1. Saundarya Bodha Shastra A Itihasik Adhyayan Jagdish Singh Manhas
Page 1
सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन-ऐकिटासिक परंपर
जगदीश सिंह मन्हास
Page 3
सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा [आलोचना]
Page 4
नेशनल पब्लिशिंग
हाउस 23, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002
Page 5
सोौदर्य बोधशास्त्रीय अ्धरान: ऐतिहासिक परंपरा जगदीश सिंह मन्हास
Page 6
नेशनल पब्लिशिंग हाउस 23, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002
शाखाएं
चोड़ा रास्ता, जयपुर 34, नेताजी, सुभाष माग, इलाहाबाद-3
ISBN 81-214-0430-4
मूल्य : 150.00
नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 23, दरियागंज, नयी दिल्ली, 110002 द्वारा प्रकाशित। प्रथम संस्करण : 1991। सर्वाधिकार : श्री जगदीश सिंह मन्हास/ 141, एन० एस० प्रिंटर्स, मौजपुर, दिल्ली-53 में मुद्रित।
Page 7
प्रत्येक शोधार्थी में शोध-शिखा के सतत् प्रज्वलन में प्रेरक गुरुवर श्रद्धेय डॉ० रमेशकुंतल मेघ को
Page 9
भूमिका
सभी भाषाओं के साहित्य में सौंदर्य की भावना और सौंदर्य-रचना अनिवार्य रूप से विद्यमान रहती है तथा उसमें सौंदयंबोधशास्त्रीय चिंतन भी विकसित होता है। हिंदी साहित्य में भी हमें ऐसा ही दृष्टिगोचर होता है, किंतु इसमें सौंदर्यबोघशास्त्रीय चिंतन का व्यवस्थित समारंभ अपेक्षाकृत काफी बाद में हुआ। आज भले ही हिंदी में सौंद्यबोधशास्त्र एक स्वतंत्र ज्ञानानुशासन के रूप में समृद्ध हो चुका है, फिर भी यह विषय संबंधी चिंतन अत्यधिक बिखरा हुआ ही है। हिंदी साहित्य में सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतन और अध्ययन का विकास किस रूप में हुआ तथा उसकी अब तक क्या उपलब्धियां रही हैं, इस विषय पर जहां तक हमारी जानकारी है, कोई सुसंबद्ध और व्यापक कार्य नहीं हुआ है। ऐसी स्थिति में यह उचित जान पड़ता है कि हिंदी में सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन और चिंतन का, उसके विकास और उपलब्धियों का सम्यक अध्ययन किया जाये। इसी उद्देश्य से हमने अपने इस ग्रंथ में सौंदयबोधशास्त्रीय अध्ययन के ऐतिहासिक विकास तथा उपलब्धियों का सर्वांगपूर्ण अनुशीलन किया है। मैंने एक अनुसंधाता के रूप में इस बात का यथाशक्ति प्रयास किया है कि अपनी क्षमता के अनुरूप हिंदी में सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन के विकास की अभिवृद्धि में योग देने वाले समस्त सौंदर्य एवं कलाचिंतकों तथा इसके अंतर्गत आने वाले सभी विषयों का विवरण प्रस्तुत करें, फिर भी मेरे अज्ञानवश यदि किसी विषय, सौंदर्यतत्त्व- वेत्ता का मूल्यांकन और उसका विकासगत महत्त्व इस ग्रंथ में नहीं आ सका है तो इसका आशय उसके प्रति सम्मान भावना की न्यूनता न होकर मेरी सीमागत विवशता ही है। वैसे भी किसी शोधार्थी से, जिसका उद्देश्य तीन वर्षों की अवधि में परीक्षा के लिए एक शोध प्रबंध प्रस्तुत करना होता है, हम उससे सौंदर्यबोधशास्त्र के सभी विषयों की सविस्तार मीमांसा की आशा नहीं रख सकते। यह बात अवश्य है कि हिंदी में सौंद्यबोधशास्त्रीय अध्ययन के विकास कार्य में जिन सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का हाथ रहा है। उन्हें विस्मृत करने का प्रमाद मुझ्से कदाचित नहीं हुआ है। यह पुस्तक चार अध्यायों में विभक्त है जो कि सौंदर्यबोधशास्त्र के विविध अंगों का विधिवत् अनुशीलन करते हुए उसकी उपलब्धियों को दर्शाते हैं। पहले तीन अध्यायों में हमने सौंदयबोधशास्त्र के सैद्धांतिक और दारशनिक आयामों को प्रस्तुत किया है। इसके अंतर्गत हमने क्रमशः 'कला और सौंदयबोधशास्त्र', [ vii ]
Page 10
'कलाकृति', 'कलाओं का वर्गीकरण', 'आशंसक या सहृदय', 'कलाकार', 'सृजनप्रक्रिया और सृजनात्मक कृत्य', 'अभिव्यंजना', 'संप्रेषणीयता' और 'सौंदर्यानुभूति' पर हिंदी के विभिन्न सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं के द्वारा किये गये चिंतन को ऐतिहासिक कालक्रम के अनुसार स्पष्ट किया है। इन तीनों अध्यायों में सौंदर्यबोघशास्त्र के विविध अंगों का विस्तारपूर्वक निरीक्षण व सर्वेक्षण प्रस्तुत करने के उपरांत हम आलोचकों की इस धारणा का खंडन करने में पूरी तरह समर्थ हो जाते हैं कि सौंदयंबोधशास्त्र की अव- धारणा पाश्चात्य रही है तथा हिंदी में इसका विधिवत् निरूपण नहीं हुआ है। यह सही है कि जहां पाश्चात्य वाङ्मय में इस विषय का विधिवत् अनुशीलन लगभग दो सौ वर्षों से हो रहा है, वहां हिंदी के लिए यह विषय एकदम नया है। यहां अभी तक सौंदयंबोधशास्त्र एवं कला संबंधी कतिपय धारणाएं पूर्णतः स्पष्ट एवं निश्चित नहीं हो सकी हैं। लेकिन फिर भी हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं तथा कलाचितकों ने इस ज्ञामानुशासन पर मौलिक चिंतन कर न केवल इसके स्वतंत्रशास्त्र होने का प्रमाण ही दिया है, अपितु इस ज्ञानानुशासन को समृद्ध भी किया है। चतुर्थ अध्याय हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं से संबंधित है। इस अध्याय में हमने हिंदी के सभी सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का परिचय न देकर केवल उन प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का ही उल्लेख किया है, जिन्होंने इस विषय पर एक से अधिक पुस्तकें लिखी हैं तथा पाश्चात्य साहित्य; संस्कृति और विचारधारा से प्रभावित न होकर अपने मौलिक चिंतन और सशक्त लेखन से इस विषय को संपन्न बनाने में योगदान दिया है तथा विषय संबंधित कई नयी दिशाओं और संभावनाओं के द्वार खोले हैं। यहां अध्याय के अनावश्यक विस्तार तथा पुनरावृत्ति के दोष से बचने के लिए इमने हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का परिचय तथा उनके योगदान को संक्षेप में ही देने का प्रयास किया है। सभी सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का परिचय अकरादि क्रम से अथवा आयु के करम से नहीं अपितु उनकी सौंदर्य बोधशास्त्र एवं कला पर प्रथम प्रकाशित पुस्तक के ऐतिहासिक कालक्रम को ध्यान में रखकर दिया गया है। सभी सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का परिचय प्राप्त कर लेने के उपरांत हमें यह स्पष्ट हो जाता है कि हिंदी के आरंभिक सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने जो चिंतन किया, वह मुख्यतः ललित कलाओं के वृत्त में ही हुआ। वास्तुकला, मूर्तिकला तथा चित्रकला इस कला- त्रयी का अध्ययन ही हिंदी में सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन का रूप धारण कर पाया है। सर्वप्रथम आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने काव्यशास्त्र के कलापक्षीय वृत्त में सुविचारित और सुव्यवस्थित सौंदर्यंबोधशास्त्र की नींव डाली और सौंदर्यबोधशास्त्र को संस्कृति एवं मानवतावाद से जोड़ा। कांतिचन्द्र पांडेय, फतहसिंह तथा नगेन्द्र ने हिंदी में सौंदर्य- बोधशास्त्र की निजता को खोजा तथा इसका स्थानांतरण किया। कालांतर में इसी परंपरा को हरद्वारीलाल शर्मा, कुमार विमल, रमेश कुंतल मेघ, एस० टी० नरसिंहाचारी तथा रामलखन शुक्ल आदि प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने आगे बढ़ाया और सौंदर्यबोध- शास्त्र को एक स्वतंत्र विद्यानुशासन के रूप में प्रतिष्ठापित किया। इस तरह हमने अपनी इस पुस्तक के द्वारा हिंदी में हुए सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन तथा चिंतन के विकास को ऐतिहासिक एवं विवेचनात्मक दृष्टि से इस प्रकार [ viii ]
Page 11
प्रस्तुत किया है कि वह हिंदी में सौंदर्यबोधशास्त्रीय ज्ञानधारा का इतिहास भी बन गया है तथा सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतन के अंतरज्ञानानुशासनात्मक पक्षों की शोधात्मक आलोचना भी हो गयी है। प्रस्तुत पुस्तक के प्रणयन में मुझे अनेकानेक ग्रंथों तथा पत्र-पत्रिकाओं से यथो- चित सहायता मिली है, जिनकी सूची अंत में दी गयी है। राष्ट्रीय पुस्तकालय कलकत्ता, मारवाड़ी पुस्तकालय कलकत्ता, नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी तथा हिंदी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद के संग्रहालय द्वारा भी मैं अपने अनुशीलन विषयक सामग्री का संचयन करने में यथेष्ट लाभान्वित हुआ हूं। अतः इन सबके प्रति आभार प्रदर्शित करना मैं अपना पहला कर्त्तव्य समझता हूं। इस अवसर पर मैं अपने उन प्राध्यापकों के प्रति भी कृतज्ञ हूं, जिन्होंने सदैव चर्चा आने पर तथा विषय-संबंधी कई महत्त्वपूर्ण सूचनाएं देकर मेरा उत्साहवर्द्धन किया है। पुस्तक की संपन्नता में प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से योगदान देने वाले शुभषियों, सहपाठियों एवं स्नेहियों का भी हृदय से आभारी हूं। इनको धन्यवाद कैसे दूं ? वे सब अपना सहयोग दे चुके हैं, मैं उऋ्ण तो नहीं हो सकता, परंतु उसकी उपेक्षा भी नहीं, क्योंकि मेरी सिद्धि ही इन सबका संतोष है। अपने अनुज कुलदीप सिंह मन्हास की सेवाओं का आभार मुझ पर कितना अधिक है, यह केवल मेरी आत्मानुभूति का विषय है, अपनी सुख-सुविधाओं को मेरे अभ्युत्थान-हित समर्पित कर उसने मुझे सदैव उल्लासित भाव से प्रगतिशील बनने की प्रेरणा दी है। सबसे बड़ी बात यह है कि कई वर्षों तक मेरे द्वारा को गयी गार्हस्थ्य की घोर उपेक्षा को चुपचाप सहन कर तथा मेरे सभी पारिवारिक दायित्व एक लंबे अर्से तक भोल कर, मुझे अध्ययन की दिशा में उन्मुख रखा है। प्रस्तुत पुस्तक उसी के इस त्याग का भी साकार निदर्शन है। आदरणीय गुरुवर डॉ० रमेशकुंतल मेघ के प्रति क्या कहूं? उन्होंने वह प्रेरणा- सूत्र प्रदान किया है जो किसी भी साहित्यिक प्रयास का मूल हो सकता है। जीवन में सतत् कर्मण्यता का उनसे अधिक समर्थ संदेशदाता मैंने देखा नहीं। वे सिद्धांत रूप में कर्मण्यता की शिक्षा ही नहीं देते, स्वयं आदर्श प्रस्तुत किये हुए हैं। उनकी आत्मीयता सारी औपचारिकता से परे है। उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का कोई भी शब्द उनके प्रति बनी हुई श्रद्धा-भावना की अभिव्यक्ति करने में असमर्थ ही माना जायेगा। उनके संरक्षण में अध्ययन-अध्यापन का अवसर मिला, इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है ? इस विषय के संबंध में मेरा जो भी ज्ञान है सब उन्हीं की प्रेरणा और निर्देशन का परिणाम है। इसमें जो त्रुटियां हैं वे मेरी सीमाएं हैं। अंत में हिंदी में सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन की भावी संभावनाओं के साथ मैं अपनी इस पुस्तक को विनम्रता से प्रस्तुत कर रहा हूं। -जगदीश सिंह मन्हास
[ ix ]
Page 13
क्रम
अध्याय-1 कला और कलाकृति का व्यापार 1-91
कला : व्युत्पत्ति और अर्थ-विकास-कला शब्द की व्युत्पत्ति; कोशगत एवं अर्थ; 'कला' शब्द का प्रथम प्रयोग तथा अर्थ-विकास; कला : परिभाषा; सामान्य कला : प्रयोजन। सौंदर्य-सौंदर्य : व्युत्पत्तिपरक अर्थ; सौंदर्य : विभिन्न परिभाषाएं; सौंदर्य का स्वरूप सौंदर्यबोधशास्त्र-सौंदर्यबोधशास्त्र : नामकरण की उफ्युक्तता का प्रश्न; सौंदर्यबोधशास्त्र : परिभाषा व अर्थ; सौंदर्यबोधशास्त्र : क्षेत्र का निर्धारण; सौंदर्यबोधशास्त्र : अन्य शास्त्रों से संबंध। कलाकृति-कलाकृति के लक्षण। रूप-रूप : अर्थ मीमांसा, रूप : विभिन्न परिभाषाएं; कला अथवा कलाकृति में रूप का महत्त्व; विषयवस्तु कलाकृति में रूप और विषयवस्तु का पारस्परिक संबंध; शैली; माध्यम। कलाओं का वर्गीकरण-कलाओं के वर्गीकरण संबंधी दो विचारधाराएं कलाओं के वर्गीकरण का कारण तथा औचित्य; ललित तथा उपयोगी कलाएं; ललित कलाएं और उनका क्रम-निर्धारण, संदर्भ ।
अध्याय-2 आशंसक और कलाकार का वृत्त 92-159
आशंसक या सहृदय-आशंसक या सहृदय की सौंदर्यशास्त्र में स्थापना तथा भारतीय एवं पाश्चात्य मनीषियों द्वारा बोध प्रयुक्त शब्दावली; भारतीय तथा पाश्चात्य चिंतकों के अनुसार सहृदय के अपेक्षित गुणों में अंतर; रुचि या अभिरुचि; आशंसा एवं रचना। कलाकार-कलाकार की विभिन्न परिभाषाएं तथा कलाचितकों द्वारा अपे- क्षित गुण; कला मीमांसा में कलाकार के अंतर्गत कवि की सर्वाधिक विवेचना होने काकारण; कलाकारों के भेद-प्रभेद प्रतिभा; प्रेरणा; कल्पना; कल।कार तथा आशंसक। सृजन प्रक्रिया और सृजनात्मक कृत्य-संस्कृत काव्यशास्त्र में सृजन संबंधी चिंतन; पश्चिम में सृजन की अवधारणा का विकास हिंदी के विभिन्न चिंतकों की सृजन- प्रक्रिया संबंधी अवधारणाएं; संदर्भ ।
[ xi ]
Page 14
अध्याय-3 सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम 160-200
अभिव्यंजना-अभिव्यंजना : व्युत्पत्तिपरक तथा कोशगत अर्थ; हिंदी के सौंदर्यतत्त्व वेत्ताओं का अभिव्यंजना संबंधी चिंतन। संपेषणीयता-साहित्य तथा कला की भाषा का स्वरूप। सौंदर्यानुभूति-हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का सौंदर्यानुभूति संबंधी चिंतन; सौंदर्यानुभूति तथा सामान्य अनुभूति; सौंदर्यानुभूति को निर्धारण करने वाले तत्त्व, सौंदर्यानुभूति और रसानुभूति, संदर्भ।
अध्याय-4 हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता 201-227
हरिवंश सिंह शास्त्री; रायकृष्ण दास; जगदीश गुप्त; भगवतशरण उपाध्याय; कांतिचंद्र पांडेय; फतेह सिंह; कुमार विमल; रमेशकुंतल मेघ; रामनाथ मिश्र; जयसिंह नीरज;निष्कर्ष; संदर्भ।
संदर्भ ग्रंथ सूची 228-236
[zii]
Page 15
अध्याय-1
कला और कलाकृति का व्यापार
कला: व्युत्पत्ति और अर्थ-विकास कला शब्द की व्युत्पत्ति 'कला' शब्द संस्कृत भाषा का शब्द है। भाषा वैज्ञानिकों की दृष्टि में इस शब्द की व्युत्पत्ति संदिग्ध है।1 तथापि संस्कृत तथा हिंदी के विद्वानों ने इसकी व्युत्पत्ति कई तरह से मानी है। अमरकोश में इसकी व्युत्पत्ति 'कल' धातु से मानी गयी है जिसका अर्थ है-शब्द करना, बजना, गिनना।2 सीताराम चतुर्वेदी इसे 'क' अर्थात् आनंद का लाने वाला मानते हैं3 तथा सद्गुरुशरण अवस्थी कला शब्द का अर्थ 'सुंदर', 'कोमल', 'मधुर' या 'सुख लाने वाला' मानकर कला को उसके साथ संबद्ध करना चाहते हैं।4 कांतिचंद्र पांडेय 'कला' शब्द की सिद्धि 'कल' धातु से मानते हैं जिसका अर्थ 'संख्यान' है।5 नगेन्द्र भी इसी का समर्थन करते हैं।6 संख्यान शब्द की सिद्धि 'खया' धातु से न होकर जिसका अर्थ 'कथन', 'घोषणा करना' या 'संवादन' होता है, 'चक्षिङ् व्यक्ता- याम् वाचि' से है जिसका अर्थ 'स्पष्ट वाणी में प्रकटन' होता है। चक्षिङ् के स्थान पर 'ख्या' आदेश हो जाता है। इसका अर्थ अवधानपूर्वक देखना भी है। सम् उपसर्गपूर्वक इस धातु का अर्थ गिनना, गणना करना अथवा संकलन करना होता है। इस अर्थ के आधार पर 'संख्यान' शब्द का अर्थ मनन-चिंतन एवं ध्यान भी होता है। ... इस प्रकार से 'कला' शब्द का अर्थ वह मानवीय क्रिया है जिसका विशेष लक्षण 'ध्यानपूर्ण दृष्टि से देखना' गणना अथवा संकलन करना, मनन और चिंतन करना एवं स्पष्ट रूप से प्रकट करना है।7 कांतिचंद्र पांडेय ने कला शब्द का अर्थ कलाकृति भी सिद्ध किया है। इस अर्थ में वे इस शब्द की सिद्धि 'कल' धातु से भावप्रक्रिया के अनुसार मानते हैं। "तदनु- सार 'कला' शब्द का अर्थ एक ऐसी कृति होती है जो मानवीय क्रिया से उत्पन्न होती है, जिसके विशेष गुण ध्यानपूर्ण दृष्टि, संकलन एवं स्पष्ट प्रकटन है।"8 इन दो अर्थों के अतिरिक्त कांतिचंद्र पांडेय कला शब्द की सिद्धि 'ला' धातु
Page 16
से भी स्वीकार करते हैं जिसका सामान्य अर्थ 'प्राप्त करना' होता है।9 रामलखन शुक्ल भी कला शब्द के उक्त तीनों अर्थों का समर्थन करते हुए कला को ऐसी मानवीय क्रिया मानते हैं जो ध्यान, मनन और चिंतन से अभिव्यक्ति प्राप्त कर प्रधानतः ऐंद्रिय सुख और आनंद प्रदान करने का साधन सिद्ध होती है।10
कोशगत एवं सामान्य अर्थ भारतीय साहित्य तथा विभिन्न कोशों में कला शब्द इतने अधिक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है कि उसका निश्चित रूप से कोई एक अर्थ नहीं बताया जा सकता किंतु फिर भी उन सब अर्थों से प्रायः एक ध्वनि अवश्य निकलती है जिसका तात्पर्य है कि किसी वस्तु की रचना करना या बनाना ही कला है। विभिन्न कोशों में कला के अर्थ मुख्यतः इस प्रकार हैं : 1. किसी वस्तु का बहुत छोटा अथवा सबसे छोटा अंश या संयोजक भाग, 2. चंद्रमा के प्रकाश और बिंब के घटते-बढ़ते रहने के विचार से उसका सोलहवां अंश या भाग, 3. अग्निमंडल के दस भागों में से एक, 4. राशिचकर के प्रत्येक अंश का साठवां भाग, 5. मूलधन या ब्याज या सूद जो बराबर बढ़ता चलता है, 6. छंदशास्त्र या पिंगल में गणना के विचार से मात्रा या अक्षर, 7. वैद्यक के अंतर्गत स्रत धातुओं की संज्ञा, 8. सूर्य का बारहवां भाग, 9. कौशल अथवा हुनर अर्थात् किसी कार्य के निष्पादन में मनुष्य द्वारा व्यवहृत एवं प्रदर्शित दक्षता-प्रवीणता अथवा विशेषज्ञता, जिसकी प्राप्ति अभ्यास, अध्ययन, पर्यवेक्षण और प्रशिक्षण से होती है। प्रस्तुत प्रसंग में इसका अंतिम अर्थ ही हमारे लिए सबसे निकट है। 'कला' शब्द का प्रथम प्रयोग तथा अर्थ-विकास 'कला' शब्द का सबसे प्रथम और प्रामाणिक प्रयोग भरतकृत 'नाट्यशास्त्र' में मिलता है। पीछे वात्स्यायन और उशनस ने क्रमशः अपने ग्रंथ 'कामसूत्र' और 'शुकनीति' में इसका वर्णन किया है।11 भरत ने नाट्य के महत्त्व का कथन करते हुए कहा कि "न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला"-अर्थात् ऐसा कोई ज्ञान नहीं, कोई शिल्प नहीं, कोई विद्या नहीं, कोई कला नहीं, जिसका समावेश नाटय में न हो। भरत- मुनि ज्ञान, शिल्प और विद्या से भी अलग कला से क्या अभिप्राय ग्रहण करते थे, यह स्पष्ट करना कठिन है लेकिन अनुमान यही लगता है कि भरत द्वारा प्रयुक्त 'कला' शब्द जहां 'ललित कला' के निकट है वहां शिल्प शायद उपयोगी कला के निकट है। भरतमुनि से पूर्व 'कला' शब्द का प्रयोग काव्य को छोड़कर दूसरे प्रायःसभी प्रकार के चातुर्य कर्म के लिए होता था और इस चातुर्यकर्म के लिए विशिष्ट शब्द था 'शिल्प'। जीवन से संबंधित कोई उपयोगी व्यापार ऐसा न था जिसकी गणना शिल्प में न हो। इस प्रकार सभी कलाएं शिल्प के अंतर्गत समझी जाती थीं।12 नीहार- रंजन राय भी इसी तथ्य का समर्थन करते हुए लिखते हैं कि "शिल्प एक व्यापक शब्द था साधारण तौर पर जिससे 'कला' का तात्पर्य ग्रहण किया जाता है। इसमें खिलौने 2। सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 17
