Books / Rasa Gangadhara Jagannatha Rasa Tarangini Narayan Misra Hindi Vyakhya of Shashinath Jha Chowkambha.djvu

1. Rasa Gangadhara Jagannatha Rasa Tarangini Narayan Misra Hindi Vyakhya of Shashinath Jha Chowkambha.djvu

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॥ श्रोः ॥

बिट्ठलदास संस्कृत सीरीज

पण्डितराजश्रीजगन्नाथविरचितः

रसगङ्गाधरः

'रसतरङ्गिणी'-संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेतः

प्रथमाननम्

व्याख्याकारद्वयः

प्रो० डा० श्रीनारायणमिश्रः

संस्कृत विभाग

कला संकाय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

डा० शशिनाथ झा विद्यावाचस्पतिः

रीडर, स्नातकोत्तर व्याकरण विभाग; का० सिं० द० सं० वि० वि०, दरभङ्गा

कृष्णदास अकादमी, वाराणसी

१९९६

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प्रकाशक : कृष्णदास अकादमी, वाराणसी

मुद्रक : चौखम्बा प्रेस, वाराणसी

संस्करण : प्रथम; वि० सं० २०५३

मूल्य : रु० ९००-००

© कृष्णदास अकादमी

पो० बा० १११५

ह० ३७/११५, गोपाल मन्दिर लेन, वाराणसी--२२१००१ ( भारत )

फोन : २४८०३२

आप्तच प्रकाशनम्

चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस

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पो० बा० नं० ९००८, वाराणसी-२२१००१ ( भारत )

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आवास : ३३४०३२

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BITTHALDAS SANSKRIT SERIES

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RASAGANGĀDHARA

OF

PANDITRĀJ JAGANNĀTHA

[FIRST ĀNANA]

WITH

Rasatarangini Sanskrit-Hindi Commentaries

BY

Prof. Dr. Śrīnārāyan Miśra

Sanskrit Department

Faculty of Art, B. H. U., Varanasi

&

Dr. Śaśināth Jhā Vidyāvācaspati

Reader, P. G. Deptt. of Vyakaran, K. S. D. Sanskrit University; Darbhaga.

KRISHNADAS Academy

VARANASI-221001 (India)

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Publisher : Krishnadas Academy, Varanasi-1

Printer : Chowkhamba Press, Varanasi

Edition : First, 1996

KRISHNADAS ACADEMY

Oriental Publishers & Distributors

Post Box No. 1118

K. 37/118, Gopal Mandir Lane, Varanasi—221001 ( India )

Phone : 334032

Also can be had from

Chowkhamba Sanskrit Series Office

K. 37/99, Gopal Mandir Lane

Post Box 1008, Varanasi--221001 (U. P.) INDIA.

Phone : Office : 333458

Res. : 334032

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सहृदय-हृदयविजेताऽऽलाध्यः सर्वेः कवयः क्रियन्ते । तत्कमर्म-वीक्षक-साहित्यशास्त्रतोद्भवैः वन्योऽस्ति ।

साहित्यमन्योः शोभाशालिन्तां प्रति काव्यसौ । अन्योनानतिरिक्तत्वं मनोहारिण्यवस्थितेः ।

साहित्यं सहितानां भावः काव्येतदङ्गड्गनाम् । मोहितानि तानि वा तत्त, सत्त्वममाश्र्यायते शास्त्रमु ।

१. भूमिकाकार द्वारा मङ्गलाचरण ।

२. कवयः कान्तदर्शिनः ।

३. वक्रोक्तिजीवितम् १-९० ।

४. मैथिली-काव्यविवेक-सम्पादक डॉ० शशिनाथ झा ।

५. साहित्यमीमांसा-इलोकसं० २ कविशेखर बदरीनाथ झा । ( मङ्ग्लनाथझा कोएमेमोरेशन वौल्यूम, झोरिग्रेण्टल बुक एजेंसी, पूना )

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साहित्य विद्या को ही आचार्य राजशेखर ने अपनी काव्यमीमांसा में पञ्चम वेद, सत्सम दर्शन और पञ्चपदसू विद्यास्थान कहा है। काव्य और काव्यशास्त्र में अंगांगिभाव सम्बन्ध है, जिनमें काव्य है अभिधा ( प्रधान ), साध्य और लक्ष्य तथा काव्यशास्त्र है अङ्ग ( काव्य का उपकारक ), साधन और लक्षण । इन दोनों लक्ष्य और लक्षणों के समुदाय को ही साहित्य कहना उचित है । जैसे कि आचार्य पतंजलि ने महाभाष्य ( प्रथमावृत्तिक ) में "लक्ष्यलक्षणे व्याकरणम्" कहकर लक्षण ( सूत्र ) और लक्ष्य ( प्रयोग, उदाहरण ) के सम्मिलित रूप को ही व्याकरण कहा है, उसी तरह काव्यशास्त्रीय लक्षण एवं उनके उदाहरण ( काव्य ) साहित्य कहे जाते हैं। केवल काव्यशास्त्र के लिए साहित्य पद का प्रयोग लाक्षणिक है। साहित्यशास्त्रद्वार्थ व्यापक है और काव्यपदार्थ व्याप्य, यह स्पष्ट ही है। यह एक व्यापक नियम है कि अङ्गी के फल ( प्रयोजन ) से ही अङ्ग का भी फल सिद्ध हो जाता है। तदनुसार काव्य के फल से ही काव्यशास्त्र भी फलवान् हो जाता है। इसलिए सभी काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में काव्य का ही फल दिखाया गया है, शास्त्र का नहीं।

इस सन्दर्भ में सर्वप्रथम स्थान कवि का आता है। वह स्वतन्त्र है, निरङ्कुश है, अतः साहित्य जगत् में सबसे पहले उसी का आविर्भाव हुआ- "कविर् मनीषी परिभूः स्वयम्भू- यथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाःः" ।

रसस्वरूप ब्रह्म से ब्रह्म के रूप में सृष्टि के आरम्भ में कवि का आविर्भाव हुआ। तब उससे काव्य निःसृत हुआ। इस परम्परा में काव्य का दूसरा स्थान है। उससे सभी मुपन्ध हुए, सभी तुष्ट हुए, सबों ने उसे देखा। पर देखने वालों में भी कोई सूक्ष्म दृष्टा निकल गया, जिसे आलोचक कहा जाता है। यह तीसरे स्थान पर आता है। उसने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से देखकर अपनी वाणी द्वारा उसकी प्रशंसा या निन्दा की और फिर उसे परवर्ती कवियों के लिए प्रचारित किया, वही हुआ काव्यशास्त्र, जिसमें लक्षण के साथ-साथ लक्ष्य ( काव्योदाहरण ) भी होता है और समस्त काव्य-जगत् ही इसके उदाहरण हो गये। इस तरह यह चौथे स्थान पर आता है। यही आलोचनाशास्त्र है, समीक्षाशास्त्र है। कवि-काव्य-आलोचक-आलोचना की यही शृंखला है। इनमें परस्पर उत्पाद्योत्पादक, कार्यकारण, उपकार्योपकारकभाव आदि सम्बन्ध हैं। कभी तो कवि के अनुसाद शास्त्र चलता है, तो कभी

१. शास्त्रनिर्देशाध्याय ।

२. मैथिली-काव्यविवेक; पृ०-१८४ ।

३. श्रुत्तलैयजुर्वत्संहिता, ४०.१८ ।

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शास्त्र के अनुशासन में कवि रहता है, आलोचक से सावधान रहता है और यही वह सावधानी है, जो महाकवि को निखारा और उच्च स्थान पर बिठाया । आलोचकों ने भवभूति के महावीरचरित नाटक के विषय में बहुत आक्षेप किया था । कवि सम्हल गये और उनका उत्तर दिया—

ये नाम केचिदिह नः प्रथयन्त्यवज्ञां जानन्ति ते किमपि तान् प्रति नव यौवनम् । उत्पत्स्यते हि मम कोपि समानधर्मा कालो हि महान् निरवधिर्विपुला च पृथ्वी ॥

फिर उनके उत्तररामचरित नाटक को देखकर तो आलोचकों को कहना ही पड़ा—“उत्तरे रामचरिते भवभूतिविशेष्यते” । इसी प्रकार महाकवि दण्डी के विषय में भी किवदन्ती है कि उन्होंने दशकुमारचरित की पूर्वपीठिका जब लिखी तो आलोचकों का तीखा प्रहार उन पर पड़ा । वे रुक गये, अपने को सम्हाला, परिश्रम करके आक्षेपों का समाधान ढूंढा और इसी छानबीन के क्रम में स्वयं एक अलङ्कारशास्त्रीय ग्रन्थ ही रच डाले—काव्यादर्श, जो इस शास्त्र का एक मूर्धन्य ग्रन्थ हुआ । इसके बाद उन्होंने दशकुमारचरित की उत्तरपीठिका लिखी, जिसकी सत्र ओर से प्रशंसा हुई । इसलिए उनकी पूर्वपीठिका और उत्तरपीठिका में इतना अंतर है ।

ऐसे ऐसे महाकवि भी जिनको कद्र करते हैं, ऊंचा स्थान देते हैं, उन आलोचकों का महत्व इसी से आंका जा सकता है। इन आलोचकों को न केवल पूर्ववर्ती सभी कवियों की जानकारी रहती है, अपितु सभी आलोचकों के सिद्धान्तों की भी जानकारी आवश्य्क है । कवि से सूक्ष्म दृष्टि उनकी होती है । जिन भावों को कवि ने सोचा तक न होगा, उनके ही शब्दों से उन भावों को निकाल कर गुण या दोष दिखाने में वे पटु होते हैं । सूक्ष्मदर्शिता, निष्पक्षता, निर्भीकता, सार्वगभित्ता, सामयिकता, सार्वदेशिकता आदि कितिपय गुण इनमें आवश्यक माने गये हैं । कवि की आलोचना करने से पहले उन्हें स्वयं कवि बनना आवश्यक है । पक्षपातिता, भोक्ता, लोभ आदि कितिपय दुर्गुण जिस आलोचक में रहे, वह निंदनीय माना जाता है । अनएव आलोचक को संयत रखने के लिए काव्यशास्त्र ( साहित्यविद्या ) परम आवश्यक है, क्योंकि अनियन्त्रित प्रवाह से परम हानि निश्च्वित है ।

अनुबन्ध-निबन्धन-

प्रत्येक शास्त्र के आदि में ही उसके विषय, प्रयोजन, सम्बन्ध और अधिकारों—इन चार अनुबन्धों का निरूपण आवश्यक होता है, क्योंकि इनके ज्ञान के बिना जिज्ञासु

१. मालतीमाधव-प्रस्तावना ।

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इसके अध्ययन में प्रवृत्त ही नहीं हो सकते हैं, जबकिं उन्हीं के उपयोग के लिये शास्त्र का प्रणयन होता है । ग्रन्थ के अध्ययन में जिज्ञासु को प्रवृत्त कराने वाले तत्व को ही अनुवन्ध कहते हैं । किसी भी कार्य में लोग तभी प्रवृत्त होते हैं जब उन्हें उसमें ‘इदं मदीष्टसाधनम्’-‘यह मेरा अभीष्ट साधन करने वाला है’ इस प्रकार का ज्ञान हो जाय । इसे ही इष्टसाध्यताज्ञान कहते हैं । सुमेरु पर्वत लाने मे उक्त ज्ञान के रहने पर भी लोग प्रवृत्त नहीं होते हैं, क्योंकि उसमें कृतिसाध्यताज्ञान नहीं है । अर्थात् जब तक ‘इदं मत्कृतिसाध्यम्’-‘यह मुझसे किया जाने योग्य कार्य है’ इस प्रकार का ज्ञान भी प्रवृत्त के प्रति कारण है और विषममिश्रित स्वादिष्ट भोजन में उक्त दोनों ज्ञान के रहने पर भी बलवत् अनिष्ट ऐसा ज्ञान होने पर वह इष्ट ही नहीं है । अतः प्रवृत्त के प्रति मुख्य दो ज्ञान हो कारण हैं—इष्टसाध्यता ज्ञान और कृतिसाध्यता ज्ञान ।

अब प्रस्तुत में प्रयोजन से इष्टसाध्यता ज्ञान होता है और विषय, सम्बन्ध और अधिकारी से कृतिसाध्यता ज्ञान होता है । विषय हुआ प्रतिपादनीय वस्तु, प्रयोजन हुआ फल, अधिकारी हुआ प्रवृत्त होने योग्य व्यक्ति और सम्बन्ध हुआ प्रतिपाद्य विषय के साथ प्रतिपादक शास्त्र का संसर्ग ( विषय और ग्रन्थ में प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव सम्बन्ध ) ।

प्रस्तुत साहित्यशास्त्र का विषय है काव्य एवं उसके उपयोगी ( गुण, अलंकार, रीति, रस, भाव, ध्वनि आदि ) पदार्थ । इनका ज्ञान प्राप्त करना ही प्रयोजन है । इन विषयों में जिज्ञासु व्यक्ति अधिकारी है और इस विषय और शास्त्र में बोध्य-बोधक-भाव सम्बन्ध है ।

उपर्युक्त आलोचकों, काव्यशास्त्रकारों की संस्कृतवाङ्मय में सुदीर्घ परम्परा रही है । आचार्य भरतमुनि ( ई० पू० द्वितीय शताब्दी ) से लेकर आज तक इसकी श्रृंखला बनी हुई है । बीच-बीच में अनेक वाद आये, सम्प्रदाय चले और अपना प्रभाव छोड़ते गये, यह शास्त्र आगे बढ़ता गया, विषय की सूक्ष्मता आती गयी । सोलहवीं शताब्दी से प्रत्येक शास्त्र में प्राचीन-नवीन का भेद होने लगा, भाषा परिष्कृत शैली को पकड़ने लगी । इस शास्त्र में यह बात कुछ बाद में आयी, जिसे लिये हुए सत्प्रवों शताब्दी में अवतीर्ण हुए पण्डितराज जगन्नाथ अपने प्रौढ़-परिष्कृत ग्रन्थ रसगङ्गाधर के साथ ।

रसगङ्गाधर

यह साहित्यशास्त्र का मुख्यन्य ग्रन्थ है । रसरूप गङ्गा को धारण करने वाला—‘रसश्रासो गङ्गा रसगङ्गा, तस्या: घरः ( धारकः ), घरतीति घर इति’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार यह रसप्रतिपादक के रूप में साक्षात् शिव ( गङ्गाधर ) ही है । तदनुसार इसका विषय रस है, जो साहित्यशास्त्र में सर्वप्रधान होने से अपने शास्त्रमात्र का संग्राहक हो जाता है, इस शास्त्र के सभी तत्वों का प्रतिनिनिधित्व करता है—

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"प्राघान्येन व्यवदे्शा भवन्ति"—प्रधान के अनुसार ही व्यवस्था होती है, इस न्याय के अनुसार साहित्यशास्त्र का नाम 'रसशास्त्र' होता है और इसे ही पण्डितराज जगन्नाथ ने इस ग्रन्थ का रसगन्धाधर नाम रखकर सूचित किया है। परन्तु वे परम्परानुसार प्रचलित नाम "अलङ्कारशास्त्र" कहना ही उचित समझते हैं और यह नाम भी प्राघान्य न्याय से ही सङ्घटित होता है, क्योंकि इस शास्त्र का आधा से अधिक भाग अलङ्कार-विवेचन में ही रहता है। परन्तु आधुनिक युग में 'साहित्य' शब्द अधिक प्रचलित है, जो 'राजशेखर, श्रीहर्ष, कविकर्णपूर आदि के द्वारा समर्थित है। साहित्य के प्रसंग में म० म० गज्जाधर शास्त्री का एक पद यहाँ उद्धरणीय है—

नाचान्तं यचिचरतैरपरिचितचरं यच्च वाचालचेलै-रौचित्यं यन्न मुग्धेन्दपि न विरचयेद् यच्चमत्कारिचेतः । तादृक्प्रौढिप्रकर्षप्रणयाभणिति या सूयते काव्यरत्नं पुण्यैः कस्याप्यगण्यैः परिणमति मुखे सा हि साहित्यरोदिति"

इस विवेचन से स्पष्ट हुआ कि साहित्य के सभी तत्त्व रसगन्धाधर के विवेचनीय विषय हुए और वे सभी विषय यहाँ सूक्ष्मरूप से विस्तृत विवेचित हुए हैं। पर खेद का विषय है कि यह ग्रन्थरत्न पूर्णरूप में उपलब्ध नहीं है। अन्तिम भाग में कुछ खण्डित है, जिसमें कुछ अलङ्कारों का विवेचन था। मध्य में भी कुछ प्रकरण नष्ट हो जाते हैं; यथा—अभिधा और लक्षणा के बाद व्युत्पत्तिनिरूपण नहीं हैं, रीतिविवेचन और दोषनिरूपण नहीं है। यह बात भी ध्यातव्य है कि इस ग्रन्थ के अध्याय, जिसे आनन कहा गया है, उसका विभाजन भी उपयुक्त नहीं जान पड़ता है।

१. "रसविद्याविदः केचिद् ग्राम्यामाहुस्तु कोमलाम्" । ( अलङ्कारसमुद्गः-इन्द्रपति: पृ० ६ )

२. "अलङ्कारान् सर्वानपि गलितगरवीन् रचयतु" । (रसगन्धाधर-आरम्भिक पद्य)

ग्राम में सभी जातियों के रहने पर भी मल्लग्राम, ब्राह्मणग्राम आदि नाम उनकी प्रधानता से ही है।

४. काव्यमीमांसा—"शब्दार्थयोंरीयोचित् सहभावेन विद्या साहित्यविद्या । नैषधीयचरित के अन्त में—"साहित्ये सुकुमारवस्तुनि" । साहित्यपाथोिनिधिमन्थनोत्थं कर्णामृतं रक्षतु केविन्द्रा: । यतस्तस्य दैत्या इव लुठन्नताय काव्यार्थचौरा: प्रगुणोभवन्ति ॥ (कर्णपूर:) । विश्वनाथ के ग्रन्थ का नाम साहित्यदर्पण भी साहित्यशास्त्र कहने के पक्ष में है।

५. विश्वमन्त्रीषा—२-२, दरभंगा में प्रकाशित ।

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लिपिकारों के द्वारा इस ग्रन्थ के पत्रों में हेराफेरी हुई है । माङ्गार ( शिव ) पञ्चानन कहे गये हैं । तदनुसार इस रसगङ्गाधर के भी पाँच आनन होने चाहिए । यहाँ द्वितीय आनन के बाद बहुत दूर तक विषय एवं प्रकरण बदलने पर भी आनन-विभाजन नहीं हुआ है, जो मध्य में ग्रन्थ के कुछ अंश के अप्राप्त होने की सूचना देते हैं । प्रथम आनन में काव्य, उसके भेद एवं असंलक्ष्यक्रमध्वन्यङ्गगध्वनि ( अभिधामूलध्वनि के प्रथम भेद, रसध्वनि ) का सङ्ग्रहापूर्वक विवेचन ( रस, गुण, भावध्वनि, रसाभासादि सहित ) हुआ है । इस आधार पर द्वितीय आनन में संलक्ष्यक्रमध्वन्यङ्गय ( अभिधामूलध्वनि के द्वितीय भेद, जिसमें वस्तुध्वनि और अलङ्कारध्वनि अन्तर्भूत है ) का, तृतीय आनन में लक्षणामूलध्वनि का, चतुर्थ आनन में व्यङ्ग्यना का और पञ्चम आनन में अलङ्कारों के विवेचन की कल्पना की जा सकती है । काव्यदोष का निरूपण यथापि आवश्यक है, क्योंकि दोष-परित्याग तभी सम्भव है जब उसका परिचय हो, तथापि पण्डितराज ने अपनी विवशतावश उसका निरूपण नहीं किया होगा । विवशता यह थी कि ग्रन्थारम्भ में ही इनकी प्रतिज्ञा है कि हम स्वरचित उदाहरण ही देंगे, दूसरे का नहीं और दुष्ट-काव्य का निर्माण पण्डितराज की लेखनी से हो ही नहीं सकता । इसलिए दोषनिरूपण इस ग्रन्थ में नहीं रहा होगा । परन्तु अभी जो ग्रन्थ उपलब्ध है, जिस रूप में प्राप्त है, उसो से सन्तोष करना होगा, उसी पर विचार करना उचित होगा ।

नव्यपरिष्कृत आलोचनात्मक शैली में विषय की सूक्ष्मता से परिचय कराना पण्डितराज की अद्भुत प्रतिभा का परिचयाक है । इस ग्रन्थ के द्वारा इन्होंने साहित्य-शास्त्र को वह गरिमा प्रदान की जो दर्शनादि शास्त्रों को प्राप्त है । शास्त्रान्तर के विवेचन के चक्कर में पड़कर इस शास्त्र के गहन अध्ययन करने को विवश हुए । यहीं है इस शास्त्र को पण्डितराज की देन, रसगङ्गाधर का महत्व ।

इसमें प्राचीन आचार्यों के मतों की विशद समीक्षा की गयी है और विषय-विवेचन अतिविस्तृतरूप में यथेष्ट हुआ है । प्राचीन ग्रन्थ पदबद्ध या कारिकाके साथ वृत्तियुक्त रहते थे, परन्तु यह ग्रन्थ केवल गद्य में, प्राजल, परिष्कृत, अवच्छेद-करतायुक्त गद्य में है । अतः यहाँ विषय को सूक्ष्मरूप में विस्तृत विवेचन का अवसर प्राप्त हुआ । साहित्यशास्त्रीय विकास के चरम उत्कर्ष के समय इस ग्रन्थ की रचना हुई, अतः उन सभी विषयों का सम्यक् प्रतिपादन-समीक्षण इसमें हो सका, जिनका पूर्ववर्ती ग्रन्थों में होना सम्भव न था । इन्होंने उदाहरण के रूप में यहाँ स्वरचित पद्यों का ही उपस्थापन किया है, जिससे यह ग्रन्थ सुरभित हो गया और पण्डितराज का कविस्वरूप भी उदात्त रूप में प्रकटित हो गया है । ये केवल आलोचक ही नहीं, वरन् उच्चकोटि के कवि भी थे । इसलिए रसगङ्गाधर का स्थान साहित्यशास्त्र में

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सर्वोपरि माना जाता है। यह ग्रन्थ प्रत्येक विषय पर अपनी नवीन मान्यता, नया मतस्थापन देता। चलता है—काव्यलक्षण से लेकर अलंकारनिरूपन तक आद्यन्त यही क्रम है और इनकी यह मान्यता आज भी आलोचकों के लिए महत्त्वपूर्ण बनी हुई है।

विषय-विवेचन—

(१) काव्य-प्रयोजन---काव्य में प्रवृत्त होने के लिए उसके प्रयोजनों को जान लेना आवश्यक है। सर्वप्रथम इसमें प्रवृत्त होने वाला कवि होता है, जो इसकी रचना करता है। उसके बाद सहृदय उसे सुनते या पढ़ते हैं। इन दोनों को इसका प्रयोजन ज्ञात रहना आवश्यक है। इसलिए रसगङ्गाधर में कहा गया है—“कविसहृदययोरावश्यकतया”१। कवि के आशय को सभी नहीं समझ सकते हैं, उसे केवल सहृदय ही समझते हैं। ‘कवे: समानं हृदयं येषां ते सहृदया:’—कवि के समान हृदयवाला सहृदय२ होता हैं, जो उसके हृदय की बात को समझ जाता है। कविपरम्परागत अनेक बातें ऐसी हैं जो प्रसिद्ध होने के कारण कहीं नहीं जाती हैं, संकेत से ही समझी जा सकती हैं, पर उस परम्परिद से परिचित हो उसे समझ सकता है, सहृदय कहलाता है। अतः काव्य पढ़ने से पहले सहृदय बनना, कवि के अन्तर में छिपे भावों को पकड़ने की कला का ज्ञान रखना आवश्यक है। इन दोनों के लिए यहाँ पाँच प्रयोजन कहे गये हैं और इत्यादि कहकर प्राचीनोक्त अन्य प्रयोजनों में भी अपनी सम्मत्ति दिखायी गयी है। उक्त पाँचों नाम हैं—(१) कीर्ति—यश:प्राप्ति, जो केवल कवि के लिए है, (२) परमाह्लाद—परमानन्द की प्राप्ति (कवि और सहृदय दोनों के लिए), (३) गुरु प्रसाद—गुरु की प्रसन्नता से विद्या-व्यवहार का ज्ञान (दोनों के लिए), (४) राजप्रसाद—इससे दोनों को धनागम, (५) देवताप्रसाद—इससे दोनों का अमङ्गल-निवारण होता है!

मम्मट ने काव्य के ६ प्रयोजन दिखाये हैं--

उकाव्यं यशसेऽथर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये ।

सद्य: परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ।।

तदनुसार—(१) यश:प्राप्ति, (२) अर्थप्राप्ति, (३) लोकव्यवहारज्ञान, (४) अमङ्गलनाश, (५) सद्य: परमानन्द की प्राप्ति, (६) कान्तासम्मित वाक्य से उपदेशप्राप्ति। इनमें तृतीय और पञ्चम का समावेश पण्डितराज के इत्यादि पद से कर लेना चाहिए।

१. रसगङ्गाधर, पृ. ७ ।

२. अथवा—‘प्रशस्तं हृदयं येषां ते सहृदया:’, प्रशस्त्येन हृदयप्रवेशसामर्थ्येनवत्व वा’ ।

३. काव्यप्रकाश के आरम्भ में ।

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सर्वोपरि माना जाता है। यह ग्रन्थ प्रत्येक विषय पर अपनी नवीन मान्यता, नया मतस्थापन देता। चलता है—काव्यलक्षण से लेकर अलंकारनिरूपन तक आद्यन्त यही क्रम है और इनकी यह मान्यता आज भी आलोचकों के लिए महत्त्वपूर्ण बनी हुई है।

विषय-विवेचन—

( १ ) काव्य-प्रयोजन—काव्य में प्रवृत्त होने के लिए उसके प्रयोजनों को जान लेना आवश्यक है। सर्वप्रथम इसमें प्रवृत्त होने वाला कवि होता है, जो इसकी रचना करता है। उसके बाद सहृदय उसे सुनते या पढ़ते हैं। इन दोनों को इसका प्रयोजन ज्ञात रहना आवश्यक है। इसीलिए रसगंगाधर में कहा गया है—“कविसहृदययोरावश्यकतया”।

कवि के आशय को सभी नहीं समझ सकते हैं, उसे केवल सहृदय ही समझते हैं। ‘कवे: सममनं हृदयं येषां ते सहृदया:’—कवि के समान हृदयवाला सहृदय होता है, जो उसके हृदय की बात को समझ जाता है।

कविपरसपरागत अनेक बातें ऐसी हैं जो प्रसिद्ध होने के कारण कही नहीं जाती हैं, संकेत से ही समझी जा सकती हैं, पर उम्‌ प्रभिन्निद्रि से परिचित हैं। उसे समझ सकता है, सहृदय कहलाता है। अत: काव्य पढ़ने से पहले सहृदय बनना, कवि के अन्तर में छिपे भावों को पकड़ने की कला का ज्ञान रखना आवश्यक है।

इन दोनों के लिए यहाँ पाँच प्रयोजने कहे गये हैं और इत्थंपी कहकर प्राचीनोंक्ति अन्यों प्रयोजनों में भी अपनी सम्मति दिखायी गयीं हैं।

एक पाँचों नाम हैं—( १ ) कीर्ति—यश:प्राप्ति, जो केवल कवि के लिए है, ( २ ) परमाह्लाद—परमानन्द की प्राप्ति ( कवि और सहृदय दोनों के लिए ), ( ३ ) गुरुप्रसाद—गुरु की प्रसन्नता से विद्या-व्यवहार का ज्ञान ( दोनों के लिए ), ( ४ ) राजप्रसाद—इससे दोनों को धनागम, ( ५ ) देवताप्रसाद—इससे दोनों का अमज्जल-निवारण होता है।

मम्मट ने काव्य के ६ प्रयोजन दिखाये हैं—

काव्यं यशसेर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये । सद्य: परनिवृत्तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ॥

तदनुसार—( १ ) यश:प्राप्ति, ( २ ) अर्थप्राप्ति, ( ३ ) लोकव्यवहारज्ञान, ( ४ ) अमज्जलनाश, ( ५ ) सद्य: परमानन्द की प्राप्ति, ( ६ ) कान्तासम्मित वाक्य से उपदेशप्राप्ति। इनमें तृतीय और षष्ठ का समावेश पण्डितराज के इत्यादि पद से कर लेना चाहिए।

१. रसगंगाधर, पृ० ७१.

२. अथवा—‘प्रशस्तं हृदयं येषां ते सहृदया:, प्राशस्त्येन काव्यवासनापरिपक्वत्वम्, कविहृदयप्रवेशसामर्थ्यवत्त्व वा’ ।

३. काव्यप्रकाश के आरम्भ में ।

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इसके अतिरिक्त चतुर्वर्ग को प्राप्ति और कलाओं में नैपुण्य-ये प्रयोजन विश्वनाथोक्त हैं। इनमें भी धर्म से अमझ़लनाश, अर्थ से धनप्राप्ति, काम और मोक्ष से परमानन्द की प्राप्ति को मान लेने पर कलानुपुण्य एक अतिरिक्त प्रयोजन होता है। इन प्रयोजनों के समादक काव्य का ही लक्षण अभिप्रेत है। शायद इसीलिए काव्यलक्षण से पहले उनका प्रयोजन प्रतिपादित होता है।

उपर्युक्त प्रयोजनों में केवल परमानन्द ( रसास्वादानन्द ) ही काव्य के प्रयोजन हैं, शेष प्ररोचक² उपायमात्र हैं।

( २ ) काव्य-लक्षण-कवि की रचना काव्य कहलाती हैं ! उसका प्रथम कार्य चिन्तन सुललित भावों को अवधारणा अर्थरूप ही हैं, पर उसे व्यक्त करने हेतु उसका द्वितीय कार्य पदावली-गुम्फन शब्दरूप ही होता है। तदनुसार सुललित भावों को व्यक्त करने वाली पदावली काव्य है, यही वस्तुस्थिति है। इसे ही आचार्यों ने अपने-अपने ढंग से काव्यलक्षण के रूप में व्यक्त किया है। इस विषय में आचार्य दण्डी ने अग्निपुराण के अनुसर अपना लक्षण दिया—

"शरीरं तावदिष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली"३ ।

तदनुसार अभीष्ट = सहृदयहृदयाह्लादक अर्थ से व्यवच्छिन्न = विशिष्ट अर्थ से युक्त वाक्छेद = विलक्षणाकृत पदसमुदाय को काव्य कहते हैं।

इनसे भी प्राचीन आचार्य भामह ( ५०० ई० ) ने कहा—'शब्दार्थों सहितौ काव्यम्'४ —चमत्कारजनक शब्द और अर्थ को काव्य कहते हैं। उसी समय से यह विवाद शुरू हुआ कि शब्द ही काव्य है या शब्द और अर्थ काव्य हैं ! सम्पूर्ण उत्तरभारत के विद्वान् भामह के अनुयायो हो गये और शब्दार्थों का आज तक समर्थन कर रहे हैं। इसी तरह दक्षिण भारतীয় दण्डी के अनुसरण पर केवल शब्द को काव्य कहने में अड़े हुए हैं। रुद्रट, वामन, आनन्दवर्धन, मम्मट, भोजराज, वाग्भट आदि आचार्य शब्द(अर्थ)युगल को काव्य मानने के पक्ष में हैं, जवकि विश्वनाथ और जगन्नाथ शब्द को ही काव्य कहते हैं। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि जो भी केवल शब्द को काव्य कहते हैं, उनके भी मत में अर्थ उसका विशेषण रहता हो हैं। तब विवाद रहा दोनों को प्रधान मानने या अर्थ को विशेषण मानने का ही और यह विवाद अभी भी जारी है।

१. सरस्वतीकण्ठाभरण से साहित्यदर्पण में उद्धृत ।

२. रसगङ्गाधर की प्रस्तावना—पं० मदनमोहन झा सम्पादित संस्करण ।

३. काव्यादर्श ।

४. काव्यालङ्कार ।

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वामन, भोजराज, मम्मट, जयदेव आदि आचार्य काव्यलक्षण में दोषत्याग और गुणग्रहण निवेशित करते हैं। कतिपय आचार्य तो काव्यशास्त्रीय रीति, रस, अलंकार तत्व भी जोड़ देते हैं। इनका लक्षण इनके द्वारा उक्त प्रयोजनों के साधक होने के कारण ही इतने बड़े हो चले हैं। विश्वनाथ ने तो इन विस्तृत लक्षणों को अतिसंक्षिप्त कर दिया और रसात्मक वाक्य को ही काव्य कहा है। परन्तु नीरस पर्वतादि-वर्णन में उन्हें प्रवन्धगत रस का आभासण करना पड़ता है और ऐसे मुक्तक वर्णन को वे काव्य नहीं मानते। परन्तु चमत्कार अनुभूत रहने पर काव्य न मानना समुचित नहीं है।

इनके बाद पण्डितराज ने सभी लक्षणों को बारीकी से छानबीन की ओर अपना लक्षण दिया—

"रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्"

अपने इस लक्षण का इन्होंने सूक्ष्म परिष्कार भी प्रस्तुत किया है, जो इसी ग्रन्थ में रहने के कारण यहां नहीं दिया जा रहा है। इस परिष्कार में विरोधियों के सभी आक्षेपों का समाधान हो जाता है।

विचार कर देखने से ज्ञात होता है, कि पण्डितराज ने सर्वप्राचीन लक्षण को ही मान लिया है, शब्दान्तर से प्रस्तुत किया है, जिसे अग्निपुराणकार व्यास एवं दण्डी ने कहा था। फर्क इतना ही है कि पदावली के स्थान में 'शब्द' कहा गया है। इष्ट शब्द से रमणीय ही अभीप्रेत हो सकता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि काव्यलक्षण अपने अनेक रूपों को धारण करते हुए सहस्राब्दिक वर्षों के बाद फिर जहाँ से प्रारम्भ हुआ था वहीं पहुँच गया।

( २ ) काव्य-कारण—बिना कारण से कार्य नहीं हो सकता है और कारण का समुचित रूप से रहने पर कार्य अवश्य होता है। काव्यरचना एक कार्य है। उसका भी कारण होना चाहिए, जिसे जान लेने पर काव्यकर्ता, प्रेरक, इच्छुक आदि उस कारण के प्रति यत्नवान् होंगे और काव्यप्राप्ति करने में सफलता पायेंगे। अतः काव्यशास्त्र के ग्रन्थों में काव्यकारण पर विचार किया जाता है। इस विषय में इन शास्त्रकारों के दो दल हैं। दण्डी आदि ने प्रतिभा, शास्त्रानुशीलन और अभ्यास इन तीनों को मिलित रूप से काव्य का कारण माना है, जबकि श्रुति आदि ने केवल प्रतिभा को।

नैसर्गिकी च प्रतिभा, श्रुतं च बहुनिर्मलम् । अभियोगोऽस्य चोक्तस्यः, कारणं काव्यसम्पदः ॥

( काव्यादर्श )

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आचार्य भामह के मत से प्रतिभा, शब्दार्थज्ञान, काव्यज्ञों की शिक्षा और अनेक निवन्धों के अनुशीलन से प्राप्त व्युत्पत्ति काव्य के कारण हैं। वामन के अनुसार लोक-व्यवहार और शास्त्रों में निपुणता, नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा (प्रतिभा) अथवा जन्मान्तरीय संस्कारात्मक शक्ति-विशेष और काव्यज्ञों के निर्देश पर काव्यरचना में पुनः-पुनः प्रवृत्ति (अभ्यास) ये सभी काव्य के कारण हैं। रुद्रट के अनुसार शक्ति, व्युत्पत्ति और अभ्यास कारण हैं। मम्मट का भी यही मत है। जयदेव केवल प्रतिभा को कारण मानते हैं और प्रतिभा के सहकारी कारण शास्त्रानुशीलन और अभ्यास को कहते हैं।

पण्डितराज के मत में केवल प्रतिभा से ही काव्य की सृष्टि होती है और प्रतिभा का कारण कहों अदृष्ट (पूर्वजन्माजित) और कहीं व्युत्पत्ति और अभ्यास है। बालकवि कर्णपूर्ण वचपन में ही बिना व्युत्पत्ति और अभ्यास के सुन्दर काव्य लिखने लगे। ऐसे बालकवियों में विद्वदावलोकार रघुदेव मिश्र, पुरञ्जनचरितनाटककार कृष्णदत्त उपाध्याय आदि प्रसिद्ध हुए। इनके काव्यनिर्माण को देखते हुए स्पष्ट हैं कि प्रतिभा का एक स्वतन्त्र कारण धर्मस्वरूप अदृष्ट मानना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में बिना व्युत्पत्ति और अभ्यास के भी अदृष्ट से एवं बिना अदृष्ट के भी व्युत्पत्ति और अभ्यास से प्रतिभा की उत्पत्ति से 'कारण' के अभाव में भी काव्य की सत्ता रूप व्यक्तिरेक-व्यभिचार प्राप्त हो जाएगा, जिसके निवारण के लिए 'अदृष्ट से उत्पन्न प्रतिभा के प्रति अदृष्टमात्र कारण' एवं 'व्युत्पत्ति और अभ्यास से उत्पन्न प्रतिभा के प्रति व्युत्पत्ति और अभ्यास कारण' इस तरह अलग-अलग कार्यकारणभाव माना गया है। अब कारण के भेद से दो प्रतिभाएँ हुई जायेंगी और कहीं पर अदृष्टजन्य प्रतिभा के अभाव में भी व्युत्पत्ति और अभ्यासजन्य प्रतिभा से काव्य होने से पूर्ववत् 'व्यभिचार प्राप्त ही रहेगा।

१. काव्यं तु जायते जatu, कस्यचिद् प्रतिभावतः। शब्दाभियोगे विजाय, कृतवा तद्रुपपासनम् विलोक्यानुबन्धवैचित्र्य, कार्यः काव्यक्रियादरः॥

(काव्यालङ्कार)

२. त्रितयामक व्युप्रक्यते शक्तियुक्तिपत्तिरभ्यासः।

(रुद्रट-काव्यालङ्कार)

३. शक्तिनिपुणता लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक णातू। काव्यज्ञशिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुद्द्रवे॥

(काव्यप्रकाश)

४. "प्रतिभैव श्रुताभ्याससहिता कविता प्रति हेतुः।

(चन्द्रालोक)

५. जब प्रतिभा के दोनों कारण हैं तो इनमें से एक के भी न रहने पर कारण-भाव हो जायेगा।

६. उपरिवत्।

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जिसके निवारण के लिए 'अदृष्टजन्य प्रतिभा से उत्पन्न काव्य के प्रति अदृष्टजन्य प्रतिभा कारण' और 'व्युत्पत्त्यसन्यासजन्य प्रतिभा से उत्पन्न काव्य के प्रति व्युत्पत्त्यसन्यास-जन्य प्रतिभा कारण' ऐसा पृथक् कार्यकारणभाव मानना चाहिए।

राजशेखर का मत है कि समाधि (मानसिक एकाग्रता) और अभ्यास (बाह्य प्रयाम) ये दोनों ही मिलकर शक्ति को प्रकट करते हैं और यही शक्ति काव्य का कारण है, जो दो प्रकार की होती है—कारयित्री और भावयित्री।

यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि साहित्यशास्त्र में शक्ति और प्रतिभा एक ही वस्तु है, जब कि न्यायदर्शन में शक्ति 'ज्ञानजन्य संस्कार' को और प्रतिभा नवोन्मेषशालिनी बुद्धि-विशेष को (जो संस्कार का जनक है) कहते हैं। वेदान्त में भी ज्ञान को आत्मा, बुद्धि को अन्तःकरण एवं संस्कार को ज्ञानजन्य माना जाता है। यहाँ तो "या शब्दब्रह्मसामर्थ्यंसायं मलद्ररत्न-मुक्ति-मार्गमनयदपि तथाविधहृदयं प्रतिभा-सर्यति सा प्रतिभा" ऐसा कहते हुए राजशेखर ने प्रतिभा को व्यक्त किया है और इसे ही भामह, दण्डी, वामन, अभिनवगुप्त, जयदेव और जगन्नाथ प्रतिभा कहते हैं, जब कि इसी प्रतिभा को रुद्रट, आनन्दवर्धन और मम्मट शक्ति कहते हैं। अतएव दोनों एक ही तत्व हैं, क्योंकि अभिनवगुप्त ने "अभ्युप्तित्तिकदोषः शक्त्या संस्क्रियन्ते कवे:" इस ध्वनिकार की पंक्ति की व्याख्या में शक्ति को प्रतिभा कहा है।

इस सम्बन्ध में किसी समन्वयवादी आचार्य का मत उपयुक्त जान पड़ता है कि काव्य की उत्पत्ति में प्रतिभा, वृद्धि में अभ्यास और सौन्दर्य में व्युत्पत्ति कारण है—

'काव्यं तु जायते शक्तिद्वयर्धतेदृश्ययोगतः । तस्य चादल्वनिष्पत्तौ व्युत्पत्तिस्तु गरीर्यसी'।

यह मत पण्डितराज के अनुकूल है और उन बालकवियों की काव्योत्पादिका शक्ति का भी समाधान इससे हो जाता है।

(४) रससरूप—'रस्यते = आस्वाद्यते इति रसः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार सहृदय समाजिक जिसे काव्य या नाट्य के द्वारा आह्लादित करे, जिससे अनिर्वचनीय आनन्द की प्राप्ति करे, उसे रस कहते हैं। इस आस्वादन के साधन को अलङ्कारशास्त्र में विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभाव (सञ्चारीभाव) कहते हैं। इन तीनों के मेल से प्रकटित स्थायीभाव रस कहलाते हैं। रसरूपताप्राप्ति से पूर्व तक ये सभी भाव ही कहलाते हैं, तो चित्तवृत्ति (चित्त में रहने वाले धर्म) ही होते हैं।

१. काव्यमीमांसा।

२. साहित्यिक के अनुसार हृदय ही शक्ति को संस्कारस्वरूप मानकर। "शक्तिः कवित्वबीजमूतः संस्कारविशेष:" ।

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ये स्थायीभाव नौ हैं—रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, घृणा, विस्मय और निर्वेद। इनके कारण को विभाव कहते हैं, जिसके दो भेद हैं—आलम्बन और उद्दीपन। यथा—श्रृंगार रस में शकुन्तलादि आलम्बन और एकान्तस्थानादि उद्दीपन है। यद्यपि विभाव स्थायीभाव के उत्पादक नहीं होते हैं, वे (स्थायी) तो सहृदयहृदय में वासनारूप से सूक्ष्म आकार में पहले ही से रहते हैं। विभाव तो उनका विकास मात्र करता है, तथापि लौकिक विभाव के उत्पादक रहने के कारण अलौकिक (शास्त्रनिष्ठ) विभाव को भी वैसा कहना अनुचित न होगा, क्योंकि अविकसित वस्तु प्रतीतियोग्य न रहने के कारण अनुत्पन्न कोटि में ही रहती है।

सच तो यह है कि लौकिक रत्यादि स्थायीभावों का शकुन्तलादि विभाव उत्पादक होते हैं, पर काव्यारूढ होने पर वे ही अलौकिक विभाव बनकर रसास्वाद के अवसर पर रस से एकीभाव को प्राप्त करते हैं। यह भी ज्ञातव्य है कि स्थायीभाव और रस में तादात्म्य रहने के कारण स्थायीभाव के आलम्बन और उद्दीपन हो रस के भी आलम्बन एवं उद्दीपन होते हैं।

स्थायीभाव के कार्य को अनुभाव कहते हैं, जो आलम्बन पर आश्रित बाह्यरूप से प्रकटित होता रहता है। जैसे अग्नि धर्म को प्रकाशित करता है। यह काव्य में निबद्ध रहने के कारण अलौकिक होता है। सात्त्विक भाव भी अनुभाव के ही अन्तर्गत आते हैं। जो विभाव से भी विलक्षणरूप से जल में बुदबुद के समान प्रकाशित हो तथा कभी स्थायीभाव में ही विलीन हो जाय—ऐसे रसोपकारक क्षणिक भाव को व्यभिचारीभाव कहते हैं। निर्वेदादि ३३ व्यभिचारीभाव कहे गये हैं। स्थायीभाव भी अपरिपुष्ट रहने पर रसान्तर के उपकारक होकर व्यभिचारीभाव कहलाते हैं। सभी भावों में स्थायी-भाव प्रधान होता है। उक्त नौ स्थायीभाव श्रृंगारादि नौ रसों में परिणत होते हैं।

रसानुभूति के विषय में सर्वग्राहींचन उल्लेख भरतनाट्यशास्त्र का रससूत्र है—“विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्ति:”—उपर्युक्त दोनों विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभाव के संयोग से रस की प्रतीति होती है। इस सूत्र की व्याख्या चार प्रकार की उपलब्ध हैं, जो रसस्वरूप के चार सिद्धान्त बनें हुए हैं—लोल्लट का उत्पत्तिवाद, शंकुक का अनुमितिवाद, भट्टनायक का भुक्तिवाद और अभिनवगुप्त का अभिव्यक्तिवाद। इसके अतिरिक्त रस के विषय में पण्डितराज जगन्नाथ ने सात मतों को प्रस्तुत किया है—(१) नव्यमत (अनिवंचनीयतावाद), (२) भावना के माहात्म्य से मानस बोध (भ्रमवाद), (३) भाव्यमान विभाव ही रस है, (४) वैसा अनुभाव, (५) वैसा व्यभिचारीभाव, (६) वैसे विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी-भाव मिलितरूप में और (७) इनमें से जिस पर चमत्कार रहे वही।

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इनमें जिस लक्षण में विभावादि तीनों नहीं ( केवल एक ही ) हैं, वह भरत के रससूत्र से विरुद्ध होने से परम्परा-विरुद्ध हैं। वे हैं केवल विभाव, केवल अनुभव और केवल व्यभिचारिभाव को रस मानने वाले लक्षण। परन्तु इनमें भी अन्य का आक्षेप-लभ्य रहना तो निश्चित ही है। अतः आक्षेपलभ्य के द्वारा ही रससूत्र का संगमन कर लेते हैं।

आचार्यं मदनमोहन श्री ने विकासवादी क्रम से इन वादों को कालक्रम ( प्राचीनतानुसार ) इस प्रकार वर्णित किया है— ( १ ) विभाव ही रस है, ( २ ) अनुभव, ( ३ ) व्यभिचारिभाव, ( ४ ) तीनों के रहने पर जिसमें चमत्कार हो वही रस है, ( ५ ) तीनों ही रस है, ( ६ ) रससूत्र के अनुसार उत्पत्तिवाद, ( ७ ) अनुमितिवाद, ( ८ ) भुक्तिवाद, ( ९ ) अभिव्यक्तिवाद, ( १० ) नव्यमत ( अनिर्वच-नीयता ) और ( ११ ) भ्रमवाद।

परन्तु यह मत उपयुक्त तब होता, यदि किसी प्राचीन ग्रन्थ में इनका उल्लेख होता। भरत से पहले पाँच मत थे, इसमें कोई प्रमाण नहीं है। इसका उल्लेख सर्वप्रथम जगन्नाथ ने हो किया है। अतः ये मत या तो उनके स्वयं उद्भावित हैं या उनके समय में चल पड़े थे।

पण्डितराज ने जो इन मतों का क्रम रखा है, उसमें सर्वप्रथम अपना मत, जो मान्य आचार्यं अभिनवगुप्त का है, को रखा है; उसके बाद अन्य मतों का प्रतिपादन भर उन्हें अभिप्रेत है, खण्डन नहीं, क्योंकि सिद्धान्त से पृथक् अन्य मत स्वतः उपेक्षणीय हो जाते हैं। जो कोई 'नव्यास्तु' से कथित मत को इनका अपना मत कहते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि सिद्धान्त आदि या अन्त में ही रखा जाता है। आदि में सिद्धान्त देकर उस पर आचार्यं अभिनवगुप्त की सम्मति दिखाने से ही उसे निर्णय की पदवी मिल जाती है।

यह भी ज्ञातव्य है कि रसनिरूपण के प्रथम पक्ष में ही पण्डितराज ने जो 'भावना-विशेषमहिम्ना' विशेषण दिया है, वह किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में न होने

१. शकुन्तलाविषयिणी रति का सम्वन्ध सहृदय से न रहने के कारण उन्हें आस्वाद कैसे हो, इस हेतु 'साधारणीकरण' व्यापार मानकर सहृदय के हृदय में उस रति को प्रवृष्ट कराते हैं। पण्डितराज का कथन है कि ये सब काव्यार्थभावना की ही महिमा से होते हैं, तो फिर हम केवल उसी 'भावना' से शकुन्तलारति को साक्षात् हो सामाजिक में आरोपित कर क्यों न काम चला लें ? इस हेतु साधारणीकरण व्यापार क्यों मानें ? यही इनके मत का बीज है।

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से इनके मस्तिष्क की उपज है और यह विशेषण इनके द्वारा प्रथमतः प्रतिपादित अन्य सातों मतों में भी निहित है। इस नवीन उद्भावना को इन्होंने अपने काव्यलक्षण के परिष्कार में भी दिया है—“कारणं च तदवच्छिन्ने भावनाविशेष: पुनः पुनरनुसन्धानात्मा, ‘चमत्कारजनकभावनाविषयार्थप्रतिपादकशब्दत्वम्’ । इस तरह रसस्वरूपनिरूपण में “भावनाविशेष” पण्डितराज की अपनी चीज हैं। जैसे कि इसकी व्याख्या करते हुए महावैयाकरण दीननाथ द्वा ने लिखा है ——“भावनाविशेषर्माहन्ता=ज्ञानविशेष-सामर्थ्येन, एतद्‌म्‌ साधारणीकरणाय व्याप्तारान्तरकरणमनावश्यकमिति सूचितं भवति। इदमेव प्रत्यक्षयते रसस्वरूप प्रकाशाद् विशेषेऽपि—“पुनः पुनरनुसन्धानात्मक ज्ञानविशेष के सामर्थ्य से’ इसी विशेषण से सूचित होता है कि साधारणीकरण के लिये व्याप्ता या भावकत्व-भोजकत्वव्यापार आदि मानना अनावश्यक हो जाता है और यही ग्रन्थकार जगन्नाथ के मत से रस का स्वरूप है तथा काव्यप्रकाश से विलक्षण है।

अतः विद्वानों का मत है कि अपनी प्रतिभा से पण्डितराज ने ही सभी मतों की उद्भावना की है। इनमें कल्पित तो रससूत्र के विरुद्ध होने से और शेष कल्पनात्मक सिद्ध² (अयुक्तवाग्‌दृशिक) होने से साहित्यशास्त्रीय विद्वानों को ग्राह्या नहीं हैं! केवल दार्शनिक दृष्टि से चिन्तित ‘नव्यान्तु’ मत किसी साहित्यिक के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता। अतः समालोचक इन मतों की उपेक्षा करते आये हैं और स्वयं ग्रन्थकार ने भी नवीन प्रकार प्रदर्शित करने के कौतूहल से ही इन्हें ग्रन्थ में निवेशित किया है, सिद्धान्त नहीं माना है।

रस-विषयक सिद्धान्त मत—

सहृदय के हृदय में वासनारूपेण सदा से स्थित (नित्य) रत्यादि स्थायिभाव ही बाह्य विभावानुभावव्यभिचारिभावों के व्यापार्यव्यञ्जकभाव सम्बन्ध से साधारणरूप में अनुभूयमान होते हुए अलौकिक आस्वादपदवी को प्राप्त कर रस कहलाता है—यह परमाचायों अभिनवगुप्त के मत का सारांश है। पण्डितराज का प्रथम सिद्धान्त इसी की व्याख्या द्वारा निम्नांकित कथ्य को व्यक्त करते हैं—

(१) जब विभावादि अनकूल वर्णों से युक्त चमत्कृत काव्य में निवेशित रहता है।

(२) यह काव्य सहृदय के हृदय में प्रविष्ट कर गया होता है।

(३) सहृदय बार-बार अनुसन्धान करते हुए विभावादिकों को साधारणीकृत कर लेते हैं।

१. रसगङ्गाधरीय-रसस्वरूपनिरूपणवल्याख्या—‘रसिकमतोरङ्गिनी’ ग्रन्थ के परिशिष्ट में—नाग प्रकाशक, दिल्ली—१९९५ ई०।

२. मैथिलोकाव्यविवेक, पृ० ६८ ।

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( ४ ) साधारणीकृत विभावादि मिलकर अलौकिक व्यापार ( भावना ) से आनन्द, जो सहृदय के हृदय में आवरण से ढँका रहता है, उसके उस आवरण ( पर्दा ) को हटा देते हैं ।

(५) इस अज्ञाननाश से रसानुभूति करने वाला ( प्रमाता ) अपने अन्तःकरण के परिमितत्व प्रभाव एवं अपने प्रमातृत्व धर्म को त्याग कर साक्षीरूप से व्यापक हो जाता है, स्वयंप्रकाश हो जाता है और अपने वास्तविक आनन्दस्वरूप का साक्षात्कार करना है और यहीं तो रससाक्षात्कार है । उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि पण्डितराज की व्याख्या अभिनवगुप्त का समर्थन साहित्यिक दृष्टि से करती है । अन्तर केवल दार्शनिक विचार में है । दोनों आचार्य रस को स्वयंप्रकाश एवं नित्य मानते हैं । फर्क तो इतना ही है कि अभिनवगुप्त के मत में चैतन्य विशेषण और स्थायिभाव विशेष्य है, पर पण्डितराज के मत में स्थायिभाव हो विशेषण और चैतन्य विशेष्य है । अभिनव ने ध्वनिवागम दर्शनों के अनुसार प्रकृति के अंश रत्यादि स्थायिभाव में भी चैतन्यप्रतिभास के कारण आनन्द की स्थिति मानी है । पर पण्डितराज शाङ्कर वेदान्त के अनुसार केवल चैतन्य को ही आनन्दमय मानकर रससिद्धान्त व्यवस्थित करते हैं और अभिनव के मत में वेदान्तानुसार संशोधन कर देते हैं । आगे इसकी विवेचना करते हुए पण्डितराज इसे स्पष्ट ही कर देते हैं । अभिनव के मत में व्यंजनाजन्य ज्ञानविषय रत्यादि ही रस है, पर पण्डितराज के मत में-"रसौ वैं सः" इत्यादि श्रुति से आत्मा और रस में तादात्म्य ( अभेद ) सिद्ध रहने के कारण तथा वेदान्तसिद्धान्तानुसार आत्मा के नित्यज्ञानरूप और अन्य के संस्कार रूप रहने के कारण आत्मा और रस में अभेद उत्पन्न नहीं हो सकता है । अतः ज्ञान-विषयोभूत रत्यादि को रस न मानकर 'रत्यादिविषयक ज्ञान को ही रस मानना समुचित है । यहाँ ज्ञातव्य है कि रसस्वरूप का सर्वप्रथम विवेचन अभिनपुराण में हुआ है

१. "भक्तिप्रज्ञाननिष्ठो रत्यादिः स्थायिभावोऽस्ति नित्यस्तम् । वस्तुतस्तु वक्ष्यमाणश्रुतिस्वारस्यान रत्यादिवचिछन्ना चिदेव रसः ।" ( रसगङ्गाधरः-रसस्वरूपपरिरूपणे )

२. आभनेपुराणे—

अक्षरं ब्रह्म परमं सनातनमजं विभुम् । वेदान्तेषु वदन्त्येकं चैतन्यं ज्योतिरेश्वेरम् ॥ आनन्दः सहजस्तस्य व्यज्यते स कदाचन । व्यक्तिः सा तस्य चैतन्यचमत्काररसाश्रया ॥

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और वेदान्त दर्शन के अनुसार ही हुआ है, भले ही उसके प्रतिपादन का ढंग भिन्न हो, पर यह रसस्वरूप वहीं से चलकर नानारूप में वर्णित-विवेचित होता हुआ अन्त में पण्डितराज के द्वारा पुनः अपने यथोचित पूर्वस्वस्थान पर आ गया।

(४) गुणावृत्तिडपण—पूर्वविवेचित विषयों के अतिरिक्त रसगन्धाधर के इस प्रथम आनन में गुणनिरूपण, भावध्वनिनिरूपण, रसाभासादि और अलंक्ष्यक्रमध्वनि के सम्बन्ध में विशेष विचार—ये विषय सक्ष्म विवेचन के साथ निरूपित हुए हैं और इस प्रकार प्रथम आनन असलंक्ष्यक्रमध्वन्यङ्गस्य काव्य के तथा तत्सम्बद्ध विषयों के निरूपण में समाप्त हो जाता है। इनका विवेचन पाठक ग्रन्थ में ही देखेंगे। यहाँ इन्हीं शब्दों के साथ विरत होता है।

पण्डितराज जगन्नाथ

आचार्य जगन्नाथ नैसर्गिक कवित्वसम्पन्न काव्यशास्त्रीय आचार्य थे। आन्ध्रप्रदेश

आचार्य जगन्नाथ नैसर्गिक कवित्वसम्पन्न काव्यशास्त्रीय आचार्य थे। आन्ध्रप्रदेश इनकी जन्मभूमि थी। ये तैलङ्ग ब्राह्मण थे। इनके पिता पेरुभट्ट महान् विद्वान् थे, जिन्होंने ज्ञानेन्द्रभिक्षु से वेदान्त, माहेन्द्र पण्डित से न्याय-वैशेषिक, लण्डनदेव उपाध्याय से मीमांसा और शेष वीरेश्वर से व्याकरण का अध्ययन किया था और सर्वविद्यावदर थे। जगन्नाथ ने अपने पिता से अध्ययन किया था और उनके गुरु शेष वीरेश्वर से भी पढ़ा था। ये व्याकरण, दर्शन और साहित्यशास्त्र के उच्च कोटि के विद्वान् थे। ये प्रतिभाशालो, प्रत्युत्पन्नमति, समयपरिक्षक (युगद्रष्टा) और प्रभावशाली पण्डित थे। तरुण होते ही ये विद्वान् हो गये और विद्वान् होते ही दिल्लीश्वर शाहजहाँ

(१६२५-१६६६ ई०) के कृपापात्र होकर पण्डितराज की पदवी प्राप्त कर लो—

"मूत्तमतेब

"मूत्तमतेब नवाबसफखानमनत:प्रसादेन द्विजकुलसेवा-हैकि-वाड्मन:कायेन माथुरकुलसमुद्रेन्दुना रायमुकुटदेनादिष्टेन श्रीसार्वभौमसाहिजहान-प्रसादाभिगत-

'पण्डितराय'-पदवीविराजितेन तैलङ्ककुलावतंसन पण्डितजगन्नाथेन भासफ-विलासाख्येयमास्यायिका निरमीयत"। ('आसफविलास' के आरम्भ में)

१. आसफविलास—जगन्नाथकृत के आरम्भ में—"तैलङ्ककुलावतंस पण्डित-जगन्नाथेन"।

२. इनका नाम पेरम भट्ट भी था; दृष्टव्य—प्राणाभरण एवं रसगङ्गाधर के आदि में—"श्रीमतेपेरमभट्टसूरितनयः"। (प्राणाभरण)

३. रसगङ्गाधर का आदि भाग।

४. अस्मद्गुरु-पण्डितवीरेश्वराणाम्—मनोरमाकुचमदन के प्रारम्भ में।

५. भामिनीविलास में—"दिल्लीवल्लभपाणिपल्लवतले नीतं नवीनं वयः"।

६. मुकुन्दराय माथुर नामक काव्यस्थ के द्वारा दरबार में इनका प्रवेश हुआ था, जो वहाँ के दीवान थे।

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वहाँ कुछ दिन शाहजहाँ तथा उसके पुत्र दाराशिकोह के आश्रय में अपना "नवीनवयः" ( युवावस्था का पूर्वार्ध, ३० वर्ष तक ) सुलभपूर्वक विताया था—"दिल्लीवल्लभ-पाणिपल्लवतले नीतं नवीनं वयः" ( भामिनी-विलास ) । जगदाभरण में जगन्नाथ ने दाराशिकोह का वर्णन किया है । इस हिसाब से जान पड़ता है कि १६४० ई० के बाद ये दिल्ली से निकल पड़े, उस समय यदि इनकी आयु ३० वर्ष मानें तो इनका जन्मसमय १६१० ई० अनुमानित होता है ।

ये अप्पयदीक्षित और भट्टोजिदीक्षित के उत्तरसम-सामयिक विरोधी थे तथा इनके ग्रन्थों पर स्वतन्त्र रूप से खण्डन-ग्रन्थ लिखे थे । अप्पयदीक्षित के भ्रातुष्पुत्र एवं शिष्य नीलकण्ठ दीक्षित ने 'कलिगताम्बुद ४७३= ( १६१५ ई० ) में नीलकण्ठविजय काव्य की रचना की थी, जिस समय दीक्षितजी परम वृद्ध रहें होंगे । सिद्धान्त-कौमुदीकार भट्टोजिदीक्षित के गुरु शेषकृष्ण के पुत्र शेषवीरेश्वर पण्डितराज के एवं उनके पिता के परमभट्ट के गुरु थे ।

बादशाह शाहजहाँ के साथ पण्डितराज ने काश्मीर की यात्रा की थी और वहाँ के नवाब आसफखान द्वारा बादशाह के सत्कारादि का वर्णन इन्होंने 'आसफविलास' में किया है ।

विद्वान् होते ही जगन्नाथ राजाश्रय को प्राप्त करने बौकानेर गये । वहाँ के राजा जगतसिंह की प्रखांस में इन्होंने जगदाभरण काव्य ( ५३ पद्यमात्र ) की रचना की । इन्हीं जगत्सिंह के पिता करणसिंह के आदेश से मैथिल गंगानन्द कवीनद्र ने कर्णभूषण ( रसनिरूपण ) ग्रन्थ की रचना की थी ।

किवदन्ती है कि वहाँ से ये जयपुरनरेश जयसिंह की सभा में पधारे । वहाँ मुल्लाओं के दो आक्षेपों के निराकरण हेतु पण्डितसभा हुई थी, पर समाधान नहीं हो रहा था । पण्डितराज ने समाधान का वचन दिया और कहा कि 'एक आक्षेप का उत्तर मैं तुरंत दे सकता हूँ और दूसरे का उत्तर अरबी-फारसी पढ़कर दूँगा' । वहाँ इन्हें फारसी पढ़ने की व्यवस्था की गयी और कुछ ही दिनों में ये उस भाषा के पारंगत हो गये । उक्त आक्षेपों का उत्तर देने हेतु इन्हें दिल्ली बादशाह के दरबार में भेजा गया । उनके समाधान से सभी प्रसन्न हो गये—

आक्षेप—( १ ) राजा जयसिंह आदि वास्तविक क्षत्रिय नहीं हैं, क्योंकि परशुराम ने जब २१ बार पृथ्वी को निःक्षत्रिय कर दिया तो क्षत्रिय आये कहाँ से ?

अष्टाविंशदुपसृष्टतसमशताधिकचतुःसहस्रेऽपु । कलिवर्षणु गतेषु प्रथितः किल नीलकण्ठविजयोऽयम् ॥

२ भू०

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( १८ )

समाधान—परशुराम ने जब पहली बार पृथ्वी को नि:क्षत्रिय कर दिया; तो दूसरी बार के लिए क्षत्रिय कहाँ से आये ? यह २१ बार कहना ही प्रमाणित करता है कि संहार के बाद भी बहुत क्षत्रिय बचे रहे, जो इन राजाओं के पूर्वज थे ।

आक्षेप ( १ ) अरबी भाषा संस्कृतन से प्राचीन है ।

समाधान—मुसलमानों के 'हदास' (धर्मग्रन्थ) में लिखा है कि—'मुसलमान हिन्दुओं से विपरीत आपरण करें, यही उनका धर्म है ।' इस वाक्य से सिद्ध है कि हिन्दू धर्म मुसलमानों के धर्म से प्राचीन है और यह भी स्वतः सिद्ध है कि उन हिन्दुओं की भाषा भी अरबी से प्राचीन है ।

दिल्लो दरबार में रहकर पण्डितराज ने एक परम रमणीय यवनी से प्रेम किया और बादशाह की 'कृपा' से वह इन्हें प्राप्त हो गयी । यह समाचार देशभर में फैल गया और इन्हें पण्डितों ने जातिच्युत घोषित कर दिया । इन पण्डितों में अप्पय दीक्षित और भट्टोजिदीक्षित प्रमुख थे । अतः इनसे पण्डितराज का बैरभाव हो गया । कुछ दिन बाद वह यवनी, जिसका नाम 'लवङ्गी' था, असमय में ही दिवङ्गता हो गयी और पण्डितराज ने विरक्तभाव से दिल्ली को छोड़ दिया । ये यवनोसम्पर्क से अपने को स्वयं पापी समझने लगे—

सुरधुनिमुनिकन्ये ! तारये: पुण्यवतं स तरति निजपुण्यैस्तत्र कि ते महत्त्वम् ।

यदि हि यवनकन्या-पापिनं मां पुनीहि तदिह तव महत्त्वं, तन्महत्त्वं महत्त्वम् ॥ ( गङ्गालहरी )

कुछ समय पण्डितराज ने नेपाल के समीप कूचबिहार (कामरूप) के राजा प्राणनारायण ( १६३३-६६ ई० ) के आश्रय में भी रहे, जहाँ 'प्राणाभरण' की रचना की । यह ग्रन्थ वही है जिसे पूर्व में 'जगदाभरण' कहा गया है, फर्क इतना ही है कि यहाँ जगोत्सह के स्थान में 'प्राणनारायण' रख दिया गया है । इस राजा का वंश इस प्रकार है—विश्वसिंह—मल्लदेव ( नरनारायण )—लक्ष्मीनारायण—वीरनारायण— प्राणनारायण । इनमें मल्लदेव के आश्रित काव्यकोमुदीकार देवनाथ ठाकुर ( काव्य-प्रदीपकार गोविन्द ठाकुर के पुत्र ) थे ।

वहाँ से लौटकर ये काशो में रहने लगे । अन्य राजाओं का आश्रय इन्हें तुच्छ दीखने लगा । ये लिखते हैं—

९. न याचे मजाराल न वा वाजिराजं न वित्तेषु चित्तं मदयं कदापि ।

इयं सुसतनी मस्तकन्यासतहस्ता, 'लवङ्गी'कुरङ्गीदृगङ्गीकरोतु ॥

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दिल्लेश्वर वो जगदीश्वरो वा मनोरथान् पूरयितुं समर्थः । अन्यैरन्न पालैः परिदीयमानं शाकाय वा स्याल्लबणाय वा स्यात् ॥

रसगङ्घाधर के मंगलाचरण आदि से ज्ञात होता है कि पण्डितराज वैष्णव थे, हालाँकि अन्य देवताओं की स्तुति भी इनकी प्राप्त है । इनका जीवन यद्यपि उल्लासमय 'रहा, पर इन पर बड़े-बड़े अन्तर्थपात हुए—युवावस्था में ही पारिणग्रहोती' ( स्वजातीया वधू से विवाह ) और पाणिग्रहिता ( पाणिग्रहण प्रथा ) का देहान्त हो गया । यवक पत्त्र स्वर्ग-वासो हो गया' । यवनोसम्पर्क-दोष से पण्डितों द्वारा अपमानित हुए और अन्त में विरक्त होकर गङ्गा के शरण में गङ्गालहरी की रचना करते हुए गङ्गालाभ कर लिया ।

ये ब्रह्मते्ज से युक्त थे । किंवदन्ती है कि जब यवनी इनके सायनकक्ष में आयी तो उसे हुक्का कि मैं जल जाऊँगी और वह लौट गयी । बादशाह के दरबार में पण्डितराज के इस ब्रह्मतेज को कम करने का प्रश्न उठ गया । किसी पण्डित के कहने से इन्हें हुक्के के पानी से नहलाया गया और तब यवनी इनके पास जा सकी ।

पण्डितराज बहुत गर्वित् स्वभाव के थे ओर यह गर्व उनका यथार्थ था, परन्तु विद्वत्समाज इन्हें शास्त्रोक्त कहता है । वे न केवल "अलङ्कारन् सर्वान् अपि मल्लित-गर्वान् रुचयतु" जैसी उक्ति रखते हैं, अपितु अपनी कविता की स्वयं ही अत्यधिक प्रशंसा करते हैं—

धुर्यैररपि माधुर्यैन्द्रदृशा-क्षीररेखु-मार्गिक-सुधानाम् । वन्द्यैव माधुरीयं पण्डितराजस्य कविताया ॥ ३१ ॥

ये न केवल कपयदीक्षित या भट्टोजिदीक्षित का खण्डन दर्‌पपूर्ण वाणी से करते हैं, वरन् आनन्दवर्धन, मम्मट आदि की तीखी आलोचना में भी ये पीछे नहीं रहे । परन्तु अन्तिम अवस्था में इन्हें अपने कृत्यों पर पश्चात्ताप हुआ कि क्यों हमने विद्वानों का अनादर किया ? क्यों यवनोसम्पर्क किया ? और इस विरक्ति के साथ संसार से ऊपर कर भगवती भागीरथी गङ्गा के शरण में पहुँचे । पर उस समय में भी अपनी प्रकृति ( स्वभाव ) ने इन्हें नहीं छोड़ा और ये गर्व से गङ्गा नदी की सबसे ऊपरी सीढ़ी पर

पण्डितराज का करुणविलास— धृत्वा पदस्खलनभीतिवशात् करं मे या रुद्वत्‌वस्य शिलाशकलं विवाहे । सा मां विहाय कथयद् विलासिनि ! त्याम् मारोहसीति हृदयं शतधा प्रयाति ॥

२. रसगङ्घाधर—प्रत्यनीक अलङ्कार के उदाहरण में पुत्रशोक का वर्णन ।

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बैठ गये और बोले—‘माता गड़्ना के लिए मैं इतनी दूर से आया हूँ तो यह माता पुत्र के लिए थोड़ी दूर भी ऊपर नहीं होंगी ?’ पण्डितराज गड़्नालहरी के एक-एक पद्य रचते सुनाते थे और गड़्ना एक-एक सीढ़ी ऊपर आ रही थी और अन्तिम पद्य समाप्त होते ही एक ऐसा तरङ्ग आया जो पण्डितराज को समेटे हुए प्रवाह में विलीन कर लिया, माता ने पुत्र को गोद में ले लिया !

पण्डितराज जगन्नाथ की रचनाएँ

१. श्रुङ्गारविलास—१९० पद्य ।

२. आसफविलास—गंगालहरी, शाहजहाँ को काश्मीरयात्रा एवं वहाँ के नवाब आसफखाँ से मुलाकात ।

३. करुणविलास (पत्नीवियोग में विलाप)—९९ पद्य ।

४. प्रास्ताविक विलास—११२२ पद्य ।

५. शान्तिविलास—निर्वेद पद्य—४४ ।

६. जगदाभरण—५३ पद्य—बीकानेर के राजा जगतसिंह की प्रशंसा ।

७. प्राणाभरण—४३ पद्य—कामरूप (कूचबिहार) के राजा प्राणनारायण की प्रशंसा ।

यह ‘जगदाभरण’ में ही नामपरिवर्तन करके प्रस्तुत किया गया है ।

८. यमुनावर्णन—गङ्गा, अनुपलब्ध, रसगङ्गाधर के मध्यम काव्य के उदाहरण में इसकी पंक्ति उद्धृत है ।

९. लहरी-पञ्चक—

(१) गङ्नालहरी—५३ पद्य, इसे ही पीयूषलहरी भी कहते हैं—‘इमां पीयूषलहरों जगन्नाथेन निर्मिताम्’ ।

(२) यमुनालहरी—१३ पद्य, इसे ही अमृतलहरी कहते हैं ।

(३) करुणालहरी—५५ पद्य, कृष्ण की स्तुति ।

(४) लक्ष्मी लहरी—४९ पद्य ।

(५) सुव्रालहरी—३० पद्य, सूर्यस्तुति ।

१०. भामिनीविलास—५५८ पद्य ।

११. चित्रमीमांसाखण्डन—अप्पयदीक्षिततकृत चित्रमीमांसा अलंकारशास्त्रीय ग्रन्थ का खण्डन ।

१२. मनोरमाकुचमर्दन—भट्टोजिदीक्षितसंकृत प्रौढमनोरमा (व्याकरणशास्त्रीय व्याख्या-ग्रन्थ) का खण्डन ।

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९३. रसगङाधर—अलङ्कारशास्त्रीय महान् ग्रन्थ ।

१. पण्डितराज-ग्रन्थावली में इनके सभी ग्रन्थों का आकर्षक प्रकाशन संस्कृत परिषत्, उर्दूमानिया विद्याविद्यालय, हैदराबाद से हुआ है ।

अन्य जगन्नाथ

संस्कृत वाङ्मय में जगन्नाथ नाम के अनेक ग्रन्थकार हो चुके हैं । उनके ग्रन्थ हैं—सिद्धान्तसम्राट् ( ज्योतिष )—सम्राट् जगन्नाथकृत, सिद्धान्तकौमुदी, रससागनित, विवादार्णवभङ्ग, रत्नम्थनाटक, असतन्द्रचन्द्रिकनाटक—मैथिल जगन्नाथकृत, अनङ्गविजयभाण, सभातरङ्ग, अद्भुतामृत, शृङ्गारभजविलास, ज्ञानविलास, समुदायप्रकरण आदि । परन्तु इनमें कोई भी पण्डितराज उपाधि वाले नहीं थे । मिथिला में रघुनन्दन उपाध्याय पण्डितराज थे, जिन्होंने बादशाह अकबर से तिरहुत राज्य प्राप्त कर अपने गुरु म० म० महेश ठकुर को दे दिया था तथा काव्यप्रकाश की टीका लिख्खी थी, जो दरभङ्गा में हस्तलिखित रूप में है ।

रसगङाधर की व्याख्या-सम्मत्ति

रसगङाधर पर निम्नांकित व्याख्याएँ उपलब्ध हैं—

( १ ) गुरुर्मपेकाश—म० म० नागेशभट्ट (१७५९ ई०) कृत । यह रसगङाधर पर सर्वप्राचीन टीप्पणी उपलब्ध है, जो इसके खण्डन के उद्धेश्य से ही लिखी गयी थी । नागेशभट्ट प्रकख्यात वैयाकरण थे । ये भट्टोजिदीक्षित के पौत्र हरिदीक्षित के शिष्य होने के कारण पण्डितराज के विरोधी हुए, क्योंकि भट्टोजि से पण्डितराज का वैरभाव प्रसिद्ध ही है । नागेश ने अपनी गुरु परम्परा के समर्थन में हो पण्डितराज का खण्डन किया है । बहुत स्थलों पर ग्रन्थ के आशय को भी स्फुटित किया है । इसका प्रकाशन १९३९ ई० में भट्ट मथुरानाथ शास्त्री की सरला टीका के साथ जयपुर से हुआ उत्तरालङ्कार पर्यन्त और आज तक इतना ही मूल ग्रन्थ भी मिलता है । नागेश की टीका भी यहीं तक है ।

( २ ) म० म० गङाधर शास्त्री की सवचिंत-सचिंत टिप्पणी सहित रसगङाधर काशी से प्रकाशित हुआ था । इससे पहले यह ग्रन्थ काव्यमाला में मुद्रित हो चुका था । तृतीय बार रसगङाधर का प्रकाशन भट्ट मथुरानाथ शास्त्री द्वारा जयपुर से हुवा ।

( ३ ) सरला—भट्ट मथुरानाथ शास्त्री को ग्रन्थलापिनी एवं गूढार्थबोधिनी संक्षिप्त व्याख्या है । यह गुरुर्मपेकाश के साथ १९३९ ई० में प्रकाशित हुई और १९४५ तक इसके छः संस्करण निकल गये, इसी से इसकी उपादेयता सिद्ध है ।

( ४ ) हिन्दी अनुवाद—पं० श्रीपुरुषोत्तमशर्मा चतुर्वेदी, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी ।

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( ५ ) 'चन्द्रिका'—कविशेखर बदरीनाथ झा—प्रथममान्य भाग, शेष भाग पर पं० मदनमोहन झा—रसगन्धधार की आज तक सर्वोत्कृष्ट व्याख्या यही है । ग्रन्थ को स्पष्ट करते हुए उसका सारभाग पाठकों के समक्ष रख देना, छात्रों एवं विद्वानों के उपयुक्त सन्तुलित विचार उपस्थि‌त करना एवं साहित्यिक दृष्टि से ग्रन्थ को देखना इत्यादि कतिपय विशेषताएँ इसे जनप्रिय बनाती हैं । चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी से १९६५ ई० में प्रकाशित ।

( ६ ) 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या—पं० मदनमोहन झा—यह व्याख्या उपर्युक्त 'चन्द्रिका' संस्कृत व्याख्या के साथ प्रकाशित है । यह सूक्ष्म विचारणा के क्रम में बहुत स्थलों पर विस्तृत हो गयी है ।

( ७ ) मधुसूदनीप्रकाश संस्कृत-हिन्दी व्याख्या—आचार्यं मधुसूदन मिश्र—काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ।

( ८ ) रसचन्द्रिका—प० श्रीकेदारनाथ झा—यह व्याख्या सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से १९७७ ई० में प्रकाशित हुई । इसमें ग्रन्थ का अवतरण, शब्दार्थस्फोरण एवं दार्शनिक दृष्टि से विषय का निरूपण किया गया है । कुछ स्थलों में यह शास्त्रान्तर विचार में सन्निविष्ट हो गयी है । जब कि बहुत स्थलों पर टिप्पणियाँ बन के रह गयी है । इसकी भूमिका केवल टीकाकारों की भत्संना में कृतशमा है, जैसा वणंन विद्वान् के लिए अशोभनीय है । काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ की व्याख्या में एक भी तत्त्वचिन्तनीय त्रुटि नहीं दिखाई गयी है, केवल न्यायशास्त्रीय त्रुटि और वह त्रुटि भी कहाँ तक समीचीत है इसका निर्णय तो परवर्ती आलोचकों, व्याख्याकारों के विचार में देखे जा सकते हैं । पर उनकी इस भूमिका से स्पष्ट हो जाता है कि 'चन्द्रिका' व्याख्या की दोषगवेषणा को ही यह श्रेय है कि 'रसचन्द्रिका' व्याख्या का उसने ही निर्माण करा लिया । माननीय व्याख्याकार के समक्ष्य में विरोध वक्तव्य नहीं है—साहित्यशास्त्रीय विषय-विवेचन में भी बहुत स्थलों पर शास्त्रवैपरित्य इनकी व्याख्या में है जिनकी गणना हम यहाँ नहीं करना चाहते । पाठक इस रसतन्त्रज्ञप्तिव्याख्या में उन्हें ढूँढ़ सकते हैं । 'चन्द्रिका' के बाद रचित होने पर भी 'रसचन्द्रिका' उसका स्थान न ले सकी, न ही लोकप्रिय हो सकी—यह भी ज्ञातव्य है ।

( ९ ) रसतन्त्रज्ञप्ति—डॉ० श्रीनारायण मिश्र एवं डॉ० राघिनाथ झा—यह प्रस्तुत संस्करण संस्कृत-हिन्दी व्याख्यात्मक है । यह छात्रोपयोगी के साथ-साथ गम्भीर विचारों का प्रतिपादक, जटिल स्थलों का परिचायक, पूर्वव्यास्यानों द्वारा विषय को प्रकृत शास्त्र से शास्त्रान्तर की ओर बहकाव का नियन्त्रक और सुव्यवस्थान का विश्खण्डक के रूप में प्रस्तुत हो रहा है ।

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प्रस्तुत संस्करण होने में ( छपने में ) बहुत विलम्ब हो गया। दु:संयोग की बात हुई कि डा० श्रीनारायण मिश्रजी की व्याख्या कुछ अंश छपने के बाद प्रेस में नष्ट हो गयी। इससे मिश्रमहोदय बहुत क्षुब्ध हुए और छपने हुई व्याख्या के बाद संक्षिप्त व्याख्या से प्रथमानन को पूर्ण किया। पर दुर्भाग्य की बात! फिर कुछ अंश छपने के बाद पाण्डुलिपि नष्ट हो गयी और डा० मिश्र ने यह काम छोड़ दिया। प्रकाशक महोदय ने मुझे प्रेरित किया और मैंने यथासमति भावशून्यनिप्रकराण के पूर्तिमात्र से आगे प्रथमानन पर्यन्त संस्कृत-हिन्दी व्याख्या कर दी। इसमें मुझे अधिक आयास नहीं करना पड़ा, क्योंकि अध्ययन एवं अध्यापन के क्रम में रसगन्धाधर पुस्तक के हाशिये पर मैंने टिप्पणी कर लो थी, जिसमें ग्रन्थ के गूढ़ाशय, मतमतान्तर एवं पूर्व व्याख्याकार से मतभेद अंकित थे और वही मेरी व्याख्या का आधार बन गया।

यह व्याख्या कहाँ तक सफल हो सकी है, इसकी क्या विशेषताएँ हैं—इस विषय के विवेचन का भार पाठकों पर ही छोड़ना उचित समझ कर विरत होता हूँ।

संस्कृत-दिवस १९९६ ई०

स्नातकोत्तर व्याख्याकरण विभाग

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

डा० शाशिनाथ झा०

विद्यावारिधि

दरभङ्गा†

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विषय- सूची

विषय:

पृष्ठम्

भूमिका

१-३१

मङ्गलाचरणादि

काव्यलक्षणम्

हेमचन्द्रोक्तलक्षणे आक्षेपः

१२

साहित्यदर्पणोक्तलक्षणे आक्षेपः

२०

प्रतिभाकाव्यकारणम्

२१

काव्यं चतुर्विधम्

३०

उत्तमोत्तमकाव्यस्य लक्षणम्

३०

उत्तमकाव्यस्य लक्षणम्

४८

मध्यमं काव्यम्

६२

अथमं काव्यम्

६५

प्रकाशकृत्कृतभेदेषु कटाक्षः

६७

ध्वनेभेदाः

७०

रसस्वरूपम्

७९

( १ ) अभिनवगुप्तमते जगन्नाथेन मतभिदः

७५

( २ ) भट्टनायकमते

८२

( ३ ) नव्यमते

९४

( ४ ) भ्रमवादिमते

१०४

( ५ ) लोल्लटमते

१०८

( ६ ) शङ्कुकमते

११०

( ७ ) इतरणि पञ्चमतानि

१११

भरतकृतरससूत्रस्याष्टव्याख्यानम्

११२

रसस्य नवभेदाः

११४

शान्तरस-विचारः

११७

स्थायिभावा:

११९

रतिः

१२४

शोकः

१२४

निवेदः

१२५

क्रोधः

१२६

उत्साहः

१२६

विषय:

पृष्ठम्

विस्मय:

१२६

हास:

१२७

भयम्

१२७

विभावः, अनुभवः,

१२८

व्यभिचारिभावः

१२८

रसभेदानिरूपणम्

१३९

शृङ्गारः

१३१

करुणः

१३४

शान्तः

१३६

रौद्रः

१३५

वीरः

१४३

अद्भुतः

१४५

हास्यः

१६१

भयानकः

१६८

बीभत्सः

१८४

रसानां संख्यानियमः

१६८

रसानां परस्परविरोधः

१६९

रसदोषाः

१५३

गुणनिरूपणम्

१९३

गुणविषये स्वमतम्

१९४

गुणविषये वामनादिमतम्

२०९

शब्दगुणाः

२०२

श्लेषः

२०९

प्रसादः

२०३

समता

२०८

माधुर्यम्

२०८

सुकुमारता

२०५

अर्थव्यक्तिः

२०६

उदारता

२०७

ओजः

२०९

कान्तिः

२१०

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विषय:

पृष्ठम्

समाधि:

२९०

अर्थगुणा:

२९२

श्लेष:

२९२

प्रसाद:

२९४

समता

२९४

माधुर्यं

२९७

सुकुमारता

२९७

अर्थव्यक्ति:

२९९

उदारता

२९९

ओज:

२९९

कान्ति:

२९९

समाधि:

२९९

अर्थ तेषु त्रिषुवान्तर्भावः

३००

गुणव्यतिकारचर्चना

३०७

रचनायं वर्गनीयन्तता

३४५

भावध्वानि:

भावलक्षणम्

२६७

हर्ष:

२७९

स्मृति:

२८०

त्रीडा

२८५

मोह:

२८७

धृति:

२८८

शङ्का

२८९

ग्लानि:

२९०

दैन्यं

२९२

चिन्ता

२९४

मद:

२९६

श्रम:

२९५

गर्व:

३००

निद्रा

३०२

मति:

३०३

विषय:

पृष्ठम्

व्याधि:

३०४

त्रास:

३०५

सुसम्

३०७

विवोध:

३०८

अमर्य:

३०९

अवहित्थम्

३१२

उग्रता

३१४

उन्माद:

३१४

मरणम्

३१६

वितर्क:

३१५

विषाद:

३१९

औत्सुक्यम्

३२२

आवेग:

३२३

जड़ता

३२४

आलस्यम्

३२५

असूया

३२७

अपस्मार:

३३०

चपलता

३३१

निवेद:

३३३

देवादिविषयार्ति:

३३४

व्यभिचारिभावानां संख्यानियम:

३३६

रसाभास:

३३५

भावाभास:

३४८

भावशान्ति:

३४०

भावोदय:

३४९

भावसन्धि:

३४२

भावशबलता

३४३

अलङ्कयक्रमचर्चन:

३६२

वर्णरचनादीनांरसभिव्यक्तिकता

३८८

उदाहृतरस्लोकानुशक्रमणी

३७५

रसगङ्गाधरेच्चिताप्रन्या

ग्रन्थकारार्च

३.९

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॥ श्री: ॥

रसगन्धाधर:

'रसतरङ्गिणी' संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेत:

प्रथमाननम्

स्मृतापि तरुणातपं करुणया हरन्तो नूणामभङ्गुरतनुतिविषयां वलयिता शशिवद्युताम् ।

रसतऱङ्गिणी

शुक्लाम्बरपरिधाना पुण्डरीकासनस्था च या । सर्वमोहाशना देवी सा नः पातु सरस्वती ॥ १ ॥

तर्कयागमपरिश्रुताश्चान्तश्वान्तिदायिनीसं । रसगन्धाधरव्याख्यां कुर्मो रसतऱङ्गिणीम् ॥ २ ॥

ग्रन्थार्थेमात्मसात्कृत्वा तरङ्गिण्या यथायथम् । स्वस्वप्रज्ञानुसारेण शिष्यैवबोध: प्रवर्त्यताम् ॥ ३ ॥

ये शास्त्राध्ययनादहंकृतिजुषो विद्याविलासद्विषो लोके पण्डितमानिनो यदि कृतिं निन्दन्ति निन्दन्तु ते । निष्पक्षं समुदीर्यन्यवितथां वाचं तु ये वाङ्मिन-स्ते कामं प्रविवेचयन्त्वह कियान् दोष: कियान् वा गुण: ॥ ४ ॥

जो स्मरण किए जाने पर भी समस्त भक्त जनों के तीत्र आातपों—आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक इन तीनों दु:खों को—कृपा करके हर लेती है, अनश्वर

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कलिन्दगिरिनन्दिनोतटसुरद्रुमालम्बिनी मदोयमतिचुम्बिनी भवतु कापि कादम्बिनी ॥ १ ॥

अपि च कलिन्दगिरिनन्दिन्या यमुनायास्तटेउपस्थितं सुरद्रुं कदम्बवृक्षमालम्बितुं शीलं यस्मास्तथाविधा सा कापि विलक्षणा कादम्बिनी श्रीकृष्णस्वरूपा मदीयमतिचुम्बिनी मदयुद्धविषया भवतु—इति मङ्गलपदार्थः । अत्र स्मृतापीत्या नेन लौकिककादम्बिनीतो व्यतिरेको दर्शितः । अपूर्वेयं कादम्बिनी साक्षात्कृता स्मृता वा तरुणातपं हरति, लौकिकी तु शिरस ऊध्र्वं नभसि वर्त्तमानैव न स्मृता न वा साक्षात्कृता, प्रदेशान्तरे तत्साक्षात्कारेऽपि तापाङ्ङमनात् । अलौकिक्या: पुनस्तस्या: प्रदेशान्तरस्थजीवेनापि स्मृतैव तपनाशकत्वमस्येव, वस्तुतोऽस्या जीवस्य च प्रदेशमात्रेsदितत्वाभाव एव । स्मृतिश्चात्र शब्दानुभवमूलिका । तत्र च शब्दानुभवस्य तापाङ्शामकत्वं तन्मूलस्मृतेश्च तच्च्छामकत्वं शास्त्रायातम् । कादम्बनीत एव रूपेणानुमित्यभावाच्च नानुमितिमूलकत्वं प्रकृताया: स्मृते: । ये पुनरन्यतरश्वरसत्तायास्तद्योतयवस्याश्रवणादनुभवाच्च मननरूपाया अनुमितेर्‌विवक्षणे तु कथञ्चित् सङ्कुचितं शक्यते । ये पुनरिं व्यतिरेकं व्याख्यायन्ति आहु:—‘प्रसिद्धा तु चक्षुषा त्वचा वा प्रत्यक्षीकृतैवातपं हरति’ इति तेऽयुक्ता:, प्रदेशान्तरे चक्षुषा साक्षात्कृतायाsपि तापाङ्शामकत्वाद्वात्तस्या इति पूर्वमुक्तत्वात्, शिरस ऊध्र्वं तदवस्थाने चाक्षुषत्वस्य तपनोपयोगात्, अन्यथाऽन्यथानां तापशमनाभावप्रसक्ते: । त्वचा प्रत्यक्षीकृतेऽति तृपहास्पदम् । वर्षणद्वारेत्यपि तथैव, संयुक्तसयोगस्य प्रत्यक्षप्रयोजकत्वाभावात् । कर्थञ्चित् संयुक्तसमवायाद्यन्युपगमेऽपि तस्य द्व्यप्रत्यक्षासाधकत्वात् । छत्रादिना व्यवहिते सम्बन्धाद्भावावाच्च । अतः प्रसिद्धा कादम्बिनी प्रदेशविशेषे स्वरूपसती कारणमलौकिक्या पुनर्ज्ञातसत्येवेत्येवं व्याख्येय इत्यलम् । तरुणातपमित्यत्रापि व्यतिरेक: । प्रसिद्धायास्तरुणबाह्यतापमात्रहारकत्वम्, तदपि व्यवच्छेदकं । अनन्तस्तापहारकत्वं तु नैव, अस्या: पुनरन्तस्तापहरन्तीति वक्तव्यमुखेन सार्वकालिकहरणशीलतया सूचितम् । करुणयेत्यनेन चैतन्यनि:स्वार्थंवागमादपि जडकादम्बिन्या व्यतिरेक: प्रतीयते ।

कान्ति से सम्पन्न सैकड़ों विद्युल्लताओं से वेष्टित है और कलिन्द पर्वत से उद्भूत यमुना के तट पर अवस्थित कदम्बवृक्ष पर आश्रित है वह अलौकिक कृष्णस्वरूप कादम्बिनी ( मेघमाला ) मेरे ज्ञान का विषय होवे, अर्थात् मेरी बुद्धि उस कादम्बिनी के आकार से आकारित होवे ॥

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श्रीमज्ज्ञानेंद्रभिक्षोः राधिगतसकलब्रह्माविद्याप्रपंचः: काणादीराक्षपादोरीरपि गहनगिरो यो महेंद्रादवेदोत् ।

नापि स एव । प्रसिद्धया अभ्यापकत्वेन यत्कश्चिदनुरक्ताननुरक्तन रतापहारकत्वमित-रेषमनुरक्तानामपि तापादहारकत्वं चास्ति, अस्या: पुनरेषानुरक्तजनमात्रतापहा-रित्वम्, 'कामाल्लोभादभयात्', 'काले कारणिक त्वयैव कृपया ते तारणीया नराः' इत्यादिरीत्या वाणीरकाननुरक्तमात्रतापहारित्वमिति । अभङ्गोरित्यादिनापि स एव, प्रसिद्धकादम्बिनीवलयीभूतविद्युतस्तनुर्त्विड्भद्रगुरा, अस्या: पुनरभद्रगुरा सेति हेतोः । बहुवचनान्तेन शतशदेनानन्यार्थकेन च विद्युतां कादम्बिनीव्यापकत्वमत एव च वलयितेत्यस्य वेष्टितेति तात्पर्यम् । प्रसिद्धविद्युतस्तु शतसंशयकवमपि नास्ति मुगपत्, प्रत्यक्षत एव तद्बाधात् । विनष्टाविनष्टयोरपि सह संश्यानाभावादतीतकालिकत्स्व-

दिनापि न निर्वाधः । कथञ्चित् सह संध्यानेsपि व्यापकत्वं तु तस्या: प्रत्यक्षवाधि-तमेव । अतोडत्रापि व्यतिरेको निर्वाधः । दृश्यस्य च कादम्बन्यालम्बनत्वेन चित्त-द्रवीभवनरूपापवास्या सूच्यते । चुम्बनशब्देन च विषयप्रतिपादनाद्विषयिणस्तन्मयत्वं सूच्यते । तथा च गीत—

'तद्बुद्धियस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः:' इति ।।

कादम्बिनीतीति स्त्रीलिङ्गे नोदें शोगुरागातिशयसूचनाय । अन्येप्यर्था यथाप्रज्ञ-मध्यवसेयाः । को हि नाम ना शक्तः परिमातुमपरिमेयं शब्दब्रह्म ?

अत्र व्यतिरेकौदाहरणो मुख्यः:, तद्बुद्धत्वेन चातिशयोकृत्यादोपिति सद्भिः ।। ९ ।।

स्वविद्योत्कर्षष्यापनाय स्वगुरुवियोत्कर्षमाह—श्रीमदित्यादि । प्रपञ्चो विस्तारः । तस्याधितः: सततपयंकस्य तस्य यथार्थबोधः । देव:= खण्डदेव:, विनाशिप्रत्ययं पूर्ववदलोपात् । शेषाद्दो वीरेश्वर:, शेषोपनामकत्वात् । शेष =

इस पद्य द्वारा इस कादम्बिनी मे लौकिक कादम्बिनी से विलक्षणता व्यक्त की गई है । लौ० कादम्बिनी जिसके शिर के ऊपर आकाश में रहती उसी के तरुण बाह्य आतप को ज्ञात कर पाती, वह भी सर्वदा और स्मरण मात्र से नहीं; यह न तो एक काल में असंख्य विद्युल्लताओं से वेष्टित होती और न इस विद्युल्लता की कान्ति ही अनश्वर होती; यह यमुना तट पर अवस्थित कदम्ब वृक्ष पर आश्रित भी नहीं होती जब कि प्रकृत कादम्बिनी—जैसा कहा जा चुका है, इन सभी दृष्टियों से लौ० कादम्बिनी से भिन्न, अत एव उत्कृष्ट, है । इससे लौ० कादम्बिनी से प्रकृत कादम्बिनी का व्यतिरेक स्पष्ट हो जाता है ।। ९ ।।

इस पद्य द्वारा इस कादम्बिनी मे लौकिक कादम्बिनी से विलक्षणता व्यक्त की गई है । लौ० कादम्बिनी जिसके शिर के ऊपर आकाश में रहती उसी के तरुण बाह्य आतप को ज्ञात कर पाती, वह भी सर्वदा और स्मरण मात्र से नहीं; यह न तो एक काल में असंख्य विद्युल्लताओं से वेष्टित होती और न इस विद्युल्लता की कान्ति ही अनश्वर होती; यह यमुना तट पर अवस्थित कदम्ब वृक्ष पर आश्रित भी नहीं होती जब कि प्रकृत कादम्बिनी—जैसा कहा जा चुका है, इन सभी दृष्टियों से लौ० कादम्बिनी से भिन्न, अत एव उत्कृष्ट, है । इससे लौ० कादम्बिनी से प्रकृत कादम्बिनी का व्यतिरेक स्पष्ट हो जाता है ।। ९ ।।

जो श्रद्धेय सन्यासि ज्ञानेंद्र सरस्वती से सम्पूर्ण वेदान्त शास्त्र को प्राप्त करने, महेंद्र पण्डित से अतिकठिन कणाददर्शन (वैशेषिकदर्शन) और वाक्पतिदर्शन

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देवादेवाधिपोष्ठ स्मरहरतनगरे शासनं जैमिनीयं शेषाद्रेः प्राप्तशेषाद्रिमलभङ्गितरभूत्सर्वविद्याधरो यः । पाषाणाद्रेः पयोयूषं स्वर्णतते यस्य लीलया । तं वन्दे पेङ्खवृत्ताऽऽख्यं लक्ष्मीकान्तं महागुरुं ॥ २-३ ॥

नयग्रोधीतो लोके ललितरसगन्धाधरसमधि: । हृदरत्नध्वान्तं हृदयमधिरुढो गुणवता-मलङ्कारान्सर्वानपि गलितगरवान् रचयतु ॥ ४ ॥

शेषावतारभूतो भगवान् पतञ्जलिमहाभाष्यनिर्माता । तद्हचचनप्रतिमुखेन पाणिनिकात्या-यनवचनप्रासिरपि सूचितः, महाभाष्यस्य तदारूढत्वात् । सर्वाणि विशेषणानि सर्व-विद्याधरत्वे हेतुभूतानि । पाषाणाद्रिपीत्यादिना स्ववर्णनकौशलेनाचेतनमपि चेतनवत् करोतीति प्रतिपादनात्स्वपतिरि कवित्वकाष्ठां दर्शिता । लीलयेत्यनेन च तथावर्णनेन पितुरायासाभावः सूचितः । लक्ष्मीकान्तमित्यनेन स्वमातुःलक्ष्म्ययभिधायाऽऽ नाम निर्दिष्टमिति कस्यचिद् व्याध्यानमनौचित्यसंस्पर्शि, एवं रूपेण लोके पितृणामिमग्रहणस्यात्यन्त-विप्रहितत्वात् । अतः सारस्वतस्य पितॄणांविप्रादृशित्वं वा प्रतिपाद्यते । इत्यव युक्तम् ॥ २-३ ॥

(न्यायदर्शन) को जानने, काशी में खण्डदेव से पूर्व मीमांसा शास्त्र का अध्ययन करने और शेष वीरेश्वर से शेषावतार भगवान् पतञ्जलि की निर्मल वाणी महाभाष्य का अधिगम करने से सर्वविद्यासम्पन्न हुए और जिनकी नैसर्गिक काव्यकला से पत्थर से भी अमृत चूने लगें जाते उन विष्णुसूदृश पितॄचरण पेङ्खवृत्त को मेरा प्रणाम सम्प्राप्त है ॥ २-३ ॥

ग्रन्थप्रशस्तिमाह्निमग्ननेत्यादिना । मननरूपजलघेरन्तर्हदरमनस्तस्तलं कलेशै-रत्नपायासैरन्तरां मननेन मया जगत्राथेन ललितो गुणालङ्कारादिभूषितो रसगन्धाधर-स्वरूपः काव्यतत्त्वप्रकाशकत्वान्मणिलौक उज्ज्वलतां जिज्ञासून्मनस्तस्चाऽऽन्तमज्ज्ञानां हरन् सर्वानपि पूर्वाचार्यैरर्चिता-लङ्कारग्रन्थान् गलितगर्वान् रचयतु । अत्र चान्तरङ्गरम् निमग्ननेत्यादिना प्रतिपाद्य-विषयस्य सुचिन्तिततयाऽऽपि सूचितं भवति ॥ ४ ॥

मननरूपी सागर के अन्तस्तल में आयासपूर्वक गोता लगाकर मैंने रसगन्धाधर-स्वरूप मणि को इस संसार मे प्रस्तुत किया है । सहृदयों के हृदय मे पहुँचा हुआ यह ग्रन्थरत्न अज्ञान को दूर करे और सभी अलङ्कारग्रन्थों को गर्वहीन—महत्त्वहीन कर दे ॥४॥

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परिष्कुरुवन्तवर्थानसहृदयघुरोणा: कतिपये तथापि क्लेशो मे कथमपि गतार्थो न भविता ।

निमग्ननेतादृशुचितार्थमेव भड्रनयन्तरेणाह—परिष्कुवंल्लवत्यादिना । कतिपये सहृदयघुरीणा भामहदण्डिमम्मटादय: पूर्वाचार्या: । तिमिरन्नाम मत्स्यविशेष: ।

तिमोन्द्रा: संस्कोभं विदधतु प्रयोधे: पुनरिमे किमेतेनायासो भवति विफलो मन्त्ररगिरे: ॥ ५ ॥

तथा च तिमिरद्रप्रयासस्याफलतयाज्जलफलतया वा यथा प्रचुरामृतफलो मन्त्ररगिरिप्रयासो न गतार्थस्तथैव ममाप्यं प्रयासोऽजोखकाव्यतसुप्रभितिजननतपरौ न गतार्थं इत्थाशय: ।

निर्वाय तूतनमुदाहरणानुरूपं काव्यं मयात्र निहितं न परस्य किंचित् ।

अनेकस्यैवार्थस्य पूर्वदृष्टोत्तरार्धयो: प्रकरणान्तरेण विधिनिषेधमुखेनोक्त: प्रतिबस्तुप्रतिमालङ्कार: ।

विकं सेव्यते सुमनसां मनसापि गन्ध: कस्तूरिकाजनलशक्तिभृता मृगेगण ॥ ६ ॥

स्वकीयप्रबन्धस्य प्रबन्धान्तरापेक्षयोत्कर्षं दर्शयति-निर्मीयेत्यादिना । मयोदाहररुपं नूतनं काव्यं निर्‌मायात्र ग्रन्थे निहितम्, परस्य तु न किंप्यत्र निष्किंसम् ।

मननत्तरितोणविद्यांचो जगन्नाथपण्डिततनरेन्द्र: ।

अयमेव प्रकृतप्रबन्धस्योत्कर्ष: प्रकृतपद्ये विवक्षित: । सुमनसाम् = पुष्पाणाम् ।

रसगङ्‌गाधरानाम्नां करोति कुतुकेन काव्यमोऽसां ।। ७ ।।

अत्राप्युत्‌तरार्धं शब्दान्तरेण पूर्वार्धार्थकथनात्‌ प्रतिबस्तूपमा ।

भामह, दण्डी, सम्मट आदि सहृदयों मे अगृणगण्य आचार्यं काव्यार्थं का परिष्कार भले हीं कर चुके हों, फिर भी मेरा यह प्रयास व्यर्थ नही हो सकता ।

तिमि-तिमि-झील आदि मछलियाँ सागर मे भले हीं उथल-पुथल मचाती रहें, फिर भी क्या इतने से हीं मन्दराचल का समुद्रमन्थन-प्रयास निरर्थक हो सकता ?

कथमपि अपेक्षित उदाहरण के अनुरुप नवीन काव्य की रचना कर उसे मैने इसमें समाविष्ट किया है, अन्य की रचना का इसमें कहीं भी समावेश नहीँ हुआ है ।

क्या कस्तूरी को उत्पन्न करने की क्षमता रखने वाला गन्धमृग पुष्पों की सुगन्धि को मन से भी कभी चहाता ? कभी नहीं ॥ ६ ॥

मननरूप नौका से विद्या-सागर को पार कर चुकने वाला पण्डिततराज जगन्नाथ अनायास ही काव्यत्तत्त्वविचारपरक रसगङ्‌गाधरनामक ग्रन्थ की रचना कर रहा है ।

है ॥ ७ ॥

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रसगन्धाधरनामा संदर्भोऽयं चिरं जयतु । किं च कुलालनि कवीना निसर्गसम्यग्विच्च रञ्जयतु ॥ ५ ॥ तत्र कीर्त्ति-परमाल्हाद-गुरुराजदेवताप्रसादाद्यनेकप्रयोजनकस्य काव्यस्य

पण्डितनरेन्द्र:=पण्डितराज । राजवाचकस्य शब्दस्य योगार्थं विनैव राजार्थे प्रयोजः, धरातुरास्वाद्यादिनिर्देशात् । अतोडत्र कलेशाधिक्याङ्गीकारोऽर्थकः । कुत-कैनायासाभावः सूचितः । एतदनुरोधेन 'तथाडपि क्लेशो मे' इत्यत्र क्लेशपदं माध्यप्रवृत्त्यपरपर्यायार्थकं मत्लव्यम् । यद्वा कुतुकनेत्यस्याल्पायासेनैत्यर्थः । एतदनुरोधेन यत्र तामिति विधिकरणबहुल्रीहिः । कर्मधारये वा मत्लवर्थोऽपि । मीमांसाशाब्दरच 'मानेज्ज्ञासायाम्' इत्यनुशासनात् 'मानवध:' इत्यादिना सन्थ्यासेतेहे च सिद्ध्यति ।

पण्डितनरेन्द्र:=पण्डितराज । राजवाचकस्य शब्दस्य योगार्थं विनैव राजार्थे प्रयोजः, धरातुरास्वाद्यादिनिर्देशात् । अतोडत्र कलेशाधिक्याङ्गीकारोऽर्थकः । कुत-कैनायासाभावः सूचितः । एतदनुरोधेन 'तथाडपि क्लेशो मे' इत्यत्र क्लेशपदं माध्यप्रवृत्त्यपरपर्यायार्थकं मत्लव्यम् । यद्वा कुतुकनेत्यस्याल्पायासेनैत्यर्थः । एतदनुरोधेन यत्र तामिति विधिकरणबहुल्रीहिः । कर्मधारये वा मत्लवर्थोऽपि । मीमांसाशाब्दरच 'मानेज्ज्ञासायाम्' इत्यनुशासनात् 'मानवध:' इत्यादिना सन्थ्यासेतेहे च सिद्ध्यति ।

तत्र जिज्ञासाशब्दस्तत्रप्रयोज्ये विचारे लक्षणिक इति भावः । अत एव 'मानं विचारे' इति काशिकां । वाचस्पतिमिश्रास्तु 'माड् माने' इत्यत एव मीमांसाशब्दं व्युत्पादयन्ति । तथा चायमेव सन्नप्रकृतिभूतः, नुगागमश्चाधिको निपातनीयोऽत्र पक्षे । मानं चात्र विचार एव । 'सनिम्निमां' इति तु न प्रसज्यते, ध्वादिसाहचर्येण तत्रेच्छासन एव ग्रहणादिति सद्विचारवचन एव मीमांसाशब्दः ॥ ५ ॥

सन्दर्भ:= पञ्चाङ्गं वाक्यमू । पञ्चाङ्गानि च— विषयो विशयश्चैव पूर्वपक्षस्थतोत्तरम् । निरर्णयश्चैति पञ्चाङ्गानि शास्त्रेऽधिकरणं स्मृतम् ॥ इत्युक्तानि । निसर्गसम्यग्विच्च=निसर्गत एव समीचीनेन । समीचीनेनत्वं च तात्स्थ्येन गुणदोषविवेचकत्वम्, परगुणेष्यरिहितत्वं वा ॥ ८ ॥

काव्यलक्षणमवतारयति—तत्रेत्यादिना । प्रसादादित्यादिपदेन व्यवहारवेदान् कान्तासम्मितोपदेशांच गृह्यते, प्रसिद्धानामन्येषां प्रयोजनानामुक्ते नैव संग्रहात् । प्रसादशब्दरच द्वन्द्रादौ श्रूयमाणः प्रत्येकमभिसम्बध्यते । तथा च गुरुप्रसादो राजप्रसादो देवताप्रसादश्च लभ्यते । तत्रापि कीर्त्तिः कविनिष्ठा, इतरणि च प्रयोजनपरमाह्लादादिगुणुभयनिष्ठानि । सम्बन्धरचेष्टां क्वचित्साक्षाद् क्वचित् परम्परयेतिं यथायर्थं विवेचनीयम् । अत्न परमाल्हादशब्देन मोक्षोऽपि गृह्यते । कविसाहचर्येण येऽपि काव्यप्रकाशनं कविता रहता । साथ ही, यह निसर्गरमणीय कविसमाज को भी आन्दित करता रहे ॥ ८ ॥

यह रसगन्धाधरनामक ग्रन्थ चिरकाल तक अपने निरतिशय उत्कर्ष का प्रस्थापन करता रहे । साथ ही, यह निसर्गरमणीय कविसमाज को भी आन्दित करता रहे ॥ ८ ॥

यहाँ की प्राप्ति, परमानन्द का आस्वादन, गुरु, राजा तथा देवता का प्रसादन आदि काव्य के अनेक प्रयोजन हैं । इन प्रयोजनों में यथासम्भव अपने-अपने

यहाँ की प्राप्ति, परमानन्द का आस्वादन, गुरु, राजा तथा देवता का प्रसादन आदि काव्य के अनेक प्रयोजन हैं । इन प्रयोजनों में यथासम्भव अपने-अपने

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व्युत्पत्तौः कविशहृदयोरावश्यकतया गुणालंकारादिभिन्निरूपणीये तस्मिन् विशेष्यतावच्छेदकं तदितरभेदबुद्धौ साधनं च तत्लक्षणं तावन्निरूप्यते—

प्रयोजनों की प्राप्ति के लिए कवि तथा सहृदय दोनों को हीं साज्ञोपाज्ञ काव्य के स्वरूपादि का यर्थाथबोध होना आवश्यक है। अतः रसादि-प्रसाद आदि गुणों एवं उपमा आदि अलङ्कारों से उपलक्षित काव्य के स्वरूप आदि का निरूपण इस ग्रन्थ में करना है। इस प्रसङ्ग मे निरूपण के विशेष्यभूत काव्य में जो विशेष्यता है उसका अवच्छेदक ( काव्यत्व ) और अन्य पदार्थ से काव्य के भेद का साधक जो लक्षण उसका निरूपण प्रथमतः किया जा रहा है—

सहृदयत्वं तस्यैव यः कविकर्मानुभविता। अत एवात्र शास्त्रे सहृदयपदेन काव्यार्थभावनाजनकसंस्कारविशेषवानेव गृध्यते। शास्त्रान्तरे च तत्‌तदर्थभावनाजनकसंस्कारविशेषवानेव सहृदयः। आवश्यकतयेऽपि। तत्त्वं च काव्यार्थव्युत्पत्तौ स्तद्विवेचनपुयोगित्वेन रसास्वादनसहकारित्वेन च बोध्यम्। गुणा माधुर्यादयः। अलङ्काराः शब्दाश्रिता अर्थाश्रिता उभयाश्रिताश्चानुप्रासोपमाश्लेषप्रभृतयः। अत्र गुणालङ्कारादिगुणादीनामुपलक्षणतयैव बोध्यते। अत एवाऽभिः काव्यतत्त्वज्ञानेऽपि नैवां सर्वकाव्यनिष्ठतयाSSश्रयाहो मुक्तकैः प्रवन्धैः च सद्वावयनिष्ठतयाSSग्राहः। यावल्लक्ष्यकालमविद्यमानेऽपि व्यावर्तकमुपलक्षणं मन्यते। यथा काकवर्तो देवदत्तस्य गृहा इत्यादौ काकः। अत एव ‘उदितं मण्डलं विधोः’ इत्यादौ नाव्यासिरित वक्ष्यति स्वयमेव। तस्मिन्=काव्ये। विशेष्यतावच्छेदकमिति। अयमाशयः—काव्यज्ञानानुकूलः शब्दप्रयोगो निरूपणमात्र। तथा च गुणालङ्काराद्युपलक्षितं काव्यं काव्यत्वम्। तच्च काव्यरूपत्वमिति प्रतिपादनीयम्। तदेव निरूपितं सत् काव्यस्येतरभेदाज्जुमितो हेतुरिति। काव्यत्वं च रसाद्यर्थप्रतिपादकत्वस्वरूपम्। तद्धि तुका चेतरभेदानुमिति: ‘काव्यं स्वेतरभिन्नम्‌’, रमणीयार्थकप्रतिपादकशब्दत्वात्‌, यत्न यत्न स्वेतरभिन्नत्वाभावः=स्वेतरत्वं तत्र तत्र रमणीयार्थकप्रतिपादकशब्दत्वाभावः, यथा गौर्गच्छतीत्यादौ, न चेदं तथा, तस्मान्न तथा’ इत्याकारिका। तत्लक्षणम्‌=काव्यलक्षणम्।

[गुण एवम् अलङ्कार आदि को काव्य का विशेषण नहीं अपि तु उपलक्षण माना गया है। जो विशेष्य मे वर्त्तमान होते हुए उसको अन्य पदार्थ से भिन्न सिद्ध करता हो उसे विशेषण और जो उपलक्ष्य में सर्वदा विद्यमान न रहकर भी उसको अन्य से भिन्न सिद्ध करता हो—उपलक्ष्य का स्पष्ट परिचय कराता हो, उसे उपलक्षण कहा जाता। संक्षेप मे यह ज्ञातव्य है कि उपलक्षण का (क) उपलक्ष्य मे सर्वदा रहना और (ख) सभी उपलक्ष्यों में रहना अनिवार्य नही है। काव्य के सन्दर्भ मे उपलक्षण का

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रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम् ॥

रमणीयेत्यादि—रमणीयस्यार्थस्य प्रतिपादक: शब्द: काव्यम् । प्रतिपत्तिश्वात्र ज्ञातं, तज्जनक: शब्द: काव्यम् । अत्र ‘शब्द इत्यनुक्तौ रमणीयार्थज्ञानजनकाभिनयादावतिव्यासिरतस्तुपादानम् । प्रतिपादकतयनेन वाचकलक्ष्यकथ्यकज्ञानां सवैंषा- मेव ग्रहणम्, तेषां तथाविधश्रवणजनतकत्वाविशेषात् । अत एव वाचक इति लक्षण इति व्यञ्जक इति वा नोक्तम् । उपस्थितिरश्च वाचकत्वादिना भवतु, तत्र न विशेष: । शब्दश्वात्र वाक्यात्मको महावाक्यात्मको वा विवक्षित:, शब्दस्य मूलतो वाक्यात्मक- त्वात् । अत एव वाक्यादेव विवक्षितार्थबोध: । पदमात्रे काव्यत्वव्यवहाराभावश्च परो हेतुरत्र । यत्र च पदे तदंशे वाचकर्षाधायकत्वं व्यञ्जकत्वादिना तत्रापि तद्घटित- वाक्य एव काव्यत्वम्, अन्यथैकस्मिन्नेव वाच्येऽनेकस्य काव्यत्वप्रसङ्ग: । अर्थप्रतिपादक: शब्द: काव्यमित्युक्तौ गौश्वलतिस्त्यादावतिव्यासिरतो रमणीयत्वमर्यस्य विशेषणम् सन्निवेश: । शब्बे रमणीयत्वं चार्थरमणीयत्वेनैव काव्यत्वोपयोगि, न स्वरूपगतम्, गुणालङ्कारादेरस्पलक्षणत्वोक्ते: । रमणीयार्थप्रतिपादकत्वकक्ष मतं च यदि रमणीयत्वं विधक्षितं तर्हि स्वरूपतादृशं शब्द तदस्तु कथम्‌चिन्त् ।

अत्रेदं बोधयम् —रमणीयत्वं च्युत्पत्तिसिद्धश्रृङ्गारादिभेदाद् भिद्यते । लोकोत्तराह्लादोद्भयत एव भिन्ना एव । अतो योपिनो यादृशं रमणीयत्वं तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थे तादृशं नान्यत्रेति रमणीयार्थप्रतिपादकशब्दद्वलतासामान्यं न काव्यत्वपर्यवसायि । अतो रमणीयार्थविशेष एव प्रकटोपयोगी । स चायं विशेष: कि स्वरूप इत्यादि निरूपितुकामो रमणीयत्वमदौ व्याचष्टे—रमणीयता चेत्यादिना । यद्विषयकज्ञाने लोकोत्तराह्लादजनकता तत्त्वं रमणीयत्वम् इति तात्पर्यम् । ज्ञायमानश्चार्थो भावनापरमिति वक्ष्यत्यग्रे । अर्थस्याज्ञातस्याह्लादजनकत्वात् परित्यज्य ज्ञानगोचरतापर्यन्तानुबन्धनम् । ज्ञायमानस्यार्थो न लोकत्तराह्लादजनक:; अर्थोंऽभावे तदनुदयप्रसङ्गात् । अतोऽर्थज्ञानस्य तादृशाह्लादजनकत्वमभिहितं प्रन्थकृतो । लोकसिरतत्वामते । अनुभावकक्ष:= निवृत्ति—लोकसिरतत्वोऽमिति ।

दूसरा रूप महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि सभी काव्यों में गुणालङ्कारादि का होना ग्रन्थकार की दृष्टि मे आवश्यक नहीं है ।]

रमणीय अर्थ का प्रतिपादक शब्द काव्य है ॥ ९ ॥ जिसके ज्ञान (भावना) से लोकोत्तर आह्लाद उत्पन्न होता हो वही अर्थ रमणीय होता है । आह्लादनिष्ठ लोकोत्तरत्व चमत्कारत्वनात्मक ‘जाति’ का ही नामान्तर है । आह्लाद में इस जाति के अस्तित्व में प्रमाण सुश्रदयों—काव्यार्थविषयक भावना से

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ह्लादगतरुचमत्कारत्नापरपर्यायोडनुभवसाक्षिको जातिविशेषः । कारणं च तदवच्छिन्ने भावनाविशेषः पुनःपुनरनुसंधानात्मा । 'पुत्रस्ते जातः', 'धनं ते दास्यामि' इति वाक्यार्थध्रीजन्यस्याह्लादस्य न लोकोत्तरत्वम् । अतो न तस्मिन्वाक्ये काव्यत्वप्रसक्तिः ।

इत्यं च चमत्कारजनकभावनाविषयार्थ-

सहृदयाडनुभवमात्रैक प्रमाणाभ्यः । सहृदयश्चात्र काव्यार्थभावनाजनकसंस्कारवान्‌प्योचितदृशा तादृशः । चमत्कारकारणमाह—कारण-वान्‌चित्ययोगादिति । अतो नातिप्रसङ्गः ।

मिति । तदवच्छिन्ने=चमत्कारतद्वावच्छिन्ने च मत्कारिणि लोकोत्तर आह्लादे । भावनाविशेष इत्यत्र सहृदयनिष्ठत्वं काव्यार्थमात्रविषयकत्वं विपरीतभावनाजसहृकुतत्वादि च विशेषः । पुनः पुनरनुसंधानात्मकत्वेन चैतद् सूचितं यत्काव्यार्थस्य भूयो भूयोऽनुसंधाने स्मरणात्मक लोकोत्तरानन्दो जायते । अत एतद्र्वीतत्तरचरित-

स्यापि पुनस्तदध्ययने रुचिरंवति । यदा यदा काव्यार्थश्चिन्त्यते तदा तदालौ-किकाह्लादो जायते एवासति प्रतिबन्धके । एतत् प्रत्येकानुसंधानेपि तादृशाह्लाद-जनकता वक्तुमेव नैकम्, अद्याप्यनुसंधानप्रवाहे तु नैवम्, आद्याप्यनुसंधानेप्यड्लादे जायमानेऽपि द्वितीयाध्यायानुसंधानेपु क्रमेणानन्दमात्राह्लास्य प्रामितेः । विकाराक्रान्तत्वमेव हि लौकिकत्वं भावनानां, तद्रहितत्वं च लोकोत्तर-

त्वम् । किन्तु काव्यार्थरसानुसंधानविषयककाव्यजनितप्रबन्धादिसहृदयेषु न प्रसिद्धः । एतदेव स्मिप्रेप्स्याह—पुत्रस्ते जात इत्यादि । न लोकोत्तरत्वान्ति । तदर्थ-भावनाजन्यत्वादभावादिति हेतुः । एतदेव ज्ञानपदमहहय भावनापदप्रयोगस्य प्रयोजनम् । वाक्य इति । वाक्यं छात्र काव्याङ्गश्रवणं विवक्षितम् । तदङ्गटके तथाविधवाक्ये काव्यत्वस्य दुरपलापत्वात् । अत एव काव्यतदितरार्थविषयकभाव-

नायामपि न चमत्कारजनकत्वम्, तस्याः पूर्वोक्तविशेषयादृत्तत्वात् । अतो न तथाविधार्थविषयकसमूहालम्बनभावनातिप्रसङ्गः । भावनाया: समूहालम्बन-

नाविषयकत्वमित्यपि नोचितम्, द्वितीयासु ज्ञानव्यक्तिषु तद्विषयकत्वसम्भवात् । सर्वासु ज्ञानव्यक्तिषु तद्विषयकत्वमित्यपि न सुवचम्, सर्वशब्दार्थस्यानुगतत्वेन यस्य तद्विषयकत्वसम्भवात् । सर्वेषां सर्वभावनाविषयत्वविवक्षणे त्वसम्भव इत्यलम् । सूत्रोक्तकाव्यलक्षणं परिष्करोति—इत्यं चेत्यादिना । चमत्कारजनिका या

ओतप्रोत सज्जनों का अनुभव हो ही है । इसलिए काव्य से बहिमूंत 'तुम्हारे पुत्र उत्पन्न हुआ है' और 'तुम्हें धन दूँगा' इत्यादि वाक्यों में उक्त काव्यलक्षण को अत्यासत्ति नहीं होती, क्योंकि ये वाक्य आह्लादजनक होकर भी लोकोत्तराह्लादजनक नहीं हैं ।

इस प्रकार उक्त काव्यलक्षण का फलितार्थ यह हुआ—

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प्रतिपादकशब्दत्वं, यत्प्रतिपादितार्थविषयकभावनात्वं चमत्कारजनककाव्यत्वं, तत्प्रतिपादितार्थब्रिषयकभावनात्वं चमत्कारजनककाव्यमू, तत्वं च काव्यत्वमितिप्रथमलक्षणार्थः।

अत्र विषयभेदेन व्यक्तिभेदेन च भावनाविशेषस्याप्यान्त्याद् गौरवमित्यतो लक्षणान्तरमाह-यत्प्रतिपादितेत्यादि। भावनात्वसू = भावनाविशेषत्वम्—भावनाविशेषस्यैव चमत्कारजनकत्वेनातिप्रसक्तस्य क्रता। विशेषशब्दो नोपात्तः।

जनकतावच्छेदकत्वमिति पूर्वनिर्दिष्टत्वाच्च सर्वत्र प्रथक्ता। काव्यार्थविषयकभावनाविशेषश्चमत्कारजनकः, तस्याश्चावच्छेदकं = जनकतासामानाधारं हि (यत्र यत्न जनकता वत्‌ते तत्र तत् वत् मानम्।)

काव्यार्थविषयकभावनात्वं चमत्कारजनककाव्यत्वम्। येन रूपेण जनकता तद्रूपं जनकतावच्छेदकं, (जनकता यत्र न वत्‌ते तत्र न तत्‌ते तत्रावत्‌मानम्।) किमपि जनकताड्वच्छेदकं भवति।

प्रकुते तेनावच्छेदकत्वं तेनावच्छेदकघटकीभूतस्थाप्यवच्छेदकत्वं इति भवत्येतद्वच्छेदकः। भावनाविशेषविषयीभूतार्थस्यैवावच्छेदकघटकीभूतत्वेन तथैवविधार्थ एवावच्छेदकत्वं नान्यतरत्वम्।

अत्र एवं स्वविशिष्टेत्यादिलक्षणेैव जनकताड्वच्छेदकत्वमुक्तं, जनकता च जन्यताऽनिरूपिता भवति। जन्याभावे सापेक्षा। कपालं घटस्य जनकं, घटस्तु कपालाज्जन्यः।

तन्तुः पटस्य जनकः; या जनकता सा न पटनििष्ठजन्यतासापेक्षा, तन्तौ या जनकता सा न घटनिष्ठजन्यतासापेक्षेति हेतोः कपालनिष्ठजनकता घटनिष्ठजन्यताऽनिरूपिता (घटनिष्ठजन्यतानिरूपित्ता कपालनिष्ठजनकता) भवति, जन्यतायाञ्चात्र पक्षे निरूपकता वचनविन्यासः शाब्दबोधे करणीयः।

यदि जन्यं विशेष्यभूतं तर्हि जनकताऽनिरूपिता जनकतेति कध्यते। अतश्च प्रकृतलक्षणे चमत्कारजनकतावच्छेदकत्वित्यस्य चमत्कारनिष्ठजन्यतानिरूपितार्थ-विषयकभावनानिष्ठजनकतावच्छेदकघटकीभूतत्वेन तथा-

(क) चमत्कारजनक भावनाविशेष के विषयीभूत (=रमणीय) अर्थ का प्रतिपादक शब्द (वाक्य) काव्य है, अथवा (ख) जिस शब्द से प्रतिपादित अर्थ की भावना (भावनाविशेष) में रहने वाला भावनात्व (= भावनाविशेषत्व) भावनाविशेषणिष्ठ.

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तावच्छेदकं तत्संख्यं, स्वविशिष्टजनकतावच्छेदकार्थप्रतिपादकतासंर्गेण चमत्कारत्ववत्त्वमेव वा काव्यत्वमिति फलितम्।

विशेषपेक्षेतया नात्र लक्षणे पूर्वोक्तअणुभद भावनाविशेषोऽन्वितप्रयुक्तं गौरवम्। अत्र च लक्षणे 'प्रत्यूच्चारणं शब्‍दो भिद्यते' इति मताश्रयणे तु यत्पदेनानुपूर्वी विवक्ष्यीया, तत्संमित्यस्यापि तादृशानुपूर्वीकत्वमित्यो ग्राह्यः। तथा च यदृशानुपूर्वीप्रतिपादितार्थविषयकभावनात्मकं चमत्कारनिष्ठजनकताया अवच्छेदकं तादृशतत्पर्वीकत्वं काव्यत्वनिति लक्षणार्थोंऽत्र सेयः। अनुगतार्थकयत्तच्छेद्योरत्र लक्षणे प्रवेशेऽपि न क्षति: एतादृशानुगमस्य वद्‌नहाराधकत्वाद्‌भवाव। अथवा भावनाविशेषत्वस्यावच्छेदकत्वम्‌स्य वद्‌नहाराधकलोभवात। अथवा अवच्छेदकत्वं चमत्कारनिष्ठजनकतावच्छेदक— 'चमत्कारनिष्ठजन्यता निरूपितपितभावनाविशेषनिष्ठजनकतावच्छेदकत्वं' इति। अर्थस्यावच्छेदकशब्दस्य काव्यत्वम् इति लक्षणं बोध्यम्। अर्थस्यावच्छेदकताव्‍मुपगमे लाघवं चापाततां दृश्यत एव। अत्र च भावनाविशेषत्वस्यैवावच्छेदकत्वं ग्रन्थकृदभिमतम् न भावनात्वस्य, 'कारणं च तद्‌वच्छेदने भावनाविशेष:' इत्युक्तत्वात। अत्र च भावनात्वस्यावच्छेदकेऽपि लक्षणे तत्प्रदेशे न तात्पर्यम्, भावनात्वस्य काव्यतद्‌तरार्थभावनात्मकनिरूपितकाव्यतावच्छेदकत्वं चिकीर्षितम्। इत्योच्‍वेदन काव्यतावलोकिष्यते।

चमत्कारजनकता का अवच्छेदक हो वह शब्द काव्य है, अथवा (ग) 'स्वविशिष्टनकतावच्छेदकार्थप्रतिपादकत्व' [स्व (= चमत्कारत्व) से विशिष्ट (= चमत्कार) में वृत्ति मान जान्यता से निरूपित (अर्थविषयक) भावनाविशेष में वृत्ती जानकता के अवच्छेदकविभूत अर्थ का प्रतिपादक होना ] इस परम्परा सम्बन्ध से चमत्कारत्ववान् शब्द ही काव्य है। प्रथम लक्षण में निर्दिष्ट भावनाविशेष के व्यक्तिभेद तथा विषय-भेद से अनन्त होने से सकलभावनाविशेषनिष्ठ भावनाविशेषत्वस्वरूप एक अनुगत धर्म को आधार मानकर लघुतर द्वितीय लक्षण किया गया है। यथासंभव विशेषण-विशेष्य के क्रम से पदार्थों को निरूपित करके किया गया द्वितीय लक्षण 'प्रकारमुद्रा' से और लक्षणघटक अनेक पदार्थों को संसर्गकोटि में रखकर किया गया तृतीय कक्षण 'ससर्गंमुद्रा' से विहित है। संसर्गमुद्रा से किए गए लक्षण में पदार्थों‍पस्थित्यादि में लाघव होता है किन्तु प्रथमतः में निर्दिष्ट परम्परा सम्बन्ध के प्रामाणिक न होने से द्वितीय लक्षण ही उत्तम है।

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यत्तु प्राच्चः 'अदोषौ सगुणौ सालंकारौ शब्दार्थौं काव्यम्' इत्याहुः, तत्तु विचार्यंते—शब्दार्थयुगलं न काव्यशब्दवाच्यम्, मानाभावात् । काव्यमुच्चैः पठ्यते, काव्यादर्थौडिवगम्यते, काव्यं श्रुतमर्थो न ज्ञात इत्यादिविश्वजनीन-

प्राचीन आलंकारिक (काव्यप्रकाशकार) मानते हैं कि दोषों से रहित, गुणयुक्त एवम् अलंकारविशिष्ट शब्द और अर्थ दोनों ही काव्य हैं । इस विषय में निम्नलिखित विचार किया जा रहा है—

तत्तु संसर्गस्य द्वैविध्यम् साक्षात्परसपराभेदात् । तयोश्च साक्षात्संसर्गविषये विप्रतिपत्त्यभावात् तस्य संसर्गत्वेन भाने लक्षणं लाघवान्वितमिति निविवादम् । परम्परया: संसर्गत्वं तु तत्रैवाभिमतं यत्तु तेन संसर्गेणैकपदार्थविशिष्टस्य पदार्थान्तरस्य प्रतीति: प्रसिद्धा, न सर्वत्र । परम्परामात्रस्य संसर्गत्वे तु सर्वे संदेहविशिष्टं स्यादित्यनर्थः ।

शब्दार्थद्वय काव्यशब्द का वाच्यार्थ नहीं हो सकता । शब्दनिष्ठ शक्ति द्वारा प्रतिपादित अर्थ ही वाच्यार्थ कहलाता है । किस शब्द में किस अर्थ को प्रकट करने वाली शक्ति है—यह निर्णय मुख्यतः शिष्टव्यवहार से होता है । काव्यपद में शब्दार्थ-युगल को प्रकट करने की शक्ति का ग्राहक (निर्णायक) कोई शिष्टव्यवहार तो है नहीं ।

अतो यत्तु परम्पराया: संसर्गत्वं प्रतीतिबलायातं तत्तु तस्य संसर्गतया भाने प्रामाणिके संसर्गविधया लक्षणं लघुतरं भवति, प्रकारमुद्रया तत्तु तावत्पदार्थनिवेशे तु गुरुतरं लक्षणम् । प्रकृतलक्षणे चमत्कारत्ववस्तुं काव्यत्वमित्यत्र तद्विशिष्ट: चमत्कार:, तत्रिष्ठजण्यतानिरूपिता जनकता-

ऐसी स्थिति में काव्यपद को शब्दार्थद्वय का वाचक नहीं माना जा सकता । वस्तुतः साहित्यशास्त्रीय व्यवहार तो शब्दार्थद्वय के विपरीत शब्दविशेष, अर्थात् रमणीयार्थप्रतिपादक शब्द, को प्रकट करने वाली शक्ति को ही काव्यपदनिष्ठ सिद्ध करते हैं ।

अत्र स्वं चमत्कारत्वम्, तद्विशिष्ट: चमत्कार:, तत्संस्थजण्यतानिरूपिता जनकताऽत्र 'उर्थविषयकभावनाविशेषे, तन्नाछ्छेदेकीभूतोर्ध्व:, तत्प्रतिपादकत्वं काव्य इति काव्येन चमत्कारत्वस्य स्वविशिष्टेत्यादिपरम्परासम्बन्ध उक्तः । अनেন संसर्गेण काव्यं चमत्कारत्ववस्य स्वविशिष्टत्ववत्, तत्सं च काव्यत्वमिति लक्षणार्थः ।

उदाहरणार्थ —‘काव्यमुच्चैः पठ्यते’, ‘काव्यादर्थौडिवगम्यते’ और ‘काव्यं श्रुतमर्थो न ज्ञातः’ इत्यादि व्यवहार हैं । इनसे स्पष्ट है कि काव्यपद शब्दविशेषमात्र मे शक्त

अस्य संसर्गतवें तु 'काव्यं चमत्कारत्ववद्' इत्यादिप्रतीतितिसाक्षिकमेव, नान्यथा । तदाकारारा च प्रतीतिनं प्रामाणिकी । अतः पदार्थपरम्परया: संसर्गतिवकलप्तं च युक्तिमति सत्यपि लाघवे तस्य प्रमाणानुगृहीततया गुरुतरमपि द्वितीयलक्षणमेव वरमिति विदुपां विमर्शः ।। इदानीं काव्यप्रकाशकारोक्तं काव्यलक्षणं दूषयितुमुपक्रमते—यत्कवितया-दिना । अनलंकुली पुत्रः कवापीत्यस्यार्थंतः संग्राहकं मालड़काराविति ।

माना-भावादिति । अयंर्थः—'लोकतोऽर्थप्रयुक्ते शब्दप्रयोगे', 'अर्थस्यान्यप्रकारणत्वाद' भावादिति ।

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व्यवहारत: प्रयुत शब्दविशेषस्यैव काव्यपदार्थत्वप्रतिपत्तेश्च । व्यवहार: शब्दमात्रे लक्षणयोपपादनीय इति चेत्त? स्यादप्येवम्, यदि

इत्यादिसिद्धान्तात् कस्य शब्दस्य कोऽर्थ: इत्यत्र शिष्टव्यवहार एव प्रमाणम् तथा च काव्यशब्दस्य शब्दार्थयुगलवाचकत्व तत्समर्थंकशिष्टव्यवहाररूपप्रमाणासभ- वान्न सम्भवतीति । द्वित्रशिष्टव्यवहारस्य च न प्रमाणत्वम्, प्रमाणसाधनत्वाभावादिति कालिदास एवाह—‘सर्वज्ञस्याप्येकस्याप्यभ्युपगमो न निर्णयाय’ इति । अतएवपदमुल्या- थंकम् । अनादिविद्धद्वहारस्यैवाथे निर्णयकत्व नियमादेकव्यवहारे तथात्वाभावादिति निष्कर्ष:। एतावता साधकप्रमाणाभाव उक्त: । सम्प्रति बाधकप्रमाणमपि ह— काव्यमित्यादिना । पठ्यते इति । पाठरुच शब्दस्यैव नार्थस्यैति सिद्धं काव्यस्य शब्द- मात्रपरत्वम् । काव्यादित्यादि । काव्यस्य ज्ञातस्यैव वार्थबोधकत्वात् तस्य शब्दार्थोभय- परत्वे काव्यज्ञानेनार्थस्यापि ज्ञानात् किमन्यदवशिष्यते यस्यान्नबोध: कार्य: स्यादिति तात्पर्यम् ।

है, शब्दार्थद्वय में नहीं। यतः प्रथम व्यवहार में काव्य के श्रवण की बात कही गई है; श्रवण तो शब्दमात्र का सम्भव है, अर्थ का नहीं। द्वितीय व्यवहार में काव्यशब्द से हेत्वर्थक पञ्चमी और अर्थशब्द से प्रथमा दोनों की मिन्नता के प्रति- पादक हैं। यह काव्यशब्द के शब्दमात्रपरक होने से ही सम्भव है। तृतीय व्यवहार में काव्य के श्रावणप्रत्यक्षज्ञान का विषय होने पर भी अर्थ के उस ज्ञान का विषय न होने से दोनों की मिन्नता सिद्ध है। अतः उक्त व्यवहारों से काव्यशब्द की शब्दमात्रबोधकता प्रमाणित है।

प्रत्युत=शब्दार्थयुगलवाचकत्व वियप्यंयेण । अयमाशय:—आदिकविना स्वयमेव— "भविष्यति हुतं काव्यं जगतुरस्तौ कुशीलवौ" इति वदता काव्यस्य शब्दमात्रपरत्वे व्यवसायपिते परस्ताच्च विश्वजननीनव्यवहारेण तथात्वं समर्थितं न शब्दमात्रपरत्वे काव्यशब्दस्याप्यिहान्तु काव्यदृष्ट। तसादिव्यवहारस्यापि दृष्टर्थनिर्यणकत्वं तथापि तत्प्रायेण यदृच्छाशब्द एव, तन्नापि- बहुतरशिष्टसमर्थने सत्येवेति तद्भावे न काव्यशब्दस्य शब्दार्थोभयपरत्वं युक्तमिति ।

उक्त व्यवहारों में शब्दमात्र में काव्यपद का प्रयोग एकदेश-लक्षणा से बताते हुए काव्यपद के मुख्यार्थरूप में शब्द और अर्थ को मानना भी असंगत है, क्योंकि यहाँ:

उक्तव्यवहारमन्यथा व्याचक्षाण आशङ्कते—व्यवहार इति । लक्षण या = एकदेश- शलक्षणया । तथा च नोकव्यवहारस्य बाधकत्वमित्याशय: प्रथनस्य । न केवलं बाधक- प्रमाणाभावादेवेष्टसिद्धि:, साधकप्रमाणमपि तदर्थमपेक्षणीयमेव, तथा च साधकप्रमाणा- भावे न काव्यशब्दस्य शब्दार्थोभयपरत्वं युक्तम्, ततश्च मुख्यार्थंबाधभावेन लक्षणयापि न सङ्गच्छत इति प्रोक्तव्यवहारस्य मुख्यार्थपर्यवसायितवे व्यवसायस्थिते न शब्दार्थपरत्वं

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काव्यपदार्थंतया पराभिमते शब्दार्थयुगले काव्यशब्दशक्तौ: प्रमाणपकं दृढतरं किमपि प्रमाणं स्त्यात् । तदेव तु न पर्याप्तम् । विमतवाक्यं त्वश्रद्धेयमेव । इत्थं चास्ति काव्यशब्दस्य शब्दार्थयुगलशक्तिप्राहके प्रमाणे प्रागुक्तव्यवहारात् शब्दविशेषे सिद्धयन्तीं शक्तिं को नाम निवारयितुमोष्ठे ? एतेन विनिगमनाभावादुभयन्त शक्तिरिति प्रत्युक्तम् । तदेवं शब्दविशेषस्यैव काव्यपदार्थत्वे सिद्धे तस्यैव लक्षणं वक्तुं युक्ततमं, न तु स्वकल्पितस्य काव्यपदार्थस्य । एशैव च वेदपुराणादिलक्षणेष्वपि गति: । अन्यथा तत्रापीयं दुरवस्था स्यात् ।

काव्यशब्दस्येत्याशयेन समाधान्ते—स्यादप्येवमित्यादिना सन्दर्भेऽण । दृढतरमिति । स्वस्मबलस्वाधिकबलविपरीतप्रमाणाभाववदित्यर्थ: । एतेन = प्रोक्तव्यवहारस्वरूपविगमकसत्त्वेन । विनिगमनाभैकतरपक्षपातिनी युक्ति:, तस्या अभावात् । दुरवस्था लक्ष्य णिकत्वप्राप्ता बोध्या ।

प्राचीन्समर्थनप्रकारान्तरं निराचष्टे—यत्स्वित्यादिना । आस्वाद:, आस्वाद्यत इत्यास्वादो रस:, 'कदभिहितो भावो द्रव्यवत् प्रकाशते' इति नियमात् । तस्योद्बोधकत्वं व्यञ्जकत्वम्, न तु जनकत्वम्, रसस्य नित्यत्वेन तज्जननाङ्गभवात् । तदाह—लक्षणं युक्तत्वम् काव्यलक्ष णान्तरुपनप्रसङ्गात् ।

लक्ष णा का आधार मुख्यार्थबाध नही है । यदि अन्य दृढतर प्रमाण से काव्यपद मे शब्दार्थोंभय की वाचकता प्रमाणित हो चुकी होती तब तो उक्त व्यवहारों में मुख्यार्थ का बाध हो जाने से काव्यपद को शब्दमात्र मे लक्ष्य णिक माना जा सकता था । परन्तु वस्तुस्थिति ऐसी नही है । विरोधी प्राचीन आचार्य का वक्तव्य तो प्रमाणसमर्थित न होने से श्रद्धायोग्य है ही नही । अत: उक्तव्यवहारों मे काव्यपद को लाक्षणिक कहना अयुक्त है । इस प्रकार जब शब्दार्थयुगल मे काव्यपद की शक्ति का ग्राहक कोई प्रमाण है ही नही तब उक्त व्यवहारस्वरूप प्रमाण से शब्दमात्र मे काव्य पद की शक्ति के निर्णय को कोई रोक नही सकता । 'एकतरपक्ष समथर्क युक्ति ( = विनिगमना), अर्थात काव्यपद की शक्ति शब्दमात्र मे है, अर्थ मे नही अथवा अर्थमात्र मे है, शब्द मे नही, के समर्थक प्रमाण के अभाव मे शब्दार्थयुगल मे ही उसकी शक्ति सिद्ध होती है—' यह मत भी उक्त रीति से ही निरस्त हो जाता है । इस प्रकार काव्यपद के शब्दविशेषमात्रवाचक सिद्ध हो जाने पर उसी का लक्षण बताना उचित है, किसी के कपोलकल्पित काव्यपदार्थ का नही । काव्यपदार्थनिर्णय की जो रीति है वही है वेद, पुराण, इतिहास आदि के लक्षणों मे भी अपनानी चाहिए, नही तो 'वेद: पठित:'; वेदस्यार्थो नाङ्गवगम्यते' इत्यादि व्यवहारों की असंगति पूर्ववत् बनी रह जाएगी ।

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यत्तु वासवादौद्बोधकत्वमेव काव्यत्वप्रयोजकं तच्च शब्दे चार्थे चाविशिष्टमित्याहुः, तत्र । रागस्यापि रसगुणरकतया ध्वनिकारादिसकलालङ्कारिकसंमतत्वेन प्रकृते लक्षणीयत्वापत्तेः । किं बहुना, नाट्याझानां सर्वासामपि प्रायःस्थात्वेन तत्त्वापत्तिदुर्वारतैव । एतेन रसोद्बोधसमर्थेsप्येवात्र लक्ष्यत्वमित्यपि परास्तम् ।

अलौकिक आस्वाद (रस) का उद्बोधक हो काव्य है, क्योंकि उक्त आस्वादोद्बोधकता दोनो ही मे समानरूप से है—ऐसा कुछ लोग कहते हैं । किन्तु यह भी असंगत है । कारण है कि तब तो राग को भी काव्यलक्षण मे समाविष्ट करना होगा, क्योंकि राग को भी ध्वनिकार आदि सभी अलङ्कारिको ने रसोद्बोधक माना ही है । एवं उक्त लक्षण मे न्यूनता आ जायेगी । अधिक कहने की आवश्यकता नहीँ, उक्त मत की असंगति के लिए इतना हीँ कहना पर्याप्त होगा कि उसके अनुसार तो बहुत से नाट्याझों के भी रसोद्बोधक होने से उन्हें भी लक्षण मे समाविष्ट करना पड़ जायेगा । अतः उक्त पक्ष अश्रद्धेय है । इसी से ‘रसोद्बोधसमर्थं तत्वं’ ही काव्यलक्षण का लक्ष्य है’ यह मत भी निरस्त हो जाता; क्योंकि उक्त न्यूनता इस मत मे भी पूर्ववत् बनी हुई है ।

अपि च काव्यप्रवृत्तिनिमित्तं शब्दार्थयोयोग्योsक्तत्वं, प्रत्येकपर्याप्तं वा ? नाद्यः; एको न द्वाविति व्यवहारेsयव श्लोकवाक्यं न काव्यमिति व्यवहारस्याप्तेः । न द्वितीयः, एकस्मिन्पद्यो काव्यद्रव्यग्यव्यवहाराप्तेः । तस्माद्देवशास्त्रपुराणलक्षणस्यापि काव्यलक्षणस्यापि शब्दनिष्ठतैवेच्छिता ।

काव्य शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त क्या है? क्या यह शब्द और अर्थ दोनों के योग्य होने पर ही होता है, या प्रत्येक के लिए अलग-अलग? पहला विकल्प सही नहीं है, क्योंकि एक या दो शब्दों के प्रयोग से ही काव्य का व्यवहार होता है, न कि पूरे श्लोक या वाक्य के। दूसरा विकल्प भी सही नहीं है, क्योंकि एक ही पद्य में काव्य का व्यवहार होता है, न कि अलग-अलग पदों में। इसलिए, काव्यलक्षण को शब्दनिष्ठ ही मानना चाहिए, जैसे कि देवशास्त्र और पुराण के लक्षणों में होता है।

घटकत्वम् । प्रायश इत्यनेन क्वचिन्नेपथ्यविधानदौ रसोद्बोधकत्वाभावः सूचितः । तत्त्वापत्तिः = काव्यत्वापत्तिः । एतेन = रसोद्बोधकत्वस्याप्रसक्तत्वेन । प्र चीनोक्तलक्षणे दोषान्तरमाह—अपि चेति । प्रवृत्तिनिमित्तम् = काव्यत्वम् । व्यासज्यवृत्तीति । पर्यायसिसमवधेनैनेकाधिकारणेsध्वस्थितं व्यासज्यवृत्तीत्युच्यते । यथा द्वित्वसंख्या समवायेन प्रत्येकं वर्त्तमानापि पर्यायसिसमवधेन द्वयोरेव वर्त्तते, नैकेन । यस्य च सम्बन्धः स तत्प्र तियोगी, यत्र च सम्बन्धः सोज्जियोगी तस्य सम्बन्धस्य । द्वित्वस्य पर्यायत्वं व्यासज्यवृत्तित्वं चेत्यर्थः । एवं नित्यत्वं पर्यायित्वं व्यासज्यवृत्तित्वं च दर्शयति बोध्यम् । अत एवैकवाक्यत्वच्छिन्नानुयोगिताकपर्यायसिसमप्रतियोगित्वं व्यासज्यवृत्तित्वमुख्यते । एतद्विपर्ययेगण चैकवाक्यत्वच्छिन्नानुयोगिताकपर्यायसिसमप्रतियोगित्वं प्रत्येकपर्याप्तत्वमुख्यते । काव्यत्वस्य व्यासज्यवृत्तित्वे दोषमाह—नाद्य इत्यादिना । काव्यद्रव्येति । एकं काव्यत्वं शब्दे, अपरं च तदर्थ इति द्वित्वमित्यर्थः । प्र कृतम्—

इस प्रसङ्ग मे यहां भी विचारणीय है कि काव्य शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त काव्यत्व

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लक्षणे गुणालङ्कारादिनिवेशेऽपि न युक्तः । 'उदितं मण्डलं विधोः' इति काव्ये दूत्यभिसारिकाविरहिण्यादिसमुदीरितेऽभिसरणविधि निषेधजीवनापसंहररत्नाह —तस्मादिति ।

सगुणो सालङ्कारावित्यादि निराकष्टे—लक्षण इत्यादिना । आदिपदेनात्र दोष- सभावो ग्राह्यः । उदितं मण्डलं विधोः' इति काव्यत्वमपिति भामहोक्तः प्रकाश- कविष्टं च खण्डयितं तत्र काव्यत्वाध्यायकं व्यङ्ग्यार्थमाह—दतीत्यादिना । अत्रापि वक्तृबोद्धव्यादिवैशिष्ट्येन व्यङ्ग्यार्थमपतीते: काव्यत्वं दुरपलवमिति सन्दर्भांशयः । तदाह दण्डी—

मतोऽस्तमकर्ं भातीन् दुर्योन्ति वासाय पक्षिणः । इतोऽद्रिमपि साधयेच कालाङ्कवस्थानिवेदने ॥ इति ॥

दूतीत्यादिवचनमित्यं योजनीयम्—अभिसारिकां प्रति दूत्युदीरितेऽस्मिन् वाक्येऽभिसरणविधिपरत्वम्, अभिसारिकया दूती प्रत्युक्तेऽभिसरणनिषेधपरत्वम्, विरहिप्रुदीरिते च जीवनाभावरत्वम्, चन्द्रोदयस्य कामोद्दीपकत्वे विरहवेदनौक्तकटत्वाद् । प्रथमवाक्येन दूत्यादिभिसारिकां प्रत्युक्तेनापि निषेधोऽभिसरणस्य कालविधोषादि

(चमत्कारजनकार्थप्रतिपादकत्व) शब्द और अर्थ इन दोनों में ही व्यासज्जयवृत्ति है

अथवा शब्द में भी पर्याप्त है और अर्थ में भी । प्रथम पक्ष में तो इसे लिए अनुचित है कि उसमें अलौकिकत्व को काव्य कहना सम्भव न हो सकेगा । कारण यह है कि किसी एक को उपयुक्त धर्म के आधार पर उस धर्म से विशिष्ट नहीं कहा जाता । जैसे दो पुस्तकों में से किसी एक के विषय में 'दो पुस्तकें' यह नहीं कहा जाता । द्वितीय पक्ष भी असंगत है, क्योंकि तब तो एक पद में दो—एक शब्द- स्वरूप और एक अर्थस्वरूप—काव्य हो जायेंगे । अतः वेदादिलक्षणों के समान काव्यलक्षण का भी शब्दमात्रपरकत्व ही उचित है ।

१. पर्यायिसमबन्ध से एकाधिक पदार्थों की समष्टि में रहने वाले धर्म को व्यासज्जय- वृत्ति कहते हैं और उसके विपरीत हर एक में पर्यायिसमबन्ध से रहने वाले को प्रत्येकपर्याय । दो पुस्तकों की समष्टि मे पर्यायिसमबन्ध से रहने वाली द्वित्वसंख्या व्यासजज्जयवृत्ति है और प्रत्येक घट मे पर्यायिसमबन्ध से रहने वाला एकत्व संख्या, घटत्व आदि प्रत्येकपर्याय हैं । व्यासजज्जयवृत्ति धर्म के अधिकरण समष्टि- रूप में अनेक होते, उनमें से कोई एक नहीं । अत एवं दो घटों के लिए ही 'घटौ द्वौ' यह व्यवहार होता है, किसी एक के लिए नहीं । किन्तु प्रत्येकपर्याय का आश्रय प्रत्येक व्यक्ति है । इसी लिए प्रत्येक के विषय में 'घट एकत्वाश्रयः', 'घटो घटत्वाश्रयः' आदि व्यवहार होते ।

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सभावादिपरे 'गतोऽस्तमर्क:' इत्यादौ चाव्याप्त्याप्ते: । न चेदमकाव्यमिति शक्यं वदितुम्, काव्यतया पराभिमतस्यापि तथा वक्तुं शक्यत्व्यङ्ग्यो भवितुमर्हत्येव । एवमग्रेऽपि यथासम्भवं व्यङ्ग्यार्था उहनीयाः । विरहिण्यादित्यादिषु यथासम्भवं सख्यादीनां ग्रहणम् । जीवनाडभावादित्यादिषु च यथं रमणागमनकालादिः संग्राह्यः । इत्यादावित्यत: परं गुणालङ्कारादिरहित इति पूरणीयम् । सख्यादिरहितस्य काव्यलक्षणस्य गणालङ्कारादिव्यतिरेकविप्रतिपादनेन हेत्वलङ्कार: पण्डिततराजाडभिमतो नेभि ज्ञायते । नाप्यत्र दोषाडभावेऽपि, उभयत्रैव विधेयाडविमर्शस्य सद्वादित्यपि बोध्यम् । किश्चैवं लक्षणे डलङ्कारदोषभाववत्यपि गुणहीने काव्येऽध्यासि । एवमेवाक्यसचनाभावे तदितरसद्वैशेष्यग्यासिरत्यपि विवेचनीयम् । न चेदमित्यनेन भामहाद्युक्ति निरस्यतीति पूर्वमेवोक्तम् ।

गई है वह भी उचित नहीं है, क्योंकि गुणालङ्कारादि से रहित होने पर भी 'उदितं मण्डलं विधो:' (चन्द्रोदय हो चुका) तथा 'गतोऽस्तमर्क:' (सूर्यास्त हो गया) आदि काव्यों में उत्त लक्षण की अव्याप्ति हो जाएगी । इन वाक्यों का काव्यत्व तो प्रमाणित है हीं, क्योंकि वक्तृ-बोधव्य आदि के वैशिष्ट्य के कारण इन वाक्यों में भी चमत्कारजनक व्यङ्ग्य अर्थ की बोधकता है । यदि प्रथम वाक्य दूती द्वारा अभिसारिका को कहा गया हो तो इससे अभिसरण का विधान, अभिसारिका द्वारा दूती से कहे जाने पर प्रकाशाधिक्य के कारण दूसरों द्वारा देखे जाने की सम्भावना से अभिसरण का निषेध और विरहिणी द्वारा अपनी सखी या किसी अन्य अन्तरङ्ग व्यक्ति से कहे जाने पर विरहह की उत्कटता तथा रमण के आने के समय आदि व्यङ्ग्यार्थ प्रकट होते ही हैं । इसी तरह दूसरे वाक्य से, दूती द्वारा अभिसारिका से कहे जाने पर, अभिसरणकाल आदि व्यङ्ग्यार्थ की भी प्रतीति होती ही हैं । यथासम्भव अन्यान्य चमत्कारजनक व्यङ्ग्यार्थ भी हो सकते हैं । ऐसी स्थिति में इन काव्यों में गुणालङ्कारादिघटित काव्य लक्षण की अव्याप्ति सुस्पष्ट है । अतः गुणालङ्कारादि का निवेश अनुगृहीते है । ये वाक्य काव्य हैं हो नहीं; अतः इनमें काव्य लक्षण की अध्याप्ति इष्ट हैं—यह तो 'कहा' नहीं जा सकता, क्योंकि जब इनसे चमत्कारजनक व्यङ्ग्यार्थ का प्रतिपादन हेतु है तो फिर इन्हें 'काव्य' में कहना समीचीनही ।

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त्वात् । काव्यजीवितं चमत्कारित्वं चाविशिष्टमेव । गुणत्ववालंकारत्वदेरानुगमाच्च ।

समानमित्यतस्तस्यापि काव्यत्वमस्त्येवेत्याशयवानाह—काव्यजीवितमित्यादि । ‘यः कौमारहरः’ इत्यादि काव्यत्वस्थलेहृदयङ्गमौचिच्चतदेव युक्तमित्यादि बोध्यम् । ननु तत्रापि कथमिच्चदलङ्कारादयः सन्त्येवेल्यत आह—गुणत्वादेरिति । चानन्विच्चततया गुणत्वादेरनुगमात्तेन रूपेण गुणादीनां लक्षणे प्रवेशः; सर्वगुणप्रवेशोऽसम्भवः; तद्व्यक्तित्वेन प्रवेशे तु परस्पराभावेन व्यभिचार इति तात्पर्यम् ।

दुष्टं काव्यमिति व्यवहारस्य बाधकं विनेत्य लक्षणत्वयोगाच्च । न च संयोजकाभाववान्वक्षः संयोजकितवदंशभेदन दोषरहितं दुष्ट-काव्यमिति ।

इदानोंमदोषाविति विशिष्य निराचष्टे-दुष्टमित्यादिना । दुष्टं काव्यमिदं पद्य-मित्यनेन पद्ये दोषयुक्तकाव्यत्वं विधीयते । तत्र यदि दोषयुक्तस्य काव्यत्वमेव न प्रकाश-कुर्मते, काव्यस्य च दोषयुक्तत्वं नेति तर्हि तन्मत एतादृशव्यवहारानुपपत्ति: । ननु प्रकृत व्यवहारे काव्यपदं लक्षणया यत्किंशलक्षणविशिष्टकाव्यदाभासमानव-क्यपरमिति न व्यवहारा नुपपत्तिरित्याह—बाधकं विनेत्यादि । मुख्यार्थस्य बाधे हि लक्षणा भवति । प्रकृते च विधेयादिविमर्शो दोषयुक्ते जपि ‘न्यकारो ह्यायमेव मे यदरयः’ इत्यादौ काव्यत्वस्य धनिकारादिसम्मतत्वेन काव्यपदमुख्यार्थस्य स्पष्टं दुष्टपदार्थ-नाश्र्वये बाधकाभावात्तात्पर्येणुपपत्तिरेवेति न लक्षणा शङ्कयाश्श्रयितुमिति भावः ।

काव्यत्वस्याद्व्याध्यवृत्तित्वमझ्ञीकृत्य क्रतामाशाङ्कां निरस्यति—नचेत्यादिना । अयम्भावः—काव्यत्वं संयोजगादिवदव्याप्यवृत्तित्वं च तस्यैव यः स्व-धीकरणे एकदेशेन विध्यमानः सन्निदेशान्तरेगाडविध्यमानः । यथा वृक्षौ कपिसंयोग-शाखाविशेषाडवच्छेदेन, वर्त्तमानः सन्नपि शाखान्तरमूलाद्यवच्छेदेनावर्त्तमानोऽव्याप्य-वृत्ती ।

समस्त काव्यों को भी अकाव्य कहा जा सकता है, जिससे उनमें काव्य-लक्षण की संगति से अतिप्रसक्त दोष अपने लक्षण में अपरिहार्य हो जायेगा । साधु ही काव्यों में अलंकारों में अनुगत किसी गुणत्व और अलंकारत्व धर्मों के सिद्ध न होने से गुणालंकारादिच्छटि काव्य-लक्षण का अनुगम (= स्पष्ट प्रतिपत्ति) भी न हो सकेगा ।

काव्य-लक्षण में ‘अदोषौ’ यह अंश भी अनुचित है, क्योंकि ‘दुष्टं काव्यमिंदं पद्यम्’ यह व्यवहाार सुप्रसिद्ध है । इससे काव्य का दोषयुक्त होना भी प्रमाणित होता है । अतः ऐसे काव्यों में ‘अदोष’ पद से घटित लक्षण की अव्याप्ति हो जाएगी ।

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मिति व्यवहारे बाधकं नास्तीति वाच्यमू। 'मूले महीरुहो विहंगमसंयोगी, न शाखायाम्' इति प्रतीतेरिवेदं पद्यं पूर्वोक्तं काव्यमुत्तरार्धे तु न काव्यमिति स्वरसत्वाहिनो विश्वजनानुभवस्य विरहादव्याप्यवृत्तिताया

अत एव स्वाधिकारनिष्ठात्यान्तभावप्रतियोगित्वमव्याध्यृत्तित्वमिति परिष्कुर्वन्ति । अन्न वेदान्तमते यद्यपि शाखाविशेषस्यैवाधिकारणत्वं न तु तद्वृत्ता वृक्षस्प्येति संयोगो नाव्याप्यवृत्तिस्तथापि वृक्ष: कपिसंयोगीत्यादिप्रतीतेरिव क्ष एवाधिकारणं कपिसंयोगस्य, शाखादिस्वधिकारणतादृचछेदक एव, शाखादौ सप्तस्मुपपत्तिरेवाधिकारणतावच्छेदकेरधिकारणत्वारोपात् 'शरीरे मे वेदना' इति वदिति न्यायमतेन शाखासमाधाने बोद्धव्ये । तदेवं काव्यत्वस्थाप्याप्यदृत्तितया तस्य चैत्रैवाधिकारणे पद्ये भावाद्भावयोर्धिकारणतादृचछेदकभेदेन विरोधाद्भावान्न दुष्टं काव्यमिदं पदामित्यत्र पद्ये काव्यपददुष्टपदपार्थान्वये बाध: । समानविषयत्वे हि विरोध:, विरोधे च दुष्टं बलीयसा बाध्यते वस्तुत: प्रकते तु काव्यत्वस्य दोषरहितांशावच्छेदेन दुष्टत्वस्या च तदितरांशावच्छेदकेन पद्ये सत्त्वेऽधिकरणतावच्छेदकभेदेन समानविषयत्वाभावान्न विरोध:, विरोधाभावाच्च न तदुभयान्वये बाध्यबाधकभाव इत्यस्मन्मतेनैवानुपपत्तिरुक्तव्यवहारेऽपि शाखार्थे:

उक्त व्यवहार में जो वाक्य दोषयुक्त होने से काव्य नहीं है किन्तु दोषरहितत्व से भिन्न काव्यलक्षणों के सम्बन्ध के कारण काव्यवत् प्रतीत-काव्याभास है उसी के लिए काव्य शब्द का वक्ता के द्वारा लक्षणिक प्रयोग हुआ है—यह कथन भी अनुचित है, क्योंकि मुख्यार्थबाध के बिना लक्षणा नहीं मानी जा सकती । 'न्यक्कारो हृयमेव मे यदरय:' इत्यादि पद्य में विधेयाडविमर्श दोष रहने पर भी काव्यत्व ध्वनिकारादिसम्मत है । एवं च काव्यात्मक पद्य के लिए दोषयुक्त होना भी सम्भव है । ऐसी दशा में काव्य शब्द के मुख्यार्थ के साथ 'दुष्ट' शब्दार्थ के अन्वय में किसी बाधा के न रहने से उक्त व्यवहार में काव्य शब्द को लक्षणिक कहना असंगत है । साथ ही, यह लक्षणा रूढ़िमूला तो है नहीं और कोई प्रयोजनविशेष भी इसमें नहीं दिखता ।

इस प्रसङ्ग से यह भी नहीं कहा जा सकता कि एक ही वृक्ष में अंशविशेष में पक्षिसंयोग और अंशान्तर में पक्षिसंयोगाभाव के समान एक ही पद्य में अंशविशेष में दोष और निरुदुष्ट अंशान्तर में काव्यत्व होने से 'वृक्ष: पक्षिसंयोगी तदभाववांश्च' 'इदं पदं दुष्टं काव्यं (च)' इस व्यवहार में कोई अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि 'मूले वृक्ष: पक्षिसंयोगी', न शाखायाम्' इस्स प्रामाणिक प्रतीति के आधार पर 'वृक्ष में अंशविशेष मे पक्षिसंयोग और अंशान्तर मे पक्षिसंयोगाभाव' से संश्रय के अध्यास्य

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अपि तस्यायोगात् । शौर्यादिदिवदात्मधर्माणां गुणानाम् हारादिवदुपस्कारकाणामलंकाराणां च शरीरघटकत्वानुपपत्तेश्च ।

यत्तु ‘रसवदेव काव्यम्‌’ इति साहित्यदर्पणे निरर्णीतम्, तत्र । वस्तुलंकारप्रधानानां काव्यानामकाव्यतावाप्ते: । न चेष्टापत्ति:, महाकविसंप्रदायस्याकुलीभावप्रसङ्गात् । तथा च जलप्रवाहवेगनिपतनोत्पत्तनवृत्तित्वस्य प्रकृतानुपयोगात्, अन्यथा दोषयुक्तस्यापि काव्यत्वं प्रसक्तमिवेति नेष्टसिद्धिरनया शङ्क्र्या ।

अत एव ग्रन्थकृतापि काव्यत्वस्याऽज्याप्यवृत्तित्वसमर्थको यो व्यवहार: ‘इदं पद्यं’ पूर्वार्धे काव्यम् उत्तरार्धे तु न काव्यम्‌’ इति तस्यैव निराकरणमनुभवविरुद्धतया कृतम् । देवस्याव्याप्यवृत्तितानिराकरणं तु नाऽश्रय:, तथाऽसति बहुव्याकोप इत्यलं परपक्षदूषणोद्भावनेन ।

तस्येत्यनेन काव्यत्वं परामुय्यते । सन्दर्भेऽसौ व्यास्यातप्राय: । किश्च श्रुतिकटुत्वादिदोषाणां सर्वैशेन काव्यनिष्ठत्वात्तत्र काव्यत्वस्याऽव्याप्यवृत्तितामाश्रित्यापि दुष्टस्याऽकाव्यतावाभ्युपगमोऽनुपपन्न इत्यादि: विभावनीयमन्तरं प्रसङ्गात् । सगुणादिपदप्रतिपाद्ये गुणादिवैशिष्ट्यमपि शब्दशरीरके काव्ये नोपपद्यत इत्याह—शौर्यादिदिवदित्यादि । आत्मधर्माणामुपस्कारकाणां चेति द्वयमपि हेतुगर्भं विशोषणम् ।

यतो गुणा आत्मधर्मां यतश्चाऽलङ्कारा उपस्कारकत्वेन शरीरान्वयव्वा अत एषां काव्यशरीरघटकत्वानुपपत्तिरित्यर्थ: ।

वृत्तित्व के' सिद्ध होने पर भी ‘इदं पद्यमस्मिन्नंशे निघ्ष्टम्‌=काव्यम्, अंशान्तरे च दुष्टम्‌=अकाव्यम्‌’ इस प्रतीति के प्रामाणिक न होने से काव्य का अव्याप्यवृत्तित्व, अर्थात् ‘पद्य के निघुष्ट अंशमात्र में काव्यत्व का अस्तित्व, सिद्ध नहीं होता । साथ ही, शौर्य आदि के समान काव्य की आत्मा (व्यङ्ग्यार्थ) के धर्मों गुणों और शरीर के आगन्तुक शोभाधायक अलङ्कारों को काव्यशरीर के ‘अङ्गभूत तत्व कहा भी नहीं जा सकता ।

विश्वनाथोक्तकाव्यलक्षणं दूषयितुं प्रयथमर्थतस्तदनुवदति—यत्स्ववत्यादिना ।

'साहित्यदर्पण में विश्वनाथ ने यह निर्णय किया है कि काव्य वहाँ है जो रसोद्बोधक हो । किन्तु यह निर्णय अयुक्त है क्योंकि तब तो वस्तुप्रधान (जहाँ वस्तु व्यङ्ग्य हो) और अलङ्कारप्रधान (जहाँ अलङ्कार व्यङ्ग्य हो) जो काव्य हैं वे उनके अनुसार काव्य न हो सकेंगे । वे काव्य हैं भी नहीं—यह तो कहा नहीं जा सकता, क्योंकि वैसा कहने पर तो महाकवियों की वर्णन-परम्परा ही उच्छिन्न हो जायगी ।

एक ही अधिकरण के किसी अंश में जिसका अभाव और दूसरे अंश में जो भाव हो उसे ‘अव्याप्यवृत्ति’ कहते हैं । अव्याप्य = अपने अधिकरण के सर्वांश को व्याप्त किये बिना, वृत्ति = रहने वाला पदार्थ जो हो ।

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भ्रमणान्ति कविभिर्वर्णितानि कपिबालादिविलसितानि च । न च तत्रापि यथाकथंचित्परम्परया रसस्पर्शोऽस्त्येवेति वाच्यम् । इन्दूरशरसस्पर्शस्य 'गौश्चलति', 'मृगो धावति' इत्यादावतिप्रसक्तत्वेनाप्रयोजकत्वात् । अर्थमात्रस्य विभावानुभावव्यभिचार्यैर्न्यतमत्पादिति दिक् ॥

तस्य च कारणं कविगता केवलां प्रतिभा । सा च काव्यघटनातुकलशब्दार्थोपस्थितौ । तद्गतं च प्रतिभात्वं काव्यकारणतावच्छेदकतया तत्रैव त्यादिना खण्डनम् । 'परम्परयेतित यथाकथंचिद्वित्यस्यैव विवरणम् । अथ रसविभावादितयाsङ्गीकृतरसस्पर्शितावमत्रं विवक्षितं परम्परयेत्यनेन । स्वरसैन तु कपिविलसितादेरपि साधादेव सम्बन्धः । शेषं स्पष्टम् ॥

सम्प्रति लक्षतस्य कविकर्मणः काव्यस्य कारणं निरूप्यते—तस्येत्यादिना । केवलेत्यनेन प्रतिभाया व्युत्पत्त्यस्यसाङ्गसहकृतत्वं बोधयतु व्युत्पत्त्यस्यासप्रतिभाभित्रितयपर्यवसितं कारणत्वस्य । निराचष्टे । लोकोत्तरवर्णनानुपुप्ताविशिष्टं काव्यं प्रति त्रितयस्य कारणत्वमित्यपरे । कविगतैत्यानेन प्रतिभाया काव्यनिर्माणानुकूलतास्वरूपसुपलक्षणमावष्टे । प्रतिभां वर्णयति—काव्येत्यादिना । अत्र यथावसरमिति पूरणीयम् । काव्यनिर्माणेन द्वयोरिति । तद्गतौ प्रतिभाग्राह्या । कारणतावच्छेदकतयैति । अत्र प्रतिभानिष्ठा काव्यकारणता किंचित्कर्मडवच्छिन्ना, कारणतात्वात्, दण्डादिनिष्ठघटकारणतावदित्यनेन प्रयोजकत्व प्रतिभा-

हो जाएगी, क्योंकि उन्होंने अपने काव्यों में केवल रसोद्बोधक तत्वों का ही नहीं अपितु जल-प्रवाह, वेग से गिरने, वेग से उछलने, चमत्कारपूर्ण भ्रमण, वन्दरों और बालकों की आकर्षक लीलाओं का भी वर्णन किया ही है । ये साक्षाद् रसोद्बोधक तो हैं नहीं । ऐसी स्थिति में इन्हें अकाव्य कहना होगा, जो नितान्त अनुचित है । ये वर्णन भी परम्परया रसोद्बोधक होने से काव्य हैं—यह मानने पर तो 'गौश्चलति' आदि वाक्यों को भी काव्य कहना होगा, क्योंकि विश्व के समस्त पदार्थों के यथासम्भव विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारिभावों में किसी न किसी वर्ग में आ जाने से सब में परम्परया रसोद्बोधकता है ही । ऐसी स्थिति में 'गौश्चलति' आदि वाक्यों का काव्यत्व मानना ही पड़ जाएगा । अतः साहित्यदर्पणकार का मत भी उपादेय नहीं है ।

काव्य का हेतु प्रतिभामात्र है, व्युत्पत्ति तथा अभ्यास से सहकृत प्रतिभा 'नहीं' । उचित अवसर पर काव्यनिर्माण के लिए उपयोगी चमत्कारजनक पदार्थ और उसके प्रतिपादक योग्य पद की कवि के ज्ञान में उप स्थितों कौ ही प्रतिभा कहते हैं । उस प्रतिभा मे रहने वाला प्रतिभात्व धर्म प्रतिभानिष्ठ काव्य की कारणता के अवच्छेदक

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सिद्धो जातिविशेष उपाधिरूपं वाङ्खण्डम् । तस्याश्र हेतुः क्वचिद्द वतासिद्धो जातिविशेषादिजन्यमदृष्टम् । क्वचिच्च विलक्षणव्युत्पत्तिकाःयकरणा

तस्य सिद्धः, ततश्च 'प्रतिभात्वं जातिः, नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतत्ववाद' इत्यनुमानेन तस्य जातित्वसिद्धिरोंध्या । उपाधिर्वाङ्खण्डमिति । यस्य निर्वचनं न सम्भवति स उपाधिरखण्डः । तथा च विप्रतिपत्तौ तत्त्वात जातेरुत्सत्त्वकथनं युक्तं ये प्रकृतिप्रतिभानिष्ठं प्रतिभात्वं जातिरूपं न मन्यन्ते तन्मतेनैदृशमखण्डोपाधिः । अयं च जातितुल्ययोगक्षेमत्वात्कारणताया अवच्छेदकः । नागेशभट्टास्तु समस्तमेवाखण्डोपाधि जाति मन्वाना अखण्डमिति पाठं चिन्त्यं निर्दिशान्तः सखण्डमिति पाठमभिप्रयन्ति । यद्वा तन्मत उपाधिसामान्य सखण्डत्वेनोपाधिर्वेत्येतावन्मात्रमेव पठनीयसम् । एतस्मते च मतकारप्रयोजकत्वं वैलक्षण्यं वाङ्छेदकसामाश्रित्यानुगमः कारणताया: कर्त्त व्यः ।

प्रतिभाहेतु निरूपयति--तस्याश्चेत्यादिना । प्रतिभाया इत्यर्थः । क्वचिद्द = व्युत्पत्त्यभ्यासरहिते पुरुषे ।

कें एक अनुमिति एक जाति है । कारण में जो कारणता रहती वह कारणनिष्ठ कार्यता से निरूपित कारणता है । उस कारणता का अवच्छेदक होता है । जैसे—दण्ड घट का कारण है, अतः दण्ड में घटनिष्ठ कार्यता से निरूपित कारणता है । उस कारणता का अवच्छेदक उससे न्यून अथवा अधिक देश में रहने वाला तदूदण्डत्व अथवा पृथिवीत्वादि नही हो सकता, अपितु जितने में कारणता रहती उतने में ही रहने वाला और उससे अधिक में न रहने वाला (अन्यूनानतिरिक्तवृत्ती) दण्डत्व नामक धर्म ही होता है । यह दण्डत्व नित्य और अनेक ( सभी ) दण्डों में समवाय सम्बन्ध से विद्यमान (अनेकसमवेत) होने से जातिस्वरूप है । इसो तरह प्रतिभा मे जो कार्यनिरूपित कारणता है उसका अवच्छेदक प्रतिभानिष्ठ कारणता से न्यूनदेश में अथवा अधिक देश में न रहने वाला प्रतिभात्व धर्म है और वह नित्य एवं सभी प्रतिभाओं में समवाय सम्बन्ध से विद्यमान होने से एक जाति है । किन्तु जाति का लक्षण सभी शास्त्रों में एक नहीं है और अद्वैतवादी वेदान्ती तो जातिनामक कोई पदार्थ मानते भी नहीं, क्योंकि उनके मत मे ब्रह्म से भिन्न सबके सब पदार्थ मिथ्या और अनित्य हैं । अतः उक्त प्रतिभात्व को एक अखण्ड उपाधि, अर्थात् खण्डों मे विभक्त न होने वाला—निर्वचन के अयोग्य धर्म, भी कहा जा सकता है । नागेश भट्ट तद् सखण्ड उपाधि है ।

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ष्यासौ। न तुत्रयमेव, बालादेस्तौ विनापि केवलान्महापुरुषप्रसादादपि प्रतिभोत्पत्तेः। न च तत् तत्र, तयोर्जनमान्तरीययोः कल्पनं वाच्यमु, गौर-

उस काव्यकरण-भूत प्रतिभा का उत्पादक कहीं देवता या महापुरुष की कृपा से अश्वा तपस्या आदि से उत्पन्न विलक्षण अदृष्ट है। कहीं लोभिक एवं शास्त्रीय

पुरुषे च। अदृष्टादिव्रितयसमुदिते प्रतिभाकारनत्वं निरस्यति-। न तु त्रयमेवेति। अन्रैवकारणं क्वचिच्च केवलेनादृष्टेन क्वचिच्च त्रितयेन प्रतिभोत्पद्यत इत्यभ्युपेयम्। त्रितयघटकमदृष्टं च केवलादृष्टविलक्षणमेवेत्यपि नागेशमतेऽपि बोध्यम्। पण्डिततराज-

व्युत्पत्ति और काव्यनिर्माण का अभ्यास ये दोनो मिलकर भी काव्यविशेषणनिर्माण के कारण-भूत प्रतिभा का उत्पादन करते हैं। किन्तु ये दोनों प्रतिभाएँ भिन्न-भिन्न

स्वदृष्टस्तस्य तत्रिय कारणत्वं मथयते यत्न दृष्टं कारणं प्रतिभन्धकासम्भवाहितेन कार्योत्पादो न व्याह्रियेत इति नैतन्मते त्रितयं स्वचिदपि कारणं प्रतिभाया:। यत्र च व्युत्पत्त्यभ्यासस्स्वेदपि कार्योभभावस्तत्र दृश्यं तदभावे चादृष्टं प्रतिनन्धकं कल्पनीयम्, कार्योत्पादानुकूलव्युत्पत्त्यभ्यासस्साधनावो वेति अनुपदमेव वयक्तीभविष्यति।

कारण से उत्पन्न होने से परस्पर-विलक्षण हैं। अतः इन दोनों प्रतिभाओं से उत्पन्न काव्य भी परस्पर-विलक्षण ही होंगे, एक स्तर के नहीं। अदृष्ट, व्युत्पत्ति और

त्रितयस्य कारणत्वाभावे दृश्यमात्रस्य च कारणत्वे युक्तिमाह—बालादेरित्या-दिना। प्रसादादिति, प्रसादजन्यादृष्टादिल्यर्थः। यद्यप्यदृष्टस्य सर्वत्र व्यापार-रूपकारणत्वमेव, व्यापारेण च व्यापारिणो नाऽन्यथासिद्धस्तथापि व्युत्पत्त्यभ्यास-सहकृतत्वमात्राभिप्रायेण फलाज्ययोगद्वयवच्छेदेन वा केवलस्यादृष्टस्य प्रतिभाकारनत्व-मुक्तं नाऽयुक्तमिति बोध्यमु। तत् तत्र=बालादौ। जन्मान्तरीयव्युत्पत्त्यभ्यासकल्पनाद्भावे

अभ्यास तीनों मिलकर प्रतिभा को उत्पन्न करते हैं—यह तो माना नहीं जा सकता, क्योंकि महापुरुष आदि के प्रसाद से उत्पन्न अदृष्ट मात्र से कुछ बाल-कवियों मे

काव्य-निर्माण अनुकूल प्रतिभा पाई जाती है। बाल-कवियों में वर्तमान प्रतिभा के कारण अदृष्ट के सत्य-साथ पूर्वजन्मजात व्युत्पत्ति और अभ्यास भी हैं—ऐसा कहना उचित नहीं है। इसका एक कारण तो यह है कि पूर्वजन्मजात व्युत्पत्ति और अभ्यास के प्रत्यक्ष सिद्ध न होने से उनकी सिद्धि हेतु प्रमाणान्तर की कल्पना करनी होगी, और जन्मान्तरीय कर्म के अदृष्टद्वारा ही कारण होने से उक्त व्युत्पत्त्यादि से जन्य

अदृष्ट को भी व्यापार कारण के रूप मे मानना ही होगा। इससे इस पक्ष मे गौरव दोष स्पष्ट है। दूसरे, उक्त स्थल मे व्युत्पत्त्यादि को भी अदृष्ट के साथ-साथ प्रतिभा का कारण सिद्ध करने वाला कोई दृढतर प्रमाण है भी नही। प्रतिभा-स्वरूप काय को हेतु मान कर उसके कारण-भूत व्युत्पत्त्यादि का अनुमान भी नही

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वान्मानाभावात्कार्यस्यान्यथाऽयुपपत्तेश्च । लोके हि बलवता प्रमाणेनाऽडृड्‌मादिना सति कारणताऽनिर्णये पश्चादुपस्थितस्य व्यभिचारस्य वारणाय जन्मान्तरीयमन्यथाऽनुपपत्या कारणं धर्माधर्मादि कल्प्यते । अन्यथा तु व्यभिचारोपस्थित्या पूर्ववृत्तकारणताऽनिर्णये भ्रमत्वप्रतिपत्तिरेव जायते ।

किया. जा सकता, क्योंकि प्रतिभास्वरूप कार्य की जन्मान्तरीय व्युत्पत्त्यादि के बिना भी देवादिप्रसादजन्य अदृष्टमात्र से उत्पत्ति हो जाने. से उक्त प्रतिभा में व्युत्पत्त्यादिकार्यंत्व ही सिद्ध नही होता । तात्पर्य यह है कि लोक-व्यवहार मे जन्मान्तरीय किसी पदार्थ को कारण और उससे उत्पन्न दृश्य को व्याप्य-कारण तभी माना जाता है जब उस पदार्थ मे किसी कार्य की कारणता श्रुति-स्मृति आदि अबाधित प्रमाण से सिद्ध हो और वह कारणभूत पदार्थ प्रकृतजन्म मे उपलब्ध न हो । किन्तु यदि किसी पदार्थ मे किसी कार्य की कारणता किसी अप्रतिपन्न प्रमाण से निश्चित न हो तो उस पदार्थ और उस कार्य के बीच व्यतिरेक-व्यभिचार होने से उस पदार्थ मे कारणता के सिद्ध न होने से जन्मान्तरीय उस पदार्थ मे कारणता का निश्चय भ्रान्त ही होता, यथार्थ नहीं ।

  1. जिसे कारण मानना अभीष्ट हो उसके बिना हीं कार्य की उत्पत्ति होने पर व्यतिरेक-व्यभिचार होता है—‘कारणत्वेनाऽभिमताऽभावेऽपि कार्यत्वाद्‌भिमतोत्पत्तिः ।’

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नापि केवलमृष्टटमेव कारणमित्यपि श्कयं वदितुम् । कियन्तं चित्कालं काव्यं कर्तुमशक्नुयात् कथमपि संजातयोग्यत्नुपसद्भ्यासयोः प्रतिबायाः प्राप्तुर्भावस्य दर्शनेन । तत्राऽयदृष्टस्याऽऽढ्यकारे प्राप्तपि ताभ्यां तस्याः प्रसक्तेः। न च तत्र प्रतिबायाः प्रतिबन्धकमदृष्टान्तरं कल्प्यमिति

कल्प्यते = अनुमीयते (नैयायिकादिमतेन), अर्थापत्त्या वा प्रतीयते (मीमांसकमतेऽन) । जन्मान्तरীয়ं कारणमिति प्राप्तेऽभिप्रायेण, परमार्थतस्त्वदृष्टस्यापि कारणस्य कल्पनं भवत्येव । तथा च कारणीभूतकर्मादितस्कलयोरानन्तर्याऽऽश्रावे कारणत्वोपपादकमदृष्टमपि कल्प्यमेवेति बोध्यम् । तदुक्तमाचार्यैः— चिरघ्वस्तं फलायालं न कर्मादितिशयं विना ॥ इति ।

अन्यथा = कारणाऽकल्पने । व्यभिचारो व्यतिरेकव्यभिचारः । यद्यप्यन्वयव्यतिरेकव्यत्न्येकाश्यां कारणत्वाऽवधारणं न सर्वसंमततम् तथापि तद्ग्याभिचारयोः प्रत्येकं कारणत्वाऽवधारणं सम्प्रतिपन्नमेव सर्वेषाम् । निर्णयो निश्चितिः प्रकृते, न तु पक्षप्रतिपक्षविमर्शोऽपेक्ष्यः।

एतावता प्रबन्धे व्युत्पत्त्याद्याऽऽसादनसहकृतादृष्टस्य प्रतिबन्धकारणत्वं व्यवस्थाप्य व्युत्पत्त्याद्यामयोगे दृश्टाऽसहकृतयोः प्रतिबाधकत्वं निरणुकामः पूर्वपक्षं निरस्यति—नाप्यादीनाम् इत्यादिना । अशेषमनुवर्त इत्यनन्तरं तदानीं प्रतिबाधकभावेन तज्जनकादृष्टविशेषस्य । प्रसक्तेरिति । अभिमतकारणसत्त्वे कार्योत्पत्ते रघ्यमभावजनकादृष्टविशेषस्य ।

