कहाँ रखें? तब कहीं सीढ़ी के नीचे तो कहीं दिखाई देता है। अलमारी में भगवान् को रखते है। ऐसे लोगों की बुद्धि मारी गई है। जब नक़्शा ****

बनाया तब क्यों नहीं सोचा कि सबसे पहला कमरा तो भगवान् का, गुरु का जिज्ञासा :- घर में सुख, शान्ति, सम्पन्नता बनी रहे इसका क्या उपाय होना चाहिए। नहीं तो गुरुजी आएँगे तब उन्हें कहाँ ठहराएँगे? है? सबसे अधिक महत्त्व भगवान् और गुरु का है। उनके लिये सबसे समाधान :- संसार में किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिये तीन उपाय अच्छा कमरा होना जरूरी है। जिस कमरे में कोई व्यर्थ की संसारी बातें न की शास्त्रों में बताए हैं। पहला उपाय है, सत्त्वाभिजय - अपने मन को हमेशा जाएँ केवल भजन ही किया जाये। गीता पाठ, रामायण पाठ करना हो तो उस स्थिर, प्रसन्न और एकाग्र रखना। सदा धैर्य और उत्साह की शक्ति से सम्पन्न हो कमरे में बैठो। बच्चों को भी ज्ञान होना चाहिए कि बिना स्नान किये इस कमरे कर प्राप्त कर्मों को करना। अपने कर्मों को हमेशा शास्त्रसम्मत विधि से ही में नहीं जा सकते हैं। इस कमरे में केवल कीर्तन, भजन, जप, पाठ यही सब करना। कर सकते हैं। इसी कमरे में भगवान् की पूजा होगी। जब गुरुजी आएँगे तो उन्हें दूसरा उपाय है, देवव्यपाश्रय - जीवन में परमात्मा का आश्रय लो, इसमें ठहराएँगे, सत्संग होगा। आध्यात्मिक दृष्टि से जो जीवन के लिये सबसे उनका भजन करो, देवताओं का पूजन करो, गुरु के प्रति समर्पित रह कर महत्त्वपूर्ण कमरा है उसे नक़्शा बनाने वाला क्या जानेगा और हमें ध्यान ही उनकी आज्ञा का पालन करो। नहीं है। अपने लिये बढ़िया कमरा बनाया और भगवान् को अलमारी में रख तीसरा उपाय है, युक्तिव्यपाश्रय - किसी कार्य में सफलता पाने के दिया तो पहले ही उनका अपमान कर दिया। फिर शान्ति कैसे होगी? लिये जो व्यावाहारिक उपाय लोक में बताए हैं उनको किसी जानकार से पहले तो गृहस्थ के घर के मध्य में अनिवार्य रूप से एक कुण्ड बनता समझकर उसके अनुसार अपने कर्म करो। था जिसमें अग्नि की स्थापना होती थी। उस कुण्ड के दक्षिण भाग में और ईशान कोण में भी एक-एक कुण्ड बनता था। दक्षिण कुण्ड में चरु आदि इसके अलावा और भी कुछ ध्यान देने की बातें हैं। सूर्योदय के समय सोना नहीं चाहिए। सूर्य भगवान् प्रत्यक्ष देवता हैं। उनका अपमान करोगे तो पकाया जाता था और ईशान कोण के कुण्ड में प्रतिदिन आहुति दी जाती थी। घर में शान्ति कहाँ से आएगी? मार्कण्डेय पुराण में लिखा है जिस घर में अग्निर्देवो द्विजातीनाम्। प्रत्येक घर का मालिक अग्नि होता था। प्रातःकाल इधर-उधर कचरा फैला हो, स्वच्छता न हो, रात के जूठे बर्तन सुबह तक बिना और सायंकाल स्नान-सन्ध्या करके उस अग्नि में आहुति देना अनिवार्य था। धोये पड़े रहें तो उस घर में दरिद्रता आती है। अब तो यह सब न रहने से घरों में अशान्ति रहती है और जगत् से वैराग्य भी घर के सदस्यों को एक दूसरे के लिये त्याग करने का स्वभाव बनाना नहीं होता है। पहले तो गृहस्थ धर्म का ठीक से पालन करते-करते, चाहिए, तभी सुख-शान्ति रहेगी। इसके अतिरिक्त घर में माता-पिता की, वृद्धों

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ लोकव्यवहार की सेवा करो। समय आने पर पितरों के लिये श्राद्ध करो। ऋषियों के वचनों शास्त्र-आधारित दाम्पत्य है उसी के बारे में मैं बता सकता हूँ। प्रेमविवाह या का पालन करो और उनके ग्रन्थों का स्वाध्याय करो। ये सब लोग प्रसन्न रहेंगे तो घर में सुख, शान्ति, सम्पन्नता आ जाएगी। कोर्टमैरेज में न तो शास्त्र का आधार है, न माता-पिता के आशीर्वाद का और न ही समाज के आशीर्वाद का। वहाँ तो केवल कामना का आधार है। इसलिये **** उसमें तो कोई नियम नहीं बनाया जा सकता। जिज्ञासा :- दाम्पत्य जीवन में यदि कटुता उत्पन्न हो जाये तो उसे दूर शास्त्रीय विवाह में तो धर्म का आधार है, ईश्वर का आधार है, गुरु के करने के लिये क्या उपाय करना चाहिए? आशीर्वाद, माता-पिता के आशीर्वाद, समाज के आशीर्वाद इन सबका समाधान :- हमारे यहाँ दाम्पत्य जीवन का निर्धारण शास्त्र के आधार है। अग्नि आदि देवताओं का आधार है। इतने लोगों के आशीर्वाद से अनुसार होता है, मनमाने ढ़ंग से नहीं। जब विवाह के मन्त्रों का विचार करते हैं तो लगता है कि इसमें एक-दूसरे को अपने मन का समर्पण करना पाणिग्रहण होता है इसलिये इसमें गम्भीरता रहती है। दाम्पत्य को ठीक चलाने के लिये मेरी दृष्टि से तीन सूत्र इसमें अनुस्यूत रहने चाहिए। आवश्यक है। दाम्पत्य जीवन त्याग से शुरु होता है और इसमें कर्तव्य की १) दोनों पर शास्त्र का नियन्त्रण है इसलिये दोनों का जीवन शास्त्र के अनुसार प्रधानता रहती है। वे दोनों एक-दूसरे की हर समस्या को भले ही दूर न कर ही चलना चाहिए। पाएं पर उसे समझते हैं। साथ ही एक-दूसरे को भी यह बात समझा देते हैं कि २) दोनों को एक-दूसरे के लिये त्याग करना पड़ता है। त्याग के बिना कहीं हम तुम्हारी समस्या को समझ रहे हैं और यह भी बता देते हैं कि समझने के भी प्रेम उत्पन्न नहीं होता। खाने से तृप्ति होती है यह सोच गलत है, वास्तव में बाद भी हर समस्या को दूर करने में हम समर्थ नहीं हैं। खिलाने से तृप्ति होती है। यही सिद्धान्त दाम्पत्य जीवन में है। दूसरे को सुख जगत् में केवल आन्तर भावना से काम नहीं चलता क्योंकि यहाँ देने में लग जाओ, यही सुख का हेतु है। इसी पर गृहस्थ आश्रम अवलम्बित प्रत्येक व्यक्ति अल्पज्ञ है वह तुम्हारे मन की बात को नहीं जान सकता। यहाँ रहता है। दूसरे के प्रति मन को ठीक रखने के साथ-साथ इस बात को उसके सामने ३) आपस में भ्रम नहीं होना चाहिए। कभी भी कोई बात हो जाए तो एक दूसरे प्रदर्शित भी करना पड़ता है। ईश्वर और गुरु से प्रदर्शन की कोई जरूरत नहीं है से कहना चाहिए। किसी तीसरे से क्यों कहते हो? चाहे झगड़े की बात हो या क्योंकि वे सर्वज्ञ हैं। परन्तु अल्पज्ञ के साथ व्यवहार करने में प्रदर्शन की भी कुछ भी, जिससे प्रेम है उससे कहो तो बात निपट जाएगी। तुम किसी तीसरे से आवश्यकता होती है। मानस में कहा - कहोगे, वह किसी अन्य से कहेगा और वह फिर किसी अन्य से कहेगा। ऐसे में बिनय प्रेम बस भई भवानी(बाल .- २३५.३) बात का बतंगड़ बन जाएगा। तुम अपने लिये व्यर्थ का संकट खड़ा कर लोगे। प्रेम ही कह देते, साथ में विनय को क्यों कहा? व्यवहार बनाने के इसलिये सीधे बात करना चाहिए। दाम्पत्य जीवन तो विश्वास पर आधारित लिये प्रेम के साथ विनय भी होना चाहिए। तुम्हारा प्रेम विनय में ही दिखाई है। इसलिये अपना व्यवहार ऐसा रखें जिससे दूसरे का विश्वास न टूटे। तुम देगा। व्यक्ति जीवन को जितना कर्तव्यप्रधान बनाता है उतनी ही शास्त्र की भी कहो कि हम तुम्हारी परिस्थिति को समझ रहे हैं, वह भी ऐसा ही कहे और प्रधानता रहती है। शास्त्र के द्वारा कहे कर्तव्य का वह निर्वाह करता है। जहाँ दोनों एक-दूसरे की कमजोरी को समझें।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ लोकव्यवहार

