1. Sangeetanjali
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संगीताञ्जलि- (तृतीय भाग)
द्वितीय पुष्प ]
कला निकेतन
लेखक
पं. शमकारनाथ ठाकुर
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संगीताञ्जलि
द्वितीय पुष्प प्रथम कली
लेखक और प्रकाशक-
संगीन मातयड, संगीत महामहोदय, संगीन सम्राट्
पं० ओम्कारनाथ ठाकुर
कुलगुरु
श्री संगीत भारती
काशी विश्वविद्यालय
बनारस।
DAL LIaSA ARY
सर्वाधिकार लेखक द्वारा सुरक्षित
प्रथम आवृत्ति
एप्रिल १६५५ मूल्य ५ )
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प्राप्तिस्थान :-
पं० ओम्कारनाथ ठाकुर
कुलगुरु श्री संगीत भारती,
काशी विश्वविद्यालय
बनारस।
मुद्रक-शमलकुमार वसु, इंडियन प्रेस, लिमिटेड, बनारस ब्रांच।
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अनुक्रमणिका
विषय पृष्ठ संख्या विषय पृ० संख्या
प्राकथन- १ २-राग अल्हैया बिलावल १२-३० प्रस्तावना- २-११ शास्त्रीय विवरण १२ ध्रुवपद-अंग-ख्याल-गाय की पूर्व पीठिका २ मुक्त आररलाप १३-१४ प्रस्तुत पुस्तक का पाठ्य-क्रम, ख्याल तथा मुक्त मुक्त ताने १५-१६ एवं बद्ध ्रलापतान ३ गीत १-'दैय्या कहा' (विलंबित एकताल) १७-१८ ख्याल-गायकी की क्रम-प्रसाली ३-४ आलाप १६-२२ स्पर्श-स्वरों अथवा कणों का महत्व ५ बोलताने २३-२४ विराम-चिह्नों का महत्व ६ ताने २५-२६ मुक्त तानों की लय में परिवर्तन की शक्यता ६ गीत २-'कवन बटरिया' (त्रिताल) २७ मुक्त आलापतानों में स्थान परिवर्तन से नवीनता ६ ताने २६-२६ परिशिष्ट में दिये हुए ख्याल गीत ३-'प्रबल ही श्याम (भपताल) भावानुरूप स्वरोच्चार ३-राग जयजयवन्ती ३१-४६ स्वर-साधना. १० शास्त्रीय विवरण ३१-३२ कुछ अन्य शारीरिक प्रक्रियाएँ ११ मुक्त श्रालाप ३२-३४ कुछ पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या- १२-१७ मुक्त ताने ३४-३५ वादी संवादी अनुवादी और विवादी स्वर १२ गीत १-लरा माई सजन (विलंित एकताल) ३६-३७ ग्रह-अंश-न्यास-संन्यास-विन्यास-अपन्यास १३ शब्दालाप ३७-३६ बल-त्रबल १५ बोलताने २६-४१ निबद्ध-अनिबद्ध गान १६ ताने ४२-४३ रागांग परिभाषा १६ गीत २-'रे घन काये' (त्रिताल) ४४ राम-प्रकृति, रस-भाव १७-१६ ताने ४५.४६ रागों का समय-निर्धारण १६-२१ गीत-३ 'दिर दिर तनन'-तराना (त्रिताल) ४७-४८ गायकों के गुख-दोष २१-२४ गीत-४ 'श्यामा श्याम सों' (धमार) ४१ कुछ तालों के ठेके २४-२५ ४-राग केदार ५ू०-६६ मात्रा-विभाग-विवरस २५-४७ स्वरलिपि-विह्न-परिचय शास्त्रीय विवरए ५ू०-५१ २७-२८ मुक्त श्रालाप ५१-५३ १-राग तिलक कामोद १-११ मुक्त तानें ५३-२४ शास्त्रीय विवरण १ गीत-१ 'बन ठन का' (विलंबित एकताल) ५४-५५ मुक्त आलाप २-३ आलाप मुक्त ताने ४ बोलतारनें ५८-६० गीत १-'मन अटकी छृबि' ( त्रिताल) तानें ६०-६२ عر
श्रालाप ६- गीत-२ 'ज्यों ज्यों बूँद परे' (त्रिताल) ६३-६४ ताने ७- तानें ६४-६५ मुखड़े के प्रकार गीत-३ 'पायल बाजे' (त्रिताल) ६६ गीत २-'कान्हा कितिक बार' (सूलताल) १०-११ गीत-४ 'ना दिर दिर दानी' तराना (त्रिताल) ६७
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विषय पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्य गीत-५ 'सरस सीस मोर मुकुट (चौताल) ६८-६६ |८-राग मालव कौशिक (मालकौंस) १२६-५७ ५ू-तडाया ७०-८१ शास्त्रीय विवरण १२६ शास्त्रीय विवरण ७०-७१ मुक्त ग्रालाप १३०-३२ मुक्त श्ालाप ७१-७२ मुक्त तानें १३३-३४ मुक्त तानें ७३-७४ गीत-१ 'अब छब देखी' (विलम्बित एकताल) १२५-३७ गीत-१ 'परदेसवा नित-जिन, (त्रिताल) ७४-७५ गीत-२ 'पीर न जानी' ( )१२७-३६ आलाप ७५-७६ आलाप १२६-४२ तार्ने बोल तानें १४३-४५ गीत-२ 'छुला देहो छैल' ( त्रिताल) ७६-६० तानें १४५-४७ गीत-३ 'गगरी मोरी' (त्रिताल) गीत-३ 'पग घू'घरू बांध' (त्रिताल) १४८ ६-राग आसावारी मुखड़े के प्रकार १४६-५० शास्त्रीय विवरण ८२-८२ तानें १५०-५२ मुक्त आ्लाप ८३-द५ू गीत-४ 'कैसो नीको लागो' (') १५२ मुक्त तानें ८५-८६ गीत-५ 'द्या स्मर दमना' (") १५४-५५ गीत-१ 'पेहरवा जागो' (विलंबित एकताल) 20-55 गीत-६ 'तो तनन तन देरे ना' तराना (") १५६ आ्रालाप द८-६१ गीत-७ 'आये रघुवीर धीर (चौताल) १५७ बोलतानें ६२-६३ ६-राग भैरव १५८-८० तानें ६४-६५ शास्त्रीय विवरण १५८ गीत-२ 'हम रैये रात' (त्रिताल) ६६ मुक्त आलाप १५६-६१ तानें ६७-६८ मुक्त तानें १६१-६३ गीत-३ 'चतरंग रस सन' (त्रिताल) ६६-१०० गीत-१ 'जियरा उनी सों (विलंबित एकताल) १६४-६५ गीत-४ 'दानी ना दिर दिर दानी'-तराना आलाप (त्रिताल) १६६-६८ १०१-२ बोल तान मुखड़े के प्रकार १६८-७१ १०२-४ ताने १७१-७३ तानें १०४-५ गीत-५ 'सखी री जा दिन ते, (चमार) गीत-२ प्रभु दाता रे (त्रिताल) १७४ १०५-६ गीत-३ 'घू'घरवा प्यारी रे' (") १७५ ७ राग बहार १०७-२८ तानॅ १७६-७७ शास्त्रीय विवरण १०७ गीत-४ 'मोहन जागो' (चौताल) १७८-८० मुक्त आ्रालाप १०८-१० परिशिष्ट मुक्ततानें ११०-११ गीत-१ 'नई रुत नई फूली' (तिलवाड़ा) राग भूपाली ११२-१३ ख्याल-'सूधे बोल तानन' (तिलवाड़ा) १८१-६२ प्रालाप ११४-१५ राग जैमिनी-कल्याण बोलताने ११६-१७ ख्याल-"कै सखी कैसे कै करिये" ( विलंबित ताने ११८-२१ गीत-२ 'सघन बनी अमराई' (त्रिताल) एकताल) १८३-५४ १२१-२२ तानें राग बिहाग १२३-२४ गीत-३ बहार आई बेलरियां फूली (त्रिताल) १२५-२६ ख्याल-"कैसे सुख सोवे नींदरिया" (तिलवाड़ा)१८५-द६ राग सारंग गीत-४ सकल बन गगन पवन चलत (तरिताल) १२७-२८ / ख्याल-'मैं समभूयो निरधार' (विलंबित एकताल)१८७-बद
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अकारादि क्रम से गीतों की सूची
गीत गीत
क्रम-संख्या पृष्ठ संख्या क्रम-संख्या पृष्ठ-संख्या १-अब छुब देखी १३५ २२-परदेसवा ७४
२-गद्या स्मर दमना १५४ २३-पायल बाजे ६६
३-आये रघुबीर धीर १५७ २४-पीर न जानी १३७
४-कवन बटरिंया २७ २५-पेहरवा जागो ५-कान्हा कितिक बार २० २६-प्रबल ही श्याम ३०
६-कै सखी कैसे १८२ २७-प्रभु दाता रे १७४
७-कैसे सुख सोवे १८५ २८-बन ठन का ५४
८ कैसो नीको लागो १५२ २६-बहार आई बेलरिया फूली १२५
६-गगरी मोरी ३०-मन अटकी छुबि १०-घू गरवा प्यारी १७५ ३१-मैं रूमभयो निरधार १६७
११-चतरंग रस मन ३२-मोहन जागो १७८ १२-छैला देहो छुल ७६ ३३-रे घन छाये ४४
१३-जियरा उनी सो १६४ २४-लरा माई सजन ३६
१४-ज्यों ज्यों बूँद परे ६३ ३५-श्यामा श्याम सो ४६
१५-तों तनन तन देरे ना १५६ ३६-सकल बन गगन १२७
१६-दानी ना दिर दिर दानी १०१ ३७-सखी री जा दिन से १०५
१७-दिर दिर तनन ४७ ३८-सघन बनी श्रमराई १२१
१८-दैय्या कहाँ १७ ३६-सरस सीस मोर मुकुट १६-नई रुत नई फूली ११२ ४०-सूधे बोलतानन १६१
२०-ना दिर दिर दानी ६७ ४१-हम रैये रात ११-पग घूँगरू बाँध १४=
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प्राक्कथन
प्राचीन-परंपरानुसार तो जो विद्यार्थी गुरुमुख से सुन कर ही शिक्षा ग्रहणा कर सकते थे, उन्हीं के लिये संगीत-शिक्षा का मार्ग प्रशस्त था। किन्तु तधुना इस देवी विद्या का सभी लाभ उठा सके इस दृष्टिबिंदु से विद्यार्थियों का क्रम-विकास सोचा गया और बरसों के अनुभव के बाद जो निष्कर्ष निकला, उसी के अनुसार रस्तुत पाठ्यक्रम बनाया गया, जिसका यह तीसरा भाग प्रकाशित हो रहा है। कुछ लोग विद्यार्थियों की शिक्षा का त्रंभ कल्याण त्रंग से करते हैं औरर कुछ लोग विलावल-शंग से। किसी ने तो तोड़ी, मारवा, पूर्वी, मैरव जैसे कठिन रागों को, जो कि पूर्वार्जित शक्ति-संपन्न विद्यार्थियों के लिये भी कष्टसाध्य हैं, प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में स्थान दिया है। अब वह युग गया है जब कि प्रारंभिक ने लेकर उचच शिक्षा तक विद्यार्थी के क्रमिक-विकास की दृष्टि से पाठ्यक्रम वनाना अनिवार्य हो गया है, क्योंकि प्रब विश्वविद्यालयों में भी संगीत-शिक्षा को स्थान प्राप्त हुआ है। उसी विकास-दृष्टि से यह क्रम बनाया गया है, जिसके प्रथम दो भाग प्रवेशिका-क्रम में प्रकाशित किये गए हैं औरर इस तीसरे भाग में मध्यमा अथवा इयटर र प्रथम वर्ष अरथवा जूनियर डिप्लोमा का पाठ्यक्रम दिया गया है। भारतीय संगीत की सूच्मता को देखते हुए उसे पूररातया नोटेशन या स्वर-लिपि में आलेखित करना करीब करीब असंभव है। स्वानुभव से मैं यह कह सकता हूँ कि जिस संगीत में पल पल पर स्पर्श-स्वरों वा करों (Grace notes) का उपयोग होता हो, ऐसे किसी भी संगीत को पूर्णातया लेखवद्ध करना अशक्य है। यथासंभव उसे लेखबद्ध करने का कार्य पूज्यपाद ररुदेव पं० विष्णुदिगम्बरजी ने किया है। किसी हद तक Staff notation वाले भी उसमें सफल हुए हैं। किन्तु सीधा और स्थूल नोटेशन प्राप्त हो तो उसे छोड़ कर सूष्म और कष्टसाध्य लेखन-शैली कौन अपनाए ? इसलिये स्थूल और सूक्ष्म दोनों दृष्टियों को सामने रखकर हमें यह मार्ग अपनाना पड़ा है, जो इन पुस्तकों में प्रयुक्त किया गया है। यह नूतन प्रयोग सफल हुआ है या असफल, यह तो इन पुस्तकों का उपयोग करने वाले ही कह सकेंगे। जिन्हें जो कठिनाइयाँ दिखाई दें, कृपया वे मुक्त रूप से सूचित करें। यथासंभव उन्हें दूर करने का यनन किया जाएगा। कामना यही है कि सौकर्य को बनाए रखते हुए यथासंभव सूक््मता को निदर्शित किया जाए।
ऐसा अनुरोध है। इस लेखन-प्रणाली के समुचित उपयोग के लिये चिह्न-परिचय की तरर विशेष ध्यान दिया जाए,
इस पुस्तक के प्रकाशन में अल्पाधिक रूप में तीन व्यक्तियों ने सुझे साहाय्य किया है। तीनों ही मेरे लाड़ले हैं, और तीनों का मुझ पर और मेरा तीनों पर अधिकार है। गायनाचार्ये प्रो० बलवंतराय भट्ट, डा० प्रेमलता शर्मा एम० ए०, पी एच० डी० और कुमारी सुभद्रा चौधरी-ये तीनों ही मेरे निगूढ़ प्यार-आशीष के पात्र हैं। इनमें भी डा० प्रेमलता शर्मा ने इस पुस्तक की समग्र पाराडुलिपि के लेखन में और प्रूफ संशोधन इत्यादि कार्यों में सबसे अधिक श्रम किया है। वे नितान्त रूप से मेरे धन्यवाद की अधिकारिणी हैं। साथ ही इगिडयन प्रेस प्रयाग की बनारस स्थित शाखा के मैनेजर श्री ए० के० बोस एवं अन्य कर्मचारियों का भी मैं आमारी हूँ, जिन्होंने विशेष ध्यान और परिश्रम से इस पुस्तक की शुद्ध, स्वच्छ एवं सुन्दर छपाई की है। काशी विश्वविद्यालय गुरुवार, वैशाख शुक्क निवेदक,
सतमी, सं० २०१२ श्ोमूकारनाथ ठाकुर
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प्रस्तावना अधुना भारत में ख्याल-गान की पद्धति अपनी विकास की भूमिका पर आरूढ़ है। सर्वत्र ख्याल-गायकों की ओर विशेष समादर से देखा जाता है। जिस परंपरा के हम अनुयायी हैं, वह भारत का एक सर्वप्रसिद्ध ख्याल का बराना माना गया है। हमारी गुरु-परंपरा ग्वालियर के सुप्रसिद्ध ख्याल-गायक हदूदू-हस्सूखां-इन बन्धु-द्वय से सीधी संबन्धित है। 'संगीताञ्जलि' के इस क्रमिक पाठ्य-क्रम के तीसरे भाग में उस ख्याल-गायकी की शिक्षा का आरंभ करना उचित माना है। ख्याल-गायकी के भिन्न भिन्न घरानों की परंपरा का उल्लेख यहाँ आवश्यक नहीं है। परन्तु हमारी अपनी ख्याल-गायकी की परंपरा के अंगों को यहाँ समझाना विशेष रूप से समुचित होगा। ध्रुवपद-अंग-ख्याल-गायकी की पूर्व पीठिका हमारी गुरुपरंपरा में ख्याल-गायकी सीखने के पूर्व ध्रुवपद-अंग की गायकी को सीखना आवश्यक माना गया है। ध्रुवपद अंग में स्व्रों का ठहराव, आलापचारी का विस्तार, स्वरों का स्थैर्य, लय की भिन्न भिन्न बांट, द्विगुन, चौगुन, आड़, तिगुन छैगुन इत्यादि लय-प्रयोग और उनकी तिहाइयाँ इत्यादि का सप्रयोग बोध प्राप्त कर लेना नितान्त आवश्यक है। सामान्यतः विद्यार्थियों का झुकाव झटपट तानक्रिया की ओर अधिक रहता है और तान-क्रिया में स्वरों की गति द्रुत होती है। कंठ को यदि द्रत गति से स्वरोच्चार की आदत पड़ जाए, तो भिन्न भिन्न भाव और रस की उत्पत्ति के लिये भिन्न मिन्न स्वरों पर स्थैर्य से जो उच्चार करना चाहिए वह कठिन हो जाता है। कंठ को स्वाधीन बनाने के लिये-जब चाहें उसे स्थिर करें, जब चाहें उसे कंप दें, जब चाहें उसे आन्दोलित बनाएँ, जब चाहें मींड़ से उच्चारें, इन सब क्रियाओं की बुशलता प्राप्त करने के लिये, जो कि ख्याल-अंग में भावाभिव्यक्ति के लिये अनिवार्य हैं,-घ्रुवपद-अंग को गले में बिठाना अत्यावश्यक है। यह कहना नितान्त रूप से सत्य का निरूपणा करना है कि भारत में ख्याल अंग के विकास के पूर्व ध्रुवपद-अंग ही अपने चरम विकास पर स्थित था। और खयाल, ध्रुवपद्-अंग में किये हुए नये विकास का ही नाम है। ध्रुवपद-अंग में तालबद्ध गान के पूर्व राग की आलप्ति की जाती है, जिसे आजकल 'नोम् तोम्' आलापचारी कहते हैं। वह आलापचारी आज ख्याल-अंग में आकारादि अव्तरों द्वारा बढ़त के रूप में प्रयुक्त होती है और गीत के शब्दों द्वारा राग के स्वरालापों में विस्तार किया जाता है, जो शब्दालाप के नाम से भी प्रसिद्ध है। ध्रुवपद-अंग के 'नोम् तोम्' के आलाप तालबद्ध नहीं होते-आगे चल कर मात्र लयबद्ध होते हैं और इस प्रकार उन आलापों के न्यास के अवसर पर 'तना तोम्' कहा जाता है। किन्तु ख्याल-अंग की आलापचारी तालबद्ध ख्याल का स्थायी अन्तरा गाने के पश्चात् ही आरंभ होती है; ताल के साथ ही उसका विस्तार होता है और ख्याल के 'ध्रुव' शब्दों के उच्चार के साथ सम पर उसका न्यास किया जाता है। तद्वत् द्विगुन, चौगुन, तिगुन, तिहाई इत्यादि लय-विभागों के जो अंग ध्रुवपद-गायकी में लिये और बरते जाते हैं, वे ही अंग ख्याल-गायकी में ख्याल के शब्दों की बोलतान में प्रयुक्त होते हैं। इसीलिये ख्याल-अंग की सविशेष गायकी की शिक्षा आरंभ करने के पूर्व ध्रुवपद-अंग की 'गायकी सीखने और अपनाने का हमारी परंपरा में आग्रह रखा गया है।
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३ संगीताञ्जलि के प्रथम दो भागों में चौताल, भपताल, सूलताल, धमार, तेवरा आदि ध्रुवपद अंग के जालों में गीत, पूर्व-उललिखित लय की बाँट सहित विद्यार्थियों को अवगत कराये गए हैं। इसके अतिरिक्त ख्याल- अंग की पूर्व भूमिका के रूप में मध्य लय के गीतों में थोड़े आलाप-तान का शिक्षण भी, विद्यार्थियों की रुचि बनाए रखते हुए, उनके लाभार्थ दिया गया है। इस तीसरे भाग में ख्याल-अंग का बोध देने जा रहे हैं।
म्रस्तुत पुस्तक का पाठ्य-क्रम, ्याल तथा मुक्त एवं बद्ध आलापतान इस पुस्तक में नौ रागों के ख्याल, उनके तालबद्ध आलाप, बोलतानें और तानें दी गई हैं। आभ्यास और विकास के लिये मुक्त आलाप और मुक्त तानें प्रथम दो भागों में भी दिए गए हैं औ्रर इस भाग में विशेष विस्तार से दिये गए हैं। मुक्त आलाप और मुक्त तानों का आभ्यास करके विद्यार्थी अपनी बुद्धि से उन उन रागों के पदों में स्वयं उनका उपयोग कर सकें, और स्वनिर्मित आलापतान से गीत को अलं- कत कर सकें, इसीलिये उनका समावेश किया गया है। तालबद्ध आलाप, बोलतान और तानें इसलिये दी गई हैं कि जिससे विद्यार्थी किस ढंग से आलाप का क्रमिक विस्तार करें बोलतान को निबद्ध करें, तान का प्रस्तार करें, और तिहाइयों से गीत को सजा कर रंजकता बढ़ाएँ-इन सब बातों में उनका मार्गदर्शन हो सके। इसी उद्द श्य से यह सब देना आवश्यक समझा गया है। एक के बाद एक रखने से दो होंगे, किन्तु एक के साथ एक रखने से ग्यारह होंगे-यह जो विकास की रीति है, उस रीति को ध्यान में रखते हुए विद्यार्थी के दिमाग में आलाप, बोलतान और तान का विकास-क्रम रखे बिना उससे स्वतंत्र विकास की तशा कैसे रखी जा सकती है ? यदि वह मार्गदर्शन के बिना स्वतंत्र विकास करेगा, भी, तो उसमें सुन्दरता और सौष्ठव कैसे रहेंगे ? इन सब दृष्टि बिन्दुओं को ध्यान में रखकर ही तीसरे और चौथे वर्ष के रागों के ख्यालों में आलापतान निबद्ध करके हेने का विचार किया गया है। इस प्रकार चालीस वर्ष के शिक्तण-कार्य से प्राप्त अ्रनुभव के आधार पर ये आलापतान निबद्ध किये गए हैं।
ख्याल-गायकी की क्रम-पणाली देखा गया है कि कुछ खयाल-गायक ख्याल के शब्दों का मुखड़ा लेकर ही आलापचारी शुरू कर देते हैं और पुनः २ सम दिखाते समय उसी मुखड़े का उच्चार करते हैं। शुरू में पूरा स्थायी अन्तरा गा कर आलाप- चारी का आरंभ वे नहीं करते। कुछ लोगों का कहना है कि स्थायी अन्तरा याद न होने से वे लोग ऐसा करते हैं, और कुछ की मान्यता है कि स्थायी अन्तरा सुनकर गायक-वर्ग में से कोई उसे याद न कर लें, इस आशंका से-छिपाने के हेतु वे लोग स्थायी-अन्तरा नहीं गाते हैं। इन दोनों कथनों की सचाई को जाँचना कठिन है। किन्तु यह तो सत्य है ही कि कुछ लोग सचमुच स्थायी अन्तरा नहीं ही गाते हैं। परन्तु हमारी परंपरा में ख्याल-गायकी में निम्नोक्त क्रम आवश्यक माना गया है। (१) आर्रारंभ में षड्ज की स्थिरता। (२) षड्ज की पूरी हवा फैलने के बाद ख्याल का पूरा स्थायी-अन्तरा तालबद्ध रूप से गाया जाए। (त्रिताल. भपताल वगैरह तालों के गीतों के सदश ख्याल का स्थायी अन्तरा भी सम, ताली, खाली वगैरह ताल के स्तंभों से भली भाँ ति निबद्ध हो।) (३) स्थायी-अ्रन्तरे के गान के पश्चान् ही तरक्रारादि अ्क्षरों में स्वरालाप शुरू किये जाएँ। आलापचारी में राग के अंग को देखकर, उसके ब्रह, अंश और न्यास स्वरों को केन्द्रित रखकर उनके इर्द गिर्द स्वरों के संविधान से उन उन स्वरों के भावों का परिपोष किया जाए और आलाप के ऋन्त में मध्य षड्ड
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( ४) पर पूर्ण न्यास किया जाए। आलापचारी के क्रम-विकास का एक उदाहरणा, समझाने के लिये, यहाँ दिया जाता है। मान लीजिए, हम जैमिनि कल्याण गाने जा रहे हैं। आलापचारी के आरंभ में हम मध्य षड्ज को केन्द्र-बिन्दु मान कर मन्द्र सप्क के भिन्न भिन्न स्वरों की जोड़ियों यथा-घ नि, म नि, ग नि और अन्य आरनुषंगिक स्वरों का विकास करते हुए षड्ज पर बार बार स्थिर होंगे। फिर क्रमशः एक एक करके ऋृपभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धेवत, निषाद और तार षड्ज इन सभी स्वरों को केन्द्र-बिन्दु बनाकर हमें आलाप- चारी को बढ़ाना चाहिए। इस प्रकार इन आलापों में राग-विकास के साथ भाव-विकास भी करना चाहिए। जैमिनि कल्याण में सभी स्वरों पर ठहर सकते हैं। इसीलिये इन सब स्वरों को केन्द्र-बिन्दु बनाने को कहा है। किन्तु अरन्य रागों में उनके आरोहावरोह, स्वर-संगति, अल्पत्व-बहुत्व, वक्रत्व आदि सभी बातों का विचार करके आलापचारी का विकास किया जाए। आराजकल कुछ लोग ख्याल के अन्तर में भी आलापचारी करने लगे हैं। किन्तु क्रम-विकास से तार षड्ज तक आलापचारी करने के बाद पुनः अन्तरे में वही आलाप ढोहराने की आवश्यकता नहीं है। मन्द्र से तार तक दीर्घ आलाप करने के पश्चात् जनता पुनः दोहराये हुए उन आलापों से ऊब जाएगी। भोजन के समय एक ही वस्तु बार बार परोसी जाए तो रुचि-भंग होता है, तद्वत् गाये हुए आलापों को फिर दोहराना, यह रसभंग है। इसलिये प्रायः सभी ख्याल-गायक अन्तरे में आलापचारी नहीं ही करते हैं और हमारी राय में इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। इस आलापचारी में अकारादि अप्तरों के स्थान पर ख्याल के रसात्मक शब्द भी उपयोग में लागे जाते हैं। किन्तु इस आलापचारी में ठुमरी अंग की स्वर-क्रियाओं, मुर्कियों का और खटकों का भूल से भी उपयोग न हो, इसकी सावधानी रखनी चाहिये। (४) आलापचारी के विशद विस्तार से वातावरण में राग की संपूर्ण छाया छा जाने के बाद मध्यर्गात की बोलतानों का आरंभ करना चाहिए। इन बोलतानों में दो प्रकार हैं। ख्याल की स्थायी के शब्दों को मध्यगति की तानों में निबद्ध करके स्थायी के शब्द पूरे होते ही ताल का आवर्शन पूरा हो और सम दिखाया जाए। इसके लिये ताल की भिन्न भिन्न मात्राओं से इन बोलतानों का उठाब या आरंभ किया जाता है और ताल के आवर्तन में उसे समाप्त किया जाता है। यहाँ एक बात का अवश्य ध्यान रखा जाए कि ख्याल के शब्दों को तीड़ा न जाए, उनके अ्थों को मरोड़ा न जाए। अन्यथा वह बोलतान भावाभिव्यक्ति का साधन न रह कर कोरी बोलतान रह जाएगी, क्योंकि शब्दों की तोड़-मरोड़ से अर्थ का अनर्थ होने की संभावना है। बोलतान का दूसरा प्रकार तिहाई है। स्थायी के बोलों की तान ऐसी मात्रा से आरंभ की जाए कि जिससे सम पर आने का सुखड़ा भिन्न भिन्न प्रकार से तीन बार लिया जाए और सम पर उसे पूर्णा किया जाए। ध्र वपद-अंग में गीत के शब्दों का भिन्न भिन्न लयों में जो पुनरुचार किया जाता है और ख्याल-त्ंग में शब्दालाप एवं बोलतान लेने की जो परिपाटी गान-विद्या की विकसित क्रिया में उपयोग में लाई जाती है, उसका मूल, मेरी राय में, वैदिक गान-क्रिया ही है। वेद-पाठ की परंपरा में जटा, धन आदिक जैसे भिन्न भिन्न अर्थ-निदशक शब्द-विन्यास किये जाते हैं, तद्वत् उसी का परंपरानुगत अनुकरण संगीत की इस गान-क्रिया में किया जाता है, जिससे अर्थ का, भाव का और रस का परिपोष होता है और श्रोताजन भाव में निमज्जित होते हैं। हाँ, सभी ख्याल-गायक शब्दालाप और बोलतान की क्रियाओं का अपनी गायकी में प्रयोग नहीं करते हैं। किन्तु हमारी परंपरा की यह विशेषता है। और बिना हिचकिचाहट के यह कहने में हम ऋत्युक्ति नहीं कर रहे हैं कि ख्याल-गायकी में ग्वालियर की परंपरा भारत में अप्रगय मानी गई है।
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( ५) (५) इन बोलतानों के पश्चात् लयबद्ध तानों से ख्याल को सजाया जाता है। इन तानों में विविध रााक्वारों का समुचित विनियोग करना कुशलता का कार्य है। इस तान-क्िया के अवसर पर वीच वीच में हलावे का प्रयोग भी किया जाता है। बहलावे में तीन, पाँच, सात, नौ ऐसे स्वरों की तान लेकर कि्सी स्वर पर ठहर कर पुनः उसी प्रकार तरप्रवरोह करके फिर किसी स्वर पर ठहर जाते हैं और इसके विस्तार को बढ़ा कर कता उत्पन्न करते हैं। यथा बिहाग में- पनि सा ग-, ग र सा नि-, रे सा नि प-, स ग म प-, मैं प नि सो-, गं रे सो नि-, व प म ग-, ग रे सा नि 17 -, प नि सा ग-, रे नि सा -- ।
बहलावे के ये प्रकार भिन्न भिन्न रागों के नियमों को देख कर ही सावधानी से बनाने चाहिए। इसके बाद मध्य या द्रुत लय के गीत गाने की परिपाटी है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि ख्याल-गायकी का यह चित्र, यह क्रम और विकास ध्यान में ख कर विद्यार्थी साधना करेंगे तो विश्वास है कि वे सफलता पाएँगे।
स्पर्श-स्वरों अथवा कर्णों का महत्व
इस पुस्तक-मालिका में दिये हुए गीतों, त्रलापतान इत्यादि में जो स्पर्श-स्वर (grace notes) या का दिये हुये हैं, विद्यार्थी और शिक्षक दोनों ही उन पर विशेष ध्यान दें। ये स्पर्श-स्वर जो कभी नीचे से और कभी ऊपर से छुए जाते हैं, इनका महत्व केवल रंजकता बढ़ाने तक ही सीमित नहीं है, किन्तु ये राग-निदर्शक
भी हैं। यथा-प-म ग म ग, यह स्वरावली बिहाग को स्पष्ट करती है। परन्तु यदि मध्यम और गान्धार पर प प
से स्पर्श-स्वर हटा दिये जाएँ, और अन्तिम मान्धार को कोमल ऋृषम का करा लगा दिया जाए तो प मैं ग
म ग, वह पूर्वी हो जाएगी। एक उहाहरण और- ग प ग रे सा-यह स्वरावली है। इसमें निन्नलिखित मिन्न भिन्न स्पर्श-स्वरों के प्रयोग से वही एक स्वरावली भिन्न भिन्न रागों की निदर्शक बन जाती है :-
घ ग प ग, रे सा. -- भूप
ग प ग, रे सा. -शंकरा ग प ग-रे सा- -देशकार
ग प ग-रे, सा. -हँसध्वनि
ग प ग रे सा. -शुद्ध कल्यागा
इस प्रकार एक ही स्वरावली होते हुए भी भिन्न भिन्न स्पर्श से, भिन्न भिन्न ठहराव से राग परिवतित हो जाता है। गुणी जनों के सहवास से ही स्पर्श स्वरों की यह सूक्ष्मता ध्यान में आएगी। इसीलिये इन स्पर्श- स्वरों के प्रति विशेष ध्यान देने के लिये हमने विद्यार्थियों को और शिक्षकों को साग्रह अनुरोध किया है।
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विराम-चिह्नों का महत्व तान-क्रिया में जहाँ जहाँ तरधैविराम-चिह्न दिये गए हैं, उसके पीछे विशेष हेतु है। मान लीजिए ककि सांरंसा रेगरे गमग मपम पवप वाला अलंकार किसी राग में प्रयुक्त किया जा रहा है। यों तो यह तलंकार तीन तीन स्वरों का है। यदि एक-तृतीयांश तथवा एक -षष्ठांश मात्रा-विभाग में इसका उपयोग किया जाएगा तो कोई दिक्कत पेश नहीं आएगी। किन्तु एक-द्वितीयांश (३), एक-चतुर्था श (१) या एक-अष्टमांश (१) मात्रा-विभाग में इसका प्रयोग करने से विषम टुकड़े वन जाएँगे। और इसीलिये विषम तानों को सम लय में और सम तानों को विषम लय में स्पष्टनया समझाने के लिये ही उन अर्धविराम चिह्नों का प्रयोग किया गया है। मुक्त आलापों में अर्ध-विराम, पूर्णा विराम, डैश, ब्रैकेट इत्यादि चिह्नों का भी आलाप के समय पूर्णा ध्यान रखा जाए और यथास्थान और यथाचिह्न उच्चार किया जाए। शिक्तक सिखाते समय औरर विद्यार्थी त्रभ्यास के समय पूर्वलिखित सारी बातों पर सविशेष ध्यान देना भूलें नहीं। मुक्त तानों की लय में परिवर्तन की सक्यता सुविधा के लिये मुक्त तानें एक-चतुथींश (१) लय में लिखी गई है। किन्तु अभ्यास से ई, 2 इत्यादि लयों में इन्हीं तानों को बिठाने का प्रयत्न करना चाहिये। और इस प्रकार विकास करना चाहिये।
झुक्त आलापों में स्थान-परिवर्तन से नवीनता शिक्षक इस बात का भी ध्यान रखें कि विद्यार्थी उन मुक्त आलापों का जो मन्द्र या मध्य सप्तर्क में दिये गए हैं, तार सप्तक में भी उसी प्रकार से यथायोग्य हेरफेर के साथ एक दूसरे प्रकार मिला कर, उपयोग करें। स्थान-परिवर्तन से वही आलाप नवीनता दर्शाएँगे।
परिशिष्ट में दिये हुए ख्याल इस पुस्तक के अंत में परिशिष्ट के रूप में पहिले के दो भागों में आये हुए चार रागों के ख्याल दिये गए हैं। उनकी शिक्ता भी साथ साथ दी जाए जिससे इन नित्य प्रचार के रागों में अपने बनाये हुए आलापतान का विद्यार्थी विस्तार कर सकें एवं गाने का अभ्यास बढ़ा सकें।
भावानुरूप स्वरोच्चार आजकल शास्त्रीय गायन के प्रति सुननेवालों की पर्याप्त मात्रा में उपेक्षा देखी जाती है। केवल स्वरों के Permutation ( विनिमय) एवं Combination (सन्धि) बनाकर गानेवाले और केवल आलापतान लेकर सम पर आना-इसी में शास्त्रीय संगीत की अवधि को सीमित मानने वाले पुस्तकी गायकों ने शास्त्रीय संगीत के प्रति अरुचि पैदा की है और कर रहे हैं। यह सत्य कटु है, इसलिये अप्रिय भी लगेगा। किन्तु इसका कोई इलाज नहीं है। सुधारक सर्वप्रिय तो हो ही नहीं सकता। कहने बैठे हैं तो गुशा-दोष कहने ही पड़ेंगे। गुया- दोष को देखकर ही नीर-नीर-विवेक का उपयोग किया जा सकेगा। इसीलिये इसको निरूपित किया जा रहा है। भाषा द्वारा विचारों की अभिव्यक्ति करते समय यानी नित्यप्रति की बोलचाल में, वही व्यक्ति बाजी मार लेता है, जो शब्दोच्चार में स्वरों के उतार-चढ़ाव का यथोचित उपयोग करता है। वाग्व्यवहार में इन उतार चढ़ाव से, लघु, गुरु और प्सुत उच्चार से और आवश्यकतानुसार मृदुता अथवा आघात से शब्दोच्चार करने से ही भावाभिव्यक्ति में प्रभाव पैदा किया जाता है। नित्य की बोलचाल के लिये जो सत्य है, वह व्याख्यान के लिए, कवितापाठ के लिये, अभिनय के लिये और संगीत के लिये भी सत्य है।
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( ८) स्वर, लय और अभिनय की भाषा में हमें किस प्रकार वोलना चाहिए, किस प्रकार हम प्राणी मात्र के हृदय तक पहुँच सकते हैं? शास्त्रों में इसकी विशद विवेचना पाई जाती है। संगीत रसमय होना चाहिए और उमे रसमय वनाने के लिये स्वरों के अन्तर, उनके उच्चार, उनके रसस्थान, उनके वर्णा, अंग एवं काकु इत्यादि क यथार्थ उपयोग समक कर करना चाहिये। ऐसा संगीत मानव में ही नहीं, प्राणी मात्र में संवेदना जगा सकता हं। इम संबन्ध में यहाँ शास्त्र के कुछ उद्धरणा देना अनुचित न होगा। नतस्वरा: नीणि स्थानानि, चत्वारो वर्णाः, द्विविधा काकु:, षटू अलंकाराः, षट् अंगानि। हास्यशृं गारयो: कार्यो स्वरौ मध्यमपंचमौ। पडूजर्षमो तथा चैव वीररोद्राङ्गुतेपु च। गान्धारश्च निषादश्च कर्तव्यौ कल्ो रसे। धंवतश्च निपादश्च बीभत्से समयानके।। त्रीगि स्थानानि उरःकराठशिरांसीति भवन्त्यपि। शारीर्यामथ वीसायां त्रिम्यः स्थानेभ्य एवच ॥ उरस: शिरसः कराठात् स्वरः काकु: प्रवर्तते। श्राभापणं तु दूरस्थे शिरसा संप्रयोजयेन्।। घट् अलंकारा: उच्यो दीप्श्च मन्द्रश्च नीचो द्रुतविलम्बिताः । पाठ्यस्येते ह्यलंकारा: लक्षरां च निबोधत। उच्चो नाम शिरस्थानगतः तारस्वरः, स च दूरस्थभापराविस्मयोत्तरोत्तरसंजल्पदूराह्वानन्रासनार्थे वा आदियु। दीप्ो नाम शिरःस्थानगतः तारतरः, सच आ्र्रत्तेपकलहविवाद अमर्ष उत्कृष्ट घर्षणा क्रोध शौर्य दर्ए तीच्ण रुत्ताभिधान निर्भत्सना आदिपु। मन्द्रो नाम उरः स्थानगतो निर्वेद ग्लानि शंका चिन्ता औत्सुक्य देनर आरवेग व्याधि गाढ़शस्त्रनत मूर्छा मद आदिपु। नीचो नाम उरःस्थानगतः मन्द्रतरः, स्वभाव आभाषण व्यशति ्रातिश्रान्त त्रस्त पतित मृच्छित आरदियु। द्वुतो नाम करठगतः स्खलितवेल्लन मदनभय शीत ज्वर त्रस्त गूढ़का वेदन आदियु। विल्म्वितो नाम कराउस्यानगतः मन्द्रः शरङ्गारवितकिततिचारामर्श असूयिता अव्यक्तार्य प्रव लज्जा चिन्ता तर्जन विस्मय दोपानुकीर्तन दीर्घरोष निपीडन आदिपु। उत्तरोत्तरसंजल्पे परुषाच्तेपये तथा । तीक्सारुत्ता भिनयने आ्वेगे क्रन्दिते तथा।। परोत्तस्य समाह्वाने तजने त्रासने तथा। दूरस्था भाषणो चैव तथा निर्भत्सनेयु च। भावेष्वेतेपु नित्यं हि नानारस समाश्रयात्। उच्चा दीप्ा द्ुता चैव काकुः कार्या प्रयोक्तभिः॥ मल्ले च मदने चैव भयातें चित्त विप्लुते। मन्द्रा हुता च कतव्या काकुर्गीतप्रयोक्तृभि: । दष्टादृष्टानुसारेय इष्टानिष्टश्र तौ तथा। दृष्टार्थख्यापने चैव चिन्तयाने तथैत्र च ।। विस्मयामर्षयोश्चैव हषें च परिदेविते। उन्मादेऽसूयने उपालम्भे तथैत्र च ।। अरव्यक्ताथ प्रदाने च तथा लोके तथैत्र चू।
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उत्तरोत्तरसंजल्पे कार्ये अ्प्रतिशयसंयुते।। विच्तते व्याधिते त्वङ्ग दुःखशोके तथैव च। विलम्बिता च दीप्ता च काकुर्मन्दा च वै भवेन्॥ यानि सौम्याथयुक्तानि सुस्वभावक्वतानि च। मन्द्रा विलम्बिता चैव तन्न काकुविधीयते।। उच्चा दीप्ता च कतव्या काकुस्तत्र प्रयोक्तभिः । हास्यशृङ्गारकरगोष्त्रिष्टा काकुविलम्विता। वीररौद्राङ्गुतेपूचा दीप्ा चापि प्रशस्यते। भयानके सबीभत्से द्रृता नीचा च कीर्तिता। एवं भावरसोपेता काकुर्योज्या प्रयोक्तमि: । (भरत नाट्यशास्र पृ० २२१-२४) अल्प में इसका सार कह देना समुचित होगा। सभी जानते हैं कि गाते समय सप्स्वरों के तीव्र- कोमलादि भिन्न-मिन्न रूप प्रयोग में लाये जाते हैं। ये स्वर तीन स्थानों अथवा तीन सप्तकों में स्थित हैं। इसके अतिरिक्त हम अपने संगीत में कई प्रकार के अलंकारों का उपयोग करते हैं। तदुपरान्त स्वर के वर्णा, काकु आदि भेद रस निर्माणा के लिये अत्यन्त आवश्यक हैं। वर्गा का अारथ है-स्वरों का गुणाधर्म। स्थान भेद, उद्कार भेद और गति भेद से स्वरों में जो परिवर्तन होते हैं, वही स्वरों के गुणाधर्म कहलाते हैं। एक ही स्वर, एक ही स्थान में भिन्न-भिन्न रूप से उच्चारा जा सकता है और उससे उसके मिन्न-भिन्न अर्थ उत्पन्न होते हैं। यथा-स्वरों का उच्चार कभी मन्दता से, कभी आघात से, कभी कम्प से, कभी आ्रान्दोलित रूप से, कभी अल्प मात्रा में, कभी दीर्घ मात्रा में करने से मिन्न-भिन्न भावों की जो तभिव्यक्ति होती है, उसी क्रिया के लिये महर्षि ने 'वर्गा' शब्द का प्रयोग किया है। भाव की अभिव्यक्ति के लिये स्वरों में काकु का प्रयोग भी अनिवार्य माना गया है। 'काकु' शब्द का अरथ स्वर-भेद करना चाहिये। गाते समय सुख-दुःखादि संवेदन प्रकट करने के लिये स्वरों में जो परिवर्तन किये जाएँ, उसी स्वर-भेद को काकु कहा है। करुणा के अवसर पर गीतालाप करते समय विलाप की अभिव्यक्ति करने से ही रस की सिद्धि होगी। और ऐसे अवसर पर स्वर गद्गद होना ही चाहिए। तद्वत् क्रोधित, चिन्तित, शान्त, नैराश्य, निर्वेद तरदिक अ्नेक मानसिक अवस्थाएँ निद्शित करने के लिये करठ में उसी प्रकार का स्वर-भेद करना अनिवार्य है। स्वरभेद की इन अवस्थाओं को काकु संज्ञा से संबोधित किया गया है। किसी को बुलाना हो. पुकारना हो, संबोधन करना हो, आश्चर्य व्यक्त करना हो, विस्मय का भाव दिखाना हो, आवेश दर्शाना हो, डर बताना हो, तो ऐसी अवस्था में मध्यसप्तक के पंचम से तार सप्तक के ऋषभ तक स्वरों की कुछ द्रु तगति में योजना करने से उन भावों की अभिव्यक्ति होगी। तद्वन् कलह, युद्ध का आरह्नान, क्रोध का आवेश, वाताधिक्य, कठोरता, गर्व, शौर्य, निभत्सना एवं भीति आदि भावनाओं को निवेदित करने के लिये तार सप्तक के उच्च स्वरों का द्रुत गति में उपयोग करना चाहिए। विराग में, दैन्य में, मन की शून्यावस्था में, दीर्घ बीमारी में, निर्वेद में एवं चिन्तित तर््रवस्था में मन्द्र सप्तक के स्वरों का मन्द आवाज में एवं विलम्बित गति से उच्चार करना आवश्यक है। इसी से वांछित भाव अरभिव्यक्त हो सकेगा। इसके अपरतिरिक्त लज्जा, शान्ति सय, वगैरह भावनाएँ मध्म सप्क के स्वरों का संकोचन करके पकम्प द्रुतगति से उच्चार करने से अभिव्यक्त हो सकेंगी। तद्वत् निराशा, उच्छ्वास, नितान्त श्रमित अ्रवस्था ूर्छा, चिन्ता, शान्त दशा एवं स्थितप्रज्ञता-मन्द्र सपक के स्वरों को मन्द्रगति से गाने से परिस्फट होंगी। २
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( १० ) इंन सब मावात्पादक क्रयाश्रों को कंठ सुविधा से उपजा सके, इसीलिये गायक को स्त्राधीनकंठ बनना चाहिए, तर स्व्ाधीनकंठ बनने के लिये नित्यप्रति का साधन आवश्यक है।
स्वर-साधना यूरोप में Voice Culture पर बहुत जोर दिया गया है, और उस पर कई ग्रन्थ लिखे गए हैं। किन्तु उन लोगों की स्वर लगाने की शैली, कंठ पर प्रभुत्व पाने की क्रियाएँ, श्वासोच्छ्वास की प्रक्रियाएँ इत्यादि संभवतः भारतीय संगीतोपयोगी कंठ के लिये उपयुक्त होंगी या नहीं, इसमें मतभेद को अवकाश है। किन्तु Voice Culture के लिये भारतीय परंपरा है ही नहीं, ऐसा कहने वाले वास्तविक सत्य की उपेक्षा करते हैं। यहाँ पर एक स्वानुभव उद्धत करूँ तो अपनुचित न होगा। मेरा बाल-कंठ अनीव मधुर था और तीनों सपकों में सुविधा से घूमता था। किन्तु यौवन आते ही फूटे मटके के सहश मेरा कंठ फट गया। वह आवाज़ इतना कराकटु था कि सुझे स्वयं ही उस पर लज्जा आराती थी। मैं कतई गाना छोड़कर मृदंग, इसराज और हार्मोनियम पर रियाज करने लगा। किन्तु साथ ही मेरे गुरुदेव पं० विष्णुदिगम्बरजी पलुस्कर की आज्ञानुसार ब्राह्म सुहूत में प्रातः चार बजे तानपुरा लेकर उनके सोने के कमरे के बाहर बैठकर उनके बताये हुए मागे से मन्द्र साधना करता रहा। बीच वीच में वे मार्गदर्शक सूचना देते रहते थे और में उस पर अमल करता था। आज मेरे कंठ में यदि कुछ है तो वह उसी साधना का परिणाम है। वह मंद्र-साधना क्या थी ?- प्रातःकाल सूर्योदय के पूर्व अपने स्वर का जो षड्ज हो, उस पड्ज से मन्द्र में नीचे से नीचे जह़ाँ तक आवाज़ जा सके, वहाँ पर करठ स्थिर करके दी्घ समय तक उस स्वर का प्लुतोच्चार किया जाए। भिन्न मिन्न शारीरिक शक्ति के अनुसार तथा कंठस्थित ध्वन्युत्पादक नाड़ियों ( Vocal chords) की रचनानुसार आ्र्प्रारंभ का स्वर भिन्न भिन्न हो सकता है। सामान्य रूप से अपने मध्य षड्ज से कम से कम पाँच स्वर मंद्र में आवाज जा सके और अपने तार षड्ज से कम से कम पाँच स्वर ऊपर आवाज जा सके, ऐसी मर्यादा बाँधकर ही मध्य षडज निश्चित किया जाए। ढाले स्वर से गानेवाले कुछ लोग ऊँचे स्वरवाले अपने शिष्यों को भी ढाले स्वर से गाने के लिये बाध्य करते हैं, और इस प्रकार स्वाभाविक प्रकृति बिगड़ने से मूल्यवान् आ्ररावाज नष्ट हो जाता है। ऐसी सभी दृष्टियों को ध्यान में रखकर ही मंद्र साधना की जाए। अपने मध्य षड्ज के नीचे जिनका स्वर मंद्र षड्ज (खरज) को लगा सकता हो, वे कम से कम पंद्रह मिनट और अधिक से अधिक आधा घंटा तक मंद्र के षडूज पर कराठ को स्थिर करें। अकार आकार, ईकार, ऊकार, ओकार इत्यादि स्वरों से उसका उच्चार किया जाए। तररकारादि मिन्न भिन्न उच्चारों के समय कंठ में कुछ परिवर्तन होते हैं, जिनके फेफड़ों पर, श्वासनली पर एवं उदर पर मिन्न भिन्न परिणाम होते हैं। पड्ज के के बाद कम से कम पाँच मिनट और अधिक से अधिक दस मिनट तक सृषभ को स्थिर करें। उसी क्रम से गान्धार मध्यम, धैवत, निषाद को एक एक करके स्थिर करते हुए मध्य पड्ज तक पहुँचा जाए। इसके बाद- ४, २, १, ३,१, १ आरदिक मात्राओर्प्रं से निबद्ध तानों का अ्र्रभ्यास किया जाए और भिन्न मिन्न रागों में भिल्न मिन्न अलंकारों को कंठ में बिठाया जाए। तान-क्रिया के अभ्यास के समय रुचि अनुसार और समयानुसार भिन्न भिन्न रागों का उपयोग किया जाए। अकारादि स्वर-समूहों का षड्जादि संगीत के स्वरों के साथ उच्चार करने के अभ्यास से भावानुकूल नाद की अभिव्यंजना करने की क्मता आ जाती है। मन्द्र साधना के पश्चात् और गाने के अभ्यास के बाद विद्यार्थी यह सदैव ध्यान रखें कि तत्काल ताल मिश्री की एक डली मुँह में डाल ली जाए। इससे कंठ और ध्वन्युत्पादक नाड़ियाँ (Vocal chords) जिनमें खुश्की पैदा हुई होगी, वे स्निग्ध और तर हो जाएँगी। और पन्द्रह बीस मिनट के पश्चात् उबले हुए दूध में एक चम्मच घी और मिश्री डाल कर पचन की शक्ति अनुसार पी जाएँ। संभव हो तो
