Books / Sarvartha Chintamani - Mahidhar Sharma

1. Sarvartha Chintamani - Mahidhar Sharma

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थीः । सर्वार्थचिन्तामणिः।

राजधानी-टिहरीनिवासि-पं०महीघरशर्मकृत-

भाषाटीकासहितः।

मुद्रक एवं प्रकाशक: खेमराज श्रीकृष्णदा्स, अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस, खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.

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संस्करण : नवंबर २०१०, सम्वत् २०६७

मूल्य : १२० रुपये मात्र।

मुद्रक एवं प्रकाशक: खेमराज श्रीकष्णददास, अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस, खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग. मुंबई - ४०० ००४.

Cसर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित

Printers & Publishers : Khemraj Shrikrishnadass Prop: Shri Venkateshwar Press, Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi, Mumbai - 400 004.

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भूमिका। -0-> थम श्रीजगत्फर्त्ता ईश्वरको समणाम धन्यवाद है कि जिसने श्रीगुरुरूप धारणकर मुझ्ग प्राकृत मनुष्यके कुण्ठित हृदयमें किश्चिन्मात्र श्रुतिषडंगान्तर्गत ज्योतिषफलादेशका बीजारोपण किया जो क्रमशः अंकुरित पल्लवित पुष्पित होकर फलितस्कन्धमें फलित होरहाहै, ज्योतिषके तीन स्कन्धोंमें तात्पर्य म्त्यक्षफलबोधक गणितानुकूल होरास्कन्ध ही है जिसके विशेष प्रचार एवं सर्व साधारणके उपकारार्थ मैं बहुत कालसे निज स्वामी श्री १०८ मन्महा- राजाधिराज केदारखण्ड जिला कढ़वाल टिहरोनरेश कीर्तिशाह देव के, सी, यस, भाई की रक्षामें धर्माधिकारी पदपर रहकर ज्योतिषफलदेशके पचारमें तत्पर हूं-मेरा परिश्रम भी गोब्राह्मण मतिपालक सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासजीकी सहायतासे बराबर सफल होताआयाहै उन्होंके अनुमोदनसे मैंने इस समय सर्वार्थचिन्तामणिनामक जातक फलादेशग्रन्थकी भाषाटीका निर्माण कीहै क्योंकि यह ग्रन्थ बहुत पामाणिक एवं सबका मान्य है, सच ज्योतिषज्ञ इसका समादर करतेहैं परन्तु अबतक टीका टिप्पणी इसमें न थी और जो जातकांतर "बृहज्जातक, भावकुतूहल, जातकशिरोमणि, नीलकण्ठी" आदि मेरे भाषाटी- कासहित उक्त सेठजीने छापेहैं उनमें एकसे एक गुणविशेष हैं तौभी उनकी अपेक्षा फितने ही विचारविशेष इसमें अन्य ढंगके होनेसे तथा गूढ एवं विशेष स्थल फलादेश विचारोंमें होनेसे उनका सारांश विशेष विद्वान्ही जानसकतेहैं सर्वस्ाधारण इससे लाभ नहीं उठासकते और फलादेशके उपयोगी चमत्कारिक फल इसमें बहुतही विशेषतासे हैं जिनके जाननेसे थोडा ज्योतिष जाननेवाले भी विशेष चमत्कारफल कहसकतेहैं जन्मपत्री आदिकोंमेंभी प्रत्यक्ष मिलने योग्य फंळ लिखसकतेहैं इसलिये सरलताके हेतु मैंने यथामति इसकी भाषाटीका रचीहै, जहां कहीं त्रुटि, पमाद, वा भूल होगई हो विदज्जन क्षमा करके परिशोधन करतेरेहैं और मेरे परिश्रम पर ध्यान देकर प्रसन्नहों। इस ग्रन्थको मैं पूर्ववद् सर्वागतया सेठ श्रीकृष्णदासात्मज खेमराज महोदयको अर्पण कर- ताहूं। आशा है कि उनकी कृपासे ग्रन्थ शीघ्र प्रकाशित होनेसे मेरा परिश्रम सफल एवं लोकोपकार होगा॥। निवेदक- महीघरशर्मा धर्माधिकारी, राजधानी टिहरी, जिला गढ़वाल।

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हमारे यहां से प्रकाशित अन्य ज्योतिष ग्रन्थ,

श्रीवेंकटेश्वर शताब्दि पंचांग- ग्रहलाघव-सान्वय हिन्दी टीका और विक्रम सं० २००१ से २१०० तक उदाहरण सहित, स्व० ज्योतिर्भूषण ज्योतिषश्याम संग्रह- पं० वच्चू द्वारा परिशोधित चक्रोदाहरणयुक्त हिन्दी टीकासहित। भविष्यफलभास्कर-हिन्दी टीकासहित जातकाभरण- ज्योतिष कल्पद्रुम-भाषा हिन्दी श्री ढूंढिराजकृत। हिन्दी टीकासहित रमलगुलजार-हिन्दी भाषा वसन्तराजशाकुन- वर्षप्रबोध-हिन्दी टीकासहित संस्कृत टीका तथा हिन्दीटीकासहित। ज्योतिषसार-हिन्दी टीकासहित। लीलावती- रमलनवरत्न- भास्कराचार्यकृत मूल और प०राम- हिन्दी टीका रमलदानियालसहित, स्वरूपजी कृत हिन्दी टीकासहित। विश्वकर्म प्रकाश-शिल्पशास्त्र पं० मिहिरचन्द्र वाराही (वृहत्) संहिता- हिन्दी टीकासहित वराह मिहिराचार्य प्रणीत। स्व० पं० केरलीय प्रश्नरत्न-हिन्दी टीकासहित। बलदेव प्रसाद मिश्रकृत हिन्दी टीका जैमिनीय सूत्र-हिन्दी टीकासहित। शम्भु होरा प्रकाश- समरसार- पं० पुंजराचार्यकृत हिन्दी टीकासहित। संस्कृत टीका-हिन्दी टीका सहित। बृहज्जातक- प्रश्नज्ञान प्रदीप-हिन्दी टीकासहित। वराहमिहिराचार्यकृत मूल और लग्नचंद्रिका-हिन्दीटीकासहित, पं० महीधर शर्मकृत सरल हिन्दी शी घ्रबोध-हिन्दीटीकासहित टीकासहित। जातक चन्द्रिका-हिन्दी टीकासहित। वृहत्पाराशरहोराशास्त्र-हिन्दीटीकासहित। प्रश्न चण्डेश्वर- पत्रीमार्गप्रदीपिका और वर्षदीपिका- संस्कृत टीका तथा हिन्दी टीकासहित पं० महादेव विरचित मूल और प्रश्न वैष्णव-हिन्दी टीकासहित। श्रीनिवासजीकृत हिन्दी टीकासहित। भुवनदीपक- प्रश्न शिरोमणि-हिन्दी टीकासहित। संस्कृत टीका तथा हिन्दी टीकासहित, मुहूर्त प्रकाश-हिन्दी टीकासहित। हायनभास्कर-हिन्दी टीकासहित। स्व० पं० चतुर्थीलालजी कृत। चमत्कार चिन्तमाणि-हिन्दी टीकासहित। मानसागरी पद्धति-हिन्दी टीका सहित भृगुसूत्र-हिन्दीटीका सहित भावकुतूहल-पं० जीवनाथ विरचित मूल केरलतत्वप्रश्न संग्रह-हिन्दी टीकासहित। और पं० महीधर शर्मा कृत हिन्दी जातकालंकार-हिन्दी टीकासहित। टीकासहित। बालबोध ज्योतिष-हिन्दी टीकासहित। मुहर्तचिन्तामणि- अर्धप्रकाश-हिन्दीटीका सहित। पं० महीधर शर्मकृत हिन्दी टीकासहित ज्योतिर्गणित कौमुदी-हिन्दी टीकासहित हनुमान् ज्योतिष- (प्रश्न ग्रन्थ) हिन्दी टीका व चक्रोंसहित

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॥ श्रीः॥ सर्वार्थचिन्तामणिविषयानुकमणिका।

विषय. लोक. पृष्ठ. पथमोऽध्यायः १. भाषाकारस्य मंगलाचरणम् ...

988 606 जन्म और प्रश्नकाअभेद ... राशियोंके स्वामी 73 ... राशियोंकेअंगविभाग 52 ... राशियों के स्वरूप ... देप्काण ... नवांशक 100 ... होराचक्र ... ... GO ... द्वेष्काणचक्र ... ... .. .. . सपांशचक्र ... CB8 नवमांशचक्र ... 14 .68 द्वादशांश त्िशांश १२ ... दवादशांशचक् ": R08 ... ... विशांश चक्र दशांशषोड़शांश ... 188 ... २४ विंशांशादि ... सिद्धांशादि चतु्विशांशचक ..: २१ ... 108 भांशचक्र .... .... .... १२ 1G0 खवेदांशचक्र .. .... १३ अक्षवेदांशचक्र ... .... १५ पष्टचंश .... .... १६ पष्टचंशचक्र १८ ... GO .... षष्टयंशकेफल २१ १९ ... 108 पारिजातादिसंज्ञा २३ २० ... 100 1 ... गोपुरादिखंज्ञा .' २५ "9 108 क्षणिकग्रहकथन ... .... ३२ २१ 108 100 बालाद्यवस्था ... ३६ राशयोंक नामांतर ३८ २२ 208 भावेकिनाम DaG BOC ... ४१ पृष्ठोदयशीर्षादय ... २२ .. . ..

... ४९ ...

6 केंद्रसंज्ञा ... ... ५० अलचर रााशि यादियोंकाबल ५२ 19

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॥ श्रीः॥! सर्वार्थचिन्तामणिविषयानुकमणिका।

विषय. लोक. पृछ्ठ. पथमोऽध्यायः १. भाषाकारस्य मंगलाचरणम् 106 २ ग्रंथकारस्यमङ्गखाचरणम् जन्म और प्रश्नकाअभेद 44 ... . . राशियोंके स्वामी ... ... राशियों केअंगविभाग .. 6Gc ... राशियोंके स्वर्नप ... द्वेप्काण . .G ३० ... नवांशक 10a .. . होराचक्र ... . . 0 ... द्ेण्काणचक 1 .. .. ... :00 सपांशचक्र ... 128

नवमांशचक्र ... LA S' द्वादशांश तरिशांश १२ ...

द्वादशांशचक 108 .. . 100 विशांश चक् 100 दशांशषोड़शांश ... २४ ... विशांशादि .GE 180 ८ सिद्धांशादि 188 चतुविशांशचक्र ... २१ 100 भांशचक्र १२ .. c ... ....

खवेदांशचक्र १३ ... BCO 2 ..

अक्षवेदांशचक्र ... .... १५ 108

पष्टचंश १६ ... ...

पष्टंशचक्र १८ ... ... .a ...

षष्टयंशकेफल .० २१ १९ ... ... 108 8 ... पारिजातादिसंज्ञा २३. २० ... . ...

गोपुरादिखंज्ञा २५ 39

क्षणिकग्रहकथन ... ३२ २१ ... ....

चालाद्वस्था ३६ "

राशियोंके नामांतर ३८ २२ F08 ..

भावोकेनाम ४१ BOc पृष्ठोद्यशीर्षादय ... ... ४७ ग्रहोंकीधूम्रादिसंज्ञा ... .. u९ केंद्रसंज्ञा ५० ... .. . जलचर राशि भादियोंकावल ५२ 19 ..

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(२ ) सर्वार्थचिन्तामणिविषयानुक्रमणिका।

विषय. शोक. पृष्ट. ग्रहोंकीउच्चराशि ... ... ... ... ... ५२

... .. ५३ २४ राशियों केदिनरा त्रिबलउपचय स्थान ... ... ५४ " राशियों के रंग "9 ... 1 .. ... ५५ वेशिस्थानतयाचक्रार्द्धादि ... .. ५६ ग्रहोंकी जाति ... ... ५७ "1

ग्रहमयशरीरकथन ५८ २५ ग्रहोंकेपर्यायनाम ... ... ५९ ग्रहोंके वर्णाकारादिज्ञान .. ... J .. ... ६५ २६ ग्रहोंकीजाति ... ७३ a७ ग्रहोकेरंग देवतादिशा ७५ ... .. ग्रहोंकी शुभपापधातुखीपुरुषादिसंज्ञा ... ७६ ग्रहोकस्थान .. ७९ २८ ग्रहोंकेवख .. ८० ग्रहोकधातु 77 .... ८२ ग्रहाकऋुतु ८६ २९ " रस और फलपाककाल ... ८७ " धातुस्वामितातथाधातुमूलादि ९० " ऊर्ध्वादिदृष्टि ९१ 9 भावोंपरदृष्टि ९२ ३० " मित्रादि ९३ " .. .. " तात्कालमैत्री ... ९८ "

"' ९९ ३१ आरोहावरोह ... ११४ ३३ म्राणपदतथागुलिक ... 100 ११५ " ग्रहोंकीपाचकादिसंज्ञा ... .. १२० ३४ " स्थानोंसपाचकादि १२२ "' पाचकोंके शत्रुमित्र ... १२५ ३५ " 19 फलकथन ... ... १२७ "' गुलिकल प्रस्पष्टविधि ... १३५ ३६ इनकेशुभाशुभदेनेकाक्रम .. ... १३६ ३७ .. C 10.

लग्नफलविचाराऽ्याय: २. ग्रंथकारकीप्रतिज्ञा ... ... ३८ सामान्यभावशुभाशुभ ... ... ... २ कर्माजीविकाकथन ... 1 .. ... ... ७ ३९ भावनाशकयोग ... 1 .. ... .. १८ ४१ मृत्युयोग .. .. ... ... ... " .... १९ धनभावयोग ... ... ... .. ... .... २० " त्ृतीपभावसंबंधियोग ... 100 ... २४ व्वतुर्थभावफल ... .... २७ " पंचमभावफल ... 100 २८ ४३ ... पष्ठभाभावफल ... "7 .. ... ... २९

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सर्वार्थचिन्तामणिविषया नुकमणिका। ( ३ )

विषय. लोक. पृष्ठ.

सप्तमभावफल ... ३० ४३ अष्टमभावफल ... ... ... नवमभावफल ... ... 37 1 .. .... दशमभावफछ ३३ .. ... 100 .. एकादशभावफल 1 .. .. ३४

व्ययभावफल शत्रुमित्रादिजन्यफल ... ३५ ४४ ... 108 100

.... 180 .. ३६ आधानलग्नसेजन्मलग्र .... ... ३८

कन्यापुत्र जन्म ... ४० पिंडाकृतिजन्म .. ... ४१ यमलजन्म ४२ ४५ ... .... पादोत्पन्नसर्पनालवेष्टितादियोग ... पशुनपुंस कच तुष्पदादि जन्मयोग वियोनिजन्मयोग 100 ... ... ५२ पशुजन्मयोग ५३ ... नपुंस क जन्म्योग 19 ... ... ५४ ६ नपुंसकयोग ... ... ५५ संस्कारहीनयोग ... ५८ ४७ ... द्विद्वार गृहनीचग हजन्मयोग ५९ "9 ... 1.0 109 ... गृहद्वारनिर्णय .. .8 ... ६० . . . उपसूतिका ... ... ६२ उपसुति का कीजाति .. ६३ ४८ 1 .. .. सुतिकागृ हमेंदीपविचार ... ६७ " .. c ... लग्नभावविचार ... . .. ... ६९ देहसौख्ययोग ७१ ४९ .... .... ... .... ऐश्वर्ययोग .... .... ... .. ... ७२ रोगीनिरोगीयोग ... ७४ "' .... ... देहदुर्बलादियोग "9 10. ७५ ... ठगचोरभीतियोग .. ७६ शिरोव्रणीयोग 10. ८० ५० देहक्कृशत्वयोग ... ... .. .. 8 ८२ शरीरस्थूलयोग ५१ ... ... ८५ पिशाचवाधायोग 100 ... .. ८८ "9

संचलनयोग ९० ५३ ... 1 .. .. 8 ... परदेशमेंभाग्योदययोग ... ... ९१ स्वदेशमेंभाग्योदययोग ९२ ... . . . ... चाल्यादिमरणांतसुखयोग ... ... ... आदि में सुखीयोग ... 1.0 ... ९६ मध्यावस्थासुखीयोग ९७ ५३ ... ... स्त्री पुत्रादिसुखमध्यांतावस्थासुख ९९ 59

सत्कीर्तियोग .. १०२ "9 ... दुष्कीर्वियोग 108

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(२ ) सर्वार्थचिन्तामणिविषयातुक्मणिका।

विषय. शोक. पृष्ट. ग्रहोंकीउच्चराशि ... २३ ... ५२ ... प्रहोंकीमूलत्रिकोणराशि .. ५३ २४ राशियों केदिनरातिबल उपचय स्थान ... ५४ राशियों के रंग ५५ 19

वेशिस्थानतयाचक्रार्द्धादि ... ... ५६ ग्रहोंकीजाति . 108 ... ५७

ग्रहमयशरीरकथन ५८ २५ ... ग्रहोंकेपर्यायनाम ... ५९ ग्रहोंके वर्णाकारादिज्ञान .. ... ६५ २६ ग्रहोंकीजाति ... ... ... ७३ ग्रहोंकेरंग देवतादिशा ... ७५ "

ग्रहोंकी शुभपापधातुखीपुरुषादिसंज्ञा .. . .. ७६ "'

ग्रहोकस्थान ... ७९ २८ ... ग्रहोकवस्त्र 1 .. ८० ग्रहोकेधातु ... ८२ 77 ...

ग्रहाकऋतु ... ८६ २९ " रस और फलपाककाल ८७ धातुस्वामितातथाधातुमूलादि ९० "

" ऊध्वादिदृष्टि ९१ 1 .. " भावोंपरदृष्टि ९२ ३० " मित्रादि ९३ " .. " तात्कालमैत्री 1 .. ९८ ... "' षड्पलकथन ९९ ३१ .. आरोहावराह ११४ ३३ ... म्राणपदतथागुलिक ... ... .. 6 ११५ ग्रहोंकीपा चकादिसंज्ञा ... ... १२० ३४ " स्थानोंसपाचकादि १२२ "' .. पाचकोंके शत्रुमित्र .. १२५ ३५ फलकथन "' ... ... १२७ गुलिकल प्रस्पष्टविधि ... ... १३५ ३६ इनकेशुथा शुभदेनेकाक्रम ... १३६ ३७ 18. ... लग्नफलविचाराऽध्याय: २. ग्रंथकारकीप्रतिज्ञा १ ३८ ... ... सामान्यभावशुभाशुभ ... कर्माजीविकाकथन 1 .. ३९ ... ... ७

भावनाशकयोग ... ... ... ... १८ ४१ मृत्युयोग .. ... ... १९ ... ... धनभावयोग ... 1 .. ... ... .... २० त्तीपभावसंबंधियोग २४ ४२ ... ... चतुर्थयावफल ... ... २७ ... D ... ... पंचमभावफल २८ ४३ ... ... पष्ठभाभावफल .. . २९ OOD

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सर्वार्थचिन्तामणिविषयानुकमणिका। ( ३ )

विषय. कोक. पृष्ठ

खप्तमभावफल ३० ४३ अष्टमभावफल ... ... नवमभावफल ... ... S दशमभावफल ... ३३ ... .. एकादशभावफल ३४ 100 ... व्ययभावफल ३५ ४४ शत्रुमित्रादिजन्यफल ३६ आधानलग्न सेजन्मलग्र ... ३८

कन्यापुत्र जन्म ४० 1 .. 10. .. . पिंडाकृतिजन्म ... 1.0 ... ४१ ... यमलजन्म ४२ ४५ ... ..

... .... ४३ पशुनपुंख कच तुष्पदादिजन्मयोग ४९ ४६ ५२ "9 वियोनिजन्मयोग 188 ... पशुजन्मयोग ५२ .. ... ... नपुंस क जन्मयोग ५४ ६ नपुंसकयोग ५५ 100 .. . ... संस्कारहीनयोग ... ५८ .. 100 ... द्विद्वार गृहनीचगृहजन्मयोग ५९ ... गृहद्वारनिर्णय ६० .. 1 ... ... ... उपसूतिका ६२ "9

उपसुतिका कीजाति ... ... ... .. ... ... ६३ ४८ .. ... ६७ " सुतिकागृ हमेंदीपविचार ... ... लग्नभावविचार ६९ ... ... देहसौख्ययोग ... ४९ ... .. ७१ ऐश्वर्ययोग ७२ ... ... रोगीनिरोगीयोग .... .. ७४ "' ... .... देहदुर्बलादियोग ... ... .. ७५ " ठगचोरभीतियोग 1.0 ... ... ७६ शिरोव्रणीयोग ८० ५० ... ... ८२ "9 देहकृशत्वयोग ... ... शरीरस्थूळयोग ८५ ५१ ... 100 पिशाचवाधायोग ८८ 100 संचलनयोग ९० ५३ ... ... ... परदेशमेंभाग्योदययोग ९१ ... स्वदेशमेंभाग्योदययोग ९२ बाल्यादिमर णांतसुखयोग ... ९३ ... ... आदि में सुखीयोग ९६ ... मध्यावस्थासुखीयोग ९७ ५३ .. C ... .. C ... स्त्री पुत्रादिसुखमध्यांतावस्थासुख ९९ ... खत्कीर्तियोग ... १०२ 3 .. ... ... दुष्कीर्तियोग १०३

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( ४ ) सर्वार्थचिन्तानणिविषयानुकमणिका।

विषय. श्लोक. पृष्ठ

... .. ... ... १०५ ५४ उदभाग्यादियोग ... ... ... १०६ " ऐचर्पल हित दीर्घायुयोग ... .. १०७ "

परमायुयोग ... .. १०८ "5

युगांतादिआयु .. १११ ५५ सुखामेलनेकीअवस्था ... .. ११४ तृतीयोध्याय: ३. धनभावमेंसु खआदिकाविचार ... २ ५६ अस्थिभंगयोग "

नेत्र नाशयोग ३ "

कुटुम्बरक्षकयोग १२ ५८ सुखसेआजीवनाभावयोग १६ "' राजयोग ... १७ " जनाधीशयोग १८ ५९ सुमुखयोग .... २५ ६० दुर्मुखयोग ... 100 .. २७ वाकप्टुयोग " D. . .. . ... ३८ मूछ (गूंगा) ोग ... ... ३० वाचालयोग 108 .. ३१ जडयोग ६१ ... ... ३४ ज्योतिवज्ञयोग .. 150 ... .. ३५ गणितज्ञयोग ... 1 .. ... ... ३६ न्यायशास्त्रज्ञयोग ४० ६२ व्याकरणज्ञयोग ... ... ४१ " ... वेदान्तज्ञयोग .. ... ... ४२ पट्शा स्त्रज्ञयोग .. ४५ उपहासकयोग ... ... .. ४७ वेदजयोग धनलाभयोग .. 73 ४6

.A. ५० ६३ बाल्यावस्थामेंधनलाभयोग ... निधिआादिलाभयोग ५२ ...

... ... .... ५४ अपनेपराक्रम सेधनलाभ धनागमकीअवस्था .. ... ५५ ६४

100 108 ... भ्रातृधनयोग ... ... ५९ अनेकभकारधनलाभयोग ... ६१ माताआदिसेधनयोग ६२ ६५ पुत्रखेधनयोग ... .. ... ... ६५ पितासेधनयोग ... ... ६८ धननाशकेकारण ... ७० ६६ . .. राजदंडसेधनक्षय ... .. ... ६७ ... ... पनदीजयोग 4 .. ..

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सर्वार्थचिन्तामणिविषयानुक्मणिका। (५)

विषय. शोक. पृड्. खर्वनाशयोग ... Don ... ... ८७ सदयोघनीयोग .. ... .. ... ८९ धनसंख्या .. 903 ... १० ऋुणदातृयोग 1 .. 190 1O6 १०७ ऋणग्रस्तयोग ... १०९ दंतंपतनदंतरोग ... ... ... ... ११३ ७१ प्रमाद (पागल) योग ... 100 .. ११५ तालुरोगयोग ११६ .5. ... नेत्रनाशयोग ... ... ११७ " नेत्रानवधानयोग .. D ११८ ७२ कर्णविच्छेदयोग १२० 1.0 शैप्यादिपात्योग ... ... १२१ 2: कच्चेप के पात योग ... १२९ ... .. ७२ बहुतथोडाभोजनयोग १३१ 1 3 ... सुखभोजीयोग ... ... ... १३४ अन्नदातृयोग ... ... १३५ ... 1 .. ... रुचिभोगीयोग १४० 1 .. .. ७५ परात्रश्राद्धान्नादियोग ... १४१ कुभोजीयोग ... ... १४३ चिरभो क्तादूपकयोग ... . १४५ १४६ " ... ... रुधिररोगयोग ... ... ... १४७ ७६ कुत्तेकी भययोग ... ... .. 1 .. १४८ कदत्रभोजीसभिययोग ... 108 aus ... १४९ निषिलाभवाकूचलन ... ... " ... ... १५१ हेकला (चाकूचलन) योग ... १५२ " ... उगजहरआदियोग ... ... ... ... १५३ ७७

चवुर्थाऽध्याय: ४. तीखरेभावमेंविचारणीय १ " ... ... ... भ्रातृनाशयोग २ 938 100

१५ ७१ 108 ... भाइयोंकेसाथशत्रुतामित्रवाभादि ... .. २४ ८० भाईबहिन के योग ... ... .. २५ भाइयोंकी संख्या २७ "9 .. ... .... 100 ... धीरपराकमीयोग ... . . . 1.0 ... ... ३० ८१ युद्धमेंपहिलेदृढ ३४ " . . . ... शुद्ध मेंअनाेज्ञ ३६ ... 10. उद्धमेंत्रवीण ... 100 ... ... ३८ सत्विकबुद्धियोग ४० .. . .. यालहगवीणयोग ४१ "9

पाहरहटमनमेंकातरयोग .. ... धतुष्पद्सर्पादिभा तियोग

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(६ ) सर्वार्थचिन्तामणिविष यानुक्रमणिका।

विषय. श्रोक. पृष्ठ. विषभक्षणयोग ... ... . .. .. ... ४५ ८E सुपान्भोत्तायोग ... .. ... ... ४६ " कठमेत्रकर्णरोगयोग ... ... ... .. ४७ कर्णभूषणयोग ... ... ... .. ५० ८४ शुभाशुभकथाश्रवणयोग ... 1.0 ... ... ... ५३ "9 अथचतुर्थभावफलाऽध्यायः४. भादसंबंधिविचार ... . .. ५४ गृहलाभयोग ... 1 .. ... ५५ उत्तमगृह्योग ... ... ... ५६ " गेहनाशयोग ... 1 .. ... .. ६३ ८५ बंधुपूज्ययोग ... ... .. ६४ ८६ संधू पकारीयोग ... ... ६६ बंधुत्यक्तयोग ६८ बंधुभयकारीयोग ... 108 ... ७० बंधूपकारीयोग .. 100 ७२ बंधु द्रे षीयोग ७2 " ... ... ... बंधुपूज्ययोग ७४ ८७ बहुगृहयोग ... ७५ गृहस्थिरतायोग ... ... ७६ " .. ... .... बहुक्षेत्रयोग .... ... ... ... .... ७९ "

भ्रातृक्षेत्रयोग ... .. ... ८३ ८८ स्वचलसक्षेत्रपाप्ति ८५ " ... ... ... ... ... ... सत्रीसे खेतीकी प्राप्ति " .. .... .. ... ८६ शत्रुस खेती .... ... .. ८७ वहुक्षेत्रयोग "9 ... ... .... ८८ भूमिनाशयोग ९० ८९ .. ... .. हुखीयोग ... ९७ ९० गृहहीनदुःखीयोग ९१ .. D ... .D. १०४ पापीयोग .... १०५ .... 1.0 ... 0 ... पृण्यभोगीयोग .... .. १०८ जलमग्रयोग ... .... ... ... ११० पत्थरसे चोट ९२ ... 8 १११ मातृगामीयोग ११५ "

मातृतुल्यस्त्रीगमनयोग ११७ "' .... ... माताका जारिणीयोग ... १२१ ९३ जारजातयोग ९४ .... ... १२६ ... ... .. मातृदीर्घायुयोग १३० " ... 1 .. 180 ... मातमरणकाल .. ... १३३ ९५ मनमें कपटयोग . १३९ ९६ ... .0. ... निष्कपटयोग .. ... ... १४३ शुद्धचित्तयोग १४६ " ... ... ... अंत:कपटवाह्यशुद्धयोग १४७ "

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सर्वार्थचिन्तामणिविषयानुकरमणिका। (७)

विषय. श्लोक. पृष्ठ

... ... १४८ १७ वाहनयोग ... ... ... ... १५२ सिंहासन प्रापप्तियोग ... ... १५६ वाहनेशयोग ... ... ... १५८ पंचमोऽध्यायः ५. पंचमभाव मेंविचारणीय .. . पितृधन पुत्रलाभयोग १०२ .. .. पुत्रनाशयोग ... १५ १०३ पुत्रसिद्धियोग ... .. .. ... १९ १०४ वंशविच्छेदयोग ... २२ पुत्र सु ख हानियोग ... ... .. . . . . ... २९ १०५ वडीउमर मेंपुत्रयोग तीव्रबुद्धियोग ... ... ... ३० .. ... ... १०६ धारणपटुयोग ... .. ... ३९ १०७ परेंगितज्ञयोग ... ... 1 .. ४२ बुद्धिनाशयोग .. ४५ विस्मृतियोग ... ४६ बुद्धिदातायोग ... ... ४९ १०८ राजमंत्रीयोग ... ५० भविष्यज्ञयोग " ... . . . ... ... ५२ त्रिकालज्ञयोग .... ... ५३ सुपुत्रजननयोग ५४ ... कन्यानपुंसकादियोग ... ... ... ... ५५ पुत्रसेमित्रताआदि ... .. ... ... ... ... ५८ १०९ पितृसेवायोग .... ... ६३ " अन्नदातायोग .... .. ... न्टृदयरोगयोग ... .. C ६५

अथ षष्ठभाव:। छठेभावमेंविचारणीय १ ११० व्रणयोग ... ... २ " ... ... रोगकेअंग ... ... ... ... ४ कुष्ठादिरोगयोग " .. 100 1 .. ... ज्वर गुल्मादिरोगयोग 100 १११ ... लिंगच्छेद पंढयोग ... ... 100 ११ हस्तपादादिछेदन योग १५ ११२ ... .. ... ... वामनयोग 10. ... ... २१ ११३ दुर्मरणादियोग .. 100 ... ... ... २२ " युद्धमेंमरणयोग ... .. २६ " .... ... ... सद्योमरणयोग ... ... २९ ११४ पितवातादिसेव्रणयो० ... ... ... ... ... ... ३२ विसपेक्षयादिरोगयोग " ... .. ... ... ... ३६

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(६) सर्वार्थचिन्तामणिविष यानुक्रमणिका।

विषय. श्लोक. पृष्ठ. विषभक्षणयोग ... ... ... ... ... ४५ सुपातभोक्तायोग ... 1 .. .. ... ... ४६ " कठने त्र कर्णरोगयोग ... ४७ "

कर्णभूषणयोग ... .. ५० ८४ शुभाशुभकथाश्रवणयोग 1. ... ... ५३ अथचतुरथभावफलाऽध्याय:४. भादसंबधिविचार 100 .. ... .. ५४ गृहलाभयोग ... ... ... ५५ "

उत्तमगृह्योग 100 " ... .. ... ... ५६ गेहनाशयोग .. ६३ ८५ ... .. बंधुपूज्ययोग 1 ..

.. . . . ६४ ८६ संधूपकारीयोग .. ६६ " ... बंधुत्यक्तयोग 100 ६८ बंधुभयकारीयोग ... ७० बंधूपकारीयोग ७२ बंधु द्रे षीयोग ... ७३ बंधुपूज्ययोग ... ७४ ८७

बहुगृहयोग .. .. . ७५ गृहस्थिस्तायोग ... ७६ ... ... ... .... बहुक्षेत्रयोग " .... ... .... ७९ भ्रातृक्षेत्रयोग ८३ ८८ ... ... .. ... ... ... स्ववलसेक्षेत्रपाप्ति " ... ... ८५ ... ... सत्रीसे खेतीकी प्राप्ति ८६ " .. ... शत्रुसे खेती .. ... ... ... ... ... ८७ बहुक्षेत्रयोग ... ८८ ... ... भूमिनाशयोग ... ९० ८९ .. ... ... हुखीयोग ९७ ९० .... .... गृहहीन दुःखीयोग १०४ २१ ... पापीयोग .... १०५ " .... पुण्यभोगीयोग १०८ " .... ... 100

जलमग्रयोग ११० .... . . ... .... ... पत्थरसे चोट ९२ .... ... ... 8 १११ मातृगामीयोग ११५ 1 ... ..

... ... ११७ 1609 ... 8 माताका जारिणीयोग १२१ ९३ .... .... ... जार जातयोग १२६ ... .. c मातृदीर्घायुयोग ... १३० 1 .. ... मातृमरणकाल १३३ ९५ ... 100 ... मनमें कपटयोग . १३९ ... ... ९६ निष्कपटयोग ... ... ... १४३ शुद्धचित्तयोग ... ... ... 100 108 ... ३४६ अंत:कपटवाहाशुद्धयोग ... .. १४७

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सर्वार्थचिन्तामणिविषयानुकरमणिका। (७)

विषय. श्रोक. पृष्ठ मातृस्नेहशत्रुतादियोग ... ... ... १४८ 3७ वाहनयोग ... ... ... ... १५२ सिंहासन प्राप्तियोग .. ... .. १५६ ९८ वाहनेशयोग ... ... .. . ... १५८ पंचमोऽध्याय: ५. पंचमभावमेंविचारणीय ... ... १ १०२ पितृधन पुत्र लाभयोग .. "' पुत्रनाशयोग १५ १० ३ पुत्रसिद्धियोग ... १९ १०४ वंशविच्छेदयोग ... .. . २२ 97 पुत्र सु ख हानियोग ... ३९ १०५ वडीउमर मेंपुत्रयोग .. ... ३० तीव्रबुद्धियोग १०६ ... धारणपट्टयोग ... ... ... ३९ १०७ परेंगितज्ञयोग ... ... ४२ बुद्धिनाशयोग ४५ " विस्मृतियोग .. .. ४६ बुद्धिदातायोग ... ४९ १०८ राजमंत्रीयोग ... 1. . ५० भविष्यज्ञयोग .. ५२ " Cus ... त्रिकालज्योग .... ५३ " सुपुत्रजननयोग ५४ " कन्यानपुंसकादियोग " ... .. ५५ पुत्रसेमित्रताआदि. ... १०९ ... ... ... ५८ पितृसेवायोग ... ... .... ६३ अन्नदातायोग .... ... ... .. ६४ "

न्टृदयरोगयोग .. 108 ... ६५

अथ षष्ठभाव:। छठेभावमेंविचारणीय १ ... 108 ... ११० व्रणयोग ... ... ... २ " ... रोगकेअंग ४ " ... ... ... कुष्ठादिरोगयोग .... 1 .. ... ... ६ ज्वर गुलमादिरोगयोग १११ ... ... ... ... ९ ... लिंगच्छेद पंढयोग ... ... ११ ... ... इस्तपादादिछेदन योग .. ११२ ... .... १५ वामनयोग २१ 1 139559 t ... ... ... ११३ ... दुर्मरणादियोग ... ... २२ " ... 1 .. ... ... युद्धमेंमरणयोग २६ " ... .... सद्योमरणयोग २९ ११४ .. ... ... ... ... चितवातादिसेव्रणयो० ... ३२ ... . . . .... ... विसपेक्षयादिरोगयोग ३६ " ... ... ... ...

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(८) सर्वार्थचिन्तामणिविषपातृ क्रमाणिका।

विषय. श्लोक. पृष्ठ. दीर्घरोगश्ासकासादि .. 6 .. ३८ ११५ मूत्र कृच्छ्र पीनशआदिरोग .. .. ४० गुल्मविदधिआदिरोग ... ... ... ४२ शत्रुपीडायोग ... ... ... 1 ... ... ४४ शब्रुमाशयोग ... 108 ४७ ११६ शत्रुलेमित्रतायोग 1 ... ... ४८ ज्ञातिपीडायोग .. .. ५० ज्ञाततिलेआजीवनयोग ५२ ज्ञातिवृद्धिक्षयादियोग ... ५३ " ज्ञात्युत्कृष्ट्तायोग ... ... ... ५५ चौराग्निपीडन .. ५६ ... ज्ञात्युपकारीयोग ... ५७ ११७ ... ... .. क्षारवस्तप्रिययोग .... ... "

1 .. ६१ "7 . . B ...

अथ पष्ठाध्याय: ६. सप्तमभावमें विचारणीय ११८ ... ... .U. ... 008 कामीपरस्त्रीरतयोग ... " अपुत्रयोग .... IGE ११९ जारजसंतानयोग 10 189 " ... स्त्रीमरणयोग ... GES ११ १२० स्त्रीसंख्यायोग 0 .. १५ अन्यस्त्रीयोग २५ २२१ 1CO QU ... बहुस्त्रीयोग ... ... ... 1 .. ... २८ १२२ शताधिकस्त्रीयोग ... कुस्त्रीयोग ... ३८ १२३ सत्कलत्रयोग पतित्रतास्त्रीयोग .. ... ...

.. ... ४३ पा्पास्त्रीयोग ४६ १२४ ४८ सुचरित्रास्त्रीयोग ... ४९ ... कुलघातिनीयोग ... ... P08 S .. ५२ १२५ पुण्यात्मस्त्रीयाग ... ... ५३ दुश्वारिणीयोग ... ... 909 ५४ गुणवतीयोग ... ... .... 108 .... ५५ कुल दूषकातरी ... oca ... ... ५६ सुशीलायोग " ... ... 168 ... ५७ बाल्यावस्थामेंिवाहयोग ... 1 ... ... ६० १२६ विवाहोत्तरभाग्योदययोग ... 08 ... ६२ विवाहोत्तर भाग्यनाशयोग .... ... ... ६३ विषाहसेभाग्यपुत्रादिचिरकालमें ६५ १२७ हीनजातिस्त्रीयोग .. ... ... 108 .DE ६८

... ... ६९

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सर्वार्थचिन्ता मणिविषयानुकमणिका। (९)

विषय. शोक. पृष्ठ अपनीसेख्ोकीउच्चजाति ... ६९ २२७ खंबंधियोंसेमिन्रतावशत्रुता ... ७३ १२८

... ... ७६ ... ... ७८ वंध्याआदिकुस्त्रीसंयोग ८० १३९ .. . ... स्थाननिरूपण ... ८३ पछुतुल्यमधुनयोग .. ... 100

... 108 ... ८७ भगचुम्बनयोग ... 100 ... हतनलक्षणयोग ... ९३ १३० भगदीर्घहुस्वादियोग ... ९६ ... 1 .. 188 ... सूपादिभोजीयोग ... ... १०५ .. ... दुग्धादिपायीयोग ११० १३२ .. .. ... मूत्रकृच्छ्रयोग ... .. ... ... ११२ सप्तमोध्याय: ७. अष्टमभावमें विचारणीय १३२ ... 18. अल्पायुयोग ... दीर्घायुयोग ... AU अल्पायुवाअनपत्ययोग १६ १३४ ... मध्यमायुयोग 1 .. ... २१ १३५ 100 २६ १३६ भजी्ण सेमरणयोग .... .. ... ... ... २८ विषोबधनसिंहादिखेमरणयोग ... ... ३१ "9 पितामाता का सहमरणयोग ३४ १३७ अपस्मारपिशाचादिसेमरणयोग " ... ... .. ... ३५ भातुल मातापिताआदिकामरण 1.0 ३९ .. ... पालकमरणभ्रातमातुलमरणयोग ... ४० १३८ ... .. आातृनाशयोग " ... ... .. ... ४३ ... बाळकमृत्युयोग ... ४४ " 1 .. OO काणांधयोग ४७ १३९ ... .. C मातापितामरणयोग ... ... मातृदुग्धरहितयोग " .. ... ५० पुत्र सुखा सुखयोग ५१ " ... ... जन्ममें पिताकी दूरसमीपता .... .. C ५४ . १४० पुनरकेहाथ सेदाहादिनहोना ... ... .. ५५ ... मातृविपततियाग ... ... ... ... ... ५६ "9 गुहारोगयोग ... ... ... . ५७ "9 10. ... ... स्थूलान्नमृद्धत्रयोग ... ५८ ... तिरस्कृतयोग ... " ... ... ५९ .. C दूरदेशमरणयोग ... ... ... 5O "

गृहेमागवामरणयाग oap ... ६१ १४१ २

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(१०) सर्वार्थचिन्तामणिविषयानुक्मणिका।

विषय. शोक, पृष्ठ.

अथ नवमभाव:। नवमभावमेंविचारणीय ... ... १ 1 .. १४१ गुरुदारगामियोग " ... ... .. .. धर्ममेंदढबुद्धियोग ... 1.0 ... ६ १४२ दंभसेघर्मयोग .... ... ... .B. ९ पापीयोग .. 8 ११ "

पितृ साख्ययोग " ... 1 .. ... 1 .. १३ पिमृदुःखयोग ... १७ १४२ पितृसुखयोग ... ... ... 100 २० शरष्ठता ऐश्वर्यादियोग ... ... ... २८ १४४ भ्रातृपुत्रादिसेधनादियोग ... .. .. . ३०

.. ३E भाग्यहीनयोग ३५ " ... ... ... पुनर्भाग्ययोग " ... ... ३७ जपध्यानसमाधियोग ... ... ४० १४६ दानीयोग ... ... ४३ ... ... दानाध्यक्षयोग ... ... ... ... ४९ १४७ दामग्राहीयाग ५२ " ... .. .. गुरुभक्तियोग ... ५५ १४८ ... 108

अष्टमोध्यायः ८. दशमभावमेंविचारणीय ... १ " ... कर्माविकलयोग २ ... यज्ञ कार कयोग 1 ece ३ कर्मनाशयोग "' ... .. गंगास्ानयोग ४ १४९ ... ... मंडपधर्मशालायोग .. . ... जीणोद्धारकारकयोग कूपादिकारक योग ... ... १० यज्ञकर्तायोग १५० 100 ... .. ११ यज्ञविघ्ययज्ञकर्त्तायोग ... ... ... १३ आज्ञाकर्वृयोग 108 ... १५ "

कीर्तिमदयोग ... ... 1 .. ... २० १५१ अपकीर्तियाग ३५ ... ... ... " दृढ़व्रतयोग 1 .. 1.0 ... ... ... २६ इंद्रितज्ञयोग .. २७ 1 .. 6 .. मानहीनयोग ... ... २८ १५२

भययोग ३९ " .. c 100 ... .... दासदासीयोग .. ... ... ३० "

३३ " दुर्षलजानुयोग 100 .. संन्यासयोग ... .. १ १५३

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( ११ )

विषय. शलोक. पृष्ठ. अथ लाभभावः। लाभभावमेंविचारणीय ... ... १ १५३ ... .. धनलाभयोग ... ... .. 5 २ ... ... धनलाभादिज्ञान ... ... ... १५४ धननाशयोग ... ... ... ... १० कर्णाभरणयोग ... २१ कर्णसाख्ययोग ...

... ... ... १२ " कर्णरोगयोग ... १३ ... ... दीर्घायुयोग . ... ..

... १४ .. . IDE ...

अथ व्ययभावः। न्ययभावमेंविचारणीय २५५ ... r . . a ... पापखेधनव्यय ... ... धर्ममेंधनव्यय .. .. खीहेतुधननाश ... .. .. २० १५६ भाताकेकारणधनव्यय ... ... ... ११ पुत्रपितृमातृकारणेन० ... ... 10. ... .. १२ नरकपतनयोग ... स्वर्गपाप्तियोग ... ... ... १५७ ... १७ .. २३ नेत्रकाशुभाशुभ ... ... २५ ... ... .. दोळापर्यकादियोग ... २८ १५८ उपास्यदेवादेव ताआदि ... ... .. ३४ उपासनास्वार्थवापरार्थ 208 ३९

अथ राजयोगाध्याय: ९. राजाधिराजयोग १ १६० ... ... वर्गोत्तम जन्मफल " ... ६ वेशि उभय चारीयोग ... ७ सुनफाअनफादियाग १६१ .. . केमङ्ुमयोग " ... ... 6 अधियोग ... ... ... ... नृपतुल्ययोग ... .... .... ... वेश्वर्यकासमय ... १६२ ... ... .... १६ ... नृपतुल्ययोग ... ... ... २० " ... ... राजराजयोग ... २३ १६३ राजतुल्ययोग .. ... 1 .. ३२ चांडालयोग १६५ ... १ ... ... विप्रत्वयोग ... ... ... २ भिक्षाशीयोम ... 1 .. ... .. . ... 3 परदासयोग ... .. ... .. ४ शासक्षयादिरोगयोग " .. .. ... ६ ... ... तनुशोषणादिरोगयोग ... . .. ... ७ नेत्र रोगोन्मादादियोग ... ... जड़अन्य धनभोगी ... ... १३ .. c दुष्कमीपरस्त्रीगामी ... १४

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( १२ ) सर्वार्थचिन्तामणिविषयानुक्रमणिका।

विषय. शोक. पृष्ठ कुलनाश काल्पा युभिक्षुयोग ... १६ १६६ ... ... अपवादीभिक्षाशनी ... ... ... ... १७ .. अपस्मारियोग 1 .. ... १८ १६७ ... ... ... चांडाळयोग धर्मच्युतयोग ... .. २० " ... कुलघ्रयोग " ... २२ .. . ... नीचवृत्तियोग १६८ 1 .. ... ... २५ राजयोगभंग .. ३९ परप्रेष्ययोग ३१ १६९ बंधनयाग 1 .. ३२ " मन्दनेत्रअंधयोग ३३ जातिच्युतयोग ... ३५ "9 ... 10. कुष्ठोयोग ३६ ... .. गहमादिरोग ३७ हद्रोगयोग ... ४० १७० भाग्यहीनयोग ४१ " .... ज्ञानधनहीन योग ४२ व्रात्ययोग ... ... .. ४३ वाहनभीतियोग ... oo पित्ताधिकयोग ४५ १७१ बालघातियोग ... ४७ ब्रह्मघातादियोग ... ... मृगपस्षिहंतृयोग ... 1 .. ... ४९ .. गळरोधसेमृत्यु योग ... ५० नेत्रनाशयोग " ... " .. ... 1 .. घरमेंकुकलासभययोग 1 .. ... ५१ मनुष्योंकापातित्य १७२ ... .. . 108 ५३ रजस्वळावंध्यागमन ५४ " हीनांगना मादिगमन .. ५५ " 1 .. गमनविहारस्थान .. ... ५७ पश्चादिमधुनयोग ... DOO ५७ १७३ स्वनलक्षणयोग ... ... ६० " जोर्णादिघर ... ६१ " ...

अथ दशमोध्याय: १०. अटपमध्योत्तमायु ... 1.00 ... २ १७४ .. तीनप्रकार बालमृत्यु .... ... .... ... नवविधायुनिणय .... ... १० १७५ ... दशावशन मृत्युतियि " ... ... ... १३ राशिसंधिगडातविचार ... ... " ... ... २६ एक वर्षभीतरआपु .. १७६ . .. ... १८ सद्योमरणयोग ... २० 19 ... अष्टवर्षायु ... ... ३९ १७9 मावासहितमृत्यु योग ... ३४ "

वीनवर्ष मेंमृर्पुयोग १७८ ... ३७

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सर्वार्थचिन्तामणिविषयानुकरमणिका। (१३ )

विषय. शोक. पृष्ठ. मासादिआयुयाग १७९ ... ... ... शीघ्र मरणयोग ... ... .... ... ... ४१ ... ... .... ५६ १८१ ... 108 ग्यारहवर्षमेंमृत्युयोग ... ५८ "' 1 .. सात्षघर्षतथा ३े४्ट्में मृ० ... ... ... ... ५९ ... द्वादशादिवर्ष मेंरणयोग 1 .. ... ६४ १८२ १८११०आदिव र्धो मंमृत्यु ... ७४ १८३ 1 ... ... ३० वर्षमेंमृत्युयोग १८४ ... .. . . . ... अथारिष्टमगाध्याय: ११ अरिष्टमंगयोगा :... .. १८५ 1. . .. अथ मध्यदीर्घयोगाध्याय: १२ ३३ वर्षांयुयोग .... ... १८९ J .. 108 ३७।४२।४४ वषमृ० ५ १९० .. .. ... ४४ वर्षायुयोग ... .. 1 .. राजयोगसहित४८ वर्षायुयोग ११ १९१ ... .. ... वेदांतज्ञ० ५२ व० भा० १२ ... .. ... ५८ वर्षायु ... ... ... .... १३ .. शासज्ञ ६० व०मा. ... १४ ... कुलनाश काग्रिमरणयोग ... १५ 100 1 .. राजयोगसहित६०वर्षायु .. १६ राजयोगसहित ६८व० आयु १९२ ... .. 100 1 .. धनवान् ६६ वर्षायु "1 ... ३१ ... ... ज्ञानियोग ६५ वर्षायु ... .. . .. १२ .. . " " ७० वर्षायु ... ... दीर्घायुयोगकथन १९३ . .. ... ... .. २७ ... ७० से अधिकायु ... ... ८० वर्षायु २८ ... ... ... ४० वर्षपर्यतककेश ऊपरसुख ... ३९ ... 10. ऐश्वपंसहितदीर्घायु ३० १९४ ... राजतुल्पदीवायु ... ३६ ... ... जितेन्द्रियदीर्घायु ३७ १९५ ... .. शतायुर्यीगा: ... ३८ .. " परमायु १२० योग ... अमतायुर्योग १९६ ... 10. ... ... ५२ सहस्रायुयोंग ५३ १९७ ... ... .a. द्विसहस्त्रायुयोग ५५ " ... ... इंद्रपदयोग ... ५७ .... युगांतायुर्योग .... ... ... ५९ मह्मापद्योग ६२ १९८ ... OOC .. . असंख्यायुयोग ... ६४ ... ब्रह्म पद्प्राप्तियोग ६८ " ... ...

युगांतायुयोंग १९९ अधुतादिआयुर्योग ... ७५

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(१४ ) सर्वार्थचिन्तामणिविषयानुक्रमणिका।

विषय, पृष्ठ, सुनितुल्ययोग ७७ 1 .. 1 .. ... १ देवतुल्ययोग ... " ... ... ७८ असंख्याद्वयोग ... ... ८० २०० ... मुंनिवुल्ययोग . . . ८१ .. . अथ त्रयोदशोव्याय: १३. दीप्तादिदशाकथन २०१ ... .. . 108 दोप्तग्रहफल .. . . .. .. ... ६ स्वस्थ ம .. . ... .. . .. . ... 15 V मुदित ... ... ... ... शांत .. . ९ २०२ हीन ... 1 .. 1 .: ... १० "

अतिदुःखित ११ .. .. . .. . ... दिकल ... १२ 1 ... ... ... ... " खल .. . १३ ... ... कोपा ... . . . ... १४

अथ दशाफलविचार:।

? २०३ ... उच्चदशाफल ... 100 1.0 आरोहीदशाफल ... ४ . A भवरोहदशाफल ... ५ "9 .. . नीचस्थितद शाफल ६ ... ... अत्यंतनीचगतफल ७ ... मूल त्रिकोणगतद०फल ८ २०४ ... स्वक्षेत्रगतफल ... . . . . . . 1 .. ... अधिशतुगतफल १० .. . शत्रुराशिगतफल ११ ... मित्रराशिगतफल ... ... १२ ... स्व गृहगतफल .. .. २३ समराशिगतफळ २४ २०५ ... .. . उव्वगतग्रहयुतदशाफल १५ ... ... नीचगतग्रहयु कदशाफल ... .. .. १६ पापयुक्तदशाफल १७ .. ... ... शुभयुक्तदशाफल ... १८ शुभवीक्षितदशाफल १९ ... .. ... पापवीक्षितदशाफक २० केन्द्रगत सूर्यदशाफल ३१ २०६ ... ...

.. . ... ... २२ ... उच्चांशकगतद०फ० २३ .. . .. नीचांशगमद०फ० ... २४ २५ " दशाआद्यंतादिफ० ..

पष्ठस्थद०फ० ... ... २७ 1) अष्टमस्थद०फ० . ...

द्वादरगतद०फ० ... २८ २०७ ...

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सर्वार्थचिन्तामणिविषयातुकमणिका। (१५ )

विषय. श्लोक पृष्ठ. धनगतद०फ० .. .. ... ... ... २९ २०७ नृतीयगतद०फ० ... ... .. . ३० चतुर्थगतद०फ० ... ... ... ३१ सप्तमगतद०फ० ... .. ३२ दशमगतद०फ० ... ... ... . . D ३३ "

एकादशगतद०फ० .. ... ... 1 .. ... ३४ २०८ स्थानबलीद०फ० ... . ३५ स्थान वलहीनद०फ० ... ... ३७ "1 दिग्वीर्यद०फ० .... .. . 108 ... ३८ दिग्बलहीनद·फ० ... ... ३९ निसगंबलीद०फ० 1: . .88 ४० २०९ चेष्टाबलीद०फ० ४१ दृष्टिबलयुतद०फ० . . . ... ... ... ... ... कूर षष्टयंशगतद०फ० ... 1 .. ४२ मृद्धशादिगतद०फ० ... ... ... ४४ पारावतादंश गतद०फ० ... ... .. ... ४५ प्रथमांत्यफलविचार .. ... ... ४६ सर्पद्रेष्काणगतद०फ० ... ... 1 .. ४७ २१० उच्चराशिनीचांशकगतद०फ० ४८ " ... .. नीचराशिउ च्चांशकफ .. ... ४९ 12 अथचंद्र स्यपरमोच्चादि- गतदशाफलानि १ श्रोकसे ४५ पर्यत ... ... अथ चतुर्दशोध्याय:१४. भौमस्यपर मोच्चादिदशाफलानि श्लो०१ से ४८ पर्यत ... ... २१७ अथवुधस्यपरमोच्चादिदशाफलानि श्रलो० १ से ४८ पर्यत 100 २२३ अथ पंचदशोध्याय: १५. गुरो:परमोच्चादिगतदशाफलानि श्लो० १से ४७ पर्यन्त ... २३० अथ शुकस्य परमोच्ादिगतदशाफलानि ४४ श्ोकैः ... ... २३६ अथशनिदशायांपरमोच्चादिगतदशाफलानि ४५ श्ोकैः ... ... ३४२ अथ षोडशोध्याय: १६. राहुदशाफलानि २८ श्रोकैः २४८ ... राहोरुच्नीचादि .. ... .. . १ राहोरुच्ादिगतदशाफ० AY ... केतुदशाफलानि५८ श्ोकै: ... २५१ ... अथांतर्दशाफलानि ... ... " ... तत्रादासमुच्चयेनांतर्दशाफलानि ३० श्राक :... २५३ . . B सूर्यान्तर्दशा २७ शोके: २५७ ase ... चन्द्रान्तर्दशा २४ श्रोकै: ... २५९ ...

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( १६ ) सर्वार्थचिन्तामणिविषयानुकमणिका।

विषय. श्लोक. पृष्ठ. भौमान्तर्दशाफलं २१ श्रोकैः ... .. 8 राहोर्तर्दशाफलं १९ ग्ोकैः ... २६४ ... ... जीवान्तर्दशाफलं २१ श्रोकैः ... २६६ ... ... ... .. शनेर्तर्दशाफलं १७ श्ोकै: २६८ ... ... ... ... बुधान्तर्दशाफलं २० शोफै: २७० ... ... ... केत्वन्तर्दशाफलं २० श्ोकैः २७२ .. 1. . .. 8 शुक्रान्त दशाफलं२०श्ोकैः .. २७४ .... .. ... ... अथ प्रकीणोध्याय: १७. जन्ममक्षत्रक्षयवृद्धिफल १ २७६ ... ... क्षयादिरोगयोग ... 1 .. २७७ स्त्रीनाशयोग ... ... ४ "' ... .... मूर्षद्वपीआदि ... ५ 19 .. D अलपायुयोग ... . .. ... बाल्येमात्रादेहीनि: ... 100 ७ अंगहानियोग V ... ... सफलराजयोग ... .. . रांजयोग १० खगादिद्रेष्काणकथन १२ २७८ ... ग्रहोंकी शुष्कार्ईसंज्ञा 11 ... .. ... ... १३ सजलनिर्जलराशिकथन ... ... ... ... .... १४

उपसंहाराध्याय: १८. ग्रहताराकथन ... ... .D. 100 वाधत्वकथन २ २७९ .... ... 6 .. करकग्रहलस्रसे० ३ .. D ...

कारकसूत्रकथन ... ... ... भाषाकारश्लोका: इत्यनुक्रमणिका समाप्ता।

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॥ श्री:।। सर्वार्थचिन्तामणिः। भाषाटी कासहितः।

श्रीनाथं परदेवतां गणपति नत्वार्भकज्ञानदां सद्दाषाविवृतिं तनोति सरलां सर्वार्थचिन्वामणेः॥ टीहर्ष्यी निवसन्महीधरधरादेवः स्वबुद्दयाल्पया- डटीकत्वादखिलोपयोगरहितत्वादेव गाढथमः ॥ ३ ॥ टीकाकार ग्रन्थादिमें विघ्नविदातार्थ प्रणामरूप मंगलाचरण करताहै कि, अपने गुरु श्रनिाथ एवं परम इष्ट देवता और गणेशको नमस्कार करके बालक अर्थाव इस शास्त्रके अर्थसे अन- भिज्ञोंको इसका ज्ञान देनेवाली, टीका टिप्पणी न होनेके कारण सर्वसाधारणको लाभदायक न होनेसे टीहरी (राजधानी) निवासी महीधरशर्मा बडे पारिश्रमपूर्वक अपनी अल्प बुद्धिके अनुसार सर्वार्थचिन्तामणिनामक ग्रन्थकी सरलार्थ भाषाटीका करता है ॥ १ ॥

श्रीमच्छेषगिरेस्तटाधिनिलयं श्रीवेङ्गटेशं गुरुं नत्वा वेङ्कटनायकं त्वनुदिनं जातोहमार्यात्सुधीः॥ ज्योतिःशास्त्रमहाब्धिपारगमने वक्ष्यामि पोतात्मकं ज्योति शास्त्रविवेक पाकविदुषां सर्वार्थचिन्तामणिम्॥१। ग्रन्थकर्त्ता व्यंकटशर्मा निर्विन्नपूर्वक ग्रन्थसमाप्यर्थ मेंगलाचरण करताहै कि. श्रीमान् शेषा- दविके तटपर निवास करनेवाले श्रीवेंकटेश्वर भगवान्को तथा जिस श्रेष्ठ गुरुसे मैं व्यंकटशर्मा पण्डित भयाहूं ऐसे वेंकटनायक गुरुको प्रतिदिन नमस्कार करके ज्योतिःशास्त्रविचारका परिपाक (फल) जाननेवाले विद्वानोंको ज्योतिःशास्त्ररूपी महासमुद्रके पार पहुंचनके वास्ते इस सर्वार्थचिन्तामणि नाम ग्रंथको जहाजरूप कहताहूं॥। १।। नीलांबुजरुचिं देवं सकृद्यांति मनोरथम्॥ देवा: प्रणम्य यं सर्वे तं नमामि गजाननम् ॥ २॥ वाग्विभूतिप्रदा देवी या श्वेतांबुरु- हस्थिता॥ गोक्षीरघवलाकारा स्वयं तिष्ठतु वाचि मे ॥ ३ ॥

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(२) सर्वार्थचिन्तामणिः। पुनः गणेशजीको वन्दना एवं सरस्वतीसे मार्थना करताहै कि, जिस गणेशजीको प्रणाम करके देवता सहजहीमें अपने मनोरथोंको प्राप्त होजातेहैं ऐसे नील कमलके समान कांति- वाले गजाननको नमस्कार करताहूं ॥। २।। जो सरस्वती वाणीरूप ऐश्वर्य देतीहै, जो श्वेत कमलमें बैठीहै जो गोदुग्धके समान श्रेत आकारवती है वह स्वयं मेरी वाणीमें बैठे॥३॥ मेषादिराशयः सर्वे दिनेशप्रसुखा ग्रहाः॥ये च लोकोपकर्तारः पांतु मामिह ते सदा।।४।। संपूर्ण मेष आदि राशि, सूर्यादि ग्रह और जो संसारके उपकारक, तिथि नक्षत्रादियोंके देवता हैं वे सर्वद़ा यहां मेरी रक्षा करें॥ ४ ॥ यज्जातके निगदितं सुवि मानवानां तत्पाश्निकेपि सकलं कथ- यंति तज्ज्ञाः॥ प्रश्नोपि जन्मसदृशो भवति प्रभेद: प्रश्नस्य चात्र जननस्य न कश्विविदस्ति ॥॥ संसारमें मनुष्योंके वास्ते जातक (जन्मकाल) में विचार कहाहै वही विचार मश्नमें भी नातकज्ञ कहतेहैं ऐसेही मश्नभी जातकके समान होताहै जातक तथा पश्नविच्वारमें कुछ भेद नहीं है॥। ५ ॥ भौमाच्छविच्चन्द्ररविज्ञशुक वक्रेज्य मंदार्कसुतामरेज्याः॥ मेषादि भानामधिपा: क्रमेण तदंशकानामपि ते भवेयुः ॥६्॥ अब संज्ञामकरण कहते हैं. कि, मषादि राशियोंके स्वामी कमसे मंगल, शुक्र, बुध, चंद्रमा, सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि, शनि, बृहस्पति हैं अंशोंके स्वामीभी वही होते हैं।। ६ ।। मेषादिपूर्धा वदनं गलाघोहत्कुक्षिवासोभृतबस्ति गुह्यम्।। ततोरु- जानुद्यजंघमंघ्री पापान्वितं यत्तदुपैति नाशम्॥७॥ राशियोंके अंगविभाग कहतेहैं मेष शिर, वृष मुख, मिथुन स्तनमध्य, कर्क हृदय, सिंह उदर, कन्या कटि, तुला नाभिसे नीचे, वृश्चिक लिंग, धन ऊरु, मकर जंघा, कुम्भ घुटना, मीन पैर, इस प्रकार शरीरराशिचक्र है, कालानुसार राश्ियोंके फिरनेसे इसी राशिचकको कालचक भी कहतेहैं।। ७॥ व्यत्यस्तमत्स्यदयमश्वजंघश्रापी मनुष्य: सगद सवीणम्। नृयु- ग्ममादाय करेगनिसस्ये नौस्थाबला मानघरो वणिकू च ॥ ८॥ घटी जलादानग्रहीतुकाम: शेषाः स्वनामानुगुणा भवन्ति॥ मेपस्तु मेषो वृषभः स एव कर्की कुलीरस्त्वथ वृश्धिकोलि:।९।

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भाषाटीकासहित:। ( ३ )

राशियोंके स्वरूप कहते हैं. मीन. मछ्लीयोंका जोडा एकके सुख पर दूसरेकी पूंछ, धन. गंवा घोडेकेसे. और कटिसे ऊपर मनुष्याकार, मिथुन, स्त्री पुरुषका जोडा गढ़ा और वीणा धारण करता, कन्या. नावमें बैठी एक हातमें अनि पात्र दूसरेमें धान, तुला. पुरुष तराजू हातमें लिये, कुम्भ कंधामें जललेनेके लिये बडा धारण करता, अन्यराशि नामसडश रूप रख तेहैं जैसे मेष मेंढा, वृष बैळ, कर्क केकडा, वृशधिक विच्छू है॥ ९ ॥ राशिं तरिधाकृत्य टकाणमाहुस्तदीश पुत्रेशशुभाघिनाथाःयुजी- न्दुसूर्य्यौं भवने रवीन्दू नाथौ त्वयुग्मे भवनस्य चारद्े॥ १०॥ द्रेष्काण, राशिके तीसरेभागको कहतेहैं एक राशिके ३० अश होतेहैं. मथम भाग १० अंश- पर्यत उसी राशिके स्वामीका द्वितीय भाग ११ अंशसे २० पर्यत उस राशिसे पंवम राशिस्वामीका तीसरे भाग २१ अंशसे ३० पर्यत उस राशिसे नवम राशिस्वामीका द्वेष्काण होताहै होरा समराशिकेपूर्वार्ध्ध१५ अशपर्यत चन्द्रमाकी, उत्तरार्धमें सूर्यकी, और विषम राशिके पूर्वार्द्धमें सूर्यकी, उत्तरार्द्धमें चन्द्रमाकी होतीहै ॥ १० ॥ चरेंशकाना मधिपास्तदंशाद्राशौ स्थिरे तन्नवमेश्वराद्याः॥ द्धिदेह मेतत्सुतराशिनाथाददंति शास्त्रार्थविदो महांतः॥११॥ नवमांश कहतेहैं, चर राशि १। ४। ७।१० में अपनी राशिसे स्थिर २।५ ।८ ११ में राशिके नवमराशिसे द्विस्वभाव ३ ।६।९ । १२ में उसके पंचम राशिस गिनना । ३० अंशके नवभाग ३ अंश २० कला होते हैं इसी कमसे गिनके नवमांश जानना।। ११॥

होराचक्रम्।

स्वा. रा. मे. वृ. मि क. सिं. क. त. वृ. ध. म. कु मी.

द्ेव १५ सू५ चं४ स ५ चं४ स. ५ चं. ४ स. ५चं. स. ५ चं. ४ सू ५ चं. ४

पितर १३ च ४ म. ५ चं. ४ सू. ५ च. ४ सू. ५च. ४ सू ५ चं. ४ स. ५च ९ स ४

द्रैष्काणचक्रमिदम्।

स्वा० रा मे वृ मि क सि क त वृ ध म कु

५ 22 नारद अ ७ ९ १० ११ १२ १० २ ६ AU

भग. २० ५ ६ ७ ९. १० ११ १२ १ २ ३

डुर्वा ३० ९ १० ११ १२ ३ ५ ६ ७

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(४) सर्वार्थचिन्तामणिः।

ग्रंथांतरे चतुर्थौशो यथा॥ स्वर्क्षादिकेन्द्रपतयस्तुर्याशेशाः क्रियादितः ॥ सनकश्च सनन्दनश्च कुमारश्च सनातनः॥

स्वा अं. १ २ ४ ५ ७ ८ ९ १० ११ १२ AU

७ २ ४ ५ ८ ९ १० ११ १२

३० मं शु चं नु मं श श यृ सनक 64 6

५ ६ ७ ८ २० ११ १ २

चं. श श मं शु संनदन 6a AU

१० ११ ४ ६

श श मं शु चं सु कुमार A S 60] Au n2

३० १० ११ १२ ३ ४ ६ ७ ८

श श बृ शु बु चं शु मं सनातन 4.1 A P A S

सप्तांशचक्रम्।

स्वा० लग्न मे वृ मि क सिं क तु ध कु मी

क्षार ६ १७ १ १० ५ १२ २ ९ ११ ६ 6 AU

क्षीर ३४ ९ ११ ६ ८ १० ५ १२ 6 oC AU

दधि १२ ५१ १० १२ ९ ११ ६ १ ८ 6 AU S cC

आज्य १७ ८ ४ ११ ६ ८ १० ५ १२ २ ९ 6 AU

इक्ष २१ २५ ५ १२ ९ ११ ६ १ ८ १० 6 AU

मद्य २५ ४२ ६ २ १० १२ २ ९ ४ ११ 6 S AU

शुद्ध ३० जल २ ९ ११ . ६ १ ८ १० ५ १२ 6 LU

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भाषांटीकासहित:। (५)

नवमांशचकम्।

स्वा० मे तृ मि क सि क वृ ध म कु मी अंशा:

देव १ मं १० श ७ शु ४ चं १ मं १० श ९ च१ सं १० श ४ वं ३२०

नृ ११ श ८ मं ५ सु२श ११ श ८ मं ५सू २ श११ श ८ मं ५ सु ६।४०

राक्ष ३ ब १२ वृ ९ ब ६ बु३ बु१ बृ ९ ख ६ ३३ वु१२ध ९ ध ६ सु १००

देव ४ चं १ मं १० श ७गु४ च १ मं १० श ७ शु४ चं १ म १० श ७ शु १३२०

नृ ५सू २ शा ११ श ८ म ५सू २श११श ८ म५ लू २ छु ११ श ८ मं १६१४०

राक्ष ६ बु ३ व १२ व ९ वृ ६ बु ३ मु१२ वृ ९ बृद गृ ३ बु१२ वु ९ न २०1०

देव ७ शु ४ चं १ मं १० गु ७ शु ४ चं १ म १० ३७ ४ चं १ म १० ३२३।२०

नृ ८ मं ५सू ११ श ८ म ५ सू २ शु११ श ८ म ५हू २ शु११ श २६१४०

राक्ष ९व। ६ बु ३ घु१२ ३९ व ६ यु ३ घु१२ गृ९ व ६ बु ३ तु १२३ू ३०1०

तत्क्षेत्रपा द्वादशभागनाथा लग्नस्य वर्गाधिपतिस्तदीशात्॥ तरिंशांशपा भौमशनीज्यसौम्यशुक्का भवंत्योजगृहे समे तु ॥१२॥ विलोमतः पंचशराष्ट्सप्तबाणाः क्रमादूचुरनेकशाख्तैः॥ सप्ांश- पास्त्वोजगृहे तदीशादुग्मे गृहे सप्तमराशिपातु॥ १३॥

द्वाद्शाश एक राशिके १२ भागका होताहै जो मत्येक २ राशि ३० अंशका होताहै जिस राशिका द्वादशांश देखना हो उसीसे गिना जाताहै. त्रिंशांशक विषमराशिमें ५ अंशपर्यंत मंग- लका, १२ तक शनिका, २० तक गुरुका, २५ तक बुधका, ३०तक शुक्का और समराशि- में विलोम जैसे ५ मंशतक शुकका, १० तक बुधका, १८ तक बृहस्पतिका, २५ तक शनिका, ३० तक मंगलका त्रिशांश होता है-सप्तांशक एकराशि ३० अंशके सातवें भागका होता है विषम राशिमॅ अपनी राशिसे समराशिमें सप्तमरशिस गिना जाताहै स्पष्टताके लिये इसका चक्र पहिले लिखदिया द्वादशांश त्रिंशांशका आगे लिखते हैं ॥ १२ ॥ १२ ॥

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(६) सर्वार्थचिन्तामणिः।

द्वादशांशचक्रम्। स्वामिन: अं मे मि क सिक तुवृ ध म कु।मा

गणेश: २ ८ ९ १०११ १२ ३० मं शु बु चं सू शु मं बृ श

अश्विनी· १२ २ कुमार: बु स शु मं ग श सं

७ १० २२ २ यम: ७ चं सू बु सं गु श श ब्र सं शु 64P 6al LU लढ ५ ९ अहि: १० ११ १२ १ सू दु मं श श वृ वु

गणेशः ५ ६ ७ ८ ९ १२ ३० सु वु सं गु श श गू सं चं 24.00

अश्विविनी १५ ६ ७ १० ११ १२ ५ कुमार: बु शु सं गु श मं चं सु 4 .- 0 6a4 AU

यम: ८ १०११ १२ ३० ३ा मं गु श श वृ मं स

अहि: २० ८ ९ १० ११ १२ ५ म त्ृ श श मं बू चं सू बु

गणेशः २२ १० १११ ५ २० ग श श मं वु चं सृ वु शु 5.2266ल आश्रवनी- २५१० ११ १२ २ ८ ९ कुमार: श गु म शु चं स बु शु मं वृ

९ यम: २७११ २२ ५ ७ ८ १० ३०श मं सृ वु शु मं श Call AU

अहि: ३०/१२/१/२ ४५ ६ ७ ८९१०११ ०इमशुवचस्बु मवृशश

विषमत्रिंशांशचक्रम्. समत्निशांशचक्रम्.

स्वा. अं मे मिसिं तु वृ|ध कुं स्वा० अ वृकक वृम री

वह्नि: मं मं मं मं मं मं मं जलद ५ शु शु शु

वायु: १० श श श श श श श घनद: १२ बु बु वु नु 6 의

इंद्र: गु गु गु गु गु गु गु शक्र: २० गु गु गु गु शु

२५ बु बु बु चु वायु: २५ धनद: नु श श श

जलब ३० शु शु शु शु वाहि: मं मं मं अं अं अं

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भाषाटीकासहित: । (७)

दर्शांशपानामधिपास्तदीशादोजे समे तन्नवमेशवरादाः॥ ओजे क- लानामधिपास्तदीशाश्रतुर्मुखो विष्णुहरौ दिनेशः।। १४॥ युग्मे क्माव्यत्ययमेव राशौ पष्टचंशपानामधिपास्त्वयुग्मे॥१५॥

एकराशि ३० अंशको दशम भाग दे। रे अंशका होता है इसे दशाश कहते हैं विषम राश्िमें अपनी राशिसे सममें उसके नवम राशिखे गिनना इनके स्वामी इन्द्रादि दश विक्पाल हैं ॥१४॥ बोडशांश राशिके सोलहवें भागको कहते हैं जो अं १ क ५२ वि. ३० का होता है विषमराशिमें त्रह्मा १ विष्णु २ हर ३ सूर्य ४ इस कमसे और समगाशमें विपरीत अर्थात् सूर्य १ हर २ विष्णु ३ ब्रह्मा ४ कितीका मत है कि बारह राशियोंके स्वामी लेकर ऊपर ४ अंशके लिये सूर्यादि ४ हैं. सममें प्थम ब्रह्मादि नव राशिस्वानी जानने. इसका स्पष्ट चकमें लिखते हैं. दशांशभी चक्रमें देख।। १५ ।।

दशमांशचक्रम्.

विषमे स्वा० मे वृमिक सिक तुवृ म ऊुंमी समे स्वामिन:

इंद्र: १० ३ १२ ५ ७ ६ ११/ म श वु य सूशु गु च गु घु श मं अनंत:

अग्ि: ६ ११ ८ ५ २३ च मं बु बु मं सू श गु ग्रह्मा

यम: १२ ५ २ ७ ९ १२ ८ १० मं ट्रा ईशान: गु सू शु गु श मं

१२ ४ ८ २ राक्ष० ? ५ १० ७ १२ चं कुबेर: मं वु श गु छु शु श

१५! ५ 金 3 의 AU

वरुण: ६ ११ १० १२ वाघु: सू गू वू मं मं बु d. oc

वायु: १८ ६ ३ ५ ७ १२ ९ बु बु मं गु गु शु चं मं वरुण:

कुबेर: २१ ७ ९ ६ ११ १० १२ ५ गु मं मं दु सू राक्षस: गु शु dj. ec c0l AU

ईशान: २४ ५ १० ७ १२ ९ २ ११ ६ मं मं यम: श छ गु गु श श त. ह

२७/ ९ ११ ५० ७ क्षा ८ १२ अग्नि: वु श मं श बु गु सु शु 6a AU

अर्नस: १० ७ १२ २ ।११ ४ १ ६ ८ शु गु गु शु श मं इंद्र: 6 S!

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(6) सर्वार्थचिन्तामणिः।

षोडशांश चक्रम्.

क तु कुंर्मा सम सं. विषम स्वा. मे वृमि सिक वृधम स्वा. अकनि

१ ५ ९ १ ५ ९ १ ५ ९१ ५ ९ सू १ ५२|३० 山

वि ६ १० २ ६ १० २ ६ १० ६१० ३४५०

ह ?? ७११ ७ ११ ११ वि ३७३० 6 w 6 AU

सू ८ ८१२ १२ ४ ८ १२ व्र ७ ३० oc oc

५ ५ ? ५ ९ १ ५ ९ १५ ९ सू २२३०

६ वि ६ ६१० ६ १० ६१० ह १११५

११ ३ वि 5 S CC JU

७ ह ११ ७ ११ ७ ११ १३ ७३० RU

८ सू ८ १२ ८ १२ ८ १३४ ८ १२ ४ व्र १५० oc

९ ब्र ९ ५ ९ ५/ ९ ५ सू १६/५२३०

१० वि १० 2 ६ १० ६ १०२ ६ १० ६ ह १८ ४५

११ ह ११/ ३ ७ ३ ११ ७ चि २०३७३० 6 6 AL

१२ सू १२ ४ ८ १२ ८ १२ ४ ८१२ ४ ८ व्र २२३० oc

१३ व्र ५ ९ ? ५ ९ ५ ९ ५ ९ सू २४२२३०

१४ वि ६/१०२ ६ १० २ ६१० 1१० २५/१५ ० oW 3

१५ ह ७ ११ ३ ७ ११ ७ ११३ वि २८/७ ३० AU

१६। सू १२ ४ ८१२ ४८१२४८१२ व्र ३००

अथ प्रसंगाद्विंशांशसिद्धांशभांशचत्वारिंशांशपं चवेदांशाः। तत्रा- दौ विंशांशः । अथ विंशतिभागानामधिपा ब्रह्मणोदिताः॥ क्रियाचरे स्थिरे चापान्मृगेंद्राद्विस्वभावके॥१॥ काली गौरी जया लक्ष्मीर्विजया विमला सती ॥ तारा ज्वालामुखी श्वेता ललिता बगलामुखी॥२॥ प्रत्यंगिरा शची रौद्री भवानी वरदा जया॥ त्रिपुरा सुसुखी चेति विषमे परिचिंतयेत् ॥ ३ ॥ सम- राशौ दया मेधा छिन्नशीर्षा पिशाचिनी॥ धूमावती च मातंगी बला भद्रारुणानला ॥४॥ पिंगला छुछुका घोरा वाराही वैष्णवी सिता॥ सुवनेशी भैरवी च मंगला ह्यपराजिता ॥५॥

इन विशांश आदियोंकी टीका उदाहरणसहित चक्रोंमें लिखा है ॥। ५ ॥

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माषाटीकासहित:। (९)

विंशांश चक्रम्.

सं. वि.स्वा. मे वृमिक सिक त वृध म कुं मी स. स्वा. अं. सं. सि

१ काली १ ९५१९५१९५१९५ दया १३०

२ गौरी २१०६ २१०६२१०६ २१० ६ प्रेधा ३1० २

जया ११ aY ७ ३११७१७३११७ छित्ना ४३०

पिशाचि ६1० 20 ४ लक्ष्मी १२ ८४१३८४१२८४१८

५ विजया ५१९५१९५१९५१ धूमावः ७।३० ५

६ घिमला ६ २१०६ २१०६२१०६ १० मातंगी ९/०

१०१३० GUATE ३११ ७ m बगला 9 jv ७ सती ७ ११ ७ ३११७ ११

४ १२ ८ १२1० 20 ८ तारा ८४ १२८४१२८ १२ भद्रा

ज्वा. मु. ९५१९५१९ ५ १ ९ ५१ अरुणा १३।३०

१० श्वेता १०६२१०६ २ १०६ २१०६ शीतला १५1० १०

ललि. ११७ ३११७ ३११७३११ पिंगला १६।३० ११ nY

१२ बगला १२८४१२८४१२८४१३ ८ ४ छुछुका १७।० १२

१३ प्रत्य. ९५१९५१९५१ ९ ५ घोरा १९/३० १३

१४ शची २ १०,६२१०६२१०६ २१० ६ वाराही २१1० १४

१५ रौद्री ११७ ३११७ ७ वैष्णवी २२/३० १५ aY ३११ ७ ३११

१६ भवानी ४ १२ ८ ४१२८४१२८४ १२ ८ सिता २४1० १६

१७ वारदा १ ९५१९५१९५ १ ९ भुवना २५/३० १७ 5o

१८ जया ६ २१० ६ २१०६२१०६ २ १० भेरवी २७1० १८

१९ त्रिपुरा ७ ३११ ७ ३११७ ३११ ७ ११ मंगला २८।३० १९

२० सुमुखी ८४१२८४१२८४१२८ ४१२अपराजिता ३०1० 20

अथ सिद्धांशकम्॥ सिद्धांशकानामधिपाः सिंहादोजभगे गृहे॥ कर्काद्ुग्मभगे खेटे स्कंद: पशुघरोनलः॥६॥ विश्वकर्मा भगो मित्रो

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(१० ) सर्वार्थचिन्तामणिः। मयोंतकवृषध्वजाः॥ गोविन्दो मदनो भीमः सिंहादौ विषमे क्रमा- त ।७।। कर्कादौ समभे भीमा विलोमेन विचिंतयेत्।८।। यथा- लग्े ३।८।१५ कर्कादिगणने मकरागतिः॥ अथ भांशकम् ॥ नक्षत्रेशा: कमादस्रयमवह्निपितामहाः॥ चन्द्रेशादितिजीवाहिपि- तरो भगसंज्ञिताः ॥ ९। अर्यमार्कस्त्वषमरुच्छक्राशनिमित्रवा- सवाः॥ नि्तत्युदकावेश्वेजगोविंदवसवोंबुपः ॥ १०॥ ततो- जपादहिर्बुध्न्यः पूषा चैव प्रकीर्तितः॥ नक्षत्रेशास्तु भांशेशा: रभांशसंख्या: स्वभात् कमात् ॥११॥ उदाहरणम् -- यथा लयं ३।८।४५ मकराद्वणनया सिंह आगत एवं स्वत्र जेयम् ॥ अंथ खवेदांशगणना।। चत्वारिंशद्विभागानामधिपा विषमे कि- यात्॥।विष्णु चन्द्रौ मरीचिश्ध त्वष्टा घाता शिवो रविः॥१२।।यमो यक्षेशगंघर्वो कालो वरुण एव च। समभे तुलतो इया: स्वस्वा- घिपसमन्विताः ॥ १३॥ उदाहरणम्-यथा लगम्. ३८।४५ तुलादिगणनीया: कन्या आगतः एवं सवत्र जेयम्॥ अथाक्ष- वेदांशम्॥ तथाक्षवेदभागानामधिपाश्चरमे करियात्॥ स्थिरे- सिंहाद्विस्वभावे चापाङ्कलेशकेशवाः ॥ ईशाच्युतसुरेज्येष्टविष्णु केशाश्ररादिषु ॥ १४॥ उदाहरणम्। यथा लग्नम् ३८४। मेवाद्णनया वृष आगतः एवं सर्वत्र ज्ेयम्॥

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मावाटीकासहित:। ( ११ )

चतुर्विशांशचक्रम्.

वि० स्वा० २ ३ ४५ ६ ७ ९१०१११२ स० सवा० अं क० सं

सकंद: ५ ४ ५४५४५४५४५ भीम: ११५ २

पशुधर: ६५६ ५ ६ ५६ ५ ५ ६ ५ मदन: ३३०

अनल: ७६ ७६ गोविन्द: ३ ४५ B AU

विश्वक: ८ ७ ८ ७८ ७८७८७८७ वृपध्वजः ४

V V ५ भग: ९८ ९८ ९ ८ ९ अन्तक: ६/१५ ५

६ मित्र: १० ९१० ९ ९१० ९१० ९१० मय: ७३०

७ मय: मिन्र ८४५

अन्तक: भग: १००

वृपध्वज: १/१२ ११२ ११२ ११२/ १/१२ ११२ विश्वक: ११११५

१० गोविंद: २ १ २ १२ २ अनल: १२१३० १० ra

११ मदन: २ २ ३ २ पशुधर: १३१४५ ११ mY nY Te la

१२ भीम: हकंद: १५१०/१२ AU AU

१३ स्कंद: ५ ४५ ४ ५ ४ ५ भीम: १६।१५२३ 20

१४ पशुधर: ६ ५ ६ ५६ ५६५६५ ६ मदन: १७।३०

१५ अनल: ७ ७ ६ ७६५६७६ ७ ६ गोविंद: १८!४५ १५

१६ विश्वक: ८ ७ ७८७८७ ८ ७ वृपध्वज. २०० १६ V V 6

V १७ भग: ९ ९ ८९ अंतक: २१।१५१७ V V PO

१८ मित्र: १० ९१० ९१० ९१० ९१० ९१० ९ मयः २२/३०

१९ मयः मित्र: २३।४५ १९

२० भंतक: १२१११२१३ १२ १११२१११२१११२१२ भग: २५/० 12०

२१ वृषध्व० ११२ ११२ ११२ १/१२ ११२ ११२ विश्वक: २६।१५ २१

२२ गोविंद: २ १ ३ १ २ १ १ अनल: २७/३० २२

२३/ मदन: ३ २ २ ३ २ ३/ २ ३ पशुधर: २८।४५ २३

२४! भीम: ४ ३ ४ ३ ४! ३ ४ ३ ४ २ ६ ३| स्कंद: ३००२४

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(१२ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

भांशचक्रम्॥

सं. स्वामि मे वृमि/कसिंक नुगृ ध म मी अंशादि

१ दस् ७१० ४ ७/१० १ ७/१० १६/४० १

यम ५ ८११ २ ५ ८ ११ ५ ८।११ २।१३।२० २

अग्नि: ९१२ ९१२ ३। २०० N

nt nY ६ ९१२ ६ AU AU

ब्रह्मा ७१० ७१० ७१० २ ४१२६।४० 20 ..

51 शश: ५ ८ ८ ५ ८११ ५।३३।२०

६ १२ ६ ९ १२ ६/४०० ६ nt W शिव: ... ६ ९ १२ ९ LU

अदिति: ७ १० १ ७१० ७ १० ७१४६।४० ७ ७ ...

जीव: ५ ८ ५ ८११ 2 ८/५३/२० ८ V V ....

nY m ९ सप्पः ९ ६ १३ ६ १२ १०1०० ९ o AU

१० पित ग: १० ७ ११० ७ ११।६/४० १०

११ भग: ११ ८११ ५ १२।१३१२० ११ V S ...

१२ अर्यमा १२ ९ १२ ९ १२ ६ ९ १३1२०1० १२ AU

20 १३ रावे: ... १ ७ १० १० १ ७१० १४/२६।४० १३ 8

१४ त्वाष्ट्र २ ८११ ५ ११ ५ ८११ १५/३३।२० १४ V S ...

१५ वायु ६ १२ ६ ९१२ १६/४०० १५ nt ... AU

१६ शक्ाग्नि: १ ४ ७१० १७१४६।४० १६ ... ७१०

२ ८११ S V V १७ मित्र: १८१५३।२० १७ ... ५

१८ इन्द्रः ६ १२ ६ १३ २०1०० १८

१९ निऋुंति: ७ १० २१६१४० १९ 20 ७१०

२० जल: ८११ ८११ ५ ५ २२११३१२० २० ...

२१ विश्वेदेवा: ९ १२ ३ ६ १२ ६ ६ २३१२०1० २१

२२ विष्णु: १० १ ७१० ७१० 9 ७ २४१२६।४० २२

२३ इन्द्र: ११ ५ ८११ ८१ ५ २५/३३।२० २३ V S

२४ वरुण: ६ ९१२ ६ १२ ६ ९ २६/४०1० २४ ...

२५ अजपात् ७१० १० ७१० २७१४६४० २५ ...

५ V २६ अहिर्वुधन्या :... ८११ ८११ २८/५३।२० २६

२७ पूथा ६ ३ ६ MT ... ९१२ 2 ६ ९/१२ ९/१२ ३०1०1० २७

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नावाटीकासहित:। (१३ )

खवेदांशचक्रम्॥

सं. स्वामि मे वृ क ।सिं क तु वृ ध म कु मी अं० कं०

१ विष्णुः ... १७ १ ७ ७ १ ७ १ ७१७ १४५ २ चन्द्र: V .. ८२८३८२ २३० V

३ मरीचि: ९ ९ ३ ९ ३ २।१५ mt ९ AU ४ त्वष्टा ... ४१० ४१० ४१० ४१० ४/१० ४१० ३1० ५ धाता ... ५११ ५११ ५११ ५११ ५११ ५ ११ ३१४५ ६ शिव: ... ६१२ ६१२ ६१२ ६१२ ६१२ ६/१२ ७ रवि: ... ७ १ १ १ ७१७१ ५/१५ ८ यम: V V ... ८ २ ८ ३८ २ ६।० V ९ यक्षेशः m' ... 2 ९ ९ ६४५ nT LU LU १० गंधर्वः 20 ... १० ४/१० ४१० ४/१० ४१० ४१० ७३०

११ काल: ... ११ ५११ ५११ ५११ ५११ ५११ ५ ८।१५ १२ वरुण: ... १२ ६/१२ ६१२ ६१२ ६१२ ६/१२/ ६ १३ विष्णुः ७ ७१ ७१७ ७ ७ ९/४५

१४ चन्द्र: ... ८२८ २८२८ २ १०१३० V V १५ मरीचि: ९ ९ ११।१५ nY ३ ९ ३ ९ ३ ९ १६ त्वष्टा ... १० ४६० ४१० ४१० ४१० ४१० १२1० १७ धाता ... ५ ५११ ५/११/ ५११ ५११ ५११ १२/४५ १८ शिव: ६ १२ ६ १२ ६/१२ ६१२ ६११ ६१२ १३१३० १९ रवि: ... ७ ७ १ ७ १ ७ ७ १ १४११५

२० यम: २ २ ८ 2 ८ २ १५/० V N V V २१ यक्षेश: ९ ९ ९ १५/४५ nY nY nY nY AU

२२ गंधर्वः १० ४१० ४१० ४/१० ४१० ४/१० ४ १६।३०

२३. काल: ... ११ ५११ ५११ ५/११ ५११ ५११ ५ १७११५

२४ वरुण: .. १२ ६ १२ ६/१२ ६/१२ ६१२ ६१२ ६ १८1०

२५ विष्णुः ... १ ७ ७ १ ७ १ ७ १७ १ ७ १८१४५

२६ चन्द्र: २ ८ २ १९/३० V V V ... ८ 21 V २७ मरीचि: ९ ३ ९ ३ ९ ३ nY ... ९ ३ ९ २०।१५

२८ त्वष्टा ४१० ४१० २१1० ... ४१० ४१० ४१० ४/१० २९ धाता २१।४५ ... ५११ ५११ ५११ ५११ ५११ ५११ ३० शिव: ... ६/१२ ६१२ ६१२/ ६१२ ६१२ ६/१२ २२१३०

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1

( १४) सर्वार्थचिन्तामणि:।

३१ रवि: ... ७१ ७ १७१७१७१७१ २३।१५ ३२ यम: ... २५/० V

यंक्षेश: nY ... ९ २४/४५ LU AU AU

३४ गन्धवः १० ६१० ४१० ४१० ४१० ४१० २५/३० 20 ३५ काल: ११ ५११ ५११ ५११ ५११ ५/११ ५ २६११५

३६/ वरुण: १२ ६१२ ६१२ ६/१२ ६/१२ ६/१२ ६ २७० ...

३७ विष्णः 108 ? ७ ७ १ ७ १ ७१७१ २७१४५

चन्द्र: ८ २ ८ २ ८३८२ ८ २८१३० V

६९ मरीचि: ९ ९ ३ ९ ३ ९ ३ ९ २९/१५ nt nY

४० स्वश्ट ... ४१० ४१० ५१० ४१० ४१० ४१० ३००

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भाषाटीकासहित:। (१५ )

अक्षवेदांशचक्रमिदम्.

स्वा० स्वा० स्वाब स्वा० स्वा० स्वा० स्वा० स्पा० सवा० सवा० सवा० स्वा०

शिव वविच्णु व्रह्माा शिव विष्ण शिव विच्णु नहा शिव विष्ण

शिव विष्ण त्रह्ा शिव विष्ण महा शिव विष्ण महा शिव विष्ण

विष्ण त्रह्मा शिव वण्ण शिव विष्ण महा शिव विष्ण बहा शिव

मे मि क सिं क ध मानअक्र 4.

२ ५ ५ ९ ५ ९ १ ९

१० ६ १० २ १० १० 1२०

७ ११ ३ ११ ७ ११ ११ AU

20 AU 20 V 20 १२ १२ १२ १२ २/४० 20

५ ५ ९ ९ ५ ९ ९ २२०

१० ६ ३० १० १०

७ ११ ११ ७ nY ३ ७ १२ ४/४० 9

20 V ८ १२ ४ ८ १२ १२ ८ १२ ५/२० oC

1 WVV ९ ९ १ ५ ९ २ ५ ९ ५ ९

१० १० १० १० २ ६ १० ६ २ ६ ४०

११ १२ ७ ११ ३ ७ ११ ७ ११ ७ ७२०

१२ ४ १२ १२ १२ V V &C AU १२ cC cc

५ १ ५ ९ ९ २ ५ ९ ८४० १३ 2 १० ६ १० १० ९२० १४ १० २

१५ २१ ११ ७ ७ ७ ११ ७ २१ २०

१२ २०1४० V 20 १६ १२ १२ ८ १२ cC

१७ १ ५ ९ ३ ५ ९ १ ५ ९ १ २०

१८ १० ६ १० २ ६ १० २ १० २

११ ७ ११ ३ ७ ११ ७ ११ ३ १२ ४० १९ ७ AU

V २० १३ १२ १२ १२ ४ १३२० v

१ १ ५ १४ cC

९ १ ५ 0 S २१ ९ ५ ९

६ १० २ ६ १० २ ६ १४४० १० २ १०

७ 3 ७ ७ १२ ११ ११ ११ १५२० nY سه

२२ १२ ८ १२ V १२ ८ १६ ० ce

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( १६ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

अक्षवेदांशचक्रस्य पूर्तिः- २५ । १। ५ ९ १ ५ १ ५ ९ ५ ९ 1१६ ४०

२६ ६ १० २ ६ १० २ ६ १० ६ १० १७ २०

ar2015 २७ ७ ११ ७ ११ ३ ७ ११ ७ ११ १८ AU

२८ ४ ८ १२ ४ ८ १२ १२ ४ ८ १२ १८ ४० 20 ८

२९ ५ ९ १ ५ ९ १ ५ ९ १ ५ १ १९ २०

० ३० ६ १० २ ६ १० २ ६ १० २ ६ १० २ २०

३१ ७ ११ ३ ७ ११ २ ७ ११ ११ ३ २० ४०

३२ ८ १२ ८ १२ ८ १२ ८ १२ ४ २०

३३ ९ २ ५ ९ १ ५ ९ ५ ९ १ ५ २२

३४ १० २ ६ १० २ ६ १० २ ६ १० २ ६ २२ ४०

११ AY ३५ ११ ३ 3 ७ ११ ७ ११ ७ २० AU

V २६ १२ ४ ८ १२ ४ ८ १२ ४ ८ २४

३७ १ ५ १ ५ ९ १ ५ ९ १ ५ ९ २४ ४०

३८ १० ६ १० २ ६ १० २ ६ १० २५ २०

nY ३९ ३ ७ ११ ७ ११ ३ ७ ११ ७ ११ २६ ४० ८ १२ १२ ४ ८ १२ २६ ४० 20 ८ १२ ४ ८ ४१ ५ ९ १ ५ ९ १ ५ ९ १ ५ ९ २७ २० ४२ ६ १० २ ६ १० २ ६ १० २ ६ १० २ २८ ४३ ७ ११ ३ ७ ११ ७ ११ ७ ११ ३ २८ ४० AU ४४ ८ १२ ४ ८ १२ ४ ८ १२ १२ ४ ३९ २०

४५ ९ १ ५ १ ५ ९ १ २ ५

अथ षष्टयंशः।।युग्मे ऋमान्यत्ययमेव राशौ पष्टचंशकानामधिपा- स्त्वयुग्मे॥ घोरांशको १।६० राक्षस २५९ देवभागौ ३५८

कुलनो ८।५३ गरला ९/५२ ग्रिसंज्ञौ १०।५१ मार्यांशक: ११/५० प्रेतपुरीशभागः १२।४९।। अर्पा पतिः १३।४८ देवगणेशभागः १४। ४७ काला १५/४६ हिभागा- १६।४५ वमृतांशु १७।४४ चन्द्रौ १८।४३ ॥१६॥ मृद्धंशकः १९/४२ कोमल २०१४१ पद्मभागौ २१/४० लक्ष्मीश २२/३९

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भाषाटी कासाहित:। (१७ ) वागीश २३।३८ दिगंबरांशा: २४।३७।। देवा २५/३६ दभागौ २६।३५ कलिनाशभाग: २७।३४ क्षितीश्रांश: २८।३३कमला- करांश:२९।३२।।१७।ऋमेण मंदात्मज ३०।३१ मृत्य ३१।३ काल ३२/२९ दावाग्नि ३३।२८ घोरा ३४।२७ मय ३५/२६ कंटकाश्च ३६।२५।। सुधा ३७।२४ मृतांशौ ३८।२३ परिपूर्णचंद्र- ३९/२२ विषप्रदग्घौ४०।२१ कुलनाशमुख्यौ ४१।२०४२१९ ॥ १८॥ वंशक्षयो ४३।१८ त्पातक ४४।१७ कालरुपाः ४५। १६ सौम्यश्श ४६११५ मृदंश ४७।१४ सुशीतलांशौ ४८।१३।। दंष्टाकराले४९।१२नदुमुख ५०।११ प्रवीणा: ५११० कालानि- ५२।९दाण्डायुध ५३।८ निर्मलांशाः५४।७॥।१९।। शुभा५५। ६ शुभांशा ५६-५ वतिशीतलांश: ५७।४ सुधापयोधि ५८।३ भ्रमणेंदु ५९।२ रखेा: ६०।१॥। ज्ञेया: क्रमाद्वयत्ययमेव युग्मे शुभान्वितांशो यदि शोभनासिः ॥२० ॥

षष्टचंश विषम राशिमें क्रमसे घोरांशकादि इन्दुरेखापर्यत और समराशिमें विपरीत कमसे इन्दुरेखासे घोरांशपर्यत गिनना षष्टयंशलानेका प्रकार ग्रथांतरोंमें है यथा "राशीन्विहाय खेटस्य द्वि- घ्रमंशाद्यमर्कहत्॥। शेषं सैंक च तद्राशिनाथः षष्टयंशपः स्मृतः॥" अर्थात् राशियोंको छोड़के अंशादि द्विगुण करना अंशस्थानमें १२ से नष्ट करना शेषमें १ जोडके उसराशिका स्वामी षष्टयंशेस् होताहै यह विषममें क्रमसे सममें व्युत्कमसे जानना. जैसे लग्न ३।८।४५ सम है अठारहवां उत्पातांश आाया सूर्योशादि ४।२८।१ द्विगुण ८।५६।२ जब अंशादि १२ से अधिक हो तो १२ से, और कला ३० से अधिक हो तो ३० से, भाग लेकर लब्धि ऊपर जोडनी यहां कला ५६ तीससे भाग लेनेसे १पाया यही ऊपर जोडदिया ८ शेषमें १ जोडना है यहां शेष ९ सैक १० मिथुनसे गिनना है तुलामें सूर्य ७ अग्न्यंशमें है सममें ६० में घटाना इत्यादि सर्वत्र नानना. " इसका खलासे उदाहरण आगे चक्में देखना इन ६० में २६ कूरांश १ मध्यम और ३३ देवभाग हैं यही देवभाग शुभ होतेहैं विशेष विचार इनका आगे कहेंगे ॥। १५॥१६॥१७॥१८।।१९।२०।

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(१८) सर्वार्थचित्तामणिः।

षष्टयंशचक्रम्.

सं. विषमे मे वृमि क सक तु तृधमकुमी समे अं. क

घोरांश १२३ ४ ५ ६ ७ ८ ९१० १११२ इंदुरखा राक्षस: १ २३ ५ ६ ८ ९ १०१११२ भ्रमण: १ देवा: २३४ ५ ६ ७ ८ ९ १०१११२१ सुधायोगः १ ३०

४ कुबेर: ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १०१११२१ अतिशीत: ५ रक्षोगण: ५ ७ ८ ९ १०१११२ अशुभ: २३० V ६ किन्नर: ५ ६ ७ ९ १०१११२२ २ शुभ:

७ प्रधः ४ ५ ६ ७ ८ १० ११/१२ १ निर्मल: ३० AU कुलुप्र: ५ ६ ७ ९ १०१११२ १ दण्डायुध: AU

20 ९ गरल: ५ ६ ७ ९ १०१११२ कालाशि: ३० OY प्रवीण: 20 १० अग्र: ४ ६ १०१११२ V ७ AU ११ माया ६ ७ ८ ९ १०११२२ १ २ ४ ५ इंदुमुख: ५ ३० AU

१२ ७ १० ११ २ nY यम: ६ ८ ४ ५ दंष्टराकरा: ६

0Y १३ वरुण: ७ ८ ९ १०१११२ ५ ६ शोतल: ६३० १४ इंद्र: ७ १०१११२ ५ ६ मृदु: ७० nY V ९ १ oC १५ काल: ८ ९ १०१११२ १ ५ ७ सौम्य: ७३० nY ६ १६ अहि: ८ ९ १० ११/१२ ५ ६ ७ कालरूप: ८० Au

अमृताशु: ९१०१११२ १ २ ४ ५ ६ ७ ८ ३० nY उत्पात १८ चन्द्र: ९ १०१११२ १ ५ ६ ७ वंशक्षय: ९ nt

OY १९ मदु: १०१११२ १ ५ ६ ८ मुख्य: ९ ३o २० कोमल: १० १११२ ५ ७ ८ कुलनाश: १०० aY २१ पद्म: १११२१२ १ ५ ६ ७ ८ ९ विष्वमदिमा ११०३० २२ विष्णुः १२ २ ५ ६ ९ १० पूर्णचंद्र: १११० २३ वागाश: १२ ५ ६ ७ ९ १० ११ अमृत: ११३० V २४ दिगंबर: १२ २ 2 ४ ६ ७ ८ सुधा १२/० २५ दव: ५ ६ ७ ९ १० १११२ कण्टक: १२३० A m V m २६ आद्र: १ ५ ७ ९ १०१११२ मयः १३० २७ कलिना० ३ ५ ८ १०१११२ घोर: २३३० २८ क्षितीश: ४ ५ ६ ७ ८ १० १११२ वादाग्नि: २४० nY २९ कमलाकर: ५ ६ ७ ८ ९१०१११२ १ काल: १४३० ३० मंद: ५ ९१०१११२ मृत्यु: us ७ ८ १५० AU|.Au ३१ मृत्यु: ४ ५ ६ ७ ८ ९ १०१११२ १२ मद: १५३०

काल: ४ ७ १० १११२ कमलाकर: १६० us २२ ५ ८ ९

दावासि: ५६ ७ ८ ९ शषिताश: DY १०१११२२२ १६३० २४ १७० OY घोर: का लनाश: N V

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भावाटीकासहित:। (१९ )

३५ मय: ६ ७८९१०१११२१२३४५ आर्द्: ?७३० ३६ कण्टक: ६ ८ ९१०१११२१ २३४ ५ देव: १८० ३७ सुधा ७ ८ ९ १०१११२ १ २ ३ ४ ५६ दिगंवर: १८/३० ३८ अमृत: ७ ८ ९ १० ११३२ २ ३ ४ ५ वागीश: १९ ० ez.n

३९ पूर्णचंद्र: ८ ९ १०/११ १२ ? २ ४ ५ ७ विष्णुः १९३०

४० विषप्रदि० ८ ९ १० ११/१२ १३ ५ ७ पडा: २०० 20

४१ कुलनाशः ९/१०१११२ २३३ ५ ६ कामल: ६२०३०

V ४२ मुख्य: S १०१११२? ५६ ७ मृदु २१० ४३ वंशक्षय: १० १११२ ३३ ४ चंद्र: २१३० W ७८

४४ उत्पात: १०११/१२ ३ ५६ ८ ९ अमृतांशु:२२/० कालर० १११२ ३३४ ५ ६७८९ १० अदिः २३/३० 2

४६ साम्य: ११/१२ m ? ४ ७ ८९१० काल: ४७ मृदु १२ ? २ ३ ४ ५६७ ८ ९१०११ इन्द्र: २३३०

४८ शातल: १२ ? २ 3 ५६७ ८ ९ १०११ वरुण: २४०

४९ दंष्ट्राकरा० ९ १०११/१२ यम: २४३० nY n' ५६/७ V

५० इंदुमुख: १ 2 ५६७ १०१११२ माया २५० V

प्रर्वाण: ४ ।६ ८ ९१०१११२ ? अग्रि: २५३० nY 5

५२ कालान्रि: ४ ६ ८ गरल: २६० nY ५ ७

दंडायुध: n १५३ m ५ ६७ ८ ९ २० १११२ ? कुलघ्र: २६३० oc

५४ निर्मल: ३४ ८ ९/१०१११२ भरष्टः २७ n ५

५५ शुभ: ५ ६ ९/१०१?३ २७/६ m ४1 किन्नर: V

५६ V अशभ: ७ ९१०१११२२ २ रक्षा गण: २८०

2 ५७ आतशी ५ ६ ७ ८ ९ १० १११२ २ ३ ४ कुबर: २८३०

५८ सुधापया ५ ६ ७ ८ ९ १०१११२ २ ३ ४ देव: २९०

५९ भ्रमण: ६ ७ ८ ९ १०१११२२ २ ३ ४ ५ राज्षस: २९३०

६० इंदुरेखा: ६७८९१०१११२२ २ ३ ४५ घोरांश:

ऋ्ूरषष्टयंशगाः सर्वें नाशयंति खचारिणः ॥ यदि पूर्णबलैर्युक्ताः स्वोञ्ञमूलत्रिकोणगाः ॥२१॥ स्वर्क्षकेन्द्रोत्तमांशस्था मित्रक्षे- तत्रिकोणगाः ॥ सप्तवर्गोद्भवाः स्वांशाः स्वाधिमित्रांशका- न्विताः ॥२२ ॥।

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(२० ) सर्वार्थचिन्तामणि:।

जो ग्रह अपने उच्च मूलत्रिकोणमेंही पूर्णबलसे युक्त हों और कूरषष्टयंशमें हो तो उत्तमब- लोक शुभफलका नाश करते हैं। २१ ॥ उत्तमादि भेद कहते हैं कि-जो ग्रह स्वराशिफेन्द्र उत्तमांश मित्रराशि त्रिकोणमें हो तथा सप्वर्गमें स्वांशकस्थ हो अधिमित्रांशका हो वह उत्तमां शक संज्ञक होता है इनका मयोजन कहते हैं कि ॥ २२॥ वर्गास्तु ये दश प्रोक्ताः पूर्वाचायैर्महर्षिभिः॥ भवंति वर्गसंयोगे पारिजातादिसंज्ञकाः ॥२३॥ दुःस्थारिनीचमूढस्था ग्रहा बल- विवर्जिताः ॥ मरणावस्थगाश्वेत्तु पारिजातादिनाशकाः॥२४॥ पूर्वाचार्य महर्षियोंने जो दशवर्ग कहेहैं उनमें जो ग्रह स्ववर्गमें हों उनकी पारिजातादि संज्ञायें होती हैं शुभ फल पूर्ण देते हैं ॥ २३ ॥ जो ६। ८ । १२ त्रिक स्थानोंमें अथवा शत्रु- राशि नीचराशिमें यदा अस्तंगत बलरहित होते हैं यद्वा मरणावस्थामें पाप्त होते हैं वे पारि- जातादि शुभ फल दायकोंका नाश करते हैं।। २४ ॥। उत्तमं तु त्रिवर्गैक्यं चतुर्वगे तु गोपुरम् ॥ वर्गपंचकसंयोगे सिंहासनमिहोच्यते॥२५॥वर्गद्यं पारिजातं पण्णां पारावर्ता- शकम्॥ सप्तमं देवलोकं स्यादष्टमं चामरं भवेव ॥२६॥ ऐरावतं तु नवमं फलं तेषां पृथवपृथक् ॥ दशवर्गस्य संयोगे विदुवैशे- षिकांशकान् ॥२७॥ दशषगोंमें दोवाला पारिजातकसंज्ञक, तीन वर्गवाला ग्रह उत्तमांशसंज्ञक, चार वर्गवाला गोपुर संज्ञक, पांच वाला सिंहासनसंज्ञक,छः पारावतांश, सात वाला देवलोक, भाठ वाला अमर, नौ वाला ऐरावतसंज्ञक होता है और दशम स्वांशकीय वैशेषिकांशक संज्ञकसे होता है इनके फल मलग अलग आगे कहेंगे॥ २५॥ २६ ॥ २७ ॥ ऐरावते सार्वभामः सर्वैश्वर्यसमन्वितः॥ देवलोके महादानकर्त्ता राजा क्षितीश्वरः ॥२८॥ पारावते माण्डलिक: सर्वशास्त्रविशा- रदः ॥ सिंहासने भवेद्धूमिपतिः सर्वैः स्तुतो महान् ॥ २९॥ गोपुरे धनवान्नित्यं सर्वविद्याविशारदः ।। उत्तमे सकला संपव् पारिजाते धनान्वितः ॥ ३०॥ स्वांशे यशस्वी मतिमान् सर्व- सौख्यसमन्वितः ॥३१॥ दशवर्गगत ग्रहोंके फल कहते हैं ऐरावर्ताशवाला च्वर्ती राजा होकर समस्त ऐश्पयोंसे परिपूर्ण रहता है, देवलोकांशवाला महादान देनेवाला संसारमें राजा होता है॥। २८ ॥

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भाषाटीकासहित:। (२१ ) पारावर्ताशवाला समस्त श्ञास्त जाननेवाला राजा, सिंहासनमें समस्त लोकोंसे स्तुत्य राजा॥२९।। गोपुर्राशवाला धनवान् तथा संपूर्ण विद्या जाननेवाला, उत्तमांशवाला संपूर्ण संपत्तियोंसे युक्त, पारि- जारतांशवाला धनवान् होता है॥ ३०॥ यदि स्वांशमें ग्रह होवे तो यशस्वी, बुद्धिमानू और संपूर्ण सुखयुक्त होता है। ३१ ॥

राशीश्वरात्प्राणपद क्रमेण घटीचतुर्थाशसुशंति तज्ज्ञाः॥ ३२॥ चापाद्विपर्येति रविस्तु सार्द्धै घटीदयं रात्रिकरोपि तस्मात्॥। क्रमेण साद्धदयनाडिकाल: कुजो वृषाव्यत्ययनाडिमात्रमू।।३३।। चापाद्ुघो व्यत्ययनाडिमात्रं मीनादघ: पंचघटीन्द्रपूज्य:।।कमेण युग्माड्वृगुनन्दनस्तु घटीप्रमाणो दिननाथपुत्रः॥३४॥ व्यत्या- समार्गेण घटीप्रमाणो मेषादगुः सार्द्धघटीयुगं स्यात्॥ मीना- च्छिखवी तन्मदगो विलोमाच्छास्नांतरे तत्फलमाहुरार्याः।।३५।। अब क्षणिक ग्रह कहते हैं-यहां क्षण पद्से ढाई घडी २। ३० का प्रमाण है लन्न मेषादि कमसे घटी तीन ३ेपल तीस ३०परत्येक होता है जिससे एक आवृत्ति दिनमें दूसरी रात्रीमें होती है और जिस राशिमें सूर्य है उससे नवम राशिस्वामीसे एक घटीके चतुर्थीश १५ पलका कमसे माणपद होता है।। ३२ ॥ धनसे उलटे २ घटी ३० पल सूर्य, ऐसही धनसे घटी २। ३५ चंद्रमा, मंगल वृषसे विपरीत घटी, १ पल १० पर्यंत, ॥। ३३ ।। बुध धनसे विप- रीत कम करके घटी १। ०, वृहस्पति मीनसे उलटे पांचघडी पर्यत शुक मिथुनसे क्रम करके १ घटी शनि॥ ३४ ॥ नेषसे विपरीत क्रम करके १ घटी, राहु मीनसे उलटे क्रम अढाई २। ३० घटी होता है और केतु राहुसे विलोम सभममें होता है। इनके फल शास््रांतरोंमें श्रेष्ठ आचाय्योंने कहे हैं ।। ३५।। बालाद्यवस्थाः क्रमशो ग्रहाणामोजे समे तद्विपरीतमाहुः॥बालः कुमारोथ युवा च वृद्धो मृतो लवानामृतुभि: क्रमेण॥ ३६ ॥ बालाद्यवस्थानुगुणं त्रजंति तत्पाककाले दिननाथमुख्याः॥३७।। अवस्था कहतेहैं विषम राशिमें कमसे सममें व्युत्कमसे प्रत्येक राशिके ६। ६ बंशकी बाल १ कुमार २ युवा ३े वृद्ध ४ मृत्यु ५ अवस्था होती हैं।। ३६ ॥ सूर्यादि ग्रह फल देनेके समय बालादि अवस्थाओंके अनुरूपताको प्ाप्त होते हैं॥ ३७ ॥ मेषाजवस्तं प्रथमं क्रियश्र वृषोक्षगोतावुरिशुक्रभं च ॥ ३८ ॥ बौधं नृयुग्मं जितुमं तृतीयं चांद्रं कुलीरं तु चतुर्थराशिम्।। सिंह

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(२२) सर्वार्थचिन्तामणि:। स्य कंठीरवलेपसंज्ञा पाथोनषष्ठी त्ववलाच तन्वी॥३९॥ जूको वणिक्सतमतौलिसंज्ञ: कौर्प्योष्टमं कौजमलेस्तु संज्ञाः ॥ जैवं धनुस्तौक्षिक चापसंज्ञं त्वाकेकरं स्यादशमं च चक्रम् ॥ ४० ॥ हद्रोगकुम्भौ घटराशिसंज्ञे मीनो झषश्रांतिमरिष्फसंज्ञः॥४१॥ राशियोंकी संज्ञा कहतेहैं अज, वस्त, प्रथम, किय, मेषकी संज्ञ । वृष, उक्षा, गो, ताबुरि, शुक्रभ, वृषकी॥ ३८ ॥। बौध, नृयुग्म, जितुम, तृतीय, मिथुनकी। चांद कुलीर चतुर्थ, कर्ककी। कंठीख, लेप, सिंहकी। पाथोन, षष्ठी, अवला, तन्वी, कन्याकी। ३९ । जूक, वणिक, सप्तम, तौलि, तुलाकी। कौर्प्य, अष्टम, कौज, अलि, वृश्चिककी। जैव, धनु, तौक्षिक, चाप, धनकी। आकेकर, दशम, चक, मकरकी॥ ४० ॥ हद्रोग, कुम्भ, घट, कुम्भकी। रिष्फ, मीन, झष, अंतिम, मीनराशिकी संज्ञाये हैं॥। ४१ ।! होरा तनुर्मूर्त्युंदयं शिरश्र वाग्वित्तकौट्म्बमथाक्षिसंज्ञम्।। सहो- त्थदुश्विक्यगलं तृतीयं शौर्य च कर्ण सुखमंबु बन्धुः ॥ ४२॥ रसातलं वै हिवुकं च वेश्म पातालहद्राहनमातृसंज्ञाः। बुद्धिप्रभा- वात्मजमंत्रसंज्ञं विवेकशक्ती उदरप्रदेशः॥४३।। रोगक्षतारिव्य- सनं तु चोरस्थानं भवेद्विघ्नमिहाहुरार्य्याः। चित्तोत्थकामो मद- नश्र भर्तृस्थानं कलत्रं दधिसूपसंज्ञम्॥४४॥ क्षीरं गुडं सूत्रककृ- छूनाम गुह्यं च रंधं मरणांतकायुः॥धर्मो दया पैत्रिकभाग्यमं तु गुरुस्तपोलाभशुभार्जितानि॥ ४५ ॥ आज्ञा च मानं दशमं च कर्म तदास्पदं खं धनलाभमायम्॥ व्ययोंत्यभं रिष्फविनाशसंज्ञं लगनांत्यखण्ड: कथितो मुनौद्रैः ॥ ४६॥ भावोंकी संज्ञायें कहतेहैं-लग्नक्री संज्ञायें होरा, तनु, मूर्ति, उदय शिर ।। द्वितीयकी बाकू, वित्त, कुटुंब, अक्षि।। तृतीयकी सहोत्थ, दुश्चिक्य, गल । चतुर्थकी शौर्य्य, कर्ण सुख, अंबु, बंधु, रसातल, हिवुक, वेश्म, पाताल, हृद, वाहन, मातृ ।। पंचमकी बुद्धि, मभाव, आत्मज, मंत्र, विवेक, शक्ति, उदर । छठेकी रोग, क्षत, आरे, व्यसन, चोरस्थान, विघ ॥ सप्तमकी चित्तोत्थ, काम, मदन, ख्रियोंका भर्तृस्थान और कळत्र, दधि, सूप ।। अष्टमकी क्षीर, गुढ, मूत्र, कुछू, गुह्य, रंध, मरण, अंतक, आयु । नवमकी धर्म, दया, पैत्रिक, भाग्य, गुरु, तप, लाभ, शुभ, अर्जित।। दशमकी आज्ञा, मान, दशम, कर्न

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भाषाटीकासहित:। (२३ )

आस्पद, खं।। ग्यारहवेकी लाभ, आय,। बारहवेंकी व्यय, अंत्य, रिष्फ विनाश और ररग्रांत्य खंडभी पूर्वाचार्य मुनींदरोंनें कहे हैं ॥ ४२।४३।४४।४५।४६।। दुःस्थाश्च नाशपभवा भवंति षष्ठाष्टरिष्फानृगतास्तथैव।। उद्यन्ति पृष्ठेन वृषाज चापकुलीरनका बलिन: सघुग्माः॥ ४७॥ ते रात्रि- कालेन्हि बलास्तु शेषा: शीर्षोदया मीनमुदेत्युभाभ्याम्॥४८।। दुष्टस्थानस्थित ग्रह तथा ६। ८। १२ भावगत नष्टमभव होते हैं॥ वृष, मेष, धन, कर्क, मकर और मिथुन पृष्ठोदय तथा रात्रिबली होते हैं शेष ५।६/७।८/११ १२ दिवाबली और शीर्षोदयी हैं परंतु इनमें मीन राशि उभयतोदयी है॥। ४७। ४८ ॥ धूमोकों विश्वभागश्रुतिभवनयुतो मण्डलाच्छोघितोसी पातः षड्ाशियुक्त: परिधिरथ भसंशोधितश्वापनामा॥ शैलाशाभाग- युक्त घनुरथ च शिखी पंच ते त्वप्रकाशा:प्रादुर्भावे च तेषां फल- मिह कथितं जातकप्रश्नयोःस्यात्॥४९॥ इति प्रकाशग्रहाः॥ सूर्य १ ३ अंश पर धूम ४ राशि युक्त कर अर्थात् ४ शाश १३ अंश पर धूमसंज्ञक -- १२ से तष्ट करके पात ६ राशि जोडनेसे परिधि २७ से शोघन करके चापनामक १०७ वा भाग जोडनेसे धनुष. पांचसे शिखी संज्ञक तत्वमकाश होते हैं इन तत्वोंके मादुर्भावमें फल जन्म तथा प्श्नमें होते हैं॥ ४९ ॥ व्योमास्तपातालविलग्नभानां वदंति नामानि मुनीन्द्रजालाः ॥। तत्कंटकं केंद्रचतुष्टयं च वर्गो तमास्तत्स्वनवांशकास्तु॥५0॥ मुनींद १०। ७।४। १ भावोंकी संज्ञा कंटक केन्द्र चतुष्टय कहतेहैं, जो राशि वही नवांशक होनेमें वर्गोत्तम कहाताहै॥ ५० ॥ जलचरपशुनरकीटा बंधौ माने तनौ मदे चापि। क्रमशो भवंति वीया विगतबलास्तत्सप्तमे वापि ॥५१॥ बल कहतेहैं-जळचर राशि (मकर) उत्तरार्दध और ११ । १२ । चतुर्थस्थानमें पश्ुराशि (१। २ । ५ मकर पूर्वार्द्ध धनका उत्तरार्द्ध) दशम भावमें नर राशि ३ । ६। ७ धन पूर्वार्ध लग्नभावमें और कीट ४। ८ सप्तम स्थानमें बली होतेहैं अपने सप्तममें बल- हीन होते हैं बीचमें अनुपातसे अंक जानने।। ५१॥। मेषोक्षनकांगनकर्किमीनतुलाघराः स्युर्दिनपात्स्वतुंगाः॥ अत्यु- ज्ञभागैर्नयनागदारमत्यामनासारनरैः क्रमेण॥ ५२॥सिंहोक्षव-

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(२४ ) सर्वार्थचिन्तामणि:।

स्तांगनचापतौलिकुंभा भवंत्युच्चसमानभावाः॥ मूलत्रिकोणानि भवंति तानि किंचिद्विहीनानि वलानि सूर्यात् ॥५३।। उच्चराशि सूर्यकी मेष, चंद्रमाकी वृष, मंगलकी मकर, बुधकी कन्या, वृहस्पतिकी कर्क, शुककी मीन, शनिकी तुला हैं। परम उच्चांशक सूर्यके मेषके १० अंश ० । १०, चंद्रमा १। ३े, मंगल ९ । २८, वुध ५ । १५, बृहस्पति ३। ५, शुक ११ । २७, शनि ६। २० है ॥५२॥ सूर्यका सिंह, चंद्रमाका वृष, मंगलका मेष, बुधका कन्या, वृह- स्पतिका धनु, शुकका तुला, शनिका कुंभ, उच्चके समान हैं। इनको मूलत्रिकोण कहते हैं बळमें उच्चसे थोड़ेही कम होतेहैं ॥ ५३ ॥ दिवाबला मानुषराशयः स्थू रात्रौ वलाढयाः पशवश्च कीटाः॥ संध्याद्ये भ्रातृभवास्पदानां सपष्ठभानां तु चयेति संज्ञा।५४॥ मनुष्यराशि दिवावली, पशुराशि रात्रिबली और कीटराशि दोनों संध्यासमयोंमें वल- बान् होतीहैं और ३। ११ । १० । ६ भावोंकी चय (उपचय ) संज्ञा है।। ५४ ॥। रक्त: श्वेतः श्यामकांतिश्च रक्तो धूम्रश्वित: कृष्णकांतिः सुवर्णः॥ स्वर्णाभः स्यात्कर्बुरो बध्रुवर्णः स्वच्छो वर्णो वर्णितो वुद्धिमद्भिः५५। राशियोंके रंग कहते हैं-मेष रक्त, वृष श्वेत, मिथुन श्याम ( हरित), कर्क रक्त, सिंह घूम्र, कन्या विचित्र, तुला कृष्ण, वृश्चिक सुबर्णरंग, धन पीत, मकर कर्बुर, कुंभ विडाल सददश, मीन श्वेतवर्ण बुद्धिमानोंने कहेहैं ॥। ५५ ॥ वेशिस्थानं सूर्ययुक्ताद्वितीयं चक्रार्द्वेस्मिन्मानमाहुर्सुनींद्राः।। वेदघं स्याद्वाणसंख्याधिकं तु वैलोम्याद्ा जूकराशे: क्रमेण ॥५६॥ जिस स्थानमें सूर्य है उसके दूसरे स्थानकी संज्ञा वेशिस्थान है. बारह राशियोंका चक्र है, इसके पूर्वार्ध्ध परार्द्ध दो भाग हैं. मेषसे कन्यापर्यत पूर्वार्द्ध, तुलासे मीनपर्यत उत्तरार्द्ध. अथवा विलोम गणनासे भी तुलादि मेषादि मान मुनीन्द्र कहते हैं, अथवा लनसे छठे ६ पर्यत, ७ सप्तमसे १२ पर्यैत, चकार्द्ध पूर्व पर हैं अथवा ४। ४ करके जानना जैसे ४ पर्यंत, ४से७ तक, ७ से १० तक, १० से १ तक चतुर्गुण हुये. पांचसे विलोम जानना १२ से ४ और ४ से १० एवं लग्नसे ७ सातसे लग्नचकार्द्ध विचारमें काम आतेहैं ॥ ५६ ॥ दिनेशचंद्रौ नरपालमुख्यौ सेना कुजः सोमसुतः कुमारः॥शुके- ज्यपूज्यौ सचिवौ शनिश्च प्रेष्यस्तु तद्ृत्तिसुपैति जातः ॥।५७॥ सूर्य चंद्रमा राजा, मंगळ सेनापति, बुध युवराज, शुक बृहस्पति मंत्री और शनि ेष्य, (प्यादा) है जिसका जो ग्रह बलवान् वा कारक है उसको उसीके अनुरूप आजीवन होता है।। ५७ ।।

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भाषाटीकासहित.। (२५ )

आत्मा रविः शीतकरो मनस्तु सत्त्वं कुजो भाषणमव्जसूनुः॥ वाचांपतिर्ज्ञानसुखे मदश्च शुको भवेदर्कसुतस्तु दुःखम् ॥५८ ॥ सूय शरीर, चंद्रमा मन, बल मंगल, बुध वाणी, गुरु ज्ञान एवं सुख, शुक कामदेव, शनि दुःख, ऐसा ग्रहमय शरीर है।। ५८ ।। सूर्यों हेलिभानुमान्दीपरश्मिश्चण्डांशुः स्याद्धास्करोहस्करश्र॥ अब्ज: सोमश्चंद्रमाः शीतरश्मिः शीतांशुः स्याद् ग्लौमृगांक:क- लेशः॥५९।आरो वक्रश्चावनेयः कुजः स्याद्गौमःक्रूरो लोहिता- गोथ पापी। विज्ज्ञः सौम्यो बोधनश्चंद्रपुत्रर्श्ध्ांद्गिः शांतः श्या- मगात्ोतिदीर्घ:॥ ६०॥ जीवोंगिरा देवगुरुः प्रशांतो वाचांपती- ज्यत्रि दिवेशवंद्याः ॥ भृगूशनोभार्गवसूनवोच्छकाणौः कविर्दैत्य- गुरुः सितश् ॥ ६१॥ छायात्मजः पंगुयमार्कपुत्राः कोणोसितः सौरिशनी च नीलः ॥ क्रूरः कृशांगः कपिलाक्षदीघौं तमोसुरश्रे- त्यगुसैंहिकेयौ॥ ६२ ॥ राहुस्तु स्वर्भानुविधुन्तुदौ स्यात्केतुः शिखी स्याद्धजनामघयः ॥ शनेः सुतः स्याद्वलिकोथ मांदिर्य- मात्मज: प्राणहरोतिपापी ॥६३॥ प्राणस्त्वसुः प्राणपदस्य नाम पर्यायमन्यत्प्रवदंति तज्ज्ञाः ॥६४॥ ग्रहोंके पर्याय नाम कहते हैं-सूर्य, हेलि, भानुमान्, दीप्रश्मि, चंडांश, भास्कर, अह- स्कर, ये सूर्यके नामन्हैं। अब सोम, चंद्रमा, शीतरश्मि, शीतांशु, ग्लौ, मृर्गाक, कलेश, चंद्रमाके।। ५९॥ आर, वक्र, आवनेय, कुज, भौम, क्रूर, लोहितांग, पापी, मंगलके। विव, ज्ञ, सौम्य, बोधन, चंद्रपुत्र, चांद्रि, शांत, श्यामगात्र, अतिदीर्घ, बुधके ॥ ६० ॥ जीव, अंगिरा, देवगुरु, मशांत, वाचांपति, इज्य, त्रिदिवेशवंद्य, बृहस्पतिके। भृगु, उशना, भार्गवसुनु, अच्छ, काण, कवि, दैत्यगुरु, सित शुकके॥ ६१ ॥ छायात्मज, पंगु, यम, अर्कपुत्र, कोण, असित, सौरि, शनि, नील, क्रूर, कृशांग, कपिलाक्ष, दीर्घ, शनिके । तम, असुर, अगु, सैंहिकेय, ।। ६२ । राहु, स्वर्भानु, विधुंतुद राहुके। केतु, शिखी, ध्बज, और शनिसुत, गुलिक, मांदि, यमात्मज, माणहर, अतिपापी ये भी केतुके नाम हैं, गुण शनि- राहु केतुके तुल्यहीहैं॥ ६३ ॥ प्राण, असु पाणपदके नाम हैं, उक्त ग्रहोंके पर्याय नाम और भी ग्रंथांतरोंमें ज्योतिषी कहते हैं ॥ ६४ ॥