बर्तन, रथ बनाने से लेकर निजी जीवन-निर्माण (जीवन शिल्प) तक मनुष्य की तमाम कौशलपूर्ण गतिविधियां शामिल थीं।13 कालांतर में भारतीय विद्वानों की मान्यता में परिवर्तन हो गया तथा शिल्प और कला दोनों शब्दों का प्रयोग पृथक्-पृथक् अर्थों में किया जाने लगा। आज कला शिल्प या कारीगरी से भिन्न है। शिल्प का कार्य आमोद-प्रमोद की तफरीह (इंटरटेनमेंट) या आजकल की शब्दावली में-'रसास्वादन' की सामग्री प्रस्तुत करना है। आमोद-प्रमोद का जीवन में एक आवश्यक स्थान है, पर उसका प्रबंध करना 'शिल्प' (काफ्ट) का कार्य है, कला (आर्ट) का नहीं।"14 एक अन्य अंतर शिल्प और कला में यह भी है कि शिल्प में आत्माभिव्यक्ति नहीं होती, उसमें तो किसी उद्देश्य की पूर्ति या किसी संवेग का किसी व्यावहारिक, जीवनोपयोगी क्रिया में संवलन (डिस्चार्ज) होता है जबकि कला आत्माभिव्यक्ति का ही दूसरा नाम है, आत्माभिव्यक्ति अथवा अपने दिल की बेचनी का स्पष्टीकरण एक स्वस्थ व साधारण मानसिक आवश्यकता है, वह किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए नहीं की जाती, आत्माभिव्यक्ति द्वारा तो कलाकार अपनी मानसिक वेदना या तनाव से छुटकारा पाता है। हां, यह अलग बात है कि किसी कलाकार की आत्माभिव्यक्ति के फलस्वरूप लोगों को आमोद-प्रमोद अथवा आत्मोत्थान की सामग्री प्राप्त हो।15 इस प्रकार यह स्पष्ट है कि प्राचीन भारतीय वाङ्मय में कला शब्द का प्रयोग कारीगरी, कौशल या शिल्प के लिए होता था। उसका स्वाभाविक जीवन के अभि- व्यक्तिकरण से कोई विशेष संबंध नहीं था। 'शुकनीति' की चौंसठ और 'प्रबंध कोश' की बहत्तर कलाएं, काश्मीरी पंडित क्षेमेंद्र की दो सौ आठ प्रमुख कलाएं तथा भर्तृहरि के प्रसिद्ध श्लोक 'साहित्य संगीत कला विहीनः' में कला की विशिष्ट स्थिति इस बात का संकेत करती है कि कला अपने आप में जीवन की प्रयत्नसाध्य कुशल अभिव्यक्ति ही रही है। कला के संबंध में पाश्चात्य दृष्टिकोण भी कुछ इसी प्रकार का ही रहा है। अंगरेजी में इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग तेरहवीं सदी के प्रथम चरण में हुआ। वहां भी इसका अर्थ शुद्ध कौशल मात्र है। अंगरेजी शब्द 'आर्ट' का संबंध पुरानी फ्रेंच 'आरट' और लैटिन शब्द 'आर्टेम' या 'आर्स' से जोड़ा जाता है जिसका अर्थ बनाना या पैदा करना होता है, अर्थात् वह शारीरिक या मानसिक कौशल जिसका प्रयोग किसी कृत्रिम निर्माण में किया जाये, आर्ट माना गया है।16 अतः प्राचीन 'आर्ट' शब्द में केवल शिल्प- बोध था, उसमें ललित कलाओं को समावेशित करने की अर्थगरिमा स्पष्ट नहीं थी। अठारहवीं सदी के पूर्व तक कला के लिए लगभग ऐसे ही विचार थे। लेकिन कला- शास्त्रियों एवं सौंदर्यचितकों के समक्ष आज भी यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि कब और कैसे 'आर्ट' शब्द में यह अभिनव अर्थागम हुआ। हिंदी के अधिकांश विचारक इसका श्रेय आधुनिक यूरोपीय सौंदर्य-चेतना को देते हैं। "सत्रहवीं शताब्दी में जब सौंदयंभावना और सौंदर्यरहस्य का विकास हुआ तब कला पर से शास्त्र का आवरण हटता हुआ दिखलाई पड़ा। अठारहवीं शताब्दी में 'कला' की विशिष्टता स्थापित हुई और उन्नीसवीं शताब्दी में 'कला कला के लिए' कला और कलाकृति का व्यापार / 3
Page 18
सिद्धांत प्रसारित हुआ जब 'उपयोगी कला' और 'ललित कला' के बीच एक विभाजक रेखा खींची गयी। इसी भांति कला का संबंध क्रमशः सौंदर्य-भावना के समीप आता गया और वह धीरे-धीरे एक मात्र ललित भाव मूलक ही निर्धारित हुआ। कला के विकास में जब से 'उपयोग' की भावना का आधिपत्य हुआ है, तभी से कला की सौंदर्य- भावना ने विद्रोह किया है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जब व्यवसाय के लिए कला का प्रयोग होने लगा तब 'कला कला के लिए' का सिद्धांत वायुमंडल में गूंजा और समझा गया कि कला का अस्तित्व केवल अपने लिए ही है। मानव की रागात्मक भावना के परितोष के अतिरिक्त उसका दूसरा ध्येय ही नहीं है।"17 कुमार विमल ने भी कला के अर्थविकास के इस कारण का समर्थन करते हुए अपनी पुस्तक 'कला विवेचन' में लिखा है-"अठारहवीं शताब्दी में जब सौंदर्यशास्त्र के विचारक शिल्प और उसके दर्शन पर सोचने लगे, तब शिल्प तथा कला का विभाजन अथवा पृथक्करण उपयोगी एवं ललित कला के रूप में हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के आते ही 'कला' (शब्द) में छिपा हुआ सौंदरयबोध इतना प्रबल और मुखर हो उठा कि अपने पुराने विशेषण 'ललित' (फाइन) को हटा देने पर भी वह अपेक्षित अर्थ द्योतित करने लगा अतः औसत व्यवहार में 'ललित कला' के लिए केवल 'कला' का ही व्यवहार होने लगा।"18 सौंदर्यचेतना के अतिरिक्त प्रभुदयाल मीतल ने कला शब्द के अर्थ- परिवर्तन के कारण 'पाश्चात्य संस्कृति और साहित्य की अनुकरणात्मक प्रवृत्तियों' को भी माना है।19 विद्वानों के उक्त मतों से कला को ललित कला की एक विशिष्ट श्रेणी, उसका एक नया रूप, नया अर्थ और नयी मान्यता प्रदान करने के कारण पूर्णतः स्पष्ट हो जाते हैं। आज कलाचितक कला को जिस रूप में व्याख्यायित करते हैं उससे केवल ललित कला ही ध्वनित होती है। कला : परिभाषा वैसे तो किसी भी शब्द या वस्तु को परिभाषा में बांधना कठिन है परंतु कला को इस दृष्टि से विद्वानों ने सबसे कठिन माना है।20 इस कठिनाई के बावजूद जिसने भी इस विषय पर लेखनी उठायी है, प्रायः सभी ने ज्ञात या अज्ञात रूप से इसकी परिभाषा दी है। कला के अनेक अर्थों के समान ही विद्वानों ने इसे अपने दृष्टिकोण विशेष से परि- भाषित किया है। हिंदी के कलामनीषियों ने अब तक कला पर असंख्य परिभाषाएं और व्याख्याएं की हैं, लेकिन इन असंख्य परिभाषाओं में कला अधिक स्पष्ट होने की अपेक्षा उलभकर रह गयी है। कोई कल्पना की अभिव्यक्ति को कला मानता है तो कोई जीवन की व्याख्या को कला कहता है। कोई इसे सौंदर्यसाधना का नाम देता है तो कोई इसे अपनी भावनाओं को दूसरों पर प्रतिष्ठित करने का साधन समझता है। प्रकट है कि यह शब्द इतना व्यापक है कि विभिन्न चिंतकों की परिभाषाएं केवल एक ही विशेष पक्ष को छूकर रह जाती हैं। 'हिंदी विश्वकोश' में कला शब्द की इसी व्यापकता को देखते हुए इसकी कोई निश्चित परिभाषा नहीं दी गयी है।21 'हिंदी
4 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 19
साहित्य कोश' में इसे परिभाषित करते हुए यह माना गया है कि "कला मानव संस्कृति की उपज है। निसर्ग से युद्ध करते हुए मानव ने श्रेष्ठ संस्कार के रूप में जो कुछ सौंदर्य- बोध प्राप्त किया है, 'कला' शब्द में उसका अंतर्भाव है।"22 हिंदी के प्रमुख कलाचिंतकों तथा सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने कला की जो परि- भाषाएं दी हैं वे इस प्रकार हैं : हिंदी के प्रथम सौंदर्यतत्त्ववेत्ता हरिवंशसिंह शास्त्री ने कला को, भावों को प्रकट करने की ऐसी चेष्टा कहा है जिनसे हम कुछ क्षण के लिए इस क्षुद्र व्यक्तित्व से ऊपर उठकर औरों से तादात्म्य प्राप्त करते हैं।23 इस रूप में इन्होंने कला को अपनी भाव- नाओं को दूसरों पर प्रतिष्ठित करने का साधन माना है। जयकांत का श्रुतधर तथा हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता कुमार विमल ने भी कला को इसी रूप में परिभाषित किया है। "कला वह आह्लादमयी शक्ति है जो कलाकार के मन से निकलकर श्रोता या पाठक के मन को पूर्णतया विवश बनाकर कलाकार की इच्छा के अनुकूल सत्य स्वरूप का दर्शन कराये।"24 कुमार विमल ने कला की समाजशास्त्रीय दृष्टि से व्याख्या करते हुए यह लिखा है कि "कला 'अहम्' और 'इदम्' की क्रिया-प्रतिक्रिया के विनिमय से निर्मित व्यक्ति के उस 'स्व' की अभिव्यक्ति है, जो समष्टि को अर्पित होती है। इस तरह कला व्यक्ति और समाज के बीच 'अहम्' और 'इदम्' के बीच तथा एक और अनेक के बीच संयोजक पुल का काम करती है।"25 हरद्वारीलाल शर्मा ने उन अभिव्यक्तियों को कला की संज्ञा प्रदान की है जो अंतःप्रदेश का एक भाग है तथा जो ध्वनि, गति, रंग, रेखा आदि के माध्यम से व्यक्त होती है।26 ब्रजभूषण पांडेय इसे 'आत्मा की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति' कहते हैं।27 भगवत- शरण उपाध्याय के लिए कला 'लिखने व कोरने, उभारने और ढालने की लाक्षणिक संज्ञा' है।28 भोलानाथ तिवारी29 तथा जयसिंह नीरज30 के लिए कला 'शिवत्व' की उपाधि के लिए सत्य की 'सौंदर्यमयी अभिव्यक्ति' है। मदनगोपाल कला को अमूर्तभावों की मूर्त्त अभिव्यक्ति मानते हुए लिखते हैं कि "हृदय में उत्पन्न हुए अमूर्त्त-भाव किसी बाह्य उपकरण के सहारे मूर्त रूप में प्रकट होने को उत्सुक रहा करते हैं, जिन्हें मनुष्य अधिक समय तक रोक नहीं सकता है। वे अवसर मिलते ही अभिव्यक्ति कर लेते हैं। .·. कलाएं इसी का परिणाम हैं।"31 रामानंद तिवारी 'मनुष्य के द्वारा रूप के अतिशय की रचना' को कला मानते हैं।32 जगदीश गुप्त कला को मनुष्य में निहित सूक्ष्म किंतु अदम्य कृतित्व-शक्ति का ऐसा मुक्त प्रस्फुटन कहते हैं जिसमें मानव व्यक्तित्व को अधिकाधिक पूर्ण, परितुष्ट एव सवेदनशील बनाने के गुण भी विद्यमान रहते हैं।33 रामचंद्र शुक्ल दो या दो से अधिक वस्तुओं के संयोजन को कला मानते हैं। वे लिखते हैं कि संयोजन का कार्य सभी कलाओं में निहित है। काव्य में शब्दों का संयोजन तथा चित्रकला में रूप का संयोजन होता है। संयोजन के बिना कला हो ही नहीं सकती।34 वासुदेव उपाध्याय के अनुसार कला 'कलाकारों के आंतरिक मनोभावों की सच्ची परिचायिका है।35 नीहाररंजन राय के अनुसार 'इच्छा, प्रेरणा या आवेग का ही अभिव्यक्त या ठोस ढंग कला और कलाकृति का व्यापार / 5
Page 20
से बाह्यीकृत रूप' कला है ।36 कांतिचंद्र पांडेय ने मानव की उस क्रिया को कला की संज्ञा प्रदान की है जो संकलन, चिंतन एवं स्पष्ट अभिव्यक्ति आदि गुणों से संपन्न है।37 रामलखन शुक्ल कला की परिभाषा में कोई नये विचारों की वृद्धि नहीं कर सके हैं, अपितु वे कांतिचंद्र पांडेय के विचारों का ही समर्थन करते हैं।38 रमेश कुंतल मेघ यद्यपि यह महसूस करते हैं कि हम विवेचन व्याख्या की इतनी विराट विरासत के बावजूद कला की कोई सर्वांगीण परिभाषा नहीं दे सकते हैं, तथापि वे कला के विषय- विवेचन में नवीनता लाने में सफल रहे हैं। वे कला पर चिंतन करते हुए एक छोटे वेणु गीत से लेकर गोदान जैसे उपन्यास और खजुराहो की विराट मू्त्तियों तक को दृष्टिपथ में रखते हैं। उनके शब्दों में "कला व्यक्तिगत तथा सामाजिक, संवेगात्मक तथा अन्य प्रकार के अतीत या वर्तमान के अनुभवों की अभिव्यंजना तथा संप्रेषण करती है। इनका प्रभाव सुंदर, सुखद, शुभ, रोचक, संवेगोद्दीपक, अनुभावक, मूल्यवान होता है। कला- सृजन और भावन दोनों में ही अभिरुचियों (शिक्षा संस्कार), वैयक्तिक प्रतिभा तथा मौलिक पुनरुत्थान की मौलिक भूमिकाएं होती हैं।"39 इन विद्वानों के अतिरिक्त हिंदी के अन्य कलामनीषियों ने भी कला पर चिंतन किया है, लेकिन वे चिंतक मुख्य रूप से ऊपर दी गयी परिभाषाओं का ही समर्थन करते हैं। अतः उनका उल्लेख करना हमने अनिवार्य नहीं समझा है। इन सभी परिभाषाओं को देखने के उपरांत हम कला की प्रकृति का तो पूरा अंदाजा लगा सकते हैं, लेकिन उसकी कोई सर्वांगीण परिभाषा नहीं दे सकते हैं। सभी कला-मनीषियों की परिभाषाओं में किसी एक बिंदु पर पहुंचकर हमें उनके विचारों में कहीं- न-कहीं समानता अवश्य दृष्टिगोचर होती है। सभी कलाचिंतक यह स्वीकार करते हैं कि कला में यथार्थ अथवा वस्तुजगत के साथ अंतर्जगत के कुछ तत्त्व अवश्य होते हैं। सृष्टि का यह विशाल वैभव कलाकार के अंतर्जगत में प्रविष्ट होकर ही कला रूप में अभिव्यक्त होता है। वह केवल फोटोग्राफी ही नहीं अपितु भीतर से अपनी बुद्धि, कल्पना तथा प्रतिभा सृजित एक नूतन जगत भी है। अर्थात् कला के कक्ष में यथार्थ और कल्पना दोनों का उपयोग है। दोनों मिलकर ही एक सत्य को प्रकट करते हैं। कला की वस्तु, उसके साधन, उसके आधार यथार्थ हैं, उसकी प्रेरक शक्ति कल्पना है। दोनों के एकी- करण से ही कला का जन्म होता है। एक अन्य विशेषता जो हमें इन परिभाषाओं में दिखाई देती है वह यह है कि दी तो सबने कला की परिभाषा है, परंतु वह हो गयी है ललित कला की परिभाषा। यह कमी या अच्छाई निरपवाद रूप से प्रायः सभी परिभाषाओं में दिखाई देती है। प्रायः सभी कलाचितक तथा सौंदर्यतत्त्ववेत्ता इन परिभाषाओं में ललित कला की ओर ही उन्मुख हुए हैं, कला की ओर नहीं। अपने व्यापकतम रूप में कला मानव की कतृ त्व शक्ति का किसी भी मानसिक तथा शारीरिक उपयोगी या आनंददायी या दोनों से युक्त वस्तु के निर्माण के लिए किया गया कौशलयुक्त प्रयोग है। इस रूप में हमारी सामान्य से सामान्य क्रिया भी किसी अंश तक कला की अपेक्षा रखती है तथा उसका क्षेत्र अत्यंत व्यापक हो जाता है जिसमें उसके असंख्य भेद और रूप हो सकते हैं। इसमें बात करना, 6 / सौंदयबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 21
भूठ बोलना, चोरी करना, घर के आगे अल्पना करना, मेजपोश पर बेल-बूटे काढ़ना, थाली में दाल-सब्जी की कटोरियों को करीने से सजाना-से लेकर यूनान में खेले जाने वाले नाटक, मिस्र के पिरामिड या मध्य युग के मंदिर और गिरजाघर बनाने तक की क्रियाएं आ जाती हैं। यह तो रहा इसका व्यापक रूप, लेकिन अपने संकीर्ण या संकुचित दृष्टि से 'कला' शब्द का प्रयोग केवल ललित कला (काव्यकला, संगीतकला, चित्रकला, शिल्पकला, वास्तुकला) के लिए भी होता है। आलोचना, साहित्य या सौंदर्यबोधशास्त्र के प्रसंग में आज 'कला' शब्द का प्रयोग इसी संकुचित अर्थ में हो रहा है। दाशनिकों, कलाचिंतकों तथा सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने कला की परिभाषा देते हुए अपना ध्यान प्रायः इस सीमित अर्थ पर ही केंद्रित रखा है। हिंदी कलामनीषियों की ऊपर दी गयी परिभाषाओं को देखने के उपरांत यह बात पूर्णतः प्रमाणित हो जाती है।
कला : प्रयोजन किसी भी विषय के बारे में यह प्रश्न स्वाभाविक ही नहीं अनिवार्य भी है कि उसकी सार्थकता क्या है ? जीवन की सभी प्रकार की साधनाओं पर चाहे वह आध्यात्मिक साधना हो, चाहे लौकिक, प्रवृत्तिमूलक हो, चाहे निवृत्तिमूलक, चाहे शास्त्र के क्षेत्र की हो, चाहे कला के क्षेत्र की, उसके बारे में यह प्रश्न अवश्य सामने आता है कि उसका उद्देश्य क्या है, उसका फल क्या है ? इसी विधि के अनुरूप कला के संबंध में भी यह प्रश्न प्राचीन काल से उठाया जाता रहा है कि उसकी सार्थकता किसमें है ? परिचित शब्दावली में कहें तो कह सकते हैं कि कला का उद्देश्य अथवा प्रयोजन क्या है ? प्रयोजन का यह सवाल वैसे तो कला के एक पक्ष से संबद्ध प्रतीत होता है लेकिन गहराई से चिंतन करने पर स्पष्ट हो जाता है कि यह प्रश्न वस्तुनः कला विषयक संपूर्ण दृष्टि से संबद्ध है। प्रयोजन के प्रश्न को कला के अन्य पक्षों से काटकर नहीं देखा जा सकता। किसी भी कलाकार की कला-प्रयोजनसंबंधी मान्यता वस्तुतः उसके कला विषयक समग्र दृष्टिकोण पर ही आधारित होती है। कला-प्रयोजन का संबंध रचना- प्रक्रिया से तो है ही लेकिन उसमें कलाकार के व्यक्तित्व का प्रश्न भी अंतर्भूत हो जाता है। कलाकार किस प्रकार किसी रचना की प्रेरणा ग्रहण करता है, उसकी प्रेरणा का आधार बाह्य जगत है या आंतरिक जीवन, यह प्रश्न भी कला के प्रयोजन के प्रश्न से जुड़ जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि कला के प्रयोजन की समस्या कला के समग्र विवेचन से संबद्ध हो जाती है। इस प्रश्न के प्रसंग में हिंदी साहित्य के कलाचितकों ने अनेक प्रकार के उत्तर दिये हैं। परिणामस्वरूप विविध मतों की अवतारणा हुई है। इन मतों को निम्नांकित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है : 1. आनंद की सृष्टि : 'हिंदी साहित्य कोश' में कला का मुख्य प्रयोजन आनंद की सृष्टि माना गया है। यद्यपि वे इसके साथ कला का लक्ष्य मनुष्य को इंद्रियबंधनों एवं देशकाल परिस्थितियों की मर्यादाओं से ऊपर उठाकर कला कल्पना की सहायता से कलाकार की कौतूहलपूर्ति एवं इच्छापूर्ति करना; मनुष्य के मानस-क्षितिज को कला और कलाकृति का व्यापार / 7
Page 22
उदार, व्यापक और उन्नत बनाना तथा सौंदर्य का अनुसंधान और रसानुभूति भी मानते हैं तथापि वे अधिक बल आनद पर ही देते हैं। उनके अनुसार, कला की निर्मिति में कला- कार को एक विशिष्ट आनंद की उपलब्धि होती है और आनंददान ही कला का उद्देश्य है।"40 मानविकी पारिभाषिक कोश में भी इसका मुख्य प्रयोजन आनंद की सृष्टि ही स्पष्ट किया गया है।41 इनके शब्दों में, "यद्यपि व्यावहारिक जीवन में इनका कोई प्रयोजन नहीं, तथापि मानव के आत्मविश्वास में ये नितांत आवश्यक हैं। सभ्यता एवं संस्कृति की तो मानो ये आधार-स्तंभ ही हैं।"42 हरिवंशसिंह शास्त्री भी कला के इसी प्रयोजन का समर्थन करते हैं। कला और अध्यात्म में अभेद स्पष्ट करते हुए वे कला के इस प्रयोजन की ओर इस प्रकार इंगित करते हैं : "अध्यात्मवादी श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन द्वारा जिस निश्चय पर पहुंचता है और जिस सत्य का, बल्कि यों कहिए कि जिस आत्मरूप का, साक्षात्कार प्राप्त करता है, उसी आत्मरूप को कला-विशारद सहजबोध (इंट्रड्शन) द्वारा देखता है। पर दोनों में कुछ भेद भी है। भेद यह है कि अध्यात्म में जो आत्मसाक्षात्कार होता है वह व्यक्तिगत होता है, अध्यात्मवादी अपने अनुभव में औरों को शामिल नहीं कर सकता, वह अकेला ही उसका आनंद लूटता है, पर कलाविद् जिस आत्मरूप का दर्शन करना है और जिस पर्दे में से दर्शन करता है उसे औरों पर भी प्रकट करता है, वह अपने आनंद में दूसरों को भी सांभी बनाता है।"43 सारांश यह है कि यथासंभव सत्य को प्रकट करना और आनंद सृष्टि करना ही कला का लक्ष्य या प्रयोजन है। 2. सामाजिक यथार्थ का अभिव्यक्तिकरण: मनुष्य सामाजिक प्राणी है, सामूहिक हित उसके अपने व्यक्तिगत हितों से निश्चय ही महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। इसी सामाजिक दायित्व को समझते हुए कतिपय-कलाचिंतकों ने कला को समाज का दर्पण माना है। यों भी कला में स्थायित्व और जनपरकता तब आती है जब उसमें जीवन- सत्य अथवा सामाजिक यथार्थ की पूर्ण अभिव्यक्ति हो, बिना इसके कला मानव-जीवन के प्रति अपने दायित्व को पूरा नहीं कर पाती है। इस प्रवृत्ति के प्रतिपादकों एवं समर्थकों में हम संपूर्णानंद, कुमार विमल तथा रामचंद्र शुक्ल आदि का नामोल्लेख कर सकते हैं। संपूर्णानंद कलाकार का समाज के प्रति एक दायित्व देखते हुए स्पष्ट करते हैं कि "कला जीवन से स्वतंत्र सत्ता नहीं रखती। उसकी उपादेयता वहीं तक है जहां तक वह सामाजिक आशाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति करे।"44 इसी का समर्थन करते हुए कुमार विमल लिखते हैं कि "कला व्यक्ति (कलाकार) के लिए उस सामाजिक दायित्व को चुकाने का एक साधन है, जो दायित्व समाज की एक इकाई होने के नाते प्रत्येक व्यक्ति के कंधों पर विन्यस्त है। अतः कला कलाकार के लिए आत्मतोष की प्राप्ति का एक साधन ही नहीं बल्कि सामाजिक दायित्व से मुक्त होने का एक प्रयास भी है।"45 रामचंद्र शुक्ल भी इसी सिद्धांत के प्रतिपादक हैं लेकिन उनका दृष्टिकोण यह है कि "कला कोई ऐसा दर्पण नहीं है जिसमें कि केवल वर्तमान का ही रूप लक्षित हो अपितु उसमें भूत एवं भविष्य भी लक्षित हो। भूत को देखकर हम यह जान सकेंगे कि 8 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 23
पहले हमारा रूप कैसा था, हम किस अवस्था में थे, हमारी प्रगति कहां तक हुई थी। वर्तमान को देखकर हम यह जानते हैं कि हमारा आज का रूप कैसा है, भूत तथा भविष्य का रूप देखकर हम अपने वर्तमान रूप में परिवर्तन करने का प्रयत्न कर सकते हैं। इस प्रकार उनके शब्दों में, "यदि कला दर्पण है तो ऐसा दर्पण है जिसमें हम अपने भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों का दर्शन कर सकते हैं ... कला, भूत, भविष्य तथा वर्तमान तीनों को ध्यान में रखकर ही समाज को प्रेरणा दे सकती है, प्रगतिशील बना सकती है, सुख प्रदान कर सकती है।"46 3. आत्म-प्रदर्शन अथवा आत्माभिव्यक्ति : मनोविज्ञान के प्रादुर्भाव के कारण कतिपय चिंतकों ने कला के इस प्रयोजन पर भी बल दिया है। वे कला का कार्य न तो किसी विषयवस्तु के प्रतिरूप का निर्माण अथवा उस वस्तु की नकल उतारना या चित्रण करना मानते हैं, न आमोद-प्रमोद या मनोरंजन या आजकल की शब्दावली में रसास्वादन की सामग्री प्रस्तुत करना और न ही वे कला का उद्देश्य जनता में ऊंची भाव- नाएं भरना, लोगों के स्तर को ऊंचा उठाना, शिक्षण अथवा उपदेश प्रदान करना अथवा व्यावहारिक जीवन के योग्य बनाने के लिए श्रोताओं व पाठकों के हृदय में उत्तम भावनाएं, संवेग, उद्वेग, विचार, आदर्श, मूल्य आदि का संचार करना ही स्वीकार करते हैं। वे कला को आत्म-प्रदर्शन अथवा आत्माभिव्यक्ति का ही दूसरा नाम मानते हैं।47 आत्मप्रदर्शन अथवा आत्माभिव्यक्ति प्रयोजन को मानने वाले चिंतक यह स्वीकार करते हैं कि कला के माध्यम से ही कलाकार अपनी आंतरिक इच्छाओं को मूर्त रूप प्रदान करते हैं। प्रश्न उठता है कि इस आत्माभिव्यक्ति का मूल क्या है तथा कला- कार के अपने लिए इसकी क्या सार्थकता है और दूसरों के लिए उसका क्या उपयोग है ? जहां तक कलाकार का संबंध है, आत्माभिव्यक्ति की सार्थकता इसके आत्म- परितोष में है, जिसे हम सूजन सुख भी कह सकते हैं। "कलाकार के अंतस् में जो अशांति और विक्षोभ है, संभवतः उस पर विजय प्राप्त करने के लिए वह कला का सृजन करता है।"48 जगदीश गुप्त भी अपने एक लेख में इस बात पर बल देते हैं कि कलाकार मानसिक तनावों से मुक्ति पाने के लिए ही कला का उपयोग करते हैं।49 इससे निष्कर्ष यह निकलता है कि यह आत्माभिव्यक्ति कलाकार को एक सूक्ष्म- तर परिष्कृत आनंद प्रदान करती है। लेकिन फिर प्रश्न उठता है कि इस परिष्कृत आनंद की क्या उपयोगिता है। इसके उत्तर में नगेन्द्र का कथन है कि "इसके द्वारा लेखक के अह का संस्कार होता है, उसकी वृत्तियों में कोमलता, शक्ति, सामंजस्य, सूक्ष्म-ग्राहकता, अनुभूतिक्षमता आदि गुणों का समावेश होता है और उसका व्यक्तित्व समृद्ध होता है।"50 इस प्रकार हम देखते हैं कि हिंदी के कुछ कलाचितक कला का मुख्य प्रयोजन आत्मप्रदर्शन अथवा आत्माभिव्यक्ति स्वीकार करते हैं। वे आत्माभिव्यक्ति को कला- कार की ऐसी स्वस्थ व साधारण मानसिक आवश्यकता मानते हैं जो किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए नहीं की जाती अपितु उससे कलाकार अपनी मानसिक वेदना या तनाव से छुटकारा पाता है। यह अलग बात है कि किसी कलाकार की आत्माभिव्यक्ति के कला और कलाकृति का व्यापार / 9 01