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बागाम का हलुआ बना कर उस पर से यह घी वाला दूध पी लिया जाए। याद यह सँभन नें ही तो कुछ वादाम घिस कर (पीस कर नहीं) दूध में मिला कर पी लिया जाए। कुछ श्रन्य शारीरिक प्रक्रियाएँ भन्द्र साधन के संबन्ध में इतना कहने के बाद कंठ, फेफड़े, छाती, श्वास-नलिका, उदर भाग इत्यादि के संबन्ध में भी कुछ कह देना उचित समझता हूँ। सामान्यतः यह लोकवाक्यता है कि गायकों को व्यायाम नहीं करना चाहिये। किन्तु यह धारणा वास्तविक तथ्य पर आर््रधारित नहीं है। यदि मुझे निजी अ्र्प्रनुभव के बल पर कहने का अधिकार हो तो मैं कह सकता हूँ कि मैं नित्यप्रति लगातार सवा घंटे तक साढ़े सात सौ डयड लगाया करता था और आठ आठ मील तक तैरने का मेरा अभ्यास था। साथ ही मुझं कुश्ती का भी शौक रहा। फलस्वरूप विश्वविजयी पहलवान गामा के अखाड़े में खेलने का और उनसे भी थोड़ी तालीम पाने का मुझे सौभाग्य मिला है। छाती में वल न हो, श्वासोच्छवास स्वाधीन न हो, तो वांछित आरवाज लग नहीं सकता, लगाने के लिये मन भी उड्डयन नहीं करेगा। कसरतवाज मनुष्य मनोवृत्ति से सहज ही ब्रह्मचर्य का पालन करने में बल पाता है, बल्कि विपय के प्रति अनिच्छा सी रखता है। और गान-विद्या में ब्रह्मचर्य का पालन एक अनिवार्य शते है। इन सभी दृष्टि बिंदुओं से मैं यह कह सकता हूँ कि गान-क्रिया की कुशलता के लिये उस गान में प्रभाव पेदा करने के लिये व्यायाम और प्राणायाम दोनों को ही करना ज़रूरी है। व्यायाम और प्राणायाम दोनों ही एक साथ सध जाए, ऐखे मेरी राय में दो व्यायाम हैं-एक समन्त्र सूर्य नमस्कार और दूसरा तैरना। जिन्हें इन दो में से किसी की भी अनुकूलता न हो, वे अपनी शक्ति के अनुसार डराड वैठक लगाएँ और प्राशायाम कर लें। यौगिक प्राशायाम और संगीतोपयोगी प्राणायाम में कोई विशेष अन्तर नहीं है। हाँ, संगीतोपयोगी प्राणायाम में क्रमशः अधिकाधिक कुंभक किया जाए। प्राणायाम की सारी विधि और क्रिया यहाँ बताने का अवकाश नहीं है। किन्तु, जब प्राणायाम किया जाए, तब सिद्धासन पर आरूढ़ होकर ही किया जाए। मंद्रसाधना के समय और गाते समय भी दो आसन प्रशस्त माने हैं-एक वीरासन, जिसमें बांयां घुटना मोड़ कर, उसी एड़ी से गुह्य और गुदा के बीच के स्थान को दबा कर दाहिना घुटना खड़ा रखा जाता है। श्वासोच्छवास की प्रक्रिया के लिये यह आसन उचित माना गया है। दूसरा आसन सिद्धासन है। इसमें भी बांई एड़ी को गुह्य और गुदा के बीच में दबा कर दाहिना पैर बांइ पिंडली पर चढ़ा कर बैठा जाता है। 'सम- कायशिरोग्रीव'-इस वचनानुसार सीधे-रीढ़ का कोई हिस्सा झुकने न पाए-इस प्रकार बैठ कर आसन जमाया जाए। गाते समय गदन इधर-उधर घूमती रहे, लेकिन मंद्रसाधना के समय हनु (दुड्डी) कंठ देश में लगाकर ही साधना की जाए। इस प्रकार की साधना भी एक प्रकार से यौगिक साधना ही है। बल्कि यौगिक क्रिया में तो मनःस्थैर्य आयास करने पड़ते हैं, जब कि संगीत में अनायास मन स्थिर हो जाता है। यदि साधक साधना त्ररकार उकारादि स्वरों पर स्थिर होते समय ओकार का दीर्घ उच्चार करने के बाद मुख बंद 'तरोम्' के 'म्' का दीर्घ काल तक बंद मुख से उच्चार करे, तो उससे मस्तक प्रदेश में एक प्रकार हट पैदा होगी, जिससे उस प्रदेश के अविकसित विभाग खुल जाएँगे। दुनिया भर की Faculties मानव-मस्तिष्क में ही सन्निहित हैं। उनके विकास से ब्रह्म और ब्रह्मागड का दर्शन भी सहज हो भावना है। नस्तावना पर्याप्त लंबी हुई। जो जिस मार्ग के पथिक होंगे, उन्हें उसके लिये इसमें से कुछ न कुछ श्रम-साथक्य मानूगा। सर्वज्ञ कोई नहीं है और अल्पज्ञ से भूल होती ही है। भूलनिदर्शन के लिये मेरा अनुरोध है; नये सदैव स्वागत होगा।
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कुछ पारिभाषिक शब्दों का व्याख्या
वादी संवादी अनुवादी और विवादी स्वर आाजकल संगीत की सामान्य बोलचाल सें रागों में प्रयुक्त होनेवाले सवल और निर्बल स्वरों को दर्शाने के लिये वादी संवादी अनुवादी विवादी आदि शब्दों का प्रयोग प्रचार में है। वास्तविकतः यह स्वर- भाषा है। स्वरों के पारस्परिक सम्बन्ध को निदशित करने के लिये इन शब्दों का प्रयोग किया गया है। किस स्वर के साथ किस स्वर का सम्बन्ध है-संवादी है, अनुवादी है या विवादी है, इसको समझाने के लिये ही इन शब्दों का शास्त्रों में प्रयोग हुआ है। रागों में प्रयुक्त स्वरों में पारस्परिक संवाद, अनुवाद या विवाद क्या है, इसको इन शब्दों से समझाया गया है। राग के रागत्व को दर्शानेवाला जो मुख्य स्वर है, वह जब दस लक्षणों से युक्त होता है, तब उसी मुख्य वादी स्वर को अंश कहा जाता है। उसी अंश स्वर के साथ संवाद करनेवाले को संवादी, अनुवाद करनेवाले को अनुवादी और विवाद करनेवाले को विवादी कहते हैं। संवाद की शर्त है कि नव-श्र त्यंतर यानी षड्ज-मध्यम-भाव और त्रयोदश-श्र त्यंतर यानी षड्ज-पंचम-भाव से स्वरों का परस्पर अंतर रहना चाहिये। स्थूल कान से भी यह षड्ज मध्यम-संवाद या षड्ज-पंचम-संवाद समझा जा सकता है। इस प्रकार जो स्वर आज हमारी गान-वादन-क्रिया में प्रयुक्त होते हैं, उनका स्थूल स्वरूप भ्री यदि देखें तो उनमें निम्नोक्त स्वर-संवाद दृष्टिगोचर होंगे। यथा
षड्ज-मध्यम संवाद षड्ज-पंचम-संवाद
सा म सा प मे रे (त्रिश्रु तिक) प (त्रिश्र तिक) रे (चतुःश्र तिक)-प (चतुःश्र तिक) रे (त्रिश्र तिक)- (त्रिश्र तिक) रे (चतुःश्र तिक)-ध (चतुःश्र तिक) घँ -नि -घ (त्रिश्र तिक) ग -नि : म -नि+ म -सो पूर्वांग के इन चार स्वरों का जो संवाद उत्तरांग में है, वही संवाद उत्तरांग के चार स्वरों का पूवींग में उसी के उल्टे क्रम से होगा। पं० भातखंडे के अ्रन्थों में उल्लिखित रागों में दर्शाये हुए वादी-संवादी के परस्पर स्वर सेन त्रोआामाभन् वसर लिखित व्याख्या से पर्याप्त अंतर पाया जाता है। स्थूल मान से देखने पर भी कई रागों में उनके नभ मयानुसार स्वर-संवाद से किसी प्रकार भी हम सहमत नहीं हो सकते। उदाहरणार्थ श्री राग में निदशिंत कोमकयां पाथ उच्चार साथ पंचम का संवाद और भारवा में कोमल ऋृषभ के साथ शुद्ध धैत्रत का संवाद-ये दो संवाद की सं
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( १३ ) भातखसाडे ने पडूज-मध्यस और षड्ज-पंचम संवाद को क्रमशः चौथे और पाँचवे स्वर का अंतर मान लिया है। शासोक्त नव-त्रयोदश-श्र त्यंतर की व्याख्या उन्होंने स्व्रीकृत नहीं की। इतना ही नहीं, षड्ज से चौथा स्वर मध्यम और षड्ज से पाँचवाँ स्वर पञ्चम-इस क्रम से स्वरों का संवाद वास्तव में होता भी है या नहीं, इसकी ओर भी न जाने क्यों उन्होंने ध्यान नहीं दिया है। उन्होंने तो केवल स्थूल मान से ही चौथे और पाँचवें स्वर को संवादी मान कर तदनुसार अपने रागों में प्रयुक्त वादी स्वर से संवादी स्चर को चौथे या पाँचवें स्थान पर रख दिया है। इसीलिये ऋृषम कोमल के साथ पंचम का और शुद्ध धैवत के साथ कोमल ऋृषभ का संवाद न होने पर भी उन्होंने इन चौथे और पाँचवें अंतर वाले स्वरों को संवाद कर दिया है। हमारी राय में न यह व्याख्या शास्त्ीय है और न युक्ति संगत ही है। भरतादि ग्रन्थकारों ने नव-त्रयोदश-श्रत्यंतरों को ही संवादी कहा है। वही सत्य संबाद है। इन संवादी स्वर-जोड़ियों के अतिरिक्त और जो स्वर रह जाते हैं, जो पारस्परिक संवाद को पुष्ट करते हों, विवाड़ न करते हों, स्वरों की वादो-संवादी जोड़ियों का अनुगमन करते हों, ऐसे जो स्वर राग में प्रयुक्त होते हों, उन्हें अनुवादी कहा जाता है। जो स्वर इन वादी-संवादी और अनुवादी स्वरों से किसी प्रकार का मेल न रखते हों, अपितु विरोध करते हों, उन्हें विवादी कहा है। ये विवादी स्वर एक विचित्र प्रकार के कंपन पैदा करते हैं, जिसे अंग्रेजी में beats कहते हैं, जो सारे स्वर-समूह में खलबली पैदा कर देते हैं। जो सारे स्वर-संवाद के दूध को फाड़ देता है, उसीको विवादी कहा है। शास्त्र में तो त्रिश्र ति ऋपुभ के साथ द्विश्र ति गान्धार और त्रिश्र ति धैवत के साथ द्विश्र ति निषाद विवाद करता है, ऐसा कहा है। इसीलिये शास्त्रकारों ने विवाद को दर्शाने के लिये दो और बीस श्र त्यंतर को ही विवादी माना है और उसी का उल्लेख किया है, यथा :- विवादिनस्तु ते येषां विशतिस्वरमन्तरम्। तद् यथा ऋषभगान्धारौ, धेवतनिषादौ। (भरतनाट्यशास्त्र पृ०३१) प्राचीन काल में वीखा पर ही गान-वादन की क्रिया होती थी। इसलिये पर्दे बँधे रहने के कारणा और किसी प्रकार का बेसुरापन होने की संभावना नहीं थी। अतः इन्हीं दो विशेष स्वर-जोड़ियों को प्राचीनों ने विवादी माना है और तदनुसार लिख दिया है। वास्तव में इन दो विवादों के अतिरिक्त और भी विवाद हो सकते हैं। यथा-जो स्वर-जोड़ियाँ संवादी या अनुवादी मानी हैं, वे पूरातया यदि संवाद न करें तो विवादी ही मानी जाएँगी। जैसे षडूज के साथ पंचम का तेरह श्र त्यंतर से संवाद है। यदि यह पंचम ठीक से न मिलाया जाए, या एक श्र ति कम करके मिलाया जाए, तो वह संवाद न करके विवाद ही करेगा। क्योंकि परस्पर संवाद न होने से भी एक प्रकार का कंप होता है और वह कंप इतना कराकट् होता है कि जिसे सुनते ही रोम खड़े हो जाते हैं, और भौहें तन जाती हैं। इसलिये इन संवाद-भिन्न नादों को भी विवादी मानना चाहिये। रागों में वादी संवादी, अनुवादी और विवादी स्वर मानने की परंपरावाले विवादी को शत्रुवत् कहते राग में जो स्वर निषिद्ध हो, उसका प्रयोग निश्चय ही शत्रुवत् माना जाना चाहिये। किन्तु गान-वादन की तयावें कुशल गुणी ऐसे निषिद्ध स्वरों का भी कभी कभी ऐसी खूबी के साथ प्रयोग करते हैं, जिससे राग का यह बहुतढ़ जाता है। इस प्रकार जो राग के सौन्दर्य को बढ़ाता है, उसे हम शत्रु कैसे कह सकेंगे? इससे है कि शत्रुत्व और विवादित्व भिन्न वस्तु है। उपरिकथित विवरण से समझना सहज होगा कि वादी प्रनुवादी, विवादी-स्वरों के इन पारस्परिक सम्बन्धों को दर्शाने के पीछे शास्त्रकारों का क्या हेतु था। ग्रह-शरंश-न्यास-संन्यास-विन्यास-अरपन्यास उपरिलिखित पारिभाषिक शब्दों की सामान्य व्याख्या 'संगीताञ्जलि' के द्वितीय भाग में दी जा चुकी विशेष स्पष्टता के लिये मतंगकृत 'बृहद्देशी' में दी हुई व्याख्या, जो कि कुछ भित्र शब्दों में है, यहाँ उद्धत शा समुचित माना गया है।
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( १४ ) ग्रह स्वर का लक्षण मतंग ने इस प्रकार दिया है-'आदौ जात्यादिप्रयोगो गृह्यते येनासौ ग्रहः ।' अर्थात् जाति आदि का गान-प्रयोग जिस स्वर से तररंभ किया जाए, वह ग्रह स्वर है। आज भी राग के आरंभक स्वर को ग्रह कहते हैं। वादी स्वर जब दस लन्तरों से युक्त होता है, तब त्ंश स्वर बनता है, यह द्वितीय भाग में स्पष्ट किया जा चुका है। अंश स्वर और ग्रह स्वर में क्या अंतर है, यह समझाते हुए मतंग ने कहा है- 'तरंशा वाद्येव परं, गहस्तु वाद्यादिभेद-भिन्नश्चतुर्विधः । यद्वा प्रधानाप्रधानकृतो भेदः। ग्रहो ह्यप्रधान- भूतः । रागजनकत्वाद् व्यापकत्वाच्चांशस्येव प्राधान्यम्। [बृहदेशी पृ० ५६] अर्थान्-अंश तो सदैव वादी स्वर ही होता है, किन्तु ग्रह स्वर के लिये यह नियम नहीं कि वह बाढ़ी भी हो; वह संवादी, अरनुवाड़ी आदि भी हो सकता है। दूसरा एक अन्तर यह भी है कि ग्रह स्वर तंश स्वर की तरपेत्षा त्र्प्रप्रधान होता है। अ्रपरंश स्त्रर राग का जनक औरर राग में व्याप्त होने के कारा प्रधान होता है। ऋंश स्वर की दस विशेषताओं का विवरस मतंग ने निन्नलिखित प्रकार से दिया है- 'अंशविभागः स दशविधो बोद्धव्यः यस्मिन्नंशे क्रियमाणे रागाभिव्यक्तिर्भवति सोंऽशः। यस्माद्वारभ्य गीतः प्रवर्तते न ग्रहस्स्व्वरितः । स्वांशो द्वितीया तारमन्द्राभिव्यक्तिहेतु: स्वांशस्तृतीयः, पञ्मस्वरमारोहणं तारं कदाचित षछ्ठस्व्ररारोहयामपि तारः। .. यथा तारनियामकमन्द्रनियामकस्व्ररोऽप्यंशसप्स्वरावरोहणा ...... । यश्च बहुप्रयोगतरः सोऽप्यंशः। यो रागस्य विषयत्वेनावस्थितः स्वरः सोडप्यंशः ।' [वृहदेशी पृ० ५७] अर्थात्-अंश स्वर दस प्रकार से बनता है। यथा-१) जिससे रामाभिव्यक्ति होती हो। २) जिस से गीत का आ्ररंभ होता हो, गह स्वर से यह भिन्न होगा। ग्रह स्वर राग के स्वरूप-विकास का आरंभक स्वर होता है, जब कि यहाँ तालबद्ध गीत का आरंभक स्वर अभिप्रेत हो, ऐसा प्रतीत होता है। ३-४) तार और मन्द्र स्थानों के स्वरों की अभिव्यक्ति का हेतु। ५) जिससे आगे पाँच या छैः स्वरों तक तार में आरोह हो सकता हो। ६-७) तार और मन्द्र स्थानों के स्वरों का नियामक। ८) जिससे सात स्वर नीचे तक अवरोह हो सकता हो। ६) जिसका अधिक प्रयोग हो। १०) राग के विषय अर्थात् केन्द्र बिन्दु के रूप में जो स्थित हो। न्यास स्वरों अर्थात् घूम फिर कर बार बार जिन पर ठहरा जाता है, उनके विषय में मतंग ने निम्नलिखित सूक्ष्मतापूर्णा व्याख्या दी है :- 'तत्र' प्रथममविदारी मध्ये न्यासस्वराः प्रयुक्ताः। ... यत्र गीतमति समाप्तिरिति संभाव्यते, सोऽपन्यासः। सर्वविदारी मध्यमो भवति। .. अंशस्य विवादी यथा न भवति प्रथमविदार्यान्तेर्यादि प्रवृत्तो यदा भवति, तदासौ संन्यास इत्यर्थ :...... । एष एव तु संन्यासस्वरः पदान्ते विन्यस्यते तदा विन्यासः। [बृहद्देशी पृ० ५८] अर्थात् गान-क्रिया के खगडों के बीच बीच में जिस पर घूम फिर कर ठहरा जाए, वह न्यासस्वर कहलता है। अर्थात् गान-क्रिया के विभिन्न खगडों में से क खगड से दूसरे में जाते समय जो ठहराव किया में सि उसका द्योतक न होकर न्यास-स्वर एक ही खराड के अन्त्गत किये जाने वाले विभिन्न ठहरावों का द्योत जहाँ ऐसा प्रतीत हो कि गीत समाप्त हुआ चाहता है, (परन्तु वास्तव में समाप्ति न हो) वहाँ अपन्यास से. एमयानुसा चाहिये। यह अवस्था सब खराडों के पारस्परिक मध्यभाग में रहेगी। जो स्वर अंश का विवादी न हो .. दरथ उच्चार: गीत के प्रथम खयड की समाप्ति जिस पर की जाए वह संन्यास कहलाता है। यही संन्यास स्वर ज काल (समूचे गाने) के अंत में रखा जाए-तब विन्यास कहलाता है।
- गान-क्रिया के खरढों को 'विदारी' कहा है।
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( १५ ) उपर्युक्त सूक्ष्म भेदों के अपरतिरिक्त मातंग ने न्यास की सामान्य व्याख्या इस प्रकार भी दी है- 'न्यस्ते त्यज्यते यस्मिन् येन वा गीतं तन्न्यास इति।' [वृहदेशी पृ० ६०] चर्थान जिस स्वर पर गीत को समाप्त किया जाए, वही न्यास है। उपरिलिखित सूक्ष्म और सामान्य व्याख्याओं के आधार पर, विद्यार्थियों की सुगमता के लिये, मध्यम मार्ग अपना कर प्रस्तुत पुस्तक में 'न्यास' शब्द का, राग में वार बार ठहराव का स्थान दर्शाने के लिये और विन्यास शब्द का, पूर्ण समाप्ति दिखाने के लिए, उपयोग किया गया है।
बल-श्रबल
गगों में कुछ स्वर ऐसे होते हैं कि जिनका वार वार उच्चारग किया जाता है, जिन पर मुकाम किया जाता है। चाहे वह अंश स्वर हो या न हो, फिर भी वह स्वर इतना अधिक बलवान् दिखता है कि जिससे मानों वही वादी हो, वही रागवाची हो ऐसा प्रतीत होता है। ऐसे स्वरों को बलवान स्वर कहा है। उसके विपरीत जिन स्वरों का उपयोग अत्यल्प मात्रा में होता है, वे निर्बल या अबल कहे जाते हैं। इसका एक उदाहरगा समझ लें। देश के पूर्वाङ्ग में सृपभ पर अधिक ठहरते हैं। यह उसका बलवान स्वर है और न्यास स्वर भी है. क्योंकि बारंबार उसका उद्चार और उस पर मुकाम किया जाता है। फिर भी यह उसका अंश स्वर नहीं है। विद्यार्थी जानते हैं कि देश के तवरोह में गान्वार धेवत का प्रयोग न किया जाए तो वह देश न रह कर समृचा सारंग ही हो जाएगा। देश राग का देशत्व पूर्वाङ्ग में गान्वार पर और उत्तरांग में धैवत पर ही अवलंबित है, चाहे वे स्वर अल्प मात्रा में ही प्रयुक्त होते हैं। विशाल देह में प्राशा की मात्रा अल्प होने पर भी देह उसी पर जीदित रहता है, तद्वत् राग का प्राणा या अंश-स्तर अल्पत्व या बहुत्व अथवा तबलत्व और सबलत्व पर निर्भर नहीं है। राग में स्वरों की इन अवस्थाओं को दर्शाने के लिये बल-अबल शब्दों का प्रयोग किया गया है। 'बल' 'अवल' को दर्शाने के लिये 'अल्पत्व-बहुत्व' इन शब्दों का भी शास्त्रों में प्रयोग किया गया है। 'संगीत रन्नाकर' में 'बहुत्व' का लक्षण इस प्रकार दिया है :-
अलद्वनात्तथाऽभ्यासाद्वहुत्वं द्विविध मतम्। पर्यायांशे स्थितं तच्च वादिसंवादिनोरपि। (सं० र० १।४६) अर्थात् 'अपरलङ्गन' और 'अरनभ्यास' से बहुत्व दो प्रकार का होता है। लङ्वन का अर्थ है स्वर का पूरा उच्चार न करके केवल ईपन् स्पर्श से उच्चार करना। अतएव 'अलङ्दन' का अर्थ हुआ-ऐसे लङ्गन का अरभाव अर्थात् संपूर्गा रूप से, साकल्य-सहित स्वर का उच्चार। अभ्यास का अरथ है-बार बार दोहराना। यह वहुत्व ऐसे स्वरों में भी रह सकता है जो अंश न होते हुए भी वादी या संवादी हो। 'अल्पत्व' का लक्षणा निम्नोक्त है :-
अल्पत्वं च द्विधा प्रोक्तमनभ्यासाच्च लङ्गनात्। अनभ्यासस्त्वनंशेषु प्रायः लोप्येष्वपीष्यते।। [सं० र० १५० ] अर्थात्-अनभ्यास ( बार बार न दोहराने से) और 'लङ्गन' से अल्पत्व दो प्रकार का होता है। यह ऋल्पत्व प्रायः ऐसे स्वरों में रहता है जो अ्रंश न हों अथवा जिनका लोप अभीष्ट हो।
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निबद्ध-अनिबद्ध गान जो गीत, जो तरलाप, जो तान, बिना लय या ताल के गाया बजाया जाए, उसे अनिबद्ध गान-क्रिया कहते हैं। जो लयवद्ध और तालबद्ध गीत और आलप्ति-प्रयोग है, वे निवद्धगान कहलाते हैं। संगीत रन्नाकर में निबद्ध अनिबद्धगान की व्याख्या इस प्रकार की है :- निवद्धमनिवद्धं तद्द्वेधा निगदितं दुधेः॥ बद्धं धातुमिरङ्गश्च निवद्धमभिधीयते। आालप्िर्वन्वहीनत्वाद निवद्ध मिती रिता।। (सं० र० ४।४५) अर्थान्-गान दो प्रकार का होता है-निवद्ध और अनिबद्ध। जो गान 'धातु' और 'अङ्ग' द्वारा निबद्ध हो, वह 'निबद्ध' कहलाता है। वन्ध रहित हीने के कारणा आलप्ति को 'अनिबद्ध' कहा जाता है। [ 'धातु' और 'अङ्ग' प्रवन्धगान के अवयन विशेष हैं]। शगांग-परिभाषा शास्त्रकारों ने रागों में प्रयुक्त होनेवाले त्रंगों के बारे में रागांग, भाषांग, क्रियांग और उपांग-ऐसे कुछ भेद माने हैं। उन शब्दों में से प्रथम तीन की निरुक्ति मतंग ने निन्नोक्त दी है: 'ग्रामोक्तानां तु रागायां छायामात्रं भवेदिति। गीतज्ञैः कथिता: सर्वें रागाङ्गास्तेन हेतुना।। भाषाच्छायाऽडश्रिता येन जायन्ते सदशा: किल। भाषाऽङ्गास्तेन कथ्यन्ते गायकैस्तौकिकादिभिः॥ करुणोत्साहशोकादिप्रवला या करिया ततः। जायन्ते च यतो नाम क्रियाऽङ्गा कारणान्ततः।।' प्राचीनकाल में षड्जग्राम और मध्यमग्राम-इन दोनों ग्रामों की मूच्छनाओं से जो राग संभूत होते थे, उन मूल रागों की जिन २ रागों में छाया दिखाई देती थी, उन्हें रागांग कहते थे। यहाँ उसकी निगृढ़ व्याख्या करने का अवसर नहीं है। किन्तु आधुनिक गान-त्ादन के प्रयोग में रागांग का यानी राग के कंग का किस रूप में उपयोग होता है, उसे हम अल्प में समझ लें। यथा कल्याण-अंग ले लें। कल्याण राग का अपना जो अंग है, वह नि रे सा, ध नि रे सा, नि ध नि रे सा-अथता प रे सा-इन स्वरों में अभिव्यक्त होता है। इसी अंग का किसी अान्य राग में उपयोग होते ही, वहाँ पर कल्याणा की छाया दिखाई देगी, ऐसी छाया जहाँ २ दिखाई दे, उसे कल्याण-अंग कहेंगे। जिन रागों में इस अरंग की छाया प्रधानरूप से दिखाई देगी, वे कल्याा अंग के ही राग माने जायेंगे। केवल ऋृषभ धैवत शुद्ध और तीव्र मध्यम लेनेवाले रागों को, यदि उनमें कल्याणा का अंग नहीं है, तो उन्हें उस अंग का नहीं ही माना जाना चाहिये। यथा-केदार और कामोद को देखें। केदार का केदारत्व अथवा केदार का अपना रागत्व-सा म, म प, प ध म, सा म, म प, म प ग
ध-म, म रे-सा-इसी पर निमर है। इसमें कल्याण का अपना अंग कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होता है। इसलिये इसे कल्याण-अंग का राग नहीं ही मानना चाहिये। वही अवस्था कामोद की भी है। जलधर केदार नामक राग ममें स्त्ररों की दृष्टि से दुर्गा के स्वर ही लगते हैं। फिर भी क्योंकि सा म, म प, ध म, म रे सा-
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यों केदार अंग से इसे गाया जाता है। इसीलिये उसे केदार-अंग का राग मानकर जलघर-केदार कहा गया है। विस्तार भय से अन्य रागों के अंगों का विवरण यहाँ देना संभव नहीं है। फिर भी मुझे विश्वास है कि विद्यार्थी और शिक्षक, रागांग या राग के अंग से क्या अभिप्रेत है, उसे इतने विवरण से समझ जायेंगे। शास्त्रों में उल्लिखित दूसरा तंग है-भाषांग। भारत बहुत बड़ा देश है और प्रचुर भाषाएँ यहाँ प्रचलित हैं। हरेक भाषा के उच्चारों का अपना एक विशेष अंग रहता है। गीत की या राग की गान-क्रिया के अवसर पर भाषाओं के भिन्न २ उच्चारों की कुछ प्रति करियाएँ संगीत के स्वरों के उच्चारों पर भी होती हैं। यदि इंग्लिश की कविता हम लोग अपने राग में गाएँ, तो वह कैसी लगेगी? भारत में भी पंजाबी, राजस्थानी, गुजराती, सिन्धी, महाराष्ट्री, कर्णाटकी, तामिल, तेलगू, हिन्दी, बंगाली इत्यादि भाषाओं के मिन्न २ उच्चारों के अंगों को देखते हुए गान-क्रिया में उन उन भाषांगों का असर गीत पर भी होता है और गीत के सुननेवालों पर भी होता है। इन भिन्न-भिन्न भाषाओं के अंगों को देखकर ही रागांग के बाद भाषांग को एक अलग अंग के रूप में शास्त्रकारों ने माना है। यह अंग आज भी व्यवहार में है, जिसकी प्रत्यक्ष तरनुभूति के रूप में भिन्न भिन्न भाषाओं के गीत-गान के अवसर पर उन भाषाओं के अंगों का डोलन सूकम दृष्टि से देखनेवालों को दिखाई देता है। कर्गााटक संगीत में भाषांग के विशेष उच्चारों से इस तथ्य की हमें प्रत्यक्त अनुभूति मिलती है।I तीसरा अरप्रांग है क्रियांग। आरजकल राग की आलप्ति, तान-क्रिया, गमकादि-प्रयोग-सब एक ही रूप से, एक ही आवाज़ से किये जाते हैं। भावाभिव्यक्ति के लिये यह दोषपूर्ण है। शास्त्रकारों ने भिन्न-भिन्न भावों की अभिव्यक्ति के लिये कंठ में भिन्न-भिन्न काक्वादि करियाएँ करने के लिये कहा है। जिनके द्वारा नवरस की अभिव्यक्ति साध्य हो सकती है। इन्हीं क्रियाओं का गानादि-प्रयोग में उपयोग किया जाए, तो उसे क्रियांग कहा जाएगा। अंतिम त्र्ग है-उपांग। इन रागांग-भाषांग-क्रियांग के ततिरिक्त रागों में प्रयुक्त होनेवाले जो सूक्ष्म अंग हैं, यथा-भिन्न रागों के स्वरों के विशेष उच्चार एवं भिन्न-भिन्न करों के उपयोग से जो अंग उत्थित होते हैं, उन सब का समावेश उपांग शब्द में सन्निहित है। फिर भी, इन त्ंगों का सूक्ष्म दर्शन निगूढ़ दृष्टिवाले ही कर सकेंगे। उपरिलिखित स्पष्टीकरणा से शिक्षक और विद्यार्थी इन शब्दों का स्थूल भाव अवश्य समझ जायेंगे, ऐसी आशा है।
राग-प्रकृति, रस-भाव
संगीत में प्रयुक्त रसों के सम्बन्ध में भरत-नाट्यशास्त्र में दो विशेष उल्लेख मिलते हैं। एक तो जाति- प्रकरण में, भिन्न भिन्न जातियों का किस किस रस की अभिव्यक्ति के लिये प्रयोग किया जाना चाहिये, यह बताते समय भरत ने संगीत में रस की चर्चा की है। दूसरे-वाद्य-संगीत में रसाभिव्यक्ति की चर्चा करते हुए भरत ने कहा है :- वाद्यप्रयोगविहितान् स्वरांश्चैव निबोधत॥ हास्यशृङ्गारयोः कार्यो स्वरो मध्यमपञ्मौ। पड्जर्षमौ च कर्तव्यौ वीररौद्राङ्भतेष्वथ।। गान्घारश्च निषादश्च कर्तव्यों करुयो रसे। धैवतश्च प्रयोक्तव्यो बीभत्से सभयानके।। [ना० शा० २६।१६-१८] me
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( १८ ) अर्थान् हास्य और शङ्गाररस में मध्यम-पंचम, वीर रौद्र और अभ्भत रस में षड्ज-ऋृपभ, कर्शा रस में गान्धार निषाद एवं वीभत्स और भयानक रस में धैवत का प्रयोग करना चाहिये। संगीत रन्नाकरादि ग्रंथों में भी प्रायः इसी प्रकार विरोप रसों की अभिव्यक्ति के लिये विशेष स्वरों की उपयोगिता के सम्बन्ध में कहा गया है। संगीत-रन्नाकर के प्रबन्धाध्याय में तो प्रबन्धों के भिन्न भिन्न प्रकारों के भिन्न भिन्न रसानुकल प्रयोग के विषय में भी विधान किया गया है। परन्तु प्राचीन ग्रंथों के इन विधानों का हमारी आरज की राग-परंपरा में रसों के निरूपण के साथ कोई सीधा सम्बन्ध नहीं दीखता। संगीत का रसानुककल प्रयोग होना चाहिए, इतना तो इन उल्लेखों से निर्विवाद सिद्ध होता है। किन्तु अधुना प्रचलित रागों के रस- निर्शाय पर इनके द्वारा कुछ विशेष प्रकाश नहीं डाला जा सकता। कुल लोगों ने यह दर्शाने का यत्न किया है कि भरतोक्त स्वरों के रस-विधान के अनुसार उन उन स्वरों
सिद्धि नहीं होती है। की प्रधानता जिन रागों में पाई जाए, उन्हें उन उन रसों के उपयोगी मान लिया जाए। इस कथन से भी रस की
पं० भातखंडे ने इस विषय की चर्चा करते समय अपने ग्रंथों में यत्र तत्र जो लिखा है, उसका सार यों है। रसशास्त्रोक्त नवरसों के स्थान पर मुख्य तीन ही रस माने जाएँ-शृंगार, वीर और करुरा। इन तीनों का संबन्ध क्रमशः रिध तीव्र, गॅनि कोमल और रि धॅ कोमल स्वर-जोड़ियों वाले रागों के साथ जोड़ दिया जाए। इस प्रकार उनके कथनानुसार रि-ध तीत्र वाले राग श्रृंगार रस के लिये, गॅ नी कोमल वाले राग वीर रस के लिये और रि धॅ कोमल वाले राग करुणा रस के लिये उपयोगी माने जाएँ। उनके अपने कथनानुसार यह विधान सयुक्तिक और समंजस है, फिर भी वह सर्वग्राही होगा या नहीं, इसमें उन्हें स्वयं संदेह है। और उन का यह संदेह यथार्थ भी है। कारण- रसों का आविर्भाव केवल स्वरों की तीत्र-कोमलादि अवस्था पर ही निर्भर नहीं है, अपितु मपकभेद, उच्चार-भेद, लय-भेद, स्पश-भेद, गमकादि प्रयोग-भेद-ऐसी बहुत सी बातों पर अवलंबित है। यथा-हमं नित्य के वाग्व्यवहार में एक ही शब्द के उच्चारण-भेद से भिन्न-भिन्न अर्थों का बोध होता है। एक ही शब्द का स्नेह, प्यार, दुःख, खेद, क्रोध, तिरस्कार इत्यादि भावों के अनुरूप उच्चार करने से ही उसके वास्तविक अथवा अरप्रभिप्रेत अर्थ की अभिव्यक्ति होती है। क्रोध में जिस आवेश से और आघात दे कर स्वरों का उच्च उच्चार किया जाता है, वैसा प्रयोग दुःख में या प्यार में हम नहीं ही करते। इन भिन्न-भिन्न उच्चारणों का जो महत्व वाग्व्यवहार में हैं, वैसा ही निगूढ़ महत्त्व रागों में भी है। तभी वाञ्छित भावाभिव्यक्ति हो सकती है, अन्यथा नहीं। इसके त्रप्तिरिक्त स्त्ररों के आपमी सम्बन्ध, उनके अन्तर (गुगोत्तर प्रमाण से), उन पर ठहरने का समय, ताल और लय की दृत मध्य विलंबित गति,-इन पर भी रस की अभिव्यक्ति निर्भर है। पहिले हम कह चुके हैं कि सप्तक-भेद पर भी रस अवलंवित रहता है। उसका यही अभिप्राय है कि मंद्र-मध्य और तार सपक के स्वरों के मंद-तीवादि भिन्न-भिन्न उच्चार िंन्न भिन्न प्रभाव उत्पन्न करते हैं। रस के विषय में विस्तृत वित्ररण देना तो यहाँ शक्य नहीं हैं, राग-रस के लिये अलग ही अ्न्थ लिखा जायगा। किन्तु स्थूल मान से विद्यार्थी कुछ समझ लें, इसलिये इस संच्तित वित्रग के बाद कुछ उदाहरगा दे देते हैं। यथा- शंकरा, छडाणा, हियडोल जैसे राग, जो कि तारगामी हैं (तार सप्तक में जिनकी विशेष गति है) और जिनकी गति मध्य-द्रुत है, ऐसे रागों की प्रकृति कभी गंभीर नहीं हो सकती। तारगामी एवं द्रुतगति वाले सभी राग तरल, उद्दाम, तीव्र और अस्थिर प्रकृति के ही होते हैं। इस प्रकृति के राग क्रोध, आवेश, उत्साह, निभत्सना आदि भावों और वीर आदि रसों की अभिव्यक्ति में सहायक होते हैं।
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( १६ ) जिन रागों में षडूज-मध्यम संवाद औपरर स्वर-संगति का प्राधान्य होता है-यथा-केदार, भिन्नपड्ज, मालकोंस इत्यादि-वे राग शान्त रस और गंभीर प्रोढ़ भाव की अभिव्यक्ति में उपयोगी होते हैं। खमाज, भिंोटी, पहाड़ी, मांड़, तिलंग जैसे राग विशेषतः शंगार रस की अभिव्यक्ति करते हैं, क्योंकि इनकी गति कभी चंचल, कभी स्थिर, कभी तार में, कभी मध्य में-ऐसे बढ़लती रहती है। शृषम धंवत कोमल और मध्यम शुद्ध जिन रागों में प्रयुक्त होते हैं उन सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि वे कररा रस के उपयोगी हैं। यथा-जोगी, गौरी जो करुणा रस से पूरित हैं। हाँ, यहाँ भैरव गुराकी जैसे रागों को अवश्य ही तपवाद मानना होगा, क्योंकि उनके स्वरों के उच्चारों में भीषता रहने के कारण वे भयानक-रमोपयोगी हैं। शृषभ-धेवत कोमल और मध्यम तीत्र वाले जो राग हैं, उनमें से भी श्री जैसे रागों को अपवाद मानते हुए (क्योंकि वह एक प्रकार की भीषणाता लिये हुए है), उनके विषय में कहा जा सकता है कि वे प्राककृतिक थकान, उदासीनता, उद्वेग, देन्य, शेथिल्य आदि भावों की अभिव्यक्ति करते हैं। यहाँ भी उनमें प्रयुक्त शब्द, स्वरर, लय, उच्चारण औपर गति के अरप्रनुसार उनके रस बदलते रहेंगे। जिस राग का जो रस होता है, जो उसकी लय होती है, जैसे उसके स्वरों के उच्चारगा होते हैं, तदनुसार उसकी प्रकृति धीर गंभीर या चंचल होती है। विलम्बित गति सदैव गंभीरता को दर्शाएगी। तद्वन् द्वृत गति चंचल प्रकृति की और मध्य गति पृथक पृथक समयों पर उभय प्रकार की प्रकृति की निदर्शक हो सकती है। सभी रागों के रस, भाव या प्रकृति पूर्णा रूप से निश्चित नहीं किये जा सकते, क्योंकि जैसे हम ऊपर कह आए हैं, तदनुसार रस का दशन त्नेक सृक्म तत्वों पर निर्भर है। इसीलिए स्थूलों नियमों द्वारा उसका निर्धारण सवथा असंभव है। किन्तु इस विषय को सामान्य रूप से समझने का मार्ग उपर्युक्त विवरण से प्राप्त हो जाएगा, ऐसी आशा है।
रागों का समय-निर्धारण
प्राचीनकाल से गान-क्रिया के समय निर्धारित होते आए हैं। यज्ञ-यागादिक के विशेष अवसरों पर सामगान करने वाले सामग भी प्रातःसवन, मध्याह्न सवन और सायंसवन-ऐसे तीन काल-विभागों में भिन्न भिन्न प्रकार का गान गाते थे। जब से राग परंपरा का आरंभ हुआ है, तब से किस समय पर कौन सा राग गाया बजाया जाए, इसका उल्लेख अ्रंथों में पाया जाता है। समय की मर्यादा निर्धारित करने में किसी विशेष नियम का परिपालन होता था या नहीं, यह संशोधन का विषय है। यहाँ पर उसकी विचारणा का अवकाश भी नहीं है। फिर भी, इस काल-निर्गाय के सम्बन्ध में अधुना जो विचारणा हुई है, उस पर प्रकाश डालना आवश्यक है। पं० भातखंडे ने रसों के सम्बन्ध में जैसे तीन स्वर-जोड़ियों वाले रागों के तीन समूहों को माना है, तद्त् उन्होंने उन्हीं जोड़ियों का अपनी परंपरा में गग-समय के निर्धारण में भी उपयोग किया है। इस सम्बन्ध में पूर्वांगवादी (जिनका वादी स्वर पूर्वाग में हो, उत्तरांगवादी (जिनका वादी स्वर उत्तरांग में हो) और सन्धि प्रकाश (जो दोनों सन्ध्याकाल में गाए बजाए जाते हों) राग-इस परिभाषा का भी उपयोग किया है। उनके मत से पूर्वांगवादी रागों का गायन-काल दिन के १२ वजे से रात्रि के १२ बजे तक है और उत्तरांगवादी रागों का काल रात्रि के १२ बजे से दिन के १२ बजे तक है। कोमल रि-ध वाले रागों को सन्धि प्रकाश राग माना है। पं० भारखंडे ने, जैसे जनक रागों के ढाँ े में जन्य रागों को ढाल दिया है, उसी प्रकार काल-निराय के लिये अपने बनाये हुए ढाँ चे में रागों को ढालने का प्रयत्न किया है। उनके ढाँचे में सव राग समीचीन
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(२) रूप से ढल गए होते तो बहुत अच्छा होता और स्थूल मान से ही सही, किन्तु सभी उसे स्वीकार करते किन्तु उनकी परंपरा में सीखे हुए विद्यार्थी अपनी आशंकाएँ लेकर मेरे पास आते हैं प्रश्न पूछते हैं और समा धान की कामना करते हैं।
एसे जिज्ञासुओं के सम्यक प्रश्न अल्प में ये है :- (१) भारतीय परंपरानुसार दिवस का आर्प्ररंभ और अंत सूर्य के उदय और अस्त के साथ होता है। रात्रि के १२ बजे से दिन के १२ बजे तक एवं दिन के १२ बजे से रात्रि के १२ बजे तक वाला काल-विभाजन पाश्चात्य परंपरा में ही मान्य है। (२) जिन रागों को पं० भातखराडे ने उत्तरांगप्रधान माना है, ऐसे बहुत से रागों का रागत्व पूर्वां'ग ही में प्रकट होता है। जैसे विलावल राग-म ग म रे, ग नि-सा, ध नि-सा-इन स्वरों में ही विशेषतया निदशिंत होता है। बिलावल-अंग के-द्वगिरि, ककुम, लच्छासाख, सरपरदा वगैरह अन्य राग भी पूर्वीग- प्रधान ही है और वे पूर्वागप्रधान होते हुए भी प्रातर्गेय हैं। इनके प्रा-स्वर भी किसी में षड्ज, किसी में ऋृषभ, किसी में गान्धार तो किसी में मध्यम हैं। तद्वन् तोड़ी भी प्रातर्गेय होते हुए भी पूर्वीगप्रधान ही है, क्योंकि उसका मुख्य अंग सा र गॅ, रेगॅ रेसा-इन्ही स्वरों में सन्निहित है। यही अवस्था भैरव और ललित की
है। मैरव का मैरवत्व म-ग रे-सा-विशेषतया यहीं पर निदशित होगा। और ललित भी नि रेगम, मे म, गरे मेग रे सा-इन्हीं स्वरों में आविभू त होता है। जैसे ये प्रातर्गेय राग पूवांग में ही निदशिंत होते हैं, उत्तरांग में नहीं, तद्वत् ऐसे राग भी हैं जो उत्तरांगप्रधान होते हुए भी रात्रिगेय हैं यथा-हमीर, शंकरा, अडाणा, सोहनी। तद्वत् उन जिज्ञासुओं की यह भी उलझन है कि एक ओर जहाँ मारवा, पूर्वकल्याणा जैसे राग उत्तरांगप्रधान होकर भी सायंगेय हैं, वहाँ दूसरी ओर पूर्वी पूरियाधनाश्री जैसे राग पूर्वागप्रधान होकर उसी समय में गेय हैं। वही तवस्था दिन के १२ बजे के बाढ़ गाए जाने वाले रागों की भी है। गोड़सारंग जहाँ पूर्वांगप्धान है, वहाँ सूर-मल्हार उत्तरांगप्रधान है। इन सब रागों का समीचीन रूप से कालनिगाय किस प्रकार किया जाए ? जिज्ञासुओं की यह उलभन स्वाभाविक है। इस सम्बन्ध में बम्बई में एक बार रागों के काल निराय का ठोस आधार खोजने के लिये अ्रनेक संगीतकारों के पास परिपत्र द्वारा प्रश्नावली भेजकर सम्मति माँगी गई थीं। किसी ने प्राचीन परंपरा की गवाही दी, तो किसी ने, परंपरा से मान्यता बनी हुई है, इसके सिवाय रागों का समय के साथ कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है, ऐसा कहा। किसी किसी ने यह भी कहा कि इसके पीछे कोई नियम अवश्य हैं जो कि ज्ञात नहीं हैं। हम देखते हैं कि रेडियो पर रिकार्ड बजाते समय रागों के समय को नहीं देखा जाता है तद्वत् सिनेमा में और नाटक-कंपनियों की रंग-भूमि पर भी रागों की समय-मर्यादा का परिपालन नहीं किया जाता है। जो इन नियमों को केवल भावुकता पर आधारित मानते हैं, वे लोग सामने से प्रश्न पूछते हैं कि क्या दिन में मालकौंस गाने से कान को खराब लगता है, या रात को मैरवी गाने से वह दिल को चुभती है? और यह भी एक सत्य है कि देवगिरि, यमनी बिलावल, कुकुम बिलावल वगैरह बिलावल- अंग के राग, जो कि प्रातर्गेय हैं, उन पर आ्र्प्राजकल के रात्रिगेय कल्याणा आदि रागों की असर है ही। कई गुशियों को देवगिरि को दिन का कल्याण और गौडसारंग को दिन का बिहाग कहते सुना है। यदि हमें रागों के समय को सिद्धान्त रूप से स्थापित करना हो तो हमें ऐसे प्राकृतिक नियम रखने होंगे. जो कि विश्वमान्य हो सकें। किन्तु उसके निगूढ़ विचार का भी यहाँ अवकाश नहीं है.
