Books / Prasnottara Mani Mala Sankaracharya Gita Press

1. Prasnottara Mani Mala Sankaracharya Gita Press

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प्र० सं० १०००० सं० १९८५ द्वि० सं० ५००० सं० १९८६ तृ० सं० ५००० सं० १९८७ चं० सं० ५००० सं० १९८९ पं० सं० ५००० सं० १९९० - प० सं ८000 सं० १९९१ स० सं० ८००० सं० १९९२ अ० सं. १०००० सं० १९९४ न० सं० ९००० सं० १९९६ कुल ६५०००

मुद्रक तथा प्रकाशक-

वनश्यामदास जालान, गीताप्रेस, गोरखपुर

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श्रीहरि:

वक्तव्य

श्रीस्वरामी शङ्कराचार्यजीकी प्रश्नोत्तर-मणि- माला बहुत ही उपादेय पुस्तिका है। इसके प्रत्येक प्रश्न और उत्तरपर मननपूर्वक विचार करना आवश्यक है। संसारमें स्त्री, धन और पुत्रादि पदार्थोके कारण ही मनुष्य विशेषरूपसे वन्धनमें रहता है, इन पदाथोसे वैराग्य होनेमें ही कल्याण है, यही समझकर उन्होंने स्त्री, धन और पुत्रादिकी निन्दा की है। स्त्रीके लिये विशेष जोर देनेका कारण भी स्पष्ट है। धन, पुत्रादि छोड़नेवाले भी प्रायः स्त्रियोंमें आसक देखे जाते हैं, वास्तवमें यह दोष स्त्रियोंका नहीं है, यह दोष तो पुरुषोंके बिगड़े हुए मनका है परन्तु मन बड़ा चञ्ल है इसलिये संन्यासियोंको तो त्तियोंसे

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२ वक्तव्य 1 हर तरहसे अलग ही रहना चाहिये। जान पड़ता है कि यह पुस्तिका खासकर संन्यासियोंके लिये ही लिखी गयी थी। इसमें बहुत-सी बातें ऐसी हैं जो सभीके कामकी हैं। अतः उनसे हमलोगोंको पूरा लाभ उठाना चाहिये। स्त्री, पुत्र, धन आदि संसारके सभी पदार्थोसे यथा- साध्य ममताका त्याग करना आवश्यक है।

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श्रीपर मात्मने नमः फइनतरी अपारसंसारसमुद्रमध्ये सम्मज्जतो मे शरणं किमस्ति। गुरो कृपालो कृपया वदैत- द्विश्वेशपादाम्बुजदीर्घनौका ।१।

प्रश्न उत्तर हे दयामय गुरुदेव!कृपा' विश्वपति परमात्माके करके यह बताइये कि अपार संसाररूपी समुद्रमें चरणकमलरूपी जहाज।

मुझ डूबते हुएका आश्रय क्या है? बद्धो हि को यो विषयानुरांगी का वा विमुक्तिर्विषये विरक्तिः।

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प्रश्नोत्तरी

को वास्ति घोरो नरकः स्वदेहः तृष्णाक्षयः स्वर्गपदं किमस्ति ।२। प्रश् उत्तर वास्तवमें बँधा कौन है! विषयोंमें आसक। विमुक्ति क्या है? विषयोंसे वैराग्य। घोर नरक क्या है? अपना शरीर। स्वर्गका पद क्या है? तृप्णाका नाश होना। संसारहत्क: श्रुतिजात्मबोधः को मोक्षहेतु: कथितः स एव। द्वारं किमेकं नरकस्य नारी का स्वर्गदा प्राणभृतामहिंसा।३। प्रश्न उत्तर संसारको हरनेवाला वेदसे उत्पन्न आत्मज्ञान। कौन है? मोक्षका कारण क्या वही आत्मज्ञान। कहा गया है?

