1. Rasa Uddhar Tantra Sri Charan Tirth Maharaj
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Rasoddhar Tantram
( Rasa Samhita )
First Chikitsa Khand
First Edition
Author
Raseshacharya Shri Charan-Tirth MAHARAJ
2000
Publishers
RASASHALA AUSHADHASHRAM
GONDAL, ( Saurashtra ) India.
Price Rs, 4=00
June 1964 A. D
Samvat 2020 Jyeshtha Masa
Page 2
सुवड़ ब्रांच.-
गोंडल रसशाला औषधाश्रम
४१६, कालवादेवी रोड, मुंबइ २.
राजकोट शाखा -
गोंडल रसशाला औषधाश्रम
घा लालाजी रोड, राजकोट.
हेड ऑफीस और कारखाना
रसशाला औषधाश्रम गोंडल-राजकोट
( आयुर्वेदीय औषधोंकी प्रमुख फाम'घी )
मध्य प्रवेश के
सेल होल्ट्रीब्यूटर
नाथमल इछमीचंद्र वार्षनेरिया,
बोलाघाट
राजस्थान के
सेल होल्ट्रीब्यूटर
राजस्थान आयुर्वेदीय सदन
(जि०) उदयपुर,
रसशाला प्रेस-गोंडल
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रसेन्द्रारतंत्रमो
(रस संहिता)
विषय:-
मङ्गला चरण
पृष्ठ
१
द्रवर पकরণ
ज्वरकी चिकित्सा
८ प्रकारके ज्वरका मेद
३२ सन्निपात ज्वर के मेद
तापज्वर-लक्षण
२
कारण चिन्हु
साध्या जुखार तरुण ज्वर
३
नव ज्वर
ताप उतर ने दा लक्षण
सामान्य शुधोपा
उपद्रव
४
वातज्वर वायुञ्जा ताप
५
शुंडयादि कसाय
६
पित्त ज्वर-रामीका ताप
द्रव्यादि कसाय
पित्ताशान्ति रस
कफ ज्वर-कफका ताप
९
सामान्य सारचाट
कफ ज्वर हर चूर्ण
८
विषमज्वर-डाढिया ताप-
सेलेरिया
विषम ज्वर चूर्ण
९
त्रिभुवन कोतिन मोली
कफाह सन्निपात (राईकैहद
ताप)
प्रळापक सन्निपात
११
चैलेकृत चिंतामणि रस
१२
सधिक सन्निपात
१३
परिवर्तितं ज्वर
काठग्रादि क्वाथ
१४
मुग्न नेत्र निपात
कंठ कुष्ट संनिपात
१५
फेफड़े के पड़की सूजन
तन्द्रिका संनिपात (ऐनफ्लूएन्जा)
१६
पृतिग्ध संनिपात (मयकी रेग)
१७
ज्वरांत न विरेचन घटी
१८
सत्तामृत पेंडो
१९
चेलकृती गांठका लेप १
२
तिक्तरादि कसाय
महासुदर्शन चूर्ण
महादरांकुश रस
२०
हिंगुले श्वर रस
रत्न मिश्रित रस
हिरण्मे शभं (हेमगम पोटर्ली)
२१
महा लाक्षादि तैल
अतिसार
२२
मन्दं मेरच गुटी
२३
कफुंर शुदरी गोळी
मस्त्य रक्तराज रस
चित्रकादि वटी
२४
अमृत चूर्णादि
कपुर रस
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वृद्ध गंगाधर चूर्ण
कुटजावलेह
संग्रहणी
यामातिसार-मुरडा
दाहे चूर्णी
पचामृत पर्पटी
लोह पर्पटी
सुवर्ण परपटी
सिद्धनाथो द्वाचन पर्पटी
महणो कपाट रक्ष
प्रदरिणी गुट्न केशरी रस
रत्न कला चूर्ण
महणो हर कषाय
संग्रहणी और मुरडामे' छालक
स'महणो आदि मे' सामान्य प्रयोग
नवासीर-अर्शो-दरोग-मस्सा
सुखा नवासीर
रक्ती नवासीर
चंद्रकला अध्यथा महाचंद्रकला
तिकुनाथि चूर्ण'
अग्नि मुख लोह
अर्शं कुठार गुटी
अंघ: करी केशरी रस
शांकर लोह मदम दुरनामारि लेई
हर हरि'द चूर्ण'
नवासीर पर (अरेलु मोंघ)
प्रयोग यो १ से १९
मस्सा उपर लगानेका लेप-
खुंई, मल्लम
प्रयोग १२
भस्मे तुड़ो गोळो
अजोण' कंटक
कस्याद रस क्षार
मोखोटा व्रणने
हिंगाषक चूर्ण
भनिमुख घूणा
लषण मास्कट चूर्ण'
सम शाकर चूर्ण'
अजोण' कंटक रस
अग्निमांध मंदामि
भस्मि दोपन गोळी
स्वादिष्ट चाटन
रसोक्त वटी
विसूचिका कोलेररा
है ठयादि पेप
विसूचो कालान्तक रस
विसूचो हरियो वटो
विसूचो विजय रस
विसूचो हरांजन
अमृत
विसूचोता हर मकन
विसूचिका हर तैल
अग्निदाह (दाम)
कृमि रोग पेटके जंतु
मुद्गादि कन्राथ
प्रयोग १ से १३
कौट पद' रस
कृमिहरी वटी
पलाश क्षोजादि चूर्ण
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पांडुरोग-कामला ४९-५३
पुत्रनं मंडर:-
नमायम तेल
घृतो तेल
महर बटुक
तैल रसायन
मधु मंडूर
सादानम प्रयोग १ से ८
रक्तपित्त रक्तस्राव
महाचंद्र कला
सुषा पर्पटी
रक्तप्रतिहर फोट
रक् शितांकुर रस
रक् स्तम्भन रस
चंद्रीटक्कव
बेल पर्पटी
सुषा निधि रस
रक्तपित्तके हिमामय प्रयोग
रक्तपित्त सामनादेह
क्षय रोग राज क्षमा
हृदय घृत
रसश्राज रस
राजमृगांक रघु
स्वर्ण' द्रव्यत मालती नं. १
स्वर्ण' द्रव्यत मालती नं. २
क्षय ज्ञातांक
स्मण' भूपति
छृ गाराश्र
वायावलेध
जातिफलादि गुटीका
महालाक्षादि तेल
क्षय रोगहिसावन्थे प्रयोग ६०
चांद्रेश्वकास कफ
गेड्नु प्रतिकार
गुण महोदधि
महं घटो
मधुयष्यादि गुटं
शुंगाराश्र रस
मुक्ता रसायन
हेरमालति गोलो
क्षयहर मिश्रण २
चेयपचोनीवादी घटो
अधि फेनादि वटी
लव गादि चूर्ण
बाल ककार्ति गुटी
स्वास दमा
सुरण' पपंटी
स्वास कुठार
स्वास काळेभर (महाकाळेभर)
तंत्रे पपटी
सुर्यातनं रस
स्वास चितामणि चू्र्णत
हंमोश्राराम्र रस
स्वास गजसिंह रस
वादादि कवाथ
चद्न स्वाशारि रस
चिंतामणि चूर्ण
स्वाशके सामान्त्य उपचार १०
इक्का हीचिका
सर्वं मंगला वटी
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दिकाढ़े सामान्य प्रयोग ८३
पायरिया
मुखरोग मुखके अदरखके रोग
दाड़िमादि पनक ८४
गळेके रोग स्वरभंग ८४
दांत हिलना ९३
चलमान मुख रस
दंतशोधन मंजन
हरड़ादि घृत
जिह्वा-जीभके दद्र् ९४
किन्नर कंठ रस ८६
एलादि घृत
सद्यतो व्रणहेड ,, गळेके अन्य रोग ८७
दारू हल्दी
तिक्तादि वट्ाथ
निदिग्धा रस हर मिश्रण
यवदाराधि गुटिका
तालुके रोग ९५
प्रवालादि मिश्रण
तालू रोग हर घृत
मलरोधकर तैल-और घो
कुष्टादि गदृप
गळेका चाकलह
मुस्नादि मिश्रण ९६
गळेका चांदा
ओष्ठ-होंठेके रोग ९६
गळेका रोगका सामान्य उपचार ७ श्री ९
लेप वपाधो हर तेल
लेप वपाधो हर मलम
दांतके रोग ९०
ओष्ठ रोपण मलम
दांतकी खेरी
मुख रोग मुख पाक ९७
तिलादि मंजन
मुहखा पाक
दोहका घृत
मुहपाक हर वटीय
पलोळी वोजांदे मंजन
मुहपाक हर मिश्रण
घांतकडा गुड प्रलेप
मुखरोग हर घृत
व्रण संस्कार चूर्ण
मुखरोग हर लवण
दांतको पाल
मुख रेगहर घृत
दत मंजन
मुख घो'दयॅ वरटो ९८
दांतके पेढ़ां-ममूढ़ेके दद्र ९२
रसोॅद गुटो (राहणो प्रतिका)
कुष्टादि मंजन
मुखरोगहर गदृप
कायॅसादि मजन
मदनोश्रेही पशु निंकलना
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प्रवालादि विशण
शान्तोफ्लादि गुटी
कुष्टादि चूर्ण
कर्णादि चूर्ण
स्वदिरादि तेल
मुख शौरभष वटी
योगपुर योग
हिम्वादि योग
अस्ल वत्त
समविस्तांनतक मिश्रण
सबं तोमन् छेदह
लीला विलास
समविस्तांक छेदह
अविष्टांनदर चूण
अस्लपेत सामनावलेड (कुष्टादिवलेह)
अस्लचि
रास्नादि योग
अरेष्टादि वत्त
वमन-छर्दि-उलटी
छदेः शांकर
छियं नताकर
ऐलादि चूणं
भमरी गुढ योग
वमल मोत्रादि योग
स्वपंरादि योग
दिपं तं दुकारि योग
अमलकादि योग
रोहचादि योग
एलादि योग
अतिविपादि योग
रोगो रस्मियोग . . . . .
वातूज उपया
परीसकादाह शोष तृषा
च दाहज याप
रौष्य गुजी
कुष्टादि गुटी
घेलादि चूण
एलादि योग
द्राक्षादि योग
बदिरादि योग
सामलादि योग
कपूरादि योग
मुशकुयादि योग
मालकादि योग
कुशादि योग
लोहास्तड योग
कृष्णादि योग
चंदनादि योग
तृषादर रस
मूर्च्छा
मूर्छा नाशन धून
मूर्छांतक रस
मूर्छा हर अ जन
रास्नादि योग
गोकुरादि योग
अष्टामृत पपंड़ी मिश्रण
अमय (दारु) से होनेवाळे दर्द
मूकोर्f वशण
प्रवालादि विशण
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रघमंजो रस
उन्माद पोगलपन १२६
सरसतो चूर्ण
भूतमोरच रस
पलाशांदि काथ
उन्माद हरो वटी
उन्माद हर मिश्रण
उन्माद शामक चूण'
उन्माद हर स्वाथ
बचचादि चूण'
कृष्णादि चूण'
उन्माद शमांकुर
चटाकाथ प्रयोग
उन्मादिहर घूणो
मद्य' घृत
वल्याण घृत
सप'गंधा फलव
वातरोग ८४ प्रकारके १२९
वात व्याधि संधिवात
महायोगराज गुगल
रघु योगराज गुगल
१ वात राक्षस
चि तामणि चवमुं ख रस
वात चित मणि वटत
वात विध्वंश रस
महा रास्नादि कवाथ
महा नारायण तैल
रास्नादि घृत
वंध्याराज हर मिश्रण
वातहर घृत
नजला अर्दित चात १२५
अर्दितांकुर रस
आफरा पेट फुलना १२६
विदयवाटी चूण'
उदरतं भस्म
उदरस्य भस्म १२६
उकस्त मारि टेप
कंपवातत
क पवातारि रस
अमर सुंदरी वटिका
गठियावा गठिया वातरोग १२८
प्रणघिस्वार्त्तक रस
जानवे वात घुंटनका वात १२९
जानुशोथहर टेप
जानुशोथहर मरहम
प्रयोदशांग गुगुल
जिनहस्तंभ-जी म-तुतलाना
अटकृन
अटसकृन १३०
अकीं पुष्ट प्रयेग
निह्रीवास्त भस्म मिश्रण
कटीग्रह टंकणीयुं कमर
झांकड जाना १३१
मद्यास्तंभ
मद्यास्त भस्म मिश्रण
हस्तुग्रह
हस्तुग्ग्रह १३२
पक्षघात
एकांगवोर रस
एकांगवोर रस १३३
Page 9
-नक्षाष'तारे रस
चाहुशोष-अप वाहुक १३३
वाहु शोध हर मिश्रण १३४
-चाहु शोध हर क्नाथ ,,
-चाहु शोध हर मिश्रण-धारे रैले ,, शिरोग्रह-मस्तक शकड जानना १३४
-शिरोग्रह हर मिश्रण
-शिरोग्रह हर क्नाथ
रसाज्ञान स्वादका अज्ञान ,, रसाज्ञान हर घर्षण १३५
श्रृध्रो वात (रोग) १३५
-श्रृध्रो वातहर मिश्रण १३५
-श्रमि देवता वटी
लकवा मुस्तवात १३३
सुमन्वात'दि तैल १३६
लकवन योग
-स धिवात १३७
श्रृंघ्रातारी रस
-स घोंत हर मिश्रण १३८
-स विरात हर चूर्ण
संत्रि ग्रह सांधे'का शकड जानना १३८
-सचि प्रद्षारी तैल
धानुर्वांत धनुर्वी १३९
-धानुर्वांत हर मिश्रण १४०
पुनर्नवा'दि क्नाथ
धानुर्वांतांतक रस
-धनुर्वांत'दि वज रस १४१
आक्षेप आंचकी वाण खेंच १४१
क्षाक्षे! हर मिश्रण १४१
वात मारहर रस
आमवात १४२
रषेान वटक १४३
आमवातारी
आमवाते'्वर
आंरेगप वचंनी गुरिका १४४
अं'रेगप वघंनी गुटिका नं १ १४४
तिहृतादि क्नाथ १४६
मुस्ता'दि क्नाथ
आपवातदर मिश्रण
महारास्ना'दि क्नाथ
अपस्मार-निद्रा-विरेची १४७
अपस्मार नाशन रस १४८
भून मैरत कघु १४८
भूत मैरव'रष महा
अपस्मार हर मिश्रण
अपस्मार हर चूर्णे १४९
वात मृगी'के सामान्न्य प्रयोग १४९
वातरक्त-गुल्म-कुष्ट-लेप्रसी १५१
वातरक्तांतक रस १५२
कृच्छ माण्डूक्य रस १५३
रक्तवातादि'नि रस
अश्मरीता गुपाळ
किशोर गुपाळ १५४
विंच हरताळ भस्म
चप' कंचुको येता १५५
महानिं'श्रा'दि क्नाथ
गदरकुठ हर गुल्म १५६
प्रयोग १ से ५
Page 10
उपदंश चांदी मरमी
चपदंश हरी वटी
कस्तुरीद गोळी
देशरादि गोळी
चपदंश हर मिश्रण
उपदंश कुठार
वि·फेराटक हर प्रयोग
हिम चंदनरम
उपदंश हर मलम
गुंअ गम' तेल
सिंदुरादि मलम
तुरपादि वटी
तुरप हरितकी वटी
विस्फोटक हर प्रयोग
विस्फोटौष वटी
भस्म घादि चूर्ण
विस्फोटक हर प्रयोग
विस्फोटक हर घुणो
चपदंश हर दुसद
सोया हुव मुद भरच्या करनिका प्रयोग
यापान्त्य प्रयोग १ थे ७
श्वेत कुष्ठ (सफेद-दाद)
('वेत कुष्ठदर रस)
वि·रागि रम
विर मारणल तैल
वंग उपदंश टेर
वंग पुर हरी सेरठो
पंच मूत
मूत्र नं प्रयोग १ दी ८
फिर्य प्रयोग
नपुंसकता चिकित्सा
गंधक रसायन
कुष्ट क्रांत रस
अरिष्टानादि फांट
महार्ण लिपादि मचाभ
सर्वकुष्ट हर मिश्रण
भृंगतकल्लानक
मच्छु राक्षस तैल
कुष्टहर लेप
सामान्य रसयान १ थे ८
स्वायंभुर गुगळ
ददु-दादर
ददु हर मिश्रण
ददु रसायन
कुष्टादि लेप
दरदादि लेप
ददुस्त सेरठो
दादके साठे प्रयोग १ थे१८
किटभ-खजूं खरजवा
खजुनादान मिश्रण
खजूना चान तैल
मामान्य प्रयोग १ थे १३
पामा विपचिंका खुजली
चित्र त्वचाविकार
पामादर मलम
रसादि मलम
अर्क तैल
पंचकादि मलम
प्रदेहन' प्रयोग १४
निसोहर चूर्ण
त्रप-गुम्मटा
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व्रण शोधनेचा मरम १७८
व्रणसे विंगड निकरनेही पेटीच ,
विंगड निकालनेका टेप ,
व्रण रोपण टेप ,
व्रण पट्टकड पटकडर रक्षणेचा उपाय ,
व्रण वेठा शनेकी पेटीष मणपकानेेही पेटींच
व्रण केडनेचा टेप
आगळो पट्टटो
रोपण मरम
रस लानेका मलम
कृत्यादि मलम
ज त्वादि तेल १८०
व्रण वस्न्न तेल
व्रण मातड रस
मलदर मिश्रण
व्रण रोपण मलदम
सिंदुरादि रोपण मलम १८१
रोपण मलहम
व्रणके साघे प्रयोग १ से ७
नामुर नाडीव्रण १८२
माढींगण हर मिश्रण
माढींगण धापक मिश्रण
नाडीव्रणांतक गुगल
नाडीमणहर ठेल
नाडीव्रग हर मलम १८३
निंबुडी तेल
भगंदर १८४
सवलं काढाका प्रयोग
भगंदरारि मिश्रण
भगंदरारि रस
भगंदरारि तेल
रकदेशो पाटी १८६
नत्रकाषोंक गुगळ ,
भगंदर शोधन प्रवाहो ,
साधां प्रयोग १ मो ११ ,
विद्रधि अन्र्तविद्रधि
वहि विद्रधि केन्सर १८८
सवेेष्वर पर्पटी ,
विद्रधि हर दिम्न न १ १९०
विद्रधि हर मिश्रण नं २ ,
विद्रधि नाशन कवाथ ,
व्रण रक्षायन ,
खादिरादि कवाथ १९३
विद्रधि हर टेप ,
विद्रधि हर धूप ,
गंडमाला गलगंड कठमाला १९२
कांचनार गूगल १९२
गंडमाला कंडन रस १९३
गलमाला हर मिश्रण ,
कंठ लोशेष रस ,
गलगंड हर तेल १९३
गलगंड टेप हर १९४
वालिपक राफी १९५
वाल्मीक हर मिश्रण १९५
वाल्मीक हर तेल ,
वाल्मीक हर टेप ,
हृदयरोग और १९६
फेफडेंका रोग ,
Page 12
हरड़ाञ्चव रस
हरित्की रस
प्रभाकर वटी
शकर वटी
हिन्त्र रस
हृदय शूल हर मिश्रण
हृदय पुष्टि मिश्रण
अजुर्नारिक्क
हृदय यष्ठ हर गुटी
मुखके वाह्रकै भाङ्के रोग
१९८
कुञ्चुमादि वेध
मुखके क्षोभके उपाय १ से ८
मुखके काढे दाषके उपाय १से १४
मुखके पसे के उपाय १ से ३
दिमाग मगज मस्तक रोग
२०३
शिरो रोग हरौ वटी
शिरो रोग हर भस्मौह
पञ्चविन्दु तेल
पञ्चामृत लोह गुङ्गाळ
लक्ष्मी विलास रस
पाठाङ्ग धेध
शिरो वसती
शिरोरोग हर मिश्रण १
शिरोरोग हर मिश्रण २
स्वर्णशिरोरोग हर नस्या
अर्ध नारिक्कर नस्या
वात जिरोवीधि मिश्रण
कस्तूरी धेध
पित्त विरेधराग प्रयोग
चंदनादि धेध
कफ विरेधराग प्रयोग
निद्राव विरेधराग प्रयोग
शय विरेधराग प्रयोग
कृमि जन्य शिरोरोग प्रयोग
विरः क्रमादि क्षर रस
अर्धावमेधक आधासीस्सी २११
स्वर्यावर्त
अर्धाङ्ग मेदर्दर नस्या
प्रयोग १ से १५
अर्धाङ्ग मेहर मिश्रण
अनन्ता वात
२१२
वनत्त वात हर प्रयोग
शंखक
दिमाग-मस्त मे रकक्तस्राव
२१४
शिरारक्त स्त्राव हर प्रयोग
मस्तकुमें पञ्ची
२१५
मस्तक पुष्टी हर प्रयोग
मस्तककफ मलेधर
२१६
जलशोथप रस
मस्तकको भ्रम
२१७
दुराल्मादि धरासथ
मस्तकके आवरण का दाद और खाज
मस्तक दाह
११८
मस्तक शिरोकी पीड़ा
कपू'रादि पाम
मस्तक पुष्टि
२१८
Page 13
मस्तक पुष्टि मिश्रण
सुषा करञ्ज
मस्तक पुष्टि हटी
मस्तक पुष्टि चूर्ण
ऐरंडे शाकको ज्यूने-किंसे
मस्तकको टाउ-डि नक्स्यत
चिराइ घोडा-ज्न-गुमची
उदर रोग पेटके दर्द
वातोदर
वातोदरादि गुटी
रसेनादि वेल
वितोदर
वितोदरादि वटी
कफोदर-डठोदर
कफोदरादि घटी
कफोदरदि मिश्रण
वंधान
कुष्टेादर-शिरोेदर-शमिपातोदर
शिरोेदरादि विश्रण
बदे रंपादि कवाथ
मदोदर-पार्श्वोदरी वदरार्ति
सतेासारादि गुटि
बद गुदेादर
बद गुदेोदरादि घृत
आनाह पेट फुलना चदना
मारायण चूर्ण
वृन्दु घृत
वदरादि रस
इच्छा मेदी गोलो
लशुन वटो
आगेमयवस्नों चूर्ण
जटेादरादि विश्रण
गुल-परिणाम गुल
गुल गज मेचरी
गुलांतक रस
गुल दावानल रस
गुल गलेन्द्र तेल
विपतिंदुकादि वटी
गुलार्ति कवाथ
ग्रलहर चूर्ण
हिंग्वादि मत्रम लेवन
शा खाद्राव चूर्ण
शो फक लसण
मलशोधनो वटी
बदर रोग हर चूर्ण
प्लीोह हर चूर्ण
प्रयोग १ हे ९
उदावर्त वायु-मेस चदना
उदावर्तोशानि रस
फलवतो
विपतिंदुकादि घटी
अष्टोङ्गला प्रत्यक्षीका सुवारकी गांठ
विद पाटेड
प्रयोग १ हे ९
दस्तक्री कवजी-मलावरोध
मधु विरेचन चूर्ण
आनाह
हरोतको अवलेढ
मलोदर कल घर
घोडेदारि रस
Page 14
शुद्ध चूर्ण
प्रयोग १ मे ५
एलोएन्द्र क्षो
जुलाब-विरेचन
कस्रखोलो
हिंग्क्षामेद्री गोळी
मेघनाद रस
विरेचन चूर्ण
नारिकेल विरेचन
आमेराय वटीजो चूर्ण
प्रयोग १ मे ५
शोध-सोफ-सुजन- सेजा
शोधेरारि पट्टर
शोध्य कालानल रस
दुग्ध वटी
शोध शार्दूल तेल
शोधकका सामान्य उपाय १ मे १५
पकीहा त्रिलोकी वटी
रसिकारणव रस
प्लीहाद्रि रस
रसोत हर मिश्रण
राहुतेकावेध
राहोतिकाष्ट
अर्क लतण
महा मृत्युजय लेह
यकृत कीडर कलेजे के रोग
यकृत प्लोहादरारि लेह नं १.
यकृत प्लोहादरारि लेह नं २
शाराय्त
रोहिदत रांदि चूर्ण
महालक्ष्मी रस
सृमुजय रस
यकृत लोहेदारी चूर्ण
रेहदितक घृत
सामान्य प्रयोग १ मे ६
गुल्म-शूलो
गुल्म दारानल
मुका पचामृत
लोकायनो गुढिका
गुल्म कालानल रस
नहनन'थ रस
गुल्म कुठार
निम्बूकार प्रवाधो
हरोतकी अवलेच
देरडा क्षार प्रवाधी
गोजिह्व प्रयेग
सुंदराम
महालाक्षादि गुगळ
सुम'भाई
वंघाण
अस्थिभंगन हड्डी टूटना
स्वामा गुगुळ
भग्नारेराय तेल
भनन सघार लेप
भनन फोति लेप
घा सुज जखम
भनतारेरायण मिश्रण
भनन हर क्वाथ
पानी लगना-दुर्जोक
जन्म रोग
दुजाल जेता रस
Page 15
अपूरे मालिनी वटी
अप.जिता पुष्टिका
दुग्ध हर मिश्रण
बधन वंगांठ पांवलाढ़ी
चव्य नागर रस
ज्वर हर मिश्रण
मन्न हर मलम
प्रयोग १ से ५
मेदर्द्धि चरबी चढना-मेदरोग
छाछ रसायन
मेढ़-चोषो रस
स्वर्णमाकर्षण बेल
शीतपित्त उद्दर्द केाठ
उत्केाठ शीतल मल
शीत पित्त शमनी वटी
शीत पित्तारि पिश्रण
शीत पित्तहर कचाथ
प्रयोग १ से ५
वीसुने रतचात
कालाझु रद रस
चोष्व हर कचाथ
लेह १ से ४
नारू सनायु वालाका रोग
स्नायु जयती वटी
स्नायु घुलारे रस
सामान्य प्रयोग १ से १५
हाथी पांव श्लीपद
स्लोपद पन्न देशारी
स्लोपदारे लेह
नित्यांनंद रस
मौरेश्वर भस्म
प्रयोग १ से ६
हडकवा पागलकुत्तेका दंश
प्रचेतक चूण'
स्वान विषहर चूण'
स्वान विषहर कवाथ
प्रयोग १ से १३
वृद्धि अंडवृद्धि अंत्रवृद्धि
वृद्धि यार्धका वटो
अंडवृद्धिहर रस
अ नत्रवृद्धि नाशन रस
अजमोदरिय रस
पहाड़ सैधवादि तेल
वृद्धिहरी वटी
वृद्धि नाशन मलम
प्रयोग ४ से ८
पथरी अंडमरी मूत्र ग्रन्थी
श्रृंगकल्प रस
अहमरी मेहदी रस
पाषाण बज्र रस
प्रयोग १ से ३
उदर द्वात पेशावमे जलन
उनवा
उदण वातहर मिश्रण
उदण वातहर चूण'
प्रयोग १ से १३
Page 16
सूत्र कुचक्र
सूत्र मालाका
सूत्र कुचक्रांतक रस वृत्त
सूत्र कुचक्रांतक रस लघु
सूत्र कुचक्रांत रस
कौटिल्य गूढोक्त
प्रयोग १ से १३
सूत्रघाति सूत्रावरोध
सूत्राघाति रसै
सामान्य प्रयोग १ से ४
सूत्राशय के रोग
सूत्राशय रोगांतक रस
सूत्रका वेध रोकनेकी-
अरशक्ति
सूत्रांतिघात हरि वटी
सामान्य प्रयोग १ से ९
सूत्र पिंडके रोग
सूत्रपिंड रोगहर रस
सामान्य उपाय १ से ७
प्रमेह
चंद्रप्रभा
प्रमेहारी वटी
मोम पराक्रम रस
हरोशंकर रस
वंगेश्वर रस
वंगेश्वर वृत्त (महावंगेश्वर)
गुगल वटी
वस्तंत तिलक रस
अनंगातक वटी
२९२
मस्तकयादि
इंद्रायण वटी
छुकमात्रक वटी
१९२
रक्तमेहांतक रस
महरा वंसंत कुसुमाकर
महरा वंशत कुमाकर
३१२
वस्तत कुसुमाकर
३१३
शारिवादि अनलेख
वातु पोषिक भवलेख
बहु मूत्रातक रस
३१३
प्रमेह कुषातका वटी
कामधेनु रस
मालती कुसुमाकर
३१४
प्रदार्घ वटी त्रिदत
पथ्य मेहारि चूर्ण
चंद्र कान्ति गुटी
मातावार्यादि चूर्ण
वातु पोषिक गुदिका
गोक्षुरादि भवलेख
३१४
मस्तकयादि चूर्ण
३५
चंदनादि
देवकृपामादि पाक
३१६
पौष्टिक साधे
धात्वन्य उपाय १ से ४०
नेष्टरोग अंशकके रोग
३२१
मुखारिदि व जन
३०
विमलाजन
च'मोदया पतिं
प्रकोष्ट प्रयोग १ से १९
३२२
वावळ
३२
वेल्ल
Page 17
सर्पेभिः
आँखों जों
कुछण मंडलका गड
फूला
आँखका डैया
मोतियो बिन्द
जामरवा नाकघुर
आँवणों
आँसू का कण
लमो नज़र
दुष्टी नज़र
निबंकल कमलोर दृष्टि
आँखों सूजन
रतोत्पत्ति मक्तोच्च
" नेत्ररोग हर मिश्रण १ से ३
" पलाश मूलार्क
" अभिकेनादि टेप
३२८ माषादि फांट
" हरिद्रादि योग
" कपुर पुर्पांजन
" विद्राजन
३२९ शुंञ्ज वटीआंजन
" शरपांजन
" माशिकांजन वति'
" कल्कांजन
३३० अञ्जन प्रयोग
३२५ प्रकोषण प्रयोग १ से ६
" नासा रोग नाकके रोस ३३६
" - पीतस-पितिषयाय
" विहंगादि वटय
" पोहस हर नस्य
" चित्रघंटा वटी
३२७ चित्रक हरीतकी
" कलिङ्गादि नस्य
"फुलाके धामान्य उपनार. १ से ३५
" पोहस हर मिश्रण
" पोहस हर धूप
" समुत्रफेनादि वति'
३३० नामुर हर टेप
" परिंचादि वटों
" रत्नपप'टी
" वक्षूरक्षांजन
" नासारोग हरी घटो
३३१ महा मुक्तांजन कुष्ण
अञ्जन
" कर्णरोग कानके दद
३४०
" -मोरा मुक्तांजन
" कल्याण वेल
" -यषबिंदु तेल
" कान पछना
" मयना मृत लोइ
" कानका मया
३४१
" -नागाजुंनी शलाका
" कानमें बहारकी चोञ
" -मात नो वरी
३३२ कानमें नाद
३९
Page 18
ग्राधियं-वद्देरेपपन
विल्व तेल
चाघियं हर मिश्रण
कृमि दरणं
कृमि दर्णारि तेल
कानमे प्रन्थो
पर्णासृत तेल
चणं-रोग हरी वटी
श्वीयोंके रोगा ३४४
मषातंव-अत्यायतंव भनातंव
कषातंव पोदितातंव
एरंड्यादि गोळी
भक्खतु हरी वटी
प्रयोग १ से ४
रक्तपदर-अत्यायतंव(लोहोदक) ३४७
रक्तप्राव हरी वटी
योल परंपोट
प्रयोग १ से ५
श्वेतपदर सेामरोग
पदरांतक ठाह
पदनारि ठाह
लशोदारिष्ट
सेाम त्रोधन रस
युगानी जुराष
प्रयोग १ से ८
सगगं खोंदा रोप
रजःकवला नियम
केशों वृधा शंगा नहि करना
नगं-धानण नियम
नार्पा पाठ
, गभं रहेनेका तात्कालिक लक्षण नियम
गभिं-जोका स्थिति
आहार विहार
गभं-लाव-गभंपात
गभंवाल रस
गमें-नु शेखर
गभं चिं-तामणो कुइत
प्रयोग १ शे ८
शुक्कगभं नागोदर छोड ३५७
शुक्कगभं-डेई पलंगवित हरनेक उपाए ३५७
छेड निवारनेक उप.य
सूतिका प्रसवता सुवावडेकी मावळत ३५९
प्रसव-पसूत- सुवावडेक लिये
सुख प्रसव
पंदरिया यत्र
गोक्षा यत्र
सुख प्रसव चूर्ण
सुख प्रसव लेप
सुख प्रसव अंजन
प्रसव व्यवस्था
बच्चेकेी समाल
प्रसवता-सूतिका-सुवावडेके रोग ३६६
देवदार्वादि कवाथ
सूतिका मिश्रण १ से ३
सुतेका रेगनक
श्रे फलादि चत्नीकु काटलु-पाक
घंट्यादि चत्नीसु काटलु
चौमासप शुठीं अवलेह
सूतिका विनोद रस
Page 19
व्रतापलदेश्वर
सूतिका व्रतम रघ
सूतिका भूषण रघ
अपरा पातन धूप
अपरा पातन तेल
मूढगर्भ
टेनाक्क
कुच्छ पचन
योनिरेग जननेन्द्रिय रोग ३७२
वात प्रधान योनि रेग
पित्तजयोनी रोग
पित्त ज योनि रेग
कफज योनो रेग
कफ ज योनो रोग
योनोकंडू-खुजली
हयमारादि तेल
योनिरह मलम
योनि श्रूल
योनिमे अशं मत्रा
ये निर्हर-बहार धाना
योनि शोध
योनो खाव
योनि दैथिल्य
स केाचनो थेगठो
दुह्यरोडेश्वरी वटी
फळधृत
व ध्यापर-बांधपन
अंतुम वंध्यतव
वी सप (रतिप) मे वंध्यतव
घरणः हडनेसे वंध्यत्व
१९९ सूजन से वंध्यत्व
गारदीषे व ध्यत्व
गुह्य भागमे गरमीसे व ध्यत्व
भूत प्रेतका उपद्रवे या
ऋषिके अमिचारसे व वंध्यत्व
संतान नधि होमेका अन्य ७ कारण
पुष्ट प्रद रस
गर्भं धारण चूर्ण
गर्भ'धारणी वटी
गर्भप्रदा वटी
लक्ष्मणा लोह
शेठम घृत
को औरत पुत्रके कत्तु और नोर्यमें
संतान नधि हेनेकी पहिचान ३७९
नाळ परिवर्तं पुत्रीका पुत्र हो
काकज घा प्रयोग
गर्भ प्रतिवंध
गर्भं निप्रह चूर्ण
गर्भं निप्रह मलम
सामान्य प्रयोग १ से ६
स्तनपान
स्तन शोध सुजन
स्तनको विधिलस्ता
क टकारी मलम
कच्छादि मलम
श्रीपर्णी तेल
टेढ्रादि तेल
घचादि तेल
श्रीके दुःख भावनकरे चिकित्सा
सुरत बंधन चूर्णी
Page 20
स्तन्य सुथा रस
सोदर्य वधैःफ
छातिप्रद तेल
सौदर्यं वच्रन् लेप
शारीररक्षा शुगंधी घरणा
नर मोहन टेप
मुख चुपांघ हर चूर्ण
शारीर सुपांघ टेप
सर्व रोगप्रातक वटी
प्रदरांतक रस
प्रमेहानंद रस
स्त्री-नपुंसक-कोमिनाश
स्मरांतकवाद-हिस्टोरिया
मुकुटेश्वर वटी
सिंहादि गुग्गुल
अश्वगंधारिष्ट
सूत शेखर
वाल रोग वच्र्चेांका रोग
मेधवाधा
३८७
सर्व श्रेष्ठ हर चूर्ण
ससच्यादि
भद्रम गल घृत
तृप्ति प्यास
ताला पतला तालु कंटक
बालारोग वटी
मलरोप हर वटी
वाल दिर्पे
रास्नादि टेप
वाल दिर्पे हर चूर्णाम
नामिका शोध
निशादि तेल
पुदाक्ष पाफ
गदाक्ष मण
दांत आवे समये रोग
दशवैद्युमेद गदांतक वटी
मधुरि्र्चा ओरी-अच्छखडा
मधरी शीतला रक्षक वटी
शीतला सीतली मातला निकलना
शीतला स्त्रोत्नं
३९२
वाल कफारि वटी
लघुगाशक
वडीकांस्य-कुक्कडीया खांसी
उडांटियु
३९५
व’लकासहरी वटी
बालघ्न मद्र चूर्ण
वच्चेोंका आरोग्य रक्षनेंवाली औषधे
पालारोग घटी
वालागेळी
वालार्क
३९६
वाल पौष्चिक घेओठी
वाल पौष्चिक वच्र्चेे
सर्वौपधि स्नान
धुस्त रोग-छोटे प्रकर्ण रोग
३९६
अमिदरद्र
अमिदरद्र सामान्न सदन
३९७
ग्राह्याग्रात
ग्राह्याग्रात रोपण तेल
Page 21
निद्रामें विशाव हे जाना
मूत्रांकुश रस
मनि'द्रार्त
निद्रा वर्जन रस
निद्रा प्रद हिम
भतिनिद्रा
निद्रा नाशन रस
निद्रारि क'राथ
अफीमकfा व्यसन छुड़ाना
अफीम हरी घटो
हाथ पारेमें खींची निकालना
हाथ पांवददो व्यथा फरनr-पांवदारी
रींषण मलम
र्हिगुलादि मलम
मथf मथ
रे घर्षादि घर्षण
रंघfादि घर्षण
चौककfी बांवलाइ
अंघघात द् लाग्यो
fहिमाद्रि रस
युदघ्र यो-
ग्रामनिकालत-
पार्नी वृ्त
गुरुभरुधा शfामf मलम
यfत्ना लघाना हुज'ल भarय रोग
अं'ल मरण
विष पकरण
विप नजागात रस
मृfयु पfाrच्छेदी घृत
एप'विषहर कनाथ
अरिष्ट योग
स्वप' विषके शfारद प्रयेग १ से १०
सिद्ध घृत
fवच्छूका दंf-घृfषक दंश
सामान्य प्रयोग १ षे १०
fवल्लीक्षrा करटनr करड
वारन हान रस
अर्क म विप
चतुराकrा विष
वच्छनागदr विष
ग्रा'कियr विष (सीमल)
धतूरक (धुतrा) मारनेकी दवा रेट (१०)
हृदघवंध रोग(हा्रर्टफेल्यार)
हृदयाmृत योग १ षे ६
भस्म पfिके पकरणम्
मदौक भस्म विशिष्ट
अभ्रक भस्म निंबंrद्र
अभ्रक भस्म १०० पूरितं
अभ्रक मरक १०० सहस्र पू'dतं
अभ्रक सत्व मरम
कान्त पाषrण मरम
कागतडोह मरम १०० पुष्टित
कान्त लो'द मरम
कासीम मरम
कासीम गोद'tी मरस
कfटकटांड़रकु मरम
कॉस्य- मरम
३९८
४०७
४०८
४०९
४११
४१२
४१३
४१४
४१५
४१६
४१७
४१८
४२०
Page 22
स्वर्ण भस्म
४२१
रजत भस्म (रौप्य भस्म)
गोदती मरम
४२२
लोह भस्म
गोमेद भस्म
लेहाभ्र भस्म
चतुंषग भस्म
४२३
वराटिका भस्म
जहर मोदरा पिष्टि
वज्र भस्म (हीरा भस्म)
जहर मोतीरा भस्म
गैक्वाद भस्म
ताम्र भस्म
हौड्रय' पिष्टि भस्म
तुत्य भस्म
४२४
शुक्ति भस्म
त्रिवंग भस्म
४२५
शंख भस्म
चूर्णांतर्मणि पिष्टि भस्म कहलवा
नाग भस्म
४२६
शृंग भस्म
नोलप पिष्टि भस्म
सप्तरत्न भस्म (नवरत्न)
मन्ना पिष्टि भस्म
४२७
नवरत्न पोष्टी
पित्तळ भस्म
४२८
सुवर्ण भस्म १
पोखराज पिष्टि
सुरण' भस्म २
पोखराज भस्म
४२९
स्वर्ण माक्षिक
पंचळेआद भस्म
४३०
संगे यशद भस्म
प्रवाल पिष्टि चंद्रमुति
स्फटिक मणि भस्म
प्रवाल भस्म
४३१
हरताल भस्म
वंग भस्म
४३२
दिं'गुल भस्म
मयूर पिछ्छ भस्म
रसाघनं-वाजीकरणं
मछे भस्म
४३३
वाजीकरणका मथ
माणिक्य पिष्टि भस्म
माक्षिक रत्न भस्म
४३४
मयपुं सकतवका कारण
सुक्षा टिपिष्टि
४३५
घटाअवस्या कैसे आति है ?
सुक्षा भस्म
कुंडि प्रवेशिका
सुक्षा शुक्ति पिष्टि भस्म
कुंडि प्रवेशके पहिले घोर पिछेके नियम
म हूर भस्म
४३६
नीलकंठ रप्म
म्रागश्रृ ग भस्म
४३७
पूर्णेन्दु घटो
यशोद भस्म
महालक्ष्मो विलास
४४९
४५०
४५१
४५२
४५३
४५४
४५५
४५६
Page 23
म
अकौक भरम
७१४
अग्रदय सतराक
२३
अभ्रिदग्ध सामक लेप तथा मलम
३९७
अभिनिद्र डे)
७९
अभिनिद्रेपन गेळे
८३
अभ्रि देहता वटी
१३५
अभ्रिमुत चूण'
८३
अभ्रिमुख टोइ
३५
अजीर्ण कंठ रस
४२-४३
अंडशुद्धि हर रस
२८५
अतिविपादि योग
१. ६
अत्न शुद्धि नाशन
२८५
अनंतगातदर प्रयेग
२१३
अपरापातन घृत
३६९
अपरापातन लेप
३१९
अपराजिता गुटिका
३३७
अपथमार नाशन रस हरीतकी
१४८
अपथमार हर चूण'
१४९
अपथमार हर मिश्रण
१४८
अपथमारके चौद प्रयेग
१४९
अपूपं मालिनी नवंत
२६८
अफीमदहन हरीटकी
४००
अमरवुंदरी गुढिका
१२८
अम्लपित्त शमनावलेइ
१०२
अम्लवित्तौक मिश्रण
१०१
अम्लपित्तातक टोइ
१०२
अमृत काजल
३३१
" मलांतक अवलेइ
१७१
" मरिचा गुगळ
१५२
अभ्रक मदम निःसंद
४१९
अम्रड भरम
900 पुडो
७१४
"
"
400 "
१५४
"
9000
१५४
अभ्रक धाव रस्म
११६
अरिष्ट योग
७०७
अरेयकामृत रस
१०४
अर्क' तेल
१०५४
अर्कलेण
३५१
अर्क वडो
९४
अजुंवारिष्ट
११८
अकं पुष्प प्रयोग
१३
अर्दितांकुश
१७६
लशुनारी नस्य
२०८
अरुणसेन हर नस्य
२१०
अशनं. करी फेसरी रस
३५
अशनं कुठार
३५
अविपतिकर चूण'
१०२
अजोकारीष्ठ
३५०
अदरमीमेदी कवाथ
३५०
अशमरी मेदी रस
३६५
अशखुरादि मलम
१९४
अश्यगंधादि चूण'
१६०
अश्वगंधा रसायन
४६७
अश्यचेष्ट
३४०
अश्वग चारीष्ठ
३८८
अष्टम गल घृत
३८८
अष्टाम्र १ पपंड़ी
११२
अष्टा वक रस
३५७
अष्टबक रकक अनुपान
३५८
अस्तंत द फेंट
१७६
अधिकेनादि लेप
३१२
Page 24
अभिकेनादि वटी
अ
भागळो
आं द्रौरव
आभा गुगळ
आम्राद्य चूर्ण
आमलादि योग
आमवातहर मिश्रण
आमवातारि रस
आगवातेश्वर रस
आया हुडि मुख शुद्धि करणा
आरोग्य वर्धिनी चूर्ण
" " पुष्टिका नं १
" " पुष्टिका नं २
" " मिश्रण
आलीप हर मिश्रण
इ
गंधकामोद
इंधनामोद
इन्द्रज्वटी
उ
चन्दन रोगहर चूर्ण
तगरादि रस
चदावताशानि रस
चुन्याद गजांकुश
चुन्याद शामक चूर्ण
" " मिश्रण
चुन्याद हर वट्नाथ
चुन्याद हर खुनी
चुन्याद हर मिश्रण
" हरी वटी
७६
१७९
३१
२६४
१०६
९०९
९८६
९८३
९८३
९६१
१८२
९८५
९८४
९०९
९८७
उपदेशा छुठार
उपदेशा हर मलम
उपदेशा हर मिश्रण
उपदंश हरी वटी
उपदंशा टुक्रा
उदरसम्भारी रस
" " टेव
उशीरासव
उद्नारिय प्रयेग
उष्णता हर चूर्ण
उष्णता हर मिश्रण
उदर्द्वासारि रस
प
पकानियार
एलादि पुष्टिका
एलादि धषण
एलादि चूर्ण
एलादि योग
एलीयादि छेप
एलीयादि वटी
बो
मोद्रेरोपन मलम
मोघव्वाचिह्न तेल
मोघव्यादि हर मलम
फ
मच्छु राक्षस तेल
कंटळोकेश रस
कंटकारी मलम
कफज्वर हर चूर्ण
कफ विरेरोग प्रयोग
कपायादि रस
९४८
९४८
९४८
१३९
१२७
१२८
३२
११९
२९८
२९९
८,८
९५२
३८८
२५
९०५ ९०९
९०५ ९०९
१०२
२८० २८६
३३२
३२६
३३६
११८
९८
९८
११८
११९
११८
२०९
९३६
Page 25
चपल चोभ्रादि प्रयोग
करंजादि चूर्ण
करंज पाकफल प्रयोग
चर्णरोग हरी वटी
कर्गशूल के प्रयोग
कर्णशूल तेल
चपूंर पुष्पाजन
चपूंर रष
चपूंरगुर्दरी
चपूंरादि वटी
चपूंरादि घाम
चकेभरारि मिश्रण
चकेभरारि वटी
चलशांभ्र
चल्याण घृत
चल्याण तेल
चल्याण मैरब रष
वस्तूरी मैद्र रष वृद्धित
करतुर्यादि गोळी
कांकरायनी गुटिका
कांजिकादि गोळी
कोंत पापाण मदम
कांतळोह मदम
कांतिप्रद तेल
कामघेनु रस
कामिनी विद्रावण रस
कामेश्वर रष
कालाग्नि रुद्र रस
कायोष मद्म
कायोस गोदंती भस्म
कायेसादि मंजन
106 काश्मादि घवण
36 काय बसम
340 दिन्मर छंत रष
343 किशोर गुङळ
340 कोट मदं
343 चकुमादि तेल
323 चकुटाहतक भस्म
28 कुटजावलेह
33 कुच्छकुंतांत रष
109 क्रथकर ठेप
217 कुष्टादि मऋप
223 कुष्टादि चूर्ण
223 कुष्टादि मंजन
749 कुष्टादि मलम
990 कुष्टादि योग
380 कुष्टादि ठेप
84 कुष्टारि रस
99 क्रिमिघ्नादि तेल
948 क्रिमिरोग प्रशोग
258 क्रिमिरोग गुटिका
992 क्रिमिहरारिगा तेल
209 क्रिमि हरारिगा प्रयोग
48 क्रिमि हरी वटी
382 क्रुऽणादि चूर्ण
333 क्रुऽणादि योग
748 कृष्णामणिक्य रस
462 केरवा झार
275 केसरादि षनखेह
948 केसरादि गोळो
820 कोवरा गुटिका
93 कनपाद रस वृद्धित
Page 26
स्वदिरादि मवाथ १९१
स्वदिरादि तेल ९९
खजूर्नाशन तेल १०३
खजूर्नाशन मिश्रण १७३
खपंर मदम ७३१
खपंरादियोग १·६
खलीलके प्रयोग ८·०
खैरसारादि गोली ७६
वाराकृत हर मलम १४४
गाल रेग हर वेष्ट ८५
गलशोधहरी वटी ७८८
गदननाश रस ७५०
गुग्गल वटी १·८
गुंजागम' तेल १५९
पुटिकाजन ३२४
गुल्मादि रसायन ७४८
ग्रंममेदोऽधि रसायन ०४
गुरुभ्र द्रव्यक मलम ७०३
गुल्म दावानल रस ७५९
ग गाघर चूणं वट् २८
ग डमाला कंडन १९३
गडमाला हर मिश्रण १९३
गांघक ददेप १६४
गांधक रसायन १६७
गांघकादि मलम १७१
गंघकादि तेल १७२
गरनाशन रस ८१०
गाहकृमे प्रयोग ७०६
गाम'चितामणि रस वृहत ३५५
गाम घारिणी वटी ३७८
गामेंघारण चूणं , मस्म ३८०
गामेंनिमद्द चूण' ३८०
गामंपाल रस ३५६
गामंप्रकाश वटी ३७८
गालगढ हर स्वाथ १९४
गलगड हर तेल १९३
गोलंग हर लेप १९२
गुल्म कुठार रस
गुप्ररोगेश्वरी वटी ३७८
गुदप्रोत्पात हर मिश्रण १३५
गोदंती मदम ७२१
गोधूप प्रयोग २६१
गोमेदमणि रिष्टी ४३२
मस्म , , मस्मम
मे.खुरादि अवलेह ३९४
मोखुरादि चूणं ७६३
मोखुरादि योग ११७
पंबिकादि कवाथ ९१
प्रतिश्यार्तातक रस १२८
प्रहणो कपाट रस ३०
प्रहणोगजकेवारी ३०.
प्रहणो हर स्वाथ ३९
घा रक्ष जलो २५४
चतुवंग मदम ४२२
चंदनादि कवाथ १०५
Page 27
चंदनादि लेप
११०
जिह्वादतंभ हर
१३०
चंदनादि तेल
२०८
ज्वरांतक विनेचन
१८
चंदनाष्टक
३१५
ताम्र पर्पटी
७९
चंद्रांति गुटो
३१८
ताम्र मष्म
४२३
चंद्रकला वटी
३३
तालु रोग हर घर्षण
९५
पहा चंद्रकला
३४
तिस्तादि कवाथ आपवात
१४६
चंद्रप्रभा वटी
३०८
तिक्तादि स्वाथ सव'ज्वर
६८
चंद्रोदयावर्ति
३२१
" चूर्ण
३४
चक्रुक्षणन
३३०
तुत्य भस्म
४२३
चांगेती वृत
४०२
तुत्य हरीतकी वटी
१५०
चिंतामणि चवुंमुख रस
१२८
तुत्यादि वटी
१५०
चिंतामणि चूर्ण
८१
तृणकान्त मणि विधि (कहरवा)
४२५
चित्रकादि वटी
१३९
तृण्णा हर रस
९९
चित्रकादि रीवटी भवटेङ
१३९
त्रयादशांग जुगळ
१३०
चित्रकादि वटी
३४
त्रिदोष शिरोरोग प्रयोग
२०९
चित्राघटा
३६०
चोपचींयादि वटी
७६
त्रिनेत्र रस
१९८
छ
त्रिभुज भस्म
४२५
छदिंकर रस
१०४
त्रिभुवनकोतिंं गोळी
९
छयांतक रस
१०४
त्रिविक्रम रस
२०९
ज
त्रिशोध्य'डि
३६२
जलशोधन रस
२१५
त्रौळकाय चिंतामणिरस रसिपात पवर १२
जटामांसी मिश्रण
१२०
त्रौलेकये चितामणि रस रसायन
१५७
जटामांसी रस
२२६
वाजीकरण
१,
जटामोदरा विधि
४२३
द
" मध्य
"
दंतमृढीकरण मंजन
९३
जातिफलादि गुटो
७५
द तमाखो
१२
कात्यादि तेल
१०९
द वातूभेद्र गर्दांतक रस
३५०
, परमम
दहु (दारू-दारदर)
१७१
कानुजोध हर कवाथ
१३०
ददुघ रसायन
१७१
" लेप
ददुघ्न चेओगठी
१७१
जिह्वारोग हर मिश्रण
९५
ददुघ्न मिश्रण
१७१
Page 28
वरदादि टेभ
१९१
नाशके रेगोके प्र.
३४०
दशन संस्कार चूर्ण
१७
नाग भस्म
३२१
दरदरे साबे प्रयोज
१९२
नागाजुंनी मति'
३२२
दारू' कवाय
८८
नागाजुंनी दानादि
३३१
दिट्ठ धूप
९८
नाड़ीश्रग्धर तेल
१४२
दुग्ध वटी
२४८
,, मलम
१८२
दुग्ध वघनं चूर्ण
३०२
,, मिश्रण
१८२
दुरालमादि कवाय
२१६
नाधो यगातक गुपाळ
१८२
दुजल जेतां रस
२६६
नामि विरेचन
२४२
दुजल हर मिश्रण
२६७
नाभारेग हरी वटी
३३९
दुर्निवारि टेभ (शांकर टेभ)
७६
नितमानंद रस मणिोपर
२०९
देवकृपादि पाक
३१५
नित्यानंद रस
८०७
देव दार्वादि मत्राय
३६९
निद्रारपन रस
२११
दीपादि कवाय
६
निद्रोपद्रव दोष
२१३
द्राक्षादि योग
१०९
निद्रारिस्राय
८००
घ
निबादि योग
१०९
घनुव्रांत हर मिश्रण
१८०
निंबो'डो आवळ गांडू
९४
घनुव्रांतादिवर्ग रस
१८१
निष्कादि चूर्ण
१९६
घनुव्रांतान्तक रस
१८०
निष्कारसायन
१९६
घातु पौष्टिक अवलेह
३१२
नीलकठ रस
८०६
घातु पौष्टिक गुटीका
३१४
नीलम पिष्ट
८२६
घायरो टेभ
५७
नीलम भस्म
८२७
नेत्ररोगके प्रयोज
२७९
न
नेत्ररोगके प्रयोग
३३१
नयन च वृंघाह
३२९
नेत्ररेग हर मिश्रण
३३२
नयनामृत लेह
- ३३२
नयनामृतांजन
३३६
प
नर मोहन टेभ
३८२
पंचामृत मणि
४३०
नतकार्बिंच गुपाळ
१८५
पंचामृत वपंती (र. त.)
२७
नवरत्न पिष्ट
८४८
,, (भै र.)
३८
नवायस टेभ
२४८
पंचामृत टेभ गुपाळ
२०६
प चामृत टेभ गुपाळ
२०६
Page 29
पंदरीया यंत्र
पन्नापिष्टो
पन्ना रस्म
पलाशबीजादि मंजन
पलाशमूलाके
पलाश बोजादि चूर्ण
पलाशादिक्वाथ
पलाशादि क्ताथ
पक्षाघातरि रस
पांडु कामलाके प्रयोग
पाठादि टेव
पामा विरेचिका खुजली
पामादर मलम
पाराण भस्म रस
पित्ताशानि रस
पित्तंधरोरोग प्रयोग
वित्तोदरारि गुटो
विसाल रस्म
पोनम हर नस्य
पोनम हर घूप
पोनम हर मिश्रण
पीपलु (पिप्पलु) प्रयोग सर हिं
पुम्रप्रद रस
पुनर्नवा दि काथ
पुनर्नवा दि चूर्ण
पुनर्नवा मंडूर
पुष्य धनत्रा वृहत
पुष्टय धनत्रा लघु
पुरष्पांजन
पूगो फलादि योग
पूगं चंद्रोदय त्रिफला गंधक मारित
३६२
पूजं चंद्रोदय भस्मान चूर्ण
४५९
पूजं चंद्रोदय पदगुण पंचक मारित
४५९
पूण चंद्रोदय भस्मान मिश्रण गोली
४६०
पूणेंदु वटी
४५६
पोमाराज विधि
४७९
पेष्टराज भस्म
४३०
पौष्टिक आये
३९६
प्रतापल केबर रस
३६९
प्रदर प्रमेहके प्रयोग
३५०
प्रदरारिं ढाढ
३४९
प्रदरांतक रस
३६२
प्रदरांतक ढाढ
३४९
प्रभाकर वटी
९८८
प्रमदानंद रस
३८२
प्रमेह कुलांतक वटी
३१५
प्रमेहके प्रयोग
४०-३९६
प्रमेहारि वटी
३०८
प्रवाल विष्ठि
४३९
प्रवाल भस्म
४३२
प्राचेतष चूण'
२८३
प्रवालादि मिश्रण रक्तपित्त
६२
प्रवालादि मिश्रण गलरोग
८८
प्रवालादि मिश्रण मुखरोग
८९
प्रवालादि मिश्रण मदात्यय
९९४
रकौहारि रस
२५०
रलोहार्णष रस
२५०
रलोहार चूण'
२३२
प्लोहाहर मिश्रण
२४९
प्लेग की गोलोके प्रयोग
२९३
Page 30
फलघृत
फलवति'
फुलाक्ष उपचार
व
वट भस्म
वंङेश्वर वृक्षव
वंङेश्वर रस
वदिरादि योग दाह
वद्ध प्रदेहादरि घृत
वनासीर के उपाय
वहुमूत्रोत्क रस
वार्धिय' हर मिश्रण
वाल कफारि वटी
"
"
मिश्रण
"
वालपौष्टिक अवलेढ
वाल पौष्टिक सेगठी
वाल चोषपं हर चत्राघ
वालागोला
वालारोग्य घटI
वालार्क रस
वाहुशोपरि वत्राघ
"
"
विंदु घृत
विलङ तेल
वोजपुर योग
चेल पपं टी
"
"
रक्त पित्त
प्रदर प्रमेघ
मत्र नाशान रस
"
हर मलम
"
"
मिश्रण
नाग्रो घृत
भ
भकोतरीय रस (चूण')
भगंदर मलम
भगंदर शोधन
मांदर हर लेप
भग दरारि तेल
भगंदरारि मिश्रण
मांदरारि रस
भनजोति लेप
भनघंधान लेप
भवन हर कवाय
भवनोरिय तेल
"
"
मिश्रण
भोषपराक्रम रस
भुजंगा वचांजन
मृतभैरव रस
"
रस महाT
"
रस लघु
मोगपुर वटी वटो
अमरीग्ध योग
म
मडार मरम
मडार वटक
मदन कामदेव रस
मध्यम जो रस
मधु १डर
मधुमेहार्दि चूण'
मधुयष्ठयादि गुटिका
"
मधुंवेरेचन चूण'
मन्त्र याम्र रस
Page 31
मम्यासंहारि मिश्रण
३३९
महावचं तक्रकुमककर रस
३१४
ममोरा सुवर्णन
३११
महासौं वचादि वेल
२८૧
-मयूख विड़ङ्ग मदम
४३२
मणिक्य विड़ङ्गी
४३२
-मरोचादि वटी
३३८
माणिक्य मदम
४३८
-मलशोधनी वटी
३३२
मातगी वटी'
३३२
मलल मदम
४३३
मालती कुमकाकर रस
३१८
-मस्तक मणयो हर प्रदेया
२१५
मादिक वत्त मदम
४३८
मस्तक पुष्टे मिश्रण
३१८
मादिकौजन
३३८
मस्तक पुष्टि वटी
३१८
सुकुटेश्वरि वटी'
३८८
मस्तये शोतमा रक्त वटी'
३५१
मुक्ता कलर
३१६
मस्तरयादि चूर्ण'
३१२
सुफादि अंजन
३२९
मस्तरयादि वटी
३१०
सुफादि मिश्रण
९५
मद्दा व'नादिे तैल
४६२
सुक' प चामृत
३१९
मद्दा च मेदा अरां
३३
सुक्का विद्र्धो
४३४
,, रक्तप्रिया कपूरीयुक्त ६०
सुकाभद्रम
४३४
महाअरांकुंरा
३०
सुकारघायन
०६
महानारायण तैल
१२५
सुकाग्निकृपीविधि
४३४
महामृत्युंजन क्रष्ण
३३०
सुक्का अग्नि मदम
४३६
महाम जोषादि मराथ
१५५
मुक्त सुंघकर चूण'
३८२
महा ग्रहस्यु जय रौद्र
२५१
मुक्तपाहर घृत्नाय
९०
-महायोगराज गुङ्गळ
१२२
मुक्त पाहर मिश्रण
९७
महाराजस्नाक रस
७९
मुत्तरेाग हर गड़ूप
९७
महाराज्नादिे कसाय
१८२
मुत्तरेागहर घृत्न
९७
,, ,,
मुत्तरेोगहर घृत
१३८
,,
मुत्तरेोग हर लवण
,,
महालक्ष्मी विलास रस
४१६
मुक्त बौ पद्म वटी'
३८
महालक्षादि गुङ्गळ
२६२
मुक्त बौर्नसप वटी'
३८
महालक्ष,दि तैल उत्तर
२९
मुक्तादि यौन
९३
महालक्षदि तैल श्य
७१
मुक्तादि रसाय
३८५
-महालेकोनाथ रस
२५६
मुक्ता'द चूण'
४२
Page 32
मूर्च्छान्तक रस
९९३
रसपत भस्म (रौप्य भस्म)
७३८
मूर्च्छानाशन घृत
९९७
रत्नकला चूर्ण
३९
मूर्च्छान्तर भञ्जन
९१३
रत्न वपं टो
३१५
मूर्च्छाछातक रस वृत्त
२९४
रसराज रस
५६
१ मूर्च्छाछातक रस लघु
२९५
रसाधि मञ्जरि
७९५
मूर्च्छाछारि रस
२९६
रसो मन्त्रादि गूढ
९५
मूर्च्छापित्त रोग हर रस
३०१
रषाअदि गुटिका
९९
मूर्च्छातिसार हरी वटी
३९९
रसाञ्ज्ञानहर घणष
१३५
मूर्च्छाध्नारि रस
३९४
रसेन्द्र गुटिका
७८
मूर्च्छाशय रोगान्तक रस
३९८
रशान वटी आमवात
१८३
मूर्च्छाङ्कुर रस
३९९
रशान वटी पंदार्ङि
४७
मुद्गर्भ
५६२
रशानादि तेल
२२९
मृगाङ्ग मञ्जरि
४३७
राजमखी मञ्जन
९८
मृखुपाशोच्छेदी रस
४०७
राजमृगाङ्क लघु
५८
मेघनाद रस
३८५
रामवाण रस
९०८
मेहरवा युनानी वाटण
४६१
रालादि योग
११२
य चकनारेल्हारि लोह मं ९
२५५
रास्नादि घृत
९२४
नं २
९९३
रास्नादि योग
९९३
रास्नादि योग
७३५
रास्नादि लेउ
३६९
यषद भस्म
३२८
वङ्क्ष लानेहा मञ्जन
९०२
युन नी वटाध
३५१
वदं रयादि घृताध
३२३
युनानी जुलाव
र
रक्तपित्तके उपचार
६२
रोपन मलम
९८९
रक्तपित्तामनवलेह
६३
रोपन मलम
९८९
रक्त पित्ताङ्कुर रस
६९
रोहोतक घृत
८०१
रक्तनेहोल्ङक रस
३११
रोहोतकादि चूर्ण
२४६
रक्तनादानि रस
१५३
रोहोतकार्ङि
२४४
रचसन भन रस
६९
रोहीतधानकेह
२४२
रचस्नाव हर मांड
६९
रौव्य गुटो
१०९
रचस्नाव हरी वटी
३४७
रौप्य भस्म (रजत भस्म)
७३८
Page 33
लुय येगातम गुगळ
सदंगा वटी
सर्व रोगहर
लत्रण मोसकर
लघुन योग
लघुन वटी कल्योदर
लघुन वटी
(लघुन वटी-प्रगलटो.)
लक्ष्मना टेह
रक्षो विशाख वेल
लाड चूर्ण
लोप्र पेटलो
लोप्रादि तेल
लोह स्वदयोग
लोह पपंंटी
लोह मर्दन
लोह रसायन-पांडू
लोह रसायन मेहरृद्धि
लोहात्न मर्दम
घ.
लवङ्गि चूर्ण
वचादि रसायन
वच्य मर्दम (होरा मस्ति)
वच्य रसायन
वचादि तेल
वंध्यत्वफे उपाय
वराटिका मर्दम
वार्द्रोक हर तेल
वाल्मीक हर मिश्रण
वाल्मीक हर लेप
वसंत कुमारकर महा
वसंतकुसुमाकर
वस्य तिल्क रस
माजोकर मोदन
वात किंतामयी वृहत
वात माजकर रस
मातरफफे उपाय
वात रक्तांकुर रस
वात राक्षस रस
वात विध्न रस
वात हर चुभा
वात शिरोगेभ मिश्रण
वादेदारि गुटी
वानरी वटी
वाल्कांदि योग
वारुणी गुढिका
वासांदि कवाथ
वासांदि कांट
वासावटेदेह
विद्ध गावलेड्ह
विद्ध गादि नस्य
विद्रधे हर धूप
, हर मिश्रण
, हर लेप
, हरी वटी
, नाडिन कवाथ
विमलाजन
विरेचन चूर्ण
विश्वताप दारण
विपरीतकरपि वटी झाल
Page 34
विषतिंदुकादि घट्टी वटावटी
विषमज्वर हर चूण'
विषमवज्रात रस
विपादरारि मिश्रण
विषचू चूर्ण कालांतक रस
विसूची विषय रस
विरेचाटक हर प्रयोग
, हर घूणेो
विरेचाटकुश वटी
घोषपिंडहर कवाथ
वृद्धिनाशन मलम
, पाठिका वटी
, हररेवटी
वृश्चिक विषहर प्रयोग
चातुर्थिक मद्म
चौड़यं' विष्ठि
, भस्म
मण पकानेका लेप
, फोड़नेका लेप
मण फोड़नेका मलम
, गेड़ादेनेका प्रयोग
, मातंड़ रस
, रसायण मलम
, व्रण तेल
मणसे विगाड़ निकालना
मण हर' मिश्रण
मा कर वटो
मा रक्तोत घूण'
मा तम मलम
मांखटो वृदत
घटयादि कवाथ
घातांर्यादि चूण'
घारोर सुगंध लेप
शकाघात रसायन तेल
शंकर टोटक मस्म (दुर्योगनिवारिणीशाद)
शिर: शूलादिव्य रस
शिरोग्रह हर वकाथ
शिरोग्रह हर मिश्रण
शिरा यकृत
शिरा रक्षघाव हर प्रयोग
शिरोरोगहर वटकेच
शिरोरोग हरी वटी (मस्तकावरणदाह)
शिलाजतु प्रयोग
शिलादि मंजन
शीतपित्त शामनो वटी
शीतपिसहर कवाथ
, शीतपित्त हर मिश्रण
, शुक्रि महम
शुकपातुका वटो
शुंठयादि मत्रे'सु'
शुंठयादि कवाथ
शुंठयादि लेप
शुद्धि चूण'
शुद्ध गम' (छेद)हृत
, पल्लवित करणT
, (छेद) निष्कासनT
छालगत कैंपरी रक्ख
Page 35
गजेंद्र तेल
२३०
सर्पभक्षी उपवास
३५६
दारूानल रस
२३०
संगे यशद भस्म
४८५
हर चूर्ण
२३१
शंमुखी के उपाय
३२
लोहासवि कवाथ
२३१
संधिप्रकाशि खदिर
१३८
गुलांक रस
२३०
तेल
मृग मदम
४८३
शंखात हर चूर्ण
१३८
'
७०-७४
शंखात मिश्रण
१३८
शोध कळानल रस
२४७
शंखातातरि रस
१३९
शोध शहुलं तेल
२४८
शंखिप्रात मैरव रस
९
शोधेधरारि मंडूर
२४९
समुंद्रफेनादि वटी
३२९
ग्रोपरों तेल
३८१
पपाटल शपं टो
१९
श्रीफल लवण
३३२
समचंदादि तेल
३००
शोफर्त्तनि भेषजं
३४७
सम्पुटन मस्म (नवरत्न मस्म)
४०१
मल्लीपद गजकेशारी रस
२१९
वसामृत लेह
३२९
मल्लीपदारि लेह
स्वान त्रिशदर कत्राय
३८२
समशर्कर चूर्ण
४८
स्वान त्रिशदर चूर्ण
सरसती भल्लेह
८६
माष काळेभर रस
७९
सरसती चूर्ण
११७
माष कुठार रस
७९
सरपंग घो हल्प
१२०
माष गजसिह रस
८०
सर्व कुष्ठदर मिश्रण
१६९
माषवितानपणि वटक
८०
सर्वमह हर चुप
१३८
विषकळानल रस
१६३
सर्वतेलमद लेह
१०१
विषारि रस तेल
१६३
सर्वमंगला वटी
८३
मनेतकुठ हर रस
हर लेप
१६४
सर्व शोगदार्तक वटी
३८३
हरी शेठी
१६४
घन' कुंछनी योग
१५५
घर्णीमन
३३४
महाभृदु तेल-मस्तक रोग
२०६
घृतविशारेरोग हर नस्य
२०८
महाभृदु तेल-नेत्ररोग
३३१
सर्वेश्रर पपं टो
१८५
संकेचनी शेठी
३३४
सर्वेविंशि स्नान
३९६
Page 36
शारद्वतारिष्ट
शारिवाङि भवङेक्ष
विन्दू मूषग रस
सि दुरादि मल्प उपद्रंषा
सिद्धुरादि मल्प व्रण
सिद्धनाथी क्रान्तन पपं्टो
सिद्ध धुप
सिद्धयशोनी चूण॔
सिद्धसुत रस
सिद्ध हरताल भस्म
सिद्धांजन
सि'दनाद गुगळ
सुख प्रपव कर स् जन
, प्रसत्र कर चूण॔
, प्रबध कर लेप
सुख्वान्ती वटीं
सुचानिधि रस
सुचा पपं्टो
खुमशातरि तेल
सुवर्ण पपं्टो
सुवर्ण॔ भस्म १
२
सुवर्ण॔ मालिक भस्म
सूत शेखर रस (स्वर्ण युक्त)
सूतका भूपण रस
मिश्रग ३
सुत्तिका रोपांतक रस
सुतिद्रा वल्लभ रस
सतिक्ला विनोद रस
मौघनादि घयपं
योग
सेाम घृत
सेाम जीवन रस
सौन्दर्य॑ वघ॔न लेप
सोमाग्निजूठी भस्मेष्ट
सौरेश्वर घृत
सक॔देश्वरी पपं्टी
स्तनय सुधा रस
द्यौैरियापक्व॑ण तेल
स्तनायु जयति घटो
स्तनायु शूलार्दि रस
स्नाटिकमणि भस्म
सत्र्ण॔ भूपति रस
स्वर्ण॔ वस तमालती घृत
स्वर्ण॔ वसत मालती नं १
स्वर्ण॔ वसंत मालती नं २
स्वानिदृष्ट चाटण
हरिद्र रस
हिमवंद्र रस
हिरण्यमपि॔ (हेम गम॔) पोटली
दिगाघक चूण॔
दिगुलेस्वर रस
हीरा भस्म (वङ्ग्र भस्म)
हृदय वंच मय हरी गुटिका
हृदय पुष्टि मिश्रण
हृदय रोग हर मिश्रण
हृदयार्णव रस
क्ष
क्षत्रेदरारि मुटी
क्षयरोगहर प्रयोग
क्षय शांाक रस
क्षयजिरोगार्त हर प्रयोग
Page 37
रसेद्वार तंत्र
रेमा तु ममनीका
म
सफ'ल मरण
४०२
अनिद्राद्द
३९६
अनिद्रााय
४५
म हृदि
३२८
अति निद्रा
३९९
कुष्टार
३२
मंडार्दि
'३८४
सन तृषात
३९९
अनिद्रा
७००
कंडमाळ-पांढमाळ
१९२
अपरसवार मीरगी .
१४५
कंपवात
१३७
कर्णरोग
३८०
अर्दनं लाघन चुराना
७०
वात्जी-मलावरोध
३३८
अमररोग
१०९
कानके रोग
३८०
आ चि
१०८
कानके रोग
१०३
संधाविभेदक
२९९
'कुष्ट
९५९
अ गुदात
७०२
कुरुठ
४२
मदेरीरोग
-३३९
कृमि-पेटके झट्यु
९/६
अररपरी
३२८
केतु-विक्किा
१२८
मटीला
१३७
हे डेरा विसूचिका
८४
अतिसार
३६४
ख
हृद्र्जी-कोटम
'१७३
वा
खांसी-कास
७३
माचके राग
३२९
ग
माघरोगी
२१९
मानाह
१२५
माठिका वात
९२८
आफरा
१९६
गुदमाळा
९८२
ग्रामरोगात
१४२
शूल प्रताप चकं
-१४०
मोक्षेप-आचकडी
१४९
मलागंध-
१८२
उदर रोग-पेटके ददं
३२९
उदावतं
३१६
रत्नाद पागलपन
१९६
उपदंश
१४८
सफतंम
१७६
उल्टी-वमन
१०४
चड्र्क्नात
३३९
मो
मोठके रोग
५६
क
कटिप्रह
१३१
वात्जी-मलावरोध
३३८
कानके रोग
३८०
किटिम-वजू'
१०३
कृमि-पेटके झट्यु
९/६
कुष्ठ
४२
केतु-विक्किा
१२८
कंठ रोग
१२
Page 38
शालेके रोग-
८९
पथरी-शर्करा
३२८
गुदभ्रंश
७०२
गुल्म-
२५८
पक्षाघात-
११८
मद्रागो रक्ताल्पता
१३५
पागलपन-उन्माद
पागलोग
९९६
४६
जलोदर-हृदयव
२८९
पाददारी-
७०१
शानवे दा-
१३९
पानी लगान-
७६३
जिह्वा-जीम रोग-
९८
पामा खुजली-
९७४
जिह्वादत म-
१३०
पेटके-वदर दद'-
२२९
वातर प्रकरण-
१
प्रदर-
३८५
प्रमेह
३०३
त
तालुके रोग
९५
प्लोहरा-तिल्ली
३४०
तिल्ली-प्लीहा
२५०
फेफडेके रोग-
९९६
द
दमाघात
७६
वच्ची खांसी-
३९४
दंत-दाद
१७१
यवासीर-शिरो-
३३
शिरके रोग-
९०
मालरोग-
३०४
दाद शोष
९०८
वातशूल-
१३३
दिमागके-पागलके रोग
२०३
विलोका काटना-
७०९
घ
घनुर्थ
१३९
बीछुका दंश-
७०८
मदन-बदनाठ-
७६८
नजला-शर्दि त-
१९४
मगंदर-
१८७
नाकके नासारोग-
३२९
मस्मपविधि प्रकारण-
३१८
नागोदर-
३१८
नाक-स्नायु-
२०६
म
नासारोग-नाकके
३३९
मंदाग्नि-
८४
नासुर नाड़ीशण-
१८२
मयसे दद'(मदाग्नय)
९१८
निद्रामूत्र-
३९८
मन्यास्त्र म-
१३१
नेत्ररोग
३२१
मशा-मश-
८०१
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मद्रोंके रोग-
मत्तकरोंग-त्रिमार्गे
मत्तकमे' ग्रन्थो
मस्तकका वातोदर
मस्तकका भ्रम
मिरगी-अपस्मार
मुखरोग
मुखरोग-मुखप्राफ
मुखके बहारके रोग
मुख्शा-
मृदगर्भ
मृदमार
मृतहस्त्र-
मूत्रवेग रोकनेकी अशान्ति-
मूत्रपिडके रोग-
मूत्राघात-
मूत्राशयके रोग-
यकृत्-शोथर रोग
योगिरोग-
रक्तपित्त-रक्तस्राव-
रक्तप्रदर-
रक्ताज्ञान-
रक्तस्राव-
रांभण-मदप्रपी-
राउमहण-क्षय-
ललाट-
वातज करम-
वातरक्त-
वातरोग-
वाल्मीक-रांफी-
विद्रधि-फोडेसर-
विप प्रकरण-
विशूचिका-फेटेरा
वीसप'-रत्सा-
वृद्धि-
वृश्चिकविप-विषुका-
मण-गुप्तादि-
शरीरमें सुगन्धी रसन-
शस्त्राघात-
शिरोरोग
शीतपित-
शीतला-माता-
शीतलास्त्रोत-
शुष्कगर्भ-शोथ-
शोथ स्रजन-
शोथ दोह-
वात-पित्त-
श्वेतकुष्ट-
श्वेतप्रदर-
स'प्रदणी-
स भिवात-
सफेद फोड़ा-
स्वप्न दोष-
संजन शोथ-
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सूतिका रेग-
दरांस्त`-
सेमरोग-
चौ दय वधं न-
स्तनपाक-
लोधो के रोग-
लोधे बूधका विकार-
लो नपू षक-
हरक्चा-जरप्रास-
हरडूी टटना-
३४९ हनुमप्रह-
३११ हाथ पांचको उप फटनर-
३४७ हाथ पांचमे खोंसी-
३८१ हायी पांच-
३०१ विकार-होचकी-
३८४ हृदय पंध-
३८२ हृदयरोग-फेफड़े।का रोग-
३८४ क्षयरोग-राजयक्षमा-
३६४ खुदरेोग-
९३९-
४०९
४०९
३०९
४१३
१९६-
४८
३८६-
ग्रन्थ संकेत
इस्स ग्रन्थमे' प्रमाण रूपमे' आधारभूत स्वीकार किये हुये ग्रन्थ
भेपडय रसनावलि
भावप्रनाश
चूहोान्नघडु रत्नाकर
मधनिम्रह
रसतरत्न समुच्चय
रसेन्द्रसार ल ग्रह
मार्दंघर सहिता
योग रन्ताकर
योग तर निणी
चू्रन्थ याषध
च अगदेह
रसमप्रकाद ह्वचाकर
रसेन्द्र चिंतामणि
रस कामघेनु
रसतरनाकर
(निर्यनायल्यसिद)
चरक
सुश्रुत
अष्थांग हृद्य
रससराज चुदर
आंायुर्वेद् प्रकारा
शारदच
वैद्य जीवन
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रसेन्द्रार तंत्र
मस्तावना
आयुर्वेद यह वडा विशाल शास्त्र है। प्राचीन ऋषि मुनियोंने अपने सैकडों ग्रन्थों का सारुण्य वप्तीत कर प्रन्थ रच्याने के लिये किया हुवा अनुवाद प्रन्थरचयिते रहें। हमारे ग्रन्थोंमें अपयुवेंदकि स्वदिनां प्रंथोंसे लेकर छोटे छोटे जे। थे कडे। प्राचीन प्रंथ है। इनमें से कडे। हस्तलिखित पुस्तकॉके रूपमें प्रानित है। इनके आधारसे बनेठ प्रन्थ प्रविच्द हुये हैं। और अनेक अप्रसिद्ध मो दे।
आचार्यं श्री दरगतेंब्रं महाराज (पूर्वाश्रम रामवैश्य जी का शाख्रो) द्विरचित रसेन्द्रार तंत्र अथवा रस रत्नंहिता यह प्रन्थ मूल व स्कृतमें गद्य पद्यात्मकर प्रन्थ है।
उसका चिकित्साविंड (उपचार पढती) गुजरातीमें २० आर्दितमें भाजतक ५१=०० पकावन हजार पुस्तकें प्रसिद्ध हुये दें। आचार्यं श्री के ५० पुस्तके शास्त्रीय औपधोंफे जानमकारा यह ग्रन्थ निचेआ, सत्वर है। उस प्रनवसे हजारों वैद्य सुसारच, नायापार्शी और प्रत्येक वर्ग के प्रजाजन लाभ उठा रहे दें। इस प्रंथको मांस हिंदी अंयरों मराठी मायालापी प्रजाकीं ओरसे कईं रुपोंसे होते रहें है। परंच छापनेकी अनुकूलता न होनेके कारण अमौख अन्य मालामें' सद्द प्रन्थ प्रसिद्ध न कर सके', आज हिंदी मापामापी प्रजाके मं'पने यकृ प्रन्थ रख्खे हुये प्रपनतता होती दें।
उस ग्रन्थकी रचना प्रत्येक प्रजाजन, आयुर्वेदके अभ्यासको, वैद्य निचिरसक सब केइई रीगके कारण चिन्ह निदान पढ्याप्यप्य और शास्त्रीय सिद्ध औपधोंसे चिकित्सा कर सकें और वैयेतेर वर्गं घरेलु उपचार मारवार सरलतासे कर सकें इस प्रकारकी रचना को है। वैश्रे ही यह ग्रन्थ आयुर्वेदके छात्र और भड्यापकोंके लिये अभ्यासक्रममें स्वार संंर्म्मं प्रंथके नाते मो परम उपयोंगी है।
इस प्रंथमे' द्विते हुये शास्त्रोय औपधोंको क्रतिथोंने आचार्यंश्रीके जो जो अनुभव मिलां है। तदानुसार घटनें हुवे उनके प्रमाण और क्रियाने जो परिंवतंन किया है। यह ५० सालके अनुमवका परिंणाम है।
इस प्रंथमें हिंदी मापामें हर्दी मापा और द्वितीये हिंदी नापमें अपूर्णता माद्दम दे। डरके मार्शोधन कर पाठं और चिकित्सा इस प्रथका उपयोग करे वैकें प्रार्थंना हैं।
इस प्रंथके अनुवादकि मांग छेतों मराठी सरहिनि मादि मापामें आ रही है। भगवतोकि इछा और क्रुपासे अर्ही तक वन सकें प्रसिद्ध करनेकी चेष्टा करेगें।
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इसका उपयोग करनेवाले विद्वान पाठक अध्ययन करने के अतिरिक्त जो अपना अनुभव हो, लिखेंगे तो उपकृत होंगे और दूसरी आवृत्तिमें हर्षका उपयोग हो, रहेगा ।
इस ग्रंथके कुछ राजस्थाने आयुर्वेदिक कालेज पाठशाला आदिमें अभ्यासक्रममें रखनेकी इच्छा प्रकट की है उनके धन्यवाद देते है ।
इसी मांग अधिक होनेसे यह आवृत्ति अल्प समयमें समाप्त होनेका संभव है और इसका पुनर्मुद्रण तत्काल हम न कर सके यह स्वाभाविक है इस लिये यदि कोई पत्रलेखक इस ग्रन्थको प्रसिद्ध करना चाहे तो हम उचित नियमोंसे सम्मति दे सक्ते है ।
गोंडल
११-६-१९६८
स. २०२० ज्येष्ठ शुक्ल ९
रसशाला औषधाश्रम
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॥ रसोद्वार तंत्रं ॥
(रस संहिता)
चिकित्सा खण्डः ॥
अध्याय १
दारिद्रयघ्नं सौ गौरीशंभू सदैव वंदे ॥१॥
गलग्रुहृगडहस्तमततजननौवातप्मरेसं सकलचिकाराणां यत् जेये राजा ज्वरः कथयातः ॥
तत्प्रध्वंसारान्त्रिशारं प्रयमं वक्ष्ये हिताय नैग्न्रानां॥२॥
सव रोगोमें ताप ज्वर मह रोगोंका राजा है। इसलये ज्वराधिकार पहिले कहते हैं।
ज्वरकी उत्पत्ति
ज्वर तैप होने पर भी यह देवकोटिका एक सत्य है। भूत, प्रेत, पिशाच यक्ष राक्षस आदि सत्त्वधोंकी उत्पत्ति मिन्न मिन्न प्रकारसे कही है। इस प्रकार ज्वरकी इत्पत्ति शास्त्रमें वर्णित है। दस प्रजापतियोंके यज्ञमें सती-अपने पति दक्षकाका अपमान देख कर जल मरी तव केपायमान हुए चक्षे भयंकर श्वाससे ज्वर उत्पन्न हुआ है। वह प्राणी मात्रको वध देता है। जन्मके शोक-चेत्युक समय प्राणी माश्चर्य शरीरमें ज्वर अवश्य घुसता है। तापको देख और मनुष्यके सिरपर और कई बद्धत कर सकता नहि। अर्थो जैसा चड़ा प्राणी ज्वर मानसे मर। नहि वच सत्त-१ उस्सका मृत्यु होता है। कहना चाहिये कि प्रजाके लिये हि ज्वर उत्पन्न हुवा है।
८ प्रकारके ज्वरका मेद
१ वात ज्वर। २ पित्तज्वर। ३ कफज्वर ४ वातपित्तज्वर। ५ वातकफज्वर ६ पित्तकफज्वर। ७ त्रिदोषज्वर। ८ अभिवातादिसे हुवा ज्वर।
८२ सन्निपात ज्वरके मेद
१ वातप्रधान पित्तकफजोइन। २ पित्तप्रधान कफ वातहोन। ३ कफप्रधाय पित्तवातहोन। ४ वातकफप्रधान पित्तहोन। ५ पित्त-लक्षणप्रधान कफवातहोन। ६ वातप्रधान पित्तश्लेष्म कफदोन। ७ वातुधान कफसध्म पित्तहोन। ८ पित्तप्रधान वातश्लेष्म कफदोन। ९ पित्तश्यान वातश्रयम कफदोन १० पितप्रवान रफमध्यम वायुदोन।
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११ कफप्रधान वायुप्रधयम पित्तद्वीन । १२ कफप्रधान पित्तप्रपम कफद्वीन । १३ सों ही दोष प्रधान तीनोंका प्रकॉप ।
आगन्तुक ज्वर-अभिघात चौट शस्त्राघातका घाव चौट प्रदार या ऐेे कारणोंसे आनेवाला ताप मिश्र माना गया है फिर भी इस ज्वरका अ तमों उपरके उतरने होता है । अथात 'कायँ' कारण परत्वे उतरके किसी ज्वरको रूप यह आगन्तुक ज्वर ले बेतो है और उसमें एक दो तीन दोषोंका न्यूनाअधिक्य भावसे प्रकॉप होना है ।
ताप ज्वर सुचार
ज्वरकी उष्णता-बारीरकी उष्णता ९७-९८ से ९९ को होती है । ९९ से १०२ तक सामान्य ताप, १०२ से १०५ तकका अधिक ताप और १०५ के उपरका भयंकर ताप माना जाता है । ९७-९८ से घटकर ९५ को वारीरकी उष्णता हो तो यह शरीरमें अपेक्षित उष्णतासे कम मानी जाती है । और ९५ से नीचेई गरमी यह वारीरकी द्वानी पहुँचानेवाला 'चैत्य' कहा जाता है । कई यर्मोंपेटर ऐेे भी होते है या कईँ उपचचारक रखतेे है । कि वह २-३ दोषों गरमी ज्यादा बतातें है । ताक्रि रोगी भयविस्कल वन जाता है । और उपचचार करनेेवालेके आधीन होकर उपचचार प्रारंम करा देता है और १-२ टेक्के पीछे बत्ती गरमी मापक यंत्रसेे रोगीका ज्वर उतार देनेेका यथो प्राप्त कर घन भी प्रदर्श करता है । वैद्य लोग तो नाडी़ो गति्से हि तापकी उष्णता नाप लेते हैँ ।
वि·ज्ञान अनुसवी वैद्योंको उघर नापनेके यंत्रकी आवश्यक्ता नही रहती । वह नाडी गतिसे ज्वरकी उष्णताका प्रमाण जान लेता है । और ज्वर में जिस प्रकारका दोष प्रकॉप हो जानकर और रोगीका ज्वर चिंताजनक हो तो भी कम कर के शाब्वासन देकर चिकित्सा करता है ।
कारण चिन्ह
शस्तु वदल्नेषे, ह्वा विगबनेमें, सूखम जंभुमे, उदमि्ज प्रपिंड त्रिपुते आभात, और, वाष, फुक्फुस हृदय त्रिमागका दाह आदि कारणोंसे स्वर ताप आता है । आद्र विहारको अतिमिततासे दूषित वात वि·त कफ दोष उदरमें आभासायमें आाकर केोठेके अभिदेा बाटर निकालनेकी चेष्टा द्ररता है सद्द ताप आता है । मतोनेकका जदरोष, देह पूरिन्द्रियाका और मनका स·थाप इस्संका ज्वर कह्तेे हैँ ।
शरीर शस्त सुहा हुअ उमे किसी मी यस्तु पर श्रेति न हो, सुखसक निस्तेज होने, सुखका संंद भंगड जाय, आँखोंे मानोंका स्वाद हो, उछ्ठी चीन
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पवन या सूर्य के तापकी इच्छा और द्वेष हे, बगाशे -जृम्भा आलस्य शारीरक मारोपन, रीढ़ोच, खुराकर अमाव, आंखोंमें अघेरा, पीले शारीरका कॉप इत्यादि चिन्द ज्वर आनेहे पून होते हैँ। नातब्रोप जन्य खुवारमें जररके चिन्दके साथ कफप्रकोप हे। तो उपरके चिन्हों के साथ आंखोंकी जलन ज्यादा हे। कफप्रकोपमें उपरके चिन्दके अतिरिक् अन्न पर अभ व वमनकी इच्छा अतिवृद्धि मोळ उबकाई ज्यादा हो।
साधा जुखाम तरुणज्वर नवज्वर
कारण-खुराक ज्यादा खानेशे, अजीर्ण से, ठंढी, सूर्यका ताप, वर्षाके कारण, भागरणसे, ठंडे पानीसे स्नान करनेसे, शरबल आइसक्रीम बरफ चौबरा वजारका खुराक वेजीटेबल घी बादि अधिक खानेशे, नाटक सोनेमा वेसनेके छदसे, निम्र नियमित होनेसे, घूपमें किनेशे, शारीर और मनक्री अधिक परिश्रम करनेसे, ऋतु में परिवर्तं न होने बुसार आ जाता है। शारीरका दोषपन, अन्न पर अमाव, पेटमें भार, मस्तक पोडा, शरोर भारी, पेठक्री पिडा, आंखोंकी जलन, नाडो गति १ मिनटमें १२० से १३० तक होना, तुपा, शीत हेाकर शारीर कापना, मुखशोष, वस्त पिशावकी अल्पता ह्रास्रेट आदि चिन्द मालूम हेते हैँ। कमी उल्केद उबकाके साथ वमन भी हेता है। और रोगी वकत्नाद मी करता है।
ताप उतरनेके लक्षण
पसीना हे, शारीर हल्का खुज लगे मुखमें पाक हे, भोखक्री पाक, जौके मोंवे, अन्न पर रुचि हे तृषा कम हो मस्तकका भारीपन मिटे कमजोरी द डसे।
सामान्य गुश्रूषा
रोगीको स्वक्त चिन्हडोमें सुक्त मकानमें शारारको पर हयन खानो हे गोकें खंडमें पवनका येडा भाना जाना हे। लेकिन उसके शारीर पर पवन न लगे, रेभोकी पास ज्यादा मनुहोसें। बैठने वातों'चिते कानो म वेनो। तृषा ज्यादा करे तो पपंटादि हेम पिलाना।
पर्पंटी तेला १, घनिया तेला १, मालतीकष तेला ४, साथ कूट पीस कर उसमें ३०-४० तोला कुएकका या ताजा जल छेढ कर रंग लपेटे सत नमे या £ मिलौके कुल्लेमें मर छेडना।
तृषा लगे तो यह पानी कपडछान कर २-४ तोला पिलाना। ताप ज्यादा हे तो भारी रहनेतों १०२ से ज्यादा हो तो यार्ड नमक हलका हुआ ठंडे पानीके पेवे सिर छावलमें घर्ना। या नदीका संवाल क ढकेके सीचमें रस्न कर सिर पर
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भरना। या भरनेके वेलौ खिर पर? या पेट पर फिराना। पेटौका पेट देखना। बोजा मार हो मचूड़ना अवरोध हो वो विश्नाप हरणकी मीलो ३ से ६ तक
माहत्मे देता उपत गर्म जल या चाय केफो पिलाना। एक से दो हत्त हेाकर पेटका मार कम हेगो। शार भमे तहण जत्रमे ल घन कराना। घडितक रेगोका चुपार
सतरें और सानेको इच्छा न हो जव तक कुछ मो सानेको न हंना। दनिके पीछे भांप वाष्प देना। एक आधा घड़ा पानी भरकर उसमें
नेंमके ओते नकाई नोमके पमे कीड़ामारी लता कर'ज आकेपान २। वौस तोले भरकर घौटाना। घड़ेके मुखपर कुछ यत्न ढकना। पोछे रेगांके खुश्बो
चार पाई या खुरशोमें बिठाकर उपर कुछ कपड़ा ढाक कर घड़ेके मुंध खोल देना और लकड़ीसे पानी दिलाते रहना ताकि वाष्प निकल कर रेगांके भत
प्रत्य गमे फालकर पथ्यौना छेड़ेगो। और दूधसे जत्र का अश निकल आयगो। शरोरकी छेडी नसेंमे रेमाराममे जत्रघन कटगो वाष्प युसताप अतक आयगा।
यह सारे शरोरमें इन्जेक्शानका काम करेगा। रेगांके ढरुं हुए कपड़ेसे घमरा हट
हो वो वांच बीच मे मुखका घाहर निकाल वे रहना लेकित गहेड नांचे के
सारे बदन मे वाष्प की क्रिग हेतो रहे वैंमे करना। १५-२० मिर्नट के बाद कपड़ा अलग कर गपीका शरीर दवालसे पोळ कर कैरा कर ढ लना।
उपवास
रेगोकेा चुपार आते ही उसके पेटकी दशा कि जाच करना। पेटमे
वादी अजीर्ण मलमूत्र चय अनि देना चहिये बिना पेट बिगड़े ताप आता हो
तोच। तोप धाने हू अन्न और दूर बंघ कर देना ओर उपवास प्रारम
करना। यदि रोगी बुद्धिमान हो और मुखार बाने हो तो सादो चक्र
ताप चदतता नहीँ है कच आता है। नकुन उसके जीभकी परार्धन शाए ही
इसकेआ चार पाथी मे पड़नेका समय आता है। रोगी अपनेका भूस लगनेका कहे
जव हो कुछ मुंह क पानी जैसा प्रादहौ देना। पेटमे आमान्ज या और बिगाड़
जवतक हेगा उपवास्य दरदकेा हानि नहो पहुचेगी वरना जैसे जैसे उपवास
आं बढ़ेगा ताप उतरने लगेगा और रेगी हुशियारी मे आंने लेगो। कद्र मूत
टेग रेगांको हच्छा न हेने पर और पेटमे भूख न हो फेर मो ठाट खुराक दिया
करते हैं। इससे बुखार उतरने के बजाय बढ़ता है। डाक्तर केग मो बुखार
वाळे। दुर पताल, खुराक, साधुदानका काजी इत्यादि देतेही सिफारिशा करते
हैं हमसे रोगी मरण न्ज्जे जता है और आयुष्य वलमे ही वच जाता है। कई
रेगिप्या दे। हमने ३ से १३ दिन तक उपवास करादर बच्चे कर दिये हैं जिन्हे
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शक्तिरहिते छर्दि दिये ये। रेागांके पेटकी जांचकर आवश्यकतानु सार लप्तप्राय करामा पेटे में शांका आधा और विगाढ नष्ट हेानेसे रेागोका मूल रनेगा। पीठे प्रवाही सुराक देना यह ठीक हेागा। जुखार निकल जाने के पहिले १०-१५ दिन के लंघन करनेसे शरीर हरका पड़ता है, अथवा वायु पित्तका जुरासा हेाता है, छाती का भार हल्का हेाता है अथवा ठकार जाते हैं गला और मुख स्वच्छ हेाता है जोंभकी मलिनता पूर हेाती हैं, सुमी और वेचैनी मिटती है पसीना आता है, शुध्द पाने की इच्छा हेाती है नरा और तृपा जुन्नो है।
शयका ताप भय क्रोध दामाशना शोक और श्रमका ताप, सगर्भाका ताप, सूय' की द्वि लगाने से चढा हुआ ताप, सूतिका'रा जर ऐेसे ताप में लघन कराना नही चाहिये। हदके जवार्मा लंघन करनेसे ज्ञानी पहुचता है। आवश्यक्ता से अधिक लंघनचे सांचे के दर्द, वातस्य, खांसी, गला और मुख' में छाप अथवा, तृपा, वांबेांकी कमलोरी, कानों में कुछ चरचरिता, मंदता श्रम शरीमेंं ख वेरा और शरीर और वलको हानि देते है, इसालिये बुद्धिपूर्वक आवश्यकतानुसार रेागोका लघन कराना उचित है।
जुत्रार के साथ मन और अतिखारके चिन्ध देने में श्रादे ता औषधसे उसे एकना नहीं टेकिन अघोवेगा कम हो यैसे उपचार करना। जुखार के रेागोके दस्त ता कर्चित हो हेाता है। चहुवा दस्त यंधे हो जाता है। जिष लिये ताप चलारने दे औपधमेंं वधुा दस्त लाने चाे घटक द्वव्य हेाते हैं जैसे कि क विष्टताप हरप आादिं लिये जाते हैं। यदि वमन आदि हेाते है ता पर्पटादि दिम देना। पपं टै रसिं, धतू रा'म और सोमलकी टाल समयमागसे कूटकर रसना। पांच तोला में ४० तोला पानी ड़ाल कर मिट्टीके वरतन में रख छोडना चार घटाके वाद रेागोका येढा येढा पिलाना। रेागोके दस्त तव घ हेा और जठरका वेग अधिक हेा, पेटमें मल जमा हेा ता देसे छ गोली विरेचनकी देनेसे दस्त हेाकर विगाढ निकल जाता है और जुखारका वेग कम हो जाता हैं। पोेठे महाजन्रकुग, त्रिभुवनक्राति', त्रिपुरमैरव आदि महाौदशंन चूर्ण के कवाथ के साथ देने से ताप शफ जता है।
शातस्वर वायुका ताप कारण-चातल पदाथों, वाल, वटाना, चोभडा और गरिष्ठ पदार्थ', चीकना ठंडा रतवोधी पदार्थ', वाजीकरण शीतादि खाननेसे और वर्षाकी ऋतु में
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यह् ताप थाता है । शरीर में कम्प गला शोर हृदयका शोध, मलका अतिरोघ, शिर, पेट, कंबर और, पीठमें दरद, तापका अनियम्थित षटनां उतरना, मुखका देश्वाद, जंसाद भाना, पेटमें आकुरा अशीन' रेमाच द्रवपादि चिह्न होते हैं।
उपचार—३ से ६ गोली त्रिशृताप हरनकी सुदर्शन के साथ देना और दो दिनके पोछे त्रिभुवन कोर्ति ३ से ३ गोली दे। वहत पानीसे देना ।
शुंडालदि कषाय.-कचू', हलदी, दारूहल्दी थेवदार, शेठ, पंख़पल काली मिरच, सर्षपानाशोके मूल, इलायची मिलेअ, कुटकी, पर्पंट, जवाखा कारदाइंगी, चिरायतां और दशामूल, शहद माझ कुटकर रखना। १ से २ तोला कराय या फोंट पिलानेसे वाथजर और दुसरे तास उभरते हैं या भटकते हैं ।
विपत्त ज्वर गरमोका ताप कारण खर्रे, सोंठ, गरम, तिखे टाह और क्षेम करनेवाळे पदार्थ' चानिसे विगढा हुवा पित्त जठरमें १ आकर खुराक में मिल रसके दूषित करता है। इसीसे पित्त गरमोका ताप आता है ।
चिह्न -- सारे बदनमें दाहे, तृषा, निद्रानाशो, मुख कदवां, मूत्रो, कडवी खट्टी वमन, चक्कर, अ्रम, वकवाद, पतले दस्त, पसोना, मलमूत्र और आंवोमें' पीलाापन, नाडीको गति १०० से १३० तक, तापकी गरमी १०३ से १०५ तक दिखाई देते है । पीछें ताप ६—७ दिन तक सतत रहता करता है । वीचमें ४-६ घंटा वेग ज्यादा रहता है । जीभ पर काली छारी जमती है । इस तापसे दरदीशा मरणाशा भय रहता हैं । और नेत्र, सतत रोंदेने के पोछे मी कर्ई दिन कमजोर रहता है । इस तापकी अवधि ७-१० या १५ दिनको है । वीचमें उन्जित चिकित्सा न होने से दिमाग, जठर, कळेजा और फेफडेमें स्रजन
स्वारस्यार—रोगीको स्वच्छ बिछानेंमें सुलाना, हवा खुलेमें आती जाती रहे लेकीन रोगके शरीर पर न लगे यह ध्यानमें रखना । रोगीका प्रारंभमें वमन और दस्त होतो उसे मघ नहो करना । सिरमें दरद और जलन होता हो तो ठंडे जलके पेटा रखना । शोध लगे तो वपं टोेकि द्विस पिल ना ।
उपचार—द्राक्षादि कषाथ-द्राक्ष, दरद, मोथ इष्टकी, अमलतास का गमं, वपंट, सहदेवी लभानमाझ १ से २ तोलाका फोंट कर पिलाना । त्रिभुवन कोर्ति' नसे ३ गोली पानीषे । महाचंदृ कला ३ से ४ गोली पानीषे ।
विप्राशानि द्रस (र स )—पारद, पंघक सेहागा काली मिरच, कचूरा, मिटेअर, शफर, इलायची, कपुरं कचली, कुडे की' छाल, रौप्य भस्म, प्रवाल पित्ति प्रयोग
१ होष्टी.
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पांच पांच तोला, मोती पिष्टी'dea घोला मिलाकर, गिलोए, डाली द्वात बडो चो फरपट्ट ईन चोरेको समानभाग कूट स्वाम कर चार भावना देकर दो रतीको गोली वनाना अयत्रा चैंट कर रसना । मात्रा १ से ३ गोली अथवा ४ से ६ रती अदरकका रस और सदार के साथ सभवा चो दफे रपपडध न किये हुए पुराने गुडके पानीके साथ देना । इस ज्वरमें आंधोमें जलन हो वो महामुर्च्याजन कृष्ण मषदा नमनसुवाका आंधोमें अंजन करना ।
कफज्वर-कफका ताप (शरीरका ज्वरात)
कारण-गरिष्ठ चीजने पदार्थ, वाजारकी मिठाइ, मिठाइ अधिक खानेको वादत, ठंडे पानीठे स्नान, दिनके सोना, रात्रिका जागरण आदि कारणोसे और यास कर वसथंव ऋतुपें यह ज्वरात भाता है ।
लिश्ह-शरीर मारहप लगे, सांघोमें दर्द' हो । मीठा खट्टा वमन हो, चरकुनेद, आलस्य, सुस्समें मीठापन दरतमें उफेद्र आम पढे, भूख मंद, नींद ज्यादा, काम और शोकमें उदास, चौंकोड लिये पढीना खांसी जुकाम, शिरदर्द नाकसे पानी पढना, दम वढना हींवकी, स्वर बैठ जाना, ड्यादि चिन्ह होते हैं।
दस्तकौ दवज्रो देखर ज्वरात धाना है माथ लांघी चढने लगती है और फेफडोमें कफ मर जानेसे ज्वरात पढना है । उचित चिकित्सा होनें से दस्त और मुखके द्वारा कफका निकाय हो कर ताप उतरने लगता है । यदि ज्वरात अधिक दिन चढे थो कफके कारण स्वासनलीमें अवरोध होता है, जिससे रोगी बहुत मुशकेलोसे दम ले सक्ता है । फेफडो के अं'तरपडदो सूसन होकर छातेंमें घाल निकलता है । भागे कमी दरदी वेशुद्ध मी हो जाता है इस दशामें दाक्तर लोग इसे न्यूमोनिया कफज्वरके सूजनको इखार कहते है । इस दशामें चमन और कफके माथ रोगोथे यदि खुन गिरने लगे-तो दरदी मचना मुश्किल है ।
सामान्य मारवाद
प्रारभें सादा विरेचन औषध अथवा त्रिवंग भस्मको ३ से ६ गोली देकर दो चार दस्त होना वाहिये । रोगोंका मूल न लगे जब तक कुछ मी घुराक न देना । गरम कर तांबे के वतनमें रखा हुवा पानी योधा येढा देवें रहना भूख लगे जन सदरख काली मिरच नमक डालो हुवा मुंगका पानी देना । ज्वरात उतर जाम जब येढा दूध मात खीचडी भादि देना । इस ज्वरारमें दरदी सहन कर सके इतने दिन लंघन कराना । दो से आठ दिन तक लंघन
१ घुवरातमें 'बड़ीवाळो' कहते है ।
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६। संकते हैं। इस कफ ज्वरमें पूष या श्वेतु दोनेंको काँजी देना यह न्यूमोनिया या श्विदेपी का आम ण देना है। छातीपर महालाक्षादि तैल या रसराज 'रगा-हर शेक करना। चलपतङ्ग रस २ से ४ रत्ती अदरक के रस यथवा तुलसी के
पत्तोंके रसके साथ देना।
कफज्वर हर रस—(र स) छोटी पीपल, पीपरीमूल, नागरमोथा, मेरु, चित्रक, चिरायता, निंबू'डोके वोज, इलायची, अजमोद, सरसों, हिंग, भारंगी, पाटा, इन्द्रजव, जोरा, वच, इलायची छाल, मूर्वा, अतीस, कुटकी, वाग्भ्रिट न गव समभाग कूट कर ३ मे ४ यास' दे तीन दफे गौम जलके साथ देना अथवा १ तोलेका कवाथ हरके पिलाना।
त्रिशुनादि हरण—(र त) पारद, गंधक, हरड़, पीपल, सोंठके मूल, कचला १ जमाल गोटेकी गोली, कुटकी निंबू का समभाग लेकर घटोरेके पानके रसमें घोट चनेके समान गोली बनाना। १ घेए गोली अय'रस हर रसके साथ टेना। २ से ४ गोली तक पानीसे। सम प्रकारके ताप उतरते हैं।
शोतज्वर-डाहिगा ताल-मेथीया
ऋतु परिवर्तन'नसे मानेबाला ताप
कारण—ऋतुके परिवर्तनसे, गाढ़ जंगल में रहनेवालेोंदे गंदे पानीसे, मेढ़कवाली जमीन में रहनेसे, मच्छर के उपद्रवके उपयोग में आनेवाले पानीका निकास न होनेसे, डेरेस-भूगर्भ में बुगदे में गंदगीका निकास और सफाई न होनेसे हवा बिगड़नेसे सूखा का ताप कम मिलनेसे, हवा ठंड़ेए प्रकाश कम होनेसे, गोच्ह वरती'गली गलीखोंसे, कच्चे वासो, ठंडे और गीले स्थाङ्क वकाला स्वानेशे, अजी ण' होनेसे, अधिक जारण करनेसे नाटक विनेशे भादिमे हजारों
मनुष्योके स्वासोच्छ्वास मिलनेसे यह बुखार आता हैं और फैलता है।
चिह्न—शारीर तस्तने लगता है, ज माई आती है, कमर फटती है। माथे जलती है, लडाट और सिरमें दर्द' होता, है तृषा लगती है, पिशाद, लाल, वमन, दरतकी चवजो। यह बुखार ठंडी लगकर या वैसे ही आता है और अमुक समय आंकर उतर जाता, है, किर आता है। अगर पहिले पसीना होकर ठंडी लग कर बुखार चढता है। कई रोगोके ज्वर आने के पहिले ठंडोसे शरीर कंपाने लगता है। सूर्य'के ताप पर जानेके इच्छा होती है। २-४ रजाद वोडकर पंछे ठंडी कम होकर ताप चढता है। कह रोगोकेा
विपातकुइस गुजरातीमें शेरकोचम्स कहते हैं।
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प्रथम सिर पकता है, दुपट्टा है, चेहरा लाल है जाता है शरीरके और प्रत्येक अवयवके सूत्र स्थानेकी इच्छा करता है । एक दिन छोड़ दूसरे दिन आता है वह एकाहिक-एकान्तरिग; दो दिन छोड़ तंसरें दिन मानेयाला तृतीयक तरेया, और तीन दिन छोड़ चौथे दिन आनेवाला चातुर्थि-क-चौथिया ताव कहा जाता है । ये सव विषमज्वरके मेद हैं ।
विषमज्वर चूर्ण—(र.स) सेठ, छोटी कटहली पुष्करमूल, काकड़ाशि'गी, कुटकी, कचूरा, चिरोंई नागवलो दारुहलदी पीपल, वानी मिरच, कुलींजन, त्रायमाण, पपड़ट, अजगरच दन, धमासा, कूड़ेकी छाल, व शलोचन, दालचीनी भतोष, देवदार, मेधि पटोल अजमोदायन (चित्रक हरड़, पीपरीमूल, नीमकी छाल प्रत्येक वार) तौला, विराक्तरा २० तोला कूटकर ३ से ४ माशा पानीके साथ दे तीन दफे देना ।
त्रिभुवन कीर्ति-(र नं)गुर्द दिंगुल, शुद्ध वछनाग, सेठ, पीपल, कालं मिरच सैन्धवाग, पं०परीमूल, शुद्ध गेरिक मप्रमाग से लेकर तुलेस्या आटु और मधुरे के पानके रसको एकएक मावना देदेर चने के प्रमाण गोली चनंग । ३ से २ गोली दो वस्त्र गरम पानीसे दी जातीं हैं । सव प्रकारके ताप उतरते हैं और रुकते हैं ।
हग्डाह्व सन्निपात (टाइफोइड ताव)
(१५ से =८ दिनेंका ताप)
दारुण—प दे छटे हुए सागभाजो, फल खाने से, न'दे कुए के पानी से, कमरे के आसपांस मेज छार मलमूत्र त्याग होते रहनेसे, वर्षाकालु के मलिन पूर आये हुये पानो पं०नेरे, वरफ शीतल आहारीअदि के दानिसे आदार, विदारको अनियमिततासे पहिले आया हुया सान्निपातिक ताप इस से निमित डररम पलट जाता है । यह ताव बहुत करके ५० सालधी उमर तक अधिकतासे आता है । गुरुराप जैसे ठंडे देशो में इसका उपद्रव स्वकिक रहता हैं । हिंदु'स्थान जैसे गरम देशो में इसका मय कम है ।
विद्ध—यह ताप आते ही रेगी दमजोर हो जाता है । शरीरके अवयवो में और खासें में दर्द', मस्तककी पीड़ा, म दार्गिन, कम्प, ठंढी लगना, दस्त, वमन, नाडोकी गति १२० से १४० होतो, है, मूल नष्ट हो जाती है, जोम पर मल जम जाता है । ताप दिनके १०१ से १०२ तक और शामका १०४ से १०५ तक बढता है । पिसाव कम होता है, नींद कम आती है । तर्सी, नश्रोध में रेगी पडा रहता है । दस्त पतला, मोतीशो दाहिनो बाजू में दर्द और गडमड आवाज होता
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२० ७। ७से १२ दिनमें धारीर पर पलावों वगीी कुप्तिरां नित्ल कर मुत्त जाती है। तीसरे सप्ताह में तापदे िछ देष हेाते हुये शरीर आम होने लगता है। इस तपमें मो रोगोका म िनपात हेा जाता है तप दांत पर काढे छाडे पदरे हैँ। हेाठ फटकर खुन निकलना है। णेघुिनि वढचर ताप जेारसे आता हैँ। सांधको मरीक वढी हेाती है। कभी नाकसे और दसतमें खुन गिरता तप १०५ से १०७ तक बढना है। तथ रेगीकी वचनेकी कम भा रहती है। कई दफे इस तपके साथ दसत, मरडाँ, इल्तमे खुन, आंते में क्षत पहना तिल्ली बढना, केंफडेकी सुजन आदि हेाते हैँ। यदिद रेगीकेा असाध्य चिह माद्यम हेाने ल ाग तथ तौसरी सप्ताहमे मृं त्यु हेाना संभव है।
पष्टप्रवाद्र—रोगोका भच्चो हतवा प्रकार और सूर्यक का ताप मिटना। हेा सैे कमरे मे रस्ना। वद्र रेगी के णीट पर सीवा न पदे य यह धयान मे रखना। यदिदारसे देखने भनेगेने रेा ि के पास शेर नहीँ मचाना। रेगीके पास वहार के णागोका भान नहा। दे ां। कपडा मिलाना यदुलथे रहना। खुला र अधिक जेार में हेा तो धुलावजल के या ठंडे जल ां पिलावे हित पर रस्ना। १०—२० दिनके पोेए रेगिया भूख लगे खुराक की इच्छा करे तथ मुगका पानी गेा िहुे भात, काफो, चा भादि देना। युखार उतर जाने के पोेए ही दूध देना। णेा णिहत्न ह हा उस प्रत्येक के लिये विचार कर औषधी की योजना करना। रेर्गकेा इस रोगसे कफ जया ड णिकलता हैँ दसके लिये दूसर आस्मोने रेगी के मुंहसे लपपहे के टुकड लच्छ कर डफ निकालना। और धुकदानी में इधरे दू र जमोनमां गाढ देना :
स निपात गैरषु-(शा. म अ १२) पारद और गंधक ३—३ तोला णेकर कजली करें। ताम्र, रौप्य, स्वर्णक, वग नाग घौत णेरह प्रत्येककी भस्म षक एक तोला, सफेद वछनाग (सि िमया)२ दा तोला मिला कर पी णे शिमु अरणि, सेंठ, पीली गम' और चोuाह प्रत्येकके रसमे एक एक दिन णेठाकर गोला करना वरतनकेा लपेट उपर कपड िंड िहो कर उसे नमकसे भरे हुये वरतनमे रसख और उष्ण वरतनकेा वाहका य णरमे रख ६ घंटे पकाना पोछे उसमेसे औषध निकालकर
१ तोला प्र ाल और आधा तोला घुस्र वछनाग मिलाकर तगर मुक्ताली जटामां णि सत्यनाश्री ने तर णेँ मूल वप णल नीली तमालप णत इलायचो, चि ाकमूल तुलसी सौंफ देवदारु घटूरा अगस्य गेरुसमु णह जू और मदनफल प्रत्येक रसमे णभदेक मावना देखर तैयार क णरना। वैसा न हो सक ेथा उपर लि िखी १८
१ शुक्तादौम सरमञा,
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मौषधिको साध कूटकर उसके पथ्याकी १८ मात्रा देवे। पथ्य २ से ३ रत्ती मदरासके रखते देतेहै यह प्रकारके सन्निपात, न्यूने,निया. ज्वराधो, द्विदोष ज्वर, _ त्रिदोष ज्वर आदि ताप उतरते हैं और मटुक जाते हैं। भाधा तोला चौंघेराके रख और एक तोला अदरखकेा और. मरीच के १६ दाने पीस कर साथ इसको मात्रा देनेके शार्ङ्घर लिखता है।
इम औषधके पाठमें शार्ङ्घरमें आर लिखकर पित्तल भस्म डालना लिखा है। हम अनुभवरसे आर को जगह अभ्रक डालते हैं और इस रखको गांगंधरके मतसे कृष्णमणिर्के सदृरसे दो दफे भावना देना लिखा है। यह वस्तु प्राप्त करना अशक्य होनेसे हम नहीं डालते। सप'विषके ध्यानमें ३ तोला सफेद बचनाग (शिं'गिया) डालते हैं।
हृदय कस्तूरी मैरच रस—(मैं र.११६) कस्तूरी, कपूर, ताम्र भस्म, झाईँके फूल, अतिविष, रौप्य भस्म स्वर्णं भस्म, मुक्तापिष्टि, प्रियङ्गु, ढोद भस्म, पाठा, वायविडङ्ग, सुस्ता, रेठी, वला, हरताल भम्म. अभ्रह भस्म और आंवलो घन्वय समान लेना कस्तूरी और कपूरको छोड़कर सब वस्नु साथ मिलाकर आंके पके हुये पानके रखको भावना देकेर सुख जाने पर कस्तूरी और कपूर मिलाना। मद अ'सघ अदरक के रखसे या तुलसीके रखसे श्वास प्रकारके जुखारसे और वेदनिपात ज्वरमें दिया जाता हैं।
बिल्व गमंडल चूर्ण और जीरा और शहदके साथ देनेहै भामातिग्रार, श्वभ्रहणी, ज्वरातिसार, मन्दागि, खांसी, प्रमेह जीन' ज्वर मादि शान होते है। भपड्यरत्नावलोमें सू०६०सिम्नो लिखा हैं। इखके र्थानमें हम नतोश डालते हैं।
प्रन्थिकारदि कषाध—पोपलीमूल, इन्द्रजी, देवदार, गुगल, वायविडङ्ग, मोरींगा, सैठ, पोपल, कालोमरच, चित्रक, काथफल, पुष्क मूल, रालछा हरड़, छोटी कटहराी, मजमोद, निर्गुडीमूल, चिरायता वचा, चव्य चिरा पहाडमूल सब समान, कट १ से २ तोलामें पानी ४० तोला छोड़ चबुड़्याशा रहने पर दिनमें दो दफे मदेका दिंवा किसी औषधके अनुपान हमेे पिलाना। सब प्रकारके सन्निपात ज्वरमें इालो या सवतिका रोगमें योग्य औषध के साथ या अकेला दिलाया जाता है।
प्रलापक सन्निपात (१४ दिनका ताप)
कारण—मेढबालो या गांदो जगहमें रहनेसे या गंदी जगहहोी या गंदे वलक्मो में रहनेसे, गंदगी वस्त्रोे रहनेसे यह ताप लाग होता हैं और इसमें मुख कारण और चिह्न टांकेआदर्फके प्रमाण देखने में आवें हैं।
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विरेचन—इस तापसे रोगी २-३ दिनमें कमजोर हो जाता है, सिरमें सन्निपात ज्वरकी लगना, शरीरके आर्यावयवोंमें दर्द, आँख लाल आँखोंसे पानी गिरना, ताप बढना, सांधे मुदना, मुख खुला रखना, उत्तर न दे सकना, वधिरता, जोडों पर काढे पड जने । हेठ और दांत पर काली फुन्सिया निकलें ताप को गरमो ६-७ दिनके पीछे १०५ तक चढे नाडीकी गति १२० तक हो, ४-६ दिनके पीछे हाथके तलुए छाती पेट सर्दीमें काढे रंगकी फुन्सिया और दादे दिखाई दे। नाक और आँतोंसे कभी खून गिरे। इसमें वात पित्त कफ तीनों का अधिकृत कोष होनेसे रोगी घबराहट मरता है। शरीर कपता है। दाह और चेष्टि बढती है।
पथ्यापथ्य—इसमें भो पथ्यापथ्य टाइफाइड तापके समान समस्ता ।
यह घुत्तार रोसपि'क है । रोगीका उच्चिष्ट या खांद हुज कई चीज दूसरोंने खाना नही । उषके मलमूत्र दूर फे कना । रोगीका हचा और उजारावाढ़े कमरें में रखना । गुगळ, लोहवान नामिक पंस घो चावलको मिलाकर धूप करना कपडे विछाने आदि कढे घृत में रखना ताप के साथ दस्त मुष्डा खून चमन्न आदि जो चिह म दृश्य हो उनके पर विचार कर भौषधेका योग करना ।
ग्रहीकृत विर्नामणि—(गृही त ) पारद, मानिक्यपिष्टी, गधक, मुक्ता,' स्वर्ण', रौप्य त'म्म्र, टेहह, भस्मक, रौथ्य माल्सिक, शंख, प्रवाल, प्रत्येककी मम्म और हरताल, मनःशील शुद्ध ड़िया हुवा प्रत्येक एक एक तोला लेकर चित्रककु मुळे काथकी ७ भावना देना । पोंछे निर्गुन्डी का क्साथकी ७ भावना देना । पीछे पारद सुरणका रस मुअर का दूध और आंँकका दूध प्रत्येककी तीन तीन भावना देना । पीछे सच सवककी पोली लोहेकींमें भर कर उसका मुँह आँकके दूध और सेहागा मिला हुया मिश्रणसे वघ करना । पोछे उसे मटकीमें भर कपड़ मिट्टी कर गजपुट समे लंगाना । निकाल कर घोंटकर उसमें सवका वजन जितना हे उतना रस सिंदूर डालना और रस सिंदूरके वजनको'न्त मस्म डालना । पंछे इन सवकेा मिलाकर चित्रकमूलकी छालके क्नाथ से ७ भावना देना । पोछे सूख जानेपर इसे'का जितना वजन हो उतना विपादी चूण' डाल्ना । और पोछे एक दिन तक विलोरेके रस्की भावना देकर मुखाकुर घेएट रखना इसकी मात्रा २ से ४ रत्ती प्रत्निकादि क्न्यापके साथ अथवा महाद्रावकस्न्के क्नाथसे या अदरसक्न्के रस या तुलसीके पानके रससे सब प्रकारके सम्पिात पचाने दिय जाता है ।
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विषादि चूर्ण—मृतोप, विड़क, दालचीनी सोंठागा, काली मिर्च हरड़, नागकेशर, लौंग, पोपल सेंठ और शुद्ध वछनाग मव समान भाग कूट डर रखना और वह चूर्ण उपर लिखे मनुसार तैयार किये हुए रसमें समान मागसे डालनेका है ।
सूत्रना-इस रौंडेकपु चितामणि रसमें हमने अनुसवसे थोड़ा परिवर्तन इस प्रकार किया है । इतने सथोंत्तु-हीरेकी भस्मफे स्थानमें माणिक्य विष्टि का योग किया हैं । स्योंकि हीरेकी भस्म बनाना और इतने प्रमाणमें मिलाना वड़े. वृष्य वपयकका कठिन काम है, यह सथफे लिये शक्य नहीं हैं। और शृङ्गमूलकी ७ भावनां देनेके पीछे जो रस तैयार हुवा है उस रसके वरावर विषादिचूर्ण और वतुर्थोश क'ला वछनाग डालनेका पाठ है लेकिन त्रिपादिचूर्ण के दश द्रव्य और स्यारहवा वछनाग खव ग्यारह ही द्रव्य समान भाग लेकर कूटकर तैयार शृङ्गमूल आवनासे तैयार किये हुते रसममें यह त्रिपादि चूर्ण समान मागमें मिलाया जाता है और पंचे सवकेा स्याजोरेकी रसधी भावना वी जाती है ।
इस रसके प्रत्येक द्वव्यका तौल लिखनेके समय हम कीली कौढीका तौल लिख नहों सके कयोंकि वह छोटी वड़ी हो सकती हैं। इसलये यह औषध वनानेवांलाने गजपुट के पीछे वह कितने तैल में रहना है यह ध्यान में रखकर यह औषध वनाना चहिये ।
इस रसमें समभाग सुत्त भस्म अर्थात पारद मस्म ठालनेका लिखा है । लेकिन पारद भस्म अनेक किस्मकी होती हैं । दुसमें दस प्रकारकी पारद भस्म इसममें डालना यह प्रश्न हो। जाननेके हप सुत्त मस्म के स्थान में रप मि'न्दूर डालते हैं था एक प्रकारकी कूप'पक्व रक्ख वज्र'की रस भस्म ही है ।
जातव्या चित्तस्थरु कमि जटहर श्वासरोगवात वातामरक्तजिन्न स्र्य कफरूाल प्रमेह कुष्ठान्ति ॥ पांडुरोगतिसार रक्तपीं धृति भाग मुत्रजेष्टद्रव्य प्रद्रतेाडस्र्ति ॥१॥
त्रैलोक्य चिन्तामणिघेया रसेा गदघ्वांतिचिनाशानश्व ॥ नानाजुपानेहस्र्ति प्रयुकः पडिगुंजमासादश्व गुणप्रदः स्यात् ॥२॥
सधिक स निपात
(परि णति' त द्रव)-पांच अथवा: नान म'नसिक्ता सार कारण—दुष्काळ के समय खराब खुराक लेनेसे अथवा दुष्काळ के पीछे मच्छिक खाराक लेने से म'न आावादी से, गंदे पानीसे, पेटमें दि्वाद होनेसे यद ताप आता है । सवमें वजन के साथ पड़ा सकत है।ा हैं। दफा श्वासिक खांसी । नीद कम ।
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सिद्धन-सिरका दर्द, कमर या अवयवोमें पीडा, पानोका शोथ, ठंडो, शरीर कं पनां, कमजोरी, पीडा में दर्द, ताप सतत रहता करे, पसीना आकर मुखार छूटे, ताप १०६ तक बढे, कफी कमला और शरीर पीला दे जीम पर काला मैल भरा मन जमे, दस्त कफज, तिन्ली और यकृत बढे, पांच या सात ने दिन नंतर ज्वर और फिर बढे उस प्रकार दो दिन टफे जथला मार कर येस्म औपधसे मुखार जाता है।
चिकित्सा- सन्निपात मैरब २ से ३ रती अथवा त्रैलोक्य चितामणि ४से६ रती अदरखके रसके साथ अथवा शहदके देना।
मठयादि कुष्थ-कचूरा, रेवददार, हरड, बहिडा, भांवळा, विषायमूल रासना, शोंठ, मिर्चोय, शतावरी, गुगल समभाग कूट १ से २ तोला का कत्राथ कर दिनमें तीन चार दफे पिलाना। महालाक्षादि तैल घारोशकी मदंन करना। भूख रगे जड साधा खुराक देना। मृदुसांन चूणको माप (नाश्य) देना। दस्त बंध हो तो विरेचन हरण २ से ६ माशे गोली गरम जलसे देना।
मुग्गनंब्र सन्निपात (उपकुष्ठको सृजनकी ताप)
कारण--वारडीसे, वर्षाकालमे नदीके ठंडे जलसे अधिक स्नान करनेशे, सापका तप्त्र हे। जब मारी करनेवाळे पशाथ खानेसे, मेढकाळो जगहमें रहनेहे, खांसी और पीनस के साथ बुखार आनेसे, वच्चेकों बढो खांसी ससणी शोक्ता वराघ आदि रोगोसे यह बुखार आता हैं। यह बुखार लाग होनेवो पेट बिगड कर फेफडोमें सृजन हेतो है। सह नूयूमेनियाषे मिलता जुलता ताप है। छातीमें दरद होता है, खांसी मातो है। नाडीका वेग बढता है, सिरदर्द, पिशाब कम, दस्त कव्ज, आंखोमे सींच, तम्रा, वकवाद श्रवणेंद्रियकी कमजोरी, कफ चींकना। इस तांपकी मुद्दत ८ से २१ दिनकी है।
सन्निपात मैरब ३ मे ४ रती अथवा त्रैलोक्य चितामणि ४ से ६ रती जुल्सी रस अथवा अदरख रसके साथ देना और इस प्रकार रखका भोजमें भंजन करना और नाकमें डालना। तापका जोर १०४ से १०५ तक बढता है। पसीना आनेसे रोगका बल कम होता है। किसीको खांसी मो नही आती है। नाडी १२० से १४० तक चलती है। रोगी क्षीण होता है। तब नाडीकी गति मी धीण होती है। फेफडोके जिस भागमें सृजन हे यार्दा दर्द और मूल माता है। दोनो फेफडोमें सृजन हो तो तापका जोर बढना है। यदि १०-११ दिनके पहले तांपका और कम होतो रोगी बच जाता है और तांपकी जोर और
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-पथ्यापथ्य--बुले हतु प्रकाशवाळे कमरमें रोगीका रकना। उघ कमरें आरने उपर बा सूखे मेवरका अगनि रात दिन रकना। रोगी वृद्धि में हो तो देखना कि पेटमें या इसके आजुबाजु में दर्द होता है मा नहों। मूल, ठकार पेटकी कठिनता और माडीकी गतिसे पेटमें कितना बिगाड़ हैं यह देखना। दाकतरों मतसे चह्ह पत्तुजन्य बुसार है। आयुर्वेदके मतसे पेटमें बिगड़े हुए मलमें स्वाभाविक दोष पेदा हाते हैं और इस रोगके पेदा करते हैं अर्थात इस बुसारका मुख्य कारण पेटका बिगड़ना है इस लिये, मलका निकाल करना और लंघन कराना यह हस रोगकी प्राथमिक चिकित्सा है। यदि रोगी कुछ खुराक मांगे तो मुगल्ली पानी था चावलका पानी नमक हल्दी दिं० कालो मिरच डालकर येष्टा पिलावे। सुदर्शन चूर्णश्का कसाय अथवा पिप्पल्यादि गण, मषाय, कस्तूरी मेरष, श्रैष्टाम्य चिंतामनि, संनिपात भैरव, हिरण्यकष्म पोटली, विष्वताप हरण आदि औषध देना और दर्शान और दोषन लेप गरम कर छातीपर लगाना या अलसीका टेप गरम कर छातीपर लगाकर उपर हळ दाब कर पाटा बांधना। छाती पर और पीठपर चपहेंके मोटेसे शेक करना। शरीरपर मदालाक्षादि तैल अथवा महानारायण तैल अथवा कल्याण घृतका मालोष करना।
कंठकुष्ठ सन्निपात (फेफड़ेांके पडकी सूजन) तेरह दिनका ताप कारण - ठुल्ला ठंडा पवन, वर्षा, शरदी करने वाळे आहार विहार, मरकफ वारसक भाइस्केम, जागरण पेटका बिगाड़, आदि कारणशे यह बुसार आता है।
लिन्द - श्वास लेते समय छाती में सुईंया चुभती हो, चौरना हो, कातता हो ऐंसी पेढा होतो है और खांसी आये वक्त मी वैंसा हो दर्द हो उस करमट पर रोंगी से सक्ता नही। दोनो फेफड़ों में दर्द हो होता है। जिस ओर दर्द हो उधरसे करवट का रोगी से सक्ता नहि। देनो फेफड़ों में दर्द हो तो रोगी सोचा सेहता है। पिशाव लाल उतरता हैं। इस बुसारसे सच्छा हौने के पीछे रोगीको हदयका पद रह जाता है और हदयेकी कमजोर मो कायु होता है। श्वासकी गति बढतो है। बकता है। खुराक पर भरुची, सारे बदनमें दर्द, कफ, सिरमें दर्द, कभर हृद, कमी धारो और मस्तकका कंप।
चिकित्सा--अलसीका टेप गरम कर करना। छाती पेट और शिर पर शेक करना। पेटमें बिगाड़ हो तो हरहकै चूर्ण से या विष्वताप हरपसे या अवचोलै आदि से बेक दें इस पताला, लंघन कराना। खुराक हरेकी बफर हे
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यदि मुखका पानी, वातरे कछ हाजमै घुडदाली या नमकवारो पतली दाल। मातका पानी नमक हलदी छाला हुमा, पपैया, मूले गेवरको अंमोंठी रातदिन रसना! गुगलका धूप दे। वस्त करना। और महाहुदगंन कनाय सध्या सठ्यादि कसाय के साथ वृहत कस्तूरी मेरव अथवा सनिपात मैरव देना। त्रिभुवन कीर्ति विपुर मेरव, हिंगाष्टक व रस टिपुलेश्वर और लफंकेतू दि्चया जाता है। मृगमद्रासर्व अथवा उत्तम प्रकारका दवा मी दिनमें तिन चार दफे २ से ४ तोला दना ठीक होगा!
हृन्फलुएन्द्वा
तन्द्रिक स निपात
अतितन्द्रा तृषा श्वासेनिसारः कफकासरुकू ॥१॥
तथैव पले कंधु; कफेराधिक ॥२॥
जिह्वा श्यामा शुचेमौद्य कफमेऽकारथ्याचकः ॥
हृन्फलुएन्द्वा स्वेदकेsयमनार्यः कफितेऽ ज्वरः ॥३॥
मायुञ्चेदे निगदितेरेव शदेऽेत्थक्ष तन्द्रिकः ।
-रसोद्दार तनु कारण—यह चेपो संक्रामक जुखार है। मदामारी (मदको) से मी जल्दी यह बुखार सारे देशमे एकदम फ़ैल जाता है। चाहे जैसे एकच्छ गावमें मी इसका फैलाव हेता है। इस बुखारका परथम चलता हे। जय वाजारकी मीठाइ, मिष्टाश्र खानेके, जठराग्नि चिगडनेमे, हमेशां निकट-घडवा भौषध सेवन नहीं करनेवाले यधु कुमार लागु हे। जतना है।
चिन्ह—यह बुखार लघु हानेका मे प्रतितयाय नाकसे पानी पडना, सिर पांड और सांधे मे दर्द हेता। प्रारेम्भमें थोडो ठंडो लगकर ताप भराना। छींके और खासी बढना। छाती फेफडे गलेमें सुजन, हृदयकी कमजोरी श्वास नली के शोथसे सुठिकल से श्वास ले सकना इत्यादि चिन्हे पीछे न्यूमोनिया हेाकर रोगौका मरण हेता है।
पथ्यापथ्य—प्रारं मे तापके चिन्ह बेखनेसे रेगीके लघन कराना। ताप का जोर कम होगा वैसे हर्द्य और फे फडो पर तापको असर कम हेगा। रेगीके भूख लगे तब मगका पानी देना। आठ दिन तक मगके पातमें अ'दुका रस हिंग काली मिरच नमक हलदी डाल कर देते रहना। और दस वारह दिनके पोछे दूधमें सेठ काली मिर्च पिपल लौंगका समभाग दिया हुवा चूर्ण डाल कर मिलाना। यधु कुछ दूधपान मधुर करना है' ता गुड या शहद येढा हालने। छाती पेट और पेडू के नारेसे शेक करना। गुगलका धूप श्वासमे देते
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रहता। छाती और गलेमें वाजुमें भलषो का ढेप कर रह दाब कर पाटा मोघनत मारे बदनमें महालाक्षादि तेल मलना। दस्त आने के लिये विषतार हरण या अस्वचेलो नेलो ३ थे द देना। शठपाति कराय, अभ्यादि कराय के साख सन्निपात मैरव कन्टूरी मैरव, त्रिलोकप चितामणि अभ्रक भस्म, चोखठ प्रदरी पोपल मृतसंजीवनी धरा सयनका ब्रान्डी देना।
ग्रन्थिक से निपात
(मरको-फ्लेग)
कारण—गंदकी डुगंध, वंधेरा, सूर्य प्रकाशका कम, मिट्टी चूड़ेढे' बदनां अथवा देती प्रकारसे यह रेग प्रगट हे फेलता है। गट', मेरी अंगनमें दिनरात मेग पेटका बिगाड, मलिन मकान इत्यादिसे बढता हैं। चूद्धा और सिखरे'लां आदिकों यह रेग एकदम लागू है और इसे जनावर एक स्यानसे दूसरे स्यानों में देदने रहनेसे सरे गावमे फॅल जाना है। यह रे'ग कम जोर क्रा और क्रदो का कम होता है जत्रान जो पुरुषों का और सगर्भा स्त्रियोंके एकदम लागू हे जाता है। यह रेग शीत और वयपौष्तुमें उत्पन्न हुवा हे। डर भय'कर डप से फैल जाता है। प्रेधम ऋतुमे इसका जोर कम हेाता है। रफे गन्नाळे रागोको मारवार करनेवाळे, देखनेमे झाले चले घदघास मे रहनेवाळे लोग मो, खानपान आहार व्यवदार और वौषधमें सावधान न रहे तो उनके भी वह रेग लागू हे जाना है। गांवमें रेग उत्पन्न हेनसे सगर्भा स्त्रियों दूसरे गाव मेॅल देना चाहिये। गला, बगळ, गाथल, के मूलरों गोंठ-ग्रंथि उत्पन्न हेनेकी गति बधना, मथी हेनीकी जगहमें दर्द शुने हानी, सुख्खा शिंकना, आंखी निस्तेज, वमन उबका, छाती में घमराहट, सिरका दर्द, दस्त कन्ट्र इत्यादि चिन्हु हेाते हैं। उढो लगकर ताप १०७ तक बढना है। नाडोकों गति अनियमित। स्वास दर पिनिट २० से ८० दफे चढे। नमही हूको, पसोंना वंध, आंखे लाल, कीको बडी, सुननेमे कमी, पेटमे जलन, तृषा अधिक जेभकर
सीवका भाग सफेद और अं मका अम्र भाग और आखु घांजूका माग लाल, झविक दिन वीतने पर जोम फरक कालो पडे, नाकके अप्रमाग पर कालिमा, तन्द्रा निप्रा घेन चढे, जांघोमें, बाछलेमें, गरडन पर गांठे दिसा दे। यदि गांठ पद कर फेर जामा तो दर्दका वदन जाता है। यदि रोगी वुढा जाणेका हे तो श्वास
होने मे पोडे। सापक्का जोर कम हेाता है, गांठ पड्तो हे। मुदि माती है तन्द्रा
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कप होती है, जीभ अच्छी होने लगती है, आँखों की लाली कम होती है। यदि गाँठ पकने पर न आवे और तापका जोर कम न हो तो रोग ३—३ दिनमें शायदुबश हो जाता है। यदि ७ दिन निकल जाय तो वह्च जानेकी आशा रहती है।
पथ्यपथ्य—यह रोग उत्पन्न होनेके ही अच्छे आदमियोंको चकाला खानेका मघ करमा। रातवासी धस्सपन नहीं खाना। देनेी वय्त्त गरम खुराक खाना। अगर शाक्य दो वक्त एक दफे ही भोजन करना। दूध गगम कर पीना।
आरोग्यवधंनी, महाहुद्रं¹ इत्यादि औषप खाते रहना, प्राणायाम करना। देनाे वक्त दिव्य धूप खथवा गुगळ घो और नीमके पत्तोंका धूप करना। घोरीको और घरकी जगह स्वच्छ रखना।
रोग लागू होनेसे रोगोशा तोत्र जुलाष देना। इच्छामेदो ५—६ गोली अववा अख्खोली १०—१२ गोली अववा विरेचन ४ से ६ मीलो गरम पानिके साथ देनेसे ४—६ दस्त होकर पेटके त्रिगाड के साथ पेचा के जन्तु मर का निकल जाते हैं। और माठ चेठ उचाल कर पिलाना और थोड़ा गरम ही पिलाते रहना। रोगींको ७ दिन तक कुछ भी खुराक नहीं देना। यदि दस्त होकर बिगाह निकल गया हो और भूख लगे वो मुंग का पानी नमक हल्दी काली मिरच हाल पिलाना। यदि दाह घोप और तुपा लगे वो पपंरटदि दिम थोड़ा गरम कर पिलाते रहना। पुठक्ने पानी भी देना। रोगीकी सेवा कानेवाले²ने हमेशां शरीर पर तिलका तेल मालिश करना। साघा खुराक लेना। एक दफे भोजन करना और घारीर स्वच्छ रखना।
लिरिकित्सा—पार भस्म¹ उपर कफे अनुषार ६—८ रत्ती हो जासे उपचाए करना। महासुदर्शन चूर्णं अववा शिलाजित कवाथके साथ त्रिफेलावय पर महालाक्षादि तैलका मदंन करना। हिरण्यगर्भं १ से रत्ती घींव कर भादरखे रखसे देना।
ज्वरांतक विरेचन—(रघ)¹ पारद, गंधक, सोठ, मोंल, हलीमिरच, चव्यानाधीके मूल, कुचक्री, चिरायत्ता, सेन्धानोन, प्रोणपुष्प² १ के फूल सग्रम्मत लेकर शयनें शमान शुद्ध किया हुया शनाक "मोटा" ढाल कर सहतैवी²के, रसक्की
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मावना देकर रती प्रमाण गोली करना। सव प्रकारके तपमे दस्त वध हॊ। जव मलकेा निकाल कर सुखारने का कम करने के लिये यह औषध उत्तम हॆ।
१. सन्नामृत वपुं्टो-(र सं). परद y, गंध-c, ठोहा ताड़ रौप्य, अस्रक प्रातेको सम्म दे दे वेला सुवर्ण मम्म ९ वेलाके त्रिवृत पकाकर, ताजे गोवर के योगसे केलाके पतोंमें दवा कर चोला ई छोटी रहरी, सत्य नाजो
घोकवार, तुलसी, अंरदरद और धतूरा प्रत्येको ९-९ मावना देकर रवना। २-से ४ रती लघुन के रससे अथवा अदरखके रसमे देना। मग प्रकारके
मंनिर'व ज्वरमें शठ्यादि वचाधसे या दूसरॆ औषध के चेश्रें दिया जाता है। और सहम्रों मतिशार पुराना मुरदा हृदयरेग, भांतोके रेग कमजोरी अ दिवे भी
शन्छा फयथ देते है।
प्लेगकेा माठफा लेप १-कायफल, सेठ राइना, चित्रक, हल्दी, अरणी के पात, इन्द्रायण के फल, देवदार सहजनेश्री छाल माथ सींधा नमक हर पोलटीशकी तरह वांष पाटा वाव उपर शेक धरना।
प्लेगकेा माठफा लेप २-सेठ, अरणीौद्रा मूल, राइना। बिजेताका मूल दशहलनी सम्म म कुटी पानी में पेस गरम कर वढी पेष्टीश कै। हपमें माठके उपर रसना। माठदी अ जुजाजुरा ९-९ इन्स मार हक गय इन तरह करीव १०-१५ वेला लेकर पाटा बांधना और उपर शेक करना।
तिकनादि कचाथ-कुटकी चित्रायता पर्पट, गिलोय, कचूरा, राइना, छोटी पीपल पुष्कर मूल, त्रायमाण, छोटी कटहररी के मूल, दंवदार, वड़ी हरड़, घमासा, भार गी रस सम्मान माप लेकर कुटी कर १० तोलेरे पसके तीन सेर पानी छेक उवाल कर ९ सेर रहनेमें कपड़छान कर उसमें आघा
तेला नमक ड'ल कर २-२ घंटोंके पिसे १-१ तोला पानी पिलाते रहनेसे प्येगारा उत्न वम होता जासगा और रेगी बच जाता है।
सव प्रकारके ज्वरमें दी जानेवालीं सौपधें
महासुदर्शन चूर्ण-(चांग'. म अ. १२, या त. रु २०) हरड़ वड़ीला, अायला, हल्दी, दाख हलदी छोटी कटहरी वड़ी कटहड़ीके मूल, पमामा, पर्पट सेठा त्रायमाण वाळा नीमकी छाल, पुष्करमूल मुलेठी मूल गुं. - त्वाल अवलायन, इन्द्रजौ, भारंगी, सहजनेकी वीज फटकीरी वचा-दालचें। - न ग्याठवाटेकी मूल च दन अतीश वलायूल शालोपर्णी पृथिपर्णी, न - दी--, तगर चित्रक (सीता) देकर चक्के वम उपन्न पटोल नींबक
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ऋषिमद्ग, लताग व शाखाचन, कमलमूल, नागकेाली, तमालपत्र जायपत्री तालोषपच सम भागसे लेकर और सब भौषधये आधे वतनसे चिरायतता हुटकर मिला देना । यह सुदृश न चूर्ण' है । वात पित्त कफ एक देशका, देा देशका, त्रिदेशका ताप और सब प्रकारका ताप आगतुक ताप त्रिवजम्बर घात मे उतरा हुवा जीर्णज्वर सद्यिपात ज्वर मनके विकारसे उत्पन्न हुवा ज्वर शोतज्वर एकान्तरा तरीया चौथिया मलेरियाका ताप मोह तम भ्रम शोथ तृषा स्वास खासी पांडु हृदयरोग कामला नव प्रकारके शूल पेटका शूल आदिमे उत्तम गुणकर्ता है । चढे हुए तपकेा उतारता है आनेरहै तापको रखता है
ॐ नमेा भगवते हुदाय नमः क्रोधेश्वराय नमेा नमस्ते'पतिपतंगाय नमोनमः सिद्धिहुद्र स्वाहापयति स्वाहा ।
हाथमे ससे'के दाने चुटकी भर लेकर इस मतकेा सात दफे पढकर जिसकेआ एकान्तर तरीया चौथिया तान भाता है। उसे छिडकै उसके शरीपर फेके, सात दफे कगनेसे सब ज्वर जाता है ।
महाज्वरांकुश रस—(यो त. र. त. २०) पारद मथक वछनाग कनक-भोज प्रत्येक एक एक तोला त्रिकटु (तोनों मिलाकर) ६ तोला चव्यानांशी के पचांग के सकों भावना ४ देकर गुजा प्रमाण गो लेकर २ से ३ रत्ती मेप वरी के रस मे अयवा अदरक के रसपे देना । सब प्रकारहै ज्वरकेा उतारता है
ॐ गुदेश्वर—'र स' ज्वर)
हिंगूल वचसनाम च प्रये'त कवंमात्रक । चव्यंघपं पिप्पलो न मदंयेतखवं मे न च॥१॥ भावनादंरसेंदे'याद्विगुजध्येषणवारिणा । वानज्वरे प्रशस्तोयमल्पानेध्वंग्रहुच न॥१॥ रस संहिता
हिंगुल तोला १, शुद्ध वछनाग तोला १, छोटी पीपल तोला ४ साथ घोटकर अदरक के रस की भावना देना । १ से २ रत्ती नाम' जलसे देनेसे वात ज्वर मे' उत्तम है । अन्य ज्वरो मे' भी देाष के प्रकैप केा देखकर भनुपान योग्यसे देना । शतिसारमें' भी गुण करता है ।
रत्नगिरि रस—(मे र. ज्वर) पारद मथक ताम्रमस्म अभ्रक मम्स सुवर्ण मस्म प्रत्येक १ एक तोला, लेध भरम तोला आंवा, वैकांत - भन्म तोला ०१ पचांग के रसपे घोंटकर घोंटन्तर पर्पटो की तरद पकाकर घोंटन्तर । पोले मृदुज्वरं वासा निंगुठो वचां चिकित्सा मांगरा गोरखमुडी छोटो कटेरी गिठेआय भरणी
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वतास्य त्रापी कुटकीं श्वेतपाठा प्रायेष्ट के रसकी तीन तीन भावना देकर गोलााकर सुपर फेरलेंके पत्ती रपेट रपर मिट्टी लपेट कर सुपा कर उष्ण मोलेकी बालुका यंत्रमे रस्च तीन घटे पकाना। पंचे शीत होने पर निकाल घेए कर रस्वाना। ३ मे ४ रत्ती इस रसधो ८ से १२ रत्तो छोटी पीपलका चूर्ण और ३ चे ३ मासा घनियाका चूर्ण मिलाकर पानीसे देनेसे एक घटामे तापकी उतारताहै।
सप प्रकार के तापकेा उतारने के लिये और वेचुध्द रेागोंकेा अग्नित करने के लिये उपयोंगो हैं। मर्कटी स्टेिङ्गमे से ३ रत्ती यथ रस सुदर्शन चूर्ण के याथसे देना न्युमोनिया टाइफोइड आदि शनिपात ज्वर मे उत्तम है। वैसेहि टम क्षय वासी हृदयरोग केफड़ों के रेाग जों'ज्वर आदिमें मो गुणकारी हैं।
हिरण्य गर्भ (हेराम्ब पेतली)-(र स ज्व) पारद तेला ४, मघक तेला १२, सुवर्ण नम्क तेला ३, रौप्य मस्म तेला ४, ताम्र भस्म तेला ३, मुक्ता पप्शी, प्रवाल, शांख पिष्टि अश्रक भस्म नेह भस्म टकग रससिदर प्रत्येक तेला ३ दे॑ बंकात भस्म तेला ९ उन साय छेटक निर्गुंड़ी निंबू और ग्वारपाटाके रसमें दो टे दिन घोटकर एक एक तेला को शेगधं या गोली वनाकर प्रत्येक तेलो की रेशमी कपडेमे वाधकर एक पटकरीमें गधक मर सक गोलियों वस गंधकमे हुवा कर जाव कर उष्ण यंत्रमें रख पकाना। ३ पंटा के बाद अंमें निकाल कर स्तांगशीत होनेपर पटको तार कर गोलीयां निकाल ठेना जला हुवा कपडा निकालकर गोली साफ करना। अदरख के रसके साथ १ से २ रत्ती घोश कर पिलाना रेगी वेचुध्दिने हो तो हिरपर ताल्के भागपर भस्मार्शे बाल निकाल छेका बेकर उस पर गोली का घोशा हुक्शा चूर्ण ताल पर घोश खुनमें मिल जाय ऐंवा करना। वातिपात न्युमोनिया सव दरेाग आदिमें गुणकारी हैं।
महालाक्षादि तैल-(र. सं. उव.) शाककी या अन्य किसी व्रक्षकी कुटची लाव तेला ४८, नन्दन घउला वाला मूलीओ शतावरी कुटकी वेचदार हलदो कुष्ठ मजीठ अगर काला वाला असगंध चलामूल द'हल्दी मोरवेल नागरमोध इलायची दालचिनी नां'गकेवर रास्ना तमालपत्र प्रत्येक सेध्द सेलह तेला लेकर जव कूट कर उसमें खटा दहों तेला ८० और पानी सदृशे ८ गुणा डाल कर पकाना आधा पोनी रहनेसे उसमें तिलका तेल अथवा सरसोंका तेल रतड़ ३ ६ डालकर पानीका अंश जल जाय और वध्य सक पक जाय जव सतार देना। स्तांगशीत होनेपर कपड़छान कर रख छोडना। पव प्रकारके ताप उतारने बकने के लिये उत्तम है और वारीरकी अदरककी वाहीरकी अल्म रच्चा विकार आदिमें गुणकारी है।
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अतिसार
दस्त ज्यादा होना
फारिग़—गरिष्ठ और चिकने पदार्थ, कब्ज़, प्रकृति विरुद्ध पदार्थ खाना, भोजनकी गीले उंडे हॊ गह हॊ थैसों हरवक्त खानेकी आदत, मिर्चन्न और वाजारकी मोटाइ॑ अधिक साना और खुराक पाचन न होने पर भी भोजन करते रहना। विपविकार, शोक भय चिंताआ हूआ पानी पीना, भांग म॑द्यपान, पेटमें ह्र॒मि जयुक्रा उपद्रव इत्यादि कारणोंसे और वच्चोंक॑ दस्तका रोग ह॑ता है।
सिद्ध—छाछा नामि करछट और पेटमें शूल आना, अधॊा वायुका अवरोध, आंवतरा, आदि चिह्न के साथ अतिसार होता है। आम कच्चा द॑पचनेवाला हॊ तो पकड़ंगप व़ाला अतिसार हॊ तो दुगंन्ध कम, चीकनाइ कम, पानी में तर॑ हॊत॑ हरवार पनट॑ दरत ह॑त॑ हैं। दस्तक॑ साध सुखद॑य॑ पात॑ गिरना, म॒हचि जॊभ पर पंड़ी छारो, पेट पर वायु और शूल, खटट॑ दुगंधवाल॑ डकार, कमजोरो और कमोंर भॊ खून का गिरना थादि चिह्न मालूम ह॑त॑ हैं।
पथ्यापथ्य—खुराक वघ करना पेटम॑ भार हॊ, मुख न र॑ग॑ वहा तक सीचहों कटो, द्राश भात, म॒हू वाजरीक॑ पतल॑ रॊटॖ, मुंगक॑ पानी धानि—रग॑कॊ प्रकृति और रोगक॑ स्वरुप द॑ख कर द॑ना। म॑सूर, मटर, म॑जीर॑ल॑ मछली, ठंडॖ प॒थु हॊ तो अं॑पॖर॑ आम र॑खना और कपड़॑ के मॊट॑ष पेट और पॆद्ध पर ध॑ न करना। महानारायण त॑ल भयत्र॑ महालाक्षादि त॑ल पेट पर मालि-ष करना। दस्त व॑द हॊन॑ के पीछ॑ मो १४-१५ दिन तक सादा खुराक द॑ना। वच्चोंक॑। दांत आन॑म॑ या मताक॑ आहार विधारक॑ अनियमितास॑ दस्त हॊत॑ ह॑अर वच्चा स्तनपान करत॑ ह॑ तो उसक॑ माताद॑ खानपानम॑ सम्हाल रखन॑क॑ सूचना द॑ना। य॑द वच्च॑ दूध पिलाया जाता ह॑ तो वायविगं और यो ठंडा चूषों चुटक॑ दाल कर पिलाना। वच्चोंक॑ वालारोग्यराट्टी, महागन्क, तालकं आदि औषध द॑न॑स॑ दस्त कम हॊ जाता है।
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विकित्सा—
मानंद गेरु गुरो (र. प्र. स. ८.)
पकाया हुआ टंकण हिंगुल शुद्ध, शि गिड़ा वछनाग, कालो मिरच और घदूरे के वोज सम शमान भाग टेड़र, ज मीरी निंबु के रसमें घोट कर गुंजा प्रमाण गोली वनाना। सब प्रकार के अतिसार में दो से तीन गोली पानी के साथ दी जाती है। वच्चोंको आधा या एक गोली देना।
० कपूर्द सुंदरी गोली—(र प्र स ८) कपूर, जायफल, जायपत्री, कनकवीज, समुद्रशोष के बीज, सफलकदा घौं'ठ, पीपल, काली मिरच चोपचीनी और लता करंज के बीजकी मींगी (भुन कर अं'दरसे गिरी निकाल कर देना) प्रत्येक चार चार तोला और भाग २ तोला, भांग १२ तोला और शुद्ध वछनाग १२ तोला वसघाव मिलाकर मांगरेके रससे घोट वर चना सपान गोली वनाना। २ से ३ रत्तीके साथ देना। इससे सब प्रकार के अतिसार, श्रमहरणी, मं दाह'में, वच्चोंके आदि रोग मिटते हैं। और इम गोली के सेवनसे अफीमकी आदत भी छूटती है।
० रसप्टीकरण : वतंमान घरकारी एकमाइड कानूनके अनुसार जिसो मी आयुवेंदिक औषधीमे सेकन जोतना टका अफीम डाला जाता हो डालना अर्थात कानून बदलता जाता है जिधर वखन जो कानून हो अफीम डालनेका ध्यानमें रखे। अफीम कम होनेसे उसका कुछ गुण औषधमें लानेके लिये रसशाला औषधालयमें अगर लिये एक घाणमें ४० तोला पोस्तरा डोडा और २० तोला लसकर कुचल कर उसके सतवका सानना दे कर पीछे भागरेके रस जों तौला लसकर कुचल कर इसक भवनना दो जाती है।
अगस्त्य सुरराज (ये. र. सं'प्रह. ) पारद १ तोला, गंधक १ तोला, शुद्ध हिंगुल २ तोला, अफीम ८ तोला कनक वीज ८ तोला मांगारा के रसकी भावना देकर तैयार किया जाता है। इसकी मात्रा २ रत्ती में टिकड़ू ४ से ६ रत्ती मिलाय शहदसे देना। उपर पानी पीवे झाड़ा मरडा़ स प्रमहणी वमन उवका उत्कृष्ट मूल मे गुणकारी है। सब अतिसारमे दो मासा जीरा का चूर्ण, १ वाल जायफलका चूर्ण १ रत्ती यह रस मिलाकर पानीषे देना।
१ लवाकंरज गुबरातमें 'ककचीया अथवा काकचा कहते हैं।
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चित्रकादि वटी—(भाव अति.) चित्रक पिप्पलीमूल और यवक्षार प्रत्येक एक १ तोला, पञ्चचलत्रण पाँच। मिल ५ तोला, शिल्क्षु तीनोंमिल ३ तोला, दिं गा अजमोदादि चत्रक प्रत्येक एक एक तोला सब साथ कूट चौजारे के रसको और द्रदिम के रसको एक एक भावना देकर ३ रत्ती को गोली बनाना। मत्रा ३ गोळी पानीसे देनेंसे सब प्रकारका वात वेदना का श्वास आंतड़ो पिटती है।
अभयादिसिद्ध—दिं गुल, शुद्ध वच्नाग, सेठ पीपल काली मिरच जोरा सेहागा पारद गंधक शश्रक भरप सब समान भाग लेना और अफीम सब के घमान मिश्र कर नीछु के रस की भावना देकर सुखाकर घोटकर तैयार करना। जीराके चूर्ण मे १ रत्ती यह रस मिलाकर शहदद से रोग का स्वरुप देखकर दो वक्त या अधिक वक्त देना। भतीमार के साथ ताप हो या न हो सब दे प मे सब प्रकार के अतिसारमे उत्तम गुणवारी है।
कपूर रस—(भ. अति) दिं गुल अफीम नागर मोथा, इन्र्जो जायफल कपू रसवसमान भाग लेकर घोंट रक्हना। ३ से ३ रत्ती रसमे केा माता जीरा चूर्ण और शहददसे देना। सब प्रकार के अतिसार प्रंप्रहणी सुरचा अतिसारमे खून गिरना आदि मिटते है।
चुद्रगंगाचर चूर्ण—(भाव. अति) नागरमोथा, अजवायनकी छाल, सेठ घाइ के फुल लेप्र वाला बेलफफली शिरी, मोचरस, पाठा, इन्रजो, कूड़ेकी छाल सामकी गुठली लजजालु घृतकुम्भागसे कूट रक्हना। २ से ७ मासा शहददसे देकर उपर पकाया हुमा चनालका पानी पिलाना। सबप्रकार के अतिसार स प्रग्रहणी आदिगेग मिटते हैं।
कुटजावलेञ—(र. स. अति) कुड़ाकी छाल अथवा मूल ४०० तोला और मु इड़आंबवली तो १०, मुलेठी का मूल तो १०, नागरमुस्ता तो. १०, वच ता १०, पाठा १० तोला, चित्रक मूळ तो १०, छोटी कटहरी मूल १० तोला कूट कर वस्मे पानी पका १ मन डालकर कुराथ करे। चतुर्या व रहें जव कपडछान कर इसमें गुड पकका १ मन डालकर पकावे। कुछ गाढा हेग जब नीचे लिखे द्रव्य डाल कर पकावे। अशलेह जैसा हो जव इसमें शहद पका शोर ५ पाव मिला देवें। इन्र्जो, अजमोद, लज्नालु, वायविड न्गा, घनिया, बेलका गरं, सेठ छोटी पोपल, देवप्र, नागफेनार, जामुनकी गुठली, आमकी गुठली का गरं, कूड़ेकी छाल प्रत्येक शोलद शोलह तोला कूट कर मिला देना। अतिसार स प्रग्रहणी 'मूल आदि मे उस्सम है।
१ मु इड़आंबली—व्रसंत में भूंस्यामलकी, गुष्टरातिमे सेठ आंबली।
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संप्रहणी (आंत्रक्षय)
कारण—अतिसारका रोग मिटने के पीछे कड़ दिन तक जठराग्नि मंद रहती है, उस समय व्यर्थ कर गरिष्ठ पथ्य खानेसे, अधिक खुराक लेनेसे जठराग्नि बिगड़ कर पित्तप्रधान नामक कला जिसको ग्रहणी नाम है वह बिगड़ कर यह रोग देता है । अनियमित भोजन, अतिभोजन, अधिक परिश्रम, मलमूल के वेग रोकना, चाय, भाइंडेश्कीम, गुल्फी, बरफ वगैरह अतिशय पीनेकी खोंड शक्कर का खुराक अधिक खानेकी आदत इत्यादि कारणसे यह रोग होता है ।
लिल्ल—इस रोग के रोगी खाया हुआ अन्न पाचन होते स्वरुज बनता है, शरीर रक्ष सूखा होता है । तृषा ज्यादा लगती है । व ग्रहणीका यह मुख्य चिन्ह है । आंखमे झांख, कानमें आवाज, पसलीयाँ और सांधेंमें शूल, हृदय में पीड़ा, शरीरकी प्रतिदिन बढ़ती हुई निर्बलता, मलद्वार पर कई चीरता हो वैसे पीड़ा, खांसी और खद्या रस पर प्रीति, किसी समय पतला वेह किसी समय सूखा कठके साथ या बिना कष्कों दस्त होना हाथमे पैरमे सूजन । यह दर्द दिवसके और रातकेा शांत रहता है । पथ्य—करवटमे शूल, मल निकलते समय घटा खांसी होती है वंसा आवाज, तड़प रहना, सुस्त, टेढ़ा रहनेकी इच्छा ये भयंकर लक्षण माने जाते हैं ।
पथ्यापथ्य—स्नान नही करना । यदि आवश्यकता हो वे सप्ताहमे एकाध दफे यथाशास्त्र गरम पानीसे स्नान करनां । पानी बहुत पीना नहीं । चिक्ने पदार्थ, लहूंड जैसे मिष्टान्न, तले हुये पदार्थ, वाजारकी मिठाइय । खट्टीचीजे नही खाना । जो जेा खुराक रोगी लेता हैं वह वैसा ही मलद्वारा वादिर निकलता है । अतः इस रोगके रोगीको पतला, तदन हलका दीपन, वातपित्त कफ नाशक खुराक देना । छेटी चमच धीमे जिरा और हींग डाल कर भातमें पकाकर छोंछकेा वछार देना और उसमे सेंधानोन अदरक हरा धनिया मीठानोम डाल कर वह छांछ खुराकके लिये देना । औषध के उपचारसे खुराकका पाचन होने लगे वैसे घेाढा घेढा भात सींचडी, कढी मुगकाा पानी वादि देना । व ग्रहणी में वायु पित्त और कफ जिस दोषका प्राधान्य हो उसका खयाल रखके औषध और अनुपान देते रहना ।
ग्रामातिसार-मुरडा
कारण—गरमा गरम खुराक, बहुत तीखे, चिरचिरे, बहुत खट्टे रातवाली बनी हुई, बिना भूख पेटमें राघते रहने किं आदत, बाजारकी चौजें
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पर प्रोति वादि कारणेषे वातोण' मलावरोध होकर वह रोग होताहै। जब यहां कडो-चूफ घूल चोट भांतो है। मदामिलाछे और भातोंको चमजोरी वाढे रोगीका यह रोग हर वस्तु हेजाता है। सपकद्र मल आंते मे रककर वहां स्रत पहते हैं, इधरसे आंते मे सजन होकर उसको वेदनाषे चूंकके साथ मुरडा हेताहै। यह रोग मिट जाने के पोछे भी इसकी असर रहाहरती है। जो बपों तक रहती है। और कभो कम्मो उभड कर दूसरें रोगोंका कारण बनताहै।
चिन्ह—पांढा वोंट घाल के सांथ आंकडो आकर मल बाहर निकलना है मल येढ़ा पूयके सांव पड़ता है। जबो खुनमो मिरताहै। रोगो शरीर के भागोंफा डचट उघर मरोड़ता है। और भषख्य वेदना सहन करताहै। यह रोग सांप मिक वेगी या। जतुमों चे उतपन्न होने की मान्यता ठोक नह्हि है।
कडें रोगीको सख्त मुरडा होकर दस्त होते हैं, और वद केशमे मलयघ होकर डुढ़डे डुढ़डे से येढ़ो येढ़ो देरसे दरत थाताहै। दस्तको हाजत रहाहरतीहै। दंते दरते समय रोगी क्रणछना है, वेठे रहनेकी इच्छा हरताहै। टेकौन येढे सुंद या भाम या खुनकु येहे वट पहतेहैं। मोही की गति वेदनाहै। नोंम पर शोर माने लरताहै। तींन मुरडा मे शरीर मे येढ़ा ताप रद्ताहै। भूख मद होतोहै। पावत्रों पिडलिया मे गुठलो चढतेहें पेट फूलताहै। दस्त मे दुग घ रहतीहै। मांखे मही उतरतोहै। मुरडा १५से२० दिन के पंंड़ै पुराना वद्दाजाताहै। और पोछे सब महणोंका रुप लेताहै।
पथ्यापथ्य—रोगीकेा स्रचछ कपडे स्रचछ बिछाने मे रखना। पोनेका पानी गम'कर ठंडाकर पिलाना। पिण्डलोयांमे गुठलो चढे या वदत हेपा कपडे के नोटेसे शेक करना। महानारायण, महानाल्क्षादि टेल पेट जांकि पिण्डलियां भादिमे मालोष करना। भन्टो के तेलका जुबाब देना। खुराक मे दूध मेसंचोको रस देना छोंछमे या दही के घोलमे जीरा सेंधोनन धनियाडालकर देना। खुराक मे लौचवी दही मुग तुवर या मुंग मठकी पतलोंदाल देनां।
स म्रहणी मुरडाकी चिकित्सा
लाइंचूण'—( भाव सग्रं ) गंधक १ तोला, पारद तोला ०॥, त्रिकटु तीनोंमिल २ तोला, प चलवण के प्रत्येक लवण डेढ डेढ तोला सव साथू विधिवत मिलाय सक्का जितना तोल हो उस्से आंधे तौलसे अर्थात ७॥ पौने आठ तोला मारग मिलाकर तैयार करे। मात्रा १ से ३ माशा हृदयेस दे। सवंप्रकार का अतिसार संग्रहणी मिटतेहै।
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पंञ्चामृत रसौषधौ (र. रं)
चतुर्दिंशाद् भागा गंधस्य च पारदस्य दश भागा: कृत्वा कज्जलिका वेऽन्वितै: स्वर्णं मारक्ष किंण स्वयः ॥१॥
प्रत्येकं दशभागौ संयं संमिश्य लोहमान्रस्थ्य' गोमृत्रमध्ये दशभागं पक्व्वा द्वौद्वौ च ढालयेत्संवत्सरं ॥२॥
कदलीोदके व्याध्नो रसिस्स्थे गोमये च लघयसके यामचतुर्थान्तरमिति निष्कास्याथ पदं' येत्खलु त्रे ॥३॥
कथिता सर्चैप्तरहिता पंञ्चामृतरप्तौ मिषद्धमतर ॥ गुंजैकामात्रं द्वादश गुंजात्वधि प्रयुज्येय रौंधव जीरकघेले: संग्रहणी रोगत्राणि निः सिद्दा ॥
अथवा मधुनद्धीतैरेततिसारार्शः:श्व ॥५॥ मपित्तेनि मज्जादिनं पांडुरोग क्षौद्र जीर्णेर्दरादिरोगमुपु
नानाजुपानयेगैश्चिन्हैर्द्वैन्यन्यानि चीकित्स्य देयेयं ॥६॥ तौद्रप्रसम प्रगेप्रोसम्प द्रवो ग्रन्थान्तरेऽपु च ॥
वस्त्रमाभिरनुभूयेयं सिद्दा मारक्षरयेगतः: रोगप्रशमन्त रसय. करेति निःपद्रवं
रस संधित्ता-संग्रहणीद्वि
४० तोला गंधक, १६ तोला पारद, दानोंकी कज्जली कर उभमें लोहमस्त्र मात्रक्रम्त स्वर्ण मारक्षू भस्म प्रत्येक दश वेधा तोल मिलाना । भस्मने उपल्का मधु मिर्ग्न कर जुल्ल्हे पर लोहेकी कड़ाई रख उसमें ९० तोला गायका दूध लोहेके तबियासे हिलाना । मद पिघलने पर ताजा गोमय-गायका छाण के उपर बिछाये हुए बेलोके पत्ते पर ढाल दे। उपर दूसरा पत्ता दाब कर उसके उपर दूसरा गोमय दाब दे। पत्ते के जितने भागमें पर्पटी हो वह दव जाय इस प्रकार गोमय मच्छी तरह दाबे । १२ घंटोके पीढ़े धीरेसे चमालकर गोमय दूर कर दे पत्ते के बीच रही हुर्द्ध पर्पटी निकाल कर अच्छी तरह घोट रखे ।
मात्रा ९ रत्ती से प्रारम्भ कर १२ रत्ती ची अती हैं । चाह्द घृतसे अभवा मध्द्र पक्खनसे देख्र उपर जीरा सेधानोन दहीका मट्ठा पिलावे । प्रारंभमे १ रत्ती ४ दिन तक देवे । ५ वें दिनसे २ रत्ती । १० वें दिनसे ३ रत्ती । १५ वें दिनसे ४ रत्ती । २० वें दिनसे ५ रत्ती इस प्रकार बढ़ायी जाती है । इस प्रकार
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देनेसे रोगका शामन हो उस माच्रामे जारी रखे और आवस्यकता के अनुसार मात्रा बढावे या कम करे । इघ प्रकार देनेसे संग्रहणी का रोग मिटता है । अतिसार मुरदहा पुरानी डीसेष्ट्री आदि रोग फिर उत्पन्न नही होता और इसके मीत्र भी नहि रहता । ववाधीर क्षय१ अम्लपित्त मदात्सिन पांडुरोग औरते के रोग अजीर्ण आदि रोगोमें वृंदिपूर्वंक उचित अनुपानसे दी जानेभे प्रत्येक रोगका शामन होता है। रोग मिटनेके पीछे भी पंद्रह बीस दिन तक सेवन करना ठीक होगा ।
इस पचामृत पर्पटीमे ताम्रसम्म का योग कछे ग्रन्थो मे लिखा रहता है हमारे अनुभवसे त म्रामस्म गुणकारो है फिरभी उपर होनेसे भातोंके क्षोभ करता है रसशंहिताके अनुसार तांम्रके स्थान मे सुत्रणं माक्षिक डालने से बहुत अच्छा गुण करती है । सेा ह्सप्रकार वनाकर अनुभव करे और लिखे रेगेको शामन कर यथा प्राप्त करे ।
पचामृत पर्पटी (भै. सग्रह. ३८५)
< तोला गनक, < तोला पारद, लोह भस्म तोला ४, अभ्रक मह्र तीला २, ताम्र भस्म तोला १ । टोहेके व्रतंनमें पकाकर पर्पटीकी रीतिसे बनाना । २ रती से प्रारंभ कर < से ९ रती तक कमशे बढाते हुए रोगो की स्थिति देखकर सेवन करावे । शहद घीके साथ दो जाती है । सग्रंहणी की स प्रहणो में अतिसार मे अंहिचि ववाधीर घमन उघर के साधका अतिसार नेत्ररोग रकप्रदर
आदि रोगोमें उत्तम गुणकारी है । जठराग्निको प्रदीप्त करती है ।
लोहपरपटी—(र. र. मै)
सूतः पलमानः स्याच्छा्वदू गंधश्र्च कज्जलीरतः ॥ जंबूफल रस पक्वं लोहं भस्मापि सतमानं स्यात् ॥ १ ॥
संमर्द्य पर्पटींवदू मोद्गृतो लिप्ते डयसः कटाहे तत् ॥ मृत्पात्रे संपाच्यं रंभाप्रभृत्यै रोगयस्स्थै चै ॥ २ ॥
संढाल्य मद्ग्रृहा सेव्या दचिजी रकरे यो मघुना ॥ दूय संग्रंहणो रोगे ससिद्धा लोहपरपटी ॥ ३ ॥
दचाद् गुंजा ह्रादयो मात्रा यावत्सस्तदिनं मिश्रीं ॥
पचात्प्रतिदिनं चेकां गुंजां गाचछतुरंशं घपं येत्रोगरांति: स्याद् ह्लासयेच्छ तथाविधं ॥
वसास्यां प्रदणोमा मातो सापचतिका गद्नान पांडुप्लीहग्निमां धादि कुप्रर्शः कामलाश्चान् ॥
दन्ति वृष्या तथा वत्या रसायनगुणप्रदा ॥ ६॥
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पारद तोला ४, गंधक तोला ४ दोनों को कज्जली कर जामुन के फकके रखमें पकाया हुआ टेह्म्म तैल ४ मिलाय घोट 'लोहेकी कड़ाइ' मे गौयका घृत उपड कर उसमें वह मिश्रण डाल, मंदाग्निसे पकाना । गोवर पर रखे हुए केलेके पत्ते पर ढालकर ऊपर घोर पत्ता-गेवर दाब कर स्वांगशीत होने पर 'घोट रखे' । ददोका घोल और जोरे के चूर्ण के साथ २ रत्ती मात्रासे प्रारंभ कर ७ दिनतक देना पीछे प्रतिदिन एक एक रत्ती बढाना जहांतक १४ रत्ती एकदिकी मात्रा हे| । आराम होय जब तक इस मात्रा से चला रखे । आरांम होनेके फिर एक एक•रत्तो प्रतिदिन घटाते हुए बंद कर दें । रोगीका बलावल पारोरकी स्थिति रोगका स्वकप रोग के साथ अन्य जो जो चिन्ह देखनेंमें आये हो सबका विचार कर उपर लिखी मात्रा मे न्यूनाधिक करना उचित लगे तो करते हुए औषध चालू रखे। और आवश्यकताछै। तो अनुपान रोगानुसार बदलते रहें। असाध्य संग्रहणी आमातिसार स्तिकारोग पाडि तिल्ली म दार्गिन कुष्ट यवासोर कमला आदि रोगकी शांति होती है यह लोह पपंड़ी बल रकवर्धक मोषिक और रसायन जैसी गुणकरती है।
सुवर्ण परपटी (र. रं. येः र.)