यदि ये सूत्र अनुस्यूत रहें तो दाम्पत्य जीवन का कार्य ठीक से चल निमन्त्रण दिया। दोनों साथ में आ नहीं सकते थे और पहले किसको बुलाए, सकता है, इसमें कोई संशय नहीं है। कभी-कभी ग्रह-नक्षत्र भी ऐसे आ जाते यह भी कठिन था। किसी प्रकार से देवता लोग मान गये कि असुरों को पहले हैं कि सब विपरीत हो जाता है। जब रामजी के जीवन में भी आ गये तो आपके जीवन में आ जायें इसमें कौन सी बड़ी बात है। कभी शनि की साढ़े-साती आ बुला लीजिए। असुरों को भोजन के लिए बुलाया, सभी को पंक्ति में बिठा दिया। राजा बहुत बुद्धिमान था, उसने परीक्षा लेने के लिये एक युक्ति अपनाई जाती है। ऐसी स्थिति में ग्रह-शान्ति आदि के जो शास्त्रीय उपाय हैं उनका और कहा, "महाराज! हमारे यहाँ एक परम्परा है कि मेहमानों को भोजन अनुष्ठान करना चाहिए। करवाते समय उनके हाथ के साथ एक सीधी लकड़ी बाँध दी जाती है।" असुर लोग सहमत हो गये और उनके हाथों में सीधी लकड़ियाँ बाँध दी जिज्ञासा :- आजकल परिवार में बड़े लोग स्वयं कुछ न करके छोटों से गई। जब वे भोजन करने लगे तो सभी के हाथ सीधे-के-सीधे रहे, अब ही सब कार्य करवाना पसन्द करते हैं। ऐसे में छोटों का क्या कर्तव्य है? भोजन कैसे करें! तब उन्होंने एक युक्ति अपनाई, वे हाथ में भोजन लेकर ऊपर समाधान :- ऐसा प्रायः घरों में होता ही है, आप जितना करते हैं उससे की ओर फेंकने लगे। इससे कुछ भोजन मुख में गिरता और कुछ इधर-उधर ज्यादा की अपेक्षा बड़े लोग रखते हैं, यह कोई नई बात नहीं है। यह तो मानव बिखर जाता। इस प्रकार कुछ देर भोजन किया तो राजा ने कहा, "क्षमा का स्वभाव है। पर आप जितना कर सकते हैं, उतना करें। अधिक की कोई कीजिए महाराज! आपके लिये निर्धारित समय पूर्ण हो गया है, अब देवताओं विधि नहीं है। जितना कर सकते हो, बड़ों की सेवा करनी चाहिए। की बारी है।" इस प्रकार असुर लोग भूखे ही रह गये और दुःखी हुए। **** अब देवता लोग पंक्ति में बैठे। राजा ने उसी प्रकार कहा, "महाराज! जिज्ञासा :- संयुक्त परिवार में रहने वाले सदस्य क्या करें जिससे परिवार हमारे यहाँ परम्परा है कि भोजन करते समय मेहमानों के हाथ के साथ सीधी के सभी लोग सुखी रहें? लकड़ी बाँध देते हैं।" देवताओं ने हामी भरी और उनके हाथों के साथ सीधी समाधान :- संयुक्त परिवार में रहना एक कला है। यदि वह आपके लकड़ियाँ बाँध दी गईं। जब देवता भोजन करने लगे तो हाथ सीधे ही रहे। तब जीवन में आ जाए तो आप सुखी रह सकते हैं। संयुक्त परिवार में दूसरों के मन उन्होंने एक युक्ति अपनाई और परस्पर अपने-अपने सामनेवालों को अपनी- की बात को महत्व देना बहुत आवश्यक है। यदि अपने मन की बात सभी अपनी पत्तल का भोजन करवाने लगे। इस प्रकार प्रेम से सभी ने पेटभर भोजन चलाने लगे तो परिवार बिखर जाएगा। संयुक्त परिवार में एक-दूसरे के लिये किया और प्रसन्न हुए। देखिए! देवताओं ने त्याग किया, अपना भोजन दूसरे त्याग तो अत्यन्त आवश्यक है। यदि आप दूसरे की बात को महत्त्व देंगे तो को खिलाया तो उसने भी खिलाया। इससे सुखी हुए और असुरों ने स्वार्थ वह आपकी बात को महत्त्व देगा। यदि आप दूसरे के लिये त्याग करोगे तो वह दिखाया तो दुःखी हुए। भी आपके लिये त्याग करेगा। अपना स्वार्थ देखना तो आसुरी वृत्ति है। ऐसे में इसी प्रकार संयुक्त परिवार में रहनेवाले सदस्यों को भी एक-दूसरे के संयुक्त परिवार में रहना कठिन है। लिये त्याग करना चाहिए। यदि वे एक-दूसरे के लिये त्याग करेंगे तो देवताओं एक राजा था। एक बार उसने देवताओं और असुरों को भोजन के लिये के समान सुखी होंगे और स्वार्थी होंगे तो असुरों के समान दुःखी हो जाएँगे

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ जिससे परिवार बिखरने की नौबत आ जाएगी। **** जिज्ञासा :- मनुष्य का लक्ष्य शरीर-निर्वाह के लिए भोजन जुटाना भी विविध होता है, बीमार हुआ तो दवाई इत्यादि करवाना भी लक्ष्य होता है। समाज में मान-सम्मान पाना भी एक लक्ष्य है। इस प्रकार उसे एक साथ बहुत-से लक्ष्यों को लेकर चलना पड़ता है, फिर संसार में रहते हुए मनुष्य का एक लक्ष्य कैसे जिज्ञासा :- हमारा विद्याध्ययन सुदृढ़ कैसे हो?

हो सकता है? समाधान :- जब हम लोग संस्कृत का अध्ययन करते थे तब

समाधान :- एक लक्ष्य का तात्पर्य यह नहीं है कि कोई अन्य लक्ष्य हो आचार्य लोग कहा करते थे कि विद्या ऐसे ही नहीं आ जाती। विद्या के ४ ही नहीं। यहाँ पर एक लक्ष्य का तात्पर्य एक को प्रधान बनाकर अन्यों को गौण पाद होते हैं उन्हें पूरा करने पर ही पढ़ी हुई विद्या पक्की होती है, केवल रखने में है। गौण लक्ष्य भी ऐसे हों जो प्रधान लक्ष्य में सहायक बन सके। सर्टिफिकेट से विद्या नहीं आती। विद्या का प्रथम पाद है श्रद्धापूर्वक एकाग्र इसलिए संसार में रहकर एक परमात्मा को ही प्रधान लक्ष्य बनाकर अन्य होकर गुरु से श्रवण करना। ऐसा करने पर विद्या का एक चरण(एक चौथाई) शरीर-निर्वाह इत्यादि सहायक कार्य होते रहें, तो कोई विरोध नहीं होगा। आपको प्राप्त होगा।

**** दूसरे चरण की प्राप्ति का साधन है विद्यार्थियों के साथ परस्पर विचार। जब हम उत्तरकाशी में पढ़ते थे तब त्रयोदशी से प्रतिपदा तक चार दिन का अनध्याय रहता था, पाठ बन्द रहता था। प्रतिपदा छोड़कर बाकी

सहसा विदधीत न क्रियामविवेक: परमापदां पदम्। तीन दिन हम सब विद्यार्थी बैठकर पढ़े हुए पाठ का विचार करते थे, उसे

वृणुते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धा: स्वयमेव सम्पदः॥ पक्का करते थे। जिसने जिस विषय को ठीक से समझ लिया होता वह अन्य

(भारवे:) को भी समझा देता था। परस्पर विचार करने पर कई शंकाएँ भी उठती थीं, जिनका समाधान बाद में आचार्य से पूछने पर हो जाता था। इससे विद्या का बिना विचार किये कोई कार्य आरम्भ नहीं करना चाहिये क्योंकि अविवेक से बड़ी विपत्तियाँ सामने आ जाती हैं। दूसरा पाद प्राप्त होता है।

सोच-विचार कर कार्य करने वाले पुरुष के गुणों से मोहित जब किसी को पढ़ा देते हैं तो विद्या का तीसरा पाद प्राप्त हो जाता होकर सम्पत्तियाँ स्वयं ही उसका वरण कर लेती हैं। है। अब भी विद्या पूर्ण नहीं हुई। लम्बे समय तक पठन-पाठन कराते-कराते समय पर विद्या का चतुर्थ पाद प्रकट होता है। तब जाकर विद्या पूर्ण होती है। **** जिज्ञासा :- विद्यार्थी अध्ययन कैसे करे जिससे विषय अधिक