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प्रश्नोत्तरी ३

नरकका प्रधान द्वार। नारी। क्या है ? स्वर्गको देनेवाली क्या जीवमात्रकी अहिंसा। है ?- शेते सुखं कस्तु समाधिनिष्ठो जागर्ति को वा सदसद्िवेकी। के शत्रवः सन्ति निजेन्द्रियाणि तान्येव मित्राणि जितानि यानि।४। प्रश्न उत्तर (वास्तवमें) सुखसे कौन जो परमात्माके स्वरूप में सोता है? स्थित है। और कौन जागता है? सत् और असत्के

शत्रु कौन हैं? तत्वका जाननेवाला । अपनी इन्द्रियाँ। परन्तु जो जीती हुई हों तो वही मित्र हैं।

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प्रश्नोत्तरी

को वा दरिद्रो हि विशालतृष्णः श्रीमांश्र को यस्य समस्ततोषः । जीवन्मृतः कस्तु निरुद्यमो यः किं वामृतं स्यात्सुखदा निराशा।५। प्रश्न उत्तर दरिद्र कौन है? ! भारी तृण्णावाला । और धनवान् कौन है! जिसेसबतरहसे सन्तोषहै। (वास्तवमें) जीते जी मरा जो पुरुषार्थहीन है। कौन है? और अमृत क्या हो सुख देनेवाली निराशा। सकता है ? · (आशासेरहित होना) पाशो हि को यो ममताभिमान: सम्मोहयत्येव सुरेव का स्त्री। को वा महान्धो मदनातुरो यो मृत्युश्च को वापयशः सकीयम्।६।

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प्रश्नोत्तरी ५

उत्तर वास्तवमें फाँसी क्या है? प्रश्न जो 'मै' और 'मेरा'पन है। मदिराकी तरह क्या नारी ही। चीज निश्चय ही मोहित कर देती है ? और बड़ा भारी अन्धा जो कामवश व्याकुल है। कौन है? मृत्यु क्या है ? अपनी अपकीर्ति। को वा गुरुर्यो हि हितोपदेष्टा शिष्यस्तु को यो गुरुभक्त एव। को दोर्घरोगो भव एव साधो किमौषघं तस्य विचार एव /७ प्रश्ष उत्तर गुरु कौन है? जो केवल हितका ही उपदेश करनेवाला है। शिप्य कौन है? जो गुरुका भक्त है, वही।

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६ प्रश्नोत्तरी

बड़ा भारी रोग क्या है?। हे साधो ! बार-बार जन्म लेना ही। उसकी दवा क्या है ? परमात्माके स्वरूपका मनन ही। किं भूषणाद्दूषणमस्ति शीलं तीर्थं परं किं स्वमनो विशुद्धम्। किमत्र हेयं कनकं च कान्ता श्राव्यं सदा किं गुरुवेदवाक्यम्।८। प्रश्न उत्तर भूषणोंमें उत्तम भूषण। उत्तम चरित्र। क्या है ? सबसे उत्तम तीर्थ क्या है? अपना मन जो विशेषरूप- से शुद्ध किया हुआ हो। इस संसारमें त्यागने योग्य काञ्चन और कामिनी। क्या है? सदा (मन लगाकर)सुनने वेद और गुरुका वचन। योग्य क्यां हैं?

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प्रश्नोत्तरी ७

के हेतवो ब्रह्मगतेस्तु सन्ति सत्सङ्गतिर्दानविचार तोषाः 1 के सन्ति सन्तोऽखिलवीतरागा अपास्तमोहाः शिवतत्त्वनिष्ठाः।ह। प्रश्न उत्तर परमात्माकी प्राप्तिके क्या- सत्सङ्ग, सात्त्विक दान, क्या साधन हैं? परमेश्वरके स्रूपका मनन और सन्तोष । महात्मा कौन हैं ? संपूर्ण संसारसे जिनकी आासक्ति नष्ट हो गयी है, जिनका अज्ञान नाश हो चुका है और जो कल्याणरूप परमात्म- तत्त्वमें स्थित हैं।

को वा ज्वरः प्राणभृतां हि चिन्ता मूर्खोडसत को यस्तु विवेकहीनः।

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८ प्रश्नोत्तरी

कार्या प्रिया का शिवविष्णुभक्ति: किं जीवनं दोषविवर्जितं यत् ।१०। प्रश्न उत्तर प्राणियोंके लिये वास्तवमें , चिन्ता। जवर क्या है? मूर्ख कौन है? जो विचारहीन है। करने योग्य प्यारी क्रिया शिव और विष्णुकी भक्ति। क्या है ? वास्तवभेंजीवनकौन-साहैः जो सर्वथा निर्दोष है। विद्या हि का ब्रह्मगतिप्रदा या बोधो हि को यस्तु विमुक्तिहेतुः। को लाभ आत्मावगमो हि यो वै जितं जगत्केन मनो हि येन ।११। प्रश्न वास्तवमें विद्या कौन-सी जो परमात्माको प्राप्त उत्तर