गुजरसेवे तैलः स्वर्णपंदलं तैलकैकमानं रसायन । मदनविचित्रनौकीकृतमपि गनवस्तेलकाष्ठरस्त्र ।। १ ।।
विपचवा कज्जलखिकां कुड लोहकटाहे घृताकदर्व्या तथा । मुद्रगिनना य पक्त्वा सोमयसंध्ये वलेप रंभाया: ।। २ ।।
सदालयोप'रि पत्न' वल्या संच्छद्यच गोमयतः । स्वांग शीतं निषकासय य मदंगपेतं जुमे कालने ।। ३ ।।
मुंजाद्रयमारस्य स्वाद गुंजाद्रयामिता यथा मात्रात । मधुना कृष्णाचूर्णैः संग्रहणी भास कास यक्ष्महरो ।। ४ ।।
हया मेध्या वृंष्या बलशुक्र विधारिणीं मता सद्य । रससंधिता प्रयुक्ता सिद्धेयं स्वर्णपर्पटी पथ्या ।। ५ ।।
शुद्ध पारद १ तोला शुद्ध गंधक १ तोला २ अथवा सुवर्ण १ भस्म तैल ४ डाल कर घोटे । स्वर्ण पारदमें मिल जाय जब शुद्ध गन्वक १ तैल मिलाय कज्जली कर लोहेकी कड़ाइमें गौयका घृत चुपड कर मन्द अमि में पकाकर रसरूप होनेसे गोबर पर मिल्ख ये केले के पत्तेपर ढाल ऊपर दूसरा पत्ता गौबर दाब स्वांगशीत होनेपर घोट उपर्युक्त दो रत्ती मात्र सेहि और छटाँक चूणके सांध प्रारंभ करे दुसरे सहमें प्रतिदिन एक एक रत्ती बढाकर दश रत्ती प्रति
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दिनको मात्रा रोग शान्ति होने तक देते रहें । पीसें एक आढ़ रत्ती प्रातदिन कम करते हुए बन्द करे' । शंङ्ग्रणी श्वास शोधो श्वय हृद्रोगे षादिमे गुनकारी है । हृदय को बलवान करती है हृद्र रक्ष वचंक, पोड़िक हृदय पतन चुमके' यतावीं है । इस वपंड़ी मे मन्शानुरमे सुवर्णांक' १ तोला सालनेका नी वाठ है । घंयांद < तौला पारद < वेढा मधक मे' ९ तोला मे नाद्दा वकं मे रपान मे' दे तोला मो डाला जाता है ।
सिद्धनाद्दी कांबन वपंर्टो ( हदाघ नपतत )
शुद्ध पारद मे' तो १० मे २ तोला स्वर्णभस्म अथवा मे'नेढा वक' (पत्ता) शालकर घोंटे, मिल ज नेष्टे पीसें वसमे' हुव गनाक तोला ३० टाल महलयो पर पौंहे उसमें मानियय पिष्टीं प्रक्षाल चद्रपुटों अस्फक मद्म निश्रण, टोद मस्म रौप्य मस्म प्रत्येक चार तोला टाल मोट डोहेरी कटाढ़ी मे गायका पय सुपक कर शय मिश्रण टाल मन्त अयिसे पकाना डोहेके तदेवो परमो थी चुपर हर दिनावे । रसस्प प्रवादी हो जानेसे मेहेर पर मिलावें केलीके पत्ते पर २राचे जतत ऊपर केलीका पत्ता ढाक तपर गेरमय हाव है । १७ घण्टे पचाफिंद पाछ पे पर्टो मे'डर नेष्ट रहे । माथ २ रत्ती से शारंभकर यथा उन्दिस्थगदयमे रेागोको दार्त देखकर आवश्कताके अनुरार मात्रा मदावे घटाढ । शाद्द मधुन्नपे वा शरद शंङ्ग्रणी पुराना मुरधा डेहेरा श्य कुराता कमजोरो भायुक्रीणता उदर हदय केडेकोंके रोग आदिमे' उत्तम है । चलवुदि शुर्ककाति मेधा आधुप्य वपंफ है।
श्रद्रणी कवाट (रकf) (र स)
रससिदुर तो १० मे सुवर्णंका वकष (पत्तां) तो १ डानकर घोंट मिल जाने पर उसमें गंशक तोला २० टालकर घोंटना । मिल्ु हूआ जानेसे उसमें रौप्य भस्म तो १०, कनक बंन तोला २, टेढ गम्म तोला ५ सावदांकिन मस्म तो ४ शफेद शींगिया ( श्वेत वस्नाभ ) तो २, मंतीविष, विजया, नागरमोध फूल मायूफल, इन न्रजे, कूडेेके छाल प्रत्येक तो ४ स्फें तो १०, सब साथ मिला हर, डेठेका गम्भ' और निंू और मांगरा प्रत्येक के रसक्की एक मपवना देहकर गुंजा प्रमाण गोली वनाना । १ रत्ती २ खे ३ नेोली पानीके साथ देना । हिदमे दूध या तीन दफे पानो के साथ देना । रेागदर स्वहह और दोषोको भिन्द देठकर मात्रा और समय त्वं'चिक करणा और अनुपानकी सादसकता हे । दश शंङ्ग्रणां आदधि रेागोमें' -जननसार, पुराना मुरह', शूल, मचराजोर रफसाव,
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प्रदरณี गज केसरी (रस रत्न समुच्चय पु. ३५७ अनुसार)
शुद्ध पारद तोला ४ और शुद्ध गंधक तोला ४ लेकर कज्जली बना कर लोहेको खरल में पिघाल कर उड़दमें केतली भरम, सुवर्णंमाक्षिक भरम और शुद्ध गंधक प्रत्येक तो। '४ टाल कर गाय के दूध पर विछये हुये केले के पत्ते पर टाल कर ऊपर केलेका पत्ता और गोंदर दाब देना। २४ घंटा के पीछे निकालकर लोहेको सरल में घैट कर उसमें सुवर्णंमाक्षिक भरम रक्ख तो। ५ और अभ्रक भरम तो, २० टाल कर रख्खो जितना रजन हेतु रख्खे आधे रजन में मीचे लिखा जत् विपादि चूर्ण मिला देना। पीछे अरणि, मरेठी (महाराष्ट्री), भांगर, मधुगंधा और पचकोल (है। टो पिप्पल, पीपलामूल चव्य चित्रकमूल और शेलटका समभागहै। दिया हुवा चूर्ण पचकोल वद्ध जाना हैं) प्रत्येकके कवाथ के एक एक भावना देहकर छायामें सुखा कर घोट रखना।
नद्दी योगीने बनाया हुवा यह रस अमृत समान गुणकारी हैं। प्रातः मौर सायं देह देह रसौ दहदसे या दही'का घोल और जीरे के चूर्णसे देना।
पुराणंमुरडा, संप्रदरजो, स्त्रियों के रोग, हृदय के रोग, भामाशय और पकवान्शय के रोग, अतिसार, प्रवाहिका प्रदर, पेटका फूलना, आदिमें उत्तम गुण करता है।
पथ्यमें दहेका घोल और छाछमें सेंधानोन डाल कर मादके घोका वाधार दे कर खुराकके लिये देना और। साष लघु हविचकर माही खुराक देना।
खुराकका पाचन होता है, जठरामि प्रदोप्त करता है, आमका पाचन होता है और सुराक पर कण्ठि बढाता है।
रत्नकला चूर्ण—(र. रत्न.) चिरायता, कुटकी, नागरमोथ, इन्द्रजौ, छोटी, छेटी पीपल, काली मिरच प्रत्येक तोला ४, कुडेही छाल तोला ६४, चित्रकमूल तोला ३ सत्र गाय कुडना। इन सव्रको चूर्ण करना। हेतु से चार माशा लादहसे या छाछ के साथ देना।
प्रदरनी हर कवाथ—(र. स.) छोट़, चित्रकमूलकी छाल, हरडंस्ताकारंजके बीज, नीलोका गम पुनर्नवा, काली मिरच, सारपु ख, कुडेही छाल सत्र समभागहै सेकर कूट कर रखना। मावा प्रातः और सांयकाल २ से ४ माशा पानी या शहदसे देना।
संप्रदरनी और सुरारामें छाछ
गायंके दहीके हाथसे या रैवैसे म पत्त कर छाछ या छैल बनाना। 'सेम मायु प्रधान'हो तो मैरुनेन डाल कर, कफप्रधान हो तो नमक और काली मिरच डाल कर और वस्र प्रधान हो तो 'शाकर डालकर लो जावी है।' वस्रग्रहणोंमें खास कर नमक क्षोरा और 'हिंगसे गायके घोसे'बवार देहकर खुराकके
समें देना। वातातिसार और प्रदरमय में सी छाछ हितकारक है।
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न तमसेवोऽपथ्येऽपि कदाचित् रोगो न तत्रामिहेतोर्भग्नित् ।
यथा सुराणाममृतं हिताय तथा नराणां भुवि तक्रपाहुः ॥
संग्रहण्यो अतिसार विसूचिकादिमे* स मान्य प्रयोग
प्रयोग १ शुद्ध शोर शाक खट्टा न हो ऐसा द्राक्षासव ३ तोला, च्यवनप्राश २ तोले खिलाना । पचामृत पपौटी कुटजमावलेहके साथ २ तोला रतो देना ।
प्रयोग २ अगस्तिसुत्तुराज तेला -।।, प्रहणी गजकेशारी, तेला ।।, सुवण' पपौटी तोला १ साथ मिलाकर ६४ पुढो वनाना । एक शुद्ध एक शाकमे आवश्यकतां हो तो एक रातमे पानी या दहिदसै देना ।
प्रयोग ३ अदरकका रस तेला ५, गामका घो तेला ४० में डालकर पकाना, पान्मी जल जाय जद वर्तनमें भर रखना । यह घी अतिसार वंग्रहणी
अदि रोगौका भोजन औप आदि में देना ।
प्रयोग ४ रसौत* भन्तोष, इन्द्रजी, कुडे की छाल सौठ, धाइके फूल
समभाग कूट कर २ से ४ माशा प्रातः सायं शहद से देना । ऊपर चावलको पकाकर उषका पानी नमक हलदी डालकर शुराकरै दपमें पिलाना ।
प्रयोग ५ आंकरलोह मप्म तोला १, अभ्रक मप्म, निस्यंद तैल १, प्रवाल चूर्णपुरी तो २, महाचं*कला तोला १ शहद घोटकर ६४ पुढी बनानर शुद्ध शाम एक एक पुढो लेकर उपर दूध या छाछ पिलाना ।
प्रयोग ६ स्वर्णिफेनादि वटी:-खाजेक या खजूरके वी*त्र तोला २।।, सेंठ तोला २।।, अफीम तोला १।। शहद पीस निऊके रसमे चना जैसी गोली
वनाना । १ से २ गोली दिनमें दे। से तौन दफे देना । अनिसार, स प्रहणी, वच्चे*कों दस्त और हैजेमै भी यह सच्छ्या काम करती है ।
प्रयोग ७ दडिमके बीज, माहजीरा और शाकर प्रत्येक ०। ०। तोला मिलाकर राहदमें खिलाना ।
प्रयोग ८ पाठा × अतीश, कुडेकी छाल, धाइके फूल, रसौत, सौठ, विलोगभ* समभाग कुटकर २ से ४ माशा शहदसै देना । उपर चालका पकाया
हु भा पानी खराबफं लिये देना । यर* स प्रहणी रोग के अलावा दस्तमें गिरता
खून भी वंध होना है । इस चू*र्ण का सवाय वरके भी पिलाया जाता है ।
रसौत:- गुजरातीमें रसवंती, जियका रस आंवमें स*जनत किमो जाता है ।
पाठा× गुजरातीमें कलीपाट कहते हैं ।
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कारण-भूत मन्द होने से, अन्न पाचन क्रम होनेसे, पिगड़े हुये वात पित्त कफ दोष मांस मेरी आधिक्य दूषित कर पदोंमें विविध आकृतियां मांवर्ॆम कर करते हैं । क्रोधसे, मलत्याग के साथ रेचनेसे, दिनके शयनसे, रातको जाग-रख करनेसे, उभयधातु पांवसे चेष्टनकी भावृत्ये, कुंट और घोटेकी अधिक सवारी, गुरू, लस निरन्त, मुगफलों, विंगदनेचा तेल, वेप्रोटेवल घो और मिलावें'की गीति आदि चेष्टें अधिक रानेसे बादत दृयादि कारणोंसे विगड़े हुये वात कफ के साथ चरन् देाता हुमा रक्त विगार्शा वह्न हनरनेवाली घमनीओमें चुरधर गुर्दामें आकर गुर्दाको वलोयेकी दूषित क मादके अंडर डरपन करता है । जब एक कारणोंसे जठराग्नि मन्द होकर जुराकका पाचन नह्ही होता तष यदा हमा मल प्राते वलोंमें अटनेसे वलिंमें फुल जाती है और वद्दा मांवर्ॆम कर दरार् होते हैं । शति दोषंनसे, कठिन आहार चांधे रहनेंसे, मलोत्सर्गके समय लोथिक वल करनेसे, मलमूत्रका वेग रोंकनसे बंठे रहनेंकी स्वादतॄ, शारीरिक श्रम घम करना और शु(क अधिक सवाना यहुत भारी नमकीलो तीखो जलद चीज़ें चाना आदिमें, जलद दवा चा दार् पीनेसे, पाचन किया. विगाडनेवाळ कारणोंसे, वसाविरका दर्द होना है ।
बिह-मान नायु ह्रस्वता मर्ती है ! अपान वायुकी कद्नं गति होनेसे घमन.न वदन ध्याग अपान और प्राण चादुकरे बिगाढ कर जठरामिमे बिगावताहै ताकि चवासोर का रोगी कुश और क्षतिहीन होता है । गरम चीज खानेसे नीम लाल होकर उन्में चोंटे पड़ते हैं । कफते घुमते श्वास चढता है, शरीरमें ताप रहता है । मुख और दार् पात पर फुन्सियाँ और नपुसक जैसी शियति, आंखोंमे अंधेरा, मन वितानुर, सांधेमें दर्द इत्यादि चिह मर्दम पड़ते हैं ।
सृधा चरासोर-शकुर चुपरे चिना क चके में दर्द हेाता है, श्वास-मेोंदता हेर् ऐसी मद वेदना होती है । कफ दे और लाल रगके होते हैं । शकुर पर मेख मारनेसे मालूम नह्ही होता, नायकों नीम जगा खरशट । आकृति वेर, हदके कच्चे फल और खारेके के वोज जेस होनी है । हमार हस्तकी कमजी;
- उभडक वैठन--रोग्म जाते तनहुँ जिस प्रकर बैठा जाता है इस प्रकार वैठनकी आदतकी गुजराती में 'उभडक वेठन' कहने है +
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कातको स्रजन, क्षयौ, वाय, मल सत्ता और वमी केनाळा, भीकना और पीडा के साथ आता है। रीराको घमडी-मय आंां मुस्स करना किठिन, पीडा माथ्रपेद पहुचाता है।
खून शःअस्त्री:-मलमे जय न्वासोर दमता है तथ गरम खून पदता है। खून अधिक पहुचने रीछा पी ग कुरा हरहोके जिजर जवा दीखता है, उतसाह कम होता है। जरामा किरनेये दम चदता है। ताकात क्षीण हो जाती है। दरत कठिन घैला खुल्ता चररता है। भूख पदर होती है। तीखा चिरचिरा चरा भी नवा नहीँ सक्ता। खने से जीभ आ जाती है। दस्तके साथ खून युटने या मलमे मिला हुवा पदता रहता है। अघोवायु नहीँ छरता। नितु या खडे पदाथ खाने थे मूत्न सौर पांव पर घेजन या जाती है।
पथ्यापथ्य - गरिष्ठ, अजीर्ण हरनेवाले वातुल दस्त दच करनवाली, चदरमे भायुप्रकोप करनवाला, गरम, दाहरु, त कष्ण चीजे खाना नहीँ। सागा, लस्सु, पतला, दीपन पाचन करनवाळा खुराक देना। दरत प्रतिदिन सांफ आने के लिये वहॉ हरहरा चूण देना। चूषका शुराक जयादा रना। छाछ, दहीकी मट्ठी राहट खुन ढाल कर शुराक के लिये देना अच्छा है। सुग जिमाकद योंवळी, सुमधी सफरजल, सौंफ, मात सौचडी, मेड़ू वच ज को रान महरवत ढही, म यका घो, सीर, मुंग, हरी और सूखी माल दाल, प(वळ चोला ह मेंथी, मेथीकी भाजी, देशभीज, आंि हितकारक है। लान मिरच, तैल, मेथीकी चीजे ग जररकी मीठाई आदि दानिकरक है।
घद्रकुरः अथवा महार्षद्रकषळत (या त पृ २०४) (यो. रत्न. यु. १९८ मत्रोचात प्रकरण)
गुद पार्न तांबतनम. मत्र मम्प प्रत्येक चार घर तेला, य धक तौर। पारद मथनं कजारो कर उपमे तैल और अभरक मिलाकर नागरमोथ वाळा.मुरली, मातारी प्रत्येक मे ए5 एक दिन मावना देकर इस औषधके वरावर मोचे षा तिखादि चूण समाग भामसे मिलाना।
तिक्तरिद्र चूर्ण-तिकत्ता (कुटकी), गिठेऑका सरव, पपड, वाळा, खे्ट्री पी ल, चन्न, और अत तमूर (सारिवा) सच समान लेह कर कूट कर चूर्ण बनाना। यह चूर्णे समाग मिलाकर माथिकर माकना देना और चटने
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मात्रुड़ गोली वनाना । यदु रस चूनी या दूवे वटीसीर, भस्मकृत, प्रदर, वांतर्दाह, वाफदाह, जलन, रक्तमूर्छा (क्लेदप्रसेक),
रक्तमूर्छा लत्तपित्त तापंजररक्तानलतद: ।
मूर्छाक्रुल्ल्य:?पा सर्वांधि प्रभेधार्त्तौ दुस्स्तरान् ।
उपर या नीचेका रसफलाान्त, धारी'का तपना और गरमीला ज्वर, मूलकृच्छ्र प्रमेह
सादिरोग शांत करता है।
योग रसना डरमें गुग्गुलेए रस्यान में' रामरसीतला के रसकी माथरा देना
लिखा है । और तिंतादे चूर्ण में रगद्दी छोटी पीपल के रस्यानमें माथवी
लिखा है ।
हम योगतं'गिणी के इस पाठकें श्रु मार यह औषषय वनाठे हैं।
सग्निमुद्र लेईह (र. रं)
निसोत, निंत्रक, निपु'ही मोरसमुंदी, मुडआं'ली, श्येक तें। ३२ या
व्राथ कर कपहड्ड न घर इस क्नाथमे व यविक्ष ग था १२, सेंठ, छोटी पोपल,
काली मिरच प्रत्येक तें। ३, वड़ी हरड वहेड़े (विम्लेतक) आंवला प्रत्येक तें। ५,
शिलाजित तें। ४ स'केका वनाये हुये कड्कय में डालकर पकान । और घट्ट हे
जाने से सूखा कर पावडर रखवना या चनं प्रमानकी गोली धनुज ।३से६ गोली वा
३ से ६ रत्ती पानी के साभ देना । सन ५कारके सूते या सूती स्वाथं, भं'दातमि,
पेटके दर्द', अजीर्ण, पह रोग, द्मान, २ करोंप, सिल्ली, धीकर अरुंदे दरदेमे
उत्तम फायदे करता है।
चद्र: कुटाज ( र. स )
पारद तें। १०. मधुक तें। १०, ताज्ञ मम्म अभ्रक मस्म, वच र मधम,
मो'कृ्ष मम्सम प्रत्येक तें । ५, अतिवाय, विल्वांग'' वेलश्रृंकि, वट के वीज, वटच,
चित्रक सेंधानोन, कलिहर काली मिरच, दंती मूल, निसोेध, स्त्रुवीं दूध, पक्वाया
हुआ सेदागरा, जद्नारद, प्रत्येक तें। ४ कूट कुरड छ'नदरं मिलाना और
कच्चे तोन युना गोमू'त्र डाल कर पकाना । वटे हेा जाय उर, चने प्रमान गोली
वनाना । मात्र। ३ से ४ गोली पानीमें देनेहें यथ प्रकारके ववामीर, और गुदाके
रोग मिटते है' ।
रक्द' करी केंसरतै -सु (र. स.)
पारद तें। १०, म.धु.तें। २०- कज्जल्री कर उवमे सुवा+ चिलानित
सो १०, वंग मम्म शंख भस्म, सुवर्ण' माक्षिक भस्म, लोह मस्म
फ्रत्येक तें । ४ मुक्ता पिंष्टि, प्रवाल पिंष्टि, मांणिक्य पिष्टि, वैक्रांत पिंष्टि, प्रत्येक
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तैल-प्रयोग-विधि
नं. ८-प्रवको-दिलाकर, काला हंसराज, बड़ी हरड़, रसौत, पंचामृत और काली प्रस्थं ग्रहण करके घेअ लेf भावना देकर छायामें सूखा छोड़ कर रखना। मात्रा ३ से ६ रत्ती शहद और महाश्वन के साथ। सब प्रकार के व्रणासोर, रक्तपित्त, प्रदर यदि रोगमें उत्तम गुणकारी है।
पं०कृत लोह भस्म-दूतीमार्त्त लोह तमस्। (१७६ अशोधितार्त) अच्छे लोह पर्याप्त शुद्ध या गजपुटलीक मनःशील पारदिक पत्तुर सौं पारद इनको मिलाकर टेढ़ पर खरल करना और अभ्रकमें पका कर काल हौ जाय जब त्रिफलाके काथमें बुझाना। इस प्रकार सव लोहका द्रव्य हौ जाने तक पुनः पुनः प्रतिशील भादिश टेप कर करके त्रिफलाके रसमें कुशाते रहना। सव लोहका चूर्ण हो जाय तब नीचे लिखे औषधके रस या कवाथमें मिलाकर एक थेक पाजपुट देन। शिलाजीत, अतीस, मोच, मोयरा मञ्जिष्ठ मिलाकर, चित्रक, सूरण दारुहरिद्रा और गुदुची। अच्छे भस्म हो जाने के पीछे घीमें मिलाकर लोहेकी गढ़ाई में पकाना। ३ से ६ रत्ती गायके या भैंसके दूधके साथ शहद और महाश्वनके देनेसे सव प्रकारके व्रणासोर नष्ट होते हैं। वात पित्त, कुष्ठ, विषम ज्वर, गुल्म, पांडु रोग, श्वेत, श्याल्म्य, अर्श, शूल, परिगामशूल वमेह सुप्त रकपित्त, आयुष्य, बल सेमके बढ़ाता है। इस भस्मके दुनों पर्यायें लोह भी कहते हैं। वातोपरलित नाशक हैं। सव प्रकारके व्रणासोर के लिये यह श्रेष्ठ श्रौषध है।
करंजार्क चूर्ण (र. र.)
तत्ता करञ्ज चोजकत गर्भ, नेत्रोज, इन्द्रजौ, अरहश्री (वचा) के पत्र, सैंधानोन वचा हि'डुए। शिल्क, समभाग से कुल रखिनो, मात्रा ३ से ६ रत्ती शहद के साथ देने से सव प्रकार व्याधि दूर हाते हैं।
व्रणासीर एवं सामान्य श्रौषध (घरेलु और औषध)
प्रथेष्ट नं १-जिमो कन्द (सुरण) के उपर देा रे अ गुट सफेद मिट्टी लगाकर अग्नारामें एकता पोढते उसमें थे सुरण निकालकर इरहदा कर, तिल के तेलमे' जीरासे वघार दे कर मेधाग्नि छिटक कर छाछ के साथ खिलाना।
प्रथेष्ट २-वड़ी मदारका चूर्ण भोर गुड भ या शहद हरड चूर्ण और शुर्कर मिलेसेर ३ से ४ माशा दे वक्त छाछ के साथ देना।
प्रथेष्ठ नं ३-इतीमची भाज और लोहकान्त माथे रक कर 01 तोला, पानी , दे साथ खिलाना। घे ड मासमें सव प्रकारके मग। हिटते हैं।
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प्रयोग ३. चमक़ी शृंगली कें पान देतें 9 पीस चर थाय दे पृथ कें थाय खिलाना ह्यौराक्रमें चावलकेां देखरी नमक लादें घो दौर नीराका उपार देखर पत्तके दही मथ कर उसके थाथ खिलाना। १४ दिनमें मसा मिटता है।
प्रयोग ४. राल तो। ४, खिलकाकी थाधकी इलायची ठेर। ४ पापन मेद तो। ४, साककर तो। ४। सप थाय कूट कर चार मे श्राठ मात्रा दिनमें मेद था देहके देखीके मेलफे चाथ देना।
प्रयोग ६. रसौत (रसस्तती) ठेर। ०। पानीमें मिथाइकर दहीमें मिलाकर पिलाना और मछे पर रसौत लगाना। सात दिनमें आराम होतार है। परम चोज ल्वाने न देर।
प्रयोग ७. इन्द्रजौ और मफ्फर सममागमें कूट दर आवा होग्या यही के थाथ देने मे गिरता हशा खून मरतता है।
प्रयोग ८. नागकेशर, इन्द्रजौ और मधर सम ममान ठेरर कूट कर कूप बनाना। ८ थे १। मासा पानो के थाथ एक था दे। दूध देना।
प्रयोग ९. पजाया हुंछा मेदतागा ठेर। ९।। पांस कर देखरी १३ पुढी पानाना। केंथार ०, कलका थेपोके पीर कर थीर ठिकाल कर ३ परां देखमें मेल कर चाय कर खिलाना उसके उगर पांच मार पेयो च्यनर ही थोर खिलाना। इस प्रकार १४ दिन तक सेंशगंद्धे ८ पुढ़ी दिनमें चरासीर मिटता है।
प्रयोग १०. गायके दहीका मट्ठा ठेर। १० इस्में कछूर ठेर। ८ आंघर मिर्चाद कर चक्मे पानी ठेर। २० और नागदेषर ठेर। ०। मुख पिल्याद १४ दिन तक खिलाने कत्रामार पिते।
प्रयोग ११. नेत्रकान (सौंफपरची) ठेर। ४. दाखर नर मना। इस १४ दिन तक खानेशे कवारेर मिटे।
प्रयोग १२. दंमो अथ्यमा बीजग (हिना चिन्हद्रा, निमम्र दसव मेचां) ठेर ३ से ४ कें मात्रा दूध ठेर। ३। और मधर ठेर। ०। विंचो ३ ठेर। ४। कक रसन। राढ़के रसके पोना। ९, मास कें मेहनदे चनायेर, पिते।
प्रयोग १३. भाददंगार (हंसरद) ह' रप ठेर। ०। और अकर मावा केंन्या दियाद्र। १४ दिन तक पियाना।
प्रयोग १४. अंनद-डाश के रप ठेर। २ पुरान मुत्रमें मिलाय धर विछाग। रप्त काष्ट रैनें। ७ थे १४ दिनमें मारीत पिते।
प्रयोग १५. कुचकें हाड और मकस मपलार ह' ह'। ०। पनियें देना।
प्रयोग १६. अपामार्ज कीचकलय चाय, मदार्नी, दंनतार, दंनंत्री, कुपितद्र्या, कुहने प्रोंटे बिनसल्या, मेंनान मेहत रेती सेव सममानमे मेल। मेला। परकिड़े थाय ३ सें ४ मात्रा देना।
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प्रयोग ९७. समीट यो ५ रमोत चौ. ५ हिमजी हरद चौ. ५ शकर तौ. १०कस ठाय कूट-२ से ६ पावा तक पामीसे १० दिन देना।
प्रयोग ९८ चोलाढ़की भाजीका रस (त’डुलीसक सांजकमानो भाजी)
तौ. ६ शकर मिलाकर ६ दिन विलाना ।
प्रयोग १२. वारावत (पारेमें-पक्षी विशेष) की चरख, रसेः मावा दूध के साथ १ दिन देना ॥
पदार वट लगानेके लेप मलम या खुंद देनेका प्रयोग
मलम नं. १-चमेली वच्ची गायके मक्खनमें घोट कर मरेपे पर लगाना ।
लेप नं. २-नागरमोथ तौ. २॥ घी तौ. ४. दानौ गरम कर उसमें वेदार नेआ १आ, अरण्डम तौ १॥ एतुरे के पत्ताका रस तौ. ४ सच का व्यच्छो तरद चोटना । मरत जैसी हेआ जाय डपी में भर देना । दिनमें २ दफे लगाना ।
लेप न ३-माल कागणी के बीजकेी पानौमें पहोने पोछ कर मस्ते पर लगाने॑ स्कसाव मंघ होता है ।
लेप नं. ४-तुलसी, कडवी तिरोड़ी शुंहतरका दूध, संघानोन समभाग-
लेक चौपड या पानीमें महोने पोस कर मस्ते पर लगाना ।
लेप नं. ५-करंजके चोख वकरी के मूत्रमें पीस कर मस्ते पर लगाना ।
लेप नं. ६-गदह मना मूल और आकके पान वेनें समभाग पीसकर मस्से पर लगाना ।
लेप न ७-अपामार्ग (अघेढा) का प चांगदेआ महोने पोस कर लुबदी पताना मुंह पर लंगोट बांधना और रेगी सेता रहेआ थेवा करणा ।
९ दिनमें ममा गिर जाता 'है ।
खुंद नं. ८-पुंडका दाल हपकी कोंचली, आकका मूल, खोजडा (जमोेड? वडा झाड) का पान समभाग कूट कर खुंद देने से मसे दुख जाते हैं ।
खुंड़ नं. ९-लकिया सरमेंके तेलमें मिलादर मस्सेके उंद देनेके रकस्नाव वघ होता है ।
खुद नं. १०-मेढ़के दिग तौ. ४, हाथो दानका जुरा तौ. ३. देददाली-
फुकड़वेआ तौ; ३ अजवायन तौ. ९ मघेधे मूत लोडे तौ. ३ गांलो (कमोद)
के छिलकै तौ. ३ मुव मथाय कूटकर खुद देणा :
केप नं. ९१ महो हरडके मक्खनमें घोस कर मघे प’ लगानेऽे जलन मिटता है ।
लेप नं. ९२-प्रोंकांम, सफेद वच्नाग, कुचला तीनों समभाग लेकर कूटकर, पानीमें महोने पोस पस्ते पर लगानेने सुख जाता ।
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अजीर्ण
पाचन अग्निप्रधान मंदाग्नि खुराक पाचन न होना
कारण-जेा मूत्राशय में पहुॅची तरह विषम पाचन खुराक खाते रहते हैं वे लोग अनेक रोगोंको उत्पन्न करनेवाले अजीर्ण के मेवे होते हैं। अजीर्णके रोगी स्वादके सोंर भूलकर ध्यानमें रखकर प्रमाणघर भोजन करने वालोंका द्वंद रोग नंह हो। अजीर्ण सःः अग्निमांथ प्रमाणघर भोजन करने वालोंका द्वंद रोग नंह हो। मदामि तामसिक पौड़ा नंह करता लेकिन यह दीर्घ काल तक टिकने वाला और मालूम न पड़े इस प्रकार जागीके। हानि पहुॅचानेवाला है। जब किसी रोगका हमला होना है तब सगल होता है और इसका मूल कारण मंथरि की उपेक्षा है और अजीर्णका पः जान प्र यक्ष सामने आता है। पाचन रफ्किसे अधिक खुराक लेनेंसे, हरवख्त नंह खाकर नींद करते रहनेंसे, बाजारकी मोहक चौपड़ी मिठाई आदीको आतेसे, वादी काफी आई रकंम शररखे ठंडक अधिक लेनेंसे, देर समयसे अविक वक्त खानेंसे, भोजनका समय अनियमित रखनेंसे पाचन न होंनेपर खाते रहनेंसे, बिना चबाे जलदी जन्मदःसे वढे यदे माप्र ( कोॅकिया लेनेंसे, अधिक च्यवास करनेंसे, भोजनके समय मनप्रस न रहनें, क्रोधसे कामेच्दीपन करनेवाले वाजंकर खुराके रसाद का अधिक सःयोगसें, बैठे रहनेंकी सादत-व्य वहारसें, अनियमित और अपने शारीरदे! अतुल्य न हे। ऐसा च्यार्क -सादत-व्य वहारसें, अनियमित और अपने शारीरदे! अतुल्य न हे। वैसा च्यार्क -मलमूत्रत्ता वेग कफनेंसे, हर्षा कोन ले देकर चिड़ ता आंदे दुप'गोषे, किसी दुः के कारण भुक कम लगने पर खुराक लेते रहनेंसे, दिनेर होंनेसे रातका जागरण करनेकी सादतसें, सोनेंमा नारक आंख वेमनेंसे, मोजन करकै तुन पेटल अधिक चलनेसे आादि कारनो से यह राग उत्पन हेाता है।
विंदू-किसीका दस्त यद देता है किसीहे वसता आंषक हेाता हें। किसीके दैा या तों दिनका दस्त हेाता हैं। नंह पा वन हुवा सुराक निचल काता है। नंह स्वाराम हेाता है। किसीके कठेन गुदक दस्त हेाता है तब मय कर हियाति हेजानी है। मुख मंद हेाती है, मुखमें ड़करलंद वमन की इंदछा रहना, डकार आंविॅद थानां, छातीमें दाह, पेटमें दर्द शूल सगान व'युदर्गोंकाला, आमाशय वंधन चबराहट महसकरमें दद चकर आना, शरीर तपना काम काजमें किसोसे वात निले करनेंमें निहायत ग्लानि वैचैनी निंश्र कम आदी चिन्ह. भग्रीण वालोंका माजम हेाते हैं। मद रैाग कीहं कातिक हेनेंसे रैोगी डुमल शर्र कमजोर हेाता
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है। शरीरका तौल कम होता जाता है। शरीर पोलेपन पांहु जिधा मयं दीसता है और यह रोग दीर्घकाल रहनेसे अश्विार या संप्रहणी का रूप लेता है।
सामजीर्णे—इस रोगमें शरीर भारी भार रुप लगता है। उरःकै लद (उवका) आना गाल और नेत्रपर सुजन, खाये हुए खुराकके गदका ढकार भाना आदि मालूम होते हैं। चित्रघ्याज्ञीपमें अरु तृषा शोध मूर्च्छा प्रताका उपद्रव, घुणा के साथका सद्दर षकार पसीना दाह आदि होते है।
विश्रघ्याज्ञीपमें शूल पेटमें पोड़ा वाघ्यान साफरा चढना। पेट फूलना, वायुका उपद्रत मल अघोगायु रुक जाना, शरीर पक्व धातु, मन मे घबराहट सांधोमें गरीड के भिन्न भिन्न अवयवों में दर्द आदि होते है।
दर्दरोपाज्ञीपमें खुराकपर अभान अजीर्ण अरुचि छाती मे मार वैनेनी रगनि, किसी कामपर अरुचि आदि मालूम होते है।
पथ्यापथ्य—साधा रूघु जन्न्दों पाचन हो वैसा शुद्र (खाना । जितना पाचन हो उतना जितना करना नहि । सीनेमा आदि देखने का व्यसन रखना नहि। हरीरा चूखा हुआ अधिक प्रमा णमें शोर वाजारकी मीठाई चोचडो जैसी चीजें खाना नहि । अजीर्ण अधिक प्रमा णमें शोर वाजारकी मीठाई चोचडो जैसी चीजें खाना नहि । अजीर्ण
मालूम पडनेसे तुराकतद कर देना । उपवास के समय पेटमें कुछ भी नहि डालना । एक समय मे शरीरका आराम देने के लिये एक दिनका रखा होगया वैैसे एक समय मे पेटको मो आराम देनेके लिये उपवास करना चादिये पेटके
आराम मिलेनेसे शरीरके प्रत्येक अवयवत्रेपी मी आराम मिलता है। भोजन के समय बीच चौथमें एक दो घोंट पाना पीते रहना । अजीर्ण म हुइ दो एक दो या अर्धक उपवाथ करना । उपवाथ करनेके पीछे भूख लगे जव टपवाथ छोड देना और पंघे साधा रूघु खुराक लेना ।
प्रति सप्ताह उपवास करनेकी इच्छा हो उन्होंने किसी तिथि या वार नियमित करना । प्रति सप्ताह उपवास न कर सके उन्होंने प्रतिपक्ष पन्द्रह दिनमें एक दिन उपवास करने के लिये अष्टमी या एकादशी जैसी तिथि का यगर तारीक अदकुल हो उन्ंहोने प्रत्येक अग्नेजी न शक्ती
१. दो घेर स्वासीरकी तारीक दे उपव्राथ करनेका नियम रखना । यदि उपवाथ के दिन भूख अर्धचक लगे तो। कूछ या कुल्ह फळ देना । भूल न ठरगोता पानीके हिवा उपत्राथ मे कुछ भी न लेना । बीजीकाल के अजीर्ण मंदाभि वाळोंने उपवास
दिन दोपान पाचन औषध छोडछे साथ लेना । हमेशा टो दफे दफत जानेकी आदत रखना । चाह काफो कें क स्वादिका छपधन हो सीरे घीरे छोड देना । दिनमें दो दफत और शारीरतक परिधामद्धा व्यवसाय करने वाळोंने प्रातःकाल दूध गुन
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मामसिक खाद्य लोकोषका चंठे चांठे दिमागी करनेवाले ने दो रफे 'मोजन करमा' आजकल प्रातः कालमे चाहं या दुस्म काफी ब्रेड रोटी पुदी बिस्कीट आर्दि का यपसन घंघु हे गवा है, जिसकी कोई आवश्यक्ता नहि हे। क्योकि १० वा ११ बजे पर नेा उन्हों मोजन करना हे। नेा इसके पहिले देा तीन घंटा पर पेटमे कोई चीज हालनेकी आावश्यक्ता नहि। १० बजे मोजन करनेवालेने चाहा काफी दूष मी पेटसे कयो हे हालना? ।
रजाके दिन रूप युपथे हैं शौर खुस स्यातें पीतें हैं और पेटकाे विरांति वेनें के अलास्या अधिक मार खातें है यत् आरोग्य के लिये वाघक है। चाव कर छोटे मास ठेकर मोजन करना। मोजन के वीच वीचमे पानी एक दे। छोटे वीते रहना छांछ दूष मोजन के सांथ लेना हो वेा सारा कटारा मोजन के पंछे नहि पी जाणा ठेकिन वीचमें छोटे घोंट पीतें रहना। रात्री के मोजन में छांछ दहीं नहि लेना, दूध हो टेना और देा पहर के मोजन मे छांछ दहीं लेना। यंदि दहीं देना हो नेा उसका मठा वनाकर वनि हो नेा जाकर 'गुड या शहद' सोनेमें मेंसे कोई शालना और घोश्रा घी हालना सह मिलाकर दिनके मोजन में वीच वीचमें छोटे छोटे लेते रहना। न रायौ कृषि भुंजोत न च पयस्तुतशाकं'। मोजन के समय मन आनंरमे रखना। मोजन खाते समय कोध नहि करना। शक्कर तिरस्कार करते नहि जिनमना। ठंडे या वर्षा मदतु में आवश्य्क कपडे पहिन ना। प्रोस्म ऋतुमें खुले बदन या वारीक कपडा पांहिने रखना। पानी ठंडा पोने के लिये वक 'डालनेकी देर्दी आवश्यक्ता नहि हैं। हां मजदू्री शारीरिक परिश्रम करने वाळे जिनकेा ८ बजे पर लाामे चढना है उनकाे ७ बजेपर कुछ नास्ता करनेकी जररत अवस्य है। ऐेसे लेाग चाहा गांठीशा वाहा ब्रेड चोादा भजिया आादि साधकता से खावें हैं, उनके लिेे यहही रेतो वा जवार बाजरी का रोटला के साथ पुढ दूध छांछ खा कर कामपर जांयें। और पीकेे सुपहरेकेा और मामका मोजन करे। दुपहर के पंछे २ या ३ बजेपर चाहे काफी पोनेको स्वादत मत लेोसेाका और रही है वसतुनः यह शुराक नहि है पेटमें जाकर शुराकका काम नहि कदता वसुतः यह मनका खेल है। यत् विश्रांति के समयं कुछ पीना हि चादिये पेषो इच्छा रदती हेोतेों गुडका या शहदका पानी पो लेना अच्छा है। चाहा आादि न पोनेसे सामकेा अच्िछो मुख लागती है और मुखमें किन्ही कुसा मोजन शारीर का पुष्टि देेेकर आरोग्य रसता है। रजाका दिन शारीके विथ्रोपि हेमां है। ठेकीन तच दिन पेटकाे विरांति नहि मिलती वसुतिके रजामे दिन खुला था पी कर पेटका परेपान किया जाता है। शारीम (बक) की
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एकोन केहरी पटकोवा या मोदकमें पानी अच्छा ठंडा रहता है वट मोना । बहुत गरमो पडती हो वैसे प्रदेसमें ताग निम्चू ९ निचोड कर उसमें थोडी शाकर हालकर एक रसाथ पीना । भोजन के पाछे पान सुपारी खोंग इलायची बडी सौंफ आदि मुख शुद्धि के लिये खाना । मुखवासके पेठे दातीन घोंट पानी पीना । खराव दूध सामे'त चहा का ही पान सुपारो आादि कई भी नीच खाने के पीछे देती तीन घोट पानी पनेक नियम अवश्य रसना ताकित वसे पदार्थ के दस्म अंबा दांत मुखमें न रहे और अन्न नलि शुद्ध रदने से भन्न नलीमें वेठे पदाथ चिपकें रहने से अनेक रोग हेंने का सम्भ रहता है वक्त जाव भोजन मे अदरकस हरि इलायची काली मिर्च दिa योग निम्चूका टुकड, आदि खाने का नियम रसना ।
मद्निल डो मेष्ट्री ( शार्ङ्ग म. उ. ३८—२३३)
शुद पारद शुद्र गन क्क शुद तव्वनाग अत्रेमेद वडीहरड ग्रहिद्रा आपला सन्जोयार यवकसार । चित्रक गैन्पानोनात फोरा सौवचंल ( सचल ) वायविडग नमक सोंठ छोटी पीपल काल मिर्च मधु सव्वान माग लेठर सवका जितना तौल हो रतना शुद कुचला मिल'श निम्चू रससे गोली चना प्रमाण वनाना ।- मर्दामि मृक कम लगाना भजोण' शुराक पाचन न होना पेटकी वायु शूल आाघमान आदिमे २ शे ४ गोली दिन भा'मे पानीषे देना । पहरेग जान नहि हैं ।
नोट—मैषज्य रसावली मे शार्ङ्गधर का हि पाठ दिया है परंच न्यूषग 'हे स्थानमे अर्थात सेठ पोपल मरीच के स्थान मे मैषज्य रसावली कारने ट कन-मोदागा कर दिया हैं । मैषज्य रस|वली स ग्रंथ घन्या होनेसे उसमे जिस मूल ग्रन्थका पाठ दिया हे वह देना चहिये था । एषर परिवर्तन करना ठीक नहि ।
अमृतवा कपटक—(म व शटराधिकार) सौवागा छोटी पीपल मिलीय शुद दिगल प्रत्येक एक सेर काली मिर्च २ सेर निम्चू रससे गोली चने प्रमाण वताना । ३ शे ६ गोली पानीषे अजोण' 'रक मिटता है जठराग्नि प्रदीप्त होता है ।
कफनाद रस दृढिन—(र स) पारद देत. ३६, गंधक तैल ३२ कज्जली कर उसमे ताम्र नस्य तेला ४ शोर लेह भस्मे तेल्ना अ मिलाय वपं टेकी . कियसे एरंड के पत्ते पर ढालना पीछे उसे पीस कर लेहेकी पहाडीं से रख कर उसमें पक| ९ शेर नीचूका रस जलाना रस चालते जाना हिलाते रहना सम रस जल जाय नम रदही नहा रहने पे उत्तर लेन। पीछे उसमै सेठ छोटी पोपल पिप्पलमूल चित्रक अप्पल्केत प्रत्येक मूत्र्य आठ आठ तोला मिलाना और पकाया हुमा सेन्द्रा| ११ तोला म्रजोखार ६ तोला और काली मिर्च १२०
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चने मिलाय चनों कां खाने। प्रभांदी दोंता है "चवन्नी माखन। मिले न मिले तो सुरफेकी भावना देना। शुखाकर गोली चने प्रभांस पनानक ३ से ६ गोली दिन भरमे देनेंसे अजीर्ण मंादरमि पेटका वायु शूल गुरंम चवांदीर
पित्तो बकून उदर रोग आदि मिटते हैं।
नोट. इस क्न्याद रसका पाठ रसरत्न समुच्चय का है इसमें पंचकोल
अमलवेतके वच्न, य को ५० भावना देनेंका और सबके वरावर टंकण और टंकणसै
वाथा टंकण लवण और स्वकै वरावर काली मिरच डाल खाने के प्रताही द्वार
भावना देना लिखा है।
भाव प्रकाषा मे पंचकोल और चूणा (शुरका) को ऐसै भावना देनेंका और
सबको समान टंकण और उतनना हिड़ काली मिरच और काली मिरचे बाधा
बिडलकरण छालकर चने खाने क्षार की ७ भावना देना लिखा है रसरत्न समुच्चय
हमारा ५० सालका अनुभव पाठ यहाॅ उपर दिया हथा है।
ग्रहणटी वृत्त ( र. रत्न. अजीर्ण ) इमलीका क्षार तो ४, पंचलवण का
प्रसेक लंञ चार चाट तोला, घींह भस्म माठ ( तोला, पिपरीमूल चिर्णक पारद
गंवक छोटी पीपल यवक्षार सज्जोखार काली मिप्प सोंठ शुद्ध वछनाग अजमोद
मिळाय हिग प्रत्येक एक एक तोला मिलाय निम्बू रसकी ३ भावना देकर
गोली ३ से ४ रत्तो बनाना । दिनभरमे २ से ४ गोली पानौसै देनैसे सभ प्रकारका
मत्रीण मिटता है । भूक लगता है पेट के सवरोग गुल्म प्लीहा वक्त उदर
रोग बवासीर वादिमे उत्तम गुण करती है।
नोट—मैषग्य रतनावली, भाव प्रकाश वादिमे शक्तवटी का पाठ मिल
सित्र है। यहा रस सं हिता का अनुभव सिद्ध पाठ दिया है।
हिगाष्टक चूर्ण (मात्र ) सोंठ पीपल मिरच अजमोद सेधानोन' जीरा
ताहा जीरा और हिग सव सम भाग छेकर कूड़ रवनां २ से ३ माशा पानीसै
देनैसै पेटके सव रोग मिटते है।
व्यत्रिमुक्त चूर्ण (मात्र) सज्जोखार यवक्षार चिर्णक पाठा करंज वीज पंच
कषण इलायची तमाखपत्र मारंगी धायविडग हिगा पुष्ट्रमूल कचूरा दादहल्दी
निदोष मागरमोय वच इन्द्रायो कोकम जोरा आंवला हरड कळौ जीरा अमलवेत
इमली के फल का रसंज अजमोद देवदारू छोटी होमाषी हरड अतीस -त्रिक सु
हुपा अमलतासका गरं तिल मुक्तक सहेजना कोकिलाक्ष और शाक इन पसीका
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मार और गौमूत्र में पकाया मूलीर सब समान भाग लेकर कूट कर निचोड़ा निचोड़ रसमें ३ दिन तक चोँटने रहना फिर मरचाँ और अदरकके रखकी भावना देना । मात्रा ५ से ७ माशा पानोसे दैना । अजीर्ण गुल्म प्लीहा ववाधीर उदररोम अंत्रवृद्धि सारण एपे डिक्स पेटकी ग्रंथो आदि में वत्तृर गुणकारी है । जठराग्निको प्रदीप करता है ।
लघण भास्कर (मात्र अजीर्णं) नमक ४ तोला, सौंठवचंल ० तोला, ²विडनोन सेन्धानोनम्, घनिया छोटीपोपल पिपरीमूल, तमालपत्र, कंलौजी भीरा, तालोषपत्र, नागकेसर चवक, अमलतैत प्रत्येक दे। दो तोला, लोंग मौरच, जोरा, सोंठ प्रत्येक एक एक तोला, दाड़ेमचीश सुस्सा ७ तोला (दरा दहीम बोज हैँ तो ४ तोला लेनो ) दालचोनी और इलायची प्रत्येक आधा आधा तोला जव साथ कूट कर रखना यह लघण भास्कर माच तोला लें आठ या सुरके के साथ लेनेसे वायु कफसे उत्पन गुल्म प्लीहा उदरोग मस्सा-ववाधीर मला्वरोग-रक्तजो भगदर शूल सृजन स्वस खाँसो श्वास पचना इत्यादिको रोग पहराँ पाढ़े वीर्य सारो में दार्घिका मिटाती है करता है ।
रूधिरशोधकर सूर्ण (मात्र. अजीर्णं) इलायची ९ तोला, दालचोनी- ३ तोला, नागकेसर ३ तोला, काली मिरच ७ तोला, छोटी पीपल ५ तोला, सोंठ ६ तोला और सवके मराशर साफर कूट कर माश्रा ५ से ७ माशा पानीसे सव प्रकारके अजीर्ण में गुणकारी है ।
-अजीर्णोफट्कर (रर.घृत अजीर्णं) पारद १ तोला, गंधक १ तोला, वच्ननाग १ तोला, काली मिरच ३ तोला मिलाय छोटी कटेरीके फलके रखको २१ भावना देना पीछे मटरके समान गोली वांचना ११॥ मेढ़ गोलोको-पीसै या चाथ कर उपर घतिलपत्तोंका मूल एक तोले॥ पानीमें पीस उसको साथ मिलाना दिनमें २ या ३ दफे देनेसे कोढेरा विसूचिका रोग मिटता हैै वच प्रकारके अजीर्ण में दो जाती है ।
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अग्निमांद्य-मंदाग्नि
रसशेषवाजीर्णे भुक्त न लायते
मतिमताय जलस्थं पानत्रियप्रमर्दितसेाजनैः मनु मानवी
महामूल्यनगरोग्राच्चिद्राडनियमाच्चया न जागरणात्
न हि पर्वणि शुक्रमक्षं, पञ्चादुपर्वणि हार्तोऽपि रोगी च
मूलं विविधगदानां तत्राद्रव्यैर्हि जाठरैर्विधि
बहु ज्यादा पानी पीनेसे, नियम बिना अनियमित रीतिसे जिनमेर्द्धि
आदतेमे, दत्त और पित्तावके वेग रोकनेसे, निद्र निचमित न लेनेसे, प्रागरण करनेसे
ऐसे कारणोसे आया खराब न व पचनेसे वेह अजीर्ण होता है जि स अजीर्ण से अनेक
रोग उत्पन्न होते है कठराग्र प्रदंत रहे इस प्रकारका आहार विशेष निंगेरे रखना
स्वरूप-भुक्त द्रव लगना इसमे रसशेष यथोक्तं भी वहा है
पाचक इद्रिय को किया मे वाचा पहुंचने पर सन्नदा पाचन हेना नहिदिये वेसा हेाताहे
निद्रा रुधा अन्न पाचन द्वारैर पोषक पदाथों द्वारेर को वृद्धि
भौर पेषण हेाता है और रुणता मिलती है इस किठोर पाचन क्रिया उहा
माता है । अन्न नली (मलाशय मार्ग) पकाशय छेटे आन्न और बडे आन्न
दसप्रहार रे. कुट ल नल्चो नली सुक्मे ग्रह हेाकर मुदा तक पहुचते है रस
पचनेव्रद्रिय मी कही जाती है । व्रया हुवा चुराकका पाचन हेाकर रस रफ म्लान
आदिसे परिणाम पाकर वातरमे फलाकर रधिरका व्यापार व्यवस्थित चलता है ।
निसययोगो भाग बहार निळल जाता है । अन्न पाचन होना उसक अर्ष यह
है कि उसका रषण हेाकर रक्त वनना है । अन्न चावने मे आता है, द्वेविं
चर्वण किया हेाती है जयव नालितंत्रिक चेष्टार्या, असंख्यय स्रातंत हार्ति अन्न
स्वाद मिलकर पेटमे जाता है । वह जटर रसप मिथ कर वहे थे यकृत घेरल
द्वारा पक्त मे जाता है । चहा त्रिदेप क्रिया हेाकर रस वन कर रक्ताजन
हानि मे वाकर वहा मे सारे अनीर मे फेलता है । अपण करता है । इस प्रकार माघ हृप
अन्नकी वपवस्या हेाती है । किसी कारणमे इसमे दितं भाता है तथ अन्निमांद
अभोगं आह्ने मेग हेाकर अन्यान्यरोग वपन्न हेनेवा मंमक रहता है ।
कारण-चाय क्राकी केाके मोहे योगावेट आदिदा सामन, अतिनिपूर्द
फे रहनेंद्री आाहार नोशरे या अचोग मे पच रदंसने माद्यपिक चरायंप न
शिलते पर मो गिले चयवहार हेते श्वप, चौरोरोध्रोहा) पोग्रया पाति
भाना रसोधे करना, आंतों ओर स्नायुबोंफा व वियन 'इते वानो घरेव
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कामदपी कफकरत न करना, जौनेमा नाटक देखने के लिये जानम करना, नियमित दिशा म लैना, चाहे कफी अधिक पौधे रहना, खड़े डकार का प्रमाण बैठे मे अधिक दालते रहना, हरवक्त खाते रहना, दाहु मांस अधिक ठेना, उपवास दर आतेका एक सप्ताह या पक्षमे एक वक्त माराम न देना इत्यादि कारणोसे जठराग्नि मं द होता है।
विध्—खड़े डकार आते हैं। पेटमे वायु भरतता है, दस्त होता है, या कब्जो होतो है। खुराक पर रुचि कम होती है। सिरमे दर्द, जीमपर मलका जमाव, मुखमे चिकनाद', तालु परथना कमी वमन हौ उभई उपका आवे, कमी मुखमे चोदा पदै वाखेमे हाय पावके तहू ओमे जलन हो, छाती मे घडकन घभराहट स्वमाल उपर तमोगुणी हो, कृषि काममे मनका उत्साह न रहै इत्यादि चिन्ह देखाने मे अति है।
रघघावधघ—खुद चबाव कर खाना। दांत निकालकर चोगठा चना हो उस लोंगोने खानेके समय उसे चबाना पोछे उसे साफ कर दांतोमें अन्न कण खुश गये हो निकाल घेउ कर डिबीमे रखना। दिनरात चढाये रसनेसे दांतके पेढे दंतवेष्ट कमजोर हेजाते है ह दे। हि वक्त भोजन करना। ७० सालकी आयुके पीछे एक दरता दिन मोजन धरना। शाकमका दूध या फल ठेना ठोक है। फिर भी शाकमका भूख लगे ठो शाखा मिताहार करना। दूधसे खोचडो मिला कर खाना। प्रातःकाल काढा काफी सादि पीनेकी कोइं जररत नहि है। जिनका १-या ११ बजेके भीतर मोजन करना है उन्हे चाह काढी ब्रेड रोटी पुठो। गठीया आदि नास्ता दराने की सैद आवश्यक्ता नहि है। शारीरिक परिश्रम करने वाळे मजदूर वग' मझेनतकश मजुर्योको , ग्रामपर जाने के पहिले कुछ खाना चाहिये कयोंकि नमकेऊ वारा वजे तक शारीरिक परिश्रम करनाही हैं। इन लोंगोने प्रातःकाल रोटी रूख, रोटी गुड, रोटी दही, रोटी छाछ आदि अल्प खुराक नास्ताके रुपमे फरना चाहिये। नाटक सोनेमा अधिक देखनेके पेट सिगडतता है और उसके विगहनेसे अनेक रोग दे नेम बनते चका मौका आता है। इसलिये श्राद्धार विधार नित्य आदिमे नियमित रहैने से शरीर अच्छा रहता है। और जठरागिन मंद नहि होती।
मजप्रदीपन गोळी (र सं)
पारद मघड छोटी पोपल् सेंठ हलदी कचूरा जटामांसी हरड आंवला सेंधानोन प्रमेयक एक एक, वोला और काली मिरच २ तोलो पंसम वर नौश ३ रत्ती से ५ दिन तक घोट कर मटर, जैसी गोली बनाना। २ से ४ गोली दिन
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अरमे सानेये कटरागिन प्रदीप्त होता है । भूत लगती है । दृष्टि याम॑ माता ' मयोल' मिटता है ।
स्वादिष्ट रसरन (३ सं.)
अश्वक अरम ३ तोला, वग मस॑म महेत 3 तोला, माक्षिरु भस्म रक॑ र॒ वात्ता, दालचीनी, काली मिर्च रमीरसत्तकी प्रथेत॑ नात॑ प्रान तोला अरुलकरा ५ तोला, लोंग १० तोला, नागकल ४ तोला, भाँग २ तोला, सोठ ९ तोला, वादामगिरी ४० तोला, केशर ३ तोला, इत्रायची पाने ७ तोल॑ सब कूट कर शहदमें मिलाय अवल॑ह जेठा वना कर एक मास तक चं न॑ड मिटे॑ वत्त॑नमे रख छोड़ना! प्रति ससाह दिनाना। एक मासके पंछे ४ से ८ मामा तक प्रतिदिन खान॑से कटरागिन प्रदीप्त हेद्दी है, भूत लगती है, शाक्ति सनात॑ है, दिमाग दृढय फ्रेफडा माते मबवान होते है ।
रसेान वटीं (लसणवटी) (३. म )
रहसानवकी तेला हिलका निफलावनी तोला ४०, हं'गा सेंठ पीपल काली मिरच अजमायन सेघनेल जीरा कटे'लाज'जीरा दार्ड'व्वीज त्येक चार चार तोल॑ और डेठान २ तोला लेकर, पहिले लसूतमें टो'वान डाल पहिन पीहू पीछे सब मिलाय निंचू रसमे गोली ४ रतीकी बनावै । पुढे र्मको २ से ३ गोली लेन॑से कटरागिन प्रदीप्त है'ता है, खुराफ पाचन हें'र है, दरत आत॑ है, गेव मिटता हैं । पेटमें वायु नहि ग्हता ! अजीर बत्ताथी शौपघ देना । मेष्टनके पहिले नमक अदरक खाना। अत॑ंघ ६ त॑ ८ रत्तो छोटी पोपल ६ से ८ रत्तो मिलाकर पानीये जुगह टेना । हिंगाअक चू अथवा लवण भास्कर २ से ४ माथा पानीस॑ टेना । श्वासप्रासके साथ छोटी पोपलका चूण॑ ६ से८ रत्तो टेना ।
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विसूचिका कोलेरा हैजा महामारी
अतिसारस्तथाऽऽर्द्रिः: पोपाश्चोद्रेशनं भ्रमः ।
वैवर्ण्यं द्वदये पोक्ता दाहः शूलं शिरोऽनुषज् ।
अतिस्न्न मूर्छोद्भव क्ष कंपी मूर्च्छा ऽनिद्रता न च ।
विसूच्या। तत्रैव दिनर्त्तानि सृज्युरूपे: सदैवसदृशं ॥ १८॥ रस संहिता
कारण--यह रोग मेजवाले प्रदेशमे प्रौढ ऋतुमे या वर्षामे वत्पन्न होकर फैलता है । किसी भी प्रदेशमे या ग्राम शादरमे किसी भी कारण उपसिथत न हेने पर भी वह विसगठनसे मरक की तरह फैल जाता है ।
कमी आहार हजम न हानेसे, रेलवेकी सफरमे कच्चे ठंडे वासो खडे हुए पदार्थ खानसे भी यह रोग हो जाता है । लस्सी सफरकी परेशानीसे, खराब गंदा दुग्ध पीनेसे भी यह रोग होजाता है । इनके विसगठनसे फट निकला हुआ यह रोग सासर्गिक--चेपी है । जोर भी पेटके समालने वाला आदमी रेगी के सदृशाशमे रहता हुआ भी यच्च जाता है ।
लक्षण--यह रोग कमो शंघकारी हेाता है कमी फसा हुआ रेगी, रोग लधा चलनेसे वच जाता है । शंघकारी मे फंसा हुआ रेगी, जल्दी मृत्यु-वशा हेाता है । इस रेगमे कइोेकी दस्त ज्यादा और वमन कमो हेाता है, कइोेकी वमन ज्यादा और दस्त कमी हेाता है । कइोेकी सधं उलजार भी रहता है ।
हैं। कइोेकी केवल दस्त हि हेाते है उलटी वमन मिलकुल नहि हेाता । और दस्तके साथ पीडाको 'पिन्डलीयामे' गुठली चढनी है । धोांकिकी वमन जेरसे होकर प्रथ्रम अन्र पोछे किनका पानी और पोछे खुन निकलत है । जिस को उलटी छम हेाती है उसे केलेराके विपरी ज्यादा भ'र हेाती है और रोग भय कर रुप पकडता है, कस्त उलटी के घध पेटमे कळेश्रामे नाभो मे पहुचे दर्द हेाता है । दर उलटी और दद' बढने के साथ शारीर की गरमी उष्णता कम हेती चलती है, सर्गीसे शारीर ठंडा लमता है । शारीकके म.मो कमी हेनसे तृषा बढती है, पीने ह'थ और पांवमे गुठली चढनी है । पहिने पांवकी पि डलोयामे पोरे हाथ मे और पंछे सरे बदन मे गुठली चढनी है जब सनायु सस्त गाढे मेठे ठंडे दिसाने हैं । आखे रदरी उतरती है! शिरुल फिळा चिंताद्रर, म्ल'ना चिकना, चकर, न'डीकी गति क्षोण, पानो'क तृष ज्रार्त, पिलासवं6,
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वरदी त्वचा काढे रँगकी, गाल वंठ गये, होठ काला सूखा, दांत खुले दीखे दांतपर छारी जमे, दद" रसहतां वाय जब नाडी क्षोण होती हुइ' निढ़य होनी है। वारीकी गरमी १५ से ८५ तक घट जाती है अंतमे मूर्छा बेहोशी बढ कर मृत्यु हो जाता है।
रोगी बचने के हो तो ओषधद्वारा अच्छे परिणाम होते लखाता है। दस्त और वमनशा समय लंबा होंने लनता है। वरीमें १०१-१०२ तक बुखार चढता है दस्त वद होने के पोछे एकच पीलेरंग का दस्त होता है, पिशाव आने लगता है, तृषा कम होती हैं।
देालेएसे वचननेकै नियम:-मरज चलता हो तब हमेंहा भूखे पेट नीमके ये डे पत्ते घाम कर खाना भथवा पीस कर प नी मिलाय पी जानो। खुराक कम लेना मुख रहने मनो। वन सके ते २४ घटा मे एक दफे मोजन करना, दामकेा सूर्यास्त के पहिले खा लेना। देनो दस्त गरमं खुराक लेना। सुवहहा दामकेा और शामका सुवहहरे नंदि खाना। हरा साग कम खानी। पानी उबाल कर ठंडा कर नामे के दत नमे रख कर पोना: दूध गर्म कर पोना। खुराक सादा हलचा जलदी पाचन हो एषा लेना। मिष्टान वाजारकी मीठाई फरसान नहि खाना! घरमे पकाया दूधा खुराक 'द लेना। उपवास नहि करना। दूध हर वक्ता राम दिया हुवा हि वच्चोको पिलाना। मूठ या सुखा मेवा कम खाना, जुलाव या दस्त लाने की दवा ठेना नहि। दस्तकी कछ्जी रहती हो तो आरोग्य वर्धनी नं २ से ४ गोली या योहडा हरडका चूर्ण गुह के साथ ठेना। मकानकी आहुजाजु और मकान के अंदर सफाई रखना। खुली हवा और पकाशवाले मकान मे रहना। इस रोगकी हवा चलती हो जब तक नहाने लिळा न जाय मुखे शाम पोना अच्छा हैं।
लवंघ्यादी पेय-सेंठ छेटीचपल काली मिर्च दारचिनी छोमा प्रत्येक एक एक चमचा सय कूट कर रखना आघा तोला चूर्ण डे तुलसी के पत्ते २ तोला और हरी चाय न तेाला और शकर यथारपचि, पानी ६ चप डाल और १० मिनिट के पीछे कपडछान कर वैसे हि वर के छोटे वडे सवनें पीनो। यदिं इच्छा हो, हसमें दूध गरम किया हुवा डालकर चाय या दूध की तरह पोनो। हरी चाय न मिले और चाय काफी का न्यसन हो तो वढ डालकर चाय वनाकर पीना।
पथ्यापथ्य—रोगीको खुली सुखी हवा। प्रकाश वाळे कमरे मे रखना। पानी उवाल तांबेके वर्तन मे ठंडा कर पिलाना। कपडे बिछाना दिन मे २-३
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दसरा व्रतनगा। मन्त्रसिद्ध दूर्वा खण्डे मे डालना उक्त रात्रि ढात देन। पञ्च द्वारमें गुठली लगे दहां चपी करन द्वावना, तेल मालीश करन। अच्छा तोत्र मघ पिलाना, मघ शरीर पर मलना। महानारायण तेल मे थोड़ा नीलगिरी तेल मिलाय मालोष करन। कन्तूरी रती २ कपूर रती २ लमङ्का रस तो।। असररकां रस तैल।। मघ या त्राही ५ तैलामें मिलाय पिलाना। पेट पेड और दूसर जिष भाग मे दर्द होता हो वहाँ नीलगिरी तेल लपेट या प्याज पलांडु का रस या त्राही मर्दन करन। सोंठ का चूर्ण शरीर पर घिसना।
विषूची कालान्तक रस (र.स.) रससिन्दूर तो ८, पारद तो ४, गंधक तो ४, अत्रक मसम तो ६, सोंठ सोहागा चरक चित्रकमूलकी छाल, निर्गुण्डीके वीज कनक वोज पिपलीमूल सज्जोखार संचल जत्राखार अपामार्ग क्षार कालो मिर्च अजमोद, हिंग शु ख भस्म शुद्ध वछनाग नागरमोथ जांयफल लेंग प्रत्येक दे। दो तैल, घेला और अप्पी- ९ तैल। सव घाथ पीस अदरकका रस निम्बूका रस और तांबूल (विना कत्था चूना लगाये) का रस प्रत्येक की एक एक भावना देकर ३ तीन रती की गोली बनाना। अथवा आधा घोटासे ३ मे ३ गोली नालि यरकै पानी से देन। दस्त वमन कम होता जाय वैसे गोलेो देनेंका समय बढाना। यह विसूचिका केाळेरा सुरक्ष प्रहणो वमन गुल्म प्लीहा यकृत वादि में अच्छा गुण करता है।
विषूची द्वारो वटो—( र सं.) सुनाहुआ घनिया की द'ल जो सुग्वावास रुपमे भोजन के पीडे खायो जाती है, तैल ४, जायपत्री तो ३, जीरा तो ३ अतोष इन्द्रजौ २अजवायन, ३कुञेराक्षवीजको मींग लेंग प्रत्येक तैल। एक एक, विडनोन सोंठ विलव फलका गर्म काली मिरच छोटी। पोपल पिपलीमूल राल इॆलायची हरड प्रत्येक तोल।। आंघा मव कूट कर निवू रसमे २ रती कि गोली बनाना। प्रति पाव पाव घटा के पीडे एक गोली प्याजके रससे या मयसे देनेये विसूची केाळेरा अतिसार सुरडा यप्रहणी मिटते है।
विषूची विजय रस—(र. र स. अ. १६) पारद शुद्ध सोहागा पकाया हुवा समभाग लेकर जायफलको भावना देन। १ रतीम ४ से ६ मासा शकर का चूण मिलाकर गायके दहींपे मट्ठे के साध देन।
१ जायपत्री गुजरातीमे जावंशी कही जाती हैं। २ गुजरातीमे भटन्र्रायन अजमा नो मसालामे खाया जाता है। ३ कुबेराक्ष-लता करजके वीज केपका कर छिलका निकाल गिरि देन। गुजरातीमे कांकतरा कांकचिया कह्ते हैं।
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कालेरेामे सामान्य उपचार
विसूचो हरांजन (झा त. लघु त. १४) भोजेराकी जड सोंठ पीपल काली मिरच, हरंज बीज सवके छांछमे पीस सेठो वनाना छांछ-तक्रमे घीस अंजन करना ।
अंजन-रुपमग ओंगाके पत्ते काली मिरच देकर समभाग लेकर चोंदेके मुखकी (लाला मुखके फेन) मे पीस सेठो वनाना पानीमे घीस अंजन करने से केलेरा मिटती हे ।
विसूचिकाहर मदन--दालचीनी तमालपत्र एरंडमूल सदजानाका मूल या पत्तो कुष्ट वज जातादरी सह समन माग टेकर छांछ मे पोव शरीर पर मदन करनेसे विसूचिका मिटती है ।
विसूचिका हर तेल--उपर लिखा दालचीनी आदि छह चीले पांच पांव तोला छांछमे पीस उसमे २ शेर छांछ और पकका ४ सेर तिलका तेल डालकर पकाना । छांछका जलांश जल जाय घटक द्रव्यों पक जाय जब उतार कर स्वांगशोत होने देना । हुसरे दिन कपडछान कर तेल देना। इसका सारे बदनमे मदन करनेसे विसूचिका मिटती है ।
अदरकका रस तोला २० प्याजका रस तोला २० अफ़ीम तो ०१ का कशुया (प्रचाही) कर सध साथ मिलाय एक एक चम्मच प्रति आवा घटां पर पिलावे । दम्त वमन कम हौ जत समय बढावे भफीमके अभावमें अफोमका अर्क (टिंक्चर ओपियम) के २ से ४ गुंद रेगाका रुप देख कर उपरके प्रवाहीमें मिलाय एक एक तोला पिलाते रहना ।
स्वेद'श्ह--डाम देना--नाभिकी आजु वाजु कुशली शाकर का डाम देना। और सिर परका बाल निदाल तालमे और गरदन पर ३ डाम देनेसे केलेरा मिटती हैं । लेएहेकी छडीने अ'ग्नमे तपाय उसका छेडा लाल हो जानेसे उपर हिदे स्थानमे अग्निका डाग दिया जाता है ।
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कृमिरोग पेटके जन्तु.
कारण—अजीर्णंसे अजीर्ण पर और बिना भूख लगे खाते रहने से, अधिक ठंडे और शरीरके अनुकूल न हो तो ठंडी अन्न पान लेनेसे, ठंडे रागी भोजनकी आदत से, चिकने ठंडे पदाथोंका सेवन, दही और गुड़ अधिक खानेकी आदतसे, जलचर प्राणियोंके मांससे आमाशय और पक्वाशयमें छोटे वंडे जन्तु उत्पन्न होते हैं।
चिन्ह्—ताप मूल हृदय रोग जैसेेेी भांन्तपर सम्भाव दस्त पेटमें दर्द क़दाता अफारा पेट चरना पेट घंडा मोटा होना सधा पाचन न होना, दस्त ज्यादा होना या दस्तकी जगह, मुत्रा में खुजलो, मिरमे दर्द, निद्र कम, दम चढना, थांधे निस्तेज, चेहरा किक्का आदि चिन्ह पेटके अन्दर कमि जन्तु उत्पन्न होनेसे होते है ।
पथ्यापथ्य—मधुर पदार्थं बाजारकी मिठाईएं वद करना । हरे या सूखे साग पत्र छोड़ना । मांस वो दूध पत्तेवाले घास, सदृशे मधुर चोजेंं त्यात्याकि चोजे आदि नीच खाना । कड़वा तोखा करनाशक भोजन देना । निंलिखित वचु नमक शहद हिंग अजगामन लहसुन हलदी कोकम मीठानिम जोरा घनिया, हरा धनिया अदरक आदि मेाजनमें देना ।
१ मुस्तार्द क्राथ—(योगरत्नक) नागरमोथा और जनेकी छाल दरद मुगाकानी वहिडा समभाग कुठ उशका १ तोल्का काथ कर उस्मे वायविडंग ३ मासा और छोटी पीपलका चूर्णं १ मासा ढाल्कर पिलानेसे कृमि निकल जाते है ।
२.खुुरासानी अजमोद का चूर्ण २ से ३ मासा—में ४ से ६ मासा गुड़ मिलाकर रातवासी पानोसे टेनेसे पेटके जन्तु निकल जाते हैं।
३. टांकके बीजका चूर्ण १ से ३ मासा खाहरेसे लेने १३ से १५ दिन्म कमि निकल जाते ।
४ वायविडंगका चूर्ण २.से ४.मास शहदसे १५-२० दिन टेना खुराक मे आवला और ममालातालां मुगका पानी और चावल का खुराक देना.
५ दाहिमकी छाल आधा तोला कूट्कर उस्मे ४० तो वानी छेढ चतुर्यांश र्हाने पर कपडछान कर उस्मे २ से ४ तोला तिल्का तेल ढाल्कर पिलाना ३ ये ५ दिन्मे पेटके किमो निकल जाते है ।
६ अर्जुन के फूल वायविडग कलिहारी भौ'लावा वाला राल कुष्ठ प्रत्येक दफ दस तोला चंदन वीस तोला साथ कूट कर यदीधूर श्वास मे ठेनेसे
७ गुजरातीमे घोेड़ा जोंगडिये वछनाग.
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पेट के कृमि निद्रल जाते है और शरीर पर मस्तक मे बालमे धुंधा देनेसे जू लोख मर जाते है । बिछाने मे देनेसे खटमल मरजाते है । कमरे मे देनेसे मच्छर भाग जाते है ।
७ वायविडंग तोला ०७१ का कवाथ कर उसका दावविडंगका चूर्ण ३ से ६ मास डाल कर पोनेसे वायविडंग के कार्यके तिलका तेल ३ चमयचमे रंवेडगका बधार देकर पोनेसे एक दो सप्ताह मे जंतु निकल जाते हैं।
८ विडंग इन्द्रजै डाक के बीज सममभाग चूर्ण करके ३ से ३ माशा मुंहके साथ एक दो सप्ताह खानेसे पेटके जंतु निकल पाते है ।
९ नीमके पत्ते ५ तोलाकेा पीस उसमे २०—१५ तोला पानी डाल करछान कर शहद मिलाय पीनेसे जंतु मर जाते है।
१० दांतके कृमि—वर धूप—इन्द्रायण के पकाफल लेकर उसके निधूम अंगारा पर रख नली द्वारा दांत या दाढ पर धूना देनेसे पोड़ा मिटती है और जंतु निकल जाते हैं धूना देते—वक्त मुंह पर वसद से जो लार पड़े वह पानी सरेईत नर्मे पदने देना -चो निकले हुए जंतु दिख पडेगे ।
११ वैसे हि छोटीया वडी कटहरी के पके फल का तिलका तेल चुपड निधूम अंगारा पर रख नली द्वारा धुना दांत दाढको देनेसे जंतु निकल जाते है पीडा -शांत होती है ।
१२ भतूरे के पानका रस तेला २० अथवा तांबूल पत्रका रस तेला २० मे पारद तोला १ घेआटकर मालमे घीसकर डालनेसे जूका और लिक्खा जू और लीखे -मर जाती है निकल जाती है।
१३ भतूरे का पान तोला ४० का पीस कर अथवा धतूरेके पानका रस तेला ४० मे तिलका तेल तो ८० ढाल पकाकर पानी जल जानेसे कपड छान कर लेना -यह तेल बालमे झालनसे जूअे मर कर निकल जाती है ।
कीटमदं रस—(र र स ५.१५) पारद १, नंघक २ अभ्रमोद ३, विडंग ४, कुचला शुद्ध ४, ढाक पलाशा वोज ६ साथ पीस ६ से १३ रत्ती रात साय शहदसे देनेसे और उपर नागरमोथा १ तोलाका कवाथ पिलानेसे कृमि निकल जाते है। यह रस रप्वरत्न सच्चयका है । भैषज्य रत्नावली काने-इसका नाम कृमि मुदगर दे दिया है-१
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कफिदरो घट-( र स.) पारद गचक खरापानी श्रमोद शेलोया, कालाजोरा कड्भा, कपिला ढोकामाली छोटोहरड रेवंचका शोरा मीडोआवल पलाश चोज इन्द्रजौ लता र.करंजवीज, चिरायता, कपूूर, हिंग, निमेषा, संचळ, वायविडंग जमाल गोटा श्रमिया हल्दी समभाग डेकर पोथ चकरीक दूधमें गोली रती प्रमाण करना ३ से ३ गोली पानीसे लेनेशे दरतौरे कफि निकल आते है।
पलाश चोज्जादि चूर्ण-( र. स )डाकदेवीज इन्द्रजौ वायविडंग नीम के वीजको गिरि चिरायता समभाग डेकर चूणं करे २ से ३ माथा चूणं गुड के साथ खानेशे ३ दिनमे पेटके किमि निकल जाते है।
१ गुज. सीफैतरा एकीया लो कवारपाटा मे बनता हैं।
२ गुज कोकचिया काकचा
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पाण्डु रोग कामला
कारण—अति विपय बहुत खट्टे पदाथों अति नमकीन, अति मधवानकी मिठ्ठी खानेकी तौऽण रलद् पदाथों खाने की आदत, अतिरफसाद, जस्सम, औरतोंको
रञ्चन के समय ज्यादा खुन गिरना अरयातव, सञ्प्रहणी के रोगमे या बवासीर मस्सामे खुन गिरना आदि कारणो से तथा क्षय अशुंघ सुरापान के रोग, विषम ज्वर मलेरिया का जुन्तार, यकॄत लीवर के रोंग आदिसे वात पित्त कफ दूषित
होकर हृदयमे रहे हुए पित्तको चलवान वायु शुद्ध करनेसे वह पित्त हृदय मे रही हुये दशा घपनी नाडियों द्वारा सारे शरीर मे फैल कर कफ रक्त मांस आदि
वातुको दूषित कर त्वचा और मांस के बीच रहने से शरीरका रंग पीला हरा और बहुत हरके पडू नपफेद होना है उसे पाण्डुरोग कहा जाता है।
चिन्ह—मारंमे हृदयका कम्प त्वचा सूक्ष्म रक्तचि पिसाब पीला पसीना न होना सूत्र मन्द अश'खे पर सूजन दस्त कण्ठ आदि चिन्ह होते है। पीठे
रुन और चरबी कम ढ़लती है। शरीर कृश होने लगता है। स्वभाव चिडचिडा होता जाता है। मुखमे पानी ज्यादा आता है अर्थात् अमीरस निकलने लगता है।
ठंड़ी चीजें या कौतसपर्स मच्छा नही लगता। बुखार आता है। कान मे आवाज शरीर सफेद कफका हाय पाख मुँह पर और कमो सारे बदनमे सूजन
होती है। ज्यादा चलने से या सीढो चढनेसे दम चढता है। छाती मे घचकार दस्त कण्ठ पेटमे वादी रहती है। रोगी रात दिन उदास रहता है। इस रोगोका
रक्कत्कीण हो गक्खा शरीर 'चेत दांत नख् आँखे पीले पड जाते हो। ताप धर्माचि नपमन टबका त्रुपा वैचैनी पुरी लिंग योनि पर सूजन शोथ हो। पसीना आकर
सारेर ठंडा पड जाता हो तो रोगी बच नही सकता।
मिट्टी खाने से हुए पाख रोगमे रक्त आदि द्वावित होते हैं। मिट्टी
का पाचन न होनेसे सिराओके मुखोंका बक देती है। इन्द्रियोंका बल तेज प्रभाव धायंक्षमता बोज नष्ट होते है। इससे शक्ति क्षीण होती है। चमडीका
रग बदल जाता है। जठरामि मन्द होती है।
मिट्टी के पाण्डु रेगमे तन्द्रा आलस्य खांखो श्वास घ्रल अश्वि, नेत्र गाल मुख पांव नामि जननेन्द्रिय मे सूजन, कृ'मिकी वयपत्ति और खुन कफके साथ
परता है। दस्त होते है।
हलीमक—काला पाण्डु, जिसमे तवचा और शरीरका रंग पीला मिश्रित हरा काला हो वह हलीमक कहा जाता है। इसमे वल वत्वाद जठरामि क्षीण
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होते है। योड़ा ज्वर रहता है। मैथुन मे अप्रीति वास तृपा चक्कर आदि चिन्ह्मालूम हे'ते है। इसका उपचार पाण्डु रेाग के अनुसार हैं। जो चिन्ह अधिक मालूम हे। उसे ध्यान मे रख औषधेाका सेवन करना।
पथ्यापथ्य—हमेशा एकदेरे दस्त हे। वेसा करना। खुराक साधा देना भाटाका खुराक मिष्टान्न रेटी आदि वद करना। करेला दुघो सूरन परवलअदरक्व हर्रा घनीया जीरा हलदी सेंधानोन आदि देना।
कामला
कारण—पित्तयोभय मार्गंसे न जाता हुवा खुनमे मिलनेसे, पित्तकं नलीमे कुछ पदार्थ घुस कर उसकका रास्ता वद होनेसे, पिताशय की नलीको सूजन या संकोाच होनेसे या अन्य कारणे से मार्ग वद होनेसे. दस्तकोई कदमीसे, चिंता शोक अजीर्ण सुखार विग आदि अति खटु्टे अति विदाही गरिष्ट पित्तकारक पदार्थ खानेसे एससे अनेक कारणोसे यह रेाग होता है।
चिन्ह्म—आंखोका सफेद डेला पीला हे। पिशाव पीला उतरे नख चमडेह पीली हे, शारीमे वैचेनी सुस्ती, खुजली तृपा आदी अस्थि परेना थूक पीले हे दस्त कड्ज, सब पदार्थ पीछे दीखे कमी थूकभी पोला होता है। पेटमे वाघु वंधं। अन्न पाचन न हे। हू उकार आवे, शरीर कुछ खुराक कम नहोने वमनमे दस्त मे मुखसे खुन, गिरे निंद्रा घेन रहे। नाडीका वेग एक मिनीटमे ५० से ६० वेगते चले। कम लगके रोगीका वमन अहोच उसके ताप मे चिन्हे दिख ते हे। मन्नुतर काळेया पोडते हे। सूजन चढ गई हे। वाद तृपा जाफरा हे। जडरामि मद हे। ये चिन्ह असाधय के है।
पथ्यापथ्य—मुख जोजो चिन्ह दिखे उसका चिकित्सा करना। करना : दस्त एकदेरे होना। पिशाव ज्यादा वेसा करना। भारी विकने पदार्थ खांड शंकरुरफी चीजे, खराबे पदार्थ दहें छोड़, रातवासी खुराक घी दही चरबी वाळे पदार्थ खानां नहि। तवोको अनुकूल हे। वेसा खुराक देना।
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पाण्डुरोग और कामलाकी चिकित्सा
पुनर्नवा मण्डूर—(मात्र) पुनर्नवा निसोथ शेठ पीपल काली मिरच वायविडङ्ग देवदारु चिरायता कूड़ हल्दी हरड़ इन्द्रायण कुचकां पिपलीमूल नागरमोथा चकड़ाइंगी करवीर अजमोदा द्रायफल राईयेँ ४ तोला मण्डूर मस्स ४ पलत्ते दुगुना लेघर सरसों कपड़ ठानकर उसमें सरसों के तेल में नोमूत्र डाल कर पचान्ता गुड़ जैसा गाढ़ा हेजानिदे ६ रत्ती भारको गोली वनाना सुग्ध नंम रे से ६ नोलो पीस कर छाछ दा प नी के साथ देना। यह गोली पाण्हुरोग कामला हरिद्रक के लिये उत्तम गुणकारी है। रसशिनो कुमारने यह वनाया है। पाण्डुरोग नं साधके श्राम स्वासी श्वास ज्वर शूल श्वदि उपद्रव मीं मिटते है। इसके अलावा दूरे रोगोंमें मी उत्तम गुणकर्ता है। जैसे कि कुष्ट घातरक्त ह मे व्रणासुर डमरोग सुजन दम स्वांसी शूल आदि।
नवायस लौह—(मात्र. रस प्रवीण) हेठ पीपल काली मिरच हरड़ वायविडङ्ग सांठला नागरमोथा प्रत्येक ४ चार तोला और लौह मसम ३६ तोला शव घाव घोंट रसना। मात्रा, से १८ रत्ती तक दिन भामे शहद घे साथ यौमुन या पानीके साथ देना। यह पाण्डु रोग कामला और उसके उपद्रवेका नष्ट करता है। और हरय रोग उदररोग सृजन कृमि कुष्ट भगंदर सुजन शोथ आदि रोगमें मी गुणकर्ता है।
घाम्र लौह—(मान) आंवला हेठ मस्स शेठ पीपल कालें मिरच हल्दी सममान मिलाना। मात्रा ६ से १२ रत्तां शहद घृतसे या पानोमें देनेसे कामान कुष्ट कामला आंदि मिटते है।
मण्डूर घृतक—(मान) हेठ पीपल काली मिरच हरड़ वायविडङ्ग आंवला नागरमोथा निस्क दारू हलदी' दालचिनी सर्षणमाक्षिक भस्म पिपली मूल देवदारु प्रत्येक चार चार तोला थौर मण्डूर भस्म श्वाली सवसे दून मिलाय सवसे ८ गुने गौमूत्रमे पका ४ रत्ती की गोली वनाना। सुवह साम c हे १२ नोली तक दिन आातों हैं। उपर छाछ ९ कटोरा पिलाना। मूव लजाने पर खुराक देना। पाण्ड़ेरोग कामलाके काम अंपथ है। इसके अलावा कुष्टरोग उदरोग उजन उकसस्थ व्रणाशीर मस्सा बीवर और तिल्ली का मदहना आदि मे उत्तम गुणकारी है।
लौह रसायन—(रस स हिता)सुध्द पारद तोला ८, ग चक तोला १६ कज्जली कर चसने लेह मस्म तोला २६ डाल घोटकर उसमें करवीरठाके रस में ३ दिन
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कालीयन तुलसी के रस की भावना देकर उसमें नींबू के रस औपधीयां मिलाना । अडूसा छाल गिलोय चित्रक हरड़ चहिंदा। आवला निंबूछाल पलाशबीज विजयसार छाल गिलो (नोली), वचुलके रसवाले पके फल चलामूल शतावरी गोकशु वायविडंग त्रिकुटा कुटकर शिला जीत प्रतिमेक थे थे तोला कूट कर मिलाना । पीपल निंफला के काथकी ३ भावना देकर स्वरसमें या लोहेक' कड़छीमें रखकर देना। छोट कर रखवना ८ से १२ रत्ती प्रातः और शामकेी पानीसें या छाछसें या गौमूत्रसें देना । पाण्डु रोग कामला हलोमक २ मास सेवन करनेसें मिटते हैं । और वातरोग और उदररोग लीवर प्लीहा कुष्ट खनका बिगाड़ सूजन आदि रोगमें गुण करता है ।
मधु मण्डूर—( रस रहिना ) मण्डूर भस्मको मि³ फलाके कवाथ को ३ गोमूत्रकी ३, कवार प'ठाकी ४ और पचामृत की ७ रजपुट देनेसें सिद्ध होता है । प्रत्येक रस में छोट चोटकर रजपुट देना । इसको मात्रा ६ से १२ रति दिन में २ दफे पानीसें देनेसें २ मास में पाण्डु रोग कामला आदि मिटते हैं ।
१ बिल्वाजीत १० से १२ रत्ती गोमूत्र के साथ देनेसें कामला मिटती हैं । २ हरड़याड़ी और पिपलीमूल समभागसें कूट ३ से ४ माशा पानीसें पाण्डुरोग में देना २१ दिन तक.
३ धारेआयवधंनो गुटी तेलो ४ मडर वटक थे ला २ तोला रसायन तेला २ साथ छोटकर ६४ पुड़ो वनाना । दिनमें २ वक्त पानीसें देनेसें पाण्डु कामला आदि रोग मिटता है ।
४ हरड़ नहिड़ा आंवला अड्डूसाछाल चिरायता नौंमक्री छाल कुटक्री गिलोय समभाग कूट १ तोला का कवाथ २१ दिन पिलाना पाण्डु कामला में
५ अपामार्ग के पंच्चांगकी भम्म जन्तुखार कुटक्री वड़ी हरड़ समभाग कूटना ४ से ६ माशा पानीसें २१ दिन देना.
६ चिरायता नौमकी छाल त्रिफला पटोल अडूसा छाल गिलोय पर्पट भांमर्रा समभाग १ तोला का कवाथ पिलाना.
७ ठाढ भस्म तेला ३ आरेग्य वधंनो तेला ४ शंख भस्म तेला १ वाचर सोंग भस्में तेला १ कवाथ छोटे ६४ पुड़ी कर दिन में २ वक्त देना ।
८ त्रिकुटा* के रसकर अंजन करनेसें कामला मिटता हैं। यह रस १ से २ तोला पिलायाभी जाता है ।
- त्रिकुटा गुर्जराती कुद्रे १ वचुलके फल-गुड़राती वावलकन्या पाकीया परिदिया । २ पचामृत-दूध, दहीं, घी, शहद, शर्करा, समभाग मिलानेसें वनता हैं ।
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रक्तपित्त-रक्तस्राव
रक्त—खुनकफा स्त्राव किसो भी स्थानले खुनकफा गिरता।
कारण—रक्तू गर्मी तोक्ष्ण तोखे बहुं सटे यद्रून नपुंसकिन क्षारग्राढे दाहे पित्त करने वाळे पदार्थी अधिक सेवन करनेसे, क्रोध शोक भयसे अधिक परिश्रमे, अपने प्रकृति विरुद्ध अन्नपान लानेसे आदि रक्तके कारणोसे दूरहुये हुव्रा रक्त पित्तको विगाढता है और विगढा हुवा पित्त खून मे दाह करता है जब मुर्छाे गुदासे यानि लिंग आदिसे कफ स्त्राव होता है।
चिन्हू—खुन गिरनेलाला हे। जड विरका दर्द अशचि ठढे पदार्थकी इच्छा, वटे डकार, स्वांसी स्त्राव ताप हृदयक धड़कन शरीर पीला हेाना दाह रुपा विरका तपना अरुचि अरुचि शुलता मनको घबराहट दांतचे मसूड़ोंमे खुन इत्य तरह मिल्न मिल्न स्थानोसे खुन गिरनेसे मिल्न मिल्न चिन्ह दिखाई देते है। आभासाय विगढा हे तो नाक या मुर्छे खुन मिल्ना है। पक्काशय दूषित हनेनेसे दस्त द्वारा खुन गिरता है। और वयनेरे डिम्बक हुवा हे तो दोनो स्याने मे खुन गिरता है।
हथियार माबिसे खुन मिल्नर—हथी चपु बह्मा तलवार अश्त्रादि घाव हनेनेसे, नशे फटनेशे टरनेशे बह्न ठढेे यहुन प्रमसे, बह्न मार उठानेसे गर्म बलत दवा खानेसे, दाह अधिक पीनेसे दिसो दिशानमे अवश्यमे खुन मढनेसे आदि कारणोसे खुन गिरता है।
मुख्यसे रक्तस्राव—हेाता है जब दांतमे मसूंडोले जोंमसे तालुमे गिरता है। हेजरी मे गिरता है जब वमन उळट्टी मे नुतन गिरता हे। वह खुन कुच काला रंकका घेरा लाल हेाता है। और अश्तिक प्रमाण मे गिरता है। साथ कुच खराब मिला हुवा रहता है। खुन गिरनेके पछिले उल्टी श्वासा है। फेफड़े पर सूजन आती है। चक्कर आता है। आंखो मे अंधेरा आता है। खुन येढी दे हेजरी मे रहरह कर वलती द्वारा बाहर निकलता है। म खुन लाल हेाता है। हेजरी पर लगनेसे दात शेनसे ह्देश यकुन के रे.गमे, मूत्रपिंडके रेागमे आदि कारणोसे खुन उलटो-वमन द्वारा गिरता हैं।
फेफड़े (फुप्फुस) मे खुन गिरनेका कारण छ तोपर मार लगनेसे धसकत वेध्न ठाननेसे ताकातमे अधिक देढनमे पत्तन स्वादि चढनेसे स्वांसीसे जोरतोको मद्यत वध हनेनेसे श्वरोगसे उरःक्षतमे वाधि करपोत फेफड़ेसे खुन गिरता है।
पित्तावमे दकस्नावह—दस्त हेाता है जल कमर दोनो पाद ओर पेट पर उकडू आदिका मार पहता है। रत्ची जगहहसे गिरनेसे धुरमे ल व्दी सफर करने
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से. मृत्पिडमे पथरी उ(मनेसे ताः जैसे जलद् पराःथेो का अधिक उपयोगमे आाःनि कारणोसे विशाःव द्वारा खुन गिरता है ? विशाःव हेाने के पहिले खुन गिरे ठेठा मूःपमार्गेसे, पित्त चके साथ मिलाःहुभा खुन दे। हे मूःवडमे, विशाःव आाजानेके पंःछे खुन गिरे या खुनके साथ पित्ताव अत(मे उतरे ते मृत्पाःयसे खुन गिरा हुवा समझना ।
पथ्येr ध्य —जागम पा धरना नहि । दाहक'ने वाछे पााःर्य वेगत पंयाः लसुन लालिमरञ्ज तेल बाजार जे मोठाई गरिष्ठ पदाःथ' पाचन मे याछा दे। ठेठो सं'जे'से दूर रहन'। साया समझोतेोषण खुराक छेना । मुग चना गेधुं चावल आाःदे आान्य केंयो(म फुलाकर नेःलदे(ाल मुंo पथी सूंन तुरे'। घोuेटा मेघो चोuलाकी भ जी परतल आादि च्वाक हितकरे है । चोuह-तक वहींका पत्ता, राईकर वागेरीशृत, वाखrठेठे वलयाञघृत, और अपनी प्रकृतेः अ(सुतुल हेा ऐेसी चीजे स्वाना । जयादा परिश्रम नधि करना घेघुमे घुमना नहि । ठंडे पान'से स्नान नधि करना सेवाल वांधना । अरनो रोंकिटे आाधक चोuल उठाना नहि । दौhना नाहि । नोःकम खून विरता हो तो मeतक पर ठंडा पानी हि(कलना ।
महाःचं(कला—( र थ -मपूryक्त) पारद राधक थप्रद भस्म लोuह भस्म य गभस्म चू(र्ण शहद महम रं(ञय भस्म पथाया हुया पाउंया सेाःथामा प्रत्येक चोला ६, अव्वता सरप पर्वत 'चिन'कवाला छोटी प पल वाछा गोररमुuी इलाइची वचुलका गोद लो(मका गे(ल टांकका फुन केलीका कंद चमल चीजका गिरि प्रत्येक तेला ३ तेःन सःथ ह(थ मिलाःकर हवूःरशो पत्नी द्वाक्ष धालो सहदेती (सेदरही) पर्वत (ु तवहसल ये, वि प पड़े।, नागरमोथा वृथ (कपि थ केंळानो 'म ) गेःजवृद्हा (जे प थनी), प्र येककरे रस हेा एक एक भ ःत्ना देकर सुरूःथर उचने कपूर चोःतत्
४ मिलाःकर पानrस चने चप्राय नाःल वनाःना । आाःथा ने.स ो ने.ला दिनमे प्यारे दफे देना । उपर द्वाक्षा पानी या रथवनप्राश जीवन या कुटा अवलेठे के साथ या पानी देना । किसी मो स्थानमे गिरता रकु अटमतता है । दाहद दाहरुवर मूःकन्डु विशाःवकी जलन विशाःवमे खुन गिरना चनको हृदि वमन उ(त्ना हृदसमे पेटमे जलन दिमाःगका तपना राग' रहना आादि मिटता है ।
सुच्रा पथंड़ी—(र स रकfपित्ते) मुखाःश्रकिकी विशोथि, प्रनाःल चं(कु(ट्टी, स्कुरणेक प(ट उ(धरपेादरता पिटो रौथ्य भस्म यशाद भस्म कु(र्णी मालकु भस्म रकु रत्नेठ पांच पांःत तोला पा द तेोला २५, यथक तेोला ७० कमलो कर एक ठेठेठी कटाहीमे ९. वेह्ा गायकका घा छेःढ मर्म होनese कमलो डालना धीमी आंचरे रख हेा जाय अथ "घृत भस्म ड स देना ठोंठे के तवेथासे हिलाना सव
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मिल जाय जत्र गोवरले उपर मिलायो केलो के पत्ते पर डाळ उपर दूसरो पत्तो दाब कर उपर गोवर दाब देना। स्वांगजोत हे नेसे २४ घंटे के पेछे निकालना। छांट कर नींचे के रखको सामान मे ३ देना। काली द्राक्ष हरा धनिया (केधमोर), पेठे नीमके पत्ते, सफेद च दनका चूरा, नीमछोछाल अजम यद्की (विजयशर) छाल प्रत्येक पांच पांच तोला लेकर कुटकर रपये मिट्रोहे वतंलसे पानीमे भिगो रखे प्रातः कालकरे हायमे मर्दन कर कपड छान कर कूए मे फेकदे प्रताहो पपटो मे डाल एडेकिन घेटकर मुखने पर किर उपर लिसो लह चोने पान पांच तोला लेकर उपर निसे अनुसार मालिसना देना इस प्रकार ३ भावना देखर सुखाकर रखे। एक दिनकी मात्रा ३ से ९ रत्ती तक जदुन गुन्त पडकन आदिसे स्पानहे गिरता खुन रुक जाता है। छातीपे नाकसे मुत्र हड्रोहे दम्तसे गिरता खुन रके। और इंदू शारण क्मताकात कम्मर आंन्द से दह दह आहोकर जलन शिर धुनना चकर अस्मलिएत छाती नो दह पिशाव कि जलने, मुत्र मे गुंदा वहरे मिलल पिदा हरता, योनिकद आंन्द रोगमे गुणकारी है।
दक्ष्नायघरू पांटू—जदको छाल, त्रिफलामार (त्रिफला मुख)को छाल, नीमको छाल, काली द्राक्ष, धमोकरकी छाल समभाग लेकर छूट कर रखना रातको भच्छे वत्तनमे १ से २ तोलाको २। तोला पानीमे भिगो रखे। प्रातमर्दन कर कपड छान कर पोशिमे भरले, उसमे ३ वढा नमचा (प्राय ३ तोला) शहद मिला कर किसी भी रक्तस्राव की औषध दो माशाके साथ = मा = दफे पिलावे। अथवा केवलो फांट मी पिला सकते है।
रसर्पयांकोसु रस्स (र.स°) पारद तेंला १०, माचकु तेला १०, रखीपदूर टरतल पकाया हुका, फिरकिती वडी हरड आंमला इलायची, चीनी हवाला (सीतल चीनी) नागर मोथ अडहस्या (असार) प्रत्येक तोलो ५ लेकर सम कुरकर पपट सौर मधुयष्टी मूलफे काय की एक एक भावना देखर रखे। मात्रा ३मे ८ रत्ती शहद, या शक्कर या पदायचे च'वण के पानो मे देगमा स्र्दप रोगोंके वारीरभी दिशिति देखकर दी जाती है। सम जड़हसे गिरता खुन सक्ता है।
रस् सुत्तंभन रस—(र.सु°) पारद म हद प्रनाल वत्पुटी अजहरमोहरा स्कुटिक पिष्टी मुक्ताशुक्ति पिष्टी लेओ। भरस रवगंम् आक्षिक भरम सोहागा पकादो मुंहा सच समभाग लेकर कूट मिलाहकर शहददेसो वाला द्राक्ष और मातृजतनान (मै पाथरी) प्रत्येक दस तोला लेकर काथ कर ३ भावना देन मात्रा ३ से
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६ रती पानी या साहदसे गिरता रक्ख रक्खे औरतों के अत्यातेंष रक्तप्रदर थेत प्रदर मिटे।
उशीरासव-(१ स्व.) काली या लाल द्राक्ष मत्तल २०, के फूल कर एक मिट्टोरे या लकड़ी के वर्त्तन मे डाल उघमें पानी रतल २०० मे पधावे रे घुटा पकाकर मिट्टी की मरा रक्खोंको फाटमें भरदे। उघसे शाकर रे. रतल छाले।
वाला तेला १८०, धाईफल तेला १००, दमल गेराटाकी मिरी कमल पुष्टप गुलाव फूल चारे लौक फूल इलाायची मोतियन्त्रोंषी मजीठ घमासा चवूलक्को ढाल द्वालमरों छाल ढाकके फूल कपुर वायवरनो जामूनके बीज प्रायेक औषधी वीज वीष वीस तेला लेकर कूट कर मिलावे छोटोढा मुख वद दरदे। आठ आठ दिन के पीछे खोल कर हिलावे दे। महिना पीछे रपद छान कर अच्छे वरतनमे भर दे। रे से ९० तेला तक की मात्रा दी जाती है। शम जगहसे गिरता खुन रुकता है और हृदय फेपहा जाते दिमाग को तारुत देता है।
तैल पर्पटी-(र स ) पारद शेर एक ग चक शेर एक ठे कर कजली कर पपं टीरी रीतिसे पकाकर घोटकर उस्में होरावेल आंघाशेर और मिलाकर त्रिफलाके काथकी भावना १ देकर घोटकर राखे मात्रा ३ से ६ रती। मधुयत्रषे या मधु मक्खन से देना। सब प्रकारसे गिरता खुन थमें। रक॔वेत प्रदर मिटे।
सुधाम्निधि रस-(यो र.) पारद नगचक स्वर्णंमाक्षिक भस्म सम भाग लेकर येद्ध के वरतनमे डाल त्रिफलाके काथ की भावना देना। सुल्व माननेपर घेटना। मात्रा १ से ४ रती शहदसे देना रक्खलाव घटके।
हर्रक्च्छदॆ सामान्न्य प्रदे॔ग—सुकाायि मिश्रण, सुक्ता विष्टी तेला •१॥ महाचंद्रकला तेला १, प्रवाल चंद्र पुती तेला ११॥, वोल ५पं टी तेलो ०॥,
अमृता सत्व तेला ३ सब साथ मिलाकर ६४ पुढी वनावे। ३छे ४ समय पानीसे या शहदसे दे।
प्रवालाक्षरधि मिश्रष—प्रवाल चंद्रपुटी तेला ३, सुक्ता पिष्टि सुधा पपं टी कंहदर गेरहवा पिष्टि, वसामृतलोह प्रत्येक एक एक तेला सब साथ ढे मिलाकर घोटकर ६४ पुढो वनांचे र वस्त शहद या चयन्नप्राशा जोइससे दें।
प्रयोग १—शाहजोरा, इन्द्रऔ मेदामोही गीलीगम्र नागकेसर इलाायची सेंफ सममान फुटकर । तेला दिनमे २ या ३ दफे शहदसे दे।
प्रयोग २—नदी का सेंधााल और काली मिट्टी मिलाकर शिरपर लगानेसे माक्षे गिरता खून वद हेत।
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प्रयोग ३—घनिया, आमला, वासा पत्ते, द्राक्ष, वितपापड़ा (पपं्टा) समभाग कूटकर २ तोलाको २ तोला पानीमें रातको भिगो रखे प्रातःकाल करसन्धान कर २ मे ३ तोला आधा मिलाय पिनमें ७ दफे पीवें।
प्रयोग ४—दालचीनी, घनिये सफेद चन्दनका तुरदा मूललेठमूल गिटोय समभाग कूटकर २ तोलाका प्रतिदो पीवे।
प्रयोग ५—नोली (गिलोय) का मूल आधा तोला पीस कर चातलके खोसामण मे आधा या दाखर मिलाकर देना।
प्रयोग ६—फेर्द चन्दन के घंस कर ०१ तोला लेकर चातलके खोसामण (पानें) मे आधा मिलाकर देना।
प्रयोग ७—अनारकी छाल, कुटेको छाल (कूटजवक) आधा तोला तेला सेह कर २० तोला पानीसे पक कर सापा रहने पर कपडछानकर सहद्र मिलाकर ३ दफे पीवें।
प्रयोग ८—कुटेको छाल, नागरमोथा, कोइम्र छोए विलक फूल अंतोद माला सम भागसे हूट कर १ तोलाका काय या फंट कर दाख या शकर मिलाकर पिलावें।
प्रयोग ९—कुड़े आंँवलखे घीमें पकाकर (तल कर) छाछमे पीसकर सिरपर धारावार पेटपर लगाना ठेक कफना तो उस स्थानसे गिरता सूजन थमे।
प्रयोग १०—अद्ही (वासा) जीरा, मूलेहठी मूल (यष्टिमधु) द्राक्ष समभाग ले कूटकर ०१ तेलमे १० तोला पानीसे भिगोकर पीना।
प्रयोग ११—दूधी कमल वांजसो फिटकि वचूलकी पत्ती, भोगा (अगमार्ग) का पान समभाग कूट ०१ मे ०१ तोला पानीसे देना।
रक्तपित्तनिवारण—(र. रत्न.) अद्ही (वासा) के पान रत्तल १० टेकर ६० रत्तल पानीमें काय हरना आधा रहने पर कपड छान कर उसमे शकर रत्तल २० डाल कर पकाना घडे हेनेसे उसमे मलाई, इलायची, न फेफेघार सफेद चन्दन का तुरास हरड घांँवल कालो मीठा सोंठ छोटी पीपर घनिया जोरा आंँड़घ्रा शतावरौ प्रत्येक ८ आाठ तोला अथवा २४ तोला मिलाकर भत्रलेह्र जेसा हेनेसे उनारन १२ से ४ तोलाकी मात्रा है। रक्तपान प्रशर प्रमेह मुखपक्चु मूत्रदाह-पुरवैके राग जलन अम्लपित्त छातींषा दाह शरीर तपना आदि मिटता है।
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क्षयरोग-राजयक्ष्मा
ह.र.ण-क्ष.यरोग॥ न मानुप्त हे पथ्यो माङ्गना सर्वथा मरण नहिं । मरणके लिये मची नहि सिद्ध देतो है । मथुर पथ्यं जानोरी वडून श्राद्धत पथुत नीते चिर जिरे, पथुत जणद उम पातां या मोहन, हर वतअ अन्ने' देतां, ग्रामरको चौथो मीठाइ अथ द अधिक नाना, अधिक चाद पीनेत' रयचन्, अति क.पय अथपक पम अधिक दार पनेत्री आदतां आ'd अरणोने धाय रोपात मोम जनतां ह । न!मो हुनार द्वायमा रोग नहुत समय लक जारो रहनेने म.लं रोहदर सय टा मर लेतां ह । फिरो रामखे मरोड़ -मोेर हुम ह ३५ मय मांने पोनेको सांसारिक वयथारक' मनोंद्रा न रसनेसे वह दं रोगा ह । मेने हे मरनूगिफल स सगं नाले, दिना खुशो हरां प्रका(न्तने पथानो' नचनेल्टे मो', टहरे रताते, रत हुए सनयके उचित नानेटे, जय रोपोने सदनं', अथि' मादणकम नेत्रा नाटक हमेघा देखने वाटोंको ह.रतों मनु'शे' = समूर ने रमने टाले't, नतत मान सुंगीत रुचत हयने सुप्रिक मोहन केरने रहो शोकिक मुंफगने मुन्ना मक्त्री आंदि जंतुयोमें दूरेत मटा हुवा दारी सुगकथ आदिके म+रवसे यह रेगं हे तां है । जेसेपेध पढतिह के भनुमार टफूनर मल नारक म तुभो शरीरमें दार्जल हेमेने कय रोग देवतां ह यह मंत दशार्श नहि हे । तव्वुत: कय रोग लतपन्न करनेवाळे हुर्णोने हि द्वारो मे पचातारक जतु उरपज देवे हे । आहार विहार औषधों के उचित वयवहारसे कय रोगे दूपेत दामयकथा भाग कम देवता ।तथा हे वैसे स्वाभावित हि उस के जतुनो नतय हर योग हिटता है ।
यह रोग प्राय -ते वे वपु की अशुद्धिको आघन हे तां हे । अथेरथोंको प्रस्तर माने सम्हाल न रसनेसे नह रोग लागू हेओ वहतां ह । इत मान समयमें खुशरो हुये और कुर्सी टुटुंयक्री आरहे' कुचेराको भादतमें पटनेंमे, छछ मी पंकिश्रम और धरेल काज का वयागाम मी न होनेने, सोनेप भर'dे शाधिक देनेनेफ कारण हुये मारींर चढ जानेने, भागाशय पेट आंतों हृदय फेडहा विगरकर ओरतोंको यह रोग लागू हेओ जातां है । हृदको पीडना, कूड़ना पानी भरना रसोइढे वनाना ऐसे धरेल काम करनेवाळी ओरतां थे, अवश्य खुदह नोरोगो नहेनेने टनरदो यह रोग नहि हेओता । इस दारण ग्राम प्रजाकी अपेक्षा शहरोंकी प्रमाने यह रोग अविक मात्र मे हेओता है । मामोने खुश्लो हवा शुद्ध पानी परिश्रमवाळा जीवन सुंदर पावंद डूनेने खुशबुदा आहार, शीनेसा नाटक आदि रवार्श्य किगारने वाले विलासी
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जीवन वनाने वाले साधनों के अभाव, शुद्ध दूध घी मिलना आदि से प्राप्त प्रज्ञा इस रोग से कुछ अ धामें नष्ट जाती है। लोंओ की अपेक्षा पुंरपेक्ष प्रायः ज्यादा यह रोग हेताहै। ब्रह्मचर्यका नाश भी इस रोगका कारण वनता है। वीर्य रक्षणसे होनेवाले लाभसे वतमान युषक विद्यार्थी ढेरास अज्ञात रहनसे प्रायः विद्याथी द्रवामे श्रमाजय को नष्ट कर लंघन परीराफल अविनध्याके युक्तेसा नष्ट करते हैं। इन्त्र दान्चा शो का सद्द शिक्षण मी एक मददनरका कारण हैः अभ्यास करनवाले छाद्रे के हरतशाद या थैसे सन्कारोसे वीर्यक्ष- हानिमे दर्भा क्षय रोगका रोग करतें हैं और अपने भारी गुदरस्थाग्रह खुहरमें आाप लगातें हैं। इस आतका अनुभव और पथ्यामाप गुरूद्वारा जीवन के सदय हेताहै। इन वात्से छात्राविद्याथिन्मी वर्ग मी परे नहि है। पुहुद आयुकै ढेराग मी विषय सुखने हित परकार साथक समझते है और थैस नयचहार कें साथ सच्चे घी दूध आदि पुष्ट सुराक के यमावसे और माजीदर औषध के दिना सेवन त्रिपयासक्त रहनसे मी क्षय रे।गसे पकडे जाते हैं। बहुत उपवासं, मल भूखादिद्ने वेध करनकी थेार जजीर्ण करनवाले पदार्थं लानेको आदतस हर रोगका माकपण हेानाहै। धनुठैम क्षयमे पहिले रम रक मांस मेद मज्जा। अस्थि वीर्य भोजका क्षय कमसे होता है और प्रतिलेभ धयमे प हॅेले वीर्यका नाश हानसे अन्न्य मज्जा मेद मांस रक रसका क्षय होकर यह रोग हेताहै। अनुठैम धयरी अपेक्षा प्रतिलेभ क्षय रेगीको कलदी घेर लेता है। शुदावस्थापे, बहुत प यसे चलनसे, शोकसे, बहुत धमरत व्यायामसे, विरोष प्रकारसे ण मलैकी प्रन्थी गांटे आदि कारणोस मी क्षय रोग हेताहै।
लिसद्ध—इस रेगधी तीन अवस्था है। प्रथमावस्थामे ल'बे समय तक खांसी चाद्र रखकर पतला कफ गिरता है। फेफडो में क्षत पडना है। दुसरी अवस्थामे' नाच्ची एक मुनरमे १५० से १२० चलती है। चमही सुक्लो और खडु हेाती है। छातोमे दर्द नाभिके नोचे देने और दर्द घमरान्ट शूल, अनियमित समयपर पसीना होता है। दिनो दिन शरीर कुश होता है। तद्त किसी देा ज्यादा किसी के कम हेाता है। स्वमाय चौदिय। अंतत उदर मोवी हेताहै। खांसी बहुत बादर कफ गिरनेसे यादी देर आराम मिलता है। काखे सफद हेातो हैं। वाहर कमजोर हेाते हुए मी विषय सुखको इन्छा हेताहै। रेगी स्वाननेमें सूखी नदियॉ, जलते वृक्ष देखता है। और पात्रोंमे पीडा हृदय पॉवसे जलन सन्न अग्रोमे' तप कमजोरी सारेलदगमे शोफ अप्पर अभाव श्याप सांधी रंकमिश्रित कफ स्वरमंप थे प्रमुख
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चिन्ह है। वायु प्रपान कफमे स्वरभंग मूल कोधा पित्तलोभो पादंमे पीडा, पित्तप्रधानमे ताप-ज्वरार शूल ज्वर जलन कफमे चुन, कफप्रधानमे विरका दर्दं खराब पर द्वेष स्त्रियों के साथ सपेद कर उपाय गिरना आदि चिन्ह होते हैं।
क्षयरोगीफे शरभरे मे तार ९३से १०० तक हेता हे पीछे मद्दतर १०में १०' तक पहुचता हे। और कफ क्षयादा हे'ता रद्दना हें। माझी घटनेसे माडोकी गति १२० तक एक मिनटमे चलती हे। बहुत करफे प्रारं.कालमे ताप फम हेता हे और श्वासके बढता जो और रातफे रहत पसीना हेता! हे। प्रां मये एक कुफकुचमे शोध हे'कार मढा हेता हें। पीछे देने फुंफुचं सरतें हैं।
मलारध्य fच=ह—चुराक पर अर्हत श्वास दम, ममल खांसी चून गिरना प( कमजोरे बढना, वृपण और पेट पर शुजन दूस्त मने सफेद जख्म श्वास हरवक्त वीयोंक्लाव आदि वमाध्य चिन्ह है।
रति डिमय जशय क्षय -जनने'द्रिय और शद्रेद्रियने पीडा त्रिपय मेगने अगक्क होने पर नीं चरन करनसे वीय' यहुत शतर पतला और कमी वीय' के बजाय चून के चुद गिरे, धारीक दिक्कत सफेद हो। वीयोंसीण देने के प,छे मेट मांस रक्क और रस यह धातुओ एक के पीछे एक क्षीण देते हैं और यद्द रोग भस्र्राध्य हेता है।
उरः क्षत—बहुत मार ठटानेसे, वलवान के माथ rहनसे, उचैस गिरनेसे, घैल घोड़ा ह,यो उट जैसे वलवान जनावरोकै कादूमें रखने हे प्रयरनसे, ल या प्रयास पांच चलकर करनेसे, ल मीं वेआंलो नहो तैरनेसे, वड़ी चटका मारनेसे अथवा कारणोसे हर्दय पर आघात होकार उरःक्षत हेता है छाती चांराती हुए रुटती हूए लगे। छातीमे असाथ नदे हे, पसलीयो मे ग्रह कुठ ताप, श्वमेजोरी, क्रृशता, खराब पर असमान, जठर'ग्नि मद, मन उदःस, दस्त पतला, सांधो मे कफ काला पीलT माठेवाला खुन मि्थित पडे र्त्यादि उरःक्षत के लधण है।
पथ्यापथ्य—जारीरिक धम कम घरना आराम निश्रांति लेन। रोगे भस्र्राक्ष दम्त जानेका नसद्रेक रसना। रोगो के रहने के मडान पर दुरगंध किद्दरी चीजको न अथने बैठी समाल रसना, विदछाना कपडा बदलते रहना, कम नेलना, मनको दूसरी यावो से रक्ना, रेगका चिंंतन चिता न करना। घ्रेयं रखना, विधिचय पालन करना। औरतोंका सद्वास कम रखना। व्रंसे एकांतसाध न देना।
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शरीर पर ठण्डी लगने नही देना । सुखी हवा वाले मझोले में रहना । इस प्रकार आये ऐसा करना लेकीन रोगीके शरीर पर सीधी हवा न लगे यह सामधानी रखनी । पनेका पानी नीमकी छाल २-४ तोला और निमोंले नीम पांच-सात दारकर वह पानी पीला। ठण्डी ऋतु और वयषा में कमरे मे शंगीठी रखनी । रोगी को अच्छरी लगे तो छोतीया यो अन्य भाग पर कपडे से सेक या मन्य साधन से सेक करना । ग्रीष्म ऋतु हो तो रोगी एक दो दिनमें गरमं जलसे स्नान कर तुतं शरीर पोंछ डालना ।
खुराक मे मादव जलदी पाचन हो ऐशी देना । गाय और चकरीका दूध चावल सींचहदी मुंग वना तुवरकी दाल गेहूं वाजरी आदि धान्य पाकल करेला घोसोड़ा दूधोका शाक, फलमें पपैया चीकू मेंठा मे संजो द्राक्ष आदि देना । एक कप दूध मे १ शे २ चना प्रमाग सेंधानोन या नमक मिलाकर पिलाना । यह दूध और घारोशण-तुरत देया हुआ बिना नम दिया उत्तम गुणकारी है ।
मूत्र मे होतो खुराक देना । दूध पाचन मे होता हो तो उसमें थोड़ी शक्कर और चादहा या काफो डालकर देना । औषधसे खुराक पाचन होने लगे तब खुराक बढाना । मुंग चावलकी अच्छरी तरह पकायो हुयी नमक हलदी दालो मोषं दाल वनायी हुयी झोचदी के साथ दूध मिला कर देना बहुत गुणकारो वृंहण शक्तिप्रद है । दूधमे उचित प्रमाणमे समक हस्लदर पोना पिलाना चरक मतानुसार वृंहण है और क्षय रोगीको नम चावाला दूध देना कुफकुस हृदय मातीकै लिये गुणकारी है ।
घारोशण सनेहसयुक्तं पोत्चा सलरर्णं पयः ॥ नतंः दिन्द्याति पोत्चा वा स्त्रिग्ध वस्न लफापितं ॥ चरक
इस तर्ह बहुत स्यायनोसे दूधमे नमक डाल कर पीनेका लिखा है । नमक-ले स्यानमे सेंधानोन भी डाला जाता है । चौराष्ट्र काठियावड मे मुगकी दाल और वेसन चावलकी दलदी नमक डाल कर वनायी हुयी झीचदी मे दूध मिल'य रात्री का दालु रात्रि भोजन प्रत्येक ग्राम और घरसे पाया जाता हैं । लागे मनुष्य रात्रि भोजनमे झोचदी दूध मिला खाते है । दूध मे शक्कर मिलाना स्वाभाविक स्वाद ननिफ है पर तुजुराके दूध के साथ नमक मिलाना या नमक न खुराक मे दूध मिलाकर खाना पथ्य गुणकारो और क्षय रेगी के लिये तों अत्यतपप जीवनदाता है । क्षय पोहित मोषाहारी के लिये चकरी का जंगली पशु का मांस या उसके प्रवाही गुणकारो है । क्षयरोगी के लिये पानी भी तर्ह हो सेक कुए का पिलाना । कुआ भी ऐसा हो जिस के ऊपर दिनके सुर्य का ताप और
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-रात्रिको चंपका प्रकाश पसता हे। जरको दपड छान कर ताने के पाछे भर रस् द्यारोगोके देना। हेमेधा दिलके तेलसे चनौ हुथा सुरघो तेल अथवा महालक्ष दि तेल दे। वहत सारे वचनमे मालोस करना। पभ जलसे स्नान गराना रेगी के कमरे मे दिव्य रूप दे। समय करना।
दिव्य धूप—नागर मोथा ४, राल ३, पीपर कपूर ४, चंदन ३, हीराबोळ म, वाळा ४, मिष्ठी ४, हलदी २, जटामासी २, चंदन सफेद लाचूरा १०, पांदलोया धूप १०, तिलक, तेल ४, गुगल ६८, ची २, इश प्रकार लिखे भागसे सद छीजो लेकर कूटकर माथ मिलाना यदघूप दसरेंम हरनेसे भूतप्रेत पिशाच्च भाग जाते हैँ हवया शुद्ध होती हैँ। क्सय रोगी नित्य हुक्का या दिलमसे इस धूपकुा शुवा श्वासमे लेनेसे क्सय रोग देनस्सर मिटता है।
रसराज रस्—(र स) पारद ४ तोला, गधक २ तोला, मातोकी छोपको मधप अश्ररभ म पालीकौही की मधप हायो गांठचों भस्म ताम्र मध्म हरणं मार्शिक अस्म ग्रन्येक एक एक तोला शाय मिलाय वसा और भरणी पट्टेके रसको एक एक भावना देेकर सुख जाने पर उस्मे छोटी पी.ल ४ ते'ला कालीमोरच २ तोला शेठ १ तोला बेंग २ तोला मिलादेर खोखी मे भरना। ३ से ६ रतो पानी दुध या शहद्मे देना कास श्वास हृदयरोगा क्षय में गुणवकारी है।
रसमुर्गादि लघु—(र स) रससिंदूर तैलाँ c, अभ्रक भस्म तेँ। c, ताम्र भस्म तेँ। ४, रौप्य भस्म तेँ। ३, सुवर्ण सस्म तेँटेँ। c, वंग मील शुद्ध तेँ। ४, हरतँल शुद्ध तेला ४, शु'क भस्म हाय भस्म सावर्सोंग भस्म प्रत्येक तोला c पीली कौही भस्म तोला ४. शेहाय पकाโย हुथा तोला ६ 'सव साथ मिलाय वकरीके दूधमे घोंट मोला बनाय चारौ सपुटमे रखपस मिट्टीोकर चालका यंत्रमे ४ पहर पकाना। स्वांगसीत होने पर सौश्ण निर्झाल घोंट कर रखना।
मात्रा ३ से ६ रतो प्रातः सांय छोटी पीपल और कलीमोचँ तीन तीन रती मिलाय शहदसे देना। खांसी कफ द्रय फेफडेका हृदयका रोग उर क्षत नादिमे गुणवकारी है।
स्वर्ण वसंत मालती वृहत् (र स) स्वर्ण भस्म १० तोला, उत्तम प्रकारके वरसाई मोतीकी विधि २० तोला, पूण च श्रोदय वडगुण ग घक मारित ३ तोला। काली मिरच ४०, तोला, यथावद भस्म रक्ख ८० तोला, सब साथ मिलादेर महावंगेसे मलहम जैसा विट बनाना। पथ्यरको खरलमे घप डालकर उपर कामरी निचूके रस डाल डाल कर घोंटडे रहना। १० दिन तक राते दिन
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घोटनेसे मध्वनद्रां स्नेह अत्यन्त दृढ़ा संध्रा नष्ट हो जाता है और औषध्रमेंं स्वादृ भी आ जाती है। तव अ धी रत्तीकी गोली वनाना अथवा अ धे आधे तोलेकी घोनठी वनानां। मात्रा २ से ४ गोली सथवा १ से २ रत्ती हाइड और घोटी-पीपलके चूणॅ के साथ देनें से श्वास वित्त कफ के प्रकुपका क्षय रोग, ज्वास, खांसी, जीर्णज्वर वमनाद मुख्घा, श्वसनार रोगमे' उत्कम गुण करती है। स्त्रति मेधा आयुष्य वारोरोग्य कांति पुष्टि सौर बलको बढाती है।
सिद्धा घेष्टा वृद्धत्स्वर्णेवसतमालतीं वरद । विश्वमूत्रय सुपे स्वदीयैः लेष्टगोदू सर्वेदषहदू ॥
स्वर्णं वम्ल त मालती नं. १—(र. स.) इसमें स्वर्णं मस्मके स्थानमेंं स्वर्ण'd्रा वसां और पूरें चान्द्रोदय के स्थानमें रससिंदूर डाला जाता है। और मुक्ता को शरद कब मून की डाले जाती है। थाकी विशेष कृति और गुणधर्मे ऊपर लिखी स्वर्णं वसंत मालती वृहत जैंसी ही है।
स्वर्णं वस्ल त मालती नं. २—(र. स.) इसमें स्वर्ण मम्र्म या स्वर्णको वच्के पांच तेला, स्वर्ण' मार्शिक रसक्त पांच तेला कम्मं मूल्यके मेतती २. तोलय, समी सिगरफ ३० ठोला, चाली मिरच ४० ठोला, हुद्द स्वपंर ८. तोला । जवकेां मह्ववनमे पिंड वनाकर १८ दिनतक निंडूके रससे घोटनेसे घेठा अथ नष्ट हो जाता है। पीछे एक रत्तीके गोली अथवा अ धे तोलेकी सोगठी वनाकर उपये'गमे' ले। घेराठो हो तो १ से २ रत्ती तद पानीधे घोसकर हपमे शहद और घोटी पीपलका चूणॅ ४ से ८ रत्ती मिलाके देन उपर इच्छा हो वह पीवे नेष्टी २ मे ४ दी जंती है।
क्षयक्नानांकु रस—(रु. र.) पारद नाधुक स्वर्णे अथ्म मुक्ता पथ्या स्कांटिक-प्रवाल और माणिक्य प्रत्येकको पिप्पिदि, अभ्रक भस्म, लेहं भस्म, रौप्य भस्म, तालच श्रोदय, भिद्ध हरताल भस्म प्रत्येक चार चार तोला, रेठी वं पल, काली मिरच, पीपलामूल, हुग'धी कुष, कचुरा, कपूर काचली, कायफल शोंगी, लताकरजके मीरटी नांरी, लौंग, इलायची, दारच नी, घयाधाका मूल, शतावरी, विगारी कंद भसगंघ, तुलसी वीज वनक बीज प्रत्येक दो दो तोला, जव मिलाके तुलसीद्रा-रष, अतरसका रस और व्राहीका रस प्रत्येकका एक एक भावना दे कर मृदु माने पर घेठ कर इसमें अथवर ९ ठे'ला, रस्मतूरी १ तोला, फेशर २ तोला सौह मीश्रवेचनी -कपूर ४ तोला मिलाके घोटकर रस्स्ना ! मात्रा ६ से ८ रत्ती पादद, घृतसे अथ कुस्से दी जाती है। इसकें सेवनसे क्षय रोग, जीर्ण ज्वर, हृद्रय और वित्त कफ्ड़के रोग नष्ट
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रहते हैं' । और हृदय वघ होनेका ( हार्ट फेल्येर ) का भय नहीं रहता और फेफड़ों। आये मज्ञाशय आदि अशयव बलवान होते हैं। विभिन्न प्रकारके प्रमेह रोगमें भी अच्छा गुण देता है।
स्वर्ण भस्म—(यो. र. स्वणयुक्त) पारद १० तोला, गंधक १० तोला, ताम्र भस्म, २० तोला, अज्रक भस्म लोह भस्म, स्वर्ण भस्म, लौह्य भस्म, शुद्ध कछुआग, कांत लोह समप्रत्येक १०-१० तोला । सब मिलाकर हंसरादिके रससे १ दिन मदन कर एक एक मासकी गोली बनाकर सूक्ष्म जानेकर काचकी शीशीमें भर उसे कपडमद्वे ढक वाथुकायंत्रमें १२ घडा तक पकाना । स्वांगशीत होनेसे शीशीसे चम औषध निकालकर घोट कर रखना । मात्रा २ मेस ४ रती, छोटी पीपलका चूर्ण ६ से ८ रती, अदरकका रस अथवा तेला सब मिलाकर खाना । उपर दूध पीना । तद्य, आमवात, घनुर्हा, पं गुवात, आडयवात, अभिम्रात्य, कुष्ठ, विद्रधि, (केन्सर) कास, श्वास, सब प्रकारके ताप, पाडरोग, इत्यादिमें उत्तम गुणदायक है। सेवनकाल—स्निग्ध आहार्ये रसायनसेव्यते स्वल्पसूत्राति।।
कृं गाराम्र—(स्वर्णयुक्त र. वं) अज्रक भस्म तो ८, पारद, गंधक, पकाया हुआ सेन्धागा, नागदन्तार, जांयपत्री, कपूूर, लौंग तमालपत्र, स्वर्ण भस्म, लत्येक एक एक तोला, तालीसपत्र, नागरमोथा, कुष्ठ, जटामांसी, दारचीनी, घाइके फूल, इलायची सेठ ढालचीमिरच, हरड रही, चहेडां यांवळां, गजपीपर प्रत्येक दो दो तोला, और छोटी पीपल १० तोला, सब मिलाकर तुलसी के रसमें घोंटकर सुखाना । आयपत्रों कपूूर लौंग दारचीनी इलाायची ऐसे शुद्धधी प्रयोग पीढेसे डालकर छोटकर रखना । साहद और घृतके साथ ३ से ६ रती तक देना समय दिया जाता है । क्षय श्वास कास पीड उदररोग, शोय, जीर्णज्वर, स प्रमेहणी मदात्य, अकु्ष्ट इत्यादिमें दीया जाता है । बल और शक्ति बढाना हैं । इसके सतत सेवनसे मनुष्य नीरोगी रहकर सौ वर्षका दीर्घायुत्रो होता है ।
घासरकुच्छ—(र.स)१० रतल भइ्रवा (बाबा)के हरे पत्ते लेकर कुटरकर ७० रतल पानीमें उबालना । आधा पानी रहने पर कपडछान कर उसमें शुद्ध रतल २० डालकर पचानां । घट्ट होने पर उसमें नीचे लिखी औषधियोंचूर्ण हे। जांय तब दुसरे दिन उछले चीनाइ मिट्टी के बरतनमें भर देना । इसमें डाल-नेकी औषध—सेठ, सौंठ, चेलायची जीरा, जीरा, पीपलीमूल, काकडाश्रृंगी
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घुटकी, हरड़, धनिया, भारंगी, अतीस, लौंग, अश्वक भस्म, शंख भस्म झुत्ति भस्म, झुंईड़मली, घमाधर प्रत्येक दे। दे। तोला कुटर मेदकेले हवाढेले झानकर ऊपर लिबे सुताविक डालना। माम्रा ९ से ४ तोला तक हिदयरोग ख्वास दमा खांसी, केफड़के रोग आदिमें उत्तम गुणवारी है।
जातिफलादि गुटिका—( जाती फलादि चूर्ण ) (र. स.) जायफल, मायविडङ्ग चित्रक, सोंठ तगर, तालीसपत्र, शफेद चन्दन, लौङ्ग, चैलौंजी जोरा, कपूर, हरड़, बहेड़ा, आंवला, काली मिरच, छोटी पीपल, वशलोचन, दालचीनी -तमालपत्र, इलायची नागकेशर प्रत्येक तीन तीन तोला। भाग वे. २३ सबके बरावर चाकर मिलाकर शहदमें ६-६ रत्तीकी गोली बनाना। मुखमें रख कर रस उतारना अथवा ४ से ८ गोली की मात्रामें देना। कास खांसी दम श्वासग्रहणी अतिसार, मुरहा, पीन्स, प्रतिश्याय, मन्दाग्निमें गुणवारी है। शहदमें गोली न बनाकर चूर्ण रखा जाय तो इसे जातीफलादि चूर्ण कहा जाता है इसकी मात्रा २ माशा।
महालाक्ष्मीादि तैल—(लाक्षादि तेल) (र. स.) (शां उ. सि.) पीपल या अन्य वृक्षकी राख ले। ४० कुटर उसमें ९। सेर पानी डालकर पकाना। चतुर्थींश रहनपर कपड़छान कर उसमें तिलका तेल रतल पांच डालकर पकाना और इसमें दहीं का पानी (मस्तु) रतल ५ डालना और कुष्ठ, महुयष्टि, देवदार, हलदी, नागरमोथा, मेरवेल, कुंटकी, शफेद चन्दन, प्रियङ्गु, हिमकद, (दधियोल) हेमकंद, रास्ना प्रत्येक चार चार तोला लेकर दहींके पानीमें पीसकर तेलमें डालना। पीछे घीमी आंचसे पकाना। पानीका भाग जल जाय जब कपड़छान कर रख लेना। इसके मदन करनेसे जीर्णज्वर, कास, श्वासग्रहणी अतिसार, वातचक्रों, वृद्धों का और शगर्भा स्त्रियोंका पांव और शरीरका झुर्रियां मिलता है। वच्चोंका मदन करनेसे शरीर नीरोगी रहता है।
क्षयरोग के सामान्य प्रयोग
नीचे लोहे प्रत्येक प्रयोग माछी, ख्वास, दमा हिदयके सिन्न मिन्न रोग, क्षयरोग, सदों रफ फेफड़ोंके रोग आदिमें दिये जाते हैं और वलवृद्धिक पौष्टिक है। क्षयरोगी के लिये एक सालके पुराना घान्च, द्विरल (वठेठ) विगेरे खाना गुणवारी है।
१ अश्वक भस्म वचहपुटों तो. ०१, शावरसिङ्ग भरम तो. १, महालक्ष्मी विलास तो. ०१, क्षय क्ठार्क तो. ०१, छोटी पीपल तो. १२ शहद घीच मिलाकर
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४८ पुट्टी वनाना । एक सुगन्ध एक चामक़ी य मर्दा हि'नेत्रादि चूर्ण' के साथ मिलाकर देना ।
२ महाराज मृगाङ्क वटी ९, अन्नभ मस्म ९=० पुट्टी ता २, तज्ज्ञ पपं'टी ता ९, सुगण्हें रस त मालनी ता ०॥, और हेर'टी पीपरल वटी ३ । सम पीसकर ६४ पुट्टी वनाना एक सुगन्ध पन्न का मर्दा हर्दने या दूधने ठेकर डार वास्तलेह ९ ते ३ तैल खिवल ना । उपर दूध पीना ।
३ त लचीनी, शेठ नागरमोथ, हल्दीची धनिया, लोंगला, दालचे और अश्मोद्र सग समासमभाग ठेकर चूणट कर पुढमें घोलनी वन'ना । उपका कुखां हुक्कामें या चुम्मीमें पीना ।
४ बहुवाचा (वाचा) मूल, जीवंती (खरखोडीया फल) पद्मती (ग्वप) के पाँचाग मुलेठी का मूल, कचूरा, हे'टी कट हरीके मूल, सम समभाग कूटकर एक तैलमे २० तैल पानी डालकर रां'वना । सुगन्ध सपट छान कर अथेलना या दिसी तरहके मर्द दे। हरे देना।
५ हे'टी कटहरी फल, रक्खी कटहरी फल मेघ उपली (भूम्याफलको) गेरखसु'धी, हल्दी, तिलपण्णी (तलकणो) रसौ'त (रसव तो) सम साथ कूट रवके वरावर गुगळ मिला र गुड़से खो'गठी वनाना । और इसका ख भां हुक्कासे पा या चीलहसे पिल ना । दिनमें दो तीन चके पिल'ना ।
६ दिव्य भृप २- तैल। तयाखुकी सूंठी पत्ती ९, हेर'ला, जुग ची जूठ य तैल। सकरौं कूड़ कर उन्में पन २- तैल। हिलार महिन कूटकर रसना हूभआ हूकर से यां नी'मे प न्ते क्षय अथि रे'गमे शुन्त लम हेतो है ।
७ कुटाही छाल ३-हूसाके पान भारगी और जीरा समभाग कूटकर ९ तैल'का कत थ गनाकर हर्दड ढालकर पिला'ना ।
८ अभ्रक भस्म ता ०, मि'लाजतु हये'ग ता ९ सुगण्हें पर्पटी ते'. ९, 'वात.चिंतामि वृ'त्त ता ०॥ सत्तामृत ले'ह ता ९ लोंगो मि'च तेहो ३, सब स'य मिलोकर ६४ पुढी वनाना । ३टकारो अन्नलेह अथवा च्यवनप्राश अथवा द्राक्षा'वलेहके साथ देना ।
९. अजु नकी छाल, आरण्डा मूल, अद्दु'सां'डे पान, जसग च दाखहल्दी, मा खां'वली, सब समा'न छेकर कू'टकर रस'ना । एक तैलमें २० तेल' पानी ढाल्ह रातकौ मिंग रस'ना । दिनहा दो चके पिल ना ।
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७-नमक ते. २० का पोषकक भाकफे दूधमें मिलाकर सुखजाने पर पानी वाला नलियर (श्रिफल) के उपरकी रेपा खव निकाल कर आंतके स्थानमें छिद्र कर पानी निकाल कर डपमे नपक मर देना। जितना समा झाकफे-दराव दाष कर मरना। पोछे छिद्र के स्थानमें जुन्त दे कर नलियरकी सात डपडमिड्रू करना। पोछे गजपुट अग्निमें पक नां। पैछे सेल कर टोपरां (टेपर) के साथ नमक निकाल देना। उसको पोछ कर रखना। ७० रत्ती दे नित्य लेनेसे ताप शांति हेतु उत्तम लाभ हेतु है।
खांसी कास कफ!
उद्दानानुगत प्राणो भिन्नकास्यस्वरेण चुद्यते।
नरेधित सहसा ह देहप कास्लोचिद्रः॥
कारण:-पसनरिमें घूल दगेरह पदारथ ज नेधे, आती हुड छोंकको रखनेधे दाद करनेधाले गरम ठंडा, वायुदर्ता रातवाले आदि पदारथं खानेधे स्नान करनेधे, ठंडा पवन लगनेधे, आधातेधे, चोट लगने, भस्मेधन, गरिष्ठ भोजन, अजीर्ण पर भोजन करनेधे आदि कारणेधे खांसीका रोग उत्पन्न होता है।
बिहून- छठेमें शूलां जेसा दर्द कर खासी आये। कप कषसे छुडे जव कुछ अच्छा न लगे। छारिमें दे डा ताप रहे। अक्सर अमानन। रेमें छोटा अकुं चुमला दे एकष लगे।
वायकी खांसीमें: हृदय गला और मूल सुखा हेतां है। हृदय पसलियां और मस्तकमे घूल निर्देधे। घमराजट, बेचेनी, डर बैठ जानां, खासी आंधी वेग अधिक, पीडा हेा, दद' हेा, खासी सूखी भावे, स्वर बैठ जाय। दस्त सुखा हेा।
पित्तकी खांसी:-छातीमें जलन, ताप कुखार, मुखमें शोथ, सुलका स्वाद कडुआ, तृपा शमिक, पित्ते र गका तीसरा कडुआ वमन, रेगीधा रंग पीलापन लिये, आंवीआे जारन छारिमें जलन दाद कफ पीला दस्त पतला।
कफकी खांसी:-कफ निस्सलनेमें कछ कष, छातीमें दर्द कम, मस्तक दिमाग कातिमें दोर्द, गलेमें कफका अधिक जमाल सुख चिकनां छरीरमें जुदती मलने पीनम वमन शरिंचि दस्त चिकना रफ सफेद।
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वर.क्षतकी खांसी—अपनी शक्तिसे अधिक वलका काम करनेसे, अधिक माघण, अधिक गाना, भविकद देवत उठाना, अधिक समय तैरना, वेल घेढा मारदि पछुके साथ रढना उनके काजुमे रेनके लिये वलका अधिक उपयोग करना आदिसे हृदयमे क्षत वण होकर खांसी आती है । इधमे कफ पीला घाला सूखा गांठेवाला सेडा हुशा पहता है । कफ निकालते गढेमे छातीमे दर्द हे। छातीमे छाल निकले, खांसी दमा, तृषा आदिसे होकर दिनेदिन शरीर क्षीण हे। छातीसे और पित्तावसे दूषन गिरे ।
क्षयकी खांसी—अतिविषय अनियमवित भोजन वाजह चीजोकी आदत, घायका अधिक व्ययसन, अधिक दूषित शोक, चिंता मानसिक शंताप, अमुक रोगसे क्षोणता आदि कारणोसे क्षयकी खांसी होती है । इसमे दूंगियावाला पीला हरा सफेद कफ गिरे, कुसार रहे, दमजोरी अधिक लगे, खुराक पर अरुचि मदामि, गांठोमे दर्द आदि चिन्ह होते है ।
पथ्यापथ्य—जो रोगी वाते रोगोसे अपने शरीरको ठंडा लगाने न बना, शीत खावु हो या शरीर ठंडो रहता न हर शकता हो तो गरम या मोटा कपडा पहिनना । शारदी करनवाले, गरिष्ठ पदार्थ, खाट शकर के मिशन, अजीर्ण करनवाले अम्लपान नहि खाना । शीतंग नहि करना । पवनका धक्का नहे इस प्रकार चल्ना नहि । सींगदानेका-मुं गफलेका तेल अचरर लाल मिरच नहि खाना । बलदी पावन हे शैवा ताजा वनाया खुराक ठेना । दूध स्वच्छ हे तेना ताजा वारेषण डाले मिले तो बिना गरम'किरे बिना शाकर ढाले पीना । दूधमे थोड़ा नमक ढालकर पीना । दूधमे गुड मिलाय पीना भदछा है । खीचडी घावल सच प्रकार दाल नेहु नाजरी जव चना भादि ल्वाना । शाकमे सुरण दुधी तरीश करेला ये गन्न परवल मि मेभी चोलाइ आदि, फलोंमे चीफू मीठे सेस जो सफरजन हरी द्राक्ष वपैया आदिस । सुसा मेनामे द्राक्ष वादाम पिस्ता आदि गुणकारी हे । चा काफो का व्ययसन हे तो बिना पानी ढालते निखारस दूधमे याही शाकर चाय या काफो डालकर एक या दो वरन पीना । हंमकेकी तमाखुमे गूगल धृत गुड अपवा हिड्नु के मेटेसे या अन्य साधनसे सेक कान्ता। शरीरपर महानारायण तेल अथवा मृ'गराज तेल म'लीश करना ।
रसेन्द्र गुष्टिका—(र स ) पारद ग धुक अश्रुक भरम् ताम्रसम्म मादनवतोल लोह भस्म मारितप्त कालीमोरच सट चंदन माग लेकेर स्वाय मिलाय मोत्ती
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निग्रहौ पद्मजना मूल्ठी मूल निञुरस हाकका फुल कारमाची प्रतियेकके रस या कवाथसे एक एक भावना देकेर दे रतीकी गोली बनाना । मात्रा २ से ४ माशा सितोपलादि चूर्ण अथवा तालीसादि चूर्ण मिलाय महादू दूध या पानीसे देना । सब विसर्पको शांसीमे लटके रे'पमे गुणकारी है ।
गुण महोददधि—(र. र.) पारद गंधक लोहभस्म ताम्रभस्म चगंधरस यंत्रक भरस्म शुद्ध वछनाग दालच्चोने प्रत्येक एक एक भाग, तमाल पत्र छोटा छेटी पीपल कालो मोरच नागरमोथा वायविडंग नागकेशर निगुंडो चक इलाायची पोपलीमूल मुरदशोंगो वंशठोाचन प्रत्येक दे । वे भाग लेकेर जलविप्लवीं (रतवेलीपोए) तीन्यू और तुलसीके रसक एक एक भावना देकेर देा रती की गोली बनाना अथवा घेटकर रसवना ६ से ८ रती अथवा ३ से ४ गोली राहर या दूध से देा या तोन समय देना । यांही स्वास छाती के फडोदा रोग स्वरनली स्वरनलोका मूजन स्वरभग भादिमे गुणकारी हैं !
मकरवट्टी—(र स') शाकका फुल २० तोला लवंग ८ तोला छोटा छेटी पीपल कालो मोरच जायफल प्रत्येक ५ पांच तोला संथ मिलाय पानीसे ३ रत्तो की गोलो वनाना मुलमे रख रख उततारना ।
मधु यष्ट्यादि गुटी—(र. र') मूल्टे मधु यष्ट्री का घन (सौर1) २ तोला, तज तमाल सोंठ दोपल कालो मोरच लवंग सावरसो ग म.म मुलकित अस्म कष्ठ प्रत्येक चार चार तोला अजदरच के रस मे गोली ३ रती की बनाना मुखमे रख रख उतारना खांसी स्वर म गलो नलोकी सुतन सरहो फमटे ।
कुंगाराभ्र—(र.स') अर्कक म.म निशाद्र तोला ३३, दशूर डायपत्री नागरमोथा गजपीपल तमालपत्र लवंग जटामासी नालोषप्ती तज नागकेशर कुष्ठ घाइफूल प्रत्येक एक एक तोला, ह. ह. आंवला बहेड़ा सोंठ पोपलछेष्टी काली मोरच प्रत्येक आढ़ा आढ़ा वेआल्या इलायची २ तोला, जायफल २ तोला, म. घक x तोला, पारद २ तोला समभाग विधिवत घोट कर अञ्जसी (वाश) के पतके रसभी भावना देकेर सुस्स जाने पर डे'ट रसपना । मात्रा ३ से ६ रती दिनसे देा या तोन वार शहद दूध या पानीसे देना । पंधे तांबूल पानमे अथरख देा माशा डाल हर चाव कर खा जाना ऊपर पानी पोना । वाच स्वास हिक्का वमन तृषा पीनस क्षय रोगको मिटाताहै । नेशरोग प्रमेह शूल अम्लपित्त षाड्दोग रक्छदाव आमग्रात भादि रोगमे मो उतम गुणकारी प्रतात हूपा है बल्य करा नपोशर और पुष्टता देनेवाला है ।
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घाजीकरण वल्येर ललनाजरनकिस रंजनेः मेरगी। ज्वरार्त्ताभः सततं मारोग्यायु:सुखवर्धनेः भवति ॥ १ ॥
मुक्ता म्नायन—(चरक वि अ म्टो. १२३ से १२५) मुक्ता प्रवाल वेधयं जांत स्फटिक प्रायेकरी विष्ठो, श्रृध्द काला सुरमा, पारद गंधक आंड़ले फूल इन्द्रायो नमक से'घानेम, ताम्र भस्म रौप्य भस्म, शेइभंम कमल पुष्प, घसे'द्रम (आयस्ल, गणेशीभ अपामार्ग)वीज्र सर्व समभाग लेकर साथ मिलाय रख्ख थे। प्रातः साय ३ से ६ रती मात्रा शहद घृतसे लेनेसे कास श्वास हिक्काजं पामन होताहै और यह थंजन करनेसे तिमिर काचं नीलीक पुष्टपक आंखका मेल चिपड़ा आंखकी खु=लो, आंख उठना आदि रोग मिटते हैं।
म्त्रेश्वरादि गोल्ली—(र सं) हेरघार या कल्या ८ भाग, पुष्टपरमूल काकड़ाजो गो काथफल मरगी, हरड़, लवंग छोट, छोटी पीपल कालीमोरच अतिस अजग्नायन, घमाष्ठा, मिठोय, छेष्टा कटहरीका फल, घही कटहरी फल बहिदा वम एक एक भाग लेना। साथ मिलाय कर कपूर ८ भाग मिलाय पानीसे गोली बने त्रपमान। दोइस व्रत स्वरमगं हिक्का आगदम भुगहारी है।
मिध्रण १ — अभ्रक भस्म तोला १, ताम्रपप्टी तोला १, चेरघठ पेरारी पीपल लेओला १, साधारविंगा भ म तोला २, हल्दी तोला ३ मव साथ मिलाकर ६४ पुढ़ि क? २ वहन शहद दुष माँ पानीसे देना। सव प्रकार के खांसी के रोगमें देते। प्रत्येक पुढ़ी के साथ ३ से ४ माशा -चिंताफलादि चूर्ण मिलाकर लेनेसे अथिक लाभ होताहै।
निंश्रण २—ग्रु चक भस्म तोला १ शृंगारभ्र देना १ मुरणं पर्पं टी तें नु " शुगर माओक मष्प तोला १, अं मरस वृद्धतं तोला १॥ सेंंठ तोला १, मधु साथ मिलाकर ६४ रती मुरादे। ये वहत लूग शहद या पानीसे सव कास श्वास मे उत्तम है। प्रत्येक पुढ़ी के साथ तालीसादि चूर्ण ३से४ माशा मिलाजर लेनेसे अथिक लाभ होताहै।
श्रेपचान्यादि वरटी—चोपचीनो बही शेंफ सुर्जं स्वार एयरंडे बोलका माज' कालो सुमली समभाग लेकर गौमूत्रमे गोली ३ रतीकी कर १ से ३ देना।
अद्धफेनादि वटी—अफीम छोटोंपल अद्धंसा मूल भार मो सेंठ काली मिरच जंवगा दालचंनी दपूवर्काचलो जं'यफल जन्सार मूलेठी मूल नमक अजमो जायफल ग हल्दी सद समान भाग मिलाय शहद्मे गोली ३ रतीकी बनानां १ से ३ गोली मुपमें रुक्ख रस नत्याथना ।
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लवंगादि चूर्णं—नोलो—लवंगा ४० तोला बड़ी छोटी पाटोपरल कालोमिरच अडूसी पत्र छोटो बड़हरीफल नागरमोथा कचूरा पिपलामूल इलायची जरखवार कर्कंट वंगो कुलींजन प्रत्येक दस दस तोला साथ कूट रखना साधंसे २ से ३ माशा श्वास दिक्का मिटे । शहदसे या मधुरसे गोली १ माशाकी बनाना ।
वालकफर्ति गुटिका—(र. र.) प्रथम तोला १०, मधुक तोला १०, सौंठ छोटी पापर कालोमिर्च वायविडंग जवखार सोहागा पकाया प्रत्येक तोला ८ दोपहरी दाख एड़ो के तेलमें तली हुई तोला २४, करया तोला ५६ कर्कंट वंगो कपूर काचली अगर मोटाकी गिरि (कांकचोय'ना) घोट लतादरज वंशल लवंग प्रत्येक तेला १, अजमाल गोटा नीरी शुद्ध तोला २० सब साथ मिलाय सुंगराज के पत्ते के रसमें मुरा जंसी गोली बनाना वच्चोंका १ में २ गोली पानीमें पेस देना कास वदहो श्वासो कफ शारसो दमा छ'तो में' कफक। जमाव आदि मिटते है । और बढ़ी उम्रके लोगोंका जसेह गोली मरमजलमें दो जाती है ।
महाराजमृगांक—(र. रं. क्षये) स्वर्णभस्म तोला १, रससिंदूर तोला २, मुक्तापिष्टी तोला ३, मघनक तोला ४, स्वर्ण माक्षिक भस्म तोला ५, प्रवाल पिष्टि तोला ६, पद्माया मोदागा तोला ७, माक्ष शुक्ति, कौड़ी साबर धतूरे ठेेद वैक्रांत शिम गा भस्मक आाठों चीजों'की भस्म प्रत्येक २ तो तोला छेक। सब मिलाय नीमके पचांगके क्वाथ या रसमें ३ दिन घोट गोलाकर रख पेट घागा वोषदर उपर मिल्टोका टेप एक एक आंजुल हरना लरण य ग्रमें गोला रसक २४ घटा पकाना । स्वादिष्ट होनेके पीछे निकाल कर घोंटकर रखना । प्रातः श्वाय ३ मे ४ रत्ती छोटी पीपल और काली मिर्च के चूर्ण ६ से ८ रत्ती के साथ शहद घृतसे या दूधसे दिनसे २ या ३ समय देना । ४० दिन सेवन करनेसे क्षयरोग मिटता है । रोग अधिक बढ़ा हुआ हो, देनों फेफड़े गिराह गये हो, तो रोगीकी शारीरिक स्थिति रोकाक शरदप देतकर आराम दे। जबतक देते रहना । इष औषधसे कफता हृदय फेफड़ेकी सुजन दर क्षत खांसी कफ नींउर मिटते है । रोगी बलवान पुष्ट होता है ।
शिलाजतु प्रयोग—(र स.) मोतीजीत वायविडंग टंकणभस्म १०० पुटी बड़ी हड़ड़ स्वर्ण माक्षिक मरम वद समान भाग लेकर घोट कर रखे । ३ से ४ रत्ती शहद घृतसे देनेसे कय वादी श्वासो दम दमजोरीमें उत्तम फायदा होता है ।
स्वर्ण वपंष्टि—(र. र.) सेनाका वक' (पत्ते ४ तोला लेकर ३२ तोला शुद्ध पारदमें घोंटना सेना मिल जाय जव ३२ तोला शुद्ध ग'क्क ढेन।।
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कड़ाहमें १० तोला गायका घी लेोढ़ पीछल जाननेपर उसमें ३२ तोला गंभक छोड उसक रस हे जानेसु सुवण पारदको पिप्ति हतल कुर लेहेके तवेस्सामे हिलोना सम मिल जाय भल हरे गौौवरके उपर चिछाय केलौके पवै पर तवरासे ढालक उपर पत्ता और हर गौवर दाष देना। २४ चटने के पीछे गौवर अलग कर ढेलीक २ पतों केवीष की पपटी निकल कर छोटकर शीशी में भर देना। मात्रा देते
रस्सी ३ से ८ माषा त्रिवेधालादि चूर्ण और काहड़ घृतमें देना। सथवा चोठ्ठ प्रकृति पे पल ६ से ८ रत्ती से मिलाय आहदसे देना। क्षय रोगमें उत्तम गुणकारी है। और स वृदणी अतिसार म टरामि पाडु जीर्णज्वर और व्रुधोोग जवाव वच्चे क्षोयं श्वासि मथकोि किमो मी रेगकी कम्मोरे मे कमताकानमे कशता क्षोणतामे परम गुनकारी है।
श्वास दमा
क्षार ष—गपन, विप, निरपविकार पांडुरोग, अजीर्ण, ताप धूप, हुमा, यम मथानमे आघत, ठढ पवन छातीमे लगाना, म धकका युनाओं, भाषांत, ठढे पानीषे नहाना आदि अनेक कारनोसे यह रेोग हेाता है । कुफकुसेोंके चाहरकी पतली धमनी नाडियों विगडनेसे उनमें साहररी वास्का यथेष्टि आगमन हेाता नही और कुफकुसेोकी विसली दवा मरगत्मे वादर निकल ससती नही । इष कारण यह रेोग हेाता है। वात है।
चिन्हु—किसीभी ठंढी वस्तुतुम, इस्की वेधोम भार किसीके सेव श्रृदतुम यह रेोग हो जाता है और बहुत वपोीतक रदता है । प्रत्येक वषमे अभुक समय प वमड भाता है । बहुत करक रातसु समय ज्यादT होता है । जब रेगी नोंदसे जाग जाता है। छातीमे एक प्रकोदरT आवाज निकलता है। पहिले सोखी भाकर दम बढता है। कफ निदल आने मे आराल रहता है। स्वरयलीमें एक प्रकारक भावाज निकलता है। पहिले खासी आकर दम बढता है। कफ निदल जानेस धोडा भाराम रहता है। छानिमे घबराहट, संकेच, दाब थडका, वलयन, पोड़ा, तुद आदि हेाते हैं । हिरने किरनेमें तकलीफ होती है। पीछली रातके तुद गो परवदता है। पाचन अच्छा नही हेाता । दस्तकी बध्जी रहती है। खांस चढे पस्न पहिले खोसी बहुत भाकर रेगी वेचैन हो जाता है। पसीना
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लघता है। संदर काने वाले माथ टेढ़े बैँ- वद्दार त्रिवलनेव'ला द्व'स्थ लघा हेतु है। लयनेमें दद प'ढ़में और क'फटमें ग्रह, काम चरममें निरयाद सुखसुधा चित्राप्रस्त आदि चिह्न देते हैं।
पथ्यापथ्य -अजीर्ण हेाने न देना। य'द्दी करनिव'ली चीज छे हन। श्वोंद मह'की चीजें, वचाके सींगहें, मूं'गकल्कीरा तेल घो, रदहो लाल यादरकनो, बरफ स डि नद्दीं य ना। रोमोघे सुर्यत हदर प्रकाशावाले कमरेमें रहना। आवश्य-पास पंथो मे'ह न होने देना। जापरण नहीं करना। घी और चरपो'ल'ले पदायें कम याना। माग, घेटी गक्शो, करनी इंदद दूर लमचातक है। उछहा और सामनें देखालो पथन लेनो नहि। प्र'णाय'म चरना, एक समय सेजन करना। गरम जलचे नह्हाना।
भ्वास कुठार (ने ) = पु १५८ )—परद नवक शुद्व द्रव्य टरडण शुद्ध मनःशील, प्राचीन वेल। - पाँच घोर कल्कां मिलच तेला ४०, सेठ तेला, २, छेठी पीपल तेला २, नो मिलच वेलो २, सब जाद मिलाके ८ दिन तक मे'ट कर खे। मत्रा—१ से २ रती द्रथ्या चूना लगाके पानमे ढाल तिलाना। दिनसे'र दा २ वार देना डपर ३४ प वें। श्वास दमा कास श्वांसो, मटार्ति, कफके रोग सूखः अपष्मार मृगीहो देना। रे च!! रती दिनीं मरचा चून लपाये प'नमें प'मलदर प्रचादो हर पिलावे। मदच्तोंके कफ सरदी भराणों वही लादीमें सरछा फायद हेतो है।
भ्वास फालेश्वर (महाकालेश्वर) ( ७ म )—पारद, न वक, अभ्रक मष्य, ताम्रभस्म, टांकभरस्म नगमष्म मालिक भस्म, हिगुल शुद्ध कुरचला जादफल जावपत्रे, लवन म, तज, इलायची नागकेशर, हदक लीम, वंशलोचन, समुंद्रफे'ण शुद्ध, सेंंठ प्र'थेक द्रय दो दो वेलो, विडंग १० ठेलों, काली पिरच ६ तेला, छेठी पीपल ६ वेलो सम स'भ घोटकर मदरशकै रखकी 9 मावन देकर सुत्ताकर घोट रखे॥ म'त्रा १ से ३ रती शहदसे या वाषा-वलेहने देना। सय प्रकफकी वाढी दम क्षय रखके रोग मदिन अनिद्रा कफजोरी शांति मिलते हैं। नकफ धाती है।
ताम्र पर्पटी—(र. म ) ताम्र मदन तेल" १२ पारद तेला " ४, वधक वेलो २४ पहिले म चकके। पिक्वाल कर रुच ह शे जानने से उस्मे पारद डालकर तवेयाथे ढिलाना। मिल जाय अव ताम्र भस्म हाल कर पप'टी ही रोतिमे गेरपर और के केलोंफ पतते के बीच दसाकर १४ घण्टे के पीछे ननकल कर घोटकर
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उसमें छोटी पीपल का मद्दीन चूर्णं ताका १२ मिलाकर घोंट कर रखना माज्ञ रे से ४ रत्ती शहद घृतसे देना। श्वास स्वाभी हृदय के रोग शारदो कफ टररोग घूल पेटकी पोड़ा गुल्म आदि मिटते है।
सूर्यावर्त -(र घ) ताम्र मरक पारद गंधक प्रत्येक तोला १०, माक्षिक शुद्ध भस्म सोठं पोपल काली मिर्च लोंग इलायची तेज प्रत्येक तोला ५ गुग्गल साध घोंट घर रखना। ३ से ४ रत्ती तुलसी के १५-२० पत्ते के साथ मधवा तांबुल पानश्री पत्त्रों के साथ देना श्वासका रोग श्वांसी हिवकी मिटे।
श्वास क्षि न्तारमणि घृ त्तु-(स्वर्णयुक्त र स) पारद गंधक ताम्र मरक शुद्ध भस्म शुं ख भस्म प्रत्येक पांच पांच तोला, सुवर्ण मष्म रौप्य मरक्म मुक्ता विष्टी प्रत्येक एक एक तोला, माक्षिक भस्म तोला ६, शहदआगा चातननाम रोठ पोपल क लों मिरच्य मनशील कनकप्रोज प्रयोठ चार वार तोला श्वाम मिलाय घोंट कर छाती पर पहों। करदरको के फलके रसचों जिग्रु हो। रसचों श्वास और अदारख की एक एक भावना देकर सुखा कर घोट रखना मात्रा ३ से ४ रत्ती शहद द्वतमें या दूधसे या शहद से देकर पानको पत्ती दिलाना। इसका धुंआं मो चिलममे पिलाया जाता है।
कामदेश्वरारघ-(र स) अभ्रक भस्म तोला ३० पारद तोला १० ज त्वक तोला ९. रसपत्दूर्वा तोला ४, कांस्य मरक्म तोला ५ सर्व साध मिलाकर घोंट कर नींचे की वस्तु के कत्राथ को ४ मारना देना। भागंभी दन्कफ पत्र महसी कमौदी चकाउन नीम निगु'ड़ी पोपलीमूल शटटरख चिच्रक चरदत तज लोण प्रत्येक तोला ४ लेकर कूट कर ४ भाग कर एक भागको 'हनाय कर इक्ततरह ४ भावनग देना पोछे सुखाकर घोट रकना। मात्रा ३ से ४ रत्ती शहदसे देना। श्वाप छाती के रोग छातीको कफजोरों खांसी वच्चे के द्रो'खों हृदयरोग श्वारो पोन्सम जुकाराम आदिमें अचछा लाभ देता है।
श्वास गर्जनिध -(दस्तूरीयुक्त र स) ताम्रभस्म पारद गंधक प्रत्येक तोला १०, अभ्रक भस्म मूलेठी मूल सोंठ पोपल पोपरी मूल तथा मिरच लेंग इला यची केसर कुलिंजन शहलकर तज न दन का ठेल मधवा चूरा प्र-येक एक एक तोला सामरमिग भस्म तो ६, मल्ल भस्म तो १०, कस्तुरी तो. २ पडि्टे पारद गंधक ताम्र भस्मक प्र-येक वचाकर हस्सरी नक्त दिलाना। इस किषमका श्वास दम दांसी हृदयरोगमें उत्तम सुखकरारी है।
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वातादि क्वाथ—( र स ) सोंठ, पपड़, हल्दी, चिरचिटा, गिलोय, मारंगो पेंडल, सोंठ, कटहलोछामूल, घन'मगं लेठर, कुटकर ९ तोलाशा क्वाथ कर पिलाना ।
ऊर्ध्वश्वासादि—(रच) शुद्ध पारद १०चकं वाग्र भस्म ठे'हंमरम, वंगभस्म, चित्रक सोंठ, छोटीपोपल, काली मिरच, अजगंध, हरड़, बहेड़ी आंवळा, छोटी कटारी मुल, हरीतकी स्फटिकरा मतीरो लहसोद, हतंभा नागकेसरेभ, कनकु चोख, रैंशब्द जवाखार, इलायची जं'रा, मुलेठी, असबायन, चीनोंकवालां, प्रत्येक १ एकताला, करतो खुप ५ भाग विषया व मात, शोर गुगळ ५ भाग मिलाकर वटी कटहरी में रख्खे भावना देखर दे। दे। रतीको गोली वनाना अथवा सोंट कर रसना माथा से से ४ गोली अथवा ६ से ८ रत्ती दे। या तिन समय पानोंये या हद्दमें देना ।
विंनामधि मृत्र—( र.च ) रसना, यलाबीजक, पपृकंष्ट, देवदारू, हरच, बहेड़ा, आंवळा सेठ पंवर, द्राली मिरच, वायविडंग घमभागसे मिलाना ! दे। समय ३ से ४ माशा शहद अथवा बी के साथ देना ।
श्वास के सामान्य उपाय
प्रयोग १ श्वास कालेश्वर वटी ०॥, सार्वकृिंग भस्म तौ। ९, अभ्ररच टेर। ०। अष्टांगृत्र पप टो तौ। ९। हिंग हेर २ रत्त सोंध मिलाकर ६४ पुढी वनाना । दे। चहल वामालिदेर अथवा शहद सध्या पानी डे साथे देना ।
प्रयोग २. ताम्र वर्पटौ तौ ०॥ शुर्णो दमंत मालती ०॥ अत्रक भस्म तौ ९ शुक्ति भस्म तौ ९ शार्कुटार तौ ९ सव साथ मिलाकर ६४ पुढी करनां । दे। सपच शहद या गनीसे ।
प्रयोग ३ अत्रक भस्म तौ। ९, ताम्र भस्म तौ। ०॥ त्रिकटुंघर पपटों तौ ९, चेसटपेरो पीपर तौ ३ ताम्रकृिंग भस्म तौ ३ रत्त साथ मिलाकर ६४ पुढी करनां । दे। मक्त शहद या पानींसे देना ।
प्रयोग ४ घतूरे का पान तौ ९ छायामें सुखाकर उसमें दिपक धूप तौ ४ और गुड तौ। ४ रत्त मिलाकर टीकिया वनाना । इसका धुआं हुंकरसे या चीलिपसे देना !
प्रयोग ५ यदिदेकी छालका चूर्ण सेर १ में ४ शेर गौमूत्र ढाल पकाकर घट्ट होनेसे दे। वा माशाकी गोली वनाना । २ से ४ गोली पानी या शहदसे देना ।
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प्रयोग ६ सनवावरत ३ से ७ माशा गठरियाके दूध से। ३० और हन्दी तो। सम साथ मिलाकर पिलाना ।
प्रयोग ७ देवदार, चलामूल, जङ्गमांसी समभाग ले स्वरके साथ पीस कर १-१ माशाकी टोकिया बनाना । सुखाकर टीडियाके म'य के श्रृतीने मिले कर हुदहुका या चीलमसे घृत पीन। ।
प्रयोग ८. दधामूलार्दि फंदाथ रसमूल वच्यृङ्ग राइत। छोटी पीपल, सेठ पुष्कर मूल काढा शिगी झावले, मार गो मिठ्ठाय लौ मf चित्रक सम समान भाग टेकर कुचकर । या ३ तोलाका कवाथ या फोए बनाकर पीन। । स्वाथ हृदयका शकरहाना पसलीयेक। गूल, हिरक।, खार्दीमें उत्तम गुणकारी है ।
प्रयोग ९. केलीका, फुल, डोलरका फुल गिरीवका फुल और छोटी पीपल सम समानभाग टेकर कुचकर रसन्ता ३ से ७ माशा पकते चारलकf अभेस:मण (पानो)-चावलके मदसे देना ।
प्रयोग १० हलदे, तालो हिरव, केलो भस्म, छोटी पीपल रसन्ता कचूरा सम समान भाग कुड गुड़पे १-१ वालदी गोली वनाना । ३ से ७ तोला सरषेंके तेलमे मिलाकर चा लेन। । उपर गरम पानो पीन। ।
दारुण-लक्षण'से उदावतं वायुको उर्ध्वंगति होनेशे, हिस्टीरियासं दवतद्रो कवजोशे रस, ठंडे, वासी भोजनसे मल्मूत्राशा वेग रोक जाने से असौच पर मोजन करनेशे भाम वृद्धिहोनेसे अभिघात और आघातशे क्षयरोगेशे और कोढ़ मो रोग भय कर रुप पकड़नेशे यह रोग वत्पन्न होता है ।
रिघहल-अननल श्रुत्वा यमला महती, ग भीरा ये पांच प्रकारकी हिक। होती है । पहला दर्द स'घव है और सामान्य उपचार से मिट जाती है । समला कष्ट साध्य है । यह हिचकी झाने'क समप मसकक और गोंदका कंप होता है, पेट चढता है तृपा लगती है। वमन और दस्त होता है, जाई और हिचकौका वेग दोनो साथ आता है। यह हिचकौ अनन प चनन है जव उठती है । इसका दूसरा नाम वेंगन्तो और परिज्ञामवती मो है। महती हिचकौ अध्याख्य है। यह बाते समय श्रृकुटी शंख (कान और नेत्रके वीचका भाग-लमणा)
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पेट हो जते हैं भाखेड़ में पानी भरता है। पेशाब नहीं सकता। इमरसाकि नष्ट होती है। इस हिचकीका शब्द तेज और बल अधिक होता है। गंभीरा हिचकी मो भासाध्य मानी जाती है। यह पक्वाशय और आमाशय कटत्री हैं। यह ज्ञातों है जब गभीर नाद जैसा शब्द होता है। दूसरे लक्षण महत्व जैसे हैं।
पथ्यापथ्य-निर्णय हिचकी मेंं प्राणायाम कराना। वायु अधिक करनेबाली वस्तु महो खाना। तप्त्राष कराना। आश्रयें जन्तु पाते करके रोगीको भय कंस ह और मान्द बढाना। साधा खुराक देना। इलायचीके छिलकेका धुआं हुकसे से या गुड़गुड़ पिलाना। वायुका अनुलोमन हेतु दसन निहार ज्यादा हो वेधा उपवार करना। उड़ण वोंमें औषध और अनुलोमन नितराक होता है।
सर्वेषां गला वटो-( र. स*) पारद, ग नक अभ्रक भस्म भस्म ताम्र भस्म मात्तु भरम्। कास्य भस्म प्रत्येक ४ चार तोला, रससिन्दुर शुद्ध मृदंग मधील छोटी पोपल, शेोठ इ़लायची, काला मिरच, पोपरीमूल प्रत्येक ८ आठ तोला, अदरक, तुलसी पत्त मतते का पान निर्गुन्डी पान और अडू़सा के पान प्रत्येक १० हम तोला लेकर कूट कर कषाथ करना। उसको ३ मावना देना। और रती रतीकी गोली बनाना। ३ से ४ गोली शहदसे चेनना और हुक्का या चोलम में धुआं पिलाना।
हिक्का हिचकी के सामान्य प्रयोग
प्रयोग १. सेठ, कालोमिरच, कुटकी, पोपरीमूल, छोटी पोपल, सेधानोनमक, कचूरा, काकडा़ शिंगी निसोथ, काला नमक कुष्ट खव समान भागसे कूट कर पीज़ारा नि'युकें रसको माचना दे कर रखना। मात्रा २ से ४ माशा प नींबे देलना। हिचकी श्वास खाँसी और मदाग्नि मिटे।
प्रयोग २. नाय के घींग का धुआं पीना।
प्रयोग ३. इलायची कू़टकर उसका धुआं पोना।
प्रयोग ४. अच्छी हींग तेल ९ मेंं चहदकका भाटा ले। ५ ढाल अंवा आभा तेला की टोकिया बनाना। छायमे सुलाना। उसका धुआं पोना।
प्रयोग ५ भारंगी और सोंठ चम भाग मिला कर पानमे आवा चोला गरम जलसे देना।
प्रयोग ६. धतूंर पपंड़ी, साबरसी ग मस्म, चोखठ पेड़ी पीपर । न च प्रभात मान मि'लाकार ४ से ६ रती। शहद या पानीसे दे।
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प्रयोग ८ पत्थरफोड़ी पीपल, इलाईची और मयूर के पंखे रखकर 'घनमाय' तेल कर कूटकर मिलेको हदोये हाड़ अंदरघुप जलाकर ऐसा धूप < रे ९. रत्तो पहदरे देना ।
प्रयोग ९. कायफलको कूट कर २ रे ४ माशा पहदरे देना ।
प्रयोग ९. हलदी फुरुपिच्छ और राल समानभाग कूटकर रच्छा खुलों पिलना ।
प्रयोग १०. मोरपिच्छको मस्सम २ से ३ रत्ती और छोटी पीपल ४ से ६ रत्ती अदरक के रससे शहद दालकर देना ।
प्रयोग ११ तुलसीके पत्तेका रस १ से २ तोला पिलना ।
प्रयोग १२ विजयसारको चाल ( अर्जुन क्षीरी वृक्ष ) और रस तजी क्षुप समभाग कूट कर ४-६ माशा पानीसे देना । अथवा धूवेमे गुड़ मिलाकर इसको धुभो पिलाना ।
प्रयोग १३ छोटी पीपर और सोंठजवेखा मूल समभाग कूट कर २ से ०) तोला पानीसे देना ।
प्रयोग १४ अभ्रसृत पर्पटी तो. १, लौंग तो. २, मिर्चोपालटि चूर्ण तो. ३, साधरसि'ग भस्म चपूर । इलाईची प्रत्येक तो. २ जायफल तो. ९, सुर सोप कूट मिलाकर २ से ४ माशा गुड के साथ दो से तीन दफे देना ।
मुखरोग सुरुवके अंदर के रोग गलेके रोग तथा स्वरभंग
विपोच्चैर्भावणाजीर्योद्यधनैरतिरतिशोचतैलैः । स्वभिघातादिभिरेंदौ वा गलशोथस्तु दुरुपिता: ॥ कुर्युन्त्यनलागददाह रिस्यत: स्वरवदेहवचि ॥र. चं.॥
कारण तथो चिकित्सा—अजीर्ण दस्तकौ कब्जी पारदो पचन दसामा गरम पदार्थ ज्यादा खाना और विष प्रधान रोग आदिचे और आग किन्हनेसे व प्रहरणी-धे; रेगसे मुखवा रोग होताहै । गलेको सुजन अंदर और महार रेतो है । जिससे पानी भी नेड़ा उत्तर शकती है । ताप भी रहती है । इ आघात वगेरह मोनो है ।
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स्वर भंग, लोरशे भाषण करनेसे, वेलनेसे, गानेसे, विष विकारसे अजीर्ण पर मेहनत करनेसे श्वाँसी क्षय फैलकर जैसे रोगसे मस्तक बदलनेसे सरदी लगनेसे, और अन्य कारणोंसे वह रोग होता है।
स्वरभंगमें वायुके दोष हो तो मुख आंखे मूत्र और मल कुपित काले रंग के हो, मुंह सूखा हो। गले जैसे स्वर निकलें। पित्तप्रकोप हो तो वे। आंख मुख मल मूत्र कुछ पीले रंग के हों। वातिक समय गलेमें दोष और वेलने हो। कफ प्रकोप में कठ कफसे कंठ आय। बहुत श्रमसे थोड़ा वेल सके। नाकसे खांस छूटे वके। क्षय के स्वरभंगमें स्वरके साथ खुआं निकलता हो वैशः माद, हो। और स्वर एकदम बैठ जाय। स्वरभंगका रोगी क्षीण हो मृदु हो, कमजोर हो ऋतु हो क'ने समयसे रोगसे पींड़ा हो और तीनों दोषों' से जिह्न दीखते हो तो वह असाध्य माना जाता है।
पथ्यापथ्य--पसन निकालनेकी दवा, जुलाबको, वमन कीं दवा देना। औषध के कुल्ला कराना। अदरकके भागमें दवाई लगाना और गलेमें किसी भागपर चुभका जमाव होना हानिकर है। वे। नस्यसेवन करना। मधुर, कषाय, कुलथीः वचंद, पंगलों माष,' परवल दूषो, चावल पुराने अन्य गरप पानी, कडुआ रस रतिकारक हित पथ्य' मत्य, प्राम्य माष, दही, पुष्ट रक्ष पदार्थ' कठिन खुराक, कफकारक पदार्थ नाजायज़ी मीठाह आदि हानिकारक है।
मुखके रोगसे वाहर के मार्गमें नाक गला या कठ पर सूजन और पंड़ा हो तो दशांग डेढ़ पथ्यत्ना देवाय्न डेढपछे तेंनगुनी सफेद पट्टी मिलाकर पानीमें पीस लेप करना और हपर पाट मोंध देना।
कल्याण मेहनत रस--(र.स ) पारद, गंधक, अभ्रक भस्म, प्रवाल-भस्म प्रत्येक दो तो। ६ मतींको पिष्टि तो। २ सवके। सभ मिला'कर शोकवार 'मागरा अड़सी', छोटी कटहली, माछी, और गिलोय प्रत्येक के रस या "कषायकों एक एक भावना दे कर रतो प्रमाण गोली वनाना। ३ से ६ गोली पंस्कर पानींसे या शहदसे देना। गले के अंदरकी सूजन, दाह़ जकड़न गलेक काड़नेसे (Tonc1l) सूजन स्वरभंग श्वास हृदयके रोग, क्षय, हिक्का, मस्या, अतिसार व प्रदरुणी जोण'डर इसमें फायद्मा होता है।
कल्याण मृत्त--इद्रायण मूल वेर। १० वचेठा, तेर। ३ देवदार वेर। ९, हंरड़, बहेड़ा, आंवला। ३-३ इन तीनोंकी वे। १५ इन्द्रायणी वेर। १५, द्राक्षाफल वेर। १५
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तमाल पत्र तेः १५, जाञ्छोदरि वेह १५, सग्रं तं धुप वेह, १५, हरड १५, आमल्की ठेह १५, घेओजी जीरा वेह १५, घटलेठ वेह. १५, दासहलदर तेः १५, कमलमुल ते. १५, मजीठ तेः १५, छोटी कटहरी तेः १५, अतिविष तेः १५, जमेलीपान तेः १५, सवकेह कूट पानीमें २४ घंटा भिगो कर उहमें घो रतल तोष डालकर पानी जलनाय तवतक पकाना। मुख जीम स्वरनली श्वास नलोके रेाग स्वरमं गठेकां मुजंन मुखपाकमें, उन्माद पागलपन, दिमागी तहें मस्तक पीड़ा, अपस्मार मेहा हृदयरोग आदिमें उत्तम फायदां करता है।
किन्तनरकंठ रस—(र स) पारद गंधक, अभ्रक भस्म, माक्षिक भस्म छैह भस्म प्रत्येक ९—९ तेएह, वंकान्त भस्म ०। तेः सुवर्णी भस्म २ आानो भार, रेधय भस्म ।। तेः च द्रपमा छैह शिलाजित वालीं ९० तेः। वटो हरड २ तेः धव साथ मिलादेर अहद्धो (गोली), मारंगो, छेओरी, कटहरो, अदरकह और व्र त्री प्रात्येकके रसकी एक एक मावना देना चनेके प्रमाण गोली वनाना। मुखके रेाग, स्वरमंग गोंदीश्व स गठे के रेाग आदिमें २ से ४ गोली हाहदसे या पानीसे देना।
सरस्वती अवलेह—(र.स) हरी माछी तेः ६०, कटहरीहा पंचांग पिटेलाय भोगरा, वासा, वला पं चांगम. मुलेठी पं चांग प्रत्येक तेः ३०, ठेकर चचकेह कूटकर ८ गुने पानीमें पकाकर चतुथांश पानी रखने पर कपडछान कर उहमें शकर हाहद और गुड प्रत्येक ६—६ रतल डालकर पकाना। कुछ गाढा होनेपर उसमें हलदी आवा हलदी पीपलीमूल आंवलहं सगुट शिलाजित, सेठ, छोटी पीपल काली मिरच, अजमोद मुलेठीका शिरा कुच निसोथ नैंघानेन वच अभ्रक भस्म प्रवाल पिष्टि प्रत्येक तेः ६—६ डालकर पकाना अवलेह जैशा होनेसे उथार कर शीत होत हे। जानेसे अच्छे वरतनमें भर देगा। मात्रा ९ से २ तोला खिलाकर उपर गरम दूध पिलाना। गठेकां रेाग, गलेकी श्वास या वाहलकी सूजन स्वरमं, खांसी, श्वास छार्दी के रोग पौनस, गलेकां श्वासडां (Toncil) की सूजन जिन्दास्तम्भ उन्माद पागलपन आदिमें उत्तम गुणवदारी है। वुद्धि स्पष्टि मेवा बढते है।
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गलेके अन्य रोग
रोहिणी—यह सेप गलेमें हेाता है। वात पित्त कफ दूषित होकर गलेके मांस खुन के विगाड़ कर गलेके ६५ रस्ते वाले शंकुर उत्पन्न होते हैं। यह असाध्य हैं। वातप्रधान रोहिणी मे जीभ मे चारो ओर पीड़ा हो। मांसांकुर गलेको करकटे, रोगी ७ दिनमे मर जक्ता हैं। विस्र्धान रोहिणी मे जलन पाक खुलार और मांसांकुर गल्र्द्धी निकल आते, ५ दिनमे रोगी मरण पावे।
कफरोहिणी—ने श्वासमार्ग गलेका मार्ग रुक जाय पकनेमे विलव हो। कठिन चिकित्सा खुजली मे साथके अंडुर निकलते, ३ दिनमे रोगी मर जाय। त्रिदोष रोहिणी—मे तीनो दोषोके न्यूनाधिक चिन्ह दिखे इसका असपताल मे पहुचा कर ऑपरेशन कराकर अं कुरोका काटना चाहिये ताकि श्वासकी गति और खुराक रुक न जाय और बचजाने की आशा रहे।
कटनके पोछे कल्याण घृत खुराक के रुपमे देना, दिनभर १० तोला तक दिया जाता है। वच्चूल की छाल, विजयसार ( वे वृनग्रंथि ) की छाल, रं दतों के छुप, हल्दी निंमकी छालि सर्व सम माप कुट कर ६ तोला मे ३ तोला पानी डाल पिलाते रहना। रसांलादि वटी ३ से ६ पानी मे घोस पिलाना वाद्य भाग मे दर्शन या देघन टेप लगाना
कंठमालूक—वैर जैसी कंटक युक्त पीड़ाकारो सिपिर कठिन कफजन्म ग्रन्थो गलेमे होती है यह शुलसाध्य है।
अधिजिह्न—जीमके ऊपरी भाग जैसा जीमके उपर के भागमे या नीचे के भागमे कफरक प्रकैपसे सूजन होती है। यह पके तो रोगी का मरण हेाता है। यह सूजन जिह्न के उपर हो तो असाध्य है, नीचे हेओे साध्य माना जाता है।
घटसय—लवा और मोटा शोध कफ जन्म होता है। इसमे अन्न मार्ग रुक जाता है असाध्य है।
वलास—कफग्रंात ग्रंथिपसे गठेमे सृजन होती है। इसमे दम चढता है पीड़ा होती है। असाध्य है।
पकशूली—गोलाई लिये मोटा दाद खुजलीवाला शोभ पकता है दवानेसे व्रण पोंचा लगता हैं। इसमे रक्तका प्रकैप हेाता है।
ग्रन्थिनी—रोहिणीसी मिलती जुुलती रोग है। चिन्ह चपचार मथ्या हि है।
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गलायु—आवलेए सोज जैसां कठेन्न दिसर पंडा यप, करतक प्रहेत वन्य, अन्नदेए रसनेवाली ग्रन्थी होती है जासप्नाघ्र है ।
कठविद्रधि—सारे गलेमे म'दरके भागमे सूजन फेल जाय पोउ दद' हे ।
गलौंध—गटेके' प्राणवायुचे' श्वासोच्छासचे' रसने वाला कफ और रक्त जन्य रोग है ।
स्वररहन्—आखमे अंधेरा आवे, श्वासक्री गति अधिक हे, स्वर वेध जाञ्च, गला सूखे। शुगक या पान उतारनेमे रोगोधा कष्ट हे।
मांसतान—गटेमे चारों ओर सूजन फेल जाय, असह्ा पीडा हे। यह त्रिदोष् प्रकोपसे होता हे इससे येदे घण्टेसे रोगी मर ज ता हे ।
विदारी—गाढ पीडा के साथ गलेमें लाल मुख् रगी सूजन हे!, उस भागमे मांस सडकर विखर जतता है । पस्स पूर निकले़ । पित्तप्रकोपसे होता हे ।
विपाकत्सा—फिस्सी मी प्रधारकिं रेहिजोएहा पत=तरसे सुत निकलवानां । २ तोला पानीमें ९ तोला नमक और ३ तोला निंबू दिय्ा घों डालकर कुल्ला कराना । पडविंदु तेल अथग' महालाषादि तेल ४-९० मिनीट मुखमे रस चूष' करना : मागकेसर चिनीदवाला कपूर समभाग मिलाकर वाहद मे निलाकर पीछो व्रशसे गलेमे लगाना। नीमकी छाल वडकी छाल अशोक की छाल अथ जनृक्षकि छाल कदती अय समभागसे कुटककर २० तेंलामे ४-५ लेोटा पानी डाल कर रख छोडना इस पानीसे कुल्ला घराना। यह पानी पिलाते रहना । पर्पिंशुु तेल के या कन्य घृत के या महालाक्षादि तेल के बुद नाकमे हर वक्त डालतें रहना। नीचेके औषध सव प्रकार के गलेके रोगमे टामकार्ज् है ।
दार्वी क्वाथ—दारुहल्दी नीमकी छाल उरमौत हिंगूच् वहे। हरड समभाग कुट रखे। २ तोला का क्वाथ या कांट पिलाना ।
तिक्तादि क्वाथ—कूटकी अतीस दारुहल्दी पाटा नागर मोथ इंद्रजी समभाग' लेकर कूट ३ से ६ तोलाका क्वाथ या फाॅट मिलाना ।
यगक्षारादि गुटी—जवाखार, दमालपत्र पाटा रसेान द'रु हलदी छोटी पीपल समभाग कूटकर शहदमें गोली वनाना। गलेके सड रेगमे ३ से ६ गोली देना ।
प्रवालादि मिश्रण—प्रवाल पिष्टी च द्रपुटि तोंला २, जवाखार मेहरा पिष्टी तोला ९, अश्वत्थ तोला ३, महाचन्दनादि वटी तो. ९ साथ मिलांकर ३ से ६ रती शहदसे या दन्य'ण घृतसे गटेके सव रोगमे दिनमें ३ या ४ दफे देना ।
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मलरोेगहर तेल मध्यमा घो—सफेद फूफकी अपरालितो (पुञ्ज, गरिणी) का पंञ्चांग तेला ४०, नायचिर ग निसोथ सेधानोन सांसहल्दी प्रांयेक तेला १० सब साभ कूटकर वथमें माछी हरी तोला २० डाल कर कुम्मे १० रत्तल पानी डाल १२ घंटा सीगे।रखना। पीढ़े उसमें ४० रत्तल तिलका तेल अथवा ४० रत्तल गायका घो डाल कर पकाना। पानी हा अथ सब थाय यप करडछान करना। तेल बनाया हो तो छलना करना, घी हो तो ४ से ४ तोला तक दिन भरमें खिलाना। घा गायका न मिले तो कोई मी घो लेना ठीकेन बंजीडेबल घो मिलाया न हे। गलेके रेगोमें यह तेल या घी बहूत लपकारक है।
दिव्य धूपका घूआ हुक्केसे या नलीम पिलाना। नीमकी अंतर छाल १० या १५ तोला कूटकर ४ से ५ छटांक पानी मे भिगो रखना। पीढ़े दिन रात वही पानी गाढ़े के सब रेगमें पिलाते रहना।
गलेका काकड़ा ( टेढ़नोइल ) क'ड़कड़ पर सूजन हो।, बढ़ा हो लाल हो गया हो, कभी वथमें खुन,थका श्रागा देखनेंमें थाता हो था इस पर घनासा तेला १० में ८० तोला पानी डालकर एथाथ कर साघा रहेनेसे उपद्रवान तुर फरला करनेसे सूजन मिट जाती है, सदा हुआ कम होता है। और काकड़ा डे कारण जो पीड़ा दरद खाने पीनेमें तकलीफ होता हो दूर होती है। और काकड़ा असल हालतमें भा नातो है।
प्रयोग १—घमाया धेला १०, रंडती खुप पंञ्चांग टेलाया ५ शरपुंखा पंञ्चांग तोला ३, नमकी छाल तेला १०, वोजयमार (अजान वृक्ष) की छाल तेला १० सब कुट कर रातके १० रत्तल अथना ४ छटाक पानीमें भिगो रखना। दूसरे दिन हुवमें से येढ़ा येढ़ा पंन्नी कणडछान कर यात आठ दफे कुल्ला करना और पिलाना। इस प्रदार १ सप्ताह करनेसे टेढ़नोलकी सब शिकायतें मिटती है। और ऑपरेशन नही करना पड़ता।
प्रयोग २—दत रेगमें दनार्जा दतम जन केा भी दतौन (वचुल्के या वरके दंत धावन)। थे टेढ़नोइल पर थो'स कर साघे पानीधे या उपर बताये पानीधे कुल्ला करनेसे १५ से २० दिन में सब शिकायतें मिटती है।
मलेका चांदा ( गला भाजाना ) गलेका दरदहा मांह लाल धोकर उसपर सुजम हे।तो है। उसपर विकनी छारी जमती है। उसमें चांदा पड़ता है। गलेका द्वार ताछुआ चेरिया सांदि लाल हो जाता है। गलेमें दरद होता है। गला सूखता है। कई मी पींज गलेके नीचे उपरानेमें कष्ट होता है। हवसर बंद जाता है। ताप रहता है। तेल ल'ल मिरच दाद करने।थे तीन पंञरभ' खानेमें गर्म मेजल टेनेमें घ्रपद घासती स चिर्वातरे दू र औधिक पीनेसे यह दुर होती है।
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गलेके रोग पर सामान्य औषध
प्र-१ कुटकी भतीषे देवदार नागरमोय इन्द्रायो शाख दारुहलद्रो सम भाग कूट १ तैलाके क्वाथ में कूट १-२ तैला शहद मिलाकर २-३ दफे पिलाना।
प्र-२ पाढ़ा रसौत दूर्वा तेजवल दाख हरड़ वहेड़ा आंवला समभाग कूट ४-५ तोला कासकर काढ़ा करना और पिलाना।
प्र-३ खैर सारादि पटोल या रास्नादि गुटी मुखमें रख रस उत्तारण।
प्र ४ प्रातःपिप्पली तैल २, जहर मोहरा पिष्टे वेला १, अमृता सतत्व तो ४, साथ चोट कर < से १२ रत्ती शहदसे या मध्वादसे २ वस्तत देना पोछे उपर दिया हुवा क्काथ या क्वाथ पिलाना।
प्र -५ नागच पका पत्र। छायामें सुखा कर हंडोमें भर कपड़ मिट्टीकर कुल्हाडपर चढाकर पकाना सद्म हेतु जायगो। य माग भस्म देनेसे स्वर-मंगा मिट कर श्रावाज खुला जाता है।
प्र-६ तज तेला १, इलायची तोल २, छोटीपोपल तोला ३, व शिलोचन तेला ३, समूळ फेन्न तेला ४, शक्कर तोला ६, सब साथ कूट कर ३ से ६ माशा शहदसे देनेसे श्रावाज खुलता है स्वरभंग मिटता है।
प्र-७ आंवला इलायची कूलीन नजोरा द्रत्या सेरोक्कार च प्रभु गुटी सब समान भ'ग घोटकर गुडसे या शहदसे गो लीर < रत्तीको यनाना। मुखसे रख रस उगारना स्वरभंग मटता है गले के रागमे फायदा होता हैं।
दांत के रोग
मनुष्यके दांत उम्रमें दो वक्त फूटते है निकलते है। स्तन घय वच्चो के छद्र माससे तीन वप' तककी आयुमे दांत भाते है, वह दुष्टिया दांत कहा जाता है। यह दांत पांच छह वपं की आयुम गिरने लगते हैं और कायमी दांत निकलने लगते हैं। १७ से १८ वपं तककी आयुमे घव दांत निकल जाते हैं। दांत ढाढ़, दा बेनिया कुतरिया और काटनेवाला भेस्सा मेद दांत मे होता है। प्रत्येक दांतमे पेल होती है। उसमें मज्जा भरी रहती है। वह पेलाण दांतका भ'तिम भाग-मूलके अम्र भाग तक और देड़ा मूलके छिद्र द्वारा रक्त शिरा द्वारा दांतके पोषण मिलता है। जबमे वात पित्त कफ दोषके कारण विगाड़ होता है तब दांतके शिंक भिन्न रोग उत्पन्न हेाते हैं।
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कारण—हर वस्तु खा खा करनेसे—खाते रहनेसे, पेलनेके विगाड़से, दस्तको क़ब्ज़ीसे, खट्टे पदार्थ अधिक खानेसे, दांतौन-दंत घावन न करनेसे, अजीर्णसे अति गरमागरम पदार्थ और प्रातः ठंडे पदार्थ खानेपीनेको आदतसे, तमाखू—जर्दा चहा केशों के अधिक अरुचिसे ऐसें अनेक कारणोसे दांत के रोग होते हैं ।
दांतको खेरी—तमाखू—प्रहरा पान सेपारी अधिक खानेकी आदतसे, दांत साफ़ रखने कौ बेदरकारीसें मेल जम नहि सदता है । दांतको पोलमें अन्न या केचु चोज़ सुदकर वह चटनेसे मी सोंतमें सड़ा होता है । क्षार पदार्थ या गर जमता है । दांत पर खेरी जमनेसे पोलमें सुराख और सड़ा होकर दांत हिलते हैं और पोले गिर जाते हैं । खेरी पोली या सफेद होती है । ज़ुकाम में देखकर चूनेनेसे कोंवसी जैसी मुखी हो जाती हैं । खेरी वाळे मनुष्यका मुख दुर्ग-
न्धि परहेज़—तमाखू—बीसोंकोक, लहसुन, मिर्चोंका तेल ५, शेखर—जैसाकर तेल ५, जैशर तेल २०, कपूर तेल १० अमिया हलदी तेल ४०, हलदी तेल २०, सफेद मिट्टी तेल १०० यत मिलाकर दतौन से दांतोपर मसूढ़ोंकि दाहि न पहुँचे इस तरह मंजन करे और गर्मपानी या डाल कुल्ला करे तो दांत के बहुतसे रोग मिटते हैं।
कारण—दांतका मूल सड़नेसे अजीर्ण'से अकस्मात्तसे पाचन शकि म'द होनेसे खट्टा और मधुर पदार्थ अधिक खानेसे यह दर्द होता है, जब निद्रा कम आती है, ज़ुकाम तेज़ा होता है । कांकरे सद रोकने जैसे पीड़ा जतन अति होती रहती है । बीचके किसी दांतमें डाढ़में या सव दांतोमे पोड़ा होती है जय रोगी पागल जैसा वन जाता है । पेड़ा येढ़ी कम हो' जव कुछ आराम मिलता है ।
उपचार—महानारायण तेल का गाढ़ा सुजमे रख मुखमें इधर उधर घुमाकर १० से १५ मिनट के पीछे थूक देना । इस तरह खुश्क गुनम दे दफे करना ।
परलाधा चोज़ादि पं जन्त-ढाकके बंल १० तेल, छोटी पीपल, चीत मरिच्च मज्ज अजवाइन हरड़ चोबानेसेन प्रत्येक पांच पांच तोला, पुनर्नवा मून और हलदी दोक्षा वंश तेला, समुंद्रनफेन ४० तोला सत चोना कर रखना दांतपर लगाना । गर्मपानीमें डाल कुन्का करना ।
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दांतका गढ़ ग्रन्थि-कारण-दाॅंतके मूलमे पड़ा होनेसे, खेरी पतनेसे यह दर्द दांतके मूलमे' होता है और छोटी जैसी गाँठे लगतीं हैं । गढ़ पड़ कर पस निकलता है । उससे पीड़ा अधिक् हो तो गाल और गलेमे सूजन होतो है । पस निकलने के बाद दर्द कुछ कम होता है ।
दशनन ल स्कार चूर्ण--सेठ, बड़ी हरड, नागरमोथा, करञ्जा, सुपारीकी फांलसा, कालीमिर्च, दालचीनी लौग, गेहॅू शव समान भाग लेकर और सबके समान सफेद् मिट्टी मिलाकर रखना. देना समय दांत पर लगाकर गॅम पानोमें धोवन सेखागा ढाल कर कुचला करना ।
दांतकी पेठ-दांत साफ न रखने से, खटे पदार्थ ज्यादा खानेसे, दांतोफे दोष अन्नका कण दत्त जाननेसे दांतमे बधा होता है और दांतके भ दर के भागमे' सड़ा होकर वदह उरपन्न हुये जन्तु दांतके अपुओको सा कर दांतमे पेठ हो जावती हैं वह बढनेसे दांतके मूल सड़ जाता है। वह बढनेसे दांतके मूल शिलकुल कमजोर हो जाते हैं, जिसमे दांतके उपरका भाग पड़ जाता है या निजी'व होतां है ।
दत मञ्जी--माजफल तो ४. कचिया तो। १, छोटी हरड तो ३, कस्तूरी सुवण' मारकक तो। ०॥, मडूर मसम तो ३ा, पकाया हुवा नीलाथोथा तो। ६ ।।, हरोमस्तकी तो! १॥, चगे हरड तो १॥, इैलायची दाना तो १, कपूर तो ०॥ रव पाथ कूट कर कपडछान कर रखना और खाने चक्त दांतपर धोवन और गॅम जलमे' थे डा डाल कर कुचला करना।
दांतके पेढ़ां (मसूढ़े दन्तवेष्ट के दर्दे)
कारण--कमजोरी, अशौच सड़ांमोठा पदार्थ ज्यादा खानेकी आदत दुखार पेटका दर्द बहुत शफे खाने रदनो अन्न के कण या उपरी कोई चोज दुप जाना मरप्ा उपदेश आदिक कारणोसे मसूढ़े (दन्तवेष्ट) मेॅ सूजन हो कर लाल हो जाते हैं और मिनिदिन कम होते होते ६ तके मूल खुलते हो जाते हैं, इस प्रकार घेढे या व्रण न्तिो के मसूढ़े शिगढ़ते हैं। यहुत करके मुखके आगड़े दांत जॅा वस्तुका कारण उन्न जॅोर उपरकी दाढोके मसूढे ज्यादा शिगढ़ते हैं, जव मध्देहो ३र दर्द न्तिो गा पस निकलता हैं, मुखमे दुर्ग'घ आती है और खाने'र्नेिीं होती है ।
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कुष्टादि मंजन—कुष्ट, दारुहल्दी हल्दी ठाक्र, नागरमोथा, मजीठ, पाठ ? कुटकी, मालकांगनी (जोतिकमती), अजवाइन, मच, सेधानोन, छोटी हरड़, मेठ सव फुट, कपड़छान कर दंतको घोवनो और गरम पानीमें येदा डाल कर कुचला करवा।
कारोंमाथि मंजन—चिफलामे पकायी हुई कसीस, कथ्या, माजूफल, चोनी सुपारी, सेघानोन, चीनोकेवाला, कालोमिरच, इलायची, हरड़ पपिटा, आंवला, दाडिमकी छाल, मेठ और चंदामके छालके कोयला प्रव सयान माग छेदर कूट कपड़छान कर रक्खना, घोवनो कुचला घरना।
ममूंदेओंसे लोहो और पस निकठना (पायोरिया)
कसीसादि घपंन—कसीस रेन्द्र, छोटी पोपल, मनसोल, प्रियंगु ठेकमल तमालपत्र, कुठ, हरदी, समभाग कूट कर रखना, इसका मजन सौर कुचला घरनेसे पायोरिया, पस मिटता है। महामरियाण तेल मथवा महानारायण तेल घर्षणोंका तेल या तिलकां तेल इनमेसे दई ठेल, मुख मे दे वार तोला रसकर इधर उधर घुमाकर १०से१५ मिनट तक रसकर यूक देना भॉर गरम पानींसे कुचला करना।
१ ठेला सदरक्ख और १० ठेला सद्दर्देवाला घन्राथ कर कुचला करनेसे मुत्र और दांतके बहुतसे रोग मिटते हैं।
१ ठेला सदररत्न, ३ तोला सफेद सरसों और ४ ठेला त्रिफला उन्ममें वार छोटा पानो डालकर पकाकर रखना कुचाला करना।
दांत—हिलना
कारण—सानपान नियमित न रखनेसे, दांत साफ रखनेकी असंघधानीसे, सपदंघा के कारण, सपदादि रोगमे पारदमाली दवासे सुध' टेनेंसे, बहुत गरम चीने खानेसे, सात के मूल कमजोर होकर दांत हिलते है। जड दांतोंमें दर्द होता है। खानेमें तकलीफ होती हैं। ठंडा पानी या ठंडे चीज खाने पीनेसे या बरफी लगानेसे दांतोंमें इल और दर्द होता है और इसकी पीडासे दुखार था जाता है। सिरमें दद' होता है और बेचेनी होती है।
दंततटदीकरण मंजन—कपूर तो. ५, माजुफल तो. १०, कश्या तो. ६, वचुलक फळ तो. २०, कीला ( वच्रद्रवा ) तो. ३५, पारद के ४, शंख तो.