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(२६ ) सर्वार्थचिन्तामाणः ।

भानुर्युगात्परांकित देहरक्तश्यामान्वितः पिंगलनेत्रकांतिः॥ पित्ता- त्मकोयं समगात्रयष्टिः प्रतापयुक् सत्त्वगुणोल्परोमा ॥६५॥ संचारयुक्संकुचितार्थवाक्यः स्वल्पप्रदो दैविकबुद्धियुक्तः ॥ चंद्रः सितांगः समगात्रयष्टिर्वाग्ग्मी परिध्यंगविवेकयुक्तः ॥ ६६॥ क्कचित्कृशः शीतलवाक्ययुक्त: सत्त्वाश्रयो बातकफानिलात्मा॥ कोपाग्रिनेत्र: सितरक्तगात्र: पित्तात्मकश्चंचलबुद्धियुक्तः॥६७।। कृशांगयुक्तामसबुद्धियुक्तो भौम: प्रतापी रतिके लिलोल:॥ दूर्वाद- लाभः शशिजोतिविद्वान् रजोगुण: सूनृतवाक्यजालः ॥ ६ु८। हास्यप्रियः पित्तकफानिलात्मा सदयःप्रतापी ननु सुंश्लश्।। बृहस्पतिस्तुंदिलगात्रयष्टिः कफात्मकः श्रेष्ठमतिः सुविद्वान्। ।७९॥ सत्त्त्वाश्रयः सर्वगुणाभिरामः पिंगाक्षपूर्दन्यकचाभि- राम:॥ सुलोचनश्रास्फुजिदात्तकाम: सुखी बली सुंदरकांति- पूणः॥७० । आनीलवणौंकित रोमयुक्तो रजोगुण: सर्वगुणाभि- रामः॥जाल्मस्तु मंदःकृशदीर्घगान्रः पिंगेक्षणः क्रूरकचाभिरामः॥। ।।७१ ॥ स्थूलद्विजस्तामसबुद्धियुक्तो वातात्मको वाक्कठिन स्तु निंदयः॥ बलेन निश्चित्य वदेद्रहाणां तत्पश्रिके जन्मनि तद्गणांस्तु ॥ ७२॥ अब ग्रहोंके वर्णाकारादि कहते हैं। जो ग्रह बलवान् है उसके अनुरूप गुण आकारादि जन्म तथा मश्नमें कहे जाते हैं। सूर्य- चतुरस्रशरीर, रक्तश्याम रंग, नेत्रकांति पीली, पित्तपकृति, समशरीर, प्रतापी, सत्वगुणप्रधान, अल्पकेश ॥ ६५ ॥ फिरनेवाला, वाक्यका अर्थ संकोचयुक्त कहे, थोडा देनेवाला और दैवी बुद्धि होवै। चंद्रमा -- श्वेतरंग, समशरीर, बोलनेमें चतुर, गोलाकार अंग, विवेकी, ॥। ६६ ॥ कहीं कृश कहीं स्थूल, ठंडे वाक्य बोले, सत्वगुणी, कफवायुमकृति,। मंगल-कोपसे लालनेत्र, शेतरक्त (पाटल) रंग शरीर, पित्तमकृति, चंचल ब्रुद्धिस युक्त। ६७ ॥ कृश अंग, तमो- गुणी बुद्धि, प्रतापवान्, और कामके लिये अतिचंचल, । बुध-दूर्वारंग समान, श्यामरंग, अतिविद्वान्, रजोगुणी, सत्यवादी॥६८।। हास्यमिय, पित्त कफवायु प्रकृति, तत्कालमतापवाला और व्यभिचारी। वृहस्पति-बढापेटवाला, कफमकृति, श्रेष्ठबुद्धि; अच्छा विद्वान, ।। ६९।।

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भावाटीकासहित: । (२७ )

सत्त्वगुणी, संपूर्ण गुणोंका जाननेवाला, शिरके केश नेत्र पीले, पसन्न। शुक-सुहावने नेत्र पूर्ण- काम, सुखी, बलवान्, सुंदरकांति,।।७०।।समृद्धिसे पूर्ण नीलेरंगसे चिह्नित, बहुत रोम, रजोगुणी संपूर्ण गुणजाननेवाला। शनि-दुष्टस्वभाव, झूंट फरेववाला, कृश, लंबा शरीर, पीले नेत्र, क्रूर स्वभाव, केशशृंगारी ।। ७१॥ मोठे दांत, तमोगुणमधान वातमकृति, कठोरवाणी निंदाके योग्य। ग्रहोंके बलका निश्चय करके जो वलाधिक हो उसके गुण, मश्न तथा जन्ममें कहने।। ७२॥ विप्रौ भवेतां गुरुदानवेज्यौ दिनेशभौमौ नरपालमुख्यौ। सोम- श्र विद्वैश्यकुलप्रसूतो दिनेशपुत्रस्तु चतुर्थवर्णः ॥७३।। चाण्डा. लजातिस्त्वथ सैंहिकेयः केतुश्च जात्यंतरमंत्र मांदिः ॥७४॥ ग्रहोंके वर्ण कहते हैं बृहस्पति शुक् ब्राह्मण, सूर्य मंगल राजा, चंद्रमा बुध वैश्य, शनि शूदनाति, और राहु चांडाल जाति, मान्दि (केतु) इन जातियोंसे अन्य है॥७३॥७४॥ रक्त: श्वेतोतिरक्तो हरितकनकरुकूचित्रनीलास्तु नाथा वह्नयंभ- स्त्वग्निजातो हरिसुरगणराडिन्द्रभार्याब्जजाताः॥ भानु: काव्यो धराभूरगुशनिशशिनः सोमपुत्रामरेज्या ज्ञेयास्त्वन्द्रादिनाथाः क्रियवृषमिथुना राशयस्ते सचान्द्राः॥७। सूर्य रक्तवर्ण, उंद्रमा श्वेत, मंगल रक्त, बुध हरित, बृहस्पति पीत, शुक चित्र, शनि नीलवर्ण है। सूर्यका देवता अभनि, चंद्रमाका जल, मंगलका अग्निज, बुधका विष्णु, बृहस्पतिका इन्द्र, शुककी इद्राणी, शनिका स्वामी ब्रह्मा है। पूर्वादि दिशाओंके स्वामी कमसे पू० सूर्य अ० शुक, द० मंगल, नै० राहु, प०शनि, वा० चंद्रमा, उ० बुध, ई० बृहस्पति हैं। मेप वृष मिथुन कर्क कमसे पूर्वादि ४ दिशाओंमे रहती हैं पुनः सिंहादि पुनः धन आदि भी ४। ४ कमसे दिश्ानिवासी होती है॥ ७५॥ क्षीणेंदुभूसूनुदिनेशमंदा: पापा बुघस्तत्सहितस्तु पापः।नपुंस कौ सौम्यदिनेशपुत्रौ शशांकशुकौ युवती च शेषाः॥७६॥ नरग्रहा भानुकुजामरेज्या: सूतौ बलात्तत्प्रवदंति तज्ज्ञाः॥। भौमस्य मज्ापि वसा गुरोस्तु शुकं भृगोस्त्वक्छशिनंदनस्य।। ७७॥ चंद्रस्य रक्तं दिनपस्य चास्थि स्न्नायुः शनेर्धातुवशादुपाधि:॥तद्धातुकोपान्म- रणं प्रयाति रंध्रस्थितानामिह खेचराणाम्॥ ७॥।

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(२८) सर्वार्थचिन्तामणि:।

क्षीण चंद्रमा, मंगल, सूर्य, शनि और पापयुक्त बुध, पापग्रह हैं, अन्य ग्रह तथा निष्याप बुध अक्षीण चन्द्र शुभग्रह है। बुध शनि नपुंसक चंद्रमा शुक स्त्रीग्रह॥ ७६॥ शष सूर्य मंगल बृहस्पति पुरुष ग्रह हैं जन्ममें बलवान ग्रहके तुल्य फल ज्योतिषज्ञ कहते हैं। भौमका धातु चर्बी, वृहस्पतिकाभी चर्बी, शुकका वीर्य, बुधका त्वचा।। ७७।। चंद्रमाका रुधिर, सूर्यका हड्डी, शनिका नशी, है, रोगादि उपाधि ग्रह अपने धातुके अनुसार करते हैं जो ग्रह अष्टम है वा मृत्युकारक है उसके धातुके कोपसे मरण होता है॥। ७८ ॥ देवस्थानं भास्करस्यांबुवासं चंद्रस्याग्निस्थानमंगारकस्य। क्रीडास्थानं सोमपुत्रस्य कोशस्थानं जीवस्येवमाहुभृंगोस्तु॥ सुप्तिस्थानं भानुजस्योत्करं तु सर्पस्थानं सैंहिकेयस्य चैवम् ।७९।।जीणे शनेवांसरनायकस्य स्थूलं गुरोमध्यमकं कवश्ध८।। काठिन्यमब्जस्य तु नूतनं वित् क्विन्नं कुजस्याग्निहतं च वर्रम्।। कंथा फणींद्रस्य तु चित्ररूपा केतोर्महाछिद्रयुता विशेषात्॥८॥ सूर्यादियोंके स्थान तथा वस्च कहते हैं, सूर्यका देवस्थान, चंद्रमाका नलस्थान, संगलका अग्निस्थान, बुधका विहारस्थान, वृह्स्पतिका खजाना वा भण्डार, गुकका शयनस्थान, शनिका पुंज, पृथ्वीका चपटीला आदि, राहुका सर्पस्थान, (बांबी आदि) केतुकाभी वही स्थान है शनिका घर वा वत्न जीर्ण, सूर्यका मोटा, वृहस्पति कुकका मध्यम, चंद्रमाका कठोर, बुधका नवीन, मंगलका टूटा फटा और अग्िदग्ध, राहुकी गुदडी रंगवर्णकी और केतुका बडेबडे छिद्रोंसे संयुक्त होता है। ७९॥८०॥८१। ताम्रं दिनेशस्य निशाकरस्य मणिहिरण्यंतु धरासुतस्य॥शुक्ति- विंदो देवगुरोस्तु रौप्यं मुक्ता भृगोर।यसम्कसूनोः॥।८२॥ राहोस्तु शीशं शिखिनस्तु नैल्यं धरामणिस्तत्कथयंति तज्ज्ञाः॥ पीतांबरं देवगुरोभृंगोस्तु क्षौमांवरं भास्करमिन्द्रगोपम्।।८३ ।। शुक्कं क्षामं रात्रिनाथस्य चांद्रेः श्यामं क्षांम रक्तचित्रं कुजस्य। वस्नं चित्रं पट्टवस्त्ं शनेस्तु नीलं राहोर्जीर्णचित्रान्वितं च ८४। रूपान्वितं तद्सनं च केतोर्बलान्वितानां तु वदेद्हाणामू।। ८८॥ सूर्यका धातु ताम्र, चंद्रमाका मणि(चुन्नी), मंगलका सुवण, बुधका जीप, वृहस्पतिका चाँदी, शुकका मोती, शनिका लोह।। ८२।। राडुका शीशा, केतुका नीलम ये पार्थिव धातु ग्होंके ज्योतिषी कहते हैं। वृहस्पतिका पीतांबर, शुकका पशमीना, सूर्यका बीरबहूटीके रंगका,

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भाषाटीकासहित:। (२९)

रेस्षम॥ ८३ ।। चंद्रमाका श्रवेत पसमीना, बुधका हरित ऊनी, मंगलका रक्तवर्ण विचित्र, शनिका विचित्र रेशमी बब्, राहुका नीला रंग और चित्र विचित्रमी॥८४॥ केतुका विचित्न रूप वस्न है। बलवान् ग्रहके उक्त धातु वस्ादि जन्ममश्नादिमें कहना॥ ८५ ॥ भृगोर्वसंतः क्षितिसूतुभान्वोर्यीष्मः शशांकस्य ऋतु: प्रवर्षः ॥ विदः शरदेवगुरोस्तु हैम्नो ऋतुः शनेः स्याच्छिशिरस्तु- कालः ॥ ८६॥ ग्रहोंकी ऋतुकी शुक्रकी दसंत, मंगलसूर्यकी ग्रीष्म, चंद्रमाकी वर्षा, बुधकी शरद्, वृहस्पतिकी हेमंत, शनिकी शिशिर ऋतु है॥। ८६ ।। द्वेष्काणपैस्तद्गतवस्तु वाच्यं प्रश्ने प्रसूतावपि नष्टसंज्ञे॥ भानो: कटुर्भूमिसुतस्य तिक्तं सोमस्य तावल्लवण विदस्तु॥८७॥ मिश्रीकृतं वस्तु सुरेज्यभृग्वोर्माधुर्यमम्लंच शने: कषायः॥ ऋतु- त्रयं वासरनायकस्य क्षणं शशांकस्य दिनं कुजस्य।। ८८।। विदो ऋतुदेवगुरोस्तु मास: पक्षो भृगोर्वत्सरमर्कसूनोः॥अष्टौ तु मासा- स्तुहिनांशुशत्रोः केतोस्तु मासत्रयमेव कालः॥८९॥ पश्न जन्म तथा नष्ट वस्तु विचारमें द्रेष्काणेशके अनुसार वस्तु बतलानी, अब ग्रहोंके रख कहते हैं सूर्यका कहुआ, मंगलका तीता, चंद्रमाका लवण, बुधका मिश्रित, वृहस्पतिका मीठा शुकका खट्टा, शनिका क्ाथ है फलपाकमें समय संख्या है कि सूर्यके छः महीना चंद्माफा मुहूर्त मंगलका दिन ।८७॥८८।। बुधके दो महीना, वृहस्पतिका एक मास, शुक्रका एफ पक्ष, शनिका एक वर्ष, राहुका माठ महीना, केतुका तीन महीना, पाककाल है॥८९॥ धातुग्रहा राहुशनीन्दुभौमा मूलग्रहौ शुकदिनाघिनाथौ।जीवग्रहौ जीवशशांकसूनू मेषादि दस्रादि यथाक्रमेण॥ ९०॥ राहु शनि चंद्रमा मंगळ धातुवस्तुके, सूर्य शुक मूळवस्तुके और वृद्स्पति बुध जीववस्तुके स्वामी हैं और मेषादिराशिकमसे धातुमूळ जीवसंज्ञक हैं ऐसेही अश्विन्यादि नक्षत्र भी क्रमसे धातुमूल और जीवसंज्ञक हैं।। ९० ।। अथोर्द्धदृष्टी दिननाथभौमौ दृष्टिः कटाक्षेण कवींदुसून्वौः॥ शर्शा

सूर्य मंगल ऊर्ध्वदृष्टि, शुक बुध तिर्छी दृष्टि, चंद्रमा वृद्दस्पतिसम दृष्टिवाले हैं, राहु शनिकी अषोद्ृष्टि है।। ९१ ।।

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(३०) सर्वार्थचिन्तामणि:।

पश्यत्यसौ भानुसुतस्तृतीयं मानं च पूर्ण चतुरस्रमारः॥ जीव- स्त्रिकोणं मदनं च सर्वे पश्यंति दष्टया चरणप्रवृद्दया ॥९२॥ दृष्टि कहते हैं शनि दे। १० भावमें पूर्ण देखता है मंगल ४। ८ में बृह्स्पति ५।९ में अन्यग्रह सप्तम भावमें पूर्ण देखते हैं पूर्णदृष्टिके स्थानसे दाहिने वायें कमसे चरणदृष्टि होती है॥। ९२ ।। भानोस्तु मित्राणि कुजेंदुजीवाः समो बुधः शुक्शनी विपक्षौ॥ इष्टो शशांकस्य दिनेशसौम्यौ शेषाः समा भूमिसुतस्य मित्रम्॥ ॥ ९३ ॥ रवीन्दुजीवाश्च बुधश्च शत्रुः समौ दिनेशात्मजदानवे- ज्यौ॥ सौम्यस्य मित्रे दिननाथशुकौ शेषाः समा रात्रिकरः सपत्नः ॥ ९४॥ शुकेंदुजौ देवगुरोः सपत्नौ मित्राणि सर्वें रवि- जस्तु मध्यः ॥ शनीन्टुजाविष्टकरौ भृगोस्तु शेषाः सपताश्र समौ कुजेज्यौ॥ ९५॥ सौरस्य मित्रे भृगुपुत्रसौन्यौ समो गुरु- स्ते निखिलाः सपत्नाः ॥ राहोस्तु मित्राणि कवीज्यमंदाः केतो- स्तथैवात्र वदंति तज्ज्ञाः ॥९६॥ मित्रामित्र कहते हैं सूर्यके मंगल चंद्रमा बृहस्पति मित्र, बुध सम, शुक् शनि शत्रु हैं। चंद्रमाके सूर्य बुध मित्र, अन्यसम हैं शत्रुकोई नहीं। मंगलके सूर्य चंद्रमा वृहस्पति मित्र, बुध शत्रु, शनि शुक सम हैं। बुधके सूर्य शुक्र मित्र, चंद्रमा शत्रु, अन्य सम, हैं। बृहस्पतिके शुक बुध शत्रु, शनि सम, और सव मित्र हैं। शुकके शनि बुध मित्र, मंगल बृह्- स्पति सम, अन्य शत्रु हैं। शननिके शुक्र बुध मित्र, वृहस्पति सम, अन्य शत्रु हैं। राहुकेुके शुक्र बृहस्पति शनि मित्र, अन्य शत्रु, ज्योतिषज्ञ कहते हैं ॥ ९३ ।९४।।९५।।।।९६।। भवंंति तात्कालिकमित्रभूताः सर्वे च वाक्सोदरवंधयुक्ताः ॥

। ९७॥ तत्कालमित्रं तु निसर्गमित्र इयं भवेत्तत्वधिमित्रसं- ज्ञम्॥ तथैव शत्रोरधिशत्रुसंज्ञमेकत्र शत्रुः समतासुपैति ॥९८॥ तत्कालमें अपने स्थानसे पंचम तृतीय चतुर्थ स्थानगत ग्रह मित्र, क्रम एवं व्युत्कमसे होतेहैं अन्य राशियोंमें तात्कालिक शत्रु होते हैं॥ ९७॥ एक तत्काल मैत्री दूसरी नैसर्गिक मैत्री (पूर्वोक्त ) हैं। दो प्रकार मित्र होनेमें अधिमित्र, दो पकार शत्रु होनेमें गधि- शत्रु होता है। जो एक प्रकार मित्र दूसरेपकार शत्रु है वह सम गिनाजाता है।। ९८ ।।

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भावाटीकासहित:। (३१ ) स्वोच्चे सुहद्धे स्वनवांशिकपि स्वक्षें हकाणे द्विरसांशकेपि॥ कलांशकाद्यंशयुतेपि चैवसुपति तत्स्थानबलं ग्रहेन्द्रः ।। ९९।। लग्ने बुधेज्यौ बलिनौ तु पूर्वे वीय यमे तद्दशेमेकभौमौ।कामेर्क- सूनुर्बलवाञलेशे बंधौ निशानाथकवी कुबेरे॥ १०० ॥ तत्सप्तमे दिग्बलशून्यमाहुस्तदंतरे चत्त्वनुपात एव।। स्वमास- होरादिनवत्सरेषु वीर्यान्विता भानुमुखा ग्रहेंद्राः॥१०१॥ षड्बल कहते हैं-अपने उच्चराशि मित्रराशि, अपने नवांशक अपने राशि अपने देव्काण अपने द्वादशांश षोडशांश आदिमें ग्रह स्थानबली होता है इनसे विपरीत नीच आदिमें बल- शून्य बीचमें अनुपातसे स्थानवल जानना । ९९ ॥ बुध बृहस्पति लगमें तथा पूर्वमें सूर्य मंगल दक्षिग दशममें, शनि सप्रम पशश्चिम और चंद्रमा शुक चतुर्थ उत्तरमें दिग्बली होतेहैं अपनेसे अप्तममें शून्य बीचमें अनुपात करना अपने महीना अपनी कालहोरा स्वदिन अपने वर्षमें ग्रहकालवली होते हैं। १०० ॥ १०१ ॥ रात्रौ बलाव्या शनिचंद्रभौमास्त्रयो ग्रहाश्चाह्नि रवीज्यशुक्ाः॥ सदा बली वित्सितकृष्णपक्षे सौम्यास्तदन्ये बलिनः क्रमेण॥ ॥ १०२॥ शुभेक्षिता: पूर्णबलान्वितास्तु दृष्टेर्बलं पापखगैर- हृष्टः॥ सौम्यायने त्वतिबली दिवसाधिनाथश्रन्द्रस्तदन्यसमये वलपूर्णयुक्तः ॥१०३॥ मंदारसौध्यगुरुशुऋशशांकसूर्या नैस- र्गिकाख्यबलनः खचराः क्रमेण ॥ १०४॥ वक्रान्विताः क्षिति- सुतप्रसुखाः समस्ता युद्धे जयी जलपदिग्गतकांतियुक्त।।१०५।। शनि चन्द्रमा मंगल रात्रिमें, सूर्य बृहस्पति शुक्र दिनमें और बुध सर्वदा काल बली होता है शुक्कपक्षमें शुभग्रह कृष्णपक्षमें पापग्रह बली होते हैं। १०२॥शभग्रहोंसे दृष्ट ग्रह जो पापदष्ट न हों तो पूर्णवली होते हैं सूर्य उत्तरायणनें चंद्रमा दक्षिणायनमें ।। १०३ ॥ भौमादि ग्रह वक्रहोनमें अथवा ग्रहयुद्धमें विनयी जिस्की कीर्ति तेन हो और पश्चिम शरहो, बृहच्ेष्टा बली होता ह। १०४॥ शनि, मंगल, बृहस्पति, शुक्र, चंद्रमा, सूर्य, इस कमसे एकसे अधिक दूसरा नैसर्गिक बली होता है॥ १०५ ॥ लग्नस्य वीर्यमधिपस्य बलं तुसवे सुख्यं वदति खल षडूविधवी- य्यमेवम्॥ १०६॥ लग्ं नृभं चेद्लमत्र रूपमाब्जं चतुष्पाद्द-

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(३२ ) सर्वार्थचिन्तामणिः। मथार्घसंज्ञम्॥ चेत्कीटलयं किमपीह नास्ति स्फुटं विलग्नस्य बलं तदाहुः॥१०७॥ इसप्रकार षड्विध बल हैं इनमें लग्न और लग्नेशका बल मुख्य कहते हैं।। १०६ ।। लग्नबलके लिये कहते हैं जो लग्न नर राशि हो तो वल १ जलराशि अथवा चतुष्पदराशियोंमें आधा ०। ३० यदि कीटराशि लग्न हो तो शून्य । अर्थात कुछभी नहीं इसप्रकार लग्नका बल स्फुट कहते हैं॥। १०७ ।। सारद्धानि षट् तीक्ष्णकरो बलीयाँश्चन्द्रस्य षट्पंच वसुं धराजः॥ सप्तेंदुसूनोरपि षट् गुरोश्च सार्द्धानि पंचाथ सितो वलीयान् ॥ १०८ ॥ मंदस्तु पंचैव च षड्बलानां संयोग एवापरथान्य- थास्यु: ॥ रूपत्रयं वलसुशंत्यथ पादहीनं स्थानं तु दिग्बल- मथांघिविहीनरुपम्॥ १०९॥ ऋत्वंशहीनवलमत्र तु चेष्टिता- ख्यमष्टांशहीनयुगमेव तु कालवीर्यम् ।। पूर्णावला रविशशांक- सुतामरेज्याश्चार्ध बलं त्वयनजं हि पृथग्विभागे॥ ११०॥ षड्बलमें सूर्य बलवन् हो तो छः ६। ३० चंद्रमा ६, मंगल ५, बुघ७, वृहस्पति६ शुक ५/३०।१०८।इनि५,वळ षहूबळमें पाता है। पूर्ण बल न होनेमें अनुपातसे घटता है। स्थान बलमें २। ४५ दिग्बलमें पादहीन एक१।४५॥१०९। चेष्टावलमें षडशहीन ०।५० कालबलमें अष्टाशहीन दो३।३०पृथक्विभाग अयनबलमें सूर्य चंद्रपुत्र वृहस्पति आधा ० 1३० बल पाते हैं॥ ११० ॥ रसांशहीनं दिशि वीर्यमाहु: स्थाने तु पादाघिकयुग्मरूपम् ॥ कालं बलं तर्यंशविहीनयुग्ममर्द्ध भवेञ्चेष्टितवीर्यमेव ॥ १११॥ त्यंशोनमेकं त्वयनं वलं स्याच्छीतांशुदेवेंद्रसपत्रगुवो:॥ चेष्टा- बलं त्यंशविहीनमेकं साष्टांशरूपं समये बलं स्यात् ॥ ११२॥ दिश्यर्द्धरूपं बलमायनं च त्यंशं भवेत्स्थानिकमर्द्धयुग्ममू ॥ दिनेशपुत्रस्य वसुंधरायाः सूनो: करमाद्वीर्यमुदाहरंति॥११३॥ दिग्वळ षष्ठांशहीन। ५०। कहते हैं स्थानमें सवादो २। १५ कालवळमें तृतीयांश कम दो १। ४० चेष्टावलमे आधा ०। ३० ॥। १११ ।। अयनबल तृतीर्यांशहीन एक ० ४० चन्द्रमा वृहस्पति शुकका चेष्टाबल त्यंशहीन एक ०। ४०, समय बलमें अषटांश

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भाषाटीकासहितः। (३३ )

सहित एक १।७।३० ॥ ११२। अयनबल डेढ़ १। ३०, स्थानबल एकका तृती यांश ०। २०, स्थानवल शनि मंगल कालकमसे २। ३० कहते हैं ॥ ११३ ॥ आरोहवीर्याः प्रभवंति भावसमानपर्यतमतश्र्युताः स्युः॥ स्वोच्चे सुहृत्क्षेत्रगते ग्रहेंद्रे पड्विर्बलैर्सुख्यबलान्वितोपि॥ ११४॥ संधौ स्थित: सन्नफलः प्रदिष्टश्चिंत्यं विशेषेण दशाविपाके॥ प्राणत्ि- कोणं प्रवदंति लग्नं तदेव मान्दान्वितराशिकोणे॥ ११ ॥ मान्दंशकात्कोणगतं विलयं तदंशकामस्थितराशिकोणे॥ शर्शा- कसंयुक्तभकोणराशौ तदंशकात्तन्मदकोणभे वा ॥ ११६ ॥ प्रश्रेपि तज्जन्मसमानकाले लग्नस्य निश्धायकमत्र तज्ज्ञाः॥तयो- बैलेनापि विकल्पमाहुर्लग्नाव्जयोरित्थमुदाहरन्ति ॥११७॥ भाव जितने अंशपर है उतने अंश पर्यत जो ग्रह है वह आगेही, उससे ऊपर अवरोही होता है। संधिगत ग्रह अपने उच्च मित्रराशि स्वक्षेत्रगत हो षड्बलमें मुख्यबलयुक्त भी हो तौभी दशामें पूर्णफल नहीं देसकता है माणपद्से त्रिकोण लग्न कहतेहैं मांद्य सहित उसके ५/९ राशि कोणसंज्ञक होती हैं मांद और गुलिक आगे अध्यायके अवसानमें सोदाहरण कहेंगे। मांदंशक कोणगत राशिके अंशसे सप्तमगत राशिके कोणको विकल्पसे कहते हैं। चंद्रराशिसे, कोणराशिमें अथवा उस अंशके सप्तमस्थित राशिके कोणमें लग्न कहते हैं। मश्नजन्म समयमें इसमकार माणपद निश्चय करना ज्योतिषज्ञ कहतेहैं. और यहभी कहतेहैं कि लग्न बली हो तो लग्नसे, चन्द्रमा विशेष बली हो तो चंद्रमासे जानना इसमकार उग्नचंद्रमें विकल्प है। प्राणपद्का खुलासा ग्रंथान्तरसे कहता हूं,-"घटी चतुर्गुणा कार्या तिथ्याप्ैश्व पलैयुता॥ दिवाकरेणापहतं शेषं माण- पदं स्मृतम्॥ १ ॥ शेषात्पलांताद्दिगुणीविधाय राश्यंशसूर्य्क्षीनेयोजिताय ॥I तत्रापि तद्राशि- चरान् क्रमेण लयाशमाणांशपदैक्यता स्यात् ॥२॥ पुनः ॥ कोणात्क्रमांतरादीनां तथा माणपदा- दपि ॥ स्वेष्टकालं पलीकृत्य तिथ्याप्तं भादिकं च यत् ।। ३ । चरागद्विभगे भागे भानौ युङ्नवमे खुते॥ स्फुटं पाणपदं तस्मात्पूर्ववच्छोधयेत्तनुम् ॥ ४ ॥ बिना माणपदाच्छुद्धो गुलिकाद्ा निशाकराव् ॥ तद्शुद्धं विजानीयात्स्थावराणां तदैव हि । ५ । दयोहीनबलेप्येवं गुलिका- त्परिचितयेव्।। तस्मात्तत्सप्तमस्थानात्तदंशाच्च कलत्रतः ॥ ६॥ तत्रैव तत्रिकोणे वा जन्मलयं विनिर्दिशेद।। मनुष्याणां पशूनां च द्वितीये दशमे रिपौ । ७॥ तृतीये मदने लाभे विहंगानां विनिर्दिशेव॥ कीटसर्पजलस्थानां शेषस्थानेषु संस्थितः ॥ ८ ॥ अर्थात् इष्ट घटी ६/ १७ बौगुनी २५ । २ पंद्ह १५ से भाग लिया शेष १० । २ पल द्विगुण १०। ४ यहां सूर्य पर राशिमें हो तो उसीसे यदि सूर्य स्थिर दिस्वभाव राशिमें हो तो उसके त्रिकोण ५/९ से गिनना उनमें भी जो चर राशि हो उससे क्रमगणनासे १५ पलात्मंक माणपद होता है।

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(३४ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

जैसे सूर्य २। ४।२८। १ द्विस्वभाव राशिमें है तो ३ । ७। ११ इस त्रिकोणमें चर Fee ghe mno तुला है इसीसे गिना ३। ४ माणपद आया सूर्याश ४ और लगनांशकी एकता आवै तब लग्न आता है यहां उदाहरणार्थ सूर्य कहा है, ऐसेही चंद्रादि जानना। गुलिक लग्नसे वा चंद्र- मासे त्रिकोण शुद्ध किये विना अशुद्ध पाणपद स्थावरोंका होता है, उक्त दोनोंमेंसे जो बलवान् हो उससे पाणपद साधन करना दोनों निर्बल हों तो उसके सप्तम अथवा उसके अंशके सप्तमसे गिनना उसमें वा उसके त्रिकोणमें जन्मलग्न कहना यह मनुष्योंके लिय प्रश्न वा जन्मसे कहा. पश्ुओंका २।१०।६।३। ७। ११ से पक्षियोंका भी इन्हीसे और शेषस्थानोंसे कीट सर्प जलचर जीवोंका जानना ॥ ११४॥ ११५ ॥ ११६॥ ११७ । लग्ने बले मांदिवशाद्विलमं चंद्रे बले चंद्रवशाद्विलग्रम्। ओजे तदंश पुरुषस्य जन्म लग्ने स्न्नियस्तद्विपरीतभांशे॥११८॥ लग्न बलवान् हो तो गुलिक मांदिवशसे उपरोक्त त्रिकोण शोध करके लग्न जानना यदि चंद्रमा बलवान् हो तो चंद्रमासे जानना विषमराशि अंशमें पुरुष, जन्म, सम राशि हो तो उसके विपरीत स्रीमें जन्म जानना ॥ ११८ ॥ क्माद्रहः पाचकबोधकश्च सकारको वेधकसंज्ञकथ्॥ मंदारजी- वामरशत्रुपूज्या शुकारसूर्यात्मजवासरेशाः ॥११९॥ रवीन्दु- सूर्यात्मजचन्द्रपुत्राः शशांकजीवाच्छघरासुताश्च ॥ सूर्यात्मजा- रेंदुदिनाधिनाथाः सौम्येंदुपुत्रार्कदिनेशपुत्राः ॥१२०॥शुकेंदु- देवेज्यघरासुताश्र भवंति तत्पाकसुखा ग्रहेंद्ाः ॥ १२१॥ ग्रह क्रमसे, पाचक १ बोधक २ कारक ३ वेधक ४ संज्ञक होता है। शनि, मंगल, वृहस्पति, शुकक॥१॥ शुक, मंगल, शनि, सूर्य॥२॥१२९ ॥सू० चं०श० बृ० ॥३॥चं० वृ० शु० मं०॥ ४ ॥ श० मं० चं० सू० ॥५॥ वृ० वृ० सू० ३० ॥६॥ १२० ॥ शु० चं० वृ० मं०॥ ७॥ इसकमसे ग्रह पांच बोधक कारक वेधक होते हैं ॥ १२१॥ स्थानानि वक्ष्ये क्रमशो ग्रहाणां षट्सप्धर्मायगताः क्मेण॥ भानो: शशांकान्मदभाग्यलाभयुक्तास्तृतीयेन धरासुताच्१२२॥।

स्तु षष्ठात्मजकामरिष्फाः शुक्राइनारिव्ययबंधुयुक्ताः।।१२३॥। तृतीयलाभारिकलन्नगास्तु दिनेशमूनो: प्रवदंति तज्ज्ञाः॥१२४॥ कमसे सूर्यादि ग्रहोंके स्थान कहते हैं, सूर्यसे ६। ७। ९ । ११, चंद्रमासे ७। ९। ११। ३े, मंगलसे २ । ६। ११ । १२, ुधसे २ । ४। ५ । ३, वृहस्पतिसे ६। ५

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भावाटीकासहितः। (३५ ) ७। १२, शुकसे, २।६ । १२ । ४; शनिसे ३े। ११।६। ७, स्थानोंमें पूर्वोक्तसंज्ञ। वाले ज्योतिषज्ञ कहते हैं ॥। १२२॥ १२३॥ १२४ ।। शत्रुर्दिनेशस्य तु पाचक: स्यान्मित्राणि शेषा: शशिनस्तु वैरी॥ व्यये तु भौमस्य च वेघकश्र शत्रुर्वुधस्यांतकरो गुरोस्तु॥१२५॥ पाकग्रहो वेघकसंज्ञकश्र शत्रुर्भवेदास्फुजितश्र वैरी॥ सकारको वेधकसंज्ञकश्च शनेस्तु तत्कारकखवेचरोरिः ॥ १२६॥ सूर्यका पाचक शत्रु, अन्य मित्र होतेहैं। चंद्रमाका व्ययगत ग्रह बैरी, मंगलका बेधक शत्रु, बुधका वेधक, वृहस्पतिका पाचक ग्रह, शुकका वेधक ग्रह, शनिका कारक ग्रह शत्रु, अन्य मित्र होते हैं॥ १२५॥ १२६ ॥ मिष्टान्नपानांबरभूषणातिं राज्यार्थभूलाभमतीव सौख्यम्॥ धैर्ये महोत्साहमतीव शक्तिं कुर्याद्रहः पाचकसंज्ञकोयम् ॥ १२७॥ मित्रे यथान्यायफलं तदन्ये ग्रहे तदन्यत्फलमातनोति॥ सनग्र- भाग्यं बहुराजपूज्यं विद्यां विनोदांकितराजगोष्ठीम् ॥१२८॥। पाचक संज्ञक ग्रह मित्र संज्ञक हो तो मिष्टान्न, मिष्टपान, श्रेष्ठवस्त्र भूषणकी नाप्ति, राज्य- लाभ, धनलाभ, अतिसौख्य, घैर्य, मनमें उत्साह, बडी सामर्थ्य करता है॥। १२७ ॥ यदि वही पाचकग्रह शत्रुसंज्ञक हो तो उक्त फल विपरीत करता है। और भाग्योदय करना राज्यपूज्यत्व विद्या आनंदसहित सभामें प्रवेशकरना यह इसका स्वाभाविक गुण है परंतु मित्रसंज्ञक होनेमें यथायोग्य फल और शत्रुसंज्ञकमें विपरीत करता है बकी हो तो विपरीत तो नहीं परन्तु उक्तफल कम करता है॥ २८ ॥ दयातपःप्राप्तमचिन्त्यभाग्यं कुर्यात्फलं बोधकसंज्ञकश्र ॥ ग्रहे तु तस्मिन् फलमातनोति समग्रपर्याप्तफलं तदन्ये॥१२९॥ बोधक संज्ञक ग्रह मित्रसंज्ञक हो तो दया तपसे माप्त अविचारित भाग्य करता है मित्र- संज्ञक होनेमें उक्त फल पूर्ण और शत्रुसंज्ञक होनेमें अन्यथा करता है॥ १२९ ॥ भाग्यं कचित्क्षीणफलं क्चिच्च दारार्थबंध्वात्मजरोगपीडा।। चो- रागिपीडा कलही जनैस्तु सकारको मित्रसमो यदि स्यात्॥१३०॥ सकारको वैरिसमो न तच्तु वदति व्यत्यासफलं विशेषात्।। चोरागनिबंधुक्षितिपालसंघैरतीव दुःखं स्वपदच्युतं च॥। १३१॥

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(३६ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

कारक ग्रह मित्र सम हो तो कभी भाग्यवृद्धि, कभी भाग्यहानि, कभी स्त्री, धन, बंधु, पुत्रोंको रोगपीड़ा, चौरभय, अग्निपीडा, एवं अग्निपाडा लोगोंसे कलह करताहै ॥ १३०॥ वही सकारक शत्रुसम हो तो औरौंके तरह विपरीत फल नहीं करता विशेषतः चौरभय, अभि- भय, बंधुभय, राजाओंसे अतिदुःख और अपने पदकी भी च्युति करता है।। १३१ ।। विदेशयानं धननाशनं च वेघग्रहस्तत्फलमन्यथान्य:।। १३२॥ वेधसंज्ञक ग्रह मित्रसम हो तो विदेशगमन धननाश करता है शत्रुसम हो तो उक्तफल अन्यथा करता है।। १३२ ।। तरुखरजयनृपतनुखनिनाडयो भास्करादिवारेषु॥ दिनमानघ- टीगुणिता नागहता गुलिकनाडिका: स्पष्टाः ॥१३३॥ स्फुट- गुलिकनाडिकाभिस्तत्कालार्केण सायनेनापि। लग्नवदानेतव्यो राश्यंशकलादिरूपको गुलिकः ॥ १३४ ॥ रविवारमें २६ चंद्रमें २२ मंगलमें १८ बुधमें १४ गुरुमें १० शुक्रमें ६ शनिमें २ अंक दिनमान घटिकासे गुणाकर ३० से भाग लेनेसे गुलिक घटी होती है स्पष्ट गुलिक घटियों करके तत्काल सूर्य तथा सायनसूर्यसे भी लगस्पष्टकी रीतिसे राशि अंश कलादि गुलिक लग्न स्पष्ट होता है।। १३४ ।।

ब्धमितमांदिघटी स्याल्लग्नवत्स्फुटमिहानयनं हि॥ १३५॥ मांद कहतेहैं रविवारमें २६ चंद्रमें २२ भौममें १८ बुधमें १४ वृहस्पतिमें १० शुक्रमें ६ शनिमें २ से दिनमान गुणाकर ३० से भाग लेकर मांद्य घटी होतीहैं तब लग्न स्फुटकी रीतिसे राश्यादि बनायके मांद्यलन्न स्पष्ट होता है गुलिक जन्म कालिकेष्टलस् निश्चयार्थ ग्रंथांत- रमें इसम्रकार है कि "रविवारादि शन्यन्तं गुछिकादि निरूप्यते ॥ दिवसानष्टवा कृत्वा वारेशाद्रणयेत्क्रमात् ॥। १ ॥ अष्टमांशो निरीशः स्याच्छन्यंशो गुलिकः स्मृतः ॥ रात्रिरप्य- षटधा भक्ता वारेशात्पंचमादितः ॥ २ ॥ गणयेद्ष्टमः खंडो निष्पत्तिः परिकीर्तिता ॥ शन्यंशे गुलिकः पोक्तो गुर्वशे यमघंटकः ॥ ३ ॥ भौमांश मृत्युरादिष्टो रव्यंशे कालसंज्ञकः ॥ सौर्म्यां शेर्द्धमहरकः स्पष्टकर्मपदेशकः ॥४॥"सूर्यादिवारोंमें दिनमानके ८ भाग करके तदिनवारेश पथम खण्डाधिपति तदनंतर उस ग्रहसे आगे कमसे खंडेश जानने अष्टमखंड निरीश होता है सातही बारोंमें शन्यंश गुळिक होता है जैसे रविवारमें सप्तमखंडेश शनिका गुलिक, चंद्रमें छठा, मंग- लमें पंचम, बुधमें चतुर्थ, गुरुमें तीसरा, शुक्रमें दूसरा, शनिवारमें प्रथम खंढ, रात्रिकेवास्ते रात्रिमानके ८ भाग करके तद्वारेशसे पांचवा आदिखंडाधिपति होतेहैं अ्ष्टमखंड यहां भी निरीश होताहै

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भाषाटीकासहित:। (३७ )

गुलिक जैसे रविरात्रिमें तीसरा, चंद्रमें दूसरा, भौमनें प्रथम, बुधमें सप्तम, गुरुमें छठा, शुकमें पंचम, शनिमें चतुर्थखंड गुलिक होता है। ऐसही दिनरातमें गुरुखंड, यमघंट, बुधखंड, अ्ई- याम, सूर्योश कालसंज्ञक, भौमांश मृत्युनामा होता है उदाहरण- गुलिकगुणकध्रुवांका: दिनमान ३३। १४ अष्टमांश ४।९।१५ बुधवारका जन्म है इसके गुणक ४ से गुण १६ । ३७ गुलिकेष्ट हुआ. छु. श. ग्र. ७ ६ ५ लग्नस्पष्टकी रीतिसे गुलिक ल ५ ।६ स्पष्ट हुआ ॥१३५॥ दि. ५४ /र

पाकेशाद्वसुभांत्यशत्रुभवने युक्तोपहारेश्वरस्तच्छच्ुर्भवतीह लाभ- धनमे सोत्थात्मजे बंधुभे॥ भाग्ये वा दशमे समन्वितग्रहस्त- च्छोभनाख्यस्ततस्तत्कामान्वितखेचरस्त्वशुभदः प्रोक्तो राणां कम: ॥१३६॥ फल देनेवाला ग्रह पाकेशसे ८। १२ । ६ स्थानोंमें शत्रु होताहै। ११। २। ५। ४।९१०।३। १ शुभ (मित्र) संज्ञक होताहै और सप्तम ७ स्थानगत गरह अगुभ देनेवाला होताहै यह ग्रहोंका क्रम है।। १३६ ॥। पापग्रहादिसहितो द्युचरस्तु शत्रः स्यात्स्थानतोपि शुभदस्त्व- तिशोभनाख्यः॥ स्थानानुरूपफलमेव विचिंत्य मार्ग ज्ञात्वा वदति सुनयो जगतां सुसिद्धयै॥ १३७॥ ग्रह पापग्रहादिसे युक्त शत्रुसंज्ञक होताहै जो शुभयुत है और शुभस्थानमें भी है वह अतिशुभ होताहै इसपकार स्थानके अनुसार फलको मार्ग विचारके शुभाशुभत्व जानके मुनि लोक जगतके सिद्धिके लिये कहतेहैं ॥ १३७ ।। संज्ञाध्यायो वर्णितः सर्वशास्त्रात्सारं बुद्धा सर्वलोकोपकारम् ॥ यद्यत्सर्वे वेंकटेशेन बुद्धा तत्तत्पाके योजये त्तत्फलानि ॥ १३८॥ इति सर्वार्थचिन्तामणौ संज्ञानिरूपणो नाम प्रथमोऽध्यायः॥१॥ वेंकटेशनामा ग्रंथकर्त्ता आचार्यने सब शास्त्रोंसे सार जानके सर्वलोकोपकारार्थ यह संज्ञा ध्याय कहाहै जो जो इसमें कहा गया है उनउन ग्रहोंका फल पाकसमयमें योजित करना॥। १३८ ॥ इति श्रीसर्वार्थचिंतामणौ महीघरकृतायां भाषाटीकार्यां संज्ञाध्याय: प्रथमः ॥। १ ॥

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(३८) सर्वार्थचिन्तामणिः।

द्वितीयोऽध्यायः॥२॥

अथ लग्नफलविचाराध्यायः। भावोद्भवानि विविधान्युचिताननि यस्माच्छास्त्रांतरादृषिगणा दढबुद्धयस्तु। यान्येव तानि खगयोगवशाद्दंति बुद्धया समी- क्ष्य विदुषां तु मुदे करोमि॥ १॥ ग्रंथंकर्तांकी उक्ति है कि दढबुद्धि ऋषिजनोंने शास्त्रांतरसे जो नानापकार भावफल कहेहैं वही पक्कबुद्धि ऋषिगण ग्रहयोगोंके अनुसार जो फल कहते हैं उन्हीको अपनी बुद्धिसे विचा- रके मैं भावफलाध्याय विद्वानोंके प्रसन्नतार्थ करताहूं ॥ १ ॥ भावाः सर्वे शुभपतियुता वीक्षिता वा शुभेशैस्तत्तद्वावाः सकल- फलदा: पापदग्योगहीनाः॥पापाःसर्वे भवनपतयश्चोदहाहु स्त- थैव खेटैः सर्वैः शुभमपि फलं निन्नमूढारिहीनैः॥२॥ समस्तभाव शुभग्रह स्वनाथ युक्त वा दृष्ट, पापग्रह योग दृष्टि हीन, संपूर्ण फल देते हैं। पापयुक्त, पापपति, पापदष्ट, नीचगत, अस्तंगत, हीनबल, शुभफलको छोडके अशुभफल करते हैं॥ २ ।।

स्तु नात्यंतफलप्रदास्तद्भावादिकानां फलमेवमाहुः।। है।। छग्नादि सभी भावोंसे भावेश ६। ८। १२ में तथा पापग्रह इन भावोमें अशुभ फल देते हैं, शुभग्रह शुभफल नहीं देते परंतु अशुभफल भी नहीं करते, पत्येक आवोंके फल ऐसेही कहतेहैं ॥ ३ ॥ यद्भावनाथो रिपुरंधरिष्फे दुःस्थानपो यद्धवनस्थितो वा॥ तद्भावनाशं कथयंति तज्ज्ञाः शुभेक्षिते तद्धवनस्य सौख्यम्॥॥॥ जिस भावका स्वामी ६।८। १२ में हो तथा दुष्टस्थानाधीश जिस भावमें हो तो उदभावका उक्तफलनाश ज्योतिषज्ञ कहते हैं। शुभग्रहकी दृष्टि उस भावपर होनेसे उस भावसंबधी सुख होता है॥। ४ ॥ तत्तद्वावात्िकोणे स्वसुखमदनभे चास्पदे सौम्ययुक्त पापाना हृष्टिहीने भवनपसहिते पापखेटैरयुक्ते॥ भावार्नां घुष्टिमाहु:

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भाषाटीकासहित:। (३९ ) सकलशुभकरीमन्यथात्वे प्रणाशं मिश्रं मिश्रग्रहेन्द्रैः सकलमपि

जिस जिस भावसे त्रिकोणादि ५।९/२।४।७।१० भावोंमें शुभग्रह हों पापहष्ट न हों अथवा भावेशयुक्त हों पापयुक्त न हों तो उसउस भावकी पुष्टि कहते हैं संपूर्ण शुभफल की पुंष्टि होती है। इससे विपरीत होनेमें उस भावका नाश मिश्रित होनेमें फलभी समस्त मिश्रही होता है। यह विचार लग्नादि सभी भावोंका है॥ ५ ॥ नाशस्थानगतो दिवाकरकरैर्लुप्तस्तु यद्राशिपो नीचारातिगतोथ वा यदि भवेत्सौम्यैरयुक्तेक्षितः। तद्धावस्य विनाशन सुनिगणा: शंसंति खेटैर्युतश्रेदन्ापि फलप्रदो न हि तदा मूर्त्त्यादिभानां कमः॥६॥ जो ग्रह नाशस्थान (८) गत है, जो अस्तंगत है, जिस भावका स्वामी नीच वा शत्रु- राशिमें हो, शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट न हो उस उस भावका नाश मुनिगण कहतेहैं जो भाव ग्रहयुक्त भी है वह भी उक्तप्रकार होनेमें शुभफल देनेवाला नहीं होता है यह लग्नादि सभी भावोंका क्रम है॥ ६ ॥ अर्थातिं कथयेद्विलग्रशशिनो: प्राबल्यतः खेचरैर्मानस्थैः पितृ- मातृशत्रुससुहृद्ध्रात्रादिभि: स्यादनम्॥ भृत्याद्वा दिननाथल- पशशिनां मध्ये बलीयांस्ततः कर्मेशस्थनवांशराशिवशतो वृत्तिं जगुस्तद्विदाः ॥७। कर्माजीविका कहते हैं-लग्नचंद्रमामेंसे जो विशेष बली हो उससे दशममें सूय हो तो पिता वा पितृवृत्तिस, चंद्रमा हो तो मातासे, मंगल हो तो शत्रुसे, बुध हो तो मित्रसे, बृहस्पति हो तो भाईसे, शुक हो तो स्त्रीसे, शनि हो तो भृत्य आदिसे धन मिले। जब दशममें कोई ग्रह लग्नचद्रमामेंसे न हो तो सूर्य चंद्रमा लग्नमेंसे जो बलवान् हो उसके दशमभावका स्वामी जिसके नवांशकमें हो उसके उक्तकर्मैसे आजीवन ज्योतिषी कहते हैं॥ ७ ॥ भैषज्य चामीकरतोययानपण्येन मुक्तामणिविप्रलंभात्।। अन्यो- . न्यदूतागमवृत्तिमार्गाज्ीवत्यसौ वासरनायकांशे॥ ८॥ मंत्रो- पदेशरसवादविनोदमार्गैवृत्तिं जगुः सकलशास्त्रपुराणमागैः॥ ज्ञानोपदेशपथभि: क्षितिपालपूज्यो जीवत्यसौ क्षितितले दिन- नायकांशे॥ ९॥

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(४० ) सर्वार्थचिन्तामणिः। ग्रहोंकी पृथक् कर्माजीविका कहते हैं कि उक्त प्रकारसे सूर्यके अंशकमें वह दशमेशस्थित नवांशेश हो तो औषधी, सुवर्ण, जल, सवारी, दुकान, मोती, मणिके आश्रयसे, तथा पराये दूनकर्म, गमनागमन, वृत्तिकद्धारा, तथा मंत्रोपदेश, रसक्िया, विवाद, विनोददारा ज्ञानोपदेश मार्गखे आजीवन, और राजपूज्यता मिलती है ऐसा ज्योतिषज्ञ पुराण समस्त शास्त्रानुसार कहतेहैं ॥ ८ ॥ ९ ॥ जलोद्ववानां क्रयविक्रयेण कृषेश्च मृद्वादविनोदमार्गात्॥ रारजा- गनासंश्रयवृत्तिरूपान्निशाकरांशे वसनक्रयाद्ा॥ १०॥ चंद्रमाके अंशकमें होवै तो जलसे उत्पन्न वस्तुओंके व्यापारसे, कृषिकर्मसे, मिट्टी, वाद वा खेळके द्वारा, राजरानीके आश्रयवृत्तिसे अथवा वस्त्व्यापारसे, आजीवन होताहै॥ १० ॥ धातोर्विवादेन रणप्रहारात्स्तव्धाग्निवादात्कलहप्रवृत्त्या॥ जीव- त्यसौ साहसमार्गरूपैर्धरासुतांशो यदि चोरवृत्त्या ॥ ११ ॥ मंगलके अंशकमें हो तो धातुवाद यद्वा धातुकर्म तथा कलहमें वादविवादसे, रणमें मह्ार करनेसे, स्थिर अगनिवाद अगनिकृत्य कलह वृत्तिसे साहसके कामोंके द्वारा और चोखवृ- चतिसे आजीवन करताहै ॥ ११ ॥

वरार्थवेदाध्ययनाज्नपाच्च पुरोहितव्याजवशात्प्रवृत्तिः ॥।१२।। बुधके अंशकमें हो तो शिल्पविद्या, काव्य, वेदशास्त्रद्वारा ज्योतिषज्ञान, श्रेष्ठ अर्थ, वेद पाठ, जप, अनुष्ठान, पुरोहिताईके मिषसे आजीविका होवै ॥ १२ ॥ जीवांशके भूसुरदेवतानासुपासकाध्यापकमार्गरूपात्॥। पुराण- शास्त्रागमनीतिमार्गाद्वर्मोपदेशेन कुसीदमाहुः॥१३॥ वृहस्पतिके अंशकमें हो तो ब्राह्मण एवं देवताओंके उपासनासे यद्वा उनके उपासकोंसे,

होवै॥ १३ ॥ पाठन वृत्तिद्वारा पुराण, शास्त्र, वेद, नीतिद्वारा तथा धर्मोपदेशसे धनमयोगसे आजीवन

सुवर्णमाणिक्यगजाश्वमूलाद्रवां क्रयाजीवनमाहुरार्याः॥ गुडौ- दनक्षीरदधिक्रयेण स्त्रीणां प्रलोभेन भृगो: सुतांशे ॥ १४॥ शुक्राशकमें हो तो सुवर्ण, मणि, हाथी, घोडाओंके कारणसे, गौके व्यापारसे, गुडोदन दूष दहीके व्यापार और स्त्रियोंके आश्रयसे आजीवन श्रेष्ठ आचार्य कहते हैं ॥ १४॥ शन्यंशके कुत्सितमार्गवृत्त्या शिल्पादिभिर्दारुमयैर्वघादैः ॥

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भाषाटीकासहित:। (४१)

शञनिके अंशकमें हो तो निंद्यमार्गकी वृत्तिसे, लकडी आदि शिल्पसे, मारणकर्म आदिसे भार ढोनेसे, जलके आश्रयसे, परस्पर वैर करने करानेसे आजीवन होवै॥ १५ ॥ स्वक्षेत्रे स्वनवांशके सुहृदि वा स्वीयोच्चभागे यदा स्वद्रेष्काण- चतुष्टयेषु सहिता मूलत्रिकोणेषु वा॥ तत्तत्कालबलान्वितास्तु खचरा वर्गोत्तमांसेपि वा ते सर्वे शुभदा भवंति हि तदा स्वांतर्द- शादावपि॥ १६ ॥ जो ग्रह अपनी राशि, अपने नवांश, मित्रराशि, उच्च रायंशक अपने द्रेष्काणादि चारमें अथवा मूलत्रिकोणोंमें हों, तत्काल बली हों, अथवा वगोत्तमांशमें हों वे सब अपनी दशां- तर्दशादिमें शुभफल देनेवाले होतेहैं जैसे शनिकी कर्माजीविका भार ढोनेसे है तो शनि नीचा- दिमें हो तो स्वयं भार ढोवैगा उच्चादिमें हो तो रेल जहाज गाड़ी आदियोंके किरायासे धन- वान् होगा अर्थात् भार दोनेके कामोंसे ऐश्वर्य करेगा ॥ १६॥ तत्तद्वावादंधपो वा खरेशो द्रेष्काणानां चापि नाथोर्कपुत्रः।। मांदीशो वा तन्नवांशाधिपो वा तेषां मध्ये यो ग्रहः क्रूरभाव: १७॥ तद्भावेशस्याघिशत्रुग्रहो वा यो वा खेटो बिंदुशून्यर्क्षयुक्तः॥तत्त- त्पाके मूर्तिवित्तादिकानां नाशं बूयादैववित्प्राश्रिकश्ञ ॥ १८॥ अपने अपने भावसे अष्टमेश वा खरांशेश वा द्रेष्काणेश शनि हो वा मांदयशेश अथवा उस नवांशका स्वामी इनमेंसे जो ग्रह कूरभावमें हो अथवा उस भावेशका अधिशत्रु ग्रह हो वा शून्यबिंदु राशिमें हो तो उनउन ग्रहोंके दशादि पाककालमें ज्योतिषी प्रश्नकर्त्ताने उग्नधनादिभाव जिनमें उक्त ग्रहहैं विनाश कहना ॥ १७॥१८॥ मंदमांद्यगुखरेशरंध्रपास्तन्नवांशपतयोपि ये ग्रहाः ॥ तेषु दुर्बल- दशा मृतिप्रदा कष्टभे चरति सूर्यनन्दने ॥ १९ ॥ मंदांश, मांदंश, राहु खरांशेश, अष्टमेश, और उनके नवांशकेश जो ग्रह हैं उनमें निर्बलकी दशा मृत्यु देती है तथा अष्टमादि कष्ट राशियोंमें जब शनि जाताहै तब मृत्यु होतीहै॥ १९ ॥ धनाधिपः पापखगो यदि स्याच्छन्यारभोगीन्द्रदिनेश्वराणाम्। अंतर्दशायां धननाशमाहु: पापान्विते तद्भवने तथव ॥२०॥ धनाधिपः पापखगस्तदीशः स्याञ्चेदशायां क्षितिपालकोपात्॥ नानार्थनाशं निगदेन्नराणां स्थानच्यु्ति स्वेष्टजनैर्विरोधम्॥२१।।

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(४२ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

धनाधीश पापग्रह होवै तो वह शनि मंगळ सूर्यके अंतर्दशामें धननाश करता है जो धन भाव पापयुक्त हो तो वही फल करताहै॥ २० ॥ यदि धनेश पापग्रह हो वहभी पापरा- शिमें होवै तो राजकोपसे घननाश होवे तथा अनेक पकार अर्थनाश, स्थानभ्रश, इष्टजनोंसे विरोध मनुष्योंको कहना ॥ २१ ॥ पापग्रहाणामपहारकाले पापग्रहस्यैव दशासु काले॥ सुत्तय- र्थमानात्मजसोदराणां नाशं समायाति शुभैरन दोषः॥। २२ ॥ वित्ते शुभे शोभनखेचरेशे तत्पाककाले धनलाभमेति॥ शुभग्रहाणामपहारकाले तथाभवेदात्मजवाग्विलासः॥ २३ ॥ पापग्रहोंके दशाकालमें पापग्रहोंका अनिष्ट फलकारक समय (अंतर्दशादि) में भोजन, धन, मान, संतान, भाइयोंका नाश होताहै शुभग्रहोंका दोष नहीं है पाप शुभमिश्रितमें मिश्र फळ जानना । २२।। धनभवामें शुभग्रह हो भावेश शुभग्रह हो तो उसकी दशांतर्दशा समयमें धनलाभ होता है शुभग्रहोंके योगकारकादि परिपाक कालमें पुत्रसुख वाग्विलास होताहै ॥ २३ ॥ पापग्रहे विक्रमभावनाथे पापान्विते पापवियच्चराणाम् । अंत- र्दशायामनलास्त्रचोरैर्दुःखं समायाति शुभप्रदेपि॥ २४॥ कलि- प्रकोपानलचौरभूपैर्दुःखं मनोजाडयमतीव कष्टम् । सोत्थेश- पापग्रहदायकाले शुभेक्षिते तादृशमत्र नास्ति ॥२५॥ तृतीयभावेश पापग्रह हो तृतीयमें पाप ग्रह हों तो उन पापग्रहोंकी दशांतर्दशामें अतनि शख्त्र चोरोंसे दुख, शुभफलमद ग्रह हो तो भी होतेहैं ॥ २४ ॥ तृतीयेश पापग्रह दशामें कलह, कोप, अग्नि, चोर, राजासे दुःख, मनो जडता, अतिकष्ट हेतहैं. उसपर शुभग्रहकी दृष्टि होवै तो नेष्टफल नहीं होताहै ॥ २५ ॥ दुश्चिक्यभावाधिपदायकाले सौम्येतराणामपहारकाले॥। नाशं वदेत्तत्र सहोदराणां भवेद्विरोध: सहजैविशषात् ॥ २६॥ तृतीयभावेशदशा समयमें पापग्रहोंका अपहारकाल हेनिमे भाइयोंका नाश तथा विशे- षतः भाइयोंसे विरोध होताहै ॥ २६॥ क्षेत्राधिपस्यैव शुभेतरस्य पापग्रहाणामपहार काले॥ स्थानच्युति बंधुविनाशमेति नीचास्तगानामपहारकेपि ॥२७॥ चतुर्थेश पापग्रह होवैं तो पापग्रहोंके अपहारकाळ अंतर्दशादिसमयमें स्थानहानि बंधु- वनाश होताहै जो ग्रह नीचराशिमें हों अथवा अस्तंगत हो उनकेमेंभी वैसाही फलजानना॥२७॥

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भाषाटीकासहित:। ( ४३)

बुद्धिध्रमं कुत्सितभोजनं च पापग्रहाणां हि सुतेशकाले।। अंतर्दशायां प्रवदेन्नराणां शुभग्रहश्चेत्न तथा भवेतु ॥ २८॥। पंचमेश पापग्रह हो उसकी दशादिमें पापग्रहांन्तरादि हो तो बुद्धिश्रम कोदवाढ़ि कढ़न भोजन मिले शुभग्रह हो तो उक्त अनिष्ट फल नहीं होता ॥ २८ ॥ राजाग्रिचैौिर्वर्यसनं व्णेशदशाविपाके तु शुभेतराणाम्॥ अतर्द- शयामपि कष्टमेति प्रमेहगल्मक्षयपित्तरोगैः ॥ २९॥ वष्ठेश पापग्रहकी दशा अतर्दशामेंभी राजा, अग्नि, चोरोंसे क्ेश मिलताहै पापदशा पापांतरमॅभी पमेह, गुल्मरोग, क्षयरोग, पित्तरोगसें कष्टको माप्त होताहै॥ २९ ॥ दारेशपापग्रहदायकाले स्त्रिया विरोधो मरणं च तस्या:॥ विदेश- यानं च पुरीषमूत्रकृछं भवेद्दपतिकोपएव ॥। ३० ॥ सप्तमेश पापग्रह दशासमयमें स्त्रीमरण, स्त्रीसे विरोध तन्मृति फल होतेहैं तथा विदेशगमन, मलरोग, मूत्रकृच्छ और राजकोप होताहै॥ ३० ॥ रंघ्रेशकाले फणिनाथभौमशनैश्र्राणामपहारकाले।। आयुर्य- शोवित्तविनाशनं च दारात्मबंध्विष्टसहोदराणाम् ॥। ३१ ॥ अष्टमेशकी दशामें मंगल, शनि,, राहु के अंतर्दशादिमें आयु, यश, और वित्त कानाश तथा स्त्री, अपना शरीर बंधुवर्ग, सगे भाइयोंकी हानि होती है॥ ३१॥ स्थानच्युतिर्बन्धुविरोधिता च विदेशयानं सहजैर्विरोधः॥ भवे- च्छुमेशस्य दशाविपाके शनैश्वराराहिदिनाघिपानाम् ॥३२॥ नवमेश शनि, मंगल, राहु सूर्यकी दशादिमें स्थानहानि, बंधु जनोंमें विरोध, परदेशगमन, झगडा होताहैं॥ शुभग्रह नवमस्वामी हो तो शुभांतरादिमें शुभही होता है॥ ३२ ॥ कारागृहप्राप्तिर नेकदुःखं दुःस्वप्रशोकानलदग्धदेहम् ॥ कर्मेश्वर- स्योत्तरभुक्तिकाले पापग्रहाणामपकीर्तिमेति ॥३३ ॥ दशमेश पापग्रहके दशादिमें कैदखानेका वास अनेकमकार क्ेश, दुष्ट स्वम, शोकरूप अग्निखे देहसंताप और अपयश मिलतेहैं शुभोंके शुभ जानना ।। ३३ ।। दृशाविशेषे त्वथ लाभपस्य भुत्त्यंतरे द्रव्यविनाशनं च।। खव्या- रभोगींद्रशनैश्धराणां कार्यार्थकृच्छं क्षितिपालकोपात् ॥ ३४॥ लामेश, सूर्ये, मंगल, राहु, शनिकी दशामें धननाश, कार्यार्थमें कठिनता राजकोपसे मिलती है।। ३४।।

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(४४) सर्वार्थचिन्तामणिः।

व्ययेशदाये रविसूनुसक्तौ दिनेशभूम्यात्मजयोरविरोधः॥ कलि- क्षयौ मानधनक्षयौ च राहोस्तु सुक्तावरिसर्पपीडा॥ ३५॥ व्ययेश शनि सूर्य मंगलकी दशामें विरोध, कलह, धनादिक्षय, मानक्षय, होताहै, राहुदशामें शत्रु एवं सर्पकी भय होती है।। ३५ ॥ तत्कालशन्रुप्रभवात्फलं तन्मित्रे यदि स्यात्फलमर्द्धमाहुः॥ अन्योन्यषष्ठाष्टमदायकाले स्थानच्युतिर्वा मरणं विशेषात्॥३६॥। स्पष्टी करिष्यंति दशाविभागे विस्तारमार्गेण सुनीन्द्रजालाः।। आपाततः संकुचितार्थवाक्यैरुक्ता ग्रहाणां फलपाकपंक्ति:।३७।। जो तत्कालशत्रुसे उत्पन्न फल है वह अन्यपरकार मित्र होनेमें आधा होजाताहै षछ्ठेशाष्में- शोंके दर्शातर्दशा परस्पर होनेमें स्थानहानि, विशेषतः मरण कहते हैं॥ ३६ ॥ इस प्रकार मुनीन्द्रसमूह दशासमयमें विस्तारपूर्वक फलपंक्ति स्पष्ट करतेहैं॥ समस्तफल थोढी सी वाक्यों करके फलपाकपंक्ति कहीहै॥ ३७ ॥ निषेकलग्राहिनपस्तृतीये राशौ यदा चारवशादुपैति॥आधान- लग्नादथ वा त्रिकोणे रवौ यदा जन्म वदेव्नराणाम्॥ ३८ ॥। आधानलग्नात्सुतभे तु जन्मलशनं भवेच्छास्त्रविदो वदन्ति॥ आधानलग्ने शुभदृष्टियोगे दीर्घायुरैश्वर्यधनान्वितः स्यात्॥३९॥ आधानलग्नसे यदि सूर्य तीसरी राशीमें होवे उसी लग्नमें जन्म अथवा आधानलगसे सूर्य ९/५ में हो तो उस लमनसे जन्म कहना॥ ३८ ॥ शास्त्रवेत्ता कइते हैं कि आधान लग्नसे पंचमलस्नमें जन्म होता है।। आधानलन्नमें शुभग्रह हों अथक उसपर शुभद्ृष्टि होवै तो बालक दीर्घायु एवं धन ऐश्वर्यसे युक्त होताहै॥ ३९ ॥ धर्मार्थपुत्रेषु निषेकलग्नाद्टप्टेषु सौम्यैः पुरुषग्रहैर्वा ॥ पुर्त्रांशकैर्वापि निषेककाले पुंजन्म बालाजननं विलोमात् ॥४० ॥ आधानलग्नसे ९/२/५ भावों पर शुभग्रह अथवा पुरुष ग्रहों की दृष्टि हो अथवा तत्स- मयमें पुरुषांशक होवे तो पुत्रजन्म कहना इसके विपरीत उन भावों ५।९।२ पर विपरीत स्त्नग्रिह दृष्टि हो वा तत्काल समराइयंश होवै तो कन्याजन्म कहना ॥ ४०॥ निषेकलग्रे शशिनंदनो वा रव्यात्मजो वा यदि पापहष्टः।।पिंडा कृति जन्म वदेत्तदानीं शुभेक्षितश्व्ेत्र तथाविधं तत् ॥४१॥

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भाषाटीकासहितः। (४५) आधानकुंडलीमें बुध अथवा शनि पापष्ट होवे तो उस गर्भसे पिंडाकार वालक जन्मे उक्त बु० श० पर शुभदृष्टि भी होवै तो पिंडाकार नहीं होगा ॥ ४१ ॥ निषेकलग्रेशतृतीयनाथौ लग्नस्थितौ चेद्यमलोद्धवः स्यात्॥ तृतीयनाथेन युतो निपेकलगनेश्वरस्तत्सहजे तथैव॥ ४२॥ आधानलसेश और तृतीयस्वामी लन्नमें हो तो यमल (दो वालक) उत्पन्न होगे आधान- लग्नेश तृतीयेशसे युक्त होकर तीसरे स्थानमें हो तोभी वही फल जानना ॥। ४२ ।। लग्नेश्वरे कर्मगते विलग्ने भोगीन्द्रयुक्ते सति पादजातः॥ रंघेशवरे राहुयुते विलग्ने जातारगैर्वेष्टितसंभवः स्यात् ॥ ४३॥ केंद्रे सराहौ गुलिकेन युक्ते लग्नेश्वरे वा निधनेशयुक्ते॥कूरग्रहाणां तु दृकाणलगने जातोरगैर्वेष्टितसंभवः स्यात् ॥४४॥ लग्नत्रिभागें- द्रजसर्पकाले तन्नाथयुक्ते तु तथा त्रिभागे॥ शुभग्रहाणां तु हशा विहीने जातोरगैर्वेष्टितसंभव: स्यात् ॥ ४५ ॥ छागोक्षकं- ठीरवलग्रभूते भौमान्विते वा रविजेन युक्ते॥ राश्यंशसादृश्य- समानदेहो नालेन संवेष्टितसंभवः स्यात् ॥४६॥ लग्नेश दशममें राहु लग्नमें होवै तो बालक पैरोंसे उत्पन्न होवै यदि अष्टमेश लग्नमें राहु सहित होवै तो वालक सर्पवेष्टित होवे सर्पवेष्टितका तात्पर्य सर्पाकारनशोंसे वा तदाकार नाल से भी है।४३॥ केंद्रमें राहु गुळिकमें लेश्वर अथवा लसेश अष्टमेश युत हो. तथा लग्नमें पाप ग्रह द्रेष्काण होवै तो बालक सर्पवेष्टित होवे॥ ४४ ॥ लगनमें सर्प वा अंडज द्रेष्काण होवै तथा द्रेष्काण तत्स्वामियुक्त हो और शुभदृष्टिरहित हो तो वही फल होताहै॥ ४५ ॥ मेष वृष सिंह लग्न शनि वा मंगलसे युक्त होवै तो राशिविभागके समान अंगमें बालक नालसे वेष्टित हौवै ॥ ४६ ॥ लग्ने सपापे बहुपापदृष्टे राहुध्वजाभ्यां सहितेथ वात्र॥ पापग्र- हाणां तु विलग्नभे वा जातो नरो नालनिवेष्टितांगः।४७। कूरां- तरे लग्नगते सराहौ लग्ने कुजे वासरनाथदष्टे॥ लग्ने शनौ भूमि- सुतेन दृष्टे जातो नरो नालनिवेष्टितांगः॥४८।। लभ्नमें पापग्रह हों बहुत पापग्रहोंसे दृष्ट हो अथवा राहु वा केतुसे युक्त हो अथवा सन्नमें पापग्रह राशि हो तो बालक नालसे वेष्टित अंग होवै॥४७॥ लग्न पापग्रहोंके बीच हो उननमें राहु हो अथवा लगमें मंगल सूर्य दृष्टहो अथवा लसमें शनि मंगलसे दृष्ट हो तो राश्यंश्समान गात्रमें नालवेष्टित होवै ॥ ४८ ॥

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(४६ ) सर्वार्थचिन्तामणिः। परस्परक्षेत्रसमाश्रितौवा देहांवुपौ जन्म वदेत्तदानीम्।। लग्नेधरे वा हिबुकेश्वरे वा ध्वजाहियुक्ते जननं पशोस्तु ॥४९ ॥ पापा बलाढ्या विबलास्तु सौम्या नपुंसकौ केंद्रगतौ तदानीम्॥ दृष्टि- स्तयोवाथ वियोनिलगने चतुष्पदां जन्म वदति तज्ज्ञाः ॥ ५० ॥ पापा वलाव्याः स्वगृहं प्रपन्नाः सौम्याः स्वगेहेतरराशियुक्ताः॥ चतुष्पदां जन्मतनौ वियोनौ वदति शास्त्रांतरपारगम्याः।।५9।। लग्नेश और चतुर्थेश परस्पर राशियोंमें होवै अथवा लग्नेश वा चतुथेश राहु वा केतुसे युक्त हो तो पशुका जन्म होवै॥ ४९ ॥ पापग्रह बलवान् शुभयह निर्बल हों और नपुंसक ग्रह बु० श० केंद्रमें हों अथवा उनकी दृष्टि हो वियोनि लग्न हो तो ज्योतिषज्ञ पशुका जन्म कहतेहैं ॥५०॥ जो पापग्रह बलवान् हों तथा अपनी राशियोंमे हों शुभग्रह शत्रुराशि आदिमें हों और लग्नमें चतुष्पदराशि होवै तो शास्त्रांतर पारग लोक वियोनिका जन्म कहतेहैं ॥ ५१॥ पक्षी हकाणे तु विलग्नभूते बलान्वितेनैव ग्रहेण हष्टे॥ राशौ चरे वा यदि तन्नवांशे वियोनिजन्मेति बुधांशके वा॥५२॥ लग्नमें पक्षी द्रेष्काण हो उसे बलवान् ग्रह देरे अथवा चरराशि वा चरनवांशक हो अथवा बुधका अंशकहो तो वियोनिजन्म जानना ॥ ५२ ॥ शुक्ेक्षिते गोजननं महिष्याः सूर्यात्मजेनापियुतः स हष्टः॥राहु- ध्वजाभ्यां सहितोथ दृष्टो मेषस्तु जातोन्यपशुस्तथान्यैः ॥५३॥ पूर्वोक्त योग शुक्से दृष्ट हो तो गौका जन्म, शनिसे युक्त वा दृष्ट हो तो महिषी, राहु केतुसे युक्त वा दृष्ट हो तो मेष (मेंढा) का जन्म, अन्यग्रहोंसे अन्यपशुओंका जन्म कहना॥५३॥ लग्ने बुधक्षेत्रगतेरिनाथे लग्नेश्वरे सोमसुतर्क्षसंस्थे॥ जातस्तु सस्त्रीकनपुंसकस्याच्छन्यारयोगात्पुरुषस्तु षंढः ।५४।। वछ्ठेश लग्नमें वुधकी राशिका हो और लग्नेश बुधकी राशिमें होवै तो स्त्रीसहित पुरुष नपुं- शक होवैं उक्तयोगमें शनि मंगल भी सामिल होवैं तो पुरुषही नपुंसक होगा॥ ५४॥ अन्योन्यदष्टी शशिवासरेशौ युग्मौ च गाविंदुजभानुपुत्रौ।। ओजर्क्षगो भानुसुतो दिनेशं पश्यत्यसौ युग्मगतस्तथैव॥ ५॥ ओजे तु लग्ने कुसुदात्मबंधुस्तन्र स्थितो युग्मगभौमदृछ्टः॥ युग्मौजगाविन्दुसतौ कुजेन दष्टी विलग्रश्र निशाकरश॥५६॥

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भाषाटीकासहित:। (४०) षट क्रीबयोगा: पुरुषांशयुक्ता: प्रोक्ता महद्विर्बहुशास्त्रविद्धिः॥ लग्नेश्वरश्चंद्रसुतेन युक्तः पंढो भवेत्सौम्यखगेन युक्तः ।५७॥ सूर्य चंद्रमाकी परस्पर दृष्टि हो १, बुध शनि दिस्वभाव राशियोंमें हो २, विषम राशिमें बैठा शनि सूर्यको देखे अथवा युग्म राशिमें हो ३, अथवा विषम लग्नमें चंद्रमा हो उसके साथ मंगल हो अथवा युग्मराशिगत मंगल उसे देखे ४, तथा सम विषम राशियोंमें चंद्रमा बुध हों उन्हैं मंगल देखे ५, लग्नेश बुसे युक्त हो पुरुषांशकमें शुक लग चंद्रमा हो ६, ये छः नपुंसकयोग बहुशास्त्रज्ञ बडे आचार्य कहते हैं ॥ ५५।५६।५७। दुःस्थानगो कर्मशुभाधिनाथो बली विलग्नाधिपतिस्तदानीम्॥ सीमंतकर्मादि विनैव जातो भवेन्नरः प्राथमिकोपि तत्र ॥५८।। नवमेश दशमेश दुष्टस्थानोंमें हों और लग्नेश बलवान् होवे तो वह वालक सीमंत जात कर्मादि संस्कारोंसे रहित ब्राह्मणपुत्र होनेपरभी रहै॥ ५८॥ लाभे सपापे त्वथ तद्गहे वा जातो नरः प्राथमिकोपि तत्र॥ सिंहोदये द्वारयुगं गृहं तत्कन्योदये नीचगृहेपि जन्म ॥५९॥ नवांशपुत्राधिपतिः सराशेद्वरं जगुर्लग्रटकाणराशेः॥द्वारं विल- ग्राधिपतिः सराशे: केंद्रस्थितैर्वीर्यसमन्वितैर्वा ॥ ६०॥ लाभस्थानमें पापग्रह वा पापराशि होनेमें भी वही पूर्वोंक्त फल है। अब सूतिका गृह- द्वार कहते हैं कि सिंह लग्न हो तो उस घरमें दो द्वार होंगे, कन्यालन्न हो तो नीचके घर वा नीच कर्मोपयोगी घरमें जन्म होगा॥ ५९ ॥ नवांशेश तथा पंचमेशकी राशिके दिशामें द्वार अथवा बलवान् ग्रहकी दिशामें यद्ा केन्द्रगत ग्रहकी दिशामें द्वार कहना अथवा लग्नमें जो द्रेष्काण है उस राशिकी दिशा वा लग्नेशकी दिशा में कहना इतने विक- ल्पोंमें मुख्य विचार बलका है उक्तोंमें अधिकवलीकी दिशा कहनी ॥ ६० ॥ ग्रहैर्धनान्त्यास्पदवेश्मगैर्वा वाच्यास्तदानीमुपसूतिकास्तु॥तन्न स्थिते भानुसुते तु शूद्रा रवौ स्थिते क्षत्रियभामिनी सा ॥६१॥ राहुध्वजाभ्याभथ जातिहीना त्वन्यैर्ग्रहैजातिसमा प्रदिष्टा॥धनां-

जो ग्रह २ । १२ । १० स्थानमें हो उसके अनुसार उपसूतिका (जो बालकको जना- तीहै) कहनी तहां शनि हो तो वह स्त्री शूद्रा, सूर्य हो तो क्षत्रिया॥ ६१ ॥ राहु केतु हों तो हीनजातिकी और अन्यग्रहोंसे समान जातिकी कहनी और २। १२ । ४

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(४८) सर्वार्थचिन्तामणिः। स्थानोंमें जैसे और जितने ग्रह हो वैसी तथा उतनी अन्य उपसूतिका उस सूतिकागृहमें कहनी ॥ ६२ ॥ तत्स्थानपैः संयुतखेचरेंद्रैः किंचिद्वदत्यत्र सहस्थितैश्च ॥ जीवें- दुपुत्रासुरदेवपूज्यैस्तत्र स्थितैर्रह्कुलाभिरामाः ॥६३॥ एतेषु पापांशकसंयुतेषु तासां तु वैधव्यसुदाहरन्ति ॥ राहुध्वजाथ्यां सहितेषु तेषु शुभास्त्रियस्तत्र शनेस्तु योगात्॥ ६ृ४ ॥ कृष्णा च कुब्जा विधवा भवेत्सा योगाद्रहाणां प्रवदेच् संख्याम्॥ वहिःप्र- देशे ग्रहमध्यभागे दश्यार्द्धभागस्थितखेचरेन्द्रैः ॥ ६५॥ संख्या वदेत्तत्र तदन्ययुक्तैस्त्वेकर्क्षगैस्तन्र बहुत्वमाहु: ॥६६॥ उक्त भावेशोंके अनुसार अथवा उनके स्थानगत बली ग्रहोंके अनुसार उपसूतिकाका वर्णा- कारादि कहने। बृहस्पति, बुध, शुक, वहां हों तो उपसूतिका ब्राह्मणी होगी॥ ६३ ॥ ये ग्रह पापांशकोंमें हों तो वह व्राह्मणी विधवा होगी इन भावोंमें राड्डु केतु हों तो भी विधवा और सुंदर स्त्री होगी, शनिके संयोगसे कृष्णा कुबडी विधवा आादि होगी जितने ग्रहौंका योग हो उतनी संख्या स्त्रियोंकी कहनी दृश्यार्द्धभागमें जिनने ग्रह हों उतनी ख्त्री घरके बाहर जितने ग्रह दृश्योत्तरार्द्में हों उतनी स्त्री घग्के भीतर कहनी, बहुत ग्रह एकस्थानमें हों तो बहुत स्त्री होंगी इनमें भी कोई ग्रह स्वोच्च स्वगहादिमें हों तो भी बहुत होंगी ॥ ६४। ॥ ६५। ६६ । दीपस्य चांचल्यमुदाहरंति चरे स्थिरे तद्ृढमत्र काले। विदेह- राशौ सधृतः करेण तत्संयुतैव्योमचरैस्तु संख्याम् ॥६७॥ तैलं वदेत्तत्र निशाकरेण वर्तिर्विलग्नादिति केचिदाङुः ॥६८॥ चरळन्न हो तो दीप चंचल, हातमें चलता फिरता होगा स्थिर हो तो दीप स्थिर और दविस्वभाव हो तो हाथहीमें होगाः ल्नमें जितने ग्रह हों उतने दीप होनेभी बलवान् होनेमें संभव होते हैं, दीपकमें तेळ चंद्रमाके अनुरूप क्षीण, पूर्ण सपाप जैसा हो वैसा, और ऐसेही लनके अनुरूप वत्ती कहनी ६७। ६८ ।। इति जन्मफलम् ॥ अथ तनुभाव:। लग्नेशे स्वोच्चमित्रांशे स्वनवांशगतेपि वा। शुभग्रहयुते दृष्टे देह- सौख्यं विनिर्दिशेत् ॥ ६९॥। लगेशे बलसंयुक्ते केन्द्रकोणगते शुभे।। पापग्रहैरसंदृष्टे देहसौख्यं वदेदुधः ॥७ ॥

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भाषाटीकासहितः। (४९) लग्नेश अपने उच्च, मित्र, अपने नर्वांशमेंसे किसीमें होवे और शुभग्रहसे युक्त वा दृष्ट होवै तो सर्वदा देहसौख्य कहना॥ ६९ ॥। लग्नेश बलयुक्त होकर केंद्र कोणमें हो तो शुभग्रह हो वा शुभयुक्त हो पापग्रह उसे न देखें तों पंडित उस मनुष्यका सर्वदा देहसौख्य कहैं।। ७० ॥ देवलोकांशगे सूर्ये लझनेशे बलसंयुते॥ भाग्येशे स्वोच्चराशिस्थे बहुसद्भाग्यकीर्तिमान्॥७१॥ सूर्य देवलोकांशकमें हो उग्नेश बलवान् हो भाग्येश अपनी उच्च राशिमें हो तो बहुत और अच्छा भाग्यमान् कीर्तिमान् होवै ॥ ७१॥ लग्नाधिपोतिबलवाञ्शुभवर्गयुक्त: स्वोचे सुहद्रहयुतः स्वनवां- शके वा। लग्नाधिनाथसहिते यदि केंद्रनाथे सद्भाग्यकीर्तिधन- धान्यचिरायुरेति॥ ७२॥ लग्नेश अतिवलवान् शुभवर्गसे युक्त हो अपने उच्चमें वा स्वनवांशकमें हो शुभग्रद्दयुक्त हो केन्द्रेश लग्नेशके साथ हो तो, उत्तम भाग्य (ऐश्वर्य), कीर्ति, धन और अन्नसमृद्धिको पाप्त होता है॥। ७२ ॥ लग्नेश्वरः ऋ्ूरसमन्वितश्चैद्देहस्य सौख्यादिविनाशमाहुः॥ ताद- वफलं नाशगतोपि तस्य शुभेक्षितश्चेत्फलमन्यथा स्यात् ७३।। दुःस्थानपेनापियुते विलग्ननाथे विलग्ने सति रोगभाक्स्यात्।। बलैर्विहीने सति लग्ननाथे केन्द्रत्रिकोणे न तु रोगभाकस्यात्७४।। लग्नेश्वराधिष्ठितराशिनाथो दुःस्थानगो दुर्बलदेहभाकस्यात् ॥

लग्नेश क्ूरग्रहसे युक्त होवे तो शरीरके सौख्यादि नष्ट होजावें। लग्नेश अष्टम होनेमें भी वही फल कहते हैं, परंतु उसपर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो वैसा फल नहीं होता कुछ शुभभी होता है।। ७३॥ लग्नेश दुष्ट स्थान(त्रिकमारक) के स्वामीसे युक्त होवे, तथा दुष्ट स्थानेश लग्नमें होवै तो मनुष्य रोगी होवै; यदि लग्नेश वलहीन हो तोभी वही फल है लग्नेश केंद्र त्रिकोणमें होवे तो मनुष्य रोगी न होवै सुखी होवै॥। ७४ ॥ जिसभावमें लग्नेश है उसका स्वामी दुष्ट स्थानमें होवे तो देह दुर्बळ रहे, ऐसेही लननादि जिस भावका स्वामी दुष्ट स्थानमें होवै तो उस भावका विनाश कहते हैं॥ ७५॥ पापैर्विलगे गुलिके त्रिकोणे लग्नेऽहिनाथे गुलिकेन युक्ते॥ लग्ने- व्वरे पापयुतेऽथ लग्ने राहौ यदा वंचन चोर भीतिः ॥७६॥शनेस्तु

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(५० ) सर्वार्थचिन्तामाणः। योगात्प्विलोकनाद्वा भीतिर्ध्ुवा वंचनचोरभूपैः ॥ राहौ विलसे सकुजेर्कपुत्रे राहौ बृहद्धीजमिहाहुरार्याः॥७७॥ लग्नेश्वरे मृत्यु- गते सराहौ रंध्रे समांदौ तु तथैव वाच्यः॥ लग्ने सराहौ गुलिके त्रिकोणे रंध्रे कुजे र्मादियुते तथैव ॥ ७८॥ पापग्रह लग्नमें हो गुलिक त्रिकोणमें लग्नमें, राहु गुलिकसे युक्त हो अथवा लनेश पापयुक्त हो, ळग्नमें राहु होवै तो ठग चोरोंसे भय होवै ।। ७६॥ लगेश शनिसे युक्त वा दृष्ट होवे तो निश्चय ठग, चौर तथा राजासे भय होवै। जो राहु लग्नमें शनि मंगल सहित होवै तोभी वही फल है "शनि मंगल युक्त राहुको श्रेष्ठ आचार्य बृहद्धीज कहते हैं"॥७७॥ लगनेश अष्टम स्थानमें राहुयुक्त अथवा अष्टममें लग्नेश केतुयुक्त हो तौ भी वही फल कहना जो लसमें राहु, त्रिकोणमें गुलिक और अष्टममें कुज केतुयुक्त हो तौ भी वही फल कहना।। ७८ ।। लग्नेश्वराक्रांततदंशनाथो राह्वारमांद्यादिभिरन्वितश्रेत्।। तस्मिन् वृहद्वीजमिहाष्टमेशसंयुक्तराश्यंशपतिः सराहु:॥७॥ लग्नेश जिस राशिके जिस अंशमें है उसका स्वामी यदि राहु, मंगल, केतु, शनिसे युक्त होवै अथवा उसमें घृहद्दोज हो यद्वा अष्टमेशस्थित राश्यंशेश राहुयुत हो तो वही फल होगा।।७९॥ लग्नेश्वरे भूमिसुते तनुस्थे पापान्विते पापविलोकिते वा॥ शिला- प्रहार्रैर्व्रणमुत्तमांगे खडगादिमिर्वा कथयंति तज्ज्ञाः॥।८०॥।शनि स्तथा चेद्रणमुत्तमांगे वाताग्निशस्त्रैः पतनेन वापि॥ यदा भवे- त्पंचघटीविलग्ने तदा वृहत्कोन तदर्दलगे॥८॥ लग्नेश मंगल लग्नमें पापयुक्त वा पापदृष्ट होवै तो पत्थरकी चोटसे शिरपर त्रण (खोट)होवै अथवा ज्योतिषज्ञ खङ्ग आदिसे त्रण कहते हैं।। ८० ।। ऐसही शनि होवे तो अभिशस्त्र अथवा गिरनेके चोटसे शिरमें व्रण होवै, जब पांच घटीवाला लग हो तो बडाशिरवाला होता है उसके आधे लग्नमें नहीं ॥। ८१ ॥ आहुर्बृहत्कं मुनयस्तदूनलगने शिरः संकुचितं तु तज्ज्ञाः॥ शुष्के खगे लग्नगते विलग्ने शुष्के यदा देहकृशत्वमाहुः ॥८२॥ लग्ने श्वरे शुष्कयुते तथैव शुष्कग्रहाणां भवनस्थिते वा ॥ लगनाधिपे नाशगते तु शुष्कराशौ तनौ शुष्कमतीव कष्टमू॥। ८३॥ लग्ना घिपस्थांशपराशिनाथः शुष्कग्रहस्थस्तनुशुष्कमाहुः॥ शुष्के विलग्नेबहुपापयुक्ते तत्रापि देहस्य केशत्वमाहुः॥८४॥

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मापाटीकासहितः। (५१) पंच घट्यात्मक लग्नमें बडाशिर उसके आधा लग्नमें छोटा शिर कहा, जो लग्न मध्यम है उनमें संकुचित गोळ और छोटा शिर ज्योतिषज्ञ कहते हैं निर्बल यहलनमें तथा लन्न निर्बल होवै तो देह कृश (माडा) कहते हैं यहां शुष्कपदसे जलचरसे अतिरिक्त राशियहोंकाभी बोघ होताहै॥। ८२॥ लग्नेश निर्वलग्रहोंसे युक्त, तथा निर्बलग्रहके घरमें हो तो भी वही फल, और लग्नेश अष्टम निर्वल तथा लग्नमें निर्बल राशि होवे तो शरीर कृश तथा अतिकष्टयुत होवै ।। ८३ ।। लगेश जिस ग्रहके राशि अंशक में है वह निर्बलराशिमें हो वा स्वयं निर्बळ हो तो शरीर सूखासा रहे निर्बल लग्न बहुत पापोंसे युक्त हो तो भी शरीरमें कृशता कहते हैं।। ८४ ।। लग्ने जलकषें शुभखेचरेंद्रैर्युक्ते तनुस्थौल्यमुदाहरंति। लग्नाधि- पस्तोयखगो बलाव्यः सौम्यान्वितश्रेत्तनुपुष्टिमाहुः॥८॥ल- ग्राधिपश्चेज्लराशिसंस्थः शुभान्वितस्तोयखगेन हष्टः॥ लगे शुभक्षेत्रगतेपि चैवं लग्नेश्वरस्यांशपतौ जल्क्षें ॥ ८६॥ लग्नमें जलराशि हो उसमें शुभग्रह हों तो शरीर स्थूल होबे ऐसा कहतेहैं, तथा लगेश जल- ग्रह बलवान् हो शुभग्रहयुक्त भी होवै तो शरीर पुष्ट कहते हैं।। ८५।। उग्नाधिप यदि जल राशिमें शुभग्रह युक्त हो जलग्रह उसे देखे तो शरीर स्यूल होवै लननमें शुभग्रह राशि होनेमें तथा लगनेश जिस राशि अंशकमें हो उसका स्वामी जलराशिमें हो तो भी वही फल नानना ॥। ८६ ।। पापग्रहाणां च हशा विहीने लग्ने शुभक्षेत्रगतेपि चैवम्॥ लग्ने गुरौ तेन निरीक्षिते वा जलक्षगेणापि जले विलग्ने।। ८७॥ सौग्यान्विते शोभनखेचरेन्द्रैर्ृष्टे त्वतिस्थौल्यमुदाहरंति॥ लग्ने शनौ राहुयुतेथ वा स्यात्पिशाचबाधा प्रवदति संतः ।। ८८।। लग्न शुभग्रइकी राशि हो उस पर पापग्रहकी दृष्टि न हो तौ भी वही फल कहना लममें बृहस्पति हो अथवा लग्नको बृहस्पति देखे, अथवा जलराशि लग्नको जलराशिगत वृहस्पति देखे तो भी वही फल कहना।। ८७॥ लगमें शुभग्रह हो शुभग्रहोंकी दृष्टि भी हो तो अति- स्थूल देह कहतेहैं, लन्नमें शनि राहुयुक्त होवे तो पिशाचकी पीडा,यों विद्वान् कहते हैं॥ ८८॥ लग्ने रविर्भूमिसुतेन हष्टः श्वासं क्षयं विद्रधिगल्मभाजम्॥ भौमे विलग्ने शनिसूर्यदष्टे खङ्गादिभिः पीडितदेहभाक्स्यात् ।८९। उसके सूर्यको मंगल देखताहो तो श्वासरोग, क्षयरोग, विद्रधिरोग, भोगनेवाला होवै, लझ्के मंगलको सूर्य शनि देखते हों तो तलवार आदिसे पीडित शरीरवाला होवै ॥। ८९ ॥

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(<२) सर्वार्थचिन्तामणि:। केतौ विलग्ने बहुपापदृष्टे पिशाचचैौरैर्भवति ध्रुवं भीः॥ लगे चरे तन्भवनेश्वरे वा चरस्थिते संचरति प्रजातः ।९०॥ लग्नमें केतु बहुत पापग्रहोंसे दृष्ट होवै तो निश्चय पिशाच तथा चौरोंसे भय होवे लयमें चरराशि हो अथवा लग्नेश चरराशिमें हो तो मनुष्य चलनेमें तत्पर रहे॥ ९० ॥ संचारशीलश्चरभे विलग्ने लग्नांशके चैवमुदाहरन्ति॥ विदेश- भाग्यं चरमे विलग्ने चरे तदीशे चरखेटहष्टे॥ ९१॥ जैसा चरराशि लननमें होनेसे चलने फिरनेमें तत्पर कहाहै ऐसेही चरांशकमें भी कहते हैं घर लम् लगेश चर राशिमें चर ग्रहसे दृष्ट होवै तो परदेशमें ऐश्वर्य होगा ॥ ९१॥ स्थिरे स्वदेशे बहुभाग्ययुक्तः स्थिरग्रहैर्भूरिधनान्वितः स्यात्॥ मिश्रग्रहैः संयुतभाग्यकीर्तिर्नानाप्रदेशे प्रचरन्कुमार्गी ॥ ९२॥। लग्नेश्वरे वीर्ययुते स्वतुंगे गंभीरगामी पुरुषोन्यथा स्यात्॥ हीने तदीशे स जडः शुभैस्तु दृष्टे युते वा न तथाविधे तत् ॥९३। स्थिर लग्न स्थिर ग्रहयुक्त हो लग्नेश स्थिरराशिमें होवै तो अपनेही देशमें बहुत ऐश्वयेँ युक्त होवे स्थिर ग्रहभी इस योगके कर्ता हों तो बहुत धनसे युक्त होवै, चर स्थिरग्रह मिल- कर योगकारक हों तो ऐश्वर्य तथा कीर्तिसे युक्त होकर अनेक देशोंमें फिरता रहै और कुमार्गीं भी होवै॥ ९२ ॥ लग्नेश बलवान् हो अपने उच्चमें हो तो पुरुष गंभीरतासे चलने वाला होवै इसके विपरीत फलभी विपरीत होताहै, लग्नेश हीनवल नी चास्तंगतादि हो तो जड (मूर्ख) होवै परंतु उसपर शुभग्रहोंकी दृष्टि युक्त हो तो वैसा फल न होगा ॥ ९३ ॥ लग्ने शुभे शोभनदृष्टियुक्ते बाल्यात्सुखं तन्नहि पापयोगात्॥ दुःखी भवेत्पापबह्ुत्वयोगे लग्ने तु बाल्यान्मरणांत कालम्।।९४॥ वर्गोत्तमांशे यदि लग्ननाथे स्वोच्चांशके वा स्वसुहहकाणे।। शुभा- न्विते वा शुभदृष्टिपाते नरो भवेदामरणांतसौख्यः। ९५॥ उग्नमें शुभ ग्रह हों तथा शुभ ग्रह लग्नको देखें तो बाल्यावस्थाहीसे सुख पावै पापग्रहोंस सुख नहीं होता ऐसे योग दृष्टि आदिपापोंकी होवे तौ बाल्यावस्थासे मरणसमय पर्यत दुःखी होवै॥। ९४॥ लग्नेश वर्गोत्तमांशमें अथवा उच्चांशकमें वा मित्रद्रेष्काणमें शुभग्रहसे युक वा दृष्ट होवै तो मनुष्य मरणपर्यंत सुखी रहे।। ९५॥ लग्नांत्यलाभे शुभखेचरेंद्रे लग्नेश्वरे केन्द्रगते बलाढचे। सिंहास- नांशे यदि देवपूज्ये जातो भवेदादिममध्यसौख्य: ॥९६॥

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भापाटीकासहित:। (५३) लग्नार्थसोत्ये शुभदृष्टियोगे लग्नेश्वरे शोभनखेचरेंद्रे।। पारावर्ताश यदि दानवेज्ये जातो भवेदादिममध्यसौख्य:॥९७॥ लग्न, बारहवें, ग्यारहनेमें शुभ ग्रह हो लग्नेश बलवान् होकर केंद्रमें हो और बृहस्पति सिहासनांशमें होवै तो प्रथम और मध्य अवस्थामें सौख्य मिले॥ ९६ ॥ १२३ भार्वेर शुभ ग्रह हों वा इनको शुभग्रह देखें लग्नेश शुभग्रह हो. और शुक पारावतांशमें होवे तो गथम औौर मध्यम अवस्थामें सुख मिले॥ ९७ ॥ बाल्ये सुखी स्यातिदशेंद्रपूज्ये केन्द्रे यदा लग्नपतिर्बलाढयः॥ पारावतांशे यदि लग्ननाथे स्त्रीपुत्रमित्रार्थसुखान्वितोयम्॥९८॥ देवलोकांशगे शुके लग्नेशे गोपुरांशके॥ लग्ने शुभग्रहैर्द्दष्टे मध्यांते सुखमामुयात्॥९९॥ लगे शुभे धने पापे केंद्रे पापसमन्विते॥ लग्नेश्वरे तूत्तमांशे आदौ दुःखं ततः सुखम् ॥ १००॥ यदि वृहस्पति केन्द्रमें हो लग्नेश बलवान् होकर पारावतांशमें होवै तो खी, पुत्र, मित्र और धनके सुखसे युक्त रहे॥ ९८॥ शुक्र देवलोकांशमें लग्नेश गोपुरांशकमें हो और लन्नमें शुभ ग्रहोंकी दृष्टि होवै तो मध्य और अंत्य अवस्थामें सुख पावै ॥ ९९ ॥ लग्नमें शुभ यह धन स्थानमें पापग्रह केंद्रोंमेंभी पापग्रह हो और लगनेश उत्तमांशकमें होवै तो पथम दुःख ीछे सुख मिळे॥ १०० ॥ लग्ने पापे धने सौम्ये भाग्ये कश्चिच्छुमग्रहः॥लग्नेशे देवलोकस्थे बाल्ये सौख्यमतोन्यथा॥ १०१॥ उग्नमें पापग्रह, धन स्थानमें शुभग्रह तथा नवम स्थानमें कोई शुभग्रह हो और लग्नेश देवलोकांशकमें हो तो बाल्यावस्थामें सुख मिले अन्यथा नहीं मिले ॥ १०१॥ लग्नेश्वरे कर्मगते दिनेशे लग्नान्विते शोभनखेचरेंद्रैः ॥ योगे प्रदिष्टे तनुपे स्वतुंगे सत्कीर्तिमाहुर्मुनयोत्र तज्ज्ञाः॥१०२॥ लग्नेश दशम, सूर्य लग्नमें शुभ ग्रहों सहित हो ऐसे योगमें लग्नेश उच्चका होवै तो सषत्कीर्तियुक्त होवै ऐसा ज्योतिषज्ञ मुनिजन कहतेहैं ॥ १०२ ॥ पापे विलग्रेशपतौ सराहौ केंद्रस्थिते कर्मणि पापखेटे॥ नीचग्रहे लग्नगतेर्कदृष्टे दुष्कीर्तियुक्तः स भवेत्तदानाम्॥ १०३॥ लग्नमें पापग्रह, अंशेश राड्डुयुक्त केंद्रमें, पापग्रह दशम स्थानमें और नीचग्रह लगमें सूर्यंसे दृष्ट होवै तो मनुष्य दुष्कीर्तियुक्त अर्थाव् दुष्टकमोंसे ख्यात होवै ॥ १०३॥

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(५४) सर्वार्थचिन्तामणिः। आरोहवीर्ये तु विलग्ननाथे भाग्याधिपे तादृशवीर्ययुक्ते॥ विख्या- तकीर्तिः प्रभवो नरस्तु शुभग्रहेणापि समन्विते स्यात्॥ १०४॥ लग्न आरोहवीर्यसे युक्त हो नवमेशभी ऐसाही हो और शुभग्रहसे युक्त भी होवै तो मनुष्य विख्यात कीर्तिवाला होवे॥ १०४ ॥ आदौ वयसि पूर्वार्द्धें सौख्यं लग्ने भृगोः सुते॥ दुःखं तु परभागे च बंधौ पापे सुते तथा॥ १०५॥ लग्नमें शुक् होवे तो उमरके पूर्वार्द्धमें सुख मिले, चतुर्थ वा पंचममें पापग्रह होवै तो उत्तरार्द्ध उमरमें दुःख होवै॥ १०५॥ लग्नाधिपे शुभयुते यदि तुंगभागे केंद्रत्रिकोणसहिते शुभदृष्टि- युक्ते।। कर्माधिपेन सहिते यदि वा स्वगेहे सद्भाग्यकीर्ति- धनधान्यचिरायुरेति॥ १०६॥ यदि लग्नेश शुभग्रह युक्त उच राशिका केंद्र त्रिकोंणमें शुभग्रहोंसे दृष्ट हो अथ वा दशमेशसे युक्त हो यद्ा अपनी राशिमें होवै तो उत्तम ऐश्वर्य, उत्तम कीर्ति, धन, अन्नयुक्त और दीर्वायु होवै ॥ १०६ ॥ लग्नाधिपोतिबलवानशुभैरदष्टः केंद्रस्थितः शुभखगैरवलो- क्यमानः॥ मृत्युं विधूय विदघाति सुदीर्घमायुःसार्द्ध गुणैबहुभि- रूर्जितया च लक्ष्म्या॥ १०७।। लग्नेश अतिबलवान् हो, पापग्रह उसे न देखें, केंद्रमें हो, शुभ ग्रह उसे देखते हों तो मृत्युयोगको हटायके दीर्घायु, बहुत गुण, तथा श्रेष्ठ लक्ष्मीसहित कहै ॥ १०७ ॥ केद्रत्रिकोणनिधनेषु न यस्य पापा लग्नाधिपः सुरगुरुश्च चतु- ष्टयस्थौ॥ भुक्का सुखानि विविधानि सुपुण्यकर्मा जीवेच्च वत्स- रशतं स विमुक्तरोगः॥l १०८॥ जिसके केन्द्र १।४।७।१० त्रिकोण ५।९ अष्टम ८ स्थानोंमें पापग्रह न हों और लगेश- तथा बृहस्पति केन्द्रमें हों तो अनेक सुखभोग करके वह पुण्यकर्मा निरोग रहकर सौ वर्ष जावै१०८ लग्नेश्वरादतिबली निधेनश्वरोसौ केन्द्रस्थितैर्निघनरिष्फगतैश् पापैः॥ तस्यायुरल्पमथ वा यदि मध्यमायुरुत्साहसंकटवशा- त्परमायुरेति॥१०९॥

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भाषाटीकासहित:। (६५) अष्टमेश लगेशसे अधिक बली हो केंद्र अष्टम छटे स्थानगत पाप होवें तो अल्पायु अथवा मध्यमायु होवै अथवा अनेक संकट क्ेश भोगके अनेक उत्साहोंसे परमायु होव। १०९॥ एकांशकस्था बुधशुकमन्दा धर्मे स्थिता लग्नसुपागता वा॥ षछ्ठाष्टमे वा हिमगुश्च यस्य सहस्रवर्षदयमस्य जन्तोः ॥ ११०॥ नवम स्थानमें बुध, शुक, शनि एकही अंशकमें होवें अथव। एकांशकहीमें लगनस्य होवें छटे वा आठवे में चंद्रमा होवे तो दो हजार वर्ष आयु होवै॥ ११० ॥ जीवांशकस्थाः सकला ग्रहेंद्राःकेंद्राश्रिता धर्मघनाश्रिता वा॥ जातो नरः प्रवजितः स बाल्ये युगांतमाहुर्बहुशास्त्रकर्ता।।१११। मंदांशकस्था रविभौमजीवाः कर्माश्रिता धर्मयुता बलाढयाः॥ राशे: समातौ हिमगौ विलग्ने युगांतमायुः श्रियमादघाति॥११२॥ धर्मे ध्वरे धर्मगते च यस्य भौमांशकस्थे हिमगौ च दृष्टे॥ मुनी- श्वरोयं सुनियोगजातः शास्त्रार्थकर्ता युगमादघाति॥ ११३॥ सभी ग्रह बृहस्पतिके अंशकमें केंद्र अथवा नवम वा द्वितीय भावमें हों तो मनुष्य बाल्यावस्था हीसे योगी होकर युगांतपर्यत जीवै और बहुत शास्त्र बनानेवाला होवे ॥ १११ ॥ सूर्य मंगळ बृहस्पति शनिके अंशकमें हों नवम वा दशम स्थानमें स्थित हो बलवान् भी हों और राशिके अंत्य नवांशकका चंद्रम। लगनमें होवे तो लक्ष्मीसहित रहे युगांत आयु हावै ॥११२॥ जिसका नवमेश नवममें हो उसे मंगलके अंशकमें स्थित चंद्रमा देख तो इस भुनियोगमें जम्मवाला मनुष्य मुनीश्वर होकर शास्त्रकर्त्ता और युगांतजीबी होगा ।११३॥ लग्नेशे धनराशिस्थे लग्नेशस्थांशपेपि वा ॥ तथा स्थिते लाभ- नाथे विंशद्वर्षांत्परं सुखम्॥ ११४ ॥ लग्नेशस्थांशनाथे तु केंद्रकोणोच्चसंयुते॥ लामेशे वा तथा युक्ते त्रिंशद्वर्षात्परं सुखम्। । ११५॥। लग्नेशे शुभराशिस्थे शुभग्रहनिरीक्षिते॥ गोपुरांश- गते वापि षोडशाब्दात्परं सुखम् ॥ ११६॥ लग्नेश अथवा जिस अंशकमें लग्नेश है उसका स्वामी दूसरे भाव में हो तथा ऐसेही लाभभावेश होवै तो वीस २० वर्षसे ऊपर सुख मिले।। ११४ ।। लग्नेश जिस नर्वाशकमें है उसका स्वामी केन्द्र त्रिकोण अथवा उच्च राशिमें हो तैसेही लामेश

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(९६) सर्वार्थ चिन्तामणिः।

भी युक्त होवै तो तीस ३० वर्षसे ऊपर सुख मिले ॥ ११५ ॥ लग्नेश शुभ ग्रहकी राशिम हो उसे शुभ ग्रह देखे अथवा गोपुरांशमें होवै तो सोळह १६ वर्षसे ऊपर सुख होवै॥११६॥ ग्रहयोगेक्षणाभ्यां तु बलाबलवशादपि ॥ लग्नस्यैव फलं प्रोक्तं श्रीमद्यंकटशर्मणा॥ ११७॥ इति श्रीसर्वाथचिंतामणौ लग्नफलवर्णनो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ ग्रहयोग दृष्टिके तथा बल निर्वलके भी अनुसार लग्नका इसमकार फल श्रीमान् वेंकट- शर्मानें कहा है॥। ११७ ॥। इति श्रीसर्वार्थचिंतामणौ महीधरभाषायां लग्नफलाध्यायो द्वितीयः ॥२॥ तृतीयोऽध्यायः॥३॥

अथ धनभावफलाध्याय:। कौटुंबाद्धर्त्तव्यान्मुखं च वाग्दक्षिणाक्षिपूर्वार्थान्।। विद्याभुक्तिविशेषान् दासान्मित्राणि च प्रवदेत्॥१॥ दूसरे स्थानसे निजपालनीय कुटुंबी मनुष्य, मुख, वाणी, दाहिना नेत्रादि, धन, विद्या, भोग- विशेष, दास, मित्र इतनोंका विचार करना ॥ १ ॥ लग्नेश्वरेण सहिते यदि वित्तनाथे दुःस्थेऽस्थिनाशनमथास्कुजि- दिन्दुयुक्ते॥ नेत्रेश्वरे तनुगते यदि नैशिकांघ: स्वोच्चे शुभग्रह- युते न तथा वदंति॥२॥ भान्वच्छलग्नपतिभि: सहिते तदीशे जात्यंधको भवति रंधवणांत्यगेपि ॥। रिष्फे धरासुतगते नयनं हि वामं नाशं तदा व्रजति सूर्यसुते तदन्यत्॥ ३।। द्वितीयेश लग्नेशसहित दुष्ट स्थानमें होवै तो हड्डी टूटे। शुक्र चंद्रमा सहित द्वितायेश लन्नमें होवै तो रात्यंध होवै. यदि उच्च राशिमें हो यद्ा शुभग्रहसे युक्त होवै तो वह फल नहीं होवै । २ ॥। द्वितीयेश, सूर्य, शुक्र और लग्नेश सहित होवै तो जन्मांध होवे तथा ८।६।१२ में हो तो भी यही फल है बारहवां मंगल होवै तो वामनेत्र शनि होवै तो दाहिना नेत्र नष्ट होवे ॥ ३ ॥ चंद्रार्कसंयुक्तहरौ विलग्ने शन्यारदष्टेक्षिविनाशमाहुः ॥ शुभा- शुभैर्वुद्धदलोचनः स्याच्छभैर्न दोष: सहितेक्षणाभ्याम्॥४॥

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भाषाटीका सहित:। (५७)

सिंह लननके सूर्य, चंद्रमा, मंगल शनिसे दृष्ट हों तो नेत्रनाश कहतेहैं यदि योग एवं दीष्टि- कर्त्ता ग्रह शुभ अग्गुभ मिश्रित हों तो (बुद्बुदाक्ष) अधीरनयन होवे शुभ ग्रहोंके योगद्ृष्टिसे उक्त दोष नहीं होता ।। ४ ।। निमीलिताक्षश्र धनेशपापे तदीश्वरे शोभनदृष्टियुक्ते॥ लग्ना- घिपे पापबहुत्वयोगे यमेन दृष्टे स तु रोगिनेत्रः ॥५॥ नेत्रे शुभे तद्धवनेश्वरे वा सौम्यान्विते कारकखवेचरेंद्रे॥ लग्नेश्वरेणापि युत- थ दृष्टे विशालदृष्टिः स नरो विशेषात्॥ ६॥ धनस्थानमें पापग्रह धनेशपर शुभग्रहकी दृष्टि होवै तो नेत्र मीचेसे रहे। लग्नेश बहुत पापग्रहों सहित होदै उस पर शनिकी दृष्टिभी होवै तो नेत्रोमें रोग रहे॥ ५॥ नेत्रस्थानमं शुभग्रह हो द्वितीयेश शुभयुक्त हो तथा कारक ग्रह शुभयुक्त हो लगनेशसे भी युक्त वा दृष्ट हो- वै तो वह मनुष्य विशेषतासे बडी दृष्टिवाला होवै ॥ ६ ॥ शन्यारयोगे गुलिकेन युक्ते नेत्रेश्वरे तत्र तु नेत्ररोगः॥नेत्रे यदा पापबहुत्वयोगे यमेन दृष्टे सति रुग्णनेत्र:॥७॥ नेत्रेश्वरस्यांश- पतौ सपापे पापग्रहक्षेत्रगते तथैव। नेत्राधिपे वासरनायके तु धरासुते वा गुलिकार्कहषे ॥। ८॥ द्वितीयेश शनि मंगलसे युक् तथा गुलिकसे भी युक्त होवै तो नेत्ररोग होवै द्वितीय स्थानमें बहुत पाप हों शनिकी दृष्टि होवै तो नेत्ररोगी होवै॥ ७॥ द्वितीयेश जिसके अंशकमें है वह पापयुत हो तथा पापग्रहके राशिमें हो अथवा द्वितीयेश सूर्य वा मंगल हो गुलिक पर सूर्यकी दृष्टि होवे।। ८ H उष्णोद्धवेनाप्यथ पित्तकासैरनेंत्रस्य रोगो भवति प्रमादैः॥अव्या- जरोगैर्नयनस्य रोगस्तत्स्थानपे दुःस्थगते ससौम्ये॥९॥सहो- दरात्मोद्भवशत्रुगेहे कलत्रमित्रादि लभेत्तथैव। रव्यारयुक्ते सति नेत्रनाथे दृष्टे तु ताभ्यां नयनांतरक्तः ॥१०।। तो गर्मीसे अथवा पित्त कफसे पमादोंसे नेत्ररोग होवै द्वितीयेश दुष्टस्थानमें शुभयुक्त होवे तो बिना पमादसे नेत्ररोग होवै॥ ९ ॥ ऐसेही भ्रातृस्थानसे भाईको पुत्रस्थानसे पुत्रको सत्रु- स्थानसे शत्रुको सप्तम स्थानमे ख्त्रीको नेत्ररोग कहना द्वितीयेश सूर्य मंगलसे युक या दृष्ट होवै तो नेत्रोंके किनारे रक्तवर्ण रहे ॥ १० ॥

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(५८) सर्वार्थचिन्तामणि:। सौम्यग्रहौ कारकभावनाथौ स्यातां शुभा दृष्टिरसौम्यता तु॥ पापग्रहैर्वीक्षणयोगतश्ध पित्रादिकानां फलमेवमाहुः ॥११॥ कारक भावेश दो शुभ ग्रह हों शुभग्रह उन्हें न देखें पापग्रह देखें तो क्ूरदृष्टि होव ऐसे ही योगमें पापग्रहोंके योग एवं दृष्टिसे जिस स्थानसंबंधी वह कारक ग्रह हैं उसके अनुसार पिता आदियोंको वह फल कहते हैं ॥। ११ ।। कुटुंबराशेरधिपे ससौम्ये केंद्रस्थिते स्वोच्चसुहृध्हे वा॥ सौम्यर्क्ष- युक्ते यदि जातपुण्यः कुटुंबसंरक्षणवाग्विलासः ॥१२॥। द्वितीयेश शुभग्रह सहित केंद्रमें हो अथवा अपने उच्चमें वा मित्रराशिमें हो शुभराशिमें होवै तो वह पुण्यवान् कुटुंबका रक्षक होवै वाणीमें विलास उत्तमता होदै ॥ १२ ॥ स्वोच्स्थिते शोभनखेचरेंद्रे कुटुंबराशौ शुभवीक्षिते वा ॥ अने- कसंरक्षणजातपुण्यो लग्नेश्वरे वीर्ययुते स्वतुंगे॥ १३॥ गुरौ कुटुं- बे स्वपतौ यदि स्याद्रगौ बुधे तादृशभावनाथे॥ स्वोच्चे सुहत्क्षे- त्रगतेथ बंधौ परोपकारी जनरक्षकः स्यात् ॥ १४॥ द्वितीयभावमें शुभग्रह दृष्ट शुभग्रह अपने उच्चमें हो तो अनेकोंकी रक्षा करनेसे पुण्यवान् होवै, लग्नेश बलवान् हो अपने उच्चमें हो तो भी वही फल जानना, द्वितीय बृहस्पति द्वितीय स्थानमें हो अथवा ऐसे ही द्वितीयेश द्वितीयमें शुक्र वा बुध हो अथवा अपने उच्चमें वा मिन्रराशिमें चौथे स्थानमें हो तो पराया उपकार करनेवाला लोगोंकी रक्षा करनेवाला होवै ॥ १३ ॥ १४।। पापे तु तद्राशिपतौ तदानीं पापेक्षिते पापयुते स्वतुंगे।। लग्ने- श्वरे हीनबले सपापे स्वजीवनोपायसहायको न ॥ १५॥ पापे बहुत्वे स्वकुटुंबराशौ पापेक्षिते हीनबले तदीशे। दुःस्थे विलग्ना- घिपतौ सपापे स्वजीवनं नास्ति सुखेन तस्य । १६॥ द्वितीयेश पापग्रह पापयुत दृष्ट हो और अपने उच्चमें हो लग्नेश पापयुक्त हीनवल होवै तो अपने आजीवनके उपायमें दूसरा सहायक न होवै अर्थात अपने गुजरका उपाय आपही करे।। १५। द्वितीय स्थानमें बहुत पापग्रह हो द्वितीयेश हीनवली पापग्रहसे दृष्ट हो लगनशे पापयुक्त दुष्ट स्थानमें होवे तो उसका जीवन सुखपूर्वक न होवै ॥ १६ ॥ पत्यौ कुटुंबस्य तृतीयराशौ स्थिते यदा पुंग्रहसौम्यदष्टे॥ शुभ- स्थिते खेचरनायके स्यात्स्वतुंगगे सर्वजनावनीशः ।।१७।।

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भावाटीकासहित:। (५९ )

द्वितीयभावेश तीसरे शुभग्रह तथा पुरुषग्रह सू० मं० बृ० से दष्ट हो गुभग्रहकी राशिमें या अपने उच्चराशिमें होवै तो सब मनुष्योंका एवं पृथ्वीका राजा होवै॥ १७॥ तन्नाथें गोपुरांशस्थे कुटुंबेशांशपे शुभे॥ सिंहासनांशके वापि पंचाशज्जनरक्षकः॥ १८ ।। द्वितीयेश गोपुरांशकमें हो अथवा द्वितीयेश जिस ग्रहके अंशकमें हो वह शुभग्रह हो और सिंहासनांशकमें होवै तो पचास मनुष्योंकी रक्षा करनेवाला होवै॥ १८ ॥ स्वोच्चत्रिकोणायगते कुटुम्बराशे: पतौ लगनपतेबलाढये॥ कुटुं- बनाथस्थितराशिनाथे केंद्रस्थिते सर्वजनावनीशः॥१९॥ द्वितियेश अपने उच्च वा मूलत्रिकोणके ग्यारहवें भावमें यद्ा उच्च वा त्रिकोण लाभ स्थित ५।९।११ में हो लग्नेश बलवान् हो तथा जिसराशिमें द्वितीयेश है उसका स्वाम केंद्में होवै तो सर्व मनुष्योंका राजा होवै ॥ १९॥ द्वितीये पापसंयुक्ते कुटुंबेशे तथा स्थिते॥ पापग्रहेण संदृष्टे दु- घेटे भावनं लभेत्॥ २०॥ आविंशते रक्षक: स्यात्कुटुंबेशे शुभै- युते।। पारावतांशके तस्मिन् धने चंद्रसमन्विते॥ २१॥ द्वितीय स्थानमें पापग्रह हो तथा द्वितीयेश पाप वा पापयुक्त दृष्ट होवे तो आजीविका कठि- नतासे होवै॥ २०॥ यदि द्वितीयेश शुभग्रह युक्त होकर पारावतांशकमें हो द्वितीय स्थानमें चंद्रमा होवे तो वीस मनुष्योंका पालन करे ॥ २१ ॥ स्वोच्चे सुहद्धे स्वगहे तदीशे सिंहासने तद्भवनेश्वरे वा ॥ पारा- वतांशे गुरुदृष्टियुक्ते शतत्रयं शास्ति चजातपुण्यः॥२२।। कुहुं- बनाथे परमोज्ञयुक्ते देवेंद्रपूज्येन समीक्षिते वा ॥ तथादिधे तद्भवनेपि जातः सहस्ररक्षो भवति प्रतापैः ॥२३॥ द्वितीयेश अपने उच्चमे, मित्रराशिमें अपने राशिमें सिंहासनांश वा पारावतांशमें, हो उसपर गुर्रुदृष्टि होवै तो वह पुण्यवान् तीन शत मनुष्योंके ऊपर हुकूमत चलावै॥ २२ ॥ द्वितीयेश्न परम उच्चमें गुरुसे दृष्ट हो अथवा द्वितीय स्थानमें सिंहासनांश वा पारावर्ताशमें होवै तो अपने मतापोंसे एक सहस्र मनुष्योंका स्वामी होवे ।। २३ ॥ सिंहासनांशे त्रिदशेशपूज्ये शुके पुनगोंपुरसंयुते तु। ऐरावतांशे धनपे बलाढये जातस्त्वसंख्यातनृरक्षक: स्यात् ॥ २४॥ बृहस्पति सिंहाखनांशमें और शुक्र गोपुरांशकमें तथा बलवान् द्वितीयभावेश ऐरावताशमें होवै तो असंख्य मनुष्योंका स्वामी होवै ॥ २४॥

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(६०) सर्वार्थचिन्तामणिः। खुखेशे केंद्रभावस्थे शुभग्रहनिरीक्षिते॥ सुखे सौम्ययुते वापि सुशुखः स नरो भवेत् ॥२५॥ प्रफुल्लवदन: श्रीमान्केंद्रे मुखपतौ यदा। स्वोच्चमित्रस्ववर्गस्थे तन्नाथे गोपुरांशके॥ २६॥ द्वितीयेश केन्द्रमें शुभ ग्रहोंसे दृष्ट हो और द्वितीय भावमें शुभ ग्रह होवे वह मनुष्य सुमुख (सुवाणी) वाला होवै॥ २५ ॥ द्वितीयेश केन्द्रमें अपने उच्च वा मित्रराशि वा अपने अंशकमें हो अथवा द्वितीयेश गोपुरांशमें होवे तो मफुल्लमुख श्रीयुक्त होवै ॥ २६ ॥ पापैर्युते सुखस्थाने तन्नाथे पापसंयुते ॥ नीचराशिगते वापि दुर्मुखः पापवीक्षिते॥२७॥कोघयुक्स नरः पापी तदीश गुलिका- न्विते॥ पापयोगबहुत्वेस्मिन्नीचशत्रुवशं गतः॥२८॥ द्वितीय भाव पापमुक्त उसका स्वामी भी पापयुक्त हो अथवा नीच राशिमें पापग्रह उसे देखे तो (दुर्मुख) दुर्वाणीवाला होवै॥ २७ ॥ द्वितीयेश गुलिकसे युक्त हो बहुत पाप द्वितीय स्थानमें हों तो वह मनुष्य पापी और क्रोधयुक्त होवै॥ २८॥ वाक्स्थानपे सौम्ययुते त्रिकोणे केन्द्रस्थिते तुंगसमन्विते वा ॥ शुभेक्षिते पुंग्रहयोगयुक्ते वाग्ग्मी भवेद्युक्तिसमन्वितोसौ ॥२९॥ द्वितीयेश त्रिकोण वा केन्द्रमें शुभग्रहयुक्त हो अथवा उच्चराशिमें हो शुभग्रह उसे देखें पुरुष गहसे युक्त हो तो चतुर युक्तियुक्त बात कहनेवाला होवै ॥२९॥ वाक्स्थानपे देवपुरोहितेन युक्ते यदा नाशगतेत्र मूक:॥ पित्रा- दिकानामियमेव रीतिरुक्ता मुनीद्रैबहुशास्त्रविद्धिः ॥ ३० ॥ द्वितीयेश वृहस्पतिसे युक्त अष्टम स्थानमें होवै तो गूंगा होवै ऐसही पित्रादि भार्वोण स्वामी होवै तो पित्रादियोंको मूकता (गूंगापन) बहुत शास्त्र जाननेवाले कहते हैं ॥ ३० ॥ वाचालक: केन्द्रगते तदीशे पारावतश परमोच्चभागे॥ सिंहासने देवगुरौ भृगौ वा वर्गोत्तमे सोमसुतेन युक्त ॥ ३१ ॥ वागीश- स्यांशपे सौम्ये स्वोचे शुभसमन्विते॥ गोपुरांशगते वापि वाग्ग्मी- पटुतरो भवेत् ॥ ३२ ॥ द्वितीयेश केन्द्रमें पारावतांशक और परम उच्चांशकमें हो बृहस्पति अथवा शुक सिंहासनांशमें हो वा वर्गोत्तमांशमें हो वुधसे युक्त होवै तो वाचाल (बहुत बोलनेवाला) होवै।। ३१॥ द्ितीयेश जिसके नवांशकमें हो वह शुभग्रह हो, अपने उच्चमें शुभग्रह युक्त हो अथवा गोपु- राशकमें हो तो बोलनेमें चतुर युक्तियुक्त बात करनेवाला होवै ॥ ३२ ॥

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भाषाटीकासहित:। (६१) वागीशोपि बलान्वितः शुभयुतो वर्गोत्तमांशेपि वा वाज्ज्मी स्या- द्धवनेश्वरो गुरुयुतः पारावतांशेपि वा।तन्नाथो भृगुणा बुधेन सहि- तस्त्वैरावतांशे तथा स्वोच्चे स्वे सुहदां गृहे धनपती वाक्स्थान- कोलाहलः ॥ ३३॥ वागीश (द्वितीयेश) बलवान् शुभग्रहयुक्त वर्गोत्तमांशस्थित हो तो बोलनेमें चतुर होवे द्वितीयेश वृहस्पति युक्त हो अथवा पारावतांशमें हो, उस स्थानका स्वामी शुक्क वा बुघसे सहित यद्वा ऐरावतांशमें हो, तथा धनेश उच्च वा मित्रकी राशिमें होवै तो बहुत बोलने- वाला होवै ॥ ३३ ॥ सभाजडो वागधिपःसपापः कर्मस्थितो नीचगतोर्कयुक्तः॥ मांघन्विते वाग्भवने्कयुक्ते पापैस्तु दृष्टे स जडोत्र जात:।।३४।। द्वितीयेश पापयुक्त कर्मस्थित, नीचराशिगत, अस्तंगत हो द्वितीय स्थानमें केतु हो अथवा सूर्य हो पापग्रह उसे देखें तो वह मनुष्य सभाजड (मूख) होवै॥ ३४ ॥ केन्द्रे बुधे वागधिपे बलाव्ये शुके धनभ्रातृगते ससौम्ये॥ स्वोच्चे धने दानवपूजिते वा ज्योतिविदां श्रेष्ठतमो नरः स्यात् ॥३५॥ बुध केन्द्रमें हो द्वितीयेश बलवान् हो शुक्र शुभयुक्त दूसरे वा तीसरे भावमें होवै अथव शुक्र अपने उच्चका दूसरे भावमें होवै तो मनुष्य ज्योतिषियोंमें श्रेष्ठ होवै ॥ ३५ ॥ गणितज्ञो भवेज्जातो वाग्भावे भूमिनन्दने ॥ ससोमे बुधसंदष्टे केन्द्रे वा सोमनंदने॥ ३६॥ वाग्भावपे बुधे स्वोच्चे लग्ने देवेंद्र- पूजिते॥ शनावष्टमसंयुक्त गणितज्ञो भवेन्नरः॥ ३७ ॥ केंद्रत्रि- कोणगे जीवे शुके स्वोच्चगते सति॥ वाग्भावपेंदुपुत्रे वा गणितज्ञो भवेन्नरः॥ ३८ ॥ वाग्भावपे रवौ भौमे सुरुशुकनिरीक्षिते। पारावतांशगे सौम्ये तत्तद्युक्तिपरायणः ॥ ३९॥ द्वितीय स्थानमें मंगळ चंद्रमासहित हो उसे बुध देखे वा बुध केन्द्रमें होवै तो मनुष्य गणित जाननेवाला होवे॥ ३६ ॥ द्वितीयेश बुध अपने उच्चमें हो लग्नमें वृहस्पति और अष्टममें शनि होवै तो मनुष्य गणित विद्या जाननेवाला होवै॥ ३७ ॥ वृहस्पति केन्द्र वा त्रिकोणमें हो शुक मीनका हो अथवा बुध वा द्वितीयेश अपने उच्चका होवै तो मनुष्य गणित विद्या जाननेवाला होवै॥ ३८॥ द्वितीयेश सूर्य वा मंगळ गुरु शुक्से दृष्ट हो बुध पाराव- तांश्में होवे तो मनुष्य ज्योतिषकी युक्ति जाननेमें तत्पर होवै॥ ३९ ॥

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(६२) सर्वार्थचिन्तामणिः। गुरुशुक्र धनेशौ चेद्रविभौमनिरीक्षितौ।। मूलत्रिकोणतुंगे वा तर्क- शास्त्रविर्दा वरः ॥४॥ संपूर्णबलसंयक्त गुरौ तद्धवनेश्वरे॥ दिनेशभृगुसंदष्टे शाब्दिकोयं नरो भवेव् ॥ ४१॥। द्वितीय भावेश वृहस्पति वा शुक्र हो उसे सूर्य मंगल देखें और मूल त्रिकोण वा उच्चमें होवै तो न्यायशास्त्र जाननेवालोंमें श्रेष्ठ होवै॥ ४० ॥ द्वितीयेश बृहस्पति संपूर्ण वळयुक्त होवै उसको सूर्य शुक देखेें तो वह मनुष्य वैयाकरण होवै ॥ ४१ ॥ वाग्भावपे बुधे स्वोच्चे गोपुरांशगते शनौ॥। सिंहासने गुरौ वापि वेदांतज्ञो भवेन्नरः॥४२॥ वेदांतपारशील: स्यात्केंद्रकोणे गुरौ सति॥ बुधेन गुरुणा दष्टे शनौ पारावतांशके ॥४३।। उत्तमांशे भृगौ लगे केन्द्रे वा तद्विधे भृगौ। देवलोकगते चंद्रे वेदांत- ज्ञानपारगः॥४४॥ षट्शास्त्रवल्भः केन्द्रे जीवे दानवपूजिते॥ सिंहासने गोपुरांशे वाग्भावस्थांशके बुधे ॥। ४५॥ द्वितीयेश बुध अपने उच्चमें शनि गोपुरांशमें हो अथवा वृहस्पति सिंहासनांशमें होवै तो मनुष्य वेदांत शास्त्र जाननेवाला होवे॥ ४२ ॥ केन्द्र अथवा त्रिकोणमें वृहस्पति होवै और शनि पारावतांशकमें बुध बृहस्पतिसे दृष्ट होवै तो वेदांतशास्त्रमें अत्यंताभ्याती होवै॥ ४३॥ लगनगत शुक उत्तमांशमें हो अथवा उत्तमांशका शुक केंद्रमें हो चंद्रमा देवलो- कांशकमें होवैं तो वेदांतज्ञानमें पारंगत होवे ॥४४॥ बृहस्पति केंद्रमें शुक सिंहासनांशमें और द्वितीयभावगतांशकेश बुध गोपुरांशकमें होवै तो छओं शास्त्रोंका जाननेवाला होवै ॥४५॥ विप्रलंभो धनेशस्य राशीशस्थांशपे शनौ।। सपापे केंद्रकोणे वा भौमेप्येवं विनिर्दिशेत्॥४६॥ परिहासकरो नित्यं भानुस्थित- नवांशपे। वाग्भावस्थे बलाव्ये तु तस्मिन्वैशेषिकांशके।89।। धनभावेशकी राशिको स्वामीके स्थित नवांशका स्वामी शनि पापयुक्त होकर केंद्र वा कोणमें होवै तो अंगीकार करके प्रतिवाद करनेवाला होवै ऐसाही मंगल हो तो भी वही फल जानना॥। ४६ ॥ सूर्य जिसराशिनवांशमें हो उसका स्वामी द्विताय स्थानमें बलवान् तथा वैशेषिकांशमें होवै तो ठठोली करनेवाला (खुश मसकरा) होवै॥ ४७ ॥ गुरौ बलाव्ये धनराशियुक्ते तदीश्वराक्ांतनवांशनाथे॥ केंद्रति कोणे शुभवीक्षिते वा ऋमान्तविच्छास्त्रपरायणक्ञ॥४८॥