करा देनेवाली है।

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प्रश्नोत्तरी ९

वास्तविक ज्ञान क्या है?। जो (यथार्थ) मुक्तिका कारण है। यथार्थ लाभ क्या है? जो परमात्माकी प्राप्ति है, वही। जगत्को किसने जीता! जिसने मनको जीता। शूरान्महाशूरतमोऽस्ति को वा मनोजबाणैर्व्यथितो न यस्तु। प्राज्ञोऽथ धीरश्ष समस्तु को वा प्राप्तो न मोहं ललनाकटाक्षैः।१२। · प्रश्न उत्तर वीरोंमें सबसे बड़ा वीर जो कामवाणोंसे पीड़ित कौन है ? नहीं होता। बुद्धिमान्, समदर्शी और जो स्त्रियोंके कटाक्षोंसे धीर पुरुष कौन है? मोहको प्राप्त न हो। विषाद्विषं किं विषया: समस्ता दुःखी सदा को विषयानुरागी।

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१० प्रश्नोत्तरी

· धन्योऽस्ति को यस्तु परोपकारी कः पूजनीयः शिवतत्वनिष्ठः ।१३। प्रश्न उत्तर विषसे भी भारी विष कौन सारे विषयभोग। है? सदा दुःखी कौन है? -जो संसारके भोगोंमें आसक्त है। और धन्य कौन है? जो परोपकारी है।

पूजनीय कौन है ? कल्याणरूप परनात्म- तत्वमें स्थित महात्मा । सर्वास्ववस्थास्वपि किन्न कार्यं किं वा विधेयं विदुषा प्रयत्नाव्। स्नेहं च पापं पठनं च धर्मं संसारमूलं हिःकिमस्ति चिन्ता।१४।

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प्रश्नोत्तरी ११

प्रश्न उत्तर सभी अवस्थाओंमें। संसारसे स्नेह और पाप विद्वानोंको बड़े जतनसे नहीं करना तथा सद्- क्या नहीं करना चाहिये ग्रन्थोंका पठन औरधर्मका और क्या करना चाहिये? पालन करना चाहिये। संसारकी जड़ क्या है? (उसका) चिन्तन ही। विज्ञान्म हाविज्ञतमोऽस्ति को वा नार्या पिशाच्या न च वंश्चितो यः। का शृङ्खला प्राणभृतां हि नारी दिव्यं वरतं किंच समस्तदैन्यम्।१५। प्रश्न उत्तर समझदारोंमें सवसे अच्छा जो स्त्रीरूप पिशाचिनी- समझदार कौन है ? से नहीं ठगा गया है। प्राणियोंके लिये साँकल नारी ही। क्या है? श्रेष्ठ व्रत क्या है? पूर्णरूपसे विनयभाव।

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१२ प्रश्नोत्तरी

ज्ञातुं न शक्यं च किमस्ति सवैं- र्योषिन्मनो यञ्चरितं तदीयम्। का दुस्त्यजा सर्वजनैर्दुराशा विद्याविहीन: पशुरस्ति को वा।१६।

प्रश्न उत्तर सब किसीके लिये क्या। स्त्रीका मन और उसका जानना सम्भव नहीं है? चरित्र। सब लोगोंके लिये क्या बुरी वासना (विषयभोग त्यागना अत्यन्त कठिनहै? और पापकी इच्छाएँ)। पशु कौन है ? जो सद्विदयासे रहित (मूर्ख) है। वासो न सङ्ग: सह कैरविघेयो मूर्खैश्च नीचैश्र खलैश् पापैः।

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प्रश्नोत्तरी १३

मुमुक्षुणा किं त्वरितं विधयं सत्सङ्गतिनिर्ममतेशभक्तिः ।१७। उत्तर किन-किनके साथ निवास मूर्ख, नीच, दुष्ट और और संग नहीं करना पापियोंके साथ। चाहिये ! मुक्ति चाहनेवालोंको सत्संग, ममताका त्याग तुरन्त क्या करनाचाहिये? और परमेश्वरकी भक्ति। लघुत्वमूलं च किमर्थितैव गुरुत्वमूलं यद्याचनं च । जातो हि को यस्य पुनर्न जन्म को वा सृतो यस्य पुनर्न मृत्युः।१८। प्रश्न छोटेपनकी जड़ क्या है? याचना ही। उत्तर

बड़प्पनकी जड़ क्या है! कुछ भी न माँगना।

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१४ प्रश्नोत्तरी

किसका जन्म सराहनीय। जिसका फिर जन्म न है ? हो। किसकी मृत्यु सराहनीय जिसकी फिर मृत्यु नहीं है ? होती। मूकोऽस्ति को वा बधिरश्च को वा वक्तुं न युक्तं समये समर्थः। तथ्यं सुपथ्यं न शृणोति वांक्यं विश्वासपात्रं न किमस्ति नारी ।१६। प्रश्न उत्तर गूँगा कौन है? जो समयपर उचित वचन कहनेमें संमर्थ नहीं है। और बंहिरा कौन है? जो यथांर्थ और हिंतकर वचन नहीं सुनता। विश्वासके योग्य कौन नारी। नहीं है ?