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६, नागरमोथ वे। ६, मुलर वटुंर चाल), ते। १०, समुन्द्रकै ते। १० सव साथ कूट महेन कर रखना दांतो पर लगाना और पानीमें डाल कर कुणाला करना ।
प्र १ हि गेरु( रंगेरुई) के मूलकी छ ल जोर कुटकी सुपभाग कुटकर चारीक कपडेकी पोटलो मे या ह के दोच रखकर दांत या दाढमे रखने मे दांतकी प्रन्थी मिटती है और हिलते दांत मजपूत होते है ।
प्र. २, वायविडंग कटहलो के बीज घमासा घमभाग कूटकर पांच तोला यह चूर्ण चार रत्तल पानीमें पकाड़र हस् डोहना पोछे सकता कुणाला दिनमे पांच सात वफे करनेथे दांत और दाढके घव रोगमे' लाभ होता है.
प्र ३, नवसार और काली मिरच समभाग -कूटकर रद के दोघमें ४-५ रत्ती डालकर दांत के उपर रखनेसे ददं मिटता है ।
प्र.४, १ तोला कपुरमे पांच तोला नीलगीरी तेल- डाल कर धूपमे रखनेथे कपूू पिगल जाता है । ठिक्का फोया मिलेाकर दाढ और दांत पर रखनेथे दांतको पीडा और अन्य वदं शांत होते है ।
राजमदो मंनन—सच्चे मोती, हच्चे प्र-ल, स्वण म क्षिक महम लाल, कच्चो रसीद, प्रत्येक एक रत्ती तेलो, मद्धर मस्म लाल, कुठ, पदायो फिटकरी, मीमरैनी कपूू, छोटी हरड, वढी हरड घहेड़ां आवकां, माजुकल, अनारकी छाल कद्या, सेधागा-प्रत्येक देल डेढ तोला कस्तूरी १ वल सव घाथ कूट हर कपडछान कर 'खनादाठकी खेरी, दातका पाक, मसूढोका ददं, द'तमे' खुजली, दातमें जंतु, मुखके दुर्गंध आदि मिटते हैं ।
जिन्हा-जीभके ददं
चिह्न—अभिलाषा, शर्दा ऋतुका परिवर्तन, मलम, लोहं, उपदेश, प्रमेह, पारदका विडार इत्यादि कारणोथे जीभमे' स्रजन होती है । वायु प्रधान हे। ता जीभमे चोरा पडता है, स्वाद मालूम नही पड़ता । पित्त प्रधान हे। ता दाद, जलन और लाल धकुर जेसा जीभ पर दिखाता है । कफ प्रधान हे। वे सोंमलके कोटा जेसा जीभ पर दिखाता है ।
जीभके नीचेका होाथ:—इसमे' कफ और खनका प्रकैप होता है । जीभ जकड जाती है और जीभके मूलमे पाक होता है ।
पडजीभी—इस वोवसे जीभ मोटी स्थूल होती है । इसमे कफ और रफका प्रकैप हेता है । काल पडती है । खुजली आती है और दाढ सो लेती है ।
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पलाशादि घृतपंचः इलायची, फिटकरी, चंदनक चूर्ण, आमकी गुठली, जटामांसी पान, तमाल पत्र, घायका फूल, शहकर, हलदी और लोध्र (लोध) सब घमान भाग लेकर कूट डर रखना और जौभ पर चार पांच वक्त घीसना । दशांग लेपका मसाल कर दिनमें ५-७ दफे कुचला करना ।
निंबादि मातृ प्रदिग्ध—निंबकी या कच नारंगरकी पत्तूोंकी गर्म प्रत्येकी छाल घमान भाग लेकर कुल्ला करना ।
रसं जनोदित गुडूष—रसांजन, मुलैठी मूल, आंवळों समभाग लेकर कुचला करना ।
विद्यारेरात हर मिश्रण—रसेन्द्र प्रतिका तैल १, प्रहल च अ्रपुटों तैल २, वत्तामृत लोध तैल १, विठोफलादि चूर्ण तैल ४ सब साथ मिलाकर ६४ पुढी घनाना । श्वबह-धूम पानीके साथ या शहदसे देना ।
तालू के रोग
पलघुंडी—कफ और रक्त के प्रकॉपसे होता है । तालूफे मूळसे ल वा शोथ होता है । इसमे तृषा लगती हे खांसी आती ह । म्वास चढता है ।
तुंडकेरो—यह मो कफ और रक्त प्रधान है । इसमे च शके शूल निकलते हैं । वेदना और पाक होता है ।
अभुष्व—शोध कफठन रक्त के प्रकॉपसे होता है । इसके साथ ज्वर और तीन वेदना होती हैं ।
कचछप—यह मछुआकों तरह मेढा, कम पीडा=आला कफ प्रकोपका शोध होता है ।
तालु शर्कुद—कपल जैसे आकारका शोध तालूके मध्य भागमें रक्त प्रकॉपसे होता है ।
तालुशोध—पित्तप्रकॉपसे तालूमे पाक होता है । यह भयकर रोग है ।
तालुरोगहर घृतंण—कुष्ट, वच, सैंघानोन, कालोपीठ (पाठा), मेधा, कचूरा, अतीष, राइतना कुटकी, पारद, ग धक, निमके फलकों, गिरो सब समभाग कूट कर रसना । तालूके शोध पर घ घुलीपे घीसना और लाला निकलने देना ।
कुष्टादि ग डूष—कुष्ट, काली मरीच, वच से धानोन छोटो पीपल पाटा मुस्ता इलायची कचूरा सब समभाग ले कर कूटकर कवाथ बनाना तालू रोगों फुल्लो—करना ।
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नदान्त टेप नीमको छाल काचनार समभाग कूटकर इक्कठा कवाथक कुल्ला कुंडोकेरी, अजूंअ और तालपात्रमे' धरना ।
य तालशोषमे' मदनारायण तेल मुखमे ९० मिनिट ख कुन्नला (गालूष) धराना । शिरोधस्ति देनार सततक पर गायकर घो ल्गाना । दशांग टेप पानीमे पोष ल्गाना । रदीखा शोवाल घफेद मिटटी और जलपिप्पली (रतवेलौये) पीघकर मसतक-
पर टेप करना घांचना ।
मुर्कान्द मिधप्रण-मुक्का पित्त्री प्रणाल च ऋपुटो रसालादि गुटी शह्रद-भद्म च ऋप्रमा गुंटो हसामत टेकर शिलाजीत सुधापर्पटी सब समान भाग टेकर मिश्रण ६ से ८ रती दै। वहत कल्पाण घृत १ से २ तोलामे २ मिलाय कर सुवह शाम देनार पाल्हेमे सवरोगमे गुणकरी है ।
ओछ होठके रोग
चिन्ह-वायु प्रकैपसे ओछ रक्ष सुखा हेाता है काले पद जाते हैं पौधा हेाती हैं पित्त प्रकैपसे छेटी छेटी फुन्सियाँ दाह हेाता हैं । कफ प्रकैपसे खुल्लि आती है, सफेद कु शोया निकलती हैं, रक्त प्रकैप होनेसे काल फुन्सौया होती हैं । पोढा रफका स्वाम हेाता है ।
ओछ मेटा-कंठमाल के दरद से उपरद ओछ मेटा स्थूल हेाता है,
ओछ फटना-शोत प्रदुथे मारसीसे' छोटी गरमोसे ओछ फटती हैं ॥
ओछ व्रणाचि हर तेल—गंधौले खेरकी—गंध चावलको छाल, तगर, कुष्ठ, वचौके वृक्षका मूल, प्रत्येक ४ तोला टेकर कूटकर दसगुने पानीमे १२ घंटा भिगो कर उसमे तिलका तेल रतल, १० तोला एरंडका तेल रतल, ५ मिलान घौर गमीलाखेर, लोंग गेठ, चंदन लाख, मुल्ठीका मूल, कायफल दासहलदों अमि्याहलदी कचुरा,
पानहदी, हरड, लोंगलो, जावन्रो दुचिया वज, प्रत्येक तोला १० टेकर पानीमें पिस कर लुगदी कर १० शेर गादहे दुधमे मिलादर तथा उसमे मेथ थो। २० डालकर कछाहडेमे पानीका भाग जब जाय तब तक पकाना । पेठे तेल कपडछान कर देना । लप चंच शीतल है। जाय तब कपूर ने रे॥ वारीक घोंट दर शरणी में डालकर मर रखें। यहतेल ओछके कैदी मी रोग पर लगायाजाता है ।
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मोघ्र्यादि घृत-राल तैल ४, मेढ़ तैल २, पकाया हुवा टरुण तैल ३, हरदी तैल १॥ मायका घी तैल, ३०, मेढ़ तैल २० श्वेत शाथ पकांनो धोके घृत दरद पर लगाना ।
शोथरापण मलहम-एंडिका तैल, घो राल, मोम रास्ना गुड, संघा-नोन रेउ मधु माप लेकर मधु घोंटकर पकाकर मलहम करना । मलहम यह लगानेघे रक्चा फट जाने पर रक्त निकलना हेा, रक्त आती है ।
मुखरोग-मुखपाक
मुख का पाक (मुखपाक) जीमकी आसपास, तालू, घेठकी भ दरका माग रटेकै बबेरह म्यानो पर चांदी पड़ते हैं । पेटफै बिकारसे, मजीर्णसे, प न तथा माग, तमाखु के साघ चूना ज्यादा खानेसे, लाल भिरंच लेघो गरम चीज उघार खानेसे, बगदंशका रोग हानेसे हगादि अनेक कारणोंसे मुल्मे घांदे पड़ते हैं ।
मुखपाक हर कषाय-छतपण' बाला, पटोल, नागरमोथा, हरड़ चिरा-यता कुरकटी मुलेठी शतावार, चंदन, घमभाग कुटकर कचाथ बनाकर पिलाना ।
मुखपाक हरमिश्रण-प्रवाल चूर्णपुटो तैल १, मुक्ता पिष्टी तैल ०१, महाच द्रकला तैल ०॥ अथवा तस्व हे ३ शहद साघ मिलाकर ४० पुडिय़ां वनाना ।
मुखरोगहर घपंण-हउदुंबर नीम विजयसार, बें, वड, दचूल इन वृक्षोंफे थड उपरकी स दरकी छाल वीस घौस घोला, कचची सुपारी घोला १०, पकाया हुवा सोहागा (टकण) तैल ३॥ सफेद हरया तैल २॥ सब मिलाकर द्रपडछान कर मुखमें घोसनेसे चांदी मुख पाक जीमका पाक गलैका रेग, काकड़ा टांकड़ीका दुःखन मिटते हैं ।
मुखरोगहर लवण-एक केांरी मिटटीकी हंड़ड़ोमें नमक घोला ४० डालंकर उसके उपर तांबीका सुरका घोला ८० डालकर पकाना । जब सुरकां जल वाय तव डंवरी दफे घोला ८० सुरका राषना । इसो तरह ३ वर्ष सुरकां -घाल पकाना । पीढे लवणमें तैल ५ माजूफल (कांटाळा मायां), तैल ५ इमलीहें वीज, तैल ०॥ रंपी मस्तकी, तैल ०॥ अथकंरकरा, लेकेर सवं साथ कूटकर द्रपडछान कर सवं घोटकर रक्सना मुखमें घोसना । मुखंकी गरमी चोंदी मिटते हैं ।
मुखरोगहर घृत-चमेलोके पत्ते, आंवपेधे पत्ते गुलवेलेका पान, नीमके पत्ते, वचुलके परथे विजयंसार (अ जन) वृक्षके पत्ते, कैंमल और कैंसीकां कंद, कच, मोआ-मधूक, मुल्ता, लेध्रे वालीं, मेंडकी बंड़बाद, अमोघाईलदो, देवदारू
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सदरस्त रचौत प्रत्येक तोला २॰ लेकर सुपी चीजो दे॥ कूटना सब पानीमें १५ पटा भिगोना पं॰छे उसमें घो घेर १५ घालकर पकाना॥ पानीछा भाग जल जाय तब कपड़छान करना॥ उसमेंकूर चो। १ पोछ कर मिलाना॥ से २ तोला चटा कर ऊपर दृढ़ पिलाना॥मुंहके प्रत्येक रोग पर लगाना मिलाना॥
मुखसै।ग ध्र्य घट्टी—चेरको छाल तथा मुलेठी कें मूल प्रत्येक घेर १, व घोला चेरको छाल घेर ४, सुगंधी कुष्ट घेर १ सवदेड़ा घाय कूटकर पानी शेर ४॰ ढालकर १२ घटा मिगो रखे॥ दुघरे दिन पकाकर आघाघानी रदेने पर कपड़छान कर उसमें नींचे लीखी वस्नुभोका कपड़छान घूण' घालकर घीमी आंचपे पकाना॥ रघदी जैसी हेा जम उत्तार कर रोंग रुपेते मरतनमें घालदर सुस्नाना पीछे गोली घुंघा प्रमाण वनानां॥ घालनेकें प्रष्य इलायची, चमलपुप्प चंदन, सारिवा, पानछी, तमाल, मुस्ता, कपूरकाचली मुड़ेठोका मूल मोखदो गुलाब, जांवर्ली, मोगराके फूल चमेलींके फूल, लौंग, गैरघार प्रियंगु नपला प्रत्येक ६ ठोला रवदी जैसी वसतनमें घालां हैं उसमें घव मिलादर पोरे उसमें लाव'ग्रो तों ६, कुष्ठ तों ६, मोमस्नों कपूर तों ४ मिलोकर गुंलां, चिरोंजी जेसां गोली वनाकर छायामें सुस्नाना॥ पंछे गुलावके अत्तरका द्वाथ देना और मधूचूत चूंबवालो हों।सीमें भर रखना॥ यह गोली शीतलतु में वनाई हेा तों बहुत गुणवारी रहती है। मात्रा ३ से ८ गोली दूध के साथ देना अथवा मुखमें रख के रस उत्तारना इस्से वायु, पित्त और कफके प्रकापसे उत्पन्न हुये चाहे जैसे मुखके तालुके घटेके रोग नष्ट हेाते हैं तथा मुंहको दुर्गंध मिट जाता है और मुख सुगंधी हेाता है॥
रसालादि गुट्ठी (घारिणी गुटिका)—पारद ग धक जामुनके रसमें पकायी ठोहररस्म, आंवला फूल, नीमकें कमल पत्ते कथा, मुलेठी, अं॰दिया हलदी, कपूर काचली, आवला, अभ्रक भस्म प्रवाल चन्द्रपुटा सोवरसो॥ भरेंग, कपूर, बच्चे इलायची, जायफल, व शठे॰चन्, चिनीकषारो कुष्ठ, जायफल जंयपत्री मुस्वा, जटामांसी, वच्न समभाग लेकर कूट कें वारीक हव छे से छान कर पानीसे चने चोथी गोली, वनाना॥ मात्रा ३ से ६ गोली दूध के साथ देना॥ मुखके सव रोग मिटे॥
मुखरोग हर गड्डू कुड्ला १—पटोल, नीम, जामून, आंम, चमेली इनके पततेका रस्नाव वनां कर कुड्ला कराना॥
मुखरोग हर ग 'डूप कुड्ला २—चमेली के पत्ते, घमासा, वच्नुक्रों छाल, चेरको छाल, आंवला॥ ये सम समभाग कूट फांट वनाके उस्का कुल्ला दिनभमें ५ से १० दफे करना॥ मुखमें जोधे पद गये होवें रोग जाते हैं॥
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मुखरोगहर गंडूष कुल्या ३—मंगरो सुरकेका और गुलाब वत का
तिलके तेलका कुल्ला कराना। मुईके पत्ते हमेशा चबाना।
प्रवालादि मिश्रण—प्रवाल चूर्ण तोला २, जहर मेहरा पिष्टोचेवाला ११,
मुक्ता शुक्ती पिष्टो थे। १, सुवर्ण वसंत मालती तो. ०११, छोटी पीपल तेला १,
इकलची दाना तोला । ।, सर घास मिलाकर दूध पुरी बनाना दो वक्त सेवन
मक्कनमे देना रसोतपिंडे वटीका सेवन कराना ।
जातीफलादि गुटिका—जायफल, जाव'त्री, मरवा, केसर, कुठ, समभाग
कूट मधुमें ७ रत्तीकी (प्रायः १ वालकौ) गोली बनाना मुखमे रस्सनेरे पस-पूस
या दूसरी दुर्गंध मिटे ।
कुष्टादि चूर्ण—कुठ जायफल, वडीहरड मम भाग कूट हमेशो सुवह
वाम । तेला चूण' पानीके साथ देना मुख दुगं'ध मिटे ।
करण्यादि चूर्ण—छोटी पीपल, नीरा, कुठ, इंग्रुव हल्दी ओवला
वेडार्ङ्गी कचुरा समभाग कूट ०। तेला पानीके साथ देना तथा
दोनों वक्त भोजनके बाद १ तोला चूणं खूव पावकर कुल्ला कराना ।।
स्वित्रादिवि तेल—गंधीला, शेरकी छाल, रतल ५ कूटकर कवाथ बना
कर, मजीठ टेघर मडेरां गंधीला घेर. कथा, कायफल, लाव, यरकड़ी छाल, छोटी,
डेलायची. कपूर, अगर, पद्माख्य लौग, तिनीरूवाला जायपत्री पत ग गेठ, तज,
नागकेसार, घाइँकेफुल, तुलसी, नागरमोथा कुष्ठ. मुळेठी रास्ना प्रत्येक ४ तोला
सेकर कूट'कर रेसमे डेलींक रथ्यं मचा पानी शेर ९०। ढाल पकाना. पानीका हिस्सा
मूल जाय तब तेल कपचाकर लेना इस तेलका कुल्ला (गरारे) करनेसे मुखके
वव रोग मिटे । मुखकी दुर्गं'ध दूर होती है । दांतोंके पेढे' (दंतवेष्ट) और
वाद, नीम, गिलोफेङे दरद मिटते हैं । मुख रोगमे १ चे २ तोला यह तेल
विलाया जाता है ।
मुखसौरस्य वटी—खेरसार तेला ५०, अभ्रक भस्म, पारद, गंधक,
रोह भस्म डेलायची कमलफुल सफेद चंदन, नागरमोथ, वाळा, सारिवा, तमालपत्र
मवीठ, मुलेठी मूल, रिघामपगी (लज्जालु) हरडे वेढ हां, रघौत घाइँके फुल, नाग
केसर, लौग, गेठ दारुहल्दी, कायफल, कमलवीज लोध्र, मधकी बचवाई
ममासा, घटामांधी, हळदी, रास्ना, दालचीनी, कपूर मौक्तिक्शरी पुन्प ।
तुलसी, शाकर, लाव प्रत्येक ४ तोला, काली मिरच, छोटी छोटी पीपल
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प्रत्नेक २ तोळा स्वय साथ कूट मिलाय गुलाब जल में भोट गुंजा जैसो गोली बनाना । यह गोली तांबुलके साथ लानेसे मुखको दुर्गंध मिलती है मुख सुप्रि-युक्त घनता है । जिह्वा, तालु, कंठके मुख रोग पिरथे है । सुरके सब रोगोमें मुखमे रख्ख स दंतादन मात्रा से ६ गोली पानीसे दी जाती है ।
वोजपूर योग—वोजारां वोजपूर हरकि छाल छायमें खप्ताना चबके कूट कर ०१ तोळा श्ववह ग्राम पानीसे देनेसे मुखभी दुर्गंध मिलती है ।
निम्मार्क योग—नीर, अशोक यचुल पटलवाइ इन प्रसोध दहोन, करके तिलके तेलमें भिगो। कर दांत ऐरार मुखड़े (पेटा) पर घोसनेको द मेश्रा आदत रखनेचे मुखकी दुर्गंध मिलती है ।
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अम्लपित्त
कारण—सिद्ध—स्वभाव, विगड़े हुये, रात्रिवासो खट्टे दाहिकर पित्तकारक लष्ठ पानके अधिक उपयोगसे, 'अजीर्ण' पर भोजन करनेकी आदतसे, छातीमें, कंटमें दाह होता है। उस समय 'छाती दकार उद्गार आता है। 'छातीमें' रुजुरा चढता है। उसका भयाता है। भूख मंद हो जाती है। इस ददमें तृषा बाद, दस्त नक्कर, वमन स अधिक होना, शरीर पीला पडना, जैसे विन्द दिखायो देते है। वमन होता है। छातीमें कढेजा तक बलन होना है। वमन या डकारके साथ खट्टा पानी या पदार्थ मुखसे पछता है। वमनका र'ग लोल, काला, लाल या पोला घेता है। मस्तककी पीडा होती है। दस्त द्दज रहता है।
पथ्यापथ्य- जव, गेहूँ, मुंग, लाल पुराना चावल, शाकर चीनी, शहद, घ'टैल, कारेलाका शाक, कासका अचार र 'वल जांगल मांस, उबालकर शोत तैल, नये घृतिये, कुष्मापानी, सत्तू दृश्यादि कफ पित्त शामक चोजें हितकारक हैं। तैल, दही, दही, छाछ, सुरका, खट्टा तीखा भारी गरिष्ठ पदार्थ बाजार को मीठाइ, आमका अचार शाक दृश्यादि हानिकारक हैं।
अम्लपित्तांतक मिश्रण—अम्लपित्तांतक लेआह तोला ०॥, सुवण वस्त त मालती तेह। ॥ प्रवाल च न्द्रपुटो तेह , आरोग्यवर्धनी तेह ४ सह साय घेट ६४ पुढी वनाना। सुवह श्नाम एकेक पुढी शहदशे या पानीशे ठेना?
आरोग्य वर्षनी मिश्रण—आरोग्य वर्षनी चूर्ण तोला ४ चोगराज रसायन तोला २, वेडा दरेह चूर्ण तोला २, साथ मिलाय ६४ पुढी वनाकर दो समम पानीशे ठेना।
सर्वेतेामद्र लेआह-लेआह मधम, ताम्रमस्म, अभ्रक मस्म प्रत्येक तोला, ६, चंद पारद तो. ३, पथक तो, ४ मारिक मस्म, शुद पनशील प्रयेष तो ३, शिलजीत तो. ३, गुगळ तो. ५, वायचिडिग, मिरवा, चित्रा शाकका मूल, पलाशके मूल, मुसाली पुनर्नवा, मोगरा, शतावरी, चक्रमर के फूल, गेरुसुंघुंठे, घूंठो, छोटी पिपली कालीमिरिच प्रत्येक तोलां ०॥, सर्वेता विशेषत् शाथ मिलाय पानीशे तीन तीन रत्तीकी गोली बनाना। मात्रा ३ से ६ गोली देा या तीन समय पानीशे तीन तीन गोली देना। जाहे जौसे उपशोकवाल अम्लपित्त मिटता है।
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इससेे बलावा भ्रमं, संंदर, ग्रहल, कुष्ठ, पांडु, शोथ, संधिवात गुल्म, सांसो खांसी, इन दरदोंमें भी गुणकारी है । रातको सेवन घेनामली ( मी ढोभाबल ) भस्मामन सम भाग हाट ०। से ०॥ तैला गरम पानीमें देना ।
लोला विलास-रस—पारद, न ग्धक, टोढ भस्म अभ्रक भस्म, हरतल, वहेरां सोनेला रतावरी निमेषा सेती पीपल निसोथार, सेोठ,नोन कुठको येह समभाग लेकर, भांगरेहे रसकी और रतावरीके रसकी या क राथकी एक एक भावना देकर घोट कर रखना, या गोली गुंजा प्रमाण बनाना । मात्रा २ से ४ रती या ३ से ४ गोली पानीसे भस्लपित्तमें देना।
भस्लपित्तान्तक लौह—त्रिफलामें पकायी हुयी टोढ भस्म तो० २ ०, पारद, ग न्धक पंडुक मन्मररक्, प्रवाल चंपुपुटी प्रत्येक १० तोला, घाथ मिलाकर निसोथ और कुठको के काथकी भावना देकर घोट कर रखना मात्रा २ से ४ रत्ती घनिया हरड़े मुलेठीके मूलके काथके साथ देने से भस्लपित्त मिटे ।
आयुर्वोंचकृत चूर्ण—सोंठ पीपल कालीमिर्च हरड, नेहदां आंवला नागरमोथा बिडलवण इलायच्ची तमालपत्र प्रत्येक एक एक तोला, लौंग तो० ९९, निशोथ तो० ४४, शाककर तो० ८८। घन साथ विविधत मिलाना माना ०। से ०॥ तैला पानौके साथ देना । घन प्रकारके भस्लपित्त मिटे तथा कड्यी मदामि और वचासोरमें बहुत लाभदायक है ।
भस्लपित्त द्वामनाघले: (कृशमांदारावलेऽह)
मीठा कददू भुराकेाला पदा हुवा देखर उपरसे छाल और मीतरमें बीज रेपा इत्यादि निकाल खमण करना । पोछे खमणकेा निचोउड कर रस निकालना । यह खमण शेक १० की घी में ५ सेर मंदा'ग्निसे झीमें वादामो रंगका हो तव तक पकाना ओर एक वाजरखना । पोछे मोठा कददू निचेओड कर निकाले रसमे हरे आंवलो बाफना । यदि आवश्यकता हो वाफनमें जदरी हो इतना तात्र पानौ डालना । जब पक: तव आंवलो निचाल बीज निकाल हू'टा कर रखना । उस छुदामे जकरी घी' डाल कर धीमी आंचसे सुनना । पीछे आंवलो का मे दा पतताथा जैसी धट्टो वाशनी हेा जब पकाया हुआ मोठा कददूका खमण और आंवलेएका छुंदा डाल फिर पताना । इस तरह पकाना कि जल न जाय । जब घहट हेा जाय तव नीचे लिखी भौषधियोंोंका चूर्ण जो तैयार रखा हेा डोलहेर डालना । धनिया छोटी पीपल नागरमोथा व शाढेठचन, जीरा, शंखजीर!, इसक-
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गोल, तुलसीके बीज दाखचीनी हल्दीचो, नागकेशर, हरद. कागज़मिरच सोंठ, पका हुवा टंकणखार, चपामार्ग क्षार, गिलोच रस, मोहग्गा प्रत्येक दस दस तोला तथा ठेठा भस्म, अभ्रक भस्म, मंडूर भस्म और शंख भस्म प्रत्येक ६ तोला, कपूर वे. २। मिलाना । शीतल हॆा जाय जथ साह्द जसर जितना मिलाना । पीछे कांसकी काथणीमें मर रखना । मात्रा १ से ३ तोला चपर घटाये किसी औषधके साथ रवना अकेला खिलाना । अम्लपित्त दाह, छातीकी जलन, अरुचि, सबका नमन, वायु, विस, कफके सव रोग, शोथ क्षयरोग, प्रमेह, प्रदर, विषावकी मलन, खोटी गरमी, बवासीर इत्यादिसे उत्तम है ।
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अरुचि—खुराकका प्रभाव रुचि न होना, कारण—संप्राप्ति
शोक, भय, क्रोध कोय अप्रिय वस्तुका दर्शन चिंतवन, दुर्गंध, ताम्र इत्यादि कारणोंसे यह दर्द होता हैँ। इधरसे दात मट्ठा होता है । मुख चेष्टादि न*कीला कड़भा, तीका, कट्टा, चीथना दे¹ जाता है । वायु प्रधान होतें छातीमें शूल निछले छातीमें दवाव होत, पित्त प्रधान होतें। तो तृषा कलकल शोप लगे । कफप्रधान होतें तो मुख चीथना होत लाला (लाळ) गिरें।
पथ्यापथ्य—पुराना चावल भूसी, वेगन, वृथ जन्त्री दोने देठे, दाडिम, फणस घो लस्सन, जमीक सुरण, माक्ष, सांप, शिखड, महीं छाड़ दितकारो हैं । अनिद्रा, मलमूत्रके वेगका अवरोध अप्रिय वस्तु क्रोध, शोक तथा दुर्गंध इत्यादि हानिकारक हैं ।
रामवाण—पारद गंथक वच्नाग लोंग प्र³येक ३ तोला, कालोमरिच तें। ६, वायफल तें। ११ सव साथ मिल य इमलोके पकड़हुए फलके रसमे गुंजा प्रमा³ण गोली करना पानोके शाप देना । अर्धचि, उल्का, भं दरामि, दस्त, इत्यादिमें दिया जात है ।
घरेलु नुस्ख़त—पारद, गंधक, अभ्रक मसम, चिनो² कशाला जीरा लोंग शाद शोरा, मुस्ता, कुठ प्रयेक तोला ४, शकर तें। १२, केशर तें ०११, कपूर तें १ सम साथ कूट मिलायदर दाडिमचू रस तेंला २० ड़ालकर छायामें सुख़ाना । पीछे इमलोके पकें हुए फल तें। २० पानिमें भिगो दर रस निताल कपड़छान कर उसमें मिलाय छायामें सुख़ाना । पोछे निँकै रसमें चना जेसो गोली वनाना । मात्रा दिनमें ४ से ८ गोली पानी के साथ देना अरुचि चमन, भोजन पर समभाव पेटमें गड़बड़ाट, वायु पेटमें पवन भरा जना, आफ़रा आध्मान इत्यादिमें उत्तम है ।
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वमन— हर्दि— वुष्टि—
कारण—अभ्रिम वन्त पान, वहुमोजन, अन्न गिरमा वजीन', कुषि, शगर्म्मा अवस्था दिसाका दर', गुणा हो जैसे परसाय देवता, स्वादवस्तुका स्मरण, दुत' हर पित्तदे प्रकुप द्रव्यान्से वमन होता है। तथा राप कोढेह, लोंदिसार, शोय लिवरका हर' पथरे मोरह रेरेसे, यो वमन होता है। वमनके दोषोंकी शांति वास्ते हिक्का ताप तृपा, छातीमे दड' इत्यादि दिखायो देते हैं। वमनमे कभों अन्न वित्त या पातो निघलतां हैं। और हमे! वमनमे रक गिरता हैं।
पथ्यपथ्य—मटर, जव, गेहू, मुंग चाह-- माश गृगका जांगल मांस शीतल द धारवत प्राप्त ह'थे, डांडीम, मेठा निंबू खट्टा निंबू सहतुत, अजीर इत्यादि हितकारक है। लंघन, कराना दस्तकी श्वा देना। देवदारू का रालान्य और अन्य लक्खणोंको जान करके, शुराक सौर औपधकं येसना चरना।
हर्दि' पा कर—रसायनर। शुण्ठि मधु टोंह मरन अम्रकु भसम सुवर्ण माक्षिक भस्म मुलहठी मूलं, शिलाजीत वंशलोचन सेंठी छो'टी पीपल, काली मरीच, तिलक्री डंठीकी भस्म, हरड, कलौंजी जीरा वायविडग, इला.म्ति, नागर-मेध, नागकेशार, दाख समुल माश' हेठ, धोकेरा के रसीकी, योंकुंडा कराथ क-देना मावना दे कर सुद्धा कर घेँट रखना। मात्रा y से ८ रत्तो पानोके साष देना। वमन वरकटेठ, अजीर्ण, शुराक पर अभाव सम्भं द्वोर्ही वमन इत्यादिमें उत्तम हैं।
वध्यन्त ड—रसप्निधू तो. y सुवर्ण माक्षिक मरम ताम्र भस्म वंगभस्म मुखा विशे प्रतयेक तो। १, टोंह भस्म, अभ्रक भस्म, तथा शुद्ध गनवक प्रतयेक तो। ६, गजोरेा, सदारस वड़ी लनी आंवलों तथा तलसो प्रतयेकको एकएक मावना दे कर सुद्धा कर घेँटना और रसमें जो'र्ण अ'वमन सेंठी, छे'ट पीपल काली मरीच हरड वेहरां, आंवळां हुलौजां जीरा, वायविडग दालचीनि प्रतयेक तो। ०१ कूठकर मिलाब घीट कर रखना। मात्रा शुमह धाम दै'रे चार रत्ती पानो या शहदपे देना। किसी भी कारणसे हेती वमन बंध हो जाती है।
पथ्यादि चूर्ण—इलायची कलोंजीरा, लौंग, चीनीक वाळा नागकेशारे छोटो, पीपल चूर्ण सेंठी गजोठी नागमोेध हरड आंवला शेतचन्दन शव समभाग कूट कर कंषडखान करके ०१ से ०१ तोला चूर्ण पानीसे देना।
अमरी मृदु योग—अमरीचका मोण—g जो मिट्टीका ढोता है। वह ०१ तोला पानीसे या शहदसे देना। वमन शमता है।
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कमल घोमादि योग--कमल मोजरी गिरी. घुरारी सारे क इलायची इस तीनोंफा सममान पीस कर मात्रा १० से १२ रत्ती पानीफे साथ देना ।
स्वप्नरादि योग--थापरीया खुद्द या स्वप्नर मस्त, बाला, इलायची, अजवायन के मोजन (यद्य) की मिले, मोरके पिसफी मद्दम रपटेफा जलाकर की हुड राज सबकेा समभाग पीस कर १२ मे २४ रत्ती पानी का मद्दतले देना चमन मिले ।
४ विपत्तिदुफ योग--विपत्तिबुक (कुचला भिमा सख्त फिमा शुधा) घोश कर प्रायं १ रत्ती पानीमे मिलाब देमा उछाळा, मेाळ, कफ्टि मिले ।
मापलकरादि--आंवळी चेाला १, ली पीपल चेाला १, काली मिरच तेाला १, शाकर ते'ला ४ माथ कूट १२ से १४ रत्ती पानी सा साथ दे देना वमन सबका मिले ।
सैंधवादि योग--सैंधानोन तो १, इलायची तो १ कुटकर १२ से २४ रत्ती पानी के साथ देना
पलादियोग--डालछी दाना १० से १२ रत्ती तुलसी के रसके साथ देना उछाळा वातिफा सममन हो ।
सतिकिविरादि योग--अतीश कुटकी हरड प्रत्येक तोला एक असार भीन तोला ३ स'थ पीस ०१ तोला पानी से देना ।
९ पूरोफळयोग चोको सुसारो तोला ०११, कध्या तेर ०११ पानी शेर २ में उबाळ कर ' जब पानी होय .M, रेहें तबह उक्षमें छेटी पीपल चूर्ण १ वाल छिड़क कर वह पानी पिलाना । उदावते वायु वमन उत्कळेर डकार मिले ।
१० निसू रस तेर ०१, गायका बुध तेर ०१, मिलाकर पिलानर ।
११ तेल मथवा घो मरनेक चमड़े का कुचळलाका डफरशरफा जला कर राब करना । यह मरसम वाल १ पातो के साथ देना, १ बहुत दिनेों तक वमन मिले ।
१२ इलायची, लाल चावल लौंग,गर पिप्यल प्रियंगु धामका फूल (मोर) मागकेदार कमल चोजरी गिरी बेरके योक्की गिरी नागरमेथ चंदन रुच सममान कूटकर शाहरद के साथ ०१ तोला देना वात (पित्त कफफो दमन मिले ।
१३ इलायची ता ०१, सेठ तो ०१, तुलसी रस ता ०१ देना वमन मिले,
१४ डोंग, अफीम, केशर सममान लेफ़र प'स कर पानीमे चना जेसी गोलो बनाना । मात्रा १ से २ मेालो दिनमे दे या तीन दफे देना' । वमन मिले ।
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१५. केशर घास-तैल, माकड़ तो. ०१, चंदनाके साथ घीष्र कर ३ दिन पिलाना उबका उलट्टी मिटे।
१६ अजवायन तो. ०॥ कूटकर गौमूत्र तोला ५ से देना। ३ दिवस पोनेशे उबका, उलट्टी, मोह मिटे।
१७ सुगळकाका घूप कोरे घडेके ७ दफे देना। पीछे पानी पानां। वह पानी पाना उलट्टी मिटे।
१८ निंबूरस तैल १ में इलायची दाना देा माासा कूट छालकर पिलाना वमन मिटे।
१९. मयूरपिच्छ भस्म, लौंग, समभाग चादद साथ ३ से ४ रत्ती चटाना। वमन मिटे।
२० विडोराका रस-तैल १ तोला २ मे मिलाकर देना।
२१. अगरकाष्ठ, नागरको काष्ठलो, कमल वोजको गिरो पानीमें घोस पिलाना। ३ से ४ दिनमें वमन मिटे।
२२ शंकेके पान छायामें सुखा कर पीसके उसमें समभाग जवाखार मिलाय तो. ०१=भांर पानीके साथ पाना। तात्कालिक वमन मिटे।
२३ तुलसीरसरसे, चेंग जीरा समभाग चूर्ण-०। तोला देना वमन मिटे।
२४. मयूर पिच्छधी-भस्म, लौंग, समभाग पोस्त नागर वेलके पानके रसमें मुग जैप्री गोली बनाना। २ से ३ गोली पिलाने देना।
२५. नागकेशर, आंवक़ी गुठली, इलायची समभाग कूट कर ०। तोला देना।
२६ जामुनके पानी उबाल कर पोलीनेस वमन, उल्की मिटे।
२७. स-चल, 'जीरा, शंकर, कालीमिर्च समभाग कूटना। तो. ०१, शहदसें चटाना।
२८. मोंठ, पोपर-चमभाग शहददसे देना।
२९. कडकी बढबाडके अंकुर जो 'कामल हो। उनका रस गायके दूधके साथ पिलाना सगर्भा स्त्रियों वमन मिटे।
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शारीका दाह शोध तृषा
गला रक्तना सुख्खमे अमी 'न रहना।
विस्तरे प्रदेशपसें मुख्मे जलन शोध आदि हेतें है। इखरे चिन्ह पित्तज-रसे 'मलते जुलते हैं। पित्तज्वरमें तेजरी पेट बिगड़नेमे शारीका ताप होआ है। हुव दाहरोगमें पित्तज्वरक चिकित्सा करना।
शारे वदनमें फिरदे रचमें जलन होता है। शरीर मानो अभि में जलता हे। तपता हे थैषा लगे। गुल हु्त' हे। शारीर और आंखे लाल हे जाय। शरीरपर अंगारे रखे हे भीनी मलन हे। हाह बहुत पीने से दाह हेरक
है वह वित्त और लोहूके बिगाड़ता है। यह मलन वही भय कर होती है। श्वास इत्यादिके आघातसे, पेटमें लोहूका जमाव होनेसे मलन होती है वह प्राय: असाध्य है। तृषा रोकनेसे अथवा तृषित मनुष्यके पानी न मिलनेसे रच क्षीण
हेकर वह। हुव तेज-आंतर-मीतरका और वाहिरका अभि वहका जलाता है। तव मनुष्य वेष्टाहान हे जाता है। गला, तालु, ओष्ठ सुखते हैं। जिहा वाहिर निकल जाता हे। घ'तुजे हयसे हुजे द'हमें मूर्छा भाती है। मनुष्य कामाः
होनेसे मंह रोगष होता है। तृषा लगती है, स्वर बैठ जाता है, डलन चलन नहिं सदता नहिं। किसी मी प्रकारदे जलनमें शरीर उपरसे ठंड लगे और मीतर
असच्य जलन होती हे। तव वह प्राय असाध्य चिन्ह है। इखरे अलावा दूसरें रागके अतमें तथा त्रिप्ती। चोज ला जानेसें मी दाह हेतता है।
यह दर्द' भड़ेला अथवा दूसरें रागकु इन्ह रुपमें मी होता है तव शरीरमें मलन होती है। न.युक्सा या पित्तका प्रकोप होनेसें, जिर्ण'ज्वरसे, बहुत श्रम करनेसें, घूपमें तपनेसें, भय पानेंसें, कामाः होनेसें, शास्त्रादिका घाव लगनेसे हयसे
तथा दूसरें रागोंके कारण मी यह दद' हात! है तव चार बार पानी पीने पर मी तृषा छोपती नहिं।
उपचार—सेा वक्त घेया हुया घी मुने हुये जत देए, आंवळां, यम माग लेएर सुरकामे या खीरी छाछमें पीस मदन करंना। छाछसें मिगोया हुया
कपदेड़ा द्राक्षा ड वीर पर हत्ती। वाळा और चंदन गावमें पैस कर लगामत। 'चंदन और मुलहठी प'घ पत्ता' पर टेपकर उहसे पंखा करना। हैलीके
पत्ते कमळ पत्त्र विछाय टस पर दद्र्को शुलाना। ठंडा पानी विरपर धतत छिड़ेतना। प्रिय गु लेओप, वात्या काला वाळा, न.गनेसर पीसके लगाना। वाळा,
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बले डाल उष्मे बिठाना कमलका जल, चौनीका पानी, दूध, गन्नेका रस इत्यादि पिलाना। काळा हंसराज, औरे जलपिपलीके पं०श पिलाना और ल्गाना।
चंदनादि कवाध–चंदन, पपं०ट सुगंधो वाला, नागरमोथ कमल कद, कमलफूल बड़ोशौफ घनिय़ा पं०डराठ, आंवळी, समभाग क्रूट 'र से ४ तोला चूर्णमें ४० तोला पानी डाल पकाना। भाषा शेप रहैने पर शक्कर या शाक्कर मिलाय श्रम प्रफारिक दाहमें पिलाना। यों २ से ४ तोलने ९ तोला पननी डाल छहू घटा मिगो रसना पीछे मलकर कपड़ डाल कर पिलाना।
रौप्य गुटिका–३ या ३ तोला शुद्ध चांदीकी गोलो बनाकर उशे अभि पर रख्ख लाल होनेसे मुलेठी, द्राक्षा, वायविडंग, चिनीकरवाला इक्षु रस शाक्कर नागरमोथ सब समभाग लेकर क्रूटना। १० तोलामे २ तोला पानी डाल १३ घटा मिगो रखना पीछे इस पानीमें वह चांदीकी गोली २१ रफे कुजाना। यह गोली मुखमे रखनैसै तृषा छोवती है। मुखमें अमी आता है। दाह मिटता है।
कुठादि वटिका–कुठ, जलपिपली मुस्ता हड़की रद्राइके दोमल अभ्रभाग, मुलेठी समभाग लेकर शहदमेंंवाल बालकी गोली वनाना। मुखमें रखनेमें तृशा मिटे।
पलादि चूर्ण–इलायची, जलपिप्पलो लौग, रजपिपल, प्रियंगु शिशवडिंगीवेर, वेरके यीज़की गिरी नागरमोथ शफेद चंदन समभाग क्रूट के २ से ४ माशा शहद या दूधमें चटाना।
पलायादि योग–इलायची चावल लौंग, नागदेवेर, चंदन समभाग क्रूट के २ से ४ माशा शहदसे देना।
द्राक्षादि योग–काली द्राक्ष पपं०ट (रेहु) शाक्कर इश्का हिम पिलाना।
घदिरादि योग–बेरके केंमल पत्ते, आंवळां पकते हुऐ चावलके पानोंमें पोश हाथपंग पर र्गाना। दाह मिटे।
भ्रामलादि योग–खोकला बड़के केंमल पत्ते, रीठेके फेन हाथपंग पर लगाना। दाह मिटे।
कपूंरादि योग–कपूर, चालो, इलायची, आंवळी, चंदन, टहरे पानीषे पीश पिलाना दाह मिटे।
सुधद्यादि योग–सफेद मुसारली, काली मिरिच, शाक्कर समभाग क्रूट शहद से ६ तोला पानी के साथ तैनैसे साथ मुखका दोष मिटे।
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वातक्षादि योग—बाला सफेद चंदन लालचंदन काला हंसराज पद्मकाष्ठ
सब समान पीस मस्तक पर लेप करना । तृषा, शोष बाह मिटे ।
कुष्ठादि योग—कुठ, चावल, बडकी बडवाइ, सुलेठी मूल नागरमोथा
प्रत्येक तोला ०॥, कमल बीजकों विषी तें। ९ सब चाथ पौष सबके समान
षाककर मिलाय शीतसे वाल वार्धी गोली वनाना । गोली मुखमें रखना तृषा,
दाह, शोष मिटे । सुखमें भमो भावे ।
लोध्रकष योग—गजवेलके हृद्वरेको तपाकर उपर पानी छिड़कना उथ
पानीमें शीतद शाककर मिलाकर पाना । तृषा शोष मिटे ।
कृप्णादि योग—छोटी पीपल, नागकेशर, दाडिमकी छाल, शकर धम भाग
लेकर शीतदसे गोली वनाधर मुखमें रखना गलाका शोष मिटे ।
चंदनादि योग—सफेद चंदन पकतेहुए चावलके पानीसे, घीष पिलाना
तृषा मिटे ।
तृष्णाहर रस—(यो तें) परिम ९, गंधक ३, कपूर ३, शिलाजित ४,
वाला ५, काली मिरच ६ और शाककर ७ भाग लेकर कूट कर ३ रत्ती रातबासी
पानीसे देना । तृषा शोष शांत होता है ।
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मूर्च्छा
कारण—निबंलता, दीप्तिदा प्रकोप, विशद आहारादिकद्दारका सेवन, क्रोध, शौक मनपर बाघात, तमोगुण, मलमूत्रादिके वेधका स्वरोध, विष माघात इत्यादि कारणों मे प्रकुपित वात पित्त कफ हृदयमें, ज्ञानेइन्द्रियोधे फथानमे, कमेंइन्द्रियोंके स्थानमें प्रदुथ हेतोते है जय मनुष्य मूूर्छित्स होता है ।
निद्रा—प्रारंभमे हृदयकी गति मन्द हेाती है । मेदक, चमन 'होनेसे वासके गति मद हेाती है वारीरमें कंपंन हेा ठंडो मच्ती है, पसीना बहुत हेता है। नाड़ी मन्द स्रदियत मनियाली हेाती है, दाय पांवके और हथेरके दूसरे स्नायु खिंचाते है, मन घबराता है । मूूर्छा जड पेड़पे पर पहुचे तथ रोगी वेधुध्ध हो जाता है, मर्छमूर्छ' हो। जाता है। श्रम, शंन्याध इत्यादि सेग इप्ते मिलते जुलते है ।
मूर्छा—पित्त और तमोगुण प्रधान है । भ्रम—पित्त वायु और रजोगुण प्रधान है । तंद्रा—वायु, कफ और तमोगुण प्रधान है ।
संन्यास—कुपित हुये वलवान देाप जिद रथानमें प्रवेश कर वाणो' देह और मनको गतिदेता हक देता है और प्राराघेन हेर गये हुये मनुष्यकेा काष्ठकी तरह पटक देता है । त्रुत' भावजोसे रुपाय न दिय तो तरकाल मरण मी हेा जाता है । इसको संन्यास कह्ते है ।
पथ्यापथ्य—दरतीका मूतपर खुलाना', ठंडो 'हवाआंघेांकेपरेसे' ले जाना, वमन स्रथिल करना । पिथा हृदो कधुमें को' या म्रोज'को पंस सु घाना या नांकमें चालना तुलसीरष म,पस्मे डालन । कालीमी', मस्तक'पर 'ठंडा पानी धिसुकना । मुंह पर ठंडा पानी क्रिसुकना मन पर पव्रत'पुंस्का करना । गटके नीचे उतरे पुंसी तरह ठंडा पानी चमन्नवसे मेठा येधा पिलाते रहना । द्राक्षासव, मधुसंजीवन सुरा, महाश्रृंगरप्ती सुरा— इत्यादि पिलाना । मस्तकके नीचे उश्रीका रस्चना । मरचा, मदरल फुर्शीना पान लघुमका रस मिचाकर येधा येधा, बहुद दाल पिलाना और नाकमें डालन । हाध पांव पर मृंगराज तेल मालोश करना ।
मूूर्छा नाशन मृृत—मेठ, पिप्पल, परिच, हिंग, निंप'दोके बीज और पत्ते, देवदार, हल्दी मनीठ जानपिदंम, चंदन, भेटी कटदरीका फल केमीका कंद शतावरी, अश्वेग श पत्तेकेा ५ पांच के कर पानीमें कबदी करक उसमे मधका
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दूष रतल ८ डालकर हियाना उसमें मायथा घृत ८ रतल डाल कर पकाना। ९ नीका थंडा जल जाय जव कपड़छान कर ठेना। यह घृत किसी मी औषधके साथ या अकेला ९ मे २ तोला खिलाना। इसमे श्रम, तृषा मिरगि अपस्मार पागलपन इत्यादि मानसिक दरद मिटते हैं।
मूर्च्छानाशक तेलका पारद तैल। ५, माधक तैल। १, रससिंदूर। ता. १, मधुक भस्म, रौप्य भस्म, ताम्र भस्म प्रत्येक ता. २, सहद शहाफे वोझ जिसौषधकी छाल, कचनार छाल, चोपचीनो संगेम्रहाकी, छाल, सोंठ छेटो पिपल काढ़े मरिच, असगंध, हतंख़वरी, वच राइना, नागरमोथा, प्रियाङ्गुध, से घानोन प्रत्येक ता. ३ ठेकर कुटकर चपड़छान कर, पिठाकर उसकरे असगंध, शहदरख, शतावरी मात्ना २ से ४ रत्ती मध्य और मूर्च्छानाशन घृतके साथ अथवा अश्वगंधावलेह दे साथ देना।
मूर्च्छाहरा हद वमन—चौठ, पिपल मरिच सह जनाका बोज सिधानोन, वच हरी लछुन, हर श्रके मील, सफेद सरसों समभाग लेके वस्त-चौकहाके मूत्रमें पोस कर चाट (वर्तिं) वनाना अथवा सत्वाकर भूका रस्ना। इस औषधका अजन करना और शुधाना मूर्च्छा अपस्मार भ्रम चक्कर मिटते है।
रक्तनादी येँप—रास्ना गले (गिठोय) बांधला, 'नगु' की समभाग पीस्ना । *।। से १ तेला भूयाकाका क्वाथ करके लघुयोगराज गुगळ ४ मे ८ गोली अथवा महायोगराज गुगळ २ से ४ गोली के साथ देना।
दौर्बल्यार्तिद येँप—गोक्ख मूत्राकानो घमासा, त्राय्मी, समभाग कूट *।। से १ तोलाका क्वाथ पिलाना। साथ सिद्धानाद गुगळ ४ गोली देना।
अप्रभृमृत घर्पसरी यादी मि*रप—भृङ्गामृत पपंड़ी ता. ०।।, महायोगराज थो. *।।, चप्रभा ता. १ साथ मिलाय ४८ पुदी बनाकर साहिद और घृतमें शक्केक पुढी सुबह शाम देना।
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मध्य (दारू) से उत्पन्न होनेवाले दर्द
मद्य—आसव सुरापान विधि
मद्य पानपात्रं दत्तं प्रियया हृसार्धितेन तेनः । हर्षप्रियायै समये भद्रयेरमृतेऽपं भवेदिहिचिता । ॥१॥
नियमपूर्वंक, नियमित मात्रा में समयका विचार कर हितकारक अन्न और साधु पदारथौं का सेवन प्रिय और प्रसन्न हुये पुत्रद्वारा दिया हुया मद्य—द्रव पदार्थ अमृत समान गुण करता है । बुद्धिमान पुरषोंने मद्यको भोजन जितना हि उपयोग माना है, दिन्न्धु जिस ऋतुमें, जिस जातका मद्य पीना हितकारक हो, तथा प्रकृति, वातादि, शारीरका वंधारण वगैरहका विचार करकै उपयोग करे तौ मद्य-दारू अमृत रूप होता हैं । और मूत॑तासे हृद्र्शे ज्याद पोते चले तो विविध रोग उत्पन्न होते हैं और अंतमे॑ मरण होता है ।
विधि-मलमूत्रोत्सर्ग और स्नान करनेके बाद, सुरगंधौ तैल आदि पदारथौं शारीर पर धारण कर लगाकर, मन सावधान तथा प्रसन्न रखकर सुरगंध पुष्टि करने वाले भोजनें खावें हुये, श्रमर मयूरोदर सुगंधित, सुगंधित शीतल पवनसे शीतल भरे हुये वातावरण वांछे स्थानोमें, चन्द्रकिरणोंसे धनलित और हुगची घूपसे सुरभित हुयो मकानेंकी कुर्सीभूमि अगासिमे मनको पहुन्त्ता बढानेकालें स्थानासनमें हुये पुत्रसेवनें, सुदृर्ण और चांदीके रत्नजदित पात्रमें भरा तुषा, रस यौवनसे पदेान्मत्त और द्रव्याभूषणसै भुपित रमणियांने दिया हुया मद्य पोनें यह शारीरदे नवयौवनयुक्त रखता है । और मद्य पोनेंके बाद विविध प्रकारके फल मेवा, सुरगंधयुक्त घो और वृप वाळे पौष्टिक अन्नपानादि पदारथौं॥ सानें यह आरोग्य रक्षण के लिये उत्तम है ।
वायु प्रकतिवाले मन्दाग्निने दिनराग और उष्ण हतुतमोंके संग मद्य पीना, पित्त और उष्ण प्रकतिवालेनें मदुर और ठंडे फल फूल स्निग्ध पदारथी और कीटेापचारके साथ मद्य पीना । कफ और शरद प्रकतिवालेनें जंगलौ मांस रस और तर्षण गुण वाले फल और अन्रादि खुराक लेने के पेइलै मद्य पीना चहिये ।
गुण—आयुर्वेद में विविध प्रकारके मद्य माने बनानेकी विधि है । कह आहार मिले मिल रोगोंके लिये हि उपयोगी है और कद आरोग्य रक्षणके लिये गुणकारी है । आयुर्वे॑दकी पद्धतिसे बने हुये पानेंदी मात्र १० तौले (१ औंस सेध औंस)तककी एक शिर्फी हैं ! विशोश रोगके कारण
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मात्रां न्यूनाधिक कोमाती है । युक्ति पूर्वक मामासे और विधिपुरस्तर पिया हुवा मद्य मनको प्रसन्नता, ओज, आरोग्य, पुष्टपातल और दलोका चंवाता दे । शरीरको पुष्ट करता है । खुराक पर प्रोति बढाना, भूख लगाना, हृदयको वलवान करना, स्वर सपकेठा विस्तारित करना, भय और शोकको मिटाना, अच्छी नींदको लाना, मलमूत्रको नियमित करना वस्तको कड्रोफे मिटाना इत्यादि गुण करता है । सवारके विभिन्न दुस शोकसे विह्वल मनुष्योमें यह कष्ट कम करता है। मद्यपान करनेवाले लोग अपेक्षाद हो कर अधिक मद्य पीते है उनके हृदय कुफुकार आते' मूर्खताई और दिमाग आदि अवयवेभी विगडते हैं और उनकी दशा पराधीन हो जाती है ।
मद्य पीनेकी निपेक्ष—मद्य-आसव किसने नहि पीना चहिये । कोधमें आया हुवा, मयसीत, बहुत परिश्रम पथ आदिसे थका हुवा, शोकसे विह्वल, मूर्छा त्रुपावाला, कसरत करनेसे और भार उठानेसे थका हुवा, मल मूत्रका वेग लगा हो ऐसे, बहुत रक्ष, बहुत ठंडे सूधे' पदार्थ खाये हो, अजीर्ण पर खुराक लिया हो, शरीरमें कफजोर हो, घूप और अविनसे तपा हुवा हो ऐसे मनुष्यने मद्य-आसव नहि पीना चाहिये । पीनेसे अनेक प्रदारके रोग होते है । अधिक मद्य पीनेसे मनुष्यकी जो दशा होती है यह इस प्रकार है ।
प्रथम दशा—नियमित मद्य पीनेसे बुद्धि बढती है, स्मरण शकि खीलती है. सचारका सुत मिलता है, पढने, गाने बजाने माषण करने आदिमें चतुराई अधिक रहता है ।
दूसरी दशा—मात्रा-प्रमाणसे सदिख मद्य पिया हो तो बुद्धि याददोस्त और वाणोमे विकार स्पष्टता होती है, उन्मत्त जैसी क्रिया और आचरण करता है । क्रोध प्रमाद बालस्य निच्रा बढती है । इस अवस्था वाटे लोर्ग वोहनकर मोटर या वशकां रत्वे तोनका ड्रीयवर हो तो अडदेमात कर देते है । कोभी कल टार्कन घोका कायदाका अपल झानेसे ऐसे लोंग वहाँ जीतनाँ मिले'दार पी लेते है इस कारण बहुत से अकस्मात होते हैं ।
तींसररी दशा—मात्रा प्रमाणमे बहुतूत प्रमाणमे मद्य प्रिया हे तो अमन्या-गमनका मान न रहे । बहुंेकी गुरु रूप मनुष्योंकी मर्यादा न रखे । अभद्य मक्षण करे । मेघर हो जाय , अपनी गुप्त बात कह दे और मनुष्य एकदम पराधीन हो जाता है ।
चौथी दशा—बिना मर्यादा दारु पीनेसे मनुष्य काटे हुए यवकी तरह गिर पडता हे । बेहोश होने पर मूर्छा माती है । किसी डर शोकादिको भोगता है। वीपित रहने पर मृतवत भमता पंवम गतिात करतां है ।
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मध्यमञ्य रोग—शरीरमें शिरा भिन्न भिन्न अवयवोंमें पीड़ा होती है। अपान् मलके रोग होता है। मुखमें शोथ रहता है। मुखमें शोध रहता है। अपान् मलके रोग होता है। शरीरमें कंप हो। कमरोरी बहूत् रहे। हृदयमें शोच हो। खांसी हिक्का स्वर् भेद होत है।
चिकित्सा—मथ से उतापन्न हुये विकारोंमें या दाबके पागडपनमें खट्टी पदाथों, छाछ, दहि का घोल, रबड़ी मलाइ मथन केड़े मूसंभी चौंह द्रक्ष, इमलीके पके फलका पानीमें मिलाकर इसके रसमें गुड मारकर या शहद डालकर पिलाना। रसों के शरीरमें वात पित्त कफकी प्रघानता यथोचितकार देखकर चिकित्सा करनी। अजूण भ जोर, पके वेर, वेल-विल्वकेप के फलके रसका शर्वत आदि देना। स्ववन प्राश कीवन, अभया'मादि धवलेंह माषाढ़र्मे अजुंनारिष्ट मादि देना। सुराकमें चावल गेहूं जव जवारी मुंग उरद आदि देना।
मुक्षावद मि'श्रण—मुकोपिष्टी सप्तामृत लोघ, यशद मरत प्रत्येक एक पुट होला, घमशांकंरचूर्ण ४ तोला मिला कर १० से १२ रत्ती शहद या घृतसे देना।
प्रवालादि मि'श्रण—प्रवाल चन्रपुट्टी तोला २, वंग मस्म भयेत तोला ९, महारल्ष्मी विकार तोला ९॥, अभया'मृत लोघ तोला ९ सर्व'पाप पोष ६४, पुङो मनामा २ शमं शहद से देना।
स्वरं वयंस मालतो २'से ३ गोली अघश्र'णचूण' २॥ ४ माषा और च्यवन' प्राश १ 'से ३ तोला के साथ देना।
शरीर पर महारलादि तेल अभया मगराज तेल मालश करना। शेकनी सुवानां।
मध्य मञ्जो रस—पारद तोला ८, गंधक तोला १६, मुकोपिष्टो तोला २, स्वण भस्म तोला ९, शिलाजीत तोला ६, यंगमस्म तोला ४, रो'य मस्म तोला ६ यव साय मिलाय इसमे गायका घो तोला १० मिलाय माक्षी कालोद्राक्ष वकोहदरंड प्रत्येक के रस' या कमापकी'जोफ मेक'माथमा, देखेर सुखा कर घोट रक्खना। मात्रा २'से ४'रती शहद'और मधुरक' के'रसपे' का तुलंछो' के''रससे' देना, मधु'दारू से' उतपन्न हुये दर्द' मिटते है।
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उन्माद पागलपन
हेतु—वातूत्त अभ्यससे, मन के आघातसे वातूत्त दाह प्रीनसे, जागरण खे, दस्सक्री कदजीसे, कुढ़यं कलेससे, मालमिल्कत या प्रयजन के नाससे, व्यापार षातिमे हानि पहु चनेसे, प्रेमांवतासे विरहसे, अत्युकट विषयेच्छासे, दोषं कालके अषीण' से इस प्रकार अनेक कारणोंसे उन्माद रोग होता हैं । औरतोंको
प्रषव के पोते षादार विहारकी अनियमिततासे या अति हर्षंसे या अति शोकसे पागलपन होता है उसे सुतिकोन्माद कहते है ।
अपनी प्रकृतिसे विरुद्ध खान पानसे, धतूरे के बीज मांग गौजा आदि खानसे, देव गुरु माझ्ञों के अपमानसे, ऋति भयभीत होनेसे, मन पर किसी प्रकार का' साघात होनेसे यह रोग होता है ।
ईर्षानद्ध—कुपित वात पित्त कफ षेर मार्ग' पर रहनेसे उन्माद होता है। यह मनका रोग है । इसमें भ्रम होता' है । मन 'वचल होता है । असंबद्व
वातप्रधान उन्मास—यह रोगी बिना कारण, बिना प्रसंग उच्च स्तरसे हसता है मद हांस्य करता रहता है नाचता' है गाता है नेलता रहता है । अपने शरीर के अवयवों के टेढ़े विकृत करता है रोता है। इस रोगोंका शरीर कृश होता' है । खुराक पच न जाय मुख लगे जब रोब वढता है ।
पित्त प्रधान उन्मादसे देहो—मेधा, वात सदन नहिं वरना । अपनी महत्ता अ डर दिखाता है । नम्रता रखता है । तिरस्कार करता है । भागता
है । शरीर तपा हुया रहता है, कुद्ध हो जाता है । सूर्य' के घुप भमिसे दूर रहता है । छ'या ठंडे धन्तपान पसंद करता हैं । मुख पीला'पने लिये हेताऽ है ।
कफप्रधान उन्माद—में रोगी का बोलना चलना फिरना देर होता है । खुराक पर अरुचि होतो है, रंको रष बेठना एकांत मे रहना पसंद करता
हैं । निद्रा आंधिक रहती हैं । वमन होता है । मुखसे लार ढहती है । भोजन के पोछे पागलपन जोर करता है । मुख मस्त यफेदी लिये होते है ।
देवले अाविष्ट उन्माद— हो तो मनुष्यसे भिन्न' पसी वाणी बोलता
हे । मनुष्य मे नहो पसा पराकम घोयं बताता है । ज्ञान विज्ञान आविषे युक्
हेाता हैं स्वोर भावेशका समय नियमित होता है॥ रोगों संवेआषे रहता
है, पवित्र रद्दता है, अच्छे पुष्टपुसंगधो पदाथों' पसन्द करता है । तम्रा रंद्धित और
पंस्कृत मे बोलता हैं । रेंका नेत्र दिवार रहता है । आभाषीक दिवा करता है
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मात्रण पर प्रोति रुकता है! इसका आवेश पूरिंमा पूरम के दिन ज्यादा रहता है ।
देत्य आविष्ट उन्माद—में पसीना अधिक आता है । माझण गुरु देव भादिको निंदा करता है । निभ य गैरमागेंमे जाननेवाला, शर्रनपान बहुत करने पीने पर भी रति नही रखता । इसका यादेशा सद्यः समय ज्यादा रहता है ।
लोमाल्य लक्षण—रोगी वहेमी व शंकावाला हेतता है । निरालिय बात पर गहन विचार, गर्मी-ठंडके ठहो और ठंडोके गामें माग्ण है । अपमा वारोर काचना बना हुवा है फूट जाइगो ऐसा मय रखता हैं । कई लेगोको एक देशी पागलपन होता है। किसो एक-हकाँक्त बात-स्रु के यारे मे उसे पागलपन रखता है दूसरा। सब तरहमे वह अच्छा होता हैं । किघोके धाप बात. करने का पागलपन होता है । कई अपने प्रियहिं द्वषती पागल होते हैं । पुदष किसी ऋषिके विरहषे पागल वन जाता हैं। किसी लोग का घामिंके पागलपन होता है । अथवा बाते करता है । कई लेग ब्रह्मसे हि जड बुद्धिहीन होते हैँ । यह भी एक प्रकार का उन्माद है । ऐसे लोगोंका जारी वेडोल होता है । वहे मस्तक वाळे मो पागल होते हैँ ।
सरस्वती जूर्प—कुठ असगंध सैधानेन भनभनाइन अजमोद जीरा माहाजीरा चेष्टि छोटीपोल कालीमिरच पाढा शंखाहुली-शंखपुष्पी प्रत्येक वाला, १० दष मत्र १२० तोला कूटकर माझणो कें रस को ३ भावना देना सुक्खने पर छानकर रखना । २ से ४ माशाकी मात्रा शहद छृतसे देना या कल्याणछृत और मधुसे देना । इसका सतत सेवनमे उन्माद पागलपन मिटता हैं । बुद्धि मेघा स्मरण शकि धारणा व कविता शकि बढती हैं । असमर्थ चक्रका प्रम मुर्छा मे गुणकारी हैं ।
भूत मैरब रस—परद, शुद्ध हरताल शुद्ध मैनसिल, शुद्ध काल गुर्मा छोटे भरम साम्रे भस्म प्रत्येक चार वार तोला, नंघक ४८ तोला लेक निधि वत्र मिल| कर गौमूत्र की भावना देकर लोहेकी कढाइमे १० तोला गाईका घृत डाल कर पपटीकी तरह पकाकर केलो के पतेकें उपर नीचे गेघरसे दबाकर स्वांगशीत हेने पर घेष्ट कर रखना । ३से ४ रती गाय के घींषे या माझोंछृत या कल्याण छृतसे देना । उपर न'चेक काथ पिलाना ।
पर्पटीशादि इंद्रायण—ढाकेकी छाल या मूल, ब्राझी की शांहुली दोतावरी उडु पर ट'ल सपंगंभा, पुनर्नत्रामूल स'भाग कुठ १ से १ तोलादा
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रसाय कर उन्माद मूर्खोऽप्यसमर्थोऽपि चक्कर आदि मे' राहद ढालकर पिलाना या किसी रस रसपानि मे' अनूपान रूपेण विलाना ।
उन्मादहरी वटी—पारद ग धक मार्षिक भस्म शिलाजीत मूपक कुष्ठ इलायची लौंग घोठ पीपल काली मिर्च वच हल्दी अतोस क माद्री वायविडङ्ग हरीतकी जहरेज भावला आभया हरीतकी नागरमोथा रास्ना प्रत्येक एक एक तोला रूपगंधा य तोला, 'अफलाकी शंखा हूंगौड़ी और शतावरीकी एक एक भावना देकर वेदवा रत्तोकी गोली बनाना । ३ से ६ गोली पानीके साथ दे समय देना सद प्रकारका पागलपन मिटता है ।
उन्मादहर मिश्रण १—उन्माद गजांकुश कुष ९ तोला, शरपुंग धा ९ तोला, प्रवाल चूर्णपुटि ९ तोला, स्वर्णति झापर ९ तोला साथ मिलाय ६× पुढौमा वनाना । २ वहत गाईके घी के साथ अथवा ह्ल्याण घृत के साथ देन? अथवा उन्माय शमक चूर्ण° य मात्रा के साथ देमा ।
उन्मादहर मिधण २—पहाडलक्ष्मी विलास ९ तोला, मुक्ता विर्षा तोला ' ११, वात त्रिषव स;तोला १ सुचा पपंड़ी चोळा १, अश्वक कल्पमटी तोष १ घास पोस ६४ पुढो करे दै ,वस्त ह्ल्याण घृत के साथ अथवा दधवन मृ य जीवन के साथ वेन? उपर उन्माद शमक चूर्ण° २ से ४ मात्रा देना ।
उन्माद शमक चूर्ण°—नागौी स्वाहुली शरपुंगधा कुष्ठ वच धमासा यकलकरा हलदी तमालपत्र ढाली मिरच सम समान भाग लेहकर कुटकर रखना । २ से ४ माशा २ वक्त पानीषे देना उन्मादमे अच्छा गुण करता है ।
उन्मादहर काय—लद्दून विपलीसूल सेंठ मार'गी शुद्ध कुचला पुष्कर मूल, चिरायता, यकलकर काली मिर्च वाहू। शहदद्वारो, अभया हरितकी पिलाना । २ से ४ माशा किसो रस रसायनके साथ या अश्वला पानीषे पिलाना ।
वचादि चूर्ण°—बन शरपुगंधा पुनर्नंवा मूल सम भाग कूट १ से २ माशा माश्रा रेढ माश्रा तक देन? । पथ्यमे दूध मात देना दिमागका दर्दे शिरोरोगमे उत्तम गुणकारी है ।
कुष्ट्रादि चूर्ण°—कुष्ट तोला १११ वच तोला ३, अङ्कलकर! तोला ।।।, शरपं गधा तोला ३ साथ कूट १ से २ माशा किसी औषधके साथ अथवा अकेला पानीषे देना । उन्माद चित्तम्रम चक्कर मूर्छामे गुणकारी है ।
उन्माद गजांकुश—पारद तोला ३, गंधक तो ३, वच व माश्रा आंकिा फूल, श स्वाहुली चनदवीर शुद्ध कुचला प्रत्येक तोला एक एक, शरपं पाक्षिक
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भस्म रक् तेला ९ कूट घीकर पाटा महाराष्ट्री गोमूत्र प्रत्येकको एक एक भावना देकर घोट रसना २ चे ४ रत्ती पानीसे या कल्याण घृतसे देना। उपर महान-
रास्नादि काय पिल्ना ।
उदूखलसिय प्रदेरण—चं टकी यायो पाटलो की डंहड़ी कूटकर रखना। यह १ रत्ती काली मिरच १ रत्ती साथ मिलाय कागजकी मु गली द्वारा डानमें कूक मार कर डालनातुन सचेत हेतुगा मूतॄन्हा उन्मादये दसंप गुणकारी है ।
उन्मादर घूर्नी—नीम्रन्ह १त्ते हल्दी गूगल लेभान बच हींग सांपकी 'कांवली बहची कटटरीोध फल, कापुसके बीज (कपाशीराय) मोर के पीछे, सरसों प्रत्येक द्रव दष तेल्म लेेकर कूट दष्मे गाईका घृत २. तेला मिलाय रखना । घव समान 'भार दूत्त्र डसक्ला भूमि स्वास्मे लि या जाय इस प्रकार देना । घव प्रथारकी प्रहररात्ना पूतप्रेत पिशाचेका आवेश सन्माद मूर्छा भम चक्कर आदिमे वच्चोंके सब टेषेभे यह घूप देना बहुत लाभ होता है ।
चाक्षी घृत—न्राह्मी हरी तेला १६., मोंगराहरा तेला ४०, घ लाहूली सातावरी हलक्की, मूलठेमूल कषाय घ नापार मेध, प्रियंगु प्रत्येक चौथी आठ आठ तेला, बच, काली मिरच ने'ठ प्रंत्येक २ थे'ला, से घानेन चार तेला सब साथ कूट रौंग लगाये पीतलके वतं नमे १ १ रत्तल प नीमे डालकर रात भर भिगे कर दूसरे दिन प्रातः दष्मे वेजोटेवल मिलावट न हे' एषा शुध्ध घो' रत्तल ३५ डालकर पकाना पानीका अंभा कुल जाय जव दपडह्लान करके अच्छे वतं नमे भरना । मात्र २ चे य तेला खाने से, बुद्धि मेवा स्मरण शक्ती ढहती है । मगज-दिमागके घन रोग मिटते हैं । हृदय वादे कुपकुम अच्छे होते है । उन्माद पारुपपन मूर्छा भम चक्कर अपरंपार-मिरगी आदि रौगमे हढून गुणकारी हैं।
कल्याण घृत—इस वासणी मूल वच्ची हरह बहिडा आवला प्रिय गु देवदार कलौंजी मोंग् तगर हलदी टासहल्दी अनन्त मूल इलायची कमल भीष दारुहलदे चोपचीनी कुलायची दमलकत द्रा'डहफुल मंजीठ तमाल पत्र माक्षी पत्ते अतीष रुद'ती शुप वायविड़ङ्ग श्वेतिरप्फा' कुष्ट नत'न दवीस्टटहरीफल पदूम काष्ठ'चमेली फूल प्रत्येक
सोलह सोलह दोला लेकर कूट कर। उस केा रौंग लगाये पीतलके टोपमे छोड पानी रत्तल ४० डालकर रातभर भिगो रखना । दूसरे दिन प्रातः दष्मे घो रत्तल ३५ डालकर घीमें आंचसे पकाना घनल पाम का अंभा जल ज य तब कपड छान कर अच्छे मरत्तनमे मर देना । यह रस २ तोला खिलोनेह दिमाग हृदय मेध्या शांते सन्मादप
रोगडा शामन होता है । यद्ह व्रत अषैला या तत्तद रोगको चौपंधीऔके अनुबान रूपमे
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दिया जाता है। यथोक्त—अपस्मार उन्माद भूतवाधा ग्रहिादि के विरुद्ध एक देशी पागलपन मूसर्छा चक्रकर खाँसी सूजन मर्दार्ं यातस्रक प्रतितन्मग्न मस व्यवायोर विपमज्वर मूसर्छा रक्तारोग कुष्ठमे उत्तम है। वंघ्या जो दो ३ मास तक खिलानेसे गर्माशयके मुख दे।प दूध देकर स्तनान देती है। न इक्षलक्ष प्रेस्सार हृदयके सब रोग दूर होऔंर हेतुसे युक्त होऔनिका मेधा नोझ मति,
रपंग्वा कल्प—मपंगधा तैला ४०, प्रवाल्चनप्रुपुरीं, मृरपणी मादिक रक्, अभ्रक भस्म प्रयोग। चीह धोए तैला, मुका शुध्दि मंनमस्मंरेपथ, पारदं ग धककौ समभाग से को हुयो कज्जलो, प्रावेक शेलह मातृक तैला सब प्राथ घोट कर मुलेठी तैला १० और ढाकके मूल तैला १० हत्त नं वत्राय कर उष्की भावना देकर सुल्तादक्य घोट रखना अथर्न दे। दूध नो जो गेलो वनाना ४ गोली प्रात दुधके देना। १६ दिन सेवन धरनेसे रक चाप दूखरद प्रेस्सार कम होऔर मर्यादित हेाता है। पागलपन मस्तक की पीड़ा मूसर्छा चककर भादि दिमाग के रोगांत क्रांत हेाते है।
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वातरोग, ८४ प्रकारके वातव्याधि
आयुर्वेदमें ८४ प्रकारके वातरोग बताये है । प्राणश्रयुके कुपित होनेसे-विकृत होनेसे हिक्का स्वास आंसी स्वरभंग गीन्स प्रतिश्याय स्वादि रोग उत्पन्न होते है । उदान वायु कुपित-विकृत होनेसे-नेत्र मुख नाक कर्ण श्रोत्र मस्तकके रोग होते है । समान वायुके कुपित विकृत होनेसे ग्रह्णि मंदाग्नि आदि रोग होते हैं । अपान वायुके प्रकुपित होनेसे स्तिथर 8 प्रहणो गुदारोग आदि होते है । वयान वायुके कुपित होनेसे पपरी प्रमेह नवासीर भगन्दर आदि होते है ।
कफ'पा—ठंडेगलनेसे, ठंडेपानीसे स्नान करनेसे, ठंडसे भीनी शाकरकी चीजे मिलाम्ल आभिक खानेकी भस्न न होनेसे भी खुराक लेते रहनेसे, खुरफे च्यागाहनेसे पाचन शाक्ति जिर्णहनेसे, आगे कमजेःर होनेसे, बिना धोये पूत कळे लंख्या खुराक लेनेसे, ठंढा रात वःलों खानेकी, अति निषयसे, जागरण करनेसे, लोंड़ी मुफ्ती करनेसे, अति परिश्रमसे स्थूल हड्डरत करनेसे, चोंट लगनेसे, अति चिन्ता शोकसे, मुट मस्तका वेग रुकनेसे, शरीरपर कॉडे चोंड 'गारक' मारनेसे हड्डो घावां टुंट पर अभिक सजारी करनेसे, अति उपवाससे शोकका या हर्ष का म्रसाचात अकस्मात सुननेसे, ठंडा पवन शरीर पर लगनेसे इत्यादि अनेक कारणोंमे वात कुपुके रोग रत्पन्न होतें है ।
वातरोगके चिन्ह--शरीरके अंग उपांग पकड़ कर झट झट जाता है । मार भमे एक दे। दिन दुवबार आता है । पीढ़े लुकारके साथ हरवक्तन घरीरमे या शरीरके किसी मागमे पछोना हाता है । नाछीक' गति वढ़ती है । नाभिपर शूलफेद छाती यमतो है । सिरमे दर्द' होता है । तृपा लगती है । दस्त सुदड़ रहता है । पिसाव कम और कम.प्रभाणसे आता है । शरीरका खून खटुंटा हेा जाता है । आगे केंानी छूटन कोढ़ स्वंमा पीठ कम्मर आदिमे पीड़ा होकर वह माग शकर जाता है । निद्रा कम आती है । पसीना खदा हेाता है । वातकी पीड़ा बहनेसे शुरूाद १०३ से १०५ तक यददता है । एक साधामे पीड़ा कम होते हि इसरे चांवामे पीड़ा उतपन्न दे आती है । सघवा होनेसैँ इसके साथ अन्य की दर्दं हो जाता है । दुसरे भेद रोगमे नामके भवुसार मिन्न मिन्न चिन्ह होते हुये माँ उपर लिये मेध कछे ,ग्नि ह्यूनाधिक मंच जात रेभमे रेभमे हैं।
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वात रोगमें पथ्यापथ्य
बहुत करकें समय वातरोगमें चिकित्सा और पथ्यापथ्य प्रायः प्रधान है। पानी कूछाके पीना लाभकरक है। दूषित खुराक ज्यादा लेना। मिश्री कम खान।। जल्दी पाचन हे। ऐसा खुराक लेना। खींचफी, वाजीरी, जव, चावल, मुगा, लहसुन, तरीकों दाल, पेठा, अदरकका, काली मिर्चं लशुन, प्याज, सेंठ, छोटी पोपल लौंग, तज, हर्रा घमिया (कैथपोयर), दूधा करेला सुरण, मीठा नीम, नमक, दलदी, पपैया, मीठा आम, मीठा सुठवो, चीफू पाक्ष, वायाम, काजू पींत्त्र इत्यादि चीजे फायदे शारक हैं।
इमली, खट्टी छाछ, कट्टा दहीं, खट्टा नींबू, माजारकी मीठाड चीजे फे अधिक मिश्री इत्यादि हानिकारक हैं। ठंडे पानीमें तैरान नह्हे। परनं शरीर पर खापरेका या तिलका तेल मालीस करेना। वातर न हे इस प्रकार खुराक देना। दस्त और पिशावका खुलासा होय यह ध्यान रखना। भूख हे इतना हे खुराक लेना। बारवत आहारमें सरफ बगरेह नही खान। सखने हवा प्रकाश घाले कमरेमें रहना, मकान कमरेमें इधर उधर गंदगी न होने देना। शरीर पर सींधा ठंडा पडन न लगे इस प्रकार रहना। ठंडो ऋतुमें और वर्षामें शरीर ठीक रखना। जिस अगे पर वात-वायुसे ददं हे। जरकट गया हे उस पर महामारायण, महालक्षादि, महामरिचादि तेल अथवा तिलका या सरसोंका तेल मालिस कर उपर सेक करना।
संधिवात
इस रोगाको उपर लिखे नियमोंके साथ हेमेषा दत साफ हे। यह ध्यान रखना। संधिवात के साथ यदि बुखार रहता हे। तो बुखारका उपचार करना। वातवित कफोर्दि जिस दैयका प्राधान्य हे उसका त्याल रखकर उसके औषध देना। इस रेगमें खुनमें भमलता-खटापन रद्ता है। वद कम हे। ऐसा उपवार करते। पसीना ज्यादा हे। यह लोमशारक है। इस रेगोका-मध्य दाद पंनेहो आादत हे और चा काफी ज्यादा पोता हे। तो वघ करना। वटे चीजे ठंडी चीजे, और खुराककी भोर खाने पीनेर्क चीज ठंडी हे गई हे। ऐसी नही देना।
महावातरक्त लुगळ—एरंडो बीजका गमं, चित्रक, दैपरमूल, अश्वगन्ध, परवलका रसी हिंग, कलोजीजीरा, वायविडंग, अभयारद, नीरा, देवदारु,
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वच इलायची, घेष्टिमेद, कुष्ठ, रास्ना, गोमूत्र धनिया, हरड़, मातृगेष्टा-लताकरंज के व.पक्व'पीरी आंवला, नागरमोथा सोंठ, छोटी पीपल, काली मिर्च, वं'गालोचुन मही नहरौके फल, लौंग, जटामांसी, वचुरां विठेकं, शुद्ध भिलावा, असगंध, दालचीनी पुनर्नवा प्रत्येक तेल r, लोह भस्म, तांत्र भस्म शुद्ध भस्म, वंग भस्म रौप्य भस्म, नागरमस्म, पारद भस्म रक्खे, शुद्ध पारद शुल्म ग भस्म, महूदर भस्म प्रत्येक तोला ४ सुवर्ण महर अथवा सुवर्ण मालिक मष्प रखन थे। ४, शुद्ध गुगळ ने? ९०, शिलाजित थे। १६। गायका घी तो ३ रत्त चाथ मिलाकर एक रत्तीके गोलो वनाना। मात्रां ३ में ६ गोलो घो के अथवा दूध के साथ देना। दृधके उपर महाप्रसादि कवाथ पीना घ य तेर क्षीणक ल म होता है।
४ प्रकारके वातरोगमें यह वटुंत गुणकारी है, इसके अतिरेंक्त, मसा वसाथेरं, स धतूरे, भगंलर, प्रमेह, कुष्ठ, उदादर्न-वात) गेर चंदन) गुनम, अप-रमाथे द्रवथरोग मद्दानि स्वाद, मासी, मूत्रर इ॑यादि मे मो उचुजा गुणकारी हैं रेमानुदास आवद्यकता हो। वे! अनुपान वदरना।
यह सुरण युक्तत 'हायोमाराज सममात्रय मितसरे मधेंगा रे नेप नहों थे मकता है प कारण सुरग युक्त सौर मालिशु मष्प मक्त रस प्रकार देा प्रकारका मनाया जत।
२घुगे,'ताक गुगळ (येग्म तर विणो-वार) धेककर) सोंठ पं पलितमूल, छोटो प वन चरक, निंत्रक मुत'रद दिग, अजमोदा?, स'सेत, ज'रा शालि'र्रा, रेन्का-(निं'गु'ह व ज) वटामोलो डेन्ट्रक्ज पाढा, वाय'वृत म, मगनपल, कुठकों अतिस, मार गो यव, प्रत्येक द्रष्य एक तोलो घीर शिफरा- तोनें मिलअर ४० तोला। सव गाय मिलाजर शृद्ध किया हुवा गुणळ थे। ६० मिलाना। इसे' गायका घो थे। ९० मिलाकर २-२। रतीके गोलो बनाना। यह श्रौषध सव प्रकारके वातरोगमें वत्तंप गुणकारी है। यह गुठळ व रोग के अतरिक्त कृछ, फेफ मक.शोर संग्रहणी, प्रमेह, वातरकुन, नामिशूल, भग दर, उदावर्त, हद्ग शौर फेफद्रे के रेग्न गुल्म भवस्स र, उरुग्रं हरष्का कडचनां मरम्मिन स्वाध नीसों,
अरंचि ओररोगका कर्तु देाप मिटता है शौर द'ग्ना नोके सतत जों, दडिनां तक देनेसे ग्रमोशय गुष्ष हेाकर गर्माशय मंतान-मर्माचानमे चेसय हेात। हे।
वालराक्षस—पारद गंधक, रस्मिंदूर सथ्रक, मनस, मप भस्म, लोह भस्म, नागनस्म; प्रत्येक तेला, रस-रुस, आंघेधे दूधमें गु'रु दिय गुदा रक्च्चपूर ने। ३०। नेध, सोंठ, छेटोपीपल कौली मरिच, अज'मोदा, तमाल, म ग्रामन घोटक।
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गोंद, गन्धाबिरोजा प्रत्येक तोला ४, शिलाजीत तो. १०, चित्रक, अतीस, पूरं मूल, गुड़रकु छाल प्रत्येक रस या स्निग्धकी एक एक भावना देकर घोटकर, रखना। मात्रा २ से ४ रत्ती घी के साथ देना। उपर महास्नानादि कषाय
पिलाया जाय तो अच्छा। यह वातरोगमें गुणकारी है। चित्रंभुलि स्तनमूल रक्त (सुवर्णयुक्त) पान करे। तो २॥ डालना। शुद्ध गंधक तो २० लोहभस्म अभ्रकभस्म, माकभस्म, प्रत्येक तो १० सब साथ मिला कर गाढ़के घों तो. १० मिला कर नित्य "दिने
क्वाथ मंर महारास्नादि क्वाथ को एकेक भावना देकर तस्का गोला बनाकर पानमें लेपेट कर वाजीरी या उड़दद्वौ कठौमें तीन दिन तक रख कर पीछे निकाल कर छोट कर रखना। दूध से चार रती घी या पथ्यसे छेनेसे वात
प्रकारके वातरोग, अपस्मार, उन्माद, आक्षेपे' फायदे करता है। धान फिचतारिणी बुडुत्व (सुवर्णयुक्त) रक्तंहिदू तो, १२, लोहभस्म, त्वच, १०, प्रवाल संपूटो तो, १० मुकुलापिंचि
तो ६, रास्ना मसम तो ४ अभ्रक भस्म तो ४, सुवर्ण मरम तो. ६, सब साथ मिलाकर सरपाठा के रसकी भावन। देकर छोट रखना या रत्ति प्रमाण
गोली बनाना। मात्रा २ से ६ रत्ती, यह भौषध वात प्रचुरकके वातरोग मे; पक्षाघात, वातरक्त, आदि वातरोगमें उत्तम गुणकारी है और वाजीकर तथा
रसार न गुण टेनेवारा है। वृंद, वृण और पेष्टिक है। वात फिटकरल रस—पारद, मघक रसांहिदू', तामलस्म अभ्रकभस्म,
छेढ़दशा शुद्धस्म, एलायची, वच, हरड़ वेड़ा, आंवला, अजवायन, सोंठ, पोपक, कालीमिरच, सिधानोन जुहल शुद्धीकरण नतशरनागकाळो शृध्ध हिंग छोभान, लो
देकर कुनारपाठा का रसको, भावना देकर घोट कर रखना। मात्रा २ से ४ रत्ती घी या ताहद से देना। यह प्रकारका वातरोग छाल कफ रोग च'प्रदरिणी, सूरंतका पात
महा रस्नादि कषाथ—रास्ना तो. १०, वचासा, वलामूल, एरडमूल, वृद्द इर ("निसो" माफ, गोकुरू, भांग घ, अतीस अमलतास, शतावरी, छोटो
पंशल, स रि त (हड़ीम) यो, घनिया, छोटी कटहरी फल, प्रतेक पांच पांच तोल। रसकर ३४ - १ छांडना। एक ठेल्या चूर्ण मे ४० तोला पानी छै। ३० तोला
रसेहु पुह करे। दे ह ९२१
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महानारायण तेल— गेरू, अरणी, अतिबला मूल, नीमकी छाल,
मद्दर, पुनर्नवा, प्रसारणी, प्रत्येक तेल। ४०, शतावरी तेल २५, कुष्ठ, इलायची,
चंदन, मेरवेल, बच, जटामांसी सेखाने, वलामूल, अश्वगंध रास्ना, सोंठ,
वेखदार, दसमूल, और तगर प्रत्येक ऋ ठ आठ तेला। सबकेा अच्ही तरह हूट कर
सब्बे चौगुना पानीमे चौथाई, घंंटा तक मिगो रखना। पींछे उस्मे तिनका
तेल पानीछे आधा हाल कर पकाना। पानोका अंश जब तेल दपक़-
छान कर ठेना। सम प्रकारके वातरोगमे १ से २ तोला मिलाया जाता। है और
रोग पर मालीस किया जाता है।
रास्नादि घृत—रास्ना, अरणिके फूल अजमोद, अजवायन, जीरा,
कालाजीरा, इलायची, तज, लौंग, सेहजना, गूगल, धनिया, सेठ छेरटीं पीपल
काली मिस्र, नागरबेलके पान, और अदरक प्रत्येक तेला १० छेटक सबदे। कूटकर
पानी रतल १५ मे २४ घंंटा मिगो रखना। पींछे उस्मे वदरीका दूध रतल
१. और गायका या कटनोका घृत रतल २. डालकर पकाना। पानीछा अस
बले जॉय तब कपड़छान कर इसमें दपूर तोल। ४ मिलना। यह घृत वातरोगमे
१ से २ ठेल। दिलाया जाता है। और दर्द पर मालीस किया जाता है।
संधिवातहर मि᳒ण—वातराक्षस तेल १, महायोगराज गुग्गल तेल १,
सर्वेँश्वर रपंटी तेल। १, वात चितामनि चू᳔त तेल। ११, योगराज रसायन तेल १,
सम वाथ मिलाकर ६४ पु᳔जो वनाना। प्रतः और शामके एक एक पु᳔जो
या सहाराशे वना। और 'महानारायण तेल मालीस करना। सम प्रकारके वातरोग,
पुत्वा शंधिवा, पस्संधान, क पत्तात, सूतिक वात आदि मे᳒ गुणकारी है।
वातहर चूया—गुगल तेल। ४, कचो मस्तकी तेल। ४, हीरावेल तेल। २०,
शानची तेल। २०, मालतीगनी तेल २०। सम वाथ कूट कर पाताल्यंत्र से पकनेसे
अम्ल्या तेल निकलेग। इस्को २-४ चू᳔द माजरवेल के पानमे᳒ डालकर
दिनमे᳒ दे। तीन दरफे खिलानेसे सम प्रकारके वातरोगमे फायदा होत। है।
नजला-अर्दित वात
कारण—ठंड़ी लगानेसे, ठंडा पवन लगानेसे, कान और नाकᷟ दरदखे,
कानको म'योष्ठे, वायुकी प्रकुपितसे, इस प्रकार अने᳒ कारणोसे, यह रोग होत। है।
चिह्न—मुखक। एक' वाजुका चेहरा (face) वढ होकर विर जाता है।
मुखद्वारक। एक ओरका कोना नीचा दिखत। है। एक वाजुका गल ढोला रहत।
ह। डेढमेसे यू᳔ड वि᳒ा इच्छा गिरत। है! फूं᳒ सी᳒ मार नहाी सकत।
वढ रोग मय रुप नहो᳒ है।
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पथ्यापथ्य और चिकित्सितर—उपर च’तरेोगमे’ कहा हुवा पर यापथ्य हस रे’गये भी चमक्ना और उछमें लिसों हुर्द औषधे इस रेोेगमे मो फायदों करतो है।
श्री’दं त’कुछ रस—पारद ग चक ताम्रभस्म, रस बि घूर प्रत्येक दश तोला, असरब’ चेपचोनी दातावरती, छोटी कटहलीके फल, इंद्रायणक फल, मोठ पोस्तल, कालीमि’च कचूरा हलदी, पुनर्न’वा मूल प्र’येक तोला पांच पांच सम साय मिलाकर रास्ना निपु दी और मला पचां ग पत्येकं सवाथकी एक एक म वनो देखर, सूता कर छोटफर रखना। अथवा रती रतीको गोली वनाना। मदिं तशात, सिद्वार्त म घोंर दूसरे वातरोगमे अच्छा फायदों करता है।
आफरा— पेटका आफरा-पेट फूलना
पेटमे’ वायु मद जाना, कारन—यह रोग पेटमे, वातो’म वायुका प्रकोप होनेसे होता है।
सिद्दयवाती चूर्ण—नयक नछाकर मुना हुया अजवाइन तेल ४० घाली मिरच, पीपलीमूल, हरड़, बहेडा चावला, छोटी हरड़, (विना बी भव लीं), प्रत्येक दश दश तोला, लौंग, हेळायची, वायविडंग, मोंठ, जीरा, शुंठ, तज, रस्नुम, वनेका खार, प्रत्येक तोळा चार चार, भकलकरा, नवसादर, गुलावका फुल, घज्जीखर प्रत्येक तोला द’ा द’, वकायी हुई हिंग, वचुरा, लोबान प्रत्येक तोला एक एक सेहागा त’, ०। प चलवन पांचेां मिलकर त’. ५, जवाखार, त’ १, कवारपाठाक रस, प्याजका रस, भदरकवा रस, वहजत्रेकी जड़का रस प्रत्येक एक एक तोला। भजनायन के सिधाय सब साथ कुट कर कपहछान कर वधुमे’ भजलाइट दिना पीशा-खदा मिलो देना। पीछे वस्लो निम्बूक रखकी पांच बी मिर्ची देते। मावा भी सें तीन मावा पानीके साथ देनेसे पेटके पेटके रोग, गुल्म, ववासीर वढो हुवी तिर्ली, पेटका वायु, गेस घटनो आादि मिटते है, भूख लगती है रट्टी माफ देती है, पेटके सब रोगमे अच्छा गुणधारी है।
उरुसतंभ =
कारण—महुत खटेटे, रक्स ठंडे, वादी, खानपानसे, शारदी लगनेसे, करोड़ रसू सूजन दे नेचे, गिर जानेसे, लचे स्पानसे गिर पड़र लकड़नमे, महुत प’ल वननेसे यह रोग होता है।
चिन्ह—कमरहै नीचे निचोेक भाग ३३ लहका है का शूलंकीन वेदना होती है। कीसीके कमरसे एक वारा वग और कीसीके दों पगमे’ होता है। वद वग इठर वघर
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किर मद्दों पकन? श्री घी सरा सरहोंजान घमा जाटा है। अगर मद्दुत कम देआता है। पिशाब लानेवा मान नहो ररता। इस कारण विछाने मे` मे दी मन्नूष करता है। पेट पर जोर कमर पर खींच कर पाटा बधा हे। सेवा भास रंगांके देआता है।
पेश्यपिडमे-गिरनेमे या चोट लगनेसे मे रोग हुंआ हे तो शलका लगाकर जमा हुंआ रक् निकालत्ना। आर म करनां। चलनां, फिरनां ह करनां। उस भाग पर मह नारायण तैल मालोष कराना। चपो कराना शेक कराना। खटो। गदाध, भचचार, खांड शक्करका मिश्रीटाक बघ कराना। सापा हिरशव कछु खुराक मूली के अनुसार देना। दस्त पिशाबका खुलाशा रखना। उट वाभरी चटना मुंगा उचबद घी खी वडमें मिलाया हुंआ दूधका खुक ज्यादा रखना। मसालेमे हलदी, नमक, सुदरख, जोरां, राई, मेथी हिंग, लालमिरच यह देना। शाकमे दूधो सारण परवल, करेला, वेंगन देना।
उदर्दात मार रस-रक्तद्रू, पारद, अभ्रक लोह, स्वर्ण मृगा भस्म, शंख भस्म, प्रत्ये पाढ वेला, काली मिरच, पीपलोमूल देवदारू रास्ता, समंग घ; जीरक फूल, वलामूल नीमका गोंद, अजमोद, सैंधानोन, हरड प्रत्येक चार चार तोला, घंव साप मिलाकर क्वारपाठाका रस, निगुडि और मधावला के प चांगका कवायको एक एक भावना देदर गोला बनाकर उघ पर ध`देके - पान लेपेट कर घागा बांधकर मेंभी दानेकी कीठीमें तीन दिन तक-रखकर, घोटकर रखना। पोढे २ से ४ रातो शहद घृत चूअ अथवा पानीसे-देना। उपर महारास्नादि प्वाथ पिलाना। टकुन्त म और दफरंक नीवेचा-किसी मी प्रसारका वातरोग मिटआ है।
उदर्दात मारि लेप-राक्षा वर्मीक-(Ant hill) की मिटि रतल- २ द्शा,ग लेप रतल ९, देवद्र्यन लेप रतल ९, सहदुनका मूल-रतल ९, सम मोहिन चर मिलाकर रखना। इसमे से आवश्यकतां हो उतना लेप लेकर पानी मिलाकर गरम कर मलह्म जितना गाढा रखकर दर्दपर लगाकर उपर ह दाब कर पाटा बांधना।
मद्दानारायण तैल कभवा विसगम` तैल, मरीचादि तैल, शरसोंक तैल, भलधोका, शेपराजा, या तिलक तैल मालोष करनां।
कंपवात-
कारण और चिकित्सा-उपर लिखे वातरोगके कारण इस रोगके मी होते है। जदीकारका कोड एक श्रंग हाड़ पोंव मस्तक जदी कोपता रहता है। रोगीका शरिर पतलीन है। जाता है। प्रारम्भमे कंपन येढा हे ता
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दाथ पोथ राम दे सरता है लेक्न रेाग बढनेसे हाम्ने केई ग्राम¹ नही हेा सक्ना । क्रिधिको एक या दोनेी दाथयेामे कंप हेाता है । किमीके मारा दाथ चांपता है । बहुत करकै कोंधंके नीचे अं'गुल तक्का मारा ज्यादा कांपता है । इसमें भी स्नानवान और पथ्य डगैरह वातरेागके अनुवार समक्षना ।
वंगघातातिद रस—पारद वे? १, गंधक दै। १५, ताम्रमस्म, रास्ना घमासा, कपूरकाचली, शुद्धपारा¹, पर्पटीपारा², बिल्वमूल देवदार, परंडेकी मूल, वाराह् दं? क्रष, डुलार्च्ची, मुलेठी मूल, प्रत्यकेष तोला ७ तो ले डर शव साभ कूट कर ड़मके' धमाघा, असगंध, रातावरी और पाटा-पाठ, प्रत्येष दशा वषा तोला लेकर कूटडर पवाध कर दुसको भावना चार देनी पंछे घोटकर रस्ना प्यथवा रती प्रमाण गोली वनाना । मात्रां—? से ४ गेालो पान्सीके याथ अपयना मकरीके पुष्टके साथ देन । और महामारायण वगैरह तेल मालिस कराना ।
समदरषुदरी गुढिका—पारद, ग धक, सांवरदिग पर्पम, एड़ीयेर-एल३र, अरिणमूल, पर्पटीपारा² मूल, शालिपर्णी मूल, पेरंडमूल मेठ, पीपलीमूल, पोपल, चवक्, चित्रा, दिं ग, दायविंद्ग, गजपीपल, कुडकी, अतीष, असमेर भहुवा मूल, सरषेा, धीरा, शाहीमारा, निगुंड़ी सीज, डुद्रुष्मो, पाटा-पाठ गेाष्ठ, मारंगो, वच, अटामांसी, तमालपत्र, देवदार, कुष, रास्ना, नागरमोथ, सैं घानेोन ड़लायच्चो, वलामोल शरद, गेाष्ठ, धानिया, यरेहडा भांगळा तज, नाला जवाखार, महघवलामूल, अतिमक्ता दूल्, न गवला मूल, यच मस्त्य सम मापसे ले डर, कूटडर कपडछन कर, उसमें चन नतुभोके वराखर शुद्ध पुगल और गुगलका घनन कितना हेा । उससे वोडा दिस्सा गायका घी मिलादेर पानीसे तीन तीन रत्तींकी गेाली वनाना । दिनमें दे? या तीन दफे २ से ४ गेालो पीस कर पानीसे देनी । ड़मके सेवनसे डुकुती न्स पक्षघ्त और डुसरे वातरेग मिटते हेै ।
गठिया वा-गठिया वातरेाग
दारद.... प्रय खान बिगाडनेसे यह रेाग हेात। है । फोंयेंकी अवेष्रा पुर्सेादे: जमात? हेाता है । एका आरिमसे, शारीरिंक और मानसिक परिश्रम नहेा करनेसे, भोजन न्हीजेने ड़मेशां दिनमे सेनेकी आदतसे, दार्के व्यसनसे, चींकने, मेंदारे . णर न्ह= शवकरके पदाथों' ज्यादा खाने, पेटमें भूख न हेाने पà मेाजन करते रहनेसे, उपर चा और गमीके रेाग्मे इस प्रकार अतेक छारणेसे यह रेाग हेाता है ।
निदान—यह रेा्ग पड प्रकाका वातव्याधि हैं । ड़समें' पांचवे अ ग्लियेमें पडते १पते रमता हे। बहुत दार्घ पीनेवाळे और मांस मक्षण करनेवाळे| मड
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रोग अधिकतराये देाता है। युरोपोयन, पारसी और मुसलमानोंमें यह दर्द अधिक देखा जाता है। प्रायः समने इस रोगमें अश्रीन देखता हैं, खुराक पाचन नहीं होता, भूल एकदम बन्द हेा जाता है। पायके अंगूठा भिगुलिमां, पांचवां तज्जा, हथेली अँगुलिर्मो, हाथोद्रि रेखेष्ट्रों लाल हेा कर सूजन आती है। जुव्वार चढता है। इस वातज हेाता है। छः तीमें वलन हेाती है। पिछली रातकेा पीड़ा चढती है प्रातःकालमें दर्द कुछ कम मालूम पड़ता है। जीभ पर सफेद छारी लगती है। पुराने गठिये वानरोगमें सुखार और मुखन नहीं हेाता। पर'च हायपाँव भैदर क मृलियों पर सुपारी जेष्टी यदी प्रतिथ्या निकलती हे। स्वाथा और न्नायु नच्छह जाते हैं। कमी ग्रथिया पक कर पस निकलता है और नाद पड़ता हे। वच्च बहुत समयंडे पोछे अच्छा हेाता है!
पथ्यापथ्य —साथ सादा लघु खुराक लेना। जौशंगा कम करना। दूध, भो। मांस यंध करना। सान पानमें व्रातत्य,िच्छके अनुसार पथ्यापथ्य सम लाना। हमेशां चरन् पाक रहते ऐसा करना। कफजा गुल्म और मेस्ता पह्हे नम। द्वावकर मिश्री वानली चोने, बहुत कम खाना। गुरुक मिष्टान सान्ना। दूषित खुराक ज्यादा रसवना, म न्सीके ऊपर ढेर तेल लगाकर शेक करना। ठंडे पानोसे दूर रहना।
प्रनियवार्तातक रम्न —पारद, गं'धक त'थापस्म, टांकमस्म प्रत्येक थेाला दश दश, आंरखे दूष्मे घोएवा हुंर रखषपुर था। २।।, शिलाजत था। ४, विलारष ताै य, शेाषमुदर, (गधा विरोचना) ताै ३, मुगळ ता ६, मुक्ताफल, हरड़, कांजी मि'n पिप्पल'मूल हे)' मञ्जिष्ठान, ज़ीरा, वचेंई ज़ोश्रीरा यथराग्र, से घानेन, देवदार, अताइस, शिलाजीत, प्रत्येक नार्त और थेाला करके (तिकु) ताै। ८ नोंकें पत्ते पेास कर देा मार्ना देना। रस्तो जैसे गोली करणा आैर मूका रखना। मावा ३ से ६ रत्ती गायके दूधसे लेकर उपर गायका सां बकरीका दूध पीन। माटया वा स'धिस्ठ पंटके दूध, उदावर्त्त, मेघ चढना आादि वातष्याधिमें उत्तम गुणकारी है।
जानवेा वा-घुटनका वातरोग
कारण निज्ज्ञ—जातप्रदेष से और खुराके बिगडनेसे घु'ट्नमें पीड़ाकारी सुगालके मस्तक जैसे सोथ होता है, यह कमी ज्यादा कमी कमो घींड़ा करता है। सोथ कठिन हेाता है फिर भो कमी रफ्फका कमाव और वात प्रकप होनेसे
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मृदु मों होता है। इसमे लघुनारायण तेल महालक्ष्मींद्र तेल मालोश करना अधोके पत्तोका पीस गर्मं कर पेटीस जैस्सा घना दर लगाना।
जानुशोथश्वर लेप—-हल्दीजी जीरा असगंध से धानेांन हलदी पयूरशिखा रास्ना समूल भाग ले र कोमुत्रेमे अथवा पानोमे पीस गर्मंकर लेपाधर उपर पत्थर कपडा लपेट पाटा सांधकर उपर सेक करना।
जानुशोथ हर कषाय—रास्ना कंलौजी जीरा, अतोस, नागरमोथा, हरड, पाटा (पाढ) अजमांधो धमभांगे कूटकर २ से ३ तोलाळा कषाय यनांकर पिलाना।
मथ्येदशांप गुगळ—-हवचुलकी पत्तो, असगंध हाटधेेर (डपुष्प-गु पळाशंकी)-सिरेटोय, गेरूखड़, रास्ना, शतावरी, दचूूरा, अजंवायन, गींठ प्रत्येक एक एक 'तेलां-शतावरी देां तोला, ओर सवके गरांयेर शुद्ध गुगळ और गायध घो तो १० पानोसे मिलाय सब साथ कूटकर पानो सेवन। दा रसों को गोली वनाना, मात्रा ५ से ६ गोली पानी या दूधके साथ देना। घुटनका वां, हाथ या पांवका वां, मजनां, स्मायु और आंत्र्य को वां, गृंध्रसी वां, भत्च्छा होतो। है। तेल वगरह मालोश करना।
जिव्हास्तंभ— जोंभ तुतलानो—अटकंना
कारगर—चवंळेकी वधन करनेवाली ंघरांभो में वांयुकां प्रकोप होनेसे घोंमकेां अटकांकर मनुष्य येकालनेमे' तुतलांता है जब बोलनेमें लकलोफ होती है। कई वार यह रोग वढनेसे वाणींको शटकायत* साथ खानापोना मो एक जाता है। उंछ वार मनुष्य विकल कुल बोल नहों सकता। रोगो सुन सकता है लेकीन वाणी चंध हेा जाती है।
उपंयुक्त प्रयोग—-घारालके फूलका वांंछला भाग रविगरफे दिन एक खाना दूसरें दिन देा इव प्रकार बढते चबते तोशवे दिन केा तोश फूल चांनां और पोछे क्रमसे उतरना। जैसे कि ३१ देा दिन ३० फूल इस प्रकार भोंतिपर दिनमें एक स्वांकर रंघ करना। इस प्रकार देा या तीन मास प्रयोग करनेसे जोंभ कूट जाता है। पथ्येमे क्षार पदाथं और नमकं घध करना।
जिन्ह स्तंभहरमिप्रपणो=वातविध्वंस व तेा। ९, सुकांपिदिध त्रा। ०१, स्मनं मस तमालती त्रा। ११, पुनर्नंवा गुगळ हो। २, सवेंश्वर पपंटी त्रा। ०॥ सब पांधय मिलांकर ८॥ पुड़ी वनांनां। प्रांत सांयंदेा वरहंत नांयके 'घी कें'शाथ यांर करयाण वृत से या दूधके साथ देना।
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कटिमह-टचकियुँ-कमर झकड जोना
कारण—भार वदन करनेसे हड्डि चलनेके समय पग क घा नीचा टेढ़ामें पड़ जानेके हृदय में ज्यादा काम करनेसे चपर मातका प्रदाह, टेढ़ा टेढ़ा मातों है। महानारायण तेल मालिश करके सेक करना। धयेधराग गुगळ खिवाना मबारिकों तेल मालिश करना। पिलोंका नाकमें डालना।
घोटे प्रयोगः—
१. बलदेव धो. १, बानची, घोटी घेर १, गुड धो. १, घो धो. १ घृतकेशर मिलाकर रसना। हेमेशां १० तोला, सामा १ माष रांनेथ चमरकां ददं मिटे,
२. तुरवाली सेठ से ०॥ एरंड' हळ रा, १ चूषमे' द्वोर पकाकर २१ दिन खाना। दुसरे' कमर पिडे
३ दालचीनी, इसपष्ठ, अजमोदन, बलदेव, शममाग, कूट हेमेशा थे. ५ खिलाना। उपरका हळ हुये.
४. कज्जल थे' १, घेठ थे' २॥, देनेथी पीस कर गोली थे.' १ को खिवाना। कमरका ददं मिटे।
५. कज्जल थे. ११, घो थे' १॥, तीन दिवस खिवाना। कमरका दरद मिटे.
मन्यास्तंभ
प्रोवा-डेढ झपकडालो-मन्यास्तंभ. कारण—दिनमें निद्रा करनेसे, कंठे देखनेकी बहुत आसक्तिसे, प्रोवा टेढी रद्दनेसे (अथवा) ऐसे करें कारणोंसे जोड़पट बात कफ संयुक्त होकर प्रोवार्के पिछड़े भागमें होनेथी १२ द्वाराधोंफा" सकर देते हैं।
१, दशामूल कवाथ पाना। महानारायण तेल मालिश करके उपर तेल लगाये आंमके या एरंडके गरम किये हुये पत्ते बांध कर सेक करवा। कुंकुट-के नदेक रसमें गायका' घी और सेंधानोन मिलाय मालिश करना।
मन्यास्तभांति मिश्रण २, महायोगराज्ज़ गुगळ से, ०१, लघुयोगराज गुगळ थे.' २, वास रासायन थे. ०॥; पलेथीं'शरः'पप्पटी थे' ०॥ सम'सायं मिल.थ समभागं (x-पथ्ये बनाकरःसायके घोमें दे' हफे' खाना। पथ्यमें कडू 'पदार्थ नहिं 'खेन्त'।
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हनुग्रह
ठोठो (ढाढ़ो) एककड़ जानो, नीचे उतरनो कॉर पो—जं भंमे ओोल उतारते समय यकके पदाथ खावे समय या किसी नीज लगनेसे ढाढ़ोंमे रद्दा कुभा मायु यिगर ढाढ़ोद नीचे उतार देते है। तम यां तो मुख खुलो हुवा रद्द जाता है। यां व रह जाता है। उशदे हनुमह रहिवे है।
रोगी ढाढ़ी खुली रह गई हे। वो प्रपम घो या तेलमे मालिम करे वाफ दे कर नमाना—ठोढ तरदछे चरां देना। पीपल और अदरक चनां घर गरम कर पीस कर उसमे लज्वान हिंग नमक शतदल शालकर भ दाजा एक एड तेलाकी पहि वनाकर उशके तिलके तेलमे पकाकर खोराकके साप पार नदत खानो मधा-मारायण तेल मालोश करमा।
पक्षाघात
कारफ—दिमागमे खुन चदनेसे, दिमागके मारतंन कमजोर होनेमे, अप-मार, हिस्टीरिया, झांयक्रों (भाषेप), मुखपविंडके रोग मादि के कारण, ऋद्धवस्था ये, किसी शकदरमातचे, अत्यंत दवं और दु:ख हेने से, अतिविषय सेवनसे, यद रोग हेाता है।
चिन्ह—घांब या वादिनों वाजुका आधा शरीर मस्तक से टेकर घांब नाक मुख हाथ कमर और पाव तक पारोके एक भागमे सुप'ज्ञान कम हेाते होते विश्कुल हूठा पह जाता है। यद रोग कमी घीरे घीरे हो कर चदता है और कमी एक साप आकमण करता है। इस रोगके गीने आकमणमे पहिने येढा येढा दर्द हेाता है और पीछे वद योर के प्रत्येक अंगमे सुप'ज्ञान कम हेाने लगता है। और नोरोगी वाघा श काहों भपेक्षा आधा दद'वाला श'व स्पष्टमे ठ हरा लगता है। शंमेर उश भ गदो स्वाभाविक वृणताकम होने आभा लगती दें। गमवाला अ गदर गाल दोरा लगता है। आंल कुछ तिरछो हेाती है। मुखका केंना नीचा ढीखता गिरती है। उश भागके मुख के देनेसे थूक और कार उश वाजुकी जीभमे स्वाद कम लगता है। ओशके उगरका हदेकन-पापड़ (Lid) आासकेदा यरावर ढ कता नाही। यद रोगधा युग चिन्ह है। वेष्टनेमे, हुशियारिमे स्मरण शक्तिमे तफावत हे। जाता है। दिमाग पर रोगका प्रभाव हुवा हे। वो नेष्टल सक्ता नही और बोवछा वोलता (Indi. Stinct. Speech.) है। या निल्कुल
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योग न होने पर भी स्वाभाविक ही रोग हो जाता है और अंत में घातक आपा भीर बला होकर रोगों रसमे भरतन कर मति सक्ता, निश्चितावा हो भया है ।
पदार्थ वेध-चुलक खावा देना । दस्त दे वस्त साफ हो बैश रवा देना । चिकित्सा का ढंगाश देना । रोगके मूल कारणकी जांच कर उसके अनुकूल र उपचार करना । औषधियमें बहसे या देख नादे चरनेमें पहांन लक्शना सहीमें वयना गरिष्ठ पदारथ, घसटे पराव क्वांट लसकरफी मीठाइके, सड़ियल करनेभाला सुरास, मय पदारथं जानां ,मृत्यु ।
पक्षांतरीट रस — पारड, म षक, रससिंदूर केह मरम, त भस्मक षभक मसम, मापवेधम प्रत्येक तेआ ४, नौसकां गोला, हस्सूलफा गोला असि न घ वचूका, घेठ, पेठक, काको मिरच, मकफकरा, गोस्खरू, निसेैय, हिल इरड रास्ना, देरदार, चौची,(किरात) वोलेंमूलहू छाल, अरणके फूल, प्रत्येक तेआ ४, युगल तो, य०, शिलाजित, तेआ । ३c, शह माथ मिलाकर, सहजनाक संग वगारपाळा निगुंडो। चित्रक, अदरक, शेर मृ गराज, प्रत्येकक एक एक म नां जड़र सुवादर घोट । रचना भयवा रतो प्रमाण गोलो वनाना । मत्रा २ से ६ गोल्यो पोषकर गायके धो के साथ मभका उंटनोकिफे धो के साथ देकर सुपर कूव शय या महागस्ता क्ताथ पिलाना । उपर लिझे दिन्हुवाळे, पदारथमें घोर मपड ज म नंर रोगमे और दुसरे ब्याधि में दिये औषधे सेवक करनेसे आराम होतां । ज रोगके
अनुसार विशेष समय तक सेवन करना वाहिये ।
पक्षाघातरोग रस—पारद, म शु, रससिंदूर गुष्टिमदम प्रत्येक तेआ ३, शाबररविभ म तेआ ५, दतें मूल, निसोथ, किरात (कूठ चा ) घेठ, वायविडंग , चाले मिरच पोंवलं नूर, नागरमोथ, उडामौठो, देसदार, सपं मधा। वचुका ११ना पुष्टकरमूल, विकला, (विक कत) की छाल, तम्र, लोंग, यच, भवं ष, शह घनेोन, दुर्लभन प्रत्येक ठेला दे दे ठेकर महाराग्नादि क्ताथ की और वायवर को एक एक भावना देवर रतो प्रमाण, गोलो वनाना । देा से चार गोलो दूष था धो के साथ बना । उपर महारास्नादि क्ताथ पिलाना ।
वाहुशोष — अपवातुक
कारण—कौंध (Shoulders) में कुपित वायु मांकके वधनसुर स्नायुमें होने से होता है यह वाहुशोष है और वाहु (Erm , ने रखी हुर्द घिरासोधर कफेन आयु संचार कर देता है । जब हथका यत्नो कर देता है ।
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छोटा-ऱदका और पतला हरा:जाता है उलको भपचानहक करते है । हेनें के लिये पथ्यापध्य और चिकित्सा वातोगमे' बताइ हुं क़ना ।
वातहरोप हर मिश्रण—घवे'क़्वा ९५ तोला ।।, सुगण ९५ तोला ।।, वातगजोंकुष तैल ९, वच्त वात-सितामणी तैल तो ०।। यधनग तैल ३ घप घाथ मिलाकर घोटकर ६४ पुदी यनाना । दिनेमे देा वक्त कटकारी भरहदेह के घाथ देना।
वातहोोपध्नर द्रचय—जटामां'ही, ऱ़ल्ना, शिंवलिगो, वही कटदरीक़ा फल, छोटी पीपल, ययूरपिसा पपरीमूल श्रृंगमध अतीश प्रमेठ ढोलर हरी द्रे?, हर्रती खुप थे। ९- यधनग' साठ द्रव्य मिलाकर थे। १६ सव साम कूट कर मिलाना । हवेसां ९ तोल'क़ करय यनाकर पिलाना ।
वातहोोपध्नर मिश्रित तैल--महानारायण तैल, महानारायन तैल, मुग गरान्न तैल, महामापदि तैल समान भाय ले कर मिल्न करना । इस तैससे दिनमें देा या तीन दफ़े मालिश क़ना । और ७ दे' नं.ते चममच पिलाना ।
शिरोग्रह-मस्तक झकड़ जाना
स्तारण—मदनक़ी ,भारण करनेवाली प्रोवामें रहती हुई शिराओ'के खुनमें घुसा हुवा', वायु, दिगोद्देश जड़ यना देता है । तक वे विराये' शुजड और रक़ यनतेो है । पीड़ा हेती है और कभी वे विरायें फूलकर काला र तको दिसायां देती है । और घीरे घीरे मस्तकके इधर उधर घुमाना व वय हेा जाता है ।
उपचार—महानाराय तैल, पडि़पिदु तैल, और अणुतेल को धीरोवस्ति देना, नस्य और कानमें ढालना और मालिश करना ।
शिरोग्रह हर मिश्रण—वातविधंघ रस थे। ९, मद्येोोगराज तैल थे। ९, लघुंगमराज तैल थे। ०, ताम्र पपोंटो तैल ।।, आरोग्यवखनी तैल थे। ९, सव घाथ मिलाकर ६४ दे मनाना । एक रु० एक तोलके दूघ शहद घृत या पानीटे साथ देना । और क़ल्कमा, घृत a ४ तोला प्रतिदिन सिलाना ।
निदान . - १७ . यनाय +तरारी क़द दशामूल, जटामां'ही, मेढ़ारिंगों, वायविड रस, च न्है क़रजा, नीमकी छाल, देवदार, प्रत्येक हे दे तेला और पुनर्नवा मु, तैल ७ ते, सव साम कूट एक वेलाद़ा क़राथ पिलाना ।
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रसायन-रोग चिकित्सा ज्ञान
धारण-दीर्घ जीवनको प्राप्तिरहे हेतु, नित्य नित्य सदा सर्वदा नीमारीके धारण करने घात नहिं दोष रोगहे कारण वह हेतु नहिं माना है सब रसुध्याे नमकीन पार खटाई, कडुबा, झषु, आदिं मृदु मभये नहोँ लगत। यह भो बात रागका एक मेद है।
रसायनादिहर घृत पञ्जिका--घृत, डाकिनी मँल, कुलींजी जांग कुटकी, चिरायतां, इन्द्रायो प'पल, दोपहरी मुर्रा, चेरठ, क'लोमिच' समभाग कूट कर जीव पर दसौँमे-चतुर्थुनहे षडङ्गव माँइोपीरे मथन व चबाइके दसौंक नाँ मथाग पोछों जेसा मनासर उपसे दर जीभ पर घोर्सर । पुनि दस किट किटा वि तामणी ९ में २ रती कल्याण घृतके माथ मिलाना । मधुंसर पञ्जीको ३ में ३ रती च्यवनप्रसहा अभवा अस्वगंधादि मटेह के साथ देना । नितरा तैल या सरसों या महानारायण तेल मुरस्से १० मे ११ पिनिट कर रस्न दर कुलार 'रत्रा । पञ्चाम ९ तेलाधा सत्राथ कर पिलाना । 'घारास्नादिं सत्राथ पिलाना ।
गृध्रसी वाति (राँध्रण)
फारण-पहिले कुलमें (Butiocki मे पेठा होकर पीछे रस्सर साधळ (Thighs) घुटन, पिंढी और पाँव तक दोन्रा हेाती है जतन हेाता अन नकस जादै हैँ। यत्न गृध्रसी अघेटे हायुकै प्रनेपसे हुर्द है। नेा पौठा और दाद हेत। है, शरीर वक्फ (वाँका) हेा जाता है। घुटन, डिंघ और घागलके सोधाखो फरकठे हैं और नकस जाते हैं। यत्न सातकफदै प्रनेपसे यगृध्रसी हुर्द हो तो शरीर चुमदार भारी मगता हैँ, मुख्मे चीरनी लारका पडना, अघ पर अँखि आदि चिन्ह मालम हेते हैं।
५७ रागमे तेलका मालीस हरना। महानारायण तेल पिलाना । महारास्नादि वसाथ पिलाना ।
गृध्रसी वार हर मिश्रण-मुक्ता पिटि ता ०॥, सुवर्ण मरस्म ता। ०॥, रसभानोत्तर रस ता ०॥, वि तामणि चतुयु रा ता ।॥, सुघ! पर्पटी ता ९ सम पाष मिलाकर ६४ पुढी बनाना । एक सुवर्त एक सामेका आभ्रक'घृत अथवा कल्याण घृतके साथ देना।
स्वप्नि देवता वसती--पारद, गधक लोह मस्म प्रत्येक ता ०, पर दमूल, भीलामूल, छोटी कटदरीका फल, रास्ना, गुगल, झेष्मदर, राँल, र्परलताम्र, गोक्सुर
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१३६ हरड़, छोट, पीपर, काली मिर्चं, घलावीम, मिलेाय त्रिफलायरा, रसपुत्र फल, कामफल, प्रत्येक तो. ३, स धीका तैल तो. १० का करमां दे कर दसरीका रूप, भरमिका रस और प्रणत'वा के पचातका कवाथ या रसकी एक ए'च सात्तना देहकर गे'ला बनाकर अथीका पत्ता रपेट कर घान्यक कीठीमे तीन दिन त'क ठहने'ा देना । पीछे निकाल ह'र पुष्टफं मूलके स'नायमे घे ट कर गे'लो चन'ा प्रदान बनाना । ३ से ६ गे'लो पानी या दूध के साथ देना । वातहरे'पये लखाये हुवे नैका पाकीष करना । शुनवतै वात, अपगहुं', शिरो'ग्रह, नानदे'ा वात', कटिस्नह वादि वातरोगमे गुणकारी है ।
कारण—मनुष्यके'ा र'चामे स्पर्शा'का ज्ञान स्वाभाविक ह'ै घ'ड ज्ञान शरीरके विशेष अ गमे'से कम हेा या बिल्कुल न हेा उसका लकवा दह'त'ा ह'ै अगर म'त अ'ग यातप्रकोपसे र'द्ध गया ह'ै ऐ'सा क'दते ह'ैं । जिस अ गा र स्पर्शा' ज्ञान नष्ट हुवा हेा उ'स्के'ा रेागी अपनी इच्छामे ह'र'न चलन नहिं करसकता । इस रेागमे उसे खुलो'कर रे'खते निकलवाना । तैल मालो'ष कराना । घूप देंना । भ'क अ'ंडो अ'इसा, धरनि हि'फे'क पान पनोमें पोषकर ल मिला ह'र लेप कर, उपर शेक करना । त्र'यादशा'ग प'गु'ळ, महायोगराज गुग'ळ वात नि'द्ध स, चवैं'बर वप'ट्टी, सिह'नाद गुग'ळ पुनर्न'वा गुग'ळ उत्थादि उ'चितरु मात्रामे कलमाण घृतके साथ देना ।
सुप्त याताति तैल—शफेद कनेरका मूल, सफेद गुग'ळ, घतुराक'ळ पान, प्र'वेद दशा दश तैल'ा टे'र पोंष ह'र टि कीया वनाना । पीछे हि'लक'ा तैल रतल र. मे' वह ट किय'ा पूरीीधी तरह तलना । ट किय'ा एकदम ल'लल कर हेा जाय जव ते'इ नी'चे उतारकर स्वांग शो'त होने देखा । दूसर'े दीन कपड'ळान कर मालिष करनेमे त्पयोग करना ।
लशुन येओग —एक कलौंका लशुन लेना जिस लशु'न की गांठमे' दुसरी कलो न हेा । ए'सा लशुन हे'ता । ठे'कर मे'द'ा जे'सा महीन करना । पोछे गे'हुं'मा आटा त'े. २० ढाल कर उसमे' लशुनका मे'द'ा मिला कर पांच तोल'ा गायका घी मिलाकर उ'स्की तेला'की टी कीया करना । वस टी कीयाके'ा पूरीीकी नाई धीमें तलना । पक जानेसे वह टीकिया द'नके साथ खाना भौर तलने के पोछे नचा हुवा घी भी खाना । इसके उपर दूसर'ा कछ मी खराब म'ह'दी लेना । पानी गरम कर ले पोछे ठंडा बना कर पिलाना । रेागी'दे'ा वं'च वैठरीमें रखना । दिछ नामे' सु'लाना ।
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शरीर पर पसीना अ'ने देना । उस के ठोरोंमें ही दस्त विशोधक औषध करना । इस प्रकार ७ दिन तक हमेएँ पाँच पाँच तोला लघुनको ढोलो सिरानेथे रख्खी मिदता है । यदि रोगोकी गरमी मातम हे तो लघुनको ढोलो ४ तोला, ३ तो. या २ तोला हरेदाँ बिलाना और मीका शुराक रसना । योदि लघुनका प्रमाण कम किया हो तो ७ दिनकी अपेक्षा १४ या २१ दिन तक बिलाना । इस प्रकार एष कलौका लघुन ५० से ६० तोला बिलाने से लकवाका रोग मिटता है ।
संधिवात
कारण—पविर्वातोफेरे, काष्ठा करनेकी आदत वालो को, अपनी प्रकृत्ति विरूद्य मँयवा वेग विहदे हानिकारक गुणधर्मो वाले आहार विहार करनेवालोको, हेतुंप पदाथो' खा कर शारीक परिश्रम नही करनेवालोको, अधिक वात्ते शधिक कफ, पढार्थो भोरे अधिक मिष्टान पर प्रोति वातेफा पमका भपकष्य दूध्चा रस्सी पमनो नथेएके द्वारा शंविवात'फा दद' वथपन्न करता है । इऋष्ठे संधेसे पीड़ा हद' छातीमें मारीपन, पंटारुप, पेडन झकके माथा, काढि चिर होते हैँ । युषार माता है, वारीमें स्पदां ज्ञान दद'फे भागमे मार कढ़याथे वारीरफे दूषरे अंगोमें वम म दृम हेाता है । उपद्रवा, चाँदी, गरमीफे गेरपियोमें भी यह दद' हेता है ।
पथ्यापथ्य—सहांहसे' दसों दिन ल घन करना । उस्म वगह पर नीमके पत्ते निगुं डो एरंडफे पत्ते पानेंये पकड़र उथको साफ देमा । तदूखे, कदंबे पदारथो' खिल'ना । जुलाय देना । वाजरो, चना, अरु, पुराना चा'ल, कुलथी, वंटाणो-मटर, उड़द्र मुग', करेला, कटोला, मेधीदाना, मेधोको भाजी, वे गन, परवल व अ दं फायंफाकारक हैँ ।
रसनिष्चार्ति रस—पारद तो १०, ग धक तो, २०, शुद्ध यरषणनभ तो. ४, से'धागा तो ६ पुठ तो ५ कालो मिरच तो ३ पुठल तो १२, माथा, जवाखार, विषायरा-श्रृददारक, सैंठ गेरकगयुबी, रास्ता, हलौ कोषेररा, मषणा-मदयक, निसोेध, इुलसीफे वीज, सै धानोन, हलीम (प्र. अशोऴियानां वी) आंम्पवरना, विफळा, एलिया प्रत्येक तोर ३. सम वाथ मिलाकर एरंडतैल तो. ९० मिला देना और पोछे वबो हर्दफके मनाथकी और अजमोदके वचाथकी एकएक भावना दे कर सुसाकर घोटकर रखना । मात्रा ३ से ६ रत्ती गायके माथ अथवा कल्याण घृतके साथ देनेसे उदावत' व यु (वीप चढना), म दाग्मि, गुल्म, भम्लोपत्त, दस्त आदि और सवं प्रकारिक संधिवात रोग मिटते हैँ ।
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रोगका स्वरूप देखकर औषधकी मात्रा यून या अधिक करना । शरीर पर पट्टी बांधनेके तेल अथवा खपराका तेल मालीश करना । वच्चेके बाल लकवानमें भी यह फायदः करता है ।
संधिवात हर विधण—गधे स्वर पर्पटी तो. ९, कातचींतामणि 'गुटिका' तैल तो. ९। महायोगराज गुङ तो. ९, कलौंजो जोरातेल. ३, शताव्ध तेल तो. ९, श्वेत साथ पोह घेऊंट कर ६४ पुढी बनाना । एक सुवह एक शामके धोके साथ अथवा कल्याण घृतके साथ देना ।
संधिवातहर चूर्ण—पुनर्नवा मूल तेल तो. १०, कलौंजी जोरातेल तो. ५, हरड, सोंठ, काली मिरच, शताव्ध लत्ताकर जके घोज, शिलाजीत, सैंधानोन, वायविडङ्ग, आंवके सूखे फूल, प्रत्येक तीन तीन तोला सब साथ मिलाकर कूट कपडछान कर रखना । २ से ४ माशा पानी या बकरीके दूधसे या ऊत्तमो द्रवसे देना ।
संधिम्रह—सांधोंका झकडजाना —पकड जाना ।
कारण—अति विषमिय सेवनसे, पटक जानसे खटटे पदाथ बहूत खानसे, उपदंश के दरदसे यह रोग होता है । घारा शरीर अथवा शरीरका अमुक विशोष सथके सांधा-संधि झकड जाती है । जव मनुष्य मुंहकेलोथे चल सक्ता है । अथवा विछानावस दी जाता है ।
संधिम्रहार्ति शोष—असगंध तेल. ०१, सफेद मुशली तेल. ९, पीपलामूल तेल तो. ०१, सब साथ मिलाकर दूध रतल ९९ में डालकर पकाना । अच्हे तरढ पक जानसे उसमें घी तो. ९, और शहद कर तो. ०१। डालकर मिलाकर खा जाना । १४ दिन तक खिलानेसे संधिम्रह संधि वात, सन्य कई प्रकारके वातरोग में लाभ होता है ।
संधिम्रहार्ति तैल—दूधी घातावरीका रस तो. ६४ यह न मिले तो घातावरी तैल तो. २० के पानीमें पीस कर उसमें गायका अथवा वकरीका दूध तो. ६४ डालकर सौंफ, देवदार, मरवा, हरीत्मक वच्च नदन, तगर, कुष्ठ, इलायची, मालकांगनी प्रत्येक तो. ०१, सवको, कूट डालकर, सब मिलाकर तिलका तेल तो. १२८ डालकर पकाना । पानीका अंश जल जाय तब कपड छान कर रखना । इस तेलका मालीश करनेसे और ४ से ८ माशा दूधके साथ पिलानेसे संधिम्रह, संधिवात,
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किम्बा शंङ्का वेडौल-बिकृत होनr. जकड़ाना, स्पन्दनका अज्ञान इत्यादि शातरेागमें वच्चा फायदा करता है । पालकुवा (Polio) वानल मरचेोंको पालेशके साथ घोटी एक चम्मष मिलाया जाता है ।
उपदं रेागमेंं बतायी हुईं केशरादि या कस्तूरीदि गोळी २ से ४ प्रातः काल खो या हुमके साध निगल जाना । ऊपर हृदय पोना । नमक, लाल मिरच खट्टी वदायें २१ दिन तक मनद करना । अविशषह सगेरे उपाधि रष होते हैँ ।
मालशोगनी का गैल वावचोवा तैल नीमके यौजका तैल महानारायणि तैल, महानारायण तैल यन घपन टे हर मिलाहर प्रालेश करना और ९ से २ चोटी चरमच रूपके साध विलाना । वे सब प्रकारके वातरेग नष्ट हे ते हैँ ।
धनुर्वात-धनुर्वा
इस रेागम सारT शरीर धनुष्यकी तरह अगर कमानकी तरह वंका हेा जाता है , ठोडी मेजवाली जमीनपर चेाने मे, हाथ मा पैंव काठनेसे या रसपर घाव लगनेसे, गरीरपर किसी वस्तुका भागात होनेसे, हथेली या पैंवकी एड़ीमे तीक्षण द्रवियार घुब जानेसे, खरतत खाटी चीजें खाने पीनेसे र्वात, तान, वमानको तरह होती है । ताप-जुन्बार सख्त खानेसे या तावमे यधिपात हेा जानेसे धनुर्वा हेाता हैँ । कभी हृदयको जोर अंदरसे वभान जेसो खोंच वेधती है । कभी पीठ-पृष्ठ मारंक और कमान रेधो मेँ- नालाँ है । इस वस्त निद्राकी दवाई देना । मेगदेी घेनमें रखकर स्नायु विाघन रनेद्री मरूरत रहती हैँ, धन्यथा रे गी मधुयुक्ता देनr है । वासेकपड-थाचकीमें स्नायु धार वार कींवाता हैँ ओैर हेंरT पता है रेांकि धनुर्वा में वह बहुत करनें सँचा हुवा वमानकी तरह बहुत समय तक रहता हैँ । अर्यात इस रेागमे स्नायु ए पूर्ण रुपमें ढंढे नहों पड़ते । और रेागी धनुर्वा-कावठाकी तरह हर या अदरकें मारमें खिंचा जाता है । जब आँचकी ओस शेवमें यद्यपि (Jaws) दँत नें आयु खोंचाबर आर म रेधता हैँ और पोछे गर्दनके स्नायु मो खों चाता हैँ जब सारे शरीरमें पनैना लगता हैँ रेागी वेंल रसता नहों । रेहे नीचे पानी मी चनरना कटिन हेाता हैँ । छाती मेंँचाती हैँ । पेटका रसायु रददी डेढा कटौन हेा जाता है । तुंषा बहुतँ नरती हैँ । दरत वँघ हे ता हैँ, भतमें श्वास रुकषर रे.गी मर जाता हैँ ।
पथ्यापथ्य सार --डपचार-रेागीके रंध्र हवापानी इत्यादिमें रहता । प्रकाश वम हे, ज्यादा आहार होने न देत । हृच्छ मेरी य महानाराच्च या
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रसौचालोका जुलाब देना । गेहूँ या ग'जरीके आटाको गुरुथ सूल कर वनी गयी वाव पिलाना । मुंग या उरद खाढा पकाकर वसने प,नोमें अदरकखा रस और लशुनका द्वारकर पिलाना । तीन मथ मधवा अृतस जीवनी सुरा सघन्रा कस्तूरी अंवर देना । मुखसे दवा वगरेढ न जा सकें वेा गुदामें पिचकारी (एनीमा) के द्वारा दवा और दूष स'धि वाष्पा । निद्रा नो दवादि देना । रचामें अृतस जीवनी सुराका हन्जीकेशन देना । मस्तिष्ककी तोलि्वेक भागमें तेल निकालकर मज्जासे उफाॅ देकर घून निकालें जघ हिरण्यगर्म्म, स'निपात मैरव, रौमवेध । सूर्यचामरण ८ थे १० रत्ती देहही निकला हो उस करह घीथना और उष दवाईमें दिई दवाई तुलधीके रसके साथ पिलाना । सूनक्वाथंषण या स'निपात मैरव भांडीमें घोंजना, नाकमें सुंवानाँ । महा नारायण तैल या तिलश तैल चारे वक्त पथ्यच्छी तरह मदंन करनाँ और देा चार तेला महानारायण तेल एंव एंव घटाके पीछे पिलानाँ याँ पिचकारी से गुदांक द्वारा ष्ठानाँ ।
घनुरांत हरु विणयन—स'जंगघा तोल २, अष्टामृत पिष्टी तोल १, त'म्र भस्म तोल १, नात'विलावपि त्रिद्दोष तोल १॥, विल्वपत्र पञ्चाङ्कल तोल १॥ सब साथ मिलाकर ९ पुढी वनाना । और पान पाव घटाके पीछे एक एक पुढी पुनर्न' वादि कत्राथके साथ दैना ।
पुनर्न्त ग'दिं कत्राथ—पुनर्नंवा मूल तोल २०. हलदी, अरन घ अरणिमूल, गो'खरमूधी वटमादी पथूर'चिक्रा' प्रंयेक तोला पांच पांच, लेढ़र कूटकर रखना और पांच तोलाँ भृङ्गरामे तीन रत्तल पानी ढाल कर पकाना । साबा रहने पर कपड़छान हर पात्र पाव घटाके पोंछे दश दश तोला प्रषाही किसी औषधके साथ या सादेला बिलातें रहना ।
घनुरांतांतक रस—शुद्ध ग'धक तोल ३, शुद्ध पारद तोल ३ दैनोकी कज्जलो कर रसमें स चळ नोन तोल ३ बालकर घे.टनाँ । पोंछे रसमें सेद्रागा तोल ३ मिलानाँ । पोंछे दसमें लोंग तोल ४, जंयफळ तोल ५, कालोमिरच तोल ५, अकलकरा तोल ९ शुद्ध वच्चनाग तोल ९ कनकशोंष तोल ९ छोटी पीपल, तोल १० सघ हाथ मिलाकर केरदाँ—करोरदे मूलदे रस याँ कन्राथकी तीन भावना, और अदरक को ७ म'वनाँ, और निंबूळ रसदी ७ भावना देदर रसों प्रमाण गोलो वनाना याँ छोट कर मूठा रखना। रौगीकी दियति देखकर २ से १५ रती तक किसी वृक्षाय अथवा किसी भाम्रन या मधुके साथ देना । पान याँ थाधा घटा पीछे देते रहना । घनुर्वौत, भास्ककी. दांत दाढ़मे चढ़ जाना, जद्वा खद्र जाना इत्यादि मे' उत्तम गुण करनाँ है ।
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घनुर्षातां'द्र वच्र रस—पारद गधक, सावरसिंग भस्म प्रत्येक तो. ८, घौठ, पोपल, कालीमिच', बिजौरक हिंग, भजमोद कुर्कक, भतील, मीरचवाँ, सेहदाना, शुद्ध चछनाम पुनर्नंवा, व वीमूल, प्रत्येक तो. ३, युगळ तो. १०, घृत घाथ कूट कर पेष्चान कर उषमें एरंड नैष तो १० का पट देनो । और पीछे रसगघटे पषयकरी देा और मागराके रस की देा भावना देकर घोंट फर रस्ना । मात्रा २ से ६ रत्ती । घनुर्षा, क्रौष्ठक, शाखेप, शोंचवा, सचिम्रह और दूसरे वातरोगमें चतसम गुणकारी है ।
आक्षेप—आंचकी—ताण—खेञ्च
कारण विसंध—लंघनमार, मृगी, होष्टोरौया, घनुर्षा हहकवा, (हाइड्रोफोबिया विया), सृतिका रोग इत्यार्शिमे तथा कोषी ध्यावनमें जखम घाव होनेसे, बहुत खून गिरनेसे, मस्तकको चोटपरो टूटने मे पगजमें रक्चस्राव होनेसे, विप दानेसे, मारेपीट में कुष्टि विकार हेनेमें, यहत घुट्टी चोज झानेसे, बुजारहे नोरचे डरपोदि थनेल कारणोसे यह रोग हे.ता है । जब सारा शरीर सथथा हाथ पांव क्रोंचता है । मुख और चहेरा लाल देजाता है । दांत बकर जाठे है । जौम बह र निद्धल जाती रे । भाष्का हुंघन होाता है ।
पथ्यापथ्य—रोमोके खुल्ली हवा वाटे कमरें खुलाना । पख से हवा चालना । मुखपर ठंडा पानी छिड़कना । जुलाव देना अथवा गुद्दाके द्वारा पिचकारीषे जुलाव देना । मस्तक पर ठंडे पानीके पेटे रखना । द्राक्षासव या अन्य मध पिलाना । निद्रा.की दवाॅई देना । तिलका तेल अथवा खोपरेाका -तेल यथमा अथवा मधानाराय तेल अथवा कल्याण घृत घारे वदनमें मालोष करना और पिलानो । प्याजका रस और लशुनका रस दे देो तोम तीन तोला पिलाना ।
आक्षेपहर विधारण—प्रथाल पिष्टि तो. २, मुक्तापिष्टि तो. ●१, मुईण' पपंड़ी तो. ९, घनिपात मिरच तो ●११, सध्रक भस्म तो. ९, छोटी पीपल तो. २, सम मिलाकर ८ पुषो वनाना । और प्रत्येक भाषो आक्षा घटाके पीछे एक एक पुथी प्याजके रससे अथवा तुलसीके रससे शहद मिलाकर देना और आक्षेपका समय घटनेसे मार्नाके समय मी बढ़ाना । शरीर पर महा'मारायण तेलमें समान भागमें अलसीका तेल मिलाकर पारे वदनमें मालोष करना ।
वातघ्नास्कर रस—अश्रक भस्म, सुवर्ण भस्म, अथवा सुवर्ण पार्द्धिक
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खार, शतयेक तोला २ असगंध, लौंग, तज, शोंठ, कालीमिर्च, पीपल कवाबचीं, हेघर प्रत्येक तोला तीन तीन, शिलाजित तो ६, गुगल तो ८, और शंख माथ कूट कपड़छान कर, असगंध, निशुं'दी, वचाव'चांग, शरणि पाँचों और कवारपाठा-प्रत्येकका रस या शहादकी एक एक भावना देकर सूखाकर घोटकर रखना या रक्तो प्रमाण गोली वनाना । मात्रा ३ से ६ गोली अदरक रस और तुलसीके रससे देना । स क्षेप, वातुर्षा, स्नायुुवात, और दुसरे वातरोगमें उर्म गुण करत है । घनुर्सा आखेपमें घोटकर आंवमें अंजन करना । पानीमें पीसकर गरमकर लेप करना और गोलीधे पीसकर नादमें नस्य देना । अथ क्षेप- णण-स्तिकाफ-आक्षेप, आंवकं, वातुर्षा, पद्राघात, उरःस्तम्भ, मुर्च्छा, सदावर्त्तं दायु, व चिवा न भला हिरटी'रोगा तौरतोंके समरोगादि इत्यादि वातरोगोंमें उत्तम गुणकारी है ।
सामवात
कार ण-यानपास, रहन छहुनली अथवावस्था, म्लेच्छ हिेशों में न रहनेसे, चिकित्सक पदाथों या द्रावण पदाथों उपलब्ध न होनेसे, शरीरिक प्रतिकूलता काम नहीं करनेसे, वायुने खींचा हुआ आम ५फस्थानेमें जाकर वह् यिना परिपक्व हुये, स्पष्टतपन्न हुये रस कि, जिसका खून वनता है वह क्षात पित्त कफसे विकृत होकर-चमनियां द्वारा क्रोढ़ेफ-प्रणाहो को निसारता है । जो रसका वहन करनेव ली-शिराफो है नेक देता है । वह विविध र गवाला बहुत चिकरा हेता है । इस कारण-सन्नरपमा खून वनता नही हे । इस कारण म्लेच्छ कम लगती हैं और हद्म पर च रस हेता है । मारोर्के अवच्येमे पोढा हेती दे । व'यु और कफ एक साथ इम रेागमे कुपित हेते है । इस पीठ और साधोंमें घुस कर उन्ह जकड रता है और इ खरता है ।
लिमिरह—अथ गमद्रे नरचि, तृषा, जमाइ, सुस्स्ती, शरीर छश होते हुवे भी वजनेदार लगे, मिश्र अवयवोंमें सुजन, हाथ, पांव, मस्तक पृष्ठ चम्पर, घुटन, कुला, माथल, सांधा आदिमें पीड़ाकारी खजन हे । जिस भागमें ज्यादा विकार हेा वहां उमादा पीडा हेती है । सुइयां मिेकने लेगी या विछु काटने लेधी लीढ़हेती है । उत्तखेद, वमन, वार पड़ना, मिग्रो फाममें उम्माद न रहना उदासीनतादाद अदि हेते है । पिशाच उमादा हेता है । पेट कठिन रहे, पेठमे दन हेा, मिदा अनिमित तृषा धने, वमन चककर, ग्यानि, हृदय जकड़ना हृदय पर वेध, दस्तन ददर और दस्तफे साथ आम ओर चोकने पड़ाय' पड़ना, अंतेंने पवन मरना, आध्मान, रेस चदना, स्वांति उम्वर हेता है । पिशाच अकस्मात उमादा हे
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वो वात कौर वरीमे' ललाश ढीलै, मायु अधिक है। वे वात और पित्त निकलै, लक अधिक है। वे वातिसे जड़ना खुलजलो है। और सारे ज़रीरमे हरवक्त सूजन होतै और मिटै। यह रोग कष्टवर्द्ध है।
व्यापापच -वचन कर सके इतना हर वक्त उपवास कराना। द्वारक दिनमें एक दफे टेना। माश्री, चना। मुग, जव उड़द करेला कटेला, दूधो, सुगिया डालो, परवल आादि डाल, हिंग जीरा, धनिया, लशुन धतूरा, सैंठ मिरच, तिल मिरच आादि दितकारक है।
रसेान वटक-लशुन रतल १० और काला तिल रतल १० देनेहै। मायको चटनी छाछमे पीसना। पोछे वसमे' घेओंठ, पीपल, मनिया, जवखर, चित्रक गजपीपल, लजमोद, तज इरायची, पीपलीमूल, प्रत्येक टो ४, शाफर टो ३, काले।मिरच टो ८, कच, शोरा और अदारक प्रत्येक टो १६, घो टो ३२, तिलका तेल टो। ३२, शहद धरसै' टो १६, राव ता. १६, शुद्ध हिंग टो. १, पंच लवण टो। ४ शक्कर विंाकर वसमे' शाइद टो। १६ मिलाकर वसमे स्वच्छ छाछ मयवा सुरचा मिलाकर पिंत करके देईमे' भर हददका सुलत यघ कर घान्यको कैलेमे' १३ दिन तक रस्सना। पेछे चार से आठ माशाको वट्टी बनाना। दिनमे' ४ से ८ वेरो खिलाना। मूली लgo वल सेवन करना। इसके सेवनसे ६० प्रकारके वातरोग, वातरोर, गुल्म, आमवात, कुष्ट, सूजन, योनिशूल मिटता है। हड्डो टट माई है वd जुड़ जावी है। शांके आती है। आमवातका यह उत्तम औषध है।
व्यामवातांतिद--पारद गधक हरद चित्रक गुगळ प्रत्येक दश दश तोला टेकर कूटकर कपड़छान कर एरंड तेल तोला ९. को मावना टेना पीछे वसमे टे ह अञ्ञक पाँक केहड़ी प्रत्येकको मम्म दवा दश तोला और शुद कियो हुअ अफीम टो। १० साथ मिलाकर भोगरै कत्थाको अयवा पोस्तक शहद के कत्थाको मावना टेकर रत्तो प्रमाण गोली वनाना। सुवह और शाम दोनो समय ३ से ६ गोली पानीह टेना आमवात और इसके शय लपद्रव अच्छे होते है।
व्यामवाते श्वर--पारद टो। १, गधक टो। २, ताम्र मरम टो। २, सोहदसम टो। १ अञ्ञक मसम टो। १, सेहंडाना टो। १०, बहेडलवण, कालीमिरच, पीपलीमूल, अजमोद, शोरा, शहजोरा दतीमूल, प्रत्येक टो १ सद साथ घेट कपड़छान कर अप्पलतासके छालके क्काथको और पंचकेलके क्काथको गैर मिलीयके क्काथहकी पद्ध परम मावना टेकर रखाकर घोटिकर रखना। मात्रा ४ से ८ रत्तो पानीके द्वाथ टेना। आमवातका रोग मिटता है।
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वारेरग्य वघिंनी गुटिका—(रसरत्न समुच्चय) पारद, गंधक, खैर नम, अश्वगंध मदम, तांत्रमहम पत्थेयक तेला ९, त्रिफला तीनों मिलाकर दो। १०, वेललखित तैल १५, शुद्ध गुञ्जल तैल २०, धने चित्रकमूल तैल २०, भोर कुञ्कुम (तिक्कता) तैल। २० प्रव साथ मिलाकर हपडछान कर नीमके पत्तको मंक्षीन पीस कर उसमें पानी मिलाकर कपडछान किया हुवा रस निधोल कर देव। हित- तक भावना देना पीछे ६ से c रत्तीको गोली बनाना। यह गोली आमवके लिये उत्तम गुणवकारी है। इधका घेंट कर चूर्ण भी रखा जाता है। संह सापयात मेवृदृधि, मदारिन, जोर्णोद्धार स चिरात, सर्वप्रकारके कुष्ट रेग- जलोदर, जिर्णों लंघार, यकॄन् रेग, दत्तक्री कषिी, मलावरोष आदिमें उत्तम गुणवकारी है। खुराकफे दीपन पाचन करता है और तीव भूख लगती है। वात पित्त और कफ द्वारवे हत्पन्न हुये विविध प्रकारके उररोगो नष्ट करता है। इधकी पूणं मात्रा १ दिनकी १ तेला तक्करी है।
इस गोलेके बारेमें स्पष्टता
रसरत्नसमुच्चय कुष्ठाधिकार म. २० का पाठ हूव प्रचार है। रस ग धकु लोहाम्र शुल्व भस्म समांशकम् । त्रिफला हिगुणा येभ्या त्रिगुणं तु शिलाजतु ॥१॥ वतुर्गुणा पुंर शुद्ध चित्रमूलं च तत्समम । तिक्कता सर्वलमा हेया सर्व स चूर्ण्य यत्नतः ॥ निष्प्रक्ष वल्कांमोशिमेदयेद द्रिदिवार्चिभि ॥२॥ ततभ्र वडिषका. कार्यः राजकोल फलेपमा: । मेदे: सार्द्धिता सर्पि द्रुति कूष्माण्डकोदवत: ॥३॥ वात पित्त कफोद्भूमानरोगानानातिप्रकारसान् । पाचय्रो दोषस्री वध्वा हया मेविनाशनानी ॥४॥ मलभूंदिलरी मितयं दुर्धपंडितुसंप्रवात' निती ॥ बहुमात्र किफल्सेन सर्वरोगेपु ग्रास्यते ॥५॥ वारेरग्य वघिंनी नाम्नो गुटिकेय प्रकोतित॑ता । सर्वेरोगप्रशामनी सिद्धनागाजुंनैविता ॥६॥ इष गोलेड़ा सच्चा शास्त्रोफ और प्रयद्धारेके हादका पाठ उपर विस्त- हुवा हो है।
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मद् गेलो राजकोलपल अर्थात् रसाजमेरी दौर के रसजत्री मापकी लिखा है रसश्र अष्ट' नं० शैलाका है अर्थात् एक दिनमें नं० शैलाका रक्खो माथा देने को प्रंषकार लिखता है। तब ऊपर लिखे पाठके अनुसार बनाद् करय सब ह' एक दिनमें नं० शैलाका मात्रां की जा सकती हैं। और इस माथाके रस गंधक, रेेह, मन्श्रक, ताँमा प्रत्येक काथी रसमें कम प्रमाेमें पेटने' जाता है। इस भौषधसे' शुरुसे गुगळ निफल चित्रक्रमूल भोर कुटकीइनका योग हो करता है। और ईन गोसोंमे रस गंधक लेह अंश्रक और ताँमा योगवाही स्वरुपमें भौषधका परिणाम देने षाले है। इन सब कारनोसे यह सिद्ध हेाता है कि इस भौषधमे रस गंधक लेह अंश्रक और ताम्र पांच द्रव्योसे त्रिगुण त्रिफला ठैशा दोहिये। अर्थात् पांच द्रव्यों एक एक तोला होनेसे त्रिफला १० तोला, हेगा चादिये भौर इस प्रकार रस आदि पांचों द्रव्योसे त्रिगुण अर्थात् १५ तोला शिलाजीत, भौर, पांचेद्रव्योसे
चतुर्गुण अर्थात् २० तोला हुद्र गुगळ और पांचों द्रव्योसे चतुर्गुण अर्थात् २० तोला शिलाजीत मूल और सबके समान अर्थात् वारह द्रव्योके समान ७५ तोला तिक्ता डेना वाहिये। इस प्रधान ही यह सौवर्ण बनाना उपयेागमें डेना सचित और साधु संमत है।
करें वैद्य महाशय इस भौषधके पाठका अथं नीचे लिखे अनुसार करते है'। और काम'शो बाधें के पास इस प्रकारकी आरोग्यवर्धिनीकी माग रहनेसे इस नौचे लिखे पाठ के अनुसार काम'शोवाढ़ी मी बन'ते हैं। इस गोलोका नं० १ देखर वे महाशय इस पाठक रसरत्न समुच्चयक बताते है मद्द रचित नही हैं। मद्द नं० १ का पाठ रस रत्न समुच्चयका नहो मद्दना चाहिये मयोकि प्रंषकारने यह पाठ रचीक्त नहिद दिया हैं। आरोग्यवर्धंनीका मूलपाठ रसरत्न समुच्चय के शिवाय अन्य प्रभमें न होनेसे इस नं० १ की मी रसरत्न समुच्चय की हि पाठ बतां
कर काम'शोकार मी इसी प्रंषका पाठ छापते है।
आरोग्यवर्ध'नी नं० १—पारद गंघक लेह अंश्रक और ताम्र प्रत्येक भस्म पांच एक तोला, त्रिफला २ तोला, शिलाजित ३। तोला गुगळ ४ तोला, चित्रक-मूल नं शैलाका, सबके समान अर्थात् १८ तोला तिक्ता सब साथ मिलाकर कपडछान कर दो दिन तक नीमके पत्ते रमको भावना देनां। इसकी मात्रा ३ से ६ रत्ती
अथवा २ से ४ गोली तककी है।
नेष्ट—प्रथकार जब एक दिनकी मात्रां १ तोला बनता हैै तब इसकी १ तोला मात्रां की जंय तो रस गंधक लेह अंश्रक और हकीर प्रत्येक दृव्यकी
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एक दिनको मात्रा ५ से ६ रती आ जाती है। ताम्र भस्म जैसी कंचु ९ दिनमें ५ से ६ रत्ती पेटमें डालना और पांचों को मिल २९ रत्ती मात्रा ९ दिनमें दे देना यह अत्यंत हानिकारक है। ईश्वर प्रकारक विचार करते हुये हम समझ सकते हैं कि प्रत्येकाने हूप गोलीकी मात्रा राजकेलफल अर्थात ९ तोला बताई है तथ यह पाठ प्रंथकारके मत नहीं हैं यह हवभाविक बात हो है। फिर ओ नं. ९ को गोली वनाकर कप मात्रामें देनेका पच्तार हुआ है। इस लिये फार्मेसी वाळे भो नं. ९ गोली बनाते है। लेकिन प्रंथकारने नें गुणवणंन किया है और ईश्वर औषधके गुण बताये हुचे (विविध रोगका नाश करने वाली इसे सिद्ध औषधी बताया है ये गुण उपर लिखे प्रंथकार समत १८० तोला वाळे पाठसे हि लिये हैं पाठमें लिखे गुण १८० तोला वजन के पाठसे यनाई हुयी मे मिलता है और अनुववसे भो यहाी गोली गुणकारी प्रतीत हुयी हैं।
तिकुनार्दि कषाय—कुटकी, पुनर्नवा इन्द्रजौ अतीस, हिटाय चित्रक समभाग कूट कर रखन। हमेसा आधा से एक तोलाका क्वाथ वनाकर पिलाना।
मुस्तादि कषाय—नागरमोथा, सोंठ, कतीम हरड़, देवदार, जटामांसी, मजीठ पुनर्नवा गेरूखमुडी सम समभाग लेईर कूट घर रखना। आधे एक तोलाका क्ताथ कर ९ महिना तक पिलाना।
आवंरातहर मिश्रण—आत चि'तामनि वृहत तो. ०॥, लेईर पर्पटी तो ९, मुक्तापिष्टि तो ०॥, अभ्रक भस्म तो ९, अ ममातेखर तो. ९ च श्रमात वे. २ शिलाजित तो ९, पुननंवा मूल तो. २, सम साय मिलाकर घोंटकर ६४ पुडो वनाना। देा समय शहद या घृतके साथ देना।
ग्रहदारास्नादि कवाथ:—रास्ना तो १०, एरंडमूल, अडू़सी धमप्रा, कचूरा, देवदार वलामूल नागरमोथा, सोंठ, कतीम हरड़ गोंखड समलताम्र, सौंफ, घनियां, पुननंवा मूल, गातावरी भृंगालीम, चरक छेटी कटेरी मूल प्रयेक पांच पांच तोला सव कूट कर रखना। एक तोलाका क्ताथ कर एक माघ तक पिलाना।
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उपस्मार-वाई मिरगी
कारण—दूष जो इसको पैदा करते हैं, अति विषय में, हस्तदोष से, कुटेव से, दिमाग के रोग से, कृमि रोग से, गर्भाशय के दद से और वातरोग, म द्देप, वातर्वा वानिपात आदि रोगों में ताण-तो चक्कर उपद्रव हेतु खाने से यह रोग होता है ।
लक्ष्ण—दद्य चौंपता है, हदय और दिमाग स्नायु जकडता है, सरसराहट कम हे। ज्ञातं है, मेजो हरते फिरते चिल्ला कर गिर जाता है । मांस खेलने के चाला डेला उपर चढ जाता है और शफेद हेाता दीसता है । मिर्गी दाते में मोच जाता है । मुख में फेन आता है । मिरगन फिर जाता है । लोंच होते जौसे ध्वतो हे तव हिस्ल काली पदती है । वेढो मिनट के बाद ताण सींच यंभा हेाता है जय दरदो सेो जाता है । इस प्रकार मार समे ६—७ महिनाके बाद एकदके आते थे और पाँचवे समय पुजरते पुजरते फेर मानेकी मुदत कम हेाती जाती हे । पाँचवे सम हेाते होते रक दिनमें देा तिन चार फेर भा जाती है ।
वात प्रधान हेंने से शरीर दावता है, दांत में चबता है, मुख में से फेन निसलता है, प्याव रदता है, लार निसलती है, मंधारा लगता है । पित्तप्रधान होने से माथ, मुख और फेन पोले हेाते हैं वृथा बहुत लदता है । वारी मोर मरता हुवा दीसता है । शरीर ठंडा पदता है और फीटभी कां चलान यादार समय तक रहते हैं । कढें रांगों का विचित्र प्रकार की चीज चिहलाना निसलता है । सारे शरीर के स्नायुमे आंव हेातं है । दातकी वातों से बध हेा जाती है । प्याव का रघन ढेताहै । हदय दुखता है, पेट में वायु मेरता है ।
पथ्यापथ्य—इस रांगों भेा कहो अष्ठेला खाने नही देना । फेर भाने का समय हेा जय साधानिसे रखना । फेर आये जय रखके हाथ पांवके इजा न दे इसक की व' माल रक्ना, छाती खुली रखना, पखा चालना । जीभी की रक्षाके लिये मुख में पाचो रक्ना । द्राक्षासव पिलाना । अन नस्यकदा उपचार करना । आहार विधार में य' माल रखना । षादा रूघु पाचन हेा जाय ऐवं सरार देना । भजोष दवजी न हेा इस प्रकार खराब ठेना । छींक और यार्त फफरका मिस्यान कंम दिलाना । दस्त और पिकाव देखां साफ हेा चैैैी याने देना । आरोग्य फेर सेात हे तो उनके ऋतु-वातिक धर्म यथादित स्थाना ।
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चांदिये। चित्रा के'ष मय, शोध न होने देना। किसीके पानी या अमिके पात्र मानसे या देखनेसे फिट आ जाता है। हर्रा शाक बकला कम सिखाना।
अपस्मारनाशन रस—पारद, गंधक, तांत्रमपि अन्नकसरम शुद्ध मनःशिल, शुद्ध हरताल वच, कुच, दिंग्, मैनसिल, सोंठ, पीपरल, काली मिर्च, वृद्द दारु, संचालनाव्च चारके विचककी राख, लश्ण म्राक्षा, शव समान भाग लेकर इसमें मालकांगनीका तेल
सवके वानसे शेलवाष्ठ दिस्साकी भावना देकर, भज (बदर) का पिशाव और मुगा काथी और म्राक्षो प्रत्येक रसको एक एक भावना देकर रती प्रमाण गोली वनाम अथर वैरकर रखना। मात्रा ३ मे ६ रदो गायके घोसे यथ क्ल्याणघृत से देना
एक से दे। महिनों तक रोवन करनेसे यह रेग मिटता है।
भूत मैरव लघु—पारद, गंधक, तांत्रमस्म, टोन्हमस्म, शुद्ध हरताल शुद्ध मनशोला अभ्रक मस्म, प्रत्येक दश दश तोला लेकर गौमूत्रमें घोटकर तैयार रखना। और ५ तोला शुद्ध गंधकुटी लेहको कडाईमें हाल धीमी आंच
से पकाना, पिघल जाने पर उसपर लिखे सात द्रव्योंंका मित्रण इसमें डाल देना और हिलाकर वर्पंटोपी वत् गोमयके उपर बिजाए हुये मेलौके पत्ते पर ढककर
वर्पंटोकी तरह तयार कररगा। वार घंटाके पीछे निकालकर घोटकर रखना। मात्रा ४ से ६ रती कल्याणघृत से यथवा गायका घी अगर दूधके साथ देना।
भूतभैरव महा—रससिंदूर, रौप्यमस्म, कुलंञी माक्षिक, टोन्हमस्म, अभ्रक भस्म शिला च द्वोदन शिलाजित प्रत्येक तो १० गधक तो। २, सुवर्ण भस्म तो १, प्रत्येक दश दश तोला लेकर उपमें, असगंध, पुतन'चामु, लशुन, जदामांधी, कुष्ठ
प्रत्येक तो। १० कूट कपड़छान कर सब शाथ उपरर्फे विश्रणके साथ मिला देना। वादमें अरणी, धातावरी मयूरशिखा, तुलसी, गोरखमुड़ी प्रत्येकको एक एक भावना
देकर छ यामे सूखाधर घोटकर रखना, ३ से १२ रती रेगका स्वरुप देखकर दूध, गायके घी अथना कल्याण घृत, म्राक्षो घृत, या उरतनीके घृत के साथ देनेसे
अपस्मार हर रस—भूतभैरवमहा तें। १, वात चिंतारामणि नुफल्त तो। ०।१, सुवैश्वर पपंती तें ०।१, सुवर्ण वस्वंत मालती तो ०।१, सुवर्ण भस्म रफ्क तो।
०।१, रत्न आगेएतर रस तें। ०।१, सब साथ मिलादर ६४ पुडि बनाना। दो वक्त स्ययमप्राश, अभ्रंग घृति अक्लेह आदि के साथ देना। रेगीकी अवस्थाके अनुबार
न्यूनाधिक समय तक सेवन कराना।
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अपस्मारहर चूर्ण--सोंठ, पीपल, कालीमिर्च, चव्य, चित्रक, हरड़, चिरायता, वच, नागरमोथा, अश्वगंधा, घनिया, जीरा, लघुन, तमालपत्र, शहंघ्रेका रोप, मालकांगनी, गजपीपल, बलारोज, अशगंध पोपचीमूल, कुठकी, अतीष देवदार, राल्चना, नागरमोथ । वटामांसी, पुनर्नवा मूल, लोग समभाग लेकेर कूटकर रक्खना । दो माशा यार्त में घो पानोके साथ देना । अपस्मार, फीट, उन्माद, होम्तिरिया दारूसे रहना हुवा भ्रम, चक्कर और मानषिक रोगमें मददारीयमे उत्तम गुणकारी है ।
वाई--मिरगी--फीटके सामान्य उपचार
अपस्मारहर वमन--मैनशिल शुद्ध, रसांजन (रसेन्द्र), कचूतरको चरक चपभाग लेकर सव साथ घेंटकर रक्खना और फीट भ्राइ हो। जब श्रंक्रन करना,
प्रयोग--चलामूल, हल्दी, दारुहल्दी, बच, रसपर्पण, कुठकी, वटामांसी समभाग कूट कर ४ से ६ माशा पानीके साथ देना ।
प्र. २--बाक्की, सुठानी, मेढी पाड़, पुष्टकर मूल, हल्दी कपूरे काचली, निसोथ, समभाग कूट २ से ३ माशा पानीके साथ देना ।
प्र ३--घारिवा, रास्ना, शतावरी, अशगंध, अश्वमेध, पुनर्नंवा, अशपंगंधा समभाग कूटकर रक्खना । २ से ३ माशा पानीके साथ देना ।
प्र ४--बच, नागरमोथी, सुठाकानी, प्रत्येक तेला ५, सोंठ, पोपल, कालीमिर्च, हरड़ प्रत्येक तेला ३॥ ढाक, लघुन तेला ६, मुगळ तेला ९। सब साथ कूटकर रक्खना । ३ से ४ माशा पानीके साथ देना ॥
प्र. ५ करञ्जे वीज, पीपल, मालकांगनी, बच, तुलसी, आम्राहल्दी, कचूर, शतावरी, सिद्देवर (घेसरहदे), शिरीष (घरंसहदे), हल्दी, शरेंी, कुछ जटामांसी समभाग कूट कर, रक्खना । दो से पांच तोला चूर्ण कै पानीमें पोव कर गरम कर द्वारे बदनमें मालीस करना ।
प्र ६ नाकोंके छायामें सुंघायें हुये पत्ते, बच, मिर्च खांहुली, हिरद तोक्षुप, सांबकूट, कालीमिर्च रजना, सहजनेका बीज, सरसों सम भाग लेकर कूट कपड़छान कर रक्खना । दो से तीन माशा पनीके साथ देना, नाकमें सुषानां आंखमें अंजन करना । श्रासमें इश्का धुंवा देना ।
प्र १० पुराने कपड़े एक हाथका लेकर हाथीके पाखा और हृदयके बीच पसीना होता है उससे भिगोना पीने छायामें सुलाकर रक्खना । रोगोंकी फीट आवे
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छल पोंछ छ इँचका उप्प सपदेका टूटक्चा काटकर तीन च र तोल) प'नीमें' भिगो-कर, मथल कर उष पा'नीके चुँद फिट मि'द दे। उसे नाकमेंं धारना । जव नाकषे-ये। जतु यद्दार निकल जामगे । और यात्र भपसमःर सदाके लिये मिट जायगे ।
प्र ८ चमार दूधली के फल तो. १, काली मिर्च तो. १, साथ मिलाकर शोंकर कपडछान कर रखलना । लेभ्य देना ।
प्र ९—द्राक्षाका मद और काली मिर्चं साथ घोटकर गे लो बना|कर रखलना । पानीमेंं घोटकर नाकमेंं चुद डालना ।
प्र १०—गद्घे'का अगाड़ीका चार दांत जलाकर उसकी घुंइं श्वासमेंं ठेनेक्षे मिगी फिट वाय मिटती है ।
प्र ११—अरणीके मूल्की छाल, तो. १ वकरीके दूधमे पीसकर पिलाना है। से १४ दिन तक पिलानेसे रोंग मिटता है ।
प्र. १२—अरीठेके फलसे बीज निकाल कर रहे हुये छीलके, इगुदीके (इंगो'रिश) के फल, लसुदपल, जियापता-पत्र जीवक'के फलषी गोली सव यपान माग ले कर पानीमेंं घोटकर रत्ती प्रमाण गोली बनाना । किट आवे जव प नीमेंं, पीस कर नाकमेंं हालना ।
प्र. १३—लसुद्र फलकेा गद्घेके पित्तावमेंं पीसकर प्रात कालमेंं चुद डालना_ और इसकी घुंइ नाकके वारा श्वासमेंं ठेना । १४ दिन तक यह प्रयोग करनेसे माइका रोंग मिटता हैं ।
प्र. १४—इन्द्रवारणी के फलका रस निकालकर पोंव दशा चुँद नावमेंं डालना और इस फषके अफिमेंं डाल इसका घुमा नाकके द्वारा श्वासमेंं ठेना ।
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वातरक्त-गलकुष्ठ-लेप्रसौ
इस रोगके लोक्रापन्न रगतपोत भी कहलते हैं ।
कारण-हह्रुा वदन अति कटे पदाथों खानेकी आादत, जलचट 'प्राणियोंका मांस खानेका क्यपथ, संयौग विद्द आहार करना, जैसे कि दूध के साथ मछली खानेके, घृत मिगाद्दनेवाले पदाथोंर्के मक्षण से, मलकुन्दि नहीं हेनेशे, उड़े रानवाची भस्रपान खानेके, हाथी येढे पर अधिक स्वारी करनेशे शरीरका रेशाही द्राथ और पांत्रमें नींचाकर इकठा होता है, घन वायुके प्रकापसे विगडकर यद द्रु उत्पन्न होता है । यद द्रु लागू होनेके पीछे घारे वदनमें फेलता है । गरीब और भीखारी टोग जि-के विगडे हुये, व्रडे हुये अन्न्रान खानेकी ज्यादT मिलता है उनके यह रोग ज्यादा हेता है । मांसाहारियोंमें यह रोग अधिक देखा जाता है । विगडा हुवा अथवा वासी अथवा अगडे दिनके मांसहरे मिष करके मिलाया हुवा मांस कइ वसत्त मिलता है ऐसे मांस खानेकी वदत हेाता है । वमनराति आहार करनाेलोका यह रोग बहुत कम होता है । यह रोग चेची अर्यात संकामक है ।
चिह्न - पदिटे पसीना ज्यादा हेाता है अगर पसीना मिलकुल वही होता । स्पष्टज्ञान कम हाने लगता है । सांधा अनायु स्थिर होता है । शरीर जड जेसा बनता है । सूई चूसती हे । वेथा दर्दे होता है । खुजली आती है । जलन हेता है । प्रदेह माठे और वमन उठ आते हैं । सारे वदन पर अथवा विशेष करके उप्पल मुख और अगुलियों पर सुजन और चमडी पर चमक झल्सगाट और कछ लाली लिये रगत हेती है । हाथपैकों अगुलियां टेडी हेाती है । नख बढ कर टेढा हेाता है । जौड चमडीमें नीचा पहता है । चमडी फटती है, पानी निकलता है मास निकलता है, मास गिरता है ।
वायुप्रधान हेा वेठ याल निकलते, संगमें कप हेा, सेई चुभने जेस्री पीडा हेा, सुषन हेा, जारी रक्ष और सूखा हेा, चमडोंका रग कालासा हेा, घोरी मसे और धमनो नसें और अगुलियोंके साधामें खोंच हेा, उटेपदार्थोंमें आसक्ति, उडे पदाथोंके सेवन और स्पष्टोंके पारी छूटे । स्पष्टज्ञान कम होने लगे ।
पित्तप्रधान हेा वेठ जलन ज्यादा हेा, पसीना छूटे, मुंहों तृषा लगे, रोगी पागलषा दीखे, किसी वस्तुका स्पष्टां रहन न हेा, शरीर लालीलीये हेा, समक और पाक हेा ।
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छफप्रधान हेा वेा शरीर टढा हेा और शरीरमें पानी निछले। शरीरके वर्णमें पलक हेा। खुजली आवे, पीडा कम हेा।
वातोया वातरक्-रूधमें हाथ, पाँव, घुटन, जाँघ, पिंडिको अंगुलियाँ, हेअन्ति आदि शून्य हेाते है। मछलोँके भोंगलेको तरह चमडी परसे पपड़ी निकलें, नख काला पड़ जावें, चमडी का दिखाव कुछ हेा। चमडी कुछ लालो लिये हो्कर फटे भोार उसमेंसे पस और खून राते दिन निकलते रहें। अंगुलियॉंकी चमडी; माथ हड्डो आदि में सथा होाकर पीरे धीरे क्षीण हेा, सुख, गाल, नाक, छान आदि अवयवेकी चमडी पर चमक-चलकाट दीसे, और पेठे पारे शरीरमें फुले। पहिले चाठा हेा। उसमेंसे गांठे-प्रणियॉं निकले। वे प्रणियर्यॉं बढो होकर पक कर उधमेंसे पस निछले। नाकको हड्डी सडकर नाक चपटा हेा बैठ जाय, पगको अंगुलियाँ सूज कर व्रणमेंसे पानी निकले और क्षीण होकर गिर पडे। हाथ पाँव रपर्सोंमें ठंडे होवें, बीचमें अघघ्या जलन हेा। चमरॉंको स्वर्शा-ज्ञान न रहें।
वात्य वातरक्-ज्वरपर लिखेे भनुसार प्रथियां रहें। हेाती लेओतिन हाज-पांवधो अंगुलियां और अंगूठे 'एकदम बहिरे-स्पर्शा ज्ञान नहोय हेा जाते है। और कद चहत मछलो के बींगडा जैसे पपडी निळरती हैं। राथपाँव और शरीरका कई भाग निकम्मा हेा जाता है। जूठा पत्ता जाता है। कई वखत शरीर पर फोला निकल फूट कर रूध आानेके 'पीछे वहॉं 'सफेद डाग पड़ता है। इस मागका अभिनसे जलाये और चपपूसें काटे तेा। मो मालम नहीं हेाता।
पथ्याायध्य—रोगीका मकान और विछाना अलग रखना। खाने पीनेका रतोंन कपडा अलग रखना। मोंषका खराब विलकुल बध करना। साघा लधु, और वनस्पतिकां ताजा गरमागरम खराब देना। दारू वधु करना। रफरश्रिका उपचार करना। खुली हवा एकांत रथल, रूच्छ पानी, नहाने घेनेकी सफाई रस्वना। दूधका खराब ज्यादा देना। मांस, मदिरा, सद्द्टे पदाथं गरम मसाला, तेल, लारमिच, फारचाले पदाथं सन्चार, अघिक नमक्जन पदाथं वघ करना व्या मद्दचय' थे रहना।
वातरक्ोतफ रस—पारद, गंधक, लेधभारम, अभ्रकभस्म, शुद्घ हरत ल-अथवा हरताल भस्म, शुद्घ येनश्रील, शिलाजीत, गुरलं वायचिल ग, हरड़, बहिर्सो. आंवलां, चेठ, पीपल, कालीमिरच, समुद्रफेण पुनन्वा, देवदार चिश्रक. दारुहर दी सफेद फूलकी अपवाजिता (सफेद फूलकी गरज) सब समभाग लेधर कू
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कपड़छान कर त्रिकटु और मंगरे के रसकी तीन तीन भावना देदर सुखाकर चोटकर रखन। मावा ४ से ८ रत्तो दिनोंमें दे। या तीन दफे नीमके पचांगके काथ अथवा नीमकी छालके पानीसे देन। दूधका खीरक रसना।
कृष्ण मृगाणक्य रस — हवण माक्षिक भस्म तो। १०, गंधक तो। १०, पारद, तो। १०, सोह भस्म, तो। २०, शुद्ध हरताल तो। १०, रांपली तो। २। मणिक्य विष्ट तौ। ४ सब साथ मिलाकर लोहेको कढ़ाईमें ढाल चूल्हे पर मन्दाग्निसे पचान। और इस्मे मद्दाम बिश्रदि दि कत्राथ तेर। ८० और नीमका पचांग तेर। ८० में पानी रखल १० डालकर २४ घटातक भिगो रखना पीछे उसे कपड़छान कर घोंड़ा थोड़ा पानी बढ़ाइमें डालते रहना और लोहेके तवेपासे हिलाते रहना। जब पानी जल जाव जस्मि बंध करके स्वांगशीत होने देना। पीछे मड़ाइसे निकाल कर घोंटकर रखना। मावा २ से १० तो। तक दिनोंमें थे। या तीन दफे नीमकी छालके पानीके साथ अथवा मद्दाम बिश्रदि कवाथके साथ देन। सब प्रकारके वातरक्त पर अच्छा गुण करता है।
रक्तवातांशो रस—पारद, तो। १०, गंधक तो। २०, ताम्रभस्म, लोथभस्म, अभ्रकभस्म, हरताल म॰म प्रत्येक तो। ६, हरड़, बहेड़ा छांवलां सेंठ, पीपर, कालोमि॰ अतोस, मिलेठाय, नागरमोथा, अह्हो। मुग़ल, चित्रक, दतीमूल, वायविडङ्ग, निसोथ विरायता, निमछवीजको मो'सी, जटामांधी, मयूरीशिखा प्रत्येक तेर। पांच पांच सवके कूट कपड़छान कर मंगरका रस, मिलेठायका रस, नीपके पत्ते तो। रस और रेठा (कपिथ) के पानका रस प्रत्येककी वार चार भ'वना देकर सुखाकर खरल कर रख छेदना। मात्रा ३ से १० रत्ती तक रे॰णका हाल देखकर न्यून'धिक मात्रा दिनोंमें दे। या तीन दफे देना। उवर नीमके टेका साथ ताजा खुराक देना। वातरक्त, गररकुष्ट, उपदंश, खून के विकारके रोग मिटते हैं।
यमुना गुगळ—(भावप्रकाश) मिलेठाय तो। १२ गुगळ तो। ६४, हरहेरैल तो। ६४ 'पुनर्नवा तो। ६४, यहेेड़ाळ तो। ६४, श्वल तो। ६४, सबसाथ कूटकर कवाथ वनाना। चतुर्थांश रहने पर अग्नायोंक कपड़छन कर छान हे। होने पर नीचे लिखे घटक द्रव्योंको दूटकर कपड़छान कर हालना। दंतीमूल, हे'ठ पीपरल वांगे मिच, वायविडङ्ग मिलेठाय यहेड़ा आंवलां डालच नी चित्र?मूल प्रत्येक दे। दे। तेल, निमे॰ष तैल १ एक मावा (८ रत्तीकी।
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ने.ली वनाना । मात्रा ३ से १२ रत्ती तक दे सक्ता स्वरुप और शारी?क स्थिती देखकर देना । वातरक्त, कुष्ठ, व्रवाधेर्, मदामि, दवितरक्त, प्रमेह, आमवात, भगदर, नाडी व्रण, शूलजन इतने रोगोकेा शांत करता है ।
सशिवस्यां निमिं तश्र्वायं अमृतारद्येया हि गगुगुलुः ।
वृिद्ध गुगळ—(ये. त) शृद्ध गुगळ तेला ६४, हरड, वदिहड आंवळी प्रशेये५ तेर। ६४, गिोय दे'। १२८ सयका कराय कर भाषा रहने पर कपडछान कर फिर पकाना । घट्ट होने पर नीचे लिखे द्रव्योका कपडछान चूण ढालकर पकाना । हरड, वदिहड आंवळां परयेक ६—६ तेराला, वायविडङ न २ तेराला, पुनर्नवा ६ तेराला, विशेश, दतीमूल एक एक तेराला मिलेयाय ४ तेराला । घट्ट होंने पर ६ रत्तोकी गोली वनाना । मात्रा ३ से १२ ने.ली पनीमे देना तीनती देपोके पडेपसे हुवा, घारे शरीरमे फेर हुवा, खून मांस गिरता हो देख्रा नीलार शपवा पुखा वातरफ—रंगतपित्त, और कुष्ठके सव रोग मिटते हैँ । इधरके भलावा अलदर खांदी फुलप स्र्जन, वदाररोग पांडु प्रमेह, मदामि मिटते हैँ और सतत सेवन करनेमे रसायन पुण भरता है ।
स्विभमूज नरदेवां' नितररदति कैलोरेक्क कपार ।।
सिद्ध हरताल मरम—सेवनप्त्री हरतालके मैसके मूलेमे कवारपाढ के रखमे, चूण के पानिमे, गरुड़कह फत्त्राथमे, कुष्म'डके रस्मे और निम्बूहे रस्मे । इस प्रकार प्र येकंने थठाररह भठ'रह घटा घोट कर शुद्ध करना । बादमे कुर'मांद रस, डाकटरा रस वेरके मूलक्का रस, अदरकका रस गे.जिहवा (मेंपायरी)का रस, नव्य छीकनोका रस, सुरजमुखोका रस दुपवोका (दुघेलोका रस), मागराका रस, एरंडमूलश रस मच्चाद होका रस, लघुनदा रस प्याजका रस, पीपलका रस, खुरास नो घारक' दूध ताक्का दूध प्रशेकको २१—२१ मान्ना देखर टीकौया वनाकर घुगमे सुखाकर एक कपडमिटो की हुड मिट्रेकी ह दंमे पो'पल (अश्वत्थ) की राखि आंवो हेड़ोमे देवाकर मेरे ऊपर टीकियां रखकर फिर पोपलकी मरभ—राख ह'दी के मुख तक भर देवाकर मुंहपर मिट्टी देखर ६४ प्रहर तक असंड अग्रि देनां । मद पथ्य तीन दिन कमश:, देनां । आगे घीरेसे टीकिया निकाल कर घेर घट कर रखवा । शंकरकी महापूजा कर वेव गाय त्राण्डण देयका पूजन कर भरम सुरक्षित रयना । मात्रा ०॥ से १ रत्तो वाहिद घो से देना ।अनुपान रोगके अनुवार नतानां । पथ्यमें लशुन, नमक, खटाई, तौला चिरचिरा, क्सारवाला पद थ" ओर तैल औषध नचलता हे। जम तक नही खानां ।वपर जिस जिस द्रन्या के रसको मावना देना लिखा है उनमेसे मिसका रस न निकल सके उसका यथायघर मावना देना ।
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२१ दिनमे गलतकुष्ट वातरक्फ. सफेद कुष्ट रक्त के किगाद्रे सब रोग, अपवमारादि पापजन्य रोग, मगदर, नासुर नाडींघ्रण मडाकरण टपद रा फिर रा रोग, श्लीपद, सुर्रन, सुतिका रेग, वाय कास पंनस, व्रणायोर, मद्दार्तिन घेप्रदणे मध्यमेद मेर्खरिद, अण्डंद (कैतव') कंटक्माल और क्षय रेगमे उत्तम गुणकारी है ।
सुपं कुचुक्की योग—स्वप'की दोंचलो पोसकर वारीक करनो ९ माशा मजुर के बीच मे डालकर सिलाना उपर दशमोशा खसुर को पेरों सिलाना । २१ से २८ दिन तक सिलानemे गलतकुष्ट वातरक्त रगरपित, श्वादि मिटते है ।
महावंरिज्यादि स्वाथ्य—(येष्ट त पृ- १८६, ) मज ठ नागरमोय हृदेकी माल, निलेजं, कुष्ठ, घेठ मारंगो, छोटी कटेरी, मूर्व, वच नीमकं मालु हल्दी, दारुहल्दी, हरड़, वचिर्हा, मोचरसां, पटोल कुठको, मेरवेल, विद्ना, वच्न(अंजनवृक्ष), चित्रक, शतावरी, प्राणमाण, पोपल, रुद्राजो, अडूशों, मुगराज, देवदार, पाठा. श्वेरीरछाल, चंदन, निसोथ, वरण, विरायता वावडो, अभ्रताथ, काकड़ासिंगी, मककौन नीम, वर क अतीष, वाय, इन्द्राषण मूल, अन तमूल धारिवा और पपं ट घच समान भाग टेकर चूर्ण कर रखना । एक से दो तोला. चूर्णका स्वाथ्य वन हर दो समय ३ से ८ रत्ती पं पल और ८ से १० रत्ती शुद्ध गुग्गल हारकर पिलाना । १८ प्रकारके कुष्टरोग, वातरफ, मर्दितवान, टपद रा, श्लीपद, सतिकिा रेग, पक्षघात, मेवृरिद, और नेत्ररोगमे उत्तम गुणकारी है ।
शरीर पर गायका घो अथवा वलक्याण धृक मालीस कराना । फिठ खोलकर अथवा जलद्वा (litchi) अथवा शिगदेंसे खून निकलवाना । इस प य द युन वहे यह घ्यान रखना । एर द तैलका सधवा अभचोलीच जूलाव टेना । इस मेगोरे दिनमे सेवन न टेना । मन पर किद्दा वातिके शोक था डुम्रे होने न टेना । परिश्रम नहों कराना । ब्रह्मचर्यं रखना । बहुद तीखा वहुद गरम, चोवन, नम क्ारवाळे पथायं नहिं टेना । एक शार्के पुराने घान्च कौ, मेहूं, चना, मुंग, मसूर, कुथमी, मेथीणा इत्यादि टेना ।
गलतकुष्ट हर मडम—नीमके पत्ते होला य।। सेहागा थेा, ०।।, राल थेा ९, वारीक कर महैन्न कर गादका घो टेो. ३०, मिलाके मलम वनाना ।
प्रयेाग १—नीमके पत्ते महीन पेषकर अंघुलियो पर लोर चोंरां पर पेटोोष को तरद्र बांधना ।
प्रयोग २—नीमकी (Loccust) जड़क टोलो ९ सुचह टोलो ९ सामदेे पानीके साध टेना । १४ से २१ दिनमे गलतकुष्ट वातरक्त मिटता है ।
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प्रयोग ३-नीमश्रोंकी गोरीतल ५ और रसकर रत्तल ४ देकर कुटकर एक कर मिलाकर मिट्टीके दो ढेरोंमें भरना, जो हरे दोऊ घो छोछ आंनिदे रीढ़ (Seasoned) हुए घो इसमें मरकर इसके ऊपर वाजिरा (Bomb) रखकर कपड़मिट्टी करना । सुप्त व घन कर देना । पीछे उसे मटकोमें। एक कुंडेमें रसना और दूवरा कुंडा ऊपर ढकना और देानों कुंडेढीं घधिमें मिट्टी लगा देना । पोछे एक कमर गहुरा खुदकर जमीनमें करके उसमें वह कुंडाका संपूट रस्स ऊपर मिटटी भरना । तीन महीनोंके पीछे निकाल छेओट कर रखना । हेमेशां चर से भाठ मासा सुभह शाम सेवन करना यह औषध ८ मासासे प्रारंभ कर प्रत्येक सरनाद्य घोत जाने पर वारह वारह तोलेकी मात्रा बढ़ाना । एक दिन की मात्रा ॥ तोला देनेसे ॥ तेला सुभह और सांध्य तेला शांपके ४० दीन खिलाना । वातरक्त, रगतपित्त, गलकुष्ट, मिटते है ।
प्रयोग ४-नदीकी छिप (छुच्ची) कूटकर महीनकर आंके दूधमें पांच पांच तोला कि टी'रिया वनांकर पकाना। इस प्रकार आंके दूधमें तीन दफे पकाकर छोट कर रखना । ५ मासां मागे हेमेशां घी या दूधसे देना । ऊपर मिगाई हुई घनेकी दाल देखेसे पदर तेला तक खिलाना । खुराकमें चनेको रोटी और दूध देना । छै मास तक देनेसे रगनपित्त वातरक्त, गलकुष्ट खुनका बिगाड़ आदि मिटता है ।
प्रयोग ५-नीम फत्ते अथवा बकायन नीम (महानीम) के पत्ते १, तेला छेष्टर महीन पीसकर हेममें १ तोला जीराका चूगं डारिकर पिलाना । दिनमें प्राप्तः काल एक वार औषध देना । रोगका समय, शरीरमें रोगका फैलाव आदि देखकर १ से २ महिनेा तक देनेसे खुनका बिगाड़ मिटता है । खुराकमें चना और दूध देना ।
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उपदंश (चांदी, गरमी)
हस्तमैथुनादि खलद तधातुक्षयाद्वानातस्युपसेवनाद्दा ।
चेष्टिनिप्रेशोपच्य भवं'ति शिश्ने प'चेरप्त'रा विविधेरपचारा ॥१॥
कारण—दूषितरेतस्र) कुचेष्टपचे । त भोर दूषितका रेत होनेपचे, दूषि'गके प'चेष्टे प्रकोप्त न दररपचे, वेष्ट्रपि दूषो'के श गमे, अनिद्रिपयपचे शोकेः शुच्यभिगके रोगपचे, अप्रिय, इष्ट'रहित शुचे'न्द्रयके रोग व ली ओर उपदंशादुए रोगमाल' शे'के श गमे, पशु जातिके -मगपचे, वीर्य' और भूलके वैगेकी वेगनेपचे दत्यादि कारणोंपचे इन्द्रिय पर जखम-मण
हो कर दूषित हुये वात पित्त और कफ इन्द्रिय पर शोध सृजन करता है ।
यह रे,ग व से पुष्टपके' और पुष्टपपचे श्लो'षा लागू होता है ।
चिह्न—डप रे,गवालो श्ले'के या पुष्टपके सगके पीड़ें देा चार दिनमे
सुहे'न्द्रपयमे चपं हानेपचे अथवा चेप लगानेपचे प्रा(ममें फुन्सियां होती है । पीड़ें
वे फूट कर वादी पततो है । यंह चांदी प्रा(प इन्द्रियं घुमर के उपर सथवा
चमड़ी टेरर होती है । प्रारंभमे चांदी दोष के दानों जिहा म'लू होते है ।
पीड़ें वह फेलता है ।
वातपित्त प्रधान कठिन उपदंश—गरमीवालो शे'के स'गके पीड़ें c से ४० दिनमे दिखाह देतो दे । शभे'के पदमे हो ऋण होता है । प्रारंभमे
फुन्सो हो; शर क्षत पड़ता है । यंह रे,ग जिदगी भरमे एक दफे होता है ।
प्रारंभमे नीचेढे मापमे कंठिन होता है शौर चादो'को फिरती घार जावी (मोटी)
रक्ती पत्तलो और बहुत चम निकलतो है चादी'के आाशपाशका माग और नीचेचा'
माग यंह कंठिन होतो है । यंह चांदी'को रे,ग ज्यादा समय नहो रहतो
और सरा भी नहीं करता ।
कफपित्तप्रधान उपदंश—पोमे'वालो शे'के स'गके पीड़ें c दिनमे फुन्सो
होती है और जड़ां फुन्सो हो । वद्द माग सड़ते शहते चादो गहरी उतरतो जातो
है । प्रारंभमे चोरा पड़कर श्वेतका रुप पड़ता है । यंह रे,ग जिदगीमे
अनेक घमय होता है व मिटता है । रलथेमे शु(दु होता है । आजुबाजु मे
मागको किनारी सलाई दिखाई है । किनारी कू'ंढो, सपाटी वैठी हुं भोर उस सपाटी
पर निजांव मापका थर जमतो है और उसमेसे गाढा पर (पय) निकलतो
है । आाशपाशका माग और सपाटी'को माग शु(दु होता है । इस प्रकारको
रोग १।। से ३ महिनाके पीड़ें मिटता है ।
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पथ्यापथ्य—प्रभचर्य पालन करमा, परस्त्री भोर भेदका संगसे पर रहमा सदाचारका पालन कम्ना, प्रयेक संग स्वतछ रसना, पवित्रता भोर शुदि रसना । गुरुमे मित्र या शत्री श्रोत्रोश्र सद्वास नहों रसना । पुंस्तारिक पुस्तकें नहिं पढ्ना । दिनेमा नाटक नत्री देखना । जागरण नहिं करना । कपडा हमेशां बदलना । चेपवाले कपडे सावनमे या भीष्मेरो मेा हालना । वाजारकी मोछाइ लाल मिरचँ गरम मसाला, द ध (मधु) इत्यादि छे चत्रा । दसन पिसाबका खुलामा रसना । च वत्र, गेहू चना, मुग, जो, दूूर शाककर शाकमे परवल, करेलाँ पँधी, सुरण, हरी हल्दी, मसाल म नमक जोराँ हल्दी, म'ठा नीप भादि साना, दूध घोँडा खराब रसना ।
उपदं द्व हरिद्रा—प'रट गंधक आंके दूधमेँ शोधा हुवा रसकपूर अकलकरा केशर वायविडग महे'दो ठेग मैनासुद्दी समभाग ठेकर घारोक कर पानीमें पँस रत्तो प्रमान्ज गोलाँ कराना । १ से २ गोली रातवाली पानी या दूधके साथ खाली हो निगल जाना । तर, रथ पीना। प्रारंभ मे १ गो'लो ठेनापीछे प्रतिससाह एक एघ गो ली बहादुर हमेशाी ३ गोली होने पर २१ दिनतक ठेठे रहना । पद्धरेग्म नमक लाल मिरच तैल, रसटे पतार्थे स नहिं । मेधूकी रोटी मायके दूध के साथ साना ।
करतूयाँदि गोळी—आंके दूधमें शोधा हुवा रसकपूर लौ म और-चूरा, हरतूरी और केशर समभाग ठेकर, तांबुलके गानके रसमें मुग जैसी गोळी बनाना । माथा ३ से ४ गोली घोा अथवा दूधमे निगल जाना ।
केशरादि गोळी—केशर, आंके दूधमें शोधा हुवा रसकपूर लौ म और-चदन समभाग ठेकर तांबुलके पत्तके रसमें मुग जैसी गोली वनाना । ३ से ४ गोलीं घो या दूध के साथ घोटी ही निगल जाना ।
उपदं द्व हर मिﬞण—सुधा पर्पटी तो ', पं'मस्म थी', १, सुवणँ वस त मालती-तेा ०॥, हरताल, भस्म वेा, ०॥ किशोर ﬞुगळ तो' ३ आरे,रथ रघंनी तो २ मव साथ मिलाकर पीस कर ४ रत्ती पुढी वनाना । देा वक्त यादद धुन या दूध के-साथ लेनाँ ।
उपदं द्वा कुठार—आंके दूधमें शे धा हुवा रसकपूर वंगभस्म श्वेत रोह्य भस्म-श्वेत, माराक्षक भस्म लाल, पारद और ग घृत ह्री समभाग की हुई दञ्जली रोग-चफेद चंदन, केशर जावँत्रो शोर प्रचाल चद्रपुती रव समभाग ठेकर कूटकर तांबुलके पत्ते के रसमें रत्तो प्रमान्ज गोली वनाना । दिनमे देा मे तीन गोली पानी-मी दूधके साथ रे ष्टी ही निगल जाना ।
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रसरत्नाकर चिकित्सा प्रयोग—शुद्ध पारद ३ तो देर आनीमार, शुद्ध हिंगुल ०.३ भार 'ग्रद्र मोदारसिग ०.१, जायफलो ०.७, बमी मक्तको ०.७ ठेना १ प्रार भमे' हिंगुल के साथ पाराको घोटकर मिला बाय जब दूसरी वस्तु मिला कर ३४ पुढिया बनाना । हेमशो सुवह १ पुढी गुडमे' मिलाकर गो'ली वनाकर खा जाना । उपर नगरवेलख 'पान तान। पर ने चालक भैर रंगहू को थूड़ी बिना नम ह शकर ढाली सिलाना । चांदी निम्फे'टक रसदि पिष्टते हैं ।
हिमचन-ग्र शुद्ध पारद तेा ५ केा लेहहेडीी खरलमें ढालकर उसमें पीमो हडें भखरर थे। १९ ढालकर नीमकी लरहदीके वत्तेे घोटना । पारे विलकुल शफकर के साथ मिलजाय यच भस्मा केंठडोया किया तेा २ मिलाकर दे। तीन तक घोटमर 'गनिसे गोलो रत्तो पच'ण वरना। हमेंशा सुवह और शाम 'टेे वा गोली घो के जीचमें रसकर यथवा शिराके बोंचमें रसरर भथवा घो और शककर के याचनने रसकर निगल जाना। दूध भात गेहूंकी रोटी दाककर घो चावलका सुराक रसना। नवक लाल विरच तेल खारटे पदायं संघ करणा।
एक माथ सेवन करनेस दोने शंथरही रोग मिटता है। तृषा लगे जब गम' पानी पिना। ठंडा पानेका रपपां मी नाही करता। पोनर मी नाही, सुवहमें शोयष था तुषा लगे थेा मीठा दाडिमचत्रा रस था नमका रस पिलान। शेच जाती वक्त गम' पानो 'लेस चोर तुतं पोछ डालना। शरीर पर पतन घूर था भप्नि लगाने न देन दिनके सेना नही। रातंदेर जागरण करना नहिं। व्रह्मचयँ प लना। स्नान करन नदी एक पहिने तक दताइ लेे कर यच करना और एक मह्हीने दे पीछे स्नान करना अपदश चांदी गरमी आादि मिटतत हें ।
लपद्र शडर। मलम—पारद, राल, शेपगुदर, केापरा, ढाली मिरच, कुष्कम, मेधीदाना। प्रत्येक तेा २।। ददइ ठेकर गायका घी शेर ९ देना। पाछड़े पर रा और रालदेा साथ पीष, मिल जाने पर दूसरी वससु अलग अलग पोस्त हूयी मिला देना। लेहहेडी कढाइसे घो'डे गरम कर उसमें घी प्रटय डालकर 'घीमी आचमे हिल'कर पकाते रहता। ठंडा होंने पर मरतनमें भर देना। चांदी परमो के मण पर लगाना। और हमेंशा रीते के पानीसे अपना पक'धा सेहागा मिल'ये पानीसे ठाकर सुवह शाम दे। वमन लगाना। यह मलहम लगाया जाध जल तक चनेकी रेटी भात दूध वगेेे खुराक देना। नमक, लाल मिरच, , सृष्ट पदारथी तेल यच करना।
गुजा मभें तेल—घु घत्ती(गुजावणेआठी) घुंधचँकके डपरेा 'छलका निकाल पानीमें पोव कर वड़ी बनाना। तिलकी तेल थे। ७ में शेाल पकड़ो वट्टीका तलना।
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पकाना। वड़ी लाल मेरी जाव जव निकलना। वड़ी फेंक देना और तेलमेा भोंदी रपद राढे घरेमें जगाना या कपड़े फेर ढकड़े पर छिलक कर मंधना।
लि दुरादि मलम-(रमोलीं), सिंदूर वीरादशण चेदार सिंप, माजुफल, राल, क पींटी, मनशील रस'पस्तकी, कायफल प्रत्येक तो। १, मेम तो। ३, सवखेड़ा य'रीक छोट कर रापक्का घो तो। ३। मेा गरम कर मेाम ढाल 'मलजाने पर दूमरी मम महॅन पोथी हुयीं वस्तुओंका घीमें डाल कर भोटिकर मंथरप चनाना। उपदशा फोड़ा विस्फोटक किःप राग इत्यादिमें लमाना।
तुरथादि वटी:--नील येओा तो। ४, छोटी हरड़ (हिरेज) तो। १४ देनेोकी वारीक पेष कर निम्बू रसक्को देा मारना दे। पीछे निम्बू रस्सेउद्द जेक्री येलो चनाना। एक गेली मुंहमें रल उपर आंधा निम्बू के रसमें १० तोला पानी मिलाकर निगल जाना। इस प्रकार आठसे सोलह दिन तक देनेसे विस्फोटक उपदंशाादि मिटते हैं।
तु'धररातकी वस्ती--नौला येओाथा तो। १०, वधया तो। १०, छोटी हरड़ (हिरेज) तो। १० वल के योज तो। ११। झीलके पत्ते तो। ११। सब साथ मथीनकर छोट कर निम्बू रसमैं १४ दिन तक छोटवे 'रहता! हमेशां ८ मे १० घंटा तक घोंटना और निम्बू रस थारथे रहना। पीछे उद्दद जेधो गे'ली चनाना। एक गेलो मर्दनके साथ खाली हो निगल जाना। ७ से १४ दिन तक विस्फोटक उपदंशा प्रमेह चनासीर मिटते हैं। पहरेप्रमे' तैल, दूध और मुग्ध यध करना।
विस्फोटक हर प्रयोग--गोरखमुंड़ी तो। १, पारद तो। ४ देने। तीन घंटातक पोस कर पानी मिलाकर देनो। हाथके कांडा तक एकसे देा घटा सक मालोश वरना, पीछे देनेो हाथ वगरमे रखवकर सेवन करना फिरना, दूध मातका खुराक रखना। तोंन दिनमें असाध्य विस्फोटक मिटता है।
विस्फोाटकुंरा वस्ती--का वियौ शुद्ध तो। ०१, शुद्ध वच्नाग १८ तोला, शुद्ध दिगुल १८ तोला, वच्चुलक्का मोती तो। ०१ सचवेकी कंटला चौलाई-(कीटावाली तांजलियो)' के रसमैं घोटकर घरे। जेपी गेली वनाना। हमेशां १ गे'ली दूधके साथ निगल जाना। उपदंशा, वातरोग, कुष्ट राग, खुनिक्का वियादि इत्यादिमे' उत्तम है।
स व र्ग घार्दि भुङ्गी--अश्वगध, छोटी करहट्री झाड़ वच्चुलके बीज, सहज ननेके बीज प्रत्येक तोला दश दश और काली मिरच तो। २ सब याथ क्रूटकर रखना। हमेशां १ माशा सुवह गायके घो से खिलाना। विस्फोटक उपदश मिटता है।
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विस्फोटक हर प्रयोग—हिंगुल तैल ०॥७ हरीतकी, इलायची, सोंठ, पीपर, पीपलामूल और काली मिर्च समान भाग ले, इनमें से ०॥१२ अकलकरा तैल घो या दूध साध लेना । दूध मात गेहूँ का चूर्ण रखना । नमक, तैल लान 'मिरच सट्ठा पदाथों' नहीं खाना
विस्फोटक हर पुरी—हिंगुल, हरताल, हरतालवटी, गंगासागरतटी' गोली (कांकसी'१) प्रत्येक पात्र पाँच तोला कूट महीन कर चौद पुदी घनाना । इसे लेना १ पुढ़े निंबू' अम्लि पर छिड़क कर मारे बदनमें घुमा लगे इस प्रकार गुप्ती देना । १४ दिन तक करनेमे फिरंग वाथु विस्फोटक उपद्रश मिटते है । मुख म्ले जाय तो। जीरा तैल ।। और शफकर तैल, कूटकर पानीमें देना और बदसुलथ्री छालदे पानीका कुचला करना ।
उपदंश हर हुक्का—जर्दा याने पीनेकी तमाकू तैल । हिंगुल तैल आंवा और गुड तो १० मिलाकर १४ गोली बनाना । पपड़छे सेनामुखी (मीठीआवत) के क्वाथमें गुड मिलाकर जलाघ देना । पीछे ऊपर नींबू गोली हररमें हालकर तसद्दा घुमा ७ दिन तक पोना । ७ दिनमे उपदंश दि-फैटक मिटे । लाल मिरच सट्ठा पदाथों' तेल नमक नहीं खाना । जरूरत लगे मि. कूमरा ७ दिन तक इस गोलीका घु'वा पिलाना । १४ दिन तक चमेली का दहेंन (दतथावन) करना और तांबुल (पानकही पत्ती) मुखमे रखना । इधरसे मुख नहीं आयेगा । और चादी गरमी विस्फोटक मिट जायगा । यदि ७ दिनमे' आराम न हो तो दूसरे ७ दिनकी गोलीका हुक्का पिलाना ।
उयदंश हर हुक्का—हिंगुल, आंवलखे मुलककी छाल, महेदीकी छाल ॥ येउ आंवा आंवा छाला तम कु तेल १५ गुह तो ५ सवं माय मिलाकर १४ टिक्कड़ी बनाना । हवेमां सुबद घोर श्याम १ हुक्कामे, शाल पोना और घुभांको फूंक नांदं पर लगाते जाना इस प्रकार करनेमे अच्छा होता है । यदि इस प्रयोग से या अन्या प्रयोगसे मुख आये तो उनके'ना पान और गुलाबके फूलहा उबाल कर कुचला करना ।
माया हुवा मुख अच्छां करनेका प्रयोग—यदि पारद या हिंगुल के योगादी दवाइ'इमे मुख आये हो, मुखमे लार या पानी पड़ता हो तो आंवला, बब्बुलघमासा प्रत्येक ते ला तीन तीन, बदसुलथ्री सतर शाल घोर चमेलीके पान प्रत्येक हेट हेठ होगां लेकर कूटकर मलमलकी तीन पोतलो थमामागे बनादां । पोछे एक पोतली तीन से चार लोटा पानीमें उबाल कर दिन भर वसथ पानीमे पोना । इस प्रकार तीन दिन तक पोतलीके पानीको कुचला करनेसे
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बाया हूँ मुत्र अच्छा होता है। पीछे १५ दिन तक दूध भात सिळाना और नमक, खटाई पदायँ। साल मिर्च तेल १५ दिन तक नहीं देना।
प्रयोग—१ मनुष्यको हड्डेको जलाकर हूष्को द्वालषे चारीक पोसकर चोदी विस्फोट पर राथनेसे अच्छा होता है।
प्रयोग—२—हिरल कपूरो भर्तको नीलायोप्या प्रत्येक पाँच पाव तोला लेकर आमलक रसघने। मरतन तो। २० मे मिलाकर लगानेसे विस्फोटक फोडा मिटता है।
प्रयोग ३—हिरल तो। १, मोम तो। २। हिराकसी (कसौघ) तो। ०।१ घृत साथ मिलाकर वसमें घो तो। १० द्वालकर मलय जैसा वनाकर काँसेके बरतनमें ढाल, पानमें ९ दफे घो, कर रख छोड़ना। पीछे मलमलके कपडेके ऊपर लेपेट कर वह टरुडा चोदी विस्फोटक आदि पर लगा देना। इस प्रकार या १४ दिन तक लगानेसे आराम होता है।
प्रयोग ४—अजवाइनको गायके गोबरके रसमें पोम कर लगानेसे चोदी, विस्फोटक, खरजना आदि मिटते हैं।
प्रयोग ४—नसिंहो द्वीप तोला २ गैर हिंगुल सेला -०।१ मिलाकर १४ पुढि या बनाना प्राप्त। और साम्हे शरीर पर घुंवा देना फायदे मिटता है।
५. ६—गुर्द, पारद टांक २।, चित्रकमूल टांक १। चित्रक पत्ते टांक १, कथा टांक ५, तालमवाना टांक २।। हेँगु टांक ३। इँडलईँची दिसिलकाष्ठ टांक ९१, इंगयची छोटी टांक ९। ईश्वरपान टांक १ पुराना गुड टांक ६ पहिले पारदेशाथ एक के पीछे एक दवा द्वाल घोट मिलाना सब दवा मिल जाय जव गुढ मिलाय के लेहेकी दलाईमें सब द्वालकर पानी इतना २ दफे पकाना और निमकी लुकनी मे ढोलाना घटते हो जाय जव गोली ३ रत्तीको वनाना। जुदे दाम दे गोली दूध से देना २१ से ३० दिनमें उपद्रव के फे दवा आदि मिटता है।
प्र.—७ सुगारी माजूफल दाडमकी छाल पेस्से ढाह सब सम भाग मिलाकर हंडो मे डालना हैलमा जेष्टा हा जाय जव गायका घो मिलाकर लगाना।
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श्वेतकुष्ट (सफेद कोढ)
कारण—मद्य कुष्ट पूर्व जन्म के कृत कर्मों का फल है और यह पापजन्य रोग कहा जाता है। यह रोग चेष्टो—सक्नामक तद्रोग है। क्षय आधि ठठना उपद्रवों वातरक्त आदि रोग शंर्गार्श मक चेष्टो है। यह रोग देखनेमे स्वराम होनेभे और तिक्तकाम्लिक औषधियों का परिणाम ने हेमक रोगी बहुत उपानिका अनुष्ठान करता है। इस रोगमे हरी'को वाधा चम्हाके र लपे परिषन त्व हे नेत्रे विराम और कुठ हानि नही है। यह रोग हारी'मे वढ जानसेसे हारे शरीरमे फल जाता है। यह रोगो धूप अविन वह्न नह कर सक्ता। दीर्घकाल तक खाने भोर लगानेव्ा ओषध हढनापूर्व क चलाये रखनेसे यद रोग अवश्य मिटता है।
श्वेत कुष्ठ रस—पारद १॥, हरड़ वह्निा आवल॥, मृ गराज, बावची, चित्रक मिलायें हरताल मॆम ले॔द भम्म चौगुणा भस्म, पीपल, नीमॆ लो को गीरी, अमलतास चकड़ हे व'ज, पढ पुनर्नॆवा, कुठी, गुगळ शिलाजीत, सत सम्हालू माग लेकर नीमके पत्ते हे रसक॥, माजची'फे कत्थायको, अज्न-वि्जयधरके छालको, भांगरेके रसकॆ एक एक म वन्ना होर खेहता कून की कैयल गिरिकर्णीं के प चागको शह मावना दे॔कर घे॥डर रसना मात्र ६ से ८ स्तो वाद॔ वृत या पानॆंसे दे ऊपर काढे तल दे तीन तॆला नित्य कर खाना॥
फिर्वारि रस—बावची तो॥ ८०, ले॔द उसमे मोमूत्र डाल॔कर भिगोना घोर मोमूत्र सूत जाले पर घोर डालना। २१ दिन तक भिगोकर पछे उद॔ बावची ले॔द मस्म त॥। ८ हरड़ त॥ ८ विलाकर घूपमे सुखाना। पख़े उसमे शुद्ध पारद और गंधकॆी समभागसे वनाइ हुई कज,ल॥ ते॥। ४ डाल॔कर सकॆे निंबू रसकी एक, महजनॆके मुखॆ रसकी एक गॆवुल पारदॆ रसकॆ एक और श्वेत फूलकी अर्परािजता के प चाग॔के रसको ९० मावना दे॔कर मूषाक॔र रसना। मात्रा ६ मे १० रती सुख॔द और तामदॆल॥ पानॆों के साथ दे॥। उपर अंजन वुक्ष-वि =यचाग॔के छालका क्वाथ मिलान॥। पथ्यमॆं खट्टी पदाथॆ वेल लाल मिरच और नही खान॥। इस औषधसॆ श्व॓फॆद कुष्टों जगह फोढा निआलॆ तॊ श्वेतापराजिता के प चागको पानी मॆं वीसर लगा न॥।
श्वित्र कालानल तैल—एरंड के बीज तॊ। ४, तु॔लमी बीज तॊ ८, नकस॓रक बोज तॊ। १०, बावची तॊ २०, कचू नाइ, स॓॔हलक बीज, कुठी, चित्रक, अमल॓तास, पुनर्नॆवा (चरौ को कषोथ; वायविडंग, हरताल अरुणाकॆ मूल, मृशा पृथ॓ैक तोला ४ ले॔कर कूट॔कर इसमॆ दो रत्तल तॆल मॆन
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२ रतल दही, १ रतल घकरीका मूल और ४ रतल घरसेला तेल सब डालकर पकाना। पानीका अंश जब जाने तब कपडछान करना। श्वेतकुष्ट पर लगाना।
श्वेतकुष्ट हर लेप—चावची तो. ६, दरताल केपड़े तो. ७, मैनशेल तो. ०॥, चित्रकमूल तो. ०॥, सब साथ कूटकर गौमुखमें पोत कर रस्सी और श्वेतकुष्ट पर लगाना।
श्वेतकुष्ट हरौ सेगठी—दाडिमके फूल तो. ३०, चावची तो. ३० सेर नागरह, तोला १५ घृत आमलासार थे। १०, घृत साध मिलाकर कूटक घेंट शफेद कोयल भपराजिताके रसकों भावना देकर सेगठी बनाना। श्वेतकृष्य पर लगाकर उपर फैलोक पत्ताका पाटा बांधना।
इस सेगठीको पाओमे पीस कर सफेद चावल पर लगाकर हाकप देो तो फैलोका पत्ता उपर रख क्षर पाटा बांधना। दिनमें थेो दफे लगाना।
गंधक कल्क—शुद्ध गंधक, हरड़, बहेड़ा, आंवला, मंागरा, मिलावा, कडवी तुंरौके बीज सब समानभाग ले कर कूट कर अपनराके रसकों और सफेद कुलकी पित्ति कर्णीकों एक एक भावना देकर सूखा कर घोट हर रखना। प्रातः ३ से ६ रत्ती शहदके साथ देना। रेगीकेा दिनभर भूखा रखकर रात्रिकेा भोजन देना। दिनकैा भूल लगे तो द्रव्य देना। खराकमे सुरण, दृष्ष वेंगन, उड़द मुंग, मक और चना यह देना। स्वादे पदार्थ और हरां शाक शंथ हरणा।
प्रयोग १—छोटा उडुद चर (मेढ़ी उंबर)की छाल और बहेड़ा एक एक झोर लेकर व्रणाध करना। वावचीकेई इस क्राथक्षो मार्ना देना। घूपमे सूखाना। पोछे पानीमे पोत कर लगाना। इधसे यदि फोडा उठे तो वह फूट जाने पर 'नम'रग (आवळ) मे पक'या हुंन्रा तेल लगाना।
प्रयोग २—हरताल शेामपत्री तो. ५ और चावची तो. २॰ साथ पीसकर मांगरेके रसकी भावना देकर रखना। पानीके साथ लगाना।
प्रयोग ३—कालो तुलसीके पत्ते, कलौंजोरा समानभाग टेकर कूट कर रखना। काढे तिलके तेलमे मिलाकर लगाना।
प्रयोग ४—लाल गुजा तो. ५ कथा तो. ०॥ पानीमे पोत कर लगाना।
प्रयोग ५—घनामुखी (मींढी आंवळ) की बडके निंबूके रसमें पोतकर लगाना।
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प्रयोग ६—सेनामुखी और चित्रक मूल समभाग टेकर घोंटेके मूडमें पोषकर लगाना ।
प्रयोग ७—जामुनो तै। ४, हरताल तै। १ दाडिमके फूल तै। ४, कडोेजी जीरा तै। ४ पव साथ मिलाकर गोमूत्रमें टिडिया वनाना । पानोमें पोषकर लगाना ।
प्रयोग ८—काले धतकोको कोंचले और नौसाद को लदडो दानोको साथ साथ - जलाकर रखना । पानोमें पीस लगाना ।
निघा रसायन—तै। ८० हल्दीकी घट्टी गोंदे, और सेनपत्री हरताल, तै। २०। महीन पीस कर देनेमे। पत्यरकी खरलमें डालना । वह हवे इतना मूलोके प चोंगा रस डालना सब रस सूख जाय जब दूमरा मूली रस डालना । इस प्रकार ७ मावना देखर छायामे सुखाकर घोंटकर रखना । दिनमें, तीन सर्फे १० मे १२ रती पानी साथ सिनाना ।
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कुष्ट—सूत्रका विगाड
धारण—अपनेो प्रकृतिमेंे अनुयल न हॊ बेैठे तुराच खोट मायु तथा देवादिके दे विष्ठ रा नवान, मधुत चिरनेे मरत्त lहलय, औैर भजीन' करनेेकालते अन्नपान सानेषे, यमनकेे करनेष. मेॉन कराेे सुमंं रा भूप लेनेषे अनिपमित मेाषनके मुआेे आंनकर हतें परित्रम कर र ठहरेो पानो पोनेसे, अजीर्ण पर मेाहन करनेेके नतेो पान्प, या हतें मल्लो, महुत गरार, यहुत न रा, पदाथां सेवन करनेेमें, प्रामान पुफ और देवका अपमान करनेमेंे हत्यादि अनेष कारनेोम रातदिन कफ नितर टेढर रस रूफ पांव, मजहा आादि मात मांतुमोा के दिगर कर विदिम मकारके कुष्ट के रेग पेदा करतें है ।
चिन्ह—कवारकुठ ओदरपर, मटरकुठ, ककुजिन्द पुठरिन्द, विसमकुठ, काकरण कुठ, कीलदा, क्षेय यह आठ महाकुष्ट हैं । चमंकुठ क्रियम वेपादिक, अलक्षक दद्रु, चमंदल, पामा, निरफोणक रक्सा दागष, विच्चिका मद शुद्र कुष्ट है।
वस्यापेय—दससत, जुलाब, वमन, हरेेना मोत्त । ल शने, करनो नह्ह । चावल, मु ग, जांगल मांसरय, परवल, सद जनारूः सोंग, करवे पदाप', गेेु, पुगने घान्प, तुरेईो दाल, शाकद, दामकर, ते गन, करैला, मादि दितकारक हें । वसरत, श्रप, शोेठना, भजीन' हरने वाला, परिटे मेाजन, पानारको मिठाइू लाल मिरच. गरम मसान्ग, यहुत खारा और सटटा भच्चार, भति स्त्रोषंग यह द्रांनदरारक हैं ।
रपाळकुछ—'तला, लाल मिश्रित रगका मिट्टीोसी हांदीके दुकुडे जैसे लाली लिये रंगका, सूखा, रक्ष, शूल पांटावाला हेाता है ।
आदुयरे रकुछ—गूंदारक फळ जन्ना उठा हुया पांड़ा शूल, जलन लाने लिये और खुललो वाला देाता है ।
मदल कुठ—सफेद लाल मिल रगका, जमाहुवा, मुठायम मोटा सुजन वाला, चक्मादार और इसफे साथ दूसरें मी छोटे छोटे चकाकार मदल हेाता हैं ।
लेठप कु्ठ—मखस खणनेसे सफेद लाल चूणों गौषा पदाथों गिरे । यह बहुत खरु छातीमेंे हेाता है । तुंवोेे फूलके रगका हेाता है ।
कारण कुष्ट—चिरौंजो जैसे लाल रगका, तीन पिड़ावाला और बहुत सममके पीछे पक्ता है । यह त्रिदोष जन्य है ।
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१६७.