यह भी नही कहा जा सकता कि प्रतिभा सर्वत्र अदृष्ट से ही उत्पन्न होती, क्योंकि जो व्यक्ति कुछ समय तक काव्यनिर्माण नही कर पाता उसमें भी किसी प्रकार व्युत्पत्ति और अभ्यास करने से प्रतिभा की उत्पत्ति देखी जाती है। यहाँ अदृष्ट के बिना ही केवल व्युत्पत्ति और अभ्यास से प्रतिभा की उत्पत्ति से यह स्पष्ट है कि सर्वत्र अदृष्ट ही प्रतिभा का कारण नही होता।

यदि उस व्यक्ति मे व्युत्पत्त्यादि के पूर्व भी प्रतिभाजनक अदृष्ट होता तो पहिले ही प्रतिभा उत्पन्न हो जाती और वह काव्यनिर्माण कर लेता। व्युत्पत्त्याद्यस के पूर्व उसमें प्रतिभाजनक अदृष्ट के रहते हुए भी प्रतिभा की उत्पत्ति नही हो पाती, क्योंकि उसमें कारणीभूत अदृष्ट के साथ-साथ प्रतिबन्धकोभूत अदृष्ट भी रहता जिसके प्रभाव से कारणीभूत अदृष्ट प्रतिभा का उत्पादन कर नही पाता;

जब व्युत्पत्त्याद्यस से प्रतिबन्ध कीभूत अदृष्ट का सामर्थ्य अथवा स्वयं वह अदृष्ट नष्ट हो जाता तभी उसमे कारणीभूत अदृष्ट से प्रतिभा उत्पन्न हो जाती—यह कहना भी युक्त नही है, क्योंकि ऐसे अनेक व्यक्तियों मे अदृष्टमात्रकारणतावादी को कारणीभूत अदृष्टों के अतिरक्त प्रतिबन्धकीभूत अदृष्टों की कल्पना (अनुमिति) भी करनी पड़ेगी।

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वाच्यम्। तादृशाने कस्‍तल गतादृ‌ष्टदृ‌श्यकल्‍पनापेक्ष्‍या कल्‍प्‍तव्‍युत्‍पत्‍त्‍यभ्‍यासयोरेव प्रतिभाहेतुत्‍वकल्‍पने लाघवात्। अतः प्रागुक्‍तर्‍या णिरेव ज्‍यायसी।

दित्यर्थः। प्रतिबन्धकाभावे सत्येव कारणसत्‍वे कार्योत्‍पत्तौ सत्‍त्‍न प्रतिबन्धकसत्‍वे न कार्योत्‍पत्तिनं तु कारणाभावे दृ‌ष्टाभावेन, व्‍युत्‍पत्त्‍यभ्‍यासयोगेन च जातयोस्‍ताभ्‍यां प्रतिबन्धकादृ‌ष्टविनाशेन जायते परचात् प्रतिभा स्वजनकादृ‌ष्टेनापि त्‍याश्र्‍यां खप्‍़ड्‍यति—न नेत्‍यादिना। दृ‌ष्टप्रतिबन्धकाभावादाह—अदृ‌ष्टान्‍तरमिति। कारणीभूतादृ‌ष्टविरोधादृ‌ष्टमित्‍यर्थः। व्‍युत्‍पत्त्‍यभ्‍यासोत्‍पत्तौ जायमानायां प्रतिबन्धामदृ‌ष्टजन्‍यत्‍वस्‍यापुलपल्‍वधेर्‍जनकीभूतमदृ‌ष्टं प्रतिबन्धकीभूतमदृ‌ष्टं चेति द्रयमपि कल्‍प्‍यमेव, तत्‍न व्‍युत्‍पत्त्‍यभ्‍यासयोः (स्‍वमते प्रतिभाकारणत्‍वेन) परमते च प्रतिबन्धकीभूतादृ‌ष्टविनाशकत्‍वेन क्‍वलसत्‍वात्‍योहेतुत्‍वमात्रं कल्‍प्‍यम्, परपक्षाड्‌जुपगमे तु अदृ‌ष्टदृ‌यकल्‍पनं व्‍युत्‍पत्त्‍यादौ प्रतिबन्धकादृ‌ष्टनाशकत्‍वकल्‍पनं चेति गौरवमित्‍यतस्‍याज एष पक्ष इत्‍याशयवानाह—अदृ‌ष्टदृ‌येत्‍यादि। अदृ‌ष्टदृ‌यम् = कारणीभूतं च प्रतिबन्धकौभूतं चापरकादृ‌च्‍छिद, व्‍युत्‍पत्त्‍यादेरनस्‍तरं कार्योत्‍पत्तावपि तस्‍य प्रतिबन्धकनाश एवपक्षीणत्‍वान्न काव्‍यकारणत्‍वम्। अतः = लाघवानुगृहीतत्‍वात्। प्रागुक्‍तर्‍या णिरेव = वाचिच्‍च व्‍युत्‍पत्त्‍यभ्‍यासाविति पक्षः। यत्‍न तु सत्‍यपि कारणीभूतेडृ‌ष्टे प्रतिभोत्‍पत्तौ विलम्‍बः, जातायां वा प्रतिबायां काव्‍यनिर्माणेऽ विलम्‍बस्‍तत्‍न दृ‌ष्टप्रतिबन्धकाभावे प्रतिन्धकादृ‌ष्टं वा कल्‍प्‍यम्, उद्बोधकाद्भावो वेति न काचिदुपपत्तिः।

नत्‍वदृ‌ष्टजन्‍यप्रतिभासत्‍वेऽपि व्‍युत्‍पत्त्‍यभ्‍याससजन्‍यप्रतिभाया अनुदयात् कारणत्‍वाभिमतसत्‍वेऽपि कार्यत्‍वाऽभितानुपपत्तिरिति रिल्‍यानयव्‍यभिचारः; एवं प्रकृताड्‌ृ‌ष्टभावेऽपि व्‍युत्‍पत्त्‍यभ्‍यासाभ्‍यां प्रतिभोदयात् कारणत्‍वाभिमताडभावेऽपि कार्यत्‍वोत्‍पत्तिरिति व्‍यतिरेकव्‍यभिचारोदृ‌ष्टप्रतिभयोः व्‍युत्‍पत्त्‍यभ्‍यासप्रतिभयोश्‍चैति कथम् कारणताग्रहोऽत्‍यन्‍त गौरवग्रस्‍तो हि स्‍योक्ष्‍यमाणः।

अत्‍यन्‍त गौरवग्रस्‍तो होते है। से योंक्ष्‍यमाण है। कल्‍पना-लाघव तो इसमें है कि उद्देश्‍यसम्‍मत व्‍युत्‍पत्ति-अभ्‍यास को हीं उत्‍क स्‍थल में प्रतिभा का कारण मान लिया जाय। अतः लाघवानुगृहीत पूर्वोक्‍त पक्ष ही अधिक उपयुक्‍त है कि प्रतिभा कहीं केवल अदृ‌ष्ट से ओर कहीं व्‍युत्‍पत्ति ओर अभ्‍यास इन दोनों से उत्‍पन्‍न होती है। यदि कहीं प्रतिभाजनक अदृ‌ष्ट के रहते हुए भी काव्‍य-निर्माण में विलम्‍ब के आधार पर काव्‍जनक प्रतिभा की उत्‍पत्ति में विलम्‍ब सिद्ध हो तो वहाँ दृ‌ष्ट प्रतिन्धक या उसके अभाव मे अदृ‌ष्ट प्रतिन्धक की कल्‍पना करनी चाहिए। अथवा अदृ‌ष्ट के उद्बोधक की ही अनुपस्थिति मानकर व्‍याख्‍या करनी चाहिये।

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तादृशादृष्टस्य तादृशव्युत्पत्त्यभ्यासयोगेऽपि प्रतिबिम्बगतं वैलक्षण्यं कार्यतावच्छेदकं, अतो न व्यभिचारः । प्रतिबिम्बत्वं च कविताया: कारणतावच्छेदकं, प्रतिभागतवैलक्षण्यमेव वा विलक्षणकाव्यं प्रतीति नात्रापि सः ।

उक्त हेत्वादिलत्यत् आह - तादृशादृष्टस्येत्यादि । अयंर्थ:- तृणारणिमन्यायेन कार्यंवैजात्याभ्युपगमान्नोत्कृष्टव्यभिचारप्रसङ्गः । तथाहि तृणेडरणौ मणौ च वल्किकारणत्वेऽपि तृणजन्यतृणत्वादिहेतुत्वेन परस्परं कार्यकारणभावव्यभिचारः, तृणसत्त्त्वे तार्णवत्तू यभावस्य चोपपत्ते स्तथैवदृष्टजन्यप्रतिभायां च व्युत्पत्त्यभ्याससजनितप्रतिभाभि: यदृष्टं तथा स प्रतिभाविशेष उतपद्यते, यदा चाडृष्टताभावस्तदा स प्रतिभाविशेषो नोत्पद्यते । इति सील्योक्तव्यभिचारनिराकरणे कारणत्वप्राप्ते न किश्चिद् बाधकमिति । इदानीं प्रतिभाकाव्ययो: कारणकार्यभावं निरूपयति - प्रतिभात्वमित्यादि । प्रतिभा काव्यकारणमिति सामान्यतः काव्यत्वं कार्यतावच्छेदकं, तन्निरूपितत्वपिताया: प्रतिभानिष्ठकारणतानिरूपितत्वसत्वयो: व्युत्पत्त्यभ्यासजन्यप्रतिभाजन्यस्य च काव्यस्य परस्परविलक्षणत्ववेनदृष्टजन्यप्रतिभाविशेषसत्वादिसत्वयोः

अदृष्टादि और प्रतिभा के बीच व्यतिरेक-व्यभिचार आपाततः अवश्य प्रतीत होता है, क्योंकि अदृष्टरूप कारण के अभाव में भी व्युत्पत्त्यादिस्वरूप कारण के अभाव में भी अदृष्टात्मक कारण से प्रतिभा की उत्पत्ति हों ही जाती है । किन्तु विचार करने पर यह दोष नहीं रह जाता । कारण यह है कि अदृष्टजन्य प्रतिभा और व्युत्पत्त्यादिजन्य प्रतिभा उसी प्रकार परस्पर विलक्षण हैं जिस प्रकार तृण से उत्पन्न, मणि से उत्पन्न और अरणिमन्थन से उत्पन्न अग्नि परस्पर विलक्षण हैं । अतः जैसे ‘तृणसत्त्त्वे तार्णवत्तू यभावस्य’ यह अन्वय और ‘तृणाद्भावे तार्णवत्तू यभावः’ यह व्यतिरेक भी उपपन्न हैं उसी प्रकार ‘अदृष्टसत्वे तज्जन्यप्रतिभाविशेषोत्पत्तिः’ यह अन्वय और ‘अदृष्टाद्भावे तज्जन्यप्रतिभाविशेषाभावः’ यह व्यतिरेक बन जाते हैं । इसी तरह व्युत्पत्त्यभ्याससजन्य प्रतिभाविशेष के साथ व्युत्पत्त्यसत्त्व के अन्वय-व्यतिरेक भी उपपन्न हैं । ‘कलत: उक्त व्यतिरेक-व्यभिचार नहीं होता । उभयविध प्रतिभा में जो दो कार्यताएं हैं उनके अवच्छेदक भी उन दोनों में रहने वाले ‘वैलक्षण्य’

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न च सतो रुपि व्युत्पत्त्यभ्यासयोगेन न प्रतिभोत्पत्तिस्तत्रान्वयव्यभिचार इति वाच्यसम् ।

कसिचद् दोषः । अन्यथव्यभिचारं निराचष्टे—न चेत्यादिना । मानाभावेनेऽति । वैलक्षण्यं प्रतिभोल्पादनाकुलोदितश्वविरोषः कार्यदर्शनानुमेयः, तद्विष्यकानुमित्यभावेन ।

अयंर्थः—वैलक्ष्यं यस्यास्ति तन्निर्द्रयतेन कायोऽयं तस्याभ्यस्योस्तद्वै लक्षण्यं वर्त्तत इति निर्णयः: कार्यहेतुकानुमानेनैव करणीयः।

नुमानं न प्रक्रमते । प्रमाणान्तरं चात्राडसम्भवि । तथा च वैलक्षण्यसाधकप्रमाणाडभावे न तादृशं वैलक्षण्यं तथाविधव्युत्पत्त्यभ्यासयोगे: प्रसिध्यति ।

तद्व्यभिचारः, कारणतावच्छेदकानव-व्यभिचारः; कारणत्वाडभिमताडभावेऽप्येष्टत्वादिति ।

यत्र पुनर्व्युत्पत्त्यभ्यासयोगेऽपि लम्बने प्रतिभोत्पत्तिस्तत्र दृष्टाडभावे जनकत्वप्रतिबन्धकं किंहि-क्रमशः हैं ।

प्रतिभाओं में रहने वाला प्रतिभात्व धर्म प्रतिभानिष्ठ काघनिरूपित कारणता का अवच्छेदक है । वस्तुतः दो प्रतिभाओं से उत्पन्न काय भी द्विविध ही होते । अतः प्रतिभाओं मे जैसे अदृष्टादिनि-प्रुङ्करणतानिरूपित कार्यताङ्कों के अव-च्छेदक क्रमशः दोनो वैलक्षण्य होते उसी प्रकार प्रतिभाओं में जो काघनिष्ठकार्य-तानिरूपित कारणताएं हैं उनके अवच्छेदक भी क्रमशः उभयनिष्ठ वैलक्षण्यदय ही हैं, उभयकाघ्य-साधारण काघत्व नहीं ।

अब प्रश्न यह है कि जब व्युत्पत्ति चौर अभ्यास के रहने पर भी प्रतिभा की उत्पत्ति नहीं होती तो 'व्युत्पत्त्यभ्याससच्चेपि प्रतिभोत्पत्त्यभावः' यहु अन्वयव्यभिचार क्यों नहीं होता ।

इसके उत्तर मे यह कहा जा सकता है कि कारणतावच्छेदक से अवच्छिन्न पदार्थ मे ही कारणता रहती है; व्युत्पत्त्यभ्या-सानिष्ठ प्रतिभाविशेषणि-रूषित कारणता का अवच्छेदक, सभी व्युत्पत्ति-अभ्यासों से प्रतिभा की उत्पत्ति न होते से, विशेष प्रकार के (=प्रतिभोत्पादनसमर्थ) व्युत्पत्त्यभ्यास-निष्ठ वैलक्षण्य है;

वह वैलक्षण्यस्वरूप कारणतावच्छेदक प्रतिभोत्पादन में असमर्थ व्युत्पत्त्यभ्यास मे नहीं रहता, अतः उसमे कारणता भी नहीं रहती; अत एव प्रतिभा की उत्पत्ति उस व्युत्पत्त्यभ्यास से नहीं हो पाती ।

उक्त वैलक्षण्य के न रहने मे कारण यही है कि उसके रहने मे कोई प्रमाण नही है ।

तात्पर्य यह है कि वैलक्षण्य के अभाव (अथवा अभाव) का ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण से हो नही सकता, क्योंकि वैलक्षण्य अतीन्द्रिय है ।

अतः उसके अभाव का निर्णय कार्यहेतुक अनुमान से ही सम्भव है ।

प्रकृत स्थल मे जब कार्य उत्पन्न ही नही होता तो कार्यहेतुक

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चिच्छन्नत्वात् । पापविशेषस्य तत्र प्रतिबन्धकत्कल्पनाद्र न दोषः । प्रतिबन्धकाभावस्य च कारणता समुदितशक्त्यादित्रयहेतुतावादिनः शक्तिमात्रहेतुतावादिनश्राविशिष्टा । प्रतिवादिना मन्त्रादिभिः कृते कतिपयदिवसव्यापिनि वाक्स्तम्भे विहितानेकप्रबन्धस्यापि कवे: काव्यानुदयस्य दर्शंनात् ॥

प्यदृष्टं कल्प्यमेवेत्याह—पापेत्यादि । वाच्यवाचकौौ समुचच्ये प्रतिभाजनन्तरं काव्यनिर्माणविलम्बेऽप्यपेक्षित गति: । एतावतोकारण्यादृश्यभिचारप्रदर्शनमुखेन कार्योत्पत्तौ प्रतिबन्धकाभावेन कार्यविलम्बेन च जनकौौभूतादृष्टाडभावतद्रूवोधविलम्बसाधनद्वारेणादृष्टच्युत्पत्त्यभ्यासन्रितयसाधारणमेव प्रतिबिम्बकरणत्वं पर्यवस्यतीति पूर्वपक्षिण आहृतं निरस्तं वेदितव्यम् । प्रतिबिम्बान्तभावे कारणीभूतव्युत्पत्त्यभ्यासन्रितयासामानाद्विकलपनेऽनैचोऽपपत्तावदृष्टस्य तत्रापि कारणत्वकल्पने गौरवादिति निष्कर्षः । जनकत्वेनेऽदृष्टस्थलेदृष्टकल्पनायुक्तत्वेऽपि प्रतिबन्धकौ-भूतादृष्टकल्पनमुखयसम्भतत्वात् प्रामाणिकत्वाच्च न गौरवपरराहतिमित्याह—प्रतिबन्धकौ-

वैलक्षण्यम् । तच्चैवंविच्चारस्थलेपपिति कारणतावच्छेदककार्यच्छेद्यप्रयोज्यं त्प्रयोज्यस्यास्स्वरूपयोः कारणयोः सदृशावेऽपि कथम् न प्रतिबिम्बोत्पत्तिरित्यग्रपपत्तिमाह—पापविशेषस्येत्यादि । शेषं कृतयादृश्यानुम् ॥

अनुमान की, जो तादृशवैलक्षण्य को मानने मे साधक प्रमाण और न मानने मे बाधक प्रमाण होता, तो कोई सङ्घति ही नही । इस प्रकार, वैलक्षण्य-साधक प्रमाण न होने से उत्त वैलक्षण्य का अभाव प्रमाणित हो जाता है । यदि कहीं व्युत्पत्त्य-भ्यास के वाद विलम्ब से प्रतिबिम्ब की उत्पत्ति होती तो वहाँ कार्योत्पत्तिप्रतिबन्धक अदृष्ट की कल्पना कर विलम्ब का उपपादन करना चाहिए । प्रतिबन्धक के रहते हुये कार्य की उत्पत्ति न होने से प्रतिबन्धकाभाव को भी प्रसिद्ध कारण के विशेषण के रूप मे (प्रतिबन्धकाभावविशिष्ट कारण) अथवा स्वतन्त्र रूप मे एक कारण मानना ही है । प्रतिबन्धकाभाव को कार्य का अन्यतम कारण तो शक्ति (= अदृष्ट ), व्युत्पत्ति और अभ्यास —इन तीनों को समुदित रूप मे काव्य का कारण मानने वाले पूर्वपक्षी को भी कहना ही होगा, क्योंकि उत्त कारणत्रय के रहने पर भी मन्त्रादि द्वारा कुछ दिनो के लिए वाक्स्तम्भन कर दिये जाने पर अनेक महाकाव्यो के रचयिता भी उतने दिनो तक काव्यनिर्माण नही कर पाते । इसकी व्याख्या प्रतिबन्धकाभाव को कारण माने विना असम्भव है । अतः उपर्यसम्भत एव प्रामाणिक होने से प्रतिबन्धकाभाव मे कारणता मानने मे कोई दोष नही रह जाता ।

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तच्चोत्तमोत्तमोत्तममध्यमाधमभेदाच्चतुर्धा । शब्दाथौ यत्न गुणीभावितात्मानौ कमपर्थमभिधयड्कस्तदाद्यम् ॥ कमपिति चमत्कृतिभूमिम् । तेनातिगूढस्फुटियङ्ङचयोन्निरासः ।

उक्तलक्ष ण* काव्यं विभजते—तच्चेत्यादिना । शाब्दार्थावित्यादि । यत्न काव्ये गुणीभावितात्मानौ शब्दार्थौ कमपर्थे* चमत्कारजनकमभिधयड्कस्तदुतमोत्तमित्य- क्षरार्थोस्य सूत्रस्य । अर्थश्चात्र यथायथं वाच्यो लक्ष्यो वडङ्गयस्यैव ग्राह्यः, यत्न व्यडङ्गयार्थेन व्यङ्गयार्थान्तरप्रतीतिर्यथा ‘निःशेषच्युतचन्दनद्रुममित्यादौ’ तत्र व्यङङ्गय- स्थापि स्वव्यङ्गयान्तरापेक्षया गुणीभाववसम्भवात् । यद्वा सर्वत्रैव वाच्यार्थस्य गुणीभाव- सम्भवा|त्तावन्मात्रनिवेशिनैव संगति: । अत एव ध्वन्यालोकड्कृत्यादौ वाच्यार्थमात्रस्य गुणीभाव उत्को ध्वनिकाव्ये । लक्ष्यव्यञ्जकान्तरव्यङ्गयोरच्यापेक्षया प्राधान्येडपि व्यङ्गयप्राधान्यभावात्रातिप्रसंगः

अत्र च शब्दार्थयोंगु णीभावत्वोक्ल्या व्यङ्गयस्य प्राधान्यं चमत्कारजनकत्वं चेति द्वयमभिप्रेतम् । तत्र प्राधान्यमुपपादकत्वाड्समानाधिकरणमुपपाद्यत्वम् । विधेयत्वं वा तादृशम्, उपपादकत्वमात्रं च गुणीभाव इत्यवधेयम् । अपरण्डङ्गेडपि शृङ्खारादेः सङ्कटकरणाङ्ङुपपादकत्वमस्येव, विशेषणोपपादक विशेष्योपपादकत्वस्य न्यायसिद्ध- त्वात् । अतिशयचमत्कारजनकल्वरूपं तु प्राधान्यमत्र न विवक्षितम्, उत्तमकाव्ये व्यङ्गयस्यातिशयचमत्कारिल्वेपि ‘तदप्राधान्योक्तेः । तदुक्तं ध्वनिकारेण—

यहाँ 'शब्दार्थयोंगु णीभावत्वोक्ल्या' में दो बातें कही गई हैं: व्यङ्गय की प्रधानता और चमत्कार उत्पन्न करने की क्षमता। प्राधान्य का अर्थ है उपपादक होना या विधेय होना। यहाँ यह भी स्पष्ट किया गया है कि गुणीभाव का अर्थ केवल उपपादक होना ही नहीं है।

यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थौ । व्यङ्क्तः;; काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः ॥ इति । अत्र च व्यङङ्कल्वेनैकार्थप्राधान्यमन्यतरस्य चाऽप्राधान्यं सहकारित्वरूप- मभिप्रेत्य विकलपार्थकोडपि वाशाब्दस्तात्पर्यत समुच्चयार्थ एवेति शब्दार्थयोंडौ योरेव गुणभाव इत्याशयेन पण्डितराङ्गेन द्वयोरेव तथात्वं दर्शितम् ।

इस श्लोक में कहा गया है कि जहाँ अर्थ या शब्द अपने अर्थ को गौण बना कर किसी अन्य अर्थ को अभिव्यक्त करते हैं, वह ध्वनि काव्य कहलाता है। यहाँ 'व्यङङ्कल्वेनैकार्थप्राधान्य' का अर्थ है कि एक अर्थ प्रधान होता है और दूसरा गौण।

तेनेति । चमत्कृतिभूमौचिति व्यङङ्गयविशेषणेनैतर्थः । सहृदयैरपि दुःखवेद्यमति- मूढम्, असहृदयैरप्यनुपायासवेधम् अतिस्फुटव्यङ्गयम् । ‘कामिनीकुचकलशावदृ गूढं

यहाँ 'तेनेति' से यह स्पष्ट होता है कि चमत्कृतिभूमि के योग्य व्यङ्गय विशेषण होना चाहिए। सहृदय और असहृदय दोनों के लिए यह उपयुक्त नहीं होना चाहिए।

महा काव्य चास्र काव्यम् काहोता है—उत्तमोत्तम (ध्वनि), उत्तम, मध्यम और अधम ।

शब्द और यथासम्भव वाच्य, लक्ष्य तथा व्यङ्गय अर्थ अपने को गौण बना कर. जहां किसी (चमत्कारजनक प्राधानीभूत व्यङ्गय) अर्थ की अभिव्यक्ति करते हों वह 'अतिगूढ' अर्थात उत्तमोत्तम, काव्य है ॥

'किसी अर्थ' का अभिप्राय चमत्कारजनक अर्थ है । इससे 'अतिगूढव्यङ्गय' और 'असहृदय' अर्थात उत्तमोत्तम, काव्य है ॥

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अपराङ्‌वाच्यसिद्धचमत्कारिण्यचस्यापि चमत्कारितया तद्वारणाय गुणीभावितात्मनाविति स्वापेक्षया व्यङ्‌ग्यप्राधान्याभिप्रायकम् ।

चमत्करोति' इति प्रकाशोक्तौ तु गूढमित्यस्येषद्गूढम् इति तात्पर्यम् । उभयोरन्वयोऽयं 'अर्थस्योपपादयितुं प्राधान्ये सत्यपि तस्य चमत्कारकरणतया भावान्नात्योक्तौ तमो-त्तमकाव्यलक्षणाऽऽदित्याऽसिरित्याशयः । असुन्‌दरव्यङ्‌ग्येऽप्यचमत्कारिणि प्रकृतविशेषणै-नैव निरसनीयाऽऽतिशयिति । उदाहरणान्येपा काव्यप्रकाशादिष्युपनसेवन्ति । अभिप्रेतस्य व्यङ्‌ग्यप्राधान्यस्य व्यावर्त्यंमाह—अपराङ्‌ङ्‌वे त्यादिना । न परो यस्मादिति व्युत्पत्त्या मुख्यः प्रतिपाद्योऽर्थ एवाऽडपरस्त्र विवक्षितः, तत्पोषकमपराङ्‌गम्, 'अयं स रसनोत्कर्षी' इत्यादौ यथा श्रुयते— करुणस्य । अतोडनुक्त श्रु तारमादाय न ध्वनित्वम्, तस्य चमत्कारित्वेऽपि प्रकृष्टकरुणोपपादकत्वात्, तन्नाऽतिशयाSSश्रायत्वेन तदुपपाद-कत्वादिति तात्पर्यम् । इदन्त्ववधेयम्—अपराङ्‌गे व्यङ्‌ग्यान्तरव्यङ्‌गकडयङ्‌ग्यया-त्क्षयोत्कमोत्तमतत्त्वाभावेऽपि पायनिककाव्यङ्‌ग्यनस्य चमत्कारकत्वेनोत्कमोत्तमतत्त्वमङ्‌घ्य-हतं । निमित्तभेदाच्चैकैकत्रोभयसमावेशो न विरोधः । एतच्चोत्तमकाव्यलक्षणघटका-वधारणं व्याचक्षाणेन ग्रन्थकृताSSपि प्रतिपादयिष्यते । यत्र च वाच्यार्थस्याऽनन्यथाऽविरोचान्तस्य विशिष्टये कश्चित् व्यङ्‌ग्योऽर्थः प्रकल्पते तदाऽचमत्कारिणि व्यङ्‌ग्येऽप्यनु-प्रासादिगुणीरूतेव व्यङ्‌ग्ये काव्यं प्रकाशादाद्युक्तम् । 'राघवविरहज्वाला.....' इत्यादि नितमद्गुणीभूतव्यङ्‌ग्यं काव्योदाहरणं भूयस्तमस्योदाहरणं । अनयोः सङ्‌दिग्धप्राधान्यतुल्यप्र धान्यका-वाक्षिसकव्यङ्‌ग्ययोस्तु व्यङ्‌ग्यार्थस्य चमत्कारित्वेऽपि प्राधान्ये भावान्नातिप्राप्तः प्रकृतलक्ष्यपसेयर्थः । व्यङ्‌ग्यार्थस्य प्राधान्ये शब्दत अनुत्तमपि शब्दार्थयोर्गुण पीभावितत्वोक्त्या गम्यत इत्याह—व्यङ्‌ग्यप्राधान्याऽऽभिप्रायकमिति ।

'अतिस्फुटव्यङ्गय' (तथा 'असुन्‍दरव्यङ्गय') नामक-जो गुणीभूतव्यङ्गय काव्य के भेद हैं उनमें इस उत्तमोत्कम काव्य के लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती, क्योंकि इन काव्यों में जो व्यङ्गयार्थ होते वे वाच्यार्थ की अपेक्षा अधिक चमत्कार को उत्पन्न नहीं करते । 'अपराङ्ग' (जिसमें एक व्यङ्गय का उपपादन करने वाल दूसरा व्यङ्ग-ण्यार्थ होता है उसमें) और वाच्यार्थ के उपपादक व्यङ्गयार्थ की प्रतीति जहाँ होती उस 'वाच्यसिद्ध यङ्ग' (एवम् 'सङ्‌दिग्धप्राधान्यव्यङ्गय', 'तुल्यप्राधान्यव्यङ्गय' भौर 'काव्य-क्वचि-त्स्थड्गय' नामक) गुणीभूतव्यङ्गयों में भी इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती; कारण इनमें व्यङ्गयार्थ के चमत्कारजनक होने पर भी उनकी (व्यङ्गयार्थ की) वाच्यार्थापेक्ष प्राधान्यता नहीं होती । व्यङ्गयार्थ की प्रधानता लक्षणवाक्य में यथाऽपि स्पष्ट रूप में नहीं कही गई है,तथाऽपि लक्षणोक्त शब्दार्थ के गुणीभावित होने का तात्पर्य व्यङ्गयार्थ की प्रधानता ही है ।

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शयिता सविघेष्वप्यनीश्वरा सफलीकतुंमहो मनोरथान् । दयिता दयिताननाम्बुजं दरमीक्ष्यतन्नयनैर्निरीक्षते ॥

अत्रालम्बनस्य नायकस्य, सविभ्राननाक्षिप्तस्य रहःस्थानदेरहोऽपनस्य च विभावस्य, तादृशनिरीक्षणादेरनुभावस्य, त्रपोत्सुक्यादेर्‌ व्यभिचारिणः शयितेते्थादि । शयितेति आदिकर्मणि भूते क्तः, आदिकर्म (व्यापार)-मात्रस्यावसितत्वात् । यद्वा शयितमस्या अस्तीति मतसर्थीभिःच् प्रत्ययः । अतो निरिक्षणकालेपि तद्वयापारान्तरसद्भावात् शयानैव सेति तत्पर्यंम् । शयानं चात्र शव्यायां शरीरास्तरणमात्रं न निद्रापर्यन्तमिति निरीक्षित इत्यनेन सुव्यक्तमेव । तथा च दयितुः 'सविघे शयानाडपि दयिता नबोढा प्रिया स्वमनोरथान् स्वान्त-संस्थितान् श्रृङ्गारविलासविषयकामिलावान् सफलीकर्तुं मनीश्वराऽसमर्था दरमी-लतां मिलती सङ्कुचती नयने यस्यास्तथाविधा दमितुमुं खकमलं निरीक्षत । इति पद्यार्थः । अत्र सविभ्राननस्य मनोरथसफलीकरणस्याभावादासचर्यमहोषद्भेन ज्योत्यते । विशेषोक्त्यलङ्कारोऽत्र ।

अत्र व्यङ्ग्यनुम्पादयति—अत्रेत्यादिना । एकान्ततत्काभावे जनान्तरोपस्थितसविधशायनाऽसम्भवात् सविधशायनेनै कान्तस्थानमाक्षिप्यत इत्याह—सविधे इत्यादि । आदिपदेन योग्यकालादिपरिग्रहः । तादृशेति दयिताकतुं कदरमीलनयनकरणक-निरीक्षणस्य, दरमीलननयनविशिष्टदयिताकर्तृकनिरीक्षणस्य वा त्रपेत्यादि । इयं च दरमीलनतपदेन, औत्सुक्यं च निरीक्षणपदेन व्यज्यते । विभावानुभावौ तत्र वाच्य-वेव । संयोगादित्यस्य सम्बन्धादित्यर्थः । न चायं वैशेषिकपरिभाषितः संयोजः, तस्य द्रव्यमात्राश्रयत्वात् । तथा च विभावादीना समेषां सम्बधानैव प्रक्ततवाक्येन व्यज्यते रतिः सम्भोगशृङ्गाराख्यो रसः प्रधानतयैति भवत्युतमतमकाव्यत्वमस्येति सन्दर्भः । वक्ष्यत इत्यस्याऽस्मरैवावान्त इति शेषः । तदिव रसभावनेशदाहरणमिति स्पष्टंम् ।

उत्तमोत्तम काव्य का एक उदाहरण यह है—

"नवोढा नायिका अपने प्रियतम के पास लेटी हुई है । फिर भी बड़े आश्चर्य की बात है कि वह अपने मनोरथों को सफल बनाने में समर्थ नहीं हो पा रही है । ऐसी दशा में वह प्रियतम के मुखकमल को 'अर्धमुद्रित' (अधखुली) आँखों से देख भोअर रही है ।"

यहाँ नायिका की नायक-विषयकं रति (सम्भोग शृङ्गार) की अभिव्यक्ति व्यङ्गयना द्वारा हो रही है, क्योकि रसाभिव्यञ्जक सामग्री—विभाव, अनुभाव

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संयोगाद्रतिरभिद्ययते । आलम्बनादीनां स्वरूपं वक्ष्यते । न च यद्ययं रयितः स्यात्तदास्यमाननाम्बुजं चुम्बेयमिति नायिकेच्छया एव व्यङ्ग्यचमत्कवमनेति वाच्यम् । मनोरथान्सफलोकतुं मसृणैरस्त्यनेत मनोरथः सर्वोऽस्या हृदि तिष्ठन्तीति प्रतितेः स्वशब्देन मनोरथपदेन सामान्यकारणं तादृशेच्छया अपि निवेदनात् । न च मनोरथपदेन मनोरथत्वकारणं तादृशेच्छास्वरूपवस्तु कोऽपि नायिकाग्रहित इवायते न चेत्यादि ।

चुम्बनेच्छास्वरूपवस्तुमनोरथस्यापि वाच्यत्वमेव, न व्यङ्ग्यत्वम् । यद्यपि सामान्याकारबोधे सर्वविशेषाणां स्फुटप्रतिप्रतिनिर्नियता तथापि चुम्बनस्य श्रृङ्गारविलासेष्वतिप्रसिद्धत्वेन तदिन्च्छाया उपस्थितिनियतैवेति तात्पर्य ग्रन्थकृतः ।

और सञ्चारियों का सम्बन्ध—विभावमान है । इसमें नायक आलम्बन विभाव है । एकान्त स्थान और उचित अवसर आदि के बिना नायक के समीप नायिका का शयन सम्भव न होने से 'प्रियतम के समीप शयन' द्वारा उसके उत्पादक एकान्तस्थानादि का आक्षेप होता हैं है । ये हीं उद्दीपन विभाव हैं । अर्धमुद्रित आँखों से देखना हैं उस 'रति' का अनुभव (काव्य) है । लज्जा और औत्सुक्य आदि व्यभिचारीभाव भी व्यङ्ग्य हैं हैं, क्योंकि लज्जा के बिना जागती हुई नायिका की आँखों का अर्धमुद्रित होना और औत्सुक्यादि के बिना निरीक्षण सम्भव नहीं है । इस प्रकार सम्भोगशृङ्गार के अभिव्यञ्जक सामग्री के उपस्थित होने से उसका अभिव्यक्त होना स्वाभाविक है । इस काव्य (पद्य) में शब्दार्थ की अपेक्षा प्रधानीयभूत और अतिशयचमत्कारजनक सम्भोगशृङ्गारादि की व्यञ्जना होने से यह उत्तमोत्तम काव्य है । आलम्बन विभाव आदि का वर्णन इसी 'आलान' में रसरूपनिरूपण के प्रसङ्ग में किया जाएगा ।

अब यह विचार करना है कि यहाँ चुम्बनेच्छास्वरूप वस्तु को व्यङ्ग्य क्यों न मान लिया जाय, क्योंकि नायिका अपने प्रियतम को अर्धमुद्रित नेत्रों से इसी लिये देख रही है कि यदि उसका प्रियतम सो गया हो तो वह उसे चूम ले । इसके उत्तर में यहाँ कहा गया है कि चुम्बनेच्छा जब सामान्य रूप में मनोरथ पद से ही अभिहित है तो. फिर उसे व्यङ्गच्य नहीं माना जा सकता । उदाहरण पद्य में 'अपने मनोरथ के मनोरथ उसके हृदय में विद्यमान हैं । उन्हीं मनोरयों—इच्छाओं—में चुम्बनेच्छा भी 'अन्तर्गत' है । अतः इच्छार्थक मनोरथ शब्द से चुम्बनेच्छा के रूप में तैैैै ।

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कारेण सामान्येच्छाया अभिधाने डपि चुम्बेयमिति विषयविशेषविशिष्टे-च्छात्वेन व्यङ्गच्यते किं बाधकमिति वाच्यमू, चमत्कारो न स्यादित्य-स्यैव बाधकत्वात् । न हि विशेषाकारेण व्यङ्गच्योडपि सामान्याकारेण-भिहितोऽर्थ: सहृदयानां चमत्कृतिमुत्पादयितुमीष्टे ।

विषयविशेषेति । विषयविशेषस्य चुम्बनं प्रकृते, तद्विशिष्टेच्छात्वेन चुम्बनविषय-केच्छात्वेनैवतथ्यः । यद्यपि चमत्काराभावेऽपि न व्यङ्गच्यत्वं बाध-कत्वम्, भूयसामचमत्कृतानापि व्यङ्गच्यानां दर्शनेऽथापि चमत्काराडभावे ध्वनित्व-भावप्रसङ्ग एव प्रकृते बाधकत्वेन विवक्षितः । एनमेवार्थं विशदयति——नहीत्यादिना । कथं व्यपि = सामान्यतो विशेषतश्च । वाच्यवृत्तिरमिधा तयोरलङ्कृतस्यैव विषयी-कृतस्येत्यर्थः । आलङ्करिकै:= ध्वन्यालोकारादिभिः । स्वयमपि द्वितीयावाने ससन्नेहालङ्कारनिरूपणावसरे प्रतिपाद्यविषयतयैवद्विसरे ण ग्रन्थकृत् । यत् एव पर्यायो-त्यलङ्कारे व्यङ्गचस्य प्रकारान्तरे ण वाच्यत्वाद् गुणीभूतव्यङ्गचतैवोकता पण्डिततरराजेन । परन्तु अर्थचाक्त्युद्भावननिप्रकरणे कविकलिपतकोत्तमकविकसनन्दालोकेनैव वस्तुना 'साङ्गह्वारसुरासुरावालि' इत्यादिपचे भान्त्यलङ्कारचवनिमुदाहरत । वाच्यतयावच्छेदक-व्यङ्गचतावच्छेदकयोर्मेदात् वाच्यस्यापि व्यङ्गचत्वे तस्य च ध्वनित्वमुपपादयता स्वयमेवाञ्जन्यथा व्यारुतम् । तत्र विरोधो दुष्परिहरः पूर्वापरसन्दर्भभयोः । मम्मटप्रकाश-कृतु विरोधं परिजिहीर्षु: 'साङ्गह्वार' इत्यादिपचै:व्याख्यानमवसरे प्रकृतसन्दर्भे णस्थस्य 'स्वशब्देन मनोरथपदेन सामान्याकारेण तादृशेच्छाया……….इत्यादिग्रन्थस्य स्थानेऽत्र 'स्वशब्देन मनोरथपदेन व्यङ्गचतावच्छेदकेच्छात्वरूपजातिरूपेण तादृशेच्छाया…' इत्यादौैव पाठ इत्यजूकोकुते । तत्र व्यङ्गचभूतायाचुम्बने च्छाया अतिप्रसक्तिमिच्छात्वं कथं व्यङ्गचतावच्छेदकं स्यादिति न विद्धः । किं तु प्रकृतसन्दर्भेऽत्रिहितोप्ययं पाठ इति चिन्त्यं सुधीरभिः । 'सामान्याकारेण विशेषालिङ्गितस्यैव भानात् वाच्यवृत्तिता' इति रसचन्द्रिकोक्तिरपि वक्तव्यैव, एवकारार्थीसज्ज्ञते:

नहीं किन्तु इच्छामात्र के रूप में (= चुम्बनेच्छात्वेन नहिं अपि इच्छात्वेन रूपेण) तो चुम्बनेच्छा का भी अभिधान हो ही रहा है । अतः जब चुम्बनेच्छा सामान्यरूप में वाच्य है तो फिर उसे व्यङ्गच्य कैसे माना जा सकता ?

जिस विशेष रूप में—चुम्बनेच्छा के रूप में—चुम्बनेच्छा वाच्य नहीं है उस रूप मे इसे व्यङ्गच्य मानने में क्या बाधा है ?—इस प्रश्न का उत्तर यही है कि जब सामान्यकार में वाच्य होने से विशेषाकार में व्यङ्गच्य भानने पर भी उसमें चमत्कारजनकता नहीं हो सकती तो उसे व्यङ्गच्य मानने में कोई लाभ नहीं है । सभी प्राचीन आचार्य यह मानते हैं कि जिसका अभिधा द्वारा सामान्य या विशेष रूप में

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नालिङ्गितस्यैव व्यङ्ग्यस्य चमत्कारितवेनालङ्कारिकैः स्वीकारात् । चुम्बनेच्छाया रत्यनुभावतयैव सुन्दररतवेन तदव्यङ्ग्यने चुम्बामीति शब्दबलाच्चुम्बनेच्छावदचमत्कारितवाच्च ।

अत एवतावता वाच्याया अपि चुम्बनेच्छाया अवच्छेदकभेदेन व्यङ्ग्यत्वमभ्युपगम्यादिप रतेव्यङ्ग्यत्वं तदनुभावकतयाडवश्यं स्वीकारणीयमित्याह—चुम्बनेच्छाया इत्यादिना । सुन्दरतवेन इति । बलादिना तादृशोच्छासस्त्वेडपि तस्या असुन्दरत्वमभिप्रेत्येदम् । तदव्यङ्ग्यने = रत्यव्यङ्ग्यने । अवचमत्कारितवाच्चेति । तथा च यदि चुम्बनेच्छारूपवस्तुसमाश्रयेणैवास्य ध्वनितवमुपपाद्यं तर्हि तादृशेच्छायां चमत्कारितवस्यावडवश्यकतया तदर्थं रतिरव्यङ्ग्यनमपि रहिय्यामिति रतेव्यङ्ग्यने स्वीकार्त्त गय्ये तामादायैवास्य ध्वनित्वपपादनमुचितमित्याशयः ।

एवं त्रपाया अपि न प्राधान्येन व्यङ्ग्यत्वम्, अनुवाद्यतावच्छेदकसामान्याकारेण प्रतिपाद्यस्तत्र विशेषालिङ्गितस्य सामान्याकारेण भावे स्वीकार्त्त एव तदभावे तथाभानाज्ञसभवात् । वस्तुतः सामान्यशब्देन शब्दमयीया सामान्याकारेणव पदार्थस्योपस्थितिं तु कदाचिदपि विशेषालिङ्गितस्यैति युक्तम् । तस्मात्पूर्वोऽपि रसनुभावः परस्परविरुद्धधावेव ।

किसी भी प्रकार से प्रतिपादन न हुआ हो उसी व्यङ्ग्यगयार्थ में चमत्कार होता, अन्य में नहीं । अतः चुम्बनेच्छा को व्यङ्गय मानना व्यर्थ है । यदि चुम्बनेच्छा को व्यङ्गय मानना भी हो तो भी भर्तृपूर्वक उस इच्छा को ही व्यङ्गय मानना उचित है, क्योंकि सौन्दर्य इसी प्रकार की चुम्बनेच्छा में हो सकता है, बलादिपूर्वक चुम्बनेच्छा ॠमें नहीं । इस लिए चुम्बनेच्छा को चमत्कारयुक्त व्यङ्गय यदि कहना हो तो भी उसक कारणीभूत रति का अभिव्यञ्जन मानना ही होगा। ऐसी दशा में प्रधानता पुनः व्यङ्गय रति में हीं विश्रान्त होती, चुम्बनेच्छा में नहीं । अतः उक्त पद्य में शृङ्गारध्वनि हीं सिद्ध होती है, इच्छास्वरूप वस्तु की ध्वनि नहीं ।

तदेवं वस्तुध्वनौ निरस्ते त्रपास्वरूपभावाध्वनित्वं न्याकूकरोति—एवमित्यादिना । एवम् = याडप्रधानत्वाच्चात्र व्यङ्ग्याया अपि चुम्बनेच्छाया ध्वनित्वं तथा । दरमीकृत्यनेनल्याननेन त्रपाया व्यङ्ग्यत्वाभुपपादात् प्राधान्येनैत्युक्तम् । प्राधान्येन दरमीकृत्यनेनल्याननेन

जिस प्रकार अप्रधानीभूत चुम्बनेच्छा की ध्वनि नहीं मानी जा सकती उसी प्रकार अप्रधानीभूत त्रपास्वरूप सञ्चारी भाव की भी ध्वनि इस पद्य में नहीं मानी जा सकती । इसका कारण यह है कि त्रपा का व्यञ्जक दरमीकृत्यनेत्यानात्व अनुवाद्य

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तया प्रतीतायां तस्यां मुख्यवाक्यार्थतया योगात् । न च दरमीलनयनात्वविशिष्टटनिरोक्षणं विधेयमिति नानुवाच्यतावच्छेदकत्वं तस्या इति वाच्यम् ।

व्यङ्गचततन्म् = ध्वनितम् । अनुवाच्यतावच्छेदकतयैति । निरोक्षणकृत्या दयिताया अनुवाच्यतन्म् उददेश्यतन्म्, तत्कतृंकदयितमुखास्नुजस्य निरोक्षणं च विधेयम् । तत्र दरमीलनयनात्वदधित इति बोधादरमीलनयनात्वव्यङ्गचतत्नपया अनुवाच्यविशेषणतयेत्यः । तथा चास्या न वाक्यार्थे प्राधान्यम्, विधेयस्यैव तत् प्राधान्या दित्याह--मुख्येत्यादि ।

एवमपि नयनगतदरमीलनस्य तत्कार्यत्चेउपि दरमीलनयनात्वविशिष्टटनिरोक्षणस्य रतिमात्रकार्यत्वात् । त्रपया एव मुख्यत्चेन व्यङ्गचतवे निरोक्षणोक्ते रनतिप्रयोजनकत्वात्ते: ।

कथं निरीक्षित इति जिज्ञासायां दरमीलनयनतया यथा स्यात्स्थेत्यादरीत्या त्रपयास्तद्वच्याया: कथंचिद्विधेयेनिरोक्षणक्रियाविशेषणत्चं स्वीकार्य सत्पं निरीक्षित इत्यर्थंकरणेन कथं त्रपया न प्रधानच्यङ्गचततन्मित्याशङ्कां निराचष्टे--नचेत्यादिना ।

तावतापि तथानिरोक्षणस्याज्ज्ञध्यानुपपत्त्या तत्कारणत्चेन रतेरच्यनचेत्यादिना ।

तथाहि--व्यङ्गचतया तस्या एव प्रधानत्चं युक्तमिति समाधत्ते--एवमपित्यादिना । तत्कार्येत्चेउपि = त्रपाकार्यत्चेउपि ।

व्यङ्गचततन्म् = त्रपाकार्यत्चेउपि । अन्ततिप्रयोजनकेत्यादि । विनापि निरोक्षणंद रमीलनमात्रेण स्वकार्यैपैव त्रपया व्यङ्गजनास्तिरोक्षणस्य नैरर्थक्यापत्तेरित्यर्थः ।

रतिंहि मात्रेण स्वकार्यैपैव त्रपया व्यङ्गजनास्तिरोक्षणस्य नैरर्थक्यापत्तेरित्यर्थः ।

अर्थात् उददेश्य, दयिता का विशेषण = अनुवाच्यतावच्छेदक है, इस लिए व्यङ्गय त्रपा भी उसी अनुवाच्य का विशेषण है । वाक्यार्थ में मुख्यविशेष्यता विधेयनिष्ठ होती । अनुवाच्य तो गौण होता । अतः उसका विशेषण त्रपा भी गौण होगी ।

गौण व्यङ्गयार्थ में चमत्कारजनकता यदि हो भी तो भी उसे 'ध्वनित' नहीं कहा जा सकता । अतः त्रपा मुख्य व्यङ्गय--ध्वनि--नहीं है ।

उसके नेत्र अधंमीलित हो गए हैं' इस रीति से दरमीलनयनत्च तथा उसके व्यङ्गच त्रपा को निरीक्षणस्वरूप विधेय का विशेषण(=विधेयतावच्छेदक) मानकर भी त्रपा को मुख्य व्यङ्गय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस पक्ष में भी रति को व्यङ्गय मानना ही होगा जिससे त्रपा में मुख्यता नहीं आ सकती ।

कारण यह है कि नेत्र का अर्धमीलीलत होना तो त्रपा से भी सम्भव है किन्तु अर्धंमीलील नेत्रयुक्त होकर प्रियतम का निरीक्षण तो रतिमात्र से सम्भव है, बिना उसके नहीं ।

अतः वाच्य तादृशनिरीक्षण की उपपत्ति के लिए रति को व्यङ्गच कहना ही होगा । फिर तो त्रपा मुख्य व्यङ्गय हो नहीं सकती, क्योंकि वैसा मानने पर निरीक्षण के बिना हीं नेत्रों के अर्धंमीलनमात्र से व्यङ्गय त्रपा के लिए और अन्य व्यङ्गय के अभाव में उसके लिये भी पद्योक्त निरीक्षण की कोई आवश्यक्ता न होने से वह निरर्थक

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दृश्या रतेरनुभावेन निरीक्षणे त्रपया अनुभावस्य दरमीलनस्येव व्यङ्ग्यनया तस्यां तस्या अपि गुणीभावप्रत्ययौचित्यात् ।

यथा वा—

गुरुमध्यगता मया नताङ्गी निहता नीरजकोरकेण मन्त्रमू । दरकु डलताण्डवं नतभ्रूलतिकं मामवलोक्य घूर्णितासीत् ॥

तरीक्षणपाटवः शय्या ) णपाटवाच्चो त्कटस्थानप्रविष्टितया रतिवृद्धिमस्वीकृतारसम्भवे-नेतररसः च योग्यव्यंग्यसाभावेन निरीक्षणस्य वाच्यार्थे न कोप्युपयोग इति तात्पर्यम् ।

अभिधयोपस्थिते रत्यानुभावभूते निरीक्षणे यद्वाऽभिहितस्य योगुणप्रधानप्रधानभावस्तद्वद्गुणयोरपि तथेति नियमाद् व्यङ्ग्यनयोपस्थितायास्तत्पाया अपि निरीक्षणव्यङ्ग्यभूतायां रतौ विशेषणत्वमुचितमिति न त्रपाया: प्रधान-

त्रपाया विधेयत्वमिति न सम्भवतेत्याह—वाच्यवृत्त्येत्यादि ।

ध्वनिरेवात्र । विशेषयत्वं च दरमीलननयेनातत्स्य निरीक्षणे व्यापारमुख्यविशेष्यकशाब्द-बोधवादिनां शाब्दिकानां मीमांसकानां च मत इ ।

प्रथमान्तार्थमुख्यविशेष्यकशाब्दबोधवादिनां नैैयायिकानां मत इ तु कथमात्र संगतिरिति विवेचनीयम् ।

एतावता सम्भोगशृङ्गारसघनिमुदाहृत्य भावध्वनिमुदाहरति— यथा वेत्य-दिना । अथवा—यद् सत्यपि त्रपाया व्यङ्ग्यत्वे नैतदुदाहरणं भावध्वनेऽस्ति किन्तु-

गुरुमध्यगतेति । गुरुवृन्दे श्रेष्ठा: रसवृदाय:, तेषां मध्ये स्थिता नताङ्गी हो जाएगी ।

अत: निरीक्षण की सार्थकता के निमित्त भी उसके अनुभावक रति की व्यङ्ग्यता का स्वीकार अपरिहार्य है । साथ हीं, "जिन पदों के वाच्यार्थों में गुण-प्रधानभाव हो उनके व्यङ्गयार्थों में भी गुणप्रधानभाव होता" इस नियम के अनुसार जब त्रपा का अनुभव—कार्य दरमीलननयेनातत्स्य के अन्तर्गत निरीक्षण का गुणी-

भावध्वनिस्वरूप उत्तमोत्तम काव्य का उदाहरण यह है—

आदि पद्य रसध्वनि का हीं उदाहरण है, त्रपापस्वरूपभावध्वनि का नहीं ।

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अत्र घूर्णितासीदित्यनेतासमीक्ष्यकारितं ! किमिदमनुचितं कृतवानसीत्थंयंसंबलितोदरर्षश्रवर्णाविश्रान्तिधामल्वातप्राधान्येन व्यज्यते । तत्र शब्दोऽर्थेश्र गुणः ।

यथा वा—

तल्पगतापि च सुतनुः श्वासासङ्घं न या सहे । सम्प्रति सा हृदयगतं प्रियपाणि रुद्धासाक्षिप्ति ॥

प्रिया मया कमलकोरकेण मन्दं निह्हता सती मामवलोक्य तथा घूर्णितयुक्ताड्भूय यथा तस्या धूर्णितां मुखदिक्संपरिवर्तनमीप्सत्कुणडलदवृतं टाण्डवयुक्तकुटिलभ्रू लतिकमासीदिति पद्यार्थः । अत्र सर्विशेषणघूर्णिततलेन किमिदमनुचितमित्यादि व्यङ्ग्यम्, तेन च वस्तुस्वरूपव्यङ्ग्येनासलतोऽसौ नायिकाया व्यज्यते । अर्थसम्बलितः = उक्तव्यङ्ग्यार्थव्यङ्ग्यत्वेन तद्विशिष्टः । तत्र == परमव्यङ्ग्यच भूते ऽस्मिन् नायिकानिष्ठे । अर्थः = वाच्यः प्रथमव्यङ्ग्यच अर्थः । गुणः = गुणीभूतः । सोऽयं मरर्षस्य प्राधान्येन व्यङ्ग्यत्वाद् भावध्वनिः ।

सम्प्रति विप्रलब्धश्रृङ्गारस्य रसध्वनि मुदाहरति— तल्पगतेति । सुतनुः = सुकुमाराननु; श्वासासङ्गसहनम् । अत्र एवं नववधूरित्यनेन विवक्षितं मारितनुः ।

कमल की कली से धीरे से ठोकर मार दी तो (क्रोध के कारण) उसने एक नज़र मेरे ऊपर डाली और क्रोध से अपना मुँह मोड़ लिया । नज़र डालते समय उसके कानों के दोनों कुण्डल कुछ हिल गए थे और भौंहें टेढ़ी हो गई थीं ॥

इस पद्य में जो 'क्रोध से मुँह मोड़ लेने' की बात कही गई है उससे नायिका का 'हे अविवेकपूर्णं कार्यं करने वाले प्रियतम ! तुमने यह अनुचित कार्यं क्यों किया'' यह आक्रोश अभिव्यक्त होता है । यतः यह क्षणिक आक्रोश क्षणिक अमर्षं (= क्रोध) के बिना सम्भव नहीं अतः इस व्यङ्ग्य आक्रोश से इसके कारणीभूत अमर्ष की मुख्य रूप में व्यङ्गना होती है और (यही) सहृदयों का परमास्वाद्य — चर्वणाविषय है । इस अमर्ष के प्रति व्यङ्जक शब्द, उसका वाच्यार्थ और आक्रोशस्वरूप प्रथम व्यङ्ग्यार्थ ये सब के सब गुणीभूत हैं । अतः यह भावध्वनिस्वरूप उत्तमोत्तम काव्य का उदाहरण है ।

अब उत्तमोत्तम काव्य का रसध्वनिस्वरूप तृतीय उदाहरण प्रस्तुत है—

"जो कोमल शरीर वाली नवोढ़ा शय्या पर लेटी रहने पर भी अपने प्रियतम के श्वास के साम्न्य आघात को भी न सह पा रही थी वही पितृगृह जाने की पूर्वरात्रि में अपनी छाती पर रखे गए पति के हाथों को धीरे-धीरे हँटा रही है ॥"

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इदं च पद्यं मित्रिमितप्रबन्धगतरवेन पूर्वसाकाड्क्षमिति दिङ्मात्रेण व्याख्यायते—या नववधूः पल्यङ्कडुशयिता स्वासस्यासङ्झमात्रेणापि संकुचदङ्गुलिलतिकारमूतसा सम्प्राप्ते प्रस्थानपूर्ववरजन्यां प्रवर्तव्यत्पतिका प्रियेण सशङ्के न समर्पितं हृदि पाणिं नववधूजातिस्वभाव्यादाक्षिप्ति, परं तु मन्त्रम् । अत्र शानैः स्वस्थानप्रापणात्पना मन्त्राक्षेपेण रत्याव्यः स्थायी संलक्ष्य-क्रमतया व्यज्यते। उपादिविष्यते च स्थाय्यादीनामपि संलक्ष्यक्रम-

यह पद्य मेरे हौं प्रबन्ध—भामिनीविलास का है। इसका सम्बन्ध पूर्ववर्त्ती वर्णन से है। अतः अर्थ को स्पष्ट करने के लिये इसकी संक्षिप्त व्याख्या की जा रही है—“जिस नवोढा कामिनी की कोमल शरीररुपी लत्ता पलंग पर लेटी रहने पर भी अपने प्रियतम के इवास के साधारण आवातमात्र से संकुचित हो जाया करती थी वहाँ प्रियतम को छोड्कर अपने पिता के घर जाने की पूर्वरात्रि में अपनी छाती पर शङ्कापूर्वक रखे गए प्रियतम के हाथों को वहाँ से हटा तो रही है, पर धीरे-धीरे ।” यहाँ प्रियतम के हांथ को उसके स्वाभाविक स्थान पर शानैः शानैः लौटाने से रतिस्वरूप स्थायीभाव (विप्रलम्भशृङ्गार) व्यज्यच है। अतः यहाँ विप्रलम्भशृङ्गार-

कठोरतापादकप्रियांरीरसज्ज्ञाभावादिदिति बोधयम् । आसज्जे ईषद्स्पर्शः । इवाससच्च प्रियस्यैव, प्रकरणात् । नववधूंहि पतिगृहं प्राप्त्यादिचिरादेव पतिगृहं प्रत्यावर्त्तंत इति प्रसिद्धिः । अत एव प्रियेणेतस्य सशङ्केनेतिविशेषणमुपपद्यते। चिरं पतिगृहवासे तु क्रमेण शङ्कापहारातदुत्पन्नमेव स्यात् । प्रवृत्यत्पतिप्रेतेनैत मन्त्राक्षेपे हेतुर्भीतिरुक्ता; शोक्राक्षेपे हि प्रियस्य कुपितत्वं सम्भाव्येत येन पुनर्मिलनसन्देहे: स्यात् । आक्षिपति = स्वस्थानं प्रापयति । व्यञ्जकस्य मन्त्राक्षेपस्य क्रमिकत्वाद्रतिरपि क्रमशो व्यज्यमाना चरमेणाक्षेपच्यापारेण पूणतोऽभिव्यज्यते । व्यज्यते इत्यनेन च स्थाप्यिनो रत्याव्यस्य रसत्वपत्तोच्यते । व्यङ्गचव्यङ्गकयोः क्रमे पौरापर्यें संलक्ष्ये संलक्ष्यक्रमो ध्वनिः । स च यदपि न स्थाय्यादीनां 'रसभावतदाभासाभावशान्त्यादिरङ्गम्;' इति वदतां प्राची-

ध्वनि है। यह ध्वनि व्यञ्जक एवं व्यङ्ग्य में विद्यमान पौर्वापर्य के सुव्यक्त होने से संलक्ष्यक्रमध्वनि है। यद्यपि कुछ आचार्यों ने रसध्वनि आदि को असंलक्ष्यक्रम ही माना है तथापि यह उचित नहीं है। ये ध्वनियाँ भी संलक्ष्यक्रम हो ही सकती हैं। इसका उपपादन इसी आननत के अन्त में किया जायगा। इसी उत्तमोत्तम काव्य को 'ध्वनि काव्य' भी कहा जाता है।

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व्याख्याचत्वम् । अमुमेव च प्रभेदं ध्वनिमामनन्ति ।

यत्तु चित्रमीमांसायामपपद्यदृक्षतैः 'निशेषच्युतचन्दनद्रव्यम्' इति पद्यं ध्वन्युादाहरणप्रसङ्गेऽपि व्याख्यातमु—'उत्तरोष्ठचन्दनं चन्दनच्युतिरीत्या न्यथा-सिद्धिपरिहाराय निशेषग्रहणमप् । ततश्चन्दनच्युते: स्तनानसाधारण्यध्यावर्त्तनेन संभोगचिन्त्रोद्घाटनाय तत्प्रग्रहणम् । स्तनाने हि सर्वत्र चन्दनच्युति: स्यात्, तव स्तनयोस्तटटपरिभाग एव द्रश्यते । इयमाशलेपकृतैव । तथाऽनिर्मृष्ट-रागोऽधर इत्यत्र ताम्बूलग्रहणविलम्बवात्रमाचीनरागस्य किंचिन्मृष्टटतैत्यन्था-सिद्धिपरिहाराय निर्मृष्टराग इति रागस्य निशेषमृष्टतोकता । पुनः स्नान-

व्याख्यास्विद्रधृतवसभवश्चिरततवमपपद्यदृक्षतोक्त निराकर्त्तु प्रथमं तन्मतमाहु—यत्तिवत्यादिना । यत्तिवतस्य तदैतदलङ्कारशास्त्रतत्प्रौनवबोधनिवन्धन-मिल्यनेनान्वयः । चन्दनच्युति: स्तानेनापि सम्भवति संभोगेन चेति तस्या: स्नान-साधारण्यम् । तद्व्यावर्त्तनाय संभोगमात्रजन्यच्युति: प्रतिपादनाय च तत्प्रग्रहणमित्याह-स्नाने होत्यादि । तत इत्यस्यैव विवरणमुपरिभाग इति । आशलेप:= करमर्दनम् । 'चास्सृष्टरागो' इत्यनुकथा 'निर्मृष्टरागो' इत्युक्तौ निर्मृष्टपदप्रयोगस्य प्रयोजनमाह—तथ्येल्यादिना । निशेषेण मृष्टो रागस्ताम्बूलचर्वणे विलम्बेन न सम्भवतीति निर्मृष्टकथनेन तद्जन्यत्वनिरासः । एवमेव स्नानान्ते 'निर्मृष्टरागितया' संभूय-तस्या: स्नानसाधारण्यमिति तन्निरासाय संभोगकृततवमात्रश्रमर्थनाय च व्याचष्टे—पुनः स्नानेत्यादिना । अस्यैवोपपादनम्—उत्तरोष्ठ इत्यादि । एवमेव चित्र-

चित्रमीमांसां में अपपद्य दीक्षित ने ध्वनि का उदाहरण देते समय 'निशेषच्युत-चन्दनं स्तनतटटम्' आदि पद्य भी उद्धृत किया है । इसकी व्याख्या उन्होंने इस प्रकार की है—

"(स्तनों से) चन्दन का मिटना तो दुपट्टे के घर्षण से भी सम्भव है। अतः 'पूर्णरूप में (निशेष) चन्दन का मिटना' कहा गया है। किन्तु पूर्णरूप में चन्दन का मिटना वापी-स्नान से भी हो सकता है । अतः 'यह सम्भोग से ही मिटा है' इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिये स्तनों से नहीं अपित केवल उनके 'तटटम्, अर्थात् 'ऊपरी हिस्सों' से चन्दन का मिटना बताया गया है । स्नान से यदि चन्दन मिटा होता तो पूरे स्तनों से वह पूरी तरह घुल गया होता न कि केवल उनके ऊपरी भागों से । अतः ऊपरी भाग मात्र से चन्दन मिटने के वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि यह कार्य सम्भोग-कालिक गाढ आलिङ्गन से हुया है; वापी-स्नान से नहीं । इसी तरह 'निर्मृष्ट ष्टरागो-ऽधर:' (अधरोष्ठ की लालिमा पूरी तरह मिट चुकी है) इस अंश में लालिमा का पूरी तरह मिट जाना इसी लिए कहा गया है कि उसका थोड़ा सा मिटना (फीका पड़ जाना) तो पान खाने में विलम्ब होने से भी सम्भव है, केवल सम्भोगकालिक गाढ़ चुम्बन

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साधारणव्यावर्तनेन सम्भोगचिह्नोद्भाटनायाधर इति विशेष्य ग्रहणम् । उत्तरोष्ठे सरागेऽधरोष्ठमात्रस्य निर्भ्रष्टेराग इति चुम्बनकृतैव इत्यादिना 'इदमपि ध्वनेरुदाहरिष्यम्' इत्यस्तेन सङ्केतः । 'तटादिव ट्टितां वाचमर्थः: स्नानग्यावृतितद्वारा संमोगाज्जानामैश्लेषचुम्बनादीनां प्रतिपादनेन प्रधान-व्यज्जकव्यञ्जनने साहायकमाचरन्ति' इति ।

तदेतद्‌डूारशास्त्रतस्त्वानवबोधनिबन्धनम्, प्राचीनसकलग्न्थवि रुद्धत्व-दुपपत्तिविरोधाच्च । तथा हि पश्चमोल्लासशेषे निःशेषेत्यादौ गमकनय-यादि चन्दनच्यवनादीन्युपात्तानि तानि कारणान्तरतोऽपि भवन्ति ।

मीमांसकाः 'धूरम्', 'मूलकिता' 'मध्यमावृदिनि' इत्येतैरप्यमि व्यङ्गयातुगुणत्वमुक्त्वो-पसंहृतं निर्दिशाति—इदमपियोत्यादि । दीक्षिताशयमुपसंहरति — तटादिघट्टिता इत्यादिरभ्य आचरन्ति इत्यस्तेन ।

दीक्षित तमत* निरस्यति—तदेतद्रितयादि सन्दर्भेऽ । निराकरणे हेतुद्रयमुक्तम्—प्राचीनसकलग्रन्थविरुद्धत्वं च । तत्राद्यमुपपादयति— तथाहेत्या-से नहीं । किन्तु वापी में देर तक शरीर-मर्दनपूर्वक स्नान करने से भी ओष्ठों की लालिमा मिट सकती है, केवल सम्भोग से नहीं । अतः यह सम्भोगमात्र से मिट्टी है—इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए केवल अधरौष्ठ की लालिमा का पूरी तरह मिटना बतलाया गया है । यदि यह वापी-स्नान से मिट्टी होती तो दोनों ओष्ठों को, केवल अधरोष्ठ की नहीं ।

उत्तरोष्ठ (ऊपर की ओष्ठ) की लालिमा ज्यों की त्यों बनी रहे पर अधरोष्ठ की मिट जाय—यह तो केवल सम्भोगकालिक गाढ़ चुम्बन या अधर-पान से हीं सम्भव है, वापी-स्नान से नहीं ।.....अतः यह भी ध्वनिकाव्य का एक उदाहरण है ।" इसी प्रसंग में उन्होंने यह भी कहा है—"तट आदि से विशिष्ट विशेषण-वाक्यों के अर्थ, उक्त रीति से, इन सारे लक्षणों की वापी-स्नान से उत्पन्न होने की सम्भावना का निराकरण करते हुए और गाढ़ आलिङ्गन, चुम्बन तथा अधर-पान आदि सम्भोगचिह्नों को प्रकट करते हुए 'रमण करने के लिए उसके पास हों गई थी' इस मुख्य व्यङ्ग्यार्थ की व्यञ्जना में सहायता करते ।"

किन्तु अपपञ्य दीक्षित का उक्त मत अलङ्कारशास्त्रीय तत्व के अज्ञान से उत्पन्न होने से अनुचित है, क्योंकि यह मत सभी प्राचीन काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों से भी विद्ध है और युक्ति से भी । काव्यप्रकाशकार ने पश्चम उल्लास के अन्त में कहा है—"निःशेष-च्युतचन्दनम्.....' आदि पद्य में जिन चन्दनच्युति आदि लक्षणों को व्यञ्जना का अनुमान में अन्तर्भाव करने वाले महिम भट्ट व्यङ्गयार्थ के अनुमापक हेतु मानते वे निश्चत तो अन्य कारणों से भी हो सकते, क्योंकि इसी पद्य में इन्हें वापी-स्नान से

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यतश्रात्रैव स्नानकार्यैवेनोपात्तानौति नोपभोग एव प्रतिवद्धानौत्यनेक-न्निकान्ति' इति काव्यप्रकाशकृतोक्तम् । तथा तत्रैव तेन—

विवरण— यत:=यस्मात् । श्रात्र=अत्र । स्नानकार्येण=स्नानक्रियया । एव=ही । उपात्ता+उत्पन्ना । नो=न । उपभोगः=भोगः । एव=ही । प्रति बद्धा=सम्बद्धा । अनेकान्तिः=व्यकिचारोणि । काव्यप्रकाशकृता=काव्यप्रकाशकर्त्रा । उक्तम्=कथितम् । तथा=तथापि । तत्र=तस्मिन् ग्रन्थे । एव=ही । तेन=तस्मात् ग्रन्थकारेण । उक्तम्=कथितम् ।

भ्रम धम्मिअ वीसत्थो सो सुणओ अज्ज मालिंदो तेण । गोला णइकच्छनिकुडंगवासिणा दरिअसीहे ण ॥

संस्कृतच्छाया— 'भ्रम धर्म्मिअ' इत्यस्येयं संस्कृतच्छाया— भ्रम धार्मिक विश्रस्तः स शुनकोडच मारितस्तेन । गोदानदीकच्छ कुहरवासिना दृप्तसिंहेन इति । 'भ्रम धम्मिअ' इत्यादौ लिङ्गलिङ्गिज्ञानरूपेणानुमानेन व्यक्तिं गतार्थंयततो व्यक्तिविवेक-विदा । हेतुहेतुमतोर्व्याप्तिवादिभिः ।

अनुमानेति । अयमाशयः—अत्र 'स शुनकोडच मारितस्तेन' इत्यनेन धार्मिके मानेन (मात्र से) नहीं हैं । अतः ये चिह्न सम्भोगमात्र से सम्बद्ध (इनकी व्याप्ति सम्भोग मात्र से) नहीं हैं । अतः एव ये व्यभिचरित हेतु हैं, इसे अनुमान हो नहीं सकता ।" अतः इन वाक्यार्थों द्वारा 'वापी-स्नान से ये नहीं हुए हैं' इस प्रकार की व्याप्ति-ज्ञानव्यवत्ति और सम्भोगमात्र के ये असाधारण चिह्न हैं—इसका समर्थन करने के लिए दीक्षित द्वारा प्रयास काव्यप्रकाश में प्रतिपादित मान्यता से विरुद्ध है । इसके अतिरिक्त, काव्यप्रकाश के पश्चात् उल्लास में हैं——

"ओ धार्मिक ! तुम अब आश्वस्त होकर घूमो, क्योंकि तुम्हारे गांव का वह कत्ता (जिससे डर कर तुम गोदावरी के तट पर फूल चुनने आये हो) तो गोदावरी के तट पर गुफा में रहने वाले उस (प्रसिद्ध) उद्धत सिंह् द्वारा मारा जा चुका ।"

इस पद्य के विषय में हेतुज्ञान से साध्यज्ञान के साधक अनुमान द्वारा व्यङ्ग्यार्थ को गतार्थ करने वाले महिम भट्ट के मत का खण्डन करते हुए यहाँ माना है कि

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कृतो मतं प्रत्याचक्षाणेन व्यभिचारितवेनासिद्धत्वेन च संदिह्यमानादपि

भीरुत्वं प्रतीयते। तत्र भयकारणस्य निवृत्तेऽर्थे मरणं प्रतिपाद्यते। देशविशेषोपस्य वाऽनुरेखाद् विशिष्टेन ग्रामे गोदावर्यादिकच्छकुहेरे वाऽविशेषेण प्राप्तेऽपि भ्रमणं ग्रामे विधेयत्वेन गोदावर्यादिकच्छकुहेरे च निषेध्यत्वेन प्रतीयते। तत्र च विधिरस्य वाच्य एवाऽऽत्र पदे, प्रतिपद्यभ्रुत्वधर्मिकश्रमणस्य तद्धेतोर्भयंकारणीभूत-

जिसके बारे में व्यभिचार तथा असिद्धि नामक हेत्वाभास सन्निधान भी हो उस शांकिक से भी अभिव्यञ्जन होता है, अनुमिति नहीं। उक्त पद्य किसी अभिसारिका की एक भ्रू धार्मिक के प्रति उक्ति है। अपने अभिसरण में उस धार्मिक भी उपस्थिति के प्रतिबन्धक होने से वह उस धार्मिक से प्रकारान्तर से यही बताना चाहती है कि वह स्थान उसके भ्रमण के लिए योग्य नहीं है। अतः उसे वहाँ से हँट जाना चाहिए। यहाँ व्यङ्ग्यार्थविरोधी महिम भट्ट का यही मत है कि पद्य के प्रतिपाद्य 'गोदावरीतट तुम्हारे भ्रमण के योग्य नहीं हैं' का बोध अनुमान प्रमाण से ही हो जाने से व्यञ्जना वृत्ति की कोई आवश्यकता नहीं। उनके मत का सारांश यह है—

इवनिवृत्तौ: इवविशेषेणात्र ग्रामस्य च प्रतिपादितत्वात्। गोदकच्छकुहेरे भ्रमणनिवेधरचावाच्योऽपि तत्र व्यापकाभूतभीतभ्रमणसाधनस्वभावकवृदृश्य भयकारणीभूतदृशंसिंहर्स्योपलधे रनुमेयो भवत्येव--अत्र भ्रमणं मा कार्षीः, दृशंिसंहर्स्यवात्= “गोदाकच्छकुहरं त्वक्तृ ङ्कद्रमणाऽSयोग्यम्‌” (भयकारणाभूत)सिंहवृत्ताव्‌ इति। अनर्थसंशयाऽभावनिश्चयादेव प्रवर्त्तितुम्‌ति मतेऽ तु 'यत्र यत्र प्रवृत्ति: तत्र तत्रार्थसंशायाभावनिश्चयस्य विरुद्धो यो गृह्यतेवमारकगोदावर्यादिकच कुहरस्थदृशंिसंहकर्तृ कोटिनर्थसंशयस्तस्तस्य सद्भावादपि तत्र भ्रमणनिषेधोऽनुमेयः। अयंव द्वितीय: प्रकार: प्रकाशाद्युपन्यस्त: शब्दान्तरेण।

गाँव के कुत्ते की हत्या का भ्रमण के कारण के रूप में निर्देश से उस धार्मिक की भीरुता स्पष्ट है। पद्य में भ्रमण का क्षेत्र निर्दिष्ट नहीं है, अतः ग्राम तथ गोदावरीतट इन दोनों ही स्थानों में सामान्य रूप से प्राप्त भ्रमण का भयकारणीभूत कुत्ते के मार दिये जाने के कारण ग्राम में विधान और भयकारणीभूत दृश सिंह के उपलब्ध होने से गोदावरीतट पर निषेध ये दोनों ही इस पद्य से अवगत होते हैं। इनमें ग्राम में भ्रमण का विधान तो शब्दबाच्य है—यह सुनिश्चित है। गोदातट पर भ्रमण का निषेध वाच्य नहीं, अपितु अनुमेय है। तत्पयं यह है कि भयकारणीभूत कुत्ते के वध का भ्रमण के हेतु के रूप में निर्देश से यह निश्चित है कि भीरु धार्मिक का भ्रमण वहीं सम्भव है जहाँ भयकारण की उपलब्धि न हो। इस प्रकार

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लिङ्गाद् द्वयञ्जननं युपरातम् । इत्यमेव च ध्वनिनिकृतापि प्रथमोद्योते । एवं च व्यङ्ग्यकानां साधारण्यं प्रतिपादयतां प्रामाणिकानां ग्रन्थैः सहाऽसाधारण्यं प्रतिपादयतस्तद्व ग्रन्थस्य विरोधः स्फुटः ।

अत्र ग्रामगोदावरोकच्छकुहरयोः 'भ्रम धार्मिक' इत्यादिेरवगमेऽपि निपेध एव वाध्यबाधकभावनिरचयकृतो वाक्यार्थस्य विश्रान्तिः, द्वयोर्विधिनिषेधार्थयोः परस्परविरुद्धयोरे काश्रयत्वासम्भवेन तयोः समुच्चयाद्भावात् । विकलपेन प्रतिपाद्यत्वे वचनादनर्थक्यात्, परस्परविरुद्धत्वेनाऽऽडम्बभावाद्भावाद्वाऽऽचेतति महिमभट्ट आहः । यवं त्वदृशच्छ्लामः-ग्रामे भ्रमविधेर्वचयितले गोदाकच्छकुहरे च भ्रमननिपेधस्यानुमेयत्वे विधिनिपेधयोर्भिन्नाश्रयत्वेन विरोधो न भवत्येव । अतो गोदावरोकच्छकुहरेऽ स माऽभ्रान्तिर्यतावन्मात्रं स पुनर्‌च्छल-स्यभिप्रेतवेन ग्रामे भ्रमेऽभवा वा भ्रमोऽरित्यस्य च सर्वथैव तद्भिप्रायाद् विषयवेन 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः' इति न्यायेनैव निपेधे वाक्यार्थविश्रान्तिलभ्यत इति । व्यङ्ग्यञ्जननाम = व्यङ्ग्यजननाया भेदं प्रमाणयति । अनुमितिरहि अद्यधिकचारिणो (व्याध्यद्वेन निर्णीतात्) पक्षधर्मतया च निर्णीताल्लिङ्गाद् भवति, न तु तथात्वेन सन्दिह्यमान-

द्वयम् । यथोक्तं-यावच्चाऽऽलव्यतिरेकितवं शतांशेनाऽपि शङ्क्यते । विपक्षस्य कुतस्तावद्द्वेतेऽर्गमनिकाबलम् इति ।

भ्रम (की योग्यता) का साधक जो भयकारणोपलब्ध्यभाव उसके स्वभाव से विरुद्ध भयकारणीभूतदृशसिहोपालभि होने से गोदातट पर उसके भ्रम (की योग्यता) के निपेध (=अभाव) की अनुमति होती है । किन्तु जो लोग किसी भी व्यक्ति की प्रवृत्ति वहीं मानते जहाँ किसी प्रकार के अनर्थ के सन्देह का न होना सुनिशिचत हो उनके अनुसार गोदातट पर (भ्रमणात्मक) प्रवृत्ति के व्यापक अनर्थेसं शयाभावनिरचय के विरुद्ध दृशसिहह्निमित्तक अनर्थ का संशय होने से वहाँ उस भीरु धार्मिक की भ्रमणात्मक प्रवृत्ति के अभाव की अनुमति हो जाती है । इसी द्वितीय प्रकार का (सामान्यरूप मे तो नहीं अपितु विशेष रूप मे) काव्यप्रकाशा मे निर्देश किया गया है । इस प्रकार हेतु भयकारणनिवृत्ति और उसके वाच्य साध्य भ्रमण के बीच सहानवस्थास्वरूप विरोध का निश्चय हो जाने से प्रकृत पद्य का तात्पर्योँ भ्रमणनिपेध ही होता, केवल भ्रमण का विधान अथवा विधान और निपेध दोनों नहीं, क्योंकि समानविषयक विधि और निपेध के परस्पर-विरुद्ध होने से उन दोनों का समुच्चय या अज्ञातिभाव असम्भव है । यदि 'घूमो' या 'मत घूमो' यह विकल्प अभिप्रेत होता तब तो पुनर्‌च्छली के कथन की कोई आवश्यकता ही न रह जाती ।

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अध्यतिरेकितवम् = अद्यभिचारितवम्, तस्य संशयोऽव्यभिचारसंशायो व्यभिचारसংশयैककोटिक: । विपक्षस्य = विपक्षे । गमनिकाबलम् = अनुमापकतवम् । व्यत्जनं पुंस्तथ्यात्वेन सन्देहमानादपि लिङ्गाद् भवत्येव । प्रकृते च गुर्वझियादिना भीहध्रार्घकस्य सिंहसत्त्वेऽपि भ्रमणसंभवादेतो: भ्रमणाभावस्वरूपसाध्याभाव ( भ्रमण ) वत्यपि गोदाकच्छ कुहरात्पके पक्षे वृत्तित्वसंशयाद् व्यभिचारसंशाय: स्कुट: । पुंइंचलीवाक्यस्थाभ्राणाज्ञानेन तत्र द्वीपसहस्रपरीक्षणादि पक्षधर्मतापि सन्देह्यवाति भवत्यसिद्ध त्वसंशयोऽप्यत्र । धार्मिकस्य पापजनकस्वस्पर्शादि विषयतोऽपि यदि वीरत्वम् तर्हि सिंहस्य तद्भयकारणत्वाद्भाव इति सिंहसत्वस्य हेतो:स्र्द्धं मणाभावाभावस्वरूपसाध्याभावव्यतिसंशयादिरुद्रत्वसंशयोऽप्यत्रेति नानुमानेन व्यत्जना गतार्थयितु शक्येति प्रकाशास्थसन्दर्भाशय: । अतञ्च गोदाफच्छकुहरे भ्रमणनिपेधो नानुमेयोऽपितु व्यत्जच एव बोद्धव्यपैशिट्येयेन । वक्तृवैशिट्यरुपयत्र कथमपि तसहकारोति वक्तु शक्यते । न चात्र विपरीतलक्षणया निपेधावगम:, पदार्थोपस्थित्यनन्तरमेव बाधग्रहे सति तस्या: प्रसरा त् । प्रकृते तु बोद्धव्यद्वैपी श्लेष्ट्र्यमप्यालोचनानन्तरमेव बाधग्रहो न पदार्थोपस्थियत्यनन्तरमिति न तथा निर्वाह: । अहं एवोक्त महिमभट्टे नादपि-“दितो-यस्त्वत एव हेतो: पर्यालोचणिरज्यर्थस्य विधेकिन: प्रतिपत्तृ प्रयोजकस्वरूपनिरूप-

उक्त रीति से तात्पर्यंविषयोभूत अर्थ—'यहाँ मत घूमने' की प्रतीति अनुमान प्रमाण से हीं हो जाने से उसकी प्रतीति के लिए व्यत्जनानात्मक शब्दव्यापार की कोई आवश्यकता नहीं । इस मत का निराकरण करते हुए काव्यप्रकाशकार ने यह स्पष्ट किया है कि उक्त उदाहरण ( तथा अन्यत्र भी ) अभिप्रेत अर्थ के ज्ञापक पदार्थ शुद्ध हेतु नहीं हैं अपितु उनके हेत्वाभास होने का संशय है । अतः वे अनुमापक नहीं हो सकते । व्यत्जक होना तो सम्भव है, क्योंकि अभिव्यञ्जन हेत्वाभासों से भी होता । उक्त उदाहरण में सिंहोपलविध को गोदातट पर भ्रमणयोग्यत्व के अभाव का अनुमापक माना गया है । किन्तु सिंहोपलविध होने पर भी गुरु या राजा की आज्ञा से अथवा किसी खोजाने की प्राति की आशा से भी धार्मिक आदि का भ्रमण सम्भव है । अतः साध्य ( भ्रमणाभाव ) का गोदा तट पर अभाव ( भ्रमण ) होने पर भी सिंहोपलविधस्वरूप हेतु के रहने से साध्याभाववद्दृत्तित्व ( विपक्षसत्त्व ) -स्वरूप साधारणव्यभिचार नामक हेत्वाभास ( हेतुदोष ) सन्दिग्ध है । अतः सिंहोपलविध भ्रमणाभाव का अनुमापक नहीं हो सकती । अनुमान के लिए हेतु का पक्ष में प्रामाणिक अस्तित्व ( = पक्षधर्मता ) भी अनिवार्यं है । किन्तु यहाँ वह भी सन्दिग्ध है, क्योंकि व्यभिचारिणी स्त्री के वचन के प्रामाणिक न होने से उसके कथनानुसार गोदातट पर गुफा

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किं च यदि निरूप्येत्याद्यवान्तरवाक्यार्थानां वापीस्नानव्यवृत्तिद्द रेण णेन सामर्थ्याद्व प्रतीतिपथमवतरति' इति ।

में सिंह है यह निश्चित नहीं हो सकता । इस प्रकार पक्षधर्मताज्ञानस्वरूप 'सिद्धि' के अभाव में हेतु के 'असिद्ध' हेत्वाभास होने का भी संशय है ही । साथ हीं, यह भी संभव है कि वह श्यामक वीर हो, किन्तु कुत्ते से इस लिए डरता हो कि उसके स्पर्शो से शरीरादि मे अपवित्रता आ जायगी ।

प्रकृतमुपसंहरति—एवं चेति । प्रामाणिकानुमिति । काव्यप्रकाशकारमतस्य भूषण निराकरणात् ध्वन्यालोकाभिमतस्यादिपि कवचिन्स्वयमनादृतत्वात् कथं तेषां प्रामाणिकत्वमिति चिन्त्यम्, अंशतोऽपि विरोधस्तु दीक्षतेनापि समानः, तथापि दीक्षितेन तेषां प्रामाण्यमध्युपगतमेवेत्यतदुक्तम् ।

ऐसी स्थिति में उस धार्मिक का सिंहयुक्त स्थान पर भी ज्ञानपुर्वक घूमनें । इस प्रकार साध्याभाव ( = भ्रमणाभावाभाव = भ्रमण ) के साथ सिंहोपलब्धि-स्वरूप हेतु की व्याप्ति के सन्दिग्ध होने से यहां विरोघनात्मक हेत्वाभास का भी संशय है । अनुमान सद्देतु से होता, निश्चित या सन्दिग्ध हेत्वाभास से नहीं ।

'तत्र ग्रन्थस्य विरोधः स्कुटः' इत्यन्तेन ग्रन्थेन प्राचीनसकलग्रन्थविरोधत्वं चिन्मीमांसाकृत उपपाद्योपपत्तिविरोधमुपपादयति—किस्ने त्यादिना ।

अत: सिहोपलब्धिध से भ्रमणाभाव का अनुमान नहीं हो सकता । यह यो व्यतिरेकानुमान मात्र से गम्यमान है । इस लिए अनुमान प्रमाण से व्यतिरेक को गतार्थ नहीं किया जा सकता ।

अयमाशयः—यथादपूर्ववाक्यस्थले शब्दप्रामाण्यस्याद्वैतस्वीकर्तव्यतयादन्यत्रापि शब्दप्रयोगे तत एवार्थादिगतिरिति तान्त्रिकप्रसिद्धिस्थले व्यभिचारितलिङ्गादिस्थले व्यतिरेकान्वयादि अवश्यस्वीकरणीयत्वेन यत्नादिपि काव्ये लिङ्गस्याद्व्यभिचारितवं तत्रापि व्यतिरेकनय-

काव्यप्रकाश के उपयुक्त सन्दर्भों से स्पष्ट है कि व्यतिरेकास्थल में ज्ञापक का असाधारण (व्यज्ञार्थमात्र से सम्बद्ध) होना अपेक्षित नहीं है । 'ध्वन्यालोक के प्रथम उद्योत में भी यही बात कही गयी है । अतः अप्पय दीक्षित का असाधारणत्व-प्रतिपादन के लिए किया गया प्रयास पूर्वोक्त प्रामाणिक आचार्यों के ग्रन्थों (में निर्णीत सिद्धान्त) से विरुद्ध है जहां व्यञ्जकों को व्यङ्गघ तथा उससे भिन्न अर्थों के साथ समान रूप से सम्वद्ध कहा गया है ।

व्यतिरेकनयेऽवसयस्वीकरणीयत्वेन यत्नादिपि काव्ये लिङ्गस्याद्व्यभिचारितवं तत्रापि व्यतिरेकनय-

अत: दीक्षित का प्रयास अनुचित्त है । अप्पय दीक्षित का उक्त प्रयास उपपत्तिविरुद्ध भी है । 'निरूप्यच्युतचन्दनं स्तनतटम्' आदि विशेषनहीन वाक्य के अर्थो को वे वापीस्नान से असंभव बतलाते हुए केवल व्यङ्ग्यार्थ के असाधारण कार्य के रूप में क्यों सिद्ध करना चाहते ?

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व्यङ्गचासाधारण्यं संपाद्यते तत्किमर्थंमिति पृच्छामः ? क्यङ्गचस्य व्यङ्जन-थोंमिति चेत् ? न, व्यङ्जकगताडसाधारण्यस्य व्यङ्जनानुपायत्वात् ।

वार्थडवसायो न गुरुतरेरणानुमानेति कथमत्र निशेषच्युतचन्दनमित्यादौ दीक्षिततस्य्यासाधारणयप्रतिपादनं व्यर्थंम्, युक्तिसिद्धत्वात्तस्यैत्यत उपपत्तिविरुद्ध त्वं तस्य प्रदर्शंयति प्रकृतेन सन्दर्भेण । तथा च व्यङ्जनास्थले सर्वत्रैव साधारण्यं लिङ्गगस्य, न वचिद-साधारण्यमिति स्वयमेव वक्ष्यति । व्यङ्गचस्य=तद्नल्तिकमेव रतुं गतासीतत्यस्यार्थस्य ।

औण्णिहं दोर्ब्बलं चिंता अलसंतणं सणीससिअम् । महं संदर्भाइणओए केरं सहि तुंह वि परिभवइ ॥

'औण्णिहम्…' इत्यस्य संस्कृतच्छाया—औद्रिद्रयं दौर्ब्बल्यं चिन्ताडलसत्वं सन्नीशसितम् ; महं संदर्भागिन्या: कृते सखि त्वामपि परिभवति ॥ इति ॥साधारणानाम्= उत्कटसंभोगवियोगादिजन्यत्वादविशेषणाम् । अर्थविशेष:= उत्कट-सम्भोग: । असाधारणस्य=अव्यभिचरितत्वस्य । व्यक्ति:=व्यङ्जना ।

के स्पष्ट अभिव्यंजन के लिए तो ऐसा करना उचित नही है, क्योंकि अभिव्यंजन के साधकों के लिए व्यंग्यार्थ के असाधारण धर्म होने की कोई आवश्यकता तो है नहीं । इसी लिए—"अरी सखी ! मुझ अभागिन के चलते जागरण, दुर्बलता, चिन्ता, आलस्य और दीर्घनिःश्वास ये सब दोष तुझे भी पीड़ित कर रहे हैं ।" नायिका द्वारा उसके पति के साथ छिपकर सम्भोग कर आने वाली दूती के प्रति कहे गये इस पद्य में सम्भोग एवं उत्कट वियोग आदि में समान रूप से होने वाले जागरण आदि को वक्रोक्ति नायिका तथा बोधव्य दूती के प्रभाव से 'दूती के सम्भोग' का. व्यंजक सभी मानते । इसलिए व्यंजक साधकों के लिए व्यङ्गचार्थ का असाधारण धर्म होना आवश्यक नहीं है । व्यंजक यदि व्यङ्गचय का असाधारण धर्म हो तब तो दोनों के बीच व्यासक्ति सम्बन्ध सिद्ध हो जाएगा, क्योंकि दो पदार्थों का असाधारण (=अव्यभिचरित होना) हीं तो व्यासक्ति है । ऐसी स्थिति में असाधारण्य अनुमान ले लिए हीं अनूकूल होगा, व्यंजना के लिए तो यह सर्वथा प्रतिकूल होगा । अतः व्यंजकवादी दीक्षित का ऐसा मानना असंगत है ।

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अथ तटादिघटिततटवेऽपि न निश्शेषेत्यादिवाक्यार्थानामसाधारणयमू, सलिलाद्रवस्नानकरणप्रोचछनादिनापि तत्सम्भवादिति चेत् ? तंहि वापी-स्नानव्यावर्त्तनेन कः पुरुषार्थः ? एकत्रानेकान्तिकत्वस्येव वहुष्वनैकान्तिकतायापि ज्ञाताया अनुचितप्रतिकूलत्वादव्यक्तिप्रतिकूलत्वाच्च । अपि चात्र हि तदन्तिकमेव रत्यादिगतासीनि व्यङ्ग्यशरीरे तदन्तिकङ्गमनं रमणरूपफलादानं न साधारणप्रतिपादनममिप्रेतमपि तु वापी-स्नानमात्रव्यावसन्नमिल्याशब्दां प्रतिपादयति—अर्थेति । यद्वा निश्शेषच्युतचन्दनत्वादेवपीस्नानजन्यत्वव्या-वर्तनेनापि नाङ्गसाधारणयम्, किलन्नवस्त्रप्रोछनादिनापि तथा सम्भवादित्याशङ्कां प्रसौति—अथेति । यथा किलन्नवस्त्रप्रोछनादिना सम्भोगेन च समानं निश्शेषच्युत-चन्दनत्वादि स्तनतटादेस्तथैव वापीस्नानेनापि भवतु मा भूद्रा नाम, उभयोरपि व्यञ्जकत्वानुपयोगेन तदर्थप्रसाधननैरर्थक्यं स्पष्टमित्याशङ्कयेन समाधानं प्रति प्रह्ण-मुखेन—तर्हीत्यादिना । ननु वापीस्नानस्य व्यञ्जकत्वविरोधित्वात्तद्वचयादित्वेस्तद्विरो-धिनिराकरणं तन्मुखेन च व्यञ्जनासहकारित्वमित्यवार्थः; किलन्नवस्त्रादिप्रोछनादि-नेश्चानुपस्थिनतत्स्वात्तद्यादित्तो न यतितमित्यत आह—अपि चेत्यादि । व्यङ्गयत्वस्य

पर भी उक्त वाक्यों के 'तट' आदि शब्दों से घटित होने वाले व्यङ्ग्य के असाधारण धर्म हैं ऐसा कहना नहीं, क्योंकि वे 'वापी-स्नान मात्र की व्याप्ति अभीष्ट है; वे पोछने आदि से भी सम्भव हैं—यह कहकर भी उक्त मत के दोष का निराकरण नहीं किया जा सकता, क्योंकि यदि वे विशेषणवाक्यार्थ अन्य कारण से भी सम्भव हैं तो फिर उन्हें वापी-स्नान मात्र से असम्भव कह कर कौन सा अभीष्ट अर्थ सिद्ध हो सकता? अनैकान्तिकता (=व्यभिचार) तो किसी हेतु की एक स्थान में ज्ञात हो या अनेक में, अनुमान के लिए समान रूप से वह प्रतिकूल ही है। अतः उक्त विशेषणवाक्यार्थी को व्यङ्गच से सम्भव मानने के साथ-साथ, यहि वापी-स्नानादि से भी सम्भव मान लिया जाय तो भी अभीष्ट अर्थ के अभिव्यञ्जन में कोई बाधा नहीं आती । अतः एवं 'तू रमण के लिए उसी के पास गई थी' (के लिए)' और 'उसके पास गई थी' । दीक्षित के मत में 'उसके पास गई थी' इस अंश को व्यङ्गच्य कहना असम्भव है। यह अंश तो विपरीत-लक्षणा से ही प्रतीत हो जायगा । जब विशेषणवाक्यार्थी की उपपत्ति सम्भोगमात्र से सम्भव है, तब तो उस अङ्गम नायक के पास जाना ही दूती के लिए आवश्यक है, वापी-स्नान के

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शाश्वेति द्वयं घटकम् । तत् तावत्तदन्तिकं गतासीत्यंशस्य त्वन्मते व्यङ्गघतवं दुरुपपादम् । तदुक्तरीत्या विशेषणवाक्यार्थानां निरेषेत्यादिप्रतिपाद्यानां वाच्यार्थैः वापीस्ताने बाधिततत्त्वादित्यैककक्षागतप्रधानवाक्यार्थीभूतविविधनिषेधप्रतिपादकाभ्यां गता न गतेति शब्दाभ्यां विरोधिलक्षणया निषेधस्य विधेरेव प्रतीतेरुपपत्तेः । नहि मुख्यार्थबाधेनोल्मीलीतेऽर्थे व्यक्तिवेद्यतोचिता । यथा 'अहो पूण्ण सरो यत्र लुठन्तः स्नान्ति मानवाः' इत्यत्र कर्तृविशेषणानुपपत्त्यधीनोल्लासे पूणत्वभावे

लिए नहीं । ऐसी स्थिति में विशेषणवाक्यार्थ की 'तस्याधर्मस्यात्निकं न गताडसी' इस मुख्यांश के वाच्यार्थ के साथ सङ्कृति न होने से '…न गताडसी' का विपरीतलक्षणा से 'गताडसी' यही संगत अर्थ होगा । इसी तरह विशेषणवाक्यार्थ, जो समभोगमात्रजन्य हैं, की संगति 'वापीं स्नातुं' गताडसी' इस अंश के वाच्यार्थ के साथ न होने से यह अंश भी विपरीत-लक्षणा द्वारा 'वापीं स्नातुं' न गताडसी' ( वापी में स्नान के लिए नहीं गई थी) का ही प्रतिपादक होगा । 'इस प्रकार विपरीत-लक्षणा से अबवतत् 'तदन्तिकं गताडसी' इस अर्थ को व्यङ्गय मानना संगतशा अन्वित होगा, क्योंकि मुख्य वृत्ति ( अभिधा ) तथा मुख्यार्थबाधमूलक वृत्ति (लक्षणा) से जो अर्थ प्रतीत नहीं होता उसकी प्रतीति व्यङजनावृत्ति द्वारा सङ्के-मान्य है । जैसे—"अहो ! यह सरोवर जल से कितना भरा हुआ है जिसके लोेग इसमें लोङ्खे हुए स्नान कर रहे हैं ! " इस वकत्य में स्नान करने वालोंे केेे लोङ्खे हुए केेे सङ्ंध पूूमशब्द केे मुख्यार्थंकेअन्बय का बा़धं होनें से विपरीीत-ललक्षणा द्वारा प्रतीपमकख पूणण शबब्द केे लोङ्खे हुए

दुरुपपादत्वमेवोपपादयति तदर्थंसैय्यल्क्ष्यतववर्णनंमुखेन—तदुक्तरीत्यादिना । वाधिततत्त्वादित्यनेन विशेषणवाक्यार्थोऽन्वयबाधं लक्षणामूलमुपदर्शयति । (वापीं स्नातुमितो) गताडसीत्यनेन मुख्यार्थोऽन्वयबाधमूलकिया विपरीतलक्षणया न गताडसीति, ( तस्याधर्मस्यात्निकं ) न गताडसीति च तथैव लक्षणया गताडसीति प्रतीते: सम्भावान्न तत् व्यङ्जन, वृत्त्यन्तरादप्रतिपादितार्थेसैव व्यङ्जनाविषयत्वादिति तदन्तिकं गताडसीत्यंशस्य व्यङ्घजनावृत्त्यादिति सन्दर्भाभीष्ट: । वाक्ये शक्तिभावाद् वाक्यार्थस्य वाच्यत्वाभावेऽपि वाच्यतुल्यत्वात्तस्य वाच्यवर्गागतेति विशेषणम् । लक्षणस्य व्यङ्ग्यघत्वाभावो दूषणान्तमाह—यथेति । अत्र लुठन्त: (= 'इतस्ततः: परिर्तमानाः' ) इति स्नानक्रियाकर्तृभूतमानवानां विशेषणस्य पूणशब्दवाच्यार्थे विवक्षिते संगतिं भवतीति विपरीतलक्षणया पूणत्वादभानं यतति । स चाऽभावो

विपरीत-लक्षणा से अबवतत् 'तदन्तिकं गताडसी' इस अर्थ को व्यङ्गय मानना संगतशा अन्वित होगा, क्योंकि मुख्य वृत्ति ( अभिधा ) तथा मुख्यार्थबाधमूलक वृत्ति (लक्षणा) से जो अर्थ प्रतीत नहीं होता उसकी प्रतीति व्यङजनावृत्ति द्वारा सङ्के-मान्य है । जैसे—"अहो ! यह सरोवर जल से कितना भरा हुआ है जिसके लोेग इसमें लोङ्खे हुए स्नान कर रहे हैं ! " इस वकत्य में स्नान करने वालोंे केेे लोङ्खे हुए केेे सङ्ंध पूूमशब्द केे मुख्यार्थंकेअन्बय का बा़धं होनें से विपरीीत-ललक्षणा द्वारा प्रतीपमकख पूणण शबब्द केे लोङ्खे हुए

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अथ तदन्तिकगमनस्य लक्षणवेद्यांतवेदपि रमणस्य फलांशस्य लक्ष्यशक्तिमूलछवननवेद्यतवम्याहतमेवेति चेत् ? 'अधमतवमप्रकृष्टतमवम्, तच्च जात्या कर्मणा वा भवति । तत्र जात्यापकर्षी नोत्मनायिका नायकस्य वक्ति' इत्यादिना संदर्भेण भवतैवर्थोपपत्तिवेद्यता चाः स्फुटं वचनात् । अन्यलभ्यस्य लक्षणत्वाद यथा तु व्यङ्गचस्तथा प्रकृते तदन्तिकगमनरूपार्थोपपत्त्याश्रयायाः । कत्रुंविशेषणस्यानुपपत्तावधीन उल्लासः प्रत्ययो यस्य पूर्णत्वाडभावस्य तस्मिन्नित्यपक्षरार्थे ।

'अपूर्ण' को कोई भी व्यंग्य नहीं मानता । इस प्रकार 'तदनतिकं गताडसि' इस अंश की व्यंग्यता की अनुपपत्ति से भी अपप्य दीक्षित का असाधारण्योपपादनप्रयास असंगत सिद्ध हो जाता । अच्छा तो 'तदन्तिकगमन' को लक्ष्य हों मान लिया जाय और इसमें विशेषणवाक्यार्थों की सहाय्यता से परिस्फुट जो सम्भोग-प्रत्यायक साध्यें है उससे सम्भोगमात्र को, जो तदन्तिकगमन का फल है—व्यंग्य मानने में क्या बाधा है ? बाधा यहीं है कि सम्भोग को इस पक्ष में व्यंग्य कहना सम्भव न हो सकेगा। अपप्य दीक्षित ने स्वयं कहा है।"उत्तम नायिका नायक के जातिगत अपकर्ष [हीनता] का ख्यापन तो कर नहीं सकती, क्योंकि जब दोनों के बीच दाम्पत्यसम्बन्ध बन ही गया तो अब अपने नायक के जातिगत अपकर्ष का ख्यापन नायिका के लिए अनुचित एवं निन्दनीय होगा--इससे नायिका का उत्तमत्व विनष्ट हो जाएगा........" इससे स्पष्ट है कि उनके अनुसार द्वीतसम्भोगादि से भिन्न किसी अपराध के चलते नायक का अधमत्व उपपन्न न होने से द्वीतसंभोगादि की कल्पना की जाती है। इससे जब

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च शब्दार्थेताया अस्वीकुते। अन्यच्च, यथाकथंचिद्‌गृहीकुरु वाच्य व्यङ्ग्यजननव्यापारं तथापि न तद्वेष्टसिद्धिः। वाच्यार्थान निरीक्षणच्युतचर्वनदनस्तनतटसंभोगमात्रान्निष्ठपात्रवैतन गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वप्रसङ्गात्। एवं चोपपत्तिविरोधेऽपि स्फुटतर एव। तस्मादृश्यार्थसादृश्यवशेनोचितमतिविदग्धनायिकानिरूपितानां विशेषणवाच्यार्थान्तरम्।

तथा हि—अपि वाच्यवृत्तिजनस्याजातपीडागमे स्वार्थेपराङ्मुखे स्नानकालान्न तु प्राचीना|राधाजातेरितरसांटकटपराधीन रमणस्योपपादकत्वादर्थोंपपत्तिद्विपयत्वेऽपि रमणत्वेन तद्विप्रच्युतत्वात्। पद्मोयेकस्य प्रकरणाद्‌वीरेभया रमणस्य व्यङ्ग्यत्वेन कातिरिक्तेन रमणत्वेन रूपेण। इष्टसिद्धिः = ध्वनिकाव्यतोपपत्तिः। गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं चात्र वाच्यसिद्धच्‌चूलरूपमभिप्रेतस्म। वाच्यार्थः = वाच्येस्तानरूपार्थः। निरूपितानाम् = प्रतिपादितानाम्।

सम्प्रति वाच्यनारायणाराधेयेन विशेषणवाच्यार्थ व्याख्याश्रयो यथादृत व्यङ्ग्यार्थप्रतीतिसतथा निरूपपत्ति—तथा हीनादिना। संसर्गस्य व्यङ्ग्यत्वसंरक्षणाद्‌वतीसंभोग कोऽर्थप्रतीतिप्रमाणविषयत्वात् सिद्ध है तो फिर उसे व्यंग्य कहना संभव नहीं, क्योंकि शब्द किसी भी वृत्ति द्वारा उसी अर्थ का प्रतिपादक होता जो उस प्रकरण में अन्य प्रकार से प्रतीत न होता हो। अतः यदि संभोग अर्थापत्तिवेद्य है

यदि प्राचीन अपराधों से भिन्न किसी उत्कट अपराध के रूप में संभोग को अर्थापत्ति कर और संभोगादेभन रूपेण संभोग को, पर्यायोक्तलड्‌कृदरप्रकरण में वर्णन किये जाने वाले प्रकार से, व्यङ्ग्य मान भी लिया जाय तो भी अपप्य दीक्षित का मत समर्थित नहीं होता। उन्होंने उक्त पद्य को ध्वनिकाव्य माना है। किन्तु उनकी उपपादनविधि से तो इसे 'वाच्यसिद्धच्‌चूल' नामक गुणीभूतव्यङ्ग्य काव्य होना चाहिए, ध्वनिकाव्य नहीं। कारण यह है कि उनके द्वारा वर्णित

अत: उपर्युक्त पद्य का अर्थ इस प्रकार करना चाहिए—'अरी सखी ! तू'

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तत्क्रमभयवशेन नदीमदीयप्रिययोरन्तिकमगत्वैव वापीं स्नातुमितो ममान्तकाद्गतातासि, न पुनस्तस्य परवेदनानभिज्ञतया दुःखदातृत्वेनाधमस्यांतिकम् । यतो निश्रेषच्युतचन्दनं, स्तनयोसटटमेव नोरःस्थलं, वापीगतबहुलयुवजनत्रपापरवश्यादंसद्वयलग्नाग्रस्वस्तिकीकृतभुजलतायुगलेन तटस्थैवोत्ततया मुहुररामशान्त । एवं स्वरय्या सम्यगक्षालनेनोत्तरोष्ठो न निर्मूंषटरागोऽधरस्तु तदपेक्षया गण्डपजल-रदनशोधनाड्गुल्यादीनामधरसंर्देमावहतीति तथा ! किं च सम्यगक्षालनने नेत्रे जलमात्रसंर्गाद्दूर्मुपरिभाग एवान्तज्जने शीतवशात्तनावाच्च तव तनुः पुलकितेति । एवं तस्या विदगधाया गूढतात्पर्यैंवोक्तिरश्चिता, अन्यथा वैदग्ध्यभंज्ञापत्तेः । एवं साधारणेषु वाक्यार्थेषु मुख्यार्थो बाधाभावात्तपर्यार्थैस्य झटित्यनाकलनात्कुतोऽत्र लक्षणधर्मत्वमन्यथोपपादयति—

अपनी सखी की पीड़ा को नहीं समझती । तू तो स्वार्थसिद्धि में हीं लगी हुई है । इसी लिए तो स्नान-वेला कहों बीत न जाय इस डर से दूरवर्ती नदी में स्नान करने नहीं गई बल्कि पास की वापी [तालाब] में हीं स्नान करने यहाँ से चली गई । दूसरों को पीड़ा को न समझने के कारण दु:ख देने वाले मेरे उस अधम पति के पास तो गई हीं नहीं । तभी तो तेरे स्तनों के उपसी हिस्से से हीं चन्दन पूरी तरह घुल पाया है, तेरे वक्ष:स्थल से नहीं, क्योंकि उस वापी में स्नान करते हुए बहुत से युवकों से लज्जित होने से तूने बार-बार अपने दोनों हाथों को स्वस्तिक मुद्रा में कंधों पर रखकर अपने उरोजों के उपरी हिस्सों को हीं छिपाया होगा । इसी तरह तेरे ऊपरी होंठ की लाली भी धुल न सकी, क्योंकि तूने लज्जा के कारण जल्दी-जल्दी स्नान करके उसे पूरी तरह धुलाया न होगा । हाँ, तेरे अधर की लाली तो पूरी तरह सही में घुल गई हैं, क्योंकि स्नान करने के पहले बार-बार कुल्ला करने और दाँत साफ करने से तेरे अधर पर तेरी अडुलियों से खूब रंगड़ पड़ी होंगी। और भी, अच्छी तरह स्नान [या सफाई] न करने से तेरी आँखों के उर्परी हिस्से का हीं आंजन कुछ-कुछ घुल पाया है । ठंड और सुकुमार होने से तेरे शरीर पर अब भी रोमांच है ।

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वकाशः ? अनन्तरं च वाच्यार्थप्रतिपत्तौ वक्तृबोद्धव्यनायकादीनां वैशिष्टचस्य प्रतीतौ सत्यामधम्पदेन । स्वप्रवृत्तिप्रयौजको दुःखदातृत्ववरूपो धर्मः साधारगात्मा वाच्यार्थे नाशयामपराधानन्तरनिमित्तकदुःखदातृत्ववरूपेण स्थितो व्यङ्गनार्थव्यापारेण दूतीसंभोगनिमित्तकदुःखदातृत्वकारण पर्यवस्यतील्यालङ्कारिकसिद्धान्तनिष्कर्षः । एतेन 'अधमत्वमपकृष्टत्वम्, तच्च जात्या कर्मणा वा भवति । तत् जात्यादुपकर्षं नोत्तमनायिका नायकस्य वक्ति । नापि स्वापराधर्यवसायिदूतीसंभोगादिहीनकर्मातिरिक्तेन कर्मणा । तादृशं च दूतीसंप्रेषणात्प्राचीनं सोढमनेवति नोद्धाटनाहंमितरव्यावृत्त्या संभोगरूपमेव पर्यवस्यति' इति यदुक्तं तदपि निरस्तम् । विदग्धोत्तमनायिकाया: सखीसमक्षं तदुपभोगरुपस्य स्वनायकापराधस्य स्फुटं प्रकाशयितुमतितमामनौचित्येन प्राचीनानामेव सोढानामप्यपराधानामसह्यतया दूतीं प्रति प्रतिपिपादयिषितत्वादिति दिक् ॥

एक विदग्ध नायिका द्वारा ऐसा हीन वाक्य देना उचित है जिसका तात्पर्य पूरी तरह स्पष्ट या नितान्त अस्पष्ट न हो । नहीं तो उसकी विदग्धता ही नष्ट हो जायेगी । इस प्रकार विशेषणवाक्यार्थ के सम्भोग एवं वापी-स्नान इन दोनों से समानरूप से सम्बद्ध होने के कारण उनका अन्वय वाच्य वापी-स्नान के साथ आपाततः हो ही रहा है । तात्पर्यार्थ का बोध तो वक्तृबोद्धव्य आदि के वैशिष्टच का अवगम होने से पूर्व हो नहीं सकता । अतः वाच्यार्थ के बोध के समय तात्पर्यनुपपत्तिस्वरूप लक्षणा-बीज भी नहीं है । अतः लक्षणा से 'सम्भोग के लिए नायक के पास जाने' की प्रतीति का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । पहले तो वाच्यार्थ के आधार पर ही वाक्यार्थबोध हो जाता । किन्तु जब वक्तृ-बोद्धव्य-वैशिष्टच की प्रतीति हो जाती तव 'मेरी प्रचण्ड विरहवेदना को न समझने के कारण नीच' यह अधमस्य पद का वाच्यार्थ ही व्यङ्गनार्थव्यापार द्वारा 'प्राचीन अपराधों से अतिरिक्त किसी उत्कट अपराध करने,' अर्थात 'दूतीसंभोग स्वरूप अपराध द्वारा दुःख' देने से नीच इस रूप में प्रतिफलित हो जाता है ।

पूर्वम् । लक्षणाद्वकाश इति । एतेन तदन्तकमेव गताजीयस्य लक्ष्यत्वं वदस्तो निराकृताः । स्वप्रवृत्तिः=अधमपदस्यं प्रवृत्तिः प्रयोजनम् । अपराधान्तरमन्त्र स्वरमणीवियोगवेदनाजनभिञ्जता । तथा च वियोगवेदनाजनभिञ्जतानिमित्तकदुःखदातृत्ववेनासधर्मत्वं वाच्यम् इत्यर्थः । अनौचित्येनोक्तम् । नानानिमित्तकस्याप्यधर्मत्वस्य विशेषणवाक्यार्थंसह्ना दूतीसम्भोगनिमित्तकदुःखदातृत्वनिमित्तकेन रूपेण नियन्न्रितत्वादव्यड्‌ग्यस्य वाच्यत्वापत्तिरपि दूषणान्तरं दीक्षितमतेऽपि वेधयम् । अयमेव विदग्धोद्वत ॥

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यत्र व्यङ्ग्यचमत्कारप्रधानमेव सच्चमत्कारकारणं तद्विदितीयम् ।। वाच्यापेक्षया प्रधानाभूतं व्यङ्गयान्तरमादाय गुणीभूतं व्यङ्ग्यमादायावधारणप्रयोजनमाह—वाच्येत्यादिना ।

पराभिमतेडपराङ्गे 'अयं स रसनोत्कर्षी' इत्यादौ व्यङ्ग्यस्य रत्यात्मकस्य श्रृङ्गारस्य वाच्यार्थापेक्षया प्राधान्येऽपि व्यङ्गयान्तरकारुणाप्रधानत्वेऽपि तत्रोत्तमकाव्यलक्षणस्थितिव्यासितिर्याशयः । तेन तस्य = पराभिमतेडपराङ्गस्य ध्वनित्वमेव । यद्यपि काव्यप्रकाशकारादिमते चमत्कारातिशयजनकस्यैव प्राधान्यं सिध्यति तथापि पण्डितराजमते उपपाद्यत्वस्यैव तत्त्वमित्यावेदितपूर्वम् । अतश्च पराभिमतेऽपराङ्गे नागेशादिमते वाच्यस्यैव श्रृङ्गारापेक्षयाऽतिशयचमत्कारवत्त्वेऽपि तु तत्र वाच्यस्य प्राधान्यम्, उपपादकत्वातस्य । यत्र पुनर्व्यङ्ग्यस्योपोपाद्यत्वेन प्राधान्येऽपि चमत्कारजनकत्वं वाच्यार्थस्यैव तत्र पण्डितराजमते मध्यमकाव्यत्वमेव । इदन्तु वोधयम्—पण्डितराजमते यावन्मात्रं विवक्षितं तन्मात्रेणैव प्राधान्यादप्राधान्यव्यवस्था,

उपयुक्त रीति से अपपाद्य दीक्षित का निम्नलिखित कथन भी निरस्त हो जाता है—

"अधमत्व, अधीन नीचता दो कारणों से सम्भव है —जाति से अथवा कर्म से । यहाँ नायक की जातिगत नीचता का प्रतिपादन तो विदग्ध नायिका कर नहीं सकती । साथ ही, दूतीसम्भोगात्मक अपराध जैसे हीन कर्म से भिन्न किसी पूर्वकुकर्म के कारण भी वह नायक की नीचता नहीं बता सकती, क्योंकि वैसे सभी पूर्वकृत कुकर्मों को तो वह सह चुकी है, अब उनके उद्घाटन का कोई प्रयोजन नहीं है । यदि वे कुकर्म नायिका को असह्य होते तो वह नायक के पास अब दूती को भेजती हीं क्यों ? अतः जाति या प्राचीन कुकर्मों के अधमत्व का प्रयोजक न होने से अनन्तो गतत्वा दूतीसम्भोगस्वरूप कुकर्म या अपराध हीं उस का प्रयोजक सिद्ध होता है ।"

इस कथन के निरस्त हो जाने का कारण यह है कि कोई भी अत्यन्त विदग्ध नायिका अपनी सखी [दूती] के समक्ष तो उसी के साथ अपने पति के सम्भोग की बात स्पष्ट रूप में कह नहीं सकती; क्योंकि उसके लिए ऐसा कहना अत्यन्त गर्हित होगा । वह तो उसके समक्ष व्यक्त रूप में प्राचीन अपराधों को हीं असह्य वताकर अपने उक्तट आक्रोश चतुराई से अभिव्यक्त करना चाहेगी । अतः दीक्षित का मत युक्त है ।

जिस काव्य में व्यङ्ग्यार्थ अप्रधान होकर हीं चमत्कारातिशयजनक हो उसे द्वितीय, अर्थात् उस्मम काव्य कहते हैं ।। इस लक्षण में व्यङ्ग्यार्थ के विषय में 'अप्रधान होकर हीं' यह अप्राधान्यता कह

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तिव्याप्तिवारणायावधारणमु †- तेन तस्य ध्वनित्वमेव । लीनव्यङ्ग्यवाच्य-

न त्वविवक्षितयतिक्षिदादाय । अत एव ‘निश्शेषच्युतचन्दनम्’ इत्यादौ द्वितीसंभोगेन

विप्रलम्भशृङ्गारस्य व्यङ्ग्यत्ववेधपि न द्वितीसंभोगस्य प्राधान्यं हीयते, विप्रलम्भस्यै-

विवक्षितत्वात् । इतरथोत्तमोत्तमतवस्य निर्विषयत्वापत्तिः । एकारव्यावर्त्यस्यै-

पराङ्गस्य ध्वनित्ववर्णनेन चान्तरालिकव्यङ्ग्यचमत्काराय पणिडतराजमते उत्तमतवादी-

व्यवहार इत्यपि सूच्यते । अतः ‘अयं स रसनोत्कर्षी’ इत्यादौ यच्च्छृङ्गारमदाय

गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वमुक्तं पूर्वं तन्मतानन्तरङ्गभिप्रायेण । पणिडतराजमते तु पायेन्तिक-

व्यङ्ग्येन करुणमदायैव व्यवस्थेति तस्योत्तमोत्तमतवमेवेति । अथवोत्तमोत्तमकाव्ये

व्यङ्ग्यचस्य प्राधान्येऽध्वरणाभानात् पायेन्तिकव्यङ्ग्यापेक्षयाप्राधान्येऽपि वाच्य-

पेक्षया शृङ्गारस्य रत्यात्मकस्य प्राधान्येन बहुतां प्रकाशटीकाराणां मते चमत्का-

रित्येन च तमदायैव ध्वनित्वमस्य निर्वाह्यम् । ‘उद पिच्छलणिप्पन्दा’ इत्यादेरपि

प्रकृतैवकारव्यावर्त्यस्तवस्येव । अत इन्द्रशस्याद्युतोत्तमतवं निर्व्यूढम् । लीन-

व्यङ्ग्ये त्यादि । लीनमसकुटं व्यङ्ग्यं यत्र तादृशे वाच्यचित्र इत्यर्थः । यद्वा

अवधारण किया गया है जिससे यह स्पष्ट है कि उसे सर्वथा अप्रधान ही होना चाहिए, किसी को भी अपेक्षा प्रधान नहीं । इसीलिए जहाँ एक व्यङ्ग्यार्थ अन्य व्यङ्ग्यार्थ की अपेक्षा अप्रधान हो उसे उत्तम काव्य नहीं कहाँ जा सकता । वह तो अन्तिम ‘चमत्कारजनक व्यङ्ग्यार्थ के आधार पर उत्तमोत्तम काव्य ही होगा जिसे ध्वनिकाव्य भी कहा जाता है । अतः उक्त अवधारण के बिना उसमें उत्तम काव्य के लक्षण की अतिव्याप्ति अपरिहार्य हो जाती, क्योंकि वहाँ भी पूर्व व्यङ्ग्यार्थ अन्तिम व्यङ्ग्यार्थ की अपेक्षा अप्रधान है हीं । इस तरह के ध्वनिकाव्य का एक उदाहरण

यह स्पष्टीकरण है कि ध्वनि में व्यङ्ग्यार्थ को सर्वथा अप्रधान होना चाहिए। यहाँ तक कि यदि एक व्यङ्ग्यार्थ दूसरे व्यङ्ग्यार्थ की तुलना में अप्रधान है, तो उसे उत्तम काव्य नहीं माना जा सकता। वह केवल अंतिम चमत्कारजनक व्यङ्ग्यार्थ के आधार पर उत्तमोत्तम काव्य हो सकता है, जिसे ध्वनिकाव्य कहा जाता है।

अयं स रशनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः । नाभ्यूरुजघनस्पर्शी नीवीवीयस्तनः करः ॥

इस श्लोक में पति की कटी हुई बांह को देखकर उसकी पत्नी का शोक व्यक्त किया गया है। यहाँ शोक का वर्णन करते हुए शृंगार रस की व्यंजना हो रही है।

भूरिस्रवा की कटी हुई बांह को देखकर विलाप करती हुई उसकी पत्नी की यह उक्ति है । इसमें पूर्वकालिक रशनाकर्षण आदि शृंगार-विलासों से व्यङ्ग्य शृंगार (= रति) प्रधानीभूत करुण की अपेक्षा गुणीभूत होकर भी वाच्यार्थ की अपेक्षा प्रधान है । अतः शृंगारस्वरूप व्यङ्ग्य को लेकर इसे उत्तम काव्य नहीं कहा जा सकता । यह तो करुणस्वरूप मुख्य व्यङ्ग्य के आधार पर ध्वनिकाव्य ही है । पण्डितराज के मत में अन्य व्यङ्ग्य के आधार पर भी उत्तमोत्तमतवादी की व्यवस्था होती है, अन्तरालिक व्यङ्ग्य के आधार पर नहीं । यद्वा विषय-संस्कृत टीका में

इस श्लोक में पत्नी के विलाप से शृंगार रस की व्यंजना होती है, जो करुण रस के साथ जुड़ी हुई है। यहाँ व्यङ्ग्यार्थ प्रधान है और वाच्यार्थ गौण है।

स्पष्ट किया गया है । इसी अवधारण से ‘उद पिच्छलणिप्पन्दा’ आदिरपि ध्वनिकाव्य

यह अवधारण इसी प्रकार के अन्य उदाहरणों पर भी लागू होता है, जैसे 'उद पिच्छलणिप्पन्दा' आदि।

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अस्फुटव्यङ्ग्येऽपि वाच्यचित्रे चेत् । व्यङ्ग्यस्याप्यस्फुटत्वादेव च तत्र चमत्काराद्भावः ।

काव्यप्रकाशोक्त- गुणीभूतव्यङ्ग्यमेवात्रोत्तमं काव्यमिति टीकाकारः ।

वयङ्ग्यविवेच्छामः—पण्डितराजलक्षणे व्यङ्ग्यस्याप्रधानत्वेऽपि वाच्यार्थाडपेक्षयाडति-

शयचमत्कारित्वं यत्र तस्यैवोत्तमत्वमभिप्रेतम् । अत एव समप्राधान्ये मध्यमकाव्य-

त्वोक्तिरूपं सङ्च्छते । प्रकाशादौ पुनरातिशयचमत्कारजनकत्वं व्यङ्ग्यस्यैव गुणीभूत-

व्यङ्ग्येऽपि न सम्भवत्येव । यत उभयोस्तमःप्रकाशवद्भेदः । किंचाडसुन्दरव्यङ्ग्यादौ

चमत्कारो नास्त्येव व्यङ्ग्यचस्यैति कुतः तस्योत्तमत्वं पण्डितराजमते ? अतो यत्न

प्रकाशाद्यभिमतगुणीशोभितेऽपि व्यङ्ग्यचस्य सङ्केताज्जनकत्वं प्रतोतिलादायातं प्रधनात्वं तु

वक्तृतात्पर्यमुख्य विषयत्वाभावेन न विद्यते तेषामेवात्रोत्तमत्वमिति । अयं च भेदो

वस्तुतः प्रधनत्वस्वरूपविषयकभेदाश्रयः । प्रधनात्वं पण्डितराजमते उपपादकत्वाडS-

मानाधिकरणमुपपाद्यत्वं वक्तृतात्पर्यमुख्यविवक्षितारूपं वैवधकर्मिति पूर्वमस्माभि-

रुक्तमेव । तथाहि च पण्डितराजाभिमतप्राधान्यभावादुक्तमेव व्यङ्ग्यचस्यैतन्मतेsपि

गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं सुष्टुतम् । परं यद् गुणीभूतव्यङ्ग्यचशब्देन प्रकाशादिष्वभिप्रेतं न

तदत्र शब्दसाम्यं नार्थसाम्यमिति विवेकः । अधिकं विशेषवेचनीयम् ।

एतावतां पण्डितराजाभिमतगुणीभूतव्यङ्ग्यशब्दार्थानिरूप्याद यद् गुणीभूत-

व्यङ्ग्यं काव्यप्रकाशो 'ग्रन्थादृशि गुणीभूतव्यङ्ग्यं' व्यङ्ग्यं तु मध्यमम्' इति लक्षितं

तन्निरस्तं वेदितव्यम्, तस्याङ्गदार्यत्वात् । किंच तदीयाधनकाव्ये अर्थाचित्रे

व्यङ्ग्यस्य वाच्यापेक्षयाडतिशयित्यभावादतीयगुणीभूतव्यङ्ग्यलक्ष णस्याडतिव्याप्ति-

रपीत्यतोडपि हेयं तत्लक्षणम् । यत्पुनस्त्रीकाकारैरेतदतिव्याप्तिवारणायैतल्लक्षणे

में भी अतिव्याप्ति का निराकरण समझना चाहिए । जिस वाच्यचित्र काव्य में

व्यङ्ग्यार्थ रहकर भी अत्यन्त अस्पष्ट रहने से चमत्कारजनक नहीं होता उसमें

उत्तमकाव्य के लक्षण की अतिव्याप्ति को रोकने के लिये व्यङ्ग्यार्थ को 'चमत्कार-

जनक' कहा गया है। इसी काव्य को वास्तविक 'गुणीभूतव्यङ्ग्य' समझना चाहिए।

जो वाच्यार्थ अतिशयचमत्कारजनक अर्थ को ही प्रधान मानते तथा काव्य के तीन हें

भेद— उत्तम, मध्यम और अधम स्वीकार करते उनके मत में पण्डितराजसममत

उत्तम काव्य भी ध्वनिकाव्य हें है ।

काव्यप्रकाशकार में व्यङ्ग्यचार्थ के वाच्यार्थ से अल्पचमत्कारजनक होने पर

काव्य को 'गुणीभूतव्यङ्ग्य' कहा है । किन्तु वाच्यचित्र काव्य में इस लक्षण की

अतिव्याप्ति स्पष्ट है, क्योंकि उसमें व्यङ्ग्यार्थ वाच्यार्थ से अधिक चमत्कार को

उत्पन्न करने से उनके मत में गुणीभूत है। उनके कुछ टीकाकार इस 'अतिव्याप्ति

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चित्रातिप्रसङ्गवर्णनाय चमत्कारेत्यादि । यत्‍तु 'अतादृशि गुणीभूतव्यङ्गच्यभ्‍म्' इत्यादिकालव्यपकाशागतलक्षणं चित्रान्यत्वं टीकाकारैरैदंतस्‍तन्‍त्रः पर्यायोक्तिसमासोक्त्यादि्रधानकाव्येषव्‍व्याप्‍यापत्‍ते: । तेषां गुणीभूतव्यङ्गचतायाश्रिततायााश्रित सर्वालङ्कारिकसंमतत्वात् ।

का निराकरण करने के लिए इस लक्षण में 'चित्रान्यत्वे सति' (अर्थात् उसे चित्र काव्य से भिन्न भी होना चाहिए) यह विशेषण जोडते, परन्‍तु इससें भी निर्वाह नहीं होता, क्‍योंकि तन्‍त्र तो पर्यायोक्त आदि अलङ्कारों से ही प्रधान रूप में घटित काव्य को, जिसे सब आचार्य गुणीभूतव्यङ्गच्‍य होने के साश्‍व-साथ चित्र काव्य भी मानते, गुणीभूतव्यङ्गच्‍य काव्य कहना सभंव न हो सकेगा । अत: उक्त विशेषण जोडने पर भी उनका लक्षण अत्यामिदोषग्रस्त होगा । अत एवं यह लक्षण असंगत है ।

उदाहरणम्‍ — राघवविरहज्वालासंतापितसह्‍यशैलशिखरेषु । शिशिरे सुखं दायाना: कपय: कुष्यन्ति पवनतनुयाय ।। इति ।

उत्तम काव्य का उदाहरण यह है— "रामचन्द्र के जानकीविरहाग्‍नि की ज्वालाओं से सन्‍तप्‍त सह्‍य-नामक पर्वत के शिखरों पर शिशिर ऋतु में आराम से सोये हुए वानर पत्‍नपुत्र हनूमान् (जिन्‍होंने जानकी की सूचना देकर रामचन्‍द्र के विरहाग्‍नि को घटा दिया) पर क्रुद्ध हो उठे ।"

अत्र जानकीकुशलावेदननेन राघव: शिशिरीकृत इति व्‍यङ्गच्यमाकस्मिकेत्यस्यानुक्तहेतुकेतर्थ: । कामपि = वाच्यार्थातिस्‍थिनीम् । अत्र च व्‍यङ्गच्‍यस्यातिशयाच्‍यचमत्कारिरत्वेऽपि कुष्यन्तीतिपदवाच्यकोपसंधकतया अप्राधान्येऽप्यमत्‍तमत्‍वमस्‍यति संबंधात् । प्रागुक्तम्‍='तल्पगतादपि च सुतनु:' इत्यत्र वर्णितम्‍ । व्‍यङ्गच्येनैव = रत्याद्यस्‍थायिनैव । अतस्‍तच्‍यायुतमत्‍वं मुक्तं न तुत्तमोत्‍तमत्‍वमित्याश्रितार्थ: । तन्‍त्र वाच्यस्‍व व्‍यङ्गच्यातिरिक्ते नाऽयुपपत्‍ती सहृदयाल्‍लादजनकस्‍य व्‍यङ्गच्‍यस्‍यन वाच्‍या-

इस पद्य में वन्‍दरों द्वारा हनूमान् पर किए गए क्रोध का कारण, जो वाच्यार्थ से स्‍पष्‍ट न हो रहा था, यह व्‍यङ्गयार्थ है कि उसने (हनूमान् ने) जानकी का कुशल-समाचार रामचन्‍द्र को बता कर उनके विरहानल के ताप को शान्‍त (शीतल) कर दिया था ।

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कपिकर्तृंक-हनू मत्रिघ्नैककोपोपपादकतया गुणीभूतमपि दुदैववशतो दास्य- मनुभवद्राजकलत्रमिव कामपि कमनीयतामावहन्ति । नत्वेवं प्राकृतमाक्षेप- गतं मान्यमपि नववधूप्रकृतिविरोधादनुपपद्यमानं व्यङ्ग्येनैवोपपाद्यत इति कथमुक्तमोत्तमतां तस्य काव्यस्येति चेतु ? न । यतो ध्यानुदिनसख्युपदेशादिभिरनतिचमत्कारिरिभरप्युपपद्यमानं मान्यमिदं प्रथममचित्तचुम्बिनीं विप्रलम्भरतिमप्रकाशयत्न प्रभवति स्वातन्त्र्येण परन्तु त्वं तिच्चवैणागोचरता- माधातुम् ।

उपेक्षमप्रधानत्वम्, प्रधानते पुनर्वाच्यस्य कोपस्य व्यङ्ग्यच्युतिरिक्कारणेनानुपपत्तौ भवति व्यङ्ग्यस्य वाच्यादलंविमिति नाननयोः साम्यमित्याशयेनोत्तरति—यत इत्यादिना । त्वमुक्तम् । सहृदयहृदये चमत्कारजनकार्थ एव प्रथमं भाषत इति विप्रलम्भरतिरेव तत्राऽSक्षेपगतमान्यकारणत्वेन प्रथमं विषयीभवतीत्यत: प्रथममचित्तचुम्बिनीमिति विशेषणं प्रदत्तं प्रकते विप्रलम्भरतते । परा या निद्धृतिरानन्द: तस्य या चर्वणा वास्वादस्तद्गोचरतां तद्विषयतामित्यर्थ: । ‘तल्पगतादिपि’ इत्यादि उक्तं न्याय ‘निःशेष-

इस्थमेव निःशेषच्युतचन्दनमित्यादिपद्ये शृङ्गमतवादिभि:

कर दिया । यह व्यङ्ग्यार्थ । यद्यपि वाच्य कपिनिष्ठ क्रोध का गुणीभूत अवश्य है, क्योंकि वाच्य क्रोध की इसकें बिना उत्पत्ति न होने से यही उसका उपपादक (अत एव अप्रधान) है तथापि चमत्कारजनकता तो इसमे उसी प्रकार विलयमान है जैसे दुःखों के वश दासी का स्थान प्राप्त करने वाली रानी में सौन्दर्य अक्षुण्ण बना रहता है । अतः इस पद्य में व्यङ्गच के वाच्यसिद्धघङ्गभूत होने पर भी चमत्कार-

तल्पगतादिपि च सुतनु:’ इस पूर्वोदाहृतपद्य में भी प्रिय के करकमलं को हँटाने में ‘जो प्रियतमा की मन्यता’ कही गई है वह भी नवोढा के स्वभाव से विरुद्ध होने से स्वतः अनुपपन्न है; ऐसो स्थिति में उक्त व्यङ्ग्यचार्थ—संलक्ष्यक्रम रति के भी वाच्य मन्यता का उपपादक होने से उत्तमोत्तम काव्य (अर्थात् वहाँ श्री व्यङ्गच के वाच्यसिद्धघङ्गभूत होने से उत्तम काव्य क्यों नहीं ) कहा गया है ?

तो फिर ‘तल्पगतादिपि च सुतनु:’ इस पूर्वोदाहृतपद्य में भी प्रिय के करकमलं को हँटाने में जो प्रियतमा की मन्यता कही गई है वह भी नवोढा के स्वभाव से विरुद्ध होने से स्वतः अनुपपन्न है; ऐसो स्थिति में उक्त व्यङ्ग्यचार्थ—संलक्ष्यक्रम रति के भी वाच्य मन्यता का उपपादक होने से उत्तमोत्तम काव्य (अर्थात् वहाँ श्री व्यङ्गच के वाच्यसिद्धघङ्गभूत होने से उत्तम काव्य क्यों नहीं ) कहा गया है ? यहाँ वाच्य मन्यता तो प्रकरण से- अविरुद्ध जो सखियों के उपदेश आदि

हैं । ( कि प्रियतम के साथ कठोर व्यवहार कभी नहीं करना चाहिए ) उनसे भी उपपन्न है हैं । अतः वाच्यार्थबोध के पश्चात् सहृदयों को शीघ्र ही प्रतीत होने वाला व्यङ्ग्यभूत विप्रलम्भरुंगार वाच्यार्थ का उपपादक न होने से गुणीभूत नहीं हैं ! किन्तु अविशेष चमत्कार का जनक तो यह है हैं, क्योंकि यही सहृदयों को वाच्यार्थबोध के बाद झट से प्रतीत होता और इसकी प्रतीति के विन

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वाच्यान्ति व्यङ्ग्यार्थतिरिक्तेनार्थेनापाततोनिष्पन्नकशरीराणि व्यङ्गकानोति न तत्रापि गुणीभाव: शङ्कनीय:। अननयोभेदयोरनपृथकत्वीयत्वमत्कारयोरपि

च्युतचन्दनम्' इत्यत्रापि योजयति——इत्थमेवेत्यादिना । व्यङ्गच्युतिरिक्कार्थेन = परवेदनानभिज्ञतारूषेणार्थेन । आपातत इति व्यङ्गच्यातिरिक्कार्थस्याधमत्वोपपादकत्वं वक्तृतात्पर्याद्विषयीभूतमित्याशयेनोक्तम् । उत्तमोत्तमयोस्तु व्यङ्गचस्य चमत्कारातिरेकदर्शनेऽपि को हेतु इत्याह——अननयोरभेदादिना ।

अत्रेदं चिन्त्यम्——वक्तृतात्पर्यविषयीभूतस्यैव व्यङ्गचस्य प्राधान्यादप्राधान्यनिरूपणं प्रकृतोपयोगि न वेभति । तत्राहुः पक्षो न शोभते, एवं हि सति 'निश्शेषच्युतचन्दनं नम्' इत्यादावपि द्वितीसंभोगस्वरूपस्य व्यङ्गचस्य विप्रलम्भाङ्गारात्मकव्यङ्गचान्तरा‌ऽऽत्मकवेनाऽऽप्राधान्यादुत्कृष्टवेनाऽऽप्राधान्यादुतमोत्तमत्वव्याघातः।

अतो वक्तृतात्पर्यविषयोऽभूतव्यङ्गचस्यैव यथायथं प्राधान्याद्ध्यानिरूपणं करणीयम् । तात्पर्यनिरूपणाद्ध प्रकरणादिना प्रसिद्ध एव । अतश्च गतोऽस्तु तर्क इत्यादेरपि व्यङ्गचः स एवार्थो यो वक्त्रबोधव्यतिरेकेण बोधव्यतिरेकबोधविषयास्तद्व्यङ्गकवाक्यसाम्यप्रयुक्तप्रकृतवाक्यादभेदग्रामेण ।

कारणस्य भ्रान्तत्वेऽपि फलस्य भ्रान्तत्वं न नियतम् । यद्वाsअर्थान्तरबोधोऽनुमानेनैव सुकरः । तदेवं वक्तृतात्पर्यविषयीभूतस्यैव व्यङ्गचस्यै काव्यार्थः पर्यवोचयन् परिग्रहे सिध्दे यथा 'निश्शेषच्युतचन्दनम्' इत्यादौ द्वितीसंभोगस्यैवान्ततोग्र्धमत्वहेतुत्वं व्यङ्गचवस्थितं तथैव 'रागवविरहः'......इत्यादिपक्षेऽपि जानकीकुशलावेदनस्यैवान्ततो वक्तृतात्पर्यविषयत्वात् वाच्यकोपहेतुत्वम् ।

ततस्तच यद्यपि जानकीकुशलावेदनमिव द्वितीसंभोगादिरप्यधमतत्वोपपादकत्वमेव तु तदुपपाद्यत्वं विरहवेदनानभिज्ञत्वरूपेणार्थान्तरेणाधमतत्वप्रतीत्या वाक्यार्थविश्रान्तेः परं चाद् वक्त्रादिवैशिष्ट्येन प्रतीतस्य द्वितीसंभोगस्याधमतत्त्वज्ञाप्यत्वमक्षतम् ।

एवमेव 'तल्पगताऽपि च सुतनु:' इत्यत्रापि योज्यम् । 'रागविरहज्वाला' इत्यादौ तु कोपस्य यद्यापि विम्बत्वातिशयादिनाsअनुपपत्ति: सम्भवति तथापि तस्य प्रकरणादिविरुध्दत्वेन न कोपोपपादकत्वं येन जानकीकुशलावेदनस्य द्वितीसंभोगादिवदुपपाद्यत्वं विरुध्दत्वेन ।

परमानन्द का अनुभव भी हो नहीं सकता । अतः इसे उत्तमोत्तम में काव्य माना गया है, उत्तम काव्य नहीं। इसी प्रकार 'निश्शेषच्युतचन्दनम्' आदि पद में भी नायक का अधमतत्व और स्त्रीतट का पूरी तरह चन्दनरहित हो जाना आदि वाच्यार्थ के प्रकरणादिविरुध्द वियोगवेदनानभिज्ञता और गीले वस्त्र से पोंछने आदि से हीं उपपन्न हो जाने से वहाँ भी अधमतत्वादि द्वितीसंभोगादि के व्यङ्गच हीं हैं, न कि उनके उपादाक ।

अतः उत्तक पद में भी व्यङ्गच को वाच्यसिद्धि का अधः-गुणीभूत

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प्राधान्याडप्राधान्याभ्यामस्ति कश्चित्सहृदयवेद्यो विशेषः । यतु चित्रमीमांसाकृतम्—

"प्रहरविरतौ मध्ये वाङ्लस्ततोऽपि परेण वा किमुत सकले याते वाङ्निष्ठं प्रिय त्वमिहैह्यसि । इति दिनशतप्राप्त्यं देशं प्रियस्य यियासतो हरति गमनं बालाडलापैः सबाष्पगलज्जलैः ॥ इति ॥

स्यात्, अपि तु प्रकरणादविरुद्धेन जानतीकुशलावेदनैनैव वाच्यकोपोपपत्तौ सत्यां वाक्यार्थविश्रान्तिरिति न तस्य कोपोपपाद्यतेन तु प्राधान्यमप्येति नात्र द्वनिलत्वम्, अपि तु वाच्यसिद्ध्यर्थमेव । तथा च यत्र काव्ये वाच्यस्य प्रकरणादविरुद्धेन व्यङ्ग्याथितरितके नार्थान्तरोपपत्या वाक्यार्थविश्रान्तिरन्तरन्तरं च वक्त्रादिवैशिष्ट्यादर्थान्तरव्यक्तिकिसे ध्वनेर्विषयः; यत्र पुनर्वाच्यस्यैव प्रकरणादविरुद्धव्यङ्ग्यार्थरितकार्यैनिमित्तोपपत्तावडभावस्सति व्यङ्ग्यार्थस्य चमत्कारिृतके द्वितीयस्योत्ककाव्यलक्षणस्य विषय इति सारम् ।

प्रहरविरतादित्यादि । अतिदूरं जिगमिषु प्रियं दिनमात्रमपि तद्वियोगसह्नाडसमर्था प्रियतम कथयति—हा प्रिय ! 'अहो' दिवसेन प्रहरमात्रेऽपि सति (प्रहरान्तरमेव), मध्ये=द्वितीयप्रहरे, ततोडपि परेण = तृतीये प्रहरे वा, किमुत सकलेऽहनि याते=व्यतीते तु त्वमिह=मत्काशेमध्येहि । इति इत्यैवंबिधैः सबाष्पगलज्जलैरालापैवांल दिनशतप्राप्त्यमपि संध्यदिनप्राप्त्यमतिदूदेशं यियासतो गन्तुमिच्छतः प्रियतमस्य गमनं हरति=निवारयति—इति पद्यार्थः ।

नहीं माना जा सकता । अत एव यह भी उत्तमोत्तम काव्य है । उत्तमोत्तम और उत्तम भेदों में व्यङ्गचार्थ के वाच्यार्थ की अपेक्षा अतिशयचमत्कारजनक होने से साम्य होने पर भी दोनों में यही अन्तर है कि प्रथम में व्यङ्ग्यार्थ प्रधान होता जब कि द्वितीय में अप्रधान । यह सूक्ष्म अन्तर केवल सहृदय समझ सकते हैं, जनसामान्य तहीं ।

चित्रमीमांसाकार ने गुणीभूतव्यङ्गच का यह उदाहरण दिया है—

"किसी नवोढा नायिका का प्रियतम इतना दूर जाता चाहता है कि वहाँ पहुँचने में हौं महीनों लग जायेंगे । उस समय शोकग्रस्तभावी दीर्घ विरह को सहने में असमर्थ उस द्वारकनाती आँखों वाली नवोढा ने हृदये गले से अपने प्रियतम से 'क्या तुम एक पहर बीतते हौं मेरे पास लौट आओगे या दूसरे पहर या तीसरे पहर में या उसके बीत जाने के बाद हौं, शाम में ? ये हृदयस्पर्शी प्रश्न पूछ कर उसकी यातना स्थगित कर दी ।"

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अत्र सकलमहः परमावधिस्थत: परं प्राणान्धारयितुं न शक्नोमोति व्यर्थ च प्रियगमननिवारणरूपवाच्यसिद्धच झमतो गुणीभूतव्यङ्गयस्य" इति तत्र । सबाष्पगलज्जलानां प्रहरविरतावित्याद्याऽलापानामेव प्रियगमननिवारणरूपवाच्यसिद्धच झमतया व्यर्थ चस्य गुणीभावाभावात् । आलापैरिति तृतीया- यया प्रकृत्यर्थस्थ हरणक्रियाकरणतया: स्फुटं प्रतिपत्ते: । न च व्यङ्ग्य- स्यापि वाच्यसिद्धच झमताडडत्र संभवतोति तथोक्तमिति वाच्यम्, निशेषच्युत- चन्दनोमित्यादौ विधातमतरूपवाच्यसिद्धच झमतया द्वितीसंभोगादौ संभ- वादगुणीभावापत्ते: । असतु वा तत्तः परं प्राणान्धारयितुं न शक्नोमोति

यहाँ 'दिन भर तो मैं तुम्हारे बिना जीवित रह सकती, पर उसके बाद नहीं' यही व्यङ्ग्य अर्थ है। यह यात्रानिवारणस्वरूप वाच्यार्थ का उपपादक होने से उसका अङ्ग -अप्रधान है। अतः यह 'गुणीभूतव्यङ्गय' है। यहीं अपृथ्य दृष्टि का मन्तव्य है। किन्तु यह उचित नहीं है, क्योंकि यात्रानिवारणस्वरूप वाच्यार्थ का उपपादक तो 'क्या तुम एक पहर बीतते हीं मेरे पास लौट आओगे' इत्यादि वाच्यार्थे हीं हैं। अतः यहाँ व्यङ्ग्यार्थ वाच्यार्थोपपादक न होने से गुणीभूत नहीं। 'आलापै:' इस पद में करणार्थक तृतीया विभक्ति से हीं यह स्पष्ट हो जाता है कि आलाप यहाँ निवारण का करण है। उक्त व्यङ्गच के भी यात्रानिवारणात्मक वाच्यार्थ का उपपादक हो सकने से उसे वाच्यसिद्धच मान कर 'गुणीभूत' कहना भी उचित नहीं हैं, क्योंकि तब तो उन्होंने जो 'निशेषच्युतचन्दनम्' आदि पदों को ध्वनिकाव्य कहा है वह भी सम्भव न हो सकेगा। कारण यह है कि वहाँ भी द्वितीसंभोगादि वाच्यार्थ अधमत्कादि के एक उपपादक हैं, अतः उन्हें भी गुणीभूत कहना होगा। यदि उक्त प्रश्नों को नायक के प्रति नायिका के प्रगाढ प्रेम का प्रतिपादक मान लिया जाय तो उपर्युक्त व्यङ्गच वाच्यसिद्धच हो सकता है। परन्तु उक्त पद को तो गुणीभूतव्यङ्गच काव्य कहना उस परिस्थिति में भी सम्भव नहीं है, क्योंकि

अत्र वाच्यैरलापैरेक वाच्यान्तरस्य प्रियगमननिवारणस्योपपत्तौ वाक्यार्थ- विश्रान्ते: परचात् प्रतीयमानं 'सकलमहः परमावधिस्थत: परं प्राणान् धारयितुं न शक्नोमि' इति व्यङ्गच न वाच्यसिद्धच झमिति न तदादाय गुणीभूतव्यङ्गचत्वोपपादन- मुचितं दीक्षितस्येत्याशयेन निरस्यति तन्मतम्—तत्सेत्यादिना । प्रकृत्यर्थस्य = आलापात्मकस्य । व्यङ्गचस्याप्यतीयत्रापि निना आलापानामपि संग्रहः । यथा आलाप- गमननिवारणसमर्थीस्थैव व्यङ्गच चमपि तत्समर्थीभिति भावः । ननु प्रकृतानामालापानां प्रेमाsटिशयप्रकाशनमेव फलम्, तथाऽ च कथम् गमननिवारणहेतुत्वमित्यत: खण्डयति—अस्तु वेत्यादिना । तथाऽ च व्यङ्ग्यभेदेन यद्यपि 'प्रहर- रेण तन्मतं ।

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व्यङ्ग्यस्य वाच्येन सिद्धचमत्कृतया गुणीभावस्थायिनि नायकादौ विभावस्य बाष्पादिदेरञु भावस्य चित्तावेगादेश्र संचारिणः संयोगादधिकचमत्कृत्यमानेन विप्रलम्भे ध्वनित्वं को निवारयेत् ॥

यत्र व्यङ्गचमत्कारो राजसमानाधिकरणो वाच्यचमत्कारस्तत्स्तृतोऽयम् ॥ विरतोः इत्यादि उदाहरणं गुणीभूतव्यङ्गचमत्कृत्वं ध्वनित्वं च तत्रैव पृथकृत्यत्प्रकारेण विवेचयति । एवं ध्वनित्वोत्तमतत्त्वादिगुणवहार इति प्रकारोऽयं गुणीभूतव्यङ्गचोदपि ध्वनिरूपताम् । धत्ते रसादितात्पर्य्यप्यालोचनया पुनः ॥ इति स्वीकुर्वन्तः प्राहस्तु यथासम्भवं पार्यन्तिकमनुसरालिकं च व्यङ्गचमादाय ध्वनित्वादिगुणवहारं मन्यन्ताम् । किन्तु सम्पूर्णवाच्यार्थपर्यालोचनायां पार्यन्तिकव्यङ्गचमत्कारमादायैव ध्वनित्वादिगुणवहारौचित्यमभिप्रयन्ति गद्याधरक्तः । ‘ग्रामतरुणम्’ इत्यादौ च पार्यन्तिकव्यङ्गच्- । तृतीये ‘पत्सु शिररुहद्रकलामननेन’ इत्यादौ ध्वनित्वं समुन्नाहरता वृत्तिकृता स्पष्टीकृतोऽयमर्थः । यदिच ‘ग्रामतरुणम्’ इत्यादौ गुणीभूतव्यङ्गचमत्कृतैव स्वीकर्त्तव्या तर्हि विप्रलमभावासस्यादिवक्षित्रतत्वमेव कल्प्यम् येन स्वयंकृतसदृशूतादृशि सा न तत्र गतेत्यस्यैव पार्यन्तिकतत्त्वमुपपाद्यते । मर्मप्रकाशोकिस्थूद्योक्तिविरुद्वेधेत्युपेक्ष्यैवेत्यलम् ॥ यत्रेत्यादि । यत्र = काव्ये । असमानाधिकरण इति । वाच्यचमत्कारापेक्षयोत्कृष्टव्यङ्गचमत्कारो हि सहृदयहृदये प्रायेण भासत इत्युत्कृष्टव्यङ्गचमत्कार-

यहाँ विप्रलम्भव्यङ्ग्यधारचवति अनिवार्य्यं है । जव विभाव नायिकादि, अनुभाव बाष्प आदि इसमें निन्दिष्ट हैं और चित्तावेगादि संचारिराव भी व्यङ्ग रस हैंहीं तब इनके संयोग से अभिव्यज्युमान विप्रलम्भव्यङ्ग्यरङ्गारधवति का निवारण कौन कर सकता ? अतः इस तृप्त को ‘गुणीभतव्यङ्गच्’ का उदाहरण नहीं माना जा सकता ॥

जिस काव्य में व्यङ्गचर्य के चमत्कार के अधिकरण में वाच्यार्थ का चमत्कार न हो उसे तृतीय, अर्थात् मध्यम काव्य कहते हैं ॥

वाच्यार्थ को व्यङ्गचमत्कार का असमानाधिकरण कहने का तात्पर्य्य यह है— वाच्यार्थ की अपेक्षा अतिशयचमत्कारजनक व्यङ्गचर्य हीं सहृदयों की आत्मा में स्थान प्राप्त करता है, अल्पचमत्कारजनक अथवा चमत्काराजनक व्यङ्गचर्य नहीं ।

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यथा यमुनावर्णने—‘तन यमैनाकगवेषणलम्बीकृतजलंध्रिजठरप्रविष्ट- हिमगिरिभुजायमानाया भगवत्या भागीरथ्या: सखी’ इति । अन्रोपेक्षा

स्वापकृष्टवाच्यचमत्कारस्य च सामानाधिकरण्यं प्रसिद्धम् । तथा च यदि व्यङ्ग्यचमत्कारो वाच्यचमत्कारापेक्षयोत्कृष्टो न प्रकाशते तर्हि व्यङ्ग्यचमत्कारो वाच्यचमत्कारसमानाधिकरणो न भवति । एप च स्थितितिवाच्यचमत्कारस्य व्यङ्ग्यचमत्कारसमानकक्ष्यत्वे तदपेक्षयोत्कर्षवत्त्वे चैति बोध्यम् । यदह ‘व्यङ्ग्यचमत्कारापमानाधिकरण:' इत्येव पाठः । तत्रापमानधिकरोत्पत्ति: कर्त्तुं ल्युट्, करणे' वा । तथा च यत्र काव्ये वाच्यचमत्कारो व्यङ्ग्यचमत्कारमपमानयति तन्मध्यमम् । अपमानश्र्च वाच्यच मत्काररूतरस्तस्य व्यङ्ग्यस्य मत्कारापेक्षयोत्कर्षेण तत्सुल्यकक्ष्यत्वेन चैति पूर्वंवदेव व्यवस्था । अत्र वाच्यचमत्कृतिविशेष्यतयोपन्यासेऽपि तत्प्राधान्ये नाग्रहः । अत एव समप्राधान्ये मध्यमत्वं वक्ष्यति स्वयमेव । अत एवात्र तस्या: प्राधान्यं साक्षादन्यथा वा नोक्तम् ।

अत: अतिशयचमत्कारजनक वाच्यार्थ के साथ उक्तविध व्यङ्ग्यार्थ का किसी एक अधिकरण में रहना सम्भव नहीं। इस विषय को इस रूप में भी कहा जा सकता है कि उपर्युक्त वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ विषयता सम्बन्ध से सहृदयों के एक ज्ञान में आश्रित हो नहीं सकते । इससे स्पष्ट है कि मध्यम काव्य में व्यङ्ग्यार्थ वाच्यार्थ से अधिक चमत्कार का जनक नहीं होता, वह या तो समानस्तर के चमत्कार को उत्पन्न कर सकता है या हीन स्तर के चमत्कार को । उक्त रीति से सामानाधिकरण्य तो अल्पचमत्कारजनक अथवा चमत्काराजनक वाच्यार्थ एवम् अतिशयचमत्कारजनक व्यङ्ग्यार्थ का हीन हो सकता । लक्षणैक्य में वाच्यार्थ का विशेष्य रूप में निर्देश कर ग्रन्थकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मध्यम काव्य में वाच्यार्थ हीं चमत्कारजनक होता, व्यङ्ग्यार्थ उससे अधिक चमत्कार का जनक अपि नहीं होता ।

तनयमैनाकेत्यादि । मैनाको हिमालयस्य तनय: क्रुद्धेन्द्रक्रतुं कपक्षच्छेदनभिया जलंधि प्रविष्ट इति पुराणम् । हिमालयाद्भूता गङ्गापि जलंधि प्रविष्टैव । तनयोत्रेक्ष्यते—तनयेत्यादिना । तनयो मैनाकस्तस्य गवेषणाद्यलम्बीकृता जलधिजठरप्रविष्टा या हिमगिरिभुजा तामिव वाच रत्या भागीरथ्या: सखीत्यर्थ: । पुंलिङ्गेन भुजशब्देन विग्रहस्तु न युक्त एव । उत्प्रेक्षा = स्वरूपोत्प्रेक्षा;

इसका उदाहरण मेरे यमुनावर्णन-नामक काव्य का यह वाक्य है—“यमुना” उस भगवती भागीरथी की सखी है जो मानों, हिमालय की वह भुजा है जो उसके पुत्र मैनाक को ढूँढ़ने के लिए फैलाई गई और समुद्र के उदर में

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वाच्यैव चमत्कृतिहेतुः। श्वेत्यपातालतलचुम्बितवादीनां चमत्कारो लेशतया सन्नपुप्रेक्षाचमत्कृतिजठरनिलीनो नागरिकेतरनायिकाकल्पितकार्मीरद्वादरागनिगीर्णों निजाङ्गगौरिमेव प्रतीयते। न तादृशोऽस्ति कोडपि वाच्यार्थों यो मनागनमृष्टप्रतीममान एव स्वतों रमणीयतामाधातुं प्रभवति। अनयोरेव द्वितीयतृतीयभेदयोर्जगारूकगुणीभूतव्यङ्ग्ययोः प्रविष्टं निखिलमलङ्कारप्रधानं काव्यम् ॥

भागीरथीसरूपद्रव्ये भुझात्वजात्यवच्छिन्नस्य तादात्म्येनोत्प्रेक्षा। वाच्यैवैति। 'उपमानादाचारे' इति पाणिनिसूत्रवृत्तिसर उत्क्रेक्षावाचकत्वात्। ग्रन्थकृतादिप विस्तारेण तन्नैतद्विषये विवेचितम्। चुम्बितववादीनामिति। व्यञ्जनाचामिति शोधः। नागरकितेरनैरैति। ग्राम्येत्यर्थः। एतेन प्र साधनादनैपुण्यं तनप्रभु युक्तं चाचिकलेपनं सूच्यते। कार्मीरद्रव = केसररसः। वाच्यस्य व्यङ्ग्यस्य काव्यप्रभेदेऽपि व्यङ्ग्यार्थे गुणीभूतः, तृतीयेऽपि तथैव; परं द्वितीये तस्य वाच्यापेक्षया चमत्कारातिशयजनकत्वं, तृतीीये पुनरन्यथा। इदमेव च मत्कारातिशयजनकत्वं व्यङ्ग्यस्य प्रकृतेऽङ्गरूकत्वं, तद्भाववशेनैङ्गारूकत्वं, द्वितीये जागरूकत्वं गुणीभूतस्य व्यङ्ग्यस्यैति पर्यायोक्तिप्रभृत्यलङ्कारप्र धानस्य काव्यस्य समावेशोऽत्रैव, पर्यायोक्त्यादौ हि वाच्यापेक्षया रतिशयचमत्कारजनकत्वादि दीपकादालङ्कारप्रधानस्य तु काव्यस्य तृतीये प्रकारेस्तुर्भावः, तेष्वलङ्कारेषु गुणीभूतव्यङ्ग्यसत्त्वेपि च मत्कारातिशयजनकत्वाभावादिते ग्रन्थार्थः।

पैठी हुई है। यहाँ 'भुझायमाना' पद में 'उपमानादाचारे' इस पाणिनि-सूत्र के अनुसार विहित 'क्यच्' प्रत्यय का वाच्य जो भागीरथी में हिमालय की भुजा की उत्प्रेक्षा है वहीँ चमत्कारजनक है। यद्यपि इस उत्प्रेक्षा से भागीरथी की शोभातात अधिक ( भागीरथी ) का पाताल में 'प्रविष्ट' होना आदि व्यङ्ग्य अर्थ हैं तथापि इन व्यङ्गयों का थोड़ा सा चमत्कार उत्प्रेक्षाके चमत्कारातिशय में विलीन है जिस तरह प्रसाधन की कला से अनभिज्ञ ग्राम्य युवती की गौरिमा ( = धवलता ) उसके मुखमण्डल पर अत्यधिक मात्रा में लगाए गए केसररसरूपी धवलता में विलीन हो जाती है। अतः चमत्कार व्यङ्ग्यार्थ का निगूढ़ तो है, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि व्यङ्गयार्थ का सर्वथा अभाव है, क्योंकि विना उसके सस्पकं के कोई भी वाच्यार्थ स्वतः चमत्कारजनक हो नहीं सकता। मुख्य रूप में पर्यायोक्ति, समासोक्ति आदि अलङ्कारों से युक्त काव्य का द्वितीय काव्य-प्रभेद ( उत्तम ) में और दीपकादि

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यत्रार्थेचमत्कृत्युपसृता शब्दचमत्कृति: प्रधानं तदधमं चतुर्थम् ॥

यथा-मित्रात्रिपुत्रनेत्राय त्रयीशात्रवशात्रवे । गोत्रारिगोत्रजत्राय गोत्रात्रे ते नमो नमः ॥ इति ।

अत्रार्थेचमत्कृति: शब्दचचमत्कृतौ लीना । यद्यपि यत्रार्थचमत्कृतिसामान्य-

अर्थात यहाँ पर अर्थचमत्कार शब्दचमत्कार में लीन है । यद्यपि यहाँ पर सामान्यतया

चालदूः शब्दद्योतनस्थलदूः । एव गृहीत्वा, शब्दालङ्कार्ये भान्त्यस्य काव्यस्य सत्यासर्थ-चमत्कृतौ च तुर्थे समावेशाशस्य वक्ष्यमाणत्वात् ॥

इसे उदाहरण के रूप में ग्रहण करके शब्दालंकार में इसकी चर्चा की जायेगी, क्योंकि इसकी चारुत्व ( सुन्दरता ) काव्य के सत्यार्थचमत्कार में अन्तर्भूत है ।

यत्रेत्यादि । यस्मिन् काव्ये वाच्यार्थजन्यचमत्कारोपिता शब्दजन्यचमत्कृति:

यत्र इत्यादि । जिस काव्य में अर्थचमत्कार से परिपोषित शब्दचचमत्कार हीं प्रधान हो उसे

प्रधानं तदधमं चतुर्थे काव्यमित्यक्षरार्थः । वाच्यादेश्च मत्कारजनकत्वं वाच्यार्थादिज्ञानस्य तथात्वादुक्तम् ।

अर्थात अधम, काव्य कहते हैं ॥

मित्रेत्यादि । मित्र: सूर्यः;, अत्रिपुत्रश्चन्द्रः;, तौ नेत्रे यस्य तस्मै । तत्री ऋग्यजुः-सामानि तद्विषयं शास्त्रं च शास्त्रत्वं यस्य शात्रवे शातयित्रे विनाशकाय ।

जैसे—"मित्र ( सूर्य ) और अत्रि-पुत्र ( चन्द्र ) जिनके नेत्र हैं, वेदत्रयी के साथ शत्रुता रखने वाले दैत्यादि के जो विधातक हैं और पर्वत के पंखों को काटने वाले

गोत्रस्य पर्वतस्य अथेरिन्द्रस्य गोत्रे जाता ये देवास्तेषां नो रक्षको यस्तस्मै, गो: पृथिव्या धेनोश्च त्रात्रे रक्षकाय तुभ्यं विष्णवे शिवाय वा नमो नम इति पद्यार्थः ।

इन्द्र के गोत्र में उत्पन्न, अर्थात् देवों, के जो रक्षक हैं उन पृथिवी के अथवा धेनु के पालक भगवान् विष्णु या शिव को मेरा शतश: प्रणाम हो ।"

लीना = अत्यन्तमस्कुटा । यद्यप्यत्रापि न व्यङ्गच्यरहितत्वम्, व्यङ्गच्यार्थेन मनागपि वाच्यार्थस्य स्पष्टीभवति स्वरूपतस्तत्स्थेय चमत्कारारूजनकत्वाद्‌भुतवृत्त्यादिलक्षणनिरूपणसंधारे स्वयमेवोक्तत्वात् तथापि भगवद्विषयभावादेव्यङ्गचस्य वाच्य-चमत्कृतौ ( तस्याश्च शब्दचमत्कृतौ ) निलीनत्वाद् प्रतीतिविषयत्वाभाव इत्यतः सतोडपि व्यङ्गचस्याडनिदेशोऽनुपपन्न इत्यवधेयम् । चमत्कारमात्रजनकतारहितार्थ-विशिष्टचमत्काररजनकशब्दचचमत्कृतियकबन्धादिवाक्यस्य काव्यपद‌वाच्यत्वम्‍भेदत्‌वेनाधम-मध्यमोत्तमत्वमाह—

अलङ्कारों से युक्त काव्य का तृतीय काव्य-प्रभेद ( मध्यम ) में समावेश हो जाता है । अतः उनके समावेशार्थ किसी स्वतन्त्र काव्य-प्रभेद को मानने की आवश्यकता नहीं है ।

अलङ्कारों से युक्त काव्य का तृतीय काव्य-प्रमेद ( मध्यम ) में समावेश हो जाता है । अतः उनके समावेशार्थ किसी स्वतन्त्र काव्य-प्रभेद को मानने की आवश्यकता नहीं हैं ।

जिस काव्य में अर्थचमत्कार से परिपोषित शब्दचमत्कार हीं प्रधान हो उसे चतुर्थ, अर्थात अधम, काव्य कहते हैं ॥

जैसे—"मित्र ( सूर्य ) और अत्रि-पुत्र ( चन्द्र ) जिनके नेत्र हैं, वेदत्रयी के साथ शत्रुता रखने वाले दैत्यादि के जो विधातक हैं और पर्वत के पंखों को काटने वाले इन्द्र के गोत्र में उत्पन्न, अर्थात देवों, के जो रक्षक हैं उन पृथिवी के अथवा धेनु के पालक भगवान् विष्णु या शिव को मेरा शतश: प्रणाम हो ।"

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शून्या शाब्दचमत्कृतिसतत्पश्‍ममध्यमाधममपि काव्यविधासु गणयितुमुचितम्, यथैकाक्षरपद्यार्थावृत्तियमकपद्यबन्धादि । तथापि रमणीयार्थप्रतिपादकशब्दतारूपकाव्यसामान्यलक्षणानाकान्ततया वस्तुतः काव्यत्वभावेन महाकविविभिः प्राचीनपरम्परामनुरुन्धानैस्तत्र काव्येषु

पस्कारकत्वेऽधमकाव्यत्वम्‌; शाब्दचमत्कारस्थ्यर्थचमत्कारोपस्कारकत्वे तु मध्यमकाव्यत्वम्‌, वृङ्ग्यार्थैस्संस्कृतैरन्तरेप वाच्यार्थस्य चमत्कारजनकत्वाभावान्न श्रेष्ठपद्यमपि काव्यम्‌। तुण्यचमत्कारजनककाव्यङ्गयार्थसंश्रावे वाच्यस्य वृङ्ग्यचमत्कारादिसमानाधीकरणत्वादक्षतेरिति वक्ष्यत्यानुपदमेव । ममप्रति तत्विरणनानड्भावे हेतुमाह—तथापित्यादिना । काव्यत्वं सामान्यं व्यपकं काव्यविशेषत्वं भावप्रयुक्तवि शिष्टाभावात्सकाव्यत्वाभावाद् व्यपकनिवृत्तौ व्याप्तिनिवृत्तिरिति न्यायेन तत्र काव्यत्वाभाववत्ति काव्यविशेषत्वाभावः सिद्ध इति न पृथगणनमहंतीत्याशयः ।

सम्प्रति मम्मटाद्यभिमतं काव्यप्रकारत्रयमाक्षिप्तनाह—केचिदित्यादि । निराकरणे हेतुमाह—तत्रेत्यादिना । अनुक्ते न दोषेण सह व्यङ्ग्यप्राधान्याऽप्राधान्यसद्भावादुतमोत्तमोत्तमद्धयभेदास्वीकरोडपि मुक्तिविरोधाद्‌ दोषो बोध्यः । विनिगीतं इत्थमिदपच काव्यप्रकारकोटौचिन्त्रस्योदाहरणम्‌ । पूर्ण पद्य यथा —

विनिर्गतं मानदमाल्ममनिराद् भवत्युपश्रुत्य यदृच्छयाडपि यम्‌ । ससरश्मेन्दुदृपपातिताङ्गला निमीलिताक्षीव भियाडमरावती ॥ इति ॥

भर्तृमेढविरचिदते हयग्रीववधाद्भगे नाटके हयग्रीववर्णनमिदम्‌ । यं हयग्रीवाभिधं दैत्यं मानदं मानदम्‌ आत्मनो मानभङ्गं शङ्क्रुणां मानं वति खण्डयति इति मानदस्तमात्मगुहाद्‌ यदृच्छया विनिर्गतं सन्सुपुपश्रुत्य करर्णाकणिकया श्रुत्वा समरश्रमेण दृतं पातिता अगुला यस्यास्ताम्‌ यस्यास्तदृशी अमरावती इन्द्रोपि भियाडमरवती ।

लिताक्षीव भवति—इति पच्यार्थः। अश्रोत्रप्रेक्षया एव वाच्यार्थःः कविसंरम्भगोचरतया व्यङ्गयोऽपि वीरादिलीनो वाच्यचमत्कारे इति भवव्येतदुदाहरणार्थचित्रा

इस पद्य में अधमचमत्कार शाब्दचमत्कार में विलीन है। इस लिए उपयुक्त लक्षण के अनुसार यह अधम काव्य है । यद्यपि एकाक्षर पद्य, अर्थान्तरित यमक से घटित पद्य और पदबन्ध आदि काव्यों को भी, जहाँ अर्थ में कोई भी चमत्कार है हाँ नहीं अपितु केवल शब्द में हाँ चमत्कार है, स्वतन्त्र काव्यप्रकार के रूप में परिणणित करना आपाततः उचित प्रतीत होता तथापि वास्तविक रूप में विचार करने पर यह स्पष्ट है कि रमणीय अर्थ के प्रतिपादक न होने से उन्हें जब काव्य कहनाह हाँ सम्मव नहीं तो फिर काव्य-विशेष कैसे कहा जा सकता ?

