4. Saral Samudrik Shastra — पंचागुली साधना विधान
पंचागुली साधना विधान
पंचागुली देवी के बारे में अनेक प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है और उसमें यह स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति नियम पूर्वक पंचागुली देवी की साधना करे तो शीघ्र ही वह सफल भविष्यवक्ता बन सकता है। किसी भी व्यक्ति का हाथ देखते ही उस व्यक्ति का भूत, वर्तमान और भविष्य उसके सामने साकार हो जाता है। साथ ही वह अनेक सूक्ष्म रहस्यों से भी भली भाँति परिचित हो जाता है।
पंचागुली साधना में शुभ मुहूर्त का विवेचन इस प्रकार है।
मास
यह साधना किसी भी महीने से प्रारंभ की जा सकती है। पर बैसाख, कार्तिक, आश्विन तथा माघ मास विशेष शुभ माने गये हैं।
तिथि
यह साधना शुक्ल पक्ष की द्वितीया, पंचमी, सप्तमी, अष्टमी, दशमी, अथवा पूर्णमासी से प्रारम्भ की जा सकती है।
वार
रवि, बुध, गुरु तथा शुक्रवार इसे प्रारंभ करने के लिये श्रेष्ठ माने गये हैं।
नक्षत्र
कृतिका, रोहिणी, पुनर्वसु, हस्त, तीनों उत्तरा, अनुराधा तथा श्रवण नक्षत्र विशेष अनुकूल माने जाते हैं।
लग्न
स्थिर लग्न, वृष, सिंह, वृश्चिक कुंभ लग्न प्रशस्त मानी गयी है।
स्थान
तीर्थभूमि, गंगा यमुना संगम, नदी का तट, पर्वत, गुफाएं तथा मन्दिर इसके लिये शुभ हैं। यदि ये स्थान सुलभ न हों तो घर के एकान्त कमरे का उपयोग किया जा सकता है।
पूजन सामग्री
| कुंकुम, | नारियल (जटा वाले) | दीपक |
| अबीर | चावल | दही |
| गुलाल | बादाम | शक्कर |
| मौली | अखरोट | पान |
| सुपारियां | काजू | भोज-पत्र |
| केशर | किसमिस | पीपल के पत्ते |
| बताशा | मिश्री | कच्चा दूध |
| दुग्ध प्रसाद | अगरबत्ती | घृत |
| कपूर | लौंग | पुष्प |
| इलायची | काली मिर्च | पुष्पमाला, हवन सामग्री |
| यज्ञोपवीत | शहद | गंगा जल |
| फल | इत्र | कुएं का शुद्ध जल |
इस साधना में कुछ बातें अत्यन्त आवश्यक हैं, जो निम्नलिखित हैं-
- स्त्री संसर्ग तथा स्त्री चर्चा साधना काल में त्याज्य है।
- क्षौरकर्म न करें।
- संध्या, गायत्री स्मरण निश्चित हो।
- नग्नावस्था में, बिना स्नान के, अपवित्र हाथ से, सिर पर कपड़ा रख कर जप करना निषिद्ध है।
- जप के समय माला पूरी हुए बिना, बातचीत नहीं करनी चाहिए।
- छींक अप्रश्य, अपान वायु होने पर हाथ धोवें तथा कानों को जल से स्पर्श करें।
- आलस्य, जमहाई, छींक, नींद, थूकना, डरना, अपवित्र वस्त्र, बातचीत, क्रोध आदि जपकाल में वर्जित है।
- पहले दिन जितना जप किया जाए रोज उतना ही जप करें इसे घटाना बढ़ाना उचित नहीं है।
- जपकाल में शौच जाने पर पुन: स्नान कर जप में बैठें।
जपकाल के नियम
जपकाल में निम्न नियमों का भी पालन किया जाना चाहिए-
- भूमि शयन, 2. ब्रह्मचर्य, 3. नित्य स्नान, 4. मौन, 5. नित्य दान, 6. गुरु सेवा 7. पापकर्म परित्याग 8. नित्य पूजा 9. देवार्चन 10. इष्टदेव व गुरु में श्रद्धा, 11. जप निष्ठा 12. पवित्रता।
नास्ति हस्तात्परं ज्ञानं त्रैलोक्ये सचराचरे। यद्ब्राह्मयं शास्त्रकं हस्ते धृतबोधाय जन्मिनाम्।।
तीनों लोकों में हस्तज्ञान सबसे बढ़कर ज्ञान माना गया है। इसकी रचना स्वयं ब्रह्माजी ने की है। वास्तव में यह ब्रह्माजी द्वारा लिखा गया एक ऐसा ग्रन्थ है जो जीवन भर मनुष्य का मार्गदर्शन कराता है।