पुहरक फफठ-सफेद रंगका लाल किनारी वाला, कमलपुष्प जैसा कांली लिये कुछ कथा हेाता है।
अअजिद्ध-लाल कीनारीवाला, स्वरसट चोचमे कालाह पीङावाला, बालूकी जीव के आचारक हेाता है।
पक कुष्ठ-पीङ न हे|, बहुत जगहमे फला हुवा मछलोकी चपदी जैसी हेाता है।
गअचमं-दाथीकी चमदी जैसी स्वरसट रक्स हेाता हे। खुशलो जाती है।
चम चल-लाथी लिये हेता है। मूल निकालता है। फांधे हेते है और स्पष्ट सदन नहीँ हेाता।
विचन्छिका-खुझलोके साथ काठे स्वानवाली फुनि-रया हेती हैं।
चपादिक-त्वचा और मांसके विगाडकर दृथ्य पैर पात्रमे जमे हुये दोषसे फुन्सियां सतपन्न होती है। उसमें खुशलो, जलन चमड़ी का फटना इत्यादि हेाता है। और पैर कथा हेाता है।
पामा-छोटी पड़ी त्वच और खुशलो वाले फुन्सी-पां हाथमे हेाती है।
कच्छु-पामा वढकर असह्य जलनके साथ वहे फेहे रहते हैं।
सर्पेदु-काठे लाल मिश्रित र गके फांधे हेाते हैं। अर्- सूखा भी हेाता है जिसमें पानी नहीं निकलता है।
विस्फोटक-काठे लाल मिश्रित रगके फांधे हेाते हैं। और उसकी चमदी पतली हेाती हैं।
किद्दिभ-सुखे हुये मण जसा स्वरसट काल। खुशली वाला हेाता है।
वलस-खुजलो आती है और लाथो लिये हेाटीं छेातीं सहुनसी होती है।
शातात-पोधकारी वृत्तमा चांदावाला हेात। है। इसमे से लाल सास गिरता है।
इस प्रकार उपर बताये हुये और दुसरे भी रस्न विधार मः हारिरमे फेले हुये कुदरती अनेक प्रकारके हैं। नीचे बताये हुये उपचाः और औषध बहुत काढे सः प्रकारके कुछ रेगमे गुणवारी हेाते हैं।
गंधक रसायन-आंगरे में शुद्ध किया हुया गंधक तो। इलायची, सोठ, पीपल, काली, विभंचि, तेज, तमाल। मिरचकंर, हरड, चहेरड, सांठी
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मंड़ूर भस्म, कुष्ठ, चें पद्मिनी, वचची, पारद गंधककि सघभागसे की हुई शनचो असगंध, शाककर प्रत्येक पांच पांच तोला लेकर कुुट कर मांगरे के रसफि भावना टेकर को महादाईमें रखखर देना। मुख टाने पर मोट दर रसना। मात्रा ३ से १२ रती तक पानी या दूध के साष देना। सब प्रकार क कुष्टके रोग में गुणकारी है।
कुषप्रकुतान्त रस--पारद तेरह तोला, गंधक तोला १६ तोला भरम ताम्र भस्म, अभ्रक भस्म, हरतल शुद्ध यवक्षीर प्रत्येक तोला ४, शिलाजीत, वं हरतत, वं हड़ां आंणला वायविडंग, दारकक खीरी नीमकी मोंरी वचछटहरी के फल मेड़ सोंगी, सुगंठ, शिलाजित, बच, हरदी, अभियाहल्दी, जटामांधी पुननवा मूल प्रत्येक तोला दो। दो लेकर फुट रपपलचान कर उसके छेकी छाल मिफला, मिटैय, पुननवा, भागरा, प्रसैषकी एक एक भावना टेकर घोट कर रखना। मात्रा ३ से १२ रती रोगका स्वरुप देखकर एक गा दे। टफे पानीसे देना। ऊपर असनादि फांट पिलाना। सफेद फे'ढ, मलकुष्ठ रगतपित्त, वादी खून के विाारिके रोग पंचनेभे मगंर, क्रिम सूजन आादि रोगोमें भी गुणकारी है।
असनादि फांट--असन (बिचा अंजनिया) कि छाल, दारककी छाल, रदरती छुप, मजीठ नीमकि छाल, मस्तुर्कि छल शतावरकी सथ समान माग टेकर फुटकर रसना। एक से दो तोला रातको पनददसे वीद्ह तोला पानी में भिगो रखना। प्रात काल में कपछान कर शीशांगें मर देना। कूचा फेक देना। आधा सुबे आधा शाम पीनेसे खून शुद्ध होता है। और कुष्ठ के किसीभी रस रस यन औषध के पीने अनुपान के रुपम पिलाया जाता है।
महामंजिष्ठादि कवााथ--मजीठ, कुषेकी छाल, मिटैय, नागरमोथ, बच, चीठ, हलदी, दारहल्दी, चें टो कटटरोंका मूल नीमकीछाल, पटोल कुटकी चिरायतां मारंगी, चिराक, नामबिट ग, मेरवेल, टेकदार, इन्दजव, भागरा, पीपल, श्रायमाण, पाढा, खेरछाल, शतावरी, हरट रहिदां, आंवळा बकायन नौम, अ कमछाल अ मत्तातस प्रियंगु (गडला) मातविदिन, धमासा, इन्दायन वाचा, सब समान भाग टेकर कूटकर रसना। एकसे दो तोलाका कवाथ या फांट बनाकर पिलाना। सब प्रकट के कुष्ठ के रोगमें लाभ करसा है कवा। इसे कुष्ठ के औषधो के पोछे अनुपान के रसमें मी पिलावा जाता है।
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सर्वकुष्ट हर सिद्रप -आँव्रेरय यवचि'नी चूर्ण' तेर २, अष्टांगृत पर्पटी, त्वचो. १, गंधक रसायन तेर. १, सुवर्ण पाक्षिक लाल तेर. २ किशोर गुगळ तेर. ३, श्वपाप घोटकर ६४ पुढे दनाना । सुवह और श्वाम एक एक पुढी पानी, दूध सदृशे चाय देना ।
पंचन् राक्षस तंत्र-मैनषील, हरताल, कसेरू, गंधक, सेंधानोन, सेंठ, ये कमूल (संधानाथी मूल), पाषाणमेद, कुष्ट पीपल, सफेद वछनाग, इक्षेरमूल, ककुंद बीज, वायविडंग चिर्वक दंतीमूल, चक्रवहके नीमदों छाल प्रत्येक तेर १०, आंवका दूध तेर २०, यवकका दूध तेर २० गोमूत्र रतल पांच, सरसोंका तेल रतल २०, पहिटे सम्ह द्रव्य कूटकर चारद घटा पानी डालकर भिगो। रस्सना १ पोछे दोषरे दिन पकाना । पानीका अंश जल जाय जव कपहछान कर रक्ख लेना । इसकका मालीन करनेसेव् प्रकारके त्वचा रोग मिटते है ।
कुष्टहर लेप-वावची तेर. २०, सेंठ, हरताल, हरह, करंकषे बीज, वरसीं, हलदी, वेधानोन, वायविडंग, नकुचह बीज, नीमफे बीज यच, माल-कांगनी, पारद, गंधक, सहिजनेके बीज प्रत्येक तोला पांच पांच श्वप कूटकर रखना गोमूत्र मध्या पानंके साथ पोसकर सम कुष्टके रोगपर लसाना ।
प्रयोग १—मनुष्यके हृदृशो इमशानके लाटेर पांसकर तेलमें मिलाकर लगानेसे काला दृष्ठ मिलता है ।
प्रयोग २—नीमके बीज्र. याने नीमोलीकी गिरी एष्ठे प्रारंभ कर हमेशां एक नीमोल? बघाते हुये एक दिनको १०० तक खिलाना । पीछे १९, १६ इस तरह उतरते उतरते एक गिरी आ जानेशे बघ करना । सव प्रकारके कुष्ट रोगमें बहुत लाभ होता है ।
प्रयोग ३—रेंदक लोदीका जलाकर गौयक मर्हतवान्में मिलाकर सव कुष्टमें लगाना । साबर सिंग ।
४ सेमरका सिग पानीमें एक नेला तक घोट कर पिलाना एक मास पिलानेसे वातरक्त रगतपीत मिटती है ।
प्रयोग ५—घरमुस्ताका रस तेर. १, उडद बर्की छालका रस तेर. १, ढाकके मूलका रस तेर. १ साम मिलाकर देना । एक मास तक पिलानेसे रगतपोत्त, वातरक्त और दुष्ट गग मिटता है ।
प्रयोग ६—उघांफकी के पचांगभे पीसकर मक्खन जैसा घट रखकर कुष्टउपर बांधना । चोथी व्रायमे रज़ आती है और रगतपीत वातरक्मे फायद होता है ।
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प्रयोग ७ —छेवपुदर, मेलागेर गोपचंदम रस समानभाग लेकर पानीमें पीसकर मलम जमा। घृत वताकर मालकांगनीके पांच सेर तेलमें पांच सेर गौमूत्र ऊपर लिखे तीनों भ्रष्ट डालकर पक न। पानीका अंश जलजाय तब तेल उपरछान कर रख लेन।। यह सन त्वचा रोगमें लगाये जाते हैँ।
प्रयोग ८—पारेकी (कवतर) की त्रिवृट-चूर्ण पीसकर ४ से ६ रत्ती दिनमें दो वक्त पानांसे देना। १५ दिन तक देनेसे कुष्ठका रोग मिटता हैँ। उपर चना, मुग कुलथीकी रोटी खिलानो।
समूल भल्लातक (७ भं कुष्ठ) मोसावा तैला ६० हृदकष्ण कर के घो तैला १२, मे पकानेसे मोसावाका सव रस भोमें आ जायगा। पीठे गिटैय हरी रत्तल ४, मंजोठ रत्तल २ पपड़ रत्तल ९ का क्काथ कर कपड़छान कर उसमें उपर चनाया हुवा भोलाठा का घी, गाय का दूध ६।। रत्तल, गुड़ रत्तल ३०, शह्कर रत्तल १।। मिलाकर पका न।। घृत होनेसे नींचे लिखे हद्योका चूर्ण डाल ६ घडा हिला कर २४ घडे के पीछे छिनाई मिट्टीकी वरणी में भर देना। हाने के द्रव्य-नीली गभं शतिविष गिटैय चांवड़ी चकवड मोग नोंमेंली की गोरी हरड महेडा आवळीं मसोठ चाली मोरच सोंठ पीपल अजवायन सेंधानोन नागर मोथ इलायची वच नागकेशर पांच पांट तमालपत्र वाळा च दरद, गोकष कचू।। रक्तचंदन प्रत्येक तैला पांच पांच ठेकर कूटकर उपर के अवलेढ मे मिलाने का हैँ। हंमेश १ से २ तै'ला खान।। सम प्रकार के कुष्ठ खुनका बिगड मसा ववास र आदि मिटते हैं। यह अश्टेढ चनतां हो जततक पहेरेज रखना। कसरत नदि करनां। सूर्यंका घूप या अंगिके तांप नदि टेनां। खर्रा पदाथों अचार माम दादि नदि खानां। तेल मालिश नदि करनां घीष ग नदि करनां।
स्वायंभुव गुगळ—(स्वयंभु गुगळ) भाव म्र भ.४) घावथी तै। २०, शिलाजीत तैला २०, गुगळ तैलां ४०, माक्षिक भस्म तै।, १२, लोह भस्म तैला ४, गेरखमुर्दी तै। ४ हरड वहिद्रा आवळा कर ज के पत्ते खरकीछाल गिटैय निसोथ दतीमूळ नागरमोथ चांविटा रा हलदी कुठेको छाल नोमकोछाल चिचक अमलतास प्रत्येक चार तैला कूट मिलाय गोळी ६ रत्तोको करना सुवे शौच पेठो ४ पानी साथे देना उपर वन शाके तौ गौमूत्र ५ तैला सुवे - ९ वह्न पेनां। कुष्ठ रगतपित्त वातरक्त दे 'विग्र' कुष्ठ पांढ उदरोग गुल्म आदि मिटते हैं।
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दद्रु-दारद
कारण—बहुत खट्टे बहुत नमकीन बहुत तीले प्रदार्थ खानेको आदत से खून बिगाड़ने बाले आहार विहारसे यह रोग होता है । प्राय मक्की दारू लाल होती है उसमेंसे पानी निकलता है वह पुराना होनेसे कालो और सुर्खी होतो है ।
दद्रुदर शिरिषण—आंव्राय वघ'नी चूगं तोला ३, स्यामत्र पपटी तोला १ किशोर गुगल तो. २, गंधक पिष्टों तोला १, लोह रसायन तोला १ शहद श्याम पीपल ६४ पुदियां बनाना । ३ वक्त पानी या दूधसे देना ।-दार्द पामा कुष्ट त्वचा विकार मे उत्तम गुणकारी है । अभावता गुणल ३ से ३ गोली पानीषे दो वक्त देना ।
दद्रुद्र रसायन—पारद मघक मह्हर भ म पारेमरमोला मष्प ताम्र मरम प्रत्येक एक एक तोला, आंव के दूध मे शोधा हृया रसकपूर तोला ॥ आंवा, हरड्ट वहेड़ा आंवला म.त्री कचूरा पुनन'वा अटामांडी अममोद कलेोजोआरां लोपचीनी अन तमूल च दन रसेात सफेद हलदी कूटक्री प्रत्येक दो दो तोला में साथ कूट कपड़छान करना ।
पहिले म मघक मे रसकपूर घोंट एक कर देन, पीड़े उसमें पारद घोल कर घोटना । घटा तक घोटक' पीड़े मंड़ूर सांबरवीज तांबा डालकर घोटना ।पीछे १५ द्रम्यक्रा चूग' डाल करके नीमकी छालके काथको भावना देकर २ रत्ती थी गोली बनाना । मात्रां २ से ७ गोली पानीषे न मत्रा लेना उपर दूध पीना । सादा सब खुराक लेना पहेरजमे जवमक दवा चलतीं हो लाल मिरच सब पदाथं बजार किं मठाइ द्वाड द्वारकिं चीजे कम खानां ।
कुष्टादि लेप - कुष्ट, मायविडंग, वावची, चकन्र हलदी, लेघानेन सरसों पीपल, पारद, मघक, सब सम भाग लेना पाना गंधकु की कुज्जली बनांकर पीछे दूसरी वस्तु महीनकर मिलाकर रखना । पानीषे या गोमूत्र मे पीसकर लगाना उपर बेली के पतलेका दफ दक कर पाटा बांचना २ वक्त रींठे६ पानीषे या घावुन से साफ करते रहना ।
दरदादि लेप—दिगूल मैनसोल मघक पारद पोपल कचनार वायविडंग व हलदी कालीम'रच हरड सेंठ नागरमोथ समुद्रफेन वावची यमलतां चकन्रद पीपल - सब सम न भाग लेना । पहिले मारद मघक की कुज्जली वनांकर पंछे उसमें दूसरी मदिन की हुड़ वस्तु मिलाकर गोमूत्रेसे यथवा समुद्रके पानीषे घं'सकर लगाना ।
ददुष्ट्र सेगठी—मघक वरखोहरताल नीलायोथ्या छोटो हरड सब समान भाग लेकर पोसकर निबू रससे सेगठी बनाना । पानी या निबू रसमें घ टेकर लगानी ।
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गूगुलादि लेप-गूगुल को फफर गोद गीहागा समभाग टेकर कचूरकञ्चूर निंचूके रसमें मिलाय लगाना ।
पलियादि लेप-एलिया चरकवड़ बोजल गधक ठेकान प्रत्येक दश दश तोला गूगुलफल नग २५ अशोठिया के बीज तेला ३॥ सब साध कूटकर चपड़ छानकर निंचू रसमें घोंट लगाना ।
रत्नादि लेप-सफेद रतन एलिया लोभ गयक प्रत्येक दश दम तेला, वनेकौ दाल तेला २० केा भिगोकर पीसकर उपरके सच महोंन किए हुरे गप्प मिलाकर सूख जाने पर चपड़ छानकर रक्खना निंचू रक्खे या पानीसे घोटकर लगाना ।
दादके साघे प्रयोग
प्र-१ सेनामुखी (मीठोभावल) के मूलवेआ निंचू रसमें घोंटकर लगाना ।
प्र-२ हिंगुलोका निंचू रसमें घोंटकर लगाना ।
प्र-३ ढाकफू बीज निंचू रसमें घोट कर लगाना ।
प्र-४ वांक्ष क टेलाके परते पीसकर लगाना ।
प्र-५ चरकवड़ के बीज युहड़के पत्ते के रसमें ३ दिन भिगो रक्खना पीठे दाद पर गायत्रा गोरख घीककर पतीत हुअा चूर्ण लगाना ।
प्र-६ शाककर और छोटीहरड (हींमजी) समभाग पीसकर निंचू के रसमें घोट लगाना ।
प्र-७ वड़ीहरड़ी के पकेआ हुरे फल छेष्टर पानाल जंत्रसे अर्क निकाळफे लगाना ।
प्र-८ लोवान और नपक निंचू रसमें घोंटकर लगाना ।
प्र-९ वंटकौ ताजा लीचआ दाद पर घोशना ७ दिन तक हमेशा ताजा लादाआ घोशना दाद मिटे ।
प्र-१० गुंजा अफीम ढाकके बीज पपंन्र निंचू रसये लगाना ।
प्र-११ नमर्ददूषली का दूध ७ दिन लगाना ।
प्र-१२ घककळ बोज तेला ९, एलुवा तेला ९, लाख तेला ९. आवला तैल ३ सम साध कूट पाथकी चटनीसाथ पीस लगाना ।
प्र-१३ शेसगुदर सत्त्या शाककर म गधक सेआआगा नवधार नीलाघोथा अफीम सम भाग लेकर निंचू रसमें घोटकर लगाना ।
प्र-१४ एलोआ तेला ने चककड़ बीज तेला ९. महिन पौषकर गलगोटा पीला फुलकाके पानके रसमें घोटकर लगाना ।
प्र-१५ दाद हरी हेआ, खुशबोसेआ पानी निंम्ले उसपर टेआनकफ महोन पूरं रगामा ।
प्र-१६ ग गधक सेआआगा सत्त्या गुगल हावकर समभाग मिलाकर कूटकर निंचू रसये लगाना ।
प्र-१७ मकोम और रतन सम भाग कूटकर गुड के पानीमें मिलान लगाना ।
प्र-१८ हिंगासगोला की गिरी एलोआ समभाग चकर निंचू रसमें घोट लगाना ।
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किटिभ खर्जू खरजवा
पहिचान—हाथ पाँव कानकौं किनारी पत्तक सिः पानेकी तकुबो घुटन कें नोचे का भाग दुरयाति अगे मे हेतात है। किटोसे फून्बोयां हेकर फूट घर पानी
आष निकलता है। दहइँ सुरता हे'ता है। प्रारमे लाष हेरकर स्रजन होता है। पोने चुक्लो माने नाने वह चमडो कठीन सुक्की नालो नेतील हेतो है। यह
रोग २—५—१० या अधिक माल तक रहता है।
सरजू नाशन मिश्रण—योगराज रसायन वेला ९, मृतासञ्जीवन तेरा २, वृंदामनो न. ९ तेर. ९, भागरप यषंनी चूर्ण तेर। २ ठाइह वप्पंटी तेर। ३ श्वव साफ
पोस मेट कर ७। पुढियॉ नानां। ७ यख्खन पानीधे या मडामंजिष्ठादि कषाय से
देना, अथवा श्वव पोसकर धोनी मे मँदेना। पोछे ८ हे १० रते तो कुचे भोर साप
लेना। १—३—५ य मासतक खवन करान। जितना पुराना हो उतनो जियादा समय तक
सेवन कर ता चादिये। खरजुभा दाद पापा विस्फोटक खुन मिटाढ़ आादि मिटता है।
सरजु नाशन तैल—पोस्त, अनन्तमूल के पत्तेका रस, गायके गोवर का रस
प्रथयेक ९ विस पल अथवा मेआ तेर। रतल लेकर टेहेकी कढाइ मे डालकर उसमे काली
मिरच सफेद चिरचुनाग म नशोल नागरमोथ हल्दी दारहल्दी निमेयाथ रसकचंदन देव-
दार सफेद चंदन कचूरा प्रत्येक दे। दे। तोला लेकर कुटकर उपरके कल्क वनाकर
कल्कमे डालकर भोर घरसेका तेल रतल ४ डाल घर मँद्र भांचमे पकाना। पानीक
आँवा जल जाप जव ठंडा होनेपर कपडछान कर रस छोडना। लगानेके सरजुभा-
पामा दाद गजचम त्वचा विशार आदि मे उस्सम फ'यदा करता है।
नीचे लीखे हुये सापे प्रयोग सरजुवा दाद त्वचा विकार भार्दिमे उतम
फायदा करते है।
१ सरजवाहन जलाकर पानीके साथ पीस लगाना उपर पेर डकौ पता। मोचना १
२ नीलाथोमा, फटको ५ह ९ तोला लेकर महीन पिस कर २। तोला
नाय के घी अथवा मकसन मे मिलाय लगाना।
३ शा ळा नामक कीटाराला मूसक जड्वा जनावर होता है जो अपंने
अपने काटाघोर मारता है। इसे भला कर सेरह तेरखे मिला कर लगाना।
४ द घाफुली अँचीपुष्पी का पचों पौध लगना।
५ सुरस काचबो। कुरम जो जमोन पर रहता है उस्की ढालकेी कूडा मे
पेककर जलाकर घो मिलाय मलम वनाकर लगाना चाहे। जितना पूराना सरजख्या
दिनमे मिटता है।
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६ शरीर के या खुजली के चित्र के कटाढ़े मे जलाकर हरड़ं के तेल मे मिलाय लगाने से खाज फोड़ा घुमड़ां मिटने हे ।
७ खाज तो ५, लग्न तो। ११ दिन तो ११ एकत्र कर लेप कर पेटंश श्री तरद खरजुआ पर बांधना। ३ दिन बांधने से खरजवा मिटे ।
८ निम्बू दारुहल्दी गंधक पारा मिलाकर लेप करे लोह मिरच जोंरा मिरचोल खर समान भाग टेरिा पारां गं'चकरी रजमली वनाकर उसमे कूमती चोज एकड़े पीछे एक ढाल घोट कर गाय के घो मे मलम वनाना मरतनश पर लगाना ।
९ मोंड़ां के वोजा भस्मं पाताल ल घमे निकाल कर लगाना ।
१० ढली 'मिरच तोला १०, आमला तो २० देको के साथ जलाकर उसमे टेरिेके वत्तन पर पकाया हुंआ नीलायोधा तोला १० मिलांइ इमे गायका घो मिलादर मलम वनाना खरंजगा पर उत्तम है ।
११ खांड तोला ०॥ नीलायोधा रत्ती ८ साथ मिलाय तैमे के दिनां रोंग लेपेटे वरतन मे ढाल मत्तन ढाल हेमेड़े टेरेटे मदन करनां तरजवा में उत्तम हैं।
१२ कदयी तुथा के योज जलायंर गायकेघो मे मिलाकर मलम वनाकर लगाना खरजवा मिटे ।
१३ आंवला पेठा का दाढा हलदी चोकनी सुशारी प्रत्येक एक एक टांक टेकर सपुट मे जलानां पं छे कसमे काली मिरच टांक ०॥ नीलां योथा टांक ०॥ ढं'पीला टांक १ मत्रीन पीस गायकेघो मे मलम वना कर लगानां खरजवा मिटे ।
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पामा विचार्चिका खुजली चित्रौ आदि त्वचा विकार
शारप चित्र—स्वपनमें सम्पाळ रक्तनेमे यह रोग होता है। पामा बहुत इरके द्वार पांच और अगोचरेष्टे वीचछे भागमे हेाती है। यह चेरो रोग है। खुजलने रहेंनेते जांग पात्र गुह्य भागमे भी फैलती है।
प्रपौदर मलप—चावच्च' असमीयाहलदी गथक रसयेक पांच पांच तोला नीलाथोधा तैल ९१, सव साध महौन पिस धतूरेक फल मे भर उसे दपढ मिट्टी का उपर मिट्टी लगाकर एक खड्डेडेमे रेतों भर उममे रक्ख नेतें न छाणाका अमि देते। स्वोर्गमांत होनेमे महौन कर सगमौक तेलमे घोटकर लगाना पामा सिटे।
रसायदि मलम—पारद गथक जोरां शहाजीरां हलसी दारहलदी मेन्त-सोठ काली मिर्च सिगरू सोंठ चूर्ण सिगरू सम चूर्ण सगायो तेलार पचोइ घोम मेलम बनाकर लगाना पामा मिटे।
अर्कतैल—आकके पके हुए पान कूट कर निकाला हुवा रस शेर ९, हलदी शेर ०१, घरेसोकां तेल शेर ९, घृत साध मिगय लेहेकी कढाईमे डाल पकाना पानी का अंश जल जाय जस ठढा हेनेत कुपड छान कर पामा खुजली खष्पर लगाना।
गथकार्दि मलम—ग थक तैलां ५, नैलाथोधा पटायां हुवा तैलां ५, नद्दानां का घ घून तैलां २५, गेपां च दनकों मिटटी तो २५ सव साध महौन पौष गायकफे मक्खनमे मिलाय मळम वनानां पांमा-खुजली अच्छी होति है। बच्चेकों पामा के लिये यह मलम अच्का है।
१ जोरां तैलां १६ का महीन पं०५ उसमे से दुर मेलां ८, घतूरेकां बोज तो ४, गथक प्रत्येक तो ४ मिलाकर पानी मिलाकर घरेसोकां तेल तैलां ८० मे पकौनां पामा जाय।
२ घेधानोन चकददके बोज सकेद्र सरसों पोपळ सनभाग ले कूट कर रक्खना नित्युक रसमे सथवा सुरदेमे अगर सटूछे छाछमे मिलास लगाना पामा मिटे।
३ मूलीक बोजको वपामार्क के रसमे घोटकर अथवा मेलं के रसमे हमदी को पोस्र लगाना विचर्चिकां पामा जाय।
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४ पार। गंधक हरताल मेनसील चावल बावची होरादकण नीलापोथार राल सिंगरफ करषा ४ पीला नेदार सव सम भाग लेहैर परिले पार। गंधको कज्जलौ कर पोछे हरताल मिलाना पोंछे दूसरी सव वस्तु मिलाना निम्बूरस वा पानीमे लगाना पामा जाय ।
५ निर्गुन्दी चूण॔ हलदी बावची नीमके पत्ते चावलै हेमसाल॔ रेट रखना ०१ से ०२ तोला चूण॔ गौमूत्र के साथ ३ वक्त खानेसे ५ दिनमे पामा मिटे ।
७ धमासा का चूण॔ कर उष्मे' मिश्री समान भाग मिलाय रखना । हमेषा प्रात डाल ॥ तोला पानीके साथ ठेनेसे शरीरको खुजलीं खांजूआ कुष्ठ शीतपित्त-सीलप १४ दिनमे मिटे ।
८ सांगर मृत्त शरीर पर मर्दन करनेसे दाद मिटे ।
९ खैरेकका २ चम्मच कर पीस निकाल उष्मेधो निंबू॔रसमें मिलोकर सुखाना ३ दफे कर पोछे लि बूरषमे से धानोन और काली मिर्च पोस हाल खारेक इवै रखना । हमेषा ४ चम्मच खा जाना । वायु नित्की खुजलीं मिटे
१० अजवायन (अजमा पृ.) कूटकर उष्मे पह घो मिला, गेल। बनाना हमेषा १ तोला खानेसे ५ दिनमे दाद पाँवको खुजली मिटे ।
११ हरड बहेड़ा आवला पार। गचक सिदूर समभाग लेहैर गायके घोर्मे मलम कर लगाना पामा मिटे ।
१२ कच्चा रस गा पीस तामेकी वड़ी थालोमे डाल नि बूरस मिलाय तामेके लोटेसे ६ घँटा घोटना लगानेसे अथवा मूली के पानका रस सरंन करनेसे विच्चिका करेओलिया मिटे ।
१३ चकवडहा मोज, एरंडोके मोजकी गिरी मालकांगनो बावची आवला प्रत्येक तोला १० एलोया तल सरसों॔ से घानोन हलदी दारहलदी नीलाथोथा प्रत्येक तोला ५ सवकेहा कूट मिलाकर दही का पानी रतल १० मे रतल चिनाइ मिट्टीको वरणो मे भर मुल्त प घकर ३ दिन तक घुप मे रखना । पीछे शरीर पर मदंन करनेसे चंदा ग्ण विच्चिका पाँमा दाद खुजलो मिटे ।
१४ केलंके पान सुखाकर उसकेीा जलाकर राख करना उस्सने सम भाग दूतरों 'मजन' पानी मे पोछ लगानेंसे पामा खुजली हवचा मेग मिटे ।
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वण गुमड
ग्रप्य गाढ गुमद चिन्ह - जब किसी मागकी सूजन दाह होकर अथवा पकने है जब उसे गाढ रहते है। किसी समय तीस्म दाह होकर और कमी बिना दाह गाढ़ी सूजन होती है। पकने पर गाढा हरा पीला सफेद रक्त मिश्रित और चसी पतला पप निकलता है। दाह होकर गाढ होना है जब खुलार आता है, तब भागमे पीडा होती है। पका न होने जब तक थडथिन लगती है। पकने लगे जब कूल पडा बढती है। तबमें पक घर पस निकलता है। यद्द सारे शरीर में और कभ! किप एक सथने हाता है।
मूढ वण -(मूढ गुमड) शरीरके किसी एक मागमे सजन हे कर पोराके साध वण निकलना है। कमजोर अथवा पुष्ट मनुष्यो का हाता रहता है। स्व-छता न रखने वाले वचेचे! उदरार हाते है। आाम* मढे फल खानेसे, सद्दटे पथार्य' खानेक थादत म खून 'बिगदनेसे, मधुमेहसे गढ गुमड हुया करतें है। पिछे उस स्थानक चमडो ल!ल हैाकर वुज्त हेत हा उसमे पोहा पूल निकलता है येध है दिनमें पक घर कूटती है। अगर वेठ जाते हैं। पोढा सहते। खुलार आता है। निका नहि आती।
वण चांदा घारा चिन्ह - शरीर पर विण पांठ पाटा गुमड पककर फूटने के पोछे वथत समय तक हजाता नहि है चांदा पडता है। उसे वण कहते है। उसो तरह वरोका हड है अग काटने से मेवानेसे धोशनेसे भी वण हाता है। जिस जगह वण हानेसे वहा सजन होकर पोछे व्रण फटक वहा चांदी पडती है। अथवा पकने के बाद गुमयकर फेढकर पस निकलनेमे नहि आता तो वह वण-पर नाहाऔमे उतर पर नाछो मग उहपन्न परता है।
गंभीर वण-भेदनोगिर - जो वण चांदी बहुत गहरी हद्रे तक पहुचते हो स्रावता नहा हड के सदाता हैं वह ग मोर वण वहा जाता हैं। माठां लबो बारी से रागीके पीठमे वम्सरमे हद्रोधके स्यानमे माटा चादा पडता है। (हिले लाछ चांदा होऔर पोछे वह माग वबकर क्षेण होता है।
पाठां-कारव कल चिन्ह - मधुमेह वालोका, मूताशारके रे गीके!, पुत बिगड वाळोके!, वृद्धो मे समयोअर यह वण होता है। यह एक प्रकारका वडा फेला हुवा गहरा वण-गुमडा है। इसमे पडिलह चमडी काला होऔर मलन होती है। उसके मीचमे कठिन हहडी जैसी चपटी वडी गहरे होती है। वह फेलाथा हुवा हडा हाता है। कामुन रगका दिखता है। कुमी काचमा की पौड
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हैसे उपमा हुता शोध हेता है । वह फूटनेके पीछे छोटे छोटे छिद्र परते हे । वन 'छिद्रों के वारों ओर कफ चमडो मरकर निकल जाती है और वह खदृशा पदता हे । पाढा बहुत करफै पीठ कि करोढ गरम्हन वम्मर मे हेता हे । कमी कुलाके बोस्मे हाथ पांव छाती पेट पर सी हेता हे ।
पृथ्वापथ्य-चव प्रकारके पणोमें वमन कराना जुलाव देना लंचन कराना । आवशयकता लगने पर डकार-भोपरेशन या द्राभ-अमिरप कराना वा श्वारक उपयेओग कर देना । चावल गेहु जव जवारी मुग चना तूरी पंवल सह जंनारींगं छेटी मूली तिलकल या घरोसैका तेल वेंगन घरेलो सूअण पपदी चो घाहरं घूप हितक री है । बहुत तीखा खट्टा अचार आदिका त्याग करना ।
त्रपा फोडने के लिये—हायीदांत हैर चंदन ठंडे तरह घिसकर मन्के उपर एक पट घेरेकि टिदिवा (चांदोले) करना ।
त्रपा फोडने का मलहम—दतीमूल विथरक घूकरहा दूर माकका लूघ मीलार्ची की गिरि काथोस से घधानोत सब समभाग मिलाना । लगानेंमें अगर फुट जाता है ।
चपलें विगार निकालने की पाटीस, त्रण फुटने के पीछे घन विगार निकालने के लिये तेंमके परतेको और बेर चदरी के पत्थे की पोस गमे कर पेटोंस बांधनेसे मव विग'डका खोंचकर बहार निकालती हे । ६ दीन करानेसे त्रणमें का समय पंग ड निकल जाता है ।
चिगाढ निकालनेका लेप—तिल नमक हरदो निसाथ नीमके पत्ते स्व समभाग कूट कर उषमें घी मथ मिलाय गमं कर मोटा पेटीस जेसा लगानेसे त्रणाढ निकाल जाता है ।
त्रण रोपण के लिये—त्रण के अंदर की छाल, पोपल (अस्सार) घी छाल गूलरक छाल पलाश धाप कूट गाढा लेप करनेसे रस्स आती है ।
त्रणा रपणा लेप—पीपलकी छाल नीमकी छाल दंहूलको छाल हरड तुलसो के पत्ते पंवर (ऱहुवक)ने परो घन कूट कर लगानेसे त्रणमे रस्स आती है ।
त्रणा पककर पूरनेका उपाय—सँधिया सेमल नीलायोधा कली चूना सम मान ने प्रत्येक अलग अलग पीस्र पीस्र मिलाय पानीमें सेंगठी मनाकर रसना । पल एका थेपील लगा रसना । मरत हो चल गौमुत्रमें योष हितमें ३ या ३ रंक्ण त्रण पर लगानेसे पक कर फुट जाता है । कु जानेते पीने
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चावलके चावलको पकाकर अच्छी तरह मिलाकर गरमागरम चण पर पेंट्सक्री तरह मोछ पाटा बाधना। एक दिनमें ४ रत्ती चावलका पाटा बांधनेसे तीन चार दिनमें रक्त चना जाता है। गढ़ गुप्त वड़गांठ बांधलायी रसौली मझा मरनी'गर माठ नहीं पकते हुए चण यवादार इतने दरदमें कि जिसको पकड़कर छोड़ दर रज़ा लाकर मिटानेको जरूरत है उस पर यह प्रयोग हरकत।
चण उठा देनेकी पेटींल--अरण्डी देवदार चोंठ भार गो राल्चा छोटी कटेरीके फल मूलठी के मूल चतु सम भाग कूट कर पानी या दूधमें पोच गज' कर पेटींस (डेपरी) को तरह लगाकर पाटा बांधना। ३ या ४ दिनमें चण चैठ जाता है।
चण पकानेकी पेटीस--तिल अलसी कूटकर गेहूंका भाटा तीन समभाग डे कर उसमें नमक १ तोला डालकर दह्होमे मिलाय सां'क पे टींस (डेपरी) रस पाटा बांघना। ५ चे १० दफे बांधनेसे चण पक जाता है।
चणा फोड़नेका लेप--करंज बीज, गूंद अचकक हड़़े मि० मूल मिलाधारी गिरि केनेरका मूल चद्वारकी तरह सब समान भाग टेढ़र कूट पानीमें मिलाय नम कर लेप कर प'टा बांधना चण फूट जाता है।
आगली--पट्टी--मोम राल और घींको साथ मिलाय ममं'दर कपड़ेपर लगा सेना पीछे चण पर वढ़ पट्टी लगानेसे रक्त आमी हैं। यह पट्टा' वातकी पीड़ा शील दे मो शांत करती है।
रेपचण मलहम--राल मोम हीरादलण कपीला मोदर वायफल प्रभयेक आधी' कर 'मलाना पीछे लगमें नवसार ढाल १ मिलाना पीछे ग यके भी'पे मलद्र वमानो। लगानो' चण वात पाटा रक्नात है।
रक्त टनेका मलहम--फेकेद राल शेर १ तिलका तेल शेर ४ को आंमंकर पोस्तो हुड़ राल ढालकर विगल जानेसे टेपमे' मुंरे हुए ठंडे पानीमें डाल देना। मलहम जेघा वन जाता है। वह व्रणम चांदा, अर्बुद आदिसे जले हुये पर शोर पाढ आादि पर लगानेसे रक्त आता है।
नत्यानिदि·मलम--जुई नीम, पटोल प्रत्येके पान, घाटा मुलेठी, हलदी, कुटकी प्रभृत, नीलाथोथा, चित्रक', हरड़ंघी', प्रत्येक दस दस नेला डेढ़ कूटकर मद्दीन करन। गायका धो रतल ४ लेना। घी गरम कर उसमें मोम मिलानो। १० तोले मिलाने पर सब चीज़ें मिलाकर रखलो।
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घंटा तक हिलाने रचना । पीछे चुल्हेम उतार कर ठंडा दे। जब तक हिलावे रहना । मथ प्रकारके मण, चंदा, इत्यादिमे रगना ।
जात्याद तेल—मोखके बिमायके रपर लिखे जात्यादि मणम कव रतल पानोमे ४ रतल घरसैक तेलमे पक नेसे जात्यादि तेल बनता है । मथ प्रकारके वणौपर रगाना कपदेहे दुरदे पर छिरक कर मण पर रस्त धिसे। गृक्षका पत्ता व घष्कर पाटा शोधना । दिनमे दो दफे रीते के पानोम या शहद मे के पानो'पे घोंट कर लगाते रहनेमे अच्छा होता है । वास्तादि मत्तहलका मोह डर तरद उपयोग करणा ।
वृंघ कज्जल—किलटारी (सफेद वच्ननाग) कुठ्ठ गिळोय, [डगिमा, (काला वच्ननाग) फिटक दूर्वीं मजीठ कर जहे घ'ज्र, ढाकफे वीज ढाकके मूळ, अकस्म घ नगारमेाथ, नीलाथे'पा, एलआ, (एलोयेर) हल्दी, ककदाफिंगो, मोनघील, हरताल सेठ, पीपल कालीदिच्चं, प्रत्येक द्र्य चार चार तोला लेक़र गौमूत्रमे' महोनै पीपल कर, गौमूत्र रतल चार ढाल पका'ना । पानीका थथा चल जाय तब ठंडा होने पर कपडछान कर रस् लेनो । जात्यादि तेलकी तरह इसका उपयोग करणा । जण चांदी, पाटा आदि मिटते है ।
वणमार्त्तंड रस—पारद तो ४, ग धक तो ८, लोह मस्म तो २।।, तव् मम, सेठ. प'पल, कालोमिवं प्रत्येक दे। बां तेला, हरड बहिहता भावळी प्रत्येक चार चार तोल। मिलाजित ९ तोला, गुगळ २४ तोला, नागरमोथ, कुठशो, गिळोय, चित्रक वाय वच न इ द्रायण के फल, कुष्ठ, हल्दी, देवदार प्रत्येक चार चार तोल। सघ कूट कपह छान कर नीपके पत्ते र 'सकी जोर भन तमूलके काथको एक एक मावना देरू छायाम सूकाकर घोटकर रखना । ६ से १० रत्ती पानी या मात मो'ह इद सुरण श्रो'ह याहिसाल गुड अथवा त्रिफकारी अवलेहके साथ देना । मण प ठा चा । घुनका विगार गल्गूमह आदि मिटते है ।
व्रणहर मिश्रण—अशथृत वप'टी तो ९, अमृता गुगळ तो ३, सितोपलाद गुगळ तो ९, पुनन'चा गुगळ तो ९ शिलाजित तो ३ सव चास प'पल ६४ पुने बनाना । सुबह ह श्याम प नी या महाम'इष्यादि क्नाथके साथ देना ।
वणरोपण महह्रम—कापूषर्के पानका रस तो. २० घों'सपेसा तो ९, राल तो. ९।। सव मम तो. ३, मोम तो ३, मायका थी तो ३० मे' रोपुस्से पा क, रस शिलाजर पकाना । पानीका थथा जल जाय कव राल भोर नेम ह'ग पर मण ९ नके सांथ सखनोरा भोर सव मम हालकर दिलाना छो'मे रख छे टना । मण चांदी चगरह पर लगाना है
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सिंदूरादि सेवन वर्णकम्—सिंदूर तो २ तो०, चंदन-मसम तो० १, दिग्रल तो० ४, मुंघो हे अहेके छिलके तो ०॥, मोध तो० ४ नामका घो रतल १, घी गरम कर मोम डाल मिल जाने पर दूसरी मद्दीन को हुदृ चन्यु डालकर हिलाते रहना। चादा पाठा जंग गूमडा़ आदि में सेवन वर्णकम्—हरजका तेल तो० ४० गरम कर उसमें गूड़ तो ४ डालना। मिल जाने पर सिंदूर तो १२ शालकर तैयार करना। इन प्रकार के
षण के साथे उपचात
१ अजू़र तो १०, मौर चपदा घे नेला देखो साजुन तो० ४ महीन पीस मिलाकर पोाटीष जैसी बना ड़र घण पर पौंधने से फूट आता है पीठे रापण का रुपचार दरना।
२ मुगरदे॒ा जलादर घें में मिलाकर लगानेचे घण फूट जा'ता है और पीछे चाद दिन तक लगातेह रहते सिगांह निकल हरर हेऊ़ जानो है।
३ हीराबेओळ केा पानी में पीसकर सुबदी जैसे यनाकर लगानेचे घ्रगकी मांडे बैठ जाती है।
४ पारद तो ११, कथा तो २॥, राल तो० १०, मोचरस तो ३॥, स्तव सोंय मरदघटा तक पोप कर एक करला टसमें घी भावश्यकतानुसार मिलाकर फिर बारदघटा तक घोटना। लगानेचे स्तव प्रक'रके घण मिटते हैं।
५ दाहिमाकी छाल, करंजके बीज, आंवला, ठाकरे फूल, पहे़दी सेराखार प्रत्येक तो २॥ कूटकर घोंटकर उसके मेढ़के दूध में पीसकर लगाने से स्तव प्रकार के घण मिटते हैं।
६ वच्युलकी पत्तो पोषकर मल्हम जितना गाढा रखडर घण पर बांधना। माढ गूमाढ पाठा वगेरेह मिटते हैं।
७ करया और गुगल देऩेएँ सममान लेकर पीसकर नीमके पत्तों के पानी में डे़ा। लपियाभरक की सेगठी वना ड़र रखना। पानी में घोंष कर घण वगेरेढ़ डपर लपाना।
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नासुर-नाडीव्रण
चिह्न—ग्रणकी जगह शोध होता है। और वह भद्रके भागमें पक जाने पर भी उसमें फोड़ा होनेसे विद्रधि करनेसे व्रणका पञ्च (पुय)-पक्ह-हा जाने पर नीचे उतर कर मास शिरा स्नायु संधि हड्डी और देराने मम भागके मेर कर छिद्र हर अंद र पहुचता है पाछे। वह छिद्र पेली मलिका (नली) जैसा बनकर वधये थे पड निकरता रहता है।
नाडीव्रण हर मिश्रण १- व्रण मार्त्तड वे। ९, लेईध पर्पटी वे। ३, किसोर गुङ्गल ते। २, वाञ्छनार गुङ्गल.ते। २, हरताल मसम थे। ०॥, गम्भक रसायन ते। १ मत्र साध घोटकर ६४ पुढी यन'ना। दिनमे दे। दफे पानी या महाम जिष्ठादि कषाय के साथ देना। सब प्रकारके व्रण चौंदा, पाटा मिटते हैं।
प्र. १—चंद्रप्रभा गोली ३ पोवकर या चामर पसीसे उतारना उपर तीन गोली केशरादि दूधके साथ खदी ही निगल जाना। पीछे दूध पोना। रातिको श्री रोग्य वाधि गोली ३ से ४ पानीसे देना। यह प्रयोग १४ से २१ दिन तक करनेसे सब प्रकारके व्रण मोंदा वगैरह ह-टते है। मलद्दम ठेल मादि वाधोपचार साथ करना
नाडीव्रण वामन मिश्रण २—सुवर्ण पर्पटी वे। १ सिद्ध हरताल तेर. ०१, चंद्रप्रभा ते। २. येओराज रसायन थे। ३ शिलाजत प्रयोग ते। १ सब याथ मिलांकर ६४ पुढी वनाना। दिनमे दें। दफे पानी दूध या घो के साथ देना। उपर कटकारी अवलेह अवधं च्यवनप्राश जीवन १ से २ तोला खिलाना। सब प्रकारके नाडी व्रण चौंदा भेस्वर खुनका विगाड भार्दि मिटवे है।
नाडी व्रणातभद्र गुङ्गल—पारद तेर। १०, गभक तेर। २०, रोनीकी कुज्जली करना पेठे हरद वहिड़ा आंवला नागरमोथा वायविडङ्ग मिलेओय इलायची वेधदार पापाणमेद मारिवा इन्द्रायण के फल हल्दी दारहल्दी सेंधानोन तिला नींत माक्षिक मसम महोर मगम प्रत्येक तेर। ४, गुङ्गल तेर। ८०, गमका घो तेर। ३० मत्र साध कुटकर पुनर्नवा कत्थामसे तीन तीन रातो की गोली वनाना। मात्रा ३ से ६ गोली दिनमें दे। दफे हलायण घृतमे भयवा पृथक के साथ देना। नाडी व्रण और सब प्रकारके अन्य व्रण १ महिना तक सेवन करनेसे मिटते है। खटते वाक्करके पदाथ' कम्ब करना।
नाडी व्रण हर टेठ—निल्यृंथी के पान, काला ह पराज, केठा(कयिरपथके) करकट गम, रोहो करनेके गमं, कचू, यापावहं, नोकरमोथ, राल, घेठ,
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मेघराग. पाढ़ के फूल, परंड के पत्ते सुवर्णाभ पुष्प, अशोकका द्रुष, रक्त रोहिणी (रोहेड़ा) प्रत्येक दश पल वेल, लेधर कुटकर पानी रत्तल १० में पारद वंटा मिलेो रहना! पृथक इसमें तिलका तेल २० रत्तल रांकर पकाना पानीदा सम! वन जाय वष रणार.१। कफरोगे वत्ति मनाकर हृछ तेल्में भिगो'कर बदर राच्ना। मौर साफ करले रहना। नामुर मग दर आंघन मिटते है। इस लेप्में वार; मौर विदर डाले। दष वष तोलां लेधर घोंटदर तेल्के घाथ मलाना।
नाढ़ी मग हर मलम--चोवार तेल ३, पञ्चर मष सफेद तेल ५, तिल तैल थे ४- में नेम थो ५ और लवृं थे २ रांलकर तराना। मिल जाने पर छोड़ि और ममु मलम, मिलि देना। यह मल्तम नामुरक ऊपर लग'ना जाता है।
मिञ्चुर्ह तेल--मिझु'रोहे प वांम थो देकर फेर कुटदर पानीमें यार घटा मिलोना। पीछे वस्मे' तिलका तेल रक्तक १० पारदीरा मधा ऊल जास अव यर पच ना। इस तेल्स मिलोङ हुर्दे श्ति नाड़ीष्मा में' चाल्न'।
नाढ़ो मकां नालिंकर मगं--एरणी नामक द्रष्षे दृढतर दां'क्में उप मापके! काटकर पाके तपचार को तरत से.वन रे पन कीना।
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भगंदर
मलद्वारको आमपास गढ छाता है । वह कमो अंदरो
और कमो बह न सुकव करता है । पहुत दिनेनो तक अ"र के ब दर हो फिलता
है , गमजोरोसे, चोट और साघात लनेसे वहाँ चोटा पदकर मुख देता है
और उसमेंसे रग निळलतीं है । वचामर शास्त्रमें मं यह नेराप मेवरा है ,
जसमे मल जानेके घाव न हानेके साफ हो सकता नहों और इस कारन रम नहों
भाती । घमी एक जगह मुख न घ होकर बाजु वाजुमे दूसरा मुख हेता है
ध्ययवा वहाँ हो फूटकर रग निळलती है और वह अ दर पदरा जा कर कुन्लाको
स दर रास्ता कर फैलातो है । किसीरो एक मुख सफरामे और टक वहार इस
प्रकार दे मुख देते है । किसीके एक मुख सफरामे हेता है और दिस्के
एक वहार हेता है । इसमे वलो (शालाका) डालनेक माद्यम हेता है । पापमक्रो
यह रोग ज्यादो हेता है । आयुर्वेदमे लिखा हे कि प्रार्च्यन दिसमे
भग दरमे विरेच प्रदारका जत्न हेता है । वह अ दर सदा पे और र टेडेमेहे
माध्यमे रहता है । वातप्रधान भग दरमे लाल केनवाला लाव पे दद
हेता है और एकसे अधिक छिद्र हेता है । पित्त प्रधान भगंदरमे लाल पोला
पखवनमे खुजली गाढा घपफेदाइ लिये जँव बद कम हेता है । जिस भग दरवा
मार देर मेढा (वक) हेता है । वायु म्ल विद्या जतु वादि उसमेसे निकलती
दो वद्द असाध्य है उसपर रसकपम फरानेसे कमो अच्छो हेता है ।
पथ्यापथ्य—पक गय न हो जतक रह रगानेको बेठ भनेक उपाम
रिधरराना उपन विरेचनेसे शोपन कराना । लेप लगाना पकाने पर लशकपमसे
अभिसे-धाम देेे या क्षार डमंसे अच्छा दरना । चातल मुग परवल हद जनेकी
फली हेठी मूली तिल भरसेक वेल हंटालो बूशो घोळेओल घो काद्द हितकारक है ।
बाजारकी मीठड़ खटूटे पदाय मजीर् करनेबालो चोने मेदोई मिठाइ परिधम
क्यरत रहना दोहना चबिने पदाथ द्वनि करता है । हर वसत दस्तकी दवा लेकर
चदर पेट साफ रसना, उपवास हर यदत करमा । खानेकी रगानेकी ववाद्का
दे तभ बेठ जाकर मिटाने के लिये उपचार करमा । केशरादि मोली दे सुने ग्राम
डुध मे कधि निगल जाना । अत्यरता सगळ ३ ने ३ नेोती दे वद देनो इछाव
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लेप वसीमें पिस ममं नग पोलेसकी तरह रग'ना । विरेधन देना और फूटने पर नीचे के रपचार करे॥
स्वर्णं सोलंकी प्रयेर शिरेनेत्री माताका दश इनको यनाकर उसे आंननेे रपचार, मरदर हे दिरने रालना । पदिखे बिना तपायो शुल,इ डालकर भग दर फिसना पदरू हरा। मे लेप बनेर नीर सुधान हे निकल केना। पंछे डसजगह रेउपन मलम अपय दर्शनं केडके हुदरो-यौंन। यनादसे हस भा जाते हैं। मलाइ एक दि दिम सुदाना ह पीछे स्वाम दरव्यरि रोपचचार दरना मरदर मिटता है ।
९७ प्रकार =तंके ये'प का शनिन हरमें सगलरके जयु नल जाते ह और रोप मिटा हेाता है ।
यदररादि न्रिक्पण—हदेदेरी पप'टो तेला ९, असृतरा गूल से'ला २ योगार्क रसादन तेला ९, अश्रक मद्मम तेला ९, प्रवाल च प्रदुयो टेला २, मारि्चव मद नो पूण तेला २, चद्रप्रभा ९० ९ सथ हरीथ पिप्पलर ६ ह पुटी वताना नेर रस्न पत्तो या दुधके पाय देना उपर मदामंलादि कषाय पिलाना
मगंमरादि रस—पारद नेा १० पथक थेा १०, लोह अभ्रक हरदं बहिसा यानलया मागरदेर्या चोपच्चीनी कार्याविस्थ'य चरक कुष्ठ निलेंप चित्रक इल्ददी दारहल्दयों मथानेयं शालिमी च रेठ इलायची नागकेशर प्रत्येक पांच पांच तोला, गूल २. तेला और फुलकृ ९० तेला रस साध कृतकर हरंतो धूर के प चागके रखके एक मावना येष्टर गुह्रा प्रमान गोलो यनाना रथवा चूर्ण रस्ना । मास ४ मे ९७ रत्तो दिनमे २ वस्तु पानिसे देना उपर नीमकी शंतर छालका पानी पिलाना । निसरे छाल दे तीन तोला कवल कर २ रूप पानोमें रातको मिगो
रमनना, प्रातं रपदक्खान हर खोरांमें भर देमा, देने समय पुढीके उपर पिलाना ।
भगंरूादि नल—कनेरचा मूल हलदी दतोमूल सफेद रछनाग योजेरा 'निंूको जर आाकका दूघ छोटा गूलर (मे चंबरी) लजादू (रींड़गमने) मर हरताल गूाळ चित्रक पार्लार्करनी मुन्ताग मि"ोाय पुनर्नंवा हरड बहिद्रा, आवला नीलावेभा, दडकी वटसाह चंदन मूलठी मूल प्रत्येक प्रद्य वचा देना लेेकर कूट कर डषमें पामो रत्तल ९. कष डाल कर रातभर मिगो रखे। प्रातं'काल हष्मे तिलका तेल रतल बीष २० शाकर फिर २८ वटा रखं छोडना पीछे पीतल के रोंग लेपेटे यतंनमे मं'द करनमे पकाना । पामोका शंधा जल जाय जल कपहकान कर रखं देवमा। नित वतंन या टोपमे भी मे तेल पकता हे। डष टोपीके उपर धिनि
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बल कर उठाते रहना इसमें छिपे हुए नीचे पानी का सुद्ध न करने जब पानी जल भा है, तेल मात्र वाकी है सभक्षण। किसी भी तेल या घृत के पत्ते सवय पानी का अद्ध सघ झाक पाया है इसव्ड़ी यह पहिचान है।
सकं दे श्वरी वप्पं सी—पचक तोला २, पारद तोला १, ताम्र भस्म तोला ४, टे' द्र भस्म तो। ४, कों य भस्म तो॥ ४, रौप्य भस्म तो॥ २, स्वर्ण भस्म तो॥ १ सघ साथ पाटकर टेओहेकी टर' ड़ेंगें गायच्हा मो तोला १. डांक चुल्की पर या भगीठी पर चढा कर मदारगनि से पकाना सब पिघल जाय जरे गोवरें पर विच्छाये मेलीकें पत्ते पर जलदी से ढा' कर उपर मेलीक पत। दाब कर डपर गोवर दाब देना। २४ घटा के पीछे निकाल छोट रसना। माला ३ से ४ रती गायरे घोसे या नाक्को घृत या कलपान घृतले या मकसनमे देना। उपर दूध पिलाना। दूधका खुराक उयादा रसना, कुलथी तुं ग चावल गेहु पाहद धृत चन' का शु' द्र देना। वटही पदाथ इमरें रद्दीं स्वांद् टाककर का विश्राम तेल मघ करना। यड़ पप' टी मग' दर नाडो' म खुलका त्रिगड छातो फेफड़ेोका दर्द शिमाग आवो के रोग प्रभनो पदारिन वचासीर वास क्रों बीमे अच्छ। फब देती है।
नघकृ.पिव' गूगल—दुरद मटेहटा भावला छोटी पीपल प्रत्येक पांच पांच तोला गूा ल तोला २५ साथ ह्रूट कर गायका मो तोला ५ मिल! कर मिट्टोय के सरप्मे गोली ३ रतीकी वनाना। ३ से ६ नेओड़ी दिनमे २ यमप पानोमें देना मग' दर नाधीमण मे गुणकारी है।
भग दर शोधन प्रवाष्टो—हरड मटिदा आंवलां वच्वूलड़ो छाल थेरो छाल अमरंगा (आवल) बलामूल ड़े गुपी मूल कायफल माजुकु ल नीमके परठे कु टका मो' घीरी (मक्खन घीतेलहरी)के पत्ते ठोक्को छोलि या मूल सवं समभाग टेढ़र कु टके रसना। १० तोलाकी ३ थे ४ नेटा पानीमें रातभर भिगो। रखना मात काम 'म' कर कपडछान कर रखना। मग दरकी जगह इष पानीसे धो समय घेओकर पोछे परमम तेल भार्द्रि लगाना (भग दर) पर इश्को पोटास मी योधा जाती है। ५ थे १० तोला चूण' मे ५ से १० तोला शफेद बिट्टो मिल! कर पानीमें पोस! कर गपं कर पेटीष की तरह मग दर पर बांचना १५—२० दिनमे भ दरकी रबो—यवके द्दो' बकर ऋतु होता है।
१ लेप—बरं ड़के पत्ते सफेद मिट्टो सेंठ मिटोय पुनर्ग शा मूलँ सघ बार्प कु टकर पानीमें पेष लगाना।
२ लेप—बिलोय (गाजर)की जड़ो मी विटोय के रादये पोसकर कपर्धो
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३ लेप-कुतेकी हड्डी मूनाम(सणबिंदाद-सराटीन) माछेवा खून सम याप पेष कर लगाना ।
४ लेप-चाकल घृंमा तिल हंद नीमके पत्ते हलदी मव कुष्ठ प्रत्येक दश दश तोला लेप्र चोला ३० घंम घाय कूट रपना । ५ मे ३ तोला चूणं पानीमे पीष लगाना ।
५ लेप-पुनर्नवा मूळ चोठ गिटोय परके पत्ते हप माछेको पानंमे पीष गमंकर पोट्टेप को तरद लाघनेपे १४ दिनेमे भगंदर मिटता हैं ।
६ लेप-कुतेकी हड्डी मेहोन पोस पानीमे वा खुती हि मगंदर पर दाष कर पाटा बांध देना २४ घटा बाद घो कर पुनः यह चूणं दावना । हष प्रकार सात दिन करनेपे भगदर मिटता है ।
आदर होघ* लेप-वदंल की घास मे २ रमोथ कुष्ठ (विर्ग-द्रुक) नीलाोयाथा घम माग कूट कर रपना । ६ मे १ तोला या स्वादयकता हो उतना केशर पानीमे पीस ललुम जौका गादा रखकर लगाता । ३ हे ४ वस्तन लगानेमे मंदरका पद-पद विराछ हिच कर बाहर अ जाता है पोछे रोपण मलम या लेप लगाना ।
८ लेप तिल बरके पत्ते चोठ सफेद मंदर मूलठीका मूल पदूमकाष्ठ, परंव शोक समभाग कूटकर पानीषे येपलो कर मगंदर पर लगाकर पाटा बांधना ।
९ भगंदर मलम-नीलायोया माकोमिरच मेनदोळ भारने उपलकी राष राल मंघादर्शी मस्म नीमके बीज परंव के शोक समभाग छेदर कूटकर इधमे तिल का तेल वल कांजीको यालोमे या कांजीके बरतनमे घोंटकर रखना दो वदन लगाना ।
१० भगंदर मलम पकाना हूवा नीमायोया कु पीला पकाद मस्म चोवा का मत्त यवा मिदीको हहंमे घाल कपड़ मिट्टी कर अं तधूंम पकाना पोछे निकाल्ना लायके योमे मलम वनाना लगाना ।
११ भगंदर मलम-खिंदीर मोजूफल पकायो किरकवी शोगारक मालधर मदन कपोळा नाग मस्म पारद कमोमस् कि रालं पकाया नीशघेया यत्र समान केना । पद्धिले पारदंमे सोहंमे सेंटनां मिल जाने पर यशोद नाग नीलायोधा किटकिट एक मीधे पृथ मिलाना पीधे सम गुण मिलोकर मद्दोन कर पायके खो मे मलम वनाना ।
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विद्रधि- अंतरविद्रधि-बहिर्विद्रधि-चेनस्र
चिन्ह ग्रन्थि सुख जिमि नामि पेट पंहुँ पसीना चहुन ग्रम्वादिनों औराधा मूल कछोंप पुढा द्रंय आातो। अगर सथयोंमें पुठयोंमें और भोरतो के यद्ध रेग्रा त्रेतो द्दै। म थोकें सननमें थी त्रेतो है। पंहले उस ग्रथान पर ग्रन्था शाकर रहतो है द्रेसे वेन्वर कहतो है। तलेसे शोना है तप अन्न उतारना मुत्र होतो है। गरमे हो तो पत्थर छोड़े नहि। वसतोमें हो थो मुद्रकोलसे पिसान भातो है। अन्न नलिमें द्रे तो। दिंचकौ (हिक्का-देहशे) अंती है। पेटमें हे तो न'यू प्रकंप अधिक रह। पेटमें ते पंठ और दम्पर श्वसह जाय। प्लींहांपे द्रे तो वावको कफघन हो। हरषमें हे तो मरा करी। शकलच यकृतमें द्रे तो श्वस दमछा प्रकाप हे। वृहेप्रमे हे तो तृषा आधिक लगे। नामिके उपरके अंगेमें विद्रधिको ग्रन्थी पक कर फुटे तो सव मुत्र द्वारा बाहर आवे और नामिके नीचे के अंगेमें फुटे तो श्वदाद्वारा सव निकलै। यदी काव मुत्रा द्वार्त निकलते तो मत्रुथ वचनेंकी शारगा रहे, पर मुत्र द्वारा काव निसटे तो वचनने की शारगा नहि। इधरां मी श्यनको विद्रिधि में पेट फूटे दस्म स'धे हे। यमन हो दिक्का लावे तृपा लगे पेटा हे। शल निकलै श्व'लकी गति हदे तो समास्य लक्षण जानना।
यह रोग विषमरनमें फेला हुभा है। लाछो मनुष्य प्रतिवर्षं इष रोगसे कराल कालके मुवनने प्राप्त होते है। अमेरिक मी'टन हसिदा आदि देशोमें' है। वैद्यों नियें की कोनफरषे मिलती है। लम्ने निवस पढे पार्हे है, उपाय मद्धि मिलता। इस रोग का चोथव हो तो नायुचे दसे मिल सकता है खोलिन इस रोगके लिये सययंंदसरे' साधन करनेका विचार हमारी सरकारने अमीतल मद्धि किया। रेदीयम स्वादि उपचारसे और विशेष प्रकारके शेकमें कभी किसी के वस्थायों येठा लाभ मालुप होता है फिन जंबो कि तैसों दशा हो जाती है। वैद्यों के पास कवचित हि यह रेोगी आता है। जब सव जगहों नराक्ष होता डाकटरेने वचनेंकी शारगा छोड दी है जब अतिम उपचारके लिये वैद्य का शाररण लेता है, तब तो रेोगने घेर लिया हे तो। फिर मी आयुर्वेदीक औषध थे यह रोग मिट भो जाता है। यदि सरकारहों औरसे सव नावइएक श्राघनेसे सज्ज रणमहाल्य (आयुर्वेंदिक अस्पताल) वनायी जाय वद्दा पच्चीस पचास विछानाको व्यवस्था हे; मस्म रक्ख न'घानादि विद्ध श्रोषधे तो उम रेोगके
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किं तु आयुर्वेद एव वर्जित एव तत्र विधिवत्, न हि जिनिर्वाण की नाय थे युगपद् रस कि आयुर्वेद और तत्रैव रमत्व भौनेऽपि| तत्र रसाभ्र पर निरय तिर्यग् वातप्रकोप्यत मंद ह्रे। रसा देहदेहि किं पृथिव्यप वक्तिःफे बदले वनसे अवले॥ कस्याः सदृशं देहने पर भो निस्रंस्र मिलनेऽफे पृष्ठे आयुर्वेदशा मक देना नाहने। तस्य प्रकार हृक् साम्यसीमित तत्र नय पेषित हुदरे॥ आदि अभ्यास मानने जाने वाले रोगोमें अथ अपुने मुख्यता प्राप्त म्रज रहा है। और संपुर्ण सफलता प्राप्त करने के लिये विश्वास है परतु मरकत मणि आाश्रय आधुनिके बिना चिकित्सा हर क्मप। पुजाराउदर पेषण धरनेकी विनासे मिटा हुआ वैद्य ममार्त क्या कर खंे?
वत्रयवत्रय-‘ रसिको माठ कच्ची हो पमटक फुल्लाग देते रहते। पत्तोंगा लनो दस केपसुर रसेर निस्रनयान। पुरमा चावल कुर्धी, मुग धो, चना, मसूर, मठ :नहीं सीत, उरदेस परसक दूधो, सूंण, घी, तिलकूट तेल मामर्का यदरेकी।। सुंटनिके दूध म्रादि गुणमरी है।
सत्नेंभर पुट'-रमग्निदू घनक, मार्शिक माक म हिगुल अअ्रममद्ध हरनाम शुद्ध, मंर्कसल रद के ल' चुरमा शुद रमंत (रसवन्त) सफेद सुरमा, मोतियागा रत्नावर (राजास्ते शुद्ध) हतले हि मरस्म, फरवीरी रसम, शुद्ध मोतिय, कार्ष ममप, रपंर शुदा दंव ममम होही ममम, शुक्ति मम मम. रसण रौप्य, ताम्र, केष्ठ, नाग, मंप. व्रसाद प्रत्येकको ममम यह प्रत्येक म्रष्य एक एक तेलर देना। हींगकी मदद और म्रकल देती लाने पीला रहन चहुर्, गेमेंद, नीम्रद पुनरार्त प्रत्येक को पृथक एक एक वाल तेला , शुद्ध पारद तेला ११२ और शुद्ध गंधक तेला ९२ छे.र पारद रा घनकफो कुजलटी करना। वड दैरे पाइवा घो तेला २० डाल तस्मे कुजलटी बाल म्रदिने पकाना, पिनने खाने पर रसमम टपर लिस्स ममम आदि हालम्र त्रिलाना थौर सफेद बहनामा तेला २१ पींवंर था हहा। वह हसकर दिखाई देगमतपर विद्धये फेंकौके प-ते पर जेइधर उपर हेजीका पता और गे मय सामग्र २४ घटा के शौमे निकाल बोतलर रस्मना। रस मेरैतका पूजन कर बोतलमे म्र दे। म्राथा २ रसौ प्राप्त ३ रसौ वामफे कामी किरच रती-२, अदारकका रस छोटी नस्पच और शहद छोटी चम्मच म्र.मिल्र थिन्त्रान्। मराका स्थाप देखकर दिनम्ररमे १२ से २० रसौ तक म्रपा -म्रप देयं उ म्रावी है।
१ मास सेक्रम करनेसे आाहरी मा ल दार्शी दिन्रत्रि मेधार बंधरत अ्रमर नं म्रिटता है। रोगका क्वचप दे देते हुए.३—४—६ या १३ मासम्रतक्चुर चहा हु विद्रधि फेएदर हाट्रा अथ पांच से म्रहणी गुरुम्रतंतततत्
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मीआढ' प्रमेय येःमराम प्रदर म द्रविन्त उदासतं-गेष चढना पुष्टिरोग इन रेासमें मो कायदा हेत। है और वैर्य रख आरहयत्तानुसार हेवन करते रद्देनेए रेापका वमन हेता। है ।
विद्रघी हर विषणा न. ९—सिद्ध हरताल तौ। ०, स्वर्णंभरम तौ। ०१, अभ्रक मरम तौ। ०॥, मुका पिष्टि तौ। ०॥ अपतता गुगळ तौ। २, होर? रसम रतौ। २, स्वर्णं पपटी तौ। ३॥, सर्वे'्वर पपंटी तौ। ५ सेङ्ग साथीं घोटकर ८ पुढो वनाना । द्रिनमें ३ समय हल्याण घृतसे देना उपर विद्रघी नाशान कत्याभ पिलाना ।
विद्रघी हर मिश्रा नं २ सर्वे'्वर पपंटो तेउ। ९, स्वर्णं वमत मालती तौ। ०॥ रत्न भागेसार रच तौ। ०॥ तां'स मसम तौ। ०३ मंमरघींग मरम तौ। ९, क्रिॐोर गुगळ ते। २ घय साबर घोट ६४ पुढ' द्रानाना द्रिनमे ३ समय शहद घृत दूध या पानीसे देना । उपर विद्रधी नाशान क्न'थ पिलाना ।
विद्रघी हरी वटी (fतंसar हिल्स' रौषध मसम तौ। ४, अभ्रक मसम तौ। ४, पूरं'थ च्रोदय तौ। ५, हरेर्णभरम तौ। ९, प्रवाल पाonिरय नीलप गोमेद वििद्रघ? वैद्यात प्रयेककरी पिप्पलो तीन तीन तोला, ग!ररमुड़ी। चोपचंनी हरती सेाठ प'पल हलद्री वचुरा प्रयेककरी पिप्पलो तीन तीन तोला अष्टवर्ग आाठो मिonकर ९६ तोला स्वकेलो मद'न दूध तर पानीसे या वाददसे मुंग प्रमाण गोली वनाना । मार भमे दिनमे दो या तिन समय दिया देओ । गोली पानोसे देना उपर हल्याण घृत ३ से २ तोला गेलोें उपर खिलाना अथवा च्यवनप्राश ९ से २ ते ला खिलानो रोगका स्वरुप देखकर और कितने समयका पुराना है !कस अवयव में फेंग है ये जान कर इस गोली क साथ स्वे'्वर पप टी स्वर्णो पप टौ रत्न मामेचार रस तम्र मसम आादि मी ९ से २ रतो देना ।
विद्रधानाशन फथ्य—हुरदतो रस, लिoकोल्फ सेंधा अजन वृक्ष, नीम रतजुं, रद पं.पल वृक्ष (शिरीष (सरसद) गौलसेरी प्रयेक वृक्षको छाल रान्ना पुरजना गेररमुड़ी, भसगं भरुद घय यमान भाग ठेठर कूटदर रखना । फोट या व्रणय कर अकेरा? रा किप्र औषधवके स्राथ पिलाना ।
रज्ज रसायन—हीरा मरम ३० रत्तो, स्वर्णंमषष तौ। ९, गेोेप्यमहम, तौ। ० पारद तौ। ३, गंधक तौ। ४ अभ्रक मरम तौ। ५ मादक मरम तौ। ६ वैद्यात ममष तौ। ३, मधवगं आाठो मिonकर तौला ३२ रत्न - य मिonकर मुंग जेसो गो ? पानोसे करवा । द्रिनमें ३ या तीन रफे २ से ३ रत्तो हर हसमय देनो
उपर क्नाथ पिलाना।
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प्रकिण्ड उपाय
१ उड़द गुनगुन वा कफ मूल वायवरल वा मूल एक एक तेला पानिमे पीलाना ।
२ चटामाका मूल तेला एकतेल पीव उसमें से घानेकी रत्ती ३ और हिंग रत्ती १ पीलाना ।
मदिरादि कवाथ—हो-हो छाल हड़द बहेड़ा आंवला नीमकी छाल मूलों ठंढा मूल हरड़वी छाल, मजन कुचला छाल टेटाल निसोथ अंकोल छाल सब माथन नेदर कुटकर रखना । ३ से ७ तेलाका क्नाथ या फेंट कर पिलाना ।
विद्रधि हर लेप—एलवा (एलोय) सरसों मोचराड़ तिल घननीखार हल्दी सेठ कुठ युक्तरमूल प्रत्येक तेला ।। हेलत कपहेड़ घोनेकी देशी साबून तेला ४, परच नेल वेलाला ४ सप वूटकर रहना भदर के निचे धरामें देनेभर हो टसके काढा मगमें यत्न टेप नौमुंहरे या हेलाके स्तन के पासोमे पेध कर करना वपर हेल्का पत्ता लत्ता हर पाटा पावना ।
विद्रधि हर धूप—गुगळ तेला १००, प्रष्ट चोना २०, धजुन पेपल वर विरोला कफुन मरपेक को छाल हद्दर रसा तेला, पीड़ीमें पोनेकी देशी जर्दा तेला ।। मोमका घो वेह १०, धप माथ कुटकर पानीमें पीसकर एक एक हेलर को टकस्मा करना । हुवके मे या चिलममे घुर F.नमे ३-४ रफे पिलाना, वा निसोथ अर्जुन पर रस्ख नलीके द्वारा श्वास में दुप पिना कैंसर मे लाभ होता है ।
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गंडमाला गलगंड कंठमाल
चिन्ह— प्रारंभ में इडपच्ची और कामले पीछे के भागमें छाती छे'टी प्रथ्मी होकर वढती है, कमों बेठ जाती है। फिर कुछ दिनों या महीनों के बाद फिर उभर आती है। यह रोग कइयोंके जिदगीभर रहता है। रोगी कमजोर निस्तेज हो जाता है। आखिर से पानी मिलता है, हेठले चीर पडता है। तलकके मसूडे़ मृदु हेतेँ हैं भुव कम नाडीीकी गति तेज, भारी, तपा हृदय इत्यादि चिन्ह रहतेँ हैं। किसीका पढ घर फुरती है। पढे पेठ मे इसे क्षय के पूर्व चिन्ह कहते हैं लेकिन वस्तुत यह बात ठीक नही है। उपचार करठे रहनेसे मिटता हे उम्हता है ओर तीसँ पथय तक औषध सेवन करते हेनैस अच्छाँ हो जाताँ है। यह रोग कइँभोकेा जिंदगी तर रहता है।
पथ्याद्रव्य— चावल जौ मुग चना कुलथी मेहू उडद आदि घ न्म कठोल एक तप' पुराना खना! परवल केराेशी फुलावर सह', नेकी फली कटेरl वेंगन करेला वाटेआल दूधो सण घी दूध सारकर आदि ख ना। मो'साहारी डे'प मयूर मेरढे़ छँदहकर ज गली पक्षीो का मांस या मात्स्य्य खे सकते हैं। यद्यपि दसैला रस गायका दूध गुणवारी है। जठराग्नि दीपन करनेवाले चीजेँ साना आहार विदार नियमित रसना 'दस्त पिशाच साफ रहेै यह धवान रसना। वाजारकf मिठार्ई बाजारकf खराब धो पकानेवाला तेल नहि स्तानl। एतदस्साहमे ३ दिन मद्याद्र पालन करनाl। दारl'पर या प्रणशीर तिलके तेलमे हल्दी मिलाय मर्ातन करानाl। परिश्रम कश्रत नँह करनाl, मापण धम करनाl। गमी मे न्हसे स्थान करनाl
कांखनार गूगल—अचनारकी छाल तेला ४०, त्रिफला तीनोंी मिष्रक्त तेला २४ वगनाकी छाल तेल। ४०, चेठ पीपल काली मिरच प्रत्येक चार चार तोला, तम इलायची तमालपत्र प्रत्येक एक एक तोला सब महे न कूटकf शुद गूगल तोा १०० सब साथ मिलाके गोरखमुंडीके कनायमे घोंट घोला २० मिलाके रँस्तोकी गोली बनानाl। मात्रा ३ से १२ गोली तक दिनमेरे दी जा, मक्ती है। पानी ग्रा दुस्से देनाl। पाकाय होेमl गोरखमुचोकl वसाथ या कांट उपर प लानाl। भाषा तोला गोरसमुचोके कूट कर २ कप पनीोमे रातकेा भिगो रसना प्रात*। कुछ गामकर कषप छान कर 'दनमl २ रकत इस गोली पर या अन्य औषध्रपर पिलानाl। यद कांखनार गूगुल = उपाल रसैालो शबुंद प्रभ्मी गुनl कष म्यो कर अपति रुपधयेने नतप पानकरताँ हैl
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गण्डमाला कुष्ठ रस—पारद तेला २, गंधक तेल ४, ताम्र भस्म तो १, त्रिकटु तीनों मिलाकर तो १, पुनर्नवा तेल २, स्वप्नगंधा तो ३, गोरखमुंडी तेल ३, कचनारकी छाल तो १२, गूगल तो १२, हरड़ तो ४, दरताळ भस्म तो ९, लोह भस्म ते २, से घानेलान तैल ९ सघ घाथ मिलाकर कंचनारकों छालके साथमे भावना देकर रसाथ प्रमाण तेलों वटाकर या घोटकर खाना । ३ से ४ रत्ते सुवे और शामकोई पत्तों दूध या घृतमे देना । उपर महामजिष्ठादि कषाय या गोरख मुंडी दशाथ पिलना । कठमाल प्रन्थी आदिमें उत्तम गुणकारी है।
गण्डमाला हर मिथ्रण—ताम्र पपंड़ी तेल ९, अभ्रक गूगल तो ९, चेङ्गराज रसायन तोला ९ चित्र रसायन म्ररुप तो ०॥, घंचनार गूगल तो २, मद्दालक्ष्मी विलास तो ९ वघ वाथ पीस ३ से ४ रत्तों दिनमें दे। समय शहद मक्खन दूर या पानीमें देना ।
कठ लेड़ेधर— पारद, तेल ४, गंधक तेल ८, ताम्रभस्म, लेह भस्म, माकिस भस्म, शंख भस्म हरड़ वहिड़ा आंवला सेठ प|पल कलीमिरच अतीष पुन्ननवा घपंघा। कुटांमांसी शिलाजित चि'द्रक्मूल, धरना कुष्ठी जलपिप्पली (रतवेलीये) छोटी कटेरी मूल निमको ढाल मिलाय देवदार गोरखसुंड़ी प्रत्येक दे दे तेला, गूगल ९० तेला, शमथ साथ कूट मिलाय नेमफे पतते कचनार प्रमाण तेलो वनाना । मात्रा ३ से ६ रत्तो दिनमे दे। या तीन दफे पानी या दूध से देना । गलगंड कुठमाल प्रन्थी अचूंद विद्राधि अंत्रिद्रधि कुष्ट भादेमे उत्तम गुणकारी हैं ।
गलगंड हर तेल—गुंजासूर मुजाप न चदन गिळेधर नंमफे पतते हरस-रान देवदार पुनर्नवा मूल हरड़ कुष्ठ भांगरा प्रत्येक दश दश तोला, कचनार की छाल ३० तोला, गोरख मुहुंडो ९० तोला शमथ साथ कूट पानीमें तेलमर भिमोरसनां । प्राप्त काल इसमे सरसोंका तेल रत्तल ९० ढाल कर पड़ा नां । पानीका भाथा जल जाय जद ठंडा होने पर कपड़ छान देना । इश्र तेलको हुंद नाकमें ढालना, रेगपर मालिश करना । कपड़े के हुकड़े फेर तेलमे मिगोइर म्रथ यो पर रख उपर किप्रो य्रक्ष का पतता शहद नाम पाटा मोंध रखना ।
गलगंड हर लेप—विकृत (टिकळे) छाल महानीको छाल शफेद बछनाम कचनार छाल भरगी मूल मिलेधककः कद भ म्लतास चिरोंजी (गुजा) देधरकी फांटका रसमें शमथ समय भेधर कूट कर रखना । पानीमें पीस गानंकर रगाय रूपर पान वंध पाटा बांवनां ।
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मलाग्र हर क्वाथ—दशमूल अपराजिता (गरुडी) कचनार वरमा हंड़्रायण मूल गिळोय हरड़ देवदार वृझरंघ सारिवा दर्भमूल पुननंवा मुळ शोंठ पोपल माली मिचं वायविडंगा रास्ना पुष्करमूल तिळपणी (तलवणो) गोरखमुंडी सव समान भाग लेकर कूट कर रखना । १ से ३ तोळाका क्वाथ कर या फांट वनाकर पिलाना । किसी औषध के अनुसार द्रवपे या पकैल ग्रंधी आदिमे पिलना ।
देवद्र्य लेप या दशांश लेप पानीमे पीस गुन' कर लगाना । महानारायण तेल मालोष करना ।
सामान्य उपाय
१ वृझदं डोका मूल पकते हुए चादल के पानीठे पीस लगानेसे कंठ मालफी माटे पक गहु हरो वह सुञ्ज कर रहि जाता है ।
२ गोरखमुंडी (वांदेयो कलार) का मूल कूट पीसकर लगाना, पिलाना
३ झमालगोटा के पान का पीसकर उसके रघषे शेठो वनाकर छाया मे सुखा कर रखवा पानी मे पीस लगाना ।
सभ्यखुरादि मलम—खोडा का नख हिणका छोग और चमड़ा संदधू म जलाकर तेला १६ डेनो उछमे बैरजो थे. ११, राल पशाया नीलाथेआया किटकरी प्रत्येक एक एक तोला घृत श्वाध घोंट हर पुराने घोमे मिलाय तामे के वर्त्तन मे ढाल दामेके छोटेसे ६ घंटा मदंन कर रख छेडना यह मलम लगानेसे कंठमाल आदिशी ग्रंधोयो मिटतीं है ।
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वृमीक राकी
सिन्धु—यह रोग प्राय पाँवकें नीचेके भागमे होता है। कभी हाथ कंठ खंभा काख साधा और गटेमे भी होता है। प्रारम्भमे पाँवके रकुभोेमे, फणामे या हडेमे या सन्धि सथानमे प्रन्यो—गाँठ हौदर पककर चिन्द्र पद पडने साथ काला या सफेदी लिये मुखरा या लाल दानेदार राई जैसी पदार्थ निकलता है। खेतोंमे नंगे पाँव धाम करने वालोंको पावमें क्षत या घाव जैसा चाँदा होतां उसमें इस रोगके जंतु दाखल होनेंसे यह रोग होता है। समय वीतने पर उसमें स्रावक चिन्द्र पडते है सूजन बढती है और सम चिद्रोंसे पस-पाँकके साथ विद्टी 'जिसा पदाथ' (रदेरा) निकलता है। बहुत चिन्द्र पडे हो मोंदा घाव पडे हो पाँव या हाथ के उपरके भाग मे हुंवा हो और उसमें बहुतसे 'चिन्द्र पडे हो शोप हे| वद्र म्रस्राष्प है।
उपचार—रोगवाली जगह चोर कर विगडा हुवा मांस निकाल वण शोधन कसाय आरिफमे गूगुलके पानीमे घोकर वण शोधन करना औरइस पारिठ के पानीमे घोलकर उस भागमे दवाकर रखपर ढाकढा पत्ता दाख पाटा याँवना। उघ भागमे क्षार कर्पोसे सथना मरिनसे वह भाग जलाया मो जाता है। पीडे रोपण करनका उपचार करना। हाथ घाव रोगमें लिल्ली रक शोषक दवाओँका सेवन करना। यदि रोग ज्यादा बढ गया होतां पाँवकां कटना पडता है।
वृमीकहर मिश्रण—तैलमर्पटी टहेला १, हरताल मद्धम तो। १, कोचिनार गूगल ठो। १ सथ वाय घोंट ६४ पुडिया बनाना। दिनमें २ समय मर्दा- प जिष्ठादि कराथसे देना।
वृमीकहर तेल—मैनसिल हरताल पारा गंधक मिलाकर इधरयची अथार सफेद चंदन अमेलो के पान सवकें गौमूत्रमे पोस उसमें निमोेलेका तेल पकाकर रस्सना उपर लिख्हे अनुसार उपचोयग करना।
वृमीकहर लेप—राल सिंदूर रसया होरादक्ष्ण मैनसोल मोम घीते मलम बनाना।
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छाती हृदय रोग और कुफ्फुस रोग
छाती और फेफड़ोंके रोग
छात्रज—बहून रस्मं चीजे बहूतख़्वा बहुत मज़ूर पड़ायो खाना अधिक खाद्य लको पीनेकी आदत, बहुतेरे परिश्रम, अति भादरी पानी, हर्दयपर किसी चीज़का अथवा न लगाना, अभक्ष्यं पर मेज़न भति ख़्वाथ न, चित्तं मल मूत्रादिद्वा वेगको हरना प्रिय वयथि या निःश्वन प्रिय वस्तुओ नाश या गमाना, अतिक्लोध, अतिशोक, अनिद्रय ख़्वार आहार र विधारको अनियमितता आदि वारणोसे हृदयका रोग होता है और हृदय सम्बन्ध बंध पड़ जाता है ।
चि.ह —वायुप्रकोपसे न्द्रोंच हो या चोराता कटना हो ऐसा लगे जिसी चीज मो'तनी हो भेषो पीड़ा ज्रल हो । यपत्त प्रकोपमे तृपा लगे दाह्ह हो खोप लगे पसोनार अति ६ हो दे। दे रेनी हो । कफ प्रधानमे सुस्सी हर्दय पर वेग-माह ज्रल लगे मरतो । जिसी द्वाम्मे निःश्वनह कक गिरे, भुस्स मुंद, कारी झाड़ नाक मुंह्मे चि· रनापन मज़ूरता अति लगे । कभो छातीके ममं स्थानमे प्रन्धो मो होती है ।
रक्तप्रकोप हे तोह टेढ़ा मेढ़का शोध—हे तो वुब्जार के साथ उछ नगह ददं दायें ऋभेसे दायें ऋथ मे सीच (आवका) छातीमें धड़कन (यहक) नाड़ीको गति तेज़ धमरादय कफसेमी श्वृदि आदि चिन्ह होते है ।
रक्तप्रकाय चढ़े यथ पीलर हे तो—येहा मो थे-- करन से श्वास चढ़े निश्व वम हो । नाड़ी अनियमित ददं, यह माग मेटा हो कुल आय ।
रक्तप्रकाय के पलटना दे रोगसे—यों वाजू = न्हो मे'टों हे पीली हे, छाती उचढ़े मेघणा फेफड़े मे सूजन हे, नाक या पेट्मे ख़ून गिरे ह्राप प!न पर शोध हे श्वदरर मूर्च्छा निश्रा कम येशवासा श्रव करनेसे श्वान चढ़े मदानड वेगृद्वि हो ।
हृदयग्मा थरकन—मे छातीमे जलन हो गला मे र सघन हो गलेमे गोला चढ़ता हो वैसा दंखे मुंह लाल 'ल्चे हो सिरमे ददं हे ।
हृदय मृल—छाती ऋ वीचो ददंल। प्रार म होतदर पीठ ऋ= वोंये वमे यक ददं हेता है । उप समथ नाड़ीको गति मुंद होती है मार टेन्ता कठठन यात हे शारोर ठंडा पड़ता है । पसीना--ह्हून हेता है एक दम .. नोच ददं उछार व ऋम दता है और उपचात ऋ शत्त द्रातो श्वास । इस प्रका हर ऋ रत --च'ल ऋ मह भाता है ।
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पथ्यापथ्य—आत्रक के या ऐरंड के पत्तो पर रहनारायण तेल या पेरंड तेल लगा कर तपा कर छाती पग बांध ऊपर पाटा बांध शेक करना । दरत पित्ताश होने दो दवा देना । शारीरिक श्रम न करना । मन शांत रखना । शोक चिता न करना । सूखो हवा प्रकारा वाळे कमरे मे रखना। ठही या दर्पा हरा वे सब्जीरो अरने उपलब्को रखना । कपडे के गोटेसे शेक वरना । शरीर पर ठहा पवन लपाने न देना । स्त्रियोंसादी पेटमे वायु मेस आधमान आकरा नहोे यह ध्यान रसना । भूखरा खराब ज्यादा रखना। पाचन मे रुचि हेतु बैशा खराब टेना । सुरण वेगान, दुधो फुलावर देख्रो परवल हिँ। घनिया जोर हलदो नमक मेठानोम कालो मिरच मदरक्त पुराने मान्य जो चावल नेहु वाजरो चना मुंग उडद तुगी रांदि हितकारक है । गम जल से स्नान वरना । महानारायण तैल पदार्क्षादि तैल तिलक तैल घरीरपर मालिष करना । मुग फलोंका तैल वेसंडेरल घो पहुना खाणा बहुत गम जलर पदार्य' खाना नहि । बहुत ठहा पदाथ, आइस कीम गुलको चे ररेत पावडरका दुस खराब छाछ, खटा बहूत साना नदि । चा कफोका चयथन हो वे निखर लेस भूखको एक दो रफे पनी । खोडी मोदकरका मिठाइ कम साना । फरसाण नादि साना । ठहडे पनीओसे नदि नहाना
दुनियाके आमे रहे हुये देहा वैक पदार्तिके वैद्यानिक लोग, हृदयरोग केंसर जय जैसे रोगके रीसर्चंसे सदल्स घन खचं रहे है । इस प्रकार हृदयरोगके पीछे मी रुपमानसे प्रयत्न और घनका बडा रकय करते है पर इशको देखाइ परणाम नहि हुवा । यतेंमान वैक वैज्ञानिकोके सामने क्षय पनसरके रोपकी तरह हृदय रोगका प्रश्न मी 'खडा है । विज्ञानमे आमो बढे हुये वेधशेमे क्षय घौर टेन्वर रोपसे मरते है इससे ज्यादा लोग हृदय रोग से मरते है । हृदयके सनायुमोंके रक दनेवाली रक वाहिनोकी खराबीसे मी हृदयरोग होता है । कफ के प्रदारपे या कफकारक पदाथों खानेसे हदे हुये कफसे रक वदन करने वाळो शिराओमें कफडा या कफ जैसे चिसट पदारथ जमनेसे वह वमजोर होती है। अंदरहा रक वदर करनेका रास्ता संकुचित होता है इस कारण हृदयको आहार्यक रक नहि मिलता । मचानक दद वठनैसे रोगो हाथे छातीफा दावता है और विलायतों दवाखा देख लतेा है । रक काहिनी शिरोंमे युषा रक जैसे पदारथ दूर करनेकी या रक वाहिनोशकी जडता दूर करनेदो दवाई शोषतक नही निलकी । विलायती दवासे कमों त रकलिल्क आराम मिलता है टेिक्न रोग नहि मिटना य रोगका मूल कारण दूर नहि होता । यह कफ' वे आभुवेिदक दवाइं हि कर सकती है । दुनोया सरकारके ओहोपेथ डाक्टरों और यूनानिके डाक्टरोंमे मिलतो रहती है । इशरोगकी दवाईका आविष्कार करनेके लिये करोडो
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रुपयेवा स्वरचा प्रयेक देशकर रहो है पर हकलता नदि मिले। जव आयुवे'द और इषके रस.यन वा.वमे हृदयथके विभिन्न रेगोकी शरपिमुनोशोने थे'हडे वयं तक अनुसंधन ठेकर से'हडे दवाईया अपनी अपनी शंहिता या ग्रंथोमें वणि'त है इसका संशोधन करना अन्य देशोके वे ऋष्यना शेंव नदि परन्तु हमारे घरबारके र्यात पर भो यह बात नहि भाति यह खेदका विषय है। हृदय रेगके लिये, हृदय चलवान होकर वद न पड़ जाय इसकें लिये आयुवेंदिक द्वादश हि सफलता प्राप्त कर रही थी और इसका हि अंतिम विजय है।
हृदयार्नव—श्रृक भस्म शुद्ध भस्म पारद गंधक पीपल चूर्ण सम भाग ठेकर हृदय पीसळ और अजुंन च'लका मत्राथ हर भावना देखर घोट कर रखना। मञ्ञार रे रत्तो दिनमें र दफे कटकारी अवलेहके स'थ देना।
हरिहर रस—पारद तोला ८, गंधक तो. १२, अभ्रक भस्म तो ६, टेहु तम्र शंृङ्गारडी शुक्ति प्रत्येककी मत्तन रेख, शिंदुर शंखो'चवन इलायची पीपल सें'ठ कालोमोरच मिलाजोती प्रत्येक चार चार तोला सब साथ विविधत मिलाय अंदरतककी रेख, कुटकी रेय तेंदू पत्री मोत्तीचांदी रस, कजु नदी छालकी वर्त्ताथ कानों टी (डीमेदरत) रस प्रत्येककी एक एक भावना टे कर छायोमें सुस्साकर घे'ट रखना। मात्रा २ से ६ .रत्ती शहद कटकारी अवलेह चयवनप्रास दुध क्रिडीके साथ दिनमें २ या ३ वक्त देना। हृदयकी कमजोरी, हृदयपुर्वल श्वास को अधिक गति कुष्ठरोगके खांसी क्षय कमजोरी स्वर नली सध नलै'दो रोग घटने हृदय तक किसी स्थानमें हुआ निद्राे केंन्वर आदिमें उत्तम गुणकारी है।
मदनकंर वटी—सप्तगोमाधीक भस्म ठेहु भस्म अभ्रक वंशो'दचन शिलाजोत रस समान भंगा ठेकर अर्जुन वृक्षकी छाल के वच शमे थे दो रत्तोकी गोली वनाना। शहदसे अथवा वासांवटेहसे २ से ४ गोली दो समय देना छातीके दे रमे उत्तम गुणकारी है।
शंकर वटी—पारद तोला ४, गंधक तो. ८, टेहु भस्म रञणोमा'धिक भस्म शुद्ध भस्म शंख वभप शुक्ति सप्त मझाल भस्म अभ्रक भस्म प्रत्येक चार चार तोल! मिला कर पिंडु चि'ग्रक अदरक अरणी अडड्सों झोलोमूल अजुंन प्रत्येकके वत्नाथ या रसकरो एक एक भावना देखर दे दो रत्तोकी गोली वनाना। दिनमें १ थे २ तोला शिलाजीत अर्जुन छालके वत्नाथके ९ थे २ तोला स्विल'नो। हृदयके छातीफे घंयरोगमे बहुत फंयदा करती है।
किनेश रस—पारद गंधक मभ्रह भस्म सप्तभाग ठेकर अजुंन छालके वत्नाथके ९१ भावनो देना। मात्रा ३ से ६ रत्ती शहदसे देना।
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हृदय रोग हर गमिश्रण—रत्नमागोत्तर रस तोला ९, मुक्ता पिष्टि तोला ९, स्वर्णं वसंत मालती। ९॥, वसंत कुसुमाकर तोला •१॥, छोटी पीपल तोला २ चव साथ पीसव घोंट कर शीतमें भरना। प्रातः श्वास ३ से ६ रती शहद मक्खन या वृंघघृत देना। हृदयरोगके फेफड़ेके सब रोगमें उत्तम है। हृदयका वलवान् बनाता है।
हृदय पुष्टि मिश्रण—महारसविलास शिलाजतु प्रयोग योगराज रसायन वंगसत्वम् शत मावाल चदुपरी स्वर्णं सार्क्षिक सम्म लाल पत्थरेकि एक एक तोला भौर छोटी पोपलका चूर्ण २ तोला सब साथ मिलाकर माशा ३ से ६ रती दिनमें २ वक्त शहद दूध या पानीसे देना। उपर पूणचंद्रोदयकी गोली २ से ३ देना। छती हृदयके श्वासरोगमें उत्तम गुणकारी है। इशके सेवनसे हृदयबंध पठनेका भय नही रहता।
अर्जुनारिष्ट—अर्जुनछाल शेर ५, छोटी कट हरड़ पाँचांग शेर ५ कशौंदी (कांचेदार?) के पानी शेर ५ सबके साथ मिला दसगुने म्रर्थात १५० रत्तल पानीमें पकाना। भआचा पानी रहनेथे कपडछान कर एक चिनाद मिट्टीकी घरणीमें या लकडौका कोठीमें मर रखमे छाईंकै पूल दे। २॥, तज् तमारलुता नागकेसर इत्यादिी लोंग काली मिरच शेठ पीपलोमूल प्रत्येक आधा आधा सेर शोर गुड शेर ८० डाल कर चिनाद मिट्टीकी घरणीमें अथवा लकडौकी रंगदोइहू पितलको कोठोये भरकर मुख व भकर रख छेढाना वसदपम् दिनके पीछे खोलकर ठिलाते रहना। वेढ या वे मासके पीछे खेलकर कपड खान दर पवन न जाय ऐसे वतंनमें मर रखना॥ यह भावच २ घे ५ तोला तक दिनमें दे। दो रफे अवेला या किरप औषधके पीछे पिलाना। छातीके रेग व्वरःक्षत हृदय श्वासों श्वांस फेफडौके रोग भादि मिटते है।
हृद्रोगं भयहर गुग्गुली—पूणचंद्रोदय, स्वर्णभस्म मुक्तापिष्टी माणिक्य विधि पुष्टराज विधी चैक्रांत विधी नीजम् विधी गोमेद विधी वैडूर्यं पिष्टी प्रत्येक आधा आवा तोला, महालक्ष्मी विलास तोला ९, लघ मगल रस तोला ०॥, हौराभस्म रत्ती ६ ठेना। पहिले हौरा भस्मकेा, पूणचंद्रोदयमें डाल ३ घटा घोटना पोछे स्वर्णभस्म और मुक्ता पिष्टीदाल २ घटा घोटना पोछे दूसरी सम वीजें डालकर ४ घंटा तक घोंट कर इशको अदरखके रसको भौर तुलसीके पतकेक रसको एक एक मावना देवकर दे। देा रतिकी गोली वनाकर रसना प्राप्तः काल ३ से ४ गोली मष्ठरागं चूण ३ माघके साथ शहद या मलाई या दूधसे देना। पोछे दूध चाय काफे पीनेकी आदत होय पीना। पथ्य खास नहि है, टेकिन हृदय रोग वाडौने चा कपजोर हृदयवालोंने किसी भो औषधका सेवन करते हेा य न करते होय वाय काफे कींका वद न कर सके हेा एकदेश स्वधिक वस्त नहि मीतस। लाथकछौां पुष्टी रोकनेर माजारकी मिताई साहि नहि च्वाना।
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सुखके वाह्रके भागके रोग
कारण—अज्ञोणमें, दाह पोनेसे, खराश हनुा पानोसे, दत्त पटन रहनेंसे सुखमें सील डाभ या चमहीके रोग आदि होतें है। जवानीके प्रारंभमें शील जैसे चमहीके रोग होते है। फिर स्वाभाविक हि दो चार साल के पोछें मिट जाते हैं।
पथ्यापथ्य—दस्त पिशाबका खुल्सा होय यह ध्यान रखना। यदि दस्तकी कजो रहतों होय तो मधुत्रेरेचन चूर्ण २ से ६ माशा घसाहमे देत तीन दफे देते रहना।
आरे गयऱधींनी गोली च धप्रभा कीजोर गुगल पुनर्नवा पुत्रुल अमृता गुगुल में से किसी की २ से ४ गोली लेनां। सफेद मिट्टी दूध या पानीमें मिलाय मुखपर मर्दन करना। दहांम ठेप दश तेरामें ४० तोला सफेद मिट्टी अथवा सांठजोग मिलाकर रखना ह्मेशां स्तान के समय पांच दश तोला गाम्भीर मिलाय मुख पर मर्दन करनां। महालाक्षादि तैल अथवा सृंगराज तैल मर्दन करना।
कृकुमारिधि तैल—देसर नंदन लोंदर पतंग रक्ख चंदन कृष्णागुरु मज्जेष्ठ वाला मूलेठीमूल तमाल पत्र पलाशकाष्ठ कमलकंद कुष्ट गोरोचन हल्दी लाद्ध दारुहल्दी चंदनोगंध सरसों वच्ा रेशपुंदर प्रत्येक एक एक वेलां ठेकर मर्दैन कर उसमें पानी तैलां २५० और मायका दूध तोला ६० मिलाकर १२ घंटा रहनें देनां। पीछे उक्तसे तिलका तैल तोला ४०० डालकर घीमी आंचसे पकाना पानीका अंश जल जाय जांयों खोल डाघ आदि मिट कर मुख खुदर होतां है।
सुखके खोंल के उपय
१ डगोशिया (इगुची) के फरका नीरी पानी ये पीस मुख पर मर्दन करना
२ लोध पाँच तोला भोनियां चनय समभाग ले कूटकर पानी में पीस मुख पर लगाना
३ सायफल चंदन नाराङेधर समभाग लेकर कूट पानी में पीस लगाना
४ मग्घर कें घाटा १० तोला अंदाज लेकर उसमें घी आाधा तोला दूध में मिलाय मुखपर मर्दन करना
५ हरसें जों हेदार से धानोन समभाग ले पानी मे पीस मुख पर लगाना
६ अर्जुन की छाल कें गाय के दूध मे पीस घर लगाना
७ मसूरका घाटा और बड़की देआमल बड़बड़ै समभाग ले पानी में मोस मुख पर लगाना
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८ शेमल (शैम्पली) क्षार किटां दूध में पास लगान
इन प्रयोेगो से स्त्री या पुंष्पो के जवानीमे या अन्य कारणसे वस्पन्न हुए सोेक (मुखदूषिका) मिटते है।
मुख पर के काले झांईो या सफेदें लिये डाघ आदिके उपाय
१ रफचन्दन श्वेत कुडकुं (केदार) आभसा मोती लकडें भस्म मसूर की वाळ शेषग्रुंदुर समभाग कुट मिलाय रखना हमेशा गाय के दूध मे पीस मुखपर लगाने थे मुखकी छाया डाघ मिटता है।
२ हलदी कपूरहचली प्रियंगु (घवलां) मसूर और मुंनच शव सम भाग कुट रसना पांचो मे पीस मुखपर मालैश करनेसे मुखकी छाया काला लल डाघ चांठा मिटे।
३ इंगुश्री (इंगोरिया) के बीजन्हो पकते हुए चावल के पानी मे पोस लगाते रहना घाली क्षंइ छाया डाघ धागा मिटे।
४ हरंड वीज डांकरें वीज कुष्ठ हलदी समभाग मिलाय पानी से धा चावल के पानी से पोष मुख पर लगाना छाया डाघ आदि मिटे।
५ चनेकी दाल तेंा १० रांपदी मिले रखना प्रात निबुडे रखमे पोष उशमें नील'घेधा कच्चां १ मंशा मिलाय पीस मुखपर मदंन धरता।
६ कपूर हीरादरण शाल वेदार्द पारद सांधक कनक वीज नील'घेधा प्रत्येक पांच पांच तेंला लेना पारां गं'वड चेड कज्जलो हर पीछे वेदार ढाल घोट पंछे दूशरो दूध मिलाना गायका घों तेंला २०० ठेहर गम्र ४र उशमें मेम तेंला ५ हाल पोघळ जाने पर दूसरो वस्तु मिलाय मलम वनाना लगानेक्षे मुखकी छाया डाघ धागा आदि मिटते है।
७ तेंा (वहणी) को लाव शवलकुं मुलक या झाल कैसर सोहागा लेम भाग लेकर कुड घর रसना। निबुडे रस मे घोट लगानेक्षे मुखको छाया डर हे।
८ सरसै। लेादर हलदी घवलां (प्रियंगु) तिल मसूर सम भाग हेट पानीसे पीस मालैश करना मुखकी छाया मिटे।
९ सरसै और जोरां सम आग ले पानीषे पीस मुखपर लगाना मुखकी छाया जाय
१० अमलतासके पान पीस मुखपर मदंन धरना मुखकी झाई डाया डाघ मिटे।
११ तिल जोरां शाकाजीरां सरसै समभाग मिलाय दूध मे पीस मुख मदंन करनेसे सच प्रकार के डाघ झाई मिटे।
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१२ सेनागेढ मलेठ नागरमोथा, हलदी दारुहलदी समभाग मिलाना । मानीसे या दुष्टशे पीठ लगाना । काले डाग आदि मिटे ।
१३ छोटी दारद (होमेष्ट) वेदार नघक समान भाग मिलाय निचु रखये लगावे काठे डाग जाप ।
१४ गंधक गूगल ढाबरान शर्कर सफेद चंदनको चूर्ण समभाग मिलाना पानीसे पोष्ट लगानेसे कपाल के मुंहके काला टागा मिटे
मुंहके मस्से के उपाय
१ नवसार सेद्वागा सिटकोरी प्र'लिया शरगनाशोका मूल समभाग कूट निचुके रखमें चोट चुपारो जैसी सेगठी वनाना । नीचुरस मे या पानीमें घ'म कर मस्सके मूलमे लगाना । मुंहके गडेके मुख गिर जाते है । उस जगह से चून गिरे ता अपावाग'के पत्ते धो पीस पेटैस लगा देना हत आ जाती हे । यद्द सेगठी विपैल है ऐसा ठेवील रगा देना ।
२ लाल च'किया नींबाथोया शकेद मिट्टी मैनघील जूना पापडस्तार चव मुम भाग डर घोंटकर निचुरसथे सेगठो चुपारो जैसी वनाना । पानीमें घेघ कर मडेके मूलके लगाना । मस्सके ऊपर घोडा फ'ला रखना । मसा निकल जाता है । पीछे उस जगह रोपण मलम लगाना ।
३ सज्जीखार शांधका कच्चा चूर्ण पानमे खानेका चूना सम भाग मिलाकर रखना पानीमें मिलाकर लेप करनेसे मस्स गिरजाते है ।
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दिमाग मगजके रोग
प्राणा: ध्रिता हि यत् प्राणसृतामिन्द्रियाणि सर्वाणि ॥
सर्वाङ्गानामग्रं यत्रोत्तममङ्गमुच्यते विन्द्धि ॥२॥
घाताद् ध्रातिदंशूलं सदुरणं पित्तासृदादूघूमायति: ॥
गुरुता मडता च कफात्पीडा प्रातसत्यां रजन्यां चे ॥३॥
दैवप्रकोपाज्जिहुतं त्रिदोषजं किमिमभव पुनर्भव शिर: ॥
दैर्घन्ध्यकफहने कविति'युतं वैद्यो वदन्ति पुययुलमू ॥३॥
॥ रसेश्वार तन्त्र ॥
कारण—मल मूत्रादि नैर रोकनेसे, रातदिन जागरण करनेसे दिनकेा सेवनेशी
अधिक आर्द्रताशे, शापनेशे पवन टेनेशे, बहून चेष्टा ऋतुनेसे बहून अग्नि या सूर्य'का
घूप सेवन करनेसे, मीठाइ खानेने वाळे हलव'इड (हलुवा) या घूपमें काम करने-
वाळोेशी मधिन और घूप सहन करना पड़ता है। अति पंपर मेंडनसे बिना भूल
खाते रहनेशे, अतिनिषय सेवनशे, हस्तपादका घृतवशे, दिनांशा काम इत्यादि
ज्यादा करनेसे, कोधेशे शोकेशे मानसिक आघातसे भयशे चिन्ताशे दाहू धरनेवाकी
गरमागरम चीजे खानेसे, चाय कॉफी जैसे चोजोंका अधिक दुष्पनसे, आवेशशे,
अति मानसेश, हदसे उजादा हांस्य करनेसे हसनेशे अति उपवासशे, अतिमापण
करनेसे, अप्रिय अथवा विपैल वस्तुर्शी गंधशे घृण हुंना ठढा या ताप लगनेसे,
अति खत्ता अति तिक्ता पदाथ' बफ' आइसक्रीम गुल्को जैसी चीजे खानेकों
भादतशे रगनेरगी प्रवाही पीनेशे, दुस्कका समाचार सुननेके पीछे अश्रु (आंसु)
रुदनेशे-अश्रु न पढनेशे मस्तकू पर किसी वस्तुकी चोट लगनेसे, वर्षांकी ऋतुके
प्रारंभशे, ऋतुसंधिलनेशे, मनके आघात शोकापत्तेशे, अतिअरनेसे देशकाल दसा पानी
बिगड़नेसे इत्यादि अनेक कारणोंसे मस्तकका घृण विगड़कर वात पित्त कफका प्रकोप
होकर विविध प्रकार के मस्तकके रोग उत्पन्न होते है।
वातज न्य मस्तक पोड़ा—उर:स्र स्वरशे मापण करनेसे, दाहू अधिक
पीनेशे जागरणशे, ठंडा पवन ल्गनेसे अतिविषयशे मल मूत्रादिकां वेच रोकनेसे
अधिक उपवाष्र करनेसे छर्दि (उल्टी) रोकनेसे शोक मय प्राणशे अधिक मार
बिर पर उठानेशे पंथ करनेशे इत्यादि कारणोसे बढा हुवा वायु मस्तककी
शिराओं मे हुर्णे से मस्तक पोड़ा होतो है। चक्रुटी ल्लाट मे पीड़ा हेा,
मस्तक फिरे चक्कर के साथ गींड़ा हेा चेटी नशे फरकें। बच्चो शिरोघरा नशे
होनेसे नाक बन्द होनेसे सिरदर्द गांम परस्पु ल्गनेसे श्वास
दुस्तर जय। रोतकी पोड़ा वेंदे कफड़ा बोंनेशे लिंगव गमं परस्पु ल्गनेसे शोक
पोड़ा कम, हेा, यह वात जन्न्य मस्तकद्रेरोग,है।
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पोछे पकाना घट हौ। जाय जब अभिन बंद करना डुपरे दिन प्रातः कालमे फिर आधा घटा ढीलाकर नीचे लिखे ९१ द्रव्योका चूर्ण तैयार रखा हो। बास्ता और किर तीन घंटा तक ढिलाना शाम तक रस् छोडना पोछे रांप कपेटी केठीमे मर देना।
डालनेफे मथम-सेठ पीपल कालीमोच तज् इलायचो लेठा गामकेशर चोपरचोनी मच सातावरि हरड महेडा बिदारोकद प्रत्येक बार चार तोला और मठ्ठवर्गो आठो। मिलाकर ६७ तोला सम्ह साप कूट कर रखना। यहां ध्यान रेखनेका यह है कि मद अवलेह पकानेका बस्तं रोग लपेटा पोतलका ठेना और दिलानेका तवेमा पोतलक्ा या लकढोका ठेना टेढास्डा होनैसे अवलेह काला बन जायगा। यह अवलेह २ से ४ तोला तक दिन भर मे खाया जाता है मस्तक-दिमाग के सब दर्दंमे उत्तम गुणकारी है।
वचादि चूर्ण सेल—पारंडमूल तगर सातावरि जीवंती रास्ना से धानोन मोंगरा इलायची बायविडङ्ग चमेलोके फूल या पत्ते, मूंगटी सोंठ मोंठा पानोसेरनी नामक, छालो या खसखस हए तुलसीका पत्ता प्रत्येक दस दस तोला लेकर कूटकर इसमे मघरीका दूध रतल १० और मोंगराके रस रतल १० छाल कर भिगो रखना। काले तिलका तेल रतल १० डालकर घीमी आंचसे पकाना पानीका अंश जब अभिन निघालना १४ घंम ठंडा होने देना डुपरे दिन कपडछान करना। इस तेलका छ उद नाडुक्के एक एक (फरण) मे डालकर निद्रा करना या दो घटा सेवे रहना। कानमे मो १०-१५ बुद डालना। मस्तक-दिमागके सब रोगमे उत्तम गुणकारी है।
पद्रजिकृतः प्रयेष्या पतिनाशार्तिनिग्रहमस्व तहसस्य शिरसः सर्वविकारांरुच्युतकेकान् द्विविधततवेष्टितांश्य ॥१॥ स्वक्षु: कर्णिग्रान्दे हन्ति च दृष्टिंं गडदपनां कुष्याज्ञ ॥ पड्विन्दुतेलम्तुलं चाहु बलं नेत्रकणों कारिकं च ॥२॥ ॥ रसोद्वार तंत्र ॥
प चामृत लेध् मूगळ पारद गा घक रौच्य मष्म अभ्रक भस्म माक्षिक मरमलाल प्रत्येक चार चार तोला, टेठ मघम सात तोला, गूगळ २८ तोला सम्हेड़ा कूट कर साम मिलास इसमें घरेराका तेल तोला ४ डालकर कूटना तिमें आनुपर मोंगराका रस् ढीलाकर घटिनी अन्सि रत्ती प्रमाण गोली बनाना ३ से
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६ गोली पानीषे दिनमे दो दफे देना । उपर गायका दूध पिलाना । सिरमस्तकके सव रोगोंसे उत्तम गुणकारी है ।
उक्ष्मो विळास तेल— शतुरा चंपाका फूल नागरमोथ चलामूल चीलী गम्भ अरण्ड घघीग्टहरी के फल अडूसेपते च दन रक्चंदन मजीठ घारीवा स्नन तमाल हलदी दारहलदी मूलेठीमूल महूडेके फूल पद्महासठ कमल फूल वाला श्रमवायन ग घप्रघारणी रास्ना शुंघी महेदी गुलावकाका फूल आंवला पानसी इलायची प्रत्येक पांच पांच तोला लेकर कूटकर पीतलके टेपाेमें डाल वस्मे सातावरका रस विद्र री द दफा रस मूराकेसा (कुष्मांड) का रस केलेके स्तं मका रस हरे गोसरकके प चोगका रस नालोएरका रस दर्होंका पानी (पस्तु) वदरीका दूध लाखका कत्राथ हरा आंवलाेका रस प्रत्येक साठ पाथ तोला लेकर वस्मे डालना १३ घटा मिगो रखना। पीछे विळासा वेल रतल २० डालकर घीमी आंचसे पकाना पार्ंका अथ जल जानेके पीछे २४ घटा स्त्रांंग्रीत हे ने देना रुपडछान कर शुचेे मतनमे भर शुरक्षित रखना । यह तेल कानोंमे नाकमें मस्तकमे डा लनेसे मस्तिष्कके आसोंके कांपने के नग प सिरिते हैं और वृद समरण शक्ति वढती है । शरीर पर मालीस करनेते आयुष्य वढता है ।
पाठाङि लेप—पाठ पतेाल सोंठ पुष्कर मूल सह जनाईकी छाल चकन्रहके पोज कड घ शव समनमाग कूट धर छोइ्मे पीस मस्तक पर साद्रा लेप करनेसे मस्तकके सव रोग मिटते हैं ।
द्विरोघसती—मस्तकमे' फिट हो ऐेसी खडे कोठेकी चमदेकी टेपी कराना टे पीका वीचका भाग खाली रखना । और उसेके नीचेका कोठा ललाट तक चारेोेएर फी ट हो और करकां कांठा बालके उपर ३ अंगुल उचा हेो इष प्रकारकी टोपी कराना । टेपीके नीचेके पायोंमे मरतु हुवा प्रकाशो आंवल गर्दन पर न गिरे ड़खलिये सांघ'मे चारेोेएर उसके भाारासे अंबूर मागमे लगा देना ।
पोछे रे गो हिळे चले नहि इस प्रकार दि्वपर बैठा का औषधीय तेल टेपीके उपर के ठाठा तक भरना और बेठेे तीन घंटातक रहने देना, इतने समयमे पौडा थांत हेागी । यह शिरोघस्ती वायुप्रधान मस्तकरोगके और गरमद हांवदो बांहस कान वाहू क मा भादिको पोताकेा शांत करती है । दिरोाबस्ति पशेउ दिन तक वी जाती हे ।
दिरोा वसति देनेके प हिळे रेङ्गीका खाने नहि देना-मुखा घेट रखना । समय पूरा हे नेते रेगीदेे धीरेसे नीचा नमा कर तेल डे ठेमा, टेपी निष्कालन पोटेे मस्तक हल'न मुख राधन क्रमा छ दि अवशयकों मद'नकुर पोंछे गमं पानीसे पोहोे मस्तक धुल'न
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स्नान कान्ता । पांचों दाल मात खीं-ची आदि लघु खुराक देना । वात पित्त कफ जिस दोषकी प्रधानता हो उस रे†के दामन करनेवाले तेलकी शिरोवार्ति देना । वायु भौतिक प्रधान वृत्त' हो तो तेलको कुढ़ तपाकर भरना पित्त गरमी प्रधान हो तो ठंडा† तेल भरना ।
वैसे हि वात प्रधान हे। वह महानारायण जैसा तेल, पित्त प्रधान हो तो रक्ष्मी विलास तेल, मृ*गञ्ज तेल अथवा महालाक्षादि तेल, कफ प्रधान हो वेर मदानारायण तेलमे खे पञ्च† तेल मिलाकर उपयो†गमे लेना ।
क्षारेक्षुधृत क्षीर विधरण —१ मुक्ता विष्ठो तेला ०॥, सप्तामृत क्षौद्र तेल २, सुगध पपं†ो तेल । ३, प्रजाल चन्द्रयुति तेल ४, अश्वता सत्य तेला ५ सप साथ घे†ट श्रींगो मे' भरना fतने देना दफे ४ थे ६ रत्तो शादर दूर ही या पानि†चे देना मस्तक के सब रे†गेपे उत्तम गुणकारी है ।
.. क्षारोदरेग हृत मि†पा—३ जमाहर मेदार† विष्ठो स†रणे वसंतमालतो अस्ने ५ मरस्सं द्वारे† रेघ द्दे वटो चन्द्रप्रभा शिलाजोत प्रत्येक एक एक तेला हेक्कर घे ट रखना । दिनमे दे† दफे ४ थे ५ रत्तो शादर घृत सा पानि†चे टेकर उपर च्यवनप्राश " जोइन अश्तका कञ्जाल घृत ९ से २ तोल† मिलाना ।
सर्हे† क्षिरेरेग हृत मस्य—सेत (रुपयंती) तोलो । 9, विद्र कर सुद्धा हुभा शफेद चउन तोल† २, मूलीठी मूल तोल† ३, शत†व्धी तोल† ४, मष्टि† ठेठामिल कर तोल† ८ तमालहकु† पत्ती सुद्धी हुंदे अथन† छि†नी तोल† ७० रव साथ फिल† ग्ल क न के भत्तर कि सुगधी मिल†कर रखना । हमेंशा छि हनी कि वरदह सुवथे रहूं†ले मस्तकके सवरेग मिलते है । और मस्तक के केई' रे ग न हो थौर दिनमालका दारम करने वाले हमेंशा हितका उपयोग कर शक्लते है ।
उनहे दिनाग का राग नहिदे होता । इसे वेधटोनिक नस्यमे॑ कहवे है ।
सधे नारोेष्टर मस्य——कौढी भरम तोल† 9, पसाय† शेढ़ागा तोल† ९, ढाली मिरच तोल† 9, अतोष तोल† ३, मूलीठी मूल तोल ४, तमाखुकोपती तोल† १० सर साथ पं०म रखना सद† प्रकार है मस्तक रे†गेपे सुंधाना ।
वात न्नगेरेग्न मि†सप——प्रजालिय पिष्टो अश्थक्र मर्दम सप्तामृत क्षौद्र वात विद्र हृ वृत्त आन चित्र†मणि प्रत्येह आधा आधा ते ला और मूलीठो चूण† ३ तोल† fिथकर श्रींगी मे भरना । मातरा ६ से ८ रत्तो दिनमे दे†। दफे† शादर युध या कल†गाढ़ा वृत†दे साथ देना न नुथे उप्पन्न मस्तक रे†ग मिलता है ।
कुप्र†द लेङ . मुख पुड़ मोल मेरठ सरपातो नेदर छाती पित्त ललाट रे टेप करना वात गि†न्य मस्तक पित्तो मिलतीं है ।
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पित्त जितेरे रोग प्रयोग-मुस्ता विद्रुम् तेला ०', प्रियाल पिष्टी तेला ९, खस्खातृत खेरह तेला ११, अमृता हरत तेला २, जवाहर मोदरा पिष्ठी, तेला १, शयन' मयत मालती तेला। ११, मूलेठी मूल' घृत चेला २ सय साथ घृत रखना य सें ६ रत्त' ग्राहक पृत च्यवनप्राश मग जीवन यो शिरे' रोग हर अवलेड़ अयरा मुलक'ह के साथ देना। पित्त रुगी से उतपन्न मस्तक रोग हमतता है।
मस्तालिद लेप-चंदन वाला मूलेठी मूल कमल पुंप कमलगट्टेों गीरी, सीमें तला हुधा मालशं धय पमन माग टेढ़र गुलाब जलमे पीस ललाट मस्तक पर टेर करनेमे हित गरमी सें उतपन्न हुया मस्तक रोग शांत हे ता है।
कफ'जिरेा रोग प्रयोग-सर्जं यमत मालती तेला ०११, साधारर्ंग मरम तेला १, वातगजांकुता तेला १, पुननवा गूण तेला २, कफ कुं जरा तेला १, छेटी पींगल तेला २ सन साथ पीप घृत रखना। ४ से ६ रत्तीं ग्राहक घृत दुष्य या मारोसे घा मरम रना। कफ वादीमे उतपन्न कुषा मस्तक रोग मिटता है।
त्रिदोष जिरेा रोग प्रयोग-सर्जं माध्रिक मत्त लाल वामुत नीरह fi:मूलादिन्ज प्रदेहं एक एक टेला घय साथ पोह घृत रखना। टिसमें ७ । ३ तीन टेफे राहक या पनीसे टेना। वात पित्त कफ होने' दोयेरे से यतनत हुधा अतत गेत पोहा शांत ऐती है।
जय द्वारे' रोग प्रयोग-पटंलम्सो बिल्वाय यचंतकुरुमादेर कछ्रह ममम हरन'महम रजन' घट त मालतो जय मंगल रस पाचन म्र सव मम माग टेढ़र घोंट रखना। दिनमे दो टेफे ३ सें ८ रत्ती' शारद घृत मलाइ मक्खन घयदा च्यवनप्राश जीवन के साथ देना। कफसे द्वारोकी कमजोरी से उतपन्न हुया मस्तक रोग मिटता है।
कृमि जन्य जिरेा रोग प्रयोग-०'वामृत टेर गूगल तेला २, जौवितरदा टेर १, अमृता चन तेला ११, मुकाफिते तेला ०१, वात गजांकुता रस टेर १, ह.वरदी ग मरम यट्टीश हलदी प्रत्येक टेर टे तेला सांगर ने'टा (कॉफचिया) कोगिरी १ तेला सय साथ घृत रखना ४ से ८ रती दिनमे टे समय पानोसे टेना। मस्तक मे, कृमि हेा वा पेटमे कृमि के उपद्रवसे मस्तक पीड़ा हेा मिटती हे।
नस्य-मेठ पोपल हाली मिरच कर'ंज वीज्र मधुरानेदं चोज रख सय मम माग टेकर यदरी मे मूत्र से पीस कर नाकमे युद्र टालनेमे कृमि जन्य मस्तक पीड़ा मिटती है।
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नस्य—लहसुन के पत्ते पीसकर नस्य निकालने नाडी़े, १० या १५ घुंन्द डालनेसे माकद्रार जंत्रु निःशेष जाता है।
कवि खिरेर रस तैल—नागविड़ंग, खसरा (पारद्विया खसरा), दंतोमूल,हींग समभाग कूट पत्तियेक चार तोला, वच्डी कटेरी के फल तोला १० घकेा गौमूत्र मे पाँच सरदोका तन्त तोला ८० पकाना। सिद्धमे तैलनेस सीदग विरेचन होकार कुष्ट धन्य मस्तक पीड़ा मिटे !