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(२१ ) हम यह भी जानते हैं कि हमारे यहाँ भिन्न भिन्न सृतुओं में उन उन ऋतुओं के राग चौबीसों घंटे गाए बजाए जाते हैं। जैसे-बसंत में बहार और बसंत और वर्षा में मल्हार। जैसे ये ऋतुओं के राग हैं-वैसे ही कुछ राग विशेष २ मासों में विशेष रूप से गाए जाते हैं। जैस फागुन में होरी (काफी), चैत में चैती एवं सावन में सावन, बरवा, और कजरी। तद्वन शिशिर, शग्त, हेमंत, ग्रीष्म इत्यादि ऋृतुओ््ं के भी विशेष राग हैं। भिन्न-मिन्न प्रसंगों के अनुकूल भी रागों का विभाजन होता है। इसके अ्तिरिक्त नायक-नायिका-भेद को दर्शाने के लिये भिन्न-भिन्न राग-रागिनियों का उपयोग हमारे यहाँ हुआ है। यहाँ पर यह कह देना उचित होगा कि इन सब रागों के गीतों में तदनुकूल शब्द-योजना पाई जाती है जैसे बहार-बसंत के गीतों में ऋृतुराज बसंत का ही वर्णान रहता है। विशेषतः इस शब्द-विन्यास पर ही यह विभाजन आधारित है। केवल शब्द पर आधारित विभाजन प्राकृतिक नियमों के सवथा अनुकूल नहीं हो सकता। उसके लिए तो अघिक निगृढ़ता से स्वर-तत्त्व को देखना पड़ेगा। सूर्य के उदय के साथ जैसे प्रकृति का क्रम-विकास होता है, और मध्याह तक वह विकास अपने चरम शिखर पर पहुँच कर फिर ढलने लगता है, वेसे ही संध्या होते होते प्रकृति श्रान्त हो जाती है। इस प्राकृतिक चढ़ाव उतार का स्वरों पर क्या असर होता होगा और उन स्वरों का रागों के साथ क्या संबन्ध है, यह सब सूच्मता से देखना चाहिए। तपते हुए मध्याह्न में सूर्य का जो उग्र रूप होता है और मध्यरात्रि में प्रकृति की जो शान्त अवस्था होती है, इन सबको देख कर रागों का समय निर्धारित किया जाना चाहिये। जब तक यह सब वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं हुआ है, तब तक स्थूल मान से रागों की जो समय- मर्यादा परंपरा से व्यावहत होती चली आई है, जिसका उल्लेख रागों के विवरण में यथास्थान दिया गया है, विद्यार्थी उसी को मान कर चलें। जिज्ञासुओं और विद्यार्थियों के लिये मेरा यही आप वचन है।
गायकों के गुण-दोष
गायकों के गुणों के संबन्ध में 'संगीतरत्नाकर' में कहा है :- हृद्यशब्दः सुशारीरो ग्रहमोत्तविचन्तखः ॥ १३॥ रागरागाङ्गभाषाङ्गक्रियाङ्गोपाङ्गकोविदः । प्रबन्धगाननिष्णातो विविधालप्तितत्त्ववित्॥१४॥ सर्वस्थानोत्थगमकेष्वनायासलसद्गतिः । आयत्तकरठस्तालज्ञ: सावधानो जितश्रमः ॥ १५। शुद्धच्छायालगभिज्ञ: सर्वकाकविशेषवित्। अनेकस्थायसंचारः सवदोषविवर्जित: ॥ १६।। क्रियापरो युक्तलय: सुघटो धारणान्वितः । स्फूर्जन्निर्जवनो हारिरहःकृद्जनोक्तरः ॥।१७।। सुसंप्रदायो गीतज्ञैगीयते गायनाग्रणी। (सं० र० ३।१३-१७ ) अर्थात् निम्नलिखित गुणों से युक्त गायक को सर्वश्रछ्ठ समझना चाहिए :- (१) हृद्यशब्द :- मनोहर कथठ से युक्त। (२) सुसारीर :- उत्तम 'शारीर' से युक्त। 'सुशारीर' का लक्ता 'संगीतरत्नाकर' में इस प्रकार दिया है :-
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( २२ )
तच्छारीरमिति प्रोक्तं शरीरेय सहोद्भवान् ॥।८२।।
घनतास्निग्घताकान्तिप्रा चुर्यादिगुशोयु तम्॥ तत्सुशारीरमित्युक्तं लक्ष्यलक्षणाकोविदैः। [ सं० र० ३।=२-४ ] कराठ की आवाज़ के जिस गुणा से बिना अभ्यास के भी रागाभिव्यक्ति करने की शक्ति रहती है, उसे 'शारीर' कहा जाता है, क्योंकि वह शरीर के साथ ही उत्पन्न होती है। तार-व्याप्ति, अनुररनयुक्तता, रमसीयता, रक्जकता, गांभीर्य, सौकुमार्य, सारपूर्शाता, कान्ति, प्राचुर्य आदि गुणों से युक्त आवाज को 'सुशारीर' कहते हैं। (३) ग्रहमोक्षविचक्षण :- गीत का आ्र्प्ररम्भ (ग्रह) और अन्त (मोत्) करने की क्रिया में कुशल। (४) राग-रागाङ्ग-भाषाङ्ग क्रियाङ्गोपाङ्गकोविद :- राग-रागाङ्ग-भाषाङ्ग क्रियाङ्ग औ्रपर उपाङ्ग का सम्यकू ज्ञाता। (५) प्रबन्ध गान-निष्णात :- प्रबन्ध गान में प्रवीय। (६) विविधालसितन्ववित्-नाना प्रकार की आलप्ति (आलाप) के तत्त्व को जानने वाला। (७) सर्वस्थानोत्थगमकेष्वनायासलसद्गति :- मंद्र-मध्य और तार-स्थानों से उठने वाली सभी गमकों का जो बिना आयास के प्रयोग कर सकता हो। (८) आयत्तकण्ठ :- जिसका कंठ अपने अ्धीन हो अर्थात स्वाधीन करठ वाला। (९) तालज्ञ :- ताल का ज्ञाता। (१०) सावधान :- सावधान। (११) जितश्रम :- गान-क्रिया में जिसे थकान न हो। (१२) शुद्धच्छायालगाभिज्ञ :- शुद्ध, छायालग इत्यादि राग-भेदों का ज्ञाता। (१३) सर्वकाकुविशेषवित् :- सभी प्रकार के काक्वादि भेदों को जानने वाला। (१४) अनेकस्थायसंचार :- अ्प्रनेक स्थायों (रागावयवयों) का प्रयोग करने में समर्थ। (१५) सर्वदोषविवर्जित :- सब दोषों से रहित। (१६) क्रियापर :- गान-क्रिया के अभ्यास में तत्पर। (१७) युक्तलय :- लय के विभिन्न प्रयोगों में प्रवीण। (१८) सुघट :- सुघड़ अर्थान् स्त्रवर्ा-ताल की यथायोग्य संयोजना करने वाला। (१८) धारणन्वित :- उत्तम स्मृति से युक्त। (२०) स्फूर्जन्निजवन :- 'निजवन' नामक स्थाय (रागावयव-विशेष) का जो यथायोग्य प्रयोग कर सकता हो। 'निर्जवन' का लक्षणा 'संगीतरत्नाकर' में इस प्रकार दिया है :- सरल: कोमलो रक्तः क्रमान्नीतोऽतिसूचमताम्। स्वरस्याद्येषु ते स्थायाः प्रोक्ता निजवनान्त्रिताः। (सं० र० ३।१४८-४६)
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( २३ ) अर्ात्-जिन स्थायों में स्वर को सरल (त्रवक्र) कोमल (सुकुमार) और रक्त (रागवान्) रखते हुए क्रमशः सूक्ष्म वनाया जाता है, वे निर्जवन संबन्धी स्थाय हैं।
(२?) हारिरह:कृत् :- वेग से गान-क्रिया करके जो श्रोताओं का मन हरणा करता है। (२२) मननोद्ध र :- 'भजन' अरथात् राग की सम्यक् अभिव्यक्ति नें अतिशय प्रवीणा। (२३) सुसंप्रदायो :- उत्तम गुरु-परंपरा वाला। गायकों के दोषों का 'संगीत-रत्नाकर' में निन्नलिखित विवरगा मिलता है :-
कराली विकल: काकी वितालकरभोड्गटाः ।२५॥। भोम्वकस्तुम्बकी वक्रा प्रसारी विनिमीलकः। विरसापस्वराव्यक्तस्थानभ्रष्टोऽव्यवस्थिताः ॥२६॥। मिश्रकोऽनवधानश्च तथान्यः सानुनासिकः । पञ्विंशतिरित्येते गायना निन्दिता मताः ॥२७॥ अर्थान्-गायकों के पच्चीस दोष माने गये हैं। यथा :- (१) संदष्ट-दाँत पीस कर गानेवाला। (२) उदूघुष्ट-विरस चीत्कार करनेवाला। (३) सुत्कारी-गाते समय जो सीत्कार की आवाज़ करे। (४) भीत-यभीत होकर गानेवाला। (५) शङ्कित-गाते समय जो अनावश्यक त्वरा करे। (६) कम्पित-गाते समय जिसके शरीर और आवाज़ में कम्प हो। (७) कराली-भयावने ढङ्ग से मुँह फाड़ कर गानेवाला। (८) विकल-जिसके गायन में न्यून-अधिक श्र तियाँ लगती हों। (E) काकी-कौवे जैसे कर्कश कराठ वाला। (१०) विताला-तालच्युत या वेताला। (११) करभ :- गर्दन ऊँची करके गानेवाला। (१२) उद्भट-बकरे की तरह मुँह बना कर गानेवाला। (१३) भ्रोम्बक :- मुँह, माथा और गदन की नसें फुला कर गानेवाला। (१४) तुम्बकी-तूम्बे की तरह गाल फुला कर गानेवाला। (१५) वक्री-गदन टेढ़ी कर के गानेवाला। (१६) प्रसारी-हाथ पैर पटक कर गानेवाला । (१७) निमीलक :- आाँख मूँद कर गानेवाला। (१८) विरस :- जिसका गायन नीरस हो।
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( २४ )
(१८) अपस्वर :- जिस्के गायन में वर्ज्य स्वरों का प्रयोग हो। (२०) अव्यक्त :- जिसके गीत के शब्द स्पष्ट न हों। (२१) स्थानभ्रष्टः-स्वरों के तीनों स्थानों में जिसकी यथायोग्य पहुँच न हो। (२२) अव्यवस्थित-जिसके गायन में व्यवस्था का अभाव हो। (२३) मिश्रक :- शुद्ध छायालग रागों का जिसके गायन में मिश्रणा हो जाता हो। (२४) अनवधानक :- गायन में यथा-क्रम विकास की ओर जिसका ध्यान न हो। (२५) सानुनासिक :- नाक से गानेवाला।
कुछ तालों के ठेके
प्रवेशिका-पाठ्य क्रम के दूसरे भाग में जिन तालों का विवरण भूल से छूट गया था, उनका एवं इस तृतीय भाग में सन्निविष्ट नूतन तालों का वितरण नीचे दिया गया है। सामान्यतः हमारे विद्यालय में सभी विद्यार्थियों को तबला की प्रारंभिक शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जाती है। अरतः इन ठेकों को यहाँ देने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं थी। परन्तु फिर भी सौकर्य के लिये वे दिये गए हैं।
ध्रुपद-अंग के ताल
चौताल
मात्रा-१२, विभाग ६, ताली १-५-६-११ पर और खाली ३-७ पर 0 0 X x ५ ११
धा घा दि ता किट धा दिं ता किट तक गदि गन
सूलताल
मात्रा-१०, विभाग ५, ताली १-५-७ पर, खाली ३-६ पर X 0 ५ ७
- घा घा दि ता किट घा किट तक गदि गन
धमार
मात्रा-१४, विभाग ६, ताली १-६-११ पर, खाली 8 -=- १३ पर 0 0 x ११
त घि ट घि ट घा क ति ट ति ट ।ता
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( २५)
तीव्रा
मात्रा ७, विभाग ३, ताली १-४-६ पर। X ७ ४
दिं ता कि ट त क ग दि ग न
ख्याल अंग के ताल
विन्वम्बित एकताल
मात्रा-१२, विभाग ६, ताली १-५-६-११ पर, खाली ३-७ पर X ५ 0 ११ m
धीं घीं धागे तिरिकिट तू ना क त्ता धागे तिरिकिट धीं ना
तिलवाड़ा मात्रा-१६, विभाग ४, ताली १-५-१३ पर, खाली ६ पर × ५ १३ 0
धा तिरकिट धीं धीं घा तीं तीं ता तिरकिट धीं धीं घा धा धीं
रूपक मात्रा-७, विभाग ३, ताली ४-६ पर, खाली १ पर
४
ती ती ना धी ना घी ना
४
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( २६ ) मात्रा-विभाग-विवरय प्रवेशिका के पाठ्यक्रम में विद्यार्थी ३,१ और ह इन मात्रा-विभागों अथवा लय-विभागों को सीख चुके हैं। तृतीय वर्ष के पाठ्य-क्रम में निम्नलिखित प्रकार जोड़े गए है :-
अर्थान् एक-तृतीयांश लय-भेद को समझने के लिये विद्यार्थी दादरा ताल की गति दिमाग में भली भाँ ति बिठा लें। दादरा के एक विभाग में जिस प्रकार तीन मात्राओं का उच्चारण किया जाता है, उसी प्रकार यहाँ एक मात्रा के तीन टुकड़े करके उन टुकड़ों का एक मात्रा के काल में उच्चारण करना है। यहाँ ध्यान रहे कि ये टुकड़े बिल्कुल समान होने चाहिए। यों एक मात्रा में तीन टुकड़ों का उच्चार तो ३+२+४-इस प्रकार भी किया जा सकता है। परन्तु वह एक तृतीयांश लय नहीं होती। अतः मात्रा-विभाग समान वजन के हों, इस ओर विशेष ध्यान दिया जाए। यह लय जब पूरी तौर से सध जाएगी, तब इसी की दुगुन और चौगुन करके और १२ लय-विभागों का सुगमता से प्रयोग किया जा सकेगा। निम्नलिखित अलंकारों से ये तीनों प्रकार स्पष्ट हो जाएँगे-
-सारेग रेगम ग म प म प ध प ध नि ध नि सो
अथवा-सा रे सा रे ग रे ग म ग मपम प ध प ध नि ध
सा रे ग, रे ग म ग म प, म प ध प ध नि, ध नि सा
अथवा-सा रे सा, रेग रे। ग म ग, म प म पध प, ध निध
हर -सा रे सा, रे ग रे, ग म ग, म प म पध प, ध निध, निसा नि, सो रे सो
अथवा-सारेग मगरे, रेगम प मग! गम प ध प म, म प ध नि ध प
ये सब प्रकार अभ्यास द्वारा सिद्ध कर लेने के बाद ३ (दो-तृतीयांश) लय को समझना सरल हो जाएगा। एक-तृतीयांश लय में प्रत्येक मात्रा के तीन टुकड़े करके उन टुकड़ों में से प्रत्येक को पृथक पृथक unit या इकाई मान कर चलते हैं। अब इन टुकड़ों में से दो दो की जोड़ियाँ बना लें और इस प्रकार एक unit या इकाई का मूल्य ह न रख कर डे कर दें। यथा-
इसा-रे -ा- रे-ग -म- ग-म -प- म-प प-घ -नि-ध-नि-सा-
एक-तृतीयांश लय में प्रत्येक स्वर को एक-तृतीयांश मूल्य ही दिया गया था। किन्तु यहाँ दो -तृतीयांश दिया गया है। इससे स्पष्ट है कि एक-तृतीयांश लय की आधी अर्थात् ड्योढ़ी (तिगुन का आधा) यह लय बनेगी। एक-तृतीयांश लय में एक मात्रा में तीन Unit या इकाइयाँ बनती थीं, तो यहाँ दो मात्रा में बनेंगी, अर्थात् एक मात्रा में ड़ेढ़ इकाइयाँ आएँगी। ई-(तीन-द्वितीयांश) लय प्रयोग के लिये : (एक द्वितीयांश) विभाग के तीन विभागों को जोड़ कर एक इकाई का मूल्य देना होगा। यथा :-
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(२७)
सा म प ध नि सो
२ सा- - रे प- घ नि - .-- - सा 1 1
- इस प्रकार तीन मात्रा शों में दो का समावेश हागा।
इसी प्रकार (एक-चतुर्था'श) लय-विभागों में से तीन को मिला कर एक इकाई बनाने से हू (तीन-चतुर्था श) लय बन जाएगी। यथा :-
सा रे ग मप ध नि सो सा निध प मग रे सा
सा- - प =- 8 -- नि- - सा -- 1 1
सा - - नि घ म -- ग * सा -- 1 1
इस प्रकार चार मात्राओं में तीन मात्राओं का समावेश होगा। ऊपर दिये हुए अलंकारों के अपतिरिक्त हाथ से ताली देते हुए गिनती द्वारा भी इन लय-प्रकारों को साध लेना चाहिये।
स्वरलिपि-चिह्न-परिचय
(१) वेद-परंपरानुसार तीनों सप्कों के चिह्न- सा रे ग म - मध्य सप्तक। सारेग म-मन्द्र ,,। सो रे ग म-तार ,, । (२) कोमल स्वर-रेगँ। (३) तीव्र स्वर-मैं।
(४) कण या स्पर्श स्वर-रे सा। सा नि
(५) आन्दोलित या कंपित स्वर -ह।
(६) मींड-सो प (७) मोटी खड़ी रेखा ताल के विभाग-स्तंभ को दिखाती है और पतली रेखा एक मात्रा की अवधि को। यथा-
सा रे ग म प ध नि सौ
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(२ ) एक मात्रा के स्थान में जितने भी स्वर लिखे हों, उनकी संख्यांनुसार वहाँ लय की गति समझकर उच्चार करना होगा। जैसे-यदि एक, दो, तीन, चार, छैः, आठ, बारह या सोलह स्वर एक मात्रा में लिखे हैं तो क्रमशः १,३,३,,, 2, ३ एवं स४ लय समझनी होगी। इसमें भी एक मात्रा के अंतर्गत भिन्न भिन्न स्वरों अथवा गीत के अप्तरों का लय-विभागानुसार मात्रांश-मूल्य समझने के लिये (-) तथा (L) चिह्नों पर विशेष ध्यान देना चाहिये। जैसे- सा रे - ग / म - परे ग - म ग-म प-ध सरे ग म प रेग मप ध गम पध नि-म प ध निसा
oviyo MviX ovm
ऊपर जहाँ २ () का उपयोग हुआ है वहाँ उसके अंतर्गत दोनों स्वरों का एकत्रित मृल्य तो २ ही है, परंतु एक एक स्वर का पृथक मूल्य ? है। इसी प्रकार अन्यत्र भी समभना चाहिये। (८) सप-x (६) खाली- (१०) ताली-ताल के उस विभाग की प्रथम मात्रा की संख्या द्वारा निर्दिष्ट की जाती है। यधा- त्रिताल में ५ और १३ मात्रा पर सम के अतिरिक्त ताली पड़ती है। (११) एक ही स्वर के दीर्घोच्चार को दिखाने के लिये S का प्रयोग किया है। इस अवग्रह का मात्रा- मूल्य तो उस मात्रा के आवान्तर विभागों पर निर्भर रहेगा। (१२) गीत के एक ही अप्तर का जहाँ दीर्घोच्चार करना हो, अथच स्वरों में परिवर्तन होता हो, वहाँ उन स्वरों के नीचे अवग्रह के स्थान पर शून्य का प्रयोग किया गया है। यथा- मे प ध प
का . .
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राग तिलककामोद नि- आरोहावरोह-सा रे म प सो, -- , प ध, म ग रे ग, सा रे म ग -- सा। -प प
जाति-औररौड़व-वक्रसंपूर्ण। ग्रह-मध्य पड्ज। अंक्ष-पूवांग में गान्धार और उत्तरांग में धैवत। न्यास-गान्धार और निषाद। विन्यास-मध्य पड्ज।
शगवाची स्वर-जोड़ी-सा -- प।
सुख्य अंग-सा रे ग, सा रे म ग, सा नि, प नि सा रे ग- -सा। समय-प्रायः दोपहर से रात तक। प्रकृति-युवा, तरल। विशेष विवरण जो विद्यार्थी देश सीख चुके हैं, वे इस राग को जल्दी समझ जायँगे। 'संगीताञ्जलि' के प्रथम भाग में देश राग का ज्ञान देकर इस विभाग में उसके निकटवर्ती इस राग को स्थान देना समुचित माना है। थोड़े से शब्दों में तिलककामोद का परिचय देना हो तो इतना कह देना पर्याप्त होगा कि देश के आरोहावरोह के नियमों का भंग करने से इस राग का दर्शन होने लगेगा। देश के आरोह में गान्धार धैवत वर्जित हैं और अवरोह में धैवत गान्धार लेते हुए पंचम और ऋषभ पर न्यास किया जाता है। यथा-नि सा रे म प नि
सौ, सो नि ध प-धमगरे- निसा। इस आरोहावरोह के नियमों का भंग करके देखिए। यथा- ग
सा रेग सा रे मग, सा नि, पु नि सा रे ग -- सा, रे म पध -- मग रेग, सा रेमग, सा नि, प नि सा रे ग -- सा, सा रे म प सा -- प, ध, म ग रे ग, सा रे म ग सा नि, पु नि सा रे ग -- सा। इतने ही से तिलक- कामोद अ्रभिव्यक हो जाएगा। उपरिलिखित स्वरावली से स्पष्ट है कि गान्धार निषाद पर ठहरने की एक विशेष करिया इस राग का आरप्रविर्भाव कराने में सहायक होती है। ऋृषभ का वक्र प्रयोग, उस पर न्यास का अररभाव और कोमल निषाद का अत्यल्प प्रयोग-तिलककामोद की ये विशेषताएँ भी इसे देश से पृथक करती हैं। यह राग विलम्बित आलापचारी के लिए उपयुक्त नहीं है और द्रुतगति की लम्बी तानें मारने के लिए भी इसमें कम गुंजाइश है। यह एक मधुर और प्रचलित सामान्य राग है। यह आत्मकथन के लिए सहायक प्रतीत होता है। यदि सोचकर विधिपूर्वक स्वरों पर न्यास किया जाए, तो दो जनों में परस्पर बातचीत हो रही हो, ऐसी भावना जागृत हो जाएगी। सा रे ग, सा रे म ग, सा नि, प नि सा रे ग, सा रे म ग, सा नि, रे ग सा रे म ग, सा नि, प नि सा रेग -- सा। आलापचारी के इन शब्दों का गूढ़ अर्थ अनुभव कीजिए-बार बार गा कर देखिए। आपको प्रतीत होगा कि सचमुच कोई बातें कर रहे हैं, कुछ कह रहे हैं-फिर ठहर जाते हैं-कुछ सोचते हैं-फिर कुछ कह उठते हैं। भावोद्रेक की कुछ ऐसी क्रियाएँ इन स्वरों में, इन ठहरने की क्रियाओं में विद्यमान हैं, जो कि सूक्ष्म दृष्टिवालों को ही दिखाई देंगी। राग एक प्रकार से स्वर काव्य ही तो है। एक ही शब्द भिन्न भिन्न योजनाओं से भिन्न भिन्न अर्थ सूचित करता है। तद्वत् स्वर भी भिन्न भिन्न योजनाओं, उच्चारों और भुकामों से भिन्न मिन्न भाव और रस का निर्माण करते हैं। स्वरों के इन छरथों का दर्शन करना-यही संगीत का जीवन-धर्म है।
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राग तिलककामोद
मुक्त आलाप गं रे सा रे (१) सा -- रे ग-सा, सा रेग रे ग-सा, सारे निसा ग रे ग-सा।
प (२) प निसा रेग-सा, पुनि सा रे ग, सा रे म ग-सा, प ध म प सारेनिसा, ग रे ग सा रे म रे, ग - सा। हे प (३) ग-रे सा नि, सा रे ग, सा रे म ग, सा नि, ग रे ग सा रे म ग-रे-सा नि, प निसा रेग,सा
प रेम ग-रेसानि, प निसा रेग-सा।
(४) रे सा सा-, सा सा नि नि रे सा सा- ग रे -ग- - सा; ध प प-,
सा नि नि-, रे सासा-, ग रे रे-, ग-सा
(५) सा नि, रे सा, ग रे प म ग-सा; सा रे निसा, रे ग सा रे, प म ग-सा; पुध म प, सा रे नि सा,
रेगसारे पमग-सा, प मध प, सा निरेसा, ग रे प म ग-सा।
(६) सा रेम पध-मग रेग, रेम पध-मग,रेग; ग रे,प म, ध प,ध -- मग रेग; गरेगसा म प ध
रे रे मरेपमध पध --- मगरैग, सानिरेसा -- मरेपम घपध •- मगग, पुनिसा रेग -- सा;
रे सारे म प ध -- म ग ग, प निसा रे ग, सा रे म पध, म ग ग, सा रे प म ग - - सा । (७) रे सा सा-म रे रे-प म मनघ प पनध, रेग सारे पम धप ध, रेसा-, मरे-,
प पम- धप - ध-,मगरेग;ध पुसा नि रेसा म रेप मध पध-मग रेग; सा रे सा, रेम रे, म प म, पघध-, मग रेग; प मग रेग सा रेगसा- निप निसा रेग सा रेम प ध-, म ग ग, रे ग सा रेपम ग-सा।
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राग तिलककामोद त्रिताल गीत-१ रथायी-मन तटकी छवि नागर नट की, केसर खौर मुकुट माथे पर, वनमाला गल लटकी त्रटकी।
अन्तरा-पृदु मुसकान नैन त्रनियारे, चितवन हिय चिच खटकी तटकी। स्थायी १३
ग रेग सा
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ग- सा सा
5 न. aSS. 0 4 A
रे सां घ म गर ग -- रे सा सागर रपम ग रे सा प रे
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प ग ध-प ग- सा-ग सा
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अन्तरा नी घ प
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सा नी नी सा रै गे सो रे प प ग
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सा प ग सो प -- ध ध-प म ग -- शासा -- गरे ग-रे सा
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आलाप
१३
१) सा सा रे ग सा रप म 1 1 म० न. नी सा नी सा 99 99 1 1 1 4 14
नी सा सा ग सा 1
ग -रे सा
99 ५) सा - गरे ग सा 1
प नी सा गरे मग .नी सा " I .
पनी सारे ग सा रेम ग नी सा म प घ सा म प घ म ग -- रे नीसा
रे ह) गरे सारे प म ग ग -- रेनीसा 1
१०) रेसासा-मरेरे-पमम-धपप-पध-पाम-गाग-रे नीसा
११) सारे मप सो -प म नग -- रे नीसा सा-रे। नीसा -- पध पधम- न. 55 १२) सारे मप सो सानी सा - पध मप। सानी 1 1 1
सा गम रेग सारे नीसा सोनी सा पनी सारे मप सानी रेनीसो 1 1 I 1
पनी सारे मप सोनी रैंनीसो - पुनी सार मप सोनी/रेनीसा - नीसानीसा -- पपपधम 1
म ·न• १३) सारे मप सा - पनी सारे गसा मरे पुम धप सानी
सो पनी सरि गं -सा -नी सो -प ध -मग-रेनीसा रेममप पघम- 1
म.न .. अटडः
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[७]
X सारे १३ १४) पनी ग -सा सारा मप ध -म पनी सर ग ।-स
-सो सानी -प धप ध -मा गरे ग सा नी रंग गसा रेममप पधम मन मन म०न. अ्र०टः अथवा
सोप धम गरे मन पम. मन
१५) पनी सारे -सा नी -प पनी सर ग -सा
नी सो -प ध A -- JJ नीसा रेम पनी सो सौ सो,सी सा सोप धम AL K
मग न.म Is न. म न
१६) सारे नीसा। पघमप सरेनीसा गरेसारे। मे ग -- रे।नीसा। सो सरिनीसा प, प ध म म न०.० e,अ
ताने x ५ १) ग रे म ग रेसा नीसा, ग रे म ग रेसा नीसा, सानी पनी सारे नीसा, । गरे म ग रेसा नीसा, रे ग सारे रेप म म . न. 0 सारे नीसा ग रे म ग नीसा, पध रे सा, प म। ग रे म ग रेसा, सारे मप, सारे नीसा, पघ मप मग रेसा नीसा गरे पम मन X ५ ३) सानी रेसा, मरेप म, ध प म ग रेसा, पम
ध प म ग रेसा, पम घ प म ग रेसा नीसा रे सा सा, म रे रे, प.म म, ध प प/ ध म • न।., अ् ट 0 0 .. . . X सानी रेसा पमधध सारे नीसा, ग रे म ग प म ध प म ग रे सा प म ग रे सा - - घ प म ग रे सा -- ग- रे प - म म 5 न न्न ऽ ट १३ ५) सारे मप सा - - प घ प म ग रेसा, सा - म ड - प घ प म ग रे सा, सा -- प ध प म ग रेसा नीसा, सो प - प घ म म न x t सासा पप म ग रे सा।प प सा सो ध प म ग
१३ 0 रेसा, सानी । रे सा म रे। प म ध प सो नी रे सो -सौ ध प । म ग रे सा ग रे म न प्_म अ ट
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[ =]
५ x 9' प प - प । मग रे सासा सौ -सो। ध प म ग
0 रेसा, रेसा । सा, म रे रे । प म म घ प प, सो नी रै सो -सो। ध प म ग । रेसा, ग सा प -म नग्डट
X 5) सारे नीसा प ध म प सारे नीसो पध मप
१३ 0 घ प म ग रे सा, म प घ प म ग रे सा, म- प ध पम ग रे सा नी सा। ग रे म ग म न ञ ट
x ह) सारे नीसा पधमप सरे नीसो गे रै में गं
१३ रैसो, सोसो, ध प म ग रेसा, सासा ध प म ग रेसा, सासा ध प म ग रेसा, गसा रे प - म म० न अरड ट
X ५ १०) सासासा, प पप, सोसा । सौ, पे पे पे म गे रे सो
१३ सानी घप मगरे सा सारे मप सा की प ध म- ग ग रे ग 5 मन की ञ • ट 5
११) पप- पे। में ग रे सो।सौ सौ ध प X म गरे सा पप - पं मे ग रे सी । सोसौ-सो ध प म ग
पं पं- प) म ग रे सा। सो सोध प [म ग रे सा रेगसारे प म ग - प म ग - प म म . न ब की S ञ ट। की ड ञर ट
१२) रेसामरे x प म ध प सा व प म ग रेसा नीसा, रेसा मरे प म घ प सो
O १३ ध प म ग /रेसा नीसा, रे सामरे प म ध प सा घ प म ग रेसा नीसा ग रे प म म नन्न ट x १३) सारे नीसा ग म रे ग सारे नीसा प ध म प
0 १३ ग म रेग सारे नीसा, सरे नीसा प घ म प ग म रे. ग सारे नीसा। गमेरे गे सो रे नी सो
X पध म प गम रेग । सारे नीसा सरिे नीसो प ध म प सा-सोरे नीसा, पध मप सा-
सोरै नीसो ३ प.ध मप /सा-सोसो। सोरे नीसा -- प-प प घ म ग ग सारे रे- प म म न 1 ञ ट की छटकी ड म•न छड • ट
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[ &]
सुखड़े के प्रकार
X 0 २
प १) सारे रेम मप धम
त्र्र० ट
२) मरेरे पमम धपप ध-म
म०० न०
रसासा, म रर,पम म,धपप धम
म००, न . ट
रे-मरे म-पम प धम
मड०. नड. . . ट 09
५) सारेसा,सा रसा, पध प, पधप धम
म०.,
रेमपध मपनीरसा धम
म० .. S
सारेमप घधपम पनीसा- -पधम
म ...
रेसामरे पमधप सानीसा -- पम म ...