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भाषाटीकासहित:। (६३ ) बलवान् बृहस्पति द्वितीय स्थानमें हो द्वितीयेश जिस नवाशमें हो उसका स्वामी केंद्र वा त्रिकोणमें शुभ ग्रहसे दृष्ट होवै तो क्रमांत वेद तथा ६ शास्त्रोंमें निपुणभी होवे ॥४८॥ लग्नेश्वरे धनस्थे लग्ने वा सौम्यसंयुते तुंगे॥ पारावते तदीशे जातो निगमांतविदचये शुके॥४९॥ लन्नेश धनस्थानमें अथवा लग्नहीमें हो परंतु शुभयुक्त एवं अपने उच्चमें हो उसका स्वामी पारावतांशमें होवै और शुक्र बारहवे होवै तो मनुष्य वेद वेदांत शास्त्रपारग होै ॥ ४९॥ लग्नेश्वरस्यांशपतिस्थराशिनाथस्थितांशाघिपतौ बलाव्ये वैशे- षिकांशे शुभदृष्टियुक्ते योगे बहुत्वे धनलाभमाहुः ॥५०॥ वित्तेश्वरेण सहिते भवराशिनाथे कर्माघिपस्थनवभावपद्ाष्टि- युक्ते ॥ वैशेषिकांशकयुते परमोच्चभागे योगे बहुत्वधनलाभ- मिहाहुरार्याः।।५9। लन्नेश जिस ग्रहके नर्वाशमें हो बह जिसकी राशिमें हो वह जिसके नवांशमें हो वह बछवान् तथा वैशेषिकांशगत और शुभग्रहोसे दृष्ट वा युक्त होवैं तो बहुत धनलाभ होवै ॥ ५० ॥ ग्यारहवें भावका स्वामी धनशस युक्त हो उसे कर्मेशस्थित नवंशेश देखे वैशेषिकांशमें हो, परमोच्चांशकमें होवै तो बहुत धनलाभ होवे ऐसा फल श्रेष्ठ आचार्य कहते हैं ॥। ५१ ॥ धर्माधिपेन सहिते धनराशिनाथ लग्नेश्वरस्थितनवांशपतीश्व- रेण॥ दृष्टे चतुष्टयगते शुभदृष्टियोगे जातस्तु भूरिघनलाभ- झुपैति बाल्ये ॥ ५२॥ द्वितीयेश नवमेशसे युक्त हो, लग्नेशके नवांशेशसे दृष्ट हो, केंद्रमें हो, शुभग्रह उसे देखे तो वाल्यावस्थाहीमें बहुत धन पावै ।। ५२ ॥ लगनार्थलाभभवने शुभखेचरेंद्रे स्वोच्चे सुहृद्धूहगतेत्र विशेषितांशे॥ तुंगांशके धनपतिस्थनवांशनाथदष्टेऽथ भूरि धनलाभसुपैति बाल्ये ॥ ९३।। लग्न द्वितीय और लाभ भावोंमें शुभ ग्रह उच्च मित्र राशियोंमें तथा वैशेषिकांशमें हों अथवा उच्चांशकमें हों तथा द्वितीयेशस्थितनवांशेशसे दृष्ट हों तो वाल्यही में बहुत धन पावै ॥ ५३॥ लग्नेशे घनराशिस्थे घनेशे लाभराशिगे॥ लाभेशे वापि लग्नस्थे बहुनिध्यादिकं भवेत् ॥५४ ॥ उग्रेश धनस्थानमें धनेश लाभ स्थानमें हो अथवा लाभेश लग्नमें होवै तो बहुत निधि- वस्तु आदि होवैं।। ५४ ।

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(६४ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

सर्वग्रहादतिबली यदि लग्ननाथः केंद्रे स्थितस्त्रिदशपूजितसंयु- तश्च ।l वैशेषिकांशकयुते धनराशिनाथे वित्तं स्ववीर्यबलतो- जितमाहुरार्याः॥५५॥ लग्नेशसंयुतनवांशपतिस्थराशिनाथ, बलेन सहितो धनपस्य मित्रम् ॥ केंद्रत्रिकोणसहित: स्वगृहेथ यद्वा जातः स्ववीर्यधनमेति बहुप्रकारैः ॥५६॥ लग्नेश सभी ग्रहोंसे बलवान् होकर बृहस्पतिसे दृष्ट केंद्रमें हो द्वितीयेश वैशेषिकांशकगत होबै तो अपने वल पराक्रमसे कमाया धन होवे ऐसा श्रेष्ठ आचार्य कहतेहैं ॥ ५५॥ लग्नेश जिस नवांशमें है उसका स्वामी जिस राशिमें है उसका स्वामी बलवान् हो तथा धनभावे- शका मित्र होवै केंद्र वा त्रिकोणमें हो अथवा स्वराशिमें होवे तो अपने बल पराक्रमसे बहुत प्रकारका धन पावै ॥ ५६ ॥ वित्तेश्वरो लाभविलग्नपाथ्यां युक्तस्त्रिकाणे यदि केंद्रराशौ ॥ शुभेक्षितः कालवलान्वितश् जातः स्ववीर्याद्धनमेति मध्ये॥ ॥७।। अंते धन याति धनेशयुक्तराशौ विलग्नेशयुते ससौग्ये।। तदीश्वरे लग्नगते बलाव्ये लाभेश्वरादेवमुदाहरंति॥५८॥ धनभावका स्वामी लाभेश और लग्नेशसे युक्त त्रिकोण ५/९ अथवा केन्द्र १/४/७।१० में हो शुभ ग्रह उसे देखें तथा कालबलसे युक्त होवें तो मनुष्य मध्यावस्थामें अपने पराक्रमसे घन पावै॥ ५७॥ जिस राशिमें द्वितीयेश है उसीमें लग्नेश और बुध भी होवैं उस भावका स्वामी लग्नमें बलयुक्त होवै तो पिछली अवस्थामें धन पावै लाभेशसे भी यह योग होता है अर्थाव जैसे धनेशके साथ कहा वैसाही लाभेशसे भी जानना ॥५८ ॥ तृतीयराशौ धनलग्ननाथौ बलान्वितौ पुंग्रहदृष्टियुक्तौ।। तदीश्व- रेणापि युतौ प्रदृष्टौ भ्रातुर्द्धनं याति विशेषितांशे॥९॥तृतीयभा- वाधिपतौ धनस्थे तत्र स्थिते कारकरवेचरेंद्रे ॥ दृष्टे युते वा तनुपेन जातो भ्रातुर्द्धनं याति विशेषितांशे॥ ६०॥ धनेश तथा लग्नेश तीसरे भावमें बलवान् और पुरुषग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हों तृतीयेशसेभी युछ्ध दा दष्ट होवैं और वै शेषिकाशक में होवैं तो भाईसे धन पावै॥५९॥तृतीयेश धनस्थानमें हो, और तहां कारफ ग्रहभी होवैं, लग्नेशसे युत वा दृष्ट हो वैशेषिकांशकमेंभी होवै तो भाईखे घन पावै॥६०॥ परस्परं वित्तपलग्ननाथौ निरीक्षितौ केंद्रयुतौ शुभांशे ।। निरी० क्षितौ लग्नशुभेश्वराभ्यां जातो धनं याति बहुप्रकारः ॥६१॥

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भाषाटीकासहित:। (६५) वित्तेश्वरं पश्यति लग्ननाथे युते स्ववीर्याद्धनमेति मर्त्यः ॥ तृती- यभावाधिपकारकाय्यां दृष्टे युते तादृशमेति वित्तम् ॥ ६२ ॥ लग्नेश धनेश केंद्रोंमे तथा शुभांशकोंमें बैठे आपसमें देखते हों लननेश नवमेश उन्हे देखें तो बहुत प्कारसे धन पांवै॥ ६१ ॥ लग्नेश धनेशको देखे अथवा एक भावमें दोनहूं होवैं तो मनुष्य अपने बलसे धन पावै तथा तृतीयभावेश और कारक ग्रहोंसे दृष्ट वा युक्त हो तो वही फल होगा ॥ ६२ ॥ दृष्टे युते वित्तपतौ बलाढचे सुखेश्वरेणापि धनं जनन्याः ॥ बंधोः सकाशादथ वा कृषेश्च धनं प्रयात्यत्र विशेषितांशे॥६३।। दृष्टे युते वित्तपतौ धनस्थे तत्र स्थिते कारकरवेचरेंद्रे॥ दृष्टे युते वा तनुपेन जातो भ्रातुर्घनं याति विशेषितांशे॥ ६४॥ धनेश चतुर्थेशसे युक्त वा दृष्ट हो बलवान् भी होवै तो मातासे धन पावै, वैशेषिकांशकमें भी होवै तो बंधु (ज्ञाति) से अथवा कृषिकर्मसे धन पावै॥ ६३॥ धनेश धनभावमें तृतीयेशसे युक्त वा दृष्ट हो तहां कारक ग्रहभी होवै, अथवा लग्नेशसे दृष्ट वा युक्त होवें वैशषिकांशकमें भी होवें तो भाईसे धन पावै ॥ ६४॥ पुत्रेशतत्कारकरवेचराभ्यां तथाविधे वित्तपतौ बलाढचे॥ दृष्टे युते लग्नपतौ बलाढये वैशेषिकांशे सुततो धनं स्यात्॥ ६ ॥ वैशेषिकांशे यदि लग्ननाथे जातः स्वपुन्रार्जितमेव वित्तम् ॥ पष्ठेशतत्कारकरवेचराभ्यां तथाविधे वित्तपतौ बलाढचे॥ ६६॥ शत्रोः सकाशात्तु धनं प्रयाति वैशेषिके लग्नपतौ बलाढये ॥ कूलन्नतत्कारकयोस्तथैव वित्तं कलत्राल्लभते हि जातः ॥ ६७॥ पंचमेश और पुत्रकारक ग्रहसे युन्त वा दृष्ट बलवान् धनश बलवान् लग्नेशसे युक्त वा दृष्ट होवै वैशेषिकांशमें होवे तो अपने पुत्रका कमाया धन पावै ॥ ६५ ॥ लग्नेशभी वैशोषिकां- शफमें होवै तो भी वही फल होगा वैसाही धनेश षछेश और शत्रु कारक ग्रहसे युक्त वा रृष्ट होवै॥ ६६ ॥ और लग्नेश बलवान् वैशेषिकांशमें होवे तो शत्रुसे धन पावै उक्त मकार बाला धनेश सप्रमेश तथा स्त्रीकारक ग्रहसे युक्त वा दृष्ट होवै तो स्त्रीसे धन पावै ।। ६७ ॥] पितुर्धनं कारकभावपाभ्यां गुरो: सकाशादपिधर्मभूलात्॥ कमें- शतत्कारकदृष्टियोगादनं स्वदानग्रहणात्स्वकीत्या ।। ६८ ॥ लामेशत त्कारक दृष्टियोगादेवं वदत्यत्र धने बहुत्वम्॥६९ ॥

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(६६ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

वैसाही धनेश दशमेश, एवं तत्कारक ग्रहसे युक्त दृष्ट होवै तो वितासे तथा उपलक्षणसे राजासे धन पावै और यहां लक्षणसे धर्ममूल धनमाप्ति, धर्मेश तत्कारक दृष्टि योगसे जानना. कर्मभावेश राज्यकारक ग्रहसे युक्त वा दृष्ट होनेमेंभी धन अपने देने लेनसे तथा अपनी कीर्तिसे होवै. ।। ६८ ।। एवंविध धनेश लाभेश तथा लाभभावकारकग्रह युक्त दृष्ट होनेमें बहुत पकार धनकी माप्ि कहतेहैं ॥ ६९ ॥ धने पापग्रहाः प्रोक्ता बलाढयास्ते तथा भवेत्॥ नीचारिमूढ

स्तन्मुखतो भवेत्॥ सहोत्थवंधुपुन्नारिकलत्रादेरयं क्रमः ॥ ७१॥ धन भावमें पापग्रहभी बलवान् होवें तो धनवान् करतेहैं जो ग्रह धन भावमें नीच, शत्रु भाव, अस्तंगत हों उनसे भी लग्नेशादि वैशेषिकांशगन बलवान् ग्रहौंके योग वा दृष्टिसे धन होताहै॥ ७०॥ जैसे धन भावमें भाई, बंधु, पुत्र, शत्रु, कलत्र आदि भावेशोंके शुभ संबंध तथा उनके बलवान् होनेसे उनके द्वारा वा उनसे धनमाप्ति कही है वैसेही उन उन भावोंके स्वामियोंके निर्बल कूरांशादिगत संबंध होनेसे उनके द्वारा धननाश भी होताहै७१ लगाधिपे हीनबले सपापे रिष्फे धनेशे दिननाथयुक्त॥ नीच- स्थिते वा शुभदृष्टियुक्ते जातस्य वित्तं हरति क्षितीशः।७२।।वयये- शे धनभावस्थे रिष्फस्थे लाभनायके॥ दुःस्थे धनेशे नीचे वा राजदंडाद्धनक्षयः ॥ ७३ ॥ धनेशे नाशराशिस्थे सपापे नीच- राशिगे॥ राजकारकसंयुक्ते राजदंडाद्नक्षय:।७8॥ लग्नेश होनवल पापयुक्त होवै, धन भावेश छटे भावमें सूर्ययुक्त होवै अथवा नीचराशिमे होवै उसे पापग्रह देखें तो मनुष्यका धन राजा हरलेवे॥ ७२ ॥ व्ययेश धनभावमें लामेश बारहवें धनेश त्रिकस्थानमें हो अथवा नीच राशिमें होवै तो राजदण्डसे धनक्षय होवै ।। ७३॥ धनेश अष्टम राशिमें हो पापयुक्त नीचका होवे उसके साथ राजकारक ग्रहसे युकत होवै तो राजदण्डसे धनक्षय होवै।। ७४॥ धनव्ययेशौ व्ययवित्तसंस्थौ लये श्ररेणापि निरीक्षितौ चेतु।। लगा- िपे नाशगते सपापे राजां प्रकोपादननाशमाहुः॥७।। कमें- सरे लाभगते विलग्ननाथेन युक्ते यमकंटकांशे॥ दंड्टाकरालांश- गतेथ वापि राज्ञा प्रकोपाद्दननाशमाहु:॥।७६।।

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भावाटीकासहित:। (६७ )

बनेश व्ययेश धन व्यय स्थानोंमें परस्पर अर्थाव धनेश व्ययमें व्ययेश धनमें लमेश उन्हें देखै और लग्नेश पापयुक्त अष्टम स्थानमें होवे तो राजाओंके कोपसे धननाश कहतेहें ॥ ७५॥ दशमेश लाभ स्थानमें लनेशसे युक्त यमघंटकांश अथवा दंषाकरालांशमें होवे तो वही पूर्वोक्त फल राजाओंके कोपसे धननाश कहते हैं।। ७६ ॥ धनायपौ भूमिजदृष्टियु कौ कूरांशगौ हीनबलौ सपापौ॥ चौरादि- भावाधि पदृष्टियुक्तौ चौराग्निभूपैर्द्धननाशमेति । ७9॥ कर्मेश्वरे नाशगते सपापे क्रूरादिषष्टयंशगते विशेषात्॥ धनायपार्भ्यां सहिते तदानीं लोकापवादादननाशमाहुः ।।७८॥ वित्तेश- संयुक्तनवांशनाथयुक्तांशकस्थानपतौ सपापे । दुःस्थे विलगे- शवरदृष्टियुक्ते चौराध्निभूपैर्द्धननाशमेति ॥७९॥ धनेश लाभेश मंगलस दृष्ट, कूरांशगत, हीनवल, पापयुक्त और अष्टमेशादि (त्रिकेश) युक्त होवैं तो चौर अग्नि अथवा राजासे धननाश पावै॥ ७७ ॥ दशमेश पापयुक्त अष्टम स्थानमें. विशेष करके कर आदि षष्टयंशकमें होवै, धनेश लामेशसे युक्त होवे तब लोकापवाद (झूठेकलंक) से धननाश कहते हैं। ७८ ॥ धनेश जिस नवांशकमें हो उसके स्वामीका अंशनाथ सपाप त्रिकस्थ हो लग्नेश उसे देखे तो चोर अतनि राजासे धननाश पावै॥ ७९॥ धनेशस्थनवांशस्य नाथो दुस्थोथ पापयुक॥ ऋूरांशकगतो वापि निर्धनोयं भवेन्नरः॥८०॥ धने कूरादिसंयुक्ते तदीशे पाप- संयुते ॥ तथैव लाभराशीशे घनहीनो भवेन्नरः ॥८१। धनेश जिस नवांशकमें है उसका स्वामी दुष्ट स्थानमें तथा पापयुक्त होवे अथवा कूरां- शकमें होवै तो मनुष्य निर्दन होवै॥ ८०॥ धन स्थानमें कूरग्रह धनेश पापयुत होवे ऐखा ही लाभेशभी पापयुक्त होवै तो नर धनहीन रहे॥। ८१ ।। व्ययेशसंयुक्तनवांशनाथो युक्तो धनेशेन निरीक्षितो वा। नीचा- र्कंगो हीनबलः सपापः केंद्रस्थितव्वेदपि निर्द्धन: स्यात्॥८२॥ व्ययभावेश जिस नवाशकमें हो उसका स्वामी धन भावेशसे युक्त, अथवा दृष्ट हो, नीच गथवा गस्तंगत हो, बलहीन, पापयुक्त तथा केद्रमें हेवे तो मनुष्य धनरहित होवै ॥८२ । धनेशाश्रितराशीशसंयुक्तांशपतिर्यदि॥ कालदण्डाद्यंशयुक्त नि- रधनोयं भवेन्नरः ॥ ८३॥ यत्किश्विद्धनसंयुक्तो धनेशे केंद्रको- णगे। क्ूरषश्यंशसंयुत्त नी चस्थेर्कयुतेपिवा ॥८४॥ यर्त्कि-

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(६८) सर्वार्थचिन्तामणि:।

चिद्वित्तमायाति लाभेशस्थांशराशिपे। गुरुणा भृगुणा दृष्टे क्रूर- षष्टयंशसंयुते ॥८५॥ धनेश जिस राशिमें है उसके स्वामीके स्थित नवांशका स्वामी यदि कालदंडादि बंसफ युक्त होवे तो यह मनुष्य निर्धन होवे॥ ८३॥ धनेश केंद्र वा त्रिकोणमें क्रूरषष्टयंशयुक्त होषे तथा नीच राशिमें अथवा अस्तंगत होवे तो थोढे धनसे युक्त रहे॥ ८४॥ लाभेश जिस नवांशकमें है उसका स्वामी बृहस्पति शुकसे दृष्ट होवै और कूरषष्टयंशमें होवै तो थोड़ा घनलाभ होवे॥ ८५॥ लाभलग्नधनेशानां युक्तांशा: क्रूरसंज्ञकाः ॥ केंद्रत्रिकोणयुक्ता- नामुत्पन्नो धनिको भवेत् ॥ ८६॥ वैशेषिकाशे धनपे स्वोञ्चमू- लत्रिकोणगे॥ ऋरषष्टयंशसंयुक्ते लाभेशे सर्वनाशभाकू॥८७॥ उत्पन्नो धनिको लग्ने नाशे वैशेषिकांशके। धनेशे क्ूरषष्टचंशे चोक्तौ केंद्रगतौ तथा।८८। सदो धनी धनेशेन कर्मनाथो यतो यदि॥ कर्मेशस्थांशपतिना लाभनाथस्तथा विदुः ॥८९॥ ाभ, लग्न, धन भावोंके स्वामी जिन २ नवांशकोंमें होवें क्ूरसंज्ञक होवें परंतु वै ग्रह केंद्र कोणमें होवें तो मनुष्य धनवान् होवै॥ ८६ ॥ धनेश वैशेषिकांशमें अपने उच्च वा मूल- त्रिकोणका हो तथा लाभेश करषष्टयंशमें होवै तो सर्वनाश होवै।। ८७॥ लग्नमें विनाश वा वैशेषिकांश होवे धनेश ऋूरषष्टचंशमें होवै ये दोनों केंद्रमें हेविं तो मनुष्य धनवान् होवै ८८ ॥ धनेशसे दशमेश युक्त होवै तथा दशेमशस्थित नवांशेशसे लाभेश युक्त होवै तो तत्काल धनी होवै यह दो योग हैं॥। ८९ ॥ लग्नेशे धनराशिस्थे लाभेशे कर्मसंयुते ।। धनेशस्यांशपे सौम्ये घनिको नामतो भवेत् ॥९०॥ सहस्त्रनिष्कभर्त्ता स्याल्लगेशस्थ- नवांशपे। धनेशस्यांशपे सौम्ये गुरुणा वा निरीक्षिते॥९१॥ लग्नेशे धनराशिस्थे लाभेशे कर्मसंयुते॥ लाभाधिपेन संदष्टे गुरुणा वा निरीक्षिते॥ ९२॥ सहसत्रनिष्कभर्त्ता स्याल्लयेशस्थ- नवांशपे।। गोपुरांशगते कर्मनाथेन सति वीक्षिते॥९३॥ छभेश दूसरे. लाभेश दशममें होवै और धनेश शुभग्रहके अंशकमें होवै तो नाम उसका सेठ होवै धन पास न रहे।। ९०। लग्नेश तथा धनेश शुभग्रहोंके अंशकोंमें होवें अथवा बृह्स्पति उनको देखे तो एक हजार रुपयाका स्वामी होवे ॥ ९१ ॥ लगेग दूसरे

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आावाटीका सहितः। (६९ ) लामेश दशमें होवै तथा लग्नेशको लाभेश यद्ा बृहस्पति देखे तो एक हजारका स्वामी होै तथा जिस नवांशकमें लग्नेश है उसका स्वामी गोपुरांशकमें हो उसे दशमेश देखे तो भी वही फल होगा ।। ९२।। ९३।। कर्मेशसंयुक्तनवांशनाथसंयुक्त सप्तांशपतौ बलाढये।। शुकेण देवेन्द्रपुरोहितेन दृष्टे सहस्रद्वयनिष्कभर्ता।। ९४॥ सौम्यषष्टयं- शसंयुक्ते धनलाभे बलान्विते॥ तदीशेपि तथा युक्ते सहस्रत्रय- निष्कयुक ॥ ९५॥ वैशेषिकांशगे वित्तनाथे गुर्विंदुभास्करे॥ तथा विधो भवेशोपि बलवाँश्चेत्तथा धनी॥ ९६॥ धनेशस्थद- काणेशसंयुक्त नवभागपः। सर्वोत्तमबलोपेतस्त्वष्टसाहस्त्रनिष्क- युक् ॥ ९७। दशमेश जिस ग्रहके नवांश कमें है वह भी जिस ग्रहके सप्ांशकमें है वह बलवान् होवे शुक्रसे बृहस्पतिसे दृष्ट होवै तो दो हजारका स्वामी होवै॥ ९४ ॥ वही उक्त ग्रह सौम्य षष्टयंशमें २। ११ भावमें हो बलवान् होवे जिसके राशिमें बैठाहै वहमी सौम्यषष्टयंत्ञयुक्त होवै तो तीन हजारका स्वामी होवै॥ ९५ ॥ धनेश, बृहस्पति, चंद्रमा, सूर्यमेंसे कोही वैशेषिकांशकमें हो ऐसाही लाभेशभी बलवान् होवे तो वैसाही धनवान् होवै ॥ ९६ ॥ धन- भावेश जिस द्वेष्काणमें हो उसका स्वामी नवांशेश सहित तथा समस्त उत्तम बलयुक्त होवे तो आठ हजार मुद्राका स्वामी होवै।। ९७ ॥ लग्नेशस्थटकाणेशसंयुक्तमुनिभागपः ॥ वैशेषिकांशकगतस्त्वयुतं धनमाुयात् ॥ ९८॥ व्यये शुके धने जीवे स्वांशे वैशेषिकां- शके॥ लग्नेशेपि तथा युक्ते तदूर्ध्वमुपयाति सः ॥ ९९॥ लग्नेश जिसके द्रेष्काणमें हो उसके साथ सप्ताशेश हो और वैशेषिकांशकमें होवे तो दशहजार धन पावै। ९८॥ बारहवां शुक दूसरा बृहस्पति अपने वा वैगपिकांशकमें हो लग्ेशभी ऐसाही होवै तो उससेभी अधिक धन पावै ॥। ९९॥ गुरौ लग्नेशसंयुक्ते धने वैशेषिकांशके। केन्द्रत्रि कोणगे वापि तदू- ध्वै वित्तमश्नुते ॥१००॥ कर्मेशस्थहकाणस्य नाथसंयुक्तस- सपः ॥ ऐरावतांशसंयुक्तो धनलक्षं समश्नुते ॥ १०१॥ लक्ष- दय धनं याति चतुष्केंद्रे शुभान्विते॥ सिंहासने धनेशेपि सति पारावतांशके ॥ १०२ ॥

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(७० ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

वृह्स्पति लग्नेशसे युक्त धन भावमें वैशषिकांशकगत होवै अथवा केन्द्र त्रिकोणमें होबै तो दश हजारसे भी अधिक धन पावै॥ १०० ॥ सप्तांशेश दशमेशगतद्रेष्काणेशके साथ होवे तथा ऐरावतांशयुक्त होवै तो एक लक्ष धन भोगता है।। १०१॥ जिसके चारों केन्द्रोमें शुष यह होवें धनेश सिंहासनांशमें वा पारावतांशमें होवै तो दो लक्ष धन पावै ॥! १०२ ॥ लक्षत्रयाधिकारी स्याल्ाभलय्रघनाघिपे॥ वैशेषिकांशकगते मृदंशाद्वियुतेथ वा॥ १०३॥ तदूर्ध्व वित्तपः स्यातु धनलाभ- पती यदा॥ वृद्धिकेंद्रगतौ तौ चेद्लिनौ भाग्यपस्तथा॥१०४॥ केंद्रत्रिकोणमे वीर्यस्त्वथ वा भवनाथयुक्॥ वैशेषिकांशगश्रेत्तु धनलक्षं समश्नुते ॥ १०५ ॥ छामेश लग्नेश धनेशमेंसे कोही वैशषिकांशमें अथवा मृद्धंशकमें होवै तो तीन लक्षका स्वामी होवै॥ १०३॥ यदि धनेश लाभेश उदयी यद्ा आरोही हों केन्द्रमें हों बलवान होवैं तो लक्षसे ऊपर धन पावै, ऐसेही भाग्येश हो तो वही फल जानना॥ १०४॥ भाग्येश केन्द्र त्रिकोणमें बलसहित होवे अथवा लाभेश युक्त् होवै और वैशेषिकांशमें होवै तो एक लक्ष पावै ।। १०५ ।। लग्नांशनाथभाग्येशा: परमोञ्चांशसंयुताः।वैशेपिकांशे लाभेश तदा कोटीश्वरो भवेत् ॥ १०६॥ ऋणप्रदो विलग्नेशसंयुक्तनव- भागप:॥ दृष्टो देवेन्द्रगुरुणा मृदंशादिसमन्वितः ॥१०७। वित्त- लाभपसंयुक्त ्यंशकेशनवांशपः॥ वैशेषिक: केद्रकोणे ऋणदाता भवेन्रः॥।१०८।। उग्नका थंशेश तथा नवमेश परम उच्चांशकोंमें होवें और लाभेश वैशेषिकाशकमें होवै तो एक करोड धनका स्वामी होवै॥ १०६॥ जिसके नवांशकमें लन्नेश है उसे वृहस्पति देख तथा मृदंश आदि शुभांशकमें होवै तो ऋण देनेवाला (साहुकार) होवे॥ १०७ ॥ धनेश लाभेश जिस द्रेष्काणमें हों उनके स्वामी जिस २ नवांशकमें हों उसर के स्वामी वैशषिकांशोंमें देन्द्रगत होवै तो ऋणदाता होवै॥ १०८ ॥ ऋणग्रस्तो धने पापे लग्नेश व्ययसंयुते॥ कमेशे लाभनाथेन युते दृष्टे विशेषतः॥ १०९॥ दिनेशकरलुप्तस्तु धनेशो नीचरा- शिगः॥ पापान्विते धने रंध्रे ऋणग्रस्तो भवेन्नरः॥ ११०॥

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भावाटीकासित:। (७१) धन स्थानमें पापग्रह हो लग्नेश बारहवां हो विशेष करके नवेश लाभेशसे दृष्ट वा युक्त होवे तो मनुष्य ऋण (कर्जा) से ग्रस्त रहे॥ १०९॥ धनेश अस्तंगत नीचराशिगत होवे धनाष्टम भाव पापयुक्त होवै तो मनुष्य ऋणग्रस्त रहे ॥ ११० ॥ धनेशे नीचराशिस्थे क्रूरषष्टयंशसंयुते ॥ लाभेशेपि तथा युक्ते ऋणग्रस्तो भवेन्नरः ॥१११॥ लाभेशस्थितभांशेशनाथे दुःस्थे शुभान्विते ॥। क्रूरषष्टयंशसंयुक्ते ऋणग्रस्तो भवेन्नरः ॥ ११२ ॥ धनेश नीचराशिमें क्रूरषष्टयंशयुक्त होवै, लाभेश भी ऐसाही होवे तो मनुष्य ऋणसे दबा रहे ॥ १११। लाभेश जिसकी राशि नवांशकमें है उसका स्वामी दुष्टभावमें पापयुक्त होवै तथा क्रूर षष्टचंशमें होवै तो मनुष्य ऋणग्रस्त होवै ॥ ११२ ॥ वाक्स्थानपे षष्ठगते सराहौ राहुस्थितर्क्षाघिपसंयुते वा॥दंतस्य रोगं पतनं च तेषां सुक्तौ तयोवा प्रवदंति तज्ज्ञाः॥ ११३॥। वाक्स्थानपेनापि युतोरिनाथस्तद्भावपस्थांशपयुक्तनाथः॥ षष्ठे- श्वरेणापियुतः स्वमुक्तौ दंतादिरोग: पतनं च तेषाम्॥ ११४॥ द्वितीयेश राहुयुक्त छठे भावमें हो अथवा राहु जिस राशिमें है उसके स्वामीसे युक्त होबै तो उनकी दशा अंतर्दशामें दांतोंका रोग होवै और दांत गिरजावें ऐसा फल ज्योतिषज्ञ कहते हैं॥ ११३॥ षष्ठेश द्वितीयेशसे युक्त हवै तथा जिस भावमें है उसका स्वामी जिसके नवां- शकमें है वह पष्ठेशसे युक्त होवै तो दंतादिरोग होवै तथा दांत गिरजावैं ये फल उक्त योग कर्त्ताओंके दशादिमें होते हैं ॥ ११४ ॥ वाक्स्थानपेनापि युतोर्कपुत्रः पापैर्युतो वातभयात्प्रमादः ॥ सूर्यस्तु कोपाद्वति प्रमादो राज्ञां कुजे चोष्णभयात्प्रमादः११५॥। शनैश्षर द्वितीयेशसे तथा पापग्रहोंसे युक्त होवै तो वातरोगसे ममाद अनवधानता एक प्रकार उन्मत्तता होवै, ऐसा सूर्य होवै तो राजाके कोपसे, मंगल होवै तो गर्मीके भयसे पभाद होवै ॥ ११५ ॥ तदीश्वरेणापि युतेंदुपुत्रे सराहुकेतावरिभावयुक्ते॥ राहुस्थितर्क्षा- घिपसंयुते वा भुक्तौ तदा तालुभवः स रोगः ॥ ११६॥ द्वितीयेशसे युक्त बुध राहु वा केतु सहित छठे भावमें होवे अथवा जिस राशिमें राडु है उसके स्वामीसे युक्त होवै तो तालुस्थानमें रोग द्वितीयेशकी दशामें होवे ॥ १११ ॥ राजारिनाथौ तनुभावयुक्तौ साच्छाक्षिपौ भूमिपतेः भकोपात्॥ उत्पाटनं नेत्रसुशंति तज्ज्ञा नीचांशगौ पापयुतौ तथैव॥११७॥

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(०२) सर्वार्थचिन्तामणिः।

राजारिनाथस्थितभांशकेशौ दुःस्थौ विलग्नेशयुतौ तथैव। साच्छाक्षिपौ नाशगतौ तथैव शुभै्न हष्टौ नयनप्रमादः॥११८॥ दशम तथा छठे भावके स्वामी लग्नमें शुक्र और धन व्ययेशसे युक्त होवै तो राजाके कोपसे नेत्र उखाडे जावैं ऐसा ज्योतिषज्ञ कहते हैं वही १०। ६ भावोंके स्वामी नीचाशक स्थित तथा पापयुत हों तो भी वही फल जानना॥ ११७॥ दशमारिभावेश जिन ग्रहोंके नवांशकोंमें होवें यदि दुष्ट स्थानोंमें होवैं तथा लग्नेशसे युक्त होवैं तथा शुक और २। १२ भावेशोंसे युक्त होकर द्वादश स्थानमें होवें, शुभ ग्रह उन्हें न देखें तो नेत्र अनवधान रहैं११८ तद्भावपाभ्यामथ कारकाय्यां पित्रादिकानां फलमेवमाहुः॥ ॥ ११९॥ कर्णस्य विच्छेदनमाहुरार्याः सौरे सभौमे घनपे विलगने॥ रोगाधिपे वित्तपतौ विलनने नाशस्थिते मंदसुतारयुक्त्े।। ।१२०॥पित्रादिकानां फलमेवसूह्यां तत्स्थाननाथग्रहकारकेम्यः॥। भुंक्तीध्वरे ह्वच्छनिशाकराभ्यां केंद्रे युते राजतमत्र पात्रमू॥१२१।। जैसा विचार उक्त २ भावोंका कहा वैसाही पिता, भाता, पुत्र, स्त्री आदि भावेशोंसे भी विचार करना जिस भावमें उक्त योग मिले उसीको अर्थात् पित्रादिको घनलाभ, ऋणी, दंतरोग, नेत्र कर्ण रोग आदि कहना ॥ १९ ॥ शनैश्चर मंगल सहित होवे धनेश लन्नमें होवै तथा षछ्ठेश और धनेश लग्नमें, शनि मंगल द्वादश भावमें होवै तो कान कटे वा फूट नावैं. ये दो योग हैं॥ १२० ॥ ऐसेही विचार पित्रादि भावौंका भी करना उन भावेश एवं उन उन भावों के कारक ग्रहोंके साथ उक्त योग होनेमें पित्रादियोंका कर्णविच्छेद फल कहना अब पात्र कहते हैं धनेश शुक्र चंद्रमा युक्त केंद्रमें होवै तो चांदीके पात्र उसके घरमें होवें ॥ १२१ ॥ सचंद्रपुत्रामरनाथपूज्ये केंद्रस्थिते स्वर्णमयं हि पात्रम्। तदीधवरे कोणचतुष्टये वा वैशेषिकांशे यदि तादशं तत् ॥ १२२ ॥ मृद्व- शके वा परमोच्चभांशे स्थिते तदीशे यदि तादशं तत्॥ स्वांशा- दिकानां परमोच्चराशौ शशांकजीवाच्छविदां यदंशे॥ १२३ ॥ वीर्यान्वितो भुक्तिपतिस्तदंशे भुक्तेस्तु पात्रं सदशं हिरण्यमू।।१२४॥ युध सहित बृहस्पति केंद्रमें होवै तो स्वर्णपात्र होवैं, धनेश त्रिकोण केंद्रमें अथवा पैव पिकांशकमें होवे तो सुदर्णपात्र होवे॥ १२२ ॥ ऐसेही धनेश मृदंशकमें अथवा परमोण्य १ भक्कीघ्वरसे यहां घनेश लिया है, मतांतरसे दशमेशका बोधकभी है।

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भाषाटीकासहित:। (७३)

रा्यंशकमें होवै तो वैसाही फल होगा। अपने अंशोंमें यद्ा परमोच्च राश्यंशकोंमें चंदमा, बृहस्पति, शुक्र, बुधके जिन अंशोंमें बलवान् धनेश होवै, उसके अनुसार सुवर्णादि पात्र होंगे ऐसा कहना ।। १२३॥ १२४॥ मृद्ंशके भुक्तिपतौ विशेषात्पारावतादौ बलपूर्णयुक्ते॥ केन्द्र- स्थिते मित्रशुभेक्षिते स्याच्छंसंति पात्रं बहु भुक्तिकाले ॥१२५॥ विचित्रपातं प्रवदंति तज्ज्ञा भुक्तीश्वरे केंद्रुगते बलाढये॥ शुका सरेज्येंदुसुता बलाढ्यास्तैरेव युक्तेत्र विशेषितांशे ॥ १२६॥ भुक्तीश्वर मृदंशकमें विशेषतः पारावतादि अंशकोंमें पूर्ण बलयुक्त होवै, केन्द्रमें हो, मित्र एवं शुभग्रहोंसे दृष्ट होवैं तो भोजन कालमें बहुत पात्र होवै ॥१२५॥ भुक्कीश्वर केंद्रमें बलवान् हो तथा शुक्र बृहस्पति वुध बलवान् हेवैं इनसे भुकीश युक्त होवै वैशेषिकांशमें होवै तो ज्योतिपज्ञ भोजनकालमें अनेक प्रकारके पात्र होवें ऐसा कहते हैं॥ १२६ ॥ लग्नेश्वरेण सहितौ यदि भुक्तिनाथौ षष्ठस्थितौ यदि तदा प्रवदति लौहम्॥ पात्रं तदीश्वरयुतौ यदि वा विनाशस्थानक्षगौ सुदृढ- मत्र सुलोहपात्रम् ॥ १२७॥ कांस्यं वदति किल सुक्तिपतौ बलाढये वैशैषिकांशसहिते यदि सौम्यहष्टे॥ भुक्तीश्वरस्थितन- वांशपतिर्यदंशे तद्राशिपः शुभयुतोति तथैवमाहुः ॥१२८॥ ढशा दशांतरेश यदि लग्नेशसहित छटे भावमें होवें तो लोहेके पात्र मिलें यदि वह तीनों पष्ठेश सहित द्वादश स्थानमें होवैं तो वही लोहपात्र दृढ और सुंदर मिले।। १२७ ।। दशेश बलवान् होवै वैशेषिकांशकमें शुभग्रह दृष्ट होवै तो कांशीके पात्र विशेष होवें, जिसके नर्वाशकमें दशेश बैठा है वह जिसके अंशके नवांशकमें है वह शुभ ग्रह्युक्त हो तोभी वही फल कहते हैं॥। १२८ ॥। पापग्हेण सहिते यदि भुक्तिराशौ तद्राशिनाथयुतभागपतौ तदंशे। तद्राशिपे गतबले च शुभैरदष्टे भुक्ती कृतौ समदढं कथयंति तज्ज्ञाः॥१२९॥ भुक्तिराशि (धनस्थानराशि) पापग्रहसहित होवै उसके स्वामीसे युक्त जो नयास् है उसका स्वामी भुक्तिराशीके अंशमें होवै, भुकिराशीश हीनबल शुभग्रहोंसे अदृष्ट होवे तो भोजन समयमें, अदृढ (कच्चे ) पात्र होवैं ॥ १२९ ॥ धातुद्ययुतं पात्रं सुत्तयंशे नाथराशिगे। पापग्हेण संदष्टे काल- के बलवर्जिते ॥ १३० ॥

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(७४) सर्वार्थचिन्ताभणिः।

भुक्ति स्थानमें जो अंश है वही भुक्त्यंश राशि होवै अर्थात् भुक्त्यंश वर्गोत्तमांशमें होवै उसे पाप ग्रह देखे कालसंज्ञक अंशमें. तथा बलरहित होवै तो दो धातुके पात्र होवैं ॥१३०॥ बह्वाशनं भुक्तिपतौ सपापे दावाग्निदंडायुधकालभागे॥ नीचां- शके पापनिरीक्षिते वा शुभैन दोष: सहितेक्षणाभ्याम्॥१३१॥ भुक्तिपति पापयुक्त दण्डायुध वा दावानि अथवा कालअंशकमें होवै तो बहुत भोजन करे अथवा नीचांशकमें पापदृष्ट होवै तो भी वही फल होगा शुभग्रहोस दृष्ट वा युक्त यह योग होवै तो वह बह्वाशी फल नहीं होगा॥ १३१ ॥ सुक्तिस्थाने शुभयुते तदीशे शुभसंयुते॥ शुभग्रहेण संदष्टे सुख- भुक्स नरो भवेत्॥ १३२ ॥ भुक्तिसौख्ययुतः श्रीमांस्तदीशे बलसंयुते ॥ विशेषितांशके वापि गुरुशुकनिरीक्षिते॥ १३३ ॥ भुक्तौ स्वोच्चे त्रिकोणे वा तदीशेपि बलान्विते॥ कारकेपि विशे- षांशे शुभदष्टे सुखाशनी॥। १३४॥ भुक्तिस्थानमें शुभग्रह भुक्तीश शुभग्रहसे युक्त दृष्ट होवै तो वह मनुष्य सुखपूर्वक भोजन करनेवाला होवै॥ १३२ ॥ भुक्तीश वलवान् वैशेषि शिमें होवे अथवा बृहस्पति शुकसे दृष्ट होवै तो सुखसे भोजन करे॥ १३३ ॥ भुक्तिस्थानमें ग्रह अपने उच्च वा मूल त्रिको- णका होवै भुकीश बलवान् होवै कारकांश वा विशेषांशमें होवे शुभदृष्ट होवै तो सुखसे भोजन करे॥ १३४ ॥ कालोचिताशनी ुक्तिनाथे देहेशवीक्षिते। पापग्रहेण वा दष्टे नीचांशादियुते न तु ॥ १३५॥ अन्नप्रदो द्वितीयेंश गुरुसौम्य- युतेक्षिते॥ वैशेषिकांशकयुते मृद्ंशादियुतेपि वा ॥ १३६॥ गुरुशुक्युते भुक्तौ नाथे सौम्यनिरीक्षिते॥ वैशषिकांशकयुते अव्नदाता नरो भवेत ॥ १३७॥ युक्तिराशिपतौ वीयें केन्द्रे तूप- चयेपि वा॥ बलयुक्तैः शुभैदटष्टे त्वव्दाता भवेनरः ॥ १३८ ॥ सौम्ये स्वोच्चगते सत्तौ मित्रसौम्यनिरीक्षिते॥ नाथे वैशेषिकांशे- वा सुखसक्तिप्रदो भवेत् ॥ १३९॥ भुकीशपर लग्नेशकी दृष्टि होवै तो जिस समयमें जो उचित है वही भोजन करे, अथवा पाप ग्रहसे दृष्ट नीचांशादियुक्त होवे तो वह फल विपरीत जानना।। १३५।। द्वितीय भाव आरदांश गुरुवुवसे युक् वा दष्ट होवै वैशेषिकांश अथवा मृदंशादि युक्त होवै तो मनुष्य अम

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भाषाटीकासहित:। (७६) दाता होवै॥ १३६ ॥ भुक्ति स्थानमें गुरु शुक्र होवें भावका स्वामी शुभ ग्रहोंसे दृष्ट होवै, वैरोषिकांशमें होवै तो मनुष्य अवदाता होवे।। १३७॥ भुक्ति राशिका स्वामी बलवान् हेवि, केंद्र वा उपचयमें होवै, बलवान् शुभग्रहोंसे दृष्ट होवै तो मनुष्य अन्न देनेवाला होवै । १३८।। उच्चका बुध धनमावमें मित्र एवं शुभ ग्रहोंसे दृष्ट होवै अथवा भावेश वैशे- विकांशमें होवै तो सुखपूर्वक भोजन देनेवाला होवै॥ १३९॥ अल्पाशी रुचिकाम: स्यादुक्िनाथे शुभग्रहे ॥ स्वोच्चे वा शुभ- संदृष्टे मृद्ंशादिसमन्विते॥१४०॥ परात्रभुक्तदीशे तु क्रूरषष्टयं- शसंयुते॥ नी चखे चरसंदष्टे तदूषणपरो नरः ॥ १४१॥ भुक्ति- स्थानाधिपे मंदे तदीशे मन्दसंयुते॥ नीचर्कसूनुना दष्टे श्राद्ध- युक्सततं नरः ॥ १४२॥ भुक्तिभावका स्वामी शुभग्रह उच्चका वा शुभग्रहोंसे दृष्ट और मृद्धंशादि युक्त होवे तो योडा भोजन रुचिपूर्वक इच्छानुकूल पदार्थोंका करे॥ १४०॥ द्वितीयेश कूरषष्टयंशमें नीचगंत ग्रहसे दृष्ट होवै तो पराये अन्नखावै यदि नीचगतग्रहसे दृष्ट होवै तो भोजनके दूषणोंमें तत्पर रहै॥ १४१ ॥ द्वितीयेश शनि होवै अथवा द्वितीयेश शनियुक्त होवै नीचमें शनि- दृष्ट होवै तो वारंवार श्राद्धान्न भोजन करनेवाला होवै ॥ १४२॥ कुभोजी सुक्तिनाथे तु शन्यारगुलिकान्विते॥ नीचशत्रुयमां- शादौ शुभदृष्टिविवर्जित॥ १४३॥ तदीशे शुभसंयुक्ते शीघ्र- सुग्बलसंयुते॥ द्वितीये शुभराशौ वा शुभखेचरसंयुते॥१४४॥ तदीशे चरराशौ वा एुक्ती वा ताहशे ग्रहे॥ तादशे पापसंबंधे चिरभोक्ता तु दूषकः ॥ १४५॥ भुक्तिभावेश श्ञनि मंगल वा गुलिकसे युक्त, नीच, शत्रु और यर्माशादिमें हो शुभग्रह उसे न देखें तो कुभोजन करनेवाला होवै ॥ १४३ ॥ भुक्तीश शुभग्रहसे युक्त बलवान् होवै तो शीघ्र भोजन करनेवाला होवै, दूसरे भावमें शुभग्रहकी राशि शुभ ग्रहयुक्त होवै तो भी शीघ्र भोजन करे॥ १४४ ।। भुक्तीश चर राशिमें अथवा चरग्रह भुक्तिस्थानमें होवे उसी गकार जैसा पहिले शुभग्रह संबंध कहा है वैसा पाप ग्रह संबंध होवै तो बडी देरीतक भोगन करे और भोजनमें दूषणभी लगावै॥ १४५ ॥ विलग्नसत्ताष्टमवित्तराशौ दिनेशयुक्ते क्षितिसूनुद्दष्टे॥ भौमेथ वा वासरनाथटष्टे स्फोटागनिीतिं प्रवदेत्खलाद्वा॥ १४६॥ लग्नां-

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(७६) सर्वार्यचिन्तामणि:।

त्यशत्रुमदने सति भूमिपुत्रे माद्यन्विते कमलबंधुनिरीक्षिते वा। मूढारिनीचभवने यदि वा क्षितीजे त्वाज्यासृगादिसहित: स भवेत्तदानीम् ॥ १४७॥ लग्न, सप्तम, अष्टम, द्वितीय भावमें द्वितीयेश सूयसे युक्क, मंगलसे दृष्ट, अथवा पापग्रह, मंगळ, सूर्यस दृष्ट होवै तो विस्फोटक (त्रण) -- यद्ा अ्निकी भय होवे ॥ १४६ ॥ मंगल लग्न, द्वादश, छठे, सातवें में शनियुक्त सूर्यदृष्ट, अथवा अस्तंगत, शत्रु नीचराशिमें होवे तो मनुष्य रुधिररोग युक्त रहे॥ ४७ ॥ मंदात्मजेन सहिते यदि भूमिपुत्रे वित्तेथ वा निधनराशिसुपागते वा ॥ तेनैव वीक्षितयुते धनभावनाथे त्वाज्यस्पृशादिनियतं प्रवदंति तज्ज्ञाः ॥१४८॥ पापेक्षिते रविसुते धनराशियुक्त पापान्विते शुनकभीतिमुपैति मर्त्त्यः ॥ तद्भावनाथसहिते दिन- नाथपुत्रे दृष्टेथ वा शुनकभीतिमुपैति मर्त्यः ॥ १४९॥ मंगल शनिके साथ दूसेरे अथवा अष्टम स्थानमें होवै धनभावेश मंगलसे युक्त वा दृष्ट होवै तो रुधिर विकारका रोग निश्चय होता है ऐसा ज्योतिषज्ञ कहते हैं ॥ १४८ । धन स्थानमें पापदृष्ट शनि पापयुक्त भी होवै तो कुत्तेसे भय होवै, द्वितीयेशके साथ शनि होवै अथवा धनेशको शनि देखे तो मनुष्यको कुत्तेके काटनेका भय होवै ॥१४९ ॥ राहौ द्वितीये गुलिकेन दृष्टे युक्तथ वा सर्पभयं वदन्ति ॥ कद- न्नभुग्भूमिसुतेन युक्ते पित्रादिकानां फलमेवमाहुः॥१५०॥ लग्नेश्वरे शोभनखचरेंद्रे निध्यादिलाभं धनभावयुक्ते ॥ सौम्ये द्वितीये यदि सत्त्वहीने पापेक्षिते वाक्चलनं तदाहुः॥१५१॥ धन स्थानमें राहु गुलिकसे दृष्ट वा युक्त होवै तो सर्पकी भय कहते हैं वही राहु मंगलसे युक्त होवै तो कदन्न (कोदो वानरा आदि) खानवाला होवै पित्रादियावोंमें ऐसा योग होवै तो उनको भी वही फल कहते हैं।। १५० ।। लग्नेश शुभग्रह धनभावमें होवै तो निषि (उत्तम दस्तु ) आदिका लाभ होता है, यदि बृघ धनस्थानमें निर्बल तथा पापदृष्ट होवै तो पंचल बोलना (हेकलाआदि) होवै ॥ १५१॥ वाक्स्थानपेंद्रौ यदि सत्त्वहीनौ क्रूरांशगौ वाक्पवनार्दितः स्यात्॥ वाक्स्थानपे धीरतया विहीने पापेक्षिते वाकचलर्न्

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मावाटीकासहित:। (७७)

तदाहुः॥१५२॥ पापे धने पापनिरीक्षिते वा कूरांशगे पाप- युते विशेषात्। तत्स्थानपे पापनिरीक्षितेपि विषप्रयोग: खलु वंचनादेः॥ १५३॥ द्वितीयेश और लग्नेश बलहीन क्रूरांशकगत होवै तो जवान वायुरोगसे पीडित होवै, द्विती- येश निर्बल पापटष्ट होवे तो जवान चलायमान (अस्थिर) होना कहते हैं॥ १५२ ॥ धन स्थान पापग्रहसे दृष्ट होवै कूरांशकगत पापग्रहसे विशेषतः युक्त होवै द्वितीयेश पापदृष्ट भी होवै तो ठगपनी आदिसे विष (जहर) का पयोग होवै ॥ १५३॥ मित्रादिस्थानपवशादेवं तेषां फलं वदेत्॥ नाथकारकभावानां बलाबलवशात्तथा॥ १५४ ॥ सर्वेषामुपकारार्थ रहस्यार्थप्रका- शकः ॥ धनभावफलाध्यायो वर्णितोव्ययसूनुना ॥१५५॥ इति श्रीसर्वार्थचिन्तामणौ धनभावफलनिरूपणो नाम तृतीयोऽध्याय:॥३॥ इस प्रकारके योग मित्र आदि भावेशोंसे मित्रादियोंको भावेश भावकारक ग्रहोंके बलाबलके अनुसार कहना॥ १५४ ॥ अव्ययके पुत्र वेंकटेशने सर्वसाधारणके उपकारार्थ गुप्त अर्थको पकट करनेवाला धनभावफलाध्याय वर्णन किया ॥ १५५॥ इति श्रीसर्वार्थचिन्तामणौ महीधरकृतायां माहीधरभाषायां धनभावफला- व्यायस्तृतीयः ॥ ३ ॥

चतुर्थोऽध्यायः॥४॥

अथ तृतीयचतुर्थभावफलविचाराध्यायः। सहजेन सहजविकरमौषघसहायान्गलोरस्थानम् ॥ विद्याद्दक्षिणकर्ण भक्ष्यविशेषांश्र मूलादीन्॥ १ ॥ तीखरे भावसे भाई, पराक्रम, औषधि, सहाय, कंठ हृदय, स्थान, दाहिना कान, कंद, मूल आादि खानेके पदार्थोंका विचार होता है, सोई आगे प्त्येक योगवश कहते हैं ॥। १॥ नाशस्थितौ सोदरनाथभौमौ पापेक्षितौ सोदरनाशमाहुः।पाप- क्षंगौ पापसमागमौ वा भातृन् समासाद्य विनाशहेतुः ॥ २॥

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(७6) सर्वार्थचिन्तामणि:।

तृतीयेश और मंगल पापदष्ट बारहवें भावमें होवें तो भाइयोंका नाश कहते हैं, अथया वे दोनों पापग्रहराशिमें पापग्रहोंके साथ होवैं तो भाइयोंको पैदा करके उसके नाशका कारण होवै ॥२ ॥ नीचक्षंगौ सोदरकार काख्यौ नी चांशगौ पापसमागमौ वा।। क्ूरा- दिषष्टयंशयुतौ तदानों भ्रातृन्समासाद्य विनाशमाहुः ॥ ३ै॥ - तृतीयेश और भ्रातृकारक ग्रह नीच राशिमें नीचांशकमें अथवा पापयुक्क होवें तथा क्रूर आादि षष्टचशमें होवें तो हुये भाइयोंका नाश कहते हैं। ३ ॥। पापग्रहे सोदरभावयुक्ते सोत्थेथ वा पापनिरीक्षिते स्यात्।। तदी- शवरे पापखगांतरस्थे सहोदराणां कथयंति नाशम् ॥४॥ पापा- तरे पापनिरीक्षिते वा पापान्विते नीचगृहान्वितेवा॥ तृतीयभावे शुभखेचरेंद्रैरन वीक्षते सोदरनाशमाहुः ॥५॥ पापग्रह तीसरे होवें अथवा तृतीय भावको पापग्रह देखें उसका स्वामी पापग्रहोंके बीचमें होबै तो भाइयोंका नाश कहते है। ४॥ तीसरा भाव पापग्रहोंके बीच पापदृष्ट वा पापयुक्त होवै शुभग्रहोंसे न देखा जावै तो भातृनाश कहते हैं ॥ ५॥ भ्रातृस्थानाधिपस्यांशराशीशे नाशराशिगे॥ नीचारातिगते मूढे त्वाहु: सोदरनाशनम्॥ ६ ॥ शनिर्मादिसमायुक्ते पापखे- चरवीक्षिते॥ तदीशे नी चराशिस्थे सोदराणां विनाशनम्।७॥ पापांतरे तदीशे तु कारके वा तथाविधे। तथैव तद्धावनाथे सोदराणां विनाशनम्॥८।। ध्रातृस्थानेश जिस् ग्रहके अंशकमें है वह बारहवें स्थानमें होवै नीचज्शि शत्रुराशिमें हो अथवा अस्तंगत होवै तो भ्रातृनाश कहते हैं॥ ५॥ शनि मादंशमें पापग्रहसे दृष्ट होे तृतीयेश नीच राशिमें होवै तो भाइयोंका विनाश होवे॥ ७॥ तृतीयेश पापग्रहोंके बोच हो भ्रातृकारक ग्रहभी बैसाही होवै और जिस भावमें वह है उसका स्वामी भी वैसाही होवै तो भाइयोंका विनाश होवे ॥ ८ ॥ पापैहि वीक्षिते भावे भावेशे भावसंस्थिते।। कूरषष्टयंशके वापि सोदराणां विनाशनम्॥९॥ आ्रातृस्थानाधिपर्स्थांशराशीशो यन्नवांशके ॥। तन्नाथे नीचमूढारिभावे सोदरनाशनम् ॥१० ॥ आ्रातृस्थानाधिपे दुःस्थे कारके वा तथाविधे। पापेक्षिते पाप-

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भावाटीकासहित:। (७९) युते स्वोच्चे वा सोदरक्षयः ॥। ११॥ सोत्थेशयुक्तराश्यंशनाथे यत्र नवांशके।। तन्नाथे नीचमूढारिभावे सोदरनाशनम्॥ १२॥ अतिक्रूरसमायुक्त भावे वा कारकेपि वा॥ तद्वावनायके वापि बाल्ये सोदरनाशनम् ॥ १३॥ तृतीयेश तृतीयमें पापदृष्ट होवै अथवा क्ूरषष्टयंशमें होवै तो भाइयोंका नाश होवै॥ ९॥ जिसके नवांशकमें तृतीयेश है वह जिसके नवांशकमें हो वह नीच, शत्रु, अस्तंगत होवै तो आ्रातृनाश होवै॥ १० ॥ तृतीयेश दुष्टस्थानमें अथवा कारक ग्रह दुष्टस्थानमें पापदष्ट पाप- युक्त होवै तो अपने उच्चमें भी हो तो भी भ्रातृक्षय होवै॥ ११ ॥ तृतीयेश जिसके नवां- शकमें है वहभी जिस ग्रहके अंशमें है, वह नीच, अस्तु, शत्रुराशिमें होवे तो ब्रातृनाश हेवि । १२ । तृतीय भाव वा तत्कारक अत्यंत क्रूर युक्त होवै तृतीयेश भी ऐसाही होवे तो बाल्या- वस्थामें ध्रातृनाश होवै ॥ १३ ॥ यकिंचित्क्रूरसंयोगे तन्नाशश्विरकालतः॥ बलहीनवशादेवं सोद- रक्षयचिंतनम् ॥ १४॥ भ्रातृस्थाने शुभैर्यक्ते शोभनग्रहवीक्षिते॥ भावनाथे बलाढये तु आ्रातृलाभसुदीरयेत्॥१५॥ आतृपे कारके वापि शुभयोगनिरीक्षिते। भावे वा बलसंपूर्णे भ्रातृणां वर्धनं भ- वेत्॥ १६ ॥ केंद्रत्रिकोणगे वापि स्वोच्चमित्रस्ववर्गगे॥ नाथे घा कारके वापि भ्रातृलाभसुदीरयेत् ॥१७॥ जो कुछ तीसरे भावसंबंधी क्रूरसंयोग है उसका नाश बहुत समयमें होताहै भाव भावेशके हीनबलके वशसे भाइयोंका क्षय विचारना ।। १४ ।। तृतीय भाव शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट होवै तृतीयेश बलवान् होवे तो भ्रातृलाभ कहना ॥१५॥ तृतीयस्थान वा तद्भावकारक शुभग्रहोसे युक्त दृष्ट होवै भावपूर्ण वली होवै तो भाइयोंकी वृद्धि होवै॥ १६ ॥ तृतीयेश वा तद्धाव कारक केंद्र कोणमें वा उच्च मित्र अपने राश्यंशकादिमें होवै तो भ्रातृळाभ कहना॥ १७॥ सौम्यग्रहान्विते वापि सौम्यानामंशके यदि॥ नाथे वा कारके वापि भावे सोदरवर्द्नम् ॥१८ ॥ तुतीयेश शुभग्रहयुक्त शुभग्रहोंके अंशकमें होवै अथवा इस प्रकार कारक ग्रह होये तो भावपुद्ि होवै॥ १८ ॥ सोत्थेश्वरे गोपुरभागयुक्ते सिंहासने कारकखेचरेन्द्रे। सौम्यमहे तद्भवनाधिपे स्याद्भात्रादिलाभं कथयंति तज्ज्ञाः।।१९।।पारा-

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(८0) सर्वार्थचिन्तामणि:। वतांशे यदि केंद्रराशौ भावेश्वरे शोभनखेटयुक्ते ॥ सौम्यांशके सौम्यग्रहे तदीशे सोत्थादिबाहुल्युदीरयंति॥२०॥ तृतीयेश गोपुरांशमें सिंहासनांशमें कारक ग्रह और तृतीयेश शुभ ग्रह होबै तो ज्योति- षज्ञ आात्रादिलाभ कहते हैं॥ १९ ॥ तृतीयेश शुभ ग्रह युक्त हो, पारावतांशमें केंद्रस्थित हो जिस राशिमें तृतीयेश है उसका स्वामी शुभ राशि शुर्भाशकमें होवै तो भाई आदियोंकी बहुतायस कहते हैं॥ २० ॥ आ्रातृभावे स्वतुंगे वा स्वर्क्षे मूलत्िकोणगे॥ बलाढचे भावनाथे तु सोदरोत्पत्तिमादिशेत् ॥ २१॥ मृद्वंशादिसमायुक्ते भाव- नाथे शुभैरयुते॥ शुभेक्षिते वा भावेशे सोदरोत्पत्तिमादिशेत् ।। ॥२२॥ वैशेषिकांशे भावेशे हयथवा शुभवीक्षिते॥ मृद्वंशादि- युते वापि भ्रातृवर्द्धनमेव तु ॥ २३॥ लग्ननाथस्तु सोत्थेशमित्र- च्चेन्मित्रता भवेत्॥ भ्राता शत्रुर्भवेच्छतावेवं सर्वत्र युज्यते।।२४॥ तृतीयेश तीसरा वा उन्नमें वा मूलत्रिकोणमें घलवान् होवै तो उसके पीछे भाई होये ऐसा कहना ॥ २१ ॥ तृतीयेश मृद्ंशादियुक्त शुभगहसे दृष्ट युक्त होवै तो वही फल कहना । २२ ॥। तृतीयेश वैशेषिकांशमें हो अथवा शुभदृष्ट वा मृद्धंशादिमें होवै तो भाइयोंकी वृद्धि होवै॥ २३ ॥ लभनेश तृतीयेशका मित्र होवै तो भाइयोंके साथ मित्रता रहे, शत्रु होवै तो शत्रुता रहे ऐसा विचार पित्रादि भावोंमें भी होता है।। २४ ॥ अयुग्मभांशे यदि कारकेशौ गुर्वर्कभूसनुनिरीक्षितौ चेत्।। ओजे मृहे स्युर्यदि विक्रमाख्ये पुंभ्रातरस्तस्य वदति तज्ज्ञाः॥२५॥ युग्मांशके युग्मगृह्दे तदीशे भावे तथा कारकखेचरेन्द्रे ॥ सहो- दरीलाभमिहाहुरार्यां नपुंसकांशे किल तत्तथैव ॥ २६॥ सृतीयेश तथा नृतीयभावकारक ग्रह गुरु, सूर्य, मंगलसे दृष्ट विषम राशिमें वा तृतीय यादमें होवै तो सहोदर पुरुष (भाई) होवैं ऐसा ज्योतिषज्ञ कहते हैं॥ २५ ॥ तृतीयेश तथा कारक ग्रह समराशि समांशकमें समभावमें होवें स्त्रीग्रह उन्हे देखैं तो बहिन उत्पन्न होये, तृतीयेश तथा कारक नपुंसकांशमें नपुंसक अहोंसे युक्त दृष्ट होवैं तो भाई नयुंसक पैदा होगा ॥ २६ ।। आ्र तृरा श्यंशकवशाद्ातृसंख्या विनिर्दिशेत्।। नाथकारकसंघु- कराश्यंशाद्ा भवेत् तथा॥२७॥ आ्ाहृराशिसमायुक्तखेचरस्या-

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भाषाटीकासह़ित:। (८१) शकाद्देव्। सोत्थेशयुक्तराश्यंशात्कारकानन्वितभावतः ।।२८।। तयोः संयुक्तखवेटस्य राश्यंशाद्ा तथा भवेत। एतयो रश्मिमा- नाद्ा पापयोगाद्विनाशनम्॥२९॥ संवादे विविधे प्राप्ते तत्क- र्मबलतो भवेत्॥कारकाद्विकमेशाद्वा विकरांतस्य विनिर्दिशेत्३०। तृतीय स्थानकी राशि अंशकके वशसे भाइयोंकी संख्या कहनी, अथवा तृतीयेश तृतीय- भावकारकयुक्त राशि अंशकके तुल्य संख्या होती है॥ २७ ॥ तृतीयमें जो ग्रह है उसके अंशकसे अथवा तृतीयेश युक्त राशिसे कारकयुक्तभावसे संख्या कहनी।। २८ ।। अथवा तृतीयेश तृतोयभावकारक ग्रहके साथ जो ग्रह है उसके राशि अशकके तुल्य संख्या होतीहै, इनमें जो अधिक बली उत्तमांशगत हो उसका फल होताहै। अथवा उन दोनोंके रश्मिके प्माणसे कहना. ऐसेही पापयुक्त कालांशादिगत ग्रहोंसे हानिकी संख्या जाननी ॥ २९ ॥ जब बहुत मकारके योग हों तो उसका कर्म बलकारक ग्रहसे तृतीयभावेशसे जो अधिक बली पारावतांशादिमें हो उसीसे संख्या कहनी ॥ ३० ॥ शौर्याधिपे तुंगयुते बलाढचे केंद्रत्रिकोणे यदि सौम्यदष्टे॥ मूल. त्रिकोणे स्वगृहेष्टगेहे वैशेषिकांशे पुरुषः स धीरः॥ ३१॥धीरो भवेद्विकमराशिनाथे सौम्ये गृहांशे शुभखेटयुक्ते॥तथैव तत्कार- करवेचरेंद्रे सौम्यग्रहाणां भवने तु शूरः॥३२॥ तृतीयेश उच्चका बलवान् केन्द्र त्रिकोणमें शुभ ग्रहोंसे दृष्ट होवै यद्ा अपने मूलत्रिको- णमें अपनी राशिमें मित्र राशिमें वैशेषिकांशमें होवै तो वह पुरुष वैर्यवान् पंडित होवे ॥ ३१ । तृतीयेश शुभ ग्रहके नवांशमें शुभग्रह युक्त होवै तो धीरं ( पंडित ) होवै. तृतीय भावकारक ग्रहभी ऐसेही शुभ ग्रहके राश्यंशमें होवै तो पुरुष पराक्रमी होवै ॥ ३२ ॥ ैयान्वितो विक्रमराशिनाथसंयुक्तराश्यंशपतौ यदंशे॥ तदंशना- थे स्वगृहादिवर्गे युद्धे विदग्ध: कलहप्रवीणः ॥ ३३॥ तृतीयेश जिसके राश्यंशमें है वह ग्रह अपने राश्यादिवर्गमें होवै तो धैर्यवान् युद्धमें चतुर और कलहमें प्रवीण होवै ॥ ३३ ॥ विक्रमाधिपतौ स्वोच्चे नाशस्थे पापसंयुते॥ चरभे चरराश्यंशे युद्धात्पूर्व दढो भवेत् ॥ ३४ ॥ पापग्रहाणां भवने विक्रमे पाप- संयुते॥ तथाविधे तदीशेपि युद्धात्पूर्वे दढो भवेत् ॥ ३५ ॥ ऋ्रूरषष्ट्यंशगे वापि तदीशे नीचराशिगे।पापयुक्तेथ वा दष्टे युद्ध

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(८२) सर्वार्थचिन्तामणिः।

जाड्यो भवेन्नरः॥३६॥युद्धे पराजितः स्वोञ्चे विक्रमेशे विनाशमे। कारके बलहीने वा ऋरषष्टयंशसंयुते॥३७॥ तृतीयेश अपने उच्चका पापयुक्त बारहवें भावमें चरराशि चरांशकम होवे तोयुद्धसे पहिले दृढ (मजबूत) रहे युद्ध छिडनेपर कातर होनावै॥ ३४। तीसरे भावमें पापराशि पाप युक्त होवै तृतीयेशभी पाप राशिमें पापयुक्त होवे तौभी वही फल जाननना॥ ३५ ॥ तृतीयेश कूरषष्टचंशमें अथवा नीचराशिमें पापग्रहसे युक्त वा दृष्ट होवै तो युद्धकर्ममें अनजान होवै । ३६ ॥ तृतीयेश उच्चराशिका व्ययस्थानमें और भावकारक ग्रह बलहीन क्रूरपष्टंयशमें होवै तो युद्धमें मनुष्य पराजय (हार) पावै ।। ३७ ॥। सिंहासनांशे यदि विक्रमेशे पारावते गोपुरभागयुक्ते।। मृदंशके वा शुभदृष्टियोगे चित्तोत्सवो युद्धविशारद: स्यात्॥३८॥ युद्धाभिलाषी समरप्रवीणो वीर्येश्वेर सौम्ययुते स्वतुंगे॥ वैशेषि- कांशे बलपूर्णयुक्ते वृद्धंशगे वा विपरीतमन्यत्॥ ३९॥ तृतीयेश सिंहासनांश, पारावतांश, गोपुरांश युक्त अथवा मृद्ंशयुक्त शुभग्रह दृष्टयुक्त हेवि तो मानसी उत्सव सहित अर्थात सहर्ष युद्धमें चतुर होवै॥३८ ॥ तृतीयेश वुधयुक्त उच्च राशिमें वैशेषिकांशमें पूर्णबली अथवा मृद्ंशकमें होवै तो युद्धकी अभिलाषा करे लड़ाईमें नवीण (अभिज्ञ) होवै, विपरीत स्थानादिमें तृतीयेश होवै तो फलभी विपरीत जानना ।। ३९ ॥ शौर्याधिपे भानुयुतेत्र धीरश्चन्द्रान्विते मानसवैर्ययुक्तः॥कृष्णो जडो भौमयुते प्रकोपी सौम्यान्विते सात्त्विकबुद्धियुक्तः॥४॥ जीवान्विते धीरतया समेतः सर्वार्थशास्त्रार्थविशारदः स्याव॥ कामातुरस्त्वास्फुजिदन्विते स्यात्तन्मूलकोपात्कलहप्रवीणः ४१। तृतौयेश सूर्यसे युक्त होवे तो धैर्यवान्, चंद्रयुक्तसे मनके धैर्ययुक्त, मंगलयुक्तसे कृष्ण और मूर्ख गुस्सावाला, बुधसे सात्विकबुद्धियुक्त,।। ४० ॥ गुरुसे धीरतायुक्त सब अर्थ शासार्थ जाननेवाला, शुकसे कामातुर तथा काम देवसंबंधी कोपसे कलह करनेमें बडा चतुर होवै॥४१॥ जडो भवेद्ासरनाथपुत्रयुक्ते फणीनामधिपेन युक्त॥ बहिटंढो हृद्रतजाड्ययुक्तः केत्वन्विते मांदियुते तथैव ॥४२॥ तृतीयेश शनियुक्त होवै तो मूर्ख होवै, राडुसे युक्त होवै तो बाहरसे तो दृढ रहे परन्तु हृदयमें जडता रहे, केतुसे युक्त होव तथा मदंशसे युक्त होवै तौ भी वही फल होगा॥४२॥

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भाषाटीकासहित:। (८३) लगे गुरौ विक्रमनाथयुक्ते चतुष्पदानां प्रवदति भीतिम् ॥ गवां भयं वा जलराशिलमे जलप्रमादो त्रुवते ध्रुव स्यात्॥। ४३। वी्याधिपे राहुसमेतराशीनाथान्विते राहुयुते विलनने॥ सर्पाद्धयं विक्रमराशिनाथे बुधेन युक्ते गलरोगमत्र॥४४॥ तृतीयेशयुक्त बृहस्पति लन्नमें होवै तो चौपैया पशुकी भय होवै, लगमें जलराशिक बैर होवें तो गोसे भय होवै तथा जलसंवंधीममाद निश्चय होगा ऐसा कहते हैं॥४३॥ जिस राशिमें राहु है उसके स्वामीके सहित तृतीयेश लगनमें राहुयुक्त हेोवे तो सर्पसे भय हवै तृतीयेश बुधयुक्त होवै तो यहां कठरोग होगा ऐसा कहना ॥ ४४ ॥ नीचे तृतीयेरिगृने विमूढे पापेक्षिते तहरलप्रमाद: ॥ विषप्रयो- गाद्विषभक्षणाद्वा तषामभावेत्र विनिश्वयार्थः॥ ४५॥ शुके ब- लाढये यदि ना शशांके सौम्येक्षिते शोभनखेटयुक्त ॥ सोत्थ- स्थिते स्वोच्चसुमित्रवर्गे सुपात्रभोक्ता सुखभुक्तिभाक्स्यात्॥४६॥। तीसरे भावमें कोही ग्रह नीच, शत्रुराशिका, अस्तंगत, पापदृष्ट होवै तो विषमयोग (विषकी क्रिया) से अथवा विषभक्षणसे जहरका ममाद होवे उक्तयोगके अभावमें विषर, हितता जाननी॥ ४५॥ तीसरे भावमें बलवान् शुक्र अथवा चंद्रमा शुभ ग्रहसे युक्त दृष्ट उच्चमें यद्ा मित्रराशिमें होवै तो मनुष्य उत्तम पात्रमें सुखपूर्वक भोजन करनेवाला होवै४६॥ पापे तृतीये गलरोगमत्र वदति मांद्यादियुते विशषात्॥ भौमा- न्विते प्रेतपुरीशभागे तृतीयराशौ यदि कर्णरोगम् ॥४७॥ सोत्थे शनौ मांदियुते तथैव वाताद्दयं सौम्यदशा विहीने॥ तृतीयनाथ- स्थितराशिनाथसंयुक्तराश्यंशपतौ च केन्द्रे॥ ४८॥ तीसरे भावमें पापग्रह होवै विशेषतः मांदशादि युक्त होवै तो कंठरोग होवै मंगल तीसरे यमांशमें होवै तो कानोंमें रोग होवै॥ ४७ ॥ तीसरा शनि मादंशमें शुभदृष्टि रहित होवे तो वातरोगसे भय होवै तृतीयेश जिसकी राशशिमें होवै वहमी जिसके राश्यंश्में है वह केदरमें होवै ॥। ४८ ॥ पापान्विते पापनिरीक्षिते वा वदंति कर्णोद्धवरोगमत्र ॥ क्रूरादि- पष्टयंशयुते तदीशे कर्णस्य रोगं कथयंति तज्ज्ञाः।।४९।। पाप युक्त दष्ट होवै तो कानका रोग कहते हैं तृतीयेश कूरादिषष्ट्यंत्में होवै तो भी ज्योतिषी कानका रोग कहते हैं।। ४९।।

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(८४) सर्वार्थचिन्तामणिः। सौम्ययुक्त तृतीये वा सौम्यखेचरवीक्षिते॥ तदीशे शुभसंयुक्त कर्णयोरभूषणं वदेत्॥५०॥ शुके तृतीये यदि मौक्तिकं तु जैवेऽतुलं त्वाभरणं वदति॥ भानोस्तु संबंधयुते तृतीये सद्रत्नमानीलमयं हि मांे॥५१॥ तीसरे स्थानमें शुभग्रह हो अथवा शुभ ग्रह देखे तृतीयेश शुभयुक्त होवै तो कानोंमें भूषण होवै ऐसा कहना॥ ५०॥ उक्तलक्षण संपन्न शुक तीसरे होवै तो कानोंमें मोतियोंके भूषण होवैं वृहस्पति होवै तो सर्वोत्तम आभरण कहते हैं, तृतीयमें सूर्यका संबंध होवै तो उत्तम रत्नोंके, और शनिका संबंध होवै तो नीलमके भूषण होवैं ॥ ५१ ॥ चंद्रे बहु त्वाभरणं तु सौम्ये श्यामं भवेत्तत्क्षितिसूनुराशौ॥ विचि- त्रमार्गाभरणं तथैव पापेक्षिते तल्लयमाहुरार्याः॥५२॥ शुभग- हाणां भवने तु तस्मिस्तृतीयराशौ श्रवणं कथानाम्॥ पुण्यादि- कानां यदि पापराशौ क्रूसश्र तत्कर्णकुठारमाहुः ॥५३॥ इति तृतीयभावः॥ ऐसा चंद्रमा होवै तो बहुतसे भूषण होवैं बुध होवै तो वह पन्नाके होवे मंगलकी राशिका होवै तो अनेक रंगके भूषण होवैं यदि तृतीयभाव वा उक्तयोग पापदृष्ट होवै तो उक्त फलका नाश आचार्य कहते हैं ॥५२ ॥ तीसरे भावकी राशि शुभ ग्रहकी होवै तो उत्तम कथा पुण्य आदिको सुननेमें आवें पापराशि पापयुक्त होवे तो दुष्टकथा कर्णनाशक कहते हैं ॥ ५३॥ इति तृतीयभावविचारः ॥ अथ चतुर्थभावविचारः। बंधुभवने बंधून्गृहमातृजलात्मवृद्धिभोज्यादीन् ॥ वाहनहृदय- स्कंधासनशयनसुखान्यधो जलं ब्रुयात् ॥५४॥ चतुर्थ भवनसे बंधु (ज्ञाति), घर, माता, जल, अपनी वृद्धि, भोज्यपदार्थादि, वाहन, हृदयस्थान, स्कंधा, आसन, शयन, सुख, पाताल कूपका विचार कहना, सोई आगे कहते हैं॥५४॥ लग्नेश्वरे लग्नगते सुखांगनाथेन युक्ते यदि गेहलाभः॥ अयत्नतः स्याच्छुभदृष्टियोगात्स्वोच्चे स्वमित्रे स्वगृहे बलाढ्ये।।५५॥। गेहा- घिपे केंद्रगते बलाढये सौम्येक्षिते मंदिरलाभमाहुः ॥ वैशेषि- कांशे परमोच्चभागे गेहेश्वरे मंदिरलाभमाहुः॥५६॥

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भाषाटीकासहित: । (८५)

लग्नेश लन्नमें चतुर्थभावेशयुक्त होवै तो गृहलाभ होवे शुभग्रहोंसे युक्क दृष्ट भी होवै यद्ा अ- पने उच्चराशि मित्र राशीमें बलवान् होवै तो विनाही पयत्न गृहलाभ होवै॥ ५५॥ चतुर्येश केंद्रमें बळसहित शुभग्रहद्दष्ट होवै तो घरका लाभ कहतेहैं। यदि चतुर्थेश वैशेषिकांशमें पर- मोच्चांशमें होवै तो भी गृहलाभ कहतेहैं ॥ ५६॥ गृहस्थानाधिपस्यांशनाथसंयुक्तराशिप: ॥ तदंशाधिपतौ केंद्रे गृहलाभमुदीरयेत्॥७॥ भाग्येशे केंद्रभावस्थे गृहेशे स्वो- च्चमित्रगे॥ गृहराशिगते खेटे स्वोच्चे बहुविचित्रकम् ॥५८॥ तृतीये सौम्यसंयुक्ते गृहेशे स्वबलान्विते ॥ तदीशे बलसंपूर्णे हर्म्यप्राकारमंडितम् ॥५९॥ चतु्थेश जिसके नवांशमें है वह जिसकी राशिमें है उसके स्थित अशाधीश केन्द्रमें होवै तो गृहलाभ कहना॥ ५७ ॥ नवमेश केंद्रमें चतुर्थेश मित्रराशिमें और चतुर्थभावमें उच्चका ग्रह होवै तो चित्रविचित्र घर मिले॥ ५८ ॥ तीसरेमें शुभग्रह होवै चतुर्थेश अपने बलसे पूर्ण होवै तृतीयेशभी बलपूर्ण होवै तो अट्टालिकासे शोभित उत्तम घर मिले॥ ५९॥ सिंहासनांशके वापि गृहेशे गोपुरांशके ॥ मृद्वशादियुते वापि तद्गूहं सौधमण्डितम् ॥ ६०। पारावतांशके गेहनाथे गुर्विन्दु- वीक्षिते॥ गोपुराद्यंशके वापि दैविकं हर्म्यमादिशेत्॥ ६१ ॥ विचित्र सौधप्राकारमण्डितं गृहमादिशेत् । कर्माधिपेन सहिते नाथे केन्द्रेर्क सूनुना ॥ ६२ ॥ चतुर्येश सिंहासभांशमें अथवा गोपुरांशकमें यद्ा मृद्धशादिमें होवै तो उसका घर चूनेसे शोभित होवै ॥ ६० ॥ चतुयेश पारावतांशकमें बृहस्पति चंद्रमासे दृष्ट होवै अथवा गो पुरादि अंशञकमें हाव तो उसका महल देवताओंकासा यद्ा देवतायुक्त हेवि ॥ ६१ ॥ चतुर्थेश दशमेश शनिसे युक्त केद्रमें होवै तो रंग विरंग चूना आदिसे तथा अटारियों सहित घर कहना॥ ६२ । गेहाधिपे नाशगते यदि स्यात्पापेक्षिते तद्वहनाशमत्र ॥ गेहेश- संयुक्तनवांशनाथे नाशस्थिते स्यादपि गेहनाशः॥६३॥ चतुर्थेश बारहवें पापयुत होवै तो उसके घरका नाश होवै चतुथेंश जिसके नवांशकमें हो वह बारहवें होवे तोभी मकानका नाश हेवै ॥ ६३ ॥

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(८६) सर्वार्थचिन्तामणि:। बन्धुस्थानस्थिते सौम्ये सौम्यग्रहनिरीक्षिते॥ तत्कारकबलाव्ये वा बन्धुपूज्यो भवेन्नरः ॥ ६४॥ बन्धुस्थानगते जीवे तदीश शुभसंयुते ॥ गुरुदृष्टिसमायुक्ते बंधुश्रेष्ठो भवेन्नरः ॥ ६५ ॥ चतुर्थ स्थानमें शुभग्रह गुभग्रहसे दृष्ट होवै तथा चतुर्थभावकारक ग्रह बलवान् होवे तो मनुष्य बन्धुवर्गका पूज्य (माननीय) होवै॥ ६४ ॥ चौथे बृहस्पति चतुर्थेश शुभ यहसे युक्त बृहस्पतिसे दृष्ट होवै तो मनुष्य बांधवोंमें श्रेष्ठ होवै ॥ ६५ ॥ बंधूपकर्त्ता तन्नाथे केंद्रे कोणेथ संयुते॥ वैशेषिकांशसंयुक्ते पाप- दृग्योगवर्जिते ॥ ६६ ॥ बन्धूनासुपकारी स्याइंन्घौ गुर्वच्छ- सोमजाः ॥ तेषां गृहे वा तैर्दष्टे सृद्ंशादिसमन्विते ॥ ६७॥ चतुर्थेश केंद्र त्रिकोणमें शुभ ग्रहयुक्त, वैशेषिकांशकमें पाप ग्रहोंके योग दष्टिस रहित होवे तो बन्धुवर्गका उपकार करनेकाला होवे॥ ६६ ॥ चतुर्थ स्थानमें गुरु, शुक, बुध होवे अथवा इनकी राशि इनसे दृष्ट होवे मृद्धंशादि शुभांशकोंसे युक्त होवे तो बन्धु जनका उपकार करने वाला होवे ॥ ६७ ॥ बन्धुभिस्त्यक्तपुरुषस्तदीशे पापसंयुते ॥ क्ूरषष्टयंशके वापि नीचारातिगृहेपि वा॥ ६८ ॥ बहुपापसमायुक्ते बन्धौ नाथे तथैव हि। तत्कारके तथैवात्र बन्धूनां कुत्सितं वदेत ॥ ६९॥ चतुर्थेश पापयुक्त अथवा कूरषष्टचंशमें यद्ा नीच शत्रुराशिमें होवै तो वह पुरुष बन्धु- जनोंसे त्यागा होवै॥। ६८ ॥ चतुथ स्थानमें बहुत पाप हों चतुर्येश भी पापयुक्त होवै तथा चतुर्थभावकारकभी पापयुक्त होवे तो बन्धुवर्गमें निन्ध होवै ॥ ६९॥ नाथकारकसंयुक्तनवांशेशांशनायकः ।। नीचराशिगतो मूढो बन्धूनां भयकर्मकृत् ॥७०॥ बन्धूपभोगी केन्द्रस्थे तदीशे शुभ- वीक्षिते ॥। गोपुरादंशके वापि शृद्ंशादिसमन्विते॥७१॥ धने लाभे त्रिकोणस्थे तन्नाथे शुभवीक्षिते॥ साम्यग्रहाणामंशे वा बन्धूनासुपकारकृत् ॥७२॥ बन्धुद्वेषी भवेन्नित्यं पापाकांते ग्रहे यदा॥ नीचास्तखेट संयुक्ते शुभदग्योगवरिते॥७३॥ चतुर्थभावेश, तथा चतुर्थभावकारक जिसके नवांशकमें हों वह भी जिसके नवांशकमें हो वह नीच राशिमें अस्तंगत होवै तो 'बन्धुवर्गके वास्ते भयके काम करे। ७० ॥ चतुर्थेश

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भाषाटीकासहित:। (८७)

केन्द्रमें शुभग्रहृदृष्ट और गोपुरादि अथवा मृद्धंशादिसे युक्त होवे तो बन्धुजनका सुख भोगकरे । ७१ । चतुथेश दूसरे ग्यारहवें यद्ा त्रिकोणमें शुभग्रहृद्ृष्ट होवै अथवा शुभग्रहोंके अंशकमें होवै तो बन्धुजनका उपकार करे। ७२॥ चतुर्थेश पापोंका दबायाहो, नीचगत, अस्तंगत ग्रहसे युक्त होवै शुभ दृष्टि योग रहित होवै तो बन्धुवर्गका द्वेषी होवे।। ७३े।। कस्मिश्रित्खेचरेन्द्रे वा बन्धौ स्वेच्चे स्वमित्रमे॥ गुरुणा दष्टिसं- पाते बन्धुपूज्यो भवेन्नरः॥ ७४॥ गृहस्थाने चरे लग्ने तदीशे चरराशिगे॥ तथैव तत्कारकेपि बहुस्थाने गृहं भवेत ॥७ ।। चतुर्थ स्थानमें कोई ग्रह अपने उच्च वा मित्रराशिमें होवे बृहस्पति उसे देखे तो मनुष्य बंधुवर्गका पूज्य होवै॥ ७४ ॥ चतुर्थ भावमें चरराशि हो उसका स्वामी भी चरराशिमें हो वैसाही चतुर्थकारक ग्रहभी चरराशिमें होवे तो एक जगे छोडकर दूसरे दूसरेसे तीखरे इत्यादि कितनेही जगे घर होवे॥ ७५॥ स्थिरे गृहे स्थिरगृहं नाथकारकयोरि। पष्टचंशे शुभभागे वा तदीशे स्थैर्यतां व्रजेत ॥ ७६॥ अर्थव्ययगृहेशैस्तैर्यावंतः पाप- संयुताः ॥ तावद्रेहादिनाशः स्याच्छुभदृष्ट न दोषदाः ।७७॥ अर्थव्ययगृहेशास्तु केन्द्रकोणादिसयताः ॥ तावद्रेहालयं सवै शोभनं तत्र निर्दिशेत॥७८॥ चतुर्थेश चतुर्थकारक स्थिर राशियोंमें होवै तो एकही घरमें स्थिरता रहे, चतुर्थेश शुभ- पष्टयंश शुभांशकमें होवे तो घरमें स्थिरता होवै॥ ७६ ॥ वह चतुर्थेश चतुर्थभावकारक धन व्यय भावेशयुक्त जितने पापोंसे युक्त होवै उतने वर आदि नष्ट होवैं उनपर शुभग्रहोंकी दृष्टिभी होवै तो दोप नहीं देते।। ७७ ॥ द्वितीयभावेश तथा व्ययभावेश केन्द्र कोण आदिमें होंवे तो जितने शुभग्रहोंसे युक्त हो उतने घरद्वार अच्छे होंगे ऐसा कहना॥ ७८ ॥ गृहेशे कर्मराशिस्थे कर्मेशे गेहमागते । बलयुक्ते धरासूनौ बहु क्षेत्रं विनिर्दिशेत्॥ ७९॥ बलाव्ये कर्मराशीशे बन्धुस्थाना- घिपे तथा॥ तयोमैत्री यदा तस्य बहु क्षेत्रं विनिर्दिशेत्।८०। क्षेत्रस्थाने शुभैर्यक्ते तदीशे शुभसंयुते॥ तत्कारके तथा प्राप्ते बहुक्षेत्रधनैर्युतः ॥ ८१ ॥ क्षेत्राधिपे पञ्चमस्थे गोपुरांशादिसं- युते॥ मृद्धंशादिगते वापि बहुक्षेत्रसमन्वितः ॥ ८२।।

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(८८) सर्वार्थचिन्तामणिः। चतुर्थेश दशम, दशमेश चतुर्थ और मंगल बलवान् होवै तो बहुत खेती ( जमीन) होवै ऐसा कहना॥ ७९ ॥ दशमेश बलवान् होवै तथा चतुर्थेशभी वली होवै उनकी आपस- में मित्रता होवै तो बहुत खेती होवै॥ ८० ॥ चौथे शुभ ग्रह चतुर्थेश शुभयुक्त चतुर्थकार- कभी वैसाही होवै तो बहुत खेती धन उसके होवें॥ ८१ ॥ चतुर्थेश पंचममें गोपुरांशा- दियुक्त अथवा मृद्धंशादियुत होवै तो बहुत खेतीवाला होवै॥ ८२॥ भ्रातृकारकसंयुक्ते भ्रातृनाथेन संयुते॥ क्षेत्रे तदीश्वरे वापि भ्रातृ- क्षेत्रं विनिर्दिशेत्॥ ८३।। चतुर्थमें तृतीयकारक ग्रह तृतीयेश अथवा चतुर्थेश भी उसमें होवै तो भाईकी खेती पाँवै ऐसा कहना॥ ८३ ॥ क्षेत्रेशसंयुक्त नवांशनाथे केंद्रस्थिते मित्रनिरीक्षिते वा॥ भौमा- न्विते भौमदशा समेते भ्रातुर्द्धनं क्षेत्रसुदाहरन्ति।। ८४।। लगे- श्वरे क्षेत्रगते बलाढये लग्ने बलिष्ठे यदि क्षेत्रनाथे॥ शुभग्रहैर्द- ष्टसमागमे वा क्षेत्रं स्वकीयेन बलेन याति ॥ ८५॥ चतुर्थेश जिसके नवांशमें हो वह केंद्रमें हों अथवा उसे उसका मित्र देखे मंगलसे युक्त वा दृष्ट होवे तो भाईकी खेती धन मिलना कहतेहैं।। ८४ ॥ लग्नेश चतुर्थस्थानमें बलवान् होवे लग्नमें चलवान् चतुर्थेश हेवि शुभग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट होवै तो अपने बल (पुरुषार्थ) से खेती धन कमावै ॥ ८५॥ कलत्रकारके क्षेत्रे तदीशे वा कलन्नगे ॥ तदीशयोस्तथा मैत्र्यां कलत्रात्क्षेत्रमादिशेत् ॥ ८६।। चतुर्थ स्थानमें स्त्रीकारक ग्रह अथवा चतुर्थेश सप्तम स्थानमें होवे चतुर्येश सप्तमेशकी मैत्री होवै तो स्त्रीसे खेती पावै॥। ८६॥ षष्ठेश्वरे क्षेत्रगते बलाव्ये षष्ठस्थिते वा गृहभावनाथे॥ षष्ठेश्वरा- त्क्षेत्रगते बलाढचे शत्रोः सकाशात्स धरासुपैति॥८७॥ पारावतांशे स्वगृहे बलाढचे क्षेत्रेश्वरे चोपचयं गते वा॥ आरो- हभागे शुभदृष्टियुक्ते क्षेत्रस्यवाहुल्यमुदाहरंति । ८८ ॥घनेशला- भेशसमन्विते वा क्षेत्रे तदीशेप्यथ कारके वा॥ वैशेषिकांशे शुभ- दृष्टियुक्ते बह्वर्थरूपं गृहमाहुरार्याः।।८९।

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भाषाटीकासहित:। (८९) पष्टेश वलवान् चौथे हेवै अथवा चतुर्थेश छठे होवै वष्टेशसे चतुर्थेश बलवान् ग्रह होवै तो शत्रुसे खेती मिले॥ ८७॥ चतुर्थेश पारावतांशमें अपनी राशिका बलवान् होवै अथवा उपचय ३।६।११।१० स्थानमें होवे उच्चाभिलापी होवे शुभ ग्रह उसे देखे तो बहुत खेती होवै ऐसा कहते हैं।। ८८॥ धनेश लाभेशसे युक्त चौथे भावमें हो अथवा चतुर्थेश वा चतुर्थ भावकारक ग्रह वैशेषिकांशकमें होवै शुभदृष्टि युक्त होवै तो बहुत पकारके बहुत घर होवें ऐसा श्रेष्ठ ज्योतिषी कहते हैं।। ८९ ।। क्षेत्रेश्वरे नीचगते विमूढे पापांतरे पापनिरीक्षिते वा॥ पापगहक्े- नगतेरिगेहे क्षेत्रादिनाशं कंथयंति तज्ज्ञाः ॥९०।पापांतरस्थे यदि भूमिपुत्रे पापान्विते पापनिरीक्षिते वा॥ पापग्रहक्षेत्रगतेथ वा स्यात्कूरांशके भूमिविनाशमाहुः ॥९॥ चतुर्थेश नोच वा अस्तंगत पापग्रहोंके बीच, अथवा पापदट्ट, पापग्रहके राशिमें, शत्रुरा- शिमें होवै तो ज्योतिषज्ञ खेती आदिका नाश कहतेहैं। ९० ॥ मंगल यदि पापग्रहोंके बीच हो अथवा पापयुक्त पापदृष्ट हो वा पाप ग्रहके राशिमें हो, क्रूरांशकमें होवे तो भूमिका नाश कहते हैं॥। ९१ ॥ ऋ्ूरादिषष्टयंशगते तदीश क्षेत्रे सपापे यदि नीचमे वा॥दुःस्थेरि- गेहे त्वतिभीषणांशे क्षेत्रादिनाशं कथयंति तज्ज्ञाः ॥ ९२ ॥ क्षेत्रेश्वरे पापयुते धनस्थे नीचारिभे क्षेत्रविनाशमेति ॥ स्वोञ् स्थिते तद्भवनेश्वरे तु पापान्विते विक्रयमेति भूमे: ॥९३॥ चतुर्थेश कूरादि षष्टयंशकमें हो, चतुर्थमें पापग्रह हो अथवा भावेश दुष्ट स्थानमें शत्रु- राशिमें अथवा भयानक अंशकमें होवै तो खेती आदिका नाश ज्योतिषज्ञ कहते हैं ॥ ९२ ॥ चतुर्थेश पापयुक्त धनस्थानमें नीच वा शत्रु राशिका होवे तो खेती नष्ट होवै यदि चतुर्थेशा अपने उच्चमें पापमुक्त होवै तो भूमि विक जावै ॥९३ ॥ आज्ञाक्षयात्क्षेत्रविनाशमाहुराज्येश्वरे क्षेत्रगते सपापे॥ ऋरांशके मृत्युयमादिभागे कर्मेश्वरेणापि युते तथैव ॥ ९४॥ आज्ञाक्षया- द्दूमिविनाशमेति राज्येशतत्कारकभूमिनाथे ।। ्ूरांशके वा त्ववरोहभागे नाशस्थिते मृत्युयमादिभागे ॥ ९५॥ राज्येश चतुर्थमें पापयुक्त होवे मृत्यु यम आदि कूराशकमें होवै तो आज्ञाक्षय (निय- मादिभंग) से भूमिनाश होवै॥ ९४ ॥ राजभावेश, राजकारक और चतुर्थेश, कूरांशकमें अथवा अवरोहभागमें, व्यय स्थानमें, मृत्यु यम आदि अंशकमें होवे तो आज्ञाक्षयसे भूमि- नाश होवैं । ९५ ॥

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(९० ) सर्वार्थचिन्तामणिः। राजाज्ञया क्षेत्रविनाशमेति भानौ तदीशेन युतेपि निग्ने॥ धनेश- संयुक्तनवांशनाथयुक्तांशपेनापि युते सपापे ॥ ९६॥ जीवेन दष्टे यदि वा तदीशे रम्ये गुरौ शोभनखेचरे वा ॥ सौम्यांतरे तद्भवने ससौम्ये सुखी भवेत्सर्वजनेषु सुख्यः ॥९७॥ चतुर्थेश युक्त सूर्य नीचमें होवै धनेश जिसके नवांशकमें है वहभी जिसके नवांशमें है उससे युक्त सपाप होवै तो भी राजाकी आज्ञासे खेतीका विनाश होवै॥ ९६ ॥ चतुर्थेश यदि बृहस्पतिसे दृष्ट होवे बलवान् बृहस्पति अथवा शुभ ग्रह शुभग्रहौंके मध्यमें हो चतुर्थ शुभयुक्त होवै तो मनुष्य सुखी और सब जनोंमें श्रेष्ठ होवै ॥ ९७॥ जीवे बलाढचे सुखराशिनाथयुक्ते ससौम्ये तु चतुष्टये वा ॥ जीवेन दृष्टे यदि वा तदीश मृद्वंशके वा सुखभाङ्गरः स्यात्।९८॥l सुखे गुरौ शोभनखेचरे वा सौम्यांतरे तद्भवने ससौम्ये॥ जीवे बलाढचे यदि लग्ननाथात्सुखी भवेत्सर्वजनेषु सुख्यः ॥ ९९॥ बलवान् बृहस्पति चतुर्येशसे युक्त शुभग्रहयुक्त होवै अथवा केंद्रमें होवै यद्ा चतुर्थेश वृहस्पतिसे दृष्ट होवै वा मृद्ंशकमें होवै तो मनुष्य सुख भोगनेवाला होवै॥ ९८ ॥ चतुर्थ भावमें वृहस्पति अथवा शुभग्रह होवै चतुर्थ भाव शुभग्रहयुक्त शुभग्रहोंके बीचमें होवै बृहस्पति लग्नेशसे बलवान् होवै तो मनुष्य सुखी तथा सबसे श्रेष्ठ होवै॥ ९९॥ गोपुराद्यंशके वापि सुखपे देवपूजिते॥ धनायवृद्धिभावेषु तस्मि- नू खेटे सुखी भवेत्॥ १००॥ सौम्येतरान्विते सौख्ये बल- हीने गुरावपि ॥ सपापे दुर्बले नाथे दुःखी स्यादर्थसंयुतः॥ ।। १०१॥ पुत्रार्थबन्धुयुक्तश्रेदःखी स्यान्नीचखेचरे॥ सुखी तदीशे पापेन युक्ते ऋूरांशसंयुते॥ १०२॥ सुखेश वृहस्पति गोपुरादि अंशकमें द्वितीय लाभ और वृद्धिभावमें होवै तो मनुष्य सुखी होवै॥। १००॥ चतुर्थ भावमें पाप ग्रह होव वृहस्पति बलहीन होवै चतुर्थेश पापयुक्त निर्बल होवै तो धनसहित भी दुःखी होवै॥ १०१ ॥ चतुर्थेंश पापयुक्त चतुर्थमें नीचका ग्रह होवै तो पुत्र, धन, बंधु सहित सुखीभी दुःखी होवै ॥ १०२ ॥ रव्यारयुक्ते सुखभावनाथे क्ूरांशके सौम्यदृशा विहीने।। आरोहभागेतरभागयुक्ते जातो नरो दुःखित एव नित्यम्॥१०३॥

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भाषाटीकासहित:। (९१)

नीचारिभागे रविभूमिपुत्रे सुखस्थिते पापदशा समेते ।। क्ूरांशके तद्भवनाधिनाथे गृहार्थहीनो भवति प्रमादात् ॥ १०४॥ चतुर्थ राशिका स्वामी सूर्य मंगल युक्त होवै कूरांशमें शुभदृदष्टि रहित होवै अवरोही अंश- कोमें होवै ऐसे योगमें जिसका जन्म होवै वह सर्वदा दुःखित रहे॥ १०३ ॥ सूर्य मंगल नीच शत्रु अंशकमें सुख भावमें पापदष्ट होवे चतुर्थेश कूरांशकमें होवै तो अपने ममादसे वर तथा धनसे हीन होताहै॥ १०४ ॥ पापान्विते पापनिरीक्षिते वा पापांतरे वा सुखमे तदीश ॥ क्रूराहिषष्टयंशसमन्विते वा पापी नरः स्याच्छुमदृदष्टियुक्ते।। ।१०५॥ पापाधिकत्वे सुखराशियुत्ते तदीश्वरे चारिविमूढयाते।। पापान्विते वा यमसूनुयुक्ते जातो बहुत्वं सस्ुपैति पापम्॥१०६॥ चतुर्थ भाव पापयुक्त पापदष्ट यद्ा पापातःस्थ होवे वा उसका स्वामी क्रूरआदि पष्टयं- शमें होवै और शुभदृष्टि युक्त होवै तो मनुष्य पापी होवैं॥ १०५ ॥ चतुर्थ राशिमें बहुत पाप होवैं उसका स्वामी शत्रुराशिमें वा अस्तंगत होवै पापान्वित वा शनियुत होवै तो मनुष्य बहुत पापोंको पाप्त होताहै॥ १०६ ॥ शुकेन्दुविदेवपुरोहितानां क्षेत्रे सुखे पूर्णबलान्वितानाम्।। शुभान्विते शोभनदष्टिपाते जातो नरोऽयं भुवि भुक्तिभाकस्या- त् । १०७॥ बुघदृष्टे सिते सौख्ये सौम्यमध्यगतेपि वा॥ गो पुराद्यंशगे वापि पुण्यभाक्स नरो भवेत् ॥ १०८ ॥ चतुर्थमें पूर्णबली शुक्र, चंद्रमा, बुध, बृहस्पतिकी राशि होवै शुभ ग्रहास युक्त ृष्ट होवै तो ऐसे योगमें जन्मवाला मनुष्य पृथ्वीमें भुक्तिभागी होताहै॥ १०७ ॥ चतुर्थ स्थानमें बुधसे दृष्ट शुक होवै, अथवा शुभ ग्रहोंके बीच होवै, यद्ा गोपुरादि अंशकमें होवै तो वह मनुष्य पुण्यभागी होताहै ॥ १०८ ॥ नीचान्विते मौढययुते सुखस्थ सपत्रभे वा जलराशिसंज्ञे।। तदीश्वरे हीनबले तदानीं पतत्यसौ कूपतटांबुराशौ॥ १०९॥ लग्नेश्वरे हीनबले सुखस्थे नीचेर्कयुक्ते यदि वा सपापे। जलग्र- हेणापि युते सुखेशे बलेन हीने जलराशिमग्रः ॥११०॥ चतुर्थेश नीचका, अस्तका, चतुर्थभावमें, शत्रुराशिका जलराशिका होवै चतुर्थेश हीनबली होवै तो वह मनुष्य कूपके किनारे जलसमूहमें गिरताहै॥ १०९ ॥ लग्नेश हीनबल चौथे

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(९२ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

भावमें नीचराशिका सूर्यसे यद्ा पापग्रहसे युक्त तथा जलचराधिप ग्रहसे युक्त होवै चतुर्थेश बलहीन होवै तो जलपुंजमें डूबे ॥। ११० ॥ सरित्स्थानाधिपे लग्ननाथेन सहिते सुखे ॥ कर्माधिपेन संदृष्टे नदीकूपतटादिषु॥ १११॥ पतनं कूपनद्यादौ सुखेशस्थानरा शिपः ॥ सरित्स्थानेशसंदृष्टे यदि वा सुखपेन युक ॥ ११२॥ चतुर्थेश लग्नेशके साथ चतुर्थ स्थानमें दशमेशसे दृष्ट होवै तो नदी कुआं आदिके तीरमें मरे । १११ ॥ सुखेश जिसकी राशिमें है वह सुखेससे दृष्ट अथवा युक्त होवै तो कुआां नदी आदिमें पतन होवै ॥ ११२ ॥ शिलाप्रहारस्तस्य स्याद्रविभौमान्विते सुखे ॥ दृष्टे युते कर्मपेन सरित्स्थानाधिपेन वा ॥११३॥ सुखेशे राहुमंदाभ्यां सहिते कुजवीक्षिते॥ शुभदृष्टिविहीने तु शिलाभि: पीडितो नरः॥११8॥ सूर्य मंगल चौथे दशमेशसे युक्त वा दृष्ट हों अथवा सुसुखेशसे दृष्ट युक्त हों तो उसको पत्थरकी चोट लगे॥ ११३ ॥ चतुर्थेंश राहु शनिसे युक्त मंगलसे दृष्ट हो उसे शुभ ग्रह न देखें तो मनुष्य पत्थरोंसे पीडित होवै ॥ ११४ ॥ केन्द्रस्थिते रात्रिकरे भृगौ वा पापान्विते पापनिरीक्षिते वा॥ क्रूरांशके वा त्ववरोहभागे सोडयं जनन्या सह संगमति॥११५॥ पापेक्षिते पापयुते शशांके दिवाकरे वा यदि केंद्रराशौ।। क्ूरे सुखे वा यदि पापदृष्टे जातो नरः स्यादिह मातृगामी ॥ ११६॥ चंद्रमा अथवा शुक केंद्रमें पापयुक्त वा पापदष्ट हों तथा कूरांशकमें अवरोही हों तो यह मनुष्य माताका संग करता है।। ११५ । चंद्रमा पापयुक्त दृष्ट हो सूर्य केंद्रमें क्रूर ग्रह पापदष्ट सुखस्थानमें होवे तो इस योगमें भी मनुष्य मातृगामी होताहै ॥ ११६ ॥ पापेक्षिते वा सुखभावनाथे पापान्विते सौम्यदशा विहीने।। दारेश्वराल्ग्नपतौ विहीने जातो नरो मातृसमानगामी॥११७॥ सहोदरी संगममाहुरन्ये दारेश्वरे क्रूरयुते सुखस्थे॥ पापेक्षिते पापसमानमेव क्रूरादिषष्टयंशसमन्विते वा ॥११८॥ चतुर्थेश पापायुक्त वा पापदष्ट हो शुभदृष्टि उसपर न होवै सप्तमेशसे लग्नेश हीनबलहोवै तो ऐसे योगवाला मनुष्य मातृतुल्य स्त्रीका गमन करनेवाला होवे॥ ११७ ॥ सप्तमेश पापयुक्त

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भाषाटीकासहित:। ( ९३ ) वा दृष्ट चतुर्थ स्थानमें होवै अथवा कूर आदि पष्ट्यंशयुक्त होवै तो मातृगमन समान पाप पावै ऐसे योगमें कोई बहिनके साथ संगम होना फल कहते हैं॥ ११८ ॥ सुखे शनौ पापनिरीक्षिते वा पापान्विते ताहशपापयुक्तः॥ पापग्र- हाणां भवने सुखे तु कूरादिषष्टयंशयुते तथैव ॥११९॥ पष्ठेशभूनं दनसंयुतेव्जे सुखस्थिते पापनिरीक्षिते वा।। चंद्रांशसंयुक्तनवां- शनाथे तथाविधे मातरी दोषमाहुः ॥१२०॥ चौथा शनि पापदृष्ट युक्त होवै तो वैसेही पापसे युक्त होवै चतुर्थमें पापराशि क्रूरादि षष्टयंश युत होवै तो वैसाही फल है॥ ११९ ॥ छठे भावका स्वामी मंगलसे युक्त चंद्रमा- सुख स्थानमें हो अथवा पापटष्ट हो और चंद्रमा जिसके नवांशमें है वह भी ऐसाही होवै तो मातामें वही दोष कहतेहै॥ १२० ॥ सुखेश्वरे राहुयुते सपापे शनैश्चरेणापि दिवाकरेण॥ मातान्य- सक्ता सुखराशिनाथसंयुक्तभागाधिपतौ तथैव ॥ १२१॥ सुखे- श्वरे लग्नगते बलाव्ये गुर्विन्दुसौम्यास्फुजिदरकदष्टे॥ वैशेषिकांशे शुभदृष्टियुक्ते पतिव्रता तस्य भवेत्सवित्री ॥ १२२ ॥ चतुर्थेश पापयुक्त तथा राहुयुक्त शनि तथा सूर्यसे भी युक्त वा दृष्ट होवे तो उसकी माता अन्य पुरुषमें आसक्त होवै चतुथेंश जिसके नवांशकमें है वह भी ऐसा होवै तोभी वह फल होगा॥ १२१ ॥ चतुर्थेश बलवान् लनमें गुरु, चंद्रमा, बुध, शुक और सूर्यसे दृष्ट होवै वैशे- षिकांशमें हो शुभ ग्रह दृष्टियुक्त होवै तो उसकी मा पतित्रता होवै ॥ १२२ ॥ तथाविधे शीतकरे सराहुकेतौ सवित्री यदि नीचसक्ता॥ मंदेन युक्तेते सति शूद्रसक्ता वैश्येन सक्ता शशिसूनुयुक्ते॥ १२३॥ रव्य- न्विते क्षत्रियजातिशक्ता शुकेज्ययुक्त द्विजपुंगवैश्च॥ धरासुतेनापि तथाविधेन वक्तुं फलं तादृशमेव सत्यम् ॥ १२४ ॥ ऐसाही चंद्रमा चतुर्थेश़ होकर राहु वा केतुसे युक्त पापयुक्त होवै तो उसकी माता नीच जातिके पुरुषमें आसक्त होवै, यदि वह चंद्रमा शनियुक्त होवै तो शूदमें, बुधसे युक्त होवै तो वैश्यमें आसक होवै॥ १२३ ॥ सूर्यसे युक्त होवै तो क्षत्रियमें, शुक्र बृहस्पतिसे युक्त होवै तो श्रेष्ठ ब्राह्मणमें तैसेही मंगलसे युक्त होवै तो वैसाही फल कहना सत्य होताहै ॥ १२४ ॥ षष्टेश्वरेण सहिते सुखराशिनाथे भाग्यस्थिते जनकमत्रविशं करोति ॥ भाग्याधिपेन सहिते यदि मातृनाथे सौख्यस्थिते

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(९४ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

जनकमत्र विशं करोति॥ १२५ ॥ लग्नेशभाग्येशसुखेशयुक्त षष्ठाधिपे स्यात्परजात एव।I तदंशनाथेन युते तदीशे पापे- क्षितः स्यात्परजात एव ॥ १२६। चतुर्पेश षष्ठेशस युक्त नवम स्थानमें होवै तो उसकी उत्पत्ति वैश्यसे होगी यदि चतुर्थेश भाग्येशसे युक्त सुखस्थानमें होवै तोभी वही फल जानना ॥ १२५ ॥ लग्नेश भाग्येश सुखे- शसे षष्टेश युक्त होवे तो दूसरेसे उत्पन्न होगा वष्ठेश जिसके नवांशमें है उसीसे युक्त भी हो पापदष्ट होवै तोभी परजात (जारज) करताहै ॥ १२६ ॥ पापांतरे मातृगृहे तदीशे तत्कारके वा शुभष्टियुक्त॥ लग्नेश्वरा- द्धीनबले शुभेशे जातस्तदानीं परजात एव ॥ १२७ ॥ न वीक्ष्यते तद्गरुणा विलग्नं निशाकरो वा गुरुणा न हष्टः॥ दिवा- करेणापि युते शशांके सपापचन्द्रे रविणा तथैव ॥ १२८॥ चतुर्थभाव पापांतर, चतुर्थेश अथवा चतुर्थभावकारक शुभग्रहसे दृष्ट वा युक्त होवै, चतु- र्थेश लग्नशसे हीनवल होवै तो वह मनुष्य दूसरेसे उत्पन्न है। १२७ ॥ लग्नको बृहस्पति न देखे अथवा चन्द्रमाको बृहस्पति न देखे चंद्रमा सूर्यसे युक्त होवे अथवा चंद्रमा पापयुक्त होवैं तोभी वही फल होगा॥ १२८ ॥ पापे शुभे मातृगृहे सपापे लग्नेश्वरे हीनबले सपापे॥ परांशकादौ सुखभे तदानीं जातो नरः स्यात्परजात एव ॥ १२९॥ मातृ- स्थाने शुभयुते कारके शुभसंयुते॥ सद्भावपे बलाव्ये वा मातुरा- युष्यमादिशेत् ॥ १३० ॥ नवम भावमें पापग्रह, चतुर्थ भाव सपाप, लग्नेश हीनबल सपाप तथा चतुर्थमें शत्रुके अंशकमें होवै तो मनुष्य दूसरेसेही उत्पन्न जानना ॥। १२९ । चतुर्थ स्थानमें शुभ ग्रह चतुर्थभावकारक शुभयुक्त वा नवमेश बलवान् यद्ा चतुर्थेश बलवान् शुभ ग्रह होवै तो माता दीर्घजीविनी होवै ॥ १३० ॥ चंद्रे बलिष्ठे यदि वा भृगौ वा सौम्येक्षिते शोभनभागयुक्ते॥ चतुष्टये मातृगृहे शुभाग्रे मातुश्च दीर्घायुरुदाहरंति ॥ १३१॥ भावेशसंयुक्त न वांशनाथयुक्तांशपे केन्द्रयुते बलाव्ये।। तस्मिच्छ- शांकाद्यदि केंद्रयुक्ते मातुश्च दीर्घायुरुदाहरन्ति ॥ १३२॥

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भाषाटीकासहित:। (९५) चंद्रमा वा शुक बलवान् शुभग्रहद्ृष्ट दुाभग्रहेंके अंशकमें चतुर्थस्थानमें होवै, चतुर्थमें शुभ- ग्रह होवैं, अथवा (मातृगृहाच्छुमाढये) ऐसाभी पाठ है अर्थात् चतुर्थसे केंद्र शुभयुक्त होवै तो माताको दीर्घायु कहतेहैं ॥ १३१ ॥ चतुर्थेश जिसके नवांशकमें है वह भी जिस ग्रहके नवां- शकमें है वह केंद्रमें बलवान होवै और चंद्रमासे भी केन्द्रमें होवै तोभी माताको दीर्घायु कहतेहैं ॥ १३२ ॥ पापांतरे पापयुते शशांके पापेक्षिते मातृगृहे विनाशः॥ शुक्रा- त्तथैवं प्रवदंति संतस्तत्स्थानपाद्ा कथयन्ति शेषम्॥ १३३॥ निशाकरात्पापयुते समरेवा भृगोस्तथैवं जननीविनाशम्॥ सुखे शनौ मातृविनाशमेति पापेक्षिते चेदचिरेण नाशः ॥ १३४॥ चंद्रमा पापोंके बीच, पापयुक्त पापटष्ट चौथे होवै तो माताका विनाश होवे ऐसेही ज्योतिषज्ञ शुकसे और चतुर्थेशसे भी फल कहतेहैं ॥ १३३ ॥ चंद्रमाले सप्तममें पापयुक्त शुक्र होवै तो वैसषेही मातृनाश फल होगा, चतुर्थमें शनि होवै तो मातृनाश होवे वह शनि पापदृष्ट भी होवै तो मातृनाश शाघ्रही होवै ॥ १३४ ॥ शुभेक्षित श्वेचचिर कालमृत्युमुदाहरंत्यत्र महानुभावाः॥पापग्रहाणां भवने शनौ तु पापान्विते मातृविनाशमेति॥१३५॥ पूर्वोक्त चौथे शनि शुभग्रहद्दष्ट होव तो यहां बडे मतापी ज्योतिषी माताकी मृत्यु बहुत दिनोमें होगी ऐसा कहतेहैं, वही शनि पाप ग्रहौंके राशिमें पाययुक्त होवै तो मातृनाश कुछही दिनमें होवै। १३५॥ मातृस्थानाधिपस्यांशराशीशो यत्रवांशके॥ तदंशनाथकिरणा- न्मातृकालं विनिर्दिशेत् ॥१३६॥ नाथकारकराशीनां मध्ये यो बलवान्भवेत्।। यावानंशस्तदंशे स्यान्मेषादौ तत्र मृत्युद:१३७।। वक्रे तु द्विगुणं प्रोक्तं त्रिगुणं त्वतिवक्रगे॥ चतुर्गुणं शुमैदष्टे कालमेवं विनिर्दिशेत॥ १३८ ॥ चतुर्थेश जिसके नवांशकमें है वहभी जिसके नवांशकमें हो उसके रश्मियोंके अनुसार माताका जीवनसमय कहना।। १३६ । भावेश भावकारक भावराशिमें से जो अधिक वळवान् हो वह जितने अंशमें है उसके अंशनाथसे मेषादि गणनासे जितनी संख्या हो उतने कालमें माताकी मृत्यु होतीहै यहां स्मरण चाहिये कि १२ राशियोंके १०८ नवांश होतेहैं वह काल १०८ वर्षके भीतर आताहै॥ १३७॥ जो वह ग्रह वक होवै तो द्विगुण, अति वकमें त्रिगुण शुभग्रहोंसे दृष्टभी होवै तो चतुर्गुण समय कहना ॥ १३८॥

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(९६ ) सर्वार्थचिन्तामणि:। हृदये पापसंयुक्ते पापदष्टे तदीश्वरे॥ पापांतरे वा हृदये हत्काप- टयं विनिर्दिशेत्॥१३९॥शन्यारराहुसंयुक्ते हृदये शुभवर्जिते॥ तथैव तद्धावनाथे हत्कापव्यं विनिर्दिशेत्॥ १४०॥ पापे करमें- श्वरे सौख्ये कपटी पापवीक्षिते॥ सपापे रंध्रपे सौख्ये कापट्यं पापसंयुते॥ १४१॥ भानुना क्षीणचंद्रेण सहिते हृदये यदा॥ कपटी क्षणमातरं तु निष्कापट्यं तदूर्ध्वतः॥१४२।। चतुर्थभाव (हृदयस्थान) पापयुक्त चतुर्थेश पापदृष्ट वा पापोंके बोचमें हो यद्दा चतुर्थ- भाव पापांतःस्थ होवै तो मनुष्यके हृदयमें कपट कहना॥ १३९ ॥ चौथे शनि मंगल राहु होवैं शुभग्रह न होवैं ऐसाही भावेशभी पापयुक्त हो शुभयुक्त न होवै तो हृदयमें कपट होगा ऐसा कहना।। १४० ॥ दशमेश पापग्रह सुखस्थानमें पापदृष्ट वा युक्त हो तो मनुष्य कपटी होगा, अष्टमेश पापसहित चतुर्थ स्थानमें होवै तो मनुष्य कपटी होवै ॥ १४१ ॥ चतुर्थ सूर्य वा क्षीणचंद्रमासे सहित होवै तो क्षणमात्र तो कपटी होवै उपरान्त निष्कपट रहे ॥। १४२ ॥ हृदये शुभसंयुक्ते स्वोच्चमित्रगहान्विते॥ शुभग्रहाणां क्षेत्रे वा नि- षकापटयं विनिर्दिशेत् ॥ १४३ ॥ विशुद्धहृदयः शांतो हृदयेशे बलान्विते॥ गोपुरादंशके वापि मृद्धंशादियुते तथा॥१४४॥ चतुर्थ स्थानमें शुभग्रह अपने उच्चमें वा मित्रके घरमें अथवा शुभग्रहकी राशिमें होवे तो निष्कपटता कहनी ॥१४३॥ चतुर्थेश बलवान् होवै अथवा गोपुरादि अंशकमें मृद्धंशादिमें होवै तो निष्कपट शुद्धहृदय और शांत होवै॥ १४४॥ लग्नेश्वरे हृद्गते वा शुभयुक्तेक्षितेपि वा॥ पारावतादिभागस्थे नि- षकापटयं विनिर्दिशेत्॥ १४५॥

पट होवै॥ १४५ ॥ लग्नेश चतुर्थ भावमें अथवा शुभग्रहयुक्त दृष्ट पारावतादि अंशकमें होवै तो मनुष्य निष्क-

लग्ने गुरौ दानवपूजितेन युक्ते यदा तस्य विशुद्धचित्तम् ॥ पापे सुखे तद्रवनाधिनाथे पापान्विते तस्य विरुद्धचित्तम् ॥१४६॥ राहौ सुखे पापदशा समेते बहिविशुद्धस्त्वति तत्र भाति॥ अंतर्गतं तत्कपटं वदति पापाधिकत्वे सुखराशियुक्ते।१४७॥

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भावाटीकासहित:। (९७ ) लग्नमें बृहस्पति शुक्रयुक्त होवे तो शुद्ध (निष्कपट) चित्त होवै, चतुर्थमें पाप चतुर्येश पापयुक्त होवै तो चित्त विरुद्ध (सकपट) हवै॥। १४६॥ चौथे राहु पापदष्ट होवै तथा चौथे पापग्रह भावेश पापयुक्त होवै तो बाहरसे निष्कपट और भीतर कपट होवै ॥१४७॥ यदा लग्नसुखेशौ वा मित्रभूतौ परस्परम॥ शुभेक्षितौ शुभैर्युक्तौ मातृस्नेहं विनिर्दिशेत् ॥ १४८॥ लगनेशरेण संदृष्टे मातृनाथे चतुष्टये।। शुभग्रहान्विते दृष्टे मातृस्नेहं विनिर्दिशेत्॥ १४९॥ शत्रुश्रेल्लम्ननाथस्य मातृलाभाधिपौ यदि॥ पापेक्षिते पापयुते तच्छत्रुत्वं विनिर्दिशेत्॥१५०॥ यदि लग्नेश चतु्थेश परस्पर मित्र होवैं शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट होवैं तो माताका विशेष स्नेह कहना॥ १४८ ॥ चतुर्थेश केंद्रमें लग्नेशसे दृष्ट शुभग्रह युक्त वा दृष्ट होवै तोभी मातृस्नेह कहना । १४९ ॥ यदि चतुयेश लाभेश उमेशके शत्रु होवैं पाप योग दृष्टिभी होवै तो माता और बेटेकी शत्रुता रहे ऐसा कहना ॥ १५० ॥ लग्नेशान्नाशराशिस्थे मातृस्थानाघिपे यदि। तथैव लगनभावाद्ा तच्छत्रुत्वं विनिर्दिशेत् ॥ १५१॥ वाहनेशे बलयुते वाहने शुभ- संयुते ॥ शुभग्रहेण संदृष्टे वाहनादिफलं भवेत् ॥ १५२ ॥ चतुर्थेश लमेशसे बारहवें होवै अथवा लग्नसे द्वादशवें होवै तो माताके साथ शत्रुता कहनी. । १५१ ॥ वाहनेश बलवान् चतुर्थ स्थानमें शुभयुक्त गुभा्ष्ट होवै तो वाहनादि फल मिलेंगे॥ १५२ ॥ सुवर्णवस्त्नाभरणादियानं शुकाद्वदेत्तत्सुखराशितो वा॥ सेंदौ च- तुर्थाधिपतौ विलग्रे लग्नेश्वरेणापि युतेश्वलाभः ॥१५३॥शुक्े ण युक्ते यदि वाहनेशे देहान्विते वा नरवाहनादि॥ देवेन्द्रपूज्येन युतेत्र लग्ने वदंति संतश्चतुरंगयानम्॥ १५४॥ सुवर्ण वस्त्र भूषण सवारी शुकसे अथवा चतुर्थ राशिसे बलाबलानुसार कहने, चतुर्थेश चंद्र- मा सहित लग्नमें लग्नेशसे भी युक्त होवे तो घोडेका लाभ होवे॥ १५३ ॥ चतुर्थेश् शुकसे युक्त लग्नमें होवै तो नरवाहनादि पालकी नालकी आदि सवारी मिले, यदि यहां लग् बृह- स्पतिस्टे भी युक्त होवे तो घोड़े हाथी रथ मनुष्य चारों प्रकारकी सवारीयां मिलैं ॥१५४॥ चन्द्रामरेज्यामरशत्रपूज्यैर्युक्ते तनौ वा यदि वाहनेशे॥ पोक्त न्रयं वाहनमाहुरार्या नी चारिमूढादिविहीनखेैः॥१५५॥ भाग्ये-

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(९८) सर्वार्थचिन्तामणिः। शलग्रेशचतुर्थनाथाः कर्मस्थिता नीचविमूढहीनाः ॥ कर्मेशवरे- णापि युते विलग्ने सिंहासनप्राप्तिमुदाहरन्ति ॥ १५६॥ चंद्रमा, गुरु, शुकसे युक्त लग वा वाहनेश होवे परंतु नीच, शत्रु, अस्त आदिमें न होवे तो तीन प्कारके वाहन रहें॥ १५५ ॥ नवमेश, लग्नेश, चतुथेश दशवे होवें नीच अस्तंगत न होवैं, अथवा दशमेश सहित लगनमें होवें तो सिंहासन मिले ऐसा कहतेहैं॥१५६॥ भाग्यस्थिते वाहनराशिनाथे सशुकजीवे सुखराशियुक्ते ॥ भा- ग्याधिपे कोणचतुष्टये वा बह्र्थदेशाभरणार्थयानम्॥ १५७॥ भाग्याधिपेन सहिते यदि वाहनेशे जीवेक्षिते तनुगते बलपूर्ण- युक्ते॥ स्वक्षेत्रतुंगसहिते यदि वा त्रिकोणे भूनाथमानववशादन- वाहनादि॥ १५८॥। चतुर्थेश नवम शुक बृहस्पति चतुर्थ वा नवमेश केंद्रमें होवे तो बहुत देशोंके भूषण, धन- सवारी मिले। १५७ ॥ यदि चतुर्थेश नवमेशखे युक्त वृहस्पतिसे दृष्ट लगनमें पूर्ण बल युक्त स्वराशि वा उच्चका अथवा त्रिकोणमें होवे तो राजासे धन वाहन आदि मिलें॥ १५८ भाग्येश्वरेणापि युते सुखेशे यत्र स्थिते पश्यति वा निजर्क्षम्।। वैशेषिकांशे यदि वा बलाव्ये सर्वार्थभाग्यान्वितवाहनः स्थात्॥ ॥ १५९ ॥ दुःस्थे विमूढे यदि वाहनेशे भाग्येश्वरेणापि समीक्षि- ते वा। दुर्वाहिनी चंचलवाहिनी वा लाभाविपेनापि समीक्षिते वा॥१६० ॥ सौख्याधिपे शोभनखेचरेण भाग्येश्वरेणापि युतेथ वा स्यात् । सेनाबहुत्वं समुपैति जातो बहुत्वदेशाभरणा- नि यानम्॥ १६१ ॥ चतुर्थेश नवमेशसे युक्त किसी स्थानमें अपने गृहको देखे वैशेषिकांशमें अथवा बलवान् होवे तो संपूर्ण मकारके धन ऐश्वर्य सहित वाहन होवे॥ १५९ ॥ यदि चतुर्थेश दुष्ट स्थानमें अस्तंगत हो और उसे भाग्येशभी देखे अथवा लाभेशसे दृष्ट होवे तो दुष्टसेना अथवा चंचल सेना (पुलिश) आदि मिलै॥ १६० ॥ चतुर्थेश शुभग्रह तथा भाग्येशसे भी युक्त होवे तो मनुष्य बहुत सेना बहुत देशोंके आभरण वस भूषणादि सहित बहुत वाहन पाँवै।। १६१॥ भाग्येश्वराल्लाभगते विलग्ननाथे सुखेशे यदि भाग्यराशौ। सुखायभावे तनुनायके वा त्वसंख्ययानादियुतःप्रसिद्ध:।।१६२।।