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प्रश्नोत्तरी १५

तत्वं किमेकं शिवमद्वितीयं किमुत्तमं सच्चरितं यदस्ति। त्याज्यं सुखं किं स्त्रियमेव सम्य- ग्देयं परं किं त्वभयं सदैव।२०। प्रश्न उत्तर एक तत्त्व क्या है? अद्वितीय कल्याण-तत्त्व

सबसे उत्तम क्या है? (परमात्मा) ।

कौन-सा सुख तज देना जो उत्तम आचरण है। सब प्रकारसे ख्त्रीका सुख चाहिये ? ही। देने योग्य उत्तम दान क्या है? सदा अभय ही।

शत्रोर्महाशत्रुतमोऽसि्ति को वा कामः सकोपानृतलोभतृष्णः । न पूर्यंते को विषयैः स एव किं दुःखमूलं ममताभिधानम्।२१।

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१६ प्रश्नोत्तरी

प्रश्न उत्तर शत्रुओंमें सबसे बड़ा भारी क्रोध, झूठ, लोभ और शत्रु कौन है ! तृष्णासहित काम। विषयभोगोंसे कौन तृप्त वही काम। नहीं होता ? दुःखकी जड़ क्या है? ममता नामक दोष। किं मण्डनं साक्षरता मुखस्य -सत्यं च किं भूतहितं सदैव। किं कर्म कृत्वा न हि शोचनीयं कामारिकंसारिसमर्चनाख्यम् ।२२/ प्रश्न उत्तर मुखका भूषण क्या है? | विद्वत्ता । सच्चा कर्म क्या है? सदा ही प्राणियोंका हित करना। कौन-सा कर्म करके भगवान् शिव और श्री- पछताना नहीं पड़ता? कृष्णका पूजनरूप कर्म।

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प्रश्नोत्तरी १७

कस्यास्ति नाशे मनसो हि मोक्ष: क् सर्वथा नास्ति भयं विमुक्तौ। शल्यं परं किं निजमूर्खतैव के के ह्युपास्या गुरुदेववृद्दा:।२३। प्रश्न उत्तर किसके नाशमें मोक्ष है?। मनके ही। किसमें सर्वथा भय नहीं है। मोक्षमें। सबसे अधिक चुमनेवाली अपनी मूर्खता ही। कौन चीज है ? उपासनाके योग्य कौन- देवता, गुरु और वृद्ध। कौन हैं ? उपस्थिते प्राणहरे कृतान्ते किमाशु कार्यं सुधिया प्रयत्नात्। वाक्कायचित्तैः सुखदं यमझनं मुरारिपादाम्बुजचिन्तनं .. च ।२४।

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१८ प्रश्नोत्तरी

प्रश्न प्राण हरनेवाले कालके उत्तर सुख देनेवाले और मृत्युका उपस्थित होनेपर अच्छी नाश करनेवाले भगवान् बुद्धिवालोंको बड़े जतन- मुरारिके चरणकमलोंका से तुरन्त क्या करना तन, मन, वचनसे उचित है ? चिन्तन करना। के दस्यवः सन्ति कुवासनाख्याः कः शोभते यः सदसि प्रविद्यः । मातेव का या सुखदा सुविद्या किमेधते दानवशात्सुविद्या।२५। प्रश्न उत्तर डाकू कौन हैं? बुरी वासनाएँ। सभामें शोभाकौनपाताहै: जो अच्छा विद्वान् है। माताके समान सुख देने- उत्तम विदा। वाली कौन है? देनेसे क्या बढ़ती है? अच्छी विद्या।

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प्रश्नोत्तरी १९

कुतो हि भीतिः सततं विधेया लोकापवादाङ्गवकाननाच को वातिबन्धु: पितरश्च के वा विपत्सहायः परिपालका ये।२६।