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निबद्धमपि नास्माभिर्गणितम्, वस्तुस्थितिरेवानुरोधयतावत् । केऽचिदिमानपि चतुरो भेदान्गणयन्त्युत्तममध्यमाधमभावेन त्रिविधमेव काव्यमाचक्षते । तत्रार्थचित्रशब्दचित्रयोरविशेषेणाधमतवमयुक्तं वक्तृमू, तारतम्यस्य स्फुटमुपलब्धेः । को ह्योऽयं सहृदयः सन् 'विनिर्गतं मानदमात्ममन्दिरात्', 'स चित्रश्रृङ्गलः क्षतजेन रेणु:' इत्यादिभिः काव्यैः 'स्वच्छन्दोच्छलदित्यादीनां पामरिलाघ्यानामविशेषं ब्रूयात् ? सत्यपि तारतम्ये यद्येक-

लिए वस्तुस्थिति का अनुसरण करते हुए हमने उन्हें स्वतन्त्र काव्यविधा के रूप में परिगणित नहीं किया है यद्यपि इतना तो सत्य है कि प्राचीनपरम्परा के अनुरोधी कुछ महाकवियों ने अपनी रचनाओं में इनका समावेश अवश्य किया है ।

उभयस्यापि सङ्करवाव्यसेयेति तदाशायः । परमन्त्रहयग्रीवप्रभवाविताय लक्षणस्य व्यङ्गचस्य जागरूकतया तस्य च प्राधान्ये ध्वनितस्वप्राधान्ये च परमते गुणीभूतव्यङ्गचत्वमेवो-

काव्यप्रकाशकार आदि कुछ आलङ्कारिक काव्य के उपर्युक्त चार प्रकार न मानकर तीन ही प्रकार मानते—उत्तम ( ध्वनि ), मध्यम ( गुणीभूतव्यङ्गच ) और अधम ( शब्दचित्र और अर्थचित्र ) । किन्तु अर्थचित्र एवं शब्दचित्र को समान रूप से एक स्तर का काव्य मानना असंगत है, क्योंकि दोनों में चमत्कार-

चित्रमिति प्रदीपकृदिभिर्निर्णीततत्त्वान्तरुदाहरणमुपपत्तिमदर्शयेत्यत्रोपरितुष्यन् चित्रमीमांसास्थमर्ये चित्रोदाहरणमाह—'स चित्रश्रृङ्गलः' इति । रघुवंशेऽजसमर-

जनकता की दृष्टि से अन्तर स्पष्ट है । क्या ऐसा भी कोई सहृदय मिल सकता जो 'विनिर्गतं मानदमात्ममन्दिरात्' (काव्यप्रकाश) तथा 'स चित्रश्रृङ्गलः क्षतजेन रेणु:' (काव्यप्रकाश) आदि अर्थचित्र काव्यों की 'स्वच्छन्दोच्छलद्‌...' (काव्यप्रकाश)

वर्णनमिदम् । पूण्ण पद्यमिदम्— स चित्रशृङ्गलः क्षतजेन रेणुस्तस्योपरिष्टात् पवनातुदूतः । अङ्गारशेषस्य हुताशनस्य पूर्वोक्तिस्थो धूम इवाडवभासे ॥ इति ॥

इन्दुमतीमुखुन्दहन्तमजं यदा तसिपत्रपहृतवैभवारवातेन रङ्गम्वरेङपमानिततथोचच राजन्यगणः पथि हरोध्यास्तथ्व तयोस्तुमुलं युद्धं प्रवृत्तं तथोस्थितः सान्द्रो रेणुः युद्धक्षत-

जेन रक्तनदीगतिमान्वितात् सन् भूमिलेखन उपारिष्टाच्च पवनातुदूतः सन् नभस्त प्रसृत-

स्तदा तस्य रेणोनभःप्रसृत ऊर्ध्वभागः अङ्गारशेषस्य हुताशनस्य निर्भूंतोलमुकावशेषस्य हुताशनस्य

अग्ने: पूर्वोक्तिस्थतो धूम इवाडवभासे इत्यर्थः । अत एव 'धूम' इति कालिदासस्योपनाम प्रसिद्धमिति दिनकरादयः । अत्र रेणौ धूमसमभावनयेऽवबद्वाच्योत्प्रेक्षैव युद्धगतभयानकादिव्यङ्गचांपक्ष्यादुत्कर्षयोत्कर्षयेन चमत्कारं जनयतीति हेतोरिदं वाच्य-

चित्रमर्थचित्रापरपर्यायं परमते ध्वनौ स्वमते मध्यमे काव्यमिति भावः । स्वच्छन्दो-

च्छलदिति । एतच्च पद्यं यथा—

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भेदत्वं कस्त्विह ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्योऽथ्यो रीषदन्तर रयोरविभिन्नभेदत्वे दुराग्रहः ? यत्र च शाब्दार्थचमत्कृत्योरैकाधिकरण्यं तत्र तयोर्गु पप्रधानभावं पर्य्य-

आदि शब्दचित्र के साथ समानता मानता हो ? यदि स्पष्ट तारतम्य रहने पर भी दोनों को एक कोटि में रखा जाय तब ध्वनि एवम् गुणीभूतव्यङ्ग्य को भिन्न-भिन्न कोटि में रखने का दुराग्रह क्यों ? इन दोनों में भी तो इतना ही अन्तर है कि प्रथम में व्यङ्ग्यार्थ प्रधान होता है जब कि द्वितीय में गौण । अर्थ- अर्थचित्र एवं शब्दचित्र को परस्पर-भिन्न कोटियों में रखना ही उचित है । एवं च यदि किसी एक काव्य में अर्थचमत्कार भी हो और शब्दचमत्कार भी तो उसे अर्थचमत्कार के प्रधान सिद्ध होने पर उसे मध्यमकाव्य और शब्दचमत्कार के प्रधान होने पर उसे अधम काव्य कहना चाहिए । यदि दोनों के गुणप्रधानभाव का निर्णय न हो सके तो उसे मध्यम काव्य ही कहा जाना चाहिए, क्योंकि व्यङ्ग्यार्थ के वाच्यार्थ की अपेक्षा अधिक चमत्कारजनक न होने से उसमें व्यङ्ग्यचमत्काराजसमाना अधिकरण वाच्य-चमत्कार माना जा सकता है ।

स्वच्छन्दो च्छलछन्दो च्छन्दकुच्छकुहरच्छलातेरामयुच्छटा-मूर्छन्छमोर्महर्षि हर्षविव्हितस्नान॥इति कविकन्ठाय वः ।

भियादुद्युदारदुंरदरी दीर्घोंदरिद्रद्रुम-द्राहद्रिद्रुमहामोदिमन्दुरमुदा मन्त्राकिनी मन्त्रिताम् । इति ॥

शब्दचित्रस्योदाहरणं पइमे काव्यप्रकारो दत्तम् । अत्र वृत्त्यनुप्रासो नाम शब्दालङ्कार । शब्दचित्रत्वं तु रसफुटतयैवास्य । मन्त्राकिनीविपयप्रोतेः श्लोकतयपर्यायाया अन्र व्यङ्गचत्वेऽपि तस्या अस्फुटतरत्वेन कविविवक्षाजविपयत्वेन वा न तामाद्रियास्य शब्दचित्रत्वेऽपि तद्वचाशय ।। इति तदाशयः । तदुक्तमाचार्यधनञ्जयेन--

शब्दचित्रस्योदाहरणं पइमे काव्यप्रकारो दत्तम् । अत्र वृत्त्यनुप्रासो नाम शब्दालङ्कार । शब्दचित्रत्वं तु रसफुटतयैवास्य । मन्त्राकिनीविपयप्रोतेः श्लोकतयपर्यायाया अन्र व्यङ्गचत्वेऽपि तस्या अस्फुटतरत्वेन कविविवक्षाजविपयत्वेन वा न तामाद्रियास्य शब्दचित्रत्वेऽपि तद्वचाशय ।। इति तदाशयः । तदुक्तमाचार्यधनञ्जयेन--

रसभावादिविषयविवक्षाविरहे सति । अलङ्कारनिवन्धो यः स चित्रविषयो मतः ॥ इति ॥

अत्रालङ्कारशब्देनैव शब्दालङ्कारस्य रसादिविवक्षाविरहे च वाच्यः । तथा च रसादिविवक्षाविरहे सत्यर्थालङ्कारयोजने च शब्दालङ्कारयोजने च वाच्यः ।

विवक्षाविरहे सति सत्यर्थालङ्कारयोजनेदर्थचित्रत्वं शब्दालङ्कारयोजने च शब्दचित्रत्वं तन्मत इति विशेषः । ईदृशिदति । स्वमतेऽभिप्रायेणैतद्वपक्षच्यते । स्वमते इति ध्वनिनिगूढार्थ-चमत्कारातिशयाधायकत्वे समानेपि पूर्वस्मिन् प्राधान्यं तस्य व्यङ्गचस्य नास्तीति महान् भेदोऽजनयोरिति स्पष्टम् । तथा च कथं परमतानुसारेणैतदुक्तं युक्तंमिति चिन्त्यं सुधीभिः ।

ननु शब्दचित्रस्याप्याद्यत्वेऽपि उभयचित्रस्य 'वराहः कल्याणं वितरतु स वः' आदि शब्दचित्र के साथ समानता मानता हो ? यदि स्पष्ट तारतम्य रहने पर भी दोनों को एक कोटि में रखा जाय तब ध्वनि एवम् गुणीभूतव्यङ्ग्य को भिन्न-भिन्न कोटि में रखने का दुराग्रह क्यों ? इन दोनों में भी तो इतना ही अन्तर है कि प्रथम में व्यङ्ग्यार्थ प्रधान होता है जब कि द्वितीय में गौण । अर्थ- अर्थचित्र एवं शब्दचित्र को परस्पर-भिन्न कोटियों में रखना ही उचित है । एवं च यदि किसी एक काव्य में अर्थचमत्कार भी हो और शब्दचमत्कार भी तो उसे अर्थचमत्कार के प्रधान सिद्ध होने पर उसे मध्यमकाव्य और शब्दचमत्कार के प्रधान होने पर उसे अधम काव्य कहना चाहिए । यदि दोनों के गुणप्रधानभाव का निर्णय न हो सके तो उसे मध्यम काव्य ही कहा जाना चाहिए, क्योंकि व्यङ्ग्यार्थ के वाच्यार्थ की अपेक्षा अधिक चमत्कारजनक न होने से उसमें व्यङ्ग्यचमत्काराजसमाना अधिकरण वाच्य-चमत्कार माना जा सकता है ।

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लोच्य यथालक्षणं क्यवहृतंव्यम् । सम्प्राधान्ये तु मध्यमतैव । यथा—

काव्यवस्तुस्याऽनुपलाभ्यत्वात् पुनरपि चतुर्थविभागोनुपपन्न एवेत्यत आह —यत्रेत्यादि । अयं च यत्र इत्यारम्भ्य मध्यमतैव इत्यन्तो ग्रन्थो व्याख्यात-पूर्वं ।

उल्लासः फुल्लपङ्कजो रसहपटलपतनमतत्पुष्पन्धयानां निस्तारः शोकदावानलविकलहृदां कोकसीमन्नितनीनानम् । उत्पातस्तमसाऽनुपहतमहसां नक्षुषां पक्षपातः संघातः कोऽपि धाम्नामयमुदयगिरिप्रान्ततः प्रादुरासीत् ॥

सम्प्राधान्योदाहरणमाह —उल्लास इति । फुल्लानां विकसितानां पद्मं वहनां कमलानां पटले पततां मत्तानां पुष्टन्धयानां मध्यकराणामुल्लास कारणम्, शोक एवान्तर्दाहकत्वाद्दावानलस्तेन विकलं हृदयं यासां तासां कोकसीमन्नी-नीनां चक्रवाकवधूनां निस्तारो दुःखनिवारकः, अपहृतंतं लघीयास्तेजो यैस्तैः तमः समू-हानामुत्पातो विनाशकः, यदैतद्रोहतमहसामिति चक्षुषां विशेषणम्, तथा चोपहतं महो- दृशिट्सामध्यं येषां चक्षुषामन्धकारे तेषां पक्षपातः सहायकः प्रतिवन्धकौभूततमःपुञ्ज-विनाशकत्वात्, एतादृशो यः कोऽपि विलक्षणो धाम्नां संचातः सूर्यः सोऽयमुदयगिरि-प्रान्ततः प्रादुरासीत् । 'प्रादुरास्ते' इत्युचितम् ॥

अत्रेत्यादि । अत्र अर्थः— अत्र प्रकारकादेरसकृत्वाद् वृत्त्यनुप्रासः, एक-वाक्यार्थस्य बहुभिवार्वाइैयैरभिधानात्, विशेषणानां साङ्भिप्रायत्वादौजो गुणात्त- प्रकासकवशसत्त्वाद् यावदर्थकपदव्यव्टिततत्वाच्च प्रसादगुणः । तततश्च वाक्यार्थ-बोधानन्तरमन्त्र रूपकं प्रतीयते, रत्नाकरादिमतेन कारणे कार्यारोपश्च यत्‌ रिपकत्वात् । ये पुनरुपमेय उपमानारोपमेव रूपकं मन्यन्ते तन्मते तु मतेनज्रोल्लासादिकारणे

इसका उदाहरण यह है— "विकसित कमल के पत्तों पर टूट पड़ने वाले उन्मत्त भौंरों के लिए उल्लास (-कारक), विरोधसरूप दावानल से सन्तप्त हृदय वाली चकवा‌कियों के विरह-दुःख का विनाश (-कारक), अन्धकार के समूह के लिए उत्पात (-कारक = विनाश-कारक) और रात्रि में जिनकी ज्योति मन्द पड़ जाती उन आँखों के प्रति पक्षपात (करने वाला) यह कोई विलक्षण तेजःपुञ्ज (से सम्पन्न सूर्य) उदित हो रहा है ।"

इस पद्य में वृत्त्यनुप्रास शब्दालङ्कार का प्रचुर प्रयोग है। साथ हीं शब्द-विन्यास ओजःपूर्ण एवं प्रमा‌दगुणयुक्त है । अतः शब्दगत चमत्कार स्पष्ट है । इसके

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योगादनन्तरमेवाधिगतस्य रूपकस्य हेत्वलङ्कारस्य वा वाच्यस्य चमत्कृत्यो-स्तुल्यरस्कन्धतत्त्वाल्सममेव प्राधान्यम् ॥

तत्र ध्वनेरुत्थोत्तमस्यासंघयभेदस्यापि सामान्यतः केडपि भेदा निरू-ध्यन्ते—द्विविधो ध्वनि:, अभिधामूलो लक्षणामूलश्च । तत्प्राग्भस्रिविध:—रसवस्तुलङ्कारध्वनिभेदात् । रसध्वनिरित्यलक्ष्यक्रमोपलक्षणाद्रसभावतदाभासभावशान्तिभावोदयभावशबलत्वानां ग्रहणम् । द्वितीयश्च द्विविध:—अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्योऽल्स्ततिरसकृतवाच्यश्च । एवं पश्चात्स्वके ध्वनो परमरमणीयतया रसध्वनेस्तदात्मा रसस्तावद्रिविधीयते—

कार्यस्योल्लासादेरौपान्तदभाव इति हेतुहदुतुमतोरभदाभिधानस्वलुपो हेतु-लङ्कारोदत्र । अयं चालङ्कारो पण्डिततराजेनोभयस्यातोऽप्यत एव तत्सम्मत इति न लङ्कारोऽत्र ।

पूर्वं 'मतोऽस्त्रमक:' इदन्त्र हेतुलङ्काराभावाभिमतत्वोक्तिस्तु तन्मात्र-विषयक:, तत्र मूयस्तस्य तत्त्वकार्यज्ञापकत्वेऽपि कार्यकरणयोर्भेदेनोभिधान-भावात् । ज्ञाप्यस्य चार्थस्य व्यङ्ग्यनयेपि प्रतीतिरुपपद्यते । अत एव तत्र हेतुलङ्कारो दृण्ढसम्भतोऽपि नाभिमतः पण्डिततराजस्य, तादृशहेतूपादानस्य विच्छित्यानाधाय-कत्त्वात् । हेतुहुतुमभेदेऽप्यभिधानस्यालङ्कारत्वं न सर्वसम्मतम्, आयुष्यं तमित्यादौ तथाविधं चमत्काराभावात् । यत्र पुनस्तथाविधेऽपि चमत्कारस्तत्र कार्यलिङ्गनापि निर्वाह्यसम्भवे व्यर्थ: हेतुलङ्कारकल्पनम् । अत एव भामहेलोत्कम्—

हेतुरच सूक्ष्मो लेशोऽथ नाङ्गलङ्कारतया मत: । समुदायाभिधानस्य वक्रोक्त्यनमिधानत्वात् ॥इति ॥

यद्वाडत्र हेतुलङ्कारोडपि भट्टोद्भटाद्यनुरोधेनैवोक्त इति सुधियो विभावयन्तु । तथा चात्र वृत्त्यनुप्रासादितत्सदृशचमत्कारस्य रूपकस्य हेतुलङ्कारस्य वा वाच्य-भूतस्य चमत्कारस्य तुल्यकक्ष्यत्वादेकतरप्राधान्यनिर्णयाभावे सममेवोभयो: प्राधान्य-मिति मुक्त्वा मध्यमकाव्यत्वमस्येति ॥ केडपि = प्रमुखा: । अर्थान्तरसङ्क्रमित इत्यजहत्स्वार्थोडपरपर्यायोपादान-लक्षणास्यलाभप्रायेण । अत्यन्ततिरसकृत इति जहत्स्वार्थाभिमिधानलक्षणलक्षणास्यलाभिप्रायेणोक्तम् ।

तदात्मा=तस्य रसध्वनेविषय: । अभिधीयत इति । रसानुभूति-अतिरिक्त जो कार्य-कारण में अभेदारोप को भी रूपक मानते उनके अनुसार इसमें रूपकालङ्कार और जो केवल उपमान और उपमेय के अभेदारोप को ही रूपक मानते उनके मत में हेतवलङ्कार है ।

इस अर्थगय अलङ्कार में चमत्कारजनकता ह्रौं । ये दोनों हीं चमत्कार समानकोटि के हैं, क्योंकि इनमें से किसी भी एक को उत्कृष्ट मानने का कोई स्पष्ट बाधार नहीं है । अतः शब्दचमत्कार तथाअर्थ-चमत्कार दोनों की हीं प्राधान्यता समानरूप से है! अत एव यह मध्यम काव्य का

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प्रथमाननम्

समुचिततललितसन्निवेशचारण| काव्येन समर्पितः सहृदयहृदय* प्रविष्टस्तत्संयोगसहृदयतासहकृतेन भावनाविशेषसहिम्ना विगलिततुष्यगन्तरमणोत्कादि-प्रक्रियाभिधानमेवात्र रसाभिधानं विवक्षितम् ।

इस श्लोक में रसाभिधान की प्रक्रिया का वर्णन किया गया है।

समुचितेत्यादि । समुचितो रसाभिव्यक्त्यनुकूलोऽस्तु ललितो यः शब्दार्थगुम्फनस्वरूपः स च्चिवेशस्तेन चारणा काव्येन समर्पिता उपस्थापितः । अयमाशयः-ये शकुन्तलादयः पूर्वोक्तरसादिप्रदर्शयुपदेशा आसन् त एव सहृदयहृदयं प्राप्तिताः सन्तः सहृदयतां रस्यादिवासनां प्राक्तनीं तथाः सहृदयतासहकृतेन

यहाँ पर समुचित और ललित शब्दों की व्याख्या की गई है।

चरितापरपर्योयभावनाविशेषस्य काव्यार्थविषयकपुनःरतुसंविदानात्मकस्य महिम्नालौकिकीक्रियते एवं विभावानुभावव्यभिचारिभावरूपवपदेशु लभन्ते, विभावनावलौकिकतयापारवस्तात् । एते चालौकिका मानसाः विभावादयो मानसप्रत्यक्षवेद्याः, साक्षिप्रत्यक्षवेद्या इति परामर्थः । तथाः च वक्ष्यतयग्रे ।

यहाँ पर काव्य के अर्थ और उसके विषय में चर्चा की गई है।

अस्यालौकिकीयामवस्थायां लोकसम्वन्धः सर्वथाः परिहृतो भवतीति हेतोः ये शकुन्तलादयो दुष्यन्तरमणोत्कादिप्रतीयन्ते स्म त एव रमणीतवादिना साधारणेन रूपेण प्रतीममानाः भवन्ति । अत्र एव च पुरुषविशेषसम्बन्धोदपि परिहृतो भवति, रमणीमात्रस्य योग्यमात्रसाधारणस्वौचित्यात् । अत्र एव च पूर्वोक्तताया: शकुन्तलादिविषयकत्वादिवासनया अपि शकुन्तलादिविषयकत्वाद्यंशो विगलितो भवति येन प्राक्तनरत्यादिवासनया सहास्या वासनाया भेदोदपि तावत्कालं विगलितो भवति ।

यहाँ पर लोक सम्बन्ध और पुरुष विशेष के सम्बन्ध में चर्चा की गई है।

प्रादुर्भावितेन = उदाहरण है ॥

यह एक उदाहरण है।

उपयुक्त चतुर्विध काव्यों के बीच उत्तमोत्तम, अर्थात् ध्वनिकाव्य के अनन्त भेद हैं । इनमें कुछ प्रमुख भेदों का निरूपण किया जा रहा है—अभिधामूल ध्वनि एवम् लक्षणामूल ध्वनि । प्रथम के तीन उपभेद हैं—रसध्वनि, वस्तुध्वनि और अलङ्कारध्वनि । इनमें रसध्वनि सभी असंलक्ष्यक्रम ध्वनियों का उपलक्षण है ।

यहाँ पर काव्यों के भेदों का वर्णन किया गया है।

अतः इससे रस के साथ-साथ भाव, रसाभास, भावशान्ति, भावोदय, भावसन्धि और भावशबलता इन सबका ग्रहण करना चाहिए । लक्षणामूल ध्वनि के भी दो उपभेद हैं--अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ।

यहाँ पर रस और भाव के सम्बन्ध में चर्चा की गई है।

उपयुक्त पांच प्रकार की ध्वनियों में रसध्वनि सर्वाधिक रमणीय है । अतः रसध्वनि के विषयभूत रस का निरूपण किया जा रहा है—सर्वप्रथम रत्यादि के आलम्बन कारण शकुन्तला आदि, उद्दीपन कारण चन्द्रिकाः आदि, इनके काव्य अनुप्रास आदि और चिन्ता आदि सहकारियों का रसोत्पादक विन्यास के कारण ललित काव्यादि द्वारा सहृदय अनुभव करते हैं ।

यहाँ पर रसध्वनि के विषय में चर्चा की गई है।

तत्पश्चात् प्राक्तन रत्यादिवासनास्वरूप सहृदयतया से वे उन कारण-काव्याँ का पुनः पुनः अनुसन्धान

यहाँ पर सहृदयता की चर्चा की गई है।

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भिरलौकिकविभावानुभावव्यभिचारिडशब्दद्ययपदेश्ये: शकुन्तलादिभिरालम्बनव्यापारितेन । अलौकिकेन व्यापारेण = व्युञ्जनाश्रयेन व्यापारेण । अस्या अलौकिकत्वन्तु आनन्दांशावरणनिवृत्तौ कत्लवस्वरूपालौकिककार्यकारितवादलौकिकविभावादि वर्णोपात्तसामर्थ्यांच्च । अलौकिककार्यनिष्ठत्वेनालौकिकत्वं तु न युक्तम्, व्यञ्जनायाः कार्यत्वादितरसाधारणत्वात् । यद्वा विभावादिचर्वणया एकतो व्यञ्जनया वासनारूपाणां रत्यादीनामभिव्यक्तिरपरपरतचर्वणयेन केनचनालौकिककृतव्यापारेण विभावनादिव्यापारेण स्वजनितेनानन्दावरणनिवृत्तिः । अथवा स्वसंवेदनात्मकंेन रत्यादिप्रहितानन्दांशसाक्षिप्रत्यक्षेण रसों व्यज्यते। अत्रैव व्यञ्जनोपयोगः । तत्कालम् = त्वमू = अन्तःकरणस्य अविद्याकार्यैर्वाजडदत्वादनदानन्दांशावरणकत्वेन चैतन्यविशेषणत्वम् । निजेत्यादि । निजस्वरूपानन्दने सह प्रविष्टनिविष्टवासनारूपो रत्यादिरेव गोचरोक्रियमानो रस इत्यन्वयः। अत एवं स्ववाध्यमान एव रसः । वस्तुतोऽयमास्वादद्वैति नातिरिक्त आस्वाध्यमानादिति गोण एव रसस्यास्वाद इति व्यपदेशः । अत एवं स्वसंवेदनसिद्धो रसोदप्रमेयः कथ्यते । एतदेव स्थायिनो रामस्य वैलक्षण्यम् यद्वास्वाभिमानो रत्यादिविभावते रससंस्कार, अनास्वादानिमित्तु स्थायिभावनिदर्शनम् । प्रान्तनिविष्टवासनारूप इत्यनेन च सामाजिकनिष्ठानां वासनात्मकतया स्थितानां रत्यादीनामेवास्वाध्यमानानां रसतत्त्वप्रतिपादनम् । अत एव सामाजिकानां रसास्वादद्वैतजसोंपपद्यते । कार्यार्थानुसन्धानादिनाने तु जायमानया रत्यादिवासनया व्यञ्जनव्यापारोद्बुद्धया तत्तदात्म्यापन्नसामाजिकनिष्ठरत्यादिवासनोद्बोध एवाभिप्रेतोऽत्र । यद्वा भावनाविशेषमहिम्ना विगलितत्वाद् शकुन्तलादिविभावस्वादे रत्यादिवासनेदानीन्तन्यपि सामाजिकलिष्ठेव । अस्मिन्न् पक्षे इदानीन्तनवासनायाः प्राक्तनरत्यादिवासनोद्बोधकतथा सार्थकत्वं बोध्यम् ।

करते। इसी अनुसन्धान को 'भावना' या 'चर्वणा' भी कहते हैं। इस भावना के प्रभाव से पूर्वानुभूत आलम्बनकारण आदि अलौकिक स्वरूप अर्थात् मानस तत्त्व का आकार ग्रहण कर लेते हैं। इस अवस्था में इनके नाम भी लौकिक उत्त्क कारण आदि से बिलक्षण हो जाते हैं। अतः आलम्बन कारण को आलम्बन 'विभाव', उद्दीपन कारण को उद्दीपन पन्थ 'विभाव', अश्रुपातादिस्वरूप कार्य को 'अनुभाव' और चिन्ता आदि सहकारियों को 'व्यभिचारिभाव' कहा जाने लगता है। भावनाप्रसूत इस अवस्था में 'यह अमुक की प्रियतमा है, अमुक की नहीं या मेरी है या मेरी नहीं'—इस प्रकार के व्यक्तिगत सम्बन्धों का बोध नहीं होता। अतः जो पहले दुष्यन्त की प्रियतमा के रूप में प्रतीत हो रही थी वही शकुन्तला मात्र प्रियतमा कामिनी के रूप में प्रतीत होने

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सहकारिभिश्च संश्रूय प्रादुर्मावितेनालौकिकेन व्यापारेग तत्कालनिर्वाततानन्दांशावरणाज्ञाननात एव प्रमृष्टपरिमितप्रमाात्रावदिनिजधर्मेण प्रमाात्रा

अयमर्थः:- प्राप्तनरत्यादिवासनावासितहृदया: सहृदया: यदा नाट्यावलोकनं काव्यपाठं काव्यश्रवणं वा कुर्वन्ति तदा नाट्ये वेषभाषाद्यारोपितदु:खान्तादितादात्म्यवतां नटानां श्राव्ये च शब्दोपालतदु:खान्तादीनां व्यापारमकगत्य ततो दु:खान्तादिनिष्ठशकुन्तलादिविषयकरत्याद्यनुमिति कृत्वन्ति व्यङ्गजनया वाडनभवन्ति रत्यादिन यतश्चानन्तरं वासनारूपेण दु:खान्तादिनिष्ठशकुन्तलादिविषयका रत्याद्यस्तदवन्त:करणे सन्तिष्ठन्ते । अनन्तरं च यदा ते काव्यार्थान पुन: पुनरनुसन्धते (= काव्यार्थभावनां कुर्वन्ति) तदा पूर्ववासनासहकृतकाव्यार्थभावनामहिना काव्यार्थानुभवकाले रत्याद्यालम्बनकारणादिरूपेण प्रतीमाना: शकुन्तलादयो विभावनानुभावनव्यभिचारगास्यत्रितयालौकिकव्यापारनिमित्तकं क्रमेण विभावानुभावव्यभिचारिस्वरूपमलौकिकं व्यपदेशं भजन्ते । एते च लौकिका विभावादियोग्त:करणधर्मभूता मानसप्रत्यक्षवेद्या: साक्षिभाव्या भवन्तीति वक्ष्यते । भावनाविशेषलव्धस्वरूपत्वाद विभावादीनामस्यामवस्थायां लोकसम्बन्ध: सर्वथा परिहृतो भवतीति हैतोडु:खान्तरमणीत्वादिना पूर्व प्रतीता अपि शकुन्तलादयो रमणीत्वादिसाधारगुरूपेणैव प्रतीयन्ते । अत एवैतस्माधारगाकरतया मुखपुष्टिमापद्यन्ते । यदा हि तेन विभावादय: समूच: सहृदयवच्यमान्ततदालौकिकत्वादेवैषां व्यङ्गजनया वासनारूपेण स्थिति: शकुन्तलादिविषयकरत्यादय: केवलं विगलितव्यक्तिविशेषसम्बन्धेन रत्यादिरूपेणैवाभिज्ञयन्ते = प्रतीतियोग्यता प्राप्नुवन्ते येन प्राप्तन रत्यादिवासनेदानीन्तनरत्यादिवासनयोरश्चाभेदावसायो भवति । अलौकिकविभावादिचर्वणापर्यन्तमेव लब्धसामर्थ्येन व्यङ्गजनास्येनानेन व्यापारेण अलौकिकरसानुस्वादसहकारिरत्वादप्यलौकिकतदियव्यपदेशेन वासनात्मकरत्याद्यवच्छिन्नचैतन्यस्यतानन्दांशावरक्मज्ञानं यावद्भिवादिचर्वणाकालं निवर्त्यन्ते ।

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स्वप्रकाशतया वास्त्वेन निजस्वहूपानन्देन सह गोचरैक्रियमाण: प्रविष्टविशिष्टवासनारूपो रत्यादिरेव रस: ॥

कस्याऽज्ञानस्यापि तात्कालं निवृत्तिदंसितैव । सदंशरसवनानुबृत एव । यद्राज्जन्येनैवालोकिकेन व्यापारेणावरणनिवृत्ति: । ततश्च वासनात्मकरण्यादेस्त:करणस्थतया तस्यैव चान्त:करणस्य प्रमातृचैतन्यविशेषणतया तत् चैतन्यभेदसाधकत्वाभावेन रत्याद्यव-च्छिन्नोचित आनन्दाशावरणनिवृत्त्या तद्रूप सम्पन्न एव हेतोरन्त:करणस्याज्ञानकार्यस्य चैतन्यावरकत्वाभावादिह सोपलत्वं व्यापारतमुपाधितवं च कार्यान्वयित्वरूपमागतमेव । अयमेव प्रमातृत्वादिपरिमितधर्माणां प्रमेय उत्क: । सर्वज्ञत्वादिपरमात्मस्वरूपापत्तिस्तु नास्ते:, अशास्त्रीयत्वादसंगत एव । तथा च रत्याद्यव-च्छिन्नोचित प्रमातृचैतन्यस्य ज्ञाननाशावरणनिवृत्त्योभयोशच चितोर्विभागकैकदेशस्थतयैकत्वेन व्यतिरेकानापादितभासनयोग्यत्वस्य रत्यादे: स्वरूपानन्देन सह स्वरूपपितैव अन्‍त:करणोपहितत्वेन साक्षित्वपदेर्शया भासनम् । इदमेवास्वादमुख्यते । अननेनैवास्वादनेन वा व्यतिरेक: प्राग्भिनिविशिष्टवासनात्मा रत्यादिरधिगततो रसपदवोभू इति पूर्वोंड्लैकिकष्यापारो व्यतिरेकभिन्न एव कलिच्छल् । काव्यमूलकत्वाच्चास्या रस-हो जाता' और दूसरी ओर वासनारूप में सहृदय के अन्त:करण में विशिष्टमान रत्यादि-स्थायी भाव उद्बोधित होकर आस्वादनयोग्य बन जाते। अथवा व्यङ्ग्यजना से रत्यादि में आस्वादयोग्यता आती और किसी अलौकिक व्यापार से आवरण-भङ्ग होता । चिदंश के आवरण के निरस्त हो जाने से आत्मा का प्रमातृत्व (= अन्त:करण की विशेषणता जिसके चलते वह चैतन्य प्रकाशित न हो पाता था वह) भी विनष्ट हो जाता और उसमें साक्षित्व (अर्थात् अन्त:करण में उपाधितव प्रकाशनात्मक कार्य पर आघात नहीं पहुँचा सकता वह) प्रकट हो जाता । अब अज्ञानावरणरहित आत्मस्वरूप आनन्द के साथ अन्त:करण में निहित वासनात्मक रत्यादि स्थायीभाव का साक्षिप्रत्यक्ष होने लगता । इसी साक्षिप्रत्यक्षवेद्य (आस्वाद-मान) स्थायी भाव को 'रस' कहा जाता है । इसे साक्षिप्रत्यक्ष को ही 'रसास्वाद' कहा जाता है जो रत्यादिपहित साक्षी के स्वरूप से पृथक् नहीं है । अत एव आस्वादभान रस तथा आस्वाद में कोई तात्त्विक अन्तर नहीं प्रतीत होता ।

  1. यह आवरणभङ्ग इसलिए आवश्यक है चूँकि इसके बिना रसास्वाद आनन्‍द-स्वरूप नहीं हो सकता । कारण यह है कि अद्वैत वेदान्त के सिद्धान्त में आनन्‍द आत्मा का स्वरूप है । सांसारिक पदार्थों में आनन्‍द की जो प्रतीति होती वह तो उस आत्मा के आनन्‍द के सम्पर्क से ही, स्वरूपत: नहीं ।

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(९) तथा चाहः—‘व्यक्तः स तैर्विभावाद्रैः स्थायिभावो रसः स्मृतः’ इति । व्यक्तो व्यक्तिविषयीकृतः । व्यक्तितरच भग्नावरणा चित्त् । यथा हि शरावादिनि पिहितो दीपस्थचिवृत्तौ संनिहितान्पदार्थान् प्रकाशयति, स्वयं च प्रकाशते, एवमात्मचैतन्यं विभावादिसंवलितान्‌ रत्यादीन् । अन्तःकरणधर्माणां

व्यङ्ग्यनया: काव्यनिष्ठत्वव्यपदेशोऽपि । आस्वाद्यमानस्य रत्यादिविसिनान्तमतया सहृदयहृदयस्थितो रस इत्युच्यते । अत्र च सर्वोऽनुपपत्तियोलौकिकत्वादेव मम्मट-घेया इति । यदि त्वलौकिकोड्यमास्वादो विभावादिसमुदितरत्यादेर्‌भिमत समूर्ह-लम्वनात्मकस्तहि वासनारूपेणान्तःकरणधर्माणां विभावादीनामपि रत्यादिभिः सह साक्षिभास्यत्वम् बोधयम् ।

उक्तार्थे मम्मटोक्तिं प्रमाणयति—तथेत्यादिना । यद्यपि मम्मटोक्तौ 'व्यक्तः' इत्यस्य व्यङ्ग्यनया प्रकटीकृतः इति चर्वित इति चार्थः । साम्प्रदायिकस्तथाडपि 'यो वै भूमा तत्सुखम्‌, अतोज्ञ्यदातृतम्‌' इत्यादिश्रुते: चिदात्मन एवानन्दरूपत्वेन तदितर-स्य च स्वत आनन्दरुपत्वाभावेनात्मानन्दसंस्पर्शोऽनन्तरेण आस्वाद्यमानस्य रत्यादेर-नन्दरूपतया न सम्भवतीत्यतोऽन्यथा व्याचष्टे—व्यक्तिविषयींकृत इत्यादिना । व्यक्तिः = प्रकाशः, सा च भग्नावरणा चिदेव, आवृततायास्तस्याः परमार्थतः प्रकाश-

उक्त प्रक्रिया में यह भी कहा जा सकता है :कि उक्त साक्षिप्रत्यक्षस्वरूप स्वसम्वेदन से पूर्ववृत्ती स्थायीभाव की अभिव्यक्ति होने से रस को व्यङ्गच्य कहा गया है । यतः इस अभिव्यक्ति का मूल स्त्रोत काव्य है अतः रस को इस पक्ष में भी काव्य से व्यङ्गच्य कहा जा सकता है । किन्तु इतना स्पष्ट है कि सामाजिकनिष्ठ पूर्ववासनात्मक रत्यादि हीं रसरूप में अभिव्यक्त होते, ध्वनन्तादिनिष्ठ रत्यादि नहीं, भले हीं पूर्वोक्त रीति से व्यक्तिगत सम्वन्ध के विलीन हो जाने से ध्वन्स्त की रति का भी सामाजिकलिष्ठ रति से भेद न रहा हो । इसलिए स्वगत रत्यादि का हीं सामा-जिक को आस्वाद होता, परगत रत्यादि का नहीं ।

त्मकत्वेऽपि तत्त्वेनास्फुरणात् । एवमित्यादि । दीपवदात्मचैतन्यमपि अज्ञान-

ऐसा हीं मम्मट ने कहा है—‘उन विभाव आदि से 'व्यक्त' स्थायीभाव उन विभावादि के साथ हीं 'रस' कहलाता है ।’ इसमे 'व्यक्त' शब्द का अर्थ है 'व्यक्ति' का विषय बना हुआ । 'व्यक्ति' उस आत्मस्वरुपभूत 'चित्' को कह्ते जिसका आवरण भग्न हो चूका हो, अर्थात जो स्वयंप्रकाश स्वरूप में प्रकट हो चूका हो । जिस प्रकार पुरवे आदि से ढका दीपक उस ढकन को हटा देने पर स्वयंम प्रकाशित होने लगता और स्वसन्निकृष्ट पदार्थों को भी प्रकाशित करने लगता उसी प्रकार आत्मस्वरुपभूत चैतन्य भी अज्ञानावरण के निवृत्त हो जाने पर स्वयंम भी प्रकाशित

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साक्षिभास्यतवाभ्युपगते: विभागादीनामपि स्वप्नतुरगादीनामिव रङ्ङरजता-

दीनामिव साक्षिभास्यत्वमविरुद्धम्‌। व्यङ्जकविभावादिचर्वणाया आवरण-

वृतं सदावेरकज्ञाननिवृततौ सन्निहितान्‌ अन्तःकरणधर्मान्‌ विभावादीन्‌ तदभियुक्तं

रत्यादिउचच प्रकाशयति स्वयं च प्रकाशते। विभावादिसम्बलिता: नित्यस्य समूहालम्ब-

नात्मकास्वादपक्षे त्रिभावादिनिविशिष्टान्‌ इति, इति पक्षा न्तरे च विभावाद्युपलक्षिताः

निति भावः। अत्राद्या एव पक्षो युक्तः। विभावादीनामपि करणार्घणामास्वाद-

कालेऽपि विद्यमानत्वात्‌। अधिकं विज्ञेयविवेचनीयम्‌। स्वप्नतुरगादीनामिति ।

स्वप्नतुरगादयोऽन्तःकरणवासनाकलिप्ता इति वेदान्तसिद्धान्तः। तथा च श्रुति:---

'न तत्र रथो न रथयोगा न पन्थानो भवन्ति, अथ रथान्‌ रथयोगान्‌ पथः सृजते' इति ।

तथा च शुद्धचैतन्याधिष्ठानस्यापि स्वप्नतुरगस्यान्तःकरणधारामायापरिणामत्वपक्षे-

डन्तःकरणधर्मेऽपोपपचतिः। रङ्ङरजतेऽयादृष्टान्तान्तरम्‌। विपयचैतन्याङ्यसतरस्यापि

रङ्ङरजतस्य प्रतिभासकाले विषयचैतन्याङ्योरडभिन्नतया

विषयचैतन्याङ्यस्तमपि रङ्ङरजतं भवत्यन्तःकरणधर्मे: कृत्स्नश्वत्‌। तथा च

प्रतिभासिकपदार्थानां यावत्प्रतिभासमवस्थि तेः प्रतिभासत्वंमनवस्थानेन तत्र

वाह्यकरणव्यापाराउस्म्भवात्‌ तेभां केवलसाक्षिवेद्यत्वमुक्तं वेदान्ते। तथैव विभा-

दीनामपि मानसत्वात्तत्र बाह्यकररव्यापाराउस्म्भवेन साक्षिवेद्यत्वमुपपनं तु

त्याश्रयः। दृश्यान्तर्दयो च स्वप्नजाग्रद्भेदाभ्यां दृढप्रतिपत्तये वेदितव्यम्‌। रत्यादिभः

सहावस्थितस्यानन्दस्यात्मस्वरूपभूतस्य आस्वादस्य चानन्दाडभिन्नस्य

नित्यत्वादस्थायिनोऽपि रसास्वादात्‌ पूर्वं परतश्चावस्थानात्‌ कथम्‌ रसस्योपपादविनाSSशो

व्यपदेश्यते इत्थं च आह——व्यङ्जकवेत्यादि। यद्यपि रस्यादेरवैषम्यानस्य

स्थायित्वाच्च तस्यास्वादकाले ततः पूर्वं परतश्च सत्त्वं

होता और स्वसम्बद्ध विभावादि से 'सम्बलित' रत्यादि स्थायी भावों को भी प्रकाशित करने लग जाता है। विभावादि से 'सम्बलित' होने के दो अर्थ हो सकते

होता और स्वसम्बद्ध विभावादि से 'सम्बलित' रत्यादि स्थायी भावों को भी प्रकाशित करने लग जाता है। विभावादि से 'सम्बलित' होने के दो अर्थ हो सकते

हैं——विभावादि से विशिष्ट और उनसे उपलक्षित। विशेषण व्यावर्त्तक——भेदक होने

हैं——विभावादि से विशिष्ट और उनसे उपलक्षित। विशेषण व्यावर्त्तक——भेदक होने

के साथ-साथ विर्ज्ञेय——कारण से भी जुड़ा रहता। जो समूहालम्बनात्मक रस लूटते

के साथ-साथ विर्ज्ञेय——कारण से भी जुड़ा रहता। जो समूहालम्बनात्मक रस लूटते

उनके मत में रस में स्थायी के साथ-साथ विभावादि के भी जुड़े होने से प्रथम अर्थ

उनके मत में रस में स्थायी के साथ-साथ विभावादि के भी जुड़े होने से प्रथम अर्थ

समझना चाहिए। किन्तु जो वैसा नहीं मानते उनके अनुसार विभावादि से उप-

समझना चाहिए। किन्तु जो वैसा नहीं मानते उनके अनुसार विभावादि से उप-

लक्षित रत्यादि स्थायी भावों का हीं आनन्दांश के साथ प्रकाशन होता। यह

लक्षित रत्यादि स्थायी भावों का हीं आनन्दांश के साथ प्रकाशन होता। यह

'प्रकाशन भग्नावरणा चिद्‌ से होता जिसे 'साक्षी' कहा जाता। अतः विभावादि के

'प्रकाशन भग्नावरणा चिद्‌ से होता जिसे 'साक्षी' कहा जाता। अतः विभावादि के

साथ-साथ रत्यादि का प्रकाशन साक्षी द्वारा हीं होता। ऐसे हीं पदार्थों को साक्षि-

साथ-साथ रत्यादि का प्रकाशन साक्षी द्वारा हीं होता। ऐसे हीं पदार्थों को साक्षि-

भाष्य कहा जाता। अतएव विभावादि से सम्बलित रत्यादि भी साक्षिभाष्य हैं।

भाष्य कहा जाता। अतएव विभावादि से सम्बलित रत्यादि भी साक्षिभाष्य हैं।

शकुन्तला आदि तो बाह्य पदार्थ अवश्य हैं, परन्तु जब ये विभाव आदि का स्वरूप

शकुन्तला आदि तो बाह्य पदार्थ अवश्य हैं, परन्तु जब ये विभाव आदि का स्वरूप

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विनाशावास्वादतदनन्तरकालयोरित्येवमवतारणीयो ग्रन्थः । विभावादिदृचवर्णाया उत्पत्तिविनाशाभ्यामलौकिकस्य व्यापारस्य तत्कार्यकारित्वस्य वोत्पत्तिविनाशौ, ततश्चावारणभङ्गस्यापि ताविति आस्वादस्याप्युत्पत्तिविनाशौ स्थायिन इच तावुपचर्येते । चवर्णाय आस्वादात् अलौकिकव्यापारावरणभङ्ग एव तद्व्यधिकरणे हितत्वाच्चवर्णस्याप्यन्ते विनाशाभ्यां रसास्वादादेहपत्तिविनाशोपचारौ द्वेधपरम्पराश्रयेण निमित्यते-स्तदगव्यवहितोत्तरावरणभङ्गोऽपत्तिविनाशोरेव तत्रारोप उचित इत्याशयेनावरणभङ्गस्थि विकलप उपात्तः । तथाचाने स्वाश्रयभावनाजन्योततरत्वं परम्परासम्बन्धः, द्वितीये तु स्वाश्रयोत्तरत्वमेवेति प्रथमोपचार निमित्तापेक्षया द्वितीयोपचारनिमित्तसम्बन्धे लाघवम् । उदयत्न स्वमुत्पत्तिविनाशौ । आद्ये तदाश्रयो भावनातज्जःयस्तदुद्भोधितो वाड्लौकिको व्यापारस्तउजन्य आवरणाभङ्गस्तदुत्तरत्वं रसस्य आस्वाद्यमानस्थायिन इति समन्वयः । उत्तरत्र स्वमुत्पत्तिविनाशौ तदाश्रय आव रणभङ्गस्तदुत्तरत्वं रसस्येति समन्वयः । परम्परासम्बन्धेनोत्पत्तिविनाशोपचार-प्रसिद्धघर्थ दूष्टान्तमाह—वर्णोंत्यादि । कमप्योमांसकमते वर्णा नित्या:, कण्ठ-ताल्वाद्यभिघातास्तु लेशां व्यङ्कजा एव न तूत्पादका इति सिद्धान्तः । तत्र यथा-डभिव्यङ्ककानां कण्ठताल्वाद्यभिघातानामुत्पत्तिविनाशाभ्यां वर्णोपात्त, ककारादि-त्पादविनाशशालित्वप्रतीति: ‘उत्पन्नः ककारः,’ ‘विनष्ट: ककारः’ इत्यकारिका तथैव प्रकृतेप्यावरणभङ्गस्योत्पत्तिविनाशाभ्यां रसेऽप्युत्पादविनाशप्रतीतिरित्यर्थः । वर्णे स्थले च स्वाश्रयाद्भिव्यङ्गचवं नाम परम्परासम्बन्धः । स्वमुत्पत्तिविनाशौ तदाश्रय कण्ठ-ताल्वाद्यभिघातास्तद्व्यधिकरणचयात्वं वर्णोंपत्ति समन्वयः ।

धारण करते तब ये वाह्य न रहकर आन्तर पदाथों—अन्तःकरण के धर्मों कहे जाते । अद्वैतवेदान्त का यह सिद्धान्त हैं कि अन्तःकरण के धर्म साक्षिभास्य होते, उनके बोध के लिए वाह्या चक्षुरादि करणों को वृत्ति अपेक्षित नहीं होती । अतः जैसे स्वाप्निक अदृश्य, रथ आदि तथा जाग्रद्वस्था के युक्ति-रजत आदि के अन्तःकरणधर्म होते से उत्को वैदान्तमत में साक्षिभास्य कहा जाता उसी रह अन्तःकरण के धर्म विभावादि को भी साक्षिभास्य कहना उचित है । इस प्रकार, आनन्दांश की दृष्टि से तो रस अनादि-अनन्त—नित्य है हीं, साथ हीं उस आनन्द के साथ प्रकाशमान स्थायी भाव भी प्रकाशन से पहले भी और बाद में भी बने रहते । ऐसी स्थिति में रस को अनित्य—आस्वादनकालमात्र में रहने वाला तो वास्तविक दृष्टि से कहा नहीं जा सकता । किन्तु रस के व्यङ्कक विभावादि की चर्वणा अथवा 'अलौकिक व्यापार' द्वारा चिदान्दंश के आवरण की निवृत्ति के 'उत्पाद-विनाश का' हें: रस में भी उपचार करके कभी रस को भी अनित्य कहा जाता है ।

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व्यञ्जकताल्वादिव्यापारस्य गकारादौ। विभावादिचर्वणावचित्तवादावरणभङ्गस्य, निवृत्त्यां तस्यां प्रकाशस्यादडवृतत्वाद्वियमानोऽपि स्थायी न प्रकाशते।

यद्वा विभावादिचर्वणामहिम्रा सहृदयस्य निजसहृदयतावशोन्तःपितेन तत्तत्स्थाय्युपहितस्वरूपानन्दाकारा समाधाविव योगिनश्चित्तवृत्तिरूपरत्यादि: कथं ने संवेदान प्रकाश इत्यत्र युक्तिमह--विभावादित्यादिना। विभावादीनां समवेतानां या चर्वणा तन्मूलकादेवालौकिकव्यापारात् स्वादिनः प्रतीतियोग्यतापादनममानन्दांशावरकाझ्ञानस्य च निवृत्तिस्थत्प्रकाशानिमित्तमिति चर्वनाया: पूर्वं परस्ताच्च विद्यमानोऽपि नानन्द: स्थायी च न प्रकाशते इत्याशयः।

उक्ते पक्षेऽलौकिकव्यापारेण चर्वणोद्भावितेन आनन्दाकारद्रुतिमन्तरेणैवानन्दशावारणनिवृत्तिवर्णनादशास्त्रीयत्वमू, तेन व्यापारेणानन्दाकारद्रुतिस्तथा चानन्दशावारणभङ्ग इति स्वीकारेऽलौकिकव्यापारकल्पनेन भावनाया लोकसिद्धवारणनिवर्तकत्वस्वभावादनभ्युपगमेन च गौरवमित्यत: पक्षान्तरमाह--यद्ये-त्यादि।

विभावादीनां या पुनःपुनरनुसन्धानात्मकभावनाडपरपर्याया सम्भूय चर्वणा तस्या महिम्नेत भावः। समाधौ = सविकल्पके समाधौ, निर्विकल्पके वासनिरोधादौ। अत्र च पक्ष आन्तरदौर्बल्यं: स्थायिनः प्रतीतिव्यञ्जनयैव बोध्या। अत्र च वक्तावानन्दस्य विशेष्यतया विषयत्वाद्रसेऽपि तस्यैव विशेष्यत्वमुच्यत इति वस्तुतस्तु इत्यादिनानुपदमेव वक्ष्यति।

तन्मयीभावनं = आनन्दमयीभावनम्। तत्त्वं औपचारिक अनित्यता अन्यत्र भी मानी गई है। जैसे--मीमांसकमत में वर्ण नित्य हैं, कण्ठताल आदि के व्यापारों से वर्ण की अभिव्यक्ति होती, उत्पत्ति नहीं। किन्तु अभिव्यञ्जक कण्ठतालवादिव्यापारके उत्पाद-विनाश का हि अभिव्यज्यमान वर्ण पर आरोप करके वर्ण को भी व्यवहार में अनित्य कह दिया जाता। है। अतः वर्ण की अनित्यता वास्तविक नहीं अपितु औपचारिक हाँ है। अतः औपचारिक रूप में रस को भी अनित्य कह देना असंगत नहीं है। इस प्रकार स्थायिभाव के रसास्वाद से पूर्वं एवं पर काल में विद्यमान रहने पर भी उसका प्रकाशन तथा तक होता जब तक आत्मस्वरूपभूत प्रकाश (और आनन्द) का आवरण नित्त रहता, उसके पहले या बाद में नहीं।

यह आवरणभङ्ग विभावादि की चर्वणा जब से जब तक होती तभी तक होता। इसी लिए सर्वदा स्थायी का प्रकाशन हो नहीं पाता। उक्त मत में विभावादि की सामूहिक रूप में की गई चर्वेणा से प्रादुभूत अलौकिक व्यापार (व्यञ्जना अथवा उसके अतिरिक्त किसी विशिष्ट व्यापार) से आनन्दाकार चित्तवृत्ति के बिना हि आनन्दाक्ष के अव्यरष का भङ्ग बताया गया है किन्तु आनन्दाकारा वृत्ति के बिना उसके आवरण का भङ्ग शास्त्रसम्पत नहीं है।

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जायते, तन्मथीभावनमिति यावत् । आनन्दो ह्ययं न लौकिकसुखान्तरसाधारणः, अनन्तःकरणवृत्तिरूपत्वात् । इत्यं चाभिनवगुप्ततमसम्भटृभट्टादिप्रन्थस्वारस्येन भग्नावरणचिद्विशिष्टो रत्यादिः स्थायी भावो रस इति स्थितम् । वस्तुतस्तु वक्ष्यमाणश्रुतिस्वारस्येन रत्यादिवच्चित्त्रां भग्नावरणा चिदेव रसः । सर्वथैव चास्या विशिष्टात्मनो विशेषणं विशेष्यं वा चिदंशमादाय चानन्दप्रचुर्याद्वत् तत्र वृत्तो बोध्यम् । अनया च वृत्त्यानन्दांशावरणभङ्गे स्वप्रकाशचित्तैव स्वरूपानन्दस्तदुपाधिभूतः; स्थायी च प्रकाशते । अस्याऽऽनन्दस्यालौकिकत्वमाह—वृत्तिरनन्तःकरणवृत्तिसदृशपत्वादिल्यर्थः । लौकिकानन्दो हि केदान्तमतेऽन्तःकरणवृत्तिरूपः। अयं तु आत्मस्वरूपभूतस्तद्विलक्षण इत्याशयः ।

अतः यह् पक्षान्तर उपस्थित किया गया है कि सहृदय की सहृदयता के प्रभाव से की गई विभावादि की सामूहिक चर्वणा से रत्यादि स्थायिभाव से उपहित आत्मस्वरूपभूत आनन्द के आकार की—आनन्दांशाकारा कोई विलक्षण अन्तःकरणवृत्ति हो जाती जिस प्रकार सङ्कल्पक समाधि में योगी की आनन्दाकारा वृत्ति हो जाती है। यहाँ आनन्दाकारा वृत्ति से प्रकाशाकारा वृत्ति भी अपेक्षित है, क्योंकि उसके बिना प्रकाशांश के आवरण का भङ्ग न होने से वह आनन्द प्रकाशित न हो सकेगा। अथवा आनन्दांश और प्रकाशांशा इन दोनों को विषय बनाने वाली एक हीं चित्तवृत्ति मानी जा सकती, क्योंकि अलौकिक विभावादि की सामूहिक चर्वणा से उक्त प्रकार की अलौकिक चित्तवृत्ति सम्भव है। उक्त आनन्दाकार द्रुत्ति का अभिप्राय यह है कि सहृदय का अन्तःकरण आनन्दमय (आनन्द की प्रचुरता से सम्पन्न) हो जाता है। यह आनन्द आत्मा का स्वरूप है, अत एव यह अलौकिक है। इसके विपरीत लोक में जिसे आनन्द कहा जाता है वह तो अन्तःकरण की इष्टवस्तुविशयक एक वृत्ति है। अत एव रसस्वरूप आनन्द लौकिक आनन्द से विलक्षण है। इस प्रकार अभिनव गुप्त तथा मम्मट आदि के ग्रन्थों का स्वारस्य इसी में है कि भग्नावरणा चित् से विशिष्ट रत्यादि स्थायिभाव हाँ रस है। इस पक्ष में प्रधानता स्थायिभाव की है, चित्त की नहीं॥

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नित्यत्वं स्वप्रकाशत्वं च सिद्धम् । रत्याद्यन्धामादाय त्वनित्यत्वमितरभास्यत्वं च । चर्वणा चास्य चिदानन्दावर्णभट्ट एतद् प्रागुक्ता । तदाकारान्तःकरणवृत्तिर्या । इयं च परब्रह्मास्वादानसमाधौविलक्षणा, विभावादिविषयसंवलितचिदानन्दालम्बनत्वात् । भाव्या च काव्यव्यापारमात्रात् ।

विशिष्टस्थायिनो रसत्वपक्षे । विशेष्यमिति च रत्यादिविशेषणाय भग्नावर्णायारविच्छितो रसत्वपक्षे । रसश्चर्व्यंत इति प्रतीतिमस्मिन् पक्षे सङ्गमयनि --चर्वणेत्यादिना । आवरणभट्ट इचाऽऽभास्वरूपत्वाद्धिकरणात्मकः । अधिकरणं चावरणस्याश्रयतया जीवेो विषयतया च सच्चिदानन्दस्वरूपं ब्रह्म । तत्र जीवीत्प्रावरणभट्ट स्येव ब्रह्मसाक्षात्कार उपयोगादुक्तावरणभङ्गस्य जीवरूपत्वाभ्युपगम प्रावश्यक इति रसस्य जीव इत्यर्थः पर्यवस्यति, म चातितमामुपगुक्त ऋतयत आह--तदाकारेति । विभावादिसम्बलितानन्दाकारेष्टव्यर्थः । अत्रान्तःकरणस्य जीवावच्छेदकत्वेन तद्वृत्तेर्योनिवृत्तमुपपनं । इयं च=चर्वणा च रसस्य चित्तवृत्त्यात्मकमा । समाधेः= निर्विकल्पकसमाधेः । द्वैलक्षण्ये हेतुः--विभावादित्यादिः । निर्विकल्पके हि समाधौ निर्विषयं सच्चिदानन्दं ब्रह्म भासते, अत्र तु चर्वणायां सविषयमिति भेदः । भाव्याः=उत्पाद्या । काव्यव्यापारः= व्यङ्गजना । तयैव रत्यादेर्‌विमनालुपम्य प्रतीतियोगित्वोपपन्नात् ।

है । अतः उस रस से कुछ हीन स्तर के काव्यरस में भी प्रधानता उस पारमार्थिक रस —भग्नावर्णा चित्त् की ही माननी चाहिये । अत एव रत्यादि स्थायीभावों से उपहित भग्नावर्णा चित्त् ही रस है । यह रस नित्य और स्वयम्‌प्रकाश है । अभिनव गुप्त आदि के मत में रसस्वरूप—आावरणरहित चित्त् से विशिष्ट रत्यादि में विशेषणीरूत चित्त् को लेकर और रत्यादि से उपहित भग्नावर्णा चित्त् को रस मानने वालों के मत में विशेष्यभूत चित्त् को लेकर रस की नित्यता और स्वयम्‌प्रकाशता स्पष्ट है । इसके अतिरिक्त रत्यादि की, जो प्रथम मत में विशेष्य और द्वितीय मत में विशेषण है, अनित्यता और पर‑प्रकाशता के कारण रस को अनित्य एवं पर‑प्रकाश भी कहा जा सकता है । यह रसचर्वणा निर्विकल्पक समाधि में होने वाले ब्रह्मास्वाद से लक्षण है, क्योंकि रसचर्वणा में विभावादि से सम्बलित सच्चिदानन्द का आस्वाद होता जब कि निर्विकल्प समाधि में शुद्ध —विषयसम्पकं—शून्य सच्चिदानन्द ब्रह्म का आस्वाद होता । यह रसचर्वणा केवल काव्यव्यापार—व्यङ्गजनाव्यापार से सम्पन्न होती । इसका कारण यही है कि जिस रत्यादि का रस में विशेषण के रूप में समावेश कहा गया है वह वासनारूप में ही सामाजिक में विद्यमान होने से आस्वादयोग्य नहीं होता । अतः व्यङ्गजनव्यापार से उसका उद्बोधनं मानना पड़ता है जिससे उसका आनन्द के साट आस्वादन हो सके ।

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अथास्यां सुखांशाभाने किं मानमिति चेत् ? समाधावपि तद्‌द्राने किं मानमिति पर्यन्तुयोगास्य तुल्यत्वात् । 'सुखमात्यन्तिकं यत्‌तद्‌बुद्धिग्राह्यमतिन्द्रियं' इत्यादि: शाब्दोऽस्ति तत्‍त्र मानमिति चेत् ? अस्त्यात्रापि 'रसौ वै सः', 'रसँ ह्वे वायँ लब्ध्वानन्दीभवति' इति श्रुति:; सकलसहृदयप्रत्यक्षं चेतिः प्रमाण-

छेदकक्रीभूतस्य रत्यादेः व्यङ्ग्यजनया प्रतीतियोग्यतापादनमन्तरेण अन्तःकरणवृत्तिस्‍तदाकारता न स्यांत्, अयोग्यस्य वृत्तिविषयत्वात् । अत एव धर्मादीनामन्तःकरणधर्मत्वाद्विशेषेऽप्ययोग्यत्वान्न सुखादिवद् वृत्तिविषयत्वमिति वेदान्तसिद्धान्तः । तथा चोक्तान्तःकरणवृत्तिसिद्ध्यर्थं तद्‌विषये तद्‌योग्यत्वसम्पादनं व्यङ्ग्यजनात्मककार्यव्यापार-मन्तरेण न सम्भवतीत्यतस्तन्मात्रभाव्यत्वमुक्तम् ।

अस्याम् = चित्तवृत्त्यात्मकचर्वणायाम् । मूलाविद्याविनाशां विना SSनन्दभाव-स्थायिभुपगमादियमासांक्षा । चर्वणात्मकाहि चित्तवृत्तिर्‌नं शुद्धचैतन्याकारारा, मूलाविद्यानाशकर्तवं पुनः शुद्धचैतन्याकाराया एव वृत्तेरितयं शङ्कार्थः । 'रसँ ह्वे वायँ लब्ध्वा' इत्याद्या श्रुति: शुद्धचैतन्याकारचित्तवृत्तिविषयिणी, न तु तदितरच्वत्ति-विषयिणीति यद्यप्यते तदाड्‌ग्याह प्रमाणान्तरम्—सकलसहृदयप्रत्यक्षमिति । यथा ब्रह्मानन्देऽनुभवोऽपि प्रमाणं योगिनां तदेवात्रापिति भावः । द्वितीयपक्षे = यद्रे त्यक्त-ब्रह्मानन्देऽनुभवोऽपि प्रमाणं योगिनां तदेवात्रापिति भावः ।

इस चित्तवृत्तिस्वरूप रसचर्वणा में आनन्द का भाव कैसे होता—यह प्रश्‍न तो समानरूप में निर्विकल्प समाधि में मान्य आनन्द के भाव के विषय में भी है । अतः जिस आधार परं उक्त समाधि में आनन्द का भाव होता उसी आधार पर रसचर्वणा में भी आनन्दांश का भाव मानना चाहिए। यदि कहा जाय कि 'योऽतीन्द्रिय', 'आत्यन्तिक सुखं वह बुद्धिवृत्त्ति से ग्राह्य होता'' यह गीतावचन तथा इसी के समानार्थक वचनान्तरित समाधिकाल में आनन्द के भाव में प्रमाण हैं तो रसचर्वणा में भी आनन्दांश के भाव के प्रमाण ''वह आत्मा तो रस हीं है'', ''रसस्वरूप सम्पन्न होता'' इत्यादि श्रुतियाँ हैं । इसके अतिरिक्त, सच्चिदानन्द ब्रह्म के समान सभी सहृदयों का साक्षात्कारात्मक अनुभव भी इसमें आनन्दांशाभान का प्रमापक है हीं । अतः रसचर्वणा में आनन्द-भाव अप्रमानिक नहीं है । पूर्वोक्त द्वितीयपक्ष में जो स्थायिभुपहित आनन्द के आकार में चित्त की वृत्ति को रसचर्वणा

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दृयम्। येयं द्वितीयपक्षे तदाकारचित्रवृत्त्यात्मिका रसचर्वणोपन्यासता सा शाब्दव्यापारभाध्यत्वाच्छन्द्री। अपरोक्षसुखालम्बनत्वाच्चापरोक्षात्मिका तत्स्वंवाच्यजवुद्धिवत्। इत्याहुरभिनवगुप्ताचार्यपादा:॥

पक्षे, वस्तुतस्त्वत्यादिपक्षे वा। अथवा वस्तुतस्त्वत्यादिपक्षे प्रथमं चिद्विग्रहणाङ्गरणभङ्गस्य चर्वणापाद्यत्वं निरूप्य पश्चात् स्थाय्युपहितानन्दाकारचिच्चमत्कृते: तन्नान्त्र्यम्। पक्ष एव चर्वणास्वरूपविपयोत्कृष्ट द्वितीयपक्ष:। स्थाय्युपहितानन्दाकारचिच्चमत्कृतेस्तद्वृत्तित्र तदाकारचित्तवृत्तिशब्देन विवक्षित। शाब्दव्यापारेत्यादि। मण्टोदर काव्यात्मक:, तेन स्वगतवृजजनव्यापारदार्शा भाध्यत्वादृ भाननापरपर्यायचर्वणा-विषयीकरणादित्यर्थे:। व्यङ्ग्यनापादितभानानयोग्यतयाेन स्थायिनोपहिततस्यैवानन्दस्य चर्वणाविषयत्वादेतदुक्तम्। शाब्दी = शब्दप्रमाणजन्या। तथा स तस्याश्चर्वणायाया: कथं न परोक्षत्वमित्याशङ्क्य यत्र विपयस्वभावकृते परोक्षत्वादपरोक्षत्वे, न पुन: प्रमाणस्वभावकृते इति 'दशमस्त्वमसि' इत्यादौ प्रसिद्धमिति विवरणकृत्वानुसारेण समाधत्ते—अपरोक्रेत्यादि। सुखस्य ब्रह्मस्वरूपानानन्दस्य 'यत् साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म' इत्यादिदर्शिते-रपरोक्रत्वमिति हृदयम्। तत्र श्रुतो 'अपरोक्राद' इत्यस्यापरोक्षमित्यर्थो वेदान्तसम्प्रदायप्रसिद्ध एव। उत्कार्थे एव श्रोत्रं दृष्टान्तमाह—तत्त्वमित्यादि। 'तत्त्वमसि' जन्याप्यपरोक्रब्रह्मविषयत्वादपरोक्षा तथैव प्रकृतवृत्तिरपीतित भाव:। तत्त्वमित्यस्य राथे बहुवचनम्॥

सम्प्रति भट्टनायकस्य भरतवच्याभ्यां तृतीयवन्यतमतस्य मतमुपनयत्यति-भट्टे त्यादिना॥

कहा गया है वह काव्यात्मक शब्द के व्यापार—व्यञ्जना व्यापार द्वारा जन्य होने से शाब्दी—शब्दप्रमाणजन्या है, किन्तु इसके विषय आनन्द के स्वत: अपरोक्र होने से यह चर्वणा अपरोक्रस्वरूप है। वेदान्त-सम्प्रदाय में विवरणकार के अनुुसार ब्रह्म-ज्ञान (=ब्रह्माकारा चित्तवृत्ति, चित्त की ब्रह्म-प्रवणता) 'तत्त्वमसि' आदि उपदेशवाक्य से होता है, किन्तु ब्रह्म के अपरोक्र होने से वाच्यजन्य होने पर भी वह ज्ञान परोक्ष न होकर अपरोक्रात्मक होता है। उनके मत में ज्ञान का परोक्रत्व या अपरोक्रत्व प्रमाण के स्वभाव पर निर्भर नहीं अपितु विषय के स्वभाव पर निर्भर होता! अतः शाब्द ब्रह्म-ज्ञान की तरह शाब्दी रसचर्वणा भी अपरोक्रात्मक है। अभिनव गुप्त का रस के विषय में यही मत है॥ भरत नाट्यशास्त्र के अन्यतम व्याख्याकार भट्टनायक का रसास्वाद के

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ताटस्थ्येनैति। तटस्थो नाटये नटः, श्राव्ये च दुष्यन्तादिः, तत्र निष्ठत्वेन परगतत्वेनैत्यर्थः ! अनास्वादत्वमित्यस्य सामाजिकानामिति शेष इति प्राचीनां व्याख्या । वस्तुतस्तु ताटस्थ्यं हेतुस्तत्रानास्वादत्वस्य ! यदि परगतत्वेन रत्यादिः प्रतीयेत तर्हि सामाजिकानां तदास्वादो न स्यात्, तेषामपकृष्टत्वे 'परसम्पदु त्कर्षों हीनसम्पदं हु:खाकरोटि' इति स्वभावादत्रादिविषये सामाजिकानां मात्सर्यं शोकादिविषये त्वानन्दोज्नुभूयतेति अनभवविपर्यय: स्यात् । अथ सामाजिकानामत्कृष्टानामेव महद्रतत्वं तदास्वादपि परगतत्वेन रसप्रतीतौ 'दुष्यन्तः शकुन्तलाविषयकरतिमान्' इति सामाजिकप्रतीत्या रत्यादौ स्वगतत्ववाधत्तत औदासीन्यमपच्येत सामाजिकानामिति नात्र पक्षे रसस्य सामाजिकास्वादविषयत्वमुपपद्यते इत्येवं योजनीयो ग्रन्थः । अत्र चात्मगतत्वेनैति परकलानुरोधेन परगतत्वेनैति पूरणीयम् । ताटस्थ्यस्यैव परगतरत्यादिविषयकप्रतीत्यन-श्रयत्वे सामाजिकानां हेतुत्वं भट्टनायकमतानुवादपरकेण लोचनप्रस्थेनाडपि — 'ननूत्क भट्टनायकैरुच्यते—यदा परगततया प्रतीयेत तर्हि ताटस्थ्यमेव स्यात्' इत्यादिना स्पष्टतम् । अत्र च रसशब्द: स्थाय्यर्थकः, आस्वाद्यत्वं रसतत्वम्, अनास्वाद्यत्वम् रसतत्वाभावः । परगतत्वे रत्यादेः सामाजिककेष्यो रसत्वं न स्यात्, तेषां तत्रौदासीन्यादिति भावोडस्य ग्रन्थस्य । पूर्वव्याख्यायान्तु ताटस्थ्यपदार्थस्वर सभझोडपि । आधुनिकं विवरणं विचारनीयम् ।

विषय में यह मत है—"रस की प्रतीति होती है—यह कहना असंगत है, क्योंकि इसके दो हीं अर्थ हो सकते हैं—(क) रस की प्रतीति दुष्यन्त आदि नायकों को होती या (ख) सामाजिक को होती । किन्तु ये दोनों हीं अर्थ असंगत हैं । यदि रस की प्रतीति सामाजिक को न होकर दुष्यन्त आदि को होती—यह माना जाय तब तो सामाजिक में उससे उदासीनता (तटस्थता) आ जाएगी, फलतः वह रत्यादि सामाजिकों का आस्वाद्य न हो सकेगा । ऐसी स्थिति में अनास्वाद्य रत्यादि को सामाजिक के लिए रस कहना सम्भव न हो सकेगा, क्योंकि जो आस्वाद्य है वही तो रस है । अतः रसप्रतीति सामाजिक से भिन्न व्यक्ति—दुष्यन्तदि को होती—यह नहीं कहा जा सकता । अब रही बात सामाजिक द्वारा रसप्रतीति की । किन्तु विचार करने पर इसमें भी संगति नहीं दीखती, क्योंकि जब दुष्यन्त की पत्नी शकुन्तला सामाजिक के लिए विभाव का रूप हीं प्राप्त नहीं कर सकती तो फिर सामाजिक में शकुन्तलाविषयक रति कहाँ से हो सकती ? बिना विभाव के तो रति हो नहीं सकतीं, अतः सामाजिक को रसास्वाद असम्भव है । अब यह प्रश्न है—विभावतावच्छेदक से अवच्छिन्न पदार्थ हीं विभाव होता । विभावतावच्छेदक कान्तात्व, वह जब शकुन्तला में भी है हीं तो फिर वह साम-जिक के लिए विभाव क्यों न हो सकती ? इसका उत्तर यही है कि केवल (सर्व-कान्ता-साधारण) कान्तत्व विभावतावच्छेदक हो नहीं सकता, क्योंकि तब तो

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त्वेन तु प्रत्ययो दुष्टः, शकुन्तलादीनां सामाजीकरणप्रत्ययविभावत्वात् विनां विभावमनालम्बनस्य रसादेरप्रतिपत्तेः। न च कान्तात्वं साधारणं विभावतावच्छेदकमात्राप्यस्तीति वाच्यम्‌। अप्रामाण्यनिरूप्याणालिङ्गिताद्गम्यादात्मप्रकारकज्ञानविरहस्य विशेष्यतासम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकस्य

आत्मगतत्वेन रत्यादिप्रतीतिं निरस्यति—आत्मगतत्वेनैल्यादिना। साधारणं सकलकान्तासाधारणम्‌। साधारणविभावत्वविच्छेदकैकिमत्यपक्षे:, विभावतावच्छेदकस्य विभावमात्रसाधारणयेन व्यावर्त्याभावात्‌, विभावादिरिकतेनोभयात्मकमानत्वेन च साधारण्याभावात्‌ साधारण्यस्य तद्विशेषगतवानुपपत्तेः। अत एव लोचने 'कान्तात्वं कान्तावसस्य विभावतावच्छेदकत्वे तदवच्छिन्ने विभावस्वमध्याहृतमित्याशङ्कार्थः। अप्रामाण्येत्यादि। इयमगम्या इत्याकारकं ज्ञानमगम्यात्मप्रकारकं ज्ञानम्‌। तत्रेदमपदेनोपसिथता कान्ता विशेष्यभूता। तथा च तस्या विषय इयमगम्येति ज्ञानं भवति तस्यां विशेष्यताविषयतासम्बन्धेन इयमगम्येति ज्ञानं वर्तते, यस्यां पुनरियंमगम्येति ज्ञानं न भवति तस्यां विशेष्यताविषयतासम्बन्धेनैयमगम्येत्याकारकस्य ज्ञानस्य विरहो वर्तते। यस्य च विरहः=अभावः स तस्याभावस्य प्रतियोगी। प्रकृते चेयमगम्येत्याकारकज्ञानस्याभावो विवक्षित इति तादृशं ज्ञानं प्रतियोगी भवत्यस्याभावस्य। तादृशे ज्ञाने च प्रतियोगिता, तादृशं ज्ञातत्वं च प्रतियोगितादवच्छेदको धर्मः। येन च सम्बन्धेन कश्चिदभावो ग्राह्यः स सम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकः, स च सम्बन्धोऽपि वच्छेदकः। येन च सम्बन्धेन प्रतियोगिता तेनैव सम्बन्धेन तदभावो

सामाजिक के लिए उस कान्तत्व से युक्त होने के कारण उनकी वहन एवं अन्य कान्ताएँ भी विभाव हो जाएंगीं। इससे महान्‌ अनर्थ होगा। अतः 'विशेष्यतासम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक अप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दितागम्यात्मप्रकारकज्ञानाभाव से विशिष्ट कान्तात्व' को हीं विभावतावच्छेदक मानना उचित है। इसका तात्पर्य यही है कि जिस कान्ता के विषय में सामाजिक को 'यह गमन करने योग्य नहीं है' इस प्रकार का प्रात्त्मक बोध अथवा 'यह गमन करने योग्य है या नहीं' इस

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प्रथमामतम्

प्रकार का संशयात्मक बोध होता हो उससे अन्य कान्ता हीं विभाव हो सकती है। उक्त विभावतावच्छेदक का विश्लेषण इस प्रकार करना चाहिए—अगम्यात्मक है प्रकार (=विशेषण) जिस ज्ञान में उसे 'अगम्यात्मकप्रकारक ज्ञान' कहा जाता । इसका स्वरूप है—'इयम् अगम्या'। किसी भी विषय के ज्ञान के विषय में तीन कोटियाँ सम्भावित हैं—प्रमात्वनिश्चय—'इदं ज्ञानं प्रमैव', प्रमात्वसंशय—'इदं ज्ञानं प्रमा न वा ?' (इसी को अप्रमात्वसंशय भी कह सकते, क्योंकि एक कोटि तो प्रमात्वसंशय में अप्रमात्व हीं है) और अप्रमात्वनिश्चय—'इदं ज्ञानम् अप्रमैव'। अतः 'इयमगम्या' इस ज्ञान के विषय में भी उक्त तीन कोटियाँ हो सकती हैं—(क) 'इयमगम्या'—इति ज्ञानं प्रमैव', 'इयमगम्या'—इति ज्ञानं प्रमा न वा ?' और 'इयमगम्या'—इति ज्ञानमप्रमैव ।' इनमें प्रथम को प्रामाण्यनिश्चयालिङ्ङितागम्यात्मकप्रकारक ज्ञान, द्वितीय को प्रामाण्यसंशयालिङ्ङितागम्यात्मकप्रकारक ज्ञान अथवा अप्रमाण्यसंशयालिङ्ङितागम्यात्मकप्रकारक ज्ञान और तृतीय को अप्रमाण्यनिश्चयालिङ्ङितागम्यात्मकप्रकारक ज्ञान कहा जाता । यह भी ज्ञातव्य है कि निश्चय यथार्थ भी हो सकता है और अयथार्थ भी । अब यह स्पष्ट है कि उक्त तीनों ज्ञानों में प्रथम और द्वितीय ज्ञान को 'अप्रमाण्यनिश्चयानालिङ्ङितागम्यात्मकप्रकारक ज्ञान' कहा जा सकता है। उक्त त्रिविध अगम्यात्मकप्रकारकज्ञानविषयक प्रमात्वनिश्चय आदि में से प्रथम या द्वितीय प्रकार के होने पर रति सम्भव या उचित नहीं है । अतः उक्त दोनों हीं प्रकारों के ज्ञान का अभाव जिस कान्ता के विषय में होगा वहीं उक्त विभावतावच्छेदक धर्म में रहेगा और वही कान्ता सामाजिक की रति का विभाव हो सकती है, अन्य, अर्थात् जिसके बारे में प्रथम या द्वितीय प्रकार का अगम्यात्मकप्रकारक ज्ञान हो वह, विभाव नहीं हो सकती । इस प्रकार प्रथम और द्वितीय इन दोनों के अभाव को स्वतन्त्ररूप में व्यक्त करने पर दो अभाव कहने पड़ते । इन दोनों का समावेश करने के लिए 'अप्रमाण्यनिश्चयानालिङ्ङितागम्यात्मकप्रकारकज्ञानाभाव' कहा गया है ।

अब यह विचारणीय है कि इस अभाव को विभावतावच्छेदक में विशेषणरूप में कैसे रखा जाय, क्योंकि विभावतावच्छेदक ( चाहे उसका विशेषणांश हो या विशेष्यांश) को विभावता के अधिकरण—विभाव में रहना हीं चाहिए। 'इयमगम्या' यह ज्ञान समवाय सम्बन्ध से सामाजिक में आश्रित है, अतः यदि सामाजिक में यह ज्ञान उत्पन्न नहीं होता तो इस ज्ञान के अभाव की ( इसी ज्ञान में रहने वाली ) प्रतियोगिता का अवच्छेदक समवाय समवाय होगा, क्योंकि जिस अधि करण में प्रतियोगी (=जिसका अभाव विवक्षित हो वह पदार्थ) जिस सम्बन्ध से रह सकता उस अधिकरण में उसके अभाव को भी, यदि किसी द्विशेष सकक्न्ध का द्विदेश न

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तेऽति भवति तादृशानविरहो विशेष्यतासम्बन्धविषयतासम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकः । यद्यप्यमगम्येत्याकारकज्ञानविरहः समवायेन नायकेऽपि वत्सलते तथापि विभावभूतायां कान्तायां विद्यमान एव तादृशानविरहो विभावतावच्छेदककोटौ निवेश्यः, न त्वादृशः, व्यधिकरणत्वात् । अतः 'विशेष्यतासम्बन्धः समवायः' इति नांङ्गशास्त्रनिर्णीत्या । इयमगम्येतिज्ञानविपये इदं ज्ञानं प्रमेयाकारकः प्रमाणत्व- (प्रामाण्य)-निर्णयः; इदं ज्ञानं प्रमाणं न वेत्याकारकः । प्रमेयत्वसंसर्गोऽप्रमेयत्वसंसर्गो वा, इदं ज्ञान-मगम्येत्याकारकोऽप्रमाणत्वनिश्चय इहैव त्रिविधं ज्ञानं सम्भवति । तत्र प्रथमे इयमगम्येति निश्चित्य:, द्वितीयेऽपि अनन्यसंसायान्न रत्युदयः, तृतीये तु भवत्येव रत्युदयः । यद्यपि इयमगम्या न वेति संशयस्त्वेदपि शकुन्तलादौ दुष्यन्तादे रतिरुदिता तथापि स रत्याभास एवेति न दोषः । यद्वा 'असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा'

किया हो तो, उसी सम्बन्ध से माना जाता है । दूसरे शब्दों में, अन्योन्याभाव ( भिन्नता ) से अतिरिक्त अभाव को संसर्गाभाव कहा जाता । इसमें एक पदार्थ (प्रतियोगी) के अधिकरण विशेष (अनयोगी) में उस संसर्ग का प्रतिषेध किया जाता है जिस संसर्ग से प्रतियोगी का अनुयोगी में अस्तित्व सम्भावित हो । यही संसर्गाभावीयप्रतियोगितावच्छेदक संसर्ग कहलाता । इससे स्पष्ट है कि सामाजिक, जिसमें 'इयमगम्या' यह ज्ञान उत्पन्न नहीं होता उसमें समवायसम्बन्धावच्छिन्न-प्रतियोगिता अगम्यत्वप्रकारकज्ञानाभाव रहेगा । किन्तु यह अभाव विभावनावच्छेदककोटि में विशेषणरूप से प्रविष्ट हो नहीं सकता । अतः इस अभाव को उस रूप में व्यक्त करना है जिससे यह विभाव में आश्रित हो । इसलिए ग्रन्थकार ने समवायसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक उक्त अभाव का निवेश न कर विशेष्यतासम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक अगम्यत्वप्रकारकज्ञानाभाव का निवेश किया है । इसका तात्पर्य यह है—'इयमगम्या' यह अगम्यत्वप्रकारक ज्ञान समवाय सम्बन्ध से तो सामाजिक में अवश्य रहता, परन्तु जिस कान्ता के विषय में यह ज्ञान होता उस कान्ता-स्वरूप विषय में भी यह ज्ञान विषयता सम्बन्ध से रहता ही है । विषय तीन प्रकार के होते हैं—विशेषण, विशेष्य और दोनों का संसर्ग । इसलिए विशेषण में विशेषणताश्रय या प्रकाताश्रय विषयता रहती, विशेष्य में विशेष्यताश्रय विषयता और संसर्ग में संसर्गताश्रय विषयता । अत एव विषयतासम्बन्ध

९. निर्विकल्पक ज्ञान में विशेषण आदि का भान न होने से उस ज्ञान की विषयता स्वतन्त्र प्रकार की होती है।

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इत्यादिनाड्गस्म्यात्वप्रकारकज्ञानेडप्रमाण्यनिश्चये जात एव रत्युदय इति मन्तव्यम् ।

के तीन भेद हो जाते—विशेषणतादृश्य (या प्रकर्तातादृश्य) विषयतासम्बन्ध, विशेष्यतादृश्यविषयतासम्बन्ध और संसर्गतादृश्यविषयतासम्बन्ध । यतः 'इयमगम्या' इस ज्ञान का विषयीभूत कान्ता उस ज्ञान में विशेष्य है अतः उस कान्ता में उक्त ज्ञान विशेष्यतादृश्यविषयतासम्बन्ध से रहेगा । इसके विपरीत जिस कान्ता के विषय में 'इयमगम्या' यह ज्ञान नहीं होता उस कान्तास्वरूप विषय में उक्त ज्ञान के अस्तित्व का अभाव विशेष्यतादृश्यविषयतासम्बन्ध से हीं रहेगा । इसलिए

एपु च ज्ञानेऽपु प्रतिफलितेऽपु प्रथमद्वितीये त्वप्रमाण्यनिश्चयालिङ्गिते ।

उम कान्ता में रहेगा जिसके विषय में 'इयमगम्या' इस प्रकार के अप्रामाण्यनिश्चितज्ञानालिङ्गितज्ञान — (क) 'इयमगम्या—इति ज्ञानं प्रमा न वा ?' ये दोनो ज्ञान—न हुए हों । अतः स्पष्ट है कि 'विशेष्यताख्यविषयतासम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक अग्रमाण्यनिश्चयानलिङ्गितज्ञानाभाव-विशिष्ट कान्तात्व' को हीं विभावतावच्छेदक मानना उचित है ।

अत एतयोर्न्यतरस्यापि सत्त्वे रत्युदयाभावाद अनयोर्भावः कान्ताविष्ये रत्युदयेडपेक्ष्यत ।

यतः शकुन्तला दुष्यन्त की प्रियतमा है अतः उसके बारे में प्रमाण्यनिश्चयानलिङ्गित ( = अप्रामाण्यनिश्चयानलिङ्गित) अगम्यात्मप्रकारकज्ञान का अभाव नहीं ।

अनन्यस्तु निश्चयः स्वयमेव रत्युदयहेतुरिति तस्याभावो नापेक्ष्यतस्तत्नेत्रि हेतोः

अत एव शकुन्तला में सामजिक की दृष्टि से उक्त विभावतावच्छेदक के विशेषण उपयुक्तज्ञानाभाव के न रहने से उससे विशिष्ट कान्तात्व (विभावतावच्छेदक) नहीं रहता, अतः विभावता भी नहीं रहती ।

प्रथमद्वितीयौ ज्ञा नाभावयोलङ्गवेन संग्रहाय अप्रामाण्यनिश्चयालिङ्गितेति विशेषणम् ।

फिर शकुन्तला सामाजिक की रति का विभाव कैसे

अग्रामाण्यनिश्चयस्य प्रमाणत्वका भवेदविशेषण रत्युदयहेतुः ।

अत एव वस्तुतोऽङ्गस्म्यायामपि इयमगम्येत्याकारकं ज्ञानमप्रमेति भ्रमात्मकप्रामाण्यनिश्चये रत्युदयो भवत्येव ।

अगम्यात्मप्रकारकरकं ज्ञानमुपपत्तमु, न त्वगम्यात्मप्रकारकनिश्चयः तथाविधः संशयो वेति बोध्यम् ।

अनयाहभयोरपि रत्युदप्रतिबन्धकत्वादुभयसंग्रहाय अगम्यात्मप्रकारकं ज्ञानमुपपत्तमु

लिङ्गितज्ञानाभावे इयं गम्येति ज्ञानसत्त्वे रते: सम्भवादभावमुखेन निवेशः ।

तदेवमेतत् पर्यवसितम्—न केवलं कान्तात्वं विभावतावच्छेदकमपि तु विशेष्यतादेवमेतत् पर्यवसितम्

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विभावतावच्छेदककोटाववश्यं निवेशयत्वान् । अन्यथा स्वसादेरपि कान्तात्वादिना तत्वापत्ते: । एतद्रशोच्यत इति कापुरुषत्वादिज्ञानविरहस्य तथाविधस्य

स्वविषयतासम्बन्धाविच्छिन्नतडप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितागम्यात्वप्रकारकज्ञाने त्वाव - च्छिन्नप्रतियोगिताकाभावविशिष्टं कान्तात्वम् । शकुन्तलादौ: परकीयत्वेन तत्रै- यमगम्ये त्याकारकमगम्यत्वप्रकारकं ज्ञानं प्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितं सदप्रामाण्यनिश्चयालिङ्गितमपि तत्सविषयप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितागम्यत्वप्रकारकज्ञानविशेषणं न तु तद्विरह इति विभावतावच्छेदकविशेषणीयभूतस्य तादृशज्ञानविरहस्याद्‌स्त्वाद्विशिष्टस्य विभावताडवच्छेदकस्याऽऽत्मनि मति न शकुन्तलादौ परकीयत्वादिकायां सामाञ्जिकान् प्रति विभावत्वमिति ।

विषयतासम्बन्धस्य वृत्तिनियमकत्वमभिप्रेत्यैव निवेशो विभावतावच्छेदककोटौ संगत: । तस्य वृत्तिनियमकर्त्तवे तु आप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दितागम्यात्वप्रकारकज्ञानविशेष्यत्वभावाविशिष्टं कान्तात्वमेव तथ्येति बोधयम् । एवं चाडभावस्तदात्म्येन कान्तायां वर्तमान: । तादृशविरहस्य विभावतावच्छेदककोटानिवेशेऽतिप्रसङ्गमाे—अन्यथेति ।

तत्वापत्ते:=विभावत्वापत्ते: । रसाद्‌तरेऽपि विभावतावच्छेदकस्वरूपनिरूपणमनयैव रीत्येत्याह—एवमिति । तथाविधस्य = विशेष्यतासम्बन्धाविच्छिन्नप्रतियोगिताकप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितागम्यत्वप्रकारकज्ञानविशेषणाभावप्रयुक्तविशिष्टाभाव:

हो सकती ? शकुन्तला के समान हीं अपनी बहन तथा अन्य सपिण्ड-सगोत्र स्त्रियों में भी उक्त ज्ञानाभावस्वरूप विशेषण के न रहने से विशेषणाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव

स्वरूप विभावतावच्छेदकाभाव है ।

इस प्रसंग में यह् भी ज्ञातव्य है कि पूर्वोक्त प्रामाण्यादिनिश्चय यथार्थ भी हो सकते हैं, अयथार्थ भी । अतः यदि किसी गम्या स्त्री के विषय में किसी को पहले

'इयमगम्या' यह बोध हो और सोचने पर उसे यह प्रामाण्यक प्रामात्वनिश्चय हो जाय—'इदं ज्ञानं प्रामैव' तो उसमें रति नहीं हो सकती । इसके विपरीत, यदि

किसी अगम्या स्त्री के विषय में किसी को पहले 'इयमगम्या' ज्ञान हो और पीछे

९. विशेषण्युक्ते विशेष्य को अभाव (=विशिष्टाभाव) केवल विशेषण के, केवल विशेष्य के और दोनों के अभाव के आधार पर भी माना जाता है । प्रथम

को विशेषणाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव, द्वितीय को विशेष्याभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव और तृतीय को उभयभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव कहते । नील-

घटविशिष्ट भूतल में रक्त घट का अभाव, उसी भूतल में नील पट्ट का अभाव और उसी भूतल में रक्त पट्ट का अभाव क्रमश: उक्त तीनों विशिष्टाभावों के

उदाहरण हैं ।

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करुणरसादौ । तादृशज्ञानानुत्पादस्तु तत्प्रतिबन्धकान्तरनिर्वचनमन्तरेण दुरुपपादः । स्वात्मनि दुष्यन्ताद्भेदबुद्धिरेव तथेतित चेत् ? न,

लिङ्गितादृशोच्यतत्वकापुरुषत्वप्रकारकज्ञानविरहवविशिष्टपुरुषत्वादे: करुणरसादौ विभावतावच्छेदकत्व वाच्यमितर्यः। शकुन्तलादौ सामाजिकानाम् इयमगम्येत्याकारकाप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितज्ञानानुत्पाद एव कथम् न भवतीत्याशङ्क्यमाह-- तादृशोति । निर्वचनमिति । एतेन योग्यस्य तादृशज्ञानोत्पादप्रतिबन्धकस्याभावः सूच्यते । यस्य पुनःशृङ्गारादिदर्शना तदविधज्ञा नानुदयो दृष्टस्तस्य रतिरेव नोत्पद्यत इति न तस्यापि विभावः शकुन्तलादिरिति बोध्यम् । तथा च योग्यप्रतिबन्धकाभावसहकृतोत्पादसामग्रीसत्त्वात् परकीयत्वादिविषये तथाविधं ज्ञानं जायते एवं सभ्यानाम-मिति न शकुन्तलादौ तेषां विभावत्वमिति निष्कर्षः । जगन्मातृत्बेनाभिमते सीतादौ

चलकर उसे यह भ्रमात्मक अप्रामाण्यनिश्चय हो जाय—‘इदं ज्ञानमप्रमैव’ तो उसमें रति हो हीं सकती है।

इस सन्दर्भ में एक विषय पर ध्यान देना आवइयक है—विषयतासम्बन्ध वृत्तिनियामक (जिस सम्बन्ध से किसी पदार्थ का किसी अधिकरण में रहना प्रसिद्ध हो वह सम्बन्ध) है या नहीं—यह विवादग्रस्त है । अतः विशेष्यतास्वविषयता-सम्बन्ध की वृत्तिनियामकता मानने पर तो उक्त वर्णनं उचित है । किन्तु इसे वृत्ति-नियामक न मानने पर विभावतावच्छेदक का स्वरूप होगा—अप्रामाण्यनिश्चयानलिङ्गितागम्यत्वप्रकारकज्ञानविशेष्यत्वभावविशिष्ट कान्तात्व । इस पक्ष में अभावीय प्रतियोगितावच्छेदक सम्बन्ध होगा तादात्म्य । अतः निष्कर्ष यह है कि वही कान्ता विभाव हो सकती है जो अगम्यत्वप्रकारक ज्ञान का विशेष्य न हो ।

शृङ्गार के समान हीं करुण के प्रसङ्ग में अप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गिताशोच्यत्व-प्रकारकज्ञानाभावविशिष्ट पुरुषत्वादि को, वीररस के प्रसङ्ग में अप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितकपौरुषत्वज्ञानाभावविशिष्ट पुरुषत्वादि को विभावतावच्छेदक समझना चाहिए । प्रतियोगितावच्छेदक सम्बन्ध का स्वरूप पृथक् है । अतः स्पष्ट है कि शकुन्तलादि सामाजिक के लिए विभाव नहीं हो सकते; क्योंकि उनके विषय में उक्त अगम्यत्वप्रकारकज्ञानं हीं उत्पन्न होता, उसका अभाव नहीं । हाँ, यदि कोई योग्य प्रतिबन्धक होता तो शकुन्तलादि के विषय में उक्त ज्ञान उत्पन्न न होता और वे विभाव हो जाते । किन्तु विचार करने पर कोई वैसा प्रतिबन्धक प्रस्तुत किया नहीं जा सकता । यह तो सम्भव नहीं कि सामाजिक नाटघादि देखते-पढ़ते समय यह भूल जाते कि वे दुष्यन्त से भिन्न हैं, क्योंकि दुष्यन्त आदि के कुछ अलौकिक गुणों—धैरोदात्तता, साम्राज्य-सम्पन्नता आदि आदि—के अपने में अभाव

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नायके . धराराधौरेयतवधीरत्वादेरात्मनि चाध्युनिकलवादेवैधर्म्यस्य स्फुटं प्रति· पत्तेरभेदबोधस्यैव हुलेभत्वात् । किं च केयं प्रतीति: ? प्रमाणान्तरानुपस्थानाच्छावीति चेत् ? न । व्याव- हारिकशब्दान्तरजन्यनायकमिथुनवृत्तान्तवित्तीनामिवारस्या अप्यहृद्यत्वापत्तेः ।

होने से वे अपने को हृद्यंत आदि से अभिन्न कैंस समझ सकत ? अतः नायक से अपने को अभिन्न समझने के कारण भी शकुंतला आादि को सामाजिक की रति का विभाव मानना असंभव है । अतः रस की स्वगत प्रतीति भी नहीं हो सकती ।

सामाजिकान् प्रत्यविभावत्वंन्तु इतोडपि स्फुटत एव । तथा = तादृशज्ञानोत्पादप्रति बन्धकः । वैधर्म्यस्यैव । एतदुपलक्षणमलोकसामान्यस्य नायकादिगतधर्ममेवैधर्म्यंस्य । तथा च यद्यपि धराराधौरेयत्वादेरनायकधर्मेण्य कमिचित्सामिकेडपि सम्भव इति तत्राभेदप्रतीति: शक्यया स्वीकर्तुं तथापि रामादेरशौौःकगुणसम्पत्तस्य साधर्म्यं न लोकिकेषु पुरुषेषु सम्भवतीत्यभेदबुद्धिस्तत्र नायकसामान्योरूज्ञानसम्पादयेदेति नात- भेदबुद्धिमादाय तादृशज्ञानोत्पादप्रतिबन्ध इत्याशयः ।

उक्त रीति से प्रतीति के परगत या स्वगत न होने से उस पक्ष का निराकरण कर अब भट्टनायक उपयुक्त प्रमाण न होने से भी रसप्रतीति-पक्ष का खण्डन कर रहे हैं, क्योकि परगत रत्यादि की सामाजिक को बाह्य प्रत्यक्ष तो हो नहीं सकत, कारण आंतरिक पदार्थ चाहे स्वगत हो या परगत वह वोह्ये न्द्रिययोग्य होता हैं नहीं । यदि चेष्टा आदि से उसकी अनुमति हो भी तो भी उसमें अलौकिकता नहीं आ सकती ।

एतावता परगतत्वेन स्वगतत्वेन च रसप्रतीतेरशक्यत्वमुपाध्य प्रतীতिरपि पर- भिमताया अलौकिककाव्यव्यापारानपेक्षलौकिकप्रमाणवेद्यत्वे अहृद्यत्वापत्तिमुखेन अनु- कत्वं प्रतिपादयन् 'प्रतीयते रस:' इति पक्षं निराकर्तु काम आह— किंचेत्यादि । प्रमाणान्तरं शाब्दातिरिक्त प्र प्रत्यक्षादि, वृत्तान्तः = काव्याश्रितो दृश्यप्रतिरूपक प्रत्यक्षादेरपि न व्याव- हारिकशब्दान्तरेऽपि । एतच्चोपलक्षण लोैकिकप्रमाणमात्रस्य प्रत्यक्षादेरपि अहृद्यत्वापत्ते रिति । एतच्चाडSहृदयत्व भट्टनायकस्य ह्यापयति, यतां हि भोज- भेदेन शाब्दप्रतीतिरपि हृदयत्वस्य सर्वानुभवसिद्धत्वात् । अथवा यादृशं हृदयत्वमलौ-

काव्यालंकारिक शब्द-प्रमाण से प्रतीति मानने पर भी अलौकिकास्वाद की समस्या पूर्ववत् बनी रहेगी, क्योकि इतिहास-पुराणादि के वाक्यों से होने वाली नायक-नायिका के प्रेमाख्यान की प्रतीति मे अलौकिक आनन्द किसी को नहीं मिलता । उक्त रसादि की मानस-प्रतीति होती है (सामाजिक को)—यह कथन भी

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नापि मानसौ, चिन्तोपनीतानां तेषामेव पदार्थानां मानस्या: प्रतीतिरस्या वैलक्षण्योपलम्भात् । न च स्मृति:, तथाप्रागनुभवात् ।

तस्मादभिधया निवेदिता: पदार्था भावकत्ववग्यापारेणाड्गम्यत्वादिरस-

किं रसप्रतीतावनुभवसिद्धं सहृदयानां तादृशं हृदयत्वं शब्दात् तत्प्रतीतौ न स्यादि- त्याशङ्क्येनदम् । तादृशालौकिकं हृदयत्वं मानस्यानपि तत्प्रतीतौ न स्यादित्याशयेनाह- नापि स्मृति: । चिन्तेत्यादि । पुनः पुनरनुसन्धानं चिन्ता, तयोपनीतानां ज्ञान- लक्षणसन्निकृष्टानां काव्यार्थानां शकुन्तलादीनां विभावत्वादिना मानस्यान् प्रतीतौ यथा नानौकिकं हृदयत्वं तथैव रसस्यापि मानस्यान् प्रतीतौ न स्यात्, ध्येयते तु न तु ।

सम्भव नहीं, क्योंकि एक तो दूसरे के रत्यादि आन्तरिक पदार्थों का सामाजिक को मानुष प्रत्यक्ष हो नहीं सकता और दुसरे, पुनः पुनः अनुसन्धान किये गये काव्यार्थ-भूत शकुन्तलादि की विभावादिरूप में होने वाली मानस-प्रतीति में वह आनन्द नहीं मिलता जो रसप्रतीति में अभीष्ट है ।

अन्तो न रसप्रतीतिमानसी भवितुमर्हतीत्याशय: । अलौकिकगुणस्य नायकादेश् स्मृतिरेव दित्याशङ्कां निराकुरुते—न च स्मृतिरिति । अनुभवो हि पूर्वकालिक: स्वजनस्य- संस्कारद्वारा स्मृतिहेतुरिति प्रसिद्धम् । प्रकृते च तादृशगुणविशिष्टनायकादेश् सामा- जिकानुभवविषयत्वा मावेन न तद्विषयक: संस्कार: सामा- जिकानां येन तद्विषया स्मृति: स्यादिति न स्मृतिरूपादपि रसप्रतीति: शाब्यादड्गुपगन्तव्या इत्यर्थ: । तदेवं रसप्रतीतिपक्षे निराकुते रसोत्पत्तिपक्षेऽपि शक्तिपक्षावपि लोचनादुक्तभट्टनायकयुक्त्या

उन अलौकिकानन्दमय दुष्यान्तादिनिष्ठ रत्यादि का सामाजिक को नाटकादर्शोन्नादि के पूर्व अनुभव न होने से उनकी स्मृति भी असम्भव है । अतः रस-प्रतीति की मान्यता सर्वथा ही है । इसी तरह, रसोत्पत्ति-पक्ष भी असंगत है, क्योंकि तब तो नायक के शोक से सामाजिक में भी शोक की उत्पत्ति मानी होगी जिसका अर्थ यही होगा कि एक बार करुण-रस-प्रधान नाटक-काव्य देख-सुनकर शोकातुर सामाजिक पुनः कभी उन्हे देखने-सुनने में

निराकरणीयौ पाठके: । तथा हि लोचन उत्तमम्—‘उत्पत्तिपक्षे च करुणस्योत्पादाद् दृश्‍काव्याभिव्यक्तौ विषयाजनतारतम्यप्रवृत्ति: स्यात् । तत्रापि किं स्वगतोद्भिव्यज्यते रस: परगतो वेति पूर्वपक्षदेव दोष: । तेन न प्रतीयते, नोत्पद्यते, नाभिव्यज्यते काव्येन रस:' इति ।

अधुना स्वमतमाह भट्टनायक:—तस्मादित्यादिना । अभिधये तुपलक्षणं लक्षणाया अपि । यथावत्पदायंप्रतिपादनमभिधया लक्षणायाश्च कृत्यमात्रं मते ।

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विरोधिज्ञानप्रतिबन्धद्वारा कान्तात्वादिरसानुकूलधर्मपुरस्कारेणावस्थाप्यन्ते । एवं साधारणीकरणेपु दुष्यन्तशकुन्तलादेशकालवयोवस्थादिषु, पज्ञौ पूर्वव्यापारमहिमनि, तृतीयस्य भोगकृतवव्यापारस्य महिमा निगीर्णयोर् रजस्तमसोरुद्रिकसत्त्वजिनेन निजचित्स्वभावनिवृत्तिविश्रान्तिलक्षणेन साक्षात्कारेण

प्रवृत्त नहीं होंगे, जब कि वस्तुस्थिति इसके विपरीत है। यदि यह रसोत्पत्ति नायकादि में ही मान्य हो तो सामाजिक का इससे क्या प्रयोजन सिद्ध होगा ? रसाभिव्यक्ति-पक्ष भी त्याज्य है, क्योंकि अभिव्यक्ति पूर्वसिद्ध पदार्थ की होती । अतः पूर्वसिद्ध रत्यादि की हीं अभिव्यक्ति माननी होगी । यदि ये रत्यादि नायकनिष्ठ हैं तो सामाजिक पुनः उनसे उदासीन हो जायेंगे । सामाजिक में उन रत्यादि की स्थिति तो है नहीं । ऐसी स्थिति में किसकी सामाजिक में अभिव्यक्ति होगी ? साथ हीं, अभिव्यक्तिक की स्थिति में तो तारतम्य के आधार पर रसाभिव्यक्ति में भी तारतम्य मानना होगा । किन्तु रससुखरूपभूत अखण्ड आनन्द की अभिव्यक्ति में तारतम्य मानना असंगत है । अतः अभिव्यक्ति-पक्ष भी अनुचित है ।

नन्तरं भावकत्वाध्यैक्यव्यापारकृत्यं दर्शयति—भावकत्वेति । तथा च भावकत्वव्यापारस्य साधारणीकरणं फलम् । तदहेव—एवम्भूतं पूर्वव्यापारः = भावकत्वव्यापारः । निगीर्णयोरित्यादिना भोजकत्वपरपर्यायभोगकृतवाध्यत्रृतीयकाव्यव्यापारस्य रजस्तमोवृत्तिनिरोधः फलम् । ततश्च सत्त्वोद्रेकाज्जायमानेन मानसैन विलक्षणेन साक्षात्कारेण भोगापरपर्ययेण भुज्यते विषयीक्रियते रस इत्ययमाशयो भट्टनायकस्य वोध्यः । निजचिदित्यादि । निजस्य = सामाजिकस्यात्मनः, चित्स्वभावनिवृत्तिः = आवरणनाशादात्मस्वभावभूतचित्तस्युपलक्षणमात्रूपसर्पिति, तस्या विश्रान्तिः = चिदानन्दामभित्नवसत्स्वगोचरत्वम्, तदेव लक्षणं साध्येयेन ज्ञापकं यस्य तेन साक्षात्कारेण परज्ञासाक्षात्कारसदृशोन साक्षात्कारेति तात्पर्यम् । सत्त्वोद्रेकाच्च रससाक्षात्कारः सुखात्मकोडत्र मते, सत्त्वस्य सुखरूपे परिणामात् । एतावतैव चास्य मतस्य सांख्यीयत्वप्रवादोऽपि । साधारणीकरणेत्यनेनैव सूचिते यत्परगत एव रत्यादिकः सामाजिकभुज्यते, परन्तु भावकत्वव्यापारेण साधारणीकरणात्मना परगतत्वं न गोचरीक्रियते इत्ययं विशेषः ।

अतः रस की मुक्ति (भोग—साक्षात्कार) उचित है । इसकी व्याख्या इस प्रकार करनी चाहिए—सर्वप्रथम तो अभिधावृत्ति द्वारा काव्यादि से वाच्यार्थ को

  1. वस्तुतः यह कथन संगत नहीं है, क्योंकि 'अभिव्यञ्जकतारतम्यप्रयुक्त अभिव्यञ्ज्यध्वोऽखण्डता में अनन्तर नहीं पड़ता । । भट्टनायक के 'विषयाज्ञानतारत्म्यप्रयुक्तिः' कथन का कोई दूसरा अभिप्राय हो, अथवा पाठ शुद्ध न हो !

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तकारेण विषयीकृतो भावनोपनीतः साधारणात्मा रत्यादिः स्थायी रसः । तत्र भुज्यमानो रत्यादिः, रत्यादिभोगो वेध्युभयसेव रसः । सोऽयं भोगो विषयसंवलनाद्ब्रह्मास्वादसविधवर्तित्वयुक्तते । एवं च त्रयोंडशाः काव्यस्य--"अभिधा

उपस्थिति होती है। इस दशा में शाकुन्तलादि से दुष्यन्तादि का सम्बन्ध बना रहता है जिससे सामाजिक को रस-साक्षात्कार होने में बाधा पड़ती है। इसलिए काव्य में अभिधा से भिन्न एक 'भावकत्व' नामक व्यापार मानना चाहिए। इस व्यापार के प्रभाव से 'साधारणीकरण' होता है, अर्थात् रस-भोग में बाधकतीभूत शाकुन्तलादिविषयक परकीयत्व, अगम्यत्व, शाकुन्तलात्व आदि धर्मों का प्रतिबन्ध और कान्तत्व आदि रस-भोगानुकूल धर्मों का उद्बोधन होता है। इसी से शाकुन्तलादि के वय, अतीत काल आदि रस-प्रतिबन्धक तत्वों का भी विलोप हो जाता है। अतः एवं दुष्यन्तादिनिष्ठ शाकुन्तलादिविषयक रति भी केवल कान्ताविषयक रति रूप में प्रकटित होने लगती है। इससे सामाजिक को उस रति के विषय में जो परकीयत्व-बोध हो रहा था वह भी विलुप्त हो जाता है। 'भावकत्व' व्यापार का कृत्य यही समास हो जाता है। किन्तु इतने से ही, बिना भोग-साधन के, रस का भोग हो नहीं सकता। भोग-साधन तो वह चित्त हो सकता है जिस में सत्त्वगुण का अत्यन्त प्रकर्य हो। यह कार्य चित्त के रजोगुण और तमोगुण के प्रभाव की सर्वथा समास किए बिना असम्भव है। अतः 'भोगकृत्‌व' (=भोजकत्व) व्यापार के प्रभाव से रजोगुण और तमोगुण का प्रभाव सर्वथा क्षीण हो जाता जिसके फल-स्वरूप सत्त्वगुण का उद्रेक हो जाता है। इससे चित्त प्रकाशानन्दमय हो जाता है। इसके सम्पर्क से रत्यादि में भी आनन्दमयता प्रकट हो जाती है। इसी 'चित्तसत्त्व' (=सत्त्वातिशयविशिष्ट चित्ते) से सांधारणीकृत्यसांधरणीभूत भावकत्व

अत्र पक्षे स्थायिनो भोगस्य च विशेषणविशेष्यभावे विनिगमकाभावाद् भुज्यमानः स्थायी स्थायिविषयकभोगो वा रस इत्याह--तत्रेत्यादिना । पूर्वकलपे साक्षात्कारस्थैव सत्त्वोद्रेक कजनितस्य सुखमयत्वेन रसास्वादि सुखमयत्वं बोध्यम् । विषयसम्बलनादित्यनेन विषयासम्बलितब्रह्मास्वादाद् द्विरस्त्वं रसास्वादस्य दर्शितम् । सविघत्वं वोपसंहरति--एवं चेत्यादिना । त्रयोंडशाः = त्रयो व्यापाराः, अभिधा, भावना, भोगीकृतिः (भोजकत्वं) चेति । तत्राभिधा वाच्यार्थविषयिणी= वाच्यार्थोपस्थापिका, भावना = भावकत्वं साधारणीकरणद्वारा सामाजिकैः सह रत्यादेः सम्बन्धस्य प्रतिपादिका, भोजकत्वं च सहृदयविषयम् इति । एतेन भट्टनायको व्याख्यानां नोदीकरोतीत्यपि सुव्यक्तमेव । अभिनवगुप्तभट्टनायकमतयोः विशेषं निर्-

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भावना चैव तद्रोगीकृतिरेव च" इत्याहः। मतस्यैतस्य पूर्वस्मान्मतातद्राव-

पर्यन्ति—मतस्यैतस्यैत्यादिना। व्यक्ति:= भगनावरणा चित्त, तस्या एवं साक्षात्का-

कतवद्यापारान्तरस्वीकार एव विशेषः। भोगस्तु व्यक्तिः। भोगकृतं तु व्यङ्गजनादविशिष्टम्। अन्य तु सैव सरणिः॥

रात्मकत्वात्, 'यत् साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म' इत्यादिश्रुतेः। यद्यपि भट्टनायकमतेऽपि चित्तसत्त्ववृत्त्यात्मक एवंआनन्दः प्रतीयते तथापि ब्रह्मातिरिक्तस्यानन्दद्वातत्सम्पर्के विन कस्याप्य्यानन्ददशप्तं न सम्भवतीत्यौंपनिषदमताभिप्रायेणैवमुक्तिः पण्डिततराज-

(३) तद्यास्तु काव्ये नाट्ये च कविना नटेन च प्रकाशितेपु विभावादिपु

स्येऽपि भट्टनायकमतेऽपि चित्तसत्त्ववृत्त्यात्मक एवंआनन्दः प्रतीयते तथापि ब्रह्मातिरिक्तस्यानन्दद्वातत्सम्पर्के विन कस्याप्य्यानन्ददशप्तं न सम्भवतीत्यौंपनिषदमताभिप्रायेणैवमुक्तिः पण्डिततराज-

स्रयेऽपि प्रतीयते। व्यङ्गजनात्व=व्यङ्गजनव्यापारः। तदुक्तं लोचनने—'भोगीकर-

व्यापारेऽसौ काव्यस्य रसविषयो ध्वननात्मैव, नाऽन्यद् किञ्चिद्' इति। अन्याः=

आस्वाद्यमानः स्थायीयेन रसः;, साधारणीकरणं चेत्याद्वा पूर्वंवणिता। अथ भट्टनायकमतेऽपि भावकत्वाद्व्यङ्गव्यापारेण साधारणीकरणम्, पूर्वंमते च भावना-

विशेषेणेति विशेषः। रसविपये तृतीयं मतमाह—तद्यास्तित्वादिना। प्रकाशितेपु = कविना

शब्देन नटेन चार्भिननायाद्युपरूक्तेन शब्देन सहृदयहृदये प्राप्तीतेपु। विभावादिष्वति।

व्यापार द्वारा पहले से हीं सहृदय के अन्तःकरण में उपस्थित परकीयत्ववसम्बन्ध-

रहित रत्यादि का सामाजिक को आनन्दमय तत्त्व के रूप में भोग (=साक्षात्कार) होता। यह रसस्वरूप आनन्दन उस ब्रह्मानन्द जैसा होता जिसमें आत्मा के चिदा-

नन्दस्वभाव की पराकाष्ठा मानी जाती है, क्योंकि सत्त्वोद्रेकमयचित्तगत

आनन्द अन्य चित्तगत आनन्दों में उत्तम होता। अन्तर दोनों में यह है कि ब्रह्मानन्द

वृत्तिभिन्न है जबकि रसानन्द रत्यादिविषयक चित्तवृत्ति है। अतः भोगविषयोद्भूत

रत्यादि या रत्यादिविषयक उत्त भोग (=साक्षात्कार) हीं रस है। इस प्रकार

काव्य के तीन व्यापार हुए, जैसा भट्टनायक ने स्वयं कहा है—"अभिधा, भावना

(= भावकत्व) और रसभोगीकृति, अर्थात् भोजकत्व (ये तीन काव्यव्यापार हैं)"

इसमें पूर्वमत (अभिनवगुप्त के मत) से यही अन्तर है कि इसमें एक 'भावकत्व'

नामक अतिरिक्त काव्यव्यापार की कल्पना की गई है। भट्टनायक का 'भोग' तो

'व्यक्ति'—भरनावर्णा चित्त हीं हैं ; केवल शब्दभेद है, अर्थमेंद नहीं, क्योंकि साक्षा-

त्कार "यत् साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म" इत्यादि श्रुतियों के अनुसार भगनावर्णचित्तस्व-

रूप हीं है। इनका 'भोजकत्व' व्यापार भी व्यङ्गजनाव्यापार से भिन्न नहीं है,

क्योंकि दोनों का कृत्य एक हीं है। अन्य प्रक्रिया दोनों की समान हैं॥

कुछ नवीन आचार्य (जिनके नाम अज्ञात हैं) सामाजिक में उत्पन्न अनिर्वचनीय

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व्यङ्ग्यजनव्यापारेण दुष्यन्तादौ शकुन्तलादिरतौ गहीतायामनन्तरं च सहृदयतोल्लासिततस्य भावनात्रिशेषरूपस्य दोषस्य महिम्ना कल्पितदुष्यन्ततत्त्वावच्छादिते स्वात्मन्यज्ञानावच्छिन्ने शुक्तिकाशकल इव रजतखण्ड: समुत्पद्यमानोऽनिवैचनीय: साक्षिभास्यशकुन्तलादिविषयकरत्यादिरेव रस: ।

एतद् मतेऽस्मिन् रसालम्बनकारणादीनां शकुन्तलादीनां विभावादिविषयप्रापणाय न भावनात्रिशेषस्य न वा भोजकत्वव्यापारस्य प्रयोजनमिति प्रतीतते, आलम्बनकारणादीनामेव नामान्तराश्रिते विभावादय इति ज्ञायते । सहृदयता=प्राक्तनी काव्यार्थवासना, रत्यादिवासनेऽन्ति याच्चत् । तथा सहृदयतया उल्लासिततस्य = सहृदयस्य, शुक्तिरजतधर्मोदपि तस्थैव भवति यस्य रजतविषयकसे स्कार: पूर्वं च वत्तंते । अतोडत्र रत्यादिविषयेडपि वासनाभ्य: कचिचत् रत्यादिविषयक: संस्कारविशेष: सहृदये नितरांपेक्ष्यत: । तस्य चोद्वोधो दुष्यन्तादिस्थानीयतटकरत्वेन करत्यनुकूलविलासादिज्ञानेन काव्याध्ययनाश्रवणजन्यतज्ज्ञानेन वा यथायथमवगन्तव्य: । सेयं वासना रत्यादिदेश्यो मातृकदुष्टफलजनकत्वादोष इत्युच्यते । स्वतस्तु वासनया दोषत्वं दुष्टं तम् । यद्वा भावनात्रिकदोषसहकारितया रत्यादिवामनाया दोषत्वं निर्वाह्यम् । भावनेन त्यादि । काव्यार्थस्य पन्था: पन्थानंरसतयेग्नातस्मधातां भावनास्या छात्र सामाजिकगतस्ववस्य ( = दुष्यन्तादिभिन्नतत्स्वस्य) अपलापकत्वेन दोष इत्यमिहिता । अनेनैच भावनाविशेषस्वरूपदोषण स्वस्मिन् दुष्यन्तरूपेण प्रतीति: । अयं च दुष्यन्तादिरत्यादिवर्चनीयो यावत्प्रतिभासमवस्थाना त् प्रातिभासिक इत्युच्यते वेदान्तनये । दुष्यन्तत्कल्पनायां च दुष्यन्ततत्त्वमपि कल्पितं भवत्ये वेत दुष्यन्ततत्त्वमपि प्रातिभासिकं सदसद्‌व्यामनिवैचनीयं तत्‌रोप्यते एव । इदमेव प्रातिभासिकत्वं सामाजिकदुष्यन्तत्वादे: कल्पितत्वमुक्त' ग्रन्थे । यदा च सामाजिके दुष्यन्तादि: कल्प्यते तदा दुष्यन्तत्वादि: तत्सहचरितो रत्यादिरपि शकुन्तलादिविषयक: कल्पित एव रज्यते रजतत्वादिकल्पनवत् । कल्पितेत्यादि । अज्ञानावच्छिन्नेष्ट जिकस्य स्वत एव दुष्यन्तादिविषयस्वमत्कल्‍छादने आप्रयते । तदा नोद्भूत: सामाजिक: स्वं दुष्यन्तमभिमन्यमान: 'दुष्यन्तोऽहं शकुन्तलाविषयकरतिमान्' इति प्रत्येति । अस्यां प्रतोतौ शकुन्तलाविषयिणी रतिरिविशेषणोभूता दुष्यन्ततत्त्वविशिष्टरच विशेष्य

(सदसद्विलक्षण——प्रातिभासिक) रत्यादि को हीं रस मानते है । इस रस की उत्पत्ति 'प्रक्रिया इइस प्रकार है——सर्वप्रथम सामाजिक काव्य या नाटच का अध्ययन या अवलोकन करते है । इससे काव्य में कवि द्वारा वर्णित और नाटच में नट द्वारा अभिनीत विभाव, अनुभाव एवं संचारिभावों की यथासम्भव प्रत्यक्षात्मक या अनुमित्या-

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अयं च कार्यो दोषविशेषस्य । नाशयइच तत्राशस्य । स्वोत्तरभाविना

इति भणन्ति दुष्यन्ततत्पं विशेषयतावच्छेदकमन्त्र । इदमेव दुष्यतत्त्वस्य स्वात्मावच्छादक्तवमत्राभिमतमिति वक्ष्यतनुपदमेंव ग्रन्थकृत् ।

अयम् = रत्यादि: । दोषविशेषस्य = सहृदयतोल्लसितभावनाविशेषस्य । तत्राशस्य = उत्तरोपविशेषणाशस्य । एतेन पूर्वोक्तमतसदृशं नित्यत्वं निराकृतं रसस्यैति बोधयम् ।

अनिवर्चनीयो रत्यादि रसपदाभिलप्यस्य कथं सुखपदव्यपदेश हेतुमाह—स्वोत्तरभाविनेत्यादिना । अयमाशय:- रत्यादिसाक्षिप्रत्यक्‌षस्य स्वरूपत आनन्दरूपतडभावेऽपि आस्वादात्मकस्यास्य प्रत्यक्षस्यालौकिक रव्यापार-भावनाजन्यरत्यादिविपयकतया डौकिक हृदादजनकत्वम्, आह्लादाच्छादव्यवहिताद् भेदे-

तमक प्रतीति उन्हें (सामाजिक को) होती । इन विभाव आदि की सहायता से व्यञ्जित दुष्यन्तादिविषयीषक रत्यादि का उन्हें बोध होता । उसके पश्चात् विभावादिसमवल्लित रत्यादि की जब वे अपनी सहृदयता से सम्वलित भावना, अर्थात् पुनः पुनः अनुसन्धान करते तो इसी भावनास्वरूप दोष के प्रभाव से उनका स्वत् (दुष्यन्तादिविषयनक) अज्ञानावृत हो जाता और उनमें क्लिप्त (अनिवर्चनीय) दुष्यन्तत्त्वादि धर्मों की उत्पत्ति हो जाती जिससे उनका व्यक्तित्व अवच्छादित हो जाता ।

शब्दान्तर में, वे अपने को ‘शकुन्तलादिविषयकरत्यादि’ के आश्रय दुष्यन्तादि’ समझने लग जाते—“शकुन्तलाविषयकरतिमान् दुष्यन्तोज्जह्म”! इत्यादि बोध उन्हें होने लगता ।

ऐसी स्थिति में उनमें शकुन्तलादिविषयक रति की उत्पत्ति भी हो हाँ जाती है, अन्यथा उत्त बोध हो नहीं पाता । यह रति वास्तविक (व्यावहारिक) तो हो नहीं सकती, क्योंकि वह है तो दुष्यन्त में हाँ हो सकती है, सामाजिक में नहीं । अतः यह प्रातिभासिक पदार्थ जिसकी सिथित प्रतिभासकाल-पर्यन्त होती, उससे पूर्वं या पश्चाद् नहीं ।

यह रति प्रतिभास जबतक होता तभी तक होती, उससे पहले या पश्चाद नहीं । इस अनिवर्चनीय रति की उत्पत्ति सामाजिक में उसी प्रकार होती जिस प्रकार अज्ञानावृत चित्तिका में काचादिदोष के प्रभाव से रजतत्व एवं तत्सहचरित बहुमूल्यत्व आदि धर्मों की प्रतिभासकालमात्र में उत्पत्ति होती ।

प्रातिभासिक पदार्थ को अज्ञान्तम्त में साक्षिभास्य माना जाता । अतः सामाजिक में उत्पन्न रत्यादि को भी साक्षिभास्य मानना चाहिए । यतः रसास्वादन सामाजिक को हाँ होता अतः सामाजिक में रत्यादि-स्वरूप रस का अस्तित्व अनिवार्यं है ।

इसलिए उनमें इस प्रातिभासिक रत्यादि

  1. स्पष्टता के लिए केवल रति को लेकर उदाहरण दिया गया है ।

यहाँ प्रक्रिया रसान्तर के प्रसङ्ग में भी समझनी चाहिए ।

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लोकोत्तराल्लादेन भेदाग्रहात्सुखपदव्यपदेशयोर्भवति । स्वपूर्वोंपस्थितेन रत्यादिनातदग्रहात्तद्रतित्वेनैकतवाद्यवसानाद्वा व्यङ्ग्यचो वर्णनीयस्योच्यते ।

नानाध्ववसीयमानो रत्यादिः सुखपदव्यपदेश्योऽपि भवति । अस्मिन् पक्षे सुखमा- ह्लादापरपर्यायं चित्तवृत्त्यात्मकमेव, आनन्दरूपावरननिवृत्तिभावेन आत्मानन्दाख- स्फुरणात् । प्रतिभासिकपदार्थतत्प्रतिभासयोस्तुल्पकलात्काद्रत्यादिप्रत्यक्सोत्तरजाय- मानस्याह्लादस्य रत्याद्युक्तरभावित्वमुक्तम् । यद्वाडनिवर्चनीयरत्यादिविषयक- साक्षिप्रत्यक्रूपेण उपायमानया उद्विद्याद्वृत्या स्वात्मानन्दावरणनिवृत्तिः, ततरच स्वात्म- भूतानन्देन सह पूर्वकं गोचरीक्रियामाणत्वाद्रत्यादेः सुखपदव्यपदेशः । अस्य च सुख- स्वात्मस्वरूपभूततया अलौकिककाव्यव्यापारप्रयोज्यतया चाश्लोकिकत्वम्, विशेषणी- भूतस्य विशेष्यभूतस्य वा रत्यादेः काव्यार्थभावनाजन्यतया वा जन्यत्वमुपपाद्यम् । अथवा रत्यादेः सुखजनकत्वेन सुखत्वव्यपदेशः । सुखस्य नित्यत्वेऽपि रत्याद्युपहित- सुखस्य जन्यत्वमुक्तम् । अस्मिन् पक्षे शोकादेरप्यनिवर्चनीयस्य सुखत्व्यपदेश इष्ट एवान्तमस्वरूपभूतानन्दसंस्पर्शादिव, 'सरसिजमनुबिन्दुं शैलेनापि रम्यम्' इति वदिति वाध्यति । तदेवमस्मिन् मते सामाजिककर्तृ करसानुभवोपपादनाय सामा- जिकेषु प्रतिभासिकरत्याद्युपपत्तिसाधनमेव विशेष इति बोध्यम् । अस्य सामाजि- कनिष्ठरत्यादेरानिवर्चनीयस्य भावनादौजन्यतया साक्षिप्रत्यक्विषयतया व्यङ्गचस्व- व्यपदेशः अनिवर्चनीयत्वेन च वर्णनीयत्वव्यपदेशः कथंमित्युपपाद्यति—स्वपूर्वोंस्थिता-दिना । उपस्थितेन = व्यङ्गचेन वर्णनीयेन च । रत्यादिनेत्यस्य ध्यन्यन्तादौ शकुन्तलादिविषयकेणत्यादिः । तदग्रहात् = भेदाग्रहात् । ननु ब्रह्मजगदध्यासे यद्भेदाग्रहस्तत्रानुयोगिनि प्रति योगिधर्माध्यास एव प्रसिद्धस्तथापि लोके यस्मिन् ध्यासः, तथा चानिवर्चनीयस्यामाजिकनिष्ठरत्यादिधर्मस्य दुष्यन्तादिनिष्ठशकुन्तलादि- विषयकरत्यादिर्धर्मिण्यस्यसम्भवेऽपि तद्विप्रयेयेयोनिवर्चनीयरत्यादौ दुष्यन्तादिनिष्ठ- रत्यादेः सामाजिकीन्ध्यजनया ग्रहीतस्य यो धर्मों व्यङ्गचत्वं तस्याध्यासान्तरमाह—एकत्वाध्य- वस्यते समाध्यानान्तरमाह—एकत्वाध्यवसाय इत्याशयः । तदन्वाद्यरोपादुत्तरान्तर- मेव वा । अत्रैव हेतुः—रतित्वेनैति । रतित्व हो भावसाधारणम्, यदैव पूर्वोंपस्थिते व्यङ्ग्ये रत्यादौ दुष्यन्तादिनिष्ठरं नाम भेदको धर्मस्तस्य च भावनास्वरूपदोष- महिम्ना स्वात्मनि दुष्यन्ताभेदबुद्ध्या प्रतीतिरेव नेति न तद्र्मस्य तयोर्भेदकत्वमिति सूच्यते । तथा च रसे व्यङ्गचत्वमुपचरितमेवेति बोध्यम् ।

की उत्पत्ति माननी पड़ती है ।

यह अनिवर्चनीय रत्यादिस्वरूप रस भावनात्मक दोषविशेष से उत्पन्न होने ७ ०

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अवच्छादकं दुष्यत्स्वमध्यनिर्वचनोयमेव । अवच्छादकं च रत्यादिविघटवोधे विशेषयतावच्छेदकरत्वम् । एतेन—“दुष्यन्तादिनिष्ठस्य रत्यादेर्नास्वाद्यत्वात्तन्न वन्धाभि: कथमनभिप्रक्ति:? स्वस्मिन्दुष्यन्तादिभेदबुद्धिस्थितु बाधबुद्धिपराहता ' इत्या‌दिकमपासतं । यदपि विभावादीनां साधारण्यं प्राचीनैर्हुक्त तदपि काव्येन शकुन्तलादिवशब्दै: शकुन्तलादावदिप्रकारकबोधजनकै: प्रतिपाद्यमानेषु शकुन्तलादिषु दोषविशेषकलनं विना दुरुपपादम् । अतोडवश्यकल्प्ये दोषविशेषे तेनैव स्वात्मनि दुष्यन्तादिभेदबुद्धिरपि सुपपादा ।

मस्मप्रति नच्यमतानुसारेण भट्टनायकमतपूर्वपीठिकां निराकरौति—एतेनैत्यादिना । अस्यापास्तमित्यनेनान्वय: । एतेनैत्यस्य च सामिजिकेऽप्यन्तर्भेदबुद्धचाजनिर्वचनीयतयाऽप्युत्पत्तिसम्भवेनैतयर्थ: । अनास्वाद्यत्वादिति । अनास्वाद्यत्वं च सामिजिकस्य तादृशरत्यादि प्रति तादात्म्येनोपपद्यते । वाध्यबुद्धिपराहन्त्यादि भट्टनायकमतनिरूपणानुसारेण व्याख्यातम् । साधारण्यमित्यस्य भट्टनायकमतेऽपि भावकत्वव्यापारेण काव्यनिष्ठेनैत्यादि:, अभिनवगुपादिमतेऽपि च भावनादिव्यापारणे त्यादि: । विशेषप्रतिपादकशब्दस्य विशेषपदं पुरस्कारेणैवार्थप्रतिपादकत्वमित्याह — शकुन्तलादिशब्दै रित्यादिना । शकुन्तलादिष्विति । अन विशेषपद सत्नियत्य । तथाऽपि च शकुन्तलादिविषयको यो दोषविशेषो भावनाविशेषोत्पादकस्तस्य कल्पनं विनेतर्थ: । भावकत्वव्यापारोऽपि फलतो भावनाविशेषाज्जनयतिरीक्त एवेति हृदयम् ।

अत्र च पक्षे दुष्यन्तादिनिष्ठरास्तवरत्यादेरेक स्वाप्रितत्वम् । स्वोत्तरभाविनां लोकोत्तराह्लादेन भेदाग्रहादेकत्वव्यपदेश: पूर्वं समर्धित: । स च रतिविषये सम्भवति, तस्याः इष्टत्वेन तद्बोधोत्तरं सुखानुभवस्याऽनुभविकत्वात् । यत्र त्वनिवर्चनीयशोकाद्याप्रियभावोत्पत्ति: सामाजिकके तत्र तदुतरं सुखानुमवादभवात् कथम् शोकाद्यात्मकस्य करुणादे: सुखत्वव्यपदेश उपपद्यत इति चेत्‌, के कारण तभी तक सामाजिक में रहता है जब तक उत्त दोषविशेष बना रहता है । उसके नष्ट होते ही यह रस भी नष्ट हो जाता है । यद्यपि यह रस स्वरुपत: सुख-स्वरूप नहीं है तथापि स्वोत्तरभावी लोकोत्तर आह्लाद से इसका भेद-ज्ञान न होने से इसे सुखरूप भी कहा जाता है । तात्पर्यं यह है कि स्वनिष्ठ अनिवर्चनीय रत्यादि के अनुभव (=साधिप्रत्यक्ष ) के बाद काव्यव्यापार (=व्यञ्जना ) के प्रभाव से उत्त अनुभव से सामाजिक को अलौकिक सुख होता है । ( करुण आदि रस के सन्दर्भ में प्रातिभासिक सामाजिकनिष्ठ शोकादि से अलौकिक सुख होता है या नहीं—यह विचार बाद में स्वयं ग्रन्थकार करेंगे । )

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नन्वेवमपि रतिरस्तु नाम दुष्यन्त इव सहृदयैःपि सुखविशेषजनकता, करुणरसादिपु तु स्थायिनः शोकादेःखःखजनकतया प्रसिद्धस्य कथंविव सहदयाल्लादहेतुत्वम् । प्रत्युत नायक इव सहृदयैरपि दुःखजननस्यैवौचित्यात् ? न न सत्सस्य शोकार्देःखजनकत्वं क्लृप्तं न कलिप्तस्यैति नायकानामेव

पद्यते इत्याशङ्कूते—नन्वेवमपर्यालोच्य चेदित्यन्तेन ग्रन्थेन । कलिप्तस्यैतस्य शोकादेरिति शेषः । कलिप्तत्वं चात्र प्रतिभासिकत्वरूपं ग्राह्यम् । समाधत्त— सत्यमित्यादिना । सहृदयेत्यादि । तदुक्तं विश्वनाथेन—करणादावपि रसे जायते यत् परं सुखम् । सचेतसामनुभवः प्रमाणं तत्र केवलम् ॥ इति ।

उसके साक्षिप्रत्यक्षात्मक आस्वाद तथा इससे होने वाले अलौकिक सुख में अव्यवधान आदि के कारण भेद-बोध नहीं होता और इसी से प्रतिबिम्बमान रत्यादि और अलौकिक आह्लाद में भी भेद-बोध न होने से रत्यादिस्वरूप रस को सुखरूप कहा जाता है । यह प्रतिबिम्बासिक रत्यादिस्वरूप रस स्वतः न तो व्यङ्ग्य है और न वर्णनीय (= अनिवर्चनीयाभिन्न) हैं फिर भी इससे पूर्वं सामाजिक द्वारा अनुभूत दुष्यन्तादिनिष्ठ रत्यादि हैं वे तो व्यङ्गच्य एवं वर्णनीय हैं । रसस्वरूप रत्यादि का दुष्यन्तादिनिष्ठ रत्यादि से भेद-बोध न होने से अथवा दोनों के बीच सादृश्यमूलक एकत्वबोधम से रसस्वरूप रत्यादि को भी व्यङ्गच्य और वर्णनीय कह दिया गया है । पहले सामाजिक के वस्तु को कल्पित दुष्यन्तत्वादि धर्मों से अवच्छादित और दुष्यन्त-स्वादि धर्मों को स्वतः का अवच्छादक कहा गया है । इसका अभिप्राय यहाँ है कि सामाजिक को जो बोध होता—“दुष्यन्तोऽहं शकुन्तलाविषयकरतिमान्”

इससे भट्टनायक आदि का यह मत निरस्त हो जाता है कि दुष्यन्तादिनिष्ठ रत्यादि से सामाजिक के उदासीन होने से उस रत्यादि का सामाजिक को आस्वाद हो नहीं सकता; सामाजिक में जो रत्यादि हैं उनका शकुन्तला आदि के साथ किसी अपेक्षित सम्बन्ध के न होने से उसकी भी सामाजिक में अभिव्यक्ति नहीं हो सकती; जहाँ तक दुष्यन्तादिनिष्ठ शकुन्तलादिमिश्रयक रत्यादि का सासाजिक द्वारा आस्वाद का प्रश्न है वह तो उठता ही नहीं, क्योंकि सामाजिक और दुष्यन्तादि में इतना वैधर्म्यं है कि दोनों में अभेदबोधम् हैं असम्भव है । जहाँ तक भट्टुनायक द्वारा भावकत्वव्यापार से और अभिनवगुप्त द्वारा भावनाविशेष से साधारणीकरण की बात

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अत एव करुणप्रधानकाव्यनाट्याद्यनयनदर्शनेनादौ भूयो भूयः प्रवृत्तिः सहृदयानां संगच्छते।

है वह भी शकुन्तलादिविषयक दोषविशेष की कल्पना किये विना असंगत है, क्योकि काव्य द्वारा शकुन्तला आदि विशेषार्थंक शब्दों से तो सामन्यतया शकुन्तलात्वादिप्रकारक अर्थों का ही बोध सम्भव है, कान्तात्वादिसाधारणधर्मप्रकारक बोध नहीं।

कार्यव्यापारस्य = व्यङ्ग्यजननायाः, यद्वा दोषत्वेनाभिमताया भावनायाः।

यह दोष भावना हीं हो सकती या उसके स्थान में स्वीकृत भावकत्वव्यापार, क्योंकि इससे अतिरिक्त किसी दोष की कल्पना असम्भव है।

विश्वनाथमते तु लोकोत्तरकुत्रलादिपदार्थानलौकिकविभावादिपदवीं नयन्तो विभावनादिव्यापारा एवंात्र विवक्षिताः।

अत: जब साधारणीकरण के उपपादनार्थ प्रचीनों को भी भावनास्वरूप अथवा उसके समानान्तर भावकत्वव्यापाररूप दोषविशेष मानना हीं है तो उसी से सामाजिक को दुःख्यन्तादि से अभिन्न होने का भ्रम भी हो हीं सकता है।

आह्लादप्रयोजकत्वम् = आनन्दजनकत्वप्रयोजकत्वम्। यद्यपि दुःख्यन्तादिनिष्ठरत्यादि स्वरूपतोड्यनानन्दजनकत्वमस्त्येव तथापि प्रातिभासिके रत्यादि सामाजिकनिष्ठे यदाह्लादजनकत्वं तद्‌दुःख्यन्तादिनिष्ठरत्यादिव्यङ्ग्यजननानन्तरेैण तदूसभावनायास्तां च विना सामाजिके रत्यादेरनुत्पत्तेरिति हृदयम्।

इसलिए अभेदग्राम न होने की बात असंगत है।

दुःखजनकत्वप्रतिबन्धकत्वम् = शोकारादिनिर्वचन्त्रणीये दुःखप्रतिबन्धकत्वम्। अनुकूलपरिस्थितो भावितः पूर्वंशोकादिरपि सुखमेव जनयतीति प्रसिद्धम्।

अब प्रश्न यह है--रति तो प्रिय वस्तु है, इसलिए जैसे दुष्यन्तादि में वह प्रिय सुख का उत्पादक करती वैैसे हीं सामाजिक में भी उत्पन्न प्रातिभासिक रति काव्यव्यापार की महिमा से उनमें अलौकिक सुख का उत्पादक हो सकती है।

तथा चोक्तम्—

किन्तु करुण आदि रसों के सन्दर्भ में तो सामाजिक में भी प्रातिभासिक शोकादि हीं उत्पन्न होंगे।

जैसे नायक में शोकादि दुःख को उत्पन्न करते वैैसे हीं सामाजिक में भी उन प्रातिभासिक शोकादि से दुःख हीं उत्पन्न होना चाहिए।

ऐसी स्थिति में करुण आदि रसों को सामाजिक में अलौकिकसुख का जनक कैसे माना जा सकेगा? नायकनिष्ठ शोकादि सत्य (व्यावहारिक) होने से दुःखजनक होते, किन्तु सामाजिकनिष्ठ शोकादि प्रातिभासिक होने से दुःखजनक नहीं होते—यह कहना भी सम्भव नहीं, क्योंकि वैसा मानने पर रजोगुसंवृद्धि से जो दृष्टा में भय, कम्पन आदि की उत्पत्ति देखी जाती उसकी व्याख्या न की जा सकेगी।

साय हीं, कल्पित शोकादि को दुःखजनक न मानने पर सामाजिक में कल्पित रति से सुख भी न हो सकेगा।

ऐसी स्थिति में सामाजिक में अनिर्वचनीय रत्यादि की उत्पत्ति

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दुःखम्, न सहृदयस्येति वाच्यम्। रज्जुसर्पादिभ्रंयकल्पनाजनुत्पादकतापत्तः। सहृदये रतेरपि कल्पितत्वेन सुखकनकतातानुपपत्तेश्चेति चेत् ? सत्यम्। सृंगारप्रधानकाव्येभ्य इव करुणप्रधानकाव्येभ्योऽपि यदि केवलाल्लाद एव सहृदर्यहृदयप्रमाणकस्तदा कार्यानुरोधेन कारणस्य कल्पनीयत्वाल्लोकोत्तरकाव्यव्यापारस्यैवात्रादिप्रयोजकत्वमिव दुःखप्रतिबन्धकत्वमपि कल्पनीयम्। अथ यदाल्लाद इव दुःखमपि प्रमाणसिद्धं तदा प्रतिबन्धकत्वं न कल्पनीयम्। स्वस्वकारणवशाच्चोभयमपि भविष्यति।

मानकर भी करुण आदि रसों के सन्दर्भ में अलौकिक सुख का समर्थन कैसे सम्भव है ? इसका समाधान निम्नलिखित है--करुण आदि रसों के सन्दर्भ में दो पक्ष हैं, एक तो श्रृंगारादि की तरह वहाँ भी सुख माना जाय और दूसरे यह कि वहाँ विलक्षण दुःख हैं, सुख नहीं, माना जाय। इनमें यदि प्रथम पक्ष सहृदयों के अनुभव से समर्थित हो तब तो जिस प्रकार अलौकिक काव्यव्यापार (व्यंजना)⁹ को सामाजिकमें उत्पन्न प्रातिभासिक रत्यादि से विलक्षण सुखजनकता का प्रयोजक माना जाता उसी प्रकार उसी काव्यव्यापार कां (सामाजिकनिष्ठ शोकादि में भी विलक्षण सुखजनकता का प्रयोजक मानने के साथ-साथ) उन (शोकादि) में दुःखजनकता का प्रतिवन्धक भी मानना होगा, क्योंकि जैसा कार्य देखा जाता तदनुरूप कारण की भी कल्पना करनी होती है। काव्यव्यापार की अलौकिकता को यह भी एक लक्षण है कि वह व्यापार स्वविषयीभूत नायकनिष्ठ रत्यादि से जिस सामाजिकनिष्ठ रत्यादि का एकत्वज्ञान होता उसमें सुखजनकता और शोकादि में सुखजनकता के साथ-साथ दुःखजनकता के अभाव का भी प्रयोजक है। यह स्थिति किसी अलौकिक पुरुष के व्यवहार से भी समर्थित है। अतः सामाजिक में

तयोर्यथाप्राथितमिन्द्रियार्थानु आसेदुषोः सदसतोः चित्रवस्तु । प्रासानि दुःखान्यापि दण्डकेपु सङ्कीर्त्यमानानि सुखान्यभूवन् ॥ इति ।

एतेन व्यङ्गजनादिजन्यदुःखान्तादिनिर्भरतस्यादेरं रसत्वमित्यपि सूचितं भवतीति वेदितव्यम्, तस्य स्वोत्तरभाविनाडलौकिकाह्लादेन भेदाडग्रहाजसम्भवात्। यस्तुत्तर-कालिकस्तद्रत्यादिजन्मास्सनदः स तु लौकिक एवैति विवेचनीयम्। उभयम् = रत्यादि-राल्लादः शोकादिदुःखं च ।

  1. विश्वनाथ के अनुसार लौकिक पदार्थों को अलौकिक विभावादिरूप देने वाले विभावन आदि व्यापार हीं प्रकृत व्यापार हैं।

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अथ तत्र कवीनां कर्तुम्, सहृदयानां च श्रोतुम्, कथं प्रवृत्ति:, अनिष्टसाधनत्वेन निवृत्तिरेचितत्वात् इति चेत् ? इष्टस्साधिक्यादिनिष्टस्य च

करुणादि दु:खाझीकारे तत्प्रधानकाव्ये कथम् सामाजिकानां कवीनां च प्रवृत्ति: रत्याश्रूते—अयेत्यादिना । श्रोतुमित्युपलक्षणम् दृश्युमित्यापि बोधयम् । समाधत्ते—इष्टस्स्यादिनिष्‍टादिना : चरमफलज्ञानकाल एवं प्रयोजन दु:खम्, पूर्वंमद्ररसास्यानुभवकाले च सुखमेव जायते इति भवतीष्टस्स्याधियक्यमिनिष्‍टस्य च चाल्पीयस्त्वम् ।

तथा च बलवदनिष्टानुबन्धित्वभावात् करुणादि्रधानकाव्याद्यध्ययनादावपि

उत्पन्न शोकादि भी रत्यादि की तरह विलक्षण सुख को हीं उत्पन्न करते, दु:ख को नहीं । इसके विपरीत यदि द्वितीय पक्ष, अर्थात् करुण आदि रस दु:खात्मक हीं होते—यह् पक्ष प्रामाणिक हो तब तो जैसे सुख के प्रसिद्ध कारण रत्यादि से सामाज-जिक को सुख होता वैसे हीं दु:ख के कारण के रूप में प्रसिद्ध शोकादि से सामाजिक को दु:ख का हीं अनुभव होगा ।

इस प्रकार यदि करुण आदि रसों को दु:खस्वरूप मान लिया जाय तब करुणादि-रसप्रधान काव्यों और नाटकों की रचना में कवियों की ओर उस प्रकार के काव्यों के अध्ययन तथा नाटकों के दर्शन में सहृदयों की श्‍ृयो भूय: प्रवृत्ति की व्याख्या की समस्या उठ खड़ी होती। कारण यह है कि कवियों की काव्य-नाटघ की रचना में प्रवृत्ति का अन्यतम प्रयोजन है रसिकों को आनन्दित करना जो दु:खप्रद करुणादि-प्रधान काव्यों-नाटकों द्वारा सिद्ध हो नहीं सकेगा । इसी प्रकार, प्रवृत्ति के प्रति इष्टस्साधनताज्ञान के कारण होने से अनिष्टसाधनभीूत करुणादिप्रधान काव्यादि के अध्ययनादि में यदि अज्ञानवश सहृदयों की एक बार प्रवृत्ति हो भी जाय तो भी दूसरी बार तो उनकी प्रवृत्ति कथंमपि नहीं होनी चाहिए थी, जब कि वस्तुस्‍थिति यह है कि उक्तविध काव्यादि के अध्ययन-दर्शन में सहृदयों की बार-बार प्रदत्तत्ति होती हीं है ।

करुणादिरसप्रधान काव्यादि के दु:खप्रद होने पर यह कैसे सम्भव है ? इसका यही समाधान है कि यदि किसी विषय में सुख अधिक और दु:ख स्वल्प हो तो उसमें प्रवृत्ति होती हीं है । जैसे चन्दन-घर्षणादि में स्वल्प दु:ख होने पर भी उसकी सुगन्धि और शीतलता आदि से होने वाले सुख की मात्रा की अधिकता होने से उसमें प्रवृत्ति लोकसिद्ध है उसी प्रकार करुणादि्रधान काव्यादि के अध्ययन-दर्शन में अन्तिम फल के दु:खद होने पर भी आदि के कथाांशों तथा ग्रंयरसाभिव्यक्ति आदिमें भी यथासम्भव सुख होने से सुख का आधिक्य और दु:ख का अल्पत्त्व स्पष्ट होने के कारण वैसे काव्यादि के अध्ययनादि में सहृदयों की श्‍ृयो भूय: प्रवृत्ति होना सम्भव है । वस्तुत: उक्तविध काव्यादि के अध्ययनादि में सहृदयों की श्‍ृयो भूय:

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न्यूतरवाच्चन्दनद्रवलेपनादाविव प्रवृत्तेरुपपत्तेः। केवलाल्लादवादिनां तु प्रवृत्तिरप्रत्यूहैव। अश्रुपातादयोऽपि तत्तदानन्दानुभवस्वाभाव्यात्, न तु दुःखात्। अत एव भगवद्रक्तानां भगवद्रण्णनाकर्णनादक्षुपातादय उपचयन्ते। न हि तत्र जात्वपि दुःखानुभवोऽस्ति।

प्रवृत्ति से हीं वहाँ सुख के आधिक्य की अनुमति कथमपि करनी चाहिए। जो आचार्य करुणादि रसों को भी आह्लादस्वरूप हीं मानते उनके मत में तो प्रवृत्ति, विघ्ना किसी प्रतिबन्ध के, उपपन्न है हीं, क्योंकि इस पक्ष में अनिष्टसाधनतज्ज्ञान, जो प्रवृत्त्ति का प्रतिवन्धक है, नहीं होता।

न च करुणरसादौ स्वात्मनि शोकादिमदृशरस्थादितादात्म्यारोपे यद्याह्लाद-स्तदै स्वप्नादौ सुप्तौ वा स्वात्मनि तद्रूपद्यापे से स्वात्, अनुभावक-च तत् केव्लं दुःखमितीहापि तदेव युक्तंमिति वाच्यम्।

काव्यप्रबन्धजन्यानन्द ऐवाश्रुपातादिजनकत्वं कार्यानुरोधेन कल्प्यत इत्यलो न श्रृङ्गारादौ वहर्ष्माकृतिर्यायः।

अयं हि लोकोत्तररसप्रवृत्तिरनिष्ठसाधनतज्ज्ञानभावान्नि:प्रत्यूहं भवत्येवेत्याह—केवलेत्यादिना। ननु यद्य करणप्रधान काव्याद्यध्ययनादि सुखमेव जायते तर्हि करुणतद्गयत्नादेरश्रुपातादयो जायंने, तेषां कुलैकमतत्नजस्यादिदृश्याश्रुंणां वयभिचारप्रदर्शंनद्वारा समाधत्ते—अश्रु-

स्मुरिते तदन आह—तत्तदिति। शोकादिरभावनाजन्यप्रातिभासिकशोकादिविषय-कानुभवजन्यानन्द ऐवाश्रुपातादिजनकत्वं कार्यानुरोधेन कल्प्यत इत्यलो न श्रृङ्गारादौ वहर्ष्माकृतिर्यायः। वहर्ष्मा—

करणादौ सुखभावप्रसाधकं पूर्वपक्षान्तरं निरस्यति—नचेत्यादिना। सत्रिपातो ज्वरविशेषः;, आदिपदात् शोकादिजनकोग्रान्तरपरिग्रहः। ननु भवतु स्वप्नादावपि शोकादिजन्यं सुखमेवेयत्तत आह—आनुभविकमित्यादि। तथा च तत्र सुखमद्युपगतं नाव्यम्, तदनुरोधेन च करणा-दावपि न सुखाऽभ्युपगम उचित इति पूर्वपक्षाशयः।

अमुसेव पूर्वपक्षं न च वाच्यमित्यनेन निराकरणे हेतुमाह—अयं हीत्यादिना। काव्य-प्रबन्धादि से हीं वहाँ सुख के आधिक्य की अनुमति कथमपि करनी चाहिए। जो आचार्य करुणादि रसों को भी आह्लादस्वरूप हीं मानते उनके मत में तो प्रवृत्ति, विघ्ना किसी प्रतिबन्ध के, उपपन्न है हीं, क्योंकि इस पक्ष में अनिष्टसाधनतज्ज्ञान, जो प्रवृत्त्ति का प्रतिवन्धक है, नहीं होता।

दावपि न सुखाऽभ्युपगम उचित इति पूर्वपक्षाशयः। निराकरणे हेतुमाह—अयं हीत्यादिना।

में करुणादि रसों को सुखस्ररूप कैसे माना जा सकता ? इसका उत्तर यही है कि ये अश्रुपाति दुःखमात्र से नहीं, अपि तु सुख से भी होते क्या भगवत्कथाश्रवण में भी भक्तों को कुछ दुःख होता ? फिर भी अश्रुपात आदि तो उस समय भी होते हीं। अतः सुखस्वरूपता में अश्रुपातादि को प्रतिकूल लक्षण नहीं कहा जा सकता।

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काव्यव्यापारस्य महिमा यत्प्रयोज्या अरमणीयापि शोकादयः पदाथ्राल्हादमलौकिकं जनयन्ति । विलक्षणो हि कमनीयः काव्यव्यापारजास्वादः प्रमाणान्तरजातानुभवात् । जन्यत्वं च स्वजन्यभावनाजन्य रत्यादिविषयकत्वम् । तेन रसास्वादस्य काव्यव्यापाराजन्यत्वेऽपि न क्षति: । शकुन्तलादावगम्याज्ञानोत्पादस्तु स्वात्मनि दुष्यन्तादिभेदबुद्धचा प्रती-

व्यापारस्य = व्यञ्जनताया: । अरमणीयाऽ इति । लोके दुःखजनकत्वेन प्रसिद्धापीतर्थ: । प्रमाणान्तरजात= प्रत्यक्षादिप्रमाणजन्यात् । शोकाद्यस्वादस्य काव्यव्यापारजन्यत्वं कथमुक्तं ? तस्य सामाजिकतद्रिप्रेक्ष्यवन्चनीयशोकादिजन्यत्वादित्यतः: काव्यव्यापारजन्यत्वं परिष्करोति— जन्य इति । स्वं काव्यव्यापारो व्यञ्जना, तज्जन्या रत्यादिभावना तज्जन्यः: सामाजिके प्रातिभासिको रस्यादिदृष्टिकयत्वं तदास्वाद्येति काव्यव्यापारस्यास्वादजनकत्वं परम्परया संगमत-मित्यर्थः । यद्यपि भावनाऽपि न काव्यव्यापारजन्या तथापि विषयतया भावनाजनककीदृश्यतादिनिप्ररसादेरेभियुज्यतेकतया व्यञ्जनाया भावनाजनकत्वमुक्त-मित्यपि बोध्यम् । भावनारूपपोषविशेषमहिम्ना सामाजिके दुष्यन्ततत्त्वोत्पत्तिसिहारेण या दुष्यन्तादिभेदबुद्धिरहं दुष्यन्त इत्याकारिका तस्या: प्रभावेण शकुन्तलादावित्यादिना । अगम्यार्थप्रकारकज्ञानाभावमुपपादयति—

बध्यते' इत्याह: ॥ (४) परे तु 'व्यङ्गचद्व्यापारस्यैवचिन्त्योऽर्थ उपगमेऽपि प्राङ्गुक्तदोषमहिम्ना स्वात्मनि दुष्यन्तादित्यादात्म्यावगाही शाकुन्तलादिविषयक-

हि सति तद्विषयककरतिमत्त्वबोधभाव एव सामाजिकानां स्यादित्यर्थ: ॥ भावनारूपपोषवशात् सामाजिकेऽनुत्पत्तस्तयैव रत्यादेशे आत्मको बोध: 'अहं शकुन्तलाविषयकरतिमान् दुष्यन्त:' इत्याद्याकारको रस इति चतुर्थ मतमाह—परे त्वित्यादिना । अत्र च मते दुष्यन्तादिनिष्ठरतिमाननुष्णेय एव, व्यञ्जनया अनभ्युपगमाद ।

कुछ अन्य आचार्ये तो रस के विषय में यह मानते हैं—दुष्यन्तादिनिष्ठ रत्यादि के बोध के लिए व्यञ्जना वृत्ति की कोई आवश्यकता नहीं । रत्यादि-बोध तो अनुमान से हाँ सम्भवव है । इसी तरह सामाजिक में प्रातिभासिक रत्यादि की उत्पत्ति मानने का भी कोई प्रयोजन नहीं है । तब सामाजिक को रस-प्रतीति कैसे होती—इस प्रशन के उत्तर में यही समझना चाहिए कि सर्वप्रथम काव्य के वध्ययन या श्रवण से सामाजिक को दुष्यन्तादि तथा उनके रत्यादि के व्याप्त चेष्टा आदि का शाब्द ज्ञान होता । नाटघ के अवलोकन से तो

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रत्यादिमदभेदबोधो मानसं: काव्यार्थंभावनाजन्मा विलक्षणविषयताशाली रस:। स्वाप्नादिस्तु तादृशबोधो न काव्यार्थंचिन्तनजन्मेति न रस:। तेन तत्र न तादृशाल्लादापत्तिः। एवमपि स्वस्मिन्नेवविधमानस्य रत्यादेरनुभवः कथं नाम स्यात्? मैवम्। न ह्यायं लौकिकसाक्षात्कारो रत्यादिः, येनावश्यं

दुष्यन्तादिद्वस्थानीय नट की दुष्यन्तादिचेष्टासादृशा चेष्टा आदि को देखकर दुष्यन्तादि की रत्यादिव्याप्य चेष्टा आदि की अनुमिति और उस अनुमित चेष्ट्रादि से दुष्यन्तादिनिष्ठ रत्यादि की अनुमिति हो जाती है। उसके बाद जब सामाजिक दुष्यन्तादिविषयक रत्यादि की भावना करता तत्र इसी भावनास्वरूप दोष के प्रभाव से सामाजिक रत्यादि को दुष्यन्तादि के साथ अपने तादात्म्य का भ्रम होता और वह अपने को शकुन्तलादिविषयक रत्यादि से युक्त समझने लग जाता। यह समझना मानस बोध है, क्योंकि रत्यादि का आत्मनिष्ठ पदार्थ के रूप में बोध मनोजन्य हीं हो सकता है। इस बोध के विषय अपने में वस्तुतः अविद्यमान रत्यादि में जो विषयता होनी वह सविषय-निष्ठ विषयता से विलक्षण हीं होती। अविद्यमान रत्यादि जो सामाजिक के बोध का विषय होता वह काव्यार्थ के पनः पनः अनुसन्धान (= भावना) के कारण

अनिवँचनोयस्याते:=सामाजिकेऽनिवँचनोयसत्यादिप्रतीतौस्तत्समकालिकतदुत्पत्तेश्च । प्रागुक्तोदोषोदत्त रत्यादिभावनात्मकः। मानस इति आत्माश्रयप्रसवादिस्थ्यादिबोध- स्योक्तम्। काव्यार्थभावनेति। काव्यस्य वाच्यो लक्यो वा योऽर्थस्तस्यैवानुसन्धानं इयं च भावना प्रागुक्तदोषात्मकाभावनाया अनुमितरत्यादिविषयिकाया अभिन्नैवेतित बोधयम्। इदमेव ज्ञानलक्षणसन्निकर्षः। विलक्षणेति। विषयतां वैलक्षण्यं चात्राडसद्विषयाश्रितत्वमेव बोध्यम्। भ्रम इति। तथा च विषयसद्भावाऽभावेपि यथा चुकिरजतस्य चाकचिक्यदर्शनसमुद्रोधितरजतविषयकसंस्कारजन्यस्मरणात्मक- ज्ञानलक्षणजन्यो भ्रमात्मकः साक्षात्कारोडलौकिको नैयायिकादिभिः स्वीक्रियते तथैव प्रकृतेऽपि भवः। धम्यंशे त्वयमपि बोधः साक्षात्कारात्मको लौकिक एवेति बोधयम्। ननु च मते बोधस्यैवास्वादरूपस्य रसत्वाभ्युपगमाद् 'रसस्यास्वाद:' इति

( यही अनुसन्धान ज्ञानलक्षणसन्निकर्ष का कार्यं करता जिससे सामाजिक को आत्मनिष्ठ रूप में रत्यादि का अलौकिक प्रत्यक्ष होता। ) उक्त रत्यादिबोध हीं 'रस' है। स्वप्न आदि में भी यद्यपि 'अहं दुष्यन्तः शकुन्तलाविषयकरतिमान्' इत्याधारक बोध हो सकता है तथापि उसे 'रस' नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह काव्यार्थभावना से उत्पन्न नहीं होता, अर्थात् उस बोध में विशेषणोभूत'रत्यादि का ज्ञानलक्षणसन्निकर्षजन्य अलौकिक साक्षात्कार नहीं होता। मतः स्वाप्नादि-बोध को 'रस' कहनाना सम्भवव नहीं। इसलिये स्वाप्नादि-बोध में लोकोत्तर

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विषयसद्रावोडपेक्षणीय: स्यात् । अपि तु भ्रम: । आस्वादनस्य रसविषयकत्वद्यवहास्तु रत्यादिविषयकत्वालम्बन: इत्यपि वदन्ति ॥

व्यवहार आस्वादविषयकृत रत्यादि रसस्योपनिबन्धन इत्याह-आस्बादनस्पेत्यादिना । 'राहो: शिर:' इति्वदभेदार्थकैव रसस्येति षष्ठीत्पि समाधा- न्तरमूहम् ।

एतैश्च स्वात्मनि दुष्यन्ततत्पर्धर्मितावच्छेदकशकुन्तलादिविषयकरति- वैशिष्टचावगाही, स्वात्मतत्पविशिष्टे शकुन्तलादिविषयकरतिविशिष्टदुष्यन्त- तादात्म्यावगाही, स्वात्मतत्पविशिष्टे दुष्यन्ततत्पशकुन्तलाविषयकरत्यौवं-

विशेषणविशेष्यभावे विनिगमकाभावादुक्तबोधस्य रसत्वेनाभिमतस्य त्रिविध्य- दर्शंयति -एतैश्चेत्यादिना । 'दुष्यन्ततोज्ं शकुन्तलाविषयकरतिमान्', 'शकुन्तला- विषयकरतिमान् दुष्यन्तोहम्', 'अहं दुष्यन्त: शकुन्तलाविषयकरतिमांश्च' इति कमेण बोधे त्रयम् ।

प्रथमे बोधे रतिनिष्ठा प्रकर्ता, तन्निरुपिता धर्मिता (= विशेष्यता) अहंपदार्थे सामानाधिकरण्ये तस्या अवच्छेदकं दुष्यन्तत्वम् । अतोडत्र दुष्यन्ततत्पं धर्मितावच्छेदकं यस्य रत्याद्यस्य धर्मद्रव्यं तस्य वैशिष्टच' ( दुष्यन्ततत्पविशिष्टे ) अहंप- दार्थे भासते ।

अत्रोयं बोधो दुष्यन्तत्वविशिष्टे रतिवैशिष्टचावगाही भवति । अत एवात्र प्रथमे स्वात्मनि दुष्यन्तत्वस्य तदनन्तरं च दुष्यन्ततत्पाविशिष्टे स्वात्मनि प्रकातरया रतेर्निष्ठा भास: ।

दात्ककता नहीं आती । अब प्रश्न यह है कि जब सामाजिक में शकुन्तलादिविषयक रत्यादि रहता हैं नहीं तो उसे उसका उपयुक्त बोध होता कैसे । इसका उत्तर यही है कि लौकिक प्रमात्मक साक्षात्कार के लिए हि विपयक का अस्तित्व आवश्यक होता ।

भ्रमात्मक साक्षात्कार में तो विषयक का अस्तित्व होता हि नहीं । उस में तो ज्ञानलक्षण मत्निकर्ष से असद् विषयक का हि भ्रमात्मक अलौकिक साक्षात्कार होता । जैसे—शुक्ति में रजत का भ्रमात्मक साक्षात्कार ।

वहां शुक्ति और रजत दोनों के चमकीले होने से चमकीली शुक्ति को देख कर ( और दोष के कारण शुक्तित्व का ज्ञान न होने से) पूर्वानुभूत देशान्तरीय रजत का स्मरण होता ।

यत: 'इदं रजतम्' यह बोध प्रत्यक्षात्मक है और वहाँ रजत के न होने से उसके साशा द्रष्टा के चक्षुका लौकिक सयोग सन्निकर्ष हो नहीं पाता ।

अत: रजतस्मरणस्वलूप ज्ञान हि चक्षु और वहाँ

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शिष्टचर्वगाही, वा त्रिविधोऽपि बोधो रसपदार्थंतयाभ्युपेयः। तत्र रतेर्विशेषणीभूताया: शाब्दादप्रतीततत्वादिव्युत्पजननायाश्च तलप्रत्यायिकाया अनुष्पगमाच्चेष्टादिलिङ्गकमादौ विशेषणज्ञानार्थमनुमानमभ्युपेयस्‌म्‌ ॥

बोधः सामाजिकस्यैतदुपपादयति—रतेरित्यादिना। अत्र च मते नटेऽपि शङ्कुकमतवच्चिन्नतुरगादिन्येन हृश्यंताद्यभेदबुद्धिः स्वीकार्यं, तदभावे नटचेष्टादिर्भदुष्यंत्ते निपुणरतेरतुमित्यसम्भवदिति ध्येयम्‌। यद्वा साधृश्यादिना नटचेष्टादुष्यंतादितादात्म्यारोपाद् भेदाग्रहाद्वा नटे हृश्यंतादिचेष्टादितादात्म्यारोपस्तद्‌भेदाग्रहो वा मन्तव्यः। अत्र च न पक्षे हृश्यंतादो नटसमवेतचेष्टादेरभावादेतच्चेष्टादेरहृश्यासतत्वेन हृश्यंतादिनिपुणरतेरदनुमितिरपि यद्यप्याभासरूपैव तथापि तत्र रत्यादिसत्वं न विरध्यते, बाधातिरिकहेतुभासनानं साध्यसाधकत्वाभावेऽपि व्याप्त्यचेष्टासदृशचेष्टादर्शनादहृश्यंतादिनिपुणरतादृशचेष्टानुमितिः, तस्यैच हृश्यंतादिनिष्ठरत्यादिनुमितिः सुलभमेवेति व्याख्येयम्‌ ॥

अविद्यमान रजत के बीच सन्निकर्ष का कार्यं करता। यद्यपि इस ज्ञान में इदं-पदार्थ के साथ चक्षु का संयोग और अविद्यमान किन्तु स्मर्यमाण रजत के साथ ज्ञानलक्षणसन्निकर्ष होता तथापि 'इदं रजतम्‌' इत्याकारक ज्ञान एक हीं होता, दो नहीं, क्योंकि अनेक सन्निकर्षों से एक ज्ञान की उत्पत्ति विषयांतर में भी प्रसिद्ध है। इसी से यह भी स्पष्ट है कि इस मत में जिस रत्यादिबोध को रस कहा गया है उस बोध में धर्मी अहंपदार्थ का तो लौकिक सन्निकर्ष—संयोग से मन द्वारा प्रत्यक्ष होता जब कि धर्म—विशेषणीभूत रत्यादिका ज्ञानलक्षणसन्निकर्षजन्य अलौकिक प्रत्यक्ष हीं होता। परन्तु उभयसन्निकर्षजन्य यह मानस साक्षात्कार एक है, अनेक नहीं—यह पहले हीं कहा जा चुका है। साथ हीं, यह बोध भ्रमात्मक है, क्योंकि जिस रत्यादि का स्वनिष्ठ रूप में बोध होता वह वस्तुतः सामाजिक में रहता नहीं। ज्ञानलक्षणसन्निकर्षजन्य बोध भी यथार्थ हो सकता है, यदि उसका विषय जहाँ ज्ञात हो रहा है वहाँ सत् हो। इसका प्रसिद्ध उदाहरण है 'सुरभि चन्दनम्‌' यह प्रत्यक्ष। इस मत में आस्वादात्मक बोध के ही 'रस' होने से रस तथा आस्वाद दोनों एक वस्तु के ही दो नाम हैं, रस विषय हो और आस्वाद रसविषयक बोध हो—ऐसा नहीं। अतः 'रस का आस्वाद होता है' यह प्रसिद्धि औपचारिक है, वास्तविक नहीं। जिस रत्यादि के बोध को रस कहा जाता वह रत्यादि हीं और औपचारिक रूप में 'रस' कहलाता जिसका विषय बनाते वाला है, आस्वादात्मक बोध (= रस)।

उक्त रसात्मक बोध के तीन रूप हो सकते हैं—(१) "हृश्यंतोज्झं शंकुतला--

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(५) 'मुख्यतया दुष्यन्तादिगत एव रसो रत्यादि: कमनीयविभावादिभिनयप्रदर्शनकोविदे दुष्यन्ताद्यनुर्त्तरि नटे समारोप्य साक्षात्क्रियते'

लोल्लटादनुसारेणाह—मुख्यतयेत्यादि । रसो रत्यादिरतिवचनेनास्मिन् मते स्थायिभाव एव रसो न तु बोधात्मक: पूर्वमतवदिति स्पष्टम् । कमनीयेत्यादि । कमनीयो यो विभावादीनामभिनयस्तत्प्रदर्शने कोविदो निपुणस्तस्मिन् । अभिनयप्रदर्शनकोविदेतेनैव क्रियतेलक्षणकोविदेति क्रथंमतेनोल्लडप्यलंकारिकोक्तिमेव । प्रथमतः सामाजिकान्मति नटे दुष्यस्तत्स्वारोप: सुकर इति । दुष्यन्तोदयं शकुन्तलाविषयकरतिमानिति प्रत्यक्षताकारप्रदर्शनेन चेदमपि स्पष्टतमेव यत्प्रथमं नटे दुष्यन्तत्स्वारोपस्तदनन्तरं च तस्मिन् शकुन्तलादविषयकरत्यारोप: । एतच्च ज्ञानं सामाजिकानां जायमानं साक्षात्कारात्मकम्, तच्चेदमपदार्थोंपस्थिततस्य चक्षुषा संयोजातदंशे लोभिकं, आरोप्यस्य च रतेःस्थायित्त्वं च चक्षुषा सह संयुक्तसमवायो न सम्भवति, तयोरारोप्योस्त्रयोः साक्षादसत्त्वात् । अत आरोप्येण सह चक्षुषो ज्ञानलक्षणात्मकोल्लोकिक एक एवं सन्निकर्ष इतयुभयामपि सन्निकर्षाभ्यामेकमेव पूर्वोक्तवत्साक्षात्कारात्मकं भ्रमज्ञानं जायते । यच्च रत्यादिज्ञानं सन्निकर्षस्थानीयं विषयकरतिमान्', (२) 'शकुन्तलादिविषयकरतिमानं दुष्यन्तोदयं' और (३) 'अहं दुष्यन्तः शकुन्तलादिविषयकरतिमांशच ।' प्रथम बोध में अहंपदार्थ धर्मी, दुष्यन्ततत्त्व धर्मितावच्छेदक है अतः दुष्यन्ततत्त्वविशिष्ट अहंपदार्थ में रति का वैशिष्ट्य-सम्बन्ध विषय होता । अतः इसमें पहले दुष्यन्ततत्त्व का और उसके बाद रति का सम्बन्ध प्रकट होता । द्वितीय बोध में रति दुष्यन्त का विशेषण है और रतिविशिष्ट दुष्यन्त अहंपदार्थ का विशेषण । इसमें विशेषण ( दुष्यन्त ) का विशेषण होने से रति को विशेषणावच्छेदक कहा जाना चाहिए । तृतीय बोध में रति तथा दुष्यन्त दोनों ही अहंपदार्थ के विशेषण हैं । इस मत में रति का बोध दुष्यन्तादिनिष्ठ तत्क के रूप में अनुमान प्रमाण द्वारा पहले होता है और बाद में भावना के आधार पर दुष्यन्त से अपना भेद न समझने के कारण सामाजिक को ज्ञानलक्षणसन्निकर्ष से उसकी अलौकिक प्रत्यक्ष होता है इसे अनुमान में 'हेतुभूत है दृश्य काव्य में दुष्यन्तस्थानीय नट में दुष्यन्तचेष्टासदृशा चेष्टा (का ज्ञान) और श्राव्य (या पाठ्य) काव्य में शब्द से होने वाले दुष्यन्त की चेष्टा का ज्ञान ।।

अब ग्रन्थकार मतसूत्र के एक व्याख्याकार लोल्लट के मत को प्रस्तुत कर रहे हैं—रसस्वरूप रत्यादि वास्तविक रूप में तो दुष्यन्तादि में ही रहते । किन्तु विभाव आदि के रोचक ( अत्यन्त स्वाभाविक ) अभिनय के प्रदर्शन में निपुण नटों में पहले दुष्यन्तादि के सांदृश्यातिशय के कारण दुष्यन्ततत्त्व आदि का आरोप सहृदय

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इत्येके । मतेऽस्मिन्साक्षात्कारो दुष्यन्नतोऽयं शकुन्तलादिविषयकरतिमान्त्यादि: प्राग्वद्रस्यों लौकिक आरोप्यांशे त्वलौकिक:॥

तर्ककाव्यात्मकशब्दजन्यं नटद्वृत्तिदुष्यन्नादिचेष्टालिङ्गकानुमितिरूपा । यद्वा नटे दुष्यन्नतवारोपप्रयुक्त एव नटचेष्टादौ दुष्यन्नतचेष्टादिभेदप्रग्रहस्तदेकत्वाध्यवसायो वेति सुलभा रत्यादनुमिति: । अनुमितिपक्षेऽपि न तावन्मात्रेण विश्वान्ति: । परोक्षात्मकाया अनुमितेरलौकिकास्वादाननुभवादिति साक्षात्कारपर्यन्तानुधावनम् । तथा चास्मिन् मते दुष्यन्नादिनिष्ठरत्यादिरेवारोपितदुष्यन्नतादितादात्म्ये नटे- समारोपित: सामिज्ञै: साक्षात्किमानो रस इति प्रतिफलति ॥

आरोपितरुदुष्यन्नत्वे नटे रत्युनुमितेरं ज्ञानलक्षणसन्निकर्षत्वं, लौकिकानुभवस-मग्रच्या अलौकिकानुभवसमग्रतो बलवत्त्वाद; अत एव पूर्वतो वदितमानित्यादि न वल्लिस्मृतेज्ञानिलक्षणसन्निकर्षत्वमाश्रित्य वल्लिप्रत्यक्षमपि स्वमुमितिरेव; लौकिक-प्रत्यक्षसामग्र्या अनुमितिसामग्रतो बलवत्त्वमपि समानविषयत्वे सत्येव, नान्यथेति धर्मिणो लौकिकप्रत्यक्षसामग्रीसद्भावेऽपि तन्निष्ठतेनाभिमतरत्यादेरनुमितिरेव, न प्रत्यक्षं लौकिकं, तद्विषयकलोकि-प्रत्यक्षसामग्र्यै

कर लेते जिसके कारण दुष्यन्नादिनिष्ठ रत्यादि का भी नटों में आरोप स्वतः प्राप्त हो जाता। अब नटनिष्ठ आरोपित रत्यादि का सहृदयों को होने वाला ज्ञान—‘दुष्यन्नतोऽयं शकुन्तलाविषयकरतिमान्’ यतः साक्षात्कारात्मक है । अत एव इसे ज्ञानलक्षणसन्निकर्ष द्वारा होने वाला अलौकिक साक्षात्कार माना जाता, क्योंकि परमत रत्यादि आन्तरिक पदार्थों के साथ सहृदयों के इन्द्रिय का कोई लौकिक सन्निकर्षं वन नहीं सकता । यह साक्षात्कार भी प्रमात्मक न होकर भ्रमात्मक है, क्योंकि जिस नट में रत्यादि का साक्षात्कार होता उसमें रत्यादि हैं नहीं । यदि उसमें अन्य प्रकार के रत्यादि हों भी तब भी शकुन्तलादिविषयक रत्यादि, जिनका है नट में भी, किन्तु उसके साक्षात्कार को रससाक्षात्कार नहीं कहा जा सकता । अतः यह रत्यादिसाक्षात्कार युक्ति में रजतत्व-साक्षात्कार के समान भ्रमात्मक होता । आनन्द तो भ्रमज्ञान से भी होता हाँ है । उक्त साक्षात्कार में भी, पूर्वंनिदिष्ट मत के समान, अलौकिकता केवल धर्मांश—आरोपित रत्यादि में हाँ है, धर्मी—दुष्यन्नत के रूप में प्रतीयमान इदम्पदार्थ नट के अंश में तो लौकिकता हाँ है, क्योंकि उसके साथ तो सहृदय के चक्षु का संयोजात्मक लौकिक सन्निकर्ष होता हाँ है ॥

भरतसूत्र के अन्य व्याख्याकार रुइकुक आदि का रसास्वाद विषयक-मत लोललट:

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(६) 'दुष्यन्तादिगतो रत्यादिनेटे पक्षे दुष्यन्ततत्स्वेन गृहीते विभावादिभि:

भावार्थ; यद्यापि साध्यर्थे विशिष्टर्थमिणोऽनुमेयत्वं तदर्थापि नटमात्रविपयकौौकिकप्रत्यक्षसामग्री रत्यादिविशिष्टनटानुमितिसामग्रीबाधकत्वं न, समानविषयत्वाभावात्; अलौकिकप्रत्यक्षसामग्री तु तद्विषयकविशिष्टविषयकौौकिकानुभवसामग्र्यर्थापि बाधकत्वं एव, अनुभावलादिति न लौलटाद्यभिमतो रत्यादि: साक्षात्क्रियमानोदपि त्वनुमीयमान एव रसः, अनुमीयमानस्यापि रत्यादेरलौकिकाल्लादजनकत्वात्तु विषयस्वभावबलादेवास्तेयमिति मन्यमानानां नाटकादौ मतं प्रस्तौति—दुष्यन्तादिगत इत्यादिना । अत्रापि मते रत्यादिरेव रस इति स्पष्टमेव । दुष्यन्ततत्स्वेन गृहीते इति । दुष्यन्ततत्प्रग्रहणुच नटे मुख्यतः शब्दादेव । वचचित्रपूर्ववासनादपि निबिमित्तभावमुपायात्यन । पवित्ररचायं दुष्यन्ततत्ष्टादिसदृशचेष्टादि-

आदिके मतसे कुछ भिन्न है। जहाँ तक रत्यादिस्वरूप रसके मुख्य आश्रयोंकी बात है वहाँ तो पूर्ववत् दुष्यन्त आदि हीं है । दुष्यन्त तथा शकुन्तला आदि के स्वाभाविक क्रियाकलापों के अभिनय में पूर्ण सफल नट-नटी आदि में सादृश्यातिशय के कारण दुष्यन्ततत्स्व-शकुन्तलादि्व आदि का समारोप तथा नट-नटी के चेष्टादि में दुष्यन्त-शकुन्तलादि्व के चेष्टादि को आरोप भी पूर्ववत् इन्हें मान्य है । किन्तु सहृदयों को जो—‘दुष्यन्तादिग्योः शकुन्तलादिविषयकरतिमान्’ इत्याकार बोध होता वह अलौकिक धमात्मक साक्षात्कार नहीं, अपि तु अनुमित्यात्मक है । इसका कारण यह है कि अलौकिकसन्निकर्षजन्य प्रत्यक्ष का लौकिक अनुभव की सामग्री बाधक होती । इसीलिए 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यादि स्थलों में व्याप्तिस्मरणरूप ज्ञान को अलौकिक सन्निकृष्ट मानकर नैयायिक वत्ति का अलौकिक प्रत्यक्ष नहीं, अपि तु अनुमिति हीं मानते है । अतः जहाँ ‘सुरभि चन्दनम्’ आदि में सुरभि अंश का अलौकिक प्रत्यक्ष मान्य है वहीं अनुमितिसामग्री का फल के आधार पर अभाव मानना चाहिये । हैं, लौकिक-प्रत्यक्ष की सामग्री अन्य परोक्षज्ञान की सामग्री से प्रबल अवश्य है । इसीलिए कहीं यदि किसी विषय के प्रत्यक्ष और अनुमित्यादि की भी सामग्री समनिकर्ष में उपस्थित होतीं तो वहीं उसे विषय को प्रत्यक्षज्ञान हीं होता, अनुमित्यादिस्वरूप परोक्षज्ञान नहीं । अत एव न्यायदर्शने के प्रत्यक्ष सूत्र की तात्पर्यंटीका में वाचस्पति मिश्र ने अपने आचार्यों की उक्ति उद्धृत की है—

शब्दजत्वेन शब्दाैैव प्रत्यक्षं चाक्षजत्वतः । स्पष्टप्रहणसम्बन्धाद् युक्तमेन्द्रियकं हि तत् ॥

किन्तु यह बाध्यबाधकभाव विरोध होने पर हीं होता है, अन्यथा नहीं । विरोध समानविषयता होने पर हीं सम्भव है, इसके बिना नहीं । अतः 'पर्वतो वह्निमान्'

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कृतिमैरप्यकृतिमतथा गृहीतैरविभिन्ने विषयेऽनुमितिसामप्रचा बलवत्त्वादनुमीयमानो रस:' इत्यपरे ॥

(७) 'विभावादिसंत्रय: समुदिता रस:' इति कतिपये ॥ (८) 'त्रिषु य एव चमतकारी स एव रसोडन्यथा तु नयोदपि न' इति वहव: ॥ (९) 'भाव्यबोधेन । अकृतिमतयेऽपि । अन्न हेतुरभिनयपाटवादि: । शेषो ग्रन्थो व्याख्यातप्राय: । अनुमानप्रथोगइच —दुष्यन्तोऽयं शकुन्तलाविषयकरतिमान्, तद्रतिव्याप्यदृष्टादेशच पूर्वारोपितादृश्यादिने कतवाध्यवसायदारोपितत्वेनैवमुक्ति: धरामिककैव, न प्रामाणिकेति स्पष्टतम् । अन्न प्रयोर्गे दृष्टान्तरत्वं रसचर्वणिक्रयामुक्तं विज्ञैर्विवेचनीयम् ॥

इस ज्ञान में पर्वंतविषयक प्रत्यक्षसामग्री वत्तिविषयक अनुमिति-सामग्री का बाधक नहीं होती, क्योंकि वनों के विषय भिन्न-भिन्न हैं । यदि वत्तिविशिष्ट पर्वंत को भी अनुभेय माना जाय तो भी समानविषयता नहीं है, क्योंकि पर्वंतस्वविशिष्ट प्रत्यक्ष-सामग्री और वत्तिविशिष्ट पर्वंत की अनुमिति-सामग्री में भिन्न-विषयता के कारण कोई विरोध नहीं है । अतः वत्ति अथवा वत्तिविशिष्ट पर्वंत की प्रत्यक्ष-सामग्री और वत्तिविशिष्ट पर्वंत की अनुमिति हों अनुभवसिद्ध है । अत एव यह स्पष्ट है कि भिन्न-विषयता होने पर अनुमिति-सामग्री प्रत्यक्ष-सामग्री से प्रबल होती है । एवं च प्रकृत में नट की प्रत्यक्ष-सामग्री होने पर भी रत्यादिविशिष्ट नट की अनुभूति-सामग्री के विद्यमान होने पर रत्यादिविशिष्ट नट की अनुमिति ही होती, अलौकिक या लौकिक प्रत्यक्ष नहीं । यही अनुमीयमान रत्यादिस्वरूप स्थायी भाव रसपदार्थ है और उसकी अनुमिति उस रस का आस्वाद है । अथवा रसानुमिति के पश्चात् होने वाला मानस-प्रत्यक्षात्मक अनुभयवसाय को ही रसास्वाद कहना चाहिए ॥

कुछ आचार्य विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभाव इन तीनों को समुदितरूप में ही रस मानते हैं । बहुत से आचार्यों का यो यह मत है कि विभाव वादि तीन

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मात्नो विभाव एव रसः इत्यन्ये ॥ ( ९० ) 'अनुभावस्थया' इत्यतरे ॥ ( ९९ ) 'व्यभिचार्येव तथा तथा परिणमति' इति केचित् ॥

तत्र 'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः:' इति सूत्रं तत्समर्थनपरतया व्याख्यायते— 'विभावानुभावव्यभिचारिभिः संयोज्याद्व्यङ्जनाद्रसस्य चिदानन्दविशिष्टस्यायातमनः स्थाय्युपहितश्चिदानन्दात्मनो वा निष्पत्तिः स्वरूपप्रकाशनम्' इत्याद्ये । 'विभावानुभावव्यभिचारिणां सम्यक्साधारणीकरणात्तया योगाद्रसवक्तव्यापारेण भावनाद्रसस्य स्थाय्युपहितसत्त्वोद्रेकप्रकाशितस्वात्मानन्दरूपस्य निष्पत्तिभोगाङ्ग्येन साक्षात्कारेण

में जो चमत्कारातिशयजनक हो वही रस है। अतः कहिं चमत्कारातिशयजनक विभाव, कहिं वैसे अनुभव और कहिं तादृश संचारिभाव ही रस है ॥ अन्य आचार्यों का मन्तव्य यह है कि भावनाविषयीभूत विभाव हि रत्यादि का आश्रय होने से रस है ॥ कुछ आचार्य अनुभव के रस्यादि-प्रकाशन में सामर्थ्य प्रकट होने से अनुभव हि भावना—पुनः पुनः अनुसंधान के फलस्वरूप रसरूप में परिणत हो जाता ॥ जब कि कुछ आचार्य परिपोषक होने से भावना-विषयीभूत व्यभिचारि-भाव का हि रसरूप मे परिणाम मानते हैं ॥

भाव्यमान इति । भावनाविषयीभूतः । विभावस्य प्राधुर्ये च स्थायिभावाश्रयत्वाद्द्बोध्यम् । मतान्तरमाह—अनुभावस्थथेति । तथा = भाव्यमान । रस इति शेषः । भाव्यमान इत्यनेन तदभावे न रसत्वमिति सूचितम् । अन्यं मतमाह—व्यभिचार्येवेति । तथा = भाव्यमान । तथा = रसरूपेण ॥

The word 'Bhāvyamāna' means being made to be experienced. It is the object of Bhāvana. When Vibhāva is predominant, it is understood that it is the basis of the Stāyī Bhāva. Another view is expressed in the phrase 'Anubhāvasthāya iti'. The word 'Tathā' means 'being made to be experienced'. The rest is 'Rasa'. This implies that if there is no Bhāvana, there is no Rasa. Another view is expressed in the phrase 'Vyabhicāryeva iti'. The word 'Tathā' means 'being made to be experienced' and 'being transformed into Rasa'.