नस्य—उद्रम माने यां पांनो (युग्मफला चमार दुग्लो) के पत्ते २ तोला और कपूूर १ रत्ती साथ पीस ऋष निद्धाल नाकने और डालनने कुष्टजन्य मस्तक पीड़ा शांत होनो है।
नस्य—सायफल कपूूर डीकामालो तमाकुरो पत्तो दो या तोला लेकर हरड़ के तेलमे पीसि ४ घण्टा मे पोछे छपद' छान करना। यह वेल नाकने डालननेसे मस्तक कुष्ट जंतु निःशेष जांतें है। और पीड़ा शांत होतो है।
शिरःशूलादिद्रे च रस—गरद गंधक लोहभस्म निसोथ प्रत्येक चार चार तोला, शुद्ध गूगल ९ तोला, त्रिकला तीनो मिलाकर ८ तोला, कुष्ठ मूलीठीमूल पीपल रेठा मोंखर नागविड़ंग दशा मूल केदस ऋषय प्रत्येक एक एक तोला' सव कूट कपड़छान छन कर दशा मूलके क्वाथकी मात्रा लेकर छायामे सुखाकर घेंट कपड़छान कर नायच्रा धी तेला १० गामंकर मिला देना पीछे पानोऋष रत्ती प्रमाण गोली बन.ना अगर चूर्ण रूपमे रखना। मात्रा ३॥ से ६ रत्ती दिवसे देा या तीन ढके पानी या दूधने देना। नायु पित्त कफ जिदोष जन्य मस्तक ददृं साधासाधो सूर्यावत' आंद मसत्तक रेशा मिटते है।
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आर्धावैदेक आधास्रो-चूचोक्तं
कारण—चिन्दः—कफ क्षराक, अर्शजों पर मेाजाल, मुखरोगे सन्चुम्ब पचन लगना, मटके वेग करना, अति उष्णो परिधम अधिक त्यायाम, बाविदि कारणोंसे कफोन्त पयु सदैवला अपार कफके मग्न मिल कर यह दर्द करणा है तब गरदन तिरछी, भमर, तिर्यगों (तिरछा), कान श्रोंटि ललाट माथे सयवेदने सगफ चंद व रसनेन्द्रिये माथे मस्तकमें पोड़ देतीं है। आधार विहारकों अमियमताने इन्द्रिय पर चिन्ता धौर चोच वेदनाश्रों सेाच किःता और बुखार पाकिको कमजोरीले, शीतलके दर्दैचे ऐंथे अनेक कारणोंसे ने शनें शेग दायें हैं।
भापा मस्तक दुक्कता है तय प—चोर ने ललाटका माथा श्रानलदो भमदरहे नवपर्य मागने हद देताहै। कत्रों दर्द मेन्ता श्रमो अशुभ होता है। तैसे सारा मस्तक पकडा़ जाता है।
भनाद्धोधोमे कुच्ह प्रातः काल चटनाॅ है आर अनियमित समयपर उतरता है। कसायते ये सूच्ये चैसें ढलता है वैसे दर्द 'हैं' है मध्याह के समय मारो ममद पँहा हेतो है और सवॅ दर्द ढलता है वैसे दर्द उतरता हुमा प्रातःके तांत दे जाना है। आधासीवेद और सूरदर्द नों-तपाय समात है।
मर्नावसैदधर नस्य—चाली मिच परदं, मघक प्रत्येक चार चार चोला, पक्वाया हुमा चेदागा दे। २, मेनफल चोा ०॥, हलायचो दाना ता 9, कपूरे ता ०॥, घषसे तीनगुना तमाखूका चूर्णा पता यप साय पोव हर उश्ने डेनाके इधर उधर सुगंध लगा हर रखना। नावासोसी, सुगंध आदि सिरके दर्दोमें नस्य देना।
प्रयोग १—पर्पटादि तेल के ९० से १२ बूंद नाकमे सथेँदयके पढिले हालना और पीहे देा देा घटा रहना।
प्र २—सूरेदियके पढिले घृतू्राका पान पोवकर उसकै रपका देा या तीन बूंद दर्दोमें अथवा दूधमे डाल हर पिलाना।
प्र ३—सुर्योदयके पढिले धीमें बनायों हुयी मरमा गरम जऱोमें तृप्ति पयँ त खिलाना।
प्र ४— धारिवा कुष्ट मुलंठी मूल यत्र पीपल कमलकुष्ठ सयकेों समान माग लेकर छान्छमें अथवा रहोेंक पोवकर ललाट शोर मस्तकमें लेप करनह प्र. ५ मेनफल, शोर दाखकर देानेँ समयनमाग देहरे दूधमे पोवक कर सर्योदतके पहिले नाकमें बूंद डालनाथा।
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प्र. ६—पेठ़ 'अफीम, लाल चावल समभाग पेधकर चांगठी बनानी ।
अरहरत हरा जव पानीमें घिस कर ललाट मे लगाना ।
प्र ७—आकके पोले पान पर तिलका तेल लगाकर गरम करना और दाथसे मसल कर पानी निकालना, उसके पांच दश हुद सुर्थोदयके पहिले नाकमें डालनेसे छींकें आ कर दर्द मिटता है ।
प्र ८— अप रजिता (परवल) का पचांग पानीमें पोस न कर नाकमें १० से १५ बूंद डालना ।
प्र. ९—काली मिरचके मांगरेके रसमें पीस कर विर पर लेप करना मस्तक पर लगाना ।
प्र १ —काली मिरच पं'पल बैनशा उज समन भाग लेकर छाछमें पोसकर मस्तक पर लगाना ।
प्र ११—पं'पलका चूर्ण रती १२, धाकर माशा ३ प्रातःकाल सूर्योदयके पहिले पानीसे देना ।
प्र १२—शिरीष (सरसडा) का मूल और फल पानीमें पोस कर कपडछान कर १५ से २० बूंद नाकमें डालना ।
प्र १३—मच और पीपल समभाग फूंट कर कपडछान कर घूंट करना । इधरमे समभागमे थोर्कनी या तम खुर्कों पत्ती मिलाना और इसका नस्य टेते रहनेसे दो तीन दिनमे दर्द मिटता है ।
प्र १४—सूरजमुखीके भोजकेा सूरजमुखी के पानके रसमें पीस कर ललाट 'कौट मस्तकमे लेप करना ।
प्र. १५—अपामार्ग (अघाडा), भोजकेा अमलतासके पानके रसमें पीस कर जख्खनमें पधाना । इसका १५ से २० बुद नाकमें डालनेसे अघाछ्य सूर्यांवत मिटता है ।
अर्धावमेद हर मि०—शिरः कुलांद्रि वच, तृ. १, कस्तूरी भरव बृहद्द तृा ०॥, शुध्दति भस्म तृा ९, धावारविग भस्म तृा ९. सुवर्ण वस त मालती तृा ०॥, वांत विध्वंस तृा ९, छोटो पीपल तृा ९, काली मिरच तृा ९; सम साध पेष कर शोषोमे, भरना । प्रातःकाल और रात्रिके यसेद रतो गायकै धोके साध अथवा भस्मग धावलैह के साध देना । और एक मात्रा सूर्योदिय के पहिले एक घूंट पर, देकर, गरम प्रताही पिलाना ।
अनिमिम्न रीतं
अनन्तवात—दोषेहालिक ctimil (Glaucoma) से मिलतां खुलता चयह मस्तक रोग है । इसमें तीन- साढ़े तीन पल होता है । भाख झूठे
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रपमा (रालक) में तोष पेदा हेाता है। गालके बाजूमें कंप हेाता है। और कमी धांकवमें अापा आता है। यह रेग असाध्य है। पस बेलाना, वातपित कफ दामक खराब देना सिरेरेागमें वनायकर तैल देना।
दहलक्री हस्द्दो, मकड़ नीमकी छाल, पाढ़ा, पियुदाष्ठ चच मममाग टेढ़र पातमें पेसदर महुएक और ललाट में रच जगह गाढ़ा लेप काके उपर वैनेाडे पान लपेट हर पाटो शांघना।
अननसचातहर प्रयेर-परचारित हैद्रुगण वैद्य 9, रघु वसंत मालती वैद्य 9. शहेंशर पपंटी वैद्य, 0'1, वातनाज कुश वैद्य 9, शिरोरेग हरी चरो वैद्य 9, सब राे पेसकर रचना दिनमें दे। यां तीन दफे चारसे छ रत्तो मात्रा दुष या पाहद के घाप देना। उपर अश्वगधादि अवलेह अरिष्ट चिद्रकहरौतको भयवत अन्नतमादातक 9 से दे।
शंखक
यह रेग मोतीझण समर (Claucoma)से मिलता झुलता है। पित्त वायु और कफ दूषित हेाकर यह दर्द लमणाके (Templer)के भागमें जम कर नयंक र पीड़ा दादह और सूजन हेाती है। पीड़े माल मसतक और कठकेी रक कर तीन या चार दिनमें रेगी मर जाता है। मसतक पर सेा दफे पानीषे या डाकफ कतऱापषे चेमा हुया घे लगाना। गुलरखी, वचक्री, पोपलमूष्ठ, (असूारध)की छाल, डाककी छाल पस साथ पोषकर कपाल ओोर सांधे मसतक पर मुधन कर मसतक और कपाल पर टेप लगाना।
दषामूल, शिमलका फूल, दूर्वा, काढ़े तल, पुनर्नवा मूल, सच साध पोषकर मसतक और ललाट पर लगाना। इसका प्रभावी नाकमें नये डालना। सिरो नसती देना।
राष्प—नीम, वचादिन नीम, महदेवी, लताकरज, सह जना प्रयेएलुके पान ! अश्वगंध, शठागंधी, कोटमाची, (कीडामारी) सत्र धमान भाग लेे कर एक वहे मत नमे मर कर उबालना। उसको वाक (राष्प) मसतक पर नाकमें और श्वासमें देना।
तिरोय (घरषदे) के पानका रस निकालकर नाकमें घेार कानपे पाक बांव घंटाके पीछे डालते रहना। शिरोरेगमें बताये हुये उपचार करना।
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दिमाग़-प्रस्तुत में रक्तस्त्राव
१. हसिन्द्र—दिमाग़ अथवा नाक से खून आया हो ऐसा होने आंख भौंर कानमें जलन हो, रातको और ठंडे उपचारसे कुछ शान्ति मिले । प्रस्तुतमें भार • वजन जैसा लहो, चक्कर खावे, कानमें अथवा हो, आंखमें देखनेकी तकलीफ़ हो, नाकसे रक्तस्राव हो, हवभाव कोषिश हो, घबराहट हो, निद्रा और वीर्य बढ़े, कुशार खावे, पेट ढीला हो । मूत्रपिंड और रक्ताशयमें दर्दं हो। दाहिने अषिक पीने से, धूपसे मलनेसे और दूषरे,। वात कफ कारणोसे यह रोग होता है । रोगी वेचैद हो और गलेके औषध और प्रताहो श्वासक न उतरता हो वे नाक द्वारा रञ्जरको मलो पेटमें उतार कर औषधको प्रताहो मनवाकर देना और प्रगहो धार क देना । आंवला, वाला, कमलकुष, दूर्वा, द्राक्ष, पुननवा, जटामांसी, अनंतमूल, सघ समीर भाग लेकर, गुलाव जलमे पीसकर, मस्तक और ललाटमें गाढा लेप करना और उषर फॅलोका पत्ता चोवन। पुनर्नवा या मूल, मूलोठा रुप सेंधा और जटामांसी सबको पानोमें पोसकर द्रवपदार्थ निचोड़ पर उसके बंद पाव पाव घटेके पीछे नाकमें और कानमें डालना । पलिंवदु तेल, रस्नादिन्त्रास तेल, महालाक्षादि तेल, के वुद कान और मादमे हर पाव पाव घं टाके पीछे डालन।
हिरोेरक खावहल प्रथ्योग—मुकापिष्टि तो। ०।, प्रवाल चद्रपुष्टि तो। ९, अशाहत मोदरा तेल। ९, हरीतामृत चूण तो। ९, सुधापवटी तो। ९, अतीस (अतिकिपा) तोल्या, ९, दोरा भम्म रत्ती ९, छेना । पहिले दोरा भधमे सुकून मिलित्रि डाकर एक घंटा तक घोटना । पोछे दुसरी चीजें मिलाना । पुननवा पुचाके क्याधने शहद मिलाके । पांच पाव मंरामें दो तीन रत्तो माथा मिलाकर पिलाठे रहना । दुसरे थो-नो चिकित्सा दिखते हो तक्षणुसार उपचार करना ।
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विधि-मस्तकरोगे किमो भेदमें चित्त²द्रजेद्र³ घ्रन्थो होते हैं वह पककर-
षय निकलता है। इस एकान नाढ और व्रणाटमे दर्दं होता है। उपदंश वगैरेह
गरमोऽे कारणसेमी यह दर्दं होता है। मस्तकमें पीड़ा हो, ठंड़ी लगा कर
लिखार जावे, पंधाना छिटक¹ जावें (छिड़कें) जावे, शरीर कमजोर हो।
मस्तकग्रन्थियोह्र प्रयो¹न-रसपर्पटी वे. १, शिरोरोग हरिवटी वे. १,
पंचानन लेह गुगळ वै. १, कांचनार गुगळ वे. १, ममी मस्तकरी वे. १,
मुस्तापिष्टि वे. १॥ सव साथ¹ मिलाकर परसाया² क्साथके साथ प्रयेठ आव
साथा घटाके पोछे दे। से तीन रस्तो देना लोंर उपर केशरादि गोली दिनमें दे
दफे २ से ४ खुरो दूधसे था क्साथसे निगल जाना।
पलाशादि क्नाथ-ढाक¹का मूल, ढाक²की छाल, गुलर³का मूल दर्भके
मूल, दूर्वा, पुननंवा पंञ्चांग, सव सम आग ले कर कूट कर रखना। दे से बार
तेलाका कसाय करे³फे मधु मिले⁴फी अंगर किशो अपथ्य न्राय मोधा घटीके पोछे पिलाना।
मस्तकरोगी ग्रन्थो विचरकर मिल्ती है।
मस्तककृा जलोदार
प्राय: वच्चोने होता है। मस्तककृी शिफल छे²टी दीखे। चामड़ीमें खींच हो।
मस्तककृा वे ज बढनेसे बालक और वढे आदमी सिछानेंमें पहा रहे। वैठ सके नहीं।
जलोदरपण रस-रससि²द्र, जटामांसी पुनर्नंवा मूल, हंड़ इन्ट्रायणके फल घमु³शोधके सीर्,
मकुंफुल, सव समभाग लेकर कुट्ट कर गुडर (तदुंबर) मुलके क्साथको माच्चना
देकर दे रतो प्रमाण लेोला बनाता। महे लादमोके³ २ से ६ गे³लोखी मात्र्रा
माराम हो जल तक देते रहना। वच्चेोका भतस्यायुदार जचित मात्र्रा देना।
रस्त कचज रहता हो तो मारोशयनव³धीनका चूर्ण १ से २ माछा पानीसे एक दे-
र दिनके पोछे मावशयमस्ताजुसार देते रहना। वहुनिभास्कर रष मो इस रोगमे देा हे
नार रदी दिया जाता है।
मस्तककृा भ्रम
वह रोग होता है। चित्त किशो काममें नदो¹। माथ किशो सांधारिक
नम मानसिक बंधो² दु खोने हम गां हो।दैवश मारता है। डिटकी शाक्ति कमजोर
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हरते कफते सम किरता हुआ दीखे। रागी गिर जाव, मेढ़ खाय किशोकोरे रोते हुए और घोर आस्व वंद घरे वो मो मूत्री घर सम फिरते दीखे, भाप आधाश्मे वक्ता हो वेसा दीले। अन्नपर अर्धचि दवथको पचजी आंदि हेते दे।
सुवण वसंत मालती रत्नभागेसार रस सुफापिसी प्रकाळ च धुपुटी शिरोरोग रस मटी आादि औषधीमेसे केह एक या अधिक मिलाकर रजनीत शास्त्रामे च्याप्त प्राण था शिरोरोग हर अवलेढके साथ देना। भारेराय मघनी चूर्ण २ से ४ माशा तक गम'जसदे देना।
दुरालभादि कषाय—चमाथा पंचांग पुनर्नवा पंचांग जंगमोवी, मेरु मिला द्वाख वाला नागरपेसाय हरड़ नींक्सुप पलाश मून उदुंबरमूल सव हपमाग लेकर क्रूट कर रपना। ३ से ३ तोलाका वथाय घर किसी औषधके साथ पिलाना।
मस्तकके आवरण (पड)का दाह आर शोध
चिन्ह—मस्तक्मे ददं, पीडा अधिक हो, घेओंटोंसे आवाजसेसे प्रकारसे या मस्तक हिलनेसे ददं अधिक हो, चककर आवे मस्तक गमं रहे शिकल काळ हो निद्रा कम पदंके स्तायू सज्ज्ञत हो। येढा तुवार रहे। चमथो रूक्ष लौट गम रहे। नाड़ी को गति वढे। दस्तकी चहदीं वृशा रगे घमन हो देा तीन सत्ताहके पीछे रोगी कम जोर हो जाता है वेसा चिन्ह मो कम होता है।
शिरोरोग हरी मटी—पंचानन लौह गूगल सुवण वसंत मालती रस मोगेतर रस चितामनि चिंतामुख जयम गळ रस रत्न पप'टी सुपमा रपंेटी आादि औषधेो मेसे एकया अधिक औषधेका योग कर उचित मात्रा रोम काकसरदर और चिंग्ठ देखकर देना। पहरादिन्दुतैल मृगाज तेल या अजुतैल वेल नाक भोर कान मे चालते रहता।
मस्तक दाह
मस्तकरो वृध्ट—मस्तककी खोपडी मे चोट लगनेसे दाह अधिक होनेसे मानसिक धाप अधिक करनेसे यह रोग होता है। चूदार रहे, पलतकड़ी पोस्ता चककर अनिंद्रा वमन शोक कानकी वाढि कम दस्तककी वझ्री आांचकी तम्रा बेचेनो अर्धा-गशात और अन्य चिन्ह दिखते हैं। यह पित्त प्रधान-मध्यम वात-द्दोनक- कफरोग है। चिन्ह देखकर उपचार करमा। सुखाप चा मुख, शिरा रोग हरड़ वटो, अस्रफ हलपटो), नीहित प्रदावटी, सुवण वसंत मालती, महावचद्रकला पुगं वंदाद्म मकरधवज' वटी मानिक्य पित्ती वयधपन प्राण नवीन अशथ गांठोंदे भवळेढ शिरो रोग हर मकसह येढावंदु तेल आादि औषधोका प्रयोग उचित मात्रामे करेना।
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मस्तक-शिरोपीडा
विरेचन से मस्तक पीडा-शिरोरोगकी कव्जोरोसे आहार विहार के अनियमिततासे क्रोध काम परिश्रम ज्यादा करने क्रोध शोक भय चिन्ता भादिके -संचन शक्ती वीर्यनेसे हतुं वलत सिर दुखने स्ताता है, फिर सामान्य हवासे मिट जाता है। कफजोके २-४ या सनुचित दिन तक सिर दर्द रहकर फिर उठता है। खान पानमे लिस्सप रसता, भूख नहीं हो तो लंघन कराया। पामा रसु धराक ठेना वमन मे एक दिन आरेपयवर्ग नू चूणं २ से ४ माशा तक या मदुबिरेचन चूणं ३ से ६ माशा गरम जलसे लेकर पेट साफ रखना। बदाम की गिरो दगेस १५ से २० दाना, पिस्ता २५-३० दाना, चिरोंजी (वारोलों) एकाथ तोला नित्य चाबकर ल्हाना अच्छी तम खु छोकनी खुंघते रहना। शारदी ल्गनेमे मी यह रोंग होता है।
सिरदर्द के सामानय उपाय-उपर कहे हुये शौपधे मेसे दर्द मे दि३ देवका प्राधान्य हो समझ कर चोयाय रस रसायन गूगल प्रतिमा भस्म भादिकर उपयाग करनां।
१ केशर के गायके, वकरौ के या उटनो के घी मे पोसकर नाकमे १०-२० बूंद डालनां।
२ कुठ पुष्टकारमूल सेंध समभाग कूट पपडी मे पीसकर ललाट मे लगानां।
३ कलौंजी जोश पानी मे पं०च ललाट मे लगाने से शारदी का विर दर्द मिटे।
४ बांये हाथ को कनिष्टिका म्रस्से हैडी (टचलो मांगलो) का मख बधानां तीन मदिने के पोछे वाटनां विर दर्द मिटता है।
कपूरादि वटी--अजमोदायन कूच अजलकरा कपूर काचली (कपूरी काचली) जुलघी पान हलदी सेंठ जायफल मरदासा का पान प्रत्येक दस दस तोला लेकर पानी मे पोस घो रतल ८ मे पढाना जलका शंश जल जाने के पीछे कपडछान करना पंछे उस घृतमे घपुर तोला, २० दाम कर पिघल कर जाय बैसे जोशेमे भरना। मस्तकु को पीडा सिरदर्द मे मस्तक ताऴू या कपाल मे लगाना मदन करना। शारीर के किसी मो भागमे दर्द होता हो उस पर मदन करना। शारिर के किसी मो भागमे दर्द होता हो उस पर मदंन करनेसे दर्द सिटता है।
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मस्तक पुष्टि
मस्तक दिमाग क्रि निम खटर—कारण मोरतोदे| पुष्टोदरं विद्यााभ्यासं करने घोटों के अनेक कारणों से मगज क्षीण होता है । चिन्ता भय क्रोध आयिंक- द्वानि सांसारिक अनेक उपा थें, दिमाग के कामका अमहत्त्व से|त्त स सार व्यवद्दार , मे घानेबाढे अनेक दि|न आदि घने| कारणों से मगज क्षीण कमजोर होता है । आज कल के|लेजों मे अभ्यास दगने वाछे छात्रों केंहृदय ५० टका इस्से दोषठी आादत होती है इष कारण दिमाग हृदय आांतें आदि कमजोर हे जाते है। ओरतोदे| मो संत|ान न ढोनेसे, पतिसे समाग सुख नहि मिलनेमे, वसुरगिद्ध मे पुत्र वधु के नाते अनेक प्रकार के दु⋅ख पहनेसे और संचार व्यदाारको अनेक चिंन्ताओंसे मस्तक कमजोर चिन्ताप्रस्त क्षीण होता है ।
दिन्द— सिरमे दर्द होता है, चक्कर आता है । सिर आंखे लशट तपतद् हह, निद्रा कम आती है, बेचैनी रहतीं है फिसो काममें चित्त लगता नहि । मस्तक्मे उरःशूल रहता है वह मू|त्र कम उतरता है लोरतोदे| मृदु मांसल वस्त्रं उल्कष्ठान व्यक्ति या धनीमसित होता है सेफेद पानी पिलाकर मुष्टि मो|गम क|लन होता हैे ।
मस्तक पुष्टि लिर्मत्रण—मुक्कापिष्टि तैला ०॥, श्वर्ण वस्ञत मालती तै। ०॥, प्रवाल च द्रुटो तै। ०, महालक्ष्मीो विलास तै। ०, पाहर मोदरां तै। ०, धम्यता स|ाथ तै। ०, स|मासृत ठेह तै। ०, शिलाजंत प्रये|ग तै। ०॥ सक साथ मिलाद्र दूधोमें मरेग्दे। दिनमें देा समय ७ से ६ रती, च्यवनप्राश—जीवन श्शेधवा घृतदधेके साथ ठेकर चटपर दूध या जो पीनेकी आदत है|पोवे ममतद्धै सम प्रकारके दोष मिटद्रर पुष्ट हेाता है । हृदय फेफड़े छातीोफे रेागमें उत्तम फायदे करतां है ।
- मुक्काफलच—मुक्का पिष्टि तै। ०, प्रवाल चद्रुटो तै। ०, अश्नक मरम तै। ०, माङ्किवय पिष्टि तै। ०, स्वर्ण माक्कषिक मरम रक्त तै। ०, रौप्य मरम तै। ०, श गभहम २वैत तै। ०, पूं०च गेोःय तै। ०, रस ग्राथ मिलाद्र भस्मवर्ग के जलको भावना देकर चोटकर रचना । दिनमें एक वक्त प्रातः काल ४ से ५। रत्ती शहद मक्सान या दूधसे देना । उपर बादाम खाना । मगज पुष्ट वळवान् होता है । स्वरनों श्वासंनली छाती के सव रोगमें उत्तम गुणकर्ता है ।
मस्तक पुष्टि हर्दि—अश्नक मार्म मुरकाश्रफि विद्धि च गभस्म श्वेत वह|द्र मरम केंद मरम रौप्य मरम घफेद मुशाली इलायचीदाना| चीनोेकवाला वंशलेाचन छोटी पीपल घोमलक्खो मूल (घालमलीमूल) प्रत्येक एक एक तोला, अश्टवर्ग ८ तोलू साच मिलाकर पोस्त अर्द्धमे ३ रत्तीसे मे|ली पत|न|ना । २ मे ३ गेोली दिनमें एःड सथवा दो दफे पानोसे या दूधसे देना ।
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- मस्तकरुचि म्रूणं—बादामको गिरि तैल १०, पिस्ता तैलां १५, चिरोंजी तैलां २०, कस्तूरी मस्तको तैलां १, शृंगवेरं स्राठे' मिलाकर तैलां १५ सफेद मुशलो तैलां १० चुलका नींब तैल. १० दावकर तैल. २०, वंशलोचन तैलां ५, शुद्ध केशर तैल ५ तज तैलां २, इलायची दाना तैलां ३। सर्षप तैल रचना हमेशा प्रातः कालमें १ से २ तैलां चूर्ण दूधमे हाल पकाकर पीना । थयवा ॥ से १ तैलां चू' पानीखे लेना पीडे दूध पोना निमित्तसे काम करनेवाळोका वहरूँ लाभ करता है । मगजकी सव' प्रदारको वीमारो तकलीफ मोटती है ।
नीचेके प्रयोंगेसे मगजके सब रोग मगजकी दम जोरी घम याददास्त आर्दि मिटते है ।
१ अच्छा छौंकनी चु घना ।
२ पडमिंदु तेल अथवा मृंगराज तेल म नाकमे बालमे डालना ताकमे डूंs
३ मदारकस्तूरी विलास ३ रत्ती शहदके चटकर ऊपर मदरमगीरी १५ से २०-रत्ती चाष कर खाजाना चपर दूध पेना।
४ सुवर्णं वस त मालती ३ मेढ़ीमे वष्टंगमं चू' ४ माशा मिलाकर शहदसे- ठेकर उपर दूध पोना ।
सिरके बालकी जूंये लिलहे
वाळकी जूंये सौर लिंखे —वालमे जूंये और लिंखे पढ़ी हो। उसका उपायं-
१ घटढ़के पान के रसमे अथवा तांबूल—नागकेवलके पान के रसमे' १ तैलां गरम मिलाकर पाकलमे' धोनेथे जडो लिंखे मर जाती है' ।
२ घटढ़का पान तोला १० पोसना पांचें तिलका तेल तोला २० मे ढाल और-मतुंरेके पानका रस तेलां तोला १० ढाल पकाना पानीका अंश जल जाय जब कपड़छान करना यह तेल बालमे डालनेसे जूंये लिंहें मर जाती है ।
३ वायविडंग तेलां १०, किचननी अथवा वीदको जड़दो तेलां १० पानीमे पोस्त उसमें घरसोंका तेल तेलां ४० बाल पकाना । पानीका अंश वस्य-काय जब कपबछान करना यह तेल बालमे डालना जये मोड़े पर जाता है ।
मस्तक की टाळ इंद्रलुप्त
मस्तककी पतलोसे कुतता हसरे अनेक कायोसे' मस्तकके बाल गिर जाते'रहते २ और टाळ पड़ती है । नीचेके प्रयोंगेसे टाळकी' जगह बाल उगते है ।
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१. दामोदांत की भस्म और रसेांतं बकरीके दूधसे भयथा पानौसे पीस कर लेप करना ।
२ शुदरकां दूध आंवला दूध बकरी बढ़शाद आंगरा अफेद कछनाग हरड़े महेदा आंवलां छोहेका चूरा शुषची (गुंजा) इंद्रायणाके फल घरसों मिलीय थब प्रमभाग छूट गोमूत्रमे पीस परसोंका तेल घकसे चार गुना लेप कर पदानां पानीका आध जल बाय जब कपड़ छानकर रखना । टाल पर लगाना ।
३ हाथीदांत की राख और आंवलां सम साग कूट कर पानीमें पोत लेर लगाना ।
४ इंद्रायणका पंच्चांग को महीन पीस टाल- पर, माढ़ा लेप कर पाटा बांघना । ३४ घटाके पोठे पानीसे घोकर साफ कर फिर दूसरे दिन लेप करना इस प्रकार ७ दिन तक करनिसे टालकी जगह बाल निकलता है ।
५ चमारकूचलीका पचांग पोत लेप करना ।
६ ढेकान ५ तोलमे एरंड चौकरी गिरी १० तोला पानीमें पीस लेप कर पाटा बांघना ।
७ कलंमें चिगींकमाला सेंघानोन आंवड़ां बढ़वादू घम सम भाग लेकेर सेंघक दूधसे पोस दे। दे। तेलाकी सेरगठी बनाना । जरर हो जांन आंवड़ेक पानीसे अथवा दहोसे पोस कर लेप कर पाटा बांघना प्राप्त काल । व आंवड़ेक पानीसे घो डालनां इस प्रदाथ १० से १३ दिन करनां ।
८ पुंठाका नवसार ग घक लकेरकी राख घम भाग लेप कर आंवड़ेक पानीमें देई दे। तेलांकी सेरगठी वनाना । पानीमें पीस लेप करनां ।
९ पकाया नीलाथेधा घमायमा कुंकुम ललाटमे चांदला करनेंका कुंकु वीदरचीक हरेक पांच पांच सेर छेदर महीन पोसकर गायका घी सेर २॥ सेर १०१ पानीसे घोकर उपरकी चौजे मिलां देनां मलमकी तरदृ लगानां ।
सिरका खेड़ा वण गुमड़ा
१ हरें केर- करीरके फळके! अतथ्युम पकां कर करजे या घरसोंके तेल अै पोत घर लगानां ।
२ हिंगूल गांठक मैनषिल हरताल शेनागेर चौदार साल मावची होरादकण विंदूर कपीला सव सम भाग लेकेर अलग अलग मारीक कर सबसे दूना सोप और तिलकी तेल मिलीय पका कर मलम वनानां लगानां ।
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उदररोग-पेट के दर्द
कारण—जठरा'ग्नि मद होनेसे सब रोग हो'ते है । इसमे भी पेटके रोग मदाग्निमे अ्रधिक होते है । अजीर्ण पर भोजन करनेसे ठं'छा, रातताघो विगर्हा हुआ मन्नपान खानेभे मोंठोमे मळ जम जानेसे, सामाशय विगदनेसे, स्वे'द जलको वहन करनेवाले मार्ग विगहनेसे, वात पित्त कफ, ग्रा'ण मायुकेो जठरा'ग्नेको और भगान वायुकेो विखृत कर पेटके रोग उत्पन्न करते है ।
चिन्ह—आफरा चढे, हरने फिरने की श'क्ति नप्ट हो, कुशाता पंदबिन शोकु मवयवोमे दद' मळ का अ्रभरोच दाह म्लानी आदि चिन्ह घच प्रकारके उदर रोगमे न्युनाधिक हो'ते है ।
वातोदर
चिन्ह—वायु प्रधान वातदर रोगमे हाय पांव नमि और पेट पर सूजन हो वा देना करवट हो'तरी कम्पर और पीठमे पेष्टा हो, मोंभोमे दद' हो । सूखी खांसी आलस्मा गारीके अमुक चिन्हयोमे न्यूनता, मळ रुक्ख ज यु, चमदी काली सूखी कक्ष हो । ऐसें चिन्ह घटे बढे । पेट पर पतली काली शिरा'मे वी'खे पेट फुला हुआ हो । पथ्यालकी तरह शान्त करे । सामाशयके उपरके मागमे वायु फिरता रहे ।
वातोदरार्ति गुटिका—पांचक तैल १५, गुद्द पारद, म्रणक ताम्र लेह्ह म्रवित मासिक प्रत्येकशो मरम पकाया सेंहांगा प्रत्येक ३ ठ ठ ठ तैल, मिलानित पंचवलण प्रत्येक चार चार तैल, डिंग तो ६, दू'रड तो ६ सम साथ मिलाय निं'दु रसको अ्रथवा' दोजोरा निम्बुके रसकी वो जो मावना दे'कर २ रत्तेकी गोली बनाना । २ से ४ गोली पानीषे दिनमे दो दफे देना । इसकें सेवनसे वयुसै उदर रोग मिटता है । पुष्टम उद्दंरच्तनसे लाभ करता है ।
रसोन्नति तेल—मेठ पिप्पल कालोयिमरद हरड वहीडा अ्रभया दतंमूल हिगं सेंचानो'नचित्रक देवदार घच कूष्ठ महह्ना'जो छाल पुनर्नंवा म्र शललवणष वायविडग अ्ररमेद गजपीपर प्रत्येक बार चार तोला निसोथ तेला २४ कूटकर २• रत्तल पानीमे १२ घंटा मिगो रखना । पीछे घममे ल'गान रत्तल ५ पांच और तिलका अ्रथवा सरसैका तेल रत्तल १५ पदद्र डाल कर परास्सा । पानीका जल जाय जब तक घीमी आंचसे पकाना । पानीषा अ्रधा मल जानेके पीछे १२ घंटां वै'से हि रहने देना, पीछे कपड छान ले'ना । १ मे ३ छोटां चमाच्च खुवषे या पानीषे पिलाना और उदर पर मालीस करनां । वायु'क उदर रे'गमे गुणकारी है । और वच प्रकारके वातरोग संधिॉो पंदा, तिरली लीवरका रोग पेटको गांठ मवासीर उदरका शूल भादिमे उत्तम पथ्य है ।
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१ दस्तको कच्चो हो या मल सूख गया हो तो अर्शचाली अधिक वा इच्छा मेशीका खुलाव देना ।
२ पाेपाल और सेंघानोन समभाग कूट '२ से ३' माशा उष्ण जलस्ने २ रत्ती देना ।
३ लहसन और अजवख एकएक तोला 'लंे पकाकर मे।छटांक माथ म्वाना ।
४ सरसों तेला १॥ कूट कर बाजरीं खाटामे मिलाय घेफाजु २ गलेरीं -खर पेटपर बांघना ।
५ तिन्दको सलं (तस्तना खेलं) को पोसकर पानीमें पकाकर पेटपर बांघना
पित्तोदर
चिन्ह---कुवार आवे वेचेनीं हो शरीरमे पेटमे जलन दाह हो तृपा लगे मुख कडुधा तीखा लगे । चमकर दस्त शमधी पोलो पेट हरेर गका दीसे पाखीनां चूॅटे पेट फूले दर्द हेा । कट्टे डकार आवे छातीमें एलन हो वमनमे पोला कफ निकलै उसमें कभी लोहूका अंश हो मस्तकमे पिंडा हो शरीर शियथल रहै श्रमराहट बहुत तीखण-जलद पडाय' खानैसे' दारू अधिक पीनेसे लोंया कुम्रा खुराक पाचन न होय गर पेटमे रहैसे सडकर पित्तका उदर रोग होताहै ।
पित्तोदरारि घट्टी---पारद गंधक रा'व पिष्टी मुक्ता शुक्ति पिष्टी मंडर सर्षप धत्रक भस्म प्रवाल चंपकपुटो प्र येक आठ भाठ तोला, आंवलां घहेरां नीम गरमेध पुनर्नंवा कटामोघी कुटकी लताकरंज वीज नीसेेध प्रत्येक चार चार तोला अभ्रलताश्की गीरी तोला २८ हरड़े तोला ८ घन_साथ मिलाकर कडाली माक्ष और वपं ट (खदिरवल्लीया पित्तपापडै ) के क्याथकी भावना देकर ३ रत्तीको गोली बनाना । २ से ८ गोली दिनमें ?॥ या तीन दफे पानी शहद या अर्कखनसे दे । पित्त गरमीका उदर रोग मिटै ।"कल के या शरनीके पान पीस कर गार्मे कर पेट पर लेप करना ।
कफोदर ग्रहोदर
ग्रह कफ-वारदी प्रधान घदर रोग है । चिन्हने म री पाचनमे गरिष्ठ शाकफर शन्न धान अजीर्ण पर मोजन बाजारकी मीठाइ ठंडे प्रदाहो ज्ञाति अधिक खाने पीनेकी आदतसे गदह उदर शेग होता है । यग प्रदयांघासे दर्द हेा उदरम दर्द हेा शरीर पर और पेट पर सुजन हेा । बलानि वेचेनी 'मल मबार्चु निद्रा खांसी चमधी कफेर्दि लिये पेट डठिन हो तृपा न लगै पिखार याव्वा, दस्त चिन्ना याव्वा (निकले
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कफोदरादि घट्टी—पारद तैला ८, गंधक, तैला १६, ठंड ताम्र भांखं प्रप्येक को मरम, सेठ पोपल, डालो मिरच पोपरींहल तज डोंग देवदार रास्ना कमर-
मोद अजवाइन कायफः हिग चित्रक नायविहं गुरतकौ, प्रत्येक चार चार तोला
निसैथ १२ तोला, हरड़ तोला ८, सब साथ पीसं तुलवी और भदरक्खी भावनादेकर दे रसौकी गोली वनाना। ५ से ६ गोली पानीषे देना। कफ षरदी से हुवादेकर रोग के लिये उत्तम है। कफ षरदी खांसी श्वास विशेषकी रक्खावट विशाळ
को जलन आदिमे मो गुणकारी है। कफठेदार मिटता है।
कफोदरादि मिर्षण—सवेँश्वर पपं टो कव्याद इहलत घारे गयच्यंनी चूणं समो मस्तको छव समान माग ठेकर ४ से ६ रत्ती दिनमें देया तीन दफे
पानोषे देना।
वंध्यान—गुड़ी देपान तमाखुके पान पंंहुके पान चौलाई समभाग देकर पोस्तकडर गमंकर पेट पर आधा घमुल का लेप करनां।
च षरण—बाजरीका आटा आंरनें उपलकी या छाछा को गरस सम भाग मिलाकर उसमें दो तोला नमक डालकर ठंडा मोती रोटी (रोटी) बनाकर एक गंजु तावड़ीपर झेक कर पेट पर बांघंता दस्त पित्ताव छूटं उघर रोग मिटता है। घमादं
मै २ या ३ दफे धरनां।
दूष्योदर—दिषोदर—सन्निपातोदर
अन्नपानमे विष या विपेल चीजे खिलां देनेषे, दिषाराम पानी दूध दाल भात खानेषे, गरोली पल्ली (हेड़गेरोली) जैसे फंदु या उल्मीं लार मुख अन्नपानमे गिरनेषेसंयोग विरुघघ धषपान लेनेषे तीनों दोषोंके हदपसे उघर रोग होतां है।
तथा पेट फूलता है। पद्मे दर्द है, कठिन है, वमन है, दानेो पाखं करवट होजरी कम्मर पीठमे दर्द हो, मुखमे झाप हो दस्ती ज्यादां हो तेम्रें—घन घे चछद्द है
फ बांधोंमे विगा मादि चिन्ह होतवे है।
दिपेधरादि मिर्षण—घारे धयवषंनी चूण पुनन्वा मूल हरड़ टं मार्सीसुवा पपंटो घम समान माग ठेकर ६ से ८ रत्ती दिनमे देया दिन दफे उपर
गूलरके मूल का सपवा ढाकरे छालवका कवाय मिलानां।
कद त्यादि कषाय—कद तीकषुप ढ ककां मूल गूंरकामूल वटा मोंघी पुनर्नंवा डोपल वक्षको छाल धोतकी छाल कुटकी सघ यम माग ठेकर कूटकर रखनां।
४ से २ तोलाका कवार कर मिलानां विष विदारक्खा या वात पित्त कफ प्रकैपपे हुषेे कफरखभाग मिटता है।
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क्षतेादर परिेस्त्रहीं उदरेाग
सन्नेे सोंप क'टक सुदृ'आाद पेठेे मानेभे वरी चर्व अ'दका घास सम्झे, भावोकोा यां होामरी कोा मेदत। हैं , जय जसमें पाक हैाकर पानी जैेवर ाक म्रुदा द्वारा होात। है । तव नामिळे बिन्चा पेठ बढताे है । कटताे हैे गैसो पोाक्ष हैोती हैे । इससे वमन भो होात। हैै गुदा या मुख द्वारा म्रुल भोे निकलता है । षोजरीमें किषो एक सथान पर स्वचििल रेे होात। हैं । पेठमे वायु भाता है । घटें षकार (घवराहट) भाता हैैं ।
क्षतेोदरादि गुठो—पारद गंभक -ञ क्षेयं नाोलोमिवच म सपत्तो (जावंी) दरड षातावरि चोपचीनो मजीठ शाकुर , ण-गय्चो, द्वारत। अनेयेह चार चार तोेलण झेर आोंके दूवमे शोधा हुवा रस येरु द ते का, मेसर द ते'ला सक विबिळत मिल।कर तुलसोके रससे मु म प्रभारण मेोली चनंतरा : ं मेे य गोली एक- या पानीसे बढो हि मिगल जाणा । यह ंिलो उपर क ंहौ जांी! द रेागमें भो गुणकारी हैै । उपर पथ्यं का कतबाय पिलाना ।
कारण—चिकित्सा वक्षा भन पान मानेभे अांतें मन्न जमाता हैै उ बहु मुराफेलीसे सूखा वकरीकी लोंदी जेधा येठा निकलता है । झेर द तेल भादिके पिचकारी देनेे भी करचिस येठा मल निकनता हैै । इसठठा त्रा हुवा मल जाभि और उसके उपरके भाग तक जमता है । इसमे हच्छादेी र ३ से ४ मेेलेभे गम' वलेसे देना एरंड तेलकी पिचकारी हमेशा देना वात पत्त कुहं प्रकोप देखकर वातो दरार वटा, पित्तो दरार वटी वांचित माछामे देना । आरेभपघंनी मूंळ २ सेभी मात्रा तक गम' जससे देना । अश्वचोा होे ८ r ११ गोेली देना क घाम करना और रेागका स्वरुप देख कर उचित उपचार घ्ररना ।
वद्य गुर्दोेदरारि घृत—हिंग लसुन अभ्रक पोेधी हुये सह चनेेे्श्री फली पीपरी मूूल हरड दतीमूल जंाखार मज्जीखार शेेभानोन लताकर'ज कीह शमूल नीोेधष हरलदी देेतदार प्रत्येक द्रष दष तोेल्या म्रकर कंचल के न- द्रये हूव जाय उतने पानीप रात्रमर भिगो रखना । प्रांत काल उसमे घो रसंक १० हाकर मकाना । पन्मेक का जंधा जक शर् माय जप कपद छानकर रसखना । १ , ३ से ४ तोेोल्या अयवा रोगका हदप देखकर और अवस्धा दिखलाकर हितकारी मूतुसार वात्री देना क घाम उतपरेागकी दवाइ मी देनी ।
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आमाश-पेट फूलना (ऐडहनी)
पेट सुस्ती गैस हो, पेट दर्द बहुत होवे, रोगी घबराहट के तरद्द स्वाँस कष्ट से लेता रहै, आम और मल को प्रतिदिन गति होकर नहार न निकल सके, पेटमें दायु भर जाय, तृषा, नाकछै पानी गिरना, हेठरी में शूल डकार, छाती सफ़ेद जानो, मलामृत दूषित जाना मूर्छा आदि चिन्हे होते है । जब मुखसे मल निकलता है। सम उदर रेागमें कुपित व व मित्त, स्वैच्छाहों और जलजाही स्नेहोंसे हृद दर प्राणवायुसे, कफरा'मेन्से और अपान वायुसे दूषित हर उधर रोग चुत्पन्न करते है । सम उदर रेागमें प्राय यह कारण मुख्य है इतर कारण गौण है । इसे आघमान या आमानाद कहेते है ।
आरारायवध्ने चूर्ण—२ से ४ माशा गम्भ हलसे दिनमें दै तिन दफे देना । इच्छा मेरी की ३ से ५ गोली देना । आचक पान पर एरंड तेल लेपेट गम' कर वांछना । खानाकी रात और बावरी का भाटा सम भाग लेकर पानी सिरपाय गरम कर पेट पर बांचाण करना ।
नारायण चूर्ण—चित्रक हरड़ चेहड़ा आंवला सोंठ पोपल कालोमीर ४ जीरा कद'त खुप वच अश्व'यन पीपरीमूल सोंफ तुल्ची पत्ता यनमोदर कचूरा घनिया दायविड़ङ्ग कटौजी जीरा चोसमूल पुष्कर मूल जवाखार सजीखर पंच स्वण कुछ प्रत्येक चार चार तोला, द तीनूल ६२ तोला, चमाच दूधली ३२ तोळा रव साय फूटना । मात्रा ०l से ०॥ तोला गौमुत्र या गाम' जलसे देना । आघमान आधरा पिटता है । जपा हुवा मल निकल जाता है । गुद्म मलादेष अपान वायुका अस्तरे'घ वतरोग ववाधोरे पेटका मूल परिणाम मूल निल्लों यकु? रोग आदिस्सर प्रकार के उदर रेागमें गुणवदारी है । कँसो प्रदा'के-निप निकारमें गम' घो के साथ दिखा जाणा है । इसके कवाय को पिचकारी भी दि जाती है ।
९—छाटी पोपल बीना पीसी धो'-खड़ोदहि केा सुद्धि दूसमें मिलोकर सुख कर चूर्ण करना मेगका स्वदुप और रेतीका शरीरका ह'ल देखकर २ रत्ती से प्रारम्भ कर प्र'तिदिन एक एक रत्ती बढाकर प्रतिदिन ४ माशा तक दी जाती है । यह उदर रोग मिटते है ।
हिदंघ्नु जल—निसोथ हरड़ वहेड़ा अं'वला पाठ' द'तीमूल कूटको अमलतास कों मिरि मोथ गोपल कालेमीर्च चित्रक छेष्टी कटहररी द्दोधकडहरी ग'जीपल प्रत्येक चार चार तोला कूट । पानो रत्तल r योरेर नजुड़ी दूर व लेा १६ और घृत तैला ५०० तोल्दार पानोको अङ्ग रल आंघ सव प्रगढ़ होई ।
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दूर या पानो के साथ जितना बिन्दु युंद दिया जाता है उतना दस्त होकर उदर रोग जमना है ।
उदरारिद रस्—यह त. र. न.) पारद १ धतू पीपल हरड ताम्रभस्म भस्म नतुल्य सवर यपमाण लेकर घोटकर युदरकृत (जुं०)द्रुमे घोटकर रस्सी प्रमाण गोली वनाना । इसे ५ रत्ती तक रे.गमा सहर पंसार नह कर इसे देना सम प्रचारके उदर रोगो नाशकर गटेदारमे गुण जारी है । दोपहर च"ना हो जब खुराकमे चावल दहीका वेल देना ।
जलेादर—जलंपर
कारण चिन्ह—जहरा¹म म द होनेमे जिना मूल लगे गरिष्ठ आहार छोने रह नेसे विरटे हुए मल्नपानं, वमन विरेचन कियाये नींवं न करनेम, च्वनक फोर, नेमे स्रकाट होनेसे, दाहू अनि पीनेसे भादि कारणोसे यह रेगे । या होता है ।तृगा लगती हैं । गुदामे रुख व हेता है खोमी श्वास सन्न च रे.ती है । पेट पर कििराये दींनवती है । न.मिदा माप गो आकार होता। है । यमा भरी पनाल जेसा पेट लगता है । दयानें पानो भरे पतनाल जैसी स्रदर, मुखका त्वाद विरहडा हो आंखो पर सूजन है, भूत मंन्द शरीर कुचा जाकंकर न हेा गया हो यह अशा चिन्ह है ।
पथ्यापथ्य—पथ्य नो और विश्राम दस्त लानेमा उपाप दरना । घावल दुग्ध मुगधा पानो भादि रुचि अनुसार देना । मट्ठे पताप या रस खुराक खराब शक्कर हो चोंजे वट देना । जिस देाप चा सके प =युनान"क हेा जाच कर खराब और शोषध प्रयोग करना । वास्तदेमं-नलंसे पानी निका³न:- आराम मिलता है लेकिन तोषरी या चोथी वार प नी निकालनेमे रोग घर नहा है । जहां तक हेा सके चौपद से पानी निचुड़ सुदे थेैसा उपाय दरना ।
जलेादरारिद रस्—पीपल कालीमिोरच (िज्ये्पम कयन?र्को छाल सम भाग लेना । सब के वर-वर गुद्द जलानगे टा लेकर 'जुं' रस्समे घोटकर रस्तो प्रमाण गोली वनाना । पमें इसे ९ गोलीसे प्राग म कर ह वलि जिाम देखकर अधिक गेाली देना । दस्तमे पानी निकल घर जलेादर का रे= मटन" रे , दू²रे उदर रोगमे भी यह द। जाता है ।
हृच्छोश्वेद्दी मेहो—नेहरी रोगमे हृदय शूल, चक्कर सौिहोगी सब समान भाग छेना और पथ्ये नरामर यमालगेाटा लेकर निबूके रस्समे गोञ्जी
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रती प्रमाण वसाना । जलेादरमे २ से ४ गोली तक दोी जाती है । प्रारंभमे १ या २ गोलीो गुनं लनेा पीदे आवशयकता अनुसार मात्ना चढाना ।
लघून हष्टो—लघुन कं, दली शेर १ मे शहद शेर १ डेढ़ सेर महीन पीस कर धीमी आंचसे पकाना गाढा होने पर जल छोड देना । हरेक्सा १ से २ देोल॰ तिलानेमें लठेदारमे फायदे होता है ।
आरारोग्यवध्नॆी चूणॆ—०१ तोल॰ी मे प्रथर भकर प्रतिदन २ तोल॰ी तक दिया जाता है । दूधका खुराक वन॰ा हॊ मदिनेमे जलेादर शियतॱा है ।
अलॆादरार्तॆ मिश्ररज—आरारोग्य वध्नॆी चूणॆ तोल॰ा १५, किलाजीत तोल॰ा ८, लव॑गि भस्म, शंख वटी, बृहत॑, मंड़ूर', घटक प्रयोग चारचार तोल॰ा खराथ मिलाकर ४ माशॆ प्रातःसकॱर प्रतिदन १ तोल॰ा मात्ना दोो आतो है खुराक रेागानुसार रसना ।
१ नारायण चूणॆ १ से ०॥ तोल॰ा प्रतिदिन देन॰ा ।
२ एलॆीया शोर पुष्टिर मूल रस माथ टूट कर प्रतिदिन माशॆ प्ररभकर ४ माशॆ तक बढाकर पानीमे स थ देनॆसे ७ जिनमे लठादर वद्नॆ लश होता है ।
३ उटक॰ा मूल (नरक॰ा) तोल॰ा १० शरॆीदॆ दूधथॆ देनॆमॆ ५ दिनमे जलेादर मे फायद॰ा हेता है ।
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शूल, परिणाम शूल
कारण चिकित्सा—वायु धरनेबाले द्रव्ये सतवासी सदा मुआफ अपनी प्रकृति के प्रतिकूल श्रेष्ट आहार करनेधे, बिना अन्न पाचन हुए भोजन करते रहनेधे, पित्त वात करने के प्रतिकपे पेटमे सूलकी दर्द होता है। जब दिनेशपे अनवसर भोजन विशेषसे अतिसारके अंसरकु या थाय मिष मिन्द भरयवेधमे धरको तरह पेटरा होती है, जिसे कुनसा रोल 'होता है। वह प्रभ्य: पेटमे आमाशयमे पक्वाषयमे मािमे या मारिके प'जुषाजुमे होता है । शुरूक लेने के पंछे २ से ३ या ४ घंटाअप अर्थात मन्न पाचन होता है उस वक्तन शूल निकलता है पेटंग दर्द होता है उसे परिणाम शूल कहते हैं।
नाभिमें; स्थानमें अथवा नाभिके इधर उधर शूल निकलता है कमो कमेजे के, स्थान्मे या तलल्लो को जगहमे बकृकेफे धयानमे पीड़ा होती है। तेल मालीशके और छेक करनेसे शुल शान्त होता है। दफत और वमन हानिसे उक्तार आनेधे अथवा वायु छूटनेसे शूल कम होता है या चठ जाता है।
रथ्यापथ्य—काघारंग शूल जोरसे मिटता है। भाकड़ पीड़े पान पदर पर डटहल रस'कर गम'कर दूधको जगह दाखदर ऊपर शेक करना। उस जगह वायु रोधक तेलका मद'न करना। दफत नंघ हो तो रथयवेचाली, इच्छामेद्री का जुलाव देना। या आरेप:= वचोंनी छूण' २ से ४ माष' गम' जलसे देना ह भूप न दे उवतक ख नैंपा नददि देना। एक या लवन कराना।
शूलग्नकेरारी (रव प्रकारा सुप्रसादर ॥ १६६ + १३६ ॥)
आजः सुतेमा गंधकं भागामेकं मध्यं' पंक्षारसत्वंचवमध्येष्ट गामम् ।
शुष्क ताम्रं चेभयेसुतुल्यभागं कन्यांतोपीमेन्च्यं मेन्च्यं रेनः । विधेय मृदूद्रों' वै धार्तिं' सपूतांतः साहुद्रादृध्ये स्थापयितद्वापि यत्रैव
दत्वा मुंद्रां माण्डवकत्रं निरुष्य गते' कुर्वा स्थान्के: पुष्टितं सत् ॥ पोंच पुन्यं' नामवम्क्र पुटं दि दरवा शीत' देहदरेतद्भ प्रयत्नातः ।
नकरम तत्पणेरक्रपड़े द्रिगुजुगु' शुलाग्नपणौ नारायेष्ट्रक्षित नेतः ।
हिड्डुण' गुण्ठ दोरक चेपण है चूप' करवा पायचेदुष्णतोच्ये ।
१ माष पारद, १ माष गंधक दोनोकी द्रजलंल कर १ प्रहर तक घोटना ।
पंछे उसेो दे'नोदी बरावर अर्थात २ भाग चूर्ण त'मका चूण' हालकर कवार पाठालो
रखमे नौट गोली बनाना। उष्ण गों'ठेक्के पाराव समुटी में' रखे कपड़मिट्ठी कर
कुदाकर पंछे उसे सपूटोरे लक्षण यथ्रमे रख- अर्थात एड़' देड़ोरे सुपुरके ऊपर
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नीचे ममक सत हुंडींक! मुख ५पह मिट्रोसे यथ कर उष रुंडींके। गजपुट्टका संपि देना। स्त्रां'गक्षोत निचाल फिर पारद ग धककी कुजलो ताप्र चूर्ण'के समान ढाल ऊपर वताये अनुसार लवण यथमें पेउकर गजपुट्टशा अग्नि देना। सर्वां'गशोत निकाल कर फिर पारद ग घकक ३ कुजलो ताप्रचूर्ण'के शपनं च लव ऊपर कताए अनुसार लवण य ग्रेंें पेउकर गजुट देना। जल त म्रमरम निरुथ हेतु सथांत निचू'रष में ढालनेंसे हरा। रग न होत तभ खानें चांदी सध्ध्ना। इखको २ रत्ती मात्रा पानीके पुटौमें दिलाना चपर अनुरान हरषे हिंग मेठ काली मिरच और मोरा यम मागधे ड़िया हुवा पूणर्ं २ चे ३ माशा गमें जलषे देना। -सद् सब प्रकारके शूल रोगमें उत्तम गुणकारी है।
नोंध—इस सूत्र गजेंद्रसर रचका मूल पंठ शांर्ग'धरकका है। उक्ता उतारा मैषज्य रत्नावली में इसप्रकार लिखा है परद एक भाग गंधक देा मग को कुजलो में ले ? माष तक घोटठे रहना। पीछे देनोके वरावर शुद्ध ताप्रका चंपुट बनाकर उसमें वह कुजली ढाल उस गेपुटके नमक मरी हुड हंडौमें रख गेपुट देना। उस गेपुटको पचं न दे। रत्तो पानीके साथ देना यह एक प्रकारका तांत्रिकसम्म 'तिह है। इसे शूल गज केतकारी नाम दियां गया है। इस प्रकार करनेसे तांत्रिकस्म कच्चो रहती है और वांति शांति करती है। तांत्रिकों मियकर विपषी उपमा शास्त्रकारोंने कही है पर च वह वांति शांति रहित हेंतो विभिन्न रोगमें उत्तम गुण देती है। शांर्गंधर और भैषप्रन्य रत्नावलौंके अनुसार एक गजपुटमें उ.नमदम रग न हो अर्थात हरा चकाट न लगे तव वह तेयार होती है। खाने लायक वनती है एक गजपुटमें ताम्र मरम खाने लायक नहि वनती, वमन श्रादि उपद्रव धरती है। हड लिचे पारद गंधकके योगसे लवण यथसे ७ से, ८ या अधिक वार -बफानेंसे ढाल रेगमें देने चोयप वनती है। शांर्गंधरमें पारद ग धककी कुजलीके वामेक मदंयेत ? प्रहर, ३ घंटा घोटनेकका लिखा हैं। जव भैषज्य रत्नावलौका संगहकार शांर्ग'ररकका हि पाठ देता है और मासेक मदंयेत एक माष तक कुजलांमें घोटनेकका लिखता है यद्य अंकारौय है। शांर्गंधर और -तथका उतारा करनेवालों मैषजग रत्नावली कार देनोके मतानुसार ताम्र गेपुटके ? गजपुट देनेंके पीछे २ गुंजा देनेंका लिखा है यह योग्य नहि है कयोंकि एक हंडौमें
निदरष माने माति-शांति रहित नहि हो सकती। अर्थांत ताम्र म.न परद गं'ररककी कुजरोके: योंसे लवण-प्रकामे इतनी दफे पकांतां चाहिये-जल तक द्रति श्रांति न हो। इन देनोका रस प्रकास मुषाकरिद्रा पाठ भनुषवधिन
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विपतिंदुकुसुम विटपी—पौंसुमे गुड कर गूमें पकाया हुवा शुद्ध कुचला चूर्ण ५०, वारद चूर्ण ८ मघर तोला ८, सेहु पापल तनों मिरच भतीस विपती मूल सतमेइत सम/१२ तो १० मेक तोल? नार घर, अकरदरा चालावीरा (काली पोस्ते) मूंगेके तीन रत्ती l:मार प्रत्ये क तेला वे लेत, तज तेला १, शफेद वचनाम दाल ४, मध मय वेईडर रसौ प्रम न मेालो यनाना = थे ३ मेालौ दिनेमे दो ममय मे नो' इत्ती । सवै प्रदारहा मूल पेटफ हव दर्द मे शांति परिलाम हुय गमन वचार पेटडो प्रतमो पेटखा किमं, पुलर वायु मेाला हिल्सो ल'वर्धो कुंद सोंद रोनेमे जनम गुन हरनी हें ।
मुस्तारि रसाथ—पह'चमन हरद बओला हे टो वझी सहरोशरा मूल पुढेर मळ गुन्तंवः मूल गट'डी नू?, ३ सलतास का गुद चप लम माप ढेन्त १ थे २ वेल र?! वच शनाछर दिनमे दे। चा तन रफे पिल्ना। पिलाने हसन १ थे १ माशा हि'टच नू? मथमा लमा मारकर चू? वाल्ना । हरनेक हे सुं पेटन रेगने गुनकारी हें।
मुनहुर चूर्ण—इंद कुचला तोल। ४, दू?लोय। तोल। ४, हरह पठा दिर्मेप (जावत्री) नू?कर यों? इिोत्री लपड़ोया खार। वीड लवण थे लेनन वपवार संचल नमवार पकायो फटकनी प्रत्ये ड एण्ट टक तेला टेढ कर रखना । २ मे ३ माशा नम' फलसे टना उपर ४ ते ल, गी'मुत्र पिलावत् । हर प्रकारक मुल गुग्प वठार दोफेदार जलेार वार रोग किमं fिझार के रे:प र गुनकारी हें।
हिंगुल भस्म प्रेत—दिगू न दहः तोल? २ शेकर एक पछड्मे अच्छी ५० मे नडहा हर पीस हुहा मारल वार पंघक तोल २ नींचे तोला २ उपर दोच मे हिगु?ल रस्म उपर पूंमी इड ढेक दरचा और चोणाकी अधि देना । हिगुल निपाल कर हिर उपर को तरद हपर नंचे गंधक टेढर दिगुल्म पहाना ६ दफे पिलानेसे फे द्र मलम देतो हें । मात्रा १ थे २ रत्तो महह्ररपे देनेसे पेटके लोवर के सोंतो दे रोग मिटते हें । सोंख तारोत आती हें । इत बढता हें ।
शंखद्राव चूर्ण—४०० निंबू रसनाले ले कर लनक रस निकाल हड वस्तुने मालवी गुड तेला २०० चाल पकाना । एक थे। जाय जव वस्तुने जवाखार तोल? ५५, सोंठाम तोल २५, नवसार तोल २०, से धानेक तोल ३२ चव कु ट कर तेल कर पकाना सब पक:ना हर् मयां लेया मक्ता थे। शा्य न्त्तार का
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रोग लपेटे वरतन में ढाल कर सुख जाने पर पोछ कर रख छोड़ना। वस्त्र पकता हो जाय एक छौड़ी उसमें डालना यदि छौड़ी पिछल जाय तब विशेष तत्कार करना समझना। यदि छौड़ी न पिछले तब निचुक ओर रस डाल कर पकाना। इसको मात्रा १ माशा तिसमें दे। समय पानी से देना। गुलम कूष्मांड युक्त वृद्धि नाशकंतुग्रु मेप लवणग्नि मुख पकाहरु मृल पेट दर्द' नाशर रोग यदि मे उत्तम गुणकारी है।
श्रीफल खपार—पानीवाला नालेएर लेकर छिलका निकाल कर वस्त्र मे बीच मे छिर कर पानी निकाल देना पंछे पीसा हुआ नमक उघमे दाब कर भरना। पीछे लधेके छिद्र से सुख देखर ७ कुप्पी मिद्दी कर सुस्सादर मट्टीपुट अ'मि हेन्तना। हजांमकोष्ठ ह्रानेएर निकालकर खोपरे के सांधे पकाहरुा नमक पीस कर रखना। ६ से ४ रत्ती तकको मात्रा रागोक्ता वागेर और रोगका स्वरुप देख् दर दिनमे दे। या तोन दफे दी जाती है। सौंफ कफ वायु कुल गुल्म रोगा यकृत वृद्धि पेटकी गांठ रोग चवाथा स्यादि मे उत्तम है।
मलसेोधनी दवाई—एकिवो और काली विष्ण श्म्म मार्ग लेकर पानी से पोस गेरो चना प्रमाण बनाना। १ से ३ तोला यामं जकसेए देनेए पेटना दर्द' घूळ मकलो आदाव तिल्ली कीतरचा दर्द, मिटता हे, टदर्दी शफ पातो हे। कष्टातं मिटता है।
उदरेओगहार चूर्ण—हींग सेठ पीपल कालिकिरष पाटा कपूरकाचली हरद कुछ भस्मा'घ इमलेएका पफे फलका रख मनार के चोब पुफर मूल जोरा चित्रक वच गं'वल सेधानोन चवक निसेएष पपड़ीयो खातो हवय समान टेकर कूट करे वोलिएर के रसएको मे मोचनी एककर सुखा'कर घोट रखना। मात्रा १ से २ माशा दिनमे दे। तीन दफे दिया जाता है। गुल पेट के अन्य दर्द पेटका वायु मं बाधिन आदि मे' गुणकारी है।
प्लीहाहर चूर्ण—ओंगा (छप.मार्ग') के पर्छाश छोही मरम देख्रा ९, हल्दी सेो ५, समीरायन सेा ५, चोरा शंखवोरा नमक प्रतेक सम मव देख्रा छेकर कूट फर रख्ना। ३ से ७ माशा पानी के साथ देने से १४ से २१ दिन मे वदो हद' तिल्ली मिटे पेटश कुल वायु मे उत्तम।
१ रज्न्यदार (राजीखार) और राईँ (शाक राष्ट्र) समभाग कूटकर हनेर्या मे वाक्को पानी के साथ देने २१ दिनमे विर्देको मिटे।
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२ तो॑ पोपलोभूल अनल्कर॑ कीलोनिरष पोपल प्रत्ये॑ पांष पांच ठेला, हरड २॥ ठेल॑ चोला वष पाय कुठ घर रखना । १ से २ माषा पानीसे देना मूल रे॥
३ नमक स चन॑ सेधाने॑न मत्राखार प्रत्ये॑ सत्ता चषा चोला, अजमोद ठोला ४, हरड ठो २, पोपल व॑ ३, सेठ व॑ ३, हींग व॑ ११, वायविडङ्ग त॑। ३ सुष स'य न्त्र रस॑या १ स॑ ३ मान॑ पानीस॑ देना पेटका वायु मिट॥ भूख रखने सुताक़ पाचन है। य॑रक॑ र॑ोग मिटे॥
४ वातहरुपमे॑-हिङ्ग अतीस बच स चल हरड सेधाने॑न प॑पल कालो मिरच चष माष कूटकर २ स॑ ३ मासा गाम'जल स॑ देना॥
५ इफ शूलमे॑-आँवला हरड हप्तादरी कालोजाइ मुलेठी मूल वाना मपाषा हव चष भा॑ कूटकर ०॥ चोथाका चबाय फर पिलाना॥
६ पित्त शूलमे॑-शतावरी मूलेठी मूल आँवला नागरमोथ चंदनक॑ घूरा रफचदन चिरनीचचाल। (चिरक बान) हव चष माग कूट २ स॑ ४ माषा कञ्जल हर सोहद डा॑डेर पिसाना॥
७ रक्त भस्म-इ स॑ ८ रत्ती गाम' जलस॑ देन॑से परि॑णाम घु व मिटे॥
८ तिल सेठ हरड श'क भस्म प्रत्ये॑ पांच पांच ठेला टेकर कुठ कपडछान कर गुथ ठेना २,म॑ मिलाय २ स॑ ४ माषा गप' जलस॑ देन॑से वरी नाम शुल मिटे॥
९ एलेयो ठ॑। ४, दिग ठ॑। २७, लाम राइ पुष्पर मूल स॑ घान॑न प्रत्ये॑ ठे'ला १२ चष कूटकर उचगने रवार पाळाक॑ रस निका कर ६ छह रत्ती की गोली बनाना गाम' जलस॑ १ स॑ ३ गोली देन॑से सब प्रकारक॑ शुल मिटे॥
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उदावर्ते 'वायु-वेष्टं शमनं
मनःसूचाघातवातेनोद्गारैरक्षसथुंदान्ति देशान् ॥
ज्ञ भा शुद्धा वपुजां निद्रायां सेघनादुद्रचत्': ॥
(रसेन्द्रवार तत्र)
कारणं 'स्नेह-कषायो वायु रौकनसे हुवाः हेतोः सवैा वायु हृ्ट्ट नहि एमल मूत्र अटंक य'य पेट फूले पटनरसे भर जाय । हृद्रयमे घमराद् रहै ।
इष उदावृतं । एरंड तैल गृध्रपे पिलाना अथवा महानारायण तैल अथवा मरिचादि तैल १ से ३ तोला गरम' पानी या दूधसे पिलाना ।
मलका वेध-रोकनेसे उदावर्त' हुंआ हेतो, पेट फूले, मुख निचल ठहरे, मल श्वटंक जाय, और रेग वढे हेर मल मुखषे निळे । इसे उदावतं मे जुनासदे देना पदौलां शुराक देना । पेट और पारेर पर हौल मालोष करना । रेगीकेर मम' पानी भरे टोणभे हंउनां । निचकारती देना ।
सूत्रशोथ रौकनेमे उदावर्त हुवा हे। वे मुखषष्ठे हे, विशाल कोर मलोने नांमिडे नीचेडे मगमे गृकषमे मुख निकले फूडे। इस उदावर्तमे दूध पानी सम माप मिलाकर उस्मे वचका चूर्ण १ माषा डाल विंलानां । घमराजाका कव'य वंप्रमाथ दारलालो ३ से ६ नोलो पीस्कर पिलाना।
जंभा-जृंभाई-रोधनेसे उदावत्ते श्वेथे वारनन पला आंत नाक मस्तकमे दर्द' हे । इस उदावर्त में निद्रा कराना । गरद'न मसतक् पर हर्रयाण घृत मालोष करना और १ से ४ तोला विलाना । आंमका शरपंत पिलाना ।
संधु-अतिसारु-रोधनेसे हुंआहेतो पीडमस प्रतिष्ठाय हे । मांकल और दिमागके रेग ड़ी हिंग्टरीया चककर वन्हाय जोसो प्रज्ञा हे । इसमें तोम अं नम ओजाकर भोंकरेम पानी लाना प्रोक्त दुंष्ख वहूणा रसवाली वाते हर देनी रुदन करे ऐसा करना!
छिंकं लफकनेसे-हुवा हेतोवा गरदन श़कड श़ाय, दिमागमें दर्द' हे गिर दर्द' हे । आवाज़ोधी चढे। इसमे छितनी नस्य घुंचाकर चा सपडेधो वाड बनाकर नाकमे' डालकर हौक लाना । छोकणीका द्ययन करना
दिमका दिछछरीका-देग रोकनेसे हुवा हेतोवा पेट गला तक पवन मर जाय पवन ऊपर या नीचे हूटे नहि बढा घमराद्ट हे । महालाष्षादी तेल अथववा इत्रय मंव ऋ रुद्रि चित्रक हरीतकी १ से ३ तोला मे' मिलाकर चिटकाना ।
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दमनकादि वटी—रोधनसे हुआा हेठो लिंग और योनिमे स्राव हेतु पांड़ पांच कष्ठ वचटेष्ट (वच) आदि सद्रन लेप । हड्दहे हुएंडा पिचवा । दिद्र घूपमें गुड मिलाकर उ'बोरे चा नगोरे स्वास्मे देना ।
पिप्पलां, वच, सेंधा लोंन' हें । इसमे मेसत करनं धरीहो म्रगाझ तेलकां यां त्रिफलां तेलकां मारीसं करनां पौष्टिक वार्त्तसेकफ औदर और शूलाक देनां ।
त्रिफलां वटी देना.नेई—हुआा हेठो मुख मुंह सूंघे, कानमे वचिरवां आने । इसमे काली द्राल मेध'सों मुंत्रा भ जोर द्वाल'सक च'वनप्राश -पोवल मुलकंद सादि देना ।
भूस्तृणादि टोट—रोधनसे हुआा जेतोर मत्तनो वेचेनी शालस्य क्रयतां क्षौंतरा दमतातात रेतभी काजोरो हानने न'जरा सादि हे । इसमे चो'कु फेलां नेत्रों में ह'नो' दूध सादि फुल देना । किंतु पथ्यादि सुपथ्याक नगो भादि देना ।
स्वासकृा टोट दफे रोकनेसे हुआा हे या अधिक परिश्रमसे होहननेसे या श्रम द्वारपोरे सदाहरुआा श्वासका वेध रोकनेसे दुबा हेठो । छातीके रोग और छातोंकां पमराइष्ट छातीळां शूल सादि हे । इसंन छाती पर भिगो हुआा कपड़ा रखनां पचां करनां । विडानेमे ध्यान करनां । दार्घ छाती घोरे दवानां धो'वा हुतो सफेत्त चंदन र माधा ३ कष पानोमें डाल आदद ५ तोळा मिलाकर चे हरा धेन्रा पिलाना ।
फिंद्राफलं वेध—रोधनेसे दुखा हेठो! मत्तक शांखने करता मुंह हेाा धरीर शिरिधर वेचेनी चनकर शांतकां जन्म सादि हे । तैल ०१ भनिमे ३ तोळां वादांम तोरां, ९ तोळां रेहड़सीप (बिड़ायांलां) हेओलां ०१ लकसकत्, ९ माषा कांलो गिरंच, २ तोळां गुलांच फुल सपफेड़ा महीन पीसि अथो ते ग पानी और ९० तोळा शक्कर डाल रांप लगाये चरतनमे रख छेढ़नां और येढ़ा घेढ़ा पिलाये रखनां रागो चिछानमे हिति सेतां रहें एैषा करनां ।
मापाश्रय और पक्राश्रयमे वायु का प्रकोप होनेसे लों उदावंत होता है उसमे पचन छटतां नहि; वसिहां ऐसां उक्कार आातां नहि, पेटमे घायु मरकर हृदयको दवाता है । छातीमें मूत्र नलंके शूल निकलता है । इसंमे साथ श्वाय श्वांसी प्रतिं रसाय दार्घ तुपां ताप नमन सिर दूध' आदि उपद्रव होतें हैं ! इस प्रकार वेध रोकनेसे मिल्न पिन्त्र प्रकृत्तिकां वद्दार्शंत' रोग होतां हैं इस को जांचकर उपचार करना ।
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उदावर्तोद्धानि रसौ—पारद तोला ४, गंधक तो १०, हरड़ तो. ४, सोंठ तो. ४, पीपल काली मिरच सेठाहगा प्रत्येक ढाई ढाई तोला, और च्युद कुचला ३२ तोला सब घाथ मिलाकर निठू रसमें घोंटकर रत्तो प्रमाण गोलो वनाना चाह जल से ९ से २ गोलो देना । सब प्रकारके उदावतं । गेष्ट चढनेके रोगोमें वद्द गोलो उत्तम गुण करतौ है । लकावतंके माथके दुसरे वपद्रवके भो शांत करतौ है। मिन्हें मिन्हें प्रकारके उपद्रवमें अनूपान मोक्से देना ।
फलघती—मौनफल पीपल कुच्ठ बच अंफेद धारचो गुढ घन समान भाग लैकर कूटफर कनि्टषका (रछलो) मंगूळो जोडो मोटो भौर देड़ इंच लम्भी मतो वनाकर छायामें सुखाकर रखणा । गुदामें चढानेसे वायुको पतिका अतुलोअमन होकर वदास्तंत मिटतौ है ।
विर्यति दुक्कादि वटी—च्युद विर्यातिदुक तोला ३२, अजमोद ३२, डेंकामरी ३२, वछनाग काळी तोला ३२, पीपरीमुल तोला ३२, तज तोला ३२, काढचीया शेकेल तोला ६४, सोंठ तोला ३२, पीपल तोला ३२, काळी मोरिच तोला ३२, अतिविष तोला ३२, हिंग तोला ३२, इन्द्रजौ, ३२ सेंघानोन इर, सब साथ कूटकर पानीमें गोलो रत्तो प्रमाण करमल २ से ४ गोलो पानीसे देनेसे सब प्रकारका उदावतं, उदरं वायु, गेष्ट चढना आदि वायुका रोग मिटतौ है ।
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अष्टोला प्रत्यष्ठीला (मुबारकौ-गांठ)
कारण-चिन्ह—यह पेटमें होनेवाली एक प्रकारकी गांठ है । वह स्थिर रहती है या कभी फिरती भी है । यह नामिके नीचे रहती है पसथर नौबो कठिन, नामिको और लंघो होती है । इससे बद्धा वायु छूटता नहि है । पेट फूलना है आध्मान होता है । वही प्रंथ्यो नामिके नींचे के मागने ठठो बढो है, अघोवायु दस्त पिशावदे रोके बहुत पीड़ा करे यह प्रत्यष्ठीला कहलाती है । इस प्रंथ्येका उपाव हो जब मुख कछुआ है, जोम पर छारो बसे, मुखमे, यशदूरे, सुसार चढे मूल निघरै, दस्तमे कमो खून गिरे, नामिमे ठठो पीडा हो, जोम सूखो चोकरो कफ वालो होय निंद माछे । इस प्रंथोमे वार्तपित या कफके न्युनाधिक प्रकोपके अनुसार चिन्ह होते है ।
विडंगवल्लेख—पिप्पिड़गं ते ला य०, पिप्परीमूल रास्ता कूडेकोंछ ल इन्द्रेजै पाढा जटामांसी आंवला प्रत्येक बीस तोला लेकर कषकर रसाध वनाना । इस यवाथ देय कपदच्छान कर उषमे गुड तोला ६०० । छइसे डालकर पकाना । गांठा होने पर तंष तमारपत्र इडलायची प्रत्येक आठ आट तोला, सेठ पीपल कालीमिरच वारचिंडग प्रयेक दस दस तोला, त्रिपु कचनार खाल ठेठम सदंतीकसुरफ प्रत्येक छद छह घेठर सव कूट कपड छानकर गुडके पाकमे डालकर घोमो अथिक से पकाकर गां�ा होने पर स्वांग पौत होने देना । मात्रा १ से २ तोला । सप्तोल, प्रत्यष्ठीला गांठ तिल्ली जेवडा । विगाढ गुल्म शूल व वृद्वि आदिमे गुणकारी है ।
१ मारे मयसर्घंनी चूणं १ से २ माशा गुडके साथ देना ।
२ आ खसटो चूर्दत ३ से ४ गोलो पानीसे देना ।
३ आ खदिराव चूणं ६ से ८ रत्ती पानीसे देना ।
४ नारायण चूण ३ से ३ माशा पानीसे देना ।
गुल्म रोगमे बताई हैर दवा इस प्रंथ्यो रोगोमे फायदां करती है । विपत्तियूकादि चूण ६ से ८ रत्तों पानीसे देना । कनयाद रस वृद्धत २ से ४ गोलो पानी से देना ।
४ कुमार्यासव ३ से ४ तोला ३ या ३ टफे देना ।
६ प्रंहर वटक सथवा विद्नादि गुग्गल २ से ३ गोलो पानीसे देना ।
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दस्तको' कफजो—मलानुरोध—आहार
प्रथिताभं शुंष्कं सुहृदनिलेन पुनश्च-द्रुपितेन ऋतुस्मर ।
ति सरदि नियमशून्य बद्धमानाहृत हदरन्ते वैचर्येण (दस्त)॥१॥
कारण चित्रह—दर वक्त जुलाव लेने'की आदत, वह्नू परिपम, वयाय म, मल मूत्र और पवनदे'कनेकी आदत, वृद्धावस्था 'कमजोरी—निरंलता' चवालीर, वायु प्रशमान प्रकृति, तुवालर भोजन गरीबठ मिट्ठे न घृत लस्सीम क्रिंचि छाड़ने'की चादर खीटें रहने'लो सादत' 'दमाप पर काठका अधिकं भार, ठंडा' वां'खी अनिदिन भोजन, आरसद्धीम सेढा चाढा थे फी दस्त अफीम मोल थादेकी इयपन, दस्त जानेकी अनियमितता इत्यादि: कारणोंसे दस्त हवजोरा रोंगें होता है । दस्त निचल सकै
माहि यहून जेार करना पदै, पेट और पेहुमे (नाभिके न चेलं भागम) भार लगे । पवन छैते नहि, पे' फूले, अ लस्स्य प्रणोद मंदाविंत मूल वसंतक फेर अवकत तुवालर वाष टेनेमे तकलीफ, कामडा जेमे चूणा, लन दिनताहु', उदावशौनता अथया'दे चिन्ह होते हैं । इधरमे दस्ततें। क्रूछल गांठे मांडे उ रहा हेक्लन पदाकी कुंडलीमें
अरुचि जाता है । दस्ततें टुस्तत हैं। वपरीसी लिहां लेल्ला मुरगरल्ली निक्लती है, और दस्तत नियमितं रपद्ध पर नहिं आती !
दस्त्योपधय—साथा जुलाव १५ से २० दिन पर लैठे रहना । शुगक सावा केलेना पेटमे देवात नहो इय पद्वार सावा हुल्का मिताहार दरना । एक मासमे २' दिन उपवास दरना । मोशनमें पड़ेहलें ४ से ६ म सा अहरस्स नग्रक छिलकदर खाहर पोंछे मोशन दरना । घयवा त्रि गासक चूर्ग २ से ३ मामा चीमे मिल'य खाहर पोंछे मोशन करना । लयून १ तोला तिलके तेल'ने 'पकाकर दाल पाकमे स्वाना । भूख देा बौंसा आहार करना । दूध छांछ, पानी शरदि पथाद्दी भोजन-दे भोच सोचमे
छैते रहना । मोशन्का समय निय'मत रखना । मोशन हे पीछे तुतं काम पर नही बैठना । मोशनके पंछे पाक बाढा घटा चामकुक्षों दरख पोंछे मब कुछ करना । मोशनके पीछे तुत' देराकना नहि । परंड़ तेल c या ९ दिनके पोंछे एड़ थे
सममच पोते रदना । पुनः दार्गा परंड़ तेल्ले पो'वमारी न'ता ! कल अतक गया द्वारेतो अफुलो द रकैर निंमत्तना । दुसरी सुरण करेला ने गत्त प , ५ मोंधा पपपढ़ो वाटोळ सहजनका सींगे सेयंथी चोलाद्ह थादि मात- सुग टह. जदेंं नाल वटाना
तिल वाजरी जव मेंहूं च'वल आदि स्वाना ।
लघुनिरेचनं चूर्ण—सेवनापत्रों (मं'टी पातळ) को' पत्ती तोला २०, मूलेठी मूल तोला २०, हद्र गंधक तोला ९-, हड़ताल (वरंयाली)
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चोटी ९, रसकद रीला ७० यह सब साथ कुट छट करना। मात्रा २ थे ८ माशा तक गम' बलसे दें जाता है। किसीक्वा कव मात्नाशे दिछोने अधिक मात्नाशे एठ दे। दसत खुलावा एह जाता है।
हरोंक्री पतलेहल—दरदरीक़ा मूल मेरीठीहा मूल हहुगाकी छाल' हरणोळा मूल हरपाररीहा हल्दी सगपानो' पं०तोम पंसोख, चोट गेर शेर टकर हुदर हर मक्ता यमय दनग्गा। यमाजोगी हपड हलन हर वस्मे हेटो हरड (हैमेज़) हंर ६ के और बांकर हंर २॥ हरा धीमें तल कर चूर्ग कर वनाथमें 'अल पक्क ना। माढ़ा शेर जव पुढ शेर ५० दाखहर पकाकर माढा होनेभर सव्वा मुलाव कुव वहंशेक (परीपाळी) घनेया टज इलायची लेठ सेठ पीपल छाली नींच दायावरी असयव च प्रगेह दस शेराळ टेठर कूट वा'क चूर्ग कर तैयार रसा हो यह पछते हुव गुटरगुमे हालहर दिलाना। माढा होनेभर अन्भि निकाल हर समोशोंत है'ने देना। अछे बरतनमें मरन्ना। पछानेक्वा दतोंन रांगा लग'वा नीदनका देना। और हिलानेछा तवेवा लरहोंदवा दा 'पितदका देना रांगा लगाये बरतनमें अयन्ता चिनादृ (मिट्टीकी परणोंमें भरदेना। मात्रां ५ थे ४ तेःला तव्व रगरा रुप नेसकर देना। वद्जी मदारिन बरावर लेनर हंटे हुये, प्लींहा
अस्थोला मन्भो पेटके रौग संधूवृंद्ध गुतव थादि रोगोंमे गुह्वारी है।
श्रृं द्र झुण —पर ६ देवलमे तलाईहुआ, भौंवला, छेटो हरड (हैमजी दरहे) पूर'ह ठेलमे तली हुईं, से घामेन, घेन मसोकी पं०त (मोंढी आंवल) सम शम साप टेठर कूट कर रसना। १२ थे ४ मासा यर्म जलमे देना। मरावरोच और उदर रोगमे गुणकारी है।
१ मयथरे शेर ३ थे ६ गोली तक गन्ने जलमे देना।
२ यदिअधिक मूल जम गयां होतो ९ से ३ गोली इन्छा मेरींकी साकरकरे चूर्गके साथ गन्नेजलमे देना।
३ अजगमय वघंनी गोली ३ से ६ अयथना आरेग्य चधंनी 'चूर्ग' ९ से ३ माशा तक गम' जलसे देना।
४ आ'तनटी २ से ३ गोली गमं जलमे देना।
५ लरण मास्कार चूर्ग २ से ३ मासा गमं जलमे देना।
६ विक्रक हरीतकी अत्रटेह, असृतमन्स तक अवलेह, मार गो पुढ, मथवा श्री बाहु छाल पुढ इनमेसे काहं मी अवटेह ९ से २ तोला तक स्वाना।
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पलोयादि वटी—नीमूत्रमें पकाया हुमा एलेया तोला १६, कालीमिर्च सोंठ १२, अजमोद सोंठ २ सस माष कूट कर कवार पाठ के रसमें रत्तो प्रमाण गोली बनाना २ से ४ गोली पानीसे देना पचन दृढ़ता है। दस्तकी कज्जी
बिदती है । मूल लगती है । भोरतो'फे माथिक घमं के समय कष्ट होतां हो-
क्यातं हो। वह दिखाकर उसे साफ कराता है ।
जुलाब-विरेचन
पूर्तं कालये वमन विरेचन आदि प चचमं'से शरीरका स शे'धन फरनेंका प्रय'ल था, इस कारण देह बिमार कम होते ये अथ वमनते कम्चित दि लिआ जाता है । माथ जुड़ाव ठेनेसे रिवाज है । पेटमें जरविमारत लमा हुवा मालप
हो भूल न लगे दस्त बद्धम रहें जब जुलाव ठेकर पेट साफ किया जाता है । मदिनामें एक दे। दफे विरेचन दैआपच ठेनेसे शरीर नीरोगी रद्दता है और
वरी'का प्रत्येक अग प्रत्येक कायंक्षम बना रद्दता है । ल घरंसे पाचन
शौचादि देहा हुवा दोष रागा कें चतां फिर उचपन्न होता है पर जुलाबसे निकल
गया दाष फिर कृपित नहि होता थो? मनुष्य बिमार केस पचता है ।
जुलाय किसे देना नहि ? बालक वृद्ध क्षणसे र्गंपा देख हुवा हो, भयमीत हो, यका हुवा त्रासवाला चरबे'वाला, सगर्भांत्री दा'खे उन्माद हुवा हो
हक्ष शरीरवाला, घ'व लगा हो, ऐसे मनुष्यको जुलाय देना नहि चाहिये ।
जुलाव किसे देना ? जोर्णे जवर्वाला दिप पिया हो गलितकुष्टो
भग'दर वलासीर । पांडु'रोग पेटके रोग ग्रन्थो छाती' रोग शंहवि ये'नि
देह प्रमेह शुल्म प्लोहा व्रण गुमड। विद्रधि-फेनसर मुख गुदा मत्तकका रेगी'
रोगे'न्वयका रागे सुरूं क्षय भां'फके रोग कृमि रोग वातव्याधि पेटका शूल
मुत्राघात-मूत्रकृच्छू ऐेेे रोगो'योंको जुलाव देना चादिये ।
पथ्यापथ्य—जुलाव लेनेके पीढ़े ठंड़ा पानी पीना पढि । भांखे पे जलन हो
वो ठंडा ग'नी आखे'पवर छिड़कना। सुरंगों पुष्प सुघना । नाहार वैल तांदूळ पान
खाना । तृप लगेतो येदा दर्म किया हुवा जल पीना । खुले पचनमें बउना नहि ।
अनुचित जुलाव न ल'खे थे—कोई कठिन वातो'लोगा साघा जुलाव काम न
करता है। जुलाव न लगा हो। वो नामि जह जे'सो हो पेटमें झूल निकलते, आघा
होय उल्टी= मल भटके शरीरपर खुजली थावे, वारी पर मसत रहते यकते हो।
ओर f१५ चक्रधर वमन इत्यादि चिन्ह म ल्हप हे'ने पे रल जैसे चिन्ह
हो J१ इ उचार करना । और तीन चर दिनके पीढ़े फिर जुणाव देना ।
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जुठाव अधिक हेतुहे-मूर्च्छा वेष्ट्रादि हो, मुद्रा वधार निडले कफ वद्दूत पडे। मांसफे घोन घेवा (पकाये हुए मांस के पानी जैसा) घृत मिश्रित दुग्ध देना। है। इसक॔ा मुर्तं हि रुपाय करना। मिगोना करडा पेटपर रसना, घेवाल लगाना। शावश्री शतर छानके! दहोमे या खट्व्री छोंडमे पीवर पेटपर लेप करना। माङियर द्र॔ रानी पिलाना। दहीके घोलमे लवण द्र॔ नहुद मिलाकर पिलाना, खोंचहे दही मिलाना। द्राक्ष वन या शालोत्राख या हरी द्राक्ष पिलाना।
सच्चा जुठाय लगा होतो-धरी लघु सफुर्तिवाला होतो है। मन प्रदर रहता है। मुख दूषार आता है। अपान वायु छूटता है। सक हुष्टेस्या बलवान शायंक्षम होतो है। बुद्धि निर्मल और शठरांप तेज होतो है। मुख द्रव काजमे हरने फिरनेमे सरषाह रहता है। मादृ जोर तनु निघर रहती है।
अभयघेष्टो-(र. प्र सु) घेष्ट चो'लो-अभयल जुदी हयपे'लो हरमिते रध गोझेका न॔म हे। प वर घृत क व' दछनाय नंधक सोनपथी शुद्र हरतार सेहळ पीपल कालीमिरच हरड चेहंदा आंरा पकाया सेहायागा दोर शुद्र अवालगोटाक! गिरी सम समा- भाग लिहेर मो'तर हे रचं घे'टकर सुग॔ जें'नी ने ली रगमा। २ से ८ गोली तक पनुचर्या मद्य औ! ठीर केंठ की जं'व दर चो'ल प्र.आ थे देना। टपर गाम जल पीना! (साभल नान' अळके रथ न्ने कर्तो साय कापी पीनेका रिवाज है वद्दो मी पी सक्ते हैं )यह शुद्र जुलाय है किर मी अधिक मात्रा से उम्र जुराय व॔त मी काम करती है। किसीका देह तुन गो'ल मे अरु'ळे जुठाव होत हे किषो कठठन केडेतोंडोने! छह से साठ रस मोली नक देना पवनं है। कम दो वार जुठाव होता। है। पेटके रोग पेटका शुल शोथ सूजन कुस्वार
हृद्ना मेदो घेष्टो-शुद्र पारद प'बुक सेंहळ वाली निरच योदागा प्रत्येक १२ रस तोल॔ शुद्र जमालगोटाकी गिरी १०॥ तोला सब रसाथ घोट पीस कर निम्बू रसने घेटकर रती प्रमाण गो'लो बनाना। १ से ५ गोली तक
हाक्करक॔ चूर्ग माशामे गोलीमे! पीस मिलाय गम' मदये जना! रोगीका कठिन केंठाकरी बांधकर येष्ट्य मागा देना। अच्छा जुलाय लगती है। जुराय' देनेके पीछे खोंचही घी खोंचही ३हों खिलाना। जादा खुल्लाब हो तो दहोमे
खाकर या शाहरद मिलाय पिलाना।
सेवनमात्र रस-(यो. र.) हिंगूल शहद, पकाड़ा चोखामा, म'जनोतन पीपरल मोत्र मोंचंमिरच हरड देइंदा यांकिर्स कालीमिर्च वायविडं पिहिं भस्मार्क्षद हचुरा
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प्रत्येक पांच पाव तेला और शुद्धगूगल गोटाकी गिरी ३५ तोला शक्कर साथ पीस निंबू रसमें घोटकर रती प्रमाण गोली बनाना । रोगीको कोठा वेचकर घ्यूताधि ५ म नाशे जुलाषके लिये देना और उदररोगमे अच्छा है ।
विरेचन—हिंगूल मोहिंगा कालीमिर्चे छोटी पीपल हरड़े प्रत्येक एक एक तोला, ऐल'ये इंद्रायण मूल सच्चल प्रत्येक सात सात तोला, निश्चय १२ तोला, शाककर ५० तोला सब घाध कूटना । गरमं जलसे १ से ३ माशा देना ।
नाभि विरेचन—जमालमोटाकी गोरी पर ढोंकी गोरी नीलाघोया लेहदागमा समभाग लेकर घोट रखना । से १० रत्ती सुद्धी दूधमे मिलाय नाभीपर ढेफ करनेंमे अच्छे जुलास होते है । पीछे उस जराइद्द साबुनसे घेट ढालना और तेल लगाना । अच्छे जुलास हेत जानेके पीछे खिचडी दही खिलाना ।
१ कढवी नाइफा कंद टुकडा कर छायामें सुखाकर भुराकर रखना । मात्रा ८। से ६ रत्ती तक पानीसे देना । दस्त और वमन होकर बिगाड निघल जाता है । यह उपर जुलाव है । रोगीका शरीर देख विचार कर देना । इससे तिल्ली लीवर बढो हो दमती हे ती है । पेटरी गांठे-ग्रंथी, छाती पर कोवर पर आंवोपर या अन्य जगह प्रतियहा हुये हो वह पिछल जाता है । सप्तदंघमे वमन विरेचन करानेके लिये ८ से १० रत्ती या अधिक मात्रा में दो जाते है ।
सादेरसघंनो चूर्ण—पारद मंचक टंक हरिताल भस्म अभ्रक भस्म तांब्रभस्म प्रत्येक एक एक तोला, हरड़ बहेड़ा आवला, तीनों मिलाकर १० तोला, शिलाजीत १५ तोला, शुद्ध गूगल रस २ तोला, चित्रक मूल २० तोला, कुटकी ४० तोला सब साथ कूटखे नीमके पत्तो तोला २०० लेकर पानीमें पीस और भावश्यकता होय सतना पानी ढ'ल कपड छान कर भावना देकर छायामें सुखाना । इस प्रकार कुल तीन भावना देकर छ'यामें हसकाना । मात्रा १ से ३ मासा प'नीषे देना । एक दो दस्त होकर पेट साफ होता है । प्रतिदिन ६ से ८ रत्ती पानीसे लेके रखनेंमे भूख अच्छे लगती है । रलोचि लीवरको वृद्धि मेटती पेटरी गांठे शोथ मोंडरोग कामला वमन, मुत्रकृच्छ मेटते है भातोमें रखा हुआ मल निकलता है । लुचे रसयको कफजो विटतों हें ।
२ वाजरोग के भाटामें-या चने के भाटामें-वेसनमें थूहर (स्नुही) दुग्ध मिलाय सुने प्रमाण गोली वनानां विचार कर योग्य मात्रा गार्म जलसे देनेसे चुकान होता है ।
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३ सेठ तेला ३ चनेका बालिश्रा तेला ३, तिलों तेला ॥ सम सायं प्रातःनक्त यूदर से दूधमें रंथी प्रयाण गोली वनाना । एकसे ४ गोली तक जुलाव के लिये दी जातों हैं । पेटका बिगाड़ निठल कर रोग मिटता है ।
४ सेना मसी (मो'हड़वावल) घो पत्ती, हरड़, निरोशय घमभाग कूटना ३॥ंसे ३ माशा घमं जलसे देनेसे जुलाव लगाकर पेठश्रु किआर मिटे । भात करो-खोचड़ी दद्दी खिलाना ।
५ मधु विरेचन मपवा हृद्दी चूर्ण॑ ३ से ६ माशा तक देनेसे एकसे दो दस्त होकर पेट साफ होता है ।
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शोध—शोफ सूजन सेजा
कारपा—वमन छर्दि के रोगसे, अतिसारसे, तपवाग्नेशे रपकोलं स्तंभने तंथे पदायँ ज्याादाखानेसे, स्तंभने दहोषे, गौपारस्से, विमड़े हुए भन्नपान खाने पोनेसे बधाग्निरसे गमोंवात हो मोनमें सूतिका' रोग (गर्भा रोग)से धो विमोसे घाव लगना अरिन आदिसे जलना औरजंतुकादंश पांडुरोग आदि घाणोसे शरीर पर या गरीर के किसी अंशपर सूजन होाती है । चिगड़ा हथपा घून पित्त कफके दोषोंसे वायु खोच कर वाता है इसका सघन होता है जब स्वच्छ— नाड़ी और मांसके आययसे सूजन हेतो हैं ।
चिन्ह—ह्रासमें विमार्द होातो छालोके उपरके भागमें शोध हो । पक्त्रार— रवमें विमार्द होतो छतो और पेटके बीचमें शोध हो । मल स्थान और आंतेामें रेंप होातो पेटपर हुज़न थावे और सारे शरीरमें फश्नता हैं । सुननका जितना शधिक प्रभाव हो वंमे चुलार वमन दत्तकी कुर्जी जौंपर सफेद पोली छारि नाहोको मात जलद्र अधिक चिन्ह पाखुम होते है । जिस जगह शोध हुवा हो बहा पंडा करमी और वधा माग वालो लिये हेतो है । वायुकी सूजनमें वधा माग लाल काला पीला रंगा, अदर सनस्नाहट शुल पोक्सा होतो है, दवानेंसे रसहटा नहि वपस्ता वपढ़ जाता है ममंचोज लगानेसे रदछा लगता हैं । पित्तकेो मूजनका शोध चाला पोला लाल र सक्रा या मि्रश्र रंकका हेतो है । पचीनो वाता है तृपा विश्हलता मलानि वेचेनी उल्न हेदो हैं । ठंडेँ चोप्र वगानेसे सचछा लगता है । शफ की सूदन ठहोन दावनेमें खड़हा पदें, मुखमें थूक वार पड़ें निद अधिक हे' वमन हे', मूल कम पानोको इच्छा नहेो तृपा न लगे पानी पीनेमें अरुचि हे । मुख केर तपानेसे श्वास दायगो लपानेश, शरीर के किसी मगाने श्वासकष्ट' (ओपवेशन) करनेने या थैशे अन् प कारणसे शोध हुवा हो वेर पित्तशोथमें मिलते चिन्ह होातहे हैं और सारे शरीरमें फैलता है । जमाल गेटा, रुदनेसे मो सूजन हे। जतो है । शोथका कारण चिन्ह देखकर उपचार करना ।
पट्यापषध—श्रुप्रका मूल कारण ह्रंडना । विरेचन मूत्नल स्वेदल भोपव देनो । पुराक सावा पाचन जल्दी हो। ऐसा दलका प्रप हों देनो । चिकना गरिष्ठ परायं मिटान खार रककर की शाले याजारकी मिठाइए देनो नहि । घेक करना थेव नगाना वेल मालिष करना । सद्डे पदाथे खडी दह्टी निदु आदि चीजेँ वना नहि ।
संपान्य उपचाम—शोधमें हरेंा आंमका प्रैष अचिक हेतो है इषरये वास्य हे! डनना स.धन उपन्राष कराना । पाचन दीपन औषध देन
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कुलाब देना देर से पकता है और रेची को शरीरविद स्थिति देखकर वमन विरेचन कराना। रेची को शुरु में अन्न वृंद कर दूध पर रखना। प्रारंभवघ नो चूणो २ मांसाचे प्रथम ४र घीरे घीरे चढाकर हमेश की आठ मासा तक दी जाती है। अद्दूो अद्देर अरणो पुनमंवा नीमके पत्ते धो साफ ( चाषप ) देना। और उपरक्ष विलासा।
मातृादरसार संग्रह
रस्मरत्नाकरका पा-पा डुलिपि
त्रिपु त्रिफला टाक्षार पोषकर घसनल राटी लौह वचा लशग न च शुमो शकु शातपुविच्छा विदंगं शातवी पुडपं जटामांसी पुनन चा एतानि समभागानि हृदयं चूण्णि कारयेत। हवं हृदयसमं चाव शुधर्क लौह त्रिदशरमं कुटजार्य रसेनापि मुण्हरं मक्षयेत मिश्रीक तैश्चितं रसुपरेण मृररसया परिटेकपितं तवो गजपुटे पक्व श्वांगसीतं समुदरेत। तनमणहरु समं चूणं त्रिकटुवादिचि्वमिश्रयेत मातृयं पुनर्नवा क्वाथे मापा हृदयार्चिक्का निहन्ति शर्करोयं ग्रहणो च विशेषतः उदरेपु च रसे हु शोयेयु शातुपयानतः विविधा ध्याधमस्तान्त्रे शेधनाद याति स'घ्यतंमृ
यह पाठ हि शास्त्रोय है। थोर इस पाटने सप शांका नहि रहती है। घटक दंयोके गमपुट मे जलादेनेका नहि है।
शोयेदारार्ति मद्दार-मंडूर भस्मपदा कूड़ाको छाल (कुटनल त्वक्) के कवाथ मे घोट कर गोला बना कर टपर जामुन (जद्बू) के पत्ते लपेट कर गमपुट देना, इस प्रकार रे मद्ठी देने पर तैयार हुया मद्दार इस औषधमे -डालना। यह मद्दार मद्म तेला १०० सौ देना और छोट पीपक कालोमिरच हरड घहेहा आंवळा लाख पुष्टकरमूल वाला कचूरा लोड़ भस्म वच लोग काकच-सोंगी तज वहेरोप (वरीयाळी) पुनमंवा वायविडंग जटामांसी घाइंदेफूल प्रत्येक शौषन पांच पांच तोला लेकर- कूटकर यह चूणं मद्दरमे मिलाकर घोटकर पिलानेवाले पथ्यार है। रसकी शुद्धता मर्यादित आवश्य देखर ३ रसौकी-सोली
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वनाना। २ घेए गोली देवे समय पानीसे देना। जावश्यकता होने पर प्रतिदिन १॥ गोली तक मात्रा कमशः बढायो जाती है।
मैत्र्युद्य रत्नावलीका पाठ
नांघ—यह औषघ मैषज्य रत्नावलीने शोध भस्म लेनेह इह नामधे दिम्र है। इसेही रसयोग सारंगधर श्री प॰ द्वारिप्रकाशने शोधार्थ लो॰क नामसे दिया है। प॰ठ मैषजय रत्नावली का दिया है। जब रस रसनाढ्य मे शोधाये दरसि मद्धर नाम है यह नाम यथार्थ है। क्योंकि इसमे सच्च औषघ हे समान मद्धर लेनेका है। मैषजय र० के पाठ मे द्राक्षा और विपोतक है। वहि रघरत्ना मे लक्ष्य ओर पुनर्म्ना है यह ठोंक है। कयोंकि शोध के औषध मे द्राक्षादि रस्यान नदि है और वहेह एक यार त्रिफला मे आपया है। और जटामांसी अधिक है। इह औषधमे मैषजय रत्नावलो के पाठमे एल विंचारता यह है कि त्रिकटु मे लेधर घाइंडे फुल तक्के सव .औषघ के समान म इह लेधर वेधा औषव के साथ मद्धर मिलाकर सवकेधा कुटज रस मे घोटकर जामुन के पत्ते लेपेट गजपुट देनेहो लिहा है। ऐसा भस्म पाठ पढनेवालेहो और स सुकृत अच्छा ज्ञान नही उन्केहो होता है। वन्तुत अंधेला मद्धर के हि कुटज रस मे घोटकर गजपुत देना है। इहप्रकार मिद्ध हुए मद्धर भस्म मे दुसरे २० घटक द्रव्य मिलाने के प॰छे हि यह औषघ तैयार हे॰कर सेवन येसयु वमन है। मैषज्य रत्नावलो का स प्रकार स्थान स्थान पर डिंस्पणणी मे अपना मत प्रगट करता है इसप्रकार यहांह इस वातकथा स्पष्टोकरन नहि दिया कि गजपुट मद्धर भस्मके हि लेनेका है। और पाठमे यह पात नहि दो गे कि मद्धर भस्म तैयार होंने के पोह्छे ३० द्रव्य मिलाना, थैसा लिखा हेाता थे। मो समक्ष मे आभासक्ता कि २० द्रव्य मद्धर मे मिलादेर गजपुट देनेका नहि है। इह प्रकार मैषज्य रत्नावली मे कई स्थानेसे शाखीय पाठ मे परिवर्तन ओर भ्रम जांनक वाते है। इस लिये मैषजय रत्नावली के अनुुसार के॰ई मी औषघ वानाने के पहिले. दुसरे ग्रन्थ मे वह पाठ होते देखकर हि वजाना उचित हैं।
मैषजय र० ने इसकाध शोष मस्म लो॰ध—नाम दिया है जब रस योग स॒गर मे शोथारि-लो॰ध नाम रखा हैं। वस्तुतः यह लो॰धकी कृति नहि है मद्धर -की हैं। परांव देने मे पाठ समान है। धो प॰। द्वारिप्रकाशजीनेभनुवाद विहित किया है। कयोंकि वे १९ घटक द्रव्यका चूण ओर उन्के समान मद्धर गजपूर मे पकानेका लिखा हे। वह अशास्रीय है। मैषज्य रस्नावली मोड
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रसयोग सारगर्के पारद्मे १९ घटक द्रव्य हैं । यह औषध मदारकृृ्ति हे नेपल मी देनेने ठेठहल्का नाम रसा हैं । यह सव विदित बात है कि ठेठल अगर मदार को कृतिसो में जोडित घटक द्रव्यो के बलसे हि ठेठल या मदार होता है । मदार और ठेठल के नाममे भतायी गयीं औपधे मे ठेठल घोर मदार अधिच प्रमाण मे पडता हैं यही उसके नावकी साध हत है । किसीभी मदार या ठेठल को कृतिमे पडने वाले वनौषधो के घटक द्रव्ये शला वेनेडे नदि लिखा । यहाँ इस औषध मे मडर के सममान १९ द्रव्यो का चूर्ण मिलानेहे लिखा है, मिलानेदे नहि । मदार केह कुटन रसमे पडाकर डालने का लिखा है । शुद्ध रयना तों विशेष्ट विशिष्ट तैयार मंडुर भरमको कुटज रस मे पडाकर्त पोछे इस थे रस मे मिलाने का मन्यदारका कहन हैं और मूल प ठमे भेषज्य रसादिको मे घोर उष्णा अनतरण होने वाले रसयोग सारगर मे रष्य हैं शुद्धे यों सुपक लेहदहि हत एक वचन है और जमु पत्तेसे चेपित यह एक वचन और रसांगवीत यह एक वचन पडर के लिये लिखा है अर्थात कोथीकार या शायदकार मदार मे डालने हि मंडूर कुटन रसमे पडे यो हुवा दि डालना यह ग्रन्थ कारहा वक्तव्य है । जय रस्नयोग सारगर्क वाळोके अनु- वादक में १९ घटक दृव्यो के मो रपुट मे जला दिये हैं! मेष्य रस्नावलीका पाठ स रक्खन पढा हुवा च्या सेठ दिन्चार हर पढे तों मण रक्खे साथ के १९ घटक द्रव पिलासा लिखा है ऐसा ज्ञात्महो सरता है ।
इसप्रकर रसयोग सांगार मे भनेक रयाने में भनुत द्र मक भेषुध्द और अंङालेय किदा गया हे । रसयोग सारगर के भनुसार के षड्वरसे षेङष वनानेवाडो देा और औषधे के उपयोंगा करनेवाळे रोंगंये का वही हानी पहुँचने का मोर वचा मी अपयश अपक्तित मिलनका संभव है ।
लोध कालानल रस—लोह भस्म अभ्रहृदन ताम्र भस्म पारद गंथक विशाक मूलकी छल आयफल इंद्रायृ गजपीपल चहे धानेच छेटाँ फींवल ठेठल शेठाग्रा घम सममान लेकर पुनर्नवा मूल और नीमके पत्ते के रस को एक एक भावनो देते रसौकी गोली बनाना । माथ्रा ४ से ६ गोली आम में जलदे अथवा पुनर्नवा के क्वाथशे देना । प्रत्येक सप्ताद के पोछे १ से २ गोली बढाहर प्रति दिन २४ गोली तक दी जाती है । वंद करना हो जब प्रतिदिन एक दो गोली कम करते हुए वंद करना । शेष मिटता हैं सूजन पेट के रोग शरीर पांड कामला श्वासोरे में मो 'फायदा करता हु ।
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दुष्ट व्रण—पुत्र वछनाग १२ भाग, अफीम १२ भाग, ठण्डा मस्म ५ भाग, शंख भस्म ५ भाग सर साथ मिलाय वकरी के दुष्ट व्रण मे गूंथ प्रलेप वनाना । १ से ३ रत्ती दुसरे देना । यह प्रकारक शोध व प्रदाहनो विपपातनाश पांहरेोग नादि मिटते है ।
शोधकादि तेल—निंबकी छाल तेल—सहजनेकी छाल जिरीफलो छाल दियेंडी मालकंगनी यह तीनोने ले वीज धतूरेवा पान पुनर्नवा भरणी घर पछाल रखवा कटहलरी छोटी काकडाश्रुंगी वरोहिणीफ अजवायन कुटकी (तित्छा) पपोठ राधना साना कचूरा कपूरकाचरी वच पीपरमूल छुछट धनेर्या द्वायफल कुनला प्रत्येक दोवष दस दस तोला ले कर कुठहर पीडे उदमे पका १० सेर नोमुष घीवर १० सेर पानी टाल कर १२ घंटा मिगो रस्सना पीडे पकाव २० सेर (४१ रत्तल) सरसोंका मथवरा तिल्म तेल ढाल कर घीमी आंच से पकाना पानोका आंता जल जाय जव स्वांगवीत होवे देना। पीछे कपडछान घर रस्सना । यह तेल १ से २ तोला तक दुसरे पिलाना और मालिश करना । सब प्रकारकी सूजन शोफ शोध मिटना है । फग रोग पाहरेोग व्रण शुल पेटके दर्द मे ओ इषध हरयोग किया जाता है ।
शोथका सामान्य उपाय
१ अडूशा गिठेआय पुनर्नवा सम भागका सदाथ मधु मिलाय पिलाना ।
२ तिलने पिप उसमें मेढकका मक्खन मिलाय मक्षम जैसे वनाकर लगाने
३ हरड हरदी भारती मिलेआय चिरक दारुहल्दी पुनर्नवा देवदार सेठ सम भाग कुटना १ से २ तोला का कनाय पिलाना ।
४ पुनर्नवा देवदार सेठ सम भाग कुटकर रखना ओ मे ८।। तोला चूरे दूधमे डाल पदाकर वह घृत पिलाना ।
५ दंतीमूल निर्गेआय सेठ पंपल कर्कटीमच त्रिक सत्त सम भाग कुटना ८।। तोलाका कनाय घर पिलाना ।
६ पुनर्न हाका पंचांग देवदार सेठ सहजना छाल धरचेका कनाय पिलाना
७ विल्वके पत्ता हेआल ३।। पानोसे महीं पोस पिलाना २१ दिनमे पाहे जिस भ गकी सर्जन मिटती है ।
८ पुनर्नवा नीमको छाल सेठ पटोल पत्रमागसे कुटकर पानोमें पीस सबन घर सेप करनो ।
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९ मोदककी घृत दा लकरो तोला ५ कें कुटकर स्वाम कर विछानेशे से १५ दिनमें श्वास निटकती है ।
१० संदेलखा नजू पानिमें प'चु टेर कराने पे श्वास मिटे।
११ पुनर्नवा नजू कें क्रट करभाग गुड मिलाकर रदना ३ से ८ माशा सोमासे देना हिते ।
१२ बेरटार नाजमे:प क्रुटको हरद बहेदेर आ|इला पेटो कटहरी मूल पटोल हरदी नी-द! हात नगळ समभाग क्रुटना १ से २ तोलका पनाय पिलाना &
१३ भरणो निंयुदो पकाइत नीम माजरादेर पड घमेने पयाग कर इष्की माज'(यष) देना ।
१४ जीरा पाढा नागमोइ पिप्पलीमूल चषक मोंठ चित्रक कटहरी मूल हरदी श्तीश सममान क्रूट ३ सेए माशा पानीशे देना सव देयपहा झोप टमटे ।
१५ लारोरसदरपंनी चूर्ण ३ से ४ माशा तक पानी या दूधमे २१ दिन सक देना ।
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प्लोहा तिलहोंकी वृद्धि
कारण—पेटद्दी पाये और हृदयके नीचे रक्खनेवाली नमकीका मूल है उसे प्लोहा या तिल्ली मरल कहते हैं । भस्मक दोष चिटने मारड पदार्श' पून विगारने वाले चित्ते, दाहा या विषमज्वर शोतज्वर नेटेरिया के वान आादये पांहरेोंसे कामलांे व्रिटेशका पानी पीनेंसे प्लोहा वटती है । और जौके दाने या मेजवाले प्रदेश जतां गओंफे मूत्रफे पानी पीनेमे जाता है चूय'फा ताप रप मिलता हैं इधरांे कारणोंमे प्लोत्रा बढती है ।
वायु प्रवान होने—प्लोहारे पडनेके साथ पेट फूलना मेय बढना उदरवायु साथे मोर दद' होता है । वित्त प्रधानमे तांप जन्न दाह चेवनो यम-राहट द्वारेका रग पोोन्पन लिये दे। कफ प्रधानमे श्वेोा कठोेन दे। मदांमि अरराच टवका धावे । यक् सेानो डमरोगर दे। सारीरके हर भागर सूरन देा हुया डर । प्लोदाा दाय दुरय पर देठा स्वार ठेनेंमे तकलीफ देा भूख नां लगे यन्त -रुचि साफ न देा याढे परिश्रमसे दप नढे।
पथ्योपथ्य—तुरंतरे साधा :हल्द्रा टेना । घाटतोहो रोटी नांवल जौचेहो मुगा चना जव दे गन दूारश दूधो चौलाइ मेघोकी भाजी छोेड़ दही दूू शह कनां को फली करेसां छोटेों परवल और जों चोज शरीरके अनुकूल हे उचपयोंमे टेनां ।
प्लोद्द पांव—पारद तेंला १०. पघक तेंला २०, तांब्रमरम रेंह मरम स्वण मक्षिक्न मरम शहं मरम गुग्गुलिभरम प्रत्येक छह छह तेंला सेंठ पीपल काली मिरच कुटरांे हलदो निमोेध वृक्ष पाटा सेंंधानोन जवावार संंपल शिलाजीत हरड सेहागा चित्रक शरपुंञ प्रत्येक चार चार तेंला, घन छूट जिंवि वत मिलादेर मिठोय सांर रेदीीतक (रगत रेरंडा) फे रस या कत्राथंी एक एक माकना टेकर रसोंकां गे लेो कनानां । रे से ४ सेहो दिंने वा दफे पानोो देना । प्लोोद्ध यकृत शृद्धि गुलम वायु रकतफांे पेटमें जमीी हुंई मलनि्य मद्दांमि अरराचि मेघ चढना उदावतं वायु आदि मिटते दे ।
प्लोोहारि—पारद आंंक, डेह,अभ्रक शंख द्वादरशो'न् प्रत्येकफो मस्म, होंं भस्मकायन सेंाठ पोपल काली मिरच रेदीीतक चिनक शरपुंञ मूल द्वांड वायविडंग हपुषा गिटेाय सेंधानोन अभ्रमोद घन चनमगा ठेडेर वाकका मूल अडुंषा नो चू प्रंदेक की एक एक भावना बेेकर ३ रत्ती की गोली बनाना । २ शे ४ गोालो पानीसे देना । २१ दिनमे बढो हुये प्लोोहा कोवर पेटकी गांठ आादि मिटते हैं इस औषधको प्लोोहानक रस मो कहते हैं ।
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प्लोदर हर मिश्रण—प्लोदर के रस यकृत रक्तोदरादि रस शिलाजित् लघु व्रणत मातको स्वर्णं पाकिच्छ मदम रक्ख प्रत्यक एक एक तोला टेरर घो टकर रक्खना । एवं से १२ रती दिनमे टेर समय पानीषे देना । प्लोदर यकृतको वृद्धि पेटद्रो ग्रन्थो आदि मिटते हैं भूख लगती है शक्ति आती है ।
रोगहोलकावलेह—रोगहोलक (रक्त रोगहर) को छाल तोला ८०० मे कूट कर वन्नाथ करना । उसे कपहचूर्ण कर उसमे गुड तोला ८०० ठालकर पकाना गाढा होनेपर उसमे रेंठ पोपल ढालो मिरच पिपलो मूल तज तमालपत्र डलाईच्चो हरड वहेडा आंवला प्रत्येक आठ आठ तोला टेकर कुटकर गुडपाकमे ढाल देना । अवलेह लेष्ट्र टेर जाय जव स्वांगशीत होनेपर अच्छे वरतन मे मर देना । २ से ३ तोला दिनमे दो दफे खाना । वढो हुये पेटकी तिल्ली यकृत बठ्ठेला ग्रन्थी टेढींके कुमावसे हुड म्र यी रक्तपित्तम शोरदो वा पश्वातंक शूल आदि पेटके रोग मिटते है ।
रोगहोत्कारिप्र—रोगह तक को छाल रतल ३० केा कुचल कर पानी रतल २०० देसौ ढाल कर वन्नाथ करना आघा रहने पर एक अच्छे लकडी चा विनार्ई मिट्टी को वरणी मे भर कर उष्मे गुड रतल ३० और घाई के फूल तोला ८०, रेंठ पोपल ढालों मिरच पिपरी मूल चरक ,चिच्रक तज तमालपत्र इत्यादिे हरड वहेडा आंवल। प्रत्येक योरह वारद तोला कुट कर डालना । देह पास तक रहने येनार वोत वोत मे आठ आठ दिनके हिलाते रहना । ५० से ६० टिन के पीछे कपड छान कर अच्छे वरतत मे मरना । एवं से ५ तोला तक दिनमे २ या ३ दफे पिलाना । प्लोदर यकृतको वृद्धि पेटद्रो ग्रन्थो गुल्म पचाऽ सृजन मंदाग्नि आदि मिटते है ।
एक्कं लवण—भांकके पीले पकै हुए पान लेकर एक हरीमें पान और पाँच हुवे नमक के २ से ४ थर टेकर उपर पान दाब हडोका मुच मिट्टीषे वद कर माज पुट अभि देना स्वांगशीत होनेपर पीस रखना । ३ से ३ माशा पानीषे देना तिल्ली लीवर वढो हुये मिटे कफ शारदो मिटे
मद्यामृत्यु'जय लेहद—लेहद मदम तोला २०, पारद ग धक अभ्रक भस्म ताम्रभस्म प्रत्येक दशा तोला, रौप्यभस्म मयुरपोच्छ भस्म वांद्र भस्म कोढो मदम जनासार वचजोक्कार विड लवण सैंधानोन मेछोल शुद हरताल चित्रक हिंग कुचकी रोगहोत्क छाल निसोथ इमली फल इन्द्रायण फल दंवला कुड अंपामार्ग मूल एवं च मूल समनेवते हल्दी दंवहल्दी त्रिकटुं इश्र्मा हरित
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अभयमोदकं रसस्यान्न हारपुंस्ख चक्रामर्दकं तज लहसुन प्रत्येक ढाई ढाई तोला लेकर ' स्वय कूट लभिवत मिलाय घडरखके रखलो और मिलोयके रसको एकएक मावना दिठर सुखाकर घोट रखना । मात्रा ९ से २ माशा पानीसे देनेसे महीं हद वीर्यरहित और पेटलो किसी प्रकारकी गांठ मिटती है । खांसी विपम ज्वर आमगात स्वाप यकाधीर ग्रहं शोभ उदररोग आदि रोगोसे भी उत्तम गुण करता है ।
नोट—इस औषधका पाठ भैषज्य रत्नावलीमें है परञ्च उसमें घटक द्रव्योँक्
प्रयोजन नदि लिखा वह अनुवादसे यहां दिया है ।
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यकृत-लीवर कलेजेके रोग
यकृतका कायँ—यह शरीरका मुख्य अवयव है । यह पेटमे पसेओर्योखेर् अंदर वाये ( दक्खिण ) भागमे रहा है । इसकेँ लंघी प्रायँ: १२ इच और वजन प्रायँ: ४ रतल होता है । इसका मुख्य कायँ रक्त शुद्ध करना है । हर किसी सान्निपातिक पाचन शाँन्तिते रक्तस्राव यह सश्व गुण पकत लोवर-कलेजापर माझार रखता है । मद्यत कर के सारे शरीरक माझँर यकृत है वद तिगनेते शरीर फररीर निगद्ता है ।
यकृतशुद्धि—माझार विहारको नियममिटटासे चेष्टा लगानेते वधिष्ठ दोधनेहे सुन दिसानेहे लिवर रहना है मय स्वास चढता है । मल्क मद हेति है । दसतको सहजो रहती है शरीर क्रूरा हेाता है वदस कमजोर वनता है ।
यकृतुका कलेदार कटनेले पानी भनेते इसकाका कद बढता है । पानी पविक मर जायेथी पेट तुवी जोडा मोटा हेाता है, पेटपर शिरायेँ दीसती है । दम मरनेलेसे देर मक्ता है, सेते किते कहो सुख शरीर नहि मिलता । रोग कपजोर क्रूरा हेाता है, वमन दिसा दस्तद्दी कमजो कमँ' वाधक वस्त ये चिन्ध हेाते हैं ।
यकृतमे सूजन जमाय—दाह अधिक पीनेसे मर्री निकसने पदाथँ याजारकर शराक जलद मदातवाळे पदाथँ खानेते शागद्दी लगानेसे विपमउररहते मलेँरयाके धुखारसे इव तरह अनेक कारणोसे लोवरमे सूजन जमावहेँता है । जय वळेजे मार-नेव्ल लगता है, पयलके नीचे और उपर ददँ हो, मोजनके पँछे पेटमे सांँच दे, पेटफूलेँ मल्क मद मोमपर छारो जमे, दसतको वठदी पिदाय दम और अटक अटक कर दतरे शिरमे ददँ हो । उतसाह स्फूर्ति आंन द न रहे वभ्रें दसतमें और उलटीमें सूजन हो, दाथ और पविम सुजन हो, स्वास वढे मुलँ पर मुखन हो ।
लीवरका तीस्णदाह इमे सुसारको गाठ, ठंडीओमाठ हुक्कारकी गाठ अठे मदते है । वलेजा मोटा हो, लाव सक्खत दढे मसतकमे ददँ हो, दाह ओर कल्स निकले, वळेजे पर दावनेसे ददँ हो खास ठेनेते, सांँसो या छोक खानemे दसँ हो, रानो बाई ओर (वाम भागमे) सेा न यके चुषा रने, विशाख येधा येओर्ा और उतरे ।
साँख कमर जौसी पाँलो दिखेहे, श्वासखो गति, वढे सक्खो खाँसी आवे, दियकद -दिचको भावे दमन हो । पेट कठिन हो जीकपर सफेद छारो जमे दांये कमाङे -ददँ हो यर्सी वीयम मोद हो ।
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यकृत के रोग—यह कफजाका सन्निपात है। पेट और छाती पर खींच कर पद्टा बांधनेसे दाह पीनेसे, विषम ज्वर वा अन्व त ताप लवे समयतल आनेसे, रक्ताशयके रोंगसे उपद्र शाके रोंगसे इत्यादि कारणोसे कफेज्ञा प्रारभमे वढा होकर मीधे स केाच पाकर छेआटा और कठन होता है। इसककी उपरकी चपाटी चदु (लोचो) म रक्तकर शोथाफल जडँह उँ ची नीची (खरचट) रहती है। अजीर्ण रहता है।
शमी मुखसे उलटीपे और दस्तसे खून गिरता है। इस रोंगके साथ कफोका कामला अरुचि वबका वमथ कदप्रो वबासोर ह्मलोरी आदि उपद्र भी होते है।
यकृतका विद्रिधि—कफेज्ञेपे शोथसे दाहसे या सन्व करणोसे व्रण-पुमडा पन्थी होकर पद (पथ पूर) होता है। तब ठंडी लगाकर जुखार चढता है पथरीना ह्वा अजीर्ण ख्वा भूख न लगे, शिदल-मुखसुर्दा निस्सेज हो। जुखार उतरे हो मोह द्वाहमे जेठण ताप रहे। न ठंडी गति फलद हे। मोम पर रफेद छारी लगे। र्ातको ताप वढे। उलटी दस्त सुरडा हो। कफेज्ञेके म्गगमे छातीमे पेटमे दाथे कमेमे दर्द हो। कलेता वढे। पाक होताहो उच जसह अथिक दद हो। विद्रिधो प्रन्थो पकने पर कभो श्वदर फुटती है। कभो वद्वार मण होकर फूटती है। तब छातिके दाया पहखा पोठ था पांचोके बौचमे सुजन होकर वडा शाढ ग्रन्थो वन द्वाता है और उसके उपरले म्गगमे छिद्र पददर खुन और पस निकसता है। यदि अंदरके म्गगमे फूटे तो उपरके चिन्हो के साथ दम चढे, पस वस्तमे पदे, खांसी भावे विकदानी भरसाथ इतना खुन मिल्थित कक और पन पस वढे।
रेागी एऋद्म स्र्मुयु पांचे। पेटमे चरुत पीडा होने लगे, सारे पेटमे बेझ भार लगे, रेागो वेदना श होवे, नाडीको गत क्षीण हो, और मरण होवे। कफेज्ञेरो विद्रिधिमे पच पाँच ह तेालस करके पाँच सात रतले तहँ-पत निस्सलता है।
पस हेानेके पीछे रेागी वलवान हो और पूय दम उत्पन्न हुवा हे। वे चसका खोपण होकर भाराम होता है। यदि एऋाद जगह मुखकर सब पूय आताहै। यंह रेाग दारू अधिक मर्ना रहित पोने वाळेठे शविक होता है। दारम देगमे दारू अधिक उपयेग करने वालो मे यंह रेाग ज्यादाहोता है।
इसे एडे पेठोमे लीवरका केन्सर मी कहते है।
पथ्यापथ्य—साथ जुलाव देना। र्स्त पिचार्वाका खुल्ख्वा देनेसे सुजन शम होती है। साठा दलका खराब देना भाराम मे--। श्रम करना नहि। दध पथ्या शूल होता हो वरत सेोक लेप करना। मु
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चनेका जोंका वाजरेका थाटाकी गुद मिल यो' रास देना। दूसी सरण परवल करेलां कटेला चोलाड मेधीकी म'जी आंदि देना। पसोंता लाना गड-ग्रण बहार नीघले चे! पचाकर फोडकर विगार निकाल देना। इस रेगके घाबा जो नो चिन्ह देा रखके अंघधका रोग तरना।
यहतव्लोहोदराथि लेओहो नं १—हर्ण महन वेओहा १, त्रायमधमम वय मचम शंखरभस्म माक्षिकभस्म श खवभस्म प्रत्येक चार चार वेओहा ठोइभस्म ९० तांला, रव गांध मिलाथर शुदरख भरगीओहें पान चीलोके पान फुरकी तुलसी पान प्रत्येक रष या कनायहो एक एक भावना देकर घोंटदर रखना या एक रत्ती की गोली वनाना। माथा २ से ३ गोली दिनमे दं। समय पानीधे देना। लीवर के रघ रोग ने गुणकारी है। तिल्लीोंदा रेग स्वास नांभी गुलम सूजन पांहू कामला मे नी अचूा मुगकारी हे।
यहतव्लोहोदराथि लेओहा नं २—इस्मे हर्ण भगमकी जगह स्वर्णमा क्षिक -स्टोली जती हैं। यह भो यकृत प्लेिहा पुष्टम प्रत्योi आदिेमे शच्छा काम देती है।
नेओंध—ग्मान्य शारिक स्थिति वांठे ठेग स्वर्णंभस्म काला न ठेठके उनके लिये स्वर्णमस्मकं रघ नगरे स्वर्णं माक्षिक ढालदर दनोंना पड़ता है। कभो गरीब रेगीहो बिना नूल्य याने घपंरदा देनेके लिये भो मार्दिकमस्म नाला वनाना पड़ता है। इस लिये जांत्रोक पाठों एक नंवर और मार्दिकवाळे दे २ नंपर दिया नया है।
क्षारामृत—अचचल जवासार सुरासार खजोचवार से'घानोत मेघागा विड स्वण वमक शंख सम'न माथा ठेठर आंफके दूधकी और थूहर के (गुदो) दूषकी एक एक भावना देकर एक हंडीमे आंफके पानधे, ४ से ५ थर देकर वीच वीचमे यह दिचाकर उपर थाक्के पान दाखकर हंडोके कपड मिट्टी दर राघपुट अगि देना क्षाराग्रीत निद्धल घोंटकर उश्के समान नीचेका राहीतकोद चूण मिलाकर रख टेॉडना। इषोो माथा दे २ से तीन माषा तक रोगका स्वरप देतदर दिया जाता है। लीवर तिल्ली गुलममे गुणकारी हैं।
रेहि तकांदि चूणों—रोहितक छाल भनीस लत्त परं वीजो गिरी (कॉचनीयारमी ज), भेठ पीपरल काढीमोरच वायविड म गरसें (गरढ वहेड़ा भांतिला सेध.होंगी पुनंवा मूल पटोलांधों भजमेष्ट मोरा श्वादाखीरा घव हम माप -लेदर फूट कर रखना। यह क्षारामृतमे चप सापसे मिलावा जाता जाता है। और मकुन लीवर के रघ रेगमे यह चूणों अकेला भो २ से ३ माषा पानीमे दिया जाता है। सब प्रकारके रोगोंके रोगमे नत्रम गुणकारी 'है।
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पारद मंथन पकाया सेहग्गा स्वर्णं पाक्षिक मसम्यष्ठ मसम प्रथयेक दश देला, साबर शोंप ताम्र शुद्ध और शक्ति प्रत्येकको वस्प मीन यौष तेला, फौदी मरम तेला ३०, सव साथ मिलाय कड़ारपाठ और पंचफे रसकी एक एक भावना देखर इथका गोला कर उपर कैलीका पत्ता रपेट वागा बांध कर उपर कपड़ चिड़ी कर पांच रतल धाण'का खविनिमे पचान । एक कुंडामें उपर नीचे छागका डुकरा रखकर रविन देना । स्वागप्रीत होनेमे निकल कर छोटकर रस छेछना ३ से ४ रती दिनमे देा समव छांछले राददषे या गायके दूधषे देना । लीवर के सव रोगोमे उत्तम गुणकारी है ।
सूतकुज अथ रस—पारद तेला ४, नगक तेला ८, मणक लोह रौंप्प प्रत्येकको भरम चार चार तेला, साम्त्र यंत्र पा'क्षित प्रत्येकहू भरम चार चार तेला, रसविदूर चित्रकू सुगंध लाक्षादि मि प'पचीपूल हरड़ वंहीडा आंनला मिसे थ अपामार्गंभूक भतीथ श्वेत विसिरिया वछनाग पुननंवा मूल जटामांशो मयूरगजजा नापरमोय सेहागा हरड़ी संचानेभ कचाखार प्रत्येक देा देा तोला सर सथ मेलाकर अपामार्गं पंचांग भरणी पान छदरखे और विस्वक पत्ता प्रत्येकहू सोध कवाथक्षा एक एक भावना देखर देा रसोकी गोल्लो वनाना । माता २ से ४ गे लों पानो मे देना । लोवरकी प्रन्थी लोवरकी वृद्धि लोंवरमे खूनका उमाद ल व रके रोगेमे वत्तम गुणकारी है । पांडु रोग छामलु पेटके मेग कफमि'गुल्म मदारिप्रि खूनका विगाढ म्लेहाको शुद्धि शुल् इन रोगो मे मी दी जाती है ।
यकतृ प्लीहः।दि योग—सवें श्वर रप'टी यकतृ प्लीहादरारिरि लोह शंष वटी महालक्ष्मी विलास अरोम्यअच'नी शिलाजीत सवणं वम नेपालीती प्रत्येक एक एक तेला और मछालेकनाथ तेला २ सव साथ घोटकर ६४ पुढ़ी वनानां दिनमे देा वमनप अमृत मल्लातक कंडकारी अंछेह अश्ववा चित्रक हरितकषी १ मे २ तेला में मिलाय कर देना । सव प्रकारके कटलेकु रोगवमे उत्तम फायरा देता है ।
रोहोतक छृत—रोहोतक (रक्त रोहदषा) को छाल होला ४०० झोर मुठषे निकालो सटूते मेर (बेर) तेला २४० कनाय वसाना उसमे वकरीका अशवा उटनोका दूष २४० डालना और मेठ पींपल काळमिरच हरड़ा वहेड़ा कांवलां हिंग अजवायन वायविडंग पिडलक्षण अजमोद संचल डोंग पुष्टकरमूल अनारबीं देवदार पुननंवा मूल इन्द्रायणका फल जमारार चित्रक हपुषा नवक वच प्रत्येक एक एक तेला कूटकर कषाथमे डालना और मच्चा घो रस ल २० डालकर घीमी आंचषे पकाना । जरका अश जल प्राय जव समिन निकाल कर ठंडा होने देना पांच गम्र कर वो उपर छानकर मुख देना
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३ से ४ तोला तिलने गीला चसत्त तिलाना और यकृत् प्लीहा के स्थान पर बाहर मालिश करना । और ऊपर चताये विषो औषध के शेष धन्वान रूपमे मो देना । यकृत् लोयहर प्लीहाके रोग धौर उसके उपद्रव पोदारी चिन्ह मे उत्तम गुणकारी हैं ।
सामान्य प्रयोग
१ सिताजीत रसजं मिश्र मादिक मदम क्षारान्वित समभाग मिलय ३ से ६ रत्तो पानीषे ११ । न तक देतेषे नं०ला लंभ होता हैं ।
२ महामनेको छाल पोपल (अन्नभ') छाल पच हि'न सेंधानेोन समभाग कुटर ९ से ३ माषा पानीषे देना ।
३ सफेद फुलको पुनर्नवा का मूल तोला १ पानीमें पैसकर पिलाना ।
४ हरड़ (वायच्ररहरे)का मूल तोला १ द्रेमषा पानीमें पेष पीलावा ।
५ धतूरे(कदिर) की छाल हरड यहेहा शावलो नीमकी छाल फुटको मूलौंठो मुल जिरेष्ठ पटोल मुसरकी दाल शेष सम भाग ले कूट रसना हंमेषा १ तोला का वत्ताय कर पिलाना ।
६ सदंर्जनादि मूल तोला १ मधूने पीस उसमें १॥ तोला पानी और १ वहा धमःच सार्द्र हालकर पिलान । २१ दिनमें यकृत् प्लींहा के रोग मे काम होता है ।
७ रक्चंदन मध्रींठ हलदी मूंगौंठी मूल सेजागेर समभाग कूट पानीषे पिष लेप करना
८ तपरके भागमे देापच लेप अथवा दशांग लेप लगा ना
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वायुका गुल्म गोला, रक्तगुल्म खूनीका गुल्म प्रन्थी
वायुका गुल्म—जठर अतिसार घनप्रकोपके रोगी धातु इस रोगसे मुक्त, चमन विरेचन लिया हुवा मधुम वायु करने वाली चीज़ खावे, भृङ्गा पेट पानी पांवे भोजनके पीछे तुत' क्षार म कछरत हरे मूडे दौडे, मल मूत्रका नेऊ रोकै इमशे यह रोग होता है। ठंडे रात्रि में अन्न ग्रहण न करनेसे, हड्ड हूवे (ग्रीष्म वातल आदि बिना प्रस्राही याथ क्रियाके) लेटे रहनेसे धोखे चोट लगनेसे मल क्षोण होनेसे अधिक उपवाससे वलवानके सथ लडनेसे वायु प्रकोप हेतु पेटमें नूरम गोला का रोग होता है।
लिन्ध—प्रारं मभे वह्न डकार आवे दस्त टेढ रहै तृपा लगे भावे मे दाह हो। पेट मे वायुका गुढगुड आवाज हो पेट फूले चमन हो मूत्र न लगे वायु प्रधान गुल्ममे वस्ति हृदय न मिले ओर देनें पथ्ये पीडा हो तिल्ली की जगह पीडा हो। मातवे वादर करे पिड़्यां मोत्तो हो एसा दद' दस्त चमन हो शरीर सिकुड जाय सूलमे शूल लगे थकान वायु छुड़ेर कफि यह गोला कठिन नदि हेाता क्षवर नीचे चढता उतरता हैं। पित्त प्रधान गुल्ममे जलन दाह स्रूटे डकार मुर्छा पसोना हो तृपा लगे डरर चढे गुल्म डपर नीचे गति मान हे। कफ प्रधान गुल्ममे वहकि पीनस नाकसे पानी गिरे डकार गुल्म कठिन दिर्य एक स्थान में जमा हुवा मालुम हे ता है।
रक्त गुल्ममे—यह गुल्म प्राय घोरदका का हेाता है। मासिक अनियनित होनेसे, गर्माञ्ञान न होनेके औषध स्थानसे, ऋतु वादर न मिलनेके लिये कफदा कदे छालनके कारण ऋतुका प्रकाद छटक जानेसे, प्रथम प्रसवके समय वीङ़ा हुया खून न निढरनेसे, प्रतिमास आता हुया ऋतु भटंक न हिमके नीचेके योनिमे जमा होकर रक्तका गुल्म गोला होता है।
लिन्ध—डकार आवे, हरीर कफा हो पेटमे दर्द उठता दाह दस्त तृपा ताप झुल येनिसे युगंधी स्वाव मादि होता है। किडीके रयूताधिक भ ता रहता है, इसी दशामे ऋतुदा रफ विशेष स्पानमे जमा होकर औरदकि रक्त गुल्म हेाता है। प्रार मभे रभं रहनेंकी वांका होती हे। तेदन गममें फरकता है जव गुल्म पियार हेदार खुल निकलता है। रसके द्वाय पांव अवयव जान सकते है जव गुल्म गोला आकार हेाता हैं।
पथ्यादध्य—जा चिन्ध साजम हो। उसका लेोपन देना। शेक करना लघु हो। हो खुराकमा नोंहा रहे। जेसी शोपन जेसे उरम न गने/शरमक
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३९कर भघो दायu छुटे वैषा करनr । येत पेढ वृकृd नामि के दोनो वाजु मालोष करानो । र घन करनr, मुल n हेतोr नानr महि । शलप मितादार इल्का शुराक सुंग वाजरी द्वव चनr सकद मेंयी दुधी शत्नr वेगन सुरण कटेलr आादि ग्राद, लrल मिरच अडरs । वदि नमक हिग ग्रेकप धानियr जीरr र'इ मेधी टोंग ठण्र मीटrनीभ आादि मसू लr खानr । निंुका रेङडr (करीर) फलदr अवधर निंुचr रस र'ल वास्त मे ड'ल खानr मिटानr डप नानr गुहृr दियानr दा.नि नहि हरतr । च'हृ कापी हम पीना ।
गुदn दाघानल—पानr मधुर, असनr सुवर्णr माधुरिक ठेहर त म प्रत्येको मसप शिलाजीत मेहरुमा नक्शr मेराकr'r मे खानीन चनेलागrर सोह पीपल काली मिर्च वचn रेवर इलायची तगर हलदी पिपरद हरड चोपचीने निसोध आाददr दूवं युदररr दूव शरप समrन माप लेहr अरनी चिरक मांगरr तांबूल प्रत्येको एक एक भावनr देखर सुनrकर चोट रखनr अथवr दैr रती को गेलrी वनानr । मातr २ शे ४ गोलि पानीनें देनr। चह प्रत्येकr गुदn गोलr एक गुल्म पिततr हैं । रगेहr यकृत को वृंद अडवृंदि रेस उदरrतं मे मी अच्छr फायदr करतr हैं ।
मुत्र पचामृत—नेतोंको पित्तो १ पलाल २, वंग ४, दंl ८, शुंकि १६, मसप याथ पिटादर इक्षु-मधुचr रस मोत्रr दुष पि.रींदद पंचामृतो वाताररी इमराज मुल्यो प्रत्येकr रस या घवायrी भावनr देखर शरान मंपुटमे -कपड मिट कर कुषमुट पुष्टd श्रमि देनr पछै निधाल घर चाटकर रखनr ३ रत्तो मात्रrमे पोपलrहr चूर्ण ६ रत्तो मिलrकर पादर चा दवथे देनr ।
मुत्र विदृंp वंगr; रs च, शुक्ति: कमांद दिगुंfतांनि ।
इदृ्नो: सुरम्यो:पसr विदादृrकr कन्यकr जrहृrवयo ।। द सspदो द्रयमाr. द्यादृच रसेन यावनेkr ।। मृरूजूट पुढेन वपदृr' करणr मुक्तr विरक्कि मातr =यात ' मुत्रr मr दुग्धेन च द्यादृ- हरकुकुच क्षrगदेपू ।। ४ 'पदृवायमेयु युगदो , मुक्तr पचामृत. पचl सिद्ध: 1:- सव प्रकारकr सुरपरोरात हरंय मग कुषकुंf रेग भय रोगमे उद्दाम सुनकारती हr ।
! १-- वंगायनो-गुटिकr—भजrगयन जी। धनियो करोमोच, असरपितr -खींzmवद सुरrजीरrर, मेधr, तेरh ६ रिrपेय देयr ८,
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पञ्च स्वर्ण पञ्चौ मिलाकर तेला ५, दंती मूल वचुरा पुष्कर मूल मायवीडंग अनार वीन हरद चित्रक अमलवेत सेठ प्रत्येक तेला १६ तव साथ मिलाय कीजोरा निम्बुके रसमें गोली ३ रत्तीकी वनाना। मात्रा ३ से ६ गोली पानीषे देना। सब प्रकारकी गुल्म वात गुनमे मधु घोंछ या भावस के साथ, पित्त गुलममे दूध के साथ, कफ गुलममे चित्रक द्रवतुली अवलेहके साथ, त्रिदोष गुलममे वधरीके थथवा टटनीके द्रषफे घाय देना।
गुल्म हरानल रस—पारद गंधक शुद्ध हरतल ल ताम्र भस्म से हंगा जवाखर र प्रत्येेक दो दो तोला, नागरमोथ पीपल दालों मीरच सेठ वजपील हरड वच कुष्ठ प्र-येक एक तेरत देखर पर्वट नागरमोथ अप माग' पारा एतयेकके स्वाथकी पकएक भावना देखर ३ रत्तोकी गोली वनाना ३ से ६ गोली पनीसे सब प्रकारके गुल्ममे दि जाती है।
पहुननाध रस—पारद गंधक अभ्रक लाम्र वंग प्रत्येककों भस्म टकण मर्कट वचयनाो हरद उश्रामवार सेधानोन हरड पीपल कालीमिर्च सप्त समूल आंष लेकर मिलय नि तु रसव क्नारपाठा भदरख प्रत्येक के रसकी एक एक भावना देखर वे देना। रत्तोथो गोली वन'ना। ३ से ४ गोली पानीसे देना सब प्रकारका गुल्म क्रोंओंका। रक गुल्म पेटकों प्र-यों मोाठ लोेधर प्लेन्हाकी शुद्ध इसमे गुणकारी है।
गुल्म कुडार (या र) नाग वंग अभ्रक कांतलोेह ताम प्रत्येक की। भरम सव अ्रममाो लेकर नि तू रसने घोटकर रत्ती प्रमाण गोली ववाना मात्रा १ से २ गोली अदरखके रसमें शहद मिलाकर इन्के साथ देना उपर मोंळ पिलान। सब प्रकारका गुल्मरोग भजीण' भाम राग खोर हृदय त्व' उदरमे निकलतर हुआ शूल रोगमे उत्तम गुणकारी है।
निसूक्तार प्रवाही—निंसूक्ता रस शोर ५ एक यथे काँचके वाटला भाषा खालों रहे ऐेसा भरना उसमे निसूक्तार सोरांखार टकण फिटकरी मजनिखार जवाखार प्रत्येक अंधा भाषा घोर कुटकर डालना पीछे मक्खनत तुल देकर रख छोडना। एक मदिनाके पंछे कपडछान कर रसना। मात्रा १० से १५ तुंद अथवा छोटी आधी चम्मच भंरदाज पानी तीन चार तोलाम डालकर पिलाना। स्वादके लिये आंवदरखता शहदो भाषा थोाथ आंवकर डालदर पिलाना। सब प्रकारके गुल्म वटार्तं वायु गेंड चढना पेटक्षी ग्रन्थो आदि मे उत्तम फयदा करता है।
हरीतकी अवलेह—चित्रक मूल भरणी आंवला घोटी कुटहरी भपामां ग' प्रदरंड़ रक'प्ष चानोेष तेला लेकर कूटदर कवाथ करणा कपडछान कर उष्ण
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कवाथमे सेठ पीपल द्वालचीनी अवाखार शतावरी घेरा से'धाना से'धानोन नमक भजवाटम ससगंध पीपरीमूल द्रांदमाण फट्फरमाथ घमासा प्रयेकषं चूर्णं चार चार चोलम और वसंतकुसुम चूणं चोलम ८ अंशी घघ चीजें यथायोग्य डालकर पकाना, रखते जेसा हे। काया नन उसमे पुढ चोला ८०० आठसो रत्ते अंडेक जेसा घरतक हे। जव स्निग्धोती हरीनिये पथ्ये करसतनमे भरना। रोगोडा सारीरेकु हाड चिन्हे टेसकर मापा ९ हे ४ तोला तक दी शातो है। जय प्रदारकवा गुरुम पेटके रोमा उरातत' गेव चढना मं'दार्शि मराघरेग वमन हिच्छो द्रवषो वचनी पाढ कामला आदिमे उत्तम गुणकारी हे।
केरंडा द्वार प्रदार्थ-फेर करंर (केरडेर) का फल जिस्का अचार बनाता जाता हे। नमक हलदी आदि डालकर फालके डचे रखते हैं। वह पानो पढा सेर ५ मे चोठ, प'पल, मेरच, से धानोन, अमलवेत जन्तावार प्रयेक पांच पांच तोल सुटकर डालना युन लगा देना जव चरत हे। २ से ५ तोल तक पिल'ता। पेटदर्दा शूल पेटदर्दा दर' हरदाल गांठे होतां हैं। चढा हुभा पुरम चठ जाता हे। हेमरा ९ चम्मच पीलासेमे १४ दिनमे गुरुम ग्रन्थी वतिलकी लों'वदर रोग मिटता हैं।
मेघुर प्रयेग-नेहुका घाटा भाहके दुसरे पदं' घर चनाना उस पर आहके पत्ते लपेट दर नाला बांधना। पीछे उसपर चाली मोटीहा मुलाकर जमींम १० डंच गहोद घर उसरे वढ रस् उपर मिट्टी दाब देना। उहके उपर घात: जोर दामदे। २८ सैर छाणा जताना। इधप्रहर सात दिनतक करना। पोछे ८ वे दिन निडर मर मिट्टीो पान अलगदर चकाकार के पीस रखना। मात्रा ६ हे ८ रत्तो पानीसे देना। हेम माजाहे प्रारमभ करना रोगडा स्वरह पेसकर यानि मात्रां वढायो जातो हे। जय प्रदारकवा गुरुम पेटे मिटता हे।
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मूढमार
कारण—हरतीसरे प्रकारमारी मे लडा़ंसे उ चे नीदे स्थानसे गिर पड़नेसे चोट लगनेसे शरीरके किसी एक अंगमे या शिरमे अवरावे या अॅगोमें मार पड़नेसे खून नहि निअरता और उस जगह पुतका उभाव होकर शोध सूजन हो जाती है दरदं होता है । हदय जोसे अॅगो पर सख्त मार पड़नेसे कभी मृत्यु हो जाती है । ऐसT मारने' मूढमार कह्ते हैं ।
पथ्यापथ्य—सट्या शकं आइसबेंग शरबते खांडको चीजे खाना नहि । मधुर पदार्थ के लिये युक्तिारी चीजे दाना वाजरी मुंड़ उडद आदि हितकर हैं ।
महालाक्षादि गुगुल—लाख तोला c साठ पारद गंधक हरड मोलींवा विराहटा छाल (आशेदारें-श्रमंतक)शिरीष छाल (सरसडे) असमांघ कचावेंज सता मधी सेंठ पोपल कालोमिरच तग लोंग प्रतयेक चार तोला छेनT, गुगुल ३२ तोला और गायका घो 90 तोला मिलाकर मद्दीन कुटकर पानीसे गोली रत्तो ६ को बनाना । २ रे ६ गोली दिनमें दे। समय पानीसे या घोसे देना उुपर दूध पिलाना । बुधका खराब ज्यादT रखना । तेल तिलप आदि वायोपचार करना ।
सुमनोभाई—पीपल रंलको र'ल तोला 80 और मीलोंवोकी उपरकी टोपी होंट निअरTल कर तोला २ टेडर दैनोदेई साथ कुटना न अच्छो तरT एकत्र हे। जाय पीपल तोला 9, शकरकरT तोला 9, और कमोठिंग रफ तोला २ सरकेई मद्दीन घोटकर उपरके लाल मोला के चूणमें मिलाकर फिर कुटनT, एकत्र हेओजाय जव उसे खोपरेदो तेल तोला १० ढालकर एकत्र करना पीछे मिलेके चौहे सुंहके धरतणमे हाज्ना (पाटीया-प्राम्य प्रजा जिसमें दाल आदि ख य पदार्थ पकाती है) उसे चुल्हो पर चढाकर तीन अमिन देता हड्डनन डांड़नT थवका रसहो जव लडधीस' हिलाना उफान (उफाणे) भावे जव नीचे उतार कर थावे जम नीचें सतारना इस प्रकार तीन दफे घरणेस' पक गया समझना पीछे उसे मिट्टीक ढंकनेसे ढंक देना १२ घंटा तक शीत होने देना । पीछे मिट्टोका बरतन ठेठकर पपंहटो-पपहो जेसे आभारीकी दवा निकाल कर घेओटकर रख छोड़ना
यह सुमनोभाई दवा तियार । इसको मात्रा रती ६ मे' जायपत्रो (जाव श्री) रत्तो ३ और लेआव रत्तो ३ का चूण मिलाकर सुचे थाम घो से देना । चहTे पोवा मूतमारु शुरुका जमयप हो गया हो मूत से खून छूटा पह आता है और इसे १० दिनमे आराम होता है । यह औषध वमन पेटफा गेस उचावलें कमजोरो मवाकि
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ये भी दो जातो हैँ । यह कौषष यनाते वक्त 'मौलाष्कार तेल तस्फर हायपर लग आय या दूसरे मंगपर 'सग लायने खेापरा (श्री फल टेापरा) खिलाना और हें परेदा तेल सम जसद रांलीस करनो । दवाड़े पवाड़े समय हायेमें घो लगाना । हें मपाद कुमाद सुमदं सुमीआदे दुतरादि नामषे पतियानहे है ।
मंघान —पहुँके पोला तेलँला १४, देशी म वत तेला १४, स घानोन तेला १४, हद्दो तेला १४, चुरा सार तेला २०, घेएदेकी लाद (लौंड़ा) तेला ४० मष्ठे चाप वृट पानो मिलाकर मे टो रोटी जोषा पनाछर पकाछर मार चोंट लगी हे व्रण पर घघना आघा इँच मोटा (जड़ा) टेप करनो । उपर रेक वरनो । जमा हुवा खून टूटा पदकर पीड़ा मिटती है ।
मरालाक्षादि तेल, महावानारायण तेल आदेसा दालेंष करनो ।
+ष्षष्ठ+क+क+
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हड्डी टूटना सांधेको मरड हेानो
कारण चिन्ह—गरजानेशे चौड लगनेसे हूाथ पांवमा परेाड टोनेसे किषी व॰तुका घाघात लगनेसे हड्डी टूट जाती है । हड्डी टेरा सांधेमेंसे नीचे खींच जाती है । हड्डीकी जगह सख्त वदं होतां है । टूटा हुवा या टिस पया सांघि वेढौल होतां है । हड्डहो बहुत करकट वेढिक वागसे टूटतां है और अंदर कमी कटकट शब्द हेतां है । हड्डी टुटी है या टिस रीया है इशको जांच कर पाछे उचित उपचार करनां, जिस या होतो उचे चोटल स्थानपर जे ठाकर पाछे पाटा टेप आदि करनां ।
पथ्यपथ्य व—ग्रारंभमे शीतापचार करनां । टेप टूडा लगानां । शीत यथाशक्ति घेनां और शीत श्रांडी वस्त्रथ पिलानां । नमक तीखा क्षार वाळे पथ्यथ्र वेषम न्यायाम रक्ष ल्वस्र—घी दूध विरहित अभिष्यत् चीजें खानां नहि । खांड शर्करा दो चौड कमायानां ।
सामान्य उपचार—प्रारंभमे उक्त जगा ठंडे पानोकी धारा करनां । ढालकी खालकी मिट्टी पनी विराय टेप करनां उपर दशम—(घास) चूण कर पाटा योधनां । हड्डी नीचे खिवक गई हे तोवो उचे चढानां, उंचे वढ गई हे तोवो नीचे उतार कर ठाककर स्थान पर ठोठा देनां, नीचे खोंचकर भच्छा करनां । पाटा दहून लोंच ला वोधनां वहि और बहुत ढीलां त्रिसिल भी नहि वोधनां । शीत पहुद्रये पाटा यात रात दिनके पंछे खेलनां और प्रोष्म ऋतुमे तीन तीन दिनमे खेलनां । ९ मास वीतने पर पाटा पांच पांच दिनके पीछे खे दना महुह्रा (मधूक) गुग्गल सर्ज पीपल (अश्वत्थ) वड (वट) ढाक इत्यादि वृक्षाकी छालफे घूंटकर यादा साधासे ९ इंच मेढा (जांघा) टेप कर उपर उछी वृक्षकी छाल रस पांटा चोधनेसे टूटो हुई हड्डी और सांधा जल्दी मिल जाता है ।
स्वास्या मरहम—वचुलकी पत्ती ढालकी मुल फुल पत्तो नीम, पीपल (अश्वत्थ) की छाल, आंवला हाड्सांचळ अंनेघु (अगधिया)की छाल, आंवळेसवरकी छाल गूळरकी छाल प्रत्येक दस दश तोला लेकर कुचकर महींन चूर्ण अनाहार घवके सप्त न अर्थात १० चीजां घस्र मुगळ डालकर उसमे मायका घो तेला २० ड'lलदर कुट मिलाना और मधुयर्द्धी ढालके कसायाकी भावना देहकर २ रत्तीकी गोली वनाना । दिनमे दो या तीन समय ४ से ८ गोली पीपहट या चावधर पानिये या दूधसे देनां । १४ से २१ दिन तक देनेसे टूटो हुई हड्डी जुड़ जाती है । खिवक गइ घोांघा अपने स्थान पर स्थिर हो जाता है ।
भग्नारोग्य तैल—वचुलकी छाल मूल फल पत्तो नीम, पीपल (अश्वत्थ) की छाल टांककी मुल दंम मूल लोध्र असगंध सोंठमोठी वलामूल बहुबला
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मूल मालपांनि पृथ्वीरजि अरणीपान सिगेयूको छ'ल गूलरककी छाल तेलकी छाल प्रतबेक दश दश तेला ठेकर कुचलकर उसमे दूध तेला ४०० और पानी तेला ४०० डालकर १२ घंटा रहने देना । पीछे तिलका तेल रखल ४० डालकर घीमें भोंडछे पदाना । पानीका अंश जल जाय स्वांगशीत होनेके पोछे स्पडछान कर रखना । यह तेल मालिश करना कपदेधा दुरंडा भिगोकर उस अघद लगाकर उपर केलोका पत्ता दाबकर पाटा बांधना । यह तेल ९ से १२ चमच्च दे। दहत दूधके साथ मिलाया जाता है ।
भन्न संघान लेप--दोरादेलके पीसकर उसमे मुरवकै रस दाखै सफेदी मिलाय मलम जैसा वनाकर लगाकर पाटा बांधना ।
भस्मांति लेप--गुल तेला ४०, हीरादेल तेला ६०, एलोयै, दमोमस्तर्की शांत भरम प्रवेक एक एक तोला सव कूट मिलाय दरारपाठाफे रखको सावनो देकर सुखाकर रख छोेरना । आवश्यक्ता हेा जय पानीसे पीसकर लगाना पाटा बांधना ।
घा रध्मा खाडी--प्राथतनाडी कोदणकी घोर मालेखंघ्र नामक घोसरची होती है जैसे सेंधनो मो कद्दते है । इसकी पहचान यह है कि उसेकी पत्ता योमेमेसे या रदोंसे तेल कर काटकर जुदनेसे घाव मिलकर पसां आना हेा जाता है, रदांसे टूटा था यह मी मालिश नहि हेाता। इसे ले पत्ते मोखकर घावपर ढेर करनेसे घाव निकलता वघ हेा जाता है और घावकी रधा भा जाती है ।
भन्नारोग्य मिश्रण--मुत्रा पर्पटी, जहर मेहरापिष्ट, प्रत्ताल चंद्रपुस्ती, व ग्रमभा न ९ शिलाजीत प्रत्येक तोला एक एक अन्मानासव तोला ३ शपाथ मिलाकर ४ से ६ रती सुवे श्याम शहदसे यां घृतसे लेकर उपर दूध पीना ।
लेप--९ जामद्रा मूल सहजनाके पान पुनर्नवा मूल वडकी छाल सममाग फटकर पानीमें या घृतमें पीस लगाना ।
भस्महर मवाथ--लाख, बककी छाल, आंरेधराकी छाल, सिगेयू (भगस्त्य)की छाल, वचवूलका मूल सव समभाग लेकर कूटकर देा तोलाका कवाय कर किसी औषधके साथ मिलाना ।
लेप--२ मजीठ, महुडेभा फूल घरसंडा (शिरीष) घोइ छाल चावलका पाटा सव समभाग लेकर पानिसे घे यां हुज्ञा दुग्ध मिलाय मलम वनाकर लगा-कर पाटा बांधना ।
२ द्रवांललेप--पानीमें पीपल लगाना ।
४ मालालाक्षादि लेप--अथवा सुंगराज तेल मालिश करना ।
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पानी लगना दुजैलजन्य रोग
कारण—देश परदेशमें-अपनी रूचि भूखसे बहुत पेटमें रहनेठे वशका पानी लपमेसे, आहार विधिरका नियम न रगनेसे, लगल पदारथोमे रदनके कारण वशांके ऋतुसे मुख्ये प्रकार ढोनेयाले जल पीनेसे, मुंहदे गौसे पांच वस्तं के साहरेभे रहनेभे तालाब आदिका गधे ज पानी पंनेसे पानी लगदा है।
चिन्ह—आर फिकरका निस्सतेस हेाता है। चलते फिरहे कामकाज करते दम चढ जाता है। शुराघ पाचन नांह हेाता, ड्सकी यद्र्ने-मलादराष रहता है। कंमी पतला दस्त हेाता है। दिमाग फिरता है। दांखि प्रोण हेावर घमजोरो भाती है। वीये पतला हेाता है। घमो विन्नान्मे निदमे स्वप्नमे वोयं स्वाव हेाता हे। समयाव गरमें वोधिया देता है। पेेनेनी रगनि निरसाव रहता है, किसी वस्तुपर प्रीति नांह रदसी। पेटमे म्ल-विगार जमता है! पेट मोटा हेाता है। नाडीया स्थूल हो जाती है। पानी लगनेठे मन्स्येमे सेभरनो रुप पेन्सर हरहड प्रक्षार वायायोन्स आदि रेग हो जाता है। कमी हंसे रोगीका हृदय मो वंद हो जाता है।
पथ्यापथ्य—भूल हे। इतनां बलप्रमाे खाना-मिस्सादार करना। चि्कना पदारथे मोलका सवटा मेदाकी चीने बाजारकी किन्ठड बटारा मांस लाल मिरच भेपका दूध घी खादि नहि खानां। गायका शकरीका दूध वाजरी चना मुंग तुदेर दाल नमक सेंधानोन जोंरा घनौया राई मेथीदाना हींग भरसक कालीमिरच दूधो परवल परेला कंटोला आदि साब खाना।
दुजैलजेता एस—पाखद्र, गंधक, वाळा गुड मछनाया प्रदेशेक वेला देा वे, कौंची रसीम, काली मिरच, सोंठ, पीपल, नागरमोथा चिरफ, गिलोय प्रत्येक वार चार तोला, कुटकी टोला घव साथ कूट विधिवत मिलाय भदरखके रसकी मालना देर रस्तो प्रमाण गोली घांघना मावा २ से ४ गोली पानीसे देना।
स्वपूर्वे श्राल्हीनी पर्षंत-(येा र.) वैकांत, अभ्रक, लाप, स्वर्ण पाक्षिक रौप्य व ग प्रवाल, रस सिंदूर, टङ्कण, लेआद सम घमभान लेेकर विधिवत मिल्य मेठे वाद्रा, शतावरी, हलदी तीनों समभान लेेकर हूष्के रसाथकी मालना देना। कौौर राथोकेा चंदको च्वादनो है प्रकारसे खुली रस छोड़ना। इस प्रकार ७ मावनां देनां। माश्रा ३, गोली है। राहद और पीपलकी चूण मिलाय खिराना ऊपर दृष्ठ पीना। घृतुगत जीनुसारसे देना। गिलोयका रस ३ माशां और शाकर ३ माशामे ३ गोली मिलाय सवे प्रकारके प्रमेह रेगमे दिया जाता है। मीजोरा
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निंबुका मूल १ तोला पोटे इसके साथ देनेसे मूत्रकृच्छ और पथरीमें फायदह होता है । पानी लगा हो उसको मात्रा ३ से ४ गोली प्रातः शौचद् यद् दूवसे देना एक मास तक सेवन दरानेसे उत्तम पुण होता है । शरीरका किकापन मं'दामि, एतको चच्री कमजोरी आदि मिटते है चून घटता है ।
अपराजिता गुटिकासा—शुद्ध पारद, गंधक टेक, अभ्रक, प हृदर, मृकि, श ख, ताम्र प्रत्येकको भस्म चार चार तोला, सेंठ, पीपल, दाली मिरच, गूगळ, हरड, बहेड़ा, आंवला, ट'ंडण, विटाक, गिलोय, अतीस प्रत्येक साठ साठ तोला, कूंटकी ४० तोला पाथ मिलाय मारेरेको २ और नीमके परोके रसकर १ वा भावना देह'र ३ तीन रत्तो दोी गोली वनान्ता । मात्रा ३ से ६ गोली प्रातः पानीसे देनेसे पानी लगा हुश्रा, प्रदुथ्य अच्छ्ा होता है और पानी लगे घैसे स्थानमे रहनेवाला इसको सेवन करता रहे तो पानी नही लगता ।
दृढे'ल हर निंबण—अपराजिता मुग्टका तोला २, चूर्णि वाजिक्रा वटी तोला २, लोह पपंड़ी तोला १, अग्नितुंड ही तोला २ स म पीप रखना । ६ से ८ रत्तो प्रातः पानीसे देना ।
आरोग्य वधंनी चूर्णं २ माशा प्रातः पानी या दूधसे टेन। पंवह्र दिन के पीछे एक माशा बढ़ादेर तीन माशा प्रातः एक समय टेन। १ माष टेनेसे शरीर अच्छ्ा टेाता है । किसोका मृदु कोठा होने से थोड़िक दस्त होता हो वेो मात्रा कम करना ।
लता हरड़के चोज (चांदचिया) पंमिरो अतौष जटामांसी हरड प्रत्येक पांच पांच तोला टेकर साथ कूंट २ से ४ माशा पानीसे टेन। ।
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वृद्ध वदगांठ वावलाई
शरीरके स्थायिबंधके सांघेंमें होनेवाली ग्रन्थी माठ
द्वारण—वदगांठ प्रायः शंदो गरमोके दरदीके स्थाना उपरंदाके किव शरीरमे रहै गया है।वै हाति है । साधलके मूनमे दसमरके नीचे साधलका प्राभ देवता है । वह सविमे प्रायः होता है । शंदा गरमोके उपरांके माथ होनेवाली वद-गांठ प्रायः पकतों है । उस्मेने पीहड़ ज्यादै हाती है । इस्के वाथ युलार मी रहता है । दसमरके नीचेके दिसो आममे चोट लगनेसे मी यह गांठ होती है । उस्मेने शुखार मी रहता है । अवयकेने पोहडा कम होती है जैसे इस्के साध हुये गांठ मी कम हेतो हुये मिट जातो है । वोंत त्रिषयमे जनने'द्रिय पर शनदम या पूंछन हेनेंके 'लिंगमे तीक्षण पीचकारी मारनेसे जोरतोको पुठा इंद्रियमे सूजन हेनेंसे घ'धिवातसे दूस प्रकार अनेक द्वारणेसै वदगांठ याने साधलके मुनमे ग्रन्थो होती है । सद् ग्रंथी ल्लाखसे मी होतो है । उसे पांदलाहु हहते है । उपदंशके कारण मो हड्डे दसत काखमे ग्रन्थो होती है । इस्का और छालकी गांठ-चांदलाहु उपच्यार रीति'न है ।
वदगांठसे या अन्य कारणेसे छातीकी एक थोर सांत वीत प्रशान ग्रन्थो माठ हेाती है उसे हेयाधौदी कहते हैं । इस्का उपच्यार मी वदगांठकी तरह किया जाता है ।
जिस जगह वदगांठ या चांदलाहु साधलके मूलमे, काखमे या अन्य अथ्यानमे गांठ हेनेंकी हेतो उस जगह दपानेमे या बिना दवाये दर्द होता है शरीरें धीरे-धीरे वढी होकर लालीलीये या चमडीके स्वाभाविक रंगकी होती है और मीहा करती है । रोगी कमजोर हो तो वह'य और पीहड़ वढती है । गांठ पडनेवड जाती है जव ठंढ लगाकर चुभार आती है । दपानेसे पघ-पघ हुभा मालम हेतो है पकनेके पीछे वीसमे फूटती है । कई वक्त एहसे ज्यादै माठे निकलती है फकती है फूटती है ।
पथ्यारपथ्य—माठ निकल न आवी हो जवतक टेप शेक आदि उपचारे आवश्यक्ता हेतो हाकसे छेदा देकर फोडना । नाम' दसरका या कषदेके गोटाका शेक करना । रोगीने चलना फिरना 'नहि शाराम करना । प्रारंभमे जुलावकी सवा ठेहर ५-७ दसत देवा ऐसा करना पीछे हमेशां एकदरे दसत और पिसाब साफ आवे ऐसा करना । जव चना सुंग पावल बावरी दूध घी करेला कटाला खारवेकै तुरिया भया चोलीफा मोंजी लकून मानिक जोरा माठानीम (विडा नीम)
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कालोमिरच अदरक सेधानेन मदुरे-मीठा पदार्थोँमे सदद्र पुष्ट इत्यादि पथ्य है । खटटा पदार्थ नमक लासोरच अन्नार बजारकी मिठाइँ बाँड शकरकी चीजेँ कम खानाँ ।
व्रण नाशन रस—पारद तोला १०, पँचक तोला २०, मँदूर मधु' तोला १०, कचनारकी छाल तो १०, अभ्रराजितादि मूल चायफल गिलोयँ नीमकीलोकि गिरि हरड पपीतपलकाँ पल शेठ पीपल वाली मिरच कुटकी वायविडग' चैपचोनी प्रत्येक चार चारी तोला गूगल तो २॰, शिलाजीत तो १० सब साथ मिलाय घो तोला २० डाला कूट कर पानीमे तीन रत्तीकी गोली बनानाँ । २ से ६ गोलो पानीके साथ देना । सब प्रकारकी गाठेँ प्रतिथियाँ मिटती है ।
गुगल हर मिॕशण—लेइह पपँटो घवें खार पपँटी धम्रता गुगुल फाँचनार मूल भारोग्य वघ'नी वूण' प्रत्येक एक एक तोला साध मिलाकर दिनमे दो दफे ४ से ५ रत्तो कल्पाण घृतसे, दूधसे या शहदसे देना ।
व्रण हर मलम—पारद गँधक किद्र रेवदचची असगँध सह'जनकका बीजँ यफेद सरसेा प्रत्येक दस तोला राल पाँच तोला, मोम १८ तोला, नीमकीलोकि (निम औौडका तेल) डरँडका अथवा तिलका तेल तो। ४० सवकेँ विधिवत मल्हम करनाँ । चाहे जिस प्रकारकी गाठ पर लगानेसे बैठ जाती है दर्द पीडँ मिटती है । गाँठ फूटनेके पीछे मो यह मलम लगानेसे लुज्ज आती है ।
१ लेप—सफेद सरसों सरसफा (किरमिच) घी छल अलसीँ काँपभँम समभाग मिलाकर पानीमे मिलाय गा'कर पेटोos रखना । फूट जाता है ।
२ लेप सुरँगीकी चरकके या पारावतकी चरचके शहदमें मिल'य लगानाँ ।
३ फोवरादि गोलकी अत्यवा करतार्यादि गोली उपदंश रोगमें बतायी हुडँ २ से ४ गोली घी या दूधसे ही निगल जाना चाहनाँ नहि या पीस कर ठेनाँ नहि उसपर दूध पीना दिनमें १ दफे ठेनाँ ।
४—भारोग्यवघँनी वूण' १ से ३ मासा तक प्रतिदिन पानीसे देना । उसपर भीमकी छारका पानी मिलाना ।
५ फूटनेके पीछे हरीशँ रीठेके पानीसे सथवर सोहागा मिलाया गा'म जलके' मथन्रा नीमके पत्तोँका उपालदर वप्प पानीसे घोने रहना और जार्यादि घृत अथवा रे पण मरहम श्रादि लगानाँ ।
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मेद वृद्धि शरीरवी बढना मेदा रोंग
स्वाद्यासुल्ल दिन निद्रा डपायामात्यंत कफकर पदाथैः ॥
अतिमधुर सिनरधायाहार विधारोचि'वघंते मेदः ॥९॥
रोग मुंहिता
कारण—शारीरिक परिश्रम व्यायाम-कसरत नह्हि करनेवाले मे| हष्टे रहनेवाले को प्राप्त या व्यवसाय वांठेके, चरबी वटती हह । दिनमें घेनेये, दिनरद्व पथ्य प्यायमा खानेवो आदतसे मेद बढता है । चरबीके सोत हळू जाननेसे रक्त मांस वाद्धि वातुथोंका पेढण कम हेहानेसे चरबी बढती है जव मनुष्य शारीरिक काम करनेवों प्राय: अशक्त हेाता है ।
चिन्ह्ह—चरबी शारीरके कइ ठवयवचों में जमती हैं खास कर चमडोंके कौचे हेाती है । पेटमे वसका जमजाव उपराला हेाता हैं । चरबीवालेोंके चलने फिरने शारीरिक काम करते दम चटता है । तृपा लगतो है । छातीमे घबराहट हेाती है । निंद अधिक आती है । पसीनेमे वदबू रहती है । वत वमनने क्षोण हिमत रहित स्त्री पुंगमे भशक्त हे'ता है । चरबीसे वांठुकों शारीरमें फिरनेवळा मार्ग हळू जानसे वायु श्रम: उदर आमाशय पक्वाशयमे ज्यादा रहनेसे कठगहिन्हो नढाकर खुराकवो शुद्धा देता है, इस कारण शरीरों तुजककी इच्छा हेाती है । च वों शौर मांस वढनेसे पेट कुण्ठा स्तन आदि अवयवो मोटा-स्थूल शौर वेडौल घनता है । चरभी वाळोंकों कुठ रतवा दैसप भगंदर प्रमेह वचाघोर हाथीपग आदि रोग हे'ना संभव हैं ।
पथ्यापथ्य—पुराना चावल मुंग कुलथी केदरा कोंग हुक्का या धूम्रपान जव गेहूं चना उपरांत छौंहने घया श्रम चिंता शौचंग मुसाफरी वागरण वेठन मेधावी चेष्टा|इककी मांजी सेवन हितकरस कालोमिरचं लालमिरच हींग छांछ 'भादि हितकारक है ।
लेऔ रसौयन—पारद तेलोँ २, पचक' तैलॉ १६; घृत मेधि मिल तेला ४, सृणमार्लिक भस्म तेला १६, दिलाजीत तैलाँ २४, लोहं भस्म तेला '८०, शहदंक मस्म तेरों ७, वंगंविध ग खेरेधार चिचनक मूल भैलावत पलाश मूल 'सफेद आंकचा मूल सफेद 'फुलककी पुनर्नवो। वावचो 'भोरखेमुंडी वटामावी मरौडँका मुल हरह मरेवाँ, न्योनो भवला सीठ पोपर कालोमिरच प्रयेष्ट चाट
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चार तोला सवको विधिवत मिलाकर शिफलाके रसेधकी भावना देना घोटकर रखना। मत्रा १ से २ माषा खादद घृतसे प्रयवा दूधसे देना।
लौह रसायनं
जमदग्नेरहि पक्त्वा लोहे भरमेस्तात् परिलक्ष्यते। हिप्पलः पारदे शुंघ्रेन्यनुलोमनः॥
मन्ःशिला परौष्ठा स्यात् मार्षिकं च च तुपालयम्। शिलाजतुः पर्पटी स्वात् अभ्रकं च च पर्पद्रयम्॥
ताम्रमूसल पलेक्ष स्यात विहंग खौर्सारक॥
वन्हिभस्म लछाक्कं प्रेतसूयंमूल पलांशक्रमू॥
घुन्तनंवा सेमराजी मुडिक्का केशराजक॥
वृक्षारास्य वीजानि गुडूच्यंतिवला तथा॥
रास्नां वचा त्रिकटुमूल्हों मधनं च द्वोतिकीरियो। लटामांसी यदिमधु हरीतककी विभीतक॥
फळमारमळको जात शुठ्टी मधिच्च विप्पलो। मृत्येक पळमात्र स्यातव दृंघ्रय॑ सूक्ष्मीकृत शुभे॥
क मिश्रय विचित्र सर्व॑ डिफला कधाथमावित॑। मेहेरेगडर वल्यै॑ वृश्य लोहरसायनम्॥
कामळायां पांडु रोगे शोथेर्द्धि भगंदरे। तद् पथ्यौषधियुक्तं प्रातःसायं शिशिरहरे॥
इति लोह रसहिताः
सेद शोष्यो रस-पारद तोला ६, यधक तोला ८, टेहद अम्रक ताम प्रत्येकद्री मस्म, रस सिंदूर प्रत्येक तोला ४चार, शिलाजोत ता॥ ६, पुगल तोल १६, कुटकी २०, चित्र क गिलोाय वायविडंगन नागरमोध जिङ्गु टींग निघेधय कुष्ठ अपलतास नमक सेंधानोन प्रत्येक तोला चार मय साथ मिलाय नीमके पत्तोड़ै पीस डुसके रमसे मे ली रती २ को बनाना २ से ४ मेली पानीमे नितो। ५ से ३ मास सेवन करनेथे चरबी कम होती है। आतेह दे रोग नोग चढना बद्रावत्त मयु पेट चढना कुझी वझासीर विशोथक्को डकारवट आदि रोसार मी लाभ होता है।
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सधौत्पापकर्षणं तेल—निसोथ, गिलोय, सहँजनाको छल टोभ्र कफेन नंवन अहरो छाल शिरीष छाल हरड नीमके पान भनारकी छाल कुप्र महेश्व आवला अमनताश तुजसो हल्दी अमियाहलदी लीली मूल प्रयेक ठेला ६. कूटकर पानीमे मिगे कर उसमे बकरीका दूध तेला ३०० डाल १३ चँटा रहाने देना। पोछे उसमे ८० तोला तिलीका अथवा सफेद सरसोंका तेल डाल पकाना। पानीका भाग जल जाय छल १२ घंटा स्वांगसीत हेाने देना। पीके कपडछान कर लेना। यह तेल १ से २ चंमच पिया जाता है और शरीरको मोलीष करनार चरयो धम हेतोी है।
९. आरोग्यवर्धनी गोली २ से ४ शहदके पनीऐ टेनेपे चरथो कम हेतोी हैँ। दा तीन मास पर्यँत टेना चहिये। शहद तेला २॥ मे पानी तेला २- जालकर पोना।
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शीतपित्त उदर्द केाठ उत्केठ शीलहस ।
कारण चिन्ह—आकार विदाहकी अनियमिततार्ं ४.नन्या यद रोग होता है । दश रोगमें धरें द्रियोंमे कुमलो छाती है साध हि मारे -रीमे जांमा उभड जाता है । दुसनेके पीछे उष्ण सथानमे वलन होतार् है । शीत थेग दे। दिनमें उपनारमे षा र्ते हि वुठ ब्राता है । फिर ज्वर सादर पूर्य दिगेमे लक्खत अतार् है इस प्रकार दर्दो क रहता है । डरद' शोर येठमे न्मित डरदा उभड जाता है शोर तरांठमे षु,लो के सथ जलन मो हेत: है ।
औषत पच शास्त्र चत्रो—पारद गंधक य रसपमू न च मस्म इंद्रा-मवकका मूल इंद्रायपोंका 'कुल वालो मीरच पोपल षेठ गुरम प्रत्येक दष दप तैल्मे:हागा तेला c मूलीठी मूल महूड़'हा कुल नोटेय द्रपी भमाश शारपे।ल्वा सफेद चंदन अशनेल लझान अरनो मूल प्रत्येक तैल पाच मुन चाथ मिलाकर तिसुंहो के पत्ते मोस्रा शोर हुंड़हो दे। दे। मावना तदृर् २ रत्तोको नो'लो वनान्त । ३ से ४ नोली पान्म देना । महा नारायण तेल महा मिर्तादि स्वादि तेल मालोठ दरना । एक मास सेवन करनेसे यह रोग मिटत' है ।
शीतपित्तार्ं नित्यण -शीतपित्त हाम्रो मेल ंआरोग्य नत्खो मेलौ निष विदुद्रांद वटं' धयेस्वर पर्पटों क्षत्र्ता गुगळ खप समांन भाग लेहतर क्रटकर रचना c से १० रत्ते पानीमे ढ़ेन्त । एक माष सेवन करनेसे यद रोग मिटतार् है ।
शीत पित्तहर कषाथ--निंबके पत्ते मतीठ, सज्जावयन सज्जमोद कोकिल मिरच पिप्पलि अरन्का मूल ल f कर च मेजमे मिरी सद समांन लेहतर क्रट कर ३ हे ० तैल्हारा कगय कर अ ला मपवा किसी शोंपतके उररि जिलाना शोर मारीर पर मदनं करना ।
१ दोषफलेके चूर्गा को पानीमे पीव गुन जेस्मे मिलाय परीत पर मदनं करना ।
२ मेढ़कुष्पी (कृंष्णा)के पंच्चांके पौष वारीपर मदनं करना, शोर घुंआ देनां ।
३ नीरा हल्दी चट् इंद्रायवकफल कालो:मिरच समभाग क्रटकर २ से ४ वाया पान्म टेन्त ।
४ कफेद सुरंजां हल्दी चकरदके वंज तिळ चनभाग क्रट मरसोंके तेलमें मिलाय धारे लांगी प* मदनं करना ।
५ छांटकर मर्१ चूना ० से २ माषाने एक मार्त्रा कुतानो मुत्र मिलाकर खानां ।
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कारण—पेटके न होने अथवा पेटमें सुन्नपना होने पर नाभीके श्राश्रित्यमित आहार विद्धारसे गहंमदानमें रहते हुये पित्त जठराग्नि दूषित हो जाने पर ऐंने अनेक कारणोंसे यह रेाग होता है। यह एक प्रकारकी सूजन है। वह एक प्रागह तर.ज हेठर लतद्दीसे फूलता है। और चमड़ीका लाल करता है। इस लिये इसे लालनात रतमा रक्तजात फुलचे है।
वात विसर्पंमें—वात ज्वरसे मिलते चिन्ह होते हैं। वमन पस्तक छातीं द्वारा में शूल, चुभनें उपर या भंंदर अभिनका तणखो गिरता हो चिराता हो, सुख जैेसी चीज घूमती हो ऐंसी पीड़ा हेाती है।
पित्त विसर्पंसे—पित्त ज्वरसे मिलते चिन्हके अलावा शरीरके एक भाग में उत्पन्न हेाकर दूसरे भागमें फैलता हैं। चमड़ी भरयंत लाल हेाती हैं।
कफ विसर्पंमें—कफ ज्वरके चिन्हतरा चिन्हके सगाथना एक करामन पर स्तवन्न हेाकर खुलतली जखारो भाती है। चमड़ी लालो लिये हेाती है।
आमवेध विसर्पंमें—ज्वर वमन मूर्च्छा दस्त त्रुषा चकर मदमि डकारोयें में दद' घेता हैं। सारे शरीरमें सप्रिदाह जेसो मलन हेातो हैं। शरीरके जिस स समे फुंले वह भाग पुछ रयांम आाघानो रंगके साच एकदम लाल हेाता है। मधिसे उछे माफोक फुलटे उभड भाता है। डूषकी गति ज्यादा हेातो है। और हदय तक फैलता है। स्वास दटना है। निंद कम हेाती हे। शरीरका मान कम हेाता है। नाभी तरफफडकता है। बेचैन रहता। कर्द सुख नहि पाता।
ग्रन्थी विसर्पंमें—फुंफसे रकता हुवा वाथु बिगडे हुये खून और कफके संगमधे नाडियांं स्वाथु मोंसल तक खोंचकर गेठ ल वगेाळ खडबचाढो प्रंथयोमां उत्पन्न करता है। इसमे सणका चायल सदृश घूमती हे। ऐंसी पोढा हेाती हैं। इसको पेष्ट से ताप ददतता है। साथ वाथ खांसी हिचको वमन मूूर्च्छा वादि हेाते है।
सांगतुक विसर्पं—चोट लगनेसे जनावरोक नख दांत लगनेसे विसारिजंतु के दंशसे सांपफा घा लगनेसे वंसपका ऑपरेशन करचे बक्ता गहद रास्त अपने कंरीर पर लग जानेके विसर्पं उतपन हेकता है। इसमे प्रारंभमे वायु कुुपित हेाकर वन के साथ पित्तके व्रदको जगह लाकर वीसर्पं उत्पन्न करता है। इसमे कोटी घेरो कुलगोयं हेाती हे। वमन शूल वाथ वेसनना हेाती हे। नाडी क्षोण नकलती हे। बीम सुखकर काली हेाती हे। भोर अंदरसों मडता हे। यह आंगसड शेष्पमें शास्तकालिक उपचार न हेेनेसे रेागीका मृत्यु थोडे दिनमे हो जाता हे।
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पथ्यापथ्य—रोगीके अच्छे स्वच्छ द्वावाटे कमरेमें रखना । पवन अच्छा न लगे तो पलासे पवन डालना।। उबाल कर ठंडा किया हुआ पानी पिलाना । कपड़ा पछछाना हमेंशा गर्म पानीसे धोते रहना । यह अ क्रमक जो रोगी रोग है से किनों रोगसे पीड़ित रोगीको इस आदमीसे दूर रखना । घमरेमें दे। तीन चार धूर करन। माटी हथका सुराक उड़ादे देना । इसमें फेर खोलकर देवन निकालने और आवश्यक्ता हो वे शाख फमे करन।
कालान्तरे सन्धि रस—पारद तोला ५, गंधक तोला १०, अभ्रक मस्म वे. ६, रौप्य भस्म वे. ४, वंगाद मस्म वे. ५, वह्ननाग शुद्ध वे. २, मूलेठी मूल वे. ४, तज इलायची लें हरड वहेड़ा आंवला हल्दी शाकधर बांब्रेटेलाका कंद, चिनीकवाला वायविडंग चिरायतता मजीठ भृंगराजी प्रत्येक तीन तीन तोला, -सबकूट मिलाय निटैय द्राक्ष जलपिपली (रतवेलियो) प्रत्येकफे रखकी एक एक भावना देवे रक्खो प्रमाण गोली शहदसे देना । उपर पुननंवा मूलका वन्नाय पिलाना ह सम देखणा जोष्म पितता है ।
घोषप हर कवाथ—घमासा गिटेॐ वाला शफेद चंदन नीमकी झाल मजीठ मुगल कमल फूल हरड जलपिपली ( रतवेलीयो ) अमलतास घंम भाग लेकर कूथना । १ सेर तोलाका कू'थ कर पिलाना ।
लेप—१ गोदं। शेखावल कमल पुष्प देवदार चंदन महूवेको फूल वलामूल अरपीपलो समभाग कूटकर दूधमे पीस टेप करन। । वातवैपमें लाभ दे।
लेप—२ रास्ता, चंदन लतादरज के बीज, हलदी, भांगरा, वालो, अलपीपल समभाग कूट पानीमे पीस टेप करन। ।
लेप ३ रास्ता कमल फुला देवदार मंहन महूवेको फूल वलामूल कलपीपलो समभाग कूट दूधमे पीघं टेप करन। । वात वैपमें लाभ हे।
लेप ४ हरड़ बहेरा आंवला। पम्यक्कोठ वाला रुजा लू कनेरकी जड़ -जलपिपली अन तमूल दम मूल समभाग लेकर पानीमे पीव टेप करन। ।
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नासु-स्तनायु वालाका रोग
कारण चित्र—यह रोग प्रायः पोनेके पानीमें ऋतु रोके वंतु होनेसे होता है । ऋतुमें वघियार पानीके कुचामे यद्र ऋतु करादि उत्पन्न होते हैं । स्त्रीको वांत विधि सफे प्रकृतिके अनुसार इस रोगमें मी चिन्हे साजुप पड़ते हैं । दाथ पांचवे शोध हेठर चित्र पहत है, उछ वगहके स्तनायुनेसे वण द्वारा धागा जेसा गोला जतु रसपन्न, टेढ़र घीरे घीरे वरावर निकलता है । यदि वह धागा—(टेढ़ा) गलतंसे टूट जाय तो पेटा बढ़ जाता है । परनेसे शोध मिटकर दूसरी जगह निदररता है । दाहूने म उघामे नाह टूट जाय तो दाथ पाचवे शोध सातिर है, ल'गडापन युगुन होता है । वात प्रधान हो तो वों काली छायावाला सफेद टेरा होता है । पीड़ा करता है । पित्त प्रधान होतों पीलायन न ये होता है और दाद जाल्न होती है । कफ प्रधान होतों सफेद मोटा—स्थूल धागा होता है ।
पथ्यापथ्य—जिस गोंमे यह रोग रतपन्न होता हो दहा'के जिस कड़ा-डायसे पानी पिया जाता है उष्ण कफ,से जल स्वो'च दर विकार देन और उषका शोधन' दरना । उस कुचामे निमकी डाल कुचल कर रालना । पानी, उचालम्र देा तीन दफे सुप्रधान कर पीना । आहार विधार तवीयतकेा अनूकूल वैषा रखना । प्रार भमे जुलव देना, पीछे हमेशा देा एक दस्त हे'ना रहे वैषा साधा विरेचन देना ।
स्तनायु जयंती द्रव—पारद मथफ रसरञ्चीर रौव्यभस्म लोहभस्म अभ्रकं समम प्रत्येक तोला ४ माशे, वायविडंग शोरकमुंडी चौपचीनी लताकर जड़ोज (कांकचिा) इन्द्रायणका पल अथवा मूल कायफल प्रत्येक वार चार तोला घन साध क्रूट गेरकमुंडोंके मथाय मे गोलो देा रत्तीको बनाना । २ रे ख गोली पानीषे देना नाह निकल आता है । और दूसरा वारीरमें वसका जतु हो बह मी मर जाता है ।
स्तनायु शूलाति रस—पारद ग घफ रौंय भस्म सामरधोग मरक मुरणं माक्षिक मम्म अतं म्र हागरगोटा (कांकचिा) चंदन गेरकमुंडी वाल वायविडंग चौपची नी हलदी दाहलरदीं फिं: य र'ट अञ्जमेद भसवाप्न हरद शातोवरी असगंध सारिंवा समभाग लेकर निधकित मि का सेहवाल-को भावना देकर ३ रत्ती गोली बनाना । १ १ ६ गोली पानीषे देना ।
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सामान्य उपचार
१ अतीस नागरमोथा भांग मोथा सेठ पीपल बटीहा घमभाग कूट कर ३ सेर सासा पानी में देना।
२ मद्रासरे (कपाट) के पत्तों को ५ सेर पानी छानना।
३ हदजुल के फौज के गौसूर में पोथ डेर करना।
४ पाताल नद्ढी (वेरहड़ो) का मूल ३ सेर ४ मासा पीस कर पिलाना।
५ निगुण्डो का पान १ तोला पानी में पीस पिलाना।
६ पारेभा (पारावत) को चरक देर पोष्ट ६ सेर ८ रत्ती गुड के साथ पिलाना।
७ देगनबेर खरबिन पर पकाकर (मदश्य करी) उसमें दही मिलाकर पीस कर पोटीस को तरह लेप करना।
८ मिही के सीज और गेहू समभाग पीस सत्त घाटकी पुढी बनाकर घीमें तल कर गुहरे साथ खिलाना दूध कुछ खुराक देना नहि तो तीन दिन में माद निकल जाता है।
९ फुक्रूट को नरक ते ला १ मिलेय खोल्ला १ गुड खोल्ल ३ साथ पोष्ट २४ गोली बनाना हमेशां ३ समय एक एक गोली पानी से देना।
१० अजोइम तेल्ला ।। हींग चुद्ध तेल्ला ।। साथ घतुरेर रसमें पीस बांचना।
११ काथफल तेला पांच केा पीस व नीम ये बडी पोटीष (डापसी) कर बांचना देख दे। घटा के पीछे पोटीस निकल हर तनायु के घोरे घीरे छींचना। नूते नहि यह समाल रख घोरे घीरे छींचना तेा सारा भाग बेराह निकल जायेगा।
१२ पेरंड पत्त केा पीस उरफा रसप तेला ५ मे घी तेला २।। मिलाकर पिलाना वाला निकल जाता है।
१३ नाऊ, डा जोय हुमा हो उसको नारील गेहू के घाटाकी पाळ कर उसमें तमाखू के हरे पानका रस भरना अयग वह रख कांचकी नलीं से सुंद कर नाक के छिद्र में डालना, दो एक घंटा मे दस्ता देरात निकल जायगा और अंदरके जहर मर जायगा।
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१४ खालसा पीपलवीन , और नागर वेलका पान , बिना करदा चूना लगाय देनो चावदर खिलाना तो वाला निकल आवा है।
१५ घतुराके पान तेला ५ दिंग़ तेला ओ। साथ पोख बाळा पर बांधना तीन दिनमे निकल जाता है।
१६ नदोकी छोपनी (शक्ति) केर मलाकर मसनन करनो, अभनायन (असमा) पथाना और दिरची (टींडेरी घोळो) का पान तीने। समभाग पोष्र लेप लगाना।
१७ करेला का मूल पता फल पाँचोंग के पोस पेटोछ बांधना ।
१८ घववार पौस ३ से ४ माशा गुड के साथ मिलाक खिलाना उपर खुराक मे सुंग़ चावलकी किचडी घो खिलाना ९ दिनमे वाला निकल आय,
१९ इंगोरिया (हं०ग्रे०) की जड़के। खटटी छाछ मे पोंस गाढा लेप करना आ पेटोछ को तरह बांधना ७ दिनमे वाला निसल आय ।
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हांथापांव-ख्लीपद
कारण चिन्ह—निय प्रदेशमे वर्षा-वारीष बहुत होता हे। और ऋतु परिवर्तन होने दो जैसे प्रदेशमे यह रोग आधिक माझप होता हे। प्रारमेने शुरूआर झाकर नामिके नीचेछे भागमे या देा वाजु शोध होकर वढ पांवमे उतरती हे। पीछे वह वढती हुयी स्थिर होती हे। यह हाथ या दूसरेअंगोमी होताहे। यह पकता हे जव पिंडा करता हे। वलमौड (राईकडा) जधा हे स्थान पर प्रतियॉं हो, कांटा जैसे अंकर चारे थोर फैलकर जाव निकलता हे, खुजली आती हे वढ असाध्य हे।
पथ्यापथ्य—पुराना चावल कुलथी मुग जव चना लहसुन सहजनाजे वेंगन करेला कडुवा पदाथ लंघन जुलाव जोका शुराक उघादा रसवना सरसोका तेल और कुमका मांस हितकारक है।
ख्लीपद गम केषारो—पारद गंधक रस सिंदूर अभ्रक भस्म तांत्र भस्म टंकण प्रत्येक तेला ५ छद, सेठ पीपल गालिमोरच वच गेरख मुडो चोपच्चोनोळोम निसोथ वचुरा पाठा (कालोपाठ) वायविडंग प्रत्येक तेला ४ चार, चित्रक मांगरा अथरख गेरखमुंडी प्रत्येकधी एक एक भावना देकर लेह रत्तो प्रमाण गोली करना। मात्रा २ से ४ गोली पानीसे देना। ये चार मास तक सेवन करनेसे यह 'रोग मोटता है।
ख्लीपदारि लेह—लेह भस्म, तेला ४० चालीस, पारद गंधक अभ्रक गंधक भस्म प्रत्येक तेला ५ छद, गुगल तेला २ दोष, निमवोजकी गिरि वकाइन नीम चोइकी गोरो हरड वहेड़ा आंवळा शिलाजोत चिकण निसोथ अभ्रककी खड अरणीमूल वच सेठ पोपळ गालोमिरच गेरखमुंडी कटामांधी प्रत्येक तेला ४ चार कुटकर मांगरा, निंबु'हडी, कांचनार, गेरखमुंडी, प्रत्येकधी एक एक भावना देना। ३ वत्तोको गोली करना २ से ३ गोली पानोसे देना। ३ से ४ मासे तक सेवन करनेसे यह रोग मिटता हे।
मिर्यादू, रस—पारद गंधक गौस्स भस्म वंगभस्म लेह भस्म ताम्रभस्म तुत्म भाम शुद्ध हरताल शंखभस्म कौडी भस्म प्रत्येक चार चार तेला, सेठ पीपल काली मिरच हरड वहेड़ा आंवळा वायविडंग जहरक विपलीमूल इखुपा (पळोसडी) वच वचुरा पाठा देवदार इलायची बिवायरा (हिरददार) प्रत्येक ४ चार तेला पंच सेवन पानीसे दिनकर निव तेला माथ मिलाकर निशोध चित्रक
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और दंतौ मूलके कदायसे एक एक मावना देना और पीछे हरड़े मसायमे गोली ३ रत्ती प्रमाण कराना । २ से ३ गोली पानीसे देना । शनै देवका मारे शरीरमे फैला हुया खोफद मिटता है । वह औषध कठमाल गंडमाला मन्खो अथु द श ग्रहद्र्द गुदाद्दे रेशा कुषि बदगाठ काखका बोवला हि द विसे मो उत्तम पुण करता है । जठराग्नि प्रदीप्त होता है । भूख लगती है द ल बढाता है ।
सौरेन्द्रवद्र घृत-तुलसी देवदार सेंठ पोपल कालीमिर्च हरड बहेड़ा आंवला पँच लवण वायविडंग चित्रक चिरचिरा विपलीमूल गूगल हपुपा वच यवक्षार पाठा कचूरा इलामची यीशावरा प्रत्येक एड़ एक तोला पोष्ट कफकु वर्ज्ज्जर महौषा पानी तेला ४८ घनियादि कवाथ तेला ६४ दश मूलका क्वाथ कपहछान कर रख्ना । हगेसा ३ तोला घृत सिलाना सोने सरीर मे फैलाहुआ मांस रफू मे द मे रहा हु आ खोफद मिटता है । रसेली कंठमाल अथ ग्रंथि वृषणग्रन्थि अथु द ग्रन्थी आदि मे उत्तम गुण करता है ।
१ लेप-रसायन और देवदनलेप मिलाकर पानी मे पोस ले कर करना
२ देवदार और विटक समभाग कूट पानीधे ले कर करना
३ सफेद सरसों और सहजनकी छाल गौमूत्र मे पीस गमं कर लेप करना
४ मजीठ मूलीठो मूल रास्ना पुनर्नवा तिलपर्णी (तलपत्री) चसमद योस समभाग कूट गमं कर लेप करना
५ चांचनार छाल मजीठ विधावरा समभाग कूट १ तोला का कवाब नित्य पिलाना
६ करज वृक्ष ढाककी छाल मूलीठीका मूल हलदी गेरुसुंडो काला हराज (६ सपदी) कूटकी समभाग कुट १ तोलाका वताथ पिलाना ।
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हडकनो पागल कुत्तेको दंश
करञ्ज—कद्देकां अतेक्खा या दे डाढा रसा हुया माछ खानेखे कुत्तेखे रिख्खोखे या.खुंगाल (धियाल) हे हडकङ चल्खा हे । इसके काटनेखे मनुष्यक्खे गाय मेष गोठा, वछेड़े वनावरीखे दे खी हडकङ्खा वस्खा हे । कुत्ता हड्कङ या न हड्खा खे एखे घच्क्खे दुत्खे के करदखे मो कम्खे हडकङ्खा चल्खा हे । हडकङ्खा कुत्ता सपना पुछ्ख पीखे फे दे पाछ्के माछ रङ्खे उधर उछौतखा हे, भमतखा रहखा हे । सद्दरेखे भर.ताटेखे हड्क' रखो ( हड्डेखान ) देख्खे हे यह तात्कालिक उपाय हे बर'न् हेठे मादेखे जहाँ यह सुलम नहि हे यदाँ हार्दालिक वपय करनखा ! कुत्ता डाटने के पीखे पाँच दिनमे या दसमी टा चार माछ के पीखे खी हडकङ्खा देख्खा हे । गाय मेंछड़ेखे कुत्ता काटखा हे और उध्का दुख पीनेखे खी हडकङ्खा चल्खा हे ।
विर्खद—पारंसमे बेचेनी अनिद्रा मसलक 'करनखा नक्खर खानखा शोंथेमे उङ हर्दयादि होवखे हैं । दिन बितने पा मुन्न सुद्राङ ययमीत टेठी हे, गरदनमे दद' हेतखा हे, मुंछे लङ पड़ती हे । सुराङ और पानी मुखे सुरकीलखे वतरखा हे । दूसरखे तीसरे दिन उपा दहुँन छगती हे फेर दरखी पानी नहि पी सक्खा ! 'प'नी पीनेखे पानीक्खे एक्शेमे 'वानीमे या दर्पंञमे मुत्त देखनेखे दूसरखे पानीक्खा आवाङ सुरनेखे आचदो खी माफ्क रोगी कंफ जातखा हैं देख्खे इन्द्रोगक्खा नाम कयराङब चद्दख जातखा हे । पंचे तुफान करतखा हे जोरखे शांतखे लाटनेकी चेष्टा करतखा हे पीखे नैघुद्ध देखकर मरण पातखा हे ।
त्रिप जङ दखा दुख्खा हे दुख जङ के व्यापपास हो चमर्रीं डाटकर वसमे ल'ल मिरच दा चूर्ण दार्ङ डाख हर लुगानो अभवा दोह करदो ! रेगी खुराक न डे एके डे जुदासे पिच्छड़ीखे पनाद्दी द्वारा हिरिवासव या यौपघेखे प्रमाही वनाकर युदासे पीतकारो से चडाना !