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ विविध

समय तक स्मरण रहे? श्लाघा विद्याया: शत्रवस्त्रयः।(महाभारत उद्योगपर्व-४०.४) समाधान :- विद्यार्थी को सर्वप्रथम तो अध्ययन का समय निर्धारित विद्यार्थी को विद्या प्राप्ति काल में तीन शत्रुओं से बहुत सावधान करना चाहिए। आजकल विद्यार्थी रात्रि के समय पढ़ाई करते हैं। पढ़कर सो रहना चाहिए। पहला शत्रु है अशुश्रूषा। शुश्रूषा शब्द के दो अर्थ होते हैं। एक जाने से विषय जल्दी विस्मृत हो जाता है। पुराने समय में विद्यार्थी रात्रि को है- श्रोतुम् इच्छा अर्थात् सुनने की इच्छा और दूसरा अर्थ है - सेवा। गुरु जल्दी सोते थे और प्रातः तीन बजे उठकर अपना नित्यकर्म करके अध्ययन जो कह रहा है उसे पूर्ण एकाग्रता से सुनने की जिसमें इच्छा नहीं है वह विद्या करते थे। इससे विषय का संस्कार दीर्घकाल तक रहता था। को ग्रहण नहीं कर पाएगा। दूसरी बात, विद्या गुरु की कृपा से प्राप्त होती है दूसरी बात जब रात्रि को देरी से सोते हैं तो सुबह देरी से उठते हैं, और कृपा मिलती है सेवा करने से। सबसे बड़ी सेवा है आज्ञापालन - जिससे एक हानि और होती है। भगवान् सूर्यनारायण प्रत्यक्ष देवता हैं, अग्या सम न सुसाहिब सेवा।(मानस अयोध्या .- ३००.२)ऋषि परम्परा सम्पूर्ण जगत् की आत्मा हैं। जब वे उदित होते हैं उस समय आप सोते हैं तो में कई दृष्टान्त हैं कि सेवा से ही सारी विद्या प्राप्त हो गई। उनका अपमान होता है। जैसे आपके घर में आपके गुरुज़ी आयें और आप आरुणि नामक विद्यार्थी गुरुकुल में पढ़ता था। एक बार शाम को सोये रहें तो आपको प्रत्यवाय(पाप) लगेगा। ऐसे ही सूर्योदय के समय सोने भारी वर्षा हो गई जिससे धान के खेतों में पानी भर गया। गुरुजी ने आरुणि से प्रत्यवाय लगता है जिससे विद्यार्थी देवता की कृपा से वंचित रह जाता है। से कहा, "बेटा! जाकर देखो किसी खेत की मेढ़ से पानी न बह पाये।" परिणाम यह होता है कि पढ़ा हुआ विषय आपके जीवन में सफलता नहीं दे उसने जाकर देखा कि एक खेत से पानी बह रहा है। बहुत मिट्टी लगाई परन्तु पाता। इसलिये सर्वप्रथम तो विद्यार्थी को रात्रि के नौ बजे सो कर प्रातः तीन धारा तेज थी, पानी बहता रहा। बालक को चिन्ता हो गई कि मैं गुरु-आज्ञा बजे उठने का अभ्यास करना चाहिए। इसके लिये उसे खान-पान में भी का पालन नहीं कर पा रहा हूँ। उसने कुछ विचार किया और जहाँ से पानी संयम रखना पड़ेगा। अधिक खा लेगा तो सुबह उठ नहीं पाएगा। बह रहा था वहाँ लेट गया, अगल-बगल से मिट्टी खींच कर लगा दी तो रोजाना कितना पढ़े यह अपनी सामर्थ्य देखकर निर्धारित करना पानी बन्द हो गया। अब उठेगा तो पानी बह जाएगा इसलिये रात भर वहीं चाहिए। किसी को कोई विषय एक घण्टे में याद होता है तो दूसरा चार घण्टे लेटा रहा। सुबह गुरुजी ने देखा कि आरुणि नहीं दिख रहा है, तो उसको में याद कर पाता है। इसलिये कितना पढ़ना है यह आपको निश्चय करना खोजने खेत में गये। आवाज दी, "आरुणि-आरुणि।" वह वहीं से बोला, चाहिए। हाँ! विषय इतना स्पष्ट होना चाहिए जिससे हम दूसरे को भी पढ़ा "गुरुजी! मैं यहाँ हूँ। यदि मैं इसे छोड़कर आऊँगा तो पानी बह जाएगा।" सकें। उसे देखकर गुरुजी का मन भर आया, उठाकर हृदय से लगा लिया। उसी **** समय सारी विद्या उसे प्राप्त हो गई। जिज्ञासा :- विद्या प्राप्ति के लिये विद्यार्थी जीवन में क्या इसलिये गुरुआज्ञापालन बहुत बड़ी चीज है। गुरु को प्रसन्न कर ले सावधानियाँ अपेक्षित हैं? तो विद्या का जो मर्म गुरु के अन्दर है वह शिष्य को प्राप्त हो जाता है। समाधान :- इस विषय में शास्त्र कहता है - अशुश्रूषा त्वरा

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ विविध इसलिये सेवा न करने का जो स्वभाव है वह विद्याप्राप्ति में बाधक है। दूसरा जागरुक न रहना, कुण्ठित हो जाना स्तब्धता कहलाती है। बुद्धि जागरुक बाधक है - त्वरा अर्थात् जल्दीबाजी, इसके रहते विद्या नहीं आती। ठीक रहे तो व्यक्ति विषय को ग्रहण कर सकता है, कुण्ठित बुद्धि वाला कुछ भी से अध्ययन करने के लिये धैर्य की आवश्यकता होती है। हमें एक महीने में यह ग्रन्थ पढ़ लेना है, फिर प्रवचन करने जाना है, ऐसे में विद्या नहीं आती। गृहीत नहीं कर सकता। बुद्धि में जड़ता नहीं आनी चाहिए, स्फूर्ति बनी रहनी चाहिए। तीसरा बाधक है- श्लाघा, प्रशंसा का रस, प्रशंसा की इच्छा। छठा दोष है- अभिमानित्व। अभिमानी व्यक्ति किसी के सामने प्रशंसा व्यक्ति के सामर्थ्य को कुण्ठित कर देती है। व्यक्ति प्रशंसा में फूल जाता है तो विद्याग्रहण में पूरी शक्ति नहीं लगा पाता। आगे कहा है- झुक ही नहीं सकता तो विद्याग्रहण कैसे करेगा। एक और दोष है- अत्यागित्व, त्याग न करने का स्वभाव। विद्यार्थी को तो अपने लक्ष्य के आलस्यं मदमोहौ च चापलं गोष्ठीरेव च। लिये सबकुछ त्याग करने के लिये तैयार रहना चाहिए। जो भी विद्याप्राप्ति स्तब्धता चाभिमानित्वं तथाऽत्यागित्वमेव च। में बाधक हो उसे त्यागने का बल होना चाहिए। इसी प्रकार साधक को एते वै सप्त दोषाः स्युः सदा विद्यार्थिनां मताः॥ भगवत्प्राप्ति के लिये सारे जगत् का त्याग करने के लिये तैयार रहना (महाभारत उद्योगपर्व-४०.५) चाहिए। इन सभी दोषों से जो बच सकता है वही विद्या ग्रहण करने में समर्थ सात दोषों से विद्यार्थियों को सदा बचना चाहिए। आलस्य होगा। विद्याप्राप्ति में बहुत बड़ा बाधक है। इसलिये आलस्य विद्यार्थी को छूना भी नहीं चाहिए। मद का अर्थ है घमण्ड। घमण्डी कभी पढ़ नहीं सकता। जिज्ञासा :- गुरुकुल के अध्ययन और आज के कॉलेज के विद्यार्थी का कहीं भी मोह नहीं होना चाहिए। मोह में सारी चित्तवृत्ति उसी अध्ययन में मौलिक अन्तर क्या है? विषय में लगी रहती है। जिसके प्रति मोह है उसके वियोग में रोता रहेगा तो समाधान :- गुरुकुल का अध्ययन व्यक्ति को योग्यता देता था, पढ़ेगा क्या! पढ़ने के लिये कभी घर भी छोड़ना पड़ता है। जो घर का, चरित्र तथा स्वाभिमान देता था। उसका जीवन ही सर्टिफिकेट होता था, माता-पिता का मोह करेगा वह पढ़ाई नहीं कर पाएगा। कोई कागज नहीं। महर्षि कणाद खेतों में गिरे हुए अन्न के कणों का भोजन विद्यार्थी का शरीर और इन्द्रियाँ स्थिर होने चाहिए, उसमें चपलता करके अपना जीवन निर्वाह करते थे। जब राजा उनके पास बहुत सा सामान नहीं रहनी चाहिए। जो चपल होता है वह दीर्घग्राही नहीं हो पाता, किसी लेकर गया तो उन्होंने उसे लेने से इन्कार कर दिया। देखिए, जीवन में क्या विषय को लम्बे काल के लिये ग्रहण नहीं कर सकता। एक और बड़ा दोष है स्वाभिमान है। गोष्ठी, बैठ कर आपस में दुनिया भर की फालतू गप्पें हाँकना। इसमें बहुत आज की शिक्षा कागजी सर्टिफिकेट अवश्य देती है पर स्वाभिमान समय व्यर्थ होता है। विद्यार्थियों को बैठ कर आपस में अपने विषय की नहीं देती। जब व्यक्ति के जीवन में स्वाभिमान नहीं होगा तो उसे चाहे पैसे से चर्चा करनी चाहिए। यदि साधक है तो परमेश्वर की चर्चा करे। बुद्धि का खरीद लो या भय से झुका लो! जैसे किसी पशु को चारा देकर बुला लेते हैं