घधपम पनीसार नीसा -- पध-म म०न०
१०) पनीसारे -सा धम डन त्रट
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[ १० ]
राग तिलककामोद
सूलताल
गीत-२
स्थायी-कान्हा कितिक बार तोहे समभायो गोरस है बहुतेरो अपने घर में, काहे को छुवत तू परायो। अन्तरा-बरजो नहीं माने करत तू अपनो थोरे दही के कारन नू, माखन चोर कहायो।
स्थायी
0 x ७
नि सारे 1/h) सा रे-पम ग -- र सा i/n) रग IN 5 न्हा कि ति· कड .. बा र
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ग म ग -- रे सा नि IN 5 को . SSO
घ प प नि सा प प घ म सा
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Page 50
[ ११ ]
अन्तरा
X ५ 0
नि न सा 1 5 V1 न हीं मा S
नि सा ग रे ग -- रें सा
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नि रैगे से रे रे पर्म- सो
द० . ही 5 5
सो सो प म ग -- रे सा
का s न मा ख न
प नि st ग
म प सो प -- ध ग -- र सा
र हा
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[ १२ ]
राग अल्हैया बिलावल
आरोहावरोह-सा रे ग प ध नि सा, ध नि ध प, ध ग, म रे, ग नि,-सा, ध नि-सा। नि
ग्रह-मध्य पड्ज। अंश-पूवींग में रिषम औरर उत्तरांग में धैवत। न्यास-पंचम। विन्यास-मध्य षड्ज।
सुख्य शंग-म ग रे, नि,-सा, नि सा। म ग घ
समय-प्रातः प्रथम प्रहर का अ्रपंतिम भाग। पकृति-इस राग की प्रकृति का मैं अभी तक कोई निर्गाय नहीं कर सका हूँ। जब कभी बिलावल
करने की कृपा करें। अपना भेद खोल कर कहेगा, मैं उसे अभिव्यक्त करूँगा। किसी अन्य को इसकी अनुभूति हो तो सूचित
विशेष विवरण
यह एक प्रातर्गेय राग है। इसमें दो निषाद लगते हैं, आरोह में मध्यम वर्ज्य है। इस राग के
धैवत पर एक विशेष प्रकार का आन्दोलन दिया जाता है। सा रे ग प घ-आरम्भ में इस धैवत पर तीव्र निषाद का स्पर्श होता है और तत्पश्चात् कोमल निषाद के स्पर्श से इसे आन्दोलित किया जाता है। और तभी वह धैवत बिलावल के स्वरूप को खड़ा करता है। यह करिया लिखी नहीं जा सकती ; गुरुमुख से ही सीख मग लेनी चाहिए। साथ ही पूर्वांग में भी एक विशेष ढंग से स्वरों को छुआ जाता है। यथा म ग रे, नि,
सा, नि सा, अथवा म ग, म रे-, ग नि-, सा, ध नि-सा। जिन स्वरों के नीचे चिह्न दिए गए हैं, उनका द्रुत ध
गति से उच्चार करना चाहिए या जैसे स्पर्श स्वर लगाए जाते हैं, उस रीति से उनका उच्चार होना चाहिए। यह भी गुरुमुख से ही अभ्यास का विषय है। पूर्वांग में यह करिया और उत्तरांग में धैवत का विशेष उच्चार इस-राग को गौड़मल्हार आदि रागों से बचा कर इसका अपना रागत्व स्थापित करेगी। इस राग की प्रवृत्ति सहसा तार सप्तक की ओर जाने की रहती है। स्वभावतः यह गंभीर नहीं है, यद्यपि इसके अन्य प्रकार गंभीरता से गाये जाते हैं। सामान्यतः विलावल कहने से अल्हैया बिलावल का ही बोध होता है। कोमल निषाद का प्रयोग ही अल्हैया विलावल को बिलावल से पृथक करता है। कर्णाटक की बेलावली शुद्ध निषाद वाले बिलावल की कृति है।
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[ १३ ]
राग अल्हैया बिलावल
मुक्त आलाप
ध घ ध नि (१) सा। नि-सा नि सा। सा-नि-सा नि-सा। सा सा नि नि-सा नि-सा -; सा ध-नि ध प, सा ध ध सा सा ध पधाजनि-सा-नि-सा। पपधनिसा- निनि-सा, ग रे-ग नि-सा नि-सा।
ग रे ग रे ग (२) सा रे ग, रेग, म रे-, ग नि-सा नि-सा। ध पपधनिसाग रे-ग नि-सानि-सा।
ग ₹ ध् रे रे सा नि सा रे-ग-, म ग, म ग, म रे-, ग नि-सा नि-सा।
नि नि घ ध (३ ) सा सा नि नि-सा, म म ग ग -- , म रे-ग नि-सा नि-सा।
ग ग म ग म म म ग साम म म (४) सा रेग प-, म ग-म रे-, ग प, ग रग प, घ ग-म रे-, ग प-, म-ग-म-रे-ग
ग घ नि-सा नि-सा। ग म म म ग सा म ग (५) सा रे ग प-, सा ग रे ग-प-, म ग म रे ग-प-, सा रे, रे ग, ग प, म-ग-म रे-ग नि-सा
धु नि - सा।
सा सा घ ग सा सा न सासा सासा सारे (६) ग ग रे सा रे ग प, ध ग-, म रे-ग-प -; रेरेसा सा, ग ग रे रे, म म ग ग, प-, ध ग-
म प म म ग सानि म रे-ग-प-, प-ध-, पनध नि ध-प-, घ ग, म रे, ग प, म-ग-म-रे, नि-सा नि-सा। सा-घ नि
नि धनप-, प ध ध ग-, म रे, मग, प,ध घ नि् ध प-, पधध ग- म रे, पन नि ध-प-,ध ग-
म सौ म रे-, ग प ध नि ध-प, प ध ध ग- ग म म रे-, ग नि-सा ध नि-सा।
ध (७) सा ग रे ग प घाजनि-सौ-,नि सौ, सो रै नि सो घ IV नि ध-प, म ग म रे ग प ध नि नि
Page 53
[ १४ ]
म सौ-, नि सौ, ध नि ध प; सौ रे नि सा, ध -- नि ध-प -; सा ग रे ग प, नि ध नि सा छrनि ध-प-, नि नि
प ध ध ग-, म रे-ग प-, म ग, म रे-ग नि-सा धु नि-सा।
ग नि स (८) सा ग रगप-, प निध नि सा-निसी, सा रे नि सा नि -- सो ध निसो- प पधनिसा-
सो मे ग नि सो, ग रेसौ, सौ ध-, नि ध प, म ग म रेग प ध नि सा -- नि सो, नि प ग नि म नि सी सारेगपध नि सा-नि सा-,
नि प म ग ध ध ल, नि ध-प, ध ग-म रे-म ग-प-, म ग म रेग नि -- सा निसा।
सोगरे ग (६) सा रे ग प ध नि सी-नि सो, सो रे निसा रे-ग-नि सो-, पपधनि सो रे गे नि-सो
घ नि-सो-,सो रैग-मै रें-नि-सो ध नि-सो; सो रे नि सो ध , ध नि ध प, पध घ ग-ग मम रे- नि
म ग-प-म-ग रे, ग नि-साधू नि-सा। प म
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[ १७ ]
राग अल्हैया बिलावल ख्याल-विलम्बित एकताल गीत-१ स्थायी-दैया कहाँ गयेलो, बृज के बसैया॥ अन्तरा-ना मोरे पंख ना पायल और बल, ना कोऊ सुघ को लेवैया॥ स्थायी ११ 0
सा नी नी नी ध धनी- प -पप- प ध ध ग - - म- ग -- म प-ध ग म
या S . 0 5
X प म ग घ ग नी -- सा नी सा सा --- रेग --- -- मग मग
हाँ FSS SO OS SS
0 ११ म प रेगप- प प सा नी --- नी 1 1
लो ब्र ज के 5 5 5 0
X 0 प घ सा-सानी नी -- नी - ध नी सा •- - नीसा --- घ -.=- प
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प ध ध ग ---- म ग-
या ... S5 5 5 .. SS
३
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[ १ =_ ]
अ्न्तरा 0 ११
प - नी ध नी सा -सासा-सो-
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सो --• नीसा --- सा - ग रे गं -- म गे रे ग- सा
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0 सो नी नी घ ------ नी घ प पधधग -- म- ग -- रेग प
. SSSSSS . ना .. SSo 5 · Ssको 15
X 0 सा घ नी सा नी- ग रे- रे-गनी-सो - नीसा घ --- ना ध प
सु ध को ले ड · 5वड . . 5 . 555 SSSS .. SSS S .
0 W नी नी ११ रे प घ ध ग ---- म ग --
या . .. 555ड .. SS
Page 56
[ १६ ]
आलाप x ५ १ ) सा -
0 ११ रे नी - -सो धनी --- सा --. या
x 0 s २) सा
११
पपुधनी सा --- नी - धनी --- स दै या --- कृ
X
३) ग सा रे ग
११ 0
मरे -- गानी --- ) सा-धनी -- सा- या •-- क
X
४) ग प ग नी" सा रे ग प -- घृग् --
११ 0
मरे -- नानी --- सा-धनी --- सा- या
X 0
५) सा
११
नी -- सा धनी -- सा सा पपधनीसा नी -- धनी --- सा
: इन मुखड़ों का नोटेशन ख्याल के सदश ही होगा।
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[ २० ]
X ६) नीष सा रे ग मरे --- गनी --- सा = धनी •-- सा- ग प ग सारेग प ---- घ ग
११ मरे -- गनी --- सा-धुनी --- सा दै या
X ५ ७) सा
११ 0
नी --- सा-धनी- सा सा-सानी धनी -- सा पपुधनीसा-नी- धनी --- सा-
X
पपधुनीसा -- ग गरे --- गनी --- सा पपधनीसा - रे- ग म रे ---
0 ह ११
गनी --- सा - धनी --- सा- या --- क
X
ग ग प ग सा रे ग प EESESSOUS00
११ 0
ग पप -- घग -- मरे -- मग- -प पप --·
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म म ग- म रे ग प --- पप घग मरे ---
११ गनी -- सा धनी --- सा --- या ...
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[ २१ ]
X ५
प सा -- रे- ग -
O ११
प पप - रे- ग रे, ग - प ग प-्धप, ध - नी- घग -- मरे --
X
मग -- प -- पप --- गपधनीसा घ नी ध प धग -- मरे -- 1
११ 0
गनी ---- सा- धनंी --- सा या
X ५
१०) सा-गरे, ग-प ग, प-धप, ध-नी-
११
धृप -- पपधनीसा घ नीध प धग -- मरे -- गनी -- सा --- नी धपम गम रेगपम दे ... या .... क
X ५
११) सारेनपघनीसा- ---- नीर्सा ---
११
मगमरेगपवनी सा --- नीसा --- घ -- नी ध-प-धग -- मरे -- गनी - - सा --- गरेगप - पधम दै ·· इया• क
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[ २ ]
X ५
११) सारेगपधनीसा- ---- नीसा ---
११
पमगरेगपधनी सा --- नीसा --- सागरेमगपधनी सा -- 'नीसा --- रेसासाS गरेरे S मगग SधपपS नीघघ-सौनिनि-सौ-निसा-
X
सौ ध नी ध प - धग -- मरे -- गपधनी सा- .--- नीसा --- धग -- मरे --
११ 0
गनी -- सा --- धनी ----- सा- S या --- क
1
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[ २३ ]
बोल तानें
0 X
ग ग प ग १) सा रे ग प --- धप - - ध
दै · या • SSSकहाडड ग
ग - - मरे पपधनीसा --- सोसा-नीधपमगरेग --- , नी धपम गमरेग, नी धपमगमरेग,नी धपम गमरेग पघगम ११
ये Ss• लो SSS वृजके SSS ब० 5 से या० . डS5 दै्या० ... दे•या ..... , दया ..
५ 0 प मग मरे ग - प- - - -ग प ध-प
दे• 0 या S05 sssक्तहाँ • डग
ह ११ 0 रे धसानीसा धनी प ---- पपधनीसा -- रेसानीधपमगग-सोसी -नीधप मग, सोसा -नीधप मग, सोसो-नीधप गम ये• ·• लो• ·SSSSबृजके S5 बसै•या. ·.· 5,दे· ड या .. ., .sया .. , दे · उ •या• .क
0 ३) सारे गप धनी सो- - रेसो नीधप
डे· या . . 5 55s कहाँ . 1 0 ११ -नी धप मग धपम गरगप-ग, पध-प,धनी - धनीसा -- सानी धप, सोनी धप, सोनी धप गम रेग पम sss गये• ०ss5लो .. ब•डज, के·5ब, सै०5·या · 55 दे• या०, दे• या० दि• या· -. *क
X O गरे सानीध सोनीरे सानी धप -- , गप
दै. या • क हॉ. ग ये• लो० 55 बृज
A धनी सरि सानी धप | -- ,गपधनीसरे सानीधप -- गपाघनी सोरे सानी धप, सानी धप गम रेग पम ग -- मग-गम ११
के• • ब सै • या• S5, बृजके · ब सै•या-5•वृजके• ब सै• या० दै० या· क हाँSS कहाँ 5 •क
Page 61
[ २४
0 ५ सारे गरे, रेग पग,। गप धप, पध नीघ,
दे· ०,या. ., क ०००, हाँ.,
११ धनी सानी सा --- सा --- गरेसानीघपगमरे/गपधनीसा -सा -'सा --- सा --- सा --- सो-गम
ग. ० ये 555 लो s 55
५ सा-गरे गप धप म । ग -- रेग-
दे ड्या• कहाँ ७० ग। ये SS.लोSS
प-नीध नीसा गरे रे/सो -- नीसा -- 'सो गरे गपधपम ग -- रे ग -- ११ गर सानीध सानी रे।सो -- नी घ प --
दैs या० क हाँ गये S5•लो SS Sदैष्या• क हाँ०ग ये S5• लो SS5 वृज के . · . • ब से S 5 · या • SS
X ५ प पध नी धनी धप गप -धप म --- ग --- गम गरे गप धनी सा --- सा --- सा -- - - ग - म ग -- मग -- म
बृज के. •5 ब. सै sSSयाSडबजक ब से डSSयाSSS देडडडडयाडक हाँ s s कहा S 5 क
र ---- ग-मग -- मग' -- म।पग ११ सो - 1 - - ग-म ग -- मग-म
Thr हॉन ड5555डद्SSSS याऽकहा डडकहा s5 कहान 555555 हाँ SS कहाँ S क
Page 62
[ ₹५ ]
तानें
१) सासा गरे गप मग रेसा नीसा गर, गप
११ 0
धप मग रेसा नीसा गरे गप धनी धप मग रेसा, गरे गप नी सोनी धप मग । रेस, सोनी धप मग रेसो, गर - गपम व०ड या०क
X ५
२) सारे गप धनी सोन धप मग रेसा, सानी
११ 0
धनी धप मगरेग पध नीसा-नी धप मग रेसा, नीसा-नीधप मग रेसा, नीसो-नी धप मग रेसा नी ध भम गम रेग पम दे· या. .. 0०•क
X 0
३) सारे गप घनी सर सोनी धप मग रेसा
११ 0
सोरें सोनीधनी धप सग रेग पघ नीसो गरे सानी धप मग रेसा नीसा, गर सोनी घप मग रेसा नीसा सा - - - - ग् - म दै ssSS याड क
x 0
४) सारेसा, रेगरे, गप ग, पधप, धनीघ, नी
0
सौनी, सोरेसो, नीसानीघनी घ, पधप, गप मग रेग पध नीसो -नी धप मग रेसा गर सोनी धप गम दै• या . ... क ग -- मं ग-ग म हाँ s s कहाँ Sक
४
Page 63
२६ ]
xs X
५) पम गरे, सोनी धप पम गरे सानी धप
११
मग रेसा, पम गरे सोनी धप मग रेसा, पम गरे सोनी धप मग रेसा, गग-रे लोनी धप मग रेसा ग रे ग प - प ध म •· ·sया·क
X ५ 0
म गरे, सानी धप पेम गरे सोनी धप
११ 0
मग रेसा, पम गरे सानी धप मग रेसा, पम गरें सोनी धप मग रेसा, सा --- सा - - - ग - - स esss सा --- सा --- . SSS & SS
x ५ 0
७) ग -- प म ग रेसानी -- रेसो नीध प, ग -- पेमे गरे सो सोनी धप मग रेसा,
६१ 0
गै -- पम गरे सो सोनी धप मग रेसा, ग -- पम गरेसा सोगी घप मग रेसा सोनी घप, सोनी धप सोनी धप गम रेग पम दे० या०, दै०या०,दे · या० .. ०• .क
0 X
पप- प म गरेसा, रेरे-रेंसोनीधप, पंप-पे मे ग रै सो सोनी धप मग रेसा, पैप-पैम गैरेसो
११ 0
सोनी धप मग रेसा, पम-पम गरेसा सोनी धप मग रेसा, सोसा-नीध पमग, सासो-नीध पमग, सोसो-नीधप गम, दे -s• या ... •5. या .. दै ·ड • या• •क
Page 64
[ २७ ]
राग शल्हैया विलावल त्रिताल गीत-२ स्थायी-कवन बटरिया गयेलो माई देहो बताय, लँगरवा कित माई चुरवा गइलवा।। अंतरा-लेन गई सुध अरे हठवारे, इतनी घरी में गयेलो का बनरा माई ॥
स्थायी X ५ O १३ गुम गम रग गनी .नी ध ध प
10 या S
प गप घप म -ग रेग गम रेग गनी घनी पध म रेग गप 1
लो S हो. ब
पगा -म रे गनी सा सा -नी धती रोग सानी घ नी
ता S S य वा क त. मा
सांसा -घ -५ मग ग ग
S चुर S वा डग ल वा
अंतरा नी सोप नी सा नीसा सो 1
ले० S न S ग S S S S S
सो सा सो सा सो नी प प 1
ध S वा प SS S AV
नी
1 पध नी 1 घ पध ग रंग पु 1 1
S त 6 री 5 5 ग ये .
सो सारे सो नी प गम रेग
का ब न रा मा
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[ ' ]
ताने
X १) धनी। सोनी। धप मग रेसा क व न याक
२) गप धनी ! सानी! धप सग सा
घनी सानी घप मग रंसा 5> " "
४) पप धनी सरि धप र्ता "
५) गरे गप धनी सरि खोनी धप मग रेस
६)सोसो सोनी धप भग रसा धनी सा
७) धनी|सो, घानीसो धनी । सरे सोनी धप मग "
८) गग ग, नी नीनी, गरे सानी धप मग रेसा "
९) रे ग प सा -रै सानी धप मग
१०)सोसा सौ, नीनी धनी सोनी धप मग रेसा 53
११)मम म,ग -ग, (सोसो सौ, नी -नी मम गं -गं मग रैसो सानी धप मग रेसा
सारे गप। धनी सोरे गप मग रसा सोनी धप मग रेसा नीसा कब नब टरि या S
१२) सासा सा, प पप सानी धप मग रेसा, रेरे रे,ध घध रैरे सानी धप मग रेसा, गग
- इन मुखड़ों का नोटेशन गीत के सदश ही होगा।
Page 66
[ २६ ]
३ ग,नी [नीनी | गंग। रेसा । सोनी धप मग रेसा क न या 1
१३) सारे। गरे रेग पग गप धप, पध नीव धनी सानी सन गैर मोर्न चप मग रे सा,
सोग। सानी धृप मग रेसा. सानी घप नग रेसा, कव नव टरि याड
१४) गग। -रै सनी धप मग रेसा, सा दम नव टररि , व टरि या,व टरि याड 1
१५) गग सोनी धप मग रेसा, गग नहै सानी धप मग रसा, गैग सानी धप
मग रेसा, - प गग मन्ी प 1 -
he हो S S कव नव टरि याड, S हो S हो
गग मनी धघ प-, गगमनी घघ प- 1 प प प 1
S हो कव नब टरि या 5 5 हो S कव नब टरि या 5
Page 67
[ ३० ]
राग अल्हैया बिलावल भपताल गीत-३ स्थायी-प्रबल ही श्याम त्रब, दुर्बल ही देख जन, भट ही पट भपट करि, गज बचायो।। प्रन्तरा-गोप ही ग्वाल को, संग लियो गिरिधर, इन्द्र को मान छिन में घटायो।। स्थायी X n 0 नी ध सो नी सा सो ध प म ग 1
प्र ब ही 5 शया ०
ग म
प म ग सा सा सा 4 म I
ल ही दे S ज न
नी नी नी नी सा सा घ घ नी ध नी प नी सा
ही प क रि ट प ट
नी गं सा ध नी सा 1
ग ज चा यो S u I 외
ग्रन्तरा प प नी घ नी सो - नी सा
गो 5 प ही · ग्वा S ® ल को S
सा गं सौ ध नी प I
रा S लि यो गि रि ब
प घ ग प घ नी सौ सा I
s को मा न छि न
ग सो प नी सा 1
में . घ टा S यो
Page 68
[ ३१ ]
राग जयजयवन्ती
मरोहावरोह-निसा रेग मग रेगँ रेस, गम धनि सौनि धनि घ प, मग रेगँ रेसा, घिसा घुनि रे। जाति-वक्र-संपूरा। ग्रह-आालाप में मन्द्र धैवत और तान-क्रिया में मध्य गान्धार। अंक्ष-ऋृपम; कोमल गान्धार और कोमल निषाद अनुगामी स्वर। न्यास-कृपभ; अपन्यास पंचम। विन्यास-मध्य पड्ज। रे ग मुख्य शंग-नि सा, ध नि रे, रे गँ मगँ रे-सा। समय-रात्रि के प्रथम याम के अन्त में। प्रकृति-आत्मकथन तथा आत्मनिवेदन को अभिव्यक्त करने के लिए परमोपयोगी।
विशेष विवरय
जयजयवन्ती खूच प्रचार पाया हुआ एक मधुर राग है। इसे राग कहें या रागिनी? क्योंकि 'जयजय- वन्ती' ईकारान्त स्त्रीलिंग हैं और स्वरावली भी उसके कोमलत्व को और मृदुल स्त्रीभाव को अभिव्यक्त करती है। इसमें द्वि गान्धार और द्वि निषाद का प्रयोग होता है, अन्य सब स्वर शुद्ध हैं। इसका चलन तीन रूप से देखा जाता है। कुछ लोग इसके उत्तरांग का चलन म प नि सो से करते हैं, कुछ लोग ग म प सा करते हैं और प्रायः गुशीजन ग म ध नि सी यों बरतते हैं। और ग म ध नि सो यही चलन गुीजन-सम्मत है। म प निसा कहने से आसान अवश्य होता है, किन्तु वह सोरठ अंग को आविभूत करता है ; और गा म प सो कभी २ जाने में आपत्ति नहीं है, किन्तु उसे नियम बना लेना समुचित प्रतीत नहीं होता। गुसी जन जयजयवन्ती को हमीर के पूर्वोंग का जवाब कहते हैं। हमीर के पंचम को सा मान कर और प, म प ग ग घ, नि ध प, मै प ग म ध-इसी को सा, नि सा ध नि रे, गँ रे सा, नि सा ध नि रे,-कह सकते हैं। हमीर में जो मे प ग स ध है, वही जयजयवन्ती में नि साध नि रे है। इसीलिए जयजयवन्ती को हमीर का जवाब कहा गया है। ग इस राग का संपूरा चलन यों होगा-सा, नि सा ध नि रे, रे, गरे-ग म ग, रे गँ रे सा, नि सा ध
नि रे, ध नि ध प, रे, रेगमप, म ग रे, रे ग म नि ध प, म ग रे, ग म ध नि सो नि ध प, म ग रे, रे गँ रे सा, ग ग
नि साध नि रे। इन स्वरावलियों में जहाँ जहाँ म ग रे और नि ध प आया है, वहाँ वहाँ उन स्वर-समूहों को एक विशेष रूप से उच्चारना आवश्यक है। अन्यथा म ग रे और नि घ प देश या सोरठ की छाया को प्रकट करने लगेंगे। इस मगरे के म और ग को क्रमशः प और म का आन्दोलन देते हुए और हिलते डुलते हुए उच्चारना चाहिए। वैसे ही नि घ प में भी क्रमशः नि कोसा का, ध को नि का और प को ध का आन्दोलिन स्पश
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करना अनिवार्य है। यह भी ध्यान रहे कि मध्यम से ऋृषभ पर आाते समय ऋृषभ को गान्वार का स्पश अवश्य ही लगे। अलबत्ता यह नियम ्लाप में ही बरता जाता है, क्योंकि तानों के अवसर पर द्रुतगति के कारण उन स्पर्शों की उतनी आवश्यकता नहीं रहती। मुस्लिम-परंपरा के किन्हीं किन्हीं गायकों ने इस रागिनी को गाते समय एक निगला ढंग अपनाया है। इतना अच्छा है कि वे उसका चलन तो जैसा ऊपर लिख आए हैं, वैसा ही बरतते हैं ; किन्तु सम पर आते समय ऋृषभ पर जो ठहरना चाहिए, वह न ठहर कर वे पड्ज पर ठहरते हैं। यथा- गँ, रे गँ रे सा रे नि सा-सा सा निसा रे सा नि ध ि-उनके पदों में ऐसी चाल देखने सुनने में आई है। कुछ निराला करने का चात या अपने घराने को कुछ विशेषता का परिचय देने का भाव इन क्रियाओं के पीछे होने की संभावना है। जो कुछ भी हो-हमें शास्त्र के नियम का परिपालन करना चाहिए और शृषभ पर ही, जिस पर सारे राग की दारोमदार है, सम देनी चाहिए। इस रागिनी के दो ग्रह स्वर होंगे। सभी आलापों का उद्गम ध नि रे, यों मन्द्र धैवत से होता है, और सभी तानों का उद्धत ग म ध नि सो नि ध प म ग रे गँ रे सा-यों मध्य गान्धार से होता है। इस लिए मन्द्र धैवत और मव्य गान्वार को क्रमशः ग्रह और उपग्रह स्वर मानना होगा।
राग जयजयवन्ती
मुक्त आलाप
ग सानि प (१) सा। नि सा ध नि रे, रेगॅ-म गॅरे-सा, रेनि-साध -नि रे,धनि धु प, रे, सा
मग नि ध परे, मृध निसा, धु नि ध प, रे, निसाध नि ध प रे, ग मध निसा-ध नि रे, रे गॅ रे सा। प रेनि रेध ग म
ग सा (२) रे रे सा नि सा ध नि रे, ग रे, रे सा, रे सा सा नि, ध नि रे-, रे गॅ सा रे नि सा ध नि ग
ग रे-, रे ग-रं, ग म-ग, रे गॅ रे-सा। म
प ग म (३ ) नि सा रे ग म ग - म र, गरे-सा, रेग-रे, गम-ग, रेगँ-म गँ रे-सा।
प गु 11 रेरेसानिसा रेगमग-मरे, गँरेसा। म ग म रे ग रे ग, म ग म रे, रे नि सा ग रे ग म ग म रे,
प रेग-रे, ग म - ग, म प-स, ग म रे -, म म ग रेग प म -ग, म रे; रे, ग ग - रे, ग, म म म मु - ग, म, प ग म प प - म, ग म रे, रे गॅ रे सा।
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[ ३३ ]
(४) निला रेग म प, ध ग, म रं ग सा, नि सा रे ग स प, ध ग, म र ज सा। ग म प ध म
सानिरे साग रेम गप मध पध ग, मरे, गँ ध सा; सा नि, र सा, ग रे, म ग, प म, ध प,
घ ग, म र वयी-सा; रेरंसािसा ममगरेग पपसग म घधप मपछ ग,सरे, ग-रे- स ग म
प ध ध ध ग म सा-,सा र ि ल प ध म प, ध ग, म रे, गनधर सा, ध नि र-, रेग म प, ग - म र, रे गँ -रे -सा।
व ग ग (५) रे ग म प, ध प - घ ग - म रे, रेगम नि घ-प,ध ग - म र, म म ग रेगम निध-
ग प-, ध ग - मरे- रेग-रे, गम-ग, मप - म, ध प,ध ग, म रे, ग रेम गप मध पध ग-
मरे, नि-निध, ध -ध प, प -पम, म -मग, म रे, रे गँ-म गँरे-सा। ग ग
प ग नि (६) रे निसा ग रेग म ग म प म प, म गम रे, रेगम प रेग म नि ध,ध प, प म, म ग,
ग प प मम ग ग प प मरे; रेग म पध ग -, म नि ध -प,ध ग-म -; रे ग म प, ध ध प, प प म, म म ग, रे, निँ, नि ध,
प प म म प ग ध, ध प, प, प म, ग म रे, रे ग म प, ध ग, म रे, रे गॅ म गॅ रे -सा।
(a) नि सा ग म ध नि सी-नि सौ, सो निध-प, रेगमनि ध-प- ममगरेग,
प प पपमगम, धधपमप, निध-प,ध ग, म रे, रेगम ध निसा, नि, नि घ-प, ध, ध प-म, प,
प प प प म म प ग tr ग प म - ग, म, म ग -रे, सौ, सो नि, नि, घ, ध, ध प, प, प म, ग म रे; रेग म प, ध ग, म रे -,
ग रेगँ, म गँरे-सा। नि साध नि मग रे-सा।
(८) नि सा ग म ध नि सो-नि सो, नि सा ग म ध नि सो-नि सो, सो रेनि सो, ध नि ह-, नि सा ग म ध
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[ ३४ ]
सो नि सो ध नि रै-, सो नि रै सो सौ, नि ध सो नि नि, ध रै, सो नि रै, सो नि ध रै, सो नि नि ध, ध ध
ध नि, रैं, रें सो, सो नि, नि ध, घ प रै; गगे रे, रै रै सौ, नि सो ध-नि रै, रे गं-में गे रै-सौ, घ नि प सौ सौ सौ
रै-, सो नि ध-प-,ध ग-म रे-, रेगॅम गँरे-सा।
(६) नि सा ग म ध नि सौ, घ-नि रै, रै गे-र, गेम गेरै, ग"में ग रै-सो-, नि सो
रै गे में गै- मे रै, रै ग- मे, प में में गै-म रे-, में मग रे ग-मे, पेपे मे गै-मे रै, रैग से गरै- atet
सा, सो नि घ -प-धग-म नि-ध-प, पध धग-म रे, रेग-सध प, ध ग-म रे, रेगॅम गॅ रे-सा। मसा म
राग जयजयवन्ती मुक्त तानें निसारेग मगरेगॅ रेसानिसा, रेगमग रेगँरेसा निसा -- ।रेगरे, ग मग, रेगँ रेसा निसा।
रेगरे, रे गरे, ग म ग, ग म ग, रेग रेसा निसा -- । रेगम प मग रेगॅ रेसा निसा। रेगम प
रेपमग रेगँ रेसा नि सा -1 रेगमग रेगरेप मगरेगॅ रेसानिसा। रेगमध पम, ग प
मग, रेगॅ रेसानिसा। निसीरेग मधधप, पममग रेगँरेसा। ग रेरे, प म म, ध प प, प मग
रे रे गँ रे सा। रेगगरे गममग मपपम पधध प म प प म ग म म ग रे गँ रे सा। रेगग, ग
ग म मम, म प प, प धध पध पम ग पमग रेगरेसा। रेगमनि घप, मध पम, ग प म ग, रे गे
रेसानिसा। रे-ग- म-निनि धपमग रेगॅरेसा। गरेरे, ग रेरे, पम म, प म म, ध प प,ध
प प, घ नि ध, पध प म प म, ग म ग, रेगँ रेसा निसा। रेग मध निसी -निध पम ग रेगॅरे सा।
निसाग म ध नि सा नि घ पमग रेगॅ रेसा। रेगम प रेप मग रेगँरे सा, म ध नि सो म सो सो नि
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[ ३x ]
ध नि ध प, ग प म ग रे गॅरेसा। निसागम ध नि सो नि नि ध, ध प प म, म ग रे गॅ रे सा।
नि ला ग म ध नि सारे सानि धप मगरे गॅ रे सा नि सा। सा रे नि सा ध नि पध मपग म
रे गे रे सा। सा रे सो, सो रे सो, नि सो नि, नि सो नि, ध नि ध, ध नि ध, पध प, पधप म पम, म
प म, ग म ग, ग म ग रेगमप मगरेगें रेसानि सा।ग मध नि सो रेग रेसोनिधप मगरे गॅ
सा म रे सा नि सा सारेरेसा धनि निध धपपम मगरेगॅ रेसानिसा। ध -- नि सो रेसा नि
घ प म ग रे गॅ रे सा ग - म ध ध प, ग मग, रे गॅ रे सानिसा। ध नि नि, रे रेरे, सो नि
ध पमग रेगरेसा। रे - ग म - - प म ग रेगँरे सा, म - ध - नि-सौ - -रैसो नि
धनि घप, रे-गे- मे-प -- पेमेग रेगे रेसी सो रेसानि निसा निध धनिधप पधप म
मपमग रेगॅरेसा। रेगॅरे,रे गॅरे, ध नि ध, ध निध, रैगरै, रै ग रें, सा रे सा नि'ध प
मगरेग रेसानि सा। रेगँरे, रे गॅरे, ध नि" ध, ध नि ध रे गर, र गरै, रै ग रै, सो रै सो
नि सानि, ध निध, पध प,म पम गमग, ग म ग, रेग रेसा नि सा। रेगग रे ग म म ग म प प म
पधध प ध नि निध निसो सो नि सारेरेसो रेगग रे सो रेरेसो नि सो सो नि ध नि"निघ
पधधप मप पम ग म म ग रेगॅरेसा। नि सा ग म धनि, निसी रेगमगे रेगेरेसो, सौ निध प
मगरेगे रेसानिसा। रेगम- -गरेगे रेसानिसा, ध निसा - -रेसो नि धप मग,
रे ग मे- -गैरैगै रै सो नि सो, सो रेगरे निसी रे सौ ध नि सो नि पध निध म पध प ग म प म
रेगमग रेगॅरेसा।रेसा निसा म गरेग प म गम निध पध सौ नि'ध नि" रेसी निसी गॅ रैसा रे
रे सौ नि सौ, सौ नि'ध प मग रे गे रे सा नि सा। पप -प मगरे गे रे सा नि सा, रैरै-रे
सोनिधप मगरेगे रेसानिसा, पैप-पे मे ग रै ग रे सो नि सो, सा निध प मगरे गे
रेसानिसा।रे-ग-म-प -- पधनि सानिधप मगरेगे रेसानिसा, ध-नि-सो-रे-
-रैरै गे मे पे मे गे रेगरेसा सो निध प मग रेगे रेसानिसा।
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[ ३६]
रग जयजयवन्ती
र्याल-विलम्बित एकताल गीत-१ स्थायी-ए लरा माई सजन ना आ्राये, कहो कैसे कटे दिन रतियाँ। अन्तरा-कौन सुने कासे कहूँ, ये दुख बतियाँ॥ स्थायी
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[ ३७ ]
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[ ३६ ]
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व प ग म रे गॅ रे सा -- र सा -- रधनि 1 1
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ल रा , मा 0 र ग म प सा ध धप धप पम पम मग मग गर -- रे गे र सा, रे सा - रे-ग धु स ज न ० · हो कै० ड5र ति या ·, ल रा 5 मा50 इ
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४०
X २) (क) रि ग - रे, ग म-ग म प -म, ध-म- -0
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X ३) (क) गरै, सारेस निसा नि,ध निध,पधप, म
ल·, रा• • मा .ब, इे .. ,स •०,ज 0 ११ पम, गमग,रेगॅरे, रेगॅ रे, गमग, मप म, पधप, धनि घ,प धप, मपम, गमग,रि गॅ रे, --- रे सा -रेध नि
.. , न .. ,., क००,हो.०, कै० ·, से ००, क . , टे .. , दि००, न०0, र तिया,S S S लS रा डमा · इें X 0 (ख) रेंग रे, सरिसा, निसा नि, धनि ध, पवप, म पम, गमग, रेगॅरे रेग रे, गमग, म प
ल०, रा० ०,मा : •, इ. .,स . .,ज ००, न०., .. 0 क००,हो००, कै०
म,पधप, धनिध,प धप, मपम, ममग रे गॅ रे - ·- मगरे गे रे -मगरि गॅ रे --- गर सा-रेधु नि
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ल • .. रा० . S5SS 5 मा . .. ११ मगरेगॅ रेसानिसारिसा - सोध-निध पव म-प ग-मरिगेरे- -मगारे गॅ रे --- मगरे गॅ रे -- ध-नि"
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[ ४१ ]
X ५ (ख) िसा गम धनि सो -- --- सोनि' धप मग रेगॅ रेसा निसा रैसो-साय-निंध
ल · . रा 55 5 5 5 मा 0 स जड न कडहूँ कै
११ 0 पधम - प ग-मर ग र - -- प- -- मग रग र - - प --- मग वे.गे रे -- गॅ रे- सा-रेंध नि • से क S टे दिऽन र ति यां S SSहोड s 5 दिनरति यांऽ55होss 5दिन रतियां 5 Se लs ग डमा० ई
0 X ६) रेग मग रेगॅ रेसा (निसा, धनिसानिधनि
ल०.० रा० ०० ७, मा००० इ ० ११ 0 धप गम, रेंग मंग रंग रैसो निसा,सरिर ो, निसा सा नि,धान/निध, पव धप, मप पम, मग रेगॅ रेसा निसा, रेसा-ध-नि
०. .. ,स. ०० ज. न , र०डो०,के ० से ०,क ०टे ०, दि०न०, र ति०,यां. .. ७ १ ७, ल राऽमार्ऽई ५ 0 रेग मप रे प मग रेसा, पवनि्सा पर्सा
ल ... रा. .. · ·, मा .. ई. ११ े नि धप, रेग मप रेप मग रेंसा, सोग, रेसो, निरेसोनि,घसा (निध, पनि धप मघ पम गप मग रेगँ रेसा, रेसा-ध-नि
· स. ०ज·न·, क हो०, कै०से .,क टे०, दि० न. र० ति•यां०.००. · ०, लराSमाडई 0 X
साप-पम गरे सा पसा-सो सो निधपासी पे-पेमेगरे सौरिंग रैसा रैसो, सोरे
ल -ड० रा .. मा.s . · .इस बsoज·न •क. · हो. ०, कै WV ११ सौनिसो नि, निसोनिघ(निध,धनि धप धप, पधप म पम, मप, पधप, म प मगम रेगँ रेसा निसा, रे- सा-रे धुनि • से. ., क० ०, टे · ०, दि• ०न . र०ति,e यां०, र० ति०्, यां. ०र० ति. यां० .. लड रा डमा · ई
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लि० रा० .. . .मा . इे . s00स · ज. न .. . क. हो. के 0 ११ निसानिंध,नि निधन। धप, धध पध पम। पप मप मग मग रेगॅ रेसा, रै-सो- रे-सा --- र-सो -- रेध नि से · · · क • टे. ·, दि•न. . र· ति० यां .. . ., लडरा 5 लडरा SS मा ० इ
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[४२ ]
ताने x १) निसा रेग मग रेगँ।रेसा निसा, रेग मप
११ मगरेगॅ रेसानिसा रेग म नि धप मघ। पम गप मग रेग (मप मग रेग मग रेगे रेसा निसा,रे- सा-रे धु नि"
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X २) रेग रे, रेग रे, गमाग, गम ग, म पम, म
مہں 0 पम, पधप, पधप, मपम, मपम, गम / ग, गमग, रेगरे,रे | गरे, रेग मप मग। रेगॅरेसा निसा,रे - सा -रे ध नि"
लड राडमा
X ५ 0 ३) रेगरे, रेगरे, धनि"।ध, धनिध, पधप,प
0 घप, मपम, मपम,। रे, रेगरे, धनिध, प/प, मपम, गमग,, रेगॅरेसा निसा,रे- सा -रे धु नि" ११ गमग, गमग, रेग
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X ५ 0 ४) पप - पमग रेगॅ (रेसा निसा, रेर-रे
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x X 0 ५) निसागमधनिसानि" धप मग रेगें रेसा
0 ११ निसागमधनिसारे सोनि धप मग रेसा। निसागमधनिसारे (ग रेसानि घपमग। रेगॅ रेसा निसा,रे- सा-रेध नि"
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X 0 ६) निसागमधनिसानि"। धप मग रेगॅ रेसा
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गमधनिसरिंगेर। सोनि"धप मग रेग (रिसा, रैग मेंग रेंगरेसो,सोनि धपमग रेगे रसा निसा,रे- सा-रेधु नि" ११
लऽ राडमा हे
x 9 ७ रेग मप रेप मग / रेगॅ रेसा, धनिसरि
घरेंसानिधनि धप रे गे मे पे रे पे मे गे, रेंग रे,सौरेंसोनि" धनि घपमपमग। रेगेरेसो निसा,रे- सा -रेध नि" 0
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X ५ (सा - प -सा -- नि" धप मग रेगॅ रेसा nX
११ प-सा-रे -- नि। धप मग रेगॅ रेसा सा-प-सो -- रेग'र सानि धपमगा रेगे रेसा निसा,रे - सा -रे धु नि
ल- राडमा • ई
X ह) निसागमधनिसारे 'रेंसानि धपमग
ऐग रेसा, रैगरे,सा रेंसा, निसोनि, धनि ध, ११ पधप, मपम, गम ग,रेगरे, रेगमप | मग रेगॅ रेसा रे -/ सा-रेधु नि
लड रा डमा · इ
१०) रिगम -- गरेगॅ। रेसा, रेगम -- गै
रग रेंसे,सोनिघप मगरेग रेसा, सानि धप मग रेगे रेसा (सोनि धप मगरेगे, रेसा, रेग मप रे -' सा-रे धु नि
लड · डमा • ई
X ११) सारे निसा, पध मप। सरिनिसा, रैगमग
इसो, सौनिध मग रेसा, रैंग मंग रैगे रैसो, सौनि धप मगरेसा, रैगमंग। रेगरसो, सौनि धप मग रेसा, ध-नि- ११
मा · ई.