प्राचेतस, चूप'—सम्पण' ( हारितण ) कुडेकी छ'ल नीपफको छाळ नागरमोथ कछ नदसल मूल टेढ़िम रौप्य माक्षिक सदृशम भाग देख्खर कूटनखा ओ! से १ तोला ठक गमंपानीखे देनखा ! १ दार्ङ तक बंदे रहनखा !
श्वान विषपद्धर चूर्ण—चागर नोटा (छोक्चे यानो मोल) घटपण घटङ काल या मूल (वायवरनो) इन्द्रखो निम्बोलीककी मिरी फुटकी विरायतखा नागरमोथ सिङ्कोय अमनताम्र नाला वचूूरा छोटो कुटदखे मूलं सपामागं पाँचोंग से घानो
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कालोमिरच पीपल सेठ पोपलीमूल घन समभाग कूट । से ।। तेला पकाये चावलके पानीषे देना ।
श्यान विपहर कवाथ--छोटी कटहली मूल नीरीमपीपरका फल पाताल. महडोका पं'चां (चेत्रडी) अपामागं मूल सनावरो कुटको ढाकका मूल घुलरकामूल ढाकका मूल घुण समभागमे कट पां'च तोलाका कवाथ कर पिलाना ।
विप प्रकरणमे कहे हुए अजितागद भीमसंद्र रस मृत्युपाश छेदते हृत मार्द्र औषघ वचिित शास्त्रामे देना ।
१ ढाकका मूल तोला १० का कवाथ पिलाना ।
२ महा सुगंध चूर्ण दोला ३ का कवाथ हर भीमसंद्र रस ४ से ६ रत्तो देना । १ मास तक पिलानेसे श्यान विष नष्ट होता है ।
३ बेठा छोटा गुलर काकडुद (वेठा डंबरो) का मूल तोला पांचमे घतूरेका बीज एक माशा भर दानोके पकते हुए चावलके पानीमे पीस पिलाने २१ दिन देनेसे श्यानविष नष्ट होता है ।
४ इन्द्रायण--पंचां'ग तोला ४, कदोटको मूल (कंकेड़ो मूल) तोला ४ देने पीस पिलाना । ७ से १४ दिन तक पिलाना ।
५ शुद्ध कुचलाका चूर्ण ६ रत्ती पुरुषभूष तेला १० के साथ १४ दिन तक पिलाना ।
६ इच्छामेधी गोली ३ से ५ ग्रमंजरसे देना । वस्त होइकर जतु निकल जायेगे । पंछे दूसरा औषघ खाते रहना और ३ से ४ दिनके पीछे इच्छा मेदोका खुलान देते रहना ।
७ भंगो (अपामागं) मूल ३ तोला पानी मे या चावल के पानोये पीस पिलाना ।
८ सच्ची कस्तूरी रत्ती ८, वचुलको पति तोला ४ के पीच' प्रवाहो कर वस्मे हस्सूली मिलाय पिलानां ।
९ कुटडाद्वी घरक, भाकडा दूध पुष्ठ तेल घन साथ पीस लेप करना ।
१० वगारपाठाके पानदेई चीर कर उस्मे पोसा से घानेईन छिड़क, कर दंष पर बांचना ।
११ अपामार्ग मूल तोला ४ के कवार पाढा के रसमें पीस 'तसके मूख से मापा से घानेईन चाक पौष बंध पर बांचना ।
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१३ कफनाशक चूर्ण तेला ३ मे माजूफल न (मोतीपवरी) तेला १० पाकर- पर दंवा पर घोचना ।
१४ माजके तुषमे बाकरोका साटा केा पोष मुंग प्रमाण गोली वनानाफ इर्दगिर्द चरतां हेर वस मधुरेषे २ से १० गोली और पचुओ का १५ से २- नेाली देना ।
१५ कटे तिळ मे प घ आंके दूषमे घेष्ट मुंग प्रमाण गोली करना ₹ से ४ गोली प'नीसे देना जुलाव तगारा सेंधंदे बाकरोके रसना जैसी इर्दगिर्द भंड़े 'निकलतो हें । ३ दिन तक देना । छोटेट चच्चेरेार २ गोली देना । मुंह चावल केा सोबहो घो डाल कर सिलाना । बड़ां नमकोम खानां नहि । दवा हेानेके पीछे हजकमा ७ जुनाव देना हजकमा घटे नहि ।
१६ देनदाली (कुठकवेल) का दोज पहिलेदिन १, दूषरे दिन ३, तीसरे दिन ३ इस प्रकार ७ दिनतक चढकर ७ वे दिन सात दोज पानीमे पीस कर सिलाना । १३ दिन सिलाना होवै तेरहवे 'दन १३ दोज देना इस प्रकार प्रतिदिन बढना । २१ या ३० दिन तक मो लिटाया जाता हैं ।
१७ नेठी या खांसी कफदारी के फल घेर १ मे गुड घेर ०१ मिलाय मड़ोन फेंक ३ म'साकी गोली बनाना । ३ से ४ गोली पानीषे देना ।
१८ शरपंछाका पंचांग तेला ५ पोम कर ७ से १४ दिनतक पिलाना ।
१९ समुद्रफल स चव्य इंद्र यण मूल हरड अपराजिता का दोज घव साथ 'पौष तीन रतीकी गोली वनाना ३ से ४ गोली पानीसे देना ७ से २१ दिन तक ।
१९ चतुराका दोज तेला ४ जूना तेला ४ पानीमे पीस कर दंषापट 'वधिरा ।
२० दारो मिरच माशा ३, कुठदाकी चरक माछा ३ साथ मिलाय ७ से १४ दिन तक देना ।
२१ कफेएली कफकेंटकों तेला ३ा पानी मे पीस पिलाना ।
२२ धूहर का दूष संडापर लगाना नीमके पड़े तेला १५ और सच्चो' ईंग तेला १ पोषकर द वापर लगाना ।
२३ हृदकवा चलता हेर कन चतुराका पंचांग तेला ३ा का नावलके पानीषे पीस पिलाना विषाणे मे जंतु जंषे ऋमि पदें ।
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वृद्धि अंडवृद्धि अंतरवृद्धि
वृषणवृद्धि स्वारण पांठवीं अंत नीचे उतरना
वृषण वृद्धि स्वारण विचार—वृशचे पानो भरानेछे छोट मनेल्छे वायु हर्ने वाली जोले मानेरै नस फुल्नाले माथि दाह पीडा मे चह रेसा हेचा हें। रघनेरु हर्दै हें। तैा माथी मे भोर उश्के मुरुमे ले तहा लएो नारोभोए मोली रटक रहो हे रघनेरु वदं हेचा हे, यशत रगचा हे। मोली परहा चमचौक आवरण उजकर मोटा स्यूं हेचा हे। भंडकेल मे ठलाने चाले लाछेरोँ देरै दिसी रकून मेोटी होल्छी हे। इेइलके साम कमो ताप रमन मलाबरौष मो खेचा हे। वृषण मे पानो मराचा हे तथ सीच हेइती हं, पाला मागदोँ पमरौँ पारचती हे। भंडकेलमे नालीलर भोर धौंकल जेसा या रघनेरु भी घटा हेचा हे। अंडकेलमे सुददा समाल देणेलै मो अ पकदेरो हछता हे तथ दाननेलै कठिन लएचा हें।
अंड वृद्धि सरिणी नोट—आँत उतरनालँ हदूँ देणेलँ पाँचमे मुस.कठी मर्दनेलै करानेलै वजन्डार वस्तु उठाने अत्यत जोर करनेलै मारी चोट लोननेलै साइकलकी सफर उयादाँ करचे रहननेलै आहार विदार्शी अनियमितताले यलँ दरदँ हेचा हें जय भात अथवा दूशारी केथलोँ मे उउरचा हें पहचा उवरचा हे। घटा लपानेलै अथवा घेओीसै धममर बाँध रचनेलै सांथे उतरचा नहि। उवरचा हँ तप दरदँ हेचा हें। नच्चेकी नामि के नीचे यह दरदँ हेचा हे।
पथ्यापथ्य—अ अँदवृद्धि और अग्रदरिको चिकित्सा प्रायः समान हे। वमन विरेचनादिसे पेट साफ करना। हमेसा दस्त साफ लानेलै। हरड ऐरंड तेल क्रिमिघ्नं पथ्युनिवेदन चूर्ण अभ्रशिलादि मारि लेने रहना। नीमके पत्तेो साफ देना, वेध्य धुप से धुप देना। जो पुराना चाँवल कुथ्यो वाजारो हुँग मठ उडद मेथो दाना आदि भस्न्य वेँगन परवल सहजनमा को घोगे चौलहँ मेथो को माजी स्वारण आादि शाक, कसून प्याज हिंग जीराँ काली मोरच लाक मिरच नमक दही उतना करना। खाँड पाकर फी मिठाइ भजोणाँ करने वाली चोजे पावथे स्वमाफरी हानि करता हे।
वृद्धियाचीका गट्टी—(मेँ र.) पारड गंधक लोह बँग ताप कास्य राँगा मोली अशककी मरम, शुद्ध हरताल ‘ वृश- मरम मेोट पोपल कानो मिरच हर्द पहिला
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आंवला वायविडंग विघटना हरीतकी पिप्पलीमूल पठा हवुपा (पिप्पलवटी) वच इलायचीं देवदार पंच लवण घृत समान भाग लेना, पंच र रकणका पंच भाग टेना शत्ध घाय मिवसत मिलाय यदी दरद के कवाध से गोलो । रक्तो चौं वनाना । रेसेह गोली पान्नीं देव । अंत्रवृद्धि संदरृद्धि मिटती हैं ।
अंत्रवृद्धि हर रस—पारद तैलर ५ म घृत दे॥ । ताम हरीतक्युक्ति- मांत्र चौथी प्रत्येक सी मम, आंवला रींठ पीपल द्वालीदरच विपरीत मूल वारपुष्टा सारगेाटा फिरी (डींडिचिया) सतोग से धानेःन शवल इलायची वेसंग्रेर प्रत्येक चार चार तेला, हरड c टोला हव घाय मिवघत्त मिलाय मिगुंडीह ९त्ते नीमक पठे और हरड प्रत्येक एक एक भावना देसार थे। ता रती की गेल्कि- वनाना । रे से ६ रे'ळा तक पान्नमें देना । अंत्रवृद्धि अश्ररद्ध मिटती हैं ।
अंत्रवृद्धि नाशन रस—पारद, गंधक शिल जतिं प्रत्येक दश दश तेला, -नूगम १५ तेला, कुचक २. तेला, रेठ, पीपल, काली मिवच, चित्रक चवक कुचळ हरड, देवदार मंड़ार्जों वायविडंग, गेरुसमुहडी, से धानेःन स चल निघेध कदावार प्रत्येक छह छह तेला टेसर घाश मिलाय कटेरी के फलहो और हरदशों, एवं एक मघना देना । मात्रा ७ से c रत्ते पान्नीसे देना । अंत्रवृद्धि, अंत्रगंद एपेंघोघाइटीस मेर मच्चेःहो वधणवल मिटतो है ।
भदोतरोग रस वातर गंधक अश्रफ भस्म लेओड शिलाजित काळह सुरमाकी भस्म शुद्ध हरताल शुद्ध मेनसोल पंपल प चलवण मजोवात यवक्षार- टंकण हड्ड वच्रेदा श्रीवल अजमाद भजवाइन वच द तोंमूळ निमेध नागर मेध नीमक योज पटोल विघायरा प्रत्येक एक एक तेला और घटूगंध यीन दे- वला टेकर वम घाय मिलाकर हरदकं वनाधी भावना देसार रसना । मात्रा ६ शे c रक्तो पान्नीसे देना । अद्रवृद्धि 'मिटती हैं । इसे भदोतरोग चूर्ण में
नेोंच—इस औषधवा नाम मेघज्य रत्नावलोपे मकोतरोय चूर्ण दिया है, व्रतुनः जिसमे पारद ग मक और मसम आदि नोह पड़ते और केंवल वनौषधि व्रगम पठते हैं उषे हि चूणांका नाम देतेको शास्रोय प्रणाली है । इष औषधमे- शात कनक यीअनि दिखा है इसका अर्थ शास्रोय प्रतिशा प्रणालोंफ अनुसार- चौ तेला अप्मा मोहकी, मिनती सणात १. c ३ ज इमकर केई समषे ह मदि श्रो तोया मीज रिया । आय = मत्र - रत्नावलोमे किचे । हष्ट
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१३५ तोलाका घण हुम्रा । भेद्य्य रत्नावलीके सम्प्रदायकाने इसको घण्टा ९ पलका जलायो है । वसकी मान परिभाषाके अनुसार २ माषाथी २४ रत्तो होतो है । अर्थांत ९ दिनको म'ग्रामे १६ रत्ती द्रनकलोज हुवा यह दवा हानि चर्ता है । अर्थात १०० तोला निघं लिया जासक्ता है ।
रस योग सागरमे यह पाठ देस कर तनके अनुयादमे कतकमीम्र १०० घौ नग बताया है यह भी येभप नहि है । श्राख्योय पाटसे कहा नंगा या शंख्या बतायी हे । वहाँ वह ढेना येभप है परतु अन्यत्र तैल हि लिया जाता हे । अन्य ग्रन्थमे स्नात' कनक वीजालि के ध्यानमे द्विक' कनक चोत्रानि लिखा है वही ठीक है । हमने यह पाठ स्वीकार कर अन्य घटक द्रव्य एकएक तोला-और कनक बीच २ सेर तोला लिया है । और अनुयवसे मो दह श्रौषध वत्तम गुणकारी पाळम हुवा है । और इसमे पारद गंधक यम्रृ कदह शिलाजीत आदि पतननेरे रस अभिषान उचित है ।
महानि'घण्टावदि तेल—(मे र.) शेघानोन मैनफल (मीढाल) कृष्ण शौफ मलाामूल वच वाळा महुठा था फुल भारगी देवदारू रीठ कायफल पुष्टकरमूल मेदा चपक चित्रक कचुरे वारविटङ p अतीस निपेधय मिंचु'ही सीज मर्लो—नीली सालपणी* हिल्तमूल अजमोद पीपल द तोमूल रास्ना भृजवातिन प्रत्येक चार चार तोला कूट कर सर्व वय हूव जाय इतना पानी ढ लदर १२ घंटा भिगो रखना । पीढे तेल तोला १२०० वारातौ डालकर पकाना। पानोका अंश जल जाय पीढे १० घटा स्वांङ्गशोंत क्षीने देना पंछे कपदच्छान कर रसना । १ मे' तोला मिलाना और मालीश घरना अवयङ्गोद मदन भ हर्द्रिक् मदगांठ उददावर्ते गुल्म जवासोर क्लोवा भानादि मूत्रारोग आदि मे मो दिया जाता है ।
वृद्धिव्हरी वटी—लोह भस्म चिरायता मोतिकाजोवाज दोपरीमूल मागफेसर निर्गुं धो वीज प्रत्येक तोला एक एक, पारावतकी चरक ढोलां ४ गुड तोला ४ सब माथ कुटकर ३ रती की गोली बनाना। २ से ४ गोली पानीषे देना । भग्रहदि वंध्येंद मिटे ।
वृद्धिनाशान मलम—शेषग्रू हर तोला २० मृल तो '२०, खिलारद् द्वन्द्रामण के मूल एरडू मोष शेठ मोष पारावत को चराक लारिका मूल प्रत्येक वच तोला मोप्म तोला २० एयरंड तेल मे पका कर वनम करना
१ लेइ गेरुसुमु ले एयरहो के दोल मच थफेद घरसेआ सह'जना को छाल मि'हुंदर मीठा, समभाग पानी मे प्रोथ लेप करना।
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२ हरड़ रात्रि भारं गो मेढ़ारों गी दचू रा पतावर री इंद्रायणमूल मलगांध्र यमभाग कूट ३ से ४ माया पानी से देना !
३ रात्रि मर्कटी मूल गिटोय चलामूल जमलतास गेरुह मगइि ं गो फल (अथवा कूटामल) समभाग कूट ३ से ४ माया पानी से देना ।
४ काली मुखली खा चूण रे खे ४ माया चीलके मूत चे देना । ३ दिन मे आराम होता हैं । चल हत्थी ने दियो हो तब का मूत्र देना !
—॥—
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पथरी—अइंसरौ मुत्नप्रन्थो
कारण—मूत्रा वेग रोकनेसे आहार विरुद्धके कुपथ्यसे धातुके ष्यसनसे' येकृतके बिगादसे मूत्र पि श्मे क्षार युक्त पदार्थों के जमावसे वीय'का धाया हुया वेग रेकनेसे कफ कर या रेती घाला पदार्थ अ टा विगेरे खानेसे इत्यादि कारणोसे यह रोग होता है । कफ दोषोमें हाथको चककी प्र यत्न निकल गई और मज्जाशिको चककोका आटा सानेका नसोमें चल रहा है इसमें पथरकी चककीके घयं से आटामे मिल्ती हुयी वारीक पथरकी रजेध भी इस रोगकी वृद्धि दे रही है ।
लिङ्गह्—नामि शोथन। मूत्रनलीमें दर्द' होता, २ या ३ घारवाला पि शाब होता, पथरीके घोसलेर निचलनेसे' माग' होता, जव नामनी जौसा नाढा अथवा वारीक कफ कर युक्तत वि शाव होता । पथरीके शोथसे क़स्त-वण पर तेज पीह,के साथ रक मिलित वि शाव होता । वाताइं शरी हो तो पीडा अथिक हेता । दांत कचड़हे, टेढ़े, लिंगमे मदंन करे नामिके दवावसे पि शाम हु द्र हु द्र निःस्ले । इस पथरीकी सट पी काला भूरे र गकी रेती है । पित्ताइं शरी—ग्रन्थि वात अजीर्ण ताप पित्ति मांसावाहिनि शिरधि कारनोसे वि त प्रकोप हेाकर एक प्रकारकी खटाइमें यह पथरी जमती है । यह लाली लि मे पीड़े वदामी र गकी हेती है । यकृताइं शरी भौर शुक्राइं शरी सफेद मे टी पेची हेती है । यह सरलतासे मिटती है । मूत्राशयमें वि शाव रहता है दुगं णयुक्त रेतीता है और पह-पस पैदा हेता है वह वायुपे पूव दर पथरीका रूप ढेता है ।
वैसे हि वीय'का वेग रेकनेमे धाता हुवा वीय'के अटकनेसे पथरे जमती है । माकं णशरपी पदरी जमती हे । उस समय दा सम खानेके पीछे उ सपर दाब देनेसे या अन्'्य कारणोसे हेती है, जासुके दाबमें-अनुलेाम वायु है; यद रेती जेधे दांकरो पि शावके साथ निकलती है । यह मुव्राशयक पथ । वही जाती है । वात प्रदेप वढता है वैसे मूत्राशयमें पोडाके साथ पथरी जमा हेती है । मूत्र-पिंडाइं शरी पि शावमें विदोष प्रकारके क्षार तं वेधी वृध्धि हानसे मुव्राशयमें अथवा मूत्र-पिंद-गुदाइं मे अथवा मूत्रापि टको रस्तीम यह पथरी जमती है । पथरी वढी हेने परे वेधे गुदाका नाश हेता चरता है, अथ मूत्रा पिंडमें अथवा दद' होता है । पथ पत उ पन्न हेाकर पि शावके साथ निकलता है । कई वक्त ल शकी आसपास मट मयनी हेाकर कम्मरको पीठने या पादप के भागमे या नामे की आसपास फूटकर मवादसे पहके सांय वि शाव निकलता है । पमरे चनाचे लेकर अं घने फल-मेरे
F घमे सह दे र म अजीर्ण प्रमेहमें हेातर है
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पथरीक्षा उपद्रव--पथरी बहुत ही और मृत्रपिंड में मृत्रनली द्वारा मूत्राशयमे उतरे वेग नत्ति पीड़ा होती है, जब पेटमे दर्द अधिक हो, चमन हो, मूत्र वि'दधे मद्द हो, रेगी को देखेतीी घबराहट हो और पथरीना श्धीक हो, वृपगमे वसाया पीड़ा हो, पिशाच लाल खून पर मिचिन आंछे, ताप घेघा रहे । यह पेड़ा कदे घंटोतक या दिनो'नक रहती है और पथरी मूत्राशयमे पहुंचे जल पेड़ा पंच होतों है ।
पथ्यापथ्य--जुलाब देना । सादृशकषा होतो पिचक'री-नोसीमा टे'कर यंत्र सेत लाना । पीड़ा ज्यादा होती हो तो भस्मकृ'मी वच या आमव या माज विsानां । पेटपर या कम्मर पर शेक धरना । रेंक लेना करनां । रेगीद्रे कम्मर तकू गमं जलमे बेठाना । राढ शकररकुो चो'ले कल्ल दिवच ठेस उठती चो'ले पथारा दार भजोण कराने कास्या खुगक वन्द कराना । भूख हो तब मेजन कराना । हलेवा प्रताद्दी दुराक देना । इसेशा २ वस्त टटटी जानां । दहल पुढ'कर पानोकी पटकसीमे ढालकर वह पानी पीड़ा मूत्रल टवा देना । पथ्यनं वढ गडे हो औश्रषष्रहे न मिटे तो शब् हम्मे डराना ।
त्रिविक्रम रस--वांतित्रों रक्वित नाम्र मस्म मे २० गुना वरने ह दुव डालदर पत्ताना । रव जल जाय जय ताम्रप=ममे ८ पुना पायरा श्री डालदर पत्ताना वों जल जाय जय यह ताम्र मस्म इस औषधरस डालनां । लंक्ष मस्म- तोलां १०, ग चकन तो. १० पारद तो १० काथ दिनिय चेट निपुं'दो के रव यों कवय मे मे लाकर कषपड मिट्टी मे'दर बाह्लराय'च मे ३ घटा नळ पत्तानां पीढे निकाल अलर पोत कर उपयेपमे टेना । मात्रां १ रत्ती पायरहे चसे टेढर ऊपर oil से १ तोलां म्रीभोरका मूत्र अथवा खट सटु यार्हे पान ५ पोहसदर पिलानां । १ मासमे पथरी विघट हर धोरे धीरे निफल जाती है ।
सद्मरी मेशी रक्व-(या र) पारद तेतर ४ म क ते'लr ८, शिलाजीत वे रr, ४, तीनों साथ मिलाकर येत पुननवा हड्डदी थे'र अपरार्जिता (रणजी) प्रारये'के रसमे एकएक दिन चौटनां पीढे योगा दनादर हुट'निगर येत पुननंवा, वासा येतां भपरार्जिताके वयाधसे दार्लिका य चग्रमे २ प्रदर यार्तर देनी । पीढे निंडाल, घो टकर मंखना । मात्रां २ रत्तो सुदि सांवलो और ह दादिमो मल्ल यथ'श्रखे वेधर दुव पिलाया जाता है । इस भौषवके पापाणवेधी नंम मो' वटदे हे ।
पापाणयज्ज रस--पारद' तेत. १५, गधक रेत; म c रउक्रमे हर खेत पत्तनंलrफे पचांगे रसही तीन मात्रां देना । पीढे मूत्र दुर. न्दा कषिन श्वेत पननंलrफे पु चांगडे रसही तीन मात्रां देना ।
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देना। पी�छे पापाण मे�दका चू�र्ण ढोल�ा ३। मिलाकर ९ से ८ रत्ती २' टोट�ा खाट ख�ट वाके पानक�ा पीसकर घनुपान �दवमे� पिलाना।
अ�ठरहवीं मे�दी प�ध�ाथ—सुं�ह� ध�ातु� उ�ज्जी�वान पु�त्तन'वा मूल पापाण मे�द सप सम भाग कूट २ से ३ तोल�ा का प�थ�ाथ कर पिलाना।
१ म�ोखर इलाय�ची व�ण (ना�वरग�ो) प�ोवल� प.पाण मे�द मूलठो मूल घनिया प�ुष्कर मूल श�थ टूट २ तोल�ा ख�ाम फर पिलाना।
२ नीमक�ो न�ी। ल�ीक�े मि�ी तोल�ा ।। त�दक�र तोल�ा ९ साथ मिल�ा वास�ो पानी�े म�ोव ७ दिन टेना पथरी वि�घलती है।
३ स�ोदा�गा पक�ाय�ा हु�ग्रा और द�ा�कर स�व भाग मिलाकर ०१ ट�ो तोल�ा दिनम�े द�ो दफे पानी�े देना, २१ दिनम�े पथरी वि�घलती है।
४ चक�प्रमा शि�लाजीत पक�ाय�ा स�ोदा�गा द�ा�कर स�व स�मभाग मिल�ाना, ३ से ४ मा�सा दिनम�े ९ या ७ दफे देनेम�े ३१ दिनम�े पथरी वि�घल निःफ�ल हो�ती है।
५ नालो�प�रका फू�ल, म�थ�ा ३ घ�ौ�र सेर�ा ख�ार मा�सा ।। स�ाथ प�ो�ष पानी�े देना।
६ जु�ड़�े या चमे�लका फू�ल तोल�ा ०१ ।। नाग�क�र ढा�ल घ�र�ी क�े दु�ध क�े स�ाथ स�सम�ा कूटक�र ९ मा�सा पानी�े न�ा शहद�श�ो देना
८ शोर�ाखार तोल�ा ६, च�ोना�रक�ी कुल�धीम�े पि�थालक�र इसमें शु�द्र गं�भक�र स�ोना ९ हि�लम�े वि�धल हो�नेप�र शि�लाजीत पि�थ�ाली हो�ने टो�ल�ा ।। छाछ क�े स�ाथ देना। ३ या ७ दिनम�े पथरी वि�घल हो�ती है।
९ ति�लक�ो ह�ड़ी (त�लध�र�ा) अपामार्ग पं�चांग के�लो�ठा र�तंभ ढाक�क�ो द�रह�ड़ी आंव�लाक�ो लक�ड़ी स�वक�ा स�ुधाकर अ�ल�गा अ�ल�गा जल�ाना, घ�च�ो भ�स्म 'प�मभ�ाग मिलाकर प�ानी ढा�ल प्रवाह�ी बना�क�र कप�ड़छान कर ढो�ठ�े पत्त�नस�े पक�ाना पानी जल ज�'या झाग चू�पं रूप धर शेष रह�ेगा। २ से ३ र�त्ती स� बदर�ीक�े मू�त्रस�े म�तर�ीक�े द�ुष्प�ते देना पथरी वि�घलती है।
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उद्णवात पित्शाव जलना उणवा
कारण-चिन्ह—धूपमे सफर करानेमे, नगे पाव घूपमे चलनेरे, भुरखे खपी हुये रेती या अमीन पर पित्शाव वरनेसे, गरम सीदे ख'ने पीनेसे यह दद' होता है जब अलनके साथ पित्शाव पीडा या लाल वतरता है। तथा शरीर दिवसाग तपता है। तथा लराती है। हाथ पावकर तलिया जलन है।
उपपसात कर मिस्रण—प्रवाल चवपुटी तेला ९, जवाहर मोदहरा तेला ९, मुक्तापिस्सो तेरा ०॥ अमृतामतव तेला ४, रस साथ पीप ५ से ९० रत्तो गुलकदरे या च्यवनप्रास जीरनमे देना।
उद्णवान हर द्रष्पों—समुरफळ तेला ९, नामोसर, हरड, शाकर, युननंवा मूल प्रत्येक देा देा ते ला केाठा श्वपथवा फलकुा सम्भो कड़ी शोंक (वरियाळो) वांपळा, डाकका फूल, कमलकंद, डेलायची, मजीठ, जीत शिलाजीत, मींढोगांवल मिठोय, चपवदका फूल प्रत्येक पांच पांच ते.ला साथ कूट ०॥ से ९ तेला पानी मे देना उपर गुडका पानीया अपवा लस्सी का पानी पिलाना।
१-गोखरु ५ चांगका काथ, गायका दूध चालकर पिलाना।
२-मधु त्रिफला चूर्ण ९॥ से ०॥ तेला गुरके पानीसे देना।
३-रसायन चूर्ण २ से ३ माथा पानीसे देना।
४-चौलाई मूल तेला ९, चावल के घोसांण मे पिस पिलाना।
५. डाकका फूल, पावाणमेर्द पुष्करमूल बच्चूलसका फल, शाकर समभाग घृत ३ से ४ माशा पानीसे देना।
६-हरड, चना, धमाका, पावाणमेर्द, गोस्तरु समभाग कूट २ से ३ माशा पानीसे देना।
७-एक साल के पुराने गुडका पानी १० दसे १५छटांक कर पिलाना।
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सूत्रस्रावचूर्ण-रक्तसे विषाव होतां
द पसे उक्ततके रक्त योद्र योद्र विषाव निवार्ना
फार्ण--१७५ ग्रंघर पीड़ा न्या'नाम उपचार करनेसे तीव्र मरत हतपदार्थों कोनेको आदरने, हौदनेमे, रक्च संचारने, शेकने पर माजन करनेसे, अधिक गुरमी या अधिक ठरसी मे प्यार फिरनेसे पसे अनेक हार्णोसे यह रोप होतां है । मूत्राघमे (fistula) fafara are मत्र हदन--पार निवार्नेका माम पेनमेल जां सके इतनी है । यह सूत्रपातमां चा सन्ब कारनेसे सदुचित हेकर दपाव शक जाय, मत्र पाग'हो नायच्रा हदो'च हेक इत्ने मूत्रच्छ या सूत्रप्रणाली वचते है । सधिका दार पीनेसे, घृत लरनेसे, हिस्टीरिया चहुरी भाननेसे और प्रमेह के कारण मूत्रपातमांहो तहच्य हूत माननेसे भयमा मृत्रपातके आाघपात मत्र प्रधानी हेनेभे मत्र माप' सकुचित हेता है । इसमे विषाक्ती मूत हदप पतलो होती हे । अथवा महुत जोर करनेसे बुद बुड यत मिदा व उतरता है भगद मूत्रपान शिलकुन बंद हे । जतां तां है तन चहरे जितना जोर करनेपार मी विषाव आघपात रकतांव हे'कर मी संकुचित हेता है ।
fiziz-H यह रोप हाने हे नी- पित्त' पनलां पड़ना है, विषाषकी इच्छा (स्त्र्य) रहती है। इम्स कारण व नतार f जातां करने अ नतां पड़ता है । मत्र जौसे ज'से भरक्ता है वंमे मूत माग' चाया (पहेएळा) हेकर मत्र माज'मे वृथन रेकर विद्रायमे कफ तरन्न होता है । नतु मृत्र'न मण्हकुन मे पावलते मूनमे मूत्राघमे और दिध्रमे तीन पीड़ा हेंती है । पित्त प्रधान मूत्रकृच्छ्रने पीला पन firithat.पीड़ा दाहरके सथ नतार रकडते मूत्र निकलता है। कफ प्रधान मूत्र कृच्छ्रेमे मिश्न और बदन त पित्त नाकर वस पर मृत्र हाती है । मृत्र का र गका तेल जेसा और चिक म दार! हेता है ।
पथ्याप यथ-खान पानमे सम्र्र इन्ना स्वाद्ही खुराक लेने मु नकां थोडां मण छांछ सान नींचडी दुध सना मेघ जत कुनथी शाकमे दूधों चोर्नडही भाजी सुर' र्कालु (रक्चालु) परवल करें। मि - ण्ही मे पानेन हल्दी जीरा धानिया हर्रा धनिचा (fizमीर) दहीनेमे, मि - ण्हेलां मेघ लो सँडरा दाख आदि ड़नां । रे'गांf इस्मर तकू घृत , दूध हे पानिमे पाव आाधा घटा
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शालाई ठाना-१ शलाइ (शलाका) डालना । हेतु उक्त दिन रेगीके चरराम कराना नामि के नीचेके भागमे और अञ्जु याजुमे शेक करना । हाकेके फुरकेा ढफका मारे पेट पर वाघना । मधु विरेचन वेला २ से ४ माघा देना । शलाइ डालनेके निकलता है । भओषधे निकाल न डाले तमी शलाइ व लना । तेल लाल मिरच बूट परोथ दोह माघ वगैरे वाद करना ।
मूत्र शलाका—यह सली चांदीको ठोस लकडीको वा अन्य पदारथ्की बनती है । चांदीको और रवरदोकी नली पोलि होती है । उसमे च दीका एक माला रहता हे । वह विस्था निकलनेमे हितकारक होता है । मूत्र माग' चे चा वरमेले ह डालेसी शलोका रखते है । सली ९ से १२ नसकडी होती है । सली डालेके पहिले उसे टेना हायके बीच घोडकर राइड लगाकर टारना । टाककर लेग मोतरीन लगाते है । रे गीका सुलाहक घूर्तन नमाजर खडा रखना । पेट ढोला रखनेकेलिये रींगोको नाचे और खडा रहकर शलोढे तेल लमाकर नाये (नाम) हाथमे शिखा परचकर दांये (दक्षिण) हाथसे मूत्राग' के छिद्र मे हाली दाखल करना । जैसे जैसे सली अंधर घुसती जाय मूत्रमाग' खुला होगा अव-तक शलाइ महसचण दिना अंधर घुसेगी । हलाहक चालते हत हरना न हे, साथे भारते हारना, लोम करनेमे मूत्रमागं पत लानेक्ष । जय है । शलका डालते समय रेगीके घेधर दर्द' डे तो भरन मो हे । जवो खुन मो निकलता है । परञु वह ठंडा पानी का पेतर रखनेसे यंध हे जाता है । शलाइ डालनेसे रेगीकेा कसी ठंड या हुलेंकार जैसा कंप होता है, हुल्कार भी चढ आता है वो सलाई निकाल देना । सल'इ डालनेमे कसी रोगो वेचुद्ध मी हेा जाता हे, कसी व्रषण सब जाता हे । कसी भापिक स्फीति हे कारण शलाइ धूप नही सहुफती भटक मूत्र शलाका करना पडता हे ।
मूत्रकृच्छ्रांतक रस वृंहण—शुद्ध पारद यथक और अष्टक चैम्रात स्वर्ण कोतलेह प्रत्येककी मद्म, मुक्तापिष्टी प्रवाल पिष्टी सब सम मग लेडर निंबू रसमे घोंटकर मूषमे घव रस् औषध् डुने इतना निंबुरस् डाल. मगडीपर नूष धरना निंबुरस जल जाय जय फीर निंबू रसमे घोंट उपर के माङोक पडाता २५ वार पकानेसे औषध् तंयार हेाता है । हरवखत औषध् मूषमे डालने के पीछे औषध् डुने इतमा निंबुरस् डालते रहना ।
मूत्रकृच्छ्रांतक रस लघु—सामान्यदो के लिये व्रषण मूस्म (मोती)
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सुस्ता पित्तिके वातान्मे' रस' पाक्तिक और सुस्निग्ध्रकिसारातिस्निग्ध दिया जाता है'। इधर लिये वृदत और लघु रसरा है इसमें भी किया उपर जिस्मी तरह' है ।
मूत्रकृच्छ्रान्ति रक्म-पारद गंधक रसमा निष्टे' गुडिचे' विष्टे' रंग रस्म यक्षाद रसम, मोक्षर हरड़ शांवला नागरमोथ शतावरी शिलाजीत छाम्लोभिक्ष रपं'ट (दहएश्लोंघ्रा) पचासार छाड़े मृदु रस्मे सेवन्तां टेकर पहुँचनी मोखुर पचांग शहदेवी कालीमाक प्रत्त्येकके मतान्त्री एक एकू मावनो देकर टे' रत्ती प्रमाण गोली वनाना । ४ से ८ गोली पानीषे देना। मूत्रकृच्छ्र मूत्राघात मूत्रपिंडका रोगा मृगनलीकी घुसन स्वादि मिटते हैं ।
दोबेड़ी गुटिक्रा—पारद गंधक यन भस्म, हारित्न्न्न अभ्रक भस्म स्फूय क्षार पारसार गोक्षद हरड़ शिताे मोत शतावरी सफेद तिरपणों (तरकशों) अमलतास्र पापाणमेद तालमसानां आवला नीलडीमूल सेनाेमधीकी पत्तों पोड़ोत्र निंबूला फूल शप सम माग लेकर हूँसकचा रस धोर घमासादि वशायको एक पलु मातना देकर टेा रत्ती प्रमाण गोली वनाना । २ से ४ गोली पानीषे देना मूत्रकृच्छ्र मूत्राघात मूत्रपिंडका रोगा मृगनलीकी घुसन स्वादि मिटते हैं ।
सामान्य उपचार
१— कुत्र्मात्क (गुराखेल्सा) का रस तेला १० मे २॥ तेला शर्कर घोर १०—से १२ रत्ती जवारार ढालकर पिलाना ।
२ रेखें मूल घास (काष्ठेधे) मूल इक्षमूल गोक्षुर मूल घमासा बहुफल्से समभाग कूटना । २ से ४ तोलाका काषाय हर शर्कर ढाल पिलाना ।
३ अमलतास गिरो दर्भे मूल घमासा गोक्षुर पपं'ट (खडसलोंघ्रा) समभाग । २ से ४ तोलाका कषाथ मिलाना ।
४ शांवला कालोमाक्ष विंदारीकंद शतावरों मूल्ठी मूल दर्भमूल बहुमळो समभाग । १ से २ तोलाका कषाथ पिलाना ।
५ हरड़ गोक्षद अमलतास पापाणमेद घमाषा चहुफली समभाग १ से २ तोलाका कत्राथ पानीषर ढाल पिलाना।
६ गूग़रक्षी गोदजैसे कणिका चुनदूर माशा ४ से ८ दूनीके पानीमे पौष प्रवाहो वनाकर पिलाना ।
७ जवारार २ माया शर्कर ८ माशा पानीमे पीस विलासा ।
८ अमलतासकी गिरो गोक्षद घमासा शेठ अभ्रककी छाल पाषाण मेद समभाग कूटना। तेला ९॥ मे पानी रस्म ३, शर्कर नबालघो मावा रानी रद्दे जब मिला देमा पिसांन छूटे।
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९ चिमंठ-(चोखटा) नो गय्-तरी निळान करनाकिपर मोचनो ।
१० इलायची दिलायोस्त पाषाणमेद् पीपड समभाग । ३ से ३ माशा
रक्खे हुए चायन के पानीषे देना ।
११ छोटो कटहरीडो पचांग कुठकर वसद्धा स्वरस तोला १ मे महद् तोला
चार मिलाकर विलाना ।
१२ मूदुमक्खी (मोडीवाला) मो भुमनर फेनती हे वेचकूल डोरे छोटो पत्तो होते
हे, पत्ता तोड़नेमे दूध निकलता हे इसका पचांग तोला २ डो राचके दूधमे
पोथ विलानेसे पिसाय ह्टूटे ।
१३ पाषाणमेद १२ रत्ती, शिलाजोत १२ रत्ती, इलायची ०।। तोला,
षााकर ०।। तोला साथ मिलाय ३ पुड़िया वनानो प्राचः ढोल दुपहर शामखे
मपंवलखे देनेसे पिसाय ह्टूटे ।
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सूत्राधात सुत्रान्तरोध
क्षरण—मरमराधिकाः वेग निघ्नते, रक्त प्रस्रावं सानुत्स्रादतश्च, पयस्त्रि हेमदर मूत्न भागं रकफ जाने च गभोञ्जयद्मा अपत्य मन्चोका दाह हेतुने चे'ट कतने च अंफोम गोजा मोम अति पीने, शस्त्र प्रयोग करने च आादि कारणेच वात पित्त कफ दूषित होत्कर विपाच रुक्क धातो भे ।
चिन्ह—मूत्रकृच्छ्रे मूत्रमागं वककुचित हेता चै भोर मूत्न धातु ने मूत्नासाय वच्चा हेाता है वगर विप्नावको जतत्ति हि पंद हेा जाता है । वस्तिका मुख नीचा है दयखो चारे भोर मुख वर्दन करने वाळो शिराभो के सदृश मुख हैै चनमेच मूत्र गिरता है । वातादि देप के प्रकोप से मूत्नमागि शिराभोके मुख सकुचित चा वंद हेाकर चह रोग हेाता है । वातकु डलिन्मा मे चस्मक को वायु नामिके नीचे और पेढने ओर किरता है इ कारण मूत्रेन्द्रिय जाने च पेडा के साच घेराछा घेराछा विपाय वतरता है । मलमूत्राश मे वायु मलमूत्राशय रोक भन्यासय फिरती धन्थो हेाती है। वाच्चासित मे भूत वेगरोधने च पेडमे का पेटमे को इच्छा (तिजत सग्नस्) रहो करे लेदिन विपाय उतरने मे चहून देरी हे। और येढा घेढा उतरे । मूत्रजटहर मे मूत्रज्ञा वेग रघनने च क्रपित चपान वायु पेटमे जप कर नामिके नीचे पौडा कर भौर मूत्रवहि शिराभो मे रोक है । मूशोन्द्रिय मे पेड मे चा इन्द्रिय को नसेने आया हुवा मूत्र रकफ जाने चौर विपाय करने के लिये जोर करने से लिगका चिद्र फट कर विपाय घृत जलन के साथ येढा येढा उतरे, शरीर के रस रकक आादि धातु सुख जनेचे वारीर नाश करता है जव घूल के साच चलन हेकर घेढा विपाय निकलता है । मूश्रग्रन्थो मे गेठ कठिन श्यामला जसो गांठ हेाती है। उन्में पथरी नक्शी पौडा हेाती है तब विपाधय महूत कछेभे वतरता है । मूत्रशुक मे विपाय को हाजत हेाने पर भो विपाय न कर स्रेचग करता है तव स्पान अध्व हुम्रा वायु वीर्यकेा दूसने माग मे चढाकर विपायक्षे कछता हैं जव राक्ष मलका वेध रेदने च मल और अपान वायु दूसरे माग मे कोच कर मक मूत्रा माग मे चा जासा है पच विपाय महूत कछेभे वतरता है और विपाय के
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फल मिथित हुक्मा हेाता है और पिशाचद्दी मंघ मिट्टी जैसैी आती है । वस्ति कुदृल मे वत्ती मे फलु मे गेल कठठन गाठ हेती है । र-मे रुल निदलत है मघ तुद तुद से आाता हैं डिम मे सुजन हेाता हैं। वहुत परल चरने दांहनेशे क घनसे चाट लगनेरे, मो यह प्रणथै हेंातो हैं ।
पथ्यादि—रुक्कलता, तेतरे, कियमधुरेल, वेसमे, नल्ड़्मे, पित्रायम मिलकवान। जेा दैाप प्रधान हैेा जेा चिन्ह देखनैमे आये तैसे भसनुसार उपाय धरना। ममंजलको कुडडो मे रेरोको बैठाना। शेक धरना। मूत्रशलाकां यानना। यदि मूत्र शलाका दातल न हे। मूत्राघात जपादि समय रहे ता मूत्र यागं करनेका भय रहता हैं। तद सुध दूशरो जमाइसे निकालने धी जरूरत रहती हैं। दिनमे एकदरी दफे घला डालनो और उसके द्वारां गमं पानीको पिचकारी ढालकर मुध्राशाय घेना। पुराना वाचल जव मुंहा षादि पाश खुराफ देना। रेगीका डररीक और रेगीका चिन्ह देखकर आाहार विहार रद्ना।
मूत्राघाताधि हर—पारद पुटक, कभुक मधु घ गमरु प्रतिथेक पांच कौला पापांन मेव खिलजीत जवासार सेाराखार सेहानेोन कद्दूके बीद श्चोमराखरा धीज हरड नाकर आंवलो प्रत्येक चार चार दिंला कुट विधिरत मिलाय घमाषा भह्ड़सो अमल पञ्चो के पत्ते ढक्का रसै प्रतेकको एक एक भावनादेेकर २ रसोतको गे लो बनानां या घेट कर रक्ना। माधा २ 'से ४ मेालो दिनमे दे या तीन दफे दम के मुल डो वंत्राप से मथवा नीचे लीजै दिक्षे देना।
सामानय उपाय
१ पर्षाण मेव हरड घमाषा अमलंतासको गिरि गेावदर बहुफली पपमाल कु्ट १ से २ तोलाका क्ठाथ पिलाना।
२ चिमटी (टोहेरी) ढो-गाठ के खड्ड़ो छाछमे पोसकर नामिपर डेैप धरना
३ कुष्मांड (भुंकेहळु) का रस तैाला २५ गुरिका पांचो तैलो १० जवारिवार १२ से २० रत्तो दूध तैाला २० सार्थ मिलाय पिलाना।
४ अम्लपणो (खातखट वे) के पान ६ पोसकर -दिनमे दे या तीन वक्त मिलाना-मूत्रको रकावट मिटती हैं और पथरी सौ पिघलती हैं।
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मूत्राशय के रोग
शार्गधरस्तीके भागेए मागमे मूत्राशय है औीर मूत्राशयके पीछे अथःम-वग्ण देताहै । दसन के प्रारंभने पिशारष बहुत रद्दे येतडं । येसा डतररता है । पिताष डोजानेके पीछे दर्द होतडं पूस खूनेया सफेद चिम्ना पद्मार्य पडे, कमरमे दर्द होता है । प्रमेह दोष होनेसे, पलाइ ता अन्य शास्र डालनमे, पथरीसे याशार्क्कम के डारण यह शरिर शोथ हेतावा है । पथरांमे सुश्रुताद्रमे हसीभार डाकनेसे करोड रुढजूने घोंट लगनेसे कठमालसे या प्रदरभी वातसे जीनंशोण डेताहै । इसमें चिताव डतर वक्त डै।, पिशारष्मे सफेद चिम्ना पद्मार्य उयाद डपडे, उस्से शरत दुरांनं आवे, पिशाष करते वक्त यहत पिड डा, पिशार्श्रक डाजत अडतडाना अशचय हेा तय पिशान साफ धावे या खुल जा यैस लपाय करन । पकाया हुया ट'चण्ण १० रत्तोभे २१ तोला पनी मिलाय पिशल जादेपर कपडछान कर शिरमे पिचकारी वेन । दशमे १० उुह्मी रक्खा हूई नकत मिलय पिलान ।
मूत्राशय रेागांनुसार रस—शिलाजीत तेला १०, पांरद तेला ४, गंघक थेा, १० पांराग्नेसद पुनर्नंवा मूूल विदारीकंद्र दमंमुल कघ मुल रोम्र काल्सा दू शराम शतावरी प्रियंगु (चिरेटा) तालमखाना गेाखरू छोटो कटहडी मुल पोंडमुजेराइ निंबूका मुल मुलेठी मुल शेराखार टंकण मवाखार सेघानेां प्रत्येक चार मार तेला लेकेर कूट विंचिवत मिलाय इस्से १० तोला पूरंड तेल की भावना देकर गोजिह्वा (गोपिप्परी) के रखकी १ भावना देकेर चुखाकर घोंट कर रखनर चभवा ३ रत्तोकी गेाली बनाना । मात्रा ६ से ८ रत्ती सथवा २ से ३ गेाली पानीस देन । मुन्रकी अडतकायत मुल.रसायडी जलन दाह सूजन आदि डिटते है ।
सामान्य उपचार
१—वडी कटहडी, डाईफुल, पाढमुल, मुलेठी मुल मधूयेका फुल इंद्रजौ श्रमलपर्णी श्रमताग कूट ३ से ४ तोलाका काथ कर पिलाना ।
२ वंठी कटहडी के पंाचांग कूटकर ४ तोला रस्से शादि डालडर दिनमे दै या तीन रुपे पिशान ।
३ बालके मुरका काथ पिलान ।
४ रेागीके सारे शरीरमे तिलका तेल अथवा महालाक्षादि तेल मालिश कर वरण (वाबरणो) की चकल या पंचांगकी साफ (नाष्य) देन ।
५ वीजारो निम्स्कूका मुल तेला १ मे हलदी थेा। १ मे पीपल पिचकारी ।
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मूत्रकृच्छ्र वेम रखनेकी अशक्तित
निदमे यत्न जाशुन दशामे विशान हे! जानता हे
कारण—सुत्राशयके मुखका स्नायु शिथिल होनेसे त्रिना इच्छा और निदमे विशान हे! जाता हे। यह रोग वच्चेको ज्आदा हाता हे। और मादृकबती हे जव मच हो आवो हे। किसीको पिशाच वंधुंद बुदेसे गिरे करता हे और रुदनेका प्रयत्न करने पर मो अटकता नहिं। ग्रन्थो कृमि, फेरो रजूके रेग और है है अनय रोगके कारण मो पिशाच गिरा करता हे।
मूत्रातिसार हरों वटी—पारद ता. २, गंधक ता. २, रससिंदूर ता. २, कपूर ता. ३, अफीम लताकर'जके वीजप्का यंग' (सोंठच्चीया), इनग्रशद प्रत्येक तोला दे. २ सब कूट कपडछान कर तुलसीके रसरी भावना दे हर रती प्रमाण गोली वनाना। दमेहा १ थे ३ गोली दूधसे देना। उपर पानीके पछों विछाना। इस गोलीसे प्यास वगे तो दहिहंडी घोल का उसमें शाकर और घी मिलाकर पिलाना।
२—माजुफळ तो. १०, पकाई हुई फिटकरी तो ५ साथ दूध १५ से १५ रत्ती पानीसे देना।
३ घेरकवार, इन्द्रजव, हरड, वहिदा, भावळा, सेंठ, पीपल, काली मिर्च निसोथ सब समभाग लेकर कूटकर १२ से १६ रत्ती शहदके साथ देना।
४—शौफ तो. १, मोगके बीज छाटे टिल वसवस, भजगद प्रत्येक तोला सबकूट कर कपडछान कर गुढमें गोली ६ रत्तीकी वनाना। २ से ४ गोली पानीके साथ देना।
५—चक्रमर्द वच दन, घनियां, वायविडंग, नागमोथा छाल, इलायची, मोगकसाद, मामरमोथ सब समभाग कूटकर एक तोलाका कवाथ वना कर शहद पर सक्कर चालकर पिलाना।
६—हरड, भावळा, नागरमोथ, घनियां, घाइके फल, वादामकी गिरी, ताक्रमखाना, कमलकंद अमलतास, कालोमिरच प्रत्येक पांच पांच तोला पातावरी वेल. १०, गेरू पंचाम तो. १५, सब साथ कूटकर एकछे दे ठोल्डा कवाथ कर शहद मिलाकर पिलाना।
१० वहंजनेका मूल तो. ३ से ४ कूटकर उसका कवाथ कर शकर मिलाकर पिलाना।
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८—आकके फूलकेा छायामे' सुस्नाकर वे. १० और काढे तिल वे. १० लधीन कुठ कर गुढमें' ६ रत्तीको गेभाली वनान्त। २ से ४ तोलकी रातनायो पानोके साथ देना।
९—दूसरे पान (मीठी दूधेलो के पान जो वार चौद इंचका लम्बा होता है और पत्त तेढ़नेसे दूध निकलता है) वह ४ तोला पानोमें पोस्त 'कर कें १० से १२ तोला मकरोका। दूध डालकर पिलाना।
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सूत्रपिंडके रोग
सूत्रपिंड गुरु और किडनी यह देह हैं। प्रत्येक सूत्रपिंड करेड़को वाजुमें कम्मर के भागमें पेटके पीछेको द्वार उघर रहता है। वह कंवां ४ से ५ ढक्क और चैदा २ से ३ इंच हैं। १९ वो पसलीके वद्द छोर होता है। साधिने सूत्रपिंडके वयपि किडनी है और उनके मूत्रपिंड दुःख सुचा मालूमोथे वेदना होती है।
कारण विरद—पहृत द्वारा पीनेधे, मुग्गपिंड पर चोट लगनेधे, तष, केंष्टेक, गठिया वा, पमसी जैसे दर्देधे, जल्लद प्वाइओधे, वट्टर पडाथें जानेपीनेधे, आधिछ्ठ ठढी लघनेधे, उप तापमे, मुग्गपिंडवा दर्दे होता है और उसमें सृजन हेतुमें है। प्रत्येकमें ठढी लघड़र तात्पार जाता है। कम्मरमे दर्दं भेलवा है। मुत्रपिंडके, भागे वमन डैसा लगता है। कमो वमन हेता है, शरीर पर और मुत्र पर सृजन हेोक्षी है। पेटमे पानो मरता है। दृःपण१३ और मुचमुच्रा पा सृजन हेाती है। शांत और उघके पेटधो,Lids मे' भी सृजन हेती है। उपघ और पांच हो वमधो '१ट करे वानिका निकमिता है। शराक पर कुजि नघी हेाती है। विरमे' दर्दे हेाता है। वमन और दवका आता है। मुत्रपिंडको आाजुबाजुं वगहमे' दर्दे हेाता है। मुत्रपिंडको जिस वाजुमें सृजन हुमा हो बहां मार जेधा लगता है। शराको मेोली उचो चढनी है। तृपा लगतो है। दस्न सदन रदता' है। विशाव लाळ थेधर-मा करनरता है। दद' कम हेाता है। जय विशाव थाक उचरनरने लगता है। मुत्रपिंडके आाजुमाजुमने- शोधधे घिरा हुआ हे वो शंषका तेन कमो हेाता है। निद्रामें पडना, याद दाछत कमो, विचार शकि नष्ट हेोघ, चेष्टदि आदि चिन्ह मालूम देखे है। ददं पड जानने से रे गोंकां मुख्य हेाता है।
पथ्यापथ्य—मत विडकी सृजन हेावे रेागोधे स्वेदन और विरेचन दवर देना। उप गर्म ले कर देखे करना। जवका पघंटका नागरमोथका या घम सर का योताया हुचा पानो ठढ करकें पिलाना। उप गर्म शारदी या ठढी लगाने न देना। सूत्ती जगढधे' रेागोधे रसना। वेल लाल मिरच, खटूते पदाथ अजीण' करनेबाली चीजे, वाजरकी मोठाइ गैरह यद करना।
सूत्रपिंड रेाग हद रस—पारद, गचध, रससिंदूर अभ्रक मशन, टेड़़ मशन, प्रदयेक पांच पांच तोला शिल'जीत १० तोला, कुटकी २० तोला, गेरधमुल, रमेंत, सेवनोन ताकहरदी आामियाहल्दी मेंं तुल घनिया दंघलेधन, इलायची, जीरा. मूयआंवला, हरदी प्रत्येक पांच पांच तोला, सम माञ 'मिलाकर शोमके परेधा रस, तलवणी का रस श्रोण-पुष्पी (ऊंवी) की रस हेगमेश एक
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कुछ सावधानी देखकर तोन रतौंधी रोगों वनाना । माथा । से ? गोली पकठे ख़ू़े जावलके पानोते अथवा इ़रखे रवखे देना । मुंहfइधर टहल दूध चोच मुंहातमे चींग मिटता छें ।
सामान्य स्वपाय
१-नागरमोथ, हरड़, आंवला, मुरेठीज़र, गुग्गुलु, विंदाल (पुंड़ाहु) वस माग कुडवर ३ तोलो फनसब हर हर्द ज़ालकर पिलाव १
२- दातावरी, टाकला फूल, पुठ, देवदारू', यवक्षार, समभाग घूट ९ थे २ चोलाखा पनाय हर पिलाना ।
३-लाल उड़केमुल, घनिया, जीरा निटेरेकला पान अथवा पान मुरक्कनो पसमाग घूट करनाय कर पिलाना ।
४-शमीया दुगदि (औंधा हुलर) पिरातत करनीज़र पर'के मून मूंब औंधलो पहुंकलो समभाग घूट कर नाय कर द्वारद ज़ालकर पिलाना ।
५ गामछ दातावरी ऐंव हर मूल समभाग घूट ९ थे २ चोलाखा पनाय कर पिलाना ।
६-अद्दूशोके पान तोला २ पोहकर पानी मिलाइकर रस निकालना । उन्में जालकर डालकर पिलाना ।
७-कपिय (केठा) के पान, धमासा मजीठ हथभ न घूट करनाय हर पिलानेोे जुगपिंड में रमा हुवा पक विषायम द्वारा निकल जाता हे ।
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प्रमेहू
अनिचिप्याद् दुर्लक्ष्मो रसस्वला संगमाद्धि वृद्धस्राव् ॥
दस्ताक्रियया दृढदतरस्रावायन्न च्छायां ददातेन ॥३८॥
कामोत्तेजक सारङ्ग सोनेमादर्शानाद् दिनान्त्रयास्त ॥
नागमेढा पुंसामासर्पसौष्ठवैकृत्प्रकोपात्स्रुजु रसेऽद्धारतन ॥३९॥
दारुण—प्रमेह भनेक प्रकारका हेता है । मलानेह घान्रमेह विष्टगेह शुक्रगेह उदस्रमेह रक्रमेह म जिङ्झामेह वड मेह मधुमेह इतपदि । मद प्रकारके प्रमेह के सामनन्य लक्षण चांदी गरमोवाली और रक्तुम्ती हड्डोंतों सग, अति गरम दुराऊ, खुनका 'मिराद, अधिक दारप दिनेको आदत, शिक्षामें हर दुरह सलाइ डालनेए मानेते चकाच, हड्डतने पुष्टी कट्टे, विदय वासनां वढानेएला शृङ्गारिक वाचन, विकार उतपन करानेवाले टारक जिनेमां आदि मरप, अति त्रिपयवासनां, जागरण अत्यादि कारणोंसे यह रेग पैदा होना है ।
चिन्हु—सम प्रमेहमें प्राय: नीचेँ लिखे चिन्हु होतें हैँ । प्रारंभमें दिप्तनकुलके सप्रमाणमें खुशली आातों हैं । पोछें चीकनी रक्खी निकलती है । प्रतिदिन यह रक्खो सधिख निकलने लगता है । प्रारंभमें रसो पानो जैसीमी निकलनी हैँ । पोछे दिनके पाछें वह दूध या पद जैसा सफेद और पीले रंगमे निकलती हैँ । पोछें पिखाव करते वक्त ललन होता है । प्रमेंह शुरु होने* पोछे पाव दद दिन में इनद्रियनेंं कुलकेउपरी पतलो छमडी लाल हो जाती हैँ । और कभी वहाँ पृथन होती है । मूत्रामार्गंका सकीर्ण होता हैँ । रक्खो ज्यादा निकलती है । कद जोडोमें तो रात दिन रसो कूंद टपकने रहते है । वह पिक जौसी पोली होती हैँ । इनद्रियोंमे जलन और दर्दँ ज्यादा होता है । पिखाव करते वक्त घारी मूत्र मलोमें पंडा होठी है, कारण कि मूत्रनलीका अंदरन भांरा रपमनवाला हनेनेए मत के द्वारकू स्पर्श और घर्षण होत! हैँ । मूत्र भानेने मुंहनलोक तथां शिक्षनेत कुलना पटतां है इस कारण भरदी उछा दम खेंनकर घीरे घारे पिखाव करनेक प्रयत्न वरता हैँ । हने वक्त पिशावको नली पुऱ पद (पड) से मर जाने से विभावकी भागयो देत तीन हेती हैँ । निद्रामे दहं हैँ । जानेसके सकरमात प्राप्त होता हैँ । रक्खोमे रक्तांसंको इरका होनेने वपके मधा होआ है कय रेवा ज्यादा बढती हैँ । और मरदी चद हैँ। वेदन होता हैँ । विद्वम वेढा हेजाता हैँ। कभी पिखावके साथ चम मो मिरता हैँ । कंसर होतो छोटो छोटो पथंरीमां चोदा मय में होते हैँ। हने राप
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सागलके मूलमें ग्रथि वा सूजन होती है। औषधोपचार करनेसे ऊपर वहे हुए चिन्ह दम और पिड़ा कम होते हैं, रसी बहुत घट हूई हूई वह पतलो होने लगतो है, और एक के पीछे एक दिनह कम होनेमें रेग 'मिटता है। प्रमेहवाले पुछपके मगमे स्तोको गम्भ नहो रहता है। और उपड स-परमो के रोगों पुछपके रहह हूवा गम्भ फर जाता है। प्रमेहवाले स्तो पुछपोके गुप्त न्योःचारसे यह रोग प्रमामे खुव फैला दूवा है।
पथ्यपथ्य-सम प्रमेहने सामान्य रीतिदे रेगमोते शारीरिक परिश्रम दम मरनो ट्याथ फिरना नहो, चप्ना न वो' रफर रस्ना नहो'। इन्डे आादपवों स देहच निकाष होनेसे रेग वढना है। वडे के नेोडे चलते फिरते कामकाज मरते औषन सेव्नमे प्रमेह मिट जाता है। रेग निटे कम तह ग्रह्मचय'का पालन करना। विथय नाशन वढ ने दाल सादिन्य पढना नहो'। नाटक द्रिनेमे देवन नहो। वारिक पुछतये' पढना। खु'राक सादा हलका सेना। ताल भाद्र खीचडी विना मयालांको साकमाजी घो दूध मुंग चावल नहू जवारी मकाई कुदथी टमाटा दूधो सुरण रतालू परवल करेला चोलाइ मेधीको भाजी मोचंवी देला सरगन दधोम द्राक्ष वादाम पिस्ता चारीलो आादि खान। लाल मिरक सीला क्सार वांला पथ्यं परमागरम चोज भरपम दाख चा आादि चोष्टना !
द्रिन्द्रीयमा युनाव (सुत मिर्गनचन) सेना। देखंटर ले वफू वसत इस रे गौकेर शिंडनमे पिचकारी से साफ मरते है इमशे कमो' हानि पहूचती है। निकलतहू हू रधोके करटा वफ इडसे रधना नहि। रसी टपरती देठो वपहेको छेडो येमी (केओरको) मे नपदत्रा यफ हू डामर इममे निचन अक्षर लटकत रहै इस पकार- कदना तांछ रसौके चूंद उस देलोमें गिरे ! यद्रि अदरकके भागमे जलन हे'तदू हे ता द्रधितव डपर और पेड डपर पानोका ठंडा प्रोाह रेगना देस्ना हरेोशां देा दर्दे साफ आवे एसी सैथपण टेठे रहना और वात पित्त कफनेसे जिस देहपकड खाधिक प्रकोप हो उदकेा धानमे रखके द्रैष्योपचचार करन।
५ चाळसैमेह—इसमें अतिराला रेपावाला चीकना पराथ' घो'नसे निकलता है। इसमे कफदोष प्रधान रहता है।
सर्तिंपिचछलमलालं देहदकमिव ततुवचस मेहनिं यः॥१२॥ फेन्याहलालसैमेह प्रदीपप्राभिमत्याद मदत्यय देगः॥१२॥
सारमेहद्रु—पिशाव म्लासमे.रखनेवाले नीोचे गाढा भाल वदता है और पिच्छाव पिड़ने 'दरक्त भों स्र्रनचल नहो'।—द्रोवा—इ यह कफप्रधान प्रमेह है।
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घटृपदाध'सम चा घटृटपदाथैंन् म्रिश्रितं सूजं ॥ जबते च्लमुपरि किश्चित् कफातिरेकेण सोंद्रमेहडसौ ॥३॥
६ विष्टमेह—इसको करते समय रेागीकेा रेमांष हेा जाता हैं कांप उठता है । पिच्छाके साथ आंता जैसी धार्रीक कणिकायें गिरती है । विष्टाम श्वेत रंगका और इतर वक्त हेाता हे । श्वेतं विष्टमं वा मुहुर्मुहूं त्रपुरस्तुजेतपुष्य ॥ शुष्क म्रिष्ठवद्घस्र्थं क्षीणं विधायच पिष्टमेहांतं ॥३॥
७ शुक्रमेह—इसमें पिच्छाव रस्रिक हरवक्त आाता है । रेागी बेचेन निरतेग और क्षीण गनता हैं । विष्ट व गाढ़ा श्वेत और वीर्य'निम्रित आाता हे । वीर्य'युतं वीर्यासं मैहन्ति मुंत्रेण चलवंदुर्स्रप्रम् ॥ चिकृतकावसरं वा क्षीणनरं शुक्रमेहिनं विद्याच्च ॥४॥
४ वालुका मेह—पिच्छाक्षमें यार्रीक रेती जैसी कणिकाये आाती है और रसास्र्थे पिच्छाव घननेसे नेेेे रेती जैसी कणिकायो जमती है । यह रेागी दिनेांदिन क्षीण हेाता है, बुठा'गप्रि पंद पहता है । दस्त अनियमित हेाता है । पिच्छाव्को हाजत इरकक्त रहतेे है । शिश्नेाे मस्ल्ता है । इस्से शिश्नंपर सुज्न हेाती है । कंकरिकाभा कणिका मूत्रेगाड्डयांति सुरिथरे मूत्रे ॥ क्षीणवळाग्ने: पुंसेऽघस्ताद्रेतिनिभा विलेरक्यंते ॥५॥
५ शर्करा मेह (बधुमेह)—पिच्छाव्में गूथ नहीें हेाती, पिच्छा श्वेत और ठंडा आाता हैै'पानी जेैसा स्वच्छ हेात्ता है । रेागीकेा पिच्छाव्द्री दाहम्त हरवखन हेाती है । रेागीका शारीर निर्ब'ल कुर्रा और निस्तेज बनता है । पांचों शाक्ति मंद हेातीं है, शुराक' पर या किची कामदोनेमें रागोके प्रीति नहीें रहती । मुहुर्डच्हे शीतं सितमुदकेपममूत्रंमुत्सृजेंटपुष्य ॥ निर्गें यं क्रशकेहा म व्रास्रिनिर्व'ले हृद्रकमेही ॥६॥
७ रक्तमेह—पिच्छाके साथ उष्ण खुन गिरता हैं अगर खुन'मभ्रित पिच्छाम उतरता हैं । शिश्नके अंदरके मागमें दाह जलन हेाती है, शिग'के मुखमें शोथ है, तृषा 'आदि ओ' हर्द्यमेें जलने, देहस्त पतला और कृशो हेाता है । यह पिस प्रथ्न प्रमेह है ।
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सक्षारमु ष्णमस्र विस्र मेहेननर: सदाहं वा ॥ पिच्चातंसदृशहृदऌनेग्रोडलौ रक्तमेहवान्मनुज: ॥ ७॥
रसेन्द्रार तंत्र ॥
मंजिष्ठारक्त सद्रश वेष्टणं द्राहेन संयुक्तं मेहेत्व् ॥ तस्मादृरः पित्तमेहेा मंजिष्ठससंख्कः प्रोक्तः ॥८॥
रसेन्द्रार तंत्र ॥
वसामेह—इस प्रमेहमें जप्युक्त वातप्रकोप रहता हैं पिशाचके साथ चरणों जैसे गाढ़ा, चीकना पद¹र्थ गिरता हैं।अथवा चरचरी, मिश्रित पिशाच निकलता हैं । यह् रोगो क्षोण अश्रु कूश अगर कमजोर हो॑ जाता हैं । ज्वरने फिरनेको शाक्त नहीं रद्दती । खुराफका, पांचन नहीं हेाता । दस्त अतियामित हेाता हैं ।
सेहति न्नरेा वसामे—मुहुर्घ्साभिश्र तयुक्तं मुखरं ॥ तमसाघ्यमाहुकार्यो घृताप्रमेह द्विती१वातकेपेन ॥९॥
रसेन्द्रार तंत्र ॥
शोजेऽमेह—यह, रागी वकरीके मृध मेसा पतला पिशाख करन-है ।पिशाझ-करनेके पेउल पाक्ति चाल और उतगाद क्षोण हेात हाेता रागोके माधपम देतेहै । इस रागोके प्रत्येक भवग्यव क्षोण होनेसे अपने अपने धातु धरनेमें कमजोर हेह । प्रारंमे, रागी चलता फिरता है।लेकिन यथरे दिनके पीहळे वध दिछलाना वध हे जाता हैं । पिशाव हर वसत्त हेाता हैं ।
मेहहति मुहुर्मूष्यश्रोजा मेहस्यजापय'प्रतिममू ॥ वांतलमस्राध्यमाहुश्रोजेमेह पुरातने पांपे: ॥ १०॥
रसेन्द्रार तंत्र ॥
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मधुमेह
मेहः सर्वेकालादुरुचितप्रतिकारहोनमनुजस्य॥१९॥मधुमेहर्तवं माप्त्रं प्रायः कृशेन साध्यहां यांति॥१९॥रसेल्वारतंत्र॥
१९ मधुमेहं-कारणम्-दीर्घकालके अजीर्णे, चोर, कांपी डाकीं आधिक पोनेको आदतहोवे, चित्त शोकवशे, शरदेघो घढ़नेसे, घी शकरके मिष्ठान्न ज्यादाखानेसे, आयतसे, शरदवशे गुल्फी घासककोम स्वादि ज्यादादिनें पोनेसे दिंम गके अधिकं खांपसे, मिम्राद उम्र हेमनेसे, कछेजेके 'रोगंमे, दार्ं अधिकंदिनेशे, प्रमेहका रोगं बहुत समयशे रहनेशे यह रेग हे'ता है। वयाल्पादिदमें रक्तविकारकामे हेरनेवाळे माझाण वग' बहुतेंदिनेंतक खांड़'गंकरवालींनीजें खांवें रहवेंहें। उनकें मी यह रेग.हे'ररात है, वैठे रहं, फर कामराज करने वाळे-रवमवरी. या, जो फिसमें काम 'कांनेव'हे. टेढ़गमें'यतद रहं 'ज्यांदा होतार्हे। 'हो फो'लपक्षातपुत्रयोमे यह रेग अधिकफा वेह्रार जतां हे'ते,
फिरह-यह रोग कमजो भय कर रूप परणडकर योंहैवर्षोमें रंेगीरें मरयुवक' पहु चांता है। जव बहुतसे रोगियोंकें यह रोंगंवहुत वेमौतक चलतेंहैं। विशांवेकां 'वजन २४ घटांमै १० सै'३० रतल तंकं घढ़तांहैं। इसमें शकरं घे'कडा ९० चोळे पिशावमें आंधा टकाों ९० टकां तक झांतो है। प्यास ज्यादालंगतीहै। पिशावकु रमें फिकां, पानी कौसां और स्वादमें मधुर रहतांहैं। वलासमें घोंहीं वेर रखनेसे फेन (कोल) निकरने रगवेंहैं। विशांव जमींनपर पड़तांहै तव वहां चोंटियां और कीड़े मकोड़ें लगतेहैं।
मधु जीभ गीला त्वचा रहना हैं, मुल्तमें खुजली रहती, जीभ लील होतीहैं। दांतके मधुरेहे कमी थूक या पस निकलतांहैं। दंतल कुंनम रहतांहैं। शुंस्कमे और मुखमें मधुरतां, अश्रोंल भों मंथु, चमचे 'सुखी हथ और मुखसुधा चितातुर दीखतीहैं। कमजोरो बढ़तीहैं। विषय दां.चक कमी होतोंहै। नींद कम होतीहैं। हांथमें जोरंउपर कमजो रहतांहै। शरीर कमजोर होतांहै।
पांच तेलां पिकांवमें १८ से २७ रती शंकर मालंम हो तो वह अमोध मधुमेह समझना। 'रोगोंकी शांस्ता मंसोधयतां और रोगके चिह्न शारीक फ द्यांदि ध्यांनमें रखकर उपचांर करना।
पथ्यरपथ्य-खुराकसे रोगोने स माल रखना चाहिये। शक्कर गुड़वाळे, मोटाके मीठाले चरबी वाळे पदारथ गहूं चावल बाटाके मीठाले
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वाजारकी मीठाइ आदि नहीँ खाना चाहिये । चा काफी माइयकेव पारसंत गुलक्री वगेरह वघ करना । दश मर्दवन, जवं वाजरी कुलथी गुंग मठ मेधीरसना चोलाइकी भाजी मेधीकी भाजी वेंगन हरेला तुरेया दूधी आदि खाना । जहाँ तक वन सकेँ विंनो शक्कर ढाला अगर घारेष्टा दूध दिया पिना नाहिये श्रोपेरोंका उपयोग करना । नहि यह चीज एक प्रकारका विष है । श्रोपेरों हृदय दिमाग जातेँ कुफुपुष्ट मूत्र,दाय आदि हवयनोर्है वला तुच्छमान पहुँचाता है । और बहुत वरपेष्टक इसका उपयोग करनेवालोंका हृदय वद हे। जानेष्टा किस्सा घनता हैं । तृषा लगे जव शरफका पानी नही पीना टेकिन, एड़ मिट्टीको मेटी हंचोेमेँ पानी ढालकर उसमें नौमकी छाल या वाळा आदि ढालकर वह पानी पोते रहना ।
भिन्न भिन्न प्रकारके प्रमेह रोग पर गुणकारी औषधेँ
च'ंद्रप्रभा—वावची वच मोथ चिरायता मिठोलय देसदार हर्दो दारुहर्दो पीपलामूल चित्रक घनौया हद्रड महेद्रो शांवलं चवक वायविडंग; गजपोपल सेरू पीपल काली मिरच सुवण माषिक जवाखार पजोखार चे'बानेन स नचळ पाननो प्रत्येक वार तोला । निसोेध रंतीमूल तमालपत्र तज एलायची व शालेँचन प्रत्येक सेरू सेरू तोला । सेरू दशमूळ १२ तोला । शाकर ६४ तोला श्रोलाजित १२८ तोला शुद्ध गुणल १२८ तोला शन दिधिवत मिलाके तीन तीन रत्तोकी गोली बनाना । जात्रा २ से ६ गोली पानीके स'थ देना । रस प्रकारके प्रमेहमें गुणकारी विशेषमेँ लाला मेहमेँ, श्वासिक फायदा करती है । इधके अलावा मूत्राघात पथरी व्रणणश्रुति, अंड़वृद्धि, संग्रहनी वांदे पांडु कामला मलावरेह मवादोर तिल्ली मगदर शोरतोके रक्तुुदोष पुरूषोके वीयंदोषमेँ उत्तम गुण करती है और सामान्य पुष्टिक है ।
प्रमेहादि घट्टी—आतावरी कमललोँककी गोरी इलायची काली मुशक्री कफनित्य (कोठ) के फलका गरम शफेद मुशालो पुनर्नवा मूल रोहितक तृण के मूळ अजमोदा शोरा हलद्री प्रत्येक पांच पांच तोला, काली मेरच चोनी कवाला नागकेशर गुगळ शिलाजित- इपुरो (इंगोरिया के फलका गरम ) प्रत्येक दश दश तोला शन मिलाकर कफिन्त्र मे पानके रसमें ३ रत्तोकी गोली बनाना । ३ से ६ गोली पानीके साथ देनेसे लाभ होता है और धन्य कफ प्रधाण प्रमेह मिटता है ।
भोम पराक्रम रस—पारद थे। ६, गंधक तोला ८ नागअरम थे। ३ मिलाकर पप'टी तरह पक्कोनार । पोछे पोष्ट कर उसमें भस्मक भस्म लोड़ भस्म
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राजावटं मरम शीलाजीत निम्फलोके गन्धप्रयेक दे। दी तैला मिलाकर गुंजामूल धपित्यरके पान नीमके पान प्रत्येका रसकी एक भावना दे कर पोछे त्रिफलाके क्वाथकी घात भावना देना। पीछे लज्जालुका पञ्चाङ और वचुलके गूंदा देनों समभाग कूटकर ५० तैलां वरके भौषघमे मिल देना। माधा ६ से ९ रत्ती रास्नादि पानीके घाथ देना। घान्द्र मेह पर चरपम गुण करता है और हुमरे प्रयोग मेरीपे भावनाचरों लोरोंमें श्वेतरोग रक प्रदर और सफेद लावमे उत्तम गुणकारी है।
हरिद्रांकर रस—रससिंदूर और शुद्ध भस्म शपमांग छेकर और पक कुये हरे आंवळेकी घात भावना दे कर रत्ती प्रमाण गोली वनाना। १ सेर गोली रव्यनप्रकाश शीवनके साथ देना। यह विष्ठ मेहमें अघीक गुणकारी है और दूसरे प्रमेहोंमें दिया जाता है।
वंगेश्वर लघु—गगसम्म श्वेत रससिंदूर शुद्ध घनक प्रत्येक १०-१० तोला। गोमलका गोद यष्टिमधुका गोद गोमलके मूल वलावीज चूर्णी सुगंधी शुद्ध भस्म प्रत्येक ५ तोला ले कर कूट कर विधिवत् मिलाकर घोंटवारके रसकी एक भावना देना। माधा ३ से ६ रत्ती पानीके साथ देना। विद्वमेहमे उत्तम गुणकारी है। इसके मलाथा बहुमूत्र मधुमेह घातुसार प्रदरमे गुणकारी है और शक्ती प्रद है।
वंगेश्वर वृहतू (महा वंगेश्वर)—(स्वर्णयुक्त) शुद्ध पारद तो. १० में सेरांका नकं वेआ. १ मिलाना। पीछे उसमें गं'चक तौ. १० डालकर कजली कर पपंतीकी तरह पकाकर घोटना। पीछे उसमें बंग शुद्ध तो. ५ और टेह मध्म मग्नक मध्म मुक्ता विष्ठिट प्रवाल पिष्टिट वन्चुलका गोद गोमलका गोद चोनीकवाला एलायची गोमलक मूल प्रत्येक ढाई ढाई तोला मिलाकर केलोके कंदके रसको एक भावना दे कर स्वगजाने पर उसमें मीमसेनी कूपर तौला ढाई और जायपत्री (जावत्री) तौला ढाई मिलाकर घोंटकर रखना माधा ३ से ६ रत्ती पानीसे देना। यह शुक्रमेह में उत्तम गुणकारी हैं। इसके मलाथा यह प्रकाकारका प्रमेह मधुमेह बहुमूत्र औरतोंके श्वेत रक प्रदर आदि में गुणकर्ता है और पौष्टिक है।
गुगलु घट्टी—प्रगटशेमे गोद जौखी पीली चमकती कर्णिकाओ चुनकर शोर १ देना। पीछे उसमें घट्टजनेका पान सदहतर (शेतूर) के पान चमेलोके पान मेगारा के पान विष्णुकापराका पान वेत्री श्वायका पान और गुलर (उदुंबर-चमरी) के पान
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प्रपेष्ट एक एक शेर टेकर सच पानोका साथ मिलाकर मथदचरे कुटकर पानोका रस निचे नाय कर उपर गुगल रखना और गुगल के उपर वचा हुया आधा पान दाख देना । पीछे हंडोका मुंह मिटोसे वंध करके ह होके जुलसी प चढाकर तिरका तेलका दीया हंडोके नीचे देना । एक शेर तेल जल जाय तब हंडोका वारह घंটা स्वांगसीत होने देना । पीछे घोरकर हंडोके घथ नीकाल हरं पीसकर चार सेर वच रत्तोघो गोली पानोसे वनाना । चार सेर घे लो मायके घी के साथ देनेसे मृकमेह घावुल्लाव और सनप प्रदू मिटता हे और सांकृत आती हे ।
वल्त तिलंघ रस—लौंह भस्म, वंगभस्म सुवर्ण भस्म, अभ्रक भस्म, रौप्य भस्म, स्वर्ण मादिक भस्म, प्रवालपिष्टि, मुंक्तापिष्टि इत्येक चार तोलो चांदी तज तमालपत्र इलायची नागकेसार प्रत्येक ९॥—॥ तोला । सब माथ मिला कर घिफलाके कनकपक्षी भावना दे कर सूरज जाने पर उसमें वरपल चार तोला और जाव खी चार तोला डाल कर कुडकर घोटकर मथना । मात्रा ३ से ६ रत्ती वादरं, या दूध के साथ देना । यह वाळखा मेढ सेवन करने से मेढ मे उत्तम हे । कष्के अलावा दुसरे सव प्रकारके प्रमेह मे मधुयेह मे पहुचुमेह मे जैल रस प्रदर मे दिया जाता हे और पोषक हे ।
प्रमेहांतक वटी—चुर्ण हिंगुल केशर लोंग जायफल चोनीकावाला सली मिरच इलायची अफोम अक्कलक़रा सव येमभोंग टेकर नीगारवेङ के पान के रसमें रत्ती प्रमाण गोली वनाना । एक से तीन गोली पानो या दूध दे देना । यह सिकता मेढ वाळखा मेढ से अधिक गुणवारी हे और दूसरे प्रमेहों में भी हो जाती हे ।
मस्तर्वद्याधी—छमो मस्तंघो तज जावत्री, कफेर,मुचाली कली मुचली घोर पेपलो मूल प्रत्येक दे दो तेली और रसक्तन श्वाथा मिलाकर १६ तोला केंसर ३ तोले पंञावी पोलम धथवा शुठाकुल मिश्रो व तोला सम सभ विशिरेव मिलाओ कपडछन कर रखना । मात्रा २ से ४ मासी पानो या दूध दे १४ दिन तक देने से सिकता मेह और सनप प्रमेह रोग मिटते हे । कट्टा खारा तोलां पदाथ औषच चाळ ठा जम तक नही खाना स्वप्न मे या अन्य रीते से गुकपात हेता हे वघमे भी यह दवा फायदे करती हे ।
इन्द्र वटी—रसविद्रु मरक भस्म भस्रम तककी छाल झाककर सव समन श्वाथ मिलाकर रेसनल दे मूल के रस मे घोंट कर रत्ती प्रमाण गोली वनाना ।
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२ से ४ नेलो पानी के साथ देने से वदक मेह यकु मूल शोर अन्य प्रमेह मे सुंकारिये है ।
गुफमार्क वटी—पारद गंधक शम्रुक मन्म लोह मन्म प्रत्येक चार चार तोला, गेरू हरद यहेंद्रों आपलों तेमार पत्त इलायची रसौत घनिया चवक जोरा तालील पंडा टहेंद्र अनारकी चाल प्रत्येक देई तोला, गायकवों धों पांच तोला सेध सैन्ध विंचित मिलाके चकरी के दूध मे २ रत्ती प्रमाण गोलो बनानो । २ से ४ गोलो पानी या अनार हे रस हे साथ सथवा चकरी के दुग्ध के साथ देनो । वहुमूत्र शादी प्रनेह रोगमे उत्तम गुणवारी है ।
रक्तमेहांतक वटस—शुद्ध प'रद गंधक वंगमस्म यराद भस्म रौप्य भस्म मुक्ता वर्पिट वटालेचन प्रत्येक टेई तोला, प्रनाल विंद्र C तोला, शेव शाथ मिलाके केलाकी कंद शतावरौ रज्जालु रघौत विरौंजी (गु'ज्जा) को पत्ती प्रत्येको एक एक भावना टेकर लौन रक्त'की नेलो दनातां। २ से ३ नेलो पानीसे टेकर उपर पके हुए हरे अंजीर पांच दश खिल्लानां सद म मिले टेई सुठे अं जारकां यारद घेंटा पानिमें भिगो कर पिलानो अथवा गुड़र के पकेऽ हुए फल पांच दश तिल्लाना हेई कलमे जतुन न देई यह वेष्ट ठेना ।
मद्रा घनत कुसुमाकर
द्रौ भानो देमभूतेप्स गगनं स्वापि तत्सादमु ॥१॥
लोद्दभस्म मद्येऽपि भागाघृतवारेरो, रसभस्मनः ॥२॥
वृद्रभस्म-स्विभागं, ह्यातकस्वंमेकत्र मदंयेतद ॥
प्रथाल मोक्तिक चेव रसालासपेयेन दापयेतद ॥३॥
भावनां गवयदुग्धेन रसौघैस्त्रुवाटरडपकः ॥
हारिद्राद्वारिका चंद सोपकन्दरसेन च ॥३३॥
शातपडरसैना चपि मालतवाः स्वरसैना च ॥
छायया शोपयेतपश्वातुलसया रसभावितः ॥४४॥
कपुंरसत्व म वसूर्त्या भागौकैक-विनिद्रिपयेत त
संमिश्र मदर्देपेतखद्मे, दिनैक ददमुप्रिना ॥१५॥
सिद्धः सर्चंगमेपौर्को वसंत कुसुमाकरः ॥
गुंजाद्वय वदौतास्य मचुना सर्वमेहजुत ॥६॥
वृष्येओ मल्येओ कुंहणगष्य-कामसंजीवन परः ॥
नानाजुपानमेतेन सर्व रोगापहरस्मृतः । ॥७॥
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मदार वसंतकुसुमाकर-मुवन्' मदार ३ तो, मदारक मदार ३ तोला लोहमस्ा ३ तो, रसविद्रू ४ तो, यंम भस्म तो, ३ प्रवालपिष्टि तो य सुक्ता पिष्टि तो, ४ सवं विधिवत मिलाकर गायत्रे दूवकी भह्र्रोके रखको हलदीके मरायत्रो श्रथवा हरी हलदीके रसकी केलोके कंदके रसत्रो गुलात्रके फुलके रसको चनेलोके मोर तलत्रोके रसकी एक एक भावना देकर सुक्ा जानोपर सीसेनी कपूर १ तो, और वस्ुरी १ तोला डालकर घोटकर रखना यह षव रोगों में उत्तम गुणवारी हैं। मातरा १ रती षाहत्रसे देनेसे माजित्र मेह मर्याति जलनेवाला प्रमेह मण प्रमेह मिटता है और घन प्रदारके प्रमेहमे^ं सरतप गुणवारी है। मिेल मिल्न अनुपानसे षव रोगोंमे^ दीया जाता है शृथ्य वलय शृंहन और कामोरोगनुक है।
वसंत कुसुंमाकर-मुवन्^ मस्न तो. १, रोंप्ता मदार तो, यं बंग भस्म तो, ६, नाग भस्म तो, ३ लोाह भस्म तो, ३ रसविद्रूर तो, ६ प्रतालपिष्टि तो ६ सुक्तापिष्टि तो, ६ वेधान्त विधि तो, य सुवर्णमाक्षिक भस्म लाल तो, ६ विशेरी कंद ४ तो, शेमलका गेंहू ४ तो, फैलकुद ४ तो, अहसनो कंद तो,४ हलदी य तो चमलं कंद ४ तो सफेद मुसली ४ तो, गुलात्रके फुल तो', ४ चनेलोके फूल ४ तो, तुलसोके बीज तो, ४ सवं साथ कूटकर गायके दूवको भावना देह्रर मुखाकर वसमें^ सुक्ा माने पर जायफल तो ४ सीसेनी कपूर तो। ८ नाव ३ी तो ४ लोह तो, ४ कस्तुरी तो। १ मिलाकर घोटकर कपहछान कर रख छेदना । मातरा ३ से ६ रती शहद धृत या मक्खनसे देना घव प्रकारके प्रमेह श्वेत रक् प्ररर सेामरोग धातुद्रीणता। हृदयरोग कसे्जरीमें उत्तम गुणवारी है। क्षयरोग फुफकुप्रके रोगमे^ गुणवारी हैं। शृथ्य पोष्टिक और शाक्तिप्रद है।
सारिवादि स्ववलेख--पारिवा नागरमोथ लोध्र वचको अंतरछाल पोपल्न (अम्रतथ)की अतरछाल नीमको अंतरछाल कचूरा धन त मूल पिप्पलाक्ष वांलो पाटा श्रावलां गिळोाय वंदन रसोत भजमोद छूटकी तमालपटटा मजीठ ढाकके फुल मींढी-मावल हरड प्रत्येक १६-१६ तो, द्वाक्ष १२। तो पान्री तो मन डालकर पकवान श्राघा रहने पर कपहछान कर गुड मण एक डालकर फिर पकाना षष्ट होने पर इलायची कुष्ठ हलदी छोट पीपल कालोमिरच तमालपत्र बीज नागकेशर वायविड़ंग लताकरंज बीज प्रत्येक ८-८ तोला बांलकर अवछेद जैसां हेाने पर रसांगत्रीत हेाने देना। घव प्रकारके प्रमेहमें २ से ४ तोला दिया जाता है। खूनके विकारमे ंचादी उपदंष भगंदर प्रमेह पीड़ितों मे उत्तम गुणवारी है।
धान्योोषध स्वप्नदृष्ट--अोमजमं मे^ ३ पीपल तो, ३- जायफल जाव श्री अफलकरा ट कण विंगार काली तुलसोके विंग कसुंभाके वोज वला्का मीत्र इस्पन
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कनकक्षोज कपल बोजको मोरी ठोंप इलायची अष्टगंध नागरमोथ चमुद्रशोण के धोेज बजमोथ मोरगो क'ला तम प्रिय गु' चोनेकवाला प्रत्येक तेला पांच पांच, कालो मिरच तेला ०॥, केसर ता १, सोंनेक वख' ता॥ १', अफोंम ता १, मालकांगनी ता ०॥, पाणकु घेष ता १, ढेबानक फुल ता ०॥ कस्तुरी रत्तो ९, चौदीन वख ता ०॥', मेखलु ता १०, कौंच ता १०, सफेद मुबल ता १०, सोंठ ता ४ वचुलक मोद ता ९, पूं०च धो:य ता २, सवं० सोंभयो:ह कूटकर कपडछान कर दूर पछा घेर १० में डालकर पकाना। घट्ट हौ जाय अरु खांड पकका घेर २. क' वासणो कर उसमें हाल देना और फिर धीरो आंचवो पक्काना। वाटन दोषा हे जाय जदो उतारकर ठंढा होने देना। इसमें कस्तुरी केशर ढेबानक फुल और जायफल जावत्रो तज सेनाहवाक वक' डननो च'जे अथलेह ठंडा होनेक पोछे ढालकर हिलाना। मात्रा ९ से २ तोला, वक्ता पदार्थ और अचार लाल विरख वंध करना। १८ प्रकारका प्रमेह, ११ प्रकार के ध'तुविकार गर्माशयके रोग प्रदर भादि मिटे। वल पराकम वढे शाकित अवें, मुख रने अन्न पाचन हे। यह कामारोजक और पोषक धवलेढ हे। यह खानेके पोछे पानको पट्ट' एक दे खिळाना खुराकमे दूजी और मिष्टान पदार्थ 'जतना नहि।
वहु मूत्रांतक रस—रगविंदूर लवंगम च गम्भीर जंबाल पंत्रि मुष्का|पित्रे अफीम धो:मलक मूल वैलका कद डोंठ गुलर (ढोंठ उंधरी) ४१ मूल वच समभाग मिलाय, चमेलोके पंचां के रसको भावना देकर घोट रखना मात्रा २ से ४ रत्तो पानीषे देना। वहुत दफे पिशाव होना मदुमेह अन्य प्रमेह प्रदर ऋतुदोष मिटना है शक्तिप्रद है। निद्रामें पिशाव हेता हे मिटता है।
प्रमेह कुर्लातका वटी—लोभ्रस्सम अभ्रक मरक पारा: रघक प्रत्येक पांच पांच तोला केदलो के दं नागकेशर केवारपाटा का मूल निंबकका मूल प्रत्येक छह छह तोला। भांकके फल हुचिया हिरकद अथलकरा त-कंटक मूल सफेद वछनाग जायफल जावत्रो बहुफलो, सफेद और कालो, मुबलो गोकळु चल्नोष ठोंग इलायची अजमो:द प्रत्येक घात घात तोला अफोम घार तो ३ और मोमसेनो कपूर तोला ५ घन साथ मिलाय पानीमें रत्ती प्रमाण गोली वनाना। ३ से ४ गोली दिनमें देर रफे पानीषे देना। वव प्रकारका प्रमेह मूल रोग धो:येढा न्ह३ देष मिटता है।
कामघेनु रस—रसविंदूर अभ्रक नाग माक्षिक यशाद रोंप्य प्रत्येकको भस्म दश पलां तोला लेकर कदलो कदके रखको भावना देकर सुखजाने पर मोमसेती कपूर तोला ५ मिलां देनां मात्र्रा ३ से ४ रत्तो पानीकेई वाष देनेछे शुक्रमेह शधामेह प्रदर क्षीण' उजर और हृदय रोगमे गुणवारी है और शक्तिमन पौष्टढ है।
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मालती कुसुम'कर—सुवर्ण भस्म १ तो०। रससिंदूर तो०। २, रं० भस्म नाग भस्म और लोह भस्म, प्रत्येक ३ तीन तीन तोला, मकरध्वज भस्म प्रताल विधि मुक्ताविप्ठि प्रत्येक चार चार तोला घप्विधत् पाथ मिलाकर गायका दूध कदली हदका रस इखका रस कमल फूलका रस और पके हुए अमीरको रस प्रत्येककी एक एक भावना देकर सुखाकर घोटकर रखना। मात्रा २ से ४ रत्ती महद पच्तन या पानीसे देना। सप् प्रकारके वातप्रेमेह वसामेह शुक्रमेह मदुमेह श्वैतमेह प्रदर गभ्भाशयके विकार मिटता है और गभ्भाशय गभ्भाधानके योग्य वनता है। इन्हीं मे'नसे हृदय वळवान होता है। हृदय, कुफकुवके रोग, खांसी, दमा इनमें भो गुणकारी है।
महाभ्रष्टो वृध्दत्—अभ्रकवम्लम, तेला १०, पारद गंधक लोहभस्म सुवर्ण सरस्म, प्रत्येक तोला पांच सप्केां मोंगरा के रसको २१ भावना देना और त्रिक षाके कर्ाथको एक भावना देकर रतो प्रनाल ने लो वनाना। २ से ३ मेढ़ो पानी मधु या मक्खन के साथ देना। सुरण' मेढमके हयातमें हरण' मार्शिक्ष ५ भस्म डालनेसे महाभ्रट्टी लघु वनती हैं / युग लिखे हुए है। सर प्रकारके प्रमेहमे मात्रिष्ठ मह् बलनेवाला प्रमेह मूत्र नलिका त्रेग दाह में गुणकारी हैं। सुरण' भस्मके हयानमें सुवर्ण माक्षिक भस्म डालनेसे महाभ्रट्टी लघु वनती है। गुण मात्रां लिखे हुए है।
मधुमेह्हरदि चूण—ञामुतके बीज तो०। ११, कड़ोञ्जी जीरा ७ तो०। आमलां कूटकद चूण वनाना। २ से ४ माशा मोजनतर पानीषे देना। २१ दिनतक देनेसे मधुप्रमेह्हमे बहुत फायदा होता है। दरद् पुराना हेता तो एक दो मंहदिनों तक शेवन डरना।
वृद्र रक्षित गुटिका—इलायचो सीमशेको फफूर शाकर जायफल गोस्त्रु सेधलके मूलके रसको एक एक भावना देकर २ रत्तीको गोली वनाना। २ से ३ गोली प्रमेह्हमे देना।
शतावर्धादि चूणां—शतावरी सफेद मुषाली केठा (कपितयके फल)का गभ्भ पुञ्तं वा नागरमञ अजनोमञ होरावलेल पापाण मेर्द इलायचो नार केशर असन' १ प्रिय गुञ् (घञ्टेे) लोहभस्म भस्मकभस्म गिळोयक्ना सत्त् और शाककर सभ् समभाग लेक्र कपड़छान कर रखना। मात्रां ०: से०॥ तोला पानीक्े पाथ देनेसे प्रमेह्हके रागमें उत्तम गुणकारी है भौर पौष्टक है।
घातु पौष्टिक गुटिका—अञ्जोमञ काली मुषाली सफेद मुषाली गोखद असन'ध मेञ्ड पीपल कालीं मीर्च तज दिलारस समी मस्तकी जावञ्रो जायफल लेञ्प हलदीञ तालमखाना केशर श्वेतके शीरकी जड़ो इलायची मदामक्त
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मोरी प्रत्येक तोला पांच पांच, फस्तूरी रती १५, चांदीका दर्ख त०ल। ११, शीलाजीत तोल। ५ टेढानका फूल तोल। ११, विडेएका सस्त्र तोल। ३॥ सव साध पिलाकर तांदूलके रसमें तेल। रत्तोकी गोली वनान। । मात्रा २ से ३ गोली सुघर और काम दूषसे हन। , और रपर दूध विडाना । खुराकमें दूधकी चांजे मिॠान्न पद्मं विडाना और पंचवीडा सान। । सव प्रदारके प्रमेह वायु खोटीं गरमी मोटे , पायीर पुष्ट हो भूत लगे कांति सवल वहे ।
मोघुरादि घवलेकष्ठ—हरे गोकषका पंचांग तोल। ४०० कें कुचल कर उसमें द्विगुण उतना पानी डालकर १६ घंटा मिगो रखना । पीढे खुव मसल कर डपहचान कर लवणमें अवन ( सोंठनीचै। वीयो। विषयसार ) की छाल चारोली खेरस र मेठ पीपल कालौमीरष हरद घाइके फुल मूलठीका मूल विडेए इलायची नार देसार तज लाव'श्री वंशीटच'न सोंठेघरी पेमलक्ता मुनि विटेए मजीठ आंघेथू (अं स्त्य-अग्न्यीचै)क। फूल यचूंगद। मोह वला वीप तुलसीचैग हन्दीं भावल्य। अतीष नागमोय वींगम हचूग कपूरकरई कदौदी प्रत्येक दस दस तोल। साताधरी तोल। २० अजगंध तोल। १५ गोकषु चूगं तोल। २० सवके कपडछान कर मथ'हीमें मिलाकर पकाना घट्टोहोनेपर शाकदर रत्तल ८० भस्मी को चावणी कर वधमें उपरक। विग्रण डालकर पकाना च टने जत्था हो जानेसे स्वांपघोत होने देना । पोछे रांगलगाये वरहनमें मग्ना । मात्रा २ से ४ तोल। विडानेसे सव प्रमेह श्वेत रक्त प्रमेर गर्माशयके रोग शांति मीटत। है शाकप्रद पौरिक है ।
मस्तकयादि घ्यूं—रुमोमस्तकी वटफुलो विटेए यस्त्र मेढरु व टीज'ण इंघम्रो चोनीकवाला घफेद मुलो दाली मुवलीं चौचा तालमखान' सव समान ठेकार कूटकर माध' ३'ठे ६ माथा पानांमें वेनेठे चोयं सव घ लुताव शुंक्तेह विटेए ।
स वनासघ—च दंनका चूड़ा तो।, ४०, वाल। , नागरमोय, महावला मूल कमल कद प्रियंगु टेघ्र पचकाष्ठ मजीठ रकपषंदन पाठ। (चिरायता यचकं। छाल पीपरकं। छाल कचूूर पां तरे मुलठी रास्ना परवल दंवनार आपकी छाल मोचरस प्रत्येक च'र चार तोल। सव कूटकर एक चिनाइ मिटिके वरतनमें भर डाल वधमें पानं रत्तल २०० देसै। और शर्ककर रत्तल २१ पच्चीस ढाके फूल तो।, ६० कालौप्रक्च तो। २००, कूटकर डालना । माठ माठ दिनके पीढे हिलाते रहना । २ मािनेके वाद कपडछान कर रखना । सव प्रकारके प्रमेह श्वेत रकत प्रमेर और चूनी वघाधीर कफघी मी स्यानेसे मुक्तछे य। दरतमैं गिरत। हुश्रा रक और विपप्रघान रोगोंमें फायदे करत। है ।
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देवकुष्टुमार्ति पानि—पायका दूध पकका रो १६ सें मलमलके करछेनी ढोलो पोटली (थेलो) में लेओंग तौ। २० ढालकर थेलोका मुख धागेठे ब ध कर दे और दूधमे डालकर दूधके पचानो। अच्छी तरह माढा हे। जाय नब थेलो नीकाल लेओ, १ पीछे दूधका मावा वनाके वीस पकानो। पीछे बादामकी गिरी तौ। ८ कूटकर मे लेओ। तेरा और कपुर वजकरी मीती तौ ५, रफेद कपुर चूना तौ। ११ केलार तौ। ९, लहसूर तौ ११।, अगर तौ। ११।, चन्दन तौ। ११, टेढ़ मस्म तौ। ५ घ'प भरम तौ ५ ढालकर रसकर पकका लेओ। ४ वाशणो करके उपरकी वर झोलेउपमे मिलाकर दे तीन तेठेका लहू वनाना यपक्का परतनमें जमाकर चकत्ते वनाओ हेमेशां रे से ४ तौ। यह पाक ल्वाकर उपर दूध पीना। सम प्रदारके प्रमेह वातरोग मिटते हैं। बल शांनित शक्ती बढती है पौष्टिक है।
पौष्टिक वायोर—जायफल जावित्री लेओंग इलायची इत्रजन दूधोया वच लेओदसम तगर अगर सफेद चंदन वशलोचन तखीर रक्त चन्दन प्रत्ये ५ तौ। दस्तूरी रती २१ मीमसती कपूर तौ १। वादामको गोरी तौ ५ कीसमैश लेओ २।, वच कूटकर मिलांकर पीछे उसमें पीसो हहू खांड शेर २।। घो शेर ५ मेलाकर चीन्हाइ मीठोके बरतनमें रख मुख व घ घेर ७ दिन तक रेहूंको लेओ।ठीमे रसना १ पीछे निकाल कर २ से ४ तोला खिराना। उपर दूध पीना।प्रमेह धातु साव फिटे रत मन हो। बल शाक्ति वढे १ सम प्रकारके प्रमेह गुणवारी है।
लामान्य उपाय
१ जवूंक की पतों हरीशुरके प चांग मेनागेध शुराखार समभाग कूट २ के ३ मावा प'नीसे सब प्रदेहसे उना।
२ हींगवणी कपरास के पान चा रस तौ। ५ मे शाकत डाल पिलाना प्रमेह वीयं देवमे लम हे।
३ काढे तिल तौ। ४ कुटकर पुष्के पाय बिल ना १४ । दिन खिलानेशे निंदमें हेतो मभा पिसाव यद हे।
४ तालमखाना तौ। ९, वटिंगण तौ। ११, कालीमुसको तौ २।। सफेद मुखवो तौ। २।। शककर तौ। ५ सब साथ कूट ४ से ८ मावा पानीसे देना बहुभूत रेपा मिटे।
५ नदीका सेपतल लाकर सूखांकर कूट कर चूण करना २ से ४ माशामे शहदकर तौ। ९ मिलाय पानीके पाय देनेसे ३ दिनमें बहुत एके हेता हुभा पिसाव मिटे।
६ हल्दी दाबहलरी हरड मेहंदी ओखली समभाग कूटना घापा ठो, चूण में
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७० तोला पानी २ तोला, शहद १ तोला रातदिन मिले रस्सीना प्राप्तःकाल कपड़छान कर पीसिलाना । ७ दिनमें श्वेत प्रदर मिटे ।
७ मेढा लरदीकेरान कूट कपड़छान कर २ से ४ माशा दूधके साथ देनेसे पित्तास्रमें रक्तपातने हेतु हुआ वीयँसाय वद हाता है ।
८ सहीदुनेलो घौैर धोतींगण समभाग कूट कर घोने के समान ताककर मिलाकर ४ से ८ माशा पानीषे देनेसे रक प्रदेह मिटे ।
९ लडन्हुके पान तोला ।। नागकेशरका चूर्ण तोला, ०१ और शावकर तोला, १ मिलाकर पानीसे देना ७ से १४ दिनमें पित्तास्रके साध गिरता रक अटके गरमोका प्रदेह मिटे ।
१० मुद्दीकरान अनारकेपान सौंफदू पान प्रत्येक चार चार तोला लेकर कूटकर मिलिटे हेट्ठमे रखना उसमें पानी तोला, ४० साल लोटका पर केदिया डे ककर अगाॅशोमें रातपर रन्ना प्राप्त द लमो पानी कपड़छान कर उसमें शावकर तोला । ७ हाकर पिलाना गरमीका प्रदेह मिटे ।
११ गोदन्त तोला, २ कूटकर मिलिटे वर्त्तनमें ढाल लस्सो पानी तोला, २० साल भरआँधे रस्सना प्राप्त अालके कपड़छान कर शावधर मिलाकर पिला देना । ७ दिनमे रकप्रदेह गरमोका प्रदेह मिटे ।
१२ सेन्धवार कलमी तोला २ रेठँचीशोरा तोला ।। चीनीडहवाला डलायची जीरा सांठ प्रत्येक एक एक तोला कूट कर १४ पुढि वनाना हेम्रों १ पुढी पानीषे देना विषावकी जलन मिटे, पित्ताष हाफ आवे ।
१३ वर मम ६ रत्तो त्रिकला ।। तोला मिलाव पानीषे देना ।
१४ ह=चूलके वके पक्कल (वावलढा पडीया) तोला ४ पीव शावकर तोला । ४ मिलाय पिलाना १४ दिनमे प्रदेह मिटे ।
१५ रसेलत डेाला रे गुलाव जल तोला, ४० साथ मिलाविया कपहछ न कर दिषनमे पिचकरी देनेसे दाद जलन मिट भदर को चांदी मिटे ।
१६ शेव मुर्दर वगर मस्म सो गोडा प्रत्येक तोला ।। धीलाॅजित तोला ।। साध मिलाय ६ से ८ रत्तो पानीसे देना सब प्रदेह मिटे ।
१७ दोर घोल हालकी खारेक्षार कुटकी अरणी पँचांगका मस्म समभाग कूटकर ३ मे ६ माशा गाय के घीछेके पुष्ट्रे पिलानेसे १८ प्रकारके प्रदेह मोटे ।
१८ चमेलीका पँचांग और टिफला समभाग कूटकर १५ से २० घाला वे रखे २ टोटा पानी ढाल रातदे मींगो रखना प्राप्त काल एक वर्त्तनमे वद प्रवाही भर उछुमे क्षिक्र और वुधनके डस्मे देने ।। वदरका जलन दाह मिटता हे और अंदर के वण चांगा हष्ये जाता हे ।
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१९ वच्युलकवा गोद तौला ९ का पानीो कर उषमे' ९ से २ माषा जवाखार ढालकर पिलाना । विशायकीं जलन विष्ट प्रमेह मे लाभ हेता़ है ७ दिन तक पिलाना ।
२०. मांगारके पान छायामे' सुखाकर घोटकर रसवना । माञ्रा ३ से ६-माषा गायके दूधे साथ देनेमे वित्त मर्मोका प्रनेह मिटता है ।
३१. तालमखाना करकर तो ०।द्रे पानी १० तोलामें ढालकर तसमे' शकर और मगद की लकडी चंदन की तरह प्राय: ६ से < रती घीघुमर उषमे मिलापिला देना । इष प्रदार ५ से १४ दिन तक देनेसे सम प्रमकारका प्रमेह मिटता है ।
३२—पाञाणमेद जामुनार इलायची सेठ हरड सहेबा।ळो और पुराना गुड चघ समान माग लेकर ४ रत्तीकी गोली वनाना । ३ से ४ गोली दिनमें दो वार देने से श्वय प्रकारके प्रमेह मे फायदा हेता़ है ।
३३ उरदक टकपा पचांग सुखाइकर महीन पीसना । इस चूण' तीनमे चार माषामें आधा तोला शाकर मिलाइकर दूधके साघ देना । यहुत हिफे हे नो हुना पिखाव पिटे ।
३४ शेमलकवा गोद तौला १९ जायफल तो १२ पानोमें पीस कर ६ रतीकी गोली वनाना । ३ से ६ गोली पानौके साथ देनेसे २१ दिनमें प्रमेह मोटे । यह गोली कामोदपक और पौष्टिक है ।
३५ मनश्रींमे वनायी दूयी नाग भस्म, सोंठ पिपल कागफल और जाव न्रो श्वव सम मापमे मिलाइकर घृतमे गोली २ रतीकी वनाना । फिनमें दो के दे दो गोली पानौके साथ देनेसे प्रमेह रोगमे उत्तम फायदा हेता़ है ।
३६ सातोंवरीका चून और चनेका आटा समभाग मिलाकर उसक' मजीथां तीलके तेलमें वनाइकर तृंषि पयं त खाना़ । दूसरां देईदे शुराक नहिं देना । ३ से ७-दिन तक खिलानेसे प्रमेह मिटता है ।
३७ वड़का टेटा (वडका पका़ हुवा फल) सुखाइकर चूण' करना । ९ से २ तोला चूणमें शाकर मिलाकर पानीमे लेना । १ से १४ दिनमें प्रमेह मिरता हैं ।
३८ वच्युलकवा फूल छ'यामें सुखाइकर चूण' करना । उषमें समभाग शाकर मिलाकर रखना । माञ्रा १।। तोला पानीके साघ देना श्वव प्रमेहमें उत्तम हैं ।
३९ मुंइ दुधसी (मुंहुड़घकका) जिसके हेटे पत्तो होते हैं और झाता जमीन पर फैलता हैं तेढ़ने से दूध निकलता है उसके' छायामें सुखाकर ५ तोला चूण' देना, उषमें ५ तोला शाल चावल और ५ तोला शाकर मिलाकर रखना मात्रा-०।। से ९ तोला पानीके साघ देने से ७ दिनमें प्रमेह मिटता हैं ।
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३१. जायफल ठेला ९ लोंग ठेला ९ तज ठेला ५ नागकेशर पीला तेल ५ चादामकी गोरी ठे. ५ राल ठेला ५ नीमको नीमोलीड़ी गोरी तेल ९ शंकर तेल, ९ घृत साध कुड कर पानीमें ६ रत्तोकी गोली वनाना ९ से ३ गोली पानीके साथ देना प्रमेह मिटे ।
३२ डांलमिरच तज चिनीकर डाला खसखस प्रत्येक पांच पांच ठेला मांगकर चीयज ७० ठेला नाग भस्म । शेष। सम घृत कुटकर ६ रत्तोकी गोली पानीसे वनाना २ मेँ ४ गोली देना ९, दिनमें प्रमेह मिटता है ताकात आती है ।
३३ तालमखाना ठे. ७० देवदारूको गोरी ठे. ५ कुटजमण ठे. ॥ ढालो सुफेद हो. ५ शेरका गोंद ठे ९ सब साध कुटकर खांड सेवन करे ॥ शेर घी शेर शहद साध निस्सार कर चीनाइ माशोके भरतनमें रत्त छोड़ना । २ मेँ ४ ठेला स्त्री पर दूध पिलाना । प्रमेह नपुंसकता मिटता है ताकात आती है ।
३४ रायगु दा (पका हुआ वडा़ गुदा) के पोजड़ी गोरी निचालकर सेवन करे, ९ चाइका गोंद से, ०) (चावदीक गोंद) मुंह दूधी सेवन करे । ०, तिलके परेका चूर्ण सेवन करे । ०। मिलाकर शहदसे गोली रत्ती ६ छौ नाना ४ से ८ गोली हमेशा खिलाना । स्वडा नपुंसकौन पदाथों वघ करना १४ दिनमें प्रमेह मिटता है ।
३५ भांगरा बहुंफली ठे.धियो कलार (मेरखमुडी) प्रत्येक दश दश ठेला, गेरू सफेद ठे! २ मुलहठी मूल ठे २, वायफिडंग ठे ९१, इलायची ठे. ९, शेरका गोंद ठे ५, पापाणमेद ठे २। शक्कर ठे २०, सब साध कुटकर रखना । ३ से १२ माशा पानीके साथ देना । ऊपर पान के पत्ताका पानी पिलाना । शायथा चायना पेस्त दूध डालकर ४र ठसमें एक सेर दूध पानी डालकर रातदिन भिगो रकना और सुबह कपडछान कर इस चूर्ण के ऊपर पिलाना ।
३६ चरद मुशालो पठाया हुवा टुकड जान जों लड म कालोमिरच अक्ल कर अंकोठ अफीम समपलतकहो ऊंटकुटी ठेठ्जान सब समभाग ले मर कुटकर तांबूळ पत्र के रसमें ३ रत्ती के गोली वनाना । २ से ४ गोली पानीके साथ देना । सब प्रमदमें उत्तम फायदा होता है ।
३९ रगतगोंदद्वार्को छाल ठे. ०। से ९ मेँ पीव कर उशमें शंकर ठे. २, डालकर ९ से २ छटाक पानी मिलाकर पिलाना । ऊपर एक से दो छेटा शहद हाँ रत्ती छाछ पिलाना । दोसे तीन घंटे पश्चात एक दो जुलाव लेना । शुरुय खडा नमकैन तीखा न हो ऐसा कराना । ७ से १४ दिन तक देनेसे चा प्रमेह मिटता है ।
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३८ कुष्ठ सफेद मुशली कौंच घोघकी गीरी आवनां शतावरी तालमखानर-प्रत्येक दशा दशा तोला, शहदर १२० तोला सम साथ कूटकर मिलाकर रखना । १ से २ तोला पानीके साथ देनेशे लाला मेह मिटता है ।
३९-आसुनक्को घुठली गुरमारकी पत्तो और सेठ तोनें खम्भाग ठेठर कपडछान कर घीो वजारपाठाके रसमें मुट्ठर सम्भाल तोलां पिलाना । दो से तीन तोलो सेजनरें पीछे पानीसे देना । मधुमेह टायघोटीसमें बहुत फायद्दा होता है ।
४० दिन्व पत्त्र १ से ११॥ शेर तक पानीमें' मेहैन पेष कर रस निकालना । यह रस गाढा चोद्दना निकलैगा । ५ से ८ तोला यह रस शहदर ३ से ५ तोलामें-मिलाषर पिलां देना । ४० दिन तक पिलानेसे मधुनेह मिट जाता हैँ । यह्ही प्रयेग पलित-कुष्ट वातरक्तमें भो बहुत फायद्दा दरता है ।
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नेत्र रोग-आँखोंके रोग
मनुजाश्रुप्ररक्षार्थं कुर्याद्यावच्च जीवितान्तकांक्षा ॥
रात्रौ दिन तुल्यां काम घानां निश्यतुल्यमिव विश्वमू ॥(३ ८)
बीसेंकी आशा हे। वृद्धोंकॊ मतुष्यॊ नेत्रकी रक्षाके लिये प्रयत्न करना रात और दिन जिस समान हैं ऐसे सब मनुष्यों चाहे सम्पो होवें लेकिन मानव बिना जगत उन मनुष्योंकेा नरक समान है।
नेत्र रोगोंके सामान्य कारण
भ्रूषमें फिरनेका अभ्यास, शीत जलमॆ अधिक स्नान करना, पदाथोंकॊ दिर्षर दृष्टिपे देख्ते रहना, अतिक्रय मदिरापान, मलमूत्र और अध्ये वायुका वेग रोकना, बहुत रष्ट्र, बहुत तीव्रा, बहुत ऋषम खु रूष टेना, दौरामॆ समनेका पवन लगना, अतिविषय, अतिसंकोष और अतिपक॑ करना, वारीक सूक्ष्म पदाथों दर्षते रक्षनेदी यादत् यैसॆ भनेक कारणोंसे नेत्रके रोग होतॆ है।
१ शंख उठना
कारण-विन्ह-मिट्टीका तेल (कैरे'सिन) में पढना, आंखोमें धु आ लगना, भुपमें फिरना, आंखमें कुछ पदाथोंको चोट लगना, सूक्ष्प पदर्थ आँख मे गिरना, ऋषम चीज स्वाना, दूपरेको उठो हुये आंवलाछा चेऱ लगना, इत्यादि कारणोंसे और शोतला मव्वरिका ताप आदि रोगोंके साथ यह दर्द होता है। जब आंखका शफेद तरक शटकत है, प्रकातॆर शदन नहि होता, आंखके पेपवच॑ (भाजरण) मुन जाते हैं।
मुक्ताादि मंजन-(मोतियो सुरमा) मुक्ता विविध थेॱ ॥ हल्दी, यकाईड किटकड़ी लोध्र काला खुंॱपा इलायची दानाॱ यगर भस्म, पॱर ढतेलमें पसाइए हरे चोटे हरड वंष हरड, प्रियंगु विंटॱ प्रत्येक द्वय एक एक तोला, गुडदुग्धपॱ सेवन। २ छे तो प पल c1, लें० वे। ० सेंंठ रती १३, शॱकदॱ वॱ २१, घॱष माथ महींन पोस, क॑डपछान कर अञ्जन कनॱ आंखके बहुतॱषॱ रोगोंमॆ फयदॱा हॱता हैॱ ।
विमलाञ्जन-शॱककर वेॱ ४, छेटो हरड (हिमेष) करचॱ नग ४, चिनीक बाला के थानॱ १०, सेंंधानोन रती १२ घव सथ घोटकर अञ्जन करनॱ । आंख पर जमॱा हुॱआ रॱख, छारी फुला आँदि मिटतॱ है।
चंद्रोदया वति-बही हरड, वच, छेटो पीपल, दालो मर्च, अंहेॱडॱ मोवजोंगोरी, मॱ खानामि. मैनषील, सममाग घोटकर गायकफे पॱषमे॑ घोंठी वनानॱ । पीस कर अञ्जन करनेसॱ आँख खुजली पहल मयुंद फुला॑, रडॱ हुॱआ माँसतरोंष ओर उँडे हुये आँखमें वच्छा ग्रुप करतॱ हैॱ ।
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प्रकीर्ण प्रयोग
१. हलदीको निबौंक रसमे ४९ दिन तक रक्खा पोछे सूखा कर रख छोडना। आंख आई होय जब पानीमे पोष कर अंजन करना।
२. सोंफर और नेत्र दोनोको महीन पीस कर रक्खना। सुरमा की तरह अंजन करना।
३ नेत्रदारको लकहीको बडेरेके पिसाबमे घोस दर अंजन करना।
४ नीमके पत्ते तेला। और चेठ रतो १२ घाय पीसकर आंख आहु हे। उस पर पेटीस की तरह बांचना। आंखके सव रोगमे लाभ होता हे।
५. उरटकी डाढेको गायके दूधसे पचपर पर घोस कर अंजन करनेसे आंखके बहुतसे रोग मिटते हे।
६ समुद्र फलको भस्मीके ठेलमे घोस कर अंजन करनेसे आंख आई हो, खुजली आती हो, उसमे फायदा होता हे।
७ हलदी, चकौ मौर फ (वरियाळो), सौंफ (सुफेदाणा), सोंफकर, लोध्र, रसोत, अफीम छोटी हरद (हिमेझ), प्रत्ये६ एक एक तोला कूटकर रक्खना। इसमे से १ तोला चूर्णमे २० तोला पानी डालकर गरम करना। पोछे कपडेकी पेटलो वथ पानीमे डुबा डुबा कर सांथ पर छ पाकरणा।
८. हरीतकि सोंगठी मि०गरणमोथ छोटौ पोपल, सांखकसी नो०मि, नील याथा०, होरावेळ, खपरिया मव समभाग लेकर वारीक पीसना और निबौंक रसको भावना देकर सोंगठी वनाना। मद्रमे घोस कर अथवा औरतके दूधमे तानेले पात्रमे घोस कर अंजन, करनेसे आंखकी पीडा शटकाक जलन आदि मिटते हे।
९. रसोत लोध्र, वचो हरद, चेतामेद, हलदी समभाग लेकर निबौंक रसमें मर्दन पीस कर सोंगठी वनाना, पतलीमे-चोथ कर थोडेक रांगेम अंजन किया जाता हे।
१० निंपंलीके वीसरे महेंश्रीके रसमे घोस कर अंजन करनेसे आंखके बहुतसे रोगोमे फायदा होता हे।
११ नेत्रशलाका-त्रिफला, मोंगरा, अदरकका रस, घो, नौमूर जावद और वकरीके दूध प्रयेक रसमें विषाय हुआ घोवारक एक एकदफे मुत्ताना। पोछे उसको सलाइद वनाना यह सलाइद हरेक सेती वक्त आंखमे डालननेसे आंखका तेज बढता हे और दुइ रोग नहो होता।
१२ मूलीका पान तो १० मे ३ रत्ती नमक मिला पीप पीस या मनाकर कपडेमे रख आंख पर पट्टा बांचना। आंख आई हो दे दिनमे मिटती हे।
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१४ वाचोलु (Pustular Ophthalmia) आखों में आती है। इस प्रकार की आखों से पानी गिरता है, वे प्रकाश सहन नहीं देतीं। कृष्णमंडलके किनारी पर, छोटी, लाल जैसी फुन्सियाँ होती हैं। बहुत करके यह देनें आखोंमें होती है। कमी कृष्णमंडलके ऊपर मी फुन्सियाँ हो आती हैं। कंठमालके रोगोंमें भी यह रोग दूर वस्नत होता है। बचचेंोमें ज्यादा होता है। बचचे धूप पर हँप रहते हैं। स्वटका होता है। येएे दिनोंके पीछे वह फुन्सियाँ कूट कर अच्छी हो आती हैं।
१४. वेङ(Pterygium) यह रोग ३० बालकी उम्रके पीछे के पुरुषोंको उमरानें होता है। आँखा रमपटल एक के नेत्रे मेएा (कुछ स्थूल) हो कर स्नायुकों नाडू बढना है और कृष्णमंडलके ऊपर चढता है इसे वेल कहते हैं। यदि यह कीलके ऊपर आ जाये तो देख नहीं सक्ता।
१५ सपेएियाँ—ग्रन्थियां(grannulations) आखोंकी पलकोंके अंदर (Lids) के पापच्योमें होती हैं। उपरका पापचा टल्टनमें मारीक लाल द'ना दिखाई देता है, वह छोटे स्वोल कहा जाता है। जब उसका रंग सफेद होता है उसे सच्चे स्वोल कहते हैं। जब आख स्वछर उठों हो। ऐसे लाल हो जाते हैं। सृजन आबा है। प्रकाश सहन नहीं होता। स्वटका आता है। कृष्णमंडलके उपर बारीक मूरे रंगका सपेएियाँ मी होती है। कमी लाल ब'रीक रेखाएं फैली हुड दिखाई देती है। पापण (Eye-Lash) के ढोलके साथ घपैण देनेसे झोला मलिन दीखता है। हँषि टंकी होती है। पापणके साथ पर झपप देनेसे और बाल गिर जानेसे श्वेतमंडल और कृष्ण मंडलके साथ रसहो दिनारी घोसती है और भाव छोटी मौर चूची होती है।
१६ आखों के चारों कृष्णमंडलका सूजन होकर मेढ़ या पोला हाघ मकता है और उससे आखर मघ प्होता है।
१७ कृष्णाम डलकका गह (Keratitis) बहारकों कुछ छोटे वडी चीन आँखमे' गिरनेके मार्ल किसी मी कारणसे बिगडनेके या अन्य कारणसे कृष्णाम डल मान हो जाता है। उस पर लाल रेखाएं देखनेमें आती हैं। प्रदाह्म शरन न्ही होता। आँखे कहते हैं। पापच्यामें सृजन पीडा स्वटका होता है। कृष्णमंडल निस्तेज रेखा बाला होता है। कमी उष्ण पर राह छोटी—प्रन्यो देवा होता—है। माराम होनेके पीछे उधर जगह फूला परता है। कृष्णमं्डलके बल 'प' रसमें पूस देाकर कूटता है और पूय वसमें जम बाय ठो आख बैठ जाती है। अभया गह—प्रन्यो उेफर माप महीं निकलती है।
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१८ फूला—अथवा शुक्र कारण में हलके ऊपर चौदह पत्तेनेके पीछे भगार सूजन होनेंके पीछे उस पर घाव हो जाता है। वह रायके दानेसे टेढ़े मेढ़े क्षरणमंडल रितना में बढ़ता है। पीड़में शूलो ऊपर आनेसे देखनेंमें तिल्ली होती है।
१९ आंवला-कारणचिह्न—चौदह अवस्था यौवनसे ऋणम पल ऋट जाता है अगर वह कुम जानेके पीछे अर्थात् रौप्य दानेंके पीछे बढ़ने लगता है। वह योंकी युठनोकी तरह बाहर निकलता है और वेष्टन देखकर बढ़ने हैं। उसपे पेडा नहीं होते। छेदन वह जप घहटा जाता है। तन पोला होता है। मस्तक दुखता हैं। आंसु बहते हैं। पांचवें यम नहीं होती है।
१ मोतिया बिन्द पटर् तिमिर Cataract
कारण चिन्ह—आंखका जल हर रस पारदर्शी होता हैं। वह जब अपारदर्शक हो जाता हैं उसे मोतिया कहते हैं। बहुत करके ४० या ५० वर्षको आयुनें पीछे यह दर् होता हैं। प्रमेह के रोगसे अपंवरा लडडो द्रांटा सुर् आदि लंगनेसे या कमजोरो मो यह रोग होता हैं। अथवा न मिल सुरे वह मोतिया पड़नेका चिन्ह हैं।
२ झामर वा (Glaucoma)—कारण चिन्ह—इधर में मस्तक पीड़ा होती हैं। पड़ा नहीं जाता। अं'खमें झांति बढ़ती जाती हैं। आलेक्श देखना कठिन और भारी होता हैं। आंखको शिराएं खुनसे भरी हुईं और फूलो हुईं देखता हैं। रोको मदद और दिन्नृत होती हैं। दिआकू सामने देखनेंमें आसपास इन्द्र धुनुप जैसा मेंल दीसता हैं। आंखको समर नेन कपाल नप्रणासे दद घुल जाता हैं। यह चिन्द कमी दश जाता हैं और कंष एठ वा पहिनेके पीछे उभदता हैं। और यह समय धीरे-धीरे कम् होकर पांच दिन में एकला पीड़ा
उत्पन्न हो कर आंख चलने झ झो हैं। किसीके यह सामरवा जि दंर्ो भररहता है, मिट जाता हैं, फिर जमहता हैं। इस प्रकार चलतेंरहते हैं और आंखका देख कमो होता हैं। आंन वेचाल और कुठं हो जाती हैं। पांचवें कुष्ण मंडल पर याष्टी रहनेंसे उघ पर शफेद-फूल—जैसी भारी जमती हैं। दिनोद्दिन नज़रें टखो हैं। कर देते कम होते हैं। प्रत्येक नसु, सपंद,नन्हो देखो जा सकता हैं। यंह राप आरतेमें अधिक देखा जाता हैं।
३.नाक सुर-नासुर (Lachryma abscess and Fistula) कारण
ईचन्ह—आंखके देानें पेपंचेके नाककि ओरफे दानेंमेंं छिद्र हे तो हैं। उघ छिद्रपे नाकको और रस आता हैं वस रास्तक द्वारा आंखका चमाभारिक पानी
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नाकमें जाकर मष्ठों कर ख्वासेच्छुग्रा के साथ उड़ जाता है। इस रोंप्ते में प्रतिष व होनेमे आँखे कोनेमे पानी माल पर बढ़ते है। कमो व नलो पडनेसे पद मिलता है। इसे कोनेमे छेट्रो फुन्सो होकर व रवार फुटती है और पद निकलती है।
४ षांजनो—(Sty) कारण चिन्ह आँखो पांपनेोंपर छेट्रो फुन्सो होकर पदतो है इस कारण उषर जगह घोटा रद हेता है। यह रमो एक पापड़ पर कमो टेनेो पापण पर हेती है। इसे षांजणी अथवा अंजनन मिला कहते है।
' षांलक कफा—(Foreign body in the eye) (आँलमे वदारको रे वस्तु गिरना)
कारण चिन्ह आँखमे घूल रेतोफे कण या टोटा या दिसीो घातुको कण आंमन गिरता हु तत आँलडे पानी वहता है। पांपने पटपटाने अथवा पानी षेरकनेे कफिाये वधा वद्द वस्तु निकल आती हैं टेदिन वद्दु कृणम दलमे सथवा रपेद्द टेले वे गुम रद्द हे वे नही निकलती पापणमे वुस पडे। वे पेपदेे टरट हर निठाल देना। परं च रोलेमें घुस गया हे वे निठालनेमे यावधानी रसना।
६ ल मदी नजऱ—दीर्घ दष्टो (Long Sight) कारण चिन्ह इष्टसे आँलकेो दूर्द परतु रपष्ट देखती हे टेदिन नजोकदी वस्तु नदी दीदती। इसे दीर्घ दष्ट कहते है।
७ टूंककी नजऱ हमच दष्टो (Short Sight) इस दष्टिवालो आँखसे नजीकको वेटा रेष्टि रेष्टती है। रेष्टने पटनेम ततलोफ नद्दो हेती। टेकिन दूर्का वस्तु या मत्तुप स्पष्ट नदी देष्टती।
८ चष्मे हपारनेे दष्टि देषि—तेरेोणो आँख नजीकको दोनमे आकरा तक देस सकती हैं टेदिन बहुत लिखने पढ़नेकी आदतसे सुधा घी दूषमथर नही
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मिलनेसे आंखे सम्हलेजार होजाती है। तम लिसलने पढ़नेसे विरमें बद्दो हेवा है चफर आता है और हृदय मे मी कवजेरी मालप होता है। कर्दे कारणोंमे आंखके मोतरेके तंतुग्रो कमजोर होनेमे मी आंनल निमंल हेतो है और पढ़ने पेखनेमें सांख लगती है।
९ आंखकी सूजनबुद्देने पेावचां सूज जाते है और देने लालघुम श्रा जाते है। सारी और मगरजी गरमीसे जमाल नेज्ञा जोडो चोंजके स्पशमें रहरोजो दवाई के भावसे चेष्ट लानेसे आवे पर मुरन हेता है।
१० रतोन्ध्यापन नष्टतांघ्य— इस रोगेे दिनमे अंधळ तरद देखता है ठेकिन रातकेा बिलकुल नहा दिसता। रातके प्रकाश या अंधेरे मादि मालप हेता है।
सुखावर्ती वति'—निंपलां के बील, मिस्कीत मि'ठ, पीपरल काली मिरच, सैंध'नेान, शंखकर, सघुफेन रखोते वायविडंग, मनकेल कुंकुट'डका कवंच समय समभाग ठेकर कुच कर मर्दोन कर स्पपडान करना। पोछे तांजे अथवा कौसोक धरतनमे ठालकर पानोसे मर्दोन पेट दर वति करना और छाया मे सुखना। पान'से घोट कर सेते वह्न अंजन करना। हसके रुपयोंमे वेल (Pterygium) घोटा कर आंनल घाफ हेता है।
नागाजुंनी घटि'— वहो हरद छाल बहिडाकी छ ल आंवळां मेठ पीपल क लो पिरच से धानेंन मुरेढ़ो मूल पकाया हुना। नोलां थे था रखोत प्रपौडरोक वां विड म ठेआप्र तांवेढ़ा काट सम समभाग ठेठर घोट कपडछान कर पानीसे वति' वनाना। तंहाेडियां, स्फेल पटल, भांयी हुये आंख इत्यादि में पानीसे या गौभूअनमे या ढाकरे फुलके पानीसे घोट कर अंजन करना।
नयनामृतांजन—सीस (Lead) तां १० मे विचालकर लघमे पारा सेला १० ठालकर ठंधा करना पीछे उसे घोट कर लघमे शुद्ध किया हुवा कांन सुरमा दिसाकर मर्दोन अंजन जोसा हे नेके पंंछे उसमें लहई तांरा मेंमसेनी कपूर मिलाकर श्रीषीमे भरना। तिमिर पटल काच अमं शुक अंजूंन आदि आंखके रेागें मे बहुता गुणकरी है।
पुष्पांजन—मेंहेडो कपूर तां १, ईलायची दाना रती २४, लौंग रती २४, नवचार रती ८, काली मिरच रती ८ सबके फुलाब वलमे घोटअर ठेबान के फुलकी तरह फुल पाटना। पोछे उच फुलके घोट कर भंजन कामा कुष्ठ मे लंकां दोह, रोह, सौंखन मिटती है।
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मुस्तिफांजन—छे टी पीपल हरड़, महीलोएश फिटकिरी, लोध, लोधेका काट सेंधानोन नमभाग बारीक कर मांगराक रसमें 'दे' दिन तक घोट कर वत्तिं' वनाना । हनेशां पानोमें घोेष कर अंजन करनेसे मोतियॉं बिनमें फायदो होता हैं । लोंक फूला खुजली वेस घावला मे लाभ हेता है ।
लेध पदलो—लेध अनारको छाल डेढ डेढ तोला टेकर बहो'के पानीमें पोप कर खुलदो वनाना, कपड़ेमे पेटली बांधकर आं'खपर वद्द पेटली बांधनो रातभर रक्खना उष्ण प्रकार पद्रह दिन करनेसे फूला कटता है ।
फूला'को सामान्य उपचार—
१ साबरकके पुठो पानीमें घोेष कर आंजनो ।
२ सनेवरमर पानीमें घोेष कर आं'पन करना ।
३ चपूर और शंखकर समभाग छो'ड़के वरतनमें घोटकर रखनो ।
४ समुद्रफेनादि वत्तिं मोमपेती चपूर माखा ४ फनक वोज, सोंठ, काजो मिरच, पीलीमुल समुंद्रफोन प्रत्येक एक एक तोला सं'फे' महीन -कर उसमें चमेलीके फूल देखों पोस कर महीन कर ननिं वनाना । घोेष कर अंजन करते रहनेसे फूला' कटना है ।
५ कंडुइ हुड फिटकरी वेस । और घं'के दिये'से वनाइ हुईं मसी वेस । १० मे मिलाकर तांदे'के वरतनमें डालकर कों'के कटोरेसे तोन दिन तक घोटते रहना हनेशा ८ मे १० घंटा तक घोटना। पोछे अस्तकी दि'वसमें सरना । अव'गुंलिखे अंजन करना । भांखेकी खुजली आयी हुये आंस, छाया, फूलो इत्यादिमें फायदो होता है ।
६ इं'गुदीका (इंगोदिया) वेस गमे अव'गुलिखे आंजन रहनसे फूला कटता है ।
७ इंगोरियाके बी को' मातरि शालक्खा चौरा पारीष पीपल के घोजको गिरो समान भाग लेकर महीन कर वदरी'के दूधमे चार प्रहार तक घोट कर पीछे बतो'या गोलो वनाना । पानीमें घोेष कर अंजन करनेसे फूला कटता हैं ।
८ गंधेको डाढ मड़हेन पो'कर लो'के दूधमे मिलाकर अंजन करना अयवा लो'के दूधसे, पथपर पर घो'कर अंजन करना फूला' कटता है ।
९ इमली (चिंचा) के बीज, कापूसफे'का मूल और गंधेका बां'त प्रत्येक अलग अलग महीन करे समभाग मिलाकर पानीमें वं'ता 'वनाना । पीछे पानीमें घो'ष कर अंजन वन'ना । फूला कटे ।
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- नीम थोथा भौैर साठो पामोल समभाग पोषकर दूधो के दूर से तेन घटा घेष्ट कर वत्ती वनाना। पीछे पानिमे' घोष्ट कर अंजन करना। फूला मिटे क
99 कालो मिरच अफीम भौर कपूर समभाग घोटकर महीने करना पीछे इमलो (विच्चा) के पांचके रसमें घोट कर वत्ती वनाना। पानीमे' घ घोट कर अंजन करनफूला मिटे
92 गंधेको नस्य जलाकर महीने कर वहीमें मिलकर धोसी वनाना। फूलीमें अंजन करना।
93 कांगके जलाकर महीने करना पीछे तीन चार गती आसमे ढल सरसे जाना। हपेरे मनुष्यके भौर पशुके मी फूला मिटता है
94 तिमिर हरी वत्ती तिलके तेलमें पदाया हुंआ घेड़ेका वाज तो। २, तिरके तेलमें परहाया खुजुरके बीज तो। १, दारु हलदिया। मफेद सुरमा, अफीम, हरड़की छालं, हे'टा हरड, (हिमेज) भेलची दाना, लवं। चीनी हपाला रपौत पदायो हुयो फिटकरों और दाककर प्रत्येक दै। तेला सम महीने पीसकर नीमके रसमें कौसोंफे भरतनेरे कालीके हरेतनेरे दो दिन तक फेंटने रहने। ह
सक्ख जाने पर तुलसीके पत्तेके रसषे वत्ती वनाना। छायामें सुरयाना। पानीमें घ पंकर अंजन करनेसे छाला फूला तिमिर मिटे।
95 भरणोके परतेका रस अंजन करनेसे पोतलाका फुंन मिटे।
96 उटसो राढ पानोमें घोष्ट कर अंजन करनेसे छाया फूला न्दिर मिटे
97 गदेधा दांत मेंड़ शोमाका शिग-सावरसि ग दानेो वारिक मह न मोपष झके दूधस वनि वनाना हो के दूषमे घोष्ट कर अंजन करनेसे फुला कटे
98 युनानी कवाध-- उशाने खुदुषा, गुडे वनफशाह, हरडका दल घोटी हरड (हिमेज) गुडे खेड, काशानी प्रत्येक साढे सात स ढे सात तेला, उनाव दाना
905, कालो द्राक्ष साफ की हुर्द तो 99 आंकर तो, ३० सम साथ कूटकर घममागसे 95 पुडिया वनाना। हरेपां 9 पुडंके कवाध पिलाना भौर उपर मही हरडका सुरदना हरद न 9 खिलाना, नजला मेंतिया मिटे।
99 सिरौजी मु जाका मूल बदरीके दूषसे घोष्ट कर अंजन करनेसे मोतियामिटे।
20 ता खनाभि पानीमें घोष्ट कर अंजन करनेसे तिमिर पड़ल मोतिया मिटे।
21 मोमके मूलकड़ी छाल छाया मे सुखाकर महीने कूट कर घेड़े के विष्टाब में वत्ती वनाना। हरेपां घोड़े के विष्टाब मे घोस कर अंजन करनेके पटल मिटे।
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२३ कचू-घृतपुष्टी है पानकेी चाठो चावलके सोपामण में पोस कर रस निकालना और हंर्दां नकमे १५-२० सुंद धीरे धीरे डालना । २१ दिन तक मालनेपे पटल मिटे ।
२३ लत्ताभूत लेप--छैह मासम जामूनके रसमें पड़ायी हुइ, हरड़ं, बहेरां आंवळां मुलेठी मुख, प्रक्षाल पित्ती, युसार भृङ्ग समूल सम भाग लेकर तिल्व करनां । तीनमे छ रत्तो देई समप माहुर और धोके साथ टेकर ऊपर दूध पिलानां । इमपे तमतरां (Glaucoma) और आंखके दूषरे बहुत रोग मिटते है ।
२४ लेप --आंम्रियादलकी (आमलरिद्रा)! मेढां'गी, काकड़'आंरगे, रघौत समपमाण टेकर कुल कर रखनां । वचरी के मुळ मे धोय कर येईल नाम' करकै आंवलके वाहरके मार्ण में घौर स्वलाट मे लेप करना । इवसै आँखरवा मे फायदां हेता हैं ।
२५ तेवतरकी लकड़ोफा पकरीके मूत्र में चन्दनको तरह घोय कर अंजन कानेपे परवाळां झोल मिलते ।
२६ देसी काले काढ़े अथवा कपूंर काचली अथवा अभ्रकां हल्दी पथवा मेरवरसिग घोय कर आंजनो के वपर लगानेपे दस दिनमे मिट जाती है ।
०२७ नयनञ्चन्द्र लेह--छैह मासम तोल ६, अभ्रकं मासम तोल ३, छोटी पेपल, क लू मिरच, हरड़, बहेरां, आंवळां छः हसि गों (ककंरख्रा³) कचूरां, रास्ता, माक्ष समलकंद, शतावर्री, विदारीकंद, मुलेठीमूल, केशर, छोटी कटहरो मूल, छेठ प्रत्यैक चार चार तोलां लेकर कूट कर महौन कर देनो। मदमेंं मिलाकर त्रिफलांके काथको और मोंगराके रसको एक एक मावनां देनां । आँखयामेंं सूजनां । घेईट कर रखनां । माक ३ से ६ रत्ती मादर और घोय टेकर ऊपर दूध पोवे । आंखकां तेज बधे और दृं'की दृष्टि मिटे ।
२८ अरिष्टेके (रीठा-अरिष्टक)के फलको छालदेी महीन कर के छूषमेंं मिलाकर अंजन करनेपे रतौंधापन मिटे ।
२९ आंवळे के बीजको गोरी और बहेरां के बीजको मीरी सममाण टेकर महीन कर सेहते वसहत पेढ़ गेा रत्तो भरण को तरह आँखमे डालनां । रत्तो था में फायदां हेता है ।
३० गायका खीरा (चमाइ हुड गायका प्रक्षवके समयका दूध देया जाता हे मरे) रत्तल ३ में टोकर तांई ५ ढोलकर पिलानां । इमरेां मधुर क्षैर राती रो दफे पिलानां । रतौंधा मिटे ।
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३१ शाकर और घमुत्रफेण समभाग लेकर महीन कर मरणकी तरह तोल वार रदौं राखमे' ढालनी घात दिन में रतोंवा मिटे।
३२ जंयापीतां-पुत्रजीवक कायफल, ढाककी झड, वीरज फलका गभं, समूर्छ फेनका गभं सह समभाग ठेकर महीन कूट कर कढ़खान कर रखना। रातकैरेतने घृतन संशोधन करनैसै रतौषा मिटे, फुला और परवाळा कटे।
३३ गावजवान (सोंपथरी) का भूल, पीस कर आंखके फेनैमें नासुर पर लगाना अथवा सांपकी छांछलौं (सरं फंचुको) की जड़ाकर लश्को राख नासुर पर दयानां। ४-७ दिन करनेमे' नासुर मिटता है।
३४ नासुरदर लेप- रमी मरतंकी तेल। ०॥, राल तैल। १॥, कच्पा, दिगुल, वैंदार, दिंदूर, कचची सुवर्णं माची'k, खपरिया और वैरजा प्रत्येक दै दै तैलां लेना। पड़ेहले प्रत्येक द्रव्य अलंघ घोट कर महीन का पोछे सह ताप मिलांनां कवार प'ठा के रसमे' मिलाकर नासुर पर लगानेसे नासुर मिटता है।
३५ शंख रसांजन- शोधा हुवा शंखा (LEAD) तेल। < हे। पिघालकर उसमें' पारा तैलां < तेला < फेर डालकर ठंडाकर पीतै महीन पीस कर उसमें काला सुरमा तैल। < पिसाकर दै दिन तक घोटना। पछेह उसमें जपतकां फुले अथवा मसम छेटो पीपल, मोगराका रस, शंखही नाम हरदी निर्भैलो घोल घोंसों हुवा च'ंदन, लाख, शाकर, मैनसील मसुरफेन चोनी ठवाला, इरायचो ताना, रसोत, पहेड़े के वीजलो गिरी, नमक, प्रत्येक आघा आघा तैलां और मो'मसैनी कपुर एक तैलां लेकर सब साथ महीन कर घोटकर शीशीमें भरना। आंख आई होय, आंखसे पानी गिरता, आंखका फफेर डेल्मा लाल होना, वातरला वेल तपेड़िया खोल, चांदा, श्वेतण मडलकी सुजन, फुला परवाला, झांख पड़ल और दूसरें आंखके रौग भ जन करनैसै अच्छा होतां है।
प्रदारमुत्रांतांजत हृद्रज—मेतो चूरा, काला सुरमा पारद, कपूर, अगर, कालीपिपच छोटी पोपल, सेठ, सैं धानेक। चोनीकवाळा, हलदी, मैनसों'k, शंखपामी, नीलाथोथा, कुंकुके इड़ांको फेरती। महेड़े के बीजको गोरी, कांस्ा भसम, य ग भसम, मथेक भसम, केसर, वही हरड़को छाल, मुटेठीमूल, राजामर जुईला फूल तुलसी के फूल, भसन वृक्षको छाल करज के वीज, नीमके पत्ते विरहारा (अदम ठक,कारान, नागरमेथ, नाईेका काट, लेहेक काट, कपूर सह साथ मिलांकर' महदेन कर तोंन दिन तक घोटते रहना। शहद के साथ अथवा आकेलां अथवा करनां। आंखके पुट रौगमें' अजन किया जाता है। हमेशां अजन करनेसे आंख नीरोगी रहती है।
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ममृत काजल--तिल के तेलको दियें घी ताड़लो मे मथ पादना डाला सुरमा मारोक घोटा घोटा ३ शनिमाय एक कर उसमे मायका घी नहर वितना मिलाय घोंटाकी थाली मे' डाल तावेके घेठटसे तीन दिन तक घोट पीछे घोंटो मे मर देना । इसकें भ'जन म गुलोसे किपा जाता है । आंखके सवं रोगोको लाभकारी हैं । बचचे मे आं जनेयसे आंखे तेजवो रहतीं है ।
ममोरा मुक्तांज्न--घींठा (नाम) तेला ५ केा पिंघाल कर उघमे पारे घोटा ४ डाल कर रांघाओत घी पेघना मदोन हेजने के पीछे उसमे घुद्ध काल! सुरमा घोटला १, ममोरा तेला ४, मुक्ता पिष्टो तेल २॥ प्रंवल पित्तो तो ४, कच्चो सुफण'मा'क्षिक, महिन पीवो इरि तेल ४, घुद्ध, घसुद्रफेन गम' तेल ५, यशद मसम तेल ६, शतनालां तेल ७, ईल यचीदाना तेल ९, चीनीदवाला तेल १, शेषानेोन तेला ०॥ घृत साथ कूट महोन पोवकर फैली कें स्थमधाँ रस, गुनरावजल, नीमके, पत्तेका रस नित्युक्त रस हुमले के पान कारण द्रवेयकी ९६ एघ भावना तेलो सुख्त बनाने पर मोममेनी कपूत तेला ॥ मिलाकर घोटकर रखना आहलके घबरोग मे म भन किया जाता है हेमेशां म भन क'नेसे आंखकी रौशानो बढती है चघमा अनेकका नंयर कम होता जालो है ।
घरघंदु तेल-- एरण्डका मूल मगर शतावरी जीवती (खरेटोडी) कल रांनो शेषानेोन मांगल। कायबिंद म मूलौठी घेठ प्रत्येक धार चार तेला कूट कर उघमे काढ़े तिलकां तेल बकरीका दूध मांगाराका रस प्रतेक चार चार रतवाघोर तल डाल कर पकाना पानीका अंश जल जाय जम कपदछान कर रव घेउडना सेती वस्तु नाकमे छे छे बुब, डालनेसे आंखका तेज बढें, चघमा की नंवर कम हो, दांन के मेग मिटे एक साल तक डालनेसे घाल काल! हो, आहलके मूल प्रद हे।
नयनां मृत लेह--जामुनमें पद्मासी हूयी ठेठभरम तोला ३२, मूलेठी मूल छोटी पीपल वंशलेाचन प्रत्येक तेला चार, चार ओमला तेल ३२ गजकर तेला ३२, वदीहरड तेला ४, महेद्र तेला १६ घृत साध घेउटना । माज्ञा ५षे१२ रतो तक शांहद घृतसे देनेसे दिमाग आहलके रेगमे बढा काम हेाता है ।
मागाजु'नी मालावा धोवा (नाग) केा पोघालकर क्रिफलाके कवाथमें १०० वफे डुबाना पोछे उसकें तेल डु मनाना यहआंखमे फिरानेसे तेज बढता है आहलके 'वहतसे' रोग मिटते हैं ।
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मात्र गी वत्ती—मात्रामों दोला १६ दो वकरी के दूधमें घेंट सुखाना । मैनसोंल तोला ६, केशरमके दूधमें घेंट सुखाना । कालो मिरच तोला ४ कौ मोतके दूधसे घोट सुवाना । से घानोन तोला २ सहजना के पानके रसमें घोट सुखाना । पोछे सब चीजे साथ मिलाकर वकरीफे दूधमें घोट वत्ती करनां पानीमें घोस घंजन करनां । सुरमा जैसे पावडर रक्खा होवे। घर इसे अंजन करनां । आंखके बहुतसे रोगोंमे लाभ हेाता ।
नेत्ररोग हित मिश्रण १—ससामुन लोध तो। १, अमृतासरव तोला ३, मुक्तापिषि, ठर ०१, दिलाजित तोला १, सुवर्ण वसंत मालती तो। ०॥ सम वाथ मिलाय शोषीमें मरना । प्राप्तंकाल ३ से ६ रती शहद घृतसे देनेसे नेत्ररोग मस्तक राग हृदय रोगमें लाभ हेाता हैं ।
नेत्र देईगहर मिश्रण— २ प्रमान पिस्सी तोला २, हवणे मकक्षिक भस्म तोळा १, गौडिय़ं विष्णो तोळा ०१। मूलेहठी मूल तोला २ रव सायथ मिलाय ३ से ४ रती च्यवनप्रास जीवन के साथ देनेसे नेत्रके माजके हृदयके राग रक्षतां दार सम्लोचित रोगमे लाभ हेाता है ।
नेत्र रेाग हृद मिश्रण ३, मुक्तां पिस्सो तोला १, नीलप पिस्सो तो। ०॥, पुखराज पिस्सो तो। ०॥, वसामृत तो। २ क्रशाहर मोदरा पिस्सी तो। १ सुवर्ण भस्म तो। ०॥ सम वाथ मिलाकर घोटकर रखना प्रात कल ३ रत्ती मात्रामे आंख भवळेहुं १ से २ तोलाके साथ देना ।
उपर लिखे मिश्रण चनतां हो तव महा मुखांजन कृष्ण अथवा ममोरां मुखांजन अपवा नयनसुधा आंखमें आंजनते रहना ।
पळाशमूलाकं पलाश (ढाक-खाखरा) के मूलसे निकाला हुवा यह अर्क जल है इसमें आंखकेहेतल बीलकुल मधुर है । नितिका यंत्रसे खोचा हुवा जल रप यह है यह प्रातःकालमे १ चम्मच दूध के साथ लिजाती हैं और सेती रहते एक थेा कुंद आंखमे डाले जाते हैं या दलिए हुबोकर आंखमे फिराद्ह जाती है ।
स्वहिफेनादि लेप अर्कोम तोला २॥, बेदारार चीज तो। ३॥, केशर तो। १। परासयी फिटकरी तो ०१, सम साथ पीस सोगठी बनाना पानीमेंया निंबुरसमें घोचकर आंखफे रागमे वदार के आगमे लेप किया जाता है ।
वासादि कांट, वडिंबो चीज (गिळेआं दाइहलदी रसात चित्रक अतिचित्रा नीमको छाल कुटको हरस्र महेबा भाविला नागरमोथा हलहळी इन्द्रजो कुडेकी कांक रुद तीखुप विजयधर (भजमोधर) की छाल सब उम भाग लेहकर कुटकर रसमा
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७ मे २ तो चूर्ण मे ३ मे ३ कव (प्रायः ३० तोला) पानीमे भिगो रखना प्रातःकाल कपछान कर उसमे २ मे ४ तोला शहद मिलाकर दिनमें दो दफे पिलाना । अकेला अथवा नेत्ररोग पर दो जानेवाली किलों औषधके उपर भी पिलाया जाता है ।
हरिद्रा—योग—हल्दीको खड़ी गांठ निवूसे डालनी त्रिसुत्रा जाय लख मिलाकर दूधपरे निचूमें ड उना इस प्रकार तीन निचूमें टालनेके पीछे निचुमुख जानैपर हरदीको गांठ रखछैबना । आंख लाल है—आयो होतेप नीसे या शहद म घोंपकर अथ रन करना । आंखमे खुजली आती हो आंखक किन।री लाल हेर तो मांगता के रसमे घिसकर बांनना । आसमे झ'क है कम दिखाता हो वे झोके दूर (घ रણ) मे घोंब आंजन। । पटलमे ढाक्के मूँगे अर्कने चित्र भांन। रवोंघा (नक्ताद्य) मे गम जलसे घिसकर आंजन। । आलेमे परवाला खील तपै दिय—पक्षम कुंड़वीपमे सुमनवा मूँगे रसमे घिसकर आंजन। ।
कपूर—पुष्टपांजन कपूर तोला १ और छोटी पीपल पीवरीमूल हलायचोदाना चोनोंकपाला मूलठी मूल प्रभेक साढा आना तोला लेकर पको महीन पीसलभो थाल मे धोचमे रखकर उपर कॉपीक ९॥ कटेरा ढक कर गेघुंके घाटे से—हि मंघ करना । पहिले पोतलको घालो मे क'सौकी कटे राखो पेक किया है डक जप । इतनी रेनी टालना पोछे गौया जलाना पोछे इँट६ जुला बनाकर उसपर पंतलकी थाली रखकर नीचे तिलके तेलक दीवा जमानां दीवाली शिखा थालो के तहरू परलेगे इस प्रकार दीवा जलाना । २। तोला तेल जल जाय जप र॥ग जोत होनेर समाल कर रेती निकॅल देना मोर काछोके कटेराके गेहुका भ'ट। लगाया है वह समाल कर निकाल देना पोछे कटोरा पर लगा हुवा फूल ले लेन। यह अंजन करने से मान विर्शात वगे राम फूला परपोला खील कुन्डोयां आदि मिटेटे है ।
सिद्धांजन—मा सलाखो मैनषील · शुर्ती खापरिया (शुर्ती खपंर) थे'धानोन घेरेहा शांत ह्मायचोदाना सुराखार कपूर मोमछेनी कपूर जिनेकशाला लत्र म छोटी पोपल निपरीमूल पकायी किटकरी पकाया नोलायोधा ले'प्र क'लोपरच अगे'लोयाक जोम जोरश चोमैड हलदी छोटी हरड बडीहरड निमंलीका नोज प्रयेउ एक एक तोला सुमा २ तोला मोर सरषे के तेलकी मथी कानल १ तोला यबरराय चोट कंर तामे—ताम्र के बने थालमे टाल उरमे भरणीठा रख डाल कर तामे के चोहेसे घोटना महीने हो काब ज वती येँ शोगठो करना पान्निमे घोट अंजन करना आंखके सव रोगमे दसम लभ होता है ।
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चोरया जपन' सुमनो व(ताला म'न कुञो तुर! पञ नो' मि' (तजो & और हरेता भञ्जन करने'े लाने तेमनो र(तो है । परेमो के देस न! सांप्र देष प्रहार पाउन। हरुओ नतोल। पाछ कर माछ के पूप नो सिंत) पर पुष्ट न! पीछे उव धनी से परधों है तेमनो दिवा र(नय कामन न'कर! वच थाज्ञ इस भञ्जन मे श(लना ।
कृपणास्प चवरासंव फतकारकतु म'ग्नं ।। रसक्रियेयर्मातावंधानां दुर्नंवम्वा।। वारभट् ।।
भृङ्गवसांजन--४ घनानो, और जिन्मो के मीत्त पीत पीत वे.प! देखर बहुत महीन पीस मिलान! श(लवके सुरमें १० दंष काटकर पीचे पे म(नरे संखकी शरमी लेन! । गोला पर:नर घो'ंडेके परने रपेट पर, मुझमें fतार कर पीस उथवर रफेद विद्र्रो पेठ देन मेोटी रपेट कर सुरमाी पीत र(मे एक एक मरे fतसे रन्न चनत नीचे रेती राल ढं ढ देन! । पीछे जुल्देर नहराइ अभि नयाना नव घंटा मातिन रेोार स्वागशीत रेने देन! । पीचे मिट्टी पत्थे निकाल कर शं'खदा ने'म सेमालदर पीस कर घाजर घोट कर रसवन! । श(हरत लगे वेो कुठ परेोंी नरदी ओर मितगह्ट घांजन जौषा यनानेन! । गर अग्नीसेए अ'जन करने'े मोनके म(रेगो मिग्घे है । और वारभट के अनुवाद मांधेरे। दार्द मिलती है । निभू'म भस्मपर टोो मार रती काजल रालकर उपर धुवा देने'े मी काम हेता है ।
सर्पोंसम--शाला शाव तुने मरा हुआ लेकर जवके मुनाछे १० थे ११ ईंच काटकर फे'क देन! । नाको के घावका दृष्टिाकाल पेठ मिलीक मट'दी मे उ तनत और उसमें गायका घो'ो ले। १ चालकर म(र्यो का सुमल रपषक मिटीक हर व द कर गाज पुष्टकी अभि येन! । पीचे निकाल मटकीने महम यन! दे वत १ घोल! देन! । उमसे नीलाथे:य १ तैल! कच्ची शु(र्ण मादिक १ तैल! और साभरीशा १ घोल! मतीन पीसकर मिलान! मो- दिनभर घोटकर अधिक मदिन करना हैसमें षे १ पंष तील बीदन! आंखमे आंजन! । आंम्रके अंध:पन मिटता है (पुरनी वहे'मेे)
माक्षिकांजन वतां--कच्ची सुवर्ण माक्षिक कालो विरच पीस से'ठ निमंलो'ीचीन लापंर कुछ चमु(द फेन काल! चुःप, चायविंदुंग शपकर प्रत्येक एक एक सोल! रेघर महीन कर मकरीक! युष तैल! ४ मे घोटन! दूध सुथजाय अन हर्तों गा लेगुठी यनान! । पानी मे घो'स भञ्जन करनेसेए तिमि पटल शुजली स्तील परवाळा मिटे ।
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मट्ठांजन -एक तामेक़ा वट़ा ठेटा ढेर उष्मे पानी ढेर १॥ और जायका घो घेर १॥ ढाल कर मुख में षकर कपड़ मिलेती कर जमीन में एक खड्ढा खुदव कर उष्मे रख्ख उपर 'मिट्टी दावनी जमीन मे उषे गाढ़ना ।
मात्रीष'ड्क १४ पूरैषमा से ढेकर डयेष्ट चुक १४ पूरैंपमा तक जमोन में रखना पीढ़े उष्मे थे घो 'निदाल कर प्रीश'मे मर 'खवना सलाइ से घं जन करने से छाया पडन तिमिर और वाधे! हे अन्य रोगो मे लाभ हेाता है ।
सहँदुग्ध प्रयेष्ट--आक का दुध पाषे १० नखेआ पर और हाथ के के १. महोपर उरना नख के मूल से जड़ पवढ़ा के पाषे नख गृह हेाता चहासे चारे नख पर लगाना ३ दिन रषनेसे आपी हुड़ आँख मिटती हैं ।
प्रकोर्ण प्रदेष्टम
१ वटो हरड़हो गुरली निकाल कर १० तोला रावकर ५० तोला देनेआ । केआ पीप मकरीके डुष्मे घोट कर एवं एक तोल्मकी सेगठी वनाना पानीमे घोघ कर स्वल करनेमे मोती हित मेतियां यतता हे तो स्वरुक ज्ञाता है आया हे! वह विटल ज्ञाता है ।
२ स्वपरिया तो १, सेराख र तो १ साथ तीन दिन तक घोंटना पीढ़े उष्मे' उपूर तो। एवं तथा हस्तूगे रती १२ मिलाकर घेओटकर रखे । अ जन करनेसे छाया पडन 'निमिर खुशबो मिटे ।
३ निल्लैय पुराना चाहर से घानेात प्रत्येक वे १ मिलाकर मदोन चर घोकोमे सर रखना । अ जन करनेसे छाया छारी मिटे।
४ आँकके दुधमे बइकी वत्ती मिलेो कर सूञाना । पीढ़े उष्म घत्तोघो सरसेंके तेल्मे डालकर स्वामल पाहना । उस कासलके मायके 'घोमे मिलाकर अ जन करनेसे आँखके बहुवसे रोग मिटते हैं ।
५. मच कुष्ठ शाखनाभि देखदेखे डोल्की गोरी छोटी पोपल प्रत्येक आवा आभा तोल्का, कालीमिरच तो। ०१ दे दिन तक मकरीके डुष्मे घोट कर सेगठी वनाना । पानीमे घोघ कर स्वल करनेसे पहल, झोके दूषमे घं'सकर अ जन करनेसे ख मली, मायके दृश्षमे' घोघ कर ल चन करनेसे आँखके बहुतसे रोग मिटते हैं! ।
६ पारेआं (पारावत) की चरफ और छोट स्रममापमे' पौष कर अ जन करनेसे छाया और पडन मिटे ।
७ घनियाँ छोट प्रत्येक चार चार तोला । नेहू का सतष ८० तोला । फेर ८० तोला, सव वीजें' मिलाकर मे तीन तोला मिलानेसे भाल्का तिमिर रोग मिटे और तेज वढे ।
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नासा रोग-नाकके रोग
कारण—बहुत पानी पीनेसे, धूल स्वाथमें जानेसे बहुत माघण बहुत निद्रा बहुत जागरण करनेसे बहुत पानीमें न्हाना इत्यादि कारणोसे, वमन तथा अशुद्ध वेग रोकनेसे, धूपरे कच कारणोसे नाकके रोग होते है ।
लिङ्ग—गारीसे जीर्ण ज्वर रहता हो ऐसा लुप्ति हे । मस्तक भारी हो जाता है । मस्तकमें, ललाटमें, गालमें वारीक दर्द होता है । उसके ऊपर कपडा रखनेसे या दबानेसे अच्छा लगता है । नाकसे या मुख पानी गिरता है । नाकसे श्वासोच्छ्वास टेना कठिन होता है । दसंत कव्ज रहता है । भूत कप लगती है ।
पथ्यापथ्य—एक सप्ताहमे एक मे दफे जुलाव लेना । भून भचछो बगे यथ मोजन करना । कपडा पहिन रखना । ठंडे पानीम न्हाना नही । प्रवाही पदार्थो कम खाना । दूधभात खोचडो दूध भैसा लघु खुराक लेना । रोग पोस कर गरम कर ललाट पर लगाना । कान पर कपडा बांध रखना । शरीर पर पवन न लगे यह ध्यान रखना । चना और कुलथीका ओसाणन लेना । भदरकष लघुन प्याज सेठ काली मिर्च आदि मसाला खुलाकमे ठेना । इस रोगवाले पवन न. भावे ऐे स्थानमें रखना और मस्तकपर गर्म और वजनदार कपडा बांधना शरीर पर लेपारा (टेपारी) अभया गरशेंक तेल दिनमे दो दफे मालिश करना ।
पीनस-प्रतिशyay
कारण—बहुत केफारसे, वर्षाका ताजा पनीमे, अविश न्हानेसे, वर्षाकृतुमे खुल्ले हवामे ठेनेसे, मेघवाली और शीतमेंट बिछाई जमोनमे सेनेसे, मद्यमदका वेग रोकनेसे अधीक बोलना, कोोध जागरण, अतिनिद्रा स्वादि कारणोसे यह वरद होता हे ।
लिङ्ग—वात प्रघान पीनसमें घ्रिर भारी रहता है, जकड जाता है, शालस्य भाती है, रोमांच होता है, श्वासोच्छास व घ हो जाता है मला थोर मोष्ट सूखता है मस्तकमें लमणोमें पीडा होती है, स्वर बैठ जाता हैं । वित्तप्रघानमें पीला स्वाव होता है, । मुख्य दुरंल और पाछश्रवण होता है । शरीर और मस्तक गाम रहता है नाकसे जलन और मुंहा निकलता है । ऐसा माघ होता है । कप-वातदो प्रघान ददमें ठंडा स्फेट छीकना स्वाव होता है, आंखे सूख जाती है, मुख तालु और मस्तकमे खुश्की आती है । त्रिदोषज दरमें तीनों दोषोका न्यूनाधिक चिह्न मालूम होते है ।
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पीनस-पुराना सठ्ठपममें खांप कष्टसे लिया जाता है। नाक सुखनां है। जुकाम जौषा निबलन्त्रा हे। अच्छे दूरी गंघ नहीं' जान शकतां और प्रतिश्याय जैसे चिह मद्दम पडते है।
चिह गादि नस्य—चायविडंग धे धानोन, हिंग, सुगळ, मनःशिल और वच (वचां) धमभाग कुटकर कपडछान कर रखना। तीन चार दिन सुंघनेसे आराम होता हे।
पीनसन हर नस्य-छीकनी (सुंघमेकीतम!कु) ते २०, छोटी पीपल, सहजानादेमीग्र जायनिह ग प्रत्येक ते। १०, कालोमिरच वे २॥ सससाथ कुटकर कपडछान कर रखना और पुराना और नया पीनस प्रतिश्याथमें सुंधाना।
चि॥घंटावटी-पारद ने १०, गांचक ते १०, तांबमस्म, ठेहमस्सम, शंखमस्म अश्रकपस्म, पकड़या हुवा ट रकण, कालोमिरच, सेंठ पीपल, नवं, रास्निनी, प्रत्येक पांच पांच तोला, भजवाइन भसमेाद, हल्दी, धे धानोन, प्रत्येक ४, घह साथ मिलाकर फेरदीनोफे रखकी और भदरसकके रखकी एक एक भावना देवक' पुंजा! जोधी रोली मिलाना। मात्रा २ से ५ रेतीने गुन' पानीफे साथ अववा तुलसीके पानके साथ देना।
चिप्र कह रितकी—चि॥श्रक रतल २०, छोटी॥पटहरी प चांग, अरणी प चांग, आंघो पचांग, और कटटरीके फूल प्रत्येक दशा दश रतल, बड़ी हरड रतल १०, धर्यानाशो (दरणंखोरी) का पंच्चांग रतल २॥, नागरमोथा पान रतल २, वच साथ कूटकर सवसे १६ गुना पानी हाल पकाना। चतु यांश रहने पर उतार कर कपडछान कर रखना और हरडके भलग कर मुसाकर वोज निकालकर उसका चूर्ण' वनाना। और फ्वाथमें हरडका चूर्ण' डालना। और सेंठ पीपल काली मिरच, शालच्चोनी, स्वगं, व शलेष्टन, चायविडंग, महिदाछाल अवावार भसमोेद भजवाइन हलदी मामहरिद्रा पाढा धेंधानोन गजपीपळ आंघोके पान प्रत्येक ते ४०, टेकर कुटकर ढालासे छानकर वसायमें डालना। और अभ्रक मस्म वससे' गुड रतल २०० डालकर पकाना। मात्रा देसे चार ते तेला दो जांतो है। उपर गरम दूध पीना। प्रतिश्याय पीनस नाकके अन्य रोग, क्षय कफ नाभि हांदी हृदयं रोग, पेटके जन्तु आदिमें गुणवारी है।
कलिंगादि नस्य—इन्द्रजव, हिंग, काली मिरच, बैरको लाख, कायफल, कुठ, वच, वच पननेफे बीज, चायविडंग धव समभाग टेकर महीन कुट कपडछान करे वारांबकी तरह सुंघना।
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पीपरहर विश्रण--१ रसवपंटो तोला. ०१, ताम्रमस्सी तो. ०११, नागकेशर वपंटो तो. ०१, चौंठपोपरे पोपर तो. ०२, घाबरधिंयां महम तो. ०१ यह याथ पीपल चार से छ रत्ती सुबह और शामको चित्रक हरीड़को के पास देना ।
पीपरहर मिश्रण--२ सुवण' वसंत मालती तोला. ०१, मुलहठी विड़ी तो. ०१, भमिन रस तो. ०१, घुघिंत महम तो. ०१, चौंठ तो. ०१, यथ पान घोटकर रवनाः ४ से ५ रत्ती सुबह और शामको स्वच्छ भल्लातक भस्मेह के साथ देना ।
प्रयेग--१ सर्षपस्वर तो. ०१ अथिनपर घीमें भोंचषे हच्चेपक्षे पकाना । हमेशां याधाषे एकू तोला तक सिलानेषे प्रतिदिनाय मिटता है ।
२. केशर छोटी पोपल घेठ समभाग कूट करना । उसमें से ३-४ रत्ती ठंडर गुलकषा पानी मिलाकार नाकमें पांच दश हूंद डालमेषे नाकके यदुतसे वेग मिटते हैं ।
३ नघशार और कलिहुना सममाग ठेहर एक घोषोमे' घालकर उसमें पानी डालना और मचूत घूण दे रखना । स्वापियक्ता हो जल सुंघना ।
४ कुष्ठ घोला १, कूट कर वषमें १५ तोला पीपलका जरदा मिलाकर योड़ी वनाना । पोछे वह घीड़ी पिलाना ।
५ वरण-घायवरणाकी छालका यत्राय पिलाना ।
६ फायफल काकड़सिंगी पुष्करमूल घेठ पोपर कालीमिर्च घमावषा कालीजीरी सवकषा कूट कर १ तोलका यत्राय पिलाना ।
पीनस हर धूप--शुद्ध हिंगल तो. ०१, काली मिर्च तो. ०१, नाईक कर महीन पीस शाकषे दूषमें घोट कर महीन पीस दश दपष इच्के कपड़ेकषे ढक्कड़े पर रखपेट कर सूखाना । नीछे उसकी बतोकषा अगनोमे' जलाकर नाकमें लश्का धुवा देना इष प्रकार एक दिनमें चार पांच दफे देना । एक वती ४ दिन तक पहुंचाना ।
मरिच्चादि घट्टी--काली मिर्च', चित्रक, हरड़, जीरा चीनकचाळा, पीपली मूल कनकवीज, तजखोर, कथमा, अनारकी छाल घेठ वष समभागषे ठेकर कूट कर हपदछान कर गुथमे एक माषाकी गोली वनाना । दिनमें दोषे चार गोली गरम पानीषे लेनेषे पीनस मिटे । नाकषे गिरता हष्मा पानो मीटे ।
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रटनपपंड़ी—पारद तो. १०, गंधक तो. २०, प्रक्षाल पिष्टी, मुक्ताविधि, शुक्तिक विधि, गौमेद, वैक्रान्त, अन्नभ्रक मरकत प्रत्येक तोला पांच लेकर रपंड़ीको तरह पकाकर ढालना, पीसकर उसे घोटकर पतूरेके पानकका रस, सहजनेकी रस, चित्रकमूलका रस और अदारसका रस प्रत्येकको एक एक भावना देकर सुफेद बरण रखना। नाकों २ से ४ रत्ती शहदके साथ देने से रागम, क्षयादिके रागम क्षांसी स्थाप यंप्रहणी प्रदर प्रमेह आदि रोगोंमें गुणकारी है।
मासारोग हरी पठी—पारद गंधक अन्नभ्रक भस्म, विधायरी अक्कलकरा चोपचीनी दृधिया मञ्ज, चित्रकमूलको छाल, इलायची तज लवंग, सोंठ पोपर मती दायकल पुष्टकरमूल, जवासा, घन घनमाथा लेकर कूट कर दुल्हों रस और मदरस्ख रसखी देा देा भावना देकर देा रत्तीको गोली बनामा । वेा सेे चार गोली पानीषे अथवा चित्रक हरीतकी काथा कंटकारी अवलेहसे देना। मारकेे सम रोग, खांसी, वाय, स्वरभंगं, हृदयरोग, दमा आदि में बहुत फायदा होता है। पूतिनस्य, नाकमें पूं–दह, नाकका पाक, क्षौंक्र्ष इर्श, सुगंधके नहीं पहिचम्ना नाकका, दाह, वादका दू मन, नाकका नाश, न'रुका मया मोंहायुँद, नासुर, नाकसे रक्तस्राव आदि नाकके रोगोंमें, गुणकारी है।
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करणरोग कानके ददं
कारण—कानके यदरका मार्ग, अंदररचा मार्ग पवंड़ा आदिमें चस्म होकर पवंड़ा होती है। पशचात् वहता है, पूय निकलता है। और ऐेेे दूषरे मी ददं होते है। कानमें वीज कफंकर आदि घुष जानेते कन पकना है। वायु वा प्रकाप होनेा है। पोछे उसमें विता कफका वंधष होनेसे अनेक प्रकारके उपद्रव होते है। मस्तक पर चोट लगनेते, कानपर द्वाथरी यफाट (चोट) लगनेते, जलमें हृवको मारनेते, डुबकीमें णण होकर पकनेते पूय पशचात् और पानीका स्वाव होता है और अन्य मी रोग होता हैं।
कानका शूल—(वसका)—दारदीए मारिर-वर्पाअनृतुको हवासे, ठंडा पशचात् लानेते, ठंडा पानो कानमें जानेते, कानमें पचा होनेते, छानमें वदारको दोष चोेज जानेते कारमें पोड़ा होती है।
कत्याण तेल—लजुन, इंद्रायणके फल; मूलो(मूला), को सुसाकर को हुते राखि, सोफ सुवादोना, अंतेद्रव, हिंग, घीठ, वच् कुछ देरारो; सधिंव नेचो छाल, रंमोत, सवलकषार, जवाखार, घजोक्षार, सोहलवण, शे'धानोन, मो'लपत्रा, नमक्, नागरमोथ प्रथेक्, चार वार तेला लेेकर कूटकर यवमें हूवे इतना मलोके सघंभका रस और उतना हो गौमूत्र, हालकर और दफंरहे वारह रतल पानी और दश रतल सरसोका तेल और एक रतल निंबूका रस डालदर यवपेधे साथ पकाना। पानीका माग जल जस कपढ छानकर रस छेष्टना। कानमें डालनेते कानका शूल, दाव और अन्य ददं मिटता हैे।
प्रयोग १ घोडेका पम लोंदाछा रस तेला २० में सरसोका तेल थो. २.० जाल पानोका अंदा जल जाय जतन कपकछान करनां। जसनके शुल ददंमें कानमें डालनां।
प्रयोग २ आंके पोटे(गान) पर एरंड वैल लगाकर अमिपर गरं कर हावड़े मषल हर रस निकालना जरा गरं'कर कानमें डालनेते कानका शूल मिटता हैे।
प्रयोग ३ वच् और चिरायतां (करीयातु) वे घे तेला लेेकर पानीमें पोसकर १० ठेलां मरनेकां तेलमें पकाकर वह तेल कानमें डालना शूल मिटे।
प्र ८ वेक(त्रिषम)कामें गरं कर कानमें हालनेते कानका शूलपोड़ा मिटता हैे।
कान पवंड़ा कानसे पूय- पस निकलना
कारण—कोइ वस्तु कानपर लपानेते, कोतळा आदिको कमजोरोते वनाो'क नहुतकर यह ददं हे'ता है, वड़ेोके स्वचित हि होता हैं।
प्र १—चतयणि तेल अथवा ण्यासमित तेल कानमें डाकना और कान हमेधां साफ करनां।
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प्र २ रत्नकूट तोषाढ़ी ९ के गोमूत्रमें पोसकर २० तोला भरसोंके तेलमें 'पकाना । यह तेल वातमें श्रेष्ठ लाभ हेतु है ।
प्र ३ वंटकों पकलाके रहहूदी जलाकर मस्म कराना । पीछे कागप्रकों नलीष्ठे 'वर मस्म य में ५ रत्ती कूकर काने डालना ।
प्र ४ मकरोठ देवदार से घानकर हींग में इष्टि प्रत्येक सारिक तौर तोला देखर 'करके वृक्षमें पोष रखड़ो सेम कर उषमें भरचोंका तेल होला य० पलाना -पानोका अभि नक जाय कप रख छोडना । कानों डालनेके ढालका पाक पच 'भष्या देता है ।
कोतका मला—यह कभो आँखसे देखा जाता था इतना मलीन होता है और कभी अंदरके भागमें होनेसे दीसतां नहि । इसका मूल पतला गयवा मोटा होता है । सोंठ मोड़ा शल आादि पक बहना आदि चिन्ह होते है । इसेरे 'घहिरापान (पारदय)मो होता है । दल्माण वेल अभया कर्णामृत तेल अथवा पच-नतारायण तेल काजलमें हालना और रतन पपटी रत्ती कर्णरोग हरीतकी २ गोली साथ मिलाकर त्रिशकदरोगको १ से २ रत्तो चममच के साथ देना ।
कानमें इद्दारकी चोष खुज जाना—कानमें दही घीग श्रादि चीज कुंस जानेकी पोढा हेती है पोस्तकाढ़ीसे या अन्य जोंचन से निकालनेकी कोशिश करना फलेप्रत तेल महानारायण तेल श्रादि डालनां ।
कानमें नाद—आावाज (भनाकार) कानमें घोरली (दाहुसी) गजती है ऐसा और दूषरे प्रकारडा भावाज हुश्रा करता है । यह वात प्रकुपिते हेता है । महानारायन तेल, कणं मूल तेल देल्वाणं तेल श्रादि डालना और पारिवादि -नोली और धन'रेग हरीतकी शिरो रोंगधर मवलेह के साथ देना ।
वातरोग—घहिरापस्म—कासमें मेल भर जानेके पददू होनेसे, कई घीज वस्लियेर घहिरापन—कासमें भर जोंनेये, पंदा मोटा टोनेसे, पवनमे, पित्तरकरे रोगसे घारवी हददावस्या औरदोको -प्रसव कष्ट सुतिकों रेग, युच्चार ताप रोंगने लिये जिनवाइच अथर फधिनाइत्न मिथ्या
षघका आधिक उपयोगसे अथवा हार्तळका तम्रोंचा लगनेसे, सप कर दहा अनाव 'शुननेकी कमजोरीषे यह 'दर् होता है ।
विरय तेल—मोली(मिलबके पत्ते) रतन ९, अपामार्ग खार तेला ५ पाँच 'बदरीका दृधों शाला ५, चित्र मूल भरणी मूल हटी 'कटहरी मूल गोधड मूल अडूसे पान प्रत्येक आठ आठ तोला । पद हूध कर सम हप जाय ।
इंतना पानां। डालना और 'वरसोंकी अथवा तिलका तेल रतल धीं डालकर पकाना यनोका अंभ जल जाय । बल कपढखान करत-रखनी। कोतन होनेसे 'घहिरापान मिटता है ।
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दारिद्रंहर विश्वप—सुवर्ण वच′त मालती ढोला ०, रक्तपपंड़ी ढोना ०′, शतामृत पपंड़ी तोलः ०॥ अश्वगंध भसम तो. १, शाबर क्षीर भसम तो. ½, चीरटी पीपल तोला २ थन बाथ मोतकर रखना । प्रातःकाल ३ र॒ रती घौम′सस जुठी के साथ सथवा ममृत मळातक′स साथ देना । अभवा ३ से ७ रती रौंद′रसी लपववा मृगु हरितक॒ी १ से २ छोटी चम्मचसस लेवन करना ।
प्र १ एरंड पत्र लिखे′फे पान मूंगफे पान, सहंजने′फे पान ढाक′फे फूल प्रत्येक बीस बीस तोला लेकर तसमे सरसोंका अथवा तिलका तेल देना १२। ढालकर मकाना । सबपान कटक हेा जाय जल स्वांरशीत होने देना कपडछान कर रखना कानमें हमेशा सोती धरत येओला गरम करकै ढालना । बहिरापनमे लाभ होता है ।
प्र ५ निर्गु′ंडी पानका रस निचाक कर ५ से १० खु′द कानमें डालने′फे बहिरापन मिटता है ।
प्र ३ प्याजका रस तो. १०, पुदी′ना (फेदो′ना) का रस तो. १०, तिलका या परमेका तेल तोला ३०। ढालकर पानीका अंश जल झारम भया कपडछान कर रक्खना । कानमें ढालना । बहिरापन मिटे ।
प्र ४ उट (नर) के पित्ताका खु′द कानमें ढालने′से एक महिना′मे बहिरापन मिटे ।
कुमि′कर्ष—कानमें पड होने′से और घना होने′से बहुत पडता है । अगर पस्सो (पक्षि′का) दानमें विठने′से जंतु होता है जब मगजमें दर्द होता है । कानमें खुशबो आती है और कानमें मार जौखा लगता है ।
कृमि′कर्णादि तेल—कच्छुवा′री (छफेद वच्छनाग), छोट पोपर मची-, पायवि′शं, वच, तिलपर्णी′ प्रत्येक पांच पांच तोला। निर्गु′ंडी बो′का मूल जसवा बो′म १० तोला, शमार कुषलीका पान १० तोला शहके′ पानीमें पोस रखो गोवा भनाकर सरथेईका तेल तोला ४० साल कर पकाना । पानीका अंश जल झाक कान काममें ढालते रहने′से जंतु निसट आता है ।
प्र. १ नीमके पत्त′का रस तोला २०, वचीकटहरी′फे फल तोला २ मे′पल मर तसमें रिस′द्र्य तेल तोला ९। ढालकर पकाना । पामो′का अंधा जल र.य कब कपूर ढोटा ०। ढालना । यह तेल कानमें डालनें′फे कानमें कतु गुस्ट मया हेा पद निसट जाता है ।
प्र. २ शिं′दातरा एल्कि′या (जो क्वारपाठा′शे बनला है ) तोला ५ कें शमार मूसलीके पानके रसमें शे′ाकर तसमे शहदका तेल ढेर ३। ढालकर पकाना । पंछे मर्द सेव कानमें डालनें′से जंतु निसटता है ।
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प्र. ३ पूआक रस निकालकर कानमें डालनेसे कानमें घुसा हुवा मधु मिलता है।
प्र. ५ करेला (जो आँखके रुपमें खाया जाता है) उसके पानका रस कानमें डालनेसे वगै सजूरा आदि जंतु निकल जाता है।
कानमें ग्रन्थी
विल्व—जानमे किची वस्तुका घाव लगानेसे ग्रन्थी या गाठ होकर पकती है और लाल पीला खून युक्त स्राव निकलता है और शल दोषो पोड़ा होती है। पित्त प्रकोप हो तो व्रण और दाद होता है।
कर्णामृत तेल—केली के रस भका रस तो. ४०, नींहुका रस तो. ४०, गौमूत्र तो ४०, मुलैठी मूल तों. ८, दाखहल्दी तों. ६ अमलतासमूल महापञ्चमूलकी छाल, छोटी कटहलरीका मूल और फल, पञ्चयानाक्षी (दशमूल) का मूल और फल, देवदार जटामांसी, रजनीवात वृद्ददारुण, कलिहारी, वायविडङ्ग, श्वेत चन्दन, नपक, मधुक (मुलहठी) सहजनोकी छाल वच, सारिवा, कुठ, पारद, गंधक प्रत्येक दे। तोला। आँकके पानका रस तो. २०। सब साथ मिलाकर उसमें तीलका तेल अपया सरसोका तेल रतल पक्के डालकर पकाना। पानीका अंथा जल जाय कपड़छान कर रखना। कनकका ग्रह, शनिवार दगड़, कनपकना, कानमें जोवजंतु या वीज घुसजाना, वदिरापण, कानकी सूजन कानकी मसा आदिमें उत्तम गुणकारी है।
कर्णरोगहर वटी—(स्वर्ण युक्त) रससिंदुर तो. ४, पारद तैल तो. २ मंषक तोला ४, अभ्रक भस्म तों. ३. छेढ भस्म तों. २, शिलाजित तैल तो. ५ गुञ्चल तो. ६, गंधक भस्म तों ०॥, लाजत्र भस्म तो. १, सारिवा, रास्ना, गुंजामूल तेज, तमालपत्र, हुलहुच्ची शोंठ पीपल, मरी टंकण सेंधानोन संचल प्रत्येक दे। तोला, वच सोंठ कुटकर मोगरा शिरीष और अगस्त (अगस्तिया) के रसकी एक एक मावना करके मेघंञ्ज लिसी गोलो बांधना। मात्रा ३ रत्ती ४ गोली पानी के साथ देनेंसे कानके सब दर्द मिटते हैं।
पथ्यापथ्य—कानके धम दर्दे मे साबसा धराराक सेना। घान पर कपड़े नोतेहो शेक करना। दसर.कच रहता हो तो घो मादां जुलाव देना। कानपर कपड़ा लेपेट रखना। ठंढा पानीके स्नान मर्दी करना। पसें आता हो तो हर वक्त कान साफ करना और हिरडा केआभा कानके आगे रकना। कानमें उपर सेंध हुए काइ मो तेल डालते रहना।
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सो जव १३ से १४ वर्षंकी तदनाद्यपाकी ओर जाता है तब प्रतिमास ऋतु भाता है। वह ३० साल तक अर्थात् ५० वर्षकी आयु तक चल रहता है। प्रवशषे पीछे देह छ या वार मदिनां के पीछे ऋतु आता हैं। स्तनराम करनेवाला सच्चा शुद्र लानेवाले स्तन कदु हो जाता है। शोक नदे चिता दस्तकी वच्ची भनं पेटफे जतु इत्यादि कारणोसे ऋतु अनियमित या वप आता है। दुष्पानी स्वभाव संघारमुख, संघारकी गुस्सु समय घटन, रोग, मानसिक भातं या शोक आदि मारनेसे भी ऋतु अनियमित होता है। ऋतु के दिनोमें नीरोग खोयेरे ८ से १। तेला तक और व्यादासे ज्यादा २। तेला तक लून गिरता है। परिश्रम करनेवाला प्राम खीयाेक्षा लून कम पड़ता है। वारीकिक श्रम नदि करनेवाला कमजोर कारेर वाली हरनाफरना नहो करनेटाली और आं'म तुरफो या पदो तरफिया पर बैठे रहने को आदतवाला सादरेोेही ख्वोयेोका लून उगता पड़ता है।
१ लप्रोतं व स्वभावंच मनातंघ—ऋतु न आना, ऋतु कम आना, ऋतु वघ दे जाना.