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग- ३ विविध

या डण्डा दिखाकर नियन्त्रण में कर लेते हैं। को प्रवचन के लिये बुलाया गया। प्रत्येक वक्ता को पाँच-पाँच मिनट का गुरुकुल में गुरु और शिष्य के मध्य धन का कोई सम्बन्ध नहीं था। समय दिया गया। एक वक्ता ने बहुत हठ किया कि हमें दस मिनट चाहिए। पढ़ाने वाले लोगों की व्यवस्था राजा करता था या जनता करती थी। प्रबन्धक ने कहा - "ठीक है, परन्तु आप क्रोध के विषय में बोलेंगे।" वक्ता इसलिये उनका विद्यार्थी से कोई स्वार्थ नहीं होता था। वे अपना सम्पूर्ण बल ने बोलना शुरु किया - "आजकल लोगों को क्रोध बहुत आता है। क्रोध उसके चरित्र-निर्माण में लगाते थे। विद्यार्थी भी विद्या पूर्ण होने पर नहीं करना चाहिए।" क्रोध के बहुत से दोष गिनाये। विद्वान् तो थे ही, समावर्तन-संस्कार के समय विद्या का ऋण चुकाने के लिये जो वस्तु गुरुजी विषयनिरूपण में किसी प्रकार की कमी नहीं थी। छः मिनट के पश्चात् को अत्यन्त प्रिय होती थी वह श्रद्धा से उन्हें समर्पित करता था। इस प्रकार प्रबन्धक ने किसी को संकेत किया तो वक्ता के सामने से माईक हटा दिया गुरु और शिष्य के मध्य एक पवित्र सम्बन्ध बनता था जो जीवन भर रहता गया। यह देखकर उनको स्टेज पर ही इतना क्रोध आया जिसका वर्णन था। आजकल विद्यार्थी और अध्यापक के बीच में धन का सम्बन्ध अधिक करना कठिन है। पता नहीं प्रबन्धक को क्या-क्या बोल दिया। उनका क्रोध दिखाई देता है, जिससे न पढ़ने वाले में श्रद्धा है न पढ़ाने वाले में दृढ़ देखकर जनता हँसने लगी। प्रबन्धक ने कहा - "क्षमा कीजिए महाराज! संकल्प। इसलिये पढ़ने वाला भी सर्टिफिकेट ही चाहता है। आप क्रोध पर बोल रहे थे।" वस्तुतः किसी विषय को पढ़ने का प्रयोजन यही होना चाहिए कि बस यही बात है, वाणी से निरूपण करना अलग बात है और उसे आप उसे दूसरे को भी पढ़ा सकें। पहले ऐसा ही होता था। व्यवहार में लाना अलग। शब्द को रटने मात्र से काम नहीं चलता। जैसे

**** किसी ने तोते को रटा दिया, बिल्ली आये तो उड़ जाना। वह रटता रहा - जिज्ञासा :- आप प्रायः कहते रहते हैं "जीवन से जीवन का प्रचार "बिल्ली आये तो उड़ जाना, बिल्ली आये तो उड़ जाना ........ ।" इतने में होता है।" यह कैसे होता है? बिल्ली आई पर वह बैठा-बैठा रटता रहा, बिल्ली उसे चट कर गई। समाधान :- सरल सी बात है कि जीवन से जीवन का प्रचार होता है अर्थ को धारण न किया हुआ ऐसा शब्द किस काम का? वह न तो और वाणी से वाणी का। यदि आपने जीवन में सत्य को धारण नहीं किया स्वयं अपना जीवन बना सकता है और न किसी अन्य का। और सत्य के विषय में केवल भाषण पर भाषण ही देते रहे तो सुनने वाला ****

भी भाषण देना सीख लेगा। वह अपने जीवन में सत्य का आचरण नहीं कर जिज्ञासा :- संवेदनशीलता और स्वसंवेद्य में क्या अन्तर है? पाएगा। आप किसी को बोलने की कला दे सकते हैं पर जीवन नहीं दे समाधान :- जो व्यक्ति दूसरों के दुःख समझता है उस व्यक्ति को सकते। इसके लिये आपको अपना जीवन वैसा बनाना पड़ेगा। आज समाज संवेदनशील कहा जाता है। आजकल व्यावहारिक भाषा में संवेदनशीलता में सबसे बड़ी समस्या यही है कि व्यक्ति अपने आचरण पर ध्यान ही नहीं का अर्थ है दूसरों के दुःख को अनुभव करके उसे दूर करने का प्रयास देता। इसका परिणाम आप देख ही रहे हैं। करना। एक बार गीताभवन, इन्दौर में गीता जयन्ती के पर्व पर महात्माओं

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग -३ विविध

आपके अन्दर बहुत से गुण ऐसे हैं जो दूसरों के द्वारा भी जाने जा जिसको जीवन में सब कुछ मान लिया, उसे इष्ट कहते हैं। इसलिये किसी सकते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें आप ही जान सकते हैं दूसरा नहीं जान का इष्ट धन है, किसी का पद-प्रतिष्ठा है, किसी का स्त्री है, किसी विरले का सकता। ऐसे गुणों को स्वसंवेद्य कहते हैं। ही इष्ट परमेश्वर है। जैसा-जैसा इष्ट है उसकी प्राप्ति का साधन भी वैसा- **** वैसा है। यहाँ पर एक बात अवश्य ध्यान रखें - सच्चा इष्ट परमेश्वर ही हो जिज्ञासा :- किसी-किसी बालक को पूर्व जन्म की घटनाएं याद सकता है। इसलिये उसे प्राप्त करने का ही उपाय करना चाहिए। रहती हैं। यह किस बात का लक्षण है? ****

समाधान :- शास्त्र में आता है कि किसी साधक के जीवन में जिज्ञासा :- आजकल प्रशासनतन्त्र एवं जनप्रतिनिधियों में निष्काम अपरिग्रह की प्रतिष्ठा हो जाए तो वह किसी के भी पूर्व जन्म की घटना को कर्मयोग का अभाव दिखाई दे रहा है। इसमें क्या हेतु है? जान सकता है। यह बात विशेष है। यदि किसी बालक को केवल अपने पूर्व समाधान :- आजकल प्रशासनतन्त्र में एवं जनप्रतिनिधि के रूप में जन्म की घटनाओं का स्मरण है तो यह किसी विशेष लक्षण का संकेत नहीं निष्काम कर्मयोगी का पहुँचना ही कठिन है इसलिये वहाँ निष्काम करता। हमने ऐसे बहुत से बालक देखे हैं जिनको बचपन में स्मरण रहता है कर्मयोगियों का अभाव दिखाई दे रहा है। इसमें मुख्य हेतु कालचक्र को ही और बाद में भूल जाते हैं। समझना चाहिए। यह कालचक्र घूमता रहता है। सृष्टि त्रिगुणात्मिका है। सृष्टि में किसी एक गुण का भोग होता है और अन्य की तपस्या होती है। जिस जिज्ञासा :- मनुष्य जीवन में पूर्ण स्वतन्त्र होने का क्या उपाय है? समय जिसकी प्रधानता होती है उस समय उसका भोग होता है और अन्य समाधान :- यहाँ पर स्वतन्त्रता से आपका क्या तात्पर्य है? लोक दबे रहते हैं। इसलिये उनकी तपस्या होती है। में जिस स्वतन्त्रता की प्रसिद्धि है वह तो किसी मनुष्य के लिये सम्भव नहीं पहले जमींदार लोगों का भोग होता था और छोटे लोगों की है। शरीर की दृष्टि से तो न कोई व्यक्ति स्वतन्त्र है न ही कोई राष्ट्र और न ही तपस्या। आज उसका उल्टा देख रहे हैं। उनको जो पहले दबाया गया यह प्रकृति। सभी किसी न किसी नियम सेबँधे हुए हैं। हाँ! स्वरूप की दृष्टि से उसी का परिणाम है। उनकी तपस्या हो गई और वे ऊपर आ गये। आज सभी स्वतन्त्र हैं। इसलिये अगर आपको पूर्ण स्वतन्त्रता चाहिए तो उनसे डरना पड़ रहा है। यह परिवर्तन ऐसे ही नहीं हुआ। इसके पीछे यही स्वरूपप्राप्ति का उपाय करना चाहिए। रहस्य है। इसी प्रकार वर्तमान में सत्त्वगुण की तपस्या चल रही है और

**** रजोगुण तथा तमोगुण का भोग चल रहा है। इसलिये वर्तमान में सत्त्व का जिज्ञासा :- इष्ट किसे कहते हैं? उसकी प्राप्ति के लिये क्या करना फल दिखाई नहीं दे रहा है। आजकल सात्त्विक लोगों को सहन करना ही

चाहिए? पड़ता है। लोग भी रजोगुण और तमोगुण का ही आधार लेना अधिक उचित समाधान :- जो अत्यन्त चाह का विषय हो उसे इष्ट कहते हैं। समझते हैं। किसी राजनैतिक दल ने किसी गुण्डे को प्रतिनिधि बनाया है तो दूसरे दल वाले भी गुण्डे को ही प्रतिनिधि बनाएंगे। उनसे पूछो कि गुण्डा