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भाषाटीकासहित:। (९९ ) सुखेश्वरे केंद्रगते तदीशे लग्नस्थिते वा बहुवाहनाव्यः॥ कर्मेश्वरे लग्नगते तदीशे कर्मस्थिते वा बहुवाहनाव्यः ॥ १६३।। लग्नेश नवमेशसे लाभ स्थानमें चतुर्थेश नवम स्थानमें हो अथवा लसनेश चौथे ग्यारहवें भावमें होवै तो असंख्य वाहनोंसे युक्त एवं प्रसिद्ध (विखव्यात) होवे॥ १६२ ॥ चतुर्थेश केंद्रमें हो जिस राशिमें सुखेश है उसका स्वामी लग्नमें होवे तो बहुत वाहनोंसे युक्त होवै दशमेश लग्नमें लग्नेश दशवेमें होवै तौ भी बहुत वाहानोंसे युक्त रहे ॥ १६३ ॥ सुखेश्वरे सौध्ययुते सुखस्थे शस्त्नाश्वकोशाधिपतिर्भवेत्तु।। क्षेत्रेश्वरे लाभगते बलाव्ये बंधौ भवे वा क्षितिसूनुयुक्ते॥ १६४॥ भूसूतु राशौ यदि वा सुखेशे राज्यार्थसौख्याभरणादियानम्॥ सौम्ये विलगे सबलं प्रयुक्त्ते धर्मान्विते शोभनखेचरेन्द्रे॥ १६५॥ चतुर्थेश चतुर्थमें शुभयुक्त होवे तो हथियार घोडे और खजानेका स्वामी होवे चतुथेश लाभ स्थानमें बलवान् होवे अथवा चतुर्थ वा लाभ स्थानमें मंगल सहित होवे ॥। १६४ ।। अथवा चतुर्थेश मंगलकी राशिमें होवे तो राज्य, धन, सुख, वस्त्र, भूषणादि और वाहन मिले लसमें बलवान् सौम्य ग्रह नवम स्थानमें शुभग्रह होवै॥ १६५॥ स्वोञ्चस्थिते वित्तपतौ च केंद्रे सिंहासनप्राप्तिमुदाहरंति॥सौ- ज्येक्षिते धर्मगृहे तु केंद्रे सवित्तपाः शोमनखेचरेन्द्राः ॥ १६६॥ उच्चे ग्रहे वा धनराशियुक्ते सिंहासनप्राप्तिमुदाहरन्ति ॥ केन्द्रे शुभा: पापखगास्त्रिषष्टलाभस्थितास्तत्पदमाहुरार्याः ॥१६७॥ और धनेश अपने उच्चका केद्रमें होवै तो सिंहासनमाप्ति योग कहते हैं, नवम स्थान शुभ दृष्ट होवे केंद्रमें धनेश सहित शुभ ग्रह होवे।। १६६ ।। अथवा उचका ग्रह धनस्थानमें होवे तो सिंहासन पाप्ति कहते हैं, केंद्रोंमें शुभ ग्रह तीसरे, छठे, ग्यारहवें में पापग्रह होवें तो भी सिंहासन मिले॥ १६७ ॥ गेहेशे व्ययराशिस्थे पित्राद्यन्यं विदेशगः ॥ अष्टमस्थे गृहेशे वा स्वयं संपादयेद्धहम् ॥ १६८ ॥। धनेशे लग्नभावस्थे कर्मेशे धनमाश्रिते। वाहने स्वोच्चखवेटस्थे वाहनाधिपतिर्भवेत्॥१६९।। लग्नवाहनभाग्येशास्त्वन्योन्यं केन्द्रमाश्रिताः॥ लग्ननाथे बलाढचे वा वाहनाधिपतिर्भवेत॥ १७० ॥

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(१०० ) सर्वार्थचिन्तामणि:।

चतुर्थेश बारहवें होवे तो पिताके घरसे अन्य घर विदेशमें बनावै अथवा चतुर्येश अष्टम • स्थानमें होवे तो आपही अपनेको घर बनावै। १६८ ॥ धनेश लग्नमें दशमेंश द्वितीय स्थानमें हो चतुर्थमें उच्चका ग्रह होवे तो वाहनोंका स्वामी होवे ॥। १६९ ॥ लग्नेश चतुर्येश नवमेश परस्पर केंद्रेंमें होवें लग्नेश बलवान् होवे तो वाहनोंका स्वामी होवे॥ १७० ॥ गोपुराद्यंशके वापि वाहनेशे बलान्विते ।। लाभकर्मशुभाधी- शैर्द्ृष्टे वाहनसंयुतः ॥ १७१॥ परमोर्च्चांशके युक्ते भाग्येसे केंद्र- माश्रिते॥ ग्रहद्ये तुंगयुते बहुवाहनपुंजभाक ॥ १७२॥ धना- िपेन संयुक्ते व्ययेशे स्वोच्चराशिगे॥ भाग्याधिपेन संदृष्टे वाह- नाधिपतिर्भवेत् ॥ १७३ ॥ चतुर्थेश बलवान् गोपुरादि अंशकमें लाभेश, दशमेश, नवमेशसे दृष्ट होवै तो वाहनोंसे युक्त रहे।। १७१. ॥ नवमेश केंद्रमें परम उच्चांशकमें होवै, दो ग्रह उच्चके होवें तो बहुतसे वाहनोंके समूहका स्वामी होवै॥ १७२ ॥ व्ययेश अपने उच्चमें धनेशसे युक्त नवमेशसे दृष्ट होवै तो वाहनोंका स्वामी होवै॥ १७३ ॥ कर्माधिपे चतुर्थस्थे लाभनाथेन संयुते॥ भाग्यनाथेन वा युक्त बहुवाहनदेशभाक्॥ १७४॥ उच्चाह्वये कर्मगते लग्ननाथेन वीक्षिते॥ भाग्याधिपेन वा दृष्टे वाहनाधिपतिर्भवेव् ॥ १७५॥ सिंहासनांशकगते कर्मवाहनराशिपे॥ लग्नेश्वरेण संदष्टे बहुवा- हनदेशभाक्॥ १७६ ॥ दशमेश चौथे लाभेशसे युक्त अथवा नवमेशसे युक्त होवै तो बहुतसे वाहनोंका स्वामी होवे॥ १७४ ॥ उच्चका ग्रह दशममें लग्नेश अथवा नवमेशसे दृष्ट होवै तो वाहनोंका स्वामी होवै॥ १७५ ॥ दशम तथा चतुर्थका स्वामी सिंहासनांशमें हो लग्नेशसे हृष्ट होवै तो बहुतसे वाहनोंके समूहका स्वामी होवै॥ १७६ ॥ वाहनार्थतृतीयेषु भाग्यकर्मभवाधिपाः ॥ स्थिता वात्यर्थमा- नादिसंयुक्ते निधने शुभे॥ १७७॥ स्वोचे सुखेशे तन्नाथे केन्द्रकोणसमन्विते॥। वाहने तुंगसंयुक्ते व्यये शुद्धे त्रिया- नभाकू॥ १७८॥ परमोच्चांशके शुके कर्मेशे गृहसंयुते॥ संभवे ताहृशे योगे वाद्यघोषादिभिर्युतः॥१७९ ॥ शंखवादि

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भाषाटीकासहित:। (१०१) ऋघोषादैः संयुक्ते भाग्यपे सुखे॥ केंद्रोच्चकोणगे वापि कमेंशे वाहनान्वितः॥ ९८०॥ चतुर्थ, लाभ, तीसरे भावोंमें नवमेश दशमेश लाभेश होवें अथवा अतिबलसंयुक्त शुभ- य्रह अष्टम भावमें होवै॥ १७७ ॥ चतुर्थेंश अपने उच्चमें हो उसका उच्चनाथ केंद्र त्रिकोणमें चतुर्थ स्थानमें उच्चका ग्रह होवि व्ययभाव शुद्ध ( ग्रहरहित ) होवै तो तीन वाहनोंका स्वामी होवै॥ १७८॥ शुक परमोच्चांशमें होवै दशमेश अपनी राशिमें होवै ऐसे योग होनेमें बाजाओंके शब्दसे युक्त वाहनोंका स्वामी होवै॥ १७९॥ नवमेश चतुर्थमें अथवा केंद्रमें उच्चका दशमेश होवै तो शंखवाजे आदियोंके शब्द सहित वाहनस्वामी होवै॥१८०॥ शनिना संयुते कर्मनाथे केंद्रे शुभान्विते॥ लग्नेशे वृद्धिभं याते पणवादिरवैर्युतः॥१८१॥ कर्मभाग्यविलग्नेषु स्वोच्चे सौम्यग्रहाः स्थिताः ॥ दृष्टेषु वा लग्नपेन यानांते दुःखमामुयात्॥ १८२ ॥ कर्मषट्सोदरसुखभाग्यलग्नव्ययेश्वराः । सुताधिपेन सहिता ह्यासंख्याढयात्मदेशिभाक ॥ १८३॥ दशमेश शनिसे युक्त केंद्रमें शुभग्रहयुक्त होवै लग्नेश उच्चाभिलाषी वा उदयी होवै तो पणत्र (वाद्यविशेष) आदिके शब्दसे युक्त वाहनाधीश होवै ॥ १८१ ॥ दशम नवम और लन्नमें उच्चके शुभग्रह होवें लग्नेश उन भावोंके देखे तो वाहनाधीश होवै परंतु अंतमें वाहनहीसे दुःखपावै॥ १८२॥ दशम, छटा, तीसरा, चौथा, नवम,लग्न,व्ययभावोंके स्वामी पंचमेशसे युक्त हेवैं तो अगणित धनवान् अपने देशके वाहनोंका सुख भोग करे ॥ १८३ ॥ सुखे शुभयुते नाथे केंद्रकोणोच्चसंयुते॥ भाग्येशे परमोच्चांशे सुखयानादिलाभभाकू॥ १८४॥ मानेशे सुखराशिस्थे लाभे सौख्येशसंयुते।।लग्ने शुभेन संदृष्टे बहुयानादिलाभभाक्॥१८५॥ मृदंगभेरीशंखादिकाहलादिरवैर्युतः॥ राजयोगे समुद्धूते कर्मपे सौख्यसंयुते ।१८६।। चतुर्थ भाव शुभग्रहयुक्त चतुर्थेश केंद्र त्रिकोणमें उच्च राशिका होवै, नवमेश परमोच्चां शमें होवै तो सुख देनेवाले वाहनादिसे युक्त होवै ॥ १८४ ॥ दशमेश सुखस्थानमें लाभे- शभी सुखस्थानमें हो, लग्नमें शुभग्रहकी दृष्टि होवै तो बहुत वाहन आदियोंके लाभवाला हौवै ॥। १८५ ।। दशमेश चतुर्थ स्थानमें हो और राजयोगभी होवे तो मृदंग, भेरी, शंलादि, काहलाहि शब्दोंसे युक्त होवै॥ १८६ ॥

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(१०२ ) सर्वार्थचिन्तामणिः। बलाबलाच्छोभनदृष्टियोगात्प्रोक्तं तृतीयस्य फलं तु राशेः॥ चतुर्थराशेश्च फलं तथैव श्रीव्यंकटेशेन निरीक्ष्य सर्वम्॥१८७॥ इति श्रीसर्वार्थचिन्तामणौ तृतीयचतुर्थभावफलविचारो नाम चतुर्थोऽध्याय:॥४।। अध्यायांतमें ग्रंथकर्ता कहताहै कि मैं व्यंकटेशने तृतीयराशि तथा चतुर्थ राजिका फल ग्रहभावके बलाबल शुभग्रह दृष्टियोगके अनुसार समस्त ग्रंथोंको देखकर कहाहै ॥ १८७॥ इति श्रीसर्वार्थचितामणौ माहीघरभाषायां तृतीयचतुर्थभावफल- विचाराध्यायश्रतुर्थः ॥। ४ ।।

पंचमोऽध्यायः॥॥

अथ पश्चमषष्ठभावफलविचाराध्यायः। सुतभवनात्सुतबुद्धिमंत्रिणामपि मंत्रभोजनपितृभावान्॥ हृद- योदरप्रवेशं विवेकशक्तिं च निर्दिशेन्मतिमान्॥१॥ पंचम भावसे पुत्र, बुद्धि, मंत्रित्व, मंत्र, भोजन, पितृभाव, हृदय, उदरमवेश, विवेक- शक्तिका बुद्धिमान् ज्योतिषोने विचार करना, सोही आगे कहते हैं ॥ १ ।। नाथैः कलत्रात्मजधर्मभानां पुन्रादिचिन्तां कथयेत्सजीवैः॥ बुद्धिं तथा सोमसुतात्मजाभ्यां पितुस्तथैवात्मजभाग्यसूर्यैः ॥२॥ सप्तम पंचम नवम भावोंके स्वामियों करिके तथा बृहस्पति करके पुत्रादिका विचार कहना बुध तथा पंचम भावसे बुद्धिका तथा पंचम नवम और सूर्यकरिके पिताका विचार कहना॥२॥ पितुर्धनं याति सुखे सभानौ पुत्रे शशांके मरणं च मातुः ॥ सुते शुभे शोभनदृष्टियोगे पुत्रं ददात्येव तदा तदीशे॥ ३॥ चतुर्थ स्थानमें सूर्य होवै तो पिताका धन पावै, पंचम चंद्रमा भी होवै तो माताकी मृत्यु होवै, पंचम भावमें शुभग्रह शुभग्रहद्ृष्ट होवे अथवा पंचमेश शुभग्रह शुभग्रहसे दृष्ट दोवै तो पुत्र ढेताहै ॥ ३ ॥ पुत्रस्थाने तदीशे वा गुरौ वा शुभवीक्षिते॥ शुभेन सहिते वापि पुत्रप्राप्तिर्न संशयः ॥४॥ लगनेशे पुत्रभावस्थे पुत्रेशे बलसंयुते॥ परिपूर्णबले जीवे पुत्रप्राप्तिर्न संशयः ॥५॥

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भावाटीकासहित:। ( १०३ ) पुत्रस्थान, अथवा पंचमेश वा गुरु शुभग्रहयुक्त दष्ट होवै तो निस्संदेह पुत्रमाप्ति होवै । ४ । लग्नेश पंचम भावमें पंचमेश बलवान् बृहस्पति पूर्ण बली होवै तो भी यही फल है।। ५ ॥ पुत्रस्थानाधिपे जीवे परिपूर्णबलान्विते॥ लगनाधिपेन वा दृष्टे पुत्रप्ाप्तिर्न संशयः ॥ ६॥ वैशेषिकांशके जीवे पुत्रेशेपि तथा स्थिते॥ शुभग्रहेण वा दृष्टे पुत्रपापतिं समादिशेत ।७।। पुत्र- स्थानगते वित्तनाथे पूर्णबलान्विते।। दृष्टे देवेन्द्रगुरुणा पुत्रप्रात्ति- र्नं संशयः॥ ८। लग्नपुन्नाघिपौ युक्तावन्योन्यं वापि वीक्षितौ। क्षेत्रे परस्परस्थौ वा पुत्रप्राप्तिर्न संशयः॥९॥ पंचमेश बृहस्पति पूर्णबली हो अथवा पंचमेश बृहस्पतिको लयेश देखे तो निस्संदेह पुत्र- पाप्ति होगी ॥ ६ ॥ बृहस्पति और पंचमेश वैशेषिकांशकमें हों अथवा ग्रहसे दृष्ट होवें तो पुत्रपाप्ति कहनी॥ ७ ॥ धनभावेश पंचमभावमें पूर्णवलयुक्त हो अथवा वृहस्पतिसे दृष्ट होवै तो निःसंदेह पुत्रमाप्ति होगी॥८॥ लग्नेश पंचमेश एकस्थानमें हों अथवा परस्पर देखते हों अथवा एककी राशिमें दूसरा परस्पर हों तो वही फल कहना ॥ ९ ॥ लग्नपुन्राधिपौ केंद्रे शुभग्रहसमन्वितौ॥ कुटुम्बेशे बलाढये तु पुत्रपाप्तिर्न संशयः ॥१०॥पुत्रस्थानाधिपस्यांशराशीशे शुभसं- युते॥ शुभेन वीक्षिते वापि पुत्रपाप्तिर्न संशयः ॥ ११॥ लग्नेशे दारभावस्थे भाग्येशे दारसंयुते। द्वितीयेशे विलग्नस्थे पुत्र प्राप्तिर्न संशयः ॥१२। दारेशग्रहसंयुक्तनवांशभवनाघिपे॥ भाग्य-

लग्नेश पुत्रेश केंद्रमें शुभग्रहसहित हों द्वितीयेश बलवान् होवै तो निस्सन्देह पुत्रमापि होवे॥ १०॥ पंचमेश जिसके नवांशकमें है उसका स्वामी शुभग्रह्युक्त होवै अथवा शुभग्रहसे दृष्ट होवै तो निस्संदेह पुत्रमाप्ति होवै ॥ ११ ॥ लभ्नेश सप्तममें नवमेशभी सप्तममें होवै द्विती- येश लग्नमें होवै तो निःसंदेह पुत्रमाप्ति होवै॥ १२ ॥ सप्तमेश जिसके नवांशकमें है उसे नवम द्वितीय और लग्नभावके स्वामी देखें तो पुत्रमाप्ति कहनी ॥ १३ ॥ पापमध्ये तु यद्धावे तदीशेऽपि तथा स्थिते॥ कारके पापसंयुक्त पुत्रनाशं वदेत्तदा ।१४।। भाग्यपुत्रकलन्रेशसंयुक्तन वभागपाः। पापांशगा: पापयुताः पुत्रनाशं वदेत्तदा । १८॥ कूरांशे

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( १०४ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

पुत्रभावेशे नीचमूढसमन्विते॥ पापैर्दैष्टेऽथ वा दुःस्थे पुत्रनाशं वदेत्तदा ॥ १६ ॥ व्ययेशसंयुतांशेशत्र्यंशनाथसमन्विते ।। दृष्टे पुत्रेश्वरे तेन पुत्रार्ति कथयंति हि ॥१७॥ जिसका पंचम भाव पापग्रहोंके बीच हो पंचमेशभी तैसाही हो संतानकारक ग्रहभी पापयुक्त होवै तो पुत्रनाश कहना॥ १४ ॥ नवम पंचम सप्तम भावोंके स्वामी जिनके नवांशोंमें हो वे पापग्रह सहित पापनवांशकोंमें होवें तो पुत्रनाश कहना।। १५ । पंचमेश क्रूरनवांशकमें नीच वा अस्तंगत होवै पापग्होंसे दृष्ट अथवा त्रिकस्थानमें होवै तो पुत्रनाश कहना ॥१६॥ व्यय भावेश जिसके नवांशकमें है वह जिसके द्रेष्काणमें हो उससे पंचमेश युक्त वा दृष्ट हो तो पुत्रपीडा कहतेहैं ॥ १७॥ पुत्रस्थानाधिपे दुःस्थे क्रूरषष्टयंशसंयुते ॥ क्रूरग्रहेण वा दष्टे पुत्रनाशं वदेत्तदा ॥ १८। मृद्वंशादिसमायुक्त पुत्रस्थानेश्वरे गृहे॥ गोपुरादयंशके वापि पुत्रसिद्धिर्न संशयः ॥ १९॥ पंचमेश दुष्टस्थानमें क्रूरषष्टयंशकगत होवे अथवा क्रूरग्रहसे दृष्ट हौवै तो तब पुत्रनाश कहना॥ १८ ॥ पंचमेश मृदु अंशादिमें बलवान् होवै अथवा गोपुरादि अंशकमें होवै तो पुत्रसंबन्धसिद्धि निस्संदेह होवै ॥ १९ ॥ पुत्राधिपस्थांशपतौ विलग्ने लग्नेश्वरस्थांशपतौ सुतस्थे ।। गुरुस्थितांशाधिपतौ च केन्द्रे पुत्राप्तिमाहुर्मुनयो महांतः ॥।२०।। पारावतांशादियुते सुतेशे भाग्येश्वरे तादृशभावयुक्ते। लग्नेश्वरे शोभनदृष्टियुक्ते पुत्राप्तिमाहुर्सुनयो महांतः ॥२१॥ पुत्रभावेश जिसके नवांश्रकमें है वह लग्नमें होवै तथा लग्नेश जिसके नवांशकमें है वह पंचम हेवि और बृहस्पति जिसके नवांशकमें है वह केन्द्रमें होवै तो श्रेष्ठ मुनिळोग पुत्रभाप्ि कहते हैं॥ २० ॥ पंचमेश पारावतांशादिमें होवे नवमेशभी तैसाही होवे लमेश शुभग्रह दृष्ट होवै तो श्रेष्ठ मुनिजन पुत्रमाप्ति कहते हैं ॥ २१ ॥ वंशक्षयादिसहिते यदि सत्यमेतच्छास्त्राधिपारगमना सुनयो वदंति॥ पुत्रादियोगमखिलं तदभावयोगं प्रोक्तं विलोक्य मनसा च वदेत्सुविद्वान् ॥२२।। वंशस्य विच्छेदकर: प्रजातश्चंद्रास्फु- जित्पापखगाः क्रमेण॥ खंदारसौख्येषु युतास्तथैव लग्नेश्वरे चंद्रसुतेन युक्ते॥ २३॥ पापग्रहा रिष्फसुताष्टमस्था वंशस्य-

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भावाटीकासहित:। (१०५ )

विच्छेद करोऽर्थहीनः॥ निशाकरे लग्नगते सजीवे तत्ससमे भूमि- सुते शनौ वा ॥ २४ ॥ वंशक्षयादि जो आगे कहते हैं तथा पुत्रादि होनेके योग उनके अभावके योग जो शाख्में पारंगम मुनियोंने कहै हैं सत्य हैं मथम मनमें ठीक विचार करके विद्वानने फल कहना ॥२२॥ दृशम चंद्रमा सप्तम शुक और चतुर्थ पापग्रह होवै तथा लग्नेश बुधयुत होवै तो वह मनुष्य वंशका विच्छेद करनेवाला होवे॥ २३ ॥ पापग्रह १२ ।५।८ भावोंमें होवै तो वंश- च्छेदक एवं धनहीन भी होवै, चंद्रमा बृहस्पति सहित लग्नमें और सप्तममें मंगल अथवा शनि होवै तो भी वही पूर्वोक्त फल कहना ॥ २४ ॥ पापग्रहा बंधुगताश्र सर्वे वंशस्य विच्छेदकरोऽत्र जातः।। लग्नां- त्यपुत्राष्टमराशियुक्तैः पापग्रहैवैशविनाशहेतुः ॥ २५॥ शुभे- तरा रंध्रविलग्नरिष्फे वंशस्य विच्छेदकर: सुतेब्जे॥ दारस्थिते सोमसुते सशके पापे सुखे देवगुरौ सुतस्थे॥ २६॥ संपूर्ण पापग्रह चौथे हों तो मनुष्य वंशका विच्छेद करनेवाला होवे, लग्न दादश, पंचम, अष्टम भावोंमें पापग्रह हों तो वह मनुष्य वंशके विच्छेदका कारण होवै । २५ ॥ अष्टम लग्न और द्वादशमें पापग्रह पंचममें चंद्रमा होवे तो वंशच्छेत्ता होवै सप्ममें बुध शुक चतुर्थमें पाप बृहस्पति पंचममें होवे तो भी वही फल कहना ॥ २६ ॥। रंध्रे शर्शांकात्सहिते तु पापैर्वशस्य विच्छेदकरोत्र जातः ॥ पापे विलग्ने सुखगे शशांके लग्नेश्वरे पंचमराशियुक्ते ॥ २७॥बलै- विहीने यदि पुत्रनाथे वंशस्यविच्छेदकरोत्र जातः ॥ क्षीणे शर्शां- के तनुभावयुक्ते मूढान्विते मंदगृहे सुरेज्ये॥ २८॥ चन्द्रमासे अष्टम पापग्रह होवे तो मनुष्य वंशच्छेत्ता होवै लन्नमें पापग्रह, चतुर्थ चन्द्रम। लग्नेश पंचम भावमें । २७ ॥ पंचमेश वलहीन होवै तो वंशच्छेदक होवै। क्षीण चन्द्रमा लग्नमें और मकर वा कुम्भका बृहस्पति अस्त होवे ॥ २८॥ त्रिकोणगैः पापखगैश्च सर्वैः प्रागेव पुत्रस्य सखस्य नाशः॥ चन्द्रात्मजे पंचमराशियुक्ते लग्ने सुखे वा यदि पापयुक्ते ॥ २९॥ शुभेतरैः पंचमभावयुक्तैर्न दश्यते पुत्रसुखं हि तेन ।। जातो यदि स्यात्क्षितिसूतुलग्ने रन्ध्रे शनौ पंचमगे रवौ वा ॥ ३० ॥

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(१०६ ) सर्वार्थचित्तामणिः।

पुत्रादिलाभं सुनयो वदति कालांतरे शोभनदृष्टियोगाद। लगे शनौ देवगुरौ तु रंधे व्यये कुजे पुत्रजनिश्चिरेण ॥ ३१ ॥ समस्त पापग्रह त्रिकोणोंमें होवें तो पहिलेहीसे पुत्रसुखका नाश होवे बुध पंचम भावमें अथवा लग्न वा चतुर्थ में पापयुक्त होवे ॥ २९ ॥ पंचममें पापग्रह होवैं तो उस मनुष्यसे पुत्रका सुख न देखा जावे जो मनुष्य लगनके मंगल अष्टम शनि वा पंचम सूर्यमें॥३०॥जन्मा हो उनपर शुभग्रहोंकी दृष्टि होवे वा शुभग्रहोंसे युक्क होवें तो उसको कालातरमें पुत्रादिलाभ मुनिजन कहते हैं। लग्नमें शनि अष्टममें गुरु बारहवें मंगल होवे तो बडी उमरमें पुत्र- लाभ होगा॥ ३१॥ बुद्धिस्थानाधिपे सौम्ये शुभदृष्टिसमन्विते ॥ शुभग्रहाणां क्षेत्रे वा बुद्धिमान्नीतिमान् भवेत्। ३२ ॥। परमोच्चांशके बुद्धि- स्थाने नाथेन वीक्षिते॥ शभ्रग्रहाणां मध्यस्थे तीव्रबुद्धिं समा- दिशेत् ॥ ३३ ॥। पंचमेश शुभग्रह शुभग्रहोंसे दृष्ट हो अथवा शुभग्रहकी राशिमें होवै तो बुद्धि तथा नीति- वाला होवै॥ ३२ ॥ पंचम स्थान परमोच्चांशमें स्वस्वामिद्ृष्ट एवं शुभग्रहोंके मध्यमें होवे तो तीच बुद्धि कहनी ॥ ३३ ॥ कारके बलसंपूर्णे तदीशे शुभवीक्षिते॥ बुद्धिस्थानेथ वा सौम्ये तीत्रबुद्धिं समादिशेत ॥ ३४ ॥ बुद्धिस्थानाधिपस्यांशराशीशे शुभवीक्षिते॥ वैशेषिकांशके वापि तीव्रबुद्धिं समादिशेत् ॥३५॥ पंचम भावकारक पूर्णबली, पंचमेश शुभग्रहसे दृष्ट होवै अथवा पंचममें शुभग्रह होवै तो तीव्रबुद्धि होगी ऐसा फहना ॥ ३४ ॥ पंचमेश जिसके नवांशकमें है वह शुभ- ग्रहसे दृष्ट होवै अथवा वैशेषिकांशमें होवै तो भी तीव्रवुद्धि कहनी ॥ ३५ ॥ कारकस्थितराश्यंशनाथे केंन्द्रत्रिकोणगे ॥ बुद्धीशवरेण संहष्ठे तीव्रबुद्धिं समादिशेत्॥ ३६॥ शुभग्रहाणां मध्यस्थे बुद्धिराशौ शुभान्विते॥ गुरौ केन्द्रत्रिकोणे वा बुद्धिमार्गविशारदः॥ ३७॥। पंचमकारक ग्रह जिसकी राशि अंशकमें हो वह केंद्र वा त्रिकोणमें पंचमेशसे दृष्ट होवै तो तीव्र (तेज) बुद्धि होगी ऐसा कहना॥ ३६ ॥ पंचम राशि शुभग्रहोंके बीचमें शुभग्रह युक्त हो वा वृहस्पति केन्द्र त्रिकोणमें होवै तो बुद्धिमार्गमें निपुण होवै ॥ ३७ ॥

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भाषाटीकासहितः। (१०७ ) बुद्धिस्थानाधिपे सौम्ये बुद्धिराशिगते गुरौ॥ शुभग्रहाणां मध्य- स्थे भावे बुद्धिं विनिर्दिशेत्॥ ३८॥ बुद्धिस्थानेश्वरे केन्द्रे शुभ- ग्रहसमन्विते॥ उच्चगहसमायुक्ते ग्रहणादिपटुर्भवेव्॥३९॥ पुत्रभावेश बुध हो, पंचममें गुरु होवै पंचम भाव शुभग्रहोंके बीचमें होवै तो बुद्धिमान् होवै ॥ ३८ । पंचमेश केन्द्रमें शुभग्रहयुक्त तथा उच्चराशिगत ग्रहके साथ होवे तो शीघ्र ग्रहण करने आदिवाली चतुर बुद्धि होवै ॥ ३९ ॥। मृद्ंशादिसमायुक्ते नाथकारकखवेचरे। शुभग्रहेण संदष्टे धारणा- दिपटुर्भवेत्॥४•॥ गोपुरादंशके वापि धारणादिपटुर्भवेत्॥।४१।। परेंगितज्ञो मेघावी कारकस्थितभागपे ॥ केंद्रत्रिकोणसंयुक्त कारकग्रहवीक्षिते॥४२ ॥ नाथकारकसंयुक्त त्रयंशभोगपतौ शुभे॥ चतुष्टये त्रिकोण वा शुभहष्टेंगितज्ञकृत्॥ ४३॥। पंचमेश तथा पंचम भावकारक ग्रह मृदु आदि अंशकमें शुभग्रहद्ृष्ट होवै तो धारण आदिमें चतुर होवै।४०॥अथवा वे गोपुरादि अंशकमें होवें तो भी वही फल होवै॥४१॥जिस भावमें कारक ग्रह है उसका स्वामी केन्द्र त्रिकोणमें होवै कारक ग्रहसे दृष्ट होवै तो पराये आकारही से उसके मनकी बात जाननेवाला बुद्धिमान् होवै।। ४२ ॥ द्रेष्काणेश शुभग्रह पंचमेश तथा कारकग्रहसे युक्त होवे केन्द्र वा त्रिकोणमें शुभग्रहद्दष्ट होवै तो पराये इसारे जाने यद्ा पराये आकार चेष्टाहीसे समझकर काम करनेवाला होवै ॥। ४३॥ पंचमे पापसंयुक्ते तदीशे पापसयुते । क्रूरषष्टयंशके वापि बुद्धिनाशो भवेत्तदा॥ ४४ ॥ नीचमूढारिगेहस्थे पापखेचरवी- क्षिते। कूरषष्टयंशसंयुक्ते बुद्धिनाशो भवेत्तदा ॥४५॥ पंचमे मंदसंयुक्ते लग्नेशे मंदवीक्षिते । तदीशे पापसंयुक्ते बुद्धिजाड्यं समादिशेत् ॥। ४६॥ मंदमांद्यगुसंयुक्त पंचमे शुभवर्रिते॥ तदीशे पापसंदष्टे विस्मृतिः प्रायशो भवेत् ॥ ४७॥ बुद्धिर्वि- स्मृतिपूर्वा स्यात्कारके शुभसंयुते ॥ तदीशे पापसंयुक्ते क्रूरण- पृयंशकेपि वा॥४८। पंचम भावमें पापग्रह पंचमेश पापयुक्त अथवा कूरषष्टयंश्में होवै तो बुद्धिका नाश होवे।। । ४४॥ नीच अस्तंगत वा शत्रु राशिमें पापग्रहसे दृष्ट हो तथा क्रूर पष्टचंशमें होवै तो

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(१०८) सर्वार्थचिन्तामणिः।

बुद्धि नष्ट होवै॥ ४५॥ पंचममें शनि होवै लग्नेशपर शनिकी दृष्टि और पंचमेश पापयुक्त होवै तौ बुद्धिजढ होगी ऐसा कहना।। ४६ ॥। शनि केतु राहुयुक्त शुभग्रहरहित पंचम भाव कारक शुभयुक्त होवै परंतु पंचमेश पापयुक्त अथवा कूर षष्टचंशमें होवै तो बुद्धि विस्मरणवाली होवे।। ४७॥। ४८ ।। सौम्ये तु बुद्धिभावस्थे गुरुशुकनिरीक्षिते॥ तादृशे बुद्धिनाथे वा सर्वेषां बुद्धिदो भवेत्॥ ४९ ॥ ऊहापोहसमर्थः स्यात्तदीशे गोपुरांशके ॥५०॥ कारकस्थितराशीशे लग्ननाथेन वीक्षिते॥। राजमन्त्री भवेद्दाता वाक्पतौ बलसंयुते ॥ ५१॥ बुद्धीश्वरेण संयुक्ते गोपुरादयंशकान्विते।। आगामिसूचको मंत्री कारके केंद्रकोणगे ॥५२॥भृगौ सौम्यसमायुक्ते दृष्टे ताथ्यां शुर्भांशके।। त्रिकालज्ञो भवेज्नीवे स्वांशे मृद्शसंयुते ॥५३।। पंचमस्थानमें बुध, वृहस्पति शुकसे दृष्ट हो ऐसेही पंचमेशमी गुरु शुक्र दृष्ट होवै तो सभीको बुद्धिदेनेवाला होताहै ॥४९॥ पंचमेश गोपुरांशकमें होवै तो ऊहापोह (दलीळ तफ- रीर) करनेमें समर्थ होवै।। ५० ॥ पंचमकारक जिसकी राशिमें है उसे लग्नेश देखे और गुरु बलवान् होवै तो राजमंत्री तथा दाताभी होवै॥ ५१॥ कारक ग्रह पंचमेशसे युक्क केंद् कोणमें वा गोपुरादि अंशकमें होवै तो भविष्य जाननेवाला मन्त्री होवै ॥ ५२ ॥ शुक्र बुधसे युक्त हो गुरु अपने नवांशमें मृदंशमें होवे बुध झुकसे दृष्ट होवे तो भूत भविष्य वर्तमान तीनों कालका जाननेवाला होवै॥ ५३॥ गोपुरादयंशके वापि शुभांशे शुभवीक्षिते। पुंग्रहे पुंग्रहं प्राप्ते पुंभागे पुत्रनायके। सुपुत्रजननं विद्यात्प्रथमं नात्र संशयः॥4:। पंचमेश गोपुंरादि अंशकमें हो अथवा शुभग्रहके अंशकमें शुभग्रहसे दृष्ट पुरुषग्रहसे युक्त स्वयं पुरुष ग्रह होवे तो प्रथम सपुत्र उत्पन्न होगा इसमें संशय नहीं ॥ ५४॥ स्त्रीराशौ स्त्नीग्रहे प्राप्ते स्त्रीभावे पुन्रनायके ॥ दारिकां प्रथमं विद्यात्षंढांशे षंढमादिशेत् ।५५॥। कारकस्थितराशेरवा पंचमे बिन्दुसंख्यया।। नीचारिमूढगेहानां बिन्दुं त्यक्त्वा सुतान्व- देत ॥५६॥ पुत्रस्थानेशकिरणातपुत्रभावांशकाददेत्। रश्मि- जालैगुरोर्वापि बलोत्कर्षाद्देत्तथा।।५७।।

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भाषाटीका सहित:। (१०९) पंचमेश त्त्रीराशिमें स्त्रीग्रहसहित खत्रीनवाशकमें होवे तो पथम कन्या होवै यदि वह नपुं सकराश्यंशकादिमें होवै तो नुंसक पैदा होगा ऐसा कहना॥ ५५॥ कारक जिस राशिमें है उससे अथवा पंचमभावके बिन्दु (अष्टकवर्ग गणनासे) की संख्यामें नीच, शत्रु, अस्तंगतके बिंदुसख्या छोडके पुत्रसंख्या कहनी। ५६॥ अथवा पंचमेशके रश्मिसंख्यासे पंचमभार्वा- शफसंख्यासे अथवा रश्मियोंसे वृहस्पतिके बलवत्तासे पुत्रसंख्या कहनी॥ ५७॥ लग्नपुत्रेश्वराभ्यां तु मित्रत्वेनैव मित्रता।।शत्रुत्वे शात्रवं प्रोक्तं समत्वे समता भवेत्॥५८॥ लग्नपुत्रेश्वरौ खटौ परस्परनिरीक्षितौ॥ परस्परगृहांशस्थौ शुश्रूर्षां कारयेत्सुतः ॥५९॥ लग्नं पश्यति वा पुत्रनाथे लग्नान्विते यदि। लग्नेश्वरे सुतर्क्षें वा पुत्रो वाक्यव- शानुगः॥६०॥ लग्नेश पंचमेश परस्पर मित्र होवें तो पिता पुत्रकी परस्पर मित्रता रहै उनके शत्रु होनेमें शन्रुता और सममें समता होतीहै ॥६८॥ लग्नेश पंचमेशकी परस्पर दृष्टि होवै, परस्पर राशि वा अंशकोंमें होवें तो पुत्र पितासे अपनी शुश्रूषा करावै॥ ५९॥ पंचमेश लग्नको देखे यवा लग्नमें होवै तथा लग्नेश पंचममें होवै तो पुत्र पिताके आज्ञापर चलनेवाला होवै ॥ ६० ॥ पुत्रस्थानेश्वरे दुःस्थे लग्नेशेनापि वीक्षिते ॥ संदृष्टे कुजराहुभ्यां नित्यं पितृविदूषकः ॥ ६१॥ पंचमे गुरुशुकाभ्यां सवित्रा सहि- तेऽथ वा॥ एते्षां भवने वापि सोयं योजयिता भवेत् ॥ ६२ ॥ तृतीयेशे तृतीयस्थे पंचमेशे सुखं गते।। शुभोच्चखेटसंयुक्ते जातो भोजयिता भवेत् ॥ ६३ ॥ पंचमेश दुष्टभावमें हो लग्नेशसे भी दृष्ट हो परंतु मंगल राहु उसे देखें तो नित्य पिताका देदी होवै। ६१ ॥ पंचममें गुरु शुक्र हों सूर्यभी उनके साथ होवे अथवा युक्त ग्रहोंके स्थानमें पंचमेश त्रिकोदि दुष्टभावमें होवै तो पिता पर आज्ञा चलानेवाला होवै॥ ६२ ॥ तृतीयेश तीसरे पंचमेश चौथे शुभग्रह वा उच्चवतीं ग्रहसे युक्त होवै तो पिताको खूब खिलाने पिलाने वाला होवै॥ ६३ ॥ अन्नदानपरो नित्यं पंचमेशे शुभंगते॥ शुभग्रहैः समायुक्त युक्ती- शे शुभसंयुते॥ ६४॥ हृदये पापसंयुक्ते तदीशे पापसंयुते॥ पा पग्रहाणां मध्यस्थे हद्दतं रोगमादिशेत्॥ ६५॥ तदीशस्थांशरा- शीशे क्रूरषष्टयंशसंयुते ॥ ऋ्रूरग्रहेण संदृष्टे हृद्गतं शल्यमादिशेत्।।

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('११० ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

॥६६ ॥ तन्नाथे नाशभावस्थे नाशस्थानेशसंयुते ॥नीचारिमू- ढभावे वा हृद्गतं रोगमादिशेत् ॥६७।। इति सुतभावः । पंचमेश शुभराशिमें यद्ा नवमस्थानमें शुभग्रहयुक्त होवै जिसकी राशिमें है वहभी शुभयुक्त होवै तो नित्य अन्न देनेमें तत्पर रहे॥ ६४ ॥ हृदय ४ स्थानमें पाप उसका स्वामी पापयुक्त, पापमध्य होवे तो हृदयमें रोग रहे पंचम उदरस्थान है उसके उपलक्षणसे उदररोग जानना । ६५ ।। उस भावका स्वामी जिसके नवांशकमें है उसका स्वामी कूरष- ष्टयंशमें हो क्रूरग्रहसे दृष्ट होवै तो हृदयमें (शल्य) शूलादिरोग होवे ॥ ६६ ॥ उस भावका स्वामी नाश १२ स्थानमें व्ययेशसहित हो अथवा नीच, शत्रु अस्तंगत होवै तो हृदयगत रोग कहना ॥ ६७ ॥ इति पंचमभावविचारः ॥ अथ षष्ठभावविचारः।

पदंशान् ग्रहराश्युदितान् वदेत्पाज्ञः॥ १॥ छठे स्थानसे शत्रु, चोर, घाव, विघ्र, क्लेश, नाभि. एवं उदररोगाद़ि और मधुर आदि छः प्रकारके उपदंश ग्रहराशियोंके अनुसार विचार करके विद्वानने फल कहने ॥ १ ॥ षष्टेश्वरे क्रूरयुते विलग्ने रन्ध्रस्थिते व्रणदः शरीरे॥ कर्मस्थिते तादृशखेचरेन्द्रे व्रणप्रदोंगे शुभदृष्टियुक्ते ॥ २ ॥ पित्रादिभावा- दृपि योजनीयं भावेशतत्कारकदृष्टियोगात्॥ बलाबलेनापि विकल्प्य सर्व तेषां व्रणं तत्कथयंति तज्ज्ञाः ॥ ३।। छठे भावका स्वामी क्रूरयुक्त लग्नमें अथवा अष्टमभावमें होवै तो शरीरमें (ब्रण) विस्फो- टकादिचिह्न होवै ऐसाही ग्रह दशमस्थानमें हो पापग्रहद्ृष्ट होवै तो अंगमें व्रण देनेवाला होताहै॥ २ ॥ ऐसाही विचार वित्रादि समी भावौंमें करना. भावेश. भावकारक ग्रहके दृष्टियोगसे तथा बलाबलके अनुसार विचारके पित्रादियोंकोभी व्रणादि कहना ॥ ३ ॥ शिरोकोदेसुखं कंठं श्रोत्रं नासा च गुह्यकम्॥ पाणी पार्श्वौ दशौ पादौ प्रपदौ कुक्षिमादिशत्॥४ ।।लग्नेशयूपुत्रशर्शांकपुत्राः सह- स्थिता: सौख्यगृहे व्यये वा॥ अपानरोगं त्वथ नापवित्रं पश्यं ति षष्ठं सुनयो वदन्ति॥५॥ शशांकतत्पुत्रविलग्ननाथाः सरा- हवः केतुयुतास्तदंगे॥ वैश्यं तुकुष्ठं मुनयो वदति शुभेक्षितास्तन्न भवेत्तदानीमू ॥६॥

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भावाटीकासहित:। ( १११ ) छडे भावमें रोगकाभी विचार है शुभग्रहोंसे शुभत्व पापग्रहोंसे रोगादि छठे भावस्य राशिके उक अंगमें होताहै इसलिये अंगविभाग कहते हैं कि शिर १ मुख २ कंठ ३ कान ४ नाक ५ गुदा ६ हात ७ बगल ८ नेत्र ९पैर १० पैरोंके तलुवे ११और कुक्षि १२ ये कमसे हैं ।४॥ लन्नेश मंगल और बुध चौथे वा बारहवें भावमें एकसाथ होवैं तो गुदामें रोग होवै ९/६ भावोंको देखें तोभी वही फल मुनिजन कहते हैं।। ५।। चंद्रमा बुध लग्नेश राहु वा केतुयुक्त छठे होवैं तो कमलकुष्ठ होवे उनपर गुभदृष्टि होवै तो वह कुष्ठ तत्रस्थ राशितुल्य अंगमें हवै ॥ ६ ॥ विना विलमाधिपति ग्रहेषु लग्नस्थितेष्वत्र तु कुष्ठभाक् स्ात्॥ पित्रादिकानां फलमेवमाहुमुनीश्वराः कारकभावनाथै:।।७॥पैत्र्यं तु कुषं कुजसंयुतेषु शत्यं भवेन्मन्दसमन्वितेषु॥ रक्तं तदा सूर्य- समन्वितेषु ग्रहोक्तदेशे नियतं तदाहुः॥८॥ विना लसेश उक्त ग्रह लग्नमें होवैं तो कुष्ठरोग होवै भावकारक. भावेशसेमी इसीमकार पिन्रादिभावोंमें होवें तो पिता आदिको मुनीश्वर वही फळ कहते हैं।। ७ ।। ठन ग्रहोंके साथ मंगलभी होवै तो पिताका कुष्ठ आया जानना, शनैश्चर युक्त होवै तो शीतसे उत्पन्न. सूर्ययुक्त होवै तो रुधिरसे उत्पन्न कुष्ठ ग्रहके उक्त स्थानमें अवश्य होगा कहते हैं॥ ८ ॥ लग्नेशषष्ठाघिपती दिनेशयुक्तौ ज्वरं चंद्रसमन्वितौ चेत्॥ जलेन गंडं क्षितिसूनुयुक्ते युद्धेन वा स्फोटकराशिमिर्वा ॥९॥ चैतेन रोगेण बुधेन युक्तौ निर्व्याधिकौ जीवसमन्वितौ चेत्॥ शुक्रेण आार्याविपदं वदति मंदेन नीचानिलरोगमाहुः॥१०॥ सराहुके- तुर्यदि सर्पपीडा चौराग्निभीर्वातभयात्प्रमादः॥ लग्नेश और पष्ठेश सूर्ययुक्त होवैं तो ज्वररोग होवै चंद्रमायुक्त होवै तो जल करके (गंड) गुल्मादि होवै मंगलसे युक्त होवैं तो युद्धसे वा विस्फोटकादिसे राशितुल्य धातुसंबंधि रोग होवै॥ ९॥ बुधसे युक्क हों तो मनके रोगसे पीडित रहे, वृहस्पतिसे युक्त होवैं तो निरोगी रहे, शुकसे युक्त हों तो स्त्री मरजावै शनिसे युक्त हों तो नीचरोग वायुरोग कहते हैं ॥१०॥ राहु वा केतुसहित हों तो सर्पसे भय. वा विसर्परोग होवै तथा चोरभय. अग्निभय वायुकी भयसे (ममाद) विक्षिप्रता आदि होवै॥ वष्ठेश्वरश्धंद्रसुतेन युक्त: सागुर्विलग्ने स्वयमत्र शिश्रम्॥ ११ ॥ छिनत्यसौ सौम्यदशा विहीन: सभूमिपुत्रो यदि लिंगरोगात्॥। कामेश्वरः शुकयुतो रिपुस्थः कलन्रषंढत्वमुदीरयन्ति ॥१२॥

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( ११२ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

पष्ठेश बुधसहित तथा राहुसहित लग्नमें होवै तो आपही अपना लिंगछेदन करे ॥ ११ ॥ यदि मंगलसहित हो उसपर शुभग्रहकी दृष्टि न होवै तो किसीरोगसे लिंगछेदन होवे, सप्तमेश शुकसहित छठा होवै तो स्त्री हिजडी होवै ॥ १२॥ षष्ठेशलग्नाधिपती समंदौ केन्द्रत्रिकोणे यदि बन्धनं स्यात्।। सराहुकेतुर्यदि केन्द्रकोणे वदन्ति तज्ज्ञा निगडं तदानीम्॥ ।१३।पित्रादितत्कार कभावनाथैः पित्रादिकानां फलमाहुरन्ये॥ तत्तद्रहाणां परिपाककाले त्वन्तर्दशायामथ वा वदन्ति॥ १४॥ षष्ठेश तथा लग्नेश शनिसहित केन्द्रत्रिकोणमें होवै तो (बन्धन) कैद पावै यदि राहु केतु सहित केन्द्रकोणमें हेवै तौभी ज्योतिषज्ञ वही फल कहते हैं॥ १३ ॥ ऐसेही योग पित्रादि भावकारक भावेशसेभी होवै तो पिता आदिकोंभी वही फल कहतेहैं ये फल उन ग्रहोंकी दशामें अथवा अंतर्दशामें कहने ॥ १४ ॥ धमें शनौ वा सगुरौ तृतीये करच्छिदोडकें निघने व्यये वा॥। विधौ कलत्रे निधनान्वितो वा कुजेन युक्ते यदि वा सजीवे१५॥ कर्मस्थिताश्वेद्यदि राहुमन्दसौम्याः पदच्छेदयुतोऽत्र जातः ।। शुक्रेज्यदष्टे दिवसाधिनाथे सारे शनौ वा फणिनाथयुक्ते॥१६॥ क्ृरादिषष्टयंशसमन्विते वा विच्छेदनं तच्छिरसो वदन्ति॥ मन्दे विलग्ने मदने सराहौ कर्मान्विते भार्गवनन्दने च ॥ १७ ॥ कृष्णे शशांके मदराशियुक्ते विच्छिन्नहस्तः स भवेत्पदेन॥ भूस- नुलग्ने यदि वा तदंशे सूर्याऽन्विते कृष्णनिशाकरे तु. ॥ १८॥ फणीन्द्रचंद्रात्मजसंयुतेर्करश्म्याभिभूते ह्युदरस्य भेदः॥ मंदोदये सौम्यदृशा विहीने सर्पार्कयुक्ते यदि कृष्णचन्द्रे ॥ १९॥ शस्त्रेण कुक्षेर्दलनं वदति जातस्य दर्शे मुनयो महान्तः ॥२०॥ शनि वृहस्पति सहित नवम वा तृतीय स्थानमें हो,सूर्य अष्टम वा द्वादशस्थानमें होवै तो हाथ कटे मंगलयुक्त चंद्रमा सप्तम वा अष्टम स्थानमें हो अथवा बृहस्पतियुक्त होवै तोभी वही फल होगा।। १५ ।। दशमस्थानमें राहु, शनि, बुध होवैं तो पैर फटे) सूर्य शुक गुरुसे दृष्ट अथवा मंगल शनि राहुयुक्त हों ।। १६ । अथवा क्रूर आदि षष्टचंशयत होवें तो शिर कटे, शनि लग्नमें अथवा सप्तममें राहुयुक्त होवै तथा दशममें

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भाषाटीकासहित: : (११३ )

शुक्रभी होवै॥ १७ ॥ कृष्णपक्षका चंद्रमा सप्तम होवै तो वह हाथ पैर कटावै. लनमें मंगल वा उसका नवांशक होवै कृष्णपक्षका चंद्रमा सूर्ययुक्त हो॥१८॥ राहु बुधयुक्त होवै अस्तंगतभी होत तो पेट फटे, शनि लग्नमें शुभदृष्टिरहित राहु सूर्ययुक्त क्षीण चंद्रमा होवै तो।। १९॥ शस्त्रसे कूखी फाडी जावै. विशेषतः दर्शमें अर्थाव पूरे क्षीण चंद्रमा होनेमें ऐसा फळ मुनिलोग कहते हैं॥। २०॥। क्षीणे शशांके फणिनाथदष्टे सौरौ शिरस्यास्य निकृंतनं स्यात्॥ लग्ने शनौ सोमसुते स्वगेहे शौयें चतुर्थे सबुघेऽतिह्रस्वः ॥२१॥ क्षीण चंद्रमा राहुसे दृष्ट शनि होवै तो उस मनुष्यका शिर कटे, लग्नमें शनि हो बुध अपने घरका होवै अथवा चौथा शनि बुधसहित होवै तो अतिछोटे कदका होवै॥ २१ ॥ षष्ठाष्टमव्यये चन्द्रे लग्ननाथेन वीक्षिते॥ मंदमांद्यगुसंयुक्ते तस्य दुर्मरणं भवेत्॥ २२ ।। नीचारातिविमूढांशे मन्दे पापान्विते- क्षिते। क्रूरषष्टयंशसंयुक्त तस्य दुर्मरणं भवेत् ॥ २३॥ रंत्रेश्वर- स्थितत्र्यंशे पाशसर्पादिसंज्ञके॥ दकाणे मरणं व्याधिरुद्वंधान्म- रणं वदेत्॥ २४ ॥ मंदमांदगुसंयुक्ते रंध्रेशस्थत्रिभागपे॥ तथा- विधेर्कपुत्रे वा हयुद्धंघान्मरणं वदेत् ॥२५॥ चंद्रमा ६।८।१२ मेसे किसीमें लग्नेशसे दृष्ट तथा शनि केतुराहु सहित होवै तो उसका (दुर्मरण ) विषूचिका उच्चपात विषबंधनादिसे मरण होवै ॥ २२ ॥ शनि नीच, शत्रु, मूढ अंशकमें पापयुक्त दृष्ट होवै क्रूरषष्टचंशमें होवे तो उस मनुष्यका दुर्मरण होवै ॥२३ ॥ जिस द्वेष्काणमें अष्टमेश है वह पाश सर्प आदि होै तो उस द्रेष्काणेशके दशा आदिमे व्याधि यद्ा फांसीसे मरण कहना॥ २४॥ अष्टमेश जिसके द्रेष्काणमें है वह शनि केतु राहुसे युक्त होवै. अथवा शनि ऐसा होवै तो फांसीसे मरण होना कहना॥ २५ ॥ पष्ठाष्टमेशे भौमे वा विक्रमेशसमन्विते॥ मंदमांद्यगुसंयुक्ते कूरांशे युद्धतो मृतिः ॥ २६॥ युद्धेन मरणं ब्रूयाच्छनियुक्तत्रिभागपे॥ कुजेन वीक्षिते युक्ते भौमक्षेत्रे तदंशके ॥ २७॥ रविभौमौ यदा- न्योन्यं परस्परनिरीक्षितौ॥ परस्परग्रहांशस्थौ द्वंद्वयुद्धान्मृति वदेत्॥ २८ ॥। षष्ठेश अष्टमेश अथवा मंगल पराक्रमेशसे युक्त हों तथा शनि केतु राहु सहित हों कूरां- शकमें होवैं तो युद्धसे मरण होवे ॥। २६ ॥ शनि जिसके द्रेष्काणमें है वह मंगलसे

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(११४ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

दृष्ट वा युक्त हो मंगलके राशि वा अंशकमें होवै तो युद्धसे मरण होवें ॥ २७ ॥ यदि सूर्य मंगलकी आपसमें परस्पर दृष्टि होवै परस्पर राशि अंशकोंमें होवे तो मल्लयुद्धसे मरण होगा कहना॥ २८ ॥ अष्टमे बहवः पापा भौमराशिगतांशकाः ॥ ऋूरषष्टयंशकयुताः सद्यस्तन्मरणं वदेत ॥ २९॥ नीचमूढारिगेहस्थाः साम्याः सर्वे पराजिताः।।पापांशस्थाः पापयुताः सद्यस्तस्य मृति वदेत॥३०।। सद्यः स्यान्मरणं तस्य शनिराहुदिनाघिपाः ॥ रंघ्रेशवीक्षिताः सवें ऋूरांशान्मूढ संयुताः॥३१॥ अष्टम स्थानमें बहुत पापग्रह मंगलके राशि नवांशकके होवे क्रूरषष्ठयंशकमें होवें तो (तत्काल मरण) अकस्मात् मृत्यु होवै॥ २९ ॥ समस्त शुभग्रह नीच अस्त शत्रुराशिगत होवैं युद्धमें पराजित तथा पापांशकोंमें पापग्रहोंसे युक्त होवें तो वैखाही फल कहना ॥ ३० ॥ शनि, राहु, सूर्य्य, अष्टमेशसे दृष्ट हों सभी कूरांशकोंमें हों अस्तंगत हों तो उसमनुष्यका अचानक मरण होवे॥ ३१ ॥ रोगस्थानगते सूर्यें तद्भावे पापसंयुते। पापदृष्टियुते नाभौ पैत्तिका द्रणमादिशेत्॥ ३२॥ तथाभूते निशानाथे क्रूरदष्टे तदंशके॥ वातार्दितो भवेज्ातो रक्तपित्तार्दितः कुजे ॥ ३३॥ छठे स्थानमें सूर्य षष्ठेश पापयुक्त पापदष्ट होवै तो नाभि स्थानमें पित्तविकारसे व्रण कहना. ॥ ३२ ॥ ऐसाही चंद्रमा होवे क्रूरटृष्ट क्रूरांशकगत होवे तो मनुष्य बातरोगसे पीडित होवै, इसीमकार मंगल होवै तो रक्तपित्तसे पीडित रहे ॥ ३३ ॥ ल्लेष्मवातार्दितस्सौम्ये तथाभूते विशेषतः॥जीवे तु विद्रधिर्वाच्यः शुके मूलातिसाररुक्॥ ३४ ॥ तथायूते शनौ गुल्मरोगो वात्र विशेषतः॥ राहुकेतुसमायुक्ते बाधा पैशाचिकी स्मृता ॥३ ॥ उसीपरकार वुध होवै तो विशेष करके श्लेष्म तथा वातरोगसे पीडित होवै, बृहस्पति वैसा होवै तो (विद्रधि) किसी भगमें गुमडा आदि रोग होता है, शुक्र होवै, तो अतिसार रोग होवै॥ ३४ ॥ ऐसा शनि होवै तो विशेषकरके गुल्मरोग होवै, राहु, केतुसे युक्त होवै तो पिशाचकी वाधा होवै ॥ ३५ ॥ चंद्रे षष्ठे कुजयुते भ्रांतिपांङ्गादिरोगभाकू॥ सारे चन्द्रे रवियुते शूलवैसर्परोगभाकू॥ ३६ ॥ षष्ठे कुजे बुधयुते भृगुचन्द्रनिरी- क्षिते॥ करूरांशकसमायुक्ते क्षयरोगं वदति हि॥ ३७॥

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भावाटीकासाित:। (११५ )

छठा चंद्रमा मंगल सहित होवै तो (भ्रांति ) चित्तभ्रम तथा पाण्डु धादि रोगवाला होवै, चंद्रमा छठा मंगल सूर्य सहित होवै तो शूलरोग विसर्ष रोग होवै।। ३६ ॥ छठा चन्द्रमा वुधयुक्त होवै शुक्र चन्द्रमा उसे देखें क्रूरांशकमें होवे तो क्षयरोग निश्चय कहतेहैं ॥ ३७ ॥ शन्यारसहिते षष्टे रविराहुनिरीक्षिते॥ लग्ेशरे हीनबले दीर्ध- रोगी भवेन्नरः॥ ३८॥ पष्टे शनौ सगुलिके रव्यारफणिवीक्षित॥ शुभैन दृष्टे युक्ते वा श्वासकासक्षयादियुक॥ ३९॥ छठे भावमें शनि मंगल होवैं सूर्य राहु उन्हे देखें लग्नेश निर्बल होवै तो मनुष्य दीर्ष- रोगी होवै॥ ३८॥ छठे शनि गुलिक सहित हो सूर्य, मंगल, राहु उनको देखें शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट न होवैं तो श्वास, कास, क्षय, आदि रोगोंसे युक्त होवै॥ ३९॥ जलराशिगते चन्द्रे षष्ठे तद्भवनाऽघिपे। जलक्षस्थविदा दष्टे मूत्रकृच्छूदिकं भवेत् ॥४०॥ षष्ठे चन्द्रे शनौ रन्धे व्यये पापे विलग्नपे॥ पापांशकसमायुक्ते पीनसं रोगमादिशेत्॥४१॥ छठा चन्द्रमा जलचरराशिका हो पष्ठेश जलराशिमें बुधसे दृष्ट होवे तो सूत्रकळ आदि रोग होवैं॥ ४०॥ छठा चन्द्रमा अष्टम शनि बारहवेंमें पापग्रह और लमेश पार्पाशकमें होवै तो पीनस रोग होगा कहना ।। ४१ ॥ बलहीनेऽरिनाथे वा लग्नस्थे वा घरासुते॥ मूर्धार्तिर्मुखरोगो वा गुल्मविद्रधिभाग्भवेत् ॥४२॥ षष्ठेश्वरस्थितांशेशे रव्यादौ हि तथा भवेत्॥ फलं पूर्वोक्तमप्यत्र कमात्तस्य विनिर्दिशेत्॥४३।। पष्ठेश बलरहित हो वा लन्नमें हो अथवा लग्नमें मंगल होवै तो शिरमें पीडा वा मुखरोग यद्ा गुल्मरोग (विद्रधि) ग्रंथि व्रण रोगवाला होवै।। ४२ ॥। षष्ठेश जिसके नवांशकमें हो वहमी ऐसा होवै तो सूर्यादिकोंमेंसे जो ग्रह हो उसके धातुके अनुसार यद्ा ग्रहोक्त अंगमें क्रमसे पूर्वोक्त फल कहना ।। ४३ ॥। शत्रुस्थानाधिपे केन्द्रे पापग्रहनिरीक्षते॥ पष्ठे वा पापबाहुल्ये शत्रु- पीडां विनिर्दिशेत्॥४४।लग्रेशे शत्रुराशिस्थे तदीशे लग्नमाश्रिते। मन्दमांद्यगुसंयुक्ते शत्रुपीडां विनिर्दिशेत्॥४५। पापग्रहेण संदष्टे बलहीनेऽरिनाय के।। पापांतरगते वापि शत्रुपीडां विनिर्दिशेत्॥४६॥ पष्ठेश केन्द्रमें पापग्रहोंसे दृष्ट होवै अथवा छठे स्थानमें बहुत पाप होवें तो शत्रुसे पीडा मिळे॥। ४४ ॥ लग्नेश शत्रु राशि (छठे भाव) में हो षछ्ठेश लगनमें हो शनि रादु केतुसे

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(११६ ) सर्वार्थचिन्तामणिः। युक्त होवै तो शत्रुपीडा कहनी॥ ४५॥ षष्ठेश पापग्रहद्दष्ट तथा बलरहित होवै अथवा पाप- ग्रहाके बीच होवै तो शत्रुपीडा कहनी॥ ४६ ॥ शत्रुस्थानाधिपे दुःस्थे नीचमूढारिसंयुते ॥ लग्नेशे वलसंयुक्ते शत्रुनाशं वदेदधः ॥४७ ॥ शुभग्रहेण संदष्टे शत्रुस्थानाधिपे यदा॥ शुभान्विते शुभक्षेत्रे तेन मैत्रीं वदेहुधः ॥॥८॥लग्नेशा- दलहीने तु शत्रुस्थानाधिपे यदा॥ शुभान्विते शुभैरदष्टे शत्रूणां मैत्रमादिशेव ॥ ४९॥ षष्ठेश दुष्टस्थानमें नीच, अस्त, शब्रुराशिस्थ होवै लग्नेश बलवान् होवै तो पंडित शत्रुका नाश होगा कहे॥ ४७॥ षछ्ठेश यदि शुभग्रहद्दष्ट शुभयुक्त शुभग्रहके राशिमें होवै तो पंडित शत्रुसे मित्रता होगी कहे॥ ४८ ॥ यदि षष्ठेश लग्नेशसे हीनवली होवै शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट होवै तो शत्रुओंसे मित्रता होगी कहना ॥ ४९ ॥ लग्नेशेऽष्टमभावस्थे वष्ठेशेन निरीक्षिते॥ तौ वा विलय्नभावस्थौ ज्ञातिपीडां विनिर्दिशेत्॥५०॥ गुरुशुकौ विलग्नस्थौ षष्ठभावे- श्वरान्वितौ॥ शन्यारफणिसंदष्टौ ज्ञातिपीडां विनिर्दिशेत्॥५१॥ लग्नाधिपे शुभयुते पष्टे चंद्रेऽथ वा शुभे॥ केन्द्रत्रिकोणगे सौम्ये ज्ञातिभिः सह जीवनम् ॥५२॥ ज्ञातयो बहवः संति षष्ठेशे देवपूजिते॥ शुभान्विते शुभैर्द्ृष्टे मृद्ंशादिसमन्विते ॥५३॥ लग्नेश अष्टम षष्ठेशसे दृष्ट हो अथवा लग्नेश षष्टेश छग्नमें हों तो अपनी जातिवालोंको पीडा होगी कहना॥ ५० ॥ गुरु और शुक लग्नमें षष्ठेश सहित होवैं शनिमंगल राहु उन्हें देखें तो ज्ञातिपीडा कहनी॥ ५१ ॥ लग्नेश शुभग्रहयुक्त हो छठे स्थानमें चंद्रमा वा कोई शुभग्रह हो वुर्ध केंद्रत्रिकोणमें होवै तो विरादरीके साथ आजीवन होवै ॥ ५२॥ षषठेश् बृहस्पति शुभग्रह्दोंसे युक्त दृष्ट एवं मृद्ंशादियुक्त होवै तो विरादरी बहुत बडी होवै ॥५३॥ ज्ञातिक्षयं विजानीयात्वष्टेशे पापसंयुते।। क्ूरांशनीचमूढादौ शुभदग्योगवर्जिते ॥५४ ॥ पारावतादिभागस्थे लग्नेशे शुभवी- क्षिते॥ ज्ञातीशे बलहीने वा तस्मादुत्कर्षतां व्रजेत् ॥५॥ भाग्येशे षष्ठराशिस्थे पष्ठेशेन निरीक्षिते॥ षष्ठेशे मन्दभौमाभ्यां युते चौराग्निपीडनम्॥ ५६॥

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भावाटीकासहित:। ( ११७ ) पष्ठेश पापयुक्त हो क्रूरांशकमें तथा नीचास्तादिमें हो शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट न हो तो अपनी जातिवालोंका क्षय होवै॥ ५४॥ लगनेश शुभग्रहद्ृष्ट पारावतादि अंशकमें हो चतुर्येश बल- रहित होवै तो अपनी जातिमें श्रेष्ठता पावै॥ ५५॥ नवमेश छठा होवै पष्ठेश उसे देखे, तथा षष्ठेश शनि मंगलसे युक्त होवै तो, चोर तथा अिसे पीडन होव ॥ ५६ ॥ तदीशे गोपुरांशादौ दिवसेशेन वीक्षिते॥ लग्नेशे बलसंपूर्णे ज्ञातीनामुपकारकृत्॥ ५७॥षष्ठे सौम्ये शुमैदैष्टे तदीश शुभसं- युते॥ पापग्रहाणां मध्यस्थे सूपदंशप्ियो भवेत् ॥५८॥। षष्ठेश गोपुरांशादिमें सूर्यसे दृष्ट होवै, लन्नेश पूर्ण बली होवै तो अपनी जातवालोंका उपकार करनेवाला होवै॥ ५७॥ छठा बुध शुभग्रहद्ष्ट हो पष्ठेश शुभयुक्त होवे परन्तु पापग्रहोंके मध्यभी होवै तो अच्छे क्षारपदार्थोंको मिय माने॥५८ ॥ उपदंशप्रियो नित्यं षष्ठे जीवे श्शांकजे॥ क्षेत्रे तयोवा संपरात्ते मृद्ंशादिसमन्विते ॥५९॥ देवेज्ये षष्ठभावेशे शुके वा तस्य नायके॥ मधुरादिषियो नित्यं गोपुराद्यंशकाऽन्विते॥ ६० ॥ छठे वृहस्पति बुध हों षछ्ठेश गुरु बुधके अंशकमें मृद्ंशादिमें होवै तो क्षारवस्तु मिय होवै ।५९॥ पष्ठेश गुरु वा शुक्र गोपुरादि अंशकमें होवै तो मीठा आदि पदार्थ पिय माने ॥६०॥ शुके पष्ठे ससौम्ये वा शुभदष्टे शुभांशके॥ बलाऽन्विते शुभांश- स्थे नित्यं मधुरभाग्भवेत् ॥ ६१॥ पापग्रहेण संदृष्टे बुधे मधुर- वर्जितम्॥ बुधेन युक्ते शुकेडरौ त्वम्लभाकू स नरो भवेत्॥६२।। षष्ठे शुक्रे भौमद्ृष्टे भौमे शुके तदन्विते। दिवसेशेन वा दष्टे त्वम्लभाकू स नरो भवेत ॥ ६३ । शुक छठा होवै अथवा बुधयुक्त होवै शुभग्रहोंसे दृष्ट शुभांशकमें हो बलवान् तथा पारा- वतादि शुभांशकमें होवै तो नित्य मीठा खानेवाला होवै॥ ६१ ॥ बुध पापग्रहोंसे दृष्ट होवै तो मीठा न खावै, बुधसहित शुक छठा होवै तो वह मनुष्य खट्टा खानेवाला होवै ॥ ६२ ॥ छठा शुक मंगलसे दृष्ट हो अथवा मंगल शुक छठे हों अथवा सूर्य उसे देखे तो वह मनुष्य खट्टा बहुत खावे ॥ ६३ ॥ पष्ठेशे भौमसंदृष्टे राहुकेतुनिरीक्षिते॥ भौमक्षेत्रगते वापि विप्र्ल- भादिचौर्यभाक॥ ६४॥ पुत्रादीनामिदं योज्यं तत्तद्वावप्रकार-

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(११८ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

कैः॥ नास्तिकाय न वत्तव्यं वत्तव्यं सुजनाय वै ॥६५॥ अध्याय: पंचमः प्रोक्तः पंचषड्भाववाचकः ॥ विचित्रार्थसमा- युक्तो वेंकटेशेन धीमता ॥ ६६ ॥ इति श्रीसर्वार्थचिंतामणौ पञ्चमषष्ठभावफलविचारो नाम पंचमोऽध्यायः॥५॥ षछ्ठेशपर मंगलकी दृष्टि हो राहु केतुभी देखें अथवा मंगलकी राशिमें होवै तो विशेष वादमतिवाद करके दूसरेसे किसीमकारकी विद्या आदि चोरे ॥ ६४ ॥ ऐसेही फल पुन्रादि भावोंमें उन भावोंके विचारस उन पुत्रादिकोको भी कहना यह शास्त्र नास्तिकके आगे न कहना सज्जनसे कहना॥ ६५॥ यह पांचवां अध्याय पंचम तथा छठे भावका फलवाचक विचित्रार्ययुक्त धीमान् वेंकटेशने कहा ॥ ६६॥ इति श्रीसर्वार्थचचंतामणौ माहीघरभाषाटीकायां पश्चमषछठभावफल- विचाराध्यायः पञ्रमः ॥५॥

षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥

अथ सप्तमभावफलविचाराध्यायः। युवतिपदादुद्वाहं भार्यापतिसूपदधिगुडक्षीरम्॥ आगमगमनमदार्ति ब्रूयान्सून्राशयं च नष्टघनम्॥१॥ सप्तम भावसे विवाहविचार, स्त्री पति विचार, दाल, दही, गुड, दूध, आगमन, गमन, कामदेवार्ति तथा मूत्राशयका विचार और चोरी आदिसे नष्ट धनका विचार कहना ॥ १ ॥ शुके कलत्रे त्वतिकामुकः स्याद्ुधेऽन्ययोषानिरतो गुरौ तु।। स्वदारसक्तो दिननाथपुत्रे कुदाररम्यः सुपतौ सुदारः॥२॥कुजे बहुस्त्रापुरतः कुलन्नो भानौ कुटुम्बी बहुदारसक्तः॥ लग्नस्थिता वित्तकलत्रशत्रुनाथाः सशुका यदि पापयुक्ताः ॥ ३।। शुक सप्तम होवै तो अतिकामी होवै, बुधसे परस्त्रीगामी, बृहस्पतिसे अपनी स्त्रीमें आसक्, शनिसे दुष्टखरीमें रमणकरनेवाला होवे सप्तमेश शुभ होवै, तो अच्छी स्त्री होवै॥ २ ॥ मंगल सप्तम होवे तो बहुत त्ति्रियोंके होतेभी कुलघ्न (दूसरेकी स्त्री तथा परम नीचजाति नीचकर्मकरने-

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भावाटीकासहित:। (११९ ) वाली स्त्रीका मसङ्गकर अपने कुलको नष्ट करनेवाला) होवै। सूर्यसे कुटुंबवाला बहुत स्त्रियोंमें आसक होवै। लग्नमें दूसरे, सप्तम, पंचम और छठे भावके स्वामी शुक्रसहित तथा पाप सहित हेैं तो ॥ ३ ॥ जातः परस्त्रीषु रतः कुमार्गी शुभेक्षितश्रेत्र तथा भवेच॥। लगा- रिपौ पापयुतौ यदि स्याजातः परस्त्रीषु रतः कुमार्गी॥४॥ लग्नेश्वरे शत्रुकुटुम्बनाथे पापैर्युते वा यदि दारराशौ। सौरो सपापे यदि दारनाथे जात: परस्त्रीषु रतः कुटुम्बे॥५॥ सराहुकेतौ यदि दारनाथे पापेक्षिते वा व्यभिचारयोगः॥ कर्मेशवित्तेशक- लन्ननाथा मानस्थिता जारमुदाहरंति ॥६॥ मनुष्य पराई स्त्रियोंमें आसक्त और कुमार्ग चलनेवाला होवै, यदि शुभग्रहोंसे दृष्टभी होवे तो वैसा न होवै कुछ कम होवै यदि लग्नेश षष्ठेश पापयुक्त होवे तो परस्त्रीमें आसक तथा कमागी होवै॥ ४॥ लग्नेश पष्ठेश द्वितीयेश पापयुक्त हों अथवा सपममें शनि, सतमेश पापयुत होवै तो पराई स्त्रीमें आसक्त रहे। यदि दूसरे भावमें। ५॥ राहु वा केतु हो सप्मेश पापदृष्ट होवै तो व्यभिचारयोग होताहै। दशमेश, धनेश, सप्मेश दशममें हों तो जार (परस्त्री गमन करनेवाला ) कहतेहैं ॥ ६ ॥ एको ग्रहस्तेषु चतुर्थराशौ जातः परस्त्रीगमनं प्रयाति॥ पुत्रेश्वरे दारपतौ बलाढचे दृष्टे युते वा त्वरिनायकेन ।७॥ जातोऽ- नपत्यो यदि तत्कलत्रे जारात्सुतः स्पाच्छुभखेटदृष्टे॥ दारेशवरे पापयुते कुटुम्बे भौमेन दष्टे यदि जारपुत्रः ॥।८।। दशम द्वितीय सप्तम भावोंके स्वामियोंमें से एकमी ग्रह चौये स्थानमें होवै तो परस्त्री- गमन करे। पंचमेश एवं सप्तमेश बलवान् हो षष्ठेशसे दृष्ट वा युक्त हो॥ ७॥ तो मनुष्य- अपुत्र होवै, यदि योगकर्त्ता उक्त ग्रह सप्तममें होवै और उसपर शुभग्रहकी दृष्टिभी होवै तो जारसे संतान पैदा होवै। सप्तमेश पापयुक्त दूसरे भावमें हो मंगल उसे देखे तो जारसे- पुत्र पैदा होवै ॥l ८॥। धीघर्मनाथौ सकलत्रनाथौ दुःस्थानगौ हीनबलौ शुभैरन॥। दृष्टे सुते दारबहुत्वयोगे त्वपुत्रयोगं मुनयो वदति ॥ ९॥ क्षीणे शशांके यदि पापयुक्ते दारस्थिते त्वन्यकलत्रगामी॥ लग्ने सपापे यदि दारनाथे जात: परस्त्रीषु रतः कुमार्गी।। १० ॥

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(१२० ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

पंचम नवमके स्वामी सप्तमेश सहित दुष्ट स्थानमें हों हीनवली हों पंचमपर शुभद्दाष्ट न होवै तो बहुत स्त्रियोंमेंभी अपुत्र योग मुनिलोग कहतेहैं॥ ९ ॥ यदि क्षीण चन्द्रमा पापयुक्त सप्तममें होवै तो परस्त्रीगामी होवै. लग्नमें पापग्रह सहित सप्रमेश होवै तो परस्त्रीगामी कुमार्गी होवे ॥ १० ॥ सुतेशे दारभं याते तदीशे पापसंयुते॥ शुक्रो बलविहीनश्रेद्रर्मेण स्त्रीमृतिर्भवेत् ॥ ११॥ नीचे भृगौ वा यदि वा शर्शाके नीच- स्थितेऽत्राम्बुनि दारहानिः॥ उद्धन्धनात्तन्मरणं वदति दारेश्वरे पाशभुजंगमाख्ये ॥१२॥ पंचमेश सप्तममें हो सप्तमेश पापयुक्त हो और शुक्र वळहीन होवै तो गर्भदोषसे स्त्रीकी मृत्यु होवै।। ११ ।। इस योगमें शुक अथवा चन्द्रमा नीचका होवै तो जलमें स्त्री मरे, यदि सप्तमेश पाश सर्पद्रेष्काणमें होै तो उद्धंधन (फांसी) से स्त्री मरे ॥ १२ ॥ द्रेष्काणभागे विषभक्षणाद्वा मान्यन्विते दारपतौ सराहौ। स्वक्षे कुटुंबाघिपतौ कलत्नाथे यदा त्वेककलत्भाक स्यात्॥ ।१३॥ ताम्यां समेतैर्ग्रहनायकैर्वा कलत्रसंख्यां प्रवदन्ति सन्तः। कलत्रनाथस्थितराशिनाथसंयुक्तखेटैरपि वाच्यमेतत् ॥ १४॥ सप्तमेश (मांदि) केतु वा राहु युक्त भुजगद्रेष्काणमें होवै तो त्त्री विषखायके मरे। द्वितीयेश अपनी राशिमें हो सप्मेशमी अपनी राशिमें होवें तो एकही स्त्रीवाला होवै ॥१३॥ अथवा द्वितीयेश सप्तमेशक साथ जितने ग्रह हैं उनके बलानुसार स्त्रियोंकी संख्या पंडित कहतेहैं। सप्तमेश जिसकी राशिमें है उसके साथ जितने ग्रह हैं उनसेभी स्त्रीसंख्या कहनी॥१४॥ कलत्रेशे बहुगुणे तुङ्गवक्रादिहेतुभिः॥ बहुभार्य नरं विद्यादुदय- र्क्षगतेऽपि वा ॥१५॥ भार्याद्वयं वदेत्तत्र लग्नेशे नाशराशिगे॥ कलत्रे पापसंयुक्ते कुटुम्बेशे तथाविधे॥ १६॥ सप्तमेश उच्च वक्र आदि बहुतगुणोंसे युक्त होवै अथवा लग्नमें होंवे तो मनुष्यको बहुत स्तिरि- योंसे युक्त जानना ॥ १५॥ लग्नेश बारहवें सप्षममें पाप कुटुम्बमेंमी पाप ग्रह होवै तो दो स्त्री होंगी ऐसा कहना॥ १६ ॥ शन्यारफणिसंयुक्ते कलत्रेशो यदा भवेत् ॥ क्रूरषष्टयंशके वापि कलत्रमरणं वदेत् ॥ १७॥ शुभग्रहेण संयुक्त: कलत्रेशेऽरिनी चगे॥ पापे कलत्रराशिस्थे विवाहद्वयमादिशेत्॥१८॥।

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भाषाटीकासहित:। ( १२१ )

यदि सप्तमेश, शनि, मंगल, राहु युक्त होवै अथवा कूरषष्टयंशमें होवै तो स्ीमरण कहना ।। १७॥ सप्तमेश शत्रु वा नीच राशिमें शुभग्रहसे दृष्ट हो और सत्ममें पापग्रह होवै तो दो स्त्री होंगी ऐसा कहना॥ १८ ॥ कारके पापसंयुक्त नीचराश्यंशकेऽपि वा॥ पापग्रहेण संदृष्टे विवाहद्यमादिशेत् ॥१९॥ कलत्रकारकश्वन्द्रो ज्ञो गुरुवाथ वा भृुः ॥ मध्ये बलिष्ठो यस्तेषां तस्मात्सर्वै निरूपयेत् ॥ २०॥ सप्तमभावकारक ग्रह पापयुक्त हो अथवा नीचराशि नीचांशकमें हो पापग्रह उसे देखे तो दो विवाह कहना। १९।। सप्तमभावकारक चंद्मा अथवा बुध अथवा शुक वा बृहस्पति होवैं इनके मध्यमी जो विशेष बलवान् हो उससे समस्त विवाहयोगका निरूपण करना ॥ २० ॥ कलन्रे वा कुटुम्बे वा पापहग्योगसम्भवे॥ तदीशे बलहीने तु कलन्नांतरभाग्भवेत् ॥२१॥ सतमे चाष्टमे पापे व्यये भूसुतसं- युते॥ अदृश्ये यदि नाथेन कलत्रांतरभाग्भवेत् ॥ २२॥ वित्ते पापबहुत्वे तु कलत्रे वा तथाविधे।। तदीशे पापसंदष्टे कलघत्र- यभाग्भवेत् ॥ २३॥ लगे कुटुम्बे दारे वा पापखेचरसंयुते॥ दारेशे नी चमूढादौ कलत्रयभाग्भवेत् ॥ २४॥ सप्तममें यद्रा द्वितीयस्थानमें पापग्रहोंकी दृष्टिका योग होवे उस भावका स्वामी वलरहित होवै तो दूसरी स्त्रीवाला होवै। २१॥ सप्तम तथा अष्टम भावमें पाप ग्रह हो बारहवां मंगल होवै स्वस्वामीसे सप्तमभाव दृष्ट न होवै तो दूसरी स्त्रीसे गृहस्थ होवै ॥ २२ ॥ धनस्थानमें बहुत पाप ग्रह हों सप्तममें भी ऐसही हों भावेश पापयुक्त होवै तो तीन स्त्री होवै ॥ २३ ॥ लग्न द्वितीय अथवा सप्तम भावमें पापग्रह हों सप्तमेश नीच राशि अस्तंगतादिमें होवै तो तीन स्त्री होवैं इन योगोंमें स्त्रीहानिसे तीस्री स्त्री होनेकी संभावना है॥ २४॥ नीचमूढारिभावस्थे लग्नेशे दारपेऽथ वा।।करूरषष्टयंशके वापि कल- त्रांतरभाग्भवेत् ॥२५॥ दारेशस्थनवांशेशे नीचमूढारिभांशके पापांतरे पापदृष्टे कलत्रांतरभाग्भवेत् ॥ २६॥ लग्नेश अथवा सप्तमेश नीच अस्त शत्रुराशिगत हो अथवा क्रूरषष्टचंशरमें होवै तो अन्य स्त्रीवाला होवै॥ २५ ॥ सप्तमेश जिसके नवांशकमें हो वह नीच अस्त शत्रु राशि वा नवांशकमें हो पापग्रहोंके बीच पापग्रहोंसे दृष्ट होवै तो अन्य स्त्रीवाला होवै ॥ २६ ॥ ६

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( १२२ ) सर्वार्थचिन्तामणि:। एवं कुटुम्बनाथेन कारकस्थांशपेनवा। पापांतरे दारगृहे तन्नाथेऽ- पि कलत्रहा॥ २७॥ लग्नेश्वरात्कर्मगते सोमपुत्रे बलान्विते ॥ दारेशाद्विकमे चन्द्रे बहुस्त्रीसहितो भवेत् ॥ २८॥ इसी प्रकार द्वितीयेशसे तथा सप्तमकारकस्थित अंशेशसेभी फल कहना। सप्तमभाव पापोंके बीच हो सप्तमेशभी पापांतर होवै तो स्त्रीहानि होवे॥ २७ ॥ लमेशसे दशममें बुध बलवान् होवै सप्तमेशसे तीसरा चंद्रमा होवै तो बहुत स्त्रियों सहित होंवे॥२८॥ व्ययार्थेशौ तृतीयस्थौ गुरुणा च निरीक्षितौ। भाग्यनाथेन वा दष्टौ बहुस्त्रीसहितो भवेत्॥। २९॥केन्द्ृत्रिकोणे दारेशे स्वोच्च मित्रस्ववर्गगे॥ कर्माधिपेन वा युक्े बहुत्नीसहितो भवेत् ॥३० ॥ धनव्ययभावेश तीसरे भावमें गुरुदृष्ट अथवा नवमेशसे दृष्ट हों तो बहुत स्त्रियोंसहित होवै ।। २९ । सप्तमेश केन्द्र वा त्रिकोणमें उच्च मित्र राशिमें वा अपने अंशादिमें हो अथवा दशमेशसे युक्त होवै तो बहुत स््री होवे॥ ३० ॥ लाभदारेश्वरौ युक्तौ परस्परनिरीक्षितौ॥ बलाव्यौ वा त्रिको- णस्थौ बहुस्त्रीसहितो भवेत्॥३१।भाग्येशे दारराशिस्थे दारेशे सुखभं गते।। भावेशे लाभनाथे वा केंद्रे बहुकलत्रभाळ ॥ ३२ ॥ लाभेश सप्रमेश एकसाथ हों अथवा परस्पर देखते हों, वलवान् हों यद्ा त्रिकोणमें होवे तो बहुत स्त्रीवाला होवै। ३१ ॥ नवमेश सप्तममें, सप्मेश चतुर्थमें, चतुयेंश वा लाभेश के- न्द्रमें होवें तो बहुत स्त्रियोंवाला होवै ॥ ३२ ॥ दारेशसंयुक्तनवांशनाथयुक्तांशनाथे सति सौम्ययुक्ते॥ पाराव- तांशादिगते बलाव्ये जातः शतस्त्रीसहितो नरः स्यात् ॥ ३३ ॥ कुटुम्बनाथस्थितराशिनाथसंयुक्तषष्टयंशपतौ बलाढ्ये। मृद्ंशके गोपुरभागयुक्ते जातः शतस्त्रीद्वियुणेन युक्तः॥ ३४॥ तत्कार- कस्थांशपयुक्तराशिनाथस्थितांशाघिपतौ च केंद्रे।। मृद्धंशके गोपु- रभागयुक्ते जातस्य वाच्या त्रिशती बधूनाम् ॥ ३५॥ सप्रमेश जिसके नवांशकमें है वहभी जिसके नवांशकमें है वह शुभयुक्त पारावतादि अंशकमें हो बलवान् होवे तो मनुष्य सौ स्त्रियों सहित रहे॥ ३३ ॥ द्ितीयेश जिसकी राशिमें है वह षष्टयंशेशके सहितहो बलवान् हो मृद्ंशकमें वा गोपुरांशकमें हो तो दो सौ स्त्री होवैं॥ ३४ ॥ सप्तमकारक जिसके अंशकमें है वहमी जिसकी राशिमें है वह जिसके नवांशक में

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आवाटीकासहित:। ( १२३ ) है वह केन्द्रमें मृद्धशकमें वा गोपुरांशमें होवै तो तीन सौ सती होवैं। ऐसे योगोंमें भावेश तथा भावेश जिसके राश्यंशमें है वहभी जिसके राशि वा अंशकमें हैं ऐसे २।३ विकल्पवाले सभी बलवान् तथा पारावतादि उत्तमभागोंमें होने चाहिये तब ठीक फल होगा॥ ३५॥ दारेशे गोपुरांशस्थे कमेशे दारराशिगे॥ तथाविधे कुटुम्बेशे दशसंख्यकलत्रभाक्। ३६। एवं पुत्रादिभावानां कलत्नादिकमा- दिशेत्॥ दारेशे पापसंयुक्ते दारे वा पापसंयुते॥ ३७ ॥ दारे- शस्थांशपे पापे कुस्त्रीभाक्स नरो भवेत्॥ करषष्टयंशके दारनाथे कुस्त्रीयुतो भवेत् ॥ ३८ ॥ सप्रमेश गोपुरांशकमें, दशमेश सप्तम और ऐसाही द्वितीयेशंभी होवै तो दश स्त्रियोंको भोगे।। ३६ ॥ ऐसेही पुत्रादिभावोंका विचार करके उनके स्त्रियोंकी संख्या कहनी सप्तमेश पापयुक्त अथवा सप्तममें पाप हो॥ ३७॥ सप्तमेशभी पापग्रहके अंशकमें होवे तो मनुष्य कुस्त्रीवाला होवै, सप्मेश कूरषष्टयंशमें हो तौभी कुस्त्रीवाला होवै ।। ३८ ॥ नीचांशे नी चसंयुक्ते दारनाथे च कारके॥ कुस्त्रीयुतो भवेज्ातः शुभदृष्टिविवर्जिते ॥ ३९ ॥ दारेशे शुभसंयुक्त्ते शुभखेचरवी- क्षिते॥ शुभग्रहाणां मध्यस्थे सत्कलत्रादिभाग्भवेत् ॥ ४० ॥ दारेशे शुभराश्यंशे कारके वा तथाविधे ॥। कर्मेशे बलसंयुक्ते सत्कलत्रसमन्वितः ॥ ४१।। सप्तमेश एवं सप्तमभावकारक नीचांश नीचराशिमें हो उनपर शुभदृष्टि न होवै तो मनुष्य (कुस्त्री) निन्ध स्त्रीस युक्त होवै॥ ३९ ॥ सप्तमेश शुभयुक्त शुभग्रहदृष्ट शुभग्रहोंके बीचमें होवै तो (सुस्त्री) उत्तम स्त्रीवाला होवै।। ४० ॥ सप्तमेश शुभ ग्रहके राशि अंशमें हो कारकभी ऐसाही हो दशमेश बलवान् होवै तो अच्छी स्त्रीवाला होवै ॥४१ ॥ स्वोच्चे मित्रे स्ववर्गेवा गोपुराद्यंशके भृगौ॥ षष्टयंशे मृदुभागस्थे सत्कलत्रसमन्वितः ॥४२॥ गुरुणा सहिते दृष्टे दारनाथे बला- न्विते॥ कारके वा तथा भावे पत्नी व्रतपरायणा॥ ४३॥ कल- वेशे रवौ वापि शृगौ सौम्यनिरीक्षिते। गुरुयुक्ते कलत्रे वा धर्म- शीला पतिव्रता॥ ४४।l कलत्राधिपतौ केन्द्रे शुभग्रहनिरी- क्षिते॥ शुभांशे शुभराशौ वा पातिव्रतपरायणा॥४॥कलत्रे-

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(१२४ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

शे रवौ वापि पापराश्यंशसंयुते॥ पापान्विते पापदष्टे पत्नी पापपरायणा॥ ४६ ॥ शुक्र अपने उच्चराशि मित्रराशि अपने अंशादिमें अथवा गोपुरादि भागमें मदुषष्टयंशमें हौंवै तो अच्छी स्त्रीसे युक्त होवै ।। ४२॥ सप्तमेश बलवान् हो वृहस्पतिसे युक्त वा दृष्ट हो ऐसेही भावकारक ग्रहमी होवै तो स्त्री पतिके व्रतमें तत्पर रहे ॥ ४३ ॥ सप्रमेश अथवा सूर्य शुक्र बुधसे यद्ा शुभग्रहमात्रसे दृष्ट हों, गुरुसहित हों अथवा सप्तमस्थानमें होवें तो स्त्री धर्मस्वभाववाली पतिव्रता होवे।। ४४ ॥ सप्तमेश केंद्रमें शुभग्रहसे दृष्ट शुभग्रहके अंशकमें वा शुभग्रहकी राशिमें होवै तो स्त्री पतिव्रतमें परायण रहे ॥ ४५ ॥ सप्तमेश अथवा सूर्य पापराशि पार्पाशकमें पापदृष्ट पापयुक्त होवै तो स्त्री पापकर्ममें तत्पर होवै ॥ ४६॥ भानौ कलत्राधिपतौ बलाढचे शुभान्विते शोभनराशिभागे॥ शुभग्रहेणापि निरीक्षित वा लग्नेशमित्रे पतिभक्तियुक्ता॥४७।। दारेश्वरे वा कुमुदात्मबंधौ पापान्विते पापनिरीक्षिते वा। पार्पां- शके पापग्रहांतरस्थे कुमार्गचारी कठिनापराधा॥४८ ॥ सप्तमेश सूर्य बलबान् हो, शुभयुक्त शुभग्रहकी राशिमें शुभांशकमें शुभग्रहसे दृष्ट हो वा लमेशका मित्र होवै तो स्त्री पतिभक्तिवाली होवै। ४७॥ सप्रमेश अथवा चन्द्रमा पापयुक्त पापदृष्ट वा पापाशकमें पापग्रहोंके बीच होवे तो स्त्री कुमार्गी एवं कठिन अपराधवाली होवै॥। ४८ ॥ सौम्यांशके सौम्यगृहान्विते वा मित्रोच्चगेहे मृदुभागयुक्तेत।। चंद्रे कलत्राधिपतौ च शुके पुण्या सुशीला सुचरित्रयुक्ता॥।४९।। दाराधिपे हीनबले घराजे कूरादिषष्टयंशसमन्विते वा॥ निव्नारि- मूढे विहगारिभावे दुष्टान्यसक्ता पतिकर्कशा वा ॥५॥ मित्रो- च्चवर्गे यदि दारनाथे शुभान्विते सौम्यददशा समेते।। पारावतांशा दिगते बलाढये क्रूरापि पत्युर्गुणमार्गयुक्ता॥५9॥ चंद्रमा सप्तमेश और शुक शुभराशि शुर्भाशकमें वा मित्रराशि उच्चराशिमें मृद्ंशकमें होवै तो पुण्यवती सुशीला उत्तमचरित्रवाली होवै।। ४९॥ सप्तमेश हीनबल हो मंगल क्रूर आदि षष्टचंशमें वा नीच शत्रु राशिमें अस्तमें होवे तो स्त्री दुष्टस्वभावकी अन्य पुरुषमें आसक वा पतिके लिये (कर्कशा) कठोर होवै॥ ५०॥ यदि सप्रमेश मित्र वर्गमें उच्च वर्गमें शुभग्रहोंसे

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भाषाटीकासहित:। (१२५ ) दृष्ट वा युक्त हो पारावतादि अशकमें माप बलयुक्त होवे तो क्रूरस्वभाव हुयेमें भी पतिके गुण एवं उसके मार्गगामिनी होवै॥ ५१॥ दाराधिपे सोमसते सपापे नीचारिमूढे यदि नाशभावे॥ पापा- न्तरे पापहशा समेते जाता पतिन्नी कुलनाशकारी॥ ५२॥ सुपुत्र सौख्यान्वितघर्मशीला त्रतोपवासादिविशुद्धदेहा॥ सौम्ये कलन्नाधिपतौ बलाढचे मित्रोच्चवर्गे यदि गोपुरांशे॥ ५३॥ सप्तमेश चन्द्रमा पापयुक्त नीच, शत्रु, अस्तका यदि बारहवें भावमें पापग्रहोंके वीचमें पापदृष्ट होवै तो वह कन्या पतिको मारनेवाली कुलका नाश करनेवाली होवै॥ ५२॥ सप्मेश शुभ ग्रह बलवान् मित्र उच्च वर्गमें यदि गोपुरांशकमें होवै तो सुपुत्रा सुखसे युक्क धर्ममें स्वभाव, व्रत उपवासादिकोंसे शुद्ध देहवाली होवै ॥ ५३॥ भृगो: सुते दारपतौ सपापे नीचान्विते नीचभमूढगेहे॥ क्रूरा- दिषष्टयंशसमन्विते वा वेश्यासमाना कठिना हि चौरा ॥५४॥ शुके कलत्राधिपतौ बलाढचे शुभान्विते शोभनखेचरांशे ॥ मित्रोच्चवर्गें स्वगृहे मृदुस्थे वाचलिका पुत्रवती गुणाव्या।५५।। सप्रमेश शुक्र पापयुक्त नीचगत ग्रहयुक्त नीच राशिमें वा अस्तंगत हो अथवा क्रूरादिषष्टयं- शयुक्त होवै तो वेश्याके समात तथा कठोर और चोर होवै ॥ ५४ ॥ सप्तमेश शुक बलवान् शुभयुक्त शुभग्रहके अंशकमें मित्र एवं उच्चवर्गमें अपनी राशिमें मृददु अंशकमें होवै तो वाचाल पुत्रवती गुणयुक्त होवै।। ५५॥ जरातिदुष्टा कुलदूषणा स्यान्मन्दे कलत्राघिपतौ सपापे।नीचां- शके नीचगृहेऽरिगेहे पापेक्षिते पापवियच्चरांशे॥५६॥परोप- कारी द्विजदेवभक्ता स्त्री ब्रह्मवादी गुरुदृष्टियुक्ते।। शुभेक्षिते धर्म- रता सुशीला मंदे कलत्राधिपतौ बलाढचा॥ ५७॥ सप्तमेश शनि पापयुक्त नीचराशि नीचांकमें शत्रुराशिमें पापदृष्ट पापग्रहके अंशकमें होवै तो बूढे आकारकी अतिदुष्ट कुलमें दूषण लगानेवाली होवै ॥ ५६ ॥ सप्रमेश शनि बलवान् शुभग्रहदृष्ट विशेषतः बृहस्पतिसे दृष्ट होवै तो परोपकार करनेवाली ब्राह्मण और देवतोंकी भक्ति करनेवाली ब्रह्मवादिनी ज्ञानवती धर्ममें तत्पर सुश्ील होवै॥ ७॥ सराहुकेतौ मदनेऽन्यसक्ता पापेक्षिते पापरता कुशीला॥ क्ूरां- शके भर्तृविषप्रदा स्यालोकापवादान्वितकर्कशा स्यात्॥५८॥

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(१२६ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

सप्तमभावमें राहु वा केतु सहित होवै तो अन्यपुरुषमें आसक्त रहे पापदृष्टभी हो तो पापमें तत्पर और दुष्ट शीलवाली होवै। कूरांशकमें हेव तो भर्त्ताको विषदेनवाली लोकमें झूढे कलंकयुक्त और (कर्कशा) कठोरभी होवै॥ ५८॥ दारेश्वरे सन्निहिते विलगने नाथस्य बाल्ये परिणीतमाहुः॥ लग्ना- त्कलत्राच्छुभखेचरेंद्रे समपिराशौ यदि तत्तथैव॥५९॥ लगे -कुटुम्बे यदि दारभावे शुभान्विते शोभनवर्गयुक्त॥ तदीश्वरे शो- भनदृष्टयुक्ते वाल्ये विवाहादिकमाहुरारयाः॥६०॥ सप्तमेश लग्नेश एकसाथ अंशोंमें समोपवतीं होवै तो वाल्यावस्थामें विवाह होवै यदि लग्नसे सपतमसे शुभग्रह समीप राशियोंमें होवै तौभी वही फल कहतेहैं ॥ ५९॥ लग्न द्वितीय और सप्तमस्थान शुभयुक्त शुभांशकादियुक्त हों उनके स्वामी शुभग्रह दृष्ट युक्त होवैं तो श्रेष्ठ ज्योतिषी बाल्यावस्थामें विवाहादि कहतेहैं ॥ ६० ॥ पारावर्तांशादिगते कलत्रनाथे कुटुम्बाघिपतौ बलाढये।। मृद्धा- ख्यभागे ततुभावनाथे बाल्ये विवाहं सुनयो वदंति ॥६१ ॥ भाग्यं विवाहात्परतो वदति शुकेस्तगे चोपचयान्विते वा।। कुटुं- बमेताहशभावयुक्ते लग्नेश्वरे वा शुभदष्टियोगे ॥ ६२॥ सप्मेश पारावतांशादिमें होवै द्वितीयेश बलवान् होवै और लग्नेश मृद्धंशकमें होबे तो सुनिलोग बाल्यावस्थामें विवाह कहतेहैं॥ ६१ ॥ शुक्र सप्तम हो अथवा उपचय ३।६।११। १० स्थानमें हो यद्रा द्वितीयमें हो अथवा लग्नेश इन भावोंमेंसे किसीमें हो शुभग्रहसे दृष्ट युक्त होवै तो मुनिलोग विवाहसे पीछे भाग्योदय होगा कहतेहैं ॥ ६२ ॥ तत्कारके दारपतौ कुटुंबनाथे विलग्नाधिपतौच दुःस्थे॥ नीचा- रिमूढांशगते सपापे भाग्यं विवाहात्प्रविनाशमेति ॥६३॥ ऋूरादिषष्टयंशसमन्वितेपि तत्कारके ताहशखेचरेन्द्रे॥ शुभा- न्विते शोभनदृष्टिपाते नाशात्परं भाग्युपैति जातः॥ ६४॥ सप्रमकारक सपमेश द्वितीयेश और लग्नेश दुष्ट स्थानमें हों नीच शत्रु मूढ अंशकमें पाप- युक्त होवैं तो विवाह होजानेसे भाग्य नष्ट होजावि॥ ६३ ॥ सप्तमकारकग्रह वा पूर्वोक्तोंमेंसे कोई क्ूरआदि षष्टयंशमें भी होवै तथा शुभग्रहसे युक्क दृष्ट होवें तो (भाग्य) ऐश्वर्य नाश होकर फिर ऐश्वर्य पाताहै॥ ६४ ॥

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भावाटीकासहित:। (१२७ ) क्रूरे कलत्रेशयुते त्रिकोणे तत्कारके पापसमन्विते वा। कुटुम्बरा- शौ यदि वात्र माने दूरे विवाहात्कथयंति संतः ॥६५॥ माने सपापे यदि वा कुटुंबे भाग्येथ वा पापयुते कलत्रे। कूरांशके क्रूरनिरी- क्षिते वा दूरे विवाहात्कथयंति संतः ॥ ६६॥ पुत्रादिलाभेष्वय- मेव मार्गस्तं चिंतयित्वा प्रवदेत्सुतादीन् ॥६७॥ लगेश्वराद्ी- नबले कलतनाथेऽरिभागांशयुते विमूढे॥ नीचांशके नीचसम- न्विते वा निकृष्टजातौ हि कलत्रलाभः ॥६८॥ पापग्रह सप्तमेशसहित त्रिकोण ९।५ में होवै वा सप्तम कारक पापयुक्त दूसरे वा दशम स्थानमें होवै तो विवाहसे बहुत दिनों पीछे भाग्य उदय होवे ऐसा सज्जन कहतेहैं॥ ६५ ॥ सप्तमेश पापयुक्त दशम, वा द्वितीय यद्ा नवमस्थानमें हो सप्ममें भी पापग्रह होवें तौभी वही फल कहतेहैं॥ ६६ ॥ पुत्रादि लाभमेंभी ऐसाही विचार करके पुत्रादिमाप्ति दूर वा शीघ्र कहनी॥ ६७ ॥ सप्तमेश लग्नेशसे हीनबली हो शत्रुराशि शत्ुके अशकमें वा अस्तंगत हो अथवा नीचराशयंकमें होवै तो स्त्री अपनेसे नीच जातकी मिले ॥ ६८॥ लग्नेश्वरात्पूर्णबले कलत्रनाथे शुभांशे शुभदृष्टियुक्त॥ वैशेषिकांशे परमोच्चभागे उत्कृष्टजातौ हि कलत्रलाभः ॥ ६९॥ लग्नेश्वरे हीनबले कलत्रनाथात्सपापे यदि नीचभागे॥ नाशस्थिते वान्व- वरोहभागे कलत्रजातेः स्वयमत्र हीनः॥७०॥ लग्नेशसे सप्तमेश पूर्णवली हो शुभांशकमें शुभग्रहोंसे दृष्ट वैशेषिकांशकमें वा परमोच्चांशकमें होवै तो अपनेसे उत्तपजातिमें स्त्री मिले ।। ६९ ।। लग्नेश सप्तमेशसे हीनवली हो पापयुक् नीचांशकगत बारहवें भावमें अथवा (अवरोही) उच्चसे उतरता होवे तो स्त्रीकी जातिसे अपनी जाति न्यून होवै॥ ७० ॥ तस्मादवलाढये तु विलग्ननाथे त्वारोहभागे परमोच्चभांशे॥ केन्द्र- त्रिकोणे यदि वा ससौम्ये श्रेष्ठः कलत्रात्स्वयमेव जातः ।७१॥ कलत्रनाथाद्यदि वा कलत्राशेः कुटुम्बाधिपतेर्वदेद्ा॥ बलेन साम्ये समजातिमाहु: स्त्रियं सुशीलां पतिभक्तिचित्ताम्॥ ७२॥ सप्तमेशसे लग्नेश बलवान् हो आरोहभागमें वा परमोच्चराश्यंशकमें शुभयुक्त केन्द्र त्रिको- णमें होवै तो स्त्रीकी जातिसे अपनी जाति श्रेष्ठ होवै ।। ७१ ॥ सप्तमेशसे वा सप्तम राशिसे

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(१२८ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

अथवा द्वितीयेशसे बलाबल देखके यह फल कहना यदि लग्नेश सप्रमेश बलमें तुल्य हों तो स्त्रो तुल्यजातिकी कहतेहैं तथा सुशीला और पतिकी भक्तिमें चित्त लगानेवाली होतीहै॥७२॥ लग्नेश्वरस्यापि कलत्रनाथे शत्रौ तदीयस्त्विह शत्रुभूतः॥ मित्राणि ते तस्य कुलोद्भवाश्च मित्रे विलग्नाधिपतेस्तदानीम् ॥७३॥ दारेश्वरस्यापि विलग्ननाथे शत्रौ तदीयास्त्वरयस्ततोऽन्ये॥७॥ लग्नेशकाभी सप्तमेश शत्रु होवै तो विवाह स्थानवाले शत्रु होवैं यदि लग्नेशका सप्तमेश मित्र होवे तो स्रीके कुलवाले भी उसके मित्र होवें॥ ७३ ॥ सप्मेशकाभी लग्नेश शत्रु होवै तो वे संबधी शत्रु और मित्र हों तो मित्र होवै॥ ७४॥ कलत्राधिपतेर्वर्ण राशेवां कारकस्य च॥ सर्वोत्तमबलस्यैव तेषां मध्ये विनिर्दिशेत्॥७५॥ सुगुणा रूपसंपन्ना तस्मिन्गुर्वच्छवी- कषिते॥ पापेक्षिते पापयुक्त कुरूपा दुर्गुणा भवेत्॥ ७६॥ स्त्रीका रंग सप्तमेश वा सप्तमराशि अथवा सप्तम भावकारकग्रहमेंसे जो सर्वोत्तम बली हो उससे कहना॥ ७५॥ उक्त बली गुरु शुकरसे दृष्ट होवै तो स्त्री अच्छे गुणोंवाली रूपसे संपन्न होगी यदि पापद्ष्ट पापयुक्त होवै तो स्त्री कुरूपा एवं दुर्गुणोंवाली होवै॥७६॥ कलत्रनाथस्थितभं तदीय राशिं कलत्स्य विदुर्महान्तः ॥ तस्योच्चनीचं यदि वा कलत्रराशिं तदशत्रितयं तदीयम्॥७७॥ कलत्रराशित्रितयेथ वा स्यात्तदीशसंयुक्तभ कोणराशौ॥ कलत्र- राशिं समुदाहरन्ति प्रोक्तान्यराशौ यदि नास्ति पुत्रः ।।७८ ।। गोसिंहकन्यादिषु जन्मराशि: स्त्रीणां भवेज्जन्मनि वाल्पपुत्रा। शुभग्रहैराक्रमितेषु तेषु सुतान्वदेत्तत्र बहून्गुणाढयीन्।। ७९॥ सप्तमेश जिस राशिमें है १,सप्तमेशकी जो राशि है २, उसकी जो उच्चराशि जो नीच राशि हैं ३, इस प्रकार कलत्र रशिक तीन भेद होतेहैं। इनसे स्त्रीका विचार बलाबळ देखके कहना॥ ७७॥ उक्त तीनपकार कलत्नराशि अपने स्वामी युक्त वा इन तीनोंमें एकका स्वामी दूसरेमें हो. अथवा सप्तमेश जिस राशिमें है उसके त्रिकोण ९। ५ में कलत्रराशि कहतेहैं। इनमेंमी बलाबल देखना. इनराशियोंमें बली ग्रह हों तो पुत्र होंगे; निर्बलग्रह निर्बलराशि हों तो नहीं होते॥ ७८ ॥ उक्त स्थानोंमें २ । ५ ।६ आदि राशि अथवा ये जन्मराशि हों तो कन्या बहुत, पुत्र कम होवैं यही राशि शुभग्रहोंसे युक्त होवैं तो गुणवान् बहुत पुत्र होंगे ऐस। कहना॥ ७९॥

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भषाटीकांसहित:। (१२९ ) वंध्यासंगो मदें भानौ चन्द्रे दासीसमाश्रयः ॥कुजे रजस्वला- संगो वंध्यासंगश्च कीर्तितः ।।८०।। बुधे वेश्यार्थहीना वा वणिकस्री वा प्रकीर्तिता।। गुरौ ब्राह्मणभार्या स्यादर्भिणी- संगमो भृगौ॥ ८१॥ हीना वा पुष्पिता वा स्यान्मंदराहुफण- श्वरैः॥ राहौ च गर्भिणीसंगः कृष्णया कुब्जया शनौ ॥ ८२॥ सप्तम सूर्य होवै तो वांझ स्त्रीका संग करे, चंद्रमा होवे तो दासीका आश्रय लेवै, मंग- लसे रजस्वला और वांझ स्त्रीका संग कहाहै।। ८० ।। बुधसे वेश्या अथवा दरिद्वा (भिखारिन) यद्वा बनियेंकी स्त्रीसे, वृह्दस्पतिसे ब्राह्मणकी स्त्रीका संग, शुक्रसे गर्भिणीका संग।। ८१ ।। शनि राहु केतुसे हीनजातिकी वा रजोवती खत्रीका गमन करे, राहुसे गर्भिणी स्त्रीका संग, और शनिसे काळेरंगकी कुबरी कुरूपा स्त्रीसे भी संग करताहै।। ८२ ।। एवं सुखस्थितैरेतैरीदक्स्त्रीसंग ऊह्यताम् ॥ सूर्यादैः सुखगै- र्वाच्यं वाहनं गृहनिर्णयः॥८३॥ वन गृहं च कुड्यं स्याद्विहारो देवतालयम्॥ जलं हरिगजस्थानमिति स्थाननिूपणम्।।८४॥ इसीमकार उक्त ग्रह चतुर्थ स्थानमें होें तो भी इसीपकार स्त्रीसंग जानना। सूर्यादि ग्रहोंमेंसे जो चतुर्थ स्थानमें हो उसके अनुसार वाहन तथा मकानका निर्णय कहना ॥ ८३ ॥। सूर्यसे वन, चंद्रमासे वस्तीमें, मंगलसे कुटिया, बुधसे विहारस्थान, गुरुसे देवालय, शुकसे जलस्थान, शनिसे सिंहव्याम्रादि स्थान, राहु केतुसे गजस्थान इसमकार स्थानका निरूयण करना॥। ८४ ॥ पापैरयुक्त चतुष्केन्द्रे चतुष्पान्मैथुनं वदेत । पापैर्दष्टेषु सर्वेषु केंद्रेव्वेवं विनिर्दिशेत्॥ ८५॥ केन्द्रे कोणे पापयुते पशुवन्मै- थुनं वदेत्। मन्दे पापान्विते वापि समांदौ तादशं वदेत्॥८६।। चारों केन्द्रोंमें पापग्रह होवें तो पशुके समान (वा साथ) मैथुन करनेवाला होवै ऐसा कहना, यदि चारों केन्द्र पापयुक्त होवें तोभी ऐसाही फल कहना।। ८५ ।। केन्द्र तथा त्रिकोण पापयुक्त होवैं तो पशुसमान मैथुन कहना शनि पापयुक्त वा केतुयुक्त केन्द्र कोणमें होवै तौभी वही फल कहना॥ ८६ ॥ मन्दे सूर्ये सुखे भौमे पशुवन्मैथुनं वदेत।। राहौ कलत्रे भौमे वा सुखे तादशमैथुनम् । ८७॥ मंदेशे भृगुसंदष्टे भौमक्षेत्र- गतेऽथ वा ॥ भृगुणा सहिते वापि भगचुम्बनभाग्भवेत्।। ८८ ।।

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(१३० ) सर्वार्थचिन्तामणिः। चौथे भावमें शनि सूर्य मंगल हो तो पशुके तुल्य मैथुन कहना, राहु सप्तम वा मंगल चौथे होवै तो वैसाही मैथुन कहना। ८७॥ जिस राशिमें शनि है उसका स्वामी शुकसे दृष्ट होवै अथवा मंगलके क्षेत्रमें हो अथवा शुक्रसे युक्त् होवै तो भगका चुम्बन करनेवाला होवै॥८८॥ एवं कुटुम्बनाथेन भगचुंबनभाग्भवेत्॥।८९। कर्मेंशे मन्दसंदष्टे भौमक्षेत्रगतेऽय वा ॥ भृगुणा सहिते वापि भगचुंबनभाग्मवेत्।। ॥९० ॥ लग्नेशे नीचराश्यादौ स्थिते तादृशचुम्बनम् ॥ एवं कुटुम्बनाथेन भगचुम्बनभाग्भवेत् ॥। ९१॥ कुजे कृशस्तनी मंदे राह्वादौ लंबनस्तनी।। कठिनोर्ध्वकुचा भानौ शेषैः स्थूलो- त्तमस्तनी ॥ ९२ ॥ इसीपकार द्वितीयेशसे भग चुम्बन वाला होताहै॥ ८९ ॥ दशमेश शनिसे दृष्ट अथवा मंगलके राशिमें वा शुक सहित होवै तो भग चुम्बनवाला होवै॥ ९० ॥ लग्नेश नीच राशि आादिमें हो तोभी वैसाही चुम्बन करे। ऐसेही कुठुम्बेशसेभी भग चुम्बनवाला होवै॥ ९१॥ मंगलसे पतले स्तनवाली, शनि राहु आदिसे लंबे स्तनवाली सूर्यसे कडे एवं ऊंचे स्तनवाली अन्यग्रहोंसे स्थूल और उत्तम स्तनोंवाली होतीहै ॥ ९२ ॥ पापेनैकेन सहिते विलक्षणकुचा भवेत्॥ दारेशे पापखेटे वा शुभे वा ताहशस्तनी ॥९३।। शुभद्रयेन सहिते दारेशेऽपि तथाविधे॥ समस्तनी भवेत्पत्नी पापयोगेऽन्यथा भवेत्॥ ९४ ॥ अति- स्थूलस्तनी पत्नी सशुभे दारनायके।। जलगेहे जलर्क्षस्थे गुरु- णापि निरीक्षिते ॥ ९५॥ एक पापग्रुहसे युक्त होवै तो विलक्षण स्तनवाली होवै, सप्तमेश पाप वा शुभ पापयुक्त नीचा दिगत होवै तो वैसाही फल होगा॥ ९३ ॥ दो शुभग्रहोंसे सहित हो सप्तमेशभी वैसाही होवै तो स्त्री समान स्तनवाली होवे पापयुक्त होवै तो समस्तनी न होवै॥ ९४ ॥ सप्तमेश शुभयुक्त होवै तो अतिस्थूळ स्तनवाली होवै जलराशिमें चतुर्थस्थानगत होवै बृहस्पतिभी उसे- देखे तोभी वही फलहोगा । ९५। रवौ वा भूमिपुत्रे वा मन्दमान्यगुसंयुते॥ दाराधिपे पापभागे भगदैर्ध्य विनिर्दिशेत्॥ ९६॥ तदीशौ गुरुशुकौ वा शुर्भांशस- हितौ यदा॥ समं भगं भवेत्तस्या: पापयुक्ते तु दीर्घकम् ॥९७॥

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भाषाटीकासहित:। ( १३१ ) शनिचन्द्रविदां मध्ये यत्रैकस्मिन्मदेश्वरे ॥ ह्रस्वं भगं समादिष्टं स्र्ियामेवं विनिर्दिशेत्॥९८॥ सूर्य अथवा मंगल, शनि, केतु, राहुयुक्त होवें सप्मेश पापांशकमें होवै तो भग दीर्घ होवै॥ ९६ ॥ सप्तमेश गुरु वा शुक यदि शुभग्रहाके अंशमें हों तो उस सीका भग सम होवै- पापयुक्त होवें तो दीर्घभग होवै॥ ९७॥ शनि चंद्रमा बुधमेंसे एक सप्तमेश होवै तो छोटा भग कहाहै इसपकार स्त्रियोंके ग्रहोंका विचार करना ॥ ९८ ॥ कलत्रेशे जलर्क्षस्थे कारके वा तथाविधे।। जल्क्षे दारभावे वा पूर्ण- चन्द्रनिराक्षिते॥ ९९॥ चन्द्रे जलक्षेदारस्थे जलस्थमृगुवीक्षिते। जलर्क्षस्थविदा दृष्टे स्त्रीगुह्यस्यार्द्रता भवेत् ॥१००॥ पूर्णे शशांके दारस्थे जलराश्यंशकेऽपि वा।। जलस्थगुरुसंदृष्टे सततं त्वार्दता भवेत् ॥ १०१॥ परमोच्चांशके शुक्े जलराशिगतेपि वा।। भानु- नासंयुते वापि मैथुनादेव ताहशम् ॥ १०२॥ सप्तमेश जलराशिमें सप्तमकारकभी जलराशिमें हो वा सप्तम भावमें जलराशि पूर्ण चंद्र से दृष्ट होवै स्त्रीका भग गोला शीघ्र होवै॥ ९९ । चन्द्रमा जलराशिमें सप्तम होवै उसे शुक देखे जलराशिस्थ बृहस्पतिसे भी दृष्ट होवै तो स्त्रीके गुह्यस्थानमें गीलापन रहे॥१०॥ पूर्ण चन्द्रमा सप्तममें जलराशि बा जलराशयंशकका होवै जलराशिस्थ गुरु उसे देखे तो सर्व दा भगमें गीलापन रहे॥ १०१॥ शुक्र परमोच्चांशकमें हो अथवा जलराशिमें हो सूर्यसे युक्त होवै तो मैथुनसेभी तादृशह भग होवै ॥ १०२ ॥ दारेशे शुष्कराशिस्थे दारे वा शुष्कसंज्ञके॥ शुष्कग्रहेण संयुक्तते त्वनार्द ग्ुह्यमीदिशेत्॥१०३॥पापक्षेत्रे पापमध्ये दारेशेपि तथा- विधे॥ पापटग्योगसंपाते त्वनाद्र गुह्यमादिशेत् ॥ १०४॥ सप्तमेश (शुष्क) स्थल चरराशिमें वा सप्तममें शुष्कराशि शुष्कग्रह होवै तो गुह्य- स्थान गीला न रहे ऐसा कहना।। १०३ ।। पापग्रहकी राशिमें पापग्रहोंके बीच ऐसाही सप्तमेश होवै पापग्रहकी दृष्टि वा योग होवै तोभी वैसाही कहना॥ १०४ ॥ सप्मेशे बुधे दृष्टे गुरुणा बलसंयुते॥ सुक्तीशेनापि संदृष्टे सूपद- ध्याज्यभाग्भवेत्॥ १०५॥ सप्तमेशे गुरौ दृष्टे शोभनांशसम- ्विते॥ सौम्यांशसौम्यसंदृष्टे सूपदध्याज्यभाग्भवत् ॥ १०६॥।

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(१३२) सर्वार्थचिन्तामणिः।

सप्मेश बुध गुरुसे दृष्ट एवं बलवान् होवै द्वितीयेशसे भी दृष्ट होवै तो. दाल दही घी आदि खानेवाला होवै॥ १०५॥ सप्तमेश गुरु द्वितीयेशसे दृष्ट शुभाशकमें तथा बुधक नवां- शमें बुधसे दृष्ट होवै तौमी वह फल कहना ॥ १०६ ।। दारस्थे भृगुपुत्रे वा पूर्णचन्द्रनिरीक्षिते॥ पापैरयुक्त दृष्टे वा सूप- दध्याज्यभाग्भवेत्॥। १०७॥ रवो वा भूमिपुत्रे वा सप्तमेशे- शुभेक्षिते॥ भुक्तिस्थानगते वापि कदाचिद्दधिसूपभाक्॥१०८॥l अथवा सप्तम शुक पूर्णचन्द्रमासे दृष्ट तथा पापग्रहोंसे युक्त दृष्ट न होवै तो दाल दही घो आदि खानेवाला होवै।। १०७ ॥ सूर्य अथवा मंगल सप्तमेश हो शुभग्रहद्ष्ट हो अथवा दूसरे स्थानमें होवै तो दही दाल कदाचित् खावै॥ १०८ ॥ पापे सप्तमभावस्थे तदीशे पापसंयुते॥ ऋरूरषष्टयंशके वापि घृत- सूपादिहीनभाकू॥ १०९॥ चन्द्रे गुरौ वा दारेशे जलराश्यंशसं भवे।। जलग्रहेण वा दृष्टे क्षीरपानादिभाग्भवेत्॥ ११०॥ सप्- मेशस्थितांशेशे शुभदृष्टिसमन्विते॥ शुभग्रहांशके वापि गुडक्षी- रादिपानभाक्॥ १११॥ सप्तममें पापग्रह हो सप्रमेश पापयुक्त हो अथवा क्रूरषष्टचंशकमें होव तो घृत दाल आदि से रहित भोजन करे॥ १०९ ॥ चंद्रमा वा बृहस्पति सप्तमेश होकर जलचर राशि वा अंश- कमें हो अथवा जलधातुवाले ग्रहसे दृष्ट होवै तो दुग्ध आदि पीनेवाला होवै॥ ११० ॥ सप्तमेश जिसके अंशकमें है वह शुभ दृष्ट होवै अथवा शुभांशकमें होवै तो गुड दूध आदि उत्तम पदार्थ पान करनेवाला होवै॥ १११ ॥ बहवः सप्मे पापा: षष्टे वा रन्धमेपि वा। ऋूरषष्टयंशसंयुक्ता मूत्र- कृच्छं विनिर्दिशेत् ॥११२॥ इति सप्तमभावस्थनिश्चितार्थ- विचारयुक्॥षष्ठाध्यायो मया प्रोक्तो व्यंकटेशेन धीमता॥११३॥ इति श्रीसर्वार्थचिन्तामणौ सप्तमभावफल- विचारो नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६ु॥ सप्तम स्थानमें बहुत पापग्रह हों अथवा छठे वा अष्टममें हों, कूर षष्टयंशकसंयुक्त होवैं तो मूत्र- कृच्छ रोग कहना ॥ ११२ ॥ मैं धीमान् व्यंकटेशने इसप्रकार सप्तमभावस्थ निश्चित फल विचार चित्र अर्थवाला छठा अध्याय कहाहै ॥ ११३॥ इति श्रीसर्वार्थचिंतामणौ माहीघरभाषाटीकार्या सप्तमभावफलवि- चाराध्याय: षषः ॥ ६॥

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भाषाटीकासहित:। ( १३३ )

सप्तमोऽध्याय:।।७।।

अथायुर्धर्मभावफलविचाराध्यायः। मरणाज्जीवितमरणं गुह्यस्थानं च मरणहेतुं च।। अन्नसुखं भृतिदंशं परिभवमपि चिंतयेत्पाज्ञ:॥१॥ मरणसे जीवन और मरण, गुह्यस्थान, मरणका हेतु, अन्नसुख, भृति, दंश, हारजानामी भष्टम भावसे विचारने। इनको खुलासा आगे कहेंगे॥ १ ॥ रन्ध्रेश्वरे पापयुतेंत्यराशावल्पायुरस्येति वदति षष्ठे॥ तत्नापे लग्नेश्वरयोगजातः स्वल्पायुरस्येति वदति संतः॥ २।। अष्टमेश पापयुक्त बारहवें वा छठे होवै तो इस मनुष्यकी अल्पायु होगी, तहां लन्नेशसेभी युक्त होवै तो विद्वान् इसकी थोडी आयु कहते हैं ॥ २ ॥ स्वक्षेत्रसंस्थे यदि रंध्रनाथे दीर्घायुराहुर्मुनयो महान्तः ॥ मदेन वाचिन्त्य विशेषमायुः स्वक्षेत्रमित्रोच्चगृहस्थितेन॥ ३॥ रन्ध्रेश- रेणापि विलग्ननाथे युते रिपौ वा व्ययराशियुक्ते॥ षष्ठांत्यपे वा यदि लग्नयुक्ते दीर्घायुरस्येति शुभेक्षितश्चेत् ॥४॥ अष्टमेश अपने क्षेत्रमें होवै तो बडे मुनिजन इसकी दीर्घायु कहतेहैं अथवा सप्तम भावसे अपनी राशि मित्रकी राशि और उच्चराशि स्थित ग्रहके अनुसार दीर्घायु विशेष जाननी॥३॥ अष्टमेशसे युक्त लगनेश छठें वा बारहवें होवै और षष्ठेश व्ययेश लग्नमें होवें शुभग्रह उनको देखें तो मनुष्यकी दीर्घार्युं होगी ॥ ४ ॥ कर्मेश्वरेणापि विचिन्त्यमायुर्दीर्ध सुहत्स्वोच्चयुतेन तेन ॥ केन्द्र स्थितैः कर्मविलग्नरन्धनाथैस्तथैवायुरुदाहरन्ति ॥५॥प्रोक्तं ग्रहैव्योमचरैस्तिमिवा सभानुजैः केंद्रगतैस्तथैव॥ स्वक्षेत्रकोणा- दिगतैविशेषाद्दन्ति दीर्घायुरुदारचित्ताः॥६।। ऐसेही मित्र उच्च स्वगृदादिस्थित दशमेंशसेभी दीर्घायुका विचार करना दशम कम और अष्टम भावके स्वामी केन्द्रमें होवें तो वैसेही दीर्घायु कहनी ॥ ५ ॥ उक्त ग्रह दशममें हों वा तीनों शनियुक्त अन्य केंद्रोंमें हों तो भी उदारुद्धिवाले दीर्घायु कहतेहैं ॥ ६॥

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(१३४ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

केन्द्रान्विते विलग्नेशे गुरुशुकसमन्विते। ताभ्यां निरीक्षिते वापि दीर्घमायुर्विनिर्दिशेत्॥ ७॥ चतुरस्े शुभैयुक्त लग्नेशे शुभसंयुते। गुरुणा दृष्टिसंयोगे पूर्णमायुर्विनिर्दिशेत्॥ ८॥ त्रिषडायगताः पापाः शुभाः केंद्रत्रिकोणगाः॥ लग्नेशे बलसंयुक्त पूर्णमायुर्वि- निर्दिशेत्॥९॥ लग्नेश केन्द्रमें गुरु शुक सहित वा इनसे दृष्ट होवै तो दीर्घायु कहनी॥७॥ केद्रोंमें शुभ- ग्रह लगनेश शुभयुक्त बृहस्पतिसे दृष्ट होवै तो पूरी आयु कहनी॥ ८ ॥ पापग्रह तीसरे छठे ग्यारहवे में शुभग्रह केन्द्र कोणोंमें हों और लग्नेश बलवान् होवै तो पूर्ण आयु कहनी ॥ ९ ॥ षट्रसप्तरन्ध्रभावेषु शुभेषु सहितेषु च॥ त्रिषडायेषु पापेषु पूर्ण- मायुर्विनिर्दिशेत्॥१०॥ रंध्राधिपे विलय्नस्थे गुरुशुक्युतेक्षिते॥ लग्नेशे केन्द्रभावे वा दीर्घमायुर्विनिर्दिशेत्॥ ११॥ उच्चाश्रितै- स्त्िभि:खेटैर्लग्रे रन्ध्रेशसंयुते ॥ रंधे पापविहीने तु दीर्घमायुर्नि- निर्दिशेत् ॥१२ ॥ छठे सातवें और आठवें भावमें शुभग्रह हों ३।६।११ में पापग्रह हों तो पूर्णायु कहनी ।। १० ।। अष्टमेश लग्नमें गुरु शुकसे युक्त वा दृष्ट होवै वा लसनेश केन्द्र भावमें होवै तो दीर्घायु कहनी ॥ ११ । तीन ग्रह उच्चके हों अष्टमेश लग्नमें हो और अष्टममें कोई पापग्रह न होबै तो दीर्घायु कहनी ॥ १२ ॥ रन्ध्रस्थितैस्त्रिभिः खेंटैः स्वोच्चमित्रस्वगेहगैः॥ लग्नेशे बलसं- युक्ते दीर्घमायुर्विनिर्दिशेत्॥ १३॥ अष्टम भावमें तीन ३ ग्रह हों और वे अपने उच्च मित्र अथवा राशिमें होवें अर्थात् अष्टम भाव उन ग्रहोंके उच्चादिमेंसे कोई होवै, और लग्नेश बलवान् होवे तो दीर्घायु कहनी॥१३॥ पारावतादिभागस्थाः पापाः सर्वेशुभास्तथा॥ केन्द्रत्रिकोण- निलया: पूर्णमायुर्विनिर्दिशेत्॥१४॥ षष्ठाष्टमे व्यये पापे लग्नेशे दुबैले यदि॥ अल्पायुरनपत्यो वा शुभदग्योगवर्जिते ॥१५॥१६ संपूर्ण पाप तथा शुभग्रह पारावतादि अशकोंमें केंद्र त्रिकोण गत होबैं तो पूर्णायु कहनी ॥ १४।। छठे आठवें और वारहवें भावमें पापग्रह हों लग्नेश निर्बल होचै शुभग्रहोंसे युक्त वा रृष्ट न हों तो अल्पायु वा अपुत्र होवै ।। १५ ।। (१६)