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विषयीकृति:' इति द्वितीये। 'विभावानुभावव्यभिचारिणां संयोगाद्नावनाविशेषरूपाद्दोषाद्रसस्यैनिवृत्तीनां यदुष्यन्तर रत्याद्यास्तमनो निष्पत्तिःह्तपत्तिः' इति तृतीयये। विभावादीनां संयोगाज्ज्ञानाद्रसस्य ज्ञनविशेषात्मनो निष्पत्ति-रुत्पत्ति:' इति चतुर्थे। 'विभावादीनां समवन्वाद्रसस्य रत्यादेर्निष्पत्ति-रारोप:' इति पञ्चमे। 'विभावादिभिः कृतिमैरण्यकृतिमतया गृहीतैः संयोगादनु मानाद्रसस्य रत्यादेर्निष्पत्तिरनुमितिः, नटादौ पक्ष इति शेषः' इति षष्ठे। 'विभावादीनां त्र्याणां संयोगात्मुदायाद्रसनिष्पत्ती रसपदवयवहार:' इति सप्तमे। 'विभावादिषु सम्यग्ययोगाच्चमत्कारात्' इत्यष्टमे।

की (सम्यक् = ) साधारण रूप में (योग = ) भावकत्व-व्यापार द्वारा भावना, उससे रस, अर्थात् भोजकत्व व्यापार द्वारा चित्त में हुए सत्त्वगुण के प्रकर्य से प्रकाशित और रत्यादि से उपहित आत्मस्वरूपानुपानन्द', की भोगस्वरूप साक्षात्कार द्वार' निष्पत्ति ( स्थायिप्रहित आनन्द को विषय बनाया जाना ) होती है। तृतीय मत में विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभावों के संयोग (= भावनाद्दोषस्वरूप द्वेष) से रस, अर्थात् अनिर्वचनीय रत्यादि, की सामाजिक में निष्पत्ति, अर्थात् उत्पत्ति हीं सूत्रार्थ है। विभाव आदि के संयोग—ज्ञान से ज्ञानविशेषस्वरूप रस की निष्पत्ति ( उत्पत्ति ) होती है—यह चतुर्थमतानुसारि सूत्रार्थ है। पञ्चममत में·विभावादि के संयोग (=सम्बन्ध ) से सामाजिक में रत्यादि स्वरूप रस की निष्पत्ति—आरोग ही सूत्र का तात्पर्य है। षष्ठमतानुसारिणि व्याख्या यह है कि कृतिम होने पर भी नटादि की अभिनयचातुरी से अकृतिम रूप में समजो जाने वाले विभाव आदि के साथ रत्यादि का संयोग=अनुमान=व्याप्ति सम्बन्ध होने से व्याप्ति विभावादि के द्वारा नट में सामाजिक को व्याप्तिक्रीत रत्यादिस्वरूप रस की निष्पत्ति, अर्थात् अनुमिति, होती है। समम मत के अनुसार भरत के रससूत्र का यह अर्थ है—विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभाव के संयोग =समुदाय के कारण हों रसनिष्पत्ति, अर्थात् समुदित रूप में इनके लिए रस-पद का प्रयोग होता।

  1. यद्यपि भट्टनायक के मत में चित्तसत्वगत. आनन्द की ही प्रतीति माननी चाहिए तथापि वास्तविक आनन्द के आत्मस्वरूपप्रभूत होने से आत्मानन्द कहा है पण्डितराजेन।

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पर्यवसितस्त्रिषु मते᳈ु सूत्रविरोधः। विभावानुभावव्यभिचारिणामेकस्य तु रसान्तररसाधारणतया नियतरसव्यजकतानुपपत्ते: सूत्रे मिलितानामपादानम्। एवं च प्रामाणिके मिलितानां व्यजकत्वे यत्र क्वचिदेकस्मादेवा- साधारणाद्रसोद्रेकस्तत्रैतररद्रयमाक्षेप्यम्। अतो नात्र काऽपि कल्पना कर्तव्या।

अष्टम मत के अनुसार यह व्याख्या है—विभाव आदि में संयॊग, अर्थात् चमत्कार के कारण किसी एक, चाहे वह चमत्कारी विभाव हो या वैसा अनुभाव या वैसा व्यभिचारिभाव, को रस कहा जाता है। नवम, दशम और एकादश मतों में तो क्रमशः: केवल विभाव, केवल अनुभाव और केवल व्यभिचारिभाव को रस कहे जाने से तीनों को समुदित रूप से रसोपयोगी बताने वाले उक्त रसमत का विरोध स्पष्ट हीं है। विभावादि तीनों का सम्मिलितरूप में उल्लेख आवश्यक भो है, क्योंकि कुछ विभावों, कुछ अनुभावों और कुछ व्यभिचारिभावों के अनेक रसों में समान रूप से उपयुक्त होने के कारण किसी एक विभाव या अनुभाव या व्यभिचारिभाव से किसी एक रस का अभिव्यञ्जन, इन मतों के अनुसार, मानना सम्भव नहीं। उदाहरणार्थं व्याघ्र आदि पदार्थ भयानक, रौद्र तथा वीर इन तीनों हीं रसों के विभाव हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में केवल व्याघ्रादि विभाव को रस मानने पर उनसे किसी एक रस की अभिव्यक्ति कैसे हो सकेगी? इसी तरह अश्रुपात आदि अनुभाव शृङ्गार, वीर, करुण और भयानक रसों के प्रसङ्ग में समानरूप से होते। अतः केवल अनुभाव या केवल व्यभिचारिभाव को रस मानने में वही आपत्ति है जो केवल विभाव को रस मानने में कही गयी है। सभी विभावों, या सभी अनुभावों या सभी व्यभिचारिभावों के रसान्तरसाधारण न होने पर भी उनमें किसी एक के समुदाय को रस कहना सम्भवत नहीं, क्योंकि विभाव-समुदाय आदि के व्यक्तिभेद से भिन्न-भिन्न होने से समुदाय का स्वरूप हीं स्पष्ट करना असम्भव है। अतः किसी एक को रस कहने वाले सभी पक्ष सूत्रविरुद्ध हैं।

इस प्रकार विभावादित्रितय के रसव्यञ्जक सिद्ध हो जाने से जब किसी ऐसे काव्य से सामाजिकों को रसाभिव्यक्ति होती जहाँ तीनों—विभाव, अनुभाव और

इस प्रकार विभावादित्रितय के रसव्यञ्जक सिद्ध हो जाने से जब किसी ऐसे काव्य से सामाजिकों को रसाभिव्यक्ति होती जहाँ तीनों—विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभाव—उपस्थित होते हैं।

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नानाजानीप्राधिः स पुरुषीभिरनोनालुप्तनयावसितोऽपि मनीषिभिः परमानन्दविनाभावितया प्रतोयमानः प्रपञ्चेऽसिमन् रसो रमणीयतामावहतोति निर्विवादम् ॥ स च—

शृङ्गारकरुणः शान्तो रौद्रो वीरोडभुतस्तथा । हास्यभयानकरश्वेतैः बीभत्साद्भुतचेतिते ते नव ॥

तादृशादृश्यं भावारूढं वेद्यं च । क्रमेणोदाहरणं च 'विभावलिनाम्नःसनेवम्', 'परिमुदितमुग्नालोकम्लानमुखं' प्रवृत्ति :, 'दूराहृतसुकमारागते' इत्यादि काव्यप्रकाशादिष्यो जेयम् । आङे सुधाधृतिमतेयादिलक्षणाणामालम्बनोदीपनविभावानाम्, द्वितीयेऽङ्गलानिर्विषयचैतन्ययादोत्पत्तिमानुभावानाम्, तृतीयेऽपि चतुसुखवीरडीनां व्यभिचारिणां केवलं निर्देशेऽपि हृदयोरसस्य चोराक्षेपः पकर्णादिवशाद् भवत्येव, रसाभिव्यक्तिकतस्य तत्र्यां विनाडुपपत्तेः । एतस्मेव यदि करुणाद् हृदयोरसस्तनावशिष्टमेकं समाक्षेप्यमवगन्तव्यम् । संश्रहोतं चात्र दर्शयेऽपि—

सद्भाववशेन् द्व विभावादेँ योरेतस्य व भवेत् । नटस्यनयसनालेये तदा दोषो न विद्यते ॥ इति ।

वस्तुतस्त्वाक्षेपगोऽहारणतया मुक्तकमेव प्रवेशनोयम् । प्रकृधे नाटचो च पूर्वापरसंवादभंत एवेतरस्तोतः : सूरपादस्वादिति विज्ञासो विभावयतु । नाटने कान्तकत्वमिति कविनिबन्धेन द्वात्र्यां वा रसव्यक्तजननामादय त्रियपर्याप्तिरसव्यक्त-स्वाभुपगमे व्युत्पत्तिरेकव्यभिचारो नेतव्यः । रसस्वरूपविषये मतभेदेऽप्यचार्याणां यादृशोप्रतिपत्तिरन्नं तहृदयैरुपसंदधृति रससामान्यतो विशिष्ट तद्वेदानाह पूर्वाचार्यांकपयेन --स चेत्यादिना । अस्य पद्यस्यार्थाच्चोन्तवेनात्रापि रसाक्षा स्वादिति

व्यभिचारिभाव न निर्दिष्ट नहीं हैं तो वहां भी निर्देश्ट विभाव या अनुभाव या व्यभिचारभाव मात्र में रसव्यक्तजकता नहीं माननी चाहिए अपि तु निर्देश्ट विभाव आदि के आधार पर अलौकिक अनुभाव आदि का आक्षेप करके तीनों के समुदाय में हौ । अतः समुदाय में रसाभिव्यक्तिजन कत्नपक्ष वैसे काव्यों में भी व्यभिचरित नहीं होता । इस प्रकार यद्यपि रस के स्वरूप के विषय में विद्वानों की प्रतिभाओं वाले मनोषियों में मतैक्य नहीं है तयापि यह सर्वसम्मत है कि अलौकिक आह्लाद रूप में प्रतीयमान 'रस' इस विषय में रमणोयताम तत्व है ।

यह रस तो प्रकार का है—ऐमा प्राचीन आचार्यों का मत है—“शृङ्गार, करुण, शान्त, रौद्र, वीर, अद्भुत, हास्य, भयानक और बीभत्स ये नौ रस हैं ॥”

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इत्युक्ते तेन वधः । मुनिवचनं चात्र मानम् ।

तत्रैवसायाह—मुनिवचनमित्यादि । नाट्यशास्त्रस्य पठ्ठाध्यायप्रस्यान्ते भरतमुनिप्रोक्तं वचनमित्यर्थः । यद्यपि बहुत्र रसेऽपि गुस्स्तकेपु शान्तरसङ्करणं न लक्ष्यते तथापि अभिनवगुप्ताचार्यः स्पष्टमज्झोकरत्वाच्चिरन्तनपुस्तकाजुरोधेनैति पण्डितराजेनापि स्वीकृतमेतदुक्तमेव । यत्तु पूर्वं भरतेनोक्तम्—

प्रह्लादरहास्यकरणा रौद्रवीरभयानका: । वीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्ये रसा: स्मृताः ॥

इति । इति तत् पूर्वाचार्यैरुरोधेनैति स्पष्टतमेव—“एते हृष्टौ रसा: प्रोक्ता दृङ्‌हिणेन महात्मना” इति तदुक्त्या ज्ञायते । स्वयं च भरताभिप्रायं शान्तस्थापि रसत्वं स्वीकृतमेव ।

यद्वा अष्टाविधे पाठः शान्तादपलाभिनाभिति स्पष्टमेवाभिनवगुप्ताचार्यैरुक्तम् ! तत्रैव शान्तपक्षपातिनां मतेऽपि प्रोक्तवचनोत्तरार्धम्—‘वीभत्साद्भुतसंज्ञौ शान्तादौ च नाट्ये नव रसा: स्मृताः’ इत्येव पठनीयम् । इदमेवात्राभिप्रेतं मुनिवचनं गृहीतगन्धरक्तवस्तुतरसचेतदुपलक्षणमेतददचायान्तेऽभिनवगुप्तादिप्रतिष्ठितस्य सकलस्य ध्यानविषयकनाट्यशास्त्रीयसन्दर्भस्य ।

इति सम्प्रदायः ।

इत रसों के समर्थन में भरतमुनि का वचन भी प्रमाण है— प्रह्लादरहास्यकरणा रौद्रवीरभयानका: । वीभत्साद्भुतसंज्ञौ शान्तादौ च नाट्ये नव रसा: स्मृताः ॥

यद्यपि उक्त कारिका का पाठान्तर भी प्रचलित है जिसमें उत्तरार्ध का स्वरूप— वीभत्साद्भुतसंज्ञावच शान्तादौ चेत्यष्टौ नाट्ये रसा: स्मृताः ॥ इस प्रकार उपलभ्य होता तथापि यह पाठान्तर शान्तरस का अपलाप करने वालों द्वारा गढ़ा गया है—ऐसा आचार्यं अभिनवगुप्त ने इस पद्य की टीका में कहा है।

  1. सम्पूर्ण संदर्भ को पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है कि अभिनवगुप्त भी शान्तरस के विषय में दृढ़ विचार नहीं रखते । विशेष विवेचन विद्वानों को स्वयं करना चाहिए ।

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शान्तस्य शमसाधयत्वान्नटे च तदसंभावात् । अष्टावेव रसा नाट्ये न शान्तस्तत्र युज्यते ॥

इत्याहुः । तच्चापरे न क्षमन्ते । तथा हि—नटे शमाभावादिति हेतुसंगतः, नटे रसाभिव्यक्तिरस्वीकारात् । सामाजिकानां शमवत्त्वेन तत्र रसोद्बोधे बाधकाभावात् । न च नटस्य शमाभावातद्भिनयप्रकाशकत्वानुपपत्तिरिति वाच्यं, तस्य भयक्रोधादेरप्यभावेन तद्भिनयप्रकाशकताया अप्यसंगत्यापत्तेः । यदि च नटस्य क्रोधादेरभावेन वास्तवतत्कार्याणां वधग्रह्नादीनामुत्थद्रयसंभवेऽपि कृतिमतत्कार्याणां शिक्षाध्यासादित

शान्तापलापिनां मतमुपन्यस्यति—केचित्त्वादिन । शमसाध्यत्वादित्यस्य शमस्थायिकत्वादित्यर्थः । तदसम्भव्रादिति । नटस्य शमवत्तवे हि तस्य नटत्वानुपपत्तिरित्याशयः । एतन्मतं निरस्यन्नाह—तच्चेत्यादि । असिद्धतेः = असिद्धेः, अपक्षधर्मत्वादित्यर्थः । यत्र सामाजिको शान्तरसोद्बोध इष्टस्तत्र शमाभावस्य पराभिमतस्य हेतोरसत्त्वेन शान्तरसोद्बोधाभावसाधनासाध्यसामानाधिकरण्यरूपद्व्यसिद्धेऽपि पक्षद्वस्तिस्वेन स्वरूपासिद्धेऽयं शमाभावात्मकको हेतुः । यत्र तु स वस्तुमानस्तत्र नटादौ

कुछ लोग मानते हैं— "शान्त रस का स्थायी भाव है शम जो नट में हो नहीं सकता । अतः नाट्य में आठ हीं रस होते हैं, शान्त रस तो वहाँ हो नहीं सकता ।"

परन्तु इससे सब आचार्य सहमत नहीं हैं । इसका कारण यह है—नाट्य में शान्त रस के न होने का जो हेतु 'नट में शम का अभाव' बताया गया है वह असंगत है । वह संगत तब होता जब जिन सामाजिकों को रसानुभूति होती उनमें शम न होता । परन्तु सामाजिकों में तो शम हो हीं सकता है । ऐसी स्थिति में उनमें शमाभाव तो है नहीं । हाँ, नट में शमाभाव अवश्य है, किन्तु उसे तो रसानुभूति नट के रूप में होती हीं नहीं । तो फिर नट में शमाभाव से नाट्य में शान्तरस के अभ्युपगम में कौन सी बाधा आती ? नट में शम न होने से वह शान्त-रसानुकूल अभिनय हीं नहीं कर सकता—यह कहना भी अनुपयुक्त है, क्योंकि तब तो उसमें अभिनय-काल में वास्तविक भय एवं शोक आदि के भी न रहने से वह भयानक, करुण आदि रसों के अभिव्यञ्जक अभिनय भी न कर पाता । अतः अन्य रसों के अनुकूल अभिनय के प्रसंग में यह मानना हीं होगा कि नट में वास्तविक भय आदि तथा उनके कार्य आदि का अभाव होने पर भी अभिनय करने की शिक्षा तथा अभिनय के अभ्यास आदि के प्रभाव से वह भय आदि के कायों का

अभिनय कर लेता है । ऐसी स्थिति में शम के अभाव में भी शम के कायों का

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उत्पत्तौ नास्ति बाधकर्मिति निरीक्ष्यते, तदा प्रकृतेपि तुल्यम् । अथ नाट्ये गीतवाद्यादीनां विरोधिनां सर्ववात्सामाजिकेष्वपि विषयत्व-मुख्यात्मनः शान्तस्य कथमुद्रेक इति चेत् ? नाट्ये शान्तरससमभ्युपगच्छन्द्रः फलवलादुद्गीतवाद्यादेशरस्मिनवररोधिताया अकल्पनात् । विषय-चिन्ता-सामान्यस्य तत्र विरोधित्वस्वीकारे तदीयालम्बनस्य संसारानित्यत्वस्य तदुद्दीपनस्य पूरणश्रवण- सत्संग- पुण्यवन-तीर्थादिविलोकनादेरपि विषयत्वेन विरोधित्वाप्तेः । अत एव च चरमाधिकार- संगीत-रतताकरेऽष्टावेव 'रसां नाट्ये ष्विषित केचिदच्युदन्तु । तद्वारु, यत: कश्चिन्न रसं स्वदते नट: ॥

प्रदर्शन उसके द्वारा ही हो सकता है जिससे शान्त रस की सामाजिकों में अभिव्यक्ति हो जाती है । अब प्रश्न यह उठता है कि ( शान्त रस के ) विरोधी गीत- वाद्य आदि के अभिनय-काल में आवइयक होने से सामाजिकों में विषयवैराग्यात्मक शान्तरस का उद्बोध कैसे होगा । इसका यही उत्तर है कि किजो नाट्य में शान्तरस मानते उनके मत में विशेष प्रकार के गीत- वाद्य आदि शान्त रस के उद्बोध में प्रतिबन्धक नहीं हैं, क्योंकि जब गीत- वाद्य आदि के रहने पर भी सामाजिकों में नाट्यावलोकन से शान्तरसोद्बोधक फल प्रामाणिक है तो फिर गीत- वाद्य आदि उसके प्रतिबन्धक कैसे हो सकते ? यदि विषयमात्र (= सभी विषयों ) के चिन्तन को शान्तरसोद्बोध का विरोधी मान कर विषयान्तर्गत गीत- वाद्य आादि को भी उसका विरोधी कहा जाय तब गीत- वाद्य आदि को ही क्यों, शान्तरस के (= शम के ) आलम्बन विभाव— संसारानित्यत्व और उद्दीपनविभाव— पुराणश्रवण, सत्संग, पुण्यवन और तीर्थादि के दर्शन- श्रवण आदि को भी वे विरोधी क्यों नहीं कहेंगे, कारण, ये सब भी तो त्रिषय हैं । अतः शान्तरस के विरोध में दी गई युक्ति असंगत है । इसी लिए सङ्गीत- रत्नाकर के अन्तिम अध्याय में नाट्य में भी शान्तरस की स्थापना करते हुए कहा गया है— ''कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि नाट्य में शृङ्गार ही रस होते । किन्तु यह अशो-

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इत्यादिना नाट्येडपि शान्तो रसोडस्तीति व्यवस्थापितम् । यैरपि नाट्ये शान्तो रसो नास्तीतियभ्युपगम्यते तैरपि बाधकाभावान्महाभारतादिप्रबन्धानां शान्तरसप्रधानताया अखिललोकानुभवसिद्धत्वाच्च काच्ये सोडवश्यं स्वीकायः । अत एवं 'अष्टौ नाट्ये रसाः स्मृता:' इत्युपक्रम्य 'शान्तोऽपि नवमो रस:' इति मम्मटभट्टोऽप्युपसमहार्षु ।

भनीय है, क्योंकि नट तो किसी भी रस का आस्वादन करता नहीं । ( अतः नट में स्थायीभाव को शान्तरस न मानने में हेतु नहीं माना जा सकता ) ।

अमीषां च— रति: शोकश्र निर्वेदक्रोधोत्साहाहास्य विस्मय: । हासो भयं जुगुप्सा च स्थायिभावा: क्रमादमो ।।

जो लोग नाट्य में शान्तरस नहीं मानते उन्हें भी महाभारत आदि प्रबन्ध काव्यों में शान्तरस मानना ही है, क्योंकि इन प्रबन्धों के अभिनेय न होने से 'नट में स्थायीभावस्वरूप' शान्तरस-निषेधक हेतु यहाँ बाधक नहीं हो सकता । 'नट में स्थायीभावस्वरूप' शान्तरस-नायिक हेतु यहाँ बाधक नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त, भारतादि प्रबन्धों में शान्तरस सर्वानुभवसिद्ध भी है । अत: इसका अपलाप किसी भी युक्ति ( = युक्त्याभास ) से नहीं किया जा सकता ।

स्थायिभावानामित्यस्य भेदो बोध्य इत्यनेनान्वय: । भेदस्वरूपमाह—घटा-देरित्यादिना । ठपक (= भग्नप्रवणवृत्त ) विषयीकृतो रसादिरेव रस इत्य-भिन्नवृत्तमतेऽपि मुख्ये नीलघटघटयोरिव यद्वापि रसस्थायिभावयोर्भेदस्तथापि वस्तुतस्तु' इत्यादिना वर्णिते(ड)भिन्नवृत्तिमतामप्यविषयो(ख)भूते रत्यादौविच्छिन्नचित एव रसत्वे रसस्याकाशस्थानीयत्वेनावच्छेद्यत्वं स्थायिभावस्य पुनर्घटादिस्थानीयत्वे-नाडवच्छेदकरत्वमित्योभयोरुक्त: ।

उक्त नौ रसों के क्रमश: निम्नलिखित नौ स्थायिभाव हैं—रति, शोक, निर्वेद, क्रोध, उत्साह, विस्मय, हास, भय और जुगुप्सा ।।

द्वितीये पुनर्भेदान्तरमते भ्रूयमानो नाडवच्छेदकरवमित्यनयोर्भेद: । रत्यादि रस इति पक्षे नावच्छेद्याविच्छेदकत्वेनोभयो: पूर्वोक्तवस्तुतस्त्वादियुक्तिसाहित्येन रत्यादाविच्छिन्नस्य भोगस्य चिद्वपर्यवस्य रसत्वमिति पक्षे(ड)वच्छेदकत्वं बोध्य: । तृतीये = 'नव्यास्तु' इति प्रतीकमादाय वर्णिते पक्षे । आ(अ) स्मि(श्रि)मश्च दुश्यान्तादिनिष्ठ(ठ)स्तरत्यादे: स्या(स्व)यं सहृदयनिष्ठ(ठ)ादनिवृ(निवि)चन(च्चन)ीयरत्यादेरच रसत्वमित्यनयोर्भेद: । चलु(त्लु)यं = 'परं तु' इत्यादिना

इन रसों तथा इनके स्थायिभावों में निम्ननिर्दिष्ट अन्तर है—रसविषयक प्रथम और द्वितीय मतों में तो रस और स्थायिभाव में वही अन्तर है जो घटा-देरित्यादिना । ठपक (= भग्नप्रवणवृत्त ) विषयीकृतो रसादिरेव रस इत्य-भिन्नवृत्तमतेऽपि मुख्ये नीलघटघटयोरिव यद्वापि रसस्थायिभावयोर्भेदस्तथापि वस्तुतस्तु' इत्यादिना वर्णिते(ड)भिन्नवृत्तिमतामप्यविषयो(ख)भूते रत्यादौविच्छिन्नचित एव रसत्वे रसस्याकाशस्थानीयत्वेनावच्छेद्यत्वं स्थायिभावस्य पुनर्घटादिस्थानीयत्वे-नाडवच्छेदकरत्वमित्योभयोरुक्त: ।

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द्वितीययोर्मतयोः, सत्यरजतस्यानिर्वचनीयरजतादिव तृतीीये, विषयस्य (रजतादेः) ज्ञानादिव चतुर्थे भेदो बोध्यः ।

वचिछन्न आकाश और उसके अवच्छेदक घट में है । प्रथममत में (अभिनवगुप्तमत), जिसे 'वस्तुतस्तु' प्रतीक के अन्तर्गत ग्रन्थकार ने प्रस्तुत किया है, रत्यादिवचिछन्न स्थायीभाव अवच्छेदक और चित्तस्वरूप रस अवच्छेद्य है । द्वितीय मत (भट्टनायकमत) में रत्यादिबोग को रस कहा गया है । इसमें त्रिशोषणोभूत रत्यादि स्थायिभाव अवच्छेदक और भोगस्वरूप रस अवच्छेद्य है । 'नव्यास्तु' इस प्रतीक के अन्तर्गत जो तृतीय मत प्रस्तुत किया गया है उसमें दुष्यन्तादिनिष्ठ सत्य रत्यादि स्थायिभाव हैं और सामाजिक में उत्पन्न अनिर्वचनीय रत्यादि रस हैं । अतः वेदान्तसिद्धान्त में जो अन्तर सत्य रजत और अनिर्वचनीय रजत में माना गया है वही इस मत में स्थायिभाव और रस में है । 'परे तु' प्रतीकान्तर्गान्त रसत्रिपयक चतुर्थ मत में तो चाकुन्तलादिविषयक रत्यादि से विशिष्ट दुष्यन्तादि के साथ अपना धमात्मक अभेद-बोध ही रस है । अतः इस मत में ज्ञान और उसके विषय में जो अन्तर होता वही अन्तर रस और स्थायिभाव में है । पञ्चम और षष्ठ मतों में तो प्रकारभेद से स्थायिभाव को ही रस कहा गया है । हृनत: इन दोनों मतों में रस और स्थायिभाव में कोई तात्विक अन्तर नहीं है । सप्तम से एकादश तक के मतों में विभावादि को समुद्धित रूप में अथवा असमृद्धित रूप में रस कहा गया है । अतः इन मतों के अनुसार रस और स्थायिभावों में आश्रय-आश्रित, कारण-कार्य या सहकार्य-सहकारी के समान अन्तर है । किन्तु इन मतों के उपेक्षणीय होने से ग्रन्थकार न इन मतों में अन्तर नहीं बताया है ।

तत्र आप्रधान्यं स्थिरत्वादमीषां भावानां स्थायित्वम् । न च चित्तवृत्ति-प्रदर्शिते मतेऽत्र च भावनास्वलूपदोषमहिम्ना सामाजकस्य स्वात्मनि दुष्यन्तादित-दा्त्म्यानुरागादिह्नकुतालादिविषयकरस्त्यादिमद्भेदवोधस्यैव मानस्य रसत्वेन रसो ज्ञानस्यानीयः, स्थायिरस्त्यादितच तद्विषयस्थानीय इत्थंश्च । प्रका़रभेदेन स्थायित एव रसतन्मिति न भेद उत्को गड्दाधरक्ता ।

रत्यादि भावों को स्थायी इसी लिए कहा जाता है क्योंकि ये प्रवन्धपर्यन्त

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रूपाणामेषामशु विनाशिल्वेन स्थिरतवं दुलंभम् वासनारूपतया स्थिरत्वं तु ध्यभिचारिष्ठतिप्रकर्षमिति वाच्यम्, वासनारूपाणामपोषां मुहुर्मुंहुरभि व्यक्ततेरेव स्थिरपदार्थंत्वात् । ध्यभिचारिणां तु नैव, तद्भिय्यक्तरेऽवि द्योतप्रायत्वात् । यदाहुः -

विरुद्धैरविच्छदैर्वा भावैर्निच्छिद्यते न यः । आत्मभावं नयत्याग्रु स स्थायी लवणाकरः ॥ चिरं चित्तेऽतिष्ठन्ते संस्कार्यन्तेऽनुभवैः । रसत्वं ये प्रपद्यन्ते प्रसेद्राः स्थायिनोड्डु ते ॥

स्मृतेः । एवं रूपमेव दृढतरवं संस्काररसै नैवाऽऽक्रियादयोऽप्यझी कुर्वन्ति । विच्छिद्यते = विनाश्यते । आत्मभावम् = स्वरूपताम्, स च स्वाऽऽत्मलवसम्पादनद्वारेणैति बोधयम् । लवणाकर इत्युपमानम् । यथा लवणाकरः स्वसंमूर्छितान्त प्रवेष्टुमन्तरजललानि स्वरूपतां लवणारूपतां प्रापयति तद्वदयं स्थायिरपि स्वसंस्कृष्टान् विरुद्धैरविच्छिन्नैश्चान्यन् स्वरूपतां प्रापयति । एतच्च प्रकर्षंकृतमेव रत्यादौ । आयं च सन्दर्भः समूहालम्वनाऽऽत्मकरसपक्षे सुकर विवरणः । विरुद्धतवं च भावानां स्वभावभेदैकत्व तनुभावाकरत्वात् । अत एव

स्थिर रहते हैं । अब प्रश्न यह है कि ये रत्यादि चित्तवृत्तिविशेषस्वरूप हैं; अतः यें स्वरूपतः तो स्थिर हो हीं नहीं सकते, क्योंकि योग्य वासनाऽऽत्मवृत्तयः अपनी उत्पत्ति के तृतीय क्षण में विनष्ट हो जातीं अयवा तभी तक स्थिर रहतीं जब तक अन्य वृत्ति का चित्त में उदय नहीं हो जाता; हाँ वासना (= संस्कार ) रूप में तो केबल रत्यादिात्मक चित्तवृत्तियाँ ही नहीं अपि तु ध्यभिचारिस्वरूप चित्तवृत्तियाँ भीं स्थिर रहतीं हीं हैं । ऐसे दशा में यदि वासनाऽ‌ऽत्मभावों को भी स्थायी कहा जाय तब तो ध्यभिचारिभावों को भी स्थायी क्यों न कहा जाय । इस प्रश्न का उत्तर यही है कि वासनात्मक रत्यादि को पुनः पुनः अभिव्यक्ति ( = उद्‌बोधक का सम्पवधान होने से स्मरण होना ) हीं उनकी स्थिरता है । ऐसे स्थिरता वासनात्मक ध्यभिचारिभावों की नहीं, क्योंकि उनकी अभिव्यक्ति तो बिजली की चमक की तरह कभी-कभी एक दो बार हीं होती है, वारम्बार नहीं । जैसा प्राचीन आचार्यों ने कहा है—

"जो भाव अपने प्रतिकूल और अनुकूल भावों द्वारा कभी विनष्ट न होने से वारम्बार अभिव्यक्त होता और स्वसंस्कृष्ट अन्य जलों को स्वाऽऽत्मन्-सां बनाने वाले क्षारसमुद्र के समान अन्य भावों को स्वाऽभिन्न-सां बना देता वही स्थायी है ।। जो भाव चिर काल तक चित्त में वासनारूप में विद्यमान

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चिरमिति व्यभिचारिवारणाय । अनुवन्धिभ्रिविभावादौः । तथा— सजातीयविजातीयैररतिरसूक्तमूर्तिमान् । यावद्रस वर्त्तमानः स्थायिभाव उदाहृतः ।। इति ।

होकर उद्भटोषक की उपपत्ति में वार्त्तवार अभियुक्त होते, अनुभावों ( =विभाव आदि ) से सम्बद्ध होते, अर्थात् उन्हें अपने अनुकूल बना लेते, और अन्ततः रसरूपता को प्राप्त होते वे प्रसिद्ध रत्यादि भाव हैं नाट्यादि में 'स्थायी' नाम से प्रसिद्ध हैं ।

तन्न । रत्यादीनामेकस्मिन्नपि रूढेऽन्यस्याप्ररूढस्य व्यभिचारिविरोधपगमात् । प्ररूढत्वादप्ररूढत्वे बहुल्प-मृष्टभोजनादौ स्वभावविरुद्धस्याप्यम्लादेरुपकारकत्वं दृष्टत्वं । स्वभावभेदेऽपि विरोघेऽप्यंघोऽयं तावदेव काव्योपकारी यावद्रस्सभावापेक्षयाद्रूढभावी न प्ररूढतर इत्यादि ध्वन्यालोकादिग्रन्थेऽयोडवसेमं । स्वयं च ग्रन्थकृद व्याख्यास्यत्यग्रे । ईदृशमेव विजातीयत्वमभिमतंप्रिपमपचेष्टपि । मूर्त्ति:=स्वरूपं, तच्च वासनात्मकम् । यद्वा मूर्त्तरभिव्यक्ति:, तत्राभिव्यक्ति: स्मृति: । सा चोत्तरौत्तर, स्वपूर्वं स्मृतेऽपि रूढभावेन तिरस्कारात् । अतएव मुहुर्मुहुरभिव्यक्तिरुचिता ।

द्वितीय पद्य में 'चिर काल तक' यह अंश व्यभिचारी भावों में स्थायी भाव के लक्षण की अत्यिया's के निराकरणार्थ दिया गया है । यहाँ 'अनुवन्धी' शब्द का अर्थ विभाव-अनुभाव-सञ्चारिभाव है । और भी,

बहुल्पेति । निवद्धाऽसिनान्यतररसकुलविभावजत्वं प्ररूढत्वं तद्विप्रकृष्टं बहुलत्वं चाडप्ररूढत्वं रत्यादेरित्यर्थः । विभावपदस्य चात्रानुभावाल्पलक्षणत्वं । जन्यत्वं

"स्थायी भाव उसी को कहा गया है जिसकी मूत्ति (= उत्तरोत्तर अभिव्यक्ति) पूर्वंपूर्व सजातीय अथवा विजातीय भावों (व्यभिचारिभावों) द्वारा अवरुद्ध नहीं होती और जो तब तक वासनालुप मे चित्त में वर्तमान रहता है जब तक वह रसरूपता को प्राप्त न हो जाता ।।"

कुछ आचार्य रति आदि में से अन्यतम को हीं 'स्थायो' मानते हैं । किन्तु यह लक्षण उचित नहीं है । इन नौ भावों में से एक के प्ररूढ होने पर अप्ररूढावस्थ अन्य भाव स्थायी नहीं, अपितु व्यभिचारी माने जाते हैं । जैसे श्रृङ्गार के सन्दर्भ में रति प्ररूढ होती पर हास अप्ररूढ । इसमें स्थायी भाव केवल रति है, हांस नहीं । वह तो श्टङ्गार के व्यभिचारी भावों में से एक है । किन्तु ऐसे हासादि व्यभिचारी भाव भी तो नौ भावों में अन्यतम हैं । अतः रत्यादन्यतमत्वस्वरूप स्थायिभावलक्षण की उचित-

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विभावजत्वे।

तदुक्तं रत्नाकर—

रत्यादयः स्थायिभावा: स्युर्भृङ्‌यिष्ठविभावजा:। स्तौकेर्निर्विभावै:रुत्पन्नास्त एव व्यभिचारिण:॥

एवं च वीररसेऽपि प्रधाने क्रोध:, रौद्रे चोत्साह:, शृङ्‌गारे हासो व्यभिचारी भवति। नान्तरीयकत्वात्‌। यथा तु प्रधानपरिपोषार्थं सोऽपि बहुविभावज: क्रियते तदा तु रसालङ्‌कार इत्यादि बोध्यम्‌॥

तत्र—

चान्त्राभिव्यज्यमानत्वसाधारणम्‌। एवं चेति। स्तौकेर्निर्विभावत्वे चेत्यर्थ:। वीररसेऽत्यादि। तदुक्तं दर्पणे—

शृङ्‌गारवीरयोर्हासो वीरेऽपि क्रोधस्तथा मतः। शान्ते जुगुप्सा कदाचित्‌ व्यभिचारिकया पुनः॥

उद्भयोः: प्रधनत्वेऽपि वीरादेः प्राधान्यं प्राकरणिकत्वादिना बोध्यम्‌। रसालङ्‌कार इति। तदुक्तं ध्वनिकृत्‌ता — प्रधानेनैव वाक्यार्थो यथा स्यात्तु रसोदयः। काव्ये तस्मिन्नलङ्‌कारो रसादिरिति मे मति:॥

विध हासादि में व्यक्तव्यासि हो जाने से यह लक्षण असंगत है। जब ये रत्यादि भाव विभावादि (=अनुभाव तथा व्यभिचारिभावों) की सामग्री से उत्पन्न यथवा ज्ञाप्य होते तब इन्हें परृथक्‌ कहा जाता है। इसके विपरीत, यदि ये भाव विभावादि-सामग्री से नहीं अपितु इसमें से कुछ से हि उत्पन्न या ज्ञाप्य होते तो इन्हें अप्रृथक्‌ कहा जाता है। यही विषय सज्जीतेरत्नाकर में स्पष्ट रूप में कहा गया है— ''यदि ये रत्यादि भाव सम्पूर्ण विभावादि-सामग्री से उत्पन्न या ज्ञाप्य होते तब तो ये स्थायिभाव कहलाते हैं। किन्तु यद्यपि-किञ्चिद्‌ विभावादि से उत्पन्न या ज्ञाप्य होने पर ये हि रत्यादिभाव व्यभिचारिभाव हो जाते हैं।''

दूस प्रकार, वीर रस (=उत्साह) के प्रधान (=प्रकृष्ट) होने पर क्रोध, रौद्र (=क्रोध) के प्रधान होने पर उत्साह और शृङ्‌गार (=रति) के प्रधान होने पर हास व्यभिचारो भाव हैं। क्रोधादि के बिना वीर आदि रसों के परिपुष्ट न होने से ये व्यभिचारि-स्थानीय क्रोधादिभाव उनमें नान्तरीयक (=अवश्यम्भावी) हैं। जब मुख्य भाव के परिपोषण के लिए गौण भाव भी बहुविभावादिजन्य, अर्थात्‌ प्रबुद्ध रूप में कवि द्वारा निबद्ध किये जाते हैं तो भी ये भाव गौण होने से रसरूपस्थानीय न होकर रस (प्रधान भाव=स्थायी भाव) के अलङ्‌कार मात्र होते हैं।

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स्थायिपुंस्यो रतिप्रौढिमालम्बनः प्रेमाख्यप्रश्रिततृतीयादिरोषो रतिः स्थायिभावः ॥

गुरुदेवतापुत्राद्यालम्बनस्तु व्यभिचारी । पुंस्त्वादिर्द्विप्रकारादिरत्मा वैकलप्राख्यपुष्टस्तत् विशेषः शोकः ॥ स्त्रीपुंसयोगस्तु वियोगे जीहिततज्ज्ञानदशायां वैकलव्यपोपपिताया रतेरेव प्राधान्याच्छृङ्गारो विप्रलम्भाख्यो रसः । वैकल्यं तु संचारिमात्रं । मतस्त्व-

सम्प्रति स्थायिभावान् विशेषतो लक्षयितुकाम आदौ स्वभावतोऽनुरञ्जकस्य मृद्वादिरस्य स्थायिभावां रतिं लक्षपति—स्त्रीपुंसयोगरतिम् । पुत्रादीति । आदर्शदेन मुनिनोपादिपरिग्रहः । व्यभिचारीति । तथुक्तं प्रदीपकृतादिरतिदर्शनेनरत्नंः स्थाद् देवतादिविषयकोद्भवः ॥ अन्यादृशभावभागित्वा स्यान्न तदा स्थायिशद्भाक् ॥ इति । आदर्शदेन इष्टतमातोपसंग्राहकः इ द्वितीय आदर्शदेन इष्टतमा|तिनिष्ठमात्रोपलक्षकः । सञ्चारिमात्रमिति । वैकलङ्यस्य चिरमवस्थानभावादिति हेतुरत्न । वैकल्यस्यैव तत्र प्राधान्याद्वित्यनुषज्यते । विप्रलम्भः=विप्रलम्भशृङ्गारः ।

रति-नामक स्थायिभाव वह है जिसे प्रेम कहतें । यह एक प्रकार की चित्तवृत्ति है जिसके आलम्बन परस्पर नायक और नायिका होते । किन्तु इसी रति का आलम्बन यदि गुरु, देवता या पुत्र आदि इष्टजनों में से कोई होता तो वह स्थायिभाव न होकर (करुण आदि रसों में) व्यभिचारिभाव हो जाती । शोक-नामक स्थायिभाव वह है जिसे विकलता (=वैकल्य) कहते । यह भी एक प्रकार की चित्तवृत्ति है और इसकी उत्पत्ति पुत्र आदि इष्टजन के वियोग अथवा मरण आदि से होती ॥ यदि नायक-नायिका का वियोग हो किन्तु एक दूसरे के जीवित होने का ज्ञान हो तो वहाँ विप्रलम्भ शृङ्गार हीं होता, क्योंकि वहाँ परस्पर वियोग से विकलता होने पर भी प्राधान्यता रति की हीं रहती । विकलता तो उस रति का परिपोषण मात्र करती । अतः इसमें होने वाली विकलता व्यभिचारिभाव है, स्थायिभाव नहीं । हाँ, यदि एक को दूसरे के मर जाने का ज्ञान हो तब तो विकलता के हीं प्रधान होने से वहाँ करुण रस हीं होगा । रति उस विकलता का केवल परिपोषक् होगी । तात्पर्यं यह है कि जिस व्यक्ति से जितना हीं प्रेम होता उसके विनाश से उतना ही अधिक क्लेश भी होता । अतः प्रियतम या प्रियतमां के मरण से सर्वाधिक क्लेश (=विकलता) होना स्वाभाविक है । यतः मरण के ज्ञान के बाद मिलन की कोई आशा नहीं रह जाती अतः ऐसी दशा में विकलता

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नित्यैरानतवस्तुविचारजनमा विषयविरागाद्यो निर्वेद: ।

केचित्त = दर्पणकारादय: । इच्छन्तीतित । एतेषां रसादचि: सूचिता । तद्वीजान्तु वैकलव्यस्य चिरमवस्थानाभावेन तस्य स्थायित्वानुपपत्तिरेव । अभिनिवेशस्य चिरमवस्थानेsभ्युपगते तु शृङ्गारोच्छेदापत्तिदोष: । ध्यानस्थायिभावं लक्ष्यति—नित्येत्यादिना । नित्यं च अनित्यं चैति नित्यानित्यवस्तु । यद्वा तयोर्वस्तु इति नित्यानित्यवस्तुनी । तयोरविचारेण विवेकेन जन्म यस्येति विप्रलभ: । अनित्यस्य वस्तुत्वाभावेन नित्यानित्योद्द्रेकृते वस्तुशब्देन कर्मधारयोडयुक्त: । नित्य आत्मा तदन्यत्सर्वं मनित्यम् । तथा च परस्परविरुद्धयोर्नित्यानित्यधर्मयोंडविवेकेन जायमानो विप्रलभ इति फलति । इदमेव तत्त्वज्ञानजन्यं वैराग्यमित्युच्यते । एतनेsभ्युदितनितवैराग्यस्य स्थायित्वभाव: सूचित: ।

धान्तरसो का स्थायिभाव निर्वेद है जिसे विषयवैराग्य भी कहते है। यह वैराग्य ( निर्वेद ) नित्य और अनित्य पदार्थों में वर्तमान धर्मों तथा उन धर्मियों के विवेक-

का स्थायित्व स्पष्ट है । रति तो उस विकलता का परिपोषक मात्र होती । अत एव यहाँ करुण रस हीन उचित है, विप्रलम्भ शृङ्गार नहीं । अत एव यदि नायक नायिका में से एक के मरण का ज्ञान होने पर भी देतातप्रसाद आदि से उसके पुनरुज्जीवन का ज्ञान हो तो वहाँ आदि-अन्त में रति के वर्तमान रहने से मध्य में मरण के कारण कुछ समय के लिए विकलता होने पर भी स्थायित्व रति का ही होता । अतः ऐसी दशा में रति के योगकालावच्छिन्न होने से विप्रलम्भ शृङ्गार रस हीन होता, करुण रस नहीं । कामिन्यो का महाश्वेता-

से उत्पन्न होता ॥

वर्णन इसका उदाहरण है । यहाँ चन्द्रापीडनिष्ठ महाश्वेताविषयक रति होने से विप्रलम्भशृङ्गार रस है, करुण नहीं । साहित्यदर्पणकार आदि कुछ आचार्य तो ऐसे स्थलों में करुण-विप्रलम्भ रस मानना चाहते । किन्तु इसमें आदि-अन्त में विकलता के न होने से उनका मत उचित नही प्रतीत होता ॥

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गृहकलहादिजस्तु व्यभिचारी ॥ गुरुभक्त्यर्थापरमापराधजनन्मा प्रज्वलनाख्यः क्रोधः ॥ अयं च परविनाशादिहेतुः । क्षुद्रापराधजनन्मा तु परुषवचनासंभाषण-

गृह-कलह आदि से उत्पन्न निवेंद तो क्षणिक होने से विप्रलम्भ श्रृंगार आदि रसों में व्यभिचारिभाव होता, स्थायिभाव नहीं ॥ रौद्र रस का स्थायिभाव क्रोध है जिसे चित्त का प्रज्वलन (जलन) भी कहते हैं । यह गुरु अथवा अन्य किसी इष्टजन के वध अथवा उसे अत्यंत कष्ट आदि पहुँचाने जैसे उत्कट अपराध किये जाने पर उत्पन्न होता है ॥

द्वहेतुः । अयमेवामर्षाख्यो व्यभिचारीति विवेकः ॥ परपराक्रम दानादस्मृतितजन्मा औग्रत्याख्य उत्साहः ॥ अलौकिकरत्नु दर्शना दिजन्मा विकसाख्यो विस्मयः ॥

यह क्रोध उत्कट अपराधी के विनाश आदि का कारण है । किन्तु यदि अपराध साधारण कोटि का होता तो इससे उसके प्रति लोग कठोर वचन का प्रयोग करते या फिर बोलते हीं नहीं । अन्य प्रकार की कटु भावना आदि भी इसी से उत्पन्न होतीं । साधारण कोटि के अपराध से उत्पन्न कोप को हीं अमर्ष कहा जाता जो रौद्र आदि रसों के व्यभिचारिभावों में अन्यतम है । क्रोध और अमर्ष में यही अंतर है ॥ वीर रस का स्थायिभाव उत्साह है जिसे चित्त का औग्रत्य, अर्थात् उत्कृष्ट-प्रगल्भता भी कहा जाता है । इसकी उत्पत्ति शत्रु के पराक्रम और उसकी दानशीलता आदि के स्मरण से होती है ॥ अद्भुत रस का स्थायिभाव विस्मय है । अलौकिक वस्तु के दर्शन आदि से स्तब्ध चित्त का विकास ( विस्तार = फैलना ) हीं इसका स्वरूप है ॥

गन्तव्ये यदिनाम निश्चितमहो ! गन्तासि केयं त्वरात्वरासंसारे वटिकाप्राणालविगलद्वारा समे जीवितेको जानाति पुनरस्त्वया सह मम स्याद्दा न वा सङ्गमः ॥

इत्यन्न दैन्यजो विरागो विरलम्भे व्यभिचार्य्येव, न त्वस्य स्थायित्वम् । अतोत्र रससद्रूपानोभत्सत्वादनुसहृदयतया मेव प्रकाशयति । एतत्सवैं-मा मंप्रेय्याद—गृहकलहादिजेत्यादि ।

इत्यन्न दैन्यजो विरागो विरलम्भे व्यभिचार्य्येव - इस प्रकार यहाँ दैन्य से उत्पन्न वैराग्य विप्रलम्भ में व्यभिचारिभाव ही है, (यहाँ) इसका स्थायित्व नहीं । अतएव रस के सदृश रूपवाले (वैराग्य) को मैं सहृदयतया ही प्रकाशित करता हूँ । एतत्सवैं-मा मंप्रेय्याद—गृहकलहादिजेत्यादि ।

अदिपदर्मिठटमात्रोपसंग्रारौद्रस्थायिभावलक्षणमाह—गुरुनन्धुनुर्धेत्यादि । हर्षम् । प्रज्वलनाख्य इत्यस्य ज्वलद्वृतिविशेष इति शेषः । व्यभिचारीति । रौद्रादिष्वति शेषः ।

अदिपदर्मिठटमात्रोपसंग्रारौद्रस्थायिभावलक्षणमाह—गुरुनन्धुनुर्धेत्यादि । हर्षम् । प्रज्वलनाख्य इत्यस्य ज्वलद्वृतिविशेष इति शेषः । व्यभिचारीति । रौद्रादिष्वति शेषः ।

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वागादिविकारदर्शनजन्मा विकासादपो हासः ॥

हास्य रस का स्थायिभाव हās है । इसे किसी व्यक्ति के वचन, अङ्ग प्रत्यङ्ग तथा शेष आदि में विद्यमान विकार के ज्ञान से उत्पन्न चित्तविकास (चित्त का खिल उठना ) कहा जाता है ॥

स्वाप्रदर्शनांतदिजन्मा परमार्थविषयकैः वैचित्र्याख्यैः स भयम् ॥

व्याधि आदि हेतु जीवों या अन्य किन्हीं परम अनर्थ ( = मरण आदि ) के जनक वस्तुओं के दर्शन श्रवण आदि से उत्पन्न जो चित्त की उत्कट विकलता है वही भय है । यही भयानक रस का स्थायिभाव है ॥

परमानर्थविषयकत्वाभावे तु स एव त्रासो व्यभिचारी । अपरे तु औत्पातिकप्रभववस्त्रासः, स्वाप्राधद्वारोत्थं भयमिति भयत्रासयोर्भेदमाहुः ॥

यदि यह चित्त विकलता परमानर्थविषयक न हो, अर्थात् किसी साधारण अनिष्ट का जनक प्रतीत होती हो तो उसे 'त्रास' कहते, 'भय' नहीं । अर्थात् त्रास व्यभिचारी भाव है, स्थायी भाव नहीं । कुछ आचार्यों का मत है कि आधिभौतिक-आधिदैविक आपदाओं से उत्पन्न चित्तविकलता त्रास है जब कि अपने ( उत्कट ) अपराधों से उत्पन्न विकलता भय है—यहाँ भय और त्रास में अन्तर है ।

कदर्थ्यवस्तुबिलोकनजन्मा विचिकित्साख्योऽद्भुतवृत्तिविशेषा जुगुप्सा ॥

किसी कुत्सित पदार्थ के दर्शन आदि से उत्पन्न एक प्रकार की चित्तद्रुति, जिसे 'विचिकित्सा' (छण्‌डण) कहते, जुगुप्सा है । यही बीभत्स रस व स्थायी भाव है ।

एवमेषां स्थायिभावानां लोके रसत्वैकगतानां शृङ्गारादीनां विभावपदव्यपदेशे हेतुमाह—एवमित्यादिना ।

इस प्रकार पूर्वोक्त विभिन्न नायक-नायिकाओं में विधमान रत्यादि को स्थायी-

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तथा वा कारणत्वेन प्रसिद्धानि तान्येषु काव्यनाटचयोरग्रेज्यमानेषु विभावक-शब्देन व्यवपदिश्यन्ते ॥

एषु = स्थायिभावेषु । व्यज्यमानेध्वस्थनेन वाच्यत्वादिव्यवच्छेदः । विभावयन्ति = रत्यादिभावान्‌ सामाजिकगतत्न्‌ आस्वादङ्कुरप्रादुर्भावयोग्यान् कुर्वन्ति । स्थायिभावकत्वे सति साधारणीकरणघटापारविषयत्वम्‌ विभावत्वमिति च प्राहुः ।

विभावयन्तीति व्युत्पत्ते: । यानि च कार्याणि तान्यनुभावशब्देन ॥

परचादिति । रत्यादिव्युत्पत्तौ अनन्तरम्‌ इदं प्रयं: । अतएव च व्यभिचारिहितप्रकाशनादवच्छेदेन वर्तमानान्‌ अनन्ययासिद्धा रत्यादय: स्थायिन: कारणानि, तद्गवद्वितोत्तररक्षणाच्च्छेदेन जायमानाच्चानुभावा: कार्याणीति व्यवपदिश्यन्ते । एतस्य चार्थस्य लोककेडपि रत्यादिकायें सम्भवादतिव्यापकत्वमिति हेतो: कार्यमात्रनियतातुभावपदप्रवृत्तिनिमित्तम्‌ अन्तरमाह—अनुभावयन्तीति । अनुमपयन्तीत्यर्थ: । अनभूभावैहि: सामाजकतत्स्था रत्यादय अनुमीयन्ते, कार्याणां सकारणत्वनियमादिति तात्पर्यम्‌ ।

यानि चव्यभिचारिणि तानि व्यभिचारिशब्देन ॥

व्यभिचारिण: । विशेषणाभिमुख्येन कार्यजनने चरिते स्थायिन उपकुर्वन्ति ये ते व्यभिचारिण: । सह चरन्तीति पाठेडपि स्थायिसहकारित्वमेव सझारित्वं भावानाम्‌ ।

भावों के जो आलम्बन कारण या उद्दीपन कारण के रूप में लोक-प्रसिद्ध हैं उन्हें ही काव्य नाट्य में स्थायिभावों के अभिव्यञ्जक होने के कारण 'विभाव' कह्हलाते हैं।

ये आलम्बनादि कारण विभाव इस लिए कह्हलाते यतः ये स्थायिभाव को विभावित, अर्थात आस्वादयोग्य, करते हैं। अनन्या स्थायिभावों का अस्तित्व प्रमाणित न होने से किसी भी प्रक्रिया द्वारा सहृदयों को रसास्वाद न हो सकेगा।

मूलदर्शनों आदि को अनुभाव इस लिए कहते यतः इनका भाव, अर्थात्‌ उद्बोधन स्थायिभावों के प्रकाशक्‌ है। परचादूवती की नियतपूर्वभावी कारण से उत्पन्न कार्यें होना शास्त्र-सिद्ध है। अथवा, इन्हें अनुभाव इस लिए कहा जाता यतः ये स्थायिभावों को सहृदयों के लिये अनुभावित, अर्थात्‌ प्रत्यक्षयोग्य बनाते—इन्हें अनुभावों से सहृदयों को नायकादिमिष्ठ स्थायिभावों की अनुभूति होती है।

१. यह ज्ञातव्य है कि भिन्न-भिन्न स्थायी भावों से उत्पन्न रोराच्च आदि अनभू-भावों को भी परस्पर विलक्षण ही होना चाहिए।

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तत्र शृङ्गारस्य स्त्रीपुंसावालम्बने । चन्द्रिकावसन्तविविधोपवनरहः-स्थानादय उद्दीपनविभावा: । तन्मुखावलोकनतद्गुणश्रवणकीर्तनादयोऽन्ये सात्विकभावानुभावा: । स्मृतिचिन्तादयो व्यभिचारिण: । करुणस्य बन्धुनाशादय आलम्बनानि । तत्संबन्धिस्निग्धगृहतुरगाभरणदर्शनादर्श-नाशयस्तत्कथाश्रवणादयश्चोद्दीपका: । गात्रक्षेपादयुपातादयोज्नुभावा: ।

उक्त नवविध रसों में— शृङ्गार रस के नायक-नायिका आलम्बन विभाव हैं । रति के उभयनिष्ठ होने से नायक के लिये नायिका और नायिका के लिए नायक आलम्बन विभाव है । आलम्बन का अर्थ विषयता सम्बन्ध से रत्यादि का आश्रय है । चन्द्रिका, वसन्त ऋतु, विभिन्न प्रकार के रम्य पुष्पों से सम्पन्न उद्यान, एकान्त स्थान तथा अन्य कामोद्दीपक पदार्थ इस रस के उद्दीपन विभाव हैं । वारम्वार प्रियतम अथवा प्रियतमा के मुख का परस्पर अनुरक्तभाव से अवलोकन, उसके गुणों का श्रवण तथा उच्चारण एवमु रोमाञ्च आदि कुछ अन्य सात्विक भाव शृङ्गार भाव हैं । अनुरागपूर्वक परस्पर-स्मरण एवं चिन्ता आदि इसके व्यभिचारिभाव हैं ।

विगतेष्वादिभिर्योगे न ह्रासो व्यभिचारिणाम् ।

अत एव प्रदीपकत्वादपि वर्णितमु— ये तूपकतुं मायान्ति स्थायिनं रसमुत्तमम् ।

उपकृत्य च गच्छन्ति ते मता व्यभिचारिण: ।। इति । इदानींमदिनिर्दिष्टानां शृङ्गारादीनां चतुर्णां रसानां विभावानुभावव्यभिचारिभावानाह विशेषेण —तत्रेत्यादिना । उक्तेषु रसेपिवर्थ:—

कहा जाता है ।। १. ‘व्यभिचारी’ यह नाम इस तथ्य का स्पष्ट संकेत करता है कि शास्त्र में जिन्द रस के जितने व्यभिचारिभाव गिनाये गये हैं वे सब के सब सर्वत्र रसनिष्पत्ति होते हैं—यह आवश्यक नहीं । वस्तुत: उद्दीपन विभावों और अनुभावों निर्देश तो उपलक्षण है ।

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म्लानिक्षयमोहविषादाचिन्तातोक्यदीनताजडतादयो व्यभिचारिणः । शान्तस्यैनित्यतैवेन ज्ञातं जगदालम्बनम् । वेदान्तश्रवण-तपोवन तापस-दर्शनायुद्दीपनम् । विषयारुचिशान्त्रु मित्राद्यौदासीन्यचेष्टाहानिनासाप्रदृष्टचादयोऽनुभावा: ।

करुण रस के आलम्बन विभाव हैं । उस प्रकार के इष्ट जनों के स्मारक उनके घर, वाहन, आभूषण आदि के दर्शन-स्मरण और उनकी कथा का श्रवण स्मरण आदि उद्दीपन विभाव हैं । विपत्ति के समय अज्ञों का क्रन्दन तथा अश्रुपात आदि अनुभाव हैं । शलान्ति, क्षय, मोह, विषाद, चिन्ता, औत्सुक्य, दीनता, जड़ता आदि इस करुण रस के व्यभिचारिभाव हैं ।

नृपपत्तेबन्धवादिनाशैवैवालम्बनत्वमुचिन्मिति पण्डितरajakू तमू । तथा हि यस्याकिञ्चनस्योऽपि विषयः स एव तस्यालम्बनम् । प्रकृतेः च प्रतियोगिनि बन्ध्यादौ भीतया तन्नाशाड्सहिष्णुत्वलक्षणेऽपि बान्धवस्य करणरसस्थायिनः शोकस्य विषयो न बन्धवादिः, तत्र द्वेषादभावात्, अपि तु तन्नाश एवेति युक्तं बन्धवादिनाशैवालयम्बनमिति मन्तव्यम्, तथैवानुभावात् सामाजिकानाम् । अत एव स्वयमपि करुणोदाहरणावसरे 'अत्र प्रमीततनय आलम्बनम्' इति वक्ष्यति । उक्तेऽपि विषयतयैव यद्यपि नाशस्यैव तथापि अभावस्य प्रतियोगिद्वेषितत्वनियमाद् प्रतियोगिनो बन्ध्यादेरपि तत्सं कथाऽधिक्येन निर्वाह्याम् ।

शान्तं निरूपयति —शान्तस्प्रेत्यादिना । चेष्टाहानिरित्योकोऽनुभावः । हितादिहितप्राप्तिपरिहारार्था हि क्रिया चेष्टा, सा च सर्वथा जगद्विरक्ते न सम्भवति, तस्येह जगति सम्भव एव । यद्यपि पूर्वसंस्कारवशाद् स हितप्राप्तत्तथापि तस्य तन्न हिततद्बुद्धिनैत्येवेत्यर्थः । हर्षोन्नाद इति । हर्ष उन्मादश्चेतरयर्थः । अत्रोन्नाद-शब्देन उत्कण्ठादिरहितचित्तविलासो न विवक्षितः, तस्य शमप्रधाने चेतस्सम्भवात् । अपि तु परमानन्दप्रासिजन्यः परमार्थतोऽसत्ये ब्रह्माभिने जगति सत्यत्व्रह्मरूपतयाऽनुभवः,

व्यवहारत: सत्ये वा जगति परमार्थतस्तद्रूपेणैवासत्यस्यावानुभवो वा । अन्यस्मिन्नन्यव्यवसाय-वभासऽच्च चित्तविलासेऽपि न व्यभिचरति । मत्यादिलक्षणं स्वयमेव भावद्वनिवृत्ते: ।

शान्त रस का आलम्बन विभाव तो नित्य रूप में ज्ञायमान यह सम्पूर्ण जगत् है । वेदान्त-श्रवण, तपोवन और तपस्वियों के दर्शन वादि इसके उद्दीपन विभाव हैं । सांसारिक विषयों में अरुचि, शत्रु-मित्र में तटस्थता, हित प्राप्ति या अनहित-निवृत्ति के लिए जनसामान्य द्वारा की जाने वाली चेष्टाओं का अभाव, नाशाप्रभाग पर एकतान दृष्टि आदि इसके अनुभाव हैं और हर्ष, परमानन्दानुभव-जन्य उल्लास, स्मृति तथा मति आदि इसके व्यभिचारिभाव हैं ।

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रोद्रस्यागस्कृतपुषादिरालम्बनम्‌ । वधबन्धादिफलको नेत्रारुण्यदन्तपीडनपुरुषभाषणशस्त्रग्रहणादिरसुभावः । अमर्षवैगौप्रचचापलादयः संचारिणः ।

उत्कट अपराध करने वाला व्यक्ति रौद्र रस का आलम्बन विभाव है। उस व्यक्ति द्वारा किये गये अपराध आदि इसके उद्दीपन विभाव हैं। उस अपराधी पुरुष के वध या बन्धन आदि में परिणत होने वाले लाक्षों को लाल करना, दांत पीसना, कठोर वचन बोलना और उसके पराभव के लिये शस्त्र-शास्त्र का ग्रहण करना आदि इसके अनुभाव हैं।

तत्कृतोद्रपराधादिरुद्दीपकः ।

एवं यस्याश्रितवृत्तेयों विषयः स तस्याऽऽलम्बनम्‌ । निमित्तानि चोद्दीपकानि निति बोधव्यम्‌ ।

इसी प्रकार अन्य रसों के प्रसङ्ग में भी यह समझना चाहिए कि जो जिस स्थायिस्वरूप उस्साहादिचित्तवृत्तिविशेष का विषय-विषयता सम्बन्ध से आश्रय, हो वही उसका आलम्बन विभाव और जो उस चित्तवृत्तिविशेषस्वरूप स्थायिभाव के निमित्त कारण हों वे उद्दीपन विभाव होते हैं॥

तत्र शृङ्गारो द्विविधः—संयोगो विप्रलम्भश्च । रतेः संयोगकलावच्‍छिन्नत्वे प्रथमः, वियोगकलावच्‍छिन्नत्वे द्वितीयः । संयोगेऽच न दम्पत्योः सामानाधिकरण्यम्‌, एकतल्पशयनेऽपोष्यादिसदृशत्वे विप्रलम्भस्यैव वर्ण्यप्रकरणे वक्ष्यति ।

उक्त रसों में शृङ्गार के दो भेद होते—संयोग शृङ्गार और विप्रलम्भ शृङ्गार। ( वियोग या विप्रयोग शृङ्गार भी इसी द्वितीय प्रकार के नामान्तर हैं)। यदि

अमर्ष इति । अयं चानुपद्मेव ग्रन्थकृता लक्षि‌तः । तदेवं शृङ्गारकरणशान्तरौद्राणां विभावादीनं विशेषतो वर्णयित्वा सम्र्रति रसान्तरालम्बनोद्दीपनप्रदृत्तिनिमित्तप्रतिपादनमुखेन आलम्बनादिस्वरूपनिर्णयप्रकारमाह—एवमित्यादिना ।

अधुना शृङ्गारं विभजते—तत्रेत्यादिना । नवसु रसेषु मध्य इत्यर्थः । सामान्याधिकारण्यमिति । एतच्चात्र दैशिकं ग्राह्यम्‌, न कालिकम्‌, कालिकसामानाधिकरण्यस्य द्वयोरपि शृङ्गारभेदयोः परमानुष्यकरत्वात्‌ । कवचिद् विप्रलम्भे पुनरालिककालेऽसामानाधिकरण्येऽपि अन्ततः सामानाधिकरण्यंस्यापरिहार्यत्वाद् । अत एव पुनरुज्जीवनसम्भावनाविरहविशिष्टनायकनायिकाद्यस्य तरमुत्स्वनितिच्यये कारण एव रसो न विप्रलम्भः ।

तथा चात्र सामानाधिकरण्यमित्यस्यैकस्मिन्‌ देशे काले वत्तंमानत्वमिति रसचन्द्रिकाविवरणसझ्झतमेवेति विभावनीयं विज्ञैः ।

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नात्। एवं विधोगोडपि न वैयधिकरण्यम्, दोषस्योत्कतत्वात्। तस्माद् दाविमौ संयोगवियोगाभ्यांवत:करणवृत्तिविशेषौ। यत्संयुक्तो वियुक्त-इचास्मीति धीः। तत्राद्यो यथा—‘शयिता सविधेऽप्यनीश्वरा’ इत्यत्र निरूपितः।

रति संयोगकालावच्छिन्न (संयोगकाल से विशिष्ट) हो तो संयोग शृङ्गार और यदि वियोगकाल से अवच्छिन्न हो तो विप्रलम्भ शृङ्गार होता। संयोग का अर्थ नायक-नायिका का एक देश में अवस्थान (दैशिक सामानाधिकरण्य); नहीं, कयोंकि यदि नायक-नायिका में परस्पर इष्या आदि के कारण तात्कालिक वैमत्य हो तो एक घर में कया, एक शय्या पर भी दोनों के एकत्र रहने पर आचार्यों ने विप्रलम्भ शृङ्गार ही माना है, संयोग शृङ्गार नहीं। अतएव विप्रलम्भ का भी अर्थ दैशिक वैधधिकरण्य नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने में जो दोष आता—वह कहा जा चुका है। तत्पयं यह है कि यदि दैशिक वैधधिकरण्य हीं विप्रलम्भ हो तब तो तात्कालिक वैमत्य के कारण एक शय्या पर लेटती नायक-नायिका के बीच दैशिक सामानाधिकरण्य रहने पर भी विप्रलम्भ का जो आचार्यों ने स्वीकार किया है वह असङ्गत हो जायेगा। अतःसंयोग और विप्रलम्भ ये दोनों हीं दो चित्तवृत्तियाँ हैं जिनके कारण नायक-नायिका में क्रमशः ‘हम संयुक्त हैं’ और ‘हम वियुक्त हैं’ इस प्रकार की धारणाएँ बनतीं हैं। इन दोनों भेदों में संयोग शृङ्गार का उदाहरण तो उत्तमोत्तम काव्य कां जो उदाहारण ‘शयिता सविधेऽप्यनीश्वरा’ आदि पढ़ा दिया गया है वही है।

यत्तु चित्रमीमांसायाम्—‘वागर्थाविव संपृक्तौ’ इत्यत्र रसध्वनि:, निरतिशयप्रेमशालिताव्यञ्जनात् इति, तदध्वनिमार्गनाकलननिबन्धनम्।

स्वारस्यादपि दैशिकसामानाधिकरण्यस्यैवावगतेर्हेतुत्वात्। दोषसेयिति। एकतल्पशयनेऽ-पि च्छ्यादिवाक्योक्तस्यैर्थः। तत्र दैशिकवैधधिकरण्याभावेऽपि विप्रलम्भाद्भीकारादिति हेतुरत्र। यत्तु = यतः। वस्तुतोडत्र सामानाधिकरण्यज्ञानमपेक्षितम्। निरतिशयप्रेमेति। प्रेम च नित्यसम्बद्धवागर्थवर्णनात्प्रायवर्तो-

  1. अत: उक्त धारणाएँ चाहे दैशिक सामानाधिकरण्य होने पर हेतुती हों या इसके अभाव में, यथाक्रम उभयविध शृङ्गार-रस होगा। कार्लिक सामानाधिकरण्य तो उभयविध शृङ्गारों में अनिवार्यं है। इसके अभाव का ज्ञान होने पर तो करुणरस हीं होगा, शृङ्गार नहीं।

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पार्वतीपरमेश्वरविषयककविरतौ प्रधाने निरतिशयप्रेम ममे कुषीभावात् । न हि गुणीभूतस्य रत्यादे रसध्वनिव्यपदेशहेतुत्वं युक्तम्, 'भिन्नो रसादलंकायं तया स्थितः' इति सिद्धान्तात् ।

सम्प्रक्तो... ..." में यह कहा है कि इससे पार्वती-परमेश्वर के निरतिशय प्रेम का अभिव्यञ्चन होने से यहाँ शृङ्गाररसध्वनि है । किन्तु उन्होंने यह वक्तव्य ध्वनिनिर्गमं के मर्मं को न समझ कर दिया है, अतः अनुचित है । वस्तुस्थिति यह है कि पूर्वोक्त स्थल में तो कवि की जो पार्वती-परमेश्वर-विषयक रति है वही प्रधान है, उन दोनों का निरतिशय प्रेम तो उस कविरति का गुणीभूत है । अतः पार्वती-परमेश्वरनिष्ठ रति को ध्वनि नहीं कहा जा सकता, क्योंकि गुणीभूत पदार्थ ध्वनिपदद्वाच्य कदापि नहीं होता । काव्यप्रकाश (आदि) में यह सिद्धान्त स्थापित है कि गुणीभूत होने के कारण अलङ्कारभूत रसादि से प्रधानीयभूत अलङ्कार्य, अत एव ध्वनिपदद्वाच्य, रस सवँथा भिन्न है । इससे स्पष्ट है कि गुणीभूत पार्वती-परमेश्वरनिष्ठ रति ध्वनिपदद्वाच्य हो नहीं सकती, यहाँ तो पार्वती-परमेश्वरात्मक देवताविषयक कविरतिस्वरूप 'भाव' हो ध्वनिपदद्वाच्य है ।

द्वितीयो यथामालिकी: प्रयाणसमये जलपत्प्रनल्पं जने केलिगन्धर्वनगरप्रविष्टानमुखे विन्यस्तवक्रास्वजा । नि:श्वासरलपिताधरोपरि पतद्बाष्पाञ्चितक्षोरद्दया वाला लोलविलोचना शिव शिव प्राणेशमालोकते ॥

अब विप्रलम्भ शृङ्गार का उदाहरण देखिए :-"एक ओर तो नायक अपने घर से प्रस्थान करते समय उसके इष्ट जन प्रचुर रूप में 'प्रास्त्यानिलैर्मालिङ्गन कर रहे हैं और दूसरी ओर उसकी नवोढ़ा प्रियतमा अपने रतिकोड़ा-गृह की खिड़की पर अपना मुखकमल रख कर मेपल्लि प्रेक्ष्य इत्यादि ।

परमेश्वररयोग्यं ज्यते । स्वोक्तार्थे मम्मटोक्तं प्रमाणयति—भिन्न इत्यादिना । इदं चित्रकाव्यं साङ्ख्यण्डनं ग्रन्थकृत्: प्रोदितवादमात्रं, तन्नास्मिन्नुदाहरंण स्पष्टमेव ध्वनिनिर्व-खण्डनादिति विभावनीयम् ।

द्वितीय:= विप्रलम्भ: । वाच इत्यादि । स्वप्राणेशस्य प्रियाणसमये मालिङ्गलिका-मालिङ्गनकरी वाचो जननदलपं जलपति सति क्रोडाश्रुग्वाकमुखे विन्यस्तं मुख्यकमलं यथा सा, अथ च नि:श्वासै: रलपितस्य मलिनीकृतस्याभरस्योपरि पतद्भि: बाष्पै: अञ्चितक्षोरद्धया वाला लोलविलोचना वक्ष्ला प्राणेश-प्राणनाथ-मालोकत इत्यर्थ: । शिव शिवेति क्षेदातिशयोत्कण्ठानाम् ।

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अत्रालम्बनस्य नायकस्य, निःश्वासाश्रुपातादेरनुभावस्य, विषादचिन्तावेगादेरच व्यभिचारिणः संयोगाद्रतिरभिजयज्यमान वियोगकालावचिछन्नत्वाद विप्रलम्भरसरव्यपदेशहेतुः ।

एक नवोढ़ा के विषय में किसी सहृदय द्वारा उक्त इस पद्य में नायक-स्वरूप आलम्बन विभाव, निःश्वास-अश्रुपात आदि अनुभावों और विषाद, चिन्ता, आवेग आदि व्यभिचारिभावों के सम्बन्ध से अभिजयजमान जो नायिकानिष्ठ नायकविषयक रति है वह वियोगकाल से अवचिछन्न (=वियोगकालिक) होने से विप्रलम्भ कहलाती है ।

यथा वा—

आविभूर्तां यदवधि मधुस्यन्दिनीदनन्दसूनोः कान्तिः काचिच्चित्रलिलनयनाकर्षणे कर्मणि । श्वासो दीर्घस्तदवधि मुखे पाण्डिमा गण्डयुग्मे शून्या वृत्ति: कुलमृगदृशां चेतसि प्रादुरासीत् ॥

एक अन्य उदाहरण भी— ''जब से नन्दतनय श्रीकृष्ण की युवतियों के मन में कामरस प्रवाहित करने वाली और उन सब की आँखों को आकृष्ट करने में जादूगर के समान कुशल जीवनावस्था की वह अलौकिक छटा प्रकट हुई उसी समय से कुलाङ्गनाओं के मुख पर दीर्घ श्वास, उनके दोनो कपोलों पर सफेदी और उनके मन में शून्य वृत्ति (=उदासी) का भी आरम्भ हो गया ।'' इसमें भी श्रीकृष्ण आलम्बन विभाव, दीर्घ श्वास आदि अनुभाव

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यथा वा— नयनाश्रलावमरसं या न कदाचित्पुरा सेऽहे । आलिङ्गितापि जोषं तस्थौ सा गन्तुकेन दयितेन ॥ इहापि सहजचारुचल्यनिवृत्तिरंडिता चानुभावव्यभिचारिणौ । इमं च पञ्चविधं प्राश्व: प्रवासादिभिरामनन्ति । ते च प्रवासाभिलाषविरहेष्य- श्रापानां विशेषानुपलम्भानुस्माभिः प्रपञ्चिता । करुणो यथा— अपहार्य सकलबान्धवचिन्तामुद्रास्य गुरुकुलप्रणयस्य । हा तनय विनयशालिन् ! कथमिव परलोकपथिकोऽभूः ॥

श्रीकृष्णविषयककविराज्ञां प्रति बिप्रलम्भरतेऽपि पुष्टत्वासदृश्योदाहरणान्तरं नयनाच्चलेतयादिति रसचन्द्रिका । नयनाच्चलेत्यादि । नयनाश्रलस्य पक्ष्मणोऽ- मर्षमाघातं या पुरा न सेऽहे सैव गन्तुकेन दयितेनालिङ्गितापि गमनकाले जोषं तृष्णीं तस्थी जडवदिति पर्यायः । अन्त्रावमरौश्रच सम्बोधनकालिकपतिपक्ष्मणो विदक्षितः । यद्वाड्न लोकसमक्षं पतितकटा क्षेमसम्बन्ध एव नयनाच्चलावमर्षौ । इमं चैति । विप्रलम्भशृङ्गारमिरस्येः । प्राञ्चः प्रकाशकारादयः । विशेषाडनुपलम्भादित्यस्य फले विप्रलम्भभेदानामू इत्यादि : अपहार्येत्यादि उद्दास्य = निरस्य । अन्त विनयशालित्वेन बान्धवपरित्याग

और दीनता आदि व्यभिचारिभावों के सम्बन्ध से कुलाङ्गनानिष्ठ श्रीकृष्ण- विषयक रति अभिव्यक्त हो रही है । यतः यह रति वियोगकाल से अवच्छिन्न है अतः एव इसे भी विप्रलम्भ कहा जाना चाहिए ।

अथवा यह तीसरा उदाहरण देखिए :— "जो यह कामिनी लोकलज्जा के कारण अपने प्रियतम के कटाक्षपात को भी पहले कभी न सह पाती थी वही आज दूर जाने वाले पति के द्वारा प्रगाढ आलिङ्गन किये जाने के समय भी चुपचाप खड़ी रही ।"

इस पद्य में प्रस्थान करने वाला प्रियतम आलम्बन विभाव, प्रस्थानादि उद्दीपन विभाव, चलता की निष्ठित्त अनुभाव और इर्ष्या, आदि व्यभिचारिभाव हैं । यतः नायिका की नायकविषयक रति यहाँ वियोगकाल से अवच्छिन्न है अतः यहाँ का शृङ्गार विप्रलम्भ कहा जाएगा ।

अम्मट आदि प्राचीन आचार्य वियोग के हेतुओं के प्रवास, अभिलाष, क्रियह, ईर्ष्या और शाप इन पांच प्रकार के होते से विप्रलम्भ को भी पांच प्रकार का मानते हैं । किन्तु हमने इन सब का पृथक् वर्णन इसीलिए छोड़ दिया है कि इनके वस्तुतः इनके फल में, कोई स्पष्ट तारतम्य प्रतीत नहीं होता ।

अब करुण रस का उदाहरण लीजिए :—

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अत्र प्रमीततनय आलम्बनम् । तत्कालवच्छिन्नबान्धवदर्शनाद्युद्दीपन-

पनम् । रोदनमनुभावः । दैन्यादयः संचारिणः ।

शान्तो यथा—

मल्यानिलकलकूटयो रमणीकुन्तलभोगिभोग्योः ।

एवंचात्मभुवो निरन्तरा मम जाता परमात्मनि स्थितिः ॥

अत्र प्रेम्णा सर्वोऽप्यालम्बनतम् । सर्वत्र साम्यम्तभावः । मत्यादयः

संचारिणः । यद्यपि प्रथमोऽर्थे उत्तमाधमयोरुपक्रमाद्वितीयोऽर्थेऽधमोत्तम-

वचनं क्रमभङ्गमावहति, तथापि वक्तृबुद्धयात्मकतयोत्तमाधमज्ञानवैकल्यं

आशङ्क्ये धोत्यते । प्रमीतो मृतः ।

मल्यानिलेत्यादि । निरन्तरा = तारतम्यरहिता । 'मानापमानयोस्तुल्यः'

हृत्यादि वचनं चात्र प्रमाणम् । उत्तमा...वैकल्यमिति । एतच्च परमात्मप्रतिष्ठस्थ्य

सर्वत्र तुच्छत्वबुद्धिरित्यतो लभ्यते ।

'हा विनतयशील पुत्र ! अपने सभी परिजनों की अपार चिन्ता को छोड़कर

और गुरुकुल के अगाध प्रेम की उपेक्षा कर तूने क्योंकर परलोक का पथ अपनाया !'

यहां मृत पुत्र आलम्बन विभाव है । मृत्युकाल में उपस्थित प्रियजनों के दर्श्न

आदि उद्दीपन विभाव हैं । रोदन अनुभाव है और दैन्य आदि व्यभिचारिभाव हैं ।

वतः इसे अभव्यज्यमान पित्रादिनिष्ठ शोकस्वरूप स्थायिभाव करुणरस

के रूप में अभिव्यक्त होता है ।

अब शान्तरस का उदाहरण प्रस्तुत है :-

'मेरी तो परमात्मा में प्रतिष्ठा हो चुकी है, अर्थात् मैं परमात्मस्वरूप हो चुका

हूं, जिससे (प्रतिष्ठा से) मलयानिल और विष के, रमणी के आकर्षक केश-कलाप

और सर्प की फणा के एवं चाण्डाल और सर्वज्ञ ब्रह्मा के बीच कोई अन्तर नहीं

रह गया ।'

इसमें तुच्छ रूप में परिजनत समस्त प्रष्ठच आलम्बन विभाव है । सभी

उच्च-नीच सांसारिक पदार्थों में समतबुद्धि अनुभाव है और मति, धृति आदि

व्यभिचारिभाव हैं । इन सब से शान्तरस अभिव्यक्त है । यद्यपि इस पद्य के

पूर्वार्ध में पहले प्रकट-पदार्थों —मलयपवनं और कामिनो-केशकलाप का और नाद

पश्चार्ध में पहले अपकृष्ट -विष सर्प की फणा का द्विदेश और उत्तरार्ध में पहले अपकृष्ट

चाण्डाल का और बाद में उत्कृष्ट ब्रह्मा का निर्देश होने सैं क्रमभङ्ग अवश्य दिखर्त्ते

देत। तथापि प्रकृत में यह दोष न होकर 'गुण' ही है, क्योंकि इस्से वक्ता की यह

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सपन्न्मिति ड्योत्तनाय क्रमभङ्ङो गुण एव ।

इदं पुन्नोदारायंस्—

सुरसोतस्वन्या: पुलिनमधितिष्ठन्नयनयो-

विध्यायान्तमुद्रामथ सपदि विद्राग्य विषयान् ।

विधूतान्तध्वान्तो मधुरमधुरायां चिति कदा

निमग्नः स्यां कस्मिंश्चन नवनभ्यामनुदर्शकः ॥

यद्यपि विषयगणालम्बन: सुरसोतस्वनतीत्तटायुद्दीपितो नयन-

निमोलनादिभिरनुभावितः स्थायी निवेदः प्रतीयते, तथापि भगवद्रासु-

देवालम्बनायं कविरतौ गुणीभूत इति न शान्तरसघनिग्रपदेशहेतु: !

इदं च पदं मित्रादिमितायां भगवदुक्तिप्रधानायां कविगालहर्यामुपनिबद्धमिति

प्रत्युदाहरणम्—इदमित्यादिना ।

सुरसोतस्वन्या इत्यादि । विधूतमनस्ध्वान्तान्तमजानं यस्म

तादृशोऽहं गज्जातटे तिष्ठन् नयनयोरस्तमुद्रां कृत्वा, निसीलेयति यावत्, परम-

तत्त्वदर्शीने चार्मणचक्षुषोऽप्यारारमावाद्, विषयांशच तद्वर्शनेप्रतिबन्धकान् सपदि

वैवधूय कस्यांचन विलक्षणाया नवस्य नभस्यांशुमू रसे: भातिप्रदोषघनस्य रोचिरवे

रचियंस्या: तस्यां चिति चैतन्यस्वरूपे परमात्मनि श्रीकृष्णे कदा निमग्नः स्यामिति

'पदार्थ: ।

भावस्यैव कविरतिस्वरूपस्यान्त प्राधान्यं प्रतिपादयितुमह—इदं चेत्यादि ।

चरमोत्कर्ष च्योतित हो रहा है कि उसके ज्ञात्रूप होने से उसकी दृष्टि में इस प्रपञ्च का कोई पदार्थ न उत्कृष्ट है और न अपकृष्ट ही । अतः इस पद्य को क्रमभङ्गदोषयुक्त नहीं कहा जा सकता ।

किन्तु निम्नलिखित पद्य शान्तरस का उदाहरण नहीं हो सकता :—

"अज्ञान से रहित होकर मैं गज्जातट पर अवस्थित होकर अपनी आँखों को अन्तर्मुख और सभी विषयों का परित्याग करके अत्यन्त आकर्षक एवं भातिप्रदोष के नवीन घन के समान रोचक चित्स्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण में कब निमग्न हो जाऊँगा !"

यद्यपि इस पद्य में भी विषय-समूहस्वरूप आलम्बन, गज्जातट आदि उद्दीपन विभावों और नेत्रनिमोलन आदि अनुभावों से सम्भालित निवेदात्मक स्थायिभाव प्रतीत होता तथापि यह शान्तरसध्वनि कहुलाने योग्य नहीं है, क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति जो कवि का निरतिशय प्रेम है वही इसमें, प्रसङ्गानुसार, प्रधान है,

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वृत्तिरप्यत्र महोद्वता रौद्रस्य परमौजस्वितां परिपुष्णाति । अन्यत्र गुरु-

स्मरणे सत्यंभ्रावविमर्षावश्यकतया प्रकृते चाजहल्ल्स्वार्थलक्षणामूल-

ध्वननेन मदीयेत्थनेन गर्वोल्कर्षस्यैव प्रकाशनात्स्फुटं गम्यमानेन विवेक-

जून्यत्वेन क्रोधस्याधिक्यं गम्यते ।

कारिभूतमोजोगुर्णं हदनुकूलं गुरूपं च वक्ष्यमाणमन्त्र उपपादयति-वृत्तिरित्यादिना । रौद्रस्य=क्रोधस्य । परमौजस्वितां=रसावस्थावासिपर्यन्तमुत्कर्षेऽपि । अन्यत्र=क्रोधाभावकाले । मदीयेत्यत्र स्मृतपदस्यैव जहत्स्वार्थलक्षणया स्वार्थंसहितः त्रिस्सकत्वः क्रियाणां निह्नुता पित्रादेशान्मातृवधकृतन्नत्यादिवाक्यादर्शः । एतेन च क्रियानिह्नुत्त्वं स्वादिनेकेन रूपेण अचमत्कृतदायैःप्रतीति: । अयमाशयः---अन्यस्य कस्यचिद् गुरुराद्बाधार्थः क्रोधोदीपकत्वाभावात् प्रकरणविरोधाच्च ईदृशैव अर्थ: सिद्धः । एतादृशस्य गुरोः शिष्यसापेक्षत्वान्मदीयपदप्रयोगं विनापि प्रकृतान्जानमदर्थंसम्बन्धप्रतीतेर्व्यर्थमर्थंकस्य अस्मच्च्छब्ददस्य प्रकृते नोपयोगः । इमेवानुपयोगलक्षणं मुख्यार्थबाधस्मादाय प्रकृते लक्षणया क्रियानिह्नुत्तुल्यधर्मेण विशिष्टस्य धर्मिणः प्रतीति: । व्यङ्ग्यजनया चेतराणां मत्वर्थनुत्ववादीनां बहूनां धर्माणां बोधः । अस्मच्च्छब्द-वाच्यमात्रस्य प्रतीतेरनुपयोगेऽपि विरोधित्वाभावाद्वहुत्वसङ्ख्यावत्त्व लक्षणा । तयाथ वा प्रकृतेऽर्थान्तरसंकरमितवाच्यध्वनिर्निरिति । लक्षणयैव सर्वेषां धर्माणां प्रतीतिसुत न मन्तव्या, एकस्यैवोपयोगिनो धर्मस्य लक्षणत्वेनैव मुख्यार्थबाधस्यात्पयोगित्ववलक्षणस्य निराकरणादन्यत्र धर्मेषु लक्षणाया अप्रसरादिति ।

जानना उचित हैं है । टूटने की कड़कड़ाहट के श्रवण से अनुमित 'निर्भीक होकर धनुष का तोड़ना' उद्दीपन विभाव है । कठोर वचन बोलना अनुभाव है । अभिमन्युमान अहङ्कार, उप्रता आदि व्यभिचारिभाव हैं । यह पचात्तमक वचन 'धनुर्भङ्ग' की ध्वनि सुनाने से टूटी हुई समाधि वाले परशुराम द्वारा कहा गया है । यहाँ उपलक्ष्य अत्यन्त उद्दत 'वृत्ति' रौद्र रस (क्रोध) की अत्यन्त उत्कटता का परिपोषक है । वस्तुतः जब क्रोध नहीं होता तो व्यक्ति में अहङ्कार का उदय नहीं होता । इस पद्य से, इसके विपरीत, 'मदीय' शब्द से अर्थात् गर्व (अहङ्कार) की प्रतीति होती । तात्पर्य यह है कि गुरु शब्द के नित्यसामिपेक्ष होने से और प्रसझ-वश भी 'मेरे गुरु' ऐसा अर्थ 'मदीय' इस विशेषण के बिना भी स्पष्ट है । वतः स्वार्थमात्र के प्रतिपादन के लिए इस पद्य में 'मदीय' विशेषण की कोई् उपयोग नहीं है । यहीं अनुपयोगिता यहाँ 'मदीय' शब्द के मुख्यार्थ की वाधा है । अतः इस शब्द को लाक्षणिक मानना तो आवश्यक है ही जिससे 'मदीय' शब्द की अन्वयोयोगिता का निराकरण हों सकें । इस लिए 'इक्कीस बार समस्त क्रियाओं' का संहार करतत:' अथवा 'इनराकरण' हों सकें ।

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इदं तु नोदाहृयं—

धनुर्विदलननध्वनिश्रवणतत्क्षणाविर्भव- त्महागुरुरघस्मृति: भ्रशनवेमधूताधर: । विलोचनविनिःसरदबहलविस्फुलिङ्गव्रजो रघुप्रवरमाक्षिपञ्जयति जामदग्न्यो मुनि: ॥

अत्राप्यपराधास्पदेन रघुनन्दनेनालम्बितो धनुर्विदलननध्वनिश्रवणेनो- गर्वोऽत्कर्षस्य, तेन च विवेकशून्यत्वस्य, तेन च क्रोधादध्वकस्य धवननमिति सन्दर्भार्थ: । अधुना प्रत्यूदाहरणमुच्यते क्रोधस्य व्यञ्जकत्वं गुणीभूततत्त्वमुपपादयति— धनुर्विदलनेत्यादिपदच्यते । धनुर्विदलनन जायमानस्य ध्वने: श्रवणपात्र तत्क्षणे श्रवणक्षणे तदवहितोत्तरक्षण एव वाविर्भवन्ती महागुरो: पितुर्ज्जमदग्नेवेधरय- सहस्रबाहुसुतुकृतस्य स्मृतिर्यस्य, पितृवधोद्सूतक्रोधस्यस्य इवसनस्य नि:श्वासदय- वेगेन धूत: कम्पितोऽघरष्ठो यस्य, क्रोधाग्निनाभ्यां विलोचनाभ्यां विनिःसरन्न बहुलो विपुल: स्फुलिङ्गव्रजोऽग्निकणसमूहो यस्य, अथ च रघुप्रवरं धनुर्धरंञ्जकं रामचन्द्रम् आक्षिपन् जामदग्न्य: परशुरामो मुनिज्जयैति सर्वोत्कर्षेण वचंत इति पच्यर्थ: । अत्र तुरीयचरितां 'क्रोधाग्नि' रक्तनेत्राभ्यां विनिस्सरतां बहुलानां विस्फुलिङ्गानां व्रजं स:' इति रसचन्द्रिकाकृतो समाससिद्धत्व:, ब्रजशब्दस्य समूहार्थकस्य नपुं सकत्वव्मपि तथैव । अत्र वचनस्यायवक्तृकतया रघुप्रवरेऽति विशेषोपादानेपि न पूर्वं पध्यात्र्‌ दोष: ।

अत्रालम्बनविभावादिव्यञ्जोऽपि क्रोधो जयतिपदप्रतिपादितायां परशुरामविष- यिणां कविरतो गुणीभूत इति न ध्वनिकाव्यमधिरोहितेत्युपपादयति—अनेत्यादिना ।

अन्य एक प्रकारतोयोगी धर्मंविशेष से विशिष्ट मेरे गुरुके कामुं क……….इस प्रकार का लक्ष्यार्थ 'मद' शब्द का स्वोकार करना पड़ता है । अतः यह अजहत्स्वार्था लक्षणा है। इसे वक्ता परशुराम की विवेकशून्यता का और इस विवेकशून्यता से अत्यधिक क्रोध का अभिव्यञ्जन होता । इस प्रकार यह भी स्पष्ट है कि यहां अत्यन्तरसङ्क्रमितवाच्य ध्वनि है ॥

निम्नलिखित पद्य तो रौद्ररसध्वनि का उदाहरण नहीं हो सकता है:—

"एक क्षत्रिय द्वारा किये गये शिवधनुर्भङ्ग के कोलाहल को धुनने से तत्काल जिन्हें सहस्रबाहुत्र द्वारा किये गये अपने पिता जमदग्नि के वध का स्मरण हो आया है, जिनका अधर अपने क्रोधजनित नि:श्वास से फड़क रहा है, जिनकी आँखों से क्रोधाग्नि की चिनगारियाँ निकल रही हैं और जो रामचन्द्र पर अपना आक्रोश प्रकट कर रहे हैं उन मुनि परशुराम की जय हो !"

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दुद्दीपितो निश्वासनैत्रवलनादिभिरनुभावितो महागुरुवधस्मृतिगवोंप्रतिवादिभिरुच संचारितः क्रोधो यद्यपि व्यज्यते, तथाप्यसौ तत्प्रभाववर्णननबीजभूतायां कवितौ गुणीभूत इति न रौद्रसध्वनिव्यपदेशहेतुः। काव्यप्रकाशगतरौद्रसोदाहरणे तु ‘कृतमनुमतं दृश्टं वा यैरिदं गुरुपातकम्’ इति पद्ये रौद्ररसघ्रणजनक्षमा नास्ति वृत्ति:, अतस्तत्कवेरष्कृतिरेव ।

इस पद्य में भी अपराधी रामचन्द्र परशुराम के क्रोध के आलम्बन हैं। धनुर्भेद्द के कौलाहल का सुनना उद्दीपनविभाव है। क्रोधाग्नि से निश्वास और आँखों से क्रोधाग्नि की चिनगारियों का निकलना आदि अनुभाव हैं अपने पिता के वध का स्मरण, अहङ्कार एवंम् उप्रता आदि व्यभिचारिभाव हैं। अतः क्रोध का अभिव्यञ्जन तो होता हीं है। किन्तु यह क्रोध परशुराम के प्रभाव के वर्णन के मूलभूत कवि- (वस्तु-) निष्ठ रति (निरतिशयप्रेम=भक्ति) का अङ्ग है, क्योंकि ‘जयति’ इस सर्वोत्कर्षबोधक क्रिया पद से यह रति स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है। अतः इसे रौद्ररसध्वनि का उदाहरण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अन्यालम्बूत रस छवनिपदध्वव्यपदेश नहीं होता। काव्यप्रकाश में जो :- ‘कृतमनुमतं दृश्टं वा यैरिदं गुरुपातकम्’ इत्यादि वेष्टीसंहार का पद्य रौद्ररस-छवनि का उदाहरण दिया गया है ‘उसमें रौद्ररस के अभिव्यञ्जन के लिए अपेक्षित महोद्रता वृत्ति (= रुषा = कठोराक्षररघट्टिता वर्णसंघटना) नहीं है। कवि चाहता तो है इस पद्य द्वारा उत्कट कोटि के क्रोध को व्यक्त करना, किन्तु अनूष्कुर वृत्ति से

महागुरुत्वादिति । महागुरुवधादिस्मृत्यादिना व्योम्ना विरलं क्रतुं वन्ति स्म । तत्प्रभावेत्यादि । तस्य परशुरामस्य प्रभावस्तत्करणं दी जङ्घुं रस्यान् रताविनिर्णयं । यद्वा तत्प्रभाववर्णनस्य बीजभूतायां वेष्टीसंहारच एतत्सत्यप्येतादृशदृत्यभावे प्रसादेति रौद्रसाभ्र्यङ्गजननं स्वीकृतमेव । स्वयंअपि वक्ष्यत्येवमेवति प्रोेढिरवेयं पण्डितराराज्यं । रौद्रस्य युयुधवीराद् भेदकं तु रक्तास्रयनप्रसवमुक्त* दर्पणकारेण ।

  1. इस 'स्मरण' के वाच्य होने से इसे व्यभिचारिभाव कहना उचित नहीं है, क्योंकि व्यभिचारिभाव व्यङ्ग्य होता है, वाच्य नहीं, हाँ यदि महागुरु शब्द का अर्थ माता हो जिनका वध परशुराम ने पिता की आज्ञा से किया था

तो कथमपि इसे व्यभिचारिभाव कहा जा सकता है।

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वीरश्रुतुर्धा-दानदयायुद्धधर्मेस्तदुपाधेरुत्साहस्य चतुर्विधत्वात् । तत्रायो यथा—

कियदिदमधिकं मे यदुद्दिशायार्थंयित्ने कवचमरमणीयं कुण्डले चार्पयामि । अकुर्वणमवकुर्व द्राक्कुपाणेन नियंद- बहुलरघिरधरारं मौलिमावेदयामि ॥

युक्त पद्य की रचना नहीं कर सका । अतः यह कवि की अशक्ति तो हैं ही; साथ-साथ इसे रौद्र का उदाहरण देने वाले काव्यप्रकाशकार की भी अशक्ति है ॥ वीररस के चार भेद हैं, क्यों कि दान, दया, युद्ध और धर्म—ये चार इसकी उपाधियाँ हैं — ऐसा प्राचीन आचार्यों का मत है ।

एषा द्विजवेषयिन्द्राय कवचकुण्डलददानोदयतस्य कर्णस्य तद्दानविस्मितानु सभ्यान्प्रत्युक्तिः । अत्र याचमान आलम्बनम् । तदुधीरीतां स्तुतिरुदृृृ-

इनमें दानवीर का उदाहरण है :—

तन्न रक्ताश्रयनेष्टतयेनोत्साहात् क्रोधाविभावो बोधितः, युद्धवीरे पुनरुत्साहमान्र्मिति भेदोज्जयोतत्पर्यंविवषयीकृतः ।

''एक तो कोढ़े याचना कर रहा हो, वह भी एक ब्राह्मण हो, तो उसे अपना तुच्छ कवच और ये दोनों कुण्डल दान कर देना मेरे लिए कौन-सी बड़ी बात है ! यथार्थ दान तो तब होगा यदि मैं निर्दयभाव से अपने खड्ग से क्षत से काट कर खून की धारा से लथपथ अपना शिर उसे समर्पित कर दूँ ।''

तदुपाधेरिरिति । स्थायिभावो रस इति पक्षे ते दानादय उपाधयो यस्सेति विग्रहः । स्थायिभावाद्विच्छिन्ना चिदेव रस इति पक्षे तु स्थायिभावानां रसोपाधित्व- र्मिति तस्य प्रकृतस्य वीररसस्योपाधिरिति विग्रहः ।

ब्राह्मण का वेष धारण कर इन्द्र जब करर्ण के पास आये तो करर्ण ने उन्हें अपने कवच और कुण्डल दे दिये । उस समय करर्ण की दानवीरता को देखकर बहूत हीं विस्मित होकर करर्ण की प्रंशसा करने लगे ।

आद्यः=दानवीरः । कियदित्यादि । अर्थंयित्ने ये याचकाय द्विजाय विप्ररूपधारिणे ( इन्द्राय ) यददहमरमणीयं क्षुद्रत्वादुपेक्षणीयमात्रत्नः कवचं कुण्डलद्रयं चार्पयामि तत् कियदधिकमिति कृतम् । अपितु तदा त्वद्भवत् याच द्विजाग्रं क्षतात् कृपाणेन स्वकीयं शिरोऽकुर्वणमवकुर्व द्राक्कुपाणेन नियंती निस्सरन्ती बहुला रधिरधारा यस्यात् तन्मन् आवेदयामीयामिति ।

नियंदबहलेऽ्यादिससम्बन्ताननपदार्थक बहुत्रींहिसमासो रसचन्द्रिकायामुक्तदर्शनः ।

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पिका!? कवचादिवितरणं तत्र लघूतवबुद्ध्यादिकं चानुभावः। मे इत्यर्था-नतरसङ्क्रमितवा!च्यध्वन्युस्थापितो गवंः स्वकीयलोकोतरपितृजन्यतवादि-स्मृतिरेच संचारिणौ। वृत्तिरप्यत्र तत्‌तदर्थानुरूपोद्गमविरामशालितया सहृद-यैकचमत्कारिणी।

अथ भावः—अर्पणामीयादिक्रियापद उत्तमपुरुष-सामर्थ्यात् प्रकृततत्वाच्छास्मर्थ्याद्‌वश्नः प्रतिपाद्य तद्‌विधानाय ‘मे’ इति पदस्य नाश्रोपयोग इति वाच्यार्थमात्रविवक्षायामनुपयोगिगतलक्षणवाच्यार्थबाधद्वास्मदपदं लक्षणिकं सत् सकलकोषदातॄत्वविशिष्टतमस्मदपद्यं बोध्यति। अविरোধित्वाच्छान्त्रास्मच्छब्द-वाच्यार्थस्यैव लक्षणार्थं समावेशोऽपि नयुक्त इत्युपादानलक्षणेवात्र। तत् एव लक्षितादर्थं विशिष्टध्वणोऽनुपयो गिगतलक्षणवाच्यार्थबाधस्य

अर्थान्तरसङ्क्रमितेत्यादि।

नि:शेष निराकरणादर्थान्तरे गर्वादौ क्षीणसामध्येऽप्यादानलक्षणा न तदर्थमन्तरं प्रतिपाद्यध्वमलमिति व्यङ्जनेनै-संश्रेयार्थचोतिका तत्प्रतिपादिकङ्गतस्या स्वीकारंभयेति गर्वादीनामर्थान्तर-सङ्क्रमितध्वनिसमूत्यापितत्वमिति। स्वकीयेत्यादि। एतच्चास्मदर्थपिक्षया, सहृदयापेक्षया तु तदीयेत्यादि मन्तव्यम्‌। स्मृति: सहृदयानामिति शेषः। एषा च स्मृति: शक्यसम्बद्ध-त्वादुक्तार्थस्यैकसम्बन्धज्ञानविधया जायते। ये तु लोकोत्तरपितृजन्यत्वं शङ्क्यते।

वाच्छेदके मन्त्र्यन्ते तथा लोकोत्तरस्यैव प्रकृतानुपयोगिगतलक्षणा बाधा लक्षणप्रयोजिक-कथमुपपद्यत इति चिन्त्यम्‌।

वाच्छेदके मन्त्र्यन्ते तथा लोकोत्तरस्यैव प्रकृतानुपयोगिगतलक्षणा बाधा लक्षणप्रयोजिक-kathamupapadyata iti chintyam.

यह उक्ति है। यहाँ याचना करने वाले ब्राह्मण आलम्बन हैं। उन्होंने ब्राह्मण द्वारा की गयी कण्ठ की स्तुति ( जो इस पद्य में निर्दिष्ट नहीं है ) उद्दीपन विभाव है। कवच और कुण्डलों का दान और उन कवचादि में तुष्टता बुद्धि आदि अनुभाव हैं। पद्यस्थ ‘मे’ पद में अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य ध्वनि से प्रतीयमान गवं ( अहङ्कार ) और लोकोत्तर पितृ भगवान् सूर्य से उत्पन्न होने की स्मृति व्यभिचारिभाव हैं।

तात्पर्य यह है कि प्रकृत पद्य में ‘अर्पणामि’ और ‘आवेदयामि’ इन उत्तमपुरुषों की क्रियाओं और प्रसङ्ग से हीं ‘मे’ पद के विना भी अस्मच्छब्दार्थ-का बोध हो जाने से वाच्यार्थमात्र का प्रतिपादन करने के लिए ‘मे’ पद का कोई उपयोग नहीं है।

यहाँ अनुपयोगिता यहाँ अस्मच्छब्द के मुख्यार्थ का बाध—लक्षणावीज है।

यत्तः ‘समस्त राज्य को समर्पित कर देने वाले मेरे लिए’ यह अर्थ ‘मे’ पद का प्रकृतानुपयोगी नहीं है।

अत: यहाँ अस्मच्छब्द में जहाँतस्वार्था लक्षणा हीं उचित है।

एवश्च ‘समस्त ……. मेरे लिए’ इस अर्थ-स्तर में संक्रमित हो गया है वाच्यार्थं जिसका उस अस्मच्छब्द में वर्तमान व्यङ्जना (ध्वनि)-अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनि से प्रतीयमान करण्णिष्ठ गवं और भगवान् सूर्यं का पुष्ट होना--व्यभिचारिभाव कहे गये हैं।

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निरूपणं विधातुं पूर्वार्धे तदनुकूलशिशिलशृङ्गात्मिका । उत्तरार्धे तु मौलितः प्रागवक्तृगतगर्वोत्साहपरिपोषणायोद्यता । ततः परं ब्राह्मणे सर्वनयतयं प्रकाशयितुं तन्मूलीभूतं गर्वंरहितं ध्वनयितु पुनः शिशिलयेत् । अत एवं वेदयामोत्युक्तम्, न तु ददामि वितरामिति वा ।

पद्य के पूर्वार्ध में कवच और कुण्डलों की तुच्छता का प्रतिपादन, जिससे करण का दानोत्साह परिपुष्ट होता है, करने के लिए (तुच्छताप्रतिपादन के) अनुकूल शिथिला वृत्ति ( कोमलपदयोजना ) है; उत्तरार्ध में 'मौलिम्' पद के पहले (अकरणस्य……….धारम्) वक्ता करण के गर्व और दानोत्साह का अतिकृष्ट अभिव्यञ्जन कराने हेतु उद्धता वृत्ति है । तत्पश्चात् 'मौलिमावेदयामि' इस अन्य भाग में याचक ब्राह्मण के प्रति अपनी विनम्रता के प्रकाशन के मूलभूत गर्वच्छून्यता की व्यञ्जना के लिए तदनुकूल शिथिला वृत्ति हों है । यही कारण है कि 'ददामि' अथवा 'वितरामि' इत्यादि गर्वप्रकाशक क्रियापद का ही नहीं अपि तु 'आवेदयामि' इस गर्वच्छून्यता-सूचक अथवा नम्रता-सूचक क्रियापद का ही प्रयोग किया गया है ।

इदं तु नोदाहरर्णीयम्— यस्योद्दामदिवानिशार्कावधिविलसत्सद्‌दानप्रवाहप्रथा- माकर्ण्यविनिमण्डलागतमिवदयवन्दीन्द्रवृन्दाननाननत् । ईर्य्यानीर्भरणफुल्लरोमनिरतरच्वलद्गूढःस्ववत्- पीयूषप्रकरैः सुरेन्द्रसुरभिः प्रावृट्पयोदायते ॥

निम्ननिदृष्ट पद्य को तो दानवीरध्वनि का उदाहरण नहीं देना चाहिए— "ये महाराज इतने उदार हैं कि इनके द्वारा दिन-रात याचकों को दिये ज ने वाले अधिकाधिक दानप्रवाह को भूमण्डल से लौटकर आये स्वर्गीय श्रेष्ठ वन्दियों के मुख से सुनकर स्वर्गस्थ कामधेनु को भी इतसे इर्ष्या हो गई है जिससे इसका सारा शरीर रोमांचित हो उठा है । इसी रोमाञ्च के कारण इसके दुग्धपूर्ण स्तनों

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अत्रेन्द्रसभाामध्यगतसकलनिरीक्षकालम्बनः अवनिमण्डलगतवियद्-

बन्दीन्द्रवदनविनिर्गतराजदानवर्णनोद्दीपितः, ऊधःप्रसृततपीयूषप्रकरैरतरु-

भावितः; असूयादिभिः सञ्चारिभिः परिपोषितोदिप कामगवीगत उत्साहो

राजस्तुतिगुणीभूत इति न रसव्यपदेशहेतुः । अत एवदमपि नोदाहरणम्-

साङ्धदीपकुलाचलां वसुमतीमाक्रम्य सप्तान्तरां

सर्वां द्वामपि सस्मितेन हरिणा मन्दं समालोकितः ।

परगुणासहिष्णुतया निभरंमतिमात्रं फुल्लोद्वितो रोम्णां यो निकरस्तस्माद्

में जो गुदगुदी लग गई है उसके कारण यह ( कामघेनु ) वर्षाकालिक बादल के

व्यावल्गदुत्फुल्लसंकुलचितप्रभाभागं यदूदृं: स्तनस्तस्माव् सर्वन्द्रः पीयूषप्रारणां प्रकरे: प्रवाहैः

समान दूध की धारा बहा रही है ॥

सुरेन्द्रदुरभिः कामधेनु: प्रावृट् पयोद इवाचरति निरन्तरं प्रवहतौत्पर्यः ।

यहाँ इन्द्र की सभा में स्थित सभी सज्जन (देवद्वन्द) जिनके लिए कामघेनु दूध

अत्र विभावादिभिः परिपोषितोद्भुतसाहो राजस्तुतिगुणीभूतत्वान्न रसपदभागि-

की धारा बहा रही है, कामघेनुगत दुग्धदानोत्साह के आलम्बन हैं । भूमण्डल से

स्युपपादयति —अत्रे त्यादिना । एवंविधे स्थल एव रसवदलङ्कारतयैवं प्राणामिष्टतम ।

लौटकर आये स्वर्गीय प्रतिष्ठित बन्दी-गण के मुख से राजा के अधिकाधिक दान-

असूयेति । गुणेषु दोषबुद्धिरसूयाक्षमाहूपा चेष्ट्यंन्ति सा भिन्नेवासूयजन्येति बोधयम् ।

प्रवाह का श्रवण उद्दीपन विभाव है । स्तनों से बहने वाली दूध की धारा

एतच्च मम्मप्रकाशानुसारेण । वस्तुत एतादृशेष्ट्यसूयोज्ज्जनकभावे विपर्य्यासो

अनुभाव है और असूया आदि संचारिभाव हैं । इस प्रकार विभावादि से कामघेनु-

ममंप्रकाशाकृत् । पणिडतराजेन वक्ष्यमाणाया असूयायास्तु ममप्रकाशोक्तेष्ट्यया भेदो न

गत उत्साह का अभिव्यञ्जन तो यहाँ होता हीं है किन्तु इसे रसध्वनि नहीं कहा

स्पष्टः । एवंचात्रादृष्टिकारणभेदकतया भेदो द्रष्टव्य इत्यधसंयमः । यद्वान्योक्तिपर-

जा सकता, क्योंकि इस पद्य में राजा की स्तुति के हीं प्रधान रूप में वक्ता

दशोन्नादिजन्यः स्वापकर्षबुद्धिविशेषः तादृशबुद्धिजन्य आक्रोशो वेष्ट्य्येतिं मन्तव्यम् ।

का तात्पर्य-विषय होने से उत्क उत्साह प्रधान नहीं है अथवा तु वह राज-स्तुति का

अमर्षं एव वा सा ।

अङ्ग है ॥

साङ्धद्वीपेत्यादि । पदत्रयपरिमितां भूमिं वामनाय प्रतिश्रुतवतो दैत्यराजस्य

इसी अङ्गत्व के कारण निम्ननिर्दिश्यमान पद्य में भी वलि का प्रतीमान

में जो गुदगुदी लग गई है उसके कारण यह ( कामघेनु ) वर्षाकालिक बादल के

दानोत्सर्ग दानवीररचन का उदाहरण नहीं हो सकता —

समान दूध की धारा बहा रही है ॥

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प्रादुर्भू तपरप्रमोदविदलद्रोमाञ्चतस्तत्क्षणं व्यानश्रीकृतकन्धरोडसुरवररो मोहिल पुरो नystवान् ॥

इह च भगवद्रमानालम्बनः, तत्कर्तृ कमनदनरीक्षणोद्दीपितः रोमाञ्चदिभिरनुभावितः, हर्षोदिभिः पोषित उत्साहो व्यज्यमानोडपि गुणः ।

बलेऽद्भुतोत्साह्याजमुखेन स्तुतिरियम् । सस्मितेनेषडदशता हरीणा वामनेन एकेन पादेन अधिरुढिः सागरेः द्वीपैरष्टभिर्मिश्च कुलपवितैः सहितां सानन्तरामन्त्वन्तिसंविसमप्रकारघटितां वसुमतीं पृथिवीम्, द्वितीयेन च पादेन सर्वां धाम ऊध्वंल्लोकमाक्रम्य मन्त्रं समालोकितोऽसुरवररो बलिः भगवत्कृपाकटाक्षपातेन प्रादुर्भूतोऽतो भिडयक्तो यः परमः प्रमोदस्तेन निषित्तेन विदलन् परिरिफुटन् यो रोमाञ्चः स सज्जातो यस्य तथा भूतोऽथ च तत्क्षणं समालोकनकाल एव व्यानश्रीकृतः कन्धरो येन स मोहिल स्वशिरो वामनस्य पुरस्त्वत्तीयपादविन्यासाय न्यस्तवान् इति पद्यार्थः । यद्वाडत्र पचे ससान्तरा- मिति च्यामित्यस्यैव विशेषणम्, भुव आदिरीणां षण्णामूर्ध्वलोकानामाधन्तौ समादाय सकलाकाशसम्भवात् । व्यानश्रीकृतेयत्त्राभूततदूद्र्वार्थकै चिवप्रत्यययेनेः पूर्वं कन्धरस्य व्यानप्रत्नाभावः प्रतिपाद्यते । एतेन स्तुतिप्रकारः सूच्यते ॥

अत्र दानोत्साह्यस्य विभावादिमिःव्यङ्ग्यरत्नेऽपि परकृतबलिस्तुर्त्तु प्रति गुणीभूत- स्वात्तस्य न रसध्वनिस्त्वमिसुपपाद्यति—इहेहत्यादिना । हर्षोदिभिरिरिति । अत्र प्रमोदस्य वाच्यत्वेन विभावारित्वाभावाद्य भिचारित्वेन निर्दिष्टो हर्षः प्रमोदादभिन्न एवेति स्थितोऽइष्टप्राप्यादिजनमा सुखविशेषो हर्षः' इति भावद्वचनप्रकरणे वक्ष्यमाण- स्त्वेन विषयजन्यं सुखं हर्ष इति, यच्च विषयाभिष्यक्तं तत् प्रमोद इति भेदोऽनयोःऽयः । तथा च हर्षस्य चित्तवृत्तिविशेषरूपता, प्रमोदस्य च तद्वृत्तिस्थात्मरूपता । सूचिता भवति । अत एव प्रमोदस्य पर इतिविशेषगम्युपपात्तम् । तथा च न हर्षस्य चथभि-

"जब भगवान् वामन ने एक विक्रम (पग) से सात समृद्धों, सात द्वीपों और सात ( अथवा आठ ) कुलपवर्तों से युक्त सम्पूर्ण पृथिवी का और दूसरे विक्रम से सात परकोटे वाले स्वर्गलोक का आक्रमण कर तीसरे विक्रम के लिए स्थान पाने की दृष्टि से मुस्कुराकर बलि की ओर तिरछी नजर से देखा तब बलि को जो परमानन्द की अनुभूति हुई उससे उसका सारा शरीर रोमाच्चित हो उठा और उसने तत्काल अपनी गर्दन झुकाकर भगवान् के सामने उनके तीसरे विक्रम के लिए अपना शिर समर्पित कर दिया ॥"

इस कथन में बलि के दानोत्साहु का आलम्बन विभाव भगवान् वामन है, उनका बलि पर तीसरे विक्रम के स्थान के लिए कटाक्षपात उद्दीपन विभाव है, रोमाञ्च आदि अनुभाव हैं और रोमाच्चादि से व्यज्यमान हर्ष (आनन्दाकारा चित्त-

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प्रागन्यगतस्यैव प्रकृते राजगतस्यापि तस्य राजस्तुत्युत्कर्षकत्वात् । एतेन 'त्याग: सप्तसमुद्रमुद्रितमहीनिर्गयोजदानावधि:' इति श्रीवत्सलाच्छनोक्तमुदाहरणं परास्तम्, तस्य गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वेन रसध्वनिप्रसङ्गे मुदाहरणी-

चारिणोस्मभ्यङ्गचत्वहानि: ! अत एव च तृतीयचरणस्यादौ 'आविभूततपर:' इति पाठ: श्रेयान् इति मन्यामहे ! प्रागन्यगत्यादौ । यदा पूर्वोक्ते यस्योदयामेलत्यादिप्रे राजभिन्नकामवगीगतस्योत्कर्षाहल्स्यापि कविकृतया राजस्तुतिरत्कर्षाधायकत्वेन स्तुत्यङ्गतवं तदाहु सुतरामसुरराजवलिगतस्य दानोत्साहल्स्य कविकृतवली-स्तुत्युल्कर्षाधायकत्वेन स्तुत्यङ्गत्वमिति न तद्य ध्वनित्वमित्यर्थ: । एतेन = अन्यादृश्-

यत्वात् ।

वृत्ति) आन्दीव्यभिचारिभाव है। इस प्रकार यहां वलिनिष्ठ दानोत्साहल व्यज्यमान अवश्य है, किन्तु यह प्रधान रूप में विवक्षित नहीं है । परन्तु जब पूर्वनिर्दिष्ट 'यस्योदयाम...' इत्यादि पद्य में काव्यप्रकाशादिटीकाकार 'वत्सलाच्छन:' द्वारा जो महावीर-चरित के द्वितीय अङ्क से दानवीररसध्वनि का उदाहरण दिया गया है वह असङ्गत

उत्पत्तिजं मदग्नितः स भगवान् देव: पिनाकी गुरु: शैर्य यतु न तद् गिरां पदवी ननु वक्त हि तत्कर्मेभि: ।

त्याग: सप्तसमुद्रमुद्रितमहीनिर्गयोजदानावधि: ब्रह्माक्षत्नपोनिर्देशेङ्गनगत् किं किं न लोकोत्तरम् ॥

इति । अत्र चतुर्थपादेन स्पष्टमेव वक्तुं रामभद्रस्य परशुरामस्तुतौ तालपयोऽ-घारणात् प्रतीयमानोपि परशुरामगतो दानोत्साहस्तदীয়स्तुतौ गुणीभूतव्यङ्गत्वान्न ध्वनि-व्यपदेशाहं इति सन्दर्भ: ।

इस प्रकार गुणीभूत उत्साह का रसध्वनिप्रसङ्ग्यपदेश्य न होना जब प्रमाणित हो चूका तब काव्यप्रकाश आदि ग्रन्थों के टीकाकार 'वत्सलाच्छन' द्वारा जो महावीरचरित के द्वितीय अङ्क से दानवीररसध्वनि का उदाहरण दिया गया है वह असङ्गत सिद्ध हो जाता । उदाहरण पद्य का अर्थ निम्ननिर्दिष्ट है---

(हे भगवान् ? आप ब्राह्मणोचित एवं क्षत्रियोचित दोनों प्रकार के तप के नियामक

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ननु 'अकरुणमवकृस्य -' इत्यत्रापि प्रतीममानस्य दानवीरस्य कर्णस्तुत्य झूत्वार्थं ध्रननित्वमिति चेत्? सत्यम् । अत्र कवे: कर्णवचनातु: वादमात्रतात्पर्यैकत्वेन कर्णस्तुतौ तात्पर्य्यविरहात्, कर्णस्य च महाशयत्वे- नातमस्तुतौ तात्पर्य्यानुपपत्ते: स्तुतिरवाक्यार्थ एव । परं तु वीररसप्रत्ययान्तरं तादृशोत्साहेन लिङ्गेन स्वाधिकारणे साधनुमीयते । राजवर्णनपद्ये तु राजस्तुतौ तात्पर्य्यादिक्यार्थतैव तस्या: ।

हैं--आपका कौन-सा गुण लोकोत्तर नहीं? आपका जन्म सहीष जमदग्नि से हुआ है, भगवान् पिनाकपाणि शिव आपके गुरु हैं, आपके पराक्रम की शब्दों में अभिव्यक्ति नहीं की जा सकती—वह तो आपके वीर-कर्मों से ही अनुमेय है, ) आप का त्याग भी ऐसा है जिसकी पराकाष्ठा है सात समुद्रों से परिवेष्टित सम्पूर्ण पृथिवी का निःश्छल दान ।। शिवधनुर्भञ्ज के बाद स्वयंस्वरभूमि में उपस्थित अत्यन्त कुपित परशुराम के प्रति रामचन्द्र की यह उक्ति है । यहाँ ( तृतीय पाद में ) यदपि वाच्य-आकेष्य विषावादि से परशुराम का दानोत्साह अभिव्यज्यमान है तथापि वह वाक्यतत्पर्य-विषयीभूत परशुराम की स्तुति का अङ्ग है । अतः इसे रसध्वनि का उदाहरण देना अनुचित है । अब प्रस्तुत यह है --'अकरुणमवकृस्य.........' इत्यादि पद्य में भी जब कर्ण की स्तुति प्रतीममान है तो फिर कर्ण के दानोत्साह को उसका अङ्ग होना चाहिए; ऐसी स्थिति में वह रसध्वनि का उदाहरण कैसे माना जा सकता ? इसका यह उत्तर है—यहाँ स्तुति की दो सभावनाएँ हैं—एक कवि द्वारा वह स्तुति की गई हो और दूसरी यह कि कर्ण स्वयम् अपनी स्तुति कर रहा हो । इनमें पहला विकल्प मान्य नहीं हो सकता, क्योंकि कवि का तात्पर्ये-विषय कर्ण के वचन का अनुवाद- मात्र है, कर्ण की स्तुति नहीं । दूसरा विकल्प भी असंगत है, क्योंकि कर्ण जैसे महापुरुष का आत्मश्लाघा में कभी तात्पर्य हो नहीं सकता । अतात्पर्यविषयीभूत पद्यं कदापि वाक्यार्थ का अङ्ग नही होता । अतः अवाक्यार्थ कर्ण-स्तुति को व्यञ्ज्य मानना असम्भव है । हैं, वीररस की प्रतीति के परचात् वही रसकाष्ठापनम् प्रकृष्ट

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द्वितीयो यथा—

न कपोत भवन्तमण्वपि स्पृशतु श्येनसमुद्ध्रवं भयम् । इदमद्य मया तृणीकृतं भवदायु:कुशलं कलेवरम् ॥

अथवैवं विन्यास:—

न कपोतकपोतकं तव स्पृशतु श्येन मनागपि स्पृहया ! इदमद्य मया समर्पितं भवते 'चारुतरं कलेवरम् ॥

दानवीरमुदाहृतिः—द्वितीयोयेत्यादिना। न कपोतेत्यादि । शिविपरीक्षार्थं कपोतवेषधारिणं धमं श्येनवेषधारिणोत्त्‌वाचक्राम । तस्माच्छ श्येनादिविश्रुतः कपोतः शिविशरणमस्मरक्षार्थमागाम । तं च कपोतं प्रति शिबेरियमुक्तिः: हं कपोत ? भवन्तं श्येनसमुद्ध्रभवमण्वपि भयं न स्पृशतु, यतोऽद्यं भवदायु:कुशलं क्षेमकरं कलेवरं मया तृणीकृतम् तृणवदुत्सृष्टं श्येनाय क्षुन्निवृत्त्यै । तथाच चैतन मदीयेन शरीरेण पूर्णोंदर: श्येनो भवन्तं नेच्छेदिति पद्यार्थः ।

अत्र पद्ये श्येनस्य सम्बोधयत्वाभावात् कपोतमाात्रमुद्दिश्य प्रदत्तः श्येनोऽनन्वहित-शिविवचनः सहसैव कपोतं निपतेधिति तस्य भयशङ्कया सत्यां पूर्वोक्तमसूजतं स्यादिति हेतोः श्येनाभिमुखोकारकं विन्यासान्तरमाह—अथवेत्यादिना । न कपोतकपोतकमिति । कपोतकपोतकयो:भयत्र 'अल्पे' कन् प्रत्ययः ।

एतत् उत्साहु करणं की आत्म-स्तुति अथवा कविकृत करण-स्तुति का अनुमापक हो सकता है । इसके विपरीत 'यस्योद्‌दाम......' इत्यादि पद्यद्वय में राजा और बलि की स्तुतियों के वक्तृतात्पर्यविषय होने से उनमें स्तुतियों की वाक्यार्थता स्पष्ट है । अतः यहाँ तो वाक्यार्थमूत दानोत्साह एवं रतुतियों में गुणवधानभाव का स्वीकार उचित हैं ।

अब दयावीर का उदाहरण प्रस्तुत है—

'अरे कपोत ! इस बाज का भय तुझे जरा भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि तेरा जीवन की रक्षा के लिए मेरा यह शरीर तेरे बदले उस बाज को समर्पित है ।'

इस पद्य में कपोत सम्बोध्य है । किन्तु उसे उक्त आश्वासन देने पर भी उस आश्वासन को न जानने वाला बाज कदाचित् सहसा ही उसके ऊपर आक्रमण कर सकता है । अतः बाज का ही सम्बोधन कर ऐसी रचना करनी चाहिए—

'अरे बाज ! इस क्षुद्र कपोत के बच्चे की तुझे जरा भी स्पृहा नहीं करनी चाहिए। देखो—उसके बदले मेरा यहाँ शरीर, जो उससे स्वाद और मात्रा दोनों में वस्कृष्ट है, तुझे समर्पित है ।'

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एषा शि‌वे: कपोतं श्येनं प्रति चोक्ति:। अन्र कपोत आलम्बनम्। तद्गतं व्याकुलीभावमुद्दीपनम्। तस्य कृते स्वकलेवरापेक्षंमनुभावः। न चात्र शरीरदानेप्रत्ययाद्दानवीरध्वनित‌वापतिरिति वाच्यम्, श्येनकपोतयोर्भ‌क्ष्यभक्षकभावापन्न‌त्वेन शिविवशरीररस्यानो‌डभावात्तद्रतिपत्तेः।

क्षुदस्य कपोतस्य यः क्षुद्रः पोतो‌ड्भंकः तस्मै स्पृहा कस्यापि न घटते यदि तद्स्थाने तदो‌धिकं चारु शरीरं प्रत्युपेत्य कले‌विदचोदिते मन‌क्सृप्टहृदभावे श्येनगत‌त्वनो‌डभिमते हेतुरुक्तः। पदार्थः स्पष्टः। कपोतं श्येनं प्रतीति। यथाक्रमं पूर्वंमुत्त‌रं च पचमित्यर्थः। कपोत आलम्बनमिति। पूर्वंपद्ये कपोतः साक्षादेवालम्बनम्, द्वितीयेऽपि कपोतकपोतकस्य कपोत‌त्वात्स आलम्बनमित्युच्यते। शरीरदानेमित्यतत्: पूर्वं शिविकृतं तं श्येनो‌द्देश्यकमपि यो‌ज्ञनीयम्। आपन्न‌त्वेनेति। कपोतशरीरस्य दानप्रतीतो सत्यामपि‌ति शेषः। अर्थान्न इति। शिविवशरीरविषयकान्यत्वसहितस्य श्येनस्याभावादित्यर्थः। अन्र विशेषणाभावप्रयुक्तो विशेष‌टाभावः। तद्रतिपत्तेः = शिविवशरीरकमकदानप्रतीतेः। यमुद्दिश्य

ये दोनों पद्य राजा शिवि की क्रमश: कपोत और बाज के प्रति उक्तियाँ हैं। दोनों में हीं शिविनिष्ठ दया का आलम्बन कपोत है। उस कपोत की व्याकुलता उद्दीपन विभाव है और उसके बदले शिवि द्वारा अपने शरीर का समर्पण अनुभाव है। धृति आदि संचारिभाव भी व्यक्तृ हैं। अतः यहाँ दयावीर रस है। यद्यपि यहाँ शिवि द्वारा किए जाने वाले अपने शरीर के दान से शिवि के दानवीरसाहस की प्रतीति होती-सी दिखाई पड़ती तथापि इसे दानवीर का उदाहरण नहीं माना जा सकता, क्योंकि यहाँ शरीर का समर्पण दान है हीं नहीं। दान तो तब सम्भव है जब कोई सम्प्रदान (=लेने वाला) हो। यहाँ श्येन कपोत-शरीर का अभीलाषी है, शिवि के शरीर का नहीं। सम्प्रदान वह होता जो देय वस्तु लेना चाहता हो या कुछ देने के लिए दाता को प्रेरित करता हो। शिवि को श्येन शरीर-दान के लिए न तो प्रेरित करता है और न वध्। अब तक शिवि का शरीर लेने के लिए अपनी इच्छाहों व्यक्त कर पाया है। अतः शिवि के शरीर के समर्पण की दृष्टि से श्येन (बाज) सम्प्रदान हीं नहीं, फिर उसका दान कैसे किया जा सकता। यदि शिवि को उनके शरीर के समर्पण की प्रेरणा न देने पर और उस शरीर को खाने के लिए प्राप्त करने की इच्छा से रहित होने पर भी श्येन को अघ‌टिदान में सूर्य आदि की तरह सम्प्रदान मान भी लिया जाय तो भी यह समर्पण दान नहीं कहुला सकता, क्योंकि किसी वस्तु के बदले में कुछ देना विनिमय है, दान नहीं। दान तो वस्तुतः वह है जो विना कुछ:लिए हीं

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शरीरनिवेदनस्य कपितशरीरत्राणोपाधिक्तया विनिमयपदवाच्यत्वात् । तृतीयो यथा—

रणे दीनानदेवान् दशवदन विद्राध्य वहन्ति प्रभावप्रागल्भ्यं त्वयि तु मम कोऽपि परिकरः । ललाटोद्यज्ज्वालाकवलितजगज्जालविभवो भवो मे कोऽण्डच्युतविशिखवेधं कलयतु ॥

किंस्विहीयते स सम्प्रदानम्, तदभावे दानं न सम्पद्यते । अत एव च सम्प्रदानस्यापि कारकत्वं निबन्धति । तथा च रयेनस्य प्रेरकरूपाप्यितत्वभावात्सम्प्रदानत्वभावे तदुद्देश्यकदानानुपपत्तो रित्याशायः । अतएव द्वितीये पद्ये 'भवते' इति न सम्प्रदाने चतुर्थी, अपि तु 'क्रियायोंपपदस्यो इत्येव, भवन्तमनुकूलयितुमिति चार्थः । न तु 'स्वशरीरं महच्च' दीयताम्' इत्येवं शिवेरयाचमानस्य रयेनस्य प्रेरकरूपाप्यितत्वभावेऽपि सम्प्रदानत्वं न विघटते, प्रवृत्तिनिवृत्त्यनुकूलनव्यापाररूपकुन्यस्यापि सूयांदिरद्रघ्नादिकं प्रति सम्प्रदानत्वस्य 'अनिराकरणात् कर्तुं स्यागादृ' कर्मणोऽपिसतं' इत्यादिवैयाकरणसम्प्रदायसिद्धत्वादित्यतत् ।

किंस्विहीयते स सम्प्रदानम्, तदभावे दानं न सम्पद्यते । अत एव च सम्प्रदानस्यापि कारकत्वं निबन्धति । तथा च रयेनस्य प्रेरकरूपाप्यितत्वभावात्सम्प्रदानत्वभावे तदुद्देश्यकदानानुपपत्तो रित्याशायः ।

तथा च रयेनस्य प्रेरकरूपाप्यितत्वप्रतिपत्त्या तदुद्देश्यक सम्पर्पण न तात्सिकं दानमिति सूच्यते ।

युद्धवीरमुदाहरति—तृतीय इत्यादिना । रण इत्यादि । हे दशवदन ? दीनान् कातारान् देवान् रणो विद्राध्य पराजित्य प्रभावप्रागल्भ्यं कोऽपि त्वयि वराके दीनदेवविद्रावणो रावणो मम शौर्यप्रकर्षवतो रामस्यां परिकरो युद्धोऽयम्: क: ? न कोऽपि, शूद्रस्त्वं न मम प्रतिभट इति मम कोऽण्डच्युतनुपरच्युतस्य विशिखस्य वेधं ललाटदुहान्तस्या ज्वालया कवलितो भस्मसात्कृतो जगज्जालस्य ब्रह्माण्डमण्डलस्य विभवो येन स भवो महेश्वर: कलयतु जानातु—इति पयार्थः ।

किया जाता । इस प्रकार कपोत के शरीर के बदले शिवि द्वारा अपने शरीर का समर्पण जब दान ही नहीं तो शिवि में दानोत्साह की प्रतीति कहाँ हो सकती ? अतः इस पद्य में दानवीरररवनि नहीं मानी जा सकती ॥

अब युद्धवीर का उदाहरण दिया जा रहा है—

“अरे रावण ? युद्ध में दीन-हीन देवताओं को जीतकर तू अपने पराक्रम की महिमा बलान रहा है, फिर तेरे जैसे च आयर के साथ लड़ने की मेरी तैयारी कैसी ! मेरे धनुष से छूटे वाणों के वेग का आकलन तो एक मात्र जगत्जनक भगवान् भव (हर = शंकर) कर सकते जिन्होंने अपने ललाट से निकलने वाली प्रचण्ड ज्वाला से इस भवजाल के वैभव को भस्मसात् कर दिया है।”

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एषा दशवदनं प्रति भगवतो रामस्योक्ति: । इह भव आलम्बनम् । रणदर्शनमुद्दीपनम् । दशवदनाद्विजाज्जातुभाव: । गवं संचारी । वृत्तिरत्र देवानां प्रस्तावे तद्गतस्थाय्यप्रकाशनद्वारा वीररसालम्बनत्वावगतेऽनुद्भुततैव । दशवदनप्रस्तावे तु देवदर्पंदमनवीरत्वप्रतिपादनायोद्घतापि तस्यावज्ञया रामगतोत्साहालालम्बनंवेन तदालम्बनस्य रसस्याप्रत्याख्यान् प्रकर्षवती । भगवतो भवस्य तु परमोत्तमालम्बनविभावतया तत्र प्रस्तावे तदालम्बनस्यौज्जसिनो वीररस्य निष्पत्ते: प्रकृष्टोद्बोधता ।

युद्धभूमि में रावण के प्रति भगवान् राम की यह उक्ति है । इसमें भगवान् राक्षसों को आलम्बन है । युद्धदर्शन उद्दीपन है । दशामुख रावण की तिरस्कार अनुभाव है । व्याजमान रामनिष्ठ गवं व्यभिचारिभाव है । यहाँ वृत्तियाँ ( वर्णरचना ) भी अत्यानुरूप शिथिल अथवा उद्धत ( प्रौढ़ ) हैं । जैसे -- देवताओं के प्रसाद्ज्ञ में ( रणेदीनान् देवान् ) देवों की कार्यता के प्रतिपादन में अनुकूल शिथिला ( कोमला ) वृत्ति है जिससे यह स्पष्ट हो जाता कि कार्यर देवता वीररस के आलम्बन नहीं हैं । दशामुख के वर्णन ( विद्राव्य……….प्राग्र्घद्यम् ) में उद्धता वृत्ति अवश्य है जिससे देवता के दर्पं को ज़ोर-ज़ोर करते वाले रावण की वीरता प्रकट होती; किन्तु ' त्वद्यि तु…'…. इत्यादि कथन से रावण की उपेक्षा प्रकट हो जाने से रावण भी रामनिष्ठ युद्धोत्साह का आलम्बन नहीं हो सकता । अत: रावणालम्बनक वीररस की भी प्रतिपत्ति नहीं होती । अत एवं इस अंश में वृत्ति उद्धता तो है परन्तु प्रकृष्टोद्बोधता नहीं है । यह विवक्षितस्थायि के अनुरूप ही है । रामनिष्ठ उत्साह के भगवान् भव हीं परम उपयुक्त आलम्बन हैं । अतः उस प्रसाद्ज्ञ में ' ललाटोद्ज्ज्वलाला…………' आदि में शाद्दूरालम्बनक वीररस की प्रतिपत्ति होने से प्रकृष्टोद्बोधता वृत्ति है । ' भव ' के स्थान में ' हर ' शब्द का प्रयोग उचित है ।

अत्र देवानां दीनत्वविशोषणं तद्वीरावणे राक्षणे क्षुद्रत्वं प्रतिपादयद्राकर्त्तं काम् तदवज्ञां चोत्पादयति । अस्मदर्थंस्य च प्रसन्नदेव प्रतीतेऽन्यथा तद्प्रयोगादपि तत्प्रती- तदभावादुभयन्त्रासमृद्धोद्यंतरसंक्रमितवाच्यध्वनिना शौर्यप्रकर्षविशिष्टं रामं प्रतिपादयति, तेन च गवों व्यज्यते । पञ्चेन्द्र भव द्रढप्रयोगौचित्यं चिस्तयम् ।

अत्र देवरावणोभयालम्बनकस्य युद्धवीरस्य यथा प्रस्तुत्यभावस्तदुपपादयति— वृत्तिरत्रेत्यादिना । प्रस्तुतावे=वर्णने । प्रकर्षवतीति । प्रकर्षेऽचात्र वृत्ते ।

१. यद्यपि वृत्तियों में रसव्यञ्जकता साक्षात् नहीं होती तथापि तत्सदृोपयोगी गुणों के अभिव्यञ्जक होने से वृत्तियों को भी रसाभिव्यञ्जन में सहकारो माना जाता है ।

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चतुर्थों यथा— सपदि विलयमेतु राज्यलक्ष्मीरुपरि पतन्त्वथवा कृपाणधाराः । अपहरतु तारां शिरः कृतान्तो मम तु मतिनं मनागपैति धर्मात् ॥ एषादधर्मेणापि रिपुर्जेतव्य इति वदन्तं प्रति युधि ष्ठिररस्योक्तिः । अत्र धर्मविषय आलम्बन ! 'न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्दर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः' इत्यादिवाक्यालोचनमुद्दीपनम् । शिररच्छेदाद्याङ्गहानीजभावः । धृतिः संचारिणी । इत्थं वीररस्य चातुर्विध्यं प्रपञ्चितं प्राचामनुरोधात् । वस्तुतस्तु बहुत्रो वीरररस्य स्थृङ्गारस्येव प्रकारा निरूपयितुं शक्यन्ते । तथा हि—प्राचीन एव 'सपदि विलयमेतु' इत्यादिपद्ये 'मम तु मतिनं मनागपैति धर्मात्'

रसप्रत्ययोपकारकत्वमेवेतेन प्रकटम् । धर्मंवीरमुदाहरति—चतुर्थे इत्यादिना । सपदीत्यादि पद्यार्थः स्फुटः । धर्मविषयः स्थायी नु; यमुत्रिदेशय धर्माचरणं प्रतिज्ञातम् । 'धर्मेऽस्य विषयः सम्बन्धतुष्टानम्, धर्मं एव वाऽनुष्ठानोद्देश्यतया विषयः' इति स्वपक्षख्यापनम् । प्राचीने = पूर्वोदाहृते । तदनुरूपमेततया = धर्मानुरूपमेततया । अत्रार्थे मन्वादिवचनं प्रमाणम् । तासां वाचामविधेत्ता सरस्वतीतीरयथः ।

अब 'धर्मवीर' का उदाहरण प्रस्तुत है— "चाहे मेरी राजलक्ष्मी तत्काल ही विनष्ट हो जाये या मेरे ऊपर तलवारों की मार पड़े या मेरा शिर ( प्राण ) यमराज हर ले पर मैं धर्मपथ से जरा भी नहीं हंट सकता ।" 'अधर्मंपथ पर चल कर भी शत्रु को जीतना चाहिये'—ऐसा कहने वाले व्यक्ति के प्रति गुढ़िष्ठिर की यह उक्ति है । यहाँ वह शत्रु आलम्बन है जिसके साथ युद्धिष्ठिर ने धर्मपथवेलम्बन की प्रतिज्ञा की है । 'काम की पूर्ति, भय या लोभ से, यहां तक कि अपने प्राण बचाने के लिये भी धर्म का परित्याग नहीं करना चाहिये' इत्यादि महाभारतादिप्रोक्त अनुशासनों का स्मरण उद्दीपन विभाव है । धर्मानुष्ठान के लिए अपने शिरच्छेदन आदि का स्वीकार अनुभाव है । सत्त्वारिभाव है । अतः इन विभावादि से यहां धर्मवीर की व्युत्पजना होती है ॥

इस प्रकार वीर रस के उक्त चार भेदों का निरूपण प्राचीनमतानुसार किया गया है । किन्तु वास्तविकता यह है कि जैसे स्थृङ्गार के अनेकानेक भेद हो सकते हैं; उसी तरह वीर रस के भी बहुत भेद सम्भव हैं; केवल पूर्वोक्त चार हीं भेद नहीं । उदाहरणायं, 'सपदि विलयमेतु.......' इत्यादि पद्य का चतुर्थ पाद रदि 'मम तु'

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सत्यात्’ इति चरमपादव्यत्यासेन पद्यान्तरतां प्राप्तिते सत्यवीरस्यापि संभवात्। न च सत्यस्यापि धर्मान्तर्गततया धर्मवीररस एव तद्वीरस्याप्यन्तर्भाव इति वाच्यम्, दानदयोरपि तदन्तर्गततया तद्वीरस्योऽपि धर्मवीरात्पृथग्गणनानौचित्यात् । एवं पाण्डित्यवीरोरपि प्रतीयते ।

मतिनं मनागपैति सत्यात्’ इस रूप में परिवर्तित कर दिया जाय तो यही पद सत्यवीर रस का उदाहरण बन सकता है । धर्माऽऽभूत सत्य के धर्मान्तर्गत होने से सत्यवीर का धर्मवीर में अन्तर्भाव हो जाने के कारण धर्मवीर से अतिरिक्त सत्यवीर मानने की कोई आवश्यक्ता नहीं—यह कहना भी अयुक्त है, क्योंकि तब तो दान और दया के भी धर्मान्तगंत होने से दानवीर तथा दयावीर को भी एक-एक भेद मानना अनुचित हो जाएगा । अतः दानवीर आदि यदि धर्मवीर से भिन्न माते जाञ्म तो सत्यवीर को भी उससे भिन्न हों मानना चाहिए ।

यथा— apि वक्त्र गिरां पतिः स्वयं यदि तासामधिदेवतापि वा । अयंस्म पुरो हयाननस्मरणोल्लडितवादम्बुधिः ॥

इसी प्रकार पाण्डित्यवीर की भी निस्संदिग्ध पद्य में प्रतीति होती है । जैसे— “लौकिक विद्वानों की तो कोई बात हौ नहीं, यदि बृहस्पति या साक्षात् वाग्देवता सरस्वती भी मेरे विपरीत पक्ष का आलम्बन करें तो भी मेरे लिए अपने पक्ष के समर्थन में कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला है, क्योंकि भगवान् हयग्रीव के स्मरण के प्रभाव से मैं सम्पूर्ण वाड्मय-रूपी समुद्र को पार कर चुका हूँ ।”

अत्र बृहस्पत्यादालम्बनः सभादिदर्शनोद्दीपनिपितो निखिलविद्वत्तिरः-स्कारानुभावितो गर्वेण संचारीरणा पोषित उत्साहो वत्कुः प्रतीयते । ननु चात्र युद्धवीरत्वम्, युद्धतत्स्य वादसाधारणस्य वाच्यत्वाद, इति चेत् ?

यहाँ बृहस्पति आदि आलम्बन विभाव हैं । पण्डितों के वादार्थ आयोजित सभा तथा उसमें किये गये काकु आदि उद्दीपन विभाव हैं । सभी विद्वानों का तिरस्कार अनुभाव है और नयज्यमान गर्वं व्यभिचारिभाव है । इन सब से परिपुष्ट वक्ता का पाण्डित्योत्साह पाण्डित्यवीर की अवस्था को प्राप्त है । घात-प्रतिघातस्वरूप युद्ध में वाचिक-घात-प्रतिघातात्मक वाद ( कथा ) के भी समाविष्ट होने से यह

वादसाधारणस्येति । प्रत्यवस्थानं युद्धम् । तच्च वादेऽपि वादिप्रतिवादि-कथातमके तुल्यमित्याशयः । क्षमेति । प्रतीकारेच्छायां जातायामपि विवेकात् प्रतीकाराकरणं क्षमा

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यथा— अपि बहुलदहनजालं मूर्छित रिरुमें निरंतरं धमतु । पातयतु वार्ससिध्दारामहमणुमात्र न किचिदाभाषे ॥ बलवीरे वा कि समादध्यात् ?

बहुलदहनजालम् = प्रचुरमग्निप्रलयज्वलम् । धमतु = प्रज्वालयतु धायुसंयोगेन । फणिप्रवीर = शेषनागः । अयत्नात् = प्राप्तौतु । जगत्कलमित्यत्र जगडणडकर्मिति पातो समंप्रकाशकोक्तो न कथमपि विच्छिद्यतिशयं प्रकाशयति ।

यथा— परिहरतु धरां फणिप्रवीरः सुखभयतां कमठोडपि तां विहाय । अहम्मिह पृथूहत पक्षकोणे निखिलमिदं जगत्कलं वहामि ॥

युद्धवीर हो तो—ऐसा यदि कहा जाय तो भी क्षमावीर का अन्तर्भाव कहाँ कर सकते ? जैसे— 'मेरा काजु पाते सेते सिर पर लहुलोहित । आग की भट्ठी जलाये या तलेवार बरसाये, मैं तो उसके विरोध में कुछ बोलता तक नहीं, प्रतिकर करूं की तो बात ही नहीं उठती ।'

यह किसी क्षमाशील पुरुष की उक्ति है । यहां मूलवस्तु क्षमाशील पुरुष के प्रति अपराध करने वाला व्यक्ति आलम्बन है । 'क्षमासारा हि साधवः' इत्यादि क्षमा-प्रशंसक शास्त्र-वचन उद्दीपन विभाव हैं । शिर पर आग की भट्ठी जलाने आदि को स्वीकार कर लेना अनुभव है । घृति आदि व्यभिचारिभाव हैं । इस सबसे क्षमावीर का अभिव्यञ्जन होता हीं है ।

इसी तरह बलवीर का समावेश उपर्युक्त चार भेदों में कहाँ किया जाय ?

'हैं इन्द्र ? शेषनाग इस पृथिवी को धारण करना छोड़ दे, कूर्मावतार भगवान् भी इसे छोड़कर आनन्द करें । इस सम्पूर्ण जगत् को तो मैं अपने पंख के एक कोने में ही धारण कर सकता हूँ ।'

यह इन्द्र के प्रति गरुड़ की उक्ति है । इसमें शेषनाग आदि आलम्बन हैं । उनकी प्रशंसा का श्रवण उद्दीपन है । पृथिवी के धारण के लिए किये गये इच्छादि अनुभव हैं । गर्व आदि व्यभिचारिभाव हैं । इन सबसे बलवीर रस की व्यञ्जना होती है । इस प्रकार स्पष्ट है कि वीररस को पूर्वोक्त चार भेदों में हीं विभक्त करना केवल

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ननु 'अपि वक्त—' 'परिहरतु धराम्—' इति पठ्यतेऽत्र गर्व एव नोत्साहः, मध्यस्थपद्ये तु धृतिरेवध्वन्यते इति भावध्वननय एवैते न रसध्वननय इति चेत् ? तर्हि युद्धवीरादिष्वपि गर्वादिध्वननितामेव किं न भूयः ? रसध्वनिसामान्यमेव वा किं न तद्रसभिचारिध्वननन्नेन गतार्थंयैः ? स्थायिप्रतीतितदुंरपह्नुति वा चेत् ? प्रकृतेऽपि अनन्तरोक्तपद्ये तु नोत्साहः प्रतीयते, दयावीरादिषु प्रतीत इति तु राज्ञामा(राजा)ज्ञात्रत्रम् ;

यद्यचिंछलक है, प्रामाणिक नहीं। अथ प्रथन यह है—'अपि वक्त......' इत्यादि पद्य में पाण्डवदर्प का दर्प और 'परिहरतु धराम्........' इत्यादि पद्य में बल का दर्प हीं अभिव्यज्यमान है, पाण्डित्योत्साह और बलोत्साह नहीं; एवमेव 'अपि बहुलदहनजालम्' इस मध्यगत पद्य में भी केवल धृति का अभिव्यजजन होता, क्षमोत्साह का नहीं; एवश्र इन्हें क्रमशः पाण्डित्यवीर, दानवीर और क्षमावीर के उदाहरण मानकर रस के पूर्वोक्त चातुर्विध्य का निराकरण कैसे किया जा सकता ? इसका उत्तर यह है—यदि पाण्डित्योत्साह आदि के स्थान में पाण्डित्यदर्प आदि भावों की ही व्यअंजना मान्य हो तब सो युद्धवीरादिस्थलों में भी युद्धदर्पादि की ही प्रतीति मानिये, युद्धोत्साह आदि की नहीं; एवश्र युद्धोत्साहादि की व्यअंजना के आधार पर वीररस का उक्त चातुर्विध्य भी असंगत हो जाएगा। इस प्रकार सभी रसध्वनियों के स्थलों में उन उन भावों की ही अभिव्यजना स्वीकार कर सभी रसध्वनियों का हीं उच्छेद प्राप्त हो जाता। अतः यदि युद्धवीरादि स्थलोंमें युद्धोत्साहादि को मुख्यतया व्यअंजना इष्ट हो तो पाण्डित्यवीरादि की भी ध्वनि अवश्य मन्तव्य है। युद्धवीरादि इसलिए मान्य हैं कि इनके पूर्वनिर्दिष्ट उदाहरणों में युद्धोत्साहादि स्थायिभावों की प्रतीति

गर्व इति । पूर्वपक्षे स्वविरूप्यप्रकर्षज्ञानाधीनं पराभिभानम्, द्वितीये पुनः स्वबलो-त्कर्षज्ञानाधीनं तदिति विवेकः । उत्साहो वीवरसस्थायियिरूपेण व्यास्यातपवं । मध्यस्थं पद्यम् 'अपि बहुलदहनजालम्' इत्यादि । धृति:= शोकभयादिजन्योपालबनिवारा रणाक-रणीभूतस्विच्छतद्वृतितिपोषो धैर्यादिसंवबाधिगम्येय । रसध्वनिसामान्यम् = रसध्वनिमात्रं, सर्वं रसध्वनिनिमित्ति भावः । तद्रसभिचारिध्वननन्नेन = तत्तद्रसस्य भिचारिणा तत्र तत्र रसध्वनिनिस्थाने ध्वननन्निमित्ति सर्वत्रैव भावध्वनिनिस्वीकरण । अनन्तरोक्तपद्ये = पाण्डित्य-वीरादाहूरणस्त्वेनोक्तपद्यस्थे । उत्साहः पाण्डित्यक्षमाबलोपाधिकः स कर्मेण । आज्ञामात्रिमित्यन्नेन न युक्तिसिद्धिमिति प्रदर्शितम् । तथा च सम्भवदत्सु सतुष्योर्धिकेष्वपि वीरोभेदेषु चतुर्णामिभाषाद्धिकारः प्राचामालङ्कारिकाणां प्रोद्भिदवदामात्र-मत्याशयः सन्दर्भेऽस्य ।

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अद्भुतो यथा— चराचरजगज्जालसदनं वदनं तव । गलद्गगनगामभीयं वीक्ष्यास्मि हतचेतना ॥ कदाचिद्गृगतो वासुदेवस्य वदनमालोकितवत्या यशोदाया इयमुक्तिः । अत्र वदनमालम्बनम् । अन्रर्गतचराचरजगज्जालदर्शनमुद्दीपनम् । हृत- चेतनत्वम्, तेन गम्यं रोमाञ्चनेत्रस्फुरणादि ज्ञाप्यम् । वासुदेवो ल्याभि- चारिणः । नैवात्र विद्यमानापि पुत्रगता प्रीति: प्रतीयते, व्रीड्जकाभावात् ।

चराचरात्मकस्य जगज्जालस्य सदनमाथ्रयः । अत्र विस्मय- पोषकत्वादुद्देश्यविवक्ष्याभवत्यासो गुण एव । गलद्गगनेऽत्यादि । गगनं तस्मिन् गगम्भीर्यं यत्न । गगनस्योद्बेकवर्णने गगम्भीर्यं प्रसिद्धम्, तादृशं गगनं यदि निपततेव तर्हि निपतितेsपि तस्मिन्न् तद्गगम्भीर्यं स्यादेवेत्याशयः । एवमर्थे तु 'गलद्गगनगम्भीरम्' इति पाठः श्रेयान् स्याद । अथवा गगनस्य गगम्भीर्यं गगनगाम्भीर्यम्, तद् गलतिरसकुर्वद्धदनम्, अन्तर्भावितण्यर्थवत् । का आपत्ति नहीं की जा सकती, परन्तु 'अपि वाक्ये:'.........' आदि पद्यों में पाण्डित्योत्सााहादि की व्यञ्ज्जना नहीं होती; अतः पाण्डित्यवीरादि मान्य नहीं है— यह कहना सम्भव नहीं है, क्योंकि ऐसो नियुक्तिक मान्यता तो राजाज्ञा मान्य में सम्भव है, विवेककों की दृष्टि में तर्हि । अतः पाण्डित्यवीरादि अनेकानेक सम्भावित भेदों की उपेक्षा कर वीर रस के केवल दानवीरादि चार भेद मानना असंगत है ।

अद्भुत रस का उदाहरण निम्नलिखित है— "हे कृष्ण ? तुम्हारे मुख को, जिसमें यह चराचरात्मक समस्त जगत् समाहित है और जो आकाश की भी गम्भीरता को अपमानित कर रहा है, देखकर मेरी तो चेतना हों लुप्त हो गई है ।"

किसी समय श्रीकृष्ण के पूर्ववर्णित मुख को देखकर यशोदा की यह उक्ति है । यहाँ उपरिवर्णित मुख आलम्बन है । मुख के अन्दर समस्त जगत् का दर्शन उद्दीपन विभाव है । चेतना की लुसता और इससे प्रतीमान रोमाञ्च और आँखों का फैलना आदि अनुभाव हैं । गम्यमान त्रास आदि व्यभिचारिभाव हैं । अतः इन सबसे अभिव्यज्यमान विस्मय का रसपरिपाक होने से यह अद्भुत रस का स्पष्टयुक्त उदाहरण है । यद्यपि यशोदा की अपने पोष्य पुत्र श्रीकृष्ण में मातृसुलभ प्रीति है अवश्य तथापि वह यहाँ व्यङ्ग्य नहीं है, क्योंकि उदाहृत पद्य में उसका

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प्रतीतायां वा तस्यां विस्मयस्य गुणत्वं न युज्यते । एवं कदाचनमहापुरुषोऽ्यमिति भक्तिरपि तस्या: पुत्रे ममारायं बाल इति निश्चितयेन प्रतिबन्धदुुत्पत्तू मेव नेष्टे । अतस्तस्यामपि विस्मयस्य गुणीभावो न शङ्क्यच: । यच्च सहृदयशिरोमणिभि: प्राचीनैरेवदाहृतम्—

प्रतीतायामित्यादि । यत्र विद्यमानत्वाद्रुतस्तत्सस्याः प्रतीति: स्वोक्रियते तत्र परस्परविरुद्धस्ववाततप्रतिबन्धविरोधानुकटविस्मयो न संगच्छते, यत्र पुनरुत्कटो विस्मय: स्पष्टं प्रतीयते तत्रैतत्प्रतिबद्धैव प्रीतिरं प्रतीयते इति युगपदुभयोरसम्भवान्न प्रीति-विस्मयोरझाङ्गिभाव: शङ्क्योपपाद इति तात्पर्यम् । प्रकृतपक्षे कथमित्यत्र प्रती-मानसि प्रीतिरुत्कटं प्रतीयमानस्य विस्मयस्यात्मगुणीभावं न प्रतिपादयितुं क्षमा, अनुक्तटस्वादिति समम् प्रकाशयिष्यामयानम् । प्रीतिरश्रान्ता वात्सल्यरूपा प्रकृष्टटविस्मयज्ञा: परानुरक्तिरूपाया भक्तिपदाभिधेयाया विजातीयैव, अनयोरेव च प्रतिबध्यप्रतिबन्धक-भावोऽनुभवातुरोघादिति बोध्यम् ।

चित्रं महानेष तवावतारः कव कान्तरेषाडभिनवैव भात्तिः । लोकोत्तरं धैर्यमहो प्रभावः काप्याकृतिनुं तनु एष सर्गः ॥

प्राचीनैः = काव्यप्रकाशकारैः । चित्रमित्यादि । बलिवधामभिधत्ते । तवैष महान् नवश्चावतारश्चित्रं, अलौकिक: । आश्चर्यमित्यपच्यायस्यैतानम्, तथा सति स्थायिनो वाच्यत्वापत्ते: । एषा साक्षात्क्रियामाणा तव कान्तिः कव ? न कुत्नापीत्यर्थः । तव

अभियङ्क तत्त्व विद्यमान नहीं है । जहाँ प्रीति ( वात्सल्य ) व्यङ्गच होती वहाँ विस्मय की प्रतीति होती ही नहीं, क्योंकि उत्कट-अनुत्कट वात्सल्यस्वरूप प्रीति-विस्मय में विरोध होने से दोनों की एक साथ प्रतीति हो नहीं सकती । अतः उक्त प्रीति का प्रकृत में प्रतीयमान उत्कट विस्मय कभी गुण ( अङ्ग ) नही हो सकता । इसी प्रकार श्रीकृष्ण के प्रति यशोदा का पुत्रभाव होने से श्रीकृष्ण मे उनके महानपुरुषत्व के कारण यशोदा की भक्ति भी नहीं हो सकती, क्योंकि पुत्रभाव का निश्चित्य भक्ति का प्रतिबन्धक है । भक्ति सर्वदा भक्त की अपेक्षा भजनोय मे जिस उत्कर्ष के ज्ञान की आवश्यकता रखती है पुत्र के विषय में तादृश उत्कर्ष का ज्ञान हो नहीं सकता । अतः यशोदा का विस्मय उनकी श्रीकृष्णविषयक भक्ति का भी अङ्ग नहीं हो सकता ।

सहृदय शिरोमणि प्राचीन आचार्ये ( मम्मट ) ने अद्भुत रस का यह उदाहरण दिया है— "हे भगवन् ? यह तुम्हारा वामन अवतार अत्यन्त अलौकिक है; तुम्हारी यह छटा वन्यत्र कहाँ ! यह शरीर-संगठना भी अपूर्वं है; तुम्हारा श्रेयः प्रभव और आकृति लोकोत्तर हैं; निश्चित ही यह एक नई सृष्टि है ।"

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तत्रेदं वक्तव्यम्-प्रतीयतां नामात्र विस्मय; परं त्वसौ कथंकारसम् [ अद्भुतरस ] छ्वनिवृ्यपदेशहेतु; ? प्रतिपाद्यमहापुरुविशेषविषयाया: प्रधानोभूताया: स्तोत्रुगतभक्ते: प्रकर्षंकवेनाैस्य गुणीभूतत्वात् । यथा महाभारते गीतासु विरवरूपं दृटवत: पार्थस्य 'पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वां- स्तथा भूतविशेषसङ्घान्' इत्यादौ वाक्यसदृशे ।

यहाँ भगवान् वामन के प्रति बलि की उक्ति है । इस विषय में मेरा यही कथन है कि यहाँ वामनालम्बनक बलिनिष्ठ विस्मय की प्रतीति भले हीं हो पर वह अद्भुतरसध्वनिपर्यन्त प्रकारं को प्राप्त नहींं है, क्योंकि इसमें तो वामन के विषय मे बलि में जो महापुरुषस्तव-बोध है उससे बलि में उत्पन्न वामन-विषयक भक्ति ( = निरतिशय प्रेम ) हीं प्रधान रूप में अभिव्यक्त हो रही है, प्रतीयमान विस्मय तो इसी भक्ति का पोषक—अङ्ग है, प्रधान नहींं । अतः इस विस्मय की स्थिति तो वही है जो गीता में "हे भगवन् ! तेरे शरीर में तो मैं समस्त देवों और भूत-भौतिक पदार्थों को समाहित देख रहा हूँ" ऐसा कहने वाले

इदममं विवेचनीयम् —प्रबन्धकाव्याङ्गतगतं अङ्गरमाभिव्यङ्ग्यकं पद्यं तततद्रस-छ्वनेैरवाहरं भक्तिमुखैैै न वेति । तत्राथे निरपेक्षतयैव तस्य तत्सवं निर्हेतव्यम् अन्र्ये तु स्वत: प्राधानेयेऽपि अङ्गिरसापेक्षया प्राधान्याभावान्न तद् रसध्वनेरद्भुत- हरराणम् । तथा च प्रबन्धेऽद्भिरसामभिव्यङ्ग्यकजकं वाक्यं तन्न्रद्रुमद्वनेरदाहरराणम्, अभ्येषां छोदाहरराणांति यथायं मुक्तकानि, तततद्रसप्रधनकास्यगतात्वात् तत्स्वद्रिरसामभिव्यङ्गक- क्रानि, अङ्गरमापेक्षयाधि प्रकर्षवत्त्वादन्र्तयाभिमतान:सुप्यनुज्र्त्वं प्राप्नुवन्ति तत्- द्रसानामभिव्यङ्गकानि च वाक्यान्यन्विति । यथा तु सम्प्रदायस्थथा पूर्वं एव पक्ष: समधीयते ।

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रत्नमुचितम् । भक्तिरेवात्र प्रतीयत इति चेद् ? दरमुखकुलितलोचनेऽपि कुर्वन्तु सहृदया: ॥

हास्यो यथा— श्रीतातपादैर्विहिते निबन्धे निरूपिता नूतनयुक्तिरेषा । अज्ञो गवां पूर्वमहो पवित्रं न वा कर्थं रासभधर्मंपत्न्या: ॥ तात्किकपुत्रोडत्रालम्बनम् । तदीया निःशङ्कोक्तिरुद्दीपिका । रदनप्रकाशादिच्छेद्रेगादयरचनुभावव्यभिचारिण: ।

तातपादै: = पितृचरणै: । कथमित्यनेन गर्देभधर्मंपत्न्या गर्देभ्याऽपि पूर्वोक्तगोपूर्वोक्तवद् पवित्रम्, चतुष्पदस्त्रीपूर्वोक्तजत्वस्य पवित्रताधिकरणतावच्छेदकत्वेन तात्पादाभिमतस्य तथाऽपि तुल्यत्वादिति सूच्यते । तात्किकपुत्र इति । तार्किकोऽत्रालम्बनमिति मुख्यतमं, मूलकतुरेवालम्बनस्वोचिस्यात् । अन्यथा सर्वत्र कवेरेलालम्बनत्ववाप्ते: । यद्वा श्रोतुस्तार्किकपुत्रवचनश्रवणादेव हासो जायात इति यथाश्रुतं संगमनियमं । तदीया = आलम्बनतत्का । रदनं दन्तः, तस्य प्रकाशादिरनुभावः, उक्ते गादयश्च वक्ष्यमाणलक्षणा रदनेत्यादि ।

अज्ञुन मे श्रीकृष्णालम्बनक विस्मय की बात है । अतः जैसे अज्ञुन में प्रतीयमान विस्मय अज्ञुन की श्रीकृष्ण-विषयक भक्ति का अज्ञ है उसी तरह यह विस्मय भी बलि की वामन-विषयक भक्ति का अज्ञ है । अत एव 'चित्रं महानेष.......' इत्यादि पद्य में प्रतीयमान विस्मय अन्यत्र रसपर्यन्त प्रकर्षे को प्राप्त होने पर भी प्रकृत में भवित का अज्ञ होने से अलङ्कार मात्र है जिसे 'ब्राह्मणश्रमण' न्यायानुसार रसवदलङ्कार या रसालङ्कार कहा जा सकता है, रस नहीं । प्रतीति नहीं होती—यह तो नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वामन के सब कुछ के लोकोत्तररसरचन पर जरा-सा दृष्टिपात करते हीं सहृदयों को बलिनिष्ठ वामनविषयक भक्ति की प्रतीति होने में कोई सन्देह नहीं रह जाता । अतः उत्त उदाहरण असंगत है ॥

हास्य रस का उदाहारण निम्नलिखित है— 'मेरे पिता जी ने अपने निबन्ध (ग्रन्थ) में एक नई युक्ति बतलाई है कि यदि चतुष्पद गाय के शरीर का पिछला भाग धर्मशास्त्र के अनुसार पवित्र है तो गर्दभी के शरीर का पिछला भाग पवित्र क्यों न माना जाय ? अर्थात् वह भी पवित्र है हाँ ॥'

अपने कुरतार्किक पिता की बात कहने वाला उसका पुत्र यहाँ हास्य का आलम्बन है । उसका निःशङ्कोक्त कथन उददीपन विभाव है और उसका दाँत जिचिकाता एवम् उददेग आदि व्यभिचारिभाव -हैं । इन सब्से हम्प रस की ह्वनि

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आत्मस्थः परसंस्थइचेतयस्य भेदद्वयं मतम् । आत्मस्थयोः दृशृदृपन्नो विभावेक्षणमात्रतः ॥ हसन्तमपरं दृशृवा विभावश्चोपजायते । योडसौ हस्यरसस्तज्जः परस्थः परिकीर्तितः ॥

सम्प्रति हस्यभेदप्रभेदनाह—आन्नाहुरित्यादिना । विभावेक्षणमात्रत इति । विभावो हसजनको विकृतवेषादिः, तस्य दर्शन्मात्रादुत्पन्न इत्यर्थः । परस्थं वर्णंयति = हसन्तमपरमित्यादिना । अयमाशयः—यदा विकृतवेषादिविभावज्ञानयुक्तमेकं हसन्तं पुरुषं दृशृवा परो विभावमपश्यन्तपि हसति तदा परस्थो हास्यरसः । तत्र च एक एव विभावः । एकत्र हांसं प्रस्तुतं परत्र तं संक्रामयति । एतच्च हासस्याम्लरसादिवत्संक्रमणमस्त्वभावात्त्वादुपपद्यते । अङ्ग हसित एकस्य पुरुषस्य हास एवं परस्थे विभाव इति रसचन्द्रिकायाऽऽयानमसत्व, हास्य विभावस्त्वानुल्लेखाव्, .अभिनवभारत्यामस्य स्पष्टं निरासाच्च । अतो हास एकस्थो निमित्तमात्रं परस्थ इति युक्तम् । यद्येकं हासः संक्रमरणशीलः परत्रापि समदवासनावत् प्रसरति, वतो निमित्तत्वमपि न घटते । अधिकरणभेदाच्च भेदबोध इति मन्तव्यम् । अन्यथा संक्रमणस्वभावात्ताभ्यप्रसङ्गः। यस्य तु हसन्तमपरं दृशृवापि न हासः सन्त्र पूर्ववदासनाया अभावात्तदुदुद्बोधाभावो वा हेतुः। यदा त्वेकं शोकाद्याविष्टं दृशृवा परोपि शोकार्दिमान् भवति तदा तत्र परस्य विभावज्ञाने तदुत्पल्य आत्मस्थ एव शोकादिनः परस्थः, तन्नान्यस्यैव शोकादेराविर्भावात् । यत्र तु एकनिष्ठशोकाद्यलम्बनविभावाज्ञानेऽपि शोकादिः संक्रान्त इव प्रतीयते तन्नात्र्यः शोकादिरेवैकशोका-दिज्ञानजन्य इति न तन्नापि शोकादेः संक्रमरणम् । तस्य च परगतशोकादेः शोकाद्य-वष्टचित्तः पुरुषः एव विभावः । अत एव शोकाद्याश्रयैकपुरुषदर्शनानापरनिष्ठ-शोकाद्योश्वेष्टादिहेतुकैपपुरुषनिष्ठशोकाद्यनुभविकम् । न चैवं होती है ॥

हास्य रस के विषय में पूर्वाचार्यों ने यह कहा है—

हास्य रस के दो भेद हैं—आत्मस्थ और परस्थ । विकृत वेश-भूषादिस्वरूप विभाव के अवलोकन-श्रवणादि से सह्हय में उत्पन्न (=अभिव्यक्त ) हास रस आत्मस्थ है ।

हास्य रस के दो भेद हैं—आत्मस्थ और परस्थ । विकृत वेश-भूषादिस्वरूप विभाव के अवलोकन-श्रवणादि से सह्हय में उत्पन्न (=अभिव्यक्त ) हास रस आत्मस्थ है ।

किन्तु ‘हँसते हुए किसी व्यक्ति को देखकर हँसने वाले अन्य व्यक्ति में अभिव्यक्त हास्य रस रस परस्थ है । हास की संक्रमरणशीलता हों इस भेदं का कारण है जिसके चक्लते विभावज्ञान से एक व्यक्ति में ंअभिव्यक्त हास्य

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उत्तमानां मध्यमानां नीचानामप्यसौ भवेत् । व्यवस्थः कथितस्तस्य षड्भेदा: सन्ति चापरे ॥ स्मितं च हसितं प्रोक्तमुत्तमे पुरुषे बुधैः । भवेद्विहसितं चोपहसितं मध्ये नरेऽपि ॥ नीचेऽपरहसितं चातिहसितं परिकीर्तितम् । ईषत्फुल्लकपोलाभ्यां कटाक्षैरप्यनुल्बणैः ॥ अतृड्यादशनो हासो मधुरः स्मितमुच्यते । वक्रनेत्रकपोलैश्चेदुत्फुल्लैरुपलक्षितः ॥ किंचिल्लक्षितदन्ततश्च तदा हसितमिष्यते । सशब्दं मधुरं कायगतं वदनरागवत् ॥

हासस्येति न शोकेनः संक्रमणशीलत्वं न वा परसत्त्वम् । यदि तु शोकार्दिमान् पुरुषो नालम्बनमपि तु शोकार्दिरन्यान् आाज्ञातालम्बनकेपि संक्रामति इत्यभ्युपेयते तदापि तस्याऽनुक्तत्वेन न रसपर्यन्तं परिपाकः, हास्ये तु संक्रान्तेऽपि उत्कटत्वमनुभवबलाद्रास्येयम् । यदि च संक्रान्तेऽपि शोकार्दानुक्तटत्वमानभविकं तर्हि शोकार्देऽपि परसत्त्वे न विशेष इत्यास्तां तावत् । 'हसन्तमपरं दृष्ट्वा ...' इत्यादिपूर्वार्द्धवन्धस्तु सिध्यति । यथा 'हसन्तमपरं दृष्ट्वविभावस्सोपजायते' इति मधुसूदन-शास्त्रिकल्पितं पाठं युक्ततरं मन्यामहे । अनुल्बणैः=सौन्दर्ययुक्तैः, असौन्दर्यजनकविकासरहितैरिस्यर्थः । दशनः=दन्तः । कायगतमित्यपपाठः । कालगतमित्थम्पयुक्तं, कायगतमिति युक्तमिति मर्मप्रकाशः । तथा सम्पूर्णशरीरमाविर्दोलयदित्यर्थः । नाटचशास्त्रे तु 'कालमतम्' इति पठचते ।

अन्य व्यक्ति को विभाव का ज्ञान न होने पर भी उसमें अभिव्यक्त हो जाता है । अन्य स्थितियों में संक्रमणशीलता न होने से उनका यह भेद-द्वय नहीं होता । यह हास्य उत्तमविष्ठ, मध्यमविष्ठ और अधमविष्ठ होने के कारण तीन अवस्थाओं वाला होता है । इसके प्रकारान्तर से छः भेद होते हैं । उत्तम पुरुष में 'स्मित' तथा 'हसित', मध्यम पुरुष में 'विहसित' तथा 'उपहसित' और अधम रूप में 'अपरहसित' तथा 'अतिहसित' हास्य होते हैं । उस मधुर हास को 'स्मित' कहते हैं जिसमें हँसने वाले के गाल ज्यादा नहीं फूलते, कटाक्ष आकर्षक होते हैं और उसके दाँत दिखाई नहीं पड़ते । 'हसित' उसे कहा जाता है जिसमें हँसने वाले के मुख, नेत्र और कपोल खिल उठते हैं और दाँत भी कुछ दिखाई पड़ने लग जाते हैं । जिसमें शब्द भी निकलता हो, मुख में ललिमा झलकती हो, आँखें सिकुड़ जायँ, और जो कोमल, मधुर हो एवं सम्पूर्ण शरीर को कम्पित करे,

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रसगन्धाधरः

आकुन्चिताक्षि मन्त्रं च विदुर्विहसितं बुधाः ।

निकुचितचिबुकांशोर्षेऽच जिह्वादृष्टिविलोकनः ॥

उत्फुल्लनासिको हासो नाम्नोपहसितं मतम् ।

अस्थानेs: सास्रुदृष्टिराकम्पसकन्धमूर्ध्वजः ॥

श्रृण्वदेवेन गदितो हासोपहसिताह्वयः ।

स्थूलकर्णकटुध्वानो बाष्पपूर्वप्लुतक्षणः ॥ इति ।

करोऽपगूढपार्श्वश्च हासोऽतिहासितं मतम् ॥

भयानको यथै—

इयेनमम्बरतलादुपगतं शुष्यदनानबलो विलोकयन् ।

कम्पमानतनुराकुलेकषणः स्पन्दितं नहि शशाक लावकः ॥

जिह्वादृष्टीति । जिह्वा दृष्टः—

लम्बिताकुन्चितपुटा शनैःस्थिरं निरीक्षणी ।

निगूढा गूढतारा च जिह्वा दृष्टिरुदाहुता ।। ( ना० शा० ८।१७० )

इति भरतेन लक्षित, तथा विलोकनं येनैत व्यधिकरणपदो बहुत्रीहिः । 'जिह्वादृष्टिविलोचन:' इति पाठेऽपि व्यधिकरणबहुव्रीहिकलेसो जायते ।

अस्थाने=अनवसर केशादिकाल जायमानः । मूर्छनोऽपि तथात्वं सूच्यते ॥

बाष्पजस्य केश्याद्यतिकम्पमानतनुकथनने सम्प्रति भयानकमुदाहरति —इयेनेत्यादिना । शुष्यदाननमेव विलं यस्य स

लावकः पक्षिविशेषः ।

सवेगापतनं येनस्यैव लावके । सङ्क्षोभण इत्यनन्तरं भयानकस्य व्यक्जका

इति बोधयम् ।

कर देता हो उस हास को 'विहसित' कहते हैं । इसको भाषा में 'ठहाका' कहा जाता है। 'उपहसित' उस हास को कहा जाता जिसमें कनपटी जाँय, नज़र तिरछी हो जाय और नाक फूल जाय । जो हास अनवसर में ही उत्पन्न हुआ हो, जिसमें आँखों में आँसू छलक आये हों और जिसमें कनपटी, सिर और गाल हिलने लगते हों उसे शृण्वदेव ने 'अपहसित' कहा है । जिस हास में करणकटु

मोटी आवाज़ होती हो, आँखों से आँसू की धार बहने लगे और हँसने वाला अपने हांथों से पेट को दबाने लगे उसे 'अतिहासित' माना गया है ॥

अम्ब भयानक रस का उदाहरण दिया जा रहा है --

'जब बटेर ने आसमान से नीचे उतरते हुए बाज को देखा तो उसका गला सूख गया, उसका दह कॉपने लगा, उसकी आँखों में आँसू भर आये और वह वहाँ से 'हिल' भी न सका ।'

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अन्न रसेन आलम्बनम् । सवेगापतनमुद्रदीप्तम् । आननशोषादयो-

डनुभावा: । दैन्यादय: संचारिण: ॥

बीभत्सो यथा—

नखैर्विदारितान्त्राणां शवानां पूयरोणितम् ।

आननेष्वनुलिम्पन्ति हृष्टा वेतालयोगितम् ॥

शवा इदंआलम्बनम् । अन्त्रविदारणाददीप्तम् । आक्षिप्ता रोमाञ्च-

नेत्रनिमीलनादयोऽनुभावा: । आवेगादय: संचारिण: ॥

नजु रतिक्रोधोत्साहभयशोकविस्मयनिर्वेदेषु प्रागुदाहृतेषु यथालम्बना-

श्रययो: संप्रत्यय:, न तथा हासे जुगुप्सायां च । तत्रालम्बनस्यैव प्रतीते: ॥

आननेषु स्वकीयेष्वेव । शवा इति । विदारितान्त्राणां शवानां तद्विदारितकाणां वेतालयोगितास्व जुगुप्साविषयतया समुचितं तदुभयमालम्बनमुक्तम् । आनत्रविदारणादीप्त्यादिपदेन पूय-

घोणितं नुलिम्पनग्रहणम् । आक्षिप्ता:=अनुमिता:, व्यकता वा । रोमाञ्चेत्यादि जुगुप्साश्रयपुरुषान्तराश्रयपक्षे तदाश्रिता:, श्रोतुरेवाश्रये तु श्रोतृश्रिता एवैते ।

न तथेति । आलम्बनस्याश्रयस्य च पृथक् पृथक् समप्रत्ययो नेत्यर्थ: ।

यहाँ वाज पक्षी आलम्बन विभाव है, उसका तेजी से नीचे उतरना उददीपन विभाव है । गले का सूखना आदि अनुभाव है और विकलता आदि व्यभिचारिभाव हैं । इस सबसे भयानक रस की अभिव्यक्ति हो जाती है ॥

बीभत्स रस का उदाहरण इस प्रकार है—

"वेता‌लों की स्त्रियाँ युद्धभूमि में पड़े ढेर शवों को देखकर प्रसन्न होती हुईं उन शवों की बँतडियों को अपने नखों से फाड़कर उनसे निकलते हुए मवाद खून को अपने मुँह पर लेप रही हैं !!"