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ विविध जीतकर क्या करेगा तो कहेंगे इसके अतिरिक्त कोई समाधान नहीं है। सज्जन गया है। उनमें से कोई एक अर्थ प्रकरणवश लेना पड़ता है। लोक में प्रसिद्ध व्यक्ति उसका मुकाबला नहीं कर सकता। है, आदत को स्वभाव कहते हैं। प्रकृति को भी स्वभाव कहते हैं - ऐसे में निष्काम कर्मयोगी मिलने कठिन हैं पर एक बात निश्चय स्वभावस्तु प्रवर्तते ..... (गीता - ५.१४) करके रखनी चाहिए कि वर्तमान में आप जो सत्त्व का बीज बो रहे हैं वह इस श्लोक में स्वभाव शब्द का अर्थ अज्ञानात्मिका प्रकृति है। निष्फल नहीं जाएगा। एक समय अवश्य आएगा कि जब सत्त्व की तपस्या व्याकरण की दृष्टि से देखा जाए तो स्वस्य भाव: स्वभावः, यहाँ स्वभाव बढ़ जाएगी और रजोगुण-तमोगुण भोग से थक कर कमजोर हो जाएंगे। का अर्थ स्वरूप होता है। इसलिये कहीं पर उसका प्रयोग परमात्मा के तब सृष्टि में कोई ऐसी हलचल होगी जिससे लोगों की सोच ही बदल स्वरूप के लिये किया जाता है। प्रकरणवश अन्य भी अर्थ हो सकते हैं। जाएगी। यह विचार उत्पन्न होने लगेगा कि भौतिकवाद तो विनाश की ओर ले जाने वाला है। तब लोगों का मन अध्यात्म की ओर झुकेगा। उस समय जिज्ञासा :- व्यक्ति की इच्छाएं, संकल्प, विचार इत्यादि क्या सत्त्व प्रबल हो जाएगा, उसकी जय होने लगेगी। तब समाज में चाहे वह उसकी मौलिकता है? प्रशासनतन्त्र में हो या जनप्रतिनिधि के रूप में, कर्मयोगी दिखाई देने लगेंगे। समाधान :- मौलिकता का अर्थ होता है जो वस्तु पहले नहीं थी **** और अब आपने उसे बनाया है। इच्छाएं, संकल्प आदि में आपकी जिज्ञासा :- क्या वृक्षों में भी जीव कला होती है? मौलिकता है ऐसा नहीं कह सकते। वे दुनियाभर की आपने बाहर से ले रखी समाधान :- वृक्षों में भी जीव कला होती है। उनमें भी परस्पर है। स्पर्धा होती है, संवेदना होती है। उनको कोई काटने के लिये जाता है तो उनको भय लगता है। परन्तु जैसे सुषुप्ति में किसी को मच्छर काटे तो जिज्ञासा :- तर्जनी अंगुली को दिखाना बुरा क्यों मानते हैं? उसका अनुभव जाग्रत की अपेक्षा कम होता है। इसी प्रकार वृक्षों में संवेदना मनुष्यों की अपेक्षा कम होती है और वह अधिक समय तक नहीं रहती। समाधान :- यह तो एक परम्परा बन गई है कि एक को देख-सुन कर दूसरा बुरा मानता है। वस्तुतः इसमें रहस्य भी है। हमारे शरीर में इसपर बड़ा रिसर्च हो रहा है कि वृक्षों को जब कोई व्यक्ति पानी देता है या रोजाना देखभाल के लिये जाता है तो यह देखकर उनको प्रसन्नता होती है विद्युतशक्ति का संचार हमेशा होता रहता है। दाहिने हाथ की तर्जनी को दिखाकर इशारा करने से, उससे दन्त मंजन करने से या जप करते समय जिससे उनका पोषण होता है। माला को उससे स्पर्श करने से वह संचार उस अंगुली के माध्यम से क्षीण **** होता है। इसलिये दाहिने हाथ की तर्जनी अंगुली दिखाने वाले को हानि जिज्ञासा :- स्वभाव शब्द का अर्थ क्या है? समाधान :- शास्त्र में स्वभाव शब्द का प्रयोग बहुत अर्थों में किया होती है। ****

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ विविध

जिज्ञासा :- कभी-कभी कुछ विशेष घटनाएं दिख जाती हैं जो बदलते रहते हैं जिससे भोग में भी भेद आ जाता है। बहुत समय तक मन में घर करके रहती हैं। उनको कैसे निकाला जाए? जिज्ञासा :- किसी सन्त ने बताया कि एक सूर्यग्रहण में कलियुग समाधान :- उनको विशेष मानना ही गलती हो जाती है। संसार की की आयु के सौ वर्ष क्षय हो जाते हैं। शास्त्र में वर्णित कलियुग के अन्त में किसी घटना को आश्चर्य के रूप में नहीं देखना चाहिए। आश्चर्य के रूप में होने वाला धर्म का ह्रास कलियुग के प्रथम चरण में ही दृष्टिगोचर भी हो रहा देखने का मतलब उसके संस्कार को अन्दर प्रवेश करने के लिये दरवाजा है। तो क्या इस समय कलियुग का अन्तिम चरण समझ लेना ठीक है? खोल देना। इसलिये जीवन में एक सूत्र बना कर रखना चाहिए जो हमेशा समाधान :- सन्त की बात को कौन काट सकता है। इस समय यदि स्मरण में रहे - संसार में ऐसा होता ही रहता है। यह कोई नई बात नहीं कलियुग के अन्तिम चरण का लक्षण घट रहा है तो आप वही समझ लो। पर है। इस प्रकार देखने से वह घटना अन्दर घर नहीं कर पाएगी। जब उस घटना एक बात समझने की है- ज्योतिषशास्त्र में एक सिद्धान्त है कि ग्रहों की के संस्कार टिकेंगे ही नहीं तो बाहर निकालने की आवश्यकता नहीं रहेगी। महादशा में अन्तर्दशा भी चलती है। जैसे यदि शनि की महादशा आपको

**** चल रही है तो उस अन्तराल में प्रत्येक ग्रह की अन्तर्दशा भी आएगी। मान

जिज्ञासा :- कल्पभेद क्यों होता है? प्रत्येक कल्प में सृष्टि एक लीजिए गुरु की अन्तर्दशा आई और गुरु आपकी कुण्डली में अच्छे स्थान

जैसी क्यों नहीं होती? पर है, तो उस महादशा में भी आपके जीवन में अच्छी घटनाएँ आएँगी। यदि

समाधान :- सृष्टि का नियम है, पहले दिन होता है फिर रात आ अशुभ ग्रह की अन्तर्दशा आई, तो हानि हो जाएगी। समष्टि में भी इस समय

जाती है। उसमें लोग सो जाते हैं। जब उठोगे तो दिन बदल जाएगा या नहीं? कोई ऐसी अन्तर्दशा मालूम पड़ती है जिससे धर्म का ह्रास तेजी से हो रहा

तुम जब सोकर उठते हो तो दूसरे दिन सारा व्यवहार पिछले दिन जैसा नहीं है। पहले जो परिवर्तन सौ वर्षों में होता था वह आज दो-तीन वर्षों में ही

करते। कुछ व्यवहार पूर्व के समान होता है तो कुछ अलग भी होता है। इसी दिख रहा है।

प्रकार जब ब्रह्मा की रात्रि आएगी तो प्रलय हो जाएगा, सारी सृष्टि सो कलियुग अभी समाप्त होगा या बाद में इसको देखने कौन आएगा?

जाएगी। जब ब्रह्मा जागेंगे तो दूसरा कल्प प्रारम्भ होगा। जब ब्रह्मा की आयु अन्तिम चरण है या प्रथम इस विचार में कोई सार नहीं है। सार तो इसी में है

समाप्त होगी तो महाप्रलय होगा। नये ब्रह्मा के आने पर नया महाकल्प कि इस समय जो सुविधा है उसका उपयोग करके हम अपने जीवन को ऐसा

प्रारम्भ होगा। बना लें कि किसी युग का कोई प्रभाव हम पर न पड़े। दुनिया को तो तुम सत्संग में रोज बैठते हैं तो मालूम पड़ता है कि समान लोग बैठे हैं। बचा नहीं सकते और नही वह तुम्हारी जिम्मेदारी है। वह तो भगवान् की परन्तु बहुत से समान होने पर भी कुछ व्यक्ति बदल जाते हैं। इसी प्रकार नये जिम्मेदारी है। तुम तो भगवान् की शरण लेकर अपने को बचा लो इसी में कल्प में बहुत कुछ पिछले कल्प की समानता होने पर भी कई बातों में बुद्धिमानी है।

भिन्नता आ जाती है। इसका कारण यही है कि जीवों के कर्म और संस्कार **** जिज्ञासा :- गृहस्थ और विरक्त के लोकसंग्रह में क्या अन्तर है?

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ विविध

विरक्त महात्मा भी आजकल लोकोपकारी कार्य कर रहे हैं। क्या यह उचित एषणात्रय का त्याग करके आता था। अनिकेतः, समः शत्रौ च मित्रे च,

है ? सर्वारम्भपरित्यागी, समः सङ्गविवर्जितः, ध्यानयोगपरो नित्यम् यही

समाधान :- महाभारत में कहा है- उसकी जीवन चर्या थी। उसको छोड़कर यदि वह प्रवृत्ति में लग जाए तो

द्वावेव न विराजेत विपरीतेन कर्मणा। निवृत्ति का वेष पहनने से क्या मतलब हुआ। पढ़ने के लिये, निर्माण करने

गृहस्थश्च निरारम्भ: कार्यवांश्चैव भिक्षुकः॥(उद्योगपर्व-३३.५७) के लिये संन्यास की कोई जरूरत नहीं है।

शास्त्र का तात्पर्य यही है कि संन्यासी को अपनी निष्ठा में रहना परन्तु आज की परिस्थिति में अन्य प्रकार से सोचना पड़ता है।

चाहिए और गृहस्थ को अपनी निष्ठा में। गृहस्थ को सदा ही कुछ न कुछ व्यक्ति का संन्यास यदि शास्त्र के अनुसार नहीं हुआ है, उसमें एषणा बाकी

निर्माण, कुछ आयोजन करते रहना चाहिए। कभी यज्ञ का आयोजन करे तो है, निरन्तर वेदान्त-चिन्तन की सामर्थ्य नहीं है तब तो उसे निष्काम कर्म का

कभी दान का, कभी मन्दिर बनाने का तो कभी धर्मशाला बनाने का अथवा अनुष्ठान करना ही पड़ेगा। आश्रम में झाडू भी लगानी पड़ेगी, भोजन भी कभी घर बनाने का ही आयोजन करे। यही उसकी शोभा है, पैसे का अधिक बनाना पड़ेगा, अन्यथा उसकी चित्तशुद्धि कैसे होगी, जगत् से पूर्ण वैराग्य