Page 24
फलस्वरूप लोगों को उससे आमोद-प्रमोद अथवा आत्मोत्थान की सामग्री प्राप्त हो जाये। 4. सौंदर्य का प्रत्यक्षीकरण : कला से बाहर प्रकृति, परंपरा या समाज आदि के क्षेत्र में कला की सार्थकता की तलाश करना कतिपय कलाचितकों के अनसार सर्वथा असंगत एवं भ्रमित प्रयास है। वे प्रत्येक कलात्मक कृति में सौंदर्य का निवास मानते हुए, उसकी सफलता सौंदर्य के प्रत्यक्षीकरण में देखते हैं।51 इस मत के समर्थकों की यह धारणा रहती है कि जब कलाकार कला की रचना करता है तो संपूर्ण चेतना सर्जना व्यापार में ही समाहित होती है। वह पूर्णता उसी में लीन रहती है। उसे यह अवकाश ही नहीं होता कि वह लोक-कल्याण या सामाजिक दायित्व को समझे या उससे संबद्ध किसी सिद्धांत को ध्यान में रखकर सर्जना को उसके अनुरूप संयोजित करने का प्रयास करे; उसका तो एकमात्र प्रयोजन सौंदर्य-अनुभूतियों की अभिव्यक्ति करना है। हिंदी में हंसकुमार तिवारी52, वासुदेव उपाध्याय,53 तथा वीणा माथुर54 आदि मनीषियों ने कला के इसी प्रयोजन की ओर इंगित किया है। 5. मनुष्य को सुसंस्कृत बनाना : कला में लोकहित की भावना भी उसका एक आवश्यक अंग है। यहां कुछ कलाचितक कला में सामाजिक यथार्थ, आत्माभिव्यक्ति तथा सौंदर्य की अभिव्यंजना को इसका एक प्रयोजन मानते हैं, वहां कला का संबंध लोकहित की भावना से भी माना जाता है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, हरद्वारीलाल शर्मा तथा नीहाररंजन राय आदि कलामनीषियों ने कला का यही प्रयोजन माना है। लेकिन इस लोकहित से उनका अभिप्राय कला को उपदेशात्मक बनाना नहीं है, अपितु मनुष्य के स्वत्व को सुसंस्कृत बनाना है। सर्वप्रथम हरद्वारीलाल शर्मा ने अपनी पुस्तक 'साहित्य और कला' में कला के इस प्रयोजन की ओर संकेत किया है। "कला मानव- मूल्यों का वह निधान है जो उपयोगशन्य होते हुए भी अपना सहज महत्त्व रखता है। इससे मानवता का विकास और समृद्धि हुई है। वह विकास का मापदंड भी है। न केवल इतना, इसके द्वारा सभ्यता, धर्म और संस्कृति आदि दूसरी मानव-अभिव्यक्तियां भी समृद्ध और परिष्कृत हुई हैं।"55 आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी कला को उन समस्त मानवीय प्रयत्नों का नाम देते हैं जो मनुष्य को सुसंस्कृत बनाते आ रहे हैं। वे कला को मनुष्यत्व की उपज, मनुष्यत्व की उद्बोधक तथा विजय ध्वजा स्वीकार करते हुए लिखते हैं कि "कला उन सारी बातों का जीवंत विवरण है जिसे मनुष्य ने देखा है, सोचा है, यह मनुष्य की उस सुसंस्कृत प्रतिभा से उत्पन्न होती है, जो उसे पशु-सामान्य धरातल से ऊपर उठाकर मनुष्यत्व के महान आसन पर बैठाती है। सच्ची कला वही है जो मनुष्य को केवल लोभ-मोह का गुलाम न रहने दे, केवल उदरपरायण इंद्रियदास न बन जाने दे बल्कि उसे स्वार्थबुद्धि से ऊपर उठाये, पर दुःखकातरता बनाये।"56 नीहाररंजन राय भी कलाओं को मनुष्य के अपने स्वत्व को सुसंस्कृत करने का कारगर साधन मानते हुए आचार्य जी के द्वारा दिये गये मत का ही समर्थन करते हैं। उनके शब्दों में "कला उन साधनों में से एक है जिसके द्वारा मनुष्य अपनी इंद्रियों और संवेदनशक्ति, भावनाओं 10 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 25
और संवेगों को तथा विचारों और सिद्धांतों, तथ्यों और वस्तुओं, घटनाओं और स्थितियों आदि के प्रति अपनी बोध दृष्टि (सरसैप्शंस) और अनुक्रियाओं को संयमित, पवित्र, तीक्ष्ण और परिष्कृत करता है।"57 इस प्रकार हम देखते हैं कि हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं और कलाचितकों ने कला-प्रयोजन पर जो टिप्पणियां की हैं उससे कला-प्रयोजन के विभिन्न मतों की अव- तारणा होती है। कोई इसका मुख्य प्रयोजन सामाजिक यथार्थ को मुखर करना मानता है तो कोई मन के सौंदर्य को कलात्मक रूप प्रदान करना। कोई इसके पीछे अनुकरण की प्रवृत्ति देखता है तो कोई इसे स्वत्व को सुसंस्कृत करने का साधन मानता है। इसी प्रकार कोई जीवनार्थ, कोई प्रचारार्थ, कोई यशार्थ, कोई सेवार्थ, कोई आनंदार्थ और कोई विनोदार्थ के उद्देश्य को लेकर चलता है। इस प्रकार के और भी कई अर्थ हैं। प्राचीन काल से आज तक संसार की सारी कलाकृतियों पर दृष्टि डाली जाये, तो यह स्पष्ट हुए बिना न रहेगा कि इनमें कोई भी ऐसा अर्थ नहीं है, जिसके आधार पर किसी- न-किसी कलाकृति का सृजन न हुआ हो। यद्यपि सभी चिंतक अपने-अपने दृष्टिकोण से कला-प्रयोजन पर बल देते हैं तथापि ये बातें कलाकार के युग, परिस्थितियों तथा उसके व्यक्तित्व आदि पर निर्भर करती हैं।
सौंदय सौंदर्य : व्युत्पत्तिपरक अर्थ 'सौंदर्य' शब्द संस्कृत के सुंदर शब्द की भाववाचक संज्ञा है जो सुंदर शब्द में 'ष्यञ्' प्रत्यय जुड़ने से बना है। विभिन्न कोशों तथा सौंदर्यचितकों ने इस शब्द की व्युत्पत्ति विभिन्न प्रकार से मानी है। वाचस्पत्यम् कोश के अनुसार 'सुंदर' शब्द की व्युत्पत्ति 'उंद' धातु में, 'सु' उपसर्ग तथा 'अरन' प्रत्यय जोड़कर मानी गयी है। (सु + उंद-अरन) और इस रूप में 'सु' अर्थात् सम्यक रूपेण, 'उंद' अर्थात् आर्द्र करना और 'अरन' कृर्तृवाचक प्रत्यय (करना) के आधार पर जो सम्यक रूपेण आर्द्र अथवा द्रवीभूत करे, वही सुंदर कहलाता है।58 हिंदी में नगेन्द्र,59 सूर्य प्रसाद दीक्षित,60 सुरेशचंद्र त्यागी61 तथा रामाश्रय शुक्ल करुणेन्द्र02 आदि सौंदर्यतत्त्ववेत्ता अपनी पुस्तकों में 'उंद' धातु से सुंदर शब्द की व्युत्पत्ति होने का उल्लेख करते हैं। 'संस्कृत-हिंदी कोश' में सुंदर की व्युत्पत्ति सुंद+अर से की गयी है।63 'नंद' धातु से भी सुंदर की व्युत्पत्ति मानी गयी है। इस व्युत्पत्ति के अनुसार सौंदर्य को आनंद- दायक माना जाता है तथा इसी आधार पर 'नंदतिकशास्त्र' को ऐस्थेटिक्स का पर्याय भी माना गया है।64 'शब्दकल्पद्रुम' के अनुसार सुंदर का व्युत्पत्तिपरक अर्थ है-'सुष्ठु उन्नति आर्द्रीकरोतिचित्तमत्ति' अर्थात् जो चित्त को भली प्रकार आर्द्र करता है।65 रामलखन कला और कलाकृति का व्यापार / 11
Page 26
शुक्ल सुंदर शब्द के इसी व्युत्पत्तिपरक अर्थ का समर्थन करते हैं66 लेकिन एस० टी० नरसिंहाचारी अपनी पुस्तक 'सौंदर्य तत्त्व निरूपण' में इस व्युत्पत्तिपरक अर्थ को सौंदर्य की प्रकृति एवं स्वरूप का निर्धारण करने में असमर्थ मानते हैं। वे लिखते हैं कि "यह सौंदर्य के प्रभाव का सामान्य कथन मात्र है। रूप का भी वही धर्म है-मन का आर्द्रीकरण। सौंदर्य और रस के अतिरिक्त और भी अनेक कारणों से मन आर्द्र हो सकता है।"67 फतहसिंह ने 'सुंदर' शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में अपनी विचारोत्तेजक धारणा व्यक्त की है। उनके अनुसार संस्कृत भाषा परिवार के बोलने वालों ने सुखद विभागों के संबंध में आकर अपने मन में जिस अनुभूति को पाया, उसके लिए उन्होंने सुम, उम तथा हुम नाम दिया, जो संभवतः अपने संक्षिप्त रूप में 'सु', 'हु' तथा 'उ' के रूप में भी आर्य भाषाओं में बने रहे, परंतु संस्कृत में उक्त आनंदानुभूति के लिए 'सुम्' शब्द का ही प्रयोग अधिक व्यापक रहा जिसके फलस्वरूप जिस वस्तु के साथ इंद्रिय- सन्निकर्ष होने पर उक्त सुम् नामक आनंदानुभूति होती थी, उसको सुंदर कहा जाता था। अतः अर्थविज्ञान के आधार पर यह कल्पना करना अनुचित न होगा कि संस्कृत भाषाभाषियों के पूर्वजों ने उन्हीं पदार्थों के लिए सुंदर शब्द को प्रयुक्त करना आरंभ किया होगा, जिनके संपर्क से उनके हृदय के 'सुम्' नामक अनुभूति उत्पन्न हुई होगी।68 इसी आधार पर लेखक फतहसिंह ने 'सुम' से 'सुंद', 'सुंद' से 'सुंदर' और 'सुंदर' से सौंदर्य का क्रम विकास निर्दिष्ट किया है। सुंद, सुंदर और सौंदर्य की चर्चा करते हुए वे लिखते हैं, "हमारा मन ही 'सुम्' अनुभूति का दाता होने से सुंद है और जिस वस्तु या विभाव द्वारा आकर्षित होकर मन में अनुभूति विभाजित होती है, उसे सुंदर कह सकते हैं अतः उस वस्तु या विभाव के आकर्षण को ही सुंदर कह सकते हैं।"69 फतहसिंह का यह व्युत्पत्तिपरक अर्थ बहुत कुछ काल्पनिक तथा अनुमानाश्रित ही कहा जा सकता है। रामेश्वरलाल खंडेलवाल के अनुसार 'सुंदर' की एक और व्युत्पत्ति भी संभव है-'सुंदराति इति सुंदरम्, तस्य भावः सौंदर्यम्' सुंद को जो लाता हो वह सुंदर और उसका भाव जहां हो, वह सौंदर्य कहलाता है। 'सुंद' अर्थात् कर्तनी अर्थात् जो कैंची की तरह काटने वाला हो, उसको जो लाता हो, वह 'सुंदर' हुआ। सौंदर्य हृदय पर नेत्र के द्वारा केंची की-सी काट वाला पक्का प्रभाव करता है, यह कौन नहीं जानता।"70 उक्त व्युत्पत्तियों के अतिरिक्त सुंदर शब्द की व्युत्पत्ति 'असून' तथा ऋग्वेद के 'सुनर' शब्द से भी की जाती है। 'असून' शब्द से इसकी व्युत्पत्ति, जो प्राण, जीवन अथवा आनंद को दे, शब्दार्थ के अनुसार निर्दिष्ट की जाती है।71 'सुनर' शब्द से व्युत्पत्ति मानते हुए उसमें भाषावैज्ञानिक आगम प्रक्रिया के आधार पर 'द' शब्द का आगम मानते हैं।72 ये दोनों ही व्युत्पत्तियां भ्रामक एवं निरा- धार हैं अतः 'असून' तथा 'सुनर' शब्द से इसका संबंध जोड़ना उचित नहीं है। सुंदर शब्द की उक्त सभी व्युतत्तियों को देखने के उपरांत यद्यपि हम निश्चित रूप से तो यह नहीं कह सकते हैं कि इसकी व्युत्पत्ति किस शब्द से मानी जानी चाहिए,
12 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 27
तथापि हिंदी के अधिकतर सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने सुंदर शब्द का संबंध 'उंद' धातु से माना है। अतः जो व्युत्पत्तियां इसके आधार पर की जाती हैं, वे ही मान्य हैं। अन्य व्युत्पत्तियों की कल्पना 'सुंदर' शब्द की विभिन्न विशेषताओं के आधार पर ही की जाती है। मूलतः सुंदर शब्द से उनका कोई संबंध नहीं है। सौंदर्य : विभिन्न परिभाषाएं प्रायः यह देखने में आता है कि जो वस्तु जितनी ही निकटवर्ती एवं चिरपरिचित होती है उसकी परिभाषा-निर्धारण की समस्या उतनी ही जटिल एवं दुरूह होती है। सौंदर्य संबंधी परिभाषाओं को देखकर इसी तथ्य की पुष्टि होती है। हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववत्ताओं ने इसकी अनुभूति को जितना सहज और सरल माना है, परिभाषा-निर्धारण में उतनी ही कठिनाई एवं जटिलता महसूस की है।73 यही कारण है कि इसकी परिभाषा एवं स्वरूप के विषय में जितना मत-वैभिन्न्य है उतना कदाचित् अन्य किसी वस्तु के विषय में नहीं है। विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से इसे परिभाषित करने का प्रयास किया है जिससे मतमतांतरों का जाल-सा बिछ गया है। सामान्य अर्थ में सौंदर्य दृष्टि का विषय माना जाता है। इस विशेषण का प्रयोग मूलतः नेत्रसुख प्रदान करने वाले या नेत्र के माध्यम से हृदय को सुख प्रदान करने वाले पदार्थ या प्राणी के लिए है। अन्य इंद्रिय सुखों तथा मन की तल्लीनता या तादात्म्य के अर्थ में इसका विस्तार इसी बिंदु से हुआ है। जैसे कर्णसुख के लिए मधुर या सुंदर ध्वनि, जिह्वासुख के लिए अच्छा या रसपूर्ण स्वाद, त्वचा या स्पर्शसुख के लिए कोमलता तथा घ्राण सुख के लिए भीनी या मधुर गंध। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का निम्नलिखित उद्धरण भी इसी तथ्य को रेखांकित करता है कि नेत्रों द्वारा ग्राह्य रंग- रूप ही मुख्यतः सौंदर्य है- "कुछ रंग-रूप की वस्तुएं ऐसी होती हैं जो हमारे मन में आते ही थोड़ी देर के लिए हमारी सत्ता पर ऐसा अधिकार कर लेती हैं कि उसका ज्ञान ही हवा हो जाता है और हम उन वस्तुओं की भावना के रूप में ही परिणत हो जाते हैं। हमारी अंतः सत्ता की वह तदाकार-परिणति सौंदर्य की अनुभूति है।"74 विभिन्न हिंदी कोशों में सौंदर्य की जो व्याख्याएं मिलती हैं उससे केवल यही स्पष्ट होता है कि इन कोशकारों ने सौंदर्य को व्यापक अर्थ में देखा है। उन्होंने इस शब्द से बाह्य व आभ्यंतर दोनों ही प्रकार के सौंदर्य को समाविष्ट करने वाला अर्थ ग्रहण किया है। हिंदी के सौंदर्य तत्त्ववेत्ताओं ने अपनी सौंदर्यसंबंधी मान्यताएं इस प्रकार दी हैं- "हिंदी के आरंभिक सौंदर्यचितकों में हरिवंशसिंह शास्त्री ने 'स्थूल या सूक्ष्म जगत में आत्मा की अभिव्यक्ति' को सौंदर्य माना है।"75 अवध उपाध्याय ने सौंदर्य को आत्मगत तथा मानसिक अवस्था से मर्यादित मानते हुए लिखा है, "सौदर्य एक मानसिक अवस्था है, जिसमें मनुष्य को आकर्षित करने की शक्ति है और यह शक्ति मानव-हृदय कला और कलाकृति का व्यापार / 13
Page 28
में है।"76 हरद्वारीलाल शर्मा, "अपनी अनुभूति-प्रत्यक्ष, स्मृति, कल्पना आदि द्वारा आनद को उत्पन्न करने वाली वस्तु के गुण को सौंदर्य और वस्तु को सुंदर कहते हैं।77 तारिणी चरणदास 'चिदानंद' के अनुसार, "सौंदर्य वस्तु या माध्यम द्वारा अभिव्यक्ति एक ऐसी चेतना है जो कि अपने केंद्र से बिछुड़ी भूली-भटकी आनंद सत्ता को फिर से केंद्र की ओर खींच लेती है और आकर्षण मिलन तथा आनंद का एक पूर्ण वृत्त आंकती रहती है।"78 रामदत्त भारद्वाज 'सौंदर्य की परिकल्पना' नामक एक लेख में सौंदर्य को परिभाषित करते हुए लिखते हैं, "मेरा निज का विचार है कि सौंदर्य को दिगाकर्षण कहा जा सकता है अर्थात् जो दिगाकाश हमको आकृष्ट करता है वह सुंदर है।"79 आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने सौंदर्य तथा लालित्य में अंतर स्पष्ट करते हुए ईश्वरीय या प्राकृतिक पदार्थो-प्राणियों के नेत्रसुख या नेत्रों के माध्यम से सुख प्रदान करने वाले गुण, धर्म या स्वभाव को सौंदर्य तथा मानवीय कृतियों के उक्त गुण, धर्म या स्वभाव को लालित्य की संज्ञा प्रदान की है।80 एक अन्य स्थल पर वे सौंदर्य को वस्तु की समग्रता का तत्त्व मानते हुए लिखते हैं कि "हम किसी फूल को, लता को, वृक्ष को, मूर्ति को, जब सुंदर कहते हैं, तब हमारे मन में उस वस्तु की समग्रता से उत्पन्न एक आनंदोद्रयक भावना काम करती रहती है। किसी फूल को सुंदर कहने का यह मतलब नहीं है कि उसकी पंखुड़ियां सुंदर हैं, उसका आकार सुंदर है, या उसके विभिन्न अवयव सुंदर हैं, बल्कि उसका यह अर्थ होता है कि वह सब मिलाकर हमारे चित्त में एक प्रकार का आनंदोद्रेक करता है। उस आनंद को प्रकट करने के लिए ही हम उसे सुंदर कहते हैं। साधारणतः किसी वस्तु को सुंदर कहते समय हमारी दृष्टि के सामने उसका संतुलन, आकार, रूप, विकासावस्था, विभिन्न अवयवों के बीच में छूटी हुई जगह, प्रकाश, रंग, गति, खिंचाव और अभिव्यक्ति जैसी चीजें आती हैं। इन्हीं के सामंजस्य संतुलन से दर्शक के चित्त में आह्लाद उत्पन्न होता है।"81 रामविलास शर्मा के मतानुसार, "प्रकृति, मानव जीवन तथा ललित कलाओं के आनंददायक गुण का नाम सौंदर्य है।"82 इनकी इस मान्यता से यह आपत्ति होती है कि कला में तो कुरूप और असुंदर को भी स्थान मिलता है, ऐसी स्थिति में उसे सुंदर कैसे कहा जा सकता है। प्रत्युत्तर में वे लिखते हैं कि, "कला में कुरूप और असुंदर विवादी स्वरों के समान हैं जो राग के रूप को निखारते हैं। वीभत्स का चित्र देखकर हम उससे प्रेम नहीं करने लगते, हम उस कला से प्रेम करते हैं जो हमें वीभत्स से घृणा करना सिखाती है-जिसे हम कुरूप, असुंदर और वीभत्स कहते हैं, कला में उसकी परिणति सौंदर्य में होती है। दुखांत नाटकों में हम दूसरों का दुःख देखकर द्रवित होते हैं-किंतु यह दुःख अमिश्रित और निरपेक्ष नहीं होता। उस दुःख में वह आनंद निहित होता है जो करुणा के प्रसार से हमें प्राप्त होता है।"83 रामविलास शर्मा की तरह रमेशकुंतल मेघ भी पूर्व और पश्चिम के कला- शास्त्र में और कलाशास्त्र के बाहर जो सौंदर्य तात्त्विक चिंतन हुआ है, उससे सक्रिय संवाद के धरातल पर गुजरते हुए, 'अथातो सौंदर्य जिज्ञासा' में सौंदर्य की जो परिभाषा देते हैं, उसमें असौंदर्य का निषेध नहीं मानते हैं। इस दृष्टि से 'अथातो सौंदर्य जिज्ञासा' 14 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 29
की प्रस्तावना का यह अंश उल्लेखनीय है-"आगामी सौंदर्यबोधशास्त्र में सुंदर वह लग सकता है जो 'समाधि' के बजाय 'संघर्ष' की दिशा में परिमार्जित हो, जो 'रति' की बजाय 'बुद्धि' से अभ्युदित हो, जो आनंद से आगे 'आत्मोद्वार' के सामाजिक प्रारब्ध में उत्कर्ष प्राप्त करे।"84 सौंदर्य के विभिन्न पहलुओं की व्याख्या करते हुए लेखक इस बात पर भी बल देते हैं कि सौंदर्य का कोई भी पक्ष सामाजिक आधार से रहित नहीं है। यहां तक कि वे प्राकृतिक सौंदर्य को भी सामाजिक उपज ही मानते हैं। उनके अनुसार सामाजिक संघटन के परिप्रेक्ष्य में ही सौंदर्य की सच्ची पहचान की जा सकती है।85 फतहसिंह की सौंदर्य संबंधी यह मान्यता है कि "साधारणतः जिस वस्तु से मानव के मन में कोई सुखद अनुभूति होती है, उसको वह सुंदर कहता है।86 रामानंद तिवारी ने सौंदर्य को 'रूप का अतिशय' माना है।87 एस० टी० नरसिहाचारी ने भी इसी मत का समर्थन करते हुए लिखा है कि "सौंदर्य रूप की विभूति है जो मानव मन को अपनी ओर आकृष्ट करती है।"88 इन सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं के अतिरिक्त सुरेन्द्रनाथ दासगुप्त,89 लालताप्रसाद सक्सेना90, शिवबालक राय91 तथा लीलाधर गुप्त92 आदि चिंतकों ने अंतःबाह्य दोनों की युगपत् क्रिया के द्वारा सौंदर्य की सृष्टि मानी है। उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट है कि हिंदी में विभिन्न सौंदयचितकों एवं विचारकों ने अपनी-अपनी रुचि एवं दृष्टिकोण विशेष से सौंदर्य का साक्षात्कार किया है। इनमें परस्पर विरोधी विचार तक मिलते हैं। व्यक्तिनिष्ठ-वस्तुनिष्ठ, प्राकृतिक-मानवीय, भौतिक-आध्यात्मिक, नीति सापेक्ष-नीति निरपेक्ष, सप्रयोजन- निष्प्रयोजन, वैयक्तिक परिप्रक्ष्य, सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देश काल सापेक्ष- निरपेक्ष तथा न जाने और भी कितनी अज्ञात दृष्टियों से इस पर चिंतन हुआ है। लेकिन ये सभी चिंतक केवल सौंदर्य के विभिन्न पहलुओं को ही व्याख्यायित करने में सफल हुए हैं। इसकी परिभाषाओं और सूक्तियों से कोई भी सौंदर्य के समग्र रूप की व्यंजना नहीं कर पाती है। वस्तुतः सौंदर्य अपने-आप में इतना व्यापक है कि उसके समस्त तत्त्वों एवं स्वरूप की ओर स्पष्ट संकेत करने वाली परिभाषा की कल्पना यदि असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। अतः विभिन्न सूक्तियां तथा परिभाषाओं के प्रकाश में ही हम सौंदर्य के स्वरूप को समझने की चेष्टा कर सकते हैं।