कारण—पांहुरोग, मनमें चिता शोक उुदें, दस्तकी कल भी अपोले मंदारिन वायुचा प्रदेप तारोकी कमजोरी किघो मो रोगमे हुइे अगकि कुठ विकार अतिविषय ऋतुके समय लून अधिठ गिरना, शारिर, खुनका विगाड, क ठररोग, म हाझाय न हेना या भंडााियसे गभोारियं पडल्यागमे किघो रोगका लीनो आयो वारनीसे दह दर्द होतां है।
चिन्हु—ऋतु के समय प्रतिमास पेड में नारिके नीचे ) मेंठा वद होता है। और पेट के साथ ऋतु आता है। वैसे हो दुसरे मदिने मो होते है कई मास के पीछे खुनका लमाव होनेसे गर्मावान हुवा हो एसा दिखता है। दस्त विसाववगा खुलासा महों होता गभंस्थाज को नाजु में पतिश जेस दिखता है। दुखार भाता हैं। वमन होता है। गर्माशय मोटा देखता है। इस दर्द से ऋतुका पांहु हेता हैं। आंख हेाठ मुख फोका पड़ता हैं। मुख पर येओो लून माल्हम होती है। मिरमे टद दर्द दिवा कमो। शारिरमे थोाहा दर्द कम्मर और पांइंनी में दुख हेता है।
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पथ्यापथ्य—शोके श्वासे शरीरे खापरेकोऽपगार सरशेकोऽतेल पदं न करना और नामिने नोचने मामे मारे पेटने जयादा मद्य न करना। ऋतु के समय ठंडा पवन हो ठेन। ठंडे प नोचे स्थान नहीं करना। ऋतु और ठंडे शरीर पर लगाने नहीं देना। मन प्रीत से रसना शरीरे पाराम देना। परिश्रम नहो करता। दूध विशोध्य सिर्फ पीवे। ऐसी आहार विधि द्वारा रखना। ठंडा रातवांधों खराब नहो खान।। मांस बंध करना घो कम खाना।
२ कष्टार्तव-पीडितार्तव
कारण,—रजःस्थानो श्क लिप्ति, अतिविषय, दसतिको हठग्रे, शायुक्रा प्रदर गेद, शश्रोंणो वसुग्रह (कम मदिनें मे नामका गिरजाना), पारदी वगरा, प्रशन के पंथे रिसो रोगका होना, इत्य प्रकार ऋतु (मासं ह) को विच्छत करनेष्ठे अनेक कारणोसे यह र्द हेतु है।
विन्ह—ऋतु के समय बमरने वदं शूल, मस्तक पोड़र, वेचैनी हातो हे। यदि दर्द कमपरसे लेकर पेटमे देकर जांघ (Thigh) तक फलता है। यह दर्द कमरसे लेकर पेटमे देकर जांघ तक फलता है। ऋतु झावके समय कमल स्रजन-वाला और मृदु दीसता है। वातकोपके पोस्तितात वमे ऋतु झानेके पहिड़े एक व विन तक वारवार पंडा होती हे। और प्रशवक्लो वेध (labor pains) तरह दर्द होता हे। कई वसत यह पोड़ा शस्ता होती है। पाय—मस्तक वद हिचको चककर आंखो जोंधे सिन्ध मी प चुप हेातो हैं। ऋतु झाने लगत। है। जब ये उपद्रव कम होने लगता हैं। गभ रहनते के पोछे पे, शव, अस्पशव व ज—हेाते हे। वद्र श्रोयेकी इन उपद्रवो के कारण गम नहो रहता प्रत्येक मास में ये उपद्रव थोड़ा बहुत प्रमाणमे हातो रहता हे। दूध शपनारसे शोकशे तेल के मर्दनशे वेदना कम होती है और ठंडे उप्चारसे बढती है।
३ शोकम्य पोधितार्तव —चू त जमनेसे पथया गर्ाशय पर शोथ हेानेसे ऋतुके समय पोड़ा हातो हैं! शूजन से गर्माशय के मूल्को रास्ता सकु चिन हें दर ऋतु झाव होनेमे वधा होतो है और पोड़ा हेाती है। कछ दै साथ माहार निकलता हुवा छुन गाठा पांठो बांला और चाषनो जेठ घट हेोता है। तेमोंदो पोछेको जोर य आगेकी शोर मुरकनेेे और वादरको शूज्मेे गर्माशय ग्रह दै। जनेमे अवस्या य ह्रासल्क। मुल के जान देनेसे मयोग मे समय पंडा हेातीं हैं। ऋतु के समय नामि के नीचे के मागमे र्द हावा है।
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जोघ मे दर्द होता है और ऋतुधु अच्छे तरह आ जाने के पीछे यह पंधरा रुप देती है। फलदारहिं के पातं मे अवरोध टेनिसे और अंडदाय विकारसे पोपितात होता है।
पथ्यापथ्य—नमं पानीसे पवन न लगे ऐंसे स्थानमे स्तान करना। गमं पानीमे भरे हुये टबमे गले तक गरम पानी मरके बाफ देना। पीड़ा पानी सरना, रगेहू वनाना चकुको पोघना, कूटना हत्यादि घरकामको कशरत करना। नामि के नचे डे भागमे कपडे के गोंटेसं श्यधया रत्नवरहो पेगे धोएक करना। ऋतुचयेका पालन करना। दत पिताब साफ डेरो ऐंसा औषध टेना। रातरावो सखे वायु धरनेचाहे अननपान स्वाना नदि। मधुर पदाथं कम स्वाना वागरण करना नहो। आहार विधार निंरु और मेप्रन मे नियमित रस्नना। एड़ सप्ताइमे षा ८ से १५ दिनमे १ उपचार करना। अग्रोणं नही इस प्रकार मूव के प्रमाण में खुराक टेना।
पलीयार्घि गोली—एलवा (शिकेतरह एळियो) जवाखार, कवारपाठारमे पकाड हुर ठोाढ भरम, सेंधानोन, वायबिग ग, इन्द्रायणका मूल प्रत्येक ५ दस तोला, घघ कूटकर फवारपाठार रसमे घोंट कर तीन रतीके गोली वनामा। दिनमें ३ से ६ गोली पानीके साठ देना। डे तीन गोली जननेद्रियमे रस्ना। कशातंव, नश्यातंव, पीड़ितातंव मिटता है और ऋतुका शुलासा होता है।
ऋततुकरी वटी—सेठ, निंशोध, हीराबोल, दिंप, सेंधानोन, चित्रकमूल, इन्द्रायनका मूल, इन्द्रायणका फल, जवाखार, रगजोहार, टंकण, हकदो समुरफेन प्रत्येक एक एक तोला और शिकेतरह एळिय तो। १३ वष कूट कर पानीमे चना जौबो गोळो वनाना। डेा से चार गोली देनेसे चवा हुवा ऋषु आता है।
प्रयोग १—इन्द्रायणका मूल—६ से ८ वृच जननेद्रियमे रखनेसे ऋद्धु काता है।
प्र २—सेठ पोपल कानोमिरच मारगी शममाग कूटकर ०। से ०।। तोला लाल तिल तोलो ५ की कूट कर उसके मराचफे साथ देना।
प्र णै—इन्द्रायणका मूल तो। २ पानी रतरल १ में पकाना। पाव शेर रहनेसे कपरछान कर उसमें तिलका तेल २ से ४ तोला मिलाकर पानां।
प्र ४—तुंदुमे करफ वेह ०१, वड़ो धोफ (मरियाळो) और मजीठ, एक एक तोला कूट कर शह साय मिलाके उसका कनाध करे उसपेम १ से २ तोला शह मिलोकर पिलाना।
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३ रक्तप्रदर-अत्यार्तव (लोहिवा)
कारण—गर्भाशयमें होनेवाले, शरीरमें वमन ज्यादT बढ़नेवाले, प्रसवके पोछे गर्भाशयका संकुच अच्छा तरह न होनेवाले, गर्माशयमें रक्तस्राव होनेवाले, ज्रोष्ठ भंडकोशमें सूजन म होनेवाले, गर्माशयमें कल्कल होनेवाले प्रथवके पीछे गर्माशयमें निग्रह रह न जाननेवाले दाहवाले, वमन गिरता है।
लिङ्ग—रजोरात्रिक रीति से ऋतुसमयमें जितना रक्तस्राव होना चाहिये उससे ज्यादा उपराश समय तक और अधिक प्रमाणमें होता है। कुछ कुछ दिनोंके पीछे ऋतुन्त्राव हुवा मरता है। शरीरकी स्थूलता या कृशताके कारण भी आधिक रक्तस्राव होता है। प्रसवके पहिले या पीछे जो रक्तस्राव होता है उसे करयातन कहते है। खून ज्यादा गिरनेसे शरीर कफा पिक्का पीला सफेद होता है। मदरक्तमें दाह होता है, तृषा लगती है, वबकंर क्षाता है, दम चड़ता है, मुख पर सूजन होती है, भूख कम लगती है, दर्द दर्द रहता है। अधिक रक्तस्रावसे श्रम्यु भी हो जाता है।
पथ्य—पथ्य—तबीअतको माफक हो ऐसा साठा सुराक लेना। गर्मी से दाह करनेवाले, रक्त चमन करनेवाले पदारथ या भौषध नहीं देना।
रक्तबाव हरी घड़ी—पारद तो. ९, गजक ठो. ६, जामुनमें पकाकर हुवे केंवसमम ठो. ५, स्यग्रक मस्म ठो. ५, रौदव मरकवेत तो. ४, रसोत, चौलाईका मूल, कूठकी छाल, फैलीका कंद, कमलका कंद, कमल बीजकी गौरी, इन्द्रयन्त्रावरी, लोधिया हेमकुंद अमवा वाराही कंद प्रत्येक चार चार तोला लेकर निषिवतं 'मलाकर कूठकी कवारका और अंजन वृक्ष (बिजोर) की छालके काथष्टी एक एक भावना देकर दे। गुंजा प्रमाण गोली बनाना। ३ से ६ गोली तक पढता हुवा चावलके पानीके साथ एक वे चमच्च शहद डालकर देना। रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर भावि मिटते है।
बोल पर्वतड़ी—पारद तो. ७ गंधक तो. ७ कौ पपं टी मनाना पोछे थो'डकर उदमें होगबोल तोला २, खेरबार कशया विलासीत, यशाद मम्र प्रत्येक एक एक तोला घाथ मिल,कर अंजन वृक्ष (बिजोर चार-बिजोर) के छालकी कवाथकी भावना दे कर रख लेना । मावा ३ रत्ती माहद और मख्खनसे अथवा स्ववनप्राश अथवा च्यवनप्राश कूटकरवटेइससे देना। छातीघे, हत्थेसे गिरता हुवा रक्त और रक्त प्रदर श्वेत प्रदर आदि दोषमे गुणकारी होता है।
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प्र. १—केरङ्गा (करीर) की सङ्ग्रह केा जलाकर वाद मसम और शेषभाग मिलाकर ८ से १० रत्ती शहदके साथ या पानीसे देनेसे रखतलाभमें लाभ होता है।
प्र २—कदम्बा, माजुफल (मोठाळों माया) अघृतता मरद्रवेत डाम्र, सेमलका गोंद, हदन्ती धुर, दुच्छी (दूधो) धुप, बैरक गोंद, फफेरुं सुरलो, तालमखाना, डाकरा गोंद या कूड़ पव साथ कूटकर सबसे दूनी (द्विगुणीत) शक्कर डाल कर रखना। आधासे ९ तोला मातरा पानीसे ७ दिन तक देना। सब प्रकारके रक्तजञ्चामें फायद होता है।
पलाशव गुटीका—इलायची तो ५, नागकेशर तो ३।, इन्कों (चिचा भामलो) के फलका गरम तो १०, घोनागेरु तो. ५, गेरूव तो. १५, पाषणमेद थो १५, सब पाय कूट कर मोंगरेके रसमें ३ से ७ रत्तीकी गोली बनाना। १ से २ गोली देनेसे यव प्रदारके रक्ततलाव मिटता है।
प्र -३ रक्ततलाव हर मिश्रण- मुक्ता विधो तो. ९, महाचद्रकला तो ९, मञाहुर मोहुरा,तो ९, शताव्य लोह तो ९, अमृता सरस प्वेत तो २, प्रनाल चद्रुटो तो. ९, सबसाथ मिलाकर शौखोमे भरना। ६ से १० रतो तक दिनमें दो दफे च्यवनप्राशा अवया कुत्रमालेह अथवा गुलकद अववा शहदके साथ देना। किसीमी जगहसे गिरता हुवा खून अटकता है।
प्र ९—नीलो (गिलोय)का मूल ०१ से ०।। तोला पकड़ते हुए चादलके पानीसाथ देना।
प्र. ३—चौलाईका मूल, रसेत, घममागमें कूट कर रख्ना, ०१ से ०।। तोला, चावलके पानीसे दस दिन तक देंसों।
प्र. ४ मुलेठीका मूल, सफेद च वनका चूरा, बैरको लाख, कमलका फूल, रसेत (रसाजन) यव घममाग कूट कर रख्ना। ०१ से ०।। तोला तक शहदमें देन।
प्र ५. सहतूत (शेतूर) के पके हुये फल हमेशा पाँच से छै तोला खान।। यथमा पकै हये संजीवनी ४ से १० नंगा खान।। १५ दिनो रक्ततलाव बंद होता है।
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श्वेत प्रदर सेामरोग
कारण—किसी भेद गमके कमजोरीसे, गुदामागके स्वच्छ नहि रखनेसे,
प्रदररोगमें दाद होनेसे अथवा विपसे, घृणित'सासे, प्रमेह ~ सौर उपदंशवाळे पुरषके
भोगने, अति मदिरापानसे, बहुत तीक्ष्णे बहुत स्वादिष्टे पदार्थ युक्त जलदू खानेंसे
अथवा पर जोरू कामेने, श्रम,पानको इत्यादि हेतोनेसे, बहुत कोहरे, बहुत तप्तामेने,
पर मल आस्रात लगनेसे अथवा क्रारणेसे श्वेतप्रदर शोमरोग और रक्तप्रदर
होता हे । वह बढता है जब प्रदाहकी तरह बद्धार निकल कर , कपडा विगडता
है । इस सावका रँग ।मतन खिन्न कारणोसे काला, पीला सफेद मि'श्रित रँगका
चट्ट मोर चिकना मो होगया है ।
शिन्दू—इसके मागमें सूलन, होती है । सूजन ज्यादा हो नव प्रदाह
चोकना और घट्ट पडना है । कपडे पर पोला और लाल दाग पडता है । सवैर्मे
चेष्टा बहुत युन्लार रहता है । कंमर और जाघमें दर्द रहता है । नाभो और
नीचेके मार्गे मार रहता है । विशाम हरवक्त होता है । गरमीस्थानमें येधा
बहुत टर्रें होता है । मूत्र कम लगता है। अन्नका रवन कम हेता है ।
दस्त अनियमित रहता है । कम्मर और शिरमें ददं, अशक्ति चेहरेमे' फोकापन
पममें उदासीनता, कामकाज करनेमें हरने फितनेमें अनिच्छा, पेट वायुसें फूलना
इत्यादि चिन्ह मालूम हेते है ।
पथ्यापथ्य—जहांतक हो सके त्रिदोष' रखना। मधु मदिरा, मांसगरिष
पदार्थ, ठंढे पथार्थ वाळी पदार्थ नहो खानां । साघा लघु खुराक लेना गरम
पानीसे नहाना। दुसरा खराब रखना । गुदामाग दे दफे गरम पानीसे धोना,
ठंडा पानी अच्छा लगे वेठंडे घोना । आहार विधार नियमित रखना ।
प्रदरोपचि लोह—लोह मसम शोमूल में पकाही हुई तें २०, पारद,
ग'चक रससिंदूर य गंधकम, रौथ्य मंसम, यशद मसम शंख मसम, भकोम,
कुन्र्र नौ, वायविडग, सेंमलका गोंद, वचचुलका मेस्व, नोंपका गोंद प्रत्येक ढाई ढाई
-तोला और वचचूल के पकै हुये फलका रस तें १ एव साध मिलाकर . कूड़ेकी
'(फटम रकक) के कषाय में घोट कर देा गुञ्ज प्रमाण गोली वनाना । य से ६
गोली शाहर के साथ देनो'। शफेद लाल पीला प्रदर मे किसो स्थानपे हरष
गुदा या इन्प्रोसे हेाता तुषा रफरबाम बंध हेता है ।
प्रदरोपधि लेई—लोह मसम ता १६, पारद तें। ८, ग चक तें। ८.
स्वर्ण' माक्षिक समप्त तां । ६ गंगा मसम, यशद मसम, रौथ्य मसम, प्रमेख दै। दै।
-तोला लज्जालु (रीकसमनि)
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(बिल्व) का गम्रे आामको गुड़ली हनप्रों, पाषाणमेद रसौत, कमलकंद. अतैब, सातपरी, दूधिया हेमकद. सेठ कालो प्राप्त, मुलेठीका मूल, मकामलाका मूल द्वारकर, महुफली, नागरमोथ, घाइके फूल प्रत्येक आठ माशा तेला, सबसशर घोट कर कुंदेशी छाल अशोकेश्री छाल वट (वट) की छाल उकुर मर (गुलर) की छाल प्रत्येक के कवाथकी भावना देेकर ३ रत्तोकी गोली बनाना । मात्रा ३ से ६ गोली चांदीके बोसाथ मण के साथ अभया रहदसे देमा । सब प्रकारके प्रर, शेमरोग, पानो गिरना पुष्ट मांगको सुजन खुल्ली पुष्टवका धौय स्वाद षादिमें उत्तम गुणवारी है ।
अशोकारिष्ट—अशोकारकी छाल पक्करा सेर ३० केा कुचल कर उषमें पकका ६ मण पानी डाल कर पकाना । आधा पांनो रहनेथे एक रहदरकी पोपषे मर वषमें डाकर या पुठ मण २ और घाइ के फूल शेर डाइ, डाक्ष शेर १ और कमलफूल वमेठी शेर गुलावश्रा पुन, सातातरी, असगंध, बलापूषक जासुतको गुठली अड़शी जोर, कलौंजी जीरा घफेड़ वदन, नागरमोथ, सेठ दारु हर्दो, कपूरकाचलो, गुलरहदे मूल सेभरके मूल, कयथा प्रत्येक शेर आाधा डावना और केठोका मुंह बंध मरना । दर सप्ताहे पोछे हिसाना कर मुख बघ कर जैन देह मषिने के पोछे सबके कपछान कर अच्छे बतंनमें मर देना । मात्रा ७ से ८ तोला दिन मरमे विलाना । सब प्रकारके प्रदर रकप्रदर, अतोसार, मुग्धा सं पणो खून वदासिर वित्तके दर्द, पुष्टषो के शर प्रकार के प्रमेह आदि मिटते है ।
नदीमजीवन रस—पारद तो. ५ मे' सेनाका चक' तो. १ मिलाकर पीछे उसमें गां'क तो. १० डालकर कमजलो करना पीछे दमको पर्पटी वनाना । उक्तदेे घोट कर उसमें पूंण चंदोदय छार मदम अभ्रक भस्म, समूद शोषके बीज प्रषाल पिंष्ट, माणिक्य विधि स्वर्ण माक्षिक मस्म वंग मस्म, मवाद मस्म वच्चूलकृा मोदक कौरका मोदक सेपलका मोदक प्रत्येक एक एक तोला मेधी विधि छोटो हरात. हाकर, वच्चूलके पकै हुये फलका रस, लवंग डेलायच्चो कालिवरच सफेद चंदन रमोत मुलेठो मूल विल्वफफलका गम्रों प्रत्येक दा दै । तोला र णाथ मिलाकर मेपलभे मूलका और नीमकी अंरदरछाल के कवाथचो एक एक मादनो देेकर वषमें कस्तुरी तो. १ मिलाकर वेध रषती गोलीं मनाना । मात्रा १ से ६ गोली परनोके साथ देना । सब प्रदारो के प्रदर सब प्रकार प्रदेष नोरोगकी शीघ्रता कफाता कमजोरी कोषा कत्तरोग, मषारोग, मलावरोध, विरेचन हितकारक दिमागकी कमजोरी पुष्टषके धौय दोष आदि मिटते है ।
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यूनाानो जुलाब∞ मुडे बनफशा थैला ॥, गुलाबका फूल तौ. ०॥, जुबने खतमी तौ. ०॥ ख्वाजो तौ. ०॥, फकहीफे गीज तौ. ०।।, मोहोआवळ (सेानामुखी) पत्ती-मेना) तौ. ०॥ शब साम्ह कूटकर ८ तोला पानीमें' पवााभ करनां । ३० तौ. पानौं रहैे जप उसमेंं अमलतासकी गीरी तौ. ४ मोर सुर्खेस तौ. ३ आतमर भिगो रखनो पोछे प्रात.कालके कपबक्खान कर लसममेंं मदामका तैल तौ. ॥ डालकर पिल'ना । भोरतोंके फुलके ऊपर सुजन टेढ़कर दाहि जलन हेतो हैे उसमेंं तमा पुथषो'के इन्द्रियमेंं दाहि जलन होतां हैे उसमेंे पिलानेसे जुनााब लगकर पौंडा शांत देती हैे ।
प्रवरके मोर प्रमेहके सामान्य उपाय
प्र. १ मूसळे पानका रस तौ. ५ मेंं एक स्वर्रा निंबू निचोड़ कर पिलाना । ५४ प्रकार तीन दिन पिलानेके पाछे खिरका गोंड, ढाकका गोंड, मेचरख, यमुन्ना सोवहके बोज लोर शाककर यब घमभाग घोट, पावसै सांभा तेला पानोके सांभ देनां । ७ से १४ दिन देनैसे मोरतेका सफेद लाव मोर पुथषोके धातुलाव मिटतां हैे ।
प्र २ मचवृलखी पत्ती, वचमूलफे पकैे हुये फल, छोटीहरड़ और शाककर घममाग कूटना । पावसै सांघा तेला प्रात:काल रातघाशौ पानोके सांभदेनां ।
प्र. ३. रातरानीके पानकै पोषकर पुघापी जेड़ो गेलो बनानां । पहमलके कवड़ेमे रखकर पुघाभागमेंं रसनां । यह रातारानो ४ से ५ कूय तक लंवी हेाती हैे, फूल शफेद हेातो हैे, यद्की सुगंध रातकै फैलातो हैे, उसके हरनो मो कहैते हैे' ।
प्र. ४ बेंर्को लकड़ी (बदरीको) राख ०१ तेला, अश्वोककी छाल तौ. १, माहिकका फूल तौ. ०॥ सबके सांभ कूट घर क्नाथ कर सांहद डाल कर पिलानां ।
प्र ५ मुलेठीका मूल कमल फूल प्रत्येक भाषा आाघा तेला पानीमेंं पीस शाशहद डालकर पिलानां ।
प्र. ६ चोनाइ्र्का मूल तौ. ०॥, रसेांत तौ. ०॥, चावलके मीसामनमेंं पोव कर पिलानां ।
प्र. ७. पकैे हुये गुलरके फूल अशवा पकैे हुये अंजीर हमेशा १० से १५ स्वानां ।
प्र ८ मूई इमलो (मूभ(वलकी) तौ. ०॥ पानीमेंं पोस सांहद चालके पिलानां ।
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सम्भा सीका रोग
१२ वघंको उक्तः पोछे और ४५ वपंको उपरान्त ऋतुचेरेा प्रतिमाव ऋतु सता है रजःस्रवा हेानेके पीछे १६ दिनकफ दोचमे याने ४ थे दिव सनान करने के पोछे १२ दिनमे योषित गभाषान हेानT है ।
रज म्वला नियम—ऋतु दर्शन हेानेके पोछे तीन दिन तक अधिवा मध्वचयं पालन दरना । अम्लीनपड देनT । एक्कात स्यानमे रहनT । गमं मसाला याला तीखT वहुत खटT जलज म्द्राफ नदिदि लेनT । पाघT मधु मेाजन करनT । पानT नहि । हदन करनT नहि । शरीर पर तेल माजोष करनT नहि, बालपे तेल ढाल्न नहि । स्नान करनT नहि । आंघेमे अंजन करनT नहि । दिनकेा घामे नादि । रातकेा जागरण करनT नहि । उच्च स्वरसे योलनT नहि । हास्य करनT नहि । घडुत घोलनT नहि । वहुत परिश्रम हरनT नहि । शरीरपर वहन लेनT नहि । जो निपेव किया है, करनेषे मभेदा हानि पहुँचती है । रज.स्रवा स्त्रा? सदन करे वेा बच्याकी शोंधे खराब देाता है । तेल मालीषसे कुठ रेागी हेाता है । दिनकेा रोनेसे वेधनT, वेठार उपर जाघर सुननेसे बंधिर, दाघ्य करनमे त ता्कू ओर जेमके रेाधवालT, वहुत रेालनेमे प्रलापी, परिश्रम करनेमे पाकाल मटतग हेाता है । पुषप रजस्वलT सीकT व गप पहिळे दिन घरे वेा आयुय्यकT शग देातT है ।
दूसरे दिन घरे ता सुन्दर म ति हेाती है, तीसरे दिन करे ता दाकिशा नाश हेात है, इस लिये ४ थे दिन खा म्रतु सनान करे पोछे दि त्रो संग सात्री यमत है ।
कैसी स्त्रीका संग नहि करनT ? ऋतुमे भाता हेा । जिसो रेागसे पोडित हो, काम वासना न हो, मलीन हो, सगर्भा हो, इधरपT हो, जेघे कोसे य ग नहि करन? । पुषप मे जो जिसने वहुत मेाजन किया हेा, घेय रहित हेा, मघातुर हेा दिसी रेागसे पीडित हेा । पत्नीको प्यTस लग्गी हेा, मलमूत्रा दिवा तेया शाया हेा । ऐसे पुषपने स्त्रो संग नहि करनT चाहिये ।
गर्भाषानके नियमें—भोरतने ४ थे दिन स्नान करेके पहिले पतेथा मुंह देखनT । शास्त्रेमे लिखा है कि जो ऋतुस्नानके पोछे पहिले निपकका मुल देतत है .उसके आादारका गमं रहतT है । पति गेर दाजर हेा ता पुषषा या पवित्र व्रतम मघ दरनT । ४ थे दिन ऋतुस्नाव बन्द हेा गया हेा । तब सोने वसम मघ दरका पविनतकर सुगंधो पदाथं नरीके लगाकर पेष्टिक खराब ठेकर पुषपको इच्चयावरी स्त्रीने पतिके पास जाना । पुषपने भी स्त्री की पर प्रेम स्नेह रस कर पौंषक पराथं साकर सुरंगधी पराथं शरीर पर लगाकर अच्छे मुहे पहने कर स्त्रीके पास जानT ।
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गर्भाधान—शुक्र और ऋतुका योग होनेसे तसमें जीव प्रवृष्ट होकर गर्भाधान होता है । मंत्रतंत्रादिसे स्त्री पुंष के बीजका दे या तं तन विभाग हो जानेसें दे या तीन वच्चा वेलहा वेलहां होतां है । वीय' स'घक होंनेसे पुत्र, ऋतु वाधक होंनेसे पुत्री और माने' घमान होंनेसे नपुंसक होतां है ।
गर्भ' रुदनेके तात्पर्योफ लक्षण—यह है कि स्त्रीके शुक्र शोणितका संयोग मर्दि होना श्रव लगतां है माझल फटतां है । यस नंगे वेचनी हें। प्रथ्म भागमे शुक्रण हो व च्चे दिने'दिन रतनोक्षा श्रव माग सूक्तता है. रजोवान हेतां है, रक्तिमादि, पापणे' धोचाप्रा करे अच्छा । शुक्राण लेनेपर भी नमन हेतां रहे, अच्छा जोडके सुपच मो पसंद न होय, दूसरें या तीसरे माघमां लडडकेके आधारका गोलाकार गभं हेतां। पुञ शहसनां और ल व गोळ आकार हेतां गभमें पुञी घमसनां ।
गर्भीणोत्री fध्याय—गर्भाधान के पं च्चे मुस्ताकृति किर जाति है । ऋतु मंद होतां है । गर्भाधान मे पंच्छे दसें स्रोयेके श्रंक टेढ माथमे वमन होने लगतां है वदर ४ से ५ मास तक रहतां है. किसोका गमं' घेठा— म द जलन के साथ पित्ताश हर वमन होतां है, दस्त बहुत करके सठनर रहतां है, गभं रहनेंके पोछे मलमूत्रा मुख वद होय जातां है ।
वार्ताविहार—गाचा जलदी पाचन होय अथवा लघु तचोयतरे' माफिकप हे देया लेन'। ठंढ रात्रि साधी खानां नहि । खांधी शफकरतां नित्याष कम खानां । स्त्रीनेमा नाटक वम देखनां । जागरण नहि करनां । दै हसमय भुस्स हे। इतना पमा'सर खानां देख मो चीकण गरमां गरम खानां पीना नहि । पान सुपारीक' आादत हेतां मेजन के पेंछे और चा दुष पोने' पोछे ख'ना । ल'ख्य होतो चा काफो केशरां बंद करनां यंदि यंद न कर चके तों एक या दे रहत दिन पोना । फीरपे बहुंत परिश्रम न पड़े एसां घरका कामकाज करनां । पोंवमे ज्यादा चलनां नहि, पौंदनां नहि, कुंथना मारनां नहिद्दि, वृक्षपर था दहूत उं चो' झाड पर चढनां नहिद । मलमूत्रा वेग रोवनां नहि । वेऴ माधोमें या घेडार मुस्ताफरी करनां नहिद । समझानमें उजड घर कुलन्या देवालाय मे जानां मादि । यमचयं रसनां यम प्रदारकों रहनां रहनमे नियम रसनां । सगर्मां जोडेकी दहतलो दहव्यो हरेकां रफती है से दसत पित्ताश साफ हे यह धयान रसनां ।
कुषका खराब ज्यादां रसनां । शामकेहा हमेशां मुंग चावलदो कोचदो दुवके साथ खानां । मरकी केळेरां जेसां पंकामक रोग चलतां हो । वहांसे दूसरें सथानमे चले जानां । दूसरां स्त्रीका प्रदर दखनें नहि देना ।
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गर्भ्स्राव-गर्भ्पात (कसुरावद्र) तीन या चार मंहिने गर्भ गिरे वद्र गर्भ्स्राव कहा जाता है। जोधे माससे गर्भके वरीकड्रा वघारण हो जाता है से चार मे नत्र मापके सोचमे पडे वद्र गर्भ्पात याने कसुरावद्र कहा जाता है। नाहार विहारको समाल न रहे तेतीन माघमे गर्भ्स्राव न हो जाणा है। गरम्नाहार अथवा गर्भ्पात हे पीछे हूञ अषिछ गिरनेसे और वद्र बड न हेनेमे मरण भी हो जाता है। मल मूत्रादि वेढ रोधनेमे, भयजनक वस्रु देखनेमे कम्पातसे चोट लगनेसे निरघानमे सयमानक या आघात जनक न्माचारण थकरम त सुननेसे कूर्मे गिरजानेमे, सप्रिय वस्रु देख्ते रहनेसे वद्दून भार उठानेसे भय कर म्वाँसी आनेसे शोड कोस भय उद्देग यहुत हे हय मद्न त’प उपच्राव देपिक वस्रु ना जान्ना अयण जुराण भयंकर सन्राज वि मलोकड्रा कडाद्डा आड कारणोसे गर्भ्स्राव या गर्भ्पात हो जाता है।
चिन्ह—गर्भ्स्राव या गर्भ्पात हे।ने वाला हे जड पार्श्रमे पारीनदाय में दद्र पोडना हेातो है। पीछे रक्त्स्राव हेता है। पीडा दानै: दानै। बढतो है नामो के नीचे के दोनेा वाजू मे पोठ में पीडा हेाती है। साघक फडतता है। यद्र दद्र चहगभंकेा सद्दार निळ्कालने वालो वेध हे। वद्दूत रक्फ के साघ गर्भेका पिढ निकल जाता है। गरमें तीन माघका या ज्यादा़ माघका हेातेो पीडा प्याद्रा हेातो है। साध छर्दिद्रहेातो है। सुलमे अपी नहि रकता सुल ख्वरता है, पानी बहुत हरवखत पीना पडता है। ताव चढता है पसीना बहुत छूटना है। इस वपपय कमजोरा मुत्र खुल जाता है। वेद्ना बढतो है और गर्भ गिरजाता है। गरमें मरा हुवा आता है अगर बाहर आकर मर जालता है। गरमें पेटमे’ मर जाय ने’ स्वाँकड्रा अंदर मर वेठा जडिया लगता है। जौबित गरमें साल रुप लगता नहि गरमें मर जाय तो नाभिके नीचेवा भाग ठंडा होजाता है। शरीर कृशतता है, वद्चर फराक्ना नदि है, पेटक्री उचाइ कम हेाती है। ऐेे चिन्ह हेतेो गरमेंको तुत’ वादर निकालनेका प्रय न करना इसमे प्रमाद करते मे मृत गरमें के विसे खों घर जाताे है। गरमें निसरल जाने के पीछे कई ख्रोओकेा ओोर्दा उछन मार अंदर रह जाता है किधीकेा गरमेंका आावरण रह जाता है किप्रोकेा दुगंघयुक् स्वाद, गर्भाशयमे सूजन, अत्यांतंव, मस्तकमे चक्कर भूमि मन्द भार्दि चिन्ह दिखते है।
पथ्यापथ्य—इसरचछ कमरमे’ खोकी रखना कसुरावद्रसे अमुक खोकी अषा हुवा अमुक खोका ऐषा दष्ठ हुवा इत्यादि बात नत्रो करना। घगराहड हे अषे वाते नहा करना। हिम्मत देना, खुराक पाघा बलदो पाचन हे। भैष्र
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रखु देना। मज़ाकी मीठाई चौदना पद् यों नहीं रेवन। व सुन्नावहके चिन्द बहुत जोर में न हो वे गभंकर दिपर करने के उपचाग करना। रदि चेण सन्तहे! और गाभं नहो टिरेठन रे'ल म लुप हेता। ल्हो उम पीवाचे रद्दो सुकत हे। रे एषा उपचात करना। रिस' क्षे रे० ३-४ महीना गभु चढ जाइसे गभें रदनेक! गभ दोता है यदे ठोक हे। ने गभाधान के षष्य यमने सुस्सार आादे चिनह नही रेते योंद मागिक चढ जया जागा था रक'स्रार होनेसे रटे कप हेता जायगा जोर कसुनावह (गभ पाल) हे ने! हे'गा रे रकतद्राव क साप ददं टहता जायगा।
गभ पाल रल-पारट गथक मँदर हुवण मािसछ रो्य प्रनाल और शु्क्ति प्रयेदकी मधं चार चार तेला रेठ पोपल कालं मिरच ज'रा रा'हमीरा घनिया। तज इलायच' निगकेसर शुद्द कुचला रसदिदूर, ठठाह मधं चलावीज हरड, मोंवला, शत'वरी अशगंघ देवदार, अभोया हलदी कुचदी प्रयेद दे। रे तेला रेकर पुटकर नीमके ९टके रसमें गुंना ग्रमाण गोली वनाना। माशा रे से ४ गोली। सुर'मा लोंकातिसार मरहा दसककी वच्जो सूत्रन पेटका रदं वमन वाप सांभो आाद द' पिटते हे आों हनेसों एक रे गोली खेनेसे गभंधा रक्षण होकर नव महीनके पोछे सुलपुतं% प्रसव हेता है।
गमे=दु रोष्सर-प्रवाल चँदुपुरीं रेा। ९० विलाजीत, अश्गक मरम, पारद गंधक रसदिदूर लेठ, यताद वंग, मािसछ और रौ्य प्राचेकी मरम, मादकक, वारिवगे', शतावरी वरामूली अशगघ कूटदी रेठ, दार्ज मिरच, हल्दी कपूंर काचनी, मूलेठे मुल प्रत्येक तीन तीन तोले! f षप गाध मिलादर मारग!, मरहुठी, म द्दो प्रत्येकं रसषों एक एक माशना देकर गुंवा ग्रमाण गोली वनानां। माशा-र से ४ गोलीं वाद्द बूच रा पानीमें देना। सगर्गा खोने सथ रेग मिटते हैँ और सुक्रुपवर्कं प्रसव देता हैँ।
गभ 'चि'न्तामणि चृहत्तु (रक्षण' युक)—पारद, गंधक सुवणं सरम, ठेठ मरम, रे'प्रमािसद मरम, वंग मरम, अश्गक मरम, हु'रापिस्सी प्र'येकं चार चार तोला और प्रवाल व चँदुपुटो आठ तोला सब याथ मिलादर न ल्हो, सहुएणो मारगरा कोर हर विप्पलो (रतवेदिया) डाला ह सराज (दूघपदे) प्रत्येको तीन तीन माशना देरर एक गुंजा ग्रमाण गोली वनाना। राद्द मसकन दूष रसशन रचयनप्राशके सथ देना। सगर्मा होनेके सब रोग मिटते हैँ और वन्ध्या नीरोगी वतरता है। किदरे रमािणयमे' विडप' (रतता) या गरमंके कारणसे गभ क' स्राव अथवा पातं
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हेरा जाता है! अमरा प्रकारके पोले तुं० बढवा मर जाता हे! हेओ प्रोने कायम हे! तेरामं रसनेके एक तेर। मधिने पदिटेसे यद भौषय नाइू हन! ओर पतनादि ज प हे! जय तकू चान्दू रमना। असुरानके लिये अटरा चूञ एङ मे दे मागा हुव ओरपकें साद निसा जाता है।
सप्रमो स्तोके भिन्न भिन्न रे'फके घरेपु उपनार
१ तार—परउफर, निलेाव मसोठ रपचंदन, मधुर गमाप कूट कर ॥ मे १ तैलडा रमाय कर रद्द मिलाकर हर दिताना।
२ धानिमार प्रोद संगणो आंपदा शंतन्वाल जमूतको भंरगछाल देनो कूटकर १ तेलाइ मराय कर रद्द मिलाकर पिलाना। अपरा सुरण पप्टो १ मे २ रत्तो मादरमे देना लयवा वालो भरेवो, रकुनरदन मृलो मूच, धानिया मिलेाय, नागरमोय भमाय, पपंट (कतरवलियो पोतरपदे) अथो शुध कममाग कुट १ से २ माणा साहदरमे देना।
३ पेठेको चूर्ण—हिं मादिक भयवसी लेण मोहुर १मेर माणा देना। अथवा पांतवटो १होर गोली सपया चद्दर कर्दाद १ से २ गोलो पानोसे देना।
४ माषो—सिरापलादि चूञ १मे २ माणा अथवा कटकारी भडे ह १ मे३ हे टो चम्मच मिलाना ओर जे'पारादि गोली गुलमे पन।
५ रक्तस्राव—मदाचन्द्रकला २ से ४ गोलो बाहंमें देना। लयवा प्रकार चंपुपुटी मेहेर रत्तो चय'नप्रदा के साथ देना। अथवा गमंपल १ से २ गोलो पुरकद साथ देना।
छातीका दाह—भमलपित्तातक १ से २ रत्तो चयवनप्रासह प्राथ देना। अथवा आंवलाका मुरववा खिलाना। अथवा सन्नापात लेह २ रत्तो और मुक्ता पिप्पि १ रत्तो चयवनप्रास अथवा साहद के साथ देना।
७ दूस्तको कफर्जी—आंरार्यवचन्नो १ मे २ गोलो पानीसे देना। अथवा मधुफिरेचन चूञ १ से २ माशा पानीसे देना। अथवा शामशापनी नं ३ ० से ४ गोलो पानीसे देना।
गर्भ'स्वार तथा गर्भपात रोकनेका उपाय
१ कमलका फूल कालीतल, कमल मो'जको गं'री शकर सघ घममाग कूट कर २ से ३ माणा शाहरके साथ देना।
२—डिआगेड़ा कमल फूल काला द्राक, मूलेठी मृल रसेात, घमभाग कूटकर २ से ३ माणा शाहरके देना गभेका पे'षण हे।
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शुष्कगर्भे-नागोदर
कारण—शोक, उपवास, हृदय पर चोटका लगना, प्रभूवामागे स्रतिल्हाव, शायूका प्रदीप शम' रहनेसे त्रिद्दा श्रादार विहार इत्यादि धारणोंशे श्रम'की वृद्धि न हे'कर कुछ दिनीतक गर्भाधानके चिह्न दीखाइ देते हैँ और पोछे गर्भ स्रूने लगता हैँ मूँ शोर श्रम'का हलन चलन बंद होताहै । हैँ श्रम के शनिश्चालन (वद) के दोसमे रखल्लाव हे'कर श्रम पिळ जेहरा वन जाताहै । लेकिन उशमे जोऋ रहना हे । उसे नागोदर अभधा श्रमंका छेङळ देा गयाहै ऐसा कहतहे ।
लिद्न—मार शमे तीन चार मधिनोतक श्रमाघान जेसेध चिन्ह देःखतेहै । पोछे भपनेआप दो वह सूखता जाता है । भपर लान होकर सूखने लगता है । शमन स्रत्नमें दूष इत्यादि श्रमाधानके चिन्ह मो वद पहटते हैँ । यदि नागोदर (छाद) हिरनेहा हेओताहै तव श्रम' पत जेसेध चिन्ह दीखतेहै । यदि वह छेङळ हिर जाता हैँ ते? स्रको श्राराम देःताहै । किझो खोधै पाँच दशा या पन्द्रह -महिनेके पीछे छेङळ पल्ववित पुठ हेओताहै । पोछे मच्च्वाका जन्म हेःताहै । कई श्रोयोकादे हेङड़ पेटमें हेओने पर मो प्रत्येक मधिने या न्यूनाधिक समय पर श्रद्नु दोसताहै और किओेफा त्रह्ङ वद् हेओताहै । यदि छेङळ पेटमें हमेशा के लिये -रह जाताहै वे? निर वध झ्रोकी स्रंतान नहीँ हेओताहै ।
पथ्यापथ्य —छेङड़वाळे श्रम'का पतन हेःनेकाः उपचार करना । शमलका मुख चौङड़ा हेओ ऐसा उपाय ठेनाज । इसे? पहिले श्रम' पहिले की नांई वढने लगे वैसे श्रम'पेओवल उपाय करना ।
शुष्क गर्भकेा पललदित करना
(पाळवधाना) उपाय
१ शतावरी शसग घ शैलाका कद वलाछा मूल माप पनी' मुद्गपर्णी मेघ्वर -रास्ता सारिवा प्रत्येक पाँच पाँच तोलाः और गुगळ तेःर । २०, कालिद्राक्ष तेःर । ३०, -स्व माथ कुडकर एक एक माघाको गोली बनानादे श्चार गोली दूष या -पानीके साथ देनी ।
२ रास्ना और गुगळ समभाग लेकर देशनोके समान शतावरी मिलाकर देा से तीन माशा दूष या पानीसे देना ।
३ वच श्रपरा २ गोलीमें' देा माशा जांतावरीका चूण' मिलाकर शहद के साथ देना और दूधका पान कराना ।
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४ मनेन्द्रुशेखर तहॆ ।।, ममॆ जितार्घ: वृद्दॊ तहा ०।, असरप' तहा ४, रव सांय मिलादर १ थे २ माषा गरड़ॆ जना । द्रूषदॆ मुरादॆ रमनां ।
४ महालक्ष्मी विलास २ रत्ती, लधपणा टोध २ रत्ती, नदृग्रमा १ माशा गोली और लधवा' २ माषा सगॆ सांय मिलाकर दूषॆ चा पदरषे देना ।
६ रत्नसागरॊष रम १ रत्ती, वंगत कुष्माक' २ रत्ती, लत,वरॊ २ माषा मिलादर न्यायनप्राश अथवा दूषॆ थे देना ।
४ हिलौ जो जीरा, नागदॊषर, जातावरी, समभाग कुडहल १ थे २ माषा दूषषे देना ।
८ कायफल ६ थे ८ रत्ती दूरहॆ घथ देना ।
९ रतकरटल (कटकंर)की जड़ और मुलेठीकी जड़ समभाग कुडहल १ माषा पकॆं हुये चावलॆ पानी (सो'मण) के सांथ देना ।
१० पयूरदिव्ता, गुद'का फल और विष यरा (इदगारक) समभाग कुडना १ थे २ माषा गायनॆ दूधकॆ स'थ देना।
छेद निकालनेका उपाय
छेउ याने पेटमॆं सूजा हुवा मामं या पेटमॆं मरा हुवा मामं या माम'कॆ मरनेकॆ तैयारी हे। उस समय थोड़े बचानेके लिये मामंके बहॆर निकालनेका आवष्यकता रहती है । छेउ पेटमे सूसकर अनेक उपाय करनेॆ पीड़ॆ पललवित नही हे'ग्य और निर्जीव साध्यॆकी तरफ धोंडा़ हष्ट देता हेा सोर ठेठ वस्त कर मदर मर गयॆ हैं एषा चिह्न मालूम पड़ता हेा वेहा बचानॆके लिये जीवित चा मृत छोड़के निकालनेका उपाय करना ।
प्रंधान—१ विषखापरा (दिसकेी गुजरातीमे घाटेओड़ा मो कहॆतॆ है') उसको छे वों लडॆ ठेठरॆकी सांथ घीया हरेक ऊपर शिकारतीरॆ तेलोंच और खा'णी (रायण) के मीज देनेके समभाग ठेठर कूटकर कपहचान कर पानीनॆ मॆ दा मेघा बनाकर उस मढ पर लेप करना और सुस्सा। मगसे पद्रॆ लेप छुना और प्रत्येॆक वरतन सरूते जना । पीछे हम जड़के अं'तमॆं दोरां दोह कर वह जड़ खोके गुदा मार्गॆ रखना । सात दिन "क करनेॆ सुखा चा मन ठेठड निकल जाता है । हमेशां नवॊी उफ रखना ।
२ नीमकी अं'तर छाल, पहं'जनेकी अं'तर छ'ल और तु'ठ प्रत्येक एक तोला और सांरकी घां'चली ०॥। तोलॆ। सबके वारीक कर पानीमॆ गेठली बनाना । उस गोलीकी खुध प्रथमार्गमॆं देना । उग्री गोन्तीके उबालकर कवार्भ कर पिलाना ।
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३ माशेके हरा पान तेज २ और मेधाने न वे. ०। देनेके वारेक पीसकर पिलाना ।
- इन्द्रायणका मूल, मेढ़क (सुवारडीका), मेधीदाना माजरका बी, हरे वांसकी जड़, सज्जीक्षार कुड़ची जड़, हरड़, प्रियंगु ढाई ढाई तोला लेकर उष्णको सात पुढीं -प•ाना । हमेसा १ पुढोसो कवाथ घर (पानका । इस प्रकार ७ दिन तक पिलाना ।
५ इन्द्रायण मूल लंघा लेना नश्के तौर एलियाका ले करना । पोछे लषके अंतमे देराघंच कर वह पथ्य मागमे रस्ना ।
६ माजरका बी तेज ०॥, गूड़ वे. ०।। देनेके कट इर 'तिलका तेल वे. ५ में राल पचानो ! उसमें गुड़ थे. ४ मिला कर पिलानो ।
सूतिका (प्रसूता-सुवावडीकी मावजल-मूत्रतिसार)
वचादि किशोरी प्रकारकी 'विना तकलोफ प्रथव हे वच सुत्तप्रथव कद्हर जाता है । किसी प्रकारको नदलोफे शौं० परेशानीके शाभ प्रथव हे वच कष्टनसन क०१ जाना है । न०म टेड़ा है! अगर यथा देश्य रस्नान पर से है। और यमांपस्मार' दूषरी तरह गम्भ"१ वादार निकलना पड़े उसे विषम प्रथव कद्हर जाना है । कड वदन शोर (मेढी-अपरा) अंदर रह जाता है । पन गुदुत उछटता है और वदे वत्त्से घा शद्बोंजनादे या अंटर हुश्र ढालकर यामके बाहर निकालना पड़ता है ।
प्रसव-प्रसूति सुवाडके लिये
प्रारंभिक व्यवस्था
सुवावड (प्रसूत) करनेके कमरा स्वच्छ हना प्रथाशा शावश्यकता भनुसार आ जाया करे ऐंसा हैन चादिये । शौचकल हो वे. डमरें में गरम गालोचा या शेत्रंजी विछाना सूतिकाके पल्मूत्रोत्सर्गके लिये कमरेंमें हो ध्यवरथा करना और शुत्त साफ कर धूप करना ।
नववा माय वेठे यच चुयामी (डामण) के साथ परिचय कराना और डेर वदन मातो छातो रहे अनजान यप'रचित सुय.णो दायण शकन्नात आषाने से शोरत डेर शकेाच धारम मातो है इसकारण वेगश्रका वेग कम होना सं'भन है ।
तेयार रस्ननेक्री घृतुप्र'-विछाना वटाइ श्रोढ़ाड लोम" और ठंढा नाव वांघने के लिये वां तौन सुंदर या वेशपक दैदार, नाल काटने, के कातर छरी या वस्था', नालके बांधने का वपटदाका पाटा, पेटपर बांधनेका पाटा, नच्वा के लिये शेती, मेवड़ियां कपड़का डसुट्टा (वांलोतीशा) वच्चाके स्न्नान कराने के लिये वडां
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सरतन, तिलबा तेल सच्चघड़ेरी निट्टा बनके लिये कमंडा, मारने उपलको (छागानी), सगहीं और आहिरक दूध डारै। इत्यादि द्रवत तैयार रखना चहिये।
प्रधव होनेका मुख्य आधार गर्भाशयक्षत संरोच है। और पेटके स्नायुओंके दावदवा है। वेण धातु यह गर्भाशयका संरोच है। और वह कमलको घोर दवाण करता है। गर्भाशय उपरके भागसे संकुचित होता। हुआ नीचे उतरता है।
वेण होती हैं। जाँच कमर और पृष्ठभागों में पेट में दर्द होती हैं। गुदं स्थान में पटपट पहक्की येलों में पानी मरता रदत्ता है। वह गर्भाशय कड़ा जाता है। इसकारण गर्भके धक्कों नधि लगता। वेइमें हि प्रधव के समय गर्भाशय के मुखद्वार चौड़ा-वितुरित करनमें वह सहायक होता। है।
गर्भके शरीर का मुख्य अग मस्तक मृत्ताशय गुदा और योनि वेष्टित है। वह अनेक छोटे वड़े स्वयंसव और दूसरें स्नायु व'हनोसे मरा हुवा है। उसके उपर के भाग के आगमन द्वार और निर्ग' मनद्वार कहलते हैं। आगमन और निर्ग' मन के वोच्चे मार्ग के वसति प्रदेश अथवा वस्ति कक्षा कहलते हैं।
प्रधव के समय कमल था मुख ६ से ले ९ घंटा में पूण'विस्तृत होता है। दे'न्य आने अरता है। जय स्वभावाजु के दर्शाव गर्भाशयत कमल्को ओर करने लगता है। और जैसे दे'न्य बढनी जाती है। वैसे कमल विस्तृत होता है।
इस प्रवा'ही पदार्थ के कारण कमल के अ्रवं व्यास पर सपान दाब होकर बिना-तकलोफ खुलता म ता हैं। कमल यं पूण' खुल जानसे गर्भाशय हो येली डटती है। दईं द्रवत कमल पूण' विस्तृत होनेके पहिले हि येलों द्वार जाती है। जय गम'के-मस्तिष्का दाब कमल पर होता है। इससे कमल पर शोध होता है।
पहिले प्रसवमे-वमलका भगा हूत व ठन देता हैं। इस कारण पहिले दसव में(पहिलो सुचावधमें) संकेफ यादा वठ शेक हैं। कमल स्व'भाविक व ठन होता है। यदिउसपर शोध होने हुवा होता। विस्तृत होने में बहुत समय लगता है। कमल विस्तृत होने के
पीछे गभ के वदित वि दरसे सदहर निफ्लने का है। गर्भाशय जोरसे म देच व पाने अरगरा है। प्राध म की वेणके कूटता हो लिगो पोंधां होती थी। जय खोंशा दरांजनर परंतां हैं। अर्थात श्वासने वल दरना पस्ता है।
पहिले मस्तक निफ्लने के पीछे पूरें मारकेा निकलने मे उजादा समय नधि लगता।। इस्में भुद्रभाण फटता मी है। परच पीछे योधे दिनमें रक्ख आ जाती हैं। वच्चा वाहेर आ जानेके पीछे
१ = या १५ मिनट के पीछे देण व'द पड़ती है। व'नचमे येंचदा बहुत खून गिरता है। स्वां शियिल हो जाती है। पीछे फिर मद वेण आने लगती हैं। जिसमे रक्त-प्रवाह के द्वाथ ओर (गर्भाशय) वाहेर पड़ती है। इस प्रकार मार्मे का पूरां प्रधव
१ से १४ घंटा में हंतां है।
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प्रस्तर करनेताले ब्रह्मा को रक्षा करनेके लिये प्रार्थना करना कि “हे बुद्धिमत्ती इंद्रे पृथ्वो पानी अग्नि वायु और आकाश। ब्रह्मा विष्णु शंकर और घनश्याम तेरी रक्षा रे! तुझे जरदो गम'से मुक्तः करे! हे सुंदर सुव्वाले बाछ कातिल कल्मोंसे रक्षा किये हुए पुत्रक1 तू प्रस्तर कर +हे श्री अमृत* चित्रभानु च द्र मोर उच्चैः प्रदा अग्नि वायु सूर्य वरण देव यहां स्वकर तेरी रक्षा करे। समुद्रमे निहाला हुमा अमृत तेरे गमकेा जल्दी पहार निकलै।” पीड़े झो के दाष में रक्षाके निमित्त श्री मुन्नेश्वरदेवांका मंगलसूत्र (मणि'घघरी) गांंथना। झोफा ददहना तु धीरे धीरे रचचेके नीचे खानेकी कोशांंश कर। दिना वेण आये मोर कांनेते रदवा विकृत अगमाला हेआ। तेरे सुव्वर सुंदर कांि दिखती हे से| तू उछर पुढाका (हि प्रस्तर दरेंगे)। इस प्रकार आन द तरप्रस्त करनेते झोकेा शनिक रदघाद और बल आता हे। प्रघन होंनेमे कष्ट हेाता हो वे काढे सांपको कांचलै'द| अपत्रा मेढरका घुंघा योनिके देना।
प्रघन हेअ जनके पीछे मेलो-और न पढे ते| मोसपपन कलींकारी मडवोेतुचो के बीज सरपेंहो कांचली कुच घरमें इनमेे जो चो'ज मिले उसका युं'ा गुप्त भागमेा देना और पानीमे पोषकर गुप्त भागमे टेप करना , कलींकारीके मू'करे देरां बांधकर गुप्तमा'गमे रखना प्रघन जलदो हे|जा हे। वेआरा मजदु न सां'वनां और वह हेअ दहार पहाके साथ बांध देना ताकी वह मूत अंदरे न घुस जाय। जलदो निकाल घेने। मू'केा अभवा छोटी पैपल और बच्च पानीमे पोष चसमे पां'ड तेल मिलाय नाभीं पर गाढा लेप करनैसे जलदी प्रघन हेाता हे।
सुख प्रस्तर—नीचे के मढा पढकर ७ वफे पानी मं'त्र कर पलानेते सुखसे प्रघन हेाता हे।
रहामृतं न सेवन्ते चित्रभानुशशि भामिनि । उच्चैः श्रवा तुरंगेभः मन्दिरे निवसंतु ते ॥ मृतम्भृतमपां समुघृतं चै लघुत्तर गम मिम' किंमु'चतु किम् । मदनलपघनार्क वारवास्ते दह लयवर्णाजुधरेःदिशं तु शान्तिम् ॥ मुक्ता पात्रा विप्राप्तः मुक्ता सूर्येंदुरश्मयः । मुक्तः सद् भयादू गम्भं पदहि मा चित्र मा चिरं ॥ नीचे वनाया हुआ पदरिया अथवा कौंषा य ण अथवा घसे अभत्रा कैंसरके कापोको थालो मे लिखकर झो का बताना और टसमे थेाडा पानी ढाल वह विराजना तहिं हरदो प्रघन हेाता हे।
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पररिया यंत्र प्रोक्त यंत्र
४ | ३ | १ | ८ ९६ | ८ | ३
५ | ५ | ९ २ | १० | १३
८ | ७ | २ १२ | १४ | ४
सुखप्रसव चूर्ण—सेठ पीपल काली मिरच भजमोद रास्ना कुटको सेंधानोन जोरा सोंठाजोरा होग अजवायन प्रत्येक पांच पांच तोला शोर असगंध तोला २८ माशा खाय कूट २ माशे ३ तोला चूणका स्वाथ कर पिलाना।
सुख प्रसव लेप—पाठ कलोंदारी अडूसा मूल अपामार्ग मूल मच माग पानी मे पेष कर नामि जननेन्द्रिय सौं नामि के नीचे के पेटके भाजुराज लेप करना और १ मासा को फवाथ कर पिलाना।
सुख प्रसव व जन—छापकी दोचलीका गाय के दूधमे ३ घंटा हि गे रख सुखाना, पोछे उसको जलाकर राख कर वसफेा आंजनसे भयत्रा घोडे नखधा चुवा गुग्गुलागमे दिनेमे जलसे प्रसव देाता है।
प्रधानके पढिले सच्ची वेण्य उपढे जब सुयाणी (दायण)ने ल्र के पास रहना । खोफा वाये पाश्वे (पढले) सुलाना। खोका घूर्न पेटाकी ओर करना द्वदियु वळावने) पंछे सुयाणने भपनी स्रचछ को हुई २ भ गुलो चेनिमे डाल कर कमल तछ ले जाकर शरद गरमो कितनी है, और पानोवाला पदाथ कितना है और कमलका मुल कितना खुला है यह जानना। खो मेाती हि रहे मार्मोसृतक्षा स्वाव होनेए पछे प्रसवका समय हेओ मन्त्र पुष्प वारक फळ खोके हाथमे देना। खोके शरीर पर तिलका तेल मदंन करना। मेहु वाजरीको गुडवाळी राब गरम परम पिलाना। खोफा चीतो खुलाना। पावकी पानी कुलफेा लगो हेइप्रकार पोध रखना। अभिफे नोचे ठेल मदंन करना। सेजपत्र और राळणा धुवा देना। पसली (पाखं) पेठ कपर सायळमे पमं किया हुवा तेल मदंन करना। सच्चया पाख्र्मे (पदखामेघुंव) गयां हेओ तो क्षीरसे हघेकोसे मदंन कर नोचे ठगरणा। वेण्य उपरां उपरि झाने लगे झन योनिद्वारफा तेल लगाकर उसफा मुह निसृत करना। पोछे खोफा धीरेधीरे वल करनेफा कहनां ह्र प्रकार प्रसव हेओ जायगां।
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प्रथम हे'नेके पीछे गरमे'स्पान्दं। दबाकर मथलना जिस्से वह रस'कोष पाकर मेड़मे एक पिंड़घो तरह लप जायगा और मेले-अपरे अलग होकर पृथ्व्याद्रामे आ जायसी । नहरत होने से व गुहोसे स्पर्श'कर खानो कर मेंलीका मंगुलोसे स्पर्शंकर शोरफा और पड़ ( आभरण ) केा बाहर निकालनो । तच्वा बाहर आमानेके वेष्टे दस मिनट के पीछे टूक देर वेष्ट धाकर शोरफा अलग निकाल लेता है । यदी शोर न निकले तो आधे घंटे की राह देखकर अ गुहोया हाथ ममंस्थान मे ह'लाकर शोरकेा बाहर निकालनो । शोर न निकले जवततदर लोके लिये भय संझाना । वच्चाके नाभीच्छाव नालु हो माय और मेरी निकल जाय पीछे नाल काटना। अपर'-मेली वहार निस्लो न हो औ नाल ढाटा जाय वेा मेरी कड़ेजेमे चढ़ कर धोका मुरदु हेतो है । इसलिये यह ध्यानेमे रखना कि मेले (अपरे) निकल पड़ जानेके पोछे दि वच्चाकेा नाल काटना ।
नाभिके ६ से १० इंच दूर पर नालकेा देराई बांधना और वच्चे हुवे वेराईे दूसराे देराई दे हं'कके दूरेपर बांधना और उस देराके वीचमे काटनेमे या सड़नेसे काटना । नाल काटकर वच्चेके एक पांवु रखना। गर्मांधियेमे पूण स'ंदेव पाकर कठिन हो वव उस जगह अच्छेो दूध डालकर उसपर पाटा बांधना । पाटा बहुत ढोला नहि और बहुत कठीन मो नहि, प्रभूता लोकेा भरच्छा रहे इतने तग बांधना । प'टा बांधकर प्रभूताोके अच्छेो चार पाइ पर सुलाना और पृथ्वीदरपर अच्छा कपड़ा रसना । वह थको हूर्द हानेके वैसे नि द्र करने देना ।
शोर-अपरे केा जमीनमे गाढने के लिये १ हाय गहरा खड्डा करनो हेतमे ५ सेर नमक डाल ऊपर शोर डाल शोर मेले के ऊपर ५ सेर नमक डाल उपर मिट्टी डालकर उपर मज़बुत पत्थर दावना ताकि जनावर मेरी निकाल न सके । शोरकेा नमककर खात गहरे खड्डेमे गाढनेसे वह वच्चा आरोग्यशालीो चिद्वान चतुर होता है । यदी मेरीकेा जानवर नीकाल खाजाय वेा वच्चा कमनघोर मूर्ख निमीलिय बुद्धिहीन होता है ।
वच्चाकेा स्नान कराकर कपड़ा पहिनाना नालकेा कपड़ेमे बिटालकर उपर हह दबाकर उपर पाटा बांधना । प्रभूताोके कमरमे काजूसाज घेघाट नदि करने देना । उसके कमरमे अंधेरा रसना राज्रोकेा कम प्रकाश वाला दिया रखना । वच्ची पास सुयाणोके दिवा किशोकी जाने नहि देना । निद करनेके पीछे वद्ध हुशीयारीमे आती है । सुनियादी y चार दिन तक विछानेमे सेतो हि रखना, इससे गर्मांधिय मेाने निकाने आता है । पेटने पेटने वेसा नहि या लहू होने नहि देना । इस्से
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छर्दि गिरनेका भय है। प्रमेहके पीडित ६ से ९ घटाके पोछे निद्राद करेेो याद दिलाना। प्रसादके पोछे २४ घटातक विशाद बिछानेमे हि हो तो रसच्छा। विशाद करनेकी याद दिलानेका कारण यह है कि मुल्य माग जलनेके भयसे पित्ताश्रेका दव ये रखती है, इशारे मुराद परणाम होता है। प्रमेहके पोछे उसे ४ घटातक दत्त न हेा ता एरंड तेल ३ से ४ तेला देखर दसत लाना। उछेे कमरे मे ठडा पत्तन आने न देना आर उसके चारपाइ के नीचे छानोका मिछु मे बमि येढा ढाल कर शेक चालु करना। शीतकाल और चर्पी ऋतवु हो तो कमरे में बपधी रसवाना।
प्रसूता केा स्नान पान मे घमाल रखना। प्रारंभ मे मारी गरिष्ठ पदाथे खाने नहि देना। बाजरी या मेढु के आटे का घो मे सुनकर प्रसका पानी राख वनायी हुदु राष देना। मुल्य बढे जव मेढु के आटे का घो पुढ से वमाया शिरा खिलाना। वाजरी के आटे मे घीया मेन देखर नमक वाले पत्ती मे रोटळा वनाकर वेगान मेशोकरी भागी के याग खिलाना। केर ( अचार ) बदरस हरी दळदो हिा घनेया यारा कोजी मिरच वगरे मेोली दाळ शेकम खिलाना। मुबार्कों दाल चावलकी खोचडी वनाकर काली मीरच घंेसे वबार कर देना। १० दिन के पोछे घाटलाका पाच खिलाना। मांस खाने वालोने प्रसूताको ९ मास तक मांस खाने केा नहि देना। शारदी वायु प्रसति हेा, ठडी ऋतु हेा ता पुराना मासर बथवा तिलके तेलमें वायविड ग और मालकांगनी बोजके पकाकर वढ तेल हमेशा सारे शरीरमे मालिश कराना। प्रसुताको ९ या १० वे दिन पहिला स्नान कराना। खटटा प्रदाथ' तेल इमली दही केले ककडो सोताफळ जमरक फनस नोचू केरी वगरे खानेहेा नहि देना।
प्रसूताका कपडा हमेशा बदलना, धोकर साफ रखना। आठ आठ दिनके पोछे शरीरपर हलदी मिलाया तेल मालिश कर गम'जलसे हमान कराना। स्नान कराकर तुं हि शरीर कैरा कर चालना। रगढो तैयार रखना शेक देना। २० दिनके पोछे हमेशा यां एरंडांतरा नहाना। दो महिना चोतने पर चाहे जौष वतंन करणा। ३ महिना पूरा हेा जलतक त्रिफळा पालना। ९ महिना तक दुघ देना न हेा। चायका मयसन हेा ता राम' पशालोवाला पानीका चाय येढा दुष ढाराहुया देना। यधाकी छोटी चार पाइमें अलग सुलाना। उपरकी गरोदी या वाटेकतिया (विछाने ढकने के कपडाका दृकृत ) एक एक घटाके पोछे बदलते रहना।
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प्रथमके पोछे चौथसीमे नीचे लिखी चौजोमेंसे जिसको से। अनुकूल लगे ञारसकना हो वह देना। पोछे दिनमे ञवस्राविंदि कषंय पिलाना प्रारंभ करना।
॰॥ तैल। स्रिग्ध के चूर्णमे १० तैल। पानो डाल १० तैल। रहनेश कपडछान कर पिलाना। हमेश। प्रातः कालके १५ से २० दिन तक यह ञवाभविलान। हमेश। ञ्ञान पानके पोछ नहाकर पकाया मेढ (मुतादाना) सुखगापके लिये खिलाना। शक्तितके लिये सुवर्णवसंत मालती, महालक्ष्मीविलास, यषत कृपाकर, मस्तक भस्म, पूगं नप्रोदककी गोली ञादिमेसे देय़पव लगे-ब-३ राहदसे यथवा सौंमरय सुंठी मबलेदके साथ देना।
बच्चेकी नाल-नारङा जो ६ से दस इंच हुं टी (नाभि)के लग। हुंआ है उसपर रह दाबकर पाटा बांवना। पाटासे पेटभर दर्द न हो यह ध्यान रखना। नाभिके उपर नाळके मूलमे तिलकां तेल हमेशां डालन। वहं नाल ५ या ६ दिनके पोछे सुत्न कर गिर ञाता है। विचमे वह नाल खोचा जाय तो बच्चा रोता है। ञौर नमी मो उभड ञाती है। पोछे बच्चेके पारीरमे खून भरे ञानेश आप हि बैठ जाता है। यदि नाल उयाद खो चा जाय तो नाभों (हद दो) पकती है। यदि नालदे नाभीके नजोदसे काटे या घाना बिना मांयें काटे तो वह खून बहुत ञररदर बहता मर ञाता है। पाल लबा रखकर काया जाय तो वह बच्चा दोर्घाञुप बुद्दिमान नीरोगी रहता है। नाल गिर जाय जब शोषीमे रख शोषो पर बच्चा की लन्प्रतिधि दिसना। बच्चा ९। चलका हो जब तक चौबार पडे तब यह काल धीश कर पिलानेसे ञाराम होता है।
बच्चाका जन्म होह उस समय थाली बजाना ताबे पेतलकी थाली पर -कीसी वस्तुके ठोककर ञवाज करना। इससे वह मनुष्य कमो कोसी प्रकारके ञातङ्र मोदर रहता नाही है। जन्मके समय बच्चांकी शरोर नरमावस मरहुमी चौंकनाइ वाला होता है षे। बाथुनमे या रीठे के पानीसे गरम पनीसे स्नान कराना, पोछे दे। दो दिनके हनान कराना। बच्चांके एकरम प्रकारमे नदि लाना। घीरे घीरे -प्रकारमे लाना। जन्मके पोछे ५-से-६ दिनतक गलमूदी पिलाना। मुंह एक दो तेलमे ५ से ८ तैल। पानी डाल पोछल ञानेके पोछे कपडछान कर उष्ण पनीमे गमं किया हुंआ गगयका घीं छोटी आंखो से १ चंमच शाल पानीके थोडा गरं कर दूधके फोयासे घीरे घीलाना। इससे ९ मास तक पेटमे जमा हुंआ कफा मल निकलता है। यदि मल नही निकलता थो। वह सारी जीदगी बिमार रहता है। कहावत है कि बच्चा पहिले दिन जिसकफे दायसे गलमूदी पोंता है
-उसके स्वभाव जेसा बच्चा होता है। बच्चा नवमासका हो अ्मतकु घनगवन-
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स्तनपान कराना। पीछे धीरे-धीरे खुर-कपर चटाकर घामण बंद करना। यदि पीछे धीरे-धीरे स्तनमें पसींधान होनेसे बच्चे केी घावण छुड़ा देना। कयोकि गर्मीाघातके पीछे बचचा स्तनपान करता है वे। कमजोर बनता है। धावन छुड़ानेके पाछिले पायखेिा दूष येआा येआ पिला कर बढ़ाना और खुराक मी देना।
प्रसूती—सूतिका सुचावहोके रोग
क्लेशाद्विषमाशीर्णाद्विपमातख्याद्योगचर्यतः ॥ अदितेःपयवारदोषात् कुचिन्द्रैदोषैर्वं ति विविधैरजः ॥ वड्ढोनतांगमदं कासो शुगामासताय मुखरेःस्रव ॥ रेगाअश्व सृतिधाया विपमा बहुकालकष्ठानारः ॥ क्षयस प्रहणोश्वासा प्रभ्ये रेगेभप पच जांय्ते ॥२ त॥
किचाँ प्रकारके दाइसे या अन्य कारणे से प्रसूताकेो ज्वर आता है, वह ४ से ८ दिनमे उतर जाता है। दहमी लबे दन मी चलता है। प्रसवके पीाछे २४से ८ घं टाके पीछे उवर आता है। प्रसवके पाछे प्रसूता क्री कुखे दिनमे म'री मरतख खुराफ खाने लगती हैतेा वह पाचन न होऔर अजीर्ण होता है। तत ताव लाग होऔ जाता है। प्रथम ठंड लगाकर ताव चढता है पसीना आता है। शिरमें दद' होता है छाती में गभराहट वलानि मन उदासो घमन धारोर से रुकता दफन कफ जादी चिन्घ म'लम होते है। पेटमे गर्मासय मे या भाङु वाजु मे दर्द होता है। पेट फुलता है जेभ शकती है। जीभपर छररी लगती है। प्याव लगती है। चमन होता है। खांसी कफ दम दम्त ज्यादा हेोता अतिधार संप्रहणो शुल शोथाके पीडा मसतक मे चकर रफकहोअ गुचि भाग मे या दोआरारमे खुलजो मुजने कोमलिा पाडि वाथि आदिरोग प्रसूताकेो अने क कारणोसे होते है। जिधररोग के साथ दूयर जेर जेआनुपं मिक चिन्घ दिसते हेा उसपर बिचार कर एक या दिा चार मोषधकर योग कर देना। मागे लिखि दघ'यां प्रसता के सब रोगो में पुण करतेो हैं।
देवदार्वादि कषाथ—देवदार बब कूष छेटीपीपल रेठ कालफल= नागरमोथ चिरायतां घनियार वचईहरड पिपपर चमाल मेलड अतीष मिोेआम कटडासं गो, आाहाजरों कौचचमीज छेटी कटहरी मुल शब सम भागा- लेकर कुटकर रखना ॥१॥
इसघरे दिनसे २० दिन तक पिलाना। यदि प्रसूताके कुठ होऔ हो तो इस कषाथके साथ रोगके अनुबार औषमी देना।
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सृतेका मिश्रण ९—अशोक मरम, महालक्ष्मो नारायण, सुवर्ण वसंतमालती, मुक्तापिष्टो, प्रताप लंकेसर, कस्तुरी शव शव मृग माग लेढर घोंटकर श्रीश्री मे मरना पीसै हमेशां ३ से ४ रत्ती सौंमाग घुंठी भस्मेड के साथ ऐक या दे। घमय देना। सांवी सांभिका दर्द चककर अपं छाती मे घमराट आदिमे देना।
सृतीका मिश्रण २—वसतकुसुमाकर सुवण मस्म सुवण पपटी सृतकेसर शव शम मृग लेढ़र घोंट रस्सना। हमेशां २ से ३ रत्ती २ समय फंटकारी भस्मेड से या वासावलेढ से देना सृतीकाका दस्त अमृतपित्त कमजोरो छातीका दर्द आदिमे देना।
सृतीका मिश्रण ३—रत्नमागेतर रस तोला ०१, जय मगल रस तोला ०१, चोगराज रसपाचन तोला १, सारिवृत लेढ तोलें ०॥, लेढ वपंती तोला १ शोलाजीत तोला १ शम साय मिलाकर ३ से ४ रत्ती शहदसे थथवा चयवनप्राशा जीवन के साथ देना। प्रभूता के श्वास रोगमे दिया जाता है।
सृतीका रोगातक—पारद न घनक अश्रुक भस्म सुचकपिष्टो पाव रसोना तेजम चौथ पीपल कालीमरीच लेढ भस्म हरण माक्षीक भस्म प्रत्येक ऐक ऐक तोला और दरण भस्म ०१ पारद तोला रव साय मिलाकर घोंटकर रखना मोत्रा २ से ३ रत्ती घौमागम घुंठी से देन। प्रभूता स्तोंका पेटका खुल छातीका दर्द चककर वायु पित्त प्रकैप आदिमे उत्तम है।
श्रीफला'द चूर्ण काढलु पाक—बकुलका गोद तोला १०. खोपरे (टीपरा) तोला २०, बादाम गोरी विस्ता सेठ प्रत्येक पांच पांच तोला वला =वीज तो २, मेधी दाना चीमेट शखलष वहीशोफ (वरीयांली) शौफ (सुवादाना) नोखश काली मुसली वाकुबा घनिया तालमखाना अशोलीया सीतन छोटी पीपल शफेद मुशलो चौंवत वीशकी गिरि काली मिरच प्रत्येक एक एक तोला जायपत्री पीपरीमूल तन जायफल मातावरी न'गकेसर तमालपत्र वायविडंग कुली जीन जीरा हलदी प्रत्येक माधा तोला वैद्कुका आटा ८० तोला घो ९०० तोला शुद १०० तोला मधका त्रिवृत पाक वनाना। शुगभ प्रय्य अलग कूट रखना -वह उपर छिडकता। शुद घोका पाक कर रव डाल'कर थाली मे दाब देना या -लड्डू बनाना। ४ से ६ तोला प्रभूताे हमेशां खिलाना। श्वासित माती है मुच -जमती है। कफ कदह मद्दि हेतु।
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श्रृंठारादि व्रणोक्तु काढ़लु पाक-चेठ तेला य. चोप नीनी एमुद्र-
से.प थीज़ घटाछा छेई भसम चोनीं के माला खेरवार मुचाळो तगर इमीमदतको
अगर गजपीपल वायविड़ग विशायरा जायपसी भड़करा केवड़ मजनायन-
कळेजोजीरा पाषणमेद तप्सोर चंदनफेद कालोजीरच पोहा मग प्रत्येक
एक एक तेला वशक चित्रा समरगघ दारहलदी लंग्री जायफल घने'ना प्याज
से पकाया हि गुल़ मोरीआमलक (अंगूरुलसु की पत्ती) प्रत्येक दे। दे। तेला,
मगदरस इलायची शेठ पीपल काली मिरच हरड़ प्रत्येक बाइ' ढाई तेला, तज
तमाल प्रत्येक पांच पांच तेला, बराबर भसम तेला o।।, साककर और घो १००
से १५० तेला वशका पाक वनाना अभशक अवलेढ जेस्ता करना। हमेशा ३ से
य तेला तक प्रवृत्तामे खिलाना। शक्तित आती है सव प्रकार के दर्दे में यह
सचछा खुगक का क़म मरता है।
होशामय श्रृंठी अवलेढ—हस्चा मण य गुडकी चाषणो रंग लगाये
बरतनमे करनां चाषणो घट्ट होनेसे नोचे लिखे ऱठयका चूण तैमार रखाहो डाल
कर लडू'के तवेथासे दिलाना।
ढालनके द्रव्य—शेठ तेला १६०, खैपर्रा—श्रोफळ सुंघा तेल १६०
चेआफ (सुवासण) तेला ६४, चारेली तैल ७०, मचुंरा नागरमोथ छोट'पीपल पीपरी
मूल रहीतेंक (वरीपाक)', तज लायफल जावश्री बाहाजीरांभ जवासन (अजमां)
हींगोटा हरड़ घनोया असगंध बफेदमुसली नागकेशर आंवला इलायची लवंग
अफेदचंदन सतावरि यसमोदर प्रत्येक वारह वारह तेला लेकर रस कूटकर हवासे
छानकर रखना और पुठको चासनो हो जानेखे घव डालकर दिलाना। घो तै.
३२० लेकर दहुलकां गोद तेला १६० को घोमे पसाकर कूटकर गुदपाकमे
ढालना और बचाहुवा घी मी अवलेढमे हाम देना। पीछे २ घंटा तक हिवाना
पीछे चलेसे सतावरकर १२ घंटा के पीछे इसने तैल १२ रत्तिदिनु अजैक भसम
तेा १२ भीमसेनो कपूर चार तेला डालकर २ घंटा दिलाना। २८ घटा-
के पोछे सच्छे बरतनमे भरादेना। मात्रा ३ से ४ तेला खाना प्रसृत के सव रोग
मिटते है सुखपूर्वंक सुवावच होती है और वच्चा मी निरोगी रहता है। प्रसृता स्त्रो
एक महिनाके पोछे स्वादर आती है। जब दृष्ट पुष्ट तेजस्वी और स्वरूपवती बनती है
सृतिका चिनेद रस—पारद गांभक रससिंदुर अभ्रक भसम प्रत्येक
दम्म दस तेला, ताम्रमरम o।। तेला रेठ पो'गल मरीच पीपरीमूल सें'धानोन
जायफळ जावश्री तज टोंक हलदी बच अतीस सों'क अभ्रोलियाका बीज प्रत्येक-
चार चार तोला साब मिलाकर देवदार्वादि कषायकी ३ भावना और निग'हो-
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के रस या कसायको १ माशा देखर मुखारद 'चोट रसना १ माशा ३ घे ४ रती शहदसे देना । प्रसूताका ताप भनिवार स महणो ममन घृत वदावतं वायु हृदय रोगमे गुणकारी है मुल लपती है खराब पाचन होतेहा है शोषित आतो हैं ।
प्रताम ल'केश्वर—घ विंदूर तेला १०, ताम्र मरक माक्षिक भस्म सिन्दूरत पारद गंधक प्रत्येक पाँच पाँच तोला, गन'क भस्म शुद्ध मधु माक्षिक मन्न्रह मन्न्र ठेह मम्म सेठ पोपळीमूल प्रत्येक अढ़ अढ़ तोला, मारने वरकको मम्म कपड छन की हुर २• तेला घव साथ मिलाय घेकशर्वादि पसाष की भावना देखर सुवा'कर घोट कर रस्ना । ३ घे ४ रती शहदसे देना । प्रसूता के बहूनसे रोगमे लाभ होता हैं ।
सूतिका चवडभ रस—पारद गंधक अन्न्र मदन माक्षिक मम्म रौप्य मरक्म स्वर्ण भम्म हरताल मद्म अफीम जायफल लौंगत्रो प्रत्येक चार चार तोला लेहकर मगरमे य बलापं'जोग शेपलका मूल प्रत्येक के कसायको एक एक माशना देखर घान्यो मे' स्वकारा पो'मे मोंसपेम्ती कपूर मे तेला ४ मिलाकर घोट -कर रस्ना । मात्र ३ घे ३ रती शहदसे देना । प्रसूताके अतिस'र स म्रहणो चोनीग्रुन ताप खांसी पेटका दर्दं छती के रोग गर्म्माघयका दं दर्द गुह्यामागसे रक्खनाव या सफेद खांन मिटते है ।
सूतिका भूपण रस—पारद गंधक स्वर्ण मरम रौप्यमद्म प्रवा्ल विध्रो अन्न्रकुम्म हरताल मद्म शुद्ध मेनशोील सेठ पोपल मरोच निं'दो क'ज घन यम माग लेहकर अं'क दू'कको नंत्रा'कफके पय'यको भोर अद्ध'सो के रसके एक एक भावना देखर धाराव स पुठमे कपर्दमिट्ट्री कर डालूखा यं'डाका ४ प्रहर (१२ घटा) अभि देना स्निग्धोते होनेपर निंकाल चोटकर रस्ना । मात्र १ घे २ रती शहदसे देनेशे प्रसूताके बहू'नसे रोगमे गुणकारी होता है ।
अपरT पातन धूप—नयी भोर(भावन)न पथ्थी होतेहा हडत्री तुबं के शोज दा'बी कांचली अमलतास शररे'का तेल यमभाग मिलाकर गुप्त मागमे घुना देना ।
मपारा पातन लेप—हलोदी (सफेद न्च्छनाग) केा पोष द्वाथ पावमे लेह करनेशे भौर (आंवल) पचतो है ।
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मूढ़गर्भ
ठंडा-वक्र-वच्चा ठंडा, वक्र मस्तक त्रिवायका वाचरका माथा पछिले आवे वो समे मूढ़गर्भ रहता है। इधरमे मस्तक न आकर वपु प्रदा घुंटन याभळ स्त्र्मा वा द्रव्य दिखता है, जय वच्चा ठंडा आया (शाद्वागर्भ) वच्चा जाता है। वह तुर्शोयार सुयाणोने अ दर हाथ डाल कर वच्चाके सीधा कर बद्दार निकालना परता है। इस कापके लिये वृद्ध अनुसूची और महतू व'योंकी सुयाणो को हो। वैशो सुयाणो होंने चाहिये। प्राम प्रदेशमे वैशो क्रिाल सुयाणो हेता है। जो वच्चाके येस(श्रि) संभांतमें लाकर प्रवश करा सकता है। जय भरतारमे रहने वाली नहपे या ठेठी डाक्टर डोग वच्चाके यपांिशत करनके कौशोल न कर कापकूट करनेकी तैयारीमे पढते है। रचित यह है कि पछिले द्रव्ये युद्विपूर्वेक वच्चाके सहीसा कर त्रसव करानेक कौशोशल करना चािहये। सुयाणो जय निरुपाय हो। तप पास कमंसे निफाल करनेहा डाक्टरके ताचेमे व'ह्रा देना।
कुचळ प्रसव—इधरमेसे वेञ्य आकर गीचमे ४ से ८ घटा वद पढ जाता है, फिर वेञ्य आंकर उठती है। इस प्रकार एससे अधिक दिन निफल जाता है। जब सुयाणो कोष या डाकटरने जलदी प्रसव करानेहा कोशोश नद्रि करना। क्रुदरवी रीतीहो प्रसव होंनेहि लिये धैर्य रखना। पहिला प्रसव हो। वो गर्भवानका माथा वहन होंनेहो, गभंळा मस्तक और प्रशवत माथा छोटा वच्चा होंनेहो, गर्माशय वक्क होंनेहो, क्रोध का मन उदास हनेहो, हितशोत्रीया ताप खांदो दरसकf। कन्जी आदि द्रदंहे, रक्ा अशक्तिय पदारथं खानेकी आदतहो, दूध घीका खराब न मिलनहे—न टेनहे, वेधाती लोका सुयाणो द'यग कमहो, अपशब्दो पोल कर ऋके पनकेा साचात पडूचानेक इत्यादि कारणोहे मर्भाशयका मुख्य मोवा या योनि संकुचित होंनेर प्रसवके समय ले का अधिक कष्ट होता है।
इस प्रकार हे। वो युद्विपूर्वेक घमनसकfर गभंके अंदरमे छिद्रकर गर्मामृत घीरे घीरे बहने देनेहे गर्माशय विस्तृत होकर वेञ्यका जोर बढकर प्रसव हेाता है। प्रथकfे पछिले जुलाव देकर पेट साफ कराना। पहिला सामf औषध देना। कुजे डाक्टर डोग प्रशवके, कछके समय एसटेकर अरगट मेहे है यद बडो भारी मूल है। प्रशवहे जानेक पीहे और अपर-मणो पड जानेक पोहे वद दियाज्ञाना चाहिये, ताकि गर्माशय न कुचित हो। असली स्थिति मे आवे विर्गाह निफल जाय और वन ज्यादा वद न जांय। वी दृष्टती हो। तप समय मर्भान मेहेसे निफरात क्रिया
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देकर प्रशन अटक जात है और स्त्री मृदुयुढ़ भयमे आ जाती है। वच्चा मर गया है ऐसा मालप है। उसे जल्दी निकालनेका प्रयत्न करना। मालमो के पडे होगे १० से घानेकी वेला १ पोष विगाना तो मृन बच्चा गिर जाता है।
कडू ड.क्टर लेडी पूरेके शरीर रर चीरफाडकर अवनरा (एक्शेरीमेन्ट) कर अवनरू लेनो की इच्चा'मे अ्रधा। कइनी वू डा हू हत्न न देख सुननेमे, घरके मनुष्यो के मनकी विहवलताकी नाप लेने डे लिये ब्रिना समय बिना डे.खे सचवादी बहार निकालने को कोशिस करते डे और लेडी डो मर जाती और। अैे मौके पर घमन्डगार सुयाणी डाक्टरकी शकती। है। लेकीन डैे नगालो कदकर डाकटर अ्रपनर गाम करता है, एैे अ्रपंसप किड़ेे वन गये है घन रहे है।
इसी लिये घरके मनु याने भी कइाती डोको डे.ख कर हाकरको डुजानेकी वातावल नहि काती। शांत धय' रक्ख कु.रती रीनीसे पसवर हेने देना। कइमे येडे समयके लिये शिलंघडे पवर है। लेकीन इवसे डोका म्रयुक्रा भय नइ रहता है। कई सुयाणी और नर से मा माने वेठे डूये डाक्टरोंमे युनानि डे लिये पवर घोसा घरल डे तो मो घारके मनुन्ये'की घमरा ट कर डाकरटके। मुलत्मे घफेलती है।
मच्चा से.खे मारंपर (नामलमे) डेे कि कर्था यइ देखना, पोछेे तेल मालस कर नीचे उतारना, वेण्य डो हेा डेो डेे तीन रती कस्तूरी गमं दुच के साथ पोष कर पिलाना, आावश्यकता डो हेा डोा येडी दूधी मी पिलाना।
[०]
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योनि रोग जननेन्द्रियरोग
कारण—गर्भाश्रयस्यामें आहार विहारहो अनौचित्यतस्साचें प्रथम पोढे वेह पदेंमा के पहिटे पुऱप संगडे बहुती गरमं पदाथें बहुत चाप पोहोनेक्री आदत उपडंक प्रमेहवाले पुढपके संगसें गरमपात करनेवाडे पदाथेंहि उपयोह करनेटे मिस मिस देओपेढेक वपन्न हेती हैं ।
योनिरोग डा सेवन—वदावर्ता वंध्या विप्हुता परिप्लुता यातला टेढितह्रा प्रजांकिनी वांपनी पुत्रधनी वितला असयानदा कांट नीचें चलणा भतौचाणा-पदो अथिर्जिनी मदती मच्ची वकुशा आदिं योनिहो रोग है ।
वातप्रधान योनि रोग—डस जगह पीडा दरद ऐे ऋतु फेन वारी रहे स्पशंहि रक्श हो पुढप संगसें दरदं दे ।
प्र ९ गुडुयोगराजवटी २ से ४ गोलो पानीसें देना ।
प्र २ घृत स्निग्दी तकां वटी २ से ४ पानीसें देना ।
प्र. ३ चंदप्रभा २ से ३ गोलोका पोहव उसमें ६ से आठ रत्तो शिलाजीत मिलाकर चौभाग्य चुणो अचलेहकै साय देना । महानारायण तेलमा कपडेकी वती मिगोकर गुह्यभाग के अंदर रखना ।
पित्तज योनि रेग—जलन होइ रकतस्त्राव होइ प्रखरमे कष्ह हे| गरमावान बहुत्या न हे| अगर गरमाधान हे तो ऋम माथ मे गरमंखाव या गरमपात हे|
प्र. ९ अवंलो चंपकुटी वेला ९, मुत्तास पितो तें. ९। अथवा महालाक्षादि तैलमे कपडेकी वती मिगोकर रख्ना।
कफज योनि रोग—पुढप संगसें तुस्ति न होइ खुबालो आवे, संगसें स्रावन हे| चिकना पानी गिरे । स्वियिलता होइ ।
प्र ९ सुर्णं वसंत मालती वेला ०.११, छोटो पीरळ तें. १, चावलकोंम अश्रक भस्म योगराज रसावन प्रत्येक एक एक तेंला सवं साथ घो टकर ६ से ८ रत्ती सगुहद्वार्शिकी अथवा रह के साय देना ।
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ये।निकडु-खुमक्की—उष्ण मार्गमे बहुत खुबली स्रावे, खुलनेनेइ पोछे वदन हो। वस्य मागपर लेइ करनेसे गमं शरतु रसनेस अष्का लगे।
प्र. ९. किसोर गुगळ, अभिन तुङो, विसतिंडुकांद वटी श्वारोग्यप्रदंनी चंदप्रमा इनमेइे एइ यांदे प्रकारकी गेोली येरय मात्रामे प्रात और सामको देन।।
हयमारादि तैल—घनेरका मूल निळेभ सेत पी.लक ढालोमिरच सेंवानोन हरड रसेइत निसेइम दंतौ मूल हंरदी दारिफल नागरमोथ म्रीमगणक फळ पाठा मगकेसर चिताक प्रतेक पांच पांच तोला ठेकर क्रूटकर उथमें पानी डाळ ९९ घटा मिगेओ रखना पीछे दूसर दिन उथमें ८०८ तोला घरेसांका तैल डाळकर पानेक अंश जल जाय जक तक पकाना रखना। इस तैलमें हड्डका फोइया चियवा कपढा मिगोइकर पुथ्य मात्रामे रस्ना राइोके रसनेनेइ पित्तर रहनेइे लाभ हेत। है।
ये।निद्राॐ मलटन—महालाक्षादि तेळ अथवा मुंगपराज तेलका फोइया मिगेइकर पुथ्य मागमे रखना। गुढ रोगेदरी गेोली ३ से ४ पानोसे देन। सुवर्ण वष त मारती ३ म ४ गेाली न्यशनप्रकारे साथ देन।
ये।निशूल—महा विषगम्र तेल अथवा महामरिचादि तेलमे कपढाका टुकडा मिगोइकर अंदर रखना और महारास्नादि कवाथ पिलाना भोर उपका घुया देन। वातविृद रस वातहिंतामणी वृद्धत गुऽल गम्रदेशरी घमभान मिल् कर ३ से ७ रती चौंठे देन। इनमको नेवमे।लो और ऐ।ही वोज समभाग कूट कर धुया देन।
येा नमे षद्रा मत्रा—अरशं कुठार शाकर लोइइमसुम सारसोग मस्म मत्रड कल्पवटी समभाग पीस ३ से ४ रती बाहुबाल गुडके साथ देन। मद्र-कासो।पदि तेलमे अथवा महालाक्षदि तेलमें कपढा मिगोइकर स गंदर रखना।
ये।निध शूल—शहारे आंन—वहडकी छाल मुग्ऱ- आंबली नीमकी छाल समीठ दार् हलदी. नागरमोथ सम समभाग कूटकर १० ठेलामे ३ ळोटा पानो डाळ उबालना।पीछे कपडछलान कर इसस वह माग चोना। काचनार गुगळ लश्र्मणा डाह प्रणाल विधी चद्रप्रमा समभाग मिलाकर ६ से ८ रतों कुटजाग्रवेइक साथ अथवा चांगेरी घृत अथवा त्रिफळा घृतके साथ देन।
ये।निहो।ध—गुऽष रोगेदरी आरोग्य वचंनी वृद्धिविधिओ वटी व्रम भाग पीव ६ से ८ रती कुटकादरी अमेइह अथवा मृगुधरीतद्दी विवेइहक साथ देन।
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हृयमारोगे तेल महानारायण तेल महालक्ष्मीदि तेल मेहे केस लमानि कवटासिगो कर अंदर रक्खना ।
योनि खाज—पीपल-श्वेतचंदनके पान नीमके पान अनंतमूल छाल सत्वुल्लकी छाल बेरकी छाल भंजन क्षकरी छाल समभाग कुट १० तोलेभर ५ नीरमे रमाल पिशाच हरते वक्तु उन पानीमें सोंड दिनरातें ४-५ दिनके घेईन । पद्मादि मो विलास तैला ।।, सुपा पटो तेला ।।, प्ररर कि तैल तिलक तैला ।।, दिश्र कर ३ से ४ रत्तो त्वच्यनप्रदाने देना ।
योनिरोगेधिलय—प्रसृत उपरान्त कष्ट होनेमे प्रवेशने मुरय वड भाग फटनेमे गम्भ विकृत द्रवमे यधार आनेशेअथवा वात जिते कफके प्रकोपमे रक्त रद्र हेता है । इस कारण गम्भ रद्तता नही । घ गम्भ देनेका कम आनंड आता है ।
प्र १ अनारके फूल और नरकेशर समभाग लेकर पानोमे पीसकर मदर टेप करना अथवा कवडेमें पोतली कर वड भवर रसना ।
प्र २ हलदी दारुहलदी कमल पुर्प देनेदार समभाग पीस टेप करना ।
प्र ३ धाइके फूल हरड यहेरडा सांवलां जासुनकी गुठली नीली (गोली) के पान सद् रमभाग टेकर पातेमे पेसड टेप करना ।
प्र ४ शांवला और करेलेभर मूल घप मात पानोमे पीस टेप करना ।
प्र ५ माजूफल और शिलारसकी समभाग पेसड माषा प्रमाण सेओगठी वनाना भस्म भागमे रसना ।
संभोगनी सेओठी—मोग तेला ।।, माजूफल तैला ५, कचूरे १, महेंदो वेह ।।, असगध वेह ।।, रेठमलकी गोद तेह ।।, जामफळ तेह ।२ वाहरलद्ने तेह ।२ सब साथ पौंच १ मासाकी सेओगठी वनाना । मलमलके कपडेमे उस डब्ब भागमे रखना ।
गुप्तरोमेश्वरी घट्टी—पारद गंधक रससिंदूर प्रभेल पांच पांच तेला, टंकण दारुहलदी शर्ककर हलदी वाचची दरड वंकोलाचन आंवलां दंवंग बहुफलें दमेधा मूल गोकह गिलोय मजीठ लेध्र सेओठ पिपल कालोमरीच सर्जनमालिक पिपरोम्फूल वरण छाल कांचीमार । अतीष वायविडंग सेभानोन शिलारस प्रत्येक ढाई ढाई तैला देना । शंमिका विशिषत मिलाय देवदार्वादि यवक्षार मावना दे कर ३ रत्तीमें गेली वनाना ३ से ४ गेली पानीसें देना । येनिके पद रे गमे लाभ कारक है ।
फट धुन—मजीठ मुलेठो मूल कुष हरड यहेरहा आंवला वलामूल मगेटो मूल प्रक्ष अजमेठ हरदी दारुहलदी प्रियंगु (घटंघो) कुषको कमल फूल कमरकं—
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विदारी कंदं प्रत्येष्ट पोटं पौंच चोला, हतादि के तो ४८, अष्टवर्गी तो ४८, सप्तके कूटकर सुव हृदय डुब जाय इदना पानी डाल-कर १२ घटा मिगो रखना । पोहें स्वमे गायका दूध परचा १० सेर डालना और गायका घो कडवा पण १ (रतल स्वर पाक नहेा जाय और पाक कडचा मो न युं ध्यानमे रखना । प्रत्येष्ट घृत और तेल्चा पाक स्वरपाक होनेमे द्रव्योड़ा गुण क्षीण होतां है और पाक कडचा रहेनेष्ट नहीँ होता इिसलिये प्रत्येक तेल घृतका पाक मध्यम र्सना ।
मात्रा ९ माझे × तेला । गर्मोंगयचो घोर्से (रतवा)से ममंचाव वय मभंपात हो जाता हे!, गर्माशयचो सूचन, कभल पथेएमुत्र हो! गया हे!, ऋतुके रोग प्रसर स्वांत मव चान यातीके सद रे.ा 'मिटते हैँ । इस्का सेवन करनेसे पुढयोंके दोन' देव मधुनेह प्रमेष्ट सरपावश्या कादिमे लम हेतु है । यह घृत क्षयेचोके मिश्रणिष्ट रोगोमें अन्य शौंपवीके घाथ अनुपान हरे मो दिवा जांतां है
वैद्यांक-विज्ञापन
श्रीकेश संतान नह्हि होनेका कारण और उपाय
जंतुसं च द्यारव—ल्केो गुढा मार्गमें विशेष प्रदार्थे जंतु उथरंन होनेमे व च्याल्न डष्मे वंकेए शयमय और पंछे मस्तक पोड होत । असुकार्डे पहिले दिंससे तीन दिन लक चर (रपाश)फी कुल थे! व!! को सुरगोके वित्तमे पिष्ट कर मलमल्को पेटलोमे घोए गुन्र मार्गमें रखना ।
(२) तेसप* (रतवा)से लंध्यारव—ग्रहामार्गसे मभीरायमें रतवा हो तो वल के शयम या माके पीले गुल-फू और मुखमे हर्द हे! । मजीठ और मूलीठी मूल शम मापे कूटकर तिलकाँ तेल मिलाय मलहम लेप्या सराकर मं दार्नोंमे पखाकर मलमल्को पेटलोमे रख गुह्य मार्गने ऋतुके शयमय पंहिले दिनमें तीन दिन लक रखना ।
लस्सनो ठेठ ३ रती, रतन मागोस्तर १ रती, घातवरी चूण' २ माशा सथ मिलाय राहद्र्चे या गायके घोचे, ऋतु स्तानके पोछे सेवन करना ।
३-चरखो 'चढ' मानेसे च द्यारव-गुह्य मार्गमें और गर्मोंदायमे चरखो चढ जाई हो तो स अपने शयम शौका करयने दद' होत । माहजीरा द्विदलिलो-घतावरी विदारी कद सम माग कुट'-४ सेर च -मासाकी पेटलो कर ऋतुके समय तीन दिन गुह्य मार्गमें रखना ।
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प्रमदानद रस २ रत्ती च मधुरप्रभा स्वर्ण वमंतमालती ३ गोलीं साताबरी-छूर्ण ७ माथा साथ पीसि साहससे ऋतु स्नानके पोछे देना ।
४-सूजनसे वंध्यत्व-ऋतुमागमें भौर गर्माशंकमें सूजन हे तो वंगके समय या पंछे मस्तक धोणी दाथका काढ़में दरं हे ।
सज्जखार हल्दी महेड़ा कनेरके शेषील समभाग लेकर पीसघर उसमें महा'नारायण तेल डाल दर पुट्ठ र में पेटलौकर ऋतु कालने ३ दिन रक्खना ।
शिलाजीत ६ रत्ती समाननी गे'लो २ युद्धोगेश्वरी ने लो २ साथ मिलाय ऋतु स्नान के पंछे प्रारंभ करना ।
५ शहदसे वंध्यत्व-पुय्यनागमें शहदो हे गद हेाती स गके पंछे पांचको लांघोने खुबरो आती हे ।
मेगदके घेज, घासेदरके वोज छोटीपीपल सम सम माग कुटकर भाषा तेला चूआंकी कपड़ेमें पेटलीकर पुष्टि मागमें ऋतुदालके तीन दिन रक्खना ।
सुवर्ण वसंतमालती वेधा oll, अभ्रक समम साबरशृंग मसम चे सठ प्रहरी पीपल प्रत्येक एक एण तेला लेकर पेसकर श्रीसीमे भरना टात काल ३ से ७ रत्ती शौभाग्य ग्रंथो अवलेह १ से २ तेला के साथ दिनमें १ समय देना ।
६ युद्धमागमें शहमोसे वंध्यत्व-गुह्यमागमें गरमो अधिक हेाता वंगके समय भदरके भागमें दर्द पोष हेाती हे ।
मूलेहठी मूल महेड़ा मजीठ घम मागसे कुटकर कवथ कर उघमें बफका कें या मिलेाकर गुह्यमागमें रक्खना ।
मुक्तापिष्टि तेला •ll, युद्धोगेश्वरी तेला १, चंद्रप्रभा लेह १ शिलाजीत मुक्त १ll तेला, शे'लाजीत १ तेला साथ पीवकर ५ से ६ रत्तो शहदसे अथवा व्यवनप्राश जीवन ये देना ।
७ भूख-प्रेरणके लपनहसे या किसीके मभिचारसे व ध्याद-दोषनेसे मन उदासीन हेा किसीसे वातचीत अच्छो न करे पुरष संगमे इच्छा न हे
दिन घुप का घुंवा भाछमें और गुह्यवाटलमें देना । नीमके पलोकेडबाल कर उघमें हल्दी मिलाकर गुय्यामागके घेरे रहना । श्री सुरतेश्वरी मायाद्रोही माला हर उत्सका पानी पिलाना रक़रखमें माला धोआनेसे मड़में पहिनाना ।
मणिद्रय पिड़ित वम तत्किलक मुक्तापिड़ो रकनभागोत्तर रक वम माग लेकर मोतदार ७ मे ३ रत्तो अपने नो मे देना ।
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संतान नहि होनेके ७ अन्य कारण
१ सगर्भे पीड़ने येनिमे कंप हो ता होतो कमल फिर गया जानना। इसमें कसायोया एक भाग, मोर पंखे २ भाग, फूटकर कनाय कर गुग्गुलमाग तीन दिन घेना।
२ सगर्भे पीड़ने कमर मे दर्द हो तो गुह्यभागमे गरमीशयमे वायुका प्रकाम अधिकु घमझना। ऋतु स्तान पोछे ४ दिन तिलके तेलसे हिंगशे पकाकर उसमे कपड़ा मिले।कर गुह्यभागमे रकना।
३ सगर्भे पोछे पांचवी पिंढ़ो (कुटणफे नोंचेके भाग) मे दर्द-पिंढ़ा होतो कमल पर मांध बढता हे समझना। शहदशीराश और दाशीकानख शममप सरसोंके तेलमे पकाकर उस तेलसे गुह्यभाग ३ दिन घेना।
४ सगर्भे पोछे दृढ़यमे दर्द हो तो कमलमे बंधु जानना। मक्कर हरड़े महेड़ा फूट मिलोकर उस पनीसे ३ दिन गुह्यभाग देना।
५-सगर्भे पोछे दाह जलन हो तो कमलमे गरमी शौर वपा हुमा रकता हू समझे। उसमे रक्तुस्थानमे खून काळे रंगका गिरता हैं। हरड़े महेड़ा आंवला चना वड़ीशोप (वरीयाली)का कष,म कर ३ दिन गु भाग देना।
६ सगर्भे पोछे पसीना मादे शरीर ठंडा पदे तो कमलमे कफ पित्त समझना। तिलके तेला १० मे काली मिरच तेला ०१ कनाब कर उससे अनेनद्रिय देना।
७ सगर्भे पोंछे वेल सफे नहि घवराहट हो हिस्तीदिया जीवा चिह्न होतो मृत प्रेत वाधा जानना। इसमें कपूर केशर बदन गोरोचंनचे मेजपकापर मूत नेवरी गायकाका मदा लिविद गुगलका घूर देकर तावीजमे चाल पड़े या माहुमे वानना भोर हंमेशां गुगलका धूर देना। अथवा सफेद फटहरीडा मूल ०१ तो, पावल के पानोमें पीस पिलाना। पुष्टामागमे हिंगघुपका धुना देना। पुत्रप्रद रस
पुत्रप्रद रस—अब्रक मस्म था ५, पूरणचंद्रोदय तो। ९, लोहमस्म था। ५, स्वर्णमस्म मुक्ता पिस्सी रौद्य मस्म त्रिव ग भरम रफाटेके पिस्सी इलायची चिनीकवाला लवंग तज केसर कत्तूरी. प्रत्येक एक एक तोला, घिलाजीत ३।। तोला, खरदेखा विविधत मिलाय हातावरी रस शिलाजितगी पंचांग त्रिदारी केंव प्रत्येक खरदेखा विविधत मिलाय
रस्की एक एक भावना देकर घायमें सुभाकर घोंटकर रखना अथवा २ रसीको गोली वनाना ३ से ६ रती मे अष्टचूर्ण छोयं, मधु मिलाय शहदसे अथवा दूधसे अथवा च्यवनप्राश-जोवनसे देना।
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गर्भधारण चूर्ण—अश्वगंध शतावरी विदारीकंद शोमलता तृण सफेद मुशलो सफेद कटहड़ी मूल द्विवलिंगी बिजया चोज नागकेशर यलाशीप मैनफल स्वय समभाग कूट दर प्रतिः २ माशा ताइके दुवषे ऋतु स्नान के पीछे देना ।
गर्भधारिणी वटी—शिवलिंगी बीज तेला १०, बिजया बीज तेला १५, पूण चप्रोदय स्वर्ण रौँध लेह मंग त्रिभ ग प्रत्येक की भस्म, प्रचाह पिष्टो मुक्ता पिष्टो स्कांटिक पिष्टो मोनफल शरपुंख मूल मूलेठी मूल एफेक ५ म॔न प्रत्येक एक एक तोला, असरंघ शतावरी वाराहेकंद मेलाकंद पहुपलनी जगदेक्शर कृष्ण म॑ड़ची तलवणी (शुकचला) अड़ूसी फूल सफेद प्रत्येक हेड तोला, मछुछ्रगों १२ तोला विभिन्न मिल'या शतायरी रखको और'विदारी कंद रस प्रत्येक को एक एक भावना देखर पीछे कस्वरी और केंफर बाधा बाधा तोला मिलाके देा रतीकी गोली बनाना । गर्माशय के मबरोग सदैव मिट कर सतान होता है । हमेशां प्रातःकल स्नान छर सूरपं के सामने खड़े है; प्रगाम घेर ३ गोली चावदर दुवषे लेना । ऋतुकाल के ३ दिन गोलीं बद दरना । गर्माशयान हेाते पर थो गोली चहिे रसमेंना । गर्माशय के गुह्य भाग के सेद दाह विकार मिटकर गर्माष न हेातर है ।
गर्भप्रदा वटी—अभ्रक भस्म तोल ५, मैनफल तोल ४, नागकेशर शतावरी अश्वगंध मयूर शिक्षा लक्ष्मण अभवा सफेद कटहड़ी मूल मूलेठी मूल वल मूल शिवलिंगी चोज प्रत्येक तीन तीन तोलश अष्ठवर्ग १६ तोला शिवलिंगी पंचांग के रस मे ३ रती को.गोली बनाना प्रातःकाल ३ गोली दूषे लेना। गर्माशय के सघ रोष दर होकार गर्माषान हेाता है ।
लक्ष्मणा लेह—आसुनमें पकायी लेह भस्म तोला २०, रससिन्दूर तोल २। अशोेक छाल हरा मृदुल मद्दर्या (पलुह) पुष्प मृलेठीमूल वका बोज पारा मिलवगमें शतावरी अश्वगंध मैनफल प्रत्येक चार चार तोला, सांभ मिलाय शिवलिंगी के पंञ्चा के क्वाथकी भावना देखर छायामें सुखाकर घेट रस्खना । ४ से ६ रती जाददषे ऋतुबती । ऋतु काल के ३ दिन सोंद रस्खना दूषे देना । गर्माशय के विकार मिटकर कमल यथायेस्य दिष्ति में आकार गर्माषान हेाता है ।
सेापद्रुत—घरपुख मूल घरसेा आंभी शा चावलो पुनन'वा मूल शतावरी कुष्ट मूलेठी मूल कुचकां हिलदो पजोठ पाटा मोगरा देवदार तलवणी भहिंसी प्रत्येक एक एक सेर, हरद वेडा आंवला प्रत्येक देोषे सेर, सारिवा ३ सेर सवकेा कूट पानीमें १२ घंँटा मिगो रखना पीख उसमें मायका दूध सेर २० और घो सेर ८० हतल कर पकाना पानी का अंश जल जाय कम कपस्ठाम हर
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रखना। मती ७ से ४ थैला। इस के सेञ्चनथे स्त्री के ऋतु के शबद्देष गर्भाषयक। विदार युग्रमाष के रेाष प्रदर सेाष रेा' सफेद स्राव सादि और पुषषे के मूत्रदेष शेय'पष पिटवे है।
स्त्री और पुषष के ऋतुमे अथवा बीर्घ मे संतान होने नहि होने की पहिचान
कुंथाने अपन्या जमींन मे दै खाथा कर मिट्टी डालने मे राष्ष बेना पीथे २४ ने ऋो और एकमे पुषष हमेशा विशाष करे। तीन दीन करना ऋो और गुथपरा बहुठा पर निशान रखना। पीथे जिषके कुंड़मे या खदूड़े मे राष्ष थगे रथड़े ऋतु और बीर्य मे संतान होने का जोवाणु है। एैथ समकष्ना और न थगे उजंने ऋतुर्थी मे नहि है। यथ जानकर थौषष थेवन कराना और पृथक रे दहिने पर उपर लिखी पहिचान करा रे रखना। एैषा समज कर जिषके पिष्याबसे रक न उगे है। एष्केई मंत्र पाठ पूण आदि संतान देनेवाथे प्रदेय कराना स्वोर भौंवर्थ सेवन कराना पुष्पथी कम ताकत होती वज्रोथरण पौष्टिक शकि पर थौषथ थेवन करना।
अथर्वदिंदवतेन् पुष्नीक पुत्र हो। गर्माधयान के पोछे दै। मात के पोछे ६१ ६२ ६३ तीन दिन और ८१ ८२ ८३ तीन दिन भाग के वोज २४ रतो रमे दूध के साथ खिलाना। और २४ रतो पानी मे पीस पुष्य माग मे छेप कं दूध पीती हेा उस्केा पुत्र हो। एैषा शास्र मे लिखा है।
अथर्र्वज प्र प्रयोग—काकजञ्चा यह है कि एएकबार सतान होकर पोछे नहि हेाता काकजञ्चा जहां किष्ह स्यान मे है यथ जान लेथा पोछे ऋो ने रविवार के दिन थांपको सध्या समये काकजञ्चा भूयको पाक जाकर ऋुप के नीचे दाथल पैषा मंग। सुपारी घर कर कह्ना कि दै काकजञ्चा देती संतान के लिये में थगणगो रविवार के तुझे ठेजावंगी मेरी मनकामनां पुरी करना, कह व यथ यन थेना। और प्रतिदिन उसके मूूलमे ७ दिन तक दूध डालना। पोछे रविवार के दिन काकज घा का ऋुप मूल सक उखाड़ थे आना और छाया मे सुखाना पोष कूट कपदक्षान कर चूण कर रखना पानिवार के दिन घमाषा के आप डाण दे आना और मूूल मे दुध डालना सुपारी पैथा नावल घरना। दूसरै दिन रिवारके प्रात कालमे घमाषा के थे आना कुट कर एपहछान चूण करना। पोछे काकजञ्चा चूण और घमाषा चूण साय मिलाय महदसे २ माषा की गोली बनाना। हमेधा २ गोली बूथसे थेना ७ दिन तक नशक नहि खाना। दूध चावल गेहुकी मोटी रोटी खीरका भोजन कर ऋतुद ऋान के पोछे ४ थे दिन प्रारमभ कर १४ दिन तक सेवन करना काकजञ्चा के सतान हेाता है।
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गर्भ प्रतिबंधक
कारण—ऋतु स्राव के समय बहुत संतान होनेसे शरीर शिथिल कृश कमजोर होता है इस लिये सतान बन्द करने का उपाय करना ।
गर्भनिम्रह चूर्ण—छेटी पीपल चरादाना मायविडंग समभाग पीस कर रखना । ऋतु स्रावे जय पहिले दिनसे y दिन तक प्रतःकाल मे २ माशा चूर्ण पानीसे देना ।
गर्भनिग्रह मलम—ढाक के बीज सोहागा y, शेरदाना वा y, वास-विट ग था y, फिटकिरी वा 9 भनार के फूल वा २ सब पीस छोट मछोन कर पो शहद मे मलम करना । ऋतु स्राता होने के पोछे गुप्त माग मे लगाना ।
9 माजुद के फुल २ सुरकामे पोष ऋतु स्रावें नह 9 ठे दिनसे ४ दिन तक खाना उपर ३ से y ठाला गुड खाना ।
२ ढाक के बीज काबला कर वह मद्य २ से ३ मासा पाथीसे देना ।
३ शेनागेठ इलायची इलदी कचुरा तज योनि माग कूट कर ऋतु स्रान के पोछे y थे दिनसे y से c मावा रातबासी पानी के साथ y दिन तक देना
y से'चानोन का हुदृडा के तिलका तेल लगा कर गुदा माग मे २ घंटा रख कर पीछे पुष्प संग दरने से गभं नहि रहता ।
५ ऋतु स्नान के पीछे yथे दिनपे निमकी छालका भुका गुप्त मागमे देना भुका अंदर जाय इस प्रकार मलि द्वारा देना । तीन दिन तक देनेसे सतान नहि होता ।
६ माशा y फिटकिरीका १० ठाला पानीमे घोलकर संग के पोछे इसको पिचकारी देनेसे गभं नहि रहता ।
स्तन पाक
१ कांटा भरोळोया के पानका पातीमे पेष घीमें डारा पका मर चोदा पाक पर पोडीषकी तरह लगाना ४ दिनमें दुःख भाती है ।
२ नीम के पान वचकी छाल हलदी बकायन नीम के पान कीडाम'री योनि माग कूट कर उसाल कर यघ पानंदे धोना ।
३ जात्यादि मलम या जात्यादि तेल अथवा महानारायणादि तेलसे लेपड मिलोकर स्तन पर रख वपर पीपलका पता दाबाकर पाटा बांघना ।
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४ लोध पपंड़ी की ओर गुठल आरारपष्ठनी केवरासि गोली मे से विधोक्ता सेवन कराना।
स्तन शोध सुजन
१ दशांग लेध पानीमें पीप गरम कर लगाना।
२ सेनागेरसमें मधु मिलाय गरमेंकर स्पाकर पाटा धोचना।
३ इंद्रायण मूल और फल और मोमकल्का पोष गरमं कर लगाना।
४ हलदी और घतुराका पाम या मूल पीस गरमेंकर लगाना।
स्तनकी शिथिलता
कारण—गर्भंपात गर्भाशय देनेसे, ऋतुचातसे अधिक घं'ताम हानसे स्तन चिंताप्रस्त मन रहनेथे पेषण स्तंभ धुराक न मिलनेसे, प्रवीत रक्त प्रदर स्तत रहनेथे स्वाभाविक शरीरका बाधा निंब'ल हानेथे पद्या या कपढा स्तनपर दब कर योंवथे रहनेथे छतिविपयसे स्तनका विकास हेन्या दुध जाता है इत्यादि कारणोसे कईं कोळो के स्तन शुध्द कम विक्सित और शिथिल होते है।
कंटकारी मलहम—छोटी कटदरीके बीज वटांकमौञ्ज शरसे कष असगंध वच गज पोपळ वचश्राग क्रूट महीने कर घोये मिलाना हेमेशा मालिश करना स्तन और शिश्न पुष्ट मेटा हेतो है।
कुष्टादि मळव—कुष्ट असगंध वच गजपोपळ सम श्राग क्रूट महीने कर घीमें मिलाना। हेमेशां मालिंस करना। स्तन और शिश्न पुष्ट मोटा होता है।
श्रीपर्णीं तेल—धोपीला* (लीनवो) के फल और छालको दुष्मे पीप तिलका तेल पकाकर मालोव करनो।
लोध्रादि तेल—लोध्र सफेद कचोय असगंध मजीपाळ सम मान ठेकेर तिलके तेलमे पकाना।
वच्यादि तेल—वच अमार छार्ल गोरखमुंही चम श्राग क्रूट कर १२ घटा पानीमें मिगो रख खरसोंका तेल पक'ना।
शोके दुग्ध (भावण) का विवरण
कारण—उपदंश आदि रोगथे, प्रमेह उपदंशाथे पुथवहं संगथे प्रवृत्ता अवस्थामें यथिय शरीरवार मथि जिनेथे आहार विधारकी स्तनियहिततासे शोका भावण र्निगरता हैं अल्प हो जाता है ताकी वच्चाके पेपण नहि होता।
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दुग्ध वर्धन चूर्ण—अतीस ठेला २॥ सतालरी तेला १०, विशारी कंद तो. १० शतगंध तो ५, शर्करा तौ. २५, ईशका मूल तौ. ५ आंवला तौ. ५, बलाधील तौ. १०, तालमखाना तौ. ५ सब कूट कर माक्षा ० सेर॥ तौला घृत शहद या पुष्पमे देना॥
स्तन्य शुद्धि रस—पारद गंधक रौप्य हेमम प्रवाल विष्णो भृंगो ५ भस्म माक्षीक भस्म कुट्ट्वो भांवला त्रिद्रीकंद भतीस नीमफे वीजकी गोंद भमीपार १ द्रव्यो कछू सतालरी असा'ल घृत एम भाग विधिवत मिलाय सारिणा और १ माझो कौड सतालरी के रसकी भावना देना। थोका धारन क्रत्द हेाकर बढता है।
कान्तिप्रद—रक्त चंदन ढाकका फूल मूलेहठो मूल मेढ़ा निंुका केसर कस्तूरी (कस्तुरी) प्रियंगु (घउ लता) मे'दो' हरदी दारुहल्दी गेरोचंद मैनश्रील सतालरी विदारीकंद पद्ममाखा कपल फूल वचक्री वच नाग केशर प्रियेक द्रव्य एक मेठ तौला चूर्ण पद्मीनी लाख तौ. २० सद्देरे कुटक' बदरीके दूधमे मिगोना पीने आवश्यकत हे उतना पानी और तिलका तेल पक्कासेर २। ढाल कर पकाना। पानीका मल जल जानेके कपडछान कर रखना शरीरका वण' (वान) अच्छा हेाता है। मुख सुंदर हेाता है। खील मसा काला दाग मुखकी झाई भांतिदे मिटते हैं॥
सौदर्य वर्धन लेप—लोध्र भूडेल्किका मूल सरसों क डे तिल शहजीरा जीरा सममान कुटकर रखना चकरीके दुथ्से अथवा पानं मो पीष मुखपर मालीस करनेसे मुप्का चाल। दाघ हपंग द्वाइंद खील आदि मिटाकर मुख सुंदर हेाता हैं॥
शरीरके सुगंधी करने नर सुगंध लेप—लोध्रची कचूरा तमालपत्ता सफेदचंदन चाला हरड़- सद् जानाकी छाल नागरमोथ कछू रम भाग कुटकर रखना स्नान करनेके पहिले पानीमे मिलाय मुख धोए और शरीर पर मदन कर स्नान करनेसे शरीर अच्छा सुगंध युक्त रहता है॥
मुख दुर्गंधक चूर्ण—केशर कछू जटामासी हलायच्ची सम भाग लेकर रखना १ मासा पानो से टेनेसे मुखकी दुर्गंध मिटती है॥
शरीर सुगंध लेप—हरड लेोध्र नागकेशर हलदी सोंकिदचंदन नागरमोथ नीमफे पत्ते सातिवण अनारदोछाल कचूरा सम भाग कुटकर पानीमे मिलाय सारे शरीर पर मदन करना। शरीरसे आती हुई दुर्गंध
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पंसोना को दुःख मिटती है । कासमें मर्दन करनेसे कासको दुःख मिटति है । कोलोके पुष्पभागमें स्नान दुःख इष्ट चुभंक्षा कमाय कर प्रक्षालन करनो ।
सर्व रोगांतकफी वटी—परद गंधक लेढ़ रसप' मार्शिळ यक अभ्रक प्रत्येक मिलम प्रमाण वंद्राळेशन प्रत्येक लेढ़ लेढ़ विड़ा, शिलाजित ३२ तोला गुलम वे। ३२ तोला पंपळ मिरच हरड़ महेड़ा आंवला वायविड़'ग नागफेसार
नेषवलि,नीम तज वपातपक इलायची नागरपोथ जटामासी पीपरीमूल सेंधानोनं विड़ाक सारिवा कचूरा भतीच कपुरकाचली श्वेत देवदार वायविड़ग (रफणखाल) मजीठ बाकर हलदी निमदीपकी नीरी प्रत्येक चार चार तोला सघ साध विधिवत मिलाय मानिन के १५ में घोट रे रतीको गोलो बनाना रे । थे y गोलो पानीसे देना । एरंडोके श्वुदेप मर्यादान विकार पर्माशयके (रतवा) हीड़ीरीया कपुरोरी चककर अम मर्दमि पेटळा वायु प्रभूता सुनीलाके रे ग मर्माके रोग
त्रिमान हृदयका रोग आहेक्का रोग हृदनध रफणभ रेग मार्शिक शर्मकी अनियमितता रक्त प्रदर सपरें चिकना पानी पीनां आदि रोगोको मिटाता है ।
मदुराष्टक रस—(रफणयुक्त) पर रद गंधक लेढ़ मरम अभ्रक सो'बरदसो ग मार्शिक लेढ़ रोग्य प्रत्येकही मधम प्रक्षालदिसठी मुखा विष्टी प्रभेक चार चार तोला सर्ण' मधम १ तोला, वंद्राळेशन शेंठ पीपल कारोमिरच तज लङ्ग ग इलायची चो'गेक्वाल नागफेसार जंभीरीफल अगद शफेद चंदन रकच'दव अतीश कपूत
काचलो काला ह'गराज हरड महेड़ा आंवला सारिवा मजीठ प्रत्येक एक एक तो. लविबत मिलाय केवडा के जलको मावना देखर सुसाकर रसाना । मात्रा ३ से ६ रतो पानीसे त्रोंमोफे ऋतुमे गभर्माशयके रोग म्चेत रफ्फ प्रदर पोर हृदके कारण
देथे हुने उपरम शांत हेतले है ।
प्रपदांतर रस (रफण' युक्त) पारद गंधक ह्मण' मरम शिलाजीत रौप्य मरम ह्मर मरम प्रक्षाल पिष्टी श्वेत सम भाग लेना, चिबुकरा कषाय त्रिफलाकषाय की मावना देखर रतो प्रमाण गोलो बनाना । २ से ३ गोलो पानीसे देना ।
क्रोमो के ऋतुमे गभीरयके रोग श्चेत रफ्फ प्रदर हिस्टीरीया दिमाग हृदयके रोग मिटता है ।
स्त्री नपुंसक-कामाशा कारण चिन्ह—जैसे पुरुष नपुंसक होता है उसी प्रकार स्त्रोंकी भी युग्य भाग के लिंग अवयवके विकारसे कामाशना नष्ट होती है । पुरुष जिस प्रकार हस्तदोष
-से स्त्रि्य साधना तुष्टि करता है उसी प्रकार स्त्री लिंगाङ्गति वस्तुषे काम वाशना
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चूर्ण करलो है हव फारणसे और किसौका जन्मरोगेहि कामवास नदि हे तो और-पुरुष सा रते प्रति स्मार्तर अनिच्छा होती है । यनसे जो भातंव चरवन्त हेाना चाहिये पह नदि हेाता ।
पुरप नपु सक फे लिये नेा भौषध दिया जाता हैं पक भौषध जोगे मो गुणकारी हेाता है । पुंग'nचोदय को गेालीया वस तकुपार महालक्ष्मी विशाख वंग मत्तन छेद भस्म स्वर्णं भस्म भस्मि वचिर्त पाम्ना मे विशेष समय तफ देनेसे लाभ देता हैं ।
६मरेान्माद हिस्टीरिया
कारण—सार्म्मावाय के रोग दिमागको कुपनेरी मग द्रोक कामविकार लिंगाकृति वस्तुये दस्तरदेव, विषय दूषनाकी तृति न हेोना हव पुर्षषये संगकी तोंव इच्छा पूर्र न हेोना शरवो बहुता झांधे मे पेटमे वायु प्रदीप इत्यादि कारनेोे दिमाग मस्तिक्क पर धुक्रा चसकने पहुँचकर और दिमागमे खुरखा चहक्शा लगनेसे यह मा दर्द् हेाता है ।
मुकुटेष्टरी पथरी—पारद गंथक रवथिदू! ठेह भस्म अभ्रक भस्म विलाजीत पाचनार । याविष्टं गोोलावा का मत्तन (गिरी) काढे तिन् पुरुषकर मूल रेाठ प'प्रनल काली मिरच मागारमोय इलायचो गोेक्रुड़ मिंठोय हरड निर्गेाष अजरेाद वच प्रत्येक पांच पांच तोला गुगळ ० तोला मिलाय पा खावल्सी के रस या अमाथ की सामपात देफ़र २ रतो को गे'ली वनान्ना । ओोको द्रिस्टीरियत दिमागकी चमनोरी आादि मिट ता हे ।
हिरद्रोग गुगळ—पारद गंथक र्मथिदू! प्रत्येक पांच पांच तोला, माक्षिक्क मत्तन विलाजीत रेाठ पोपल काली मिरच वहलको ढाल कौंचन र ह'ड़ कनक बीज निटेएय चित्रक निर्गेाष दतमूल नागरमोय वायविडंग वलामूल सत्तावरी हिधादरा गुंंफाशा मूल हुलदी धनेीमा राथ्ना प्रत्येक चार चार तोला गुगळ १०० तोला दस्मूल के कवाथकी माथन| देफ़र २ रतो को गेाली वनान्ना २ से ३ गेालो पानोसे येन्रा । यच प्रकार के वातरोग स'चि्ता हिस्टीरिया भावते के रेग पक्स्वात अगदि मे गुण्कारी है ।
स्वप्न दोारिष्ट—अश्व गघ तोला, ३००, शफेद मुसाली तो! ८०, मजीठ हरड दालद' महुऽडा का फूल राथ्ना विदारी कंड़ अजुंन छाल नागरमोथ मयूर शिखा प्रत्येक चालेाष चाल पा तोला, अनत मूल वारिवा शफेद चंदन रक्खचंदन वच (चित्क प्रत्येक बत्तीस तोला कूट " मंथ पानो मे उबाल कर पीलो अच्छा
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कठोली में पथ्य प्रयोक्त के छाप द्रल कर उसमें अड़हुल के फुल तैल १२८, सहदेवर १०. नागकेसर तथा तमाल त्रिफला सोंठ पोपल प्रत्येक सेमल घेलद तैल और गुड मेर ४० द्राश कर कठोलीका मुह बन्द दर आसवकी रीतिसे रौवार करना २ से ४ तौला मात्रा। हिस्टोरिया मूत्रकृच्छ अपस्मार मृगी चत्मार क्लिष्ट प्रवेशर शादिमें गुणवारी है।
सूतसेक्वर (स्वर्णयुक्त) पारद गंधक स्वर्णं मस्म टंकण शुद्ध वङ्गनार सोंठ पोपल कालोमिरच कनक खाज ताम्र मस्म तमाल नागकेसर एन्चों घंघमसम निचसमुद्र कचुरा पथ शममात्र लेकर विविधत मिलौम मांगरण के रसकी माथना देना। गोली १ रत्ती प्रमाण धरना मातृ पित्त कफमर्य रोग श्रमकपित हिस्टोरिया सकरोग्नमाद कल्हपेशर मेस चडना दृढ़ दाह शातोका रौग दूरमें गुणवारी है।
वाल रौग बच्चों के रौग
जन्म कृत्य—बच्चोंकी जन्म समयकी सारवार--बच्चा जनमते हि पहिले भावमें रेने लंगो वह बहुत बच्चा है। रेनेसे शरीर पर भच्छी भंसत होती हैं। उसके फेफडे फूलते हैं और श्वासोच्छवासका मद्द मिलती हैं। जो मेलो-मपरासव निकल आनेके पीछे हि बच्चाकी नाल काटना, यदि मेलो बिना गिरे नाल काटा जाव तो मेलों कफेजमें चडकर श्वासका दंघम हेतनेसे स्त्री मर जातो है। इस लिये बच्चाका जनम हेतनेके पोछे मेलो न गिरे यहाँ तक बच्चाको जमीन पर बिछाये कपडेपर सुलाये रखना। मेलो गिर जानेपर बच्चाकी नाभीसे ६ या ७ अंगुल दूर सुतरकी धागा बाँध दर मेलोकी मोरके आसमे दा माँगल दूर कदनासे बा कातरसे काटना। न'ळ नाभिसे जितना दूरसे काटा आय मस्ता सामखालो होता है। पहेलेके समयमें ८ से १० इन्ज दुरसे कातते ये पर न इतने लंवे नालकी रक्षा करना कठिन है। ता है इस लिये बार पौष हूंचके दुरसे काता जाता है। कातते वक्त नामीसे लगा नाल खोंचा न जाय यह सम्हाल रखना। थो घंटेसे कमो नाल टूट आनेसे रखलाय डोकर बच्चा मर जाता है।
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बच्चेभो मुलायम नवमी पर एक प्रकारका चिकना वेष्ट जैसे 'पसाव' चुपच हुम्रा होता है यह निकालते वरवत समाल रस्ना । पहिले खेभपरेका मातिल्मा तेल घीरेसे लगाकर कपडेभे पार धारीर पेंछ ढारमा ताकि चिकना पसाव निकल जाता है। पेंछे येभा गम्भ जलसे अच्छे साधुनसे अथवा रीठे के पानीसे स्नान कराना पहिये। पानीसे धोकर कपडोभे पिटाल कर वे तोल कोटी चम्मच पानो मिलाकर छोटी चारपाई (खाटलो) मे सुलाना और उसे शांतिसे सेःने देना।
नाल काटनेके पोछे मेलोकी एक हाथ गहरा खड्डा कर रखा हो। उसमे चार, पाव सेर नमक डाल उपर मेलो डाल फिर उपर नमक चार पाव सेर शाल मिट्टी दाबकर उपर पनभर रखना । गहरे खड्डे मे मेलो डाल उपर अचके प्रमाणमे नमक ढालनेसे वह सुरक्षित्र रहनेभे यचचा भाग्यशाली होगा है । बदरा ऋम रहरा हो। और मेलोकी एक जनावर निकाल कर खा जाता है वे वह वचवा कमनधेनु सुद्दिहोन होता हैं। आदमखोर 'विना नमकका' ईस प्रकारकी गाली देनेमे भातो है इसकी रहस्य यह है । वच्चाको स्नान कराकर नाल पर वेह दवाकर पांती वांधना वह त गहो। माभी पर नाल लगा हो उस पर हमेशा तिलक तेल अथवा बालमे डालनेका घुपेल तेल ढाकरते रहना और ६द मे हमेशा बदलता रहना। १०से१२ दिन पेंछे नाल आप हि गिर ज'ता है । वह सुचा हुचा नाल एक शीशीमे भर वच्चेभो दनम समय लिस्नना । वच्चा विसार हो जाय यश उपका नाक घोसकर विलाया जाता है ।
प्रथवमे पोछे स्तनमे ३ या ४ दिनमे दुघ-धाघण आती है इस लिये वच्चा तक महतुदी पिलानेका रिवाज हैं । एक साल पुराना घृत १ तोला के पांच सात तोला पानीमे ड़'ल मिथाल कर वस्सेमे गायका घो ।। तोला ढालकर कुछ तांता कर (येभा गम्भ कर) करके फेंयायसे पिलाना, दिन मे ३ या ४ दफे पिलाना । हर समय येभा गम्भ कर लेना इससे वच्चचाके पोषण निफ्ता हैं और पेटमे जमा मल निकलता हैं। किसी वच्चचाके मल कम निकलते या निकलता हुवा अटकै वे वच्चा रोता हैं तब गुलमुवी मे दो चार, जुंद एरंड तेल ढालकर पिलानेसे मल निकल जाता हैं । जो मुख्य वच्चचाके प्रथम गुलमुवी पाता है उप्रे स्वभावका वच्चा रेतो हैं। गुलमुवी पिलानेके पोछे मुत्त गमा पानी सींगोभे कपकेके डुंकेसे योछ ढालना । यदि पिलानेके समय पारेभर पुढचा पानी वरता है। गिरा हो वे वच्चा रोता हैं तब कीड़ी (विपोकीरा) लग जाती हैं और वच्चा रोता हैं वह व निकालो जाय तो गहरी उतरेभे छिद्र पडते हैं और वच्च्चा मर जाता हैं । ईस कीड़ीभु गुझरातीमे घामेलियु कहा जाता है ।
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वच्चाके तें मरे दिन 'घवराना' (रक्षन पाश कराना) पड़िले हाथपे स्तनमसे मोडा। दूध निकाल कर पोछे इतनके वी टटो वच्चाके मुखमें देना जब आप ही मावने लगेगा और रहिके पाना छुड़ेगा' अर्थात् दूष'पे रतनमें दूषक। वेग आयेगा। कभो वच्चा सान्तरा नहि है जव हरड़ घो'पकर उपमें सेंधा नोन रतोमेर मालकर मेंगुलीषे वच्चाकी जीमपर घिसना 'सम तुत' धामने लगता है। किशो स्त्र'का स्तन मोटा और कड़ा हे तो घावते वच्चा वच्चाकी नाक दबा न जाय और दू'घ कफ न आस यह ध्यान रखे। घावण स्तनमें रद्दू, मर जानेके और उस समय क्रो दुमरेसे' बातचीत करनेसे वच्चा घ'वते वक्त अहेताराय जाता है अर्थात दूध स्वाद नली में चढ जाता है। जोर पोछे वच्चा को मारदो स्वांसी जैसे तक्नोक होते' है, दूध लिये स्तन पान शांतिसे कराना। घावण कम भावेते दूध वघंड़ मोषघ खोले देना और वच्चाके मायका या वच्चीका दूध पिलाना। सातना आंठना' मायपे साधा सुराख देना प्रारंभ करना।
२ महवाघा
कारण लिखे--जिस कुटुंब मे देवता पितृमो आह्मणे आहु सत गुरू मातिधि का सत्कार नहि होता, होम हवन देता नहि, शौच सोंचार पवित्रता रक्खो नहि झाती, दान नहि दिया जाता, तनखे वच्चे'के एकादश प्रहेको पोवा हेती है। महवाघावाला वच्चा मुंझ'tा है रेाता रे नमक जाता हैं। नव और दातसे मांस' और अपने वारीरके काटता है। उंचे देख कर चोच पाड़े मरांघा (जूंमा) खायो करे, भुइं'टीके वं'ची नीचे करे, मुंह्मे फेन आवे, वारीर क्रषा वनता जाय, रातेको लागे, शरीर पर सजन हो, दसत प्यादा हो, हगव बंध आया नहि होता, मोह शुध्द घटे !
एव प्रह घाघामे उपचार
१-- रकंद, रकंदीपस्मार शाकुनी पूतना गंघपूतना शीत पूतना मुख्प'चिका रौगमेय वादि महेकी माघासे वच्चाके मिल्न मिल्न विंड़ हेाते है। सव महवाघामे तुलसो हलदी गेरुखमुं'दो और धाला पेड़ समभाग कूट कर रक्ना येऊर चूना'के रसाल कर नवसेका पानी'ले वच्चाके स्तन कराना।
२-- सामान्य रीती'से वं'चीपाठक पाठ कराना। युगल नोम'गुंदेर नीमके पत्ते डे'वान हलदी च वन समभाग कूट धो मिलाय ३ समय वच्चाके धुप देना और वच्चा वाले कमरे में धूप करते रहना।
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सर्वंग्रह हर धूप—मपं की काँचली लघुन मोरचेल नीमके पान मेंढा घोंटो वच हलदी वरसोंं लेओान चावक पामली चंवन देवदारू पींछेे बाल सब घम आाव और समसे दूना गुल लेकर कूटकर घोका करमाा देकर रसमाा । यह धूप दिनमेंं २—३ दफे मच्याके शरीर केा देनाा और घमरे में करमाा ।
समच्छादानि लेप—सातवण कुष्ठ हलदी चंदन सम माग कूटकर पानी में मीलाान शरीर पर लेप करमाा ।
अष्टमंगल घृत—वच नागो कुष्ठ सरसोंा काली तुलसीके पान सारिवा घेघानेान पीसकर प्रत्येक दस दस तोला लेकर कूटकर १२ घटा पानी में मिलोाकर पीछे उस्मे गाय का घी घेर पांच पकानाा । यह घी वच्चाकेे १ सेर छोटी चमच्च गाम'कर पिलाने थे सब माल पहेर को पीड़ा नष्ट होतो है और वच्चा बुद्धिमान नीरोगी समाण वाजिखवाला हेाता है।
बालकरोग का कारण—वच्चेाके रतमपान कराने वालीं माता खान पान मे नियम मही रखती आहार विहार में अनियमित रहती है महाने घाने को स्वच्छता नहिं रखती, कपसा बिछाना मलिन होते है जब उघ के शरीर मे कृपित व तिस ऋफ के घारण विगारनेसे वच्चाकेे विभिन्न रोग-होते है ।
१ तृषा प्यास—वच्चाके झोव पडता हेोता अष्टमंगल घृत अभया त्रिफलाा घृत येह। योधा देना, माताकेा खिलामा सरतांभृत लेहा तोला १, अभृतां वचव तोा ३, प्रमााल चं द्रमुटी तोला १ मिलाकर ६ से ८ रतीमें चव्यनप्राश जोवन -र तोला मिलाय माताके देना ।
२ गलाा पहनां तालुकंठ—वच्चा गिर जानेसे बहुत रोानेसे तळ के माथ मे कफ देश प्रकुपित हें कर यह रोग होतां है । सब मस्तक के उपर के तालु मे खररंडा पड़ता है। हृदयतन पानी नहिं करता पतला दस्तत होतां है, तृषा लगती है । मरदन पतली हेा, शरीर कृश होने लगे ।
बालारोग्य घटी—२ गोली पानी मे पोष देना अष्ट मंगलगृत अपवा कल्याण घृत एक देा घेआतो चमच्च पिलाना। पंवापानी गोली पानी मे पोष देमा कुमार कल्याण रस •। ये १ रती घृत या शहद मे मिलाकर देना । इन्द्रजोई इलायची भसमोेद केाठा-कपिथ्स का गमं वायविडंग चम साग कूट कर इस्का धनाष कर शहद डाल योाहा पिलाना ।
मल दोष द्वी वस्री—हंराइची, जायफल,-फांव-श्राे, रसवोेग, हरड, राइं, घाइंका फूल?, मोचरस, बंलीगंभ, अभमोेद, अजन्मान्त पोपळ, भतीस अफीम शाकर हिलदो कृंषणपित्त रफ्खलपंर, सनीमस्तकी घृत दिंप्रुल, छोट, फेंटर,
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किरमाली अजमोआ, वागविशंग, ईनम्रजव, वाकुचा, अजूंन छाल, अव समभाग कूट कर दालिम के रसमें एक रातोंी गोलो बनाना। पानी से' पीपल घुंवद और ताम्रफे अनुसार गोलोंदो मात्रा देना। इस गोलीसे मच्छाकेा गला पचा हेा और इस कारण जेा कुछ चिन्ह हेाता हेा सब शांत हेा जाता है। और वच्चा नीरोगो भोर पुष्ट हेाता है।
३ वाळ विसर्प' वाळ रतया-पचासम्-मच्छेांदो मस्तक मूत्राशय अमनेद्रुक के भागमें विसर्प' रतवा हुवा हेा वेा वच्चाका मुखु देता है, विसर्पं मस्तक के ल्मणंमें हृदय में और वद्दींोे प्रदामे कनरता है। वेधे हो मुडाताल में' जिसपं हुवा हे। वेा युदा में' जासर वहांसे हृदय में हे'कर मस्तक में जाता है।
रास्नादि लेप-रास्ना, कमल पुष्प चंदन, मुलेठी मुर, देशवार समभाग कूट कर, गाय के दूध में' नीकसकर उपर में' येधा घो पीला कर तलगाना। पालविसर्प'हल् कपाथ---गिरेधाय छोटी बहुंदी, पेटेल, भारिक पानी, हरड, वहे'डां, आंवळां, देेसर समनताष्का गुड समभाग लेकर कवाथ कर पिलांना।
४ नामिका दोाथ-मामिला म'ल खो'चानेसे अथवा नामिके उपर कुछ चोट लगनेमे सूजन हेाती है।
विसर्पादि तेल-चिलदो छेआ प्रिमंगु, मुलेठी मूर समभाग कूट कवाथ कर उपमें तिलका तेल पकाना और लगाना और वचची के वड़ेांकेा कूट कर पानीमें' पीस कर गपं कर नामि के उपर टेप करना।
५ गुदाकी पाक-पित्त प्रदोषसे यह दद' हेाता है। जात्यादि मलम, श्यामक मलम, रेउंण्टि मलम लगाना। पीपलकी छाल भोर मडकी छालका कवाथ कर वह भाग घेनाना। रसांजन लगाना।
६ गुदाकी व्रण-नच्चोो द मलमूत्रकी जगहमें घेकर पाक न रखने से उधर जगह पर सुजली भाकर गुदाकी आषपाप्र कुष्ठी और व्रण हेाता है। उस में' से माव निकलता है और योग्य उपचार न करने से वह व्रण भयंकर हो' जाता है। कच्चे पांशका पीषा हुंवा चूण', काला सुरमा मुलेठी भूल सम'भाग कूट कपड छाण कर पानी में पीस ढेप करना बालांरोग वटी समवा स्वं'शमनी वटी देना।
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७ दांत धातु से सम्भके रोग—दांत भारे समय मचनेव्रे ताव अतिस्वार खांसी सिरदर्द' विद्रप' बांके उउना कुशता आदि दद देात है । यह हानि करता नहीं है। दांत भाजाने के पोछे आप ही भर गन उपश्र मिट जाता है ।
द तेअदुमेढ नदांनक घटो—अभ्रक भस्म, वच, मरम, टांकणवमम, मं०किफ मरम, पीपल, पीपरोमल, चवक, विडालक, सोठ अनमेष्ट, भर्ज इन हलदो, दारुहलदो, मुखेठो मूल, देवदार, रघांजन, वार्धिवृन ग, इलायची नागकेसार, वला, कचूरा, ककरासि गी, शे धानेक हपमात्र टेड़र गाय के दूध मे मुग जैसी गेलो मनाना । दांत भाजनेक शोर म हेा जबचे गन प्रात गाय जब तक एडसे दे गेलो पानी में पीव कर देना ।
मसूरिका घोरी मडहवडा Measles Chickenpox
कारण—तौखा, सट्टा नमकोन क्षारवाला मगोण करनेखाला घदा हुया रात्रि म्वो शुराफ लेनेसे वातप्रकोप, पीड़ा रे समप्र वेधनारा वातावरण त्रिदोष होनेसे पवन और जल विकृत होनेसे गुनमें मिलकर यह दद होातो है !
चिन्ह—ताप आये खुश्की हेा, वारीरमें बेचेनी, फेर चकर, चमड़ीमें श्रमय र गदा शोथ, झांखे लाल हेाती है । वायुप्रधान हेो तो काला लाल रक्ख पीड़ाकारी कठिन और देरसे पकनेवाला मसूरकी दाल गौरा दामर हेता है । पित्तप्रधान हेोतो शोथा और हदद्यमें दद हेा, झांखो आवे, शरीर कफे बेचेनी हे, तृषा, मोह, जीन सूखे, प्यास शगे. दाना काल पीला हेा और जलदी पके । कफ प्रधान हेोतो दाना घफेद सुलायम शुमली वाला कम पीड़ावाला हेता है !
इशका स्थान चमड़ेमे हेा हेातो पानीक परपोटा लेग दाना हेाकर फुटकर पानी रेलकडे । गुनमे सतरात हेातो लालो लिये फुन्सियां हेा । इश प्रक्रार मांस चरनी शरिय मजजो और वींय तक सतराता है । यह मोरी मंह शरदृतुमे छोटे बच्चोके, पीछे पांचके शारे हच्चोमे फेलता है । इसलए वच्चोंके आंख और नाकसे पानी गिरता है, कफ हेाता है छींक आती है बेचेनी हेाती है, श्वासका वेग बढता मसतक दुस्वता हैं दुसरे तिमरे दिन नग छाती और मुख पर लालो लिये दिखायो खेता है और पंछे शारे वागीरेमे फेलकर जामुन के रंग जेसा हेातो है । दाना निकलनेके पोछे ता प कर वेग कम हेाता है, जम झांखो और अतिसार हेानें कंगता है !
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ताप कवर हे। वच तठ पतला द्वाराढ देना। प्ररंभमे तीन दिन तकू-
रूप डांजी नही' ठना। पतले। भाजरीकी गुरवाली राम या मुंगका पानी देना।
दाद हे। ते। द्वाक्ष सुसमे' रखना और साहदका पानो पिलाना। दस कज्ज है।वो
हरदका वचाप पिलाना। चाकल मधुरकी दाल, मुंगकी दाल, भाजरीकी रोटी
इमका शराफ देना।
मसूरी शीतला रक्षक घटी—गारद ग चक अभ्रक मस्म प्रवाल विष्णो
चोह मधु रचिसिंदूर टंकण हरत बहेडा भांवला हलदी च दन मूलीठी शेठ
पिपळ दालो मिरच निम'हो चोम प्रियंगु मानेश्वेा टेसान प्रत्येक पांच पांच
चेा शिलाजीत नृसाल गेरुसमुंडो निमसिंह गोती दातात्ररी अभग घ कुटकी विरायवा
प्रत्येक दव दस ते'ला घटा विशेषत मिलादर गायकाका घो तेहला ४. मिलादर
अद्रसो चमेळी पप'ट (घडमलोय पितपापड) के'तानारो नीमडु पान प्रत्येककी एक
भातमा देकर्ं तीन सतोको नेलो वनाना २ से ३ नेलो पानीमे पोसकर
मदरिका शीतला आादम देनो। इस रोगकी शांतिर्नर होना हें। जप भच्चेएो
देनेसे दस रेंगका भाक्रमण नहि हेतो।
शीतला झांळी माता निकलना
कारण चिन्ह—शीतवा झोळो घात प्रकारकी है उनमे महती नामक
झोळो हि प्रवलित है। प्ररंभमे ताप आता है। दसना सात दिनमे निकल जाता है
दूसरे घात दिन पूरा भर जाता है और तीसरे सात दिनमे सुखाकर पपड़ी
(मिगडा) उखड जाता है। इस प्रकार २१ दिनकी मर्योादा है। जो देान्हडे कुटे
वडगर भारने उपल (अढायमाळाणा) की राख करड छानकी दुर दाषते रहना और
जोंमके पतवेसे पसकेंया उडाते रहना। तापसे प्यास लगे ते। ठंढा पानी देना।
रोगीहे। ससक्ल एकान्त जगहमे खुलाना। रकस्र्वला होने और अपवित्र मचुजपने
रोमीका दसवा' करतां नहि इसमे मदृथा औषध नहि दिथा जाता किरमी
मदृरिका शीतला रक्षक जे,ली भायु के अनुसार ९ से ३ तक दीजाय ते। लाभ
हेाता है। देह रोग शीघ्रमे है। इसकपे महा मनुसंडी केरकी हेाती है।
यह बहुत करफै चघंत ऋतुदू मे हेाता है। कमो चाढे जिस ऋतदु मे फैल जाता है।
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शीतला सोसौका दिसि शरीर मे प्रविसट हौने के पीछे १२वे १४ दिनमे डंठ गरमी सिरदर्द पौठ मे पीडा उलटी आदि चिन्ह दीखते है । पीछे गले मे शोथ थूंक को वृद्धि भास्र के पे.पचा लाख हो खाव मे दुरंघ आती है । बडे बचेोंफा घेम और छोटेटेभा वोचको-शाद्देष माता है । ताफे पीछे शीतलाचा दाना पहिले मुख और गरदन पर दिसाइ देतेहै पीछे मस्तक ललाट छाती और पाँवमे मालूम पडता है । दाना दिसनेके पहिले ताप शीतलाचा है या साधा यदि नहि जान शकते । सम्भर और पीठमे बकत पद हृदयकी गतिका यधिका देग अधिक वमन-
ये चिन्ह ज्यादा हौतेहौ शीतला भयकर रीतीसे निकलेका संभव हैं । शबरमालोफो शीतला मिसले थेा गंमपात है ।
दाना वाहर निकलजाने के पीछे ताप कम होता हैं । दाना पक कर भराता है कव फिर ताप अर्ता हैं । ताप शानेके पोछे तीसरे दिन शीतलाचा दाना दिसवता हैं वह कठिन हेता होता हे । उस दाना पर मेती पपता उसमे पानी भराता है और दानाफे उपरफे छामे छोटा सहडा पसता हैं और इसकें आपपास की चपदी काल हेती है । वे दिनछे पंछे उसमे पद हेनेसे वह पानी घट और सपकेद देता है और वह मेती कुनखोका रूप ढेता हैं । दे दिन पोछे उघ कुनसोफा उपरका माग काला पद सुनने लगता हैं और ४ से ५ दिन पोछे पपडो वनकर गिर जाती है । मांसमे घोली निकलनेसे सेकड ७१ टका रोगियोफो मांसमे फूला पडता है अथवा अन्धा होता है ।
मिलानेमे कमरेंमे चारोओर नीमके पते वाष्पना उचिच्छ मुखवालेो और अशुद्ध मनुष्यको रोगोक पास नहि आने देना कून्सीमे दाह जजने हेतो भारने उपलको राष्र क्रिकना चाहना ।
तापमे चंदन छोटी अड़दो पान नागरमोथ मिलेोय और द्राक्षका क्वाष-पिलाना ।
रोगी सुन शके इस प्रकार ब्राह्मणसे नष्टाध्यायो हुद्रीका पाठ चंडीपाठका पाठ कराना। स्वस्तिवाचन शंकर पाषंतेोका पूजन शीतलादेवीका पाठ कराना । शीतलाचा उपद्रव मिटने वलता थाे जब उस रोगोसे बचनेके लिये प्रातः सायं धूप करना । भोर श्री भुवनेश्वरीका छशो और चितामणी यंत्रको छजोकेा धूप दीप कर स्तुतिपढाना और शीतला स्तोत्रचा हमेभा ९ पाठ करना । भुवनेश्वरी हुद्रीका और रघुसुतवका पाठ कराना। इसमें शीतलाका हर्दो रूप मिटा देता है और अपने घरमें यह रोग आता नहि है ।
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शोतेला स्तोत्रे
वस्य ओ शीतला रथोप्रस्थ महादेव ऋषि: ।
अनुष्टुप् छंद: । शीतलोपद्रदशात्थ्य' अथे चिनियेग: ।
स्कंद उवाच ।
भगवन्न्देवदेवेश शीतलाया: स्तवं शुभम् ।
कतुमह स्यकोपेण विरफोटकभयापहम् ॥ १ ॥
घदेऽ' शोतालां देवो रामभस्यां दिगंबराम् ॥
यामासादय निवर्तंत विष्टेकभय मधुव ॥२॥
शीतले शीतले लेति ये। कूयाद्दाहपीडित: ॥
विस्फोटभय घोरं क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति ॥३॥
यस्त्वामुदकमध्ये तु धृत्वा संपुटयेमकर. ।
विस्फोटक भयं घोरं कुले तस्य न जायते ॥ ४ ॥
शीतले उदकमध्ये पुतिगंध मतस्य च ॥
प्रणष्टस्यशुरावुज्ण'सर्वामहुजी'वितप्रदा ।
ममारामि शीतलां देवीं रासभस्थां दिगंबराम् ॥
मार्जनीकलशोपेतां शूर्पाडंकृतमस्तकाम् ॥६॥
शीतले तनुजान् रोगान् नृणां हरसि दुस्स्त्रान् ॥
विस्फोटकविषोर्णानां तस्मैवामुर्त्वापर्णी ॥ ७ ॥
गल गंडप्रभा रोगा ये वात्ये द्वाहयण नृणाम् ।
त्वदनुध्यानमात्रेण शीतले यांति ते क्षयम् ॥ ८ ॥
न मांद्रो नौपधं किंचिद् पापरोगस्य विध्वरे ।
रवमेकां शीतले घाम्रो नान्यत्पदध्यामि देवतम् ॥ ९ ॥
मृणालत'नुसदृशो नामिहीनमध्यम'स्थिताम् ।
यस्त्वां संधयतेहेऽर्हीं तस्य मृत्युं जायते ॥ १० ॥
मष्टक' शीतलादेव्या य: ९देनमानव: सदृश ।
विस्फेटभय' घोर कुले तस्यन जायते० ॥ ११ ॥
मोत्रद्य' पठतनस्य च जनेर्मो'किसर्मन्वितै: ।
उपसर्गं विनाशाय परं स्वास्थ्ययनं महत् ॥ १२ ॥
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बच्चेकी खांसी—सतण्ठी चराध भराणो
कारना चिन्ह—शरदी लगनेसे, श्वास नलीमें घूल मात्न रजकरणे जानेथे, खुंवाथे गुदा द्वारे तापनें रफाइाथ के रोंगथे और सांधेथाले बच्चेकी सपर्श थे वह हर्द होताहै । जब श्वास टेनेथे श्वावनली मुत्रादर लाल होतोहै । पहिले फेफवाला पीछे पसलीने पीला, या कफेद कफ गिरता है । इस मुखनसे खांसी आती है। श्वास चढता है । हर्दयका सदेन हो । छाती चूची होतोहै । पांचसात दिनमें भाराम होता है । यदि यह उम्र ५ पकडे हो ४ मे १० दिनमे बच्चा मरजाताहै । यह रोंग ६ मासथे २ वर्ष आयुके बच्चेंमे होताहै ।
वालकफार्तो घृत—पारद गंधक कफकरासोंगी कपूर काचली धागर गोटाकी गीरी लवंग प्रत्येक दस दस तोला १• काली मिरच शोंठ वायविडंग मत्राखार पकाया टंकण पंपल प्रत्येक आठ आठ तोला, छोटी हरड २४ तोला, कत्था ५६ तोला. जमालगोटा तोला २० मंगराके रसमे कमाल गेरू'टाकेथे घोंट कर पीछे यव सथ मिलाय मंगराके रथकी भावना देकर मुंगा प्रमाण गोलो बनाना ।
वालफारिरिष्ट—पारद गंधक कफकरासोंगो कपूर काचलो सागरमोटाकी गिरी लवंग प्रत्येक दस दस तोला काली मिरच शोंठ वायविडंग जप्यासार पकाया टंकण पंपल प्रत्येक आठ आठ तोला, छोटी हरड २४ तोला, कत्था ५६, जमाल गोटा तोला २०, मंगराके रसमे जमालगोटाकी धोइकर पीछे यव वचथु साथ मिलाय मंगराके रथकी भावना देकर मुग प्रमाण गोलो बनाना ।
आयुक्त सन्निपात १ मे २ गोली पानी से देना । पहिले मे कफ बहा जाता हे निकल नहि सकत तब यह गोली देनेथे दस्त होर चमन होकर कफ निकल जाताहै । और बच्चा अच्छा होताहै यह गोली ४ से ८ दिन दे जातोहै ।
ल्वंगा'ष्टक—लवंग लशुन अपामार्गबीज अरारनित्ता (गरनो) बीज नच तज अंमवायन वायविडंग हरड शमभाग पोप रखना १ से ४ रत्तो पानीसे देना है
तांबुल के, पानके पीप बिना पानी ढालें निचोड़ कर रस निकालमे उसमें शहदरक का रस २ मात्ना डाल इसमे से लशुन पीसकर यह रस यालता पिलानेसे यंत्रणाम निकलताहै ।
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वड़ी खांसी कुकडिया खांसी उद्दात्तियु
कारण विल्ह—अथ रोग पाकमद् चेपो होनेसे एतद् रक्ताश्रयो होनेसे यथोफे घृतायप में भानेबाले या स्पष्टों करने बाले दूमरे वच्चोही होता है । महुत हर के पलेख मस्तकादेरो एक वस्तु यह रोग होता हैं । पंछे कमी मदि रोता । रे में १० पंचमी हनुम्र के बल्लेरा को हेतुता हैं ।
इष रोगमे खांसी भावे नन त्रिकोटो पानो जौशो आावाज होता है । पहिने आठ दिन तद् येधा मोटा ताप आता है पौछे प्रतिरामें (श्वासक्म) होकर सांघी करता है । खांसी आते वक्त मुल्त लाल हो जाता है । सांघी बंद होती है जव वच्चा रफने लगता है । फिर १५-२० मिनिट के पौछे या एड देर घंटा के पीछे खांसी आता हो । दिवस को अपेक्षा रात मे खांसी इतने जोरसे आाती है कि वच्चादेरो वस्त्र विधाव हो जाता हैं । यत् रोग १५ से ३० दिनमें मिटता है ।
वालकांश हरी कद्दी—एकतोया लवण हिंग हिरायचमल् सेधानोन समभाग केशर मदनक के रसमें सुण प्रमाण गोली वनाना २ रे ३ नोली पानीषे देना ।
वाठलत्त मन्द्र चूर्ण—अतिविष् घाइ के फूल विद्र फलका रासमं, घालामोय हिरड कदतारोंगु मुल्ताप कूट ५ से ८ रत्ती शहद से अयवा पानीषे सेनेषे इष रोग में लाभ होता है ।
वच्चोकेां आरोग्य रखने वाली औषधें
वालारोग्य चरौ—चायविडंग हरड मंहुंर मसम प्रत्येक पांच पांच तोला, अतिविष् १० तोला, लता, करंज बीज पिरो १० तोला, विडेकायका घन ५ तोला, कुड़ंकी छाल ५ तोला, लवग भारफल चायविडंग वृणनाइचेन अजमोद प्रत्येक तीन तीन तोला चूर्ण के दोदाके दवाथ मे गाली मुग प्रमाण वनाना २ रे ३ गोली पानीषे देना सब रोग मे गुणकारी है वच्चा निरोगी पुष्ट होता है ।
वाढायोगलो—जारफल वच्च वायविडंग हरड टोकान प्रत्येक पांच पांच तोला, कणक बीज पिरी लता करंज बीज मिरी मुंड़ो आंवला प्रत्येक ढाई तोला, शाबरधोग मसम वंकोटाचल वं'दन विडोय घन इक्षौ मदंर मसम अतिविष् हिरायची प्रत्येक दो दो तोला, तुलसी रस तथा कुशोमा के रस की एक एक आापना वेकर सुंग प्रमाण गोली वनाना । २ से ३ गोली पानीषे देना वालक निरोगी रहते हैं । वच्चोके वच्च रोगों मे गुणकारी है ।
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घालाक—यथा९ महम तेला ०, शतपों 'महम तैल २. गोराखप ते, ५, अतीविप कळो तैल २०, प्रबाल पंत्रुटी तैल. २०, शुद हिं गळे' तैल, २०, कचुरो तैल, २०, रेशार तैल ३ थम याथ पोलाय तुलसी के रसभे मोंट मुंष प्रमाण गेलो वनाना । वच्चोंको स्वांमां वथी स्वांयो सारसो लाव दस्त आदि मिटे । पुष्ट होवे ।
वाल पौष्टिक सेरगठी—शाला गेलो के द्रव्या के सेरगठो के रुप मे वनाना १ थे २ रत्तो पानीमे शिपदर देना, वच्चा पुष्ट होता हे ।
वाळ पौष्टिक स्वलेह—दशामूल c शेर तेसर पदारथ कर कपड छान कर उसमें शुद शेर २० राळ पकाना । चावळो जोबा बने जम हरड महेडा आंबला मुरलो भदरग घ सातावरी वडीसाफ तुलसीसीक हलदी काथलासोंगो दोवच यीज परो योन बिल्व फल गर्म लवण शोंठ पोपल प्रत्येक पांच पांच तोला रेठार कुट कर हवाले छान कर रत्ता हे। यह शुद को चावणो मे नाळकर पथाना। घुट्टी टेने पर वच्चार घर स्वांगफीत होते देसां। १ थे २ छेटी चमच वच्चेकी उम्र के अनुंसार सिलाना वच्चा पुष्ट नीरोगी हेता हे।
सरौपधी स्नान—नीम के पत्ते मेठार्दींगो वच कुट निसपम्र हलदी दारहलवो कचुरा नंफा फुल मेघ समसग कुट घर रसना यह चूर्ण चार पांच तोला करदेको शिथिल थेलो मे ढाल कर वह पानी मे डाल गरम कर उस पानीमे वच्चेके स्नान डाने थे वच्चे के बहूत थे रोग मिटते हे । १ मास मे एक देा टफे स्नान करानेसे वच्चा नीरोगो रेहता हे ।
॥ इति [०] ॐ
क्षुद्ररोग-छोटे प्रकर्ण रोग १ अग्निदग्ध
कारण—प्राइमसे तेजावसे गमं तेल भौर पानीसे ग्याषलेट ठेल यां पेटरेाल से अनेनेक कारणेसां मनुष्य जल जाता हे । हमारी सरकारने हिंदुस्थान लिये एक जो पर दूसरो नहि करनेका कानून वनानेसे दूसरां हो करनेके लिये पहिलो जोरां जला देनेकी घटना सद्ययातोत वन रहो हे । ह द्राराष्ट्र मे कानून के पीछें ३५ गुणा जोभोके जला देना या अन्य प्रकारसे प्राण जाननेका फिस्सा वन रहो हे । यह कानून खों के कल्यान भौर हिंदुभोंसी संख्या न घटने के को
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दृष्टिये किआ हे। पर सारेोका विनाशक बन रहां है और यह पाप घरकार पर बढ रहा हे। सचे मन जमाने ये बिलाख दे साधन बढ रहे हैं वैसे उनसे मुरयु मो बढ रहे हे। प्रतिदिन से जलने थे। प्रति दिनकी बात हे। रही है। विलाख से मनना थे। उधो क्षण मृत्यु केा मेटना है। शानुन और विलाख से मोही ये नोचिक नाश हो। रहा है।
चिन्ह—जलनेथे सारे शरीर मे पीडा हेाती है। बढे मनुष्येा दो अपेक्षा घटाटी रसराछेतेा जयादार पोडा हेाती है। शरीरका आंघिक मार मसत्तक छाती पसाभाग जलनेथे सु.यु हेाता है। साघारन जलनेमे चमर्दी के उपर दा मार लाल रेतां है। ईसथे जयादा जलनेथे र्फेऱट (फोडला) उठता है, ईसथे जयादा बढेथे उपर दाह और नीचेरी चमर्दी जलती है। ईससे जयादार जलनेसे स्नायु घमनी रक्त वाधिनी विराधि जलकर वह मार काल पडता है, ईस के पछे अस्थि तक पहुंचता थे।
पहिली अवस्था मे—जलानी दाह अंदर हे। भयंकर मे खुनका जमाव हे। यह दि्योति अविट समय रहेथेा। शरीर ठढा पढने लेने, नाडी क्षोण चले, चेतना हो। ईस दशा मे दिमागमे खुन चढ कर मृत्यु हेाता है।
दूसरी अवस्था मे—जलानी कम हो। कर कुछ हुशियारि आवे दाह चुपण हे।, यह दि्यति अत्थेक दिन रहे, थोडा रात्रि रहेथे कमि ताप चढे, पेट और छाती मे दाह हे।, शांत्र मांतेभे मे रण पडे खुन मि्थित दस्त व वमन हे।, कमो दाह पेट मे रक्त वाधिनो विराधि मे उपरपन्न होनेसे रक्तस्राव हेाकर रोगोशा मरण हेाता है। बहुत दफे ईससे घनुरया या घोभप' रतत्ना का विकार उपपन्न हेाता हे। कोभोकी छाती सतान और शुध भाग जलने से ईस थे ५ घण्टे मरथन हेाता है।
उपवार—शरीर पर था जले मार पर पवन आने वेनां नहिदि खारीपरका । उपर जले थे। एक दम ठंडा नहिदि वैसे हि खडा रहना महि एरुदम आळेआटने लगनाभालेाटवा मरज्चु) थेार जो केई मोटा (जाॅड) कपडो रखाइ या लेहाहाम लगो ईससे जलथे कपदेथेा वारीरपर विटाल देना ईससे पवन ठक कर अथिक जलता थके।
मप्रिद्रगध ग्राममक मड्ढम—पकरां लगाये बढे बरतनमे एरंड वेल्क अभषा तिलका तेल शेर ५ मे पांसी हुड राल शेर २ डाल कर मद भमिरेे यंहां राल विंघल नांम जब उ्समे मींम आवी शेर डालना वह विंघल जाय अ्न चुल्हसे नीचे वतार कर उ्समे पानी थोड़ा थेा डांलने रक्तना और लकडो़
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संडाये जोरसे हिलाते रहना मसूद्धन गोवा सफेद पत्थर हेमा तह कछे हुए पहलगामा और कपडे पर हलाहल वह कपढा कछे माग पर लगा देना ।
महान्च मकला गोली प्रमान चन्द्रपुटी कषाहर मोदरा निद्धो मुचा निद्धो सप्तावत छोडि बादि वेस्य मात्र| मे देना ।
योहा जला देवोा निस भागोरे पानीमे लुका रसना । चुपराज तेल घोपराक्रा देन तिलका तेल अथवा महालाक्षादि तेल मे कपवा मिगोइर कछे माग पर लगा देना और पवन न लगे इस लिये कड दाब कर कपरा बिटेल्ना । और वपर घावरा येओदा तेल हिचकते वाना ।
कली चुना १ तोला एक चेटल मे डार उपरमे पानी पैने दे। रतलक (७० तोला) डालपर मभुत युच देवकर ३-४ मिनीट छोडना पेछे युच देवकर ३ घंटा रख छोडना पीछे उपरसे स्वच्छ पन दुसरी चेतनमे डालदर रख छोडना जले भाग पर मनाना होय यत्रु चुनाका जल और तेल मिथ्र कर कपडा मिगोइर जले भाग पर लगाना । जलाकर उस्क्री रास तिलके तेलमे मिलाइर अथवा रेसमके कपडेके मलाइर उस्सो राख तिलके तेलमे मिलाइर अथवा त्रिफलादि एर् मटधीमे मरा जलाइकर उसको र'ख तैलके तेलमे मिलाइर जले: माग पर लगाना ।
६ रक्ताघात
चरपु भरूा तलदार य| अन्य वरतुसे कटनेसे घेघानेसे खो चानेसे पत्थर आदिसे चुदानेसे खं जर सेध्र आदि घुंपनेसे अथवा पद्धा श्रादिके नख दांतसे काटनेसे घाव पदता हैँ खून गिरता है । अधिक खून गिरनेसे मृत्यु होता है ।
रक्ताघात रोपण तेल—चवलक्री छाल गोद राझन हस्पूसंधारी (हारसालळ) शिवीखकी छाल अर्जुन वृक्षकी छाल ढाककी छाल प्रत्येक भाग| आघा घेर, क|ख १ सेर अपामार्गका पंचाग सेर घेर पीपलके कोमलपान नीमके पत्ते सो दूर ढांकचबाकी ढाल मजीठ बकराकी घोंग प्रत्येक एक एक सेर रववेल्रा कूट कर पानी डालकर १२ घटा मिगोा रखना पीछे उस्स्ने तिलकर तेल घेर ६-८ डालकर पकाना । इस तेलमे कपडा मिगोइर घाव पर लगा देना ।
३ निद्रामें पिशाव हो जाना
यह रोग बहुत करके बच्चोादे होता है । वमे हसने प द्रह सालके हस्तोको- होता है । ज्यादि होता है । मधुर पदाथ, पूस, च्हाहा इत्यादि कारणोसे वह रोग होता हैं ।
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मूत्रांकुश रस—लोह मर्दम, य गमर्दम, अफीम विरव फलका गम, चीरोरवाला माघेप्रर, आमलकी गुठली की गिरी, जमुन की गुठली, भजीर, माध, रस चिदूर घन मममाग डेढर जामुन के पके हुये फल के रस में घोटकर दो रत्ती की गोली वनाना । १ रे २ गोली पानी या दूध के साथ देना । दिना रेष्टा होता हुमा या निराहार होता हुमा विराम धारक्ता है । मधुमेह, वहमत्र, चैामरोग, हृदय मौर प्रमेहों में मी यह श्रद्भुत पुण करता है ।
४ अनिद्रा निद्रा कम आना या नही आना
कारण चिह्न—तप से तापकी गरमो, वायु प्रकृति खांसी, श्राघ चढना पेट के जंतु, पेट फुलना अरुविष, सीमागदी कमजोरी, उन्माद, पागलपन। विचार वायु क्रोध शोच मय, अंःकार इत्यादि कारणो से रुद दर्द होता है ।
निद्रावर्धन रस—पारद प'घक, मुर्का शक्ति विधि, च या मसम, प्रज्ञाल पिप्पिि प्रत्येक पांच पांच तोला । शिलाजित शफला गुणवत, कूटको प्रत्येक दो दो तोला नतपीपल, छोट. चीनोफास, डुलायची, ठेठा, जायफल, तज, रास्ना, जताकर ज बोजको गोची (काकचिदानां मीज), कुठ वायविडग, सेंधानोन, प्रत्येक पांच पांच तोला, सघ सथ मिलाकर मेठी के रस में दे। रतीकि गोली वनानां) मात्रा २ से ६ गोली पानोसे अपवा दधराशि जौवन सेह. शहददषे, मक्खनमे अयवा गुलकंदषे टेन । एक महीना तक सेवन करनेसे लाभ होता है । यह श्रौषध अरुविष, विधावको पचन मे' लाभ करता है ।
१ रसांकन १ रत्ती गुदके पानों मे घोप कर श्वास मे अंजन करना ।
२ मदारुसक्तोंजन शोती वक्त भंजन करनी।
३. काकमंघा (वेटो अपेही ) का मूल मुख में रखनेसे निद्रा आती है ।
४ शपसप देहसे तीन माशा शाकर के साथ खिलाना ।
५. शापदी काचलकीका रस में विटाल कर तिलके तेलसे दोप जलाकर काचन (पशो) पावना । वह गायके घी में मिलाके अंजन करना ।
निद्राप्रद हिमष्नागरमोम, वायविडग, नागकेदार, चीनोकराला, डुलायची। तज तमाल पत्र, शतीष क शंग, मिठोय वचड़ी वधवार्दं, प्रक्ष खजूर, पपट पट चीर, शरदाखू, सम घममाग कूट कर देा तोला मे २ या ३ कप पानी डाल , वातमे रस छोड़कर मात्र कालका ममल हर लपलक्कान कर उछमे शाककर या घाहड चाबकर दिनमे दो टफे खिलाना ।
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५ - अतिनिद्रा निंद बहुत आना घेन
कारण—कफ प्रकृति से स्वाभाविक लगनेवाले, कफ प्रघन न ताम्रे शनिवात वशर से और जन्मसे ही निद्रालु स्वभाव होनेसे निद्रा बहुत आती है।
निद्रा नाशन रस—पारद, न गंधक, शुद्ध, पीपरल, काली मिरच, अभ्रक भस्म, टंकण भस्म सफेद बच-छाल, टंकण, सेंधानोन लवण, तज, लोंग ये प्रत्येक पांच पांच तोला और सुना हुवा कुंद १० तोला साप मिलाकर निगुं दी मोंगर। छोटी महुएी भपगारं, भांग, पत्ता र कुचालिया के मो सुना हुवा कुंद प्रत्येक ५ तोर'थ भगार रखदर ऐस एक भ'वनना देरर २ रतीची गोली बनाना ।
निद्राघ्न कषाय—शोंठ पीपल, मरी, तज, लविंग, रास्ना, अश्वगंध, गuma जुलसीके पान पीपरीमूल, वायविडंग प्रत्येक दस दस तोला और सुने जुड १० तोला सब शुध कर रखना । एक तोलाका कषाय कर उसमें पुढ डाल मिलाना ।
६ उर्फीमका ठयसन लुड़ाना
सफोण ठयसनहरी वटी—जायफल वावं के शुद्ध अभ्रक भस्म, लाल कनेरकी छाल सफेद करनेको छाल दाडिमके मूळको छाल वतुराका मोत घसुराका मूल प्रत्येक पांच पांच तोला, शुद्ध कुचला १० तोला साप शाथ पेप पेररके डेढ़के रसाथमें घोंटकर रती प्रमाण गोली बनाना । त्रितमा भफीम हमेशा लि या जाता दे। वससे दूने वजनसे गोली देना । और हमेशा येठा भफीम कम करते कुपे वंध करना ! डस गोलीसे मुखमें शोथ पड़े तेर शहदका पानी अथवा चपवनप्राप शोविन अथवा गुलकंद अथवा अंजोर द्राक्ष अथवा दूधका मावा(खोया) खिलाना ।
७ खोलें—हाथ और पाँवमें खींलें निकलना
दाध पांच संपूर्णोंमें पोचायें पांचके ताजूमें दाध पांचवके किसीसी स्थानमें सोली निफलतो है, उस सोली को जगहमे येठा बहुत दर्द रहता मरता है, चस्मु भादिषे रखेदेखर निकाल देते है तो फिर वदृा जमती है।
१—तिलक्री ददीयां (तलघड़ो) को राख और कलिचुना समभाग मिलाय खोलोपर बांधना पेल्टीसकौ तरह बांघना। ३ या ४ वखत लगानेसे मिट जाती हैं।
२—मुरगों कौ वथर हुबक्काका गुड शलोचुना समभाग मिलाय मोमूत्रमे पीस कॉटी पेल्टीषकौ तरह बांघना ।
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३-पालेफे कूट सेनागेरु वतूरादापानें पानीमे पोष मानना ।
४-मायका चूप वेआर ९ एरंडी भीमको 'तिसी 'वेआ ०, देखी सावून तेर,
०, जाय पेष्ट पेटो'ब कर बांधना ।
५- मोवलाेके रातको मिंगो रखना, जुते महीन पोश पेटी'ब गांठ पांटा
मोनना ७ दिन करनेसे शत पदवाली सोर्सी भंडार रखकर निकल जाती है ।
६. हाथ पांवको ठया फटना-पाददारो
कारण-कियेोेकी धोतीकऽुमे और किषोेए पारो माथ हाय पांरके ताळखो
मे पेटोको केंन री पर पद्शी फटतो है वहां येआ दद' होता हैं पांव फटनेसे चलने
फिरनेमे कष्ट होता है ।
रेपषन मलम-एरंड ठेल शेर १४, राल शेर १०, मेम शेर, २१,
वेल वम' रेएरसे राल डालना बाकी पिछल जाय जप मे मि करणा विघल झानेपर
मोचे वतार कर सुघ दिलाना रह लगानेशे जुतं आराम होता है । किशोर प्रगण,
वारोश्यवन'नो गोली, वसप्रभा येअमय माझा से देना ।
दिग्घरादि मलम-शीं'गरफ राल पांचक टंकण विदूर नीलाथेया
रोतादसम कंपोशा कुंकुम (ललाटमे टोचा करनेग्रा) प्रतवेध डार्ई ढहूँ तोला, मेम
७० तोला, घो घेर रे साथ विधि वत मिलांय मलम करना । हाय पांव
पर 'लगानेसे फटा हुवा माघ रक्ख जाता है और पोश मिटती है ।
९. मस्सा-मस
यह माघ गाला वादी मुख गरदनपर ज्यादा होता है शरीरके वम्म भागमे
मो होता है । मस सजीव और निर्जीव होता है । निर्जीव मस तं'भोों'बे वा
शत पांष कनिका ओो से वना हुवा होता है । वसजो'व मसफे हाजमे काट कर
उस भागमे राम देमा-अम्रिमे जलाना ।
सै'धरादि घपंपा--सै'वानोेन ह'चल सेठ पीपल डालो मिरच मेनरील
चिगममूल नेलायोेभा लल सेधमल सम साथ घोट रखना मस पर घी लगाछ
७६ चूर्ण'लगाना । मूँ'से मस सूख जाता है ।
टंक धार्ई घवें पान-टंकण वरे चूना नमक शंभाग पेष्ट रखना ।
पुटकौ भर र.खपर घे सना फेरना तीन दिन करनेसे मस मूँ'से निसदलञाता है।
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१० काकवी लावलाज्ञा
बुशाग ठेठ अपच्चा देवन लेप अथवा मद्दारास्ना दे कर्णेष अमत्रा पंविष्यद्धिकगण पानो मे पीष्व गमंधर पेटीस माफोक लगाकर वदनाष घर पटा मोवनं । भोरेतपु पयुंनी दिशोर गुगळ मेश्वरदि गेलो कस्तूरीदि गोली भादि मोवष , शेवण कराना ।
११ अशुघात-लू लगना
सूर्य के तापमे चुलनेमे, धूपसे गमं हवासे लगनेसे, धूपमे नगे पांव फिरनेसे चुलनगती है । सम कपहा निकाल टंडा पर्ण पंखा करंना । केलीके पान बिछाकर सुल'ना, ठंडे पानीषे भिगोयां कपडे़ शरीर पर लगाना गुदा कर पानी कर'कपड्ढ छान कर येओला येओला पिलाना । घकेर चंदनका चूरा पानीमे पोसकर शरीर पर पदं करना । मस्तकपर पानी छे़डेकना ।
धिमांद्रे रस—(स्वर्ण युक्त) सुक्ता प्रशाल.वैक't मानिक प्रत्येकी पोष्टी पारंद ग ठक प्रत्येक एकएक तोला, शे'का वटकं २ तोले, चांदीका वटकं २ तोल्मा चीनीकषाला इलायची हरड घेहेठ आवम्ग मोमसेनो कपूर प्रत्येक आधा तोला; मोलेरी मूल २ तोला जलपीपली नीमवमाज (सोमाथरी) मंगरा शतावर्री त्रिदार्री कंद प्रत्येक च्यार च्यार तोला, लेकर कूष्मांड रस आंवलाका रस हरी दाखका रस प्रत्येक एक एक भावसां देकेर २ रत्तीको गोली बनाना । २ से ४ गोली पानीषे अथवा गुदके पानीसे देर देत घंयाके पीछे देना, २ दिनमें लू लगो होत चहु आराम होना है । पित्तप्रकोप किसी मी जपकका जारीरका दाद आंवेसरी, जलन छातीळा दाद अमरपित्त कफ्सो मो रपानरा रख्खनार व छुनी मघा प्रदर प्रमेह पित्तावदी जलन दुरयादि पित्त गरमी प्रधान रोगोमें यह उत्तम कायदा करता है ।
१२ गुदभ्रंश-आमण निकलना गुदा बहार निकलना
कारण—यह रोग बहुत करके वच्चेमें होता है । वड़ी समप्राथोंके मी कदमी होता है शति दाष पीनेषे उचेषे कुदनेमे गरमी से यह रोग होता है । दस्त जाते वछन गुदाका सामा बहार निकलनेके पीछे़ दत्त भाता है । १स्सत आंञानेके बाद धीरे धीरे अंदर विठता है । विस्सोेषे बहुत दशानेप विठतो है ।
नांगेरी वृक्ष—चेठी गुलरकका मूल जलपिप्पली छोटी पीपल त्रिकटु घातावरी विबरककी गोरी व हराज हराघनीया अदरक भजमेाष इन्द्रनो गोबर्ह पाट केलकं प्रत्येक दश दश तोला कूटकर इसमें दही शोर ४०, लड्डू लुणी (जांगेरी) शोर १० और फी शोर २० चालभर पकाना । पानीका कंदा नक ग्रहण करे
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कपल्कान 'कर' टेना । मावा 'प से' x तेला गुदभ्रंष्मे उत्तम गुनकारी है । यह वृत बनी मधा घग्रहणी पेट फूलना पि²ावकी जलन इनमें भी गुनकारी है ।
गुदभ्रंषा श्रावक मलहम --पाठा वेल फत्की गिरो इलायची नीमक मालू, प्रस्तेक चार चार तोला, लहसुन--चागेरी तोला, ८० सवके कुट इसमें घो २ सेर पकाना पीछे उष्ण घीमें शखजोरा तोला २ कपूत तोला ।।, शाखर तेल १।। के
महीम पोष 'मिलना । यह परम लघाना ।
१ घेरकी गोदं तेला ।। मुं०फा आटा' तेला २ घेंमे मिलाय ७ दिन खानेसे आमण निकलै नही ।
२ कमलके केमल पतेफा पीस शक़्कर मिलाकर पिलाना ७ दिनमे यह दरं मिटे ।
१३ पानों लगना-दुर्जल जन्म रोग
दुष्टैल जन्म्य रोगी समवदू जैसे वड़े राहरोमे रदनेसे अथवा देख परदेष खानेसे प²नो लुत्तरा है, तवह दहुत त्रास रहता है, बहुत रूप होतजो है । खून किसीका पड्ता है शरीर कमजोर क्षोण होता है ।
मारे उप वधनी गोलो, हुं०ल जेता, शु³ण' वसंत मालती, पूं०चंप्रोदयक्को गेको, चो०गराज रस'यन, जवायप ठोइठ, ठोइठ रसायन, वसांत ठोइठ शौभाग्यशु³ठो जमृत मललांतक आदि औषध दिया जाता है ।
१४ अकाळ मरण
जलमग्नेः श्वास्रादेः पतिसेः वज्रा²निना हतेर् मनुजः ।।१।।
मायु'ये सर्याप वात मृ²युवशा याति मानवो नूनः ।।
श्वासोनियनाकिच्चेःडीनान्ते श्वासो प्रयत्नतॊ जीवति ।।२।।
याषनि·च्ध्यिलावयवच्छेऽणनशरीरश्वसि·क्तिसतु योग्यः ।।३।।
मलमग्रमघः द्वारस॑ करवा नि.सारयेक्कलं सध्य ।।
यार्वे·न शा³ितमास्ये स्वमुखेन घमे²ल्लीयचन्द्रेण ।।४।।
सी²ांजननस्योषष्यैग योऽद्याश्व सन्निपातोऽत्रः ।।
तारुन्न हिरणरपमेँ घपे²द्यावच्च रक्तस योग ।।५।। (रत्तो·द्दार तंञ)
भायुष्य रदते हुए मो मदुष्यक मरण होताज है यह भकाल मरण है । पानिमे हूवनेसे मचा पाका खानेसे विगनरी पढनेसे भय कर भय लगानेसे भयंकर अप्रिय इ²ष्ट शराव यनाने सुननेसे किलानो-वूक्ष महान अदृष्टे गिरनेसे छातो दबनेसे श्वास नकोमे वाधा पदाथों घुस जानेसे श्वासेकी गति रुक जानेसे हृदय बंद
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पहनेसे आदि आदिसे जलनेसे जलादेनेसे प्राप्तमपि आदौ प्रकामात्सरे इष्ट प्रकार अनेक धारणोष्ठे आयुष्य देते हये मों मनुष्य मर जाता है।
इनमेसे जोसके भारीके म गोकेा स्वयमेवेोा ह्रानीन म पहूंची हे| नेथेा उप्चार करनेठे पुनः जोमिन होनेका शंभव हे।
पानीमे डुबकर मरण पाये हुयेोा महार निकालनेके पीछे उस्केा चबे मरतक नोंगकर पानी वधार निकालनोा भयवा मरतककोा माथा नीचा रखकर मुंह खुला धर जीव चौपीठाथे पकड़ खेंच रखना तांकि पानी निकल जायगा श्वास चाछु करना। रेगीका कपड़ा निकाल टालना पीछे सजिराठमे भोर श्वं दंबामे बताये तीन मंजन नस्यकाछा उपयेाग करना। नलौद्वारा कू क मार कर नस्य चढाना। तालुमे अभ्रकाष्ठे छेई वेकर खून निठे ठम्र जगह दिर्ण गमं पनिपात मैरव है ठेठार वितामगो अवेधार तृष्णिंध भादि औषध चितना।
चिवीपाथे जीव पछड़ कर नाक वघ कर गलेमे नलीद्वारा कू क मार मार कर या भन ग रीतिथे श्वास चाछु करनेकी युक्ति करनो। जीवमेा हर वक्त सेवनोा होलो करना इससे छोंक भावे वमन होतेई जोमकोा हेज न होना इससे आम नाछु होगो। इस प्रकार जीवकेा सेो चना होलोी करना यह क्रिया थेई मीनीटमे ८-९ दफे करना।
छाती पीठ पपलीमे मध्वानारायण ठेल शपवा तिल ठेल या सरसेठेका तेल जोरसे मदं न करना। पेटके नोचे मोधोका रख उथो सुलाकर पोठ-पृष्ठके भागमे दावना। तेल मदं न करना इससे छाती दवेगी फिर पांवं थालो (पसखावैा) धर फिर टं घा सुलाना इस प्रकार १ मीनीटमे १०-१२ दफे करना फिर मनुष्यकेोा चौतों सुलाकर पोठमे थेई देई उथेड़ा रख चोता सुलानोा और पेट दावना तैलसे मदं न करना जोम चिवीपाथे पकड़ रख मुख खुला रखना इस प्रकार ९ मीनीटमे १०-१२ दफे करना। मस्तक पर पानी छंडकना पीछे वैंने मस्तककी ओर खड़ा होकर देईना हाथ कांपाथे पकड़कर लुंघाकर पाथाकीा भोर पत्तककीा और खड़ा होकर देईना हाथ कांपाथे पकड़कर लुंघाकर पाथाकीा और खींचना और छ'ती उपर रखना इस प्रकार एल मीनीटमे १०-१२ दफे करना।
मुंगली अथवा नली गदेमे उतार मुख्से स्सतत फूंक मारना और नबौद्वारोा मृत व जोवनोा सुरोा अथवा उ चोा कीसमकोोा नोंधोा मेंदर दाखल करना इस वक्त जोमकेा चिसियाथे पकड़ रखना। घारे भारीमे सेंठकाछा चूंगं मदं न करना ग्रांहोका मालीस करना। इस प्रकार देई तीन घंटा पर्यं त उप्चार करनेसे मनुष्यमे यासकीा गति होकर वच जाता है। इस प्रकार उपचार करनेपरमो यासकोा गति नाछु न होतोा जोवित होनेकीा भाशा छोड़ना।
अथ छोक स्वाधीन स्वादिसे श्वासोा न्छकपात हृदय बंध पहूंचता हुये तव पर मिलेोा उपचार वारवार करना।
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विष प्रकरण
प्राणिज विष वनस्पतिज विष खानिज विष
१ सर्पदंश-सांप काटना
दिग्ध-प्रहारोला सर्प का काटा होता है तबतक वेध छिद्र होते हैं, यदि तीन-तीनकी देह लाइनमें छ छिद्र होवें वड़ घाव क्षुद्रोला नहिं है ऐेसा सममनाहट । घाव काटते 'हह मनमनाहट होती है, चक्कर आता हैं, वमन उपका करनेका मन होता है, पावमें जोर दहि:रहता श्वासका दंघन होता है, मछलीसे जाव डे सकता है, नाभोकी गति चेष्टाळी और आचका श्वास डरै चलती हैं। शौल सकता नहिं जो घाव छेटो पड़ने लगता है। घु क गिलनेकौ श्वस नहिं रहेगी, नौम वादार निकलती है किसीके मुंहमें फेन आता है। ठंडा पसीना होता हैं। बेईद्द होकर धीरे धीरे श्रमजोर होकर मरण पाता है। क्षुदरी वपं हो तो २ से ४ घंटामें मृत्यु होता है
तुत को जाननेवाली सारवार
साप काटते हि जयमे १-२ इंच उपर के सापमें मलबुत पोटा चांघना जिससै खूनकी गति रुक जाय। पीछे किसो मलबुत आदमोखे विस चूसना। चूसने वाळेहे मुंहमें चांदा नहों और बांटके मछुएंसे खुन निःछलना नहों चूव चूव कर युक डालना भौर सपं क्षरड क्स्तायका कुंडला करते रहना। जूवनेक्र न होवें मद्दां छेड़ा देहकर खून वददाना। घे'री नस न कटे यह ध्मान रक्ना। पोछे दशांगुल माग ग्यासलेट तेलसै मरे हुऐ बरतनमें भपना कैलौफे ल्याबके रखसे भरे हुये बरतन में हुवाना। विस वज्ज्रगात रस अथना शौलेक चिंतामरि अयवा रौंपवेष रस मथवा हिरण्यगर्भं रस मेरो किसोका पौंसकर दशपर दावना भोर येघ्र माके पानोसे अथवा बाकेके मुलके स्वाथसे देना।
पीपल(म न वस्थ) पत्र प्रयोग-पीपल वृक्षही छेटी वावळा वेढ लानर जिसमे २०-२५ वहे पान हो। शपंदंत वाळे रागोखे नेठाना हुवके पोछे दे आदमी उछके देई हाथ पछड़े एक आदमी मसतक पछड़े, दू आदमी देई पांच पछड़े और एक आदमी सामनें बैठकर पोपळ डेई परहेकी लंबी द'बी हो। यह देानो काममें धुपा दे घीरे घीरे कानमें जाकर भटुक जाय मब दबीया द कानक शांध दाबदर रखना। यही देरमे देगभी चिल्लाने लपेगा तो मी उसे छेडना नहिं हंमी नीकाीलना हंमी। पांच दश मीनिट पछे यह पतते एक वाज रख दुसरे लंभी ड हौके परते डेकर दही कानसे चुपादना और कानके साप मलबुत पक्र
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रखना। इस प्रकार ४-७ हदी मदननेसे सर्प साहर बंधी चूस लेते हैं और रसना·
वच जानता हैं। विधौँल वदी वाले परथे फेर जल देन। वह पत्ता पद्य था। जाय था
पर जाता है। रोगी वेभुद्ध है। गया हो वद मी वच जानता है। कोष्य राहट'ने-
परा हुथा बता दिया हो वच पर मी यह प्रयेग करना वच जाता हैं।
वह अचम्भ प्रयोग है।
गरूड वृक्ष अथवा गरुड गच्छ वृक्षका प्रयोग
इस वृक्षके वारेमें हमारे मित्र धो टेलरजी कालिदास C/o प्रमुदादास
वाघजीभाइ एण्ड कं पानी वेधी पततादे हय पारी राजनौतांब मध्य प्रदेश। इनका
गुजर ती नक्ता अनुमार वेते हैं। वे लिखथे है कि में आवेरी सवं विप निवारक-
अदभुत औषधी मेजता हूँ इसक। नाम गरुड अशथवा गहड गच्छ, गहडका वृक्ष-
जंगलों ठेग कदते है। वह जंगलोंका पदाथी वृक्ष हैं। मोरीशा जोर पथ्यप्रांतक-
जंगलों मे पधाडे। पर कहीं कहीं देखनेमें आता है। यह वृक्ष वद्दूत उँचा और
घनीशा हेाता है, पत्ते बिल्कुल पनको तरद एक चंदोमें पाच सात लगे रहते हैं।
परते लंव गोळ होते हैं। इसक। एक डंठल हाथ लंम्बे फलो हेातो है। फली जब
वृक्ष पर लडकती है तम माने। सपं लटकते है! ऐसा माघ हे'ता है। फलीमत
नोचेक। माग कुछ वक (नपाहुभा) हेाता है। सुकने पोछे वह फटती हैं। तय उपमेंथे
सर्पाकृति फली जितनी लंभी लकडी जेसा निकलता है। उसके अग्रभाग सपं का
मुलक। बिलकुल मिलता जुलता है। इसकी आजुबाजु कागज जेस। पतल-
सेकदे। बीज निकलते है। इस फलोक। सपंकी हददो जेसे नाम' और छाल सपं
विषका लेपथ है। जहाँ सपं कांटा हे। वहाँ फलीके गमंडा टुहडा पीसकर लगा-
तेरा, और पानीमें पिलानो। इस वृक्षक। फली अंगला ठेग लोकार
बाजारमें विकते है। और सपं विषकी अमेष्ट औषधी के माथे ठेग जाते है।
वौ पहाड पर खुद जाकर श्री मे' लाया हूँ न। आवकी पास मेजता हूँ। जंगली ठोक
सपं विषमें हूसका उपथेग करते है और शत प्रतिशत रोगी अच्छे हो जाते है"
यद वृक्ष भयंकर सपंविषका औषध होने पर सवय विैैल-सदृशिला नहि.