संचय नहीं करना चाहिए। प्राचीन काल में हमारे देश में परम्परा थी कि पैसा कैसे होगा। वहाँ रहकर जब व्यवहार को ठीक से पढ़ लेगा तो उसका मन

इकठ्ठा होने पर राजा और सेठ लोग यज्ञ करते, मन्दिर बनाते, दान देते थे। जगत् से उठ जाएगा। यदि वह अपने लक्ष्य को ठीक रखे तो वहाँ से आगे

यज्ञ करने से पैसा समाज में बँट जाता था और करने वाले को यश मिलता बढ़ जाएगा।

था। यश बहुत बड़ी चीज होती है, इसके लिये व्यक्ति कितना भी पैसा खर्च आज संन्यासी लोग बहुत से लोकोपकारी कार्य कर रहे हैं।

कर सकता था, पहले भारत में यही गणित था। यज्ञ करने वाले को जीवित अस्पताल, स्कूल, गोशाला चला रहे हैं। हम इन सब को खराब तो नहीं

रहते हुए समाज में यश मिलता था और मरने पर स्वर्ग। अतः समाज में धन मानते परन्तु यह विरक्त की शोभा नहीं है। हर पार्ट की एक शोभा होती है। ये

का वितरण होता रहता था। कर्म शास्त्र के विपरीत नहीं है, परन्तु संन्यास धर्म के विरुद्ध हैं। वे लोग

हमारे आज के नेता लोग यह यज्ञस्पर्धा नहीं बना पाये। नहीं तो गैरिक वस्त्र की निष्ठा में नहीं चल रहे हैं। लोकोपकार करने के लिये संन्यास

आज किसी से बिना कर्जा लिये ही सारा विकास हो गया होता। नेता लोग की क्या आवश्यकता है? हमारे पास एक महात्मा आये थे जो सफेद वस्त्र

तो जनता के पैसे से, कर्ज के पैसे से स्वयं यश लेना चाहते हैं। जो व्यक्ति में रहते हैं और दो लाख गायों की सेवा कर रहे हैं। सफेद वस्त्र में रहने से

गरीबों को मकान बनाकर दे, पुल बनवाए, सरकार की ओर से उसका नाम क्या वे सेवा नहीं कर पा रहे हैं।

टी.वी. पर दिया जाए, स्तम्भ पर लिखा जाए तो समाजसेवा की होड़ लग विरक्त का लोकसंग्रह यही है कि अपने लक्ष्य के प्रति, अपने

जाएगी। इस प्रकार से कुछ न कुछ आरम्भ करना यह गृहस्थ का लोक संग्रह संन्यास-धर्म के प्रति निष्ठा में रहे और गृहस्थ का लोकसंग्रह यही है कि

है। शास्त्र के अनुसार गृहस्थ-धर्म का पालन करे। गृहस्थ का काम विरक्त करे

प्राचीन काल में संन्यासी की भूमिका एकदम अलग थी। वह तो और विरक्त का काम गृहस्थ करे यह विपर्यय ठीक नहीं।

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ विविध

जिज्ञासा :- जो संसार वास्तव में है नहीं उसको इतनी शक्ति कहाँ से भाव है, वह अमृत है। पर सच्चा प्रेम बहुत कठिन है। जिसे जगत् के लोग मिलती है कि वह बड़े-बड़े ऋषियों को भी हरा देता है। प्रेम कहते हैं वह तो प्रेम है ही नहीं। जहाँ स्वार्थ का किंचित् भी सम्बन्ध है समाधान :- आप यह बताओ, जो स्वप्न है ही नहीं उस स्वप्न को वहाँ प्रेम नहीं है। अपरोक्ष आत्मज्ञान का सम्बन्ध भी हृदय से होता है इतनी शक्ति कहाँ से मिलती है कि वह आपको सुखी-दुःखी कर देता है, क्योंकि उसका हेतु ईश्वर से सच्चा प्रेम(पराभक्ति) ही बनता है। इस दृष्टि से भयभीत कर देता है, परेशान कर देता है। यह तो आपका रोज का अनुभव है अपरोक्ष ज्ञान और प्रेम में अन्तर नहीं है। और आप यह भी जानते हैं कि स्वप्न झूठा होता है, अर्थात् वास्तव में होता ****

ही नहीं। सामने रस्सी पड़ी है और आपके मन में आ गया कि यह सांप है तो जिज्ञासा :- सर्वश्रेष्ठ शक्ति किसको माना गया है?

आप भयभीत हो जाएंगे। वहाँ से भागेंगे तो हो सकता है कि गिरकर हाथ- समाधान :- किसी भी वस्तु में जो कार्य करने की क्षमता है उसको पैर टूट जाए, यहाँ तक कि व्यक्ति भय से मर भी सकता है। अब बताओ शक्ति कहते हैं। शक्ति तो अनन्त प्रकार की हैं। जैसे अग्नि में दाहिका शक्ति, रस्सी में सांप पैदा होता है क्या? जो चीज उत्पन्न ही नहीं हुई वह भय पैदा बीज में अंकुरोत्पादन शक्ति, ऐसे ही अनेक प्रकार की शक्तियाँ हैं। शारीरिक कर रही है, मृत्यु का हेतु बन रही है। उसे कहाँ से बल मिल रहा है? रस्सी बल, धनबल, जनबल ये सब शक्ति के ही भेद हैं। इन सबमें आध्यात्मिक का जो अज्ञान है उसी से बल मिल रहा है। शक्ति सर्वश्रेष्ठ है। योगसूत्र के भाष्य में भी बताया है कि अन्य भौतिक इसी प्रकार स्वरूप के अज्ञान से संसार को बल मिल रहा है। संसार शक्तियों से जो कार्य नहीं हो सकता वह आध्यात्मिक शक्ति से सम्पन्न हो में खुद का कोई बल नहीं है, यह तो मायिक है। संसार से जीव का कोई सकता है। सम्बन्ध नहीं है, परन्तु यह जीव जो मैं और मेरा की सृष्टि कर लेता है वही इसके बन्धन तथा पराजय का हेतु बन जाती है। यही माया है। बाहर का जिज्ञासा :- हम पढ़ाई तो बहुत करते हैं पर परीक्षा देते समय बहुत संसार हमारा कुछ नहीं बिगाड़ता, हमने अज्ञान से मन में जो संसार बना गलतियाँ हो जाती हैं। इसे कैसे सुधारें? रखा है वही बन्धन में डालता है। मैं का अर्थ शरीर हो ही नहीं सकता, परन्तु समाधान :- विद्यार्थी को लिखने का अभ्यास अधिक करना यही अर्थ मन में बैठा है। यह गलत ज्ञान ही सारी समस्या का मूल है। चाहिए। नोट्स बनाने की आदत बनानी चाहिए। लिखने का काम अधिक करोगे तो परीक्षा में गलतियाँ कम होंगी। दूसरी बात यह है कि पढ़ाई एक जिज्ञासा :- ज्ञान और शुद्ध प्रेम में क्या अन्तर है? व्यवस्थित तरीके से करनी चाहिए। जब तुमने एक पाठ पढ़ लिया तो पुस्तक समाधान :- ज्ञान का सम्बन्ध बुद्धि से है और प्रेम का हृदय से। को बन्द कर दो, फिर आँख बन्द करके जो पढ़ा उसे मन में दोहराओ, बुद्धि में चालाकी रहती है, इसलिये ज्ञान में चालाकी आ सकती है, चाहे उसपर विचार करो। यह पढ़ाई का ठीक तरीका है। भले ही थोड़ा पढ़ो पर वह ज्ञान संसार का हो चाहे आत्मा का बौद्धिक ज्ञान हो। प्रेम तो हृदय का इस तरीके से उसे अपने मन में पक्का बैठाते रहो। यदि ऐसा करोगे तो तुम्हें

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ विविध

अपना पाठ लम्बे समय तक याद रहेगा, तब परीक्षा के समय गलतियाँ कम समाधान :- स्वप्न एक स्वाभाविक अवस्था है, वह सबको आती होंगी। इन दो बातों पर ध्यान देने से विद्यार्थी को बहुत लाभ हो सकता है। ही है। जैसे जाग्रत एक अवस्था है, उसी प्रकार से स्वप्न और सुषुप्ति भी **** अवस्थाएँ हैं। हमारे अन्दर इस जन्म के और पूर्व जन्मों के अनेक संस्कार जिज्ञासा :- भूत-प्रेत क्या वास्तव में किसी से मिलते हैं? शास्त्रों में हैं, उनको लेकर ही स्वप्न आ जाते हैं। स्वप्न आने के वैसे बहुत-से कारण कहीं-कहीं ब्रह्माजी के लिए भूत शब्द का प्रयोग क्यों किया गया है? हैं। शरीर में वात, पित्त और कफ के बढ़ने पर अलग-अलग प्रकार के स्वप्न समाधान :- हम तो बहुत जगह श्मशान में भी बैठे हैं, पर हमें कोई दिख सकते हैं। जैसे वात बढ़ जाए तो आप अपने को आकाश में उड़ते देख भूत नहीं दिखा। परन्तु शास्त्र कहता है कि भूत-प्रेत आदि योनियाँ होती हैं, सकते हैं। इसलिए हम उसे मानते हैं। जब शास्त्र के आधार पर ही हम देवता, स्वर्ग, स्वप्न आने में स्थान का भी प्रभाव होता है। यदि किसी गलत स्थान ब्रह्म सबके बारे में जान रहे हैं तो फिर भूतयोनि के विषय में क्यों विवाद पर आप सोये हैं जहाँ प्रेतात्माओं का निवास हो, तो प्रायः आपको बुरे करें? भूतयोनिवाला भूतकाल की सारी बातें जान लेता है, पर भविष्य की स्वप्न आएँगे। कई बार भोजन के प्रभाव से भी स्वप्न आते हैं, यदि भोजन नहीं जान सकता, इसीलिए उसका नाम भूत है। शास्त्रों में कहीं-कहीं भूतों बनाने वाले व्यक्ति में अथवा जिस पैसे से अन्न आया है उसमें अथवा बनाने की गिनती देवयोनि में भी की जाती है क्योंकि उनमें विशेष शक्ति रहती है। के स्थान में कोई दोष हो तो ऐसे भोजन को खाने पर आपको गलत स्वप्न वे अपना रूप बदल सकते हैं, उनका शरीर वायुमय होता है, उन्हें कहीं आ सकते हैं। आने-जाने में दीवार आदि की रुकावट नहीं रहती, इसी प्रकार और भी उनमें कई बार स्वप्न आगामी घटना के सूचक भी होते हैं, इनमें भी दो