सौंदर्य का स्वरूप अपनी इंद्रियों के माध्यम से हम अपने से बाहर जो कुछ भी देखते हैं वह वस्तुजगत है, और अपने मन के अंदर जो कुछ सोचते, अनुभव करते तथा इच्छा करते हैं, वह भाव जगत है। यानी मन विषयी है तथा वस्तु विषय। पहला भीतर है और दूसरा बाहर है। इस प्रकार विषयी और विषय, भाव और वस्तु, भीतर और बाहर ये दो जगत हैं। प्रश्न उठता है कि सौंदर्य की स्थिति कहां है ? वह बाह्य पदार्थ का गुण धर्म है या एक मानसिक भावना अथवा इन दोनों का एक मिश्रित परिणाम। आचार्य कला और कलाकृति का व्यापार / 15
Page 30
रामचंद्र शुक्ल तो इस प्रकार की चर्चा को 'भाषा के गड़बड़भाले के सिवा और कुछ नहीं' समभते हैं।93 जबकि अन्य सौंदर्यचितक इस पर तीनों ही दृष्टिकोणों से विचार करते हैं। सौंदर्य पर विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गयी उक्त परिभाषाओं का अवलोकन करने के उपरांत यह स्पष्ट हो जाता है कि हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने सभी दृष्टियों से इस पर चिंतन किया है। कतिपय सौंदर्यचितक वस्तु के बाह्यरूपाकार में इसका अस्तित्व मानते हैं तो कुछ व्यक्ति या मन, उसकी स्थिति देखते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ चिंतक मध्यमार्ग के अनुयायी हैं। ये विचारक बाहर-भीतर के भमेले को छोड़कर बाहरी पदार्थ और भीतरी भावना के एक विशिष्ट संबंध या क्रिया-प्रतिक्रिया में ही सौंदर्य की सत्ता का साक्षात्कार करते हैं। इनके अनुसार सौंदर्यानुभूति के लिए वस्तु का रूप एवं मानसिक आकर्षण दोनों ही आवश्यक हैं। इस प्रकार सौंदर्यचितकों के तीन प्रमुख वर्ग बन जाते हैं : 1. वस्तुगत या विषयगत दृष्टिकोण, जिसमें विभाव या वस्तु की दृष्टि से सौंदर्य पर विचार किया जाता है। 2. आत्मगत या विषयीगत दृष्टिकोण, जिसमें व्यक्ति या भाव को दृष्टि में रखकर विचार किया जाता है। 3. समन्वयवादी अपना उभयपक्षी दृष्टिकोण, जिसमें वस्तु और व्यक्ति दोनों को ही प्रधानता दी जाती है। 1. वस्तुगत सौंदर्य दृष्टि : सौंदर्य के प्रति वस्तुगत अथवा विषयीगत दृष्टि रखने वाले चिंतकों ने सौंदर्य को बाह्य पदार्थों में देखा है तथा अपने विचारों के अनुकूल ही सौंदर्यविधान के लिए बाह्य बातों को प्रधानता दी है। आत्मसत्ता में विश्वास न रखते हुए ये सौंदर्यचितक सौंदर्य को इंद्रियों को सुख देने वाले गुणों अथवा रूप से समाहित मानते हैं। पंचेंद्रियों को सुखद लगने वाले उपकरण ही इनके सौंदर्य के माप हैं। वस्तु की सुडौलता, संमात्रा, आकार, रूप, व्यवस्थित क्रम, एकान्विति, स्पष्टता, मसूणता, स्निग्धता, वर्णदीप्ति, सुकुमारता, कोमलता, सामंजस्य, संतुलन, संश्लिष्टता, समन्वय, अनुपात, माधुर्य, उदात्तता आदि गुणों के आधार पर ये वस्तुवादी विचारक सौंदर्य का निर्णय करते हैं। हिंदी में रामविलास शर्मा इस मत के प्रबल समर्थक हैं। व्यक्ति के मन में सौंदर्य की सत्ता स्वीकार करने वाले कुछ चिंतक यह तर्क देते हैं कि एक ही वस्तु भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को सुंदर अथवा असुंदर लगती है। सौंदर्य की धारणा में जो परिवर्तन होता है उसकी व्याख्या क्या हो सकती है, यदि वस्तु के रूप और गुण तथावत् रहते हों। जो वस्तु कुछ लोगों को असुंदर प्रतीत होती है, वह दूसरों को कैसे सुंदर लगती है। हमें अपने देश के पहाड़ बहुत सुंदर लगते हैं, दूसरों के लिए वे साधारण पर्वत मात्र हैं। मां को अपना बच्चा बहुत सुंदर लगता है, दूसरों के लिए वह अन्य साधारण बच्चों जैसा ही है। सौंदर्य की अनुभूति इतनी व्यक्तिगत है कि शेक्सपियर या तुलसीदास को पढ़ने वाले दो व्यक्तियों की प्रतिक्रिया एक-सी नहीं हो सकती है। 16 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 31
रामविलास शर्मा इन तर्कों को दोषयुक्त मानते हैं। उनके अनुसार इनमें पहला दोष यह है कि ये चिंतक इंद्रियबोध और भावों को एक ही वस्तु मान लेते हैं तथा दूसरा दोष यह है कि भावों और इंद्रियबोध की व्यापकता को अस्त्रीकार किया गया है। "यदि हमें अपने ही देश के पर्वत अच्छे लगें तो दूसरे देशों के पर्वतों को हम कभी भी सुंदर न कहें। यदि किसी को ऐल्पस और हिमालय दोनों सुंदर लगते हैं, तो इससे यही सिद्ध होगा कि व्यक्तिगत संबंधों के अतिरिक्त भी सौंदर्यानुभूति की कोई सामान्य भूमि है।"91 रामविलास शर्मा यह पूर्णतः सिद्ध करते है कि सौंदर्य की वस्तु- गत सत्ता होती है, इसलिए शुद्ध सौंदर्य नाम की कोई चीज नहीं होती। .. सौंदर्य की इस वस्तुगत सत्ता, सामाजिक विकास से उसके सापेक्ष संबंध, कला और साहित्य के रूपों के अनुसार उनकी विषयवस्तु की विविधता को ध्यान में रखकर ही हम सौंदर्य- शास्त्र का सही विवेचन कर सकते हैं और सौंदर्यसंबंधी अनेक समस्याओं का उचित समाधान प्राप्त कर सकते हैं।"95 रामानंद तिवारी भी कुछ सीमा तक सौंदर्य की वस्तुगत सत्ता का समर्थन करते हैं। वे भी यह मानते हैं कि जगत की अनेक वस्तुएं जिनमें प्राकृतिक वस्तुओं की प्रधानता है, अनादि काल से सुंदर मानी जाती रही हैं। सभी उनमें सौंदर्य का दर्शन करते हैं। आकाश, सूर्य, चंद्र, बादल, निर्भर, उषा, संध्या, इंद्रधनुष, पशु-पक्षी, फल-फूल आदि में व्यक्ति सदा से ही सौंदर्य देखता आया है। इनकी सुंदग्ता के विषय में मत- भेद नहीं है। इनका सौंदर्य स्वीकृत सौंदर्य है। अतः यह व्यक्ति की भावना पर निर्भर नहीं करता है। यहां तक कि दुःख में भी इन वस्तुओं के सौंदर्य का अक्षुण्ण बना रहना सौंदर्य की वस्तुगत और स्वतंत्र सत्ता का समर्थ प्रमाण है।96 वस्तुगत दृष्टि का समर्थन करते हुए वे यह भी मानते हैं कि सौंदर्य के प्रति आत्मगत दृष्टिकोण में समुचित संगति नहीं है, क्योंकि यह दृष्टिकोण बाह्य विषयों, व्यक्तियों, माध्यमों तथा कला की बाह्य अभिव्यक्तियों के महत्त्व को नकारता है। वे यह तर्क देते हैं कि यदि केवल आंतरिक अनुभूति में ही कला का सौंदर्य पूर्ण है तो असंख्य कलाकार बाह्य माध्यम के द्वारा उसे रूप देने का प्रयत्न क्यों करते हैं ? तथा क्यों हम अपनी सौंदर्यानुभूति को दूसरों तक बांटने के लिए उत्सुक रहते हैं।97 सौंदर्य की वस्तुगत सत्ता का समर्थन हिंदी के लीलाधर गुप्त98 तथा लालता- प्रसाद सक्सेना भी करते हैं। अपनी पुस्तक 'मंभन का सौंदर्य दर्शन' में लालता प्रसाद सक्सेना लिखते हैं, "सौंदर्य के निर्धारक मन का महत्त्व होते हुए भी सौंदर्य की सत्ता प्रमुखता वस्तुगत ही है, उसका अस्तित्व प्रमुख रूप से वस्तु-जगत के गुण-धर्मों में ही है। आंतरिक सौंदर्य भी मानव-भावों, विचारों, आदर्शों एवं व्यापारों का सौंदर्य होने के कारण वस्तुगत ही माना जायेगा। चेतना की स्फूर्ति अथवा प्राणी के अंतःकरण की सात्त्विक प्रक्रिया भी सौंदर्य की वस्तुगत सत्ता के ही परिचायक हैं।99 इस प्रकार इस विचारधारा के समर्थक इस कथन को कि सौंदर्य मन के भीतर की वस्तु है, बाहर की नहीं, निराधार मानते हैं। इनके अनुसार सौंदर्य पूर्णतः वस्तु की ही चीज है तथा वस्तु से पृथक् उसका कोई अस्तित्व नहीं है।
कला और कलाकृति का व्यापार / 17
Page 32
- आत्मगत सौंदर्य दृष्टि : वस्तुगत सौंदर्य दृष्टि के उक्त महत्त्व के होते हुए भी हम यह नहीं कह सकते कि किसी वस्तु विशेष का सौंदर्य संसार के सभी व्यक्तियों को समान रूप से ही प्रभावित करता है। सौंदर्य यदि केवल वस्तु की ही विशेषता है, उसके गुण-धर्मों की देन है तो यह जिज्ञासा स्वाभाविक पैदा होती है कि एक ही वस्तु, व्यक्ति अथवा दृश्य के विषय में मत-वैभिन्न्य क्यों होता है? क्यों संसार के कुछ व्यक्ति उग्र, कराल एवं भयंकर प्रतिरूपों में भी सौंदर्य का साक्षात्कार करते हैं, जबकि दूसरों की दृष्टि में उनमें कोई सौंदर्य नहीं होता है। यही नहीं, एक ही व्यक्ति को एक ही वस्तु विभिन्न परिस्थितियों में समान रूप से प्रभावित क्यों नहीं करती ? सौंदर्य के प्रति विषयीगत अथवा आत्मगत दृष्टि रखने वाले विद्वान इस पर गहराई से चिंतन करते हैं तथा इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि सौंदर्य व्यक्ति की अपनी निजी अनुभूति है। बाह्य जगत से उसका कोई भी संबंध नहीं है। उनके विचार से वस्तु के तथाकथित सभी गुण-आकार-प्रकार, रंग, दीप्ति आदि वास्तव में भौतिक पदार्थ न होकर प्रतीतियां मात्र हैं। जड़ पदार्थ का अपना कोई रूप-गुण नहीं है, ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से प्रमाता की चेतना के सन्निकर्ष से ही उसमें रूप और गुण का आविर्भाव होता है। अर्थात् उसकी प्रतीतियां ही उसके रूप और गुण कहलाती हैं। वे यह पूर्णतः स्वीकार करते हैं कि हमारी इच्छा तथा रागात्मक प्रवृत्ति ही वस्तु में सौंदर्य का संचार करती हैं अर्थात् सौंदर्य की सत्ता वस्तुगत न होकर पूर्णतः आत्मगत या विषयीगत है। हिंदी के लगभग सभी सौंदर्यतत्त्ववेत्ता, सौंदर्य के स्वरूप का स्पष्टीकरण करते हुए, सौंदर्य के प्रति आत्मगत दृष्टिकोण रखने वाले पाश्चात्य एवं संस्कृत मनीषियों के मतों को तो अवश्य उद्धत करते हैं, लेकिन स्वयं वे इस संबंध में कोई मौलिक चिंतन नहीं करते हैं और न ही इस दृष्टिकोण से सहमति ही प्रकट करते हैं। वास्तव में हिंदी के सभी सौंदर्यचिंतक सौंदर्य के प्रति समन्वयात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। उन्होंने सौंदर्य के वस्तुगत एवं आत्मगत दोनों ही स्वरूपों को दृष्टि में रखते हुए अपने विचार प्रस्तुत किये हैं। 3. समन्वयात्मक सौंदर्य दृष्टि: उक्त दोनों ही विचारधाराओं को अतिवादी मानकर सौंदर्य-चिंतन की एक नवीन विचारधारा का आविर्भाव होता है, जिसे हम समन्वयात्मक विचारधारा कह सकते हैं। इस विचारधारा के अनुसार सौंदर्य की वस्तुगत और आत्मगत दोनों ही धारणाएं एकांगी हैं। एक सौंदर्य को वस्तुओं का गुण मानकर उसके सृजन में चेतना की सक्रियता और सृजनात्मकता के मूल्य का तिरस्कार करती है। दूसरी सौंदर्य को पूर्णतः आत्मगत मानकर उसके वस्तुगत और स्वतंत्र स्वरूप की उपेक्षा करती है। दोनों ही वर्गों के विचारकों के सिद्धांत अतिवाद से आक्रांत हैं। न तो केवल रूप अथवा वस्तु ही सुंदर हो सकती है, क्योंकि उसके प्रति मन में आकर्षण एवं आनंददायक अथवा सुखात्मक भावना का होना आवश्यक है और न ही केवल मानसिक रूपों को ही सुंदर कहा जा सकता है। रूप के प्रत्यक्षीकरण के लिए बाह्य अभिव्यकति न हो तो उसके सौंदर्य की प्रतीति नहीं हो सकती। अतः सौंदर्य के
18 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 33
लिए एक और तो ऐसे रमणीय पदार्थ का होना आवश्यक है जो सामान्य रूप से सभी को आकर्षित करे और दूसरी ओर सौंदर्य के द्रष्टा की भी आवश्यकता होती है। संसार के किसी भी सौंदर्यपूर्ण पदार्थ में उस समय तक सौंदर्य का कोई मूल्य नहीं जब तक उसका द्रष्टा न हो। उदाहरण के लिए जंगल में खिला हुआ कोई फूल किसी द्वारा न देखे जाने के कारण किसी के हृदय में सौंदर्यानुभूति नहीं पैदा करता, जबकि एक असुंदर पदार्थ द्रष्टा की रुचि के अनुकूल होने के कारण उसे आनंदविभोर कर देता है। अतएव बिना दोनों का संयोग हुए सौंदर्य की सार्थकता सिद्ध नहीं होती। इसी तथ्य को देखते हुए हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने वस्तुगत एवं आत्मगत इन दोनों ही अतिवादों की जटिल प्रक्रिया से ऊपर उठकर सौंदर्य की सत्ता वस्तु और व्यक्ति दोनों से संबंधित मानी है। उनकी पुस्तकों से लिये गये निम्नलिखित उद्धरण इस तथ्य को पूर्णतः प्रमाणित करते हैं : (क) "जिस प्रकार जल पृथ्वी के हृदय से भी भरता है और आकाश के बादलों से भी, जिनसे मिलकर स्रोतस्विनी का जन्म होता है, उसी प्रकार सुंदर वस्तु और रसिक की आत्मा दोनों से ही रसानुभूति का उदय होता है।"100 -हरद्वारीलाल शर्मा (ख) "दोनों प्रकार का एकांगीपन एक मूल तथ्य का तिरस्कार करता है। यह सर्वविदित है कि सौंदर्यानुभूति के व्यापार में प्रमाता एवं विभाव दोनों का कुछ-न-कुछ हाथ है, उक्त एकांगीपन इसको भूल जाता है और वह यह भी भूल जाता है कि मनुष्य न तो केवल 'तन' ही है और न केवल मन ही, वह 'तन' और 'मन' दोनों का संघात है।"101 (ग) "केवल वस्तुतत्त्व होने मात्र से वस्तु सुंदर नहीं होती उसमें भाव तत्त्व -फतहसिंह
का योग होना आवश्यक है।"102 -सुरेन्द्र बारलिंगे (घ) "मेरा तो ऐसा विश्वास है कि सौंदर्य युगपत् विषयगत एवं विषयीगत दोनों ही है।"103 -रामदत्त भारद्वाज (च) "सौंदर्य वह गुण है जो वस्तु और व्यक्ति के बाह्य और अंतर के सामंजस्य से उत्पन्न होता है।"104 -शिवबालक राय (छ) "सौंदर्य न तो पूर्णतः प्रमाता की चेतना में रहता है और न पदार्थ में। उसकी सत्ता वस्तुतः दोनों के संवाद में है।"105 -नगेन्द्र (ज) "सौंदर्य आंशिक रूप से वस्तु में होता है और आंशिक रूप में द्रष्टा के मस्तिष्क में और दोनों का परस्पर सामंजस्य ही व्यक्ति को सौंदर्य की अनुभूति कराता है।"106 -राजेन्द्र वाजपेयी (भ) "वस्तु और भाव दोनों से संबंधित और समन्वित रूप को ही सौंदर्य की व्याख्या में रखना संगत होगा।"107 -सुरेशचंद्र त्यागी (ट) "इसे निर्विवाद मान लेना चाहिए कि सौंदर्यबोध का संबंध अंशतः ऐंद्रिय प्रत्यक्ष से अवश्य है; साथ ही, सौंदर्य के ग्रहण में अंतःकरण का योग अपेक्षित है।"108 - कुमार विमल (ठ) "रूप के बहिर्मुखी और अंतर्मुखी पहलुओं में औचित्यपूर्ण संतुलन आवश्यक कला और कलाकृति का व्यापार / 19
Page 34
है अन्यथा इंद्रियों और मन में किसी एक पर ही प्रभाव पड़ता है। सौंदर्यानुभूति की प्रक्रिया में दोनों की सामंजस्यपूर्ण क्रियाशीलता होती है और होनी चाहिए।"109 -एस० टी० नरसिंहाचारी (ड) "अब इसके लिए यह लाजिमी हो जाता है कि हम 'वस्तुगत' तथा 'आत्म- गत' की अधिक गहरी छान-बीन करें और अंत में इन दोनों की संघटना से सौंदर्य की पूर्णता का आभास दें।"110 -रमेशकुंतल मेध (ढ) "सौंदर्य एक ऐसा सापेक्ष भाव है जो वस्तु और व्यक्ति मानस के बीन सूत्र रूप में रहता है।"111 -बैजनाथ सिहल
सौंदर्यबोधशास्त्र
सौंदर्यबोधशास्त्र: नामकरण की उपयुक्तता का प्रश्न सौंदर्यबोधशास्त्र (Aesthetics) भारतीय बाङ्मय के लिए एक नया शब्द है। वर्तमान युग से पूर्व भारतीय वाङ्मय में न तो इस शब्द का प्रयोग मिलता है और न इस नाम के किसी शास्त्र का उल्लेख ही। हिंदी तथा कुछ अन्य भारतीय भाषाओं में इस शब्द का निर्माण 'ऐस्थेटिक्स' (Aesthetics) के पर्याय रूप में किया गया है। 'ऐस्थेटिक्स' के जन्मदाता जर्मन निवासी अलेक्सांडर गॉट्लिएब बामगार्टन (Alexander Gottlieb Baumgarten, 1714-1762) माने जाते हैं। सन् 1735 में जबकि उनकी आयु केवल 21 वर्ष की थी, डॉ० की उपाधि प्राप्त करने पर उन्होंने अपना शोधप्रबंध "(Meditationes Philosopicae de nomullis ad poema Pertinentibus) प्रकाशित करवाया, जिसमें 'ऐस्थेटिक' (Aesthetic) शब्द का पहली बार प्रयोग हुआ था। सन् 1749 में उन्होंने इस विषय पर अनेक व्याख्यान दिये। तदनंतर उन्होंने सन् 1750 में 'ऐस्थेटिका' (Aesthetica) शीषक से एक ग्रंथ लिखा, जिसमें उसे स्वतंत्र कलाओं का सिद्धांत, ऐंद्रियबोध का विज्ञान प्रतिपादित किया। बाडमगार्टन ने एक शास्त्र के रूप में 'ऐस्थेटिक' को 'सिद्धांत' तथा 'विज्ञान' ही नहीं अपितु 'दर्शन' भी माना है।112 हिंदी में 'ऐस्थेटिक' के पर्याय 'सौंदर्यशास्त्र' का प्रथम प्रयोग करने का श्रेय सुरेशचंद्र त्यागी ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल को दिया है।113 लेकिन इससे भी पूर्व इस। शब्द का प्रयोग फरवरी, 1924 की 'माधुरी' पत्रिका में प्रोफेसर 'वाण' ने किया था। इस पत्रिका में उनका 'सौंदर्यशास्त्र' शीर्षक से लिखा गया लेख इस विषय का पहला हिंदी लेख माना जा सकता है।114 इस विषय पर पहली पुस्तक सन् 1936 में हरिवंशसिंह शास्त्री ने 'सौंदर्यविज्ञान' शीर्षक से लिखी।115 इस प्रकार हिंदी में 'सौंदर्यशास्त्र' शब्द का प्रथम प्रयोग तथा उस पर प्रथम लेख लिखने का श्रेय प्रोफेसर 'वाण' को तथा प्रथम पुस्तक लिखने का श्रेय हरिवंशसिंह शास्त्री को जाता है। आज हिंदी में 'ऐस्थेटिक्स' के पर्याय रूप में 'सौंदर्यशास्त्र' शब्द प्रचलित हो
20 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 35
गया है। हरद्वारीलाल शर्मा, रामविलास शर्मा, रामानंद तिवारी, फतहसिंह, कुमार विमल, नगेन्द्र, निर्मला जैन, एस० टी० नरससिहाचारी, सुरेशचंद्र त्यागी, सूर्यप्रसाद दीक्षित तथा रामलखन शुक्ल आदि सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने इसी शब्द को मान्यता दी है। परंतु कुछ चिंतकों ने इस शब्द को 'ऐस्थेटिक्स' का समानार्थक न मानते हुए अन्य शब्दों का प्रयोग भी किया है। हरिवंशसिंह शास्त्री ने 'सौंदर्यविज्ञान'116 प्रवास जीवन चौधरी ने 'सौंदर्यदर्शन'117, राजेन्द्र वाजपेयी 'सौंदर्य'118, सुरेन्द्रनाथ दासगुप्त ने 'वीक्षा शास्त्र'119, दि० के० बेडेकर ने 'कला स्वरूप शास्त्र'120, कांतिचंद्र पांडेय ने 'स्वतंत्र कलाशास्त्र'121, हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा परेश ने 'लालित्य शास्त्र'122, गणपतिचंद्र गुप्त ने 'रस शास्त्र'123, जगदीश शर्मा ने 'नंदतिक शास्त्र'124, शिवकरण सिंह ने 'लालित्य बोध'125 तथा 'लालित्यबांधीय'126, शिवबालक राय तथा नंद दुलारे वाजपेयी ने 'कला दर्शन'127, ब्रजगोपाल तिवारी ने 'कला विज्ञान'128, रामचंद्र शुक्ल ने 'कलाशास्त्र'129, लीलाधर गुप्त ने 'कलामीमांसा'130 तथा रमेशकुंतल मेघ ने 'सौंदर्य बोधशास्त्र'131 शब्द का प्रयोग करना उचित समझा है। इन संज्ञाओं या पर्यायों के अतिरिक्त 'संवेदन शास्त्र'132 'नंदन शास्त्र'133 'आस्वादशास्त्र'134 आस्वादगुण'135 आस्वाद मूल्य व आस्वाद तत्त्व जैसे शब्दों का प्रयोग भी 'ऐस्थेटिक्स' के समानार्थक किया गया है। ये सभी शब्द वस्तुतः 'ऐस्थेटिक्स' के भिन्न-भिन्न पक्षों या अंगों के सूचक तो हैं, किंतु इनमें से कोई भी अकेला शब्द ऐसा नहीं है जो ऐस्थेटिक्स' के विभिन्न अर्थों को सर्वांगीण रूप में प्रस्तुत करता हो। इसलिए प्रत्येक शब्द एकपक्षीय होने के साथ- साथ भ्रामक भी है। 'सौंदर्य' तथा 'सौंदर्यशास्त्र' से यह ध्वनित होता है कि इससे संबंधित शास्त्र के अंतर्गत सभी प्रकार के (प्राकृतिक और मानवीय सौंदर्य का भी) सौंदर्य का विवेचन होता है, जिससे कलागत सौंदर्य गौण हो जाता है जबकि वस्तुतः ऐसा नहीं है। प्राकृतिक तथा मानवीय सौंदर्य का विवेचन करना ऐस्थेटिक्स का कार्य नहीं है। उसके क्षेत्र में तो केवल कलागत सौंदर्य ही आता है। हीगेल अपनी पुस्तक 'दि फिलासफी ऑफ फाईन आरट्स' में लिखते हैं कि "यह एक ऐसा विषय है जिसके अंतर्गत सौंदर्य का सपूर्ण क्षेत्र आ जाता है और स्पष्ट रूप से कहें तो इसका क्षेत्र कला का या कहना चाहिए कि ललित कला का क्षेत्र है।"136 ऐसा ही विचार इंसाइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटेनिका में भी है।137 कतिपय भारतीय सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने भी इस शास्त्र का संबंध कलाओं के माध्यम से अभिव्यक्त सौंदर्य से सिद्ध करते हुए उक्त तथ्य का समर्थन किया है तथा 'सौंदर्यशास्त्र' नाम को अपर्याप्त और संदिग्ध मानकर उसके बदले में 'कला-विज्ञान'138 'कला स्वरूप शास्त्र'139, 'कलाशास्त्र'140, 'कला दर्शन'141 तथा 'कलामीमांसा'142 आदि सीधे-सादे तथा अर्थवाही नामों को घोषित किया है। परंतु इन शब्दों से भी यह भ्रांति होती है कि तत्संबंधी शास्त्र में सभी प्रकार की कलाओं का विवेचन होता होगा जबकि इसका संबंध केवल ललित कलाओं से ही
कला और कलाकृति का व्यापार / 21
Page 36