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[ ४४ ]
राग जयजयवन्ती
त्रिताल गीत-२ स्थायी-रे घन छाये, कारे बदरवा, मोरा जियरा घरके 'प्रएव' नियरवा। अन्तरा-दादुर मोर पपैया बोले, शोर करे भींगरवा, लागे डरवा।। स्थायी X १३
नि सा नि®
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म म ग रे सा नि सा ध नि पुर 4
छ S S क द वा रे घ . न ब
सग म गा म गे सा नि सा सा 1 1 1
छा S s ये छ ये S मो रा जि य रा
सानि नि ध प म ग - म प रे ग इं सा 11
s घ र ० का S प या sa पं यड So वा
अ्नन्तरा
नि
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[ ४५]
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रेसा निसा मग रेग पम गम रेगे रेसा निसा 6
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१०) गम धनि सानि धप मग रेगॅ रेसा
११) रेसो (सोनि सोनि निध।निध धप घप पम पम मग मग रे गॅरे रेसा नि सा ध नि
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[ ४६ ]
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१३) सोरे निसा निसा धनि धनि पध पध मप मप गम गम
रेगे रेगे सारे सारे निसा गम धनि |सा- वनि सा- घनि सो- सा नि
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१४) रेरे सानि सा, गे गेंरे सारे मम गरे ग, प पम गम घध पम ,नि निध पध, सोसो
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निसो सोनि धनि निध पध धप मप पम गम मग रेगॅ रेसा सा नि
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[8 ]
राग जयजयवन्ती तराना-त्रिताल गीत-३ स्थायी-दिर दिर तनन तन देरे ना, दीं तों तन देरे ना तदानि, तननन न देरे ना, तननन न देनां, देर्ना तदानि। अंतरा-उदतन देरे ना, दीं तन देरे ना, तन देरे ना, तन देरे ना, तन देरे ना, रेग रेसा निसा धनि रे, गरे, मग, पम, धप, किड्धत् धागिन धागि तिरकिट तक्तान् घाघा, विरकिट, तक्तान घाघा, तिरकिट तक्तान घाघा। स्थायी
X ५ 0 १३ नि नि सा सा। रे सा रे नि सा नि 1
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रे गॅ रे नि निसा सा रे सा रे नि सा घ नि
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[ ४६ ]
राग जयजयवन्ती घमार गीत-४ स्थायी-श्यामा श्याम सों होरी खेलत आज नई नन्दनन्दन को राधे कीन्हों, माघव आप भई। श्रन्तरा-सखा सखी भए, सखी सखा भई यशोमती भवन गई, बाजत ताल मृदंग भां डफ, नाचत थे थै थै।। स्थायी 0 0
ग म म र रे ग रे ग गँ गँ गँ रे सा नि सा नि AV
श्या मा श्या म सों e हो . • ०री खे ल त
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[५० ]
राग केदार. ग प आरोहावरोह-सा म, म प, मै प ध-्म, मै प प सां, नि ध, धनि धप, मै प ध मैं प, म, मरे-सा।
जाति-वक्र औड़व-षाड़व। ग्रह-मध्य पड्ज। अंक्ष-शुद्ध मध्यम। न्यास-पंचम। विन्यास-मध्य षड्ज। शग-वाची स्वर-जोड़ी-साम। ग प सुख्य अंग-सा म, म प, मै प ध-म। समय-रात्रि के प्रथम याम के अंत में। प्रकृति-शान्त गंभीर।
विशेष विवरण इसको किसी ने कल्याणा थाट का राग माना है। कल्यागा में शुद्ध मध्यम का संपूर्णा अभाव है और केदार में शुद्ध मध्यम ही प्राण है। जो बीज में नहीं, वह फूल फल में कहाँ से आ सकता है ? जनक थाट में जो स्वर नहीं है, वह जन्य राग में कहाँ से, कैसे, किस नियम से आया? उसके लिए क्या शास्त्रीय आधार है? इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं। वास्तव में इन प्रश्नों को सामने रख कर ही पं० व्यंकटमखी ने ७२ थाटों में रागों को विभक्त किया था। दस थाटों का वर्गीकरण उसी का अनुकरया है। क्या यह पद्धति विद्वन्मान्य हो सकेगी ? केदार में दो मध्यम और दो निषाद सर्वसम्मत हैं। इसमें गान्वार वर्ज्य है। गुणी जन इस में गुप्त गांधार बतलाते हैं। शुद्ध मध्यम के प्रबल गुंजन में वह गान्धार छिपा हुआ है। यह कहना यथार्थ है क्योंकि जब सा म-म प, यों मध्यम से पंचम पर आरूढ़ होते हैं, तव स्वभावतः सहज रूप से गान्वार का अज्ञात स्पर्श हो जाता है। पं० भातखराडे ने इसका आरोहावरोह यों दिया है :- सम, मप, धप, निध, सा-, सौ, निध, प, मे प ध प, म, ग म रे सा। वास्तव में यह अन्त का 'ग म रे सा' भारत में कोई भी गायक वादक प्रयुक्त नहीं करते हैं। समझदार मनुष्य बराबर जानते हैं कि 'गम रेसा' करते ही केदार का राग-भाव तिरोहित हो जाएगा। संभव है यह सूच्म- राग-ज्ञान के अभाव का परिणाम हो। इस राग के मलुहा केदार जलधर केदार एवं चाँदनी केदार-ऐसे अन्य प्रकार भी गाये बजाये जाते हैं। सभी प्रकारों में केदार का मुख्य अंग ज्यों का त्यों रख कर सुरों को घटा बढ़ा कर अथवा उनकी चाल में थोड़ा सा परिवर्तन करके राग का दूसरा रूप उपजाया जाता है। इसका मुख्य अंग ध्यान में आने के बाद अन्य प्रकारों पर प्रभुत्व पाना आसान होगा।
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[ x१ ]
इस राग का सीवा आरोहावरोह नहीं होता। गान्वार तो वर्ज्य है ही, किन्तु रिपम भी त्याज्य है। यदि रिनम का आरोह नें परित्याग न करें तो सारंग की छाया सम्मुख खड़ी होगी। 'सा रे म' कर ही नहीं
करते। इसलिए केडार का अपना निरालापन अभिव्यक्त करने के लिए सा रे सा, म, म-म प, मैं पध में प म, ग
म-म रे-सा।
यथासंभत्र आरोह में निषाद का प्रयोग न करना अच्छा है। सभी गुी जन अन्तरे में से प प सौ ही जाते हैं। फिर भी तान-करिया में मे पध नि सो निधप मे प-यों जलद तानों को सुलभ बनाने के लिए आरोह में निषाद का उपयोग किया जाता है। ध्यान रहे कि केवल तानों में ही निषाद का अल्प प्रयोग ही ज्ाय है, आलाप सें नहीं। अन्पया राग का स्वरूप विलप होने की संभावना है। विद्यार्थियों को यशासंभव तानों में भी मे प प सो-यों ही जाने का प्रयत्न करना चाहिए। अवरोह करते समय धैवत और रिपम का दीर्वोच्चार आवश्यक है। निषाद का छल्पत्व है। 'सा म' इन स्वरों का उच्चार करते ही या तो म रे-सा यों करना होगा या तो म पयों करना होगा। इस
दूसरी क्रिया भें 'सा म' के म का दीर्घोच्चार करना होगा और 'म प' के म के अल्पोच्चार होगा और पंचम
पर कुछ समय ठहर कर तीव्र मध्यम से मे प ध,म-यों करने से राग की संपूर्ण छाया वातावरण में छा जाएगी। विद्यार्थियों को चाहिए कि वह क्रिया गुरुमुख से कंठस्थ कर लें।
राग केदार
मुक्त आलाप
म नि (१) सा। सा अ-, म रे-सा; सा रे नि सा -ध प, पृध म पसा - निसा। सा रे निसा
ग म -, म प -, पध मै प-म, सा नि रे सा ग -, प ध मै प-म, म - प,ध मैप म -म रे-सा।
(२) सा रे नि सा म -, सा नि रे सा म -, नि रे निसा म-, रे रे सा नि सा म -, ध ध पुर्भ प,
ग रे रे सा निसा म-, परुध म पुसा रेनिसाम-, निसारेरेसा निसाम- मप, ध मप-म-, मैप
ग प- ध-म, प म, पध -म, सा म -प,ध-म, म रे - सा।
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(३) रे रे सा नि सा म -, ध ध प म प-म, मपध-म, सामम प, प ध-म, भे प-,
ग मे पध -म, धध प मैं प-ध मैप-म, म प, ध मैप-म, म रे-सा।
म ग ध (४) सा म -प-मे प, मै पध नि ध-प, म पध-म, मैप प सौ -निध-प, मप ध मे प
म ग म, सा - म - प, ध म प म -, म रे-सा।
(५) सा रे निसा म -, पध मै प सौ - निसा, सौ रेनि सा ध- निध-प, मप प सौ-
ग म नि नि ध-, नि ध-प, मे पध ध प मै प सौ भे-प, ध मै प -म, सा म, म प, पध, म प सौ - मे-
प -ध मैपम; सा नि रेसा प मेध प सौ- मे-पध मेप-म-, म रे,-सा।
(६) सा रे नि सा पध मे प सौ रे नि सो में-में रै-सो, सौ ध-प, ध मैप-म; मेप प
सो - म-प, ध मपम-, सा नि रेसा -प मधप-म, प मध प, सौ निरैसो -, -प ध मैप-
म-, सा नि रे सा -प मध प- म-पध मेंप-म-, निसा रेनि रेनि रे नि सा, म पध मेध मै प,
म-गप -मैध मैप-म-, म रे-सा।
(७) सा ममपसो सो रेसो-निसो, सा मम प,प सो सो रेसो-नि सो, सा रे सा म-,
पध पसा -निसा, रे नि सा म -, ध मै प स रैनि सो मे-, मे रै-सो नि सौ, रेरेसो नि सो ध-प, नि
प, ग घ घ प म प ध - म, म - पध मै प म -, म रे-सा।
मे (८) नि सा रे सा, मं पध प, नि सी रे सो -नि सो, रे रे सा नि सा म-, धध प मैंप सौ-
नि सो, नि-रे सा, म-ध प, म - मैं-धप, नि-रेसौ नि सो; म-धप, नि-रे सा, म-ध प, नि-
रै सो, मैं - धप-मे-, मे रै-सो, सौ ध-प, मैं-धप-म-, म रे-सा।
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[ ५x ]
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0 ११ m. मे घ ग मैपधनी धपमप ध म म प मरे -सा, ध ब प ध म म न ठ • न X 0 ४) .सा -- नीरे -- सा म प धमप -- म- मप प ध
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0 ११ घ सा पधमप - म म प धमप -- म- मरे - सा, ध प ध म म ब न ठ · न X O सा रे नि सा पधमप म पवमेप सो - पवमप
११ m म पर्म धम पसो नीरेनीसो पम धर्म पम --- म - प-धमेप-) मर -सा, ध पध म म ब न ठ • न
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[५७ ]
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[ ५ह ]
X ५ू 0 ४) सो -सो ध म सा-सा म - म प -प मे पध निसा -- रे ) 'E) प प सासारे ---
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ह ११ 0 -- मप धप ममासा-म --- ममासा निसा सा-म- पध मै प । रसो-धसा ध-प । धर्म - पध पम म
sSम.न. .OभाS Sड5व•न .. सॉडव5 रे सलोने कन्हाडई कन्हाडई कन्हा S इव न उ न
५ 0 ममरै, ममर,सो सा रेरेसो, रे रे सौ, सध धनि ध, धनि ध, मप। धवप, धघप, मप । ममरे समरे सासा
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साँ · ब•रेssSस्लो• ने ·· क० •न्हा • इं, ब० न · S5डब• ब • · 555ब. ब• · S5 ठडन
X 0 ५ ७) सारे निसा, पध मप सरि निसा, पध मप। मैप धनि सौ-धनि,सौनि धनि धप मप। मप्म, पधप, धनि
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११ सौनिधपमम रेसा सारे साम गप मैप (निसानि धनि धमपसमरेंसा रेसोनिसा मपघ निसा-सारें/सो ध प-धप मम
·· व०न• ·· सॉ०व · रे· ·. स· लो ने० क •• न्हा• इ · बनठ न का ड ब न ठ न काडबन ठन
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[ ६० ] c) सोरे निसा -- धनिसोनि धप मम रेसासारे निसा -- पघ मप सौनि धप मप। सैप पस, पध धप
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निसासोनिवनिधप, साम मरे सोरे निसा।निध सोनि सरनिसां सौसी-नि धप मग रेसा निसा,सौ-सौ,सौ -सो,सौ-सा,म-म X
व • . .न.०. सा० व०रे•स०लो० ००ने०क०न्हा०5.ई.8० ००.०, व 5 न, बS न, ब न, उन
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ब.डन ठ न का जु ·50 च० ले० ऐ०डसी को ० ० । म ०ड नभा० ०
सा - सा प-प। सौ-सो पे-प (मम रेसा, सोसी धपमम रेसा, मैम रेसोनिसा,सासो धप मेप। पध धप म-मग साँ s व रेडस लोऽन कS ब०न० ठड०न
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)सांसा मम पप धप मैप धम मम रेसा सासा सा,म मम पप प,प धप मेप मम रेसा
सारे नीसा मप मम पध मप मम रेसा सासा मम पप मैप धनी धप मम रेसा
सासा मम पप मैप धनी सोनी धप मैप सारे सोनी धप सैप धनी धप मम रेसा ११ मप धनी सा - घ - प -म - -- म- प, मप धनीसा-घ- ए० . . ड ब ड न S S S S न 5 का, ए. . .5बड
प -म - - -म-, प मैप धनीसा-ध-प-म --- म- न s ठ 5 5 S न 5, का ए० · . . 5 बडनSठड S S नS
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[ ६१ ]
२) सा फ म - प --- धम प,ध मेप, धम प,ध मेप, मम रेसा
प - सो - र --- रैनी सो, रै नीसा, रैनी सा, र नीसो, सोसो धप
प-सौ - मे- पैम मे, प मेमे, पैमे में,पे मेमे, मैम रेसो
रेंनी सो, रै नीसा, रैनी सौ, रै नीसो, सौसो घप धम प,ध मैप, धमे प,ध मैप, मम रेसा
११ धप मम प -, धप मम प -, धप मम
बन ठन काड, बन ठन का 5, बन ठन
३) साप-प मम रंसा, परे-रे सासो धप सोप-पे मेमे रैसो सोसो धप मम रेसा
५ू साम-म,मप-प,परसा-सौ, सम-मे सा-प-पे मेम रेसो सौसो धप मम रेसा
सोप-पे मेमे रेसो सौसो धप मम रेसा सौ-पे मेमे रेसो सोसो धप मम रेसा
मप धप में-प- ध सो, मपधप
बन ठन का 505 , बनठन ११ घ म-प-,सो मप धप मे-प-
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घ म
४) सारै नीसा, पध मेप, सारे नीसो, पंध मैं पे मम रेंसो सासा धप मम रेसा मम रेसा
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[ ६२ ] ५ सौसौ धप, मैमे रेंसो, सौसो धप मम रेसा रेनीसा, रेनीसा, धमप, धमप, रैनीसो, रे
0 नीसा, धैम' पे, धम पै, मेम रेसो, सौसा धप मम रेसा, सा --- प --- सा ---
ह पं --- मेमे रैसो सोसो धप ममरेसा धप - म-मप-
बन ड ठ 5 न काड
सौ, धप - म -म प -सौ-, धप मम
·, बन S ठ 5 न काड · 5, वन ठन
५ू) सारेनीसा, पधमप, सरेनीसो पंध में पे सेम रैसो सोसो धप
ममरेसा, ममरेसा, सोसधप, ममरेसो, सांसधप, ममरेसा
० सारेनीसा, पघसप, सारेनीसो, पंधमे पे ममरेसो सोसधिप
ममरेसा, ध-प-म-म- प - सा -, धप
ब ड न ऽ ट S न S का 5 S, बन ११ म म प - सी-, ध प म म प-
ठ न का 5 5, ब न ठ न काड X घ म
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[ ६३ ]
राग केदार
त्रिताल
गीत-२
स्थायो-ज्यों ज्यों वूँद परे जिया लरजे, छृतियां मोरी थरहर करे। अन्तरा-चहूँ और बादल घन छाये, प्यारा अजहूँ घर नहीं आये, प्यारा आवे गरहूँ लगाबे, छतियां मोरी थरहर करे।
स्थायी
X १३
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नी सा सा नी सा नी ध प मै प - घ नी सा नी प
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[ ६४ ]
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ग गा S छ छँ So S S
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३) मेप धप घप मम सा 33
४) सा म प धूप मम सा "> 1
५) सारे रेसा पध धप सप घप रसा "
६) सारे नीसा पव मैप सोस धप मम रेसा
७) मेप पसा सरे सानी धप मम रेसा नीसा "
८) मेप/ पसा। सास। मेरे सोसो धप मम रेसा
६)नीसा रेनी 1. सारे सारे नीसा मैप धर्मे पध पध सप नीसो रेनी सरि सर नीता धप
मैप धनी सर सोनी धप मम रेसा। नीसा प घनि ध प
ज्यों S ज्यों S द प १०) मम रेसा सोसा। धप मम रसो सोसो धप मम रेसा मम रेसा सोसा धप मम रेसा प पनि सन प ज्यों ज्यों S बू . द प
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[ ६x ]
x O ११) मम रे, म रेसा सोसा
धर्सा धप मम रै,मे रैसो सोसो धसा धप सप धनी सोम धप मम रेसा ---- 1-
ज्यों ज्यू दप रे मप सोम मरे सासो घप मम रसा ज्यों ज्यो
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नीसा । रेसा मप धप मम रेसा घप धनी सोनी धनी सानी धप मप सरे सानी
ध धप मैप धनी सानी धप धनी सानी धनी धप मप धप मम रेसा
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प सो प 1 प - प नि घ 1
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१३)साम/ मप पध मैप मम रेसा मप सानि घप सप पंध मैप
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[ ६६ ]
राग केदार
त्रिताल गीत-३ स्थायी-पायल बाजे, शोभा राज की, अत भरी काम सो। अंतरा-अटल छत्र सब देखो, राजा बहादुर लपक भक, पग धरत धरत, अत धूमधाम सों॥
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[ ६ ]
राग केदार
तराना-त्रिताल गीत-४
स्थायी-ना दिर दिर दानि त दानि तों तनना तदरे दानि, दीं तन तुद्रे दानि। अंतरा-धीती लीती लन ना दिर दिर दीं तान देरे, तदरे दानि दीं, देर्ना देर्ना दीं, नितारे तारे दानि ।।
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[ ६= ]
राग केदार
ध्र पद-चौताल
गीत-५
स्थायी-सरस सीस मोर मुकुट पाछन को, राजत कुंडल ललित, कुटिल तलक भाल विशाल, तिलक मृगमद के नीके भलके।।
अंतरा-भौंह धनुष नैन कमल, नास कीर अधर बिम्ब, दशन कुन्द करठ कम्बु, ता मध मणि कौस्तुम शोभे भलके।।
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[७]
राग अडाणा शरोहावरोह-सारे मप नि सो, सौ धॅ नि प, गॅ भ रेसा। जाति-पाड्क-वक्र संपूर्या। ग्रह-मध्यतार पड्ज। अंश-पूर्वांग में गान्वार और उत्तरांग में धैवत। न्यास-पंचम। चिन्यास-मव्य पड्ज। सुख्य अंग-सो, सौ रें निसा, धे नि प। समय-रात्रि का द्वितीय प्रहर। पकृति-तरल-युवा। विशेष विवरण अडाशा कान्हड़ा प्रकार का एक राग है। किसी २ की मान्यता है कि कान्हड़ा कनड़ देश से लाया गया है। कोई यह भी कहते हैं कि भूपाली, मुल्तानीं आदि रागों के नाम जैसे नगरों पर से रखे गए हैं, वैसे हीं कन्नड़ देश के नाम पर से इस राग का नाम दिया गया है। कान्हड़ा प्रकार के रागों में से अडाणा बहुत प्रसिद्ध, लोकरञ्जक और जन-मानस को शीघ्र आ्रप्रकर्षित करने वाला राग है। इस राग में, गान्धार, धैवत और निषाद कुछ चढ़े से कोमल लगते हैं। कुछ लोग इसमें दो निषाद का भी प्रयोग करते हैं। इसमें धैवत का उपयोग अल्प मात्रा में छू कर ही किया जाता है। कोमल धैवत का प्रलम्ब उच्चार और विलम्बित गति इस राग के भाव को तिरोहित कर देते हैं। और वहाँ दरबारी की भाँकी होने लगती है। इसलिए धैवत के दीर्घोच्चार विलम्बित गति से सदा बचना चाहिए। इस राग की प्रकृति चंचल एवं उद्दाम है। सवथा तार सतक की और इसकी गति रहती है। मन्द्र-सप्तक की ओर तो भूल कर भी नहीं जाना चाहिए। मध्य और तार सतक में ही इसकी आलत्ति मध्य और द्रुत गति में ही प्रशस्त है। कान्हड़ा और मल्हार के प्रकारों में सवदा सारंग का दर्शन होता रहता है। और प्रायः सभी की वानों में सारंग का बाहुल्य अनिवार्य सा माना गया है। इसके आरोहावरोह के विषय में कुछ मतभेद पाया जाता है। कुछ लोग सारे गॅ, मपधेनि सो, सो घे नि प, म प, गॅम रेसा-यों करते हैं। कुछ लोग सा
सारे म प सी-इस प्रकार आरंभ करते हैं और कई सारे म प नि सो करते देखे गए हैं। यदि सा रे म प घॅ सौ-यों जाएँ तो आसावरी का भास होगा और बार बार सारे म प धे नि सो करने से जौनपुरी की छाया दीखने लगेगी। सारेमपनि सोसे सारंग की प्रतीति होगी। इसलिए हमारी राय में सारे म प सौ यों आरोह करना प्रशस्त है। सा रे म प नि सो जाने में भी कोई आपत्ति नहीं है, कारण इस राग में सारंग अ्रंग विशेष रूप से आता है। तार षड्ज कहते ही धॅ नि" प यों जोड़ देना चाहिए। कान्हड़ा के सभी अंगों में गँ म रेसा यह जोड़ी सवत्र पाई जाती है। तद्वत् इसमें भी गँ म रेसा अवरोह में होगा। इसका पूर्ण अवरोह सौ घैँ नि प, गॅ म रे सा-यों होगा। यह राग उत्तरांग में ही निदशित होता है, पूवांग में नहीं। किन्तु कोई ऐसा न सम ले कि उत्तरांग प्रधान होने से यह सबेरे का राग है। यह सर्वथा रात्रि में ही गाया जाता है। धे नि प और गे म रे-ये दो
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[ ७ ] क्रियाएँ इम राग के रागत्व को अ्रभिव्यक्त करती हैं। इसका त्र््रारंभक ग्रह स्वर यद्यपि मध्य षड्ज माना है, फिर भी तार पडूज से ही इसका रागत्व परिदर्शित होता है। इसलिर तार पड्ज को भी मध्य पड्ज के साथ ग्रह स्वर का स्थान दिया जाना चाहिए। ँ नि प और गे म रे-इन दो स्वर-क्रियाओं के राग-वाचक होने के कारणा कई लोग गे वे अ्थवा गे नि को वादी संवादी बनाने का प्रयत्न करते हैं। जब सा से आगेह करते हैं, तब तो सा रे म प सो ही जाएँगे। किन्तु मध्यम या पंचम से जब आरोह होगा, तब मप निसी, पनिसी या कभी कभी म प धे निसो, भी जाना होगा। ऐसी अ्रवस्था में घैवत को निपाद का कसा दे कर जाना होगा। इसके चलन का मुख्य रूप या होगा- मपनि सो धे निप, पति को रे नि सौ धे न प, मप निसी रें गे रै को नि वे नि सो धे नि
प, म प घे नि सो, धे नि प, सा प गे म रे सा, सार मप सो धे नि सो सारंग के छदरोह में थे और गे का नि
वक्र प्रयोग करने से अडाया हो जाएगा।
राग गडापा युक्त आलाप [ यह राग उत्तरांग प्रधान होने से इसकी आप्रालाएच्वारी भी तार पड्ज से ही आ्ररंभ करनी चाहिए। मंद्र सप्तक में स्वर को कतई न छुआ जाए। दरबारी कान्हड़े की छसर से वचना इससे सहज हो जाएगा। तद्वत पूवोंग में भी कभी कभी ही मध्य पड्ज तक गे म रे सा करके अवरोह करना चाहिए और तत्काल सारे मप सौ यों आरोह करके पुनः तार षड्ज पर पहुँच जाना चाहिए, क्योंकि उत्तरांग ही इस राग का प्राणा है। इसमें आलाप की गति भी मध्य-द्रत रखी जाए। मन्द्र विलम्बित गति से सदैव ही दूर रहना समुचित होगा । ] प (१) सी। घे-नि सी। धु नि -प, सी। म प सौ धॅ नि -प, नि नि प म प सो घॅ-नि-
प, म नि नि प प सो सौ नि निरेरे सो वे-नि - प, प नि प, म प नि सो धे-नि - प, म प निप म प नि नि प नि सो नि नि सो रे सो धे- नि - प, गॅम प गे-मरेसा। सारेम प सौ।
(२) प नि नि प म प सो धँ, ध नि सो घॅ, धे नि रे सा घॅ, रे सो घॅ, धे नि सो नि -नि,
नि नि नि सा रे सौ -सो, रे नि सो धे, सो सौ नि नि, रेरेसौ सौ, रे नि सो धे, घे- निरेरेसो धे ध-नि
सो नि नि, नि - सो रे सो सो धे, प नि प सो नि रे सो रे नि सा घे, पसी सा नि, नि रेरेसो, रे सा
घॅ, घॅ नि सो रै ग रे रैसो, नि रें सो धे, घॅ - नि - प, प म निप सो धे- निप, म प गे-स रे सा।
सारे म प सी। * इस घैवत को आन्दोलन नहीं देना है और जहाँ तक हो सके, इस धैवत पर पहुँचने तक आवाज़ बहुत छोटी कर दी जाए।
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[ ७२]
(३) नि सा रे म प नि सो रे गे', रे सो नि घॅ, नि - रे सो, नि - सो नि, धॅ- निध, नि-
सो नि, सो-रें सो गे", सो रें सो रै-सो, नि सो नि सो -नि, धे नि घॅ नि-घॅ, नि सो नि सो -नि, में
सो रें सो रे- सौ गै, रै सो नि घ, निर-सो। नि नि प म प सौ घॅ, निरे-सो; नि नि पम प
सौ सो निधॅ नि रे रे सो नि सो रे नि सो घॅ, नि रै-सो; घॅ नि सो रै ग, गै" रे सो नि घै, घे नि
सा रे-सो, नि नि प म गॅम रे सा नि सा रेम प नि सौ ध, निरै-सौ, प म नि प सो -गॅम रे-सा। नि
सारेम प सौ धॅ -नि -प, सो -नि सो।
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मप ननि पप निसो नि, निसी रेसी, रेनि सो घॅ, नि -रे सो-, नि सो; सा रेम प सो -निसो, नि पनि मनि प सो -नि सो, म गॅ प म नि रे नि स घॅ, नि -पसो -,
नि सो, सा म म गॅ म प प म, म नि नि प, प सी सो नि, निरे रे सो-, रे सो घे; नि रै रे सो नि सो, गे म नि
नि सा रे म प नि सो रेग रेसी नि घॅ नि रे-सो, नि सो, गॅ-म रेसा, सा रेम प, सो -नि सो।
(५) रे सासा मरेरे पमम नि पप सो - निसो; रेसा सा, म रेरे, पम म, निप प,
सो नि सो, धॅ नि सो रै ग, सो रे प ग, मे रे -सो; रे रे सौ सो, र, ग- मे रे सो- सौ
नि सो; नि रै सो, सो मे ग, ग में रे सो -नि सो, सो गै, मैं रै-सो - नि सो, रै रै सो नि सो घे मे नि - प,म पनि सो रैग, धे नि -प, नि नि प म प सो, गॅम-रे, घॅ नि -प, ग मे -रे, गॅम -रे, सा, सा - नि सी।
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गीत-२
स्थायी-छला देहो छैल छबीले, चरचा करेगी सब घर की मोरी, का कीनवा। अ्रन्तरा-और के दिये से का, तुम पावोगे, हमरा तो मन तुम लीनवा।
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गीत-३
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राग आासावरी सा आरोदादरोह-सारे म प धे सौ, सोनि घॅ प, म प घॅ म प, गॅ रे सा। जाति-औौड़व-संपूर्रा। ग्रह-मध्य पड्ज। अंक्ष-पूवांग में गान्वार और उत्तरांग में धैवत। न्यास-पंचम। विन्यास-मध्य पड्ज।
मुख्य अंग-घॅम प सो, धजजर। समय-दिन का द्वितीय प्रहर। प्रकृति-आत्म-निवेदन-उपयोगी। रस-कोमल शृंगार।
विशेष विवरण आसावरी प्रातःकाल का एक सुमधुर राग है। राग और रागिनी परंपरा के मानने वाले दर्पयादि ग्रन्थों में इसे रागिनी कहा है। इसमें गान्धार धैवत और निषाद कोमल लगते हैं। स्थूल मान से कान्हड़ा कांग के रागों में भी यही स्वर प्रयुक्त होते हैं। फिर भी इसके गान्धार और धैवत के आन्दोलन में भिन्नता होने से इसका निगला व्यक्तित्व कर्रागोचर होता है। सा रे म घॅ म प, गँ r रे-सा. यों करने में गान्धार को सा
आ्ान्दोलन देते समय पंचम से गान्ार पर मध्यम को कुछ छूते हुए आते हैं और तदनन्तर वह गान्धार रिषभ के आन्दोलन लेगा। यदि बार-बार गान्वार को मध्यम के आन्दोलन दिये जाएँ तो उस समय वहाँ कान्हड़ा की छाया का आभास होने लगेगा, उससे बचने के लिए रिषम के आन्दोलन देना अानिवार्य है। आलापचारी में तो रे म प घॅ म पगॅ-यों मध्यम को छोड़ कर ही पंचम से गान्धार का उपयोग किया जाता है। पर तान-क्रिया में त्वरित गति के कारण और सरलता के निमित्त म गॅर सा का प्रयोग भी सर्वसम्मत है। यहाँ एक और
बात भी ध्यान में रखना आवश्यक है कि आलाप के समय रे म प धॅ म प गेरे सा-यों करने में रिषभ को सागे
षड्ज का स्प्श और पड्ज को गान्धार का स्पश सहज रूप से लिया जाता है। राग के रञ्जकत्व की दृष्टि से ये स्पर्श आवश्यक हैं। यहाँ यह भी ध्यान रहे कि गान्धार को रिषम के आन्दोलन देते समय रेगे रेगँ न हो जाए, अन्यथा वहाँ देसी-तोड़ी अापना सिर ऊँचा करेगी। इसलिए रिषभ के आन्दोलन का गान्वार गुरुमुख से सीख कर अभ्यास से अपना लेना चाहिए।
इस राग के उत्तरांग में धैवत का प्रयोग भी समझ लेने योग्य है। सारे मप धॅ प-यों घैवत को निषाद नि
का स्पश करके पंचम पर न्यास करना चाहिए। बारंबार धैवत पर निषाद का स्पश करते रहने से वहाँ कान्हड़ा की छाया दीख जायेगी। एक या दो बार इस प्रकार धैवत को आन्दोलन देकर पंचम पर सुकाम करना होगा, अन्यथा आसावरी के तिरोहित हो जाने का डर है। कई अनजान लोग इस राग में धे नि प कर जाते हैं या घैवत पर बहुत ठहर जाते हैं। इससे सवथा बचना अच्छा होगा। म प नि धँ प ही किया जाए, म प घॅँ नि
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घँ प कभी न किया जाए। कोमल आसावरी के मप धॅ नि वे म गे रेसा की स्वर-क्रिया किसी गुगी जन से सुनकर म प धॅ नि धॅ प करने के लिए कुछ कलाकार ललचाते हैं, किन्तु यह समुचित नहीं है। तार पड्ज पर
पहुँचते समय म प धे सो अथवा म प धे प सो या म प धे म प सौ यों ही जाएँ; म प धे नि सौ कभी न जाएँ। नि
इस रागिनी में कोमल निषाद की अवस्था भी समझने योग्य है। नियमपूर्वक इस राग के आरोह में निषाद (कोमल) का प्रयोग नहीं होता, फिर भी सौ नि सा रे नि सौ यह प्रयोग सवसम्मत है, क्योंकि सा या रे से अवरोह ही होता है। प्रचार में सभी कलाकारों में सौ नि सौ अथवा पड्ज का उच्चार निपाद को छू कर करने का मुहावरा सरवत्र ही दिखाई देता है। इसको ध्यान में रखते हुए निपाद के चलन को और उसके ढंग को गुरुमुख से सीख लेना अच्छा होगा। ताना-क्रिया में सा रे म प धॅ सौ, सौ नि घॅ प म गे रेसा, म प घे सो, सा नि घॅ प म गे रे सा-यों जाना चाहिए। फिर भी प्रचार में तान-क्रिया की सुलभता के लिए और म प धॅ सौ द्रुतगति में लेने में जो कष्ट पड़ता है, उसे महसूस करते हुए मप निसा रे गं रें सौ. सौ निँ घॅ प म गे रेसा-यों निषाद का आरोह में भी प्रयोग किया जाता है। इसका अधिक वोध आलाप और तान की सक्रिय शिक्षा से मिल सकेगा। आररोह करते समय म प धे नि सौ-यों निषाद का प्रयोग कुछ अनजान अथतरा गुरुमुख से न सीख कर किसी को सुन कर ही रियाज़ करने वाले और नियम को न समझने वाले 'सुन्नी शागिद' करते हुए सुने जाते हैं। किसी गुणी जन के यों पूछने पर कि-'क्यों साहब, यह कहाँ की आसावरी है'-हाजिर जवाबी गवैये जवाब दे देते हैं-'हमारी यह जौनपुरी आसावरी है।' इसी प्रकार 'जौनपुरी' नाम का प्रचार हुआ है। वास्तव में ये दो राग एक ही हैं। रस, भाव और प्रक्रिया की दृष्टि से इनमें कोई अन्तर नहीं है। इसलिए जौनपुरी को अलग राग मानना समुचित नहीं।
राग आसावरी
मुक्त आरालाप*
रे नि सानि प नि (१) सा। नि साधु -प, सा। रे र सा, रे धु - प, निध प, मपधु-सा।
रे रे सा नि सारेध प, सा। सा नि रेसाध -सा। सा- नि रे-साध, सा। नि प सा नि सा नि प
नि सा सा नि (२) सा। सा रे, रे नि रे, साधM, रे रे सा छ ल ध,
निघ, पसाध, मध सौ। प नि
रे (३) रे रे सा नि सा रे ध V, सा नि रे सा ध, प सा, नि र-सा ध, सा। सा सा नि प नि
- इस राग की आलापचारी में एक बात पर विशेप ध्यान देना चाहिए। गान्वार को मध्यन से छू कर ऋूषभ के आन्दोलन देना होगा और धैवत को निषाद से छू कर पंचम के आन्दोलन देना होगा।
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[c४ ]
म प ध म रेमपगm, रेसा। सा रेम प घे ग, रेम प, धेगे; रे सा म रे प म घॅय घॅ गरे म, सा गे म प म म्
रे म म म म प, प ध, नॉ, रे - म, म - प, प - घँ नM; सा रं सा, रं म रे, म प म, प धे ग, म प धे घॅघॅ नि
सा सा रे पप ग. ग ग रे रे, प प म म, घॅ धॅ प प, म प घे- ग, रे म प धॅ , सारे पणसा रे-सा। सा सा सा म म प ध प
म नि नि (४) सा रे म प धचजप, रे म प धजप, म प म धॅ, सा रे-सा, रे म -रे, म प-म, नि प प म म प ध लप, पधॅ प म रे म प धॅ-प, धे प धॅ-म, म प धप, रे म प नि धजप; धे धे प प प म प धे नि प प
र नि प नि घrप, रे म प म - धँ-प; प धॅ प म प म रेम प धेप, प-धॅ नि धे-प, म -प धँप-
धॅ नि घॅ प, रे -म पम-प धॅप-धॅ नि घँप; सा रे, सा म, रेप, मघँ, पनि घॅप,
सा घॅ- म, म प घॅ म प गरे सा।
(५) सा रे म प धप, म प निघप, म प सो घप, धे घॅ प म प सा धॅजप, म प नि प धे नि नि
प मधॅ पसी धॅप, रे प म, म धॅ प, प नि घॅ, सो सोधेप, प धे पम रेम पसा-वाJVप, नि नि सा
धप, प घॅ प म प गोरे म प सा सा-धॅ, म रे म प सो सौ धप, गॅ गे रे रे-म, प प म म सा सासा सा मम
रे म-प, घॅघॅ प प-सो धप, म रे म प सो सो धप, रेमपधे मधॅप, पधेपम पसा निसो म
घrvप, सो नि रे सो धप, नि घॅ-प, घॅ-म, म प घॅ-गे, रे म प गॅसा रे-सा। सा
म पधे नि प प धे नि म प धे (६) सा रे म प धसा-नि सौ, म प धे सो-नि सो, रेमपसो-निसा, रेसासा म रे रे
सा पम मधेप प सा-निसा, सा रे रे सा-सा, सा म म म रे-रे, रे पप म-म, प धे धे प-प,सो-निसो,
सा सी रे, रे म, म प,प ध, मपसौ-सौ सौ, सा-रे सा, रे-म रे, म-प म, पनधॅ प, वे म धॅ प म प
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[ =x ]
सौ-सो सौ, रैघॅ्प, सो घॅ-प, नि ्घॅ-प, घॅ-म, मप घेप nण, रेस पर्षे प v, सा रे प प सो नि
सा नn, रे-सा।
(७) सा रं म प, हसो- नि सो, र ग है सो गे है-सो, रै नि रै सौ ग n रै सौ, रे
नि नि वrप, म प धे, सो रे गतर-सो, रे घ, प म धे प सौ नि रे सो गr रै-सो, रें ॅप, सा
पप म सा घॅघॅ प प रे रे सौ सो, ग ग रे रै, सो गरे-सो, रै रै घे-प, प म घॅ प सा - गr, रे म, म प, नि सो सी सौ सा सा रे
म प घॅ गॅ-, सा रे प नॉॉV रे-सा। सा
राग आसावरी
मुक्त तानें सारेमप घँपम गॅ रेसा, रेम प नि घॅप म गँरेसा। रे सा म रे प मघँ प नि नि धैँ प म गँरे सा।
सा रे म म सा रे सा, रे म रे, म प म, परध प सो नि घॅ प म ग रेसा। सा रे रे सा -सा, सा म म रे -रे रेप पम
-म, म ध ध प -प नि निध प म गँरेसा। सा रे म रे रेमपम म पधँ प पनि घँ प मगरे सा।
मरेसारेपम रेम धँ पमप निनिधँ प मग रेसा। सा रेम प धँ सौ, सो नि घँ प म गँ रेसा-सा।
सारेमपरेमपध मपध सौ -निधँ प मगँ रेसा। रेसा, मरे प म, धँ प सौ निधप म गॅ रे सा।
सा रे म सारेरे, रे मम, म प प, पध ध धँ सौ सौ, सो रै रै, सो नि धॅ प म गँ रेसा -सा। सा सा रे रे सा
रे म म रे म प रेममरेमपपम पर्ध धँ प पसोसोनि सोरे रेसो सोनिधँप मगॅ रेसा। सा रे सा, सा
रेसा, रेम रे, रेम रे म प म, म प म, पधॅ प,पधॅ प सा नि रैसो गे रे सो नि धॅ पम गँ रे सा-सा।
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[ = ] रे-म-प -- नि घँ प म गँ रेसा नि सा, म -प-सौ- रे सो नि धॅ प म गँ रे सा, धॅ-सौ-
'गॅ -- रै सी निधँ प म गरेसा। रे सा सा, म रे रे, म रे रे, प म म प म म, धँ प प, सौ नि घँ प म गँ
रे सा-सा। प मधँ प सो -- नि घॅ प म गॅ रेसा-सा। सा रेम प घा नि मपधॅँ सौ रे गँरे सो
सो नि घॅ प म ग रे सा। सा -प-सो -- नि धॅप मग रेसा सा-, घँ-सौ-गँ -- रे सो निघॅप
मगॅरेसा। सारे रेसा रेमम रेमपप म पधँ धँ प धॅसो सौ नि सो रे रेसो सो रे गँ रे सो निधॅ प सा रे म
सौ सौ म गँरेसा। रें रें सी नि सा, घॅ घॅ प म प, रे रे सो नि सो, गँ 'गॅ रै सो रै 'गॅ रै सी नि घॅ प म गँ
म रेसानिसा। सारेमप रे -- नि धॅ प म गॅ रे सा रेमपधॅ म- प सोनि घॅ प म गॅ रे सा।
रे म प ममं, म प प में 'गँ रै सौ, सौ नि घँ प म गँ रे सा। AV सारेरे, रेमम, म प प, प धध ध सो रू रै रे, रै
सा-रे-म-प-ध -- प मगरेसा, म -प- धँ-सा - गँ -- रें सानि धँप म गँरे सा।
सा-रै-मे-प-घॅ -- पे मे गँरेैसी सोनि घॅप म गँरे सा। सा रेम प घँ सा, सो रे में प घँसो
घँ सो सो नि धँपे में गँरे सो सो नि घँप म गॅ रे सा। सा रे म म प, प ध ध सा, सो रे रे मं, मे पे
मे पं मे गॅ सा पपम, स ग गॅरे, रेंसा सा नि, नि घ प, म गॅ रे रे सा सा सा रे रे, रे SC
रे म म, मं म प सा म म, म प प, प ध धँ धॅ सो सो, स र रै, : मं पप, प धँ ध,धे पं प, प मे मंम ग गँ रे रे, रे
सो नि प म गँ नि सासौ,सोनि नि, नि धधँ धपप, प म म, म गँग, गरे रे रे सा सा -। सा रेम प ध- ,म पधॅसा
ग --- , सोरेमपं धँ-पम गँरेसो सो नि धॅप मगँरेसा। सा सासा, प पप, सौ सौ सो, पेपे पै
मे गॅँ रै सी सो नि घॅ प म गॅ रे सा।
- यह षड्ज तारतर सतक का है।
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[ E७ ]
राग आसावरो
सयाल-विलम्बित एकताल
गीत-१
स्थायी-पेहरवा जागो रे जागो रे, चुरवा लागिला थारी घात। अंतरा-इतना ही में रैन बीतत, चेत पाछली रात ।।
स्थायी
११ घॅ प धॅ म -- प सा निसो :-- ,प धॅप पम-पधे
पे. . र . 5 5,वा0000500
X O 0 म सा घॅ सा सा - - - रे सा ध - x मप प
जा गो . रे
११ सा सा पधप मपध गॉ सा --- र सा -- निसारेगँ रेसा 1
5 960000 जा SSSe गो5 5.
X 0 ५ नि रंग सार म - प म प 1p* 1
रे वा ड ला• गि ला था री
११ नि सो-निसा रे -- सारंगँ घ निध प- धॅप मम पसा निसी -- ,पधॅप पम-पधँ
. 5 .. 0 घा त पे · 5
Page 121
[ =]
सन्तरा
११ 0 नि प
म सो -- सौ सो 1 घ
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X ५ 0 नि मं मे सो - सो रे रैग सारे गँ 1
में SSS .o S न
११ 0 नि सोरै -- सो र- -सासौरै-
बी.555.555 S sSSत.o5 त S
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ग निसोरे ध सो 1
चे ssत पा SSSछ. ली S
११
-नि सो रे . सा र गँ घ नि ध प - घँप मम पसा निसो -,प धप पम-पध
S S . रा त पे 5 Ss,वा .... 5.0
आलाप
X ५
१) सा
0 ११
सा नि रे -घ - - प नि सा -धँप घँम -- प सा निसा -- ,पधँप पम-पध
पे. sSह . र . 55, वा .... 5.
Page 122
५ 0
सा रे म प घॅ -- म
११ 0
सा प घम -t प ध गे र - सा सा रे म पर्ध मप 1 1 I
पे ह र वा . .8
५
सा रे म प घॅ - -म
O ११
प मप रेमप नि घ- -म प मप ---
X
प सो नि सारेम प व -- म प धम- धॅप - नि धॅ
सा - प ेम - प धे रेसा धॅप धॅम ·- पर्सा निसा , प धॅप पम- प धे पे .. SS, वा .. .O505
X 0
म ४) सा रे म प घॅ - - प.
0 ११ प सा निसा --- रे म प नि धे - - म सो निसा -
X ५
रेरे सोनिसो रै धे - - म सो निसा -- धॅम- धॅप - सा -- ३
११ सा नि धँ प घम - प धॅ गॅ रे - सा सा रे म पधे मप
ह र वा. ..
Page 123
६०
X ५) सा रे म प ११
निसा- . - म प ध सा ₹ ---
X
नि रैनिरेंसो गं - रेर --- सौ --- रेरे सोनि सा- है- छ प घॅम-घॅप-सा नि-रसा ग --- रेर ---
0
सा - र नि सा धॅ प धम- प ध गॅ - रे सा रे-म-पसा निसा वॅ प पध म प घॅ
वा० ०.0
x ६) ५ सा रे म सा रे रे म मप पधे
घ मं म, सो -- निसा - म प प ध धॅ सो सो रे सा - निसा-
x 0 C ५ रेर सानि सो रे ररे -- सो रे नि सो र धॅ प
0 निb ११
घ प घॅम घॅप सा --- गॅ - रे सा सो - -प प- धॅम प-घॅ-
q sse ह· र. वा ऽ . 5 X ७
सारे-सारे म - रेमप -म पधॅ-प प ११ सा निसा --- सोनि धॅप सो-रे- रेरे सा -- निसा- x
सोरेप - ग- रै सो गेरे गे सो रे नि सी रै। धॅ प नि
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[ g ]
११ म प छॅ प वॅ म प धॅ गे- रे सा रे म प सो रेनि सो --- रेनिसो --- घॅम पव
पे०० ० ह र वा डडडहर वा ड ड ड ह र वा X O द) ५
सा रे म प वॅ सो सा रै
-रसा - पं रेर --- सो - निसा -
X
मप-स, पवे-पधसा - धॅ सो रे -सो मै -सो रै नि* घॅ प I
पनथॅप सौ- म -गॅ रे सा पम धॅप सौ पम धेप सौ पम धॅप सो - -* पम पर्वे प- 1
ड हर वा ड ह· र· वा पे. 0 e S5S SS हर वा० .5
X O
रेसासा, मरेरे, पम म, धॅपप, धॅम धॅप ११ म सा -- नि सा - (पमम, धॅपप, सोनि' नि, रसोसी, रेग मर रेर - सा- X 0
सोरे रें्म में पैं पै भे सौमेसो रेरे- सो नि धॅ
सा प - - म सो प गॅ रे - साम पसानि सा -- सोनि"सा --- पम परधे
पं ह र वा · SS ह र वा S S S हर वा
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बोल ताने
(१) सा रे म प सा -- रे
पे •ह र वा 5 5 @
w ११ नि घ - - प मग रैसो रे निस-सो रेग रे-निवॅ- धप-पध म प- -प-प ध म प- -प-प धम पघ
जा s S गो चुर वा०्ला • गि०ला· • थाडरी घाS त पेड ह र वाड sपेड• ह र वाड डपेडह र वा ०
X (२) सारे-सा, रे म-रे। मप - घम-घप
पे .5 ·, ह .5 र. 5 वा050
११
प नि सो नि सो (मप सोनिसारेंग रैसौरैनि-सो रसो घप धप-प धॅम पघ" ग -- प ग -- प
जा गो - 555 चुर वा· ·. ·ला · गिलाडथा • री घा० त पेडह · रवा जा S डहो जाड डहो
x (३) रेसासा, मरेरे, पम/म,ध पप,सानि सा-
पे. ·, ह .• , र०-,वा०.,जा • गो.