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भाषाटीकासहित:। ( १३५ ) चतुष्टयगते पापे शुभदृष्टिविवर्जिते॥ बलहीने विलग्नेशे त्वल्प- मायुर्विनिर्दिशेत्॥१७॥ व्ययार्थौ पापसंयुक्तौ शुभदृष्टिविव- जितौ । ऋूरषष्टयंशके वापि स्वल्पमायुर्विनिर्दिशेत्॥१८॥। केंद्रमें पापग्रह शुभग्रहदृष्टि रहित होवे तथा लस्नेश बलहीन होवै तो अल्पायु कहनी ॥१७॥ बारहवां और दूसरा भाव पापयुक्त शुभद्ृष्टिरहित हों अथवा कूर षष्टयंशकमें होवें तो अल्पायु कहनी ॥ १८ ॥ आयुर्योगास्त्रिधा प्रोक्ता: स्वल्पमायुश्चिरायुषः॥ द्वात्रिंशत्पूर्वम- ल्पायुर्मध्यमायुर्विनिर्दिशेत॥ १९॥ सतन्याः प्राक ततः पूर्ण- मायुरत्र वदंति हि।।अल्पायुर्दिननाथस्य शत्रुर्लभ्ाधिपो यदि॥।२०।। अल्प मध्य दीर्घ भेदसे आयुके तीन भेद हैं। ३२ वर्षसे पहिले अल्प, ७० वर्षसे पूर्व मध्य इससे ऊपर पूर्णायु कहतेहैं॥ लग्नेश सूर्यका शत्रु होवै तो अल्पायु होवै ॥ १९॥२० ॥ समत्वे मध्यमायुः स्यान्मित्रे दीर्घायुरादिशेत्॥ बलहीने विल- झेशे जीवे केन्द्रत्रिकोणगे॥ २१॥ षष्ठाष्टमव्यये पापे मध्यमा- युरुदातम् !! शुभे केन्द्रत्रिकोणस्थे शनौ बलसमन्विते ॥२२॥ वष्टे वाष्यष्टमे पापे मध्यमायुरुदाहतम्॥ लगे त्रिकोणे केन्द्रे वा मध्यमायुश्च मिश्रिते ॥२३॥ लन्नेश सूर्यका सम होवै तो मध्यमायु, मित्र होवै तो दीर्घायु कहनी। लग्नेश निर्बल होवै बृहस्पति केंद्र वा त्रिकोणमें होवै और छठे आठवे बारहवें में पापग्रह होवै तो मध्यायु कहोहै। केंद्र त्रिकोणमें शुभग्रह हों शनि बलवान् हो छठे अथवा आठवें पापग्रह होवै अथवा लग्न त्रिकोण केन्द्रमें पापग्रह हावै तो मध्यमायु होवै, उक्तयोगमिश्रित हों तोभी मध्यायु होवै ॥ २१॥ २२॥२३॥ अल्पायुर्योगजातानां वियत्पाको मृतिप्रदः॥मध्यमे प्रत्यरिदशा मृति दद्याद्विशेषतः ॥ २४॥ वधभेशदशा कष्टा पूर्णायुर्योगसं- झके।। योगायुरिति निश्चित्य जातस्यैवं वदेदुधः॥२५॥ जिनके अल्पायु योग होतेहैं उनको विपत् नक्षत्रेश दशा, मध्यमायुवालेको पत्यरितारेश दशा, और विशेषकरिके पूर्णायुयोगमें वधनक्षत्रेशदशा मृत्यु देतीहै, इसमकार योगायु निश्चय करके पंडित आयु कहे॥ २४ ॥ २५॥

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(१३६ ) सर्वार्थचिन्तामणिः। आयुर्विलग्नाधिपती बलेन हीनौ धरासूनुव्रणेशयुक्तौ॥युद्धे मृति तस्य वदन्ति तज्ज्ञाः शस्त्रेण वा तन्मरणं विशेषात ॥२६॥ रंधांगनाथौ यदि वा रिपुस्थौ राह्वन्वितौ केतुयुतौ समंदौ॥ तद्- क्तिकालेप्यथ वापि पाके शस्त्रेण चौरैर्मरणं प्रयाति ॥२७॥ अष्टमेश और लग्नेश बलरहित होवैं तथा मंगल एवं षष्टेशसे युक्त हेवैं तो ज्योतिषज्ञ उसकी मृत्यु रणमें; विशेषतः शस्त्रसे कहतेहैं ॥ २६ ॥ यदि लग्नेश अष्मेश छठे स्थानमें शनि तथा राहु वा केतु सहित होवे तो उसकी दशा अथवा अंतर्दशामें शस्त्रसे चोरोंके हाथसे मरे ॥ २७ ॥ रन्धांगपौ वाहननाथयुक्तौ तस््मान्मृतिं तस्य वदति तज्ज्ञाः॥ मृति त्वजीर्णाद्गरुसंयुतौ तौ देहेशजीवौ रिपुगावजीर्णात् ॥२८।। लग्ने श्वरे वाहननाथयुक्ते वागीश्वरेणापि युते त्वजीर्णात्॥ देहेश्वरे वाहनवित्तभावनाथान्विते वा मरणं त्वजीर्णात् ॥ २९॥रन्ध्रे- शयोगान्मरणं दशायामन्तर्दशायामथ वा वदन्ति ॥ पित्रादि- भावाधिपयोगदृष्टया पित्रादिकानां मरणं तथैव ॥ ३०॥ अष्टमेश लग्नेश चतुर्थेशसे युक्त होवैं तो वाहनसे मृत्यु कहतेहैं। यदि वही लग्नेश अष्ट- मेश बृहस्पतिसे युक् होवैं तो अजीर्णसे मृत्यु होवै। तथा लग्नेश और बृहस्पति छठे हों तौ भी अजीर्णसे ज्योतिषी मृत्यु कहतेहैं ॥ २८ ॥ लग्नेश चतुर्येशसे तथा बृहस्पतिसेभी युक्त होवै तो अजीर्णसे मृत्यु होवै। लग्नेश, चतुर्थेश, द्वितीयेशसे युक्त होवै तोभी अजीर्णसे मृत्यु होवै। २९ ॥ अष्टमेशके योगसे उसकी दशा वा अंतर्दशामें मरण कहतेहैं। ऐसेही पित्रादिभावेशोंकी दृष्टि वा योगसेभी पिता अदिका मरण कहना ॥ ३०.॥ भुक्त्यंगपौ भानुसुतेन युक्तौ दुःस्थानगौ वा विषभक्षणेन।। राहुध्वजाभ्यां सहितौ च दुःस्थावुद्धंधनात्तस्य मृतिं वदंति॥३१।। षष्ठेश्वरे भानुसुते सराहौ केतौ मृगाद्भीतिमुदाहरन्ति॥ जीवेन- युक्ते गजभीतिमस्य जातस्य चन्द्रेण युतेश्वभीतिम् ॥ ३२ ॥ सूर्यान्विते तादृशभानुपुत्रे मृगात्सशृंगाच्छुनकात्सभौमे ।। षछ्ठ- स्थिते भानुसुतेपि चैवं विना स्वतुंगस्वगृहं सुखेटे॥ ३३॥ दशमेश लग्नेश शनिसहित दुष्टस्थानमें होवें तो विषखानेसे मृत्यु होवै। यदि राहु वा केतुसे युक्त दुष्ट स्थानमें होवें तो फांसीसे मरण होवै॥ ३१ ॥ वष्ठेश शनि

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भाषाटीकासहित:। (१३७ )

राहु वा केतु सहित होवे तो मृगस भय कहतेहैं। बृहस्पतिस युक्त होवे तो हाथीसे और चंद्रमासे युक्त होव तो घोडेसे भय कहतेहैं॥ ३२ ॥ वैसाही शनि सूर्यसे युक्क होवे तो शींगवाले मृगसे और भौमयुक्त होवे तो कुत्तासे भय होवै. छठे स्थानमें शनि होवे तोभी यही फल जानना इन योगोंमें योगकत्ता ग्रह अपने उच्चराशि स्वराशि का न हो तब उच्त फल होंगे ॥ ३३॥ सुखेशभाग्येशविलग्ननाथास्त्रिकोणगा: केन्द्रगताश्च सर्वे॥। सुक्तो यदा तत्परिपाककाले पित्रा सहैवानुमृति च मातुः॥३४॥। रन्धे शशांके फणिनाथयुक्ते हीने त्वपस्मारयुतः समन्दे॥ तत्र स्थिते हीनबले शशांके पिशाचपीडा जलजा च पीडा ॥ ३५॥ भौमाहिमन्दान्यतमेन युक्ते क्षीणे शशांके निघनस्थितेपि।। दुःस्थे त्वपस्मारभयान्मृतिः स्यात्पिशाचाबधा त्वथ वा मृतिः ्यात्॥ ३६ ॥रन्ध्रे सराहौ यदि वा सकेतौ चातुर्थिकात्पीडन- माहुरस्य॥ रन्ध्रेश्वरेणापि युते तथैवं ऋरादिषष्टयंशयुतेतिस- त्यम्॥ ३७॥ नीचस्थिते वासरनायके वा षष्ठाष्टमस्थे यदि पापदष्टे। राज्ञां प्रकोपान्मरणं पितुश्च तत्पीडया वित्तवि- नाशमेति ॥ ३८॥ चतु्पेश नवमेश और लग्नेश त्रिकोण वा केन्द्रमें होवें उनकी दशा अंतर्दशा समयमें पिताके साथ माताकीभी मृत्यु होवै॥ ३४ ॥ अष्टम भावमें चंद्रमा राहुयुक्त तथा बलहीन होवै तो अपस्मार (मृगीरोग) होवे अष्टमस्थ निर्बल चन्द्रमा शनिसहित हेवै तो पिशाच आर जलसे उत्पन्न पीडा होवै॥ ३५॥ ऐसाही चन्द्रमा क्षीण (तनु) मंगल, राहु शनिमस किसीसे युक्त अष्टमस्थ होवै तो भी वही फल कहना। ऐसा चंद्रमा यदि अन्य दुष्टस्थानमें होवै तो पिशाचकी पीडा अथवा मृत्यु होवै॥ ३६ ॥ अष्टमस्थ चन्द्रमा राहु वा केतु सहित होवे तो चौथिया ज्वरसे पीडा इसको हेवै अष्टमेशसे युक्तभी होवै तो वही फल होगा यदि कूरादिषष्टयंशमें भी होवे तो वह फल अतिसत्य (अवश्य) ही होगा॥ ३७ ॥ सूर्य नीच राशिमें होवै अथवा छठे वा आठवें भावमें पापदृष्ट होवै तो राजाओंकी पीडासे मरण एवं पिताफा मरण एवं धननाशभी होवै।। ३८ । अथ केचिदरिष्टयोगाः॥ लग्नाच्छुमे कर्मणि भूमिपुत्रे पापेक्षिते मातुलमृत्युमाङ्ु:॥ मन्देन युक्ते यदि पुत्रमृत्युं चन्द्रे हि तन्मा-

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(१३८) सर्वार्थचिन्तामणिः। तृमृति सपापे ॥ ३९ ॥ पितुर्मृतिर्वासरनायकेत्र न संशयः पाप- दृशा समेते॥ पापद्येनापि युतौ विलग्ननिशाकरौ मृत्युभुपैति बालः॥ ४०॥ ग्रस्ते शशांके परिवेषयुक्ते पापेक्षिते वा मरणं च सदः ॥ त्वष्टार्यतोयेषु विलग्नचन्द्रे जातः सवित्रीसुतमातु- लांश्र ॥ ४१ ॥ अब थोडे अरिष्टियोग कहते हैं। उग्नसे नवम वा दशममें मंगल पापदृष्ट होवै तो रामाकी मृत्यु होवै यदि शनियुक्त होवै तो उसके पुत्रकी, और चंद्र सहित होवे तो उसकी मृत्यु होवे। ३९ ॥ इन्ही भावोंमें पापदृष्ट सूर्य होवै तो निस्संदेह पिताकी मृत्यु होवै, लग्नेश तथा चन्द्रमा दो पापग्रहोंसे युक्त होवै तो बाल्यावस्थाहीमें मरजावै॥४०॥ जन्म समयमें चन्द्रमापर ग्रहण अथवा ( परिवेष) मंडल होबै तथा पापदृष्ट होै तो बालक शीघ्र मरजावै ।। चंद्रमा एवं लग्न चित्रा, उत्तरा फालगानी, पूर्वाषाटामें होवै ऐसे समयमें चंद्रमा ग्रस्त वा परिवेषयुक्त होवै तो भाई और मामा मरें ॥ ४१ ॥ पादाक्रमेणापि निहन्ति तांस्तु शुभैस्तु दृष्टे सहिते न दोषः॥ लाभे शुभे वा यदि मन्दभौमौ फणीन्द्रयुक्तौ पितुरस्त्यपायः ॥ ।४२॥ पापेक्षिते भूमिखते कलत्रे जातः स मृत्युं ससुपैति रन्ध्े।। सोत्थे घरासूनुयुते सपापे पापेक्षिते सोदरनाशमाहुः ॥४३॥ यद्ा उनको पादाक्रमणसे मारे यदि उस योगकर्ता ग्रहपर शुभग्रहकी दृष्टिभी होवै तो वह दोष नहीं होगा, लाभ वा नवम स्थानमें शनि मंगल राहुयुक्त होवें तो उसके पिताका नाश होवै॥ ४२ ॥ पापदृष्ट मंगळ सप्तमस्थानमें यद्वा अष्टम स्थानमें होवै तो बाल्याव- स्थामें मरण होवै तृतीयभावमें मंगल पापयुक्त दृष्ट होवै तो भ्रातृनाश होवै ॥ ४३ ॥ अस्ते शशांके यदि मातृमृत्युं पापान्विते पापदशा समेते॥ भानौ पितुर्मृत्युमुदाहरन्ति मन्दारशुकैः सहिते सुतस्य ॥४४॥ तृतीय- षष्ठस्थितखेचरेन्द्रैः पापग्रहैरन्त्यगतैश्च सौम्यैः॥ शिशोर्मृति वा कुमुदात्मबन्धौ चतुर्थरंध्रस्थितपापखेटैः ॥४॥ पापयुक्त दृष्ट चन्द्रमा सप्तम स्थानमें होवै तो माताकी मृत्यु होवै ऐसाही सूर्य होवे ता पिताकी मृत्यु कहतेहैं यदि सप्ममें शनि मंगल शुक्र सहित होवै तो पुत्रकी मृत्यु होवे ।४४ ॥ पापग्रह तीसरे छठे भावोंमें हों शुभग्रह बारहवें में हों अथवा चंद्रमा पापग्रहोंस- हित चौथे वा आठवें होवे तो बाळककी मृत्यु होवे ।। ४५॥

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भावाटीकासहितः। (१३९ ) लगनेर्क चन्द्रौ व्ययगास्तु पापा: शिशोर्भृति शोभनदृष्ट्यभावे॥ अस्ते रवौ चन्द्रयुते विलग्ने पापान्विते तत्सुतमृत्युमाहुः॥४६॥ दिनेशचन्द्रौ व्ययगौ तदानीमन्धो भवेत्सौम्यदशा विहीनौ॥ युक्ते तयोरन्यतरेण रिष्फे काणो भवेत्सौम्यदृशा विहीने॥४७। दिनेशचन्द्रौ व्ययगौ तदीशे लग्नस्थिते देहविनाशमाहुः॥ सुरे- शवरे रंधगते व्यये वा पापान्विते पापदृशा समेते ॥ ४८॥ लग्ा- घिपे पूर्णबले सुखेशभाग्येश्वरौ नाशगतौ विहीनौ। जातस्य ज. न्मावसरे तदानीं पितुश्च मातुर्निधनं वदन्ति ॥४९। लन्नमें सूर्य चन्द्रमा व्ययभावमें पापग्रह हों उन्हें शुभग्रह न देखें तो बालककी मृत्यु होवै, सपममें सूर्य लग्नमें चन्द्रमा पापयुक्त हों तो पुत्रमरण कहतेहैं।। ४६ ॥ सूर्य चन्द्रमा व्यय- स्थानमें शुभदृष्टिरहित होवै तो अंधा होवै, इनमेंसे एक छठे एक व्ययस्थानमें शुभदृष्टिरहित होवें तो एक आंखसे काण होवै॥ ४७॥ सूर्य चन्द्रमा व्ययभावमें और व्ययेश लयमें होवे तो शरीर नष्ट होवे। बृहस्पति आठबें वा बारहवें पापग्रह दृष्ट युक्त होवै ॥४८॥ लन्नेश पूर्णवली, चतुर्येश नचमेश अष्टमभावमें बलहीन होवें तो मनुष्यके जन्मरमयहीमें माता और पिताकाभी मरण कहतेहैं॥ ४९ ॥ दुःस्थे तृतीयाधिपतौ सचन्द्रे स्तन्यं परस्त्रीषु पिवेत्स बालः॥ तातेशतत्कारकखेचरेन्द्रौ दुःस्थौ तयोः पुत्रसुखं न दृष्टम् ५०॥ केंद्रत्रिकोणे यदि तौ विहंगौ वदेत्तयोः पुत्रसुखं त्वभीष्टम्॥ पितुर्निशायां.मरणं वदंति भाग्येशसूर्यार्कसुताः क्षतस्थाः।।५१। वष्ठेश्वरेणापि युतास्तथैव चंद्रेण हीनास्तु दिवा मृतिः स्यात्॥ सुखस्थितैः खेचरनायकैर्वा मातुर्मृतिः स्यादयने तु तस्मिन्॥।५२।। तृतीयेश चंद्रमासहित त्रिक स्थानमें होवे तो अन्यस्त्रीका दूध पीवै, अपनी माताका न पीवै, दशमेश तथा दशमभावकारक ग्रह दुष्टस्थानमें होवें तो उनको पुत्रसुख देखनेमें न आवे. ॥ ५० ॥ वही ग्रह केन्द्र त्रिकोणमें होवे तो उनको मनोनुकूल पुत्रसुख कहना। नवमेश सूर्य और शनि अष्टम स्थानमें होवें तो पिताका मरण रात्रिमें कहते हैं ॥ ५१ ॥ यदि वही पछ्ठेशसे भी युक्त होवें तो दिनमें कहते हैं, परंतु पष्टेश चंद्रमा होवे तो वह फल नहीं होगा, वही ग्रह चतुर्थ स्थानमें होवें तो उक्तमकार दिन वा रात्रिमें माताकी मृत्यु कहनी ॥ ५२ ॥

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( १४० ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

नो चेत्तदीशान्वितराशिकाले मातुमृतिः स्यादयने च तस्मिन्॥ द्वित्यादियोगादयनं हि तत्र व्यत्यासतो वा प्रवदन्ति सन्तः ॥ ॥३॥ नाशे चरे वा पितृभावनाथे दूरस्थितस्तज्नकोपि वाच्यः॥ स्थिरोभयस्थे पितृभावनाथे समीपतस्तज्नकः स्थितः स्यात ॥५४। ऐसे न हों तो चतुर्थेश जिस राशिमें है उसके उक्त समय (अयन दिन रात्यादि) में माताकी मृत्यु कहनी, यदि दो तीन योग होवें तो मरणसमय विपरीततासे सज्जन कहतेहैं ५३॥ दशमेश अष्टममें वा चरराशिमें होवे तो मरणसमयमें उसका पिता दूर रहेगा ऐसा कहना, यदि स्थिर वा द्विस्वभाव राशिमें होवै तो उस समयमें पिता समीप होगा॥५४॥ केंद्रे चरेके यदि वा शर्शांके सुतो दहेत्तत्पितरौ न तत्र॥ द्विदे- हराशौ यदि तौ च केन्द्रे तयोरमृतिं वा दहने विकालम्॥५५॥ बलेन युक्ते पितृभावनाथे शशांकदेहेशचतुर्थनाथाः ॥ बलेन हीना यदि तज्जनन्यां गाढां विपत्ति समुदाहरंति ॥५६॥ सूर्य अथवा चंद्रमा चरराशि केंद्रमें होवें तो पुत्र अपने माता पिताका दाह अपने हाथसे न करे, यदि वही केंद्रमें दविस्वभावराशिके हों तो माता पिताके मृत्युमें दाहका कुसमय होवै ।। ५५। दशमेश बलवान् हो चन्द्रमा लग्नेश चतुर्थेश बळहीन हों तो उसकी माताफो गाढ़ी विपत्ति कहतेहैं॥। ५६ ॥ रन्ध्रे तु पापबाहुल्ये ग्रुह्यरोगं विनिर्दिशेत्। शुभग्रहेण संदृष्टे न दोषं तत्र निर्दिशेत्॥३७॥ रन्धे शुभेक्षिते तेन संयुते चेत्सुखं भवेत्।। स्थूलान्नं पापसंबंधे मृदन्नं शुभसंयुते।॥ अष्टम भावमें बहुत पापग्रह होवैं तो गुह्यस्थानमें रोग होवे उनपर शुभग्रहोंकी दृष्टि होवै तो वह दोष न कहना। ५७। अष्टम स्थानमें शुभग्रह हों शुभग्रहोंकी दृष्टि होवे तो सुखी रहै। ऐसेही पापसंबंधसे मोटा अन्न शुभग्रह संबंधसे कोमल अन्न मिले ॥ ५८ ॥ रन्ध्रेशे पापसंयुक्त पापदृष्टे तदन्तरे॥ पापक्षेत्रेथ वा रन्धे जात: परिभवान्वितः ॥ ५९॥ शुभग्रहाणां संबन्धे रन्धे परिभवो न हि।। चरे रंधे मृतिर्दूरे तदीशे चरराशिगे॥। ६०।। अष्टयेश पापयुक्त दृष्ट होवै वा पापोके बीच, वा पापराशिमें अथवा अष्टम स्थानमें होवे सो वह मनुष्य ह्वारा हुआ रहे।। ५९॥। यदि भष्टम भावनें गुभग्रहोंका दृष्टियोगादि रूंबंष

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भाषाटीकासहित:। (१४१) होवै तो परिभव (तिरस्कार) नहीं होगा. अष्टममें चरराशि हो अष्टमेश चरराशिमें होवै तो दूरदेशमें मरण होगा ॥ ६० ॥ शनौ वा चरराशिस्थे चरांशस्थे तथा भवेत्॥ स्थिरे रन्ध्रे तदीशे पि स्थिरराशौ तदंशके॥ ६१॥ शनौ वा स्थिरराश्यंशे स्वगृहे मरणं भवेत्॥ रन्धे द्विदेहराश्यादौ मार्गे मरणमादिशेत् ॥६२।। इत्यष्टमभावविचारः।। अथवा शनि चरराशिमें हेवे वा चरांशकमें होवै तोभी दूरदेशमें मरण हेववि। अष्टम स्थानमें स्थिरराशि हो उसका स्वामीभी स्थिरराशिमें होवे तो अपने घरमें मृत्यु होवै। ऐसे ही अष्टममें द्विस्वभाव राश्यादि होवें तो मार्गमें मरण कहना ॥। ६१ ।। ६२। इतने अष्टम भावके विचार कहे हैं।। अथ नवमभावविचारः । शुभभवनाद्वरुभाग्यं पितृपौत्रदयातपःप्राप्तिम् । ऊरुस्थानं स्वांतं सहभोक्तृन्दानयोगमपि विद्यात्॥ १॥ चिन्तनीया गुरु- स्वामिपितृभाग्यादिमातुलाः ॥ नवमे स्वामिसाय्यान्ये शुभा एतेन्यथाशुभाः॥२॥ नवमभावसे गुरु, भाग्य, पिता, पौत्र, दया, तप, लाभ, ऊरुस्थान, मन, कुटुम्बादि खाथ भोजन करनेवाले, दान, योगसाधन इतनोंका विचार जानना।। १ ॥ तथा गुरु, स्वामी (आचार्यादि), पिता, ऐश्वर्य आदि, मामा, इनका, विचारभी इसीसे करना। नवमभाव अपने स्वामी एवं शुभग्रहसे युक्त होवे तो उपरोक्त अच्छे होतेहैं; और प्रकार होनेमें अशुभ फल जानना ॥। २ ॥ चन्द्रे सपापे यदि धर्मराशौ भृगोः सुते वा गुरुदारगामी। धर्माधिपे तादृशखेचरेण युते सपापे गुरुदारगामी॥ ३॥ धर्मा- धिपस्थांशपतौ तथैव शुक्ते तदा तादशदारगामी॥ धर्माधिपे नीचगते तदंशे शुक्ेण युक्ते गुरुदारगामी॥४॥ क्षीणे निशीशे त्वथ वा तदंशे शुके तथैवं गुरुदारगामी॥ धर्माधिपे नीचगते तदंशे शुक्ेण युक्ते गुरुदारगामी॥५।। यदि नवम भावमें पापयुक्त चन्द्रमा अथवा पापयुक्त शुक होवै तो गुरु ( अपनेसे म्ेष्ठ) की सीका गमन करनेवाला होवै, धर्मभावेश ऐसे गहसे युक्त तथा पापयुक होवै तो

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( १४२ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

भी वही फल होगा॥ ३ ॥ नवमेश जिसके नवांशकमें है वहभी ऐसा युक्त होवै तो गुरु स्त्रीगामी होवै नवमेश नीच राशिमें धर्मभावस्थांशमें शुक्क होवै तोभी वही फल होगा ।। ४ ॥ क्षीण चन्द्रमा अथवा नवमभावांश तथा शुक उक्त पकारके होवैं तोभी वही फल देंगे, और धर्मेश नीचगत, धर्म भार्वाश शुकयुक्त होवै तो भी वही फल जानना ॥ ५॥ धर्मेश्वरे सौम्ययुते तदंशे वैशेषिकांशे त्वथ वा तदीशे॥ ऋ्ूरादि- पष्टयंशविवर्जिते स्याज्नातस्तु धर्मे दढबुद्धियुक्तः ॥६॥। गुरौ वा भृगुपुत्रे वा स्वोच्चमित्रांशके शुभे॥ धर्माधिपे बलयुते धर्मा- ध्यक्षो नरो भवेत् ॥७॥ गुरुशुकबुधांशस्थे धर्मनाथे शुभे- क्षिते॥ शुभग्रहाणां मध्यस्थे धर्मभाक्स नरो भवेत् ॥८॥ नवमेश नवमभावांश शुभयुक्त होवै नवमभाव भावेश वैशेषिकांशकमें होवें क्रूर आदि षष्टयंशसे रहित होवे तो धर्ममें दृढ बुद्धिवाला होवै॥ ६ ॥ बृहस्पति अथवा शुक उच्च मित्रांशकका नवम स्थानमें होवै और नवमेश बलवान् होवै तो मनुष्य धर्माध्यक्ष होवै । ७॥ नवमेश गुरु शुक बुधके अंशकमें शुभग्रहयुक्त होवै अथवा शुभग्रहोंके मध्यमें होवै तो वह मनुष्य धर्मवाला होवै॥ ८ ॥ सौम्यान्विते धर्मगृहे तस्मिन् पापांशसंयुते॥ करषष्टयंशके वापि दंभाद्र्मपरिग्रहः॥९॥ नाथकारकभावानामंशे शुभसमन्विते॥ शुभांशे शुभसंदष्टे शुचितो धर्मसंयुतः ॥ १०॥ नवमभाव शुभयुक्त हो परंतु उसमें पापांशक अथवा क्रूरषष्टचंशक होवै तो दंभ (घमंढ) से धर्म करे। ९॥ नवम भावेश नवम भावकारकेशके अंशकमें शुभयुक्त होवै अथवा वे शुभांशकी शुभदृष्ट होवैं तो पवित्रतासे धर्मसहित रहे॥ १० ॥ धर्में पापे पापभाक्स्यात्तदीशे पापसंयुते॥ क्रूरषष्टचंशके वापि पापमध्यगतेऽथ वा॥ ११॥ राहुमंदयुते धमें कूरांशे गुलिके- क्षिते॥ तदीशे क्रूरराश्यंशे त्वतिक्रूरादिकृद्धवेत् ॥ १२ ॥ धर्मस्थानमें पापग्रह होवै तो पाप भोगनेवाला होवै, धर्मेश पापयुक्त अथवा कूरषष्टयंशमें वा पापग्रहोंके मध्यमें होवै॥ ११ ॥ यद्ा धर्मस्थान राहु शनैश्वरसे युक्त होवे कूर गुळिकसे दृष्ट होवे नवमेश कूरराशि कूरांशकमें होवै तो अतिक्रूरआदि काम करनेवाला होवै॥ १२ ॥ पितृस्थानेश्वरे सौम्ये कारके शुभसंयुते॥ भावे वा शुभसंयुक्ते पितृसौख्यं विनिर्दिशेत् ॥ १३॥। पारावतादिभागस्थे नाथे वा

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भाषाटीकासहित:। ( १४३ ) कारकेपिवा॥ स्वोच्चमित्रांशके वापि पितृसौख्यं विनिर्दिशेत्। ॥१४॥ सौम्यांतरस्थे तन्नाथे गुरुशुकयुतेक्षिते॥ तेषामेकेन संयुक्ते पितृसौख्यं विनिर्दिशेत् ॥ १५॥ गोपुराघंशसंयुक्ते कारके ना- थवीक्षिते॥ पापैरवीक्षित युक्ते पितृसौख्यं विनिर्दिशत् ॥१६॥ पितृस्थानका स्वामी शुभग्रह होवै पितृकारक ग्रह शुभयुक्त होवे अथवा पितृभाव शुभग्रहयुक्त होवै तो पिताका सौख्य कहना॥ १३॥ भावेश वा भावकारक पारावतादि अंशकमें होवै अथवा उच्चांशक मित्रांशकमें होवे तो पितृसौख्य कहना॥ १४ ॥ पितृस्थानेश शुभग्रहोंके मध्यमें गुरुशुक्रसे युक्त वा दृष्ट होवे अथवा गुरुशुकमेंसे एकसेभी युक्त होवै तो पितृसौरव्य कहना॥ १५॥ पितृकारक गोपुरादि अशमें हो पितृभावेशसे दृष्ट पापग्रहोंसे अदृष्ट होवै तो वही फल कहना ॥ १६ ॥ पापदष्टे सपापे वा कारके भावनायके॥ पापांतरगते वापि पि- तृदुःखं विनिर्दिशेत्॥ १७॥ ऋूरनी चांशकस्थे वा भावनाथे च कारके॥ मंदमांद्यगुसंयुक्ते पितृदुःखं विनिर्दिशेत्॥१८॥ सौम्ये तदीश्वरे वापि नीचशत्रुसमन्विते॥ क्रूरषष्टयंशके वापि पितृदुःखं विनिर्दिशेत्॥ १९॥ पितृस्थानेश्वरांशेशसंयुक्तनवभागपः॥ क्ू- रनीचारिभागस्थपितृदुःखं विनिर्दिशेत् ॥२०॥ पितृभावकारक वा भाव पापयुक्त वा दृष्ट हो अथवा पापोंके मध्यमें होवै तो पिताको दुःख कहना॥ १७॥ भावेश वा भावकारक क्रूरांशक नीचांशकमें होवे शनि केतु राहुसे युक्त होवै तो पिताको दुःख कहना॥ १८ ॥ पितृभावेश वा तन्नस्थ शुभग्रह नीचका हो अथवा शत्रुराश्यंशयुक्त होवै अथवा कूरषष्टयंशकमें होवे तो वही फल कहना॥ १९ ॥ पितृभावेश जिसके अंशकमें हो वह जिसके नवांशकमें है क्रूर नोच शत्रुके अंशकमें होवै तोभी वही फल कहना॥ २० ॥ लग्नेशात्पितृभावेशे संपूर्णबलसंयुते॥ कारके वा शुभैर्दष्टे जातः पितृवशानुगः ॥२१॥ पितुर्जन्माष्टमे जातस्तदीशे लग्नगेपि वा ॥ तेनैव पितृकार्याणि कर्मशेषं समापयेत् ॥ २२॥ पितृभावेश वा पितृभावकारक लग्नेशकी अपेक्षा पूर्णबली तथा शुभदृष्ट होवैं तो मनुष्य पिताके वशमें उसका आज्ञाकारी होवै।। २१ ।। पिताके जन्मलग्नसे अष्टम लग्नमें जन्म होवै. अथवा उस लग्नक। स्वामी इसके लग्नमें होवे तो उसी ग्रहसे शेषकर्म (कारकायुर्दायादि) समाप्त करे इसका खलासे अष्टकवर्ग गणितमें है ॥ २२ ॥

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(१४४ ) सर्वाथचिन्तामणिः। पितृकर्मगृहे जातः पितृतुल्यगुणान्वितः ॥ पितृजन्मतदीयर्क्षे जातः पितृधनाश्रितः ॥२३।। पितु षष्ठाष्टमे जातः पित्रोः शत्रुर्भ- वेन्नरः॥पितुर्धरमायवित्तेषु जातः पितृवशो भवेत् ॥२४॥ पित्रष्टमे- शनक्षत्रत्नितये यस्तु जायते॥ स करोति पितुर्दुःखं पुत्रपौत्रसम- न्वितः ॥ २५॥ पितुर्जन्मांत्यभेश्क्षत्रितये यस्तु जायते॥ स करोति पितुर्दुःखं दूरदेशगतो भवेत ॥ २६ ॥ पिताकी राशिसे दशम राशिमें जन्म होवै तो पिताके गुणोंके तुल्य गुणवाला होवै यदि पिताके राशिमें जन्म होवै तो मनुष्य पिताके धनका आश्रयी होवै । २३ । पिताके राशिसे ६ वा ८ राशिमें होवै तो मनुष्य पिताका शत्रु होवै पिताके ९ ।११। २ मेंसे किसी राशिमें जन्म होवै तो पिताके वशमें रहै॥ २४ ॥ पिताके अष्टम राशिमें वा अष्टमेश जिस नक्षत्रमें है उससे तीन नक्षत्रोंमें जन्म होवै तो वह मनुष्य पुत्रपौत्रसहित पिताकी आज्ञा (शिक्षा) पर चले ॥ २५ ॥ पिताके जन्मराशिसे द्वादशेशसे तीनराशियों- मेंसे किसीमें जन्म होवै तो पिताको दुःख करे तथा दूरदेश चलाजावै ॥ २६ ॥ भाग्याधिपे विलग्नेशे दुश्चिक्ये धर्मगेपि वा॥ बलवान् स्वोचे वापि येषां ते श्रेष्ठमानवाः ॥२७। त्रिकोणकेन्द्रे यदि भाग्यनाथे सौम्यक्षिते सौम्ययुते बलाव्ये।। पारावर्तांशादिगते शुभांशे जातो धनाव्ये बहुभाग्ययुक्तः ॥२८ ॥घनाधिपे लाभगते तदीशे भा- ग्यस्थिते तद्भवनाधिपेथें।। कर्माधिपेनापि युतेथ दष्टे जातो महा- भाग्ययुतो नरः स्यात् ॥ २९॥ नवमेश तथा लग्नेश तीसरे वा नवममें होवें बलवान् होवें अथवा अपने उच्चमें होवें ऐसे योग जिन मनुष्योंके हों वे श्रेष्ठ मनुष्य होतेहैं ॥ २७ ॥ नवमेश केन्द्र त्रिकोणमें शुभग्रह्- दृष्ट वा युक्त होवे बलवान् होवै पारावतादि शुंभांशकमें हो तो मनुष्य धनवान् बडा भाग्य- शाली होताहै॥ २८॥ द्वितीयेश लाभस्थानमें लाभेश नवममें नवमेश द्वितीयमें होवै दशमें- शसे दृष्ट वा युक्त होवै तो मनुष्य बडा भाग्यशाली होवै ॥ २९॥ तृतीयराशेरधिपेन युक्ते भाग्याधिपे सौम्यदशा समेते॥ शुभा- न्विते शोभनखेचरांशे भ्रातुर्धनाद्भाग्ययुपैति जातः॥३०॥पुत्रे

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भावाटीकासहित:। (१४५ ) शवरे वा यदि भाग्यराशौ भाग्याधिपेनात्र युतेपि दष्टे। तत्का- रके वा यदि पुत्रभावे जात: सुताद्भाग्यमुपैति वित्तम्॥३१॥ नवमेश तृतीयभावेश युक्त तथा शुभग्रहोंते युक्त वा दृष्ट और शुभग्रहके अंशकमें होवै तो भाईके धनसे मनुष्य ऐश्वर्य पावे॥ ३० ॥ यदि पंचमेश भाग्यस्थानमें भाग्येशसे युक्त वा दृष्ट अथवा नवमभावकारकग्रह पंचममें होवे तो पुत्रसे ऐश्रर्य एवं धन पावै॥ ३१॥ ज्ञातिस्थानाधिपे भाग्ये भाग्येशे ज्ञातिसंगते। ज्ञातिकारकसंयु- के ज्ञातिभाग्यमुपैति सः॥३२॥ कलत्नकारकादेवं तत्स्थाने- शाद्देत्तथा ।। भाग्याधिपस्य शत्रुश्ध शत्रुराशिपतिस्तथा॥३३। तदीश भाग्य संबंधे शत्रुभाग्युपैति सः॥ षष्ठाष्टमात्यनाथेन युक्त नाथेत्र तत्फलम् ॥ ३४ ॥ चतुर्थेश नवमस्थानमें नवमेश चतुर्थमें हो चतुर्थभावकारकसे युक्त होवे तो ज्ञाति (विरादर) का ऐश्वर्य पानै ॥ ३२ ॥ ऐसेही कलत्रभाव कलत्रकारकसे भी खीसे ऐश्वर्य कहना नवमेशका शत्रुग्रह तथा शत्रुराशिका स्वामी भाग्य वा भाग्येशसे वैसाही संबंध करै तो शत्रुका ऐश्वर्य पावै यदि भाग्येश ६।८। १२ भावेशसे संबंधी हो तोभी वही फल होगा ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ भाग्याधिपे विनाशस्थे शत्रुनीचनिरीक्षिते।कूरांशे नीचराश्या- दौ भाग्यहीनो भवेन्नरः॥ ३५॥बहुपापसमायोगे भाग्ये हीने त- दीश्रे॥ लग्नेशे बलहीने वा भाग्यहीनो भवेन्नरः॥ ३६ ॥ भाग्येश बारहवें भावमें शत्रुदृष्ट वा नीचमें यद्ा नीचगत ग्रहसे दृष्ट होवै कूरांशमें अथवा नीचराशि आदिमें होवे तो मनुष्य भाग्यहीन होवै॥। ३५ ॥ नवममें बहुत पाप हो नवमेश हीनवल होवै अथवा लग्नेश बलरहित होवै तो मनुष्य भाग्यहीन होवै॥ ३६॥ गुरुशुक्ेक्षिते युक्ते भाग्ये तन्नायकेपि वा।।लग्रेशार्थपतौ धीरे भा- ग्यप्राप्तिः पुनर्भवेत्॥ ३७॥ ऋूरराश्यंशके भाग्यनाथे शुक्ेज्य- वीक्षिते॥ भाग्यलग्नेशसंदृष्टे भाग्यनाशं करोति सः॥३८ ॥ लग्नेशे भाग्यराशिस्थे भाग्येशे लग्नमाश्रिते॥ लाभे भाग्येशसं- युक्ते पुनर्भाग्यं लभेत्खल।। लाभभाग्येशसंयुक्तभाग्यपेर्थ: पु- नर्भवेत्॥ ३९॥

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(१४६ ) सर्वार्थचिन्तामणि:ः।

भाग्यभाव तथा भाग्येश बृहस्पति शुकसे दृष्ट वा युक्त होवे, लभेश तथा द्वितीयेश बलवान् होवै तो फिरभी ऐश्वर्यकी पाप्ति होवै॥ ३७॥ नवमेश कूरग्रहके राशि अंशक्षमें होवै उसे गुक बृहस्पति देखें भाग्येश लग्नेशभी देखें तो वह ऐश्वर्यका नाश करताहै ॥ ३८ ॥ लग्नेश नवममें नवमेश लग्नमें हो अथवा नवमेश लाभस्थानमें होवे तो फेरभी नष्ट ऐश्वर्यका लाभ होवै, लामेश भाग्येश युक्त हो अथवा परस्परराशिगत हो तोभी फिर धनादि होंगे॥ ३९ ॥ कर्मेंशे भाग्यराशिस्थे भाग्येश बलसंयुते॥ गुरुशुक्युते दृष्टे ज- पध्यानसमाधिमान् ॥४० ॥ कर्मेशयुक्तराश्यंशराशीशे बल- संयुते॥ तदीश भाग्यसंबंधे जपध्यानसमाघिमान्॥४॥ देवलोकांशकस्थे वा कर्मेश भाग्यपेथ वा॥ पारावतांशके सौ- म्ये दष्टे सुब्रह्मनिष्ठता ॥४२॥। दशमेश नवम हो नवमेश बलवान् हो बृहस्पति शुकसे युक्त वा दृष्ट होवे तो जय ध्यान समाधिवाळा होवै॥ ४० ॥ दशमेश जिसकी राशीमें है वह बलवान् होवै जिस राशिमें वह बैठा है उसका स्वामी नवमेशसे किसी मकारका संबंध रखता हो तोभी वही फल होगा॥४१॥ दशमेश वा नवमेश देवलोकांशकमें हो भथवा पारावतांशकमें शुभदृष्ट होवे तो ब्रह्मनिष्ठ होवे॥ ४२ ॥ दानस्थानाधिपे स्वोच्चे शुभग्रहनिरीक्षिते॥ तत्स्थाने शुभसंयुक्ते दानकृत्स नरो भवेत्॥४ ३ ॥ पारावतादिभागस्थे दानेशे गुरु- वीक्षिते॥ लग्नेशे भृगुसंदष्टे महादानकरो भवेत्॥४४॥दानाधि पेन संदृष्टे लग्ने नन्नायकेपिवा। तस्मिन्केन्द्रत्रिकोणस्थे महादा- नकरो भवेत् ॥४५। सिहासनांशके दाननाथे लग्नेशवीक्षिते॥ कमेशेनापि संदृष्टे महादानकरो भवेत् ॥ ४६ ॥ नवमेश अपने उच्चमें शुभग्रहद्ष्ट होवे नवमभावमें शुभ ग्रह होवै तो वह मनुष्य दान करनेवाला होवै।। ४३ ॥ नवमेश पारावतादि शुभांशकमें गुरुसे दृष्ट होवै, लग्नेशपर गुक्रकी दृष्टि होवे तो मनुष्य महादान (अजिमदान तुलादानादि) करनेवाला होवै ॥। ४४ ॥ लगनेश वा छग्नमें नवमेशकी दृष्टि होवे वह नवमेशभी केन्द्र त्रिकोणमें होवै तो भी वही फल होवै ॥ ४५॥ नवमेश सिंहासनांशकमें होवे उसे लग्नेश देखे और कर्मेशमी देख तोभी वही फलु होगा॥ ४६ ॥

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भापाटीकासहित:। (१४७ ) भाग्ययोगे तु संप्राप्ते दानयोगे तथा भवेत्॥ राजयोगेथ वा प्रात्ते नेतरेषां तथा भवेत्॥ ४७॥ इतरेषां तु संपाते दानयोगे कथ भवेत्।। भाग्ययोगे नरो जातो दानस्य तु सहायकृत्॥४८॥ जातः पुरोहितो वाथ ब्रह्मवंशसुद्धवः॥ दानाध्यक्षोऽथ जातः स्याद्वर्णभेदविकल्पनात्॥४९॥ भाग्ययोगहोनेमें तथा दानयोग अथवा राजयोग होनेमें उक्त फल होताहै. अन्ययोगोमें नहीं॥ ४७॥ दानयोग होनेमें भी उक्तयोग न हो राजभंगादि दुष्टयोग हो तो दानी होना संभव नहीं होता दानयोगमें भाग्ययोगभी होवे तो वह दानकर्ममें सहायता करता है भाग्ययोगकी संपन्ननासे दान होताहै अथवा दूसरेके दानमें सहायता और उसका नतिपालनआदि करताहै॥ ४८ ॥ उक्तदानादियोगोंसे ब्राह्मणवंशोत्पन्न पुरोहित अथवा दानाध्यक्ष होताहै क्षत्रिय दानी, अथवा दानकर्मसहायक होताहै ऐसही स्ववर्णानुरूप फल मनुष्यको मिलताहै ॥ ४९ ॥ चतुर्थे दानभावेशे कर्मेशे केन्द्रमाश्रिते॥ व्ययेशे गुरुसंदृष्टे महा- दानकरो भवेत् ॥५०॥ भाग्येशेनापि संदष्टे स्वोच्चस्थे सोमनं- दने ॥ लाभेश केन्द्रभावस्थे महादानकरो भवेत् ॥८१॥ नवमेश चतुर्थदशमेश केन्द्रमें होवै व्ययेशपर बृहस्पतिकी दृष्टि होवै तो महादान- ढेनेवाला होवै॥ ५०॥ बुध अपने उच्चका होवे नवमेश उस देखे और लामेश केन्द्रमें होवै तो महादान करनेवाला होवै॥ ५१॥ लग्नेशे लाभराशिस्थे कमेशे बलसंयुते ॥ लग्नशेनापि संदष्टे दानग्रहणमिष्यते॥५२॥ सुतेशे भाग्यराशिस्थे कर्मभाग्यपसं- युते ॥ लग्नेशेनापि संदृष्टे दानप्राप्तिर्न संशयः ॥५३॥ भाग्येशे कर्मनाथेन दृष्टे केन्द्रत्रिकोणगे॥ परमोच्चांशके वापि दानप्रा- पिर्न संशयः ॥५४॥ लग्नेश लाभस्थानमें हो दशमेश बलवान् होवे उसे लन्नेशमी देखे तो दान लेनेवाला होवे।। ।। ५२ ॥ पंचमेश नवमस्थानमें नवमेश तथा दशमेशसे युक्त होवे उसे लग्नेशभी देखे तो उसको दानकी पाप्ति होवे इसमे संदेह नहीं।। ५३॥ नवमेश दशमेशसे दृष्ट होकर केन्द्र त्रिकोणमें होवे अथवा परम उच्चांशकमें होवे तो निस्सन्देह दानकी माप्ति होवै॥ ५४॥

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(१४८) सर्वार्थचिन्तामणि:। गुरुस्थानेशसंयुक्तनवांशाधिपतौ यदा ॥ गुरुशुकेक्षिते वापि गुरुभक्तियुतो भवेत् ॥५५॥ गुरुस्थाने सौम्ययुते गुरुसंबंध संयुते॥ तदीशे मृदुभावस्थे गुरुभक्तियुतो भवेत् ॥५६॥ अध्यायः सप्तमः प्रोत्तश्वायुर्घर्माधिवाचकः ॥ नानार्थसारसं- युक्तो व्यङ्गटेश्वरशर्मणा ॥५७॥ इति श्रीसर्वार्थचिंतामणौ अष्टमनवमभावफलविचारो नाम सप्तमोऽध्याय:।।७॥ बृहस्पति जिसकी राशिमें है वह जिसके नवांशमें हो वह गुरु शुक्रसे दृष्ट होवै तो गुरु- भक्तिवाला होवे ।। १५॥ नवमस्थान शुभयुक्त हो बृहस्पति उसके साथ संबंध करता हो उसकी अधिष्ठित राशिका स्वामी सौम्यभावमें होवै तो मनुष्य गुरुभक्तिवाला होवै ॥ ५६ ॥ यह सातवां अध्याय आयु तथा धर्मविचारवाचक नानापकारके सार अथोंसे युक्त वेङटेश्वर शर्मीन कहा॥ ५७॥ इति श्रीसर्वार्थचिंतामणौ माहीधरभाषाटीकायामष्टमनवमभावफल- विचाराध्यायः सप्रमः ॥७॥

अष्टमोऽध्यायः॥८॥

अथ दशमादिभावविचाराऽध्यायः। दशमात्प्रवृत्तिमाज्ञां कीर्ति वृष्टिं प्रवासपूर्तादीन्॥ मानं कर्माजीव जानुस्थानं च निर्दिशेदासान्॥ १॥ दशमभावसे कर्मकी प्रवृत्ति (किस काममें रुचि रहेगी) हकूमत, कीर्ति, वर्षा, प्रवास, पूर्त (वापी कूपआदि) आदिसे राज्यस्थान ऐश्वर्यादि, तथा मान, किस कामसे भगीवन होगा, (पितृस्थानादि ) और जानुस्थानका विचार, दासआदियोंका विचार कहना ॥ १ ॥ कर्माधिपे हीनबले सपापे कर्मादिवैकल्यसुशंति तज्ज्ञाः॥ कमें- शवागीशशशांकपुत्रा वीर्यान्विता यज्ञकरा भवन्ति ॥ २॥ शुभग्रहैरद्ृष्टिस मन्वितास्ते वीर्यान्विता यज्ञविशेषमाहुः॥दुःस्थाः शशांकात्मजजीवशुकाः पापेक्षिता: कर्मविनाशमाहु: ॥३॥

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(१४९ ) दशमेश हीनवळ पापयुक्त होवै तो ज्पोतिषज्ञ कर्मआदिकी विकलता कहतेहैं दशमेश वृहस्पति बुध बलवान् होये तो मनुष्य यज्ञ करनेवाले होतेहैं ॥ २ ॥ वही तीनों गुभग्रहोंसे दृष्ट तथा बळवान्भी होवे तो यज्ञविशेष कहतेहैं बुध गुरु दुष्टस्थानोंमें हों पापग्रह उन्हें देखें तो कर्मका नाश कहतेहैं॥ ३ ॥। नाशस्थितास्तत्र तदंशनाथास्तद्युक्तराशेरधिपाश्च नाशमू॥ राहौ च माने यदि वा दिनेशे भागीरथीस्नानमुशति तज्ज्ञाः ॥४॥- माने च मीने यदि वा ससौम्ये भौमान्विते वा भविता च मुक्तिः॥ जलर्क्षगे पूर्णशशांकजीवे मानस्थिते गांगजलादिपूतः॥ ५॥ वही बुध गुरु शुक नाशस्थानमें हों अथवा उनके अंशनाथ तथा राशिनाथभी नाशस्थानमें हों तो भी वही फल होगा यदि राहु अथवा सूर्य दशम स्थानमें होवैं तो ज्योतिषज्ञ भागी- रथीका ख्नान मिलेगा कहतेहैं ।। ४ । दशममें मीनराशि शुभग्रहयुक्त अथवा भौमयुक्त होवै तो मुक्ति होगी दशमस्थानमें जलचर राशिके पूर्णचन्द्रमा बृहस्पति होवैं तो गंगाआदिके जलसे पवित्र होवै ॥ ५ ॥ माने गुरौ शुकयुते च केन्द्रे स्वोच्चस्थिते तादृशतोयपूतः॥ माने धने शुकयुते सजीवे केन्द्रोच्चगे तादृशतोयपूतः ॥६॥ बुधे व्यये वा यदि वा तदीशे स्वोच्चान्विते तादृशपुण्यभाक्स्यात्॥ चन्द्रे तृतीये जलराशियुक्ते सौम्यान्विते तादृशपुण्यभाकस्यात्।७। दशम स्थानमें बृह्स्पति शुकयुक्त होवै अथवा अपनी उच्चराशिका किसी केन्द्रमें होवै तो गंगाजलसे पवित्र होवै दशम वा द्वितीय स्थानमें शुक्सहित बृहस्पति हो अथवा केन्द्रमें उच्चराशिका होवै तो वैषवेही गंगाजलसे पवित्र होवै ।। ६ ॥ बुध बारहवें होवै अथवा व्ययेश अपने उच्चमें होवै तो वैसाही पुण्यवान् होवे चन्द्रमा जलराशिका तीसरे भावमें शुभयुक्त होवै तोमी वैसेही पुण्यवाला होवै ॥। ७।। शुभेश्वरे केन्द्रयुते जलक्षें सौम्येक्षिते तादृशतोयपूतः ॥ बुधे सजीवे यदि वा सभौमे प्राकारकृन्मण्डपगोपुरादीन॥८॥ मानस्थिते तद्गहनाथयुक्ते करोति जीर्णोंद्धरणादि तत्र॥ ९॥ करोति कूपादितटाकभूमिं कर्मेश्वरे गोपुरभागयुक्ते॥ मृद्धंशके वा शुभदृष्टियुक्ते भाग्येश्वरेणापि निरीक्षिते वा॥ १० ॥

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(१५० ) सर्वार्थचिन्तामणिः। दशमेश जलराशिका केन्द्रमें हो शुभग्रह उसे देखे तो गंगाआदिके जलसे पवित्र रहे बुध बृहस्पति अथवा मंगलसे युक्त होवै तो भाकार मण्डप अट्टालिका आदि बनानेवाला होवे ॥ ८॥ बुध दशमेश सहित दश्म स्थानमें होवै तो जीर्णोद्धार आदि करताहै ॥ ९ ॥ दशमेश गोपुरांशकमें होवै अथवा मृद्धंशकमें होवै शुभग्रह तथा भाग्येशसेभी दृष्ट होवै तो कुर्आ तालाव आदि भूमि बनावै॥। १० ॥ चन्द्रात्मजे कर्मगते तदीशे भाग्यस्थिते पापविवर्जितेस्मिन् ॥ सौम्येक्षिते शोभनभावयुक्ते यज्ञस्य कर्त्ता स भवेत्तदानीम् ॥ ११ ॥ कर्भाधिपेस्मिन्यदि सोमपुत्रे स्वोच्चस्थिते वा यदि धर्मराशौ॥ विवर्जितः स्याच्छिखिराहुपापैर्यज्ञस्य कर्त्ता स भवे- त्तदानीम् ॥ १२॥ बुध दशम स्थानमें दशमेश नवममें पापरहित होवे शुभग्रहकी राशियोंमें गुभग्रह दृष्ट होवें तो यज्ञ करनेवाला होवै ।। ११ ॥ यदि बुध दशमेश होकर अपने उच्चमें हेवि अथवा नवमभावमें होवै केतु राहु और पापग्रहोंखे रहित होवै तो यज्ञका करनेवाला होवै ॥ १२॥ कर्माधिपे स्वोच्चगते सपापे नीचांशगे नाशगतेपि तस्मिन्।।विध्ो भवत्येव मखस्य तस्य क्रूरादिषष्टयंशगतेपि चैवम् ॥१३॥ तुंगस्थिते सोमसुते तदीशे स्वोच्चान्विते सोमसुतेन दष्टे॥ शुभे- क्षिते वा सबुधे स्वराशौ यज्ञस्य कर्ता स भवेत्तदानीम्॥१४॥ दशमेश अपने उच्चराशिमें हो परंतु पापयुक्त नीचांशकमें और बारहवें होवै तो उसके यज्ञका विभ् अवश्य होताहै यदि दशमेश क्रूरआदि घष्टचंशमें होवै तोभी वही फल होगा॥१३॥ दशमेश अपने उच्चराशिमें हो उसे उच्चराशिस्थ बुध देखे अथवा शुभग्रह दृष्ट तथा बुधयुक्त होवै यद्ा उच्चमें न हो अपनी राशिमें होवै तो वह मनुष्य यज्ञकरनेवाला होवै॥ १४॥ आज्ञास्थानाधिपे सौम्ये शुभदृष्टियुतेपि वा ॥ शोभनांशगते वापि जातस्त्वाज्ञाधिपो भवेत्॥ १५॥ आज्ञास्थानगते सूर्यें भूमिपुत्रेण वा युते ।। केन्द्रान्विते तदीशेपि कूरामाज्ञां करोति सः ॥ १६॥ आज्ञाधिपे मन्दयुते रन्ध्रनाथेन संयुते ॥। कूरांशे केन्द्रराशौ वा कूरामार्ज्ञां करोति सः॥ १७॥ मानाधिपे केन्द्र- युते शुभयुक्तेक्षितेपि वा ॥ शरषष्ट्यंशसंयुक्ते सौम्यामार्जञां क- रोति सः ॥१८॥

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भाषाटीकासहित:। (१५१ )

दशमेश शुभग्रह शुभग्रहसे दृष्ट युक्त होवे अथवा शुभांशकमें होवै तो दूसरेको बाज्ञा देने- वाला (हाकिम) होवै॥ १५॥ दशम भावमें सूर्य वा मंगल होवे दशमेश केन्द्रमें होवै तो वह हाकिय होनेपर क्रूर आज्ञा देनेवाला होवै॥ १६ ॥ दशमेश शनियुक्त तथा अष्टमे- शसे युक्त होवै कूरांशकमें अथवा केंद्रमें होवे तो क्रूर भाज्ञा देताहै॥ १७॥ दशमेश केंद्रमें शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट होवै पांचवें षष्टचंशमें होवै तो वह हाकिम सौम्य भाज्ञा देताहै॥ १८ ॥ राहुमांदियुते माने रंधे राहौ ध्वजेपि वा॥ नीचस्थे धर्मभावेशे कूरामाज्ञां करोति सः॥१९॥ शर्शांके कर्किसयुक्ते गुरुशुक निरीक्षिते॥ पारावतादिभागस्थे सत्कीर्तिसहितो भवेत् ॥२०।। राहु वा केतु दशममें हो अथवा अष्टममें हो और धर्मेश नीचराशिमें होवै तो वह कूर भाज्ञा देता है।। १९ । चंद्रमा कर्कका बृहस्पति शुकसे दृष्ट होवै पारावतादि शुभांशकमें होवै तो वह मनुष्य सत्कीर्तिवाला होवै ॥ २० ॥ तदीशे शुभसंयुक्ते शुभमध्यगतेपि वा।।शुभग्रहाणामंश वा सत्की- तिसहितो भवेत् ॥ २१॥ कांतिस्थानाधिपे सौम्ये स्वोच्चमित्र- स्ववर्गगे।I सौम्यषष्टयंशके वापि सत्कीर्तिसहितो भवेत् ॥२२॥ तदीशे देवलोकस्थे सिंहाश शुभनायके॥ बलपूर्णे विलग्नेशे सत्कीर्तिसहितो भवेत् ॥ २३ ॥ पापग्रहाणां संबंधे माननाथे बलक्षये ।I ऋूरषष्टयंशसंयुक्ते सत्कीर्तिसहितो भवेत् ॥ २४॥ चंद्रराशीश शुभयुक्त अथवा शुभग्रहोंके मध्यमें हो अथवा शुभग्रहोंके अंशकमें होवै तो सत्कीर्तियुक्त होवे । २१ ॥। दशमेश शुभग्रह अपने उच्च वा मित्रराशि वा अपने अंशमें होवै अथवा शुभषष्टचंशमें होवै तो सत्कीर्तिवाला होवे॥ २२ ॥ दशमेश देवलोकांशकमें होवै और नवमेश सिंहासनांशकमें पुस्तकांतरमें "शुभांशकस्थे" ऐसा पाठहै अर्थात् शुभग्रहफे नवमांशमें हेवै, लग्नेश पूर्णबली होवै तो सत्कीर्तिवाळा होवै ।। २३ ॥ दयमेश निर्बळ तथा पापग्रहोंसे संबंधी होवै और क्ूरषष्टयंशमें होवै तो वही फल होगा ॥ २४॥ अपकीरतियुतो जात: कर्मस्थे च रवौ शनौ। पापांशके पापदष्टे पापमध्यगतेपि तत् ॥२५॥ शुभग्रहाणां संबंधे मानतन्नाय- केपि वा॥ स्वोच्चे वा स्वगृहे वापि जातो मानी दढव्रतः॥२६।। इंगितज्ञोपि मानी स्यान्माने जीवेथ वा शुभे॥ तदीशे शुभसं- बंधे शुभमध्यगतेपि वा ॥२७॥

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(१९२ ) सर्वार्थचिन्तामणिः। दशमस्थानमें सूर्य वा शनि पापदृष्ट वा पापमध्य होवै तो भी अपकीर्तिवाला होवे॥२५॥ दशमस्थानसे अथवा दशमेशसे शुभग्रहोंका संबंध होवै अथवा स्वोच्चराशि वा स्वराशिमें होवै तो मानवाला और दढवतवाला होवै ॥ २६ ॥ दशमस्थानमें बृहस्पति अथवा कोई शुभग्रह होवै दशमेशका संबंध शुभग्रहोंसे होवै अथवा शुभग्रहोंके मध्यमें होवे तो आकारहीसे दूसरेके मनका भाव जाननेवाला होवै ॥ २७॥ पापे माने पापदष्टे तदीशे नी चराशिगे॥ पापराश्यंशके वापि मानहीनो भवेन्नरः ॥ २८॥ मानाधिपे चरांशस्थे संचारसहि- तो भवेत् ॥ स्थिरांशे स्थैर्यमुदिष्ठं मृगयात्रा द्विदेहगे ॥ २९॥ पष्ठेशे कर्मराशिस्थे कर्मेशे मंदसंयुते॥ केंद्रत्रिकोणगे वापि दासी दासान्विनिर्दिशेत्॥ ३०॥ दशमस्थानमें पापग्रह पापग्रहसे दृष्ट हो दशमेश नीचराशिमें हो अथवा पापग्रहकी राशि वा अंशकमें होवै तो मनुष्य मानहीन रहे ॥ २८ ॥ दशमेश चरराश्यंशकमें होवै तो घूमने फिरनेवाला होवै स्थिरांशकमें होवै तो स्थिर रहे और द्विस्वभावांशकमें होव तो शिकार खेल ना आदि सैळानी होवै॥ २९॥ षष्ठेश दशममें दशमेश श्नियुक्त होवे अथवा केन्द्र त्रिको- णमें होवै तो दास दासी बहुत होवैं ॥ ३० ॥ कर्माधिपस्थांशपतौ शनिसंबंधसंयुते॥ षष्ठाधिपस्य संवंधे बहुदासान्विनिर्दिशेत्॥ ३१॥ शुभग्रहेण संदृष्टे कर्मराशौ तदी- श्वरे। भानुपुत्रेण वा युक्ते बहुदासान्विनिर्दिशेत्॥३२।कर्मनाथेन वा सुक्तिप्रश्ने पूर्ति विनिर्दिशेत्। तत्र पापसमायोगे जानुदौर्ब- ल्यमादिशेत्॥ ३३॥। इति दशमभावविचारः॥ दशमेश जिसके नवांशकमें है वह शनिसे संबंधी होवे वष्ठेशकाभी संबंध होवै तो बहुतदासका होना कहना।। ३१ ॥ दशमस्थानमें गुभग्रहकी दृष्टि होवै वा दशमेश शनियुक्त होवे तौभी वही फल कहना॥ ३२ ॥ भोजनमश्नमें दशमेशसे भोज- नकी पूर्ति आदि बलाबल देखके कहनी दशममें पापग्रह होवैं तो जंघा कृश होवै॥ ३३ ॥ इति दशमभावविचारः ॥ अथ प्रव्न्यायोगा:। ग्रहैश्धतुर्भिः सहितैस्तदीशे त्रिकोणगे केन्द्रगतैस्तु मुक्तः ॥ चतु- श्रहैः केंद्रगतैः प्रत्रज्यामाप्नोति जातः कथितो सुनीन्द्रैः ॥१॥

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भावाटीका सहित :: (१५३ ) न वीक्षित श्वेदितरग्रहेंद्रैर्लगाधिपः पश्यति भानुपुत्रम। लगाधिपं वा यदि भातुपुत्रः संन्यासयोगो हि बलेन हीनः॥२॥ शने र्दकाणे कुमुदात्मबन्धौ मंदेक्षिते तादृशयोगमाहुः॥ मन्दांशके भूमिसुतांशके वा मंदेक्षिते चन्द्रयुते तथैव ॥ ३॥ संन्यासयोगा- घिपतौ सराहौं कूरांशके वा गुलिकेन युक्ते॥ संन्यासवैकल्यमु- दाहरंति भंगो भवेत्तस्य शुभैविहीने॥४॥ इति प्रत्रज्यायोगाः॥ अब संन्यासयोग कहते हैं चार ग्रह एक स्थानमें होवैं उस भावका स्वामी केन्द्र त्रिको णमें न होवै अथवा चार ग्रह केन्द्रमें होवैं तात्पर्य यह है कि चार आदि ग्रह एक स्थानमें होवैं तो मनुष्य संन्यासी (फकीरी) पाता है यह मुनीन्द्रोंने कहाहै ।। १ ।! लगेशपर केवल शनिकी दृष्टि होवै अन्यकी न होवै अथवा शनिको लग्नेश देखे लग्नेशको शनि देखे वलरहित हवि तो संन्यासयोग होताहै ॥ २ ॥ चन्द्रमा शनिके द्वेष्काणमें हो शनि उसे देखे तो संन्यासयोग होताहै शनिके वा मंगलके अंशकमें शनिसे दृष्ट हो अथवा चंद्रमा शनिसहित होवै तो भी वही योग होताहै॥ ३॥ जिस स्थानमें संन्यासयोग है उसका स्वामी राद्ुयुक्त होवै अथवा कूरांशकमें गुलिकसहित होवे तो सन्यासमें विकलता होवै यदि शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट न होवै तो संन्यास लियेमें भी भंग होजावै॥ ४ ॥ इति संन्यासयोगाः ॥ अथ लाभभावविचारः। आगेनार्थावाप्ति पादावपि वामकर्णचिंर्ता च। जातावपि कच- कुब्जाञ्ज्येष्ठान्बूयाद्धनान्यासाम्॥ १॥ लाभेश्वरे केंद्रगते त्रि- कोणे वा समन्विते॥ लाभे वा चापसंयुक्ते धनलाभसुदीरयेत्॥।२॥ ग्यारहवें भावसे धनपाप्ति, पैरोंका विचार, वामकर्णका विचार, केश, कुनता, बढेभाई, धनादिविचार करना ॥ १॥ लामेश केंद्र त्रिकोणमें हो अथवा लाभस्थानमें पापग्रहसे युक्त होवै तो धनलाभ कहना ॥ २ ॥ धनाधिपे लाभगते लाभेशे धनमागते॥ तावुभौ केन्द्रगौ वापि धनलाभमुदीरयेत् ॥ ३॥। शुभमध्यगते लाभे तदीशे वा तथा स्थिते॥ पारावतादिभागस्थे धनलाभमुदीरयेत॥४॥ लाभे- शयुक्तराशीशे शुभग्रहनिरीक्षिते। शुभग्रहाणां मध्यस्थे धन- लाभमुदीरयेत्॥ ५॥ लाभनाथसमायुक्तनवांशाधिपतौ शुभे॥

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(१५४) सर्वार्थचिन्तामणि:।

वित्ताधिपेन संदृष्टे धनलाभमुदीरयेत् ॥६॥ लाभाधिपसमायु- कत्यंशभागपतौ शुभे॥ कर्मेश्वरेण संदष्टे धनलाभमुदीरयेद॥७॥ धनेश लाभमें लाभेश द्वितीयभावमें होवै अथवा वे दोनोंके केंद्रमें होवें तो धनलाभ कहना ॥ ३॥ लाभभाव शुभग्रहोंके बीचमें होव अथवा लाभेश ऐसा होवै और पारावतादि अंशकमें होवै तो धनलाभ कहना॥ ४ ॥ लाभेश जिस राशिमें है उसका स्वामी शुभग्रह दृष्ट शुभग्रहोंके बीचमें होवै तो धनलाभ होवै॥ ५ ॥ लाभेश जिसके नवांशकमें है उसका स्वामी शुभग्रह हो और धनेश उसे देखे तो धनलाभ कहना ॥ ६ ॥ लाभेश जिसके द्ेष्का- णमें है वह शुभग्रह होवै कर्मेश उसे देखे तो धनलाभ कहना ॥ ७ ॥ पापग्रहाणां संबंधे धनहानिं विनिर्दिशेत्॥ लाभेश्वरोक्तदिग्भा- गाद्धनप्राप्तिं विनिर्दिशेत्॥८॥ लाभराश्युक्तदिग्भागात्सर्वोत्त- मबलादपि।वनबलवशेनैव द्रव्यलाभं विनिर्दिशेत् ॥९।। लाभे पापे तद्गूहे वा धनहानिं विनिर्दिशेत्॥ लामेशे पापसंबंधे धन- नाशं विनिर्दिशेत्॥१०॥ लाभेश पापग्रहोंसे संबंधी होवै तो धनहानि कहनी धनप्राप्तिके लिये लाभेश जिस दिशा- का स्वामी है उस दिशासे धनलाभ कहना॥ ८॥ लाभगत राशिके उक्त दिशासे अथवा सर्वोत्तम बली ग्रहके दिशासे धनमाप्ति कहनी ॥। ९। लाभस्थानमें पापग्रह हो वा पाप- ग्रहकी राशि होवै तो धनहानि कहनी लाभेश पापग्रहोंसे संबंधी होवै तो धननाश होवै ॥१०॥ कर्णस्थानेश्वरे सौम्ये शुभदृष्टिसमन्विते॥ कर्णाघिपे बलवति कर्णाभरणमिष्यते ॥११॥ पापग्रहाणां संबंधे तन्नाशोत्र भवि- ष्यति ॥ लाभेशात्सोदरेशाद्ा कर्णसौख्यं विनिर्दिशेत् ॥१२॥ तदीशे शुभसंबंधे कर्णसौख्यं विनिर्दिशेत्॥ तदीश पापसंबंधे कर्णरोगं विनिर्दिशेत ॥ १३॥ ब्रूयाज्येष्ठांशलाभेन शुभपापव- शादपि॥ शुभग्रहाणां संबंधे दीर्घमायुर्विनिर्दिशेत्॥१४॥ लाभेश शुभग्रह शुभदृष्ट होवै तथा लाभेश बलवान् होवै तो कानोंके भूषण होवै ॥ ११ ॥ यदि उसका पापग्रहोंसे संबंध होवै तो उन भूषणोंका नाश कहना ऐसेही लाभेशसे तथा तृतीयेशसेभी कानोंका सौख्य कहना । १२ ॥ इन भावोंका स्वामी शुभग्रहोंसे संबंध करे तो कर्णसौख्य कहना। पापसंबंधसे कर्णरोग बधिरता आदि कहनी॥ १३ ॥ लाभसे दक्षिण कर्ण तृतीयसे वामकर्णका विचार शुभ पापग्रहवशसे शुभाशुभ कहना शुभग्रहोंके संबंधसे दीर्घायु फहनी॥ १४ ॥

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भावाडीका सहित:। (१५५) पापान्विते पापहष्टे तद्दानिं प्रवदति हि॥ लाभराशेश्च दिग्भागे

झुदीरयेत्॥ लाभराशिवशादेवं चिंतयेन्मतिमात्रः॥ १६ ॥ इत्यायभावविचारः॥ तदीश पापयुक्त दृष्ट होवै तो लाभकी हानि कहते हैं लाभभावराशिकी जो दिशाहै उस दिशासे लाभ कहना ।। १५॥ अथवा लाभेशकी दिशाकी ओरसे धनमाप्ति कहनी। इस प्रकार बुद्धिमान् मनुष्य लाभराशिके वशसे धनका लाभालाभ विचारे। १६ ॥ इति लाभ- भावविचारः ॥ अथ व्ययभावविचार:। व्ययभवनाछ्ययमखिलं पतनं नरके च वैकल्यम्॥ वामाक्षि चरणयुगलं शयनस्थानं विनिर्दिशेत्पाज्ञः ॥ १॥ बारहवें भावसे संपूर्ण व्यय (खर्च), नरकमें पडना, विकल्पकता, वामनेत्र, दोनों चरण, शयन स्थानका विचार माज्ञ कहे ॥ १ ॥ व्यये पापसमायुक्ते तदीशे पापखेचरे॥ पापग्रहेण संदष्टे पापमू- लाद्धनव्ययः॥ २ ॥ मन्दमान्यगुसंयुक्ते व्यये वा तद्हाधिपे।। क्रूरांशकसमायुक्ते पापमूलाद्धनव्ययः ॥ ३ ॥ व्ययाधिपसमायु- कनवभागपतौ शुभे॥ शुभांशे शुभमध्यस्थे धर्ममूलाद्धनव्ययः ।।४ ॥ गुरुशुकौ व्यये वापि बुधचंद्रौ शुभेक्षितौ॥ पारावता- दिभागस्थौ धर्ममूलाद्वनव्ययः ॥५।। व्ययभावमें पापग्रह होवें व्ययेश पापग्रह होवे पापग्रहसे दृष्ट होवै तो पापके कारण धन खर्च होवै॥ २ ॥ शनि केतु राहुसे युक्त व्ययभाव वा व्ययेश होवि तथा कूरांशकमें होवै तो पापके कारण घनव्यय होवै॥ ३ ॥ व्ययेश जिसके नवांशकमें है वह शुभग्रह होवै एवं शुभग्रहके अंग्रकमें शुभग्रहोंके बीचमें होवै तो धर्मके कारण धन व्यय होवै ॥ ४॥ बृहस्पति शुक अथवा बुध चंद्रमा व्ययभावमें शुभदृष्ट तथा पारावतादि अंशफोंमें होवें तो धर्मके कारण धनव्यय होवै ॥ ५ ॥ व्ययाधिपे त्रिकोणस्थे केन्द्रे पापनिरीक्षिते। परषष्टयंशके वापि पापमूलाद्धनव्ययः ॥६॥ पापेन कर्मनाथेन व्ययेशे दृष्टि- संयुते ॥ शत्रुनीचादिभागस्थे पापमृलाद्धनव्ययः॥७॥शुभेन

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(१५६ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

कर्मनाथेन दृष्टे युक्त व्ययेश्वरे॥ स्वोच्चमित्रस्ववर्गस्थ धर्ममूला- द्नव्ययः॥८॥ व्ययेशे बलहीने वा शत्रुनाथयुतेक्षिते॥ गुलि- कादिसमायुक्त शत्रुमूलाद्धनव्ययः ॥९। व्ययेशे दारनाथेन बलहीनेन तेन तु।। दृष्टे युते वा क्रूरांशे स्त्रीहेतोरईननाशनमू॥१०॥ व्ययेश त्रिकोणमें वा केंद्रमें पापदृष्ट होवै, अथवा दूसरे षष्टयश अर्थात् राक्षसषष्टयशमें होवै तो पापके कारण धनव्यय होवै ॥ ६॥ दशमेश पापग्रह करके व्ययेश दृष्ट होवै तथा शत्रु नीचआदि अंशकमें होवै तो पापके कारण धनव्यय होवै॥ ७॥ यदि दशमेश शुभग्रहसे व्ययेश दृष्ट होवै अपने उच्च मित्र स्वराशिमें वा नवांशकमें होवै तो धर्मके कारण धनव्यय होवै॥ ८॥ व्ययेश बलरहित हो अथवा षष्टचंशसे युक्त वा दृष्ट होवै और गुलिकादिसे युक्त होवे तो शत्रुके कारण धनव्यय होवै ॥ ९॥ बलहीन सप्तमेशसे व्ययेश दृष्ट वा युक्त हेवे तंथा कूरांशकमें होवे तो खीके कारण धननाश होवै ॥ १० ॥ तादृशे व्ययनाथेस्मिन्दष्टे युक्तेथ वा भवेत॥ तथाविधेन भौमेन भ्रातृमूलाद्धनक्षयः॥ ११॥पुत्रभावेश्वरेणापि वलहीनेन संयुते॥ दृष्टे व्ययेशे क्ूरांशे पुत्रमूलाद्धनव्ययः॥ १२॥ पितृस्थानेश्वरे- णापि कारकेणापि वा युते॥ व्ययेशे दृष्टिसंबंधे पितृमूलाद्धनव्य- यः॥ १३॥ एवं मातृपयोगेन युते दृष्टे व्ययाधिपे॥ क्ररान्विते कूरभावे मातृमूलाद्धनव्यय:।।१४।। ऐसेही व्ययेशपर निर्बल मंगळकी दृष्टि हो वा युक्त होवै तो ध्रातृवर्गके कारण धननाश होवै ।। ११ ॥ तथा बलहीन पंचमेशसे दृष्ट वा युक्त व्ययेश होबै तथा कूरांशमें भी होवै तो पुत्रके कारण धनव्यय होवै॥ १२ ॥ व्ययेश दशमेशसे युक्त वा दृष्ट होवे अथवा कार- कसेभी युक्त होवै तो पिताके कारण धनव्यय होवै॥ १३ ॥ ऐसेही चतुर्थेशसे युक्त वा दृष्ट व्ययेश होवे क्रूरभावमें क्रूरग्रह्युक्त होवै तो माताके कारण घनव्यय होवे ॥ १४॥ बलहीने तु रिष्फेशे कूरराश्यंशकेपि वा॥ नीचांशे नीचराशौ वा देहे वैकल्यमादिशेत्॥ १५॥ बहुपापसमायोगे व्यये तद्भावना- यके।। मन्दमान्द्यगुसंयुक्त देहवैकल्यमादिशेत्॥ १६॥ व्ययेश बलहीन होवे क्रूरराशि क्ूरांशकमें अथवा नीचराशि नीचांशकमें होवे तो शरीरमें विकलता होवै॥ १५ ॥ व्ययभावमें बहुत पाप होबैं व्ययेश शनि केतु राहुसे युक्त होवे तो शरीरमें विकलता होवै॥ १६ ॥

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भावाटीकासहित:। (१५७ ) व्ययेशे पापराश्यंशे क्रूरांशे क्रूरसंयुते॥ पापग्रहेण संदष्टे नरके निपतिष्यति ॥१७॥ नरके पतनं ब्रूयाद्राहुमांदियुते व्यये॥ षष्ठा- धिपेन संदृष्टे रन्ध्नाथेन वा युते॥१८ ॥ व्ययेशयुक्तषष्टचंशे क्रूरभागादिसंज्के। क्रूरग्रहेण संदृष्टे नरके पतनं भवेत ॥१९॥ चन्द्रार्कयोर्यो बल्वांस्तद्युक्तत्यंशनायकः ॥ गुरुर्वा चन्द्रशुकौ वा सूर्यभौमौ ज्ञसूर्यजौ॥ २०॥ दैविकं पितृलोकंतु तिर्यङ् न- रकमेव च॥ तेषां वदेत्क्रमेणैव तल्लोकः श्रेष्ठ उच्यते ॥२१॥ व्ययेश पापग्रहके राशि अंशकमें वा क्ूरांशकमें कूरयुक्त होवै पापग्रहसे दृष्ट होवै तो नर- कमें पढेगा॥ १७॥ राहु वा केतु व्ययभावमें पष्ठेश़से दृष्ट अथवा अष्टमेशसे युक्त होवै तो नरकमें पडेगा कहना।। १८ ॥ व्ययभावेश क्रूर आदि षष्टयंशमें क्रूरग्रहसे दृष्ट होवै तो नर- कमें पडेगा कहना॥ १९ ॥ सूर्यचंद्रमामेंसे जो बलवान् हो वह जिसके द्रेष्काणमें हो वह द्वेष्काणेश बृहस्पति होवे तो देवलोक, चंद्रमा शुकसे पितृलोक, सूर्य मंगलसे तिर्यग्योनि, (कीटादि ) और बुधशनिसे नरकलोक उसके लिये श्रेष्ठ कहा जाता है यहां ग्रहकमसे फल- क्रम है॥ २०॥२१ ॥ उच्चस्थे श्रेष्ठलोक: स्यान्नीचे नीचत्वमामुयात्॥ समस्थिते सम- प्राप्तिरित्याहुश्च महर्षयः ॥२२॥शुभे स्वोच्चे व्यये वापि सौ- व्यखेचरवीक्षिते ॥ देवलोकादिभागस्थे स्वर्गप्राप्तिर्भविष्यति ॥ २३॥। देवेज्ये कर्मराशीशे व्ययराशिगतेपि वा ॥ शुभग्रहेण संदृष्टे स्वर्गप्राप्तिर्भविष्यति॥२४॥ उक्तग्रह उच्चका होवै तो उत्तमलोक नीचका होवै तो नीचलोक और सम होवै तो समलो- ककी पाप्ति होवै, इसपरकार महर्ष्ि कहतेहैं॥ २२ ॥ शुभग्रह अपने उच्चमें बारहवेंभी होवै उसे शुभग्रह देखें और देवलोकादि अंशकमें होवै तो स्वर्गमाप्ति होगी ॥ २३ ॥ दृशमेश वृहस्पति व्ययभावमें भी हो उसे शुभग्रह देखे तो स्वर्गकी पाप्ति होगी ॥ २४ ॥ नेत्रेशे शुभसंयुक्ते शोभनांशसमन्विते॥ शुभखेचरसंबंधे तन्नेत्रस्य शुभं वदेत ॥ २५ ॥ अन्यथा चेद्धदेन्नाशं पादयोरपि तत्तथा॥ तत्प्रपंचादिकं सवै धनभावे प्रदर्शितम् ॥ २६॥ व्ययेश शुभग्रहसे युक्त हो शुभषष्टयंशमें तथा शुभग्रहसे संबंधी होवै तो नेत्रका शुभ कहना । २५।। पापयुक्त, अशुभ षष्टयंशगत पापसंबंधी होवे तो नेत्रनाश कहना ऐसेही पैरौंका भी विचार कहना क्योंकि पादस्थानभी द्वादशही है इसका समस्त विचार धनभावमें कहदिया है॥२६॥

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(१५८) सर्वार्थचिन्तामणिः। गुरुशुकबुधास्तत्र वाहनं निर्दिशेहुधः॥ वाहनोक्तादिकं सर्वैतदि हात्र विचिंतयेत्॥ २७॥ शुभग्रहाणां सम्बन्धे व्यये तद्भावना. यके ॥ दोलां तु मंचं पवदेच्छयनादिसुखं तथा ॥ २८ ॥ व्ययेशे स्वोच्चराशिस्थे शुभवर्गसमन्विते॥ शुभग्रहेण संदृष्टे पर्यकशयनं वदेत्॥ २९॥ विचित्रमश्चशयनं व्ययेशे परमो- चगे । भाग्यनाथेन वा दष्टे मणिरत्नविभूषितम् ॥ ३० ॥ पापग- हाणां संबंधे व्यये तद्भावनायके। क्ूरांशे ऋ्रूरसंदष्टे शयनादि- सुखं न हि॥३१॥ व्ययेश: पापखेटोपि स्वोच्चमित्रस्वराशिगः॥। तस्यनाथोपि तत्स्थाने शयनादिसुखं वदेत् ॥३२।। नीचे व्यये वा लग्नेशे शत्रुनाथेन वीक्षिते। मंदमांदयगुसंयुक्ते शयनादिसुखं नहि ॥ ३३॥ व्ययभावमें बृहस्पति, शुक्र, बुध होवै तो वाहन होगा कहना और जो चतुर्थस्थान विचा- रमें वाहन विचार कहेहैं वह सभी यहां विचारने ॥ २७ ॥ वारहवें स्थानमें तथा व्ययेशके साथ शुभग्रहोंका संबंध होवे तो डोली मंच आदि होंगे कहना तथा विस्तर आदिका सुख कहना॥ २८॥ व्ययेश अपने उच्चराशिमें शुभाशकादियुक्त होवे तथा शुभग्रह उसे देखें तो पलंग आदि शय्या मिळे ॥ २९ ॥ व्ययेश अपने परम उच्चमें हो वा नवभेशसे दृष्ट होवै तो शय्या मणि आदिसे भूषित होवै ॥ ३० ॥ व्ययस्थानमें पापग्रहोंका संबंध होवै व्ययेश क्रूरांशमें क्रूरदृष्ट होवै तो शय्याआदिका सुख न होवे॥ ३१ व्ययेश पापग्रहमी अपने उच्च मित्रराशि अपने अंशादिमें होवै और उस राशिका स्वामीभी उसी स्थानमें होवै तो शय्या आदिका सुख कहना ॥ ३२॥ लग्नेश नीचराशिमें वा व्ययभावमें षष्टयंशसे युक्त होवै शनि केतु राहुमेसे किसीसे युक्त होवे तो शय्या आदिका सुख नहीं मिलेगा॥ ३३ ॥ पंचमे भृगुसंयुक्ते चन्द्रेण सहिते तथा ॥ ताम्यां दष्टेथ वा पुत्रे स्त्रीदेवोपास्तिमादिशेत् ॥। ३४॥। पंचमे पुंग्रहयुते पुंदेवोपास्ति मादिशेत् ॥। पंचमे भानुसंबंधे सूर्यशंकरभाजनः ॥३५॥ चन्द्रे तथाविधे जाते यक्षिणी देवता भवेत्॥ स्कंदो वा भैरवो वापि सौम्यसंबंधवीक्षिते॥ ३६॥ उपास्या शारदा सौम्ये विष्णुर्वा सात्विको गुरौ। चासुण्डां पंचमे शुकसंबंधे तु विनिर्दिशेन्।३७।।

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भावाटीकासहित:। (१५९ ) शनौ पेताशनी प्रोक्ता श्मशाननिलया भवेत्। राहुकेतुयुते तत्र परपीडनदेवता॥ ३८॥ पंथम स्थानमें शुक्र चंद्रमा सहित होवे अथवा शुक्र चंद्रमा पंचमभावको देखें तो स्त्री संज्ञक (देवी आदिका) उपासक होवै ॥ ३४ ॥ पंचममें पुरुषग्रह होवैं तो पुरुषवाची (शिवगणेशादि) की उपासना करे। पंचममें सूर्यका संबंध होवे तो सूर्य एवं महादेवकी उपासना करे।। ३५ ॥ ऐसाही चन्द्रमा होवै तो यक्षिणी उसकी देवता होवै उसपर बुधका संबंध हेव वा दृष्टि होवै तो स्कंद ( वेतालादि ) अथवा भैरव उसकी देवता होवै॥ ३६ ॥ पंचम भावमें बुध होवै तो सरम्वती उपास्य देवता होवै बृहस्पति होवै तो सात्विक विष्णु राम कृष्णादि उपास्य होवें शुक्र पंचम होवै तो चामुण्डा होवै॥ ३७ ॥ शनि होवै तो मेतके अशनवाली देवी राहु केतुसे शमशान कालिका आदि दूसरेको पीडा देनेवाली होवै।। ३८ ।। उत्ेष्वेतेषु खेटेषु स्वोच्चमित्रांशकेषु च ॥ तदेव भजनं स्वार्थ परार्थ त्वन्यथा भवेत् ॥ ३९॥ सौम्येक्षितेषु स्वेषु मृद्धंशादि- गतेषु च॥। तदेव सौम्यता वाच्या क्रूरांशे क्रूरता भवेत् ॥४० ॥ द्वित्र्यादिग्रहयोगेन तद्देवभजनं भवेत्॥ लग्नाधिपस्थ मंत्रेशे मित्रे तन्मित्रमादिशेत्॥४१॥ शत्रुत्वे शत्रुभूतः स्थात्समत्वे समता भवेत् ॥ ४२। लग्नादादशराशीनां फलं प्रोक्तं मयाधुना ॥ संगृह्य सारमखिलमध्यायस्त्वष्टमोऽभवेत् । ४३ ।। इति श्रीसर्वार्थचिन्तामणौ भावफलनिरूपणो नामा- अष्टमोऽध्यायः ॥।८।। उत्तग्रहोंमेंसे यदि अपने मित्रांशक उच्चांशकोंमें होवैं तो वह उपासना अपने लिये और नीचशत्रु आदि अंशकोंमें होवैं तो पराये अर्थ होवै॥ ३९ ॥ उक ग्रह सभी शुभदृष्ट होवै तथा मृदुआदि अंशादिमें होवैं तो सौम्य उपासना और क्रूरदृष्ट कूरांशकादिमें होबै तो कूरो- पासना कहनी॥ ४० ॥ जो दो तीन आदि ग्रहोंसे यह योग होवै तो वैसेही प्रकारके उत- नेही देवताओंकी उपासना होवै लग्नेशका पंचमेश मित्र होवै तो वह देवता मित्रभावमें शत्रु होवै तो शत्रुभावमें रहेगा कहना ।। ४१।। ४२ ।। लग्नसे बारह राशियोंका फल मैंने इस समय समस्त सार ग्रहण करके कह दिया इसमकार अष्टम अध्याय होगया ॥। ४३ ॥ इति श्रीसर्वार्थचिन्तामणौ माहीधरभावाटीकार्यां भावाध्यायोऽषमः॥८॥ इति द्वादशभावविचारः ॥

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(१६० ) सर्वार्थचिन्तामणः।

नवमोऽध्यायः॥९॥

अथ राजयोगाध्यायः। पड्भिग्रहैरुच्चसमन्वितैः स्याद्राजाघिराजो बहुदेशभर्त्ता।। उच्च- स्थितैः पश्चमिरत्र राजा शत्त्यान्वितो देवगुरौ विलग्ने॥ १॥ कुम्भे विलग्ने भृगुनंदने वा स्वोच्चस्थिते भूमिपतिश्च्तुर्मिः॥ उच्च- स्थितैर्नीचवियुक्तभागैः ऋूरादिषष्टयंशविहीनभागैः ॥२॥ छः ग्रह उच्चके होवें तो राजाओंका राजा (बादशाह) बहुत देशोंका स्वामी होवै पांच ग्रह उच्चके हों और लग्नमें बृहस्पति होवै तो सामर्थ्यवला राजा होवै ॥ १॥ कुम्भराशि लग्नमें शुक होवे और चार ग्रह उच्चके होवैं तो राजा होवै, परन्तु जो ग्रह उच्चके हैं वे नीचांशक एवं कूरआदि षष्टयंशोंमें न होवैं तब राजयोग होताहै ॥ २ ॥ लग्ने वृषे तत्र गते शशांके षड्भिग्रहैरुच्चगतैर्नृपः स्यात् ॥ क- स्मिन् गृहे स्वोच्चयुते तु सर्वैः स्वक्षेत्रगैर्भूपतितुल्यजातः॥ ३। मूलत्रिकोणाङ्गितराशियुक्तर्मित्रर्क्षगैरवा यदि वक्रयुक्ततैः॥ कस्मिन् गृहे स्वोच्चयुतेत्र शेषैरनीचांशहीनैनृपतुल्यजातः ॥४॥ जनयति नृपमेकोप्युच्चगो मित्रदष्टः प्रचुरधनसमेतं मित्रयोगाच्च सिद्धम्।। विवसुविसुखमूढव्याधितं बंधतप्तं वघदुरितसमेतं शत्रुनिन्न- क्षैगेषु ॥ ५॥ लग् वृष हो उसमें चंद्रमा हो और ६ ग्रह चंद्रसहित उच्चके हों तो राजा होवै फिसी स्थानमें भी सभी ग्रह उच्चगत होनेसे राजा होताहै सभी स्वराशिगत हों तो राजाके तुश्य होवै॥ ३॥ मूलत्रिकोणराशियोंमे वा मित्रराशियोंमे अथवा वकरगह किसीभावमें हो शेष उच्चराशियोंमे हो परंतु नीचांशकोंमें न होवै तो मनुष्य राजाके तुल्य होवै ॥ ४ ॥ एक भी ग्रह उच्चगत मित्रग्रहसे दृष्ट हो तो बहुत धन सहित मित्रमंडलीसे संपन्न राजा होताहै शत्रुनीच राशियोंमें पापग्रह धनरहित सुखरहित बंधनसे संतप्त मरण अरिष्ट सहित करतेहैं ॥ ५॥ शुभं वर्गोत्तमे जन्म वेशिस्थाने च सदूहे॥अशून्येषु च केन्द्रेषु कारकाख्यग्रहेषु च ॥ ६॥ हित्वाकै सुनफानफादुरुधराः स्वा- न्त्योभयस्थैग्रहैः शीतांशो: कथितोऽ न्यथा तु बहुभिः केम-

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भाषाटीकासहित:। (१६१ ) द्रुमोऽन्यैस्त्वसौ ॥ केन्द्रे शीतकरेऽथ वा ग्रहयुते केमद्रुमो नेष्यते केचित्केन्द्रनवांशकेष्वपि वदंत्युक्तिप्रसिद्धा न ते ॥७॥ सौम्ये स्मरारिनिघनेष्वधियोग इन्दोस्तस्मिश्व भूपसचिवक्षितिपाल- जन्म ॥ संपन्नसौरुपविभवा हतशत्रवश्च दीर्घायुषो विगतरोगभ- याश्च जाताः ॥।८। वर्गोत्तम लग्नमें जन्म शुभ होताहै शुभग्रह वेशिस्थान (सूर्यसे १२) में तथा कारकग्रहमें भी जन्म शुभ होताहै परंतु केन्द्र शून्य ( ग्रहरहित ) न हों॥। ६ ॥ सूर्यसे १२ में वेशि २ में वो दोनोंमें ग्रह होनेसे उभयचारी होताहै, तैसेही सूर्यको छोडकर चंद्रमासे दूसरा कोई ग्रह होवै तो सुनफा, १२ में होवै तो अनफा होताहै, यदि दोनों भावोंमें हों तो दुरुधरा होताहै इनमेंसे कोइ भी न होवे तो केमद्रुम योग होताहै, अन्य आचार्य चंद्रमा केंद्रमें होनेसे अथवा किसी ग्रह सहित होनेसे केमद्रुमभंग होना कहतेहैं, कोई केन्द्रनवांश- कमें होनेसेभी ऐसा कहतेहैं परन्तु यह बात उक्तिसे प्रसिद्ध नहींहै।। ७। चन्द्रमासे ७।६।८ । भावोंमें ग्रह होवें तो अधियोग होताहै इसका फल होके सुखबिभवसे संपन्न, शत्रुरहित, दीर्घायु, नीरोग, निर्भय, सेनापति, मंत्री और राजा होतेहैं, इसमें यह कम मानते हैं कि चन्द्रमासे ६। ७।८। मेंसे एक भावमें ग्रहहो तो सेनानायक दोमें हो तो मंत्री तीनोंमें हो तो राजा होता है ॥ ८॥ लग्ने चन्द्रे गुरौ सौख्ये कर्मस्थे भृगुनन्दने॥ स्वोच्चस्व्क्षस्थिते मन्दे नृपतुल्यो भवेन्नरः ॥ ९॥ दशमैकादशे रिष्फलग्रवित्तसहो- त्थभे॥ ग्रहास्तिष्ठृंति चेत्सौम्या नृपतुल्यो भवेन्नरः॥ १०॥ केन्द्रत्रिकोणगाः सौम्या पापाः षड्लाभसोदराः॥ लग्नाधिपे बलवति नृपतुल्यो भवेन्नरः ॥११॥ दृश्यते युज्यते वापि चन्द्र- जेन बृहस्पतिः॥ शिरसा शासनं तस्य धारयंति नृपास्तदा ॥१२॥ चंद्रमा लग्नमें वृहस्पति चतुर्थमें शुक दशमभावमें हो और अपने उच्च वा अपनी राशिमें होवे तो मनुष्य राजाके तुल्य होवै॥ ९ ॥ दशमभावसे लेकर तीसरे पर्यत शुभग्रह सभी होवैं तो मनुष्य राजाके समान होवै॥ १० ॥ शुभग्रह केन्द्र त्रिकोणोंमें पापग्रह ६।११ । ३ में हों औौर लग्नेश बलवान् होवै तो मनुष्य राजतुल्य होवै।। ११ ॥ वृहरपतिको बुष देखे वा युक्त होवै तो उस मनुष्यकी आज्ञाको राजालोग शिरमें धारण करें॥ १२॥ नीचस्थितो जन्मानि यो ग्रहः स्यात्तद्राशिनाथोथ तदुचनाथः॥स चेद्दिलग्राद्यदि केन्द्रवर्ती राजाभवेद्धार्मिक चक्रवर्ती ।।१३॥ नि-

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(१६२ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

शाकरे केन्द्रगते विलयं त्यक्त्वा त्रिकोणे यदि जीवहष्ट।। शुक्केण दृष्टे बलपूर्णयुक्ते जातो नरो भूपतितुल्यभाग्यः ॥ १४॥ नीच- स्थिता जन्मनि ये ग्रहेन्द्राः स्वोच्चांशगा राजसमानभाग्याः।। उच्चस्थिता चेदपि नीचभागा ग्रहा न कुर्वैति तथैव भाग्यम्॥१५॥ जो ग्रह जन्ममें नीचका है उसके उच्चराशिका स्वामी अथवा जिस राशिमें बैठा है उसका स्वामी लग्नसे केन्द्रमें होवै तो धार्मिक तथा चक्रवर्ती राजा होवै॥ १३ ॥ चन्द्रमा लग्न छोडके केंद्रमें होवै अथवा त्रिकोणमें होवै उसे बृहस्पति देखे अथवा शुकसे दृष्ट होवै पूर्णबळी होवै तो मनुष्य राजाके ऐश्वर्यके बराबर ऐश्वर्यवाला होवै ॥ १४ ॥ जो ग्रह नन्ममें नीचके हों वह अपने उच्चांशकोंमें होवैं तो राजाओंके समान ऐश्वर्यवाले होवैं जो ग्रह उच्चराशियोंमें हों वह नीचांशकोंमें होवे तो वै ग्रह वैसा ऐश्वर्य नहींकर सकते॥१५॥ ग्रहा बलाढ्या यदि पूर्वपङ्ध स्वोच्चस्थिता: पूर्वदले नृपः स्यात्॥ तद्यत्ययं पश्चिमभाग्यायुक्ता मिश्रस्थिताश्रेदुभयत्र भाग्यम्॥ । १६॥ त्रेधा विभज्यं तु वयःप्रमाणं खण्डत्रयं तत्र वदन्ति संतः ॥ व्ययादिकं प्राथमिके च खण्डे शुभग्रहाः शोभनमत्र दद्युः॥ १७॥ खण्डे द्वितीये बहवश्च सौम्यास्तथैव सौख्य तु तृतीयखण्डे॥ खण्डे तु यस्मिन्बहवश्च पापा नीचांशगा मूढस- मान्वितास्तु॥ १८॥ दुःखं भवेत्तत्र विशेषतस्तु राज्यात्पदभं- शमुदाहरन्ति ॥ एवं भवेच्छोभनखचरेन्द्रैः खण्डान्वितैःशोभन- कालमाहुः॥१९॥ बलवान् ग्रह यदि पूर्वषट्ट (उग्नसे छठे भावपर्यन्त) में होवैं तो या युके पूर्वदलमें और पश्चिमषट्क (७ से १२ केभीतर) होवैं तो उमरके उत्तरदलमें, दोनों घट्कोंमें होवें तो दोनहूं दलोंमें, ऐश्वर्य होवै॥। १६ ॥ आयुके माणका तीन भाग करना इनको ज्योतिषज्ञ तीन खंडकहतेहैं ऐसेही १२ भावोके ३ खंड जानने पथम दूसरे तथा तीसरे खंडमें जहां शुभग्रह हों उस खंडमें सुख ऐश्वर्य देतेहैं जिस खंडमें बहुत पाप हो अंथवा नीचांशके वा अस्तंगत ग्रह हों तो उमरके उस खंडमें दुःख होताहै विशेषकरके राज्यसे पदच्युति होनी कहतेहैं ऐसेही शुभग्रहोंसे वह उमरका खंड शुभ कहतेहैं ॥। १७। १८। १९ ।। लग्ने गुरौ बुधे केन्द्रे भाग्यनाथेन वीक्षिते॥ लग्रेशे वापि सँ- दृष्टे नृपतुल्यो भवेन्नरः ॥ २०॥ सप्मे जीवसंयुक्ते त्रिकोणे वा

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आापाटीकासहित:। (१६३ ) समन्विते॥ लग्नाधिपेन संदृष्टे नृपतुल्यो भवेन्नरः॥२१॥ केन्द्रे शनौ त्रिकोणे वा स्वोच्चमूलत्रिकोणगे । राज्याधिपेन संदष्टे नृपमानसमन्वितः॥२२ ।कर्मेशे रन्ध्रभावस्थे स्वोच्चमित्रांश- संयुते॥ पारावतांशक वापि राजराजो भवेत्ररः॥२३॥। लग्नमें बृहस्पति बुध केंद्रमें भाग्येशसे दृष्ट और लग्नेशसेभी दृष्ट होवे तो मनुष्य राजाके तुल्य होवै॥ २० ॥ बृहस्पति सप्ममें वा त्रिकोणमें होवै लग्नेशसे दृष्ट होवै तो वही फल होगा॥ २१॥ अपने उच्च वा मूछत्रिकोणका शनि केन्द्र वा त्रिकोणमें होवे दशमेश उसे देखे तो राजमानसे युक्तरहे॥ २२ ॥ दशमेश अष्टममें उच्चका वा मित्रांशका होवै अथवा पारावतांशमें होवे तो राजराज होवै ॥ २३॥ नीचे गुरौ विलग्नस्थे रन्ध्रस्थे वाथ धर्मपे॥ तथाविधांशसंयुक्त राजराजो भवेत्रः॥ २४॥ गुरौ व्यये शनौ लाभे रवौ वा विक्र माधिपे॥ गुरौ व्यये विलग्नेशे राजराजो भवेन्नरः ॥२५॥पंचमे जीवसंयुक्ते चन्द्रे केन्द्रे बृहस्पतौ। स्थिरलग्ने तदीशेतु राज्यस्थे नृपतिर्भैवेत् ॥२६॥ पूर्वषट्वें ग्रहाः सवे यस्य तिष्ठति ज- न्मनि॥ भाग्याधिपे धनस्थे वा सचन्द्रे नृपतिर्भवेत् ॥२७॥ नीचराशिका बृहस्पति लम्न अथवा अष्टमभावमें होवै और नवमेश पारावताशमें होवे तो राजराज (राजाओंका राजावा कुबेरसम) होवे ॥ २४ ॥ बारहवें बृहस्पति ग्यारहवें शन्दि वा सूर्य होवै तृतीयेश बृहस्पति होवे लग्नेश बारहवें होवै तो गनराज होवै ॥ २५ ॥ पंचम भावमें वा केन्द्रमें बृहस्पति सहित चन्द्रमा होवे उनमें स्थिरराशि लग्नेश राज्यस्थानमें होवे तो राजा होवै॥ २६ ॥ जिसके समस्त ग्रह लग्नसे छठे भाव पर्यन्त हों अथवा भाग्येश धनस्थानमें चन्द्रमासहित होवे तो राजा होवे ॥ ७ ॥ चन्द्राधिष्टितराश्यंशनाथे केन्द्रायकोणगे॥ बुधात्केंद्रगते वापि राजराजो भवेन्नरः ॥ २८॥ निशाकरः सभौमस्तु वित्त वा ि- क्रमेपि वा । पंचमे राहुसंयुक्त राजराजो भवेन्नरः॥२९॥भा- ग्याधिपसमायुक्तनवांशाधिपतौ सुखे॥ पुत्रस्थानगते वापि नृप- श्रेष्ठो भवेन्नरः ॥ ३० ॥ चन्द्र जिसकी राशि वा नवांशकमें है वह बेन्द्र लाभ वा त्रिकोणमें होवे अथवा बुधसे केन्द्रमें होवे तो मनुष्य राजाओकाभी राजा होवै॥ २८ ॥ चंद्रमा मंगलयुक्

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(१६४ ) सर्वार्थचिन्तामणिः। दूसरे वा तीसरे भावमें होवै राहु पंचममें होवै तो राजराज होवै ॥ २९ ॥ नवमेश जिसके नवांशकमें है वह चतुर्थभावमें होवै अथवा पंचममें होवै तो राजाओोंमें श्रेष्ठ होवै ॥ ३० ॥ क्रूरे सकर्मभावेशे ग्रहास्तिष्ठंति चेत्क्रमात्।। लग्नादिपूर्वषट्केस्मि- न् राजराजो भवेन्नरः ॥ ३१॥ लग्ने चरे तदीशेपि चरराश्यंश- कान्विते ॥ भाग्येश चरराशिस्थे भूमिपालोऽन्यदेशगः॥ ॥ ३२।। राजयोगादिसंजाते तथा वाच्योऽन्यथा न हि॥ उत्तमांशगते चन्द्रे गुरौ नीचांशवर्जिते ॥ ३३॥ शुभषष्टयंशके सूर्ये नृपतुल्यो भवेन्नरः ॥ त्रयो वा द्वौ खगौ वापि चत्वारो नीच- संयुताः ॥ ३४॥ शुभषष्टयंशसंयुक्ताः स्वोच्चांशे वा धरापतिः॥ ॥ ३५॥ नीचास्थितांशनाथस्तु खेट: केन्द्रत्रिकोणगः ॥ चरलग्ने तदीशे तु चरांशादौ नृपो भवेत् ॥३६॥ दशमेश पापयुक्त होवै और लग्नसे छठे भावपर्यत कमसे ग्रह होवें तो राजराज होवै।। ३१ ।। लग्नमें चरराशि हो लग्नेश चरराशि चरांशकमें होवै भाग्येशभी चर- राशिमें होवै तो परदेशमें जाके राजा होवै॥ ३२ ॥ यह फल जिसके राजयो- गभी हों उसको कहना औरको नहीं, चंद्रमा उत्तमांशमें हो बृहस्पति नीचांशकमें न हो सूर्य गुभषष्टयंश्ञमें होवै तो मनुष्य राजतुल्य होवै, तीन वा दो यद्धा चार ग्रह नीचराशि- योंमें होवे और शुभषष्टचंशोंमें वा अपने उच्चांशकोंमें होवें तो राजा होवै, नीचगत ग्रहका अंशनाथ ग्रह केंद्र त्रिकोणमें होवै लग्नमें चरराशि लग्नेश चरराश चरांशकमें होवै तो राजा होवै॥ ३३॥३४॥३५॥३६॥ माने राहौ भवे मंदे भाग्यनाथेन वीक्षिते।।लग्नेशे नीचखेटेन युते नृपसमो भवेत्॥ ३७ ॥। अंशतो भावतो वापि स्वोच्चमूलत्रिको- णग:॥ राजयोगास्तु निर्दिष्टास्तेषां योगे बहुत्वदाः ॥३८।।इति राजयोगाः ।। दशम राहु लाभमें शाने भाग्येशसे दृष्ट होवै और लग्नेश नीचगत ग्रहसे युक्त होवै तो राजतुल्य होवै।। ३७ ॥ अंशसे भावसे ग्रह अपने उच्च वा मूळत्रिकोणमें हो तो भी राजयोग होताहै।। उक्त राजयोगोंमें ऐखा झोनेसे विशेषतर राजयोग होताहै. ॥ ३८ ॥ इति राजयोगा:।।

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भाषाटीकासहित:। (१६५ ) अथ जातकभंगयोगा:। जीवे सकेतौ यदि वा सराहौ चाण्डालता पापनिरीक्षिते चेतु। नीचांशके नीचसमन्विते वा जीवे द्विजश्रेदपि तादशः स्यात्॥ । १ ॥ ध्वजाहिमन्दैः सहितेंद्रपूज्ये शुक्ेक्षिते वा शशिसूनुद्दष्टे॥ शूद्रोपि चेद्विप्रसमानमेति विद्यां च सर्वामधिगम्य जातः॥२॥ बृहस्पति केतु वा राहु सहित और पापदृष्ट होवै तो बह मनुष्य चाण्डालताको माप्त होवै वह बृहस्पति नोचराशि वा नीचांशकमें होवे तो ब्राह्मणभी हो तो भी चाण्डाळ होजावै॥ १ ॥ केतु राद्ु और शनिसे युक्त बृहस्पतिको शुक्र वा बुध देखें तो शूदभी हो तो भी मनुष्य समस्त विद्या जानकर ब्राह्मणके समानताको माप्त होताहै ॥ २ ॥ मेषे शशांके रविसूनुदृष्टे भिक्षाशनी भूमिसुतेन हष्टे॥ निःश्री- र्विलग्नस्य निशाकरस्य लुब्धो दिनेशात्मजदृष्टियोगात्॥३॥ शुभग्रहाणामवलोकनेन हीनाद्भवेत्तत्र समन्विताद्वा॥ तत्काल- होराधिपतौ घराजे केंद्रे शनौ चद्दि वा विलग्ने॥४॥ शुभग्र हाणामवलोकहीने दासस्तु भिक्षाशनदेहशीलः॥५॥ मेषका चंद्रमा शनिसे दृष्ट होवै तो भिक्षा मांगके खावै मंगलस दृष्ट होवै तो लक्ष्मीरहित होवै लग्न चंद्रमाके शनिसे युक्त वा दृष्ट होनेसे लुब्घ (नित्य तृष्णायुक्त) रहे॥ ३ ॥ यह फल शुभग्रहोंके योग दृष्टि रहित होनेमें होताहै तत्काल लग्नका स्वामी मंगलमें केन्द्रमें हो अथवा शनि लग्नमें होवै ॥ ४ ॥ शुभग्रह उसे न देखें तो पराया दास होवै और भिक्षाके अन्नसे देहधारणकरे ॥ ५॥ पापमध्यगते चन्द्रे सतमे मन्दसंयुते॥ श्वासक्षयप्ीहगुल्मविद्रधिं भजते नरः॥ ६॥ वेशौ समन्दे दशमे सचन्द्रे वैकल्यमङ्गे क्षि- तिजे कलत्रे। परस्परक्षेत्रनवांशयुक्तौ शशाङ्गसूर्यो तनुशोषणं स्यात् ॥ ७॥ दिनेशचन्द्रौ रविराशियुक्तौ चन्द्रर्क्षगौ वा यदि शोषणं स्यात्॥ रन्धारिवित्तांत्यगता ग्रहेन्द्रा दिनेशचन्द्रारयमाः कमेण ॥ ८॥ कुर्वन्ति जातं नयनेन हीनं तद्धातुकोपाद्लसं- युतस्य॥। लग्ने गुरौ भूमिसुते कलत्रे उन्मादभाक् तत्र नरो हि जातः ॥ ९॥

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(१६६ ) सर्वार्थचिन्तामणि:।

चन्द्रमा पापग्रहोंके बीचमें हो शनि सप्तम भावमें होवै तो श्रवास, क्षय, प्रीह्, गुल्म, विदधि रोमसे मनुष्य पीड़ित रहे ।। ६ ॥ सूर्यसे दूसरे (वेशि) स्थानमें शनि दशममें चन्द्रमा और मंगलसप्ममें होवै तो अंगविकल होवैं। चन्द्रमा सूर्य अन्योन्य राशि नवांश कोंमें होवें तो शरीरक्ेश रहे।। ७ ॥ सूर्य चन्द्रमा सूर्यकी राशिमें वा चन्द्रराशिमें होवे तो शरीर सूख जावै, अष्टममें सूर्य, छठे चन्द्रमा, दूसरे मंगल, बारहवें शनि कमसे होंदें तो । ८ ।। मनुष्यको बलवान् ग्रहके धातुके कोपसे नेत्रहीन करतेहैं। लग्नमें बृहस्पति सपममें मङ्गल होवै तो मनुष्य उन्मादी (विक्षिप्त) होताहै॥ ९ ॥ उन्मादयुग्भ्रंशयुतो विलये शनौ कलत्े सकुजे त्रिकोणे॥ लगने शनौ रिष्फगते दिनेशे चन्द्रे त्रिकोणे यदि वा धराजे॥ १०॥ उन्मादबुद्धि: सजडोथ वा स्याजजातो हि चेचञ्चलबुद्धियुक्तः॥ लझने त्रिकोणे दिननाथचन्द्रौ सौर्य्ये गुरौ केन्द्रसमन्विते वा॥ ।। ११॥ उन्मादबुद्धि: स भवेत्तदानीं शन्यारवारो यदि जन्म काले ॥ केंद्रस्थितौ सौम्यनिशाकरौ वा सौम्यांशहीनौ भ्रमसं- युतः स्यात् ॥ १२॥ लन्नमें शनि सप्तममें मंगल हो अथवा त्रिकोणमें होवै तो उन्मादी ( बावला) अथवा स्खळित वाणी होवै, लन्नंमें शनि बारहवें सूर्य और त्रिकोण ५/९ में चन्द्रमा अथवा मंगल होवै॥ १० ॥ तो उन्मादबुद्धि अथवा जड (मूर्ख) यद्ा मनुष्य चंचल बुद्धिवाला होवे ळग्न वा त्रिकोणमें सूर्य चंद्रमा अथवा शनि बृहस्पति केन्द्रमें होवै॥ ११ ॥ और जन्म- कालमें शनि वा मंगलवार होवै तो वह मनुष्य उन्मादबुद्धि होवै वा यदि केंद्रमें बुध चंद्रमा शुभांशरहित होवे तो भ्रमसंयुक्त होवै ॥ १२ ॥ केन्द्रस्थिता मन्दनिशाकरार्का जडो भवेदन्यवसूपभोक्ता।। भाग्येश्वरे रिष्फगते तदीशे वित्तस्थिते भ्रातृगतैश्च पापैः॥१३॥ केमद्रुमेस्मिन्स भवेत्कुभोजी दुष्कर्मयुक्तोन्यकलत्रगामी। १४॥ शनि चंद्रमा सूर्य केन्द्रमें होवैं तो दूसरेका द्रव्य खानेवाला मूर्ख होवै। भाग्येश बारहवें व्ययेश धनस्थानमें और तृतीय स्थानमें पापग्रह हों ऐसे केमद्रुम योगमें मनुष्य कुभाजी (निकम्मे अन्नादि खानेवाला) दुष्टकर्मोंसे युक्त परस्त्रीगमन करनेवाला होवै ॥ १३ ॥१४॥ नीचे विलग्नाधिपतौ तदंशे षष्ठाष्टमस्थैर्यदि पापखेटैः॥ १५॥ मांदौ विलग्े कुलनाशकः स्यादल्पायुराहुः शुभदृष्टिहीनैः॥ सर्वग्रहैर्नीचसपत्नभोगैः कर्मान्यगैर्भिक्षक एव जातः ॥१६॥

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भावाटीकासहित:। (१६७ ) लसेश नीचराशि नीचांशकमें होवै पापग्रह छठे आठवें होवै मांदि लग्नमें होवै तो अपने कुलफा नाशकरनेवाला होवे उक्त ग्रहोंपर शुभग्रहद्ृष्टि न होवे तो अल्पायु कहतेहैं। समस्त ग्रह नीच शत्रुराशियोंमें दशम स्थान रहित होवें तो मनुष्य भिक्षुक होवै ॥ १५ ॥१६ ॥ होरेश्वरे रिष्फगते तु माने क्रूरान्विते भौमयुते शशांके॥ जातो- भिशस्तः परदेशवासी भिक्षाशनी दुःखितदेहभाक्स्यात्॥१७। वृष्ठाष्टमे भानुसुते सभौमे जातोप्यपस्मारयुतो नरः स्यात्॥ पापग्रहाः षड्व्ययरंध्रभेषु जीवे परिध्यान्वितकेन्द्रगे वा ॥१८॥ रन्धस्थिता: पापखगाश्च सर्वे निशाकराच्छौ यदि केन्द्रयुक्तौ।। योगे गदाख्ये सभवेत्तदानीं जातोप्यपस्मारयुतः सुतप्तः।१९। लग्नेश बारहवें दशम स्थानमें पापग्रह चन्द्रमा मंगलयुक्त होवे तो मनुष्य झूठे कलंकवाल पर देशमें रहनेवाला मिक्षा मांगके खानेवाला और दुःखी शरीरवाला होवै ॥१७॥ शनि मंग- लंसहित छठे ा आठवें भावमें हो तो मनुष्य अपस्मार (मृगीरोग) वाला होवै पापग्रह ६। १२ । ८ भावोंमें हों बृहस्पति परिधि (शौंडल) वाला जन्ममें अथवा केन्द्रमें होवै तोभी वही फल होगा॥ १८ ॥ सभी पापग्रह आठवें भावमें हों चंद्रमा शुक केन्द्रमें ऐसे गदायो- गमें मनुष्य अपस्मारी होताहै आश्रयोक्त गदायोग 'आसन्नकेन्द्रदयवाला' यहां नहीं है उत्तयो- गकी गदा संज्ञा रखदी है इसमें मनुष्य संतप्तभी रहताहै ॥ १९ ॥ समन्विताः सौम्यशशांकशुका: केन्द्रस्थिता भोगिपतौ विलग्रे।। चंडालयोग: स भवेत्तदानीं जातो निजाचारसुकर्महीनः॥२०॥ जातः परिभ्रंशसमन्वितः स्याच्छुभैरन युक्ता यदि दृष्टिहीनाः।माने स्थिता वा यदि वित्तराशौ पापास्तथा देवगुरौ च हीने॥२१॥ बुध चंद्रमा शुक् एकसाथ केन्द्रमें हो राहु लग्नमें होवै यह चंडालयोग होताहै इसमें उत्पन्न मनुष्य अपने कुलाचार एवं सत्कर्मसे हीन होताहै॥ २० ॥ पापग्रह दशममें वा द्वितीय स्थानमें शुमग्रहोंके योग एवं दृष्टिसे रहित होवैं और बृहस्पति नीच मूढ दुष्ट षष्टचंशादियोंमें होवै तो वाणी स्खलित बोले यद्ा धर्मादिकार्यसे च्युत होवै ॥ २१ ॥ भाग्येश्वरे चांशगते सपापे जन्मोदयेशे रविगे कुलन्नः ॥ विन- षपुत्रार्थकलत्रभाक्स्याच्छमैर्न युक्तौ यदि वीक्षितौ वा ॥ २२ ॥ शुभाशुभैः केन्द्रगतैः शशांको लग्नेश्वरेणापि निरीक्षितश्चेत ॥ सौरांशके वा यदि संयुतश्वेज्नातः कुलध्वंसकरो विदारः॥२३॥

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(१६८) सर्वार्थचिन्तामणिः।

गृहात्परिभ्रष्टविदारपुत्रो गुणेन हीनो यदि वा जडोऽसौ॥ केन्द्र शनौ लग्नगते शशांके जीवे व्यये भिक्षुक एव जातः ॥२४॥ नवमेश पापयुक्त व्ययस्थानमें हो लग्नेश अस्तंगत होवै तो कुलका नाश करनेवाला होवै यदि शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट भी न हो तो उसके स्त्री पुत्र धन नष्ट हेवैं ॥ २२ ॥ केन्द्रोंमें शुभ पाप सभी हों चन्द्रमाको लग्नेश देखे तथा शनिके अंशकमें वा'शनिसे युक्त हेव तो स्त्रीरहित होवै तथा कुलका विध्वंस करे । २३ ॥ शनि केन्द्रमें चन्द्रमा लग्नमें बृहस्पति बारहवें होवै तो अपने घरसे स्त्री पुत्रोसे गुणोंसे रहित होवै अथवा मूर्ख होवै और भिक्षा मांगनेवाला होवे ॥ २४॥ चन्द्रात्सुतेथें यदि लग्ननाथे रंध्रस्थितैः सौम्यखगेतरैर्वा॥ मान- स्थिते रात्रिकरे तदानीं जातस्तु जीवत्यतिहेयवृत्त्या॥ २५॥ लग्नाधिपान्मृत्युरिपुव्ययस्थैः पापैर्हि जातो जनिभूमिभ्रष्टः॥नी- चारिभांशे यदि देवपूज्ये तदंशके वासरनाथपुत्रे॥ २६॥जातो- ति दुःखी सुतदारहीनः कृच्छ्रादसौ जीवति भाग्यहीनः॥ उच्च- स्थिते वासरनायके तु नीचांशयुक्ते यदि राजपुत्रः।२७॥पप्ोति नीचत्वमिनोदये स्यात्पापेक्षिते वा यदि निश्चितार्थः ॥२८॥ चंद्रमासे पंचम वा दूसरे लग्नेश हो अथवा अष्टममें पापग्रह हों दश्ममें चन्द्रमा होवै तो मनुष्य अतिनिंद्य त्याज्यवृत्तिसे आजीवन करे।। २५ ॥ लगेशसे ८।६।१२ भावोंमें पापग्रह होवें तो जन्मभूमिसे भ्रष्ट होवै यदि बृहस्पति नीच शत्रु अंशकमें होवै और शनि वृहस्पतिके अंशमें होवे तो मनुष्य अतिदुःखी स्त्री पुत्र रहित भाग्यहीन होवें बडी कठि नतासे आजीवन करे सूर्य उच्चका होवै परंतु नीचांशका होवै तो राजपुत्र हो तो भी नीचता को माप्त होवै इस योगमें यदिवा पापदृष्ट सूर्य लग्नमें होवै तो वह फल निश्चयही होगा२६/२७।२८।। तुलायां दशमे भागे स्थितः पंकजबोधनः॥ सहस्रराजयोगानां फलं नीचत्वमामुयात् ॥२९॥ भृगोः पुत्रोपि नीचस्थो राज- योगविनाशदः॥ उल्कापाताद्यप्रकाशे ग्रहे जातोपि भंगग:।।३।। सूर्य तुलाके दशवें अंशमें अर्थात् परमनीचांशकमें होवै तो हजार राजयोग हुयेमें भी नीचता पावै॥ २९॥ शुक्रभी नीचका होनेसे राजयोगका नाशक होताहै। तथा जन्म- समयमें उल्कापातादियोंसे अपकाश होनेमें वा ग्रहोंके मकाशावस्था वा उदयता न होनेमें भी राजयोग भंग होतेहैं ॥ ३० ॥

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भाषाटीकासहित:। (१६९ ) नीचे भृगौ मन्दनवांशके वा व्ययस्थिते चन्द्ररवी कलते।। निरीक्षितौ भानुसुतेन चात्र जातः परश्रैष्यस्ुपैति नित्यम्॥३१॥ क्षीणे शशांके भृगुजे कलत्रे लगे शनौ भ्रंशदशान्वितः स्यात्॥ लग्ने शनौ कर्मगते शशांके शुकेक्षिते वा यदि बंधभोक्ता॥३२।। शुक नीचका वा शनिके नवांशकमें बारहवें होवे चन्द्रमा सूर्य सप्तमभावमें शनिसे दृष्ट होवै तो मनुष्य सर्व पराई आज्ञा करनेवाला दूत होवै॥ ३१ ॥ चन्द्रमा क्षीण होवै शुक्र सप्तममें लग्नमें शनि होवै तो फटे टूटे वख् पहिने, लग्नमें शनि दशममें चंद्रमा शुकसे दृष्ट होवै तो बंधनका भोगनेवाला होवै॥ ३२ ॥ चन्द्रे व्यये वा यदि वा दिनेशे मन्दे त्रिकोणे मदरन्ध्रभेके॥ मन्दाक्षिरोगी स भवेत्तदानी नीचारिशत्वंशगतास्तथैव।। ३३।। सुताम्बुगौ पापखगौ विशेषाच्चंद्रेष्टरिष्फारिगतेंडघता स्यात्॥ शुभग्रहाणामवलोकहीने त्वन्धो भवत्येव शुभैर्न दोषः ।। ३४ ॥ बारहवें चंद्रमा वा सूर्य त्रिकोण ९/५ में शनि ७८ में सूर्य होवै तो मंददृष्टि नेत्र- रोगी होवै, नीच शत्रु नवांशकमें उक्त ग्रह हों तो भी वही फल होगा॥३३॥ पंचम चतुर्थमें पापग्रह हों विशेषतः चंद्रमा ८।१२ स्थानमें होवे तो अंधा होवै इनग्रहोंपर पापदृष्टि होवे तो अंधा होवै शुभग्रहदृष्टि होनेमें दोष नहीं॥ ३४ ॥ माने शशांके सबुधे कलन्ने शनौ द्वितीये विकलांगमेति॥ जाति- च्युतिर्नीच सपत्नभागसमन्वितास्तेपि विनिश्चितार्थः॥३५॥ निशाकरे कामुकमध्यभागमृगांशकर्कीवृषभागयुक्ते । मंदा- रयुक्ते तद्वेक्षणे वा कुष्ठी भवेत्सौम्यदशा विहीने॥ ३६॥ दशममें चंद्रमा सप्तममें बुध दूसरे शनि होवै तो अंगकला रहित होवै यदि उक्तग्रह नीच शत्रु राशि अंशकोंमें भी होवैं तो निश्चय अपनी जातिसे पतित होवै॥ ३५ ॥ चंद्रमा धनके मध्य अर्थात् पांचवें नवांशकमें शनि मंगळसे युक्त वा दृष्ट होवे तो कुष्ठी होवै अथवा चंद्रमा किसी राशिमें मकर कर्क वृषांशकमें शनि मंगलसे युक्त वा दृष्ट होवै । भी कुष्ठी होताहै परंतु यह योग चन्द्रमापर गुभदृष्टि न होनेमें है यदि शुभग्रह दृष्ट वा युक्तमी हाव तो कुष्ठ नहीं होता तदंग रोग दद्ू चित्रक आदि होतेहैं ॥ ३६ ।। कुलीर कुम्भालिनवांशयुक्ते चंद्रे समांदौ यदि गुल्मरोगी॥ चंद्रे सुखे तद्दवनांशयुक्ते पापान्विते स्याददिजकंठरोगी॥ ३७॥ चंद्रे

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(१७० ) सर्वार्थचिन्तामणः।

सपापे फणिनाथयुक्ते रिष्फे शुभे रन्ध्गते तथापि॥ उन्मादभाक तत्र सरोषता च जातस्तु नित्यं कलहप्रियः स्यात्॥ ३८ ॥ कर्क कुंभ वृश्षिकांशका चंद्रमा राहु केतु सहित होवै तो ( गुल्म ) पेटमें गोलेक़ा रोग होवै यदि वैसाही चंद्रमा चतुर्थ होवै और पापयुक्त होवै तो दांत तथा कंठमें रोग होताहै॥ ३७ ॥ चंद्रमा पापयुक्त राहु सहित बारहवें होवै अथवा चंद्रमा सपाप और १२ वें ८ वेमें शुभग्रह होवैं तो मनुष्य उन्मादी (बावळा) होवै और क्रोधी एवं नित्य कलहको प्यारा माननेवाला होवै॥ ३८ ॥ चन्द्रे तु गोकर्कटराशियुक्ते पापान्विते तद्विपरीतयुक्ते॥ उन्म- ण्डलस्थौ शशिभौमसंज्ञौ पापान्वितौ सौम्यदृशा विहीनौ।।३९।। हच्छूलभाग् जातनरस्तु नित्यं तथैव तौ सप्तमराशियुक्तौ।। केन्द्रे शनौ जन्मनि येन दृष्टे जीवे शशांके यदि वा दिनेशे॥४ ॥ विलग्नगे स्याद्यदि भाग्यहीनः प्राप्तार्थचोरो सुनयो वदंति॥४१॥ वृष कर्कका चंद्रमा पाप एवं शत्रुयुत होवै वा चंद्रमा मंगल अस्तंगत पापयुक्त तथा शुभ- दृष्टिवर्नित होबैं॥ ३९ ॥ तो हृदयमें शूल रहे यदि वैसेही चंद्रमा मंगल सप्मस्थानमें हो तो भी वही फल मनुष्यको नित्य होगा शनि केंद्रमें बैठकर लग्नगत बृहस्पति वा चंद्रमा यद्ा सूर्यको देखे ।। ४० ॥ तो मनुष्य भाग्यहीन होगा मिलेहुये धनकांभी चोर होवै ऐसा ज्योतिषज्ञ मुनि कहतेहैं ॥ ४१ ॥ व्यये शुभेशे यदि पापखेटे केन्द्रस्थिते ज्ञानधनादिहीनः॥ परात्रभुग दुःखितदेहभाक् स्याच्छुमैरन दृष्टे कलहप्रियो वा॥।४२।। केन्द्रे गुरौ तज्जनकेन काले न कर्मवेदोक्तमथास्ति नास्ति॥ पितुः सुतो वा यदि वा न कुर्यादूर्ध्वे तु तत्कर्म शुभैर्विहीने॥४ ३॥। नवमेश यदि बारहवें होवै पापग्रह केन्द्रमें होवे तो ज्ञान धन आदिसे हीन रहे उसपर शुभग्रह दृष्टिमी न होवे तो पराया अब्र खानेवाला दुःखित देह अथवा कलहको प्यारा मान- नेवाळा होवै॥। ४२ ॥ बृहस्पति केन्द्रमें होवै तो उसके पिताने समयपर वेदोक्तवर्म (संस्कार) न किये होंगे अर्थात् ब्रात्य होगा अथवा पुत्र पिताका ऊर्ध्वकर्म न करे ऐसा फळ तब होगा जब वृहस्पति शुभग्रह दृष्टि योगरहित हो ॥ ४३ ॥ केन्द्रे शशांके क्षितिसूतुयुक्ते रन्ध्रस्थितो वा यदि कश्विदस्ति॥ संवाहनाद्भीतिमुशंति तज्ज्ञा: सुखस्थिते क्षीणनिशाकरे तु।४४॥