है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का 'लालित्य-मीमांसा', 'शिवकरण सिंह का 'लालित्य बोध और 'लालित्य बोधीय' तथा कृष्णकुमार शर्मा148 द्वारा हिंदी में 'ऐस्थेटिक' के लिए प्रयुक्त 'ललित' शब्द इसी तथ्य के द्योतक हैं। लेकिन इससे ऐसा प्रतीत होता है मानी इस शास्त्र में केवल लालित्य या कला सौंदर्य की ही मीमांसा होती होगी जबकि ऐस्थेटिक का क्षेत्र इतना व्यापक है कि उसमें न केवल कलाओं के सौंदर्य की ही अपितु उनकी सृजन प्रक्रिया से लेकर आस्वादन-प्रत्रिया तक के विभिन्न क्रियाव्यापारों एवं तत्संबंधी तत्वों की भी व्याख्या होती है। अतः ये शब्द भी इतने व्यापक नहीं हैं कि इनसे ऐस्थेटिक्स के पूर्ण विस्तार का बोध हो सके। रामाश्रय शुक्ल करुणेन्द्र ने भी ऐस्थेटिक्स के इन हिंदी पर्यायों को दो कारणों से अस्वीकार किया है। "पहले तो लालित्य शब्द में निहित धातु आस्वादन करने के अर्थ में प्रचलित नहीं है, दूसरे, आज की कला समीक्षा से उपेक्षित 'फाईन' (फाईन आर्ट) शब्द का अविकल अनुवाद होने के नाते यह हमारे प्रयोजन का नहीं।"144 पुनः स्वतंत्र 'कला शास्त्र' नाम पर भी यह आपत्ति उठायी जाती है कि पहले तो यह नाम 'ऐस्थेटिक्स' का उचित अनुवाद या पर्याय ही नहीं है, दूसरे यह नाम इस नथ्य को स्पष्ट करता है कि यह शास्त्र किसी अन्य दर्शन या विज्ञान के अधीन नहीं है अपितु स्वतंत्र रूप से प्रतिष्ठित शास्त्र है। बामगार्टन ने भी इसी धारणा के आधार पर 'दर्शन' से अलग स्वतंत्र रूप में 'ऐस्थेटिक्स' की स्थापना की थी, पर भारतीय साहित्य में बहुत पहले से ही कलाओं की विवेचना दर्शनशास्त्र से पृथक् रूप में होती रही है तथा 'स्वतंत्र' विशेषण का प्रयोग किये बिना ही 'कलाशास्त्र' अपनी पृथक्ता एवं स्वतंत्रता की घोषणा करने के लिए पर्याप्त है। अतः हमारे विचार में यह नामकरण भी उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। एक और शब्द जिसका प्रयोग स्फुट रूप में देखने में आता है और जिसके बारे में जगदीश शर्मा का कथन है कि यह अन्य संज्ञाओं की तुलना में 'ऐस्थेटिक्स' के भाव की कहीं अधिक रक्षा करता है।145 यह शब्द है 'नंदतिकशास्त्र', जिसका आधार कलाओं की आनंदमयता है। 'नंदति' में 'क' प्रत्यय जोड़कर यह शब्द बनाया गया है जो आनंद प्रदान करे (नंदति), वह नंदतिक (आनंद प्रदान करने वाला) है। इस शब्द के बारे में यही कहा जा सकता है कि कलाओं की आनंदरूपता विवादास्पद है और इसलिए इस विषय के लिए कोई भी आनंदमूलक संज्ञा विवादास्पद ही बनी रहेगी। तदनंतर 'वीक्षाशास्त्र', 'संवेदनशास्त्र', 'नंदनशास्त्र', 'आस्वादशास्त्र', 'आस्वादगुण', 'आस्वादमूल्य', 'आस्वादतत्त्व' आदि शब्दों को इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि वह प्रचलन में नहीं हैं। इन संज्ञाओं या पर्यायों के अतिरिक्त हिंदी में 'ऐस्थेटिक्स' के लिए 'सौंदर्यविज्ञान', 'सौंदर्यदर्शन' तथा 'रसशास्त्र' आदि शब्दों का भी प्रयोग हुआ है, लेकिन यह शब्द भी एकपक्षीय तथा भ्रामक होने के कारण विभिन्न विद्वानों द्वारा खंडित हुए हैं। ऐसी स्थिति में यह विचारणीय है कि क्या हिंदी में कोई एक ऐसा शब्द नहीं है जो 'ऐस्थेटिक्स' के विभिन्न अर्थों को समन्वित रूप में प्रस्तुत करने में समर्थ हो। वैसे तो 'सौंदर्यशास्त्र' शब्द ही हिंदी में इतना प्रचलित हो चुका है कि उसे त्यागकर 22 / सौंद्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 37
कोई नया शब्द अपनाना अव्यावहारिक-सा प्रतीत होता है, लेकिन फिर भी हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता रमेश कुंतल मेघ द्वारा 'सौंदर्यशास्त्र' नामकरण में किया गया थोड़ा-सा संशोधन सौंदर्यबोघशास्त्र अधिक उपयुक्त लगता है। जैसा कि यह स्पष्ट है कि ललित कलाओं की सृजन-प्रक्रिया से लेकर आस्वादन-प्रक्रिया तक के विभिन्न क्रिया-व्यापारों का अध्ययन 'ऐस्थेटिक्स' के अंतर्गत होता है और इस रूप में वह केवल कला के सौंदर्य का ही अनुशीलन करता है। लेकिन प्रश्न पैदा होता है कि यह शास्त्र यदि केवल कला जगत के ही सौंदर्य का विश्लेषण करता है तो फिर लता-पुष्प, वन- निर्भर, उषा-संध्या, पशु-पक्षी और नर-नारी आदि के सौंदर्य का निरूपण कौन करता है ? इस भ्रांति के कारण हम 'ऐस्थेटिक्स' शब्द का हिंदी रूपांतर 'सौंदर्यशास्त्र' शब्द मान सकते हैं। ऐस्थेटिक्स' के पर्याय रूप में 'सौंदर्यशास्त्र' शब्द के रूढ़ हो जाने के मूल में मुख्य कारण कदाचित यही रहा है कि व्यापक अर्थ में सौंदर्य इसके अध्ययन का विषय समझा गया है। ऐसा मानने के पीछे पाश्चात्य दाशनिकों के विचार थे जो 'ऐस्थेटिक्स' के अंतर्गत सभी प्रकार के सौंदर्यसंबंधी चिंतन को स्थान देते थे और कलानुभूति को व्यापक सौंदर्य के परिप्रेक्ष्य में देखते थे। हिंदी में इस विषय का नाम- करण करते समय भी ऐसे ही शब्द की खोज हुई जो विषय की व्यापकता का वाचक हो सके और इसलिए सौंदर्य के संपूर्ण प्रसार के अर्थ द्योतन की दृष्टि से, तद्विषयक चितन के लिए 'सौंदर्यशास्त्र' शब्द ही सबसे अधिक उपयुक्त प्रतीत हुआ। इससे इस धारणा की पुष्टि होती है कि इसके क्षेत्र में कलागत और प्राकृतिक दोनों ही प्रकार का सौंदर्य आ जाता है। जबकि हम यह मान चुके हैं कि यह शास्त्र केवल कलागत सौंदर्य का ही अध्ययन करता है। कतिपय विचारक 'ऐस्थेटिक्स' को सौंदर्यविज्ञान के रूप में स्वीकार करते हुए विज्ञान और शास्त्र के सहारे इस भ्रांति को दूर करना चाहते हैं कि वे कला सौंदर्य को 'सौंदर्यशास्त्र' और प्राकृतिक सौंदर्य को 'सौंदर्यविज्ञान' के अंतर्गत मानते हैं।146 लेकिन ऐस्थेटिक्स' को 'सौंदर्यदिज्ञान' कहना भी अनुचित है। परंपरा के अनुसार वह दर्शन की एक ऐसी शाखा है जिसकी परिधि में केवल कला का सौंदर्य ही आता है, प्रकृति का नहीं। इस विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि 'ऐस्थेटिक्स' का प्रचलित हिंदी रूपांतर 'सौंदर्यशास्त्र' भ्रामक है जो कि सौंदर्यसंबंधी अनेक भ्रांतियों को जन्म देता है, जबकि इसकी तुलना में 'सौंदर्य बोधशास्त्र' शब्द यह पूर्णतः स्पष्ट करता है कि 'ऐस्थेटिक्स' 'कला-प्रदर्शन' ही है। यह वह शास्त्र है जो सौंदर्य का शास्त्रीय बोध कराता है, जो रूढ़ अर्थों में प्रचलित सौंदर्य से अलग है। सौंदर्यबोधशास्त्रीय सौंदर्य आनंददायक ही नहीं है, बल्कि सौंदर्यानुभव से उत्पन्न सौंदर्य है, जो सुखद और दुखद का मिश्रित रूप है। हम 'सौंदर्यबोधशास्त्र' शब्द को स्वीकार करके इसमें सौंदर्य के उदात्त रूप से लेकर भीषण और फूहड़ पक्ष तक तथा कला की भावना से लेकर कला कृति एवं कला के इतिहास दर्शन तक को समेट सकते हैं, अनः हमारे मतानुसार 'सौंदर्य- बोधशास्त्र' शब्द अंग्रेजी के ऐस्थेटिक्स' शब्द के अधिक निकट प्रतीत होता है। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि रमेशकुंतल मेघ द्वारा 'ऐस्थेटिक्स' का कला और कलाकृति का व्यापार / 23
Page 38
किया गया नया रूपांतर 'सौंदर्य बोधशास्त्र' अब तक के प्रचलित शब्दों से कहीं अधिक उपयुक्त है तथा 'ऐस्थेटिक्स' के सही अर्थ को प्रस्तुत करने में सक्षम है। इसी विशेषता को देखते हुए हमने अपने इस अध्ययन में 'ऐस्थेटिक्स' के लिए 'सौंदर्यबोधशास्त्र' शब्द का ही प्रयोग किया है। यह सही है कि यह शब्द 'सौंदर्यशास्त्र' की भांति बहु- प्रचलित नहीं है, लेकिन इस कारण से इसकी उपयुक्तता के संबंध में शंका नहीं की जा सकती। यदि अपने अर्थ-साहचर्य के बल पर यह शब्द 'ऐस्थेटिक्स' के लिए 'सौंदर्य- शास्त्र' की तुलना में अधिक उपयुक्त सिद्ध होता है तो इसके प्रयोग में हिचक नहीं होनी चाहिए और न ही रूढ़ हो जाने के कारण 'सौंदर्यशास्त्र' शब्द को छोड़ने में ही किसी प्रकार के मोह को आड़े आना चाहिए। हिंदी में 'ऐस्थेटिक्स' के नामकरण संबंधी वाद-विवाद को देखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि आज जबकि अन्य भाषाओं में सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतन अधिक विकसित हो रहा है, हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ता इसके नामकरण की समस्या पर ही अटके हुए हैं। स्थिति कितनी भ्रामक है, यह एक ही लेखक के निम्नलिखित उद्धरणों से स्पष्ट हो जाता है : 1. "'ऐस्थेटिक्स' शब्द का मूल अर्थ यद्यपि भिन्न है किंतु प्रचलित अर्थ में उसे 'सौंदर्यशास्त्र' का ही पर्यायवाची मानना उचित है।"147 2. "अस्तु, सही अर्थ में सौंदर्यशास्त्र को, 'सौंदर्यशास्त्र' भी नहीं, कला-शास्त्र भी नहीं अपितु 'कला-दर्शन' कहना चाहिए।"148 3. "अस्तु, अब तक की प्रगति के आधार पर उसे 'सौंदर्यदर्शन', 'सौंदर्यशास्त्र' एवं 'सौंदर्यविज्ञान' तीनों की संज्ञा दी जा सकती है।"149 4. "अस्तु, व्यवहार में हम भले ही 'ऐस्थेटिक्स' के लिए 'सौंदर्यशास्त्र' या 'कलामीमांसा' जैसे शब्दों का प्रयोग करें, किंतु सिद्धांततः इसका निकटतम पर्याय 'रस- शास्त्र' ही है .. ऐसा हम निस्संकोच कह सकते हैं।"150 इन उद्धरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि जहां अन्य भाषाओं में सौंदर्य बोध- शास्त्रीय चिंतन विविध आयामों को स्पर्श करता हुआ निरंतर विकसित हो रहा है। वहां हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ता अभी तक नामकरण की समस्या से ही जूझ रहे हैं। सौंदर्यबोधशास्त्र : परिभाषा व अर्थ उपर्युक्त विभिन्न विद्वानों द्वारा हिंदी में 'ऐस्थेटिक्स' के नामकरणसंबंधी वाद-विवाद का स्पष्टीकरण उनके द्वारा प्रस्तुत की गयी विभिन्न परिभाषाओं व अर्थों के द्वारा भी किया जा सकता है। 'मानक हिंदी कोश' के अनुसार सौंदर्यबोधशास्त्र वह शास्त्र है, "जिसमें कलात्मक कृतियों, रचनाओं आदि से अभिव्यक्त होने वाले अथवा उनमें निहित रहने वाले सौंदर्य का तात्त्विक, दार्शनिक और मार्मिक विवेचन होता है।"151 'मानविकी पारिभाषिक कोश' में इसे 'सुंदर के स्वरूप एवं सौंदर्य-सिद्धांतों के अन्वेषण-पर्यालोचन का शास्त्र' माना गया है।"152 'भारतीय साहित्य कोश' के अनुसार "यह वस्तुतः 24/ सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 39
कला का संपूर्ण शास्त्र है, जिसमें उसके सूजन की प्रक्रिया तथा मूल्यों की गंभीर मीमांसा की जाती है।"153 आचार्य रामचंद्र शुक्ल यह मानते हैं कि "'सौंदर्यशास्त्र' अभी कोई ठीक- ठिकाने का शास्त्र नहीं-कभी होगा, यह भी नहीं कहा जा सकता।"154 'समालोचक' पत्रिका के सौंदर्यशास्त्र विशेषांक में ब्रजगोपाल तिवारी भी आचार्य शुक्ल के इसी मत का समर्थन करते हैं। 155 जगदीश शर्मा भी अपने एक लेख में लिखते हैं कि "सौंदर्य- शास्त्र मतमतांतरों का ऐसा जंगल है कि उसमें भटक जाने के बाद व्यावहारिक उपयोग की चेतना का अक्षुण्ण रह पाना कठिन हो जाता है।" 156 वस्तुतः विद्वानों का सौंदर्य- बोधशास्त्र के प्रति यह दृष्टिकोण स्वस्थ नहीं है। हरद्वारीलाल शर्मा ने सौंदर्यबोधशास्त्र को सौंदर्य की शास्त्रीय विवेचना का शास्त्र मानते हुए, इसकी परिभाषा इस प्रकार निश्चित की है: "सौंदर्यशास्त्र (एक विशेष दृष्टिकोण से जिसे 'शास्त्रीय' कहा जा सकता है) मानवीय चेतना के उस अंश का विधिवत् अध्ययन करता है, उसके विश्लेषण, विकास, सृजन, आस्वादन संबंधी प्रश्नों पर विचार करता है, जिस अंश को हम आनंद (रस) आह्लाद की अनुभूति कहते हैं और जो वस्तु के सौंदर्य से उत्पन्न होता है।"157 रामविलास शर्मा के अनुसार, "सौंदर्यशास्त्र दर्शन का एक अंग है जिसका उद्देश्य सौंदर्य तथा उसकी अनुभूति की व्याख्या करना है।"158 विश्वम्भरनाथ उपाध्याय159 तथा शिवबालक राय160 ने हीगेल से प्रभावित होकर सौंदर्यशास्त्र को 'कला का दर्शन' माना है। कांतिचंद्र पांडेय जो कि ऐस्थेटिक्स को हिंदी में 'स्वतंत्र कलाशास्त्र' नाम देते हैं, कोचे161 और हीगेल162 के विचारों का समन्वय स्थापित कर यह धारणा व्यक्त करते हैं कि स्वतंत्र कला-शास्त्र स्वतंत्र कलाओं (काव्य, संगीत, वास्तु) का विज्ञान और दर्शन है।163 कुमार विमल यद्यपि सौंदर्यबोधशास्त्र का उचित अर्थ निर्धारण करने में कठिनाई महसूस करते हैं164 तथापि वे सौंदर्यबोधशास्त्र को ललित कलाओं के तत्त्वों का सैद्धांतिक निरूपण करने वाले शास्त्र के रूप में ही परिभाषित करते हैं।165 सुरेशचंद्र त्यागी कुमार विमल के मत का ही समर्थन करते हुए लिखते हैं कि "सौंदर्यशास्त्र वह शास्त्र है जो ललित कलाओं के पारस्परिक संबंधों को स्पष्ट करता है तथा उसके आनुभूतिक एवं अभिव्यक्तिक सौंदर्य के सिद्धांतों का निरूपण करता है।"166 नगेन्द्र ने पाश्चात्य सौंदर्य तत्त्ववेत्ताओं की परिभाषाओं को उद्धत करने के उपरांत अपनी परिभाषा इस प्रकार दी है,"'सौंदर्यशास्त्र' ललित कलाओं के रूप में अभिव्यक्त सौंदर्य से संबद्ध मौलिक प्रश्नों के तातत्विक विवेचन और उसके परिणामी सिद्धांतों की संहिता का नाम है।"167 रमेशकुंतल मेघ सौंदर्यबोधशास्त्र को परिभाषित करते हुए लिखते हैं कि "यह विषय व्यापक तौर पर साहित्यशास्त्र, काव्यशास्त्र से आगे 'सौंदर्यबोधशास्त्र' (ऐस्थेटिक्स) कहलाया जिसमें अनेक प्रकार की कलाएं और कौशल, विधाएं और विकास शामिल हो गये। अतः पंचेंद्रियों के उत्सवों से युक्त नाना
कला और कलाकृति का व्यापार / 25
Page 40
कलाओं, विधाओं-साहित्य रूपों का महाशास्त्र ही सौंदर्यबोधशास्त्र की संज्ञा पा गया।"168 इस प्रकार हम देखते हैं कि सौंदर्यबोधशास्त्र की परिभाषा स्थिर करने का प्रयास हिंदी में बहुत से सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने किया है, लेकिन इन परिभाषाओं में साम्य कम तथा मतभेद अधिक दृष्टिगोचर होता है। सौंदर्यबोधशास्त्र के साथ अतिव्याप्ति गुण के कारण कभी कला, कभी दर्शन, कभी आलोचना तो कभी तरह- तरह के विज्ञान समय-समय पर जुड़ते रहे हैं, जिससे इसकी परिभाषाओं में न केवल मतभेद ही पैदा हुआ अपितु यह शास्त्र 'परिभाषाओं और लक्षणों संघटकों का अजायबघर' भी बनकर रह गया है। विषय की इस विविधता और व्यापकता को देखते हुए, इसके उचित अर्थनिर्धारण तथा परिभाषा को निश्चित कर पाना कठिन लगता है।
सौंदर्यबोधशास्त्र: क्षेत्र का निर्धारण
सौंदर्यबोधशास्त्र की उपर्युक्त परिभाषाओं को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि कुछ सौंदर्यतत्त्ववेत्ता सौंदर्यबोधशास्त्र का संबंध केवल ललित कलाओं से मानते हैं और कुछ सौंदर्य मात्र से। दूसरी कोटि के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं की दृष्टि केवल कलाओं में ही नहीं अपितु प्रकृति और जगत के प्रत्येक क्षेत्र में सौंदर्य का दर्शन करती है। इस मत का समर्थन करने वाले विद्वानों की यह धारणा है कि "सौंदर्यशास्त्र का संबंध व्यापक सौंदर्य से है। उसमें कलाकृतियों का सौं:र्य भी आता है और कला इतर वस्तुओं का भी, किंतु प्रधानता कलासौंदर्य की ही है।"169 रामविलास शर्मा तो प्रकृति और मानव जीदन के सौंदर्य की व्याख्या किये बिना कलात्मक सौंदर्य का विवेचन ही असंभव मानते हैं अतः इनके अनुसार भी "सौंदर्यशास्त्र का विषय उस व्यापक सौंदर्य की व्याख्या है जो प्रकृति, मानव जीवन तथा कलाओं में विद्यमान है।"170 हिंदी में सौंदर्यबोधशास्त्र पर प्रथम लेख लिखने वाले प्रो० वाण171 तथा जगदीश शर्मा172 और बैजनाथ सिंहल173 भी उक्त मत का ही समर्थन करते हुए सौंदर्यबोधशास्त्र का क्षेत्र व्यापक मानते हैं। सुरेशचंद्र त्यागी भी रामविलास शर्मा के मत का ही समर्थन करते हुए अपनी पुस्तक 'छायावादी काव्य में सौंदर्यदर्शन' में छाया- वादी कवियों का अध्ययन भाव एवं कल्पना सौंदर्य, अभिव्यक्ति सौंदर्य, मानवीय सौंदर्य और प्राकृतिक सौंदर्य इन चार दिशाओं में करते हैं तथा इस चतुर्विध सौंदर्य के दर्शन को ही सौंदर्यबोधशास्त्र का विषय मानते हैं।"174 इस प्रकार हिंदी में प्रो० वाण, रामविलास शर्मा, जगदीश शर्मा, बैजनाथ सिंहल तथा सुरेशचंद्र त्यागी आदि सौंदर्यतत्त्ववेत्ता सौंदर्यबोधशास्त्र का क्षेत्र व्यापक मानते हैं। सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन को केवल कलामूलक सौंदर्य तक सीमित रखने वाले चिंतकों में कांतिचंद्र पांडेय, कुमार विमल, रमेशकुंतल मेघ, शिवबालक राय, नगेन्द्र, कृष्णकुमार शर्मा तथा रामलखन शुक्ल आदि प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का नाम
26/ सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 41
आता है। ये चिंतक सही अर्थों में सौंदर्यबोधशास्त्र का संबंध ललित कलाओं के माध्यम से अभिव्यक्त सौंदर्य से मानते हुए लिखते हैं कि सौंदर्यबोधशास्त्र केवल कला जगत के ही सौंदर्य का विश्लेषण करता है। मानव या मानवेतर प्रकृति के अंतर्गत अपनी ज्ञानेंद्रियों के द्वारा हम जिस सौंदर्य की प्रत्यक्ष अनुभूति करते हैं, वह इस शास्त्र का प्रतिपाद्य नहीं हो सकता।175 कांतिचंद्र पांडेय सौंदर्यबोधशास्त्र का क्षेत्र केवल स्वतंत्र कलाओं (काव्य/ संगीत/वास्तु) तक सीमित मनते हुए लिखते हैं कि "भारतीय साहित्य में पांच सौ बयासी कलाओं का उल्लेख मिलता है, परंतु स्वतंत्र कलाओं का प्रतिपाद्य विषय उन सब कलाओं की कृतियों में उपलब्ध सौंदर्य नहीं है, और न ही प्रकृतिगत सौंदर्य ही है।"176 लेकिन अपने ग्रंथ के द्वितीय भाग में वे यह भी लिखते हैं कि "वर्तमान संदर्भ में ऐस्थेटिक्स शब्द का निम्नलिखित अर्थ अधिक सुष्ठु और विषयानुकूल मालूम पड़ता है: "वह विज्ञान एवं दर्शन जिसका प्रतिपाद्य विषय कलाकृतिगत और प्रकृतिगत सौंदर्य तथा भव्यता है।"177 यद्यपि सौंदर्यबोधशास्त्र के क्षेत्र के निर्धारण में कांतिचंद्र पांडेय की यह अनिश्चित धारणा भ्रम उत्पन्न करती है, तथापि पुस्तक का नाम 'स्वतंत्र कला- शास्त्र' इस तथ्य पर ही बल देता है कि सौंदर्य बोधशास्त्र का क्षेत्र कला सौंदर्य तक ही सीमित है। रमेशकुंतल मेघ सौंदर्यबोधशास्त्र को कला से जोड़कर परिभाषित करते हुए 'कला, कला रचना और कला कृति का दर्शन, मीमांसा, इतिहास और आशंसा को संयोजित करने वाली विधा और विज्ञान को सौंदर्यबोधशास्त्र कहते हैं,178 उनकी यह परिभाषा सौंदर्यबोधशास्त्र के क्षेत्र को कलासौंदर्य तक ही सीमित रखने के पक्ष में है। 'कुमार विमल179, कृष्णकुमार शर्मा180 तथा रामलखन शुक्ल181 आदि सौंदर्यचितक भी सौंदर्यबोधशास्त्र को परिभाषित करते हुए इसके सीमित क्षेत्र की ओर ही इंगित करते हैं। नगेन्द्र भी अपनी पुस्तक 'भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका' में इसी धारणा की पुष्टि करते हैं कि सौंदर्यबोधशास्त्र केवल ललित कलाओं के सौंदर्य तक ही सीमित है, प्रकृति-सौंदर्य से उसका सीधा संबंध नहीं है। वे लिखते हैं कि "प्रकृति-सौंदर्य के प्रत्यक्ष भावन और चिंतन से कला का जन्म होता है और कलानिबद्ध सौंदर्य के भावन तथा चिंतन से सौंदर्यशास्त्र का।"182 इस प्रकार हम यह देखते हैं कि विभिन्न विद्वानों ने सौंदर्यबोधशास्त्र के क्षेत्र का निर्धारण अपने विचारानुसार किया है जिससे यह निश्चित रूप से निर्धारित करना असंभव प्रतीत होता है कि इस शास्त्र के अंतर्गत केवल कलागत सौंदर्य आता है या कि प्रकृतिगत भी। अधिकतर विद्वान इसके क्षेत्र को केवल कलागत सौंदर्य तक ही सीमित रखने के पक्ष में हैं। जो चिंतक इसके क्षेत्र को व्यापक मानते हैं वे वास्तव में 'ऐस्थेटिक्स' के लिए हिंदी शब्द 'सौंदर्यशास्त्र' की मान्यता प्रदान करते हैं। हिंदी में सौंदर्यशास्त्र शब्द से ही यह भ्रांति उत्पन्न होती है कि इसके क्षेत्र में सभी प्रकार का सौंदर्य आता होगा। किंतु वस्तुतः ऐसा नहीं है। निःसंदेह यह शास्त्र प्रकृति और शिल्प के विभिन्न उपादानों में सौंदर्य की सत्ता तो स्वीकार करता है लेकिन वह अपना संबंध केवल ललित कलाओं तक ही सीमित रखता है। सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने इस तथ्य को स्पष्ट कला और कलाकृति का व्यापार / 27
Page 42