नि ११ नि नि गें रैंग गेरे निसा-1र ग है,रे रैसो,सौसी। नि,नि निध, धॅपघॅममप -सोसो -धॅममप-सासो-धम/मप-सासी-परधेप
चु रवा •ला गीडला ·,था०•,री।० ,घा · ,त०पे०वहर वा 5पेवहडर वाडपे ·हडर वा ड .. .
x O
(४) सा-रेम प --- (धम पध पसा --
पे ह रवा S S Sजा. गो• रे ० s5 ११ नि नि न स रे मप घँप ममग -- रे सरे -- सो नि सा रेंसा धँप धॅमप-निसो रसा घॅप ध म प-निसी रैसोघ प धम-पधप
चुर वा०्ला• गंगला .• ड5·था·डडरीया त पे हरवाडघा· त पे ह र वाऽघा · तपे · ह र ड वा
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1
(v) सारे मप निनि पँप (मपसीनिसारे मे रैसे
प.००० हर वा०जा० ०गो० रे०
११ म -मा - -सा - 1प -- निवान-सा वै -- प निसानि-रसा वै- -प, रेम पर्ध प- 1
चुर वा · डला ड गगिडला 5 S थाडरीघा 5 उतS डप हर वा 5 5 प · • डह र वाड डo, पे. हर वा 0 (६) सार रम मप पध धिसो सर रैम मेप
पे०e० ह० र वा • जा० गो. रे• नि ११ नि नि प म 'धॅप पम में गॅ गरेसो सोनि नि घघपमन सोनिस रे ग रेशसा-सप सौ नि स रिगरिसासा-, मपसोनि सारेग रेसो सो-धॅप चु· र• वा• ला०गि० ला• था री०घा •• त पे हर वाडवा ० त पेणहर वाड,वा० · त पे० ह र वाड.
५ (७) सारे म- रेम प- | मप घॅ-प धे सो-
पे· ०5ह0 05 | र.डवा. .5 घॅसा रे-सोरे ग --- 'गॅ गे रैसा,र रेसोनि,सासौनिधे, निनि। धॅप-प, धॅम धॅप(सा --- रे नि सो -- ११ -धॅम पध मप जा. ·डगो · 5ऽडचुर वा०,लागि ला• था री· घा.डत, पे हर वाडSS ह र वा sSSSडहर वा. . x O (८) ५ मग गरे रे - सा - सारेंसा, निसानि, धॅप
मे सो पे• ह· र ड वा 5 जा .. , गो · e,रे• ११ घॅप धॅम घॅप सो-। सोरे 'ग-रै-सो-सोरेंसो रैसे धॅप घॅमप --- रैसोरे नि। सो --- धॅप घॅम | प --- रेम पधे चुर वा. ला. गिऽ ला • 5 थाऽरीऽवा त •• पे• हर वा ऽ ऽ डपे ह र वा 5 sS पे• हर वा 5S 5 .. *
XW सारे रेसा, रेम मरे मप पम, प धँ घँप पे· · ·, ह· र० वा. -. ,जा. .. पसासोनि, सारिरसो, रैग गरे,सर रैसो निसासो नि,घॅनिनिध। प -- पधॅप धॅम। प -- पसा -- सौ ११ रैनि w 1 -- सा -- सा -- गो. .. ,रे• •,चु• र •,वा• ला०ग० ला०,था• री·घाड डत पे• हर वा ऽ S •जाऽ S गो S डजाs s गोड 5
Page 127
[ह४ ]
तान
6 ५ सारे मप धॅप मगॅ। रेसा, रंमप घॅमप
धे पम गे रेसा,सा रे[मप नि नि धॅप मगे। रेसा, सारे मप घॅसो [सोनि धॅप मगे रेसा घॅपघे मप सोनि साप घॅमप में-
पे .• ०ह०रब 55वा00005
२) सारे रेसा, रेम मरे। मप पम, पर्धे घॅप
११ घँसोसोनि,मोरेरेंसो रेरे सोनि घॅपमग रेसारे रें सोनि घँपमगरेसा,रे रेसोनि घॅपम गेरे सा,सा - रेम प वै म प
पेड हर वा ..
X ३) सारेमपधँ सोसानि धॅप मगे रेसा, सोसा
-निधॅप मगरेसा । सारे मप धँसो रे रे/सोनि धँप मग रेसा। रैरे-रेसो निधेप।मगॅ रेसा, सारेम प धॅ म प ११
पे 55S ह र ना .
X ४) रेसा मरे पम धॅप/सानि रससरिगर
w . ११ सोनि घँप मगरेसा (सरि ग रे सानि घॅपामगॅ रेसा,सरे गरे/सोनि घॅप मग रेसा। रे म प सो 1 -- पधॅ-मप-
पे. . 55हर5 वा ० 5
O रेसासा, मरेरे, पम /म, घॅँपप, सानि नि, रे
सोसो, सो-हैीहै।सोनि घॅप मगँ रेसा/सो-रे-गंरैसोनि [घॅप मगॅ रेसा, सो-रै-गॅ रेंसो निघॅप। मगँ रेसा, पघॅ मप ११
हर वा
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[Ex ]
X को 0 सारे सारे, रेम रेम। रूप मप, पर्े पर्व
O नवमपाअनि सौ सरि सर रेंगे रेगेसो सो सौ रेरे रे गे सो नि वॅप मगँ रखा सो ह -- सो --- /नी -- - प्घॅ मप
पेsssपsss पेsSSहरवा *9 0 रेसासा, मंररे, पम म, धॅपप, मगरेला
0 99 नम, धॅदप, सौनि नि, रेसोसो, सानि घॅपसो नि नि, रेसोसी, मेरे। पम घ पे मग रसो सोनि धॅप मगेरेसो सोनि सोप पर्वे मप
पे • हर वा . . x U 0 X O सारेर, रेमम, मप । प,पघॅघॅ, घँसो सौ, सो
स , पीमंस, संपंप। वे पैपे, पेममे, मैगगि, गै रैै, रसोसी, सौ नि नि, निधय,पेपप पमम, मगग, गरेरे,रेसासा, रेसामा, म ११
रेरे, पमम, धॅपप सो --- ,ग रैसोनि घॅप मगरेसा निसा रेसासा, मरेरे, पम, म, घॅप प सा --- गॅरे सोनि घॅप मगॅ
रेसा मिसा, रेसासा,म रेरे, पमम, घॅपप, ११ म सौ --- , गर सोनि धॅप मगॅरेसा निसासोनि रसो पम धॅप पम धॅप पम धॅप
प· हर वा हर ा र वा X ह) सारे मप सौ --- सोनि धॅप मगॅरेसा
रैरे-रैसो नि धॅप। मगोरेसा, गें गैरै सानि धंप मगॅरेसा पप - पं मगरेसो | सोनि धँप मगेरेसा (मगरेसा, सानि घॅप
भग रेंसो, सार्निघॅप। मगॅरेसा, मगरेसा सोनिधँप, मर्ग रे सो सोनि घॅप मगरेसा [मगरसा, सोनि घॅप,।मंग रेंसा,सौनि घॅप
मगॅरेसा, सा --- । पर्घेम - पसानि सा ११ धं - प -पघम - (पसो निस धॅ -- पवभ-पसानि सा। घे-प-पघॅम-
पे०० sह· र. वाड • s, पे•ड ह र वाड5पे०ड ह. र• वाड. 500.5
Page 129
[ ६६ ]
राग चासावरी
त्रिताल
गीत-२
स्थायी-हम रैये (रहिये) गत बिरहिन के पास, पट पटबीज नास, नूँद परत। अन्तरा-बाट घाट सब रोकत टोकत, अव न मनूँ तेहारी बात।।
स्थायी
x ५ १३ प सो
म
नि सा प म प सा प
रा • न पा स म
8 ध प प स प प म प
S ये रा ० वि० र न पा S प 0 त
मं सोनि सो सा रे रैसो नि सो सा सो सानि प घॉँ
ट बी . ना बू प त
अंतग
म प प धँ म सा सां सा सो 1 1
बा S टो ट घा ब रो त S क त
सो सा सो सो सो रे सोनि धेप। घाँ म SiE
ब न म नू ते हा री वा त
Page 130
[8७]
तानें
१३ X
सा म म सा i
२) रेसा म प म नी .प म सा 2'
३) र सा सा, म प नी नी प म ग र सा
मा घॅ सो सानी प म ग र सा सा - म प सा 11 ४) म
५) सानी घॅ प म ग रे सासा रे म प सो म
।सोनी नी सो म
७ सो.नी नी घ प धॅ प. म प म रे म
८) सा सोनी म ग रे 'सा म
ह) प, प प म प म प म, धॅ नी नी घॅ, प प,प घॅ प,
सो रे सो, सो रें सो, नी सानी, नी सानी रे ग रे रे गरे, सा रे सो, सा रे सा, नी सा नी, नी सानी घॅनी
घॅ, घनी ध प प, प प, म प म, म प न. रे म । प सौ सानी घॅ प म ग रं सा, सो
१०) सा रे म नी नी प म सा म प 2' 4
सो नी प म गॅ रे सा, सा प म गॅ रें सो सोनी धॅ प नी ALL 1 AL
म गॅ रेसा,म ग रें सो सोनी घॅ प म गँ रि सा, मं ग रे सो सानी वॅ पम ग रे सा, प सा म
११) म म प नी रे सा रे म प म प घॅ सा
घॅ रें सानी म म.प नी प, घ सानी .नी र।सोनी (सो गे। रे सो।सोनी वे प MC
म गँ रेसा,सग रे सासानी धॅ प म रे सासो गॅ रे सा सानी घॅ प म गॅ रे सा, प सो
ह म १३
Page 131
[ a ]
X १३ १२) ५ गे गे रे, गॅ ग रे, सा रे,। धॅ घँ प, धे धे प म प.ग गर गे मॅ रे नो रै,
सा नी सा नी सो नी रं सो नीर सानी घॅ नी नी ध प घॅ, प म प प म रे म प सो. प सौ. प सा
ह म ह म ह म
१३) गँ रे सा रे म प म प सानी नी रे सोनी सो गॅ रे सोनी घॅ प म गॅ रे सा, गॅ रें सानी प म गॅ रे सा गॅ रे सोनी घ्ँ प म. गॅ रे सा म -, प सो
म
१४) ग रे सा प म रे म धॅ प म प नी नी घॅ प म ग रे सा, प म रे म धॅ प म प सानी धॅ नीरे सो नी सो गॅ सानी घॅ प. म गॅ रे सा, प ध प प प ध म म प सी
ह् म रह ह म ह म १५) सा रे म प सा रै रे गॅ गॅ.सो रे ।रे, सो रै रे नी सो(सौ,नी (सो सो घॅ नीनी नी प ॅ म प प, म प प रे म प नी धॅ प म ग रे सा प सा SiC
ह म
१६) सा सा म परे म प म प धे घॅ प प सो 'सोनी,सो रे।रे सौ A'
रै'मे गॅ रे सो रेरे सो सा सानी नी प घँ प म प प म गँ रे सा सा म १७) 'ग रे रै/सो रे सा रे सो सौ रे।रे सौ सो रै रे सानी सासानी, धॅ नी नी ध नी नी धॅ नी घॅ न नी घॅ प घ घॅ प म प ध सा रै मे सौ नी घॅ प म गँ रे सा,म गॅ रे सासानी घ प मं गँ रै सा सोनी घँ प म गॅ रे सा, प सो म
६८) सा प सा पं म गरे सा सानी धँ प 1 1 1
म गॅ रे सा, पं मे गॅ। रे सो सोनी। घॅ प। म गँरे सा,। पे मे गॅ।रे सो ।सोनी। धॅ प 1 1
म गॅरे सा, प सा सो प म, प सा सो प म, प सो
ह म र। हि ये ह म। हि ये, ह म
Page 132
राग आसावरी
चतुरंग-त्रिताल गीत-३ स्थायी-चतरंग रस सन गाइए, ले जाइए सुर ताल पर, आ्लान कर सुनाइये। अन्तरा-ना दिरि विति ला नत् दीमू दीम् तननन, नितारे नितारे ता दीम्, सासा, सारेम, रेमप, मपवॅं, पनी पँ, मपसी, रोज़ में गोयंके फ़र्दा, तर्के मन सौदा कुनमू, वादे चूं फ़र्दा शबद, फ़ीरोज़ रा दुनियाँ कुनम्।। स्थायी
x 0
प सो नि सो प प ध् प म प
च . त • ग स स .
सा म सा प सा 1 1 1. 1
गा e S S S ए S ले 5 जा S S S
म सा म रे सा सा रे म प सो
सु S ता S ल प ला S प सु S
नि सो रे सा नि प धॅ म SK
ना - इ ए .
ग्न्तरा
नि। नि म म म म सा सा सा सो ना दि दि घि ति ला S न त दीं S 5 त न न न
म at सा सा सो 1
नि ता S रे नि ता S रे ता S S S दीं S
Page 133
[१०४]
0 ३ नि सा सा सा म प म 1 1
सा सा S सा म S S म प S
प प सो प 1 1 1 1
प S म सा S S S ज़ S S
सा सो नि सो सो सा 1 1 1
S So S फ़ र दां 5 S S म न
नि सो सा प घ प म म 1 1 1 1
S S कु S S S बा र
म प सा नि सो -सा प म स सा रे 1 1 242
S श व S दू S S रा नि. दन्य
नि सा नि 22
या कु नं
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राग आसावरी
तराना-त्रिताल
गीत-४
स्थायी-दानी ना दिर दिर दानि त दानि, दीं तन नन दिरि ना, तन देरे ना तन देरे ना दानि, उदन दीं तन न नित्रों, तों ततन देरे ना।।
अंतरा-ना दिर दिर दिर, तु दिर दिर दिर, दिर दिर तन देरे ना, दिर दिर दिर दिर तु दिर दिर दिर, दिर दिर, ताना देरे ना, ताना देरे ना, ताना देरे ना, ताना देरे ना।।
स्थायी
X १३ 0
प धॅ म प सो निनि
दा . नी नी दि र र दा नी त दा नी
सा नि प गॅ म प म 1
त न न न S S ना S S त न
प प प रे सा 1
ना S S S त न दे रे ना दा S नी S
सा सा म प प प सो सो सा सा 1 11
द! न दीं S त न न नि S तों त न न
सो रे सो ति प धॅ
दे ना दा० नि
Page 135
[१०२]
अंतरा
५ १२
म म म म म म म प प प ध ध
ना दि दि र दि नय
सो सो सा सा स
दे र दि र ता ना ना S दि र दि र र दि र दि र र दि र
सा नि सा प सा
दि दि ता ना ना S ता ना रे
सा सा सा नि नि सां सा
ना ता ना दे रे ना ना
सा नि सौ प प धॅ म
दे रे S ना दा . नी
मुखड़े के प्रकार
x १३ 0 १) नी सो रै सानीसौ-नी प प म
दी· त न न दा नि
२) नी म नी रेनी सा सा पनी प ध प 1
त दा • नी S त· दा• नी
३) प घॅ नी V= नी छ प प प धॅ सो नी म प धॅ सा सो सा सरगरे
दी . न न न दा. नि त न न न दानी
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[ १०३ ]
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[ १०४ ]
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राग आसावरो
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गीत-५ स्थायी-सखी री जा दिन ते फाशुन आयो, चित को और सुहायो। अंतरा-कुल की कान लाज सब तजि के, मोहन मनही लुभायो।।
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Ace. No. 10542 आसूकारनाथ ठाकुर
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[१०७ ]
राग वहार
आरोहादरोह-सा म, प गॅ म नी"-ध निली, नी"-प, मद गॅ-,म सन: जाति-पाड़व-वक्र संपूर्खा। ग्रह-पड्ज। अंश-शुद्ध मध्यम । अपनुगामी स्वर-गान्धार औरर निषाद। न्यास-पंचम। विन्यास-मध्य पड्ज। मुख्य अंग-सा म-, प गॅ-म, नि-ध निसा। समय-वसंत में सवदा। अन्यथा रात्रि का द्वितीय प्रहर। प्रकृति-युवा, उत्साहप्रद। विशेष विवरस बहार वसन्त ऋृतु का एक विशेष राग है। इसमें कोमल गान्धार और दो निषाद (कोमल और शुद्ध) का प्रयोग होता है, अन्य स्त्रर शुद्ध हैं। सा म-, प गॅ-म-यों सा-म की स्त्रर जोड़ी एवं मुक्त मध्यम का प्रयोग वसन्त के उल्लास के सूचक हैं। साथ-साथ इस रग की तार सप्तक को गति भी उसी उल्लास को बढ़ाती है और हृदय की उमंग को परिपोषित करती है। स्थूल दृष्टि से यह राग दो रागों के सम्मिश्रण का परिणाम है। पूर्वांग में गँ म रे सा-यह प्रयोग कान्हड़ा को सूचित करता है और उत्तरांग में म गॅ म नि-ध, यह बागेश्री का सूचन करता है। किन्तु बागेश्री के अंग को तिरोहित करने के लिए म गे म नि-ध नि नि सा-सी, यों तीव्र निषाद का प्रयोग करने से बागेश्री तिरोहित हो जाती है और बहार का आवाहन होता है। और अ्रवरोह करते समय नि प करने से बहार की छाया छा जाती है। पूर्वांग में भी गँ म रे सा से जो कान्हड़े की छाया खड़ी होती ई, उसको सा म-इस स्वरावली से तिरोहित करके उत्तरांग में बहार की स्वर-मूर्वि खड़ी की जाती हैं। बहार का संपूराँ स्वर-स्वरूप यों होगा।
सा म-, प गँ-म, म नि-ध निसा-, नि सो रें सौ नि सौ नि-ध, सो नि-प, म प गॅम, नि ध निप
मपगॅम, पगँम रेसा। रे नि सा म, प गॅ म निनध, नि नि सा-स।।
पंजाब में वसन्तोत्सव के छवसर पर वहाँ की जनता पीली पगड़ी और पीले वस्रों में सुसज्जित होकर गाँवों के हरे भरे खेतों में और आम्र की घटाओं में खाती पाती और बहार राग गाती हुई देखी सुनी जाती है। इस राग के चलन में हृदय का उत्साह और उमंग प्रद्शित होते हैं ; और कवियों ने भी इसे वसन्त के गीतों से ही अलंकृत किया है। 'नई रुत नई फूली', 'बहार आई बलेरिया फूली'-इत्यादि ऐसे कई पद बहार में पाए जाते हैं। यह बड़ा ही मधुर, भावनापूर्र उत्साह प्रेरक और युवा प्रकृति का राग है। युवा प्रकृति का होने
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[ १०८ ] इस राग का ग्रह स्वर घड्ज है। यद्यपि इसकी सभी तानें प्रायः गान्धार और निषाद से ही उठते हैं, तथापि राग का सुख्य त्रंग जो आर्लाप है, उसका सभी चलन षड्ज से ही आररंभ होता है। वास्तव मं सासा म म प म गँ म यों करते समय अनजानपन से निसा म म प म-हो जाता है। गुरु वे
बैठ कर जो लोग नहीं सीखते, उनसे ऐसी भूलें प्रायः हो जाया करती हैं। सा म-, प ग-म, नि-ध नि सा-यह क्रिया इस राग को आविर्भूत कराने के लिए परमावश्यक है। इसे वार-बार रट कर गुरुमुख से सीख लेना चाहिए।
राग बहार
मुक्त आरलाप [ इस राग की आालापचारी के पूर्वोंग में कान्हड़ा अंग ही प्रयुक्त होता है। केवल सा-म, किंवा सा रे नि सा म, ये स्वर-समुदाय पूवोंग में कान्हड़ा को तिरोहित करके बहार की अभिव्यक्ति स्थापित करते हैं। किन्तु बहार का स्पष्ट स्वरूप तो उत्तरांग में ही प्रद्शित होता है-जब मथ्यम से म नि-ध निसा-यों किया जाता है। इससे स्पष्ट है कि यह राग उत्तरांग प्रधान है। इसलिए इसकी आलापचारी में भी राग की अभिव्यक्ति के लिये तारसपक की ओर विशेष ध्यान दिया जाए। जिन्होंने गुरु का सान्निध्य प्राप्त नहीं किया है और जो केवल पुस्तकों के अभ्यासी हैं, वे मंद्र में भी इसी प्रजार की आलापचारी करने का यत्न करते हैं। और तब नि-ध निसा-यों करते समय मल्हार को निमंत्रणा देते हैं। मंद्र में भी यदि नि-ध नि सा लेना हो तो मंद्र मध्यम पर ठहर कर गुँ म नि-ध नि सा-यों ही जाना चाहिए। और यह करिया गुणी गुरु के पास 'सीना-ब- सीना' सीखने से स्पष्ट अभिज्ञात हो जाएगी। ] (<) सा। सा म, पगाँ म-रेसा। रे ति साम, म प-ध म प ग, म रे-सा।
रे रे-सा निसा म, प गम नि-ध नि-सो, नि-प, म प गनम-रे सा।
(२) सा, रे रे सा नि सा नि-ध नि-प, म प ग म नि-ध नि-प, म नि-ध नि सा। रे रे सा नि सा म सा म, गॅ-मरे-सा। म, निध नि प, म नि-ध नि सा, म, गँम रे सा। सा रे रे सा नि सा म, प गे n म, गँ
रेसासाम, मप धमप ग, म पम प-म, धमप गे, गँम म म म प ध ध प म प गेम रे सा। म सा म (३) सा म, प गn, म गॅ-म नि-ध सौ नि नि-प, म प नि नि प म प ग, म नि-प,
मघ परॉ, सा म, प ग, म रे-सा। सा
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[११३ ]
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[११४ ]
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x ५ ३) रे रेसा निसा- प पम गॅम- नि निपमप- गॅ म
१३ म-मनि-घधनि सा-नि।निर्सा रे-सो /सरे गैरेसरेनिया- नि-धधनि सो । म-मधनि सो निनि पप :- पमग
न ई रुत ड न• ई.
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0 १३ नि नि नि -- ध धनि सा -- निसा-नि,सरि-सारेंग-रेसानिसा- नि"नि'प प -प गम -सरि नि सा- -पगॅम
न इ रु व ड न इे ड 5 न ई.
X ५ ५) सामगॅम,मनिधनि सो -- रै सो नि -- ध धनि सा -- निसो-नि,सरि-सो, रैग-रै,सो-रैस
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[ ११x ]
१३ ! नि नि -- ध धनि सो -- ग -मेरैसो नि -- ध,धनिसा -- धनि सो -- धनि सौ - नि नि"पप-पगॅम
न इ रु त ऽ न ई S X ५ (पमगॅम -मरेसा।नि"सा-सा, सा निधन-नि,पमगॅम-मरेसानि सा-सा, म।गममरिसो निसे-सो, निसोन नि-न
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पमगॅम-मरेसा ि'सा-सा, धनिसा नि नि प प ----- घ नि सा- नि नि प प •सारेनिसा नि निपप नि - पगॅ
इ रु त SS SS . . . S न इ रु त SSSS . . . न र त ड न इ।
X ममरेसारेसानिसा निनिप, मपम,गाम नि - - 8 ममरससा निसा
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सा म - म प - पनि मप गॅ - गॅ म म म नि -ध नि सो -रे गॅ रै
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१३ नि सो निसारेनिसो नि - - ध सोग-स म रे - स सा -निध धनिनिध, निमासानिसारेंग रेसोनिरेसी नि - - घ
यां s 5 . न ई ड क लि य ड न को s . न• इ., न. कलि• य · न· को s 5
x मनिध, नि। सो नि, सो रे/सो, रे -ग है। सा - - निप गँ -- गॅम नि - - धनि सा -- गरै।सौ -- निप
... ,. ..... ., .Sन• यो s s न यो s s न. यो sऽ र सा s s न . थो sS न
ने -- गॅम नि SS धनि सा -- गं रें सा -- नि प ग -- गॅम नि - - धनि रो - निप -प गॅ म
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[ ११६ ]
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१३ नि 0 सा सा सा म म म निध नि सौ -- निसो गॅ रसा धनिरेंसो (नि नि प प। - प गॅ म
न इं क लि य न को• न यो s s न यो S5 र• स ·· ०न ई रूतडन ईे
२) ग -- मं र- सोगॅ -- मरे -- सा/सामगम, मनि्धाने।निसारैसी
नड्डई रुडडतनsडइफूडडलीन· ई., वे•ली बहा रियां
नि - - धनि १३ नि गरेस -- नि -ग गॅम रे सा म - - गॅम रसा -- गरेसा-धनिरेसो(नि नि प प-पर गॅम
न ·योऽडकलिडय न· कोन योऽ5 न• यो डड न. यो 5S र०स ड . • न ड रु त ड न डे ड )
x ३) सा म म प गॅ म धनि सो -सो गॅमरे सो
न त न ई फू · · ड ली न ई वे ली
पनि पम पगॅ गॅम निपगॅ-गॅम रेसा, गॅरे १३ नि सा -- नि पाग -- ध नि सा -- गर सा -नि प -पर गॅम
ब हा रि• यांन ई• क लियडन· को०, न० यो 5S न •योडड न • यो ड5 र सड रु त ऽ न ई
X ५ ४) ममरेस रेरे सानिससनि धनि नि पर्मागँ गॅम नि प। गँ गॅम रेसा सा 'गॅ - 'गाम रे निरेसो
न०इo रु०त-न • इ• फू ली.न ई• बे ली ब हा रियां न इ 5 कलियन को
१३ नि मनि -घ निसा-रेनिसा। मनि -घ नि सो - रेंनि सौ (मनि -ध निसा-रैनि सा। निनि पप।-पगॅम न यो · रसाs· नयोऽ र स 5. नयो 5. रस 5. न ई रुव डन ई.
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[११७ ]
गॅर गर सीरे सौनिसी निधनप म पमगॅ मम निँ ध नि सोसा-सा म-मम - पर णॅ -म ५
न• इरु • ता न • ई फृ • लीन • ईवे्लीव हा •रि यांन s ई कलिय Sन कोडन
१३ निघनि सोनिसा रे गेरे सो -म निधनि सौनिसारे ग रसो -विवनितानिसरे गेरेसौ -- नि" निपप -पगॅम
यो०नयो• नयो०र स ऽ नयो• न यो• न यो• र स S नयो नयी• नयो • रस ऽन ई रत/ ऽन ई
६) सासा म म पम निष म गॅ म-नि-निं्निपमगॅम गॅमधनिसा- घ निसो र। गेरे सो रे
न इ रुत न· • . इ. 5फूड .. ली. 5न ईवे लीव
नि सो नि सौ नि'ध घ नि सो रे गे गॅम रें सो /निसानिरेसा/नि-ध घनि सो नि" निपप।-पगॅम
हा · • रि। यां S न ई क लि य न • को • नयो ० र• स ड0 ० रु त
७) (प-गॅ --- मम/रेसानिसा, रे-सा-1 -- रेरे सो निधनि,प-'गें --- मैमे
नऽ ईssSरु. त. , नऽईs55फू·ली. नऽईSSSवे
रैसोनिसा, र-सा --- ररैसोनि धनि" सानिसा, मगॅम, प निष, म गेम निधनि,सानिसारे गे रे,सौनिसो।सोनिसा, निघनि पमप, मगॅम १३
ली. ·· , बडहाSSSरि•यां · ·. न • डे, कलि य • न, को० न यो• न,यो •नयो • र, स • •न • ई, न • ई रुत, न• हं X सा --- सानिसा, मगॅम प निप, प गंम ।
फू s s 5. ली न • डें, कलि य • न, को• न
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१३ 0 गॅ गें म रे सासानिरेसा मगॅपम निपसा नि रैसे ग-रे गे रे गे सारेनिसा धन पधनि सा निसा-नि -- प-निसा-नि -- प-निसा-नि-पमप
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[११= ]
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१३ सौ - ध नि सा गॅ म ध नि सो -ध नि सा - - - नि - नि' - पप - पगॅम
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रे सा निसौ, सा निधनि) नि"प म प, 'गैरेसो रै। रे सौ निसौ, सा निध नि नि प म प, प म गॅम
'गे रें सा रै, रै सो नि सो सो नि'ध नि, नि"पम प। प म गॅम, म रे सा रे रे सा नि सा, प म गॅ म
१३ नि' प म प, सो नि'ध नि"। रे सौ नि सो, 'गॅरे स रै। रै सा नि सा, नि"प म प गॅ म रे सा, - प गॅ म
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५ नि सो नि पनि"पम प प निपमप मरगॅम म प म गॅम रे सा रे गॅ म रे सा रे सा नि सा
रे रे सा रे रे सा नि सा प प म प प म गॅ म निनि" प नि निपम प सौ सौ निसो निघ नि
१३ सो रे ग रे सो नि सा-। सो रे 'गॅ रे सो नि सो -। सो रे गॅरे सा नि सो - । नि सौ - नि -प गॅम
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[ ११६ ]
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न ई रु त ऽ व ई. आ्रा .... . . 5 १३ घ नि सो -नि निपप। -पर गॅम, निसा गॅम |घ नि सा -, ध निरसा- नि' नि'प प -पर्गे म
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नि निप म गॅ म रे सा नि सा गँ म ध नि सा - सो निसानि ध नि प म प म गॅ म
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[ १२० ]
सा - म- नि - ध नि सो गे - मं- पे में गँ मे रै सो नि सो
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नि नि प म गॅ म रे सा नि पा ग म ध नि सो सो नि सो निध नि प म प म गँ म
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नि निय, नि नि प म प, प प म, प प म गॅ म म म रे म, म रे सा रे, रे रे सा, रे रे सा नि सा,
सा रे नि सा, म प गॅ म । प नि म प, नि सौ ध नि । सो रे नि सो, गॅ मे रे सो । नि निप म गॅम रे सा
१३ "गॅ मे रे सो निनि प म गॅ म रे सा, गॅ म रे सो । नि नि प म गॅ म रे सा नि सी - नि- प म प
न ई डरु डतन ई
X ७) ग - -मध नि सो नि घ -- नि सो रे गॅरे
ग - - में पे में ' गॅ म । रै सो नि सो, नि नि प म । गँ म रे सा, म नि ध सो । नि रे सो रे नि सो ध नि
सौ - -- म नि ध सो निर सो रे नि सौ ध नि ( सा --- , म नि ध सो नि रे सो रे नि सो ध नि
१३ सा --- , 'गॅ- मे - रै सो गँ म रे सो नि सो नि प गँ म
न 5 ई S रु त न ई रु व न ई रु तन ई
X ८) रे सा सा, म गॅ गॅ, म गे । गँ, प म म, प म म, नि
प प, निपप, सो नि नि।सो नि नि, रैसो सो, रै सो। सो, म 'गॅ 'गॅ, मेमे रैसो। नि नि पम गँम रेसा ५
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[ १२१ ]
में मे रै सो, नि नि प म गॅ म रे सा, मे मे रै स । नि नि प म गॅ म रे सा र सा सा, म गॅ गॅ, प म
न . ., इ . ., रु त
म, नि पप, प म म, नि /प प, सो नि नि, रेसो सो, सो रें रें, नि सो सो, प नि। १३ नि, मप प, म पर गॅ म
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राग बहार
त्रिताल
गीत-२
स्थायी-सघन बनी अमराई बड़ी भोर भई तामें पुकारे मलियाँ, किनी वाले लाल भूले।
अन्तरा-ले ले ले ले चितवा, भंवरन के पास, कोयलिया बोले कृक कूक़, सरस वसन्त मोरे, बिरहिन के संग भाम फिरत, मोरा जिया डोले डोले।
स्थायी
x ५ 0 १३
म म प म नी नी प मप -- म
स घ न व . नी 5.55 தா म
नी घ ध सानी सो मी प प पि-नी पामप- म 1 1
S S घ न ब नी S .. SS म
AV नी सा गं प नी
- ध ध नी सानी सा सा घ नी - नी सो नी प म पु 1
रा 50 0 .... डे ब ड़ी : भो र भ ता 5 मे ब
१६
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[ १२२ ]
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[ १२३ ]
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नि नि | प नि। म प गॅ म नि - ध निनि प नि (मपागॅम नि - ध निनि पनि, म प । ग म
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सोनि सौ सोनि सानि प नि नि प म प प म गाँ। म म । रे सा
नि सा गॅ म ध नि। सां नि सा म ध नि सो न सा गॅ म ध नि सो निनि पनि । म प /गॅ म
स घ न ब
मं मं निनि |पम गॅम रे सा 1
नि सा गॅ म ध नि सा - घ नि सा - नि सा गॅ म ध नि सा - घ नि सौ I
म म नि सा गॅ म ध नि सो ध नि सो 1 नि नि प नि प नि प -नि प गॅ म
सघ न ब नी 5 ब नी 5 ब नी अम
७) नि सा। गै म ध नि सो सा सो नि नि प म गॅ मरेसानिनि प नि, म प गे म
सघ न ब नी अम
c) नि सा ग म ध नि नि सा 'गे में। प म ग मं। रै सो
Page 153
[ १२४ ]
X १३ नि' नि पम गम ।रे सा रै गँ।रि, सौरे सो,नि सा। नि, पनि प,म प। म, गे। म म रेसा |रै । रे, स+
रे सौ, नि सो| नि पनि प म प म. म रे सा 'गँरे सार सौ,नि सो नि, प / निप । म प । म,
म म रे सा नि मप सो - नि नि म प सा नि नि। म प सो - म 1
स घ न व घ न ब S सघ न ब नी S म
सो सा सौ नि सोनि नि प / नि प। प म
प म म गॅ म म रे सा रे सानि सा प म गॅ म ।नि प म प सानि धनि रें सा नि सासोनि।घ नि
नि प 7 प प म म रे सा नि नि म प म नि - ध गॅ म - ध। गॅ म
स घ न ब श्र म रा श्र म S
१०) स नि नि प, पप म, म गॅ म म रे सानि सा
गॅ म सौ।नि नि प म गॅ म रे सानि सानि नि नि मृ प ।गॅ म
स घ, न ब नी अम
११) रे सासा, म ग ग। प म् म, नि प प,सानि नि रे
सो सो [सो रे।रे, नि सोसौ,(प नि नि, म प प, /गॅ म/म, सा रे रे /नि सासी -निनि ।प नि। म प । गॅ म
स घन बनी•अम
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[१२z ]
राग वहार
त्रिताल
गीत-३
स्थायी-बहार आई बेलरियाँ फूली, रही अमरैयाँ मोरी, बाग बाग मलियां बोले, 'लाम्बे थाम्बे थाम्बे', किनी वाले लाल, बेलो वाले राम। अंतरा-डार डार अरु पात पात पर, ँवर फिरत मँडराये, अमरैयन पर बैठ कोयलिया, कूकत सबद सुनाए, पियु पियु करत पपीहरा, चहूँ ओर इसन बसन्त फ़ुलाए, अत मन भाए।
स्थायी
x e १३
नी सो नी सा रे नी सा
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नी प म गे प म म म
प फू S ली S S S र
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ही . म याँ S मो. S S री S
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ला म्बे था स्वे था म्बे कि नी वा
गं में मे सो नी सा - घ नी सो सो सारे नी सा
ला • ल बे लो वा ले . रा S 5 म्। ब हा र आ . .#
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[ १२६ ]
अंतरा
१३ 0
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म नी ध नी सो सा सा सा रे सानी सो घ 1 1
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क त स ब सु ना S S ए S
म नी घ नी - सो सा सा सा नी सो पि S पि यु S क त प य रा S नी AV नी नी नी ध सो सो सा नी ती घ्
च श्रो र ह स न व त फु ला ये नी सो सा रें रें सोनी सो - ध नी सो सानी सो। रे सो त्र त म न भा S ये S हा रआ ...
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[ ६२७ ]
गग बहार
त्रिताल
गीत-४
स्थायी-सकल वन गगन पवन चलत पुरवारो री, माई रुत बसन्त आई फूलन छाई बेलरियाँ, डार डार तंरुवन की कोयलिया रही पुकार, और तंबुना बूदन भर लाई। स्थायी-मुरवा बोले कुंजन कुंजन, कलियन कलियन भौंरा, वरन बरन बिरवन की कलियाँ, पिक शुक चातक रहे पुकार, और हरखत निरखत कुंवर कन्हाई।
स्थायी
X १३ 0
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नि सा सो नि सो नि सो सो घ नि 1
श्र र त्रं बु । वा S बं 5 द न र ला मं
- इस चीज में तार सतक में शुद्ध गान्धार का प्रयोग बहार के उस रूप को निदशित करता है जो लोकगीतों में प्रचलित है।
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[ १२८ ]
अंतरा
X १३
म नि ध नि सो सा सो सा सो
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नि निं सो सा सो सो नि रें। रे सा नि 1 1 1
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[ १६ ] राग मालवकौशिक (मालकौंस)
शरोशावरोह-नि सा गँ म धै नि सो। सो निँ घैँ म, गॅ म गे या। जाति-औौड़व-शड़व। ग्रह-आलाप में मध्य षड्ज और तानों में मन्द्र निषाद। अंस-मध्यम। गान्घार धैतत-अनुगामी स्वर। न्यास-मध्यम। विन्यास-मध्य पड्ज। मुख्य शंग-सा म-नाँनजसा गॅ म गॅ सा। समय-मध्य रात्रि। भक्कति-शान्त, गंभीर।
विशेष विवरण
मालवकौशिक एक परम मधुर एवं शान्त-गंभीर भाव को निदशित करने वाला पुरुष राग है। राग और रागिनियों द्वारा राग-वर्गीकरण करने वाली परंपरा में इसे छैः रागों सें से एक सुख्य राग माना है। संभवतः मालवकौशिक का ही अापम्रश रूप 'मालकौंस' होगा। इसमें ऋषभ पंचम का समूचा त्याग है और गान्वार घैवत, निषाद-ये कोमल स्वर हैं। सम, गॅ घॅ और मनि-ये तीन स्वर-जोड़ियां इस राग में परस्पर संवादित होती हैं। जिन-जिन रागों में इस प्रकार की स्वर-जोड़ियां आपस में संवाद करती हैं, वे राग प्राकृतिक माधुर्य से ततपोत रहते हैं। निसर्ग का विकास संवाद से ही होता है और हुआ है। रागों में भी इसी प्रकार के संवाद, शास्त्र सम्मत हैं। इसीलिये मालव- कौशिक सब को परिचित, सब के हृदय को भंकृत करने वाला और आदर पाने वाला राग है। इस राग का प्राचीन अन्थोक्त रूप दर्शन करने से ऐसा प्रतीत होता है मानो इसे वीर और भयानक इसका निदशक माना हो। संभव है उस काल के 'मालवकौशिक' में निगले स्वर रहे हों। त्राजकल दात्तयात्य पद्धति में 'मालकौंस' को 'हियडोल' कहते हैं। औत्रात्य हिरडोल का स्वरूप वीर रस का द्योतक अवश्य है, क्योंकि उसमें वीत्र धैवत, तीव्र मध्यम और तीव्र निषाद का प्रयोग होता है। किन्तु छाधुना प्रचलित ममालय- कौशिक में गान्वार, घैत्रत निषाद कोमल हैं और आरंभ ही में सा-म का उच्चार शान्त गंभीर भाव का दोतक
है। तद्वत् अवरोह करते समय भी सो नि घॅ-म, यों धैवत को दीर्घ करके मध्यम पर उतरने से वही शान्त-गंभीर भाव निदशित होता है। इससे इस राग के स्वरों, उनके उठाव, ठहरने के स्थान इत्यादि-सन बातों को देखते हुए यह राग शान्त रस और गंभीर भाव का दोतक प्रतीत होता है। मध्य रात्रि के प्रशान्त वातावरण के लिये यह विशेष रूप से प्रशस्त भी है। कारया इसमें जागृति प्रशान करने वाले शृषम पंचम का त्याग, गांधार, धेवत, निषाद का कोमलत्व, षड्ज-मध्यम का संयोग और मध्यम का अंशत्व तथा न्यासत्व-ये सब प्रशान्त वातावरय को पुष्ट करने वाले उपादान हैं। इस राग के स्वरों पर आघान नहीं देना चाहिए। मींड का अधिकतर उपयोग करना चाहिये और मन्द गति से आन्दोलित गमक की बरतना चाहिये। इससे रस-भाव के निर्माणा में सहायता मिलेगी। १७
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[ १३० ]
राग मालवकौशिक
मुक्त आ्रलाप गाँ नि नि नि धे सा नि सा (१) सा। नि सा। सा धु नि सा- नि सा। सा- नि गँ सा छ, ध नि सा- नि नि
नि घॅ नि ध नि ध घु nn, म घु नि, धु सा। सा सा (२) गॅ गँ सा नि सा व rn, ध नि ग सा धr, ध नि सा गॅ-सा, नि गॅ-सा नि नि नि नि नि सा गँ सा नि
नि घnn, वू नि गँजजसा, -नि, गसा ध, म ध नि - धुँ सा। साम नि नि ध
गॅ गॅ (३) नि सा गँ, गाँ सा नि धr, ध नि सा ग, म गँ सा नि-, गॅ सा नि घु,
धू नि-धु", निसा-नि, सा गॅ-, म गँ सा गॅ सा नि-धु, धु नि नि सा -सा गँ- म गँ गॅ सा, गॅ सा नि नि नि
सा कि, सा नि ति छु, धु '03 सा।
नि सा गॅ सा गँ गॅ सा (४) धु नि सा म-, मगसा नि म -, म गॅम सा, गॅसा गॅनीसाध, नि सा म -, सा
सासा सा सा सा नि नि नि ध नि सा म म गँ गॅ, गॅ गॅ सा सा, सा सा नि नि, ध नि सा म - गँA नी सा। गु नी
(५) गँ सा नि ध नि सा म -, सा नि गसा म-, निध सा नि गॅसा म-, ध म नि ध
सा सा सा सानि गेसा म-, मगॅ गसा म -, म गँ गँ सा सा नि म -, म गॅ गँसा सा नि निधु म - म -,
मगँ सानि , म ध नि सा -, म गॅ सा नि ध, मधु नि सा म -, म गँ-मसा-गँनि-
गँ म गँ नी साध, नि सा म-,म ग, सा गँ म ग-सा। म नि सा (६) नि सा गॅ म घलVम, म- घॅ म म गॉम, वॅ म म ग, सा ग गॅ म षँ म म म
म गँn,व नि, नि सा,सा, गॅम, घम म , नि सासा गॅ गॅम म ्यर्ष म म , सा नी ET गॅ नि 12
Page 160
[ १३१ ]
सार्र म गॅ-मघॅ मम गसा, गॅ म मं- गॅ स घॅ घे- म, घॅ स म गn, सा म गॅ - म सा। सा सा
(७) नि सा गॅम ध, सा ति मे सा म गै, थँ म ह, नि सा गे म हे सा गे म धे नि वू नि सा गॅ म
म धॅधॅ-, गॅ, - गॅ मध, घॅ,-सा - म गँर गॅ-, गॅ-घॅ म म -, म - नि घॅथै- नि -गै सा, सा- म
म गॅ,गँ- वे म, म नि घॅ -, नि धं-म, म-धॅवॅ-नि, नि घॅ-न, घॅ घॅ म गँ म षँ- नि घॅ-म, धँ नी
म गॅ, म गँ सा।
(८) नि सा गॅ म ध, निसो धn, धँ नि सो नि -घ, मधँ नि मनि नि घॅ, नि
गॅ मधॅ गॅघॅ घॅ म, सो, म सा म म गँ, गँ म धॅ गॅधॅ घँ म, म मधॅ नि म नि निध, ग म म, म घँ घँ
धूँ नीv ध नि नि घॅ - गॅ मधेनिसौ, नि घॅ; धॅ नि सो धे सौ नि" म धे नि म नि घँ - सा नि गॅ सा म नॅ
घॅ मनि धे नि घ; निसा गँम वे नि सो नि घॅ, म धे नि घँ, घॅ म ग, सा गॅ म गे सा नि म
गॅ नी (६) नि सा गँ म धॅ नि सो, सो नि नि घॅ- सो सौ नि नि, नि नि धँ धँ; धँ घॅ म म, घॅ-,
घॅ -घॅ म म, नि - नि धॅ घँ, सो -सौ नि नि, निघॅ घँ-सा म - म गँ गँ, गँ धॅ-घ म म, म नि-
नि घँ घॅ, ध सौ-सो नि नि, नि घॅ घॅ -; सा गॅ म, सा म म गँ, गँ म घँ, गॅघँ घॅ म, म षँ नि, म नि नि घँ
घॅनि सो, घ सो सो नि, निधॅघॅ- घॅ-सो, सो नि नि, म -नि, नि घॅधँ, गँ -घॅ, घँ म म,
सा -म, म गॅ ग नी" - गँ, गँ सा सा धु नी सा -नी सा। नीसा नी
गे गँ म धॅ नि सा निँ गॅ म धॅ नि सो नि (१०) नि सा गॅ म धे नि सा-नि सो; नि सा गँ म घे नि सा-नि सो, सा-गॅ-म-धँ-नि-सो निसा,
Page 161
[१३२ ] गँ गॉँ मधॅनि सा-मे सा, हॅ-म गं,म धैँ म,धॅ नि घँ,नि सो नि,सो-नि सो; नि सा गे म घॅ, सा गॅ म घँ निनाँ म धॅ निसा,
म धै नि सो सा सा गे म धॅ नि सो-निसो; सा गॅ-, मघॅ, निसा-निसो; सा म गॅ, घॅ म, म नि घ, स1-निसो; गॅगॅसा निम गॅनि
नि सा सा सा म म शे सा, स मगॅ गॅ,ध घॅ म स, नि नि धे घॅ, सौ सो नि नि, सौ-निसो, निसी-नि ध- म धॅ नि-निध- म धॅ नि -म,
म म नी घ म ग, सा। (११) नि सा गॅ म धॅ नि सो-नि सो; सो नि नि गँ सा सा म गँ गे घॅ म म नि घॅ घॅ सो नि नि
सो-नि सो; सा नि नि,गॅ सा सा गँ सा सा, म गॅ गँ म गॅ गँ, धॅ म म घॅ म म, नि घॅ धँ सो नि नि सा-
निसा; सा गँ, गॅ म, म षँ, धँ नि, निसो-नि सो, गे"ग" सो, निँ सो, निग सो, सौ सो नि, धँ निधॅ सो नि-
नि वि घॅ म वॅ म नि हैँ-, म घैँ नि सो। नि सो; सो नि ग सो, नि धॅ सो नि, हूँ म नि घॅ, सौनि, धे नि सी ग
सो नि नि मध निसी ्ग सौ ग नि सो धॅ नि सौ-नि सौ, नि सो गे", ग"-सो सो सो नि धँ-, नि सा गँ म, घ, नि, सो-
गँ नि सौ; नि सौ गे" ग" सौ नि सौ नि-, म घँ सो सो नि घँ नि, घँ, गँ म घे धे म गँ म गॅ, नि-सा।
(१२) नि सा गँ म धे नि सो म-म-, धॅ नि सो में-, मैं ग" सो नि धै नि सो में-ग, म-गँ, सो- सा मधँ नि
ग सो नि-सो नि, धँ-नि धँ, म-धँ म, धॅ नि सो मं-, मैं गे गे सो, सो नि नि है, में में में मंग, सो गे सो गे" सो, नि सो नि सो नि, धँ नि घँ नि घँ, म धॅ नि सो मं-, में गॅ सो नि-सो
गं'सो नि घॅ-नि', सो नि घॅ म-घॅ, नि' घॅ म गॅ-म, घॅ म गँ सा-गँ, नि" सा गँ म धँ नि" सो म-, म-, घॅ म गै, सा
मग सा, धु नि सा।
Page 162
[ १३k ]
राग मालवकोशिया (मालकंस)
ख्याल-विलस्थित एकताज
गीन-१
स्थायी-अब छर देखी अपने पिया की निकसत गंगा वाउ के केस।। पन्तरा-कानन कुंडल गल विच माला, कैसे मोहे मृगछाला, तंग बभूत भस्म भेस।।
स्थायो
६३ 0
म नी -सा गु मनी नी ध -- धममग -- स-घॅ-
TSSSe0o
x नी नी सो नी नी सा -- साग नी-नी सा -- -- ती घॅ-म- म धॅ नी सा घॅ -- मघ-नी-
खी SSS S TO SSSIS S S OMSTS या . 5 0 · SS e Seo S
0 ६३
घॅ म सा नी नी सा घ म म ग म ग गॅ सा - ग नी सा - ना - -ग सा -- धू नी 1
की S 5 न SSSO क 5S5 स त
५ 0
सा नी सा ग म ग - ग म ग म घ-घम गमधम मगग-
गे 5 e 5 6 गा .. SSS
गॅ मम नी नी घ घॅ म म ग म धॅ नी सो नी धॅनी सा- नी सा -- नी सो
के. . . .... SSSS s के . S ae . SSSSi I . SS
Page 163
[ १३६ ]
x साग नी-नी 'सो- --- नी" ह-म म धॅ नीसो घ -- म ध-नी- धॅ म म गू- घॅ म छ०.54055555• ने5पिड या. 0 80005 की
११
गँ म
स गे ग सा - नी सा नी -- सा म मग मनी नी घ घँ माम ग- -म-घ- 1
अंतरा
x नी सौ नी - घ म म गा -म धॅ-नी- सौ "-नीसो सो
का5550. SSS· न 5 न 5 S
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नी नी सो सग नी- सा- -नीध-म- म धॅ ली सो म घ - नी"
ल . SSS श 5MSSSSSSO बि डच ड म.र
X C ५ सा नि४ सा
धे म धं म म ग म ग गॅ सा - नी सा निY -- ग सा नी 1
ला . 0 8 6 8 5 5 क 5 5 0 से
w 0 १ :
गे सा -- नी सा गॅ म म --· म म धे-घेम्गम्धम मगेग- -- गॅ गे म 5 )
सो 5 5 55555 5500 SSS मग छाs ......... 5 s डला न्रं.