कई शक्तियाँ होती हैं। प्रकार हैं - कुछ स्वप्न तो आनेवाली घटनाओं का परोक्षरूप से संकेत देते शास्त्र में ब्रह्माजी को भूत कहा इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। शास्त्र में हैं, स्पष्ट नहीं बताते। कुछ स्वप्न ऐसे भी होते हैं जिनमें आगे होनेवाली तो ब्रह्म को भी महाभूत कहा है - अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यद् घटना स्पष्ट दिख जाती है। अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को अपनी ऋग्वेदो यजुर्वेद: सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस .. ।(बृ.उप .- २.४.१०) जो भी मृत्यु से पहले ठीक वैसी घटना दिख गई थी। उन्होंने अपने मित्र को बताया सिद्ध (पहले से मौजूद) वस्तु है उसका नाम भी भूत है। आकाशादि था, मैंने ऐसा स्वप्न देखा कि अमुक स्थान पर मैं भाषण दे रहा हूँ तब एक पञ्चतत्त्वों को भी भूत शब्द से कहा जाता है। सभी प्राणियों के लिए भी भूत आदमी ने मुझे गोली से मार दिया। इसके कुछ दिन पश्चात् ही ठीक उसी शब्द का प्रयोग गीता आदि ग्रन्थों में किया ही गया है। प्रकरण देखकर ही स्थान पर उसी तरह उनकी मृत्यु हुई। किसी शब्द का अर्थ लगाना चाहिए। कुछ स्वप्न संकेत से सूचना देते हैं, उनको स्वप्नविद् ही जान सकते हैं। जैसे स्वप्न में श्वेत वस्तु का दर्शन शुभ माना जाता है, परन्तु कपास को जिज्ञासा :- स्वप्न क्यों आते हैं? स्वप्न आना ठीक है अथवा नहीं? छोड़कर। स्वप्न में काली वस्तु का दर्शन प्रायः अशुभ मानते हैं, परन्तु काली गाय, हाथी और सर्प इनका दर्शन शुभ होता है। जाग्रत की भाषा से

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ विविध स्वप्न की भाषा भिन्न है। जैसे जाग्रत में कहीं आपका पैर विष्ठा में पड़ जाए समाधान :- आज के युग में विज्ञान से बहुत लाभ हो रहा है, यह तो बहुत खराब है, परन्तु स्वप्न में ऐसा दिखे तो शुभ मानते हैं, समझते हैं बात निःसन्देह सत्य होने पर भी यह सम्भव नहीं है कि किसी एक वैज्ञानिक कि आपको धन प्राप्त होनेवाला है। ने भौतिकवाद को आधार बनाकर कुछ कल्पना की तो उसको हम भी मानने स्वप्न एक अवस्था है और वह सभी में आती है। ऐसा मत समझिए लगें। बहुत-से वैज्ञानिक भी इस सिद्धान्त से सहमत नहीं हैं। यदि उनके तर्कों कि कुछ व्यक्तियों को स्वप्न नहीं आते। स्वप्न शास्त्र में वर्णित अवस्था है, पर विचार करें तो केवल तर्क की कोई गति नहीं होती है क्योंकि एक व्यक्ति वह सभी को आएगी ही, किसी को याद न रहता हो यह अलग बात है। आपने पूछा है स्वप्न आना ठीक है या नहीं? वह तो एक अवस्था है, अपने तर्क के आधार पर किसी वस्तु की सिद्धि करता है तो दूसरा उसको अपने तर्क से खण्डित कर देता है, तब तर्क की गति कहाँ हुई? इसलिए आएगी ही, उसको ठीक-खराब क्या कहें? जाग्रत को आप ठीक कहें और तर्क कोई अन्तिम निर्णय नहीं है। इस विषय में शास्त्र के प्रति श्रद्धा रखकर स्वप्न को खराब, इसमें तो कोई कारण नहीं दिखता। उसे ही प्रमाण मानें तो उचित होगा। हमारे वेद पक्षपातरहित, निर्दोष ईश्वर स्वप्न का आत्मविचार में भी बड़ा महत्व है। स्वप्नावस्था के के द्वारा उपदिष्ट हैं और उनका कथन है कि चैतन्य शरीर नहीं है, वह शरीर से विचार से हमें आत्मा की स्वयंप्रकाशता स्पष्ट हो जाती है, साथ ही जगत् पृथक् है। बहुत-से महापुरुषों ने ज्ञान प्राप्त करके ऐसा अनुभव भी किया है। का मिथ्यात्व सिद्ध करने के लिए स्वप्न एक सटीक दृष्टान्त है। स्वप्न में जो वस्तुतः चैतन्यस्वरूप जो आत्मा है वह किसी वैज्ञानिक की पदार्थ दिखते हैं उस समय एकदम सत्य मालूम पड़ते हैं। स्वकाले सत्यवद् प्रयोगशाला में सिद्ध होनेवाली वस्तु नहीं है। वैज्ञानिक तो वस्तु की खोज भाति, परन्तु जागने पर - प्रबोधे सत्यसद् भवेत् (आत्मबोध-६), उसके गुण को आधार मानकर बुद्धि से करता है, पर आत्मा न तो गुणवाला एकदम से मिथ्या हो जाते हैं। जैसे स्वप्न में पदार्थ दिखने पर भी मिथ्या है और न ही बुद्धि का विषय, न ही किसी वैज्ञानिक ने चैतन्यस्वरूप आत्मा होते हैं, उसी प्रकार से जाग्रत-पदार्थ भी मिथ्या हैं। इस प्रकार स्वप्न के को अभी तक किसी प्रयोगशाला में उत्पन्न किया है। अतः इस विषय में विचार से जगत्-मिथ्यात्व के चिन्तन में बहुत सहायता मिलती है। अपने को कुछ समझ में न आए तो शास्त्र-कथन और महापुरुषों का **** अनुभव ही प्रमाण मान लेना चाहिए, न कि वैज्ञानिक तर्क। जिज्ञासा :- कुछ वैज्ञानिक लोग चैतन्य की उत्पत्ति जड़ वस्तुओं **** के एक विशेष अनुपात के विशेष परिस्थिति में मिलने से मानते हैं और जिज्ञासा :- भारतीय परम्परा में अतिथि-सत्कार का बड़ा महत्व इसमें तर्क भी देते हैं। उनके तर्कों को हम एकाएक नकार भी नहीं सकते बताया गया है। पर आजकल देखा जाता है कि चाहे आश्रम हों या घर, क्योंकि आज विज्ञान से हम लोग बहुत लाभ ले रहे हैं, जिसका सभी लोग उनमें इसका ह्रास होता जा रहा है। इसका कारण क्या है और इस ह्रास को अनुभव भी करते हैं। ऐसे में वैज्ञानिक तर्क को न मानकर शास्त्र की बात को रोकने का समाधान क्या है? मानना कितना युक्तिसंगत है? समाधान :- आजकल जब सभी परम्पराओं का ह्रास हो रहा है तो

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३ विविध फिर सेवाधर्म का भी ह्रास हो रहा है, इसमें क्या आश्चर्य है! यदि ह्रास न हो जिज्ञासा :- बालक को माता उत्पन्न करती है, पालन-पोषण इत्यादि तो आश्चर्य होना चाहिए। इस ह्रास में मुख्य हेतु युग का प्रभाव ही समझना चाहिए, पर इतना होते हुए भी आजकल आश्रमों में सेवा तो हो ही रही है, भी करती है और बालक को कोई पूछे कि किसके पुत्र हो तो वह पिता का

विशेषकर वैष्णव और उदासीन आश्रमों में आज भी सेवा देखी जाती है। नाम बताता है। ऐसा क्यों?