रूप में स्वीकार करते हुए इसके पक्ष में अनेक तर्क भी दिये हैं। इसके अतिरिक्त हिंदी में कुछ चिंतक ऐसे भी हैं जो यह स्वीकार करते हैं कि सौंदर्यबोधशास्त्र का क्षेत्र स्पष्ट नहीं है। उनके शब्दों में, "पिछले कुछ समय से 'लालित्य-चिंतन' के क्षेत्र में विश्व के दोनों गोलार्द्ध सक्रिय हो उठे हैं। किंतु यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि अंगरेजी का यह शब्द 'ऐस्थेटिक्स' अपने क्षेत्र-विस्तार में कितनी दिशाओं को घेरता है।"183 निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि सौंदर्यबोधशास्त्र की परिधि में केवल वे ही रूप आ सकते हैं जो मानव के द्वारा अनुभूत होकर लिपिबद्ध रूप में सुलभ हो गये हैं। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि सौंदर्यबोधशास्त्र प्रकृति एवं बाह्य जगत के सौंदर्य का अध्ययन सीधे रूप में और उनके प्रकृत रूप में न करके कलाओं के माध्यम से उनके संवेदित रूप का ही अध्ययन करता है। सौंदर्यबोधशास्त्र के आधारभूत ग्रंथों को देखने से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि उनमें सौंदर्य के नाम पर विभिन्न कलाओं का ही-या कलागत सौंदर्य का ही निरूपण हुआ है। यदि उनमें प्रकृति के सौंदर्य का कहीं उल्लेख भी हुआ है तो वह कलागत सौंदर्य के प्रसंग में -उसी की मीमांसा के साधन रूप में हुआ है। अतः इस दृष्टि से सौंदर्यबोधशास्त्र केवल कलाशास्त्र ही है और कलाओं में भी केवल ललित कलाओं से ही उसका संबंध है। सौंदर्यबोधशास्त्र: अन्य शास्त्रों से संबंध प्रोफेसर 'बाण' के अनुसार "कोई भी शास्त्र बिलकुल स्वतंत्र नहीं है।"184 इस रूप में सौंदर्यबोधशास्त्र को भी ज्ञान की और शाखाओं से अलग नहीं किया जा सकता। वैसे भी सौंदर्यबोधशास्त्र स्वभावतः आधारबहुल है, क्योंकि इसके अंतर्गत समाविष्ट विषय-सामग्री के अनेक परिसर हैं। कुमार विमल के अनुसार "सौंदर्य गुण, विशिष्ट रूप-विधान, अनुकरण, अभिव्यक्तिगत माध्यम, प्रातिभ स्फुरण, सत्य-शिव-सुंदर, सादृश्याभास, लोकमंगल, अभिव्यंजना, आनंद, संवेग, रस, समानुभूति, औदात्त्य, आलंबन-विधान, अर्थातिशय, मिश्रिन ऐंद्रियबोध इत्यादि अनेक ऐसे विषय हैं, जिनकी सम्यक् व्याख्या सौंदर्यशास्त्र का अभीष्ट है।"185 इनमें से किसी अध्येतव्य विषय का संबंध काव्यशास्त्र से है, किसी का आलोचना शास्त्र से, किसी का मनोविज्ञान से तो किसी का दर्शनशास्त्र से। इस तरह सौंदयबोधशास्त्र के स्वरूप में ज्ञान-विज्ञान के विविध विकास और मानविकी की विभिन्न शाखाओं के बीच समन्वय तथा संयुजता (कोआर्डिनेशन) स्थापित करने की विशेष प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होती है। इसके विकसित होते हुए आयामों की चर्चा करते हुए रमेशकुंतल मेघ भी लिखते हैं कि "अब कला का संस्कृति के अन्य चरणों, जैसे-विज्ञान, मनोविज्ञान, नैतिकता, राजनीतिशास्त्र, दर्शन- शास्त्र, समाजशास्त्र, नवंशशास्त्र, पुरातत्त्वशास्त्र, जीवशास्त्र आदि से संबंध निश्चित किया जाता है।"186 हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं के उक्त कथनों से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि सौंदर्यबोधशास्त्र ऐसा शास्त्र है, जिसे ज्ञान की अन्य शाखाओं से संबंध स्थापित करना ही पड़ता है। लेकिन इन सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने सौंदर्यबोधशास्त्र का संबंध अन्य शास्त्रों 28 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 43
से किस रूप में तथा किस सीमा तक स्वीकार किया है यह प्रत्येक शास्त्र से उसकी स्वतंत्र चर्चा करते हुए स्पष्ट किया जा सकता है। सौंदर्यबोधशास्त्र और काव्यशास्त्र : सौंदर्यबोधशास्त्र विषयक हिंदी ग्रंथों में प्रत्यक्षतः तथा काव्यशास्त्रीय ग्रंथों में प्रसंग रूप में सौंदर्यबोधशास्त्र और काव्यशास्त्र का अंतर बतलाया गया है। हिंदी में कांतिचंद्र पांडेय, कुमार विमल, नगेन्द्र, कृष्णकुमार शर्मा, सुरेशचद्र त्यागी, रामलखन शुक्ल, बैजनाथ सिंहल तथा बलदेव उपाध्याय आदि चिंतकों ने इनके अंतसंबंध पर विस्तृत चर्चा की है। इस चर्चा में हिंदी के सौंदर्यतत्त्व- वेत्ता मुख्यतः अंगरेजी तथा संस्कृत मनीषियों के विचारों का ही पिष्टपेषण करते हैं जिससे उनकी विचारधाराओं में कोई विशेष मौलिकता दृष्टिगोचर नहीं होती है फिर भी इन्होंने अपनी पुस्तकों और लेखों में सौंदर्यबोधशास्त्र और काव्यशास्त्र में जो अंतःसंबंध दर्शाये हैं वे इस प्रकार हैं : सौंदर्यबोधशास्त्र का क्षेत्र निर्धारित करते हुए जब हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि सौंदर्यबोधशास्त्र केवल कलाशास्त्र है और कलाओं में भी केवल ललित कलाओं का ही अध्ययन करता है तो यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि सौंदर्यबोधशास्त्र काव्य- शास्त्र की तुलना में अधिक व्यापक है। इस प्रकार इन दोनों में पहला अंतर विद्वानों ने यही माना है कि काव्यशास्त्र केवल काव्य का शास्त्र है और उसके अध्ययन की सीमा केवल काव्य तक सीमित है, जबकि सौंदर्यबोधशास्त्र सभी ललित कलाओं का शास्त्र है और उसकी सीमा काव्य के साथ सभी काव्येतर कलाओं-स्थापत्य, शिल्प, चित्र और संगीत तक फैली हुई है। नगेन्द्र इस मत की पुष्टि करते हुए लिखते हैं कि "माध्यम-उपकरणों की दृष्टि से सौंदर्यशास्त्र की परिधि ही अधिक व्यापक है। काव्य- शास्त्र का विवेच्य विषय है काव्य-सौंदर्य अर्थात् शब्दार्थ के माध्यम से व्यक्त सौंदर्य, जबकि सौंदर्यशास्त्र समस्त कलाओं के सौंदर्य का तत्त्व विवेचन करता है जिसकी अभि- व्यक्ति के, शब्दार्थ के अतिरिक्त स्वर, रंगरेखा, काष्ठ-प्रस्तर आदि अन्य माध्यम-उप- करण भी हैं।"187 लेकिन साथ ही वे काव्य-शास्त्र को इस दृष्टि से व्यापक भी मानते हैं कि उसमें सौंदर्य के तत्त्व-चिंतन के अतिरिक्त उसकी प्रविधि अथवा रीति का भी निरूपण रहता है, जो कि सौंदर्यबोधशास्त्र की प्ररिधि से बाहर है।188 कुमार विमल189 तथा सुरेशचंद्र त्यागी190 ने सौंदर्यबोधशास्त्र और काव्यशास्त्र में एक आधार पर यह अंतर स्पष्ट किया है कि भारतीय काव्यशास्त्र रस, ध्वनि, रीति, वक्रोक्ति आदि के द्वारा काव्य के आत्मतत्त्व की गवेषणा में अधिक प्रवृत्त हुआ है। जबकि सौंदर्यबोधशास्त्र सौंदर्य के संवेगात्मक पक्ष को प्रमुखता देता है। तदनंतर हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने जार्ज संतायन191 और एस० के० डे192 के अभिमतों से प्रभावित होकर सौंदर्यबोधशास्त्र और काव्यशास्त्र में निम्नलिखित अंतर भी स्पष्ट किये हैं। काव्यशास्त्र में निर्णय की प्रधानता रहती है, जबकि सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन में प्रत्यक्षीकरण या इंद्रियबोध को प्राथमिकता दी जाती है। काव्यशास्त्र का
कला और कलाकृति का व्यापार / 29
Page 44
व्याकरण से गहरा सबंध है जबकि सौंदर्यबोधशास्त्र का व्याकरण से कोई सीधा संबंध नहीं है। सौंदर्यबोधशास्त्र में कल्पनातत्त्व को सर्वाधिक महत्त्व प्राप्त है, जबकि संस्कृत काव्यशास्त्र में प्रतिभा आदि के विवेचन के अतिरिक्त कल्पना को कोई महत्त्व प्राप्त नहीं है।193 हिंदी के कतिपय सौंदर्यचिंतक एस० के० डे के इस मत से सहमत नहीं हैं कि सौंदर्यबोधशास्त्र का व्याकरण से कोई संबंध नहीं है। उनका यह तर्क है कि "यद्यपि सौंदर्यशास्त्र का व्याकरण से प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, तथापि काव्य सौंदर्य की चर्चा के प्रसंग में सौंदर्यशास्त्र में भी व्याकरणसम्मत आधार ग्रहण किये जायेंगे। जब सौंदर्य- शास्त्र काव्येतर कलाओं पर चर्चा-प्रवृत्त होगा, तब तत्त्व कला-संदर्भीय आधारों का विवेचन करेगा। व्याकरण से संबद्ध-असंबद्ध आदि भेद-कथन वैसा ही है, जैसे यह कहना कि चित्रकला का रंगों से संबंध है तथा मूर्तिकला का पत्थरों से, पर सौंदर्यशास्त्र का न तो रंग से संबंध है न पत्थरों से। अतः यह भेद स्थापन विवेकपूर्ण नहीं कहा जा सकता।"194 सौंदर्यबोधशास्त्र और काव्यशास्त्र के अंतसंबंध को देखते हुए हमें सौंदर्यतत्त्व- वेत्ताओं की दो विचारधाराएं स्पष्ट होती हैं। एक विचारधारा के अनुसार सौंदर्यबोध- शास्त्र कोई नयी चीज नहीं है। यह काव्यशास्त्र का ही पर्याय है और भारतीय काव्य- शास्त्र में सौंदर्य का जितना व्यापक चिंतन हुआ है, उतना अन्यत्र नहीं। नगेन्द्र ने अपनी पुस्तक 'भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका' में स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया है कि "भारतीय सौंदर्यशास्त्र का वास्तविक एवं विकसित रूप काव्यशास्त्र में ही उपलब्ध होता है।"195 तथा "भारतीय सौंदर्यशास्त्र की रूपरेखा का निर्माण काव्यशास्त्र को केंद्र में रखकर ही किया जा सकता है।"196 इस संबंध में सर्वाधिक उल्लेखनीय प्रयास फतहसिंह का है जिन्होंने भारतीय सौंदर्यचिंतन का प्रारंभ वेदों से माना है।197 क्षेमेन्द्र के 'औचित्य सिद्धांत' को देखकर कुमार विमल भी यह लिखते हैं कि "औचित्य पर केवल रस-आश्रित औचित्य की दृष्टि से सोचने का अभ्यास छोड़कर यदि उसे कृति के वस्तुपक्ष और कलापक्ष की व्यापकता के संदर्भ में देखा जाये तो औचित्य-सिद्धांत आधुनिक सौंदर्यशास्त्र के लिए भारतीय काव्यशास्त्र का सर्वोत्तम अवदान सिद्ध हो सकता है।"198 दूसरा वर्ग उन विचारकों का है जो यह मानकर चलते हैं कि गदि काव्यशास्त्र के अध्ययन की सीमा केवल काव्य तक ही सीमित है तो सौंदर्यबोधशास्त्र सभी ललित कलाओं का अध्ययन करता है। चूंकि काव्य एक ललित कला है अतः इस रूप में वह सौंदर्यबोधशास्त्र की एक शाखा है। काव्यशास्त्र जहां केवल काव्य को प्रधानतः दृष्टि में रखकर उसकी आलोचना करता है, वहां सौंदर्यबोधशास्त्र सभी ललित कलाओं के सर्वमान्य तथा प्रधान तत्त्वों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। दूसरे शब्दों में सौंदर्यबोध- शास्त्र के निष्कर्ष प्रायः सभी कलाओं को दृष्टि में रखकर निकाले जाते हैं, जबकि काव्यशास्त्र के निष्कर्ष केवल काव्य को लक्ष्य कर निकाले जाते हैं। इन दोनों के अंतर
30 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 45
को स्पष्ट करते हुए बलदेव उपाध्याय ने लिखा है-"सौंदर्यशास्त्र का क्षेत्र साहित्यशास्त्र के क्षेत्र से कहीं अधिक व्यापक और विशाल है। साहित्यशास्त्र तो केवल शब्द के माध्यम द्वारा निर्मित कला की ही द्योतना करता है, परंतु सौंदर्यशास्त्र ललित कलाओं जैसे भास्कर्य, चित्र तथा संगीत आदि में निर्दिष्ट चारुत्व को भी अपने क्षेत्र के अंतर्गत करता है। अतः दोनों का पार्थक्य मानना न्यायसंगत ही है।"199 सौंदर्यबोधशास्त्र और आलोचनाशास्त्र : सौंदर्यबोधशास्त्र तथा आलोचना का निकटतम संबंध माना जाता है। दोनों का क्षेत्र कम-से कम आंशिक रूप में एक है। दोनों में भेद केवल इतना है कि सौंदर्यबोधशास्त्र दर्शन और सिद्धांत पर विशेष बल देता है और आलोचनाशास्त्र व्यवहार पक्ष पर। कतिपय चिंतक सौंदर्यबोधशास्त्र को आलोचनाशास्त्र के सहायक रूप में स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार आलोचना के क्षेत्र में जो अस्पष्टता आवेश या भावुकता रहती है, वह सौंदर्यबोधशास्त्र में नहीं मिलती। सौंदर्य संबंधी सिद्धांतों से अपरिचित रहकर भी आलोचक कला का आनंद प्राप्त कर सकता है परंतु इन सिद्धांतों से परिचित हो जाने पर आलोचना में स्पष्टता व निभ्रािता अवश्य आती है, दूसरे उसकी दृष्टि सूक्ष्म व सक्षम हो जाती है, तीसरे वह साहित्य व कला के संबंध अन्य आलोचकों सौंदर्यबोधशास्त्रियों व कलाकारों के सिद्धांतों में तर्क विरोधी तत्त्वों को दूर करके आलोचना के सिद्धांतों को अधिक वैज्ञानिक बना सकता है। सौंदर्यबोधशास्त्र सिद्धांतों के विवेचन पर अधिक बल देता है, जिससे उसके वास्तविक स्थिति से दूर जाने का भय बराबर बना रहता है। वह अन्य सिद्धांतों के दोष तो सुविधा से खोज लेता है परंतु जब स्वयं सिद्धांतों का निर्माण करता है तो उनमें वह औपचारिक हो जाता है।200 इस प्रकार यह दोनों शास्त्र अलग होकर भी परस्पर सहायक तथा संबंधी हैं। कुछ चिंतक सौंदर्यबोधशास्त्र और आलोचनाशास्त्र की स्वतंत्र सत्ता मानते हैं तथा उन्होंने इन दोनों के बीच अभेद लौहावरण उपस्थित कर रखा है। कुमार विमल उसे मिटा देने के पक्ष में हैं। वे मानते हैं कि "इस अभेद्य लौहावरण ने सौंदर्यशास्त्र और आलोचनाशास्त्र दोनों का अपकार किया है। यह भेदकता इसलिए भ्रामक है कि आलोचक को अपने व्यावहारिक विश्लेषणों की वस्तुनिष्ठ परिणति के लिए आलोचना- शास्त्र का सहारा लेना पड़ता है। जब एक सौंदर्यशास्त्री किसी कलाकृति की निपुणता उच्चावच शोभा या अभिव्यक्ति लाघव का विश्लेषण करता है, तब वह किसी आलोचक से भिन्न नहीं रहता है और जब कोई आलोचक आलोच्य कलाकृति के विवेचन- विश्लेषण के बाद सूक्ष्म सैद्धांतिक अवधारणाओं या दार्शनिक विकल्पों को प्रस्तुत करता है, तब वह किसी सौंदर्यशास्त्री से भिन्न कार्य नहीं करता है। सच यह है कि सौंदर्य- शास्त्र आलोचना के धरातल पर उतरकर निकष बन जाता है और आलोचना सौंदर्य- शास्त्रीय स्तर पर पहुंचकर ज्ञानकोश बन जाती है।"201 सौंदर्यबोधशास्त्र और तत्त्वमीमांसा : सौंदर्यबोधशास्त्र के सीमावर्ती दो और अनुशासन हैं-तत्त्वमीमांसा और मनोविज्ञान। ससार में जितने पदार्थ हैं, सबके दो रूप हैं। एक जो हम और आप देखते हैं और दूसरा जो असल में पदार्थ का रूप रहता कला और कलाकृति का व्यापार / 31
Page 46
है। जो शास्त्र असल रूप अथवा तत्त्व का अन्वेषण करता है उसे तत्त्वशास्त्र या तत्त्व- मीमांसा कहते हैं। इस प्रकार यह तत्त्व-मीमांसा दर्शन की ऐसी प्रमुख शाखा है जो सृष्टि के मूल तत्त्व और उसके व्यक्त रूपों के पारस्परिक संबंधों का विवेचन करती है। प्रोफेसर वाण तथा नगेन्द्र ने इन दोनों के अंतसंबंधों पर चर्चा की है। प्रोफेसर बाण ने सौंदर्यबोधशास्त्र के साथ तत्त्वशास्त्र का गहरा संबंध मानते हुए यह लिखा है कि किसी भी पदार्थ की सुंदरता हम तब तक नहीं जान सकते, जब तक पदार्थ के तत्त्व को न जाना जाये। कोई वस्तु हमें क्यों सुंदर लगती है ? हमारी चेतना क्या है ? उसमें कौन-कौन-से परिवर्तन होते हैं ? उन परिवर्तनों का क्या परिणाम होता है ? उन परिणामों में और सुंदरता में क्या संबंध है ? ऐसा कौन-सा परिवर्तन हमारी चेतना में होता है, जिससे कोई वस्तु हमें सुंदर लगती है ? आदि प्रश्नों का तत्त्वमीमांसा से गहरा संबंध है।"202 'भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका' में नगेन्द्र भी सौंदर्यबोधशास्त्र में तत्त्वशास्त्र के योगदान को स्वीकार करते हैं, साथ ही वे इनके अंतर का भी स्पष्टीकरण करते हैं। सर्वप्रथम वे तत्त्वशास्त्र का विषय सौंदर्यबोधशास्त्र की अपेक्षा व्यापक मानते हैं। उनके शब्दों में, "तत्त्व मीमांसा का प्रतिपाद्य है सत्य, अथवा और निश्चित शब्दावली में, सत्य का वह रूप जो भौतिक जगत से परे है। सत्य का स्वरूप सर्वव्यापक है। अतः तत्त्वमीमांसा की विषय-परिधि में जीवन और जगत के समस्त रूपों का धारणात्मक चिंतन रहता है-सौंदर्यशास्त्र उसका केवल एक पहलू है-वह मूलतः ऐंद्रिय संवेदना का विषय है।"203 दूसरा अंतर वे इन दोनों में यह मानते हैं कि तत्त्वमीमांसा शुद्ध बुद्धि का विषय है। उसका संपूर्ण व्यापार अमूर्त धारणाओं के माध्यम से चलता है जबकि सौंदयंबोधशास्त्र का प्रतिपाद्य बुद्धि का विषय न होकर सहजानुभूति का विषय है अतः चिंतन-व्यापार में बुद्धि के अतिरिक्त सहजानुभूति का भी योग होने से उसकी धारणाएं अपेक्षाकृत मूर्त तथा इंद्रिय संवेद्य होती हैं।204 सौंदर्यबोधशास्त्र और मनोविज्ञान : कोई भी वस्तु हमें क्यों सुंदर लगती है ? इस प्रश्न का हल करने के लिए हमें मनोविज्ञान का आश्रय लेना पड़ता है और इस रूप में सौंदर्यबोधशास्त्र मनोविज्ञान से गहरा संबंध रखता है। मनोविज्ञान में मानव- चेतना की प्रक्रियाओं, उनके विषयों और परिस्थितियों का विश्लेषण रहता है। उसकी विषय-परिधि में एक प्रकार से समस्त अनुभव-जगत् आ जाता है जिसका वह प्रमाता के संदर्भ में विचार करता है। इस प्रकार मानसबोध और संवेदन के माध्यम से जो भी हम अनुभव करते हैं वह सब मनोविज्ञान का विषय है। रामलखन शुक्ल के अनुसार सौंदर्यबोधशास्त्र मनोविज्ञान का विशिष्ट उपयोग इस रूप में करता है कि उससे कलात्मक सृजन और कलात्मक आशंसा की प्रक्रियाओं पर प्रकाश तो पड़ता ही है, साथ ही विभिन्न बिंबों के संवेगात्मक प्रभाव और प्रतीकात्मक अर्थों का भी स्पष्टीकरण होता है।205 प्रोफेसर वाण206 तथा नगेन्द्र207 भी मनोविज्ञान को सौंदर्यबोधशास्त्र के लिए इसी रूप में सहायक मानते हैं। नगेन्द्र ने इन दोनों की तुलना करते हुए सौंदर्यबोध-
32 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 47
शास्त्र को मनोविज्ञान की अपेक्षा अत्यंत सीमित माना है। वे लिखते हैं कि "चेतन और अचेतन मन की वृत्तियों और उनसे उत्पन्न असंख्य विकारों का वैज्ञानिक विवेचन मनोविज्ञान का विषय है, उसकी एक सीमा जीवनविज्ञान का स्पर्श करती है और दूसरी शरीरविज्ञान का। इस प्रकार, मनोविज्ञान अत्यंत व्यापक विषय है जिसका संबंध मानव मन की मौलिक और अनगढ़ प्रवृत्तियों से ही अधिक है, जबकि सौंदर्य- शास्त्र का क्षेत्र अत्यंत सीमित है और उसका संबंध मन की एक अत्यंत गौण किंतु सर्वाधिक परिष्कृत प्रवृत्ति-सौंदर्य के साथ है -अर्थात् मनोविज्ञान की तुलना में सौंदर्य- शास्त्र अत्यंत सीमित किंतु अत्यधिक परिष्कृत अनुशासन है।"208 इन दोनों के अंतर्सबंध पर हिंदी के प्रमुख सौंदर्यंतत्त्ववेत्ता कुमार विमल ने भी चर्चा की है। वे सौंदर्यबोधशास्त्र का मनोविज्ञान से कुछ सीमा तक ही संबंध मानते हैं। उनके शब्दों में, "सौंदर्यशास्त्र को मनोविज्ञान से मिलाकर आच्छन्न कर देना एक भारी भूल है, क्योंकि सौंदर्यशास्त्र मनोविज्ञान से उतना ही संबद्ध और भिन्न है जितना कि मनोविज्ञान से काव्यशास्त्र। यह निश्चित है कि सौंदर्यशास्त्र के कुछ सूत्रों की विवेचना में मनोविज्ञान की सहायता आवश्यक है, किंतु मनोविज्ञान सौंदर्यशास्त्र की सीमा नहीं है और न सौंदर्यशास्त्र मनोविज्ञान की स्वायत्त संपत्ति है।"209 तत्त्व मीमांसा और मनोविज्ञान के अतिरिक्त हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने सौंदर्यबोधशास्त्र का संबध आचारशास्त्र (ऐथिक्स) समाजशास्त्र तथा नृतत्त्वशास्त्र से भी माना है। समाजशास्त्र और आचारशास्त्र से संबंध स्थापित करते हुए प्रोफेसर बाण अपने लेख में लिखते हैं, "परिस्थिति का प्रभाव सुंदरता पर पड़ता है इस कारण सौंदर्यशास्त्र का संबंध समाजशास्त्र (Sociology) से भी सिद्ध होता है। सौंदर्यशास्त्र का संबंध आचार-शास्त्र (ऐथिक्स) से भी है। सत्यं शिवं सुंदरम्-अर्थात् ब्रह्मा सत्य, सुंदर तथा मंगलमय है। मंगलमय का विषय आचारशास्त्र का है। अतएव सौंदर्यशास्त्र का संबंध आचारशास्त्र से भी प्रमाणित हुआ।"210 इस प्रकार सौंदर्यबोधशास्त्र का संबंध नृतत्त्वशास्त्र से मानते हुए रामलखन शुक्ल लिखते हैं कि सौंदर्यबोधशास्त्र में यह सूचना कि कला किस प्रकार के लोगों और विभिन्न कालों के सांस्कृतिक प्रतिमानों के अनुरूप सिद्ध होती है, हमें नृतत्त्वशास्त्र से ही प्राप्त होता है।211 इस प्रकार हम यह देखते हैं कि हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने सौंदयंबोधशास्त्र के अन्य शास्त्रों से संबंव को लेकर विस्तृत चर्चा की है। यहां इन चिंतकों ने यह स्पष्ट किया है कि सौंदर्यवोधशास्त्र ने ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखाओं से उपयोगी सामग्री को उपजीव्य की तरह ग्रहण कर ज्ञान-विज्ञान के विविध विकास और मानविकी की विभिन्न शाखाओं के बीच समन्वय तथा संयुजता (कोआर्डिनेशन) स्थापित करने का प्रयास किया है। वहां ये चिंतक यह भी मानते हैं कि इन शाखाओं ने सौंदर्यबोधशास्त्र के अर्थ व सीमा निर्धारण में कई तरह की भ्रांतियां भी पैदा की हैं। कुमार विमल ने 'सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व' में स्पष्ट रूप से लिखा है, "एस्थेटिक्स' का उचित अर्थ-निर्धारण या व्यपदेश-परिसीमन पूर्णरूपेण नहीं हो सका। इस अनिर्णीत व्यपदेश या अनिश्चित अर्थ-प्रतिपत्ति का एक प्रमुख कारण यह है कि दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान ने सौंदर्यशास्त्र के स्वतंत्र व्यक्तित्व कला और कलाकृति का व्यापार / 33