Page 164
[ १३७ ]
X
मनी 'नी घे-घ 'म- न- गॅ-मर्वॅनी सो-सोसो- नी म गं
सोगनी-सो- नी हॅ - र शेप स्थायी की वरत्र त्रम्र
राग मालवकौशिक
ख्याल-विलस्बित एकताल
गीत-२ स्थायी-पीर न जानी वे पिया, देख्री तेहारी अनोखी रीत। अन्तरा-ऐसे निरमोही भइलवा बलमा, तुम उत समझा ही ये कवन गाँव की नीत।
स्थायी ११ 0 सा ग म धॅनिस नि सा गँमवॅनि सा-नि सा -धॅ नि
पी . . ... 5
x गॅ म ५ म ध म मम म - ध म म ग -सा गॅ म नि सानि निघ
जा . .. SSS S ... ... . SSS
११ 0 - म, म ध म ध नि सन- घ म घँ म म ग - सा, सा ग साग म ध म --
S·, नी. . e SS वे . . . .SSS S O, पि. .. SS
१८
Page 165
[ १३= ]
x नि गे सा निसा- सा - -ॅ नि सा निसा गॅ सा निसा गॅ सा घ -- घ -- नि -- 1
या • . 5 दे 5 खी ड S• ते • हा 0 • री SSछSSनो SS
११ गे
सा म'-" घॅ म म गॅ -- सा ग म गँ सा -- ग नि सा
खी . 55 . S S. त
अंतरा
अ्रन्तरा लेते समय स्थायी को निन्नलिखित ढङ्ग से पूरा करना होगा :-
x ५ गॅ म धै म मम म - ध म म गॅ - सा ग म गॅ सा निसा 1 1
जा .. SSS 55 ... . 5000 नी - 5SS
O ११ सा नि नि- म -- गॅ म नि< सनि निधे Aft - धै नि सो सो e w-सौ सो
ऐ 5 5 0 से . 5S .... SS 5 नि र मो SS S
X 0 नि नि निसा-" = सा सो -- नि निसा -- नि - धॅ निसा गे सा - नि सा- (- धे घँ नि-सानि"
ही - SSS .SS वा 5 s ब ल 05.0 •
११ सानि धम गॅमधेनि गे गॅ म घ निसी घ म -, नि'सा ग म धनि सो नि सो सो-घॅनि सा --- H1
मा . ... SS s, तुम उ त स म . ....
- यहाँ एक-षोडशांश लय-विभाग का प्रयोग है।
Page 166
[ ११६ ]
X
नि सी - - नि सो नt सौ नि - निल -सो मे गे मं गे सो -- नि नि - धे धे नि-सानि
ही · 55 . SSS न . SS ड गा
0 ११ म ध घ घ म धॅ म म ग - -, सा गॅ म गे सा -- गॅ नि सा ~-
व की .. 55, नी त . SS V/)
आलाप
x
गॅ सा साम सा गॅ म म 1 सा S
११ सा नी नी धूग नी -नॉ स नी सा -- नौ सा- नौ सागम धँनी स-नी -सा-घॅ-नी
पी ..... .-. -. -रगन
X O ५ म गँ सा नी सा गँम सा २) म गँसा नी ध नी सा गँ म
११ घॅँमम गँ -- मगग सा -- गसासा घु -- नी सा
X
३) सागे-सा गँ म-गँ। मघे -- ।धॅम मग गॅसा गॅम घ
११
म नी धे- ग घ म- सामग- नी गँसा- "
Page 167
[ १४० ]
x ५
४) नी सागॅम मगसानी - सागॅमध घॅमगँसा 1
११ 0 गॅमधनी नी घमग- मग सानी' -- गँसा मग म - मग धम घ नी घ सानी गनीसी -बॅनी 5) पी० 0 ..- पी० पी ० o.डर न
0 X
५) सा गँ म धँ नी नी सा ग म धनी" नी 'सा गम -- धुनी साग मध
११ सा सा सा गॅनी साघँनी सानी गॅनी मध सोस- म ग - ग सा -- पी . . . . र न
x
६) सा गॅ म धे नी सा गॅ म नी सौ ध" नी सो नी नी सो नी सा ---
9 ११
सा नीघँ म धॅनी सा सा नीघँ म गॅ म धॅ नी म गँ सा सा नी 'सा --- म गँ सा नी गँ म घँनी साग मध
x 0 सा नी सागे गॅ म घॅनी सा नी 'सा- -- सा नी "ध" नी सागमध सो नी सा ---
.9 सो नी धे ११ नी वै म सा नीघम धॅ म गे -ध" नी घ म ग -म धम ग सा सा -नीसा गॅम धनी सा घनी
पी. .. • रन
Page 168
[१४१ ]
७) म नी सा नी गे सा म गॅ घॅ म घँ नी वे सौनी पँसा पॉनी"
सा नी सा (सानी नी, गँसा सा, म गँ। गॅ, घॅ म म, नी" घॅ सौ नी"
ह ११ सो नी सो सानी नी -ॉसासा-मगग-धॅमम-(नी वॅधॅ-सनी नी- गसोस-रॅनी नी-
X
सो नी सा --- सो गँ नी सौै नी सो घॅ- 1
५ू नी घॅनी म- ध म म घँ गँ ग म सा - नी सा गॅ म घॅ नीसो - घॅ नी 1
पी l00000र न ११
सागॅनी सो -- , नी सागॅ म धॅ नी सौ - सो नी सौ गनीसो -- , नी सा गॅ म घॅ नीसो -धॅ नी
जा . . .5s,पी .. - र न जा . . .-- पी . .... . - र न
x u 0 सा गे म घे नी स गे सा नी नी सागॅम धे नीसो गे सा
नी "सा --- , सा गे मधे नीमो गे मे नी" सा गॅ म घॅ नीसो गे मे मं गै सौ नीघॅ म गॅ सा
११ सा नी सा गॅम धे नी सो गे सौ में नी, ध नी सा गॅ म घॅ नीसा 'गँ सौ नी" घॅ म गॅ सा नी X नी नी सा गॅ म घॅ नी सो ध म धॅ नीसा सा ध" 'नी सा ग
सौ मे गे गे सो नी घे म ग सो नी नी धे सा घ म म गे गँ सा नी सा, w 1 ११ -नी सागे धॅ नी सा गॅ म- सार्गे म - घॅ नी सा - धे नी
पी .. .. 5 पी · · 5पी. · डर न S S
Page 169
1
[ १४२ ]
X ह) सागे-सा गम -ग म धॅ -म धॅ नी"- धे
५
नी सो-नी 'सो गॅ-नी नी सो नी सो सा गॅ गॅ सा, गॅ म म गॅ 121212F218:5016N0
मधॅधॅम,धॅनी नी घनी "सो सानी', सो ग गॅनी नी सो नी सा ---
X O सा नी सागॅ गॅसा-सा, मनी" नीधॅ-धॅ, सो गॅ गेसो - सो, म नी नी" घे - धॅ धै नी 1 सो
नी नीसा --- मे गॅ गॅसो सोनी"-सो सा नी घ गॅ सो सानी नी धॅ - सो नी घम सा नी नी 'धे धॅ म - नि
११ मग नी" धे धॅ म म गॅ - धे म ग सा धॅ म म ग सा - -सा सौ -धॅ नीसा -, सौ - घॅ नीसौ -, सौ - धॅ नी"
पी ड र न जा s, पी S र न जा S, पी ड र न
Page 170
[ १४३ ]
बोल तानें X १) म वॅ नि ह नि ग म धॅ नि नि सा -- नि गँसा घॅ - -सो नि
पी इ · न जा 5 5 नी वे s Se 1प . या S S के
0 ११ सा सा धॅ - निध म नि म - धै म - म गे म सा नि सा गॅमधे निमे-नि- स सौ - घॅ नि खी • 5 ति . हा · 5 री शर 5नोo खी • री पी · डर न
X २) सा म ह निसो नि सा गॅ म घॅ नि सा नि" नि सो सो नि सा
पी ० र न जा · नी वे पि या
म म म धे नि सो सा निर नि धॅ नि- घॅ म धॅ- धॅ घॅ म ग म- गॅ म धे नि सा -- सा, धॅ -- नि" दे खी S ति • हा • री ऽअ•नो • खी री . .. त 5 पी• र न जाड डनि, जाS S नि
X ५ ३) सौ नि सा गॅ-सा, गॅ म-गॅ मघे-म,धॅ नि-धे निसो -सो
पी · 5ब,र•ड•न ·5.,जा5नीवे Sपि या सोनि गॅसो, निग्सानि घे सौन्धि, ११ मागे घॅ मग,साम गँ सा नि सा -सा मधॅ-म, धॅनि-धे।नि स- गॅसा धे नि नo x Do दे .. , खी ति• . म, हा. .री. 00.३० नो · 5 खी रीडत,रीडत री .sतपीडर न 20
ग' म घ" नि सो ग मे सो ग -- नि सा -- सो में
पी · र न जा · . नी वे SS पि या S5 दे·
११
मं ग- सानि - -ध मननि निध -म साम मग -- सा मनि" निध -- म सम मर्ग-सो सो-धॅनी" · . S डखा ते हा · 5 डरी त. नो• 5 डखी री .. s Sत री . · .s त री० •· डत पीड़ रन
Page 171
[ १४४ ]
x
नि' सा गॅ सा, सा गॅ म ग गॅ म घॅ म, म धॅ निधॅ
पी
५ 0
घे नि सौ नि', निसो गसोसो ग" मे गै, नि" सो ग"सो। धे नि" सो नि', म धॅ नि धे। गॅ म घॅ म, सा गॅ म गॅ
नीo o, वooपo या दे •, खी ० ते . . ०, हा . . .
११ निसा गे सा, गॅ सा नि" सा। म गॅ सा गॅ, घॅ म गॅ म नि घॅ म"घे, सौ नि धॅ निगं सोनि सौ, सोनि" धें नि
री . ., अ •नो . खी . . ०, री. . त · , पी •र नपी • र न,पी र न
X
६) गे मे गैमे, सो गसो ग/निसो निसा, धॅ नि धॅ नि"
पी .... र. . न . . ., जा. . .
५ 0
म घॅ म ध, गॅ म गॅ म सा गँसा गे, निसा निसा सा गॅ सा गॅ, गॅ म गॅ म म धॅ म धॅ, धे नि धॅ नि
नी. . ., वे .. . पि. . . या दे · ·, खी. . . ते . . ., हा . . .
ह ११ नि'सोनि सो, सोग "सोग। ग म ग मे, सो ग सो ग" नि सो निसा, ध नि धे नि।नि सो निसो, धे नि धॅ नि
री . , र. नो ·· ·, खी . . . री . . ., त . . . पी . . र न
X 0
७) गे मे गै सो गेसो नि सो सोग सौ नि सोनि धॅ नि
पी • · र · · न · जा. •नी वे
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नि"सो नि'धॅ निघॅ म धे। धॅ निधॅ म धॅ म गॅ म म धॅ म गॅ म गॅ सा गॅ गॅ म गॅ सा गँ सा निसा
पि· • या · · दे . खी · · ते • . हा री . •अ •. नो. खी० • री. .त .
ह ११ सा गसो नि सा निधॅ नि(सो -- सो, सो गे सो नि। सो नि धे नि सो -- सो। सो ग सो निसो नि"धॅ नि"
पी • • र · · न •जा ऽऽ नि, पी • • र • • न · जा 5 S नि पी . . र · न '
Page 172
[ १४x ]
xU [मं- गे' मे -- सो - 'गे'- सो गे -- नि'-'सो-निसी -- घॅ-नि'-धॅ नि" -- म-
पी Sर · SS न S आाS • नीssवेsपिs. या 5 डदेऽखीड ते SS हाड
११
धे-मर्घे -- गे- नि म-गॅम -- सा- मं-गँ म -- सो -सौ --- गे -सो म -- नि-धे --- सो -- सा-धेनि"ड
रीडअ SSनोड खीड•रीडsतsपीssरSSन डजाssS, पीड• रSनSजाऽSSपीडSडरनS x w X साग म म ध नि नि सा ग म -- गॅ म धॅ म गे सा गें म धे नि -- धें निसो निर्धेम
पी • र न 55 जा. ·. नी वे पि या S डदे· •• खी.
निसोगे ११
धॅ निसा गॅ-साग मगे सोनि निगग म निधे,धे न सानि घॅम, मधे निधे म गॅग मधे म गे साघे निशगेर नि वैनि
ते · हा sडरी •अर ०नो ० .सत्री, री० • . त., री० ·तत •, री० · · त •पी० • र • न S
तान
x १) नि"सा गॅ म धे धे म गॅ । सा नि"घ"नि"सा गॅम धे
निनि धॅ म गॅ म गे सा नि सा गॅ म धै नि" सौ नि"।धॅ नि'धॅ म गॅ म गॅ सा नि'सा ग म धॅ नि सो गे-
सो गेसा निधॅ नि धॅ म ( गॅम गे सा, नि सा गे म ।धे नि सो 'गे निसो -- ११ घॅ नि' धॅ 1
पी . . . ec ... SS
0 :) नि सा गे म गे सा, सा ग म धॅ म धॅ, गें म धॅ नि 3X
0 मे म, म धे नि"सो निधँ। धे नि"सो 'गे स नि,सो गे म गेसो नि" नि"सो गे सो। नि घै,घे नि सो न घँ म
मधॅ नि घॅ म गॅ, गॅम [धॅ म गॅ सा, नि सा गॅ म धँ नि सो -, घॅ नि सो - ।घॅ नि सो -,सो - घॅ नि ११
·... पीडरन १६
Page 173
[ १४६ ]
नि सा गॅ सा, सा गॅ म गॅ। गँ म घॅँ म, म घॅ नि घै
घे नि सो नि, नि सो, गँस सो 'गॅ म 'गँ,नि सो 'गे सो धॅ नि सो नि, म धॅ निधॅ गॅ म घॅ म, सा गॅ म गॅ
११ नि सा गॅ सा,साम गॅ सा। म धॅ म गॅ, म नि घे- सा - -- घँ - सौ - (- -ध - सौ - घँ नि
पी ड - 5SS पी 5 · 5 55 पी5 · 5र न
४) नि सा गॅ म घॅ म म गॅ । गॅ सा, नि सा गॅ म धॅ नि
५ नि धॅ घॅ म म गे गॅ सा। नि सा गँ म धॅ नि सो नि। नि घँ घॅ म म गँ गॅ सा। नि सा गँम धॅ नि सो गँ
ग सो, सो नि,नि धे, धेम म गॅ गॅसा, नि सा गेम ।धॅनि सो गॅ म- -- ११ म --- सा-धॅ नि
पी . . . .. SSS पी s s s पी ड र न
0 ५) नि सा गॅ म धॅ निसा -। -- धॅ निसा नि"धॅ म
C
गे सा निसा, गॅ म धॅ नि सो - गॅ --- सो गॅ सो नि घॅ म गॅ सा नि सा नि सौ गॅ म धॅ नि सा - 'गॅ- ११
- 'गॅ म गॅ सो सो नि' धॅ म गॅ सा, सौ- - सो -- सा - - धे-नि
पीs S पी ss पी sSरS न
गे सा निसा, म गॅ सा गे। घॅ म गॅ म, नि धॅ म गे
सो नि'धे नि, गे सो नि"सो म गे सौ 'ग, गे सो निसो सौ निधॅ नि',नि धॅ म घँ धॅ म गॅ म, म गे सा गे .
"गसा नि"सा,नि"सा गॅम । धॅ नि सा -, सौ - धॅ नि" १५ स --- , सो - घॅ नि" सा --- , सो - धॅ नि"
पी ड र न [ जा SSS, पी ड र न । जा S S S, पी ड़ र न
Page 174
१४७ ]
x ७) नि सा गॅ म गँ, सा गै सा। सा गँ म धैं स, गैँ म गे
घॅ, म्घॅम ।मधेनि स नि, धैनि धे ि नि सो गेसा, नि सौनि सो गैसो, निसानि, नसो
नि घनि धै, घै नि घँ,म घॅ म, म घॅ म, गा म गे गॉ म गॅ, ला गे सा, निसा। सो - धॅ नि
पी ड र न
गॅ म ग, मगँ, गॅ म गॅ सा नि सा, षे निं षॅ, घॅ
नि घॅ, घॅ नि घॅ म गॅ म गॅ में ग 'ग म गँ,'गँ मे सो नि सौं, वे नि घै, है नि घै, धे नि वॅ म गॅ म
गॅ म गॅ, गॅ म गॅ, गॅ म, गॅ सा नि सा, नि सा गे म।घ नि सा - नि सा गे म ध नि सो - सौ - धॅ नि
पी • .. र • न 5, पी ... ३• न 5 पीडर न
ह) घम म, वै म म, ्घ म म ग गे सा, सौ नि नि,सो
सो नि नि षॅधॅम मे गॅ गँ, मं गँ 0 गे सो, ग सौ सो नि, सोनि। नि घॅ, नि घॅ धँ म, घँ म
म गॅ, म गॅ गँ सा, सो नि। नि सा नि नि घॅ --- नि सो नि सो नि नि घॅ --- सो नि नि घै नि नि ११
पी .e र न जाऽ5डपा र न जा55पीर न
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[१४८ ]
राग मालवकौशिक
त्रिताल
गीत-३
स्थायी-पग धूँगरू बाँध कर नाची।
अंतरा १-विष का प्याला राणाजी ने भेजो, मीरा पीवत हासी।
२-बाप कहे मीरा भई बावरीं, लोग कहें कुल नासी।
३-मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, मैं तो तेरी दासी।
स्थायी
x 0 १३
सा गॅ म सा नि सा नि
प ग घ ग रू बॉ घ
नि सा म
ना . ची S S
अन्तरा
म नि नि
म
का, S प्या ला
नि सो नि सा नि सा नि नि- सा सा सो 1 1
रा 5 मी S रा. . बु व
घे नि म 1
हा सी S S
अन्य अन्तरे भी इसी प्रकार।
Page 176
[ १४६ ]
मुखड़े के प्रकार
१)नि सो गे सासा गॅ। म गॅ गॅ म म म गै सा सा सा
ना रू घ र 6प. २)ग सा/नि साम गँ सा गँ। घॅ म गे म म नॅ गसा
ना . प०
३)ग सा सा, म। गे गे। धे म म, ध गे सा 35
ना ची
४)सा गॅ ग,साग म म ग म ध घ म ग म म ग 39
ना० .. ची ना • ची
५)निसा गम -म सा ग म घ - म म गग सा
ना o l . . डची ना चीप . ग
६)म ध /म घ ।-घ ग म ग म -म म ग गे सा
ना . 5 ची ना 5 चीप
७)निसा । ग म नि® घ घ म म गै ग
ना . ची
=) निसा( ग म[घ नि। सो म म ग ग सा 35
ना . ची ग
ह)नि"सा गे म निसोनि ।निधघ म म ग 35
ना . 100 ची प .
म १०) सोसानिनि-नि निनि घ म म म
ना . . . s चीना . S ची प ग •
नि ११) नि सा ग मध नि सा ग सा म ग ग सा
ना • o ... ची प . ग
१२)व म /निंध(सोनि। गॅ सो गॅनि। सा -ग सा
ना . . . s प ग
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|१2० ]
१३ 0 १३)सो 'गे ग सानि सोसा नि ध नि" निध म घघि म
ना •
१४) निसा गे म ॅ नि सोग नि साध नि म घ म सा गॅ म गे सा "9
ना 10 ची प . ग
१५) सोग नि नि सो धॅ नि म म धॅ सा गॅ म सा 95
ना • ची ना ० चीना ची प . ग घ घ . बा
ताने
१) निसा गॅ म (ध"नि] सो (ध" नि(सा निघ 'म सा गॅ म सा नि सा ध नि
ग रु बां ध क र 4.
२) निसा गॅम धॅनि सानि सा "'
३) निसा गॅम धॅनि साग सानि सा नि सा CK
४) निसा गॅग साग म म गॅ म घे नि धे सो घॅ म गॅ सानि सा
- गगसानि धेम गे सा नि सानि म ग सा नि सा गॅ म नि साध नि
घ बां डघक र
५) निसा [ गे म ।गे सा,निसा ग म घॅ म गॅ सा सा गे म धे नि। घॅ म ।गे सा, [नि सा ग म धॅ नि सोनि
घॅम गॅ सानि सा गॅ म ै नि सोग 'सोनि म सा नि सा गे म नि सो गं म गसानि धे म
गॅ सा, नि सा गॅ म [घॅ नि सो गॅ म धॅ नि सा में म [धॅ नि सा गॅ सा गॅ म गे सा।नि साध नि"
प गघंघरू वां डघ/क र
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[ "' ]
१३ गे गे सा सा म स म म नि'
X घॅ सौ सो नि नि गे सो सो ग सो सो नि
0 धॅ म म सा म सा नि सा नि® ISi
· घ घ क 의 . X ७) सो गॅ सौ सो गे सो /नि"सौ नि/ निसो नि" धॅ नि घॅ घे नि धे म ध म म धॅ म
गं म गॅ गॅ म गॅ सा गे सा। सा गॅ सा म गॅ सा नि”सा ध" नि'
घू' 8 रु बा 5 क र X ५ 5) नि सा गँ । म गॅ सा सा गॅ म धं म गे गे म धे नि ध म म धे नि स नि ध
१३ O नि सा नि धॅ नि धे म म गॅ म गॅ गॅ म गॅ सा नि सा घ" नि'
घू" घ रू बां ध क र X ६) म म ।म सा म ध म गॅ नि' निधे नि धॅ म।सो सा नि। सो नि धॅ
ग गे सो गॅ सो नि। सो सा नि" १२ सो नि धॅ नि नि'धे नि धॅ म धे म धे म गे
x गॅ म गॅ म ध म धे नि धॅ निसा नि" सो गॅ सो म ग सो गॅ सो निसी नि"
0 १३ धॅ नि धॅ म धॅ म गॅ म गॅ। सा गॅ सा गे म सा नि सा धु" नि
घू घ बां कु र X १०) निसो गे। मे गॅ सो। सो गे मे गॅ सो नि धॅ नि सा गैं सा नि/ निसा गे। सो नि'धॅ
0 म धॅ नि सा नि धें धे निसा नि धे म गॅ म धे नि धे म म धॅ नि। घॅ म गे
Page 179
[ १५२ ]
X गॅ म ध म, म धे नि घॅ, धे। निसा नि' नि को गें। सो, धे नि", सो नि', म। धॅ निधॅ,
१३ गॅ म धॅ म, सा गॅ । म गे नि सा गॅ सा गे भ गॅ सा नि सा ध् नि'
घू' घ रु बां · ध क र
X ११) सा निनि गै सा सा। म गॅ गॅ घॅ म म नि' धॅ धॅ सो नि नि। गे सौ सो। में गे गे
'गॅ सौ सौ। सो नि"नि"। निधॅ धे ३ ध म म मे म म ग, म ध धे म, घँ। नि' नि धॅ
नि' स सो । नि', सो गे। X गे सो, गॅ में भे गे सो गॅ सौ, नि सो ( सो नि, घॅ। नि नि घँ,
१३ म धॅ घॅ ।म, गॅ म म गॅ, सा गॅ गॅ सा म सा नि सा धू नि
घूं, घ रू बां 5घ क र
X गम सो ग ५ १२) निसा में
१३ ध मं में सै सो निv ग सो सो नि 1 1
x ५ नि"घ ध म घ म म ग ग सा 1
१३ 0 ग म ग सा नि सा ध' नि
घ रु बाँ S घ क र
Page 180
[ १५३ ]
राग मालवकौशिक
त्रिताल
गीत-४
स्थायी-कैसो नीको लागो मां, ये बनरा मोरी शांखन मा। स्थायी-गवो सखी मिल मंगल गावो, आज मोरे घर काज।
स्थायी
X. 0 १३
ना नि सा धे म
नी को
नी वॅनि म म म धॅ नी सावॅ नीनी ग नी सो धे म 1 1
ला . S S S ला गो मा० के सो नी का 0
नी सा म सा सा गे सा म 1 1
ला S S S व न रा S S मो री
नी
सा सा नि 'सा गॅ म घॅ नी सो सो 1
S ख न मा • S
अ्न्तरा
नी
म म नी सोधे नी सा -1 सा सो
S वो स स्वी S म ल • मं S ग ल
नी सौ सो सोग नीv सो सा गसा गं - सो सा गंग स,सा सानी नी नी 1
गा • वो 5 की ज मो रे घ र 1 का •
म म घ, घ। घ म, म ग गॅ सा,नी सा गॅ म धॅ नी सा नी" सो नीम 1
न . मा o S क .
२०
Page 181
[ १५४ ]
राग मालवकौशिक
त्रिताल
गीत-५
स्थायी-शद्या स्मर दमना शंकरा, डमरू वर करा, अमल निधान।। अंतरा-१-कंठी गरल नेत्री अनल, शीर्षि शशिघरा, डमरु वर। तंतरा-२-भूतात्मा, परात्परा, महेश्वरा, उमावरा, प्रवरा, नवरा, न वरा दूसरा, पूरा करा, सुरा दिगम्बरा, शंकुरा, डमरू वर०।। अंतरा-३-ब्रह्माच्युत युत गाती, मुनिवर योगा, वरि वरि वाचे उनि पर राहे, गिरिवर माहात्म्य अपार, श्रुतीस ना पार ।।
स्थायी
सा म नी सा म सा नि नी 19
द्या स्म र म
नी सो सा म म मग नी स नीv नी 1 1
ना S शं रा .. S म रू व क रा के
म म ग सा 1 1
म ल नि घा 5 ना S
अंतरा-१
नी
म म म नी सो सो नी घ म नी 1 1
S ही S ग र त ने S 5 न ल शी
सा म नी" नी घ म म नी सा नी नी 1 1
षि S शि शि घ रा S ड म व क रा
घ म सा 1
म ल नि घा S ना S
Page 182
अंतरा-२
O १३ ना
म म - नी" .--- 1 11 1 1
S S ता त्मा S प रा S त्प
नी सो सा सो म ग म 1 1
रा S म S S रा S मा. S
ग घ नी ध नी 1 1 1 1
रा S S S प्र व रा S न रा S न व रा S
सो नी सा सा नी सा नीv म घ ग 1
दू स रा S रा S क रा सु रा S दि गं S 5
म सा म घे म म गॅ ग घ नी सी नी घ 1 1
ब रा S शं S रा०. S म व क रा
म म गॅ सा नी- सा म सा नी नी 1 1
त्र म ल नि धा S ना S श्रा द्या रम र द म
अतरा-३
सा सा सा नी सा म म म 1 1
ब्र S ह्मा S च्यू त यु त गा S ति S मु नि व र
घॅ नी म नी नी सा नी ME SiE 1
यो S गा S रि रि वा S चे S उ नि प र
सा सा नीv म सां नी धँ नी म 1 1
रा S S गि रि व र म हा S त्म्य त्र पा S र
म धँ म म सा नी सा म सा नी 1
श्र ती S स न पा 5 र त्र द्या स्म र द
Page 183
[ 8k& ]
राग मालवकौशिक
तराना-त्रिताल गीत-६ स्थायी-तों तनन तन देरे ना तक्धारे दारे दानी तदानी, नाद्रे तुन्द्रे तदरे दानी। अन्तरा-यालेमो यालि यलाय यलाय लाले, तन देरे ना तन देरे ना तदान्तो, घा किटतक धुमकिट तक घित्ता कड़ानूधा कड़ानूधा कड़ानूधा।। स्थायी
X ५ १३
सा म सा
तों S त न न त न दे रे ना
म नी सा सा म म म म म 1
त क घा नी S ता दा नी त • दा S ना AV
ग ग सोनी सो म सो 1
दा S नि
अंतरा
सा सो सा नी म म म 1 1
या S ले S मो S या लि ला य य
सा सो सो सा सो मं सा सो घॅ नी 44
ला य ला ले त न दे रे ना त न दे ना
नी म म सा सा सासासा मम म म म म म म सा सा सा 1
त द S तौ घा कि टत क धु म किट त क धि त्ता कड़ा ड न् धा क्ड़ा
नी सा सा सो 1 I.
घा कड़ा S न् घा S तो
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राग मालवकौशिक
ध्र दपद-चौताल
गीत-७ स्थायी-आये नघुवीर धीर, लंकीस त्र्प्रवध मान, संग सखा सुगरीव और हनूमान। अन्तरा-रहम रहस गावत युवती, जग वंदन विधान, देव कुसुम बरसत घन, जाके नभ विमान॥ स्थायी ११
सा नि सा ध नि सा म
S र घु वी र
म म 1 11
ले S घी S स मा S नु
म नि 2144 म
म सा सा नि सा 1
सं स खा S द
सा
म ध नि ध म A : गॅ म सा सा 1
री • श्र S ह नू मा न 과
अंतरा नि
म नि सा सा सा सा
र ह स गा S त व
नि- सा सा नि सा नि® म म 1 1
वी S ग बं S द न वि घा S न
सो सो सो सा घ
S व कु सु म र स त घ न
म म ध नि धं म गे म सा सा
जा S के • न भ वि मा न
Page 185
राग भैरव नि सा आरोहावरोह-नि सा ग म घॅ, नि सी। सौ निधँ प, म ग रे।स।
जाति-शरड़व संपूर्गा। ग्रह-मन्द्र निषाद, तानों में गान्धार भी। अंश-पूर्वाङ्ग में कोमल ऋषभ और उत्तरांग में कोमल धैवत। न्यास अपन्यास-शृषभ, धैवत और मध्यम। विन्यास-मध्य पड्ज। नि ग मुख्य अंग-ग म धँप, ग म रलसा। समय-प्रातःकाल। प्रककुति-प्रौढ़ गंभीर। रस-रौद्र। विशेष विवरण
भैरव एक प्रौढ़ गंभीर राग है। उसमें ऋृषभ धैवत कोमल लगते हैं। अन्य स्वर शुद्ध हैं। गान्धार निषाद का प्रमाण अवरोह में अल्प है। उसी से यह राग खुलता है। सामन्यतः इसका आरोह-अवरोह- सार ग म पधॅ निसौ। सौ नि घॅ पमगरे सा। यों कुछ अनजान लोग करते हैं। परन्तु उपरिलिखित आरोहावरोह ही गुगीजन-सम्मत है। और वह अनेक दृष्टियों से योग्य भी है। क्योंकि उससे रामकली, कालिंगड़ा आदि रागों से सहज ही में बच सकते हैं। ग इस राग में धैवत और ऋषभ पर विशेष प्रकार के आन्दोलन दिये जाते हैं। सा-गम रे V, यों ऋृषभ पर न्याल करते समय मध्यम से गभीरता-पूर्वक मींड़ से गान्धार को लेते हुए उतरना चाहिये। वहीं पर मैरव का 'मैरवत्व' दृष्टिगोचर होगा। तद्त् आरोह करते समय ग म धॅँ के धँ का उच्चार निषाद को छूकर आघात के साथ करना चाहिये और अवरोह करते समय भी निषाद को अत्यल्प छू कर धैवत पर उतरना चाहिये और पंचम को थोड़ा दिखाकर मध्यम पर ठहर कर मींड़ से ऋषभ पर जाना चाहिये और अन्त में सा पर पूर्णा न्यास करना चाहिए। इस राग में पंचम के अल्पत्व का ध्यान रखा जाए; ऋृषभ धैवत के अतिरिक्त मध्यम का बल भी ध्यान में रखा जाए। निषाद के अल्पत्व की ओर इससे पूर्व ध्यान खींचा ही गया है। आरोह में पंचम वर्ज्य है और अवरोह में भी उसका अल्प प्रयोग है। पंचम पर अधिक ठहरने से राग का गांभीर्य तो नष्ट होगा ही, किन्तु सूक्म दृष्टि से देखनेवालों को पंचम के बढ़ने से रामकली का भी आविर्भाव होता दिखाई देगा। कोमल निषाद का अल्प स्पश इस राग में ग्राह्य माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थों में भैरव में मध्यम को ही ग्रह, अंश न्यास स्वर माना है, किन्तु प्रचार में भैरव का जो स्व्रूप है, उसे देखते हुए उपर्युक्त विवरण ही अधिक युक्त है। तानपुरा मिलाते समय इस राग में पंचम की (प्रथम) तार को मध्यम ही में मिलाना समुचित होगा। उससे बड़ी सहायता पहुँचेगी। साथ ही इस राग के गंभीर और प्रौढ़ भाव की अभिव्यक्ति के लिये और कोमल ऋषभ-धैवत की संवाद-संगति के लिये भी यह प्रयोग सभी हष्टियों से उपयुक्त होगा।
Page 186
[१५६ ]
राग भैरव
मुक्त आ्रालाप
ग 8 नि श। र सा धु् सा। रे रै सा ति सा धत नि नि
नि जिसा धn, धे निसा धै्य, धू निसा रे।जक्षा। नि ग
(२) सा, सा धr, रे-रे सा निसा धn, सा - तिसा घपार सा, रे सा नि धू नि नि नि ध
नि धm गम धn, सा-निसा। नि घ
(३) सा,ग म रn, निसा गम रn, रेर सा नि सा म "रAv, र -रे सा, ग
नि ग ग - ग रे, म n, सारे, सा ग, म गN, निसा ग म र, घु निसा रे।सा।
(४) निसा ग, सा ग मरेn, नि सा ग म रn, गमपमगरA, नि सा रै रे म रे रे
म म प प M सा ग nmn, म रYजसा!