सिक्ख सम्प्रदाय में देखो, आज भी बहुत अन्नक्षेत्र (लंगर) चलाए जाते हैं। समाधान :- यह बात प्रसिद्ध है कि क्रिया तो शक्ति ही करती है, पर

हाँ, कुछ कमी अवश्य हुई है पर यह परम्परा समाप्त नहीं हुई है। नाम शक्तिमान् का होता है। अग्नि की दाहिकाशक्ति वस्तु को जलाती है, पर

आपने इसका समाधान पूछा तो समाधान यही है कि उपदेश से काम लोग कहते हैं - अग्नि ने जलाया। यह इसलिए कि शक्ति का स्वतन्त्र

नहीं चलता। आपको ऐसा करके लोगों के समक्ष आदर्श रखना पड़ेगा। एक अस्तित्व नहीं मानते हैं, वह जो कुछ भी करती है शक्तिमान् के आश्रित

ऐसे आश्रम या घर की प्रतिष्ठा करके लोगों को दिखाना पड़ेगा, मात्र दूसरों होकर ही करती है। इस प्रकार शक्ति का यह एक त्याग ही समझना चाहिए

का दोष देखने से तो समाधान होनेवाला नहीं है। कि वह सब कुछ करते हुए भी अपनी पहचान प्रकट नहीं करती।

साधु को अन्नक्षेत्र शुरू करना हो तो उसे पहले एक बात ध्यान में माता को भी शक्तिरूपा ही समझना चाहिए और यह उसका विलक्षण

रखनी चाहिए। एक बार बाबा कालीकमलीवाले (ऋषिकेश के एक त्याग है कि बालक को उत्पन्न वह करती है, पालन-पोषण भी वही करती है, पर पहचान उसकी न होकर पिता की होती है। महात्मा) एक अन्नक्षेत्र में भिक्षा के लिए गए। वहाँ कच्ची रोटियाँ भिक्षा में मिल गईं तो उन्होंने व्यवस्थापक से शिकायत की। व्यवस्थापक ने कहा यदि इतना सहन नहीं हो रहा है तो अपना अन्नक्षेत्र खोलकर बताओ। जिज्ञासा :- भारतवासियों के स्वाभिमान का जागरण कैसे हो?

महात्मा को वह बात लग गई। उन्होंने ऋषिकेश से लेकर चारों धाम तक समाधान :- यदि कोई भारतवासियों के स्वाभिमान को देखना

बहुत-से अन्नक्षेत्र खोल दिए। चाहता है तो उसे विचार करना चाहिए कि उसका अपना जीवन वैसा है कि

परन्तु अन्तिम समय में लोगों ने उनसे जीवन का अनुभव पूछा तो वे नहीं, जैसा वह दूसरों का बनाना चाहता है। उसे पहले अपने जीवन का

बोले, यदि मैं उस दिन व्यवस्थापक की बात सहन कर लेता तो इतनी निर्माण करना पड़ेगा क्योंकि केवल भाषणबाजी से यह काम होनेवाला नहीं

आफत में न पड़ा होता। इसके लिए मुझे क्या-क्या करना पड़ा है! जो सेठ है। जब वह अपने जीवन का वैसा निर्माण कर लेगा तो समझो उसका

पहले मेरे पीछे-पीछे घूमते थे, बाद में मैं उनके पीछे-पीछे घूमता रहा और भारतवासियों के स्वाभिमान-जागरण में बहुत बड़ा सहयोग हो जाएगा

वे मिलने के लिए तैयार नहीं थे। इतनी दीनता का मैंने जीवन में अनुभव क्योंकि उसको अन्दर से यह विश्वास हो जाएगा कि आज भी भारत का

किया। यह उनका अन्तिम समय का अनुभव था। इसलिए प्रश्नकर्ता को व्यक्ति अपने स्वाभिमान का निर्माण कर सकता है। नहीं तो आप वाणी से

समाधान ढूँढ़ने से पहले इस बात पर विचार कर लेना चाहिए। किसी को उपदेश करेंगे तो सुननेवाला भी उपदेश करना सीख लेगा, पर जीवन का प्रचार तो जीवन से ही होता है। ****

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प्रश्नोत्तरदीपमाला भाग-३

एक-एक व्यक्ति से समाज का निर्माण होता है। ऐसे समाज में जो भी प.पू. स्वामी रामानन्द सरस्वतीजी महाराज के श्रीमुख से निःसृत

आएगा, उसको उस समाज के अनुसार बनना ही पड़ेगा। इसलिए मेरे स्वाध्याय एवं प्रवचनों की पुस्तक एवं सी.डी. की सूची विषय मूल्य रु. विचार में तो पहले बहुत आगे का न सोचकर अपने जीवन का ही निर्माण क्र. संख्या

:: पुस्तकें :: करें, फिर आगे की समस्या का समाधान हो जाएगा। प्रश्नोपनिषद् प्रवचन १ ३५ १

**** २ दक्षिणामूर्तिस्तोत्र प्रवचन 9 ३५

अमृतवचन १ ५० RU भावकुसुमाञ्जलि: १ २० ४ शिवमहिम्नःस्तोत्रम् एवं नर्मदा महिमा 9 ४० कल्पायुषां स्थानजयात् पुनर्भवात् SC प्रश्नोत्तरदीपमाला (भाग-१) १ ६० ६ क्षणायुषां भारतभूजयो वरम्। प्रश्नोत्तरदीपमाला (भाग-२) १ ५० 9 क्षणेन मर्त्येन कृतं मनस्विनः * प्रश्नोत्तरदीपमाला (भाग-३) १ ५० संन्यस्य संयान्त्यभयं पदं हरे:।। पत्रपीयूष (भाग-१) १ ५० (भागवत-५.१६.२३) १० दक्षिणामूर्तिस्तोत्र प्रवचन (अंग्रेजी) १ ४०

:: प्रवचन MP3 एवं VCD ::

2 जहाँ कल्पपर्यन्त दिव्य भोगों को भोगकर फिर संसार में लौटना गीता प्रवचन ६०

पड़ता है ऐसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति की अपेक्षा भारत-भूमि में एक क्षण २ गीता विचार ३ ६०

3 दक्षिणामूर्तिस्तोत्र १ २० की भी आयु प्राप्त करना श्रेष्ठ है। इस भारत-भूमि में बुद्धिमान् पुरुष ४ १ २० अपने मरणधर्मा शरीर से किये हुए कर्म भगवान् को अर्पण करके एक शिवमहिम्नःस्तोत्र

अमृतवचन १ २० AC क्षण में ही उनके अभयपद (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है। ६ मुण्डक प्रवचन १ २०

७ माण्डूक्य प्रवचन १ २०

बाराबंकी-प्रवचन(VCD) 3 ६०

मार्कण्डेयपुराण प्रवचन ३ ६०

:: प्रस्थानत्रय स्वाध्याय MP3 ::

१ गीता भाष्य ३४ ६८०

२ ईशावास्योपनिषद् भाष्य २०

३ केनोपनिषद् भाष्य 3 ६०

४ कठोपनिषद् भाष्य 3 ६०

प्रश्नोपनिषद् भाष्य ३ ६० AC

६ माण्डूक्योपनिषद् भाष्य १८० 3

७ तैत्तिरीयोपनिषद् भाष्य १६०

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प.पू. स्वामी रामानन्द सरस्वतीजी महाराज के श्रीमुख से निःसृत स्वाध्याय एवं प्रवचनों की पुस्तक एवं सी.डी. की सूची हमारे अन्य प्रकाशन क्र. विषय संख्या मूल्य रु. ऐतरेयोपनिषद् भाष्य १६० छान्दोग्योपनिषद् भाष्य २० ४०० १० बृहदारण्यकोपनिषद् भाष्य १२ २४० ११ ब्रह्मसूत्र भाष्य १६ ३२ भावकुसुमान्जलि SHRIDANSHINAMURTI STOTRA :: आगम स्वाध्याय MP3 :: दक्षिणामूर्ति स्तोत्र भावनोपनिषद् १ २० २ सुभगोदयस्तोत्र ६० ३ स्पन्दकारिका ३ ६० ४ शिवसूत्र ३ ६० Discoon ses by POOJYPAD SHRI SWAM ५ तन्त्रसार २ ४० RAMANANDAN SARASWATI MAKARAJ ε परमार्थसार २ ४० ७ विज्ञानभैरव ४० परात्रिंशिका १ २० पी शिवमहिम् स्तोत्रप एवं नमदा महिमा :: अन्य ग्रन्थों की MP3 :: र दीपमाला प्श्नोत्तर दीपमाला विवेकचूड़ामणि १०० = X १

२ पातञ्जलयोगसूत्र :: प्रश्नोत्तरी MP3 एवं VCD :: १ प्रश्नोत्तरी ओंकारेश्वर २५ ५00 २ प्रश्नोत्तरी सुन्दरनगर ३ ६० प्रश्नोत्तरी मानसा 20 20 ३

४ प्रश्नोत्तरी हरिद्वार १००

५ प्रश्नोत्तरी हरिद्वार(VCD) ३ ६०

६ प्रश्नोत्तरी उल्लासनगर(VDVD) ४ २०० पत्रपीयष :: MP3 :: (पू. स्वामी कृष्णानन्दजी) अमृत-वचन रकमी यमानन्दवी सरनती १ वेदस्तुति प्रश्नोपनिषद्-प्रवचन 9 २० २ देवीमाहात्म्य १ २०

स्वामी रामानन्दनी सरस्यती 272

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सबसे पहले तो शरीर की नश्वरता का विचार करना चाहिए। रोज कुछ काल ऐसा अभ्यास करो कि मेरा शरीर छूट गया है, इसे लोग चिता पर जला रहे हैं। मनरूपी नेत्र से शरीर को जलते हुए देखो और सोचो कि मैं शरीर को जलते हुए देख रहा हूँ, इसलिये मैं शरीर नहीं हूँ, इससे अलग हूँ। शरीर के जितने सम्बन्धी हैं उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसा अभ्यास दीर्घकाल तक करने पर शरीरसम्बन्धी मोह दूर होगा और देहाध्यास शिथिल हो जाएगा। यह सत्य का अभ्यास है, मैं कोई झूठ का अभ्यास नहीं बता रहा हूँ। जो घटना घटने वाली है उसी का ध्यान करने को कह रहा हूँ।

इसी पुस्तक से (पृष्ठ - १०३)

श्री मार्कण्डेय संन्यास आश्रम पब्लिक ट्रस्ट, ओंकारेश्वर