Page 48
को अपहृत करने की सर्वाधिक चेष्टा की है।"212 एस० टी० नरसिंहाचारी ने भी अपनी पुस्तक 'सौंदर्य तत्त्व निरूपण' के 'दृष्टिकोण' में इस बात की ओर इंगित किया है कि सौंदर्यबोधशास्त्र दर्शन से संबंधित होने के कारण ही कई दार्शनिक उलभ्नों से भरा हुआ है।213 सौंदर्यबोधशास्त्र तथा अन्य शास्त्रों के संबंध को लेकर उपर्युक्त किये गये विवेचन का सारांश हम इस प्रकार दे सकते हैं : 1. सौंदयबोधशास्त्र को काव्यशास्त्र, आलोचनाशास्त्र, तत्त्व मीमांसा या मनो- विज्ञान का पर्याय नहीं कहा जा सकता। 2. सौंदर्यबोधशास्त्र के निष्कर्ष प्रायः सभी ललित कलाओं को दृष्टि में रखकर निकाले जाते हैं, जबकि काव्यशास्त्र के निष्कर्ष केवल काव्यकला को लक्ष्य कर निकाले जाते हैं। इस रूप में काव्यशास्त्र सौंदर्यबोधशास्त्र की अंगी- भूत शाखा है। 3. सौंदर्यबोधशास्त्र आलोचना के धरातल पर उतरकर निकष बन जाता है और आलोचना सौंदर्यबोधशास्त्रीय स्तर पर पहुंचकर ज्ञानकोश बन जाती है जिससे यह दोनों शास्त्र एक-दूसरे के लिए विशेष रूप से सहायक सिद्ध होते हैं। 4. तत्त्वमीमांसा, मनोविज्ञान तथा अन्य शास्त्र सौंदर्यबोधशास्त्र के साधनभूत अनुशासन हैं-इस अर्थ में कि वह इनकी विशेष पद्धतियों का उपयोग प्रतिपाद्य विषय के स्वरूप, अनुभूति, अभिव्यक्ति आदि के विवेचन में करता है। 5. सौंदर्यबोधशास्त्र ने ज्ञान-विज्ञान के विविध विकास तथा मानविकी की विभिन्न शाखाओं के बीच समन्वय स्थापित करने के साथ-साथ अपने अर्थ तथा सीमा-निर्धारण में कई तरह की भ्रांतियां पैदा की हैं। 6. अब सौंदर्यबोधशास्त्र स्वतंत्र होने जा रहा है तथा अपना स्वतंत्र स्थान बनाने लगा है। हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने भी इसकी स्थापना इसी रूप में की है।
.12
कलाकृति
सौंदर्य एक अगोचर और अमूर्त संघटना (फेनामेना) है। इसी के मूर्त/अमूर्त रूपाकार कला अथवा कलाकृति कहलाते हैं। कई बार आलोचक 'कला' और 'कलाकृति' को एक ही अर्थ में प्रयुक्त करते हैं लेकिन कला और कलाकृति को एक ही अर्थ में प्रयुक्त करना उचित नहीं है। कलाकृति कलाकार का कृतित्व है जो उसकी कला का परिणाम है, वह स्वयं कला नहीं है। कला एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा कलाकार किसी वस्तु को निश्चित रूप प्रदान करता है तथा कलाकृति वस्तु की उस अवस्था का नाम है जो उच्च-
34 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 49
प्रक्रिया के फलस्वरूप ही रूप प्राप्त करती है। हरद्वारीलाल शर्मा के अनुसार यह कलाकार के मानस में गर्भ की भांति पलकर किसी सुंदर वस्तु के रूप में प्रकट होती है।214 एक अन्य स्थान पर वे मानते हैं कि "कोई भी मानव अनुभूति रूपवती होने पर कलाकृति हो जाती है।"215 इस तरह हरद्वारीलाल शर्मा कलाकृति का प्रमुख कार्य आंतरिक अनुभूति का प्रत्यक्षीकरण मानते हैं। इसी का समर्थन करते हुए शिवकरणसिंह लिखते हैं, "कलाकृति अमूर्त्त को मूर्त, अस्पष्ट को स्पष्ट और परोक्ष को अपरोक्ष स्वरूप प्रदान करती है। वह कलाकार के अवबोध, विचार और अनुभूति की अद्भुत पत्रक सिद्ध होती है। इसका प्रमुख उप- जीव्य कलाकार की आंतरिक भावना और यथार्थ का मानस-प्रत्यक्ष होता है।"216 धर्मवीर भारती ने भी कलाकृति के सृजन में कलाकार की अंतःप्रेरणा को अत्य- धिक महत्त्वपूर्ण माना है। वे लिखते हैं, "कलाकृति चाहे वह शब्दों में हो या संगीतात्मक ध्वनियों में, चाहे रंगों और रेखाओं में या स्थापत्य में-किंतु उससे कलाकार के अंत- जंगत का निकटतम संबंध रहता है। प्रत्येक कविता या चित्र या गीत का उद्गम कला- कार के मानस से होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। वे, जो कला को या तो दैवी शक्तियों या सामाजिक शक्तियों द्वारा उद्भूत मानते रहे हैं, भी इतना तो मानते ही हैं कि ये शक्तियां भी मनुष्य के अंतर्जमत में संस्कार या अवतरण या अलग किसी रूप में पहले प्रतिष्ठित होती हैं और तभी उसकी रचनाप्रक्रिया को प्रभावित कर पाती हैं और कलाकार के अंतर्जगत में घटित होने वाली इस रचनाप्रक्रिया का मूल अंतःप्रेरणा है। जब तक कलाकार में अंतःप्रेरणा नहीं जगती, तब तक वह सजीव कलाकृति नहीं प्रस्तुत कर पाता।"217 इसी संदर्भ में डी० प्रेमपति 'पहल' के मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र विशेषांक में रूसी विचारक निकोलाई गार्वोलोविच चर्नोशेवस्की के यथार्थवाद की विकासप्रक्रिया का विवेचन करते हुए कलाकृति का मुख्य कार्य अन्य किसी उत्पाद के समान एक ऐसे जनसमूह को तैयार करना मानते हैं जो उसके (अर्थात् कलाकृति) अपने विलक्षण सौंदर्य के प्रति सचेत रहता है और जो उसके आस्वाद की सामर्थ्यं रखता है।"218 हिंदी में कलाकृति पर विस्तृत चर्चा नगेन्द्र अपनी पुस्तक 'भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका' में करते हैं। उन्होंने भारतीय काव्यशास्त्र में कलाकृति के स्वरूप और उसकी रचनाप्रक्रिया का जो विवेचन मिलता है, उसका गहरी आस्था से उद्घाटन किया है। उनके अनुसार "सौंदर्य का मूर्त रूप ही कलाकृति है।"219 कलाकृति पर अपनी कोई परिभाषा देने से पूर्व नगेन्द्र कलाकृति के प्रति भाव- वादी एवं वस्तुवादी दृष्टिकोणों का स्पष्टीकरण करते हैं तथा इन दोनों दृष्टिकोणों को अनिवाद से दूषित मानते हुए कलाकृति को अपने शब्दों में इस प्रकार स्पष्ट करते हैं- "कलाकृति अनुभवगम्य होने पर भी अनुभूति मात्र नहीं है, और आस्वादन का विषय होने पर भी, मूर्त्त वस्तु नहीं है। सामान्य विवेकसम्मत दृष्टिकोण यह है कि वह सर्जना- त्मक अनुभूति सीध शब्दों में भाव प्रेरित सर्जनात्मक कल्पना की मूर्त उपादानों द्वारा अभिव्यक्ति है जो निमित्त रूप से भावक की अनुभूति को उद्बुद्ध करती है।"220
कला और कलाकृति का व्यापार / 35
Page 50
इसके साथ ही वे कलाकृति के प्रमुख कलाओं के अनुसार पांच रूपों-वास्तु, मूर्ति, चित्र, संगीत तथा काव्य-का भी उल्लेख करते हैं। इन सभी कलाकृति रूपों में अपने-अपने मूर्त उपादानों की सीमा के भीतर, भावना की अभिव्यक्ति रहती है, जो इन्हें सामान्य उपयोग की भूमिका से ऊपर उठाकर कला की गरिमा प्रदान करती है। इन कलाकृतियों में वास्तुकला का रूप सर्वाधिक मूर्त और सघन होता है। इसकी अपेक्षा मूर्त्ति और चित्र में भावना की अभिव्यक्ति अधिक तथा मूर्त्त उपकरणों का योगदान कम होता है। संगीत में मूत उपकरणों की मूर्त्तता घटते-घटते नादतत्त्व तक सीमित रह जाती है और काव्य में आकर वह प्रायः नगण्य बन जाती है। क्योंकि काव्य के उपादान-सार्थक शब्द तो स्वयं ही किसी भाव या विचार के प्रतीक होते हैं। इस प्रकार नगेन्द्र ने कलाकृति की मूर्त्तता की कई कोटियां निर्धारित की हैं जिनका प्रसार त्रि-आयामी भौतिक पदार्थ से लेकर प्रतीक रूप शब्दार्थ तक होता है। रमेश कुंतल मेघ कलाकृति के उत्पत्ति की दृष्टि से विभिन्न पक्ष तथा विकास की दृष्टि से विभिन्न चरण स्पष्ट करते हुए इसके अंतर्गत रूप, विषयवस्तु, शैली तथा माध्यम आदि का उल्लेख सभी ललित कलाओं के संदर्भ में बड़े विस्तार से करते हैं।
कलाकृति के लक्षण किसी कलाकृति में कौन-कौन-से लक्षण पाये जाते हैं इसकी चर्चा हिंदी कलाचितकों ने बहुत कम की है। अगर कहीं इसका उल्लेख हुआ भी है तो वह केवल प्रसंग रूप में ही आया है। केवल हरद्वारीलाल शर्मा ने अपनी पुस्तक 'काव्य और कला' में कलाकृति को अनेक लक्षणों का विलक्षण आधारबिंदु मानते हुए उसमें निम्नलिखित प्रमुख लक्षण बताये हैं : 1. कलाकृति का प्रथम और प्रमुख लक्षण उन्होंने यह माना है कि उसमें 'कृतित्व' रहता है जो उसे मानव माध्यम से प्राप्त होता है। कलाकार अपनी मानवता को भूलकर और उससे अलग होकर 'सृजन' नहीं करता। अतएव उसकी कृति में मानवता की स्पष्ट छाप रहती है। 2. कलाकृति का दूसरा लक्षण यह है कि वह गोचर और साकार होते हुए भी वेदना और चेतना की विशेष स्फूर्ति प्रतीत होती है। कला की ये वेदना कृति में दो विशेष लक्षणों को संभूत करती है, एक, यह कृति में आभ्यंतरिकता लाती है, दूसरा यह कृति में संगति और संतुलन को प्रकृष्ट करती है। 3. 'कृति' संपूर्ण होती है, उसे केवल बुद्धि से नहीं, सर्वात्मना ग्रहण किया जा सकता है। उसे अवयवों में खंडशः नहीं किया जाता, क्योंकि कृति में अखंड आत्म- ज्योति या पिंडीभूत का मूर्त स्फुरण होता है। 4. कलाकृति देखने में परिच्छिन्न, पृथक् प्रतीत होते हुए भी अपरिच्छिन्न, समष्टि-चेतना को मूर्त करती है। अतएव इसमें सामाजिकता (Social milieu)
36/ सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 51
रहती है तथा उसके द्वारा जो अनुभूति जगती है, वह सहोपभोग, सहवेदना (Shared Experience) होती है। 5. कलाकृति का अंतिम लक्षण यह है कि वह गोचर, मूर्त होती है। उसका स्थूल कलेवर होता है, जिसे इंद्रियों के व्यापार से ग्रहण किया जाता है। रंग, रेखा, आकार, ध्वनि, स्पर्श आदि कृति के इंद्रियग्राह्य तत्त्व हैं जो हमारी 'अनुभूति' में प्रविष्ट होते हैं। परंतु जहां से कृतित्व का प्रारंभ होता है वहां इन इंद्रियग्राह्य तत्त्वों में 'अतींद्रिय' का प्रादुर्भाव होता है। अतएव कलाकृति में इंद्रियग्राह्य और अतींद्रिय तत्त्वों का समावेश रहता है, पार्थिव और अपार्थिव, मूर्त्त और अमूर्त्त, चेतन और अचेतन, दोनों के अद्भुत सम्मिलन के कारण कलाकृति कलाकार की पूर्ण और सजीव 'सृष्टि' कही जाती है।221 कलाकृति पर विद्वानों के किये गये चिंतन का अवलोकन करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि सौंदर्यबोधशास्त्र के बढ़ते हुए आयाम के संदर्भ में यह विषय हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं के लिए एक नया व श्रमपूर्वक प्रयास है। कलाकृति जिसमें कि अनेक कलाओं (वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीतकला, काव्यकला) का समावेश होता है तथा उत्पत्ति और विकास की दृष्टि से जिसकी परिधि में विभिन्न पक्ष छिपे रहते हैं, एक विस्तृत अर्थ की द्योतक सिद्ध होती है। रमेश कुंतल मेघ ने कलाकृति के अंतर्गत रूप, विषयवस्तु, माध्यम तथा शैली आदि का विवेचन उचित समझा है।222 अतः हम भी इसी संदर्भ में आगे बढ़ते हुए करमशः रूप, विषयवस्तु, शैली तथा माध्यम का उल्लेख करना उचित समझेंगे।
रूप
रूप : अर्थ मीमांसा 'रूप' शब्द का धातुमूलक अर्थ है-बनाना या गढ़ना। शब्दकोशों में इसी आधार पर इसके अनेक अर्थ किये गये हैं, जैसे-बनावट, गठन, आकृति, लक्षण, अवस्था, दशा, सौंदर्य आदि। 'रूप' के धातुमूलक अर्थ पर यदि गहराई से चिंतन करें तो 'बनने' का अर्थ किसी वस्तु का सर्वथा नया उत्पादन करना नहीं है, अपितु पूर्वप्राप्त सामग्री को ही नयी वस्तु में परिणत कर देना है। जैसे एक बढ़ई कुर्सी बनाते समय किसी सर्वथा नूतन पदार्थ का उत्पादन नहीं करता, अपितु लकड़ी को जोड़तोड़ कर ही उसे एक नयी वस्तु में बदल देता है। इससे मूल पदार्थ के तत्त्वों में कोई परिवर्तन उपस्थित नहीं होता अपितु उसकी बाह्य बनावट में ही अंतर आता है। अतः कहा जा सकता है कि विभिन्न पदार्थों में बनावट, गठन, आकृति, अवस्था, दशा आदि की दृष्टि से जो परस्पर अंतर है, उसी को हम 'रूप-भेद' कहते हैं या दूसरे शब्दों में-बनावट, गठन, आकृति, अवस्था, दशा आदि से संबंधित विशेषताओं को ही 'रूप' कहते हैं। कला और कलाकृति का व्यापार / 37
Page 52
उपर्युक्त अर्थ 'रूप' के अभिधेयात्मक प्रयोगों से संबंधित हैं तथा हिंदी के विभिन्न कोशों में वही अर्थ मान्य हैं।223 इसके अतिरिक्त लाक्षणिक अर्थ में 'रूप' का प्रयोग सौंदर्य के लिए भी किया गया है। सौंदर्यबोघशास्त्र में कलाओं की मीमांसा प्रायः इनके रूप के आधार पर की जाती है। सौंदर्यबोधशास्त्र के अनुसार कला में रूपविधान का लक्ष्य ही सौंदर्य की सृष्टि करना है। कला का मूल द्रव्य सुंदर हो, यह आवश्यक नहीं है किंतु उसे सुंदर रूप में प्रस्तुत करना नितांत आवश्यक है। कलाकार की कलाकारिता भी इसी में मानी जाती है कि वह असुंदर को भी सुंदर में बदल दे। इसी से हिंदी के कुछ सौंदर्यतत्त्ववेत्ता, जिनमें हरद्वारीलाल शर्मा224, रामचंद्र शुक्ल225, नगेन्द्र 226, सुरेशचंद्र त्यागी227, सूर्यप्रसाद दीक्षित228 तथा एस० टी० नरसिंहाचारी229 आदि का नाम उल्लेखनीय है, जो कला के प्रसंग में रूप को सौंदर्य की अभिव्यक्ति मानकर उसे लगभग एक-दूसरे का पर्यायवाची मान लेते हैं। संस्कृत साहित्य में भी 'रूप' शब्द का प्रयोग सौंदर्य के पर्याय रूप में ही हुआ है। महाकवि कलिदास ने अपने काव्य में अनेक स्थानों पर 'रूप' शब्द का प्रयोग सौंदर्य के अर्थ में ही किया है। यद्यपि ये दोनों अन्योन्याश्रित तत्त्व हैं, फिर भी परस्पर अभिन्न नहीं हैं। रूप मात्र वस्तुनिष्ठ है, जबकि सौंदर्य आत्मनिष्ठ भी होता है। रामानंद तिवारी ने सौंदर्य के पर्याय के रूप में 'रूप' शब्द का प्रयोग सबसे अधिक सीमित माना है। वे लिखते हैं, "एक प्रकार से जिस सौंदर्य के लिए 'रूप' का प्रयोग होता है वह भी सौंदर्य का एक विशेष और सीमित रूप ही है। प्रायः मनुष्यों, विशेषतः स्त्रियों के सौंदर्य के लिए 'रूप' शब्द का प्रयोग काव्य और लोक-व्यवहार में अधिक प्रचलित है। अन्य पदार्थों के सौंदर्य के लिए भी 'रूप' का प्रयोग संभव और समीचीन है, किंतु व्यवहार में वह अधिक प्रचलित नहीं है।"230 रामानंद तिवारी ने यहां सौंदर्य के पर्याय रूप में 'रूप' शब्द का प्रयोग सबसे अधिक सीमित माना है, वहां उन्होंने सौंदर्य और रूप दोनों शब्दों के व्यापक अर्थ का अनुसंधान करते हुए इनके इस पर्याय भाव को अधिक व्यापक रूप में भी प्रमाणित किया है ।231 लेकिन फिर भी 'रूप' का प्रयोग सौंदर्य के अर्थ में करना भ्रमोत्पादक सिद्ध होता है इसलिए सभी कला- चिंतकों ने इस अर्थ को सौंदर्यबोधशास्त्र में स्वीकार नहीं किया है। उनका तर्क है कि "कलात्मक सौंदर्य में निश्चित ही रूप का बहुत बड़ा योगदान रहता है किंतु इसका यह तात्पर्य नहीं है कि द्रव्य या विषय का कोई महत्त्व नहीं होता है। हमारे विचार से विषय और रूप दोनों के सहयोग से ही कला में सौंदर्य की सृष्टि होती है, अतः रूप को कला का एक ही पक्ष माना जा सकता है, उसे सपूर्ण सौंदर्य (या आकर्षण शक्ति) का पर्याय- वाची नहीं कहा जा सकता।"232 रूप : विभिन्न परिभाषाएं हिंदी में रूप पर सर्वाधिक चर्चा हरद्वारीलाल शर्मा ने की है। उन्होंने अपनी पुस्तक 'सौंदर्यशास्त्र' में 'रूप' को 'सौंदर्य' के तत्त्व के रूप में विश्लेषित करते हुए, संकुचित तथा व्यापक दोनों दृष्टियों से परिभाषित किया है। उनके अनुसार संकुचित दृष्टि से
38 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 53
तो केवल चक्षु के द्वारा ही रूप का निरूपण किया जाता है, किंतु व्यापक अर्थ में 'रूप' का अर्थ विन्यास, संयोजन, संगठन, संघटना अथवा व्यवस्था किया जा सकता है जिससे अनेकता में 'एकता' का बोध होता है।"233 अपनी अन्य 'काव्य और कला' तथा 'सुंदरम्' में भी वे रूप को परिभाषित करते हैं : 1. "रूप' कला का प्राण है जो गोचर माध्यम में प्रकट होकर, उसे उत्प्राणित कर अर्थवत्ता (Significance) देकर, स्वयं अगोचर रहते हुए भी मन की सौंदर्याधा- यिनी कल्पना की परिभाषा और स्रोत है।"234 2. "अंगों के कुशल विन्यास में जिस 'अतिशय' तत्त्व का उदय होता है वही रूप है।"235 रामानंद तिवारी ने इसे अभिव्यक्ति का माध्यम कहा है। उनके शब्दों में "कोई भी भौतिक सत्ता अथवा मानसिक तत्त्व (Matter) जिस माध्यम के द्वारा अपने को व्यक्त करता है उसे 'रूप' (Form) कह सकते हैं।"236 गणपतिचंद्र गुप्त ने रूप शब्द के अर्थ को स्पष्ट करते हुए भौतिक विज्ञान, मनोवैज्ञानिक, साहित्यिक तथा सौंदर्यबोधशास्त्रीय आदि सभी दृष्टिकोणों से उसकी व्याख्या की है। सौंदर्यबोधशास्त्रीय दृष्टिकोण से रूप की व्याख्या करते हुए वे "विषय- वस्तु की अन्व्रिति, संयोजना, अभिव्यजना या प्रस्तुतीकरण के ढंग को ही कला में रूप मानते हैं।237 नीहाररंजन राय के अनुसार 'रूप' विचार ग्रहण करने का सिद्धांत या तकनीक है।238 रमेशकुंतल मेघ 'रूप' की रचना तब मानते हैं जब कोई कलाकार माध्यम या पदार्थ (मोम, पत्थर, लकड़ी, कागज, रंग आदि) को आकृति प्रदान करता है। इस प्रकार उनके 'रूप' का जाना-माना अभिप्राय 'कलाकृति' की आकृति है जो इंद्रियबोधात्मक (सेंसिटी) है और प्रस्तुत (प्रेजेंटेड) है।"239 कला अथवा कलाकृति में रूप का महत्त्व सामान्यतः हम यह मानते हैं कि कला में आकृति या रूप की जो विशेषता अनिवार्य रूप से विद्यमान रहती है उसका ही प्रभाव श्रोता एवं द्रष्टा के मन पर पड़ता है और उसी के फलस्वरूप वह मानसिक अवस्था उपस्थित होती है, जिसके अभाव में कला का रसास्वादन संभव ही नहीं। जब तक हम किसी प्रासाद, किसी चित्र अथवा मूर्ति के रूपसौष्ठव को नहीं पहचान पाते तब तक हम उनसे आनंद नहीं प्राप्त कर सकते। इस प्रकार हम इस परिणाम पर पहुंचते हैं कि कला अथवा कलाकृति के समुचित रसा- स्वादन के लिए रूप-विधान का सहज अथवा प्रबुद्ध ज्ञान महत्त्वपूर्ण ही नहीं अपितु अनिवार्य भी है। हिंदी के लगभग सभी सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने रूप के इस महत्त्व को स्वीकार किया है तथा इसे 'कलाकृति' में प्रवेश करने का 'सिंहद्वार' माना है।240 कला तथा कलाकृति में रूप के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए हरद्वारीलाल शर्मा यह मानते हैं कि रूप से निरूपित होकर ही कलाकार की प्रेरणा सफल और उसकी 'मनीषा' साकार होती है।241 एक अन्य स्थान पर कलाकृति में रूप के महत्त्व को अशंकनीय मानते हुए वे कला और कलाकृति का व्यापार / 39
Page 54