यहाँ शव ( अथवा शवों को नोचने‌खसोटने वाली वेतालों की स्त्रियाँ ) आलम्बन हैं और नखों से फाड़ना आदि उददीपन विभाव हैं । आँखों का मूंदना आदि अनुभाव है और आवेग आदि व्यभिचारिभाव हैं । इन सब से बीभत्सरस की अभिव्यक्ति होती है ॥

यहाँ एक प्रश्न उठता है—रति, क्रोध, उत्साह, भय, शोक, निर्वेद के एक-एक आलम्बन और उनसे भिन्न एक-एक आश्रय होते । किन्तु हास और जुगुप्सा के तो केवल आलम्बनों की प्रतीति होती, उनके आश्रयों की तो प्रतीति होती ही नहीं। रस, अर्थात अलौकिक हास और जुगुप्सा, का आश्रय हो नही सकते, क्योंकि श्रोता-‌द्रष्टा तो आश्रय हो नही सकते, क्योंकि श्रोता-द्रष्टा तो‌ लौकिक स्थायीभाव-

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पञ्चश्रोत्रुश्च रसास्वादाधिकरणत्वेन लौकिकहासजुगुप्साश्रयत्वानुपपत्ते रिति चेत् ? सत्यम् । तदाश्रयस्य दृष्टपुरुषविशेषस्य तत्नाक्षेप्यत्वात् । तदनाक्षेपे तु श्रोतुः स्वीयकान्तावर्णनपद्यादिव रसोद्बोधे वाक्यार्थावात् । एवं च संक्षेपेण निरूपिता रसा: ॥

स्वनस्येदंव्यवकारणं आश्रयेदंव्यवच्छेदः । रसोस्वादिति । अलौकिकजुगुप्साद्या श्रयेत्यर्थः । अनुपपत्ते रिति । अलौकिकत्वलौकिकत्वयोः परस्परवि हद्रत्वेनैकस्योभयधर्मंविशिष्टजुगुप्साद्याश्रयत्वासम्भवादित्यर्थः । आक्षेप्यत्वादिति । तदुक्त साहिल्यदर्पणे—

एषां प्राधान्ये हवनिय्यपदेशहेतुत्वम्, गुणीभावे तु रसालङ्कारत्वम् ।

यस्य हास: स चेत् क्वापि साक्षात्कनैव निवध्यते । तथाप्येष विभावादिसामग्रीपदवसीयते ॥ इति ।

तदनाक्षेप इति । अनुत्पनविषयरसवमानाक्षेपे हेतुः ॥ रसालङ्कारत्वमिति । रसकर्त्तृक*-स्वभिन्नशो माधायकत्वमित्यर्थः । अत्र विशेष आननान्ते वक्ष्यते । एतदुक्तं लोचने—‘तस्मात् स्थायिमेतत् —अभितयज्जयन्ते

स्वरूप रत्यादि के अलौकिक स्थायीभाव होने के आश्रय सहृदयभिन्न हृदय वाला कोई भी सहृदयभिन्न होना चाहिए । तात्पर्य यह है कि लौकिक रत्यादि के अधिकरण अधि करण हो नही सकते । अतः सहृदयों को हास आदि के आश्रय कह नहीं सकते । ऐसी स्थिति में योग्य आश्रय के अभाव में हास्य और बीभत्स रसों की अभिव्यक्ति कैसे होती ? इसका एक उत्तर तो यह है कि हास्य और बीभत्स रसों की प्रतीति

के आधार पर इनके आश्रयों के वर्णित न होने पर भी उनकां आक्षेप कर लेना चाहिए, क्योंकि अभिव्यक्ति अपनी सामग्री के बिना सम्भव नही है । यदि आक्षेप करने में कोई अनौचित्य प्रतीत होता हो तो दूसरा उत्तर यह है कि इन दो रसों के प्रसङ्ग में स्थायिभावों के आश्रय सहृदय ही होते हैं । उनके अलौकिक रस के आश्रय होने के साथ-साथ लौकिक स्थायिभावों के भी आश्रय होने में कोई विरोध नही है । यह अपनी हीं प्रियतमा के वर्णन को सुनकर स्वप्रियतमालम्बनक रसास्वाद करने वाले सहृदयों में स्वीकायँ हैं हीं, क्योंकि वहाँ अन्य आलम्बन की कल्पना असम्भव है । अतः एक हीं सहृदय के अलौकिक एवं लौकिक रत्यादि का आश्रय होने में कोई बाधा नहीँ है ।।

इस प्रकार रसों का संक्षिप्त निरूपण किया जा चुका है ।

जब ये रस प्रधान रूप मे अभिव्यक्त होते तब इन्हें ‘छवनिय्य’ कहा जाता, किन्तु

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केचित् 'प्राधान्य एवैषां रसत्वमन्यथालङ्कारत्वमेव । रसालङ्कारव्यपदेश-स्त्वलङ्कारध्वनिव्यपदेशवत्, ब्राह्मणश्रमणन्यायात् । एवमसंलक्ष्यक्रमत्वमेव । अन्यथा तु 'वस्तुमात्रम्' इत्याहुः। एते चासंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्याः सहृदयेन रसव्यत्तौ झङ्गिते जायमानायां विभावानुभावव्यभिचारिविमर्शक्रमस्य सतोदपि सूच्यशतपत्रपत्त्रशातवेधक्रमस्येवावलक्षणात् । न त्वक्रमगध्यङ्ग्याः;

रसः प्रतीत्यैव च रस्यते इति । तत्राभिव्यक्तिः प्राधान्येन वा भवत्वनभ्याथा वा । प्रधानत्वे छदनिः, अन्यथा रसाच्छादकतारा:' इति । ब्राह्मणश्रमणन्यायादिति । यथा पूर्वविस्थामादाय श्रमणे ब्राह्मणत्वव्यपदेशास्तथा यथ्र रत्यादौ रसरूपतामभिग्यत-स्तत्न्र्यं रसत्वं तन्न्र्याशोभाकरे रत्यादौ समादायालङ्कारस्वेऽपि रसव्यपद्द्वारस्तत्र रत्यादाविस्तयर्थः । एतन्मूलैकलिवै 'सामप्रतिकाभावे ध्वनिपूर्वंनगतिः' इति प्राचीनदर्शिया-करणानां परिभाषा । यद्वा रत्यादे रसालङ्कारत्वे रसपदं स्थायिभावपरमिति वोध्यम् । एवम = रसत्वम् । अन्यथा = संलक्ष्यक्रमत्वे । स्वयं तु 'एवंवादिनि देवर्षौ' इत्यादावानन्दवर्धनाचार्यनुसारेण व्वचचित सलक्ष्यक्रमतायामपि रसत्वमुपपाद्यिष्यति । अन्र च व्यभिचारिभावभूताया लज्जायाः प्रतीतो विलक्षण सतोदपि क्रमस्य स्फुटमवभासनात् संलक्ष्यक्रमत्वम् । यदा तु लज्जाविष्कर्ष तथा रसप्रतीतो सतोदपि क्रमस्य न वोध्य इति ध्येयम् । तदुक्तमभिनवगुप्तपादेन—'रसस्वत्रापि दूरत एव व्यभिचारिस्वरूपे पयालोच्यमाने भातोति तदपेक्षयालक्ष्यक्रमत्वम् । लज्जापेक्षया तु तन्न लक्ष्यक्रमत्वम्' इति । विभावादिप्रतीयमानन्तरं 'रसव्यक्तो जायमानायां पोर्वा-प्यरूपपस्य क्रमस्य नाभावः, अपि तु प्रतीत्यभावमात्रमित्युपपाद्यति — एत इत्यादि।

जब ये हाँ रस किसी अन्य पदार्थ के अङ्ग हो जाते तत्र इन्हें 'रसालङ्कार' कहा जाता । परन्तु कुछ आचार्यों का मत है कि ये ( रस ) प्रधान होने पर हाँ 'रस' कहुलाते, अप्रधान होने पर तो इन्हें 'अलङ्कार' ही कहलाना चाहिए । इसी तरह ये जब असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गच होने तभी रस-पदवाच्य होते, अन्यथा तो इन्हें वस्तु-मात्र कहना उचित है, 'रस' नहीं । रसों को असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गच्य इसलिए नहीं कहा जाता कि इनके विभावादि के परिज्ञान और इनकी व्यञ्जना में कोई क्रम होता हाँ नहीं, क्योंकि जब विभावादि-परिज्ञान रस-व्यञ्जना का हेतु है तब इन दोनों में क्रम तो अनिवार्य है; कारण, सामान्यत: दो पदार्थों में कार्यकारणभाव हो हाँ नहीं सकता । अतः विभावादि-प्रतीति और रस-व्यञ्जना में क्रम होता तो है हाँ, परन्तु विभावादि की प्रतीति के बाद अत्यन्त दीघ्रता से सहृदयों को रसाभिव्यक्ति हो जाने के कारण इन दोनों के बीच वस्तुमान क्रम का भी बोध उसी तरह होता नहीं जिस तरह एक के ऊपर दूसरे के क्रम से रखे हुए कमल के पत्तों

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व्यक्तेस्तद्रूढेनां च हेतुहेतुमद्रावासंगत्यापत्ते: ॥

अथ कथंते एव रसा:, भगवान्म्बनस्य सोमाच्चाश्रुपातादिभिरनु- 'भावितस्य हर्षादिभिः परिपोषितस्य भागवतादिपुराणश्रवणसमये भगवानु- करनुभूयमानस्य भक्तिरसस्य दुरपल्नवत्त्वात् । भगवानुरागरूपा भक्ति-रच्छात्र स्थायिभावः । न चासौ शान्तरसेन्टस्थायीभवति, अनुरागस्य वैराग्यविरुद्धत्वात्? उच्चते—भक्तिरसेऽपि विषयानुरक्तिरेव भविन्तर्गततया रसत्वानुपपत्ते: ।

रतिदेवादिविषया व्यभिचारी तथाडSडिजत: । भाव: प्रोक्तस्तदाभासा ह्यनौचित्यप्रवर्तिता: ॥

दिना । असंगत्यापत्ते'रिति । हेतुहेतुमद्रावस्य पूर्वापर्यनियतत्त्वादित्यर्थ: ॥ भक्तिरसं निरस्यन् पूर्वपक्षमााह—अयेत्यादिना । प्राचाम् = काव्यप्रकाशकार- णाम् । अन्येषां भागमहादीनामिमदपमुपलक्षणम् । स्वातन्ड्र्ययोगात् = भरतादिमुनिवचना- नामेव स्वातन्ड्र्यवत्त्वम् कीदृशस्य रत्यादेर्भावितत्वम् कीदृशस्य च स्वा- स्थायित्वम् इत्यत्र, न त्वस्मदादीनाम् । अत्र एवं तत्र 'स्वातन्ड्र्याडSयोग' इत्यपि पाठान्तरं न विरुद्धते । ननौक्तं नायोग्यते—मनोंक्तं नियोगापन्नयोगानुरोधेनैव तत्रा स्वातन्ड्र्ययोगे हेतु: । शेषो ग्रन्थो निगदव्याख्यात: ॥

का ऊपर से सूई द्वारा वेधन करने में क्रम के वतंमान होने पर भी उस क्रम का बोध लोगों को नहीं होता । अब पुनः प्रश्न है—नौ हौं रस कैसे माने गये हैं, क्योंकि इनसे अतिरिक्त भक्ति रस भी तो है? भजनীয় देव इसके आलम्बन विभाव होते, रोमाञ्च, अश्रुपात आदि इसके अनुभाव और व्यभिचारीभाव होते । भागवत आदि पुराणों के श्रवण के समय भक्तों को इसका आस्वाद भी होता हौं है । ऐसी स्थिति में इसे एक स्वतन्त्र रस अवश्य मानना चाहिए था; क्योंकि शृङ्गारादि में तो इसका अन्तर्भाव असम्भव है । रही बात शान्तरस की, तो उसमें भी इसका अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि शान्तरस का स्थायिभाव वैराग्य-निवेंद है जो इस भक्तिरस के परमानुरागस्वरूप भक्तिरयात्मक स्थायिभाव से विपरीत है । वत: एक अतिरिक्त भक्तिरस के प्रमाणसिद्ध होने से इसकी उपेक्षा कर नो हौं रस मानना युक्त है । इसका उत्तर देते हुए गज़ाधरकार कहते हैं कि देवादिविषयकरतिस्वरूप यह भक्ति एक 'भाव' है, स्थायिभाव बहौं । अत्र एवं काव्यप्रकाशकार ने कहा है— 'देवादिविषयक रति और मिलावादि से अभिव्यक्त व्यभिचारी को 'भाव'

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इति हि प्राचां सिद्धान्तात् । न च तर्हि कामिनीविपयाया अपि रतेर्भोगौत्पत्तिमस्नु, रतितत्त्वाविरोषात् । अस्नु वा भगवदुक्ततरेव स्थायित्वम् । कामिन्यादिरतोनां च भावत्वम्, विनिगमकाभावात् इति वाच्यम् । भरतादिमुनिवचनानामेवात्र रसभावत्वादिवयवस्थापकत्वेन स्वातन्त्र्य-योगात् । अन्यथा पुत्रादिविषयाया अपि रते: स्थायित्वं कुतो न स्यात् । न स्याद्वा कुतः श्रृङ्गारभावत्वं जुगुप्साशोकादीनाम्, इत्यखिलदर्शनवैचाकुली स्यात् । रसानां नवन्त्रगणना च मुनिवचननियन्त्रिता भज्येत । इति यथाशास्त्रमेव ज्याय: ॥

इस पर पुनः एक प्रश्न है—यदि देवादि-विषयक रति ‘भाव’ है तो कामिनी-विषयक रति को भी ‘भाव’ क्यों न मान लिया जाय, क्योंकि दोनों रति ही हैं; अथवा कामिनी विषयक रति को हीं ‘भाव’ और देवादि-विषयक रति को ‘स्थायिभाव’ क्यों न मान लिया जाय, क्योंकि इसमें जो वैपरीत्य (कामिनी-विषयक रति को ‘स्थायिभाव’ और भगवद्विषयक रति को ‘भाव’ मानना ) अभीष्ट है उसमें विनिगमक (=एक पक्ष का समर्थक युक्ति ) तो कोई है नहीं ? उत्तर में कहा गया है कि भरत आदि मुनियों के वचन हीं यहाँ विनिगमक हैं, कारण यह है कि किसे ‘स्थायिभाव’ कहा जाय और किसे ‘भाव’ मात्र—इसमें ये हीं काव्यतत्त्वद्रष्टा: स्वतन्त्र हैं, हम साधारण जन नहीं । तभी तो पुत्र-पौत्रादि-विषयक रति पूर्वपक्षी की दृष्टि में भी श्रृङ्गार का ‘स्थायिभाव’ नहीं है । यदि यदृच्छा से सभी रतियाँ ‘स्थायिभाव’ हों तो पुत्रादिविषयक रति को भी ‘स्थायिभाव’ कहना हीं होगा । साथ हीं, जुगुप्सा, शोक वादि भी फिर केवल ‘भाव’ होंगे, स्थायिभाव नहीं । ऐसी दशा में समस्त कवि-सम्प्रदाय तो अतद्भ्यस्त होंगे हीं, महामुनि द्वारा रसों की नो संख्या का नियम टूट जाने से उनके वचन से भी विरोध होगाष

अविरोध इति । ध्वनिम्यालोकवतस्तु तु रोद्यशृङ्गारयोर्द्वयोर्विरोध उत्कः । अयं च विशेषेण विप्रलम्भे सहेति बोधयम् । अत्र चाविरोधे येन क्रमेण रसनिदेशः स क्रमोडपि ग्राह्यः । अतो वीररसः शृङ्गारेणैवविरोधेऽपि शृङ्गारस्य वीररस्य विरोधो दर्पणाद्युक्तः, संगच्छते, वीरशृङ्गारानन्तरं शृङ्गारवीरेण विरोधेऽपि, विपर्यये विरोधात् । अधिकं दर्पणादिषु यद्येमम् । शृङ्गारकरुणयोरपि विरोधो ध्वन्यालोकानुक्तोऽपि युक्तिकत्वादुक्तो गडधरक्ता । विरोधश्रावयमुभयोः प्रद्यानीभतवाक्यार्थस्त्व एवेति कथं गय है किन्तु शास्त्रीय तथा लौकिक मर्यादा का अतिक्रमण करने वाले रत्यादि तथा अन्य भाव 'रस' एवं 'भाव' न होकर वस्तुतः: 'रसाभास' और 'भावाभास' कहलाते हैं॥

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शृङ्गारहास्ययो:, वीराद्भुतयो:, वीररौद्रयो:, शृङ्गाराद्भुतयोश्च विरोध: । तत्र कविना प्रकृतरसं परिपोष्टुकामेन तदभिव्यञ्जके काव्ये तद्रुद्ररसाङ्गानां निबन्धनं न कार्यम् । तथा हि सति तदभिव्यक्तौ विरोध: प्रकृतं बाधेत । सुन्दोपसुन्दन्यायेन वोभयो-रुपहतिः स्यात् । यद्य तु विरोध्योरपि रसायोरेकत्र समावेश इष्यते तदा विरोधं परिहृत्य विधेय: । तथा हि --विरोधस्तावद्रुद्रविधि:--स्थितिविरोधो ज्ञानविरोधश्च । आध्यासतदधिकारणावृत्तितारूप: । द्वितीयस्तज्ज्ञानप्रतिबन्धक-स्वयमेव बाधयति । बाधयतेति । दुर्बलं प्रबल इति भव: । समबलत्वे तु तयो-र्विरोधिनोराह—सुन्दोपसुन्देत्यादि । तदधिकारणेत्यादि । अयमेवैकाधिक-रण्यविरोधीत्युक्त: पूर्वाचार्यै: । तज्ज्ञानेत्यादि । एकस्य ज्ञानेन प्रति श्रुतमध्यपद-हितोत्तरकालिकं ज्ञानो यस्मात्तथैवर्थ: । अयमेवोक्त: शास्त्रकारैर् न जो भक्त्त् को रस न मानते हुए केवल नौ रस कहे हैं वही उचित है ॥

उक्त नौ रसों में कुछ रसों का परस्पर-विरोध और कुछ का अविरोध है । वीर और शृङ्गार का, शृङ्गार और हास्य का, वीर-अद्भुत का, वीर-रोद्र का तथा शृङ्गार-अद्भुत का परस्पर कोई विरोध नहीं है । इनके अतिरिक्त शृङ्गार-वीभत्स का, शृङ्गार-करुण का, वीर-भयानक का, शान्त-रोद्र का तथा शान्त-शृङ्गार का परस्पर-विरोध है । अतः कवियों को चाहिए कि वे अपने काव्यों में यदि मुख्य रस की परिपुष्ट अभिव्यक्ति करना चाहें तो मुख्यरस की अपेक्षा उसके विरोधी रस के अभिव्यञ्जक विभावादि का उत्कृष्ट वर्णन न करें, क्योंकि वैसा करने पर प्रबल विरोधी अङ्ग-रस की अभिव्यक्ति से अङ्गी रस की अभिव्यक्ति बाधित हो जायेगी । साथ हीं, विरोधी अङ्ग रस की अभिव्यक्ति-सामग्री के समान प्रखर से वर्णन भी न करें, क्योंकि इस स्थिति में अभिव्यञ्जक-सामग्री के समान दोनों की अभिव्यक्ति परस्पर बाधित हो जायेगी । अतः यदि किसी कवि को अपने काव्य में कहीं दो विरोधी रसों की अङ्ग-अङ्गी के रूप में अभिव्यक्ति करनी हो तो दोनों के विरोध का परिहार करके हीं उनकी अभिव्यक्ति करनी चाहिए जिससे पूर्वोक्त बाधक बाधकभाव न हो सके । विरोध-परिहार के लिए विरोध के स्वरूप का ज्ञान आवश्यक है । अतः विरोध का स्वरूप बतलाया जा रहा है । रसों का विरोध दो प्रकार का से होता—(क) दोनों की स्थिति में विरोध और (ख) दोनों के ज्ञान में विरोध । प्रथम में यह होता कि एक के

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ज्ञानकतवलक्षणः । तत्राधिकरणान्तरे विरोधिनः स्थापने प्रथमो निवर्त्तते । यथा नायकगतत्वेन वीररसे वर्णनीयेऽ प्रतिनायकेऽ भयानकस्य । रसपदेनात्र प्रकरणे तदुपाधिः स्थायिभावो गृह्यते, रसस्य सामाजिकवृत्तित्वेन नायकाद्-व्यवृत्तित्वात्, अद्वितीयानन्दमयत्वेन विरोधासंभवाच्च । उदाहरणम्—

प्रथमविरोध के परिहार का उदाहरण निम्ननिदिष्ट है—

कुण्डलीकृतकोदण्डदोर्दण्डस्य मृगारातेरिव मृगाः परे नैवावतस्थिरे ॥

हे राजन्‌ ? जैसे सिंह के समक्ष मृग नहीं टिकते उसी तरह धनुष को पूरे तरह कुण्डलाकार में ताने हुए बाहुदण्डों वाले आपके समक्ष शत्रुराजण में आपके

नैरन्तर्यविरोधीति प्राप्तौऽनैकत्वम् । नैरन्तर्येण ज्ञानासंभवो यत उभयोः, एकप्रतीत्याद-व्यवहितोत्तरकालिकया अपरप्रतीते: प्रतिबन्धादिति हेतोः । प्रथमः = तदधिकरण-वृत्तित्वलुपो विरोधः । निवर्त्तत इति । तदुक्तम्—

विरोधी रसों का एकाश्रित वर्णन न कर उन्हें विभिन्न-विभिन्न आश्रय में वर्णित करना चाहिए, जैसे —यदि नायक में वीर-रस का वर्णन अभीष्ट हो तो उसके विरोधी

विरुद्धैकाश्रयो यस्तु विरोधी स्थायिनो भवेत् । स विभिन्नाश्रयः कार्यस्थस्य पोषेऽप्यदोषता ॥ इति ।

भयानक रस का वर्णन प्रतिनायक में करना चाहिए, नायक में कदापि नहीं । इस प्रसंग में यह भी ज्ञातव्य है कि रसों का जो विरोध कहा गया है उसमें रस का

रसयत आस्वाद्यत इति व्युत्पत्तेरिदंर्यः । अयं चार्थः सर्वसममतः । स्थायित्वमपि क्वचिद् वैशद्यमवेक्ष्यपि बोध्यम् । सहृदयकर्तृ कत्-स्थायिविरोधः परिहरति—अद्वितीयत्वादिना।

अथे स्थायिभाव इति । रसयत आस्वाद्यत इति व्युःपत्तेरिदंर्यः । अयं चार्थः सर्वसममतः । स्थायित्वमपि क्वचिद् वैशद्यमवेक्ष्यपि बोध्यम् । सहृदयकर्तृ कृत्-स्थायिविरोधः परिहरति—अद्वितीयत्वादिना ।

आचार्यविरोधपरिहारप्रकारमुदाहरति—उदाहरणमिति । कुण्डलीकृतः कर्णा-न्तकपंनेन कुण्डलवत् वृत्तौ लोकृतः: कोदण्डौ धनुर्योध्या दाध्म्या' बाहुम्यां तावेव दण्डौ यस्य तस्मै परे शान्तवसस्थैव नावनमस्थिरे यथा मृगाराते: सहृश्य पुरो मृगा:

यह कि सभी रस वस्तुतः परमानन्दस्वरूप हैं, फिर इनमें विरोध हो ही नहीं सकता—वैश! होने पर तो इनकी आनन्दरूपता हों ( रसल्व हाँ ) निरस्त हो जायेगो ।

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रसगन्धाधरः

रसान्तरस्याविरोधिनः संधिकर्तुं रसव्यान्तरालेsवसथापने द्वितीयोऽपि निवर्तंतेऽते । यथा मुनिनाsमित्रसायामालायिकायां कण्वाश्रमगतस्य श्वेतकेतुमहर्षेः शान्तरसरप्रधानने वर्णने प्रस्तुते ‘किमिदमनाकलितपूर्वं रूपम्, कोऽयमनिर्वाच्यो वचनरचनया मधुरिमा’ इत्यद्भुतस्यन्तररसस्थापनेन वरवर्णिनीनां प्रत्युरागवर्णने ।

यथा वा—

सुराज्ञाभिराजिलष्टा व्योम्नि वीरा विमानगाः । विलोकन्वे निजान्देहान्फेनाः रोहिरावृतान् ।।

नायकविष्ठन्ते । अशोकसाहस्य युयुत्सयाsभयस्य च परपदार्थे शत्रौ वर्णेनान्न तयोरिविरोधौ तु भयस्योस्ताहपरिपोषकत्वमेवेति भावः । रसान्तरस्येऽति । रसान्तरचवर्णनया इत्यर्थः । 'सन्धिकर्तुमिति । वादिप्रतिवादिनोः प्रति पक्षपातरहितस्य तटद्रद्वयाविरोधिन इत्यर्थः । द्वितीयः = तज्ज्ञानप्रतिबध्यज्ञानप्रतिवध्यकल्पो विरोधः । मध্যে च चष्यंमाण उदासीन उभयोः विरोधी रसो वाक्यार्थो वा भवेदाक्षेपलभ्यो वा मवेदित्यन्न न विशेषः । आदावस्योदाहरणं स्वनिर्मितालाख्यायिकातो दृष्टा द्वितीयस्योदाहरणमाह—यथा वेति । रसस्याक्षेपलब्ध्यत्वं तटद्वयङ्कुसम-ग्रचाक्षेपादुक्ततम् ।

निजान् देहान् । इतस्य मृत्तान् स्वदेहानित्यर्थः । फेनारीभिः= श्रुगालोभिः । उपलक्षणमेतद् शृगालादेरपि बोधयम् । एतेनोदाहरणेन द्वितीयोऽपि विरोधो भिन्न-विरोधी टङ्क न सके ॥

इस उदाहरण में राजा में वीर और उसके शात्रुओं में भयानक रस का वर्णन किये जाने से इन दोनों में कोई विरोध नहीं (अपि तु शात्रुगत भय राजगत उत्साह का परिपोषक हैं) है । द्वितीय प्रकार के विरोध का परिहार तब हो जाता है जब दो विरोधी व्यक्तियों के बीच सन्धि कराने वाले मध्यस्थ के समान दो विरोधी रसों के बीच कोई उदासीन रस निबद्ध कर दिया जाय । जैसे मेरे द्वारा रचित आख्यायिका में कण्व के आश्रम में पहुँचे महर्षि श्वेतकेतु के शान्तर रस तथा वरवर्णिनो नामक नायिका के शृङ्गार रस के वर्णनों के वोच 'यद् कैसा अदृष्टपूर्व सौन्दर्यं ! वाणी में यह कैसी वर्णनान्ते मधुरता ?' इस वर्णन द्वारा अद्भुत रस के निबन्धन से शान्त और शृङ्गार का विरोध समाप्त हो गया है । यथवा जैसे—

"आकाशे विमान द्वारा जाने वाले ये उद्धताङ्गमनशील महापुरुष दिव्याज्ञानाओं से कालिङ्गित होकर सिसादिनिकों से घिरे अपने भौतिक शरीरों को देख रहे हैं ।"

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अत्र सुराङ्गनामृतशरीरालम्बनयोः शृङ्गारबीभत्सयोरन्तः स्वगैलाभाक्षिप्तो वीरो रसो निवेशितः । अन्तर्निवेशश्च तदुभयचर्वणाकालानन्तर्वीति कालगतचर्वणाकत्वम् । तच्च प्रकृतपद्ये प्रथमार्थे एव शृङ्गारचर्वणोत्तरं वीरोस्य चर्वणादनन्तरं द्वितीयार्थे बीभत्सस्येति स्फुटमेव । 'भूरेणुदिग्धान्' विषयत्वेऽपि सम्भवतीति सूचितम् । समनविषयत्वे त्वयं विरोधो भवत्येव । अतएव 'भूरेणुदिगधान.........' इत्यादिविवरणे 'अन्यथा सितविषयत्वात् को विरोधः' इति लोचने विषयत्वमाश्रयत एव बोधयम् ।

इस पद्य में दिव्याङ्गनास्वरूप आलम्बन वाले शृङ्गार और मृतशरीररसस्वरूप आलम्बन वाले वीभत्स रसों के बीच स्वगालाभ से आक्षित ( अथवा आकृष्ट स्वर्गलाभ से प्रतीयमान ) वीर रस द्वारा शृङ्गार और वीभत्स रसों का परस्पर-विरोध शान्त हो गया है ।

सुराङ्गनेऽत्यादि । सुराङ्गनालम्बनकस्य शृङ्गारस्य मृतशरीरालम्बनकस्य बीभत्सस्य चैति यथासङ्ख्यमन्वयः । स्वर्गलाभाक्षित इति आक्षिसस्वर्गलाभेन प्रतीया-मान इत्यर्थकः । वीररस इति । एतेन वीरबीभत्सयोरस्यविरोधः सूचितः । व्योमपदस्य स्वर्गार्थकत्वे तु वीरानुभावादयः श्लेषेपलक्ष्याः एव च व्योम्नोत्पककर्मण एवाधिकारणत्वविवक्षया सङ्गमी भेया । पद्यो वीरा इति विशेषेण ईरयन्निगच्छन्नोत्यर्थः । कम-प्रत्ययान्तस्य कर्त्तरि रूपम्, न तु 'वीर विक्रान्तौ' इति धातोः पचाद्यजन्तस्य ।

वीरोधी रसो के बीच किसी उदासीन रस के समावेश का अभिप्राय उन्हें विरोधी रसो की चर्वणाओं के बीच उदासीन रस की चर्वणा से है । उदाहरण पद्य में यह स्थिति है, क्यो कि इस पद्य के पूर्वार्ध में जो वर्णन है उससे प्रथमतः शृङ्गार की चर्वणा, तदनन्तर वीर रस की चर्वणा और इसके पश्चात् पद्य के उत्तरार्ध में किये गये वर्णन के अनुसार बीभत्स रस की चर्वणा की सामग्री है ।

तथा च मध्ये चर्व्येमाणतलेनाभिप्रेतस्य वाच्यत्वापत्तिनिरस्ता । यद्वा स्वशरीरराण्येवालम्बनं वीरगतद्योः साहस्य मध्ये प्रतियमनस्तूरसाहो न तदालम्बनकोऽपि तु स्वर्गालम्बनकः तस्य च वाच्यत्वाभिप्रेतं न द्वेषः । तथा च त्रिकान्तार्थंकथातौरपि वीरशब्दच्युत्पादने न हानिः । वस्तुतोडत्र वीरशब्दप्रयोगो-नोचितः, यद्वा सिद्धानुवाददपतिवाददोषः । मध्यगगतस्यं चोदासीनस्य चर्व्यपेक्ष्यमेव, च वर्णनानुक्रमेणाभिप्रेता, अन्यथा स्वर्गलाभानन्तरं सुराङ्गनाल्लेपस्य सम्भववात्-व्यवधानं वीरेण न स्यादित्याह—अन्तर्निवेशोन्तेत्यादिना । भूरेणुदिगधानिति ।

( छविन्यालोक तथा ) काव्यप्रकाश मे जो 'भूरेणुदिगधान'.......... आदि तीन पद्यो का समूह—'विशेषक' उदाहरण दिया गया है उसमें भी यही स्थिति है ।

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भूरेणुद्रिधानवपरिजात मालारजोवासितवाहुमध्या: ।

गाढं शिवाभि: परिरधयमाणान् सुगन्धीनां शिखण्डटशुभजन्तराला: ॥

सशोणितै: कतकभुजां स्फुरद्भिः पक्षे खगानामुपवीड्यमानान् ।

संबीजिताश्चन्दनवारीसेकै: सुगन्धिभि: कलपलतादुकूलै: ॥

विमानपङ्क्तिल निषण्णा: कुतूहलाविष्टतया तदानौम् ।

निर्दिदयमानालललनाड्गुलीभि-र्वीरा: स्वदेहान् पतितानपश्यन् ॥ इति ।

प्रथमश्रृतेरिति हेतुर्वीभत्सस्य प्रयत्नावसादे । तत्स्वं च भूरेणुद्रिधानिति प्रथमोदादानेन वीभत्ससामग्र्या निष्यून् धमेष्ट्याभिप्राय: । अस्मिन्नपि विशेषके वीरशब्द-विषये पूर्वोक्तं स्मर्तव्यम् । पाठक्रमाद्यार्यक्रमस्य वलीयस्त्वेन गृहीतारचवर्णनीव प्रथममिति मन्यामहे ।

अनुसार प्रथमवर्णित

तत्स्य च मध्यवर्त्तिना वीरे ण सह 'आध्य: करुणवीभत्सरोद्रवीर-भयानकै:' इत्यादिना साहिल्यदर्शने विरोधे वर्णितेतदपि समासविपर्ययत्व एव तयोर्विरोध

बीभत्स की चर्वणा के बाद

इत्यादिश्रिसय परिहार: कतुं शक्य: । वीरबीभत्सयोरस्तु न विरोध इत्युपपत्तिमन्त्राणि पक्शे वीरेरष्य मधये चघयंमाणस्योदासीनतवमिति विवेचनीयं विद्धि: ।

वीर: स्वदेहान्

वस्तुतस्तस्वत्र कुदारान्नवत्सामग्रीस्मश्रणादुदाहरणमेतन्न विच्छित्तिजनकं । "वीरा: स्वदेहान्" इत्यादिना तदीयोतसाहाद्यवगतया कर्तृकर्मणो: समस्तयाव्याप्तानुरूपितया प्रतीति-

इति लोचनोक्तिरपि

रिति मधयपाठाभावेऽपि सुत्रां वीरेरष्य व्यवधायकता' इति लोचनोक्तिरपि प्रकृतोदाहरणे न कामपि विरुध्दति । कुतु: सर्वाव्याप्तार्थप्रतिपादेपि संदैव

मोभरसमात्रास्वादप्रसक्तौ बिरोधोद्भावनस्यैवाशक्यत्वत्वम् ।

वीररससमात्रास्वादप्रसक्तौ बिरोधोद्भावनस्यैवाशक्यत्वत्वम् । अथ च रत्निगुप्तस्योभयारिस्थित्यमित्यादौषाहाररणान्तरं तेयम् । तथापि समुचित

तदाहरणे मधये तटस्थचर्वणाया: परस्तरविरोधपरिहारप्रकारप्रदशोंपरतत्वेन क्रयषिद्ध

तदाहरणे मधये तटस्थचर्वणाया: परस्तरविरोधपरिहारप्रकारप्रदशोंपरतत्वेन क्रयषिद्ध

अनन्तर केवल यह है कि इस उदाहरण में वर्णित सामग्री के अनुसार प्रथमवर्णित

अनन्तर केवल यह है कि इस उदाहरण में वर्णित सामग्री के अनुसार प्रथमवर्णित बीभत्स की चर्वणा के बाद वीभत्स की सामग्री से आख्यान निःशकु प्राणत्याग आदि सामग्री से वीर की चर्वणा होती और अन्त में वर्णनक्रम से शृङ्गार की चर्वणा ।

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शृङ्गारचर्वणोति विवेक। इत्थं चोदासिनचर्वणेन प्रतिबन्धकज्ञाननिवृत्तौ निष्प्रत्युत्थः प्रतिबन्धकचर्वणोदय इति फलितोऽर्थः। अङ्गाङ्गिनोः, अङ्गिन्यनुस्मन्नङ्गयोरवा न विरोधः, अङ्गत्वानुपपत्तिप्रसङ्गात्।

ग्रन्थो योजनीयः। प्रतिबन्ध्यकेत्यादि। परस्परं प्रतिबन्ध्यप्रतिबन्धकभावात्पूर्वंप्रतीतस्य प्रतिबन्धकत्वमवगन्तव्यम्। अनयो च विरोधिपरिगणने ऋमस्य न विवक्षेति पण्डिततराज्ञां, प्रतीयते। दरपणकृदादयस्तु क्रमं विवक्षितं मन्यन्त इति पूर्वंमुक्तमेव।

यथा - प्रत्युद्गता सर्वनयं सहसा सखीभिः स्मेरैरः स्मरसय सचिवैः सरसावलोकैः। मामङ्कजुरचनैर्वंचनैश्च वलेभिर्हा लेशतोऽपि न कथं वद सत्करोषि॥

अङ्गाङ्गिनोरिति! पोष्यपोष्यमयो हि तयोर्विरोधे नोपपद्यते। एवमेव एकस्याङ्गिनोऽङ्गद्वयोरभूतयोः योरङ्गत्वे न विरोधः। अङ्गसूतयोः परस्परमसम्बन्धाद्गुणानां च 'परार्थत्वात्समवायः स्वार्थ' इति न्यायात्। अतश्च विरोधो नाङ्गत्वम्, इत्याह—अङ्गत्वानुपपत्तीत्यादिना।

इस प्रकार उदासीन रस की चर्वणा से पूर्वज्ञात प्रतिबन्धक-ज्ञान की निवृत्ति हो जाने से परचात् प्रतिबन्धक रस-की चर्वणा निर्विरोध रूप में हो जाती है।

अङ्गस्याङ्गिनां विरोधाभाव उदाहरणम्—यथेति। अन्न भूतकालायंकैन तत्रप्रत्ययेन पूर्वविरोध्यंस्य भूतपूर्वत्वं प्रत्युद्गतेति।

इसके अतिरिक्त, अङ्ग-भूत रस का अपने अङ्गी रस के साथ और एक अङ्गी रस के अङ्ग-भूत दो रसों में भी परस्पर-विरोध नहीं होता।

अङ्ग-अङ्गी में विरोध न होने का कारण यह है कि अङ्ग-रस पोषक ( उपजीव्य ) होता और अङ्गी रस पोष्य ( उपजीवक )। पोष्य-पोषक में विरोध न होने से स्पष्ट है कि यदि किन्हीं दो के बीच विरोध हो तो उनमें पोष्य-पोषकभाव सम्भव नहीं। अतः यदि पोष्य-पोषकभाव—अङ्गाङ्गिभाव है तो उनमें विरोध सम्भव नहीं। एक रस के दो अङ्गों में विरोध तो इस लिए नहीं होता क्योंकि उन दोनों में परस्पर-सम्बन्ध होता ही नहीं। जिन दोनों में विरोध होता वे दोनों परस्पर सम्बद्ध अवश्य होते, ऐसी स्थिति में वे दोनों स्वतन्त्र रूप में किसी एक अङ्गी के अङ्ग हो ही नहीं सकते।

एक अङ्गरस और एक अङ्गी रस के विरोधाभाव का उदाहरण देखिए— 'श्री नवयौवने प्रिये? पहले तो तू' मुस्कुराती और कामदेव को भी आकर्षित

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इयं चं पुरो निपतितां प्रमतां नायिकां प्रति नायकस्योक्ति: । इहं नायिकालम्बना, अश्रुपातादिभिरनुभावैरभावविषादादिभि: संचारिभिरह व व्यज्यमाना नायिकगता रतिस्तुल्यसामग्र्यामप्रच्यभव्यक्ते प्रकृतत्वात्प्रधानीभूते

प्रतिपाद्यत । अत एव स्मयन्माणत्वमग्रे वक्ष्यमाणमुपपद्यत । प्रभोताम् =मुखतः । अश्रुपातादिभिरितरस्यान्तस्याक्षिप्यमाणै: क्रियादि: । नायकगतेत्य- न्तरं नायिकाविशेषेति योज्यम् । प्रकृतत्वात्—प्रकृतनायिकाविषयाहनि हेतः । प्रधानी- भूतत्वे शोकस्य । तुल्यसामग्रीति । नायिका- सर्वकालालिकेन नायिकाकार्तृ कस्विनय- प्रत्युद्गमननादिना रतिरभिव्यक्ता, तेनेव च प्रत्युद्गमनादिना नायिकाड्सरत्कवाले: स्मयन्माणेन शोकोड्यभिव्यज्यते इतमुभयोस्तुल्यसामप्रच्यामप्रच्यभिव्यक्तत्वमुक्तम् । एष चार्यों व्यतिरेकेण कविकुलगुरोरप्यभिमतः—

पादास्ते एव शशिनः सुखयन्ति पान्रं बाणास्ते एव मदनस्य ममाथुकूला: । संरम्भरक्षसि सुन्दरि यद् यदासीत् त्वत्संगमे तन मम तत्दिवहानुनीततम् ॥

इति । मालतीमाधवे'पि 'यद्विस्मयमस्तिमित......' इत्यादिनाड्यर्थः: स्फुटः । अतएव 'उत्कण्ठाग्रस्ततत्क्षणोचितव्यथां' इति ममप्रकृतोव्यभिचारिभ्यांनिम, शोकादिप्रभृति आवेगविषादादिभिश्र संचालितः, परं शोकस्याश्रुपातदय आवेगसम्बन्धसम्बन्धिभिस्तैस्तैर्भाना इति सजातीयत्वमिति रसचन्द्रिकोक्तं तदुपपादनं च चिन्त्यम् ।

इयमस्तु विशेषः—अत्र तुल्यत्वमुपपातया एव सामग्रचा अभिप्रायेण, व्याक्षिप्तायाम् अश्रुपातादिसामग्र्यामभेदेन जातीयत्वयोरभावात् । नायकेन च नायिका- करेन नायिकाकार्तृ कस्विनय- प्रत्युद्गमननादिना रतिरभिव्यक्ता, तेनेव च प्रत्युद्गमनादिना नायिकाड्सरत्कवाले:

करने वाले कटाक्ष से मुझे देखती हुई अपनी सखियों के साथ दौड़ कर मेरी अगवानी कीया करती थी; पर तू बता कि क्या आज अपनी मीठी बातों से थोड़ी देर के लिये भी अपना प्यार नहीं देगी !!

यहाँ नायिका आलम्बन विभाव है, अश्रुपात आदि अनुभाव हैं और आवेग, विषाद आदि व्यभिचारिभाव हैं । इन सबससे अभिव्यज्यमान नायिकाविषयक नायकनिष्ठ रति वर्णनीय होने से प्रधानीभूत नायकनिष्ठ मृतनायिकाविषयक शोक को बढ़ाती हुई उस (शोक) का बाझ है जो रत्यभिव्यञ्जक सामग्री—अगवानी करना आदि से अभिव्यक्त हो रहा है ।

तात्पर्य यह है कि जीवन-काल में नायिका द्वारा की जाने वाली अगवानी तथा अन्य क्रियायें नायकनिष्ठ रति का और मृत्यु हो जाने पर उसी नायिका की वे ही क्रियाएँ स्मरणमात्र से नायकनिष्ठ शोक का अभिव्यञ्जन करती हैं । यद्यपि रत्यभिव्यञ्जक अश्रुपात आदि सामग्री शोकाभिव्यञ्जक अश्रुपात

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तद्गत एव शोकेऽपि प्रकर्षकः वादृङम् । यदि तु नायकगता रतिरन्विता प्रतीयते किं तु निःकत्सामग्र्या शोक एव प्रकृतत्वादित्यगृह्यते, तदा नायककालम्वना प्रत्युद्गमाद्यनुभाविता हर्षादिभिः पोषिता नायिकाश्रया रतिरेव तत्राङ्गमस्तु, नायिकागतरेतैरेकशोकप्रकर्षहेतुत्वात् सर्वसंमतत्वात् । न च नायिकाया नाशात्तद्गताया रतेः संनिधानात्कथमङ्गत्वम् इति वाच्यम् ।

यदि में अभेद भी नहीं और सजातीयता भी नहीं; अतः रति और शोक को ‘तुल्यसामग्र्यभिव्यक्त,’ कहना संगत नहीं लगता तथापि रत्यभिव्यञ्जक जो सामग्री ( अगवानी करना आदि ) पद में निर्दिष्ट है उसे को लेकर रति और शोक दोनों को ‘तुल्यसामग्र्यभिव्यक्त’ कहा गया है। यह सामग्री जीवन-काल और मृत्युोत्तर-काल में क्रमशः रति का और शोक का अभिव्यञ्जक है हीं । अतः एवं यह भी स्पष्ट है कि नायक द्वारा अनुभूयमान यह सामग्री रति का और स्मयमाण नायिका शोक का अभिव्यञ्जक है। परन्तु इससे सहृदयों में रस की अभिव्यक्ति में कोई अन्तर नहीं पड़ता। यदि यह आग्रह किया जाय कि यहाँ नायकनिष्ठ रति की अभिव्यक्ति नहीं होती, क्योंकि प्रत्युद्गमन आदि सामग्री नायिकाविषयक नायिकानिष्ठ रति का हीं अभिव्यञ्जक है; हीं उत्तरार्ध से नायकनिष्ठ शोक की अभिव्यक्ति अवश्य होती तो उक्त प्रत्युद्गमन आदि अनुभावों से अभिव्यक्त और वध्यमान हर्ष आदि से परिपोषित नायिकानिष्ठ रति हीं नायकनिष्ठ शोक का परिपोषक होने से इसका अङ्ग हो । नायिका की नायक विषयक रति का नायिका के अभाव में नायकगत शोक का परिपोषक होना सर्वसंमत है हीं । यहाँ यह आशङ्का नहीं करनी चाहिए कि नायिका के विनष्ट हो जाने से तन्निष्ठा रति का नायक को

जीवनकाले अनुभवमाना मरणोत्तरं च स्मर्यंमाणापि सा न रत्याऽभिव्यञ्जकेन न जीवनकाले अनुभवमानाऽनुभावैरस्मभ्यारसभावनायाङ्क्षिप्यते इति । अत्र च नायिकानिष्ठनायकविषयकनायिकानिष्ठशोकस्य नायकनिष्ठनायिकाविषयकरतिभावनायाङ्क्षिप्यते इति ‘यदि तु’ इत्यनेन सूच्यते : नात्र प्रतीयत इति । नायकनिष्ठनायिकाविषयकरसामप्रचरणानादिति भावः । निःकत्सामग्र्या = नायिकाकर्तृ कस्वादिनयप्रत्युद्गमनादिनाऽनुभाविता हर्षादिसामप्रचया । अत्र भावः । यदि तु वक्ष्यमाणरीत्या स्मर्यंमाणा नायिकानिष्ठरति रते: शोकाङ्गं नपादध्यम् तहि तादृश्या नायिकानिष्ठरतेः प्रतोति: कथं स्यात्, उभयोरेवं बीजाभावात् । यदि तु वक्ष्यमाणरीत्या स्मर्यमाणा नायिकानिष्ठा रतिः शोकाङ्गं न भवेत् तर्हि तादृश्या नायिकाकर्तृ कातिरकालिकसविनयप्रत्युद्गमनादिनाऽनुभावितरस्मारकरतस्य साक्षाद्दर्शितस्वम् नायकनिष्ठरतेः प्रतोति: प्रकारान्तरेण प्रतीममानस्वमाङ्क्षिप्यमाणत्वं वा नायकनिष्ठरतेरपि प्रतीममानत्वात् ।

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सन्निधानस्याऽऽडम्बरतायामतन्त्रत्रवेन स्मर्यंमाणायास्तस्याऽअङ्गत्वोपपत्तेः । अङ्ज्योयोयेथा—

उत्क्षिप्ता: कबर्रीभरं विवलिता: पार्श्वेन्द्रियं न्यक्कृता: । गृहीन्ति त्वरया भवत्प्रतिभटक्ष्मापालवामद्रयां ।। यान्तीनां गहनेषु कण्टकचिता: के के न भ्रमीरहा: ।। पूर्वंमुक्तमेव । असंनिधानमन्यत्रानुबन्ध: । सन्निधया नममनुभव: । समप्रत्येकस्मिन्नङ्गज्योत्स्नामययोयौंया न विरोधस्तदुपपादयन्नाह—अङ्ज्यो- यथेति ।

उत्क्षिप्ता इति । विजितरिपो राज्ञ: कस्यपिचिदयं स्तुतिः । हे राजन् ! पराजिता ये वनस्थाः क्ष्मापालाः तेषां वामद्रूवां रमणीना महनेपु यान्तीनां के कण्टकाकीर्णा भूमीरहा वृक्षास्ताभिरुत्क्षमा: सन्तस्ततासां कबर्रीभरं केशपाशं न गृहीन्ति नाकर्षन्ति ? अपि तु सर्वेऽप्याकर्षन्त्येव । किन्तु विवलिता वक्रीकृता: सन्तस्ततासां पार्श्वेन्द्रियं न गृहीन्ति संदशवृनाऽभिधन्ति ? न्यक्कृता अध: - ऋता: पादाम्भोजयुगम्, रुषा दूरेण परिहृताइच सन्तस्ततासां चेलाचलं च न गृहीन्ति ? गृह्यतऽ्येवेत्यर्थ: ।।

अनुभव ( अनुप्रिति ) न होने से वह नायकगत शोक का परिपोषक—अङ्ग हो नहीं सकती, कारण, अङ्गत्व के लिये अनुभूयमानत्व के आवश्यक न होने से स्मर्यंमाण नायिकामिष्ठ नायक विषयक रति भी नायकगत शोक का परिपोषक हो हि सकती है ।

अब एक अङ्गी के दो अङ्गों में परस्पर-विरोध के अभाव का एक उदाहरण लीजिए:—

"हे राजन् ! आपसे पराजित होकर जङ्गल में छिपे हुए आपके शत्रुओं की रमणियां जब जङ्गलों में चलतिं तब कौन से ऐसे काटेदार वृक्ष नहीं जो ( जिनकी शाखायें ) उन रमणियों द्वारा ऊपर उठाये जाने पर उनके केश-पाश को पकड़ नहीं लेते ( केश-पाश में उलझ नहीं जाते )? किनारे हठाये जाने पर उनके दोनों पार्श्वों ( उनकी कमर ) में चिपक नहीं जाते ? नीचे झुकाये जाने पर उनके चरणकमलों को नहीं पकड़ लेते ? और क्रोध से दूर हटाये जाने पर उनके आँचल में उलझ नहीं जाते ?"

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अत्र ममासोक्तवयववाभ्यां तदुकिमकरत्वंकरिपुकामिनोकबरीयादिग्रहणरूपाभ्यां प्रकृताप्रकृतध्वबहाराभ्यां व्यक्तयोः करुणशृङ्गारयोः राजविषयकरतिभावाङ्गतवम् ।

इस पद्य में विशेषणों के श्लिष्ट होने के कारण प्रकृत वृक्षों के कायं से अपप्रकृत कामुक पुरुष के कार्य (व्यवहार) की भी प्रतीति होती है और इस प्रकार प्रकृत वृक्ष के व्यवहार से करण की ओर अपकृत कामुक के व्यवाहर से शृङ्गार की अभिव्यक्ति होती है। ये दोनों ही वक्ता की राजविषयक रति (स्तुति) के अङ्ग हैं। अत अङ्गश्रुत करण और शृङ्गार में किसी साक्षात् सम्बन्ध के अभाव में कोई विरोध नहीं है।

किं च प्रकृतरसपरिपुष्टिमिच्छता विरोधिनोऽपि रसस्य वाध्यत्वेन निबन्धनं कार्यमेव ! तथा हि सति वैरिविजयकृतां वर्णनस्य कापि शोभा संपद्यते । वाध्यत्वं न रसस्य प्रबलैविरोधिनो रसस्याङ्गैविद्यमाने ऽपि संपदि स्वाङ्गगेपु निष्पत्तेः प्रथनिबन्धः । व्यभिचारिरणो वाध्यत्वं तु तदोयर्सनिष्पत्तिप्रतिबन्धमात्रांत, न तत्तनभिव्यक्त्या, अभिव्यक्ततौ बाधकभावात् । न च विषयकरतिभावाङ्गत्वेन न परस्परं विरोध इह्युपपाद्यति—अन्नेतपादिनां अवयवत्वं च प्रकृताप्रकृतध्वमिकघयबहारयोः समासोक्तिप्रतिपाद्यार्थघटकरवम्, प्रथमे तदुपपादकत्वं वा ।

और भी, कवि को चाहिए कि वह प्रकृत मुख्य रस को परिपुष्ट करने के लिए उसके विरोधी रसों का भी 'बाध्य रसों' के रूप में अपने काव्य में वर्णन अवश्य करे। इससे मुख्य रस में अपने विरोधी रसों के पराभव से एक विलक्षण चमत्कृति आ जाती है। किसी भी रस को 'बाधक' बनाने का अर्थ यही है कि उसके विरोधी मुख्य रस के अङ्गों का प्रबल चित्रण होने से मुख्य रस की ही प्रतीति (अर्थात आस्वाद) हो पाती, दुवंल रूप में वर्णित उस रस को नहीं।

परिपुष्टिमिच्छति । एतेनात्रापि तयोरेवाङ्गाङ्गभावः सूचितः, परिपोषकस्यवाङ्गतया प्रसिद्धेः । सुराङ्गनेतस्यादिना पूर्वं मुक्तेऽविरोधेऽनु प्रवन्धैविरोध इति वृथग्रुपादानं न पुनरुक्तिदोषास्पदम् । ब्राह्मणवसिष्ठन्यायेन वा । अङ्गैरितरस्यत्र कत्तुंरितीत्या । स्वाङ्गगेविवक्षित स्वपदं वाध्यपरम् । निष्पत्तिरभिव्यक्तिः, आस्वाद इति भावः । प्रसङ्गाद् व्यभिचारिरणो बाध्यत्वं निषुपपत्ति —व्यभिचारिण इत्यादिना ।

किन्तु व्यभिचारिभाव की अभिव्यक्ति में कोई बाधक नहीं है। यह आाशङ्का नहीं करनी चाहिए कि 'विरोधी (= बाधक) रस के अङ्गमूत विभावादि की अभिव्यक्ति से बाध्य रस के

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विरोध्यङ्गाभिव्यक्त्या प्रतिबन्ध्याभिव्यक्तिरिति वाच्यम्, तद्रङ्गङ्गकशब्दार्थज्ञानसमये बिरोध्यङ्गाभिव्यङ्गकशब्दार्थज्ञानस्यासंनिधानात् प्रतिबन्धप्रतितदीयेति ।

तदभिव्यङ्ग्यङ्गरङ्गेन विवक्षितेतेर्थः । तत्पदे व्यभिचारिपरङ्ग । अभिव्यक्तौ=व्यङ्ग्यचतवे । तदङ्गङ्जकेति । बाधप्रत्यभिचारिरङ्गङ्गकेत्यर्थः । शब्दार्थज्ञानम्=वाक्यार्थज्ञानम् । असन्निधानादिति । अयमर्थः:—यदा पूर्वं महावाक्यघटकस्य बाध्यार्थ्यभिचारिरङ्गङ्गकवाक्यार्थस्य ज्ञानम्, तस्मादध्यासिद्ध्याभिव्यक्तेः प्रतिबन्ध: ।

तस्मादेव विरोध्यङ्गकशब्दार्थज्ञानं तत्राभिव्यक्त्या व्यवधानात् परचाज्जायमान्तरमेव विरोध्यङ्गाभिव्यङ्गकशब्दार्थज्ञानं तत्राभिव्यक्त्या बाधकव्यकभिचारिरङ्गङ्गकत्व मानेन विरोध्यङ्गाभिव्यङ्गकशब्दार्थज्ञाननेन पूर्वनिष्पन्नस्य बाध्यव्यकभिचारिरङ्गङ्गकस्य वाक्यार्थज्ञानस्य प्रतिबन्ध्याभिव्यक्तेः ।

तस्माद्मध्येयङ्ग्या व्यभिचार्यभिव्यक्तिः केन वायं ताम्? यत्रापि बाध्यव्यकभिचारिरङ्गङ्गकवाक्यं निषेध्यघटितं तत्रापि निषेधप्रतीतः: प्रतिबन्धप्रतियोगिज्ञानजन्यत्वनियमात् पूर्वं जायमानेन प्रतिबन्धप्रतियोगिज्ञानेन तस्माद्मध्ये बलायातां व्यभिचार्यभिव्यक्तिं निषिध्यत्यूह्यैव, निषेधप्रतीत्या व्यवधानात् परं विरोध्यङ्गाभिव्यङ्गकशब्दार्थज्ञानस्याधिकम् ।

यदि तु बाध्यव्यकभिचारिरङ्गङ्गकविरोध्यङ्गाभिव्यङ्गकशब्दार्थज्ञानयोग्यं गदपदेव समूहालम्बनरूपेणोत्तरक्षणे तद्दोत्करणे व्यभिचार्यभिव्यक्तितन्न सम्भवति, परमेतादृशं समूहालम्बनं वस्तुतो जायमानमपि कविना न निवन्धनीयम्, विवक्षितानाधायकत्वात् ।

प्रबन्धे प्रायेण तदस्यभवाच्च । चर्वणा तु नुत्पत्तिरेव । मर्मप्रकाशो तु असन्निधानादित्यस्य विनष्टत्वादित्यर्थ उत्कः:, स च तदैव घटते यदि प्रथममेव विरोध्यङ्गभिव्यङ्गकशब्दार्थज्ञानं ततस्तु विरोध्यङ्गाभिव्यक्तिः, ततस्तु बाध्याङ्गभिव्यङ्गकशब्दार्थज्ञानमिति क्रमः ।

वयं तु मन्यामहे—एतादृशं निबन्धनं न विच्छित्तिजनकम् । अत एव यत्र प्रबन्धस्यादौ पूर्वं विरोध्यङ्गाभिव्यङ्गकशब्दस्तदनन्तरं बाध्याङ्गभिव्यङ्गकोपिनिबन्धनं तत्रापि परस्ताद्विरोधिनिबन्धादिकवितेऽपि च । मुक्त्वा तु परस्तादेव विरोधिनिबन्धकर्तव्यमिति ।

'न तु विरोध्यङ्गाभिव्यङ्गकशब्दार्थज्ञानजन्य—) संस्कारस्यैव तत्‌ । व्यभिचारी की अभिव्यक्ति का प्रतिबन्ध हो जाता है, क्योंकि यदि बाधक रस के अभिव्यङ्जक शब्दार्थज्ञान व्यभिचारी के अभिव्यङ्जक शब्दार्थज्ञान के पश्चात् होने वाला हो तो पूर्वोत्पन्न व्यभिचार्यभिव्यङ्जक शब्दार्थज्ञान से उत्तरक्षण में व्यभिचारी की अभिव्यक्ति को उस समय उत्पन्न बाधकरसाभिव्यङ्जक शब्दार्थज्ञान कैसे रोक सकेगा ?

अथ चेत् बाधकरसाभिव्यङ्जक शब्दार्थं का ज्ञान हि पहले उत्पन्न होता हो तब भी उत्तरक्षण में उस बाधक रस की अभिव्यक्ति होगी; तदुतरक्षण में व्यभिचार्यभिव्यङ्जक शब्द का ज्ञान होगा उसके उत्तरक्षण में व्यभिचारी के अभिव्यङ्जक उस शब्द के अर्थ का ज्ञान होगा ।

अत: अपनी उत्पत्ति के

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बन्धकभावकल्पने मानाभावात् भावशबलताया उच्छेदापत्तेः । रसनिष्पत्तेः प्रतिबन्धस्त्वनुभवसिद्ध इति तां प्रत्येव विरोधज्ञानां बलवतामभिव्यक्तेः प्रतिबन्धकत्वं न्याय्यम्‌ । अपि च यत्र साधारणविशेषणमहिम्ना विरुद्धयोः प्रतिब्यक्तिसत्‍त्रापि विरोधो निवर्तते ।

मुख्य अर्थ-प्रकाश-विवरणम्‌ । तदर्थि पूर्वं विरोधज्ञानाभिव्यङ्कक-ज्ञानात्‌ अर्थात्‌ 'सामान्य-विशेषण-भावेन' शब्दार्थज्ञानस्यैव पूर्वजाततद्वात्‌ पदच्युतज्ञानस्य वा पूर्वजाततद्वात्‌ सामान्यविशेष्यक्तिप्रतिबन्धकत्वं अनुपपत्तेः । यद्य तु पूर्वं बाधकाभिव्यङ्कक-शब्दार्थज्ञानं तदनन्तरं विरोधज्ञानं तर्हि बाधकव्यभिचार्याभिव्यक्तिप्राप्तिरुच्येत तदर्थाप संस्कारस्य समकलिकस्य प्रतिबन्धकत्वमन्तर्भाविविरुद्धं, व्यभिचार्याभिव्यङ्ककशब्दार्थज्ञानस्यैव प्रतिबन्धकत्वं प्रतीतमपि तादृशाभिव्यक्तिक्रमस्यैवग्रामगिकत्वेन तद्रूपानुपपत्तिमेव । अतः पूर्वोक्तासनिर्द्धानविवरणवदिदमपि ममं प्रकाशाविवरणं पाक्षिकमेव मन्तव्यम्‌ । रसनिष्पत्तौ बाधकाभिव्यङ्जकनयरसस्वादस्यैवर्थः । प्रकारान्तरेणापि विरोधहरमाह-आप नेत्यादिना । अभिव्यक्ति-समाप्तिस्थले । साधारणविशेषणतया तेन शिलष्टविशेषणमात्रोक्तेस्तादृशविशेष्याभाव-प्रतिपादनाच्छछदरक्षिता मूलदूषणमेवं समाप्यते; प्रतिपादितः ।

तृतीयक्षण में लष्ट होने वाला बाधकाभिव्यङ्कजक शब्द का ज्ञान और उसके अर्थ का तदुत्‍तरक्षणोत्पन्न ज्ञान क्रमशः अपने अपने वि क्षण में उत्पन्न होने वाले व्यभिचार्याभिव्यङ्कजक शब्द के ज्ञान का और उस शब्द के अर्थ के ज्ञान का प्रतिबन्धक न हो सकेगा। अतः व्यभिचार्याभिव्यङ्कजक शब्दार्थज्ञान के सामध्ये से व्यभिचारिभाव की अभिव्यक्ति होगी हैं । अतः प्रतिबन्ध-काल मे अनुपस्थित बाधकरसाभिव्यङ्कजक शब्दार्थज्ञान को प्रतिबन्धक और व्यभिचार्याभिव्यङ्कजक शब्दार्थज्ञान को प्रतिबन्धक और व्यभिचार्याभिव्यङ्कजक शब्दार्थज्ञान को प्रतिबन्ध नहीं माना जा सकता। साथ हीं, इन दोनों ज्ञानों में प्रतिबध्य-प्रतिबन्धकभाव अनुभवसिद्ध भी नहीं है, क्योंकि 'भावशबलता' में परस्पर-विरोधी व्यभिचारियों का ज्ञान सर्वसम्पत है । उक्त प्रतिबध्य-प्रतिबन्धकभाव मानने पर तो उक्त प्रकार की 'भावशबलता' का उच्छेद हो जायेगा । व्यभिचारी की -अभिव्यक्ति के विपरीत, बाध्य रस की अभिव्यक्ति का बाधकरसाभिव्यक्ति द्वारा प्रतिबन्ध अनुभवसिद्ध है । अतः इन दोनों में प्रतिबध्य प्रतिबन्धकभाव मान्य है ।

उपयुक्त विरोधनिवृत्त्ति से अतिरिक्त बहून भी विरोध की निवृत्ति अभोष्ट है-जहाँ विशेषणमान के शिलष्ट होने से प्रकृत वस्तु के व्यवहार से षप्रकृत वस्तु के ब्यवहार

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नितान्तं यौवनोन्मत्ता गाढरक्ता सदाहवे । वसुन्धरां समालिङ्ग्यच शेरते वीर तेऽरयः ॥

नितान्तमिल्यादि । हे वीर ? त्वया सह आहवे युद्धार्थमागता यौवनोन्मत्ता अरयः गाढरक्ता घनीभूतं रक्तं येषां तादृशाः सन्तः, शरीराद् वहिनिःसृतं रक्तं घनत्वमापच्यत इति प्रसिद्धम्, वसुन्धरां पृथिवीं समालिङ्ग्यच भूमौ निपत्य शेरते परलोकं गच्छन्तीति प्रकृतोद्यम् । अत्र यौवनोन्मत्ता, गाढरक्ता, वसुन्धरां समालिङ्ग्यच च शेरते इति विशेषणांं विशिष्टत्वेन यौवनोन्मादयुक्ता गाढमुत्कटा रमणी समालिङ्ग्यच स्वपन्नीति अप्रकृतकार्मि च व्यवहारोदपि प्रतीते । तत्र प्रकृतारिद्व्यवहारेण च शृङ्गारस्यापि प्रतीति । तत्र चान्योः शृङ्गारकरणयोरविरोधो भिन्नधर्मिकत्वादित्येकः पन्थाः, अप्रकृतकार्मि व्यवहाराभेदेन प्रकृतारिधर्मिकव्यवहारस्य भाषामानसवादविरोधो वा, अभेदप्रतीतो विरुद्ध योरप्य विरोधप्रतीते; पुरुषसिद्धवत् । अयमेव डविरोधः काव्यप्रकारो ‘सामेनाथ विवादक्षत’ इत्यनेनोक्तः । ‘उत्क्षिप्ता: कबरोरमू….’ इत्यत्र तु समासोक्तिबलालायातस्यादृट्स्वम्, अत्र पुनर्नं तथेत्युभयोर्विशेषः । वस्तुतस्त्रापि कर्थ न राजस्तुत्यनुज्झलुमुख्यो रिति चिन्त्यम् । राजस्तुतिरविवक्षया वा कर्थाश्चित् समाधेयम् । अन्यथोदाहरणद्वयस्य पृथगुपादानं व्यर्थमेव । अत एव प्रकारोऽपि ‘विवक्षित’ इत्युक्तम् । इदमत्र बोध्यम्—अत्र प्रकरणे प्रतिपादितो विरोधो निवन्धनाभिप्रायेण, वस्तुतस्तु व्यवहारो निवेदित इव कथनेऽपि भिन्नार्ङ्भिन्नविषयोरप्युद्भवो भवत्येविति ।

की प्रतीति ( समासोक्तिमथ्यल में ) होती, किन्तु वे दोनों प्रकृत-अप्रकृत-व्यवहार किसी अन्य के अङ्ग नहीं होते । जैसे:—“हे राजन् ! युवावस्था से अत्यन्त उन्मत्त और संग्राम में आपके अस्त्र-शस्त्राघात से बहता हुआ रक्त जिनके शरीरों पर जम गया है वे आपके शत्रु पृथ्वी की गोद में सो रहे हैं ।”

९. यह ग्रन्थकार का अभिप्राय प्रतीत होता, किन्तु यहाँ भी करण और शृङ्गार दोनों ही 'उत्क्षिप्ता: कबरोरमू…' आदि पद्य की तरह राजस्तुति के अङ्ग क्यों नहीं हैं—यह विचारणीय है । राजस्तुति को अविवक्षित मानकरं कथञ्चित् संगति हो सकती, है, अन्यथा पृथक्-पृथक् दोनों उदाहरणों का निर्देश निष्प्रयोजन है ।

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इथंमविरोधसंपादनेनापि निवध्यमानो रसो रसशब्देन श्रुज्झारादिशब्दैर्वा नाभिध्यातुमुच्यितः, अनास्वाद्यतापत्तेः। तदास्वाददश्र व्यङ्ङजनमात्रनिष्पाद्य इत्युक्तत्वात्। यत्र विभावादिभिरभिव्यक्ततस्य रसस्य स्वशब्देनाभिधानं तत् तु को दोष इति चेत्, ? व्यङ्ङ्यचस्य वा च्योकरเณ सामान्तो वमनास्यदोषस्य वक्ष्यमाणत्वात्। आस्वाद्यतावच्छेदकरूपेण प्रत्ययानकतया रसस्थले वाच्य-वृत्ते: कापेयकल्पत्वेन विशेषदोषत्वाच्च।

इदानों रसदोषाणां भिधातुमुपक्रमते—इथंमित्यादिना। पूर्वोक्तप्रकारैरित्यर्थः। निवध्यमान:=आस्वाद्यतावेन प्रतिपादयिष्यति। अनास्वाद्यतापत्तेरिति। विभावा-व्यभिव्यक्ततस्यैव रसस्यास्वादत्वनियमादिति भावः। इयं चाप्तियेन्र केवलेरसादि-पदव्याच्यत्वं न तु विभावाद्यभिव्यक्ततरवमपि तत् बोध्यम्। यत्र तुभयं तत्राह—यत्रे त्यादि। सामान्त इति। सर्वेऽपि व्यङ्ङ्यधरैवेन चमत्कृतिजनकानां वाच्यत्वे सत्यं दोष इत्यभिप्रायेणेदेमुक्तम्। केचित् वलङ्काराणां वाच्यत्वेऽपि रचिच्छमत्कृति-जनकत्वं मन्यन्ते। रसस्थलमात्रे दोषमह—आस्वाद्यतावच्छेदकरूपेणेत्यादिना। वाच्यत्वादिसहकृतविभावा व्यभिव्यक्ततत्वेन रूपेणेत्यर्थः। कापेयकल्पत्वेनेति। कपे: कर्म कापेयम्, निरर्थकं कर्म, तत्सदृशवनेतस्यर्थः। विशेष इति रसस्थल-मान्राभिप्रायेण। निवध्यमानोऽभिव्यक्ततार्ङ्कितस्य रसस्याभिधाने तु न

यहाँ 'यौवनोन्मत्तता:' ( नवयौवन के दर्प से समन्वित ), 'गाढ़रक्तता:' ( अत्यन्त अनुरक्त ) और 'वसुन्धरां समालिङ्ग्य शेरते' ( ज्योतिष्मती—सुन्दरी नायिका का आलिङ्गन कर सो रहे हैं ) इन विशेषणों के श्लिष्ट होने से अप्रकृत कामुक पुरुषों के व्यवहार की भी ( समासोक्तिमाहात्म्यप्रयुक्त ) प्रतीति होती हैं । किन्तु प्रकृत-व्यवहार अप्रकृत-व्यवहार से अभिन्न रूप में भाषित होता । यही 'अभेदेन भाषमानत्व' दोनों में अविरोध का निमित्त है ।।

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एवं स्थायिव्यभिचारिणामपि शब्दद्वाच्यतवं दोषः। एवं विभावानुभाव-

योरसम्यकप्रतीतये विलम्बेन प्रतीये वा न रसास्वाद इति तयोर्दोषत्वम् । सम-

बलप्रबलप्रतिकूलरसाङ्गानां निवन्धनं तु प्रकृतरसपोषप्रतीपकर्मिति दोषः।

दोषः। अत एवं 'धातुः शिल्पातिशय................' इत्यत्र काव्यप्रकाशोदाहरणे 'शृङ्गारस्योपनतस्मधुरा राज्यमेकातपत्रम्' इत्यत्र चतुर्थे पदे शृङ्गारशब्देनाभिधानेsपि न दोषः। अत्रहि यत्र मुख्यतस्तत्सततप्रतीपादनं स्वशब्देन तत्रैव दोष इत्यपि मतम् ।

दोषः = व्यभिचारिभावादि का नामोल्लेख । अत एव = इसीलिये । 'धातुः शिल्पातिशय................' = काव्यप्रकाश में दिया गया उदाहरण । इत्यत्र = इस उदाहरण में । काव्यप्रकाशोदाहरणे = काव्यप्रकाश में दिये गये उदाहरण में । शृङ्गारस्य = शृङ्गार रस का । उपनत = प्राप्त । स्मधुरा = मधुर । राज्यम् = राज्य । एकातपत्रम् = एकछत्र । इत्यत्र = इस उदाहरण में । चतुर्थे पदे = चौथे पद में । शृङ्गारशब्देन = शृङ्गार शब्द द्वारा । अभिधानेsपि = कथन करने पर भी । न दोषः = दोष नहीं है । अत्रहि = यहाँ पर । यत्र = जहाँ पर । मुख्यतः = मुख्य रूप से । तत् = उस (व्यभिचारिभावादि) का । सततप्रतीपादनम् = निरन्तर कथन । स्वशब्देन = अपने नाम से । तत्रैव = वहीं पर । दोषः = दोष होता है । इत्यपि मतम् = ऐसा भी मत है ।

व्यभिचारिणामिति । यत्र पुनस्तद्व्यभिचारिरिविशेषणीयतोडनुभावादिनं वचन्ते तत्र तेन व्यभिचार्यभिधप्रत्तेः स चरङ्गरत्वात् स्वशब्देन व्यभिचार्यभिधानेऽपि न दोष इति प्राञ्चः।

व्यभिचारिणामिति = व्यभिचारिभावों के नामोल्लेख में । यत्र = जहाँ पर । पुनः = फिर । तद् = उस (व्यभिचारिभाव) को । व्यभिचारिरिविशेषणीयतया = व्यभिचारिभाव के विशेषण के रूप में । अनुभावादिनम् = अनुभाव आदि का । वचन्ते = कथन करते हैं । तत्र = वहाँ पर । तेन = उस (व्यभिचारिभाववाचक) शब्द से । व्यभिचार्यभिधप्रत्तेः = व्यभिचारिभाव का कथन होने के कारण । सः = वह (व्यभिचारिभाव) । चरङ्गरत्वात् = अङ्ग होने के कारण । स्वशब्देन = अपने नाम से । व्यभिचार्यभिधानेऽपि = व्यभिचारिभाव का कथन करने पर भी । न दोषः = दोष नहीं होता । इति प्राञ्चः = ऐसा प्राचीन आचार्यों का मत है ।

"न दोषः स्वपदेनोक्तावपि सस्वारिणः वचचित् ।" इति ।

"न दोषः = दोष नहीं है । स्वपदेनोक्तावपि = अपने नाम से कथन करने पर भी । सस्वारिणः = सत्त्व (स्थायीभाव) के साथ रहने वाले (व्यभिचारिभाव) के । वचचित् = कथन में ।" इति = ऐसा (कथन है) ।

समबलेत्यादि। समबलप्रतिकूलरसाङ्गानां प्रबलप्रतिकूलरसाङ्गानां चेत्यर्थः। आधानिबन्धने सुन्दोसुनदवुभयोरनिष्पत्तेः, द्वितीये प्रकृताध्यक्क्तिप्रतिबन्धे दोषः। एतेन दुर्बलानामत एव प्रबलप्रकृतबाधकानां प्रतिकूलरसाङ्गानां निवन्धनं प्रकृतपरिपोषाय कर्तुं न शक्यमिति सूचितम् । प्रबन्ध इति । पुनः पुनरिति प्रायेण प्रबन्धकाव्य एव सम्भवतोति प्रबन्ध इत्युक्तम् । सामग्र्येण = समबद्वयाsदनुभावादिपरि-

समबलेत्यादि = यहाँ से आगे । समबलप्रतिकूलरसाङ्गानाम् = समबल (समान बल वाले) प्रतिकूल रस के अङ्गों का । प्रबलप्रतिकूलरसाङ्गानाम् = प्रबल (अधिक बल वाले) प्रतिकूल रस के अङ्गों का । चेत्यर्थः = और ऐसा अर्थ है । आधानिबन्धने = रचना करने में । सुन्दोसुनदवुभयोरनिष्पत्तेः = दोनों की ही अनिष्पत्ति होने के कारण । द्वितीये = दूसरे (प्रबल प्रतिकूल रसाङ्गों के निबन्धन) में । प्रकृताध्यक्क्तिप्रतिबन्धे = प्रधान रस की शक्ति के प्रतिबन्ध होने के कारण । दोषः = दोष होता है । एतेन = इस कथन से । दुर्बलानाम् = दुर्बल (कम बल वाले) रसाङ्गों का । अत एव = इसीलिये । प्रबलप्रकृतबाधकानाम् = प्रबल (अधिक बल वाले) प्रधान रस का बाध करने वाले । प्रतिकूलरसाङ्गानाम् = प्रतिकूल रस के अङ्गों का । निवन्धनम् = निबन्धन । प्रकृतपरिपोषाय = प्रधान रस के परिपोष के लिये । कर्तुम् = करने के लिये । न शक्यम् = शक्य नहीं है । इति सूचितम् = ऐसा सूचित किया गया है । प्रबन्ध इति = प्रबन्ध काव्य में । पुनः पुनरिति = बार-बार । प्रायेण = प्रायः । प्रबन्धकाव्य एव = प्रबन्ध काव्य में ही । सम्भवतोति = सम्भव होता है । प्रबन्ध इत्युक्तम् = प्रबन्ध ऐसा कहा गया है । सामग्र्येण = समग्र रूप से । समबद्वयाsदनुभावादिपरि = समबद्ध अनुभाव आदि के द्वारा ।

जनकता होती उन्का भी शब्ददतः अभिधान होने पर होता है। इसी लिये इस दोष

को सामान्य दोष कहा गया है। रस-रसाभास-स्थलों में तो व्यङ्गच को वाच्य

बना देने पर 'निरर्थकत्व' नामक विशेष दोष भी होता, क्योंकि जिस व्यङ्गचजनामात्र-

गम्यत्व रूप में रस में आस्वाद्यता होती उस रूप में व्यक्त किये जाने के बाद पुनः

उसका वाच्य रूप में—जिस रूप में रस आस्वाद्य कभी नहीं होता—निर्देश करने

का कोई प्रयोजन रह नहीं जाता। यह कार्य तो वानर के कार्य के समान सदृश्या

निष्प्रयोजन है।

इसी प्रकार, स्वार्थविभाव और व्यभिचारिभावों की भी शब्दद्वाच्यता एक दोष

है। किन्तु काव्यप्रकाशकार आदि का मत है कि जहाँ किसी विशेष व्यभिचारिभाव

का सुनिदिष्ट रूप में अभिव्यञ्जक अनुभाव कवि द्वारा निबद्ध न हो वहाँ व्यभि-

चारिभाव की असनिगद्ग अभिव्यक्ति न होने से व्यभिचारिभाव के वाच्य होने पर

भी कोई दोष नहीं होता। इसी तरह, विभाव और अनुभाव की सम्यक्‌-प्रतीति न

होने और विलम्ब से प्रतीति होने पर भी रसास्वाद न होने से विभावादि की

असम्यक्‌-प्रतीति और विलम्ब-प्रतीति भी दोष हैं। प्रधान रस के समबल अथवा प्रबल प्रतिकूल रस के विमावादि के निबन्धन से भी प्रधान रस के आस्वाद में बाधा होती; अतः समबल अथवा

प्रबल प्रतिकूल रस के शृङ्गारादि के निबन्धन भी दोष हैं।

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प्रबन्धे प्रकृतस्य रसस्य प्रसङ्जान्तरेsपि विच्छिन्नतस्य पुनर्दीपने सामाजिकानां न सामग्र्येण रसास्वाद इति विच्छेददीपनं दोषः।

तथा तत्तद्रसप्रस्तावना- पोषितत्वेन रूपेण। प्रबन्धे प्रकृतस्य...दोष इति। तदुक्तं धन्यालोकवृत्तौ— ‘उपभुक्तो हि रसः स्वसामग्रीलङ्घपरिपोषः पुनः पुनः परामृश्यमानः परिम्लानकुसुमकल्पः कल्पते’ इति। अत्रेदं बोध्यम्—दीपदीपनं नामायं दोषो नाङ्गीरोषे, तस्य सत्त्वेन रसाभिव्यञ्जनाद् इति। एवञ्चात्रैवोदाहरणं वाच्यम्। रसान्तरसमावेशः प्रस्तुतस्य रसस्य यः। नोपहतस्यैङ्जितां तस्य स्थायित्वेनावभासिनः॥

प्रबन्धे प्रकृतस्य इति पाठः कर्तव्यः।

अयं चापरो विशेषः—‘परिपोष गतस्यापि पौनःपुन्येन दीपनम्’ इत्यादिधन्यालोकवचनं प्रतीत्य यत्रप्रबन्धे एकत्र परिपुष्टस्य कस्यचनाङ्गरसरसस्य प्रसङ्जान्तरव्यवहितं पुनः पुनरन्धानं महाकवीनां न कार्यमिति। तदुक्तिग्रन्थेनैष्यमर्थः र्फुटः।

तथा चेतदनुरोधेन कस्यचनाङ्गरसरस्य समनालम्बनत्वेनैव कत्र्र्वसरे सामग्र्योपनिबन्धनं कर्तव्यम्, न तु भूयो भूयःस्थैति प्रतिफलति।

‘प्रसङ्गान्तरेण विच्छिन्नतस्य पुनर्दीपने सामाजिकानां न सामग्र्येण रसास्वादः’ इत्युक्ततें गङ्गाधरकारमतेऽपि विच्छिन्नदीपनं दोषः पुनःसत्त्वे प्रबन्धे भवेद यथाऽऽद्गररसस्यावशिष्टसामग्र्या निबन्धनमिति कविच्छद्विलक्षण एवं दोषो गड्गाधरोक्कदोषाद इति प्रतोयते।

किसी प्रबन्ध-काव्य में किसी अङ्गी रस' के अभिव्यञ्जक सामग्री का एक अंश एक स्थान पर और अन्य अंशों का अन्य स्थानों पर निबन्धन करने पर सहृदयों को पूर्णरूप में रसास्वाद नहीं हो पाता।

अतः ऐसा करने पर 'विच्छेददीपन' नामक दोष होता। इसी प्रकार, अयुक्त अवसर पर किसी रस की सामग्री का निबन्धन करने पर भी यह दोष होता।

१. 'प्रबन्धे प्रकृतस्य' यह पाठ मान कर ऐसा अनुवाद किया गया है।

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नहेंडवसरे प्रस्तावं; विच्छेदानन्ह च विच्छेद:। यथा संध्यावन्दनदेव-यजनादिधर्मवर्णने प्रस्तुत्के कयापि कामिन्या सह कस्याचित्कामुकस्यामुकस्यानुराग-वर्णनं। यथा च सुप्रतिष्ठितेषु महाहवदुर्गमंदेषु प्रतिभटेषु ममंभिन्दि वचनान्युदीरयत्सु नायकस्य संध्यावान्दनादिवर्णने चेत्युभयमनुचितम्। एवम-प्रधानस्य प्रतिनायकादेर्नाविधानां चरितानामनेकविधायाश्र संपदो नायकसंवन्ध्यभ्यस्तेयो नातिशयो वर्णनीयोऽ। तथा सति वर्णयितुमिष्टो नायकस्योत्तकर्षो न सिद्धचैन, तत्प्रयुक्तो रसपोषश्र न स्यात्। न च प्रतिनायकोत्तकर्षस्य तद्भिमभावकनायकोत्तकरर्षाज्जात्वालकथमवर्णनीयत्वमिति वाच्यम्। यादृशस्य प्रतिनायकोत्तकर्षवर्णनस्य तद्भिमभावकनायकोत्कर्षा-जातसंपादकत्वं तादृश्येष्टत्वात्। तद्विरोधिन एव निवेशयत्वात्। न च

और जिस रस का जहाँ विच्छेद उचित न हो वहाँ उसक। विच्छेद भी दोष हैं। जैसे - संध्यावन्दन, देवपूजन आदि का वर्णन करते समय किसी कामुक पुरुष का किसी कामिनी के प्रति अनुराग का वर्णन करने पर प्रथम दोष और महान् रणधीर शत्रु द्वारा उपस्थित होकर नायक के प्रति मर्मंभेदी वचन कहते समय नायक द्वारा संध्यावन्दन आदि कर्मों के वर्णन में द्वितीय दोष है। इसी प्रकार, नायक के विभिन्न चरितों और गुण आदि की अपेक्षा प्रतिनायक के चरितादि का उत्कृष्ट वर्णन करना भी दोष ही है, क्योंकि ऐसा करने पर नायक का प्रतिनायक को अपेक्षा विशक्षित उत्कर्ष अवगत नहीं होता। यद्यपि प्रतिनायक का उत्कर्षं उसका पराभव करने वाले नायक के उत्कर्ष का परिपोषक होता है तथापि यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रतिनायक का जितना उत्कर्ष नायक के उत्कर्ष परिपोषक हो उतने हीं उत्कर्ष का वर्णन हो, उससे अधिक नहीं। उससे अधिक उत्कर्ष का वर्णन तो सर्वथा परित्याज्य है। नायक द्वारा प्रतिनायक का अभिभव या विनाश करने से

तु काव्यप्रकाशनिर्दिष्टौ दोषौ धन्यालोकोक्तदोषाभिन्नतया व्याख्यात:। अन्र काव्यमंजूषा: प्रमाणम्। अनहेंडवसर इति। 'अकाण्डे च प्रकाशनम्' इति रूपेण ध्वन्यालोकोक्तदोषाभिन्नता बोधयम्। अड्डिगरसरिप्लुते हि सहृदयचेतसि तद्विरोधस्तत्सम मानाधीकरणस्तद्व्याधिकरणे वा तत्समानवैश इत्यमुषि तु उदाहृत-रसांतरस्थप्रवर्हितानिदानद्विरोध उपपादनीयो यथोचित्यम्। विच्छेदा-नहं इति। अयमेवाकाण्डे विच्छेद: प्रागुक्तोऽस्ति। अयं चाडिगमात्रविषय:। यद्वा यथासंभवमुभयविषयमिदं दोषद्वयम्। उभयम= अनवसरे प्रस्तावो विच्छेदश्च द्रावान्तरमाह- एकमित्यादिना।

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प्रतिपक्षस्य प्रकृतापेक्षया वर्ण्यंमानोऽप्युत्कर्षः स्वाश्रयह्नतामात्रादेव प्रकृतगतमुत्कर्षमपि नाशायेत्, अतो न दोषावह इति वाच्यम् । एवं हि सति महाराजं कमपि विषरक्षसेपसात्रेण व्यापादितवतो वराकस्य शबरस्येव प्रकृतस्य नायकस्य न कोऽप्युत्कर्षः स्यादिति । तथा रसालम्बनाश्रययोःरसंधानमन्तरान्तरा न चेद्दोषः । तदनुसंधानाधीना हि रसप्रतिपत्तिर्धारा तदनुसंधाने विरता स्यात् । एवं प्रकृतरसानुपकारकस्य वस्तुनो वर्णनंमपि प्रकृतरसविरामहेतुत्वाद्दोष एव ।

प्रतिनायक का अधिकाधिक उत्कर्ष भी नायक के उत्कर्ष का परिपोषक हीं होगा—यह कहना भी असंगत है, क्योंकि वैसी स्थिति में नायक का कोई उत्कर्ष उसी प्रकार प्रतीत नहीं होगा जिस प्रकार किसी शूर महाराज को केवल एक विवादक वाण के द्वारा मार गिराने वाले क्षुद्र शबर ( किरात ) का कोई उत्कर्ष प्रमाणित नहीं होता । इसी तरह, मुख्य रस के आलम्बन और आश्रय का कथा के बीच में अनुसंधान न करना भी कवि की कृति में एक दोष है, क्योंकि ऐसा होने पर आलम्बनादि के अनुसंधान से होने वाले रसास्वाद का विच्छेद हो जाता ।

अनौचित्यं तु रसभङ्गहेतुत्वात्परिहरणीयम् । भृङ्गश्र पानकादिरसादौ सिक्तादिनिपातजनितेवाहन्तुदता ।

अनौचित्य तो रस-भङ्ग का प्रमुख कारण होने से सर्वथा त्याज्य है । रस-भङ्ग का अर्थ अप्रियता है । जैसे किसी मृष्ट पेय पदार्थ में बालू आदि के मिल जाने से उसके आस्वाद में अप्रियता आ जाती उसी तरह रसास्वाद में आई अप्रियता हो रस-भङ्ग कहलाती ।

तच्च जातिदेशकालवर्णाश्रमवयोवस्थाप्रकृतिग्रयबहुरादे: प्रपञ्चजातस्य

जाति, देश, काल, वर्ण, वाश्रम, वय, अवस्था, प्रकृति, व्यवहार, आदि के

प्रतिनायकचरितादे: स्वाश्रयेतत् । स्वयं प्रतिनायकोपकर्षस्तदाश्रयः प्रतिनायक एव । उत्कर्षाश्रयानाश्रयमात्रस्य नोत्कृष्टतरसर्वमिति दृष्टान्तमुखेन समाधत्ते—एव । एवं हीत्यादिना । एतावताऽत्रपररसोपकारकस्यापि वर्णनंमपि प्रकृतरसविरामहेतुत्वाद्दोष एव । कतश्चिदमिति प्रतिपादितम् । दोषान्तरम्—तथेत्यादिना । रसो ह्यत्र प्रधानो

भवतीत्यादि । तदाश्रयादेव प्रकृतभङ्गान्तरानुसंधाने वैरस्यात् । एवमप्यादिनाडङ्गस्य वर्णनं दोष इत्याह ।

अस्यं दे षमादहु—अनौचित्यमिति । पूर्वोक्तानां दोषाणामनौचित्यांतर्गतत्वेऽपि नात्रविवक्षिते । तच्च = अनौचित्य च ।

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तस्य तस्य यललोकशास्त्रसिद्धमुचितद्रव्यगुणक्रियादि तद्भेद । जात्यादेरनुचितं यथा - गवादेश्तेजोलकायैणि पराक्रमादीन, सिंहादेश्र साधुभावादीन । स्वर्गे जराव्याध्यादि, भूलोके सुथासेवनादि । शिशिरे जलविहारादीन, ग्रीष्मे वन्तिसेवा । ब्राह्मणस्य मृगया, बाहुजस्य प्रतिग्रहः, शूद्रस्य निगमाधययनम् । ब्रह्मचारिणो यतेश्र ताम्बूलचर्वणम्, दारोपसंग्रहः । बालवृद्धयोः स्त्रीसेवनम्, यूनश्र विरागः । दरिद्राणामाढचाच्च रणम्, आढचानां च दरिद्राचारः । प्रकृतयो दिव्या:, अदिव्या:, दिव्यादिव्याश्र । धीरोदात्तधोरोदधीरललितधीर शान्ता उत्साहक्रोधकामिनी रतिनिवेदप्रधान उत्तममध्यमाधमाश्र ।

लोक-सिद्ध तथा शास्त्र-सिद्ध जो जो द्रव्य, गुण, क्रिया आदि अनुकूल हैं उनसे भिन्न का वर्णन हाँ अनौचित्य है। इनमें जातिगत अनौचित्य गाय बैल आदि क्षुद्र सत्वों द्वारा तेजस्विता और बल के कार्य पराक्रम आदि के और सिंह आदि उग्र पशुओं द्वारा साधुता आदि के प्रदर्शन के वर्णन में स्पष्ट है । स्वर्ग में जरा एवं रुग्णता के वर्णन में, भूलोक में अमृतपान आदि के वर्णन में देशगत अनौचित्य हैं । ब्राह्मण द्वारा शिकार खेलने, क्षत्रिय द्वारा दान लेने और शूद्र द्वारा वेदाध्ययन आदि के वर्णन में जातिगत अनौचित्य है । आश्रमगत अनौचित्य ब्रह्मचारी और सन्यासो द्वारा पान चबाने और विवाहादि कार्य के वर्णन में स्पष्ट है । वयोगत अनौचित्य बालक और वृद्ध की कामिनी में आसक्ति और युवक को उससे विरक्ति के वर्णन में है । अवस्थागत अनौचित्य है । दारिद्रच्यावस्था में वर्तमान व्यक्तियों द्वारा धनियों जैसे काय के सम्पादन और धनियों द्वारा दरिद्रों जैसे आचरण के वर्णन में । प्रकृतियाँ तीन प्रकार की होतीं–दिव्य, अदिव्य और दिव्यादिव्य । इनसे प्रत्येक के चार प्रभेद होते–धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित और धीरप्रशान्त । इन

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तत्र रत्यादीनां भयादतिरक्तस्थायिभावानां सर्वत्र समत्वेऽपि रते: संभोगरूपाया मनुष्ये दिव्योत्तमदेवतासु स्फुटीकृतसकलानुभाववर्णनमनुचितम् त क्रोधस्य च लोकभस्मीकर रणपटोर्दिनरात्रिव्यत्ययाद्यनेकाश्चर्यंकारिणो दिव्येशिवादिषु आलंबनगताराध्यतत्त्व्यानुभावगतमिध्यात्वस्य च प्रतीतया

रतिप्रधाना धीरललिता, निर्बेंदप्रधाना धीरशांतेतिचतुर्धा विभज्यते। तदेवं द्वादशधा प्रकृति:। सर्वांगयोगेन समग्राराध्यप्रभेदैरदिव्यादिषु द्वादशभेदैर्दिव्यादिषु मृदुल्लते, परत्र त्रिविधभेदा प्रकृति: पर्यवस्यति। भयादतिरक्तेति। भयमुपलक्षणमन्यस्यापि तत्स्थायिकाद्योरसस्य स्थायिभावस्य। यथोत्तमदेवतासु शोकाभाव:। यथा वा निर्बेंदवति नायकेजुगुप्साद्यभाव:। तथा च यत्र नायके य: स्थायिभाव उपपनस्तत्र तस्योचितेन वर्णनं कार्यमिति तदयंम्। स्फुटीकृतेत्यादि। स्फुटीकृता सकला रतेरनुभावा यत्र तदवर्णनमत्थर्थ:। उत्तमदेवतास्वभाव:। रत्यतिचैवमेक गीतगोदिन्दं प्रकृत्य उपलक्षणमेतदुत्कृष्टममात्रस्य। अत एवातमप्रकृते राजादेरपि संभोगशृंगाररवर्णनमनुचितम्। परस्वप्रेक्षरशांतनादय: शृंगारारंभेदास्तु वर्णनीयाः। लोकभस्मीकर णोत्यादि विशेषणदयं क्रोधस्य। एतादृशस्योक्तकटक्रो धस्यादिव्येषु नायकेषु वर्णनमनुचितम् इत्यर्थ:। 'अदिव्येषु' इत्युक्तेर्दिव्यादिव्येषु तद्वर्णने दोषोचिंतार्भाव: सूच्यते। उक्तविधिसंभोगशृंगारवर्णने तदनुरोधेन च यदनौचित्यमुक्तं तन्न क्रमेण हेतुदयमाह- आलंबनगतैरत्यादिना। यत्र नायके सभ्यानां वितृष्णा बुद्धि: तन्निर्बंधट रत्या स्वानभूता यां नायिकायां मातृकुचद्वयाद्यमाराध्येऽपि प्रतीतेस्तद्रि शय संभोगवर्णनमुंदे जकं सभ्यानां न तु शृंगारारंभयडुत्कमिध्याशय:। यत्र चादिव्ये लोकभस्मीकर णदु क्रोधो नोदेतेव तत्र तादृशकोधवर्णने मिध्यात्वप्रतीते चा।

चारों में क्रमश: उत्साह, क्रोध, कामिनीविषयक रति और निर्वेद की प्रधानता होती। इस प्रकार प्रकृति के बारह प्रभेद हुए। इनके भी उत्तम, मध्यम और अधम भेदों के आधार पर तीन-तीन उपभेद होते हैं! अतः छत्तीस प्रकार की प्रकृतियां सिद्ध हुईं। इन सबमें यद्यपि उत्तम दिव्य प्रकृतियों में भय ( क्रोध शोक ) को छोड़कर अन्य रसादि भाव अदिव्य-मानव प्रकृतियों के समान होते अवश्य हैं तथापि जिस प्रकार की संभोग-स्वरूप रति का स्पष्ट एवं पूर्ण वर्णन मानवप्रकृतियों में किया जाता उस प्रकार का स्पष्ट एवं पूर्ण वर्णन उत्तम दिव्य प्रकृतियों में नहीं करना चाहिए। इसे तरह दिव्य प्रकृतियों में जैसे संसार को भस्मसात् कर देने में, दिन को रात में और रात को दिन में बदल देने और इसी प्रकार के अन्य आश्चयंजनक घटनाओं को उत्पन्न कर देने में समर्थ क्रोध का वर्णन अदिव्य प्रकृतियों में भी कर देना अनुचित है। मानव प्रकृति में वर्णनीय रति के समान रति का उत्तम दिव्य

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रसातुल्लासाप्त्ते:। न च साधारणीकरणादाराध्यतत्त्वज्ञानानुत्पत्तिरिति वाच्यम्। यत्र सहृदयानां रसोद्बोध: प्रमाणसिद्धस्तत्रैव साधारणीकरणस्य कल्पनात्। अन्यथा स्वमात्रविषयकस्वपित्ररतिवर्णनेsपि सहृदयस्य रसोद्बोधापत्ते:। जयदेवादिभिस्तु गीतगोविन्दादिप्रबन्धेषु सकलसहृदयसंमतोदयं समयो मदोन्मत्तमतङ्गजैरिव भिन्न इति न तत्रिदर्शननेदानीन तनेन तथा वर्ण्यितुं सांप्रतम्। विद्यावयोवर्णाश्रमतपोभिरुत्कृष्टै: स्वतोदपकृष्टेषु न सबहुमानेन वचसा व्यवहर्तव्यम्। व्यवहर्तव्यं चाप- कृष्टैस्तकृष्टेषु। तत्रापि तत्रभवन्तभगवन्नित्यादिमि: संवोभ्रनेमुनिगुरुदेवता

प्रकृतियों में वर्णन करते समय उनमें जो लोगों का आराध्यतत्त्व-ज्ञान होता है उसके कारण सहृदयों में दिव्यप्रकृत्यालम्बनक शृङ्गार रस की अनुभूति न हो सकेगी। इसी तरह मानव में दिव्य प्रकृति के समान आश्चर्यजनक क्रोध के वर्णन में उस क्रोध के मानवनिष्ठ उत्त अनुभावों में दिव्यात्म-बोध होने से सहृदयों को तन्मात्रालम्बनक रौद्र रस की प्रतीति भी न हो सकेगी। अतः इस प्रकार के वर्णन अनुचित हैं। भावकत्व व्यापार आदि के कारण दुष्यन्ततत्त्व आदि के समान आराध्यतत्व के भी आच्छादित—अव्यक्त हो जाने से रस-प्रतीति होने में उपयुक्त आराध्यतत्व-ज्ञान प्रतिबन्धक न हो सकेगा—ऐसा कहना असंगत है, क्योंकि यदालम्बनक रसप्रतीति प्रामाणिक है। तदालम्बनविषयक साधारणीकरण ही मान्य है, अन्य प्रकार का नहीं। यदि ऐसा न हो तो अपने माता-पिता का रति-वर्णन में भी साधारणीकरण द्वारा मातृत्व पितृत्व का आच्छादन हो जाएगा, फलतः वहाँ भी पुत्रादि सहृदयों को शृङ्गार रस की प्रतीति मानी होगी। परन्तु यह नितान्त अनुचित एवम् अप्रामाणिक है—ऐसी सभी सहृदयों की मान्यता है। हाँ; जयदेव आदि कुछ कवियों ने गीतगोविन्द आदि में पागल हाथी की तरह इस मान्यता का उल्लङ्घन अवश्य किया है, किन्तु उन्हें निदर्शान मानते हुए ऐसा वर्णन करना अनुचित है। व्यवहारीचित्य का निर्वाह करते हुए कवि को विद्या, वय, वर्ण, आश्रम एवम् तप से उत्कृष्ट व्यक्तियों द्वारा अपनी अपेक्षा हीनतर

रौद्ररसाभिध्यवितन्नं भवतीत्यर्थो द्वितीयस्य हेतुवाचकस्य। साधारणीकरणादिति। भट्टनायकादिमते पूर्वोक्ते भावकत्व्यापारभावनविशेषमहृत्तया साधारणीकरणाद् यथा दुष्यन्ततत्त्वादिकं न प्रतीयते तथैवाराध्यतत्त्वमपि देवपरस्यादिषु न प्रतीयतेतस्याश्रय: शृङ्गितुः। समय:=सिद्धान्तः। समय: सङ्केत इत्यपद्याश्यानम्। भिन्न:=भिन्न;, परित्यक्तः।

इस प्रकार के वर्णन में रौद्र रस की अभिव्यक्ति होती है, यह द्वितीय हेतुवाचक का अर्थ है। साधारणीकरण से तात्पर्य है कि भट्टनायक आदि के मत में पूर्वोक्त भावकत्व व्यापार भावना विशेष के द्वारा साधारणीकरण होता है, जिससे दुष्यन्त तत्त्व आदि की प्रतीति नहीं होती, उसी प्रकार आराध्य तत्त्व की भी प्रतीति नहीं होती। यहाँ आश्रय शृङ्गार का विषय है। समय का अर्थ है सिद्धान्त, और सङ्केत इसका पर्याय है। भिन्न का अर्थ है भिन्न या परित्यक्त।

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प्रभृतय एव न राजादय:, जात्योत्तमैद्रिजैरैव नाधमै: शूद्रादिभि:, परमेश्वरेत्यादिसंबोधनैश्चक्रवर्तिन एव न मुनिप्रभृतय: संबोध्या: ।

व्यवहर्तृनौचित्यं प्रतिपादयति — जात्येत्यादिना । उत्तमैर्ये धन्यालोककृत्तिस्थं वचनं प्रमाणत्वेन निर्दिशति—तथा चाहुरिति । परोपनिषत् = उत्कृष्टोपनिषदविद् रसतत्त्वाभिज्ञःक: प्रसिद्धौचित्यबन्ध इत्यर्थ: । सर्वलोकस्वतन्त्रं रावणं स्तोतुं तस्य द्वारि समवेता ब्रह्मादीन् प्रति दौवारिक-

तथा चाहु: — अनौचित्यादृते नान्यद्रसभङ्गस्य कारणम् । प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योप निषत्परा ॥

व्यक्तियों के प्रति अत्यादरसूचक वचन का प्रयोग नहीं करवाना चाहिए । इसके विपरीत होन व्यक्तियों द्वारा उत्कृष्ट व्यक्तियों के प्रति उस प्रकार के वचन का प्रयोग, औचित्यानवबोधार्थ, कवि को अवश्य करवाना चाहिए । अत्यादरसूचक वचन के प्रयोग के विषय में भी यह ज्ञातव्य है कि 'तत्र भवन्', 'भगवन्' इत्यादि शब्दों से मुनि, गुरु, देवता आदि श्रेष्ठ व्यक्तियों का ही सम्बोधन उचित है, राजा आदि का नहीं । मुनि आदि का उपयुक्त शब्दों से सम्बोधन उत्तमजातीय द्विजों द्वारा ही उचित है, अधमजातीय शूद्र आदि द्वारा नहीं । इसी तरह, 'परमेश्वर' 'महाराज' आदि शब्दों से चक्रवर्ती राजाओं का सम्बोधन ही उचित है, मुनि आदि का नहीं ।

यावता त्वनौचित्येन रसस्य पुष्टिर्नास्तावत् न वाघ्यते, रसपतिकलस्यैव तस्य निषेध्यत्वात् । अन एव --

अत एवं आचार्य आनन्दवर्धन ने कहा है—"रस-भङ्ग का कारण अनौचित्य को छोड़कर और कुछ नहीं है । अपनी कृतियों में प्रमाणसिद्ध औचित्य का निर्वाह रस-तत्त्व की अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम प्रकार है ।"

किन्तु साधारणत: अनौचित्य के परिहार्य होने पर भी जो अनौचित्य सम्बद्ध रस का परिपोषक हो उसका उपनिबन्ध कवि को करना ही चाहिए, क्योंकि रसपरिपाक हों कवि का मुख्य लक्ष्य होता । अत एव यह स्पष्ट है कि परिहरणीय अनौचित्य का तात्पर्यं उस अनौचित्य से है जो रस-परिपाक का विरोधी हो ।

इसी लिये —

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ब्रह्मान्तध्ययनसङ्ग नेष समयस्तूष्णीं बर्हिः स्थीयतां स्वल्पं जल्प वृहस्पते जडमतेऽनैषा सभा वज्रिणः । वीरां संहर नारद स्तुतिकथालापैरर्लं तुमुरो-सीतारल्लकभल्लभभग्नहृदय. स्वस्थो न लङ्केश्वरः ॥

काव्येऽमुकित:- ब्रह्मन्नित्यादि । अध्ययनसङ्ग = रावणमडलार्थं करिष्यमाणस्य वेदपाठस्य ! तुमुरग्निर्दर्श्वः । सीतारल्लकेत्यादि । सीताया य आरल्लकः स्वर्याति राममुद्रिरय सिन्दूरधारणार्थं तथा गृहीतां लोहरलाकां सिन्दूरसरिणा सेवन भल्लक-स्तेन भग्नं हृदयं यस्य स रावण इत्यर्थः; विप्रलम्भशृङ्गारात्: = सीतालम्बनको विप्रलम्भशृङ्गाराभातः । परिपोषकतयैति । अयं ब्रह्मादीनामधिक्षेप: प्रतिपादयति यत् तस्य रावणस्यैवं परमैश्वर्यं यद् ब्रह्माद्याऽपि तत्समक्षं तुच्छा इति रीत्याSस्य परिपोषकत्वं भवति ।

इति कस्यचित्काटकस्य पद्ये विप्रलम्भशृङ्गारार्ज्जी भूत्वीररसाक्षेपकपरमै-रव्यं परिपोषकतया स्थितदौवारिकवचनस्य ब्रह्माद्यधिक्षेपपररस्यानौचित्यं न दोषः । एवमेव 'अले ले सद्दः समुप्पाडिअहरियकुसगंधिय मईआच्छ-मालापइविसंसंभिआलविटहबन्दः कअणा बम्हुणा' इत्यादिदिवूपकवच-ने डपि रेझाइदिप्रयोगस्य तत्तथा हास्यानुगुणत्वात् । एष हि दिगुपदर्शिता । अनया सुधीर्भिरन्यदृश्यं यथेष्टम् ।

उदाहरणान्तरमाह-एवमेवेति । अल्ले ले सद्द इत्यादि संस्कृतच्छाया यथा-'अरे रे सद्यः समुप्पादितहरितकुसुमग्रन्थिमया-क्षमालापारदृढतिविस्मितबालबिध्वान्तकरणा ब्रह्मणा!' इति । सद्यस्तत्क्षणं समुत्पादिताऽत एव शाञ्जुकृतद्वाद हरिता ये कुशा: तेषां ग्रन्थय: पर्वाणि तैर्निर्मिताया ब्रक्षमालाया: परिदृढितमान्रेण विस्मितमिति विश्वासं प्राप्तो बलविवश्वानामन्त:-करणं येष्टे ब्रह्मणा इति सम्बोधनम् । अनेन वस्तुत एतेषां न ब्रह्मनिष्ठत्वमिति सूचितम् ! तत् = अनौचित्यम्, तथा = न दोषावहम् ॥

"अरे ब्रह्मा ! यह वेदपाठ का समय नहीं, चुपचाप जाकर प्रतীক্ষा कर; अरे बृहस्पति ? घरी-धीरे बोल, यह इन्द्र की सभा नहीं; अरे नारद ? अपनी वीणा को हँटा; ओ तुमुरो ? स्तुतियाँ बन्द कर, क्योंकि सीता की सिन्दूर-रेखालुपी बृद्धों से आहित हृदय वल्लभाधिपति महाराज रावण इस समय स्वस्थ नहीं हैं ॥"

किसी कवि के नाटक में निबद्ध इस पद्य में रावण के द्वारपाल द्वारा ब्रह्मा आदि की निन्दा करने वाले इस कथन में अनुभयमान अनौचित्य दोष नहीं है, क्योंकि यह अनौचित्यपूर्ण कथन रावण के परम ऐश्वर्य का परिपोषक है जिससे विप्रलम्भशृङ्गाराभास का अझ्झसूत रावणालम्बनक वीररस का आक्षेप हो जाता है ।

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रसेषु चैतेषु निगदितेषु माधुर्योजःप्रसादाख्यांस्त्रीन्गुणानाहुः।

तत्र ‘शृङ्गारे संयोगाख्ये यन्माधुर्यं ततोज्ज्वलतिशयितं करणे, ताभ्यां विप्रलम्भे; तेऽप्योजपि शान्ते।

उत्तरौत्तरमति शयिततया|श्रिततदू तेऽजननात्’ इति केचित्। ‘संयोगशृङ्गारात्करणशान्तयोस्वाद्यारम्भि विप्रलम्भे’ इत्यपरे।

'संयोग-शृङ्गारात्करणशान्तयोः स्वाद्योस्ताऽध्यारम्भि विप्रलम्भे' इत्यपरे। 'न पुनस्तत्रापि तारतम्यम्' इत्यन्ये।

तत्र प्रथमचर्वमयोर्यमितयोः ‘करणे विप्रलम्भे तच्च्छान्ते चातिशयान्वितम्’ इति प्राचां सूत्रमनुकूलम्।

तस्योत्तरसूत्रगतस्य क्रमेणेति पदस्यापकर्षानिपकर्षाभ्यां व्याख्याद्वयस्य संभवा्त्।

अथ गुणानिरूपणत:- रसेष्वित्यादिन।

अत्राधिकारणे ससमी, प्राचीनेरेषां रसाश्रितत्व्वाऽऽश्रयभमाव।

आहुरिति।

भामहानुसारीणो धन्यालोकारादय इति शेषः।

तत्रैष्यादिन।

काव्यप्रकाशोक्तध्वनिभेदानुसारिपक्षमुपन्यस्यति।

विश्वनाथाऽस्यैवदेवाभिमतम्—‘सम्भोगे करणे विप्रलम्भे शान्तेऽधिकं क्रमाव्’ इति वदत्।

आनन्दवर्धनेन तु संभोगशृङ्गाराद् विप्रलम्भे करणे च माधुर्यांतिशय उत्त्कः;

तत्र चकारेण क्रमस्य विवक्षितत्व्वात् सम्भोगशृङ्गारापेक्षया मधुरतर्रो विप्रलम्भः;

ततोज्ज्वलमपि मधुरतमः करुण इति वदन्तोऽभिनवगुप्तपादा अपि यथोत्तरमुत्कर्षनिरततायं मन्यन्ते।

तत्र विप्रलम्भः' प्रकाशनतरो भवति करुणो वेत्तव्यः पूर्वंवासनाभेदकृतो विशेषः

सहृदयविशेषे—इति मन्यामहे।

उत्तरसूत्रम्= ‘वीभत्स-

इसी प्रकार, विदूषक के—

‘अरे रे ! तत्काल उखाड़ी हुई हरि कुशाओं की गांठों से बनी हुई माला फेरकर बाल विधवाओं के मन को धोखा देने वाले ब्राह्मणो ! — — —”

इत्यादि कथन में पूजनीय ब्राह्मणों के प्रति ‘अरे रे’ इस तरह के अनुचित बचन का प्रयोग दोष नहीं है, क्योंकि समपूर्ण वाक्यार्थ के ज्ञान से हास्य रस की परिपुष्टि होती है।

अनौचित्य के दोष होने और न होने के उक्त उदाहरणा दिग्दर्शानार्थ प्रस्तुत किये गये हैं।

अतः रस-परिपाक के प्रतिकूल अन्यान्य अनौचित्यों की निरा-करणीयता और उसके अनुकूल अनौचित्यों की ग्राह्यता—अदोषता का अनुसन्धान विद्वान् पाठकों को स्वयं करना चाहिए ॥

अब गुणों का निरूपण किया जा रहा है।

उपयुक्त नवविध रसों में माधुर्य, ओजस् और प्रसाद ये तीन गुण कहे गये हैं।

इनमें भी कुछ आचार्यों का मत है कि संयोग-शृङ्गार में जितना माधुर्यं होता उससे अधिक विप्रलम्भ शृङ्गार में और इन सबसे अधिक शान्तरस में होता, क्योंकि पूर्वं-पूर्वं रस की अपेक्षा उत्तरोत्तर रस से क्रमशः

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तु मतेऽकरणशान्ताभ्यां विप्रलम्भस्य माधुर्योत्कर्षे यदि सहृदयानुमवोद्रित साक्षी, तदा स प्रमाणम्। वीरबीभत्सरौद्रे शृङ्गारोदयोसो यथोत्तरमतिशय:, उतरोत्तर रसोत्कर्षयिताया श्रृङ्गारदीप्तेरर्जनात्। अद्भुतहास्यभयानकानां गुणवद्रययोगित्वं केचिदिच्छन्ति, अपरे तु प्रसादमात्रं। प्रसादस्तु

चित्तद्रुति उत्पन्न होरी है। किन्तु कुछ आचार्य मानते कि संयोग-शृङ्गार से अधिक माधुर्य करुण और शान्त रसों में और इन दोनों से भी अधिक माधुर्य विप्रलम्भ-शृङ्गार में होता जब कि कुछ अन्य आचार्यों के अनुसार संयोग-शृङ्गार की अपेक्षा करुण, विप्रलम्भ-शृङ्गार और शान्त रसों में समान रूप से उत्कृष्टतर माधुर्य होता, न कि अन्विम तीन रसों में भी पूर्वं-पूर्व से उतरोत्तर रस में क्रमश: उत्कृष्टततर माधुर्ये होता। उपर्युक्त मतों में से प्रथम तथा तृतीय मत का समर्थन तो “करुणे विप्रलम्भे तच्च्छान्ते चातिशयावनितम” (काव्यप्रकाश, उल्लास-८) इस काव्यप्रकाशोक्त वचन से हीं हो जाता है। यदि 'दीप्तयात्मविसृतिहेतु तु रौजो — — तस्याधिपत्यं क्रमेण तु' (काव्यप्रकाश, उल्लास-८) इस उत्तरसूत्र से 'क्रमेण' पद का अपकर्ष कर पूर्वसूत्र की व्याख्या की जाय तो प्रथम मत का अन्यथा—स्वतन्त्र रूप में अपकर्ष के विना हीं—व्याख्या की जाय तो तृतीय मत का समर्थन हो जाता है। द्वितीय मत में जो करुण और शान्त रसों की अपेक्षा विप्रलम्भ-शृङ्गार में अधिक माधुर्य कहा गया है उसमें यदि सहृदयों का अनुभव समर्थन हो तो वह मत भी प्रामाणिक हो सकता है, अन्यथा नहीं। वत: वीर रस की अपेक्षा बीभत्स और रौद्र रसों में क्रमश: अधिकाधिक चित्तद्रवित उत्पन्न होती अत: वीर; बीभत्स और रौद्र रसों में क्रमश: ओजोगुण के उत्कर्ष में तारतम्य होता। अद्भुत;

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सर्वेषु रसेषु सर्वासु रचनासु च साधारणः ।

गुणानां चेष्टां दृप्तिदीप्तिविकासलाघ्यास्यस्थितसरिच्चितवृत्तयः प्रयोज्याः,

तत्तद्गुणविशिष्टरसरचनावर्णाजन्या इति यावत् । एवमेतेषु गुणेषु रसमात्रधर्मेषु

व्यवस्थितेषु मधुरा रचना, ओजस्वी बन्ध इत्यादयो व्यवहाराः आकारोऽस्य दूर इत्यादिव्यवहारौपचारिका इति मम्मटभट्टादयः ।

येषां माधुर्योजःप्रसादा रसमात्रधर्मतयोक्तास्तेषां रसधर्मत्वे किं मानम्‌ ?

प्रत्यक्षमेवेति चेत्, न ।

दाहादेः: कार्योदनलगतस्योष्णस्पर्शोस्य

वारीरेडभांवेऽपि स्वसमवायिसंयुक्तस्वसमवायिन्चेन स्वाश्रयाभिव्यङ्गयकत्वसम्बन्धेन वा शरीरेद्वित्तिस्वभावाद् वाश्रयेर शृङ्गारस्वभावस्तथा रसाश्रितगुणविषयोऽपि शब्दार्थ-

वृत्तिस्वधयवहार इत्यादि । मम्मटभट्टादय इत्यन्विपदादिभिन्नगुणविश्वनाथ-

दिपरिग्रहः ।

तदेवं मम्मटादिमतं गुणानां रसधर्मत्वं प्रतिपाद्य तत्निरासोपक्रमते —येषां

हास्य और भयानक रसों में कुछ आचार्य दो गुणों--प्रसाद एवम् ओज की स्थिति मानते हैं तो कुछ अन्य आचार्य केवल प्रसाद गुण की । वस्तुस्थिति यह है कि प्रसाद गुण केवल अदश्रुतादि तीन रसों में हैं नहीं अपि तु सभी में विशिष्ट मान होता है ।

हास्य और भयानक रसों में कुछ आचार्य दो गुणों--प्रसाद एवम् ओज की स्थिति मानते हैं तो कुछ अन्य आचार्य केवल प्रसाद गुण की ।

वस्तुस्थिति यह है कि प्रसाद गुण केवल अदश्रुतादि तीन रसों में हैं नहीं अपि तु सभी में विशिष्ट मान होता है ।

ये तीन गुण—माधुर्य, ओजस् और प्रसाद—क्रमशः द्रुति, दीप्ति और विकास नामक तीन प्रकार की चित्तवृत्तियों के प्रयोजक हैं ।

तत्पर्य यह है कि उपर्युक्त तीन गुणों में से क्रमशः एक-एक गुण से विशिष्ट रस की चर्वणा से क्रमशः उपयुक्त एक-एक चित्तवृत्ति उत्पन्न होती है ।

इस प्रकार यह सिद्ध है कि ये गुण केवल रस के धर्म हैं, रसातिरिक्त शब्दादि के नहीं ।

ऐसी स्थिति में रसाभिव्यञ्जक रचना आदि में 'यह रचना मधुर है', 'यह बन्ध बड़ा ही ओजस्वी है' इत्यादि व्यवहार में शब्दादि में प्रतीयमान माधुर्यादि उसके वास्तविक धर्म नहीं, अपि तु औपचारिक हैं ।

जैसे आत्मनिष्ठ शौर्य आदि गुणों को आत्मा के अभिव्यञ्जक आकार—शरीर में आरोपित कर के 'इसका आकार शूर है' इत्यादि व्यवहार होते उसी प्रकार रसाभिव्यञ्जक रचना आदि में रस के माधुर्यादि गुणों को आरोपित करके उपर्युक्त व्यवहारों का उपपादन करना चाहिए ।

यहाँ काव्यप्रकाशकार मम्मट भट्ट आदि का मत है ।

अब विचारणीय यह है कि मम्मट आदि आचार्यों द्वारा माधुर्यादि गुणों को जो रस मात्र का धर्म कहा गया है उसमें प्रमाण क्या है ।

इसमें मानस प्रत्यक्ष स्पर्शों का जिस प्रकार वङ्गिन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष होता है उस प्रकार रस के करणेभूत

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यथा भिन्नतयानुभवस्था द्रुत्यादिचित्तवृत्तिभयो रसकार्योऽभ्योडन्येषां रसगतगुणानामनुभवात् । तादृशगुणविशिष्टरसां द्रुत्यादिकारणत्वात्कारणतावच्छेदकतया गुणानामनुमानमिति चेत् ? प्रातिस्विकरूपेणैव

इत्यादिन । प्रत्यक्षमन्र मानसं ग्राह्यम् । कारणतावच्छेदकत्वेति । कारणे विशेषण-

शृंगारादीनां द्रुत्यादिकारणत्वोपपत्तौ सत्यां कारणतावच्छेदकतया गुणानां कलपने गौरवात् । तद्र्य तात्पर्य्यं:-पूर्वोक्तस्तेषु प्रयत्ने पक्वे सम्भोगशृङ्गारकरुणादिप्रलम्भशृङ्गारशान्तानां क्रमेण प्राकृष्टप्रकृष्टतरादिद्रु तिजनकत्वं प्राणामभिमतम् ।

तथा च तत्तद्रसकार्येषु प्रतीयमानत्वाद् द्रुत्यादिर्जात्यस्य न सामान्येन सम्भोगशृङ्गारादीनां विजातीयदूती: प्रति संचारवं निवर्त्तहूति, तत्रैव-

दृतेरपि पक्षे सम्भोगशृङ्गारापेक्षया करुणादिषु द्रुते: प्राकृष्टतरत्वादमेव न्याय: ।

द्रुति आदि जिन वृत्तियों से अतिरिक्त रसगत माधुर्यादि गुणों का मातम प्रत्यक्ष में मान नहीं होता । माधुर्यादि गुणों से विशिष्ट रसों में द्रुत्यादि चित्तवृत्तियों की जनकता होने से करणीयूत रसों में विशेषणीयूत गुणों का करणतावच्छेदक के रूप में अनुमान भी असंगत है । इसका कारण यह है कि जब माधुर्यादि गुणों का

भिन्न-भिन्न रसों में तारतम्य है तब भिन्न-भिन्न रसों की चर्वणा से होने वाली द्रुत्यादि चित्तवृत्तियों में भी तारतम्य मानना हि होगा । ऐसी स्थिति में तारतम्यमुक्त द्रुत्यादि की करणता जब तत्तद्रस में सिद्ध हो जाती तो तद्रसत्व--तद्-व्यक्तित्व को करणतावच्छेदक मानना हि होगा, उसके अतिरिक्त माधुर्यादि को

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प्रथमातनम्

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रसानों कारणतोपपत्तौ गुणकल्पने गौरवात्। श्रृङ्गारकरुणशान्तानां माधुर्यवत्त्वेन दृप्तिकारणत्वं प्रति स्वकरूपेणैव कारणत्वकल्पनापेक्षया लघुभूतमिति तु वाच्यम्, परं मधुरतरादिगुणानां पृथग्‌दृत्ततद्रत्वादिकार्यतारतम्यप्रयोजकतयाऽपुपगमेन माधुर्यवत्त्वेन कारणताया गडु भूत्त्वात्। इत्यं च प्रतिस्वरूपेणैव कारणत्वे लाघवम् !

भी कारणतावच्छेदक मानने में गौरव स्पष्ट है । अतः एव—श्रृङ्गार, करुण और शान्त रसों में से प्रत्येक को तद्रसत्वेन, दृप्ति का कारण कहने की अपेक्षा माधुर्यवत्त्वेन कारण कहने में लाघव है, क्योंकि प्रथमपक्ष में तीन कार्यकारणभाव होंगे जब कि द्वितीय पक्ष में एक—यह कथन भी अयुक्त है, क्योंकि उक्त तीनों रसों में जब एक प्रकार की दृप्ति की जनकता है हों नहीं तब तीनों में एक प्रकार का माधुर्य मानना असंभव है । फलतः तद्रसत्वेन कारणस्या ही मानी जा सकती; माधुर्यवत्त्वेन कारणतां मानना तो सर्वथा निरर्थक है, क्योंकि जब माधुर्यविशिष्ट माधुर्यवत्त्व को उत्त्कृष्ट रसत्रय में एकविध दृप्ति की कारणता हों नहीं तब माधुर्यविशिष्ट

एतदेव प्रपञ्चयिष्यते विशेषयितुम्—श्रृङ्गार इत्यादिरसस्य गडुभूतत्वादित्यादिव्याख्यात् । गडुभूतत्वं व्यघ्रत्ववत् कार्यभेदे कारणभेदस्यावश्यकतया तद्रसत्वेन तद्रतिकारणत्वादित्यर्थः । असत् गुरुभूतत्वादिति पाठान्तरं मधुरूपदनशास्त्रकलिप्तं रसच नि क्कायामुक्तधाट्ट्रयमपि नाऽस्माञ्जसमिति प्रतीमः । यत्कृतं रसचन्द्रिकायाम्—'ननु तत्तद्विशेषश्रृङ्गारतिरुचि मध्य… … … …प्रतिस्वरूपेण कारणतायान्तु अनन्ता इति कथं परित्यागो लघुभूतस्यैति चेतु ? न, माधुर्यादिभिध्यतिज्जकायां प्रसादप्रक्ननायां रचनायां सत्यां विकारसवृत्या श्रृङ्गारस्वादो जायते दृप्तिरिच्च न जायते, तन्न श्रृङ्गार-

उक्त रसत्रय को कारणतावच्छेदक मानना सार्थक कैसे होगा ? तन्माधुर्यवत्त्व को भी कारणतावच्छेदक मानना निरर्थक है, क्योंकि जब रसविशेष का तन्माधुर्यं (=तन्माधुर्यं) अत्यभिचरित धर्म में है तो फिर तद्रसत्व को कारणतावच्छेदक न मानकर तन्माधुर्यवत्त्व ( = तन्माधुर्यं ) को कारणतावच्छेदक मानना निरर्थक हूँ तो है । अतः प्रामाणिक तद्रसत्व को ही कारणतावच्छेदक मानने में लाघव स्पष्ट है । इस प्रकार दृप्त्यादि-कारणतावच्छेदक के रूप में गुणों का अनुमान ही जब अनुपपन्न है तो इस अनुमान से गुणों का रसमात्रधर्मत्व प्रमाणित नहीं किया जा सकता ।

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किञ्चात्मनो निगूढं ज्ञातयात्मरूपरसगुणत्वं माधुर्यादीनामनुपपनंम् । एवं तदुपाधिरतयादिगुणत्वमपि, मानाभावात्, पररीत्या गुणेऽपि गुणान्तरस्यास्ति नो॥

माधुर्याभाव: सिद्धयति, व्यङ्गकाभावोऽस्त्य व्यङ्गगचाभाव:सिद्धकत्वात् । अत एव ‘अयोगव्यवच्छेदेन रसोपकारकत्वम्’ इति काव्यप्रदीपोक्तं गुणलक्षणं विवृण्यतो-घोतकृताप्युक्तम्—“एवं च यत्र रसस्तत्र माधुर्यादिकमस्त्येव, तस्य तद्मन्त्वात् । कतिचित् व्यङ्गकाभावोऽङ्गीकृतत्वमित्यन्यत् । यथा ‘श्यामं न रक्षणोत्कर्षी’ इत्यादिप्रतिबोध्यम्” इति । तथा च शृङ्गारो माधुर्यस्य नियतस्वेन द्वि नभावोदसम्भव: । प्रकृतमुपसंहरति—इत्थं चेत्यादिना । यदिदोषणां कार्यकारणभावसतत्सा- मान्यस्यादि तथेति नियमस्तु परिदृश्यतेमानवैजात्यकार्यङ्ग्यतिरिक्कविषयक एवेति प्रातिस्विकरूपेण कारणत्वोपपत्तावपि न सामान्यान्त माधुर्यवस्तादिना दृश्यादि- कारणता सिद्धयतीति तात्पर्येण ।

युक्त्यन्तरमाह—किञ्च्वेतत् । आत्मन: = चिद्वस्तु रसस्य काव्यात्मभूतस्य न तनु विभावाद्यभिव्यक्तस्य रस्यादिरेव रसत्वमिति वदतां प्राचां चिद्गुणत्वाभावो माधुर्या दिविष्ट एवयत आह—तदुपाधीति । चिद्वस्तु रसस्योपाधया ये रत्या:दयस्तेषामपीस्र्यर्थ: । अस्य वाक्यस्य पूर्ववाक्यस्थेनानुपपन्नामित्यनेनान्वय: । चकारो हेतौ, यतः वैशिष्ट्यनिय गुणेऽपि गुणान्तरभावेन रत्यादौ इच्छाविशेषात्मके गुणे माधुर्यादिगुणस्याभावोदतो रत्यादि- चिद्वस्तु परसोपाधी माधुर्यादिस्वीकारे मानाभाव इत्यासाय: । तथा च मधुरा रति:, मधुरो हास इत्यादिव्यवहारारो यदि वचिद्विदूर्यते तर्हि स शोपचारिक कत्वेन व्याध्येय: । यद्वा मानसत्र व्यवहारसाङ्किकोडनुभव एव सदृशदयानाम् । तथा च रस्यादि कविचित् माधुर्यादिस्वप्रतिपादकव्यवहारस्त्वेऽपि शोक- स्थायिभावके माधुर्यादितथ्यं स्वीकुर्वतां मते मधुरतर: शोक इति व्यवहारो यदि भवेत् तदा स एवं प्रमाणं सदृश्य माधुर्यादिसत्त्वे, न चैवं दृश्यते । अच्वित्तथा व्यवहारस्त्वक्त एवोपचारिक: । अतो व्यवहारसिद्धानुभावकप्रमाणाभाव वस्तुत्वंय- विषय: प्रकृते । तथा च पररीत्येत्यादियुक्त्यन्तरमेवात्र यत्तु रसचर्वणिकायां नित्यत्वम्—‘यदि माधुर्यादिगुणा रत्यादौ सुसुत्था रसत्वामुपगम्यामुपि तन्नो हि चिद्व- स्त्वयेत, न च तथा, तथा च केन प्रमाणेन रत्यादिगुणत्वं माधुर्यादीनामङ्गीकायंमिति

अब प्रकारान्तर से भी गुणों के रसमात्रधर्मत्व का खण्डन किया जा रहा है— रस को काव्य की आत्मा कहा गया है । यह आत्मभूत रस सगुण हो नहीं सकत, ऋषोंकि ऐसा मानने पर रस की चर्वणा विगलितवेद्यान्तर न हो सकेगी । ऐसी स्थिति में काव्यारम्भूत रस को निर्गुण ही कहना उचित होगा । इसका संकेत रस की चिद्रूपता के प्रतिपादन के अवसर पर किया जा चुका है । एवञ्च जब

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चित्याच्च । अथ शृङ्गारो मधुर इत्यादिःयवहारः कथं मिति चेत् ? एवं तर्हि दृश्यादिचित्तवृत्तिप्रयोजकत्वम् प्रयोजकतासम्बन्धेन दृश्यादिकमेव वा माधुर्य्य-माना-भावादिर्यनेष्टम् 'इति तद्युक्तम्, रसाभासेऽपि दृश्यादे: कविसमप्रदायप्रसिद्ध-तद्वाद् ! अत एव विश्वनाथेऽत्र प्रसङ्गेऽपि रसपदेन रसाभासस्यापि ग्रहणं कण्ठत एवोक्तम् । किं च भक्तिरसमनुज्ञीकुर्वंतः पण्डिततराजष्य मते रसनानप्रतिपाद्यामपि भगवद्विषयाणां रतिर् इत्य् अपि स्वीक्रियादौप तद् विरुद्धेऽप्यवलम्बते । इदं तु विशेषः-अन्न-माधुर्य्यादयो न वैशेषिकपरिभाषाश्रिता गुणाः, अपि तु तद्विधर्म्मा एव सहृदयैकानुभवसिद्धा इति वैशेषिकसमयेन न किंचन प्राचां हीयते ।

किं च दर्शना-न्तरे गुणे गुणाऽऽरोपो दृश्यत एव । तथापि पूर्वोक्तमाना-भाव एव खण्डन-युक्तिस् तत्र । यदि तु विमानाऽऽद्यभिव्यक्तमतेु सर्वत्रैव रत्यादिस्थाऽयिभावेषु मधुरादिव्यवहार इष्टते तर्हि प्राचीनमते दोषा-न्तरं मुख्यम् । अतश्च यदुक्तं मानन्द-वर्धनेनानुसारेण-'गुणाऽलङ्कार्यौ पुनस्तत्रैव दृश्तिः साध्वर्थ्योमत्तया' इति तदेकम्, माधुर्य्यादिकं दृश्यादिकारणमिति तदित्थीं च प्रतिक्षेप्यमप्यशिष्यत इति तदेवाह प्रथमोत्त-राध्या-मथेत्यादिना । व्यवहार इति । तथा चैनाऽऽदृशेन व्यवहारेण शृङ्गारादौ रसे माधुर्य्यादिसत्त्वं निष्प्रयूहं सिध्यप्रति, तद्योग्यत्वं हेत्वादौ तथा व्यङ्ग्यारस्तु गुणवृत्त्यै-वोपपाद्य इत्यभिप्रायः ।

शोभते तु । तत्र व्यवहारे हि विमर्शोऽस्य मुख्यत्वस्थायिभावस्यैव प्राधान्येन शोभते । तत्र व्यवहारे विमर्शोऽस्य मुख्यत्वस्थायिभावस्यैव प्राधान्येन शोभते । तया-ङ्ज्यन्त्र च गौणतया स इति विशेषे मानाभावा-त् तद्वशात् त्वया माधुर्य्यौदि परिष्कार-णीयम् येन सर्वत्रैवैकैव दृश्यत्नहारोपपादनाय सङ्केतो दृश्यताह-एवं तर्हीत्यादिना । प्रयोजकत्वं च भन्यथाऽसिद्धिग्रहितं कारणैककारणसाधारणमिति सर्वत्रैव पदेऽर्थे वाच्यरूपायां रचनायां रसे चेतिं सर्वं एवंते गुणवत्तः समाना-रूपेणैवेति भावः ।

एतच्च दृश्यादिचित्तवृत्तिष्यो भिन्ना माधुर्य्यादयो गुणा इत्यमिप्रायेण । वस्तुतस्तु दृश्यादिचित्तसत्त्वृत्तिदृश्तिविशेषा रसास्वादात्मकाः एवंते 'तथा दीप्त्या आस्वाद-विशेषाऽऽलिमकया' इत्यादिलोचनोक्तै-केवलदेशानुमतया सिद्धे गुणा अपि रसास्वादाभिन्न-दृश्यादिरूपा एवेति 'ते च प्रतिपन्नाऽऽस्वादमयाः मुख्यतया' इत्याऽधुनवगुणणदृष्टा-रीत्या प्रवर्त्तते । दृश्यादिरूपा एवेति रसकार्य्यप्रयोज्येषां रसगतगुणानाऽऽमनन-भावादित्यनेन स्वयमपि प्रतिपादितपूर्वंमेवैतत् । ततश्च दृश्यादिप्रयोजकत्वं न गुणोऽपि तु दृश्यादिरेवेति फलितमाह- दृश्यादिकमेवेति ।

रस निर्गुंण है तब माधुर्यादि को रस का धर्मं कैसे मान जा सकता है ? इदं की प्रकार गुणों को चित्स्वरूप रस के उपाधि-भूत रत्यादि के भी धर्म नहीं कहा जा

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दिकमस्तु। व्यवहारस्तु वाजिगन्धोषणेतिव्यवहारवदक्षत:। प्रयोजकत्वं चादृष्टादिविलक्षणं शब्दार्थरसरचनागतमेव ग्राह्यम्।

अत्र च प्रयोजकत्वप्रकार इति गुणलक्षणे प्रयोजकतात्वस्य शङ्कयतावच्‍छेदककोटिप्रविष्टत्वम्, द्वितीयो न च प्रयोजकताया: संग्रर्गतया संगमर्यादया भानान्न तत्‌ गुणपदशक्तिरिति न सा शङ्कयतावच्‍छेदककोटिप्रविशतेति लाघवगौरवविचार: शास्त्रसम्बन्ध: पुष्ट:।

प्रयोजकत्वसम्बन्धेन तद्रूपस्या सम्भन्धस्य कुत्रास्तीति बोघ:—व्यवहारस्थित्यादिना। वाजिगन्धा=अश्वगन्धा 'असगन्ध' इति नाम्ना लोके प्रसिद्धा।

तस्या भक्षणेन उष्णत्वं जायते इति तत्‍त्र यथोणत्वप्रयोजकत्वमादाय प्रयोजकता-सम्बन्धेनोष्णत्वमादाय वा 'अश्वगन्धा उष्णा' इति व्यवहार: प्रसिद्धो वैद्यके तथैव 'शृङ्गारो मधुर:' इत्यादि व्यवहारोदपि भाव:। अदृष्टादीनांनाविशब्देन्त-

साधारणनिमित्तकारणानि असाधारणानि च कारणीचित्तु कत्रादीनि, समवायिकारणं चान्त; करणम् संगृहयते। व्यवहारातिप्रसक्तिरिति 'अदृष्टं मधुरम्' इत्यादि-व्यवहारापत्तिरीत्यर्थे:। यद्यप्यावादिविशेषस्स्वरूपद्र तिप्रयोजकता रसे विषयतया, शब्दद्वारो च तद्विषयतया चित्कतयैति विविधा प्रयोजकता तथापि विलक्षणप्रयोजकता

कयोकि इच्छाविशेषादिस्वरूप रत्यादि के स्वयम् गुण होने से उनमें माधुर्यादि गुणों के अस्तित्व में, 'मधुरा रति:' 'मधुर: शोक:' इत्यादि अनुभव के अभाव में, कोई प्रमाण नहीं है। साथ हीं, 'गुण में कोई गुण नहीं होता' इस वैशेषिक-सिद्धान्त के अनुसार रत्यादिस्वरूप गुणों में माधुर्यादि गुण हो भी नहीं सकते : अब 'शृङ्गारो मधुर:' इत्यादि व्यवहारों का उपपादनमात्र अवशिष्ट है।

इसके लिए शृङ्गारादि रसों या इनकी चर्वणा में जो द्रुत्यादिचित्तवृत्तियों की प्रयोजकता हैं, उन्हें ही माधुर्यादिगुण कह देना पर्याप्त है, अथवा प्रयोजकता-सम्बन्ध से रसादिनिष्ठ जो द्रुत्यादिसत्व, अर्थात् द्रुत्यादि चित्तवृत्तियाँ हैं, उन्हें हीं माधुर्यादि गुण मान लेना चाहिए। अत: प्रयोजकता-सम्बन्ध से द्रुत्यादि प्रयोजक होने से . शृङ्गारादि को द्रुत्यादिमान्—माधुर्यादिगुणवान्—मधुर—आदि कहा जाता है।

इस प्रकार उक्त व्यवहारों का उपपादन, गुणों को रसों के स्वाभाविक धर्म में न मान कर श्री, हो ही जाता है। तत्प्रयोजक पदाथों में तद्रूपत्व का व्यवहार तो सुप्रसिद्ध है, जैसे—अश्वगन्धा के भक्षण से उष्णत्व (= गर्मी ) होने से उष्णत्व के प्रयोजक अश्वगन्धा को उष्णत्वयुक्त कहा ही जाता है। 'इसी प्रकार रसादि के भी द्रुत्यादिप्रयोजक होने से रसादि को द्रुत्यादि-माधुर्यादि-युक्त कहा जाता है।

यह द्रुत्यादिप्रयोजकता यद्यपि अदृष्ट, देश, काल आदि में भी है, क्योंकि ये कार्यमात्र के प्रति निमित्तकारण होते तथापि प्रयोजकभेद से प्रयोजकता के भी विलक्षण होने से अदृष्टादिनिष्ठ द्रुत्यादिप्रयोजकताओं से विलक्षण प्रयोजकता

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प्रसक्तिः । तथा च शब्दार्थयोरपि माधुर्यादिरूपस्य सत्वादुपचारो नैव कल्प्य इति तु मादृशा: ।।

श्लेष: प्रसाद: समता माधुर्यं सुकुमारता । अर्थव्यक्तिरुदारत्वमोज: कान्तिसमाधय: ।।

त्वनेवानुगम इत्याशय: । यद्वा आस्वाद एव दृश्यादिजनक:, तथा च दृश्यादि-प्रयोजकत्वं माधुर्यादि--इति रीत्या स्वरूपत: आस्वादे तद्विषयतया आस्वादजनके रसे तदभिव्यञ्जकतया च शब्दादयो व्यञ्जकहार उपपाद्य: । तथा च शब्दार्थरसरचन-त्याग्र रसेत्युपलक्षणं रसास्वादस्यापि । द्वितेयं स्यान्तरजनने बाधकाभावान्नेद-मनुपपन्नम् ।

तदेवं भामहादिप्रेतं रसनयालोकाराध्यानुमोदितं च मस्मृतसम्पतं गुणवैयवदं विविधं वामनाभिमतं 'दश शब्दगुणा:', दश चार्थगुणा:' इति पक्षं तनिरासप्रकारं्व प्राचीनोक्तपथानुसारेण वक्तुमुपक्रमते— जरत्ततरारिस्वादिन: वामनोक्तं काव्यालङ्कारकत्ता परामृशत: । अत्र त्रिगुणवादिषु काव्यप्रकाशकृतं रेव कण्ठत उपादानात्तदवपेक्षया वामनोऽ्जरतर इत्युक्तम् । यत्कुत्र रसरचनद्रिकायाम्—‘त्रिगुण-वादिन: काव्यप्रकाशदायो जरस:, दशगुणवादिनो वामनादयो जरत्तरा:, यद्यापि प्राचीनो भामहोऽपि गुणवैयवादी तथापि तन्मतस्यान्नति: प्रदिद्धै न तत्परिगणितम्' जीवातुभूतस्य रसनयालोकस्याऽऽद्ययनैर स्पष्टीमेव प्रतीयते । अत एव लोचनेऽप्युपसंहतम्—‘एवं माधुर्योज:प्रसादा एव त्रयो गुणा उपपन्ना भामहाभिप्रेतं' इति ।

श्लेष: प्रसाद इत्यादि । इदं च पदं यथापि दण्डिन:, यथापि चैतेपां लक्षणेष्वपि दण्डिसम्मतेपु स्वाचित् वक्चिद्रामनोक्तलक्षणेष्यो भेदस्तथापि नामसाम्यादिदं वामनमतानुरूपंवसरे ग्रन्थकृतानि निर्दिष्टमिति बोध्यम् ।

हीं यहाँ सम्बन्ध रूप में विवक्षित है; अत: अदृष्टादि में माधुर्यादिवस्तु के व्यवदार की आपत्ति नहीं होती । इस प्रकार शब्द, अर्थ, रचना, वन्ध और रस में यत्तंमान विलक्षण प्रयोजकताओं के सम्बनध्रूप में विवक्षित होने से दृश्यादिमस्व-माधुर्यादि गुणवत्तव को औपचारिक कहने की कोई आवद्यकता नहीं है—ऐसा हम सोचते । वामन आदि कुछ प्राचीनतर आचार्य---श्लेष, प्रसाद, समता, माधुर्य, सुकुमारता, अर्थव्यक्त, उदारता, ओज, कान्ति और समाधि नामक दशा शब्दगुणा मानते ।

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इति दश शब्दगुणान्, दशैव चार्थगुणानमनन्ति । नामानि पुनस्तान्येव, लक्षणं तु भिन्नम् ।

उदिष्टान् गुणान् क्रमेण लक्षणयति-- तथाहेत्यादिना ! शब्दानाम् = शक्तानां पदाथानाम् । एकत्वप्रतिभानमभेदबुद्धि:, एषा चाहार्यविषयैात्का सहृदयानाम् ।

तथा हि - शब्दानां विशेषानमप्येकत्वप्रतिभानप्रयोजक: संहितयैकजातीयवर्ण-विन्यासविशेषो गाढत्वापरपर्याय: श्लेष: ।

एतच्चोको लक्षणं दीर्घंसमासस्येति वक्ष्यते । 'पृथक्‌वदवं माधुर्येण' इति वचनविवरणे पृथक्पदत्वं समासदोष्योनिवृत्ति-परमितिर्वदतो वामनस्यैवमेवाभिप्रय: । समासदोष्येमेवैकत्वमाने हेतु: ।

यदाहु:—'श्लिष्टमस्पष्टशरोभिल्यम' इति । यथा—'अनवरतवि द्र द्रुमद्रोहि-दारिद्रचमाचदद्रिपु द्द ण्डामदपौ ङ्गविद्राव णप्रौ ढपक्षानत् ।' इति ।

एकजातीयवर्णानामेकोडनेको वा समू होद्भव विवक्षित:; तेन चानुप्रास: सूच्यते ! गाढत्वं च संयोगपरह्रस्वप्रकर्षच्युत्वमाणाम् : उत्कर्ष दण्ड्योक्तं प्रमाणयति—यदाहुरित्यादिना ।

अन्न यादृशं सौथिल्यं दण्डिनोक्तम् अलंप्राणाक्षररोत्तरम् इति तद् ग्रन्थकृतो नाभिप्रेतम्, उदाहरणस्याल्प-प्राणवर्णसमू होत्पत्तिस्वभाव् । अतोडत्र प्र कृतगाढत्वविपरीतमेव सौथिल्यं विवक्षितं मन्तव्यम् । अनवरतेः्यादि । विद्रांस एव फलदातृत्वाद् दृ‍ृ माः, तेषामनवरतं द्रोहो यां द्वारिद्रचयलुो माधुर्य द्विप्रस्तस्यो दामपौ ङ्गस्य विद्रावणे प्रौढ: पठचानन: सिंह

इन्हीं नामों के दश अर्थगुण भी उनके द्वारा स्वीकृत हैं, किंतु इनका स्वरूप शब्दगुणों के स्वरूप से भिन्न है ।

अब क्रमश: पूर्वोक्त शब्दगुणों और अर्थगुणों के लक्षण-उदाहरण दिये जा रहे हैं—

पदों के वस्तुत: भिन्न-भिन्न होने पर भी सन्निधि ( = उपसन्नता के अत्यन्त सान्निध्य ) के कारण उन सब पदों के एक होने की प्रतीति के निमित्तभूत और अनुप्रास-समूहघटित रचना-विशेष को हाँ 'श्लेष' कहा जाता । इसे हाँ दूसरे शब्द आचार्य दण्डी ने कहा भी है—'जिसमें शिथिलता ( गाढ़ता के विपरीत विन्यास ) न हो—शिथिलता का आधिक्य न हो, उसी रचना-विशेष को 'श्लिष्ट' ( = श्लेष ) कहा जाता ।'

जैसे—'अनवरतवि द्र द्रु म...' इत्यादि वाक्य में उपयुक्त लक्षण के घटित

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गाढत्वशैथिल्याभ्यां व्युत्क्रमेण शिथिलनं बन्धध्वं प्रसाद: ॥ यथा—

कि भूमस्तव वीरतां वयममी यस्मिन्धराराखण्डल-

क्रोडाकुण्डलितभूषणतये दोर्मण्डलं परिष्यति ।

माणिक्यावलिकान्तिदन्तुरतरैर्भूषासहस्रोत्करै-

विन्ध्यारणयगुहागृहावनिसृहास्तत्कालमुल्लासिता: ॥

इत्यर्थ: । दानशौल्यस्य कस्याचिद्राज्ञो वर्णनमिदम् ।

प्रसादं लक्ष्यति—गाढत्वेत्यादिना । गाढत्वं चौथिल्यं चास्माभिर्यंणितम् । व्युत्क्रमेणेति । विपरीतक्रमेणेत्यर्थ: । पूर्वं च शिथिल्यं परश्चाद् गाढत्वमिति तात्पर्यंम् । तथैवोदाहरणमपि दृश्यते । यथा तु वामनप्रस्तुतया स्वोज:सम्प्रक्तं चौथिल्यं प्रसाद इति लक्ष्यते । अस्या तदुक्तसमाधेरेभेदचिन्त्यत्न्य । भरतादिषु पुनराचायैं: प्रसिद्धधंकत्वं प्रसाद इत्युक्तम् ।

होने से 'श्लेष' गुण विद्यमान है ! उदाहरणार्थ का अर्थ यह है—'ये राजा विभिन्नउजनस्वरूप दृक्षों के नित्य-विच्छेदही दारिद्र्यचहपी उन्मत्त गजराज के प्रचण्ड दर्प को धवस्त करने में समर्थ सिंह हैं ।'

किं भूम इति । हे धराराखण्डल महीपते ! तव वीरताममी अलपज्ञा वयं किं भूमो वर्णंयाम: यस्मिन् क्रोड्या कुण्डलिते तवं लीलाक्षते वक्रोकृते भूषौ, येन, अथ च शोणे नयने यसय तथाविधे स्तवक्वि स्वदोर्मण्डलं परिष्यति सति विन्ध्यारणयम्, तदगतपर्यन्त: गुहा: तद्गरण्यगुहागृहावनिसृहास्तत्कालमेव समुल्लासिता इत्यर्थ: । त्वद्रूपयात् प्रतिभटा राजान: पलायिता: सन्तो यथासम्भव-

किसी भी वन्ध में गाढता और शिथिलता का विपरीत क्रम से, अर्थात् पहले शिथिलता का और पश्चाद् गाढता का सम्मिश्रण हें 'प्रसाद' नामक शब्दगुण कहलाता है ।

!!हे महाराज ! हम साधारण जन आपकी वीरता के विषय में क्या कहें ? आप विनोद के लिए भी अपनी भृकुटियों को टेढ़ी कर क्षोर आँखों को लाल करके अपने भुजदण्ड को जिस क्षण देखते उसी क्षण आप के भुज से पलायमान शत्रु-राजाओं के हीरे-मोती की छुटाओं से अत्यन्त आर्षणक दिखने वाले हजारों

१. यद्यपि शब्दगुण का अस्तितव उदाहरण-पच में ही है, उसके अनुवाद में नहीं, तथापि हिम्दी-टीका में शिष्याथ॑बोधाथं अनुवाद हि दिया गया है । अन्य निष्य में उदाहरणों में भी यथासमम यहि समक्षना क्ञाहिए ।

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अत्र यस्मिन्नित्यतयाॅन्तं शैथिल्यम्, भ्रूशब्दान्तं गाढत्वम्, पुनर्नयननेत्र्यन्तं प्रथममित्यादि बोधयम् ।

आश्लेषण के समूह से विरधावन, वहां की गुफाएं, वहां की झोपड़ियां और वहां के वृक्ष चमक उठते ॥

उपक्रमादासमाप्ते रौत्यभेदः समता ॥ यथा वक्ष्यमाणमाधुर्योदाहरणे । तत्र हचुपनागरिकैयवोपक्रमोपसंहारौ । संयogपरिहार्वातिरक्तवर्णेङ्घाटिततत्पये सति पृथक्पदत्वं माधुर्यम् ॥

इसका तात्पर्य यही है कि रसन-राजा पल भर के लिए भी आपका सामना नहीं कर पाते अपितु तुम आपके क्रुद्ध होने की थोड़ी झलकढा होने पर भी भाग खड़े होते । इस पद्य में 'रस्मिन्‌' तक शिथिलता 'घराक्षण्डलम्'.....'भ्रू' तक गाढ़ता, 'घोणनयने' में पुनः शिथिलता और 'भ्रू-मण्डलम्‌' में पुनः गाढ़ता के होने से उपरिलक्षित 'प्रसाद' गुण विद्यमान है ।

मात्रमरक्ष्यैः कौचित् विन्द्याद्रिश्रेणी गता; अन्ये तत्रैत्यागिरुहामुपविश्टाः, इतस्ततरण्यस्थलेऽपि ग्रुठेषु मुन्यादीनामुढजेपु मिलीनाः, एके पुनस्तदीयपक्षानवल्डा इति तात्पर्येऽम् ।

प्रारम्भ से अन्त तक रीति (=शैली) की एकता को 'समता' कहते ।

अत्र च पश्यतीत्यत्र सतिससम्या पलायनक्रियाया आक्षिप्यमाणाया एवं दर्शानक्रियासमकालिकतत्प्रतीतः: तत्कालमित्यनेन न पौनरुक्त्यम् । दर्शानसमकालं चोर्लासनक्रियाया असंभवादितिाशयोक्तिस्थत्वणेनैनाभिव्यज्यते ।

इसका उदाहरण 'माधुर्य' गुण का दिया जाने वाला उदाहरण—"नितरो यरुषा…'हैं है, क्योंकि इस पद्य में आरम्भ से अन्त तक उपनागरिका—वैदर्भी रीति हैं उपलब्ध है ।

अत्र प्रसादमुपादयति—अत्रेत्यादिना । प्रथमं शैथिल्यम् । समतां लक्षणयति—उपक्रमादिति । धारासम्बादित्यर्थः: । उपनागरिका वैदर्भीरीतिः ।

संयोग के पूर्ववर्ती हस्व स्वरों से भिन्न वर्णों से घटित होने और पदों के द्वघ्ंसमास से रहित होने को "माधुर्य"- नामक गुण कहा जाता ।

एवमेव उपक्रमादिमासमाप्यन्तं बन्धे यदिँ गौडी यदिं वा पांचाली रीतिः-स्तदापि गुणवोडयं तिरस्कृण्हति । अतस्तु रीतिभेदाद्दाबन्धस्यापि नैविध्यं फलति—मृदुमृदुवर्णत्रिन्यासयोनिः, स्फुटवर्णदिन्यासयोनिः, मिश्रदर्शनदिन्यासयोनिर्शेति ।

एतेषामेव क्रमेण मृदुः, स्फुटः, मधयम इति च व्यवदिश्यते । वैदर्भी, गौडी, पांचाली नेति क्रमेण तिस्रो रीतय उपनागरिक, परुषा, कोमला चेति व्यवदिश्यन्ते ।

माधुर्यस्य लक्षणमाह—संयोगेत्यादिः । संयोगः परो येष्यस्ते हस्वास्तद्वति-रिक्तं त्यादिर्यः ।

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यथा— नितरां पङ्षा सरोजमाला न मृणालानि विचारपेशलानि । यदि कोमलता तवाङ्कानामथ का नाम कथापि पल्लवानाम् ॥ apरुषवर्ण घटिततवं सुकुमारता ॥

प्रतिषेधवर्णनाद् । परसवर्णनिष्पन्नहल्ङषटितस्तु संयोगो न प्रतिकूलः अपि तु मधुररसानुकूल एवैतद् वक्ष्यते । अत्र च माधुर्ये यद्यपि: संयोगो वज्रनौयस्सोडपि वक्ष्यमाणः । पृथक्पदत्वं हलेपदवीर्घंससमासाभावः । नितरामित्यादि । हे कामिनि ! यदि तव अनुकम्प्यानामज्जानां कोमलता विभाव्यते तर्हि सरोजमाला अपि तदपेक्षया परुषा कठोरैव प्रतीयते, मृणालान्यपि विचारे पेशलानि रस्माणि न प्रतियन्ते । एवंमुयेषां कठोरत्वनिर्णये कृतेऽपि पल्लवानां सम्वन्धिनी या कोमलता तद्विश्रयिणी कथाऽपि का न कapi, तुच्छेतरयाथ । tवाङ्कानामित्यत्र 'जूञ्' इत्यस्य परसवर्णनिष्पन्नहल्ङषटितसंयोगरचनेन तत्पूर्वस्य आक्रासय च ह्रस्वभावेन पल्लवशब्दे च 'ल्ल' इत्यस्य परसवर्णनिष्पन्नहल्ङषटिततत्चेन न दोषः । अत्र 'संयोगाच्छान्त' परसवर्णनिष्पन्नहल्ङषटित एव ग्राह्य:' इति ममं प्रकाइे मुद्रित: पाठो भ्रष्टः । अत्र एवैतदनुरोधेन चन्द्रिका-रसरचनिद्रक्योः कृतं व्याख्या-नमयुक्तम् । apरुषेति । वर्गाणां द्वितीयचतुर्थों टवर्गादियुतशच परुषा वर्णा वक्ष्यन्ते । तद्वृत्या वर्णा अपरसुणा: कोमला इत्यर्थः ।

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यथा — स्वेदाम्बुसान्द्रकरणशालिकपोलपालिल- दोलायितश्रवणकुण्डलवन्दनीयां । आनन्दमदृङ्कुरयति स्मरणेन कार्पि रस्या दशा मनसि मे मदीरेक्षणाया: ॥ अत्र पूर्वार्धे । उत्तरार्धे तु माधुर्यंमपि । भृङ्गिति प्रतीषमानार्थान्वयकत्वं सथेभर्यत्न: ॥ यथा ‘नितरां’ इत्यादि ।

स्वेदाम्बुव्यात्यादि । मदीरेक्षणाया: प्रेयस्या: कार्पि विलक्षणा रस्या या दशा स्वेदाम्बुनो धमंजलस्य सान्द्रै: कण्ठो विन्दुभि: शालिन्यां शोभमानायां कपोलपाली दोलायिताभ्यां श्रवणकुण्डलाभ्यां वन्दनीया सा स्मरणेन मे मनसि आनन्दम् मढ़कुरयति । अत्र पद्यो ‘मनसि’ इति अपार्थम् । ‘रस्या दशा मधु परं···’ इति पठनीयम् । पूर्वार्धे इति । सुकुमारतेति शेष: । पूर्वार्धे दीर्घंसमासान्माधुर्याभाव इत्यश्र उत्तरार्धे सुकुमारतया माधुर्यंस्यापि सुप्रकटच्युत्क: । यदोपदेशमुखरेरेक्ष्याप्रतीत- मसाक्षुयं बोधयम् । झगितील्यादि । झगिति शीघ्रम्, प्रतीममानोऽर्थान् अन्वयकस्तस्य भाव इत्यर्थ: । यत्नाविलम्वेन वाक्यार्थबोध- स्तत्रार्थे वयक्तिगुं ण इत्याशय: ।

जैसे — ‘स्वेदाम्बु...’ आदि पद्य में

मतवाली आँखों वाली रमणी की वह रमणीय दशा, जो पसीने की घनी बूंदों से भरे उसके गालों पर झूलते कुण्डलों के कारण अत्यन्त अभिनन्दनीय और पूर्णरूप से वर्णनातीत है, स्मरणमात्र से मेरे मन में आनन्द को अड़ङ्कुरित कर रही है ।

इस पद्य के पूर्वार्ध में उपरिलक्षित ‘सुकुमारता’ है जबकि उत्तरार्ध में ‘सुकुमारता’ के साथ-साथ माधुर्यं गुण भी है । पूर्वार्ध में दीर्घंसमास के कारण माधुर्यं गुण के लिए अपेक्षित ‘पृथक्‌षदत्क’ के अभाव में ‘माधुर्यं’ स्फुट नहीं । पदों के अर्थों का शीघ्र अवबोध हो जाना ‘अर्थव्यक्तिक’ गुण है । इसका भी उदाहरण ‘माधुर्यं’ के उदाहरण के रूप में पूर्वनिर्दिष्ट ‘नितरां परुषा सरोजमाला···’ इत्यादि पद्य हैं ।

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कठिनवर्णघटनारूपविकटत्वलक्षणोदरता ॥ यथा—

प्रमोदभरतुन्दिलप्रमथदत्ततालावली- विनोदिनि विनायकेऽडमरुडिण्डिमक्वानिनि । ललाटटटविस्फुटन्नवकृपीटयोनिच्छटो हठोद्घतजटाटोट्टरो गतपटो नटो नृत्यति ॥

पदां नृत्यत्प्रायत्वं विकटता' इति काव्यप्रकाशटीकाकारो व्याच- क्षते । उदाहरन्ति च—'स्वचरणविनि विष्ठितैर्‌नूपुरैर्निन्तं कीनां झणिति रणितमा- कठिनेत्यादि ।

कठिना वर्णाः टकारादिलुपाः । विकटत्वं लक्षणं स्वरूपं यस्याः सा । तथा च लक्षण्य विकटतैव उदारता, विकटतायाै स्वरूपं कठिनवर्ण- घटितत्वम् पणिडततराजमते ।

प्रमोदेत्यादि । प्रमोदभरेगानद्वादातिशयेन तुन्दिले हरफुल्लोदरेरडटहासं कुर्वेन्द्र: प्रमथैर्गणैर्दन्ताभिस्तालावलीर्भिविनोदशीलोऽत एव डमरु डिण्डिमं च वादयति विनायकेऽसति ललाटटटाद्दिस्फुटन्ती नववस्त्र सदा:प्रज्वलितस्य कृपीटयोनिरग्नेःश्छटा यस्य अथ च हठेन उद्धताभिजेंटाभिर्‌नृटटरो विकटो गतपटः =नृतत्ववासा नटः शिवो नृत्यति—इति पद्योाथः ।

अन्वयदार्तोयाः प्राक्तलक्षणसूत्रोक्तः स्फुटत्वे । सम्प्रति वामनाभिमतं काव्यप्रकाशटीकाकृदृदशनाथाचानुमोदितं विकटता- लक्षणं खण्डयति — पददानामित्यादिना ।

नृत्यत्प्रायत्वम् इति । यस्मिन् विन्यसे कृते पददानी नृत्यन्तीव उच्चावचानौौ श्रवणदौौ प्रतीयन्त इत्यर्थः । स्वचरणेत्यादु- दाहरणं वामनेनैव पूर्वं प्रदत्तम् । अत्र 'झण' इति नूपुरशब्दानुकरणम् । अत एव 'झणिति' इति कवचिन्मुद्रितः पाठोयुक्तः ।

एतादृश्याम् = पदां नृत्यत्प्रायतारूपायां रचनां की विकटता, अर्थात् टकार आदि कठोर वर्णो से घटित होना, 'उदारता' नामक शब्दगुण है ।

उदाहरण 'प्रमोदभर …' आदि पद्य में देखिए— ''आनन्दातिरेक से अट्टहास करने के कारण फूले हुए नथरों वाले 'डिंडी' आदि गण द्वारा दी गयी तालियों से प्रमुदित गणेश डमरु और डिण्डिम नामक वाद्य-यन्त्र्र बजा रहे हैं और दिगम्बर नटराज शिव, जिनके ललाट-टट से सदा:प्रज्वलित अग्नि की उज्वाला निकल रही है और जो नृत्तमग्न होने के कारण जटा के ऊपर उठ जाने से बड़े ही विकट भयंकर दिल रहे हैं, नाच रहे हैं ।''

( वामन और) काव्यप्रकाश के विश्वनाथ-प्रभृति टीकाकार पदों को नृत्यत्‌- प्रायता—ऐसी रचना जिसमें पद नाचते-से प्रतीत होते हों—को विकटता (=उदारता)

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सीत्' इत्यादि । तत्र तेषामेतादृशां विकटत्स्वलक्षणामुदारतामोजस्यान्तर्भावयन्त्र काव्यप्रकाशकार: कथमनुकूल इति त एव जानन्ति । न ह्यत्रौजसो वैपुल्येन प्रतिबिम्बनमस्ति । 'विनिविष्टैर्नैपुरैरैन्तै' -इत्यत्र सन्नप्योजसो लवो न चमत्कारी । नापि तत्र नृत्यत्प्रायत्वं वर्णनानमुत्वन्न्त सहृदया: । अंशान्तरे तु माधुर्यमेव ।

विकटत्स्वलक्षणाया मुदारताया भेद: । एतादृशौचित्यमयपाठ्य:, तैरैवणिताया उदारताया: काव्यप्रकाशकारेणौजस्यान्तर्भाविकरणेनास्त्याविष्कृताया अनन्तर्भावक्रियाकमन्त्वानुपपत्ते: । अथवा एतादृशामिति पठनीयमू । यद्वा शब्दगुणकवेनाभिमतामित्यर्थं कृत्वा कथमनुचिन्द्र द्वितीयान्तपाठस्या पि सङ्झति: कर्तव्या । कथमनुकूल इति । ओज:पर्यायभूतस्वादिकटताया पदनां नृत्यत्प्रायतत्वस्य सर्वत्राभिवान्तवभिन्ना विकटता न तादृशी मन्तुं शक्यते मम्मटेनैतर्थ:। तथा चैते टीकाकार मूलविद्धा एैवेति नादरणीया: । नतु ओजस्यान्तर्भावो विकटतास्वलक्षणोदारताया न तदभिन्नतयार्भि खण्डनयुक्तिन्तरमाह—न वैपुल्येनैति । स्वचरणेऽन्र क्षणिति रणितमासीदित्यादौ चोजसोऽभिवादिति भाव: । लव इत्युक्तिरोजसोंडकावस्थिमभिप्रेत्य । न चमत्कारोति । प्रकटरसानुकूलतवमत्र हेतुः । अंशान्तरे=स्वचरणेऽत्यादौ ।

स्वचरणेऽत्यादौ क्षणिति रणितमासीतत्र चित्रं कलड्क च ।

कहते । इसका उदाहरण उन्होंने निम्नलिखित पद्याधें को दिया है— स्वचरणेऽत्यादौ क्षणिति रणितमासीतत्र चित्रं कलड्क च ।

किन्तु विकटतास्वरूप उदारता का ओजोगुण में अन्तर्भाव करने वाले काव्यप्रकाशक का तृतीयप्रायातास्वरूप विकटता कैसे अभिमत हो सकती है ? कारण यह है कि काव्यप्रकाशकार इस विकटतास्वरूप उदारता को ओजोगुण से अभिन्न मानते; ओजोगुण में सर्वत्र पदों की तृतीयप्रायता नहीं देखी जाती, अत: ओज से अभिन्न विकटता में भी सर्वत्र तृतीयप्रायता न होने से उपयुक्त व्याख्या मूलानुकूल नहीं है, अत: उपेक्षणीय है । यदि तु उक्त अन्तर्भाव का उपपादन विकटता को ओजोगुण से अभिन्न नहीं अपितु उसका एक विशेष प्रकार मानकर किया जाय (यहाँ उचित भी है ) तो भी उक्त व्याख्या संगत नहीं है, क्योंकि उनके द्वारा प्रस्तुत उदाहरण में भी सभी पदों में तृतीयप्रायता तो है नहीं । हाँ, 'विनिविष्टैर्नैपुरैरैंत' इस अंशमात्र में तृतीयप्रायता का प्रतिबिम्ब होता है । किन्तु इस तृतीयप्रायातास्वरूप ओज को ( काव्यप्रकाशकार के मतानुसार ) चमत्कारजनक न होने से गुण कहाँ तक संगत है—यह विचारणीय है । इसके चमत्कारजनक न होने का कारण यही है कि उदाहरण में वीर वादि रसों की अभिव्यक्ति न होने से यह ओज रसानुकूल

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संयोगपरहस्वप्राचुर्यरूपं गाढरसमोजः ॥

यथा— साहङ्कारमुरासुरावलिकराकृष्टधरामनन्दर- क्षुभ्यत्क्षीराधिवलगुवीचिवलयश्रीगर्वसंश्रङ्क्षा; । तृष्णाताम्यदमन्तदतापसकुलैः सानन्दमालोकिता भूमिभूषणं भूषणन्ति भुवनाभोगं भवत्कीर्तयः ॥

यथा वा 'अयं पततु निर्देयं' इत्यादिप्रागुदाहते । संयोगेत्यादि । संयोगरचान्त परसवर्णनिष्पन्नहलुभिन्नहलुघटितो ग्राह्यः । अत्र 'संयोगरच परसवर्णनिष्पन्नो ग्राह्यः' इति व्याख्याकणा रसचन्द्रिका चिन्त्या । एवमेव माधुर्येऽद्यस्यादानन्तर्गतादिव । इयं हि व्याख्या ममंप्रकाशस्थपाठभ्रंशमूलिकैवैति प्रागेवेदितम् । प्राचुर्यं चैकाधिककत्वमती द्रि:प्रयोगेऽपि तत्वमक्षतम् ।

साहङ्कारेत्यादि । हे भूमेःभूषण वसुधालङ्कारभूत राजन् ? साहङ्कारा या सुराणामसुराणांश्वावलिस्तस्या, करैराकृष्टतया द्रुतमध्रमता मन्तरेण क्षुभ्यतः क्षुभ्यत: क्षीरधे: समुद्रस्य वीचिवलयानां श्रिय उज्ज्वलतया गर्वस्य सर्वश्रृङ्खषा: पूणर्तया डपहारिका:,

अथ च तृष्णया ताम्यदुमिराकुलैरमनदानां तपस्विनां कुलैः सानन्दं सुघास दूष्यादालोकिता भवतः कीर्तयः भुवनस्य आभोगं विस्तारं भूषणन्ति । कस्यचिद्राजः स्तुतिरियम् । 'भूमि:' इति 'कृतिकारादक्तन:' इति विलपेन द्वीपप्रत्यये रुपम् । शब्दशक्तिमूलेध्वनिप्रसङ्गे विशेषोऽत्र वक्ष्यते । अयं पतत्तिव्यादि । नबोचछल-

नहीं है । इसके अतिरिक्त यह भी सत्य है कि सङ्घटयों को 'विनिविष्टटेनं पुररन्तं' इस अंश में भी श्रृङ्गारप्रायता का अनुवम नहीं होता, 'स्वचरण' आदि अंशों में तो श्रृङ्गत्यप्रायता के विपरीत 'माधुर्ये'न् का ही अनुभव होता है । अतः न तो उदाहरण हाँ उपयुक्त है और न उपयुंक्त व्याख्या हीं ।

परसवर्ण-निष्पन्न व्यङ्गजन से भिन्न व्यङ्गजनों से घटित संयोगों से पूर्वंवर्त्ती हस्व स्वर की रचना गत प्रचुरता को हीं 'ओज' कहते हैं ।

उदाहरणाथ 'साहङ्कारो' । आदि यत्र दृष्टव्य ह—'हे महाराज ! अहङ्कारपूर्ण देव-दानवों के समूह द्वारा आकृष्ट होने से तीन गति से घूमते हुए मन्दराचल द्वारा आलोडित (= उन्मथित) क्षीरसमुद्र के रम्य तरङ्गों के समूह के सौन्दर्यालिमान को समूल विनष्ट कर देने वाली और विपासाकुल उत्तम तपस्वियों द्वारा स्वच्छ सुधा के धाम से आनन्दपूर्वक देखी जाने वाली आपकी उज्ज्वल कीर्तिराशि समस्त ब्रह्माण्ड को प्रकाशित कर रही है ॥"

इसका दूसरा उदाहरण रौद्ररस के उदाहरण के रूप में पुर्ंनिर्दिष्ट ( नैबोचछल= १४ २०

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अविदग्धवैदिकादिप्रयोगयोग्यानां पदातानां परिहारेण प्रयुज्यमानेषु पदेषु लोकोत्तरशोभारूपमौज्वल्यं कान्तिः॥

यथा ‘नितरां’ इत्यादिप्रागुदाहृते ।

बन्धगाढत्वशिथिलत्वयोः क्रमेणावस्थापनं समाधिः ॥

अन्योरेव प्राचीनैरारोहारोहव्यपदेशः कृतः । क्रम एव हि तयोः प्रसातत्यादिरोच्योदाहरणभूतस्य पदस्योत्तरार्धंमिदम्‌ । तत्राद्योजः । उत्तरार्धंमुपलक्षणं सम्पूर्णस्य पदस्य । पादग्रृथकृत्वे तु द्वितीयं पादमपहाय । अथ च परसवर्णंनिष्पन्नहलूभिन्नहलूभिटतसंयोगमादाय लक्षणसमन्वयो बोध्यः ।

वामनोक्तं कान्तिलक्षणं परिष्कृत्याह—अविदग्धाद्येत्यादि । अविदग्धा अरसिका ये वैदिकादयस्तेषां प्रयोगयोग्यानि यानि पदानि तेषां परित्यज्य प्रगुज्यमानानि यानि सहृदयसुलभानि पदानि तेषु—इति रूपेणार्योजडसे यस् ।

पदेऽपि शोभाया लोकोत्तरत्वं नाम तद्वद्रसानुकूलवर्णंमात्राघटिततत्समू ।

बन्धगाढत्वादिता समाधिः लक्ष्यते । अनयोः—गाढत्वशौथिल्ययोः । प्राचीनैः—वामनादिभिः । व्यपदेश इति । तथा च वामनः—‘आरोहारोहयोः क्रमः समाधिः’ इति । क्रमः ऐकत्यादि ।

लित ० इत्यादि पद का उत्तरार्धं )

अयं पततु निदयं दलिततनु सूभ्रुशुध्दग्गल- स्वलद्र धिररहस्मरो मम परसवधो शैरवः ॥

पद्यार्ध भी है । वस्तुतः पूर्ण पद हूँ उदाहरण के रूप में विवक्षित है, द्वितीय पाद में संयोजगप्राचुर्यं न होने पर भी पूर्वार्धघटक प्रथम पाद को लेकर द्वितीय पाद को भी उदाहरणान्तर्गत माना जा सकता है । पृथक्-पृथक् पाद की विवेचना करने पर तो प्रथम, तृतीय और चतुर्थ पादों का हूँ उदाहरणत्व उपपन्न होगा ।

वैदग्धयरहित वैदिक-मीमांसकादि द्वारा प्रयोग करने योग्य पदों से भिन्न ( कवि द्वारा प्रयुज्यमान ) पदों के शलौकिक सौन्दर्यं, जिसे पदों की उज्जवलता भी कहा जाता, को ‘कान्ति’ कहते हैं ॥ ‘माधुर्य’ गुण का उदाहरणभूत ‘नितरां परुषा सरोजमाला’ इत्यादि पद में ‘कान्ति’ नामक गुण भी विद्यमान हैं ।

रचना में क्रमशः गाढ़ता और शिथिलता का होना हूँ ‘समाधि’ नामक शब्दगुण है ।

गाढ़ता और शिथिलता को हूँ वामन ने क्रमशः आरोह और ऽवरोह कहा है ।

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दादस्य भेदकः । तत्र हि तयोर्व्यत्क्रमेण वृत्ते ।

यथा— स्वर्गनिरर्गतनिरर्गलगड्डातुज्झभडगुरतरड्ढसख्तानामू । केवलामृतमुचां वचनानां यस्स लास्यगृहमस्यसरोजम् ॥

अत्रारोहः प्रथमेऽर्धे । तृतीयचरणे त्ववरारोहः । गड्डेत्यादौ माधुर्यस्य चारोर्हितोदाररति, तत्र हि प्रसादेन माधुर्योमियातः । पणडतराजेनोद्याः व्याख्यातम् । अत्र वामनग्रन्थे कश्चन विशेषो वर्णनतस्तत एवावधेयः । अत्रापि परसर्वण्जन्यहलुभिन्नहलूघटितसयोगमादाय समन्वयः कर्तव्यः ।

स्वर्गनिरगतेत्यादि । कस्यचिद्रुषो वर्णनमिदम् । यस्य विदुष आस्यसरोजमू = मुखकमलमू, स्वर्गान्निरगताया निरंग्लाया गड्डायास्तुज्झे भडगुं रसच तरड्डगे सदृशानां केवस्यामृतस्य वर्षंकाणां वचनानां लास्यगृहं तृतीयशाला वत्संत इत्यर्थः । केवलममृतं मुखचनेतोति विरुपि षष्ठीवबहुवचनान्तं केवलामृतमुचामिति ।

यत्र वचनोपमानभूतानां तरड्डाणां ‘भडगुर’ इति विशेषणं वचनेपु भडगियुक्तत्वप्रत्यायकतया कस्यचिद् व्यास्येयम्, अन्यथा वैरस्यापादकं स्यात् । अथवा तुज्झे भडगुरेत्यनेनोच्चारवचत्वं प्रतिपादयतो विदग्धमुखकमुजेडपि वचनानामुचचावचत्वं गाढत्वशिथिलत्ववशिष्टचरुपमाभिप्रेतमिति व्यास्येयम् ।

तृतीयचरणेति । अत्र ‘तृतीयचरण इति बहुवोति: । द्वितीयेऽर्थे इत्यर्थः’ इति मम्मप्रकाशो युक्त एव, चतुर्थचरणे संयोगपरहस्वत्वस्य यस्य-पदस्यकारोत्तराकारमात्रे सत्वेऽपि प्राचुर्येऽभावात्, अन्ययोषश्च संयोगपरत्वेऽपि ह्रस्वत्वाभावात्पणडतराजानुसारेण गाढत्वरूपारोहानुरुपत्ते । ‘उत्तरार्धे तु सौदृपि’ इत्यनेन सत्वमपि वक्ष्यत्येनत् ।

यदुक्तं चन्द्रिकायाऽपि—‘इह तृतीयचरणे इत्यत्र बहुत्वेर्हिति केषाऽपि च्छात्रो यदुक्तं चन्द्रिकायाऽपि—‘इह तृतीयचरणे इत्यत्र बहुत्वेर्हिति केषाऽपि च्छ

'प्रसाद' और 'समाधि' में गाढ़ता और शिथिलता का क्रम-भेद—'समाधि' में पहले गाढ़ता और पदचात् शिथिलता जब कि 'प्रसाद' में पहले शिथिलता और पदचात् गाढ़ता का अवस्थान—हीं दोनों में परस्पर भेद का साक्षक है ।

इका एक उदाहरण 'स्वर्गनिरगत' आदि पद्य है—

'ये ऐसे विलक्षण विदग्ध विद्वान् हैं जिनका मुखकमल स्वर्ग से निकाल कर उन तरड्ढों के समान ( अत्यन्त सादृश्य ) और केवल अमृत बरसाने वाली वाणी ( स्वरूप-नर्तकी ) की तृतीयशाला है ।'

इस पद्य के प्रथमार्ध में तो चारोहर-गाढ़ता है जब कि तृतीयचरणवडित उत्तरार्धे में अवरोह-शिथिलता है ! यद्यपि पूर्वार्धे के 'गड्डातुज्झे भडगुरसारड्ढ' अंश मे

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व्यञ्जकेषु वर्णेषु सत्स्वपि दीर्घंसमासान्तःपातितया न तस्य प्ररोहः । उत्तरार्धे तु सोऽपि । एते दश शब्दगुणाः ॥

विदग्धं चित्तं च बहुधा हृदयम् । तस्योत्तरार्धपरत्वाधयायपक्षे तदघटकत्वतथ्यंचरजो भवेत् । तच्चिन्त्यनियमः । अत एव सरलाप्येषां वर्ण्यन्ती सरलंव । अतो यत्पुनरुक्तं 'रसचन्द्रिकायाम्-'सरला तु चतुर्यंचरणेऽवरोहं नानुभवति । तत्तत्स्वम् , तृतीयचरणमपेक्ष्य नावरोहः; , परं प्रयत्नमाधुर्यमपेक्ष्य द्वितीयार्धेऽन्वयरोहमनुभवन् मभिप्रकाशः प्रायो नाऽऽसमौचीन इति प्रतिभाति' इति तदप्यकिञ्चत्करम् । माधुर्यलक्षणे संयोज्यताम् परसवर्णनिष्पन्ननहुलभिन्नहलघटिततत्स्योक्तस्वाद्द्वितीयाचरणे कथम् न माधुर्यस्यारोह इत्याशङ्कां निराचष्टे-गड्गेत्यादावित्यादिना । दीर्घंसमासतेत्यादि । एतेन माधुर्यस्यामपेक्ष्यमाणस्य पृथक्पदतत्स्याभावोपपादनम् । न प्ररोहः । इति । प्ररोहः = प्रकाशः । समासवटकतया द्वितीयचरणस्य प्रथमपदेन गाढत्वप्ररोहवता तथात्मित्यमिप्रायः । सोऽपि = माधुर्यंप्ररोहोऽपि । अतश्चोत्तरार्धं संबोधिमाधुर्ययोगेऽपि भवेत् । प्रतिपादितं तु 'एतद्वता दर्शनेनैदगुण-निरूपणं' प्राचामनुसारेण परिष्कृत्य कृतम् ॥

एवम्— क्रियापरस्पर्या विदग्धचेष्टिततस्य तदस्फुटतत्स्य तदुपपादकयुक्ते श्च सामानाधिकरण्यरूपः श्लेषः ॥

तदस्फुटततस्य = विदग्धचेष्टिततस्य परेणाप्रतीयमानत्वस्य । तदुपपादकैत्यान्नापि तत्पदेन विदग्धचेष्टिततस्य ग्रहणम् । सामानाधिकरण्यमेकत्र वाक्ये महावाक्ये वा माधुर्यं-व्यञ्जक वर्णे विदग्धमान हैं तथापि दीर्घंसमास के कारण माधुर्य-लक्ष पाघटक 'पृथक्पदतत्व' का अभाव होने से यहाँ माधुर्य का उत्कर्ष नहीं .मना जा सकता । उत्तरार्ध में माधुर्य-विरोधी दीर्घंसमासादि लक्षणों के न होने और माधुर्यं-व्यञ्जक वर्णों के होने से श्लिष्टता के साथ-साथ माधुर्य का भी उत्कर्ष है ही । इस प्रकार प्रबन्ध वामनादि द्वारा स्वीकृत दश शब्दगुणों का निरूपण किया गया ।

शब्दगुण के समान नाम वाले श्लेष, प्रसाद आदि दश अर्थगुण भी वामनादि के अभिमत हैं । किन्तु नामसाम्य होने पर भी इनके स्वरूप में भेद है । यथा: श्लेष; प्रसाद आदि अर्थगुणों का क्रमशः रक्षण-उद्वाहरण के साथ निरूपण किया जा रहा है— एक के बाद एक क्रिया का निर्देश करते हुए क्रमशः किसी विदग्धमान की चेष्टा; उस चेष्टा की अव्यक्तता और उस चेष्टा के उपपादक युक्तियों का सामाना-

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प्रबन्धघटकैर्निवेशः । प्रबन्धे प्रायेण सर्वत्र, मुक्तके तु मवचिदेवासुं गुणः ।

यह अर्थगुण इसीलिए माना जाता है कि उक्त सामानाधिकरण्य श्लेषादि अथ्यों का ही विवक्षित है, तद्धावक शब्दों का नहीं ।

अस्योदाहरण* पण्डितराजजप्रथे* न दृश्यते । कथमिव चत् परिश्रष्टमिति प्रतीतते ।

इमका उदाहरण रसगङ्गाधर में उपलब्ध नहीं है । अतः वामन द्वारा उद्धृत वमशुक कवि के 'दृष्टैकासनसंस्थिते' इत्यादि पद्य में ही इसका उदाहरण दृष्टव्य है ।

अतो वामनोक्तमुदाहरण* दृश्टव्यम—

पद्य संस्कृत-टीका में उद्धृत है, इसका अर्थ तिस्न्नलिखित है—

दृष्टैकासनसंस्थिते प्रियतमे पश्चादुपेत्यादराद्

"जब धूर्त्तं नायक ने देखा कि उसकी दोनों ही प्रियतमाएँ एक ही जगत् बनी हुई हैं और उस स्थिति में उन दोनों में अनुकूलतर प्रियतमा को चूमना उसके लिये वम्भव नहीं, क्योंकि वैसा करने पर एक प्रियतमा नाराज हो जाएगी सब उसने उत्कण्ठापूर्वक् पीछे जाकर शैल के बहाने उस एक प्रियतमा को आँखें बन्द कर

एकस्या नयने विधाय विहितक्रीडानुबन्धच्छलः ।

दीं । फिर धीरे-धीरे से अपनी गर्देन को कुछ टेढ़ी करके प्रेम से उसलसित होती हुई और 'अन्य प्रियतमा कहीं यह रहस्य समझ न ले'—इस भय से भीतर ही भीतर हँसते के कारण फूले हुए गालों वाली दूसरी प्रियतमा को रोमाञ्चित होकर उसने

अन्तर्हसितसकपोलफलकां धूर्तोऽस्यां चुम्बति ॥

(' धूर्त्तं नायक ) ने चूम लिया ।'

अस्यार्थः—एकस्मिन्नेवासन उपविष्टे प्रियतमे ( द्वितीयादिच्चने रूपम् ) दृष्ट्वा

धूर्त्तों नायकः पश्चात् पृष्ठदेशाल् आदरादर्शंकतारालिङ्गनकोतुकादस्या नायिकाया:

क्रीडानुबन्धच्छलेन नयने विधाय मनाङ्गनमितग्रीवः सरोमोद्गमश्र्‌ सन् प्रेमोल्ल-

तन्मानसां रहस्यसङ्गोপনेच्छया* विहितेनात्रहसिनोत्फुल्लकपोलफलकां चापरां

नायिकां चुम्बतीति । उभयोरन्वयिकयोः प्रियतमे तिनिदेशेऽस्म्रथयाया ऽपि चुम्बनादिकं

तेन क्रियत एव । सुपुलक इत्युक्त्या पुनर्द्वितीयस्यामतुरागतिशयो ज्ञोत्यते ।

अत्र चैकस्या वध्चनेनापरसयाऽइचुम्बनं विद्रध्र चेष्टितम्, एकस्याऽस्परचुम्बनस्याऽज्ञात-

स्वातदस्फुटत्वम्, क्रीडानुबन्धच्छलेन च प्रथमनायिकानयननिपिधानादपरसयाऽइचुम्बन-

स्योपपादनम् इत्येतत्सर्वं तनुकल्क्रियापरस्परया पश्चादादर्शकादुप्रेक्षा समान एव

पच्ये ग्रथितमिति श्लेषोऽत्रायङ्गुण इति समन्वयप्रकारः।

ध्विकरणयसम्बन्ध, अर्थात् किसी एक काव्यनायक या महाकाव्य में वर्णन होना हीं 'श्लेष' नामक अर्थगुण है ।

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यावदर्थकपदत्वेनार्थवैमल्यं प्रसादः ॥

यथा—‘कमलतुकारि बदनं किल तस्या:’ इत्यादि । प्रत्युदाहरणं तु ‘कमलकान्तमनुकारि वक्त्रं’ इत्यादि । प्रक्रमादभङ्गेनार्थघटनानातमकत्ववेष्म्यं समता ॥

यावदर्थकत्वादि । यावन्नोद्याः प्रतिपाद्येऽर्थिताः तावतामेव शब्दानां न न्यूनानां नात्यधिकानां प्रयोोगो यत्र तत् तत्त्वं प्रसाद इत्यर्थः । अर्थेऽन्यूनतातिरक्तपदप्रतिपाद्यत्वं प्रसादोर्थगुण इति तात्पर्यम् । इदं च ‘अर्थवैमल्यं प्रसादः’ इति वामनोक्तलक्षणस्यैव स्फुटतरं वचनम् ।

कमलकान्तीयत्र प्रत्युदाहरणे कान्तिपदमधिकृत्यैतदाशयः । वामनेन तु अर्थपुष्टिरुक्तावपि प्रत्युदाहरणस्वमङ्गीकृतम् । प्रकृतेऽपि तद् बोध्यम् । तादृशं प्रत्युदाहरणं वामनादिग्रन्थेषु शोधिगत्वयं । परन्तु मञ्जूषान्तरेणार्थस्य पुनरुक्तिर्युज्यते न दोष इति कविसमप्रदायः । वक्ष्यते चैवं माधुर्यं लक्ष्यता ग्रन्थकृता ।

प्रक्रमादभङ्गेनेति । येन शब्देनार्थस्याभिधानमारम्भे तेनैव समाप्तिपर्यन्तमभिधानम्---समन्वादेनैवोपक्रमप्रसङ्गोपसंहारपर्यन्तं प्रतिपाद्यभानरवमर्थस्य समतेति भावः । उद्देदेश्यस्यैक्येनेऽभिन्नेनैव पदेनोपादानं तस्य विशेषेणापेक्ष्यते । विशेषणत्वेन विवक्षितार्थ-

एक को धोखा देकर दूसरी को चूमना विदग्धचेष्टित है, यह विदग्धचेष्टित जिसका उपपादक है । इस प्रकार एक हठ में चुम्बनक्रिया द्वारा विदग्धचेष्टित का, शृङ्गार करने का बहाना करने की क्रिया द्वारा विस्रब्धचेष्टित क्री एक नायिका के लिए अय्यक्तता का और पीछे से आकर आँखें बन्द कर देने की क्रिया से उस विस्रब्धचेष्टित चुम्बन का उपपादन किये जाने से यहाँ पूर्वोक्तक्षित 'श्लेष' गुण की स्फूर्ति स्पष्ट है ।

अर्थ की विमलता—स्पष्टता, अर्थात् प्रतिपाद्य अर्थ का प्रतिपादन करने के लिए जितने शब्द आवश्यक हों उतने ही शब्दों द्वारा, उनसे कम या अधिक शब्दों द्वारा नहीं, अर्थप्रतिपादन किया जाना 'प्रसाद' नामक अर्थगुण कहलाता । जैसे—“उस नायिका का मुख कमल का अनुकरण करने वाला, अर्थात् कमल सदृश मनोहर है” इस वाक्य द्वारा वर्णित अर्थ में 'प्रसाद' गुण है । इसके विपरीत, “उस नायिका का मुख कमल की कान्ति का अनुकरण करने वाला है” इस वाक्य में वर्णित अर्थ में 'प्रसाद' गुण नहीं है, क्योंकि इस वाक्य में विवक्षित अर्थ के प्रतिपादन के लिए आवश्यक शब्दों से अधिक 'कान्ति' शब्द प्रयुक्त है ।

विवक्षित एक अर्थ का जिस शब्द से वर्णन के प्रारम्भम्भ में प्रतिपादन किया गया

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हरिः पिता हरिमाता हरिप्रजा हरिः सुहृत् । हरिं सन्त्र परश्यामि हरेः अन्यन्न भाति मे ॥

अत्र विष्णुप्रतियादिनिर्माणेऽपि प्रक्रमभङ्गादात्मकं वैषम्यम् । एकस्या एवोक्ते भङ्गेऽस्तरेण पुनः कचनात्मकमुक्तिवैचित्र्यं साधुर्यम् ।

ज्ञानार्थत्वादस्यार्थान्नात्रापि तथा । यदि तु एकपदप्रयोगे न विचिकित्सितस्तदः परिहरणीय एव सः ।

हरिरित्यादिकथे हरिरशब्देनैवोपक्रमादुपसंहारपर्यन्तं परमेश्वररूपार्थस्याभिधीयमानत्वं स्पष्टमेव । पर्यायशब्दानां परस्परं भिन्नत्वं नार्थभिन्नत्वे कारणमिति यदष्यापाततः प्रतीयते तथापि शब्दद्वयापि शब्दबोधे भानस्य वैयाकरणादिसम्मतत्वेन एकशब्देनार्थबोधे एकरूपेणार्थः प्रतीयते शब्दान्तरेण पुनर्बोधे तच्छब्दद्विशिष्टः प्रतीत इतिविशेषणभेदादर्थभेदोऽर्थवैषम्यरूप इति सममप्ৰकाशः । अत्रोदाहृतमिदं पद्यं कीदृशं काव्यमिति विवेचनीयम् ।

वामनोक्तं माधुर्यलक्षणं परिष्कृत्याह—एकस्या इत्यादिना । उक्तशब्दे हो उसो शब्द से अनतं तक उसका प्रतिपादित होना ( प्रारंभ में एक शब्द से ओर बाद में अन्य शब्द से प्रतिपादित न होना ) 'समता' है ।

जैसे— 'हरि हीं मेरे पिता हैं, हरि हीं माता हैं, हरि हीं मित्र हैं, मैं सर्वत्र हरि को हीं देखता, मुझे हरि से अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखायी देता ।'

इस पद्य में उपक्रम से उपसंहार तक परमेश्वर-स्वरूप अर्थ का एक 'हरि' शब्द से हीं प्रतिपाद होने से इसमें 'समता' नामक गुण है । इसके विपरीत,

हरिः पिता हरिमाता विष्णुप्रजा हरिः सुहृत् । सर्वत्र परश्यामि विष्णोरन्यन्न भाति मे ॥

इत्यादि प्रकार से यद्यपि भिन्न-भिन्न शब्दों द्वारा परमेश्वर-स्वरूप अर्थ का अभिध्यान किया गया होता तो 'समता' न होती । इसका कारण यह है कि शब्दबोध के सविकल्पक होने—विशेषणविশिष्ट विशेष्य का ज्ञान होने—से विशेषणहीन शब्द में भी शब्दबोध-विषयता होती ।

ऐसी स्थिति में भिन्न-भिन्न शब्दों से एक हीं अर्थ का प्रतिपादन करने पर तत्सच्छब्दजन्य बोध में तत्सद् शब्द (नाम) की प्रतीति होने से सभी खण्डवाक्यों से होने वाले बोध में एकरूपता हो नहों सकती ।

अतः उक्तबैचित्र्य मो 'माधुर्यं' कहा जाता ।

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यथा—

विधत्तां नि:शङ्कं निरवधिसमाराधिविधिरहहो सुखं शेषे शेतां हरिरविरतं नृत्यतु हरः ।

कृतं प्रार्थशिवत्तैररलमथ तपोदान्यजनने: सवित्री कामानां यदि जगति जागर्ति भवती ॥

अत्र विधयादिभिन्नोक्तिस्तु किमपि प्रयोजनमित्येषोऽर्थ: समाधिविधानादिप्रेरणारूपेणोक्तिवैचित्र्येऽपि हितः । अन्यथाडनवद्यीकृतत्वापत्तेः ।

नायोंड्नाभि:प्रेतो ह्युपपत्तिर्मेदेन लक्षणया वा ।

विधत्तामित्यादि पद्यं गड्गालहयामू । सवित्रोति तृणन्तं पदम्, कामानामिति षष्ठच्यंतपदात् । तृणनस्तवे तु द्वितीया स्यात्, न लोकाङ्गयेति कर्मषष्ठया निषेधात् ।

उत्कर्ष: पुनस्तृन्ननस्तपयोगे स्यात् । भवती=गङ्गा । पद्यार्थः: स्कुरतः ।

प्रेरणात्र लिड्ल्य:, अधीष्टं वा । अन्यथा==उत्कृष्टवैचित्र्यामावे । अनवो:कृतत्व-

अकाण्डे=अनावसरे । मार्गे विविधकृतदेरप्राप्तेरुद्देश्येन नावसर इति शोकस्या-

नवसरता । एतच्च बोधयतस्तवे शोकस्य कुशलस्वित संवलकत्ते । महदप्यनृतंत्वं तु शोकस्यं

विवक्षितमिति मन्यामहे । उदाहरणानुरोधेन चाकाण्ड इत्यस्य तात्पर्येऽस्फुटम् ।

'असारक्यं सौकुमार्यम्' इति वामनोक्तं लक्षणमेवात्र परिष्कृतम् । सुकुमारताया:

पारुष्याशावसव रूपतवेनेव दोषाभावात्मक्तत्समुपपादयत्नन्ये ।

अयं का भिन्न.भिन्न भङ्गी (अभिव्यक्ति-प्रकार) से प्रतिपादन करना है ।

उदाहरण गङ्गालहरी के निम्नलिखित पद्य में दृश्यतव्य है ।

"मां मज्जे ! सर्वे कामनानो को पूर्ण करने वाली तू" जब इस संसार में सजग है तब विधाता निहचिन्त होकर अनन्त समाधि में निमग्न हो जाय, भगवान् विष्णु वैषणाग के ऊपर आराम से शयन के लिए चले जाय, भगवान् शिष् संवदा अपने ताण्डव में संलग्न हो जाय, पापक्षय के निमित्त विभिन्न प्रार्थशिवत्त करने की भी कोई आवश्यकता न हो और इसके लिये तप, दान और पूजन आदि शास्त्र-विहित कर्मों में का भी कोई उपयोग नहीं ।"

इस पद्य में प्रतिपादनीय अर्थ यही है कि जब गङ्गा सकल पाप-ताप को दूर करने के लिए सन्नद्ध है तो फिर विधाता आदि का कोई प्रयोजन नहीं । परन्तु यदि इसी रूप में यह अर्थ शब्दों द्वारा प्रतिपादित होता तो इसमें कमस्कार न होने से यहाँ 'अनवो:कृतत्व' दोष आ जाता । अत एवं विधाता आदि को अनन्तं समाधि में निमग्न हो जाने आदि की प्रेरणा का प्रतिपादन किया गया है जिससे अर्थ में एक

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अकाण्डे शोकदायित्वाभावरूपमपारुष्यं सुकुमारता ॥ यथा—‘त्वरया याति पान्थोऽयं प्रियाविरहकातरः।’ इत्यत्र शोकदायिनो मरणशब्दस्य सत्त्वात्पारुष्यम् । इदं चारलीलतादोषव्यपेक्षम् ।

वैदग्ध्य आ जाता है। प्रतिपाद्य यत्पाठ्य मे---कठोरता, जिसका अर्थं अनुत्सर मे शोक देना है, के अभाव को हैं 'सुकुमारता' कहते है। जैसे— "यह पथिक अपनी प्रियतमा के विरह (=मरण) से अत्यन्त खिन्न होकर शोघ्रता से अपने घर को लौट रहा है ।" इसौ वाक्य मे यदि मरणस्वरूप अर्थ के प्रतिपादन के लिए 'प्रियामरणकातर:' कहा जाता तो यह अन्वयर मे हाँ शोकप्रद होता, क्योंकि घर लौटने के समय उस पथिक की प्रियतमा के मरण की बात सुनकर सहृदयों को शोक होता । यद्यपि जिस व्यक्ति को ऐसी कठोर बात कही जाती उसे भी शोक हो ही सकता है तथापि काव्य मे सहृदयगत शोक हाँ विवक्षित होता । अतः उक्त लक्षण मे निर्दिष्ट शोक को सहृदयनििष्ठ शोक समझना चाहिये । इस लक्षण से यह स्पष्ट है कि यह् अर्थगत कठोरता---पाठ्य, जिसके अभाव को 'सुकुमारता' कहा गया है, एक अर्थगत दोष है । इसे स्वतन्त्र दोष के रूप मे नही माना गया है अपितु वह 'अश्लीलता' दोष के अन्तर्गत आता, जिसमे क्रोड (=लज्जातिशय), जुगुप्सा अथवा अमज्जूल की प्रतीति होती । 'अश्लीलता' दोष के अन्तर्गत पूर्वोक्त मरण-शब्द से प्रतिपादित अर्थ मे अमज्जूल-सूचकतास्वरूप 'अश्लीलता' है ।

वस्तुनो वर्णनीयस्यासाधारणक्रियारूपयोर्वर्णनमर्थशक्ति: ॥

वर्णनीय वस्तु के असाधारण स्वरूप और असाधारण क्रिया का वर्णन करना ही 'अर्थशक्ति' है । ऐसा प्रतीत होता कि 'अर्थश'

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यथा—

गुरुमध्ये कमलाक्षी कमलाक्षेण प्रहृतुंकामं माम्‌ । रदयन्न्तररशनाग्रं तरलितनयनं निवारयाऽऽचक्रे ॥

अथमेवेदानींतनैः स्वभावोक्त्यलंकार इति व्यपदिश्यते ।

तन्मुखयोर्विशेषणम्‌ । एतद्—अर्थव्यक्तिरिति रित्यम्रार्थशब्दोऽसाधारणक्रियास्वरूपयोर्वांत इति बोध्यम्‌ ।

गुरुमध्ये इत्यादि । गुरुणां श्रेष्ठजनानां मध्ये कमलाक्षेण प्रहृतुं कामोडभिलाषं यस्य तादृशं मां कमलाक्षी प्रिया लज्जया रदैदंस्तैरन्तर्निपीडितं रशनाग्रा मग्रे यत्न अथ च तरलिते निकोचवती नयनने यत्न कर्मणि तथा निवारयाऽऽचक्रे । दत्तैरैर्जिह्वाग्रं निपीडयन्न्ती नयनने च व्यापारयन्ती कमलाक्षी कमलाक्षेण प्रहृतुंकामं मां निवारित- वतील्यभिप्रायः । रदयन्न्तरतेत्यादिक्रियाविशेषणद्वयम्‌ । अत्र 'निवारयाऽऽचक्रे' इति लिट्‌प्रयोगद्विचनस्य । पद्येऽस्मिन्‌ कमलाक्षीत्यनेन वसाधारणस्य नायिकास्वरूपस्य रदयन्न्तरतेत्यादिदिविशेषणद्वयविशिष्टाया निवारणक्रियायाऽसौ वर्णनादर्शव्यक्तिगुणं ण इत्यभिप्रायोऽप्यज्ञातः । तथोक्तनिवारणक्रियायामपापरमप्रसिद्धां कीदृशमसाधारण- त्वमिति विवेचनीयम्‌ । यद्वा पारमार्थिक्यामपरोक्षप्रत्यभिज्ञापूर्वकै- वैदग्ध्यात्प्रतिभामात्रवैदग्ध्याद्वासाधारणत्वं कस्यचिन्मन्तव्यम्‌ ।

ईदानींतनैः=गुणत्रयवादिभिराचर्यैः । स्वभावोक्तीत्याादि । ईदं च 'वस्तु- स्वभावस्फुटत्वमथंव्यक्ति:' इति वामनोक्तलक्षणेनैव सूचितप्रायम्‌ । विशेषः काय- प्रकाशादिष्यो येऽपि ।

व्यक्ति' शब्द के पूर्वार्धभाग—'अर्थ' शब्द के अभिधेय वस्तु (= अर्थ) के असाधारण स्वरूप और असाधारण क्रिया हैं ।

इसका उदाहरण निम्नलिखित पद्य में उपलब्ध है—

''जब श्रेष्ठ जनों के बीच बैठीं अपनी कमलतुल्य नेत्रोंवाली प्रियतमा पर मैंने अपने कमल—सदृश नयन से प्रहार करना चाहा—उसपर कटाक्षपात करने को उद्यत हुआ तो उसने दांतों तले जीभ दबाकर आँखों के इशारे ( कनखी ) से मुझे वैसा करने से रोक दिया ।''

इस कथन में प्रियतमा के असाधारण स्वरूप का 'कमलाक्षी' शब्द से और दांतों तले जीभ दबाकर आँखों के इशारे से रोकने की असाधारण—वैदग्ध्यपूर्ण क्रिया का वर्णन होने से 'अर्थव्यक्ति' नामक गुण है ।

इसी 'अर्थव्यक्ति'-नामक वामनादि-सम्मत गुण को परवर्ती आचार्यों ने 'स्वभावोक्ति' अलंकार कहा है ।

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'चुम्बनं देहि मे भायें कामचाण्डालतृप्तये' इत्यादिप्राप्तप्रार्थनपरिहारोदाहरणा ॥

एकस्य पदार्थस्य बहुधा: पदैरभिधानम्, बहूनां चैकत्वं, तथैकस्य वाक्यार्थस्य बहुविधाविकल्पे:, बहुवाक्यार्थस्यैकवाक्येनाभिधानम्, विशेषणानां साभिप्रायत्वं चेतिपश्चविधमोज: ॥

चुम्बनं देहोस्यादौ प्रतिपाद्योऽर्थो न विदग्धोचि: ! अतो प्राप्तस्यव नामाऽविदग्धार्थोक्तिदोषस्तदभाव उदाहरणतैर्यथ: ! अधमभिन्ने वक्तरि ग्राम्यत्वं दोष:, नतु मोक्तु तु ग्राम्यत्वं गुण एवेति बोध्यम् । ग्राम्योक्तिकवलितो हि विभावादिहपोष्यो न रसनिष्पत्तये समर्थ:; श्रृङ्गारो बीजमिवाङ्कुरायेतिं प्रदीपादौ स्पष्टम् ।

सम्प्रति क्रमप्राप्तमोजोगुणं वर्ण्यते—एकस्येत्यादिना । बहूनामित्यादि बहूनां पदार्थानामेकेन पदेनाऽभिधानमित्यर्थ: ।

ग्राम्य अर्थ का परिहार (करते हुए अप्राम्य——विदग्धोचित अर्थ का प्रतिपादन किया जाय तो) 'उदाहरणा' नामक अर्थगुण कहा जाता है ।

उत्तम और मध्यम श्रेणियों की प्रकृतियों के लिए वैदग्धयरहित अर्थ का प्रतिपादन करना ग्राम्यत्वदोष कहा गया है । किन्तु अधम प्रकृति के लिए तो यह ग्राभ्यत्व गुण है, दोष नहीं । अत: उत्तम और मध्यम प्रकृतियों द्वारा प्रतिपादित अर्थ में हि 'उदाहरता' सम्भव है ।