नि रे म प नि नि नि (५) नि सा ग म ध, नि ि सा ग म धेत,
म प प नि म प प प ग म प गम प ग म हँ, ग म प प म ग म ध, धे धे प म प -म, ग म रM, सा ग म प,
पग म गर म सा रेलसा।
*यहाँ आघात के साथ धैवत पर निषाद का कएा लेना है। मध्यम से ऋपभ गंभीरता के साथ मींड़ से श्रए और घैवत को निपाद का करा देकर लिया जाए। पंचम का अल्पत्व और मध्यम का बहुत्व इस राग को स्वाभाविक रीत्या गंभीर बनाते हैं। किन्तु भैरव का भीषरात्व कोमल ऋृषभ को मव्यम की गंभीर मींड़ से लेने पर एवं कोमल धैवत को निषाद का आघात देने पर ही व्यक्त होगा। भैरव के भैरत्व की अभिव्यक्ति के लिये ये प्रयोग आवश्यक हैं। अ्रन्यथा कोमल धैवत और कोमल ऋषभ इसे करुणा की ओर खींच ले जायँगे, जो कि तभीष्ट नहीं है।
Page 187
[ १६० ]
नि नि (६) रे रै सा नि साग म ध, घँ घॅ प म प पप ग ग म ध रे रे सा नि सा
ग ग नि नि नि म म ग सा ग पपमम ग ध धु नि सा रे, साग म धँ नि सा रेM
नि सा ग म ध, प- मग रे, सा।
नि सा रे मप नि नि (७) निसाग म घँnn सो -निसी, निसागम घ सो - निसो, नि सागम घँ
सो निसो, सा ग गम म प ग म घं सौ -निसा, रेरे सा निसा गम ध सो - नि सो, सा ग प नि नि प
नि नि सा सा सा ग र सो निसी n, सौ नि सोनिसा ग धपम गम, ग म गम
ग रेसा। नि सो (८) निसागम पगम घे r सो - निसा, रे रै सो नि सो रैसो नि सो,
नि सौ है सो सो ने घै नि सो गँ, में रn, सो -निसी, रे र सो निसो मे-गै म, रमे मे गे न- सौ सौ, सौ
मेसलसा नि सी,रै रे से नि स धॅ धॅपम पपमगम पमगर, सा-निसा। सो प म
सा रे म पनि सौ रै' गँ नि (६) निसा ग म धे नि सी र; निसा गम धैनि सो रेn, ग म धॅ
नि सा n, निसा रे गम धॅ नि सो गं ग नि सानि रेसामग प म गम
प सा मग पम निधेसौ निरे सो रnnn, सो-नि सो, सो -नि रे सो नि छप-मप मगरै/
सा -नि सा।
(१०) रे रे सोनि सा रेजप प म ग म घेरे रे सो नि सो रे n सो-नि सो सा नि गे
Page 188
[ १६' ]
सा ग् ग नि म रे A, नि सा र, ग म धॅ, नि सो रै, गे मे धे, में रnसा नि सी।
सा र- रे सो नि सी, सो-सो निध नि, -निन घॅप व, धनधॅ पम प, प-प म ग म, म - म ग सा
प ग सा ग म रेसा -नि सा।
सा सा नि सा सा सा सा सा सा म म ग म म म धँ ध प (११ ) रे रे-सा सा, ग ग - रे रे, म म - ग ग, प प -म म, ध धे -प प, नि नि धॅ धॅ,
सौ सो -निनि, हे र सो सो, ग ग-रे रै, म म -गै गै, मै घँ सौ सो निस सौ सो सो सौ पं ग सा नि सो, सो ध म रै नि सा
म रेसा धnun, नि सा रे/सा। रे नि गा
(१२) धूँ निसा रे - रे सा निध सागमर्घँ- पमगरे मधॅसो रै - सो निध नि
धॅ नि सो ग-मे गे रै सो नि सा, ध निसा धु निसा ग ग रे -,सा ग म सा ग म नि नि षॅ-, धे नि सो
धँ नि सो गे ग रे- सो नि तो, ग -ग रे म - म ग नि-निध सौ - सो नि 'रे-रे सी गैग रे
सो - नि सी, निसा ग म धँ;ग म षॅ नि रे; नि सो गंम धँ; में रे; सो निसा, रे -रे सौ नि सो नि नि'
रेसो नि घँ; घॅ-धँ पम पप म गरे; सा ग मधँ; धँ नि सा रे; रे सो नि घ; प म ग रे; सा निसा। नि
राग भैरव
मुक्त तानें निसागम पपम ग रे सानिसा; पपम ग रे सानिसा; गमपप मगरेसा; निसागग
साग म म गम प प म गरे सा घॅघ प, प प म, ग म प प म ग सानिसा निसा ग ग
२१
Page 189
[ १६२ ]
साग म म ग म प प, मगरे सा; नि सा ग म -मसाग मप -प मगरे सा। निसा ग म
घॅ घँ प म प प म ग रे सा नि सा धँघॅ मप धॅप म प प म गम म ग रे ग सग म प ग म प म
ग प - प म गरे सा। निसाग म पधे प- -पमग रे सानिसा। निसारे सा साग म ग
गम पम म प ध प घँ नि सौ नि घँपमग रेसानिसा। नि सा ग म घँ नि सो नि घँ प म ग
रे सा नि सा। सौ नि धॅ नि सो रे सा नि घँ प मग रे सा नि सा। सागमप म गरे सा,
घॅ नि सो रे सो निघँप, सा निधँ नि सा रेसो नि घँ प म ग रे सा निसा। साग म प
साग म प म ग रे सा, घॅ नि सौ रे घँ नि सा रे सौनिवॅपमगरे सा। निसागम धॅ निसो रे
सानिधॅप मगरे सा, घॅ - - नि सौ रै सौ नि घॅ प म ग रे सा नि सा। घँ नि नि, धॅँ नि नि, धे नि
सौ रे सो नि घपमग गम प, ग म प ग म प प म ग रे सा नि सा। सा रे सा सा रे सा सा रे
रेसा, ग म ग ग म ग ग म म ग म प प म पपमप पम, पध प,पधैप पधधँ प, धँ नि धेँधँ
निधँघॅनि निधॅ, निसो नि, नि सा नि नि सो सो नि, सौ रे सो सो रे सो सो रे" रेसौ - नि
घँ पमग रे सानि सा। मगरे, म म ग, धँ प म, धेधॅ प नि सो नि, रै रे"सौ, सो नि धैँप म ग
रेसा -- । गरे रे, ग ग ग रे सा निधॅ घॅ, नि नि नि धॅ प म ग रेसा । ग रे ग -- गरे सा,
नि घॅ नि - निधॅप, गरग- -गरे सो सो निधेप मगरे सा। सा -रे - ग - म-
निं प - -प मगरे सा ग - म - ध-सा - ३v - सो नि धॅ प म गरे सा। सा ग म प
सापम ग रेसा, धॅ नि सा रे घँ र सो निधॅप, सोगमेपे सो पेमेगे रैसौ, सौ नि घॅप मग
रे सा - -। सौ प - प म गरे सा सानिषँप, सो प-पै मगरे सी सा निधॅ प
सा ग भ म गरे सा। रे रे सा नि सा, म म ग रे ग, प प म ग म, ध ध प म प, सो सौ निधॅ नि, रै रैसो
मे सा सा नि सा, म म ग रेग, पं प मगंमं, मे ग रे सो सानिधॅप मगरे सा। सारे रे, रे गग, ग म
ग प नि म, म धॅ घ, धे नि. नि, नि सौ सौ, सो ३2v , रे गोगे गेमेमे, मे पप, मेंगे रैसो, सो नि घॅ प म ग
Page 190
[ १६३ ]
रसा -- सा रे ग म सा म म ग रे सा, रग म प रे प प मगरे, गमपवे गधॅ घे प
मग, म प धे नि म नि नि घ प म धँ नि सो रे धेरे रे सो निधॅ, प प म ग रे सा। सा रे ग म
-मसाम मगरे सा, र गम प - परे प पमग र, गम पधे -धँ ग वँ धॅ प म ग, म प धॅ नि
-नि, म नि निधॅप म, धँ नि सौ रै"- है" सौ निधॅ घ प, प म म ग, ग रे रे सा -- ।
सासा सा. प प प, सा सा -निर्धेप म गर सा, रे "रे, घँ घॅषॅ, रेंर - रे सो नि धे प मग
र सा गगग, नि ने नि नि, गं ग रै सौ, सौ नि वॅँप म ग रं सा, म म म, सौ सौ सो,
मेगेमेमे रे सो, सोनि धेपमग रेसा - -। निसाग म घॅ नि नि सो ग से पे पे में गै रै सो
सोनिधॅप मगरे सा। सार सा, सा रे सा, ग म ग, ग म ग, धॅ निधॅ े नि धॅ, नि सो
नि, नि सो नि सौ रे सौ, सो ३ै सौ, गै म गं, गे मे ग, रे ग मेगै ३ैसो, सो नि धें प म ग
रेसा -- 1 सार गम गर, रे ग म प म ग, ग म प ध पम, म प ध नि धँ प प घॅ नि सो
निधॅ, घँ नि सी रै सो नि, निस रे सो निध,घँ नि सो निध पधे निध पम, म प ध प म ग,
रे गमग रे सा - -। रे सानिसा, गरे सारे मगरे ग प म ग म, घँ प म प, नि धँ प घँ
सो नि धे नि, रे सो नि सो, गेरेसो रै, में ग रै गै, पे में गे में, गमे ये मं, रें गमे ग, सौ रे गेरे
नि सो र सौ, धँ नि सो नि, प धॅ नि ध, म पध प, गमपम, रेगम ग, निसार सा। रे गमग
रेसा, घॅ नि सो निधँ प, रै गमेगे रै" सौ, सा नि घैपमग रे सा - -।रेगरे गम गरे सा,
घँ नि धॅ नि सो नि घँ प, रे गरेगे मं गे रैसो सीनिधॅप मग रेसा। सारे गम साममग
रेसा, रेग म प रे प प म गरे, गमपध गधँ घँ प म ग, म प धे नि, म नि निध प म, प धँ नि सो
पासों सौ नि धँ प, धॅ नि सो रे ध रै" रे सो नि धॅ, पधँ नि सो प सो सो नि धैँ प, म प घॅ नि म नि निषॅ पम
गमपध गघॅधॅप मग, रेग म प रेय प म ग रे, सा रेगम सा म म ग रे सा -- ।
Page 191
[[१६४ ]
राग भैरव
खयाल-विलम्बित एकताल
गीत-१
स्थायी-जियरा उनी सों, ना मोरे पिया को वेख, उन बिन, उन बिन रहिलो ना जाय, रे माँ। अन्तरा-वेग व्यथा सब, भोर भईला, दूबर भइला, का सों कैय्ये, कौन खबरिया भी सुन ले, मा।।
स्थायी
११ 0
ग नि नि नि प प म म प ग म- म घॅ -- घ-घँ- प - मप - - नघॅ ध-म प
जि .. 5- .. 5S. SOS रा 5. 5 ड Sउ ·Sनी ·5
X O ५ सा सा म गम =-- प - प म गम- प म ग रे सा निसा --- 1
सों .. SSS . S .... SS S · . SSS
११ 0 सा र नि" नि रे-रे सा निसा -- रेम- मपग- म - -गम नि घॅ-घॅघॅ I
नाड .. णSS 5 मो 55· रे - 55 .. SSS पि.०S याड 5.0 · S· SOSoS
५ प प सप -- w घँ-घॅप मप- म म म - रे'
को वे डos e. 5SS उ · S न 5 5
११ 0 नि ग नि सा ग म नि* सा -- नि सार- रे सा नि सा -- ध नि सा ग गम सो
बि5ड. .. 5 = न न वि न र . हिmm लो
Page 192
[ १६x ]
सो नि सो सो सो - सो धँ नि ध वनि
ना or जा . 5 . य . . SSS . S .. S
११ म प ध- घॅप मप -- म - गम -
मांड . .055 .5O. S
अंतरा
११ मनि घे म प ग- धँ सा नि सो-३ ३
वे .. 5m2 था
X
सो नि सा- निधॅ - नि ध- नि धॅ - नि घॅ- नि सो सो
. . SSS भो • 5 .. 5 र ला
११ 0
सो रे नि -- सग म सा -- 4 सौ -- रे सो म नि पप - -म
दू .. SS व SSर मै 55. " ला2 का · 5 5 सों.n
X 0 ५ म प नि - धप सप-44 म म गग् म -- साग गम प प घ ब4 सा क 5 .. . 5 5 ये ·s 55 को• नखव रियाड•मी सुलजन् ले
0 नि धॅ प म घँसा सोनि निघ घॅप यम गम --
मां ....... .... SS
Page 193
[ १६६ ]
आ्ालाप ५
१) म --- , पगम- रे सा नि सा ---
११
रेसा नि ध a सा ग म प - म प- प ध - मप-
जि य रा 5. उ . S ना
x घृ-सा नि रे -- सा म - -ग प म ग म रे X
११ 0 सा नि सा 99
x ३) नि सा ग म प म ग म घ म ग म प म ग म- 1
११ 0 सा
x 0 नि
४) नि सा ग म प मपू ---
११ म - 3
वँ-घ प, म प -- प -प म ग म -- सा -, ग म घं- प प म
जि य रा 5, उ नी
X नि ५) नि सा ग म सो नि स ---
0 ११ ३सो निधॅ- प प म ग म- रे सा प ध -म प- . .
उ . 5 ना • s
Page 194
['६७]
x नि नि सा ग म सा नि सा --
0 ११ नि र-र मा निसा -- प-पम गम -- व -ध प म प -- सा नि सा#
X नि र-रे सा निसा -- - घ प म प -- म प - पम ग म --
११
सा नि सा -- म ग प - मप- प ध - म प-
जि य रा 5 . 5 उ · 5 नी. 5
x ५
७) नि सा ग म 1 सा नि सा --
११ 0 धॅ नि स ३ सो नि सा - - गम। षॅ -- निसो
५ 0 x सो नि सो ३ सो नि धे -1 प घ प म प- म
११ म
प म ग रे - सा नि सा -, ग म घ -, ग म व- गम घे-, प प
जि य रा S, जि य रा s, जि य रा 5, उ नी
गं x u X नि सा ग म. सो
0 ११ नि सा --- नि सो ग म पे मे गा मे मे सो नन सो .-
Page 195
[ १६= ]
X ५
सा सो सा म - -ग रे सा -- निध मं -- ग रै सा - - निधॅ म - - ग रे
११ W म म
सा नि सा --- ग म घॅ - प प म - म प म - प म
जि य रा ऽ उ नी सों 5 उ नी सों s उ नी
X ५
ह) नि सा ग म प म ग रे ग म घँ स रै सो निधँ 1
११ 0 नि सा ग म प म ग रे सा रैसौ निधे 1 प प म ग रे-
X सा निसागम धा गमधॅ सो र नि सो गमे धv मं- -गं रै। सो - - नि घॅ
म 0 म -- ग रे - सा - ग म घ-, नि सा रे -, ग म घॅ -, प प
जि य रा 5, जि य रा S, जि य रा s, उ नी
बोलतानें
x
१) नी सा ग म धॅ नी सा- -- सा रे सो नी धॅ-
जि यरा .. . .5 SS उनिसों . .5
५ O म ग रे सा, सा -- म ग - -प म -- नी घे -- सा नी -- र सा -- सा धॅ -- नी
.. . ., ना 5 5 मो रेSs पियाSs को वे s s ख उ ड 5 न बि SS न र SS हि
Page 196
[ १६६ ]
न प - - धप म - प म -, ग म ्ध - प प म -, ग म ६ = प प म -, ग मर्धे - प म
लो s S न जा • s य मा S, जि य रा ऽ उ नि सां 5, जि यरा ऽ ३ नि सा 5, जियरा 5 उ नि x २) सा - सा -- र सो नी घॅ प म ग र सो नी सा
जि इ य SSरा 3 नि सों . . . . . ना 0 ग म ध् --- ग म वॅनी र - -- सा रे नी स - रे सो नी धॅ प =- पनी घैपधेप
.. . S55मो या · 5 को वे · ख़ . डडउन बिनरहि ११
घॅ. - म प - ग म म ग म नी नी धे -- म गम नीनीधे -- म ग मनी नी धॅ प म
लोSन जा s य मां-। जियर . . .SS जियग . . .55 जियरा उनी X 0 ३) सा - ग - म- घ- - -सानी सा -- ब
जि ड य S रा S SS SS उ निसों s S ५ 0 धॅ- नी - सा-रे. -- मंगरे सा नी सौ । धॅ सौ - नी रे सा नी धॅ प नी सा ग म ग म धे-
ना - 5 . 5- ssमो•रे .. . पिया S• को वे • ख उ न बिनरहिलोS ११ घॅ नी-रै सा-, ग म धॅ - घॅ नी -रसो ग म धँ - धॅ नी-३ै सो नी नी धे घॅ प प म
न जाडय मां 5, र हि लो ड न जा ड य मा S र हि लोड न जा ड य मा · जि य रा• उ नि x
४) सा सा सा ग ग ग म म म, धँ घॅ घॅ, नी नी नी
जि • •य . . रा . • उ . •नी .• सां
सौ सो, मे मंगै, गै गे रेरिरैसो, सौ सो नी, नी नी। ५ धॅ, ध घँप, प प म, ग म-, ग म धॅ नी सौ रे
· • ना • •मो . ब रे · . पि • . या . · को · • वे • ख • 5, उ न बिन रहि . w ११
रैनी - नी घॅ -- घॅ नी नी नी धे प -- , नी घ -- घॅ प -- नी धॅ -- घे प-, म प ध - प म
लो · s न जा s S य मा S S, न जा s ड य मा ड ड न जा · s य माड जि यरा Sउ नि २२
Page 197
[१७० ]
X नि सा ग म प निधॅ प मग रे सा, ग म धॅ नी ५) जि य ग. उनि सो. . .,ना ..
0 सोरे' सो नी घे प म ग। घै नी सो गे मे पेमे गे [रे सो नी वॅ, सो रे सा,नी सौ नी, धॅ नी वॅ, प धॅ प
... मो · रे . . पि • या .• •को दे · ख · उ . . न । · • वि . .न . .
नि ११ प ग म - म घे - नी सा -, रै नी नी - नी घे घँ-, नी घँ घँ - धॅ प प -, ध प घ म प ग
रहिलोsम जाडय माS, जि य रा Sउ नि सों S, जि य रा S उ नि सों 5, जि य रा ड उ नि
x O
६) सा - ग - प --- म ग रे सा, म - ध-
जि ड य S रा 5SS उ नि सों S, ना 5 मो 5
0 सा -- रे सो नी धॅ प सो - गं - पं-# मे ग रे सौ, सो गे गे रेसो रैरे सो, नी सो सो नी
रे55• पि• या• को s · s · S55 दे · ख · उ • न • बि • न • र• हि .
११ घॅ नी नी धॅ, प धे धॅ प प ग म - गेमधॅ नी सा -, ग म धॅ नी सौ- ग म धॅनी सा - धॅप
लो • न • जा • य मा· ·- जिय रा. • - जि यरा ... जि यरा• •- उन
X साग म प सा प म ग रे सा, म धेनी सौ धेरे 6 x
जियरा• उनिसो • .,ना ··. सो•
सौ नी धे प, सो गे मे पे। सो पं मे गरे सो, े नि। सो रे धे रे सो नी धे पगरे गरेरे सो र-
रे · पि • या. को . . . . . , दे• . . ख . . . . . उ न वि न र हि लो-
११ नी सा - सो, नी धॅ नी- प धॅ - धँ, धॅ पधे - म प - ग म -, गम घ - - प म
न जा s य, र हिलो S न जा S य र हि लो S न जा - य मां - जि य रा - - उ नि
Page 198
[ १७१ ]
x साग - सा ग म - ग म धँ - म ध नी -घ
जि · s • य 5 रा • s·उ· 5 ननि
पे गै नी सा -नी सौ ग- सो सा - - र नी - - सौ ध -- नी प -- घॅ
सों · 5. ना · 5 मो रे · S पियाSS को वे 55स उ SS न विडs न र S S हि ११ म - - प ग - - म नी धॅ सौ नी रे -- र नी नी घॅ, नी धे वॅ- नी वँ घे -प म
लोs s न जा s s य मा .... 555 Ssजिय रा• उनि सों S उ नि सों S उ नि X सा ग म नी सौ मे ह) नौ सा ग म घै नी सो ग
जि य रा उ नि सों ना मो
५
मे गे गं रे सौ नी सौ नी at रै सो धॅ नी at नी सो - रै नी नी धॅ 1
रे• पि• या• को वे• ख उ न वि न -2 -- र हि लो •
• 1 -9नीधधे प 5प घे- म प - ग म - ग म नी घॅ सो नी रे नी नी धे
-
- -:- रहि लो• र हि लो न जा · य मा - जि य रा. उनि
सों
तान
x नि सा ग मन प प म ग र सा, नि सा ग म प धे
घँ पमगरे सा, निसा) ग म पधे नि निधॅ प मगरे सा, नि सा ग म /पधॅ नि सौ, रे रेसा नि
धै प स ग रे सा निसा ११ म ग म प प
जि य रा उ नी
Page 199
[१७२ ]
२) नि सा ग म, सा ग म प ग म पधँ, म पधँ नि -
प धॅ नि सो, घॅ नि सा रै। सो निधँप म ग रे सा सा-, सौ -- रे सो नि। धॅपमगरे सा, सा ब
रे सा, ग म ध - प प म सो -- रे सो निधे प म ग रसा, सा - सौ -।-र सो नि घप म ग
जिय रा S उ नी
x 0 ३) ग म रे गरे सा, म म ग म ग र, धॅ घँ प धे
प म, नि नि ध नि धँ प /सो सो नि सो नि धॅ, ३" रे (सो रे सो नि, सा सो नि सा। नि धे, नि नि धॅ नि धे प
११ घॅ घ प ध प म, प प 1 म प म ग, ग म ध नि सो रे सा निर्धेप म ग रे सा. " " "
साग म प सा प म ग रे सा, ग म प ध ग ध xc X
0 घ प म ग, म प ध नि म नि नि ध प म, प ध निसी पसौसौ नि धँ प घँ नि सो रे घँ रेरे सा
११ पँ, घॅ सौ सो निधँ प प नि निधॅ प म, म घँ घँ प म ग, म प म ग रे सा " ' 39
५ू) सागरे सा, रे म गरे। ग प म ग, म धॅ प म x x
प नि घॅ प, घँ सो नि धँ नि रे" सा नि, सो गं रै" सो। नि रे" सो नि, धे सो नि घँ। प नि धँ प, म घॅ प म
ग प म ग रे सा, ग म । धँ नि सौ - ग म धे नि सो -, ग म घँ नि सा- सा - निधँ, घँ - पम
जिड यरा, ·डउ नी
रे गमगरे सा, घॅनि सो नि धॅ प, रे गे मे गें
0 रै सो, धैँ नि सो निध प रेगमग रे"सा, रेग/ म -- गरे सा, ध नि ५ । सौ - - नि घॅँ प, रै" गे
Page 200
[ Y७३ ]
में -- गैहै" सौ, सो नि धैं प म ग रे सा, स/ नि। धे प म ग रे सा, सो नि। घ प मग रे सा, प म ११
, उ नी x 9 NdE X ७) रेग मर गम रेगमग रसा, धैँ नि सो घॅ
0 ने सौ धॅ नि सी नि घॅ प। रै गं में बै गे में है गे में ग रे सा, सो नि धॅ प मग रे"सा, रग म ग
घै नि सो नि, रै गे मं गै। रै सो, सो नि घॅ प म ग रे" सा नि सा, ग म घॅ-।सो नि सो, सौ नि धँ, घँ प
जिय रा ऽउ नी सों, उ नी सों,८ नी XT NE नि सा ग म धँ नि नि सो गे मे पे पं में गे रैसो
0 सो निघॅ पॅ म ग रे"सा नि सा ग म - म, म ध नि सा -सो, नि सो गे म । -में, में गे रे सो, सौ नि
घै प म ग रेसा, म- -म, सा -- सो मं- -मैं, मे ग रे"सो सो नि घँ प म ग रे सा, प म
उ नी Xw गृ म म, ग म म, ग म मगरसा, नि सो सा, नि
सा सौ, नि सो सो नि धँ प गै में मै, गै मै में, गे मे मे गे रे सो, स नि घॅ प म ग रे सा, प प - प
सो सो -सो, पे पै-थे। मे गै रें सो, सो निर धॅ प मगरेसा, रै - नि नि नि-, घॅ घॅ घॅ - प म
श्ाड उ नी सोंड, उनीसोड उ नी
Page 201
[१७४ ]
राग भैरव
ग्रिताल
गीत-२
स्थायी-प्रभु दाता रे, न करे मन जीवन घरि पल छिन।। अन्तरा-जो तू चाहे अन धन लछमी, दूध पूत बहुतेरो, वा को नाम भज गुरु को नाम ।।
स्थायी
१३ x 0
म
प्र भु
सा म ग ग 1 प म ग 1 1 1
ता S S न क दा . S 5 S S S S
नि स सां नि प प म ग म म
म न जी व घ री प छि न भु S
अंतरा
प नि घ सा सो म म सा सो नि 1 1
जो 5 तू s चा S S न न ल 5
सा सा सो सो रे रे सो नि सा घँ प 1
ते रो S S दू S घृ ब S
नि ग ग म घँ म प म प ग म प म सा ग म 1
वा · को ना S म म ज रु को· ना S म प्र भु
Page 202
राग भैरव
त्रिताल
गीत-३
स्थायी-घू गरवा प्यारी रे, मोरे घरवा लेहो लेहो बजाय।
अंतरा-सननन नननन तान सुनैया थैया थैया थैया।
स्थायी
x ५ १३ 0
म प म
वा S न्या
म प प म म प म म ग प सा 1 1
री • S S वा S
सा रे सा नि पधे प प नि प म ग 1
ले . हो ले हो S ब जा o
अ्न्तरा
म
ग म म म म
स न न न न
-ननि सा सो सो सा सा र ३े 1 1 1
ता न 5 या S या
सो नि नं नि प म ग म
या . या
Page 203
[१७६ ]
ताने
X ५ १३ 0
१) निसा | गम (घॅप /गम,घ प।मगरे सा नि सा ग म प 1
र वा S प्या
२) म घ।घँ प ।म ग/सा ग। प मगरे सा SK
३) रेरे/सा, गाग रे। म म ग, म ग सा 92
59 ४) नि सा। ग म । धॅ नि । सो - -निं धॅ प म ग रे सा "
५) ग म ध नि ।सा --: ।नि नि प म ग सा 19
६) रेरे/रे, म / म म ध रे नि प । म गरे सा नि सा नि नि। घ प प म
घ ग र वा • प्या•
७ रेरे/रे,म म म म, नि म सा ।ध रे 42
३ हैसो नि । धॅ प म सो नि घॅ प मग सा ग म पधॅ।धॅ म SE
ग र वा · प्या.
८) सा नि धॅ नि सो रै सो नि प म ग रे सा सा सो सा नि| ध प म गर सा
ग म घॅ घ । प प । ध म प ग म। धॅ ध प प ध घॅ म प ग म प प ध म
घं. ग र वाप्या री S ग र वा . प्या री S घ . ग र/ वाप्या •
६) घॅ नि सा रे- रे/धॅ नि।षे रे" -रे धॅ रै।सो नि घै प [म ग, रसानि सा।
१०) रे ग म ।-ग/मग ।रे साधॅ नि सा -नि सौ नि धॅ प ग गरे सा सा नि I
घॅ प ।मग। रे सासोनि, धॅ प ।म गरे सा सा नि।ध प। म ग रे सानि सा ग म ।धे धॅ प प ।धॅ म
ग र वा • प्या
Page 204
['so ]
1W3" mepoes x ६१) गग। रे,म।म ग, धॅ घे। मनि निध सो निनि मा नि' प म ग सा :5
१२) मम /- गर सासौ सौ नि प -गं (रे"सो (सो नि धॅ प मग रे सा. मं ग -गै। रै सो
सो निघे प म रे सा में मँ सासो नि प म ग सा निसा ग म प पा ध प 1
ग र बा• प्या
१३) साग म ध।- प ग सा ग म नि नि.सा नि घ प मग सा गै -धाँ पँ प
मै गै सोसो नि धे प म गर साग म पृ प ग प म ध ध। प प ध म
वू ग र वा • घू, ग र वा घू • ग र वा प्या
१४) रेग। मरे गम रे ग मग रैसा ध नि।साध नि सो घँ नि सो नि घॅप रेग। मं, रै/ ग में
मे गे रेसो। सो नि धॅ प म ग ि सा सो नि घॅ प म सासा नि घ प म ग रेसा पाप ।घ म
वा •प्या.
१५)रेर सो, सो सा निः नि नि धे, घ। घ प मगरे सा प. म 1
वा S ्या !
१६) म म उग, ग (ग रि सौ सो नि,निनि घॅ सा सा नि नि। निध।ध,ध प. प प म प प
म,म । म ग ग ग /रेरे रि सानि सा ग म घ नि सा ग म ध नि सा ग म घ नि सो घ म
प्या.
२३
Page 205
[१७= ]
राग भैरव
धर वपद-चौताल
गीत-४
स्थायी-मोहन जागी मनोहर मधुसूदन, मदनमोहन माघो सुकुन्द मन भावन॥
अन्तरा-जागो जागो जगदीश, जगतपति जगजीवन, जागो नाथ जगत सुख, प्राण प्यारे।
सव्चारी और आभोग-जागिये जु श्रीकृष्णचन्द्र, परमानन्द, आ्रानन्द, रामकृष्णा के तुम हृद में बसत, तीन लोक के जग या करुणानिधान॥
स्थायी
x ११ 0
प
ग म प
मो न .. S SS
म म ग
H -- ग प 1 1
जा म नो S .. SSS र
Av म म ग म रे सा नि सा सा सा
घु सू न म न मो म द ह न
म
सा म ग म ग म प
मा S घो S भु द म न
म सा ग म म प
भा व S न S मो न V
Page 206
[ १st]
अंतरा
X 0 ११
नि
म सा नि सो सो 1
जा गो जा S गो ज S स
न सा सा
ज ग त ती जी न
नि
प म म नं सा 1
जा ना ग त S
नि सा -- नि प म म प 1 1
रा नSS प्या S 0 SSS मो S ह न SSS
संचारी और आयोग
म म प ME
जा ये का 5 न व
नि नि
म प धँ नि सा सो 1 1 1
के व ल S ल्या S न रा
म म
ग म सा 1
जा श्री
सा सा म म सा प 1
र मा सा न S 4 3
Page 207
×
नि सो प म
S रा S S के S
नि नि नि सा सा घ
त ती शैं . ब स S
नि
म नि सा 1
लो क · SSS ज या S क रु
प
सा ग म
नि न मो न घा S S ह S . SSS
Page 208
परिशिष्ट
१, राग भूप
ख्याल-तिलवाड़ा
गीत
स्थायी-सूधे बोल तानन, रूप की मरोर। अंतरा-कर रही मान, मान ले प्यारी, कीने जतन करोर।
स्थायी
१३
1 सो ध• सा - सा -- सो धपप. ग प
सू - 5 5 घे .. 5 ! --
X ग रे रे सा सारसासा ध सा
बो ल S S न
१३ ग प. प
ग ग ग पधपप सां घ पधपन 1 1
S S S S S 31
× ५
प ग प सो ध - सो सो सा-सा रे - 1
की· S म • S 5 . . S .. S S
१३ 0
सोरेसोसो ध पप - पध- घ ग - प-
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Page 209
[ १=२ ]
अंतरा
१३ 0 सा सौ सो
सा घ ध सो सा सो
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सो घ सा सा रे
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सौ घ सो ध- सो घपप =- प ग प रे 1 सोरेसोसो
प्या .. . S S री S की . S 0 न. ण 5S
× ध सा प ध सा सा सा- सा सा- सा रै ग प
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१३
सोरेसोसा घ पप- पध घ ग-प-
रो. .. s
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[ =]
२. राग जैमिनि-कल्याण
र्याल-विलम्धित एकताल
गीत-६ स्थायी-कै (कइ) सावी, कैसे के करिये, जी भरिये, जिन ऐसे लालन के संग। अन्तरा-सुन री सखी मैं का कहूं तोसे, उनही के जानत ढंग॥
स्थायी
0
रे प रे ग नि - ग ग - ग ग रे निसारेरेसानिसा- -- निध
के . 5. 5 S स खी SS के . ..... s S 5 से के
×
सा सा न नि' सा-सानिधिनि- ध म प- रे नि - नि नि घ - म -
क 5.055 S रि ये S जी S .. 5
धु सा 6 11न सा सा गि सा ·-- रेनि - निरे -- रे ग
रि • SSS ये . . SSS जि . s .. Ss ..
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न . . S S 5 से . 5 ला - S S 5 ल . 5 S
११ 0
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ग ग गम न AV प घ प प रे ग ग भ ग रे धु नि सा
... SSS सं . ग
Page 211
[१८४ ]
अंतरा
११ में मै घ ग ग म - नि ध नि मौ सो -- सा सौ
सु न खी SSS
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निसारे रैसानि सा- नि सा -- निध सो-सानि धनि -- -- ध नि
मैं SS . .S का. . .. . . 5 ssकहँ तोड.55
११ मैं मैम धघ पध मंप --- 1 प ग - - पैघ म प- मपप, निनिध, मपनिसा-
से .. . 5 S S S SSही. . . S के जा .. , ... , .... S
0 X
ग रे गप गम नि -- घ प रे रेगग म ग रे धु नि सा
sS नात வு.
Page 212
[ 9=x ]
३ राग बिहाग
ख्याल-तिलवाड़ा
गीत
स्थायी-कैसे सुख सोवे नींदरिया, श्याम मूरत चित चढ़ी।
अन्तरा-सोच सोच सदारंग शकुलाये, या विध गात परी।।
स्थायी
१३ 0
प प प प ग म ग -- रे नि सा ग म
कै से से 5 S सु ख
x प ५ू नि ग रे नि- सा- सा सा - सा नि पुनि रे सा 1 I
सो S S वे नी s. . .. SS SSo द रि
० र १३ ग नि पृधु म प- सा म ग म
या S . 5 S श्या म मू
x ५ म - म ग सा गा -- म ग प मप·
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म सौ नि रे नि सो १३ नि घ म प -- म ग म ग रे नि सा -- रे न- सा म
च . . . ढ़ी कै . SS .. SSS सु ख
२४
Page 213
[ १८६ ]
अंतरा
१३ सौ प - नि सा -नि सा-
सो S So .S
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सा नि सा --- सानि रे सानि- सा - नि नि -सो रे सौ
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घ प नि धमप ग म प ध ग म ग रे नि सा -- सा
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ग ग नि सा म ग प म पग- ग म ग प सोनिर्वंनि सो 1
या . बि .. . घ. 5 S गा त प. ...
ध मं प- नमैं ग म
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Page 214
[ १=७ ]
४, राग सारंग
र्याल-विलम्बित एकताल
गीत
स्थायी-मैं समभूयो निरधार सब जग काचो कांच सो।
अन्तरा-एकै रूप अपार, प्रतिबिम्बित लखिये जहां।।
स्थायी
0 ११ रमप --- मरेम। रेसानि पुसानिरेस
. .. स. म
X म -म रे,सारे --- मरे-सा-रिमरेसा रेमप नि। सा-निप
भयो S ·5.055s55· निडर 5घा ......
म ११ 0 निनिपमप -- म म म प म म - रे- सा र नि सा सारेरेसा-सा,साम म रे -रे, रे प प म
र5.55 . . .S . S . 8 स .. . 5 ., ब .
मे में सा मँं नि -मपनि निप-पम पनिसारे-म X ५ सो रें नि सा सरनिसा --- नि
ड. ग· ·S· का .•• S0S चो . . कां. ·· 555च
निसानि नि --- पम प म म --- रे म म म ११ सा रे नि सा
सो .. 555005550
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[ १८= ]
अन्तरा
११ 0 - पनिप नि सा -- -- निर्सा-
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शुद्धि-पत्र
प्रस्तावना
पुष्ठ पंक्ति प्शुद्ध शुद्ध रे र २० ग प ग, रे सा ग प ग, रे सा २२ ग प ग-रे, सा ग प ग रे-, सा १६ उच्यो उच्चो ७ करूगोष्विष्ठा करुणेष्विष्टा १५ मातंग मतंग १७ ३१ स्वरो स्वरो २१ २५ शुद्धच्छाया लगभिज्ञ: शुद्धच्छायालगाभिज्ञ: २१ २५ सर्वकाक विशेषवित् सवकाकुविशेषवित्
मूल पुस्तक
१ २० सा रे म प सा - -प सा रे म प सा -- प, प २ ४ ग रे ग सा रे म ग रेग सा रेम
२ ग रे रे - ग - सा ग रे रे - ग - सा
8 १० नि सो, प नि नि सा, प नि
सा सा
म ग म S
५ म ग प म U
अ ट ञ ट
घ १२ १६ निसा नि सा
सा सा १७ नी ध धनी- नी ध घ नी"
Page 217
( 2)
पृष्ठ पंकि श्रशुद्ध शुद्ध
नी नी
१७ १३ 4-ध नी
रे
१८ मग --
२३ सो सौ - नी ध प म ग सो सौ - नी ध प म ग
दै o डo या००
इससे आगे वाली मात्रा में भी इसी प्रकार शुद्धि कर ली जाए।
२५ ३ ग रेग प ध नी धप। ग रे ग प ध नी ध प
२५ 3 रे सो, ग रे - ग प म रे सा, ग रे - ग प म दे०डया०क दै०डया०क
२६ १ पे मे ग रे सा नी ध प। पे मे ग र सौ नी ध प
२६ गै -- पे में ग रे सा। गं- - पे मे गं रे सौ
२६ सौ गी ध प म ग रे सा। सो नी ध प म ग रे सा
२६ ११ पे म-प मगरेसौ। पं पं- पे मेगैरै सौ
२७ २१ नी। प. नी प०
५ रे सा।-। रे सा। निसा।
२ह ३ साग। गरे। सोनि। धप। नग। साग। गरे। सौनि। धप। मग ३० १८ सौ । - नी सा/ -/ ग्वा 1 50 ग्वा | 5
३१ १ घि साध नि रे नि साध नि रे ३१ २१ नि साध नि रे नि साध नि रे सा ग सा ग ३२ १६ नि साध नि रे निसा धनिरे ग रे ग ३२ १६ सा ध - नि रे साध - निरे ३२ १८ रे सा सानि रे सा सा नि
३४ १२ नि सा रेग निसा रे ग
३४ १७ म सो सो नि म सौ सौ नि
३७ नि सा धु नि। नि सा ध नि। ३७ ११ - सा रे धुनि। -सा रेधनि।
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( इ)
पृष्ठ पंकि अशुद्ध शुद्ध
३८ १ -सा रेघ नि -सा रेध नि
३८ ५ रे सा - रेध नि रे सा - रेध नि
३६ १ -- ध नि। -ध नि।
सा सा ग
३६ ११ - रे -गध। - रेध नि
३६ १३ निध धुप घप पम। निध धप धप पम।
ग
३६ १५ - रं -गध। -रेध नि
-- धृ नि। -- धू नि M N 9 ४०
४० निध नि। म नि ध नि
४० -- रंधु नि -- रेध नि
४0 रै गॅ रै, सी रे सौ, नि सौ। रे गॅरै, सो रे सो, नि सो
४० १३ रें गॅ रै, सा रे सौ, नि सा। नि रै 'गॅ रै, सा रें सौ, नि सा। नि
४० १५ रेगँ रे --- गर। रेगँरे --- गॅरे।
४0 २० प ध म - प ग - म प ध म - प ग - म ० से 5 क टे दि S न ० से क S टे दि S न
४३ ४ रे गॅ रे सो नि सा, रे- रे गॅ रे सा नि सा, रे- ल 5
४३ १४ सा - रे ध नि। सा - रे धु नि
o डमा रा डमा ०
म म
४४ १९
४४ १५ घ नि घ नि
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४७ ७ ग रे, म ग, प म, ध प ग रे, प म, ध प
म म ४६ गॅ ग गॅ
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( ४ )
पृष्ठ पंक्ति पशुद्ध शुद्ध
४६ १५
32 ४६ १७ सा 1
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५३ १३ घ म प म म रे सा सा ध प म प म म रे सा
५४ १४ प प प ध म प प प प प ध म प
ooo 0 जु च जु च
५५ १२ म- म नि ध मे - मै नि ध
५६ १२ म -प -ध म प -- । (मं - प - ध में प -- म ।
५६ १५ पध मैप- पध मैप
५ू६ू १६ सा रे नि सा सारे निसा-
५६ १७ पम धम पसा निरें नि्सा पर्म ध मे प, सौ नि रैनि सौ
५७ रै- रैसो नीसा- रे- रैसो नीसो --.
uY ५७ नध प मे प -- ध-ध प मैप -- ५७ १० मे-पे-धे मप-। 'मे - पं-घं मेप --
घ नि सा ध च१ ले ऐ ध नि सौ ध चले ० ऐ
५६ १ मै प ध निसी -- रे। मैप ध निसी -- रै। ६० ग्यारहवीं, बारहवीं, चौदहवीं, सोलहवीं, अद्ठारहवीं पंक्तियों में ताल के चिह्न इस क्रम में दिए हैं- ६, ११,, ५। उन्हें इस प्रकार शुद्ध किया जाए- ०, ६,११, x । ६१ १४ सारें निसा, पध मप, सारे निसी, पंध मे पे। सारे निसा, पध मेप, सर निसा, पंर्ध 'मेप ६१ १४ मम रेंसो, सासा धप, मम रेसा, मम रेसा। में मे रेंसो, सौसो धप, मम रेसा, मम रेसा। ६२ ऊपर से नीचे को चौथा ताल चिह्न ह की बजाय ११ होगा।
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( x )
पृष्ठ पंक्ति प्रशुद्ध शुद्ध
६३ १२ नी घ। प मै नो घ प म
क रे। र ० क
नी नी ६३ १७ ध
प्या S ग क प्या S S
६४ क्ष म म : र म । रसा। म म । रेसा। निसा
६५ ७ म प । ध प। मै प । ध प।
नी नी ६६ घ प 1
बा S S S S बा S
प प
७१ १८ ध नि - प, सौ घँ नि - प, सा।
नि
७१ २३ प सा सानि, निरेरेसा, रे सा प सो सा नि नि रे रे सो, रै सा
१० मप निम, नि नियम गेम पगं,प म गँम म प निम, निय प म गॅम प गॅ,प गे मम
७४ २२ म प म नी म प म नी" प
हां
७र६ १ प ध प प निप
१७ नि सा
8 6
२ : नि सी।
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मं ५ सो- "u,
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( ६ )
पृष्ठ पंक्ति प्राशुद्ध शुद्ध
१५ घ प म म प सा नि सो घॅ प प म प सो नि सो
१० प मम पसा निसी । -- ,प धॅप पम-पघॅ धँप पम पसा निसा -- , प धप पम - पघॅ
१ 1 मं पे प म में पं पे ध।
६५ १५ मे 'ग रै सौ, सा नि घँ प म ग रे सो, सा नि घँ प
६५ १५ सो नि घॅ प, म गँ रे सो सो नि घँ प, मं ग रे सो नि नि १६ धे।-। सौ। घे। धे।-। सौ। सौ।
६७ १२ प न । रेम। प म ।रेम।
६७ १४ रै। मं।प/-। रै। मैं। प/-।
६७ १८ सोग। रे सो। सो गै। रै सा।
२१ म म म म म म
ना दि दि ना दि रि
१०१ ११ प धँ म प सो सो प घ। म प सौ सौ
दा · नी नी दि र दा · नी ना दि र
१०२ ४ सो सा सा सो
ता ना त न
अन्तरे में जहाँ-जहाँ 'ताना' लिखा है, वहाँ 'तन' कर ले।
१०६ ३-४ सा - सा
या S यो
११० १२ रे सा नि सा रे रे नि सा
११५ ७ 'गे - -म। 'गे - - मं
११५ ७ सा - - गॅम सो -- गॅम
त s S न. ई s5 रु०
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( ७)
पृष्ठ पंक्ति त्रशुद्ध शुद्ध
११७ १ म - प गॅ-म पनिप गॅ - म
य ड न कोडन य • न कोड न
रै सौ निसा, गॅ र सी र रै सौ नि सो, 'गॅ रै सो रै ११८
नी
१२१ १८ सो नी घ नि सा
न ड़ी भो ड़ी
१२४ ११ नि नि ।प नि नि नि (प नि
स घ न स घ निब
१२५ ११ म प म
यां फू यां S फू
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1 १२६ प कॉ म
S ए 5 S ए S
१२८ गॅ नि म प प
ब र न ब र ब न न
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१३५ १४ नी सा -- नी सो-
स - S S स SS
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१३६ सो गॅनी सौ - л
ल . - SS
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१३६ नी - सा -- घॅ- नी नी - सा - - घॅ - नी" n
. s· SSरSन . SS SSरsन
Page 223
( <)
पुष्ट पंकि अ्शुद्ध शुद्ध
१३६ १२
सोनि म नि'
१४२ सो सो
या या
ऐसे ही दसवीं पंक्ति में भी शुद्धि कर लें।
१४४ १७ सा गै सौ नि सा नि घँ नि। सो गँ सो नि सो नि धे नि
१४५ 3 सा - - -, गँ - सो मं। सौ - - -, गं - सो गें।
१४६ ३ म धॅ म गॅ, म नि घँ -। ग घॅ म गँ, म नि घे-
१४६ १३ घॅँ म गॅ म, नि धॅ म गे। घॅ म गॅ म, नि घँ म घँ।
१४६ १ नि सो। गै सा। नि सा। गँ सा।
१४६ ध्। नि। धूँ। नि।
१५१ १ मि गॅ। गँ सा। नि गँ। गँ सा।
१५२ सानि नि। गँसा सा। सा नि नि। गँसा सा।
१५४ १८ म म
ी S ग ठी ग
सो 30
हे S हे S
१५६ देरे ना तदान्तौ देरे ना तदानी
१५६ १६ नी
या ली य ली
१५६ १६ म म म म
दा S तौ त दा 5 नी
१५७ म गे म
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१५७ : १६ गँ गॅ म म
र ह स
Page 224
(६)
पक्ति
१५७ १७ सा निसा सोनि सौ
i0 ग
१६० प प म म न पपसगम
१६० ६ सो नि सो निसो सो निरे निसा
सा हा सा सा सा १६० प म ग म.गम पप ग म प स ग म ग म प प म ग म
पृष्ठ १६०-६३ पर मुक्त तानों में जहाँ कहीं रे सा - आता है, वहाँ रे सा नि सा कर लें।
१६३ ७ मेरग म मं मे म म ग
गा ग् १६४ म पग म- म प ग स-
जि . 5- ज
१६६ १ रे
१६६ २ सा ग म सा गम
१६६ घ म ग म- घ प म प-
निग पृ० १६६-६८ पर जहाँ-जहाँ घँ और रे पर कोई करा-स्वर नहीं लगे हों, वहाँ-वहाँ ध, रेकर लिया जाए।
म १६८ २ म - य म म -प प
सोंड उ नी सों 5 उ नी
१६६ ११ घॅ सौ-नी रै को नी घॅ प / धे सो नी रे सा नी घॅ प
पिया S • को वे • ख पिया• को वे • स
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( १० )
पृo पंक्ि प्शद्ध शुद्ध १७२ ५ । ग म रे गर स,म म । ग ग रे ग रे सा, म म।
म म म भ १७६ १५ ग ग
ग ये गि ये
१८१ सो ध सौ-(सौ -- सौ[घ प प-सो घ --- सौ।-सो ध प प
१८२ सो सो --- सो सो --- सो रे --- सो सौ --- 'सो सौ - सो रें-)
प प प प प प १८५ ग म ग -- रे। ग म ग - - रे
के से से 5 5 से s s
१८५ १५ रे नि सा -- रे नि रे नि सा - - ' रे नि --
से . - SS . . SSS .. .55 से · 555
1
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क्रमशः प्रकाशित होनेवाले ग्रन्थ
क्रमिक पुस्तक माला के शेप भाग
(१) संगीता्जलि-चतुर्थ भाग (सीनियर डिप्लोमा का पाठ्यक्रम)। (शीघ्र ही प्रकाशित होगा)। (२) संगीताअ्जलि-पश्चम भाग (बी० म्यूज० प्रथम वर्ष का पाठ्यकरम) (३) संगीतास्जलि-षष्ठ भाग (बी० म्यूज़० द्वितीय वर्ष का पाठ्यकरम)। संगीत शास्त्रन्गन्थ जो हिन्दो और संस्कृत में क्रमशः तीन भागों में प्रकाश्ित होगा :- (१) प्ररव-भारती-(प्रथम भाग) श्रुति-स्वर-ग्राम-मूच्छना-जाति-वरा-अलङ्कार का विवरय। यह ग्रन्थ हिन्दी में प्रकाशिव हो गया है। मूल्य ६। (२) प्रएव-भारती-(द्वितीय भाग) प्राचीन, मध्ययुगाय और आधुनिक राग वर्गीकरया-पद्धति, इस विषय पर नवीन दष्टिकोया से प्रकाश, रागां का विस्तृत विवरय। (३) मणव-भारती-(तृतीय भाग) राग और रस। रस-शासत-परिभाषा का संगीत में उपयोग नायक नायिका-भेद का राग-रागिनियों के साथ सम्बन्ध।