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भाषाटीकासहित:। (१७१ ) रवौ सुखे पापहशा समेते देहोष्णतां सौख्यमथाहुरार्याः॥ रवेः शशांके नवमस्थिते तु जले मृतिस्तस्य पितुश्च वाच्या॥४॥ केन्द्रमें चंद्रमा मंगल सहित हो अथवा अष्टममें हो यद्ा क्षीण चंदमा चौथे होवै और अष्टम भावमें भी कोइ ग्रह होवै तो ज्योतिषज्ञ वाहनसे भय कहतेहैं॥ ४४ ॥ सूर्य चतुर्थ स्थानमें पापदृष्ट होवै तो शरीर गरम रहे तथा श्रेष्ठलोग पित्तधातु गवल रहनेसे नीरोग सुखी भी कहतेहैं सूर्यसे चन्द्रमा नवमस्थानमें होवै तो उसके पिताकी मृत्यु जलमें फहनी ॥४५॥ पापेक्षितौ चंद्ररवी झषस्थौ जले मृतिस्तस्य पितुश्च वाच्या॥ कुजाहियुक्ते दिवसेशपुत्रे सुखे शनौ वा भयमस्य वाच्यम्॥४६॥। नीचे भृगौ धर्मगते सपापे द्विजप्रहर्ता यदि पापदष्टे।। विकर्णता- मेति फणीन्द्रयुक्ते माने तदा भौमयुते शिशुघ्ः॥४७॥ चन्द्रमा सूर्य मौन राशिमें पापदष्ट हों तो उसके पिताकी मृत्यु जलमें कहनी यदि शनि मंगल राहुसे युक्त होवै अथवा शनि चौथे होवै तो जातकको जलकी भय कहनी॥४६।। धर्म स्थानमें नीचराशिका शुक पापयुक्त होवै उसे पापग्रह देखे तो ब्राह्मणको मारनेवाला होवै यदि राधुसहित होवै तो कानोसे रहित होवै यदि दशमस्थानमें मंगलयुक्त होवे तो बालकोंको मारने वाला होवै॥। ४७ ॥ नीचे गुरौ वासरनायके वा केन्द्रस्थिते पापयुते शिशुघः॥ केंद्रे सपापे शुभदृष्टियुक्ते रन्ध्रे भृगौ गोमृगजातिहन्ता॥४८॥ श- शांकसौम्यौ दशमस्थितौ वा पापेक्षितौ पापसमागमौ वा॥ नीचांशगौ सौम्यदशा विहीनौजातस्तु नित्यं खलु पक्षिहंता।।४९।। वृहस्पति अथवा सूर्य नीचराशिका केन्द्रमें पापयुक्त होवे तो बालघाती होवै शुक केंद्रमें पापयुक्त शुभदृष्ट होवै अथवा अष्टममें होवै तो गवय आदि मृगजातिका मारनेवाला होवै ।४८। चंद्रमा बुध पापयुक्त वा दृष्ट दशमस्थानमें होवें अथवा नीचांशकोंमें गुभदृष्टि रहित होवै तो निश्चय सर्वदा पक्षियोंका मारनेवाला होवे ॥ ४९॥ रन्ध्रे गुरौ नीचसमन्विते वा गलांतमृत्युं प्रवदन्ति तज्ज्ञाः॥चन्द्रे व्यये वा मदने सशुके जातस्य वामं नयनं हिनस्ति॥ ५०॥ रन्धे त्रिकोणे दिवसाधिनाथे जातस्य गेहे शिथिलीभयं स्यात्।। तस्मिञ्छनौ वा यदि वा सकेतौ पतेत्तदानीं कृकलासजातिः॥१॥ भष्टम स्थानमें वृहस्पति नीचका होवे तो गला घुटकर मरण होना ज्योतिपश कडतेहैं चंद्मा व्ययभावमें शुकसहित हो अथवा सप्तममें होवै तो मनुष्यका वामनेत्र हीन होवे

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(१७२ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

। ५० ॥ चंद्रमा त्रिकोणमें सूर्यसहित होवै तो मनुष्यके घरमें शिथिली (जहरीले फीट) की भये होवै उक्तस्थानमें केतुसहित शनि होवे तो उसके घरमें कृकलास ( छिपकलीफ़ी नातिविशेष) पडे ॥ ५१ ॥ कौल्यादिपातित्यमुशंति तज्ज्ञास्तत्रैव राहौ तु कुजे तु कौर्मम्।। तत्र स्थिते सोमसुते तु दंशं शुके तु निद्रायतनं स्तियाश्च ॥५२॥ तत्रैव मंदे पतनं नराणां बलाबलं तत्र वदेद्विचिन्त्य ।। ५३।। उक्तस्थानमें राहु होवै तो उसके घरमें कुत्ता अथवा शूकरसे अपवित्रता होना कहते हैं यदि तहां मंगल होवै तो कछवे पड़ें बुध होवै तो दंश ( वनमक्षिका) पडे। शुक होवै तो स्त्रियोंके शयन आदिसे मलिनता रहे॥ ५२ ॥ तहां शनि होवै तो मनुष्योंके शयन आदिसे मलिनता होवै इसमें बलाबल देखके बुद्धिवलसे न्यूनाधिक्य यद्ा मलिनता पतितता आदि कहनी॥ ५३ ॥ वंध्यास्त्रियाः संगमनं रवौ स्यान्मंदे शशांके भवने समानम्॥ रजस्वलासंगमनं कुजे तु वंध्यांगनासंगमनं चवाच्यम्।५४। बुधे तु वेश्यागमनं मदस्थे हीनांगनासंगमनं वणिग्जा॥ मदे गुरौ ब्राह्मणभार्यया वा भृगौ तु गर्भान्वितभामिनी वा ॥५॥ सपुष्पिणी जातिविहीनिका वा गम्या भवेत्तेन शनिध्वजादैः॥ राहौ मदे गर्भिणिसंगमः स्यात्कृष्णा चकुब्जा शशिना वदंति॥।५६॥ सप्तममें सूर्य होवै तो वांझ स्त्रीका गमन करे चन्द्रमा वा चंद्रमाकी राशि सप्तममें होवे तो समान स्त्रीका गमन करे मंगल होवै तो रजस्वलाका गमन करे तथा वांझ स्त्रीका संगमभी कहना॥ ५४ ॥ बुध होवै तो वेश्या तथा हीन जातिकी स्त्री यद्ा वणिक् सीका गमन करे गुरु होवै तो ब्राह्मणकी स्त्रीसे, शुकसे गर्भवती ख्त्रीका गमन करे।। ५५। श्नि केतु आदिसे रजस्वला वा जातिसे हीन हुई सत्रीका गमन करे, राहु सप्तम होवै तो गर्मिणी चंद्रमासे कृष्णकुवरी आदिसे गमन करे ये फल केवल भावजन्य नहीं है उक्तग्रह नीच शत्रु आदिमें हों तब ये फळहैं अन्यथा होनेमें नहीं हैं ।। ५६॥ सुखस्थितैरीदृशसंगमस्तु वाच्यस्तदा व्योमचरै्वरिशेषात्।। सूर्या- दिभिव्योंमचरैःसुखस्थैर्वाच्या तयो: संगमनस्य शाला॥५७॥ वनं गृहँ शून्यगृहं विहारस्थानं तु देवालयतोयभूमिः॥ हरीशज- स्थानमतीवदुर्गस्थानं तु वा निर्जिततोयभूमिः॥५८॥

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भाषाटीकासहित:। (१७३ )

उक्त संगम सुखस्थानगत ग्रहोंसे भी कहना विशेषतः चतुर्थस्थानगत ग्रहोंसे मैथुनस्थान कहना जैसे सूर्यसे वनमें चन्द्रमासे घरमें मंगलसें शूने घरमें बुधसे विहार स्थान बृहस्पतिसे देवतालय जलाशयभूमि शुकसे विष्णु वा शिवस्थान शनिसे दुर्ग ( किला) वा जीतोहुई जलमाय भूमि मैथुनस्थान कहना ॥५७॥५८॥ केन्द्रे चतुष्के यदि पापयुक्ते जातः पशुनां मिथुनं समेति॥ केन्द्रत्रिके पापयुते यदि स्यात्पश्वादिवन्मैथुनमेति जातः।।५९॥ कृशस्तना भूमिसुते मदस्थे लंवस्तना मंदफणींद्रकेतौ। काठि- न्यतश्रोर्ध्वकुचा रवौ स्याच्छेषग्रहैरुत्तमकोमलांगी॥ ६० ॥ चारों केंद्रोंमे पापग्रह होवें तो मनुष्य पशूके साथ मैथुनकरे यदि तीन केन्द्रोंमें होवैं तो पशुके समान मैथुन करे ।। ५९ ॥ मंगल सप्तम होवे तो त्री कृश स्तनवाली मिले शनि राहु केतुसे लम्बे स्तनवाली सूर्यसे कडे और ऊंचे स्तन अन्यग्रह चंद्मा बुध बृहस्पति शुकसे कोमलांगी उत्तम स्तनादि अंगोंवाली स्त्री होवे ॥ ६० ॥ चन्द्रे कृशांगे परिजीर्णगेहं तस्मिन्बलिष्ठे सुदृढं नवीनम्॥ दुःस्थे यदि स्याच्छनिराहुकेतौ दाहेन तप्ं नियमेन वाच्यम्॥ ।६१॥घनायपौ लग्नपतेस्तु मित्रे धनं तदीयं द्विदेवतार्थमु । ।६२२॥8 चंद्रमा क्षीण होवै तो जीर्ण घर होवै चन्द्रमा बलवान् होनेमें दृढ एवं नवीन होता है यदि शनि राहु केतु दुष्टस्थानोंमें हेवैं तो अभ्नि आदि दाहक वस्तुसे घर संतप्त नियमसे कहना ॥। ६१ ॥ २ । ११ भावोंके स्वामी लग्नेशके मित्र होवैं तो उसका धन देवता एवं ब्राह्मणोके काम भवै॥ ६२ ॥ इति चिंतामणौ प्रोक्तो राजयोगादिनिर्णयः॥ जातभंगादिकं चैव व्यङ्गटेशेन धीमता ॥ ६३ ॥ इति श्रीसवार्थचिन्तामणौ राजयोगजातभङ्गादिनिरूपणो नाम नवमोऽध्याय:।।९।। इतना सर्वार्थचिंतामणिम राजयोगादि तथा जातकके राजयोग भगादिका निर्णय धीमान् व्यंकठेशने कहा ॥। ६३ ॥

निरूपणाध्यायो नवमः ॥ ९॥

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(१७४ ) सर्वार्थचिन्तामणिः। दशमोऽध्यायः॥१०॥

अथारिष्ठाध्यायः। के चिद्योगं प्रशंसन्ति दर्शां केचिद्धदन्ति हि॥ तद्विना चायुषं ज्ञातुं न शक्यं तु मनीषिभि:॥१। त्रिविधाश्चायुषां योगा: स्वल्पायुर्म- ध्यमोत्तमाः॥ द्वान्रिंशत्पूर्वमल्पं स्यात्तदूर्ध्व मध्यमं भवेत्॥ २॥ आसप्ततेस्तदूध्वे तु दीर्घायुरिति संमतम्॥ उत्तमायुः शतादूर्ध्व- मिह शंसन्ति तद्विदः॥३।। आायुके लिये कोई तो योगकी पशंसा करतेहैं कोई दशा कहतेहैं इनके बिना आयु जाननेको मुनियोंका सामर्थ्य नहीं है।। १ ।। इनमें पहिले योगोंका विचार कहतेहैं कि आयुके योग तीन मकारके होतेहैं अल्प मध्यम और उत्तम ३२ वर्षसे पूर्व अल्पायु इसके ऊपर ७० पर्यत मध्यमायु इसके ऊपर दोर्घायु कही है सौसे ऊपर ज्योतिषज्ञ लोक उत्तमायु कहते हैं ॥ २ ॥ ३ ॥ आद्वादशाब्दा ज्ंतू नामायुर्ज्ञातुं न शक्यते।। जपहोमचिकित्साचै- र्बालरक्षां तु कारयेत्॥४॥ पित्रोरदोषैरमृताः केचित्केचिद्धालयहै- रपि॥ अपरे रिष्टयोगाच्च त्रिविधा बालमृत्यवः ॥५॥ जन्मतः प्रबलेनैव बालानां पुष्टिवर्द्धनम् ॥ कथयेदेव शेषं तु तत्तद्यो- गानुरूपतः ॥ ६॥ दशा आदिसे आयु १२ वर्षसे भीतर ज्ञात नहीं होसकती इस अवस्थामें जप हवन (चिकित्सा) वैद्यकसे बालरक्षा करनी चाहिये॥ ४॥ किसी बालककी मृत्यु माताके रोग असंयम. अन्याय पाप आदिसे होतीहै किसीकी बालग्रह पूतना छल छिद्र आदिसे किसीकी वाल्यारिष्टयोगोंसे भी मृत्यु होती है ।। ५। जन्मसे भवल योगोंके अनुसार वाल- कोंके पुष्टि बढानेके उपाय कहने ॥ ६ ॥ अल्पायुर्लग्नपे भानो: शत्रौ मध्ये तु मध्यमम्॥। मित्रे लग्नेश्वरे तस्थ दीर्घमायुरुदाहतम् ॥७॥ अल्पायुर्योगजातस्य विपहाये मृति- स्वदेत्। जातस्य मध्यमे योगे प्रत्यरौ तु मृ्तिंवदेत्॥८॥

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भाषाटीकासहित:। (१७५ ) दीर्घायुयोगजातानां वघभे तु मृति वदेत्॥ जातस्य मध्यमे योगे प्रत्येकं त्रिविधं भवेत्॥ ९॥। जन्मलग्नेश सूर्यका शत्रु होवे तो अल्पायु, सम होवै तो मध्यमायु और मित्र होवै तो दीर्घायु कहीहै॥ ७॥ जिसकी अल्पायु पाई गयी है उसकी मृत्यु विपत् नक्षत्रकी दशामें कहनी मध्यायु योगमें मत्यरिके॥ ८॥ और दीर्घायु उक्त योगवालोंकी वधताराके पाकमें सृत्यु होतीहै उक्त तीन योगोंमें मत्येक ताराके पाककालमें मृत्यु होतीहै॥ ९ ॥ चरस्थिरेति सूत्रेण दीर्घमध्याल्पकायुषः॥ तयोरन्यतमं ज्ञात्वा चायुज्ञीनं प्रचक्षते ॥ १० ॥ अल्पायुरल्पमध्यं तु पूर्णायुस्ति- विधं स्मृतम्।।मध्यमादल्पमध्यं तु पूर्णायुस्त्रिविधं भवेत्॥११॥ दीर्घायुषोल्यमध्यं तु पूर्णायुस्त्रिविधं भवेत्॥ एवं नवविध: प्रोक्त- श्वायुषां तु विनिर्णयः ॥ १२॥ सूत्रपठित जो चर स्थिर द्विस्वभाव हैं इनके अनुसार दीर्घ मध्य और अल्प आयु होती है इनमेंसे यहां किसकी माप्ति है उसका निश्चय करके आयुका ज्ञान कहते हैं॥ १० ॥ इन अल्प मध्य दीर्घ आयुके ३। ३ भेद हैं. कि अल्पायु अल्प मध्य और दीर्घ भेदसे तीन प्रकारकी है, मध्यायु अल्प मध्य पूर्णसे दीर्घायु अल्पमध्य पूर्ण भेदसे ३ प्रकारकी है इस प्रकार आयुका निर्णय नौ ९ मकारका है पत्येक आयुके वर्ष जो पूर्व कहे हैं उनमें भी चर स्थित दिस्वभाव भेदोसे प्रत्येकके तीन तीन भाग होतेहैं ॥ ११ ॥ १२ ॥ पश्चम्यारदशामृत्युं दद्यात्षष्ठीगुरोर्दशा।।शनेश्वतुर्थीमृत्युः स्याद- शाराहोश्च सप्तमी॥ १३॥ विपत्पाकदशा कष्टा प्रत्यरीशदशा तथा॥।वचभेशदशा कष्टा पापा स्यादशुभेक्षिता॥१४॥ नीचारा- तिविभूढस्य विपत्प्रत्यरिनैधनाः॥ दशा दद्युमृतति तस्य पापैर्युक्ता विशेषतः॥१५।। उक्त दशाओंमें मंगलकी दशा पंचमीमें गुरुकी षष्ठीनें शनिकी चतुर्थीमें राहुकी सप्रमीमें मृत्यु देतीहै। १३ ॥ विपत्ताराकी पाकदशा कष्ट देतीहै ऐसे ही मत्यरिके स्वामीकी और वध नक्षत्र स्वामिकी भी कष्ट देतीहै यदि पापटृष्ट होवै॥ १४ ॥ नीचगत शत्रुगत अस्तंगत- की विपव् प्रत्यार निधनदशा मृत्यु देतीहै पापयुक्त होनेसे विशेषफल करतीहै॥ १५ ॥ राशिसंधिषु ये जातास्ते बाला मृतजीवनाः॥पापदृष्टा युता वापि निःसंशयमृतिःस्मृता ॥१६॥ गंडांतेषूद्रवो मर्त्त्यः पितृमातृब- लात्ततः ॥ यदि जीवेत्स्वर्गपालो गजवाजिसमन्वितः ॥१७॥

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(१७६ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

राशिसंधिमें जिनबालकोंका जन्म होता है वै मृतप्राय रहतेहैं यदि पापग्रहोंसे युक दृष्ट होवें तो निःसंदेह मृत्यु होतीहै ॥ १६ ॥ जो मनुष्य गंडांतमें उत्पन्न होताहै वह माता पिता के बल अर्थात् शांत्युपचारादिसे बालक बच जावै तो स्वर्गकाभी पालक अर्थात बडा पराक्रमी हाथी घोडे सहित बडा ऐश्वययुक्त होताहै ॥ १७॥ तृतीयगौ भानुनिशाकरौ वा क्रूरक्षंगौ क्रूरनिरीक्षितौ वा।व्याधि नरस्यापि वदति तज्ज्ञाः स्त्रीवर्षमात्रं त्वतिदुर्लभं तत्॥१८।। चन्द्रात्स्मरे वासरनाथभौमौ कुजोदये वा मरणं दशाहात्॥१९॥ सूर्य चंद्रमा तीसरे अथवा कूर राशिमें वा क्ूर ग्रहोंसे दृष्ट होवें तो ज्योतिषज्ञ उस मनुष्यको रोगयुक्त रहना कहतेहैं यदि कन्या होवै तो उसका जीवित रहना एक वर्षभी दुर्ळभ होवै॥ १८ ॥ यदि चन्द्रसे सप्तम सूर्य मंगल होवे अथवा चंद्रमासे सप्तम सूर्य और लग्नमें मंगल होवै तो दश दिनमें मरण होवै ॥ १९ ॥ उद्द्रेष्काणजा मित्रे यस्य स्यादारुणो ग्रहः॥ क्षीणचंद्रे विल- अ्स्थे सद्यो हरति जीवितम् ॥ २०॥ विलग्नादिपतिर्नीचे नि- धने वार्कसंयुते ॥ कृच्छ्रेण जीवितं विद्यात्मृतप्रायो भविष्यति॥ ॥२१॥आपोक्िमे स्थिता: सर्वे ग्रहाव लविवर्जिताः॥ षण्मासंवा द्विमासं वा तस्यायुः समुदाहतम् ॥२२॥ सप्तमभावमें उद्यदायुध (मेषका प्रथम, मिथुनका दूसरा, सिंहका प्रथम, तुलाका दूसरा, कुंभका प्रथम,) द्रेष्काणका पापग्रह हो और चन्द्रमा लगमें होवै तो तत्काल बालक मरजावै ॥ २० ॥ लग्नेश नीचका होवै अथवा सूर्यके साथ अष्टममें होवै तो बडी कठिनताखे बचे मरेकें सदृश रहे।। २१॥ आपोक्किम ३। ६। ९। १२ भावोंमें सभी ग्रह बलहीन होवैं तो ६ महीने अथवा २ ही महीने उसकी आयु होवै ॥ २२ ॥ केतोरुदय: पूर्वें पश्चादुल्काग्निपवननिर्धाताः॥ रौद्रे सति मौहूर्त्ते प्राणैः संत्यज्यते जंतुः ॥२३॥ ग्रहणं परिवेषकाले जात: पा- पान्विते विलग्नस्थे ॥। लग्नेशे बलहीने जीवति पक्षत्रयं त्रिमासं वा ॥ २४ ॥ अंशाधिपतिर्जन्मपतिर्लग्नपतिश्वास्तमुपगता य- स्य।।जन्मावसानमरणं तस्य भवेत्कतिपयाहेन॥ २८॥ संधि चतुष्टयकाले जातो मृत्युं समादिशेत्तज्ज्ञः ॥ पापयुते वा दऐे शीघं सौम्यैरदष्टयुते ॥ २६्॥

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भाषाटीकासहित:। (१७७ ) जिसके जन्ममें पूर्वमें फेतुका उदय, पश्चिममें उल्कापात अभनि वायुके निर्वात शब्द हो और रौद्र मुहूर्तमें जन्म हेवि तो शीघही वालक मरजावे॥ २३ ॥ जिसका जन्म ग्रहण वा परिवेष (शौंडल) के समयमें हो लग्नमें पापग्रह लग्नेश बलरहित होवै तो ३ पक्षमें वा ३ महीनेमें बालक मरे ॥ २४ ॥ लग्नेश अंशेश राशीश िसके अस्तंगत होवें तो कुछही दिनौंमें मरजावै ॥ २५॥ मातः सायं अर्धरात्रि और मध्यान्ह इन चार संियोंकी समयमें जिसका जन्म होवे लग्न चंद्रमा पापयुक्त हों और शुभयुत दृष्ट न हों तो शघ्र मृत्यु होवै ॥ २६ ॥ राहौ केन्द्रे पापयुक्तेक्षिते वा क्षिप्रं नाशं याति सौम्यैरहरटे॥ पापः केन्द्रे वार्किलग्े त्रिकोणे सौम्यैः पष्ठे चाष्टमेंत्येच बाल:॥ । २७॥ जातः क्षीणे शीतगौ लग्नसंस्थे पापैरदैष्टे नाशमाशु प्रयाति ॥ उच्चक्षेत्रं मेषराशिं च हित्वा राहुर्युक्तस्तेष्वपि प्राणनाशः॥२८।। राहु केन्द्रमें पापयुक्त वा दृष्ट होवे शुभग्रह उसे न देखें तो शीघ्र वालक मरजावै अथवा पापग्रह केंद्रमें शनि लग्न वा त्रिकोणमें और पापग्रह ६। ८। १२ भावोंमें होवै तो शीघ्र मरे ।२७॥ क्षीण चंद्रमा लग्नमें पापदृष्ट हेोवै तो शीघ्र बालकका नाश होवै इन्ही स्थानोंमें चंद्रमा मेष वृष कर्कसे अन्य राशियोंका राहुयुक्त होवै तौभी वही फल करता है॥ २८ ॥। लग्नात्स्वांत्यौ पापयुक्तौ यदि स्तः सप्तस्वांत्यौ वा विनश्ये- त्क्षणेन । लग्नाद्वालश्वाष्टमे पापचारैः सोमे क्षीणे त्वष्टमाब्दं च जीवेत् ॥२९॥ केन्द्रे चन्द्रात्पापयुक्तैरसौम्यैः स्वर्गै याति प्रोच्यते वत्सरेण॥। जन्माधीशे लग्नगे क्रूरयुक्ते पश्यत्यार्किश्चा- ष्टमे जीववर्जे ॥ ३० ॥ लग्नसे २। १२ स्थान पापयुक्त होवैं अथवा सप्तमसे २/ १२ बर्थाद् ६। ८ भावोमें पाप ग्रह होवें तो बालक तत्काल मरे लग्नसे ५।८ में पापग्रह्युक्त क्षीण चन्द्रमा होवै तो बालक ८ वर्ष जीवै।।२९॥ चंद्रमासे केद्रमें पापग्रह हों शुभग्रह न हों तो एकवर्षमें स्वर्ग चला जावै, लग्नेश लग्नमें क्रूरयुक्त शनिसे दृष्ट होबै तो ८ वर्ष जीवै, परन्तु तहां बृहस्पति होवै तो यह फल नहीं होता ।। ३० ।। षष्ठे वष द्वादशे वाष्टमे वा संधौ राशेर्जातको मृत्युमेति॥ षष्टे रंधे शीतरश्मिश्च यस्य क्षीणे रिष्फे पापयुक्तेऽथ वापि॥

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(१७८) सर्वार्थचिन्तामणिः। सौम्यैदष्ट त्वष्टमाव्दं च जीवेत्पापैः सौम्यैर्मिश्रितैस्तद लाख्यम् ।३१॥जीवे विलग्ने मिथुने तुलायां शुक्रेण युक्ते शशिसूनुनापि ॥ ३२॥। पापैदष्टे मृत्युराशिस्थितैवां जीवेद्र्ष चाष्टमं चैव बालः ॥ ३३ ॥ (राशिसंधि) गंडांतमें जन्महो और ६। ८। १२ भावमें पापयुक्त चंद्रमा होवै तो बालक मरजावै यदि उसे शुभग्रह देखे तो ८ वर्ष बचे यदि पाप शुभ दोनों देखें तो ८ का आधा ४ वर्ष जावै ॥ ३१ ॥ मिथुन तुलाका बृहस्पति उन्नमें शुक्र वा बुधसेभी युक्त होवै । ३२ ॥। और उसे पापग्रह देखे अथवा अष्टमभावमें होवै तो बालक आठवर्ष जीवै॥३३॥ लग्ने क्षीणे शशिनि निधनं रन्धकेन्द्रेषु पापैः पापांतःस्थैनिधन- हिबुकदयूनसंस्थे च चन्द्रे॥ एवं लग्ने भवति मदनच्छिदसंस्थेश्र पापैरमांत्रा सार्द्धै यदि नच शुभैर्वीक्षित: शक्तिमद्धिः ॥ ३४॥ राहुग्रस्ते शीतरश्मौ विलग्ने क्रैर्युक्ते चाष्टमे भूमिपुत्रे॥ मात्रा- सार्द्ध चन्द्रवद्धास्करेपि शसतैः पातेनाशु मृत्युं प्रयाति ॥३॥ ळग्नमें क्षीण चंद्रमा अष्टमभाव तथा केंद्रोंमें पापग्रह होवैं तो बालक मरे ८॥४७ भावोंमें चंद्रमा पापग्रहोंके बीचमें होवै तौभी वहीफल होगा, ऐस लगनमें पापातस्थ चंद्रमा ७। ८ भावोंमें पापग्रह हेोवैं तो मातासहित बालक मरे, परन्तु इनको यदि बलवान् शुभ- ग्रह न देखें तब यह फल होगा।। ३४ ॥ ग्रहणसमयका चंद्रमा ळन्नमें पापयुक्त अष्टममें मंगल होवै तो मातासहित बालक मरे, ऐसेही चंद्रमाके तरह सूर्य होवै तो शबसे बा गिरनेसे शीघ्र मरे॥ ३५॥ अस्तंगते दिनपतौ रविज विलगे भौमेऽथ वा निधनगे वजति तृतीयात्। एवं स्थितेपि हिमगावशुभैरहष्टे राहुयहे च निधनं भवतीह चाष्टौ॥ ३६॥ बृहस्पतिर्भौमग्रहेऽष्टमस्थः- सूर्येन्दुम- मार्कजदष्टमूर्तिः ॥ अन्दैस्त्रिभिर्भार्गवदृष्टिहीनो लोकान्तरं प्राप- यति प्रसूतम्॥३७॥ सप्तम सूर्य लग्नमें शनि अथवा अष्टममें मंगल होवै तो तीसरे वर्ष बालक मरे ऐसे योगमें चन्द्रमापर पापग्रह दृष्टि न हो राहुपरभी पापदृष्टि न होवै तो आठ वर्षमें मृत्यु होतीहै ॥ ३६॥ वृहस्पति भौमराशि१। ८ का अष्टम भावमें हो उसे सूर्य चन्द्रमा मंगल शनि देखें शुककी दृष्टि उसपर न होवै तो बालकको तीन वर्षमें लोकान्तर भेजताह ॥ ३७ ॥

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भाषाटीकासहित: । (१७९ )

वकरी शनिरभौमगृहं प्रपन्नश्छिद्े च षष्ठे च चतुष्टये वा। कुजेन संप्ापतबलेन दृष्टो वर्षद्यं जीवयति प्रजातम् ॥ ३८ ॥ सौरे स्मरस्थे यदि वा विलग्ने जन्मस्थलग्ने शशिनि त्वलौ वा॥ सौम्येषु केन्द्रोपगतेषु सदयो जातस्य मृत्युयवनोपदिष्टः॥३९॥ नीचस्थे देवपूज्ये तु भौमक्षेत्रगतेऽथ वा ॥ संधित्रयेपि जातस्तु मासान्यृत्युं प्रगच्छति॥४०॥ वकगतिवाला शनि मंगलकी राशिका छढे आठवैं वा केन्द्रस्थानमें होवै उसे बलवान् मंगल देखे तो बालकको दो वर्ष जीवित रखताहै।। ३८।। शनि सप्तममें वा लग्नमें हो तथा जन्मलग्नमें अथवा वृश्षिकमें चन्द्रमा होवे औौर शुभ केन्द्रींमें होवे तो बालक तत्कालही मरे यह योग यवनाचार्यका कहाहै।। ३९ ॥ नीचका बृहस्पति हो अथवा मंगलके घर १। ८ का हो तीन मकारकी राशि संधियोंमें किसीमें जन्म होवै तो एक महीनेमें मृत्यु होती है॥। ४० ॥ क्षेत्रस्य सन्धौ तिथिराशिसंधौ एकत्रता तत्प्सवस्तिया स्यात्॥ जातस्तु मृत्युं समुपैति सद्यः शुकेह्ि जीवेदिति नन्दिकोक्तम्॥ ॥४१। पष्ठयां जातश्रार्कलग्ने कुजे वा गण्डान्ते वा मृत्युयोगेथ वाषि। भौमो हन्ति प्राणिनं तत्क्षणेन जीवेक्षितश्र्वेन्न भवेत्प्जातः ॥४२॥। भौमोदये तदिवसे कृशेन्दौ होरास्वामी लग्नकेन्द्राद्व- हिष्ठः । जातो योसौ क्षिप्रमेवैति मृत्युं भौमः सौरोप्येवमेवं विघत्ते ॥ ४ ३ै ॥ भावसंधि तिथिसंधि राशिसंधिमेंसे एक वा दो तीनके एक साथही आय पडनेमें मसव होवै तो बालककी मृत्यु होवै यदि उस दिन शुकवार होवे मृत्यु नहीं होगी यह नंदीश्वरका मत है।। ४१ ॥ षष्ठीमें जन्महो लग्नमें सूर्य वा मंगल होवे और तीन पकारमें से कोई गंढांत होवै अथवा मृत्युयोग होवे उस दिन मंगलवार होवै तो उसी क्षणमें मृत्यु होती है यदि बृहस्पतिकी दृष्टि होवे तो बालककी मृत्यु नहीं होगी॥ ४२ ॥ मंगलवार हो मंगलही लग्नमें हो चंद्रमा क्षीण हो लग्नेश लग्न वा केंद्रोंसे वाहर होवै तो जो जन्मा है उसको मंगल शीमही मृत्यु देताहै ऐसाही शनिभी करताहै॥। ४३ ॥ सुतमदननवांत्यलग्नरंध्रेष्वशुभयुतो मरणाय शीतरश्मिः॥भृगुस- तशशिपुत्रदेवपूज्यैर्यदि बलिभिरन विलोकितो युतो वा ॥ ४४॥

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(१८० ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

पंचम सप्तम नवम द्वादश लन्न अष्टमभावमें चंद्रमा पापयुक्त होवै तो मृत्यु देता है यदि गुक बुध बृहस्पतिस दृष्ट वा युना न हो इनसे युक्त दृष्ट होनेमें आरिष्ट नहीं होता ।। ४४॥ होरास्ताष्टमगेष्वसत्सु हिमगौ क्षीणे तु जात: शिशुः स्वर्ग गच्छति सौम्यकेन्द्ररहितो जीवो न चेद्ीक्षते॥ लग्नांत्याष्टमधर्मभेषु सहिताश्चंद्रार्कमौमार्कजाः क्षिप्रं गच्छति चांतकं सुरपतेमैत्री न चेद्ीक्षते ॥४॥ पापयुक्त चन्द्रमा १। ७।८ भावौमें हो और क्षीण भी होवै तो ऐसेमें उत्पन्न हुआ बालक स्वर्ग जाता है यदि केंन्द्रोंमें शुभग्रह न हों तथा चंद्रमाको बृहस्पति न देखे और १।१२।८।९ भावौंमें चंद्रमा सूर्य मंगल शनि होवें इनको गुरु न देखै तो शीघ्र बालक मरता है॥ ४५॥ लग्ने चन्द्रे भास्करे वा बलिष्टे पापैः केन्द्रे नैधने च त्रिकोणे।। शुक्र: सूर्य: शीतगुश्चैकसंस्था नाशं गच्छेद्योगमवैति जात:।।४६।। मेषे विंशतिभागे स्यान्मृत्युं दद्यान्निशाकरः॥ एकविंशतिभागस्तु सिंहे तत्वैस्तु गोवृषे ॥४७॥ लग्न चंद्रमा अथवा सूर्य बलवान् होवै पापग्रह केंद्रमें हों अष्टम वा त्रिकोणमें शुक्र सूर्य चंद्रमा एकसाथ हों तो इस योगमें बालकका नाश होवै॥ ४६॥ मेषके २० वीसबे अंश सिंहके २१ में वृषके २५ अंशमें चन्द्रमा बालको मृत्यु देताहै॥ ४७ ॥ वृश्चिके च तथा चन्द्रस्त्रयोविंशतिभागकः ॥ द्वाविशतिकुलीरे तु तुलायां वेदभागकः ॥ ४८ ॥ विंशतिर्मकरे चंद्रः कन्यार्यां प्रथ- मांशकः ॥ धनुरष्टादशो भागो मीने दशमभागयुक् ॥४९ ॥ द्वाविशतिर्नृयुग्मे तु चन्द्रोप्येवं मृतिप्रदः।। कुंभे पंचेंदुभागेच मृत्युं दद्यात्तथैव च ॥। ५० ।। ये ये निशाकरांशास्तु मृत्युभागव्यव- स्थिताः ॥ तावद्भिर्वत्सरैर्जातो मृत्युमेति न संशयः ॥५१॥ लग्नजन्मपयोर्यस्तु शत्रुर्लग्रगतः शुभः ॥ करोति मृत्युं जातस्य स्वस्य घातोः प्रभावतः ॥५२। तैसेही वृश्चिकके २३ वें ंशमें कर्कके २२ में तुळाके ४ में॥४८ ॥ मकरके २० में कन्याके १ में घनके १८ में मीनके १० में ।। ४९ ।। मिथुनके २२ में चंद्रमा मृत्यु देने-

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भाषाटीकासहित:। (१८१ ) वाला होताहै तथा कुंभके १५ वें भी मृत्यु करताहै॥ ५० ॥ जो जो चंद्रमाके अंश मृत्यु- भागमें हैं उतने वर्षोंमें मनुष्य निस्संदेह मरण पाता है॥ ५१॥ लग्नेश वा चंद्रराशिका शत्रुग्रह लग्नमें शुभग्रहमी होवै तोभी अपने पूर्वोंक्त धातुदोषसे बालककी मृत्युकरताहै ॥५२॥ रन्ध्रे धरासूनुदिनेशसौरा जातस्तु मृत्युं समुपैति मासात्॥ केतुश्च यस्मिन्नुदितेत्र जातो मासद्रयेनैव यमं प्रयाति ॥५३॥भूपाल- योगा यवनैःप्रदिष्टा राज: कुले जातनरे घरेशाः॥तेतिप्रयोगास्तु तदन्यजाताः सदो यमं यांति नरास्तथैवम्॥५४॥ भानुर्नभ- स्थो यदि पापदष्टो धरासुतर्क्षे शशिनश्र गेहे। जातस्तु मृत्युं समुपैति शीघं शुभैन दृष्टो वियुतोपि चैवम् ॥५५॥ अष्टम स्थानमें मंगल सूर्य शनि होवें तो एक महीनेमें बालक मरे जिस लग्नमें केतुका उदय है उसमें जन्म होवै तो दो महीनेमें मरे॥ ५३॥ जो राजयोग यवनाचार्यने कहेहैं उनमें राजकुलका बालक तो राजा होता है ऐसे योगोंमें अन्यका वालक जन्में तो अतिपयोग (असंभव) होनेसे वह बालक तत्काल यमको माप्त होता है ।। ५४ ॥ यदि पापदृष्ट सूर्य दशम भावमें मंगळ वा चंद्रमाकी राशिका होवै शुभग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट न होवै तो शीघ्र बालक मरे ॥ ५५ ॥ लग्ने ये द्रेष्काणा निरर्गला हि विहंगपाशघरसंज्ञाः॥ मरणाय सप्त वर्षैः ऋरयुताश्चापि संदष्टाः ॥५६॥ रविचंद्रभौमगुरुभि: कुजगु- रुसौरेन्दुभिस्तथैकस्थैः ॥ रविशनिभौमशशांकैर्मरणं खलु पश्च- भिर्वषैः ॥७॥ रविणा युक्त: शशिजः सौम्यैर्दष्टो विनाशयति नूनम् ॥ एकादशभिर्वर्षैर्देवांकेपि स्थितं जातम् ॥५८।। जो लग्नमें पक्षि सर्प पाशघर द्रेष्काण क्रूरग्रहौंसे युक्त दृष्ट होवैं तो सात वर्षमें मृत्यु देते हैं।। ५६ ।। सूर्य चंदमा मंगल गुरु अथवा मंगल गुरु सूर्य चंद्रमा यद्वा सूर्य शनि मंगल चंद्रमा एकस्थानमें होवें तो निश्चय पांचवर्षमें मृत्यु देतेहैं॥ ५७ ॥ सूर्यसे युक्त बुध शुभग्रहोंसे दृष्ट होवै तो बालक देवताके गोदमेंभी बैठा हो तौभी ग्यारहवें वर्षमें मारही देताहै यह योग अन्यग्रंथोंमें नहीं देखा गयाहै॥ ५८ ॥ लग्ने रविशनिभौमैः शुकगृहे वा शशी क्षीणः ॥ दृष्टो न देवगु- रुणा सप्तभिर्दैर्विनाशयति॥ ५९ ॥ केन्द्रे रविमुषिततनुः क्षितिजो मन्दावलोकितोथ युतः ॥ वर्षचतुष्केणाशु मारयति

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(१८२) सर्वार्थचिन्तामाणे:। किमत्र गणितेन ॥ ६० ॥ लग्नाधिपतेश्चन्द्रो मरणपदस्थोपि कृष्णतां याति।।क्रूरैः सकलैर्द्ष्टो न शुभैर्वर्षैस्त्रिभिस्तु मारयति६ु१।। लग्नमें सूर्य, शनि, मंगळ हों क्षीण चंद्रमा शुककी राशिका होवै उसे गुरु न देखे तो ७ वर्षमें मारता है ॥५९॥ केन्द्रमें अस्तंगत मंगल शनिसे दृष्ट वा युक्त होवै तो चार वर्षमें मार- ताहै इसमें गणितायुकाभी पयोजन नहीं है॥ ६॥ लगेशसे चंद्रमा अष्टम होवे कृष्णपक्षका जन्म हो सभी पापग्रह उस चंद्रमाको देखें अुभग्रह न देखें तो ३ वर्षमें मारताहै ॥ ६१॥ पापो विलग्नाधिपतिः शशांकादंत्यस्थितः क्ूरनिरीक्षितश्रवेत्।। चन्द्रांशकस्थो यदि वा तदीशोजात: शिशुः प्रेतपुरीं नवाब्दैः।। ॥६२॥। दृश्ये भागे संयुता: सौम्यखेटा: पापाः सर्वे यस्य जन्मन्यदश्ये॥ राहौ लग्ने पापयुक्तेथ दष्टे जातो मृत्युं याति पंचा- ब्दसंख्यैः ॥६३॥ लग्नेश पापग्रह चन्द्रमासे बारहवें भावमें पापदृष्ट हेवैं अथवा ऐसे योगंमें चंद्रराशीश पापांशकमें होवै तो बालक ९ वर्षमें यमपुरी पहुंचे।। ६२ H जिसके जन्ममें शुभग्रह दृश्यार्ष ४ से १० पर्यत और पापग्रह अद्ृश्य भागमें हों राहु लग्नमें पापयुक्त वा दृष्ट होवै तो बालक पांचवेंमें मरजावै ॥ ६३ ॥ राहु: सप्तमभवने शशिसूर्यनिरीक्षितो न शुभदष्टः।दशभिर्द्धाभ्यां सहितैरव्दैजातं विनाशयति नूनम्॥ ६४॥ घटालिसिंहे फणि- नाथयुक्ते तस्मिन्विलग्ने सति पापहष्टे।। जातो यमं सप्तदशे प्रयाति वर्षेन्द्रपूज्येन युतो न हष्टः ॥ ६॥ सप्तम भावमें राहु सूर्य चन्द्रमासे दृष्ट हो शुभग्ह उसे न देखें तो बालकको १२ वर्षमें नाश करे यह निश्चय है।। ६४ ।। राहु ११।८।५ राशिका लग्नमें हो उसे पापग्रह देखें और उसको बृहस्पति न देखे न उसके साथ होवै तो बालक १७ वें वर्षमें मरे ॥ ६५ ॥ क्षीणेन्दुः पापसंदष्टो राहुदृष्टो विशेषतः। जातो यमपुरं याति दिनैः कतिपयैः किल॥ ६६ ॥ जन्मेशलयाघिपती विलगा- त्वष्ठाष्टमांत्येषु दिनेशयुक्तौ ।। जातो यमं द्वादशमिश्च वर्षेः प्रयाति सौम्येन युतौ न हष्टौ॥ ६७ ॥ होराधिपतिर्धूने पाप- जितो मरणमेव विदधाति॥ राशि त्रिगुणीकृत्वा वर्षें मासे न संदेहः ॥ ६८ ॥

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भषाटीकासित:। (१८३ ) क्षीण चन्द्रमा पापदष्ट हो विशेषतः राहुदृष्ट होवै तो निश्चय कुछेक दिनौंमें चालक मरे । ६६ ॥ जन्मलन्नेश तथा चन्दराशीश लगनसे ६।८।१२ भावौंमें सूर्यसे युक्त होवें शुभ- ग्रहोंसे युक्त दृष्ट न हों तो १२ वर्षमें यमपुर जावै॥ ६७॥ लग्नेश सप्तम स्थानमें ( पाप- जित) पापग्रहसे युद्धमें पराजित होवै तो जिस राशिमें है उसको त्रिगुण करके जो अंक हो उतनवें महीने वा वर्षमें निःसंदेह मरण करताहै॥ ६८ ॥ तरणीन्दुकुजा: पुत्रस्थाने युक्ता न सौम्यगाः॥ जातो यमपुरं याति नवमेब्दे न संशयः॥ ६९ ॥ लगनेशवरे विलग्नस्थे पापैः सर्वैरदृश्यगैः॥ चतुर्थे मासि मरणं याति बालो न संशयः।।9०। चन्द्रलग्नाधिपः सूर्यः स्वपुत्रेण समन्वितः ॥ लग्नादष्टमरा- शिस्थो द्वादशाब्दे मृतिप्रदः ॥७१॥ वषठाष्टमे पापयुते सौम्ये दृष्टिविवर्जिते। आपोक्किमे विलग्नेशे षोडशे निधनं बजेत्॥७२॥ सूर्य चंद्रमा मंगल पंचमभावमें शुभग्रहोंसे युक्त दष्ट न होवैं तो नवमवर्षमें निस्संदेह यमालय जाता है।। ६९ । लसेश लग्नमें और सभी पापग्रह ( अदृश्यारई्ध ) ११ से ३ भावपंर्यत होवैं तो निस्संदेह बालक चौथे महीने मरजावै॥। ७० ॥ चंद्रराशीश सूर्य शनिसे युक्त अष्टम भावमें होवै तो १२ वें वर्ष मृत्यु करताहै ॥ ७१ ॥ वही सूर्य पाप- युक्त ६।८ भावमें शुभग्रह दृष्टिरहित हो तथा लगनेश आपोककिमें ३/६/९।१२ में से किसीमें होवै तो १६ वर्षमें मृत्यु हैवि ॥ ७२ ॥ परस्परक्षेत्रसमास्थितौ वा लग्नेशरन्ध्राघिपती न सौम्ये॥ रिष्फा- रिभे वागधिपेन युक्ते त्वष्टादशाब्दे निधनं प्रयाति॥७३॥ केन्द्रेषु पापेषु निशाकरेण सौम्यग्रहैर्वीक्षणवर्जितेषु॥ षष्ठाष्टमे वा यदि वा शशांके जीवेच्छिशुर्विशतिवर्षमात्रम्॥७॥ लग्नेश अष्टमेश अन्योन्य राशियोंमें शुभग्रह योग रहित होवें अथवा ६।१२ भावमें पंच- मेशसे युक्त होवें तो १८ वर्षमें मृत्यु होवै॥ ७३ ॥ केन्द्रोंमें पापग्रह चंद्रमा शुभग्रहोंक्री दृष्टिसे वर्जित होवे अथवा केंद्रोंमें पापग्रह हुयेमें चंद्रमा ६।८ भावमें होवै तो बालक वीस २० ही वर्ष जीवै॥। ७४॥ जीवेन सहितः सूर्यो लग्नस्थः कीटराशिगः॥ अष्टमाघिपतौ केन्द्रे द्वाविशे मरणं ध्रुवम्॥ ७॥राहुणा सहित चन्द्रे जामित्रे चाष्टमेपि वा॥ देवेज्ये लग्नगेहेस्मिन् द्वाविंशे मरणं भवेत्।।७६।।

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(१८४) सर्वार्थचिन्तामणिः। पापद्यांतरस्थे तु होरानाथे न साम्यगे॥ पितृजन्मनि जातस्तु पंचविशे यमं व्रजेत्।७७। मंदोदये शत्रुराशौ सौम्यैरापोक्किमो- पगैः॥ षड़िंशे सप्तविंशे वा मरणं भवति ध्रुवम् ॥७८॥ वृहस्पतिसहित सूर्य कीट ४ राशिका लग्नमें होवै अष्टमेश केन्द्रमें होवै तो २२ वैं वर्ष मृत्यु होवै॥। ७५॥ राहुसहित चन्द्रमा सप्तम वा अष्टमभावमें होवै बृहस्पति लग्नमें होवै तो २२ वर्षमें मृत्यु होवै ॥ ७६ ॥ लग्नेश दो पापग्रहोंके बीचमें शुभग्रहरहित होवै और पिताके जन्मलन्नमें जन्म होवे तो २५ वर्षमें मरे ॥ ७७॥ लग्नमें शनि शत्रुराशिका होवै शुभग्रह आपोक्िम ३/६।९। १२ में हों तो २६ वा २७ वर्षमें निश्चय मरे ॥७८ ॥ चन्द्रो मन्दसहायस्तु सूर्यश्राष्टमसंयुतः ॥ एकोनतरिंशके वर्षे जातो यमपुरं त्रजेत् ॥७९॥ पापा जन्माष्टमार्गस्थाः सौम्याः केन्द्रबहिस्थिताः॥ अस्मिन् योगे समुत्पन्रे त्वष्टाविंशे मृति- भवेत्॥ ८० । जन्मरन्ध्रपयोर्मध्ये निशानाथे व्यये गुरौ। सप्तविंशतिवर्षे वा त्रिंशद्वर्षेपि वा मृतिः ॥८१।। रन्ध्रेशे जीव- संदृष्टे पापे पापनिरीक्षिते॥रन्ध्रस्थे जन्मपे वापि अष्टाविंशे मृति- र्भवेत्॥। ८२।। अष्टमाधिपतौ केन्द्रे लगने तु बलवत्तरे।। त्रिंश- द्वर्षाण्यसौ जीवेद्वान्रिंशद्ाथ जातकः ॥८३॥लग्नादष्टमराश्यंश भानुपुत्रसमन्विते। पापे बलाघिके लगे केन्द्राद्वाहो शुभे तथा॥ ८४॥ अन्योन्य संगतौ क्रूरौ लग्नस्थौ पापवीक्षितौ॥ द्वा- दशे शीतरश्मौ च परमायुस्तथैव हि॥ ८॥ चंद्रमा शनिसे संबंधी होकर अष्टमभावमें होवै सूर्यभी अष्टमभाघमें होवै तो २९ वैं वर्ष यमपुरमें जावै।। ७९ । पापग्रह १।८। ७ भावोंमें होवें शुभग्रह केन्द्रोंसे बाहर होवैं इस योगमें जो उत्पन्न हो उसकी मृत्यु २८ वर्षमें होवै॥ ८० ॥ चन्द्रमा लन्न तथा अष्टमेशके बीचमें हो बृहस्पति बारहवां होवै तो २७ वा ३० वर्षमें मृत्यु होवै ॥८१॥ अष्टमेशपर बृहस्पतिकी दृष्टि होवै अष्टमेसभी पापग्रह हो पापग्रह उसे देखे अथवा लग्नेश अष्टममें होवे तो २८ वर्षमे मृत्यु हेवि।। ८२ ॥ अष्टमेश केन्द्रमें अथवा लग्नमें बलवान् होवै तो वह ३० वर्ष अथवा ३२ वर्ष जीवै।। ८३॥ लग्नसे अष्टम राशि वा उसके अंशफ- में शनि होवै बलाधिक पापग्रह लग्नमें होवे तथा केंद्रोंसे वाहर शुाभग्रह होवैं तोभी वही फल होगा॥ ८४ ॥ अन्योन्य राशिगत पापग्रह पापदष्ट होकर लग्नमें हों चंद्रमा बारहवां होवै तो भी उतनीही आयु होगी॥। ८५॥।

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भाषाटीकासहित:। (१८५)

जन्माष्टमेशौ यदि केन्द्रयुक्तौ रन्ध्रे तु यः कश्धन खेचरेन्द्रः। द्वाविंशके तन्मरणं शुभैस्तु केन्द्रेषु हीनेष्वहितैर्ग्रहेन्द्रैः ॥ ८६॥ क्षीणे शशांके दिवसेशयुक्ते रन्धाधिपे केन्द्रगतेष्टमेपि॥ पा- पान्विते लग्नगते विहीने द्वानिंशद्दे निधनं प्रयाति॥८७॥ लगनरन्ध्रपयोयोंगे स्फुट तत्कृत्यसंयुतः ॥ शुभैरयुक्त: पापश्चे- न्मृत्युः स्यात्सप्तविंशतौ॥८८॥ यदि लग्नेश अष्टमेश केन्द्रमें होवें तथा अष्टमभावमें कोई ग्रह होवै और केन्द्रोंमें शुभग्रह न हों पापग्रह होवैं तो २२ वर्षमें उसकी मृत्यु होवै॥ ८६ ॥ क्षीण चन्द्रमा सूर्ययुक्त होवे अष्टमेश केन्द्रमें पापग्रह अष्टमभावमें हो हीनबली ग्रह पापयुक्त लग्नमें होवे तो ३२ वर्षमें मृत्यु को पाप्तहोवै। ८७॥ लग्नेश अष्टमेश एकसाथ पापग्रह हों शुभग्रहोंसे युक्त न होवें तो २७ वर्षमें मृत्यु होवै ।l ८८ ॥। लग्नाद्विलोमे ससुतश्र चन्द्रो रन्धेश्वरे केन्द्रगते ससौम्यैः॥दष्टे युते वा परमायुरत्र त्रिंशत्परं नास्ति बलैर्विहीनः ॥८९॥ रन्धेश्वरे भाग्यघनात्मयुक्ते लग्नाधिपे रन्ध्रयुते त्वसौम्यैः॥जातश्रतुर्विश- तिवर्षमात्रं जीवत्यसौ शोभनदृष्टियुक्त।। ९०।। लग्नसे बारहवैं भावमें बुधसहित चन्द्रमा होवै अष्टमेश किसी केन्द्रमें निर्बल शुभग्रहोंसे दृष्ट बा युक्त होवे तो उसकी परमायु ३० वर्षसे अधिक न होवै॥ ८९ ॥ अष्टमेश ९/२/१ भावोंमेंसे किसीमें हो लग्नेश अष्टमस्थानमें पापयुत वा दृष्ट होवै उसपर शुभदृष्टिभी हो तौभी २४ वर्षमात्र जीवै ।। ९० ।। अष्टमाधिपतौ लग्े लग्नेशे बलवर्जिते॥ त्रिंशद्वर्षाण्यसौ जीवोत्रें- शन्नातीव वर्तते ॥९१॥ आपोक्किमगते चंद्रे लग्नेशे च तथैव हि ॥ पापेक्षिते बलैहीने जीवत्यायुस्तथैव च ।९२॥ गुरुशुकौच केन्द्रस्थौ लग्नेशे पापसंयुते॥ आपोक्किमस्थे संध्यायामायुः षट्- तरिंशदेव हि॥ ९३॥ अष्टमेश लगनमें लग्नेश बलरहित होवै तो ३० वर्ष बचे उपरात आयु न पावै ॥ ९१ ॥ चंद्रमा आपोक्किम ३। ६। ९ । १२ भावमें से किसीमें हो ऐसाही चन्द्रमाभी आपोक्किममें पाप- दृष्ट तथा बलहीन होवै तौभी उतनीही आयु होगी ॥ ९२॥ गुरु शुक केन्द्रमें हो लग्नेश पापयुत आपोक्किममें हो और संध्याकालका जन्म होवे तो ३६ की परमायु होवे ।। ९३ ॥ 2.

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(१८६ ) सर्वार्थचिन्तामणिः। लग्नस्थिते वासरनायके तु पापान्तरे शत्रुगते विहीने।। षद्निं- शदंतं परमायुरस्य शुभैन दृष्टे सति सत्यमेतत् ॥ ९४॥ भूसूतु- चन्द्रौ तनुगौ शुभास्तु केन्द्राष्टमस्था न भवेयुरत्र॥ जातो यदा मान्दुदये शिशुःस्यात्षद्त्रिंशकेव्दे निधनं प्रयाति ॥९५॥ हो- राशास्त्राभ्यासबलात्संगृह्य विदुषां मुदे॥ परं त्यक्कका त्वसारं तु कृतं व्यङ्गटशर्मणा ॥ ९६॥ इति श्रीसर्वार्थचिन्तामणावरिष्टयोगनिरूपणं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥ सूर्यलन्नमें पापग्रहौंके बीच शत्रुराशिमें एवं निर्बल होवै और शुभग्रह उसे न देखे तो ३६ वर्ष उसकी परमायु होगी॥ ९४॥ मंगल चन्द्रमा लग्नमें हों शुभग्रह केन्द्र तथा अष्टम स्थानमें न होवें और केतु लग्नमें होवै तो बालक ३६ उचीस वैं वर्षमें मरे ॥ ९५ ॥ यह बाल्यारिष्टाध्याय होराशास्त्रके अभ्यासवलसे व्यंकटेश्वरने असारको दूर छोढके सारसंग्रह कियाहै॥ ९६ ॥ इति श्रीसर्वार्यचिंतामणौ माहीधरभाषाटीकायामरिष्टाध्यायो दशमः ॥ १० ॥ एकादशोऽध्यायः॥११॥

लग्नस्थितो देवगु रुर्विशेषात्खेटान्निहन्याद्विबलांस्तथैव। एकोपि बालेन्दुधरप्रणामः समस्तपापं शमयेत्तथैव॥१॥ अत्यंतसत्वे यदि लग्ननाथे सौम्यान्वितें ता दृश दष्टिमार्गे।। केंद्रस्थिते पापदशा विहीने स भाग्यवान् जीवति दीर्घमायुः॥२॥ बाल्यारिष्टहारक ग्रहोंमें विशेषतः लग्नका वृहस्पति अरिष्टकर्ता निर्बल ग्रहोंके फलौंको नाश करदेताहै जैसे एक शिवजीको पणाम करना समस्तपापौंको नाश करदेताहै ॥ १ ॥ लग्नेश अतिबलवान् होवे शुभग्रहोंसे दृष्ट वा युक्त होकर केन्द्रमें बैठा होवै पापदृष्टिरहित होवे तो वह बालक भाग्यवान् एवं दीर्घायु होताहै ॥ २ ॥ शशांको रन्ध्रनाथस्तु सौम्यद्रेष्काणसंयुनः॥जातं शिशुं प्रयत्नेन रक्षयेद्रात्रिवासरम् ॥३॥ चन्द्रः संपूर्णगात्रस्तु सौम्यक्षेत्रांशगोपि

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आषाटीकासहित:। (१८७) वा।।सर्वारिष्टनिहन्ता स्याद्विशेषाच्छक्रवीक्षितः।४।। जीवभार्ग- वसौम्यानामेक: केन्द्रगतो बली॥ पापग्योगहीनश्वेत्सघयोरिष्ट- स्य भंगकृत ॥ ५॥ चन्द्रोपि शत्रुराशिस्थो जीवशुकविर्दा यथा॥ द्रेष्काणं शमयत्येवारिष्टं पापं हरिर्यथा॥ ६ु।। अष्टमेश चन्द्रमा शुभग्रहके द्वेष्काणमें होवै तो दिनरात यत्नसे बालककी रक्षा करनी अर्थाव दिनरात यह बालक केशी रहकर बच जाताहै।३॥पूर्णचन्द्रमा शुभग्रहके राशिमें अथवा अंशकमें होवै तो समस्त वाल्पारिष्टौंका नाश करताहै विशेषतः शुकसे दष्ट यह फल करताहै । ४ ॥ बृहस्पति शुक बुधमेंसे एकभी केन्द्रमें बलवान् होवै पापग्रहोंसे युक्त दृष्ट न होवै तो तत्काल आरष्टिभंग करताहै ॥ ५॥ चन्द्रमा शत्रुराशिमें भी होवै परंतु बृहस्पति शुक्र बुध के द्रेष्काणमें होवै तो अरिष्टिको शमित कर देताहै जैसे श्रीहरि पापको शमन करतेहैं ॥ ६॥ शुक्ेपि पक्षे यदि रात्रिजन्म चन्द्रोपि षष्ठाष्टमराशियुक्तः॥शुभे- क्षितः सत्निह कृष्णपक्षे दृश्य: स पापैरवति प्रसूतम्।७॥ निशाकरे शोभनखेचरांशे शुभेक्षिते पूरितदीतिजालः। जातस्य निःशेषम- रिष्टमाशु यथा विषं हन्तिच वैनतेयः ।८। प्रकाशमानो गगने- न्द्रपूज्य: केन्द्रस्थितो रक्षति जातसूनुम् ॥ सौम्यांशका जीवश- शांकशुकसौम्या विनिन्नन्ति समस्तदोषम्॥९॥ जन्माघिपः केन्द्रगतः शुभश्रेजनातं शिशुं रक्षति सौम्यहष्टः ॥ स्वांशस्थितैः शोभनखेचरेन्द्रैर्द्ष्टस्तदान्यो विनिहंत्यरिष्टम्॥१०॥ शुक्कपक्षमें रात्रिका जन्म हो चंद्रमा छठे वा आठवें भावमें शुभदृष्ट होवै और कृष्णपक्षमें दिनका जन्म चद्रमा ६। ८ भावमें पापदृष्टभी हो तौभी बालककी रक्षा करताहै ॥ ७॥ चंद्रमा शुभग्रहके अंशकमें शुभदृष्ट पूर्णमण्डल होवै तो बालकके संपूर्ण अरिष्टोको नाश करताहै जैसे गरुड विषका नाश करताहै।। ८।। उदयी बृहस्पति केन्द्रमें होवै तो बालककी रक्षा करताहै गुरु शुक चंद्रमा बुध शुभांशकौंमें होवैं तौभी संपूर्ण अरिष्टयोग फलको नाश करतेहैं । ९॥ जन्मळग्नेश शुभयह केन्द्रमें शुभदृष्ट होवै तो बालककी रक्षा करताहै लग्नेश शुभ पापोंसे कोई हो उसे अपने अंशकस्थित शुभग्रह देखें तो वहमी अरिष्टहंता होताहै ॥ १० ॥ लग्नाततृतीयारिभवे च राहुः पापैर्वियुक्त: शुभदृदश्यमानः।। विनाश- यत्याशु समस्तरिष्टं तूलं यथा वायुबलस्य वेगः ॥ ११॥ शीर्षोदयस्थाः सकला ग्रहेन्द्रा रिष्ट हरन्त्याशु शुर्भांशकस्थाः॥

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(१८८) सर्वार्थचिन्तामणिः। पूर्णेन्दुरन्यैवियुतः शुभैस्तु दृष्टो हरत्याशु समस्तरिष्टम् ॥१२॥ सर्वग्रहेन्द्रैः परिपूर्णचन्द्रो दृष्टो हरत्याशु समस्तदोषान्॥ नयैः स्वकीयैः प्रहरेत् क्षितीशो यथा तथा जन्मनि दोषजालम्॥ ।। १३ ॥ सौम्यग्रहैरतिबलैर्विबलैश्र पापैर्लगै च सौम्यभवनं शुभदृष्टियुक्तम्। सर्वापदां विहरतो भवति प्रसूति:पूजापरे खलु यथा पठनैर्ग्रहाणाम् ॥ १४॥ राहु लग्नसे तीसरा छठा ग्यारहवां पापरहित शुभग्रह दृष्ट होवै तो समस्त बाल्यारिष्ट शीघ्र नाश करताहै. जैस वायुका बल वेग रुईका गल्ला उडादेताहै ॥ ११॥ समस्तग्रह शर्षो- दय ५।६।७।८। ११। ३ राशियोंमें शुभ ग्रहोंके अंशकोंमें होवै तो अरिष्टको नाशतेहैं पूर्ण चंद्रमा पापग्रहरहित तथा शुभदृष्ट होवै तौभी संपूर्णदोष दूर करताहै ॥ १२ ॥ पूर्ण चंद्रमापर सभी ग्रहोंकी दृष्टि होवै तौी वही फल होगा जैसे राजा अपने न्यायोंसे समस्त मजाके दोषोंके दूर करताहै॥ १३ ॥ शुभग्रह अतिबलवान् होवै पापग्रह निर्बल होवें तथा लग्नमें शुभग्रहकी राशि शुभग्रहसे दृष्ट होवै ऐसे समयमें जन्म होवै तो संपूर्ण आपत्ति- योंसे रहित होवै. जैसे ग्रहौंकी पूजामें ग्रहौंके स्तोत्रादि पाठमें तत्पर मनुष्योंकी आपत्ति दूर होतीहै॥ १४ ॥ उदयोगस्त्यमुनेः सप्तर्षीर्णा मरीचिपूर्वाणाम् ॥ सर्वारिष्टं नश्यति तम इव सूर्य्योदये प्रबलम्। १५॥ अजवृषकर्किणि लग्ने रक्षति राहुः समस्तपीडाभ्यः॥ पृथिवीपतिः प्रसन्नः कृतापराधं यथा पुरुषम् ॥ १६ ॥ चंद्रः शुभवर्गस्थः क्षीणोपि शुभेक्षितो हरति रिष्टम्॥ जलमिव हंत्यतिसारं ज्ातीफलवल्कलक्कथितम् ॥ १७॥। सप्ताष्टमषष्ठस्थाः शशिनः सौम्या हरंति कष्टफलम्। युवतिजनस्य कटाक्षा ललिता यूनां यथा नूनम् ॥ १८ ॥ जन्म समयमें अगस्त्य मुनिका उदय तथा मरीचि आदि सप्तर्षियोंका उदय समस्त अरिष्ट नाश करता है जैसे परबल अंधकार को सूर्योदय नाश करता है॥१५॥ मेष वृष कर्क राशिका राहु लग्नमें होवे तो समस्त पीडाओंसे रक्षा करताहै जैसे अपराधी पुरुषको पस्न्न हुआ राजा बचाय देताहै॥। १६ । चंद्रमा क्षीणभी हो परन्तु शुभग्रहोंके राश्यादि वर्गमें होवै तो आरिष्ट हरण करताहै जैसे अतिसारको जातीफलके बकलोंमें पकाया पानी हर लेताहै॥ १७॥ चंद्रमासे ७। ८। ६ स्थानोंमें शुमग्रह होवें तो कष्टफलका हरण करतेहैं जैसे जवान ख्त्रियोंके सुहाउने कटाक्ष युवाजनोंके फष्ट दूर करतेहैं ॥ १८ ॥

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भाषाटीकासहित:। (१८९) पापराशिगते चंद्रे तदीशेन निरीक्षिते॥ सौम्यग्रहाणां वर्गस्थे कृपणेन धनं यथा॥ १९॥ चंद्राधिष्टितराशीशे लग्नस्थे शुभ- वीक्षिते ॥। भृगुणा वीक्षिते चंद्रे स्वोच्चे रिष्टं हरेत्तदा ॥ २०॥ स्वोच्चस्थे स्वगृहेथ वापि सुहदां वर्गे स्वकीयेथ वा संपूर्ण: शुभवी- क्षितः शशघरो वर्गेषु सौम्येषु वा ॥ शत्रूणामवलोकनेन रहितः पापैरयुक्तेक्षितो रिष्ट हंति सुदुस्तरं दिनमणि: प्रालेयनाशं यथा ॥ २१॥ अध्यायोरिष्टभंगाख्यः प्रोक्तश्विंतामणौ मया॥ मधु- वृत्त्या गृहीत्वा तु व्यंकटेश्वरशर्मणा ॥ २२॥ इति श्रीसर्वार्थचिंतामणावरिष्टभङ्गनिरुपणो नाम एकादशोध्यायः॥११॥ चंद्रमा पापराशिमें हो उस राशिका स्वामी उसे देखे और शुभग्रहौंके अंशादिमें होवे तो बालककी रक्षा करताहै जैसा कृपण मनुष्य धनकी रक्षा करताहै॥१९॥ चंद्रमा राशीश उन्षमें शुभग्रह दृष्ट होवै तथा चंद्रमाको शुक देखे उच्चमें होवै तो आरेष्टको हरताहै ॥ २० ॥ पूर्णचं- द्रमा शुभग्रहोसे दृष्ट होकर अपने उच्च वा स्वगृहमें हो अथवा मित्रके वर्गमें हो अथवा अपने वर्गमें हो यद्ा मित्रके वर्गमें हो शत्रुदृष्टिसे रहित पापयोगदृष्टि रहित होवे तो कठिन अरिष्टिको भी दूर करताहै जैसे सूर्य बर्फका नाश करताहै॥ २१ ॥ मुझ व्यकटेशने माधुक- रीवृत्तिसे अनेक ग्रंथोंका सार लेकर यह अरिष्टर्मंगाध्याय कहा ॥ २२ ॥ इति स० चि० म० माहीधरभाषाटीकायामरिष्टमङ्गध्याय एकादशः ॥ ११ ॥ द्वादशोऽध्यायः॥१२॥

अथ मध्यमायुर्योगविचाराध्यायः। द्वात्रिंशदूर्ध्वमर्वाक्तः सप्तत्या मध्यमायुर्योगान्॥ तावत्कालनि- यमितान् योगविशेषानहं वक्ष्ये॥ १॥ चंद्रे कुजक्षें तनुगे प्रदृष्टे ऋ्ूरग्रहैः शोभनखेचरेन्द्रैः॥ केन्द्राद्वहिष्ैरनिधनं प्रयाति वर्षैस्त्रय- स्तिंशसमानकैस्तु॥२॥ पापग्रहे रंध्रपतौ सचंद्रे केंद्रस्थिते वा यदि वा त्रिकोणे। निरीक्षिते पापखगैर्नभस्थैर्जातस्त्रयस्त्रिंश- दुपैति वर्षम् ॥ ३ ॥

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(१९० ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

अब मध्यमायुयोग कहतेहैं कि ३३ वर्षसे ऊपर ७० वर्षके भीतर आयुके योगविशेषमें अंथफर्त्ता कहताहै। १॥ चंद्रमा मंगलकी राशिका लग्नमें पापग्रहोंसे दृष्ट होवै शुभग्रह केंद्रमें न होवें तो ३२ वर्ष आयु होवै। २॥अष्टमेश पापग्रह चंद्रमा सहित केन्द्र अथवा त्रिकोणमें होवै उसे पापग्रह दशम भावमें बैठकर देखें तो मनुष्यकी ३३ वर्ष आयु होवै ॥ ३ ॥ लगने शनौ रात्रिकरेण युक्ते भौमे घटस्थे सुरसंख्यवर्षैः॥ क्ूरं तरे लग्नगते तदीशे युग्मस्थिते देवगुरौ पुरस्थे॥४॥ जातस्तु मृत्युं सुनिवह्निवर्षैः प्रयाति शास्त्रप्रवरैः प्रदिष्टम्॥ सभूमिजे रंध्र- पतौ विलगे राशौ स्थिरे वा यदि वा धराजे ॥ ५॥ रिष्फे- ष्टमे मृत्युसुपैति जातस्त्वव्दैर्द्विपाथोधिसमानकैर्वा॥ केन्द्रे सुरौ कर्मणि सूर्यपुत्रे लग्ने चरे वेदयुगैः समानैः॥६॥ लभमें चंद्रमासहित शनि होवे मंगल कुम्भका होवै तो ३२ वर्ष आयु होवै लन्न पापांतर हो लग्नेश मिथुनका होवै और बृहस्पति चतुर्थ होवै ॥४॥ तो जातक ३७ वर्षमें मृत्युको माप्त होताहै यह शास्त्रज्ञोंने कहाहै, लग्नमें मंगल सहित अष्टमेश होवै यद्ा मंगल स्थिररा शिमें आगग्म वा बारहवें भावमें होवै तो ४२ वर्षमें मृत्यु होवै वृहस्पति केंद्रमें शनि दशम होवै लग्नमें चरराशि होवै तो ४४ वर्ष आयु होवै ॥ ५ ॥ ६ ॥ गुरुशुकौ च केन्द्रस्थौ लग्नेशे पापसंयुते॥आपोक्िमस्थे संध्या- यामायुः षट्त्रिंशदेव हि॥ ७॥स्वोच्चे विलगे रविनंदने च जीवे- स्तगे कर्मणि सूर्यपुत्रे।। जातो धनाव्यो बहुशास्त्रवेत्ता वेदान्धि- वर्षैरनिघनं प्रयाति ॥८।। लगेश्वरे रंभ्रगते सपापे केंद्राइ्हिष्ठे यदि सौम्यखेटे॥ चत्वारिंशद्वत्सरे मृत्युमेति जातः पुत्रों नान्यथा शास्त्रमेततू।९।। गुरु शुक केन्द्रमें हों लग्नेश पापयुक्त होकर २। ५। ८। १२ भावमें से किसीमें हों और संध्याकालका जन्म होवै तो ३६ वर्ष आयु होवै॥७॥उच्चका शनि लग्नमें बृहस्पति सप्तम शनि दशम होवै तो मनुष्य धनवान् तथा बहुत शास््र जाननेवाला होवै ४४ वर्षमें मरजावै ॥ ८ ॥ लसेश पापयुक्त अष्टमस्थानमें हो शुभग्रह केंद्रोंमें न हों तो ऐसे योगमें जन्मवाला पुत्र ४४ वर्षमें मृत्युको माप्त होताहै यह शास्त्राज्ञा झूठी नहींहै।। ९ ।। जन्माधिपे रंध्रगते सपापे पापान्विते रंभरपतौ रिपुस्थे॥ बला- न्विते वा शुभदृग्विमुक्त पंचाब्धिवषैर्निघनं प्रयाति॥१ ॥

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भाषाटीकासहित:। (१९१ ) मेषे शशांके तनुगे सुपूर्णे सौम्येक्षिते भूपतिरत्र जातः॥ पापग्र- हाणां च हशा विहीने नागाब्धिवर्षैनिधनं प्रयाति॥११॥ लग्नेश पापयुक्त अष्टमभावमें अष्टमेश पापयुक्त छठे स्थानमें बलवान् बा शुभदृष्टिरहित होवै तो ४५ वर्षमें मरणको पाप्त होवै॥ १० ॥ पूर्णचंद्रमा मेष राशिका लग्नमें शुभदृष्ट होवै तो ऐसे योगमें उत्पन्न मनुष्य राजा होवै परंतु उसे पापग्रह न देखते हों और ४८ वर्ष में मृत्युको माप्त होताहै ॥ ११ ॥ शनैश्चरो लग्नगतः सहायस्त्वन्येन चन्द्रो व्ययभेष्टमे वा।वेदां- तविज्ञानसुशीलवृत्तो जातस्तु मृत्युं नयनेषु वर्षे ॥ १२॥ चापे गुरौ लग्नगतेष्टमस्थे भौमे सराहौ सुनिबाणवर्षे॥ रन्ध्रेश्वरे काम- गते शशांके पापान्विते षण्मृतिगेष्टबाणे ॥ १३॥संरधपे देवगुरौ विलग्ने कुंभे सपापे यदि केन्द्रराशौ।। शास्त्रार्थवेत्ता खलु पुण्यवांश्ध जातस्तु षष्टया निधनं प्रयाति॥१४॥ शनि किसी ग्रहके साथ लग्नमें होवै चंद्रमा ८ वा १२ भावमें होवे तो वेदांतके ज्ञानसे उत्तम स्वभाव एवं चरितवाला होव और ५२ वर्षमें मृत्यु पावै॥१२॥धनका बृहस्पति लग्नमें अष्टममें मंगल राहुसहित होवै तो ५७ वर्षमें और अष्टमेश सपम चंद्रुम्रा पापयुत ६।८ भावमें होवै तो ५८ वर्षमें मरे॥ १३॥।गुरु लन्नमें अष्टमेश सहित होवै अथवा कुंभका गुरु पाप- ग्रह सहित केन्द्रमें होवे तो शास्त्रोंका अर्थ जाननेवाला तथा पुण्यवान् होवै और ६० वर्षमें मृत्यु पावै ॥ १४ ॥ केन्द्रे सपापे तनुपे व्ययस्थे लग्नेश्वरे रन्ध्रगते हि वह्नौ॥ लोका- न्तरं प्रापयति स्म जातं कुशीलवृत्तं कुलपांसनं तम्॥ १५॥ सौरो विलग्ने हिबुके शशांके कुजे कलत्रे गगने दिनेशे।कवीज्य- सौम्येष्विहतैर्युतेषु नरेश्वरो जीवति वर्षषष्टया ॥ १६॥ केंद्रमें पापसहित लग्नेश हो अथवा सपाप लग्नेश व्ययभावमें हो अष्टमभावमें होवै तो वह मनुष्य दुष्ट स्वभाव चरित्र तथा कुलनाश करनेवाला होवे और अग्निमें जलकर, मरे॥ १५ ॥ उग्नमें शनि, चतुर्थ चन्द्रमा, सप्तममें मंगल, दशममें सूर्य होवै शुक्र बुध गुरुमें से किसीसे युक्त होवै तो राजा होवे६० वर्ष जीवै ॥ १६ ॥ लग्नाभिधाने विबुधारिपूज्ये बुधेज्यचंद्रैः परिदृश्यमाने।जातं नरं भूमिपतिं धनाव्यं करोति षष्ट्या सुतभेन्द्रपूज्ये।। १७ ॥ सिते

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( १९२ ) सर्वार्थचिन्तामणिः। विलग्ने बुधभास्करात्मजौ चतुष्टयस्थाः परमोच्चखेचराः॥ तृती- यलाभर्क्षगतास्तु योगे महीपतिः स्यान्निधनं च षष्टया॥ १८॥ लग्नमें शुक चंद्र बुध गुरुसे दृष्ट होवै तथा गुरु पंचममें होवै तो मनुष्यकोः राजा एवं धनाव्य करताहै और ६० वर्ष आयु होतीहै॥ १७ ॥ शुक लग्नमें होवै बुध शनि केन्द्रमें होवैं और परमोच्च राशिगत ग्रह ३।११ भावमें होवैं तो ऐसे योगमें मनुष्य राजा होताहै और ६० वर्ष आयु होतीहै ॥ १८ ॥ होराजन्माधिनाथौ निधनसुपगतौ मृत्युनाथे च केंद्रे योगे जातो नरोस्मिन् जनयति नरपं कीर्तिवित्तान्वितं च । पष्टचां षड्- भिर्युतायां निधनमभिहितं नंदकोक्ते द्विनिन्नम् ॥वर्षे निंशेथ वा स्यात्खिलमिति खचरैजायते पार्थिवेन्द्रः ॥ १९॥ नक्षत्रना- थसहितः सविता नभस्थः सौरिर्विलग्नसहितो हिबुके सुरेज्यः॥ अस्मिन् योगे जायते यो मनुष्यः क्षोणीपतिर्नैधनमष्टषष्ट्या ॥ २०॥। जीवे विलग्े बुधसूर्ययुक्ते मीने शनौ द्वादशगे हिमांशौ । जातो योगे चार्थवान्सौख्यभाक् च जीवेत् षष्टया घट्सहा- येन जातः। २१।। लग्नेश तथा तत्काल होरेश अष्टम स्थानमें होवें अष्टमेश केंद्रमें होवै ऐसे योगमें जिसका जन्म होवै तो वह कीर्ति एवं धनयुक्त राजा होताहै ६६ वर्षमें उसकी मृत्यु होतीहै नंदकोक्त मतसे ६० वर्ष आयु इस योगमें कहीहै राजा होना उसके मतसे भी है॥ १९ ॥ सूर्य चंद्रमा सहित दशम भावमें शनि लग्नमें गुरु चौथा होवै इस योगमें जो मनुष्य जन्मे वह राजा होताहै तथा ६८ वर्ष आयु होतीहै॥ २०॥ लग्नमें गुरु बुध सूर्यसहित होवे मोनका शनि किसी भावमें हो चंद्रमा द्वादश होवे इस योगमें उत्पन्न मनुष्य धनवान् सुखी होताहै और ६६ वर्षपर्यत जीता रहे ॥ २१ ॥ चंद्रे विलग्ने स्वगृहं प्रयाते नीचे शनौ सप्तमगे च सूर्यें।। अस्मिन् जातो मानुषो ज्ञानिमुख्यो जीवेत्षष्टिः पंचभिः संप्रयुक्तः।। २२॥ नीचे मंदे केन्द्रगे वा त्रिकोणे सौम्ये केंद्रे भास्करे वा ससौम्ये॥ योगे जातः पंडितो धर्मशीलो ज्ञानी प्राज्ञ: सप्तेर्वैत्सराणामू॥।२३। चंद्रमा कर्कका लग्नमें नीचका शनि सप्तम सूर्य हो इस योगमें उत्पन्न मनुष्य ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ होवै और ६५ वर्ष आयु होवे ।। २२ ॥ नीचका शाने केन्द्र वा त्रिकोणमें, शुभग्रह

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भाषाटीकासहित:। (१९३ ) केंद्रमें अथवा बुधसहित सूर्य केन्द्रमें होवे तो इस योगमें उत्पन्न मनुष्य धर्म करनेवाला पंडि- त एवं ज्ञानी होताहै और ७० वर्षपर्यैत जीताहै ॥ २३॥ प्रबले केंद्रगे सौम्ये निधने सौम्यवर्जिते॥ लग्नाधिपेन दृष्टशे- त्पापैजीवति सप्ततिम् ॥२४॥ पंचमस्थे धरासूनौ नीचे मंदेस्तगे रवौ॥ अस्मिन् जातो मनुष्यस्तु सप्तत्या निधनं व्रजेत् ॥२५॥ इत्येवं बहुधा मया निगदिता योगास्त्वसंख्या इमे ये प्रोक्ता यवनादिभिर्मुनिगणैर्निश्चित्य योगान् स्थितान्। ज्ञात्वा सम्य- गुदाहरंति मनसा ते यांति कीर्तिम्परामेवं प्रश्नविधौ सुजन्मसमये वैवाहिके कर्मणि ॥ २६॥ बलवान् शुभग्रह केंद्रमें होवे धनस्थानमें शुभग्रह न होवै लगेशसे दृष्ट न हो पापदृष्ट होवे तो ७० वर्ष बचे॥ २४॥ मंगळ पंचमभावमें शनि नीचराशिमें सूर्य सप्तमभावमें होवे इस योगमें उत्पन्न मनुष्य ७० वर्षमें मरे ॥ २५ ॥ ग्रंथकर्ताका कथन है कि इसपकार योग मैंने कहेहैं परंतु ऐसे योग असंख्य हैं जो यवनाचार्यादि मुनिगणोंने कहेहैं उनमें जो वर्त्तमान योग हैं उनको मनमें निश्चय करके जो फल कहतेहैं वह परम कीर्तिको पाप्त होतेहैं ऐसे योगोंका विचार जन्ममें पश्नमें और विवाहमें भी करना ॥ २६ ॥ अथ दीर्घायुयोंगा:। दीर्घायुराप्नोति खगाः समस्ताः शुभाशुभाः षद्वनांतरस्थाः॥ लग्नात्तथैवापरभागयुक्ता: शुभाशुभास्तद्विपरीतमन्यत् ॥२७॥ लग्नादिषट्के शुभखेचरेन्द्राः सवें बलाव्यास्त्वपरे तु पापाः॥ प्रदीप्ियुक्तो गुणवान् सुशीलः श्रीमानशीत्या निधनं प्रयाति ॥ २८ ॥ अब दीर्घायुयोग कहतेहैं- शुभाशुभ सभी ग्रह लगनसे छठे भावपर्यैत हों अथवा सप्तमखे व्ययपर्यत होवैं तो दीर्घायु ७० से ऊपर आयु मिलतीहै और प्रकार होनेमें विपरीत फल होताहै। २७ ॥ यदि लग्नसे छठे भावपर्यैत बलवान् शुभग्रह और दूसरे भाग ७ से १२ पर्यंत बळवान् पापग्रह होवैं तो गुणवान् उत्तम स्वभाव लक्ष्मीवान् होताहुआ ८० वर्षमें मरताहै।। २८॥ लगे केन्द्रे शशिसते कोणे चंद्रे शुभे शनौ। जातस्तु देवमुनिभि- वर्षेः क्विश्यत्यतः सुखम् ॥२९॥ ओजराशिगता: सर्वें पूर्णच-

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(१९४) सर्वार्थचिन्तामणिः।

न्हुसमन्विताः॥ओजलगने परं भाग्यं दीर्घमायुरुपैति सः।३०॥ समराशिगता: सर्वे पूर्ण चंद्रसमन्विताः ॥ त्त्रीयास्तु जननं युग्म- लग्ने भाग्यसुपैति सा ॥ ३१॥ भाग्ययोगेषु दीर्घायुर्वदन्ति यव- नादयः ॥ तत्पथक पृथगेवाहुर्वराहमिहिरादयः ॥ ३२ ॥ उभ्नमें वा अन्यकिसी केन्द्रमें बुधहो ५। ९ भावमें चंद्रमा दशममें शनि होवै तो मनुष्य ४० वर्षपर्येत केशी उपरांत सुखी रहे॥ २९ ॥ पूर्णचंद्रमा सहित सभी ग्रह विषम राशियोंमें होवें लग्नमेमी विषमराशि होवे तो परम ऐश्वर्य तथा दीर्घायु मिलतीहै॥ ३०॥ समस्त ग्रह पूर्ण चंदमासहित समराशियोंमें होवैं समराशिही लग्नमें होवे तो ऐसे योगमें स्त्रियोंका जन्म भाग्य एवं आयु देनेवाला होताहै ॥३१॥ भाग्ययोगोमें दीर्घायुभी होनी यवनादि कहतेहैं परंतु वराहमिडिरादि उनको अलग २ कहतेहैं क्योंकि कोई धनहीनभी दीर्घायु होतेहैं॥ ३२ ॥ यत्र तत्र तयोरयोंगस्तदिष्ट मम संमतम्॥ कदाचित् कांतयोयोग: सर्वथा न भवेत्तदा ॥ ३३ ॥ अ्रंथकर्ताकी संमति है कि जहां कहीं भाग्य और दीर्घायु योग मिलतेहें तहां ऐश्वर्य और दीर्घायुभी होतेहैं परंतु ऐस योग कदाचित् मिलतेहैं सर्वथा नहीं होते राजयोग जुदेहैं दीर्घायु जुदेहैं जहां धनैश्वर्य सहित दीर्घायु कहीहै तहांही दोनोंकी माप्ति है और राजयोग एककाही फल होताहै इसीलिये पहिले और आधेभी वैसे योग पृथक् इस ग्रंथमें लिखेहैं॥ ३३ ॥ जीवे सचंद्रे केन्द्रस्थे सौम्यदष्टे परे ग्रहाः॥ दशमात्परतो युक्ता- स्त्वशीत्या निधनं भवेत् ॥ ३४ ॥ चतुष्टयगता: सौम्या: पापा- श्वाष्टभवर्जिताः ॥ चंद्रो विलग्नात्षष्ठस्थः षडशीत्या यमं व्रजेत् ॥३५॥ पापास्त्रिलाभषष्ठस्थाश्चंद्रः षष्ठाष्टमं गतः ॥ केंद्रे गुरौ

गुरु चंद्रमासहित केन्द्रमें शुभदृष्ट होवै औौरं सभी ग्रह दशमभावसे ऊपर ११। १२ में होवैं तो ८६ वर्षमें मृत्यु होवै।। ३४॥ शुभग्रह केन्द्रमें होवैं पापग्रह अष्टमभावमें न होवें चद्रमा लग्नसे छठे भावमें होवे तो ८६ वर्षमें यमपुर जावै॥ ३५ ॥ पापग्रह ३। ११।६ भावोंमें चंद्रमा ६ । ८ में और गुरु केन्द्रमें होवै तो तीनहजार ग्रामके अधिपति और दीर्घायु भी होतेहैं ॥ ३६ ॥ लग्नात्रिकोणे निघनायकेंद्रे ग्रहास्य: पंच पयोधिसंख्याः।। जातः स्रिियं प्राप्य जितेंद्रियस्तु जीवेत्स यत्नाव्ृपतिः परे हि॥ ३७॥

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भवाटीकासहित:। (१९५ ) जीवे लग्नेश्वरात्केन्द्रे केन्द्रकोणविवर्जिताः ॥ पापाः सुखानि सत्वात्तु जीवेद्वर्षशतं नरः॥३८॥ जीवे लग्नेशवरात्केन्द्रे नियति: सप्ततिः परा॥ ३९॥ लन्नसे ५।९।८।१।४। ७।१० भावमेंसे किसीमें तीन चार वा पाँच ग्रह होवें तो मनुष्य स्त्री पायकेभी जितेद्रिय होवै दीर्घजीवीभी होवै कोई आचार्य ऐसे योगमें रा। होना भी कहतेहैं॥ ३७॥ गुरु लग्नेशसे केन्द्रमें होवे, पापग्रह केन्द्रकोणमें न होवें तो सुखस पुष्टिसहित सौवर्ष जीवै।। ३८ । केवल गुरु लग्नेशसे केंद्रमें ७० वर्ष जिलाताहै॥ ३९ ॥ केन्द्रे गुरौ लग्नगते दिनेशे भूसनुयुक्ते यदिवा मृतिस्थे॥ जातः श्रियं प्राप्य गुणाधिकारी शतं तु जीवेच्छरदां विशेषात्। ॥ ४० ॥ मीनांत्यलग्ने खचरैश्चतुर्मिः केंद्रस्थितैनांगशत स जीवेत॥ निशाकरे लग्नगते स्वभागे मीनस्थिते वा यदि वा कुलौरे॥ ४१॥ ग्रहैर्विहीने खचरैश्चतुर्मिः केंद्रस्थितैनागशतं स जीवेत्।। सिंहे विलग्ने खचरैश्चतुर्मिस्त्रिकोणगरजीवतितावदेव ॥४२।। गुरु केन्द्रमें सूर्य लग्नमें मंगलसहित अथवा सूर्य मंगळ अष्टममें होवैं तो मनुष्य लक्ष्मी पायके गुणोंका अधिकारी होवै विशेषतः ८ सौ वर्षपर्यत जीवै॥ ४० ॥ लग्नमें मीन राशि अंत्याश होवै और केंद्रमें चार ग्रह होवैं तो सौ वर्ष बचे, चंद्रमा लग्नमें कर्काशकी मीन वा कर्कका होवै।। ४१ ॥ उसके साथ कोई ग्रह न होवै और केन्द्रमें चार ग्रह होवें तो सो वर्ष बचे, अथवा सिंहलगसे ४ ग्रह त्रिकोण ५/९ में होवें तोभी वही फल होगा॥४२॥ त्रिभिग्रहैः स्वोच्चगतैर्विलग्ने वृषे कुलीरे सगुरौ तथैव॥ मृगे कुजे कर्किणि देवपूज्ये केंद्रेषु शेषा: परमायुरत्न ॥४३॥ भृगौ चतुर्थे सगुरौ विलये सेन्दौ शनौ कर्मणि पापहीने।। जातो नरोस्मिन् सक्षुपैति दीर्घमायुश्च विर्द्यां यशसा समेताम् ॥४॥ उग्नमें वृष वा कर्क राशि गुरुसहित होवे और तीन ग्रह उच्चके हो अथवा मकरका मंगळ कर्कका गुरु होवै अन्यग्रह केन्द्रोंमें होवैं तो यहां भी परमायु होती है॥ ४३॥ शुक्क चतुर्थ होवै, लन्न गुरुसहित होवै और चंद्रमासहित शनि दशम भावमें पापरहित होवे ऐखे योगमें उत्पन्नभया मनुष्य विद्या तथा यशसहित दीर्घायु होताहै ॥ ४४ ॥ लग्े मृगापराद्े तु पूर्वार्द्धे भौमसंयुते॥ लग्ने शशांकसहिते गुरौ केंद्रे परं वयः॥ ४५॥ नृयुग्मपूर्वार्द्गते भौमे लगे परार्ईके।

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(१९६ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

चापपूर्वार्द्धगे जीवे लग्ने त्वपरभागगे॥ ४६॥ सौरौ केन्द्रे भृगा: पुत्रे सचंद्रे त्वपरं वयः॥ कन्यापूर्वार्द्धगे सौम्ये परार्द्ें लग्नमा- गते ॥४७॥ गहैस्त्रिंभिवा स्वोच्चस्थैः शतवर्षात्परं वयः॥ पापासिरषष्ठलाभस्थाः सौम्ये लग्नांत्यभागके॥४८॥ लग्ने सौरौ गुरौ केंद्रे भृगौ वा त्वपरं वयः॥४९॥ उग्न मकरका परार्ध १५ अंशसे ऊपर होवै उसीके पूर्वार्द्ध १५ अंशसे भीतर मंगल लग्नमें होवै और चंद्रमासहित गुरु केद्रमें होवै तो परम आयु १२० वर्षकी होवै ॥। ४५॥ मंगल मिथुनलम्नके पूर्वार्द्धमें हो, लग्न मिथुनका उत्तरार्द्ध हो, यद्ा धनके पूर्वार्द्धमें गुरु उत्तरार्द्धमें लग्न होवै॥। ४६ ॥ शनि केंद्रमें शुक चंद्रमासहित हेवि तो परमायु होवै कन्याका उत्तरार्ई ळग्न पूर्वारई्धमें बुध होवै॥। ४७॥ अथवा तीन ग्रह उच्चमें होवें तो सौसे अधिक आयु होवै पापग्रह ३। ६। ११ भावोंमें हों बुध लग्नके अंत्यभागमें हो। ४८॥ लग्नमें शनि केंद्रमें गुरु अथवा शुक् होवै तो परमायु भोगे ॥। ४९ ॥ नृयुग्मपूर्वार्द्धगते धरात्मजे लग्ने परार्े सगुरौ विशेषात्॥ केंद्रे- च्छविद्धयां सहितेत्र जात: शतात्परं जीवति पुण्यभाक् च।।५। अनिमिषपरमांशके विलग्ने शशितनये गवि पंचवर्गलिते॥ भवति हि परमायुषः प्रमाणं यदि सहिता: सकला: स्वतुंगभेषु॥५१॥ मिथुनके पूर्वार्द्धमें मंगल उत्तरार्द्धमें लग्न गुरुसहित होवै विशेषतः केन्द्रमें शुक बुध होवैं तो मनुष्य सौवर्षसे ऊपर जीवै पुण्यवान् भी होवै॥ ५०॥ मीन मीनाशकलग्रमें हो वृषक चंद्रमा पांचवर्ग होरा द्रेष्काणादियोंमें अपने वर्गका हो अन्य सभीग्रह उच्चराशियोंमें होवैं तब परमायु १२० का प्रमाण दशागणितसे होताहै ॥ ५१ ॥ अथाऽमितायुर्योगा: । गुरुशशिसहिते कुलीरलग्ने शशितनये भृगजे च केंद्रयाते॥ भव- रिपुसहजोपगैश्र शेषैरमितमिहायुरनुक्रमाद्विना स्यात् ॥ ५२॥ जिस योगमें आयु प्रमाणसेभी अधिक होजातीहै उसे कहतेहैं कि गुरु चंद्रमा सहित कर्क- लम हो बुध शुक केंद्रमें हों अन्य ग्रह सूर्य मंगल शनि ३। ६ । ११। मेंसे किसीमें हों तो आयुपमाण जो केवल गणितके लिये १२० वर्ष कहाहै उससेभी अधिक आयु मिलेगी वायुका न्यूनाधिक करना मनुष्यके हातमें है यदि आचारवान् संयमी योगाभ्यासरी पुण्यवान् भी रहे तो गणितागत आयुसेभी अधिक जी सकताहै यदि अनाचारी व्यभिचारी असंयमी दुष्टकर्मा पापी रहे तो गणितागत आयुको भी नहीं भोग सकता "परदारानायुष्यन्त"यह श्रुति है कि परखी- गमन करनेवाले पूरी आयु नहीं भोगते इत्यादि अनेक प्रमाण ग्रंथांतरोंमें हैं ॥ ५२ ॥

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भावाटीकासहित:। (१९७ ) लग्ने घटे देवगुरौ झपस्थे व्यये भृगौ वासरपे विलगने॥। जात: परं ब्रह्मपरं प्रयाति रसायनादयैर्देशवर्धितं तत् ॥५३॥ सिंहे विलग्ने सगुरौ भृगौ तु कुलीरगे सोमसुते धनस्थे॥ पापग्रहैः षद्त्रिद- शायगैश् सहस्रवर्ष समुपैति जातः।।५४॥ लग्न कुंभ बृहस्पति मीनका शुक व्ययभावमें और सूर्य लनमैं होवे तो रसायन सेवन आदिसे गणिनागत आयुसे दशगुणी आयु होतीहै॥। ५३ ॥ सिंहलन्नमें वृहस्पति कर्कका शुक चंद्रमा धनस्थानमें और पापग्रह ६। ३ । ११ में होवें तो मनुष्य एकहजार वर्ष जीवेगा ॥५४॥ दिनेशभौमौ हिबुके विलग्ने मंदान्विते भोगिपतौ व्ययस्थे। शेषग्रहैर्मृत्युगहोपपन्नैः सहस्रवर्षदयमत्र जातः ।।५५॥ अजे विलग्ने च रवौ सुखस्थे माने यमे भूमिसुते कलत्रे॥। रिष्फेशशांके परिपूर्णवीर्यें रसायनादयैर्द्विस हस्र मायुः॥५६॥ वृषे शशांके तनु- गे विशेषात्समन्विते सौम्यसुरासुरेज्यैः ॥ जातस्तु देवेन्द्रपद प्रयाति शेषग्रहैरर्थसमन्वितैर्वा ॥५७॥ सूर्य मंगल चौथे शनि ळग्नमें राहु व्ययभावमें हो शेष ग्रह अष्टमस्थानमें होवै तो मनुष्य दो सहस्रवर्ष जीवै।। ५५॥ मेष लग्न चौथा सूर्य दशम शनि सप्तम मंगल बारहवां चंद्रमा पूर्ण- 你 傳 彩 彩 बली होवै तो रसायन तथा आदिपदसे संयम योगाभ्यास सत्यव्रतादिसे दो हजारवर्ष आयु होवे॥। ५६ ॥ चंद्रमा वृषका विशेषतः लग्नमें होवै बुध गृरु गुक्से युक्त होवै शेषग्रह धनभावमें होवें तो मनुष्य इंद्रपदको प्राप्त होवै॥ ५७॥ जीवे विलग्रे स्वगृहं प्रपन्ने शून्ये नृयुग्मे भृगुजे च केन्द्रे।। रसायनादयैर्बहुवर्षजीवी जातस्तु देवेन्द्रपदं प्रयाति॥ ५८॥एक- क्षेगव्योम चरैरशेषस्त्रिकोणगैः केंद्रचतुष्टयस्थैः॥ जातः शिशुर्न- श्यति जातमात्रो जीवेद्युगांतं यदि मंत्रसिद्धया॥५९॥ बृहस्पति अपने घरका लग्न वा दशमभावमें हो तथा मिथुनका शुक केन्द्रमें होवै तो मनुष्य रसायनादिमयोगोंसे बहुत वर्ष बचे और इंद्रपदकोभी प्राप्त होताहै॥ ५८॥ समस्त ग्रह एकही राशिमें केंद्र वा त्रिकोणमें होवें तो बालक जन्मतेही मरे, यदि मंत्रसिद्धिसे न मरे तो युर्गांतायु होवै ॥। ५९ ॥ त्िकोणे पापनिर्मुक्ते केंद्रे सौम्यविवर्जिते।।निघने पापरहिते जा- तस्त्वमरसन्निमः॥ ६०॥ लगे वृषे शुकयुते गुरौ तु केन्द्रान्विते

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(१९८ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

षट्न्रिदशायसंस्थैः॥रसायनादयैरिह मंत्रसिद्धया जातस्तु देवेन्द्र- पदं प्रयाति ॥ ६१॥ शनौ तुलायां मकरे गुरौ च लग्ने कुलीरे वृषभे शशांके।। जातः सुखी ब्रह्मपदं प्रयाति प्रसाधनादयैरिह मंत्रसिद्धाचा॥ ६२ ॥ त्रिकोण ५।९ में पापग्रह न हों केंद्रोंमें शुभग्रह न हों अष्टम भावमेंमी पापग्रह न होवैं तो मनुष्य देवताके तुल्य होगा॥ ६०॥ वृषलन्नमें शुक् हो गुरु केन्द्रमें तथा अन्यग्रह ६। ३। १० । ११ भावोमें होवें तो मनुष्य रसायनादिसे अथवा मंत्रसिद्धिसे इन्द्रपदको भाप्त होवै॥ ६१॥ शनि तुलाका गुरु मकरका चंद्रमा वृषका और लग्न कर्कट होवै तो मनुष्य योगादिसाधन एवं मंत्रसिद्धिसे ब्रह्मपदको माप्त होताहै॥ ६२ ॥ वर्गोत्तमे लग्नगते कुलीरे केन्द्रे गुरौ भूमिसुते कलते॥ सिंहास- नांशे भृगुजे विशेषाद्रसायनादयैरमितायुरेति॥६३॥ कन्यांत्य- लग्ने सबुधे कलत्रे जीवे यदा गोपुरभाग्ययुक्ते। मृद्ंशके वा दि- ननाथपुत्रे जातस्त्वसंख्यायुरुपैति सूनुः॥ ६४॥ लग्न कर्क कर्काशक होव गुरु केन्द्रमें मंगल सप्ममें होवै विशेषकरिके शुक्र सिंहासनांशकमें होवै तो रसायन आदिसे अमित आयु होतीहै॥ ६ ३ ॥ कन्यालन्न (अंत्यांशक) वर्गोत्तममें बुध होवै सप्तम गुरु गोपुरांशकमें अथवा शनि मृद्ंशकमें होवे तो मनुष्य असंख्य आयु भोगताहै॥ ६४ ॥ देवलोकांशगे शुक्े केन्द्रस्थे धरणीसुते॥ सिंहासनांशके जीवे केन्द्रे जातस्त्वसंख्यकः ॥ ६५॥ उत्तमांशे बुधे केन्द्रे शुके पा- रावतांशके॥ स्वर्गलोके गुरौ केन्द्रे त्वौषधाधैरसंख्यकः ॥६६॥ गोपुरेशे भृगौ केन्द्रे गुरौ पारावतांशक।। त्रिकोणे कर्किलग्े तु यु- गांतं सतु जीवति॥ ६७॥ शुक देवलोकाशकमें मंगल केन्द्रमें गुरु िंहासनांशमें केन्द्रगत होवै तो असंर्य आयु होयै॥। ६९॥ उत्तमांशगत बुध केन्द्रमें हो शुक पारावतांशकमें हो गुरु स्वर्गलोकांशकमें होवै तो रसायन औषधादिसे असंख्यायु होवे॥ ६६॥ शुक गोपुरांशगत केन्द्रमें होवै गुरु पारावतांशकमें त्रिकोणगत हो लग्न कर्के होवै तो युगांत आयु होवै ॥ ६७ ॥ चापांशे कर्किलग्ने च तस्मिन्देवेन्द्रपूजिते॥ त्रिचतुर्मियहैः केन्द्रे जातो ब्रह्मपद लभेत ।६८।। तृतीयका दशे शुके गोपुरादयंशका- न्विते॥ वृषे वर्गोत्तमे लगे गह्मण: परमं पदमू॥ ६९॥ लगे

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भावाटीकासहित:। (१९९ ) शुके गुरौ कामे कन्यायासुडुनायके॥ चापे मेषांशके लगने जातो याति परं पदम्। ७०॥ पंचमे बुघसंयुक्ते गोपुरादयंशका न्विते॥ गुरौ घटे विलग्नेस्मिन् जातो ब्रह्मपदं लभेत् ॥ ७१ ॥ कर्कलगमें धनुरंशक हो तहां गुरु बैठाहो और ३। ४ ग्रह केंद्रमें होवें तो मनुष्य ग्रह्म- पद पावै॥ ६८ ॥ तीसरा वा ग्यारहवां शुक्र गोपुरादि शुभांशकमें होवै वर्गोत्तम वृषलय्न होवै तो मनुष्य ब्रह्मके परमपद्को प्राप्त होवे॥ ६९ ॥ लग्नमें शुक गुरु सप्रम कन्यामें चंद्रमा हो धन लग्नमें भेषांशका होवे तो मनुष्य परमपदको माप्त होवै ॥ ७० ॥ पंचम बुध गोपुरादि अंशकमें होवै गुरु कुंभका लग्नमें होवे तो मनुष्य ब्रह्मपदको माप्त होवै ॥ ७१ ॥ केन्द्रे गुरौ लाभगतेर्कपुत्रे धने रवौ मांदियुते कलने।भाग्ये धरा- सूनुयुतेत्र जातो युगांतकालं समुपैति मंत्रैः ॥७२॥ त्रिकोणगौ जीवबुधौ विशेषाल्लग्ने वृषे तत्र युते धराजे॥ निशाकरे गोपुरभा- गयुक्ते जात: सहस्रद्यवर्षमेति॥७३॥ पक्षे सित जन्म यदा- ह्विकाले केन्द्रे गुरौ वा शशिभे विलग्ने। दारे कुजे भानुसुते सु- खस्थे जातस्तु जीवेदयुता्दसंख्यम्॥७॥ गुरु केन्द्रमें शनि लाभस्थानमें सूर्य धनस्थानमें केतु सप्तममें मंगल नवमस्थानमें होवै तो मंत्रवलसे युगांत पर्यत आयु होवै ।। ७२ ॥ गुरु बुध त्रिकोणमें होवैं वृषळग् हो उसमें मंगल होवै और चंद्रमा गोपुराशमें होवै तो दो सहस्रवर्षकी आयु होवे ॥ ७३॥ शुक्कप- क्षमें दिनका जन्म हो गुरु केन्द्रमें अथवा कर्कका लग्नमें होवे सप्तम मंगल चौथा सूर्य होवे तो दसहजार वर्ष बचे । ७४॥ जीव मंदारशुक्ाणामन्योन्यं केन्द्रसंभवे। त्रिकोणे वा यदा याते जातस्त्वयुतवत्सरः ॥॥ शुभैर्युक्ते चतुष्केंद्रे पापेः षटत्रि- भवान्वितैः॥ सिंहे लगे यदा जातो जीवेत्षडयुतानि सः॥७६॥ गुरु शनि शुक्का अन्योन्य केन्द्रस्थिति संबंध होवै अथवा त्रिकोणमें होवे तो एक अयुतव- प जीवै।। ७५ ।। चारों केंद्रोंमें शुभग्रह होवैं पापग्रह ६। ३। ११ भावोंमें हों लग्न सिंह ह्ोवै तो छः अयुतवर्ष आयु होवै॥ ७६॥ अथ मुनियोग: । कर्क्यादिस्थैग्रहैः सर्वैरगरुचंद्रादिभिर्यदा।शून्यं तैः परमोज्चस्थै- सुनितुल्यो भवेन्नरः॥ ७७॥ शन्यादिभौमपर्यैते लग्नादौ खेचराः शुभा:॥ वैशेषिकांशकयुता जातास्त्वमरसन्निमाः॥७८॥

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(२०० ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

करकसे मकरपर्यत सभी ग्रह गुरु चंद्रादि होवें इस बीच जिनके उच्च हैं वै उच्चराशियोंमें होवें तो मनुष्य मुनितुल्य होवै॥ ७७॥ लग्नसे लेकर कमसे शनि सूर्य चंद्रमा मंगल होवें वैशेषिकांशकोंमें भी होवैं तो मनुष्य देवताओंके तुल्य होवे ॥ ७८ ॥ आकल्पं जीवति नरो मृगे लग्ने कुजादिकाः॥रव्यन्ताः खेचराः सर्वे सोत्थे जीवेहि जन्मनि ॥७९॥ मेषांत्यलगने सगुरौ भृगौ वा निशाकरे गोधनुमध्यमांशे॥ सिंहासनांशे यदि वा धराजे जातस्त्वसंख्याव्दसुपैति मंत्रैः ॥८० ॥ स्थिरे रवौ सोमसुतेन युक्ते चंद्रे वृषस्थे मिथुने च शुके। गुरौ कुलीरे यदि वा विलग्ने शनौ तुलायां मुनिसाम्यमेति॥८१॥ मंगलसे लेकर सूर्यपर्यत ग्रह मकर लग्नमें होवें तीसरे बृहस्पति और दिनका जन्म होवै तो मनुष्य कल्पपर्यत बचता है। ७९ ॥ मेषके अंत्यांश लग्नमें गुरु अथवा शुक्र होवैं चंद्रमा वृषके वा धनके मध्यमांशमें होवै अथवा मंगल सिंहासनाशमें होवै तो मनुष्य मंत्रब- लसे असंख्य वर्षपर्यत बचताहै॥ ८० ॥ सूर्य बुधसहित स्थिरराशिमें चंद्रमा वृषका शुक्र मिथुनका गुरु कर्कटका लग्नमें शनि तुलाका होवै तो मुनितुल्य होवै॥ ८१ ॥ देवलोकांशके चंद्रे भौमे पारावतांशके ॥ सिंहासने रवौ लग्ने जातो मुनिसमो भवेत् ॥ ८२॥ मेषलग्ने रवौ माने जीवे स्वोच्च समन्विते॥ त्रिषडायगते पापे जातो मुनिसमो भवेत्॥ ८३ ॥ चिंतामणौ मया प्रोक्तं संख्यायुश्च मनीषिणाम्॥ यदुक्तं पूर्वकै: सर्वे तत्तदेव मयाधुना।।८४॥ इति श्रीसर्वार्थचिंतामणावायुस्संख्यानिरूपणो नाम द्वादशोऽध्यायः॥१२॥ चंड्मा देवलोकांशकमें मंगल पारावतांशमें सूर्यसिंहासनांशमें लन्नगत होवे तो मनुष्य मुनि तुल्य होवै।। ८२ ॥ मेष लग्न सूर्य दशम वृहस्पति उच्चका और ३। ६ । ११। भार्वोमें पापग्रह होवें तो मनुष्य मुनितुल्य होवै॥ ८३॥ जो यहां आयुसंख्या कहीहै यह विद्वानोंके तुष्टचर्थ जो पूर्वाचायोंने कही है वही समस्त मैंनें यहां कहीहै॥ ८४ ॥ इति श्रीसर्वार्थचिंतामणौ माहीधरभाषाटीकायामायुस्संख्यानि- रूपणाध्यायो दवादशा: ।।१२ ।।

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भाषाटीकासहित:। (२०१ )

त्रयोदशोऽध्यायः॥१३॥ - अथ दीप्ाद्यवस्थाफलविचाराध्यायः। दशानुरोधेन फलं वदंति सुनीश्वरा जातशुभाशुभं तत् ॥ सारं समुद्धृत्य तदेव वक्ष्ये भेदं यथा विस्तरतो दशानाम्॥ १॥ दीपः स्वस्थस्तु सुदितः शांतो हीनोतिदुःखितः ॥ विकलश्च खलः कोपी नवधा खेचरो भवेत् ॥ २॥ उच्चस्थ: खेचरो दीप्: स्वस्थ: स्वक्षेत्रमित्रमे। मुदितो मित्रमे शांतस्त्वपरो हीन उच्यते॥ ३॥ शत्रुभे दुःखसंयुक्तो विकल: पापसंयुतः ॥ खलः पराजितो ज्ञेयः कोपी स्यादर्कसंयुतः ॥४ ॥ पृथक्पृथक फलं तेषां दशाकाल- विशेषतः ॥ तत्र नामानुरोधेन परिपाके वदंति हि॥ ॥ अब दशाफलके लिये दीपादि अवस्था कहतेहैं कि मुनीश्वर दशाके अनुरोधसे शुभाशुभ फल कहतेहैं उनमें सार लेकर विस्तारसे यहां वही विचार कहताहूं ।। १ ।। दीप् १, स्वस्थ २, मुदित दे, शांत ४, हीन ५, अतिदुःखित ६, विकल ७, खल ८, कोपी ९, ऐखे नौ पकार यह होते हैं॥ २॥ अब इनके लक्षण कहते हैं॥ उच्चस्थित ग्रह दीप्- १, अपनी राशिमें स्वस्थ २, मुदित ३, शुभराशिगत शुभयुत शांत ४, नीच राशिमें हीन ५, ।। ३ ।। शत्रुराशिमें दुःखी ६, पापयुक्त विकल ७, युद्धमें पराजित खल ८, सूर्ययुक्त अस्तंगत कोपी ९ ॥ ४ ॥ इनके पृथक् फल विशेषकरके दशासमयमें नामके गुणानुसार परिणाममें कहते हैं ॥ ५ ॥ पाके प्रदीपस्य धराधिपत्यमुत्साहशौर्य धनवाहनं च ॥ स्त्रीपुत्र- लाभं सुखबंधुपूजे क्षितीश्वरान्मानसुपैति विद्याम्।।६।। स्वस्थस्य खेटस्य दशाविपाके स्वास्थ्यं नृपाल्लब्धधनादिसौख्यम्। विद्या- यश: प्रीतिमहत्त्वरतां च दारार्थभूम्यात्मजघर्ममेति॥७॥ सुदा- न्वितस्यापि दशाविपाके वस्त्रादिभूगंधसुतार्थधैर्यम्। पुराणधर्म- श्रवणादिगानदानादियानांबरभूषणाप्तिम्॥।८।। दीप्ादियोंके पृथक् फल कहतेहैं मदीप् ग्रहके दशामें राजत्व, उत्साह, शौर्य ( वीरता ), धन, वाहन, खत्ीपुत्र ळाभ, सुख, बंधु वर्गमें सन्मान, विद्या और राजाबे सन्मान मिळतेहैं

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(२०२ ) सर्वार्थचिन्तामणि:।

॥ ६ ॥ स्वस्थ ग्रहकी दशामें आराम मिले, राजासे मिले धनादिका सुख, विद्या, यश, पसन्नता, बढ़प्पन, स्त्री, धन, भूमि, पुत्र और धर्म मिलतेहैं।। ७ ।। मुदितावस्थावाले ग्रहकी दशामें वस्चादि, भूमि, सुगंधि वस्तु, पुत्र, धन, धैर्य, पुराणधर्म सुनना आदि, गायन, दान, सवारी, वस्त्र, भूषणादि मिलतेहैं ॥ ८ ॥। दशाविपाके सुखधैर्यमेति शांतस्य भूपुत्रकलत्रयानम्॥ विद्या- विनोदान्वितघर्मशास्त्रं बह्वर्थदेशाघिपपूज्यतां च॥। ९॥ स्थान- च्युर्ति बंधुविरोधितां च हीनस्य खेटस्य दशाविपाके।। जीवत्यसौ कुत्सितहीनवृत्त्या त्यक्तो जनै रोगनिपीडितः स्यात्॥ १० ॥ दुःखान्वितस्यापि दशाविपाके नानाविधं दुःखमुपैति नित्यम्। विदेशगो बंधुजनैर्विहीनश्वौरादिभूपैर्भयमाभिशस्तः॥ ११॥ शांत ग्रहकी दशामें सुख, धैर्य, भूमि, पुत्र, स्री, वाहन, विद्या, चर्चायुक्त, धर्मशास्त्र- बाध, बहुत प्कार प्रयोजनसिद्धि, और राजासे पूज्यता मिळती है ॥ ९॥ हीनग्रहकी दशामें स्थानहानि, बंधुविरोध होतें हैं तथा निंद्य और हीन वृत्तिसे आजीवन मिलताहै अपने मनु- ष्योंसे त्यक्त और रोगपीडित रहताहै॥ १० ॥ दुःखयुक्तकी दशामें अनेक प्रकारके दुःख नित्य मिलते हैं विदेशगमन बंधुजनसे हीन नर रहे चौर आदि वा राजासे भय एवं अप- बाद पावै ॥ ११ ॥ वैकल्यखेटस्य दशाविपाके वैकल्यमायाति मनोविकारम् ॥ पित्रादिकानां मरणं विशेषात्स्त्रीपुत्रयानांबरचोरपीडाम् ॥ १२॥ दशाविपाके कलहं वियोगं खलस्य खेटस्य पितुर्वियोगम्॥ शत्रुं जनानां धनभूमिनाशसुपैति नित्यं स्वजनैश्च निंदाम्॥१३॥ कोपान्वितस्यापि दशाविपाके पापं समायाति बहुप्रकारैः ॥ विद्यायशःस्त्रीधनभूमिनाशं राजां च वित्तं हरतेऽत्र योगी॥ १४॥ विकल ग्रहकी दशामें विकलता मनमें विकार पिता आदियोंका मरण स्त्री पुत्र वाहन हानि चोरसे पीडा मिले।। १२ ।। सलग्रहकी दशामें कलह, अपने मनुष्योंका वियोग पिता का वियोग अनेक शत्रु, धन भूमिका नाश और अपने मनुष्योंसे निन्दा मिले ॥ १३ ॥ कोपयुक्तकी दशामें बहुत प्रकारसे पाप आताहै विद्या यश स्त्री धन भूमिका नाश राजासे वित्त- हरण यद्ा राजाऑकाभी धन योगी हरण करे ।। १४ ॥। इति दीप्ादिग्रहफलविचारः ॥

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भषाटीकासहित:। (२०३ )

अथ दशाफलानि। भानोर्दशायां परमोञ्चगस्य भूम्यर्थदारात्मजकीर्तिशौर्य्यम्॥। संमाननं भूमिपतेः सकाशादुपैति संचारविनोदगोष्ठीम्॥१॥ उच्चान्वितस्यापि रवेर्दशायां गोवृद्धिधान्यार्थपरिभ्रमंच।।संचा- रयुग्बंधुजनैर्विरोधं देशाद्विदेश चरति प्रकोपात् ॥ २॥ प्रच- ण्डवेश्यागमनं क्षितीशादुपैति वृत्तिं रतिकेलिमानम्॥ मृदंगभेरी- रवयुक्तयानमन्योन्यवैरं लभते मनुष्यः ॥ ३॥ आरोहिणी वासरनायकस्य दशा महत्वं कुरुतेतिसौख्यम् ॥ परोपकारं सुन- दारभूमिगोवाजिमातंगकृषिक्रियादीन्॥४ ॥ उच्चराशिके परमांश १० अंशपर सूर्य होवै तो उसकी दशामें भूमि, धन, ख्त्री, कीर्ति, शौर्य राजासे सन्मान और टहलने घूमने आदि शुभ संचार (सगल) मंत्रणाकी गोष्टी (सभा) प्रवेश इतने मिळतेहैं ॥। १ ॥ केवल उच्चराशिमात्रमें होवै तो उसकी दशामें गौकी वृद्धि अन्नधन भ्रम गमागमादि होवै इधर उधर फिरना पडे बंधु जनोंसे विरोध होवै कोपसे एकदेशसे दूसरे देशको चला जाताहै॥ २॥ दुष्ट वेश्याका गमन होवै राजासे आजीवन मिले कामकीडा तथा मान मिले, मृंदग तुरही आदि बाजे जिसके आगे बजते हों ऐसी सवारी मिले आपुसमें परस्पर वैरभी मनुष्य पाताहै ॥ ३ ॥ यदि सूर्य (आरोही) उच्चमें चढ़रहा होवै तो उसकी दशामें वडप्पन मिलताहै सुख बहुत करताहै दूसरेका उपकार होताहै पुत्र स्त्री भूमि गौ घोडा हाती और कृषि कर्म आदि मिलतेहैं ॥ ४ ॥ दशावरोहाहिननायकस्य कृषिक्रिया वित्तगृहेष्टनाशम् ॥ चोरा- ग्निपीडां कलहं विरोधं नरेशकोपं कुरुते विदेशम्॥॥। नीचस्थितस्यापि रवेर्विपाके मानार्थनाशं क्षितिपालकोपात्॥ स्वबंधुनाशं सुतमित्रदारैः पित्रादिकानामपकीर्तिमेति ॥६॥ अत्यंतनीचान्वितसूर्यदाये विपत्तिमापोति गृहच्युति च॥ विदेशयानं मरणं गुरुणां स्त्रीपुत्रगोभूमिकृषेर्विनाशम्।।७॥ सूर्यकी दशा (अवरोही) उचचसे उतरकर नीचमें जानेवालीमें कृषिकर्म अन्न, धम, घर, मियवस्तुका नाश करतीहे चोरकी अग्निकी पीडा कलह वैर राजकोप और विदेशनणम करतीहै॥ ५॥ नीच राशिगत सूर्यकी दशामें राजकोपसे मान एवं धनका नाश अपने पंधु-

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(२०४ ) सर्वार्थचिन्तामणिः। का नाश, पुत्र, मित्र, खत्रीसे हानि, पिता आदियोंकी अपकीर्ति पाताहै॥ ६ ॥ अत्यंत नीच तुळाफे १० अंश पर स्थित सूर्यकी दशामें विपत्ति पाताहै घरबार छूट जाताहै विदेश गमन पिताआदि गुरुजनोंका मरण और स्त्री, पुत्र, गौ, भूमि, कृषिका नाश होताहै।। ७।। मूलत्रिकोणस्थरवेर्विपाके क्षेत्रार्थदारात्मजबंधुसौख्यम्॥ राजा- श्रयं गोधनमित्रलाभं स्वस्थानयानादिकमेति राज्यमू॥८॥ स्वक्षेत्रगस्यापि रवेर्दशायां स्वबंधुसौख्यं कृषिवित्तकीर्तिम्॥ विद्यायशःप्रार्थितराजपूजां स्वभूमिलाभं समुपैति विद्याम्॥९॥ अपने मलत्रिकोणमें स्थित सूर्यकी दश्ामें खेती, धन स्त्री, पुत्र, बंधुसे सुख राजाक आश्रय गौ, धन, मित्र, अपनास्थान वाहनादि और स्वकुलानुमान राज्य पाताहै ॥ ८ ॥ अपने क्षेत्रगत सूर्यकी दशामें अपने बंधुजनोंसे सौख्य कृषि, धन, कीर्ति, विद्या, यश, मांगी- हुई राजासे पूजा अपनी भूमि एवं विद्याको पाताहै ।। ९ ।। दशाविपाके ह्यघिशत्रुगस्य रवेः प्रनष्टार्थकलत्नपुत्रः॥ गोमित्र- पित्रादिशरीरकष्टं शत्रुत्वमायाति जनैः समंतात् ॥ १०॥ सप- लराशिस्थितसूर्यदाये दुःखी परिभ्रष्टसुतार्थदारः॥ नृपाग्निचौरे- र्विपदं विवादं पित्रोर्विरोधं च दशांतमेति॥११॥ अधिशत्रु राशिगत सूर्यकी दशामें धन, स्त्री,पूत्र नष्ट होवें गौ, मित्र, पिता आदिके शरीरमें कष्ट होवे सभी ओरसे मनुष्योंके साथ शत्रुता होवै ॥ १० ॥ शत्रु राशिगत सूर्यकी दशामें दुःखी रहे पुत्र, धन, स्त्री नष्ट होवें राजा, अगनि, चोरसे विपत्ति मिले विवाद होवै इस दशामें माता पितासे विरोध पावै ॥ ११ ॥ स्वमित्रराशिस्थित सूर्यदाये स्वभृत्यपित्रात्मजराजपूजाम्॥स्वगेः हवासं स्वजनस्य संगं यानादिभूर्षांबरतान्नलाभम् ॥१२॥ अत्यंतमित्रर्क्षगतस्य भानोर्दशाविपाके ह्यतिसौख्यमेति ॥स्त्री- पुत्रधान्यार्थमनोविलासरथादियानांबर भूषणानि ॥ १३॥ मित्रराशिगत सूर्यदशामें अपने सेवक पिता पुत्र राजासे सम्मान पूजा मिले अपने घरमें रहै अपने मनुष्योंका संग मिले सवारी आदि तथा भूषण वस्न तांबेका लाभ होवै॥। १२ ॥ वषिमित्र राशिगत सूर्यकी दशामें अतिसुख मिले सत्री, पुत्र, अन्न, धन, मनका विलास रथ आदि सबारी और वस्त् भूषण मिलें॥ १३ ॥

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भाषाटीकासहित:। (२०५ ) समक्षगस्यापि रवेर्दशायां समंजनैः स्यात्कृषिभूमिधान्यम्॥ गोवाजियानांबरदेहसौख्यं स्त्रीपुत्रदोषं रणपीडितः स्यात्॥१४॥ नीचान्वितस्यापि रवेर्दशायां नीचानुवृत्त्या कुनखवी कुशीलः। स्त्रीपुत्रधान्यार्थपशुक्कियादिमनोविकारं समुपैति हेयम्॥१८॥ उच्चान्वितस्यापि रवेर्दशा्यां मनोभिलावं लभते स्ववृत्त्या॥ तीर्थाभिषेकं हरिकीर्तनं च प्राकारकूपादिपुराणशास्रम्॥ १६॥ सम ग्रहके राशिगत सूर्यकी दशामें मनुष्योंके साथ समता रहे कृषि, भूमि, अन्न, गौ, घोडे, सवारी, वस्न मिलें शरीर सुख मिले स्त्रीपुत्रोंको दोष उत्पन्न होवै रणसे पीडित रहे॥ १४॥ नीचगत ग्रहसे युक्त सूर्यकी दशामें नीचवृत्तिसे आजीवन होवे कुनखी होवै दुष्टस्वभाव रहे स्ती, पुत्र, अन्न, धन पशुक्रिया आदिमें मनोविकार रहे इनका त्याग होवै॥ १५॥ उच्चगत ग्रह- युक्त सूर्यकी दशामें अपनी वृत्तिसे मनोभिलाष पावै तीर्थस्नान मिले हरिका कीर्तनभी होवे परिखा कूप आदिका बनाना पुराण शास्त्रकी चर्चा मिलै॥ १६ ॥ पापान्वितस्य द्युमणेर्दशायां नित्यं मनः क्विश्यति देयबुद्दया॥ कुभोजनं कुत्सितवस्त्रपाने कुशीलवृत्त्या त्वधनं कृशत्वम्॥१७।। दिनाधिनाथस्य शुभान्वितस्य पाके सुखं भूमिधनादिवस्रम्। इष्टैर्विलासं स्वजनैः समाजं कल्याणवाग्जालविनोदगोष्ठीमू।१८।l पापयुक्त सूर्यकी दशामें बहुत व्ययकी बुद्धि यद्वा त्यागबुद्धीसे सर्वदा मनमें क्लेश रहै कुभो- जन कदन्न आदि कुवस्त्र आदि निषिद्धपान मिलें दुष्टशीळ दुष्टवृत्तिसे निर्द्धनता और कृशत्व होवै॥ १७॥ शुभयुक्त सूर्यकी दशामें सुख मिले भूमि धन वस्त्रादि मिलें मनोनुकूल मनुष्योंसे विलास अपने मनुष्योंका समाज मंगल वाणीवाणीके जालके विनोद और सभ्यत्व मिले॥१८॥ करोति भानुः शुभवीक्षितश्रवेद्विद्यायशःस्त्रीसुतवाग्विलासम्॥ कांतिप्रतापं रतिकेलिसौख्यं पित्रोः सुखं भूपतिमाननंच।१९॥ पापेक्षितस्यापि सहस्रभानोर्दशाविपाके परमं तु दुःखम्॥ पित्रो- र्विनाशं सुतदारकष्ट चौराग्निभूपालकृतं कृशत्वम्॥ २०॥ शुभ ग्रहद्दष्ट सूर्यकी दशामें विद्या, यश, स्त्री,पुत्र मिळैं बातचीतमें विलास होवे कांतिबढे पताप बढ़े फामक्ीडाका सुख मिळे॥ १९॥ पापदृष्ट सूर्यकी दशामें परमदुःख मिले मातापिताका विनाश स्त्री पुत्र कष्ट चोरसे अभिसे भय रांजासे भय मिले और शरीरमें कृशता आवै॥।२०॥

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(२०६) सर्वार्थचिन्तामणिः।

केन्द्रान्वितस्यापि दिवाकरस्य दशाविपाके नृपदंडसुगम्॥ स्थानच्युति बंधुवियोगमेति भंगः कृषेर्वित्तपरिभ्रमं च ॥२१॥ त्रिकोणसंयुक्तरवेर्दशार्यां बुद्धिभ्रमं राजविमाननं च॥ सौख्या- दिहानिं निधनं पितुश्च कर्मादिवैकल्यमुपैति काले॥ २२ ॥ केन्द्रगत सूर्यकी दशामें राजासे दण्ड पांवै दुःख मिले स्थान छूटे बंधुका वियोग होवे कृषि भंग होवै धनमें गडबडी होवे॥ २१॥ त्रिकोणमें स्थित सूर्यकी दश्यामें बुद्धिग्रम होवै राजासे अपमान मिले सुखादिकी हान्दि पिताका मरण कार्यादियोंमें विकलता रहै ॥२२॥ उच्चांशकस्य च दशा विदधाति वृत्ति नित्यं प्रतापजनितां महतीं श्रियं च।। नानाविनोदललितं रतिकेलिसौख्यं स्त्री वस्नलाभ- मनिशं पितृवर्गनाशम्॥ २३॥। नीचांशयुक्तस्य रवेर्दशार्यां भा. र्यार्थभूहानिविदेशयानम् ॥ त्यक्तो जनैवैधुविकुत्सितस्तु मनो- विकारं ज्वरमेहरोगम् ॥२४॥ उच्चांशगत सूर्यकी दशा नित्य अपने मताप (पराक्रम) से जीतीहुई वृत्ति बडी शोभा वा लक्ष्मीभी देतीहै नानापकारके रमणीय खेल काम क्रीडाका सुख स्त्नीलाभ वस्नलाभ नित्य होवै पितृवर्ग (पितृ पितृव्यादिक) का नाश होवै॥ २३ ॥ नीचांशगत सूर्यकी दशामें स्त्री, धन भूमि की हानि विदेशगमन होवै अपने मनुष्योंसे त्यक्त रहे बंधुजनोंसे निंदा पावै मनमें विकार रहे ज्वर पमेह रोग रहै॥ २४ ॥ आदौ सूर्यदशायां दुःखं पितृरोगकृत्क्षयश्धाधिः॥ मध्ये पशु- धनहानिश्चान्ते विद्यां महत्वश्च॥२५॥दशाविपाके धनहानि मेति षष्ठस्थभानोरतिदुःखजालम् ॥ गुल्मक्षयोद्ूतपवित्ररोगं मूत्रादिकृछूं त्वथ वा प्रमेहम्॥ २६॥ रन्धस्थमानोरपि वाद शायां देहस्य कष्ट त्वथ वाशिभीतियू।। चातुर्थिके नेत्रविकारकासं ज्वरातिसारं स्वपद्च्युति च ॥ २७॥ समुच्चय फल है कि सूर्यकी दशाके आदिमें दुःख पिताको रोगसे उत्पन्न क्षय एवं मानसी व्यथा होतीहै मध्यमें पशुधन हानि और अंत्यमें विद्या तथा बड़प्पन मिलतीहै॥ २५॥ छें भावमें स्थित सूर्यकी दशामें धनहानि अति दुःखोंका जाल गुल्म क्षय से उत्पन्न अतिसार रोग सूत्रकछ आादि अथवा ममेहरोग होताहै॥ २६ ॥ अष्टमभावगत सूर्यकी दशामें श्रीरका पा अथवा अगनिभय चौथिया ज्वरनेत्रविकार कासज्वरसहित अतिसार और अपने पढकी हानि भी पाताहै॥ २७ ॥

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भावाटीकासहितः। (२०७ )