ग्राम्यत्व दोष का उदाहरण देखिये—

'ओ भायें (= प्रिये) ? कामरूपो चाण्डाल की तृष्ण के लिए मुझे चुम्बन दे ॥'

इसमें चुम्बन वाचि ग्राम्य अर्थ का अभिधान होने से इस वाक्यार्थ में प्राम्यत्व दोष है । किन्तु यदि यही वाक्य किसी अधम प्रकृति——गँवार जन द्वारा प्रयुक्त हो तो ग्राम्यत्व दोष नहीं होगा । अत: किसी उत्तम या मध्यम श्रेणी के मनुष्य द्वारा ऐसा कहने पर हाँ प्राम्यत्व दोष समझना चाहिए ।

ओज पाँच प्रकार का होता है—(१) एक पद द्वारा जिस अर्थ का प्रतिपादन सम्भव हो उस अर्थ का पद-समूह द्वारा प्रतिपादन किये जाने पर, (२) पद-समूह द्वारा जिस अर्थ का प्रतिपादन किया जा सकता उस अर्थ का किसी एक पारिमाषिक पद द्वारा प्रतिपादन किये जाने पर (३) एक वाक्य के द्वारा जिस अर्थ का प्रतिपादन सम्भव हो उसका अनेक वाक्यों द्वारा प्रतिपादन किये जाने पर, (४) अनेक वाक्यों द्वारा जिस अर्थ का प्रतिपादन किया जाना है उसका एक वाक्य से प्रतिपादन किये जाने पर और (५) विशेषण के साभिप्राय, अर्थात

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पदार्थे वाक्यरचना वाक्यार्थे च पदासिधा । प्रोढिव्याससमासौ च साभिप्रायतवमस्य च ॥

पूर्वोक्तप्रतिपाद्यं द्वयं व्याससमासौ चेति चतुष्प्रकारा प्रोढिः, साभिप्रायतवं चैति पश्चप्रकारमोज इत्यर्थ: । प्रोढिः प्रतिपादनवैचिच्यम् । साभिप्रायतवमस्य च ।

सरसिजवनवन्धुश्रीसमारम्भकाले रजनिरमणराञ्जये नाशमाशु प्रयाति ।

उक्तार्थे वामनवचनं प्रमाणत्वेनोपन्यस्यति— यदाहुरिति । वाक्यरचनेऽप्यत्र वाक्यवचनं चैति पाठद्वयं वामनग्रन्थे सम्भत्युपलभ्यते । अत्र पदे 'साभिप्रायतवमस्य च' इत्यनेदं पदेन विशेषणस्य प्रहणमभिप्रेत्य पूर्वं विशेषणस्य साभिप्रायतवमुक्तम् । वामनेनापि 'आश्रय: कृतधियाम्' इत्यत्र विशेषणस्यैव साभिप्रायतवं वर्णितम् । चतुष्प्रकारेऽपि वामनमते तु प्रोढिरेव पद्यमोदि प्रकार: प्रतीयते । अत्र 'अर्थेऽस्य प्रोढिरोज:' इत्येव तदुक्तमोजोलक्षणं पद्यस्वपि प्रकारेष्टवनुगतं लभ्यते । साभिप्रायविशेषणप्रयोगे प्रतिपादनवैचिच्यरूपा प्रोढिः पण्डिततराजेन कथमपि मन्यते इत्यवगमेऽपि दुराशाः— यद्वा प्रयमेपु चतुषु प्रकारेषु विवक्षितार्थस्य पदादिषि: प्रतिपादने कृतेऽपि वैचिच्यसहिताभावो भवति, न स्वपुष्टार्थता; साभिप्रायविशेषणभावे स्वपुष्टतार्थता भवतोति वैलक्षण्यादच वैचिच्यरूपप्रोढभावमादायास्य तद्धिह्नाव उक्त इति बोधयम् ।

विवक्षित अर्थ का पोषक, होने पर । यही विषय वामन ने स्पष्ट किया है:— ' पद के अर्थ का वाक्य (= पद समूह ) से और वाक्यार्थ का किसी एक ही पारिदृश्यिक पद से प्रतिपादन व्यास, समास से चार प्रकार का प्रोढिरोज और इनमें व्यास और समास शब्द क्रमशः 'एक वाक्य के स्थान पर अनेक वाक्यों से और अनेक वाक्यों के स्थान पर एक वाक्य से अर्थ के अभिधान' के वाचक हैं । यहाँ प्रोढि का अर्थ प्रतिपादनगत वैचिच्य—वैदग्धता है । पण्डितराज के कथन के अनुसार ओज के प्रथम चार प्रकार हूँ प्रोढि हैं, पदच्छेद प्रकार नहीं । जब कि वामन ने 'अर्थस्य प्रोढिरोज:' यह ओज का लक्षण करते हुए पूर्वोक्त 'पदार्थ वाक्यरचना' इत्यादि पद्य में पाँचों प्रकारों को प्रोढि के अन्तर्गत ही रखा है ।

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परमपुरुषवक्त्रादुद्गतानां नराणां

मधुमधुरगिरां च प्रादुरासीत् नोदः॥

अत्रोष्टसीत्येकपदार्थस्याभिधानाय प्रथमचरण इत्याद्यग्रेडपि बोधयम्।

पदार्थे वाक्यरचनताया उदाहरणम्-सरसिजेत्यादि। कमलवचनस्य बन्धोः सूर्यस्य श्रियः समारसभ्काले अथ च रजनिरमणस्य चन्द्रस्य राज्ये आशु श्रीघ्र तत्क्षणं वा नाशं प्रयाति सति-इत्यर्थंकस्य पूर्वार्धंस्य उषसीतर्थः, अयं च एकेनैव उषसीति पदेनैविध्यातु योग्योडपि पूर्वार्धरूपेण वाक्येन प्रतिपादितः। एवमेव परमपुरुषवक्त्रादुद्गतानां नराणामिति वाक्यं ज्ञापयितुमित्येकपदार्थ प्रयुक्तम्। परमपुरुषवक्त्रादुद्गतान्वित्यनेति मधुमधुरगिरामित्यत्रापि। तथा चास्य पदसमूहस्य वेदानामित्यर्थः पर्यवस्यति। उषसि ज्ञापयितुं वेदानां च विनोदः क्रमेण पाठकर्तृ-स्वात् पाठकर्मत्वाच्च प्रादुरासीदीति भावः। वाक्यं चात्र पदसमूहमात्रं विवक्षितं न त्वाकांक्षादिमत्पदसमूहो निराकांक्षार्थप्रतिपादक एव। अत एव ग्रन्थकृता 'बहुभिः पदैराभिधानम्' इत्युक्तम्। तथा च पदसमूहमात्रं वा स्यादाकांक्षादिमत्पदसमूहो वेत्यन्न प्रथमचरण इत्यत्र बहुत्रीहिः, तथा च प्रथमसो भागः पूर्वार्धरूप इत्यर्थः। यद्यपि प्रथमचरणेन द्वितीयेन वा विवक्षितार्थप्रतिपादनं शक्यसम्भवम् तथापि पुनरुक्तिवारणाय बहुत्रीहिः स्वीकृत इति बोधयम्।

द्वितीयस्योदाहरणमाह—खण्डितेत्यादि। खण्डितताया अनुपदं वक्ष्यमाण-

एक पद से प्रतिपाद्य अर्थ के पद-समूह द्वारा प्रतिपादन का उदाहरण यह है— ''जिस समय कमल-कुल के मित्र (सूर्ये) की छटा का उदय हो रहा था और निशानाथ चन्द्रमा के राज्य का शोभ्रता से अन्त हो रहा था (पूर्वार्ध का अर्थ) उस समय परमपुरुष भगवान् के मुख से उत्पन्न मानवों में और उसी भगवान् के मुख्ख से आविर्भू²त मधुसदृश मधुर वाणी का उल्लास हुआ।''

इस पद्ध में प्रथम और द्वितीय चरणों के पद समूह से उस उष.काल का प्रतिपादन, वैशिष्ट्य के साथ, किया गया है जिसका अभिधान एक हीं ‘उषसि’ पद से हो सकता था। इसी प्रकार एक ‘ब्राह्मण’ पद द्वारा जिस अर्थ का अभिधान किया जा सकता था, उसके लिए सम्पूर्णं तृतीय-चरणरूप पद-समूह का और केवल ‘वेद’ पद के अभिधेय अर्थ के लिए ‘परमपुरुषवक्त्रादुद्गतानां मधुरमधुरगिराम्’ इस पद-समूह का प्रयोग किया गया है। अतः इसमें प्रथम प्रकार का खोज है।

एक पद द्वारा वाक्यार्थ के अभिधान का उदाहरण देखिए----

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खण्डितानेत्रकज्जालिमञ्जुरञ्जनपणिडताः । मण्डितताऽखिलदिक्प्रान्ताश्रेणीशोभान्ति भानवः ॥

अत्र 'यस्या: पराङ्‌नागेहात् पति: प्रातर्गृहेदृचतिः' इति वाक्यार्थे खण्डिततापदाभिधानम् ।

अयाचितः सुखं दत्ते याचितश्च न यच्छति । सर्वस्वं चापि हरते विधिरुष्टः कदलो न कदापि ॥

अत्र दैवाधीनां सर्वमित्येकस्मिन्वाक्यार्थे नानावाक्यरचनानातमको व्यासपदवाच्यो विस्तारः ।

लक्षणया नायिकाया नेत्रकज्जालनेनैकमलश्रेण्या रञ्जुनि रङ्ङोऽपि पणिडता निपुणा अथ च मण्डिता अखिला दिग्भागा यैस्तादृशैः चरण्डैः सोऽयंस्य भानवो भान्तीत्यर्थः ।

वाक्यार्थः = निष्कृष्टखण्डिततालक्षणवाक्यार्थस्थाने खण्डितापदेनार्थाभिधानादोजोऽर्थ-गुणः ।

वृत्तीयस्योदाहरणम्—अयाचित इति । अत्र 'दत्ते', 'यच्छति' इति क्रियाद्वयैकवाक्याय तृणामिस्यात्त चतुर्थ्या विपरिणामः कर्तव्यः । यद्वा सम्प्रदानत्वाद्विवक्षया सम्बन्धसामान্যে पञ्चम्यैव निर्वाहः, 'कस्याच किं दीयताम्‌' 'किं दीयताम्‌विकलक्षिताद्‌पिनस्ते' इत्यादिवत् ।

"सूर्य के वे प्रकाश चमक रहे हैं जो 'खण्डिता' नायिका के नेत्र-कमलों के पूर्ण रङ्‌जन में निपुण हैं और दिग्‌-दिगन्तों को मण्डित करने वाले हैं ।" इस पद्य में 'जिसका पति परकीय नायिका के साथ रात बिता कर प्रातःकाल में उसके पास लौट आता (वह नायिका 'खण्डिता' कहलाती है)" इस सम्पूर्ण वाक्यार्थ का एक ही 'खण्डिता' पद से अभिधान किया गया है । अब तृतीय प्रकार के ओज का; जिसमें एक वाक्य के अर्थ का अनेक वाक्यों द्वारा विच्छिन्नपूर्ण रीति से प्रतिपादन किया जाता है, उदाहरण लीजिए—

"मनुष्यों का भाग्य कितना अच्छा अल-अनियतवस्थित होता कि वह बिना मांगे सुख देता पर मांगने पर सुख भी न देता और सारा सर्वस्व भी हर लेता है ।" इस पद्य में तीन वाक्यों द्वारा 'सब कुछ भाग्याधीन है' इस एक वाक्यार्थ का प्रतिपादन किया गया है । यही वामन के शब्द में 'व्यास.' अर्थात् शब्द-विस्तर कहा गया है । अब अनेक वाक्यों के अर्थों के एक वाक्य द्वारा प्रतिपादन का उदाहरण प्रस्तुत है—

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तपस्यतो मुनेरवक्त्राद्वेदेऽर्थमधिगत्य सः । वासुदेवनिविष्टात्मा विशेष परमं पदम् ॥

तपस्यतो इति । मुक्तोऽर्थमूर्त्तित चतुर्थपादार्थम् उक्तः । शत्रु-चतुर्थस्योदाहरणम्—तपस्यत इति पदे, कत्वा-प्रस्योद्रधिगम्यतेन, तृतीये च पादे बहुत्रीहिरस्ति तस्य विवेशेति तिङन्तम् । सर्वासां क्रियाणां तिङन्तेन क्रुदन्तेन वा शब्देनाभिधाने वाक्य-चतुष्टयं स्यात्, ततस्ताने तयं क्रमशः शत्रुप्रत्ययान्तिना क्रियाप्रतिपादनपूर्वंकमुद्देश्य-विशेषणतयोदिते स्योद्देश्यीकृतं तिङन्तप्रतिपाद्याराः परमपदनिवेशक्रियाया विधेयाया इत्येक-वाक्यतवं स्पष्टम्, प्रधान-भूतक्रियायास्तिङन्तपदोपपदस्यार्थस्य चैकत्वादित्यभिसन्धानेनोक्तम्—अनुवाच्येत्यादिना । अनुवाच्यम्=शब्दमुद्देश्यम् ।

अत्र मुनिस्तपस्यति, तद्वक्त्रात्स वेदार्थमधिगतवान, तदनन्तरं वासुदेवे परब्रह्मणि मनः प्रवेशयत्, ततश्च मुक्तोऽभूदिति वाक्यार्थकलापः शत्रुः कत्वा-बहुत्रीहिसंहितडन्तेन चानुवाद्याविधेयभावेनैकवाक्यार्थीकृतः । साभिप्रायत्वं च प्रकृतार्थपोषकता ।

पदच्‍चमं प्रकारं व्याचष्टे—साभिप्रायत्वमिति । प्रकृतार्थस्य पोषकत्वमुपपाद-

"तपस्या करते हुए मुनि के मुख से वेदार्थ का परिज्ञान कर के परमात्मा मे अपने मन को समाहित कर उसने परम पद को प्राप्त कर लिया ॥"

इस पद्‍च में चार वाक्यों—‘मुनि तपस्या कर रहे हैं ( मुनिस्तपस्यति ), ‘उनके मुख से उसने वेदार्थ का परिज्ञान किया’ (तद्वक्त्रात् स वेदार्थमधिगतवान्), ‘उसके बाद उसने वासुदेव, अर्थात् परब्रह्म में अपने चित्त को समाहित कर लिया’ ( तदनन्तरं वासुदेवे स मनः समावेशयत् ) और ‘उसके पश्चात् वह मुक्त हो गया’ ( ततश्च स मुक्तोऽभूवत् )—के अर्थों का प्रतिपादन एक हीं वाक्य में चारो वाक्यों का समावेश कर किया गया है। प्रथम वाक्य की समाप्तिका क्रिया—‘तपस्यति’ को शत्रुप्रत्ययान्त ‘तपस्यत’ शब्द द्वारा, द्वितीय वाक्य की समाप्तिका क्रिया—‘अधिगतवान्’ को कत्वा-लुप्तूप्रत्ययान्त ‘अधिगत्य’ पद द्वारा और तृतीय वाक्य की समाप्तिका क्रिया को बहुत्रीहि ( वासुदेवे निविष्ट आत्मा = अन्तःकरणं यस्मिन् तया-विधः—तत्पुरुषषष्ठीबहुत्रीहि ) समास द्वारा प्रथम तीन वाक्यार्थों को उद्देष्टव्य ( के विशेषण ) ओर अन्तिम वाक्य के तिङन्तर्धटित होने से उसके अर्थ को विधेय बनाकर चार वाक्यों के स्थान में एक हीं वाक्य द्वारा अर्थ का प्रतिपादन कर दिया गया है।

विशेषण के साथप्राय होने का अर्थ उसका विवक्षित अर्थ का परिपोषक होना है। ऐसे हीं विशेषण को ‘हेतुभ्रं विशेषण’ कहते हैं। देखिए—

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यथा—

गणिकाज्जामिलमुख्यानावता भवता वताहमपि । सीदन्‌भवमरहर्त्तं करुणामूर्त्तिं न सर्वथोपेक्ष्यः ॥ अत्रोपेक्षाभावे करुणामूर्तितत्त्वं पोषकम् । पापिष्ठत्वात्करुणाया अभावे प्रकृतेस्स्या: संपादनाय गणीकेत्याादि सीदद्र्र्शिति च । दीप्तरसत्बं कान्तिः ॥

कत्वमित्यर्थं । एतादृशां विशेषणं हेतुगर्भंमित्युच्यते । गणीकेत्याादि । हे करुणावतार परमेश्‍वर? गणिकाज्जामिलो मुख्यो येषां तान् अवता रक्षता भवता भव एव महत्त्त्संस्तस्मिन् सीदन्‌ कलेस्मनुभवन्तनहमपि न सर्वथोपेक्ष्य इति कश्चिद्ध वाङ्मो भक्तो भगवन्तं प्रार्थयते । अथ च पछो निर्दिष्टा गणिका पिङ्गलानाम्नी यस्राः कथा या श्रीमद्भागवते एकादशस्कन्धस्य तवमेढ्यामे, अजामिलस्य च दासीपुत्रस्य कथा तत्रैव षष्ठस्कन्धस्यादौ तृतीयवध्यायेशु वर्णिता ।

वत्न विशेषणस्य सामिप्रायत्वच्‌मुपपादयति—अत्रेत्याादिना । अत्र च करुणामूर्त्तेर्द्विति सम्बोधनपदस्य करुणामूर्तितत्त्वविभिष्टार्थंकत्वेन करुणामूत्त्तरस्य (=करुणायाः) विशेषणत्वमुक्तम् । योग्यतावशात्परमेश्‍वरपदाद्‌ध्याहारे तु करुणामूत्त्तिरेव विशेषण- परमेश्‍वरस्य, क्रियाया वेति बोधयम् । कान्तेर्‌वामनोक्तं लक्षणं प्रस्तोतु-दीप्तेत्याादि ।

"क्षो करुणावतार परमेश्‍वर ! तूने गणिका और अजामिल जैसे अज्ञों को तारा है; इस लिए संसाररूपी सूखे गड्ढे में तड़पने वाले मुक्त वाङ्मम की भी किसी तरह उपेक्षा मत कर ॥" इस पद्य में करुणामूत्त्ति' का करुणामूत्तित्त्व अथवा अध्याहियमान परमेश्‍वर का 'करुणामूत्त्ति' यह विशेषण 'उपेक्षा मत कर' इस अर्थ का परिपोषक है । इसी तरह प्रार्थी के पापिष्ठ होने से आपाततः वह करुणा का पात्र नहीं हो सकत; किन्तु पापिष्ठ जन भी यदि पीड़ा से तड़प रहा हो और जिससे करुणा की माँग जा रही हो वह यदि उसकी शिक्षा देने का अभ्यस्त हो तो पापिष्ठ जन में भी करुणापात्रता आ जाती है—इसी अभिप्रेतार्थ के पोषण के लिए गणिका आदि को दुष्टान्त रूप में परमेश्‍वर के विशेषण का घटक और 'सीदन्‌' इस पद को प्रार्थी सामिप्रायता है । दीप्तरसत्ब को 'कान्ति' नामक अर्थगुण ( वामन ने ) कहा है ।

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तच्च स्फुटप्रतीममानरसत्वम् । उदाहरणं च वर्णितमेव रसप्रकरणे, वर्ण्यविषयते च । अर्वर्णितपूर्वोऽ्यमर्थः पूर्वंवर्णतच्च्छायो वेति कवेरालोचनं समाधिः ॥

ज्ञानस्य विषयतासंबन्धेनार्थनिष्ठतया अर्थगुणता । आद्यो यथा—‘तनयमैनाकवेषणा-’ इत्यादौ । द्वितीयस्तु प्रयत्नः तच्च = दीस्रसत्वं च । वर्णितमेवेति, ‘शायिता सविघेऽप्यनिश्वरा.......’ इत्यादौ वर्ण्यविषयत इत्यस्य यथासंभवमलङ्कारादिप्रकरण इति दोषः । अर्वर्णितपूर्वोऽ्यर्थादि । इमावेवाथो वामनेन क्रमशः ‘अयोगिनः’, ‘अन्यच्छायायोगिनः’ इति कवितो । वामनेन पुनरुभयभावव्यतिरेकव्यक्तसूक्ष्मास्वाम्यां द्विधा, अनयोगरपि सूक्ष्मोऽर्थो विषयकालोचनस्य कविनिष्ठत्वेन कथं मय्यनिष्ठत्वमित्याशङ्कापकारोति— ज्ञानस्येत्यादिना । समबायेन कवो वर्त्तमानमप्यालोचनं विषयतासमबन्धेनार्थनिष्ठ- मेवे यस्मै ज्ञानमात्रस्य विषयतया डनिष्ठतया दिव्यर्थः: एतच्च विषयतया वृत्ति नियामकसम्बन्धस्वीकार एवोपपद्यते ।

'तनयमैनाक' इत्यादिगद्यसन्दर्भों मध्यमकाव्योदाहरणतया प्रयोज्यात् ।

रस की दीसत्ता का अर्थ उसकी स्फुट रूप में अभिव्यक्त है । इसका उदाहरण रस-निरूपण के सन्दर्भों में दिया जा चुका है! वहाँ ‘शायिता सविघेऽप्यनिश्वरा…….’ आदि पदों में विरलप्रेम-गू्ढ़ार रस की स्फुट अभिव्यक्ति बतलाई गयी है । वामने भी छवनि-अलङ्कार आदि के निरूपण के अवसर पर इसके अनेक उदाहरण दिये जायेंगे ।

काव्य रचना करते समय कवि का यह चिन्तन कि वह जिस अर्थ का अपने काव्य में उपनिबन्ध करने जा रहा है वह पहले किसी कवि द्वारा वर्णित नहीं हुआ है—अपूर्व अर्थ है या वह अर्थ पूर्व कवि द्वारा वर्णित अर्थ का ही साक्षात् या प्रकारान्तर से अनुकरण है, ‘समाधि’ नामक अर्थगुण है ।

यद्यपि यह ‘समाधि’-स्वरूप गुण समवाय-सम्बन्ध से धनिष्ठ ही है तथापि विषयता-सम्बन्ध से अर्थनिष्ठ होने के कारण अर्थगुण माना गया है, क्योंकि ज्ञान-मात्र विषयता-सम्बन्ध से अर्थनिष्ठ होता ।

अपूर्व अर्थ के उपनिबन्ध का एक उदाहरण वहाँ है जो मध्यमस्य काव्य का उदा- हरण पहले ‘तनयमैनाकवेषण’ … इत्यादि यथुमा-वर्णनात्मक गद्य विसा जा चुका है । पूर्ववर्णित अर्थों का अनुकरणात्मक उपनिबन्ध तो प्रायःःमुख काव्यों को छोड्

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सर्वत्रैवेत्याहुः ॥

अपरेऽपि त्वेषु गुणेषु कतिपयान्प्रागुक्तैस्त्रिभिर्गुणैर्यंक्ष्यमाणदोषाभावलङ्कारैश्च गतार्थंयन्तः, काञ्चिद्रैद्विच्यमात्ररुपतया कवचिद्दोषतया च मन्यमाना न तावत् स्वीकुरवन्नित । तथा हि-श्लेषपोदारताप्रसादसमाधीनामोजोग्यरञ्जकघटनायामन्तर्भावः । न च श्लेषपोदारतयोः सर्वत्रै गाढबन्धातमनोरोजोग्यरञ्जकघटनान्तर्भावोऽस्तु नाम, प्रसादसमाध्योस्तु गाढशिथिलातमनोरञ्जनौ योग्यरञ्जकान्तर्भवेऽप्यशान्तरेग कुत्रान्त-

इति । अवर्णितपूर्वस्यायंस्य कवचिदेव केनाचिदेवोपनिबन्धनाभिप्रायेणोक्तमिदम् । 'इत्याहुः' इत्यस्य दर्शानदगुणप्रस्तावेऽनिर्दिष्टेन 'जरत्करास्तु' इत्यनेनैवद्यः ॥

एतावता प्रबन्धेऽन सपरिकरं दशशब्दगुणानां दशैव वार्थगुणान् वामनादिसम्मतान्लिरुप्य सम्प्रति गुणत्रयवादिमते यथैषां त्रिषु गुणेषु तदतिरिक्तेषु वा गुणालङ्कार-द्विषु यथायथमनन्तर्भावो मम्मटाद्यभिमतस्तत्रिरुपयति—अपरेऽपि त्वत्रारब्ध मम्मट-भट्टादय इत्यन्तेन प्राञ्चेन । वयममान्त्वं दोषस्य तदभावस्य वा स्वमते, न मम्मटादिमते, तत्र गुणेष्यः पूर्वमेव दोषाणां वर्णनान्न । अलङ्कारैश्चकैःर उपलक्षणं रसदलङ्कारस्य रसस्य चेति बोध्यम् । कवचिद् दोषतयेऽपि विवक्षि-तार्थप्रतिकूलत्वे सतीदृश्यः । अन्तर्भावमेवोपपादयति —तथा ह्यादिना । क्रमप्राप्त-शब्दगुणा नामन्तर्भावप्रकारमाह—श्लेषेत्यादिना । अंशेन = गाढातमनः । अंशान्त-रेण = शिथिलातमनः । अंशान्तरस्यैवेत्यादिमध्यगतस्यैव कस्यादिवाक्यस्य । परेऽपाम् = वामनादीनाम् । अस्माकम् = मम्मटादीनाम् । वामनादिभिः शब्दे माधुर्ये स्वीकृतम्, मम्मटादिमिः पुनः रसे । तथा च वामनादिष्वभिमतं शब्दनिष्ठं माधुर्यं मम्मटादिमते रसनिष्ठमाधुर्यंस्याभिव्यञ्जकत्वमिति व्यवच्‍छेदरररररसधर्मेर्वाच्यत्वं माधुर्यादिविषयकं तद्-

कर, सर्वत्र देखा जा सकता है ।

इस प्रकार वामनादि-सम्मत दश अर्थगुणों का निरूपण किया गया ।। गुणत्रयवादी आचार्यां तो पूर्वोक्त वामनादिसम्मत २० गुण नहीं मानते । इन बीस गुणों में से कुछ को तो ये पूर्ववर्णित—माधुर्य, ओजस् और प्रसाद इन तीन हौं गुणों में, कुछ को दोषाभाव में, कुछ को अलङ्कार आदि में गतार्थ कर देते; शेष में से कुछ को दोष हीं मानते । जैसे—शब्दगुणान्तर्गत श्लेष, उदारता, प्रसाद और समाधि का ओजोगुण के व्यञ्जक रचना में अन्तर्भाव हो जाता है । इनमें भी श्लेष तथा उदारता का तो ओजोग्यञ्जक रचना में अन्तर्भाव सुस्पष्ट है, क्योंकि इन दोनों में बन्ध—रचना की मादृश्य पूर्णतया होती हीं है । परन्तु प्रसाद में प्रारम्भ में क्षोभ समाधि में अन्त में विमिश्रता होने से इन दोनों के प्रौढांश का ओजोग्यञ्जक

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भाव इति वाच्यम्। माधुर्याभिव्यञ्जके प्रसादाभिव्यञ्जके वेत्ति सुवचतत्वात्। माधुर्यं तु परेषामसमदृश्युपगतं माधुर्यव्यञ्जकमेव। एवं च सर्वत्र व्यञ्जकस्य व्यङ्ग्यशब्दप्रयोगो भात्कः। समता तु सर्वत्रानुरूपतैव, प्रतिपाद्योद्रटत्यानुद्भटत्वाभ्यामेकस्मिन्नेव पद्ये मार्गभेदेऽप्यष्टतत्वात्॥

व्यञ्जकशब्दधाम प्रयोगो भात्कः। एवमेव व्यङ्ग्यरसप्रतिपादकस्य मधुरादिशब्दस्यापि तद्व्यञ्जकरचना|वशेषप्रतिपादनाय प्रयोगोऽपि भात्क एवं|तयारभ्य भात्क इत्यन्तेन ग्रन्थेनः समता = उपक्रमादिमात्रे रीतिभेदेऽपि। प्रतिपाद्य = इष्टतत्वादिति। अथ कश्चिद् विशेषः साहित्यदर्पणादिग्रन्थद्वसेयः। इदं तु दिन्त्यमू— यत्रोपक्रमादिसंहारपर्यन्तमनुद्रुतस्यैवार्थस्य प्रतिपादनमिष्टं तत्र ममता कथमनुचिन्तेति। यत्रा चैकस्मिन्नेव पद्ये प्रतिपाद्योद्भटत्यानुद्भटत्वाभ्यां गुणत्रयवादिनामपि तानागुणयोगित्वमभिमतं तथैव प्रकृतोदाहरणेऽपि कथम् न सम्भवत्तीतित। उपधैयसङ्कुरस्तु उपाधीनामसङ्कुराद् वामनादिमते न दुष्यति। रससङ्करादाहररजेषु च गुणत्रयवादिनां मत्यन्तराभावोऽपिति।

रचना में और शिथिलता की माधुर्याभिव्यञ्जक रचना में अर्थवा प्रसादाभिव्यञ्जक रचना में यथासम्भव अन्तर्भाव हो जाता है। यह स्मरणीय है कि वामनादिसम्मत माधुर्य गुण गुणप्रदायाभिमत माधुर्य गुण नहीं, अपितु इसका व्यञ्जक है (और माधुर्य गुण इससे व्यङ्ग्य है)। इसी प्रकार वामनादिसम्मत ओज आदि गुणों के अभिव्यञ्जक है। अतः स्पष्ट है कि व्यञ्जक-भूत गुणविशेषचक माधुर्य आदि शब्दों का माधुर्यादि के व्यञ्जक रचना-विशेषों के लिए जो वामनादि द्वारा प्रयोग किया गया है वह (= व्यङ्ग्यार्थ-वाचक माधुर्यादि शब्दों का व्यञ्जक रचना के अर्थ में प्रयोग) औपचारिक है।

जहाँ तक समता-नामक प्राचीन-सम्मत शब्दगुण का प्रश्न है वह तो सर्वत्र—सम्पूर्ण काव्य में नितान्त अनुचित है (अतः इस रूप में यह दोष है, गुण नहीं), क्योंकि एक ही काव्य में प्रतिपाद्य अर्थ की उत्कटता और उसकी अनुरक्तता के आधार पर कमशः समता और विषमता होनी चाहिये, न कि सम्पूर्ण में समता हीं। उदाहरणार्थं 'निरमाणे यदि … ' पद्य में अर्थ की उत्कटता—प्रौढता के कारण प्रथम तीन चरणों में गाढ़ता और चतुर्थ चरण में अर्थ की अनुरक्तता—शिथिलता के कारण रीति में जो विषमता—शिथिलता है वही गुण है। यदि प्रथमा एव भत्प्र में भी प्रथम तीन चरणों की तरह गाढ़ता या प्रथम ततीन सरणी में रीति सथिलता हाती तो दोष हीं होताः

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निमाणे यदि मार्मिकोडसि नितरामतथान्तपातद्रवन्‍ृृरीकामधुमाधुरीमदपरिहारोददूरराझां गिराम्‌ । काव्यं तर्हि सुखेन कथय त्वं समुक्षे मादृशां नो चेद्‌दुष्कृतमात्मना कृतमिव स्वान्ताद्‌बहिर्मां कथा: ॥

निर्माण इत्यादि । हे सखे ! यदि त्वम्‌ अत्यन्तेन परिपाकेन निमित्तेन द्रवन्त्या: प्रकर्षन्त्या मुग्धीकाया द्राक्षाया मदधुनो मुग्धतस्य रसस्य माधुर्यमदापहारेऽपि नितरामतिशयेनोद्‌धुराणां मुग्धीकारसमाधुर्यमन्तरस्कारकारिणीनां गिरां निर्माणे समर्थप्रयत्ने मार्मिकोडसि तर्हि मादृशां सहृदयानां संमुखे सुखेन स्वं काव्यं कथय । अनयथा आत्मना कृतं दुष्कृतमिव स्वं चहृदयहृदयावलोककं निरस काव्याभासं स्वान्ते मनस्येव स्थापय, न त्वस्मत्समक्षं तद्‌बहिष्कुरु—इति पद्यार्थ: ।

अत्र पूर्वाधं तृतीयचरणे च लोकोत्तरनिर्माणप्रतिपादके यो मार्गो न च चतुर्थचरणे कदैकाव्यप्रतिपादक इति वैषम्यमेव गुण: । ग्राम्यत्वकष्टत्वयोस्‍त्यागात्कान्तिसौकुमार्ययोरगतार्थता, प्रसादेन चारुत्वयक्‍तेरिति ॥

अत्रेत्यादिना । हृदयानां दोषाडभावेऽतिभाविमाह—ग्राम्यत्वेत्यादिना । ग्राम्यत्वकष्टत्वस्य पुरुषवर्णग्ङ्घदितत्वस्य चाभाव: सौकुमार्यम्‌ हृदयत्वय: । रित्यस्य पत्रायमतेत्यनेन पूर्ववाक्यस्यैथेनाभिसम्बन्ध: । इंतिशब्देन शब्दगुणान्‍ल‌ भावप्रकारोपसंहार: सूच्यते ॥

अर्थगुणेष्वपि—श्लेष:, ओजस आङ्‌चारत्वारो भेदाइच वचिच्‍छ्यमात्रनिर्माण इत्यादि ।

क्रमप्राप्तमर्थगुणान्तर्भावप्रकारमाह—अर्थगुणेष्वपीत्यादिना । वचिच्‍छ्यमात्रमिल्यक्ष देच्‍छ्यं कवेभेद्‌झुविच्‍छेद: । अनयशा = वैचिच्‍छ्यमात्रस्य गुणत्ववैच्‍छभिमते ।

उदाहृत पद्य का अर्थ निम्नलिखित है— "अरे मित्र ! पूरी तरह पक जाने से रस टपकाने वाले बड़गूर के मझ-सदृश माधुर्य के मद को भी ध्वस्त करने में समर्थ वाणी के विन्यास में यदि तू निपुण है

तब तो मेरे सामने अपना काव्य पढ़, नहीं तो—यदि तेरे काव्य में प्रचुर माधुर्य नहीं है तो—अपने काव्य को अपने किये गये कुकर्म की तरह भीतर ही छिपा कर रख्‌, उसे बाहुर मत कर ।"

इसी प्रकार, ग्राम्यत्व-दोष का अभाव कान्ति-नामक प्राचीनाभिमत गुण है, जब कि कष्टत्व-दोष का अभाव सौकुमार्य है । अर्थव्यक्त्ति तो प्रसाद में हों समाविष्ट है

प्राचीनाभिमत अर्थगुणों में भी श्लेष और ओज के प्रभेद चार प्रकार तो

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रूपा न गुणान्तर्भवमहन्ति, अन्यथा प्रतिश्लोकमर्थवैचित्र्यवैलक्षण्यादगुणभेदापत्तेः। अनधికपदत्वात्मा प्रसादः; उक्तिवैचित्र्यमपुर्माधुर्यंषु, अपारुष्यशरीरं सौकुमार्यम, अग्रम्यरुपोदाहरणा, वैशद्याभावलक्षणा समता। साभिप्रायत्वात्कः पश्चम ओजः प्रकारः; स्वभावास्फुटत्वात्मिकोऽर्थव्यक्तिः, स्कुटरसत्वरूप कान्तिरश्च, अधिकपदत्वान्वीकृतत्वामडलरूपाश्रोलग्राम्यभरतप्रकृत्यापष्टार्थस्वपाणां दोषाणां निराकरणेन स्वभावोक्त्यलङ्कारस्य रसघदनिरसदलङ्कारयोश्च स्वीकारणेन च मतार्थानि । समाधिस्थु कविगत: काव्यस्य कारणं न तु गुणः, प्रतिबाया अपि काव्यगुणत्वापत्तेः। अतस्त्रय एव

गुणभेदः= गुणान्तरयम्। ‘तदभावेऽपि काव्यवबह्नारप्रवृत्तेः’ इति प्रकाशोक्तो हेतुरहेतुः; परैरेषां काव्यमात्रगुणत्वादेवीकारः। अन्यथा गुणवत्रयवादेऽपि प्रत्येकस्य काव्यमात्रगतत्वाभावाद् अगुणत्वप्रसङ्गादिति पण्डिततराजशयः। अनधिक्तेरगचारस्य पञ्चम ओजः प्रकार इत्यन्ने वर्णनितानां वामनादिभिमततां प्रसादादीना गुणानां क्रमशोडनतभङ्गिव उच्चयतेऽधिकपदत्वादिदोषाणामभवेव्हे- अधिकपदतव... निराकरणेनेति। अर्थव्यक्तिः स्वभावोक्त्यलङ्कारे, कान्तिरश्च यथासम्भवं रसघवर्ती निरसदलङ्कारे चान्तर्भाव उच्यते—स्वभावोक्तित्यादिना; अन्न विशेषः काव्यप्रकाशेऽट्टीकादिश्योदयसेवः। कारणमिति। ग्रन्थकारोऽत्रस्य विवक्षितृ कल्पनाभाव

उक्तिवैचित्र्य मात्र है, इनको गुण कहना अनुचित है! अन्यथा—यदि उक्तिवैचित्र्य को भी गुण माना जाय तो प्रत्येक इलोक में भिन्न-भिन्न प्रकार के उक्तिवैचित्र्य को एक-एक गुण कहना होगा । ऐसी स्थिति में दश ही नहीं, अपितु अनन्त गुण हो जायेंगे । प्रतिपाद्य अर्थ से (कम या) अधिक शब्दों के प्रयोग का अभाव, जिसे प्राचीनों ने प्रसाद-नामक अर्थगुण कहा है, (शून्य-पदत्व दोष अथवा) अधिक-पदत्व-दोष का अभाव ही है, कोई भावात्मक गुण नहीं । उक्तिवैचित्र्य, अर्थात एक ही अर्थ का भङ्गिभेद से पुनः कथन उनके मत में माधुर्य-नामक अर्थगुण है; यह वस्तुतः अनवीकृतत्व-दोष का अभाव ही है। जिस अपारुष्य को उन्होंने सौकुमार्य-नामक अर्थगुण कहा है वह भी औचित्य-लालित्य-नोष के घटक अमज्जुल का अभाव ही है । उदाहरणत—

नामक उनका अर्थगुण तो प्राम्रव्यत्व-दीप का अभाव-मात्र है—यह उन्हीं के लक्षण से स्पष्ट है । उनकी वैशद्याभावस्वरूप समता भी भरतप्रकृत्य-दीप के अभाव से अतिरिक्त कोई भावात्मक गुण नहीं । विशेषण की साभिप्रायत को उन्होंने ओज का पञ्चम प्रकार कहा है, किन्तु यह भी वस्तुतः अपुष्टार्थत्व-दोष का अभावमात्र है । स्वभाव-स्फुटता (-सम्पादक वर्णन) जो उनके मत में अर्थव्यक्तित-नामक अर्थगुण है, गुणत्रयवादियों के स्वभावोक्त्यलङ्कार का ही नामान्तर है । स्कुटरसत्ब

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गुणा इति मम्मटभट्टादयः ॥

तत्र ट्वर्गोज्जितानां वर्गाणां प्रथमत्रयीषु शृङ्गाररतसस्थैयैश्च घटिता, नैकटच्येन प्रयुक्तैरगुस्वारपरसवर्णैः शुद्धानुनासिकैश्च शोभिता, वक्ष्यमाणैः सामान्यतो विशेषतश्च निषिद्धैः सयोगाद्यैरच्युत्सिता, अवृत्तिमुण्डदूषितैश्च

सङ्कावयरचनारूढमभावात्, अर्थालोचनरूपस्य समाधेः मग्नतया ( = समावायेन ) कविनिष्ठतया विषयतया च वृत्तिनियामकतया तस्य समाधेः कार्यनिष्ठतवानुपपत्तेश्चाति तात्पयें । काव्यकारणस्य काव्यगुणत्वावलोकारे त्वनिष्ठापत्तिमाह—प्रतिभाया अपि इत्यादि । एतावता प्रवन्धे मम्मटादिसम्मतं मतं निरूपितम् ॥

इदानीं माधुर्यादिगुणां रचना विशेषेण निल्हयति—तत्रे त्यादिना । गुणवयबद्धान्तेषु वध्यान्त वां । येन व्यवधानमप्यमरपरिहार्यन्तेन शवधानमरपि पुनरव्यवधानमेव मन्तव्यम् । शुद्धानुनासिकैरिति अनुनासिकेषु शुद्धत्वं परसवर्णयोः।

निष्पन्नतवम् । तथा च नमडणनकारेरिरितर्यः! अत्र न च टवर्गोज्जितानां वर्गाणटवर्गे वजंनीया आदित इह तवाव एतस्यापि बोध्यम् । अत्र निमित्ते विवक्षितः । अभावायकरच नजिति समासोऽयन् । भवते माधुर्यादिगुणकरचनायां स्वीकृते मृदुशब्दरचालपार्थकः प्रसिद्धः ।

तथा चोल्पाद्यन्तरिति पयवस्याति । तथैवोक्तं पादचाल्यपि संगृहीतां । तत्र च द्वित्रेच्छुषुपदान्तः समासो ग्रह्यात इति सद्यार्थ-दत्तो विवक्षिताभिति विभावनीयम् । अपुरुषवर्णतत्समूहाल्मकपदानि मृदूनोच्यर्थी वा ।

शवति में और अप्रघानता होने पर रसवदलङ्कार में समाविष्ट है । वतः उनके नौ गुणों का यथासम्भव उक्तिवैचित्र्यादि में अन्तर्भाव हो जाने से उन्हें स्वतन्त्र अर्थालङ्कारों की अवश्यकता नहीं रह जाती । अब उनका एक समाधि-नामक अर्थगुण संवर्गष्ट है जो वस्तुतः गुण नहीं अपितु काव्य का कविनिष्ठ एक कारण है । यदि कविनिष्ठ काव्य-कारणों को भी गुण कहा जाय तो प्रतिभा आदि काव्य-कारणों का

भी गुण कहनां पड़ेगा । यह तो उन्हें श्री इष्ट नहीं है । वतः माधुर्य, कोज और प्रसाद ये हीं तीन गुण हैं—ऐसा मम्मट आदि आचार्यों का मत है ।

उक्त तीन गुणों में माधुर्य-गुण का व्यञ्जक रचना—वर्णानुपूर्वी वह है जिसमें टवर्ग श्रे मिश्र चौर करञ्जन-वर्गो के प्रथम और द्वितीय व्यञ्जनन, करट-प्रसादाहारान्त्य-

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रचनानुपूर्व्यां तमका माधुर्येस्य व्यञ्जका। द्वितीयचतुर्थ्यास्तु वर्ग्यां गुणस्यास्य नानुकूला:, नापि प्रतिकूला, दूरतया सनिवेशिताश्चेत्। नेकटच्येन तु प्रतिकूलऽपि भवन्ति, यदि तदायत्तोऽनुप्रासः। अन्ये तु वर्गस्थानां पञ्चानामध्यविशेषेण माधुर्यव्यञ्जकतामाहुः॥

गंत व्यञ्जन (क्, ख्, ग् अन्,लःस्थ (य, र, ल, व) हों; जो निकटता में अनुनासिकों और परसवर्णों एवं मूर्ध्न्-अनुनासिक ( ण्, ञ्, ण, न, म) में युक्त हों; आगे जिन संयोग आदि का सामान्य या विशेष रूप में निर्देश किया जाने वाला है उनसे रहित हों और समास-गुण अथवा लघु-समास से युक्त हों। उक्त चार व्यञ्जन-वर्गों में द्वितोय और चतुर्थ व्यञ्जन यदि दूर-दूर में प्रयुक्त हुए हों तो 'रहस्य'-गुण के न अनुकूल होते और न प्रतिकूल हीं, किन्तु यदि इनका समीप में ही प्रयोग किया गया हों जिससे अनप्रास हो गया हो तो उन्हें माधुर्य-गुण के प्रतिकूल समझना चाहिए। कुछ आचार्य तो उक्त चार व्यञ्जन-वर्गों के पञ्चों व्यञ्जनों को और णकार को समास रूप में माधुर्य-व्यञ्जक मानते हैं।

उदाहरणम्— तन्तमालतरु कान्तिलताङ्गनीडनृत्यरीकृतनवाम्बुदतनुषम् । स्वान्ते मे कलय शान्तये चिरं नैविकीनयनचुम्बितां श्रियम् ॥

इसका एक उदाहरण है—‘तन्तमालतरु कान्तिलताङ्गनीडनृत्यरीकृतनवाम्बुदतनुषम् । स्वान्ते मे कलय शान्तये चिरं नैविकीनयनचुम्बितां श्रियम् ॥’ पद्यार्थ इस प्रकार है—“रे मन ! तू शाश्वत शान्ति के लिए उस (भगवान् श्री कृष्ण की) छटा का ध्यान कर जो तमाल-वृक्ष की छटा को भी अपमानित कर चुकी

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यथा वा— स्वेदाम्बुसान्द्रकरणशालिकपोलपालि- रन्तः स्मितालसविलोकनवन्दनीयाः । आनन्दमदकुरयति स्मरणेन कापि रस्या दशा मनसि मे मधुरेक्षणायाः ॥

प्रथमे पद्ये अतिशयोक्त्यलंकारस्य भगवद्भक्तिदानोत्सवेश्य भगवद्वीर्यैक- रतेर्वा छवन्यमानाया: शान्त एव पर्यवसानात्तद्गतमा|धुर्यस्याभिड्यडिजका

किञ्चिद्रोकता दासीकृता नवाम्बुदतिवृढ यया तादृशीमप च नैचिकीना मुक्तमानां गवां नयनैरचुम्बितां तां विलक्षणां श्रीकृष्णश्रियं चिरं शान्तये शाश्वताय विश्रमाय कलय समाश्रयेत्यर्थः । अत्र सम्बोधनप्रथमातस्य स्वान्तपदस्याम्न्रतत्वेन 'आमन्त्रितं पूर्वमविद्यमानत्वाद' इत्यनुशासनेनैताविद्यामानत्वबाधादस्मत्पदस्य पदात्परत्वाभावेन 'मे' इत्यादेशरहितत्वमिति चन्द्रिकायाम् ।

स्वेदाम्बुसान्द्रेऽत्रादि । पूर्वोक्तदृशेस्मिन् पचे द्वितीयपादे कुण्डलशब्दे 'पद' इत्यस्य प्रतिकूलतया किंचित्तु परिवर्त्तितमत्र । अत्र च पादलिरित्यन्तमेकं विशेषणं दशाया: , अन्यच्च वन्दनीयेत्यन्तम् । अस्तः स्मितकाले कपोलकुण्डलयोःकुल्लतया नेत्रस्कान्चा- दलसत्वं विलोकनस्य लभ्यते ।

है, नवीन घन की हरित मेघ जिसकी दासी बन चुकी है और दुधारू गायों की अनुरक्त आँखें जिसे चूमती रहती हैं ।''

अतिशयोक्तीति । श्रीकृष्णश्रियो वस्तुतस्तमालतरुकान्तिलल्हुकत्वाद- सम्बन्धेऽपि तत्सम्बन्धवर्णनाद् बोध्यादान्नातिशयोक्तिः । तद्गतेति । तत् प्रयोज्येत्यर्थः ।

इका दूसरा उदाहरण है—'स्वेदाम्बुसान्द्र …' वाद पद्य । इसका अर्थ निम्नलिखित है—

"मदमाती आँखों वाली कामिनों की वह अलौकिक रमणीय दशा, जिसमें उसके गालों पर पसीने की बूँदें छलक आई थीं और जो (दशा) मुस्कुराहट और कلسाई आँखों के कारण प्रफुल्लनीय रही, स्मरणमात्र से मेरे मन में आनन्द उत्पन्न कर रही है ।''

प्रथम उदाहरण-पद्य में शान्तरसगत माधुर्य का ध्वन्यकक वर्णनविन्यास है, क्योंकि उस पद्य में चाहे अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन में भगवान् कृष्ण के ध्यान की उत्सुकता ध्वनित होती हो या उनमें रति (= भक्ति), दोनों का परस्परसादृश्य तो अनस्तः शान्त- रस में हों है । किन्तु द्वितीय उदाहरण में स्मरण से परिपुष्ट स्थायीभाव-रस के माधुर्ये

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रचनेयम् । द्वितीये तु स्मृत्युपष्टटद्रव्यृ॒जारगतस्य ॥

नेकटचेन द्वीतियचतुर्थवर्गवर्ण-टवर्गंजित्हामूलोयोपधमानोयविसर्गसकारबहुलैवेंघंघटितो झयरेफान्यततरघटितसंयोगपरहस्ववेश्च नेकटचेन प्रयुक्तै-रालिङ्ङितो दीर्घवृत्यातमा गुम्फ ओजसः । अस्मिन्पतिता: प्रथमत्रतीयवर्ग्या गुणस्यास्य नानुकूला नापि प्रतिकूला: संगोगघटकास्चेत् । तद्धट-कास्त्वनुकूला एव । एवमनुस्वारपरसवर्णा अपि । यथा—‘अयं पततु तद्धृष्यति वा विवक्षितम् , एवमग्रेऽपि , स्मृत्युपष्टटद्रघेति । मद्दिरेक्षणादस्मादोजोज्जडिकां रचनाओं निर्लपयति-नेकटचेनैतेयादिना: अव्यवधानभोषटदृश्यवधानं च नेकटघमु, वैविक्षकं वा । द्वितीयेतेयादि । द्वितीयाश्चतुर्थासिच्च वर्गघटका ये वर्णाः—खू, घ, छ, झ, थ, ध, फ, भू इत्येते तैरित्यर्थः: वर्गा अत्र टवर्गंभिन्ना दिवक्षिताः:, टवर्गस्य पृथगुपादानात् । बहुलैरिति । एतेन क्वचित् क्वचिदन्येषा अपि व्यंजनानां सत्त्वं न हानिकरमिति स्वयमेव वक्ष्यति । झयिति । ‘झभणू, वढघषू, जबङडशू, खफ-छथचटतब्, कपयु’ इति माहेश्वरसूत्रस्थोक्ति व्यंजनानां अनुसन्धानरिक्षान्ति झय-प्रत्याहारेण गृह्यन्ते । तथा च झयू-रेफान्यततरघटिता ये संयोगास्ते परा येषां ते

ह्रस्वम्यस्ततरस्य । द्विह्रद्रुयात्मनि पदपङ्क्तौ निदर्शितः: समासे उक्तः । अथवा रेफप्रकृतगुणव्यझ्जकवर्णघटित एवोजोज्जडिकां बोधयः: बहुलैरपि सूचितं विशदयति-अस्मिन् इत्याेदिनां । गुम्फे रचनायामित्यर्थः । पतिता इत्थनेनापि प्रथमत्रतीयानां टवर्गान्तिरिक्तवर्गंचतुर्थयस्थां व्यंजनानां क्वचिद्वप्रयोगे क्षतभाव एवावेध्यते । अत एवां नेकटचाश्रावान माधुर्यंध्यज्जकत्वमिति नोचः:प्रतिरिकुलत्वम् । एवम्=ओजो-व्य क्जकगुम्फप्रतितासत्र क्वचित्प्रयुक्ता: प्रथमत्रतीयवस्र्या एव । अत एव चैते दूरवर्तींतन इत्येतेषां माधुर्यंध्यज्जकत्वमादाय न क्षतिः । अत्र ‘अनुस्वारपरसवर्णा अपि संयोजक-

का व्यंजनक वर्णविन्यास (रचना) है ॥ अब ओजोगुण-व्यंजक रचना का निरूपण किया जा रहा है—टवर्गं भिन्न चार व्यंजन-वर्गों के द्वितीय और चतुर्थ व्यंजनों, टवर्ग, जिह्वामूलीय, उपधमानोय, विसर्ग और सकार की जिसमें अधिकता हो, जिसमें झय् (=ख, भ, घ, ध, घ, ज, ब, ग, ढ, द, ष, फ, छ, ठ, थ, ध, ट, त, क, प) अथवा रेफ से घटित संयोजक से पूर्ववर्ती ह्रस्व स्वरों को निकटता से प्रयोग किया गया हो और जो लम्बे-लम्बे समस्त पदों से घटित हो वह रचना ओजोगुण-व्यंजक होती है। इस प्रकार की रचना में टवर्गान्तिरिक्त वर्गों के प्रथम और तृतीय व्यंजन, यद्यपि संयोजक के घटक न हों तो न अनुकूल होते और न प्रतिकूल हैं। किन्तु यदि ये व्यंजन संयोजक के घटक (=संयुक्त) हों तब तो ओजोगुण के अनुकूल होेते है। इसौ प्रकार ‘अनुस्वार

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निर्दयं दलितदृष्ट'-इत्यादौ प्रागुदाहृतौ । श्रुतमात्रार्थ वाक्यार्थ करतलबदरमिव निवेद्यन्तो घटनाप्रसादस्य अयं च सर्वसाधारणो गुणः । उदाहरणान्तरं प्रयोज्यो मदीयानि सर्वाण्येव पद्यानि ।

तथापि यथाऽयं चिन्तामीलितमानसो मदनविह्वलप्रभोः प्राणेशः प्रणयाकुलः पुनरसावस्तां समस्ता कथा । घटकौ उदासीनौ, संयोजघटकस्वारसनुकूला एवं भवन्तीस्थ्य । 'इतश्चन्द्रीकान्वितरयुक्का, अनुस्वारस्थ स्वरधर्मत्वेन संयोजघटकरवदसम्भवात् । सह तस्य संयोज्यसम्भववस्त्वभूत् । परसवर्णस्य तु संयोज्यघटकत्वमसम्भवमेवेति सुव्यक्तमेव । प्रागुदाहृत इत्यस्य रौद्ररसप्रस्ताव इति शेषः । करतलेति । करतलस्थमित्यर्थः । एतदपि सहृदयानां करते । प्रयक्ष इति केषुचिदिहोदाहृतेषु पघेषु पद्यांशेषु वा प्रसादाभावं सुचयति । अथ प्रसज्जतदुदाहरणजिज्ञासयान्त्वाह-तथापीत्याादि । चिन्तेत्यादि । अतिमानवती कामिनींप्रति ऋदद्रया: कस्याच्चन सकथा नक्ति-रियम् । सुग्धे सखि ! तवाननातिमाननेन मनसिजो वैषल्यम्रयाद् चिन्तया मोहितं सङ्कुचितं मानस यस्य तादृशो जातः, तव सख्यरच ह्लतप्रभा जाता:, तव प्राणेशः प्रणायकुल:, एवं स्वदोयपरिज्ञानान्तरञ्चाकुलतवविषयणी समस्ता कथा वघुना तु यथावसरमेतावदेव त्वां चिनिवेदयामि । यदि यद् त्वं ममोचित हितां स्वकल्याणकररीं मन्यसे तहि मानं मा कृथ, अन्यथा प्रियतममाद्राड्जनकं रोषकलुषित-

परसवर्ण भी (यदि निकट-प्रयुक्त न हों तो ) इस गुण के अनुकूल या प्रतिकूल नहीं होते ! इसका उदाहरण रौद्र रस के उदाहरण-रूप में पूर्व-निर्दिष्ट 'अयं पततु निर्दयं . . .' इत्यादि पद्यां है ॥

जो रचना सुन्दर हों वाक्यार्थ का किसी आयास के बिना प्रतिपादन करने वाली हो वह प्रसाद-गुण का अभियोजक होती । यह प्रसाद गुण सभी रसों में समान रूप से उपलबध हो सकता है । यद्यपि इसके उदाहरण तो मेरे द्वारा रचित भी उदाहरणार्थ प्रस्तुत है । पद्यायं यह है-

"अरी मूदृ सखी ? तेरे हठ (=मान) के चलते कामदेव का मन चिन्तामें डूब चुका है, तेरी सखियों में उदासी छा गयी है, तेरे प्राणनाथ प्रणय के लिखे

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एतत्सां विनिवेदयामि मम चेदुद्भक्ति हितां मन्यसे मुद्धे मे कुरु मानमाननमिदं राकापतिरंजेष्यति ॥

व्याकुल हो रहे हैं, ... और इस प्रसाद में अब तुझे मैं क्या-कया बताऊं ! यदि तुझे मेरी बात अच्छी लगे तो मुझे इतना हौं कहना है कि अब इस हृदय को छोड़ दे, नहीं तो पूनम का चन्द्र तेरे इस मुखं को जीत लेगा ॥

अत्र सर्वावच्छेदेन प्रसादाभिव्यङ्कतवमंशभेदेन तु माधुर्यौजोभिव्यङ्जकत्वमपि, मनसिजान्तस्य माकुर्विदेश्च माधुर्याभिव्यक्तिहेतुत्वात्, सख्या इत्यादेरोजोगमकत्वात् । नन्वत्र शृङ्गाराश्रयस्य माधुर्यस्याभिव्यक्तये तदनुकूलास्तु नाम रचना, ओजसस्तु कः प्रसादो यदर्थं तदनुकूलवर्णविन्यास इति चेलु ? नायिकामानोपशान्तये कृतानेकयत्नायास्तदोयं हितमुपदिशान्त्या: सख्या: सक्रोधत्वस्य व्यङ्जनीयतया तथाविन्यासासस्य साफल्यमेव विकृतवर्णं तदेवमानं राकापतिः पूरणशृङ्गारोयं कलङ्ककलुषितौषधि यत्किमपि स्वाद-सौभाग्यवशाजनाह्लादकत्वात्सुभगवर्णत्वाच्च जेष्टयति—इति पदार्थः ।

उदाहरण पद्य में प्रसाद-गुण तो सर्वावंश में है ही। 'बिसतामोंहितमानसो मनसिज:' 'मा कुरु मानमाननमिदम्' इन अंशों में माधुर्य-व्यंजकता और 'सख्यो विधी नप्रभा:' आदि में ओजः-व्यंजकता भी हैं । अब प्रस्तुत यह है कि उसकत पद्य में शृङ्गार रस की अभिव्यक्ति के अभिप्रेत होने से शृङ्गाराश्रित माधुर्य का अभिव्यंजक वर्ण-विन्यास तो उचित है, किन्तु ओज के व्यंजक विन्यास किये क्या उपपादित है, क्योंकि इसके आश्रयरूपत रौद्र आदि रस तो प्रकृत पद्य से अभिव्यक्तमान हैं नहीं ? इसके उत्तर में यहु कहना है कि नायिका पर सखी के क्रोध की अभिव्यक्ति के लिये

अत्र प्रसादस्य गुणान्तरसममानाधिकारणयोपपादनायाह—अंशाभेदेनैतस्यं: । असाविशेषावच्छेदेनैतस्यं: । शृङ्गाराश्रयस्येत्यत्र बहुत्रोंहि:, परंरेरां गुणानां रसाश्रितत्व-भूयप्रगादिदम् । माधुर्यविशेषणं चैतद् । कृतानेकयत्नायास्तदोयं हितमुपदिशान्त्या इति । एतदुपदेशात्पूर्वं सख्या बहुविध्वायास: कृतः, परं न नायिकामानभङ्गे सफल्यं समवात्रमत्यत एतदुपदेशकाले सख्या: सक्रोधत्वमुपपचते । पूर्वं प्रयत्ना एव चिन्तामोलितमानस

भोजो-व्यंजक रचना आवश्यक है । सखी में क्रोध होना इसलिये उचित है क्योंकि

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वाचा निर्मलया सुधामधुरया यां नाथ शिक्षामदास्तां स्वप्नेऽपि न संसृष्टाम्यहमहंभावावृतो निस्त्रपः । इत्यादिगःशतशालिनं पुनरपि स्वीयेषु मां विध्रतस्त्वत्तो नार्स्ति दयानिधिर्युपते मत्तो न मत्तः परः ॥

इत्यादिनोपदेशेन सूचितमिति बोधयम् । अत्र क्रोधस्य स्थायित्वे मृग्यारम्भण्णप्रसक्तेत्यतस्तत्स्यात्र वभिचारिरससुपपादयति—किं बहुनेत्यादिना । वाच्ये = विवक्षि-तेऽर्थे । प्रवन्धे वेत्यत्र वा-शब्दः समुच्चये, तेन मुक्तकस्यापि संग्रहः । सम्प्रति प्रसादस्यासंक्षोभोदाहरणमस्मद्—यथा वेत्यादिना ।

वाचेत्यादि । हे नाथ यदुपते ! निर्मलया सुधामधुरया च वाचा श्रुतिगीतादि-रूपया त्वं मह्या" यां शिक्षामदास्तामहमहंह्रकारात्तविवेकोडन एवं निलॅलज्जः स्वप्नेऽपि किं नु जाग्रद्रसायां न संसृजामि नानुसरामि । संसृष्टामोत्यस्य स्मरामोति 'रसचन्द्रिकाड्याल्यामस्मत्, विरुद्धत्वात्तु । जाग्रत्स्वप्नयोरेव नतु संसरणं वाच्यमेव, तुन्दसम्भव एवञ्चित भावः । एतेन सर्वावसरेषु शिक्षोपेक्षा गम्यते । अत एव पुनः पुनरुपेक्षया आगःशतशालिस्वमुपपद्यते; तथाविधमपि क्रियासमभिहारेणा-

नायिका को समझाते-चुचाते वह यक यक चूकी है, पर वह मृदु नायिका अपना हठ छोडने को तैयार नहीं । यह तथ्य उत्तरार्ध में निर्दिष्ट वर्णन से भी स्फुट होता है । इस विषय में (कि मृग्यार आदि रसों में भी क्रोध की अभिव्यक्ति उचित है) अधिक कहने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि ओजोगुणयुक्त रसों की ओर उनके अमर्ष आदि व्यभिचारिभावों को अभिव्यक्त के अनुप्रेत न होने पर भी आश्र्यायिका आदि काव्यों और प्रवन्ध-काव्यों में ओजो-व्यंजक रचना देखी जाती है यदि वक्ता स्वभावतः क्रोधी हो अथवा वक्तव्य अर्थ ही क्रूर—कठोर हो तो । अतः उक्त उदाहरण में अंगभूत ओजोगुण की रचना अनुचित नहीं है ।

अथवा दूसरा उदाहरण—जिसमें केवल प्रसाद है, अन्य कोई गुण नहीं—'वाचा निर्मलया…….' आदि पद्य है । पद्यार्थ निम्नलिखित है—

'हे भगवन् ! मैं अहङ्कार से ओतप्रोत ऐसा मिल्ललज्ज अघम हूँ कि तुमने 'निमल और अमृत के समान मधुर वेदादि शास्त्रों द्वारा मुझे जो उपदेश दिये उनका -सो मैं स्वप्न में भी पालन नहीं करता, फिर भी तुमने असंख्य अपराध करने वाले 'मुझे अपने परिजनों में स्थान दे दिया है । अतः हे यदुनाथ ! न तो तुम से बढिये कोई

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अत्र गुणान्तरासमानाधिकरणः प्रसादः ।। इदानों तत्वदुगुणव्यञ्जनक्षमा या निमित्ते: परिचयाय सामान्यतो विशेष-तश्व वर्जनीयं किंचिन्निरूप्यते—वर्णानां स्वान्तरयं सकृदेकपदगतत्वे किंचिदश्रव्यम् । यथा—‘ककुभसुरभि:, विततगात्रः, पललमिवाभाति' इत्यादौ । असकृच्चेदधिकम् । यथा—‘वितततरस्तरेष भाति भूमौ ।’

पराधीनतां मां स्वीकृत्यैव परिज्ञेयं विभ्रत्स्वभावं उत्कृष्टतररूपद्योते द्योतनविधिनास्ति, नापि मद्धिकतर: रचनान्यो मत्त उन्मत्तोदस्तीति पद्यार्थः ।

अत्र प्रसादस्य गुणान्तरासमानाधिकरणस्य करणमिति विवेचनीयम् । ‘मत्तो न मत्त:' इत्यत्र दीर्घसमासाभावात् कथमिचिदोजस् अभावोपपादने डपि पदविशेषे वाच्ये-त्यादि माधुर्यंस्वाभावो न स्वीकतुं शक्यते यत: । पदसंधूर्मकंमंशमादाय वा पदे वर्त्तमानस्यापि गुणान्तरस्यात्राडभिव्यञ्जनमिति संगमनोयं कथमिच्चित् । समूर्ह-स्वाच्चयवहितानामिति तु प्रसिद्धमेव । वस्तुतस्तु रिच्छत्यमेव तत्त्व ।

ककुभेत्यादि । अत्र ककारस्य स्वानान्तरयम् । यद्यप्यत्रापि पूर्वंककारोत्तर-ककारथोरकारण तन्नास्ति तथापि व्यञ्जनस्फुटोच्चारणार्थं ह्रस्व-स्वाकारस्य प्रसिद्धतया तदतिरिक्तह्रस्वाकारस्यापि तज्जातीयत्वेन तद्‌गुणवध्याने द्रया-निधान है और न मुझसे बढ़कर कोई उन्मत्त-कतुथ्यच्युत अधम ।

इस पद्य में ग्रन्थकार का कहन है कि यहां केवल प्रसाद-गुण है, अन्य कोई गुण नहीं । परन्तु वतुर्य चरण में ( विशेष कर ‘मत्तो न मत्त:' इस अंश में ) ओजो-व्यञ्जकता क्यों न मानी जाय —यह विचारणीय है ।

अब भिन्न-भिन्न गुण की व्यञ्जकता में समर्थं रचना का परिचय देने के लिये सभी गुणों के व्यंजक रचनाओं में और गुणविशेष-व्यञ्जक रचना-विशेष में जिन वर्ण-त्रिरोषों का प्रयोग वर्जनीय है उनका क्रमश: निरूपण किया जा रहा है । इनमें प्रयमतः सामान्यरूप में वर्जनीय क्या है यह बताया जा रहा है —

किसी भी व्यञ्जन का एक पद में बिना व्यवधान के दो बार प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे वह पद ( तथा तद्पदघटित वाक्य में ) अश्रव्य—सुनने में अप्रिय हो जाता है । जैसे—‘ककुभसुरभि:', 'विततगात्र:', 'पललमिवाभाति' इत्यादि शब्दों में एक पद मे क्रमश: ‘कक’, ‘तत’ और ‘लल’ के प्रयोग से अश्रव्यता आ गई है। यदि दो से अधिक बार प्रयोग किया गया हो तब तो और भी अधिक अश्रव्यता आ जाती है । यथा—‘वितततरस्तरः' । इस शब्द में एक ही ग्रन्थोक्त आननस्य—अभवधान सान्द्र है।

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एवं भिन्नपदगतत्वेऽपि । यथा--'शुक करोषि कर्थ विजने रचिम्र' इत्यादौ। असकृदिन्नपदगतत्वेऽपि ततोडप्यधिकम् । यथा--'पिक ककुम्भो मुखरीकुरु प्रकृतिम्र' । एवं स्वसमासानवर्ग्योनन्तर्य सकृदेकपदगतत्वेऽपि किंचिदेश्रव्यम् । यथा--'वितथस्ते मनोरथः' । असकृचिदेशधिकम् । यथा--'वितथतरं वचनं तव प्रतीमः' । एवं भिन्नपदगतत्वेऽपि । यथा--'अथ तस्य वचः श्रुत्वा' इत्यादौ। असकृदिन्नपदगतत्वेऽपि तु ततोडप्यधिकम् । यथा--'अथ तथा कुरुषेन्न सुखं लभे' । एतच्च वर्गाणां प्रथमद्वितीययोः स्तृतीयचतुर्थयोःरानव्यान्तयं मुक्ततम् ।

अत एवं अनुपदं गुरुडरवयेनाश्रव्यत्वं यथातरेकं वक्ष्यति । पयोंक्त- स्याकारस्य ह्रस्वत्वादिना साजात्यं विवक्षितं वेदं ह्रस्वस्वरमारभ्यवधानेन डप्यानन्तयं न विधत्त इत्यपि बोध्यम् । भिन्नपदगतत्वेऽपि सङ्कृतं स्वानन्तयं क्रिश्चिदेश्रव्यमिति शेषः । भिन्नपदगतत्वेऽपि सङ्कृतं स्वसमासानवर्ग्योनन्तर्य क्रिश्चिदेश्रव्यमिति शेषः । एतच्च = स्वसमासानवर्ग्योनन्तर्य च । प्रथमद्वितीयीययोः स्तृतीयचतुर्थयोःरानव्यान्तयं मुक्ततम् ।

'वितततरः' पद में 'त' का लगातार तीन बार प्रयोग होने से अधिक अश्रव्यता आ गई है। यदि पद की भिन्नता होने पर भी लगातार हो या अधिक बार किसी एक व्यंजन का प्रयोग किया गया हो तो भी क्रमशः सामानध्य एवं असामान्य रूप में अश्रव्यता आ जाती है। 'शुक करोषि.....' और 'पिक ककुम्भो.....' ये दो क्रमशः उदाहरण हैं। प्रथम में दो पदों--'शुक' और 'करोषि' में लगातार दो बार 'क' का प्रयोग और द्वितीय में 'पिक,' 'ककुम्भो' इन दो पदों में कुल मिल्कर तीन बार 'क' का प्रयोग होने से क्रमशः अश्रव्यता और अश्रव्यतातिशय आ गये हैं। इसी प्रकार, यदि एक ही वर्ग के दो व्यंजनों का किसी एक पद में लगातार एक-एक बार प्रयोग हुआ हो तो भी अश्रव्यता आ जाती है। जैसे--'वितथस्ते मनोरथः' इस वाक्य के 'वितथ' पद में लगातार 'त' और 'थ' का प्रयोग अश्रव्यसाजनक है। यदि समानवर्गीय व्यंजनों का अनेक बार प्रयोग एक पद में किया गया हो तब तो यह अश्रव्यता और भी अधिक बढ़ जाती है। जैसे--'वितततरं वचनं.....' इस वाक्य के 'वितततरं' पद में 'त-थ-त' के प्रयोग से अश्रव्यता उत्कट रूप में है। अश्रव्यता की यही स्थिति भिन्न पदों में समानवर्गीय अनेक व्यंजनों का एक-एक बार या अनेक बार ( दोनों में से किसी एक का भी दूसरे के बाद ) प्रयोग होने पर आ जाती है। उदाहरणायं--'अथ तस्य.....' इत्यादि वाक्य में 'अथ' पद में 'थ' के बाद 'तस्य' पद में 'त' के प्रयोग से कुछ अश्रव्यता आ-हीं गई है। 'अथ तथा कुरू'.....' इत्यादि वाक्यों में तो 'थ-त-थ' के प्रयोग से उत्कट अश्रव्यता है। किन्तु समानवर्गीय दो व्यंजनों के आनन्तर्य में जो अश्रव्यता आती है वह प्रथम

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नतयंम् । प्रथममत्रीययोद्वितीयोयृततीययोर्वाचौssनन्तर्यं तु तथा नाश्रव्यमपु, किं त्वोषत, निर्माणमार्गमिकैकवेद्यम् । एतदप्यसकृच्चेततोऽधिकत्वात्साधारण-रपि वेद्यम् । यथा-‘खग कलानिधिरेश विजृम्भते’, ‘इति वदति दिवानिशं स धन्यः’ । पञ्चमातां मधुरत्वेन स्ववर्ग्यानन्तर्यं न तथा । यथा- ‘तनुते तनुतां तनौ’ । स्वानन्तर्यं स्वश्रव्यमेव । यथा-‘मम महती मनसि व्यथयाविरासीत्’ ।

एतानि चाश्रव्यतव्वानि गुहृव्यवायेनापोद्यन्ते । यथा-‘संजायता कथंकारं काके केकाकलस्वनः’ ।

अधिकम् । ईदृदित्यस तात्पर्येमाह—निर्माणमार्गमिकैकवेद्यमिति । स्वानन्तर्यमपु=वर्गेस्थपञ्चमातां स्वानन्तर्यमित्यर्थः ।

संज्ञायतामि-यादौ ‘काके’, ‘केके’, ‘केका’, ‘काक’ इत्यत्र च गुहृव्यवायः ।

द्वितीय व्यञजनों तथा तृतीय और चतुर्थ व्यञजनों के विषय में हाँ समझनो चाहिए । जहाँ तक समानवर्गीय प्रथम-तृतीय और द्वितीय-तृतीय व्यञ्जनों के भिन्न पदों में एक वार आनन्तर्य का प्रश्न है, अश्रव्यता तो उसमें भी है, किन्तु इसे कुछ विशिष्ट रचनाकार—कवि हाँ समझ सकते, साधारणजन नहीं, जब कि पूर्वं-वर्णित अश्रव्यता तो साधारण जन के भी समझ में आ जाती है । हाँ, यदि इसका भी आनन्तर्यं अनेक वार हो तो स्पष्ट रूप में अश्रव्यता आ ही जाती है जिसका साधारणजन को भी अनुभव हो ही जाता है । जैसे 'ख-ग-क' इस प्रकार द्वितीय-तृतीय-प्रथम समानवर्गीय व्यञ्जनों के प्रयोग से जो अश्रव्यता है वह सुस्पष्ट है । इसी प्रकार ‘इति वदति दिवानिशं….’ इस वाक्य में भी ‘द-ति-द’ यह आनन्तर्य-पयोग स्पष्ट रूप में अश्रव्य है हाँ । किन्तु सभी वर्गों के पञ्चम व्यञ्जनों के मधुर होने से उनका यदि स्ववर्गीय व्यञ्जनों से आनन्तर्य हो तो भी उसमें अश्रव्यता नहीं आती । जैसे ‘तनुते तनुतां तनौ’ इस वाक्य में प्रथम-पञ्चम का अनेक बार आनन्तर्य होने पर भी अश्रव्यता नहीं आई है । हाँ, यदि समान पञ्चम व्यञ्जनों का आनन्तर्य हो तब अश्रव्यता आ ही जाती है । जैसे—‘मम महती मनसि …' इत्यादि वाक्य में ।

यत्रि उपयुष्टक अश्रव्यताधायक एक अथवा एकवर्गीय व्यञ्जनों के मध्य मृदु स्वर (दीर्घ-स्वर) हों तो उपयुष्टक अश्रव्यता नहीं आती । जैसे—‘संजायतां … काके केकाकल…’ इत्यादि वाक्य में ‘काके’ ‘केके’, ‘केका’ कौत ‘काक’ आदत्त मे दीर्घ-स्वर के व्यवधान के कारण अश्रव्यता-महीं है ।

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यथा वा—

यथा यथा तामरसायतेङ्क्षणा मया सरागां नितरां निषेविता । तथा तथा तत्त्वकथैव सर्वतो विकृष्य मामङ्करसञ्चकार सा ॥ इदं तु दीर्घव्यवाये । सयोगपरखव्यवाये तु— सदा ज्ञानुष्णाणामड्डानां सङ्ङरसस्थलम् । रज्ञारज्ञणमिवाभाति ततत्तरगताण्डवैः ॥

यथा यथेत्यादि-पञ्चपुष्पोक्ते 'था ता' इत्यत्र, तयोत्तरार्धे च 'तथा तथा तत्व' इत्यत्र 'यात' 'थात' इत्यनयोः रुढव्यवायेनाश्रव्यत्वनिरासः । 'तथा तथा' इत्यत्र तु तकारस्थकारयोरुढव्यवायेनाभावादानन्तर्यं भवत्येवाश्रव्यत्वमिति वक्ष्यति—इदं गुरुवेन तद्वयवायान्नाश्रव्यत्वविमति बोधयम् । प्रकृतपद्यो तामरसायतेङ्क्षणे यस्स्य कमलोत्कुलललोचनेत्यर्थः । एकरसभित्यत्रैवकशब्दो नायिकार्थकः, उपमाने तु बह्वार्थकां

बोध्यः ।

'संयोग गुरू' इति शास्त्रानुसारेण प्रसिद्धमूलकेन संयागपूर्ववर्त्तिनो ह्रस्वस्यापि पारिमाणिकं गुरुत्वमस्त्येवेति तद्वयवायेऽपि गुरुत्ववयवकृतमश्रव्यत्वमभावमाह— सयोगेपीत्यादिना ।

सदा जयेत्यादि । सर्वदा जयेऽनुसङ्घः सम्बन्धो येषान्तेषां देशादिपानां था ता (म...)’ में द्वितीय-प्रथम का आनन्तर्य दीर्घ-स्वर के व्यवधान के कारण अश्रव्य नहीं है । इसी प्रकार उत्तरार्ध में '(त) था त' और 'था तरक' में दीर्घ-ह्रस्व के व्यवधान से अश्रव्यता का निराकरण हो जाता है । 'त(त्क)' में तॄकारोत्तरवर्ती तृतीय के आनन्तर्य में तो स्वाभाविक अश्रव्यता है हीं । इसी प्रकार 'तद् (व)' में स्वानन्तर्य-प्रयुक्त अश्रव्यता वर्तमान है । 'मामे...' में पञ्चम का स्वानन्तर्य-प्रयुक्त अश्रव्यता का भी दीर्घं स्वव्यवधान के कारण अभाव ज्ञातव्य है । पञ्चार्धं इस प्रकार है—

अन्य उदाहरण भी देखिए—'यथा यथा ताम...'—तत्व' आाद पद्य में । इसमें '(य) था ता (म...)' में द्वितीय-प्रथम का आनन्तर्य दीर्घं-स्वर के व्यवधान के कारण अश्रव्य नहीं है । इसी प्रकार उत्तरार्ध में '(त) था त' और 'था तरक' में दीर्घ-ह्रस्व के व्यवधान से अश्रव्यता का निराकरण हो जाता है । 'त(त्क)' में तॄकारोत्तरवर्ती तृतीय के आनन्तर्य में तो स्वाभाविक अश्रव्यता है हीं । इसी प्रकार 'तद् (व)' में स्वानन्तर्य-प्रयुक्त अश्रव्यता वर्तमान है । 'मामे...' में पञ्चम का स्वानन्तर्य-प्रयुक्त अश्रव्यता का भी दीर्घं स्वव्यवधान के कारण अभाव ज्ञातव्य है । पञ्चार्धं इस प्रकार है—

“ज्यों ज्यों मैं कमल के समान विकसित नेत्रों वाली इस कामिनी की अधिकाधिक सेवा (सम्पर्क) करता गया त्यों-त्यों तत्व-कथा की तरह इसने मुझे सब तरफ से मोड़कर एकरस कर दिया ॥” तात्पर्य यह है कि जैसे तत्वविद्या-सम्पन्न व्यक्ति कामिनी दीखता है वैसे हीं मुझे सबत्र-सवंन्दा यही कामिनी दीखती है ।

ये सब 'उदाहरण स्वतः दीर्घ-स्वर के व्यवधान से अश्रव्यता के निराकरण के हैं । (इनमें भी 'तत्व' शब्द में जो दीर्घ-स्वर का व्यवधान है वह तकारोत्तरवर्ती

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इदं तु बोध्यव्यम्—गुरुयोर्योग्यं वध्यायकस्तयोरेव वर्णयोरान्तर्यंकृतम श्रघ्यत्वमपवदति । तेनात्र थकारातकारान्तर्यंकृतदोषापवादेऽपि तकारथकारान्तर्यंकृतमश्रघ्यत्वमनुपोदितमेव ।

एवं उ्यादीनां संयोगोऽपि प्रायेणाश्रघ्य:—‘राष्ट्रे त्वोष्ठ्य:' परितश्र रन्ति' इति । एवमादय: श्रुतिकाटवभेदा अन्येऽप्यनुभवानुसारेण बोध्याः ।

सज्जरसस्थं रणा भूमि: तस्मा तस्मात्तुरगात्तोऽपि: रज्ज्वाज्ञानां श्रुतिपाठलेख्यभाति तित पद्यार्थ: : रज्ज्वाज्ञानेष्टत्र नस्वं चिन्त्यम् । अनेककृतां कत्थावाटवानां बहुत्वमुक्तम् । अत्र च पद्ये चतुर्थपादे 'तत्ततु…' इत्यत्र प्रथमद्वितीययोर्ह स्वाकारयो: संयोगपरत्वेन तद्रघ्यवध्यानादश्रघ्यत्वभाव: : "(आभा) ति त…' इत्यत्र तु ह्रस्वेकारस्यवध्यानेरपि स्वानन:्तरयसतवादश्रघ्यत्वमपनोदितमेव मस्तव्यम् । अत्र परस्वर्णभूयस्त्वं दोष: ।

प्रकारान्तरमाह—एवमित्यादि । उ्यादीनामित्यन्रादिशब्देन ग्राहक:, तदधिकानां संयोगस्याडपसिद्धत्वात् । राष्ट्रम् इत्युदाहरणे ष्ट्र इत्यत्र ष्रयाणां ष्ट्रच आकार के स्वरूपत: दीर्घ होने से नहीं, अपितु उसके संयोजक-पूर्वक होने से) इसके अतिरिक्त संयोजक-पूर्ववर्ती ह्रस्व-स्वर के पारिभाषिक गुरुत्त्व-दीर्घत्व को लेकर दीर्घ स्वर के व्यवधान के आधार पर अश्रघ्यता के अभाव का (एक अन्य) उदाहरण

'सदा जयातु… तत्ततुरगाणद्वे:' इस पद्य में दृष्टव्य है है; यहाँ 'तत्तत्…' आदि शब्द में दो तकार-द्वयों का आनन्तर्य संयोजकपूर्ववत्त्व-निमित्तक गुरु-दीर्घ-स्वर के व्यवधान के कारण अश्रघ्यताघातक नहीं है । इस पद्य का अर्थ यह है—

"जिनका जय के साथ नित्य सम्बन्ध बना हुआ है ऐसे अङ्गदेश के राजाओं की रुद्धभूमि विभिन्न अश्वों के ताण्डव से तृतीय-शाला के समान शोभित हो रही है ।" इस प्रसङ्ग में यह ज्ञातव्य है कि जिन दो के बीच स्वाभाविक या पारिभाषिक दीर्घ-स्वर होत। उन्हीं दोनों के आनन्तर्य में अश्रघ्यतापादकता नहीं होती; गुरु-व्यवधानरहित व्यञ्जनों, चाहे जिनके बीच दीर्घ स्वर हो उनमें से कोई एक क्यों न हो, के आनन्तर्य में तो अश्रघ्यता होगी ही। अतएव 'यथा यथा…' इत्यादि उदाहरण में 'तथा' शब्द में तकार-थकार के और 'तत्सु' शब्द में तकार सकार के आनन्तर्य से अश्रघ्यता बनी ही है। इसी प्रकार, 'सदा जयातु…' इत्यादि उदाहरण में भी '(…भा) ति त (तत्तुरग…' के आनन्तर्य से जो अश्रघ्यता है वह भी अक्षुण्ण है ।

उपयुक्त अश्रघ्यता के समान तीन-चार क्य'जनों का संयोजक भी सामान्त्यतया अश्रघ्य होता । जैसे —'राष्ट्रे त्वोष्ठघ: परितस्ररन्ति' इस पद्यांश में 'ष्ट्र' शब्द में

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अथ दीर्घान्तयं संयोगस्य भिन्नपदगतस्य सकृद्व्यक्त्यश्रव्यम् (असकृत् सुत्राराम्) ॥

इत्यत्र 'चतुर्णां संयोगः' । प्रकारान्तरेणास्योदाहरणे शृदित्कडुत्वाभावप्रायेणेतुक्कम् । दीर्घान्तयमित्यत्र दीर्घों न संयोगपरो हरवो विवक्षितः । असकृदिति । सहृपस्य विरूपस्य वेति नानयोर्विशेषः । सुत्रारामित्यस्याधिकमित्यर्थः ।

हरिणीप्रेक्षणा यत्र गृहिणी न विलोक्यते । सेविचं सर्वसम्पद्वरपि तद्भवनं वनम् ॥

हरिणीत्यादि । यत्र भवने हरिण्या: प्रेक्षणमिव प्रेक्षणं यस्मात्तादृशी गृहिणी प्रियतमा न विलोक्यते तद्भवनं सर्वसम्पद्भरितं; परिपूर्णमपि वस्तुतो वनं निवासयोग्यं स्थानमेव गृहस्थस्य कुत इत्ययम् । अत्र च पद्ये प्रेक्षपेक्षि उत्तरपदादे: प्रेतिसंयोगस्य णीशब्ददोत्तरं सतताद्यश्रव्यत्वम् । असकृदित्यादि ।

षट् ट् रू का संयाग और 'ष्ट्रण्:' शब्द में ष्-ट्-टृ् य का संयाग अश्रव्य है । कभर्ई इनमें अश्रव्यत्व नहीं भी होता । जैसे—'सत्कविमि' इत्यादि शब्दों में लृ-लृन् य का संयाग । इसी प्रकार अन्य अश्रव्यत्व—श्रुतिकडुत्व के भेदों का अनुसन्धान पाठक को अपने अनुभव के आधार पर स्वयं करना चाहिए।

दीर्घे स्वर' के बाद यदि भिन्न-पदगत एक भी संयाग हो तो वह अश्रव्य होता, अनेक होने पर तो कुछ कहना ही नहीं । जैसे—'हरिणीप्रेक्षणा यत्र ‥‥', इत्यादि पद्य में 'णी' इसके बाद 'प्रे' इस संयाग में अश्रव्यता है । इसी प्रकार 'हरिणीप्लुता' शब्द में 'णी' के बाद 'प्लु' इस संयाग में भी अश्रव्यता है हाँ । उदाहृत पद्य का अर्थ इस प्रकार है :-

"जिस भवन में मृगनयनी गृहिणी न देखी जाय वह सभी सम्पत्तियों से युक्त होने पर भी भवन नहीँ, अपितु वन ही है ।"

१. अग्रे मुग्द्रितोद्ययं पाठ: प्रसज्ज्ञातुरोधाद्रास्मामिः स्थापितः ।

२. यहाँ स्वाभाविक दीर्घे-स्बर विवक्षित है, पारिभाषिक नहीं ।

३. 'विवक्षितमित्यर्थ:' । इस परवर्तीं ग्रन्थ के बाद मुद्रित—'असकृत् सुत्राराम् । यथा—'एषा प्रिया मे कत गताऽऽपाकुला ।' अंश को 'हरिणीप्रेक्षणा' आदि पद्य के बाद योजित्य के आधार पर मैंने रखा है । इसी से यहाँ इस अंशा की व्याख्या की गयी है ।

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एकपदगतस्य तु तथा नाश्रव्यम् । यथा—‘जाग्रता विचितः पन्थाः शात्रवाणां वृथोद्यमः’ । परसवर्णकृतस्य तु संयोगस्य सर्वंथा दीर्घान्तद्वयम्-पदगतत्वाभावान्मधुरत्वाच्चानन्तयं न मनागप्यश्रव्यम् । यथा—‘तान्तमालतरुकान्ति-’ इत्यादिपद्ये । अत्र तामित्यत्र नेमित्यत्र च परस-

भिन्नपदगतस्य संयोगस्याने कवारं प्रयो्गेऽधिकमश्रव्यत्वमित्यर्थः ।

तथा = दीर्घान्तयं संयोगस्य सकृदसकृद्वा । यदाहुःसकृदसकृत्संयोगस्य दीर्घान्तयन्मित्यनुसृतं तथेत्यस्य सुतरामश्रव्यतिमित्यर्थः कायं । तथा च किञ्चिदश्रव्यत्वं भवत्येवेति तात्पर्यं कल्पनीयम्, जाग्रतेयुबाहरंण जा, झो इति श्रयांणां संयोगपूर्वाणां दूघाणामुपलम्भात । सर्वंथेति । अघ्यवबहितयोद्द्योःहलोः संयंगसंज्ञेति पक्षे परस्य ह्रलः परपदादावयवतेन तद्घटितसमुदायश्रुपस्य संयोगस्य न पूणर्तः पूर्वंपद-घटकत्वं वा पूणर्त उत्तरपदघटकत्वमित्यभिप्रायेणोक्तं सर्वंथेति । दीर्घादित्वस्य आनन्तयंमित्यनेनान्वयः । लघ्वनीकृतद्वीरित्येतद्घट कस्मैतत्यः ।

तब तो अश्रव्यता का आघिक्य हो जाता है । जैसे—‘एषा प्रिया मे कव गता षपाकुला’ इस पद्यांश में ‘षा’ के बाद ‘प्रि’ और ‘ता’ के बाद ‘ग’ इन संयोजनों में अधिक अश्रव्यता है । किन्तु यदि दीर्घोत्तरवर्ती संयोजक एकपदनिष्ठ हो, अर्थात् जिस पद में दीर्घ स्वर हो उसी पद में दीर्घोत्तरवर्ती संयोजक भी हो, तो अश्रव्यता नहीं आती । जैसे—उक्त पद्य में ही ‘विलोकयते’ पद में ‘लो’ में दीर्घ स्वर है नाद्र ‘कय’ में क्-य का संयोजक अश्रव्य नहीं है । इसी प्रकार ‘जाग्रता विचितः पन्थाः शात्रवाणां वृथोद्यमः’ ( शत्रुओं का सारा प्रयत्न निरर्थक हो गया, क्योंकि जगे हुए उसके विरोधी ने उसके गुप्त मार्ग को खोज लिया ) इस पद्यांश में ‘जा’ के बाद ‘ग्र’ और ‘त्रा’ के बाद ‘व’ इन संयोजनों में अश्रव्यता नहीं है । यदि दीर्घं-स्वर के बाद का भिन्न-पदगत संयोजक परसवर्ण-सन्धि से निष्पन्न—परसवर्णदिशा हल्ङ्घटित

हो तो उसमें अश्रव्यता—श्रुतिकटुता नहीं आती । इसके दो कारण हैं—एक तो यह कि उस संयोजक घटक पूर्ववर्ती व्यञ्जन पूर्वं-पद का अन्त्यावयव होता खैर इस लिए उस परसवर्णनिष्ठपन्न व्यूंजन तथा परवर्ती पद के आद्य व्यूंजन का संयोजक उत्तरवर्ती पद का आघ अवयव होता हैं नहीं, उसका अवयव तो उस संयोजक का केवल परवर्त्ती व्यूंजन होता जं स्वरस्य में संयोजक नहीं हैं । दूसरा कारण यह है कि परसवर्णनिष्ठपन्न संयोजक स्वरुपतः मधुर होता है जिससे उस संयोजक के ह्रस्व या दीर्घ स्वर के परवर्त्ती होने पर भी उसमें अश्रव्यता आ हीं नहीं सकती । जंसे—‘तान्तमालतरुकान्ति...’ इत्यादि पूर्वोदाहृत पद्य में ‘न्त’ और ‘न्त’ में जो संयोजक है

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वर्णस्य पूर्वंपदभक्ततया न संयोगो भिन्नपदगतः। प्रत्येकं संयोगसंज्ञेति पक्षेऽपि भिन्नपदगतः संयोगो न दीर्घादित्वबहित्परः। नवाम्बुदेत्यत्र त्वेत्यादि

तो पूर्वं ओर इससे अग्र्यवहितोत्तरवर्ती दोनों व्यञजनों के समूह में संयोजक सञ्ज्ञा होती है—इस पक्ष के अनुसार किया गया। अब पाणिनि के “हलोऽनन्तराः संयोगः” इस संयोग-सङ्क्ञाविधायक सूत्र के महाभाष्य में निर्दिष्ट पक्षान्तर—‘प्रत्येकं संयोगसञ्ज्ञा', अर्थात् जो दो व्यञ्जन अग्र्यवहित पूर्वोत्तर हों—जिन दो व्यञ्जनों के मध्य में कोई स्वर न हो—उनमें से प्रत्येक व्यञ्जन संयोजक कहलाता -- पूर्वं व्यञ्जन भी एक संयोग है और परवर्ती व्यञ्जन भी एक संयोग है—के अनुसार भी विचार करने पर परसवर्णनिष्पन्न संयोजक में श्रुतिकटुत्व नहीं आती, क्योंकि जो प्रथम संयोजक परसवर्णनिष्पन्न व्यञ्जन है वह यदि दीर्घं स्वर के बाद आया भी हो तो वह भिन्नपदगत नहीं होता और जो द्वितीय संयोजक—परवर्ती पद का आधायक व्यञ्जन है वह पूर्ववर्ती पद के दीर्घं स्वर से नहीं अपितु उसके अन्त्यावयवभूत परसवर्णनिष्पन्न प्रथमसंयोगस्वरूप व्यञ्जन से परवर्ती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि परसवर्णनिष्पन्न संयोजक वहां भी श्रुतिकटु नहीं होता जहां उसका एक व्यञ्जन पूर्वंपद का अनत्यावयव हो और दूसरा दूसरे पद का आधायावयव। जहां एक ही पद में परसवर्ण है वहां तो उसके श्रुतिकटु होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। अब ‘तान्तमालसरुकान्ति...' आदि पदों के उत्तरार्ध में आये 'नवाम्बुद...' एवं इस प्रकार के अन्य 'मणि' आदि शब्दों में जो दीर्घं स्वर के बाद परसवर्ण—निष्पन्न संयोजक श्रुतिमाण हैं उनके विषय में विचार कर लेना चाहिए कि वे श्रुतिकटु (अश्रव्य) होते या नहीं। एकादेश के विषय में पाणिनि का एक योग है—‘अन्तादिवच्च' (६।१।८५)। इसका अर्थ यही है कि पूर्व—पर स्वरों के स्थान में हुमा एक आदेश, जैसे अ + आ के स्थान में ‘आ’ सवर्णदीर्घ एकादेश ‘आ’, साधारणतया पूर्वंपद का आधायकव्यञ्जन भी माना जाता है और परपद का अनत्यावयव भी। इसके अनुसार न + व और अम्बुद इन दो पदों में पूर्वंपद 'नव' के अन्‍तिम वकार और परपद 'अम्बुद' के आधा आकार के

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कारदेशस्य पदद्वयभक्ततया दीर्घाद्द्वित्रिपदगतत्वे सत्यव्यवहितोत्तरत्वं यद्यपि परसवर्णकृतसयोगस्य भवति तथाप्यत्र भिन्नपदगतत्वमेकपदगतभिन्नत्वं विवक्षितमित्यदोषः । (असकृतू सुतराम् । यथा—‘एषा प्रिया मे कवृ गता

सवर्णदीर्घेस्त्य आकारस्य । पदद्वयभक्ततयैति । ‘अन्तादिवच्च’ इति पाणिनीयनु- शासनादित्यर्थः । तथा च आकारोऽयं पूर्वपदस्यान्तावयवोडपि मन्यते, उत्तरपदस्यादि- व्यावयवोडपि । तत्र च पूर्वपदस्यान्तावयवत्वे ‘स्व’ इत्यस्य दीर्घाद्व्यब्दितोत्तरसयोग- त्वादश्रव्यत्वापत्तिरिति पूर्वपक्षः । अमुत्राद्दशच भोगादिकाद् ‘अबि शब्दे’ इत्यातमनेप- दिनो वातोःकुलकादेऽणादिके । ड्‌-प्रत्यये धातोश्छेदि स्वान्तुमागमे ‘अनु’ इत्यत्र नकारस्यापदान्तस्य इति भवति ‘स्व’ शब्दस्य पर- सकर्ण च कृते निष्पन्न इति भवति ‘स्व’ शब्दस्याप-

स्थान में सवर्णदीर्घेस्वरूप एकादेश से निष्पन्न दीर्घ स्वर (नव् + ) ‘आ’ पूर्व-पद का आध्यावयव माना हो जा सकता है (अर्थात् ‘नव’ पूर्व-पद हो जाता है) । इससे भिन्न पद ‘स्वद्’ में जो संयोग है वह दीर्घ-स्वर के बाद आने वाला ‘भिन्नपदगत परसवर्ण-निष्पन्न संयोग है ।

सवर्णकृतसयोगस्त्वम् । एकपदगतभिन्नत्वमिति । अत्र पश्यमोतत्पुरुषे हरिणी- प्रेक्षणेति पूर्वोद्धारणे समस्तादेकपदादृभिन्नपदगतत्वाभावो भवत्येव प्रेति- संयोजस्यैति तद्राश्रव्यत्वोक्तिरसंगता स्यात् । एकपदगतश्च तद्‌दृशश्चेत्येकपद- गतभिन्नस्त्वमिति किञ्चिद्‌ व्याघातो न्याघाटः । तथा च यत्र संयोजे एकपद्ये समासादौ दीर्घ- व्यवहितोत्तररत्वमथ च तद्‌दृशन्नैकपद्यभावेऽपि तथा तैवाश्रव्यत्वमिति स्यातो हरिणीप्रेक्षणेत्यन्रोपप्रथापि दीर्घाद्व्यवहितोत्तररत्वादतवादश्रव्यत्वोपपत्ति:, नवाम्बुदेशयत्र तु एकादेश एव सयोगस्य ‘स्व’ -इत्यैव तयावदान्तराश्रव्यत्वाभावात् । एकपदगतभिन्नत्वमित्यत्र पश्यमीसमासाभिप्रायेण प्रकारांतरेण रसचन्द्र- रियाम् क्रत: परिष्कारो मुक्तोऽपि ग्रन्थाशयेनानुगुणत्वादसमभिरुपेक्षित: आ सकृत्स्वित्यादि । अप- मंशो व्याख्यातपूर्वः । एषेत्यादि । अत्र प्र-स्व-त्रेति प्रिए संगेष्ट्रश्रव्यत्वाधिक्षयम् ।

हैं । अनः इसमें अश्रव्यता माननी चाहिए या नहीं । समाधान करते हुए पण्डितराज कहते हैं कि सवर्णीकृत ‘भिन्नपदगत संयोग’ का तात्पर्यं उस संयोग में है जो ‘एकपदगतभिन्न’ हो । इसका आशय यही है कि जो संयोग समास एवम् सन्धि आदि करने पर भी दीर्घ-स्वर के व्यवहित उत्तर में भिन्न पद के आरम्भ में श्रूयमाण हो और उनके बिना भी पूर्वपदवर्ती दीर्घ-स्वर से व्यवहित उत्तर में भिन्न पद में श्रूयमाण हो वहाँ ‘भिन्नपदगत संयोग’ के रूप में विवक्षित है, अन्य प्रकार का संयोग नहीं ।

  1. यह किञ्चार परसवर्णनिष्पन्न संयोग की स्वाभाविक मघुरता की मान्यता को ध्यान में रखकर किया गया है । इसका अद्देश्य ‘भिन्नपदगत’ शब्द का परिष्कृत अर्थ प्रस्तुत करना है ।

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त्रपाकुला' 1) इदं चाश्रव्यतयैव काव्यस्य पद्यं त्वमिव प्रतीयते ।

अथ स्वेच्छया संध्याकरणं सकृदुप्यश्रव्यम् । यथा--'रम्याणि इन्दुमुखि ते किलकिलकितानि' । प्रगृह्यताप्रयुक्तं त्वस्कृदेव--'अहो अमी इन्दुमुखी-पद्यौ त्वेन तुल्यं चमत्कारापहारि, तत्तर्हि रसादप्रतीत्यापत्तिरित्याह--इदं चेत्यादिना ।

प्रकारान्तरमश्रव्यत्वस्याह--स्वेच्छयेत्यादिना । स्वेच्छया = अतुलासक्त्विना । 'णि' 'इन्दु' इत्यत्रेकारसर्वदीर्घीः संध्यभावः स्वेच्छया कृतः । 'चन्द्रमुखि !' इति पा ठे तु नाश्रव्यतयैव स्यात् । असकृदेवेति । एतेन सकृत् प्रगृह्यताप्रयुक्तसंध्यभावा-नाश्रव्यतयैवापादक इति लक्ष्यते, अन्यथा काव्ये तदनुसारानर्थक्यमनुष्टानलक्षणं स्यात् । सकृदनुष्टानेन शास्त्रासायिक्ये पुनस्तदनुष्टानं न शास्त्रवेद्यध्व्यात्मकर्मिति तात्पर्येम् । अहो इत्यत्र 'ओत्' इति सूत्रेण, 'अमी' इत्यत्र च 'अदसो मात्' इति सूत्रेण प्रगृ ह्यता । चन्द्रमुखीतिपाठे त्वनाश्रव्यतयैवापदुष्टते । एवमेव=अनृतू

संयोग दीर्घ-स्वर से अध्यवहितोत्तरवर्ती और भिन्नपदगत हो हों नहीं सकता । वतः परसवर्णनिष्पन्न संयाग कमी भी अश्रव्य नहीं होता । यह काव्यगत अश्रव्यता प्राणियों में पाई जाने वाली क्रोधादि ( रुष्टता ) के समान है जो रस-प्रवाह को अवरुद्ध कर देती है । अतः वजनीय है । पूर्वोक्त अश्रव्यता से अतिरिक्त नियमप्राप्त स्वर-संधि आदि का न करना भी अश्रव्यताघातक है । जैसे -- 'रम्याणि इन्दुमुखि ते किलकिलकितानि' ( अरी चन्द्रमुखी ! तेरे ये भाव, जो मित्रादि की प्राप्ति से उत्पन्न हर्ष के कारण मुस्कुराहट, शुष्क रुदन और क्रोध आदि से मिश्रित हैं, बड़े ही आकर्यंक हैं । ) इस पद्यांश में 'णि' के इकार और 'इन्दु' के इकार के स्थान में प्राप्त सवर्णदीर्घ न करने से अश्रव्यता आा गई है । इसी प्रकार 'प्रगृह्य-संस्कार' के कारण पदों का अनेक बार एक वाक्य में प्रयोग करने पर भी अश्रव्यता आ जाती ।

उदाहरणार्थं--'अहो अमी इन्दुमुखीविलास:' ( चन्द्रमुखी के ये विलास वदधुत हैं ! ) इस पद्यांश में 'अहो' इस निपात के 'ओत्' ( पा० सू० ८।२।८९५ ) सूत्रानुसार और 'अमी' पद के 'अदसो मात्' ( पा० सू० ९९९९९५ ) सूत्रानुसार हो जाने से क्रमशः पुंरूप और सवर्णदीर्घ संधियाँ नहीं हो पातीं । अतः क्याकरणा-कुसार इस प्रयोगों में गृद्यता होने पर भी अश्रव्यता है हीं । इसी तरह यदि किसी काव्य मे अनेक बार 'लोपः शाकल्यस्य' ( पा० सू० ८।३।९९९ ) सूत्रानुसार वकार अथवा वकार का लोप किया गया हो वो भी अश्रव्यता का अनुभव होता ।

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भुजगाहितप्रकृतयो गाढसम्बन्धमन्त्रा इवावनीरमण । तारा इव तुरगा इव सुखलीना मन्त्रिणो भवतः ॥

सन्धयकरणम् । अत्र च ‘लोप: शाकल्यस्य’ इति य-लोपानुशासनस्य त्रिपादीस्मृतत्वेन सप्तपदसमाध्यायोस्थगुणादिविषय प्रत्ययसिद्धतत्वाद् भवति सन्धयकरणम् । असकृदेवं सत्य-श्रद्धत्वम् । सकृत्सनुशासनानुष्टानायर्तवान्त तयाप । अपर इषव इत्थमादेशाघटितस्य इषव एते इत्यत्र च यादेशस्य पूर्वोक्तेन सून्रेण विकलपेन लोप: कृतः । भुजगेत्यादि । हे अवनीरमण ? भवतो मन्त्रिण: भृद्गानां सर्पाणामहिताः प्रकृतियेषां ते भुजगाहितप्रकृतयो गहडसम्बन्धिमन्त्रा इव भुजगान् विटानामहिताः

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इति भवदीयं काव्यमिति चेत् ? अकुत्वैव तलोपं पाठान्न दोषः । एवं रौकत्वस्य ह्लीलोपस्य यण्‌गुणवृद्धिसवर्णदीर्घपूर्वरूपादीनां नैकटघेन बाहुल्यमश्रव्यताहेतु: । एवमिमे सर्वेऽप्यड्‌गश्रव्यभेदाः काव्यासामान्ये वजनीयाः ॥

उक्त अश्रव्यता-प्रकारों से अतिरिक्त अश्रव्यता उस काव्य में भी आ जाती है जिसमें 'क' के स्थान में उत्प, 'हलि सर्वेषाम्‌' सूत्रानुसार यण्‌-लोप, यण्‌-संधि, गुण-संधि, संप्रदानौकार-निपात, पूर्वसर्गादि कारकवर्ण प्रकृतिभाव आदि सन्ध्यादि व्यापार एक से अधिक बार की गई हों, केवल एक बार करने पर अथवा दूर-दूर अनेक बार करने पर भी अश्रव्यता नहीं आती । इस प्रकार स्पष्ट है कि किसी भी सत्कवि को अपने काव्य में उपर्युक्त अश्रव्यताओं तथा अनुभवानुसार अन्य अश्रव्यताओं का भी साधावक विन्यास कदापि नहीं करना चाहिए ॥

अथ विशेषतो वजनीयाः । तत्र मधुररसेपु ये विशेषतो वर्जनीयाऽनुपदं वक्ष्यन्ते त एवौजस्विनः काव्यस्य; ये चानुकूलतयोक्तास्ते प्रतिकूला इति सामान्यतो निर्णयः । मधुररसेपु दीर्घसमासे झुङ्घटितसयोगपरहस्वस्य प्रकृतिरूपां ते भुजंगहितप्रकृतयः, सुष्टु हे गगने लो रा: सुललोनाम्नारा एव, अथ च सुष्टु खलीनं कविका ('ल्गाम' इति लोके प्रसिद्धम्) येपां ते सुङ्खलीनास्तुरगा एव मुखलीनाः सुधे लीनाः निमग्नाः सन्ति, अथ 'मन्त्रा इव', 'तारा इव' 'तुरगा इव' इत्यन्न त्रिपु यलोपः पूर्वोक्तसूत्रेण न विहितः, तस्यासिद्धत्वाद्गुणसंधीनां भयोत्कर्षश्रव्यतया भवतः काव्येऽप्यपलितमिति प्रहेलिका । उत्कृष्ट य लोपस्य वैकल्पिकत्वेन तल्कोपमकृत्वैव 'मन्त्रायिव' 'तारायिव', 'तुरगायिव' इति पाठेन निवारणीयमश्रव्यत्वमित्युत्तरम् । दोषान्तराणि निर्दिशति —एवमिमद्यादिना । नैकटघेन = बध्ववधानैन, स्वल्पपद्यवधा-नेन वा ; अतएव प्रबन्धे दूरेपां प्रयोयोगबाहुल्येऽपि नाश्रव्यत्वं यद्य कश्चिद्धावये सकृत्प्रयोगः । एकस्मिन्नेव वाक्ये प्रबन्धघटकेऽप्यसकृत्प्रयोगे स्वश्रव्यतया भवेदेव । नात्र विरोधिनी । एवमेव सकलप्रयोगे दोषप्रकाशनं कृतम् ॥

अब एक-एक गुण के अभिव्यञ्जक काव्य में विशेष रूप से वजनीय साध्यों का निरूपण किया जा रहा है—इस प्रसङ्ग में सर्वप्रथम यह बात है कि मृदुरसादि मधुर रसों में दीर्घ हो जिनमें वर्जनीय कहा जाना चाहिए वे औजस्वी वीरादि रसों

सम्प्रति तत्सदृगुणानुकूलरचनासु वर्जनीयानाह—अथेल्यादिना । सामान्यत इति । विशेषापेक्षतया विशिष्टेषु बोध्यमिदम् । दीर्घसमासमिति । अस्थ वजंयेदित्यने-तान्वयात् सकृदपि मधुररसे दीर्घसमासस्य वर्जनीयत्वमुक्तम् । अन्येऽवान्तर सकृत्प्रयोगं वजंयेदिति स्पष्टमेवोक्तम् । जयृघटितेत्यादि । जय-प्रस्थाहारघटितः संयोगः परो

में उपयुक्त हैं । आकाश में लीन ( सु + ख + लीनाः ) तारों के समान और सुन्दर लगाम वाले घोड़ों के समान ( सु + खलीनाः येषाम्‌) सुष्टु में निमग्न (सुष्टु + लीनाः) हैं ॥'

आकाश में लीन ( सु + ख + लीनाः ) तारों के समान और सुन्दर लगाम वाले घोड़ों के समान ( सु + खलीनाः येषाम्‌) सुष्टु में निमग्न (सुष्टु + लीनाः) हैं ॥

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विसर्जनीयादेशकारजिह्वामूलीयोपध्मानीयानां टवर्गज्ञेयां रेफहकारान्यतरघटितसंयोगस्य हलां ल-म-न-भिन्नानां स्वात्मना संयोगस्य झय्द्रयघटितसंयोगस्य चासकृदप्रयोग नैकर्येयेन वर्ज्येयेत। सवर्णदीर्घद्रयघटितसंयोगस्य

में अनूकू 'और जिन्हें मधुर रसो में अनूकूल माना गया है वे ओजस्वी रसों में प्रतिकूल होते हैं। मधुररसाभिव्यञ्जक रचना में दीर्घ–समास का तो कभी प्रयोग नहीं करना चाहिए।

यस्मादिति बहुत्रीहिः, विसर्जनीयोयेत्यादि । विसर्जनीयेस्थानिक आदेशः सकारादिरित्यर्थः । तेन विसर्जनीयस्याडसकृतप्रयोगेऽवर्जनीयत्वं सिध्यति । एतच्च 'सानुरागोस्सी' इत्यादिद्विवेक्षिताहारणस्य पूर्वाधिेमास्स्य साधुर्यात्तस्मात्स्वरूपत्ववर्णननेन लभ्यते ।

साथ हीं, झय–प्रत्याहार (इ, भ, घ, ङ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प ) के व्यञ्जन के संयाग से पूर्ववर्त्ती हस्व स्वर का; विसर्जनीयेस्थानिक' आदेशों–म् अल्पवा सा, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय का; टवर्ग से सभृकृत झय–प्रयाहारान्तर्गत व्यञ्जनों का; रेफ अथवा हकार से घटित संयोग का; ल, मु, और तु को छोड़कर अन्य व्यञ्जनों के उच्‍छृङ्खल

तथा च तदवतरणाक्ये विसर्जनीयोप्राचुर्यमित्यस्य विसर्जनीयेस्थानिकादेशसकारप्राचुर्यमित्यर्थः । अत एव 'विसर्गसकार' इति पूर्वोक्त झोजोऽवषलकसुप्-वर्णनवाक्ये विसर्जनीयादेशः सकार इत्यर्थः । सकाररहचत्र स्वसूपानिकशकारस्यामुपलक्षणम् विसर्जनीयोर्हच तदादेशाश्चेत्यादिरूपेण समासे विवक्षिते तु वक्ष्यमाणोदाहरणस्य तुरीयेये पदे 'कान्ताया: स्वान्तद्रुतस्य' इति मुद्रितपाठस्थाने

व्यञ्जनों के साथ ( व+व ) संयाग का ओर कार–प्रस्याहारान्तगर्त सिन्‍न्–भिन्न दो व्यञ्जनों के संयोग का एक से अधिक बार निकट में प्रयोग नहीं करना चाहिए।

उत्तराध्रेस्य माधुर्यनिगुणत्वोपपादनाय कान्ताया:स्वान्तद्रुतस्य' इति पठनीयम् । स्वाभिन्नेनैष्यर्थः । टवर्गज्ञेयामिति । टवर्गसहितानां टवर्गसहचरितानां वा झयादित्यर्थः । द्वन्द्वे तु काद्यस्येतादृशस्य विरलविषयत्वापत्तिः ।

१. विसजेनीय और उसके आदेशों.....इस प्रकार भी अर्थ किया जा सकता है । २. यद्यपि शल् प्रत्याहार (शा, ष, स, ह ) महान्‍प्राण है तथापि हकारघटिसंयोग के असकृत्—एक से अधिक बार—प्रयोग के वर्जनीय होने से यहां केवल झार–प्रस्याहारान्तगर्त व्यञ्जनों का निषेध किया गया है :

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श्रभिन्नमहाप्राणघटितसंयोगस्य सकृदपीति संक्षेप:॥ दीर्घे समासो यथा— लोलाकावलिबलसयनारविन्द- लीलावशवदितलोकविलोचनाया:॥ सयाहनि प्रणयिनो भवनं व्रजन्त्या: इच्छतो न कस्य हरतो मतिरीक्षणानि॥

नेक्टयं चात्र वैचक्षिकमेकातुभवप्रवाहघतिततत्‌ वां बोधयम्‌। सकृदपीत्यापि श्रवणेनासकृत्प्रयोगस्य सुतरां व्रजन्तीयत्वमुक्तम्‌। व्रजन्तीयानामुहारणानि क्रेणाह —दीर्घेत्यादिना। लोलानां चञ्चलतानां मुखोपरिस्फुरतामलकानां केशानां या आवलिस्तया बलदृ आहच्छन्नमादृतं यत्नयनारविन्दं तस्य लीलया विलासपूर्णया आह्लादकादलकावलिनिखेपाय क्रियामणेन व्यापारेग वशंवदितानन्येकान्तमाकृष्टानि लोकानां विलोचनानि यया तस्याः, अथचैवंरूपेण सायाहनि स्वप्रियांसमस्य भवनं व्रजन्त्या अर्जुनाया मति: कस्य रसिकस्य मनो न हरत इत्यर्थ:। अत्र हरतेरात्मनेपदं चिरतयम्‌॥

अत्र पूर्वं व्यास्यातार: बलदिति अन्‍त:स्वार्थे चलनार्थकं धातुं मरवा व्याघक्षते। तत्र चलनार्थकस्य वलधातो: परस्मैपद: कथं मिलत्यवगतु न श्रृक्यते। मतो बलन्निति पदर्गादि: पाठ: कत्तृण्य:। धातूनामनेकंयत्वाच्च प्राणनार्थकस्य बलधातोरन्तरं लीलेऽपनेनोक्तार्थत्वं चेति। यदि तु कथंखिदन्तन:स्वार्थिरेव वलधातु: परस्मैपदीति मन्को छोड़कर अन्य महाप्राण घटितसंयोगों (पाँचों व्यञ्जन-वर्गों के द्वितीय कोर चतुर्थं व्यञ्जनों) से घटित संयोग का तो एक बार भी प्रयोग नहीं करना चाहिए।

दीर्घसमास का प्रयोग ‘लोलाकावलिबल...' इत्यादि पदों में किया गया है।

पद्यार्थ निम्नलिखित है— 'चञ्चल केश-कलाप से आह्लादयन्त नेत्र-कमल के विलासपूर्ण व्यापार से लोगों के लोचन को बरबश आकृष्ट करती हुई श्याम के समय अपने प्रेमी के घर की ओर जाने वाली अभिसारिका की गति किस रसिक के मन को आकृष्ट कर हाँ लेती है ? अर्थात् सब के मन को आकृष्ट कर ही लेती है।'

इस पद्य का पूर्वार्द्ध एक समस्त पद है। अतः यह मदुर रस के प्रतिकूल निबन्धन है।

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झयघटितसयोगपरहस्वानां प्राचुर्य नैकट्येन यथा—

हीरस्फुरद्रदनशुभ्रिमशोभि किं च

सान्द्रामृतं वदनमेणिविलोचनाया: ।

वेधा विधाय पुनरुक्तिमिवेन्दुबिम्बं

दूरीकरोति न कथम् विदुषां वरेण्य: ॥

अत्र भृशब्ददप्यन्तं श्रृङ्गारानुगुणम् । शिष्टं तु रमणीयम् । उत्तरार्धे ककारतकारसपयै:सयोगस्य सत्त्वेऽपि प्राचुर्याभावात् दोष: ।

यद् मन्यते तर्हि तस्य सम्वररुपमाद्याक्षरमयं विहाय चलनार्थकत्वाभुपगमस्तेधां रसिकत्वे न प्रमाणमित्यालोचनायम् ।

हीरस्फुरदित्यादि । होरा होरका इव स्वच्छतया स्फुरतो ये वदना दन्तास्वेषां शुभ्रिमणा धवलतया शोभनशोभिलमयच च सान्द्रामृतं यत्र ( अधरोष्ठे तद्घटिततमम् ) मृगाक्ष्या वदनं विधाय विदुषां वरेण्य: श्रेष्ठो वेधा प्रजापतिः पुनरुक्तिमिवेन्दुबिम्बं पूर्वंहितमपि कथम् न दूरीकरोति ? यथा पूर्वप्रयुक्तमपि शब्दमनन्तरं विवक्षितार्थंवाचकमधुरतरशब्दप्रयोगे कृते विदुषां वरेण्यो दूरीकरोति निरस्यति तथेव वेधसापि कत्वव्यम्, तथा चाड्कुबिम्बं वेधा न विदुषां वरेण्योऽपितु होन ऐश्वर्यम् । तम्में-प्रकाशादौ तु न: काकप्रयोगमार्श्रित्य परिवेषच्छलेन परिव्रमणच्छलेन वा दूरी-

कारोत्येवेत्यपि तात्पर्यान्तरमुक्तम् । तत्र लट्प्रयोगोऽत्र काव्याश्रयणे ईपदप्तिकुल

इव प्रतीयते ।

अत्र च पद्ये 'स्फु' 'द्र' 'भ्रि' इति फकार-दकार-भकारात्मककसयघटितसयोगानां नैकट्येन प्रयोगात् माधुर्यमनुगुणत्वं च भृशब्दान्तस्य भागस्पृश्याह-अत्रेत्यादिना । संयोगस्य द्वयोः पर्याप्तत्वाद् प्रत्येकमादायास्य झयघटितत्वम्, स्वस्य

झय-प्रत्याहार के व्यञ्जनों से घटित संयोजनों से पूर्ववर्ती ह्रस्व स्वरों का निकटता से प्रचुर प्रयोग 'हीरस्फुरद्रदन . . .' आदि पद्य में किया गया है ।

पद्यार्थ निम्नलिखित है—

"प्रथमोक्त अर्थ का अभिधान जब पुनः ( कुछ उसकृष्ट रूप में ) हो जाता है तब लेखक प्रथम शब्द को दूर-काट कर अलग-अलग देता है । ऐसी स्थिति में जब विद्वानों मे श्रेष्ठ विद्वाताने मृगनयनी कामिनी के हीरे के समान चमकते दातों से सुशोभित और गाढे मधुरामृत से परिपूर्ण मुख का निर्माण कर ही लिया

तब स्वरचित चन्द्रमा-प्रस्तल को ह्रासा क्यों नहीं लेता ?"

इस पद्य में ( …. शु)भ्र' शब्द तक मधुररस के प्रतिकल विन्यास है, क्योंकि 'स्फु'; 'द्र' और 'भ्र' इन तीन झय-घटित संयोजनों से पूर्ववर्ती ह्रस्व

स्वरों का प्रयोग हुआ है । उत्तरार्ध ( तृतीय पाद ) मे 'भ्र' यह एक झय-घटिक

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तु 'दन्तांशुकान्तमरबिन्दरमापहारि सान्द्रामृतं' इत्यादि क्रियते तदा सर्वमेव रमणीयम्।

विसर्गप्राचुयं यथा— सानुरागास्सानुकम्पाश्रुतरास्शीलश्शीतला: । हरन्ति हृदयं हन्त कान्ताया: स्वान्तवृत्तय: ॥

अत्र शृङ्गारस्य सयोगान्त: पूर्वोद्ध मोदयोरनुरागादि पद्य है। इसमें 'हृशी' शब्द तक पूर्वार्द्ध मधुर रस के प्रतिकूल है, क्योंकि इसमें 'गा-पा-रा' के बाद विसर्गस्थानीय 'स-स-श' का प्रयोग हुआ है। पथार्थ यह है—

विसर्गस्थानीक सकार-शकार के प्राचुर्य का उदाहरण 'सानुरागास्सानु…' आदि पद्य है।

स्वघट रसवद्र । 'म्वं' इत्थस्य जयघटितसयोगवेदपि मधुरमकारघटिततद्वेन तत्पूर्वं हस्वमादाय न प्राचुर्यमिति कयचिद् व्याख्येयम्। मकारस्य परसवर्णनिष्पन्नत्वेन तदघटिततसयोगस्य चानुकूलतया वा समाधेयम्। दन्तांशुकान्तमित्यादि । दन्ता- नामङ्गुधि: प्रकाशौ: कान्तं मनोहरमय चारबिन्दस्य रमाया: श्रिगोडवहारि — इत्थादिरर्थ: । चन्द्रविम्बेपी कमलकान्त्यपहारकर्तृ च प्रसिद्धमेव ।

संयोग से पूर्वं 'उ' यह एक ही हस्व स्वर है। अतः इस तरह के संयोगों से पूर्ववर्त्तीं हस्व स्वरों की प्रचुरता नहीं कही जा सकती । यद्यपि 'नु' और 'स्व' इन शब्दों में भो जय घटित संयोग तो हैं हीं तथापि 'नु' शब्द मे पहले हस्व स्वर न होने से कोई दोष नहीं है। साथ हीं, 'नु' यह संयोग परसवर्णघटित भी है । इसी प्रकार, 'स्व' यह संयोग भी परसवर्णघटित है। अतः इसमें भी स्व-पूर्ववर्ती हस्व स्वर को दूषित करने का सामर्थ्य नहीं है। यदि उत्त पद्य का पूर्वाद्र्ध 'दन्ता शु कान्तम…' 'हत्यादि रूप में संगृहीत हुया होता तो कोई दोष नहीं रह जाता ।

सानुरागा हत्यादि । कान्ताया: सानुरागा: सानुकम्पा: चतुरा विदग्धा अग च शीलेन रसिकस्वभावेन शीतला अनुकूला: स्वान्तवृत्तयो मनोहरत: करुण हृदयं न हरन्ति ? हरन्त्येव सर्वेषां हृदयमित्यर्थ: । हन्त हति हप्।

कामिनी की अनुरागपूर्ण, अनुकम्पायुक्त, आकारवर्णनिमुण और शील से शीतल विसद्वृत्तियां वरवधू हीं रसिकों के अन्तःकरण को आकृष्ट कर लेतीं ॥" विसर्गस्थानीय जिसतामूलीय की प्रचुरता 'कलिशकुक्षिा …' आदि पद्य में उपलद्र है।

पूर्वार्द्धमित्यादि । अत्र विशेष: पूर्वमुक्तः ।

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कलितकुलिशाधाता केऽपि खेलन्ति वाता कुशलमिह कथम् वा जायतां जीविचे मे। अयमपि बत गुहजन्तालि माकन्दमौलौ वलुकृत्यति मदीयान् चेतनां वचचरीकः॥

अत्र द्वितीयोऽह्हामूलोयपर्यन्तमननुरूगणां माध्यमस्य। यदि च ‘कथमिव कथा मिवाशा जायता जीविचे मे, मलयभभगवाग्न्ता वान्ति वाता: ऋतास्ता:’ इति विधीयते तदा नायं दोषः। उपधमानौयप्राचुर्य यथा—

कलितेत्यादि। कुलिशस्य वज्रस्य घाताऽ इव घाता: कुलिशघाताः, कलिताः कुलिशधाताः यैस्ते केऽपि विलक्षणा वाताऽ इहु खेलन्ति यदा तदा हे अलि मम जीवितविषये कथा नाम कुशालं जायेताम् ! माकन्दमौली आम्नाशिक्षरे गुहजन्तयं वचचरीको धमारोऽपि मदीयान् चेतनां चुलकृत्यति शोधयति - इति पद्यार्थः। द्वितीयेयति। वाता केपोयत्रेयस्य। द्विःप्रयोगेऽपि प्राचुर्यमभिमतमिति पूर्वमुक्तमेव। मलयेत्यादि। मलयाचलस्था ये वातास्तेऽपि उदगोर्णा ऋत एव ऋतास्ताः ऋतुथस्तो विनाशो यैस्ते। यदा ऋतास्तो यमसुतसदृशा ( वाताः ) वान्ति प्रवहन्ति इत्यर्थः: परिकृतस्य पाठस्य। उपधमानौय इत्यादि। पफास्यां प्राग्रध्दिविसर्गसदृशो विसर्गस्थानीय वादेशः इति रेक्खाद्दृत उपधमानौय उच्यते। तस्य प्रचाचुर्यमेकाधिकवारं प्रयोगः।

"वज्र के समान कठोर आघात करने वाली यह कोई मयकूर हवा (आन्धी) बह रही है। ऐसी दशा में मेरे जीवन में कुशाल कैसे हो सक्ता ? देख मेरी सखी ! आम के बौरों पर पूंजता हुआ यह भौरा भी मेरी चेतना को पोसा सा जा रहा है !!"

उपयुक्त पद्य में ‘घाता इव’ यह प्रथम और ‘वाताः’ यह द्वितोय जिह्हामूलोय है। यहाँ तक का अंश माध्यम के लिये प्रतिकूल है। अतः यदि ‘कथमिव कथा मिवाशा जायता जीविचे मे….’ इत्यादि रूप में पूर्वार्द्ध का विन्यास कर दिया जाय तो माध्यम के अनुकूल होगा। इस पाठान्तर का अर्थ यह है—"वता रो सखी ? मुझे अपने जीवन की आशा कैसे हो सकती जव मलयाचलनिवासी विषधर सौपों के मुंहु से निकली हुर्ई प्राणहरण करने वाली हवा बह रही हो !!"

विसर्गस्नानिनक उपधमानौय की प्रचुरता का प्रयोग ‘मलका फणि....’ आदि पद्य में हुआ है। इसमें ‘अलका’ और ‘नयनास्ता इन दो उपधमानौयों का प्रयोग श्लान्त रस के प्रतिकूल है। पद्यार्थ इस प्रकार है—

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अलकाफणिशावतुल्यशीला नयनान्तापरिपुष्टतेषुलीला: । चपलोपमिता खलु स्वयं या वत लोके सुखसाधनं कथम् सा ॥ अत्र द्वावुपमानौानीयावेव न शान्तानुगुणौ । टवर्गस्य प्राचुर्य यथा-

यस्या अलका: केशपाशा: फणिशावै: सर्पेणिशुण्डिभिस्तुल्यं शीलं येषां तादृशा:, नयनान्ताश्च कटाक्षा: परिपुष्टतृष्णा: पुष्टप्रेमयुक्ता ये इषवो बाणास्तेषां लोके लीलैव लीला येषां वश्लास्वभावा वृत्तं इत्यर्थ: । अत्रोपमानौनीयम्, एक:-अलकाइत्यत्र मन्यशब्द-नयनान्ताइत्यत्र नेति प्राचुर्यं स्पष्टमेव । शेषस्तु बन्ध्यो मुक्त एवेत्येककारेण सूच्यते ।

वचने तव यत्र माधुरी सा हृदि पूर्णा करुणा च कोमलेडभूत् । 'अधुना हरिणाक्षि हा कथम् वा कटुता तत्र कठोरताविरासीत् ॥

हे हरिणाक्षि! तवैव यत्र वचने सा विशिष्टलक्षणा माधुरी, यत्र च तव कोमले हृदि पूर्णा करुणाडभूत्, तत्रैव वचनेऽधुना मानाकाले कटुता हृदि च कठोरता कथं प्रादुर्भूंतेत्यर्थ: । अत्र टवर्गस्य कटुता-कठोरता-कटदयोरध:प्रयोगो नान्तिकूल इति वकूूलं पाठान्तरमुत्तरार्धस्य प्रदर्शयितुम्-अधुनेत्यादि ।

"जिस वनिता के केश-पाश सॉप के वच्चों के समान हों, जिनके कटाक्ष पंख वाले बाणों के समान आघात करने वाले हों और जो स्वयं चपलता विधुतोपमिताऽऽतीव रस्खल हो वह वनिता भला इस लोक में सुख का साधन कैसे हो सकती ?"

"अरी प्रिये ! मुझे आश्चर्य है कि तेरी जिस वाणी में मधुरता और कोमल हृदय में पूर्ण करुणा थी उन्हीं वाणी और कोमल हृदय में आज क्रमश: ये कटुता और कठोरता कहाँ से आ गयी ?"

"किंतु होता तो वह स्पृग्जार के प्रतिकूल न होता । इस पाठान्तर का अर्थ है-"किंतु आज तेरो वाणी और कोमल हृदय में पहिले के गुणों के विरूध दशा क्यों देखी जा रही है ?"

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रेफघटितसंयोगासकृत्प्रयोगो यथा— तुलामनालोक्य निजामखवं गौराङ्गीं गर्वं न कदापि कुर्या: । लसन्ति नानाफलभारवत्यो लता: कियत्यो गहनान्तरेषु ॥ यदि तु 'तुलामनालोक्य महीतलेऽस्मिन्‌' इति निर्मीयते तदा साधु ।

स्पष्ट: । अत्र णकारस्याऽप्यसकृत्प्रयोगमननुकूलमभिन्नव्यत्ते रसश्चिद्रकाकूत्, तत्स्व-स्तिमन् परिष्कृते पा ठे 'हरिणाक्षि' इति पूर्वंपाठस्थाने 'सखि'-शब्दप्रयोगं कारणं मत्वा । वस्तुतस्तु नेदं सम्पकृं, णकारस्य माधुर्याऽनुगुणत्वस्य पण्डिततराजसम्प्रत-स्वाद । कथमन्यथा पूर्णा करुणेति णकारप्राचुर्यस्य पूर्वोक्तं सत्वेऽपि उत्तरार्धमात्र-मनतु गुणं मत्वा तत्त्वान्तरं एव पाठान्तरं कल्पयेत ? यस्तु 'हरिणाक्षि' इत्यत्र 'सखि' इति पाठान्तरं कृत्वा तत्र णकारस्याऽमूर्तस्वादिपि तु विवक्षितस्य तत्रैति पदस्य समा-वेशायंवेऽति बोधयम् । तदेवं पूर्वस्मिन् पा ठे उत्तरार्धं टवर्गप्राचुर्यं प्रदशितम् । अन्येषां टवर्गसहचरितानां ककारादीनां झ्यायामपि प्राचुर्यं व्यक्तमिवात्र । तुलामनालोक्येत्यादि । हे गौराङ्गि ! निजां तुलां स्वकीयगुणसादृश्यमापात-तोऽन्यस्यां कामिन्यां मनालोक्य कदापि अक्खयं गर्वं न कुर्या:; यतो नानाफलभार-सम्पन्ना: कियत्योऽपरिमिता लताः गहनान्तरेषु वनान्तःप्रदेशेषु लसन्ति । अतस्त्वन्मतुलनया नैव तस्मै इत्याशय: । अत्र पदे अक्खवं गर्वं कुर्या इत्येतस्यु पदेऽशु गर्वं कुर्या:' इत्यमुना रेफघटितसंयोगानां सत्वाऽनुगुण्याभाव इति हेतो: पाठान्तरं प्रदर्श- यति-- 'तुलामनालोक्य महीतलेऽस्मिन्' इति । एतावताऽपि 'गर्व' कुर्या:' इत्यमुना व्याघ्यानेऽपि नैकटस्थं त्वक्खरत्वमेव, कथमात्रानुगुण्यमिति न स्यादुदाहरणान्तराणाम् । अतोडमुया गुणयसम्पादनाय 'तुलामनालोक्य मह्हीतलेऽस्मिन् गौराङ्गी मानं न कदापि कुर्या:' इति, 'तुला . . . गौराङ्गी गर्व न कदापि ध्येया:' इति वा पाठान्तरं कल्पनीयम् । द्वितीयपादे गर्व कुर्या इत्यादे: सत्वेऽपि

रेफघटित संयोग के प्रभूत प्रयोग का उदाहरण 'तुलामनालोक्य....' आदि पद्य है । इसमें 'अक्खयं', 'गर्व', और 'कुर्या:' इन पदों में तीन बार रेफघटित संययोग हैं । ये श्रुति-काररस के प्रतिकूल हैं । हाँ, यदि इसके पूर्वार्ध का 'तुलामनालोक्य मह्हीतलेऽस्मिन् गौराङ्गी मानं न कदापि कुर्या:' यह पाठ हो तो पूर्वोक्त दोष नहीं रह जाता ।

'अरी गौराङ्गी सखि ! स्तनों के भार से अवनत न पाने मात्र से इतना कसीम महाद्भार कबापि मत कर, क्योंकि नाना प्रकार के फलों के भार से अवनत कितनी ही लताएं अन्यत्र मुखोमित हो रही हैं ।'

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हलां ल-म-न-भिन्नानां स्वात्मना संयोगस्यासकृत्प्रयोगो यथा—‘विगणण्य मे निकाय्यं तामनुयातोऽसि नैव तन्न्याय्यम् ।’ ल-म नानां स्वात्मना संयोगस्तु न तथा पारुष्यमावहति । यथा —

आचार्याभिनवगुप्त यदुक्तं रसनिरूपणप्रस्तावने तत्र न्यायोक्तिहेतु: । हि:प्रयोगेऽपि प्राचुर्योदक्षत: । हकारेण पुन: घृत्तत्स्य संयोगस्यासकृत्प्रयोगस्योदाहरणम्—‘आलक्‍ष्य दोलमालि मध्वाम-सह्हवातम्’ इति रामायणचम्पूतो रुष्टतयम् । अत्र तु न लभ्यते । कारणं न ज्ञायते ।

इयमुल्लसितता मुखस्य शोभा परिफुल्लं नयनाम्बुजद्रयं ते । जलदालिमिय जगद्वितानवक्लित: कवापि किमालि नीलमेघ: ॥

विगणण्येतरथादि । ललितता नायिका नायकमुपालभते । मम निकायं गृहं विगणण्य परित्यज्य यत्‍वं तामन्या नायिकामनुयातोऽसि तत्‍व कथमपि न्यायं न्यायादनपेतमुचितं नेत्यर्थ: । अत्र यकारद्रयघटित: संयोगस्‍न:कृतव: प्रयुक्त इति प्रतिकूल्यम् ।

तथेति । अधिकमिस्यर्थ: । अत्र च लादीनामपि परिहरणीय एव भूय: भूय: स्वात्मना संयोजो महाकविनैति सूच्यते । आवहत्तीतित । अत्र एव हलां ल-म-न-भिन्नानां स्वात्मना संयोगस्य असकृत्प्रयोगं वर्जयेदिति पूर्वं सुक्तम् ।

इयमुल्लसिता.... । कृष्णदर्शनप्रसन्नाया गोप्या तत्सखी पृच्छति——हे भालि ? तव मुखस्येयमेतावती विलक्षणा वा शोभा उल्लसिता, नयनकमलद्रयं च परिफुल्लं वितानवत्‍व नीलमेघ: श्रीकृष्णस्तद्रू पारोपात कवापि कलितो दृष्ट: प्राप्तो वा किम् !! अत्र लकारस्य स्वात्मना लकारण द्वो संयोजो वत्समानावपि नाधिकं पारुष्यं जनयत: ।

ल, मू और नू से भिन्न व्यञ्जनों का अपने से अभिन्न व्यञजनों के साथ संयोजन यु.यु. का संयोजन है । अतः यह शृङ्गार के प्रतिकूल है । पथार्थ यह है --

ल, म और न से भिन्न व्यञ्जनों का अपने से अभिन्न व्यञजनों के साथ संयोजन यु.यु. का संयोजन है । अतः यह शृङ्गार के प्रतिकूल है । पथार्थ यह है -- 'मेरे घर की उपेक्षा कर तुम उस ( अन्य नायिका ) के साथ चले गये —यह किसी तरह न्याय-पुर्ण नहीं हो सकत ।''

‘मेरे घर की उपेक्षा कर तुम उस ( अन्य नायिका ) के साथ चले गये —यह किसी तरह न्याय-पुर्ण नहीं हो सकत ।’’

किसी स्पिण्डिता नायिका की अपने प्रिय के प्रति यह उक्ति है । किमु लकार-द्रय, मकारद्रय अथवा नकारद्रय का संयोजन कठोर न होने से मधुर रस के प्रतिकूल नहीं होते । लकारद्रय के संयोजन का प्रयोग 'इयमुल्लसिता...' आदि पद्य में दो बार हुया है ।

पथार्थ निम्नलिखित है— (कोई गोपी अपनी सखी से पूछ रही है —) "क्यों री सखी ? आज तेरा मुंह बहुत चमक रहा है और आँखें खिली हुई हैं ! सारे संसार को काले बादल के समान बना देनेवाले उस काले बादल ( = श्रीकृष्ण ) से कहीं भेंट हो गयी है क्या ?"

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झयुद्रघटितसंयोगस्य यथा— आ सायं सलिलभरे सवितारमुपास्य सादरं तपसा । अधुनाऽऽजेन मनाक् तव मानिनि तुलनां मुखस्याप्ता ॥ अन्र द्वितीयाऽऽधंर्मरमयम् । ‘सरसिजकुलेन संप्रति भागिनि ते मुखतुला-श्रिगता' इति तु साधु ।

ऋय-प्रत्याहार के असवर्ण व्यञ्जनों के संयोग का प्राचुर्यं "आ सायं सलिलभरे ..." इत्यादि पद्य में उपलब्ध है । पद्यार्थ निम्नलिखित है— "हे मानिनी ! कल प्रातः काल से लेकर सायंकाल तक जल के भीतर रहकर सूर्य की श्रद्धापूर्वक उपासना करने वाले कमलिनी अपने तप के फलस्वरूप आज तुम्हारे मुख की जोड़ी-सी समानता पा सकी है ।" इस पद्य के उत्तरार्ध में 'अन्र' शब्द में ब + ज का और 'आस्त' शब्द में पू + त् का संयोग झय-घटितसंयोग है । यह श्रृङ्गार रस के प्रतिकूल है । यहाँ, यदि सरसिजकुलेन संप्रति भागिनि ते मुखतुलाश्रिगता' यह पाठ उत्तरार्ध का होता तो उक्त दोष नहीं होता ।

सर्वण्झयुद्रघटितसंयोगस्य सकृत्प्रयोगे यथा— अपि मनदस्मितमभूरे: वदन तन्वङ्गि ! यदि मनाकुरुर्षि । अधुनाॅव कलय शमितं राकारमणस्य हन्त साध्राज्यम् ॥

दो सवर्ण झयों का एक बार संयोग 'अपि मनदस्मित...' वाकि पद्य में प्राप्त होता ।

झयुद्रयेति । असर्वण्झयुद्रयेत्तयस्यः । आ सायमिति । मानापनोदनाय कश्चिन्मानिनों स्तौति । ह्यः प्रातरारम्भ सायंकालपर्यन्तं सलिले स्थित्वा सवितारं सादरमुपास्याऽऽर्ज यततपस्तेपे तेन निमित्त भूतेन, हे मानिनि ! अधुना ऽअच तव मुखस्य मानात्पूर्व विकसनस्य तेनाऽऽजेन अत्रअनुजशब्दे आःशब्दे च वकार-जकारयोः पकान्तकाययोश्च झयोः संयोगद्रय मित्यनुकूलमिदमिस्याह—अरम्यमिति । अत्रानुजकुलं विन्यासं प्रदर्शंयति—सरसिज कुलेन संप्रति भागिनि ते मुखतुलाश्रिगता' इति ।

जेत्यादिना । अपि मन्तेत्यादि । अपि तन्वङ्गि ! यदि त्वं स्ववदनं मनागपि मनदस्मितेन अधुनाॅव कलय शमितं राकारमणस्य हन्त साध्राज्यम् ॥

"हे कोमलाङ्गी ! यदि तू अपने मुख को योड़ी सी मुस्कुराहट से युक्त बना ले तो वह तृण्ण वर्ण का सौन्दर्य पर जो आािभलष्य है यह अतिशय हो उठा ।"

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नन्वस्त्र ककारादिसंयोगस्य हल्घटितस्वात्मसंयोगविनैव निषेधात्कथं संयो. गस्य महाप्राणसंयोगनिषेधविषयत्वात्तत्संयोगस्य चासंभवात्सवर्णञ्जयघटि-

यही उदाहरण पद्य का अर्थ है। इसमें 'मनाकुरुषे' इस अंश में क् + कु का संयोजन सवर्णञ्जय संयोजन है। यह शृङ्गार रस के प्रतिकूल है।

मधुरं कुरुषे तर्हि राकारमणस्य पूर्णचन्द्रस्य सोन्मदयंसारत्राजपद्युन्त्रौक सद्य एव द्रुतिं कलय जानौहि। प्रतिकूलतां।

इस प्रसङ्ग में यह प्रश्न उठाया गया है--

अत्रैष्येव 'कु' इति सवर्णञ्जयघटितसंयोगस्य प्रयोगात्प्रतिकूलतां। सवर्णञ्जयघटितसंयोगस्य वचनाविच्छेद प्रियगुणदानं निरर्थकंमिति लभ्यते-- नन्वित्यादिना। स्वात्मसंत्यादि। 'हलां ल-म-न-भिन्नानां स्वात्मनः संयोगस्य....' इत्थनेन पूर्वंमिदमुक्तम्। असंभवावादिति। ककारे परे पूर्वस्य ककारस्य नियमेन

पहले ल्, म् और न् से भिन्न व्यञ्जनों के समान व्यञ्जन के साथ संयोजन का मधुर-रसाभिव्यञ्जक रचना में निषेध किया जा चुका है।

अतः त्वरितरि रिक्त व्यञ्जनवर्गों के प्रथम + प्रथम के संयोजन (जैसे दो दो ककार आदि के संयोजन) का तो उक्त निषेध में ही समावेश स्पष्ट है।

जहाँ तक चार व्यञ्जनवर्गों के प्रथम तथा द्वितीय व्यञ्जनों (क् + ख् आदि) के संयोजन के निषेध की बात है वह भी व्यञ्जनवर्गीय द्वितीय वर्णों के महाप्राण होने से महाप्राणघटित संयोजन के पूर्वोक्त निषेध में गर्भित है।

यही स्थिति सवर्ण तृतीय-चतुर्थ व्यञ्जनों के संयोजन (ग् + घ्) की भी है। वर्गों के प्रथम-तृतीय का संयोजन तो असंभव है, क्योंकि तृतीय व्यञ्जन के परे पूर्ववर्ती प्रथम व्यञ्जन का नियमतः जश् (उसी वर्ग के तृतीय व्यञ्जन) के रूप में परिवर्तन हो जाने से वह सवर्ण प्रथम-तृतीय व्यञ्जनों (ग् + ग्) में ही होगा।

प्रस्तुत निषेध भी एक व्यञ्जन का स्वसमानरूप दूसरे व्यञ्जन (क् + क्) के संयोजन के पूर्वोक्त निषेध से ही हो जाता है। न् और म् को छोड़ कर अन्य व्यञ्जनवर्गीय पश्चाद्वर्ती व्यञ्जनों का सवर्ण पश्चाद्वर्ती व्यञ्जनों के साथ (ह् + ह् आदि) जो संयोजन होगा उसका भी इसीसे निषेध स्पष्ट है।

ऐसी स्थिति में कोमल-सा दो सवर्ण ह्रस्व-दीर्घ-हस्व-संयोजन का स्वसामान्य रूप में यह निषेध सार्थक है ?

इसके उत्तर में यह कहा गया है---स्वसमानरूप व्यञ्जनों के संयोजन का एक से अधिक द्वार प्राप्त होने पर हैं पूर्वोक्त निषेध किया गया है, एक बार प्रयोग होने पर नहीं।

कसः यद्यपि अचम-प्रथम, तृतीय-तृतीय और पश्चाद्-वर्गीय अथवा वर्गों के संयोजनों को भी पूर्वोक्त निषेधके हों विषय मानेंगे तो उनमें भी मधुररस-प्रतिकूलता

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संयोगनिषेधो निरवकाश इति चेत्? न, सकृत्प्रयोगविषयत्वेनास्य पार्थक्यात् । अन्यथा मनाक्कुरुष्ट इति निर्दोषं स्यात् ।

जडत्वाद् कफकारूपेणैवोपलब्धेर्न तु ककाररूपेण, यस्तु ककारादिसंयोगस्तस्य हलां स्वातन्त्र्येण संयोगनिषेधोक्तौ रेव संग्रहादिदमुक्तम् । सकृदित्यादि ।

महाप्राणघटितसंयोगो यथा—

अथि मृगमदविन्दुं चेष्ट्राले वाले समातनुझे ।

जडत्वाद् गकाररूपेणैवोपलब्धेर्न तु ककाररूपेण, यस्तु ककारादिसंयोगस्तस्य हलां स्वातन्त्र्येण संयोगनिषेधोक्तौ रेव संग्रहादिदमुक्तम् । सकृदित्यादि ।

अथ महाप्राणघटितसंयोगातिरिक्तस्य सर्वपण्णयुद्रयसंयोगस्य सकृत्प्रयोगो निषेधस्य विषयत्वेन विवक्षित इति बोध्यम् । अत एवाग्रिमपदचर्चायाल्याने 'अघुनैव महाप्राणसंयोग-

अथ महाप्राणघटितसंयोगातिरिक्तस्य सर्वपण्णयुद्रयसंयोगस्य सकृत्प्रयोगो निषेधस्य विषयत्वेन विवक्षित इति बोध्यम् ।

स्यादसकृत्प्रयोगे निषेधविषयत्वं व्यवस्थाप्य तत्सकृत्प्रयोगे पुनरतुदाहारणप्रदर्शनं कथम् संगच्छत इति चिन्त्यम् ।

अत एवाग्रिमपदचर्चायाल्याने 'अघुनैव महाप्राणसंयोग-

निषेधात् । अस्य = प्रकृतनिषेधस्य । अन्यथेति । यदि निषेधान्तरविषयत्वमस्य सर्वपण्णयुद्रयादिनिषेधसंयोग एव तर्हीयर्थः ।

स्यादसकृत्प्रयोगे निषेधविषयत्वं व्यवस्थाप्य तत्सकृत्प्रयोगे पुनरतुदाहारणप्रदर्शनं कथम् संगच्छत इति चिन्त्यम् ।

निर्दोषं स्यादिति : प्रकृतस्य संयोगस्य निषेधात् । न तु सकृत्प्रयोगं, पूर्वं तस्य तस्य निषेधस्यासकृत्प्रयोगविषयत्वात् ।

निषेधात् । अस्य = प्रकृतनिषेधस्य । अन्यथेति । यदि निषेधान्तरविषयत्वमस्य सर्वपण्णयुद्रयादिनिषेधसंयोग एव तर्हीयर्थः ।

तथा च सकृत्संयोगे 'कक्' इत्यादौ ग्राह्यतापक्षे प्रतिकलितयाडस्मितेऽपि त्रिप्रध-

निर्दोषं स्यादिति : प्रकृतस्य संयोगस्य निषेधात् । न तु सकृत्प्रयोगं, पूर्वं तस्य तस्य निषेधस्यासकृत्प्रयोगविषयत्वात् ।

विपयत्वं न म्यादिति तात्पर्यम् ।

तथा च सकृत्संयोगे 'कक्' इत्यादौ ग्राह्यतापक्षे प्रतिकलितयाडस्मितेऽपि त्रिप्रध-

अयोत्याादि ।

विपयत्वं न म्यादिति तात्पर्यम् ।

अथि वाले ! यदि त्वं स्वभावे मृगमदस्य कस्तूरिकाय विंदुं समातनुझे तर्हि राकारमणस्य साध्राज्यमधुनैव शमितं कल्येति पत्वंपख्योत्करद्योमेस

अयोत्याादि ।

तभी प्रतीत होगी यदि इनका अनेक वार प्रयोग किया गया हो, एक वार प्रयोग करने पर नहीं । कित्तु ऐसा संयोग एक वार प्रयुक्त होने पर भी मधुर रस के लिये प्रतिकूल है । अन: ऐसे संयोगों का एक वार भी प्रयोग करना अनुचित है— उम विषय को मिद्ध करने के लिये सर्वर्ण-द्वय द्रय-संयोग का स्वतन्त्र्य रूप में निषेध किया जाना सर्वथा आवदश्यक है । अनयथा उदाहरण पद्य में 'मनाक्कुरुष्टे' उस अंश में सर्वर्ण-द्वय द्रय-संयोग का एक संयोग कथमपि दृष्ट न होतां, जैवकि वस्तुन: यह रसप्रतिकूल होने से दुष्ट है ही !

अथि वाले ! यदि त्वं स्वभावे मृगमदस्य कस्तूरिकाय विंदुं समातनुझे तर्हि राकारमणस्य साध्राज्यमधुनैव शमितं कल्येति पत्वंपख्योत्करद्योमेस

महाप्राणघटित संयोग का एक वार प्रयोग 'अथि मृगमद...' आदि पद्य के 'द्वाले' अंश मे है । हम पद्य का उत्तरार्द्ध पूर्वोक्तह्न पथ का उत्तरार्द्ध ... 'अघुनैव कलय: 'साध्राज्यम्' हो है । उस प्रकार पद्य का अयं यह हुआ —

तभी प्रतीत होगी यदि इनका अनेक वार प्रयोग किया गया हो, एक वार प्रयोंग करने पर नहीं । कित्तु ऐसा संयोग एक वार प्रयुक्त होने पर भी मधुर रस के लिये प्रतिकूल है ।

अरी वाले ! अगर तू अपने माथे पर कस्तुरी की बिन्दी लगा ले तब तो सच मान पूण्णचन्द्र का मोंदयें पर जो आधिपत्य है वह समाप्त हो जुका ।।

महाप्राणघटित संयोग का एक वार प्रयोग 'अथि मृगमद...' आदि पद्य के 'द्वाले' अंश मे है । हम पद्य का उत्तरार्द्ध पूर्वोक्तह्न पथ का उत्तरार्द्ध ... 'अघुनैव कलय: 'साध्राज्यम्' हो है ।

अरी वाले ! अगर तू अपने माथे पर कस्तुरी की बिन्दी लगा ले तब तो सच मान पूण्णचन्द्र का मोंदयें पर जो आधिपत्य है वह समाप्त हो जुका ।।

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उत्तरार्धं तु प्राचीनमेव ।

पदं प्रपूर्यं व्याख्येयमित्याह—उत्तरार्धमित्यादि ।

एवं त्वप्रत्ययं यडन्तानि यडलुगन्तान्यान्यानि च शब्दकप्रियाण्यपि मधुररसे न प्रयुञ्जीत ; एवं व्यञ्ज्यचर्वर्णाातिरिक्तयोगनाविशेषापेक्षानापाततोऽधिकचमत्कारिष्णोजुप्रासनिचयात् यमकादीन्‍श्‍च संभवन्तोऽपि कवीन्‍ निबन्धीयात् ।

मधुर दकाररमकारयोगस्संयोगस्य निवेधात् । एवंमन्येषामपि भूय:प्रयोगे प्रातिकूल्यं प्रतिपादयति—एवमिति ।

यतो हि ते रसचर्वणाायमानन्तर्भवन्त: साहृदयहृदयं स्वाभिमुखं विदधाना रसपरिपंथिमुखं विदेधीरन्‍ । विप्रलम्भे तु सुतरां नास्य निर्मलसितानिमित्तपानकरसस्येव तनोयानपि स्वातन्त्र्यमावहन्पदार्थ: साहृदयहृदयारुन्तुदतया न सर्वथैव सामानाधिकरण्यमहंन्ति ।

पूर्वोक्त-वदित्यर्थ: । अन्याचित्=कुदनतदितान्तानि अमधुरवर्णघटितानि पदानी तोषदूयमात इत्यादीनि । व्यञ्ज्यचेत्यादि ।

व्यञ्ज्यचेत्यादि । व्यञ्ज्यो रम:, तस्य चर्वणााया अतिरिक्ता बहिरङ्गा तन जत एव योजनाविशेषापेक्षा: आपाततोडधिकचमत्कारयुक्ताश्‍च ये तानिर्यर्थ: । स्वमनुप्रसादय: । अत्र हेतुरापाततोडधिकचमत्कारिष्णुप्रसादयमिति पूर्वोक्त: । तनोयानपीत्यादि ।

स्वातन्त्र्यमावहन् तनोयानपि पदार्थ इत्यन्वय: । स्वातन्त्र्यं छात्र रसाभ्यञ्जकभावनाड्विषयत्वेन वा बोधयम् ।

सामानाधिकरण्यमिति । विप्रलम्भमभि वयकाव्यविषयस्वम् । यस्मिन् काव्ये विप्रलम्भस्य निवन्धनं तस्मिन्नेव काव्येऽनुप्रासादेरपि निवन्धनमिति

इसौ प्रकार स्व-प्रयोज्यान्त शब्दों, यडलुगन्त क्रिया-पदों या संज्ञा-शब्दों और अन्यान्य कटु शब्दों, जो वैयाकरणों के लिये प्रिय हों, का भी भृय:प्रय: प्रयोग मधुर-रसाभिव्यञ्जक रचना में कवि को नहीं करना चाहिये ।

इसौ तरह यद्यपि अर्थ को चर्वणा के लिये जिनकी योजना भावदयक हो उसमें भिन्न योजना की अपेक्षा रखने वाले अनप्रास-यमक आदि अलङ्कारों का भी कवि को अपने काव्य में समावेश नहीं करना चाहिये, भले ही वे अनप्रासादि सामान्य दृष्टि से पाठकों के अधिक आकर्षक क्यों न हों । इसका कारण यह है कि वे अनप्रासादि पाठकों को अपनी ओर आकृष्ट कर लेते जिससे पाठकों को रसास्वाद हो नहीं पाता । विप्रलम्भ रसाङ्गर तो उक्तविध अनप्रासादि का परिहार विशेष रूप में करना चादिए । कारण यह है कि यह मधुरसम रस है ।

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यदाहुः:—

छवन्यात्मभूते श्रृङ्गारे यमकादिनिबन्धनम्। शक्तावपि प्रामादितवं विप्रलम्भे विशेषतः॥

सरलार्थः। एतच्च समानाधिकरण्यं रसान्तरेणापि दोष एव। अत्र योजनाविशेष-

पेक्ष्य इत्यनेन वानुम्रासादीनां रसचर्वणापेक्ष्यप्रयत्नाभिन्नप्रयत्ननिवर्त्यांतरमेव निपेष्ट्य- त्वमुख्यते। आपाततोऽधिकेत्यादिना च रसचर्वणापूर्वकानेकालिकभावनादिपयत्वं ज्ञाय्यते। अत एतेषां रसानुरलक्षणक्रमध्ययुक्तत्वे बाधकत्वं पर्यवस्यति। एतत्प्रतिपेधस्य व्यङ्ग्यविषयत्वोक्त्या वाज्छिरसाभिव्यञ्जक एव काव्येऽनुप्रासादीनां निबन्धनं निपेष्ट्यमिति सूच्यते। छवन्यालोके चैकलूपानुवन्धद्वानित्ययुक्ता विचित्रो भिन्न-भिन्न-

व्यङ्गजनाबुरुत्यात्मकोडुप्रायो न दोषायेत्यपि लक्ष्यते। परन्तु अङ्गरसेनुप्रासादि- निबन्धने कामचारो न बोजमिति नावसच्छायाम्। एतदेव शान्तादिविरोधितादसो प्रति- पादं विचित्रानुप्रास्योनेन का वार्तेत्यापि चिन्तनीयम्।

उक्तार्थे छवनिकारवचनं प्रमाणयति—यदाहुरित्यादि। छवन्यात्मेऽत्यादि! छवनिस्वरूपे प्रधानतयैते श्रृङ्गारे यमकादेः यमकादिप्रकारस्य किलोडरस्य यमकस्य, खादबन्धरुलेखस्य न किलिङ्गदस्य, खादगवृत्तशादेष्टच निबन्धनो कवेस्तन्निबन्धनगर्त्ती सत्यामपि प्रमादितवं प्रतिपादयतीत्यतस्तन्निबन्धनं कविना कदाचिदपि न कर्त्तव्यम्। सुक्तुमारतिस्नायादिस्नम्भे त्वदं निबन्धनं विशेषेण प्रमादितवं प्रतिपादयति, अतएव श

विशेषण नियमतः परिहरणीयोऽभिलाष्यः। अत्र 'प्रमादितवंमित्यनेतदृश्यंते—काक- तालीयेन कदाचित् कस्यचिदेकस्य यमकादेर्निपततारवपि भूतनादृश्श्रान्तरस्य मा- त्वेन निबन्धो न कर्त्तव्य:' इति तद्वृत्ति।। वयं रसगच्छायाम्। मतङ्गदेव परिह गोषपदे किलोटरत्नं महद्भोदवेजकत्वेऽपि तन्नथूल। तथा चैकक्यानेवार्थ न यमकादेः प्रयांगे नागरः। यद्यपि एकोडुप्रायवेजकस्तत्रापि म परिहरणीय एव, अनङ्गनुद्वेवजकस्तत्रापि

झाबंत में थोड़े से लाक्षणिक मिले जान में जैम वह अनावश्यक हो जाती। यंहें ह्रों इस रस में सो यद्यपि यङ्गार-शृङ्गार! कां प्रतिपूल किसी पदार्थ का मिश्रण हो जाये तो यह रस अनावश्यक हो जाता। अतः महद्दूष्य का उद्रे जक श्लोके से उक्त अनुप्रासादि का विप्रलम्भ-श्रृङ्गार-रसाभिव्यञ्जक काव्य में कभी नहीं समावेश करना चाहिए।

अत एव छवन्यालोकार ने कहा है:— 'यद्यपि कवि में यमक-अनुप्रास आदि का चिन्यास का सामर्थ्य हो तो भी छवनि- कावयो मे प्रघानतम शृङ्गारारश्रध्यञ्जक काव्य में उन यमक आदि का समावेश कवि का प्रमाद होत है, गुण नहीं। विप्रलम्भ-शृङ्गार-रसाभिव्यञ्जक काव्य में तो उक्त काव्यो मे प्रधानतम शृङ्गारारश्रध्यञ्जक काव्य में उन यमक आदि का समावेश और भी अधिक प्रतिपूल होने से विशेषतया त्याज्य है।।'

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ये तु पुनरमिलष्टततयानुरतसकन्धतया च न पृथग्भावनामपेक्षन्ते, किं तु रसचर्वनायामेव सुसुखं गोचरीकर्तुं शक्या:, न तेषामनुप्रासादीनां त्यागो युक्तः ।

यथा—

कस्तूरिकातिलकमालि विधाय सायं स्मेरानना सपदि शीलय सौधसौधमोलिमू ।

तत्परिहारे नाम्रहिमहेलेन कविना भाव्यम् । प्रायेण यमकादीनां भूनां प्रयोग उद्भवज-

कत्वसम्भावनेति रक्षणीयम् ।

तदेवं पूर्वंकालिकार्थ संग्रहः—

रसाक्षिसतया येषां बन्धः शाक्यतयो मतः । अपृथग्यत्ननिवर्त्यश्च सोऽलङ्कारो ह्वनो मतः ॥

इत्यन्नतरकारिकोक्तमर्थं संगृण्हाति—ये त्वित्यादिना । अविलष्टा इति । विलष्टा उद्भटेजकास्तद्भिन्ना हेत्यर्थः ।

'विलष्टा विलम्बेनस्वादपथ्यमवतीर्णा:' इति रसचन्द्रिकोक्तमप्यध्याहार्यम् । यतो हि असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गयो रसे ये तद्भिन्नशक्तिपूर्वकाःलङ्काराभिव्यक्तिविषया रसप्रतिपादनेऽप्यवश्यम्भाविनः 'एवं पारिहरणीयस्यवनेनार्धं वसीयस्त्वे तु तद्वास्त्वादपृर्वं रसास्वाद इति ।

तथा च परिहरणीयानां कृतिस्वादविषयतैवेष्टा, विलम्बनेनास्वादपथ्यानुरतसकन्धा इति । पूर्वप्रतीतिविषया उन्नतसकन्धतासादृश्येन ।

यदाऽऽविभावादिसंवलितालङ्कारास्तत्कृततया विलष्टासतद्भिन्ना इत्यर्थः । तथा चानुरतसकन्धा इत्यस्य विभावादियोजनानन्तरीयकतया योज्यता:, रसप्रतीतिपूर्वकालिकप्रतीतौ हि विषयस्व-

भाववृत्त इत्यभिप्रायः । कस्तूरिकेत्यादि । हे कालि ! स्मेरानना सती त्वं सायं करतू रिकातिलकम् विधाय

हां, जिन अनुन्रास आदि के निवन्धन के लिये कवि को इतस्ततः्न प्रयत्न न करना पड़े—जो अनुप्रासादि रसाभिव्यञ्जक सामग्री के वर्णन में अनायास उपनिबद्ध हो जॉय और इस लिये रस-चर्वणा के बहिहि्तू न हों उनका यत्नपूर्वंक परित्याग करना भी बच्चा नहीं है ।

जैसे 'कस्तूरिकातिलक...' आदि पद्य में अनायास-निबद्ध अनुप्रासादि रस-चर्वणा के अन्वकूल हैं, प्रतिकूल नहीं । पद्यार्थ निम्नलिखित है—

'मेरी सखी ! श्याम के शवक अपने माथे पर कस्तूरी का टीका कमा कर मुस्क-

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प्रौढिं भजन्तु कुमुदानि मुदामुदारा:। मुल्लासयन्तु परितो हरितो मुखानि ।।

सुग्धावलस्य प्रसादस्य शिखरं शीलय । एतेन मुखचन्द्रौदय: सूच्यते । तेन च कुमुदानि मुदां हर्षणामुदारां प्रौढि परमां काष्ठां भजन्तु, हरितो दिशरच्च मन्दकाव्रावगुण्ठनं निरस्य स्वमुखानि उल्लासयन्निवृति पद्यार्थ: ।

इत्थमेतेऽत्रसज्जतो मधुररसाभिव्यञ्जकायां रचनायां संक्षेपेण निरूपिता दोषा: ।।

अत्र वृत्त्यनुप्रासः, 'मुदामुदा' इत्यतत्र चांशो यमकंमतयेत्तत्सेव शृङ्गाराभिव्यञ्जक-योजनानन्तरीयकतया योजितं रसप्रतीत्यतिरिक्तप्रतीतिविषयत्वान्न प्रतिकूल-मित्याशय: ।। उपसंहरति—इत्थमित्यादि ।।

एभिरविशेषविषयै: सामान्यैरपि च दूषणै रहिता । माघकयेनारभरङ्गरचनामुनतुप्रबन्धनिचयन्यासा ।। व्युत्पत्तिमुदृङ्गिरन्ती निर्मातुर्या प्रसादयुता । तां विभुधा वन्दर्भी वदन्ति वृत्तिं गर्हीतपरिपाकाम् ।।

वन्ते माघकयेनारभरचनायां वेदर्भीरीतेःश्चिततत्वात् प्रसङ्गात् तां वर्ण्यते—एभिरित्यादिकेन । विशेषविषया: सामान्यविषया दोषाइत्र पूर्वोक्ता एव ।

राती हुई चमकतो अटारी पर चली जा जिससे तेरें मुख-चन्द्र की वन्दिता से ये कुमुदिनी प्रफुल्लित हो उठे और सारी दिशाएं चमक उठें ।। इस पद्य में ककार आदि का वृत्त्यनुप्रास और 'मुदामुदा.....' शब्द में यमक का स्वाभाविक रूप में विन्यास होने से ये अनुप्रासादि सम्भोग-शृङ्गार भी वृत्तेभा के अनुकूल हैं, अतः ये त्याज्य नहीं हैं ।

इस प्रकार प्रसङ्ग या जाने के कारण मधुर-रसों के अभिव्यञ्जक कार्य में जो दोष हो सकते हैं उनका, संक्षेप में, निरूपण किया गया है ।

इसी प्रसङ्ग में वेदर्भी रीति ( = उपनागरिका ) का स्वरूप भी स्पष्ट कर दिया जा रहा है—

"पूर्वोक्त सामान्य और विशेष दोषों से रहित, माधुर्य गुण के भार से लदे हुए मृदुल सुन्दर पदों और रचनाओं से सम्प्रवित, रचनाकार की कुशलता-निपुणता को प्रकट करने वाली, प्रसादगुण-समन्विता और रस-परिपाक को कलाने में समर्थ होते ( वीत्ति ) को विदग्धजन 'वेदर्भी' कहते हैं ।"

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अस्यामुदाहृतान्येव कियन्त्यपि पद्यानि ।

यथा वा—

आयातैव निशा निशापतितकरैः कीर्णं दिशामन्तरं भामिन्यो भवनेषु भूषणगणैः केललासयन्ति श्रियः । वामे मानमपाकरोषि न मनागद्यापि, रोषेण ते हा हा बालमृगालतोद्योतिततमा तन्वि ! तनुस्तिमितैः तनुस्तीभ्यति ।

या तै रहिता माधुर्येऽपि मारेण मदनगुरोर्नप्रः कमनीयः सुन्दरपदवर्णनानां विन्यासो यत्र तथाविधा, निर्माणतः कवेःशृं स्पात्ति निर्माणकोशलं प्रकटयत्सी अथ च प्रसादगुण-समन्विता वृत्तिस्तां गृहोतः परिपाको मधुररसाभिनयाङ्कसामध्येंकाष्ठा रसवद्वेणा वा या तादृशीं वैदर्भीं विदुधा वदन्ति ।

अस्याम् =वैदर्भ्या वृत्तो । उदाहरणान्तरम्—आयातैवेत्यादि । मानिनां प्रसादयितुं नैककस्योंऽक्तिरियम् । हे वामे ! निशा आयातैव, दिशामन्तरं च निशा-पतितकरैः किरणैः व्याप्तम्, प्रेमाद्रिं अन्यथा भामिन्यः स्वसवकेलिलग्रहेपु भूषण-गणैरलेलासयरन्ति श्रियः सौन्दर्यं वर्धयन्निति । परन्तुस्त्वमधुनाडपि स्वस्य मानं मनागीषदपि नापाकरोषि, पथय-तथ रोषेण बालमृणालतोंदपि तन्वोः क्राततरा ते तनुरसितमिस्तमां साम्यति ।

अस्याहचेत्यादि । एतच्च मधुरसाभिनयाङ्ककाव्यविषये क्षेयम् । परिपाकोड्न रसस्य विकसितः ।

पूर्वनिर्दिष्ट अनेक उदाहरण-पद्यों में इसे देखा जा सकता है । अथवा, यह एक अन्य उदाहरण भी देखिए:—

( कोई नायक मानिनी नायिका से कह रहा है—)

"रात भी आ गई, चन्द्रममा चारों तरफ अपनी चन्द्रिका बिखेर चुका, कामिनियां अपने-अपने घर में अपने को तरह-तरह के आभूषणों से सजा कर जगमग रही हैं पर तूं अब भी अपना मान नहीं छोड़ रही है । कितने दुःख की बात है कि नवीन मृणाल से भी अधिक कोमल तेरा शरीर इस कोप से स्थाहू पड़ गया है ।"

इस रीति के निर्माण में कवि को अत्यधिक सावधान रहना चाहिए, नहीं तो रस-परिपाक ह्रास न हो सकेगा ।

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यथाडमरुककविपद्ये- शून्यं वासगृहं विलोक्य शयनादुत्थाय किंचिच्छनै- र्निद्राव्याजमुपागतस्य सुचिरं निर्वर्ण्य पतिमुखम् । विस्रब्धं परिरचुम्बय जातपुलकामालोक्य गण्डस्थलौं लज्जानम्रमुखी प्रियेण हसता बाला चिरं चुम्बिता ॥

अत्रोत्थाय किंचिच्छन्नै रितयत्र सुवर्णझयद्रयसुंयोषितस्त्रापिं नैकटच्येनैति अधुना मुक्तकचनापटीयसोऽसकस्य शाल्यकर्म कत्तुं मारभते-- यथेत्यादिना । शून्येत्यादि । प्रथममानतीयं मदनन विकारक्रियावशं निषेदमु । नवोधा मुग्धा 'नववास-गृहं कौतुकागारं शून्यं स्वपतिभिन्नजनरहितं विलोक्य, शयनाद उत्थाय: वलयादिकवणनेन पतिनिद्राभङभयात् धाने: किंचिदपरकायेन उदस्थाय निद्राया व्याजं छलमुपागतस्य प्रियतनेनानुभवामवादात पश्यु: मुखं सुचिरं निर्वर्ण्यावलकय विस्रब्धं विस्वासयुक्त* यथा स्वयत्था परिरचुम्बय तस्य गण्डस्थलो तच्चुम्बनप्रभावेण जात-पुलकां दृष्ट्वा पतिजामरणनिश्चयाद लज्जया नम्रमुखी जाता, अथ च व्याज-साफल्येन हसता तेन प्रियेण चिरं चुम्बिताडपि दित्स्यर्थः ।

अत्र विलोक्येत्यादौ पदपक्षे 'वि' हिते वलया प्रत्यये समानकर्तृ कर्तव्य पूर्वकालिकत्वं चोपपाद्यम् । तथा व लज्जाशब्दस्य समस्त-त्वे डपि न क्षति: । अधिकं व्यक्तिविवेकादिष्वोडवसेयम् । अत्र व्यभिचारिणां लज्जा-हासयो: काङ्क्षत उपादाने दोषोदपि विवेचनीयः ।

उदाहरणार्थ, अमरुक कवि का 'शून्यं वासगृहं...' आदि पद्य दृष्टव्य है जिसकी रचना में कवि की असावधानी से इतनी कमियाँ आ गई हैं जिनके कारण रस-परिपाक हो नहीं पाता । पध्यायं इस प्रकार है— "पति देव सोने का बहाना करके आँखें मूँद कर लेते। लहू या । घर में कोई और न था । ऐसी स्थिति में एकाएक घोरे से अपने विहितर से नायिका उठी और पति के मुँह को कुछ देर तक देखती रही । फिर जब उसे अपने पतिदेव के सो जाने का विश्वास हो गया तो उसने उस ( प्रियतम ) का गाल चूम लिया जिससे सोने का बहाना कर लेते हुए उसके प्रियतम के गाल पर रोमाञ्च हो उठा । यह देखकर उस नायिका ने लाज से सर मुँहा लिया और उसका प्रियतम उसे बैर तक चूमता रहा ।"

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सुतरामश्रव्यः। एवं झयृघटितसयोगपरहसस्वस्यापि। तथा शानेःनिद्र॑द्यत्न, निर्वर्ण्ये पत्युमुंक्ष्मितयत्न च रेफघटितसंयोगस्य, झयघटितसयोगपरहसस्वस्य च प्राचुर्यम्। विसर्ग॑मितयत्न महाप्राणघटितस्य, लज्जेत्यत्न स्वात्मसर्वण॑सयुर्द्रय-घटितस्य मुखी प्रियेण॑तद्यत्न भिन्न॑पद॑गतदीर्घा॑नस्तरस्य संयोगस्य, तथा कत्वा-प्रत्ययस्य पश्चा॑कृतत्वः, लोकत॑श्च धातो॑र्द्धिः प्रयो॑गः कब॑निर्माणसामग्रीदारिद्र्यं प्रकाशयति। इत्यलं परकीयकाव्यविमर्शन॑न। इत्थं संक्षेप॑ण निरूपिता रसा:॥

अथ भावछवचित॑निरूप्यते-

सकृदेवायं संयोगोऽश्रव्यतापादकस्तदा हि सुतरामेव तथा नेकट्येन प्रयो॑गे त्वति-तमामश्रव्यतेति भावः। एवं झयृघटितेत्यादि। 'हु'-शब्दे, 'छि'-शब्दे, 'णि'-शब्दे, 'पु'-शब्दादौ च झयृघटितसंयोगपूर्‌व॑स्य हसस्वस्य बहुल॑मुपल॑भ्य। अन्यत्‌ स्पष्‌टम्‌। तदेवं साङ्क्ष॑पाद॑ रसनिरूपणमुपसंहरति - इति संक्षेप॑ण्यादि॥

भावछवनिरित्यं भावशब्दो हृद्यादि॑चतु॑स्त्रि॑शत्पदार्थपरः, तस्य छवनिरित्यमः।

सवर्ण॑-झय॑ द्रय-संयोग हैं। ये भी आस-पास हैं। अतः अत्यधिक अश्र॑व्य है। इन दोनों संयोगों से पूर्वं क्रमशः 'उ' और 'हु' (हृ-शब्द में)हस्व स्वरों मे भी अश्रव्यता है। इसी प्रकार 'शान॑निद्रा'....'निर्वर्ण्ये पत्यूमुंक्ष्म' इस अंश मे रेफघटित संयोगों का अनेक बार प्रयोग किया गया है। 'द्रय' और 'स्पु' इन झय॑-घटित संयोगों से पूर्वं 'उ' और 'अ' इन दो हस्व स्वरों का भी प्रयोग हुया है। 'विसर्गमु' सर्वण॑झय-द्रय-संयोग तथा उससे पूर्वं हस्व स्वर का प्रयोग है। 'मुखी प्रियेण' इस अंश में दीर्घ स्वर (खी-फे) ईकार के बाद अन्य पद 'प्रियेण' मे 'प्र' इस संय॑ग का भी प्रयोग है। एक हीं पद में 'विलोक्य', 'उत्सार्य', 'विस्म॑र्य', 'परिचुम्ब्य' कोर 'आलोक्य' ये पांच क्त्वा-प्रत्यय॑न्त पद भी प्रयुक्त हैं। साथ हीं 'लोक' धातु का भी दो बार प्रयोग किया गया है। इन सबसे यह स्पष्ट है कि कवि के पास पद्य-रचना के लिए अपेक्षित सामग्र्री नहीं थी।

इसी प्रकार अन्यान्य कवियों की रचनाओं में भी दोषों का अनुश॑धान पाठकों को स्वयं करना चाहिए। दूसरे के काव्य के दोषों का इस ग्र॑थ में अधिक विव॑षण करना सम्भव नहीं।

उपयुंक्त रीति से रसों तथा इनसे सम्ब॑द्ध विषयों का निरूपण किया गया।

अब भाव-छवनिरूपण किया जा रहा है -

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अथ किं भावत्वम् ? विभावानुभावभिन्नत्वे सति रसव्यङ्जकत्वमिति चेत् ? रसकाव्यवाक्येऽतिव्याप्तिः। अर्थद्वारा शब्दस्यापि व्यङ्जकत्ववात् । द्वारान्तरनिरपेक्षत्वेन व्यङ्जकत्वे विशेषिते त्वसभावःः अभज्ज्येत । भावस्यापि भ्रावेनाद्वारेण व्यङ्जकत्वात्, भावनायामतिव्याप्त्यापत्तेः। अत एव च विभावानुभावभिन्नत्वस्येव शब्दाभिन्नत्वस्यापि तद्विशेषणत्वे न निस्तारः;

इस प्रसङ्ग में सर्वप्रथम यह विवेचनीय है कि 'भाव' कहते किसे ? इसका क्या लक्षण है ? 'विभाव और अनुभाव से भिन्न जो रस-व्यञ्जक तत्व है वह भाव है' यह कहन। तो उचित नहीं है, क्योंकि रस-व्यञ्जक काव्यात्मक वाक्य में इस लक्षण की अतिव्याप्ति स्पष्ट है। उक्त काव्य में विभावानुभाव-भिन्नत्व भी है, और रस-व्यङ्जकत्व भी, क्योंकि रस-व्यञ्जक अर्थ का प्रतिपादक होने से काव्य को रस-व्यञ्जक कहना कविसम्प्रदाय में प्रसिद्ध है। यदि 'विभाव-अनुभाव से भिन्न रस के साक्षाद् व्यञ्जक जो भाव' कहा जाय तो उक्त अतिव्याप्ति तो न होगी, क्योंकि काव्य वाक्य में अर्थ-द्वारा रस-व्यञ्जकता होती, साक्षाद् नहीं । परन्तु असम्भव तो होगा ही, कारण एक भी 'भाव' बिना भावना के रस-व्यञ्जक नहीं होता ।

रस्काव्येति। रसौभव्यञ्जककाव्यत्वेऽथः। काव्ये रसाभव्यञ्जकत्वं न तद्रिता' इत्यादिना वर्णितम्। तदाह—अर्थद्वारेत्यादिना । लक्षणवाक्ये साक्षाद्व्यजकत्वानुक्ते : परम्परया रसाभव्यञ्जके काव्यवाक्येऽतिव्याप्तिः। भावनायां द्वारान्तरनिरपेक्षायां एव रसव्यञ्जकत्वादिति भाव । न निस्तार इति। भावनायां शब्दभिन्नत्वस्यापि सत्त्वेन तत्रातिव्याप्तेः।

ऐसी स्थिति में सब भावों में भावना-द्वारा ही रस-व्यञ्जकता के प्रसिद्ध होने से ( किसी भी भाव के साक्षाद् रस-व्यञ्जक न होने से ) किसी भी भाव में उक्त लक्षण समन्वित न हो सकेगा । हमारे साथ हैं, भावों की 'भावना' में उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति भी होगी, क्योंकि भावों की भावना साक्षाद् रस-व्यञ्जक भी है और विभावानुभाव से भिन्न भी । 'भाव' की भावना में इस अतिव्याप्ति के कारण ही 'विभाव-अनुभाव से भिन्न, शब्द से भिन्न और साक्षाद् रस-व्यञ्जक तत्व को भाव' कहना भी सम्भव नहीं, क्योंकि भाव की

१. यहाँ परिकर भावना का अभिप्राय है जिसके आभ्रय को 'भाव' कहा जाना सम्भव है। परन्तु सरलता की दृष्टि से हम सब लक्षणों को भाव के लक्षण कहा गया है। इससे हम लक्षणों के अनुयार भावत्व का निर्णय सरल हो जायेगा ।

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प्रधानध्वन्यमानभावे रसव्यञ्जकताभावादव्याप्यापत्तेश्च । न च तत्रापि प्रान्तेऽभिव्यङ्यते एवेति वाच्यम् । भावध्वनिविलोपप्रसङ्गात् । भावचमत्कारप्रकर्षोद्धावध्वनित्त्वम्, रसस्तु तत्र व्यङ्यमानोऽप्यचमत्कारित्वात् ध्वनिव्यपदेशहेतु नास्त्यपि न शङ्क्यं वदितुम् । चमत्काररहितरसव्यक्तो मानाभावात् । रसे हि धर्मिग्राहकमानानेनांशाविनाभावस्य प्रागेवोद्‌दनात् ।

प्रधानेत्यादि । यत्र भावस्यैव प्राधान्येन ध्वननम्, न तु रसस्य तेन, तथा सति गुणस्य भावस्य ध्वनिव्यपदेशानुपपत्तेरित्यत् : तस्मिन् भावे यथाकथञ्चनापि रसस्य जकताभावाद् भावलक्षणाङ्ग्यामि: । दर्शणाद्वृत्कदर्थो निराकरणायं- माह— नचेत्यादि । प्रान्ते = भावध्वनिनान्तरम्, विलोप इति । रसस्त्य प्रधानस्यैव प्रधानतया ध्वनिव्यपदेशाहेतुत्वेन तदृङ्मूतभावस्य- प्राधानस्य कुत्रापि ध्वनिव्यपदेशाहेतुत्वानुपपत्तेरित्यर्थ: । भावचमत्कारेत्यादि: पूर्वपक्ष: । चमत्कारातिशयेनिमित्तकस्तु रसादृशृङ्मूतेरपि भावे ध्वनित्व- च्यवहार उपपन्न इत्याशय: पूर्वपक्षस्य । चमत्काररहितेत्यर्थ: । यो हि रस: स निरतिशयचमत्कारवान् रस इत्याशय उत्तरपक्षस्य । एतमेवोपपादयति -- रसे हीत्यादिना । आनन्दांश एव निरतिशयचमत्कारविविष्टो, न कश्चिदन्य: । यथा भावन

भावना के भी शब्दभिन्न होने से उक्त अतिव्याप्ति दोष ह्रस तृतीय-पक्ष में भी यथावत् बनता ही रहता है । इसके अतिरिक्त, इस तृतीय लक्षण की भाव-ध्वनि में अव्याप्ति भी होगी हीं, क्योंकि ध्वन्यमान भाव रम व्यञ्जक नहीं होते । यदि कोई भी भाव पहले व्यङ्ग्य होकर भी पश्चात् रस का व्यञ्जक हो जाय तो उसे 'ध्वनि' कहा जाता है । कोई भी तत्र 'ध्वनि' तभी कहा जाता जब वह प्रधान रूप में अभिव्यक्त होता हो । स्वयम् अभिव्यक्त होकर दूसरे की अभिव्यक्ति करने वाला तो उस स्वप्रधानव्यङ्ग्य का अङ्ग बन जाता । ऐसी स्थिति में तृतीय लक्षण करने पर तो भाव ध्वनि का अस्तित्व हों मिट जाएगा । अतः तृतीय लक्षण असंगत है । भाव द्वारा अङ्गतत: रस का अभिव्यञ्जन होने पर भी जहाँ अभिव्यञ्ज्यमान रस की अपेक्षा उसका अभिव्यञ्जक भाव अधिक आकर्षक—चमत्कारजनक (और वाक्यार्थ की अपेक्षा प्रधान) हो वही भाव-ध्वनि कहलाता, अन्य नहीं; अतः तृतीय लक्षण करने पर भी भाव-ध्वनि के अस्तित्व का मिटना और उस कारण भाव-ध्वनि में अव्याप्ति दिखाकर तृतीय लक्षण का खण्डन करना अनुगित है—यह तर्क भी खंडित है, क्योंकि एक

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विभावादिप्रज्यमानहर्षादिरण्यतमतत्वं तत्वम् ।

विभावादित्यादि । विभावादिद्यज्यमानहवे सति हर्षादिरण्यतमतस्वं भावत्वमिति लक्षणार्थः । तत्र हर्षादिरण्यतमतस्वमात्रोक्तो लोकरहपोंदारितड्यामिरतो विभावादि ।

यदाहुः:- 'व्यभिचारी तथाऽऽलिङ्गितः । भाव:' इति । हर्षादीनां च सामाजिकगतानामेव स्थायिभावन्या येनाऽभिव्यक्तिः ।

उक्तेऽर्थे मम्मटोक्तं प्रमाणत्वेनोपन्यस्यति—यदाहुरित्यादिना । 'व्यभिचारी तथाऽऽलिङ्गितो भाव:' इति शुद्धः पाठः (द्र० का० प्र० ४१३१-३६) । 'व्यभिचार्य्यञ्जिततो भाव:' इति मुद्रितः पाठस्तु मूलत्स्वादस्मादिरूपेक्षितः । विभावादिदर्शितो व्यञ्जितो यो व्यभिचारी निवेदादिर्हर्षादिर्वा स भाव इति मम्मटवचनार्थः ।

स्थायिभावन्या येनेऽति । यथा कामिन्यादिविषयया स्थायिदयो रतंमाना एक सामाजिके विभावादिसामग्रीबलेनालौकिकत्वमापन्नः: स्थायितया व्यज्यते तथैव देवादिविषया रत्यादयोऽपि पूर्वंम एव सामाजिकहृदये वर्तमानाः विभावादिसामग्री बलादलौकिकत्वेन रूपेणाभिव्यक्ता भवन्ति ।

उपयुंक्त सिध्दति को ध्यान में रखते हुए ग्रन्थकार और इन ( व्यभिचारी ) भावों का परिष्कृत लक्षण प्रस्तुत कर रहे हैं— विभाव और अनुभाव से व्यज्यमान हर्ष आदि (३४) चित्तवृत्तियों को 'भाव' कहा जाता है ।

अत एवं मम्मट ने कहा है—"( विभाव आदि से ) अभिव्यक्त होने वाले ( निवेद, ग्लानि आदि ) को 'व्यभिचारिभाव' कहते हैं ।" ये हर्षादि सामाजिक मे पहले से होते हैं । किन्तु स्थायिभाव के समान इनकी विभावादि-सामग्री से अभिव्यक्ति होने पर ही ये 'भाव' कहलाते हैं, अन्यथा नहीं । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार सामाजिकनिष्ठ रत्यादि हीं विभावादि सभी सामग्री से अभिव्यक्त होने पर स्थायिभाव कहलाते हैं, अन्यथा नहीं ।

उसी प्रकार सामाजिकगत हर्षादिके लिए 'भाव' या 'व्यभिचारिभाव' शब्द का प्रयोग तभी होता है जब ये अपनी सामग्री से अभिव्यक्त होते हैं, अन्यथा नहीं । यह भी ज्ञातव्य है कि रत्यादि 'स्थायिभाव' रूप में भी अभिव्यक्त होते हैं ओर 'व्यभिचारिभाव' के रूप में भी । किन्तु दोनों में अन्तर यही है कि ये जब सकरुण

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अपीति तात्पर्यम् । तथापि यदा परिपूर्णा विभावादिसामग्रो रत्यादेरभिच्चिज्जिका तदा ध्वन्यमात्र्यो रत्यादिमंजते रसच्यपदेशमन्यथा तु भावच्यपदेशम् । अत एवैवां व्यभिचारित्वमप्युपपद्यते । ततुत्कं संगीतरत्नाकरे— रत्यादयः स्थायिभावा: स्थुभूः¹यिष्ठविभावजा: । स्तोके²कोद्भावौस्ल्पन्नास्त एव व्यभिचारिणः ॥ इति ॥

शब्दार्थतरणी— रत्यादिशब्देर्नरूढः: स्वादु देवादिविषयोद्भवा । अन्यैरूढभावाभाग्वा स्यान्त तदा स्थायिमावभाक् ॥

इदन्तु बोध्यम्—सविषयकाणां पदार्थानां विषयभेदाद् भेदस्य सर्वत्रानुसिद्धान्तसिद्धतया नायिकादिविषयकरतयादे: देवादिविषयकरतयादिभिन्नत्वेऽपि रतितत्त्वेन साजात्यमादाय 'त एव' इत्युक्तम् । 'स्तोके²कोद्भावे:' इत्यस्यायमाशयः—स्थायिभावाभिच्चिज्जिका विभावादिसामग्री सकला, भावाभिच्चिज्जिका पुनर्निविकला । भावाभिच्चिज्जने हि कविभ्रदालम्बनत्वे सत्यपि आलम्बनत्वादिना विशेषरूपेण विभावादेर्निर्विषयत्वेन त्रिष्यहुपालम्बनस्य तत्रासम्भवात् । यत्पुनरुद्दीपनविभावस्य विषयकत्वे तदोऽपि निर्विषयत्वेन विशेषरूपेण कारणत्वमभिप्रत्येत स्वयमपि 'विसावस्त्व व्यभिचारिणो निमित्तकारणसामान्यम्' इत्यनेन वच्यतयेतत्र ।

सामग्रो से अभिव्यक्त होने के कारण प्रधान रूप में योग्य आलम्बन को विपय बनाते तब ये 'स्थायिभाव' होते, विकल सामग्री से अप्रधानरूप में अभिव्यक्त होने पर 'व्यभिचारि-भाव' कहलाते । विकल सामग्री का अभिप्राय यही है कि व्यभिचारी-भाव के रूप में इनकी अभिव्यक्ति के लिये आलम्बन-उद्दীपन आदि की विशेष रूप में (आलम्बनत्वादि रूप में ) अपेक्षा नहीं होती । कुछ निर्विषयक व्यभिचार-भाव तो ऐसे हैं जिनके आलम्बन विभाव होते ही नहीं । जिनके सर्वविषय होने से आलम्बन-विभाव होते भी उनकी भी आलम्बनत्व के लिये आलम्बन-विभाव की विशेष रूप में (आलम्बनत्वेन रूपेण) नहीं आवा तु सामग्रय निर्मित्त कारण के रूप में ही आवव्यनकत्वा होती । यही स्थिति उद्द्दीपन-विभाव की भी है । परन्तु 'रत्यादिभाव' की अभिव्यामित के लिये तो आलम्बन और उद्दीपन इन दोनों ही विभावों की आवव्यक्ता विशेषरूप में होती ही है, सामान्च रूपमात्र में नहीं । स्वयं ग्रन्थकार ही 'विभावस्त्व व्यभिचारिणो निमित्तकारणसामान्यम्' इत्यादि वचनों द्वारा इस तथ्य को स्पष्ट करेंगे।

इस प्रकार 'स्थायिभाव-न्याय से व्यभिचारिभाव की" कार्तिकादित्य कत्पते

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सापि रसन्यानुपेतित केचित् । व्यङ्गच्यन्तररस्यायेनैत्यपरै मन्यन्ते ।

रसन्यानुपेति । यथा विभावादिसंवलितसामग्रीचर्वणाभिनावर्णाचर्वणचिद्विशिष्टो रत्यादिरूपो भग्नावर्णरत्याद्युपहितचित्तस्वरूपो हृदयं विभाव्यते स्म इत्यर्थः । एतद् तात्पर्याभिनवगुप्तादिमतेनोक्तम् ।

स्वमतमाह—‘एतच्चान्तरनरस्यायेनैति’ । रसन्यानुप्रवेशन्यो व्यङ्गच्यन्तररम्, तस्य यथा मत्सामग्रीबलेनाभिव्यक्तिमदर्थैव रतिरभावान्तरमभिव्यक्तिरित्यर्थः । ‘अपरे’ इहास्य ‘न परे’ इत्यर्थात् स्वमतमिरभिन्नं प्रतिपाद्यते ।

अस्य मतस्येदं सारम्—यावानानन्दो रसचर्वणायामनुभूयते सामजिकैरैवं तावानानन्दो नालङ्कारादिव्यङ्गचर्वणायामिति वस्तुगतिः । तथा च त्रिभन्नादिमतेऽप्यमरीचर्वणया आनन्दरूपायामपि चित्तो (आनन्दरूपायाः) आनन्दावर्णनस्य शौक्तिक्य पुनरव्यतिरेकात्संयोगात्,

सर्वथा सत्यावर्णने तन्नानन्दमात्रप्रतीतौ डिम्भसद्भावात् । एतद् साधीयस्त्वस्य रसापकर्षानन्दमात्रानुभवोपपादनाय विकलविभावादिसामग्रीचर्वणया रत्याद्यभिरठान्चैतन्यस्य यथानुसवं यथायथं शौक्तिक्यमणिमास्येयम् ।

उपयुक्त भावाभिव्यक्ति रसाभिव्यक्ति के तुल्य होती—ऐसा कुछ ( अभिनव गुप्त आदि ) आचार्यों का मत है । आशय यही है कि जिस प्रकार विभावादि-सकल-सामग्री की चर्वणा से जिसका आवरणमात्र हो चुका होता उस ‘चित्त’ से विशिष्ट रत्यादि की रस-रूप में अभिव्यक्ति होती उसी प्रकार विभावादि-बिकल-सामग्री की चर्वणा से जिसका आवरण ( आभासिक रूप में ) हृद्‌ चुका होता उस ‘चित्त’ में विशिष्ट हृदयावधि भावों की अभिव्यक्ति होती ।

इस मत में रस-चर्वणा और भाव-चर्वणा में समान आनन्दानुभव होना चाहिए, किन्तु ऐसा होता नहीं । साथ ही सकल सामग्री और विकल सामग्री से समान रूप में ‘चित्त’ के आवरण का अभिनव मानना भी उचित नहीं है ।

अतः ग्रन्थकार का मत यही है कि रस-चर्वणा और भाव-चर्वणा में अनुभूयमान आनन्द के उत्कर्षापकर्ष के अनुसार दोनों प्रकार की सामग्रियों से होने वाले आवरण भङ्ग में भी उत्कर्षापकर्ष अवश्य मान्यव्य है । अतः जैसे रस-चर्वणा की अपेक्षा स्वल्प आनन्द का अनुभव अन्य अलङ्कारादि व्यङ्गच्यों की चर्वणा में होता वैसे ही

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विभावानुभावौ सान्न व्यङ्जकौ । न त्वेकस्मिन्नङ्गभिचारिणि वन्यमाने व्यभिचार्यनरं व्यङ्गज कतयावश्यकमपेक्ष्यते, तस्यैव प्राधान्यापत्तेः ।

अत्र -- भावविशेषे । अबन्ध्यर्मिमांत । एतेन कदाचिदर्श्यत एतेन च सूच्यते । तस्यैव--अवश्यमपेक्ष्यमाणस्य व्यभिचार्यन्तरस्यैव नान्तरीयकस्य । प्राधान्यापत्तिरिति । अवश्यापेक्षणीयतादृश हेतुः ।

वस्तुतस्तु प्रकरणादिवशात्प्राधान्यमनुभवति कस्मिश्चिद्रावे तदीय-सामग्रीप्रचुरचर्वण नान्तरीयकतया तनिमित्तमावहतो व्यभिचार्यन्तरस्याऽ-

किन्त्ववश्यापेक्षणीयत्वं प्राधान्येन प्रयोजकम्, अन्यथा रसाभिध्यत्तत्प्रयुक्तस्यैवाङ्ग-क्ष-पीयानां विभावादीनामेव प्राधान्यापत्तेरित्यत आह-- वस्तुतस्तु... इदानीं स्वरूप आनन्द का ही अनुभव भान-चर्वणा में भी स्वतःकरणीय है । अतः भावां की व्यङ्जना अलङ्कारादि की व्यङ्जना के समान सम्भावना चाराङ्क्षे, रस की व्यङ्जना के

विभावादिसामग्रीचर्वणया यथावर्णभङ्गो न तथा विकलाविभावादिसामग्रीचर्वंणया सम्भवति, तथा तु सति रसानन्दभावानन्दयोगस्तुल्यकक्ष्यस्त्वमुभवविरुद्ध* युक्तिविरुद्ध* आपत्तेत् । अतश्च यत्रापि देवादिविपयकृत्यादावापाततः प्रतीतयत आलम्बनादि-

भाव के अभिव्यञ्जक प्रायः विभाव और अनुभव होते । मन्दादिमत् एक निस्सं-व्यभिचारिभाव का अभिव्यञ्जक गौण अन्य रअभिचारि-भाव भी हो सकता है, किन्तु आवश्यक रूप में सभी भावों में तिरोभूत अपेक्षित नहीं रहता । यदि सभी भावां के

सकलसामग्री तत्रापि फलवलादालम्बनादौ रसचर्वणाप्रयोगकालम्वनादिवें जात्यं कल्पनीयमेवेति तत्रापि विकलैव सामग्री । यत्र पुनरालम्बनासम्भवो नित्त्रतयेषु भावेषु तत्र सामग्रीवैकल्यं तु सुतरामेवागतमिति भावचर्वणिस्थले चिदावरणशैथिल्य-मेवालङ्कारादिवनिस्थलबद्धभयुपेयर्मिति । संलक्ष्यक्रमतामादाय व्यङ्गचयानन्तरं न्यायस्तु नोपयुज्यत इत्यपि बोधयम् । एष संविद्भोंग्यैवव्यभियात्रभियं यया व्याध्य्यत;, तन्न युक्तायुक्तत्वे सहृदयाः प्रमाणम् ।

अभिव्यङ्जन के लिये अन्य कोटि का अभिनय रअभिनय-भाव आदाय्यक होता नः वही व्यभजक व्यभिचारिभाव प्रधान हो जाता । इसीलिए तारण अलङ्कार के रूप में किसी अन्य व्यभिचारि-भाव की आवयकता हो तो हो सकता है, किन्तु यह आवयकता व्यङ्जक की प्रधानता का आधार नहीं हो सकती, क्योंकि तब तः रस की व्यङ्जना के लिए जिन विभाव आदि की आवयकता होती ये विभाव आदि रस की अपेक्षा प्रधान हो जाते । अतः ग्रन्थकार ‘वस्तुनस्तु...’ आदि सन्दर्मे में यथार्थ स्थिति का विवेचन कर रहे हैं । जहाँ प्रकरण आदि के बल से किसी अभिव्यञ्ज्यमान भाव-विशेष की

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जृम्भेडपि न क्षति:। यथा? गर्वादावमर्यादौ वा गर्वस्य। न चैवं सति गुणीभूतस्याऽऽङ्गरवारपत्ति:, पृथक्‌सिद्धावानुभावैराभिमुख्येन यत्नस्य ( भावस्य ) गुणीभूतस्याऽऽङ्गस्य प्रधानस्येहेतुत्वात्‌। अत एव न नान्तरीयकस्य भावस्य छवननं भवति। अन्यथा गर्वादिछवननेऽप्युच्‍छेद एव भवेत्‌।

नान्तरीयकस्यापि भावस्य प्रधानभावाऽऽङ्गभूतस्याऽऽङ्गत्वेन तु भावस्य व्यङ्ग्यत्वं कथं न तत्र सम्भवति—इत्याशङ्क्याहुः निरस्यत इति—ने चैवमित्यादिना। एपा शाङ्का विवक्षावशाद्वाच्यद्वनैरपि गुणीभूताऽऽङ्गस्यैव यत्नस्य गुणीभूतस्याऽऽङ्गस्य प्रधानस्येहेतुत्वात्‌ स्वनित्यत्वमित्यभ्युपगच्छतां द्वयानिकारादीनां मतममुंष्यं स्वमतं तु यद्यच्‍छं नान्तरीयकस्य पर्यव्निकस्यैव वेत्ति नावमर्यादया आशङ्क्रयाः। पृथाङ्ग-विभावतस्यैव, न त्वेकविषयानुभावैरभिमुख्येन यत्नस्य, अत एव नान्तरीयकस्य भावस्येत्यनन्तरं चमत्कारातिशयवत्‌ इति पूर्वणीयम्‌। अभिमुख्येनैव यत्नस्य च पृथक्त्वान्नान्तरीयकत्वं न सम्भवतीति हेतो: कृचित् पुस्‍तके ( कामसमुद्रिते ) गुयग्निभावाेनु. भावाभिविषयतयैकादानान्तरोयकस्य भावस्य गुग्णीभूतस्याऽऽङ्गस्यदेह-हेतुत्वात्‌। अन्यथा गर्वादिछवननेऽप्युच्‍छेद एव स्यात्‌। अथ तै पाटाऽऽप सम्भ-भवति इति निर्णयसाग्रमुदितः: पाठाऽऽद्यतत्‍वादसमभिरपीत:। अथ छवननम् प्राधान्येनाभिव्यक्तितरम्।

( अतिशय-चमत्कार-युक्तता के कारण ) प्रधानता सुनिश्चित हो जानी वरती उसी प्रधान भाव के अभिव्यञ्जक सामग्री से प्रधान भाव के पहले अभिव्यक्त होवें व्राला नान्तरीयक भाव प्रधान भाव का अङ्ग हो जाता। फलत: उस नान्तरीयक भाव की अभिव्यक्ति भी स्पष्ट रूप से नहीं हो पाती। इससे वह नान्तरीयक भाव दुर्बल रूप में प्रतीत होता और उसमें प्रधान भाव के समान चमत्कारोत्पादक भी नहीं होता। अत: ऐसा नान्तरीयक भाव यदि किसी काव्यमर्मज्ञ को कदाचित् हो भी तो भी कोई अनुपपत्ति नहीं। इसके उदाहरण के रूप में 'गर्व' का प्राधान्येन अभिव्यञ्जन के लिए उससे पूर्व नान्तरीयक 'अमर्य' का अभिव्यञ्जन या 'अमर्य' का ही प्राधान्येन अभिव्यञ्जन से पूर्व उसी सामग्री से नान्तरीयक रूप में अभिव्यक्त 'गर्व' को लिया जा सकता है। अत: स्पष्ट है कि नान्तरीयक भाव में वह चमत्कार नहीं होता जो प्राधान्येनूूल भाव में होता। अतएव व्यङ्गच होने पर भी किसी नान्तरीयक भाव के आधार पर किसी काव्य को 'गुणीभूतव्यङ्गच' नहीं कहा जा सकता। 'गुणीभूतव्यङ्गय' तो तब कहा जाता है

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विभावस्त्वत्र व्यभिचारिणो निमित्तकारणसामान्यम् । न तु रसस्येव सर्वथै-वालम्बनोद्दीपनेऽपेक्षते । यदि तु क्वचिच्संभावनस्तदा न वायते ।

जब एक प्रधान भाव के व्यञ्जक विभावादि से भिन्न विभावादि सामग्री से किसी दूसरे भाव की अभिव्यक्ति हो और वह दूसरा भाव समस्कारातिशाययुक्त हो । ऐसी स्थिति में यह दूसरा भाव नान्तरीयक नहीं, अपितु अनान्तरीयक होगा । अनन्त एवं नान्तरीयक भाव की ध्वनि प्रधान रूप में अथवा चमत्कारातिशाययुक्त भाव के रूप में कथमपि सम्पन्न नहीं हैं ।

भावान्तरापेक्ष्याऽऽतिशयेन चमत्कारवत्त्वे गुणीभूतव्यङ्ग्यत्न ध्वनित्वापत्तिस्तथाऽपि स्वमते नान्तरीयकस्य भावस्य चमत्कारातिशायवत्त्वं न कथमपि सम्प्रुपेयते, यथा गर्वादावमर्यस्य अथ एवं 'नान्तरीयकत्व' तनिमित्तभावहतो व्यभिचार्यन्तरस्ये' इत्यनुपद्मेवोक्तम् ।

( विभाव अथवा आलम्बन उद्दीपन के रूप में ) नहीं, अपितु एक निमित्तकारण के रूप में ही आती, न कि रस के अभिव्यञ्जन में जिस प्रकार विभावस्‌वरूप में चुकता है । अतः मात्र उद्दीपन-विभावस्वरूप निमित्त कारण से, आलम्बन के बिना भी, व्यभिचारि-भाव की अभिव्यक्ति हो ही सकती है । हाँ, यदि किसी भाव के निमित्त कारण के रूप में आलम्बन और उद्दीपन दोनों ही सम्पन्न हों तो दोनों को ही निमित्त कारण मानना चाहिए ।

तत्र तनिमित्तमित्यस्य श्रौतिलयमत एवाऽऽडचमत्कारित्वरमितत्यर्थः। यद्यपि चात्र प्रधाना-भूतस्य भावस्य चमत्कारातिशायजनकत्वेनोत्तमोत्तमस्तकाव्यत्वमू, रसध्वनिस्थलेsडपि तथैव तथापि सामग्रीवैकल्याद्द्रि षयस्खभावाच्च भावध्वनिस्थले न तावानानन्दो यावान्रसध्वनिस्थले ।

१. यह भ्रान्तता आंशिक रूप में ही प्रायः सम्मत है ।

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हर्षादयस्तु हर्षस्मृतिश्रीडामोहहृष्टतिराट्कलनिवैन्यविचालतामरसश्रमगवविद्रावमतिव्यात्रित्रासमुप्तविवोधामर्षाविहृत्योप्रतोन्मादमदरणवितर्कविचारोन्मुखयावेजडताम्लस्यासूयापस्मारचपलताः । प्रतिपक्षकृतांशकः रदिराजन्मा निवेदेरचाति न्यायेस्थशद्वचविचारणः । गुरुदेवतृपुत्रादिष्वधिकारतिशयं चतुरस्न्रशात् । एतेन वात्सल्याख्यं पुत्राद्यालम्बनं रसान्तरगर्भिति परास्तत्वं । उच्यते—तत्क्षयात्ताया मुनिवचनपराहततत्वान् ।

तयालम्बनं तत्रालम्बनस्य आलम्बनत्वेन न निर्मितत्वमपि तु अन्यालम्बनोचिति जेयम् । कचित्—सविषयकभावस्यैव ! भावान् परिरणयति—हर्षादियदिना ; 'मालोकनात्तया हर्षानिरूरणं प्रथमं रोचते पण्डितराजाम्' इति रसचन्द्रिका। माध्यमविषयत्वात् तथा क्रतम् । मुनिरचनैस्त्वयादि । यद्य वात्सल्यमपि रसान्तरं स्यार्त्तः सर्वज्ञै न मुनिना तस्यादि स्थायिभावरूपेण पुनःप्रादुर्भावकरतेगणना कुतः स्यात्, न चैवमिल्यतो न वात्सल्यं रसान्तरम् । अतः एव च पुत्राद्यालम्बनविषया रतिरिङ्गित भाव एव, न मध्यायि-भाव इत्याशयः ।

हर्षं आदि भाव निम्न-निर्दिष्ट हैं—

(१) हर्ष, (२) स्मृति, (३) श्रीडा, (४) मोह, (५) शति, (६) म्लानि, (७) दैन्य, (९) चिन्ता (१०) मद, (११) श्रम, (१२) गर्व, (१३) निद्रा, (१४) मति, (१५) व्याधि, (१६) त्रास, (१७) मुष, (१८) विवोध, (१९) अमर्ष, (२०) अवहिथा, (२१) उप्रता, (२२) उत्साद, (२३) मरण, (२४) वितरक, (२५) विषाद, (२६) औत्सुक्य, (२७) आवेग, (२८) जडता, (२९) आलस्य, (३०) असूया, (३१) अपस्मार ओर (३२) चपलता। ग्रन्थ द्वारा शृङ्गारन-ललकारने आदिक से

देव-विषयक, नूप-विषयक, और पुत्रादि-विषयक (३४) रति भी एक भाव है।

इस प्रकार चौतीस (३४) भाव हुए ।

कुछ लोग पुत्रादिद-विषयक वात्सल्य को भी एक अन्य रस मानते । पुत्रादि-विषयक रति इसका स्थायिभाव होना चाहिए था। किन्तु पुत्रादि-विष्यक स्थायिभाव मानकर वात्सल्य रस मानना उच्यते—तत्क्षयात्ताया मुनिवचनपराहततत्वान् ।

को रस नहीं माना जा सकता।

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इष्टप्राप्त्यादिजन्मा सुलक्षणविशेषो हर्षः ।

तदुक्तम्--

देवभक्तं गुरौ स्वामिम प्रसाद: प्रियसंगम: ।

मनोरथाप्तिरपि प्राप्यमनोहर रघनानाम् ।

अथोत्पत्तिषु च पुत्रादेर्विभावो यत्र जायते ।

नेत्रवक्त्रप्रसादादिरुच् प्रियोक्किः पलकोदरम् ।

श्रुतिस्वेदादयश्चानुभावा हर्षं तमादिशेत् ।।' इति ।।

उदाहरणम्--

अवधो दिवसावसानकाले भवद्वारि विलोचने दद्याना !