प्रश्न उत्तर निरन्तर किससे डरना लोक-निन्दासे और चाहिये! संसाररूपी वनसे। अत्यन्त प्यारा वन्धु जो विपत्तिमें सहायता कौन है ? करे। और पिता कौन हैं ? जो सब प्रकारसे पालन- पोपण करें। बुद्ध्वा न बोष्यं परिशिष्यते किं शिवप्रसादं सुखवोधरूपम्। ज्ञाते तु कस्मिन्विदितंजगत्स्या- तसर्वात्मके ब्रह्मणि पूर्णरूपे ।२७।

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२० प्रश्नोत्तरी

प्रश्न उत्तर क्या समझनेके बाद कुछ शुद्ध,विज्ञान, आनन्दघन भी समझना बाकी नहीं कल्याणरूप परमात्माको। रहता ? किसको जान लेनेपर सर्वात्मरूप परिपूर्ण ब्रह्म- (वास्तवमें) जगत् जाना के स्रूपको। जाता है? किं दुर्लभं सद्गुरुरस्ति लोके सत्सङ्गतिर्ब्रह्मविचारणा च। त्यागो हि सर्वस्य शिवात्मबोध: को दुर्जयः सर्वजनैर्मनोजः।२८। प्रश्न संसारमें दुर्लभ क्या है! उत्तर सद्गुरु, सत्सङ्ग, ब्रह्म- विचार, सर्वखका त्याग और कल्याणरूप परमात्माका ज्ञान ।

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प्रश्नोत्तरो २१

सबके लिये क्या जीतना कामदेव । कठिन है? पशोः पशुः को न करोति धर्म प्राधीतशास्त्रोऽपि न चात्मबोधः। किन्तद्विषं भाति सुधोपम स्त्री के शत्रवो मित्रवदात्मजाद्याः।२६।

प्रश्न उत्तर पशुओंसे भी बढ़कर पशु शास्त्रका खूब अध्ययन कौन है ? करके जो धर्मका पालन नहीं करता और जिसे आत्मज्ञान नहीं हुआ। वह कौन-सा त्रिप है जो नारी। अमृत-साजान पड़ता है? शत्रु कौन है जो मित्र-सा पुत्र आदि। लगता है?

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२२ प्रश्नोत्तरी

विद्युच्चलं किं धनयौवनायु- रदोनं परं किञ्च सुपात्रदत्तम् । कण्ठङ्गतैरप्यसुभिन कार्यं किं किं विधेयं मलिनं शिवार्चा।३०।

प्रश्न -उत्तर बिजलीकी तरह क्षणिक धन, यौवन और आयु। क्या है ? सबसे उत्तम दान कौन- जो सुपात्रको दिया जाय। सा है? कण्ठगत प्राण होनेपर पाप नहीं करना चाहिये भी क्या नहीं करना और कल्याणरूप चाहिये और क्या करना परमात्माकी पूजा करनी चाहिये ? चाहिये।

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प्रश्नोत्तरी २३

अहर्निशं किं परिचिन्तनीयं संसारमिथ्यात्वशिवात्मतत्त्वम्। किं कर्म यत्परीतिकरं सुरारे: क्कास्था न कार्या सततं भवाब्धौ ।३१।

प्रश्न उत्तर रात-दिन विशेषरूपसे संसारका मिध्यापन और क्या चिन्तन करना कल्याणरूप परमात्मा- चाहिये ? का तत्व। 11 वास्तवमें कर्म क्या है? जो भगवान् श्रीकृष्णको प्रिय हो। सदैव किसमें विश्वास संसार-समुद्रमें। नहीं करना चाहिये ? कण्ठङ्गता वा श्रवणङ्गता वा प्रश्नोत्तराख्या मणिरत्नमाला ।

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प्रश्नोत्तरी

तनोतु मोदं विदुषां सुरम्यं रमेशगौरीशकथेव सदः ।३२। यह प्रश्नोत्तरनामकी मणिरत्माला कण्ठमें या कानोंमें जाते ही लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु और · उमापति भगवान् शंकरकी कथाकी तरह विद्वानों- के सुन्दूर आानन्दको बढ़ावे।

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गीताप्रेस, गोरखपुरकी गीताएँ गीता शांकरभाप्य सरल : गीता केवल भाषा = हिन्दी-अनुवादसहित यजिल्द ""· ।=) मू० २॥) स० २॥) :गीता-मापा माहालग गीता बड़ी भापासदित सहित मृ० 1) स 1-) सजिल्द पृ० ५७०, १।) गीता लोटी अर्थ- गीता मराठी टीका- सहित =)।। स । सहित सजिस्द्र १।) गीता मूल ताबीजी =) गीता मझली, भापाटीका- गीता मूल चिष्णुसदस-