है, तैरोगो मनुष्य मी खा सकता है। इसहडे गुदेकी मात्रा १ से २ माशा और
छालकी ३ से ४ माशा पानीमें पीस कर दो जातो है। पता मी ४ से ६ माशा
पीस कर दिदा जाता है। रोगी वुद्धिमें हेते। फलोके कवचका टुहडा कूटकर अभवा
गद्दाके। करके पानीमें पीसादे रेगो, वेभुद्ध हो तो ताजुभमे छेद कर घीते के साथ,
घीसे और फलीके। वृक्षकी छालके। या पुदके। पानोमें पीसकर चारे वंदतमें मरेैन-
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हरे। उसहरे वृद नाक में मोंखमे ढाहे और रेोगो शपनेछे पो नहि चके तो नलीके द्वारा मुख्मे और पीछेंहारी वसित द्वारा गुदासे प्रनाही दर चढे रागो वच जाता है। यह सदमूत वृक्ष है। यह वृक्ष अन्य किषो स्थानमे होवो जगलके अभिकारीओने ढूंढकर प्रकाशसे लाना कि ठोंग घरलकेसे लंम ढे सके।
विपवज्ञपात रस—ओमल वछनाग टंडण पकाया नीलक्ठीया काली मोरच मैनसोळ हरड भंग्रवत मसम कोलि्दारी (लागली) सम.षम शाप ठेकर केनोका रष देवदालो-कुदरदनेल रस शरामागं रस शिरीष रस प्रत्येकी एक एक माष्षा देना। चपदषा वारेको दष शपर घाव जरा चौडा कर लगाना। ३ से ४ रती पाव पों। घटाके पीछे ढाकेरे मुल्के कम यथे अथवा अग मानंकेधरसथे अथवा केळोंके रसथे देना। बांवमे अंजन कराना। नाकमे सुंधाना। वीकुंड दषमे तथा दूसरे स्यावर क गमु विषमे पुगकारी है। इसहो मात्रा देनेके पीछे गरम किया हुवा पायका घो ४-१० तोला पिलाना।
मुन्यु-पारहछेड़ी वृत्त—आकके मूल देवदालो अथामांव घांग ढाक्कीओ मूल मिस्र पत्तां किरोली मूल केलीका कंद प्रत्येक चालोस तोला, मुत्रानानो घनाषा रडुम लु पाताल गरही थातवरी लांगलली मजीठ राधना तुलसी मरवा प्रत्येक वोष चोला, कुष्ठ योगेभन व्रक्षो हंसी प्रत्येक पांच तोला सम्होळ कर केलीइे यभके वानीमे १२ घंटा मिगो रखना। कछुना एक मन घो डालहर पदानां पानीहा अंश जल दाय उन्न चपदछान दर ठेना। पांत्र पात्र घटाइ पोछे ५ से १० तोला घृत पाम कर सपंद शवाळेए और विधुद शवाळेओका पिलाना। प्राण्म वनस्पतिज शवनिज पथ विषमे यहु पुगकारी है।
सर्पंदिपहर कवाथ—आकहा मूल देवदालो अथामांव निमुंदा किरीयता वच अरळोपत्र जिरोपी पत्ते भतीस नागरमोध हरड डाक मूल केलीका कंद थे वानोन पममाग कुट रध्ना ७ से ९ तोलाका काथ कर रेागोकेा पिलाना।
सदिम्रु योग—ठेठा फल १५ लेकर उष्मे पानी १० तोला डालकर उवालना पोछे नीचे उतारकर ठार्हसे वसकल हर छान कर चपची चमची फरके ३-५ तोला पानी पिल्ना देना। पात्र घटामे उलटी-वमन होगा। यदिं वमन न हो तो दूसरा ३-५ तोला पानी पिलाना, वमन होगा। यदि घांप पसहरी होगो तो वमनमे हरे रंगकी झांइ हेईगी वह सर्प विद है। इस प्रकार निफल भायका। यदि हरी झांइ न दिखे तो सर्पं विषपेल नहि है। वमन हो जाने के पोछे काको-धूप पिलाकर रेोगोकेा शुलाना।
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सर्प' दिपके साघे प्रयोञ्ज
१ कुटजवेळ देवदारुके पन पानोने पीठ कर पिलाना।
२ इंगुदी फलका गिरी खिलाना।
३ दच्वी दिन ४ मे ५ रत्ती हर पाव पाव घटा में पानी मे पीस पिलानात्रि-पर गीं घृत पिलाना।
४ धतुर फल चिय हर नाइ मे सुंद डालना।
५ घारीशका मुळ २ से ३ तोला पानी मे विष पिलाना।
६ पीला फुलकी अथवा लाल फुलकी कल्कंधारी (लांगली)को जड़ मे दंक मर दाब कर रखना विषके खींचकर मार फट जायगी और रोगी वच जायगी।
७ अंफेद फुल दे साच्चा मुल १ तोला पानी में पीस कर पिला देनेस-वटो दस्त हो कर विष निचल जायग।
८ कुथा (प्रोणुप्पी ) का पचांग तो। २८ के २ सेर पानीमे उवालकर-दर ०। सेर ॥ घंटा पीछे दश दस्त तोला पानी पाये रखना।
९ रक्चुन कबी सेरा ४, सांपकी काचली तोला ४ यूदरका दूध तो ९ , नपक्क तो १ छोटी पीपल तो १ सब सथ य कूट बिना रोंग लगाये तांबे के कटोरेमें-डालकर निडू रख मे घोंट हर गोली बना। पानी मे घोट कर अंजन' करनार-१।
१० विश्वधूप हमेंशा करने से घर मे सर्पं नहि।
सिद्धधूप-कपिंचुलं सुम्ताडरकफल सिद्धार्थक्च सर्जररत्न।
भल्लात' धूपपाडय' समभागरतस्य सिद्धाद्य: ॥१॥
मूपकमकुणसर्ष नश्यं'ति विपैठ कीटका: सवै': ॥
चांषद दच्च्ट्ट सांश्रा धिपोन्नाभाष्र जंतवोऽपि हि॥ २॥
कवच फली (कवी वच्चु फली) त्रिपके। मे(व सोप मी कहेते है। नागरमोथ-चोलु मच्छर भार्दि पाग जाते है।
विध्छूका दंश च्रथिक दंष
विसन्र—मोचु पांदता है। जब सुंद खुजली हो शेषा लगता हैं। येष्टी देर मे-हद' डदता है। जलन होती है। ५—१० मिनट मे धारे शरीर मे फेलता। है। झहरीलां-वं चु होत। पीडा के स'य पसेंना छूटता है और रोगी का शरीर ठंडा पद जाता है। बोले पद्धाचे 'हुने चां बीचुसे दई रफे मच्चु होता है।
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२ भपामार्गे का मूल लाकर ॐ ह्रीं बुद्दनेत्री वद्द वद्द वृश्चिक विषं ना जाय नाशाय हौं फट् स्वाहा । यह मंञ्र पढ़ ले व'य और दंष के मागके मूलक? स्पर्श कर नीचे रतार जमीन पर छिड़देते जाय । दूष प्रकार व रक्वह दिष उतरना है ।
३ प्रदि घेएे वचने केा दंषा काटा यह म'ञ्रम न हे' तो डांड़के मूल्कोा यथवा शिरेष के फूल पते के अवचा कुच (प्रोंगुर्री) हे प चांपदेे पीस कर वारे वदन पर मर्द्न करना ।
४ रीठे के फलमे बोंज निकाल कर छि:केदेा रसाल कर वह पनी रिषाना और छोलके दे पीस कर दंष पर लगाना ।
५ लार्डे प.त्न देा मचल कर पानी निकाल कर नाक मे बूंद डालना छोले भाकर शहर निकल आयगा ।
६ कदहृ वृक्षकी पली के गोरी देा पीस कर विलानो लगाना ।
७ कलौहारी को माठ पीस कर दंष पर लगाना।
८ पल्ली करेलो (हेड़हगोली) देा तेल मे पेषा बना पोछे उस तेल का बूंद दंषार लगानेम श्रेष्ट निकल जाता है ।
९ इद्रायण का मूळ पोस कर वद्षा पर लगाना,
१० विष दज्यात । ठेला पानी मे पोस दषपर लगाना ।
विलोका काटना-करंड
विल्लो—माजरी वडूच्चा काटती नदि छेदिन इमषे कुड्द करनेएे, वह मर जाव इंद त'ह्द सतानेमे कबी काटती हैं, उस्से आरम्भ मर जाता हैं । इदृका मारर मर'कर होती हैं । कुदरतने उस्से भय-विध्नपनता हैं, इसे कारण वसका काटन वराञ्चत हि वनता हैं । वह हृछ हे। सब नेड़ लगते हैं, इस्से विष नहि हैं, सांतेमे दिप है । इसे सु न पहिले सिकुलपेटदे पेटेरेमे चोफंदार हे। दिल्लो कटी सी इस शांक म'ञ्क' करने लगा था, षांदे पीली पढ़ रदे थी इदर अवर मरषे छुप ने दगता था विल्हो वेड़ा मयभंत (यंघन) सम्भव तुत हे गया। या फेरल-कुस कृति विचित्र हिकृत हे। रयो मो और मोहेधे घंटेमे मर गया
उपवास—दुहता है।दृढे रपचां शास्मे दिष्ला मवि हैं पर च सांधे प मादृा उपवचार इदृकेा सी दारता । इसे दज्पात ०१ से ०।। वेधा घो के साथ देना ! मादृहसुके ७ थे रा मुदार्दे पीस ९ से २ रत्तल पानोमें पीव प्रतेक पाव घटाके पंछे देना । मृत्यु पाइदृदी घृते । हेल्योण वृत्त नेम कर दस्सके रक्मे अक्शय पें वर दुहके पांतकेा र ही घुसाधना जिदृषी विधि रुपंर रस्मे दि है !
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गरनाशन—पारद रस तेला, ग धक २० तेला देना। हरगंका वड ते, ५, पारदसे 'मलाहर पीछे आंघक डाल कउमलो कर पीछे लवणं पाक्षि कचौको पिठो तेला १० मिलाना १० हसमें घफेद फूलते अ'क्का मूळ शिरीष मूळ मयूरके पांचकी हड्डी निम्बोज गिरि ढाकके मूश्री डाल हलदी मजीठ प्रत्येक पांच पांच तेला मिलाय कनारपाठाख रस और पोपलके पत्ते ह दही के घाथके कुटकर रसक्ा रस और पुनर्नंवा मूलुचा क्वाथ प्रत्येक की एक एक मात्रा देना। याप विछु और अन्य स्थावर ज ग्राम विषमें ६ से १० रतो प्रत्येए पांच पात्र घटामें देना।
पलंडी—गरेलो (ढेल गरेलो) यह खान पानमे पड जानेसे मृ:खु हे'ता है। देठा (कपिरय) फलका वनकुलथी पमं चौमेढ आंइके बीज सेठ पोरक कालीमोच कर जम्रें न लताकर जमौज हड्डी द हड्डीदो ढोकना मूख शपमाग कूट कर ३-४ तेलाका क्वाथ कर पिलाना शिरोप वृक्षके पचांगका क्वाथ पिलाना।
अफीम विष
शफेप डर पेडा आंमकु सौंफक है, जिधरां तेयेरे मरण हेता है। हसके बिपैल चि॑नहमें चक कर आतेा है बेचेनां सुदबुदाष शरीर ठंडा पडे नीर पडता उंरे वेध्रुद्र रास गंत क्षीण हेा स्नायु खींचे। १ से २४ घटामें मृ:खु हेता है।
उपचार—तुरत दधत विशाख कराना, हर्छामेदी ६ से १० गोली गम जलसें देना और गुदा द्वारा चढाना। मैन फलका क्नाथ पिलाना। विशअंजात ८ से १० रती प्रती भाषा घंटाके पोछे गमं घंते या ढाकके मूळके क्नाथसे देना। चोला घारपुस नींदके पदेथ क्नाथ देना। गरनाशन ६ से ८ रती प्रयेह पांच घंटामें पिलाना। मोगराका रस तेला १० तुलसी रस तेला ५ मिलाकर पिलाना।
घटूरेाका विष—घतुरेका बीज सेती है खानसे भाघा घटुरे चिन्ह दिखते है। चषकर मुंहमें गलेंमे शोथ पवाह आंखोंकी कोहो चोंहो हे आंखे मुब लाल हे। वेध्रुद पानल पन हे। स्वासकी गति म थ हे। यबहुतेका मृ:खु नहेाता ह इपमेके लीए पागल बन जाता है।
उपचार—हर्छा मेदी ४ से ६ गोली गमं जलमे देना। शमन वीरेचन हाकर निकल जाता है। समुधफल तेला १ नौसादृके साथ पिलाना। घो गम हर पिलाना। ढाकके मूळका क्नाथ पिलाना शिरीश मूळका क्नाथ पिलाना। गामकी छाल पिलाना। कापूस (वण)क मूळका क्नाथ पिलाना।
वछनाग—बिप्पे मुंह जीम हेाठमे झनकस्नाहट हेता हे पेटमे जलन वलर गया हे। ऐसा लगता है आंख कानकी श'क्ति कम हेती है शरीरके स्तानायु नशील हेात हे। कयी आंते—तांत्र आते है इसकी उपचास सी अफीम घटुरेक
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सेमल
यह मयकर द्रिप है। इसमें स्वाद तिक्त है। इस लिये दपाते द्रिपा या पकता है। पेट में देने से पहले एक च घण्टाे में ढीला अन्नर होनी है। पिछले पेट में दाह होता है। उसक भ्रंता है, वमन हो दस्त हे। दस्तमे दून पड़े, विसूचिमे चलन हो प्याउ लगे, आँख लाल हेा, नींद सोैर स्वापको पति मरे, मुत्र लााल हे।
उपचार—इच उ'मेोे गोली ४—७ वा उशाद वेष्टर वमन विरेचन कराना। जोराइ के रसमें दवा और रसकर मिलाकर पिलाना। घारपुष्प के प चूर्णके कवाथमे शहद और दही डाल पिलाना। नीमके पत्ते के रसमें शहद ढालकर पिलाना। ढाकके मूलका क्वाथ पिलाना। हे।हागा कचवा अ'घा तैल नाड़ूश रस ४ ठेला मिलाडर पिलाना। अपामार्ग का मूल ॥ तेला, इध्रामण मूल तेला ॥ पिलाना।
मूषक चुहेकेी मारनेकी दवा रेट (रट)
सरकार आयुर्वे'dक निरीपे दवा पर प्रतिबिंघ लगाती है। और रेटरट मूषक मारनेवाला मि'कर हह्वार हजामे रखती है जिससे वहकेए चाहे लम लेष्टवे हे मंर अपने'फे और दूसरेकी हान्या आँस'नीसे घर सुह्ते है। बेधारी भुख्ख मरे। अथ ठेप दंेटेघ या अन्य कारणसे मारदघात करना चहिये जव लेष्टर उपयेग हर रते हे। इस प्रकार मूषक चितने मरे यत हे।द जान नह्हि सकते। टेकिन देखा मने से एक डेो झाड़ पुहवाकी हतया हो। रहती है। दूसर वात यह घ्यान रोचती हे कि इस दवासे म्यूक मरते होगे लेकितन इसपको का खानानेवाली हुजारो विल्लियाँ मर यहो है कयोंकि झाड़र स्वाये हुये म्यूषकमे खानानेवाली विल्लियाँ मंर झदर से मर जती है।
चुहाकी उत्पत्ति वृद्धि नाश, मनादि कालसे चलती है। अधर्म वृद्धिसे विकृ' वतावरन हे अनन्देअवस हे होता है और उड़के चिन्हे' मे मूषक वृद्धिभी एक है। और कुदरत से हह वनष्पा नाश मो हो जाता है। दिलको'य के नाक शे मुप्फेएकी वृद्ध हेो रही है। रेट रटसे जितना मुप्फक नह्ही मरते विल्लो शोंकि मरनेे वृद्ध हे।ज,ती है! आयुर्वे'दमें कईं शैषे घृप हे। जिसमे चुहे टो' आंद चतु मरे आते हे। परन्तु हम बारेमे सुशोधन करनेका उते्जन आयुर्वे'दशोंके मं'छ विया जाता।
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उदराद-रेतल विष के लिये जो उपायोगो है वह इष्ट रेट हट के
जहर ये भी लाभकारी होना सभव है। यह दवा खाने हो वे तुरं वमन
विरेचन कराना। इच्छा मेदी ५-७ गोली या अववेचीलो १० से १२ गोली गम' नगस्से देना। एक घंटा राह देखकर रेक्त न हो ता फिर देना। सिध्दज्वालं ४ थे ८ रत्तो
गम' घ के साथ देना किद्दा बृक्षक छालका अथवा ढाक मूत॑ा दवाथ पिलाना ६
चौनाइदृा रस अथवा फैल्लीचा रस पिलाना। एलैया चै।ला ०१, वच तोडो ०॥
नमक तैल ९, घृत वाथ छाछमे पोष छाछड के साथ पीसाना हि
जान पुरप-१ पिलाव ३० से ४० ते ला पिलाना।
हृदय बंध रोग-हार्ट फेल्योर
अपने को सुघारास्दी कहने मनाने वाळे, सुखी जीवन विताने वाळे,
मोटर दिमान मे फिरने वाळे बंगला मे रहने वाळे बडे बडे अ'धिकर मोगते
बाळे प्रमः द्वाहेर मे रहने वाळे, फेमौली डाकटरे की रक्षा पानेवाळे गृहस्थ श्रोमं
लोग सौट शुद डाकटर लेग मो मत्यु के आधीन हे। जाते हैं। माने
हृदय मघ रोगो जमाना चल रहा' है। वैसे किस्से सुन्तो मुहोदये में और कहदेरों
में हि अधिक वनते है। हिदुस्तान मे और विश्व के समी देसी में यह दसा है।
जम'ना आगे बढ रहा है, नई नई शोध खोज वैज्ञा|निक लेग कर रहे है, जीन थे रण
उने लाने की मगधरी वताथारी कर रहेहै वैसे हि क्षय केन्सर रगरतपिन-कुछ
ऐत कुछ डायावेटीस द्वारय बघ म'पहण' मान्त्रक्यय और अनपाथ्य नये नये
मेा फल रहे है और निरन्तर ऐेसे रोगोयाकी स खया वढ रही है। प्रत्येक
रेास ह लिये किम्वे वैज्ञा|निके की देानकरन्से मिलती दे। रोग बढने रहे
है और लेका मनुष्य इन रोगोके बल पह रहे है वही यह दमनसक दवाो
साहरोंमे ज्यादा है। पालंमिेन्टके मेम्बर पुठार करते है कि सरकार प्रामोमे
डाकटरौक और विलायती दवाओ दवाथा सरकार नदि कती इ'यादि दहड
म मेोका डाकटरोका ल म दिलवानेके लिये प्रयत्ल करते है, पर तु उहृे यदृ शेवनार
चाहये कि वाम गजामे विलायती दवा और ढालकर नहि पहुचे और
सरकार नहि पहुचवा सको यह प्राम प्रमाे लिये सद्माग्य टा विन्द है।
सरकारी अधिककारी वर के वीकत किये अनुवार हिदुस्तानकी प्रजामे से र्दा १५
से २. टका प्रजा एलोपेथी-डिल यती दवाथा राम टे सकती है इसका अभं यह
है कि से बडत ८० टका प्रजा आयुये दके भाव'रहे रे'मा मुक्त हो रही है और
स ना भ रोग वचा रही है। ऊपर दिखे रोग और हृदय वंध राइरेाये से कष्ट
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८० टका और प्रम प्रमाने से कफका २० टका हेाता है । इस प्रकार विचार करनेसे मालूम हेाता है कि जठराग्निकी अपेक्षा म म प्रम'द्ना आरेप कफक्षा है नेक्न यसा और रसामु'कचे पाचनका मसा हि ड़्के लाचे जयोकै 'मत्ता है । प्राप प्रम'चा आहार विहार वंर पर'पराटे चटै षारे ओपीन पद तेक्न हि है । जो कि अपमानोंके अनुमान स्वानुभने और शास्त्रने गोस मे'नोइर् अंघोग से करनेके देखे प्राप प्राणमे प्रवेश हो रहे हैँ। देरी डोचहे डारसाने रसधान र्प्यानपर निकलनेके प्रामोसे ४४ खोचा का रद्दा है द्रव कारण प्र म प्रजाका धारे गप विगहने लगा है फिरभी साहरेके लपेटा प्राप प्रनात आरेारप हद्रसे सन्ट्ल है । वेसा कालके वातावर'परे, सुरकाळ आदिसे पनुग्रोंठा नाश बढ रहा है कौओ में'सेक्न कतलक्न नामे अस्स दप मघ दे । द्ना है, वद्द तो मरत्ना पद रहो दै' दौर देरी निरेरने म ममनेरैहो दूव खों जाता रहा है इत्पांद कर रनेके प्राप प्रजाका आरेराय सिर रहा है वद्द आगे हिव द्रारने पद्हुेचा भावोके गम्त मे है । आप्रतकुन्का अनुमत्र कद्ता है कि हिय यप रेात प्रजाका अवलेका साहेरान हद्राता है ।
हृद्यामृत येाग—१ अभ्रक मम्न तेर १, सुवर्ण वप्त मालती तेला ०॥ ने'घठपेसी पीपर तेर १, बग मम्न तेर १ मिल्र कर घोटकर ५ से ६ रत्ती मद्यपे अपत्र च्यवनप्रासे ले ।
हृश्यामृत येाग—२ महारक्ष्मी विगरम तेर १, अभ्रक म'म तेर १, विचद्ध तेला २ मिल्र कर ५ यो ६ रती च्यनप्रासे अधन्रा वप'रस हरीतक'श ।
हृदयामृत येाग—३ रतनमो'गत्तर रस तेला ०।, वच तकर'चुप कर मुक्ता !पिसो तेर १, रत्नाम्श्र टोध तेर १ मिल्र कर ६ यो ५ रतो मघ अयरा छोम' य घुठे अन्रलेधे
हृद्यामृत येाग—४ हरीत मम्न १ रत्ती, रसनमो'गत्तर ०। तेला सुवर्ण' वप्त मालती ॥ तेला, सुग' मम्न रक्ख ॥ तेला, पून'च दोदय ०। तेला, मिध्र कर ४ से ५ रती च्यननप्रधाए ।
हृद्यामृत येग—५ विद्ररसांयन करप २ से ३ गोली मृत्तलंग' चूण' = से ३ माशा म मिलाय खादद्शे अथना दूधशे ।
हृदयामृत येाग—६ मुक्ता !पिसो तेर १, पून'च मोदय तेल ०।, वैक'त मम्न तेर १, सुवर्ण वप'टो तेर ०। मिल्र कर ३ से ४ रती मघु या र'जन शो जि'चने ।
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॥ भस्म पिष्टि प्रकरणम् ॥
अथैक भस्म पिष्टिकृत् (रसेन्द्र तंत्रे)
न शोधनकृत्स्था शुद्धमृत्कलमात्रात् ।
चूर्णी कृतमर्दीकं च कुष्ठारी केतकी रसे ॥१॥
जलपिष्टविलिखा रंभा रसेर्मध्ये पुनः पुनः ।
कुक्कुटारकष पुष्टः: पक्वमृत्तमं भस्म जायते ॥२॥
उपयुक्तरसेन्द्रैः शुष्कं सूर्याशुभ्रमिरुहः ।
भवेत् पिष्टिरसौकार्य सौम्या हृद्दाहनाशिनी ॥३॥
मधुरा पित्तरोगेषु वातरोगेऽत्रगन्धया ।
कास हृद्रोगशिरोगेऽपि रूंगवेररसैः ॥४॥
अथत्रक भस्म निर्माणं (वातरोग प्रकरण अध्याय २)
शोधनम्
अथवा इन्द्रकवाराथे ध्यातभस्मं विनिक्षिपेत् ।
मर्द्दते पाणिना शुष्कं धान्याम्लादतिरिच्यते ॥५॥
धान्याम्लेन प्रकः रस्मादाध शोधयित्वा तु मर्द्दयेत् ।
अर्कक्षीरर्द्धनं मध्वपर्कपत्त्रद्रवेण वा ॥६॥
चक्राकारं ततः कृत्वा शोध्यद्रव्यपे खरे ।
चेष्ट्रयेदकपात्रे तु समग्रगजपुटे पचेत् ॥७॥
गुनमर्द्दैः पुनः पाच्यं सप्तवारं प्रयत्नतः ।
ततः वडशकाधैस्तद्वदूद्र देय पुनत्रियम् ॥
त्रियते नाम्न संदेहः सर्वरोगेषु योजयेत् ॥८॥
अथत्रक भस्म १०० पुष्टितं (रसेन्द्रार्तंत्रे)
पत्राद्रकं च नेा 'ग्राह्यं चिकित्सायां रसायने ।
वज्राभ्रकस्य पापाणाः कृष्णास्तेजसिचने वराः ॥९॥
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गुरुश्रेष्ठाममप्रत्षि तरच वचाभ्रक विटु: | वत्राभ्र वह्निना तमं न किंचिदू विकृति व्रजेत ॥१०॥
शोषन धान्याभक- वत्राभ्र वरीक्नाथे वन्हितमं विनिक्षिपेत् | पात्रिं पाणिना शुल्क ग्रोथि शूलेण सूचि शोषं ॥११॥
सहस्रशो चहिः कुर्गात कर्णिकारामसंभवाः | मनयम शोषण:- अभ्रकं वज्रकंडा निपिंचेदू बदरीजले ॥१२॥
पधातू सणपटे वध्र्रा मर्दयेत पाणिना बहु | अभ्रं जले सवेदसमवालुकाः पटपधगाः ॥१३॥
जलादभ्रं च निष्कास्य शोषयेदातपे खरे | ततोधर्येपक्वग्नि: सृटेभि: मुक्त्वाथा निष्कासयेदू भिषक् ॥१४॥
मारण - धान्याभ्रमिदचकस्य दुर्धर्र्वा पत्रजे रसैः | संपर्र्ं चक्रिकाः कृत्वा भानुप्रेक्ष वेष्टयेत ॥१५॥
पचेदू गजपुटे पक्षात कवार्थे वडजटामवेः | कुंदती नातसी शुस्वा म जिष्ठा व कुलालिकां ॥१६॥
मूर्वा शिरसि दिवरा भूमिगामलकी दुर्गिषका वचீ | तगरामलकी चैवापामार्गी नो गलपातनं ॥१७॥
जटामांसखकंपचाणि रसैः कवार्थेमुहुर्मुहुः | देयाः सप्तपुटाः सम्यक वैद्यैर्ग्रजपुटाच्चयैः ॥१८॥
अभ्रक भस्म सहस्त्र पुटितं (आयुर्वेद प्रकाशः सध्र्रायः २) यो लोहचेष्टपारास्तु सन्यान्येष गपनमार्कानि मेपजार्नि लिख्नित यथा.- मकंदुघं १, वरतदुघं २, शेहुणपदुघं ३, धृतकुमारी ४, पंचांगुलमूल पन्नानि ५, कफमाच्चो ६, मुस्ता ७, वटवरोटः ८, वसतरोपित ९ विसद्रुमूलपन्नानि १०, वस्निप्रिय थ ११, द्वोपन्री' १२, रसनकुः १३, पार्डी १४, श्वदिपर्णी १५, पृथितवर्णा' १६, कण्टकारी
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२७, लवसत्वः १८, वृत्ततो १९, लोष्ट्र' २०, किलवणां' २१, खरमंजरी, २२, गुड २३, लिद्रार्थके· घवलः २४, पादंकचूया २५, मालती २६, लोनूष २७ हरीतकी २८, आंम्र २९, विध्नोतनक ३०, तालीसपत्र ३१ वि्रषक मूलपत्र' ३२, जलकुम्भो ३३. ताडमूलो ३४, चुवः ३५, वाजिगन्धा ३६, मगस्तकपपत्र ३७, भृंगराज. ३८, कदलीकन्दुरत्' ३९, लतपत्रं. ४०, देवदारु ४१, गुग्गुली ४२, घन्टूरः ४३, कासमर्दे: ४४, मुलतान्ती ४५, लोध्र ४६ तुलको ४७, दूर्वा ४८, मारीवः ४९ मुषकवर्णीं ५०, दाराहिम वहलश्र ५१, घेष्टा ५२, सांक्तृपो ५३. नागवक्ली ५४, विप्पदी'नगरं ५५, श्वेतपुनर्नवा ५६, हिलमेधिका ५७ मधूकृतकर्णी' ५८ तितिक्त ५९, मदनः ६०,
द्रयाद्रिंमंवदेनुप्तनैदेककेनाद्रयभके माराणीय. इति मथक मार्जोयपत्र: । श्राभियंधालाभ सद्ध न्रपुता देया। यथासंकल्पं च प्रत्येकस्य सत्ववृपुप्टा: प्रायशोऽ भवत्ति । पत्रं सुखासंकल्पा पुय'है । द्रति श्रभ्रद्र सद्धसपुष्टित ॥१९॥
अभ्रक सत्त्व भस्म- (आयुर्वेद प्रकारा मध्याय २)
अथाभ्रकसत्वनिष्कासनविधिः कथमने । चूर्णी'कृतं गगनपङ्क्रमथारनाळे
दृढ़ी दिनिक्कमरोब्य च हरणसध ॥२३॥
भाण्यं रसैस्तदु मूलरसैः कदलस्या: पादांकुरंकंयुतं शफरैः समेतस्म ॥२०॥
पिण्डीकृतं तु बहुशा महिषीमलेन सचे'द्रव्य कोष्टगताम्भु धर्मेदृंढतां ।
सत्वं पतत्यतिरसायनजारणार्थं चोग्यं भवेत्सकलोऽप्यगुणाधिक' च ॥२१॥
एव पतिते सत्वे ततः किं कार्यं तदाह— कणशो यत्प्रसतेत्मत्वं रुपायां प्रतिनिधाय तत् ।
पितृपंचकृयगदातमेकीभवति घेषचव ॥२२॥
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घृतमधुगुरु गुडंजांटं कणयेततस्यांतं मित्रपंचकं नाम ॥ मेळयति सस्नेहातुनंगमाराजनेो हु धमानेन ॥२३॥
अयास्य शोधनमार्णमाह—— अयोanतशोधनं तस्य पारण वद्ददेष हु । मारितं ताम्रवद्दू गन्धपारदाराभ्या नियोजितपेत् ॥२४॥
पिण्डोकृतं तु बहुशोेएंव्य व्याध्यया-विन्दुक्रमाणान् बहुविन्दान् गोऽधनन् कुरवेत्यधेः । कोशागतंरमिति व्याघ्यार- यथापातकोद्रू्योः स्थापयेतम् । मारणं तद्रदेव तु यावद्रा-श्रिफलादि भिलोंड्वदूस्माच्चिरवा बिंचकृतिवारं वचिवारं । यत्स्वमारं या पुष्टियश्वा स्तवपद्मम् संप्राय जतणाथ', रसे' जातणाथ' तु शोधयिरवा मार्येम् ॥
अयास्यगुणा:- विरिरं सरसपन्नस्य त्रिदोषघनं रसायनमम् । विशेषात्पुं स्त्रीकारि स्याद्र्यसस्स स्तम्भनं परम् ॥२५॥
नानेन संदशो कि विदृंऐषण्यं पुष्टिस्थकृतपरम् । सत्यसेवी वयस्तम्भं कभथे नात्र सःशमः ॥२६॥
आयुर्वैधनम्भं हृदयति देहं च भुक् बुद्धिकरं । मृत्येोभ्रांति` दूरीकुर्यांत् सततं हि सेवनेंदं ॥२७॥
हृद्दृदौर्बल्यरोगकुपिमेहयकुष्ठहद्र वच्यं । दर्शप्रिकासामपकरं रसायनं वृंहणं परं वृंघ ॥२८॥
कान्त पाषाग-भस्म-(रसोद्वार-व तम) (र. तं) कान्तं पाषाग खण्डाश्र कान्तगर्भाश्र चुम्वक्षा: । आरक्तां मृत्तिकागर्भा। तमा रंभारसप्लवा: ॥२९॥
बुद्धा! कुपारिका द्रावैग्रुग्रा गजपुटेः पचेत् । सम्भारंवर` भस्म रक्तं स्याद्रू गुणदर्शने ॥३०॥
द्विपणी—— नृपमृत्स्थाने वृपमन्मूत्र । गंगाuptrणं भद्रमुस्ता` । अजारक्तच्याने अजामूत्रं ॥
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देये दृपितरकाय मेदेपाण्डूदरादिपु
वरयं हृद्य क्षत क्षीणे वृष्यं पुष्टिप्रदं भवेत् ॥३९॥
दुग्धेन पथुना मात्रा चतुर्गुणा मिता भवेत् ।
अनुभूय रसेन्द्रातन्त्रे योगः प्रकाशितः ॥ ॥३२॥
कान्तलेाह भस्म १०० पुटीततं (रसेन्द्रसार तंत्र)
शोधनं—कान्त चूर्णमश्रितं निपिंचेत् चैफले जले ॥
भू मराजरसे पश्चात्कटकारीरसे तथा ।
तैले तक्रे कुलत्यार्थकग्राये शोधग्रंमिश्रगिरे: ॥३३॥
मारणं—पलद्वादशकं कान्त पलं हिगुलमेव च
दिनं स मर्द्य कनकाद्रूभस्मतथा नजपुटे।
पचेत् सप्तपुटा देया हिगुलान्तर्गता: सुधी: ॥ ॥३४॥
पुनर्नं वाद्रिकर्णी च भृंगराजेम्लकपर्णिका ।
मपुनाडेा रिनिता द्रव्त्री सूर्या पाठा च पर्पटी: ॥३५॥
देशडाळी हंसपादी वंश्यकरेाटकी त्वथ्था
दुग्धिका द्रैपपुष्पी च गोजिन्हा जलपिप्पली ॥
मत्स्यकेसयं शुठीपत्त्रस्यु कांतभस्म मर्दयेत ॥३६॥
गुणा:—ग्रहणीमतिसारं च यकृत् पांडु च कामलां।
दारतरोगांसलूस्था , शूलं परिणांमभत्नं , जयेत् ॥३७॥
कान्त श्वासं वमिं पित्तं मेतिरोगायं भगंदरं ।
अर्श:कुष्ठग्रिरोगान् , प्लीहवमेदोहारं परं ॥३८॥
द्रुढणो —म्र्द्रुढणो' प्रदेतापरार्जिना मरजोति ॥
खाटी लणणी। रुक्काह' कुबाडोये। हंसपुप्पो' कुचेा। जलपिंपळी रतनेोलियेा
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कान्तलोहं भस्म ( आयुर्वेंद प्रकाश: षष्ठध्याय: ३ )
असाणमू—यत्पात्रे न मम्रति जले तैलचिदु। प्रथप्ते । हिर्गुगेन्व ल्यर्जितं च निज तिक्ततां निम्वकल्कः ॥३९॥
तन्मू द्रुघ्नं भवति शिखिग्नकारकं नैति भस्म । कृष्णांगः स्वातु सजलचपकः कान्तलोहं तदुक्तं ॥ ८०॥
जीर्णशक्रादि खंडा वा पुराणचक्रंडकाः । तीक्ष्णजार्ते हि गृहृणंति मारणार्थी विशिष्टराः ॥४१॥
माणोद्वांत शुलचूर्णं गृहीतं चुम्बकाशिना । शाखांतलोहकाराणां गृहे तदृ वह्नुल भवेत ॥४२॥
तच्चूर्णं तु समानंतीय सुध्दौतं निर्मलं शुचि । युकृत्या'स शोधय शास्त्रोक्तविधिना तंतु मारयेत ॥४३॥
शोधनमू—भस्मरक्तेन संक्षिप्तं किंकारकपयसायसं दलं छुताशने ध्मातं सिक्तं त्रिफलवारिणा ॥
त्रिधा: कान्तसघ संशुद्धिरिस्थेवं परमा भवेत । सर्वाभावे निपेक्तव्यं क्षीरतैलाद्यगोझले । शुद्धस्य शोधनं होतद गुणाधिक्याय समवं ॥४५॥
मारणमू—संशुद्धं शुलचूर्णं तु समानीय शशंगरः । स मर्दयेद् दिनं चैकरामलिन्दुकजे रसे: ॥४६॥
त्रिफला भृंगराजस्य कटकारोरसस्य च । त्रि:पुटानि त्रीणि दत्तानि सत्य चारितरं भवेत ॥४७॥
कासीसं भस्म ( रसेदार तंत्र )
कासीसं पुर्षपसंकं च नेत्रास्र्गदनाशनं । नानाश्लेष्मविधिं केशरंजनकायकं ॥४८॥
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भर्जितं भृंगराजेन कासीसं शुद्धिमाप्नुयात् । पलपोहेन योज्यमानं तत्कफातेजोमर्दनं च ॥४९॥
पत्रं गजपुटे पश्चाद् भृंगराजरसैर्युतम् । कुमारिका रसैर्युक्तं वाराहपुटपक्वं चितं ॥५०॥
सिद्धं गुंजात्रयं पल्त्रीहगुदामयहरं परम् । पांडुं गुल्मे मूत्रकृच्छ्रे देहं च मधुसंप्रपा ॥५१॥
कासीस मोदंतो भस्म-(रसौद्धार तंत्रं) । कासीसं शोधन पलं भृंगराज रसप्लुतं । मोदंती हरितालं च तावद् ग्राह्यं सुपाचितं ॥५२॥
द्वौ संमिश्र्य हरीतक्या: क्वाथै: संमुदयेद् दिनं । वाराहपुटपक्वं तत्कन्याद्रवै: पुत्रयं ॥५३॥
पुत्रैकरमध्यं धायात् सिद्धं क्षौद्रादिसंयुतं । स्तम्भु गुंजामितं दद्यात् स्वासे कासे हृदामये ॥ पांडो शूलेऽतिसारे च दद्यात् छर्दिं गदे निळे ॥५४॥
कुक्कुटांडरजक् भस्म (रसौद्धार तंत्रं) । कुक्कुटांडहत्वचूर्णं मर्द्धे निम्बूरुवारिणा । वाराहपुत्रपक्न तत् पुन: कन्याद्रवै: पुत्रेत ॥५५॥
ततः शातावरोक्वाथे मर्द्धे पाच्यं पुन: पुन: । देहं त्रिरतिकामात्रं मधुनाद्ररसैन च ॥ कासं श्वासकफार्धमानच्छर्दिं हिक्कामदोषहृत् ॥५६॥
द्वौ अस्य भस्म (रससरत्न समुच्चय: अध्याय: ५) । निर्पाण विधि:-अष्टभागेन ताम्रेण द्विभागखुरेकणं च ॥ विधृतं भवेत्कांस्यं तत्साराष्टभवं शुभं ॥५९॥
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तीक्ष्णरत्नं मृदु स्निग्धमच्छं इपामलं शुभ्रवर्णं ॥
निर्मलं दाहरक्तं च पेढा कांस्य परस्पनते ॥५८॥
घृतमेकं चिनां धान्यतं सर्वकांस्य मतं तृणां
भुक्तमात्रोग्य सुखदं हितं साम्यकरं तथा ॥५९॥
गुणः-कांस्यं रघु च विक्तोष्णं ढेखनं हृद्यमपादनं ॥
कृमिकुष्ठहरं वातपित्तनं दीपनं हितं ॥६०॥
शोधन मारण-वस्त्रं कांस्यं मृद्रे नापितं परिश्रृङ्गयति ॥
त्रिधते गंधताप्लव्या निरुथ्यं पंचभिः पुढे: ॥६१॥
त्रिक्षारं पंञ्चलक्षण सप्तधातुकेन भावयेत् ॥
रक्तवा गजपुटे पक्वं शुद्धभस्मतामनुयात् ॥६२॥
खपुष्पं भस्म (रसौदार तंत्रे)
खपुष्पेर वीजनपूरस्य रसे जंभस्य मज्जातल
अम्लतकैध संतीप्तिप्रिवेलं परिश्रृङ्गयति
रसकेन नरमृद्रेषु रिधते मातृ च रंजयेत् ॥६३॥
ताम्र च पारद तारं स्वर्णवर्णं भवेत् भवेत् ॥६४॥
रसकं कदलीकन्द क्रुमार्पं जुन्नसारिका
पक्वं भस्म भवेत् भस्माद् दद्याद् गुंजाचतुष्टयमु ॥६५॥
नचुष्यं कफपिच्छलं शिरोनेत्रगदापह ॥
शिराचूणे न मद्ना दद्याद् वा-नयनोत्तम ॥६६॥
गोदंती भस्म (रसेन्द्रार तंत्रे)
गोदती द्विविधा प्रोक्ता मृद्दी च कटोनापरा ॥
चद्रप्रिसहना मृद्दी तीव्राग्निसहनापरा
चूर्णीकृतारनालेन जम्भांम्भसा पचेद् दिनम् ॥६७॥
पश्चाद् द्विटनजारोग्य सुरत्विविधमर्दित
सत्वे चूर्णीकृतेनैव मर्दनाज्जायते ततः ॥६८॥
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चतुरंगनामितं दृढाढ वातपित्तकफामये । प्रमेहे मदरे घासे श्वासे शूलपे गुणदम् ।।१६९।।
गोमेद भस्म (रसेन्द्र सार तन्त्र') गोमूत्रसमचर्णः स्यात् स्वच्छं स्निग्धं च निर्दलं ।। निंचूर्णसे दिनं पिष्टं निशाक्काये करांके ।।
पक्वं पक्षाद् दिनं घृतं मुसतया भस्म जायते ।। वङ्रंं दद्याद रत्नानि पिष्टिस्वपाणि सेवयः ।।१७१।।
रोगे रसायने युंज्याद् न पुटे पाचयेत् कदचिन् ।। गुणहीनानि पक्वानि स्मुरे गजपुटादिपु ।।१७२।।
हृद्रोगश्वासकासादि स्मृति मेधापतिम् । वातपित्तकफैर्देकान् रोगान्प्रशमयेदिदं ।।१७३।।
चतुर्वंग भस्म ( रसेन्द्र सार तन्त्र ) यशाद पारदं नागं वंग सर्वे समं भवेत ।।
वर्त्तानना गालचेन्नागं तत्त्र वंगं विनिर्हपेत ।। रसरूपं यदा जातं यशद तत्त्र दापयेत ।।१७५।।
पारदं मक्षिपेत्पक्षात् निंचदंढेन चालयेत ।। मधुक्राथ चिंचागाया; त्वचाचूर्णं हड्डुं क्षिपेत ।।
घावत्सस्वं भवेद् भस्म कृष्णाभ्रभस्मतारयेत ।। पिष्टं कन्यासरैः कुयाद चक्रिकाः शोषयेत ततः ।।१७७।।
पक्वं गजपुटे पश्चात कसाये वटजोऽद्भवे ।। चतुर्वंग भवेदिसद्ध गजारुयद्रार्शमिः पुटेः ।।
गुजााद्रयां सपधुना सर्पिषा पयसाथवा ।। प्रमेहं मदरं वातं मद्यमेह प्रणाशयेत ।।
कुष्ठकृमिहरं शक्तिमदं संधिरुजापहम् ।।१७९।।
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जहरमोहरा पिष्टि: ( रसेन्द्रार तन्त्र )
सुनानी वैद्यके मोक्तं द्रव्यं जहरमोहरा रक्तपित्ततृड्दाहं दुनिशं रमनी मता ॥
वचे: चूर्णेन शोका चूर्णीहृत्याजुनत्वच: । कषाये घटजटाटायाश्च केतकीपुष्पदारिणी ॥८१॥
भावचित्रा भृङ्गं घृत्पा मतिद्रव्य दिन दिनं । त्रिचु जामातृपा क्षौद्रै: दत्ता पिष्टिरुपे नवा ॥८२॥
जहरमोहरा भस्म ( रसेन्द्रार तन्त्र )
पिष्टिरुपेण वहुभां देया जहरमोहरा भस्मनोस्त्रिगुणा: मात्या हीना: स्युः परिहानिता: ॥८३॥
अर्जुनस्य वचाक्वाथैस्तथा डंटजटांकुरै: । वाराहपुण्डपक्वेयं मंजिष्ठाथैवारिणि ॥८४॥
सिद्धं भस्म प्रवेन्मात्रां द्विरक्तपरिमाणतः । श्वासहद्रोगकासध्नी रक्तपित्तांशिवां हिता ॥८५॥
ताम्र भस्म ( रस रत्नादर: पारदतीपुंज नित्यनाथसिद्ध उपदेश: )
नागेन रसणं रजतं च ताम्र ये गृहेन ताम्रं शिल्यां च नाग । तालेन वगं त्रिधिषे तु ठोहे नागीपचो हन्ति च हिङ्गुलेन ॥८६॥
षोडशनं- अभुद्रं ताम्रमायसने कांतिदिनं स्मरभावहा । वांति मूर्छ्छाभ्रमोद्वेगकृतपंकं च शूलकृत ॥८७॥
रतुर्केकशरीररक्तरणकांजिकैर्मत्तामपककं । किंत्वा प्रवाप्य-निर्गुङ्गो रसै: सिंचयात् पुनः पुनः ॥८८॥
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जपाजपुसुमसंकाशं सिन्दूरं मृदुघनसमं ।
लोहनामोद्रुमितं ताम्रं मारणाय मृगस्यते ॥८९॥
वारान् द्वादश तं शुद्धं लेपात्तापाच्च सिंचनात् ।
रत्निकालवलपिष्टरौप्यशाटकाद्रौ
पेषयेत् ॥९०॥
पडवारमल्लकांवर्fर्निर्गुण्डचाथ क्रिमिद्धये ।
शुद्ध्यर्थात् नाग्र सदेहो मारणं च अप्योच्यते ॥९१॥
मारणं- गंधेन ताम्रतुल्येन हेम्नःपिष्टेन लेऽपयेत् ॥
कंटवेधीकृतं पत्रं धमयित्वा पुटे पचेत् ॥९२॥
उद्धृत्य चूर्णंयेतस्मिन् पादांशं गन्धकं क्षिपेत् ।
जं ध्मातेरसानालैर्वा भस्मद्रेवोत्थद्रवैः ॥९३॥
पिष्ट्ववा पिष्ट्ववा पचेद् रुद्धं सगंधं च चतुःपुटेः;
मातुलिंगरसैः पिष्ट्ववा पुटमेकं प्रदापयेत् ॥
समशर्करया चैवपुटा देयो मृतो म्रियते ॥९४॥
अनुभवः-पाषाणभिच्चयास्लपर्णी कृष्टं शिखिवन्हिर्वा क्षिवा ॥
प्रत्येकं पुटो देयो शतैकं वा चथान्ति ॥९५॥
पश्चात् मुरणकद्रवेन गोदकं प्रतिधाय -च ॥
पाच्यं माजपुटे गोदकं मृत्क्षा व्रणवेष्टितं ॥९६॥
ग्रणः-ताम्रं तिक्ताम्लपक्वरं कषायं शीतलं सरं ।
कफं पित्तं क्षयं पांडुं श्रमयेच्च रसायन ॥
परिणाम शूलपर्शांसि मंदाग्रिं च विनाशयेत् ॥९७॥(र.तं.)
सुवर्ण भस्म (रसोद्धार तंत्रं)
करपेला विटू द्रवांशा रप्यात् टंकणं च दशांशकं ॥
मध्ये निचूषजंबौने वाराहे च पुटे पचेत् ॥९८॥
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घृते: शर्करया दध्ना दध्नात् खजु फलं पूटं । प्रतिवेधं मधुर्यैषं टंकणं पक्षिपेद् भिषक् ॥९९॥
शांतित्रांतिहरं श्रेष्ठं निऋत्यं भस्म जायते । वृत्यं लड्कषायं च ज्वरघ्नषं भेदि शेकनं ॥ कुष्टकृद्रोगहरणं च पित्तमेदोविनाशनम् ॥१००॥
नागं वंगं च यशदं सप्तभागेन कल्कपेद् । कटाहे द्वापित्वाथ आधारूपस्य दंडतः ॥१०१॥
अभ्रस्थस्य तद्वाचूर्णं पक्षिपेच्च मुहुर्मुहुः । वातयेत् सुतं लेप: कुष्ठं वर्णं भवेच्छुभ्रं ॥१०२॥
कुपात्राश्रयदान्त्यपात्र रसेन चक्रिया: कृताः । शुद्धा गजपुटे पक्व्वा पीताभं भस्म जायते ॥१०३॥
मपेहं मदरं सेमारोगं पित्तं कफं कुरूतेन । संयेनवधुमेहं च हृदयं बलयं रसाघनम् ॥१०४॥
रक्तित्रयं सगधुना नवनोतेन दापयेत् ॥ नानानुपानयोगेन योगवाढि गुणावहम् ॥१०५॥
वृणकोंतमणि पिष्ट:-भस्म रसौदार तंत्र'
पिष्टि: वृणकांतमणि: शुद्ध: स्वभावेनैव विधते ॥ श्वेतापर्ंजितोमृदुक्कषाथै?चूर्णीं कृतश सः ॥१०६॥
घृष्टो दिनं च जंवीररसेनाश्वत्यजत्ल्वचा । अतावरीरकैषंधै? पिष्टि: स्याद् रोगनाशनी ॥१०७॥
भस्म पुनर्नवाग्राः पंञ्चागरसातिपिष्टि च मद्येते । अभ्रापुष्पीरसैः पश्चाद्जनस्य त्वचारसैः ॥१०८॥
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कुङ्कुटोरसंपुटेऽपि द्रेयो घृष्ट्वा रोगेषु दापयेत् । गलग्नाहं गलप्रणिः वातपित्तकफोद्र्भवेषु ॥१॥
दिग्विजयमृतास्तवे षड्र्गुर्जेमं धुस्तपिष्टा ।
नाग भस्म (रसतालोक्त नित्यनाध सिद्ध प्रयोगेऽपि)
पाकदीनेन नागवंगं कुष्ठं गुल्मं रजाकरां । पांडुमेह शूलं वातकफशोफादिरोगं हतत् ॥१॥
शोधनं निष्क्रियते मूलचूर्णेनांकदुग्धेन लेपयेत् । नागपत्रं तु ततः शुद्धं तांपयित्वा निषेचयेत् ॥२॥
निष्क्रियतेद्रवसंसिद्धे तु ततः पत्रे न कारयेत् । लिप्त्वा हेम्ना पुनः सेध्यं सप्तपात्रं निधापयेत् ॥३॥
सारणं चाश्वत्थमेवचे भस्म नांगस्य चतुर्भतः । क्षिप्त्ववा चुल्यां पचेत्पात्रे चोळयेल्लोहदंडकात् ॥४॥
यावद् भस्म तदुन्द्रांशं भस्मतुल्यां मनःशिलां । जंबीररसैः श्चार्नवालेक्ष पिष्ट्व्वा पुुटे पचेत् ॥५॥
स्वांगशीतं पुनः पिष्ट्वा विंशतांशं शिलाम्लके । एवं चिं शुद्धे पक्वंनागं स्यात्त्रि निःतुत्सकं ॥६॥
नोल्लम पिष्टः भस्म (रसेंद्रदार तंत्र)
गुटिका इन्द्रनोलं वारिनोल श्वेतसंपुटे मृदप सत्वचित्र वारिनोळं द्रवपुणमाषधेष्टूपमुद्रवपते ॥१॥
तेजेऽपयं कृष्णगर्भं स्निग्धं स्वच्छं च मध्यमं । उत्तमं नीलमेतत्स्यादलघुभार्द्र च विष्पतम् ॥२॥
मृदुमासि कन्यकासुच्र सम्तं हीनम्नां नहि । नयचिकित्स्वे भवेत्सर्वे रोगवारणकर्मणि ॥३॥
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यावе पित्ते कफे श्वासे, दारुण्ये हृदयस्य च। इष्टे च रक्तपित्ते च - दाहे शोर्षे गुणोदरम्॥११९॥
मषारायोः पित्तिरेव-धीनं स्यात्तु-वह्निपाचितम्। वर्ज्यं विरेच्य संशोधय रक्तेपु निश्रयस्त्वग्मयम्॥१२०॥
मेध्यं, सर्वेषु-रसान्त्रेषु गुणान् भनेत् प्रकटाश्चितां, मस्म-विपित्तिन्, कुचापि रसाम्त्रेषु व्रष्यं च ते॥१२१॥
मस्मामिरजुभूष्यात्र मिपकु हिताय दीयते। चवकहार्या पित्तिरेव कार्ये भस्म न रत्नजम्॥१२२॥
गुणाधिकां भस्मसिद्धं पिप्पलिं - सर्वत्र युज्यते। पिष्टूना सम्यक् चेम्द्रनीलं द्रोणपुष्पीपसैर्दिनमु॥१२३॥
दिनं कुपारिवकार्द्रैवः केतकीकुसुमेदिं नमू। सतपत्रीभवैः पुष्टैः सतावर्या रसैर्दिनं नमू॥१२४॥
सं पर्घ्यं विधिवत् सिद्धा पिप्तिनीमलमत्नजा। रक्तपित्तं - कफ कांमं भासं हृच्छछमुत्तमम्॥१२५॥
पारपिचकफाद्भूतान समपेन्दं वहुलान गदान। वस्त्या रसायनी वृष्या मेधास्मृतिमतिप्रदा॥१२६॥
मस्म-पदिंते चक्रिकां कृत्वा र-मापत्रैच वेष्टयेव। वस्त्रमृतिकऱ्यांवेष्टच शुष्कं गोधूपकोष्टके॥१२७॥
वार्घे दशदिनं धावत् ततो निष्कास्य पाचयेत्। कराहे गाढ़कापूर्ण गोळं तत्र निवेष्टयेत्॥१२८॥
दग्राद यामाष्टकं वहिस्वेदांगसीतं च मद्ययेत्। इन्द्रनीकभवं भस्म द्विगुंजं मध्युसर्पिंषा॥१२९॥
नित्यं वह्निस्थरोगाणां दोषप्रतिकनिवारणम्॥१३०॥
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पन्ना पिट्ठीः भरकम् (रसेंद्र सार तंत्र) ग्राह्यमत् हरीतकी। ताक्ष्यं मरकतं गुड । पन्नाखयं मसंणःसिनरंध्र रसिपचंद्रभासुरः गुडः ॥१३०॥
चिविटं किंशुकी नीरं कर्पूर पांडु शोधितम् । कुंकुमाभं सेवन्नानह गुणहीनं तु मुच्यते ॥१३१॥
ताक्ष्ये च मरगुरु श्रीतम्मलैपित्तहर गुर । जोंफेडबरोगिनपातंगोमपचात श्वांसं विषापहम् ॥
पांडुरुनोमचोपकनपायुष्णे चूर्णण स्मृतः ॥१३२॥
रसप्रस्थेयु पन्नाया मस्म पिट्ठिश्व नेदिता ॥
पर प्रयुज्यते वेधीः कवचिद्रुणोषधंतेरे प्रयो ॥
उद्यते डनु मचेनैव रसेंद्रारारंगयत्करेत ॥१३३॥
पिट्ठी ताक्ष्यं सुवर्णं ग्राह्यं सूक्ष्मचूर्णी कृतं पुनः । सारिवा काकजंधायं तिलपण्याढकसंस्कृतं ॥१३४॥
वृत्तकृवाथै रसैमेंर्ध प्रतंगहं च पृथकृ पृथकृ । यथैः च दिवसे रात्रौ खल्वे चंद्रार्धसेविज्ञात ॥१३५॥
पिट्ठिमरक्तस्थेयं वृध्या चलन्या रसामयी ॥
मधुना रक्तचिक्का मात्रा दुधेन सुप्वपाथना ॥
हृत्फुल्फकफे शिरो रोगे दशादायुष्यर्धिनीनि ॥१३६॥
असभ-करष्ठिकमिव पिट्ठिरगंधकं ताकलकं तथै ॥
चतुः करषंमिनं ग्राह्यं मदितं कन्यकारसे: ॥१३७॥
गोलं कुलवथस्थपनेरावेष्टयावातपरोषितं । कृत्वा मृत्कपुट समयपुनरातपशोषितं ॥१३८॥
पचे तु द्रालकाग्नौ ससततं पराहग्निकं । स्वांगशीतं समादाय खल्वे सूक्ष्मं विमर्दचेत ॥१३९॥
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वेतापराजितां मांसी हदन्ती सारिवाजले: ।
एकैकां भावनां देया सर्वरोगेषु दापयेत्॥१४०॥
गजेंद्रचांडवंगस्य चूर्णं द्वादशरक्तिकं।
मधुहेरं मातृनाभ्रं हद्रात्रौ निह्नपानतः ॥१४१॥
हच्छ्छेदे बिन्दते मेहे सयरोगे मयुज्यते ।
नरामृत्युहरं वृद्यं वयःस्थैयकरं परम्॥१४२॥
पित्तल भस्म (रस रत्न समुच्चय अ० ५)
उपारुह्या रीतिकां काकतुंडी च त्रिविधं पित्तलं भवेत् ।
गुणैः संत्रिप्तवाकांजिके क्षिप्त्वा ताम्राभा रीतिका मता॥१४३॥
एतं या जायते कृष्णा कांकतुंडोति सा मता ।
रोचिविश्वकसेसा साक्षोदर्जुनुंधनी साक्षरिपत्तनुजु ॥१४४॥
कमिकुष्टहरां येभंगात् सेवनद्रेयां च शोभिलां ।
काकतुंडी मत्सनेहा त्रिकतोष्णा कफकित्तनुत्॥१४५॥
यकृत्प्लीहीहरां शोतवीर्यां च परिकीरितिचां
शोधनं तप्त्वा क्षिप्त्वा च निर्गुंडी रसे श्यामार्जेनान्निते ॥१४६॥
पचवारेण सशुद्धिं धैविरायाति निश्चिता ।
मारणं निम्नतुरस्संयोगे ध्वेक्षित्ता पुष्टितां लभ॥१४७॥
रीतिरायाति भस्मत्व ततः श्रेष्ठा यियासुखं ।
ताम्रतन्मारकं तद्यः कृत्वा सर्वत्र योजयेत्॥१४८॥
शंखराज विष्ट: (रसोद्दार तंत्र)
शंखकारेरगुपाया: प्रोक्ता उत्तमाषपभेदतः ।
पुष्परागस्य भस्मार्थं विशिष्टुक्ता न कुत्रिचित् ॥
भिषक् हिताय चास्माभिः प्रोक्ता रोगान्नाशत्तये ॥१४९॥
स्थूलं स्वच्छं गुरु हिमं श्वेतं क्षेमलं तथा ।
उत्तमं पुष्परागं तत्वं निघप्रभं इयामकं तथा॥१५०॥
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तोमरदीनं द्रापयुक्तं तत्पकीर्तितम्
वान्तपित्तकफान्हन्ति कुष्टोदरार्तिमं नथा ।॥१५१॥
रक्तपित्ते तु मन्दाग्नौ मूत्रकृच्छ्रे गुणाधिकम् ।
शोभनं नेत्रयुक्तं स्पातिपीड़ितनीलमुखं भवेत् ॥१५२॥
पाचयते वृह्नकायत्रे भस्माशा विधते मृदि
वाराहादिपुटेष्टपक्वं रत्नं हीनगुणं भवेत् ॥१५३॥
पेष्टरराज भस्म (रसेन्द्र सार तन्त्र)
चूर्णीकृत पुष्परागं हरिद्रा त्रिफला रसे:
घृष्टं दिनत्रयं यावद्रगोले रम्भाद्रलेह्यत: ॥१५४॥
वेष्टयित्वा स्त्रवद्रव्यै: वस्त्रप्रतिचर्या तत:
वस्तं क्षयपिश्युमि: शुष्कं वातुल्लकायंच पचेत् ॥१५५॥
यामद्धादशपर्यन्तं स्वांगशोतं समुद्धरेत्
मर्दघेद्र्दिनमेकं च द्विरक्तिमात्रया तव: ।
मधुना नवनीतेन घृतेन पचसाधना
उत्तरोगेषु सर्वेषु समयमस्ति गुणाधिकम् ॥१५७॥
पंचलेहक भस्म (रसेन्द्र तन्त्र)
कयार्कुजा-नागेन चंगरतथा खोहे कास्य रीतिः समं समं॥
स्पादुत्समं पंचलेहकं द्वावितं सर्वमेकत: ।
वर्तुल्लं वर्तलेहकं च भर्तिं पंचरस तथा
पंचलेहस्य नृपानि पात्राण्यारोग्यदानि वै ॥१५९॥
सर्वमेव पचेद्भाण्डे चाम्लद्रव्याभिवर्जितम्
तत्पात्रे पाचितं शुक्तं शुभं तैलघृतादिकं ॥१६०॥
शोधनं वसलोहेनापि तैले तक्रे च कांजिके ।
गोमूत्रे व कुष्ठरथानां कषाये च विधा चिकित्सा ॥१६१॥
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मत्स्यानि निष्पिचेत घावच्चूर्णीभवन्त्यघृतानि च । शुद्धं भवेत् पञ्चचत्वारिंशत् पञ्चाशत् भस्म समोचरेत् ॥१६२॥
संवत्सं चापमृतेऽपि सश्कवारं निष्पेच्चयेत् च । वर्ज्जयेल् शुद्धिमार्गाति भस्म येऽनुज्यं अवेद घनमुच्यते ॥१६३॥
मारणं-भर्त्सनं चैव बलादङ्गष्टेन पञ्चमे गन्धकतैलकेन च । अर्कक्षीरेण संपिष्टं पचेदृ' गजपुटान्तधे ॥१६४॥
अर्कक्षीराक्षप्रक्षेपान् रसेन निंबुकस्म च । कुमारीभि: बद्धभङ्गानां मर्द्यं गजपुटे पचेत् ॥१६५॥
भवेद् रोगहरं भस्म,प्रतिमेक्षरद्रिमि: पूटे: । वादपित्तकफादीनां श्रवणदेहहरं फसुपां जानु ॥१६६॥
इत्थं मुदावते निर्मलकशं छदिं'क्रमिहतं तथा । पलशुद्धिकरं नेत्र्यं श्वासकास हरं भवेत् जितं ॥१६७॥
कुष्टत्रयचातिकारदं कुहध्नं रुचिदरं नमू । अञ्चाल- पिष्ट: चन्द्रपुटे श्व (रसोद्भवत्रि) । विधुमस्स पुणां पोक्ता शास्त्रकारैरिभेषधरै: ॥१६८॥
न तद्भस्माथ पिष्ट्वा निर्दिष्टा कृतविसंकचेत् ॥१६८॥
अस्वामिर्भरतुध्याय दीयते । वैङ्लहेतवे ।
पचाले चूर्णमात्राथ द्वौपुष्पौरसोनन्वितौ । शतावरी च मधुजिह्वा शतपत्रोमसूनकं ॥१६९॥
प्रत्नेकरस्मु रसद्रवैर्देय दिनं यथादिधि- । जलेन शतपदच्ाष पुष्पपातं मर्द्येंद दिनेऽपि ॥१७०॥
पचांक्रिपिष्टिका सिद्धा शीतविंयी गुणावहा ।
चतुर्गुणा मिता मात्रा दद्याच्च मधुना सह । रक्तपित्तमग्नां स्रुंनमादजानगदान ॥१७२॥
एतां चन्द्रप्रभित माहू: रत्ना चन्द्रांगुसंयुता ॥
चतु: सूर्यांगुधृत: पीडयस्तां च सूर्यंगुढ' कडु: ॥१७३॥
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प्रवाल भस्म [रसेन्द्रार तंत्र]
उक्तपिष्टिं प्रवालस्य कन्यागर्भेैषु मर्दयेत् ।
वटांकुररसैः पर्षद्भुटेद्वारार्द्रजे पुते ॥१७४
निगुढा भस्मता तस्य द्राविकापक्ष्मासकृप्यये ।
उष्णवीर्यैर्मिदं भस्म दशम द्रयादुदीरजे गदे ॥१७५
जंग भस्म (योग रत्नाकर):
व्यालयादि-खुरकं मिश्रकं चैति द्विविधं वंगमुच्यते ।
शोधनं खुरं तत्र गुणैः श्रेष्ठं मिश्रक न हित मतं ॥१७६॥
धवलं मृदुलं स्निग्धं द्वितद्रावं सगेरवं ।
निःशब्दं खुरवंग स्यात् मिश्रकं इ्यामथुष्ट्रकं ॥१७७॥
द्रावयित्वा निशायुक्ते क्षिप्तं निर्गुंठिकारसे ।
विशुद्धघर्मति त्रिवारेण खुरवंगं न सापायः ॥१७८॥
मारणे मृतवाते द्राविते वंगे च चाम्बुस्थचेच रजः ।
क्षित्वा क्षिप्तवा चतुर्थांशं छोर्द्रद्र्ग्या विचालयेत् ॥१७९॥
ततोग्व द्रियामात्रेण वंगभस्म प्रजायते ।
अथ भस्मस्मं तावं सिप्त्वास्ठेन मर्दयेत् ॥१८०॥
वरतां राजपुटे पक्वा पुनरम्लेन मर्देयेत ।
तावेन द्रप्रांशेन याममेकं ततः पुते ॥
एतद् द्रप्रांशे: पक्वं वंगं तु भ्रियते ध्रुवं ॥१८१॥
मयूर पिच्छा भस्म [रसेन्द्रार तंत्र]
शिखिपिच्छभवं भस्म कृत्वचिन च हस्रवे ।
भिषग्भिर्युपयते यस्मादस्मामिस्त्वद्विषोषपते ॥१८२॥
संघ्रशं शिखिपिच्छानि हण्डिकायां निवेशयेत ।
पचेद्र्गजपुटे पश्चात्तपस्मं पातं च भस्मनः ॥१८३॥
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पकारैरमृदुजे: कवाथै: द्रोणपुष्पीरसै:स्थथा ॥१८८॥
चक्रपदैरसेनार्थं घृताढवा गजपुटे पचेत् ।
ताम्रं गंधं च नेतद् विषं वातं क्षयं करं ।
इदं च गुल्ममरुचिंसि मचककुष्ठं च नाशयेत् ॥१८४॥
मल्ल - भस्म [रसेन्द्रार्तंत्रं]
गैरीपांपाणिजं भस्म विधिवन्नेवं हि रचयते ।
रसशाखेषु कुत्रापि ततोऽत्रास्माभिरुच्यते ॥१८५॥
रोगप्रशमनार्थीयां श्वेतः प्रोक्ता गुणावहः ।
चतुर्भागाथ गोदन्ती मल्लोऽपि भागैक एव च ॥१८७॥
मर्दने दिनरेकं तु वत् पाश्चात्समं विधीयते ।
मेघनादरसैःस्थैः तण्डुलीयरसैःस्थथा
अर्कदुग्धैः गवां मूत्रे ततो गोमलं विधीयते ॥१८८॥
पत्रेरेरंडजैर्वेष्टच्य सूत्रवंशं च कारयेत् ।
प्रकां गुल्मप्रमाणेन मृत्कपिंडं विधीयते ॥१८९॥
प्रवेष्टचं वालुकायंत्रे अग्निं दद्यात्क्रमेण च ।
यामषोऽद्भुतं यावत्स्वांगीसीत् सद्युद्ररेत् ॥१९०॥
भस्मांगेलं पृथकृत्यवा दुर्गंधका रसमर्दितं ।
पश्चाद्वस्त्र्यां शुनात शुष्क रक्तिकैका प्रदीयते ॥१९१॥
मधुना शृंगवेरेण दद्याच्च श्वासकासयोः ।
कफरोगेषु सवैंषु ज्वरेषु विविधेषु च ॥१९२॥
माणिक्य विपिठ्ठ: भस्म (रसेन्द्रार्तंत्रं)
पिष्ट: रसजोऽत्रेषु कत्र्रापि पिष्टिपांणिक्यभस्म च ।
न हृश्यते न तत्रास्त्र तयवहाराय दीघते ॥१९३॥
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माणिक्यं पद्मरागाख्यं सिनगधं स्वच्छं गुरु स्थिरं ।
पद्मरागोपमं श्रेष्ठं रोगमथनं तु तत्परं ।
पिष्टीकृतं च माणिक्यं मेषश्रृंगीजरसाप्लुतं ।
भृंगराजरसेनैवं रसैः शास्त्रविहितैस्तथा ।
जलपिप्पलिकाद्रवैः प्रत्येकस्य दिने दिने ।
पिष्टिरेषा भवेत्सिद्धा माणिक्यस्य गुणप्रदा ।
आंवुश्या वृंहणी वृष्या कफवातहराद्र्तिहरु ।
पापरोगग्रहातिं च नाशयेद्योगमात्रया ।
भस्म द्राणपुष्पी रसेन पिष्ट्वा सम्पग्नोलं विशाय च ।
वेधितं कदलीपुटे मृदु स्कपुटं विधाय च ।
वालुकाप्यं च्रमध्ये लतपाच्यं द्वादशार्जामकम् ।
स्वांगडीप्तं निष्कास्य भस्म उच्चहरेद्भिषक् ।
इदं किंचिदुष्णवीर्यं दिव्येपातिप्रश्विद्गुणात् ।
माक्षिक सत्व भस्म [रसेद्धार तंत्र]
स्वर्णाक्षयं माक्षिकं पिष्ट्वा समभागेन दापयेत् ।
गुंजा क्षौद्र टंकणं च तेलमेरण्डहजं तथा ।
मर्दयेत् तस्य चूर्णेन सत्वं माक्षिकजं भवेत् ।
ततः समभागेन गंधकं ।
मेषश्रृंगींद्रवैर्जलमूसेन परिमर्दयेत् ।
वन्ध्याकर्केटकी मूलैरहनिर्दशद्रवैर्हजैः ।
चतुःपंचपुटेरेप सथेन माक्षिकसत्वजं ।
वृष्यं रसायनं धन्यं चक्षुष्यं पांडुमेहनुत् ।
कुष्टं शोफ च दुःखामरोगं साध्यो विनाशयेत् ।
रक्तिकैककार्मवं दद्यात् सन्योषं मद्यसेविता ।
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मुक्ता पिष्टः (रसेन्द्रार तन्त्रे) ।
रसशालेषु मेपु मुक्ता पिष्टैरयाश भस्मनः । विधिः कुत्रापि नैवोक्तःरस चार्माथिरिहोच्यते ॥२०५॥
मुक्ताचूर्ण विघायायां रजोगुणरहौ भवेत् ।
शतावर्यैरसैःश्वाथं शतप्त्रौपेषनजैरपि ।
प्रत्येकं दिनं मध्या रात्रौ चन्द्रांशुधारितः ।
मुक्तापिष्टिर्मे तसद्धा । द्वित्रिरक्तिकमात्रया ॥२०७॥
मधुना नशनेत तन शरप्षा पयसाथवा ।
दध्यान्नस्थितप्करोगेषु रक्तपित्तेषु सेवन्ते ।
शीतवीर्य गुणयुक्ता ग्रहदोषनिवारिणी ।
॥२०८॥
मुक्ता भस्म (रसोदार तन्त्रे) ।
विल्वपत्र सैर्मुक्तापिष्टद्रुया गोलेन विघाय च ।
विल्वपत्रेश्व संवीज्य कुय्यामृत्कप्टे ततः ॥२०९॥
गूढक तद्राहुकायंत्रे दशदामावेधिः पचेत ।
स्वाग्नौीत च निप्कास्य घृष्ट्वा सम्पिं दिनार्वाधि ॥२१०॥
द्रिगुंजामितं दध्याद्रातपित्तकफामये ।
अनेनैव विधानेन्वयेन्द्रोगक्षयकोत्सादव ॥२११॥
मुक्ताशुक्ति पिष्टः भस्म (रसेन्द्रार तन्त्रे)
व्याख्याऽसंक्षेपाद् रसशास्त्राणि मुक्ताशुक्तितेर्युनान जड्गु ।
न तद्भेदसमकृतिः कैथितुं स्वल्पग्रंयेषु वणिता ॥२१२॥
मुक्तावदेव तस्युक्तिः मायः स्वल्पपुणा मतः ।
न शुक्र भस्म मुक्तायास्तथा शुक्तेनिबेधत ॥२१३॥
अश्मन्मते तु मुक्तिपिष्टिर्यबहार्या भिषग्वरैः ।
अथापि तत्कृतिं वचिम शुक्तिभस्म प्रवारीतत् ॥२१४॥
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शोधन-शुक्कयः खंडशः कृत्वा पक्षाल्य चारिणा वतेः ॥
धृचिकृकरजांतत्त्वान निष्कास्य शुद्धिपादरेत् । ॥२९५॥
पिष्टि-पश्चात्स कुट्य संप्रेष्टं वस्त्रगाळं च कारयेत् ।
अष्टत्यादुग्रसंप्लक्षपलाशानि सुभावितम् ।
एकैक दिन पर्यन्तं शुक्कं मूषायां शुधिर्भवेत् ॥
शुक्कं शुक्कं हुतर्मध्ये वस्त्रपूतं ततः कुरू । ॥२९६॥
चतुर्णां ना वीता मात्रा तकेन मधुनाथवा ।
नवनोतमितायुक्ता पातं पित्तं कफं जयेत् ॥
रक्तपित्तं वमिं मेहं पदरं पित्तजान्मदान् ॥२९७॥
भस्म-शुक्ति पि प्रस्थाजुनत्कृशोऽल्पमलि(लि)क्वाथमपिद्रुतः ।
चक्रिकाः सूर्मितापेन शुक्का गजपुटे चेत् ॥२९८॥
तथा पंचपुटा: देया खरवेधे सम्प्रुटे विरमेत् ।
भावनात्रितयं पश्चात् जवीरस्य रसेन च ॥
माशादितृचतुंर्योगा तकेन मधुनायवा ।
कासहद्रोग शूलध्नी गुल्मेदरक्रपीन जयेत् ।
दचिकृत्कफवातरो किंचिदुष्टगुणा स्मृता । ॥२९९॥
मण्डूर भस्म (सेोद्भाव त त्)
नगह्रिया-पुनर्जातं खानिजं किट्ट मेहैर यथ्क्कारजं ॥
शोधन-श्रोषितने रजतच्छायं रक्ताभ गुरु चेतनम् ।
विधिवल्लेखाह कटूर्मध्ये क्वापि भस्मकृतींहि ॥३००॥
चूर्णीकृतय खरांगारैस्तप्तं क्षिपेच्च गोजले
तक्रेऽक्षे त्रिफला क्वाथे निम्बुजुनीरे क्षिपेद बुधः । ॥३०१॥
तेन किट्टटे:मपचयोगो निघेतर शुद्ध भवत्प्रलं ॥
मारण-काकमाची या स्वपुष्पो कुमारी त्रिफलान्विता: ॥३०२॥
मत्स्येकस्य रसैः क्वाथैर्धाष्टव्रा गजपुटे चेत् ॥
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पंचामृतेऽस्तवत्: पञ्चवं पाण्डूरमुत्तमं भवेत् ॥२३५॥ 'नालपुष्पिकर' पौण्ड्र कामलां श्वेतगुञ्ज जयेत् । शोणवीयं रचिकरं चक्रपुष्पीहेदारमः ॥२३६॥
मृगशृङ्ग भस्म (रसेन्द्रवार तन्त्र) - साधारसीङ्ग भस्म अटन्त्यरणघमथे ये 'हरिणीमियुतां मृगाः' । tवत् शृङ्गाणि न योग्यानि चिकित्सासमकर्मणि ॥२३७॥ पाण्डान्तश्व वृत्तकाया मृग ये 'वनचारिणः' । तृपभोगपा मत्तशृङ्गास्तेपा शृङ्गाणि गृह्यतां ॥२३८॥ 'हस्तिवेदं तु तन्मानि स्तवः श्वेतगर्भीण चूधिका: । क्रियान्ते शुभकाये गुदु बालिका धारयनि च ॥२३९॥ ठाके सेमर सिङ्गं च कषयचे तद् गुणपदमम् । वहुस्वाथायुतं शृङ्गममै क्षिमं दहस्यलम् ॥२३०॥ त्रिनाश्रपं भवेच्छूवर्णं कुञ्जराभं श्वेतनिर्मिश्रत् । सङ्कुटचय निम्बुकद्रावेशक्रिया धनेशपितां: ॥२३१॥ 'पश्चाद् गजपुटे पकृतवां श्वेतं भस्म भवेद् ध्रुव' । वरगस्स्याधि च गुदा अगस्त्यस्च रसप्लुतम् ॥२३२॥ पुनगजपुटे पक्वं श्वेतं भस्म प्रजायते । श्वासे कासे क्षये शूले हृद्रोगे कफजे गदे ॥२३३॥ आपवाते उरुस्तम्भे दोयते चेदरे गदे
यशाद भस्म (रसेन्द्रार्द तन्त्र) 'रसघास्रेष्ठु मृद्रचं हि गनना सप्तप्रहावधु । नभस्मोदितक्रीति: कषायप यशदस्यच हि विधते ॥२३४॥ 'चित्रमेतद् विषकृच्चित्तपस्माभि: कृतिरुच्यते
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घष्रदं शुद्धसायाति त्रिदेशात्, पडडतिकापभं ।।२३५।।
कटाहे लोहजे क्षिप्य, कुल्यामपंनेह मतापचेत् ।
गलितं निष्ककाष्ठेन चालयेत् तत्न च क्षिपेत् ।।२३६।।
अपामार्गैरस्च पंस्क्रांग् चिंचापाष्र त्वच्चारजः ।
यागद्रारंभ्यां भवेद् भस्म पक्षेपेन मुहुर्मुहुः ।।२३७।।
कृष्णाभं निम्बुरद्रांशशक्रियां: सूर्यतापिता: ।
वाराहध्रुपुटे पक्वाः पुनर्वंटंजटांकुरे: ।।२३८।।
अजूं नस्र त्वचाक्वाथै: स्याद्रू भस्म-वेध्तमं गुणै:
त्रिगुं जामातया दत्तं , मधुना , पघ्रसाथवा ।।२३९।।
शीतळ कफपित्तनं मूत्रदोषहरं परं ।
शिरोरोगं तथोदराहं प्लीहोदरविधायकं ।
वृपादादिकाः पित्तभवा रोगाः शमं ययु ।२४०।।
रजतं भस्म (रौप्य भस्म) आयुवेंद प्रकार्श आद्याय: ३
वदारसंधा-रूष्र्य शीतं कपायाम्लं स्वादुपाकररस सरं ।।२४१।।
गुणै:-दगस्त्; स्मापनं स्निग्धं लेखनं दातपित्तजित् ।।२४२।।
प्रमेहादिकरोगांश्व नाशघत्यचिरार्द्र धुवं ।
गुटिकास्र्र शुद्धा वक्त्रे तृष्णा शोर्ष विनाशिनी ।।२४३।।
शोधनं तैलतक्रादिद्रवैर्द्रवय रजतरस्य विश्रेषत: ।
शोषन शुद्धनिर्मि: प्रोक्तं तदू यथावेदनिगघते ।।२४४।।
स्स्रस्पपन्नीकृतं रुष्यं म्रदुध्दं जातवेदसि ।
निर्वीपितमसस्त्र्रस्प 'रसे' वारत्रय' ध्रुति ।।२४५।।
विधायप्ति पिष्टिं स्स्रतेन रजतस्र्याथ येल्र्रयेत ।
सारजां-चालु गंग्र समं शुद्धं तनपघं निम्नुजल्रदै: ।।२८६।।
नेल्र्कीकृत्य संश्रद्धं म्रषायां स्र्प्त्वा न्न हतं ।
फ्रिम्र्पुटेष्टैर्म्वेद्रू भस्म येज्यमेतद्र रसादिषु ।।२४७।।
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पारद-वारपत्रं तुंग्यभासं भागेकं शुद्धतालकं ॥ एतद्यं चोरेजनद्रवैः कल्कीकृत्यांधिकृतं मिपुटे " ॥२४८॥ तेन वारस्थ पत्राणि लेभ्येत शोषयेच्च ततः । चागवस्यपुटे तापमृद्वार्चा मन्यके क्षिपेत् ॥२४९॥ तारतुल्यं तत्त्वतोनि रुद्व्वां मषपुटे पचेत् ॥ त्रि शदुपपककृत्वापि विंशादृमिस्रारपंचचवा ॥२५०॥
लोह भस्म (रसेन्द्रार वन्न) - शोषनं-शोधनांतेन लिप्तं हि संस्वारेभं तापितं । कान्तादिमवं चोहं हि शुद्धमत्प्रेम न संशयः ॥२५१॥ सप्तभिर्द्रवणैर्द्रवत्वात् लोहपात्रे निलीनले - निर्वापितं भवेत शुद्धं सत्यं गुडद्रवा चथा ॥२५२॥ मारणं-लोहचूर्ण, पद्मन्द्रद्रां, गुडगेहा लमांश्रिकैः । खल्वे त्रिपुर्द्ध नितरां पुटेद्र विंशतिवारकं ॥२५३॥ पेषणं तु मकर्त्तव्यं पुटात् पुटात् मदीच्यते । अनेन विधिना सम्यक् भरपीभवति निश्चितं ॥२५४॥ सर्व रेगान्निद्र्येव नात्र काचिद विचारणा । श्वेतात पुनर्नैवापत्रतां न दशास्य धयकाः ॥ शुद्धांतत्र प्रदीयाच्च सिंदूराभं पलायते ॥२५५॥
लोहाभ्र भस्म (रसेन्द्रार वन्न) - समभागं मिश्री कुर्यात लोहे निशाव्रतमभकं । द्रवैः कुपारिकायाश्च घृतस्नरुज नपिष्पले ॥२५६॥ प्रत्येकस्य रसैः कुर्याद्रुटवा राजपुटे पचेव । एकैकं राजपुटं भस्म जंबूफलद्रवैः ॥२५७॥
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वलीपलिततहुलं हत्वा हतकुष्ठं चलाचलं । चतुर्गु'जामितं खादेत् नित्यं च मध्यमर्पिता ॥२५८॥
वराटिका भस्म [रसेन्द्रार तन्त्रं]
वराटिकामनुगुणं प्रोक्ता रसज्ञास्त्रे न शोधनं । मारणस्य कृतिनेरेक्ता तदस्माभिर्निरूप्यते ॥२५९॥
श्वेता पीता द्विभेदेयं पीताधिक्यगुणप्रदा । वराटा: खाद्र: कृत्वा निष्कास्या घूलिकंकरा; ॥२६०॥
मक्षालप वारिणा पश्चात्सैक्षपुर्णीं कृत्वास्तवः । निम्बूकवारिणा पिष्टा दिनैकं रहडंडतः ॥२६१॥
चक्रिकां द्विप्लुटान्मानां शुद्धा: सूर्यांशुनां च ता: । पश्चाद् गजपुटे पकत्वा स्वांगशीतना: समाहरत॥२६२॥
वर्तिकां चार्चयित्वा रसायैरुदुं वरत्नचाभवै। हरिद्रावारिणा पश्चात् पुतेद गजपुटे पृथक् ॥२६३॥
भावना निंबुकद्रवै: त्रिवेधं दापयेद् मिशृकं । चतुर्गुजामिता मात्रा दद्यात् च मध्यसरिपिता ॥२६४॥
एषणवीर्यां वराटीय ग्रहणीक्षफञातहतु । दीपनौ पाचनौ तद्वत् कुष्ठीजये रसै: ॥२६५॥
वत्र भस्म (भावप्रेंद मकारोऽध्याय ५)
शोधनं-गृहीत्वा हि शुभं वत्रं वज्राद्रिकन्दरे निक्षिपेत् ॥ माहिषीविडया क्रित्वा करीपास्नें विपाचयेत् ॥२६६॥
त्रियामं वा चतुर्यामं याविन्यन्तेहषमृद्रके ॥ सेचयेत् पाचयेदयं सप्तरात्रेण शुद्धयति ॥२६७॥
भस्म-त्रिसप्तवारं सततं खरमुत्रेण 'सेचितं । मत्तकुणेस्ताक्कं पिष्ट्वा तद्रूगाढे कुष्ठिं क्षिपेत॥२६८॥
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मध्यादं माजि निधाय सिक्तं पूरेक्रमेण तु । हंसोऽत्र निःसृतो नित्यं वपुर्जरामृत्युतां व्रजेत् ॥२६९॥
वज्रं संपूर्यकृपिच्चगदान्निःस्पन्द्यत । सर्वरोगापहारिकम् ॥ सर्वाघघ्नमनं सार्धपदाह्येकार्ति रसायनम् ॥२७०॥
वज्रोपमं च कुर्वते । वपुरुत्थमश्रि ॥२७१॥
शोपश्रसभ्रम भगन्दरमेघेदो पाण्डुरोगयुहारति रसायनं ॥२७२॥
चेकान्त भस्म (रसैद्धार तंत्रे)
श्वेतः कृष्णस्तथा रक्तः पीतः मिश्ररंगकः । पञ्चकाणी वेष्टकाणि स्यातां पसूणो गुरुतायुतः ॥२७३॥
निर्मलेः सिद्धिदः स्वर्णरोप्यादिकरने शुभः-। तद्रसस्तंवते हि वैक्रान्तं ध्यातः सिक्तोमुखेन च ॥ २७४॥
शुध्यति क्रियते गं धनि नुकद्रवपदिंवः । सम्यगृक्तपुटः सिद्धो वज्रसत्त्वै नियोजपेत् ॥२७५॥
वज्रवद् गुणद्वायं देहसिद्धिकर. परः । मेरुकल्पक्षयवासकास जीर्ण द्वारार्कः ॥२७६॥
चेक्रान्ते पिष्टिं भस्म [रसैद्धार तंत्रे]
पिष्टि वैद्रप्तु गुरुभिः पाक्त्रा शोधन मारणे-। नेक्तते कवचि ततोऽस्माभिः कध्यत्रेनुंभवेन च ॥२७७॥
शुभ्रं गुरु समं स्वच्छं इयामाभं शस्यते छुने॥
यज्रोपवीतद्रेक्षासितस्तसस्तव शोमनं विदुः ॥२७८॥
पाजीरार्क्षिसमार्त्तपं अच्छविः वै द्रवपिंतं ।
चिपत्रं चक शे इयामप्तोऽच्छवि च शस्यते ॥२७९॥
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रक्तरेखागर्भमेतद् गुणैर्हीनं मकोतितं ।
तस्मगेनं घृतरोच्ये सेविचं सप्तवारकं ।
शुद्ध चूर्णैः कृतं पश्चात्तेनैव श्लिष्यशिलां भवेत् ।
जटामांसी कषायेथ पद्मकंदरसै ततः ।
कदलीकंदतैरोथ हृदयं तोक्षुपजे रसे ।
प्रत्येकस्मिन् दिनं मर्द्यं वेष्टय पिष्टिका भवेत् ।
देया द्विगक्तिमात्रा नवनातसियुता ।
रक्तपित्तत्रृशा दाह सर्वपित्तगेपु च ।
श्रृंष्णं रसायनं वश्यमायुर्वर्धनं परं ।
भस्म द्रोणपुष्पी रसेश्वरेष्ठा प्रोक्ता वैद्यैः पिष्टिका ।
शोधनं शोषहृद्रोगकुष्ठार्शःकृमीनां च परं ।
शुष्कं तद् बालुकाग्न्रे सततं प्रहराष्टकं ।
स्वांगरशीतं - सपृकृत्य - मर्दघेरंजनोपमं ।
किचिदुष्णगुणं... चेतत्कासाश्वासकफपहं ।
वातं पित्त' हरेऽन्नानुपानात् सर्वरोगहृत् ।
शुक्ति भस्म (रसेन्द्रार तंत्रे)
प्रक्ता मुक्ता शुक्तिक्काय तत्रोक्ता भस्मकृतिः ।
सा एवेयं शुक्तिपिष्टः शुक्तिभस्म तदेव हि ।
क्रियया च गुणैरेवद् मिश्रते नेति निश्चियं ।
मिन्नभस्मकृतिश्वास्या नेकृता चेति विदांकुरः ।
शंखभस्म (रसेन्द्रार तंत्रे)
प्राचीन कविभिः कृतोऽपि शंखभस्मृतिं नेदिता ।
सांमतं व्यनहारोऽस्ति ततः वक्ष्ये ऽस्थातय' ।
शंखांश शवलोकृत्य दोषीकृत्यंदजःकुप्यान् ।
धातुस्त्वङ्निरिणा सम्पकू पश्वाच्चूर्णीकरोतु च ।
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दूर्वारिणी पिप्पलाक्षी कवायैर्गजपुटा: पृथक् । शिरोभि:विराजिता नित्यं रसे: सम्पकं व मर्दयेत् ॥२९१॥
निस्क्तिका च कोष्ण भाव: सगृतं सेवनं च । अन्येन वारुंपानेन यथादृष्टं प्रयोजयेत् ॥२९२॥
आहारी देहि प्रहण्यशोणितमांधारोचवायुषु । गुल्मोदरामदोषश्व कम्पते कंठच: शुभ: सुप्ता: ॥२९३॥
अपक्ववा नेत्ररोगाणां जननं मुखदूषने । तारुण्यपिटिका: सर्वा दूरीकुर्याच्च वन्ध्या: ॥२९४॥
संग भस्म (रसेन्द्रसार तंत्रे)
वृहन्नवारङ्गस्य व्यहारोस्ति भस्मनि । पूर्वोक्ता तिक्तकिरोषधै: नेत्रा: क्रियते भैषजं वै ॥२९५॥
सवरत्न भस्म, [नवरत्न भस्म] (रसेन्द्रसार तंत्रे)
[नवरत्नभस्मन एवं व्यवहार: 'न सवरत्नस्य] ब्जभस्माथेतेरेषां रत्नानां पिष्टया रक्तया: । प्राणिक्य मेष्टिकं चैव विद्रुमं ताक्षर्यमेव च ॥२९६॥
पुष्परागं च वज्ञं च मोमेद' च विद्रुरकं च । इमानि नवरतानि, नवनिष्कमितानि च ॥२९७॥
वज्ञं निष्क्किंवत प्राप्य सर्वाङ्गचक्रं कारमेत । निनूक्रस्य जपंस्त्याश्व तंडुलीयस्य चारिणा ॥२९८॥
नीलपाक्ष त्रिफलायाश्र भावनेका पृथकू पृथकू । समभागृकृतं ताल बिला गंधकज रज: ॥२९९॥
पं चर्मष्ठिकनिष्कं च सर्वरत्नेषु मेलयेत । सं पेष्य लकुचन्द्राचै: कपेतापुटपुटिच्च ॥३००॥
देवमष्टपुटा देया: कपेतारूख्या मिश्रवैरै: तालादिमिश्रण चक्रवच्चैव प्रदीयते ॥३०१॥
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रत्नान्वयेवाभिधीयन्ते नश्येत्तालादिप्रभृण । नवरत्नाभिधानेऽस्मे जायते सुरसार्वभौम ॥३०२॥
वातपित्तकफोद्भूतान्नानारोगान्विनाशयेत् । कासं श्वासं च हृच्छूलं क्षयार्क्षतमजस्रा ॥३०३॥
ग्रहणीशूलगुरुमन्दीगुदावर्तोदरान्बहून । नाशयेत् ॥३०४॥
नवरत्नं पिष्टं (रसोद्वार तन्त्रे) रवे:पैणिक्यमिन्द्रेशं मुक्ता मौपस्य विडुमं । बुधे ताक्ष्यं पुष्पराग गुरो: शुक्रस्य वज्रकं ॥३०५॥
शानेनीलं च गोमेद' राहो: केतोर्व्वैडूरकं । वज्ज्रस्य हरिमे वज्रेशां उत्तमां पिष्ट्वा समधयेत् ॥३०६॥
सप्तपर्णैर्मोगानि गृहीपीयात्केतकी पुनर्नवैरेव । ऋतुपत्री- मधुचान्ना- जकेन्द्रुष्टवा दिनद्रयां ॥३०७॥
स्थितं वन्द्रांशुभि रात्री दिनमेकं च पेषयेत् ॥३०७॥
पधुना सपीतां मात्रां दद्याच्चैवाधंरक्तिकर्का । वातपित्तकफोद्रेकात् प्रशमं यान्ति सत्पवर ॥३०८॥
आयुष्या वृद्धया पुष्टिरेषा रसायनी । काय|कल्पकरी च स्मृतिमेधामतीमदा ॥३०९॥
उर:क्षत क्षयं जीर्ण द्वरररोगगणान्शिनी । नवग्रहाणां पीडां च प्रभयेत् त्रिप्रुष्टिच्छिदा ॥३१०॥
सुवर्ण भस्म ९ (आयुर्वेद प्रकाश: अध्याय ३) सुवर्णेनो भृते मूत्त' दद्यात्तु सीस कदान्शकं ।
अम्लेन मद्येये तत्तु चूर्णीयित्वा शनै: शनै: ॥३११॥
पश्चात्तद् गोधकं कृत्वा तद्युगं धरजेगत । शरावसं पुुटे स्थाप्यं स धि हृत्वा पचेत तत्त ॥३१२॥
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विंशाद्वनेपुटे सम्यक् समघेवन् धुनः पुनः ।
अम्लेन गेळकं कृत्वा पचेद्धर्णामृतिं वहेत् ॥३१३॥
सुवर्ण भस्म २ (रसपकास ग्रंथाकरः अध्याय: ८)
हेम्नः श्वेताम्बरनि भूर्जपत्रान्यादाय सुलेप्य वे ।
वज्री दुर्धरहिङ्गु हिङ्गुनस्मैरे कत्र ' पिष्टीकृतेः ।
सत्यं संपुटके निधाय हेममिश्रैवं पुडैः कुरुकुटे: ।
पाच्यं हेम च रक्तगैरिसकं सं जायते निश्चितं ॥३१४॥
एतत्सुवर्णभस्म करोति च रजः शान्त्यर्थं दै सदां ।
रोगान् दैवकृतान् निहन्ति सकलान्येव त्रिदोषाद्भवान् ।
यः सेवेत नित्यं संपान् दिनेशं कान्तं वहेत् स नो जायते ।
देवाश्च श्रीर्गरोड्भवा विषभवा ओजोनुकां स्युनेच ॥३१५॥
स्वर्णमाक्षिकं भस्म (धातुवेद पकाशः अध्याय: ४)
स्वर्णाभं स्वर्णमाक्षीकं निष्कण्ठं शुद्धतायुतं ।
काष्ठिमां विकिरेत् वस्तु करे धृष्टे न तं भजयः ॥३१६॥
स्वर्णवर्णी गुञ्जां स्तिग्धमोदकैर्नीलच्छवि: सफुटे ।
कषे कनकवत् तद्वत् हेममाक्षिकं ॥३१७॥
शोधनं-माक्षिकस्य ग्रथेया भागा भागेकं सैन्धवस्य च ।
मात्रुलुङ्गद्रवैराथ जंबीरस्यद्रवैः पचेत् ॥३१८॥
चाष्टयेलक्ठेऽमजे पात्रे चावत्पात्रं लुठेऽहितं ।
भवेततस्तुं संशुद्धं स्वर्णमाक्षिकमेव च ॥३१९॥
मारणे-माक्षिकस्य चतुर्थांशं दत्वा गंधं विमर्दयेत् ।
तुवरकृत्प तत्रैव तत्रैव कार्यार्थ चक्रिकां ।
उरूकृत्य तिलकेन तत्र कार्यार्थ चक्रिकां ।
शरावसंपुटे हृत्वा पुडेङ्क्व गजपुटेन च ॥३२०॥
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धान्यस्य तुषमृद्वांशो दृत्या शीत-समुद्धरेत् ।
सिन्दूराभं भवेद् भस्म मार्षिकरस्म न संशयः ॥३२१॥
सुवर्णमार्षिकं स्वादु तिक्तं वृष्यं रसायनं ।
चक्षुष्यं वृषिहत्कंठ-पाडुमेहादिपोदारं । ॥३२२॥
अथः शुद्धं विशेष कंडू त्रिदोषमापे नाशयेत् ।
षडुपानं चरा न्योषं वेलकं सार्षयं हि मार्षिके ॥३२३॥
संगे यथाव भस्म (रसेन्द्रार तन्त्रे)
युनानी वैद्यकेऽपि तन् संगे यथाव नामकं ।
द्रव्यं चूर्णीकृतं नीळीगोक्शुरक्नाथभार्भवित । ॥३२४॥
चिलवपत्ररस्सैरेतद् शुद्धं भवति निश्चितं ।
समाहृतं गुड़ युक्तं निंबकजैर्हैः । ॥३२५॥
कुक्कुटार्धपुटे पक्वं तिं श्वासारण्यकेात्पलैः ।
तस्मिः पुढेऽवस्मेऽपरसस्यास्य निश्चितं । ॥३२६॥
रौषद्रदय घ भघुना पदसा वा घृतेन च ।
हृद्यं रुचिकरं शीतवीर्यं पित्तविनाशनं ।
रसायपित्तप्रशंणशो मुदाग्रयह्रं परं । ॥३२७॥
स्फाटिकर्मणि भस्म [रसेन्द्रार तन्त्र] ।
वचाद्रयाः खंभावते मुरद्रावस्य खंडाः स्फाटिक संभवा ।
प्राप्यंते शोघनानही उद्ज्ज्वलाः स्वरप्रमूल्यतः ॥३२८॥
शोधनं चूर्णीकृत्याग्निसं तस्राः क्षिप्रा भूम्यामलीजले ।
कृष्णाम्बर रसे क्षिप्रा नुध्यंत्ति स्फाटिका धुवम् ॥३२९॥
मारणं शतावर्यंश्वगंधा च जटामांसी प्रिचंगकः ।
प्रत्येकस्य रसैस्सृप्टं पुढेद् वारात्रिे पुढे- ॥३३०॥
नवनीतं पोतशांनां दृत्या निंबकवरिप्लवा ।
भावनां त्रितयं दच्यात् स्फाटिक भस्म सिध्यति ॥३३१॥
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गुणा: चद्रगुंज' रक्तपित्ते, दाहे शोेषे मुखामये । मकरोगेविष्ठारे, च ग्रहण्यामपिसां ज्वरे ।अररार। वराक्षते गुदभंशे पित्तरोगेषु दीयते । हरताल भस्म ( रसरत्न समुच्चये )
च्चार्या हरितालं द्विधा, मोक्तं पत्राघ पिंडसंज्ञितं । स्वर्णपत्रं गुरु स्निग्धं तनुपत्रं च बाह्यर् ॥३३३॥ तत्पत्रतलाक', मोक्तं बहुपत्रं रसायनं ।
निष्पत्रं पिंडसदृशं स्वल्पपत्रं तथा गुरु । स्त्रीपुष्पहरण' वस्तु गुणाढघं पिण्डतल्कं ॥३३४॥
शोधनं सिनन्न' कुष्मांडतेये वा तिलक्षारजलेपि वा तोथे वा चूर्णसंयुक्ते देहलायंत्रेण शुध्यति ॥३३५॥
पारणं र मधुतुल्ये, चनाभूते रुपाये ब्रह्ममूलजे । त्रिचार' तालकं भाव्यं विष्ठान्न मूत्रेध माहिषे' ॥३३६॥
उपलेर्दशभिर्देेंग . पुुटे रुग्वाथ पेषयेद । एवं द्वादशमा पाच्यं शुद्धं योगेषु योजयेत ॥३३७॥
पारणं २ (वृहत् चोगंतर गिणी ४१ तरंगे) । सदृक' नाळकं शुद्धं पैनन्नंवरेसन तु ॥३३८॥ खल्वे 'निपद्येेदेकदिनं पश्वाद्धि शोषष्येत । संवेष्ट्य गोळक' पत्रेस्वृ॑त्कप्टं विशोषयेच ॥३३९॥
ततः पुनर्निदक्षारैर? स्थाल्यर्धनतु प्रपूरयेत् । तत्र तदू गेलकं धृत्वा पुनस्तेनैव पुरयेत ॥३४०॥
आकंठं पिंडर' तस्य विधानं भारयेन्त्रुखे । स्पाली चुल्यां समारोप्य क्रमाद् वनिदं विधीयेत ॥३४१॥
दिनान्तंवरूधून्यायां पुटं वह्निं महापचेत । पवं तु त्रिपते . मात्रा तस्यैकरक्तिका ॥३४२॥
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अनुपानानुपने कानि प्रथायोग्यं प्रयोजयेत् । यथा! हरीतक्यादि हृद्यं दिनरत्नं कषायपार्वं हरिद्रादि ॥३८३॥ एकद्रव्यरसप्रयोगे द्वे। पित्तकफशमनान्त्र । मौलकं हर्दिकं मेगान्तं कफ मन्देस्तु मारापहं ॥३८४॥ रक्तं च शोधनेऽपि वीर्य कान्ति स्त्रिदि तपायुजः ॥३८४॥ हिंगुलं असृक् (मायुवेद मकराSSदेयोऽपि सः) । माघारक्ते-हिंगुले दरदं रक्तेच्छ हिंगुलं चूर्णपासरम् ॥३८५॥ सुरंगं रसगर्भे च वीर्यं रक्तप्रद्यथ । गुजा: हरदस्य विप्र मौक्तिकपारद: शुक्ततुण्डकः ॥३८६॥ हंसपादस्फुरण्याSSपि स्वादु गुणवात्तरोत्तरः । तिक्तं कषाय कडङ्ग द्रिगुले स्थापनत्रिपयेधने कफापत्तिहार ॥३८७॥ हेमामकुष्टोज्वर-कापलाग्रं प्लीहामपहाति। च गले निहन्ति ॥३४७॥ शोधन-मेधीकरेण हिंगुले ऽभयमकरेण । भाववेतः ॥३४८॥ ससंधार मघेतनेन शुद्धिं प्रयाति निश्चितं ॥३४८॥ मरण-दिगुले तेनुब्धिकंचुक गतं कृत्वा पररञ्जनं कन्या मधुरस्थं कृतवा मर्दा संवेष्ट्य पुटपाक विषानेन द्रप्रवने पले पुटेत एवं रक्तपुटानि । तत्र रक्तपुटान्त्रेष मन्त्रता कस्य । तत्र रक्तपुटान्येव मन्त्रारिफलस्य । तत्र रक्तपुटान्येव अम्लवेतसफले सस्य । तत्तः सिद्धो जातश्रारुणवर्णो भरति रक्तिकेकाम्रस्य पर्ण खण्डेन त्रिगुणादि सुरानिध द्रव्यैश्चाल्लामं भस्मयेत द्रिसुणामिः । हिगुणकामः काष्ठ श्वास संघ द्वरादिनाशाय ॥३४९॥
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वजीकरणं रसायनं
जमनात्परदे व्याधिजरामृत्युहरो-नुत्तां अमृतत्वीं च दुर्लभतां परदः सर्वदिक्षु दृष्टः ।
अलीकलिसद्वयमाकल्पराजी-रसित परः सुगाम्यो नपसद्वयमे, मुनि भुक्तिदयद्वातायनमम ।
सुमे काले देशे च बुद्धि कृत्वा, सेवयं रसायनम्
करस्सरयुबिनाशाय हि हेमसुगुणाय च ।। रसेशाद्वार तंञ्।
यो ही रस—और रसायन देनेको परस्पर संबंच रखवता है इस लिये सेवनो एक परण मे·दिये गये है ।
अयुर्द्ध के रसायन शास्त्रमे·भतुद्रष बढाने माळे रसायन औषधें·कंपे हुए प्रदेमें·और·ह्रस्व·ह्रिद्रोगे·से·दग्धें·की सद्यमे·निदान है ।
श्री मदन मे·ह्न मद्वीद्वालंने·अपने शरीरपर मर्द प्रयोञ्ञ करनाया क्य चारे भूषरळ का ध्यान
दूष विगळहो·और·नया·और रसायन कायो·कुलय यह कुछ दास्सीय f पय
आयुवें·देमें·मे ऐसा म·दपण हुया । शास्त्रमे·कुछप्राणेरिकु·और दातार्तपीय
दे =कारवे रसायन प्रयेज्ञम है। व्यकद्वाय प्रदत्त इस हत मान वालमें·कृति पार्द्ध्येक
प्रयोग भरण? दरवाना कठिन है । विभिन्न प्र्ययोग फल देते नहि और
प्रयोगो·ह्रस्वीं फःश्रुति प्र म न ह्रेने·से म।कपर श्रद्धा दम ह्रोती है । पं मात वीयाजी
पर दिचा हुया? प्रभेम निफल हुया इसक कारण यह्हे है । नेहन रदेऩ रमत
विरेचन ह्दै प्र मिद्ध वरीय शुद्धि नहि करायथी । शास्रुमे कहा है दि अविधुद्ध—
कारीरे हिदि दुक्षो रख-सने। विधि ।। वारीदरे-वा मलिने वेढे रग द्राफलः ।।
मलिन बद्धपर रंग नहि चढता। इस प्रकार बिना शुद्ध दिधि दारिम्पर रसायन अभ्या
वाजीकरण विधि निफल हेता है । प्रयोग के-पीछे चार रपयंमें मालविद्याज्ञों·और
प्रयेज्ञ करानेवाला वच्य गुजर गये और जोवनित रहे जव तक शरीर जतार्कुं तं ह्र्स्सा
मत्पाद मञ्ज और तेज कुछ नहि रहा । सामान्य मनुष्य मो ८०—९० सोर १००
वप मक थच्च्यो·तरद दवे·mद्य वळद्रे हाय नीवित रहता है पव माल्द्याजी
मरमरे·हुन्ड गयें थे·वदावस्थाके दिन्हे·में कद्रि परिवर्तन नहि हुया था । कायो
कत्पे·पंहुते वद मान दशेमे·दिये गये प्रचारसे निसभरके·टेमोशत म्यान इस
और नं·द्र । और 'घनक (विदेध) छोंग रत्नहे·देखने हिद आये थे निरोध हुये ।
कारन 'यह्ह अय फो' प्रथेर विचिहीन द्राय गयाथा । इसमे द्रिथा है कि रदाद्शाहे
वदै 84ॐ॑ चो पनित मे द्राथा रघना ऋक्ष ऋ ।। अथयारदये दिन बेस रे द्रति
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नपुंस गिर नाचे है और गुप्त मये निकलने लगते हैँ थैया तो मर्द कुमा वेदन पूते शेवपं तक मीरागी दशामें 'नित मो म'रह सुखे । प्रयोग करानेके पूं एक रयक्त पर भारभार न रख कर गैशोको सभा खुला करै यथ पवितकौ देनभालमे कराया हेाता थै मच्छा परिणाम भानेका थंभ था । पदनेका यद्य हे कि वाजनीय क्रियामें बतावो हुये विधिये करमा नादिये था ।
वाजीकरणका मथ्य——शालोकरण भौषधोके सेवनसे पुष्टप क्षोण रोगदे लिये अशक्त नदि हेाता, माजम ग नहि होता, शौकै धंनुर्ष कर सतता है, वेएँको वृद्धि होकर विपम सेवनमे होनेवाले क्षोणतां नदि हेाती । धारेर मी ऋतु क्षोण नहि होता इंद्रियौष्ठ बंध बना रहता है, यथेष्ट संबार सुख मोग सकता है । यं सारमे विषययाचनाल्ही वृति भाहनेवाळेने वाजीकरण औषध सेवन कंने रहना चाहिये ।
अनितीकडण तीसरा अति क्षार पाळे रसणवाळे बहुत मटटे पदाथँ सानेसे उपद द्वादि नेगासे तीसँपाही विराके छेदसे अति कदाचय'से हरपादि कारणोसे पुष्टप क्षोण होयँ होता है । चिंता क्रोध लघन वेदावस्या आदिसे पुष्टप क्षोण रोगदे लिये अशक्त वनता है । वाजीकरण औषधोके मेशन नहि करवां अथर मितिप्रितय मेवन करता है वह मी क्षोण और नपुंसक जैसी दशाकेा प्राप्त हेाता है । अथवा पद्मात नैसै दर्दका मेग बनता है । इस लिये विषय सुखकी इदृदावाळोंने वाजोकर औषधका सेवन करना चाद्दिये ।
वाजोकर औषघ नदि सेवन दरते हुये यतितिपयँ सुख मेगनसे रँज क्षोण पुष्टपँेधा सब इंद्रियेकी रसातकत चौंधिक्री शौणता हैैती है, मन लछारो रहता है सांधेाके दल' रहता है, शरीरके किसी अंभमेँ कप हेाता है । सांधेमें दर्द रहता है, हरने फिरनेमें दम घहता है । पाचन क्रम होता है, मत्ता धन्य रहता है । मिन्न मिन्न प्रकारका वातव्याधि उत्पन्न हेाता है और कमी नपुंसकत्व प्राप्त हेाता है ।
पथ्य्रपथ्य——मिन्नमिन्नप्रदारके वृत पाक्षर मधुयुक्त मेवन उत्तम अंभीत तांबूल मथ सुगंधो पदाथँ मनकै प्रसमन रखनेवाळे तव्यहार नवयौवन युक्त क्षोण विभिन्न प्रकारके सामान हितकारक पथ्य है । इसकके विषयमे कुपथ्य है ।
नपुसकत्व का कारण——मिन मिन्न भावोँके सात लोशंप करने को इच्छावाळे प्रदष दशमें अंग देनेहें, अतितिपय सुख मेगनेपर वाजीकरण औषध सेवन न करनेये, नपुसँक नैसै जिनके वीर्यपातके कारणसे, इंद्रीय के शाक्ति क्षोण
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चाहे का खेद होवेसे, मति भ्रम भय पातनसे इत्यादि हस्त दोष मुत्र मैथुनसे इस प्रकार अनेक कारणोसे पुरुष नपुंसक वमता है भयवा नपुंसक होता कमजोर होता है ।
इसी भयस्कान के समयमे स्त्रीनेमे कामोत्तेजक दृश्य देखनेसे चित्त निकृष्ट वमकेर रतिप्रय कोशनाकी तृष्णिके लिये स्त्रीगण को, इछाकृत्निके लिये द्रवण दोषकी कुतेन पहती है और पीछे यह हर हमेश की बन जाती है । भदकोने छोटे उस्मे यप करनेसे अथवा जोरनेसे शरीर कर्बोर होना संभय है परन्तु उत्तम आदार दिवारमे चहु कमजोरो हार कारक मर्द पनता एकिन हस्त मैथुनसे चे वीर्य नश्ती हैते? है वह शरीरके प्रत्येक अंगको कमजोर बना देती है और बीदते
मर वह संचारसूत्रके लिये योग्य नेहे रहता । हस्तमैथुनको करते रहने पर भी परिणाम निःसार भनमे तुरव आता हैं कप मलूम पड़ता हैं । इससे स्त्री हमेशके लिये पतला पानी जैश बन जाता हैं, दिमाग खाली होता है, मन बेचैन, हरने फिरने कामकाज करनेमे निहत्साद, स्त्रीगमे अशवा स्त्री के पाप वार्ताचित करने मात्रमे वीयं स्वकित होना । हृदयपिंडमे दर्द (कळतार वेध) इत्यादिमे कंठ-शुष्का विरमे दर्द इत्यादि विचिन्ह होवे है ।
आजकलके युबानोने से देखा 90 तका हस्तमैथुनकी कुतेनमे फँस चुके हुये हैं ! इनका दिमाग इतना कमजोर हा जाता है कि मामुली बातमे डरनेके या अपने अमीर या-दौलत पदूछनेवाता है ! अभ्याससे नापास होनेसे अथवा नापाम होनेके मयव सापघात करता है इसकां मूल कारण यह है । माजे वद ग्रहस्पाथममे पहता हैं तथ हर देहवका मूलके लिये उसने पद्मासाप होता है यथेष्ट व मार्शुक मोग नहि युक्ता जबमे आपघात करनेके खयत होता है ।
इस प्रकार स्त्रियोमे मो नपुंसकत्व होता है । जेठे केदो पुरुष जन्मसे द्वि नपुंसक देता है वैसे स्त्री मो जन्ममे भयवा हरत देहवसे नपुंसक होती है । इसे पर्य सामान्ना पर तिरस्कार रहता है इच्छा नहि हेती । नाटक सोनमे के वदयेसे वलपद छाववासनाकी तृष्णा किशो लिगाकृति कद्रेसे करती हैं यह मादत हनेसे मो जो नपुंसक होते हैं ।
उस भोरत का शारीर फसा बेचैन फक्का रहता है । ९६ 'दशकनी'-क्रममे लम हर देनेसे इशो देतेमे यास्कारोने लिखा है केैसे कि वृक्षपर पका हुवा फल लेकर 'तसका वपयोग करनेसे उसका लाभ प्राप्त हे। सक्ता हैं, यदिं फल पद अपने पर मो नहि लिगावे। वद हद माता है या वृक्षते हिरदर निवम्मा हो जत। हैं । यहीं दशा लडके लडकियों की हैं ! युब हस्पा आाशाना यह मंघारमे अनेको पक्र द्दारा हैं इस समय संचारमे
मदनसे शरीरके हानि नहि होती जो दूर के विकारोंके भाविन मिटनेमे रहती है ।
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॥ बद्धाऽऽया कैसे माती, हे? सर्वेऽत्रिदोषा नश्यन्ति प्राम्र्याहाराद् मधुर्यगन्धु ह्यसारे-
णुग्रकदाडिमान्त फलपुष्करिद्रुमसेविनां विरुद्धवन्य प्रमादिग्रहण-
विदद्रिड सशि मर्दनतत्परोपविष्ट वारिजगां किम्रगुद्रू तनुर् 'पित्तमेहिनां
विवमार्ग्य ननप्रयोगां दिवासुप्तो व्यथितगात्रां विरमानिमात्र-
व्यायामश्रोंऽततश्रां राज्ञां भयकोधशोक्लेऽभावाद् भयु मानम्र्वेनिर्मिंतं
हि शिरोऽभिल्ली व्रणेऽति मांसान्ति, विरुपत्वते तनुग्न्र; विरामवे
ररुं चिरपतन्वेहे वामन्वं मेव· न संधीग्रमेदेस्नु मत्वा, गुरुकं
न प्रहरन्ते, क्षयमुपैत्योजः स पचंमूत्रा ग्लायति दोषि नित्य-
तन्द्रोलसस्वमन्ति'वेऽडारतममधु चैत्रं निहन्तारः प्रभविति,
असमर्थैः श्रेष्ठानां वीरिमानसानाम्, नॄपस्मृतिरुद्रिचरघे! रोगालाम-
विषयानभोगी न 'सघ'नायुर्दामोति तस्मादेतान् देवाननेद्यमाप्रत्। सर्वान्
पथ्योऽनु 'द्वानपार्श्वड्ङारविहारान् रसावहानि प्रयोजातुमदं ततोयुपवास-
मग्नेन्त पुनर्न सुरामेयुच्यते ॥
नाम्ये हृदये सुरां मद्ये लञ्छोय तोत्रे धारयते गुह्ये गात्र ज्वरो-
ऽटेढी पोक नये धान्या प्रकृतितोऽनुरूपल न देहनेवाळे हृस्य व्र्ये जर्जरं
चरनेशाठे पदार्थ रानेश्वाने, हरेहुए चिन्ते दृप मारो मरिष्ट जिनेने रातरामो
पदार्थ स्वानेवाळे, अन्नगुणित और अग्राह्यं पर मेधन करनेलाळे, दिनेने हित्ता और
रातरू जागरण करनेशाठे ऋ' मादिरा और जिसाय मे पानिक रत, व्यादावने
वादिरके ऽन्थल करनेवाळे, भय कोध शोक टेम और आधिक परिश्रम करने
वाळे मतुल्ये! के माङ सुरायु ध्याया निधिल दोषा देहता है । योन तमे वाजी
है चरचा बढती है, भय समये कच्चा मत्तो मदि, वीर्य मर्दता नहि, शोक शोक
देहता है। हम ददाखे मधुरा हुआ मनुष्य वेचेन रहता है कछ पता है,
निद्रा सुस्स्ता शान्तस्त हे मोर जाताहे । हारोर जोर मनका चम करनेके लिये
मधाक पनता है, -स्मरणशक्ति युदि कार्ति नष्ट रेातो है मारोर रोसका पर वमता
है, पूण आयुष्य मेान शकता नहि । इस धारण दंघे जोवन चाहने वार्डेने उपर
चहरे हुए देहोकेा और चित्तशुध करने वाळार वादार विधारोनेा छोडकर रसावन
और वामोकरन मोपनोदा सेवन करना चादिये ।
हम मन औषध मेवन करने वाळोने किसे प्रकार वु बतलें करमहे हैं
वोरे में भगवान आकोव लिखते हैं।
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वरं यवादिनमकोषे नित्यवृतं मध्यमेयुनातः ॥
वरिटं सर्पिषनायासं प्रशस्तं प्रियवादिनम् ॥
येषां रोगोपरि क्षीरं द्वेष्यं तेषां तपस्विनाम् ॥
देवरोः स्वाश्रुपास्वायं गुरुवृद्धाचने रतम् ।
आनृशंस्यपरो नित्यं नैकं कहृणवेदनम् ॥
सम्ज्ञापरणरहितं नित्यं सौहृदताधिकम् ॥
देशकालप्रमाणज्ञः पुष्टिश्रुमनहः क्रतम् ॥
घस्टाश्चारमसं कीटं यध्यात्मप्रवणोन्द्रियं ।
उपस्थितार्बुदानामासितकानां जितात्मनाम् ॥
घृते राखपरं विद्यां निरयद्वलाधानमू ॥
गुणरहितः स तूदितः प्रयुक्तके यारसायनम् ॥
रसायनगुणाद्-सर्वाऽनुजोऽपि स लभुयते ॥
जो मतुञ्च मृल्युमुखी हो, कोषी न होय मधुरो सोऽपि निःस्व होय यममें परभदित हे। आदि शक, परिधम ठगायाम नहि करनेघाला, त्रिप' नेालनेघाला नित्य नेमिनिक यज्ञ करनेघाला पवित्र घोर दाता तपस्वी चेघनता नाय माक्षग आचार्य' गुरू और शिष्यों थेता करनेघाला, सात्वितसं दयालु निश्रा' और लागरण, में नियमिन्त, घो दूमचा सेवक करनेघाला। देख दानध्या पहिचानेघाला' सुष्टि प्रयुक्ति यमक्लेशने त'रा, अथ द्वार नदि करने दारा गुरूद्ध आचरण वाला 'कुलीन तथ्वज्ञानी ऋषियों माहिनह ओर जिवेधिनय पुरषोको सेवा करनेघाला, व्रह्मज्ञानीदेव मानने घोला सेघा मनुन्य जिना रसायन सेवक हि रसायनगुण पाता हैं। अर्थात' वह मद्वत्त समय नीरोगी रहकर स'कित रह सकता हे। ओर रसामन औषध सेवक करने घाले ने मो उपर कहे सद्गुणोंके सेवक धरणा चाडिये।
रष यन औषधके गुण वणनं करते हुये मगवान आत्रेय कहतें है कि दोर्घमारायु स्मृति मेधागारोग्यं तरुणं वयः ॥
पभवर्ण स्वरादार्यो देहेन्द्रियवळ- परमू ॥
वाक्किसिद्धिं प्रजातीं कान्तिं चमते नो रसायनात् ॥
अपतपसंतानकरं यत्सद्यः संपरिषणमू ॥
वाजीकरणातिवेल्लो येन यारघपतितः स्वयम् ॥
स्ववल्यातिभयां लोभान्नेन सेवनापरिक्षीणने ॥
नीमतेरड्यक्ष्यं शुक्रं फलदघेन द्रिचते ॥
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धौच'भयुज:* वताम समरण दा'क देवखा मारेरप तचणास्या! तच्जवल वल कोषि उत्तम स्वर शरीरखा और वचं दृढ़ोका वल वाणको विरुद्ध ममता काम पाकि संताम उतरपष करनेयालो जोकि सव अवयवेयोो तृस्ति मादि रघायमल शोवन वेषनखे प्राप्त होते है। 'भोर यमलो द'हु बलवान होते हदर कोषेधे। क्रिय देते है और जीवनमे' वीर्य' अकषप रोता है। यद माजीहदर है।
'परकाराय' चररक जि रथा मा र.
रसामनान्ना, हृदविशन् प्रयेगमृपयेर विचु: ॥ कुट्टिम्रावेष्टिक चैष व्रातालापकमेव च ॥ जुटीप्रावेष्टिकर्यासदो fq'घे. मतुलदेक्ष्यते मे नृपैर्यद्धिजातिं साद्युनां पुण्यकरजानं मु ॥
fतवासे निम्नीये वास्ते प्राप्त्योयषरगे पुरे ॥ fहंष पुर्षोंवरस्यान तु शुभूभों कारयेत कुरोर्म् ॥
, विसतारेरतसेष्टस्यां निरर्था सुदृशलेक्षणा ॥ घनfर्माचमृतुसुमां सुमृषां मनः क्रयाम ॥ कच्वादोनामहस्तानामनसयां मोfवर्जि'तामु ॥
ड डोपकररेजोfपेतां मदजवैशैंग्रषद्विजाम् ॥ अथोfदगयम चुक्ले तथिनक्षत्रपूजिते ॥ मुहुर्त्तेररगेपेते प्रदासते कृतवापन ॥
'घ्रांतस्मृतिवलं हरवा श्रद्धषान: समाधित: ॥ वधूय माfस्तान् देवान मेश्री भूतेषु विस्तरयन् ॥
देवतां: पुजयेद्राेपे हिजातीं श्रु प्रवक्षिणाम ॥ देवमेवावाह्यनु हृत्वा तवस्तां प्रविष्टेव कुरोर्म ॥
तस्यां स शोघने: शुद्ध: सुश्री हातवळ: पुन: ॥ रसायनं प्रयु'जीन .. ….................. ॥
घागभटारायां उनरस्थाम व. ३९ धूपातपर' जेध्यल खरो'मूर्खाचधिल मितां ॥ सज्नै चोपकरसां सुमृषां करायेतकुट्टोम् ॥
अथ पुण्येयfह संfपूल्य पुष्टयांतां प्र'वरोच्युकि ॥ व्रक्चरी व्रनियुमः श्रद्धघाने जितेन्द्रिय: ॥
यान्मांfडययासंfयतघनं परायण: ॥
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देवतोंचुस्मृतिं युक्तो युक्तरसरप्रयोगनरः॥
प्रियौषधः पेंतालवण्क्र पारमेत रसायनम्॥
माषार्योंते रसायन शेष्ट के दे प्रकार कहे हैं। कुटीप्रावेशिक और जातातपिक। कुटीप्रावेशिक प्रयोग पूर्ण हो तब तक केटटे मे रहकर और मृत्ती मेहर रहकर करनेटा है।
कुटीप्रावेशिक-जिस प्रदेशमे राजा दोष्च प्रायनो सांधुयुष वण्प्रथाली मनुरूप निवास करते हो, जेठ स्थान निर्भंय हो, प्रणामे प्रचांषा प्राप हे, जहां सन सरद् वारकाल मिलती हो, शाहरर्या प्रामको नजदीक गांवशे मेहर मनोहर मूमिमे कुटी करनो। इह वस्छो तरह चौदो उंची तोनखंउवालीं छेटीे मारीया जाली वाल्छे अच्छो दितारयवालो नक्तुभे परिवतंनसे मो किछो प्रचार हष्ट न हे। जिस जगहमे रहनेटे मन प्रपंन हे वौसी कुटी वनाना।
यह कुटी मिट्टीकी इटोंसे मिट्टीसे वनाना। और उपर मिट्टी चुपदर सुंदर वनाना। वहां मेहर है भितरिया सोधन मे लेनो आय, वहां नीमोको मोती न हे वद साधन चामरी हावश्यक द्रुव्यो तैयार रख वैघ औषध और दैवपाटी प्राथनको डांजर रखना। केटटदोकी दिगादे पर नीचे मूलेपर मिट्टीमे गोहर मिथकट दछ्छो मार परना।
देइटदोहे एक चमरमे कलमूत्र करनो, दूधरे संचमे चीज वस्तु रक्खना, तीसरे व'दमें रहना सेना चौठना।
कुटी प्रवेशदे पहिले और पीछे के
नित्यम्-छाया दलद करानेवाला साधक जव सूर्म उत्तरायणका हे। गुकृक्व पक्ष तितिथि नक्षत्र करण शुभ हे। ऐेसी उत्तम दिन शुद्धि ग्रह मुहूर्त देखकर मरतकं शुभ वारिके छेव वोल नित्योले हर मुहूर्त कर रोटडोमें प्रवेश करे।
छोटदोमें ओषधोंसे हेमेदग क्रिया कराना पोछे वमन विरेचन कर उदर केाठा शुद्ध कराकर पोछे - वत जोका सक्कु (प्राथवा) सिखाना इवसे पुरांमा मन निफ्लल जायमा पोछे स्नानकर थेप 'सफेद घेती' पहिनना लेष्ट 'सफेद घेती' झाड़ी पर मोडमा और कुटीमें प्रवेश द्ररना।
प्रावश्छने व्रतचयं पीलन 'करना' बैय रक्खना औषधोपर प्रोति रक्खना, म'द द्रव्यके साथ मधुर नानो बोलना कोष करना नही। राग द्वेष इषां काम कोष मद मदि मुनका देईव श्रेष्ट देना। प्राणो मातृ पर स्नेह भावना रक्खनर 'मातृणोफर पूजन कर केटटदोसे प्रदेश-करना।
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इस प्रकार शरीर करके जिप् प्रकृतिको मनुष्येो जे - रसपान मोंवप्य-
पचुकुछ लामप्रद हैनेएा हो। वह सेवन करांनो । भष्यांत-प्रतयेक मनुरखका परीत
कुछ पुष्ट मधराम केड! है। रदभाव धादार विदारादि वेष्टा , जिप है, मरीरमे
पोष पिर! कफांजिमें -कोन रसव न्यूनार्धिक दे इत्या'द वायोेएा ध्यानम ! कर जिमुके
हैोचे मो रसपायन भौषध अभुनेल दे ठररहा उपन कडानो । युध वात प्र बडेए
हैन्थित करके गौषधको रौयार्द्रे हर रखना ।
नीलकंठ रस पुष्टं चोदय, तैाला y, सुरण भम्म ठैला y, मषक
गरम डे'हु मसम मुचो । जपिप वंसांत मधम प्रदेए , आ- दे तेबा,
रौष्य भरम प्रवाल पिंड , वत्रण', पारदिक मधम अ गमसम प्रचेए एउ एक तेबार
वादफल बाघश्रो ललंग इलायची छेएी पेपल जीवक सेठ वाटीं मिरच कपुर
बफेद सुपारी प्रायेए एउ एक तेबाो शरहे। विडिगत पिलाय जोंद तो ल ख
चित्रकमूल दाताररी निदारिवद सालमलोयून प्रतयेक के रख रा वगार्दी एक
एक मातनो' देकर गौला बना "र एर एक पत्र लपेट सुत्र दोंच नेहंती बाठी में
३ दिन रस्ना । पीछे निच कर रत्तो प्रमाण गौली बनाना । पान के पात y से रे
चोंलो स्वा कर दुस पानो । रेह उत्तम रवाघन गुणवारी हे आयुध रदाता' हैँ
गुणधारी हैं वाजीकरण वृंघ पौंष्टि है ।
पुड़ें' दू वट्टी- पारद ठोआ y में सोनाक नहं वेआ 9 मिलानो । पोंछे
वटघमे रंफळ तेआ y मिलांडर द्रजनी करनो । पंछे सबकं 'रहफदूर वे y,
डे ह भम्म y तेबा, अभ्रक मसम y तेबा रौष्य भरम रोला । र, वंग मधम
तेबो y, तांबे मरम कडिये मरम एक एउ तेबा, आयकल मवैगो टंकादो मो
जं रा मोमंनो कपुर पिरयगु नागरमोय प्रथमेक तीनतोन ठेला सव. मय निचवदर
मिलांड़र पचारपाठाके रसष्टी एर'दके मुल्के कषाथको हरबकेए यन्नायको भावना
देकर गौली वनाना । ठपपर एरडके पत्र लपेट करा सुत्रपेए राच दर घंनसकौ
रे ठंमे ३ दिन रखना पंछे गुंना प्रमाण गौली' वनाना । पानके पात 9 या र
ह नेएे १५ यन . गुन ' दरती- है । याराय यदता है पों'पर्त यकेएर रे
रकमं प्रवेश बहुमूल मधुमेह प्रटर म्रल स प्रहणी पालीद रे:में गुड़दारी है'
बृद्धौप तलं र्वर्धीं खरो.यां ख वट्ळमेा भंडेेु
पुड़ाहदंमी दिलासु — शभ्रक मो'm वे। c, पारद वे। y शभुक नेए- y,
हैं। fसम वे। y, रौंघ मधम तेएो 9, रंक wata रा. 9,
f. -f5 टो. 11 ६ पूर वे y, पानफळ बाघश्रो पिर १२५ इ६र्
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चनकन्नोज प्रयेए दं। दं। तोलं रस साय मिलाना। मात्रा ३ से-४ रत्तो। गोली बनायो हो। रे। १ से २ गोली पानदोी पप्ड़ीके साथ खाकर ऊपर दूध पीना वह रसायन गुणकारी है। आयुज्य मेचा वृद्धि स्मरण शाक्ति कान्ति वीय' बढता है। वृद्धावस्थोमें मी युव'न जैसा वल आता है। प्रमेह पित्ताष्के रोग श्रो'का नाशु पोष वातश्लेष्मका रोग रक्ताश्रय क्षय क्षयरोग हृदयको कमजोरी गोलेको रोग शंभरणो अतिस्थार भसावित सब रोगोंकी धमजोरी मस्तकके दानके नाकके मुखके रोग आदिमें उत्तम गुणकारी है।
त्रिलोकप विंतामणि पारद ग चक होरामलम सुर्ण' मदम रौप्प मद्म हेम मरक मदन हाम्र मरम मुक्ता मणि शांखपिस्सि प्रभाल पिंप्सि शुद्ध हरताल शुद्ध मैंग'ैल प्रत्येक एक एक तोला लेना और पोली भराटिकाको पिस्सि तोलं २३ लेना विधिवत् मिलाकर चित्रकमूलके क्नाथको ७ भावना, माक्के दूधधी २ भावना निपु'दो रस, सु'णका रस और सेहु लके दुष्को एकएक भावना देकर हिंगौया करके शराव समुटमे रखकर कपडमिट्टी कर व'लूष्ठा यन्त्रमे ४८ घंटा पकाना स्वांगसीत होनेपर निकाल कर पीसना। उसमें २० तोला पूंग चंकोदय द्रिपुण गंधक मारित और वैक्रांत विस्थे तोला ४ डालकर घोटकर सदृश्वानेलो छालके कवाथको ७ और चित्रकमूलके क्नाथको ३ भावना देकर घोटकर रख छोड़ना। मात्रा १ से २ रत्तो शहद घृत मिलाह दूधसे देना। यह उत्तम रसायन है आयुष्य बढाता है। हारीतकै नीरोगी रखता है। फुफकुष्ट रोग हृदयरोग हृदयकी कमजोरी विद्रधि पांहुरोग भतिक्थार संप्रदरणो वजाघोर कुष्ट आदि रोगोंमें' भोतत्तम गुणकारी है।
अष्टांगविक रसः
पारद शुद्ध तोला १०, गंधक तोला २० लेना। पारदमें सेोनाका शुद्ध तोला १ और चांदोका कफ' तोला १ मिलाकर पीछे उसमें गंधक ढाल करंजलो करना। पीछे' इसमें नागमस्तक ताम्रमरस यशाद मरम और गभसम प्रत्येक आधा आधा तोला डाल घोटकर वटांकरके रसमें ३ घंटा घोटना। पीछे क्वारपाठा के रसमें' घोटना सुवनने पर काचकी शीशोमें' डालकर वालूका यंत्रमें मृदु मध्य तीव्र अभ्रेषे ३ दिन तक पकाना। शीशोके बालेपर जमा हुवा पूण चंद्रोदय जैसा रस शोशो तोड़ हर निकाल लेना। इसको मात्रा १ से २ रत्तो और अनूपान' चूण' ३ से ४ रत्ती पानको पत्तोमें डालकर खाना साय अनूपान चूर्ण ६ से ८ रत्ती मिलाना अथवा शहद और घृतके साथ लेना।
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घनुपान छूपं-जारफळ लविंग जातंर्रो शेमलका गोंद सफेद गुग्गुलो पंञासालम कालोमिरच भोमषेओ कपूूर सब घनमात्र छे.। कूट कर रवनां । ऊपर बादाम इलायची पाककर केशर जालकर पकावां हुवां कूष पीना । यह तस्म रसायन गुणवारी हैँ मलोปลितफेँ मिटावां है पौष्टिक कांप्र मेषा बुद्धि साधुयसंध के तस्म आपिच हैँ । अप्ठाखि तस्म के साथ में छे < मही रेवा ।
सारस्वतारिष्ट-मात्रो पचांग १६८ तोला, मातावरी विदारी कंद दरव वाला रेठ मड़.सेओप तज इलायची छोटो पीपल कालेंभीरच प्रत्येक चीज मोघ तोला, पानी ९ मन दच्चामें पय द्रव कूटकर चाल पकाना आाधा पानी रहने पर कपड़छान कर एक चौथाई मिट्टीओँ मरजंमें मर तस्मे मधु तोला ८० दाखकर शहद फूड़ तोला २०, प्रियंगु छोटो पीपल लवंग बच कुष श्वकलकरा अस्पागध पहेचा पोड़ेओय इलायची मुवलो जायफल जावंरो वायविड़ं तज प्रत्येक देर दे। तोला कूटकर ढालना । हुद्मे सेनाका वक' तोला १ मलमलके करदेकी ठोलेमें ढाल मुष यदेकर घप्मे चाल देना । १ मासके पेधे देखना। तस्मे स्वर्णपफा विघल कर आाप्रवमेंं प्रवादो वनकर मिमगयाा होगां यदि कुछ यचा हो तौ थीली आाप्रवमें फिर ढालना और ।। चे २ मास पोछे स्वासवकेा कवड़ छान कर खा छोटना । सेनाका वक' कुछ बचा हो तो थैली आासवमें रख छोटना । एघाप्र मात्रमें सब 'पदूल जायगां ।
मात्रा ९ से ३ तोला तिनमें एक या दे। वार पोनेमें उत्तम रसायन गुन करता है । बुद्धि मेधा स्मरण शाक्ति प्रज्ञा स्वायुष्य बढ़ता हैँ । हुदयकेाा चलवान करता हैँ । भारीरयकेा हानिधरफ तरवेंफा नघकर शरीरको तंदुरस्त बनाता हैँ । पुप्प में और बच्य सबके लिये गुनकारी हैँ । सेवीतकारोँके लिये मो उत्तंम लाभकारी हैँ ।
पूर्ण ब'द्रोंदय विद्रगुण गंधक जारित-(स्वर्ण घाटित विद्र मकरध्वजम्र) सेनाका वक' १ तोला मे शुद्ध पारद ८ तोला डालकर घोटना मिल जाने नर शुद्ध गंधक तोला १६ मिलाकर कज्जलो हो। जानसे चौपुष के फूलफो १ और क्वार 'गूठा के रस की १ मावन। देकर सुख जाने पर कपड़माटी की हुरी शोषो मे शाक कर वाचुछायन मे मँद मथ्य सीत अम्रिसे पकानेमे पंंघक जककर शीसी के गलेमें जमता। हैं ओड नीचे चं'द्रोक्य लग जाता हैँ । श्रीती तोल क" निचाल लेना तलमें स्वर्णां सम्हालसें जे छेई रहाँ हो। चं'द्रोदय - में घोट मिलाकर कस्तूरी मलमें २४ घटा घोट कर सुखाना इसकी १ रतो मात्रा में
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मतुपान चूर्ण' रे रतो मिलाय शहद घृत से अथवा पानको पत्ती के साथ स्वा-
प उपर मेहर इलायची धफकर मिलाकर पकाया हुवा दूघ पीना ।
पुर्णचंद्रोदय-कf मतुपान चूर्ण—मो'मसेनी कपूर जायफल कालो'मिरच
मंग प्रत्येक वार चार तोला और दरतुरी १ तोला मिलाकर घोटकर रखना
यह मतुपान चूर्ण त्रिफला मधुयष्टि मोदक गुण ह्रादि पुर्ण चंद्रोदय के साथ दियो
खाता है । पुर्णचंद्रोदय का मतुपानचूर्ण'का नीचे दिया कन-y प्रकार मो है ।
दुपच'दोदय मतुपान चूर्ण—रससिंदुर शोरकम सुवर्ण माक्षीक भस्मक
मदम निबं मधम सफेद मुसली पंनाषालम विदारीकंद भूताग गैरपुटो
छोटं पे पस मांह के बीज इलायची रत्न शोधके बीज स्वरलधर। प्रत्येक एक एक
चोला कदुगं अ ठंद्र ध्म मिलधर १६ तोला, जायफल जाव मो' काल'मो'रच मंमसेनी
कपूर प्रत्येक साठ अ ठ चोला, दरतुरी ४ तोला मेघर४ तोला सब साथ घोटकर
रखना । इसको म मात्रा रे ६ रतो दो है 'दुगुण पदगुण पोदशगुण शातगुण केह
मो पुर्णचदोदय की १ रतो मात्रा में यह मतुपान चूर्ण मिलाकर पानको
पत्ता के साथ साना अथवा शहद घृतमे लेनेर उपर दूघ पीना ।
बिषे'मो कारण हे पुषन यां ल्री दमनेओर अशक्त हो गये हे, बिषे मो
रोगषे हतपनन हुयी निर्बलता मिटती है ह्रदय फेफडे लिमाग बलवान हेता है
कामशक्ति बढतो है यह मतुपान चूर्ण अहेरला लेने से
गंवं श्रययतिः क्रीणां कामविव्हलचेतसां
कामासक्तो मुगाक्षीणां प्रियः सगात्त वलवान् पुमान् ॥९॥
वय.स्तं भनकृतसर्वरोगाशक्तिनिवारणः
॥
रसायनगुणश्रेष्ठो वलीपलितनाशानः ॥२॥
शुधार्तिद्दि न कुर्वते मेधायु: कांतिवर्धनः ।।
सेवनात् सततं पुसां जरामरणनाशनः ॥३॥
पुर्णचदोदय पदगुणमधक जार्गित (स्वर्ण घटित चित्रकमरचक) द्विगुण
मंष्रक आरण किये हुये पुर्णचद्रोदयमे पुन १६ तोला मंधक मिलाय मापूष्के
फूल और वसारपाठाको मावना देखर मालुकां यंत्र मे पदाना इस प्रकार
कर तोंन वस्त पकाने से पदगुण न शक जरित हेता है । दो प्रकार ये दशगुण
मोर शातगुण की धक औरन बरनेष विधि मिले प्रकारहा पुर्णचद्रोदय वनाकर
मतुपान चूर्ण के साथ सेवन दियो जाता है ।
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पूर्वंचंद्रोदयस्य अनुपानं मित्रं गोली-पोटाद्रह्यां चंद्रोदयं लेने ये छठिनाड़ मालप दे। वनकेरी गोली लेना अनुकूल रहता है। १० तोला पूर्वं चंद्रोदय मे ४० तोला भृंगरास चूर्ण मिल'य चाहर मे सुंग जोड़ो गोली वनायो जातो है मात्रा. ३ से ६ गोली दूध मे घाम लो जातो दे यथवो पानको पाटो के घाम खाकर उपर दूध पिया जाता है। सब प्रकार के पूर्वंचंद्रोदय को गोली इस प्रकार बनाकर सेवन को जातो हैँ। सबरोग को कमजोरी में पुरुष और स्त्रियो यव ठे सकठे है।
हसके सेवनसे इष्टफलानुसार विपय सुखभोग चक्ता है धनप्रभं निधि हेतो। स्त्रीओका पति' स्वधन करता है। सतत सेवन करनेसे वल्लीपलित मिटता है। वृद्धावस्था जेसी वल पना रहता है। किषो मो रोग न मोह नहि वनता। स्त्रीओ मो राक्षि मचाने के लिये हसका सेवन कर शकती है सब प्रकारकी कमजोरी मिटतो हैं।
शारीरको क्षोणतामे अतिविपत्तिसे हस्तदेव आदिसे हुआ शुक्र क्षय फीकोता नपुंसक जेसो स्थिति दे दूर कर शारीरहो वलवान वनानेकाला यह सौपध है।
श्री मन्मथाश्रम-भभ्रक भरम ठेला ८, पारद पांचक कपूर छेई भरम प्रशयेक चार तोला, यग भरम ठेला २, ताम्र भरव चसुद्रीप नीम विदारी कंद शतावरी तालमखाना घलावीश कौंचचमीज अतिवला चीन वायफल वायचंद्रो लशंग मोगके चीज सफेद राळ भस्मोश्र प्रत्येक एक एक ठेला सब विधिवत मिलाकर तीन दिन तक घोट कर तैयार करना। मात्रा ३ से ६ रत्तो पानको पटोके साथ अथवा शहदसे लेकर उपर दूध पीना।
ने शिश्नस्थ्य न शिथिल्यं सेवनादिस्य जायते न विषयासक्तचित्तस्य शुक्रे न क्षीयते वलं॥१॥ रसायनगुणोः चलयेा वृध्दया वाजीकरण परः। मन्मथाश्रो रसाश्रायं शांकरेणोदितः स्वय'॥२॥
सिद्ध रस—दिपुण गंधक जारित पूर्वचं द्रोदय ठेला ५, मुस्ता पीपल सुवर्णं वच्चम रौच भस्म प्रत्येक ए8 ठेला सब पाथ मिलाकर कमलके फूलके रसहरीं अशंघ्र मक्वाश्रको माथना देखर रख छेठना मात्रा २ से ३ रत्तो सफेद मुशकबो चूणॅ १ माथा मिलाय पानकी पटोके साथ अथवा शहद घृतसे लेकर उपर दूध पीना कामोत्तेजक पौष्टिक वाजोकर है। हदष पौष्टिक रसामन है।
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मोगपुंदरो घड़ी—रघसिंदूर तज तमाल पत्र इलायची नागफेशर लवंग सेठ चंदन जावंती केसर छोटोपीपल भकलकरा अफीम कस्तूरी कपूर प्रत्येक एक तोला, मोग १५ तोला नागर वेलची परोके रसमें गोली रत्तीको वनाना । १ से २ गोली दूधके साथ देना । यह पौष्टिक कामोत्तेजक शक्त्ति वर्धक स्तंभन कर है ।
कामिनी विद्रावण—रब विद्रवी, गंधक लोहभस्म हिंगूल लवंग देसरी छोटो पीपल मायफूल जावंती चंदन भकलकरा प्रत्येक एक एक तोला मांg २ तोला पानके रसमें गोली गुंजा प्रमाण बनाना । १ से २ गोले दूधके साथ देना । वृंघ्य पौष्टिक है ।
मेफ़रवा—युनानी शाटन—अश्व गंध सुवर्णं रौप्य नाग वंग टेढ़ ढेकांत मत्येकको मद्दप, मुक्ता विष्ठी रघसिंदूर मीमशेनी कपूर अगर पीपल जावंती वच्च नागफेशर मेथ छोटोपीपल कचूर। चंतीकगाला हेममस्तको माजूफल जटामांसी शतावरी रेमल मूल कायफल चाइके फूल गोकह भककरा मेशीदाना शतावरी कौंच्च वीज तिलपपानी कीकरकी कोंकल कमलकंद रेंखर कुष्ठ मूलौठी मूल चंदन विदारीकंद सुसारो करलोकद प्रियंगु वोरकुट्टी मूंगं सेठ मरी हरड़ वहेड़ा आंवला इलायची तज घनिया चोपचीनी समुद्रशोव वोज थापामगं घीज़ भकलकरा वला हतुरी प्रत्येक एक एक टाला, मांg १५ तोला घौर शक्कर ८० तोला रव मिलाय शहदमें मिलाय अवलेह वनाना । ०१ से ०६ तोला शाकर उपर दूध पोना वृंघ्य पौष्टिक हेमोत्तेजक शक्त्तितर्द है ।
पुष्टपघंवा लघु—रघसिंदूर, नाग टेढ़, अश्व गंध प्रत्येकको मद्दप, कनक वाज, मोंग, मूलौठी मूल, शेमलका मूल पानकी जड़ सव समान मांg टेकर विधिवत मिलाना । मात्रा २ से ४ रत्ती मधुरतके साथ टेकर दूध पीना काम वाजि बढ़ाने वाला औषध रघ'क रसायन है
पुष्ट घंघवा वृहत (स्वर्णयुक्त)—सेमलका वक' तोला ९, पूंगंचंद्रोदय तोला २, टेढ़ मद्दप तोला ३, माक्षोण भस्म तोला ४, जावफल जाव न्त्रो कमलकंद शेमलका गोंद पानकी जड़ लवंग भोमशेनी कपूर कालो मोर्च भकलकरा प्रत्येक चार चार तोला मिला कर २ रत्तीकी गोली बनाना । १ से २ गोली पानकी पत्तो के साथ खाकर उपर पकाया हुया दूध यथवा रबड़ी पोना और दुग्धपान जोवा पौष्टिक खुराक खाना । इसके सेवन से वाजीकरण गुण होता है नपुंवक कौमी देर्या मिटती है । वाजीकरण वृंघ्य और स्तंभन होता है ।
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मदनकाम देव रस- पारद तेला c मे सुमनं पत्रं तेला ? मिलाकर पंछे उस्मे पंघ तेला c मिलादर गजाम्रो कराना पींछे रौप्य भम्म वैक्रांत पिष्टो सुफा पिष्ट टेड़ह भम्म माक्षीक भम्म प्रत्येछ नार चार तोला ढाल मिलाय करार पाटाके रस मे घोट सुफा कर साराव घंपुट मे रक्त कपड़ मिटदी कर सेधानोन भरेहुए लषण यंत्र मे रक्त २४ घंटा पकाना । स्वांगदी ते हाने पर घपुट खोलकर भोपघ निकाल ठेना पोछे उसदेवा घोट कर उपरमे पानके रसको भावना देकर अघगंधा भस्मगं कौंच सुवले शालपुषाना चोनीकवाला चोठ पिंपल कालीं मिरच ललायची लशं जायफल जावंरो मोमसेनी कपुर सेमलका मींग प्रत्येेक देर दे? तांह और कस्तुरी माथा तेला मिलाय शहद मे देा रक्तो प्रमाण गोळो वनाना । पानको पट्टो के साष दे? तीन गोळी खा कर उपर कढी हुया दूध पीन। यह वाजीकरण शृंघ्य पौष्टिक है ।
कामेष्ट रस- पूंछं चद्रद्रय जायफल जावंरो कककुता व गमद्रम अभ्रक भम्म माक्षीक भम्म अफीम रसभांज लेकर पोस्त के डाढे के रसवाय मे घोट कर रती प्रमाण गोळी करना । पानंसी पट्टो के साष एक दे? गोळी खा कर चपर वद्दाहुए दूध पंना । यह वाजोकर स्तंभक पौष्टिक केंमेज ठ प्रमेहणी अतिपात प्रदर प्रमेह मे गुणवारी हैं।
सिंदूर भूषण रस- रस सिदूर तेला c मे सेनाढा वकं तेला आधा-मिलाना पोछे उस्मे घनक वोज भाग तांरखाना जायफल जावंरो सहेजने का वोज अकलकरा लवण चोनीकवाला सफेद सुवले पंनासालम समुंद्रशोष मीन कपुर अफीम प्रत्येेक देर दे? तेला ढेकर घोट कर नागरबेल के पान के रस्मे देर-रती प्रमाण गोळो वनाना पानको पट्टोये १ या २ गोळी स्वाकर उपर कढी हुया दूध पोन। नपुंसक मदुष्य को मी काम जागृत होता है। वोर्यंवा स्तंभन हेाता है प्रमेह प्रदर अतिपात वंग्रहणो दौसे रोग मिटते है।
चं देेश्वर वृंहत रस- मंग रांग तेला c केा पिघालकर उस्मे पारद तेला c ढालना पंछे पींषकर उस्मे गंधक तेला c ढालकर कपड़ माटी को हुया अम्लो शोषी मे मर वाळकृय कर मे पकांता । एषांगींत निकाल कर रसफे घेट-मद्र रस तेला c और जायफल जावंरो लवंग कालीमिरच केंघर मोमसेनी प्रत्येेक चार चार तेला मिलादर रखना । उस्को २ से ३ रती मागामे अघवगं घूणं २ से ३ माशा मिलाकर शहद घृतसे खाकर उपर दूध पोना। शक्तीबल वघं पौष्टिक है । प्रमेह मूत्ररोगमें गुणवारी हैं।
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मोखुरादि चूर्ण—गोखरू तालमखाना सफेद मुशाली शतावरी ग्वाताहरी कंद कमलबंद छोटी पीपल मूलीठी मूल नागरमोथा कूचक चौकच घोख सभभगंधा छोड़ पस्म भाग कूट रसना । ३२ से ३ माशा में शहद मिलाय देना ऊपर दूध पीना वाजीकरण गुण होता है ।
वानरी बूटी—कौंचछु कौंचाकेे दूधमे पकाना फीके निहालकर तप्तकी छिलकी निकाल गिरे ठेना । वह गिरी तेला ८० तोला महोन पीसमा, पीछे दूधमे रससिंदूर रवंगा काळो मिरच शेंठ जायफल भकङ्करा इलायची शतावरी सफेद सुठळी तालमखाना प्रत्येक दे । दे । तोलाका चूण मिलाकर चार घार पासाका गोला वनाना पेष्टे थन गोलेके धीमें पकाकर-तलकर शहद भरे बरतनमें टाळ देना १५ दिनके पोछे दे चार गोला खाकर ऊपर दूध पीना पौष्टिक कामोत्तेजक है ।
पुनर्नवादि चूर्ण—श्वेत पुनर्नवाका मूल शतावरी गोखरू अश्वगंधा सफेद सुठळी नागवला मूळ तालाली मुळ बकूलका गोद बच्छनाग सवसमा मान इकट्ठा रसना । १ से ४ माशाे दूधक साथ रेवन करनेसे वाजोकर गुण होता है ।
केसरादि स्वलेह—केसर तेला ८ तोला घोटडकर तैयार करना पोछे रससिंदूर अश्रुठ मधप छोड़ अश्वगंधा प्रत्येक दे । दे । तोला ठेना । तम तमाल नागकेसर इलायची शेंठ पोपल कालीमिरच लवंगा अगर चंदन तालम-खाना भकङ्करा जायफल शालपली गोंड वलायोळ मूलेरिटो मूल अश्वगंधा गोखरू सुठळी वाय वच ग समूळशोप वोज मांग प्रत्येक वार चार तोला ठेकर कूटकर सम घाम मिलाय शहदमें अवलेह जैसा वनाना । पोछे इसमे सेनाका वक तोला एक और चौदका वक दे । हेाला मिलाना । माशा ३ से ४ माशा खाकर ऊपर दूध पोना वाजीकरण कामोत्तेजक पौष्टिक पुष्टिमेघा वृषणं रसायन है । इसक सेवनसे शुद्ध मी तरण जौवा वलवान होता है । पव प्रकारके वाजरेग रघिात पशघात स्तम्भनात वस्तंम कटिप्रद कमजोरी रक्तस्त्राव आदिमें गुणकारी है ।
सुपारी पाक स्वलेह—विकनी दक्खण वेशधे लाल सेपारी तोला ८० छेडर कूट कर चूण करना । उसको पदा १० घेर दूधमे पकाकर छोडवा-मावा घनाना पोछे वस्सा मावाेक घंमें पकाना वदामो रंग हो वहां तक घोमी आंचसे पकाना पोछे उतारकर ठंडा करना । पीछे उस्मे नीचेएे लिक्ष्योदक चूण डालना । तज तमाल नागकेसर इलायची जायफल जावत्री वलामूल नागवला मूल मूलीठी मूल छोटो पोपल मंशाळोचन शेंठ विदारीकद शतावरी कौंचवीजकी गीधी पाक्ष सारपखाना गोखरू वीरा घनीया हलोजीनीरा अजवाइन जटामांसी मेथीदाना
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साफकर शेर १०को वासनी कर घष द्रव्य इसमे ढाल देना भवठेह गौषा वनाना १ से २ तोला साफकर चपर दूध पीना । पौष्टिक शक्तिप्रद रसायन है ।
महाघृतादि तैल— चंदन, रक्तचंदन पतंग कुष्णागुरु देवदारु सरल मोच पद्मकाष्ठ लाल सुगंधी शपू लताफतुरी ढाकवान केचर-गोरेवचन जायफल जावित्री लवंग कुलिंचो चोनीकबाला तज त नागकेशर वाळा जटामांसी मुरीछरेला नामरेभाष प्रियंगु गूळ लाख नवसार राळ घायके फूल मनिःषण मञोठ तगर मयiek चार चर तेला । लेकर पानीमें करक कर तिलका तेल रतल २५ मे पकाना पीछे ईष्मे पानीका अंश जल वाप जद स्वांगशीत होनेषर कदंबरीका अन्तर अथवा हीनाळ अन्तर तेला ४ और स्नपमेनी कपूर पोस्त कर ४ तोला मिलाना । अचछे हाथके वतनमे रख छोडना । युच मज्जुत लगाना । यह तेल शरीरपर मालिस करनेसे वृद्धके शरीरमे बलकाति कांति माती है वाजोकर है भायुण्य बढता है रसायन गुणवारी है ।
गुड़ूच्यादि रसायन—गिलोय शंखावली हरड बहेडा भांवळां मूलौठी मूल समभाग कूट कर मांगरेके रसको ३ भावना देना हरेरां प्रातःकाल २ माषा शहदसे लेकर दूध पीना ।
अश्वगंधा रसायन—अश्वगंध काला तिल आंवला मधु मांग लेकर मांगराके रसको ३ भावना देना प्रात १ से २ माषा दूधसे लेनां ।
वच्यादि रसायन—वच हरड शतावरी सेठ गिलोय अपामार्ग मूल वायविडग जावला शा खावळी जटामांसी समभाग लेकर मांगराके रसको ३ भावना देना १ से २ माषा शहद घृतसे लेकर दूध पोना ।
वाजीकरण सेवन—वहडको दाल खडे उडद दही वकत साना । वोयको हिकि-कर्त्ती हैं । गेहूंको रोटी चावल दूधको शोर मुग चावलको खिचडी में पुष मिलाकर भोजन सुरणपाली उडदकोहह सोहिळे दूधपोकि घेर दूधमे १ तोला चावल चांवल और ४ तोला साफर घिलाकर पककर मदाम इलायचि पोस्ता डाल वन था हुवा पायस दूधपोक, गेहूंसा लड्डू इत्यादि भोजन पौष्टिक शक्ती वधक हैं ।
हरीतक्यादि चवळेह—हरड महेटा भावळा चित्रक मूल गिलोय सेठ पिप्पल काली मिरच ब्राह्मी शतावरी मुशली बलामूल निप्पी ही मूल हमदो दावहल्दी नगदेकवार मोोगरा तज इलायची मूलौठी मूल वायविडंग हंड़ीओ अतिविषा रतागेरज वीरखा गोरी प्रत्येक द्रव्य दश तोला लेकर कूटकर चूर्ण बनाना पंछे गुढ तेला एक दजारेका मांगाराके रसमें पकाकर घट होनेषे चूणं डाल अवठेहके रुपमे तैयार करणा । हरेरां १ से २ तोला खाना दूधका खराब रक्षणा रसायन पुण करतां है और हरद रोग उडरंग गुल्म व हृद्रोग नाशिकारी शरीरमें पुण करता है ।
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वाजीकरण घटीसुनानी--पाये भरावी तेला ४, देशर तेला ९, अंबर वेटेा ०॥ फत्तूरी वेत्। ०॥ मो'पसैनी घपूर वेत्। ९, जायफल जाव मो' पानको छह रंवा भवरकर' दंगा शारम प्रत्येक देा तेला साथ मिलादर मांड़ो दार तेला रप मे घोटकर थो, प्रमाण मे लो दन'ना । दूधफे साथ १ रे २ गोले वेनेषे कामारोजक गुण करती है ।
नपुसकत्वदर युनानी तिलेस--रीछदो इंद्रौ वेल। २॥, जु पठेड़सतर वेटा =॥, कराट'न वेटा ४, वीरहुरी वेटा । रेसा महीन वेटा २॥, मो'क (जलेा) वेटा । २॥, जारफल मालकर'णो वीज अनन्वेषा प्रत्येक ढाक ढाड तेला अकर कर तम्र द गरप शुद्ध शफेद मत्त्र शुद्ध प्रत्येक सवा सवा तेला, सुरभी'ना के २० अंदे'लेो ज.दी शे हदो वरयो रे रा ४, लेधर रं'क्षौ इंद्र ऐर जुड़ वेसतर रे। वेची'ने दातरकर द रीछ करन। रसपे दूमरी चीजें मल्हो'पुल घोट मिलाव करवी ओर भ दारो करदी मिलाय चुपारी जैस्रा गोलादर पाताल्य'न से वेल। ९ निकारना। पीछे रसपे घपूर वेटा ।०॥, कतू'री वेटा ०॥, आधी तेला ९ मे घोंटकर मिल'य शंशीमे मरना । इष्टेहे इंद्रीपर मालिष करनेशे हस्तदेवसे कुष्मा नपुसकत्व हद्दोषाटे ढापन वचता मिलदर इ'द्री लंबी हेरती हैं । इद्र्रीमें इंदर! मरती है चाम श ग्रंथ होता है ।
स्वो सगके पीछे क्या करना मद्द के अनुसास ऐरार अपने शारीरकेो पस्सट हेो वौरे गरम हदाया रपम शीरींण पान'चे नहाना । हावकर मिलाय दूध हैयार रक्खा रे वद्द पीना । मधुर फल खान' आहार शव जैसा आहाव घार पांच वेल। पीना । पच'का पचन देना और नीद्रा करन। सेा जान। यह दित कर। है ।
प्रयोग ९ विद् रीकद शातादरी समभाग कुट घर । ० से ०॥ टोड़े चूण' घो या मधमें चौंती हपर बुध पीना नाजोकं है ।
२ हरेे आंवळावे! कुट घर रस निकाल तसके २ या ३ मावन। देखर रखना । ०। तेला उच्त चूण'मे र'हद घृत मिलादर खान, उपर दूध पीना इष्टेहे 'बुद्दमें सी तण जौषा वल आता है ।
३ चौवच की मोरी भैर तालमस्सा'ना समभाग कूट रक्खना । सेनोके समान शाककर मिलाना ०॥ से ९ तेला मात्रा दूधषे देना थो इंदमे मी शकि अ'ती है ।
४ मूलंठो मूल विदारी हंद समभाग कूट ०॥ से ९ तेला मधु घृतषे ठेकर गूष पांचवे तसका बीय क्षौण नहो' काम मार्त बढे ।
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५ विसर्पीकंद छोटी पोपल वंशलोचन मूलेठी मूल चव समभाग ठेढकर कूटकर राहदमें मिलादर अचछे वतनमें रखना १ मास के पोछे १ से २ तोला स्वा कर दूध पीना यह रुप वाजेकर चृदय है ।
शिक्षवृद्धि लेष्ट-छोटी कटहरी फल, तज काली मीरच पीपल सेंधानमक लपपो) यव काढे तीन दिन सफेद सरसो। अभयगमा मुख वभाजा कूट कर रखना मिलाय राहद मिल यकते रहदनेसे स्तन शिक्ष व आदिकी वृधि देाकर पुष्ट होते है ।
शिक्षवृद्धि मल्लम नागवला मूल वच अकरगंध गजपीपल घरनेकी जड यव सम भाग लेकर पेसकर मसलनमें मिलाय मल्लम वनाना हमेशां मदंन करानेसे लिंग स्तन पुष्ट होते है ।
चोयस्त अवटी--जायफल लवंग जावश्री केशर हलायची अफीम शककर करा प्रयेक एक तोला, केपूर ०। पांच तोला तजवूल पन्नाखे रसपसे गुंजा प्रमाण गोली वनाना । एकसे दो गोली लेनेसे वीयका स्तंभन करतों है वल कोकित वहाती है ।
लोपिकच्छु अवलेह--कौआ कींगरी तोला १२० केा पीस कर चूर्णेका दूध पकथा सेर ५ मे डालकर पकाना देवाथ-मार्ग हो जानेसे उसमें घो घेर १ मे वदामो रंग होने देा शाकर घेर ३ की चाशनी कर वसमें लियो द्रव्योका चूर्ण रौयार रखो हो डाल कर धीमी आंचपे पकाना अवलेह जोषा होनेसे ठंडा होने देना ।
प्रक्षेप द्रव्य नाय फल छोट पोपल कालीमिरच तज तमालपत्र इलायची लवन अशरकरेा जामत्री तालम्वाना केशर पुनर्नवामूल प्रत्येष्ट चार चार तोला, सफेद मुरली तोला ८ अफीम रसविंदुर लोह मछली मुंछ मृग मेदक भस्म अश्वक भस्म प्रत्येह सेर दो तोला, शालना उपर लींहे कतकच्छु अवलेहकी चाशनीमे डाल भरतन मे भर देना । हमेशां १ से २ तोला खांकर उपर कढा हुवा दूध पीना र्वपषे वीय वल शकि बढती है कामोत्तेजक है ।
जातिफलादि गुटी--जायफल अकरकरा घतुराकी वीज जासंत्रो अफीम नाग भस्म रसविंदुर समप्रम भाग लेंकर पोस्त के डंठे के कवाथ मे घोट कर गुंजा प्रमाण गोली वनाना । एक से दो गोली शाकर प्रातय तोला के साथ लेकर उपर दूध पीना वीय स्तंभन देाता हैं कामोत्तेजक पौष्टिक है ।
शांघपुप्पी प्रयाग--शंखाहुनी गिलेाय भगमार्गां मूल वायविडंग वच हरद छोट धातावरी समभाग कूट चूर्ण करना १ से २ माषा गय के घो साथ ठेरे से मेचा समरण शक्त वुद्धि आयुष्य बढना हैं ।
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सतालव्यादि चूर्ण-असगंध ककुच बीजद्रो गोरी शफेद सुफली गोधृक चाराहोंकंद मलाईठो मूल अंयफल शपलकां गोंद शपमाग कुट कर पाव तोला चूर्ण गंधक के साथ ठेकर ऊपर दूध पीना पौष्टिक वीर्यवृद्धिक कामोत्तेजक है।
कामोत्तेजक युनानी तिलां-छाछवान कोडोयें तोला २०, काले तिल तोला ७१, शफेद शेपल तोला ११, वचनाग, चतुरांकी चोय शफेद गुंजा कुचला अकरकरा जायफल मालकांगणी बोज लवंग तज प्रत्येक पाव पांच तोला लेकर पाताल यंत्रसे तेल निकालना। यह तेल तोला ५ मे रत्तुरी तोला ६ देशर रत्ती १२ मोससेनी रत्तो ६ मांही दो तोला (८ तोला १) समप्राय मिलाकर शीशी मे भरना। इसको इस ऊपर मालिश करने से कोम जागृत होता है नपु शक्काव मिटता है स्तम्भन होता है।
॥ इति आयुर्वेद संग्रह ॥
रसरत्नाला प्रेस-मोंडल
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सीवन इनवर्टेड सीवन
रसोद्धार तन्त्रम्
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स्वर्णपताका प्रकाशन
ग्रंथ-कार-सम्पादक
पं० मोतीलाल शास्त्री
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