भानोद्वीदशगस्य चैद्यदि दशाक्वेशार्थहार्नि कृशं स्त्रीबंध्वात्मज भूमिनाशमथ वा पित्रोर्विनाशं कलिम्॥ स्थानात्स्थानपरिभ्रमं विषकृतं राज्ञो भर्यं पादरुग्विद्यावादविनोदगोष्ठिकलहं गोवाजि- संपीडनम् ॥ २८॥। द्वादशगत सूर्यकी दशामें क्लेश धनहानि, कृशता, स्त्री, बंधु, पुत्र, भूमिका नाश अथवा माता पिताफी हानि कलह एकजगहसे दूसरे जगह भ्रमण जहरसे भय राजासे भय पैरोंमें रोग विद्याके शास्त्रार्थकी विनोदसभामें कलह गौ हाथीसे पीडा मिले ॥ २८॥ पुन्नोत्पत्तिविपत्तिमत्र कुरुते भानोर्घनस्थस्य वा क्ेशं बंधुवियोग- दुःखकलहं वाग्दूषणं क्रोधनम्॥ स्त्रीनाशं धननाशनं नृपभयं भूधुन्नयानांबरं सर्व नाशसुपैति तत्र शुभयुग्वाच्यं न चैतत्फलम् ॥ २९। भानोर्विक्रमयुक्तस्य दशा घैमे महत्सुखम्॥नृपमाननम- र्थातिं भ्रातृवैरविपत्तथा ॥ ३० ॥ द्वितीयस्थानगत सूर्यकी दशामें पुत्रकी उत्पत्तिऔर पुत्रहानिभी होती है क्ेश बधुजनवियोग दुःख कलह वाणीका दूषण क्रोध पावै स्त्रीनाश धननाश राजासे भय भूमि, पुत्र, सवारी, वस्न सब नष्ट होतेहैं यदि तहां शुभयुक्त होवे तो यह फल न कहना पूर्वोक्त शुभयुक्तका ही फल परवल रहताहै।। २९ ॥ तीसरे सूर्यकी दशामें धैर्य बड़ा सुख राजमान धनागम होतेहैं तथा भाईयोंसे वैर और उनकी विपत्तिभी होतीहै ॥ ३०॥ सुखस्थितस्यापि रवेर्दशायां भोगार्थभूभृत्यकलत्रहानिम् ॥ क्षेत्रादिनाशं स्वपद्च्युति वा यानच्युति चोरविषागनिभीतिम् ॥३१॥दारान्वितस्यापि रवेर्दशायां कलत्ररोगं त्वथ वा मृतिं च।। कुभोजनं कुत्सितपाकजातं क्षीरादिदध्याज्यविहीनमन्नम्॥३२॥ कर्मस्थितस्यापि रवेर्दशायां राज्यार्थलाभं समुपैति धैर्यम् ॥ उद्योगसिद्धिं यशसा समेतं जयं विवादे नृपमाननं च ॥३३ ॥ चतुर्थस्थित सूर्यकी दशामें भोगपदार्थ भूमि, धन, भृत्य, स्त्रीकी हानि खेती आदिका नाश अपने अपने अधिकारसे गिरना अथवा एवारीसे गिरना चोर विष अन्निकी भय इतने फल होतेहैं।। ३१। सप्तमगत सूर्यकी दशामे स्त्रीको रोग अथवा मरणभी मारक दारहा ग्रह संबंधसे होजाताहै तथा कुभोजन(निकम्मे पकाये स्वाद रहित और दही घृतसे हीन) मिलें। ३२॥

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(२०८) सर्वार्थचिन्तामणिः।

दशम सूर्यकी दशामें राज्यलाभ धनला होवै धैर्य मिले उद्यम सफल यशसहित होवै विवादमें जय राजासे मान मिले ॥ ३३ ॥ आयस्थितस्यापि दशाविपाके भानोर्घनातिं शुभकर्मलाभम्। उद्योगसिद्धिं सुतदारसौख्यं यानादिभूषांबरदेहसौख्यम्॥। ३४॥ संज्ञाध्याये यस्य यद्व्यमुक्तं कर्माजीवे यस्य यच्चोपदिष्टम्।। भावस्थानालोकयोगोद्भवंच तत्तत्सर्वै तस्य योज्यं दशायाम्।३५॥ ग्यारहवें सूर्यकी दशामें धनमाप्ति अच्छे कार्यका लाभ उद्यम सफल स्त्री पुत्र सुख वाहन आदि तथा भूषण वस्त्र लाभ शरीर सुख मिळतेहैं।। ३४।। अन्य फलके लिये कहतेहैं कि संज्ञाध्यायमें जिसग्रहका जो द्रव्य कहाहै तथा कर्माजीवोमें जिस ग्रहकी जिस मकार आजी- विका कही है उन्ही फलोंको भावमें स्थान वीर्य दृष्टि योगके कारणसे उसी मकार सब फल उसकी दशामें लगाना ॥ ३५ ॥ सूर्यें स्थानबलाधिके कृषिघनं गोभूमियानांबरं सौख्यं राजसु- माननं परधनैः संयुज्यते कांतिमान्॥ तत्पाके शयनांबरादि ल- भते सवोपकारं महाकीर्ति भूषणमिष्टबंधुसहितं तीर्थाभिषेकं महत् ॥ ३६॥ रवौ यदा स्थानबलेन हीने तत्पाककाले बल- मर्थनाशम्॥ स्थानच्युति वधुविरोधतापं देशाद्विदेशं समुपैति दुःखम् ॥ ३७॥ स्थानबलाधिक सूर्यकी दशामें खेती वारी धन, गौ, भूमि सवारी, वस्त्रोंका सुख मिले राजासे सन्मान मिले पराया धन मिले कांति बढे शय्या वस्त्रादि मिलें सबका उपकार होवै बडी कीर्ति होवै भूषण मिले इष्ट मित्र सहित बडे तीथोंका स्नान मिले॥ ३६ ॥ स्थान बलसे रहित सूर्य होवै तो उसकी दशामें बल एवं धनका नाश होवै स्थानहानि बंधुजन विरोध संताप देशसे विदेश गमन और दुःख पाताहै॥ ३७ ॥ दिग्वीर्ययुक्ते दिवसेश्वरे तु दिगंतराक्रांतघनोपि सौख्यम्॥ तत्त- दिशः प्राप्तयशोर्थभूमिनोंचेत्तथा तादशमत्र नास्ति ॥ ३८ ॥ तत्कालमानात्तनुते बलिष्टे रवौ विपाके कृषिभूमिवित्ते॥ उद्यो- गसिद्धिं नृपमाननं च हीने रवौ कालबलेन नाशम्।। ३९॥ दिग्बलयुक्त सूर्यकी दश्यामें इतना धनवान् होवे कि धनसे दिगंतभी दबनावै सुरमी होवै उन्ही उन्ही दिशाओंसे माप्त यश, धन, भूमि मिलें यदि दिग्बली न होवै तो अन्य

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भाषाटीकासहित:। (२०९)

बली होनेमें ऐसा फल नहीं मिलता।। ३८ । सूर्यकाल बलीके दशामें खेतीके कृत्यमें लाभ भूमि धन लाभ उद्यम सफल राजासे मान मिले सूर्यकाल वलरहित होवै तो उक्त वस्तुओंका नाश होवै॥ ३९ ॥ निसर्गतः सर्वसुपैति काले रवौ तु नैसर्गिकवीर्ययुक्ते॥ यानार्थ- भूर्षांवरदेहसौख्यं हीने रवौ चोरनृपाग्निभीतिम्॥४०॥ रवौतु चेष्टाधिकवीर्ययुक्ते स्वचेष्टितार्थागममेति सौख्यम् ॥ नृपस्य मानं सुतदारसौख्यं कृष्यादियानं न च हीनचेष्टे।। ४१॥ रवौ खगानां बलदृष्टियुक्ते त्वचिंतयित्वा सकलं च सौख्यम्॥ तज्ा- यते तत्परिपाककाले तेनैव हीने सकलं विनाशम्॥ ४२॥ नैसर्गिक बली सूर्यकी दशामें वाहन, धन, भूषण, वस्त्र, देहसौख्य समयपर स्वामा- विकही मिल जातेहैं इस बलसे हीन होवै तो चोर राजा और अग्निकी भय होे॥ ४० ॥ चेष्टा बली सूर्यकी दशामें अपनी चेष्टा (कियाविशेष) से धन आवै सुख मिले राजासे मान मिले पुत्र कलत्र कृषि आदि तथा वाहन लाभ होवै, चेष्टा बलहीन होवै तो ऐसे फल न होंगे बलके विपरीत होंगे ॥४१॥ सूर्य दृष्टि बलसे युक्त होवै तो बिना विचारे हुये भी समस्त सुल मिळें दृष्टि बलहीन होवै तो सब सुख नष्ट होवैं ॥। ४२ ॥ क्रूरादिषष्टयंशरवेर्दशायां स्थानच्युति वा नृपचौर भी तिम्।। कोपा- घिकं तत्र शिरोरुजं च पित्रादिनाशं त्वथ वा तदीयम् ॥४३॥ मृद्ंशषष्टयंशरवेर्दशायां मृद्धंशपाद्बरभूषणाप्तिम् ॥ नामदयं राजसुपूज्यतां च वेदांतशास्त्रागमधर्मशास्त्रम्॥४४॥ पारावता- दंशयुतस्य भानोर्दशाविपाके महतीं च कीर्तिम्। बंध्वर्थंदेशा- धिपमाननं च पुत्रादिसन्मित्रकलन्रलाभम्॥ ४५ ॥ करूर षष्टयंशगत सूर्यकी दशामें स्थानहानि दा राजा अथवा चौरकी भय होवै गुस्सा अंधिक होवै शिरमें रोग होवै अथवा उसके पिता आदिका नाश होते॥। ४३॥ मृद्वंश षष्टयंशगत सूर्यकी दशामें मुद्ंशेश ग्रहानुरूप वस्त्र भूषण मिलें दो नाम अर्थाव दूसरा उपाधिनाम यदा अधिकारी नाम मिले राजासे पूज्यता मिले वेदांत वेद धर्मशास्त्रका ज्ञान मिलै॥ ४४ ॥ सूर्य पारावतादि अंशकमें होवे तो उसकी दशामें बडी किर्ति मिले बंधुवृद्धि धनागम राजासे मान पुत्रादिलाभ अच्छे मित्र अच्छी स्त्रीका लाभ होवे ॥ ४५॥ स्वोज्चादिजन्यं फलमाहुरादौ पश्चात्फलं खेचर दृष्टिजन्यम्।।मध्ये फलं स्थानभवं तथैव पापग्रहाणामिह योजयन्ति ॥४६॥भु-

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(२१० ) सर्वार्थेचिन्तामणि:।

जंगमत्यंशयुतस्य मानोर्दशाविपाके हि भयं विषाद्ा॥ नृपाग्निपा- तित्यमनेकदुःखं पाशादिभृत्यंशयुतस्य चैवम्॥४७॥ स्वोञ्च- स्थोपि दिनेशो नीचाशे चेत्कलन्नधनहानिः॥ स्वकुलजनंधुविरो- धः पित्रादीनां तथैव सुनिवाक्यम्॥ ४८ ॥ उज्चांशकयुतो भानु- र्नीचस्थोपि महत्सुखम्॥ करोति राज्यभारं च दशति विपद कृशाम् ॥। ४९ । इति रविदशाफलानि॥ जहां दशेश सूर्य या कोई ग्रह उच्चादिमें हो तथा ग्रहदृाष्टि बलयुक्त भी हो तो मथम उच्चादिफल पवल होगा तब दृष्टि आदिका होगा बीचमें स्थानफल होगा ऐसे प्रकारसे पापग्र- होंफे फलकी विधि लगातेहैं॥ ४६॥ सर्पद्रेष्काणगत सूर्यकी दशामें विषसे अथवा राजासे अभिसे पतित होनेसे अनेक दुःख मिलतेहैं, पाश्भृत् देव्काणगत सूर्यकी दशामें थी ऐसेही फल होतेहैं।। ४७ ॥ सूर्य उच्चराशिका भी नीचांशकमें होवे तो लीकी तथा धनकी हानि करताहै तथा अपने कुलोत्पन्न बंधुजनसे विरोष तथा पिता आदियोंकी भी विरुद्धता होवे ऐषा मुनिवाक्य है॥ ४८ ॥ जो सूर्य उच्चांशकमें नीचराशिका भी होवे तो बडा सुख मिले और राजभार भी करताहै परंतु दशाके अंतमें थोडी विपत्तिमी करताहै॥ ४९॥ इति सूर्यदशाफलानि। अथ चंद्रदश्ञाफलानि। अत्यु्चग स्यापि निशाकरस्य दशाविपाके कुसुरमांबरं च॥ महत्त्व- मामोति कलत्लाभं धनायति पुत्रमनोविलासम्॥१।।उज्जस्थित- स्यापि निशाकरस्य प्राप्तौ दशायां सुतदारवित्तम्॥ मिष्टान्नणा- नांबर भूषणापिं विदेशयानं स्वजनैर्विरोधम्॥२॥ परमोज्चगत चंद्रमाकी दशामें उत्तम पुष्प वख और वढप्पन स्त्री धनसंचय पुत्रमाप्ति मनके विलास मिलते हैं॥ १ ॥ उच्चगत चंद्रमाकी दशामें पुत्र, स्त्री, धन, मिष्टान्न, पान, बख, भूषणोंका लाभ तथा विदेशगमन अपने मनुष्योसे विरोध होताहै ॥ २ ॥ आरोहिणी चन्द्रदशा प्रपन्ना स्त्रीपुत्रवित्तांबरकीतिसौख्यम्॥ क- रोति राज्यं सुखभोजनं च देवार्चनं यसुरतर्पणं च॥।३॥। निशा करस्या प्यवरोहकाले स्रीपुत्र मित्रांबरसौख्यहानिम्।। मनोविकार स्वजनैर्विरोधं चौराग्निभूपैः पतनं तडागे ॥४॥ नीचांशगस्यापि

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आपाटीकासहित:। (२११ )

निशाकरस्य प्राप्तौ दशायां विविधार्थहानिम्। कुभोजनं कु- त्सितराजसेवां मनोविकारं सक्षुपैति निद्राम्॥५॥ आारोही (उच्चाभिगामी) चन्द्रमाकी दशा सत्री, पुत्र, धन, वस्र, कीरति, सुख, राज्य, सुखपूर्वक भोजन देतीहै देवताका पूजन ब्राह्मणोंकी तृप्ति करातीहै॥ ३॥ अवरोही (उच्चसे उतरके नीचाभिगामी) चन्द्रमाकी दशामें खी, पुत्र, मित्र, वल और सुखकी हानि होती है मनमें विकार अपने मनुष्योंसे विरोध चोर अगि राजासे भय तालावमें गिरना ऐसे फल होतेहैं ॥। ४। नीचांशकगत चंद्रमाकी दशाम अनेकमकार अर्थहानि कुभोजन कुराजाकी सेवा मनका विकार और निद्रा पाताहै ।। ५ ॥ मूलत्निकोणस्थित चन्द्रदाये नृपाद्धनं भूमिसुतार्थदारान्॥ मा- पोति भूर्षांवरमानलाभं सुखं जनन्या रतिकेलिलोलम्॥ ६॥ स्वक्षेत्रगस्यापि निशाकरस्य नृपाद्धनप्राप्तियुपैति सौख्यम्॥ प्र० चण्डवेश्यागमनं क्षितीशात्संमाननं स्त्रीसुतबंधुसौख्यम।।७॥ मूछत्रिकोणस्थ चंद्रमाकी दशामें राजासे धन मिळे भूमि, पुत्र, धन खी, भूषणं, बल मिल- तेहैं माताका सुख मिळताहै तथा पूर्वोक्त दाराओंसे चंचलरति कीडा मिलती है॥ ६ ॥ अपनी राशिगत चंद्रमाकी दशामें राजासे धन मिले सुखमिले मचंद वेश्याका गमन होवै रा० जाखे सन्मान मिले स्त्री पुत्र बंधुनन सुख मिलें।। ७॥ निशाकरस्याप्यतिशत्रुराशिं गतस्य दाये कलहार्थनाशम्। कुव. स्त्नतां कुत्सितभोजनं च क्षेत्रार्थदारात्मजतापमेति।।८।। यानांब- रालकरणादिहानि विदेशयानं परिचारकत्वम्॥ देशांतरे गच्छति बन्धुहीनो दुःखी परिक्विश्यति शत्रुदाये॥ ९॥ अतिशत्रु राशिगत चंद्रमाकी दशामें कलह धनहानि कुवस्त्र निंद्य अन्न खानेको मिलते हैं खेती, घन, स्त्री, पुत्रपक्षसे संताप मिळताहै।। ८ ।। शत्रुराशिगत चंद्रदशामें सवारी वस्त भूपणोंकी हानि विर्देशगमन परायी सेवा मिळती है देशांतर जाताहै बंधुसे हीन होताहै दुःखा होकरं सब ओरसे केशित रहताहै॥। ९ ॥ मित्रर्क्षगस्यापि निशाकरस्य पाकेर्थलां क्षितिपालमैन्नीम्॥ उ- द्योगसिद्धिं जलवस्तुलाभं चित्रांबरा भूषणवाग्विलासम्।। १-Hसु- घाकरस्याप्यतिमित्रराशिं गतस्य दाये त्वतिसौख्यमेति॥ विद्या- विनोदांकितराजपूर्जा क्षेत्रार्थंदारात्मजकामलाभम्॥११॥

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(२१२ ) सर्वार्थचिन्तामणि:।

मित्रराशिगत चंद्रमाकी दशामें घनलाभ राजासे मैत्री उद्यम सफल जलोत्पन्न वस्तुका लाभ रंगविरंगे वस्त्र भूषण और वाणीका हास विलास मिलताहै।। १० ।। अतिमित्र राशिगत चंद्रमाकी दशामें बडा सुख विद्याविनोदसे राजपूजा, खेती, धन, स्त्री, पुत्र और इच्छापूर्ति मिळतीहै॥ ११ ॥ दशाविपाके समराशिगस्य कलानिधे: कांचनभूमिलाभम्॥ किंचित्सुखं बांधवरोगपीडां विदेशयानं लभते मनुष्यः ॥ १२॥ नीचस्थितस्य दशया विपदं महार्ति क्वेशार्थदुःखवनवाससुपैति काले ।। कारागृहं निगडपादकृशान्नहीनो चौरागनिभूपतिभयं सुतदारशेषम्।। १३॥क्षीणेन्दुपाके सुकलाविहीनो राजार्थभूु- त्रकलत्रमित्रम्॥ उन्मादचित्तं स्वजनैविरोधमृणत्वमायाति कु- शालवृत्त्या ।। १४॥ समराशिगन चंद्रमाकी दशामें सुवर्णभूमि लाभ थोडा सुख बांधवोंको रोगपीडा विदेशगमन मनुष्य पावताहै॥१२। नीच राशिगत चंद्रमाकी दशामें विपत्ति बढी पीडा क्ेश वनका दुःख और किसी समयमें वनवासभी पावताह कैद बेडी कृशता मिलतीहै अन्नहीनता चौर अत्नि राजासे भय स्त्री पुत्रकी समाप्ति होतीहै॥ १३ ॥ क्षीण चंद्रमाकी दशामें उत्तमकलासे हीन- ता राज्य, धन, भूमि, पुत्र, स्त्री, मित्रोंसे हीनता चित्तमें उन्माद अपने मनुष्योंसे विरोध होतेहैं दुष्टस्वभाव दुष्टवृत्तिसे ऋण होजाताहै॥ १४॥ पूणेंदुपाके परिपूर्णमेति विद्याविनोदांकितराजपूजाम ॥ स्त्रीपुत्र- भृत्यार्थमनोविलासं विशेषतः शोभनकर्मलाभम् ॥ १५॥ के- नापि स्वोच्चस्थवियच्चरेण युक्तस्य चंद्रस्य दशाविपाके।। मनः- प्रसादं मदनाभिरामं स्त्रीपुत्रभृत्यादिविनोदगोष्टीम्॥१६॥ पूर्ण चंद्रमाके दशामें विद्याविनोदसे भूषित राजपूजा मिले: स्त्री, पुत्र, भृत्य. धन और मनके हासविलास मिलें शुभ कर्मोंका लाभ होवै॥ १५॥ किसी उच्चराशिगत ग्रहके साथ रहते चंद्रमाफी दशामें मन मसन्न रहे कामदेवजन्य सुख मिले स्त्री पुत्र नौकर आदियोंके साथ खुसी हंसीसे बैठक होवे ॥ १६ ॥ पापान्वितस्यापि निशाकरस्य पाकेऽग्रिचौरक्षितिपालकोपैः ॥ दुःखं सुतस्त्रीसुखबंधुदानें विदेशयानं त्वशुभादिकर्म।१७॥

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मपाटीकासहित:। (२१३) चंद्रस्य सौम्यग्रहसंयुतस्य प्राप्तौ दशायां शुभकर्मलाभम्॥ गोभू- हिरण्यांबरभूषणानि तीर्थाभिषेकं परदारसौख्यम् ॥।१८॥ पा. पेक्षितस्यापि निशाकरस्य दशाविपाके विफलं सुकर्म॥ कोपा- घिकं कुत्सितभोजनं च मातुवियोगं त्वथ वा तदीयम्॥१९॥ पापयुक्त चन्द्रमाकी दशामें अत्नि चोर राजाके कोपसे दुःख मिले पुत्र त्ी सुख और बंधुजनकी हानि होवै, विदेशगमन अशुभ आदि फर्म होवें॥ १७ ॥ शुभग्रह युक्त चन्द्र- माकी दशामे शुभकर्म मिळे गौ, भूमि, सुवर्ण, वस्न, भूषण मिले तीर्थस्ान मिले और परखीसे सुख मिले॥ १८ ॥ पापदृष्ट चन्द्रमाकी दशामें शुभकर्म निष्फल होवें कोप अधिक रहै निकम्मा भोजन मिले माताका वियोग होवै ॥ १९॥ निशाकरस्यापि शुभेक्षितस्य परोपकारं महतीं च कीर्तिम्॥ इ- ष्टार्थबंध्वागमभूपमानं जलक्रियावस्रमनोविलासम्॥२०॥ मूलत्रिकोणभेन्दोर्दशां प्रपन्नो नरः सुबहुकोशः। बहुपुत्रवान् वि- नीतो बंधुविरोधं प्रधानतां याति ॥ २१॥ सुखस्थितस्यापि निशाकरस्य मातुर्वियोगं सुखयानभूमिम्। कृषेर्धनातिं ग्रहकर्म- लाभं कीर्तिस्वनामांकितपद्यलाभम् ॥ २२ ॥ शुभग्रहद्ृष्ट चंद्रमाकी दशामें पराया उपकार बडीकीर्ति मनोवाछित वस्तुलाभ बंधुजनका आगम राजमान और जलकर्मसे लाभ मनका विलास मिले॥ २० ॥ मूलत्रिकोणगत चंद्र माकी द्वशामें मनुष्य बहुत खजाना बहुत पुत्र वाला होताहै, नम्रता मिलतीहै, और बंधुविरोध होताहै प्रधान (मुख्य) ता मिलतीहै। २१ ॥ चतुर्थभावगत चंद्रमाकी दशामें माताका वियोग होवै सुख मिळे वाहन भूमि मिलें कृषिसे धन आवै घरके काममें लाभ होवै कीर्ति एवं अपने नामसहित पद (खिताब) मिलें ॥ २२ ॥ दारान्वितस्यापि निशाकरस्य पाके कलत्राप्तिमुदाहरंति॥ सुपु- ्रसौख्यं शयनांबरं च प्रमेहमूत्रादिकृशं तथािम्॥२३॥क- मंस्थितस्या पि दशाप्रपन्ना चंद्रस्य कीर्ति लभते सुविद्याम्।। यज्ञादिकर्माप्तिम नेकसौखयं भपुत्रयानांबर बंधुपूज्यम्।।२४।। सप्तमचंद्रमाकी दशामें स्त्री प्राप्ति कहतेहैं सुपुत्रका सुख शय्या वस्त्र मिलें पमेह मूत्रकछ आदि रोग तथा मानसी रोग होवे ॥२३॥ दयमगत चंद्रमाकी दशामें कीर्ति उत्तमविद्या मिले यज्ञादि काम मिलें अनेक प्रकारके सुख भूमि पुत्र वाहन वस्त्र और बंधुजन पूज्यता मिले॥२४॥

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(२१४) सर्वार्थचिन्तामणि:।

नीरचांशगतस्यापि ददाति रोगं महत्तरं चेन्दोः॥पादाक्षिरोगपीर्डा युद्धेषु पराजयं गतोत्साहम्॥।२५।।उ्चांशगस्यापि दशा ददाति सौख्यं महत्तरं चेंदोः॥ नानाविघघनलाभं भूपतिसन्मानतां सु- घुष्टिं च॥२६॥ चंद्रदशायामादौ नरपतिसन्मानकीर्तिसौख्यं च।। मध्ये त्तीसुतनाशं गृहधनसौख्यांबरं चा॥ २७॥ पष्ठस्य चं- द्रस्य दशा प्रपन्ना करोति दुःखं कलहं वियोगम्॥ चोराशनिभूपा- लभयं जलेन मूत्रादिकृच्छूं धननाशमाहुः॥२८॥ नीचांशकगत चंद्रमाकी दशामें बडा रोग होताहै पैर नेत्रोंमें पीडा लडाइयोंमें हार उत्साह भंग होताहै॥ २५ ॥ उच्चांशक चंद्रमाकी दशामें बडा सुख अनेक प्कारके लाभ राजस न्मान शरीर पुष्टि होतीहै।। २६ । चंद्रदशाके आदिमें राजसन्मान कीर्ति सुख तथा मध्यमें स्री पुत्र हानि अंत्यमे घर तथा धनका सुख होताहै। २७॥ छठे चंद्रमाकी दशामें दुःख कलह वियोग चोर अग्नि राजासे भय जलसे हानि मूत्रकृछ आदि रोग और धननाश कहतेहैं॥२८॥ रंध्रस्थितस्यापि दशा प्रपन्ना देहस्य काश्यै जलभीतिदुःखम्॥ विदेशयानं सकलैविरोधं कुभोजनं मातृजनेषु कष्टम॥२९॥ रिष्फगचंद्रदशायां संप्राप्तो भृतिनाशनं कुरुते ॥ राज्ञोनृतधन- भाग्यं स्थानविनाशं महत्परं दुःखम्॥ ३०॥ चंद्रस्य वित्तस्थि- तपाकका ले वित्तात्मजस्त्रीसुखभोगभाग्यम। मिष्टान्नपानांबरके- लिसौख्यं धनागमं पुण्यजलाभिषेकम् ॥ ३१ ॥ तृतीयराशि- स्थनिशाकरस्य दशा महत्सौख्यमनेकवित्तम । मनोदृढं भ्रातृ- जनादिसौरयं कृष्यन्नपानांबरभूषणाप्तिम्॥ ३२ ॥ अष्टम चंद्रमाकी दशा शरीरमें कृशता जलकी भय दुःख विदेश गमन सबके साथ विरोध कुभोजन मातृजनोंको कष्ट देतीहै॥ २९ ॥ अष्टम चंद्रमाकी दृशा आजीवनका नाश राज- द्वारमें झूठापन धन तथा ऐश्वर्यका नाश बडा और परम दुःख देतीहै॥ ३० ॥ धनस्थानगत चंद्र्माकी दशामें धन, पुत्र, स्त्री सुख, भोग ऐश्वर्य तथा उत्तम अन्न, जल, वस्त्र, मिलतेहैं कामकेछि सुख होताहै धनका आगम पुण्यजलका सनाने मिलताहै॥ ३१॥। तीसरे चंद्र- माफी दशा बडा सौख्य बहुत धन मनकी दढता भाई आदियोंका सुख कृषिकर्म अन्र, जल, भूषण, वस्तकी माप्ति करतीहै।। ३२।।

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भाषाटीकासहित:। (२१५) लाभस्थितस्यापि निशाकरस्य प्रात्तौ दशार्यां विविघार्थलाभमू।। मृद्न्नपानांबरकेलिलोलं त्रीपुत्रलाभं च मनोविलासम् ॥३३। दिनेश्वरस्याहत चंद्रदाये प्राप्नोति दुःखं स्वजनैर्विरोधम ॥। भार्याक्षयं भीतिनृपागनिचौरैमांतुवियोगं कृषिघान्यनाशम्।।३:।। लाभगत चंद्रमाकी दशामें अनेक प्रकार धनलाभ कोमल गन्न पान वख कामकेलिको चपलता सती पुत्र लाभ होवैं मनमें विलास हासादि मसन्रता रहे।। ३३ । सूर्यके साथ अस्तंगत चंद्रमाकी दशामें दुःख अपने मनुष्योंसे विरोध खनीका क्षय राजा अननि चोरसे भय माताका वियोग औौर कृषिकर्म अन्नका नाश होवै ॥ ३४ ॥ चंद्रे स्थानबलाघिके धनसुखं कीर्ति च विद्यागम देवबाह्मणत र्पणं नृपधनान्याप्रोति भूरमिं धनम् ॥ स्त्रीरत्नांबरभूषणं कृषि- धनं गोविक्रयं सेवनं मिष्टान्नादिरसायनं फलयुतं दध्याज्यमाल्यां बरम्॥ ३५॥ निशाकरे स्थानबलेन हीने स्थानार्थनाशं स्वप. द्च्युति च। स्वबन्धुनाशं त्वथ वा वियोगं कृषेर्विनाशं समुपैति काले ॥ ३६ ॥ चंद्रमा स्थानबलमें गधिक होवै तो उसकी दशामें कीर्ति होतीहै विद्याका भागमन देवता- ओंका पूजन ब्राह्मणोंकी तृप्ति राजद्वारसे धन पाप्त होतेहैं भूमि धन स्त्री रत्न वस्त्र भूषण कृषि भन्न मिलते हैं गौका व्यापार गौकी सेवा मिष्टान्नादि रसीले पदार्थ मीठे फलौं सहित तथा दही, घृत, पुष्प, वस्त्र मिलते है।३५॥स्थान बलहीन चंद्रमाकी दशामें स्थान धनका नाश अपने पदसे उतरना अपने बंधुजनोंका नाश अथवा उनका वियोग होताहै समयपर खेतीकाभी नाश होताहै॥३६॥ निशाकरे दिग्बलसंयुतेस्मिन्दिगंतरादागत वस्तुचित्रम्।। विद्यागमं भूपतिमित्रतां च स्वबन्धुपूज्यं गजवाजिसौख्यम्॥ ३७॥चन्द्रे तथा कालबलान्वितेस्मिन् तुरंगयानं कृषिगोमहीश्र ॥ विद्या- दिघोषं नखकेशदंतचर्माबरालंकृतवाहनं च । ३८॥ विसर्ग- वीर्यान्वित चंद्रदाये निसर्गत्श्धापि करोति सौख्यम्॥ अयत्नतो वाहनदेशलाभं नृपालपूज्यं बहुवाहनं च।। ३९।। चंद्रमा दिग्बळयुक्त होवें तो उसकी दशामें देशदेशांतरोंसे अनेक प्रकारकी वस्तु आवैं विद्या आावै राजासे मित्रता होवै बंधुवर्गमें पूज्यता मिळे हाथी घोडेका सुख मिले॥ ३७ ॥ कालवलयुक्त चंद्रमाकी दशामें घोडेकी सवारी कृषि गौ भैंस मिलै, विद्या आदिका प्रचार रहे,

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(२१६ ) सर्वार्थचिन्तामणि:।

नख, केश, दांत और चमडेके बने उच्तम कारीगरीके वस्तुजात वखादि और अलंकारयुक्त वाहन मिलें॥ ३८ ॥। निसर्ग बलयुत चंद्रमाकी दशामें स्वभावहीसे सुख मिले, विनाही पयत्नकिये वाहन मिले देश मिले राजासे पूज्यता और बहुत वाहन मिलें॥ ३९॥ चन्द्रो यदा दिग्बलवीर्ययुक्त: कृपाकटाक्षेण नरेश्वरस्य ॥ सम- स्तभाग्यं समुपैति सौख्यं परोपकारं च मनोमिलाषम्॥४ ॥ ऋूरादिषष्टयंशसमन्वितस्य दाये शशांकस्य बहुत्वदुःखम्॥स्त्री- पुत्रनाशं क्षितिपालकोपं विद्याविवादं कलहं जनैश्र ॥।४१॥ दिग्बली चंद्रमाकी दशामें राजाकी कृपादृष्टिसे संपूर्ण ऐश्वर्य मिलें सुख तथा पराया उपकार अपने हाथसे होवै मनोभिलाष पूर्ण होवे॥ ४० ॥ ऋरूर आदि षष्टयशगत चंद्रमाकी दशामें दुःख बहुतायतसे होवै स्त्री पुत्र हानि राजाका कोप विद्याका विवाढ़ (शास्त्रार्थ) और लोगोंके साथ कलहमी होवे ।। ४१ ॥ मृदंशषष्टयंशसमन्वितस्य चन्द्रस्य दाये बहुपुत्रलाभम्।।सृत्यार्थ- लाभं विजयं सुखं च कीर्ति च विर्द्या लभते विशेषात्॥४२।।पारा- वतादयंशसमन्वितस्य चंद्रस्य दाये महतीं च कीर्तिम्।। बिद्या- विनोदं लभते च सौख्यं देवाचैनं पुण्यजलाभिषेकम् ॥४३॥ क्ररद्रेष्काणसंयुक्त श्रन्द्रो दिशति रोगिताम्॥ कार्ये पापसमायुक्तं गोब्राह्मणनिपीडनम् ॥ ४४ ॥ आदौ भावफलं प्रोक्तं स्थानजन्यं ततः परम् ॥ अंशोद्भवफलं पश्चाद्रहजातफलं तथा ॥ ४॥ इति चंद्रदशाफलम्॥ इति श्रीसर्वार्थचिन्तामणौ ग्रहदीपाद्यवस्था-सूर्यचन्द्रदशाफल- निरूपणो नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥१३॥ षष्टयंशमें मृद्ंशगत चंद्रमाकी दशामें बहुत पुत्रोंका लाभ होवै नौकर, धन, विजय, सुख, कीर्ति, विद्या विशेषस मिैं॥ ४२ ॥ पारावतादि अंशकगत चन्द्रमाकी दशामें बडी कीर्ति होवे विद्याका विनोद रहे सुख पावै देवताका पूजन पुप्यजल स्नान मिले ॥ ४३ ॥ कूर द्रेष्काणगत चंद्रमाकी दशामें रोग होताहै, पापयुक्त कार्य गौ ब्राह्मणको पीडा करे॥ ४४॥ प्रथम भावफल तव स्थानका तब अंशका तब ग्रहयोगका फल कहाहै यही क्रम फल कहने का जानना॥ ४५ ॥ इति चंद्रदशाफलविचारः ॥ इति श्रीसर्वार्थचिंतामणौ माहीघरभाषाटीकार्या ग्रहदीप्ाद्यवस्था-सूर्य्यचन्द्रदशा- फलनिरूपणाध्यायस्रयोदशः ॥१३ ॥

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भावाटीफासहित:। (२१७ )

चतुर्दशोऽध्यायः॥१४॥

अथ भौमादिदशाफलविचाराध्यायः। अत्युच्चभूनंदनदायकाले क्षेत्रार्थलाभं समरे जयं च। आधिक्य- मन्वेति नरेशमानं सहोदरस्त्रीसुतवाग्विलासम् ॥१॥ उच्चंग- तस्य च दशासमये कुजस्य प्रामोति राज्यमथवा क्षितिपाच्चवि- त्तम्॥ भूमध्यदारसुतबंधुसमागमं च यानादिरोहणविशेषविदे- शयानम् ॥ २॥ आरोहिणी भूमिसुतस्य सौख्यं दशा तनोत्यत्र नरेन्द्रपूज्यम्।। प्रधानतां धैर्यमनोभिलाषं भाग्योत्तरं गोगजवा- जिसंघम्॥३ ॥ उच्चराशिके पूरे उच्चांशकगत चंद्रमाकी दशामें खेती धनका लाभ युद्धमें विजय बहुत मनु- व्योंमें अधिकता राजासे मान मिले, भाई स्त्री पुत्रोंसे वाणीका विलास अर्थात हंसी खुशीकी बातचीत होवै ॥ १ ॥ उच्चराशिगत मंगलकी दृश्ामें राज्य अथवा राजासे धन मिले भूमि स्त्री, पुत्र, मित्रोंका समागम सवारीमें चढना मिले विशेषतः परदेशगमन भी होवै ॥ २ ॥ उच्चमें चढ़तेहुये मंगलकी दशामें सुख राजपूज्यता श्रेष्ठता, धैर्य, मनोभिळाषसिद्धि, भाग्य- वृद्धि और गौ हाथी घोडाओंका समूह मिलेहैं । ३ ॥ धरासुतस्याप्यवरोहकाले स्थानार्थनाशं कलिकोपदुःखम्॥ वि देशवासं स्वजनैर्विरोधं चौरागिभूपैर्भयमेति कष्टम ॥। ४ ॥ नीचस्थितस्यापि धरासुतस्य दाये कुवृत्त्या स्वजनादिरक्षा। कुभोजनं गोगजवाजिनाशं स्वबन्धुनाशं नृपवह्निचौरैः ॥॥ अवरोही (उच्चसे उतरकर नीचाभिमुख) मंगलकी दशामें स्थान एवं धनका नाश, फलह, क्रोष, दुःख, परदेशवास, अपने मनुष्योंसे विरोध चोर अत्नि राजासे भय और कष्ट पाताहै ॥ ४ ॥ नीचराशिगत भौमदशामें कुवृत्तिसे अपने कुट्ुंब आदिकी रक्षा करे कुत्सित भोजन मिले गौ, हाथी, घोडाओंफी हानि होवै अपने बंधुजनोंकी हानि तथा राजा अननि चोरौंखे हानि होतीहै ।। ५ ॥ मूलत्रिकोणस्थित भौमदाये मिष्टान्नपानांबरभूषणाप्तिम्॥ पुराण- धर्मश्रवणं मनोजं आ्रात्रादिसौख्यं कृषिलाभमेति ॥६॥ स्वक्षे-

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(२१८ ) सर्वार्थचिन्तामणि:। तगस्यापि धरासुतस्य दशाविपाके लभतेर्थभूमिम्।। स्थानाधि पत्यं सुखवाहनं च नामद्यं भातृसुखं सुखासिम।। ७॥ धघरा- सुतस्याप्यतिशत्रुराशिं गतस्य दाये कलहादिदु:खम्॥ नरेशकोपं स्वजनैविरोधं भूम्यर्थदारात्मजमित्ररोगम्॥८॥ मूलत्रिकोणगत भौमकी दशामें मौठे अन्नपान वस् भूषण मिलें पुराण धर्म आदि सुननेमें आवैं भाई आादियोंका सुख खेतीका लाभ पावताहै ॥। ६॥ अपनी राशिगत भौमदशामें धन भूमि लाभ स्थानका आधिपत्य सुख वाहन मिलें, २ नाम अर्थाव दूसरा उपाधिनाम मिले भाइयोंका सुख तथा अनेकों सुख मिलैं।। ७।। अतिशत्रुराशिगत मंगलकी दशामें कलद आदि दुःख मिलें राजाका कोपहोवै अपने मनुष्योंसे विरोध होवे भूमि, धन, ख्त्री, पुत्र, मित्र संबंधी क्वेश तथा कष्ट होवै ॥ ८ ॥ भूनंदनस्याप्यरिराशिगस्य दशाविपाके समरे च पीडान्॥ शोकाग्निभूपालविषैः प्रमादं पीडातिकृछादिगुदाक्षिरोगम्॥९॥। मित्रर्क्षजस्यापि कुजस्य दाये मित्रत्वमायाति सपत्नसंघैः॥चौरा- भ्निर्मांद्याक्षिविपादभूमि कृषेर्विनाशं कलिकोपदुःखम् ॥१०॥ कुजस्य दाये त्वतिमित्रराशि गतस्य भूपालकृतार्थभूमिय्॥ वस्त्नादिय ज्ञादिविवाहदीक्षाशुपैति देशांतर लब्घभाग्यम् ॥ ११॥। शत्रुराशिगत मंगलकी दशामें संग्राममें पीडा शोक, अग्नि, राजा, विषसे पीडा ममाद् अति- कृछादि गुदारोग नेत्ररोग होवै॥ ९॥ मित्रराशित चंद्रमाकी दशामें शत्तुसमूहसे भित्रता होजावै चोरभय अग्निभय दृष्टि मंदता भूमि कृषिका नाश कलह कोध और दुःख होवै ॥१०॥ अतिमित्र राशिगत मंगळकी दशामें राजाकी कृपासे धन एवं भूमि मिले वच्ादि मिलें यज्ञा- दिकर्म होवे विवाहदीक्षा पावै देशांतरमें ऐश्वर्य मिले॥ ११ ॥ धरासुतस्यापि समर्क्षगस्य गृहोपकार्य त्वचनप्रमाणात॥ त्त्री- पुत्रभृत्यात्मसहोदराणां शत्रुत्वमाप्नोति नृपागनिपीडाम् ॥१२। नी चग्रहेणापि समन्वितस्य घरासुतस्यातिमनोविकारम्॥।। प्रेष्य- त्ववृत्तिं परकीयमन्नं स्त्रीपुन्रनाशं नृपवह्निचौरैः॥३॥ किंचि- त्सुखं भोजनवस्नपानं कृच्छ्रेण वृत्ति नृपवूजनं च ।। उच्चान्विते- नापि समन्वितस्य भौमस्य दाये सुतदारपीडा।।१४।

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भावाटीकासहित:। (२१९)

सम राशिगत मंगलकी दशामें निर्धनताके कारण घरका उपकरण (मरम्मत) ादिमी न होसके, खत्री, पुत्र, नौकर, अपने भाईयोंसे शत्रुता होवे राजा तथा अगिसे पीडा मिले॥ १२॥ नीघगत ग्रहसे युक्त भौभकी दशामें मनका विकार बहुत होवे (मेष्य) दूसरेकी चाकरीसे आजीवन होवै पराया अन खाना मिले स्ीपुन्रनाश राजा अत्नि चोरसे भय होवै॥ १३ ॥ उच्चवर्ती ग्रहसे युक्त मंगलकी दशामें अल्पसुख भोजन वल पानमें तथा बड़ी कठिनतासे आजीविका होवै राजासे पूजा मिले त्ी पुत्रोंको पीडा होवे ॥। १४॥ पापान्वितस्यापि कुजस्य दाये पापानि कर्माणि करोति नित्य- म्॥ देवद्विजानां च सहोदराणां कुमार्गवृत्त्या हयपकारणं च।१५॥। शुभान्वितस्यापि कुजस्य दाये किंचित्सुखं देदकृशांगरोगम्। भूपैर्विवां समरे जयं च विद्या विवादं परदेशवासम् ॥१६॥ शुभेक्षित घरासूनोदाये भूम्यर्थनाशनम् ॥ तस्मिन् गोचरसंयुक्ते त्वत्यंतं शोभनं भवेत्॥१७॥ पापयुक्त मंगलकी दशामें नित्य पापकमोंको करताहै देवता ब्राह्मण तथा भाइयोंका कुमा- र्गवृत्तिसे अपकार करता है। १५ ॥ शुभयुक्त भौमकी दशामें अल्पसुख शरीर कृशता बंगों में रोग राजाओंसे कलह संग्राममें विजय विद्या संबंधी विवाद और परदेशवास होवे ।। २६ । शुभग्रह दृष्ट मंगलकी दशामें भूमि धनका नास होवे यदि उसी अवसरम गोचरसे भी राशिमें आवै तो अतिशुभ फल होवै ॥ १७ ॥ आरस्य पापग्रहवीक्षितस्य प्राप्तौ दशायां बहुदुःखकष्टे॥ जनः पररित्यक्तकलन्रमित्रो देशांतरस्थः क्षितिपालकोपात्॥१८॥ केंद्रगतभौमदाये चोरविषाध्यासुपैति दुःखानि ॥ कलहो वा स विरोधं लभते देशांतरं याति॥ १९॥ चतुर्थराशिस्थितभौम- दाये स्थानच्युतिं बंधुविरोधतां च।। चोराग्निपीडां नृपतेः सका- शाद्दीति परे दुर्गपदे प्रयाति॥ २०॥ कलत्रयुक्तस्य कुजस्य दाये कलतहानिर्गुदमूत्रकृच्छम्॥ अगोचरस्थस्य च ताद्ृशैव तदन्यथा चेत्फलमन्यथैव ॥ २१॥ पापदृष्ट कुजकी दशामें अतिदुःख हो, राजकोपसे स्त्री मित्र छोड विदेशमें रहै।। १८ ।। केंद्रगत भौमकी दशामें चोर तथा जहरसे दुःख पावे कलह वैरसहित होवे विदेश गमन करे। १९ ॥ चौथे भौमकी दश्ामें स्थानहानि बंधुविरोधता और चोर अननि राजासे भव परमकठिन पदमें पहुंचे॥ २० ॥ सप्तम मंगलकी दशामें सीहानि गुक्षमें रोग मत्रकृच्छ्र यह फल अगोवरमें है यदि गोचरमें गावे तो फलभी अन्य होतेहैं ।। २१ ॥

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(२२० ) सर्वार्थचिन्तामणि:। कर्मस्थितस्यापि कुजस्य पाके कर्मादिवैकल्यम्ुपैति दुःखम् ॥ उद्योगभंगं त्वपकीतिमेति विद्यासुतस्त्रीधनमानहानिम्॥ २२॥ अर्कगभौमदशायां दधाति शोकं स्रत्रिया विरोधं च ॥ राज्या- च्युति विपक्षाद्देशांद्देशांतरं याति ॥ २३ ॥ वित्तगभौमदशार्या संप्राप्तौ तस्य वृद्धिमुपयाति॥ स्वकुलाढयत्वं लभते नृपहृतचितं सुखाक्षिरोगं च॥ २४॥ दशमगत मंगलकी दशामें कर्म आदिमें विकलता, दुःख, उद्यमभंग, अपयश, विद्या, पुत्र, स्त्री, धन और मानकी हानि पाताहै।। २२ ।। सूर्ययुक्त मंगलकी दशा शोक मरण करतीहै स्त्रीसे विरोध राज्यसे परिभ्रष्ट शत्रुसे देशसे देशांतर चला जावै ॥ २३॥ धनस्थानगत चन्द्रमाकी दशामें धन वृद्धिको माप्त होवै अपने कुलमें संपन्नताको पाप्त होता है राजा मनहरण करे मुख नेत्रमें रोगभी होवै ॥ २४॥ आ्रातृस्थानगतश्र सौख्यफलदो भूनंदनोऽरातिहा धैर्य वित्तसुता- र्थंदारसहजैः संगं नृपात्पूज्यताम्। पुत्रस्थानगतस्य पुत्रमरण बुद्धिभ्रमं जाडयतां शत्रुक्षेत्रगतस्य भूमिसहजैर्दुःखं महारोगभाक ।२५॥पं चमस्थघरासूनोर्दायः कीर्तिविवेकताथ्॥ नेत्ररोगं त्वर्थ नाशं दद्यात्कलहमेव वा॥।२६।। मरणपदस्थो भौमः करोति दुःखं महद्दयं पाके।। स्फोटकमन्नविरोधं स्थानविनाशं विदेशयानं च ॥ २७।। नवमस्थघरासूनोर्देशापाक: पद्च्युतिम् ॥ शुरूणां च तथा कष्टं तपोविघनं महद्भयम् ॥ २८ ॥। दूसरा मंगल अपनी दशामें सुखफल देताहै तथा शत्रुहंता होताहै धैर्य पुत्र, धन, स्त्री, भाईयोंसे संग राजासे पूज्यता देताहै पंचम मंगल पुत्रमरण बुद्धिभ्रम जडता देताहै शत्रु- भावगत भूमि भाईपक्षसे दुःख देताहै महारोगवाला करताहै ॥ २५ ॥ पंचम मंगलफी दशाका फल औरभी है कि कीर्ति विवेफ (समझ) नेत्ररोग धननाश गथवा कलह देताहै ।। २६।। अष्टम मंगळ अपनी दशामें दुःख बडीभय विस्फोटक रोग अन्नकी अरुचि स्थान हानि विदेशगमन करताहै॥ २७॥ नवमगत मंगलकी दशामें पदको हानि गुरु (श्रेष्ठ) जनोंको कष्ट तप आदिमें विघ्न और बडीभय होतीहै॥ २८ ॥। आयस्थभौमदायः करोति राज्यार्थभूपसन्मानम्॥ समरे जय- प्रतापं वागुपकारं मनोजवं कीर्तिम्॥ २९ ॥ व्ययगतभौमद-

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भाषाटीकासहित:। (२२१ ) शायां प्राप्तौ धनहतिं नृपाद्भीतिम्।। स्थानसुतदारनाशं भ्रातृणा- मन्यदेशवासं च॥। ३० ॥ उच्वांशसंयुक्तधराजकाले मनोभिला षं विजयं सुखं च। प्रचण्डदासीगमनं नृपस्य प्रधानतां याति सुधर्मकीर्तिम्॥ ३१ ॥ ग्यारहवें मंगलकी दशामें राज्यधन राजासे सन्मान संग्राममें विजय वाणीसे दूसरेका उपकार बहुत फैलनेवाली कीर्ति मिले॥ २९॥ बारहवें मंगलकी दशामें धनहरण राजासे भय स्थान, पुत्र, स्त्रीका नाश और भाइयोंका परदेशवास होवै॥ ३०॥ उर्च्चाशगत मंगल की दश्यामें मनोभिलाषसिद्धि विजय सुख मिलतेहैं।। तथा मचण्ड स्वभाववाली दासीफा गमन राजाके प्रधानताको माप्त होताहै धर्म और कीर्तिभी होती है। ३१ ॥ नीचांशभौमदाये नीचयुते कर्मवैकल्यम्।। धनहानिभूपदण्डः शिश्रोदरपरायणोऽशीलः॥ ३२ ॥ भौमदशायामादौ लभते विविधार्थमानहानिं च। मध्येग्निभूपचौरैभीति तत्र विनिर्दिशे- न्मतिमान्॥३३॥अंत्ये भ्रातृवियोगं सुतदाराग्निगुल्ममूत्रादिम्॥ भौमेप्येवं न भवेद्रोचरयुक्ते विशेषतः कथयेत्॥३४॥ नीचराशि नीचांशकगत भौमदशामें कायोंमें विकलता होवै धनहानि होवै राजासे दंड मिले पेटभरनेमें तथा मैथुनसुखमें तत्पर रहे शीलसे वर्जित रहे॥ ३२ ॥ भौमकी दशामें प्रथम अनेकप्रकारधन तथा मानहानि मध्यमें राजा चोरकी भय बुद्धिमानने कहनी॥३३॥ अत्यदश्चामें भाइयोंको वियोग पुत्र धन स्त्री आदियोंको कष्ट गुल्मरोग मूत्ररोगादि रोग होतेहैं यदि गोचरमें भी भौम उसी अवस्थामें आवै तो उक्त फलविशेषतासे होतेहैं अन्यथा पूरे नहीं होते ॥ ३४ ॥ भौमस्य संस्थानबलान्वितस्य दशाविपाकेर्थकलत्नसौख्यम्॥ स्थानादिलाभं सुखकीतिशौर्यमुद्योगसिद्धिं त्वनयादुपैति॥३५॥ स्थानवीर्यविहीनस्तु कुरुते स्वपद्च्युतिम्॥ कुजः कुसीदवृत्त्या च करोति ध्रुवजीवनम्॥ ३६॥ स्थानवळयुत भौमदशामें धन तथा स्त्रीका सुख स्थानादिका लाभ सुख, कीर्ति, शौर्य उदयमसफलता न्यायसे पाताहै॥ ३५ ॥ स्थानवलहीन भौमदशामें अपने पदकी हानि कुछीद (गूद) आदिवृत्तिसे निश्चल आजीविका होवै॥ ३६॥

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(२२२) सर्वार्थचिन्तामणि:। दिग्वार्ियुक्तस्य कुजस्य दाये नृपात्सुलन्घार्थरणप्रतापम् ॥ गोभूहिण्यांबरयानलामं दिगंतराक्ांतयशःप्रतापम्।३७॥ कालवीर्ययुतभौमदशायां काम्यलन्धिरतिसौख्यकुपैति॥ पट्टव- स्मणिमौक्तिकलाभं चित्रवस्त्कृषिगोगजलाभम् ॥३८॥निस- गैवीयांन्वित भौमदाये कृपाकटाक्षेण महीपतीनाम्॥ समस्तभा-

दिग्बली भौमकी दशामे राजासे धन रणमें पताप गौ, भूमि, सुवर्ण, वस, सवारी मिलें यश एवं मतापसे दिगंत दबे रहैं॥। ३७ ॥ कालवळी मंगलकी दशामें मनोभिलाषमाप्ि अति- सुख, रेगमीवस्, मणि, माती मिलतेहैं तथा रंगबिरंगे वस्, कृषि, गौ, हाथीका लाग होताहै ।। ३८।। निसर्गबली मंगलकी दशामें राजाओंके कृपादृष्टिसे संपूर्ण ऐश्वर्य मिलतेहैं तथा पुत्र मित्र, बंधु, गौ, भूमि, भूषण, वख और देहसुख मिलतेहैं ॥। ३९।। निसर्गतः स्थानघनािनाशं पित्ताधिकं कुत्सितभाजनं च।। कुजस्य दाये कुनखी पितृ्नः सहोदराणामपि देहपीडा॥ ४०॥ वक्रान्वितस्य भौमस्य दशाकाले महद्यम्।। चौरागिसर्पंपीर्डा च वनवास पदच्युतिम्॥४१॥ दिग्वीर्ययुक्तस्य कुजस्य दाये कृपाकटाक्षेण महीपतीनाम्।। समस्तभाग्यात्मजमित्रबंधूगोभू- मिभूषांबर देहसौख्यम ॥।४२॥ निसर्गवलयुत भौमकी दशामें स्थान धनका नाश नेत्रविकार पित्तधातुकी अधिकता निन्ध भोजन मिले कुनख्त होवै पितृपक्षघात करे भाइयोंके देहपीडा होवे॥ ४० ॥ वक्री गौमकी दशामें वडीभय चोर अग्नि राजासे पीडा वनवास और पद्से च्युति (गिरना) होवै॥४१॥ दिग्वीर्ययुक्त भौमकी दशामें राजाओंके कृपादृष्टिसे संपूर्ण ऐश्वर्य, पुत्र, मित्र, बंधुजन, भूमि, भूषण, वख और देहखर्य बढतेहैं।। ४२ ॥! कूरषष्टयंशसंयुक्त भौमदायतिपीडनम।। कारागृहमवेश च समस्त विभवक्षयम्॥ ४३॥ सौम्यषष्टचंशसंयुक्तमौमदाये महत्सुख- म्।। यूम्यर्थंदारसंपत्तिघनवाहनभोजनम् ॥।४४॥ पारावतादि संयुक्तमौमदाये शुभं भवेत्॥ विवाहदीक्षायज्ञं च सर्वेषासुपका- रकम्॥ ४५॥ कूरद्रेष्काणसंयुक्तकुजदाये मनोव्यथा॥। निगड विषभीति च पाशबंधनमेव छ॥ ४६।।

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भापाटीकासहित:। (२२३) कूरषष्टचंशगत मंगलकी दशामें अतिपीठन कैदखानेमें निवास संपूर्ण ऐश्वर्यका क्षय होताहै ॥४३ ॥ सौम्य षष्टयंशगत भौमदशामें बडासुख, भूमि, धन त्त्ी, संपत्ति, कार्यिद्ि, वाहन और उत्तम भोजन मिलतेहैं।। ४४ ॥ पारावतादि जशगत भौमदश्ामें जुभफल मिल- तेहैं विवाहदीक्षा यज्ञदीक्षा और सबका उपकार करना मिलताहै।। ४५॥ क्ूर द्रेष्काणगत भौमकी दशामें मनमें व्यथा कैद आदि बंधन विवकी भय अथवा मुस्के बँषें।। ४६॥। उच्चस्थोपि धरासूनुर्नीचांशकसमन्वितः ॥ तत्पाके भ्रातृमरणं नृपवाह्विविषाद्यम् ॥४७॥ भूमिपुत्रोऽपि नीचस्थ: स्वोचभाग- समन्वितः ॥ तत्पाके भूमिदारार्थपुत्रमित्रववर्द्धनम् ॥४८॥ इति कुजदशाफलम्॥ उच्चराशिगत मंगल यदि नीचांशकमें होवै तो उसकी दशामें भाइयोंका मरण राना अभि और विषसे भय होवे॥। ४७ ॥ यदि मंगल नीचराशिमें उच्चांशका होवे तो उसकी दशामें भूमि, खी, धन, पुत्र और मित्रोंकी वृद्धि होतैहै ।। ४८।। इति भौमदशाफलम् ॥ अथ बुघदशाफलम्। अत्युच्चसोमात्मजदायकाले धनान्वित: ख्यातिसुपैति सौख्यम्।। ज्ञानं च कीर्ति जननायकत्वं स्त्नीपुन्रभूम्यर्थमहोत्सवं च॥ १॥ उच्चस्थितस्यापि शशांकसूनोर्दशा महत्त्वं कुरुतर्थसौख्यम्।। देहस्य पुष्टिं धनधान्यपुत्रगोवाजिमत्तेभमृदंगनादमू।२।। आरोहिणी सौम्यदशा प्रपन्ना यज्ञोत्सवं गोवृषवाजिसंघम्॥ मृदन्नभूर्षावरयानलाभं वाणिज्यभूष्यर्थपरोपकारम्॥। ३॥ परमोन्दमव बुधक्री दशामें धर्मयुक्त ख्पाति मिलतीहै सुख ज्ञान कीते बहुत मनुष्योमें आधिपत्य ख्त्री, पुत्र, भूमि, धन और बढे उत्सव होतेहैं ।। १ ।। उच्चराशिगत बुषदशामें वढप्पन, धनसुख, शरीरपुष्टि, धन, गत्र, पुत्र, गौ, घोडे, उन्मत्तहाती मिलतहैं नित्य खुळीमें मृदंगका शब्द सुननेमें माताहै॥। २॥ उच्चमें जानेवाले वुधकी दशा यज्ञका उत्सव गौ बैल घोडाओंकां समूह कोमल अन्न भूषण वस्त्र सवारीका तथा भूमि एवं धनका लाभ देतीहै, अपनेसे पराया उपकार होताहैं।। ३ ॥ शशांकसूनोस्त्ववरोहिणी या दशा महत्कष्टतरं च दुःखम्॥। विज्ञानहीनं परदारसंगं नृपाग्िचौरैभयमत्र कष्टम ॥४॥ नीच

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(२२४ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

स्थचन्द्रात्मजदायकाले ज्ञानेन हीनं स्वजनैवियुक्तम्॥ पदच्यु- तिं बंधुविरोधतां च विदेशयानं वनवासदुःखम् ॥५॥ अवरोहिणी (ऊच्चसे उतरके नीचेमें जानेवाले) बुधकी दशा महत्कष्ट दुःख विज्ञानहीनता परस्ीसंग राजा अभि चोरसे भय और कष्ट देतीहै। ४ ॥ नीचगत चंद्रमाके पुत्रकी दशामें ज्ञानसे हीन अपने मनुष्योंसे वियोग पदहानि बंधुजनसे विरोध विदेशगमन वनमें वास और दुःख देतीहै ।। ५ ॥ मूलत्रिकोणान्वितसौम्यदाये राज्यं महत्सौख्यकरं च कीर्तिम्। विद्याविलासं निगमार्तिशीलं पुराणधर्मश्रवणादिपूतः ।। ६।। स्वक्षेत्रगस्यापि शर्शांकसूनो: प्राप्तौ दशायां धनधान्यसंपत्।।

मूछत्रिकोणगत बुधदशामें राज्य बडासौख्य कीर्ति विद्याविलास वेदाभ्यास पुराणधर्म आदि सुननेसे पवित्रताभी मिलतीहै । ६ ॥ अपनी राशिगत बुधकी दशामें अन्नधनकी संपत्ति व्यापारमें लाभ गौ, भूमि,पुत्र, धन, स्त्री,कोमल अन्न; पान, वस्त्र, भूषणोंका लाभ होताहै।।७। शशांकसूनोस्त्वरिराशिगस्य शत्रोर्भयं भूपतिकोपजातम् ॥ वि- द्याविहीनं कुलहीनसेवां कुभोजनं दारसुतार्थनाशम्।।८।। श्शां- कसूनोरतिशत्ुराशिं गतस्य पाके विपद च दुःखम्॥ उद्योगभंगं स्वजनैर्विरोधं यज्ञादिविभनं शुभकर्मनाशम्॥९॥ शत्रुराशिगत बुधकी दशामें शत्रुसे भय राजकोपसे भय विद्याका विस्मरण हीन कुलवाले- की सेवाकुमोजन स्त्री पुत्र धन नाश होतेहैं॥। ८ ॥ अतिशत्तुराशिगत बुधकी दशामें उद्य- मभंग अपने मनुष्योंसे विरोध यज्ञादिकर्ममें विघ्न और शुभकुर्मका नाश होताहै॥ ९ ॥ मित्रक्षेत्रदशायां शशांकसूनोर्घनायतिः सौख्यम्। नामदयसम्प्रा-

त्ोमहत्त्वतां याति।।भूपतमैत्रं सौख्यं धनसुतदारांश्र बंधुसन्मानम् ॥११॥समर्क्षगस्यापि शशांकसूनोर्दशा सुखं धान्ययुतांबराणि।। करोति राज्यच्युतिमत्र विघ्नं विज्ञानहीनं पिडकादिरोगम् ॥१२॥ मित्रराशिगत बुधकी दशामें धनकी वृद्धि सुख उपाधि नामकी माप्ति अपने नामयुक्त क- विताके गद्य और अपनेनामके पद्य (श्लोकछंदादि) होवें ॥ १० ॥ अतिमित्रराशिगत बुघकी दृशा में वढप्पनको माप्त होताहै राजासे मित्रता सुख, धन, पुत्र, स्त्री और बंघुवर्गसे सन्मान

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भापाटीकासहित:। (२२६ ) मिल॥ ११॥ समराशिगत बुधकी दशामें सुख अत्र वल मिलतेहैं तथा राज्यहानि पिच विज्ञानहानि फुनसी फोडे शीतला आदि रोगभी होतेहैं ॥। १२ ॥ नीचखे चर संयुक्त सौम्यदायेतिकष्टताम।। पद्भमं बंधुनाशं कर्म- नाशं मनोरुजम्॥ १३॥ उन्चरवेचर संयुक्त सौ्यदाये महत्सु- खम्।। भाग्योत्तरं सुविद्यां च वाणिज्यं गोकृषिक्रियाः।।१४।। विदः पापान्वितस्यापि दाये पापसुपैति च। क्षेत्रार्थदारपुत्रादिकृषि- गोभूमिनाशनम्॥१५॥ विद: सौम्ययुतस्यापि परिपाके महत्सु- खम्॥ राज्ययोगं सुखं कीर्ति दारपुत्रनृपात्सुखम्॥ १६॥ नीचगत ग्रह युक्त बुधकी दशामें अतिकष्टता पदमें संदेह बंधुनाश कर्मनाश और मनमें रोग होताहै।। १३ । उच्चराशिगत ग्रहसे युक्त बुधकी दशामें बहुत सुख ऐश्वर्यवृद्धि उत्तमविद्या व्यापारसे लाभ गौ तथा कृषिकर्ममें लाभादि होतेहैं॥१४॥पापयुक्त बुधकी दद्यामें पाप मिलताहै खेती धन स्ी पुत्रादि तथा कृषि गौ भूमिका नाश होताहै॥१५॥ शुभग्रह्युक्त बुधकी दशामें बडासुख राज्यसंबंधी सुख कीर्ति और स्री पुत्र एवं राजासे मिलताहै ॥ १६ ॥ सौम्येक्षितस्यापि शशांकसूनोर्दशाविपाके महतीं च कीर्तिम्। विद्याविला सोद्धवराजपूर्जां कांतिप्रतापं यशसा समेतम् ॥१७॥ पापेक्षितस्यापि शर्शांक सूनोर्धान्यक्षयं बंधुजनैवियुक्तिम्॥विदे- शयानं स्वपद्च्युति च प्रेष्यानुवृत्त्या कलहोत्र कृछ्रम्।।१८॥ केंद्रोपगस्य हि दशा शशिनंदनस्य भूपालमित्रधनधान्यकलत्न- पुन्नान्। यज्ञादिकर्मनृपमानयशःप्रलन्धि मृद्न्नपानशयनांब- रभूषणानि ॥ १९॥ जुभग्रहद्दष्ट बुधकी दशामें बडीकीर्ति स्त्नरी, पुत्र, सुख, विद्यासंबंधी हर्ष राजासे पूज्यता कान्ति और यशसहित पताप मिलताहै। १७॥ पापदष्ट बुकी दशामें अन्नक्षय वंजुणनसे मलगहोना, विदेशगमन अपने पदकी हानि, पराये शेष्यतासे भजीवन कलह और अल्येग हेतिहैं ।। १८ । केद्रगत बुधदशा राजासे मित्रता, धन, अन्न, सरी पुत्र यज्ञआदि पर् राजमान यश कोमल अन्न, पान, श्या, बख, भूषण देतीहै।। १९।। लनं गतस्य च दशा शाशीनंदनस्य भूपालमानकृषिवाइनलन्- भाग्यम्॥। मेरीरवादिपरिघोपितयानमाग तीर्थामिषेकमम पा

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(२२६ ) सर्वार्थचिन्तामणि:। जगति प्रसिद्धिम्॥२०॥ वित्तगसौम्यदशायां विद्यापातिं मह- त्प्रकीर्ति च। भूपतिभाग्यसमानां राजस्थाने प्रधानतां याति॥ ॥ २१ ॥ तृतीराशिस्थितचंद्रसूनोर्दशाविपाके जडता समेति॥ उद्धानमाजीवन गुल्मरोगमन्नार्तियोगे नृपमाननं च ॥२२।। लन्नस्थित बुधकी दशामें राजमान कृषि वाहनसे ऐश्वर्य मिलें, मेरीशब्दभादिसे युक्त सवारीमें मार्ग चलना होै अथवा तीर्थ फिरना होवे संसारमें मख्याति मिलें ॥ २० ॥ धनस्थानगत बुधकी दश्ामें विद्यामाप्ति बढी कीर्ति राजासे ऐश्वर्य मिले राजदर्वारमें श्रेष्ठता मिले ॥ २१ ॥ तीसरे बुधकी दशामें जडता पाताहै गायनसे आजीवन होवै गुल्मरोग अन्नसे पीडा और राज- मान होवै ॥ २२॥ शशांकसूनोर्हिबुकस्थितस्य दशा प्रपन्ना गृहधान्यनाशम्॥ सौख्यादिदानिं हिबुके समृत्युसुद्योगभंगं च पदच्युर्ति वा॥२३॥ पंचमस्थशशिनंदनस्य वा क्रूरुद्धिरतिकष्टता भवेत्। हीनवृत्ति- रपि राजसेवया कृच्छ्रलव्घघनमेति संपदम् ॥।२४।। पष्ठाष्टमांत्य- स्थितसौम्यदाये त्वग्दोषजातं बहुरोगमेति॥ विचर्चिका पैत्तिक- पांडुरोगं नृपाभिचौरैर्मरणं कृशत्वम् ॥२५॥ चतुर्थगत बुधकी दश्यामें गृह और अन्रकी हानि सुखािसे हीनता मातृकष्ट वा मृत्यु उद्य- मभंग अथवा पदसे उतरना होवे।। २३ । पंचम बुधकी दशामें कूरुद्धि तथा अतिकष्टता होवे निंदयफर्मसे आजीवन तथा राजसेवामें बड़ी कठिनाईसे धन एवं संपत्ति मिले ॥२४ ॥ छठे माठवें बारहवें बुधकी दशामें त्वचा ( चमड़े) में बहुतनकारके रोग मिलतेहैं वमन विरेक पित्तजन्य पांडुरोग और राजा अग्नि चोरसे भय कृशता वा मृत्यु होतीहै॥ २५॥ देहांगवैकल्यकलत्रबंधुविद्वेषणं भूपतिदत्तकोपम्। आकस्मिकं मृत्युभयं प्रसादं रिष्फस्थितस्यापि शशांकसूनोः॥२६॥दार- स्थितस्यापि शशांकसूनोर्दशाविपाके सुतदारवित्तम्। विद्यावि- नोदं विमलांबरं च नामइयं धूपतिमिन्रतां ॥२७॥ बारहवें बुधकी दशाफा विशेषफल कहतेहें कि शरीर तथा भंगोंमें विकलता अर्थाद अंग अपने २ कामोंसे निकम्मे होवें स्त्री तथा बंधुननसे वैर राजासे कोप अकत्मात् मृत्युभय ममाद

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भापाटीकासहित: (२२७ ) होतेहैं॥ २६॥ सप्तम बुधकी दशामें पुत्र स्त्री धन विद्याका विनोद निर्मलवर अधिकारी दूसरा नाम और राजाका मित्रता मिले ॥ २७ ॥ भाग्यस्थितस्यापि शशांकसूनोर्भाग्योत्तरं दारसुतार्थलाभम्।। तीर्थाभिषेकं जपहोमदानं यज्ञादिकर्माणि लमेन्मनुष्य: ॥ २८।। कर्मस्थितस्यापि शशांकसूनोर्दशाविपाके नृपतौल्यमेति।। सौख्यं स्वनामांकितगद्यपदं नामद्यं दारसुतार्थलाभम॥ २९॥ नवम भावगत बुधकी दत्यामें ऐश्वर्यवृद्धि स्त्री पुत्र धनलाम तीर्थस्ान जप हवन दान यज्ञ- आदि कर्म मनुष्य पाताहै॥ २८॥ दृशमभावगत बुधकी दशामें राजाके तुल्य अपने कुछानु- मान होवे सुख अपने नामयुक्त कविता श्लोकादि उपाधिनाम और स्त्री पुत्र धनलाभ होतेहैं२९॥। प्रपूजनं देवमहीसुराणां साध्ाज्यलाभं जननायकत्वम्॥ कवित्व- मार्ग समुपैति काले यज्ञादिदीक्षां स्वजनैर्विशेषात॥ ३०॥उ पांत्यराशिस्थित सौम्यदाये त्वनेकधा वित्तसुपैति काले॥ दानेन वा भूपतिमाननाद्वा कृषेश्श वाणिज्यविचारतो वा॥ ३१॥उर्जा- शसंयुक्तशशांकसुनोर्दशाविशेषे सुतभूणषात्तिम् ।। मनोविलासं मदनाभिरामसुत्साइधैये च जलाभिषेकम्॥ ३२॥ ग्यारहवें बुधकी दशामें देव ब्राह्मणपूजन राजाधिराजता मनुष्योंमें आधिपत्य कविताकी राह यज्ञआदिकी दीक्षा विशेषतः अपने मनुष्योकरिके समयपर पावै॥ ३० ॥ दादशगत वुधकी दशामें अनेकमकार धन पावै राजाके देनेसे अथवा राजाके माननेसे कृषिसे व्यापारसे अथवा विचारमंत्रणा आदिसे धन पावै॥ ३१॥ उच्चाशगत बुधकी दशामें पुत्रलाम भूषणलाभ मनके विलास हास कामदेवका सुख उत्साह ैर्य तीर्थस्रान मिलतेहैं॥ ३२ ॥ नी चांशकयुतः सौम्यो नीचवृत्यानुजीवनम्॥ प्रेष्यत्वं परिहारं च दशार्यां च करोति तत॥। ३३॥ सौम्यदशायामादौ लभते धनधान्यसंपद पुरुष:। अंत्ये स्वजनविरोधं मध्ये दाये नरेशस- न्मानम्॥ ३४॥ अर्कगसौम्यदशारयां लभते विविधापदं मनो- हुःखम्॥ स्वकुलजनविरोधं निंदाभीवाक्षिकर्णरोगं च ॥३॥ नीथांशकगत बुधकी दशामें नीचवृत्तिसे आजीवन (गुजारा) होवे पराये चाकरीमें नानापडे निंदा लाचारीभी करताहै॥ ३३॥ बुधकी दशाके भादिमें पुरुष धन धान्यकी संपत्ति पाताहै

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(२२८ ) सर्वार्थचिन्तामणिः। अंत्यमें अपने मनुष्योंसे वैर मध्यमें राजसन्मान मिलताहै॥ ३४ ॥ सूर्ययुक्त विशेषतः अस्तं गतकी दशामें नानामकारकी आपत्ति मानसी दुःख अपने कुलवाले मनुष्योंसे विरोधं निंदा भय अथवा नेत्र कानके रोग पाताहै॥ ३५॥ स्थानवीर्ययुते सौम्ये तत्पाकः कीर्तिराज्यदः॥ मनोधैर्य मनो- त्साहं यज्ञदीक्षाशुभप्रदः॥३६॥ तद्विहीनबुधे स्थानदारपुत्र- महद्धयम् ॥ विदेशवासं दुःखं च नानापरिभवक्रियाः॥३७॥ दिग्वीर्यसहिते सौध्ये दिगंताद्धनिक: सुधीः॥सामंतराजमित्रत्वं गंघमाल्यस्य लेपनम् ॥ ३८ ॥ स्थानवलयत बुधकी दशामें कीर्तिबढे राज्यमिले मनमें धैर्य उत्साह होवै यज्ञ करनेकी दीक्षा मिले शुभकर्म होवै॥। ३६ ॥ स्थानवल हीन बुधकी दशामें स्त्रीपुत्रोंको बड़ीभय होवे विदेशमें निवास होवे दुःख मिले नानापकार अपमानके काम होवें ॥ ३७ ॥ दिग्वलयुत बुधकी दशामें देशदेशांतरोंसे धनवान् होवै सुंदर बुद्धिहोवै छोटे राजासे मित्रता होवै सुगंध द्रव्य पुप्पादि लेपनादि होवें ॥ ३८ ॥ कालवीर्ययुतसौम्यदशायां देहसौख्यमतुलं रिपुहानिः॥ दारपुत्र- नृपमाननमेति गांगतोयपरिपूततनुः स्यात् ॥ ३९॥ निसर्गवी- र्यान्वितसौम्यदाये निसर्गतश्वापि शुभादिकर्म ॥ विद्याविवादं स्वजनैर्विरोधं मातुर्वियोगं त्वथ वा च कष्टम्॥४॥ काळवळी बुधकी दशामें बहुतसा शरीर सुख शत्रुहानि स्रीपुत्रवृद्धि राजमान मिलताहै गंगा- जलसे शरीर पवित्र होवै।। ३९॥ निसर्गबली बुधकी दशामें स्वभावहीसे शुभकार्य होवें तथा विद्याका विवाद (शास्त्रार्य) अपने मनुष्योंसे विरोध माताका वियोग वा कष्ट मिले॥४०॥ वक्चेष्टान्विते सौम्ये भाग्यदारसुतार्थभाकू॥ तथा पुराणदा- नादिसमुद्रस्नानमाचरेत् ॥४१॥ दिग्बलेन युते सौम्ये सर्वभूतेषु सौम्यताम्॥। करोति रतिकेलिं च राज्यभाग्यसमन्विताम्।४२।। ऋूरषष्टयंशसौम्यस्य दशापाके महद्यम् ॥ चौरामिभूपैर्भीतिः स्याच्छुभद्ग्योगवर्जिते ॥४३ ॥ सुध वक्ी पेष्टावलयुक्त होवै तो उसकी दशामें ऐश्वर्य, खत्री, पुत्र, घन वटे, पुराणश्रवण दान और समुदस्नान करे॥ ४१॥ दग्वलयुत बुधकी दशामें सच माणियोंनें सोम्यता कर-

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भावाटीकासित:। (२२९) ताहै कामकीडा सुख राज्य ऐश्वर्यसे युक्त रहताहै॥ ४२ ॥ कूरषष्टचंशगत बुधकी दशामें बढ़ीभय चौर अभनि राजासे भय होतीहै यदि बुध शुभग्रहसे युक्त वा दष्ट न हो ॥ ४३े ।। मृद्वंशादियुते सौम्ये राज्यलाभं महत्सुखम्॥ मार्दव सवभूतेष्ठ कृषिपुत्रार्थसंपदम्॥४४ ॥ सौम्ये वैशेषिकांशस्थे विशेषाद्वाज- पूज्यताम्।। सुगंर्धांवरमाल्यं च विद्यागोष्ठीरहस्यताम्॥४॥ क्रूरद्रेष्काणसंयुक्तश्चंद्रसूनुर्यंदा तदा। चौरागनिभूपतिभयं स्थान- नाशं महद्यम् ॥ ४६ ॥ मृद्दंशादियुत बुधकी दशामें राज्यलाभ बडासुख सब जीवौंमें दयाभाव कृषि पुत्र धनकी संपत्ति होतीहै॥ ४४ ॥ वैशेषिकाशगत बुधदशामें विशेषकरके राजपूज्यता मिलतीहै सुगंध वस्न् पुष्प विद्या कौन्सिलू गुप्तमंत्रणा होतीहै॥ ४५॥ बुध क्ूर द्रेष्काणमें होवे तो उसकी दशामें चोर अग्नि राजासे भय स्थाननाश बडी भय होवै॥ ४६ ॥ उच्चराशिगतः सौम्यो नीचभागगतो यदि।। राज्यं सुखं च कीर्ति च विनाशयति तत्क्षणात् ॥४७।। चंद्रात्मजोपि नीचस्थ: स्वोञ्चभागसमन्वितः॥अशुभं फलमादौ तु शुभमंते प्रयच्छति॥ ॥ ४८ ।। इति बुधदशाफलानि॥ इति श्रीसर्वार्थचिन्तामणौ भौमबुघदशाफलनिरूपणो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४॥ उच्चराशिका बुध यदि नीचांशकमें होवै तो उसकी दशा राज्य सुख कीर्तिका तत्काल नाश करती है।। ४७।। बुध नौचराशिगत उच्चांशकमें होवै तो प्रथम अगुभफल पीछे शुभफल देताहै॥ ४८ ॥ इति बुधदशाफलानि ॥ इति श्रीसर्वार्थचिंतामणौ माहीधरभाषाटीकायां भौमबुधदशाफल- निरुपणाध्यायश्वतुर्दशः ॥ १४॥

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(२३० ) संर्वार्थचिन्तामणिः।

पञ्चदशोऽध्यायः॥१५॥

अथ गुर्वादिदशाफलविचाराध्यायः। सुरोर्दशायां परमोच्चगस्य राज्यं महत्सौख्यमुपैति कीर्तिम॥ मनोविलासं गजवाजिसंघनृपाभिषकं स्वकुलाधिपत्यम्।।१।। कुलीरगस्यापि गुरोर्दशार्यां भाग्योत्तरं भूपतिमाननाद्ा॥। विदेशयानं महदाधिपत्यं दुःखैः परिष्विन्नतनुर्मनुष्यः॥२॥ परमोच्चगत गुरुकी दशामें राज्य, बडासुख और कीर्तिको माप्त होताहै, मनके विलास हाथी घोडाओंकी बहुतायत, राजाभिषेकानंद, अपने कुलमें आधिपत्य मिलताहै ॥ १ ॥ कर्क (उच्चराशि) गत गुरुदशामें ऐश्वर्यवृद्धि राजमानसे होवे, अधिकारी काममें विदेशगमन बडा अधिकार होवै और मनुष्य दुःखोंसे खिन्नमन भी रहै ॥ २ ॥ आरोहिणी देवगुरोमहत्त्वं दृशा प्रपन्ना कुरुतेर्थभूमिम्। गानकि- या स्त्रीसुतराजपूज्यं स्ववीर्यतः प्राप्तयशः प्रतापम्॥३ै।। जीव- दशायामारोहिण्यामीशो मण्डलादिनाथो वा। द्विजभूपालल- व्घघनो मेघावी कांतिमान् विनीतिज्ञ:॥४॥ आरोहिणी (उच्चमें जानेवाले) गुरुकी दशामें बढ़प्पन, धन, भूमि, गायनक्किया, ख्तरी, पुत्र राजपूज्यता मिलतीहै, और अपने वलसे यश एवं प्रताप होताहै॥ ३॥ औरभी फल आरो- हिणी गुरुदशाके हैं कि राजा वा माण्डलिक (कुछेक गांवका राजा) होताहै ब्राह्मण राजासे धन मिले, बुद्धिमान् कांतिमान् नीतिज्ञ होताहै।। ४ ।। देवेन्द्रपूज्यस्य देशावरोही करोति सौख्यं सकृदेव नाशम्॥ सकृ- द्यशः कांतिविशेषजालं नरेश्वरत्वं सकृदेव याति।।। अति- नीचभागभाजो गुरोर्दशार्यां प्रभग्नगृहपुंजः। अन्योन्यहृदयवैर कृषिनाशं याति परमृत्यः॥६॥। अवरोही (उच्चसे उतरके नीचगामी) गुरुकी दशा कभी सुरू कभी सुखका नारा कभी गदा कभी विशेष कांति कभी राजा कभी अराजा करतीहै।। ५॥ नीच नीचांशकगत गुरु- दशामें घर फटें टूटें आपसमें मनोंमें वैर रहे कृषिका नाश होवे पराई नौकरी करनीपडे।६।।

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मापाटीकासहित:। (२३१ ) भूलत्निकोणनिलयस्य गुरोर्दशारयां राज्यार्थभूमिसुतदारविशेष- सौख्यम्।। यानाधिरोहणमपि स्वबलाप्तवित्तं यज्ञादिकर्मजन- पूजितपादपीठम् ॥७॥ गुरोर्दशारयां स्वगृहं गतस्य राज्ञोर्थभू- धान्यसुखांबरं च। मिष्टान्नदो वाजिमनोविलासं काव्यादिपुण्या- गमवेद्शास्त्रम्॥८॥l मूलत्रिकोणगत गुरुकी दशामें राज्य, धन, स्त्री, पुत्रोंका विशेष सुख मिले सवारीमें भी चढे अपने बलसे धनादिक पांवै यज्ञादिकर्म करे बहुत मनुष्योंसे उसके पैर पूजेजावैं ।। ७।। स्वगृहगत गुरुदशामें राजासे धन, भूमि, अन्न, सुख, वस्न मिलें, मीठे भोजन घोडे मनका विलास काव्यादि विलास पुण्यागम वेदशास्र ज्ञान देती है॥ ८ ॥ गुरोर्दशायामतिशत्रुराशिं गतल्य दुःखं समुपैति शोकम्॥। विषा- दभूम्यर्थकलन्ननाशं नृपागिचैौिबहुदुःखपीडाम् ॥९॥गुरोर्द- शायामरिराशिगस्य क्षेत्रादिवित्तं शयनांवरं च।। नरेशसन्मा- नसुपैति नित्यं स्त्रीपुत्रभृत्यात्मसहोदरार्तिम्॥ १०॥ अतिशत्रुराशिगत गुरुदशामे दुःख शोक विषाद मिलते हैं भूमि, घन, स्रीनाश, राजा, अगनि, चोरसे बहुत दुःख तथा पीडा मिलतीहै॥ ९॥ शत्रुराशिगत गुरुदशामें खेती आदि धन शय्या वस्त्र और राजासे सन्मान नित्य मिलतेहैं, स्त्री पुत्र नौकर और भाइयोंको पीडा होतीहै॥ १० ॥ प्रात्तौ दशायामतिमित्रराशि गतस्य जीवस्य नरेन्द्रपूज्यम्।। मृदंगभेरीरवयानघोषं दिगं तराक्ांतसमस्तभाग्यम्॥ ११॥मित्र- क्षगस्यापि गुरोर्दशायां नरेशमैत्री समुपैति कीर्तिम्।। विद्यावि- वादे जयमन्नसौर्यं सुगंधमृद्दस्त्रपरोपकारम्॥ १२॥ समर्क्षग- स्यापि गुरोर्दशायां सामान्यतो भूपतिदत्तभाग्यम्।। कृष्यर्थगो- भूमिमनोविलासं मित्रांबरालंकृतिभूषणात्तिम्॥ १३॥ अतिमित्रराशिगत गुरुकी दशामें राजपूज्यता मिले मदंग भेरी आदिके शब्द युक् सवारी में चले ऐश्वर्यंसे दिगंतपयत आकांत करे संपूर्ण ऐश्वर्य होवे। ११ ॥ मित्रराशिगत गुरुकी दशामें राजासे मैत्री कीर्ति विद्यासंवंधि विवादमें विजय अन्रसुख सुगंधिद्व्य मृत्तिकाके पदार्थ दल और परोपकार करना मिले।। १२ ॥। समराशिगत गुरुदशामें सामान्यतासे राजाका दिया ऐश्पर्य कृषि, धन, गौ भूमि, मनकी मसन्नता विलासादि मित्र, वस्न, अलंकार, भूद- णोंकी भापि होदै ॥ १३ं ॥

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(२३२ ) सर्वार्थचिन्तामणि:। नीचखेचरसंयुक्तजीवदाये मनोरुजम्॥ परप्रेष्यापवादं च पुत्रा- णां च विरोधिताम्॥ १४॥। उन्चरवेचर संयुक्तगुरुदाये महत्सुखम्॥ अनेकगोपुरादीनां निर्माणं नृपपूज्यताम ॥ १५॥ नीचराशिगत ग्रहसंयुक्त गुरुदशामें मानसीरोग पराये कहेसे सफर करनापडे पुत्रोंके साथ विरोध होवै॥ १४॥ उच्चराशिगत ग्रहसंयुक्त गुरुकी दशामें बडा सुख मिले अनेक अट्टालिकावाले गृह बनावै राजासे पूज्यता मिले ॥ १५॥ पापान्वितस्यापि गुरोर्दशार्यां करोति पापं हदयांतरस्थम्।। गूढं बहिः पुण्यफलं विशेषाद्दूव्यर्थदारात्मजसौख्यमेति॥१६॥ शुभान्वितस्यापि गुरोर्दशायां नरेशयानं मृदुलांबरं च॥ दानेन वित्तं नृपमाननाद्ा यज्ञादिसन्मार्गविशेषलाभम॥१७॥ पापयुत गुरुकी दशामें मनमें पाप करतारहै बाहर छिपाय रक्खे तथा दिखावेंमें पुण्यफल कहे और भूमि, धन, स्त्री, पुत्र, सुख भी पाताहै॥ १६ ॥ शुभग्रह युक्त गुरु दशामें राजासे सवारी कोमल वस्त्र मिलें दान मिलनेसे वा राजाके सन्मान करनेखे धन मिले यज्ञादि पुण्य- मार्गेका विशेष लाभ होवै ॥ १७ ॥ पापेक्षितस्यापि गुरोर्दशायां प्राप्तं सुखं किंचिदुपैति चैर्यम्॥ क्चिद्यशः कुत्रचिदाप्तसौख्यं कचिद्धनं नाशभुपैति चांते॥१८।। शुभेक्षितस्यापि गुरोर्दशायां देशांतरे वित्तसुपैति भूपात्॥ देवार्चनं भूसुरतर्पणं च तीर्थाभिषेकं गुरुपूज्यतां च॥ १९ ॥ केन्द्रगतजीवदाये राज्यं भूदारराजसन्मानम्॥ विविधसुखान- न्दकरं बहुजनरक्षां प्रधानतां याति॥२०॥ पापदृष्ट गुरुकी दशामें थोडा सुख वैर्य कभी यश कभी सुख मिले अंत्यमें धननाशभी होषे।। १८।। शुभग्रह दृष्ट गुरुकी दशामें देशांतरमें राजासे धन पाँवै देवताका पूजन ब्राह्मणोंकी तृप्ति तीर्थस्ान और गुरुका पूजन होवै॥ १९॥ केन्द्रगत बृहस्पतिकी दशामें राज्य, भूमि, स्त्री और राजसन्मान मिले भनेक प्रकार सुख आनंद करताहै बहुत मनुष्यों की रक्षा अपनेंसे होतीहै मधानताको माप् होताहै ॥ २० ॥ लमं गतस्य हि दशा पुरुषे करोति जीवस्य सौख्यममलांबर- भूषणासिय्।। यानाधिरोहणमृदंगपणारवैश्ध मत्तेमवाजिभटर्स-

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भाषाटी कासहित:। (२३३)

घयुत करोति॥ २१॥ चतुर्थकेन्द्रस्थितजीवदाये यानत्रयं भूप- तिमित्रभावम॥ भूपालयोगे यदि भूपतित्वं नोचेत्तथा तत्सदशं करोति॥२२ ॥ कलवराशिस्थितजीवदाये दारार्थपुत्रार्थसुखं प्रयाति॥विदेशयानं समरे जयं च ध्यानं परब्रह्मणि पुण्यकर्म॥।२३।। लग्नगत गुरुकी दशा सृख निर्मलवस्त्रभूषणोंकी माप्ति मृदंग नगोरोंके शब्दसहित सवा- रीमें चढना और उन्मत्त हाथी घोडे योद्धाओंसे युक्त कराती है।। २१ । चौथे गुरुकी दशामें तीन प्कार अर्थात् चतृष्पढ मनुष्य निर्जीव सवारी मिलें राजासे मित्रभाव हों राज- योगभी मनुष्यको होवै तो ऐसी दशामें राजाही होजावै राजयोग न होवै तो राजाके तुल्य तोभी होजाताहै॥ २२ ॥ सप्तमगत जीवकी दशामें स्त्री धन पुत्रोंका सुख विदेशगमन संग्राममें जय परत्रह्ममें ध्यान लगे पुण्यकर्म होवै॥ २३ ॥ कर्मस्थितस्यापि गुरोविपाके राज्याप्तिमाहुर्सुनयस्तदानीम् ॥ भूपालयोंगे त्वथ वार्थपुत्रकलत्रसत्कर्मसुराजयोगम् ॥२४॥ पंचमस्थगुरोदाय मंत्रोपास्ति महत्सुखम्॥ सुताप्तिं राजपूजां च वेदांतश्रवणादिकम् ॥२५॥ त्रिकोणसंस्थस्य गरोर्दशायां स्त्री- पुत्रधान्यार्थविवेकवुद्धिम्। मृद्न्नपानांबरपट्टवस्त्रयानादिलाभं भवनेशसौख्यम्॥ २६ ॥ उच्चांशसंयुक्तगुरोर्दशार्यां भाग्योत्तरं राजसमानमेति॥ प्रवालमुक्तामणिरत्नलाभं सर्वेषु सख्यं समुपैति सौख्यम् ॥२७॥ द्शमगत गुरुदशामें मुनिलोग राज्यमापि कहतेहैं यदि राजयोगभी होवे तब यह फल है अथवा धन पुत्र स्त्रीलाभ सत्कर्म राजपसाद तो विना राजयोगभी होतेहीहैं ॥ २४ ॥ पंचम गुरुकी दशामें मंत्रकी उपासना बड़ासुख पुत्रपाप्ति राजासे पूजा और वेदांतश्रवण यादि उत्तम काम होवै॥ २५ ॥ त्रिकोणगत गुरुकी दशामें स्त्री, पुत्र, अन्न, धन, विवेक बुद्धि, कोमल अन, पान, वस्त्र, रेश्मीवस्र, सवारी आदिका लाभ गृह्पतिसे सुख मिलतेहैं॥। २६ ॥ उच्चांशकगत गुरुकी दशामें ऐश्वर्यवृद्धि राजासे सन्मानता, सूंगा, मोती, मणि, रत्नोंका लाम सबके साथ मित्रता और सुख होतेहैं॥ २७॥ नी चांश संयुक्त गुरोर्विपाके भूपाद्धयं गुल्मविचर्चिकादीन्॥ स्था- नच्युति बंधुविरोधितां च नृपाभिचौरैः स्वकुलोद्नवैध ॥२८॥ अर्कगजीवदशायां सहसा ज्वरपीडितो भवेत् क्षीण:।। ऊर्ध्वी-

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(२३४) सर्वार्थचिन्तामणिः।

गरोगतप्तो दुःशीलत्वं प्रभम्नसंसारः ॥ २९॥ आदौ गुरुदशा- काले नृपपूर्जां महत्सुखम्। मध्ये स्त्रीपुत्रलाभादि चाँते कषटं विनिर्दिशेत्॥ ३०॥ घनस्थितस्यापि गुरोर्विपाके धनाय्ति भूपतिमाननं च। विद्याविवार्दाकितराजगोष्ठीं सर्वोपकारं विजयं सुखं च ॥। ३१।। नीचांशगत गुरुकी दशामें राजासे भय गुल्म अरुचि आदि रोग होवैं, स्थान छूट जादै, बंधुजनोंमें विरोध होवै, राजा अभ्नि चोर और अपने कुलवालोंसे भी भय होवै ॥२८॥अस्तंगत गुरुकी दशामें एकाएकी ज्वरसे पीडित तथा क्षीण होनावै, ऊपरके अंगमें रोग होनेसे संतप्त रहे, शील नष्ट होजावै, सारा संसार निरर्थक मालूम पडे ॥ २९ ॥ गुरुफी दशामें पहिले तो राजपूज्यता तथा सुख मिळता है बीचमें पुत्रादिलाभ और अंतमे कष्टफल कहना ॥३० ॥ दूसरे भावगत गुरुकी दशामें धनकी वृद्धि राजासे मान विद्याकी चर्चावाली राजसमामें भवेश अपनेसे सबका उपकार विजय और सुख इतने फल होते हैं ।। ३१ । नृपकृतबहुमानं आ्रातृभिर्भूमिलाभं परयुतविजनैवा दृत्तगोभि- वित्तम्।।अशनवसनभूषा गंधमाल्यांवराणि परकृतसुपकारं विज्ञ- तामेति शौर्य्यम्॥ ३२॥ तृतीयस्थगुरोरदाये आ्रातृणां च सुखं भवेत्॥ नृपदत्तं धनं सौख्यं गंघमाल्यांवरादिकम्॥।३३॥।नीरो- गता पुत्रकलन्नलाभं लग्नाद्विपुस्थस्य गुरोर्दशायाम्॥आदौ भवे- देवमर्थांत्यपाके दारार्थंचौरादिभयं सरोगम्॥ ३४॥ जीवो मर- णपदस्थ: करोति सौख्यं स्वबंधुजनहानिम्॥ स्थानच्युर्ति विदेशं प्रांति स्त्रीराजपुत्रसन्मानम् ॥३५॥ धनस्थानगत गुरुकी दशाका फल औरभी कहतेहैं कि राजाका किया बहुत मान, भाइयोंसे भूमिका लाभ, शत्रुसे वा अन्य किसी मनुष्योंके दिये गौ भूमि घन मिलें, भोजन, वस, भूषण, पंदन, पुष्प, उत्तमवस्न मिलें, दूसरेसे मपना उपकार उत्तम बुद्धिमत्त्व और सामर्य्य मिलें। ३२ ।। तीसरे गुरुकी दशामें भाईयोंका सुख राजाका दिया धन सुख और चंदन सुगंधित पुष्प वस्त्रादि मिळते हैं। ३३ ॥ छठे गुरुकी दशामें प्रथम निरोगता पुत्र स्त्री लाभ अंतमें स्त्री धनहानि चोर आदिकी भय होतीहै॥ ३४॥ अष्टमस्थ गुरुकी दशा सुख तथा अपने बंधुजनोंकी हानि करतीहै स्थानहानि विदेशगमन कराती है अतमें सी राजसन्मान पुत्रादिलाभ यद्ा राजपुत्रसे सन्मान दिलाती है।। ३५ ॥।

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भावाटीकासहित:। (२३५ )

लाभगजीवदशायां संग्रात्तौ राज्यलाभसुपयाति॥ बह्वर्थदारपु- नानू भूपविरोधं स्वबंधुविद्वेषम्।३॥ व्ययगतजीवदशार्या प्ाप्तौ वाहनादि समुपयाति। लभते विदेशयानं नानाक्केशैश परिभूतः ॥ ३७॥ ग्यारहवें गुरुकी दशामें राज्यलाभको माप्त होताहै धन स्त्री पुत्र बहुत होतेहैं, राजा तथा अपने बंधुजनोंमें दवेष होताहै ॥३६॥ बारहवें गुरुकी दशामें वाहन आदि मिळतेहैं तथा यनेक पकार के क्लेशोंसे दबकर विदेशगमन मिलताहै॥ ३७ ॥ पाके स्थानबलान्वितस्य च गुरोः क्षेत्रार्थदारात्मजान्संप्रामोति गजांश् वस्त्नकनकं चित्रांबरं भूषणम् ॥ दिग्वीर्यान्वितदेवनायक- गुरौ लोके प्रसिद्धिं तथा जीवे कालबलाधिके नृपवधूसन्मानता याति सः॥ ३८ ॥। निसर्गवीर्यान्वितजीवदाये निसर्गतश्राति- सुखं महत्त्वम् ॥ विद्याविलासं रतिकेलिसौख्यं भागीरथीतोय- कृताभिषेकम् ॥३९॥ वकं गतस्यापि गुरोर्दशायां महार्थता याति सुतार्थदारान्। युद्धे जयं भूपतिमित्रतां च सुगंधजातां- बरवाग्विलासम् ॥४० ॥ स्थानबली गुरुकी दशामें खेती, धन, स्त्री, पुत्र मिलतेहैं हाथी, ोडे, वस्र, सुवर्ण, अनेक रंगके वसत्र भूषणोंका लाभ होताहै दिग्वीर्ययुक्त गुरुकी दशामें लोकमें ख्याति, कालवलयुतगुरु- की दशामें राजरानियोंसे सन्मानताको प्ाप्त होताहै।। ३८।। निसर्गबलयुत गुरुकी दशामें खुख वड़प्पन विद्याका विलास कामक्रीडाका सुख और गंगाका स्नान मिलताहै॥ ३९ ॥ वकगति गुरुकी दशामें धनसंपन्नता स्त्री पुत्र धनलाभ संग्राममें विजय राजासे मित्रता सुगंध द्रृव्य उत्तम वस् और वाणीका विलास मिळतेहैं ॥ ४० ॥ दृग्वीर्ययुक्तस्य गुरोर्विपाके कृपाकटाक्षेण महीपतीनाम् ॥ समस्तभाग्यं समुपैति नित्यं देशान्तरे भ्राम्यति किंचिदेव॥।४ १।। कूरषष्टयंशसंयुक्तमुरोर्दायेतिकष्टताम् ॥ राजकोपावमानादीन् लभते नात्र संशयः॥।४२॥ हग्वली गुरुकी दशामें राजाओोंकी कृपासे संपूर्ण ऐश्वर्य नित्य पावै तथा थोडा, देश्ञांतर कमनमी करे।। ४१।। कूरषष्टचंशयुक्त गुरुकी दश्ामें अतिकष्ट राजाका कोप भपमान वादि निस्संदेह पाताहै ।। ४२ ॥

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(२३६) सर्वार्थचिन्तामणि:। सौम्यषष्टयंशसंयुक्तगुरोर्दायेतिसौख्यताम॥ वाहनं वन्धुसन्मानं यज्ञवैवाहिकं शुभम् ॥४३॥ पारावतांशयुक्तस्य गुरोदाये मह त्सुखम्॥ मृद्न्नपट्टवसतं च हेमविक्रयभूषणम् ॥४४।। पाश द्रेष्काणयुक्तस्य गुरोदाये च बंधनम्॥ कारागृहप्रवेशं च निगडं दारविग्रहम् ॥ ४५॥ उच्चस्थोपि गुरुर्नीचराश्यंशकसमन्वितः। महाभाग्ये तु संप्राते तत्क्षणादेव नश्यति ॥ ४६॥ नीचस्थो देवपूज्योपि स्वोच्चांशकसमन्वितः ॥ भाग्यक्षयेपि संप्राते भाग्यं याति तदा नरः ॥ ४७॥ इति गुरुदशाफलम्॥ शुभषष्ट्यशगत गुरुकी दश्ामें अतिसुख वाहन बंधुवर्गमें सन्मान यज्ञ तथा विवाहकर्म होतेहैं। ४३॥ पारावर्ताशगत गुरुकी दशामें बडासुख कोमल अन्न रेशमी वस्त्र सुवर्णसे रंजित भूषण मिलतेहैं।। ४४॥ पाशद्रेष्काणगत गुरुकी दशामें बंधन कैदघरमें प्रवेश कठिन स्थानमें बंदी होना और खत्रीके साथ कलह होतेहैं॥ ४५॥ उच्चराशिका बृहस्पति नीचां- शकमें होवै तो उसकी दशामें बडा ऐश्वर्यभी नष्ट होजाताहै॥ ४६॥ नीचराशिका उच्चांशकमें हो तो ऐश्वर्य क्षयभी होगयाहो तोभी पुनः पूर्ण होजाताहै॥ ४७ ॥ इति गुरुदशाफलम् ॥ अथ शुकदशाफलम्। अत्युञ्चभृगुदशायां मत्तविलासप्रियार्थभोगी स्यात। माल्या- च्छादनभोजनशयनस्त्रीपुत्रधनयुक्तः॥१॥ स्वोच्चस्थितस्यापि भृगोर्दशायां स्त्रीसंगन ष्टार्थविरुद्धघर्मम्॥ पित्रोर्विनाशं सयुपैति दुःखं शिरोरुजं भूपतिमाननं च ॥। २ ॥ अब शुकदशाके फल कहतेहैं परम उच्चगत शुककी दशामें मौढ हासविलास मिलें मिय वस्तुका भोगवाला होवै सुगंघित पुष्प, वस्त्र, भोजन, शय्या, स्त्री, पुत्र और धनसे युक्त रहे॥ १ ॥। उचराशिगत शुककी दशामें स्त्रीसंगसे धन नष्टहो विरुद्धधर्म होवै मातापि ताकी हानि दुःख शिरमें रोग और राजासे मानभी पावै ॥ २ ॥ आरोहिणी शुकदशा प्रपन्ना धान्यांबरालंकृतिकांतिपूजाम् ॥ प्रवृत्तिसिद्धिं स्वजनैविरोधं मात्रादिनाशं परदारसंगम्॥। ३ ॥ भृगोः सुतस्याप्यवरोहकाले प्रचंडवेश्यागमनं धनाप्तिम्॥8 त्ती पुत्रबंध्वार्तिमनोविकारं हच्छूलरोगं मदनार्तिमेति॥।४॥

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भाषाटीकासहितः। (२३७ )

उच्चमें जानेवाले शुक्की दशामें अन्न, वत, भूषण, उत्तपकांति लोकमें पूज्यता उद्यम- सफल तथा अपने मनुष्योसि विरोध माताआदिका नाश पराई खरीसे संग होवै।। ३ ।। नीचमें जानेवाले शुककी दशामें मचण्डवेश्याका गमन धनमाप्ि जी पुत्र बंधुजनोंको पीडा मनमें विकार हृदयमें शूलरोग और कामदेवकी पीडा पाताहै॥ ४ ॥ उद्देगरोगतप्तः कर्मसु विफलेषु सर्वदाभिरतः ॥ अतिनीचगस्य- दाये शुकस्यात्मार्थदारपुन्नार्तिम् ॥ ॥ मूलत्रिकोणभाजो भृगोर्दशायां महाधिपत्यं स्यात्।। क्रयविक्रयेषु कुशलो धनकी- र्तिसमन्वितो विधिज्ञश्च ॥ ६॥ परमनीचगत शुककी दशामें उद्देग रोगसे संतप्त रहे सर्वदा निष्फल कामोंमें तत्पर रहे अपने शरीर स्त्री पुत्रोको पीढा होवै ॥ ५ ॥ मूळत्रिकोण ७ तुलाके शुककी दशामें बडा आधिपत्य (अफ्सरी:) होवै व्यापारमें निपुण धन तथा कीर्तिसे युक्त और विधि जाननेवाला भी होवै ॥ ६ ॥ शुकक्षेत्रदशायां लभते स्त्रीपुन्रमित्रधनशौर्यम् ।नित्योत्साह द्वेषं परोपकारं महत्त्वंच ॥ ७ ॥ भृगोर्दशायामतिशत्ुराशिं गतस्य पुत्रार्थकलन्नहानिम्॥ प्रभग्नसंसारविशीर्णदेहं गुल्माक्षि- रोगं ग्रहणीप्रकोपम्॥८॥। वृषराशिगत शुक्ककी दशामें स्त्री, पुत्र, मित्र, धन और पराक्रम पाताहै नित्य उत्साह द्वेष पराया उपकार और बडप्पन भी मिलताहै।। ७ ॥ अतिशत्रुराशिगत झुक्रकी दशामें पुत्र धन स्त्रीकी हानि संसारसे विरक्ति शरीर शिथिल गुल्मरोग नेत्ररोग और संग्रहणी रोगका कोप होवै ॥ ८॥ शत्रुक्षेत्रिदशायां भृगोरपत्यार्थदारहानिः स्यात्॥ भूपतिरोषं कु- रुते मत्तविलासार्थपापकर्माणि ॥९॥ मित्रक्षेत्रदशायां परोप- कारी कलाविधिज्ञश्र। पूगारामकृषिः स्याद्देवमनुष्यैश्र्वोद्धृता- र्थश्र ॥ १०॥ अतिमित्रशुक्दाये भूपतिसन्मानसौख्यं च। गोधनवाजिसमेतं गजपतिसंचैनिरस्तदोषेश् ॥११॥ शत्रुराशिगत शुककी दशामें पुत्र, धन, ख्त्रीकी हानि होवै, बढे विलासादिकी हानि और पापकर्म होतेहैं ॥ ९। मित्रराशिगत शुकदशामें पराया उपकार करे, ६४ कला जाने, विषि वा ज्योतिष जाने, सुपारी आदिका बाग खेती देवता एवं मनुष्योंके काममें उसका धन आये

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(२३८ ) सर्वार्थचिन्तामणि:।

॥ १० ॥ अतिमित्रराशिगत गुक्रकी दशामें राजासे सन्मान हावै, सुखमिले, गौ गादि पु- धन घोडे तथा निर्दोष श्रेष्ठ हाथियोंसे युक्त रहे॥ ११ ॥ समर्क्षगस्यापि भृगोर्विपाके प्रमेहगुल्माक्षिगुदप्ररोगः ॥ किंचि- त्सुखं भूपतिवह्निचौरिर्भयं स्वनामांकितगद्यपद्यम्॥।१२।नीच- खेचरसंयुक्तभृगोर्दाये महद्यम्॥ अपवादकृतं दोषं लभते पाप- कर्ममिः॥१३॥ स्वोच्चस्थितेन सहितस्य भृगोर्विपाके राज्यं महत्त्वसमराधिपतित्वमेव।। हेमांबरादिमणिभूषणयानलाभं मेरी- मृदंगपणवारववाद्यघोषैः॥१४॥ समराशिगत शककी दशामें भमेह गुल्मरोग नेत्ररोग गुद़द्वारमें रोग होवैं, सुख थोडा मिले राजा अभनि चोरसे भय होवै, अपने नामसे चिहित गद्य पद्य होवें॥ १२॥ नीचगत गहसे युक्त शुककी दशामें बडी भय होवै, झूठा कलंक पाप कर्मोसे मिले।। १३ ।। उच्चगत ग्रहसे युक्त शुककी दशामें राज्य बड़प्पन युद्धमें नायकता सुवर्णवस्त्रादि तथा मणियों सहित भूषण मिलें, भेरी मृदंग नकारे आदि बाजाओंके शब्दसहित गमन करे॥ १४ ॥ पापान्वितस्यापि भृगोर्दशारयां स्थानच्युति बंधुजनैर्विरोधम्।। आचारहनि कलहप्रियत्वं कृष्यर्थभूम्यात्मजदारनाशम्॥ १५॥ शुभान्वितस्यापि भृगोर्दशायां सौभाग्यमित्रात्मजधान्यलाभम्।। नरेशपूर्जां गजवाजिसंघं प्रवालमुक्तामणियानलाभम्॥१६॥ पापयुक्त शुकदशामें स्थानहानि, बंधुंननोंसे विरोध, आचारहीनता, झगडामें मेम, खेती, धन, भूमि, पुत्र, स्त्रीकी हानि होवे।। १५॥ शुभग्रह्युक्त शुकदशामें (सौभाग्य) उत्तम ऐश्वर्य, मित्र, पुत्र, अन्न, धनका लाभ,. राजपूज्यता, हाथी घोडाओंके समूह, मूंगा, मोती, मणि, वाहन मिलें ॥ १६ ॥ पापेक्षितस्यापि भृगोरदशायां मानार्थहानं सक्ुपैति दुःखम्॥ स्त्रिया विरोधं स्वपदच्युति च विदेशवासं निजकर्महीनम्॥१७॥ शुभेक्षितस्यापि भृगोरविपाके धनांबरं भूपतिपूजनं च।। जना- िपत्यं स्वशरीरकांतिं कलत्नमिन्रात्मजसौख्यमेति॥१८॥ पापदृष्ट शुककी दशामें मान धन हानि और दुःख पाताहै, खीसे विरोध अपने पढकी हानि विदेशमें निवास और अपने कर्मसे हीनता मिळतीहैं।। १७ ॥ शुयग्रहद्ष्ट शुक्रदशामें वन यख राजासे पूजा बहुत मनुष्योंमें नायफता थपने शरीरमें उत्तमकांति स्त्री मित्र पुनरोका सुख मिलताहै।। १८ ।।

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आवाटीकासहित:। (२३९ )

केन्द्रे गतस्य हि दशा भृशुनन्दनस्य यानांबरादिमणिभूषित- देहकांतिम्॥। राज्यार्थ भूमिकृषिवाहनवस्शस्त्रदुर्गाधियानवनवा- सजलाभिषेकम् ॥१९॥ लग्नगशुकदशार्या संपात्तो राजमाननं लभते॥ मणिगोधनकृषिलाभं परापवादं महोत्साहम् ॥ २०॥ चतुर्थराशिस्थितशुकदाये राज्यं महत्सौख्यसुपैति यानम्॥। कृ- षिक्रियावित्तपशुपजानां वृद्धिं प्रतापान्वितकीर्तिजालम्॥२१॥ केन्द्रगत शुककी दशामें सवारी वस्ादि मिलें, मणियोंसे भूषित शरीरकी कांति बढ़े, राज्य, धन, भूमि, कृषिकर्म, वाहन, वस्त्र, शस्त्र मिलें, किलामें गमन वनवास वन्यजल स्नान मिलें ।। १९ । लन्नगत शुककी दशामें राजमान पाताहै, मणि, गौ, धन, कृषिका लाभ, बडा उत्साह और अपवाद मिलतेहैं॥ २०॥ चौथे शुककी दशामें राज्य बडासौख्य वाहन पावे कृषिकर्म धन पशु सन्तानकी वृद्धि होती है प्रतापसे युक्त कीर्तिजाल फैलताहै॥ २१॥ कलत्रराशिस्थित शुक्कदाये कलन्ननाशं त्वथ वा विदेशम्॥ ग्रमे- हगुल्मादिशरीररोगं प्रभग्नवित्तात्मजबंधुराज्यम् ॥२२॥ कर्म- स्थशुकस्य दशाविपाके विद्याघनप्राप्तिनरेशपूजा ॥ भाग्योत्तरं पालितदेहकांतिं दिगंतरप्राप्तयशःप्रतापम् ॥ २३॥ त्रित्रिकोण- गतः शुकः करोति नपपूज्यताम्॥ यज्ञकर्मादिलाभं च गुरुपित्रोः सुखं यशः ॥ २४ ॥ पंचमस्थभृगोर्दाये पुत्रावाततिं विनिर्दिशेत्। कीर्ति च राजपूजां च सर्वेषामुपकारकमू ॥२५॥ सप्तमगत शुकदशामें स्त्रीनाश अथवा विदेशगमन होवै, पमेह गुल्म आदि रोग शरीर में होवैं, धन पुत्र बंधुजन और राज्य भग्र हेवि॥ २२ ॥ दशम शुककी दशामें विद्याधनकी भाप्ति राजासे पूजा ऐश्वर्यवृद्धि शरीरमें शरृंगारादि कांति बढे और यश प्रताप दिगंतरोंमें फैले ।। २३॥ नवमगत शुककी दशा राजपूज्यता यज्ञकर्मादि लाभ गुरु एवं पिताका सुख तथा यश देती है ॥ २४ ॥ पंचम शुक्की दशामें पुत्रमाप्ि कहनी तथा कीर्ति राजपूज्यता औौर अपने हाथसे सबका उपकार करना मिले ॥ २५॥ वित्तगशुकदशायां धनहानिमाहुर्घनायतिं चापि।। अन्नसुखं वा- ग्विलासं परोपकारं नरेशसन्मानम्॥ २६॥ तृतीयराशिस्थित- शुऋदाये घैर्य महोत्साहमदीनसत्त्त्म्। चित्रांबरालंकृतवाहनाति

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(२४० ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

सहोदराणां बहुभाग्यलाभम्॥२७॥ भृगोर्विपाकेऽरिगतस्य नाशं धान्यार्थबह्वात्मजसोदराणाम्॥। रोगं महत्कार्यविनाशनंच शत्रो- र्भैयं भूपतिवह्निचोरैः ॥२८॥ धनस्थानगत शुककी दशामें प्रथम धनहानि तब वृद्धिभी होतीहै, अन्नका सुख वाणीका विळास पराया उपकार तथा राजासे सन्मान मिलताहै ॥ २६ ॥ तीसरे शुककी दशामें धैर्य मनका उत्साह बडा जहीन वा पताप विचित्र वस्त्रोंसे शोभित वाहनकी पाप्ति और भाइयोंका भी बहुत ऐश्वर्य लाभ होवै॥ २७ ॥ छठे शुककी दशामें अन्न, धन, पुत्र, भाईयोंका नाश होवे बडारोग उत्पन्न होवै कार्यहानि और शत्रु, राजा, अग्नि, चोरखे भय होवै ॥। २८ ॥। रंघ्रे स्थितस्यापि भृगोर्विपाके शस्त्राग्निचौरक्षत मित्रविन्नम्।कचि- त्सुखं किंचिदुपैति वित्तं कचिन्नरेशापयशः प्रतापम्॥२९॥ लाभस्थितस्यापि भृगोर्विपाके सुगंधमाल्यांबरराजपूजाम् ॥ पुत्रार्थसौख्यं कृषिविक्रयं च दानं र्वनामांकितपद्यजालम्।।३०।। व्ययगतशुकदशार्यां लभते धान्यार्थराजसन्मानम्।। स्थानच्युर्ति पवासं मातृवियोगं मनोविलासं च॥ ३१॥ अष्टमगत शुक्की दशामें शस्त्र अन्नि चोरसे भय होवै, चोट लगे, विध्न होवै, कभी सुखभी होवै, कभी धन पावै, कभी राजासे यश मिले, कभी पताप बढे। २९ ॥ लाभगत शुक्रकी दशामें सुगंध पुष्प वस्त्र राजासे पूजा मिले, पुत्र तथा धनका सुख कृषिकर्ममें लाभ दानादि देना और अपने नामसे युक्त क्षोकादियोंके समूह होवें॥ ३० । बारहवें शुक्ककी दशामें अन्न धन राजासे सन्मान मिले, तथा स्थानहानि परदेशगमन माताका वियोग होवै और मनका विलास भी होवै॥ ३१ ॥ जीवर्क्षग तस्य भृगो: स्त्रीपुत्रभूमिनाशनं कुरुते। कर्मसु नित्योदि- ग्रो जननीकेशान्वितो मनोदुःखी ॥३२॥अर्कगशुकदशायां जी- र्णगृहौका: शुभावरोधश्च॥ लभते दारविनाशं आातृवियोगं च क- लहं च॥। ३३। सिंहगशुकदशारयां लभते विविधापद मनो- हुःखम्। उद्योगरोगतप्त: कर्मश विफलेषु सर्वदाभिरतः ॥३४॥ गुहराशिगत युकदशा सी पुत्र भूमिका नाश करतीरै, कामोमें सर्वदा डदिम रहताहै, माता ज श्रेख मिलताहै मनमें दुः्खी रहताहै॥ ३२॥। अस्तंगत शुककी दशामें पुराने परमें निफड

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भावाटीकासहित:। (२४१ ) मिलताहै, भलेकाम रुकनातेहैं, स्त्रीहानि भाइयोंका वियोग और कलहमी होताहै॥ ३३॥ सिंहराशिगत शुककी दशामें मनेकमकार आपत्ति पाताहै मनमें दुःख उद्यमसे तथा रोगसे संतप्त और निष्फल होनेवाले कामोंमें सर्वदा तप्तर रहे॥ ३४॥ शुके स्थानबलाधिके नरपतेः सन्माननं भूषणं विद्यावादविवाद- गोष्टिरसिकं नामदयं संभ्रमम् । तस्मिन् दिकपबलान्विते बहु- यशः पुत्रार्थदारांबरं शुके कालबलान्विते सुखधनं कीर्ति: स्व- नामांकिता ॥३५॥ निसर्गवीर्ययुक्तस्य भृगोदाये महत्सुखम् ॥ कृषिगोभूमिवित्तादिभ्रातृमातृसुखं भवेत् ॥३६॥। स्थानबली शुक्रकी दशामें राजासे सन्मान भूषण मिलें, विद्याके विवादवाली सभामें पवेश रसिकता बडे उत्साइसे दो नाम अर्थात दूसरा अधिकारी नाम मिले, दिग्बली शुककी दशामें बहुत यश बढे पुत्र, धन, स्त्री, वब्र मिलतेहैं कालवलयुक्त शुक्दशामें सुख धन और अपने नामयुक्त कीर्ति मिलतीहै॥ ३५ ॥ निसर्गबली शुकदशामें बढा सुख मिलताहै, कृषि भूमि धनादि बढतेहैं, तथा भाई एवं माताका सुख होताहै ॥ ३६॥ वकंगतस्यापि भृगोः सुतस्य दशाविपाके त्वतिराजपूज्यम्। मृदंगभेरीरवयुक्तयानं विचित्रवस्त्राभरणानि राज्यम्॥३७॥ दृग्वीर्ययुक्तस्य भृगोर्विपाके यज्ञादिकर्माणि करोति काले।। विद्या- विलासं शयनाम्बरं च नृपाभिषेक कलहं विरोधम्।।३८।कूरष- पृयंशयुक्तस्य भृगोरदाये विषद्धयम्॥ चौराग्निराजभीतिश्र् कृषि- गोधूमिनाशनम् ॥३९॥सौम्यषष्टयंशयुक्तस्य भृगोदाये महत्सु- खम्॥ कूपारामतडागानां निर्माणं देवपूजनम् ॥४० ॥ वक्गतशुककी दशामें बहुतसी राजपूज्यता मिळे, मृदंग भेरी आदियोंके शब्दसहित उसकी सवारी निकले, अनेक पकारके वस्त्र भूषण और राज्य मिलें॥ ३७ ॥ दग्बली शुककी दशामें समयपर यज्ञादिकर्म करताहै, विद्याका विलास मिले, शय्या वस्त्र मिलें, राजाका अभिषेक देखे और कलह विरोधभी होवें।। ३८ ।। कूरषष्टयशगत शुककी दशामें विपत्ति भय चोर अभ्नि राजासे भय कृषि गौ भूमिका नाश होवै।। ३९ ॥ शुभषष्टयंशगत शुकदशामें बढा सुख मिळे कुंर्वा बगीचा तालाव बनावे, देवपूजन करे ॥ ४० ॥ वैशेषिकांशयुक्तस्य भृगोर्दाये महत्सुखम् ॥ वाहनं भूपसन्मार्नं

कारागारमहत्कष्टमनलं चौरपीडनम् ॥ ४२ ॥

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( २४२ ) सर्वार्थचिन्तामणिः। वैशेषिकांशगत शुक्की दशामें बहुत सुख मिळे, वाहन राजसन्मान भाई स्त्री धनकी संपत्ति होवै॥ ४१ ॥ क्रूरद्रेष्काणगत शुककी दशामें शत्रुसे भय कैदमें रहनेसे बडा कष्ट और अग्नि चोरसे पीडा मिले॥ ४२ ॥ उच्चक्षेत्रेपि नीर्चांशयुक्त: शुकोतिकष्टदः॥ करोति राज्यनाश च स्थाननाशमथापि वा॥४३॥ उच्चांशयुक्तशुकोपि नीचराशिस- मन्वितः ॥ कृषिगोभूमिवाणिज्यं धनघान्यविवर्द्धनम्॥४४॥ इति शुकदशाफलम्॥ उच्चराशिगतभी शुक नीचांशमें होवे तो उसकी दशा अतिकष्ट देतीहै राज्यनाश अथवा स्थाननाश करतीहै।। ४३ ।। यदि नोचराशिमेंभी उच्चांशकी होवै तो कृषि, गो, भूमि व्यापार, धन, अन्नको बढातीहै ॥ ४४ ॥ इति शुक्दशाफलम् ॥ अथ शनिदशाफलविचारः। मन्दोतत्युच्चदशायां ग्रामसभामण्डलाधिपत्यं स्यात्।। लभते विनोदशीलं पितृनाशं बंधुकलहं च॥। १॥ स्वोच्चदशायां कुरुते देशभ्रंशं मनोरुजं दुःखम्॥ वाणिज्यसत्त्वहानि कृषिहानि नृप- विरोधं च ॥ २ ॥। अब शनिकी दशाका फल कहतेहैं परमोच्चगत शनिकी दशामें गांवसभा (मण्डल) परगन्नाका आधिपत्य मिले, खशीकी वार्तालाप और पिताका नाश बंधुजनसे कलहमी होताहै ॥ १ ।। उच्चगत शनिकी दशा दात गिरातीहै, मनका रोग दुःख व्यापारमें हानि, तेजकी हानि कृषिहानि और राजासे विरोधभी करातीहै ॥ २ ॥ आरोहिणी वासरनाथसूनोर्दशाविपाके नृपलब्धभाग्यम्॥ वा णिज्यलाभं कृषिभूमिलाभं गोवाजियानं सुतदारलाभम् ॥ ३ै॥ दिनेशसूनोस्त्ववरोहकाले राज्यच्युति दारसुतार्थनाशम् । भाग्यक्षयं भूपतिकोपयुक्तं प्रेष्यत्वमायाति गुदाक्षिरोगम्॥४॥। नीचस्थितस्यापि दिनेशसूनोर्दाये कलन्नात्मजसोदराणाम् ॥ नाशं महत्कष्टतर्रां कृषिं च नीचानुवृत्त्या सभुपैति वृत्तिम् ॥८॥ उच्चराशिमें जानेवाले शनिकी दशामें राजासे ऐश्र्य मिलें, व्यापारमें लाभ गौ घोडे सवा- री पुत्र स्त्रीका लाभ होवै॥ ३॥ नीचराशिमें जानेवाले शनिकी दशामें राज्यहानि सी पुत्र धनका नाश ऐश्वर्यका क्षय राजाफे कोपसहित तथा पराया मेष्यत्व (दूतक्र्म ) और गुदा

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भावाटीकासहित:। (२४३ )

एवं नेत्रमें रोग होवै॥ ४॥ नीचराशिगत शनिकी दशामें स्त्री पुत्र भाईयोंका नाश कृषि बडे कष्टसे और आजीवन नीच वृत्तिसे होवै॥ ५ ॥ मूलत्निकोणनिलयस्य शनेर्दशारयां देशान्तरादिवनवाससुपैति काले । नामदयं यदि सभानगराधिपत्यं विद्वेषणं सुतकलन्नध- नादिभिवा ॥६।। स्वक्षेत्रगस्य च दशा दिवसेशसूनोर्द्वेषं करोति बलपौरुषकीर्तिजालम्। राजाश्रयं कनकभूषणभूमिलाभं धैये स्वनामसदृशानुगुणं च सौख्यम्।।७॥ मूछत्रिकोण ११ राशिगत शनिकी दशामें देशांतरगमन वनमें वास पावै तथा उपाधि- नाम सभा एवं नगरका आधिपत्य पावै और पुत्र स्त्री अथवा घनसे विद्वेतिता पावै॥ ६ ॥ अपनी राशिगत शनिकी दशा द्वेष करातीहै तथा बल पुरुषार्थ कीर्तिनाल रामाका आश्रय सुवर्णके भूषण भूमि धैर्यता मिलतेहैं अपने नाम गुणोंके सदृश सुखमी मिलताहै।। ७॥ शनेर्देशायामतिशत्रगस्य स्थानच्युति बंधुविरोधतां च।। चौरा- दिभूपैर्भयमत्रविधो मृत्यार्थदारात्मजकोपमेति।।८।। दिनेशसूनो- स्त्वरिराशिगस्य वैश्याद्धनं प्राप्यति भूमिनाशम् ॥ कृषेर्विनाश स्वपदच्युतिं च वैरं समायाति शरीरकृच्छम् ॥ ९॥ अतिशत्रुराशिगत शनिकी दशामें स्थानहानि बंधुजनमें वैर चौरादिमय राजाओंसे भय कार्यमें विघ्न नौकर धन स्त्री पुत्रोंका कोप पावै ।।८॥ शत्रुराशिगत शनिकी दशामें वणियेंसे धन पावै, भूमिका नाश कृषिका नाश पदकी हानि वैर शरीर कष्ट पावै ।। ९ ॥ मित्रक्षेत्रदशार्यां मंदस्य तु शिल्पकर्मगुणवेत्ता।। ज्ञानबलं च प्रतापं ददाति दुःखं महत्त्वं च॥ १०॥ अधिमित्रमंददाये ददाति सौख्यं नरेशसन्मानम्॥ सुतघनदारविशेपात पशुकृषिमहिषा- दिवाणिज्यम्॥ ११॥ समर्क्षगस्यापि शनेर्दशायां समानबुद्धिः सुतदारमित्रे॥ भृत्यापदं बंधुजनेषु वैरं देहस्य कष्ट क्षयवा तपित्तैः॥१२॥ मित्रराशिगत शनिकी दशा शिल्पकर्म कारीगरीके गुण जाने, ज्ञान बल पताप तथा दुःख और बढ़पनभी देतीहै॥ १० ॥ अधिमित्रराशिगत शनिकी दशा सुख राजासे सन्मान पुत्र धन स्त्रोसे विशेषतः कृषि महिष आदिके व्यापारसे धन देतीहै।। ११ ॥ समराशिगत शनिकी दशामें पुत्र स्री मित्रोंमें समान बुद्धि रहती है, सेवकको आपत्ति बंधुजनोंमें वैर तथा झ्षय दात पित्तसे देहकष्ट होताहै।। १२ ॥

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(२४४) सर्वार्थचिन्ताभाणः । नीचखेचर संयुक्तशनेदाये महद्यम्॥ विप्रलंभोपवासश्च नीच वृत्त्यानुजीवनम् ॥ १३॥ स्वोच्चवेचरसंयुक्तशने्दाये महत्सुखम् किश्चिद्राज्यं कृषेलाभं भृत्यवर्गार्थनाशनम्॥ १४॥ नोषराशिगत ग्रहयुक्त शनिकी दशामें बडी भय होतीहै, फोई बात अंगीकार करके उसका संपादन न करना होवे निराहार रहना पडे, नीचवृत्तिसे आजीवन होवै॥ १३ ॥ उच्चराशि- गत ग्रहसे युक्त शनिकी दशामें बडा सुख मिले, थोडा राज्य कृषिसे लाभ होवै और सेवक तथा धनका नाशभी होवै ॥ १४ ॥ पापान्वितस्यापि शनेर्दशायां पापानि गूढानि करोति काले।। नीचस्त्रिया संगमनं विशेषाच्चौरादिनीचैः कलहं विदारम्॥१५॥ शुभान्वितस्यापि शनेर्दशायां विशेषतो ज्ञानसुपैति काले।। परोपकारं नृपलब्धभाग्यं कृष्णानि धान्यान्ययशश् लाभम्॥१६॥ पापयुक्त शनिकी दशामें गुप्तपाप करताहै विशेषतः नीचस्त्रीका संगम करे चौरादि नीचोंसे कलह तथा स्त्रीहानि होवै॥ १५ ॥ शुभग्रहयुक्त शनिकी दशामें विशेषकरके ज्ञानपावै पराया उपकार करे राजासे ऐश्वर्य मिले कृष्णरंगके अन्न और लोहेका लाभ होवै ॥ १६ ॥ पापेक्षितस्यापि शनेर्दशायां भृत्यार्थदारात्मजसोदराणाम् ॥नाशं समायाति परापवादं कुभोजनं कुत्सितगंधमाल्यम्॥१७॥ शुभेक्षितस्यापि शनेर्दशायां स्त्रीपुत्रभृत्यार्थसुपैति काले॥। पश्चा- दुपैत्यत्र महत्वकष्टं गोभूमिवाणिज्यकृषेर्विनाशम्॥।१८॥ पापदृष्ट शनिकी दशामें सेवक, धन, स्त्री, पुत्र और भाइयोंका नाश होवै, झूठा कलंक लगे कुभोजन निंद्य चंदन पुष्पआदि मिळे॥ १७ ॥ शुभग्रहद्ष्ट शनिकी दशामें स्त्री पुत्र सेव- कोंकी वृद्धि मिलती है, पीछे बढ़पन एवं कष्ट और गौ, भूमि, व्यापार, कृषिका नाश होताहै।१८॥ केन्द्रान्वितशनेर्दाये कलहायासपीडनम्॥ पुत्रमित्रार्थदारादि- बंधूनां मरणं ध्रुवम् ॥ १९ ॥ लग्नस्थितशनेदाये देहकृच्छयु- पैति च ॥ स्धानच्युति प्रवासं च राजकोपं शिरोरुजम्॥२०॥ चतुर्थस्थशनेरदाये मातृतद्वर्गनाशनम्॥ गृहदाहं पदभ्रंशं चौरार्ति नृपपीडनम्॥ २१ ॥ केन्द्रगत शनिकी दशामें कलह श्रम पीडा तथा पुत्र मित्र धनादिहानि बंधुजनमरण निश्चय होताहै।। १९।। लभ्नगत शनिकी दशामें देहमें कष्ट पावै, स्थानहानि विदेशवास राजाका

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भाषाटीकासहित:। (२४५)