अवलोक्य समागतम् तदा मामथ राक्षा विकसन्नुजी वभूव ।

अनवधिकाले प्रियागमनं विभावत: । मूलविकासोऽनुभाव: ।

इष्टप्राप्त्यादौति । आदिशब्देनानिष्टनिवृत्त्यादिर्गृहत इति रसचन्द्रिका ।

तच्च तदैव शोभते यदान्यथानिवृत्त्या दुःखभावातिरक्तं किमपि भावरूपं भवतीति मन्यते । न चैवमनुभवसिद्धम् । अनिष्टनिवृत्त्यनन्तरं कस्यचिन्नेष्टस्य प्राप्तौ जायमानं सुखं तु नानिष्टनिवृत्तिजं यत् ।

सुखन्तु नानिष्टनिवृत्तिजं यत् ।

तदुक्तमिनि ग्रन्थे । प्रियस्य हि इत्युपलक्षणं प्रियासंगमस्यापि । सप्राप्तिरेति ।

दुःप्राप्येयथार्थ: । दुःप्राप्यायानिष्टनिवृत्त्यर्थं मनोहरेऽपि मनोविपणम् । सद्देशगमनेप--

मिष्टप्राप्तिरुपलत्वेऽपि गोबलीवर्दश्वयेन द्वात्रिंशतासिठन्यास्येन वा पृथगुपादानम् ।

अनवधिरित्यादिपद्यं रूपप्टार्थम् ।

प्रियागमनमित्यत्र आगमनमुत्तरपदम् ।

अनुभाव इति । आश्यां हर्षो भाव्यते ।

इष्ट वस्तु की प्राप्ति आदि से उत्पन्न मूलविशेषात्मक चित्तवृत्तिविशेष को हर्ष कहते ।

यहाँ ता-त् मार्गौत्तरस्त्ताकार में कहाँ गयी है---

'जो इष्टनष्ट-विशेष के विभाव होते हैं--दयिता, राजा, गुरु और स्वामी (पति) की प्रसन्नता; प्रिय के साथ मिलन; मनोरथ (इष्टटेनस्यादिविषयोभूत वस्तु ) की प्राप्ति; उस प्रकार के धन का लाभ नो मिलता नो प्राप्त करने योग्य नहीं होता और पुत्र-पौत्री आदि की उत्पत्ति तथा अनुभव होते--नेत्रों आदि मुख की प्रसन्नता; प्रिय वचन; रोमाञ्च, अश्रु प्रवम् स्वेद (पसीना) आदि उसे ही हर्ष कहना चाहिए ।'

इसका उदाहरण निम्नलिखित है---

'मेरे आगमन की अवधि जो सायं सन्ध्या भी उस समय घर के दरवाजे पर अपनी आँखें टिका कर बड़ी मेरी प्रियतमा ने जब मुझे आते देखा तब उसका

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संस्कारजन्यं ज्ञानं स्मृति: ॥ यथा -

तन्मङ्जु मन्त्रद्वसितं हसितानि तानि सा वै कलङ्कविधुरा मधुराननश्री: । अध्यापि मे हृदयमन्दयन्न हन्त सायंतनांबुजसहोदरलोचनाभ्यां ॥

चिन्ताविशेषोऽत्र विभाव: । प्रह्नतिगात्रनिश्चलत्वादय आक्षेपगम्या व्यजत इत्यर्थं: ॥

मुद्रणे हसितविभमबेन व्याख्यया नष्टा पुरातनी ॥ साम्प्रतं समयाभावादुरार्यो निरुप्यते ॥ संस्कारजन्यमिति । संस्कारमात्राद्यापारकमित्यर्थ: । तन्मङ्जु मन्त्रेत्यादि । नायिकया नायिकान्तरस्य । यद्रीयमुन्नतरातमगता हसितादिस्वरूपवचिच्छन्नबोधकं, यदितु अज्ञातहसितादिस्वरूपविशेषपरिज्ञामिका तर्हि तत्प्रदं बुद्धिस्थलाविच्छेदं शीलाभ्यां विशेष: एतमतेन मनसो निधाय ग्रन्थे नुदुपेत्तत्प्रस्य शाक्षद्रयं वक्ष्यति । 'अध्यापि' इत्यनेन विरविभ्रमयुक्तस्याप्रनीतिः । मयन्तनाम्बुजसहोदररेलोचनाभ्यां तु उत्तरौत्तरनिमीलनोत्कृष्टस्वदयनिरमित म्वयमेव नक्ष्यति । चिन्ताविशेषोऽत्र स्मृतिबीजमूवस्य संस्कारस्योद्बोधक: 'सहकारिहटाविच्छिन्नाथा:

मुख खिल उठा ॥'

यह नायक द्वारा अपने प्रिय मित्र को कहा गया है । इसमें समय समाप होते हो प्रिय का आगमन विभाव है और नायिका के मुख का खिल उठना अनुभाव है ।

इनसे हर्ष की अभिव्यक्ति होती है । संस्कारस्वरूप एकमात्र व्यापार-कारण से उत्पन्न ज्ञान स्मृति है ॥ उदाहरण देखिये

"सायंकालिक (अर्थात् संकुचित होने वाले) कमल के समान लज्जादवसा उत्तरोत्तर अधिकाधिक संकुचित होती जाने वाली आँखों से युक्त प्रियतम के वह मधुर मुस्कान, रतिकुश्माजन्य वे ध्वास और वह मनोहरररजक निष्कलङ्क मुखछवि---ये सब आज भी मेरे मन को पागल बना रहे हैं ।"

यह नायक की प्रियतमा के वियोग में स्वगत उद्विग्न है अथवा अपने प्रिय मित्र के प्रति । इसमें निपुण नायिका के विषय में विशेष प्रकार की नायकगत चिन्ता विभाव है और आभद्रत: उपस्थित न होने पर भी अन्वस्त चिन्ता से उद्भावित होने से

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अनुभावा: यद्यप्यत्रास्या एवं स्मृते: संचारिण्या:, नायिकालुपस्य विभावस्य, हन्तपदगम्यस्य हृदयबैकल्यरूपानुभावस्य संयोगाद् विप्रलम्भरसाभिव्यक्ते रसध्वनित्वं शक्यते वक्तुम, तथापि स्मृतेरेवात्र पुरःस्फूर्तिकतवाच्चमत्कारि-त्वाच्च तद्‌ध्वनित्वमुक्तम् ।

तदादेवं द्विस्थप्रकारावच्छिन्ने शक्तिरूपे नये वन्धे: शक्तितरवच्छेद-समृतिबीजस्य बोधिका:' इत्युक्तत्वात् । आधेयस्य इति तु वाचकशब्दाभावात् । अस्य विप्रलम्भध्वनित्वमाश्रयद्धय निराचष्टे—यद्यपीतयादिने । हन्तपदगम्य-स्येति निपातानां चोतकत्वमिति मतानुसारेणोक्तम् । पुरःस्फूर्तिकत्वादिति तच्च्छद-सामथ्र्यात् । चमत्कारित्वाच्चेति वचनस्वाभाव्यात् । तद्‌ध्वनित्वम्—स्मृति-ध्वनित्वम् ।

स्मृतेःरस्यास्तत्पदवाच्यतांसंस्पर्शेण कथम् ध्वनित्वमिति निरूपयति—तदादेरित्यादिनः । वदिस्थो यः प्रकारो घटत्वादिस्थितदवच्छिन्ने घटादौ शक्तितदिन्येकः प्रसिद्धो नयः । अनन्व च घटत्वादिषु प्रकारणारामनन्येन शक्त्यातद्यप्रसज्यः; तं परिहन्तुं बुद्धिस्थत्वेनैकेन रूपेणानुगामिनि तदादिपदेयं नोनात्वपोत्कर्षात् बोधव्यम् । अनन्व एकास्योपलक्षणत्वम् । प्राक्तनतावच्छेदकर्मिति स्पष्टम् । अनन्व एकास्योभयलक्षणत्वात्‌वम् ।

आक्षेपेण तस्य श्रु-कुटी का उन्मग्न ओर शरीर में नियचानना आदि हमकें अनुभव है जिनसे ममूर्च्छा-किसलयकलित चित्तवृत्ति ध्वनित होती है । यहाँ प्रश्न यह उठता है कि इस पद्य में निपातक 'हन्त' इस निपात पद में गम्यमान हृदय-विकालतारूपी अनुताव के प्रस्तुत होने से यनके संयोज से चिप्रनलम्भ मां र्यन की परिस्पति हो है ही । फिर इतरं म्रथानकं में स्मृति की ही क्यो नुभानि मानी जाती ? इसका उत्तर यही दिय गया है. कि यहाँ हृदयसादृश्यं से स्मृति की ही अभिव्यकित पहचेक् होती कोप बन्ही स्मृति चमत्कारिणी है । इसीलए यहाँ स्मृतिध्वनि ही मान्य है, निप्रकलक-ध्वनि नहीं ।

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कानुगमकतया न वाच्यतासंस्पर्शः। बुद्धिस्थत्वं शाक्यततावच्छेदकमिति नयेऽपि स्मृतितत्वेन स्मृतेर्व्यधिकरणत्वात्।

न वाच्यप्रत्यवसंशयो इत्थं दुर्द्धर्षनिवार्यमाह—बुद्धिस्थैवतद्विमत्यादिनां। तथाहि च वाच्यतावच्छेदकत्वं यत्किंचिद्वयतिरिक्तं सामान्याकारेण द्वाच्यताया अपि स्मृतेर्व्यधिकरणत्वकारण द्वचितत्वमिति लक्ष्यते। यत्पुनः बुद्धिस्थत्वमिति प्रत्यक्षकोटौ यत्किं चिद्वस्तुसंबन्धित्वं रसस्यान्विकायाम्—‘परामर्शे सर्वस्मभ्यः सड़गतिमेव। यतः सर्वत्रैवोपस्थितोऽपि शाक्यततावच्छेदकस्य भावस्ये, पुंसि मत्वर्थीयप्रत्ययः घटादिपदार्थजन्योपस्थितौ। इति तत्पदार्थजन्योपस्थितौ बुद्धिस्थत्वस्य प्रतीयतावच्छेदकत्वं भावनमिति वदतो ग्रन्थकृतः। किं विरुद्धद्विति न विद्मः। किंत्व अन्तर्भिद्याहन्ततत्पदार्थात् तथस्थान्य यो बोधस्तत्र बुद्धिस्थत्वादितिरिक्तं हि शाक्यततावच्छेदकं मेने शाक्यतावच्छेदकत्वमिति ग्रन्थकृतोऽभिप्रायः।

इदं पुनरन्यच्चिन्त्यतदाम्—पदार्थोपस्थितिपूर्वकस्यैव शाब्दप्रयोगस्य वाच्यत्वं वस्य सम्भवात् पूर्वानुरूपतदर्थप्रतिपादकमन्वयबोधप्रयोगात्पूर्वं तद्वस्थितोऽपरस्य चकार्यमिति निर्विवादम्। न चेतदर्थस्यैवेष्ट पदार्थोपस्थितिपूर्वकानुरूपतत्स्वरूप, नतस्याः सम्भकारशोधत्बात्।

पुनः प्रश्न उठ सकता है कि ‘तत्’ आदि सर्वनाम शब्दों के वाच्य अर्थ के अन्तर्गत स्मृति के आ जाने से उसे व्यतिरिक्त कैसे माना जा सकता है। इसके उत्तर में ग्रन्थकार ने—उक्त सर्वनाम शब्दों का स्मृति किस अर्थ में है और उनका समावेश है अथवा नहीं, यदि है भी तो किस रूप में है—एक बुद्धि के रूप में अथवा स्मृति के रूप में—इसका विचार कर यह स्पष्ट किया है कि जिस रूप में स्मृति के वाच्य होने पर उसे व्यतिरिक्त मानना असम्भव है उस रूप में स्मृति ‘तत्’ आदि पदों की वाच्य नहीं है, अतः उसे व्यतिरिक्त मानने में कोई आपत्ति नहीं उठती। यहाँ ‘तत्’ आदि पदों की शक्तित के विषय में प्रयत्न यह मत प्रस्तुत किया गया है कि इनकी शक्तिबुद्धिस्थ जो (घटत्व-घटरत्व) आदि प्रकार—विशेषण हैं, उसे अवच्छिन्न-विशिष्ट (घट-पट आदि) पदार्थों में है।

पटत्ब आदि नाना प्रकारों का अनुगमक है, स्वयं में यह न शाक्य है और न शाक्यता-वच्छेदक। बुद्धिस्थत्व को शाक्यतावच्छेदक का अनुगमक ( उपलक्षण ) न मानने पर शाक्यतावच्छेदकों के और उनके कारण शाक्यों के भी नानात्व के कारण एक-एक शाक्य

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तस्याश्रयात्र वाङ्मयेऽत्र स्वेदपि पदस्येव कुर्वन्त्रपत्वादपडुतनि निष्यत्नमु । एतेन भावानां पदघयडचयत्वे न वेधिचरयमिति परास्तम् । सायञ्जनाभ्यु जोपमानेऽन मधुयोऽत्तररोतराधिकलिमीलनोन्मुखत्वादवननद्वारा तस्या आनन्दमग्नताप्रकाशः ।

मुदाहारनान्तरं मुखम् । श्रोतुस्ततुपदाश्रवणानन्तरं वक्तृभक्त्या कपुर्वानुभवनत्रिपयमेव पदार्थस्य प्रतीतिरिति यदि विभाव्यते तर्हि स्मृतेः सामान्येनापि तह्रदयाहग्रन्थम् । तथाऽपि स्मुनेरपि संस्कारजननालत्वमिति गुरुतरं पक्षान्तरमदाय कथञ्चित्संगमनोयो ग्रन्थः ।

में एक-एक शक्ति मानीं होगी जिसका परिणाम एक-दूसरे 'तत्' आदि सर्वनाम शब्द में नाना शक्तियों का अपरिहार्य अभ्युपगम होगा । इससे प्राप्त गौरव का परिहार, अर्थात् शक्ति-नानात्व का निवारण, करने के लिये आवश्यकैक viis उन प्राक्यातावच्छेदकों का अनुसमक एक बुद्धिस्थत्व को माना जाय । तब तो बुद्धिस्थ रूप में सभी प्रकारों—प्राक्यातावच्छेदकों का एक रूप में ही उपसंहृति होगी और तद्रूप प्रकार एक ही शक्ति सभी प्राक्यातावच्छेदकों और उनसे विशिष्ट वाक्यों की उपस्यिति तथा प्रतिपत्ति में पर्याप्त हो जायेगी । इस प्रथम मत के अनुसार अनुगमक बुद्धिस्थत्व कि अन-प्रथमान्त स्मृति का सङ्ग्रह होने पर भी उसे वाक्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वाक्यता यत्प्रकारक और प्राक्यातावच्छेदक तक ही सीमित है, उनमें अनिर्वक्त में नही । अतः इस मत में उक्त पद्य में स्मृति को व्यवहृत मानने में कोई दोष नही है । द्वितीय मत यह है कि 'तत्' आदि सर्वनामों को शक्तिबुद्धिस्थत्वविशिष्ट बुद्धिस्थ पदाथों में है । इस मत में बुद्धिस्थत्व प्राक्यतावच्छेदक होगा और शाक्य—बुद्धिस्थ्य के घटक बुद्धि के अन्तर्गत स्मृति एक बुद्धि के रूप में अवश्य आती, किन्तु बुद्धिविशेष स्मृति के रूप में नही । अतः बुद्धिस्थत्वविशिष्ट

अत्रेदमपि विवेचनीयम्—'जयिना पत्रित्रे' इत्यादिपदविवरणानुसरे 'कथमपि वान्यवृत्यानुलझितस्तथैव व्याजघुस्य चमत्कारित्वेनालक्ष्य इति: स्वीकारात्' इत्यभिदधतो ग्रन्थकृतो वचनमिदं प्रकृतेऽनुप्रय न साहचर्यात्प्रतीयादिपदार्थानाम्नानावसरे विरुद्धम् । अत एव चाश्मासिरपि पूर्वंमेव मेवोक्तम् । परन्तु सामान्याकार.चिरेपा-कारप्रतीतिर्योवैलक्षण्यं परीक्षाकोपदेशसहकृतरत्न पदिप्रत्यक्षदर्शिनिर्ववादम् । अत एव प्रकृतेऽपि तथोक्तं ग्रन्थकारेण । अत एव च 'शयिता सर्वेश' इत्यादिपदचयोऽनाना-वसरेऽपि 'कथमपि वाच्यवृति' इत्यादिपूर्वाचार्यप्रसिद्धपक्षमुपस्थाप्याऽऽन्ते 'अस्मान्निश्चय:' ... अच्छमत्कारित्वाच्च' इति सन्दर्भेऽपि प्रकारान्तरमुक्तम् । अञ्च च 'व्यतिरुच्याद-

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दरानमतकंधरवनश्रमोषत्निमोलितसिन्धुरघविलोचनाञ्जम् । अनलप्ति श्वासभरालसाङ्गं स्मरामि सङ्गं चिरमङ्गनाया: ॥

छ्छेदकतया भासमानजात्यादिरूपेण यत्न वाच्यता न तत्रैवास्माकाग्निता । पूर्वोदाहर णे हि मनोरथवेच्छारतवयोरे णटत्कलयात्ववदेकनया तेनैव रूपेण वाच्यता डम्तीत न दोष: ' इति मर्मप्रकाशोकतं मतान्तरमपि चिन्त्यमेव ।

तस्या: स्मृते: । कविवरद्रू पत्व कार्यजननमसामयं तच्च प्रकृते स्मृतित्ववैचिज्य-ममेव तदादिपदे प्रसिद्धमिति भाव: । तेन च कविवरद रूप पत्तन वमत्कारतमरिमा नदू विच्छित्तिस्थोभिनेकेन भूषणेनैव कार्यमने ! वदयोद्योतेन मुखवेदव्वनिना भाति भारती ॥ इति ।

प्रत्युदाहरणम्-दरानमदिति ! दरमरीषदानमनु कनधरवनघो यन्मनु (तमङ्गनाया: सङ्गम), अर्थ च इष्टस्मिमिलिते हि नयने विलोचने अङ्कजे तव मनसो यत्न श्वर स्मरामीत्थर्थ: !

स्मृति में वाच्यता आने पर भी स्मृतित्वविशिष्ट स्मृति में, 'जिसमें वाच्यता अभिप्रेत है, वाच्यता नहीं है । इस प्रकार स्मृति को व्यञ्जना कहना सर्वथा उचित है । इस विषय में विशेष विचार संस्कृतटीका में द्रष्टव्य हैं ।

उक्त स्मृति को अभिव्यञ्जना यद्यपि पूरे पध्यात्मक वाक्य में होती है तथापि पध्यान्तर्गत 'तत्', 'तानि' और 'सा' इन तीन पदों में स्मृतित्ववैचिज्य-सामथ्यं की उत्कटता के कारण यहाँ स्मृति को पद से ही व्यङ्ग्य समकाना चारित । अत एव यह मत निरस्त हो जाता है कि हर्वादि भावों के पद-व्यङ्ग्य होने पर उनमें चमत्कार नहीं रह जाता ।

इस पद्य से प्रमाणित नायिका की आनन्दसमनता श्री उसकी आँखों के उदरानन्द अधिकाधिक सङ्कोच प्राप्त करते जाने की व्यञ्जना द्वारा ध्वनित होती है । मङ्कोष अब एक प्रत्युदाहरण भी द्रष्टव्य है—

'मैं प्रियतम के साथ हुए उस समागम का स्मरण नितरकाल करता रहता हूँ जिसमें उसकी गर्दन कुछ झुकी हुई थी, उसके आकर्षक नयनकमल मयणा से कुछ सङ्कुचित हो गये थे और उसका सारा शारीर रतिक्र माजन्य अत्यधिक नि:श्वास से कलसाय लुका था ।'

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इत्यनन्त स्मृतितिनं भावैः, स्वशब्देन निवेदनादव्य॑ञ्चतवात् । नापि स्मरणालङ्कारः, सादृश्यामूलकत्वात् । सादृश्यमूलकस्यैव स्मरणस्यालङ्कार, रत्नवमू, अन्यस्य तु व्यङ्गयत्वमिति सिद्धान्तात् । किं तु विभाव एव सुन्दररत्नादिकथ॑चन्द्रसरयवसायी ।

नायक: स्वमित्रं न्याहरति—कुचेत्यादि । कुची कलशयुगान्तर्मामिकोनं नखाऽऽलङ्क॑ सुपुलकतनु मनदं मनदसमालोकमाना । विनिहितवदनं मां वीक्ष्य बाला गवाक्षे चकितनतनता॑ल्री सद्म सद्यो विवेश ।

स्त्रोणां पुँरुष॑वलोकनादे:; पुंसां च प्रतिज्ञाभ॑ङपराभवोदितप॑न॑तेव॑ञ्चप्रौढिमुखत्वादिकथ॑नाभूतश्चित्तवृत्तिविशेषोऽङ्गीभूत इति ।

स्वशब्देन = स्मरणवाचकस्मरामोतीशब्देन । अधय॑ञ्चतवात् । व्यङ्ग्य-स्यैव व्यभिचारिणो भावत्वादिति भावलक्षणे॑नैव प्रतिपादितत्वादिति । तत्पर्यं । कय॑चिद्विति । नायिकास्वरूप॑लम्बनविभावादिति॑क्तानुभावादीनामनवबोधादित्याशयेनैतदुक्तं ।

त्रीडो लक्षणयति—स्त्रोणामिति । अधोमुखत्वादीत॑य॑ आत्मगोपनं नखविलेखनादिकं च आदिपद॑ग्र॑ह्यं ।

नायक द्वारा अपने मित्र से कहे गये इस पद्य में स्मृत ‘स्मरामि’ इस क्रिया पद का वाच्य है, व्यङ्गय नहीं । अतः यहाँ इसे भाव नहीं कहा जा सकता । इसे स्मरणालङ्कार कहना भी सम्भव नहीं, क्योंकि सादृश्य॑दर्शनान॑नय स्मृति ही अलङ्कार होती । यहाँ तो स्मृति नायिका-प्रत्ययक पुनः-पुनः चिन्तन से जन्म है । यह अलङ्कारिकों का सिद्धान्त है । कि सादृश्य॑दर्शनजन्य स्मृति अलङ्कार है, और व्यङ्गय होते पर भाव । नायिकाल॑म्बन आलम्बन विभाव के आकारक होते से विप्रल॑म्भ शृङ्गार-व्यभिचारक सामग्री के अभाव में भी इसी तरह यहाँ विप्रल॑म्भ की सञ्जना मानी जा सकती है ।

स्त्रियों में पुरुषों के मुखदर्शन आदि से और पुरुषों में प्रतिज्ञाभ॑ङ, पराभव आदि से उत्पन्न वह विशेष प्रकार की चित्तवृत्ति ‘डोझा’ ( रीझ ) कहलाती है जिससे मुख विवर्ण हो, जाता, नखें खुजने लगती हैं ।

उदाहरण देखिए— "अपने कतकतुल्य विशाल एवं उन्नत कुचों के बीच मेरे द्वारा किये गये"

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गुणडादण्डं कुण्डलीकुरुत कूले कलोलिन्या: किंचिदाकुञ्चिताक्ष: । नेवाकर्षन्त्यम्भु नैवाम्बुजालिं कान्तापेतः कृत्यशून्यो गजेन्द्र: ॥ लोभ शोक भयादिजनितोपप्लवविनिवारणकारणेभूतशुद्धतत्वतत्स्ततेशेषे

उदाहरणम्- सन्तापयामि हृदयं धावं धावं धरातले किमिहम् । अस्ति मम शिरसि सततं नन्दकुमार: प्रभु: परम: ॥ अत्र विवेकशृतसंपर्याादिविभाव: । चापलाख्यप्रमोदनुभाव: । ननु चोत्तर- राधे चिन्ता नास्तीति वस्तुनोऽभिज्ञक्यते: कथमस्मय धृतिभरावृक्य नतवामिति

धृति. ॥

गुण्डादण्डमित्यादि । कान्तापेत इत्यनेन विभाव: प्रदर्शित: । अगुभावा- श्चाक्षेपगम्या: । वृतिलक्षणम्--लोभेत्यादि : जनिपर्यन्तमुपप्लवैरविभेषणम् ! सन्तापयामित्याद्युदाहरणं धृते: । धान्तं धावमित्यभिलक्षणं नमुच, धावित्वा- धानित्येत्यर्थ: । अर्थ: स्पष्ट: । उत्तरार्धे कारणवर्णनम् । विवेकज्ञानादिकं धृते: शास्त्रायं ज्ञान तस्मै च सम्प्राप्त: विवेकशानुसम्पात: । vastun:--चिन्दाभावस्य । अभावस्य तुच्छक्यापि रसालङ्कारभिन्नवाद बसुत्व-

"गजराज अपनी प्रियतमया हस्तिनी के वियोग से दततना विकलतयाविमूढ है । युकाहै कि अपनी सूँड को कुण्डलाकार बना और आँखों को सिकोड़कर वह नदी-तट पर खड़ा होकर भी न तो पानी पी रहा और न ही कमलों को ही असक्तव्यस्त कर रहा है ॥" यहाँ भी प्रियावियोग विभाव है और नदी-तट पर खड़ा होकर पानी न पाना आदि अनुभव जिनसबसे गजेन्द्रगत माँद की अभिव्यञ्जना होती है । लोभ, शोक और भय आदि से उत्पन्न होने वाली अशान्ति को उत्पन्न होने से रोकने वाली चित्तशान्ति धृति है ॥

इसका उदाहरण देखिए— "इस धरातल पर इधर-उधर भाग-दौड़कर अपने हृदय को मैं क्यों सन्तप्त करूँ" जब परमेश्वर नन्दकुमार—भगवान श्रीकृष्ण मेरे सर पर हृाथ धरते हुए है !!" यहाँ (आक्षेपगम्य) विवेकज्ञान, शास्त्राध्ययन-मनन आदि विभाव है और चित्ताश्चल आदि का अभाव अनुभव । इन सबके चृत्ति अभिव्यक्त होती । अब प्रश्न यह है कि जब उत्तरार्ध से 'फिर मुझे कैसी चिन्ता' इस प्रकार

निश्चिन्ततास्वरूप वस्तु की व्यञ्जना होती तब इसमें धृति को व्यपृथक मान कैैैे

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चेत्, तस्य वृत्त्युपयोगितयैवाभिव्यक्ते: । किमनिष्टं मम भविष्यतिेत्याकारविचित्ततत्कृतिविशेष: शब्दः । उदाहरणम्— विधिवश्वितया मया न यातं, सखि ! सज्जनकेतनं प्रियस्य । अधुना वत ! किं विधातुकामो, मयि कामां नृपतिः पुनरं जाने ॥

रूपेणैव ध्वननमात्रं प्रतीत इति कथमस्य पद्यासु गौणमिति अतिसंक्षेपभावद्वतेरुदाहरणत्वमिति प्रष्टु: । तस्य चिन्ताभावरूपस्य वस्तुनोऽपि ध्वनिभावोपयोगितयैव तदुपकारितयैव तद्ज्ञप्त्यैवाभिव्यक्तिरभवन्तीति धृतेरेवात्र प्रधानं, चिन्ताभावरूपं वस्तु गौणमिति भवतोदं पद्यं धृतिभावद्वनेरुदाहरणमित्युत्तरम् । शब्दोऽपि शब्दो नतु वा रसगन्धाधरं हरम् । अपूर्णोऽप्ये व्याख्यां रम्यां रसतत्कृतिणीम् ॥ शब्दोऽयं भावं लक्ष्यति—किमनिष्टेति । भाविनः स्वानिष्टस्यैव निश्रिनस्यापि या आशङ्का मनसि जायते सैव शब्दाद्यो भावः । अथ शब्दोऽत्र सम्भावना । अतिनिश्चयसम्भावनाया: कारणरूपा: परिकरतादय: शब्दाया विभाव:, वैवर्ण्यादिदशानुभाव: । दिधीति । हे सखि ! भाग्यप्रतारिणया मया नायिकया प्रियस्य सङ्केतभवनं नैव गतम्, न स्वेच्छया विवेकपूर्वकमपि तु भाग्यवशादेव नायिकापराधिनोति ध्वनिनमुं प्रियन्तनेन प्रणयाश्रयतेन तत्रावस्यं गन्तुमुचितमिति च । अधुना हन्त ! भाग्यप्रेरणया मया अपराधे कृते मनि नृपतौ कामो राजा कामदेव:, शासनकवाद् युवजनानां न राजेति दण्डदायक: क्रूर इति ध्वन्यने । स किं विधातुकामो वर्तते इति न जाने, कठोरं दण्डं दास्यति, किं वा विधास्यतेऽनि शब्दा । विधातुकाम दुत्थन 'नुंकाममनमो' रित्यादिवार्तिकैरेण म्लोप: ।

किन्हों अपरिहार्यैं कारणैं से आचार्य डॉ० श्रीनारायण मिश्र जी द्वारा सम्पादित व्याख्या न सम्पन्न न हो पायी । अतः अवशिष्ट भाग की पूर्ति आचार्य श्री डा० दीनानाथ जी द्वारा की गयी ।

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अत्र राजापराधो विभावः । मुखवैवर्ण्यादिम आश्रेप्या अनुभावा: । इयं तु भयाद्युत्पादनेन कम्पादिकरिणी, न तु चिन्ता । आधिव्याधिजन्य-बलहानिप्रभवो वैवर्ण्यं-शिथिलता-जडत्वदृश्रमणादि-हेतुत्वद:खविशेषो मलानि: ।

हे सखि ! भाग्य से वश्चित होने ( भाग्य के साथ न देने ) के कारण मैं प्रिय के द्वारा संकेतित स्थान पर नहीं जा सकी । 'हाय ! अब मैं जिन राजा कामदेव मरु विषय में क्या करना चाहता हूँ । स्वेच्छा से नहीं, दुर्भाग्यवश मैं अपराधिनी हो गयी ! राजा स्वभावत: क्रूर होते हैं । कामराज कहीं दण्ड न दे दें, इसकी शंका है । इस शंका का विभाव राजा के प्रति अपराध है, अनुराग भी मुखवैवर्ण्यादि आक्षेपलम्य अनुभव है । यह शंका 'भय आदि उत्पन्न कर' कम्प आदि ला देती है, चिन्ता ऐसा नहीं करती है । अतः शंका चिन्ता से भिन्न है । मानसिक एवं शारीरिक दु:ख के कारण हुई दुर्बलता से उत्पन्न दु:खविशेष को मलानिलक्षणमहं—आधिव्याधियोति ।

यथा — शायिता शैवलशयने, सुप्तमाशेषा नवेंदुकुलेऽपि । प्रियमागतमपि सविच्छे, मत्कुक्षे मधुरवीक्षणेऽपि ॥

मानसिक: हारिरीतु:वेद माश्वारे या वलस्य हानिस्तदुत्पन्नं दु:खमेव मलानिभाववश्रितवृत्तिविशेष एव । तमैव मलान्या देहे विवर्णता-शिथिलतादनुत्तमाह्लादयो जायन्ते । मलानिभावमुदाहरति—शय्याप्यतेति । सुपवमा परमा शोभेर्क योगा यस्या: सा विर-हिणी द्वितीयाचन्द्रलेखा इव सूक्ष्मावयववती अतिक्शीणा धारिणीक्षीणशुकेर्‌नि यावत्, शयवलशयने शयिता मानस-शारीरतापमनाय शोवालतल्पे दयिता न तुर्पाविष्टा मलह्हान-त्वात्, प्रियं रमणं सविधे समीपे आगतमपि मधुरदृष्ट्यैव मत्कुक्षे, प्रिययुवत्यानिद्रय-सामथ्य्यति ।

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केचित्तु व्याध्यादिप्रभव-बलनाशं ग्लानिमाहुः। तेषां मतेऽचित्तवृत्त्यात्म-केशु भावेषु नाशारूपाया ग्लाने: कर्थं समावेश इति ध्येयम्। यद्यपि—

वलस्यापचयो ग्लानिराधिव्याधि-समुद्भवः। इत्यलक्षणवाक्यादपचयशब्देन नाश एव प्रतीयते, तथापि प्रागुक्तानुपपत्या बलनाशजन्यं दुःखमेव बलापचयशब्देन विवक्षितम्।

ग्लानि कहते हैं, जो मुख की विवर्णता, अङ्गों की शिथिलता, आँखों का घूमना आदि का कारण है। यथा——

तिरोहित। विरहजन्यैः श्रमैः सम्भूतबलहानिर्नित्येत्यर्थे चित्तेति कविर्देश्चारणः। श्रम इति। ननु श्रमेण परिक्लान्तापि प्रत्युद्गमादिकरणेऽस्मर्था भवतीति प्रस्तुतोऽनुदाहरिष्यमाणेन श्रमभावस्यैव प्रतीरसितत्वाति चेत्न, बहुत्तरशरीरायाससङ्क्रशमप्रतिपादककारणोपन्यासाभावात्।

बलनाशमिति। वलाभावस्य चित्तवृत्तितभावात् कर्थ भावत्वम्। भावस्य चित्तवृत्त्यात्मकता अन्येः: स्वीकृता इत्याश्रयादिमतुक्रम्। यद्यपि भरतमुनिना नादृशवला-पञ्चरूपैव ग्लानिरुक्ता। तत्रापचयेन नाशस्यैव प्रतीतिभंवति, तथापि तेनैव पूर्व भावस्य चित्तवृत्तितवं कविना, तदनुरोधेनात्र तन्नाशजन्यं दुःखमेव ग्लेयम्।

वाली नायिका दैवाल के विछोहने पर पड़ी हुई थी, समीप में आये हुए भी प्रिय का मन्कार मधुर दृष्टि से ही करती है। (दैवालचयन से, मन एवं शरीर का ताप है, 'जिसे आन्न कर रही है, ऐसा ध्वनित होता है और मधुरदृष्टि से ही स्वागतम् मे ध्वनित होता है कि वह उठने में भी असमर्था है।)

यहाँ ध्वनित प्रियविरह (से उत्पन्न बलहानि) ग्लानि का विभाव है, 'मधुर-दृशोक्षणैरेक' में एवं शब्द से बोध में आये हुए अगवानी करना, पैर पर गिरना, आलिङ्गन देना आदि के अभाव (नहीं करना) अनुभव हैं।

इस पद्य में भगवान् आदि करणने में अशक्ततामें श्रमभाव व्यक्त होता है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि 'श्रमप्रकर्षकरत्वं' का यहाँ अभाव है।

कोटि आचार्य 'व्याधि आदि मे उत्पन्न बलनाश' को ही ग्लानि कहते हैं। उनके मन में नित्तवृत्ति रूप भावों में नाशरूप (जो नित्तवृत्ति नहीं है) ग्लानि का समावेश कैसे होगा? यह विचारणीय है। (आचार्यों ने सभी भावों को चित्त में रहने वाला ही माना है।) यद्यपि 'आधि-व्याधि में उत्पन्न बल की क्षीणता को ग्लानि कहते हैं'——ऐसा भरतमुनिकृत लक्षण के 'अपचय' शब्द से नाश ही समझा जाता है, तथापि उनके द्वारा पूर्व में कहे हुए (जिस भृत्ति विशेषों भावः) वचन की अनुपपत्ति के

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दुःख-दारिद्र्यादि-जनितः स्वापकार्ष-भापणादिहेतुश्चित्तवृत्ति-विशेषो दैन्यम् ।

दैन्यं भावं निरूपयितुं—दुःखेति । स्वोयदुःखादिकारणेन यद् 'अहं पातकी'-त्यादिभाषणद्वारा 'वर्कीयहीनत्वं प्रकाशयते तेन दैन्यो भावश्चित्तवृत्तिविशेषो यद्यपि ।

उदाहरणम्—हतकेन मया वनान्तरे, वनजाक्षी महिषा विवासिता । अधुना मम कुतः सा सती, पतितस्येव परा मरस्वती ॥

उदाहरति—हतकेनेति । सीतापरित्यागानन्तरं रामचन्द्रैरियम् । हतकेन धौचित्य-हननकर्त्रा हतभावेन वा, मया रामेण, धनजानां जनकात्मजा कमल..यथा अनकोमलाक्षीति भावः, 'पयः कीलालममृतं जीवनं भुवनं वनमू' न्यन्मरः, महिषा अदितिर्भविष्यति तदयं वनान्तरे सुदूरे बने, निर्वासिता ! अग्निना महतिः स्वांपध्योरापराधं जाते सति मयि मा निर्दोषा, सती पतिव्रता माता, पतितस्य भ्रातृसखे विप्रस्य परा मदोस्कृतिः सरस्वती शुतिदिव, मम कुतः भविष्यति ? यथा पतितेः शूनिर्नैव प्रासरे मत्सम्भावर्त्ती नैव 'भवितुमर्हती'ति भावः । स्वस्यिमन् पतितवत्कार्यप्रतिपादनं दैन्यं भावं प्रकाशयति ।

सीतां परित्यक्तवतो भगवान् श्रीरामभद्रस्यैवमुक्तिः । अत्र सीतापरित्यागरूपोपराधस्तज्जन्यं दुःखं वा विभावः । पतितमामयकूप-स्वान्तकः भावण-मनुभावः ।

कारण बल के नाश से उत्पन्न दुःख ही यहाँ 'बलापचय' शब्द में विवक्षित है, तैमाजनना चाहिए । दुःख, दरिद्रता, अपराध आदि के कारण उत्पन्न अपने हीनता को प्रकटित करने वाली अपनी उक्ति का कारण जो चित्तवृत्ति उसे दैन्य भाव कहने है । उदाहरण—अभागां मैंने पहले कमल-नयना कोमलाङ्गी सीता को बिना विचारे ही सुदूर वन में निर्वासित कर दिया ! अब पतित व्यक्ति की श्रुति ( वेद ) के समान वह पतिव्रता मेरी कहाँ हो सकती है ।

सीता के परित्याग करने के बाद भगवान् रामचन्द्र की यह उक्ति है । यहाँ सीतापरित्याग रूप अपराध या उस अपराध से उत्पन्न दुःख विभाव है और 'पतित के:

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चित्तौत्सुक्यानमनस्तापाद् दौर्गत्याच्च विभावत: ।

अनुभावातु शिरसोद्भ्यावृतेर्गतत्रिगौरवात् ॥

देहोपस्करणतयाागाद् दैन्यं भावं विभावयेत् ॥ इति ।

दौर्गत्यादेरनौजस्यं दैन्यं मलिनतादिकृत् ॥ इति च ।

अत्र हतकेन मया विवासिता, न तु विधिनेत्येतन्र्यर्थस्य पतितोपमयैव परिपोष: न तु शाब्दापमया । यत: शाब्दस्य जात्यैव श्रुतिदौर्लभ्यं विधिना कृतम्, पतितस्य तु ब्राह्मणार्द्रेवेधिना श्रुतिसुलभत्वे स्वभावेन कृतेऽपि तन्नव तथाविधं पापमचरता स्वत: श्रुतिदौर्लभ्येति तस्य पतितेन साम्यम् । तस्याश्र श्रुत्येत्युपमालङ्कारो दैन्यमेवालङ्कुरुते ।

चित्तौत्सुक्येति । चित्तस्य औत्सुक्यम्, मनोज्ञयथा, दौर्गत्यं दरिद्रता चैति दैन्यभावस्य विभावा:, शिरसोद्भ्यावृत्ति: पुन:पुनर्धूननं, देहेऽपि किलये, नेहप्रसाधनतयाागश्रेऽनि अनुभावा: तेम्यो दैन्यं भावं विभावयेद् जानोयात् । दौर्गत्यादेरद्रिद्रयादिकारणाद् यद् अनौजस्यम् औजोहीनता, सैव दैन्यं यद् मुखमलिन्यादि करोतीति ।

अत्रेति । पूर्वोक्तोदाहरणे मयेत्यनेन मचैव न तु विधिनेतिन व्यज्यते । तदर्थस्य पतितसादृश्येतैव परिपुष्टिरेवति, न तु शाब्दसादृश्यकल्पनैन । 'वपुष्मयैव' इत्यन्वितपाठ-कलपनैन । जायैव शूद्रत्वैनैव "न स्वोशूद्री वेदमधीयाताम" इत्यागमयोचितेनेव वेद-शून्यत्वं शूद्रस्य जन्मनेव विधिना विहितम् । पतितो द्विजातिस्तु विधिना स्वभावेन, स्वजात्यैव शुचिप्राप्त्यधिकारीकृत:, परन्तु म पतित: स्वकोय-पापाचरणेनैव स्वन: शुचि दूरोकृत्य तादृशपावनवस्तुतो विहीनो भवतीति । तथैव रामोऽपि मोनाया: पतितोनेव स्वत: सुलभां तां स्वीयाविवेकाद् दूरोकृत्य तदनधिकारी मत्वन्त्र हि नाने पतितद्विजाति-

समास' इस प्रकार का अपने विषय में हीनता के प्रतिपादक वचन अनुभव है । इन्हीं से दैन्य मंजक भाव अभिव्यक्त हो रहा है । प्राचीनालङ्कार्यों में कहा है—

मन की उत्सुकता, मस्स्ताप और दरिद्रता इन विभावों से तथा मुख की वार वार हिलाने, देह का भारोपन और शृङ्गार के प्रसाधन का त्याग, इन अनुभवों से दैन्य भाव को जाने । और यह भी कहने हैं कि दरिद्रता आदि के कारण जो दुर्बलता ( क्षोभ-

स्विता का अभाव ) हां जाती है, वहां दैन्य भाव है । जो मलमलिनतादि का कारण है ।

यहां 'अभागा मैंने सीता को निर्यामित पर दिया, न कि विधाता ने' इस अर्थ की परिपुष्टि पतितसादृश्य में ही होती । न कि शूद्रादि के साहृश्य से । क्योंकि शूद्र के लिए जन्म से ही या जातिर्मै को दूर्लभ कर दिया विधाता ने, पर पतित ब्राह्मणादि के लिए विधान ने स्वाभाविक रूप से वेद को यथापि सुलभ कर दिया है, तथापि उंसौ पतित ने उम प्रकार के पाप करके स्वत: वेद को दूषर कर दिया । अतस

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तथा मयेतिं सेतिं चोपादानलक्षणामूलध्वनिभ्यां कृतध्वनत्व-कृतज्ञत्व-निर्दयत्व-दयावत्तीत्वाद्यनेकधर्मप्रकाशनद्वारा तदेव परिपोष्यते, मेति स्मृत्या च लेशतः प्रतोयमान्या ।

इष्टाप्राप्त्यनिष्टप्राप्त्यादिविजनितो ध्यानपरपर्यायो वैवर्ण्यं-भ्रूलेखनाद्वेषमुखत्वादिहेतुत्वाच्च तबृत्तिविशेषविशिष्टचित्त !

सादृश्यं संघटते । न तयोः कचित् श्रुतितः स्मृतितः सादृश्यं श्रुतिमात्रश्रयत्वेन उपमा-कोरोति स्मुटनया वाच्यो व्यङ्ग्यो दैन्यमलंकरोति । व्यङ्गयस्य प्राधान्याद्यादृशोत्कर्षान्वितस्त्वेन । दैन्यभावोऽदाहरण-गर्हितत्वादिधर्मात् ध्वन्यते । एवमेव सेतिं पदेन विप्रलम्भस्थायिभावमपि सेचरं सेतिं प्रयोजनमूलोपादानलक्षणाद्वारा ज्ञायते, ततश्र्च गीयते कुन्ते त्व-दयावत्तीत्व-क्षमावती-त्वादिधर्मात् ध्वन्यन्ते । ध्वनिनिरूपि तदेव दैन्यमेव परिपोष्यते । सेतिं पदेन यद्यपि नादृश्या गुणवत्या: सीताया: स्मृतिलेशतः आंशियकुणे परिपोषकसामग्रोविरहान्न प्रतीयते, तथापि स्मृतिरपि दैन्यमेव पोषयतीति, तेन स्मृतेरपिन्तु दैन्यस्योद्धरणमेव ।

चित्तां लक्षयति——इष्टापत्तौ । इष्टाप्राप्त्यादिविजनितया: कारणस्वरूपा विभावा:, तस्या: कायस्वरूप: तज्जन्या: मुखविवर्णनादयोऽनुभावा: ध्यानं बिन्तापरपर्यायं स्मृत्यनुकूलष्वापाररूपमिति प्रोढमनोरमा-शाब्दरत्नप्रभृतयो हरिवरीक्षिता: ।

यहाँ पतित से ही राम का साम्य दिखलाया गया । उस सीता का श्रुति से साम्य कहा गया । यहाँ उपमा अलंकार दैन्य भाव को ही अलंकृत करता है, अनः प्रधान नहीं है ! इसी तरह उपर्युक्त उदाहरण पद्य में 'मया' और 'सा' इन पदों में उपादानलक्षणामूलक ध्वनियों के द्वारा कृतध्वनत्वादि अनेक धर्मं प्रकाशित होकर उसी दैन्य भाव को पुष्ट कर रहे हैं और 'सा' इस पद से अत्यन्तप्रिय सीता की हृदय की स्मृति भी उसी का पोषक है । 'मया' पद से 'वनवास के समय में भी सीता से वियुक्त होने के प्रयोजनमूला उपादान लक्षणा से होता है, जिससे राम में कृतध्वनत्व, निर्दयत्व, आदि धर्मं ध्वनित होते हैं । 'सा' पद से उत्त लक्षणा द्वारा 'विप्रलम्भास्थाया' में भी सच्चरो वह सीता' यह अर्थ आकर सीता में कृतज्ञत्व, दयावतीत्व आदि धर्मं ध्वनित करते हैं, जो दैन्य को ही पुष्ट कर रहे हैं ।

अमीष्ट वस्तु की प्राप्ति अनिष्ट वस्तु का प्राप्त होना इत्यादि कारणों से उत्पन्न 'मुख का फीले वक्त्र जानि निप्रयोजन मुख दे भूमि पर निक्षिप्त, सीधे मुख करणादि कायों कर कारण प्रो चित्तवृत्ति, उसे ही ध्यन या 'चिन्ता' कहते है ।

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यदाहुः—

विभावा यत्र दारिद्रयमैश्वर्यंभ्रंशं तथाः । इष्टार्थपहूति: शस्त्रच्छवासोच्छवासावधोमुखम् ॥ सन्तापः स्मरणं चैव कार्यं देहानुपस्कृतेः । अधृतिश्चानुभावा: स्युः सा चिन्ता परिकीर्तिता ॥ वितर्कोऽस्या: क्षणे पत्रं पाश्र्वात्येवोपजायते । इति ॥ ध्यानं चिन्ता हितानाप्तेः सन्तापादिकरी मता ॥ इति च ।

लक्षणस्यास्य प्राचीनाचार्यैर्ममन्ततवं दर्शयति—यदाहुरिति । सा चिन्ता, यत्र दारिद्रयादयो विभावा:, इष्टार्थपहूत्यादियोगेन्तुभावा इति सारांशः । दरिद्रता जन्मजातः पाश्र्वाद्भावा वा धनाभावजन्या, प्रभुत्वस्य प्रभावस्य नाश ऐश्वर्यभ्रंशं, शाश्वतं सदैव, स्मरणमर्थादिनाशस्य, कालस्य क्षीणता, अनुपस्कृतिरसंस्कारः, अधृतिश्चेयाभावः । अस्या: पूर्वक्षणे पाश्र्वाद्यक्षणे वा वितर्को जायते । हितानाप्तिसंज्ञयं यदध्यानं तदेव चिन्ता ।

उदाहरणम्— अधरद्युतिरस्त- पल्लवा मुखशोभा द्राशिकान्तिलक्खनी । अकृतप्रतिमा तनुः कृता, विधिना कस्य कृते मृगोद्देशः ॥

जैसे कि आचार्यों ने कहा है— जहाँ जन्मजात दरिद्रता, ऐश्वर्यं ( प्रभुत्व या सम्पत्ति ) से च्युत होना एवं हष्ट वस्तु का अपहरण हों जाना चिन्ता के कारण होने से विभाव हों और सन्ताप द्वास का तेज से ऊपर नीचा होना, नीचे मुख करना, मन्ताप, नष्ट वस्तु का स्मरण, दुबले होना, देह को परिष्कृत न करना, अधीरता हुल्यादि कायंरूप अनुभाव हों, उस चित्तवृत्ति को चिन्ता कहा गया है। इस चिन्ता के पूर्वक्षण में या बाद के क्षण में वितर्क ( सन्देहादि के आने वालः स्फूर्तियुक्त विचार ) उत्पन्न होता है । और भी कहा है कि हित वस्तु की अप्राप्ति से उत्पन्न दुःम विचार को चिन्ता कहते हैं जिससे सन्ताप आदि उत्पन्न होते हों । उदाहरण—

विषाता ने इस मृगनयनाः के शरीर की रचना किसके लिए की, जिसे नासिकाकार के अंश की कामिल फलस्वरूपी शोभा को ढँक फँक थी। अवश्यमेव 'मनसिजै रसास्वादनिपुणः' बडकर है और शरीर तो अनुषम ही है ।

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अत्र तदप्राप्तिविभावः । अनुत्पादय आश्वास्य अनुभावा: । न चात्रोत्कुयकथंवनिरतिं वाच्यमू, 'कस्य कृते' इत्यनिधारितधर्म्यालम्बनानायाश्रितनायिका एवं प्रतीममानतया सतोड्यप्योत्कुष्टयसंज्ञतद्वाक्येन प्राधान्येनात्रोधनात् ।

यहाँ उस नायिका को अप्राप्ति विभाव है । उम अप्राप्ति से उत्पन्न दुःख, विकलता आदि अनुभव है, जो शब्दतः नहीं रहने से आक्षेपसिद्ध्य है ।

मध्याद्युपयोगजन्मा उल्लाससाध्यः शृङ्गारहासतादिहेतुरुचित्तवृत्तिविशेषो मदः ।

यहाँ नायिका के प्रति उत्सुकता व्यक्त होने से औत्सुक्य ही है, न कि चिन्ता, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि 'किसके लिए' यह नायिका है—हम उक्ति के द्वारा किसी अनिश्चित व्यक्ति के विषय में होने वाली चिन्ता ही व्यजित हो रही है ।

यदाहुः—

सम्मोहनन्दमनन्दहर्षो मंदो मध्योपयोगजः । इति ।

तदप्राप्तिविषयगतानाया नायिकाया अप्राप्तिशृङ्गारनायिकाभावस्य । तज्जन्यया व्याकुलीभावादयः । वाच्यंनयालम्बनाभावा । शाब्दनोक्तद्युत्पन्ना अपि जायमाना अनुनापादयोडनुभावा आक्षेपेण लभ्या हन्ति । न चात्रेति । अस्मिन्न पचे नायिकाप्रासिस्थियपकोन ग्रहणीयः । मदोऽनुसुध्यास्यभावद्यनिरेखास्तु, चिन्ता हि तस्याऽनुभावत्वेननि हेतुत्वं, 'वयम् ह्यन' इत्यनेन 'मम ज्ञानविरहः स्यात् अन्यस्य वा' इति चिन्तयैव प्रवृत्ता भवति, औत्सुक्यं चैणम्, मदिर अन्यस्येप्रमिति ज्ञायते । स्यात्, स्वप्राप्तौ निश्चिता स्यात् नदीव औत्सुक्यमभावः सम्भवति, अत्र तु तथा नास्तीतिचिन्तोदाहरणमेवेदं समाधनम् ।

अत: औत्सुक्य के विधमान रहने पर भी इस वाक्य से उसकी प्रखानता प्रतिपादित नहीं हो रही है ।

मदकद्रव्याणाम् मद्य-सुरा-मदिरा-नालोषधीतां येप्यन्वेति लोकः । स्वाप-ह्मनादीनां कारणस्वरूपा चित्तवृत्तिमंदनामको भावः । अत्र प्राणोनसम्भ्रान्तदर्शन्यति—यदाहुरिति । सम्मोहस्य अविवेकस्य = मूढभावस्य, आनन्दस्य च मनोदोहः । समुच्ययो मद्यसेवनादुपश्रयो मदसंश्रको भावः । अत्र स्वापादीनामाश्रय एवानुभावत्वम् । परस्परोक्किः कटोरवाक् । साहिलयवर्णनानुसारि वेदमनुभावमिलवर्णं कारयप्रदीपप्रतिकूलम् ।

मदिरा पीने से उत्पन्न शृङ्गार हसित आदि का कारण उल्लास नाम का चित्तगत विचारसौन्यता और आनन्द के समुदाय को मद कहते हैं, जो मद के सेवन से उत्पन्न हुए हों ।

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तत्रोत्तमे पुरुषे स्वापोदनुभावः। मध्यमे हसित-गाने। नीचे तु रोदन-परुषोक्त्यादि। अयं च मदर्श्रिविधः—तरुण-मध्यमाधममेदात्। अव्यक्तकार्मेर्गत-वाक्यैः सुकुमारस्वलद्गत्या च योऽभिनीयते स आद्यः। भुजाक्षेप-स्न्नलित-घूर्णण-तादिभिरम्ङ्गयमः। गतिभङ्ग—स्मृतिनाश-हिक्काच्छर्द्यादिभिरधमः। उदाहरणम्—मधुरतरं समयमानः, स्वसिमन्नेवाऽऽलपप्शान्तः किमपि। कोकिलतांऽयिलोकरीमालोकयन्-शय्यामীক্ষते धीरः॥

उत्तमस्त्वः प्रहसति, गायति तथैव च मध्यमप्रकृतिः। परुषवचनाभिवाय्यी, शोने रोदित्यधममस्त्वः॥ उत्तमे प्रहामोदृृहमः, अधिके मते मति स्वापः, मध्यमे उत्तमवद् अनिहामो गानं च, अधमे परुषवचनं, रोदनम् अपहसितं न च। अधमे मते न गव्रं स्वाप एतेति तत्त्वम्। अव्यक्तलेति। अव्यक्तकमस्फुटाक्षरम्, अगङ्गतममस्फुटमेव च। सुकुमाराऽनुद्रुता, स्वलन्ती वारं वारं नृत्यन्ती चामो गनिस्नया। हिक्का ‘हिलको’ इति हिन्दीभाषाप्रसिद्धा, पित्तोल्पणवशाल्कुठनगतविकृतवाग्राध्वनि। ऋष्यादः वमनम्। मधुरतरमिति। कश्चिद् क्षीरो मदतः, मन्त्रे मन्त्रं सिस्नतं कुवन्तं, स्वसिमन्न् आत्मनि अन्यं विनैव, किमपि असम्बद्धं, शनैरस्पष्टम् आलपनं न तादृशापं कुवन्तं, नियौको’ त्रिभुवनमेव मदारुणदृशया कोकिलदयितं रक्तकमलमिव गुरुन्तं, आत्मसनाथुर्यं निरालम्ब निर्निमयं घूर्ण्यमेवेनि यावत्, पश्यति।

उत्तम व्यक्ति मद्यपान नहा बाद गो जाता है और यही आयन मदभाव का अनुभव है। मध्यम व्यक्ति में हँसनता और गाना अनुभव हों।ता है, जब कि अधम व्यक्ति ( नीच ) में रोदन और ऋठोर वचन आदि अनुभान अनुभव हों।तें। यह मद तीन प्रकार का है—तरुण, मध्यम एवं अधम। अधमस; एवं असमंग यामियं के द्वारा कोमल वाङ्गों को फड़काना, स्वलित पतं नत।रान्ती गतियों में मध्यम मद यक्त होता है। चलने में ककावट, स्मुनिनारा, हिक्का एवं वमन आदि में अधम मद प्रकटित होता है। यथा— मत्त व्यनक्त मधुर-मधुर मुस्कानात् हुआ, आप-ही-आप चोरें-चोरें कुछ-कुछ ( अगम्सबाङ ) बोलता हुआ, तीनों लोकों को माल कमल के समान ( सदजन्य आँख एवं मन की रकितमा से ) रक्त वर्ण करता हुआ, विषय के विना हो शून्य को देख रहा है।

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अत्र मादकद्रव्यसेवनं विभावः। अव्यक्तालापाद्यनुभावः। अत्र मद्-स्वभाववर्णनस्य तत्रैष्टमद्रव्यख्यानार्थत्वान्मदभाव एव प्रधानमिति न विभावो-मत्स्यलङ्घारस्य प्राधान्यम्, अपि तु तद्वचन्युपस्कार एव तत्रेमेवा।

यहाँ मादक द्रव्य का सेवन विभाव है। अव्यक्त आलाप आदि अनुभाव है। यहाँ मद-स्वभाव का वर्णन रहने से स्वभावोक्ति अलंकार है, परन्तु वह मदव्यंगि में रहनेवाला मदभाव की अभिव्यक्त करने के लिए ही वर्णित हुआ है। नतश्च मदभाव ही प्रधान है, न कि स्वभावोक्ति अलंकार। अपितु मदभाव वर्णन के उपकारक (संस्कारक) के रूप में गौणतया हो वह अलंकार उपस्थापित है।

इदं वा पुनरुदाहरणम्—

कथवा यह भी उदाहरण है—

मधुरसान्मधुरं हि तवाधरं, तरुणि ! मद्दने दिवानिशं नय । मम गृह्णण करेण कराम्बुजं, पपाततामि दृशा ! भभभू.त.ः ॥

अत्रापि स एव विभावः। अधिकरणाच्चाङ्गाङ्गान्वयादिरनुभावः। पूवोक्तमत्ता-ग्राम्योक्तिः, उत्तरार्धे च तरुणीकरेडम्रुज्योपमेयतया निरूपणीये मयन्त्रय नदु-मेयतया निरूपणं न मददर्शने पापयत:।

यहाँ भी विभाव आदि पूर्ववत् है। यहाँ मद का उद्रेक होने से पूर्वोक्त मत्तता की ग्राम्य उक्ति है, उत्तरार्ध में तरुणी के हाथ को कमल के साथ उपमान-उपमेय भाव से निरूपणीय होने पर भी नायिका के रूप में उसका निरूपण मद के दर्शन में नहीं होने से वैश्यम्योक्ति अलंकार है।

बहुत्तर-शरीरव्यापारजनमा निश्चितवासान्नि सम्भद्विन्द्राविकारणोभूतः खेदविशेषः श्रमः।

मत्स्वभावे ति। यद्यप्ययं स्वभावोऽनिरलङ्कारः एवपुटः, मधापि मदालस्यभाव-पकारकत्वात् तस्य वाच्यत्वेऽपि ज्ञायते, तत्र मदोऽपि विश्रषणतया वाच्य एव इति वाध्यान्वय-तस्य व्यङ्ग्यत्वस्य कथमपि रतिस्थिनिमित्त वेदितुहारणान्तरं दूषणानि—इदं वेदित।

यहाँ मद का स्वभाव वर्णित है, यहाँ मद का आलस्य भाव प्रकट होने से मद व्यंग्य नहीं है, यह कहना संगत नहीं है। यहाँ मद व्यंग्य ही है, क्योंकि आलस्य भाव के प्रकट होने से मद व्यंग्य ही प्रतीत होता है।

मधुरसादति। हे तरुणि ! मधुरसान्मधि मधुरतरं मुखारविन्दम् अव मदने मनसुलेऽपि विनिवेशय । किन्तु त्वं स्वकरण ( साधारणन ) मम कराम्बुजं करेण गृह्णण । अहं श्वस्तले पतामि । पकादरदयं भकारदयं श्वासिकं मदभावमधिके ।

स एव मादकद्रव्यसेवनादिः। प्राकृतोक्तिः स्वकवनेदरनिर्वाहनस्य गूढतया प्रकाश्यस्य वाच्यत्वेनोक्तिः। स्वकरसय कुते कमलविलोचनं मार्मिकाकरं कुने मु नेति वैशम्योक्तिरेवपरोता मदस्य पोषिका।

यहाँ मादक द्रव्य का सेवन आदि पूर्ववत् है। प्राकृत उक्ति होने से स्वभावोक्ति अलंकार है। यहाँ वैशम्योक्ति भी मद का पोषक है।

श्रमभावं निरूपयति—बहुतेरेति। बहुतेरेण अरधिकेन, शरीरव्यापारेण भारवहनादिना जन्म उत्पत्स्यस्य। एतेन श्रमभावस्य विभावो दर्शितः।

यहाँ श्रम भाव का वर्णन है। अत्यधिक शारीरिक परिश्रम से श्रम भाव उत्पन्न होता है, यह विभाव दर्शित है।

यहाँ मादक द्रव्य का सेवन विभाव है। अव्यक्त आलाप आदि अनुभाव है। यहाँ मद-स्वभाव का वर्णन रहने से स्वभावोक्ति अलंकार है, परन्तु वह मदव्यंगि में रहनेवाला मदभाव की अभिव्यक्त करने के लिए ही वर्णित हुआ है। नतश्च मदभाव ही प्रधान है, न कि स्वभावोक्ति अलंकार। अपितु मदभाव वर्णन के उपकारक (संस्कारक) के रूप में गौणतया हो वह अलंकार उपस्थापित है। कथवा यह भी मद का उदाहरण है—

हे तरुणि ! मधु रस से भी मधुर अपने अधर को दे मेरे मुख में डाल दो, अपनें हाथ से मेरे करकमल को पकड़ो, हाय हाय ! मैं तो क्या मझू मुख पर न जा निपट रहा हूँ।

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यदाहः — अध्यवसायामसम्बन्धी विभावस्तुभावके: । मार्गगन्धादिहीनस्य-गन्धैरचैर्नुमोटने: ॥ निःश्वासमी वृश्रान्तैर्मदै: पादौष्ठगो: श्रमो मनः ॥ श्रम: येनेहवृत्तयार्देन द्वाश्राश्रामाधिकिग्रन: ॥

दीर्घंध्याम', अत्रनुसम्मदं: स्वेदनेह देहमर्दनं, निद्राछृङ्गारस्पादि, एनेचा मारणास्वरूप: । तन्वन श्रमभावस्यानुभावो दर्शन: । खेदो दुःखं चित्तवृत्तिनिरोधे श्रमभाव उच्यने । प्राचीनसम्मतित दर्शन्ति—अध्यवसायं श्रमकारणञ्चेन अथ्यगमनपरम् । मार्गंगमन-ऽध्यायाम-सेवाप्रभृतिभि: विधायै:, गात्र य दारीरस्य मर्दनंगर्दने:, मृगमकोटी:, अनुद्वनियङ्करणो, दीर्घोंणनश्वासं:, जृम्भान.रुः: मर्दनगा पार्श्वोरस्कानुगाः: श्रमल्क्यो

  • भावो जायने । इतरदिपक्षे श्रमनम्राह—श्रम एतत् । अश्वगत्यादिनिवारणादुप्त्र: खेद पव श्रमो मनः; यो हि निद्रादिवारणात् श्वसित । ननु मानिभावेऽपि नेद पृथक् जासन हेतु ननेनास्य श्रमत्वं पार्यते. हेदा, अस्मसु मनोव्यापारेऽपि नन्वातनु लाजीरकमपारदृश्यते ।

अयं न मत्वयपि तने जायते, द्वारादर्श्यमारोदनं जगत्ते । न तु श्रमानि: अतो म्लानि: श्रमस्य न भेद: ।

यह श्रममार्ग शरीर में बल रहने पर भी होता है, शारीरिक व्यापार से ही होता है, जलार्कादिक मलानिमाव में देसी बात नहीं है । कचः क्रोधादिके चित्तप्रोभव रहने के: वाग्जुष मलानि में श्रम का भेद है । उदाहरण—

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उदाहरणम्—

विधाय गा मद्ददलनानुकूलं रूपालमूलं हृदयं रमयितुं । विराय विचित्रे लिपिते तन्वि, न गमितुं रतिम् । अन्र विपरीतमुरतरूपः शारीरदयापारः ।

दयोऽनुभावः । न चात्र निद्रा-भावद्यवननेन रतिरसंवेद्यः, नुययो हि ज्ञानरहित्येनैव यत्नरहित्याननदयि स्पन्दितं न हृदयेन । जनकतद्वापत्तः; तदोभोभिहिततया तन्व्या वयसुरुण्येनानुरागलक्ष्य । स च मुचितम् ।

रूपधनादिव्यतिप्रयुक्तात्मोत्कर्षंजानाधीनपरार्थनेतनं गवं ।

उदाहरति—विधायेतिं । गा तन्व्या कामं हृदयं नायकस्योरसि जायाना मतो, विराय निरगमत् । यद्वा हृदयं नायकस्योरसि जायाना मती, विराय निरगमदिति । अत्र स्वल्पमपि स्पन्दितं हारोरमंचारं कतुं क्षमा समर्था ननाम ।

वहु कोमलाक्री अपने गाल के मूल को मेरे मुख के अनुकूल करनें । मेरे ( नायक के ) हृदय पर सोयी हुयी देर नक तस्थौैर में लिखित होते के समान थोड़ा शारीरिक संचार करने में अक्षम थी ।

न चात्रेभि । अन्र श्रमोदाहरपद्ये निबंधापर-वादिना अग्रिमतया तैव श्रमभावो गतार्थ इति नाशङ्कनीयम् । अन्र हृदयगत—मुग्धी निद्रया व्याप्ताव्-नैव चेष्टाशून्यतयैव स्वनः सिध्यति, तदयं न स स्पन्दनरहित्यपरत्वेन । अपरञ्च "कायात्" इत्युपपदेन वाग्र्यात्यैव निद्रेःप्रसङ्गः, न तु मूर्छनया । श्रमभावे तु निद्राऽधुपकारकमेव ।

यहाँ विपरीत सुरत रूप शारीरिक ब्यापार श्रम का विभाव है और हिलनें में असमर्थता, स्यैन आदि अनुभाव है । यहाँ निद्रा सादृश्य के ह्यवनित होने से ही श्रम को गतार्थ नहीं माना सकता, क्योंकि निद्रित अवस्था में ज्ञानराहत हाव से ही यत्न-रहितत्व सिद्ध हो है, फिर "थोड़ा मो हिलने में सक्षम नहीं थी" इस कथन का निष्प्रयोजन होने कों आती है और कीड बालु के स्थ्म "कयाना" के द्वारा वाच्यरूप से उपस्थित निद्रा को व्यङ्गच्य कहना अनुपपन्न है । श्रमभाव में तो ऐसा रूप, घन, विधा आदि के कारण अपने कष्टकंर भाव के मधीन अन्य व्यभिकारी

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उदाहृतपद्मम्

'नाभिमूलनलसमानेांभोजय-प्रसादाद् आ न कूलेन पद्मोन्मीलन्मानसं: शनैः काञ्चनकमलपत्रवम्ते विशदं वदन्तु । मूत्रीकार-प्रथित-निरूपित-रसभाव-गङ्कररोमाजुरीभारमाजां वाजमान्यामनायाः पद्मगुभदिनं मृदुलिता धमयं मदनस्य: ॥ अभ प्रथितविशिष्टविलासिताया अज्ञातस्यस्यार्घातलज्ञानं विभावः । परालिक्षेपवै तादृशादाकप्रयोगं|उपभोग: । इदम नासूयापि लेखतः: पृथग्लानि । उत्साहप्रभानो गूढगर्वा हि वीररसादीनां, अयं नु गर्वप्रधान रति न तमाददय विशेदः ।

यहाँ पर पद्म (कमल) का वर्णन किया गया है, जिसमें इसके विभिन्न पहलुओं और रसों का उल्लेख है। इसमें वीर रस और गर्व की प्रधानता का भी वर्णन है।

आमूलाद्वित । रसमानो' सुमेलपवंतस्य, मूलमभियायं तत् भारतस्य मलयारत्नाननु, पयोद्रेश: भूलं तटमभियाय नावाल्पर्यंतं यावत्स: यादत्सुयकाः काव्यरचनाकुशला: मन्त्र, ते विशालोकै निरीशाकै वदन्तु । अभ्र मेघयवेष्टितमुद्रतटस्य दधिणार्यस्यतिह्यातमुनेरोकतरवर्तस्व त्व स्वनः: सिद्धार्थं, 'मवेतामेव वर्षाणां मेगकर्तरत्नः: स्थिरतम' इति पौराणिकवचनमप्येतत्साधकम् । 'आदर्शमर्यादाभिव्यो:' इति सुश्रेण आभविधावर्योडर खादः कर्मचर्वणीयमंजा, तथ्योक्ते पक्स्मो । किं यदनिश्वयाह—मूत्रोकोऽति । मूत्रोयानां द्राशाफलानां मध्यात्र्यंतरी निर्गरतां मसृणां चिक्कणा रसशारा तन्व्या माधुरा मधुरतरव भोग्ये भजन्ते न तादृशोना वाच्याम आचायंताया: पदं ध्यानम् अनुगम्यतिं मदनस्यो मन्त्रान्त्रों ध्यः कुतार्थः कोउस्सिन् ? त कोऽर्थोंन्थः ।

यह भाग रस के विभिन्न पहलुओं और काव्य रचना की कुशलता का वर्णन करता है। इसमें आदर्श मर्यादा और रस शास्त्र के विभिन्न तत्वों का उल्लेख है।

अनन्यमाधारतां सर्वोकृष्टम् । पराविधेयपपरः परानिराकारकः ।। इदमिति । एतद् यत्स्थं अगुस्या परमोज्ज्वलहंतं लेशतः: प्रणोयमालापि तमप्यन्वित । उदपनप्रीणगारगुरगादुत्साहहेत वीर्यस्य निर्वमस्य विरम्य । इदं रसनो हि गर्वोप्रधान-उत्साह गय प्रभानः, गयंतनो वर्षस्य प्राधान्यगम्, उत्साहस्यप्राधान्यनिर्देशः ।

यह भाग अनन्य माधुर्य और पराविधेयता का वर्णन करता है, जिसमें उत्साह और गर्व की प्रधानता का उल्लेख है।

किं त्व आभिमानित कविभिर्महा रस है कि: सुमुग्ध पयंत् न मया न लेखर मलयादयं से रधयं मालरट पयंत में यमन्यायां जिनले नभा काल्यनिलात में निःपुण र्निर्गण है, न गाढ़-नाप कर्ं निः असूर नों मगय में निलक्न्यो निझ । इस्लोति रसगार के मादुर्य-भरे वाग्विलासं यः आचार्योः पद वाच्य । वृदते, मृदुले हो सकती है? स्पतां कोर्हि नहि ।

यहाँ पर कवियों द्वारा रस के विभिन्न पहलुओं और माधुर्य के बारे में चर्चा की गई है। इसमें रस के माधुर्य और वाग्विलास का उल्लेख है।

यहाँ अपनो कविता पा अन्य कवि कि कविता में अगाधारण ( उत्कृष्ट ) होने का ज्ञान विभाव और अनुभावों पर आधारित्युम्न वाच्यां का प्रयोग अनुभाष है ।

इस गर्वभरा कवि अभया ( गर्व से: यह को न महिमा ) भी आाधिकरुप से पुट कर रही है । ( अभः प्रयोंगमाला भी अनुषा गौण ही है । ) इस उदाहरण को यत्सरगयवन् नहीं मुनु माने । पर्याप्ति वीररराधन में उत्साह प्रधान रहता है और माधं मूद रहता है, यतःक यहा नी गर्व हो प्रथान है ।

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तथा हि—वीररसप्रकाङ्गे प्रागुदाहृतं 'अपि वक्ति' (पृ० १५५) इत्यादि । तत्र गीर्वाणनिगा गिरामधिदेवताग्रापि मार्तमहं वद्रियामोदिनं यननेमाभिनन्दनस्य-तसाहस्य परिपोषकतया दर्शन: सर्वेषामपि पुष्टिम्न: स्थैयंपुष्टिकृत् । तत्र गद:. न तु प्रकृतपथ एव नाम्न्येव महीतले मदनस्य द्रुतिमकुरोदितन्न गात्रेऽप्यन नाम्र्यावन प्राधान्येन प्रतीयमान: ।

श्रमादिप्रयोग्यं चेत:सम्भोसनं निद्रा । नेत्रनिमीलन-गात्रनिष्क्रियत्नवादयोऽन्यगानुभावा: ।

उदाहरणम्— सा मदागमन-वृंहिततोगा, जागरेगा गमिनगम्यतोगा । बोधितापि तनुबुधे मधुपैर्न, प्राणगणनज-गौरभरदृशे: ॥

सोल्लुण्ठं गाभित्रायम् । निद्रार्यां भावं नयति—श्रमादीन् । श्रम:—श्रम-नाश-निदानौ भक्तिजननौ । समस्तप्यं चेत: सम्भोलसं मनस: इन्द्रियै: यत्सम्पर्केरहिततया स्वस्था निद्रा । स्वस्थानं च तस्य तर्संजकनाड्यां प्रवेश: । सुप्तिस्थ: ! वेदान्तनये तस्य हृदयममृतं स्थीय । तामकरूच्य- स्थानेऽवस्थानं निद्रिती । निद्रायां चेतसो वृत्तिनं अभाव:, स्वरूपे तु भवत्येव नि उपयोमेव: ।

उदाहरति—सेति । सा पूर्वानुभूतप्रेमप्रीतिमनो:, मदागमनन नायकस्य प्राप्तानुराग-स्मरनेन वृंहितो तन्द्रालस्य यस्या:, जागरेण कालापरिलम्बादिगुणान् । गमिनया अपि दोषा रात्रियंया, न प्राणै: श्लथैर् अनल्पमात्र- मुग्ङपपसुगन्धिलोलुपपैमंधुपै: बोधितापि जागरितापि, न युवुधे न जागृमवानी ।

वह मेरी प्रियतमा मेरे प्रबोध से अपने पद वक्ष: । वागर्था इव, वचने सारी

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रात्रिजागरणश्रमोदयत्र विभावः। मध्योपवासोऽधःभावोऽनुभावः। शास्त्रादिविचारजन्यमदयोनिर्धारणं मतिः।

अत्र निःशकृतदर्शानु ध्यानं-संशयोच्छेदाद्योडनुभावा:।

उदाहरणम्—

निश्विलं जगदेव नश्वरं, पुनरस्मिन्नितरां नितरां कलेशरम्।

अथ तस्य कृतेऽपि कियानयं, क्रियते हन्त ! मया परिश्रमः॥

‘शरीरमेतज्जलबुदबुदमपमम्‌” इत्यादिशास्त्रपर्यालोचनसमग्र विभावः।

शरीर को जल के बुलबुले के समान नाशवान समझना इत्यादि शास्त्रों के विचार से उत्पन्न विभाव है।

हन्तपदगम्या सन्निकर्षा राजमेवादिविरतिरितिर्वितताङ्गता नानुभावः।

‘हन्त’ इस पद से गम्य सन्निकर्ष ( निकटता ) आदि से उत्पन्न विरति ( वैराग्य ) आदि विस्तृत अनुभाव नहीं है।

अगिति मतेऽत्र नमस्कारादि श्वनियतपदेशेऽनुता, न शान्तस्तस्य, विलम्बनं प्रतीतः।

यहाँ नमस्कार आदि नियत देश में अनुताप ( पछतावा ) आदि अनुभाव नहीं है, न उसके शान्त होने में विलम्ब प्रतीत होता है।

बोधाभाव एतत्। मध्योपवासननरमद बोधाभावोऽनुभाव एलि शहदर्यमू।

बोध का अभाव होने पर मध्योपवास ( दोपहर का उपवास ) आदि बोधाभाव नामक अनुभाव होता है।

मतिसङ्कलभावं लचयति—शास्त्रादौति।

मति के सङ्कल्प रूप भाव को लक्षित करता है—‘शास्त्रादौ’ इत्यादि।

शास्त्रगयहानिगष्टा इत्यादि-विचारणोत्पश्रो योऽर्थस्तस्य निर्धारणं निश्चित्यस्वरूपा मतिसचयने।

‘शास्त्र का त्याग करना ही ठीक है’ इत्यादि विचार से उत्पन्न जो अर्थ ( तात्पर्य ) उसका निर्धारण अर्थात् निश्चय रूप मति सञ्चय ( संचय ) करने में।

निःशकृतस्य अमन्दरागधनया ज्ञानस्य तदर्थस्य निर्णयाऽर्थस्य अनुष्ठानं रागद्वेषणम्‌, सन्देहदूरीकरणं चेष्टयादि मन्तरतुभाषा भवति।

निःशंक ( निश्चय ) रूप तीव्र राग से युक्त ज्ञान के द्वारा उस अर्थ ( तात्पर्य ) के निर्णय के लिए जो अनुष्ठान तथा राग-द्वेष आदि है, वह चेष्टा आदि के द्वारा मन में प्रकट होता है।

शास्त्रनयनाऽनुरोधेनं विभावः।

शास्त्र के नय ( न्याय ) के अनुसार ( विचारपूर्वक ) यह विभाव होता है।

उदाहरण—अथ लिललिति।

उदाहरण—‘अथ लिललिति’ इत्यादि।

मनो निर्वाहं ममुजो, जयतां ममार गम्य नश्वरं विनाश-शीलतां, अभिमतं जगति, कालकबरं शरीरं पुनर्नितरां नश्वरं वदन्ति।

जो मन में विचार आता है कि ममत्व ( ममता ) को जीतने वाले हैं, वह नश्वर विनाशशील शरीर और भी अधिक नाशवान है ऐसा कहते हैं।

अथ नदा, नश्वरस्य शरीरस्य कुले पोषणादिनिमित्तं हन्त ! मया अथं परिश्रमः क्रियते।

अब नाशवान शरीर के कुल में उसके पोषण आदि के लिए हाय ! मैं कितना परिश्रम करता हूँ।

ननु अगमप्रचारा इहसङ्गरादिरहितः परमार्थतत्त्वप्रतिपादनः शास्त्रं रमोऽपि-निरर्थकं थाक्षुं निरर्थकते—अर्थपत्तितोऽति।

यदि शास्त्र अगम्य ( समझ में न आने वाले ) प्रपंच ( कथन ) से रहित होकर परमार्थ तत्त्व ( वास्तविक अर्थ ) का प्रतिपादन करने वाला है तो वह व्यर्थ है, क्योंकि वह निरर्थक है—यह अर्थापत्ति ( अनुमान ) से सिद्ध होता है।

शरोरं धारणाऽऽश्रिता इह सदा दीर्घ प्रातःप्रातः मे दृश्यतां भूतं मया मुरभिद्य मृगयूथं मृगायो मृगाऽऽय मृगों के द्वारा जगतां पर भी मृगता नही नाम मर्कः।

शरीर को धारण करने वाले यहाँ सदा प्रातःकाल मुझे दिखाई देते हैं, मृगों के झुण्ड मृगों द्वारा मृगों के लिए मृगता ( मृगपना ) ही नाम है।

यर्हि रात्नि में दूग श्रम विभाय रप्य मोरों के द्वाग जगाने पर भी न जागनाऽनुभाव है।

जब रात में दूध देने से श्रम ( थकान ) होने पर भी मोरों के द्वारा जगाने पर भी नहीं जागना, यह अनुभाव है।

धाम्न्न, शोकादि रप्य मानसजन्तोः न जयम् इह, विचार है उत्पन्न किसी वस्तु के निःश्रयात्मके ( नाश ) का मति यहाॅं हे।

धाम ( तेज ) में, शोक आदि में भी मानस ( मन ) में उत्पन्न होने वाले जय ( जीत ) का यहाँ अभाव है, यह विचार यहाँ उत्पन्न होता है कि किसी वस्तु के नाश का।

हम मति भाव के ( धाम्न्न्वचमानुरोधि शादि विभाव और ) निःश्रयात्मक ( नाश ) का निर्णय होकर निश्चित अथं का कारण, सन्देह का नाश आदि अनुभव है।

यह मति रूप भाव के ( धाम आदि विभाव और ) नाश रूप अर्थ के निर्णय हो जाने पर निश्चित अर्थ का कारण, सन्देह का नाश आदि अनुभव होता है।

अब यह सम्पूर्ण संसार ही नश्वर ( नाश को प्राप्त होने वाला ) है और उसमें भी बार-बार तो अहर्निश हूँ नाशवान् है, हाय ! तों भी शरीर के लिए मैं कितना परिश्रम करता हूँ ?

'यह शरीर जल के बुलबुले के समान है' इत्यादि शास्त्रचचन णा अनुभवीलन

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रात्रिजागरणश्रमोदयत्र विभावः । मध्यपेयौषधाभावोऽनुभावः । शास्त्रादिविचारजन्यमथोऽनिर्धारणं मति: । अत्र निःशङ्कतदर्थानु ध्यान-संशयोच्छेदाद्योडनुभावा: ।

उदाहरणम्—

निश्विलं जगदेव नश्वरं, पुनरस्मिन्न् नितरां कलेशरम् । अथ तस्य कृतेऽपि कियानयं, क्रियते हन्त ! मया परिश्रमः ॥ 'शरीरमेतज्जलबुदबुदामममू' इत्यादिशास्त्रपर्यालोचनसमग्र विभाव: । हन्तपदगम्या सन्निन्द्रा राजमेवादिवर्तिनी वितृण्णता नानुभाव: । अग्निति मतेऽपि नमस्काराद् र्वनितपदेऽपि सेवन्ता, न शान्तिस्थ्य, विलम्बनं प्रतीतः ।

बोधाभाव एतत् । मध्यपेयौषधानन-नरमपि बोधाभावोऽनुभाव एतत् । मन्त्रमङ्गकभावं लक्ष्यति—शास्त्रादौति । शास्त्रेऽप्यहारविषयं निप्यादि-विचारणोल्लस्म्रो योग्यस्तस्य निर्धारणं निर्णायकस्वरुपा मतिरुच्यते ।

निःशङ्कस्य अमन्दरागधनया ज्ञानस्य तदर्थस्य निर्णयान्थस्य अनुष्ठानं रसग्रहरणमू, सन्देहदूरीकरणं चेष्टयादिको मन्तेरतुभावा भवन्ति । शास्त्र वचनानुरोधेन्तं विभाव: ।

उदाहरण—आलम्बनमिति । मनोः निश्वलं, मग्नोऽपि, जगत् नाश्वरं विनाश-शीलतया, अभिमतं जगति, कालक्रमे शरीरेऽपि नितनतरां नाशनं व्रदति । अथ ननु, नाश्वरस्य शरीरस्य कुते पोषणादिनिमित्तं हन्त ! मया अपि नितान्तं परिश्रमः क्रियते । अर्थ तु ममाऽपि थ्रमः क्रियन्ते नित्य मे महान्तंऽपि निर्णयोऽत्र ममाङ्गे भावः ।

ननु अशाश्वततरा इहशरीरस्याशाश्वततया नाशस्वरुपत्वेन चिन्त्यमानाः चेति निःशङ्कं प्रत्ययस्व मुख रागोत्कर्षान् निरासभते—अतद्गततोति । शरोरं धारणः स्मति मर्त्यस्य पष्क नाशं-नाशकं नाशकरं त्रिना दीं ओर प्राप्तःःःमे चरमाङ्ग मुख मुरुढ़य म्नुभाये भोरों के द्वारा जगत्पर भी यह कह नही जान सकता ।

यहाँ रात में जागने मे दूगः श्रम विभाव र्प्य मोरों के द्वाग जगाने पर भी न जागना अनुभव है ।

धाम्न, शोकादि र्प्य मान्त्यजन्तोः नाश इति, विचार से उत्पन्न किसी वस्तु के निश्चयात्मक फिटत्स्वस्नित का मन्ति यह्है ।

हम मनि भाव के ( शास्त्रवचनानुरोधि श्रादि विभाव और ) निश्वयक होकर निश्चित अपयं कां करना, सन्देह का नाश आदि अनुभव हू ।

अब यह सम्पूर्ण संसार ही नश्वर ( नाश को प्राप्त होने वाला ) है और इसमें भी बार-बार तो अशेष ही हूँ नाशवान् है, हाय ! तों भी शरीर के लिए में कितना परिश्रम करता हूँ ?

'यह शरीर जल के बुलबुले के समान ह' इत्यादि शास्त्रप्रमचन का अनुभव ।

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विरहोक्त विभावः, अङ्गेष्वेपादिरतुभावः । भोरोघोररसचर्वणास्फूर्जथु-श्वासणादिजन्मा चित्तवृत्तिविशेषस्त्रासः ॥ अनुभावाश्रास्य रोमाञ्च-कम्प-स्तम्भ-भ्रमादयः यथाद्रदुः— ओत्पातिकैरिति मंत्रक्षेपस्त्रासः कम्पादिकारकः ॥

उदाहरणम्— आलीलु केलि-रभसेन वाळा, मुहुरमंगलापमुगालपन्नी । आरालकर्ण्य गिरं मदीयां, सौदामिनीयां सुपरामरागींहू ॥

दत्तस्य गुमकुरुमति सुरदार देवदत्तस्य कुवलयदलव्यालाकुलितया समागस्नर्याहहः । यत्स मन्त्रो मुहुरवान् धारं स्वाछन्दि त्रिपस्ती, मर्कटीना नटद्रुमनपर्य तस्य नायकस्य य उदन्तो वतनाहलः तक्षणानपरायण ममे खे नायिका अनिन्दितानां निधिम आदधति । मम्चीना कुलि प्रयुक्ते मुख-शोभने मृदवक्त्रतेन म.पिमां मुले एक एव विलसन्नो नायकतामपमेहतेरहितः शुच्यने ।

श्रागारस्यभावाह—शोभोरतिं । भृङ्गोरमशस्योदय, घोरमत्प्रानि याध-वराहादयः तेऽां दर्शनेन, स्फुरज्जथः वडवाप्रशरदः नटकुट्टनन, आतिना विकृतनारगुरुदर्शनेन त्रोत्पत्कः ऋम्पादिजन्यो मनोदुःखस्त्रादिनोच्यतेन ।

घोरमृगदर्शनादिनुभावः, नखजया रोमाञ्चाद्यनुभावः । औत्पातिकैरिति । उपपन्नानि भय ओत्पातिन्हि वचनिर्यागादिः नेनोःपत्रो मनःशोगो मनसो व्याघातः तस्प-रोमाद्दिजननादिः मय शाखः । यथा—

आत्मोदिवृत्तिः । नायकः नगयादि जिनिः—मा वार्ता मुहुः मफ.प्रगा, हृद्य.चिन्तन विलमयथान हेततेल, आहत्य मदीयना ममे। मदयसेनाः मम मयत.पुमत् अत.प्तं बार बार तरङ्ग-दृशर्‌य यत्न यत्न । मयिमये मे नत उमगा मति हृदयं नित्यं नित्यं नायक नाथं नयति मे वशं नितरां नितमाम् ।

मपां त्रिहृ विशाख और अङ्गेष्वेपादनभावात् अनुभूतिः । मगपोत् ( मृग ) नय ममे भगयम् यत्न । यत्न मय मृगाङ्क मुख मण्डल उपरमित मृग.ङ्क-तनु तनोति च । हृदयः f.हानि हृदयं पश्यन्-पद्मानन और मृगभानु मुख, मधुर, वेणीहस्तनख, व्रण क्रार्ति हे । मेगा fित तनोति :—हृदयं हि नतत मे । नत ममे आहित चिति ममे मनसो नतत हे ।

( तृतीय ) अमर भाव । प्रमग मृ.यादिर्‌य चरित मति हे । कन स्वार्याभाव कोष और मंमार्ता भाव मग्ना मे यया मग्न हे । देव हहं मृ.हो मा भमानक रम का स्वार्यीभाव भम कोऊ । हम मधुरां भाव यामि मे यया मग्न हे । यह प्रद्म उठ मकतना है । दोनों का समाप्लान विशेषमा-वैचक्षण्य हह । मनोभ्यां दहा अव भय और अनुत्कट दशा मे नाम होग ।

उदाहरण—

मायन कहुला हे, fित ममे यस्या ( मेरी मुख्या प्रिया ) मेघाकीतकुककवा लखियं के

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अत्र पत्या स्ववचनाकरणं विभावः । पल्यावचनमधुनातः । न चात्र लज्जया व्याधूयतेवमाशङ्कनीयम्, नायिकानेतय नायिका निरगम् । इदं वा विविक्तमुदाहरणम्-

बीच में मेरे विषय में बार-बार बातें कर रहीं थी, किंतु दूर से ही मेरी आवाज को सुनकर बिजली को शोभा को प्राप्त कर गयी (फुर्रू से भाग गयी) । यहाँ पति के द्वारा अपने (नायिका) के वचन को सुनकर के नायिका का विभाव और भागना अनुभव है !

मा कुरु कशां कराल्जे, करुणायिति ! ऋषिगणं मम ख्वेदयन् । खेलन् न जातु गोपीगणै ! चिलस्मि निःशङ्क्यम् ॥

यहाँ लज्जा ही व्यभिचारि है, ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'गणैः' पद के नायिका में शृंगार कहा गया है और वचनपन में लज्जा का प्रवेश ही कहा है । यदि कहें कि यहाँ वाला पद से मुख्या अमिप्रेत है, मझनी नहों तो नाम और दूसरा उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है :-

वार्तालापम् उपालपक्ती कयनेनो आतङ्क प्रजेशे मदीया इव वाप्पम् उपाकरणं श्रुस्वा, गोदान्तीयां विश्रुतस्मृतिपथिनी मग्ना मुगमा रीं निध्वन अगमत् प्रासवदनोत्सवः । सौदामनो विच्छेद, 'मुगमा परमा शोभंतरमसः ! नामपदार्श्रवणेनैव सख्या एष पल्यावितेनि भावेनैन धार्गो न्वयुत्प । अत्र 'एव' इत्युप्रेक्षितंव्याम् उपालापस्य च नायिकाछलवानेनिधि-वदस्वछल् ।

हे दयावती माता ! तू अपने करकमल में कोमल अमल ठालकर, माँगफि एक्टे मेरा मन कोप जाता है ! मन में योपों के साथ खेलते-हुए मर्जी, मेरी माथी करेंगी ।

स्ववचननेतित नायिकया वचननस्य आःपं न परिगृहीतः । यतः स्वदृश्यान्तिकृष्णस्य पत्नुरेख परामर्श हतव्यायानि, यद्यपि स्वेभि मयूरश्रृङ्गैःनखरेखा नायिकाया एव परामृश्यतेवम् । किञ्च स्वदृशोदरहिलनेन पत्नुरेखान्वितवयमालिङ्गन् जातमिति नायिका बद्धा जानाति नदेय नस्य विभावाद्यस्मिन् इत्थं ।

न चात्रेतित अत्र लज्जयादिप पल्यावनं मभवत् । न च लज्जनेव भानित्स्व, न चाम हति निराकरिति शङ्केनैवतेति, बालापकर्षणेनैन भावः । न चू बालापदमन न निष्प-मपि तु मुरडामेव बोधयतीति पुनरुज्ज्जाय उपालप्तिनिर्बध्येन उदाहरर्णामरं प्रस्तौति—इदं वेत्ति इविर्क्त स्मुटम् लज्जया अमसकृतं स्वनमकं मालयोद्दाहाररम् ।

मा कुर्वति । श्रीकृष्णा यशोदया तर्जिततमा प्रति मभयं कुरे । हं करणावति अम्ब ! मातः ! मम कराल्जे करकमले कतां भर्सटिका मा नहि, कुश नादय ।

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एपा भगवतां लीलागोपकिशोररसयोक्तिः । निद्राविभावोत्यज्ञानं सुप्तम् ॥

स्वप्न इति यावत् । अस्यानुभावः प्रलापादिः । नेत्रनिमीलनादयस्तु निद्रायै एवानुभावा:, न त्वस्य, अनिद्रजन्यत्वात् । यत्नु प्राचोते: 'अस्यानुभावा निभृतगात्रनयनत्रनिमीलनम्' इत्याद्युक्तं, तदनयथासिद्धानामपि तेषामेतद्द्राव्यापकत्वादिति ध्येयम् ॥

उदाहरणम्— अकुरण ! मुषाभावासिन्धो ! विमुख भामा-श्रलं तव परिचितः स्नेहः सम्यड्मयेत्यनुभावितोऽस्मु । अविरल-गलद्ब्राष्पां तन्वीं निरस्तविभूषणां क रुहं भवतीं भद्रे निद्रे ! विना दिनेद्रियैः ॥

तेन मम स्वान्तं मनः, कम्पते । अथञ्ज ! गोपी, सैनन् अनः परं न जानु नेः, विलसद्व करिष्यामि । लीलया गोपकिशोरोडपि द्वाससमवलोच्यप । सुप्ताख्यं भावं लक्षयति—निद्रेति । निद्राद्रावपिभावायाः उपायम् उत्कृष्टं ज्ञानमय सुप्तं सुज्ञानां गुमाख्यो भावः । स्वप्न हन्त फणिनोडप्यः । तदं भावग्रस्ततिनि निद्रा सुप्तभाविन्यं विभावं विद्धि । तेनानुभावितं निद्राद्रव्यं, न त्वज्ञानत्वात् । अस्मिन्न् जन्यत्वात् । अन्यथासिद्धानां निद्रपीडितस्यान्त लेपां निद्रमीलनादीनाम् एतद्‌द्राव्यापकत्वात् स्वानुभावः तावदेक मयिर्निमीलति । इत एवत्कारणे तेषमीक्षणदर्शनं प्राचोतेरनद्राव्यानुभावत्वेनोक्तम् । यत्नयोः पद्‌योः पद्‌यम् ! विदेहस्थोऽप्यकः स्याने प्रिया द्रुता निद्रा प्रति वर्धते—अकुरणेति । अ भते निद्रे ! भवनों विना को जनः पर्यपिा मनवी हिेम मृते मप्रवा विलास्यन्

यह युक्ति लीला हरिौ गोपकुमार निलुलाय मन्त है ! निद्रा 'संभाव मे उपस्थित या निलम्बदशा में उपस्थित मानो है । इमकें अनुभव ( चिन्ता ) प्रलाप ( बड़बड़ाना ) आदि हैं । आँखों का बन्द होना नो निद्रा के अनुभव है, मुख के नहीं, अपितु चेतन में उपस्थित नहीं होने है । प्राचीनालङ्कारियों में जो कहा है कि इस मुख में अनुभव देखे की मिलवेच्छा कोर आँकांक्षा का कन्द रहना है । परन्तु ये नों अस्सयानुभाव है । अपितु निद्रा से ही यह किल, विलसद्‌व्यापार से नहीं । उनका हेतुप्रत्य है कि यों विभाव निद्रा के समय मे रहने के हेतु गुमाख्य

में मी रहने ही है । प्रभासो विरहो नायक को स्वप्न में प्रिया का दर्शन कराया । यद्यपि पर निद्रा से कह रहा हूँ—नह निद्रे ! कल्याणचायिभिः ! यद्यपे निद्रा 'चील नत लती।

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एषा प्रवासगतस्य स्वप्नेऽपि प्रियामेत्रंभावाभिनां दृश्यते नो निद्रां प्रति कम्पचिदुक्तिः। यद्यप्येवंभूताया: प्रियतमावस्थाया निर्येणेन 'निद्रं मम भर्तव्या महानुपकारः कृतः' इति वस्नु, विप्रलम्भप्रणयाश्रावप्रणीततथ्यमदनतत्नि, तथापि पुरःस्फूर्तिकतया स्वप्नाध्वननमय दार्त्तं न प्रान्तं नयान्तं च न निरोधधुमीटे।

निद्रानाशोत्तरं जायमानो बोधो विरोधः ॥ निद्रानाशे तत्पूर्वित-स्वप्नान्त-नायकस्यैव दृश्यत्वात्-प्रियदर्शनमिति तदेवात्र विभावा: अधिदैवंदृग्-गात्रस्मर्दनादयोऽनुभावा:। न तत्र संप्रयोगः। कीदृशों प्रियाम? न कोऽपोत्ययः। कीदृशी प्रिया? हे अकृत्र! प्रियदर्शा हृदयसंनिष्ठरसवत् ! मिथ्याविकल्पनागार ! मम अश्रुब फुहुम्र, मरा य । इत्येतत् स तिग्म: संयकतया परिचित, तत् स्वनेहः कुशिमो। न वार्त्तयति: इह-गेमे , हे-गेमे मारिगणाम । किश्च धाराप्रवाह-निपततश्रुकाम, परित्यकतारबुदारोदिनि ।

विभावोऽत्र निद्रा, अनुभावश्च मुसद्विकार-हृदयांचचारः। इत्य अत्र हृदय-श्वननसमग्र प्राधान्येनोपलक्ष्याय प्राधान्यं भजते। वस्नु-रमेशब्दयोहप्य पद्यादृश्यते व्यप्राधान्यान्त हि प्रान्ते अस्ते, तयोः मसूरमध्योः रसानन न निरोधसमर्थं । अथ तत्रैव स्वप्नभावः, अज्ञात्वेन व रस-रमप्यश्रु अज्ञ विराजते रस ।

विरोधं लक्षित-प्रायो-निद्रानाशोचति । निद्राभानानन्तरमुत्पद्यमान ज्ञान को विरोध कहा है ।

कोई दिखला सकला है? अर्थात् कोई नहीं । स्वप्न में वह प्रिया पल-पल-प्रवाहित आभू वहा रही थी, आभूषणों को उतार चुकी थी और मुझे कह रही थी कि ह हृदि्गे ! महामिथ्यावादी ( झूठे का सागर ) ! मेरी काचल खोजो, तेरे स्नेह को मैंने भलीभाँति जान लिया है !

यह उक्ति प्रवास-गत किसी नायक की है, जो स्वप्न में प्रिया को इस प्रकार देखकर निद्रा से कह रहा है । यद्यपि इस प्रकार की प्रियतमावस्था के निवेदन से—( १ ) मित्रे ! आपने मेरी महान् उपकार किय—ऐसा वस्तुसूचक और ( २ ) विप्रकृत्य ग्रन्थ यहाँ जाना जाता है, तथा उनसे पहिले ही स्वप्नभाव की सूचना होने से उसी भावच्यनि के कच में इसे यहाँ उदाहरण के रूप में रखा गया है । परन्तु वह स्वप्नि अपने बाद स्वप्न में उन दोनों ( वस्तु एवं श्रृगार ) ध्यनि को रोकने में समर्थ नहीं है । अर्थात् ये स्वप्निमयी भी यहाँ होते ही हैं । प्रथमोपस्थिति के कारण स्वप्नप्रभानि प्रधान है ।

निद्रानाश के बाद होनेवाले ज्ञान को विरोध कहा है । निद्रा का नाश अनेक कारणों से होता है, यथा—निद्रा पूर्वक होना, स्वप्न कर

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नितरां हिलायाद्य निद्रया मे, वत ! यामे चरणमे निवेदिताया: । सुदृशो वचसां श्रुणोमि यावन्, मर्यि तावत् प्रचुकोप वारिवाह: ॥ अत्र गर्जितश्रवणं विभाव: । प्रियावचनश्रवणाल्लमनाशोऽनुभाव- स्तूस्तेय: ।

केचित्‌विद्वांसजन्यमध्यनुमितामन्वित्ते । तेऽपां मतं— निद्रा मोहः स्मृतिलक्षणा, स्वप्रसंगादात्मनयच्यतत् । स्मितहासोडरिम गतगर्वदेहं, करिगद्रे वचनं तव ॥ उतिगीतापक्रमुदाहृतंयम् । वियोगः, मद्यां जागनावस्थायां समुत्पन्नं ज्ञानमिल्ययः । त एवंति निंदाप्रकर्ष-एव-तत्- वसानोच्चलशब्द-कठिनस्पर्शादयः । नितरामिति । वत हन्त ! अत्र मे मम, निरारामतिशयेन चितया प्रियकार्तण्यया निद्रया निवेदिताया उपस्थापिताया:, सुदृश: सुदृशेनावाया: प्रियाया यजनं नायके यामे रात्र्यन्तमप्रहरं यावत् श्रुणोमि, तावत् वारिवाहो मेघ:, मधुरैरप्यन- कुपितोद्भूत् । मनगतानेव मधुरस्वानो भवत इत्याशय: । उक्तंय हि— वियोगरक्षणे मननांतरमाह —केचिद्रिति । अविरलागः स्वकांत्वाभिमानादि- कषाय: स्ववशजन्यम् आत्मज्ञानं वियोग इत्योप स्वीकुर्वन्ति । तदनुरोध-

नष्टे मोहः । तनिप्रलयप्रत्याहारण्यीयम् । मोह: अज्ञानं विरहानुभवारादि नष्टम्, स्मृतिन: आलंबनमरणं नटवदानं, नें अज्ञानं स्त्रीलक्षण ! नटदनादत इतरत्प्रकारं ननुति । अत्र उदासीनं त्रिगतमनदेहं निं ताव वचनं मधुरये पाठिगिरयामिति । अत्र अविरलागसंज्ञस्य चित्तोधस्य स्पषंरितनयनस्य हरिणमप्यनुसरम् ।

अत्र, नष्ट आवार:, मोददार सप्रम आदिते, मे माऽरण हहा (वियोगत गमक ! भाव के विभाव होने थे । "अत्र मझा, तनु या अंग." इत्य आदि अनुवाथ दह । मंदिरस ऋप मे उरहारण — आार 'मति । मधुरम पडकर if अत्यंतं हसितार्शिन्द्रा द्वारो आार्गी गयी मृगबदृं का यनन तन्वंगी में मृगनयना मग, तभों में उतर मेघ मुरझिन हो गया । महा मयतने पा दानि मगनार किमाव है । प्रिया ने मयतन का सुनने में उल्लास का नाथ अनुभव है, तो कबह करनं पर जाता है । (मार्गान् प्रतिपादित न होने से गम्य है ।) काव्ये, आभास्य खविद्या ( माधात ) नाम मे उत्पन्न आह्लादात्मकात् को ही वियोग मानतं है । उनके मन में इसका उदाहतण निम्नाकित गीता का पद्य हो सकतार है । ( उपर्युंक्त उदाहरण नहीं )— हं शोककष ! आपकी कृपा में मेरा आान मह शुखा, ज्ञान प्राप्त हुमा । कल में सद्बेध-रहित हो मुरका हूँ । इसकिए तुम्हारा वचन ही करणयतार ।

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न तु वारिवाहविषयाया असूयाया एवात्र वाक्यार्थतैति शङ्क्यम्, विभोधप्रतीतौ हि सत्यां तस्मिन्नौचित्यावगमे सत्यानुचित-विरोधजनकत्वेन वारिवाहेडसूयाया विलम्बेन प्रतीते:, परमुखानिरीक्ष्यत्वात् । स्यादपि तस्या अपि प्राधान्यम्, यदि वारिवाहे निष्ठकुरुत्स्वादिवोधकं किंचिदपि स्यात् । नापि स्वप्नस्य, वारिवाहनादेन तत्सादृश्येन प्रतिपत्ते: । अमुना वा स्वप्नभावप्रसङ्गेन सूयया च सहैव सङ्गरः।

इदन्तु नोकथायसू— गाढमालिङ्ग्य सकलां, यामिनीं सह तमःशुभिमु । निद्रां विहाय स प्रातरालिङ्ग्याथ चेतनां ।।

न तिरस्कति । अत्र 'न चेति' पाठ एवन्तिः: पूर्वोक्तन्यस्तोदाहरणे "नितरां हितयेति" पद्ये सिंहावलोकनन्यायेन शङ्क्यते-- न तिरस्कति । वस्तुतः "केचिद्" इह्न मतप्रदर्शनात्पूर्वं मेवास्या: शङ्क्याया उपस्थापनं सुसङ्गतम् । यद्यपि मेघविपया असूया प्रतीयते, तथापि स न प्राधान्यम्, विभोधानन्तरमेव तस्या: प्राणिति:, अमूयाप्रतीतांतेः कारणं विभोध एवात्र प्राधान्यम् । असूयाया विभोधज्ञानापेक्षत्वमेव तस्या: परमुख-निरोक्ष्यत्वरूपं गौणत्वम् । स्वप्नस्थ्येति, वाक्यार्थता, प्राधान्यमित्यावत् । यदि सहदयः: अमुना स्वप्नस्थामर्ष स्वीकरेत्, तर्हि तस्यां सहैव विभोधस्थायिन् मस्कूर: स्वीकार्यः । तत्रापि विभोधस्थैव मुख्यतयेत्याशयः !

गाढेति । स नायकः सकलां यामिनीं रात्रिमभिषीयाय गाढमालिङ्ग्य सह-स्थितवतीं निद्रामेकां नायिकामिव प्रातःकाले विहाय अपरां नायिकामिव चेतनां जाग्रता-

विवोधभाव के पूर्वोक्त 'नितरां हितयाद:' इस उदाहरण पर शंका करते हैं कि यहाँ मेघविषयक असूया ( ईर्ष्या ) ही वाक्यार्थ है, प्रधान है । पर, ऐसी शंका उचित नहीं है, क्योंकि पहले विभोध की प्रतीति होने पर उसमें औचित्यबोध के बाद अनुचित विवोध के कारण मेघ में असूया की प्रतीति विलम्ब से होती है, कारण यह ( असूया ) परमुखापेक्षी है, अर्थात् विवोधज्ञान पर अवलम्बित है । अतः यहाँ विवोध हो प्रधान है । यदि कहें कि यहाँ स्वप्न ही प्रधान ( वाक्यार्थ ) हैं, तो यह भी उचित नहीं है, क्योंकि मेघराजन से उसके ( स्वप्न के ) नाश की ही प्रतीति होती है । यदि कहें कि असूया का प्राधान्य सहदयानुमोदित है, तो यह भी मान सकते हैं कि स्वप्नभाव के प्रशमन और असूया के साथ विभोध भाव का सङ्कर ( सम्मिश्रण ) यहाँ है । पर, उसमें भी प्राधान्य विभोध का ही रहेगा ।

विवोधभाव के लिए इसे तो नहीं उदाहृत किया जा सकता है— किसी नायक ने पूरी रात साथ-साथ रहने वाली निद्रा को कासके मालिङ्ग्य करके सुबह में उसे छोड़कर चेतना ( जाग्रतावस्था ) को मालिङ्ग्य कर लिया ।

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विरोधस्य चेतनापदवाच्यत्वात् ।

वस्तुं ( विरोधम् ) आहुर्निबन्धः । अत्र विरोधोऽय प्रतीतावापि चेतनाद्देन तस्य वाच्यायमानत्वान्न भावत्वम् ! ममासौक्त्यलङ्कारस्येह्नात्र प्राधान्यम् ।

यथा निश्रयत् सत्प्रतिपक्षौ द्वाभ्यां नायिकाराभ्यां द्वौ कालावुपमेयार्थी दृष्ट्वा यथोचिते नायिकैकामुपभुज्य कालान्तरे प्रवृत्ते तां विहाय तया भुक्त्वा तथैवयं नायिकां नितरां प्रातरभ्येत्यनुभूय समासक्ततरेखे पुनरपि सानात् ! परं तु डाकिनीदेवतान्तरे पराधिजन्यो रसोऽन्वेष्टव्यस्तथापि तन्निष्ठ-तत्परायां तद्विद-कारयेप्सुभि-चित्तत्वात्तद्विलेषणोपयः ॥

अथ्यामपं निप्रयपनि—परकृतेऽपि । अन्येन केनापि दृष्टा या अवज्ञा तिरस्कार-प्रतिकूलाचरणादिश्र तुज्यनस्य यत् स्वस्मिन् तृष्णोन्माद-कोधोरभापण-रौचकनवक्रत्वादि तत्कारणमेवाम्पः अमहिष्णुता । प्रश्नेऽहहि विरोधभावनं ! अमर्पस्य विभावः परकृतापराधे अस्मिन् साधार्त मोहनाद्वापाराध्ययः !

प्रायवत् कारणानां कार्याणां च ऋमेण विभावानुभावत्वम् ।

असर्पद्वाहारत—दक्षोजेज्ञति । पाणिना स्वकरेण दक्षोजातं नायिकया: स्तनाग्रं असर्पमुदाहतं—चक्षोजाग्रं पाणिनाडडूष्ठच दूरे यातस्य द्रागननातर्जं प्रियस्य ।

यहाँ प्रसुक्त 'चेतना' पद का वाच्यार्थ ही विरोध है, जो अस्पृप न होने के कारणमात्र नहीं वन सकना । जंघे कोश नायक डस्यपं वचनेन गन्यान्या । पर तनुुु मनहुर अपनी दो नायिकाओं के उपभोग के लिये ( भिन्न-भिन्न ) समय देवर यथोचित समय पर एक ( नायिका ) का उपभोग दरु , मं समय में पहली को छोड़कर दूसरी का उपभोग करना है, वहीँ ही यक्ष, यत्कि, रात्रि में निद्रा को और सुवह में चेतना को आर्निद्रित करना है—उस प्रकार नी समागौक्त ( श्लेपयुक्त विरोधपां नो द्वारा प्रकट नत माथ अपकृष्ट नतां मनी उपमापन ) ही। यहाँ प्रकाशित हो रहा है। अत्र यह सापेक्ष्यान्न हेतोरपि परिहारत्न होतु निते ।

अस्य अमर्पं भाव यत् निस्पष्णा करणं है—दूसरे नत द्वारा किये गये अपमान, विकृतकार्य आदि अनेक अपराधों से जनपन्न तथा क्रुप होकर, कठोर वचन, आँख तानना आदि का कारण जो चित्तवृत्ति उध्दृ ही अमर्प कहते हैं । पूर्वभाव ( विरोध ) के समान ही यहाँ भी अमर्प के कारण एवं कार्य क्रमशः इसके विभाव एवं अनुभाव होते हैं । उदाहरण— ( नायिका के ) स्तन के अग्रभाग को हाथ से छूकर ( मुख खाने के डर से )

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शोणाग्राभ्यां भामिनीलोचनाभ्यां जोपं जोपं जोपमेऽवतरःख्ये ॥

इह त्वाकस्मिक-स्तनाग्रस्पर्शो विभावः । नयनारुणग्रनिनिमेषनिरेक्षणे अनुभावौ । ननु क्रोधामर्षयोः स्थायी-ग़ञानिर्णोभान्त्रोः किं भेदकमिति चेद्, विषयतावैलक्षण्यमेवेति गृहाण । नत्र तु गमकं अस्ति न परविगाशाद्री प्रवृत्ति-वचनवैमुख्यादिकं चेतिं कार्यवैलक्षण्यम् । गोपनाय जनितो भात्रिजोषोऽवहित्यम् ॥

सहसा आमृशय संस्पृशय (अपराधं कृत्वा नाडनभीतया) द्रग्‌ सततं यातम्य प्रियस्य कृतापराधस्या रमणस्य, आननादृशं मुखकमलं शोणाग्राभ्याम् कोपाविष्ट पद्मरागाभ्यां अवतस्थे स्थितवती । जोपं जोपमिति जमुलकुनं 'जोपां प्रीणनयनयोःरिनि'आत्नोः । लोचनाभ्यां सेवनं दर्शनमेव ।

इह तिव्रति । अमर्पलक्षणे परकुन्नावज्ञा विभावत्वेनोक्ता, यह तु आदिप्रेन ग्राह्य आक्ष्मककुचस्पर्श एव । क्रोधः स्थायी भावः, अमर्षस्थौनारिभावः ममान एव प्रतीयते । तथापि उभयोः वस्तुगतवैलक्षण्येन पारस्परंमिन्न । माथ द्वौतात पर-भावस्य अनुकटावास्थादमर्पस्थेन मौनादिकार्य जायतेः, तस्माद् उत्कटदस्या क्रोधस्थेन क्षिप्रमेव परविनाशे प्रवृत्तिरूपं कार्य जायतें । इत्थंभयोः कार्यमेव विरम्नावैलक्षण्यं ज्ञापयतीति ।

अवहित्यं भावं निप्रयति-ग़ोडादिर्भिरति । लज्जा-भयवद्‌ग्ना-धूततादिभिः कारणैविभावस्वरूपैः, हर्षोल्लास्यादिजनितानानमुभावानामश्रुपात-रोमाञ्च गत्रविकासादीनां

शीघ्र ही दूर भागे हुए प्रिय के मुख-कमल को कोपनस्वभावा नायिका लाल-लाल आँखों से देख-देखकर चुप ही रही। यहाँ आकस्मिक रूप से स्तनाग्रस्पर्श विभाव तथा आँख लाल होना आदि अनुभव है। अब यहाँ शंका करते हैं कि स्थायीभाव क्रोध और संचारी-विषय के धर्म का विलक्षण होना ही भेदक है। अर्थात् परकुंत-अपमान से उत्पन्न सामान्य कोप अमर्ष एवं उत्कट कोप क्रोध है। इसमें नियामक कार्य का वैलक्षण्य ही है कि क्रोध में परविनाश के लिए झटसे प्रवृत्ति होती है, जब कि अमर्ष में वचन देने

लज्जा, भय, दृष्टता आदि कारणों से हर्ष, औत्सुक्य आदि के अनुसादों (अश्रु-

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तदुक्तम्—अनुभाव-पिधानार्थेऽवहित्थं भाव उच्यते । तद् विभाव्यं भय-व्रीडा-धाष्टर्य-कौटिल्य-गौरवैः ॥

अत्र व्रीडादि विभावः । तादृश-कालिय-कथाप्रसङ्गेज्जनुभावः । एवं भयादि-प्रयोज्यमप्युदाहार्यम् ।

यथा—प्रसङ्गे गोपानां गुरुबु महिमानं यदुपते-रुपाकरण्यं स्त्रिग्धतुल्याकृतिकपोला कुलवधूः । विपज्ज्वालाजालं झम्पति वमतः पन्नगपते-फणाग्रं साश्रुं कथयति-तरां ताण्डवविधिमु ॥

गोपनाय निगूहनाय उत्पन्नो भावोऽवहित्थम् । अत्र विभावो व्रीडादिः, अनुभावश्च हर्षादिगोपनचेष्टादिः ।

अत्र प्राचीनाचार्यैः सम्मतं दर्शयति—तदुक्तमिति । अनुभावस्य हर्षादिर्जनि-तरोमाञ्चादिः, पिधानार्थं गोपनार्थं जनितो भावोऽवहित्थमुच्यते । तद् अवहित्थं, भयादि-र्भविर्भावैर्विभावनीयम् । यथा—प्रसङ्ग इति ।

को अवहित्थ कहते हैं—जैसा कि कहा गया है—अनुभाव को छिपाने के लिए उत्पन्न भाव को अवहित्थ कहा जाता है । वह भय, लज्जा, व्रीडता, कुटिलता और गौरव में प्रदर्शित होना है ।

गोपानां मुखैरत कथाप्रस्तावक्रमे गुरूजनानां समक्षंमकु पदुपतेः श्रीकृष्णस्य महिमानम् उपाकरण्यं श्रुत्वा कुलवधूः गोपकुलाङ्गनाः कान्तिं संश्रृङ्गार-शृङ्गारयुक्त-शृङ्गारस्थला जाता । श्रीकृष्ण-प्रेम्णा पुलकभावप्रकाशो गुरूजन-ममीनां लोचति दृनि मलमि निवेश्य मा तद्गोपनाय विपज्ज्वालारौशि भमति अतिशीघ्रं वमत उद्गिरन् पन्नगपने: कान्ति-य-पात, रोमाञ्च आदि ) को छिपाने के लिए उत्पन्न भाव-विशेष ( मः प्रकार के भाव )

उदाहरण—गोपों के मुख से कथावर्तन-प्रसङ्ग में गुरूजनों ( मगुल आदि ) के समक्ष हो श्रीकृष्ण के गुण-वर्णन-गुणो सुनकर गोपकुल-वधू के माङ्ग पर ( प्रेमवश ) आनन्द के कारण हर्षो उल्लल पड़ें । तत्र वह विष की उयाःशाओं में तूर्ण वमन करते हुए सर्पराज कालिय नाग के फणा पर श्रीकृष्ण ने ताण्डव नृत्य करने की घटना को आश्चर्य से कहने लगी ।

( तात्पर्यं यह कि यह माङ्ग पर जलकण, इस घटना की वजह से ही प्राप्त हैं, न कि प्रेम से । ) यहाँ लज्जा विभाव है । इस प्रकार को कालिय-कथा अनुभव है । इसी तरह भय के कारण भी हर्षादि के छिपाने का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए ।

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अधिक्षेपापमानादिप्रभवा निश्चित्य करोमोत्याद्याकारा चित्तवृत्तिउग्रता ॥

यदाहुः— नृपापराधोऽसदृशोपकृतं चोरसारणीयम् । विभावा: स्युरथो वन्धो वधस्ताडन-भर्त्सने ॥ एते यथाज्ञातभावास्तदौग्र्यां निर्दयतात्वकारणम् ॥

यथा— अवाप्य भद्रं खलु सङ्झरार्ज्जणं, नितान्तमनुन्नाथिगनगरम्‍अलयम् । परप्रभावं मम गाण्डिवं धनुर्विनिन्दततमे हृदयं न कम्पते ॥

नागस्य फणायां श्रीकृष्णस्य ताण्डवविविधं समृद्धतनुःखरी॥ माश्रयं कथयनितरां ! तदाश्र‍यंणैवं स्वेद-पुलकादिकं जातर्मिनि बोधयितुं तथार्ज्जुनम् । उग्रतास्यं भावं निरूपयितुम्—आधिक्षेपैप्ति । निर्दयतामनथारोपाद्विकारण- सङ्कल्पा 'क्रिमस्य दण्डविधानं करोमो'द्याद्याकारा चित्तवृत्तिस: उग्रामंजके भाव: ।

यदाहुरिति । प्राचीनाचार्यै: इनि रूप: । यत्सिमन् गने उयन्तां भाविनो तं प्रति तत्कारणतया ( १ ) राज्ञोपराधोऽनुचितशासनम् ( २ ) तथ्सिमन् स्नेहीद्रियमानस्य गृढतया विद्यमानस्य वा असमोक्ष्यमपस्य अग्येन कथनम्, ( ३ ) तन्नस्नु-चोरस्य वध-ताडन-भर्त्सनानि अनुचितास्वाद्रूपाणि । नत्स्थायंनया वन्ध- सङ्झरार्ज्जणे युद्धप्राज्ञणे अर्जुनराजात् करणान् निन्दातमयन्तम् अकृस्मशुभं भवं पराजयम् अकाप्य प्राप्त्य, खलु निन्द्रयेन, पर उत्कृष्ट: प्रभावो यस्य तादृशं मम अर्जुनस्य गाण्डिवं धनुः। तदाश्र्यं चापं विनिन्दतः, ते युधि|शिरस्य हृदयं न कम्पते, 'कथं न कम्पत' इति काक्वा 'अवश्यं कम्पनीयम्' इनि घ्येयते । गाण्ड: वृषभूल्याच्छा-खोदृगमस्थानेपर्यन्तो भाग: अस्यास्स्तोति संज्ञायां वः, पूर्वविपदस्य विकार्य्यन दूष्य दृष्टि

निन्दा, अपमान, निरर्थक अभियोग आदि से उत्पन्न ' मैं हमका या अनिष्ट कर डालूँ' इत्यादि प्रकार की चित्तवृत्ति को उग्रता कहते हैं । जैसे कि आचार्यों ने कहा है :— जहाँ राजा का अत्याचार, अनुचित दोष कथन, चोर को आश्रय देना आदि विभाव हैं तथा बान्धना, वध करना, पीटना, डाँटना ये अनुभव है, वहाँ निर्दयता- स्वरूप उप्रता नामक भाव होता है । जैसे— युद्भूमि में कर्ण से अत्यन्त अमंगल पराजय पाकर सत्कृष्ट प्रभाव वाले मेरे ( अर्जुन के ) गाण्डीव धनुष की निन्दा करते हुए आपका ( युधिष्ठिर का ) हृदय

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एषा कर्णेन पराभूतं गाण्डवं निन्दन्तं, युद्धिष्ठिरं प्रति धनञ्जयस्योक्तिः।

गाण्डीवो गाण्डवहस्ते सिद्धौ। युद्धिष्ठिरद्वारा अनुपमप्रभावस्य गाण्डिवस्य निन्द्रां शृण्वा अर्जुनः उग्रतया शत्रुवधेच्छामकरोदिति भावः।

युधिष्ठिरकत्तृकगाण्डवनिन्दात्र विभावः । वधेच्छाडुभावः ।

प्रागुदाहुते "वक्षोजाग्रं पाणिनेतिं" पद्ये। अमर्षे मुन-वाक्पारुष्यादनुभावाः

न चामर्षोत्पत्त्योर्नास्ति भेद इति वाच्यमू, प्रागुदाहुतेsमरपध्वनावुप्रताया अप्रतीते: । नाप्यसौ क्रोधः, तस्य स्थायित्वेन अस्याः सङ्कारिगोलवेनैव भेदातू ।

तस्य अनुत्कटतां, उग्रतायां तु वध-बन्धाद्योडनुभावा उत्कटतां ज्योतयन्ति । अस्यां उग्रताया: सङ्कारिभावतात् क्षणिकत्वम् ।

विप्रलम्भ-महारपत्ति-परमानन्दादिजन्माडन्यस्मरण्याध्वास उन्मादः ॥ शृङ्करजतादिज्ञानव्यवृतये जन्मान्तरम् ।

उन्मादं निरूपयति-विप्रलम्भेति । विप्रलम्भो वियोगः, महारपत्तिरोरविपत्ति:, अतिगयानन्दादिम्य उत्पन्नो योऽन्यवस्तुनि तदितरबस्तुनोऽन्योडभावो ज्ञानं, स एव उन्माद-संजको भावः ।

काँपता नहीं है ? अर्थात् अवश्य काँपना उचित है, मैं अवश्य इन धनुप से शत्रु का नाश करूँगा ।

यह उक्ति कर्ण से परास्त एवं गाण्डीव वनुप को निन्दा करते हुए युद्धिष्ठिर के प्रति अर्जुन की है ।

युद्धिष्ठिर के द्वारा की गयी गाण्डीव की निन्दा यहाँ विभाव और शत्रुवध की इच्छा अनुभाव है ।

अमर्ष और उग्रता में भेद नही है—ऐसा नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि अमपञ्चदशनि के "वक्षोजाग्रं" इस पूर्वोदाहृत पद्य में उग्रता की प्रतीति नहीं होती है ।

विषयगत अनुत्कटता एवं उत्कटना ही दोनों में भेदक है । यह उग्रता क्रोध के अन्तर्गत भी नहीं आ सकती, क्योंकि क्रोध स्थायीभाव है, जबकि उग्रता मंचारीभाव ( क्षणिक है ), और यही दोनों में भेद है ।

वियोग, घोर विपत्ति, अनिशय आनन्द इत्यादि से उत्पन्न जो किसी एक वस्तु में अन्य वस्तु होने का ज्ञान उसे उन्माद कहते हैं ।

इस लक्षण में ‘जनमा’ यहाँ तक का अंश इसलिए दिया गया कि यह लक्षण ‘शुक्ति में रजत-भ्रम’ स्थल में न चला जाय । रजतभ्रम का कारण वियोगादि नहीं, अपितु चाकचिक्य, दूरत्व आदि है ।

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उदाहरणमुदाहृत्य अकणुणहृदय ! प्रियतम ! मुझ्रामि त्वामितः परं नाहम् । इत्यालपत् करुणस्वजमादायालिङ्गनस्य विकला सा ॥

अकरणेति । विकला सा वियोगिनी, आलिङ्गनस्य सखीजनस्य करकमलं गृहीत्वा 'अकणुणहृदय ! निष्ठुर ! प्रियतम ! त्वाम् ( चिरान्नमिलतं ) इतःपरमस्यप्रभूति अहं न मुझ्रामि' इति आलपत् । अत्र सखीजनेऽपि प्रियतमभावासः, तेनैवंविधा उक्ति: । व्याध्यन्तरेऽपि । व्याधिभाने शाय्याशयनतम्, उन्मादे 'प्रान्तरसम्बद्धप्रलाप:', मरणसूर्छा, अपस्मार इत्यादौ शय्या-शयन-निद्रादैनैचित्र्यम् । मरणाश्रयं भावं लक्ष्यति—रोगादिति । रोग-शोक-वियोगादिकारणेनेत्पन्ना चेतनाशून्या मरणात्युयावस्था ( न तु वास्तविकं मरणम् ) मरणाश्रयो भावः ।

एषा प्रवासगतं स्वनायिकावृत्तान्तं नायकं प्रति कस्याश्चिद् सन्देशहारिण्या उक्तिः । प्रियविरहोद्ग्न विभावः । असम्बद्धोक्तिरनुभावः । उन्मादस्य व्याधावन्तर्भावे सम्भवतऽपि पृथगुपादानं व्याध्यन्तरापेक्षया वैचित्र्यविशेषस्फोरणाय ।

कोई वियोगिनी नायिका विकल होकर सखी के करकमल को पकड़कर बोलती है—निष्ठुरहृदय ! प्रियतम ! तुम्हे इसके बाद मैं कहीं नहीं छोड़ूंगी । यहां सखी को प्रियतम मानकर कहना ही उन्माद को प्रकटित करता है ।

रोगादिजन्यया मूर्छारूपा मरणप्रागवस्था मरणम् ॥

यह उक्ति किसो सन्देशहारिणी दूती की हैं, जो प्रवासस्थित नायक के प्रति उसकी नायिका की दशा कह रही हैं । प्रिय का विरह यहां विभाव है । असम्बद्ध उक्ति अनुभाव है । यद्यपि उन्माद भी व्याधि ( भाव ) में ही आ जाता है, तथापि इसका अलग से कथन इसलिए किया गया है कि यह अन्य व्याधियों की अपेक्षा अधिक चमत्कारी होता है, जो सहृदय के हृदय को स्वतः अभिभूत होता है । व्याधि में विलक्षणता पड़ते रहना, उन्माद में भ्रम एवं असम्बद्ध बोलना, मरण में मूर्छा तथा अपस्मार में कांपकर गिरना आदि वैचित्र्य है ।

न चात्र प्राणवियोगात्मकं मुख्यं मरणमुचितम्, चित्तततृत्त्यात्मककेशु भावेषु तस्याप्रसक्तेः, भावेषु च सर्वेषु कार्य-सहृदयत्तया शरीरप्राणसम्योगस्य हेतुत्वात् ।

रोग, शोक एवं वियोगादि से उत्पन्न जो मूर्छा, जिसे मरण की पूर्वावस्था कह सकते हैं, वह मरण-संज्ञक भाव है । यहां प्राणवियोग रूप मुख्य मरण का ग्रहण करना उचित नहीं हैं, क्योंकि चित्ततृत्ति ( मन में रहने वाले ) स्वरूप भावों में प्राणवियोगात्मक ( चित्तरहित )

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दयितस्य गुणानुस्मरन्ती

शयने सम्प्रति या विलोकितासीत् ।

अधुना खलु हन्त ! सा कुशाङ्गी

गिरसङ्गीकुरुते न भाषितापि ॥

प्रियविरहोद्र विभावः । वचनविरामोऽनुभावः । हन्तपदस्यात्रात्यन्तमुपपादकत्वाद् वाक्यगतयोद्भय्यं भावः पदगतयोद्भयतामवहति । एतेन भावस्य पदगतयोद्भयतां नात्यन्तं वैचित्र्यमिति परास्तम् । दयितस्य गुणानुस्मरन्ती-

यहाँ प्रिय का विरह विभाव है । बोलने की भी शक्ति का अभाव अनुभाव है । 'हन्त' पद यहाँ ( मरणभाव में ) अत्यन्त उपकारक है, इसलिए वाक्य द्वारा व्यङ्ग्य होने पर यह मरण-भाव पदगङ्ग्य वन जाता है । इस प्रकार पदगङ्ग्य

स्यनेन व्यज्यमानं चरमावस्थायामपि तस्यैव दयितगुणविस्मरणं नाभूदिति वस्तु विप्रलम्भस्य शोकस्य वा चरमर्मभिव्यक्तत्स्य पोषकम् ।

में भी विलक्षणय देखने के कारण किसी आचार्य का यह मत खण्डित हो जाता है कि 'भाव की पदगङ्ग्यता में कोई चमत्कार नहीं है' । 'प्रिय के गुणों का स्मरण करती हुई' इस उक्ति से व्यङ्ग्य वस्तु ध्वनि यह है कि "अन्तिम ( मरण अवस्था में भी वह प्रिय के गुणों को नहीं भूली" । यह वस्तु-ध्वनि भी अन्त में अभिव्यक्त विप्रलम्भ या शोक का पोषक होता है ।

दयितेति । प्रवासस्थस्य दयितस्य प्रियस्य, गुणोत्कीर्तनं कुर्वतोऽतिदौर्बल्याद्

मरण का प्रसंग ही नहीं है और सभी भावों में, कार्य ( अनुभव ) के साथ-साथ रहने वाला शरीर के साथ प्राण का संयोग ही हेतु हैं । ( यह कारण कार्य से पूर्व नष्ट न होकर कार्यकाल में भी रहता ही है ) ।

या शायने शाय्यां द्रुष्टा, सैव कुशाङ्गी प्रियविरहोद्वेगतया तं दुःखलाङ्गी अधुना धणानत्तरमेव हन्त ! भाषितापि पृष्ठापि गिरं स्ववचनं नैव अङ्गीकुरुते स्वीकुरुते प्रत्युत्तरं नैव ददातीति भावस्थेन मूर्छोऽवस्था गम्यते ।

जो दुबली अङ्गवाली अपने प्रियतम के गुणों का स्मरण करती हुई अभी-अभी विछावन पर लेटी हुई देखी गयी, वही अब तुरत ही हाय ! हाय ! पूछने पर भी नहीं बोलती है ! उसे बोलने को भी शक्ति नहीं रही ।

वचनविरामो भावनाशक्तिनिवृत्तिः । हन्तपदस्य दुःखातिशयबोधकस्य ।

यहाँ प्रिय का विरह विभाव है । बोलने की भी शक्ति का अभाव अनुभाव है ।

एतेन पदगतयोद्भयतां चमत्कारोत्कर्षप्रदर्शितेन । व्यज्यमानं वस्तु विप्रलम्भस्य शोकस्य वा पोषकत्स्यन्वयः । चरमावस्था मरणम् । चरमर्मभिव्यक्तत्स्य अन्ते

दुःखातिशयबोधक 'हन्त' पद यहाँ ( मरणभाव में ) अत्यन्त उपकारक है, इसलिए वाक्य द्वारा व्यङ्ग्य होने पर यह मरण-भाव पदगङ्ग्य वन जाता है । इस प्रकार पदगङ्ग्य में भी विलक्षणय देखने के कारण किसी आचार्य का यह मत खण्डित हो जाता है कि 'भाव की पदगङ्ग्यता में कोई चमत्कार नहीं है' ।

मरणं हि नास्ति । चरमर्मभिव्यक्तत्स्य पोषकत्वात् ।

प्रथममतः प्रतीत मरण भावध्वनि ही प्रधान है । वस्तु एवं रस ध्वनि बाद में प्रतीत हो रहे हैं ।

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अयं च भावः स्वव्यङ्गक-वाक्योत्तरवर्तिना वाक्यान्तरेण सन्दर्भघटकैन नायिकादेः प्रत्युज्जीवनवर्णनं विप्रलम्भस्य, अन्यथा तु करुणस्य पोषक इति विवेकः। कवयः पुनरमुं प्राधान्येन न वर्णयन्ति, अमङ्गलप्रायत्वात्। स च निःश्रयानुकूलः। सन्देहाद्यनन्तरं जायमान ऊहो वितर्कः॥

यह मरणभाव तो अपने प्रकाशक वाक्य से आने वाले वाक्य के द्वारा, जो वाक्य अपने प्रबन्ध ( ग्रन्थ ) के अन्तर्गत हो हाँ, नायिका आदि मरणावस्था प्राप्त व्यक्ति के पुनर्जीवन का वर्णन से विप्रलम्भ रङ्गार का पोषक होता है और यदि पुनर्जीवन का वर्णन न हो तो करुण का पोषक होता है । कवि तो इसे प्रधान रूप से वर्णित नहीं करते हैं, क्योंकि यह अमङ्गल है ।

स च निःश्रयानुकूलः॥ यद् वा सा मिथिलेनद्रनन्दिनी नितरामेव न विद्यते भुवः। अथ मे कथं सस्ति जीवितं न विनालम्बनमाश्रितसस्थितिः॥

सान्देह, विपर्यय ( विपरीत ज्ञान ) आदि के साधक युक्ति का स्फुरण ) ही वितर्क-सञ्ज्ञक भाव है । यह वितर्क निश्चय के अनुकूल होने से निश्चयात्मक ही रहता है ।

प्रतीतस्य। मरणावस्थाया: प्राथम्येन प्रतीतिरत एव प्राधान्यम् । वस्तुना पोपिनस्य विप्रलम्भस्य शोकस्य च प्राश्रात् प्रतीतिरत एव न प्राधान्यम् । अयं चैति। च शब्दस्तु शब्दार्थः, अथवा भावस्य वैशिष्ट्यान्तरस्य समुच्चय-यार्थः। अयं मरणाख्यो भावः प्रवन्धकाव्ये यत्र निरूपितः, तस्मिन्नेव काव्ये तदग्रे नायिकाया: स्वस्थता चेतिरूपतये तर्हि विप्रलम्भसाधकः, अन्यथा करुणसाधक इति। वितर्कं-भावं निरूपयति—सन्देहेति। स्याणुर्वा पुरुपो वेति विरद्रकोटि-द्वयावगाहि-ज्ञानरूपे सन्देहे एकतरपक्षीयुक्तिस्फुरणरूपः, स्याणौ वा पुरुषावधारणरूपे विपर्यये वा स्याणुत्वप्रतीतिसाधकयुक्तिस्फुरणरूपो वितर्काख्यो भावः॥

स चैति वितर्को भावो निःश्रयानुकूलस्तेन चिन्तादिभावतो वैलक्षण्यम् । पूर्व सन्देहस्तदनन्तरं मुहुर्दिन्तनायामपि भवति, किन्तु न स निःश्रयानुकूल इति॥

उदाहरण—मिथिलेनद्रनन्दिनी सीता यदि भुवि नितरामेव निश्चितरुपेणैव न विद्यते, परलोकमेव गता, अथ तर्हि, मे रामस्य जीवितं कथं सस्ति केन प्रकारेणास्ति, यतः आलम्बनं विना आथितस्य

सर्वथा नहों है तो यह मेरा ( राम का ) जीवन कैसे विद्यमान है ? क्योंकि बिना

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स्वात्मनि भगवतो रामस्यैषोक्तिः । भुवि सीतार्स्ति न वेति सन्देहोऽत्र विभावः । भूक्षेप-शिरोधऽङ्गुलिनर्तन्तनम् आक्षिप्तमनुभावः । न चासौ चिन्तेति शक्यं वदितुम्, चिन्ताया नियमेन निश्चयः प्रत्यप्रयोजकत्वात् । 'किं भविष्यति', 'कथं भविष्यति' इत्याद्याकारायाश्चिन्ताया: 'इदमित्थं भवितुमर्हति प्रायशः' इत्याकारस्य वितर्कस्य विषयवैलक्षण्योपलम्भाच्च । 'न विने' त्यादिनोक्तोऽर्थ- न्तरन्यासोऽप्यस्मन्निवेदनानुकूलः ।

आश्रय के आश्रित वस्तु का रहना सम्भव नहीं है । सीता के जीवन के बिना मेरा जीवन रह नहीं सकता । अतः मेरे जीवन से जानकारी जी के जीवित रहने का निश्चय हो रहा है । अपने मन में भगवान् राम की यह उक्ति है । 'सीता इस पृथ्वी पर है या नहीं' यह सन्देह यहाँ विभाव है । भौंहूँ तानना, शिर और अंगुलियों को नचाना इत्यादि अनुभव है, जो उदाहृत पद्य में शब्दतः अनुक्त रहने पर भी 'वितर्क-काल में रहते ही हैं' इस ज्ञान के द्वारा आक्षिप्त ( आक्षेपलभ्य ) हैं ।

इष्टटासिद्ध-राजगुर्वाद्यपराधादिविजन्योऽनुतापे विषादः ।

स्थितिनं क्वापि सम्भवति । सीताजोवनं विना मज्जोवनासम्भवाद् मज्जीवनदर्शनादेव सीताया जीवितत्वं सम्भावनीयमिति 'सीता भुवि अस्ति न वा' इति सन्देहे निश्चयानुकूल ऊहोऽत्र धितर्कः ।

यह वितर्कं चिन्ता ही है—ऐसा नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि चिन्ता नियमतः निश्चय के प्रति कारण नहीं हो सकती ( प्रयोजक, साक्षात् या परम्परया कारण ) । 'क्या होगा' 'कैसे होगा'—इस प्रकार की चिन्ता होती है, जिससे 'यह ऐसा हो सकता है, प्रायः' इस प्रकार के वितर्क की विषयगत-विलक्षणता ( पार्थक्य ) स्पष्ट ही है । इस पद्य के अन्तिम चरण 'न विनालम्बन-' अर्थान्तरन्यास अलङ्कार भी इसी निश्चयात्मक वितर्कं में अनुकूल है । (यहाँ सामान्य उक्ति

स्वात्मनि स्वगतम् । आक्षिप्तस्मितमिति, अत्र शब्दतोऽनुक्तमपि आक्षेपलभ्यम् । वितर्कसमये भूक्षेपः, शिरोनर्तनम्, अङ्गुलिनर्तनं च स्वभावसिद्धम् । वितर्कस्य चिन्तातः पार्थक्ये—न चैति । चिन्तायां निश्चयोत्पत्तौ न लक्ष्यते, वितर्कस्तु निश्चयानुकूल एव भवतीति विषयवैलक्षण्यमुभयोः । न दिनेनेति । अन्नोदाहृतपद्ये 'न विनालम्बन-माश्रितस्थितिः' इत्यनेन सामान्येन, विशेषस्य रामजीवनेन सीताजोवनस्थितेः समर्थन-रूपोऽर्थान्तरन्यासो निश्चयप्रतिपादकः । वितकेडनुकूलः ।

के द्वारा विशेष का समर्थनरूप अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है । ) बहुत आयास के बाद भी अभीष्ट कार्य के सिद्ध न होने से तथा राजा, गुरु, देवता, देश आदि के प्रति अपराध आदि करने से उत्पन्न सन्ताप को विप्रलम कहने हैं ।

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भास्करसूनावस्तं याते, जाते च पाण्डवोत्कर्षे ।

दुर्योंधनस्य जीवित ! कथमिव नाद्यापि निरीयासि ॥

अत्र स्वापकर्ष-परोत्कर्षयोर्दर्शनं विभावः । जीवितनिर्याणाशंसा तदा-क्षिप्तं वदन-नमनादि चानुभावः ।

अस्मिन्नेव च विपादद्वनौ दुर्योंधनस्येत्यर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनिरनु-ग्राहकः । न चात्र नासाभावध्वनित्यं शोक्यम्, परवीरस्य दुर्योंधनस्य त्रासलेश-स्याप्ययोगात् । नापि चिन्ताध्वनितमम्, युद्धेवा मरिष्यामिति तस्य व्यवसायात् । नापि दैन्यध्वनितवम्, सकलसैन्यैकक्षयेऽपि विपदस्तेनागणनात् । न वा वीररसध्वनितवसु, मरणस्य शरणीकरणे परापकर्षजीवितस्योत्साहस्याभावात् ।

राज-गुरु-राष्ट्रविकालं प्रति कृतेऽपराधे च स्वात्मनि जायमानोडुतापः; स एव विषादसंज्ञको भाव उच्चयते । यथा—

भास्करेति । कर्णं मूते निराशास्य दुर्योंधनस्य स्वजीवनं प्रति उत्किरियम् ।

भास्करसूनौ सूर्यपुत्रे अनुपमप्रतापशालिनि कर्णे असतं याते मूते सति, तदनन्तरं पाण्डवो-त्कर्षे पाण्डवानां युधिष्ठिरादीनां वैरिणाम् उत्कर्षे च जाते, हे दुर्योंधनस्य जीवित !

ऋतुलपराक्रमस्य कर्णकप्राणस्य मम जीवन ! अद्यापि स्वकीयसर्वनाशे शान्त्रदलोकर्षे च जाते इदानोंपि कथयमिव कथं खुलु न निरीयासि निर्गच्छसि ? अवश्यमनिर्गंतव्यस्य तवाव-स्थानं नोचितमिति भावः ।

निर्याणाशंसा प्रयाणेच्छा, तदिच्छासमये वदनतनमनवैवर्ण्यादिकं स्वभावसिद्ध-मनुक्कमपि आक्षेपलभ्यम् ।

अर्थान्तरसंक्रमितेति । दुर्योंधनः स्वयं वक्ता 'ममेति' वाक्ये 'दुर्योंधनस्ये'ति पदं साभिप्रायं प्रयुक्ते । तेन तस्य तत्तद्गुणवत्स्वं लक्ष्यते—अतुलप्रताप-पराक्रमादियुक्तः कर्णकप्राणः, प्रधर्षित-पाण्डव इत्यादि । तेन दुर्योंधनसंबद्धोऽत्र अर्थान्तरे संक्रमितः । परन्तु

उदाहरण—

उदाहरण—

कर्ण के मर जाने पर निराश दुर्योंधन को अपने जीवन के प्रति यह उक्ति है—

हे दुर्योंधन के प्राण ! तुम सूर्यपुत्र कर्ण के असत् हो जाने ( मर जाने ) पर और पाण्डवों की उत्तति हो जाने पर भी अभी तक क्यों नहीं निकल जाते हो ?

यहाँ अपनी अवनति और शत्रु की उत्तति देखना विभाव है और प्राण निकल जाने की इच्छा तथा उसके द्वारा आक्षेपलभ्य सर झुकाना आदि अनुभव हैं ।

इसो विषाद श्वनि में 'दुर्योंधनस्य' इस पद से प्राप्त अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य-ध्वनि सहायक है । इस उदाहरण पद्य का वक्ता स्वयं दुर्योंधन ही है । वह 'मम' ( मेरा ) कहने के स्थान में 'दुर्योंधनस्य' पद का साभिप्राय प्रयोग करता है, जिससे अतिप्रतापी,

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अथि ! पवनरयाणां निर्दयानों हयानां इलथय गतिमहं नो सड़ड़रं दृश्यमीहे । श्रुतिविरसममी मे दारयन्ति प्रकुप्यद्-भुजगनिभ-भुजानां बाहुजानां निनादाः ॥

अत्र = विषादध्वनि। अयोध्या। कोमलसम्बोधनां बृहल्लावेशधारिणमर्जुनं सारथिनं प्रति युद्धकार्तरसय विराटपुत्रस्योत्तररसय । पवन इव रयो वेगो येषां तथा-विधानां दयारहितानां कठोराणां घोटकानां गर्तिं इलथय मनदीकृत । अहमुत्तरः सड़ड़रं संग्रामं द्रष्टुं न ईहे इच्छामि । यतो हि—प्रकुप्यतर्षक ते भुजगाः सपोः, तन्त्रिभाः तत्सदृशा भुजा बाहवो येषां तेषां बाहुजानां क्षत्रियाणां 'बाहु राजन्यः कृत' इति पुरुप-

धरमवीर, कर्ण का प्राणाधिक मित्र, पाण्डवों को वार-वार नीचा दिखा चुकने वाला आदि विशेषण युक्त वक्ता, ऐसा अत्यन्तर में संक्रमितवाच्य ध्वनि है, परन्तु प्रधान न होकर विवाद का पोषक ही है। यहाँ त्रासभावध्वनि की शंका न करें, क्योंकि परमवीर दुर्योधन को त्रास का लेश रहना भी संगत नहीं है । तब चिन्ताध्वनि भी नहीं कह सकते, क्योंकि सकल सेना के क्षय होने पर भी उसने विपत्ति की परवाह न की । इसे वीररसध्वनि भी नहीं कह सकते, क्योंकि मरण को स्वीकार करने से शत्रु को नीचा दिखाना रूप उत्साह का ही यहाँ अभाव है ।

यह पद्य तो इस विषादध्वनि के लिए उदाहृत नहीं हो सकता है—हे सारथी ! वायु के समान वेग वाले इन निर्दय घोड़ों की गति को स्थिर करो, मैं युद्ध नहीं देखना चाहता । प्रकुपित सर्पों के समान भुजा वाले इन क्षत्रियों के ये युद्धोन्माद-शब्द मेरे 'कान के बिल को फाड़ रहे हैं । यह उत्तम युद्ध से भयभीत विराटपुत्र उत्तर का बृहल्लावेशधारी अर्जुन के प्रति है ।

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अत्र त्रासस्यैव प्रतीममानत्वेन विपादस्याप्रतीते:, लेशतया प्रतीतो वा त्रास एवानुगुण्यौचित्येन ध्वनिगुपदेशायोग्यतया वात् । अधुनैवास्य लाभो मस्मास्वततोच्छा औत्सुक्यम् ॥

यहाँ त्रास ( भय ) ही प्रतीयमान हो रहा है, इसलिये विषाद की प्रतीति ही नहीं होती है। अन्यतः उसकी प्रतीति मान भी लें तो उसे श्रास के अनुकूल गौण रहने के कारण वह ध्वनि कहलाने योग्य नहीं हैं ।

इष्टविरहादिरत्र विभावः । त्वरा-चिन्तादयोऽनुभावा: । यदाहुः— सज्जातमिष्ठविरहादुदीप्त प्रियसंश्रुते: । निद्रया तन्द्रया गात्रशैथिल्येन च चिन्तयो: ॥ अनुभावितमाख्यातमौत्सुक्यं भावकोविदै: ॥ इति ।

'अभी मुझे यह मिल जाय' इस प्रकार की उत्कट इच्छा ही औत्सुक्य है । इष्ट का विरह ( अभाव ) यहाँ विभाव एवं प्राप्ति की शोघ्रता, चिन्ता आदि अनुभव हैं । जैसा कि आचार्यों ने कहा भी है—

सूक्तम्, अमो समीपस्थाः एतद् निनादाः शब्दा:; मे मम, श्रुतिभिरं कर्णकुहरं दारयन्ति स्फोटयन्ति ।

सूक्तम्, अमो समीपस्थाः एतद् निनादाः शब्दा:; मे मम, श्रुतिभिरं कर्णकुहरं दारयन्ति स्फोटयन्ति ।

अत्र उत्तरसस्य विपादो विद्यमानोडपि न भावपदवींआवहति, भीरुत्वेन कठोरशब्दश्रवणरूपविभावद्वेन च प्रतीमभानस्त्राम एवात्र भावः । यथाकथञ्चित् लेशतया यत्किञ्चित् कर्णद्विदर-विदीर्णनद्वारा प्राणान्तहृदया प्रतोतोडपि विवाद:, पूर्णामिध्यत्न्वेन प्रनीयमानस्य त्रासस्य आनुगुण्येन अनुकूलतया परेपकत्वेन गौणो ध्वनित्वेन व्यवहारस्यायोग्य एव ।

अत्र उत्तरसस्य विपादो विद्यमानोडपि न भावपदवींआवहति, भीरुत्वेन कठोरशब्दश्रवणरूपविभावद्वेन च प्रतीमभानस्त्राम एवात्र भावः । यथाकथञ्चित् लेशतया यत्किञ्चित् कर्णद्विदर-विदीर्णनद्वारा प्राणान्तहृदया प्रतोतोडपि विवाद:, पूर्णामिध्यत्न्वेन प्रनीयमानस्य त्रासस्य आनुगुण्येन अनुकूलतया परेपकत्वेन गौणो ध्वनित्वेन व्यवहारस्यायोग्य एव ।

औत्सुक्याद्यो भावे लक्ष्यति—अधुनैवैति । अभिलपितवस्तुनः प्राप्त्यर्थमुक्तते—छास्वरूपो भाव औत्सुक्यसंज्ञक: । इष्टस्य प्रियजनस्य वस्तुनो वा विरहोऽभावस्वरूप एवं विभावः । तत्प्राप्तये त्वरा शोघ्रकारिता, चिन्तादिश्व कार्यतयानुभावः । अत्र प्राचीन्सम्मतं दर्शयति—सज्जातमिति । इष्टविरहात्तु संजातमुत्पन्नं, प्रियसंश्रुते: उद्दोष्टं वर्धितं, तेन प्रियसंश्रितेरहृदीपनविभाव इति सूचितम्, निद्रा-तन्द्रादेहमुरुत्वानुभव-चिन्ता-दयोडनुभावा: तै: अनुभावितम् अनुभावनद्यापारसमन्ववीकृतम्, यत् तद् भावज्ञ: औत्सुक्य-भावरूपं प्रतिपादितम् ।

इष्ट व्यक्ति या वस्तु के विरह से उत्पन्न, उसी प्रिय व्यक्ति या वस्तु के स्मरण से उद्दीस ( वर्धित ) और निद्रा, तन्द्रा, देह के भारीपन तथा चिन्ता से अनुभवगोचर होने वाले भाव को भाववेत्ताओं ने औत्सुक्य कहा है ।

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निपतत्द्वाष्प-संरोध-मुक्तचाछवल्यतारकम्। कदा नयननीलाञ्जालोके मृगीदृशः ॥ अनर्थान्तरिताजनिता चित्तस्य सम्भ्रमाल्या वृत्तिरावेगः ।

नीलकमलं कदा आलोकेय पश्येयम्, यत्कमलं निपततां वाष्पाणां नेत्रविन्दुना संरोधेन स्तम्भनेन मुक्तं चाञ्चल्यं याम्यां ते तारके करनीके यस्म तथाविरम् । प्रियविरह-लक्षणेन तस्मिन्नेव वियोगे प्रियादर्शनोल्कटच्कारो आत्मनुथ्यभावः प्रतीयते । आवेगाख्य भावं लक्ष्यति—अनर्थेति । आकस्मकरूपेण अत्यन्तानिष्टघटनाया: कारणेन चित्ते जायमानः सम्भ्रमो (विक्षोभ, हड़बड़ी) को आवेग या उद्वेग कहते हैं । विश्वनाथ ने आवेग को हर्षं से भी उत्पन्न माना है ।

उदाहरणम्— लीलया विहित-सिन्धुबन्धनः, सोज्ज्यमेति रघुवंशनन्दनः । दर्पद्विवलसितो दशाननः, कुतः यामि ? निकटे कुलक्षयः ॥ एषा स्वात्मनि मनोदौर्यादुक्तिः । रघुनन्दनागमनमात्रं विभावः । कुतः यामील्येतद्वयधः स्थैय्यभावोदनुभावः । न चात्र चिन्ता प्राधान्येन व्यज्यते इति शङ्क्यते वक्तुम्, कुतः यामोति स्फुटं प्रतीतेः स्थैय्यभावेनैवोद्रेगस्येव चिन्तया अप्रत्ययात् । परन्त्वावेग-चर्व-णायां तत्परिपोषकतया गुणवैचित्र्यापि विषयीभवति ।

लीला से ही सागर में सेतु बाँधने वाले, अतुल पराक्रमशाली रूप में प्रसिद्ध वे (जिनकी पत्नी को) अपहरण किया गया है ) श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्य आ रहे हैं और रावण उनके स्वागत के बजाय दर्प से दुराचाररत हैं, उनसे हर्ष हाँ कर रहा है । तब तो सम्पूर्णं कुल का ही नाश बहुत निकट है । हाय ! कहाँ जाऊँ ? यह अपने मन में मनोदौर्य की उक्ति है । रघुनन्दन का आगमन यहाँ विभाव है । 'कहाँ जाऊँ' इससे व्यभिचारता का अनुभव है । यहाँ चिन्ता ही प्रवाहरूप से प्रतीत हो रही है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि 'कहाँ जाऊँ' इस वाक्य के द्वारा स्फुट (स्पष्ट ) रूप से प्रतीत स्थिरता के अभाव

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चिन्तोत्कण्ठा-भय-विरहेष्टानिष्टदर्शनश्रवणादिजन्याडवदयकत्तव्यार्थ-प्रतिसन्धान-विकला चित्तवृत्तिजड़ता ।

इयं च मोहात् पूर्वत: परतश्च जायते । यदाहु:- कार्याविवेको जड़ता, परयत: श्रृण्वतोऽपि वा । तद्विभावा: प्रियानिष्टदर्शनश्रवणे रुजा ॥ उत्पभावास्त्वमी तृष्णाभाव-विस्मरणादय: । स पूर्वं परतो वा स्यान्मोहादिति विद्वां मतम् ॥ इति ।

मन्दोदर्या विलापोड्यम् । लीलया अनायासेनैव विहित: सिन्धुरन्ध्रन: सागरवन्धनो येन सोऽयं परिचितो दिङ्वपराक्रमशाली समोपस्थितो रामचन्द्रो लङ्कामागच्छति । किन्तु दर्शननो रावणो दपं दुर्विलसितो दुराग्रहो, रामस्य समचीन न करोति, तं दृष्ट्वा । अत एव कुलक्षयो निकट एव । अशरणा क्वच गच्छामोति । अत्र कुलस्यैव क्षय इत्यालम्बनविभावो, रघुनन्दनागमनमुद्दोपनविभाव:, स्थायि: स्थैर्यं स्थिरताया अभाव: चञ्चलताडनुभाव: । उद्वेगस्यैव = आवेगस्यैव चिन्ताया: प्राधान्येन प्रतितीयभावात् । चर्वणायाम् = आस्वादकाले । गुणवतेन = भृश्रतया ।

जड़तास्यं भावं लक्ष्यति—जृम्भते । जितोकोत्पत्तौ पठान्तरम् । उत्कृष्टादि-शयादपि कर्तव्यपरिधेर्जड़ता भवति । चिन्तादि-सुत्पन्ना किञ्चिदतङ्ग्यविमूढता जड़ता । इष्टस्यानिष्टस्य च दर्शनेन श्रवणेन चेतस्यर्थ: ।

इयं जड़ता मोहात् = मूच्छ्र्नात् । कार्याविवेक इति । किंऽपि परयत: श्रृण्वतो वा जनस्य कर्तव्यनिर्धारणाज्ञानं जड़ता । तस्या: विभावा: प्रियस्य इष्टस्य अनिष्टस्य च दर्शनेन-श्रवणेन रोगग्र, अनुभवास्तु तृष्णाभावो विस्मृतिश्चेत्यादय: ।

( नाखुशी ) के द्वारा जैसे उद्वेग ( आवेग ) दृष्ट हो रहा है, वैसे चिन्ता प्रधानरूप से प्रतीत नहीं होती है । परन्तु आवेग-भाव के आस्वादनकाल में उसके पोषक के रूप में क्रोध बनकर चिन्ता भी यहाँ सम्मिलित होकर विषय बनती है ।

चिन्ता, उत्कण्ठा, भय, विरह, इष्ट एवं अनिष्ट के दर्शन एवं श्रवण आदि से उत्पन्न अवश्यकर्तव्य ज्ञान से विकल ( रहित ) चित्तवृत्ति को जड़ता कहते हैं ।

यह जड़ता मूर्च्छा से पहले और बाद में भी होती है । जैसा कि आचार्यों ने कहा है—किसी को देखने या सुनने वाले में कर्तव्य के ज्ञान का अभाव ही जड़ता है । इसके विभाव है—प्रिय एवं अनिष्ट के दर्शन एवं श्रवण तथा रोग, अनुभव है—चुप्पी, विस्मरण आदि । वह जड़ता-भाव मूर्च्छा से पहले या बाद में होता है—ऐसा विद्वानों का मत है ।

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यदवधि दयितो विलोचनाभ्यां, सहचचरि ! दैववशेन दूरतोड्भूत् । tदवधि शिथिलींकृतो मदीयैरस्थ करणैः प्रणयो निजक्रियासु ॥

उदाहरति—यदवधीति । हे सहचरि सखि ! दैववशेन भाग्यवशात् मम दयितः प्रियः यदवधि यस्मात्कालादारम्भ्य मम विलोचनाभ्यां दूरतोऽपि दूरं गतवान्, तदवधि तस्मादेव क लात् मदीयैः करणैः चक्षुरादिभिः निजक्रियासु दर्शन· श्रवणादिषु प्रणयः स्नेहः स्वव्यापारसक्तिरूपः, शिथिलींकृतो मन्दीकृतः । अन्र अथेलित पादपूरणे । ‘प्रणयो निजे’त्यत्र पूर्वान्त्य-परादिवर्णयोः सहावस्थानेनालोलत्वम् ।

प्रणयस्य शिथिलींकरणमनुभावः । मोहे चक्षूरादिभिश्श्वाक्षुषादेरंजननम्, इह तु प्रकारविशेषवैशिष्ट्येन बाहल्येनाजननमिति तस्मादस्य विशेषः । अत एवोदाहरणे शिथिलींकृता इत्युक्तं, न तु त्यक्क इति । अतितृष्ति-गर्भ-व्याधि-श्रमादिजन्या चेतसः क्रियांनुस्मुखताइष्यलस्यम् ।

प्रणयस्य शिथिलींकरणमनुभाव इति । मोह इति । मोहजडतयोर्‌नवैकल्य-रूपत्वात् कुतः पृथगुपादानमिति समाधत्ते——मोहे इति । मोहे इन्द्रियाणां सर्वथा क्रियाशून्यत्वं, जड़तायां तु इष्टकार्यंकरत्वं, न सर्वथा ज्ञानाभाव इत्यभ्योर्लक्षणयेन पृथगुपादानम् । प्रकारैरैति तत्कदसाधारणरूपेण बहुष्यो न तु सर्वथा । तेन क्वचिच्छाक्षुषादे-र्जननमपि जड़तायां, मोहे तु सामान्यरूपेणैव तज्जननमिति । आलस्यं लक्षणति——अतितृप्तीति । अतिमन्तुप्ति-गर्भ-रोग-श्रमादिकारणेन क्रियांनुस्मुखताइष्यलस्यम् ।

उदाहरण——हे सखि ! जब से मेरे प्रियतम भाग्यवश मेरी आँखों से दूर हो गये हैं, उसी समय मेरी आँख-कान आदि इन्द्रियों ने अपने देखने-सुनना आदि कायों में स्नेह को मन्द कर दिया है । यहाँ प्रिय का विरह विभाव है, करणों ( साधनों ) आँख-कान आदि से कायों में——उन-उन इन्द्रियों की प्रमतियों ( प्रत्यक्षों ) में प्रणय ( स्नेह ) का मन्द करना अनुभाव है । मोह-भाव से आँख आदि से चाक्षुषादि प्रतिभात नहीं होती । और यहाँ जड़ता भाव में उन-उन असाधारण विशेषताओं के द्वारा अधिकतर रूप से प्रतीति नहीं होती, किन्तु कहीं-कहीं प्रतीति होती भी है । इसलिए मोह से जड़ता का पाठान्तर्‌ ही है । मोह में इन्द्रियों के विषयों से सम्पर्क होने पर भी कदापि कुछ भी प्रतीति नहीं होती है, जब कि जड़ता में स्थूल रूप से कुछ-कुछ होती है । इसलिए पूर्वोक्त उदाहरण में ‘शिथिलींकृत’ कहा है, ‘त्यक्क’ नहीं । अत्यन्त तृप्ति, गर्भ, व्याधि, श्रम आदि के कारण उत्पन्न मन में कायों में करने

की प्रवृत्ति को आलस्य कहते हैं ।

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अत्र च नासामर्थ्यम्, नापि कार्याकार्यविवेकशून्यत्वम् । तेन कार्याकरणरूपस्यानुभावस्य तुल्यत्वेऽपि ग्लानर्जडताद्याश्वास्य भेद: ।

इस आलस्य भाव में कार्य करने में सामर्थ्य का अभाव नहीं रहता है (जब कि ग्लानि में रहता है ) और कर्तव्य एवं अकर्तव्य के ज्ञान का अभाव भी नहीं रहता है ( जब कि जड़ता में रहता है ) । इसीलिए 'कार्य का न करना' रूप अनुभाव के ग्लानि और जड़ता—इन तीनों भावों में ) तुल्य रहने पर भी ग्लानि और जड़ता से इसे भालस्य का भेद ही है ।

उदाहरणम्— निखिलां रजनिं प्रियेण दूरादुपयातेन विवादिता कथाभि: । अधिकं नहि पारयामि वक्तुं सखि ! मा जल्पन्, त्वमायसी रसज्ञा ॥

उदाहरण—हे सखि ! दूर देश से ( या बहुत दिन पर ) आये हुए प्रिय ने मुझे अनेक कथा-चर्चाओं के द्वारा पूरे रातभर जगाये रखा है । अतः मैं इससे अधिक बोल नहीं सकती हूँ । अब तू मत बोलो । क्या तेरी जिह्वा लोहे को बनी है ? ( जो मुझे अत्यन्त श्रमी रहने पर भी बार-बार पति-वृत्तान्त पूछ रही हो और जिह्वा थकती ही नहीं है ? )

समुत्पन्ना चित्ते या व्यापारा प्रविच्तिः सैव आलस्यम् । वस्तुतस्तु व्यापरमन्थरता, न तु व्यापराभाव: । अन्यथा भावरूपालस्यस्य अभावरूपतापत्ति: स्वप्न !