सहित ॥e स० ॥1=) नामसहित सजिन्द-)।I गीता दो पन्नेमें संपूर्ण -) गीता बंगला टीका- श्रीकृष्णविज्ञान, गीता पद्या- सदित पृ० ५३५, ॥।।) नुवाद ॥I) स० गीता मोटे अक्षरवाली गीता-सूची अर्थसहित ॥) स० [) गीतामें भक्ति-योग 1-) LE0

गीता-१।) वाली गीताकी गीता डायरी 1) स० ।-)

ठीक नकल गीता-निबन्धावली=)।।

गीता केवल मूल मोटे गीताका सूक्ष्म विषय-)।

अक्षरवाली 1-) स० le) गीतोक्त सांख्ययोग और निप्काम कर्मयोग )।। पश्चरत्न गीता मूल, मोटे गजलगीता आधा पैसा अक्षर, सजिल्द 1) सपशलोकी गीता 29 3 पता-गीताप्रेस, गोरखपुर

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कुछ प्राचीन शास्त्र

श्रीविष्णुपुराण-सटीक प्रभोपनिषद्- पृ० ५४८, चित्र ८, मू० २), बढ़िया २।।।) माण्डूक्योपनिषद्- १)

अध्यात्मरामायण-सार्थ तैतिरीयोपनिषद् ।।।-)

पृष्ठ४०२,चित्र,१।।।), ऐतरेयोपनिषद् 1=)

बढ़िया जिल्द २) उपनिषदोंके चौदहरत।=)

एकादश स्कन्ध-सानुवाद प्रेम-दर्शन-पृ० २००,l-) पृष्ठ ४२०, मू० ॥।।) १) मूलरामायण-मू० विष्णुसहसतनाम-शांकर- मनुस्मृति द्वितीय अभ्याय भाग्य, हिन्दी-अ० ॥=) सार्थ, मूल्य

सार्थसंग्रह, पृ०२८४, l।) श्रीरामगीता-मूल्य)।।। ईशावास्योपनिषद्- E) सन्ध्या केनोपनिषद्- मृ० 11) नारद-भक्ति-सूत्र कठोपनिषद्- 11-) बलियैशदेवविधि मुण्डकोपनिषद्- )पातज्जलयोगदर्शन पता-गीताप्रेस, गोरखपुर

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परमार्थ-ग्रन्थमालाकी कुछ मणियाँ तत्त्व-चिन्तामणि (भाग१)-श्रीजयदयालजी गोयन्दका, पृष्ठ ३५०, मृल्य 11=) सजिल्द I।।-) गुटका संस्करणं-पृ० ४४८, मृ० 1-) स० 1=) तत्व-चिन्तामणि (भाग २)-श्रीगोयन्दकाजीके लेखोंका सचित्र संग्रह, पृ० ६३२, सृ० ॥= स० १=) गुटका संस्करण-पृष्ठ ७५०, मू० ।=) स० ॥) तत्व-चिन्तामणि (माग ३)-श्रीजयद यालजीगोयन्दका- के लेखोंका नया संग्रह मू०॥) सजिल्द ।।|=) गुटका संस्करण-पृष्ठ ५६०, मूल्य ।-)सजिल्द ।=) मानव-धर्म-धर्मके दश प्रकारके भेद बड़ी सरल, सुबोध भाषामें उदाहरणॉसहित समझाये हैं। मू०=) साधन-पथ-इसमें साधन-पथके विन्नों, उनके निवारणके उपायोंका वर्णन है, पृष्ठ ७२, मूल्य =)।। तुलुसीदल-सचित्र, श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दारके लेखोंका संग्रह, पृ० २९२, भू० ॥) स० 15) परमार्थ-पत्रावली-श्रीजयदयालजी गोयन्दकाके ५१ कल्याणकारी पत्रॉका संग्रह, पृ० १४४, सू० ।) नैवैद्य-श्रीहनुमानप्रसादजी पोहारके कुछ और चुने हुए लेखॉका संग्रह, पृ० २५०, मू० ॥)स०॥) ईशर-लेखक-श्रीमालवीयजी, पृष्ठ ३२, मूल्य-)। पता-गीताप्रेस, गोरखपुर