कोप और शिरमें रोग होताहै॥ २० ॥ चौथे भावगत शनिकी दशामें माता तथा मातृवर्ग मांवसी ताई चाची दादी आदिका नाश, घरका जलना, पदसे भ्रष्ट होना और चोरसे राजासे पीडन मिलताहै॥ २१ ॥ दारराशिगतस्यापि शनेर्दायेऽरिपीडनम् ।। मूत्रकृच्छूं महाद्वेवं खीहेतोर्मरणं च वा ॥२२॥ दशमस्थशनेदाये कर्मनाशसुपैति च॥ देशांतरं पदभ्रंशं निगडं राजपीडनम् ॥ २३॥ द्वितीयस्थ- शनेदाये वित्तनाशमथाक्षिरुकू॥ राजकोप मनस्तापमन्नद्वेषं मनोरुजम् ॥२४ ॥ तृतीयस्थशनेर्दाये कृषिगोधनसंपद: ॥ मनोजाडयं मनोत्साहं भ्रातृतद्वर्गनाशनम् ॥ २५॥ सप्तमगत शनिकी दशामें शत्रुसे पीडन मूत्रकृच्छ रोग बडा वैर अथवा खीके कारण मरण होवै॥ २२॥ दशमगत शनिकी दशामें कर्मका नाश पावै, देशांतरगमन पदसे भ्रष्टता कैद राजासे पीडन इतने फल होतेहैं।। २३ ॥ दूसरे शनिकी दशामें धननाश तथा नेत्ररोग राजाका कोप मनमें संताप अंन्नमें अरुचि मनमें रोग होतेहैं॥ २४ ॥ तीसरे भावगत श्निकी दशामें कृषि गौ धनकी संपत्ति मनकी जडता ( कुन्द) ता तथा मनका उत्साह और भाई ध्रातृवर्गका नाश होवै ॥ २५ ॥ पंचमस्थशनेदाये पुत्रनाशं मनोरुजम्॥ राजकोपं भृत्यनाशं बंधुस्त्रीवित्तविभ्रमम् ॥ २६॥ षष्ठस्थरविसूनोस्तु दशाकालेऽरि- पीडनम्। व्याधिचौरविषैर्बाधां गृहक्षेत्रविनाशनम्॥ २७ ॥ मरणपदस्थो मंदः करोति नित्यं सुतार्थदाराणाम् ॥। नाशं सृत्यजनानां गोमहिषभूमिदारनाशं च ।। २८॥ नवमगतमंद- दाये पित्रोर्नाशं गुरोस्तथैवापि। लभते विदेशयानं स्वकुलजा- तैर्विनाशमुपयाति ॥ २९ लाभगतमंददशायां लभते विविधार्थ सौख्यसन्मानम् ।। सुतदारभृत्यसौख्यं मनोविलासं कृषेश्च धनलाभः॥३० ॥ पंचमगत शनिकी दशामें पुत्रनाश मानसी रोग राजाका कोप सेवकका नाश बंधुजन स्त्री घनका विभ्रम होवै॥ २६ ॥ छठे शनिकी दशामें शत्रुपीडा रोग चोर और विषसे पीडा मिळे वर खेतीका नाश होवै॥ २७ ॥ अष्टमस्थानस्थित शनिकी दशा पुत्र, धन, स्त्रियोंका नाश, भृत्यहानि, गौ, भैंस, भूमि, स्त्रीनाश करतीहै। २८।। नवम शनिकी दशामें मातापि-

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( २४६ ) सर्वार्थचिन्तामणिः ।

ताका नाश तथा गुरुका नाव परदेशगमन और अपने कुलवालोंसे नाशको पाप्त होवै।. । २९। ग्यारहवें शनिकी दशामें नानाप्रकार धन, सुख, सन्मान, पुत्र, स्त्री, सेवकोंका सुख, मनकी विलासता (खुसी खेळ हंसीआदि) और कृषिसे धनलाभ होवै ॥ ३० ॥ व्ययगतमंददशायां भीति चौराग्िभूपसंघैश्च । विविधापदं च दुःखं विदेशयानं स्वबंधुनाशश्र॥। ३१ ॥ अर्कगमंददशायां स्वजनद्वेष परस्त्रियं लभते॥ भृत्यापत्यविरोधं महोद्यमं दोषपारि- भूतम् ॥ ३२ ॥ व्ययभावगत शनिकी दशामें चोर अननि राजाओंसे भय नानापकारकी आपत्ति दुःख परदेशगमन बंधुविनाश होताहै॥ ३१ ॥ अस्तंगत शनिकी दशामें अपने मनुष्योंसे दवेष पंरस्त्रीसंग सेवक तथा पुत्रोंसे विरोध होवै, बडे उद्यम होवें परंतु दोषपूरित ॥। ३२ ।। नीचांशमंददाये नीचाचारेण जीवनं लभते । सर्वेषां प्रेव्यत्वं धनसुतदारैश्च विग्रहं दुःखम्॥ ३३॥ उच्चांशमंददाये विविधस- खानन्दभोगभाग्यादीन्॥ कुरुते विदेशयानं ग्रामसभामण्डला- घिपत्यं वा॥ ३४॥ आदौ मंददशायामतिदुःखं मातृनाशनं कुरुते॥ मध्ये विदेशयानं परगृहवासं परात्रभुक चांते ॥ ३५॥ नीर्चाशगत शनिदशामें नीचकर्माचरणसे आजीवन मिलताहै, सबका मेष्य (दूतत्त्व ) धन पुत्र स्त्रीसे कलह तथा दुःख मिलतहैं।। ३३।। उच्चाशगत शनिकी दशामें अनेकमकार सुख आनन्द भोग ऐश्वर्यआदि होतेहैं, वह परदेशगमन वा ग्राम. (सभा) कचहरी परगन्नाका मालिक बनाती है।। ३४॥ शनिको दशा पथम अतिदुःख माताका नाश मध्यमें विदेश- गमन अंतमें पराय घरमें निवास पराया अन्न भोजन करातीहै ॥ ३५॥ स्थानवीर्ययुतमंददशायां दारपुत्रधनकीर्तियुपैति॥ चोरशननृप- वह्निभयं वा धान्यभूमिकृषिवाहनलामम् ॥ ३६॥ मंदस्य दिग्वीर्ययुतस्य दाये दिगंतरादातंसुतार्थकीर्तिम्॥ भूगूढदारात्म- जसोदराणां विनाशनं बंधुजनैर्विरोधम्॥ ३७॥ कालवीर्ययु- तमंददशायां कालकूटविषभीतियुपैति॥ दारपुत्र नृपचौरभयं वा धान्यभूमिकृषिवाहनलाभम्॥ ३८ ॥ स्थानबली शनिकी दशामें स्त्री पुत्र धन और कीर्ति पाताहै अथवा चोर, शत्रु, राजा, अभिसे भय तथा अन्न, भूमि, कृषि, वाहनका लाभ होताहै ॥ ३६ ॥ दिग्वीर्ययुत शनिकी

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भावाटीकासहित:। (२४० )

दशामें दिगंतरसे कीर्ति आवै पुत्र धन मिलें भूमि गुप्तस्त्री पुत्र भाईयोंकी हानि बंधुजनसे विरोध होवै॥ ३७॥ कालवली शनिकी दशामें कालकूट विषकी भय अथवा स्त्री पुत्र भय राज चौर भय मिलती है, अन्न, भूमि, कृषि और वाहन लाभ होताहै॥। ३८॥ वक्रचारयुतो मन्दः करोति विफलां क्रियाम्॥ उद्योगभंगं दुःखं च सोदराणां चनाशनम्॥ ३९॥ ऋरषष्टयंशयुक्तस्य शनिदाये महद्यम् ॥ नृपकोपं पदभ्रंशं कारागृहनिवेशनम्॥ ४० ॥ सौम्यषष्टयंशसंयुक्तशनिदाये महत्सुखमू।।दार पुत्रार्थसंपत्ति लभते बन्धुविग्रहम्॥४१॥ वक्रगत मंगलकी दश्ा कार्यविफल उद्योगभंग दुःख और भाईयोंका नाश करतीहै।। ।३९ । कूरषष्टयंशगत शनिकी दशामें बडीभय राजकोप पद्हानि और कैदघरमें निवास होताहै। ४०॥ शुभषष्टयंशगत शनिकी दशामें बडासुख स्त्री पुत्र धनकी संपत्ति मिळे और बंधुवर्गमें कलह होवै । ४१ ॥ वैशेषिकांशसंयुक्तः शनिः सौख्यं करोति च॥ विशेषाद्राजस- न्मानं विचित्रांबरभूषणम् ॥४२॥ कूद्रेष्काणसंयुक्तशनिदाये महद्यम्॥ उद्धंधनं विषाङ्गीतिं नृपचौराग्निजं भयम्॥४३॥ नीचराशिगतो मंदः स्वोच्चांशकसमन्वितः।दशादौ दुःखमापाद् दशांते सुखदो भवेत् ॥४४।। उच्चराशिगतो मंदो नी चांशकसम- न्वितः।दशादौ सुखमापाद्य दशान्ते कष्टदो भवेत् ॥४५॥ इति श्रीसर्वार्थचिंतामणौ गुर्वादिशन्यन्तदशाफलनिरूपणो नाम पंच-

वैशेषिकांशगत शनिकी दशा सुख करतीहै, विशेषतः राजासे सन्मान अनेकमकारके वञ् भूषण देतीहै।४२।कूरद्रेष्काणगत शनिकी दशामें बहुत भय फांसी लटकना विषसे भय राजा चौर अग्निसे भय होतीहै॥ ४३॥ नीचराशिगत शनि यदि उच्चांशकमें होवै तो दशाके आदिमें दुःख देकर अंतमें सुख देनेवाला होताहै॥ ४४ ॥ उच्चराशिगत शनि यदि नीचांशकमें होवै तो दशाके आदिमें सुख देकर अंतमें कष्ट देनेवाला होताहै॥ ४५॥ इति श्रसर्वार्थचिन्तामणौ माहीधरीभाषाटीकायां गुर्वादिशन्यन्तदशाफल- निरूपणाऽध्याय: पश्चद्शः ॥ १५॥

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(२४८ ) सर्वार्थचिन्तामणि:।

षोडशोध्यायः॥ १६॥

अथ राहुकेतुदशाफलविचाराध्यायः। राहोस्तु वृषभं केतोर्वृश्िकं तुंगसंजञितम्। मूलत्रिकोणं कुम्भं च प्रियं मित्रभसुच्यते ॥ १॥ ए्षां सप्तमराशिस्तु केतोर्मूलत्रि- कोणभम्॥ षष्ठाष्टरिष्फगो राहुः स्वदाये कष्टदो भवेत्॥।२।। उञ्च- स्थः सैंहिकेयस्तु तत्पाके सुखदो भवेत्।। राज्यं करोति मित्रातिं धनधान्यविवर्द्धनम्॥ ३॥ राहुका वृष, केतुका वृश्चिक उच्चसंज्ञक है, कुंभ मूलत्रिकोण मेष मित्रराशि है ॥ १॥ इनकी सातवीं राशि केतुका मूळत्रिकोण है, राहु ६। ८। १२ भावोंमें अपनी दशामें कष्ट देताहै ॥ २।। उच्चगत राहु अपनी दशामें सुख देनेवाला होताहै, राज्य मित्रमाप्ति और अन्न धनकी वृद्धि करताहै॥ ३ ॥ राहुर्नीचस्थितो दाये चौराग्निनृपभीतिदः॥ उदंधन विषाद्धीतिं कुरुते सिंहिकासुतः ॥॥ राहोर्दशायां संप्राती नृपचौरागिपी डनम्॥ विदेशयानं दुःखार्ति वनवासाद्नयं धरुवम्॥५॥ लग्नग- तराहुदाये बुद्धिविहीन विषागिशस्त्रादैः। बंधुविनाशं लभते दुः- खार्ति च पराजयं समरे॥ ६ ॥ नीचगत राहुदशामें चौर अत्नि राजासे भय देताहै, फांसी लटकना विषसे भय करताहै ।४॥ राहुकी दशामें राजा चोर अग्निसे पीडन विदेशगमन दुःख पीडा और वनवाससे निश्चय भय होतीहै॥ ५॥ लग्नस्थित राहुकी दशामें बुद्धिहीनता विष अ्ननि शस्त्रादिसे भय बंधुविनाश दुःख पीडा मिलतीहै, युद्धमें हारभी मिलतीहै॥ ६ ॥ राहोर्दशायां धनराशिगस्य राज्यं च वित्तं हरते विशेषात्॥ कु- भोजनं कुत्सितराजसेवा मनोविकारं त्वनृतं प्रकोपमू।।७॥। तृतीयराशिस्थितराहुदाये पुत्रार्थदारात्मसहोदराणाम्।।सुखं कृषे- र्बधनमाधिपत्यं विदेशयानं नरपालपूज्यम्॥८ दूसरे रहुकी दशामें राहु विशेषतः राज्य तथा वित्तभी हरण करताहै, कुभोजन मिले निन्ध राजाकी सेवा मनमें विकार झूट और क्रोध होवैं।। ७॥ तीसरे राहुकी दशामें पुत्र धन अपने भाइयोंका सुख कृषिकर्मसे बंधन आधिपत्यता विदेशगमन पूज्यता मिले॥ ८॥

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भावाटीकासहितः। (२४९) चतुर्थराशिस्थितराहुदाये मातुर्विनाशं त्वथवा तदीयम्॥ क्षेत्रार्थ नाशं नृपतेः प्रकोपं भार्यादिपातित्यमनेकदुःखम् ॥९॥चौरा- शनिबंधार्तिमनोविकार दारात्मजानामपि रोगपीडा।। चतुर्थराशि- स्थितराहुदाये प्रभग्नसंसारकलत्रपुत्रमू॥।१०॥ बुद्धिअ्रमं भोजन- सौख्यनाशं विद्याविवादं कलहं च दुःखम्॥ कोपं नरेन्द्रस्य सु- तस्य नाशं राहो: सुतस्थस्य दशाविपाके॥११॥ चौथे राहुकी दशामें माताका विनाश अथवा अपना विनाश होवै, खेती धनका नाश राजाका कोप स्त्री आदिको पतितता अनेक दुःख होतेहैं ।। ९ । औरभी फलहैं कि चोर अग्निभय बंधन पीडन मनका विकार स्त्रीपुत्रोंको भी रोग पीडा होवै, स्त्री पुत्र और संसारसे मन विविक्त रहे॥ १० ॥ पंचमराहुकी दशामें बुद्धिका भ्रम भोजनका सुख नाश होवै, विद्यामें विवाद कलह दुःख राजकोप पुत्रनाश होताहै॥ ११ ॥ दशाविषाके त्वरिराशिगस्य चौराग्निभूपैर्भयमात्तनाशम्॥ प्रमेह- गुल्मक्षयपित्तरोगं त्वग्दोषरोगं त्वथवा मृति च ॥। १२॥कलत्- राशि्थितराहुदाये कलत्रनाशं समुपैति शीघ्रम्॥ विदेशयानं कृषिभाग्यहानिं सर्पाद्धयं मृत्युसुतार्थनाशम्॥१३॥ राहोर्दशायां निधनस्थितस्य यमालयं याति सुतार्थनाशम्॥ चौराग्रिभूपैः स्वकुलोद्भवैश्व भयं भृगोर्वा वनवासदुःखम्॥ १४॥ छठे राहुकी दशामें चोर अग्नि राजासे भय, लाभका नाश,अपने हितैषीका नाश, ममेह, गुल्म क्षय, पित्तरोग, त्वचाके दोषका रोग होव अथवा मृत्यु होवे।। १२ ।। सप्तमगत राहुकी दशामें स्त्रीनाश शीघ्र होताहै, परदेशगमन कृषि तथा ऐश्वर्यकी हानि सर्वसे भय, मृत्यु, पुत्र,धन नाश होवै॥ १३ ॥ अष्टमगत राहुदशामें यमालय जाताहै, पुत्र धन हानि होतीहै, चोर अग्नि राजासे तथा अपने कुलवालोंसे भय होवै ( मृग) सिंह भेडियाआदिकी भय होवै ॥ १४ ॥ राहोर्दशायां नवमस्थितस्य पित्रोर्विनाशं लभते मनुष्यः॥ विदे- शयानं गुरुबंधुनाशं स्नानं समुद्रस्य सुतार्थनाशम्॥ १५॥मा- नस्थितस्यापि दशाविपाके राहोः प्रवृत्तिं लभते मनुष्यः ॥ पुरा- णधर्मश्रवणादिभिश्च् गांगेयतोयेरपि शुद्धदेहः ॥ १६॥ सौम्य- क्षगश्वेत्फलमेवमेव पापर्क्षगश्ेत्र तथाभवेद्धि॥ प्रोक्तं फलं यत्स- कलं तदेव सौम्यर्क्षगश्चेत्फलमन्यथा स्यात्॥१७॥ १०

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(२९० ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

नवमगत राहुकी दशामें मनुष्य माता पिताका नाश विदेशगमन गुरुजन बंधुजनका नाश पुत्र धननाश होवै तथा समुद्रस्ान मिले॥ १५॥ दशमराहुकी दशामें मनुष्य फर्ममें पवृत्ति पावै पुराण धर्म श्रवणआदि करके धर्ममें प्रवृत्ति होवै गंगाजलसे देह शुद्ध होवै ॥ १६ ॥ राहु शुभराशिमें होवै तब ऐसा फळ होताहै पापराशिमें होवै तो वैसा फल न होगा पापराशिमें होनेसे उक्तफल विपरीत होताहै॥ १७ ॥ पापक्षेत्रगतो राहुः कर्मस्थः पापसंयुतः ॥ अभिशस्तस्तदा काले पुत्रदाराग्निपीडनम्॥ १८॥ आयराशिगतो राहुस्तत्पाके नृपमाननम् ॥ धनातिं दारलाभं च गृहक्षेत्रादिसंपद्ष:।।१९।। व्ययगतराहुदशायां देशअ्रंशं मनोरुजं कुरुते॥ विच्छिन्नदारपुत्रं कृषिपशुधनधान्यसंपदां नाशम्॥२०॥ दशमराहु पापराशिमें होवै तथा पापयुक्त होवै तो झूठा कलंक लगे पुत्र स्त्री अनिसे पीडन मिले ।। १८ ।। लाभगत राहुकी दशामें राजमान धनमाप्ति स्त्रीलाम मकान खेती आदिसंपत्ति होवैं॥ १९॥ बारहवें राहुकी दशामें देश छूटे मनमें रोग करताहै स्त्री पुत्र उच्छिन्न होवें कृषि धन अन्न संपत्तियोंका नाश होवै ॥ २० ॥ कुलीरगोमेषयुतस्य राहोर्दशाविपाके घनलाभमेति॥ विद्यावि नोदं नृपमाननं च कलत्रभृत्यात्मसुखं प्रयाति ॥ २१॥ पाथो नमीनाश्वयुतस्य राहोर्दशावियाके सुतदारलाभम्॥ देशाघिपत्यं नरवाहनं च दशावसाने सकलं विनाशम्॥ २२॥ पापर्क्षसंयुक्त फणीन्द्रदाये देहस्य कार्श्य स्वकुलस्य नाशम् ॥ भूपाद्रयं वश्चनतोऽरिभीतिः प्रमेहकासक्षयसूत्रकृच्छ्रम् ॥२३॥ कर्कवृषमेषगत राहुकी दशामें धनलाभ विद्याविनोद राजासे सन्मान मिळताहै स्त्री सेवक तथा शरीर सुखको प्राप्त होताहै॥ २१ ॥ कन्यामीनधनके राहुकी दशामें पुत्र स्त्रीलाभ देशमें अधिपतिता नरवाहन मिलतेहैं परंतु दशाके अंतमें सब उक्तवस्तुका नाश होताहै॥। ॥२२।। पापराशिगत राहुकी दशामें देहकृश अपने कुलका नाश राजासे भय ठगीसे शत्रुसे भय पमेह, खांसी, क्षय, मूत्रकृच्छ रोग होते हैं ॥ २३ ॥ शुभदृष्टियुतो राहुः करोति सफलक्िंयाम्॥ राजमाननम रथाति बंधूनां मरणं धुवम्॥२४॥ पापदृष्टियुतो राहुः कर्मनाशं करोति च ॥ उद्योगभंगं देहार्ति चौराग्निनृपपीडनम् ॥ २॥

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भाषाटीकासहित:। (२५१ ) उच्चग्रहयुतो राहूराज्यलाभं करोति च॥ स्त्रीपुत्रधनसंपत्तिवस्त्राभ- रणलेपनम् ॥ २६ ॥ नीचग्रहयुतो राहुरनीचवृत्त्यानुजावनम्॥ कुभोजनं कुदारं च कुपुत्रं लभते तदा॥ २७ ॥ दशादौ दुःख- मापोति दशामध्ये सुखं यशः॥ दशांते स्थाननाशं च गुरुपुत्रा- दिनाशनम् ॥ २८॥ इति राहुदशाफलविचारः। शुभग्रहसे दृष्ट राहुकी दशा कार्यसफल राजमान धनागम और बंधुजनका मरण निश्चय करतीहै।। २४ ॥ पापग्रहसे दृष्ट राहुकी दशा कार्यका नाश उद्यम भंग शरीरपीडा और चोर अन्नि राजासे पीडन करतीहै।। २६॥ उच्चग्रह्युत राहुकी दशा राज्यलाभ स्री पुत्र धनकी संपत्ति वस्त्र भूषण चंदनादि लेपनद्रव्यकी प्राप्ति करतीहै॥ २६ ॥ नीचराशिगत ग्रहकी दृशामें नीचवृत्तिसे आजीवन कुभोजन कुस्ीकी पाप्ति और कुपुत्र मिलताहै॥ २७॥ राहुकी दशाके अदिमें दुःख मध्यमें सुख तथा यश और अंतमें स्थानहानि गुरु पुत्र आदियोंको पीडा होवै॥ २८ ॥ इति राहुदशाफलविचारः अथ केतुदशाफलम्। भार्यापुत्रविनाशनं नरपतेभ्रौतिर्महत्कष्टतां विद्यावन्धुधनापि मित्ररहितं रोगाग्निमित्रैर्भयम् । यानारोहणपातनं विषजलैः शस्त्रादिमिर्वा भयं देशाद्देशविवासनं कलिरुचिं देहादिभिर्वा भयम् ॥१ ॥ केतोर्दशायां संपाप्तौ दारपुत्रविनाशनम्॥ राज- कोपं मनस्तापं चौराग्निकृषिनाशनम् ॥२॥ केतुदशाके फलहैं कि स्त्री पुत्र नाश राजासे भ्रांति बडा कष्ट विद्या बंधु धनागमन और मित्रोंसे रहितता रोग अग्नि मित्रोंसेभय सवारीसे गिरना विष जल शस्तादिसे भय एकदेशसे दूसरेदेश निकलना कळहमें रुचि अथवा रोगादिभय होताहै॥ १ ॥ केतुकी दशा पाप्तहुयेमें स्त्री पुत्र नाश राजाका कोप मनमें संताप चोर अग्निसे भय कृषिका नाश होताहै ॥ २ ॥ केन्द्रस्थस्य दशाकेतोः करोति विफलक्रियाम् ॥ राज्यार्थसुत- दाराणां नाशनं विपदं तथा॥ ३॥ लग्नकेंद्रगतस्यापि केतोर्दाये महद्यम् ॥ ज्वरातिसारमेहं च स्फोटकादिविषूचिकाः ॥४॥ धनराशिगतस्यापि केतोर्दाये धनक्षयम् ॥ वाक्पारुष्यं मनो- दुःखं कुत्सितान्नं मनोरुजम् ॥ ॥ तृतीयराशिगस्यापि

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(२५२ ) सर्वार्थचिन्तामणि:। केतोदाये महत्सुखम्॥ मनोवैकल्यमायाति भ्रातृभिर्द्वेषणं परम् ॥ ६ ॥। चतुर्थराशिगस्यापि केतोर्दाये सुखक्षयम ॥ प्रभग्नदार- पुत्रादिगृहे धान्यप्रहर्षितः ।।७।। केन्द्रगत केतुदशा कार्य व्यर्थ करतीहै राज्य, धन, पुत्र, स्त्रीका नाश तथा विपत्ति करती- है। ३॥ लग्नगत केतुदशामें बडीभय ज्वर अतिसार पमेह विस्फोटकादि रोग विषूचिका (हैजा) करतीहै॥४ ॥ दूसरे भावस्थ केतुकी दशामें धनका क्षय कठोरवाणी मनमें दुःख और निन्ध अन्न भोजन मनमें रोग होतेहैं॥ ५ ॥ तीसरे केतुकी दशामें बडासुख मिलताहै मन विकल होताहै भाइयोंसे परमवैर होताहै॥ ६ ॥ चौथे केतुकी दशामें सुखहानि स्त्री पुत्रा दिसे अलग होवै घरमें अन्नसे हर्षित रहे॥ ७॥ पंचमस्थस्य केतोस्तु दशाकाले सुतक्षयम् ।। बुद्धिभ्रमं विशेषेण राजकोपं धनक्षयम् ॥ ८॥ केतोस्त्वरिगतस्यापि दशाकाले महद्धयम्॥ चौराग्निविषभीतिश्च दशातति सकुपैति च ॥९॥क लत्नराशिसंयुक्तकेतोर्दाये महद्भयम्॥ दारपुत्ार्थनाशं च सूत्रकृच्छं मनोरुजम् ॥ १० ॥ केतोरष्टमयुक्तस्य दशाकाले महद्यम् ॥ पितृमृत्युश्वासकासग्रहण्यादिक्षयान्वितः ॥११॥ नवमस्थस्य केतोस्तु दशापाके पितुर्विपत्॥ गुरोर्वा विपदं दुःखं शुभकमवि- नाशनम् ॥ १२॥ पंचम केतुकी दशामें पुत्रक्षय बुद्धिभ्रम विशेषतः राजाका कोप और धनका क्षय होताहै ।। ८ ।। छठे केतुकी दशामें बडीभय चोर अगनि विषसे भय और फटे वस्त्रोंके किनारे पहरने- को मिलें॥ ९ ॥ सप्तम केतुकी दशामें भी बहुतभय स्त्री पुत्र धननाश मूत्रकृच्छ रोग तथा मानसी रोग् होताहै॥ १०॥ अष्टमभावगत केतुकी दशामें बडीभय पिताकी मृत्यु श्वास कास संग्रहिणीआदि तथा क्षयरोगसे युक्त होवै ॥ ११ ॥ नवम केतुकी दशामें पिताकी वि- पत्ति अथवा गुरुकी विपत्ति दुःख शुभकर्मका नाश होताहै ॥ १२ ॥ कर्मस्थकेतोः संप्राप्तौ दशायां सुखमेति च॥मानहानि मनोजा- डयमपकीर्ति मनोरुजम् ॥ १३॥ लाभस्थकेतोः संप्राप्तौ दाये सौख्यं करोति च ।। आ्रातृवर्गादिसौख्यं च यज्ञदानादिवर्द्धनम् ॥१४।रिष्फस्थकेतोः संप्रात्तौ दाये कष्टतरं भवेत्॥ स्थानच्युति

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भाषाटीकासहित:। (२५३ )

प्रवासं च राजपीडाक्षिनाशनम्॥१५॥ दशादौ सुखमाप्रोति दृशामध्ये महद्यम् ॥ दशांते राजभीतिश्र देहजाड्यम- थापि वा ॥ १६॥ दशमगत केतुकी दशा माप्तहुयेमें सुख पाताहै और मानहानि मनकी जडता अपयश मानसीरोगभी मिलतेहैं।। १३॥ लाभगत केतुकी दशामें सौख्य करताहै भ्रातृवर्गादिसे भी सुख मिलताहै यज्ञ दानादि पुण्य बढ़तेहैं।। १४।। बारहवें केतुकी दशामें विशेषतर कष्ट होताहै स्थानहानि परदेशवास राजासे पीडा और नेत्रनाश होताहै॥ १५ ॥ केतुकी दशाके आदिमें सुख, मध्यमें बडीभय और अंत्यदशामें राजासे भय अथवा शरीरमें जढता (शरीर जकडना) मिलता है ॥ १६ ॥ शुभवीक्षणसंयुक्त: केतुः सौख्यं करोति च॥ राज्यार्थ गृहशांति च राजपूर्जा महादढम् ॥ १७॥ पापेक्षितयुतो वापि केतुर्दुःखं करोति च।। ज्वरातिसारमेहाँश्र त्वग्दोषं राजपीडनम्॥१८॥ शुभग्रहद्दष्ट केतु अपनी दशामें सुख करताहै राज्य धन घरमें शांति राजपूजा और दृढता देताहै।। १७॥ पापग्रहयुक्त वा दृष्ट केतु स्वदशामें दुःख करताहै ज्वर अतिसार गमेह तथा त्वचामें रोग और राजासे पीडनभी करताहै॥ १८ ॥ इति केतुदशाफलानि॥ अथान्तर्दशाफलानि। तेजस्विनमतिसुखिनं सुस्थिरविभवं नृपाच्च लब्घघनम्॥ स्वनवां शकवलयुक्तः पुरुषं कुर्याद्धनान्वितं ख्यातम्॥१॥ शुभदर्शन फलयुक्त: करोति विख्यातिकं सधनम्॥ सुभगप्रयासममलं सुरू- पदेहं सुसौम्यं च ॥ २ ॥ नवाशबलसे युक्त ग्रह पुरुषको तेजस्वी अतिसुखी स्थिर ऐश्वर्यमान् राजासे माप्तधन अन्यध- नसे युक्त और ख्यात करताहै॥ १ ॥ शुभग्रहोंसे दृष्ट ग्रह ख्यातिवाला धनयुक्त उत्तम परि- श्रमी निर्मलतायुक्त सुरूपदेहयुक्त और मृदु करताहै ॥ २ ॥ अन्योन्यषष्ठाष्टमदायकाले नृपाद्भयं भृत्यजनैर्विरोधम्॥ स्त्रिया विरोधं सुतदारनाशं चौराग्निबंध्वार्तिमनोविकारम्॥ ३॥ पाके- श्वरादंत्यगतस्य सुक्तौ स्थानच्युति बंधुजनैर्विरोधम् ॥ विदेश- यानं स्वजनैर्विरोधं पादाक्षिहद्रोगमुपैति काले॥। ४ ॥ षष्ठेश अष्टमेशकी परस्परदशा अर्थाद एककी दशा दूसरेके अंतर्दशामें राजासे भय सेव- कजनोंसे विरोध खनीसे विरोध पुत्र दार नाश चोर अभि बंधुजनोंसे पीडा मनमें विकार होता

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(२५४ ) सर्वार्थचिन्तामणिः। है।। ३॥दशेशसे बारहवें ग्रहकी अंतर्दशामें स्थानहानि बन्धुननोंसे विरोध विदेशगमन अपने मनुष्योंसे विरोध पैर नेत्र हृदयमें रोग मिलता है ।। ४ ॥ दशाधिपेनापि युतस्य भुक्तौ स्त्रीपुत्रभृत्यार्थकृषेर्विनाशम्।। उद्यो- गभंगं स्वजनैर्विरोधमाकस्मिकं दूषणमेति काले ॥ ८॥दशा- धिपाद्वित्तगतस्य भुक्तौ मृद्धन्नपानांबरगंधमाल्यम्।।परोपकारं स्व- जनस्य सख्यं स्त्रीपुत्रबंध्वात्ममनोविलासम् ॥ ६॥ दशाघिपा- त्सोदरराशिगस्य भुक्तौ नृपाद्वित्तसुपैति सख्यम्॥ सुगंधमाल्यां- बरभूषणं च सुहद्धवं भोजनसौख्यपुष्टिम् ॥७॥ दशेशसे युक्त ग्रहकी अंतर्दशामें स्त्री, पुत्र, भृत्य, धन, कृषिका नाश, उद्यमभंग, अपने मनुष्योंसे विरोध, अचानक दूषण पावै॥ ५॥ दशेशसे दूसरे ग्रहके अंतरमें मृदु अन्न, पान, वस्त्र, चंदन पुष्प मिलॅ, पराया उपकार होये, अपने मनुष्योंमें सख्य बढ़े, स्त्री, पुत्र, बंधुजन, सुख, मनके विलास (खुसी) मिलतेहैं॥। ६॥ दशेशसे तीसरे ग्रहके अंतरमें राजासे धन सख्यता सुगंधवस्तु, पुष्प, वस्त्र, भूषण, मित्रोंका दिया भोजन सुख और पुष्टि इतनें फल होतहैं।। ७।। दायेश्वरादंबुगतस्य भुक्तौ दारात्मजार्थगृहधर्मयानम्॥ मिष्टान्न पानांबरभूषणं च शुभग्रहश्चेत्फलमन्यथा तत् ।।८।।। पाप- ग्रहोपि शुभदः खलु दायनाथाद्वन्घुस्थितस्वभवनोच्चबलादि- युक्तः॥ सौम्यग्रहोष्यशुभद: सुखराशियुक्तो दायेश्वरात्स्वभव- नोचबलादिहीनः ॥९॥ दशानाथात्मुतस्थस्य भुक्तौ पुत्रादि- मादिशेत् ॥ शुभग्रहस्य सौख्यं च पापभुक्तौ सुतक्षयम्॥ १० ॥ दशेशसे चतुर्थगत ग्रहके अंतरमें स्त्री, पुत्र, धन, गृहके धर्म वाहन मीठे अन्नजलादि तथा वस्त्र भूषण मिलतेहैं यदि वह शुभग्रह होवै तो यहफल विपरीत होताहै ॥ ८॥ दशेशसे चतुर्थगत ग्रह यदि अपनी रशि उच्चबलादिसे युक्त होवै तो पापग्रहभी शुभफल देताहै यदि राशियल उच्चव लादिहीन होवै तो दशेशसे चौथा शुभग्रहमी अशुभफल देताहै ॥ ९ ॥ दशेशसे पंचभगत ग्रहके अन्तरमें पुत्रादि होवे कहना यह शुभग्रहमें है पापग्रहमें पुत्रक्षय होताहै॥१०॥ अन्तर्दशायां पापस्य षष्ठस्थस्य दशेश्वरात् ॥ चौरादिऋणदे- हार्ति लभते पदविभ्रमम्॥११॥ तस्मात्पष्ठस्य सौम्यस्य दशे- शात्सुखवर्द्धनम्।लभते पुत्रमित्राप्तिं स्वोच्चमूलादिगस्यतु।।१२।

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भाषाटीकासहित:। (२५५) दायेशात्सप्तमस्थस्य पापस्यापह्नतौ तथा ॥ दारार्थपुत्रबंधूनां नाशं भूमिपतेर्भयम्॥ १३॥ सप्तमस्थशुभस्यापि हतौ सौख्यं दशाधिपात्॥ नीचशत्रुविहीनस्य सद्त्नांबरभूषणम्॥ १४॥ दशेशसे छठे पापग्रहकी अंतर्दशामें चोरआदिकी भय ऋणकी भय देहपीडा और पदमें भ्रम पावै॥ ११॥ दशेशसे छठा अंतरेश शुभग्रह होवै तो उत्तोंसे सुख बढे पुत्र मित्र मिलें यदि उच्च मूलत्रिकोणादिमें होवै॥ १२ ॥ दशेशसे सप्तमगत पापग्रहके अंतरमें स्त्री, धन, पुत्र, बंधुका नाश तथा राजासे भय होवै॥ १३ ॥ वह सप्तमस्थ शुभ होवै तो सुख देताहै यदि नीच शत्रु आदिमें न होवै तो अच्छे रत्न, वञ्त्, भूषण मिलतेहैं।। १४।। पाकेशादष्टमस्थस्य सौम्यस्यापहतौ सुखम्॥ मुत्त्यादौ शो- भनं प्रोक्तमंते कष्टं विनिर्दिशेत् ॥ १५॥ पाकेशाद्ष्टमस्थस्य पापस्यापहतौ भयम् ॥ निधनं कुत्सितान्नं च चौराग्रिनृप- पीडनम् ॥ १६ ॥ दायेशान्नवमस्थस्य पापस्यापहतौ यदा॥ अशुभं लभते कर्मस्थानभ्रंशो मनोरुजम्॥ १७॥ प्रधानतः शुभस्थस्य सौम्यस्यापहतौ यदा॥ विवाहं यज्ञदीक्षां च दाना- दीन् लभते नरः ॥ १८ ॥ दशेशसे अष्टमगत पापग्रहके अंतरमें आदिमें शुभफल सुख और अंतमें कष्टफल कहना ॥ १५ । दशेशले अष्टमगत पापग्रहके अंतरमें भय, मृत्यु, निन्ध अन्न, चोर, अग्नि, राजासे भय मिले॥ १६ ॥ दशेशसे नवमगत पापग्रहके अंतरमें अशुभकर्म पावै, स्थानहानि मानसी रोग होवै॥१७॥यदि वह नवमस्थ शुभग्रह होवै, तो विवाह यज्ञ दानादि मनुष्य पाताहै॥१८॥ कर्मस्थपापखेटस्य हतौ पाकेश्वरादयदा । कर्मनाशमवाप्रोति दुष्कीर्ति विविधापदम् ॥ १९ ॥ तस्मात्कर्मस्थसौम्यस्य हतौ सौख्यं विनिर्दिशेत्॥ तडागगोपुरादीनां पुण्यकर्मादिसंग्रहः ॥२०॥। लाभस्थस्य दशानाथात्पापस्यापहतौ धनम्॥ लभते पुत्रमित्रार्थस्थानप्राति च शाश्वतीय् ॥ २१ ॥ पाकेशाल्ामयु- क्स्य सौम्यस्यापहतौ सुखम्॥ भाग्योत्तरं नृपात्पीर्ति दारपुन्रा- दिवर्द्धनम्॥ २२ ॥ व्ययस्थस्य हतौ दुःखं पापस्य तु दशाधि- पात्॥ अर्थनाशं नृपात्क्रोषं स्थाननाशं स्मृतिभ्रमम्॥२३॥

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(२५६ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

पाकेश्वराद्ययस्थस्य सौम्यस्यापहतौ यदा ॥ वाहनं भोगभाग्यं च वस्त्नाभरणभूषणम्॥२४॥ दशेशसे दशमगत अतरेश पापग्रहमें कर्मका नाश दुष्कीर्ति अनेक प्रकार आपत्ति पाताहै ॥ १९॥ दशेशसे दशमगत शुभग्रहके अंतरमें सौख्य तालाव नगर द्वार आदि पुण्य कर्मादि- योंका संग्रह कहना॥ २०॥ दशेशसे लाभगत पापग्रहकी अंतर्दशामें धन पुत्र मित्रसे अर्थ पाताहै और नित्य स्थायी स्थानकी प्राप्ति होतीहै ॥ २१ ॥ दशेशसे लाभगत शुभग्रह्के अंतरमें सुख ऐश्वर्यवृद्धि राजासे प्रसन्नता और स्त्री पुत्रादियोंकी वृद्धि होवै ॥ २२॥ दशे- शसे व्ययगत पापग्रहके अंतरमें दुःख धननाश राजासे क्रोध स्थाननाश और यादगारीमें श्रम (भूल) हो जातीहै॥ २३ ॥ दशेशसे व्ययगत शुभग्रहके अंतरमें वाहन, भोग, ऐश्वर्य, वस्त्र, भूषण मिलतेहैं॥। २४ ।। तत्तद्दशायां संयोज्यमेवमेवं विशेषतः॥ स्वर्क्षोच्चवर्गमित्रादि विना सर्वत्र कल्पयेत् ॥२५ ॥ लग्नार्थसोत्थगस्यापि पापस्यापहतौ तदा।।पाकेशादुःखमाप्नोति सौम्यभुक्तौ शुभं भवेत्॥। २६ ॥अंत- रदशायां क्रूरस्य क्रूरदाये महद्धयम्॥ स्थानाक्षिबन्धुपुत्रार्थदार- नाशं नृपाद्नयम् ॥२७॥ इसमकार पापदशा पापातरमें सर्वत्र बिना स्वराशि उच्चवर्ग मित्रराशिगतके वही पापफल कल्पन। करने॥ २५॥ लग्न द्वितोय तृतीयगत पापके अंतरमें दुःख शुभके अंतरमें शुभ होताहै ये फळ दशेशसे लग्नादिगत अंतरेशके लिये हैं॥ २६ ॥ कूरदशा क्रूरांतरमें बडी भय, स्थान, नेत्र, बंधु, पुत्र, धन, स्त्रीका नाश, राजासे भय होतीहै॥ २७।। शुभयुक्तौ शुभे दाये स्थानवाहनभूषणम्॥ सौम्यभुक्तौ पापदाये त्वादौ सौख्यं परं भयम्॥ २८॥ सौम्यदाये पापसुक्तौ त्वादौ कष्टं ततः शुभम् ॥शीर्षोदयर्क्षगा: खेटास्त्वादौ चान्ते नृऋक्षगाः । २९ ॥। यत्र संपादबाहुल्यं योजयित्वा फलं वदेत् ॥ अपि संवादकार्येषु यथोक्तं फलमादिशेत्॥ ३० ॥ शुभग्रहकी दशा शुभग्रहके अंतरमें स्थान, वाहन, भूषण मिलतेहैं, शुभग्रहकी दशा पाप- ग्रहके अंतरमें प्रथम सुख पीछे भय मिलतीहै॥ २८ ॥ गुभग्रहकी दशा पापके अंतरमें प्रथम कष्ट पीछे सुख होताहै, शीर्षोद्यराशिगत ग्रह प्रथम अन्यराशियोंके अंतमें शुभ फल देतेहैं । २९॥ जहां शुभफल देनेवाले तथा अशुभवालेभी बहुतहों तहां बलाबल योजना करके फल कहना तुल्यतामें यथोक्तफल कहना ॥ ३० ॥ इति सामुदायिकांतर्दशाफलम् ॥

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भाषाटीकासहित:। (२५७ ) अथ म्रहाणां लग्नादिस्थितमेदेन पुनरप्यं तर्दशाफलविशेषमाह। लग्नगस्य रवेः पाके भौमार्किशििभोगिनाम् ।। अंतर्दशायां दुःखं च राज्यार्थगृहनाशनम्॥ १॥ तेषामगोचरस्थानां दिने- शात्फलमीहशम्॥ गोचरस्थे फलं सौख्यं सर्वस्मिन् पाकपादूहे ॥ २ ॥ "गोचरत्वं नाम" स्वर्क्षतुंगत्निकोणस्थः षडष्टांत्यविव- र्जिंतः ॥ अनस्तगो मित्रगस्तु गोचरस्थो भवेद्रहः॥३।अस्तगो नीचगो वापि स्वर्क्षमूलविवर्जितः॥षष्ठाष्टमव्ययस्थो वा य: खेटो यमगोचरः॥४।। लग्नगत सूर्यकी दशा मंगल, शनि, केतु, राहुकी अंतर्दशामें दुःख और राज्य, धन, घरका नाश होताहै ॥ १ ॥ यदि वे ग्रह सूर्यसे अगोचरमें होवैं, तब ऐसा फलहै, गोचरमें हेवें तो खौर्प फल देतेहैं यह सभी दशेशसे सभी स्थानोंमें करना ॥ २ ॥ गोचर अगोचर संज्ञा कहतेहैं कि अपने राशि उच्च मूल त्रिकोणगत ग्रह ६।८।१२ भावोंसे अन्यमें हों मित्रराशिमें हों अस्तंगत न हों वह गोचरस्थ कहातेहैं ।। ३ ।। अस्तंगत नीचगत अथवा स्वराशि मूल त्रिकोण रहित ६।८।१२ भावस्थित जो ग्रह हों वह अगोचरस्थ कहातेहैं ॥ ४॥ लग्नस्थवासरेशस्य दशायामिज्यशुकयोः॥शर्शांकसौम्ययोर्भुक्तौ कृषिगोक्षुतदारभूः ॥५॥धनस्थवासरेशस्य पापयुक्तौ धनक्ष- यमू॥ वाक्पारुष्यं मनोदुःखं नेत्ररोगं महद्भयम् ॥ ६॥ सौम्य- भुक्तौ रवे: पाके धनस्थस्य महत्सुखम्॥ विद्यालाभं नृपात्पीति वस्नवाहनभूषणम्॥ ७॥ तृतीयस्थस्य तु रवेः पाके पापहतौ यदा॥ गोचरस्थे महत्सौख्यं नोचेत्पापफलं वदेत् ॥ ८॥ लग्नगत सूर्यकी दशामें गुरु शुक्रकी तथा चंद्रमा बुधकी अंतर्दशामें कृषि, गौ, पुत्र, ख्त्नी, भूमि मिळते हैं।। ५॥ धनस्थानगत सूर्यकी दशामें पापांतरमें धनक्षय वाणीकी कठोरता मानसी दुःख नेत्ररोग बढी भय होतीहै।। ६॥ धनस्थ सूर्यद्शा शुभग्रहके अंतरमें बडा सुख, विद्याला, राजकृपा, वस्त्र, सवारी और भूषण मिलतेहैं।। ७।। तीसरे सूर्यकी दश्ञा पापांतरमें गोचरमें होवै तो शुभ अन्यथा अशुभ फल कहना ॥ ८॥। तन्नस्थभानुपाके च शुभयुक्तौ महत्सुखम्॥ धर्ये वित्तं सुतातिं च समरे जयमाधुयात्॥ ९ ॥ दिनेशस्य सुखस्थस्य दशायां पापिनां हतौ।। मातृनाशं मनोदुःखं चौराभिनृपपीडनम्॥१०॥

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(२५८) सर्वार्थचिन्तामणिः।

खे: सुखस्थितस्यापि शुभभुक्तौ महत्सुखम्॥। राज्यार्थपुत्रदारादि वस्न्नमाल्यानुलेपनम् ॥ ११॥ पंचमस्थरवेः पाके शन्यारशिखि भोगिनाम्॥ अंतर्दशायां पुत्रार्ति चौरभूपाग्निपीडनम् ॥ १२॥ शुभग्रहाणां भुक्तौ च रवेः पंचमगस्य तु ॥ परिपाके सुतार्ति च राज्यवाहनभूषणम् ॥१३॥ तृतीयस्थ सूर्यकी दशा शुभग्रहोंके अंतरमें बडा सुख मिले धैर्यता, धन, पुत्रमाप्ति और युद्धमें जय पावताहै ॥ ९ ॥ चतुर्थगत सूर्यकी दशा पापग्रहांतर में माताका नाश मनमें दुःख चोर, अग्नि, राजासे पीडन मिलताहै॥ १० ॥ चतुर्थगत सूर्यदशा शुभग्रहोंके अंतरमें राज्य धन, पुत्र, स्त्री आदि तथा वस्त्र, सुगंधितपुष्प, चदनादि मिलतेहैं।। ११ ।। पंचमगत सूर्यकी दशा शनि, मंगल राहु, फेतुके अंतरमें पुत्रपीडा चोर, राजा, अग्निस पीडा मिळे ॥ १२ ।। पंचम रविदशा शुभग्रहांतरमें पुत्रमाप्ति राज्य वाहन भूषणोंकी भाप्ति होतीहै।१३॥ षष्ठस्थसूर्यदायेऽस्मिन् पापदाहृतिपापिनाम् ॥ ऋणचौराग्निभू- पैस्तु भीतिरावश्यकी तथा॥ १४ ॥ सौम्यानामपहारे तु भास्करस्यारिगस्य च।। परिपाके सुखं पूर्व पश्चाद्विष्टं विनिर्दि- शेत्॥ १५॥ सप्तमस्थरवेः पाके शुकेज्याब्जविदां हतौ॥ दार- लाभं मनोत्साहं यानांबरविभूषणम्।। १६॥ तथाविघरवेः पाके दुःखं स्यात्पापिनां हतौ॥ ज्वरातिसारं पित्तं च मेहकृच्छारि पीडनम् ॥ १७॥ छठे सूर्यकी दशा पापग्रहोंके अंतरमें ऋण, चोर, अग्नि, राजासे भय, अवश्य देतीहै तथा यह दशा पापभी देतीहै।॥ १४ ॥ ऐसे सूर्यमें शुभग्रहके अंतर पहिले सुख पीछे कष्ट देतेहैं कहना ।। १५। सप्तम सूर्यकी दशा शुक, गुरु, चंद्रूमा, बुधके अंतरमें स्त्रीलाभ मनका उत्साह सवारी, वस्त्र भूषण मिलतेहैं।। १६ ॥ ऐसे सूर्येकी दशा पापग्रहोंके अंतरमें ज्वर, अतिसार, पित्तममेह, मूत्रकृच्छ्रादि पीडन मिळताहै॥ १७॥ अष्टमस्थरवेः पाके शुभमुक्तौ शुभं वदेत्॥ किंचिद्दु:खं शुभा- घिक्यं शयनांबरभूषणम्॥ १८॥ तथाविघरवेर्दाये पापसुक्ती महद्रयम् ॥ मरणं व्याधिपीडा वा ॥ परश्रेष्यत्वमेव वा॥१९॥ शुभस्थानगतस्यापि रवेः पाके हतौ यदा॥ सौम्यानां शुभक- मारतिं दानयजञं महोत्सवम् ॥२० ॥ नवमस्थरवेः पाके पाप- : भुक्ती यदा तदा॥ करोति दुःखबाहुल्यं गुरुपित्रादिपीडनम्॥२१॥

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भावाटीकासहित:। (२५९ )

भष्टमगत सूर्यकी दशा शुभग्रहोंके अंतरमें शुभफल कहना थोडा दुःख शुभफल अषिक तथा शय्या वस्त्र भूषण मिलते हैं।। १८।। ऐसही सूर्यकी दशा पापांतरमें बडी भय वा भरण यद्ा रोगपीडा और पराया दौत्यकाम मिलताहै॥ १९॥ नवमगत सूर्यकी दशा शुभग्रहोंके अंतरमें शुभकर्मकी मापि दान यज्ञ बडे उत्सवादि करने मिलतेहैं।। २०। नवम सूर्यदशा पापांतरमें दुःखकी बाहुत्यता गुरु पिता आदियोंको पीडन मिलताहै ॥ २१ ॥ कर्मस्थरविदाये तु पापयुक्तिर्यदा तदा॥ करोति कर्मशोकार्ति चोराग्निनृपपीडनम्॥२२॥ तथाविघरवेः पाके शुभुक्तिर्यदा तदा॥ करोति विपुलं राज्यं कीर्तिश्चाचंद्रतारकम् ॥२३॥ लाभराशिगतस्यापि रवेः पाके शुभेतरा॥ सुक्तिर्यदा तदा दुःखं पश्चात्सौख्यं करोति च ॥२४॥ तथाविधरवेः पाके शुभयुक्ति- यदा तदा॥ धनापतिं राजसंमानं दारपुत्रनृपात्पियम्॥ २५॥ द्वादशस्थरवेः पाके पापसुक्तौ महद्भयम् ॥ स्थानच्युति प्रवासं च तृपकोपाद्विमानता ॥२६।। तथाविधरवेः पाके शुभसुक्तौ मह- त्सुखम् । गोभूमिवस्त्रधान्यादिमणिविद्ुमभूषणम् ॥२७ ॥ इति रविपाकान्तर्दशाफलम्॥ दशमगत सूर्यदशा पार्पातर जब होवै तब शोकके कर्म करातीहै पीडा चोर अभि राजासें पीडन मिळताहै।। २२॥ ऐसेही सूर्यद्शा शुभातरमें बडाराज्य और जहांपर्यैत चंद्रमा तारागणहैं तहांलौं कीर्ति बढातीहै॥ २३ ॥ लाभगत सूर्यदशा अशगुभग्रहोंके अंतरमें दुःख भोगके पीछे सुखरभी करतीहै।। २४ ।। ऐसेही सूर्यदशा शुभांतर जब आवै तब धनपाप्ति राजासे संमान स्त्री पुत्र तथा राजासे शुभत्व होवे । २५॥ बारहवें सूर्यकी दशा पापांतरमें बडी भय स्थानहानि परदेशगमन और राजकोपसे मानहानि होवे ॥ २६ ॥ ऐसेही सूर्यकी दशा शुभग्रहोंके अंतरमें बडासुख मिळे गो, भूमि, वस्त्र, अन्नादि, मणि, मूंगायुक्त भूषण मिळते हैं। २७। इति रविपाकान्तर्दशाफलम् ॥ अथ चंद्रदशायामन्तर्दशामाह। मूर्तिस्थ चन्द्रदाये तु शुकेज्याब्जविर्दां हतौ। देहारोग्यं नृपा- त्पीति वाहनांबरभूषणम्॥ १॥ तथाविघस्य चाब्जस्य परि- पाके शुभेतरा ॥ हृति: करोति दुःखं च कृषिगोभूमिनाशनम् ॥ २॥। द्वितीय स्थनिशानाथपरिपाके शुभेतरा॥ कलत्रपुत्रर्षं-

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(२६० ) सर्वार्थचिन्तामणिः। धूनां नृपाद्धीतिं करोति च ॥ ३॥ सौम्याहतौ द्वितीयस्थचंद्र- दाये महत्सखम्॥ भोजनांबरपानं च मनोत्साहं करोति च॥।४।। लग्नगत चंद्रदश्ा शुक, गुरु, चंद्र, बुधके अंतरमें देहमें निरोगिता, राजासे मखन्नता तथा वाहन वस्त् भूषण मिलतेहैं ।। १ ॥ ऐसे चन्द्रमाकी दशा पापग्रहोंके अंतरमें दुःख, कृषि, गो, भूमिका नाश करतीहै।। २ । दूसरे चंद्रमाकी दशा पापग्रहोंके अंतरमें स्त्री, पुत्र, बंधु- जनको, कष्ट, राजासे भय करतीहै ।। ३।। दूसरे चंद्रकी दशा शुभग्रहोंके अंतरमें बडासुख भोजन, वस्त्र, पान और मनका उत्साह करतीहै।। ४ ।। तृतीयस्थनिशानाथपरिपाके महत्सुखम्॥ शुभग्रहाणां सुक्तिस्तु करोति नृपमान्यताम् ॥ ५॥ तथाविधनिशानाथपारिपाके शुभे- तरा॥ हृतिः करोति वैकल्यं ्रातृधैर्यविनाशनम्॥ ६॥चतुर्थ- स्थनिशानाथपरिपाके महत्सुखम्॥ शुभभुक्तौ नृपात्प्रीतिर्जायते गृहजं सुखम् ॥ ७॥ पापमुक्ती महत्कष्टं गृहदारार्थनाशनम्॥ चौरागिनृपभीति च तादृगव्जदशांतरे ॥।८।। तीसरे चंन्द्रमाकी दशा शुभांतरमें बडासुख तथा राजमान करतीहै॥ ५ ॥ पापातरमें विकलता भाई तथा धैर्यका नाश करतीहै॥ ६ ॥ चौथे चंद्रमाकी दशा शुभग्रहोंके अंतरमें बडासुख राजासे हर्ष घरका सुख देतीहै॥ ७॥ चौथे चंद्रमाकी दशा पापग्रहोंके अंतरमें मकान स्त्री, धनका, नाश, चोर, अग्नि, राजासे भय देतीहै।। ८ ।। पंचमस्थानेशानाथपरिपाके महत्सुखम्॥ सौम्यसुक्तौ कलन्ार्थ- पुत्रमित्रांबराणि च।९॥तथाविघद्शानाथदाये पापहतौ यदा।। बुद्धिक्षोभं मनस्तापं पुत्रदारनृपाङ्मयम् ॥१०॥ कृषिनाशमृण गस्तं षष्ठसस्थितनिशाकरात्॥ स्यात्पापिनां हतौ दुःखं प्रमेहक्ष- यपाण्डुभिः॥११॥ रिपुस्थितदशानाथे सौम्यानां तु यदा हतिः॥ करोति सवंतो मैत्रीं चौरागिभयनाशनम्॥१२॥ पंचमचंद्रमाफी दशा शुभग्रह्ोंके अंतरमें बहुतसुख, ख्त्री, धन, पुत्र, मित्र और वस्त्भी देतीहै। ९ ॥ ऐसे चंद्रदशा पापांतरमें बुद्धिमें क्षोभ (भय) मनमें संताप, पुत्र, स्त्री, राजासे भय देतीहै।। १०॥ छठे चंद्रमाकी दशा पापांतरमें कृषिका नाथ्न ऋणसे दवना, नमेह, क्षय, पाण्डुरोगसे दुःख देतीहै।। ११ ।। षष्ठस्थचंद्रदशा शुभांतरदशा सबसे मैत्री तया चारे, अगनि, राजभयका नाश करती है।। १२ ।।

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भाषाटीकासहित:। (२६१ ) कलत्रस्थनिशानाथाददा सौम्याहतिस्तदा।। कलन्नपुत्रसंपतिरवां- हनांबरभूषणम् ॥१३॥ तथाविघदशानाथात्पापिनां तु हति- यदा॥ विदेशयानं पुत्रार्थदारबंधुविनाशनम्॥ १४॥ अष्टमस्थ निशानाथात्पापभुक्तौ महद्यम्॥ मरण दारपुत्राणां कुत्सितान्नं पराजयम् ॥ ३५ ॥ रंध्रस्थितनिशानाथपरिपाके महत्सुखम् ॥ सौम्यसुक्तौ महत्कीतिवैर्यवाहनभूषणम् ॥१६॥ सप्रम चंद्रमासे जब शुभांतरआवें तब स्त्री, पुत्र, संपत्ति, वाहन, वस्त्र, भूषण मिछतेहैं ।। १३ ॥ ऐस चंद्रमासे जव पार्पातरदशा होवे तब परदेशगमन, पुत्र, धन, स्त्री, बंधुजनका विनाश होवै॥ १४ ॥ अष्टमचंद्रमासे पापातरमें बडीभय, खत्री, पुत्र, मरण, निन्ध अन्नका भोजन और युद्धादिमें पराजय, (हार) पावै ॥ १५ ॥ अष्टम चंद्रदशा शुभांतरमें बडा- सुख, बढीकीर्ति होवै, धैर्यता तथा वाहन, भूषण मिलें ॥ १६ ॥ धर्मस्थितदशानाथाच्छुभसुक्तौ पितुः सुखम्॥ धमै यजं विवाहं च राज्यस्त्रीधनसंपदः॥१७॥ तथाविघद्शानाथात्पापिनां तु हृतिर्यदा। धर्मह्ानिर्मनोदुःखं राज्यार्थगृहनाशनम्।१८॥क- मंस्थचन्द्रदाये च सौम्यभुक्ति: करोति हि॥ स्वकर्मनिरतं शास्र धर्मदानपरायणम्॥ १९॥ कर्मस्थितनिशानाथात्पापभुक्तिर्यदा तदा॥ कर्मनाशं करात्यत्र ह्यपकीर्ति महद्भयम् ॥२० ॥ नवमगत दशेश चंद्रमासे शुभातरमें पिताका सुख, धर्म, यज्ञ, विवाहादि, तथा राज्य, स्त्री, धनकी संपत्ति होवै॥ १७ ॥ ऐसे चंद्रमादशा पापांतर जब आवै तब धर्महानि, मन- में दुःख राज्य, धन, गृह, नाश होवैं।। १८ ।। दशमगत चंद्रमाकी द्यामें शुभग्रहोंकी अंतरदशा अपने कर्ममें तप्तर, धर्मशास्त्र, तथा दानमें तप्तर करतीहै।। १९ ।। दशम चंद्रदशासे पापांतर जव आवै तब कर्मनाश, अपयश, औरवडीभय करतीहै ॥ २०॥ लाभचन्द्रदशायुक्तिर्धनधान्यांबराणि च ॥ वाहनं राज्यलाभं च करोति विविधं सुखम् ॥ २१॥ लाभचन्द्रे पापसुक्तौ धन- नाशसुपैति च ॥ कृषिधान्याक्षिदेहार्ति नृपचौरादिपीडनम् ॥ ॥२२॥ द्वादशस्थनिशानाथपरिपाकेऽर्थनाशनम्॥ पापभुक्तौ- महत्कष्टं सर्वशत्रुत्वमेव च ॥२३॥ शुभयुक्तौ व्ययस्थस्य वर- माल्यविभूषणम् ॥ दारार्थपुत्रमित्राणां वर्धनं वाहनं सुखम्॥।२४।। इति चंद्रपाकान्तर्दशाफलम्।।

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(२६२ ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

लाभगत चंद्रदशामें शुभांतर धन, अन्न, वस्त्र, वाहन, राज्यलाभ और अनेकमकार सुख करताहै। २१ ॥ लाभगत चंद्रदश्यामें पापांतरदशा धननाश, कृषि, अन्न क्षय, नेत्र, तथा देहपीडा, राजा, चोर, भग्निस पीडन देतीहै ॥ २२॥ दादशचंद्रमाकी दशा पापांतरमें बडा कष्ट मिलताहै तथा सर्वत्र शत्रुता होतीहै ॥ २३ ॥ व्ययगत चंद्रदशा शुभांतरमें स्त्री, धन, पुत्र, मित्रोंकी वृद्धि, वाहनलाभ और सुख मिलतेहैं ॥ २४ ॥ इति चंद्रपाकान्तर्दशाफलम् ॥ अथ भौमदशांतरफलानि। लग्नस्थितघरासूनो: परिपाके व्रणं क्षतम्॥ पापभुक्तौ महत्कष्टम- जीर्णादिमहद्भयम्॥ १॥ शुभभुक्तौ नृपात्पीति भ्रातृवर्गभवं सु- खम् ॥ तथाविधघरासूनोर्दशायां क्षेत्रवाहने॥२॥ धनस्थितघ- रासूनोः शुभभुक्तिर्यंदा तदा॥ आ्रातृसौख्यं मनोत्साहं विद्यावाह- नभूषणम् ॥ ३॥। द्वितीयस्थघरासूनो: परिपाके शुभाहृतिः॥ पूर्ववित्तविनाशं च राजकोपं ज्वराग्निभी: ।।8।। लग्नगत भौमकी दशा पापग्रहोंके अंतरमें त्रण घावसे बडा कष्ट अजीर्ण आदिसे बडे भय होवे॥ १॥ ऐसे भौमदशा शुभांतरमें राजासे पसन्नता, भ्रातृवर्गसे सुख और खेती, तथा वाहन मिलतेहैं॥ २। दूसरे मंगलकी दशामें शुभग्रहोंका अंतर जब होवै तब भाइयोंका सुख, मनका उत्साह, विद्या, वाहन, भूषण मिलतेहैं ।। ३ ।। द्वितीय मंगलकी दशा शुभांतरमें पहिलेका संचित धन नाश, राजकोप, ज्वर, अननिभय होवै॥ ४ ॥ तृतीयस्थघरासूनोः पापयुक्तिर्यदा तदा॥ मनोवैकल्यमायाति आ्रातृवर्गविनाशनम्॥ ५॥ तृतीयस्थघरासूनोः पाके सौम्यह- तिर्यदा। भोजनांबरसौख्यं च कृषिभूषणवाहनम्॥ ६ । हिबु- कस्थधरासूनो: क्रूरभुक्तौ महद्दयम्। गृहक्षेत्रविनाशं च तृपचौ- राग्रिपीडनम्॥७॥ हिबुकस्थघरासूनो: पाके सौम्यहतिर्यदा।। क्षेत्रांबरसुखावाप्तिं पशुवाहनभूषणम्॥।८।। तीसरे मंगलकी दशा पापांतरमें मनकी विकलता होवै भ्रातृपक्षका विनाश होवै।। ५ ॥ तृतीय मंगलकी दशा शुर्भातरमें भोजन, वस्त्र, सुख, कृषि, वाहन, भूषण, मिलें।। ६ ।। चौथे मंगलकी दूशा पापांतरमें बडी भय, गृह, खेतीका विनाश, राजा, चोर, अगिसे पीडन मिले । ७ ॥ चौथे भौमकी दशामें शुभग्रहोंके अंतरमें खरेती, वस्त्रके सुखकी माप्ति, पशु, वाहन · और भूषणभी मिलतेहैं ॥ ८ ॥ पंचमस्थघरासूनो पाके पापदृतिर्यदा ॥ कृषिगोधनधान्यार्थ सुतदारविनाशनम् ॥ ९॥ तथाविधकुजात्सौय्यख्यक्तौ शोमन-

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आपाटीकासहित:। (२६३ ) मादिशेत्।। राजपूज्यं सुतात्तिं च मंत्रावाप्तिमिहादिशेत् ॥१०॥ षष्ठस्थितकुजात्पापभुक्ता कष्ट विनिर्दिशेत्। चौराग्निनृपपीर्डां च स्फोटकक्षयमेहनम्॥ ११॥ तथाविधकृजात्सौम्यभुक्तौ भूपा- लमित्रताम्॥ बन्धुनाशं मनोदुःखं पश्चात्सौख्यं विनिर्दिशेत्।।१२।। पंचम मंगल दशामें पापांतर जब होवै तब कृषि, गो, धन, अन्न, पुत्र, ख्त्रीका विनाश होवे॥ ९॥ ऐसे मंगलमें शुभांतर जब आवै तब शुभफल कहना राजासे पूज्यता, पुत्र- पाप्ति और मंत्रमाप्ति कहनी ॥ १०॥ छठे मंगलकी दश्ा पापांतरमें कष्ट कहना, चोर, अग्नि, राजासे पीडा, विस्फोटक, क्षय, मेह रोगभी होतेहैं ॥। ११ ॥ छठे मंगलदशा शुभां- तरमें राजासे मित्रता, बन्धुनाश, मनमें दुःख और पीछे सुखगी कहना ॥ १२॥। कलत्रस्थकुजात्पापभुक्तौ स्त्रीसुतराजभीः॥ शुभ्भुक्तौ महत्सौख्यं नृपवाहनभूषणम् ॥ १३॥। अष्टमस्थकुजाद्गुक्तौ पापिनां मरणं कृशम् ॥ सौम्यभुक्तौ महत्सौख्यं कृषिगोनृपपूजनम्॥ १४॥ नवमस्थघरासूनोर्दाये पापहतिर्यदा॥ पित्रोर्नांशं गुरोर्नाशं धर्महानिं मनोरुजम् ॥ १५॥ तथाविधकुजात्सौम्यसक्तौ गोध- नसंपद:॥ विवाहं यज्ञदीक्षां च देवभूसुरतर्पणम् ॥ १६॥ सप्तम मंग्लकी दशा पापातरमें स्री, पुत्र, राजासे भय शुभान्तरमें बडा सुख राजासे वाहन, भूषण मेलें।। १३ ।। अष्टम मंगलकी दशा पापांतरमें अल्पमृत्यु, कृशता और शुभग्रहोंके अंतमें बडासुख, कृषि, गौ लाभ, राजासे पूजन, मिलतेहैं ।। १४ ।। नवम गत मंगलकी दशामें पापातर जब होवै तवमातापिताका नाश, गुरुका नाश, धर्मकी हानि, मनमें रोग होतेहैं।। १५ ॥ ऐसे मंगलकी दशा शुभांतरमें गोधनकी संपत्ति, विवाह, यज्ञकी दीक्षा, देवता ब्राह्मणोंकी तृप्ति, करनी मिलें॥ १६ ॥ कर्मस्थितघासूनोर्दुःखं स्यात्पापिनां हतौ ॥ विदेशयानं दुष्कीर्ति लगते हि पराजयम् ॥ १७॥ लाभस्थभूमिपुत्रस्य पाके पापहृतिर्पदा॥ करोति विपुलं राज्यं गंधमाल्यादिभूषणम् ॥ १८॥ शुकेत्याब्जविदां भुक्तौ लाभराशिगतस्य तु ॥ परि- पाके महत्सौख्यं दानधर्मादिसंग्रहम्॥ १९॥द्धादशस्थघरासूनोः पाके पापहतियदा॥ करोति दुःखबाहुल्यं कारागृहनिवेशनम् ॥२॥ शुभापहारे सौख्यं च यानांबर विभूषणम्॥ भुत्तयंते राज- कोपं च पदभ्रंशं म्नोरुजम्॥।२१।।इति भौमपाकान्तर्दशाफलम्॥

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(२६४ ) सर्वार्थचिन्तामणि:।

दशम मंगलकी दशामें जब पापांतर होवै तब विदेशगमन, अपकीर्ति, पराजय (हार) पावताहै॥ १७॥ लाभगत मंगलकी दशामें जब पापांतर आवै तब बहुतबडा राज्य, चंदन, पुष्प और भूषण मिलतेहैं।। १८ ॥ लाभगत मंगलमें शुक्र, गुरु, चंद्र, बुधकी अंतरदशा जब आवै तब बडासुख, दान, धर्म आदिका संग्रह होताहै।। १९ ॥ व्ययस्थ मंगलकी दशामें नव पार्पातर आवै तब बहुतदुःख और कैद घरमें प्रवेश करताहै॥ २०॥ शुभग्रहोंके अंतरमें सुख, सवारी, वस्त्र, भूषण मिलतेहैं, दशाके अंतमें राजाका कोप पदसे च्युति और मानसी रोग होतेहैं ॥ २१ ॥ इति भौमपाकान्तर्दशाफलम् ॥ अथ राहुदशांतरफलानि। लग्नस्थसैंहिकेयस्य दाये पापहतिर्यदा॥ करोति दुःखबाहुल्यं नृपचौराग्निपीडनम्॥ १॥ तत्रस्थभोगिन: पाके शुभभुक्तौ शुभं वदेत्॥ गृहक्षेत्रादिवृद्धिश्र् भोजनांबरभूषणम् ॥२॥ षडष्टांत्य गतस्याहे: परिपाके शुभेतरा ॥ हतिः कलहरोगागनिनृपचौरवि- षाहिभीः॥ ३ ॥ श्वासक्षयप्रमेहादिशूलनिद्धादिभाग्भवेत्॥कुभो जनं कुवस्त्रं च स्थाननाशं नृपाद्धयम् ॥।४॥ लग्नगत राहुकी दशामें पापातर जब आवै तब बहुत दुःख तथा नृप, चौर, अगनिसे पीढन करतीहै।। १।। लग्नगत राहुकी दशा शुभांतरमें शुभफल कहना घर, खेतीकी वृद्धि, भोजन, वस्त्र, भूषणवृद्धि, होतीहै। २ ।। छठे, आठवें, बारहवें, भावगत राहुकी दशामें पापांतर जव हों तब कळह, रोग, अगनि, राजा, चोर, विष, सर्से भय होतीहै।। ३ ।। तथा श्रास, क्षय, पमेहादि शूल, निद्रा आदिवाला होवै कुभोजन, कुवस्त्र मिलें स्थानका नाश होवै राजासे भय होवै ॥ ४ ॥ दुःस्थस्य चाहिनाथस्य परिपाके शुभा ह्रतिः॥ आदौ शुभं मह- त्सौख्यं नृपमानं धनागमम्॥ ५॥अंते तु राजभीति: स्यात्स्था- ननाश मनोरुजम्॥ कृषिगोभूमिवस्त्रादिबंधुपुन्रार्थनाशनम्॥६॥ दुष्टभावगत राहुकी दशामें जब शुभग्रहोंके अंतर भावैं तब मथा शुभफल, बडासौख्य, राजमान, धनागम होवै॥ ५॥ अंतमें तो राजासे भय, स्थानका नाश, मनमें रोग, कृषि, गौ, भूमि, वस्ादि तथा बंधुजन, पुत्र, धनका नात होवै॥ ६॥ केन्द्रत्रयस्थितस्याहे: पापानां तुहतिर्यदा ॥गृहदाहाक्षिरोगा- दिदारपुत्रमहद्दयम्॥ ७॥ स्थानच्युति मनोदुःखं निजाचारवि- वर्जितम् ॥ अकस्मात्कलहं चैव चौराभिनृपर्णडनम् ।।८॥ चतु-

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भाषाटीकासहित:। (२६९ ) ष्टयगतस्याहेः परिपाके शुभा हतिः ॥ कचित्सौख्यं कचित्कीर्ति कचिद्धमै कचित्र हि॥ ९॥ एवमादौ तु अक्त्यंते राजकोपान- क्षयम्॥ युद्धे पराजयं चैव विद्यावादं महद्यम्॥ १०॥ उग्नसे अतिरिक्त तीन केन्द्रोंमेंसे किसीमें स्थित राहुकी दशामें जब पापातर आवै तब घर जले, नेत्ररोगादि होवैं, स्त्रीपुत्रोंको बड़ी भय होवै॥। ७ ॥ स्थानहानि, मनमें दुःख, अपने आचारसे वर्जितता अफस्मात्कलह, तथा चोर, अभनि, राजासे पीडन मिले॥ ८ ॥ केन्द्रगत राहुदशामें शुभांतरका फल कभी सुख, कभी कीर्ति, कभी धर्म कभी न हेवै ॥ ९॥ ऐसे फल दशादिमें होतेहैं दशाके अंत्यमें राजाके कोपसे धनका क्षय, युद्धमें पराजय, विद्यासंबंधी बाद और बडी भय होतीहै॥ १०।। त्रिकोणस्थफणीन्द्रस्य दशापाके महत्कृशम्॥ पापभुक्तौ मह- त्कष्टं पापाचारसमन्वितम् ॥ ११ ॥ अपकीर्ति कुभोज्यं च कृषिगोभूमिनाशनम् ॥ नृपभीतिं च शौर्य च मौल्यादिपतर्न भवेत् ॥ १२ ॥ तथाविधफणीन्द्रस्य शुभभुक्तौ शुभक्रिया॥ सुतदारधनापिं च भुक्त्यंते फलमीदशम्।। १३ ॥ किंचित्सुख तदादौ तु विदेशगमनं तथा॥ मंत्रोपास्ति मनोत्साहं कलत्नात्म- जदूषणम् ॥१४॥ त्रिकोण ५।९ गत राहुकी दशा पापातरमें बहुत कृशत्व, महाकष्ट, पापाचारसहित होवै ।। ११ ।। अपकीर्ति, कुभोजन मिलें कृषि गौ भूमिका नाश राजासे भय, तथा पराक्रम करना मिले परंतु मौल्य आदिका पतन होवे अर्थात् कीमत (करामत) घटजावै ॥१२॥ त्रिकोणगत राहुमें जब शुभांतर होवै तब शुभकाम होवे, पुत्र स्त्री धन पाप्ति होवै, ऐसे फल दशाके अंतमें होतेहैं॥ १३ ॥ दशादिमें तो थोडासुख तथा परदेश गमन मंत्रोपासना, मनका उत्साह, और स्त्रीपुत्रोंको दूषण मिले॥ १४ ॥ तृतीयलाभगस्याहे: परिपाके महत्सुखम् ॥ पापभुक्तौ नृपप्रीति फलमीदृशमादितः ॥ १५॥ अंते कष्ट विनिर्देश्यं चौराग्रिनृप- पीडनम्॥ बन्धुद्वेषं मनोदुःखं भ्रातृवर्गविनाशनम् ॥ १६ ॥ धनराशिगतस्याहे: पापानां तु हतिर्यदा। धननाशं मनोदुःखं भार्यापुत्रविनाशनम्। १७। ऋरयविक्रयवित्तातति वाग्दूषणम- थापि वा ॥ तथाविधफणीन्द्रस्य शुभभुक्तौ तु भोजनम्॥१८॥l

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(२६६ ) सर्वार्थचिन्तामणि:।

वस्नवाहनभूषातिं क्रयविक्रयदूषणम् ।उद्योगभंगं देहार्ति गूढपापं लमेन्नरः ॥ १९॥ इति राहुपाकान्तर्दशाफलम्॥ तीसरे वा ग्यारहवें राहुकी दशा पापांतरमें बडा सुख मिले; राजाकी मसन्रता होवे, ऐसे फळ मथम मिलें॥ १५ ॥ दशाके अंतमें कष्ट कहना तथा चोर, अग्नि, राजासे भय, बंधु- जनसे वैर, मनमें दुःख भाइयोंका नाश होताहै॥ १६ ॥ धनराशिगत राहुदश्ा पार्पा- तरमें धननाश, मनमें दुःख, स्त्री पुत्र नाश।। १७ ।। व्यापारमें धनहानि वा वाणीसे दूषण मिलतेहैं धनके राहुदशा शुर्भातरमें उत्तम भोजन ॥ १८ ॥ वस्त्र, वाहन, भूषणोंकी पाप्ति, व्यापारमें दूषण, उद्यमभंग, देहपीडा, तथा गुप्तपाप मनुष्य पावै ।। १९ । इति राहुपाकान्तर्दशाफळम् । अथ जीवान्तर्दशाफलम्। केन्द्रस्थितस्य जीवस्य दशायां देहपीडनम् ॥ पापाहतौ तथा दुःखं राजकोपं धनक्षयम् ॥ १ ॥ कृषिगोभूमिनाशं च विरोधं बंधुभिः सह॥ उत्साहभँगं वैकल्यमादौ चांते शुभं वदेत् ॥२ ॥ भुक्तौ शुभानां तत्काले गुरोः केन्द्रगतस्य तु॥ राज्यलाभं मनो- त्साहं वस्त्रवाहनभूषणम्॥ ३॥ दानं होमं जपं धम्यै नृपलाल- नमानताम्॥ सर्वोपकारं कल्याणं विचित्रांबरकाश्चनम्॥४ ॥ अब बृहस्पतिकी अन्तर्दशाका फल कहतेहैं केन्द्रगतगुरुकी दशा पापातर्दशामें देहपीडा, तथा दुःख राजाका कोप, धनक्षय ।। १ ।। कृषि, गौ, भूमिका नाश, बंधुजनोंसे विरोध, उत्साहमंग, विकलता, इतने फल प्रथम होतेहैं दर्शातमें शुभफल कहना ॥ २ ॥ केन्द्रगत गुरुदशा शुभग्रहोंके अंतरमें राज्यलाभ, मनका उत्साह, वस््र, वाहन, भूषण मिलतेहैं।। ३।। दान, हवन, जपादि धर्म होतेहैं राजासे प्यार, एवं मान मिलताहै सबका उपकार होताहै मंगलकार्य होतेहैं नानामकारके वस्त्र एवं सुवर्ण मिलताहै॥ ४ ॥ त्रिकोणस्थगुरो: पाके शुभसक्तौ महत्सुखम्॥प्राकारगोपुरादीनां निर्माणं देवतर्पणम् ॥५॥ भाग्योत्तरं महाकीर्ति दारपुन्रार्थसं- पदः॥विदेशयानादाप्तार्थ यशो विद्यां जयं सुखम्॥६॥ तत्रस्थि- तगुरोः पाके पापानां च हतिर्यदा । दारपुत्रनृपक्ोधं बंधूनां मरणं तथा॥७॥ बुद्धिभ्रंशं पदभ्रंशं कार्यविघ्नकरं तथा॥ चौरा- प्निदारपीडां च कुरुते नात्र संशयः ॥८।। त्रिकोण ५/९ गत गुरुकी दशा शुभग्रहोंके अंतरमें बडासुख होताहै सहरपनाह नगरद्वार आादि इमारत बनें देवताओंकी तृप्ति यज्ञ यजनादिसे करे।। ५ ॥ ऐश्वर्य बढे बडी कीर्ति

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भाषाटोकासडित:। (२६७ )

होवे स्त्री, पुत्र, धन, संपत्ति होवे परदेशगमनसे धनप्राप्ति, यश, विद्यां, विजय, और सुख मिलें । ६ ॥ त्रिकोणगत गुरुदशामें जब पापांतर आवै तब स्त्री, पुत्र, राजासे क्रोष, बंधु- जन मरण । ७ ॥ बुद्धिकी गलती, पढ़की हानि, तथा कार्यमें विघ्न, करे चौर, अग्नि, स्त्रीसे पीडा, मिले इसमें संदेह नहीं ।। ८।। स्वकुलाचारहीनं च परदाराभिमर्शनम्।। चांचल्यं मानहानिं च मणिविहुमनाशनम् ॥ ९॥ पष्ठाष्टमव्ययस्थस्य गुरो: पाके शु- भेतरा॥ करोति स्वकुलाचारहीनं राज्यार्थनाशनम्॥१०॥ आत्मार्थबन्धुमरणं विदेशान्तृपलालनम् ॥ भूमिवादं मनोदुःखं व्याधीनां भयमेव च ॥ ११॥ अपने कुलाचारसे हीनता, पराई स्त्रीको कुद्टष्टिसे देखना, चंचलता, मानहानि, राज्य और धनका नाश मिलताहै॥ ९॥ छठे, आठवें, बारहवें, भावगत गुरुकी दशा पापातरमें अपने कुलाचारसे हीनता राज्य एवं धनका नाश॥ १० ॥ अपने निमित्त बंधुननका मरण, विदे- शसे राजाका प्रेम, भूमिसंबंधी विवाद, मनमें दुःख, रोगोंकी भयभी होताहै॥ ११ ॥ गुरोर्नाशं गतस्यापि परिपाके महत्सुखम् ॥ देशग्रामाघिपत्यं च शुभभुक्तौ महद्यशः ॥१२॥ देहारोग्यकरं किंचिद्गजाश्वाद्यंबराणि च।। सुष्टुभोजनमुल्लासं क्षीरदध्याज्यशर्कराः ॥ १३॥ तृतीया- यगतस्यापि गुरोः पाके महद्यशः॥सौम्यानां भुक्तिकाले तु वस्त्- वाहनभूषणम् ॥ १४ ॥ मणिविदुममुक्तादिकांचनाद्यम्बराणि च।।देशाघिपत्यं मंत्रित्वं लभते नात्र संशयः ॥१५॥ तादृशस्य गुरोर्दाये पापभुक्तौ महद्यम्। आचारहीन कुरुते स्वकुलोद्धव- नाशनम्॥ १६॥ विदेशवासं कष्टं च नानादुःखपरिभ्रमम्॥ एवमादौ दशांते तु सुखंवाहनभोजनम् ॥१७॥ अष्टमगत गुरुकी दशा शुभांतरमें बडासुख देश गांवकी आधिपत्य (मालकी) और बड़ा यश मिले॥ १२ ॥ तथा शरीरमें आरोग्यता, थोढी घोडे, हाथी आदि वस्त्र, उत्तम भो- जन, हर्ष, दूध, दही, घृत, शकर मिलें।। १३ ॥ तीसरे, ग्यारहवें, गुरुकी दशा शुरभातरमें बडायश वस्त्न, सवारी, भूषण ॥। १४ ॥ मणि, मूंगा, मोतीआदि रत्न, सुवर्णआदि धातु, वस्त्र, देशकी अधिकारिता, मंत्रित्व, निस्संदेह पावताहै। १५॥ ऐसेही गुरुकी दशा पार्पा- तरमें बडीभय, आचारहीनता और अपने कुलवालेका नाश करतीहै॥ १६॥ तथा परदेश वास, कष्ट, अनेकमकार दुःख, भ्रम, इत्यादिफल दशाके आदिमें औौर अंत्मे सुख, वाहन, भोजन देतीहै॥ १७ ॥

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(२६८) सर्वार्थचिन्तामणि:।

धर्मस्थितगुरोदौये शुभमुक्तौ धनागमम् ॥ विद्यालाभं जयं सौख्यं दारपुत्रनृपात्सुखम्॥१८॥सर्वेषामुपकर्तृत्वं धनाधिक्यं म- हत्प्रियम्॥ भोजनं पौष्टिकं चैव धर्मदारधनादिकम्॥ १९॥ द्वितीयस्थगुरोः पाके पापभुक्तौ यदा तदा॥ करोति दुःखबा- हुल्यं राज्ञा हतधनं तथा ॥ २०॥ बंधुद्वेषं मनोद्वियं वाचिक- न्दैन्यमेव च।। कुभोजनादिदुष्कर्मकुत्सितप्रेष्यभावताम्॥२१॥ इति गुरुपाकान्तर्दशाफलम्। नवमगत गुस्की दशा शुभांतरमें धनकी आमद विद्याका लाभ, विजय, सुख, स्त्री, पुत्र, राजासे सुख मिले॥ १८ ॥ सबका उपकार अपनेसे होवै, धन अधिक होवे, बडी मियता, पौष्टिक भोजन, और धर्म, स्त्री, धनादि मिलते हैं॥। १९ ॥ दूसरे गुरुकी दशा पार्पातर जब आवै तब बहुत दुःख करतीहै राजा धन हरण करताहै॥ २० ॥ बंधुजनोंमें वैरं, मनमें उद्विम्रता, जबानीदीनता, कुभोजनआदि तथा दुष्कर्म, निंद्य, दूतताका भाव मिलतेहैं ॥।२ १॥ इति गुरुपाकान्तर्दशाफलम्। अथशनेरन्तर्दशाफलम्। केन्द्रस्थस्य शनेदाये यदा पापहृतिस्तदा। स्थानच्युर्ति प्रवासं च नृपचौराग्निपीडनम्॥ १॥ तथाविघशनेर्दाये शुभसुक्तौ मह- तसुखम् ॥ नृपाभिषेकमर्थाति देशग्रामाधिपत्यताम्॥।२॥ फल- मीदशमादौ तु भुत्तयंते रोगपीडनम्॥ परापवाद बंधूनां मरणं धननाशनम् ॥ ३ ॥ केंद्रगत शनिकी दशामें जब पापग्रहोंका अंतर होवै तब स्थान हानि, परदेश वास, राजा, चोर, अग्निस्ने पीडन मिले।। १ ।। ऐसे शनिकी दशा शुभांतरमें वडा सुख, राजकार्यमें अभिषेक, (अधिकारिता) धनपाप्ति, देश, ग्रामका आधिपत्य (मालकी) मिले ॥२॥ ऐस फछ दशाके आदिमें होतेहैं अंतमें रोग पीडा, झूठा कलंक, बंधुजनोक्त मरण, धननाश होताहै।। ३।। त्रिकोणस्थशनेदाये पितृपुत्रविनाशनम् ॥। पापसुक्तौ महत्कष्ट कर्मनाशमथापि वा ॥४॥ वाताक्षिमूलरोगं च स्वबंधुकलहं तथा ।। उद्योगभंगं दुःखंच स्थलधान्यविनाशनम् ॥५॥ तथाविध शनेर्दाये शुभभुक्तौ महत्सुखम्॥ राजपूज्यं कृषेलाभं घनधान्यवि वर्द्धनम् ॥ ६॥ स्वबन्धुदारपुत्राणामारोग्यं भूषणादिकम्॥ भृत्य मित्रार्थसंपत्तिं लभते धर्मसंग्रहम्॥७॥

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भाषाटीकासहित:। (२६९ )

त्रिकोण ५।९ स्थित शनिकी दश्ा पापातरमें पिताका तथा पुत्रक्रा नाश, बडाकष्ट अथवा कर्मका नाश होवै॥ ४॥ वातविकार, नेत्ररोग, मूलाधारमें रोग, अपने बांधबोंमें कलह, उद्योगभंग, दुःख और स्थलोत्पन्न अन्नका नाश होवै॥। ५ ॥ त्रिकोणगत शनिकी दशा शुभांतरमें वडासुख, राजासे पूज्यता, कृषिकर्ममें लाथ, धन अन्नकी वृद्धि ॥ ६ ॥ अपने बांघव, स्त्री, पुत्रोंकी आरोग्यता, भूषणआादि मिलतेहैं तथा सेवक, मित्र, धनकी संपत्ति और धर्मका संग्रह मिलताहै ॥ ७॥ षष्ठाष्टमव्ययस्थस्य शनेर्दाये शुभेतरा॥ हतिर्दुःखं महत्कष्टं स्था- ननाशं घनक्षयम्॥ ८॥ गुह्यरोगं विषार्तिश्च ज्वरवह्िनृपाद्ध- यम्॥ अत्याप्तबन्धुमरणमुद्योगस्य विनाशनम्॥।९।। षष्ठाष्टमव्य- यस्थस्य शुभपाके महत्सुखम् ॥ आरोग्यं कान्तिवृद्धिं च देश- ग्रामाधिपत्यताम् ॥ १०॥ छठे, आठवें, बारहवें, शनिकी दशा पापांतरमें दुःख, वडाकष्ट, स्थाननाश, धनकाक्षय । ८ ।। गुह्यस्थानमें रोग, विषकी भय, ज्वर, अगनि राजासे भय, अतिकृपा करनेवाले बंधुका मरण और उद्योगका नाश होताहै॥ ९ ॥ ऐसे ६ ।८ । १२ गत शनिदशा शुभां- तरमें बडा सुख, निरोगिता, कांतिकी वृद्धि और देश ग्रामकी माळकी मिलतीहै ॥ १० ॥ तृतीयलाभराशिस्थशनेः शुभह्ृतिर्यदा॥ पाके शुभफलं प्रोक्तं नृपलालनभूषणम् ॥ ११ ॥ तृतीयलाभराशिस्थशनेः पापत्ट- तिर्यदा॥ पाके धनापतिं दुःखं च भ्रातृवर्गविनाशनम्॥१२॥ विदेशयानं कलहं वैकल्यं भृत्यनाशनम्॥ कुभोजनं परप्रेष्यं कुस्त्रीसंगमनं लभेत् ॥ १३॥ तीसरे, ग्यारहवें, शनिकी दशामें पा्पातर जब होवै तब शुभफल कहाहै राजासे (लाड) प्रेम तथा भूषण मिले ॥ ११ ॥ ३। ११ भावगत शनिदशा पापांतर जब होवै तब घन- प्ाप्ति और दुःख, भ्रातृवर्गका नाशभी होताहै। १२ ॥ तथा विदेशगमन, कलह, विक- छता, सेवकका नाश, कुभोजन, पराया दूतत्व, निंद्य स्त्रीका गमन मिळे ॥ १३ ॥ धनस्थितशने: पाके यदा पापत्वतिर्भवेत्॥ राजदण्डं महाविघ्नं कारागृहनिरोधनम् ॥ १४॥ उत्साहभंगं देहार्ति ज्वरातीसार- पीडनम्॥ राज्यनाशं गवाश्वानां मरणं वाहनाड्भयम्॥ १५॥ द्वितीयस्थशने: पाके शुभसुक्तौ मनोदृढम्॥ उपकर्तृत्वमन्येषां

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(२७० ) सर्वार्थचिन्तामणिः।

धूतविद्याविनोदनम् ॥१६॥ गानकेलिरहस्यं च भोजनांबर- भूषणम् ।। उद्योगसिद्धिं राज्याप्तिं मणिविड्ुमकांचनम्॥१॥ इति शनिपाकान्तर्दशाफलम्॥ धनभावगत शनिकी दशामें जब पापातर होवे तब राजासे दण्ड मिले, बडा विध्र होवै, कैदमें रोका जावै।। १४॥ उत्साहमंग होवै, देहमें पीडा, ज्वर अतिसारकी पीडा होवै॥१५॥ दूसरे शनिकी दशा शुभांतरमें मन दृढ रहे, औरोंका उपकार, अपनेसे होवै, जुवाकी विद्याका विनोद होवै ॥ १६ ॥ गायन क्रीडाका रहस्य भी मिले, भोजन, वस्त्र, भूषण, उत्तम मिलें उद्यम सकल होवै, राज्य मिले, मणि, मूंगा, सुवर्णका लाभ होवे॥ १७ ॥ इति शनिपा- कान्तर्दशाफलम् ॥ अथ बुधांतर्दशाफलम्। केन्द्रस्थितस्य सौम्यस्य दशायां पापिनां हतौ॥ कर्मविघं महादुःखं मनश्चांचल्यमेव च॥।१॥ उत्साहभंगं गोभूमिहिर- ण्याम्बरनाशनम् । स्थानच्युति महाद्वेषं विद्यानाशं लभेत्तदा ॥।२।शुभभुक्तौ बुधस्याथ पापकेन्द्रगतस्य तु।विवाहिकं यज्ञकर्म दानघर्मजपादिकम् ॥ ३॥ ज्ञानाधिक्यं नृपात्पीति कृषिगोभूमि वर्धनम् ॥ मुक्तामणिप्रवालादिवाहनांबरभूषणम्॥४॥ अब बुधदर्शांतरफळ कहतेहैं केन्द्रगत बुधकी दशा पापग्रहोंके अंतरमें कर्ममें विघ्न, बडादुःख और मनचंचलभी होवै । १ ।। उत्साह भंग, गो, भूमि, सुवर्ण, वस्त्रका नाश स्थानसे च्युति महावैर और विद्याका नाशभी पावै ॥ २ ॥ केन्द्रगत निष्पाप बुधकी दशा शुभांतरमें विवाहकृत्य, यज्ञकर्म, दान, धर्म, जपादि होवें। ३ ॥ ज्ञानकी अधिकता होवै, राजासे प्रसन्नता, कृषि, गो, भूमिकी वृद्धि तथा मोती, मणि, मूंगा आदि और वाहन, वस्त्र, भूषण मिलें ॥ ४ ॥ ज्ञस्य त्रिकोणयुक्तस्य दशायां पापिनां हतौ॥ दारपुत्रार्थनाशं च कर्मनाशं मनोरुजम् ॥ ५॥ कृषिवाणिज्यनाशं च बंधुनाश- मथापि वा ॥ पादभंग महाद्वेषं बंधुद्वेष लभेननरः ॥ ६॥ तथा विधज्ञस्य पाके शुभसुक्तौ नृपात्पिरियम् । आरोग्यमतिसौख्य च सोमपानादिकं सुखम् ॥ ७॥ स्वनामांकितपद्यानि नागद- यमथापि वा। भोजनांबरभूषातिं नरेशत्वं लमेन्रः॥।८।

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भावाटीकासाित:। (२७१ ) त्रिकोणगत बुधदशा पापांतरमें, स्त्री, पुत्र, धननाश, कर्मनाश, मनमें रोग ॥ ५॥ कृषि व्यापारका नाश अथवा बंधुनाश, पैरोंका टूटना, बडा वैर मिलतेहैं।। ६।। त्रिकोणगत बुधदशा शुभातरमें राजासे प्रेम, आरोग्यता, अतिसां्य, सोमपानादि सुख ॥७॥ अपने नामके श्लोक, कविता, अथवा उपाधि (अधिकारी) नाम भोजन, वस्त्र, भूषण और राजत्व, मनुष्य पाताहै॥ ८॥ वष्ठाष्टमगतज्ञस्य परिपाके तु पापिनाम्॥ हतौ चौरारिपीर्डी च ज्वरातीसारपीडनम् ॥९ ॥ स्वबंधुमरणं केश भृत्यस्त्रीपुत्र- नाशनम् ॥ विवादं विग्रहं सवैर्बन्धुभिर्लभते नरः ॥ १०॥तथा विधान्जपुत्रस्य शुभभुक्तौ महद्यशः॥ आरोग्यं कांतिलाभं च देवभूसुरतर्पणम् ॥ ११॥ दशादौ फलमेवं स्याद्ुत्तयंते सुखना शनम्॥ गोमहिष्यादिपीडां च वाक्पारुप्यं नृपाद्नयम् ॥१२॥ छठे, आठवें, भागवत बुधकी दशा पापातरमें चोरभय शत्रुभय, ज्वरातीसाररोग पीडन । ९। अपने बंधुका मरण, क्रेश, सेवक, स्त्री पुत्रोंका नाश, कलह, युद्ध, सब बांधवोंके साथ मिळताहै॥ १०॥ छठे, आठवें, बुधकी दशा शुभांतरमें बडा यश, आरोग्यता, कान्तिलाभ, देवता, ब्राह्मणोंको तृप्त करना ॥११। ऐसे फल दशाके आदिमें होतेहैं अंतमें सुखका नाश, गो, भैंस आदिकी पीडा, वाणीकी कठोरता और राजासे भय होतीहै ॥ १२ ॥ तृतीयायगतज्ञस्य शुभभुक्तौ शुभं भवेत् ॥ मनोधैये मनोत्साहं विदेशाह्व्यसंचयम्॥ १३ ॥ विद्याजयं नृपात्पीति भोजनं पौष्टिकं तथा॥ यज्ञवैवाहिकं कर्म पुराणश्रवणादिकम्॥१४॥ तथाविघज्ञस्य पाके पापभुक्तौ महद्भयम् । आ्रातृवर्गविनाशं च वैक्व्यं नृपपिडनम् ॥ १५ ॥ चौरारिवह्निभीतिश्च कुस्त्रीभूता- दिसेवनम्॥ कर्महीनं कृषेनाशं गजाश्वानां च पीडनम् ॥ १६॥ तीसरे, ग्यारहवें, बुधकी दशा शुभांतरमें शुभफल होताहै मनको धैर्य, मनमें उत्साह, पर- देशसे धनसंचय॥१३॥ विद्यासे विजय, राजासे प्रसन्नता. पौष्टिक भोजन, यज्ञ, विवाह आदि वर्म और पुराण श्रवण आदि फल होतेहैं॥ १४॥ तथा ३।१ १गत बुधदशापापान्तरमें बडीभय भ्ातृ- वर्गका विनाश नपुंसकता राजासे पीडा॥ १५॥ चोर, शत्रु अभनि भीति, निन्ध स्त्री संग, भूत आदिका पूजन, कर्महीनता, कृषिका नाश, हाथी घोडाओंका पीढन, ऐसे फल होतेहैं ॥१६॥ धनस्थिताब्जपुत्रस्य परिपाके शुभेतरा ॥। करोति राजदण्डं च बंधनं निगडं तथा॥ १७॥ विषार्ति बंधु विद्वेषं कृषिगोभूमिना-

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(२७२) सर्वार्थचिन्तामणिः। शनम्॥ शत्रुत्वं सकलैः सार्द्ध नित्याचारविवर्जनम् ॥१८॥ द्वितीयस्थस्य सौम्यस्य परिपाकेऽर्थलाभभाक॥शुभभुक्तौ महा- प्रीतिं देवभूसुरतर्पणम् ॥१९॥ अध्वरादिमहत्कर्म दानहोम- जपादिकम् ॥ बंधुपूज्यं महोत्साहं विद्यालाभं च विन्दति ॥२०॥ इति बुधपाकान्तर्दशाफलम्। द्वितीय भावगत बुधदशा पापातरमें राजासे दंड बंधन कैद।। १७ ।। विषसे पीडा, बंधुजनके साथ वैर, कृषि, गो, भूमिका नाश, सबके साथ शत्रुता, नित्याचारसे राहित्य मिले ।। १८। दूसरे बुधकी दश्ञा शुभांतरमें धनलाभवाला होवै, बडी पसन्नता रहे. देवता ब्राह्म- णोंकी तृप्ति करे॥ १९ ॥ यज्ञआदि बडे कर्म, दान, हवन, जप आदि होवैं, बंधुवर्गसे पूज्यताबडा उत्साह और विद्यालाभ, मनुष्य पाताहै॥ २० ॥ इति बुधपाकान्तर्दशाफलम्॥ अथ केतारंतर्दशाफलम्। केतोश्रतुष्टयस्थस्य यदा पापहृतिस्तदा ।मानभंगं महाद्वेषं नृप- चौराग्निपीडनम्॥ १॥ मातृनाशं तदीयं वा दारपुन्रविनाश- नम्॥ कर्मनाशं पदभ्रंशमकस्मात्कलहो भवेत्॥ २ ॥ केतोस्त- थाविघस्यापि शुभभुक्त नृपात्प्रियम्॥ देहारोग्यकरं सौख्यं बंधुभिश्च समागमम् ॥ ३॥ भोजनांबरभूषाप्तिमादौ चांते मनो- रुजम्॥ उद्योगभंगं कामार्ति स्वकुलोद्भवनाशनम् ॥।8 ॥ अब केतुके अंतर्दशाफल कहतेहैं केन्द्रगत केतुदशा पापातरमें मानहानि, बडा वैर, राजा, चोर, अगनिसे पीडा, ।। १ ।। माताका नाश, अथवा उसीका नाश, स्त्रीपुत्र विनाश, कर्मका नाश पदसे गिरना और अकस्मात्कलह होवे॥ २ ॥ केन्द्रगत केतुकी दशा शुभातरमें राजासे मीति, देहमें नीरोगिता, सुख, बंधुवर्गसे मेलन ॥ ३ । भोजन, वस्त्र, भूषणमाप्ति, इतने फल दशाके आदिमें होतेहैं अंतमें मानसीरोग, उद्यमहानि, कामदेवकी पीडा, और अपने कुलवाले किसीका नाश होवै ॥ ४ ॥ त्रिकोणराशियुक्तस्य केतोर्दाये शुभेतरा॥ हतिस्तदा मनस्तापं करोति विविधापदम्॥ ५॥ पुत्रवर्गादिमरणं पित्रोर्नाशमथापि वा। स्थानार्थयोस्तथा नाशं भृत्यबंधुविरोधनम्॥६॥ शुभग- हाणां केतोस्तु परिपाके हतिर्यदा॥ कृषिगोभूमिलामं च विद्या- बंघुसमागमम्।। ७॥ भोजनांवरसौख्यं च अक्त्यादो फलमी- हशम्॥ भुक्त्यंते स्थानचलनमकस्मात्कलहं वदेत॥८॥

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भावाटीकासहितः। (२७३ )

त्रिकोणगत केतुदशा पापांतर होनेसे मनमें संताप अनेक प्रकार आपत्ति करतीहै ॥ ५॥ पुत्रवर्गादिका मरण अथवा माता पिताका नाश, स्थान धनका नाश, तथा परिश्रमालस्य सेवक वर्गसे विरोध होवै ॥ ६ ॥ त्रिकोणगत केतुदशा शुभांतर जब होवै तब दशादिमें कृषि, गो, भूमिका लाभ, विद्या, एवं बंधुजनका समागम ।।७।। भोजन, वस्त्र, सुख होतेहैं, दशाके अंत्यमें स्थानसे विचलित होना और अकस्मात्कलह कहना ॥ ८ ॥ वष्ठाष्टमव्ययस्थस्य केतोदाये शुभेतरा ॥ हतिः करोति मरणं विदेशं वा पदभ्रमम् ॥९ ॥ प्रमेहमूत्रगुल्मादिराजचौराग्निपीड- नम्॥ फलमादौ तदन्ते च यत्किचित्सुखवर्द्धनम्॥१०॥ भुक्तौ सोम्यग्रहाणां तु हतौ स्त्रीपुत्रवर्द्धनम्॥ धान्यांबरविभूपातिं मणि- प्रवरकांचनम् ॥ ११॥ विप्रलंभं च शौरय च मौल्यादिपतनं तथा॥ स्वबंधुजनशत्रुत्वं शिरोक्षिगदपीडनम् ॥ १२॥ छठे, आठबें, बारहवें, केतुकी दशा पापांतरमें मरण, परदेश निवास, पदका भ्रम ॥९॥ प्रमेह, मूत्र, गुल्मादिरोग, राजा, चोर, भगनिसे पीडन, इतने फल दशाके आदिमें मिलते हैं अंत्यमे थोडा सुखभी बढताहै ॥१०॥ ऐसे केतुकी दशा शुर्भातरमें स्त्री, पुत्रवृद्धि, अन्न, वस्त्र, भूषणोंकी माप्ति श्रेष्ठमणि, सुवर्णलाभ ।। ११ ।। अंगीकारका संपादन न करना शूरता, मूल्य आदि गिरना (बेकदरी) अपने बंधुजनोंमें शत्रुता और शिर, नेत्र, गुदामें, पीडन होवै ॥१२॥। तृतीयलाभयुक्तस्य केतो पाके परं सुखम् ॥ शुभभुक्तौ नृपा- त्प्रीति विचित्रांबरभूषणम्॥ १३॥ वाहनं भूमिलाभं च गंधमा- ल्यानुलेपनम्॥ दूरात्करागमं चैव स्वबंधुजनपूज्यताम्॥ १४॥ पापसुक्तौ तथा जंतोः पापकर्मसमाचरेत्॥ सर्वेषां विन्नकर्तृत्वं बंधुभिस्त्यक्तजीवनम् ॥ १५ ॥ परप्रेष्यं कुवस्त्रं च ुक्त्यादौ फलमीदृशम्॥ भुक्त्यंते सुखमाप्नोति दारपुत्रधनागमम् ॥ १६॥ तीसरे ग्यारहवें भावगत केतुकी दशा शुभातरमें परमसुख, राजाकी मसन्नता, अनेकपका- रके वस्त्र भूषण।। १३ ॥ वाहन, भूमिका लाभ, चंदन, पुष्पादि सुगंधिळेपन, दूरसे करकी आमद, अपने बंधुवर्गसे पूज्यता मिळतीहै।। १४ ।। पापांतरमें जीवकी हिंसा आदि पाप- कर्म करे सबका वित्र करनेवाला होवे बन्धुजनसे परित्यक्तता ॥ १५ ॥ पराई दूतता, कुवख्र, इतने फल दशाके आदिमें मिलतेहैं द्शांतरमें सुख, स्त्री, पुत्र, धनका आगम होवै॥ १६ ॥ धनस्थितध्वजस्यापि परिपाके शुभेतरा॥ करोति विविधं दुःखं मैक्ष्यमन्नं मनोरुजम्॥ १७॥ पुत्रमित्रकलन्नाणां नाशनं महदा

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(२७४ ) सर्वार्थचिन्तामणिः। पदम्॥ राज्ञा चौरेण वा वित्तं ह्वियते बंधुनाशनम्॥। १८ ॥ शुभभुक्तौ धनाप्तिं च विद्यावादजयावहम् ॥ परोपकारं सर्वेर्षां भोजनांबरभूषणम् ॥१९॥ भुक्त्यादौ फलमेवं स्यादते किंचि- द्वनव्ययम्॥ वाक्पारुष्यं मनोद्वेगं प्रवृत्तेर्मैगमेव वा ॥२ ॥ इति केतुपाकान्तर्दशाफलम्॥ द्वितीयभावगत केतुदशा पापांतरमें अनेक प्रकार दुःख, भिक्षाका अन्त, मनमें रोग॥१७॥ पुत्र मित्र स्तियोंका नाश, बडी आपत्ति मिले, राजासे चोरसे धन हरण होवै, बंधुनाशन होवे । १८॥ शुरभांतरमें धनमाप्ति, विद्या, विवादमें जयमिले सबका उपकार होवै, भोजन, बस्न, भूषण मिलें।। १९ ॥ दशाके आदिमें ऐसे फळ होतेहैं अंतमें थोडा धन व्यय होवै, वाणीकी कठोरता, मन उद्दिग्न और कार्यप्रवृत्तिका भंग होनै॥ २० ॥ इति केतुपाकान्तर्दशाफलाम्॥ अथ शुक्ांतर्दशाफलम्। केन्द्रस्थितस्य शुकस्य सौम्यानां तु हतिर्यदा॥ राज्यातिं राज- सन्मानं यानांबरविभूषणम् ॥ १ । उत्साहं कीर्तिसंपत्तिस्त्री- पुत्रधनसंपद:॥ भाग्योत्तरं मनोधैर्य राजद्वाराघिपत्यताम्।।२।! तथाविघस्य वाऽच्छस्य पापयुक्तौ घनक्षयम्। कुभोजनं कुवसं च शुभकर्मविनाशनम्॥३॥ भुक्त्यादौ फलमेवं स्यादंते शोभ- नमादिशेत्॥। गृहगोभूमिलाभं च दूरदेशाद्धनागमम्॥।8॥ अब शुकदशांतरफल कहतेहैं केन्द्रगत शुकदशा शुमग्रहोंके अंतर जब होवै तब राज्य, राजसन्मान, सवारी, वस्त्र, भूषण ।। १ ।। उत्साह, कीर्ति, संपत्ति और स्त्री, पुत्र, धनकी संपत्ति होवै॥ २॥ केन्द्रगत शुक पापातरमें धनहानि, कुभोजन, कुबख, शुभफर्मका नाश होताहै। ३। इतनेफल दशाके आदिमें होतेहैं अंतमें शुभफल कहना कृषि, गो, भूमिलाभ, दूरदेशसे धनकी आमद होवे ॥ ४ ॥ त्रिकोणस्थस्य शुकस्य शुभसुक्तौ शुभक्रिया॥ देवभूसुरभक्तिम्य सुतदारविवर्द्धनम्॥ ५॥ यज्ञादिकर्मलाभं च गोभूषणमथो ज- यम्॥ आरोग्यं देहकांति च चिंतितार्थमनोरथम् ॥ ६॥ तथा- विघस्य शुकस्य पापझक्ती मनोरुजम् ॥ अनारोग्यममयाद नृपचौराग्निपीडनम्॥ ७॥ कुस्त्रीसंग कुवाती च बंधुद्देषं मतिश्र मम् ॥ दुःखन्नं मौलिपतनमपकीर्ति लभेनरः॥८॥

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भावाटीकासहित:। (२७५ )

त्रिकोणगत शुककी दशा शुभांतरमें शुभकार्य, देवता ब्राह्मणकी भक्ति, पुत्र, स्त्रीकी वृद्धि ॥ ५॥ यज्ञादिकार्यका लाभ गो, भूषण, संग्राममें विजय, निरोगिता, शरीरकी कांति वृद्धि, मनकी अभिलाषा पूर्ण होतीहै॥ ६।। त्रिकोणगत शुकदशा पापातरमें मानसीरोग, तथा भनेकरोग, अमयादाके काम, राजा चोर, अग्निसे पीडन।। ७॥ निन्ध खीका संग, निविद्ध- वार्त्तामें प्वृत्ति, बंधुजनसे वैर, बुद्धिभ्रम, दुष्टस्वम देखने, शविरोगत श्रेष्ठ मनुष्यका गिरना और अपयश होवै ॥। ८॥ पाके शुक्रस्य दुःस्थस्य शुभभुक्तौ महदयशः ॥ राजसन्मानमर्था सिं पुत्रस्त्रीधनसंपदः॥९॥ वस्त्रवाहनभूषाप्तिमादौ चान्ते मनो- रुजम्॥ बन्धुद्वेषं गुरोरनाशं स्वकुलोदवनाशनम् ॥। १०॥ शुभग्रहाणां भुक्तों तु देहारोग्यं महत्सुखम्॥ परात्रं पट्टवस्त्नातिं गंघमाल्यविभूषणम् ॥ ११॥ युत्तयादौ फलमेवं स्यादंते क्लेश- करं भवेत्॥ चौरारिदेहपीडां च स्वबंधुजननाशनम्॥ १२॥ दुष्टस्थान ६।८। १२ गत शुककी दशा शुभांतरमें बडायश, राजासे सन्मान, धन- भापि, पुत्र, स्त्री, धनकी संपत्ति॥ ९।। वस्त्र, वाहन, भूषणमाप्ति, ऐसे फल दशादिमें होते हैं अत्यमें मानसीरोग, बंधुजनसे वैर, गुरुजनका नाश, अपने कुलवालेका नाश होताहै॥ १० ॥ ऐसे शुकदशा शुभांतरमें देहमें निरोगिता, बडासुख, परात्र, रेश्मी वस्त्रोंकी पाप्ति, चंदन, पुष्प, भूषण, मिलतेहैं ऐसे फळ दशाके आदिमें होतेहैं अंतमें क्ेश करनेवाली होतीहै चोर, अभनि, भय, ऋरीरपीडा, औौर अपने बंधुजनका नाश होताहै ॥ ११ ॥ १२ ।। तृतीयायस्थशुक्रस्य परिपाके शुभेतरा ॥ हृतिर्दुःखमवाभोति धनधान्यविनाशनम्॥ १३ ॥ उद्योगभंगं केशं च चौराग्िनृप पीडनम् ॥ भूमिवादं स्वबंधूरनां नाशनं स्वपदस्य च।। १४॥ तथाविघस्य शुक्रस्य शुभभुक्ती महत्सुखम्॥ नृपपूर्जां मनोधैय देशग्रामाधिपत्यताम् ॥ १५॥ वाहनं भषणात्तिं च पुत्रत्त्रीमृत्य- संपद:॥ प्रपारामतडागानां निर्माणं धमसंग्रहम् ॥ १६॥ तीसरे ग्यारहवें शुककी दशा पापांतरमें दुःख पाताहै घन अन्नका नाश ॥ १३ ।। जयममंग, क्ेस्, चोर, अगनि, राजासे पीढन, भूमिविषय विवाद, बंधुजनकी हानि और अपने पदकीभी हानि होतीहै।। १४ ॥ ऐसे ३। ११ भावगत शुककी दशा शुर्भातरमें बढासुख, राजासे पूज्यता, मनमें धैर्य, देश, एवं गांवका आधिपत्य (माळकी) ॥। १५ ॥ वाहन, भूषणोंकी प्राप्ति, पुत्र, स्त्री, सेवकोंकी वृद्धि, प्याऊ बगीचा, तालाबका बनाना और धर्मका संग्रह होताहै॥। १६ ॥

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(२७६ ) सर्वार्थचिन्तामणिः

धनस्थस्यापि शुकस्य शुभभुक्तौ महत्पिरियम्।दारपुन्रार्थलाभं च स्वबंधुजनरक्षणम्॥१७॥ विद्याजयं मनोल्ासं देवयूसुरतर्पणम्॥ यज्ञादिकर्मलाभं च लभेन्नामद्यं तथा।।१८।। धनस्थितस्य शुक्- स्य पापभुक्तौ भृश वदेत्॥ राजदण्डं मनोदुःखं त्दद्रोगाक्षिप्रपीड- नमू॥१९॥।विद्यावाद कृषेरनाशं कर्महानिं पदभ्रमम्॥। वह्निचौरारि- भीति च लभते नात्र संशय:॥।२०।।इति शुकपाकान्तर्दशाफलम्।! इति श्रीसर्वार्थचिंतामणौ राहुकेत्वादिदशान्तर्दशाफल निरुूपणोनाम षोडशोऽध्यायः॥१६॥ धनभावगत शुककी दशा शुभांतरमें बडी मसन्रता होवै स्त्री, पुत्र, धनलाभ, अपने बंधु- जनोंकी रक्षा ।। १७।। विद्यासे विजय, मनके उत्साह, देवता, ब्राह्मणोंका पूजन, यज्ञ आदि कर्मका लाभ, तथा दो नाम (अधिकारी दूसरा नाम) पावै।। १८ ॥ धनगत शुकदशा पापातरमें वारंवार राजदण्ड, मनमें दुःख, हृदय रोग, नेत्रपीडा ।१९। विद्यासम्बंधि विवाद, कृषिका नाश, कर्मकी हानि, पदमें भ्रम, अग्नि चोर शत्रुका भय निःस्संदेह पाताहै ॥ २० ॥ इति शुकपाकान्तर्दशाफलम् ॥ इति श्री सर्वार्थचिन्तामणौ माहीधरीभाषायां राहुकेत्वादिदश्ान्तर्दशाफलनिरूपणाच्याय:बोडशः १६

अथ प्रकीर्णाध्यायः। यद्यज्जन्मनि नक्षत्रे वृद्धिभावसुपेयुषि ॥ तस्य श्रीरायुरारोग्यं भवत्येवं विनिश्चयः ॥ १॥ ति्थ्यादिषु तथा वाच्यं क्षये तस्मिन् क्षयो भवेत् ॥ तिथिरेकगुणा प्रोक्ता ऋक्षं दशगुणं भवेत्।। लयं लक्षगुणं प्रोक्तं तत्समूहे फलादिकम् ॥ २ ॥ जिसके जन्ममें नक्षत्र वृद्धिगत, अर्थात् ६० घटी पूर्ण रहकर दूसरे दिनभी चलाजावै और जन्मसे पूर्वदिनमें उसका स्पर्श होजावै पकारान्तरसे घटिकाओंमें बढता जो नक्षत्र है उसकोगी वृद्धिभाव कहसकतेहैं ऐसेमें जिसका जन्म हो उसकी श्री, (शोभा) आयु नैरुज्यता, होतीहै यह निश्चयहै।। १ ॥ तिथ्यादियोंमें भी ऐसाही फल कहना ऐसे क्षय तिथि नक्षत्रादियोंमें जन्मवालेके उक्त श्री आदिका क्षय कहना, इसमें तिथिका फल एकगुण नक्षत्रका दशगुण लग्नका उक्षगुण कहाहै इन सबके समूहसे फलादि कहना ॥ २ ॥।

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भाषाटीकासहित:। (२७७) केन्द्रस्थिता जन्मनि यस्य कस्य पापाश् सर्वे विफलप्रदा: स्युः॥ कुर्वैति दारिद्र्यमनेकदुःखं श्वासक्षयप्ीहगुदोदरार्तिम् ॥३॥ पापग्रहे कर्मगतेति नीचे वक्रान्विते पापखगैः प्रहष्टे॥ नाशं कलन्रस्य वदति नूनं मुनीश्वरास्तद्वदनेकशास्त्रैः ।४॥ दुःखी मूढो लोकविदेषकारी काण: पंगुनिर्धनो मानहीनः॥ अल्पायुः स्यात्केंद्रगा: पापखेटा ब्रह्मद्वेषी चापकीर्तिश्र सवे ॥५॥ जिस किसीके जन्ममें पापग्रह केंद्रोंमें होवैं तो सब पाप शुभफल नहीं देते, दरिद्रता, अने- कदुःख, श्वास, क्षय, प्रीहा, गुदरोग उदररोग, करतेहैं।। ३।। दशमस्थानमें अतिनीचगत पापग्रह वकगतियुक्त ग्रहोंसे दृष्ट होवें तो मुनीश्वर भनेक शास्त्रोंसे निश्चय खत्रीका नाश करतेहैं ॥।४। समस्त पापग्रह केंद्रोंमें शुभरहित होनेमें दुःखी, मूर्ख लोगोंमें विद्ेष करनेवाला, काणा, पंगु (खोडा) निर्धन, मानहीन, अल्पायु, ब्राह्मणोंका द्ेषी और अपकीर्तिवाला होताहै॥५॥ शंकराचार्यमते तु-लग्ने माने सप्तमे चाथ बंधौ पापाः खेटा ज- न्मकाले तु सवें। तिष्ठन्त्येते स्वल्पमायुष्प्रमाणं तेषामेको लग्न- पो वा यदि स्यात्॥ ६॥ तथापि तद्योगफल प्रमाणं तादृग्विघं स्यान्मनयो वदन्ति॥ स्वनीचभागादि महीपयोगेप्येवं फलं दुःखितनिर्गतायुः॥७॥ तथास्थिते जन्मनि यस्य कस्य बाल्ये च पित्रोर्मरणं च कष्टम्। भिक्षाशनेनाप्युदरस्य पूर्तिस्तदा भव- त्येव तदंगहानिः॥८।। शंकर नामा आचार्यका मतहै कि, लग्न दशम सप्तम और चतुर्थमें पापग्रह सभी जन्मका- लमें होवैं तो आयुका प्रमाण थोडा होवै यदि उनमें एकग्रह लग्नेशभी हो ॥ ६ ॥ तोभी उस योगका फलममाण मुनिजन उसी प्रकार कहते हैं यदि राजयोगभी होवै फिन्तु राजयोगकारक ग्रह अपने नीचांशादिकोंमें होवैं तोभी वही फळ और दुःखित, गतायु होताहै॥ ७॥ ऐसे केन्द्रगत समस्त पापयोगमें जिस किसीका जन्म होवे तो बाल्यावस्थामें माता पिताका मरण और कष्टभी होवै भिक्षाका अन्न खायकरके पेटकी पूर्ति और उसकी अंगकी हानि होतीहै॥ ८॥ स्वनीचभागादिमहीपयोगे जातेपि यस्यापि नरस्य कस्य।। केन्द्रत्रिकोणेषु शुभो यदि स्यात्तद्राजयोगं सफलं वदंति॥९॥ स्वाशेक्षिते लग्नगते क्रमांशे जीवेन दृष्टे धनराशिपेन॥ स्वनी- चभागादिमहीपयोगे जातोपि भूमेरधिपत्यमेति॥१०॥ एवं

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(२७८) सर्वार्थचिन्तामणिः। चिन्तामणौ प्रोक्तं वेंकटेशेन धीमता॥ नीचभागादियोगार्थ राजयोगादिजं फलम्॥ ११॥ यदि किसीका नीचांशकादिगत ग्रहजन्य राजयोग हुयेमें यदि केन्द्र त्रिकोणमें शाभग्रहमी होवै तो राजयोगका फल सफल होना कहतेहैं॥ ९ ॥ अपने नवांशकमें शुभग्रहसे दृष्ट, लन्नमें स्थित, वह राजयोग कर्ता ग्रह गुरुदृष्ट, धनेश दृष्ट, होवै तो पूर्वोक्त स्वनीच भागाढि राजयोगमें केंद्रस्थ पापग्रहोमेंमी इनके फलको हटायके भूमिके आधिपत्यको माप्त होता है । १० ॥ इसमकार सर्वार्थचिंतामणिमें धीमान् वेंकटेशने नीचांशकादि योगार्थ सहित राज- योगादिका फल कहाहै ॥ ११ ॥ अथ द्रेष्काणाः॥ मेषद्वितीयो मिथुनः पूर्णः सिंहस्य प्रथमः खगद्रेष्काण: कर्कस्य द्वितीयतृतीयौ वृश्चिकस्य प्रथमतृतीयौ मीनतृतीयो व्याल: मकरादो निगडः ॥१२॥ प्रथम फलादेशमें खगादि द्रेष्काण कहेहैं उनकी संज्ञा कहते हैं कि मेषका दूसरा मिथुनके तीनों और सिंहका पथम खग द्रेष्काण कर्कके दूसरे तीसरे वृश्चिकका पथम तीसरा और मीन का तीसरा व्याल (सर्प) मकरका प्रथम निगड द्रेष्काण होतेहैं ॥ १२ ॥ रविभौमार्कजाः शुष्काः सजलौ चन्द्रभार्गवौ॥ बुधवाचस्पती ज्ञेयौ सजलौ जलराशिगौ।१३।। कुम्भकर्कटकौ मीनमकरालि तुलाघराः॥ सजला राशयः प्रोक्ता निर्जला: शेषराशयः॥॥ इति श्रीसर्वार्थचिंतामणौ प्रकीर्णभावफलनिरूपणो- नाम सप्तदशोऽध्यायः॥१७॥ सूर्य मंगल शनि शुष्क चंद्रमा शुक् गीलेंहैं बुध वृहस्पति जलराशियोंमे गीले अन्यराशियोंमें शुष्क हैं ॥ १३ ॥ कुंभ कर्क मोन मकर वृश्चिक तुला सनल अन्यनिर्जल राशिहैं ॥ १४॥ इति श्रीसर्वार्थाचिंतामणौ माहीधरीभाषारयां प्रकीर्णभावफलनिरूपणाऽव्यायः सप्रदशः ॥१७॥

अथ ग्रहफल-बाधककारकत्वम्। जन्मन्यर्कों हिमकरसुतः सैंहिकेयः सुरेज्यः केतुश्चंद्रो दिनकर सुतो भार्गवो भूमिपुत्रः ॥ तापं कान्तिं क्षतिधृतिलयं कीर्तिहानिं प्रमोदं मृत्युं ताराबलमनुदिनं संचरंति क्रमेण॥ १॥ जन्ममें तारा जन्म नक्षत्रसे ९ के स्वामि फलसहित ग्रह इस क्रमसेहैं कि सूर्यसे ताप युषसे कांति राहुसे हानि गुरुसे धारण केतुसे लय चंद्रमासे कीर्ति शनिसे हानि शुकसे खुशी मंगलसे मृत्यु इस कमसे ताराहैं ॥ १ ॥

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भाषाटीकासहित:। (२७९) गहार्णां स्थानवशेन परस्परबाधकत्वमाह।I क्रमाच्च रागद्विश- रीरभाजासुर्पात्यधर्मस्मरगास्तदीशाः। खरेशमांदिस्थितराशि- नाथा अतीवबाघाकरखेचराः स्युः ॥२॥ घुमणिरमरमंत्री भूसुतः सोमसौम्यौ गुरुरिनतनयारौ भार्गवो भानुपुत्रः।। दिनकरदिविजे- ज्यो जीवभानुज्ञमंदा: सुरगुरुरिनसूनुः कारकाख्याविलग्नात्।३।। स्थानवशसे परस्पर ग्रहोंका वाधकत्व कहतेहैं कमसे चरराशियोंके स्वामी ११ एकादशमें स्थिरोंके नवम ९ में दिस्वभावोंके सप्ममे कमसे राहु केतुस्थित राशिस्वामी भतीव बाधाका- रक ग्रह होतेहैं ॥२॥ अब कारक कहतेहैं. लग्नमें सूर्य दूसरा गुरु तीसरा मंगल पंच चंद्र बुध गुरु छटे शनि मंगल सप्तममें शुक्र अष्टममें शनि नवममें सूर्य गुरु दशममें गुरु सूर्य बुध श्नि ग्यारहवेंमें गुरु बारहवेंमें शनि कारक होतेहैं॥ ३॥ इति ग्रहफलवाधककारकत्वनिरूपणम्॥ अथ कारकसूत्राणि। पितृप्रतापारोग्यमनःशुचिरुचिज्ञानोदयकारकः सूर्यः ॥१॥ धवलचामरयशोदयामोदकांति मुख लावण्यमातृमनःप्रसादकारक- श्न्द्रः ॥ २ ॥ परात्रमविजयविख्यातिसंग्रामसाहससेनापत्य दंडनेतृत्वखद्ग पर श्वधकुंत कुठारशतन्नीभिंदिपालधनुर्वाणनैपुण्य- धृतिकांतिगांभीर्यकामकोधशत्रुवृद्धि आग्रहावग्रह परापवादस्वंत- त्धातृभूकारक: कुजः ॥ ३ ॥ संततिशांतिविनयभक्तिमतिमातु- लबांधवज्ञातिगोत्रसमृद्विगणितप्रज्ञावेदांतविद्याकारको बुधः॥

कर्मपुत्र संपज्जीवनोपायकर्मयोगसिंहासनकारको गुरुः ।५। सगीतसाहित्य दास्यर साद्ुतमदनयुवतिरति केलिविलासविचित्र- कांति सौं दर्यराजवशीकरणराजमुखवशीकरणगारुडेन्द्रजालमा- लावैशद्यमहदणिमाद्यष्टै श्वर्यकाव्यकला समभो ग कलत्रकारकः

यकारकः शनिः ॥७॥ यशः प्रतिष्ठाछत्रकारको राहुः ॥८॥

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(२८० ) सर्वार्थचिन्तामणिः। पिता. मताप. आरोग्य. मनकी पवित्रता. रुचि-ज्ञानका उदय इतनेका कारक सूर्यहै॥१॥श्वेत चामर. यश. दया. हर्ष. काति. मुखकी कोमलता. माता. मनकी परुन्नताका चंद्रमा ॥२॥परा- कम. विजय. ख्याति. संग्राम. साहस. सेनापति होना हाकिमी. खङ्ग. फर्सा. कुंत. कुल्हाडा. तोप. भिंदिपाळ. धनुष. बाण. निपुणता. धैर्य. गंभीरता. काम. कोष, यत्रुवृद्धि भाग्रह अवग्रह कलंक. स्वातंत्र्य. धाई. भूमिकारकमंगलहै ॥। ३ ॥। संतान. शांति. नम्रता. भक्ति. बुद्धि. मामा. बांषव (विरादर) सगोत्र. समृद्धि. गणितषुद्धि. वेदांतविद्या कारक बुध ।।४।। वाणी. सवारी. मंत्र, राजतंत्रनिष्ठा, हाथी, घोडा, पालकी, वेदशास्त्रज्ञान, कर्म, पुत्र, संपत्ति, जीवनका उपाय, कर्मयोग, सिंहासनकारक गुरु है ॥ ५ ॥ संगीत, काव्य, दासत्वरस, अद्धु- तरस, कामदेव, स्त्री, कामकीडा, विलास, चित्रकांति, सुंदरता, राजा राजपुरुष वशीकरण, गारुडविद्या, इंद्रजालवाला, चातुरी, बडा छोटा होना आदि अष्टैश्वर्य, काव्यकला, समभोग, स्त्रीकारक शुक है ॥६॥ मोह लोभ, विषम, परपीडा, निर्धातशन्दादि, निष्ठुरता, दुर्मति, दरि- द्ता, दुर्दशा, रोग, वातरोग, ठगी, भैंस, दलिया, कृष्णअन्न, आयु, जीवनका उपायकारक शनि है ।७।। यश पतिष्ठा और छत्र कारक राहुहै ॥ ८ ॥ इति सर्वार्थचिन्तामणौकारकसूत्राणि। श्रीवैक्रमे क्षितिरसांककुसम्मिते दे धर्माधिकारि पदधारि महीधरेण। गूढारथंबोधनकरी विवृतिः स्वबुद्धया सद्धाषया व्यरचि टीहरिराजधान्याम् ॥ १॥ कृतार्थयन्तु विद्वांसो होरामर्मविशारदाः॥दष्ट्र भ्रमं स्वसौजन्यात्पूरयन्तु त्रुटिं मम॥२॥ ये केचित्समदा: स्वीयाऽबोधेन विहसन्ति माम्॥ ते छिद्रान्वेषणपरास्तुष्यन्तु विहसन्तुच २ ममाभीष्टन्तु सर्वेषामुपकारोत्र कारणम्।श्रेष्ठिने खेमराजाय ग्रन्थोयं विनिवेदितः ॥४॥ ॥ शुभमस्तु ॥ श्रीरस्तु ॥

समाप्तोऽयं ग्रन्थ:।

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