कार्यस्यानुभावरणरूपोडनुभाव: आलस्य-ग्लानि-जड़तासु एक एवेति कथं त्रयाणां तैक्ष्यमिति प्रतिपादयति—अत्र चेतित । आलस्येऽनासामर्थ्य कार्यकरणेऽशक्तिनं भवति, ग्लानौ तु भवन्त्युभयोभेद: । आलस्ये कर्तव्याकर्तव्यज्ञानाभावो न भवति, जड़तायां तु भवतीत्युभेद: ।

उदाहरति—निखिलामिति । हे सखि ! दूराद् हृदयेशात्, चिराद् उपयातेन प्रियेण कथाभिरित्यादिभि: अहं निखिलां रजनिं रात्रौ विवादिता जागरिता । रजनोमित्यत्रालस्याया: कम्याश्चिद्दुक्कृत: । अत्र रजनिजागरणं विभाव:, अधिकसंलापणाभावोऽनुभाव: ।

प्रिय के आगमन के दूसरे दिन में बार-बार रात्रि-वृत्तान्त पूछती हुई सखी के

कथाभिरिति । चिरान्मिलितायां प्रियायां केवलााभि: कथाभिरेव रात्रिजागरणमनुपपन्नं सत् कथाभिरिलयस्य वाच्यमदिवक्षितं, लक्षणया सुरतव्यापारं गमयति ।

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जड़तायां मोहात् पूर्ववर्त्तित्वमुत्तरवर्त्तित्वं वा नियतं, न तत्त्वत्रेत्यपरो विशेष: । गोপনीयविषयत्वाद् यदि कथाभिरित्यविवक्षितवाच्यं, तदा श्रमोद्‌स्तु परिपोषक:, श्रमजन्ये ह्यालस्ये श्रमस्य परिपोषकतया अवार्यत्वात् । अतितृप्त्यादिजनिते त्वालस्ये श्रमाद् विविक्तविषयत्वं बोध्यम् ।

जड़ता भाव में मूर्छा से पहले या बाद में जड़ता का रहना नियत है, किन्तु इस आलस्य में ऐसों बात नहीं, यह इसकी दूसरी विशेषता है । सुरत के गोपनीय विषय होने के कारण 'कथाभि:' यह पद अविवक्षितवाच्य के रूप में अपने वाच्यार्थ वार्तालाप की अविवक्षा कर सुरतव्यापाररूप लक्ष्य अर्थ के द्वारा श्रमातिशय को ही ध्वनित कर रहा है और तब तो यह श्रमध्वनि का ही उदाहरण हुआ, आलस्य का नहीं, ऐसा नहीं कहूँ मकते; क्योंकि श्रमध्वनि रहने पर वह आलस्य का ही पोषक है, क्योंकि श्रम मे उत्पन्न आलस्य में श्रम का पोषक होना अपरीहार्य हैं । ( नायक बहुत दिन पर आया है, वह बात हों में रात बिती है, यह संगत नहीं हैं, इसलिए 'कथा' शब्द से सुरत अर्थ लेना आवश्यक हैं और लज्जानिवारणार्थ नायिका सुरत न कहकर 'कथा' से काम चला रही है । ) श्रम से असंकुर्ण आलस्य का उदाहरण अतितृप्ति आदि से उत्पन्न रहेगा ।

परोल्लर्षदर्शनादिजन्य: परनिन्दादिकरणीभूतश्वित्तत्वं स्त्रिविशेष-शोभासूया ।

दूसरे के उत्कर्ष को देखने आदि से उत्पन्न, इस उत्कर्ष को निन्दादि के कारण-स्वरूप चित्तवृत्ति को असूया कहते हैं । इसे ही असहन ( असहिष्णुता ) आदि शब्द से कहते हैं ।

इमामेवासहुनादिशब्देन व्यवहरन्ति । यथा—

प्रति किसी नायिका की यह उक्ति है, जो रातभर जागने से अलसायी हुई है । यहाँ रात में जागना विभाव और अधिक बोलने का अभाव अनुभाव है ।

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कुत्र शवं धनुरिदं क न चायं प्राकृतः शिशुः। भड्रस्य तु सर्वसंहार्त्रा कालेनैव विनिर्मितः॥

एषा भग्नहंकारमुकस्य रामस्य पराक्रममसहमानानां तत्त्रत्यां राज्ञामुक्तिः। अन्र च श्रीमदाराश्रथिवलस्य मर्वोत्त्कृष्टताया दर्शनेन विभावः, प्राकृतशिशुपदगम्या निन्दानुभावः। तृणालोलतिलोचनने कलयति 'प्राचीं नके सर्रजे मौनं मुर्छति किञ्च केरवकुले, कामे धनुर्धन्वति। माने मानवतीजनमस्य सपदि प्रस्थातुकामेऽधुना ध्यातः! किं नु विधौ विधातुमुचिनो धाराधरगिरिस्वरः॥

कुत्रेति। जनकतनयां वनुर्यज्जे रामविदेपीणामनिरियम्। कुत्र परयोध्यापना शाक्यमिदं शवं शिवममन्ध धतुः? अयं रामः प्राकृतो वैशम्प्यायरहितः माघारणः: शिझुबालिश्र कच? उभयोः समरन्जोडसम्भव एव। तेन धनुर्भङ्गो नैक रामेण सम्भाव्यते। तर्हि तद् भग्नं कथमिति चेदुच्यते, तस्य भग्नस्तु मर्वसंहारकेण कालेनैव विनिर्मितो निर्धारितः। घातुनामकाथंस्ववाद् रचनार्थकस्य निमित्ते: करणार्थे प्रयोगः। निदर्शना लडूारः।

भग्नहंकारमुकस्य भग्नं हरकार्मुकं शिवधनुर्येन। तत्त्रत्यां धनुर्ज्जे सीता परिणयार्थमागतानां राज्ञाम्। पुनरसूयासमशङ्कडोर्णिमुदाहरति—तृण्णयोत। अन्र कस्यप्निदं राजकुमारस्यागर्मन् प्रस्तुतं सहमाडवकृदृमिति अप्रस्तुतेन चन्द्रवृत्तान्तेन वर्णनम्। चन्द्रोदयमाल एव मेघाडम्बरविवातारं घातारं कस्यचिदाक्रोशति—हे धातः! अधुना सायंकाले चन्द्रोदयावसरेऽपि तृण्णया चन्द्रिकाप्रासौष्ठव्या लोले चक्षुले विलोचने यस्म न स्मृतं, चकोरसमुदायैः प्राचीं दिशां कलयति पश्यति सति, किञ्च अपि च, केरवकुले मौनं दिवाकृतमुद्रणं मुखति सति, कामदेवेऽपि धनुर्धन्वति कम्पयति सति, मानवतीजनस्य माने प्रणयकोपे

कहाँ यह शिव का धनुष और कहाँ यह माघारण बालक ( राम ) ? इस धनुष को मेझे तो मबा के सहित करते वाले कालपुरुष ने ही 'किया है। यह शिवधनुष को तोड़ने वाले राम के पराक्रम को न सहने वाले वहाँ सीता परिणय के लिए उपस्थित राजाओं की उक्ति है। यहाँ श्रीमान् दशारधि राम के सैन्य को सर्वोत्त्कृष्टता दर्शन विभाव एवं ‘साधारण शिशु’ पद से ध्वनित निन्दा अनुभव है। अमर्षमिश्रित असूया का उदाहरण—हे विधाता! अभी चन्द्रोदय होने के समय सायंकाल में जब चाँदनी को देखते हेतु चञ्चल चक्षों वाले चकोरगण पूरब की ओर देखने लगे, कुमुदिनी-वन अपनी खुप्पी ( संकुचित होना ) छोड़ने लगे काम-

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अत्रापि यद्यपि तदीयोच्छृङ्खलतादि-दर्शनजन्या अनुचितकारित्वरूप-निन्दाप्रकाशानुभाविता, कविगत, विधानालम्बनासूया व्यङ्गयत इति नाकयते वक्तुम्, तथापि कार्यकारणयोस्तुल्यत्वादभिव्यक्तेना मर्षेण सकलिनेवाभौ न विविक्ततया प्रतीतेः । नहि विधानुरपराध इव भगवतो रामस्यापराध्यस्ति, येन केवेरिव वीराणामप्यमर्षोंडभिव्यज्येत । स्वभावो हि मह्हे:तत्क्रियानिगदनं वीराणाम् ।

प्रस्थातुकामे प्रस्थानुमूल्यते सति, विधी चन्द्रे, धाराराघराडम्बरः मेवाच्छादनत्वं किं तु न्वया विधानुमुचिनः ? मद्वथा नैवोचित इत्यर्थः । तदीया विधातुः, उच्च्छृङ्खलता अनुचितकारिता । विधानालम्बनया विधाने सम्बन्धिनी । कार्यकारणयोः अननुभावविभावयोः निन्दाप्रकाशोऽननादिमं नयोः तु:पद्वात्, समनन्त्वात्, असूयामर्षयोस्तुल्यविम्बानुभावकल्वादेकालोपस्थितावसूयामर्षी शाबलितैव मिश्रितैव । विविक्ततया पृथक्‌कृतया । नहोति । अमर्षमिश्रिनासूयाद्वारेणे प्रस्तुतपद्ये विधानुरपराधेनेव केवेरमर्षः । जुद्रासूयोदारहणे "कुतः शैवम्" इत्यादि पद्ये रामस्यापराध एव नास्ति, येन वीराणाममर्षः । स्वभावतो महोत्सवतिप्रकाश्येन धतुनभंगेने प्रवृत्तो न तु मत्त्सरतया ।

देव अपने धनुष को कंपाते लगे और मानवती जनों के मान घटने प्रमाण करने लगे, तत्र उमो समय चन्द्रमा पर यह मेघ की घटा याद देना क्या उचित हुआ ?

यहाँ यद्यपि विधातृा की उच्च्छृङ्खलता ( मनमानी ) ने दर्शन में उत्पन्न 'अनुचित क्रिया विधाना ने' डम निन्दा में अनुभावित कविगत विधानालिप्त अमूया अभिव्यक्त हो रही है—ऐसा कहा जा सकता है, तथापि उभयो समय अभिव्यक्त अमर्ष ( अपराध के कारण क्रोधना या चुप होना ) के माथ वह मिश्रित रूप में ही प्रकाशित हो रही है, पृथक्‌ स्वनन्त्र रूप में नहीं । अमूया एवं अमर्ष के धिव्यात और अनुभाव यहाँ समान ( एक ) हो हैं । डग कारण दोनों समय नह्लु में हों प्रनात हह्न । अनः यह उदाहरण अमपंकरीण असूया नह्लु है ।

पूर्वोदाहृत 'कुतः शैवम्' पद्य जुद्रद्‌-अमूया का उदाहरण है, क्योंकि जैसे 'लुब्धलोल' पद्य में विधान्ता का अपराध है, वैसे डम पद्य में भगवान्‌ राम का अपराध नहीं है, जिससे कि विधाता के प्रति कवि के अमर्ष के समान वीरों को मी राम के प्रति अमर्ष हो ! शिव के धनुष को तोड़ना अपराधवश नहीं, स्वभाववश हो राम के द्वारा हुश्रा, क्योंकि महान्‌ उन्नतिदायक कायं करना वीरों का स्वभाव हो है ।

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अत्राप्रस्तुत-चन्द्रवृत्तान्तेन प्रथ्नुत-राजकुमारादिवृत्तान्तमन्य ध्वननात्रास्त्यसूयाध्वनिर्न त्वमिति तु न वाच्यम्, एकध्वनेरेऽनन्तराविरोधित्वात् । अन्यथा महावाक्यध्वनेरवान्तरवान्तरावाक्यध्वनिमिः, तेऽपां च पदध्वानिमिः सह गामानाधिकरण्यं कुत्रापि न स्यात् ।

यहाँ अप्रस्तुत चन्द्रवृत्तान्त के द्वारा प्रस्तुत ( वर्णनीय ) राजकुमार के वृत्तान्त के ध्वनित होने से असूयाध्वनि, एँसा नहीं कह सकते; क्योंकि एक ध्वनि दूसरे ध्वनि का विरोधी नहीं है । तात्पर्य यह है कि एक ही जगह दो स्वतन्त्र प्रधान ध्वनियों का समावेश हो सकता है । अनः यहाँ दोनों ध्वनि है ।

वियोग-शोक-भय-जुगुप्सादीनामतिरसाद् भूताद् व्याधिरविशेषोऽपस्मारः ।

वियोग, शोक, डर, घृणा आदि के अत्यधिक होने पर या भूत लगने से उत्पन्न चित्तविक्षेपपरूप ( जिसमें गिरना, कँपकँपी, मुँह से झाग आना आदि हो जाते है ) व्याधि-विशेष को अपस्मार ( मृगी ) कहते हैं ।

महावाक्येर्देशदचोऽत्पन्नो व्याधिरविशेषोपस्मारः । व्याधिरन्तवेनास्य कथनेपि विरोषोकारेण पुनः कथनं सौभत-भयानकयोरस्यैव व्याधेरऽन्तवं नात्रस्यैति स्फोरणाय । विप्रलम्भे तु व्याध्यन्तर-स्त्यापि च ।

वियोगादीनामाधिव्याद् भूताद्वेशादच समुत्पन्नश्चित्तविक्षेपपरूपो व्याधिरेवापस्मारः । व्याधावसिमन् ज्ञानहरण-कस्म-स्वेद-लालानिपातादयो भावान्ति । ग्रहहदैनात्र पूतनादयो बालपिशाचा भूतादयो वा ग्राह्याः । विरहादयोदन्त्र विभावा: । निपतनादयोउनुभावा: ।

ननु व्याधिभाव: पृथगुक्तस्तद्विशेषस्यापस्मारस्य तदस्त्यन्तवेन पृथगुपादानं तदस्त्यन्तवेन ।

व्याधिसंज्ञक भाव पहले ही प्रदर्शित हो चुका है और यह अपस्मार भी तो व्याधि ही है । व्याधिरूप में इसका कथन सामान्यरूप से यथापि हो चुका है, तथापि विशेषरूप से इसका यहाँ पुनः कथन इसलिए हुना है कि वीभत्स और भयानक रस में

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हरिमागतमाकण्यं मथुरामन्तकान्तकम् । कष्पमानः स्वमनःकं पो निपपात महीतले ॥

अच भयं विभावः, कष्प-निःश्वास-पतनादयोऽनुभावा: । अमर्षादिजन्या वाक्प्ररुढ्यादिकारणीभूता चित्तवृत्तिरचपलता ॥

यदाहुः—

अमर्षप्रातिकूल्येष्विरागद्वेषाश्रक मतनुः । इति यत्र विभावा: स्युरनुभावस्तु भत्क्षणम् ॥

व्यर्थमिति चेत्; बोधत्स-भयानकरमयोपरसमारूप एक एष कयाश्चिद्राथीयां नमः । सूचनाय विशेषमाश्रयत्वात् । विप्रलम्भशृङ्गारेऽपस्मारेण महेन्द्राण्यादिरूपि दूष्यते । हरिमिति । अन्तकस्य यमराजस्यापि अन्नकं दिनेशान हरिं श्रीकर्णनां मधुरां कंसस्य राजधानीम् आगतं आकणर्य चारमुखानु श्रुत्वा कंः भयात् कम्पमानः स्वमन महीतले निपपात । अत्र हृयागमनजन्यं भयं विभाव, कष्प-श्वास-निपतनादि चानुभावः । चपलतास्यं भावं लक्यणयित—अमर्षेऽति । अमहर्हि पूनादेर्पादिगमितपात्र कमोर्वाक्प्रयोग-ताडनादिजनिका चित्तवृत्तिरेच चपलता। "अमर्षादिजन्य-वार्प्रकारयादि"पाठे मत्क्रमयुरागुराग्यर्थ-कदारणार्थमेकनादिप ते ममाच्चीतां "विदग्धकरस्य गुणानाक्षि परार्थवादमस्मृतः: सम्वादात्" इति मम्मटकृद्दर्शनेनैतन्यायमभिप्रेत्य "समासस्य म तया उपेक्षित" इति कविकेशरिचरणरेणीकृत् । अद, असूयादिभावलक्षणं मुखस्खा नखक्षता नखरणाच्च । चपलता हि अमर्षादिजन्या वाक्प्रकारयादि च जनयति । नहि अमयं जनयं वार्प्रकार । तत्कारणस्य चपलतास्पस्य चित्तवमानस्यादिति ।

अमर्षप्रातिकूल्येति । यत्र चपलनायामिति । अग्निः, प्रतिकूलता, ईर्ष्या, द्वेषः

हरिमा व्याधि का ग्रहण होना है, अन्य का नहीं । यद्यपि विप्रलम्भ श्रृङ्गार में अपस्मार भी व्याधि का ग्रहण होता है, अन्य किसी भी व्याधि का ग्रहण होना है ।

यमराज के भी अन्तकालय ( मरनवशाकालान ) श्रीकर्ण को मथुरा में आया हुआ सुनकर सन्नप्ता पत्रं तेज नाम लेन हुआ कंस पृथ्वीर पर गिर गया । यहां भय विभाव एवं कष्प, निःश्वास, गिरना आदि अनुभाव है ।

अमर्ष ( अपकारधी के प्रति अगहिण्णुता ), ईर्ष्या, द्वेष आदि से उत्पन्न एवं कठोरवचन, मारना, पीटना, कोमना आदि का कारण जो चित्तवृत्ति है उसे चपलता ( चञ्चलता ) कहते है । अमर्ष से चपलता एवं उससे वाक्प्रकारयादि यही क्रम है । जैमा कि कहा है—अमर्ष ( असहिण्णुता ), प्रतिकूलता, ईर्ष्या, राग, द्वेष, मत्सर ( अन्य को उन्नति से जलन )—ये जहां विभाव हों और वाक्प्रकारादि

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वाक्पारुष्यं प्रहाररक्ष ताडनं वधवन्धने । तच्चापलमनालोच्य कार्यकारित्वमियते ॥ इति ।

वालप्रयोग:, प्रहार:, ताडनं, वध:, वन्धनमित्यादियोडनुभावा: कार्यंप्रपा: । अनालोच्य अविचार्यं कार्यकरणं चापलं चपलतास्यो भाव: । उदाहरण—आहिंतेति । ‘अस्य विष्णोर्हितमहितं मत्वपकारं वा व्रतमड्ढीकृतं यस्स स तन्मस्सुड़ो । पितुरादेयादरेण नातू पापस्वरूप प्रह्लाद ! त्वं मे महहं आननं स्वमुखमुं एवं = श्रीयन्मा दंयं । त्वद्‌दर्शन-परिवर्तनाय वचाय वा अप्रीतिकार: सन्तहं स्वात्मानमेवं हनुमिच्छामि, येन मया तवं भावित उत्पादितोस्मि । तवकुत्पादनेन त्वरकृतानिष्टाचरणस्य पापो मस्सेवेनि भाव: ।

चिरकालोति । चिरकालाद् विद्यमानत्वेनैतेर्थ: ।

‘प्रह्लादे सदैव हिरण्यकशिपोपरम्भ:, किन्तु ने सदैव ने वा प्राथमिकालू आत्मवधेच्छा, अपि तु चिरवर्षानत्तरमेव । अनत आत्मवधेच्छा नामपं मात्र जnya । इयंम आत्मवधेच्छा इदम्‌प्रथममा तस्म्या भाव इदम्‌प्रथममत्ता प्रयमोत्पत्ति: । इदम्‌प्रथमकायेमू सद्ध: प्राथम्येनोत्पन्नाया आत्मवधेच्छाया: कारणं सध्य: तद्‌पूर्वक्षणे समुत्पन्ना चपलतेव, न तु चिरकालात् स्थिततोडमर्य इत्यन्न चपलताध्वनिरेव ।

बोलना, प्रहार करना, पीटना, वध करना और बाँधना—ये जहाँ अनुभव हों, वह बिना सोचे-विचारे कार्य करना चपलता है ।

उदाहरण—हे अनिष्ट कार्यं करने की प्रतिज्ञा वाला ! पिता की आज्ञा को उपेक्षित करने के कारण पापस्वरूप ! प्रह्लाद ! तू इस तरह निर्‌दं‌जय होकर अपना मुँह मत दिखा । अब मैं आत्महत्या ही कर लेता हूँ ( क्योंकि बहुत प्रयाम से भी न तो तुझे सुधार सका और न ही मार सका ), क्योंकि तुझे पैदा करने के कारणस्वरूप तेरा दुराचार मेरा ही अपराध है ।

यह भगवद्‌द्वेष में ( प्रह्लाद के ) अनुराग को हटाने के उपाय को न देखने पर समापतित भगवद्‌द्वेष पुत्र के प्रति द्वेष यहाँ विभाव है और आत्महत्या की इच्छा तथा कठोर वचन अनुभव है ।

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न चामर्ष एवात्र व्यज्यत इति वाच्यम्, सदैव भगवदनुरागिणि प्रह्लादे हिरण्यकशिपोरसदृशर्मस्य चिरकालसमभृततनैनात्मवधेच्छाया इदंप्रथममतानुरूपत्वात्, इदंप्रथमकार्यस्य चेदंप्रथमकारणप्रयोग्यतया प्राचीनचित्रवृत्तिविलक्षणाया एव चपलतया द्व्यचित्रवृत्तेः सिद्देः। न चामर्षप्रकर्ष एनात्मवधेच्छादिकारणमभिव्यज्यतामिति वाच्यम्, प्रकर्षस्यापि स्वाभाविक-विलक्षणलक्षणतया आवश्यम्‌ कतया तस्यैव चपलतापदार्थंत्वात्।

अमर्यस्य स्वभावः चिरकालः, स तु नात्मवधेच्छाजनकः, ततो लक्षणगमेवोच्यते—मर्यस्तज्जनकः। उत्कटावस्था हि स्वाभाविकावस्थाविलक्षणणा भवत्येव। उत्कटावस्था म्रुचपलता वैलक्षण्यातिशयाद् भावांतरमिति।

नोचपुुरुषेष्टवाक्रोशानादिक्षेप-व्याधि-ताडन-दाहाद्‍व्ये ष्टाद्विरह-परसम्पदर्शनादिभिः, उत्समेभ्यः स्ववशादिभिरंजनिता विषयविद्वेषाद्‌ल्या रोदन-दीर्घश्वास-शोकमुलतादिकारिणी चित्रवृत्तीनिवर्तते।

निवेदाख्यं भावं लक्षयति—नोचवैति। आलंबनभेदेन निवेदद्रय भेदो—नीचपुरुषगत उत्तमपुरुषगतरच। तत्‍ तु नीचेऽपु भरसन-गालीप्रदान-रोगारादिभिः, उत्तमपुरुषेऽपमानादिभिः सामारिकविषयाद विरागरूपा चित्रवृत्तिनिवेदो जायते। वसुनस्तु अवज्ञया उत्तमेऽपव न नीचेऽपु, आक्रोश-ताडन-परमसंपदर्शनैरपि नोन्मेषव नोनमेषव

अमर्य भाव ही यहां अभिव्यक्त हो रहा है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि मनमे भगवदन्‌ में अनुरागवाले प्रहलाद में हिरण्यकशिपु का अमर्य चिरकाल से विद्यमान रहने के कारण आत्मवधेच्छा का अभी-अभी प्रादुर्भाविकरूप में होना संगत नहीं होना है ( यदि आत्मवधेच्छा अमर्य में ही होती तो इसकें पहले भी विद्यमान अमर्य के द्वारा उत्पन्न कार्य का पहले-पहल ममात्रत कारण से ही उत्पत्ति मुक्त है, अतः चिरकाल से विद्यमान चित्तवृत्ति में विलक्षण ही एक चित्तवृत्ति, जो अभी-अभी हुर्है, उसका कारण है और वह्‌ तो चपलता है।)

यदि यह कहे कि उत्कट-अमर्य ही आत्मवधेच्छा के कारण के रूप में इर्षानि वर रहा है तो ऐसा नहीं कह मक्ते, क्योंकि प्रकार्ष ( उत्कृष्ट, अतिशय ) अमर्य भी स्वाभाविक ( सामा‍न्य ) से विलक्षण है, ऐसा मानना तो आवश्यक ही है और वही अमर्य-प्रकरपं तो चपलता कहलाता है।

निवेद भाव दो प्रकार का है—नीचपुरुपगत एवं उत्तमपुरुषगत। नीच पुरुप में गाली-गलौज, तर्जन, रोग, मारपीट, दरिद्रता, विरह, दूसरों की उन्नति देखकर आदि के कारण एवं उत्तम पुरुष में अपमान आदि के कारण-से सांसारिक विषयों से

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उदाहरणम्—

यदि लक्ष्मण ! सा मृगेक्षणा, न मदेक्षासरराणि नमेज्यति । अमुना जडजोवितेन मे, जगता वा विफलेन किं फलम् ॥

नित्यानित्यवस्तुविवेकजन्यनिरत्क्षाभावान्नागो रसपदव्यपदेशेऽत्नः । देवान्तरेऽपि रतिर्यथा—

निवेदो जायते, आधिक्षेपद्वेषाद्द्वन्द्वद्वेषाद्‌ विरहादिमिष्णु उदवेग उद्भवति रामकिस्नु विरहेणैव निवेदस्यात्पद्मेवोदवहत्वादिति । अनुभावाम्नु उभयिन् रोदनादयः ।

उदाहरति—यदैति । सीताहरणापमानेऽपि विरहेण सा रामकिङ्गमक्तिः । हे लक्ष्मण ! सा मृगनयन। माता यदि मदेक्षागरराणि मन्त्रैरपथं न गमेऽपनि । ( नदा ) मे

मम अमुना दुरवस्थापन्नेन जडदृजजीवितेन, विफलेन किं रघुना स्त । जगता रङ्गार्ण वा किं फलम् ? न किमपिर्थ्यः ।

फलम् ? न किमपीर्थ्यः । अत्र फलशब्दस्य द्विरुपादानकपस्य कविभनवद्भिरोपस्य परिहाराय 'फलम्' इत्यस्य स्थाने 'भवेत्' इति पाठयम् । तनरदाऽयें 'नदा' इति

आक्षेपलक्ष्यम् ।

नतु निवेदस्य स्थायिभावत्वादत्न शास्त्ररमेऽवनिरेव कायं न प्रणीयत इ्यैन चेत्- समाप्ते—नित्याऽनित्येति । योडसौ स्थायिभावो निवेदः न हि नित्यानित्यवस्तुनोः विवेक- जन्यः ।

भावरुपस्यास्य निवेदस्य तु आक्रोशादिजन्यत्वाद्‌भुयोगे पथ्यम् ।

चतुस्त्रशृङ्गारं रतिमुदाहरति—यथेति । र्निन्ह द्विविधा—स्त्री, परद्रव्योः परस्परानुरागात्मिका स्थायिभावस्वरुपा शृङ्गाररमाभारता प्रथमा, देवता-गुरु-मित्र- पुत्रादि-विषयक-प्रेमाख्यचित्तवृत्तिस्वरुपा व्यभिचारिभावात्मिका द्वितीया ।

पूर्वनिरूपि- विरक्तिस्वरुप निवेद उत्पन्न होता है, जो रोना, लम्बी साँस, दीन मुख होना आदि

का कारण है । वहुतः गाली, मारपीट और परस्परविद्वेषादि से नीचों में ही और अवज्ञा से उत्तमों में ही तथा विरहादि से दोनों में निवेद देखा जाता है । अनन्तर उनम

श्रीराम में विरह ने निवेद का उदाहरण प्रस्तुत हो रहा है । हे लक्ष्मण ! यदि वह प्राणप्रिया मृगनयनी सीता मेरी आँखों के सामने नहीं आयेगी तो मेरे इस जड़ ( चैतन्यहीन ) जीवन से तथा निरखंक इस संसार से हो क्या

फल होगा ? कुछ नहीं । यहाँ प्रिया का विरह विभाव एवं जीवन-जगत् का निष्फल बताना अनुभव है ।

निवेद दो प्रकार का है—एक शास्त्ररस का स्थायीभाव, जो नित्यानित्यवस्तु- विवेक से उत्पन्न होता है और दूसरा प्रस्तुत भावरुप, जो विरहादि से उत्पन्न होता है । यहाँ नित्यानित्यवस्तुविवेक के न रहने से रसचर्वणि नहीं हो सकता है ।

देवता-गुरु-पुत्र इत्यादि विषयक रतिभाव का उदाहरण देते हैं—

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भवद्वद्वारि कृत्यजजय-विजय-दण्डाडहिंसदलत्त-किरोटास्ते कीटा इव विधिमहेन्द्रप्रभृतयः । वितिष्ठन्ते युष्मत्स्थयानपरिपातोलिकलया वाराकाः के तत्र क्षपितमुर ! नाकाधिपतयः ॥

अत्रापमानमहत्त्-भगवद्वद्वारनिष्पेवन - भगवत्कृते द्रुपाताभिलापाद्विभ-ॠज्यादिगता भगवद्लसत्ता रतिनाभिव्युज्ज्यते, अपि तु भगवद्वद्वारगमन-वसु-नगोचर इति नेदं, तथापि तादृशशवदंशद्रव्यवर्णनानुभावितया कवितागत-भगव-दालम्बनरतया ध्वनिततमक्षतमेव !

तत्त्वादिह लक्षणं नोक्तम् । भवद्वदारोति । हे क्षपितमुर ! मुराम मुर-नासक पालयोर्दण्डाभ्यामनुमतिप्रवेशनिवारकास्मां वेदणडाभ्यां या अनिराधारः तेन द्रुतः स्कुटत: किरोटा येषां ते कीटा इव रदोपरि भवत्स्थयानपरिपानो- कण्टका विविधे पेण यत्र तिष्ठन्ति, तत्र वाराकी दीनाः ( महेन्द्रादिप्रेक्ष्यतल्पप्रभावा: ) नाकाधिपतयः स्वर्गराजाः यम-कुबेरादयः के भवन्ति ? तेभां कुतr गणना ? कुबेरादयो हि स्वर्गे राजानः, उदधिसुतु महाराजोडन एव महेन्द्रः !

अत्रोक्तम् । ननु रतिभावादिहेतॄनैमित्तिके न सम्भवति, तदार्घिपेक्षणाद्र तु रभावदिनापि भवितुमर्हति, मर्वप्रभूणां ब्रह्मादीनां तथाचारणेन भगवद्देवस्यो द्रविसाममिति वस्तु-है—( १ ) स्त्री-पुरुष के परस्पर अनुरागस्वरूप स्थायीभाव, जो शृंगार रस का आधार है और ( २ ) देवगुरु-मित्र-पुत्रादिदिविषयक अनुरागस्वरूप व्यभिचारिभाव । स्थायीभाव-निरूपण के अवसर पर लक्षण निरूपित हो जाने के कारण रति का लक्षण यहां नहीं दिया गया है ।

हे मुरारे ! आपके द्वार पर जहाँ जलद्वारों से प्रवेश करते वान् पर विग्रहते हुए जय-विजय नामक द्वारपालों के द्वारा दण्ड-प्रहार से भरत्नकुठ वाकि रक्षा, महेन्द्र आदि रयमप्रभु भी कीड़ों के समान अपने पर आपकी दृष्टि पुणे होने से खड़े रहते हैं, वहाँ ये स्वर्ग के द्रुत राजा लोग ( यम, कुबेर आदि ) कौन होते हैं ? ( महेन्द्र के उल्लेवन रहने के कारण 'स्वर्ग के राजा' कहलने से कुबेर आदि धन, प्रशासन, जल, शिक्षा आदि विभागीय स्वर्गराजाओं का ग्रहण हो उचित है ।)

यहाँ रक्षा आदि के द्वारा अपमान गहना, भगवान् के द्वार पर खड़ा रहना, भगवान् के कटाक्ष पाने की अभिलाषा आदि के द्वारा ब्रह्मा आदि महान् देवों में स्थित भगवद्द्वयक रति अभिव्यक्त नहीं हो रही है, अपितु 'भगवान् का ऐश्वर्य वाणी और मन से परे है' यह वस्तु ह्रां ध्वनित हो रही है—यद्यपि ऐशा कहा जा सकत्म है.

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इदं वोदारणम्—

न धानं, न च राज्यसम्पदं, नहि विद्यामिदमेकमर्थने । मयि धेहि मनागपि प्रभो ! करुणाभडारनतर्गलितां द्रुशम् ॥ अथ धानाद्यपेक्षाशून्यस्य भगवद्रूपगतपाताभिलाषो हि भगवत्य- स्यान्तानुरक्त व्यनक्ति ।

एवं संक्षेपेण निरूपिता भावः ॥

'अथ कथयिष्य संक्षेपानियमः, मात्सर्योद्धेग-दंभेष्ट-विवेक-निर्णय-कलेपय-क्षमा-कुतुकोत्कण्ठा-विनय-मञ्जषा-ग्रास्थादीनामपि तत् तत् लक्षणादिति

ध्वनिनिरेवाव्रेति चेष्टं, तादृशेन वस्तुना चरमप्रतीकाले कविगतानाया रतंरेव स्कुटनया प्रतीतेरत्र भावध्वनित्वमेव । यदि वस्तुध्वनिरेवात्र प्रधानं न भावध्वनिरिल्येवामहन्ताहि वस्तुध्वनयसम्पक्-मुदाहरणान्तरं प्रस्तौति —न धनमिति । हे प्रभो भगवन् ! अहं त्वत्तो न तु धनं, न वा राज्यं, न वा विद्यामेव, अपि तु एकमेव त्वं अर्थ्ये याचे यन् त्वं मनागपि ईपदपि संक्षेपेणैति । भेदादि-विचारं विनैव । व्यभिचारिभावा निरूपिता: ।

अस्य = भावस्य । संख्यानियम इति । त्रयस्त्रिशदेव व्यभिचारिभावा, न ततोधिका इति नियम: कथमिति प्रश्न:। उद्देगस्यादिवर्गपर्यायवर्ग-मूलकृतैवोक्तत्वात्

ध्वनित होना स्थिरर होत हैं । वस्तु के द्वारा अन्ततः रतिभाव का ही प्रकाशन होना है । अथवा रतिभाव का स्वतन्त्र ( वस्तु से अभिन्न ) उदाहरण--

तथापि उस प्रकार के भगवान् के ऐश्वर्य से प्रकाशित कविगत भगवद्रूप्यक् रति का

हे प्रभो ! मैं आप से न धन, न राज्यसम्पत्ति और न विद्या ही माँगता हूँ, अपि तु यह एक मात्र मेरी याचनना है कि आप मुझ पर थोड़ी भी दयाभरी चेष्टा से उछलती हुई दृष्टि डाल दें ।

यहाँ धन आदि की अपेक्षा से शून्य किसी सक्त की 'भगवान् के द्वारा दया-दृष्टिपात की अभिलाषा' भगवान् में अत्यन्त अनुराग को व्यक्त कर रहा है ।

इस प्रकार संक्षेप में ( भेद-निरूपण को छोड़कर ) चौंतीस व्यभिचारिभावों ( भावध्वनियों ) का निरूपण सम्पन्न हुश्रा ।

अब प्रश्न उठता है कि इन भावों की संख्या ३३ हो है, ऐसा नियम कैसे करते हैं ? क्योंकि इनसे भतिरिक्त मात्सर्य ( दूसरे की उन्नति से जलन ), उद्वेग ( उत्तेजना ), दंभ ( घमंड ), ईर्ष्या, विवेक, निर्णय, कलेपय ( पौरुषहीनता ), क्षमा, कुतुक ( उत्सुकता ), उत्कण्ठा ( आकांक्षा या लालसा ), विनय, संशय, दृढ़ता आदि भी

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चेद्, न; उक्तेषु वैपामन्तर्भविण संख्यान्तरनुपपत्ते;, असूयातां मात्सर्यस्य, त्रासादुद्रेगस्य, अवहिस्थाख्याद् भावाद् दम्भस्य, अमर्षाद् ईर्ष्याया:, मत्सरद्वेष-निर्णयो:, दैन्यात् क्लैष्यस्य, धूते: क्षमाया:, औत्सुक्यात् कुलकोत्कण्ठयां:, लज्जया विनयस्य, तर्कात् संशयस्य। नापलापद् आष्टर्यस्य च वस्तुत: सूक्ष्मे भेदेऽपि नान्तरीयकत्वात् तदनन्तरिरक्तस्यैवाध्यवसायात्, मुनिवचनानुपालनतया सम्भव उच्यते:ऽनौचित्याच्च।

भावरूप में ही उन-उन प्रयोगों में देखे जाते हैं। तो इनके रहने पर बाधाओं की संख्या बढ़ जानो चाहिए, ऐसा नहीं है, क्योंकि पूर्वोक्त ३३ भावों में ही इनके अन्नभाव हो जाने मे उत्त. संख्या से अधिक संख्या उपपन्न नहीं होती । यद्यपि जिन-जिन भावों मे इन मात्सर्य आदि को गणार्थ करते हैं उन-उन से उनका सूक्ष्म भेद है ही; यथा---असूया से मात्सर्य का, त्रास से उद्वेग का, अवहिस्थ मे दम्भ का, अमर्ष मे ईर्ष्या का, मत्सर मे द्वेष और निर्णय का, दैन्य से क्लैष्य का, धूर्ति से क्षमा का, औत्सुक्य से कुलकोत्कण्ठा का, लज्जा से विनय का, तर्क से संशय का तथा नापल से आष्टर्य का सूक्ष्म भेद रहने पर भी इनके अविनाभाव ( अनिवार्यरूप से परस्पर जुङे रहने ) के कारण असूयादि को लक्षण ही न करना करेगे कि उनके अन्तर्गत मात्सर्यादि भी आ जायँ, इससे भावों की संख्या वहाँ रह जाती है। तात्पर्य यह है कि असूयादि स्वरू मे मात्सर्यादि रहता ही है, उसे असूयादि के लक्षण मे ही गतार्थ कर लेते हैं। भरतमुनि के वचन का पालन न करने पर मनमानो स्वतन्त्रता अनुचित होगी और अध्यवस्या कील जाते है, जब कि देवादिविषयक रति को लेकर इत्यादि ।

कथनौचित्यम् । उक्तेषु = त्र्यासत्रशृङ्गारवश्पु गणार्थस्यादेपां पूर्वग नोल्लेगु र्त्ति मस्य-नियम: समुचित एव इत्युतरम् ।

उक्तेषु = त्र्यासत्रशृङ्गारादिवश्पु गणार्थस्यादेपां पूर्वग नोल्लेगु र्त्ति मस्य-नियम: समुचित एव इत्युतरम् । नान्तरीयकेति । असूया-मात्सर्ययो:, त्रासोद्रेगयोश्चापि सूक्ष्ममन्तरा भेदोऽस्ति, तथापि तत्तदुदाहरण उभयोरपिनाभावो दृश्यते। यत्र मात्सर्यं तत्र अनिवार्य-कृतकेन असूयादिलक्षणेनैव तथा कृतके असूयादिलक्षणेनैव उज्जेगादय: । अन एव मात्सर्यादीनां गूथरलक्षणम-असूयादित्स्वेन्त अधयवसायो बोधो भवति । मुनिवचननेति । भरतन्त 'एकोनपञ्चाशदभावा:' इति नाट्यशास्त्रे ससमाद्याये निरूपितम् -अष्ट स्थायिभावा:, अष्ट सात्विकभावा:, त्रयस्त्रिशच्च व्यभिचारिभावा: । शममहिना: पञ्चाशद, देवादिविषयक-रतिरहिनाष्ट

एकोनपञ्चाशद् भावा इति । मूलन: स्थायिसात्विक-व्यभिचारिणां मस्कृतनेन ४९ एकोन-पञ्चाशद्भावा: मुनिसम्मता:। तथ च स्वीकरणसम्भवे उच्चशृङ्खलनाया: तद्वतुलशृङ्खनरूप स्वान्तरङ्गस्य अनौचित्याद्यध्यवसायात्प्रस्तुत संख्यानियमस्वीकरणमावश्यकमेव ।

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एपु च सख्वारिभावेषु मध्ये केचन केपांचिन् विभावा अनुभावाश्र भवन्ति । तथाहि—इष्ट्याद्या निर्वेदं प्रति विभावतत्वम्, अमूया प्रति चानुभाव- त्वम् । चिन्तया निद्रा प्रति विभावतवम्, औत्सुक्यं प्रति चानुभावतत्यादि स्वयमूढ्यम् ॥

अथ रसाभास:। तत्र—अनुचित-विभावालम्बनत्वं रसाभासत्वम् । अनुचितेति । हर्षादयो ये सञ्चारिभावा निर्वेदिनोऽनेन क्रतापि नुदाचिदु विभावा स्थले तज्जन्यत्वात् साजनुभावत्वात् यान्ति । यथा अपि चिन्ता नित्राद्या नायम् इारः, न प्रमिद्रा मेवेति चिन्ता निद्रोपचाररूपेण निद्राया विभाव इत्यादि चरमप्रसङ्गादि दृष्ट्या स्वयमेवास्वादकैर्हतनीयम् । रसाभासत्वमिति । रसस्य आभासः प्रकार आवर्तते यत्र तनू रूपो रसाभास: । अनुभूते विभाव आलम्बने यद्यत् स अनौचित्यविभावालसन्न एव रसाभासः। लोकानामिति । वस्तुतः सहृदयानां मख्येव वक्तव्यम् ! लोके हि स्वोयानिरिकतान् नायिकानानमुचितलेटपि साहिल्ये तामां वहुत्र समुचितत्वप्रनादनान् परस्वामिति वक्तव्ये मुनिपत्यादित्यानुपदमेवोक्तत्वात् ! शृङ्गारेऽनुचितविभावत्वं हि परस्परानुरक्तयोः स्त्री- पुंसयोरन्यतरस्य पुष्ट्यत्वं, बहुनायकानुरक्तात्वं तयोरे कतरस्याप्यनुरक्तत्वक्षोःत कविमतय- प्रसिद्धम् । वस्तुतो नायकस्य स्वपरिणीतता, स्वपरिणययोग्या कुमार्या, वस्त्या चैति त्रिविधैव नायिकाचिता, तद्वृत्तौ सर्व अपि अनुचितता एव ।

अत: भावों की संख्या पूर्वोक्त से अधिक नहीं मानी जा सकती है । इन हर्षादि ३३ सञ्चारिभावों में कितनें ही किन्हीं के हो जाते हैं। जैसे कि—इष्ट्या निर्वेद का विभाव एवं असया के प्रति अनुभाव है। चिन्ता निद्रा के प्रति विभाव और औत्सुक्य के प्रति अनुभाव बन जाती है। इस प्रकार अन्य भावों के विषय में भी स्वयं ऊह करना चाहिए । अब रसाभास का निरूपण करते हैं। उसमें पहले इसका लक्षण दिया जा रहा है। जिसका आलम्बन विभाव अनुचित हो वह रसाभास ( रस का प्रकाश या आकृति वाला ) है । विभाव एवं रति के अनौचित्य का ज्ञान लोकव्यवहार से जानना चाहिए ।

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'अनुचितमिति' धीरिति केचित् । तदपरे न क्षमन्ते, मुनिपत्न्यादिविपयकरत्यादे: संग्रहेऽपि बहुनायक-विषयाया अनुभयनिष्ठाया अश्र रतेरंगग्रहात्, न तु विभावगतानौचित्यास्याभावात् । तस्मादनौचित्रयेन रत्यादिविशेषणीय: । इत्थं चानुचितत्विभावाल्लवनाया बहुनायकविषयाया अनुभयनिष्ठायाश्र संग्रह इतिअनौचित्यं च प्राग्वदेव ।

केचित् इत्यर्थ: ! नवीनाः इत्यर्थः: बहुनायक-रतिस्थले एकनायकानुरागस्थले च विभाव में सामाजिकों को "अनुचित हैं" इस प्रकार का बोध हो, उक्त भाव रस न होकर रसाभास बहलाता है—ऐसा किन्हीं (प्राचीनों) का मत है । ( पण्डितराज जगन्नाथ का भी यही मत है, क्योंकि सूत्र में भी यही है । यहाँ 'लोकानां' के स्थान में 'महूदयानां' महसूा है । उक्तिन है । लोक में तो विवाहितासे अनिरक्त मभा रति के अनुचित माने जाने पर भी महूदयजन बहुस्या परकोष्या का वर्णन कर देने हैं ! उनके लिए श्रृंगार रस का अनुचित विभाव के रूप में यह कहा जा सकता है कि परस्पर अनुरक्त स्त्रो-पुरुष में कोई एक-दूसरे का प्रेय, बहुन पुरुषों में अनुरक्त स्त्री और दोनों में एक अनुरागहीन । ऐसा इसलिए कहा गया कि आगे सूत्र में ही 'परस्प्रा' कहने के स्थान में मुनिपत्न्यादि का उल्लेख किया है! वसुनः तीन प्रकार की हो नायिका उचित हैं, शोक अनुचित ही है—( १ ) स्वकीया, स्वपरकीयागोभय कुमारी पवं वेश्या ) ।

हेरिज्जदीन । प्राचीनाः: पण्डितराजाह्वेति । सूत्रे आरम्भतिबिन्दु अव्यनौचित्यस्य विशेषितत्वात् । बहुनायकविषया रतिरहि नायकगणतहुल्वान्नौचि-यात्वानु-चिन्ता, अनुभयनिष्ठा रतिरिरपि रत्यभावाविशिष्ट अलम्बनानौचित्यादेवानुचितेति प्राचीनमतेऽनुपदमेवाक्षतदोषयोद्धाराच्च ।

पूर्वोक्त मत कि अनुचित विशेषण विभाव का है, हमको अन्य (नवीन) आचार्यों नहीं मानने हैं, क्योंकि पूर्वमत में मुनिपत्नी आदि विपयक रति के संग्रह (अनुचित रूप में ) होने पर भी अनेक नायक-विपयक एवं दोनों ( स्त्री-पुरुषों ) में ' रहकर एक में ही रहने वाली रति का अनुचित रूप में संग्रह नहीं हो पाना है, क्योकि वहाँ (बहुनायकस्थल एवं एकपक्षीय प्रेमस्थल में ) विभावगत अनौचित्य नहीं है । अतः रसाभास के लक्षण में अनौचित्य से रति, हास, शोक आदि स्थायीभावों को विशिष्ट करना चाहिए । अर्थात् अनुचित स्थायीभाव के रहने पर वहाँ रसाभास होता है । इस तरह अनुचित आलम्बन विभाव वाली, बहुनत नायक में एक नायिका का अनुराग वाली एवं एकपक्षीय इन तीनों रतियों का संग्रह हो जाता है । इस द्वितीय मत में भी अनौचित्य का विवरण पूर्वप्रतिपादित के समान ही होगा ।

( यहाँ पूर्वमत में भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि आलम्बनगत दोष से ही रति

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तत्र रसाद्याभासत्वं रसतवादिनः न समानाधिकरणं, निर्मलस्यैव रसादित्वात्, 'हेतुर्वाभासत्वमिव हेतुत्वेन' इत्यके। ननुचिनतत्वेनात्महानिः, अपि तु सदोषत्वादाभासत्वहारः, अश्वाभामादिवद्यथापरे।

में भी अनुचितत्व आता है। बहुनायकविपयक रति में नायकगण बहुत्व ही दोष है और एकपक्षीय रति में रतिभावविशिष्टत्व हो अनुचितत्व है, जो आलम्बन में ही है।

विभावः समुचित एव, किन्तु तत्र रतिनिबन्धनुचिनेयायः। रत्यादिर्हति। नवीनमतेऽनुचितस्थायिभावत्वं रसाभासत्वमित्येव लक्षणम्। आङ्गिकादि हावशोकादीनां ग्रहणात् प्रङ्गिवादिते। लोकव्यवहारात् हि भावः तत्रैति। रसाभासे रसस्य भावस्य वा आभासत्वं प्रतिनि रुणेऽपि ज्ञानं रसत्वेन न व्यवहार्यम्। निर्मलस्य दोषपरहिनैवस्य। यथा—रत्यादिकत्वेऽपि हेतुरभावममानो हेत्वाभासोऽपि न हेतुः, यथावत्। नायङ्गपक्षः—इत्येपामाचार्याणां मनम्।

रसाभास को रस मानें या न मानें—इस विषय में दो मन दिखाने हैं। रस और भाव के आभास का रस के साथ समानाधिकरण नहीं हैं—दोनों एक स्थल में नहीं रह सकते, क्योंकि निर्मल ( निर्दोष ) को ही रस कह सकते हैं और जैसे हेत्वाभास ( दुष्ट हेतु ) का हेतुरूप में ग्रहण नहीं होता है ( और माहिष्य में विरोधाभास का विरोध के द्वारा ग्रहण नहीं होता ) वैसे ही रसाभास का रस के रूप में ग्रहण उचित नहीं है—यह कुछ विद्वानों का मत है।

अपरमतानुसारेण रसाभासोऽपि रस एवेत्युभयोः मामानाधिकरण्यमेव। रसाभासस्य अनीचित्यमेव बीजम्, तस्य दोषपरत्वमेव। अनुचितत्वेन दोषमदूषणं नैव स्वरूपहानिः कीटविद्धरत्नादिवत्। आभामद्यवहारस्य दोषयुक्तत्वादेव रसस्य आभासो दोषो रसाभास इति। दुष्टोद्भवोऽङ्गावभासो, दुष्टो मतद्यो मन्तव्याभानो यथैव तथैव दुष्टो रसो रसाभासः इत्युष्टोद्भवानौचित्यरम्यदिमत्त्वम्। रसस्याङ्गणतु चितस्थायिभाव-निवारकस्यानुकत्वेन रसाभासेऽपि रसवद्वहारः। न कापि वाया। हेतुरपि दुष्टत्वे विद्यमानोऽपि त्याज्यतयैव ज्ञायते नाभावतया। तस्माद् रत्याभासत्वेन दृढतान्नोऽपि समानाधिकरणे बाधक इति।

किसी के अनुचित रहने पर स्वरूप की हानि नहीं होती, दोषयुक्त रहने के कारण हो इसे आभास कहा गया है, जैसे दुष्ट ( बुरी चाल वाले ) घोड़े को अश्वाभास कहते हैं, वैसे ही अनुचित विभाव वाले रस को ही रसाभास कहते हैं—ऐसा अन्य आचार्यों का मत है।

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शतेनोपायानां कथयमपि गतः सौधशिखरं सुधाफेनस्वच्छे रहसि शयितां पुष्पशयने । वित्रोंध्य क्षामाझीं चकितनयनां स्मेरवदनां सनिश्वासां शिलष्यत्यहह !! सुकृती राजरमणोऽस्म्‌ ॥

कवचित् सुकृती पुण्यकवान् कामुक उपायानां शतेनापि परमोच्चप्रासादारहणानुकूल्यवाराणां शतैरपि क्लेशेन सौधशिखरं राजप्रासादस्योच्चतमप्रकोष्ठं गतः प्राप्तः, तत्र सुधाफेनवत्निर्मलेऽतिद्वले पुष्पशयथ्यायां रहसि एकान्ते शयितां सुतां क्षामाझीं विरहातिशय्यादत कशाध्नीं राजरमणीं विवोद्य जागरयित्वा, तां चकितनयनां दुःखरनदागमनविस्मितनमनां स्मितमुखीं अहह ! निःश्वासेन महितं यथा स्यात्तथा शिलिष्यत्यालिङ्गति ।

अत्रोल्लासवत्न्म अनुचितप्रणयां राजरमणीम्‌ । रहो-रजन्यादौ उद्दोपनम्‌ । साहसेन राजान्तःपुरे रमनं, प्राणेभ्युपेक्षा, निःश्वासाइलेषाद्यश्रानुभावा: । रत्का-दयश्र सङ्कारिणः । निषिद्धालम्बनकत्वाच्चास्या रतेराभासत्वं रसाभास्य ।

अनुचितेति । अनुचितः साधारणपुरुषाश्रितः प्रणयोरस्स्या: । रहो-रजन्यादि एकान्त-रात्रिप्रभृति । निषिद्धं सहृदयैरनुचितत्वेन ज्ञातमालम्बनं प्रच्छन्नकामुकसहिता राजरमणी, तदाश्रितमिदमुदाहरणं रसाभासस्य प्रथमभेदस्यैव ।

रतिविषयक रसाभास तीन प्रकार का है— ( १ ) साधारणजन का नृपत्नी, राजपत्नी आदि विषयक, ( २ ) बहुनायकाश्रित-नायिकाविपयक और अतभयनिष्ठ ( एकपक्षीय ) । क्रमशः तीनों का उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है—

सैकड़ों उपायों के द्वारा किसी-किसी तरह ( कड़े पहरे के बावजूद बड़ी कठिनाई से ) राजमहल के ऊपरी प्रकोष्ठ में पहुंच कर पुण्यकवान् कोटि युवक एकान्त में अमृतफेन-तुल्य स्वच्छ फूल की शय्या पर सोई हुई कृष्णाझी ( विरह के कारण दुबली ) राजपत्नी को जगाकर उस चकित आँखों वाली मुस्कानभरी रमणी को दीर्घं निःश्वास लेता हुआ आलिङ्गित कर लेना है, यह आश्चर्य है ।

यहाँ आलम्बन विभाव अनुचित (परपुरुष में) प्रेम करने वाली राजा की रमणी है । एकान्त एवं रात आदि उद्दीपन विभाव है । साहसपूर्वक राजा के महल ( रतिवास ) में जाना, प्राणों की उपेक्षा, निःश्वास, आलिङ्गन आदि अनुभाव है और शंका आदि संचारीभाव है । निषिद्ध ( अनुचित ) आलम्बन ( नायक-नायिका ) वाली इस रति के कारण यहाँ रस का आभास है । अर्थात् यह अनुचित आलम्बन वाले रसाभास का उदाहरण है ।

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न चात्र चकितनयनतांमित्यनेन परपुरुषोपसंघानाभिव्यक्त्या रतेरतुभयनिष्ठतेत्याभांमिताहंतुवाच्यः। अस्याहच चिराय तस्मिन्नारक्तिः... अनन्तःपुरे परपुरुपागमनस्थायान्तत्सनाभावयतया 'क एप मां ध्यायति' इत्युच्यते। एवन्नासः। अनन्तरं च परिचयाभिव्यक्त्या 'शोच्यं मत्प्रियं म;धयं प्राणान्तपि तृणीकृत्यागत' इति ज्ञातदुत्पन्नं हृदयंभिव्यज्यत इति 'स्मेरदशनाम्बु' इति विशेषणं रति तदीयामपि कचनशक, परन्तु प्राधान्यान्न त;च्याभिनिर्गवा मति न चैः। इदंवावाक्यार्थ-तत्त्वात्। यथा वा—

यदि कहें कि अनुभयनिष्ठ रति वाले रसाभास का ही उदाहरण है। क्योंकि 'चकितनयनां' इस पद से परपुरुषोपसंघान को शंका से काम की हुई अभिव्यक्ति होती है, रति की नहीं और तब तो नायिका में रति न रहने से यह एकपक्षीय हृदय—तोरतिव्रास में परपुरुष के आगमन का अत्यन्त असम्भव होने के कारण (उस नायक के आगमन की संभावना के अभाव में ) 'कौन यह मुझे जगा रहा है' इसमें काम ( भय ) उचित ही है। इसके बाद त्वरित परिचय के व्यक्त हो जाने पर 'वहां यह मेरा प्रिय मेरे लिए प्राणों को भी तिनके के समान मान कर आया है' इस ज्ञान से उत्पन्न हर्ष को प्रकाशित करते हुए "स्मेरवदनाम्बु" यह विशेषण उस ( नायिका ) की रति को भी व्यक्त कर रहा है। (उक्त विशेषण से नायिकानिष्ठ हर्ष एवं रति दोनों व्यक्त होते हैं और तब रति का नायिकानिष्ठ हो जाने पर उभयनिष्ठता सिद्ध हो जाती है, क्योंकि रति नायकनिष्ठ तो पूर्व से हो है। परन्तु प्राधान्य तो नायकनिष्ठ रति की

न धात्रेति । सुतादिस्थाया। मद्योजागरणातनन्तरमर्माप नायिकाया रोरभ नोदतुपूर्णपाति। किन्तु : 'स्मेरवदनां' इति विशेषणं तस्या हृदयं क्रकुज्जयतु रतिमभिव्यनक्ति। तथच नायिका अपि रतिविशिष्टयैवि नेदमुदाहरणमनुगयति श्रितस्खेत्तत्पक्ष-भिप्रायः ।

यहां पर 'न धात्रेति' इस पद से यह दर्शाया गया है कि नायिका को मद्योजागरण के बाद अपने प्रियतम के आगमन का पता चलता है और वह रोरभ ( रोरुदती ) हो जाती है। किन्तु 'स्मेरवदनां' इस विशेषण से यह दर्शाया गया है कि उसके हृदय में हर्ष और रति दोनों की अभिव्यक्ति होती है। इस प्रकार नायिका भी रति से युक्त है, यह दर्शाने के लिए यह उदाहरण दिया गया है।

तदीयामपि । 'हृपसमुच्चायकौतिप:' इति भतृनैगेो वारयालिनं मम्यकु परोक्षैव लिख्यति । सरलकृतु अन्वयेनापिसा नायर्र्जैन मगच्वायमति— तदनेनात्रया-स्वयपरीक्षा निरपेक्षमेव। नहि 'स्मेरवदनां' इति विशेषणं न;पिचरितमय नायरक-रतिमभिव्यनक्ति। येन नायकतदेन तस्याः सफलत्वः। स्थितं तु 'किचिन्नायकरतेः पूर्वोक्तदशैव । अन केवलं नायिकारतिरेव माध्या, तयाैव उभयनिष्ठता रनेरभिप्रेताि मिद्धा भवति ।

यहां पर 'तदीयामपि' इस पद से यह दर्शाया गया है कि नायक की रति भी अभिव्यक्त होती है। 'हृपसमुच्चायकौतिप:' इस पद से भतृनैगेो ने वारयालिन को परोक्ष रूप से लिखा है। सरलकृतु अन्वयेनापिसा नायर्र्जैन मगच्वायमति— तदनेनात्रया-स्वयपरीक्षा निरपेक्षमेव। नहि 'स्मेरवदनां' इति विशेषणं न;पिचरितमय नायरक-रतिमभिव्यनक्ति। येन नायकतदेन तस्याः सफलत्वः।

वस्तुतः सन्दभीव्यो हि नायककरतिसम्भूच्चयात्मकस्वमप 'अपि' सदस्मः पदेध्वन । अन एव रतिमपौत्यनुत्स्या तदीयामपिोति लिख्यनं सङुच्यते। धर्मंहि यत्पदाच्यवहितपे प्रगुज्यते तत्पूर्ववैनैविन नियमात् नायिकारतिप्रयोगोगिनी नायः्चात गमुच्चायर्यति ।

वस्तुतः सन्दभीव्यो हि नायककरतिसम्भूच्चयात्मकस्वमप 'अपि' सदस्मः पदेध्वन । अन एव रतिमपौत्यनुत्स्या तदीयामपिोति लिख्यनं सङुच्यते।

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भवनं करुणावतीं विगन्तीं गमनाज्ञालङ्घनलाभलालसेपु । तहणोेप दिलोचनाजनसालामथ दाला पथि पातयास्वभूव ॥

बहुनायकविपर्यरतिस्वरूपं हृदयं रमाभाममुदाहरति—यथा वेति । कारिचद् बाला ग्रामान्तरान् स्वगृहं मागच्छन्ती मत्ती ( स्वगृहम्-एव-मागत्य ) स्वभावतः (प्रवेशकाले) पथि 'चिरानुगमनानन्तरं गमनस्य परावर्तनस्य आज्ञाया योः लेशस्तस्य लाभाय लालसा येषां' तेपु अनुरक्तेपु तरुणोेपु करुणावती दयावती मतीः अव अन्यतो बिलोचनाजनमालां नयनकमलश्रेणीं कलिपयकटकाटकान् पातयामास निक्षिप्तवती । अप बालयाः अनुरक्तेन तरुणोेप दृष्टिपातेन च बालायाः रणिरभियुक्तेन ।

निजसेवेलति । प्रीत्यानुगमनरूपां तरुणदलकृतां मुख्या: मेवा तरुणा हृदये मनागपि स्थानं ललकुर्वती न वेति ज्ञात्वा 'भवस्तः स्वगृहम् प्रति पथस्थातम् रक्षेत्' इति प्रतिपत्स्युक्तवन्तौ ।

ही है, क्योंकि यह सम्पूर्ण वाक्यार्थ हो है । अन्य ( तात्कालिक रति ) नो आयमे एकदेशीयार्थं पर ही आधृत है । बहुनायकविप्रकृष्ट मतिद्वाले रमाभास का उदाहरण—कोऽपि तरुणी रसपरे गालिव मे अपने घर जा रही थी, रास्ते में एक तरुणदल् उगको पीछे मोहित होकर चल रहः थ, जव वह वाताः अपने घर प्रवेश करते लमयी तो ये युवतणः मत्त गयः कि आः हमें यह तरुणी प्रस्थान करने की आाज्ञा दे नो हम उन्में में कुनार्यः हों जायेंगे । दयावनी उस तरुणी ने राह पर नत्रे उन युदकों पर नयनकमल कौ श्रेणीं ही जाल् दी । हमीं से वे अपने को धन्य नमअ कर चले गये । यहाँ कहीं मे आनी हुंई यवनो का, राह में उन्मः रूप और यौवन से आकृष्ट मनवालों युवकों ने पोछे-पोछे चलना शुारू कर दियाः । जव यह अपने घर के पास पहुंचकर घर में प्रवेश करने लगी तो वे वहाँ मक् गये । देर तक साथ रहने पर भी उस तरुणी का न तो वचन सुना और न हो नगद हो मिले सके । आाखिर सुन्दर तक अनुरमनरूप अपनी सेना को सारथकता ( इस सेवा का स्थान उस तरुणी के हृदय में कुछ है या नहीं ) को जानने के लिए 'अब आपलोग जा सकते हैं' इस आाज्ञा को पालने के हेतु वे युवक तरस रहे थे । वह तरुणी भी उनके अथक परिश्रम को जानकर दया से उन पर अपने नयनकमल से एक नज़र डाल दी, जिससे उन्हें 'जाने की आाज्ञा' इसल

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यथा वा— भुजपल्लवे गृहीता, नवपरिणीता वरेण वधूः । तत्कालजालपतिता, वालकुरङ्कींव वेपते नितराम् ॥

अत्र रतेनावबद्धा मनागप्यस्पर्शादनुभर्यादिम्रहेनाभासत्वम् । तथा चोक्तम्— 'उपनायक-नंसस्थायां, मुनि-गुरुपत्नीगतायां च । वहुनायिक-नदपियायां, रतिः तथानुभयत्नस्थायामू' ॥ इति ।

युवत्युक्तिश्रवणमेव साधकर्मितयैव तरुणेऽपि दाल्मा ! सुन्दर यौवनसुमनः-प्रसवपिश्रेमेण तरुणां युवती दयावलंबी मर्ती दृष्टिप्रकर्ष, न तु वचनेनालंब दवनी । अहंवचनेति । तेनात्र यदि एकवचनं प्रयुज्यते तर्हि रसप्रतीतिरेव ।

रसाभासस्य तुतीयं प्रभेदमनुभयानिष्पन्निमदाहरणनि—अथ विवाहिता वधू ( नायिकेन ) बाहुपाशो गृहीनां मनो नायकण-जाल-निबद्धा दाल्मूर्छ इव नितरां कम्पते । कम्पनात्र वधायो राम एवार्भियज्यते, न रतिः, मुरसादिनिशयाद-ननुभूततरतिव्वाच्च ।

अनुचितत्वं हि रतौ कुतो कुन्त भवत्नीनि परिणणं भेदप्रश्ननपूर्वक प्रान्तीनोक्तं प्रस्तौति—उपनायिकादिषु, मुनि-गुरु राजपत्नीस्विदपयिणी, वहुनायक- विषयिणी, अनुभयनिषयिणी (एकपक्षाश्रिता) च रतिः चनुत्कृष्टा रसाभानानां यान्ति ।

अत्र मुनिपल्यादिविषयिणी रत्निन्ह उपपतिविपयायिणी एव, किंतूपपनिविषयिणी साधारणानौचित्यं, मुनिपल्यादिविषयिणी तु अत्यन्तानौचित्यं जनयन्नात्रसनयोमोदः । ग्रन्थकृता तुभ्योरेकत्वमेवोक्ततम् ।

गयी । इस गमनाज्ञा देते के सूचक नयनकमलप्रक्षेपादि अनुभाव के वर्णन में अभिव्यक्त होती हुई रति बहुतवचन के द्वारा वहुविपयक सूचित होती हैं । इसलिए यह भी रसाभास ही है । रसाभास के तृतीय भेद अनुभयानिष्ठा रति ( एकपक्षीय ) का उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है—पति ने नवीन विवाहिता वधू को बाहुपाश में बांध लिया । इससे वह वधू तत्क्षण जाल में फँसी बालमृगी के समान अतिशय काँपने लगी । कवित से यहाँ वधू में त्रास ही व्यक्त होता है, रति नहीं, क्योंकि यह अतिशय मृदुता है और रति का अनुभव अभी उसे हुआ ही नहीं है । यहाँ रति का नववधू से थोड़ा भी स्पर्श न होने के कारण अनुभयानिष्ठ ( दोनों में न रहकर एक में ही स्थित ) द्वारा आभासित है । जैसा कि कहा गया है— उपपति में रहने वाली, मुनिपत्नी, गुरुपत्नी आदि में रहने वाले, बहुनों नायकों में एक नायिका द्वारा रहने वाली और अनुभयानिष्ठा रति आभासता को प्राप्त करती है ।

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अत्र मुनिगुरुशब्दयोरुपलक्षणपरतया राजादेरपि ग्रहणम् । अथात्र किं व्यङ्ग्यम् ?—

यहाँ मुनि और गुरु शब्द उपलक्षण ( दृष्टान्तपरक ) हैं, दुष्यन्त राजा, मिश्र आदि का भी ग्रहण हो जाता है । यहाँ प्रथम भेद साधारण अथ चिन्यप्रकृत है। जब कि द्वितीय भेद अत्यन्त अनौचित्य के कारण ।

व्यानम्राश्लिष्टतारचैव, स्फारितताः परमाकुला: । पाण्डुपुत्रेषु पाञ्चाल्या:, पतन्ति प्रथमा दूश: ।।

अब प्रदान उठता है कि यदि बहुनायकगत रति को रसाभास मानते हैं तो स्वीय बहुनायकगत रति भी रसाभास होगा, पर इसे लोक में अनुवित नहीं माना जाता हैं । तो अभिनवगुप्ताहरण में क्या प्रयोजन है नया—रस या रसाभास ?

अत्र व्यानम्रतया धर्मात्मताप्रयोज्यं युद्धिष्ठिरे सभक्तित्वम्, चञ्चिननया स्थूलाकारताप्रयोज्यं भीमसेने सन्नतासत्वम्, स्फारिततया अलौकिकशौर्यधैर्यप्रयोज्यम् अर्जुने सहर्षतत्वम्, परमाकुलतया परमगौर्द्यप्रयोज्यं नकुल-सहदेवयो: व्यज्ज्यन्तेऽभिमर्षिभि: । पाञ्चाल्या बहुविषयाया रतेर्भयाद् रसाभास एवेति न क्यम् । प्राहस्तु अपरिणतत्वं बहुनायकविपयत्वे रतेराभागतेन्या(ल्य)द्रु:।

पाण्डुपुत्रों ( पाण्डवों ) पर द्रौपदी भी प्रथम दृष्टियाँ उम प्रकट पड़ रही हैं—विनम्र, चञ्चल, विकसिन और परम व्याकुल ।

अथात्रेति । यदि बहुनायकविषया रती रगाभागस्थ नहि द्रोपदा: पञ्च पाण्डवान् स्वीयान् प्रति प्रकारितभावैर्द्वारा किं व्यङ्गच्यम् ? रमो रसाभासो वा ? बहुल्येन रसाभासो वेति विच्चारगा । विवेचन आ समन्नाक्या: ।

यहाँ ( दृष्टि न ) अतिविनम्र होने से 'धर्मात्मा होने के कारण युधिष्ठिर' के प्रति भक्ति को, चञ्चल होने से 'मोटा-तगड़ा होने के कारण भीमसेन' के प्रति भय को, विकसिन होने से 'अद्भुतवीर' होने के यश:श्रवण के कारण अर्जुन के प्रति हर्ष को और परम व्याकुल होने से 'परम सुन्दर होने के कारण नकुल तथा सहदेव' के प्रति औत्सुक्य को व्यक्तिजत करती हुई दृष्टियों से द्रौपदी के अनेक, पुरुषविशयक रतिक

बहुविषयाया इति । भक्ति-त्रासयो रतेरव्यक्तनादपि हर्ष-परमाकुलत्बाभ्यामन्विता:, बहुनायकक्रियतत्वमात्रेण तत्सिद्धे: । विवाहित-बहुनायक-विपयत्वेऽपि रग एव न रसाभास इति रसे एवात्र व्यज्ज्यते । अत्र रसाभास पदेति नागेशभट्ट:, रसाभासलक्षणे तद्वदेविवरणे वा परिणयशब्दनयो:लेनमाभावान्न । चन्द्रिकाकृनस्तु प्राचीनमतस्य पूर्वो(ख)लेखनाहंस्य पञ्चान्त्रिदशेन्दुस्नस्थ गरीयस्त्वं मुनिप्रनि । रसाभासलक्षणे लोकसास्त्रगाहितत्वरुपाणीचिन्त्यस्य प्रवेशेन, प्रकृते नथाविधान्तर्गत्या-

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तत्र शृङ्गाररम इव शृङ्गाररमाभासौ अपि द्विविधः, नायके विप्रलम्भभेदात् । संयोगाभासत्वेनुद्भावनेनाहृतः । यथा——

अभिव्यक्त होने के कारण यह रसाभास ही है—केशव नवीन आचार्य कहते हैं । परन्तु प्राचीन आचार्यों तो अविवाहित अनेक नायक विप्रलम्भ को ही आभास मानते हैं । यहाँ तो पाँचों पाण्डव द्रौपदी से परिणय करने वाले हैं, अतः यहाँ रस ही है ।

व्यतयस्तं लप्त्वा दर्शनं, द्वयोरध्यो मेलनं भासते । सर्वस्मिन्नु विन्दधाति तं च विपये दृशौ । निरालम्बनाय । द्वार्तां दीर्घमुररीकरोति, न मनागडुङ्गु भ्रुवे यत्नं, वैदेही-करुणया-कवचितां, हृद हन्त ! लङ्केश्वरः ॥

शृङ्गार रस जैसे दो प्रकार का होता है, वैसे ही शृङ्गाररमाभास भी संयोग और विप्रलम्भ भेद से दो प्रकार का है । उनमें संयोगाभास का तो अर्भ-अर्भं उदाहरण दिया जा चुका है । अब विप्रलम्भाभास का उदाहरण दिया जा रहा है—

अन्न सीतारलस्वनेन लकुड़ेलगता विप्रलम्भभरनिर्भरता, जगद्गुरुपत्नीविपयकता च आभासता गता 'व्यतयस्तं लप्त्वा' इत्यादिभिरुक्तिभिव्यज्यमानेह नुन्माद-शम-मोह-चिन्ता-व्याधिभिमितथैनाभासता गता नः प्राप्तान्नयेन परिपोष्यमाणा 'अवनिड्यपदवीं नुः ।

हाय हाय ! सीता के सौन्दर्य से वशीभूत लकापति रावण अत्यन्त व्याकुल है—क्षण में उलट-पुलट ( असम्बद्ध ) बोलता है, क्षण में ही चुप हो जाता है ( चुप्पी लगा लेता ), सभी विषयों में शून्य दृष्टि लगाना है ( देखते हुए भी न देख पाता है ), दार्घ श्वास लेता है और अंगों में स्थिरता नहीं रखता है ।

सम्भवाज्ञान रसाभास इति । यतु रमचन्द्रिन्द्रकविकृतु ' न च नटसाम ( अनभयनिष्ठायां ) रतेरयुक्ततां शीलोंकस्य' इति तन्नास्मसुं रोचते, एकपक्षीयरत्नखलु विवाहितायां-विवाहितायां वा अनौचित्यस्य सर्वनुभवसिद्धत्वात्, अनौचित्याभास हि रसाभासलक्षणमेव तत्राभ्याप्तं स्यात् ।

यहाँ सीता पर आश्रित रावण में स्थित विप्रलम्भ रति अनुभयनिष्ठ होने के कारण एवं जगद्गुरु श्रीरामचन्द्र की पत्नी के विषय में रहने के कारण आभास ( रत्याभास ) होकर 'व्यतयस्तं लप्ति' इत्यादि उक्तियों के द्वारा अभिव्यक्त ( व्यङ्ग्यार्थ ) होते हुए जन्माद, श्रम, मोह, चिन्ता और व्याधि, जो आभास हो रहे हैं, के द्वारा

अनुपदमेवैतत् । सच्चः प्रदर्शितपूर्वोऽहारणश्रये । व्यतयस्तमिति । हृद हन्त ! वैदेही जायतया सोढुमस्या कर्तुचितो भक्तोऽनुसरतः । लङ्केश्वरा रावणः क्षणं व्यतयस्तनमसम्बद्धं लप्तनि प्रलापं करोति, किञ्चिद् अपि च सर्वस्मिन्नु विन्दधाति निःशून्यां नुष्टिं दृष्ट-

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एवं कलहशील-कुपुत्राद्यालम्बनद्रुतया वीतगाग्रिनिष्ठा च वर्ण्यमाना: शोकः, ब्रह्मविद्यारत्नाद्यार्चणडालिदगतद्वेन च इन्द्रिये:। क्रन्दयन्-कातरादिगतद्वेन पित्राद्यालम्बननतद्वेन वा क्रोधैरतिप्रहा:, ऐन्द्रजालिकाद्यालम्बननतद्वेन न विषाद्य:, गुर्वाद्यालम्बननतया न हातः, महावीरगतद्वेन सदर्प:, मृगीयथपशु-वताडृश्यमानालम्बननतया वर्ण्यभाना जुगुप्सा च रसाभासा:। विस्नृतिभया-च्चार्भा नोदाहताः सुभीभत्सनेया:।

प्रश्नात रूप से परिपुष्ट होने के कारण स्थायी कहलाने योग्य है। नात्पर्य यह है कि महती उन्मादादि भावाभासा रसाभास से उपकारक होने से गौण है, उनं स्थानी ही पदवी नहीं मिल सकती है, जवकि रस्याभास उन्में द्वार। पुष्ट होने के कारण स्थानी ही है। इसौ प्रकार श्रृगाराभास कं। तरह करणादि रसों के भी आआ:भनगत अनौचित्य से करणाभासादि होते हैं। यथा— पितना से कलहु करनाे वाले कुपुत्र के आलम्बन से ब्रह्मविद्या के अनभिज्ञ चाण्डाल आदि (घोर कुलों में ग्लिसां ) में स्थित निर्वेद वर्णित होने पर शान्तरसाभास हो जाता है। कृपण एवं कातर आदि में स्थित अथवा पिता आदि गुरुजनों पर होने द्वाला पुत्रादि स्थित क्रोध और उत्साह वर्णित होने पर क्रमश: रौद्र एवं वीर रस के आभास होते हैं। जादूगर आदि के आलम्बन से उत्प्रेक्ष विस्मय अद्भुतरसाभास होना है। गुरु आदि के आलम्बन से शिष्यादिगत हास हास्यरसाभास होता है। महान वीर में स्थित भय वर्णित होने पर भयानक रसाभास होता है। यज्ञ में ध्यात्त पशु के चर्वी, शोणित, मांस आदि के आलम्बनकृत में वर्णित

क्षुद्रेपापि विषयं प्रत्यक्षीकर्तुं न प्रभवन्तीत्थर्थ:। द्वौर्द्र स्वानुभूयकरुणौ। स्थानेप न मनागपि ईपदापि धृंति न धत्ते। अथ प्रलापेपि उन्मादः, मोहात्मनेनैव श्रमः, दृग्दानऊयदर्शनात् मोहः; दृश्यध्वमाचिचनता, धैर्यभावाच्चन व्याधिरभूवोद्भयस्यने, तं च श्वित्रप्रभृतिभावो व्यज्यते, प्राधान्येन च नस्यैव ध्वनिपदद्यव्यहार्यनता।

नात्पर्य यह है कि महती उन्मादादि भावाभासा रसाभास से उपकारक होने से गौण है, उनं स्थानी ही पदवी नहीं मिल सकती है, जवकि रस्याभास उन्में द्वार। पुष्ट होने के कारण स्थानी ही है। इसौ प्रकार श्रृगाराभास कं। तरह करणादि रसों के भी आआ:भनगत अनौचित्य से करणाभासादि होते हैं।

एवम्भिति। अनौचित्यालम्बनादिगतता रतिर्यथा रसाभासो भवति, तथैव अनुचितालम्बनादिगता रतिर्यथा रसाभासो भवति, नथ्रैव अनुचित-तालम्बननिष्ठा अनौचित्याश्रयणादृश्र शोकादयः सवेंपि स्थायिभावा रसाभासतां यान्ति।

पिता आदि गुरुजनों पर होने द्वाला पुत्रादि स्थित क्रोध और उत्साह वर्णित होने पर क्रमश: रौद्र एवं वीर रस के आभास होते हैं। जादूगर आदि के आलम्बन से उत्प्रेक्ष विस्मय अद्भुतरसाभास होना है।

पित्रा कलहं कृत्वा कुषित्रो हि पितृः जोक्षस्य कारणनया आलम्बनविभावो भवति, एवं-विधानुचित-कलहोःपपात्रः शोको, वात्सरागो निरक्तः तत्नितॄ.सद्राश्रितोऽपि शोको हि करणरसाभासः। योक-मोहादिसामनेनैव वात्सराद्द्वै भवति, तरस्मिन् शोकां नोदाहतम्। नियायानितयवस्तुविवेकजस्य निवेदस्य महावीर्याज्ञानादेव प्रभुत्वोः गम्भवभौवन, दैन्यो-लाद्रे: स्वभाव एव तथाविधविवेकदंशमुख्यस्य। अन्र प्वान्चारिकरस्द्रत्क्षमु। कदर्थः क्रोधनः, कातरो भयादुः, आदिपदेन दैन्यलक्खणादिपरिपादि:हुः, तदाश्रितयोः शृपुप्रायालम्बनद्रुतयो: शिष्यपुत्राद्याश्रितयोः क्रोधोत्साहयोर्नोदाहतम् रौद्र-वीररसाभासता।

गुरु आदि के आलम्बन से शिष्यादिगत हास हास्यरसाभास होता है। महान वीर में स्थित भय वर्णित होने पर भयानक रसाभास होता है। यज्ञ में ध्यात्त पशु के चर्वी, शोणित, मांस आदि के आलम्बनकृत में वर्णित

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एवमेवानुचितविषया भावाभासः ।

भावा एव भावाभासा भवन्ति । तथा च भावविभेपा एव भावाभासाः । स्थायिभावश्रितास्तु रसाभासाः ।

यथा—

उदाहरणत—सर्व इति ।

सर्वेऽपि विस्मृतिपथं विपयाः प्रयाता

अधुना प्रियाया रमरणावमरे सर्वेऽपि विषयाः वचांनश्रवणादिविषयाः चिरसेविता अपि विस्मृतिपथं गताः, चिराद्यस्मात् विद्वैपि पराक्तना-प्रोतदर्शनेऽप्योविच्छेदात् खेदकलिता खिन्ना मतो महिमुखीभूता ।

विद्यापि खेदकलिता विमुखीभूव ।

विद्या भी (परस्त्री-विषयक प्रीति देख) विष्णु होकर विमुख हो गयी, केवलमकः सार्चिरपूपं सेविता हरिण-शिशुलोचना प्रिया मे मम हृद्याद अधिदेवता पृथिव्यादि-चेष्टातदेवतेव नैव अपयाति कदापि नैव दूरीभवति ।

सा केवलं हरिणशावकलोचना मे

नैवापयाति हृद्यादधिदेवतेव ।।

गुरुकुले विद्याध्यासममये तदीयकन्यालावण्यगृहीतमनसस्य, अन्यस्य

गुरुकुलेऽसम्प्रविचिन्तनीयस्यर्थः । 'अप्रतिप्रे'नि मूलपाठो हि मलेरच्छेदकरत्वादुपेक्षितः, तथा मति अनौचित्याभावाद भावाभासतैवात्र न स्यात् ।

वा कस्यचिदतिप्रतिवद्धमनां स्मरतो देशान्तरं गमनस्यैवमुक्तः ।

होने पर घृणा ही वीभत्स रसाभास होना है। ग्रन्थविस्तार के भय से इन सभी रसाभासों का उदाहरण नहीं दिया गया है, इन उदाहरणों का कथं स्वयम् विद्वान लोग कर लेंगे ।

इन्द्रजालाद्याद्भुतविचित्रप्रदर्शकः । यज्ञोऽपसृत्यनस्य लोके महर्द्धैरन्नीचितयं ज्ञायते ।

यैबौद्धादिभिस्तत्क्षानौचित्यप्रतोतिः क्रियते, तेषां न तु रसाभासः एव ।

इसी प्रकार रसाभास की तरह ही अनुचित विषय रहने पर भावाभास होते हैं ।

एवमेवेति । रसाभासवदेव आलम्बनविभावगताः अनुचिताः विपया येषां ते

अर्थात् जिस भाव का आलम्बनविभाव अनुचित हो उसे भावाभास कहते हैं ।

भावा एव भावाभामा भवन्ति ।

सहृदयों को जो अनुचित मालूम पड़े उसे ही यहाँ अनुचित कह सकते हैं ।

तथा च भावविभेपा एव भावाभासाः । स्थायिभावश्रितास्तु रसाभासाः ।

उदाहरण—विरहो नायक कहना है कि अभी ( इस विरह-कथया में ) सभी विषय ( दर्शने-श्रवणादि से उत्पन्न ) विस्मृति के मार्ग पर गयी हुई विद्या भी ( परस्त्री-विषयक प्रीति देख ) विष्णु होकर विमुख हो गयौ, केवल मेरी वह (पूर्वदृष्टा अनुरक्ता ) बालहरिण-लोचना ( प्रिया ) अधिष्ठात्री देवी के समान मेरे हृदय से कभी नहीं जाती है ।

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अत्र च स्वात्मत्यागात्यागाभ्यां सकृच्चन्दनादिपु विपयेषु चिरसेवितासु विद्यासु च कृतधनत्वम्, अस्यां च लोकात्तरत्वमभिलष्यमानं व्यतिरेकवचु: स्मृतिमेव पुष्णातोति सैव प्रधानम् । एवं च त्यागाभावगतं मार्दवदिकत्वं व्यञ्ज्य- यन्न्यविधदेवतोपमाणि । एपा नानुचितविगयकल्यानुभर्गानिःसृतत्वाच्च भावाभामः । यदि पुनरियं तत्परिणेतुरेवोक्तः, तदा भावश्यानिरेव ।

अत्र व्यङ्ग्यस्यैव भेदकत्वात् । तथाहि—आश्रयस्यायत्ता: सकृच्चन्दनादयो विषयाः चिरसेविता विद्या च न स्वस्मिन् आत्मीये चिरसेवके नायके आत्मनः स्वतत्त्वस्य ( विषयत्व-विद्यात्वयोः ) त्यागेन कृतधनता कृतसत्त्वभावश्च प्रकटायते, किन्तु इयं हरिणशावकलोचना स्वस्मिन् आत्मीयेडचिरसेवके नायके आत्मनः स्वतत्त्वस्य ( प्रियात्वस्य ) अत्यागेन कृतसत्तामेव व्यनक्ति ति न्रयाणां विपय-विद्या-नायिकानां सङ्क्षे- त्वेन साम्येऽपि त्यागात्यागाभ्यां वैपम्यदर्शनाद् व्यतिरेकः स्मृतिप्रकटत्वनादृशम् । यथा पृथिव्या अधिष्ठातृदेवता स्वसेवकं न कदापि त्यजति तथ्वेन्य नायिकापि दृढुपमापि स्मृतेरेक पोपिका ।

अनुचितत्वविषयकत्वात् अतिप्रतिपद्घनायिकाचिन्तनविपयत्वात्, अनुभयनिष्ठ- त्वादिकतरैकत्वादिति । यद् तया नायिकया परिणयानन्तरं विद्यासास्थ्रस्य नायकस्योर्न- रियं तदा स्मृतिभावध्वनिरेव न भावाभासः, अनुचितत्वभावावात् ।

किसी अन्य विद्देश्श्थ नायक की यह उक्ति है, जो रति के लिए अत्यन्त निपीद्धा नायिका का स्मरण कर रहा है ।

यहाँ आजन्म सेवित माला, चन्दन आदि विषयों एवं चिरकाल से सेवित विद्या में स्वसेवक ( नायक ) के प्रति आत्मत्याग ( विषयत्व एवं विद्यात्व को छोड़ने ) के कारण उससे कृतधनता एवं इस ( नायिका ) में स्वसेवक ( नायक ) में प्रति आत्म- त्याग ( नायिकात्व रूप से न छोड़ने ) के कारण उससे अलङ्कक ( अद्भुत ) कृतसत्ता व्यक्त होती हुईँ व्यतिरेकसरूप से स्मृतिभाव को ही पुष्ट कर रही हैं । नायक के द्वारा सेवित विषय, विद्या और नायिका में सेवीतरूप से सादृश्य रहने पर भी चिरसेवित विषय और विद्या द्वारा नायक का त्याग ओर अचिरसेवित नायिका द्वारा अत्याग रूप ही व्यतिरेक है । इसी तरह त्याग न करने में 'सदा' इस गुण को व्यक्त करतीं हुइं पृथिव्यादि अधिदेवता की उपमा भी स्मृति को ही पुष्ट कर रही है । यहाँ व्यङ्ग्य अलङ्कार गौण एवं स्मृतिभावाभासध्वननि प्रधान है । यह स्मृति अनुचित ( परस्त्री ) विषयक होने से एवं अनुभयनिष्ठ ( केवल नायकनिष्ठ ) रहने से भावाभास है और यदि यह उक्ति वर्णित नायिका के पति की ही हो, तो भावध्वननि ही है ।

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अथ भावशान्तिः

भावस्य प्रागुक्तदशारूपेषु शान्तिरन्तिमाऽः।

स चोत्पत्त्यवचिछन्न एव मालाः; नञ्प्रेक्ष्य नञ्रय नमःकारितवान् ।

उदाहरणम् —

मुखे च नायिके कानि, भामिनि ! मन्दिरगतैरद्यैः ।

इति तद्व्याः पतिवचनैरपि तथा रञ्जने!पापं नाक्षिप्त् ।।

इह तादृक्‌-प्रियवचनाश्रवणं त्रिभागः, नयनयोर्गतयो नयनेऽपि;

तद्भिव्यक्तः प्रमादो वाजुभावः । उत्पत्तिकालार्वाचीनो रोषः शान्तो व्यदृश्यत ।

तथा—

भावस्येऽति मकारिभावस्य हरपाथैरमस्य नाशो भातराऽऽनः ।

उत्पत्तिकालिको भावलोपोऽप्यवह्नकार्थक एक एव महद्रूपमपारकत्वाद् भावशान्तिः

इति च नायङ्कथ्यने, न तु नागोत्कर्षकथाऽऽनक ।

उदाहरति—मुखे चकोलिते हि भामिनि कानने !

मुदिरालिन्मेंवमाला डोदयैरपि प्रारब्धता, त्वङ्ङ अध्याऽपि इदानीमपि कां वोपं न मृग्यभि,

मेघमालादर्शनेऽनव कोपस्य द्विषतिरमसद्वेनि । इति प्रतीयते; पतिवचनैः सख्या

कोमलाङ्गया नयनकमलकोणगतरक्तताऽऽचिवः अपाङ्ग विनाशनेन यायन ।

शोणरक्तद्दारमपि रामपभाषा पूवर्दशितोऽपि व्यज्यनेन, पतिवचनसेन न तुाङ्गास्य मथ्याऽऽनवर्तनाऽऽ

मर्वभावशान्तिः ।

तादृशं मेघमालागमनशोकं रने: परमोद्दीपकम् । योगरुचिनाशाद् अभिव्यक्तो

अब भावशान्ति का निरूपण करते हैं । पूर्वोक्त हर्पादि भावों के शान्तिकालिक

स्वरूप को भावशान्ति कहते हैं ।

लक्षण में 'नाश' पद से उत्पत्तिकालिक नाश का ही ग्रहण करना चाहिए,

क्योंकि सहृदयों को वही चमत्कृत करता है । उदाहरण—

हे कोपने ! मेघमाला उदित हो गयी, पर अभ्र भी अङ्गप को नहीं छोड़ रही

हो' पति के इन वचनों ने कोमलाङ्गी के नयनकमल के कोने में स्थित लाल छवि को

पी लिया ।

मेघमालादर्शनेन मानिनी का मान टिक नहीं सकता है । यहाँ इस प्रकार के

प्रियतम-कथित वचन का सुनना विभाव है और नयनकमल के कोने में स्थित लाल

छवि का नाश या उस लाल छवि के नाश से प्रकटित प्रसन्नता अनुभाव है ।

इसी तरह वर्णन के समय में ही भाव की उत्पत्ति को भावोदय कहते हैं ।

उदाहरण—

हर्षं से प्रिय को आलिङ्गित करती हुई नायिका ने अतिशय प्रिय के छाती पर

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भावोदयो भावस्योत्पत्तिः।

उदाहरणसूत्रम्—

वीक्ष्य वक्षसि विपक्षकामिनी-हारलक्ष्मं दयितस्य भामिन्या ।

अंसदेश-वलयोः कृतां क्षणादाच्चकर्प निजवाहु-वल्लरीम् ॥

अत्रापि दयितवक्षयोगत-विपक्षकामिनी-हारलक्ष्मदर्शनं विभावः । प्रियां-

सदेश-वलयोः कृत-निजवाह-लताकर्पणमनुभावः । रोषादयो व्यभिचारयः ।

यद्यापि भावशान्तौ भावान्तरोदयस्य, भावोदये वा पूर्वं भावशान्तेर्नैव-

वश्यक्त्ववाद् नानयोर्विविक्तो व्यभिचारस्य विषयः; तथापि द्वयोरेकत्र नमत्कार-विरहात्, चमत्काराधीनत्वाच्च व्यवहारस्य। असित विपक्षविभागः ।

नायिकागतः प्रमाद एव अमर्पनाशसूचक इति तस्यैवानुभावत्वमित्यभिप्रायेण पक्षान्तर-मुक्त्वा । उत्पत्तिकालावच्छिन्नः सद्योजायमानः ।

भावोदयं निरूपयति—भारोदय इति । वर्णनप्रस्तुतेऽपि तद्विषयमानस्य तस्यचिद्भावस्य उत्पत्तिजन्म भावोदयशब्देनोच्यते ।

वीक्ष्येति । हर्षेण प्रियालिङ्गिता भामिनी अकस्मात् प्रियस्य वक्षसि विपक्ष-कामिन्या: प्रतिनायिकाया अचिरोपभोगकालिक-हारचिह्नं वीक्ष्य अङ्गदेशनावलोकनोक्तितां प्रियसक्तधैर्ये वेष्टिततां निजबाहुवल्लरीतां क्षणादेव आचकर्प पुष्टकुनवनी । अत्र हर्षभाव-

नाशोत्तरममर्यभावस्योत्पत्तिः: प्रभानतया वर्णितत्वेन दवनी ।

उपनायिका के हारचिह्न को देखकर क्षणभर में उगके ( प्रिय के ) कन्धे से लिपटी वांहुलूपी लता को हटा लो ।

अत्रापि पूर्ववर्णितभावशान्त्युदाहरणे अमर्पभाव एव आस्थितः, अत्रापि भावोदये स एव वर्णितः । पूर्ववदन्रापि रोषपद्ममपर्स्य बोधकम् ।

यहाँ हर्षभाव के नाश के बाद अमर्प भाव की उत्पत्ति ही प्रधानतया वर्णित है । अतः यह भावोदय द्वानि का उदाहरण है ।

पूर्वोक्तभावशान्त्युदाहरणे अमर्पनाशे हर्षोदयस्य, भावान्तरोदयस्यैति ।

भावशान्ति की तरह यहाँ भी अमर्ष भाव ही आस्थित है । प्रिय के छाती पर स्थित विरोषिनी नायिका ( सपत्नी ) के हारचिह्न का दर्शन विभाव है । प्रिय के कन्धे पर लिपटी अपनी बाहुलता को खींचकर हटा लेना अनुभव है । ‘सपत्नी से यह मेरा प्रिय प्रेम करता है’ इस अपराध से रोष, ‘सपत्नी ने इसे मोह लिया है ।’ इस ज्ञान से ईर्ष्या आदि व्यंग्य होते हैं ।

यद्यापि जहाँ भावशान्ति वर्णित होगी वहाँ किसी भाव का उदय भी अवश्य होगा और जहाँ भावोदय होगा वहाँ किसी भाव की शान्ति अवश्य होगी—यह निश्चित है और ऐसी स्थिति में इन दोनों भावशान्ति एवं भावोदय कं एक-दूसरे से अलग रूप

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एवम्-भावसन्धिरनयोरनभिभूतयोर्नयोर्न्योर्याम्भावनयोग्ययोः सामान-धिकरण्यम् । उदाहरणञ्च—

प्रस्तुतोद्दाहरणञ्च हपना्शे अमरोदयम् । य दर्शनेन उभयौः परस्परं मामानाऽधिकरण्यमेव ।

यौवनोद्गम-नितान्तशङ्किताः, जालध्योयैव लकार्ता नलोभिता । संकुचित विकसन्ति राघवे, जानकीनयन-नीरजश्रियः ॥

विविक्तः = पृथक्‌कृतः । गहदैरेयदृशो नमत्तमारोऽधिकांशोभुयने न तस्यैव नथनितवम् । पूर्वोक्त-हर्यादिभावेनपि कयोरेकदेशाकालस्मध्येपि प्रधानयोरेव परस्परप्रभावयुक्त्या भावनिधिरसितयाम्या भवति । अनभिभतयोरनिर-क्तयोः प्रधानयोरेवेतिभावः । उभयोः परस्परसम्बन्धे सति न कयार्याम्भवः सम्भवति, अपितु समवलराजोरिव परस्पं सन्धर्मेऽपि भवति । एकतरस्याम्भवे, उभयोरसम्बद्धत्वे वा सन्ध्येरेव न स सम्बवतीति विशेषणद्वयलक्षणे प्रयुक्तम् ।

यौवनोद्गमे नितान्तमितगतेन शङ्किताः, राघववीर्य-शील-शोयैव बलकार्ता नलोभिता सत्यः । त्यादिना श्रीडा, शीलेत्यादिनोऽसाहोद्भव्यज्यते ।

में ( स्वतन्त्र ) ब्यवहार का विषय हो ही नहीं सकना, तथापि दोनों के एक स्थल में चमत्कारक नहीं होने के कारण और भावशान्त्यादि ब्यवहार का चमत्कार के अर्थान रहने से दोनों का विषय अलग-अलग ही रहती है, चमत्कार तो एक ही में रहता है और जिसमें चमत्कार रहेगा, वहाँ उसी का विषय माना जायेगा ।

इसी तरह पूर्वोक्त हर्षादि भावों में एक स्थल या समय में स्थित किन्हीं दो प्रधान ( किसी का अङ्ग नहीं ) भावों का परस्पर एक-दूसरे से प्रभावित होकर ( एक आधिक्य पर ) रहने को भावसन्धि कहते हैं । उदाहरण—

सद्यः उद्गम से अत्यन्त शंकित होती हुईं एवं शील, शौर्य आदि का दर्शन विमाव है । आँखों का संकुचित एवं विकसित होना अनुभव है । लज्जा और औत्सुक्य भावों की सनिष्ठ व्यग्रता है । इसी तरह—

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भावशबलत्वं भावानां वाध्यबाधकभावसापन्नानाम् उदासीनानां वा व्यामिश्रणम् ।

परस्पर विरुद्ध ( एक दूसरे के बाधक ) या तटस्थ ( न साधक और न बाधक )

एकचमत्कृतिजनकज्ञानगोचरत्वमिति यावत् । उदाहरणम्—

दो से अधिक हर्ष आदि भावों के विशिष्टरूप से मिलने को भावशबलता कहते है ।

पापं हन्त ! मया हतेन विहितं, सीतापि यद् यापिता, sा मामिन्दुमुखी विना वत ! वने किं जीवितं घास्यति ? आलोकेय कथं मुखानि कृतिनां, कि ते वदिष्यन्ति मां, राज्यं यातु रसातलं पुनरिदं, न प्राणितुं कामये ।।

व्यामिश्रण ( विशिष्ट रूप से मिलन ) का तात्पर्य है कि इन भावों के अनेक वाक्यों में रहने पर भी एक चमत्कार को उत्पन्न करने वाले ज्ञान से ही उनकी प्रतीति होती हो ।

पूर्वोक्तहर्षादिविभावानां मध্যতः केशवाख्य विरुद्धानां वाध्यबाधकभावापन्नानाम् अविरुद्धानां च तटस्थानामेकचमत्कारोपस्थितानां मिथो व्यामिश्रणमितस्ततोऽवस्थानं भावशबलत्वम् भावानां विचित्रत्वम् । भिन्नाकृतिनां चित्राणां विरुद्धानां तटस्थानां वा एकसन्दर्भन्वयेनैकचित्रता कर्तुमतिदुष् दृश्यते, तद्वदेव भावशबलत्वं नानावैकयगतानां भावानां विरुद्धानां तटस्थानां वा एकसन्दर्भभन्यवैचित्र्यमेव । व्यामिश्रत्वमेव स्पष्टोकरोति—एकचम- त्कृतीति । ज्ञानविषयत्वमित्यर्थः ।

उदाहरण—सीता-परित्याग के बाद सन्ताप से व्याकुल श्रीराम कहते हैं कि हाय ! हत्यारा मैंने पाप किया जो सीता जैसी पतिव्रता पत्नी को मैं वन को विदार कर दिया । हाय ! वह चन्द्रमुखी मेरे बिना वन में जीवन काँ धारण कर सकेगी क्या ? ( नहीं कर सकेगी ) । मैं सज्जनों के मुखों को कैसे देखूँ ? वे मुखें क्या कहेंगे ? मेरा यह राज्य रसातल में चला जाय । मैं जीना नहीं चाहत। हूँ ।

सीतापरित्यागानन्तरं सन्तप्यमानस्य श्रीरामस्योक्तिरियम् । हन्त ! मथो रामेण हतेन हतकृत्यं विहितं, यत्ते सीतासदृशी पतिव्रतां पत्नों को मैं वन को विदार

स्याम् । मम राज्यं रसातलं पातालं यातु, न मे तेन प्रयोजनम्, प्राणितुं- मपि नाहं कामये, दुःखदुःखंयोज्चालामहंनाक्ष्मो मरणमेवेच्छामि ।

३५ र०

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अत्र मत्यसूया-विपाद--मृति-वितर्क-श्रीडा-चिन्ता-निर्वेदानां प्रागुक्तस्वस्वविभावजन्मनां शव्लता।

यहां पूर्वोक्त अपने-अपने विभावों से उत्पन्न मति, असूया, विपाद, स्मृति, वितर्क, श्रीडा, शंका और निर्वेद भावों की शव्लता ( चेष्टा ) है ।

यत्तु काव्यप्रकाशटीकाकारैः "उत्तरोत्तरेण भावेन पूर्वपूर्वभावोपमर्दः शव्लता" इत्यभिधीयत, तत्र—

यह जो काव्यप्रकाश के टीकाकारों ने कहा है कि "पूर्वं-पुर्वं भाव का अपने से उत्तर ( आगे आने वाले ) भाव के द्वारा दबा देने को शव्लता कहते है"—सो उचित नहीं है, क्योंकि—

'परयेतु कश्चिच्च', 'चल ! चपल रे !', 'का त्वरग' ? 'डहं कुमारो', 'हस्तालम्बं वितर', 'हहहा !!, व्युत्क्रमः', 'कार्म' 'यासि' ।

'कोई देख लेगा', 'चल रे चचल !' 'जल्दी क्यो है' ? 'मैं कुमारी हूँ', 'हाथ का सहारा दो', 'हाय हाय !' 'क्रम भंग हो गया', 'कहाँ हो, कहाँ जा रही हो' ?

इत्यत्र शोकसूया-धृति--मृति-श्रम-दैन्य-मत्यसूयेत्यनुपमर्दलेशाचून्यतथेंद्रपि शव्लताया राजस्तुतिगुणात्वेन पञ्चमोल्लासे मूलकुंभद निरूपितात् ।

यहां क्रमशः शंका, असूया, धृति, स्मृति, श्रम, दैन्य, मति और औत्सुक्य भावों में किसी के थोड़े भी दबाने ( उपमर्द ) से रहित होने पर भी शव्लता के द्वारा राजस्तुति के गुण ( उपकारक ) रूप से काव्यप्रकाश के पंचम उल्लास में स्वयं मूल-ग्रन्थकार मम्मट ने ही निरुपित कर दिया है ।

अत्रैति मया पापं विहिनमियसेन मानतः, हंसत्पेनेऽमुया, गीतपादविलम्बन स्मृतिः कि जिजिनमिरमसेन चिन्तःः, क्रथमाोेः यन्यानिदन त्रीडा, 'किं ते' इत्यनेन शङ्का, राज्यं यत्नित्यनेन न निर्वेदो ऽनुप्रे । ग्रीपात मःाननामू एकान्वयिपूर्ववाक्येन व्यवस्थितानामुदासीनानामवस्थां नं भवाव्यन्विता ।

यथोर्वात काव्यप्रकाशटीकाकारा वाच्यवाचकनिमित्तभावापन्नान भावानामेवात्र वि-नामेव भावशवलतमिच्छन्ति । उपमर्दोऽभिप्रायः ! तत्स्थानामपि भावानां शव्लत्वं लोपयति, तेन टीकाकारामूलकुंभकत्विरोधिस्वनेनोपस्थेयः !

अतः उत्तर-उत्तर भावों के द्वारा पूर्वं-पुर्व भावों का उपमर्द ही शव्लता है, यह मत खण्डित हो जाता है ।

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स्वोत्तरविशेषगुणेन जायमानस्तु नाशो न व्यङ्ग्यः, नोपमर्दपदवाच्यः, नापि चमत्कारी । तस्मात्—

नारिकेलजलक्षीर-सिताकदलामिश्रणे । त्रिलक्षणो यथास्वादो भावानां संहतौ तथा ॥

अत्रेदं बोध्यम्—य एते भावशान्त्युदय-सन्धिशबलताध्वनय उदाहृताः,

स्वोत्तररत्न इति न्यायसिद्धान्ते चित्रभानुस्वरूपा ह्यपि यो भावः शृङ्गारादिविशेषगुणेनैव भावान्तरभवति । तथा च विशेषगुणस्वभाव एव पूर्वपूर्वगुणनाशान्तरमेवोत्तरगुणोदयः । एवमेव पूर्वभावनाशो हि उत्तरवर्तिभावानुदयैक एवेति पूर्वोक्त-काव्यप्रकाशटीकाकृन्मतेन सम्यग्गतिर्न मन्तव्यम्, तथाविधस्य नाशस्य स्वनःसिद्धत्वेन व्यङ्ग्यत्वाभावात् । उपमर्दस्तु विद्यमानस्यैव भावस्य सम्भवति, न तु नष्टस्य, यथा दिने विद्यमानस्यैव चन्द्रप्रकाशस्य सूर्यप्रकाशोनाभिभवो भवति । तथा च न भावानां नाशो नैवोपमर्दपदवाच्यः । यदि नाशाश्चैव उपमर्दसंज्ञा क्रियते तथापि नामौ चमत्कारी । अतो नैवोपमर्दोऽयं भावशबलतां लेष्टा ।

काव्यप्रकाश के टीकाकारों के पक्ष में युक्ति दी जाती है कि ह्यपि भाव चित्तवृत्ति ( चित्त में रहने वाले ) होते हैं, जो ज्ञान, इच्छा आदि आत्मवृत्ति ( आत्मा में रहने वाले ) विशेष गुण के अन्तर्गत ही आते हैं । विशेष गुणों का स्वभाव ही है कि एक गुण के नाश से ही अन्य गुण का उदय हो सकता है, एक साथ अनेक गुण वहाँ रह ही नहीं सकते । ऐसी स्थिति में अगल्या उत्तर भाव से पूर्वं भाव के उपमर्द को ही शबलता कहना होगा ।

भावानां सम्भिलनेन शबलत्वचमत्कारास्वादो हि विलक्षण एव पृथग्निस्थितेम्यो भावेम्यः । कथम् ? यथा लोके नारिकेलजलक्षीरसिता-कदलानां मिश्रणे न स्वास्वादमहिम्नो विलक्षणास्वादो भवति, तथाव्रतेति भावः ।

यहाँ यह ज्ञातव्य है कि ये जो भावशान्ति, भावोदय, भावशबलतादि

अत्रेदमिति । अन्र भावशान्त्यादिप्रकरणे ज्ञातव्यं यद् भावशान्त्यादयोऽपि

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तेऽपि भावध्वनय एव, विद्यमानतया चर्व्यमाणेऽपि विद्व उत्पत्त्यवच्छिन्नतद्विनाशयदवस्थास्वन्धोयमानत्व-परस्परसममानाधिकारणत्वे: प्रकृतरैश्वर्यमाणेभु भावेऽप्येव प्राधान्यम्यौचित्यात्, चमत्कृतेऽस्त्रैव विश्रान्ते: । यद्यप्युपपत्ति-विनाश-सन्धि-शबलतां तत्तस्म्वन्धिनां भावानां च ममानायां न चर्वणाविपयतां न प्राधान्यं विनिर्गन्तुं शक्यते, तथापि स्थितौ भावेपु प्रधानताया: क्लृप्तत्वाद् भावशान्त्यादिष्वपि तेष्वेव शान्तिप्रतियोगित्वादिभिरव्यञ्ज्यमानेषु तस्यानुरूपं कल्पयितुमौचित्यात् ।

ध्वनितत्त्वेन प्रकाशितौ भावध्वनिनिस्वरूपौ एव, न तु शान्त्यादिध्वनितद्वरूपौ: । ये हर्पादयो भावाः ध्वनितत्त्वेनास्वाद्यन्ते ते विद्यमानावस्थापन्नलवेन, तत्र यथा भावध्वनिरेव, न विद्यमानत्वध्वनिस्तथैव भावशान्ती नाशावस्थापन्नभावस्य, भावोदये उत्पत्त्यवस्थापन्न-भावस्य, भावसन्धौ सन्धोयमानावस्थापन्नभावस्य, भावशबलतायां च परस्परसममानाधि-करणावस्थापन्नभावस्यैव ध्वनितत्त्वं, न तु नाशोदयादेः । नहि नाटकादिस्य भावशान्तितत्त्व-मपि तु उत्पत्तिकालिकनाशाश्रयैव । तत्र नाशांशो नैवं चमत्कारोऽपिनु विनाशयदवस्थापन्न-भावांश एव । वस्तुतो भाव: पद्यधा—विद्यमानभाव: ( शुद्धो भाव: ), विनाशद्रभाव: ( भावशान्ति: ), उत्पत्त्यमानभाव: ( भावोदय: ), सन्धोयमानभाव: ( भावसन्धि: ), परस्परसममानाधिकारणभाव: ( भावशबलता ) इति । स्थितौ = विद्यमानदशायां शवलता ध्वनि उदाहरण हुए हैं, वे भी भावध्वनित ही हैं, क्योंकि विद्यमानत्व रूप से आस्वाद्यमान भावों की तरह उत्पत्तिकालिक अवस्था वाला, नाश होती हुई अवस्था वाला, मिलती हुई अवस्था वाला और परस्पर समानाधिकरण की अवस्था वाला प्रभेद से आस्वाद्यमान भावों में ही प्राधान्यता का औचित्य है, नाश, उत्पत्ति आदि में नहीं, क्योंकि चमत्कार भावों पर ही विश्राम लेता है । तात्पर्य यह है कि ये जो हर्ष आदि भाव ध्वनि कहलाते हैं, वे विद्यमान अवस्था वाले भाव हैं, वहाँ जैसे भाव ही प्रधान है, विद्यमानावस्था नहीं, उसी तरह भावशान्ति आदि में नाश होने को अवस्था में स्थित भाव में ही चमत्कार होते से वहाँ प्रधान है, नाश नहीं; उत्पत्ति होने को अवस्था वाले भाव में भी भाव ही प्रधान है, उत्पत्ति नहीं । इसी प्रकार भावसन्धि एवं भाव-शबलता में भी भाव की प्राधान्यता जाननी चाहिए ।

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किच्च यदि भावशान्त्यादौ भावो न प्रधानं, किन्तु तदुपसर्जनक- शान्त्यादिरेवेत्यप्युपेयते, तदा व्यङ्ग्यमानभावेषु अभिहित-तत्प्रशमादिषु काव्येषु भावप्रशमादिध्वनित्वं न स्यात् । तथा हि—

उषसि प्रतिपक्षनायिका-सदनादन्तकर्मच्छति प्रिये । सुदृशो नयनाञ्जकोणयो रुचियाय त्वरयाडरुणायुतिः ॥ अत्रान्तरूवैगान्तिना भावोदयस्य वाच्यतयैव प्रतीतिराद्‌ ।

तत्‌तद्वस्थाया: ! अरुचित्यादिति । विद्यमानभावे निर्नीतार्थ: नायादिभावेष्वपि स्वीकार्य इत्येवोचितम् ‘एकत्र निर्नीत: शास्त्राथोंडपरत्रापि सदृशरती’ति न्यायात् । कस्यचिद् भावस्य नाशोत्तरमेवापरभावस्योदयो भवतीति भावशान्ते: प्रथमोपादानं युक्तमन्त्र तदवयुक्रमेण प्रथममुत्पत्त्यवच्छिन्नलोकतिश्रुतनतनीपैव ।

तदुपसर्जनकेति । स भाव उपसर्जनकं विशेषणं यस्य । भावो विशेषणमेव शान्त्यादिरिति भाव: । अभिहितेति । येषु काव्येषु भावाः भावाः व्यङ्ग्याः, शान्त्याद्य- शृङ्गार अभिहिता वाच्यार्थस्वरूपास्तत्र वाच्यायमानत्वात्तेषां ध्वनित्वं न सम्भवेदित्यर्थः । यथा—उषसोति । उषसि रात्र्यन्ते प्रस्तुतनायिकाया विरोधिन्या नायिकाया गृहात्

प्रिये पथ्या अन्तिकं सम्पमद्यति आगच्छछति सति सुदृशो: शोभननयनाया: नायिकाया: नयन-कमल-कोणयो: अरुणयुतिः रक्तच्छवि: त्वरया शोभ्रमेव उदियाय उद्गताड‌भूत् । अत्रेति । उदयपूर्वकेण इण्‌खातुना उदयार्थकेन अमर्षभावोदयस्य वाच्यार्थरूपेण प्रतीतिगोचरोक्तत्वात् अमर्षभावोदयध्वनित्वं न स्यादुदयप्रधान्यादिनां मते, भाव-

( विशेष्य ) के रूप में भावों को ही प्रधनाता माननी जानी चाहिए, यही उचित है । ( शान्तिविशिष्ट भाव, उत्पत्तिविशिष्ट भाव आदि रूप में भावशान्त्यादि को जानना चाहिए ।

और यह भी जानना चाहिए कि यदि भावशान्ति, भावोदय आदि में भाव प्रधान न हो, किन्तु भावविशिष्ट शान्त्यादि ही प्रधान हो, ऐसा मान लेते हैं तो जिस काव्य में भाव व्यङ्गय हैं और उनके शान्ति आदि वाच्य है, उस काव्य में भावशान्ति आदि ध्वनि नहीं हो सकेगा, क्योंकि शान्त्यादि तो वाच्य ही है। जैसा कि—

रात के अन्त में उपनायिका के घर से अपने घर के पास प्रिय के माने पर सुनयनी ( नायिका ) के नयनकमल के कोने में शीघ्र ही लाल चमक उग आयी । यहाँ उदयार्थक उत् उपसर्गपूर्वक इण्‌ धातु के द्वारा भावोदय का वाच्यरूप से हो प्रतीति होगी ( आपके मत से ) ।

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उदयस्य वाच्यत्वेऽपि भावस्यावाच्यत्वाद् ध्वनितत्वं मुस्फुटतरति चेतःप्रधानस्य व्यपदेशानौपयिकत्वेऽपि प्रधानकृतव्यपदेशः मुख्यतया नुपपत्तेः। अस्मन्मते तूत्तपत्तेर्वाच्यत्वेऽपि उत्तपस्थवाच्छ्लाघ्यमप्यंस्य प्रधानस्याद्वयत्वाद् युगपद् एवं भावोदयध्वानिध्यपदेशः। एवं व्यज्यमाने भावप्रतियोगिकस्य प्रशमस्य वाच्यत्वे भावशान्तिध्वनित्वं न स्यात्। यथा—

यदि आप कहेंगे कि उदय के वाच्य रहने पर भी भाव के अवाच्य (व्यंग्य) रहने से इसे ध्वनि कहना ठीक ही है, तो यह भी नहीं हो सकेगा, क्योंकि प्रधान ( उदय ) के मुख्य व्यापार व्यंग्यार्थप्रतिपादकत्व में असमर्थ होने पर अप्रधान ( भाव ) के द्वारा कृत व्यंग्यार्थ-द्यवहार उचित नहीं है। हमारे (भावप्रधानवादी) के मत में तो उत्पत्ति के वाच्य होने पर भी उत्पत्तिकालिक असंप्रत्य के प्रधानरूप में अवाच्य ( व्यंग्य ) रहने से भावोदय ध्वनि कहना उचित ही है। इसी प्रकार व्यंग्य भाव के प्रशम ( शान्ति ) के वाच्य रहने पर भी भावशान्तिध्वनि नहीं हो सकेगा। जैसे—

क्षमापणैकपदस्यः पदस्यः परत्तः प्रिये। क्षेमुः सराजनयनानयनारुणकान्तया॥

क्षमा देने का एकमात्र स्थान प्रिया के चरणों पर प्रिय के गिरते पर कमलनयना के आँखों की लाल कान्ति शान्त हो गयी। यह भावशान्तिध्वनि का उदाहरण है। यदि भाव को प्रधान न मान कर शान्ति को ही प्रधान मानते हैं तो वह ( शान्ति ) 'क्षेमुः' इस पद का वाच्यार्थ ही है, उसे ध्वनि कैसे कहा जा सकता है ? पर शान्ति का प्रतियोगी ( विशेष्य ) अर्थ

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ननु शाब्दवाच्यान्तां प्रशमादीनामरुणकान्त्यैवान्वयाद् अरुणकान्तिप्रशमादेरव वाच्यत्वं पर्यवसितं, न तु तादृश-प्रशमादिव्यङ्ग्यस्य रोपप्रशामादेः, व्यङ्ग्य-व्यञ्जकभेदस्यावश्यकत्वात्। न चारुणव्यङ्ग्येरोपस्यैव वाच्योभूतप्रशामादन्वय इति वाच्यं, वाच्य-व्यङ्ग्यप्रतीतौ रानुप्रेक्ष श्लिष्टतया वाच्य-स्वयमोधदेलायां वाच्यैः सह व्यङ्ग्यान्वयानुपपत्तेः। अन्यथा 'सुदृशो नयनाञ्जकोण्यो:' इत्यस्यान्वयो न स्यात्। मैवम्। एवमपि—

भाव को मानने पर अरुण कान्ति के कारण के रूप में वह तो व्यङ्गय ही है, तो यहाँ ध्वनि हो जाता है।

कान्तयः शोभः गान्ति गनताः। अत्रारम्भभावः शान्तिध्वनिः। नगनानण्येनामर्वो व्यज्यते । शान्तिसतु 'शोमू' पदवाच्यैवैति ।

अब शान्त्यादि को प्रधान मानने वाले शंका करते हैं कि उपर्युक्त उदाहरण में शब्द से वाच्य शान्ति का अन्वय तो अरुण कान्ति से ही है, अमरप् से नहीं। तब तो 'अरुण कान्ति का प्रशाम' यहाँ वाच्यार्थ निर्णीत हुआ, न कि उस वाच्यार्थ से व्यङ्गय भेद रखना तो आवश्यक ही है। इस स्थिति में शान्ति का प्रधान मानने पर भी यहाँ भावशान्तिध्वनि ठोक ही रहता है।

भावशान्त्यादि पोष्यत-ध्वादेति। असतु शब्दवाच्यः प्रशमादिः, किन्तु तथ्यान्वयस्तु अरुणकान्त्यादिनैव, न तु रोषादिना। तथाहि च अरुण-कान्त्यादिशम एवं वाच्योर्थः; तेनार्थान् व्यङ्गयोर्थो रोषप्रशामादिः। एवं हि रोषप्रशामादिनं वाच्यार्थो व्यङ्ग्यार्थवान्। व्यञ्जको हि वाच्यार्थो व्यङ्ग्यार्थाद् भिन्न एव सम्भवति।

यदि इस पर कोई कहे कि केवल आरण्य (लाली) से व्यङ्गय होते हुए रोष का वाच्यस्वरूप प्रशम के साथ ही अन्वय यहाँ है और तब तो प्रशम वाच्य ही रहा, व्यङ्गय नहीं, तो यह आपत्ति ठीक नहीं है; क्योंकि वाच्य और व्यङ्गय का बोध आनुपूर्वी (एक के बाद दूसरा) रूप में ही सिद्ध है, तो वाच्यार्थ के अभ्यबोध के समय में वाच्य के साथ व्यङ्गय अर्थ का अन्वय ही अपपक्ष (अयुक्त) है, क्योंकि उस समय व्यङ्गय अर्थ उपस्थित ही नहीं है।

ततश्च रोषप्रशामदेव्यङ्ग्यार्थं तले शान्तिप्राधान्येऽपि भावशान्तिध्वनिर्नित्यमक्षत-मित्यभिप्रायः। पूर्वपक्षिणा कृतम् आक्षेपं समाधान्ते--न चेति। वाच्यार्थस्य प्रशमादेरव्यां नैवाहुकान्त्यादिना अपितु तदव्यङ्ग्येरोपादिनैव।

यदि ऐसा न हो तो 'सुदृशो नयनाञ्जकोण्यो:' इसका 'अरुणभृति' के द्वारा व्यङ्गय समर्प से अन्वय हो नह्हीं हो

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निर्वासन्तीं धृतिमड्‌नानां, श्रोभां हरेरेणदृशोः श्रयन्त्या:। चिरापराधस्मृतिमांसलेऽपि, रोष: क्षणप्राभुणिकोऽभूत् ॥

तथाहि—निर्वासन्तीर्भवति। अद्धनानां गोपासुत्रनाना श्रृङ्गैर्निर्वासन्ती निस्सारयस्न्ती हरेः श्रीकृष्णस्य श्रोभां मौन्दर्यं घयन्त्या: पिवन्या पणडुशो हरिणनयनया:, चिरकालापराधानां स्मरणेन मांसलेऽपि परिपुष्टेऽपि रोष: अमर्ष: क्षणमात्रस्य प्राभुणिकोऽतिथि: अभूत्। हरिसौन्दर्यांकृष्टतया रोषो विरानोऽभूदिनि भाव:। अत्रामर्षभाजो रोषपदवाच्य एव, तत्प्रशमस्य क्षणप्राभुणिकशब्देन व्यज्यते।

सकेगा, क्योंकि लाली का अन्वय आँख से संभव है, पर उससे व्यंग्य अमर्ष तो चित्तशक्ति है, वह आँख में कैसे रहेगा ?

भाव को प्रधान कहने वाले उत्तरपक्षी कहते हैं कि शान्त्यादि को प्रधान मानने वालों का ऐमा उपर्युक्त समाधान ठीक नहीं है, क्योंकि इस समाधान के वावजूद भी अग्निम पद्‌ में, जहाँ भावशान्तिध्वनि नहीं होता है, उसमें भी वह ध्वनि हो जायगा—यह आपत्ति ( दोष ) अलग से खड़ी हो जाती है।

सुन्दरियों के शैर्य को निकालती हुई हरि की शोभा का पान करती हुई (उन्हें एकटक से देखती हुई) मृगनयना की रोष (अमर्ष) चिरकाल से हरि के द्वारा अपराध ( अन्य रमणी-अनुराग ) करने के स्मरण से परिपुष्ट होने पर भी क्षणभर का अतिथि हो गया ( झट से भाग गया )।

इत्यादि पद्यों में भी भावशान्तिध्वनि की आपत्ति या जायगी, क्योंकि यहाँ भाव ( अमर्ष ) के वाच्यरूप में (रोषपद से ) रहने पर भी उसके प्रशम जो आपके मत से प्रधान है, वह तो व्यंग्य ही ( क्षणप्राभुणिक शब्द से ) है ! (हमारे मत से तो भाव प्रधान है, जिसके वाच्य रहने से ध्वनित्व का प्रसंग ही नहीं है ! )

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सहृदयानामतुचितैव । तस्माद् भावप्रशमादिष्वपि प्राधान्येन भावानामेव चमत्कारित्वम्, प्रशमादेश्वूपसर्जनत्वम् । अतो न तस्य वाच्यादोपः । इदं पुनर्भावध्वनिष्यो भावशान्त्यादीनां चमत्कारवैलक्षण्ये निदानम्— यदेकत्र चर्वर्णायां भावेषु स्थितयवच्छिन्नैरमर्षादितवमेव वा प्रकारः, अन्यत्र तु प्रशमावस्थात्वादिरपीति ।

यदि नाम भावस्य वाच्यादिष्वभाव्यङ्गङ्गिभावेनैव प्रकाराङ्गप्रविभाजनत्वं स्याद्— एकत्र एवात्र न ध्वनित्वमिति चेत् पूर्वोक्तभावशान्ति-भावोदयोऽङ्गङ्गिभावः— षट्प्रकार्योः जमो दयोरेषां च्च्यान्वैप केवलभावगतत्वेऽपि ध्वनिस्वव्यङ्ग्यहारः रसवन्मतोऽस्तुतः स्यात् । उपसर्जनत्वम् = विशेषणत्वेन गौणत्वम् । एकत्र = भावध्वनौ । स्थितयवच्छिन्नैरिति = विद्यमानताविशेषःमर्षादितवम् ।

आप कहेंगे कि ध्वनि होने में भाव और शान्त्यादि दोनों का अवाच्य ( ध्वंग्य ) रहना अपेक्षित हैं, एक ही का नहीं, तो यह और अधिक आपत्तिजनक हो जायगा, क्योंकि पूर्वोक्त दोनों पद्यों में 'उपसि' में शान्ति के और 'क्षमापण' में उदय के वाच्य न रहने के कारण ये उदाहरण ही न रह सकेंगे, जबकि इनका उदाहरण होना सर्वसम्मत है । अतः इस आपत्ति को आप इष्ट नहीं कह सकते, क्योंकि सहृदय इसे अनुचित ही मानेंगे ।

अतः भावशान्ति, भावोदय, भावसन्धि और भावशवलता में भी प्राधान्यता भावों में ही चमत्कार रहता है, शान्ति आदि तो गौण ही हैं । अतः उनके वाच्य रहने पर भी भाव के व्यंग्य रहने से भावशान्त्यादि ध्वनि मानने में वाच्यता दोप नहीं लगता है ।

और भावध्वनियों की अपेक्षया भावशान्ति आदि के चमत्कार में विलक्षणता ( फर्क ) का यह भी एक मूल कारण है कि एक ओर भावों के आस्वादन में स्थितिरूप अवस्था वाले अमर्ष आदि रहते हैं (पूर्व से ही भाव की स्थिति बनी रहती है ), दूसरी ओर भावशान्त्यादि में प्रशमादि उन-उन अवस्था वाले ही अमर्षादि रहते हैं ।

इस प्रकार भावों के विशेषण के रूप में स्थिति रूप अवस्था-विशेष वाले अमर्षादि या केवल अमर्षादि और भावशान्त्यादि के विशेषण ( प्रकार ) के रूप में प्रशमावस्थापन्न आदि देखें जा सकते हैं । भावों को प्रथम विशेषण युक्त रहने पर भी भावशान्त्यादि से वैलक्षण्य नहीं होता, क्योंकि अमर्षादि भी तब भाव-विशेष स्थित्यावस्थापन्न होते हैं और भावशान्त्यादि भी प्रशमावस्थापन्न आदि भाव-विशेष ही होते हैं ।

अतः भावों को भावशान्त्यादि से विलक्षण दिखाने हेतु उसका प्रकार ( विशेषण ) अमर्षादितव ( अमर्षत्व, असूयात्व आदि ) ही मानें, जिससे 'सहृदयसम्मतों का जोष' ध्वन्या#

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रसस्य तु स्थायिभावमूलकत्वात् प्रशमादेरसम्भवः; सम्भवे वा न चमत्कार इति स न विलीयते ।

( अलक्ष्यक्रमव्यंग्यध्वनि-विचार ) सोऽयं निषादितः सर्वोऽपि रत्यादिलक्षणो व्यङ्ग्यप्रपञ्चः स्फुटप्रकरणे झगिति प्रतीतपू विभावानुभावव्यभिचारिगण महद्दर्शनमेतत् प्रमात्रा सुष्ठु मेणैव केवलं तत्त्वभावनारहितमेतत् या प्रकृतो विशदणम् । अन्यत्तु - भावशान्त्यादिरो भावत्वेन सह प्रशमावस्थात्वादिरपि विश्रोपणम् ।

यथा भावस्य प्रशमादिरूपेण, तथैव रसस्यापि तद्वत् न भवतोत्याह— दयादयो न सम्भावनीन । यद् तथापि तद्रूपां क्रिमते, तहि तत्र न कश्चिच्चमत्कार-सम्भावनेति ।

पूर्वप्रतिज्ञातं “स्थायिप्रतीनारूपि सल्चयक्रमदर्शनंयस्यत्वमुपादयिष्यत” इति भाव-निरूपणानन्तरं प्राप्तावसरं प्रस्तौति—सोऽयमिति । मयः प्रतिपादितानां रत्यादिलक्षणा-झगिति = झटिति द्विलभित्यनेनैव । प्रमात्रा ज्ञातास्वादकपुरुषा । हेतुहेतुमतो कारण-भेदनवत् कमो नैव लक्ष्यते इति कारणाद् अलक्ष्यक्रम-नाम्ना मुख्यतया व्यपदिश्यते, सर्वेऽयं प्रकरणं भवति, उन्नेया ऊहनीया वा विभावादयो भावानां कारणस्वरूपास्तत्र विशिष्ट भावत्व आदि । शुद्ध जल और बर्फ में जो भेद है, वही भाव और भाव-शान्त्यादि में है । या मित्र के साथ-साथ रहने में जो आह्लाद होता है और उनके वियोग आदि के समय होता है, इनमें जो अन्तर है वही भाव और भावशान्त्यादि में है।

रस तो स्थायिभावमूलक है, उनके सदा स्थायी रहने से उनका प्रशम, उदय आदि होना सम्भव नहीं है । अथवा यदि सम्भव भी हो तो तद्गत कोई झलक से पूर्ववर्णित ये सभी रत्यादि स्थायीभाव, सन्ध्यारिभाव रस आदि जितने व्यङ्ग्य-व्यभिचारिभाव के शुद्ध प्रतीत हो जाने से अत्यन्त सहृदय ज्ञाता के द्वारा अत्यल्प समय में ही समक्ष लिये जाते हैं, जिससे कारण ( विभावादि ) और कार्य ( रसप्रतीति ) के पूर्वं-पर के क्रम के ( कौन पहले और कौन बाद में—इसके ) लकित न होने के कारण

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समयेन प्रतीत इति हेतुहेतुमतोः पौर्वापर्य क्रमस्‍यो लक्ष्यणाद अलक्ष्यक्रमो व्यप्‍दिश्यते । यत्र तु विचारवेचं प्रकरणस्‍मु, उन्नेया वा विभावादिस्‍तत्र मामग्रो-विलास्वाधीनं चमत्कृतिरमास्थिर्य्यमिति संलक्ष्यक्रमोडप्येष भवति । यथा—“तल्पगतापि न सुनतुं” इति प्रागुदाहृत इत्येतदर्थावगतिनिविलम्‍नत । न खलु धर्मिग्राहकम्‍मान-सिद्ध रत्यादिध्वननैरसंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्‍गयत्वम् । अतः पय लक्षणक्रमप्रसड्गो—

प्रतीति न होने के कारण ) अलक्ष्यक्रम कहे जाते हैं । किन्तु जहाँ प्रकरण ( प्रमेय ) का ज्ञान कुछ सोचने के बाद होता है या विभाव आदि का ऊह करना पड़ता है वहाँ रसप्रतीति में अपेक्षित सामग्री ( साधनों ) के ज्ञान में विलम्ब के कारण विलम्ब से चमत्कार मन्‍द पड़ जाता है ओर इसलिए यह रस, भाव आदि संलक्ष्यक्रम ध्वनित भा हो जाता है, क्योंकि वहाँ वाच्य-लक्ष्य-प्रकरण-विभाव-अनुभाव आदि के क्रम प्रतीत होते हैं । यथा—उत्तमोत्तम काव्य के उदाहरण में दिये गये “तल्पगतापि” इस पद्य में 'अभोऽ' इस अर्थ की प्रतीति विलम्ब से होनी है । ( इस मुख्या को पहले लज्जा अधिक थी, पर अब भावी वियोग के कारण वह कम हो गयी हैं—ऐसा अर्थ प्रकरणज्ञान-सापेक्ष होने के कारण विलम्ब से होता है । अतः वहाँ का 'अभोऽ' ( रसाभास ) संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य है । ) रस अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ही हो ऐसा कोई नियम नहीं हैं, क्योंकि अलक्ष्यक्रम-व्यङ्गयत्व रूप धर्म ( भाव ) का धर्मी ( आश्रय ) रस के ग्राहक ( प्रहण करने वाले सहृदय ) ही इसके संलक्ष्यक्रमत्व या असंलक्ष्यक्रमत्व में प्रमाण हैं, वे यह नहीं कहते कि रस अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ही है । इसलिए रस लक्षणक्रमव्यङ्ग्य भी होता है । अतएव संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य के प्रसंग में आनन्‍दवर्धनाचार्य्य ने ध्वन्या लोक में कहा है कि—

लक्ष्यते अनया इति लक्ष्यणा ।

'इस प्रकार देवर्षि अज्‍जिरा के बोलने पर पिता के पास बैठी हुई पावंती नीचा मुँह करके खेलने के लिए हाथ में स्थित कमल की पत्तियों को गिनने लगी'

एवंवादिनि देवर्षौ पार्श्वे पितुरषेःमुखी । लीलाकमलपत्राणि गण्यामास पावंती ॥

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इत्थं कुमारीस्वभावाद्यद्‌ध्यधोमुखतवविशिष्टस्य लीलाकमलपत्रगण-नस्योपपत्त्या मनाग् विलसद्‌ नारदकृतविवादान्द्रिप्रमदाद्विज्ञानोत्तरं त्रीडायाश्चमतकरणाललक्ष्यक्रमोडयं ध्वनिः

डति प्राहुरानन्दवर्धनाचार्याः, "रसभावादिरर्थो ध्वन्यमान एव, न वाच्यः, तथापि न संलक्ष्यक्रमण्य विप्रय" इति चाभिनवगुप्तपादाचार्यः।

स्यादेतत्, यद्ययं संलक्ष्यक्रमण्य विप्रयः स्याद्, अनुरणन-भेदरगणप्रस्तावे "अर्थशक्तिमूलस्य द्वादशभेदा" इत्यभिनवगुप्तः, "तेनायं द्वादश-पूर्वनिदिष्ट-शिवगणद्रों देवर्षिर् अद्भिररुणि यदति ननु पित्रुर्हितमत्य पार्श्वे स्मितताकुमारी पार्वती अघोमुखीं लीलाकमलं त्रीडाद्राथ् स्वहस्तने श्रृणु यत्, मलं तस्य पदत्राणि नण-यितुमारेभे।

कुमारसम्भवे पञ्चमसर्गे स्यितां स पर्याप्तमदम्। अत्र देवविपरीतरा न तु नग्नः, पूर्ववत्‌पद्येऽत्र रस एव उपक्रमान्। उपपत्त्या मितद्र्वेन। मद्यो वार्ङ्गनध्यानुपपत्ति-द्वाराड्थान्तरघटद्‌ग्यतलेन विलसद्यो न जायते, अन्वयोपपत्ति तु प्रकारणादिनाथान्तरयोगे विलम्बेन क्रमो लक्ष्यत एव।

अत्र कुमार्याः स्वभाव एव तथाविधी भवनेति नाम्न्ययानुपपत्तिः या लज्जा दृश्यत भवनेत्, किन्तु पूर्वप्रकाशतस्व-विदाविहृतचर्वाड्‌धोमुखतव् नेन तस्यां लज्जा-भावोद्‌भवयज्यते।

अत्र कारण-कार्ययोः क्रमावयोध्यपुरस्मरं लज्जा-भावोद्धविनि-प्रतीतेः तस्य ललक्ष्यक्रमत्वं ह्रदनिकटवेधम्। अभिधेयतद्धितरिये च रसभावादिद्वनिः लक्ष्यतया स्पष्टतां याति।

रसध्वनेः संलक्ष्यक्रमत्वमीपिति पूर्वप्रतिपादितमिद्धान्नमाश्रयति-स्पादेतदिति। अयं रसभावादिद्वनिः

अनुरणनभेदः संलक्ष्यक्रमगम्भविनिर्देशः, अनु = पश्चान् क्रम-ज्ञानानन्तरं ध्वन्यते, तथ च विश्चवनाथः माहिल्यदर्पणे संलक्ष्यक्रम मद्‌ग्यसं-पत्रों का गिनना संगत हो सकता था, वहाँ लज्जा व.ि बोध नहीं था, पर कुछ विलम्ब लज्जा के चमत्कृत होने से यह ध्वनि लक्ष्यक्रम है (क्योंकि भावबोधक-सामग्री के बोध में क्रम देखा जा रहा है)।

कुमारसंभव के इस पद्य में कुमारी स्वभाववश भी नीचा मुँह करके कमल-पत्रों का गिनना संगत हो सकता था, वहाँ लज्जा व.ि बोध नहीं था, पर कुछ विलम्ब

लज्जा के चमत्कृत होने से यह ध्वनि लक्ष्यक्रम है (क्योंकि भावबोधक-सामग्री के बोध में क्रम देखा जा रहा है)। इसकी व्याख्या करते हुए आचार्य अभिनवगुप्त ने ध्वन्या-लोक-लोचन में कहा है कि "रस, भाव आदि ध्वनन ही होते हैं, वाच्य नहीं, फिर भी

लज्जा के चमत्कृत होने से यह ध्वनि लक्ष्यक्रम है (क्योंकि भावबोधक-सामग्री के बोध में क्रम देखा जा रहा है)।

इसीको व्याख्या करते हुए आचार्य अभिनवगुप्त ने ध्वन्या-लोक-लोचन में कहा है कि "रस, भाव आदि ध्वनन ही होते हैं, वाच्य नहीं, फिर भी

इसीको व्याख्या करते हुए आचार्य अभिनवगुप्त ने ध्वन्या-लोक-लोचन में कहा है कि "रस, भाव आदि ध्वनन ही होते हैं, वाच्य नहीं, फिर भी वे सभी अलक्ष्यक्रम के ही विषय नहीं होते"।

रसभावादि ध्वनि को यदि संलक्ष्यक्रम भी मानते हैं तो इस पर शंका उठ-रही है कि तब तो संलक्ष्यक्रमध्वनि की भेद-गणना के प्रकरण में रसध्वनि की भी

गणना होनी चाहिए, परन्तु "अर्थशक्तिमूलक ध्वनि के बारह भेद होते हैं" ऐसा

गणना होनी चाहिए, परन्तु "अर्थशक्तिमूलक ध्वनि के बारह भेद होते हैं" ऐसा

ऐसा काव्यप्रकाशाकार मम्मट का कथन संगत नहीं हो रहा है (वे उन बारह भेदों में

ऐसा काव्यप्रकाशाकार मम्मट का कथन संगत नहीं हो रहा है (वे उन बारह भेदों में

रसभावादि ध्वनि को नहीं गिनते)।

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ल्मक" इति मम्मटोक्तिश्व न सङ्झुच्छेत वस्त्वलङ्कारात्मना द्विविधेन वाच्येन स्वतःसम्भवितत्व-कविप्रौढोक्तिनिष्पन्नतत्व-कविनिबद्धवक्तृपौढोक्तिनिष्पन्नतवैशिष्ट्यभिरुपाधिभिश्चैविध्यमापन्नेन पडात्मना वस्त्वलङ्कारयोरिव रसादेरप्यभिव्यञ्जनाद् अग्रादशात्प्रसङ्झात्।

रसध्वनि का समावेश नहीं करते) क्योंकि वस्तु और अलङ्कार रूप वाच्य अर्थ के तीन-तीन उपाधि ( धर्म या स्वभाव ) स्वतःसम्भवी, कविप्रौढोक्तिसिद्ध एवं कविनिबद्ध-वक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध के मिलाकर छः व्यङ्ग्य ( व्यंग्यार्थ के साधक ) हुए । इन छः

अत्रोच्यते—प्रकटैर्विभावानुभावाद्यभिचारिभरलक्ष्यक्रमतयैव व्यङ्ग्यमानो रत्यादिः स्थायिभावो रसीभवति, न संलक्ष्यक्रमतया। रसीभावो हि नाम विषयेऽयं "व्यङ्गयक्रममलक्ष्यत्वादेवानुरणनरूपो यो व्यङ्ग्यः" इत्याह। वस्त्वलङ्कारयोरिव वेऽति। संलक्ष्यक्रमध्वनौ वस्तु अलङ्कारश्चेति द्वावेव व्यङ्ग्यौ न रसादिरिति सिद्ध रत्नि 'द्वादशात्मक' इति कथनैन। तथा हि वाच्यस्वरूपौ वस्त्वलङ्कारौ व्यङ्ग्यकौ स्वतः-सम्भवि-कविप्रौढोक्तिसिद्ध-कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध्वेति भेदःः त्रिविधौ।

व्यङ्जकों के द्वारा व्यङ्ग्य वस्तु एवं अलङ्कार को लेकर संलक्ष्यक्रमध्वनि के बारह भेद होते हैं । अब यदि रस को भी ले लिया जाय तो उक्त छः व्यङ्जकों से व्यङ्ग्य रसध्वनि के छः भेद इसके बढ़ जाने से इन आचार्यों को बारह के स्थान में अठारह कहन

तथा च व्यङ्ग्यकः षट्। तैःषड्जकैर्वस्त्वलङ्कारयोरध्यङ्ग्यत्वेन द्वादशात्मकता ममःषट्क्रमध्वने: सिद्धा। रसादिद्वनेरपि सम्मेलनेन पूर्वोक्तषड्विधव्यङ्ग्यकद्वारा तस्यापि पडविधस्य व्यङ्ग्यस्य सम्भव इति साकल्येन अष्टादशभेदाः कथ्यितयितुमुचिता।

ज्ञातव्य है कि यह आक्षेप रसध्वनि को संलक्ष्यक्रम भी मानने वाले अभिनवगुप्त एवं जगन्नाथ पर ही लगत है, मम्मट पर नहीं, क्योंकि उन्होंने रसध्वनि को कहीं भी संलक्ष्यक्रम कहा हो नहीं है। यहाँ अपने मत में मम्मट से विरोध रूप आपत्ति होने का

किन्तु द्वादशात्मकत्वमेव कथितमिति मान्याचार्यसिद्धान्तविरोधः कथम् परिहरणीय इत्याक्षेपः। समाधान्ते—अत्रोच्यत इति। केनचिदाचार्येणोक्तं, न तु मयेतिति स्वमतैन तु आक्षेपो युक्त एवेत्यन्रय-सन्दर्भभेदौ प्रतिभाती। पण्डिततरैजन "उपपादयिष्यते च स्थाध्यादीनामपि संलक्ष्यक्रमत्वम्", "सोडयं निगदितः सर्वोऽपि रसादिलक्षणी व्यङ्ग्य-प्रपञ्चः......संलक्ष्यक्रमोऽयेष भवति" इत्यादिसन्दर्भभेदौ रसभावादिद्वने: संलक्ष्यक्रमता

ही आक्षेप है । उक्त आक्षेप का समाधान करते हैं—जहाँ विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी-भाव व्यक्त ( स्पष्ट ) रहते हैं वहाँ तो अलङ्कारमध्वपे सै ही व्यङ्ग्यार्थ होते हुए रति आदि स्थायिभाव रस बन जाते हैं, संलक्ष्यक्रमध्वपेँ सैं नहीं ( क्योंकि यहाँ

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झगिति जायमानालौकिक-चमत्कारविपयस्थायित्वम् । मंलक्ष्यक्रमतया व्यङ्ग्यमानस्य रत्यादिस्थायिभावरपरान्तकै तथैव स्वमतेऽपि ।

पूर्वाचार्यसममत्यै साधिता । अथवा यथाशिनवगुसमते स्वोक्तिवरौषधपरिहाराय रसपदस्य 'स्थाय्यादीनामपि संलक्ष्यक्रमत्वम्' इत्येव हि पण्डितराजेनोत्कम्, मेदगणनप्रस्ताव्ये च रसगङाधरे नैव रसशब्दतः संलक्ष्यक्रमत्वं परिगणितः । तेन अन्त्राच्चन इत्यस्य मयेतिच्छेषः ।

प्रकटैःरिलते । स्कुटप्रकरणे सुव्यक्ते विभावादौ या रति: प्रतीयते मा अक्रमनैव, सैव रसस्वरूपतां याति, अलक्ष्यक्रमसंज्ञा च लभते ।

या हि रति: ( भावमात्रं ) स्ववोंशो क्रममपेक्षते स केवलं रतिस्वरूपा, न तु रसमस्वरूपा । नमया 'नसंलक्ष्यतद्वेवान्तर्भाव इति । रसीभवत्तीत, अस्मों रसः सम्पद्यन इनि अभिनवद्रावोः किवप्रतीये दीर्घे च मिद्यति ।

नहि स्थायिभावा एवं रमा अपि तु अलक्ष्यक्रमा एव, नतु मंलक्ष्यक्रमास्तु वस्तुरुपा: । झगिति अविलम्बेन ।

तदुक्तकोनारमू आनन्दवर्धनाभिनवगुसपादानाम् । स्थाय्यादीनां मंलक्ष्य-क्रमभेदगणने तदनुपादानमिति विरोध:, स्थाय्यादीनां यस्तुरुपना-वर्णभाव इति ममाचान्तम् !

विभाव एवं रस की प्रतीति में क्रम लक्षित नहीं होता है । स्थायीभाव जो रस नहीं है, वे रस तब बनते हैं जब अतिशीघ्र उतपन्न अलौकिक चमत्कार के विपय बनते हैं । जहाँ उत्त चमत्कार हेतु से उतपन्न होता है वहाँ संलक्ष्यक्रम ( क्रम का लक्षित होना ) रुप से से व्यंग्य होते हुए रति आदि स्थायीभाव या विभावरीभाव भी वस्तुमात्र बनकर रह जाते हैं, अर्थात रत्यादि वहाँ रस नहीं बन पाते हैं—इस प्रकार से उन लोगों ( अभिनवगुप्त आदि ) के आशय को वर्णित करने पर उनकी उपयुक्त उक्तियों ( “द्वादश भेदा:” ) से विरोध नहीं होता है । परन्तु ऐसा समाधान करने में कोई युक्ति होनी चाहिए, जो काव्यतत्व के मर्मज्ञ विद्वानों को विचारना चाहिए ।

अब शंका होती है कि 'संलक्ष्यक्रम' स्थली में योंद रत्यादि रस नहीं बनते, वस्तुमात्र रहते हैं तो अभिनवगुप्त ने जो पूर्वं में “रसभावादि सब जगह अलक्ष्यक्रम हो नहीं रहते” ऐसा कहा है और जगन्नाथ ने स्वयं “सभी रसादिलक्षण” ऐसा जो कहा है वह असंगत हो जाता है । इसका समाधान करते हैं कि कि वहाँ रस शब्द रत्यादि भाव अर्थ में लाक्षणिक ( लक्षणा से बोधक ) है । नागेशभट्ट ने उपयुक्त समाधान में अपेक्षित युक्ति ( उपपत्ति ) प्रस्तुत की है और एक नवीनमत को भी 'गुरुमर्मप्रकाश' में रखा है। युक्ति यह है कि रस को

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तदुक्तीनां विरोधः । उपपत्तिस्तस्वर्थेऽस्मिन् विचारणीया । 'रसभावादिरर्थ' इत्यत्र रसादिशब्दो रत्यादिपरः ।

उपपत्तिरिति । अस्मिन् स्थाय्यादीनामलक्ष्यक्रमत्वे रसत्वं संलक्ष्यक्रमत्वे तु वस्तुत्वमित्यत्र उपपत्तिर्युक्तिविचारणीया काव्यतत्त्वज्ञैः । विषयोऽयं सङ्केतः प्रतिभाति, किञ्चवत् युक्तिः त न पश्यतः, यदि युक्तिरुद्भाव्येत तर्हि मतिमद्भिर्माध्यमेवेत्याशयो ग्रन्थकृतः । युक्तिरहि नागेशभट्टोक्तानपदेमेव वक्ष्यते । ननु "रसभावादिरर्थो न सर्वोऽलक्ष्यक्रमस्य विपयः" इत्यभिनवगुप्तोक्तौ "सर्वोऽपि रसादिलक्षणं" इति पण्डितराजोक्तौ च रसस्यापि सलक्ष्यक्रमता विरुध्यत इत्याह—रसभावेऽति ।

तत्रत्य-रसपदं स्वार्थ्ये रत्यादौ लक्षणकम् ।

अत्रोच्यते—रसादिध्वने: संलक्ष्यक्रमत्वविपये मतभेदोपलभ्यते—(१) सर्वोऽपि स्थायिभावा व्यभिचारिभावा वा अलक्ष्यक्रमत्वेन भाव्यद्वनयो ( रसध्वनयो ) भवन्ति, संलक्ष्यक्रमत्वेन तु वस्तुध्वनय इत्यानन्दवर्धनाभिमतयोर्मतम् । संलक्ष्यक्रमध्वनिरूपे हि तेषां वस्तुरूपेणैव भान ( रत्यादिरूपेण हृदिदृश्यपेण वा ), न तु भावत्वेन । अत्र नागेशाभट्टोक्ता उपपत्ति:—विगलितवेद्यान्तर एव रसास्वाद इति सर्वसंमतं, न च अलक्ष्यक्रम एव सभ्भावात्, यदि वाच्य-लक्ष्य-विभावानुभावादि-रसस्यु क्रमः पूर्वंगवभावसरूप: प्रतीयते तर्हि तत् वेद्यान्तरसय ज्ञानान्तरसय अविगलितत्वेन रसत्वमेव न सम्भवति । अत एव तथाविधस्य स्थाय्यादेरं रमतत्वमपि तु वस्तुत्वमेव चिति ।

( ३ ) रसभावादीनां ममंप्रकाशो नागेशभट्टानां मतम् । अन्रोपपत्ति:—विभावादिप्रतीतिसामग्रीविलम्वे वाच्यार्थज्ञानक्रमस्य ध्वनिप्रतीतिक्रमत्वेन नाझ्झीकरणेऽपितु विभावज्ञान-रसज्ञानयोः क्रमस्यैव, वक्तृवैशिष्ट्यप्रकाशनादिज्ञानसहितस्यैव व्यङ्गकत्वात् । अत एव सर्वत्र रसोदलक्ष्यक्रम-व्यङ्गय एवति ।

सर्वसंमत रूप से विगलितवेद्यान्तर ( अन्य सभी ज्ञानों से रहित एकमात्र रसज्ञानस्वरूप ) माना जाता है । ऐसी स्थिति में विभावादि-प्रतीति एवं रस-प्रतीति में यदि सूक्ष्म काल का भी अन्तर हो जाता है तो अन्य ज्ञान की प्रतीति के कारण रसत्व का भङ्ग हो जायगा और संलक्ष्यक्रम में ज्ञानान्तर का बोध हो ही जाता है । अतः उस स्थिति में रहने वाले रत्यादि को रस नहीं, वस्तुमात्र कहा जा सकता है । नवीन विद्वानों के मत कहकर नागेश ने अपना मत भी दिया है । वक्तृवैशिष्ट्यप्रकरणादि के ज्ञान सहित वाच्यार्थ ही व्यङ्गक होते हैं और क्रम तो प्रकारणादि ज्ञान में ही रहता है । व्यङ्गक की उपस्थिति से तत्क्षण विभावादि एवं रसादि की

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तदित्यं निरूपितस्यास्य रसादिध्वनिप्रपञ्चस्य पदवर्णरचनावाक्यप्रबन्धैः पदैकदेशोर्वर्णातिमकै रागादिभिश्राभिव्यक्तिमामनन्ति ।

प्रतीति होती है, जिसमें क्रम अलक्षित रहता है । अतः इसे अलक्ष्यक्रमव्यंग्य ही कहते हैं, संलक्ष्यक्रम नहीं । वाच्यार्थ के क्रम को लेकर रत्यादि को संलक्ष्यक्रम नहीं कह सकते, क्योंकि विभावादि ज्ञान से रहित यत्किञ्चित् वाच्यार्थ ( वाच्यार्थ के अंश ) से रसप्रतीति नहीं हो सकती है ।

तत्र वाक्यगतानां पद्यानां स्वार्थानुपस्थितद्धारा वाक्यार्थज्ञानोपाये समानेsपि यत्तु 'निह्न विभावादित्यारभ्य मर्मप्रकाशोडन्यद्गुद्धः प्रतिभाति' इति रसचन्द्रिकायामुक्तं तत्सूत्रेमेक्षया मूढभावानाकलनजन्यमेव ।

वाच्यार्थ के क्रम को लेकर रत्यादि को जो संलक्ष्यक्रम कहा है सो वारोपितरूप से ही यथाकथञ्चित् माना जा सकता है ।

विभावनादित्युप्रेमेव वाच्यप्रकरणादिप्रतीत्यानन्तरं न तु नैव क्रमोऽनुभूयते । ममैवप्रकाशे 'तत्क्रमग्रहणे' इत्यस्य वाच्यार्थक्रमग्रहण इत्यर्थः ।

रस-भावादिध्वनियों के विषय में ऊपर तीनों मत प्रदर्शित हुए—( १ ) अस्फुट प्रकरण में रसादिध्वनि संलक्ष्यक्रम होते हैं—यह पण्डितराज का मत है ।

पूर्वोक्तेषु त्रिष्वपि मनेपु द्वितीयो मेने एव पूर्वाचार्यैरान्थममन्वयो भवति । परन्तु भावध्वनेः संलक्ष्यक्रमे वस्तुध्वनौ, असंलक्ष्यक्रमे तु रसध्वनौ स्थापनं नैव युक्तं, भावानां 'वस्तुतः' पाठ्यस्य मत्वमममनत्वात्, रत्यादीनां विभावादिसामग्रीग्रममवेतानां न रसत्वमित्यपि नैव महूदयम्ममनमित्यस्यापि प्रसिद्धत्वात्, विभावादि-रसबोधक-सामग्रीगतक्रमस्य क्वाप्यदृष्टस्वाच्च रसस्थल एव भावादिस्थलस्थस्य तुल्यत्वाच्चैति तृतीयमतमेव समर्थयामहे ।

( २ ) अस्फुट प्रकरण में रत्यादि वस्तुमात्र रह जाते हैं, रस नहीं—यह आनन्दवर्धन एवं अभिनवगुप्त का मत है ।

तदित्थमिति । प्रपञ्चः समुदायः । पदं = सुबन्तं तिङन्तं च । वर्णा आकारद्रव्यं, रचना-पदोऽवयवप्रान्तरितः, वाक्यं क्रियान्वयपरस्परमकोपदेशसमुदायः, प्रबन्धो महावाक्यं मेघदूतादि, पदैकदेशः प्रकृति: प्रत्ययो वा, अवर्णातिमको वीणादि-

( ३) रसादिध्वनि सदा अलक्ष्यक्रम ही होते हैं—यह नागेश का मत है ।

अब रसादिध्वनि के व्यञ्जकों के विषय में प्राचीन एवं नवीन विद्वानों के मत निरूपित करते हुए पहले प्राचीनों का मत प्रस्तुत कर रहे हैं । तो इस प्रकार निरूपित रसभावादि ध्वनियों के समुदायों का पद, वर्णं, रचना ( वाक्यादि रीति ), वाक्य,

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कुर्वदृपतया चमत्कारयोगव्यवच्छेदकत्वेन कस्यचिदेव ध्वनिव्यपदेशहेतुत्वम्, यथा—''मन्दमाक्षिपति'' इत्यत्र ''मन्दमिति''त्यस्य ।

ध्वनि:, राग: भैरवादि, संगीतशास्त्रीय ताल-मान-रसाक्षित-गानपद्धति , आदिना चेष्टादीनां संग्रह: । आमन्नति प्रतिपादयन्ति प्राचीनाचार्या: । आमन्तीत्यस्य अनुपदमेव वक्ष्यमाणेन प्राक् इत्यनेन सम्बन्ध: ।

कुर्वदृपतयेतित ।

बहुषु समानकायंसाधकेषु कस्यचिदेकस्य विलक्षणकार्य-कर्तृत्वमेव तस्य कुर्वदृपता । शब्दोऽयं बौद्धदर्शने पारिभाषिक: समुदाये एकस्यापि प्रयांसेन कार्ये जाते मभुदायत्वैव साफल्यमित्यर्थ: ।

यथा—सकलसीर्षषु युद्धघमानेषु कस्य-चिदेकस्यासाधारणशौर्येण विजये लब्धे सर्वेऽपि विजयिनो भवन्ति, तथैवात्र वाक्यघटक-सकलपदानां वाक्यार्थबोधे साधनत्वेऽपि कस्यचिदेकस्य विलक्षणशक्तिमत्तया रसप्रतीतौ सम्पूर्णवाक्यस्यैव रसप्रत्यायकत्वमिति ।

उपाय: साधनम् । चमत्कारस्य अयोगोऽ-सम्बन्ध: तद्रहितत्वेन नियतचमत्कारसहितत्वेन कस्यचिदेव वाक्यघटकस्यैव पदस्य ध्वनिव्यवहारहेतुत्वा ।

उत्तमोत्कर्षकाव्यस्योदाहरणे मन्त्रमाक्षिपतीति ।

तत्र वाक्यघटकानां सकलपदानां श्रृङ्गारच्याख्यक्तत्वेऽपि मन्त्रमिति पदेन ''शानै: प्रियकरापसारणमि''त्यर्थ इतर-वैलक्षण्येन रसनिरूप्यमाणे ।

रचनान्ति ।

रचना हि वर्णाश्रिता पदाश्रिता वा, तदतिरिक्तं न किमपि स्वरूपं तस्या:, वण्स्तु पदावयवत्वेन स्वरूपवान् भवति ।

अर्थबोधो हि रचना-वर्णयो: पदवाक्यार्थान्तर्गत एवेति रचनैव प्रथममाक्षिप्या ।

तथा च स्वतन्त्ररूपेण व्यङ्जकता रचना-प्रबन्ध ( सम्पूर्ण ग्रन्थ ), पद के अंश ( प्रकृति या प्रत्यय ), अव्यक्त वौणाद्दनि, राग ( भैरव आदि संगीतशास्त्रीय ) तथा चेष्टा से अभिव्यक्त ' प्रकटित ) होना प्राचीन आचार्यों प्रतिपादित करते हैं ।

उनमें वाक्य में स्थित सभी पद यदापि अपने-अपने अर्थों को उपस्थित करके वाक्यार्थ के ज्ञान में समान रूप से कारण होते हैं, तथापि प्रधान कार्यकर्ता के रूप में चमत्कार के असम्भव से रहित ( क्षम्य च मत्कारोत्पादक ) होने के कारण कोई एक ही पद ध्वनिसम्पादक के रूप में प्रसिद्ध होता है ।

सेना में स्थित सभी योद्धा लड़ते हैं, पर किसी एक-दो के अद्भुत उत्साह से हो प्राप्त विजय से सभी विजयी कहलाते हैं ।

इसी प्रकार वाक्यान्तर्गत सभी पद वाक्यार्थ सम्पादित करते है, पर किसी एक पद की व्यञ्जकता से उत्पन्न ध्वनि के भागी वे सभी पद होते हैं ।

जैसे—'मन्दमाक्षिपति' (पृ० ३८) में 'मन्दम्' इस पद से हो चमत्कृत ध्वनि होता है ।

यद्यपि रचना और वर्णं तो पद या वाक्य के अनन्तर्गत ही रहने के कारण पदवाक्य में स्थित व्यङ्जकता के विशेषण स्तर में ही प्रतिबद्ध हो सकते, स्वतन्त्र व्यञ्जक

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मेव, न तु व्यङ्कतव्मिति यद्यपि सुवचचम्, तथापि पदवाक्यवविशिष्टरचनात्वेन, रचनाविशिष्टपदवाक्यत्वेन वा व्यङ्कतव्मिति विनिगमनाविरहेऽण घटादौ दण्डचक्रादेः कारणत्वस्येव प्रत्येकमेव व्य न्कताया: सिद्धेरिति प्राच्चः ।

वर्णरचनाविशेषणां माधुर्यादिगुणाभिव्यञ्जकत्वमेव, न तु रसाभिव्यञ्जकत्वं, गौरवात्पमानाभावाच्च । नहि गुण्याभिव्यञ्जकं बिना गुणाभिव्यञ्जकोपेक्षितं पदकाव्यघटकत्वेनैव भवेत् यद्यपि श्लोक आक्षेपलम्यस्थापोति पदोच्चारणेन । एकव् पदवाक्यनिष्ठा या व्यञ्जकता तद्रोपणश्रेण्यामेव रचना-वर्णयोः स्थानम्, न तु प्रधानव्यञ्जकत्वेनैति शङ्का । समाधाने हि—समुदितपदवाक्यो-व्यञ्जकत्वेऽपि तथ्घटकस्य कस्यांशस्य विशेषस्यन्वेत्यत्र न कापि विनिगमना = तत्पक्ष-साधिका युक्ति:, तदभावादुभयोःञ्जकता मुख्यैव । यथा दण्ड-चक्रादिकं सम्मिलित-रूपेणैव घटकारणत्वेन दृष्टम्, तत्र कस्याप्येकस्य विशेषप्तया युक्त्यभावात् पुथक् पुथक् दण्डस्य चक्रस्य च घटकारणता मुखयतयैव स्वीकार्यते, तथैव क्षत्रापीत भावः । प्राच्च: काव्यशास्त्रप्रणेतार: प्रत्येकमेव व्यञ्जकत्वं आमनन्तीति ।

रचना-वर्णादीनां व्यञ्जकत्वविषये काव्यशास्त्ररीयाचार्याणां नवीनानां मतमुप-स्थाप्यते—वर्णेभित । वर्णविशेषा रचनाविशेषाश्च प्राचीनमते गुणसहित-रसव्यञ्जकाः, नवीनमते न तु गुणभिव्यञ्जका: । रचनाविशेषा वेदभूमिप्रसुत्काः, वणविशेषाश्र माधुर्यादिगुणस्यैव व्यञ्जकाः, न तु, गुणाश्रयाणां रसभावादीनामिति नव्या: जगप्राथ-प्रभृतयः । तत्र ते युक्तिदयं ब्रुवते—गौरवादिल्यादि ।

नहीं हा सकते—ऐसा कहना तो ठीक है, तथापि सम्पूर्ण पद या वाक्य के व्यञ्जक होने पर भी उनके किस अंश में विशेष्यता है या ध्वनिव्यञ्जक के रूप में पदवाक्यस्थित रचना को या रचनायुत पदवाक्य को मानें—इसमें किसी एक पक्ष की साधक युक्ति नहीं है। इसलिए दोनों प्रकार से व्यञ्जकता को प्रधान ही माना जा सकता है । जैसे घट के कारण दण्ड एवं चक्र के मिलितरूप से होने पर भी दोनों प्रधानरूप से ( अलग कहने पर भी ) कारण माने जाते हैं । यह प्राचीन आलंकारिकों का मत है ।

गुणानां रसव्यञ्जकत्वे तदधिक-व्यतिरेकाम्यां माधुर्यादिगुणानामेव रसव्यञ्जकत्वे सिद्धे तदतिरिक्तरचनादेरपि तत्वे किर्मपि प्रमाणं नास्ति ।

काव्यशास्त्र के नवीनाचार्यों के मत में व्यञ्जक वर्ण एवं व्यञ्जक रचना माधुर्य आदि गुणों के ही व्यञ्जक होते है, रस-भाव आदि के नहीं; क्योंकि इसमें ध्वनिव्यञ्जकं संख्या बढ़ाने का गौरव ( अधिक आयास करना ) रूप दोष है । सांक्षात् रस से सम्बन्ध रखने वाले माधुर्यादिगुणों से ही रस के· व्यङ्ग्य हो जाने से गुणों द्वारा उससे सम्बद्ध

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कल्वं नास्तीत्यस्यित नियमः, इन्द्रियत्रयेऽपि व्यभिचारात् । इत्यर्थं च स्वस्वव्यञ्जक-पनीतानां गुणिनां, गुणाश्रयानाम् उदासीनानां च यथा परस्परोपश्लेषणौदासीन्येन वा तत्संप्रतिमितोचचरता तथा रसानां तद्गुणानां चाभिव्यक्तिविषयतेति नव्या: ।

ननु गुणो नाम गुण्याश्रित एव, नहि गुणिनं विना गुणस्य स्थितिरपि सम्भवति । तस्माद् गुणिनः पदादौ; सत्त्व एवं गुणस्य रक्तादेरभिव्यक्ति: सम्भवति । अत्र एवं त्रापि गुणिनं रसमभिव्यञ्जयैव रचनादिद्वारा गुणस्य माधुर्यादिरभिव्यञ्जकता सम्भवतोति शङ्का । समाधानन्तु व्यभिचारेण नायं नियमः मिद्ध्यति—इन्द्रियत्रयेऽपि घ्राण-श्रोत्र-जिह्वासु व्यभिचारात् । ग्राणेन्द्रियेण हि गुणस्य गन्धस्यैवाभिव्यक्तिर्न तु गुणिनः पृथिव्यादेः, श्रोत्रेण शब्दस्यैवाभिव्यक्तिरनाकारेः, जिह्वया रसस्यैवाभिव्यक्तिर् जलादेः । एवमेव रचनादिना गुणस्यैव, न तु गुणिनो रसादेरभिव्यक्तिरिति ।

इत्थमिति । गुणानां गुणिनाश्र स्वातन्त्र्येणाभिव्यक्त्यैव स्थिते मतीत्यर्थः । स्वस्वव्यञ्जककः चक्षुरादिभिः उपनीतानाम् उपस्थापितानां गुणिनां पृथिव्यादीनां, घ्राण-दिङ्मिर्यगुण्पानां गन्धादीनाम्, श्रोत्रादिभिः उदासीनानां गुणगुणिभावरहितानां शब्दादीनाश्र परस्परमन्वयेन विशिष्टविशेषणभावेन, उदासीनतया तटस्थभावेन वा एकविषयकज्ञान-गोचरता भवति ।

वर्ण-रचनाादि को भो रसस्यव्यञ्जक मानने से व्यञ्जकों की संख्या बढ़ जाती है और इसके व्यञ्जक मानने में कोई प्रमाण भी नहीं है ।

यहाँ शंका होती है कि वर्णरचना को माधुर्य आदि गुणों का व्यञ्जक मानना तो मर्यसम्पत ही है, तत्र तो इन गुणों के आश्रय (गुणी) रसादियों के भो व्यञ्जक इसी को मानना होगा, क्योंकि गुणे (आश्रय) के प्रकटित होने के बिना गुण (आश्रित) की अभिव्यक्ति उचित नहीं हैं (वस्त्र के बिना उसके गुण लाल आदि का दृष्ट होना संभव नहीं है ) । इसके समाधान में कहते हैं कि बात तो यथार्थ है, पर यह बात अनिवार्यं नहीं है, सब जगह लागू नहीं होती है; क्योंकि कान, जिह्वा एवं नासिका इन तीनों इन्द्रियों में इस नियम का व्यभिचार (लङ्घन होना) देखा जाता है । कान से शब्दगुण का तो प्रत्यक्ष होता है पर उसके आश्रय आकाश का नहीं, जोभ से मधुरादि गुण का ही, उसके आश्रय जल का नहीं; नाक से गन्ध का ही, उसके आश्रय पृथिव्यादि का नहीं । पृथिव्यादि का तो अन्य इन्द्रिय ( आँख ) से ही प्रत्यक्ष होता है ।

इस प्रकार अपने-अपने स्वतन्त्र व्यञ्जकों से गुण, गुणी एवं उदासीन ( गुण-गुणिभाव-रहित ) के व्यङ्गय होने पर आपस में मिलकर वा न मिलकर जैसे जल-उन ( समुद्रित ) अर्थों का प्रत्यक्ष कराना दृष्ट है उसी प्रकार रस एवं माधुर्यादि गुणों की अभिव्यक्ति होती है । अर्थात् रचनादि रस आदि के व्यञ्जक नहीं हैं—ऐसी कतने

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उदाहरणन्तु—“तान्तमाल—” इत्यादि प्रागुक्तमेव । वाक्यगम्यं व्यङ्ग्य-कतायामपि “आविर्भूता यदर्थ—” इत्यादि च । प्रवन्धस्य तु 'यद्गतासित्-रामायणे' शान्त-करुणयोः, रत्नावल्यादीनि च श्रृङ्गारस्य व्यङ्ग्यत्वानि दर्शानानि प्रसिद्धानि । मत्रिमिताक्ष पद्य लहर्यो भावस्य । पदैकदेशस्य च “निखिलमिदं जगदण्डकं वह्नाम—” इति 'क'-रूपतद्भितो वीररसस्य प्रागेवोदाहरणत: । एवं रागादिभिरपि व्यङ्ग्यत्वे सहृदयहृदयमेव प्रमाणम् ।

अब पूर्वोक्त रसादिव्यञ्जकों के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं । रचना और वर्ण की व्यञ्जकता का उदाहरण “तान्तमाल” इत्यादि पद्य पहले ही गुणनिरूपण में कहा गया है, जिसमें माधुर्य गुण के व्यञ्जक वर्ण और रचना शान्तरस के भी व्यञ्जक होते हैं । वाक्य की व्यञ्जकता के उदाहरण भी “आविर्भूता” इत्यादि पद्य रसविशेषणिरूपण में दिया जा चुका है, जहाँ सम्पूर्ण वाक्य विप्रलम्भशृङ्गार रस का व्यञ्जक है । प्रबन्ध ( सम्पूर्ण ग्रन्थ ) की व्यञ्जकता के उदाहरण—योगवासिष्ठ ( महारामायण ) शान्तरस का, वाल्मीकिरामायण करुणरस का, रत्नावलीनाटिका ( हर्षवर्धनकृत ) शृङ्गार रस का, विद्यापतिकृत मगीतजरनाटिका शृङ्गाररस का, ज्योतिरेश्वरकृत घूर्त्तसमागम-प्रहसन हास्य रस का आदि प्रसिद्ध हो है । मेरे ( जगन्नाथ ) द्वारा रचित गङ्गालहरी, यमुनालहरी आदि पाँच लहरियाँ प्रबन्धगत देव-विषयक रतिभाव के व्यञ्जक हैं । पद के अंश ( प्रत्यय ) की रसव्यञ्जकता का उदाहरण तो “निखिलमिदं” रसविशेषणिरूपण में कहा जा चुका है, जिसमें जगदण्डक' में स्थित तद्धित प्रत्यय 'क' वीररस को

दिमिरूपनोतानां रमादिगुणनिरूपणाच्च कदाचनिन्द्रिये:नेन, कदाचित्पार्थक्येन चाभिव्यक्तिभवतीति ।

रचना-वर्णयोर्दाहरणं प्रागुक्तं गुणनिरूपणे नियद्यं माधुर्यं गुणव्यञ्जकत्व-रचनाद्वारा शान्तरसस्यापि व्यङ्ग्यत्वम् ।

वाक्यस्येति । रसादिव्यञ्जकनेरूपणप्रसङ्गे सम्पूर्णंतु “आविर्भूतं” त्यादि सम्पूर्णमपि पद्यं विप्रलम्भशृङ्गाररसव्यञ्जकम् । योगवासिष्ठं महारामायणं, रामायणं वाल्मीक्रीयं, तें उमे अपि सम्पूर्णग्रन्थस्यान्तर्भासुपे क्रमशः शान्तरसस्य करुणरसस्य च उदाहरणे । हर्षवर्धनप्रणीता रत्नावलीनाटिका, राजशेखरकृता कर्पूरमञ्जरी, विद्यापति-कृता मणिमञ्जरीनाटिका स्वस्वसम्पूर्णग्रन्थेषु शृङ्गाररसरव्यञ्जकत्वाति । मत्रिमिता मध्या जगन्नाथेन निर्मिता गङ्गालहरी-यमुनालहरी-करुणालहरी:।त्यादि-पक्वलहर्य: प्रबन्धवहुपेण भावस्य देवविषयकरते: व्यङ्जिका: । पदैकदेशस्वरूपस्य प्रकृतिप्रत्यादेव्यञ्जककोदाहरणं

आचायं कहते है । नवीन के मत में वर्ण, रचना एवं पदैकदेश को रसादिव्यञ्जक नहीं माना जाता है ।

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एवमेषां रसादीनां प्राधान्येन निरूपितान्युदाहरणानि । गुणीभावे तु वक्ष्यन्ते, नामानि च । तत्र प्राधान्य एवैषां रसादितवम्, अन्यथा तु रत्यादितव- मेव । नामनि रसपदं तु रत्यादिपरमित्यके । अस्त्येव रसादितवं, किन्तु न ध्वनि-व्यपदेशहेतुत्वमित्यपरे ।

अब रसादि प्रकार का उपसंहार करते हुए कहते हैं कि इस प्रकार इन रस- भाव आदि के प्रधान होने पर ( उनके ) उदाहरण यहाँ प्रस्तुत किये गये । जहाँ ये गुणीभूतव्यंग्यं होते हैं ( रस आदि किसी अन्य के अंग के रूप में रहते हैं ), वहाँ इनकी स्थिति गौण होती है, जिनके उदाहरण अलंकार-प्रकरण में दिये जायेंगे और उनके नाम भी रसवत्, प्रेयस्, ऊर्जस्वि और समाहित भी कहे जायेंगे । 'रसवत्' इस नाम में रस पद का लक्षणा द्वारा रति आदि ही अर्थ है, क्योंकि रत्यादि के गौण रहने पर कतिपय आचार्यों के मत में वहाँ रसत्व रहता ही नहीं है, आपितु बहुधा स्पष्टों में रत्यादि वस्तु बनते हैं और रसवत् आदि में अलंक्कार ही कहे जाते हैं ।

इति तैलङ्क-पण्डितराज-जगन्नाथ-विरचिते रसगङ्गाधरे प्रथममाननं सम्पूर्णम् ।

रसविशेषप्रकरणे जगडणकमित्यत्रनतस्य-कप्रत्ययेन वीररसाभिव्यक्तिरिति । भैरवादिरागै: प्रभातादिदिव्यङ्गयै:, चेष्टादिभिर्युवत्लावदिव्यङ्गयै प्रसीद्मेव ।

रसविशेषप्रकरण में 'जगडणकम्' इस पद में 'क' प्रत्यय के द्वारा वीर रस की अभिव्यक्ति होती है । भैरव आदि रागों ( संगीतशास्त्रीय रागों ) के द्वारा, प्रभात आदि के द्वारा ( नटों की चेष्टा आदि के द्वारा ) युवती आदि के द्वारा वीर रस की अभिव्यक्ति होती है ।

प्राधान्येनैविति । यत्र वाच्यादौ रसस्य प्राधान्ये तत् रसत्वस्य सर्वसम्प्रततत्वमेव, तेषामुदाहरणानि शास्त्रस्मिन् प्रदर्शितानि । गुणीभावे तिरस्कृतौ । यत्र तु रसस्य वस्त्व-लङ्कारादीनामङ्गत्वं, रसस्य गौणता तेषां स्वरूपम्, उदाहरणानि, नामानि रसवत्-प्रेय-ऊर्जस्वि-समाहितालङ्कारस्वरूपाणि अलङ्कारप्रकरणे प्रतिपाद्यियन्ते ।

इस प्रकार यहाँ भैरव आदि संगीतशास्त्रीय राग, नटों की चेष्टा आदि भी रसादि के व्यञ्जक होते हैं, जिनकी रसादिव्यञ्जकता में सहृदयों के हृदय ही प्रमाण है ।

अत्र मतभेदं प्रदर्शयित—तत्रेति । रसस्य यत्र प्राधान्यं तत्रैव तस्य 'रस'- पदवाच्यत्वम्, अन्यथा रत्याद: इतराङ्गतया रत्यादिवस्तुतैव न रसत्वम् । रसवदित्यादौ रसपदं रत्यादौ लक्षणिकमेवेति प्राचां मतम् ।

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नव्यमतमुपस्थापयति-अस्त्येवेति । गौणत्वेऽपि रस-भावादि-व्यवहारो भवत्येव, किन्तु तत्र ध्वनिनिव्यवहारकारणत्वं न भवति ।

अन्य आचार्यों के मत में रत्यादि के गौण रहने पर भी वे रसभावादि कहलाते हो हैं, केवल उन्हें ध्वनि नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि ध्वनिरस के प्रधान रहने पर ही ध्वनि होता है ।

अर्थाद्ध्वनिरुत्कत गिरिजा, पशुपतिरिशोड्यमानगुणक्षालो । गजेंद्रप्रस्तुतभालः, फणिपतिमालः सुवर्ण दद्यात् ॥

इति रसगङ्गाधर-प्रथममाननस्य मेधिलश्रोत्रियपण्डितगङ्ग नाथशर्मंतनूज-विद्यावाचस्पतिश्रीशशिनाथशाश्रमंकृता रसतरङ्गिणी

इति मिथिलाजनपदपाववयव-मगधवनीमण्डलान्तर्गत ‘दीप’ ग्राम-वास्तव्य मैथिलश्रोत्रिय पण्डितगङ्ग नाथशाशम्प्रदरभट्ट संस्कृतविश्वविद्यालयीय व्याकरन-प्र ध्यापक-विद्या वाचस्पति ( डॉ० ) शशिनाथशाश्रमंकृत-रसगङ्ग धर-

व्याख्या समाप्ता ।

रसतरङ्गिणी हिन्दी व्याख्या में

प्रथम आनन समाप्त ।।

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उदाहरणश्लोकानुक्रमणिका

श्लोकः

पृष्ठांकः

श्लोकः

पृष्ठांकः

अकरुण ! मृपाभाषा

३०७

किं भूमस्तव वीरतां

२०३

अकरुणहृदय

३१६

क्रियदिदमचिकं

९८३

अथ षड्रयुतिरस्तपललवा

२९५

कुचकलशयुगान्ते

२५४

अपहाय सकल

१३५

कुण्डलीकृतकोदण्ड

९९९

अपि बहुल दहनजालं

१५६

कुतः शैवं धनुरिदं

३२५

अपि वक्त्र गिरां

१४५

क्षमापन्नैकपदयोः

३४८

अयाचितः सुखे

२२२

खण्डितानानेत्रकज्ज्वालि

२२२

अथि पवनरयाणां

३२९

गणिकाङ्गामिलमुं

२२४

अथि मन्दस्मित

२५७

गाढमालिङ्ग्यच सकलां

३९०

अथि मृगमद

२५९

गुरुमध्ये गता मया

३७

अलका: फणिशाव

२५८

गुरुमध्ये कमलाक्षी

२९५

अवधौ दिवसावसान

२७९

चराचर जगज्जाल

९५८

अवाप्यं भजूं खलु

३१४

चिन्तामणिलतमानसो

२३४

अहितत्रत ! पाप

३३२

चिन्तं महानेश

९५९

आ मूलाद्रुल्नसानो

३०९

तन्मज्जु मन्‍दहसितं

२८०

आयातैव निशा निशा

२६४

तपस्यतो मुनेःकात्राद्

२२३

आलीषु केलीरभसेन

३०४

तल्पगतापि च सुतनु

३५

आविर्भूता वदवघि

१३४

तां तमालतसुकान्तित

९३९

आ सायं सलिलभरे

२५७

तुलामनालोक्य निजा

२५४

इयमुल्लसितामुखस्य

२५६

तृष्णालो लिलोचने

३२८

उत्क्षिप्ता: कबरीभरं

९७८

दयितस्य गुणानानु

३९०

उल्लास: फुल्लपङ्के

६१

दरान्तर्गतकञ्चर

२८४

उपसि प्रतिपक्ष

३४७

धनुर्विदलनध्वनिनि

९४२

एवंवाचिनि देवर्षो

३६३

न कपोतकपोतकं

९४०

ओपिणदं द्रववल्ल

४७

नखैरविदारितन्न्राणां

९२८

कलितकुलिशाघातः

२५३

न धनं न च राज्य

३३६

कस्तूरिकातिलक

२६२

नयनाअलकावमर्‌षं

८३

कालागुरुद्रवं सा

२७०

नवो‌च्छ्वलितयौवन

९३२

Page 401

३७६

श्लोका:

पृष्ठांक:

नारिकेलजलक्षीर

३४५

निखिलं जगदेव

३०३

निखिलां रजनिं

३२६

नितरां हितयाच

३०९

नितरां पुरुष सरोज

२०४

नितान्तं यौवनोन्मत्ता

१८२

निपतद्रप्ससंरोध

३२३

निरुद्ध च यान्तीं

२८६

निर्माणे यदि मातृको

२२८

निर्वासयन्तीं वृत्ति

३६०

पारहस्तु धरां फणि

१४६

पश्येत कश्चित

३४८

पापं हन्त मया

३४३

प्रत्युद्गता सविनय

१७४

प्रभादभरविन्दले

२०७

प्रसृजे गोपानां

३१३

प्रहरविरंतो मध्ये

६०

ब्रह्मादध्ययनस्य

१९२

भम घनिममअ विसत्यो

८२

भवनं करुणावती

३४३

भास्करसूनावस्तं

३२०

भुजगाहित प्रकृतयो

२४७

भुजपञ्जरे गृहीता

३४४

मधुरतरं स्मयमान:

२९७

मधुरसान्मधुरं हि

२९८

मलयानिलकाल

१३६

मा कुरु कशां करालजे

३०६

मित्रातिपुत्रनेत्राय

६२

मुखेsसि नाद्यापि हर्षं

३५०

यथा यथा तामरसा

२४७

यदवधि दयिनो विलो

३२५

यदि नःमण मा

३३८

यदि मा मिथिलेश

३१८

यस्योद्धामदिवानिशं

९४५

यौवनोद्गमनितान्तं

३४७

रणे दीनानदेवानदर्श

९५२

राजवविरहज्वाला

४०

लीलया विहिनमिथ्यु

२२३

लीलालकावलवल

२५०

वक्षोजाग्रं पाणिना

३१९

वचने तव यथा

३४८

वाचा निर्मलया सुधया

२३६

वाचो माङ्कुलिक:

१३२

विगततां निःशङ्कं

२९६

विधाय सा मदनना

३००

विधिवशक्नितया

२८९

विरहेपण विकलहृदया

२८०

वीक्ष्य वक्षसि विपक्ष्म

३४९

व्यत्यस्तं लपतिं क्षणं

३४६

व्यथान्म्राश्रुलिताश्रुबी

३४४

शातेनोपायानां कथा

३४९

शयिता शयवलशायने

२९०

शयिता सदिवेश्येऽप्यननो

३२

शुण्डादण्ढं कुण्डली

७२

शून्यं वासगृहं

२६४

श्वेतमम्स्वरतलातलु

९६८

श्रीतातपादीविहिते

१९८

सदाज्जयानुषज्ज्ञाना

२७०

सन्ततपयासि हृदयं

२=५

सपदि विलयमेतु

९९८

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इलोका:

२३०

सरसिजवनवन्धू

सचेतोपी

विस्मृतिपथं

सानुरागा:

सानुकम्पा

साविधद्रोपकुलाचलां

सा मदागमनवद्‌हित

मा‌हृद्रारसुरासुरा

सुरसोतस्विन्या:

सुरड्‌नाभिराधिलष्ट:

स्वर्गानिर्गंतनिरर्गल

स्वेदाम्बुसान्द्रक्रन

हतकेन मया

वनान्तरे

हरि:

२१५

पिता

हरिमोता

हरिणोप्रेक्षणा

२४२

यत्न

हरिमागतमाकण्यं

३३१

हीरस्फुरद्रदनशुभ्रि

२५१

हृदये

कृतशैवलानु

३०४

रसगंगाधरे चर्चिताग्रन्था

ग्रन्थकारश्र

प्रमापका:

( प्रथमावलने )

अप्पयदीक्षित:

८०

अभिनवगुसाचार्यपादा:

४९, ८२, ३६४

अलङ्काररत्नाकर:

१२३

आर्ष्यायिका

( जगन्नाथ: )

१७२

ज्ञानदवर्धनाचार्य:

३६४

करुणालहरी

१३७

काव्यप्रकाश:

४२

काव्यप्रकाशोकारा:

२०७, ३५४

गीतगोविन्दं

१९०

गीता

९६०

चित्रमीमांसा

१३२, ६०, ७०

जयदेव:

१९०

जरत्तरा:

( दण्डि-वामनादय: )

२०९

ध्वनिकारादय:

४८, १५

नव्या:

४, ३७९

पञ्चलहयं:

३७२

प्राच्य:

१२, ३५०

भट्टनायक:

५२

भरतमुनि:

१६९

भागवतं

१६८

मम्मटभट्ट:

७९, १११

महाकवि:

( माघ आदि )

६६

महाभारतं

१५०

यदाहु:

( केचन )

३९८

यमुनावर्णनं

६३

योगवासिष्ठं

३७२

रत्नावली

३७२

रामायणं

३७२

व्यक्तिविवेककृत्

४३

शार्ङ्‌देव:

१६४

श्रीवत्सलाञ्चन:

८५

श्रुति:

८१

सज्जोतरत्नाकर:

११५

साहित्यदर्पण:

२०