स्पष्ट करते हैं कि "रूप ही संगति, संतुलन आदि का आश्रय होता है। रूप के ग्रहण और अवगाहन में इंद्रिय, शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के अनेक उच्चस्तरीय व्यापार संचरित होते हैं जिसे हम रसावगाहन क्रिया (Aesthetic activity or Self activity) कहते हैं।242 'रूप' के इसी महत्त्व की ओर 'समालोचक' पत्रिका के सौंदर्य- शास्त्र विशेषांक में रामअवध द्विवेदी भी इंगित करते हैं। वे अपने लेख 'प्रभाव ग्रहण की प्रक्रिया' में यह धारणा व्यक्त करते हैं कि अशिक्षित लोग भी संगीत अथवा कला से प्रभावित होते हैं, किंतु यह तभी संभव है जब उनमें रूपबोध की नैसर्गिक क्षमता रहती है। कला में 'रूप' केवल सौष्ठव का कारण ही नहीं है, वह आनंदप्राप्ति का एक अनिवार्य साधन भी है। जब कभी कला की आकृति में वैषम्य होता है, उस समय हमारी आस्था को ठेस लगती है और हमारा सोया हुआ अविश्वास जाग उठता है। यदि किसी उपन्यास का पूर्वार्द्ध निरूपण की एक पद्धति प्रयोग में लाता है और उत्तरार्द्ध दूसरी, तब निश्चित है कि कलाकृति असुंदर और अग्राह्य हो जायेगी। यह आवश्यक नहीं कि कला में प्रयुक्त प्रत्येक तथ्य जीवन की कसौटी पर खरा उतरे, परंतु यह अनिवार्य रूप से वांछनीय है कि कला का आंतरिक तारतम्य और सामंजस्य नष्ट न होने पाये।'243 रमेशकुंतल मेघ ने कलाकृति में रूप का महत्त्व इसलिए भी माना है कि कलाकृति में रूप की विशिष्टता कलाकार के मंतव्य को उद्घाटित करने में सफल होती है।244 नीहाररंजन राय ने कलाकृति में 'रूप का महत्त्व इसलिए माना है क्योंकि वह तीक्ष्ण और प्रभावशाली विधि से विषयवस्तु के संपूर्ण अर्थ को सामने लाने में सफल होता है। उनके शब्दों में, "रूप का कार्य विषयवस्तु के अर्थ को सामने लाना है, दूसरे शब्दों में यदि कहें तो रूप विषयवस्तु को पूरी तरह व्यक्त और अव्यक्त अर्थ से, जैसा कि स्वयं कलाकार अनुभव करता है, युक्त करने का प्रयास करता है। इस प्रकार रूप एक उद्देश्य के लिए साधन का काम करता है। किसी भी कलाकृति में यदि रूप माध्यम के अर्थ में कला की तर्कसंगत कार्यप्रणाली का अतिक्रमण करता है और आवश्यकता से अधिक जोर देता है तो वह कलाकृति उस दबाव और अतिक्रमण के अनुसार अपने अंतिम उद्देश्य को उपलब्ध कर सकने में विफल मानी जाती है।"245 'रूप' शब्द के अर्थ, उसकी स्वरूप व्याख्या, परिभाषा तथा कला में रूप के महत्त्व को निर्धारित करते हुए हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने 'कला में रूप-भेद के कारणों'248, 'रूप गठन के तत्त्वों'247, 'रूप क विभिन्न पहलुओं'248, 'रूप के तकनीकी पक्षों'249, 'रूप के सौंदर्यबोधात्मक कार्यों और प्रकार्यों250 तथा 'रूप के प्रति पाश्चात्य विद्वानों के दृष्टिकोणों को भी विस्तृत रूप से जांचने'251 का पूर्ण प्रयास किया है। लेकिन 'रूप' के इन पक्षों का उल्लेख प्रासंगिक रूप में ही हुआ है अतः यहां इनकी चर्चा नहीं की गयी है। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि 'रूप' पर हिंदी में सर्वाधिक चर्चा हरद्वारीलाल शर्मा ने की है। इसके अतिरिक्त रमेशकुंतल मेघ ने भी 'रूप' को विवेचित करने के लिए सभी कलाओं के रूप पक्ष को अत्यंत विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करते हुए, विभिन्न 40 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 55
आकृतियों तथा तालिकाओं की महायता ली है। कदाचित् यह कहा जाये कि उन्होंने रूप को विवेचित करने हुए किसी भी विषय को अछूता नहीं छोड़ा है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। विषयवस्तु वैसे तो प्रत्येक कलाकृति वस्तुतः एक अखंड सृष्टि होती है परंतु उसका विश्लेषण करते समय व्यावहारिक सुविधा के लिए हम उसके दो पक्ष मान लेते हैं। एक रूप, जिसकी चर्चा हम कर चुके हैं तथा दूसरी विषयवस्तु, जिसमें कि कलाकार का जीवन-विषयक चिंतन आता है। दीर्घ काल से ही कला में रूप को विषयवस्तु का तथा विषयवस्तु को रूप का सहायक माना जाता रहा है तथा इन्हें किसी भी कला-उत्पादन के अर्थ प्रकट करने के लिए उत्तरदायी समझा जाता रहा है। हिंदी कला तथा सौंदर्य-चिंतकों का इन दोनों के अंतःसंबंध को लेकर क्या दृष्टिकोण रहा है, इसे जानने से पूर्व उनकी विषयवस्तुसंबंधी धारणाओं को जानना आवश्यक होगा। विषयवस्तु कला अथवा कलाकृति का सबसे प्रधान तत्त्व माना जाता है। फिर भी हिंदी के कलामनीषियों ने विषयवस्तु को जानने और उसको परिभाषित करने का प्रयत्न कम किया है। 'मानक हिंदी कोश' में इसे परिभाषित करते हुए यह माना गया है कि "कल्पना, विचार आदि के रूप में रहने वाला वह मूल तत्त्व जिसे आधार मानकर कोई कलात्मक या कौशलपूर्ण रचना की गयी हो, किसी कृति का आधारिक और मूल विचार- विषय252 कहलाता है।" 'मानविकी पारिभाषिक कोश' के अनुसार विषयवस्तु उसे कहते हैं, जिसमें कथा एवं लेखक का जीवन-विषयक चिंतन आता है।"253 शिवकरण सिंह यद्यपि विषयवस्तु की कोई निर्विवाद परिभाषा करना कठिन समभते हैं तथापि उन्होंने विषयवस्तु को 'कलात्मक विन्यास की विशिष्ट शैली द्वारा अभिव्यक्त विचार और भाव का तत्त्व' माना है।254 कलाकार के लिए विषयवस्तु का क्या महत्त्व है, इसे स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं, "कला की विषयवस्तु से उसका 'आत्म' ही ध्वनित नहीं होता, अपितु वह वस्तुगत स्वरूप भी स्पष्ट होता है जिसका कलाकार ने अपने आत्मविकास में उपयोग किया है। सामान्य कोटि के कलाकार के लिए आत्माभिव्यक्ति अपने को प्रकट करने का प्रमुख साधन है, पर असामान्य और उत्कृष्ट कोटि का कलाकार इसी के माध्यम से व्यापक और विश्वजनीन सत्यों को अभिव्यक्त करता है।"255 कलाकार अपनी विषयवस्तु का चुनाव किस प्रकार करता है तथा इससे उसका क्या संबंध है, इस पर शिवकरण सिंह विस्तृत चर्चा करते हैं। उन्होंने कलापूर्ण चिंतन (Artistic Contemplation) को विषयवस्तु के चुनाव में अत्यधिक सहायक माना है। कलापूर्ण अथवा कलात्मक चिंतन से उनका अभिप्राय है कला की आवश्यकताओं को हृदयंगम करके किसी विषय विशेष पर एकोन्मुख अथवा निर्विशेष भाव से सोचना। इस प्रकार का चिंतन विधायक कल्पना की करोड़ में पलता और उसी से संवद्धित होता कला और कलाकृति का व्यापार / 41
Page 56
है। यह विशेषतः चिंतन की प्रकृति को घनीभूत और तथ्यात्वेषी बनाती है। इससे कला- कार में साक्षात्कार की अद्भुत क्षमता उत्पन्न होती है। कलाकार की विधायक कल्पना जिस अनुपात में सघन और तीव्र होती है उसी अनुपात में उसकी कलात्मक उपलब्धि भी महत्त्वपूर्ण होती जाती है। विधायक कल्पना शून्य में नहीं सक्रिय होती, इसकी क्रियाशीलता की कुछ आवश्यक शर्तें होती हैं। ये शतें संसृति के विविध स्परूपों द्वारा पूरी की जाती हैं। विधायक कल्पना का क्षेत्र संसृति का विशाल क्षेत्र होता है। इसी के माध्यम से कलाकार व्यापक परिवेश और परिप्रेक्ष्य से संबंधित अनुभूति वैविध्य को हस्तामलकवत् प्राप्त कर लेता है।256 नीहाररंजन राय के शब्दों में, "विषयवस्तु वह चीज है जो कला के सुनिश्चित और अव्यक्त अर्थात् प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों अर्थ निष्पन्न करती है।"257 उनके अनुसार, "कोई भी विषय चाहे वह कोई तथ्य (वस्तु) हो या चिंतन और कल्पना की उपज (अलंकार), भावात्मक मनःस्थिति हो या अनुभूति (रस)-जब तक प्रकृति के साथ उसका द्वंद्व नहीं होता अर्थात् जब तक प्राकृतिक और वास्तविक जीवन के संबंध में उसे रखा जाता है, वह कलाकार की विषयवस्तु का प्रयोजन पूरा करता है।"258 विषयवस्तु को 'काव्य के घटक तत्त्व' के अंतर्गत विवेचित करते हुए निर्मला जैन का यह कथन है कि पाश्चात्य काव्य-चिंतन में विषयवस्तु और रूप का प्रचलन मूलतः चित्रकला की विवेचना में ही प्रचलित था जो कि काल-क्र्म में आकर संपूर्ण ललित कलाओं के विवेचन के लिए स्वीकृत हो गया। आगे चलकर लेखिका ने भारतीय काव्य- शास्त्र के घटक शब्द और अर्थ के आधार पर भारतीय तथा पाश्चात्य मनीषियों के मतानुसार वस्तु अर्थात् विषयवस्तु का स्पष्टीकरण भी किया है।259 निर्मला जैन की उक्त विचारधारा का समर्थन रामलखन शुक्ल ने भी अपनी पुस्तक 'भारतीय सौंदर्य- शास्त्र का तात्त्विक विवेचन एवं ललित कलाएं' में किया है।260 रमेशकुंतल मेघ ने उत्पत्ति की दृष्टि से कलाकृति के दो पक्ष रूप और विषय- वस्तु मानते हुए 'अथातो सौंदर्य जिज्ञासा' में 'कलाकृति' वाले अध्याय में पांचों कलाओं की विषयवस्तु और उसके मुख्य आधारों की चर्चा की है तथा वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि कलाओं में विषयवस्तु की अपनी-अपनी खूबियां होती हैं।261 इनसे पूर्व रामविलास शर्मा ने भी 'समालोचक' पत्रिका के एक लेख में प्रासंगिक रूप से विषयवस्तु का उल्लेख करते हुए यही धारणा व्यक्त की थी कि प्रत्येक कला से एक ही विषयवस्तु की मांग करना अनुचित है। वे लिखते हैं, "यह सही है कि विषयवस्तु नियामक है, उसकी आवश्यकताओं के अनुसार रूप निर्मित होता है किंतु यह भी सही है कि रूप विषयवस्तु का नियमन करता है। किसी कलाकृति में किस कोटि का अनुभव अथवा सौंदर्य निहित होता है, यह उसके रूप और माध्यम पर भी निर्भर होता है। स्थापत्य और चित्रकला में चाहे कितना साम्य हो, स्थापत्यकला संगीत की भूमिका पूरी नहीं कर सकती। साहित्य के क्षेत्र में उपन्यास जिस तरह सामाजिक समस्याओं का चित्रण कर सकते हैं, उस तरह गीत नहीं, और जब करेंगे तब उनकी परिणति चिंतन के गद्य में हो जायेगी। 42 / सौंदर्यबोधशात्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 57
रूप और विषयवस्तु के संबंध में भ्रांति भाववादी विचारकों में ही नहीं मिलती। कभी- कभी हमें समाजवादी लेखकों में भी इस तरह के विचार मिलते हैं। कला में मानव श्रम का चित्रण होना चाहिए अथवा कलात्मक कार्यवाही को समाजवादी निर्माण का अभिन्न अंग बन जाना चाहिए। यदि कोई चित्रकार किसी प्राकृतिक दृश्य का चित्र आंकता है तो उससे समाजवाद की रचना में कितनी सहायता मिल सकती है ? उतनी ही जितनी अजंता के चित्रों से। इसलिए प्रत्येक कला से एक ही विषयवस्तु की मांग करना अनुचित है।"262 विषयवस्तु पर विद्वानों के उक्त मतों को देखने के उपरांत हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि कलाकृति के इस पक्ष (विषयवस्तु) का विवेचन-विश्लेषण उस प्रकार से नहीं हुआ है जिस प्रकार से रूप पक्ष का हुआ है। कलाकृति में रूप और विषयवस्तु का पारस्परिक संबंध यद्यपि हिंदी में कला विचारकों की रूप और विषयवस्तु पर की गयी स्वतंत्र चर्चा हमें इस बात का स्पष्ट संकेत करती है कि कलाकृति में रूप और विषयवस्तु दो अलग-अलग पक्ष हैं तथापि कुछ कलाविचारकों ने इन दोनों के पारस्परिक संबंध को लेकर ऐसी जिज्ञासाएं भी उठायी हैं जो इन्हें अन्योन्याश्रित अथवा एक-दूसरे के पूरक सिद्ध करती हैं। कलाकृति में रूप और विषयवस्तु के पारस्परिक संबंध के विषय में एक आधार- भूत प्रश्न निर्मला जैन ने यह उठाया है कि क्या किसी पूर्ण कलाकृति में इस प्रकार का श्रेणी विभाजन संभव या अनिवार्य है ? और यदि है तो इस प्रकार के विभाजन की कोई उपयोगिता या औचित्य है अथवा नहीं ।263 पश्चिम के सौंदर्यबो शास्त्र के इति- हास में पाश्चात्य मनीषियों ने इस प्रश्न के जो उत्तर अनेक रूपों में दिये हैं उनकी विस्तृत चर्चा भी निर्मला जैन ने की है।264 पाश्चात्य मनीषियों ने कभी कलाकृति में इस प्रकार का विभाजन कर वस्तु और रूप दोनों के महत्त्व पर समतुल्य बल दिया है तो कभी कलाकृति को रूप मात्र कहकर वस्तु पक्ष को बिलकुल नकार दिया है। कलाकृति को रूप-मात्र बनाने की यह प्रवृत्ति रूपवादी आलोचकों में अत्यंत प्रबल रही है। उन्होंने कलाकृति के प्रभाव से वस्तु-तत्त्व को पूर्णतः बहिष्कृत कर दिया। सौंदर्यानु- भूति के लिए वे वस्तु-तत्त्व की प्रयोजनीयता को अस्वीकार करते हुए 'विशुद्ध रूप' का महत्त्व प्रतिपादित करते हैं। किसी संपूर्ण कलाकृति के 'वस्तु' और 'रूप' जैसे दो भागों में विभाजन की उपयोगिता पर भी विचारकों ने प्रश्नचिह्न लगाया है। उनका कथन है कि इस प्रकार का विभाजन शिक्षा के निमित्त तो उपयोगी हो सकता है, परंतु कला- कृति के आस्वाद के निमित्त कृति को विभाजित करना न संभव है और न उपयोगी। विश्लेषण-व्याख्या के निमित्त यह शिक्षक का साधन हो सकता है, आस्वाद के लिए ग्राहक या आलोचक का नहीं। हिंदी में विषयवस्तु और रूप के पारस्परिक संबंध को लेकर जिन कलाचितकों ने चिंतन किया है उनमें रामविलास शर्मा, शिवबालक राय, नीहाररंजन राय, रामकीर्ति
कला और कलाकृति का व्यापार / 43
Page 58
शुक्ल, निर्मला जैन तथा रमेशकुंतल मेघ का नाम उल्लेखनीय है। रामविलास शर्मा ने रूप और विषयवस्तु को कलाकृति में अन्योन्याश्रित मानते हुए लिखा है, "यह सही है कि विषयवस्तु नियामक है, उसकी आवश्यकताओं के अनुसार रूप निर्मित होता है किंतु यह भी सही है कि रूप विषयवस्तु का नियमन करता है। किसी कलाकृति में किस कोटि का अनुभव अथवा सौंदर्यबोध निहित होता है, यह उसके रूप तथा माध्यम पर भी निर्भर होता है।"265 आगे वे रूप को विषय- वस्तु का अभिन्न अंग मानते हुए स्पष्टतः लिखते हैं कि "कलात्मक रूप कोई परिधान नहीं है जो विचारों को पहना दिया जाये। यह विषयवस्तु का अभिन्न अंग होता है।"266 शिवबालक राय ने कलाजगत में रूप और विषयवस्तु दोनों की ही सत्ता स्वीकार करते हुए यह लिखा है कि "कला एक प्राणवंत आवयविक वस्तु है। उसमें वस्तु भी है और रूप भी। सच पूछिए तो दोनों वहां दोपन खोकर एकरस हो जाते हैं।"267 नीहाररंजन राथ ने रूप को विषयवस्तु के संपूर्ण अर्थ को सामने लाने में अत्य- धिक सहायक माना है। उनके अनुसार तो बिना रूप के विषयवस्तु का संपूर्ण अर्थ स्पष्ट ही नहीं किया जा सकता। उनका यह कथन है कि कलाकृति में रूप और विषयवस्तु को हम केवल वहीं अलग-अलग करते हैं जहां पर हमें कलाकृति के विश्लेषण और समझ की आवश्यकता पड़ती है। रूप और विषयवस्तु की अभिन्नता को दर्शाती हुई उनकी ये पंक्तियां द्रष्टव्य हैं-"विषयवस्तु वह चीज है जो कला के सुनिश्चित और अव्यक्त अर्थात् प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों अर्थ निष्पन्न करती है। जिस तरीके और पद्धति से यह अर्थ सामने आता है वह उसका 'रूप' है जो स्वयं विषयवस्तु की ही तुलना में अनंत और विविध है। फिर भी कलानुभव में, स्वयं कलाफार के संदर्भ में भी विषयवस्तु और रूप व्यावहारिक स्तर पर अविभाज्य है, रचनात्मक कल्पना और विचार इन दोनों को एक आम सहकर्म की प्रक्रिया में संबद्ध रखते हैं क्योंकि वस्तु और उनके अर्थ कला- कार के समक्ष उसकी रूप धारणा के अनुसार ही स्वयं को पेश करते हैं। वह चीजों को अर्थात् वस्तु को अपनी वंशगत और उपाजित धारणाओं के ही संदर्भ में देखता है। उलटे वस्तु भी उसकी रूप संबंधी धारणा को प्रभावित करती है और वास्तव में ऐसा होता है इसलिए किसी भी विशेष कलात्मक क्रियाशीलता और कला उत्पादन में विषयवस्तु और रूप एक प्रत्यक्ष इकाई का गठन करते हैं। परंतु विश्लेषण और समझ के लिए वे अलग-अलग विश्लेषण योग्य रखे जाते हैं।"268 इन दोनों के पारस्परिक संबंध पर रामकीरति शुक्ल की भी यह धारणा है कि "एक कलाकृति में रूप और विषय दो भिन्न उपादान नहीं हैं जो रूप के विषय के प्रति अधिक अनुकूल होने पर अलग- अलग शक्तिशाली हो जाते हैं। ये वास्तव में एक ही तत्त्व की दो अलग अभिव्यक्तियां भर हैं।"269 रमेशकुंतल मेघ ने भी कलाकृति में इन दोनों पक्षों को परस्पर विरोधी नहीं अपितु एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा है।270 निर्मला जैन के अनुसार किसी भी कलाकृति में वस्तु और रूप के मध्य संबंध तथा परस्पर निर्भरता का प्रश्न बहुत दूर तक उस कला की प्रकृति और उनके मध्यवर्ती भेद पर निर्भर है।271 निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं में रूप और 44 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 59
विषयवस्तु के पारस्परिक संबंध को लेकर उस रूप में मतभेद नहीं रहा है, जिस प्रकार कि पाश्चात्य सौंदर्यत्रोधशास्त्र में हमें दृष्टिगोचर होता है। हिंदी के लगभग सभी सौंदर्य तथा कला-विचारक यह मानकर चले हैं कि कलाकृति में रूप और विषयवस्तु के विभाजन का आश्रय केवल कलाकृति के आस्वाद की व्याख्या विश्लेषण के लिए ही उपयोगी सिद्ध होता है। वस्तुतः ये दोनों कलाकृति में एक-दूसरे के पूरक अथवा अन्यो- न्याश्रित रहते हैं। शैली सौंदर्य बोधशास्त्र के अतर्गत 'शैली' विषय को बहुत कम विद्वानों ने वर्णित किया है। हिंदी शब्दकोशों272 में इस शब्द का अभिप्राय किसी भी कार्य के करने अथवा कोई चीज प्रस्तुत या प्रदर्शित करने का कलापूर्ण ढंग, तरीका, परिपाटी, प्रणाली, रीति, प्रथा आदि माना गया है। साहित्य के संदर्भ में इसका अर्थ 'अभिव्यक्ति का वह धर्म जो उसे सौंदर्य और प्रभविष्णुता का वैशिष्ट्य प्रदान करता है' स्त्रीकार किया गया है।273 'हिंदी साहित्य कोश' में इसे गुण मानते हुए इसकी परिभाषा इसी प्रकार दी गयी है। "शैली अनुभूत विषयवस्तु को सजाने के उन तरीकों का नाम है, जो उस विषयवस्तु की अभिव्यक्ति को सुंदर एवं प्रभावपूर्ण बनाते हैं।"274 कृष्णलाल शर्मा 'शैली' की व्युत्पत्ति 'शील' शब्द से मानते हैं जिसका अभिप्राय है स्वभाव ।275 'शील' शब्द के इस अर्थ के कारण ही कतिपय चिंतक कृति में 'शैली' की चर्चा करते हुए कृतिकार के अपनत्व तथा निजत्व को ढूंढ़ते हैं। हरद्वारीलाल शर्मा तो यह मानते हैं कि कलाकार की मनस्विता, निजता अथवा अपनापन कृति में प्रकट न हो, यह संभव ही नहीं, उनके अनुसार कृति में कृतिकार का जो अपनापन, निजस्व प्रकट होता है वही शैली कहलाता है।276 रमेशकुंतल मेघ भी यह धारणा व्यक्त करते हैं कि कृति में शैली ही कलाकार के व्यक्तित्व को प्रतिबरिंबित करती है।277 कलाकृति में शैली का क्या महत्त्व है तथा उसका शिल्प से क्या संबंध है, इसका उल्लेख ब्रजभूषण पांडेय ने 'सम्मेलन पत्रिका' के कला-अंक में किया है। अपने लेख 'कला : शिल्प शैली' में वे लिखते हैं कि 'अभिव्यक्ति अथवा कलाकृति में शिल्प और शैली को वही स्थान प्राप्त है जो हमारे व्यक्तित्व में या हमारे अस्तित्व के प्रत्यक्षीकरण में शरीर और इंद्रियों को प्राप्त है। जैसे प्रत्यक्ष रूप में हमारी आत्मा शरीर और इंद्रियों के माध्यम से प्रकट होती है। शरीर और इंद्रिय का परस्पर जो संबंध है शिल्प और शैली का भी वही है।"278 इस प्रकार ब्रजभूषण पांडेय कलाकृति के निर्माण में अर्थात् अनुभूति के अभिव्यक्तिकरण में शैली का महान योग मानते हैं। उनके अनुसार किसी भी कलाकृति के उद्देश्य की पूर्ति में इससे पर्याप्त सहायता मिलती है। कलाकृति में शैली की सीमाओं को निर्धारित करते हुए वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि "कभी-कभी शैली की जटिलता कलाकृति की उपयोगिता को नष्ट कर देती है। इसे कलाकार की अक्ष- मता ही माना जायेगा। कोरी अभिव्यक्ति के रूप में ही कलाकृतियों का मूल्य नहीं है। कलाकृति जितने ही विस्तृत पैमाने पर और जितने ही सहज-सरल ढंग से दूसरी कला और कलाकृति का व्यापार / 45
Page 60
चेतना में वह अनुभूति जागृत कर देती है, वही उतनी ही उपयोगी और सार्थक है। शिल्प और शैली कलाकृति की इस उपयोगिता के लिए उत्तरदायी है। शैली और शिल्प का यह काम है कि सौंदर्यानुभूति में कलाकृति के स्थूल उपादान कारण पत्थर आदि को विघ्न रूप में, व्यवधान रूप में न उपस्थित होने दे।'279 किसी कलाकार के लिए शैली का क्या महत्त्व है, इसका उल्लेख शिवकरणसिंह भी करते हैं। उनकी यह धारणा है कि कलाकार संवेदनशील व्यक्ति होता है। संसुति के विविध क्रिया-कलाप उसकी अनुभूति को आंदोलित करते रहते हैं। तरह-तरह की आशा-निराशा, अभिलाषा, आकांक्षा उसके मानस को मथते रहते हैं। इसके परिणाम- स्वरूप वह अपनी अनुभूति और अंतर्दृष्टि को-अपने आंतरिक तनाव को संप्रेषित करके इनसे मुक्त होना चाहता है। उसकी शैली इन्हीं विचारों को अभिव्यक्त करने का प्रमुख साधन सिद्ध होती है।"280 कला और साहित्य के क्षेत्र में हमें जो विभिन्न शैलियां दिखाई देती हैं। उसके पीछे भी जगदीश गुप्त ने यही कारण माना है कि कलाकार अपनी अनुभूति को ठीक-ठीक और विशिष्ट रूप में अवतरित करने के लिए ही तरह-तरह के प्रयोग करने लगता है जिसके परिणामस्वरूप विविध शैलियों का अजस्र स्रोत फूट पड़ता है ।281 रमेशकुंतल ने शैली पर सर्वाधिक चर्चा की है। उन्होंने शैली को प्रधानतः स्वाश्रित सौंदर्य प्रभाव का पहला अनुशासन माना है। उनके अनुसार इसी अनुशासन पर आधारित होकर और इसी के निर्देश से पूरी कलाकृति का समग्र प्रभाव पड़ता है। अतः शैली 'रूप' और विषयवस्तु, कलाकार और समूह, देह और काल, राष्ट्र और युग, माध्यम और प्रयोजन की श्रेणियों में परिव्याप्त हैं।1282 इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वे शैली को रूप तथा तकनीक के बेहद नजदीक मानते हैं। शैली के लिए पदार्थ तथा रूप का क्या महत्त्व है ? इस प्रश्न को उठाते हुए वे लिखते हैं, "शैली के लिए पदार्थ की अपेक्षा रूप का अधिक महत्त्व है। हम रूप की धारणा के अनुसार पहले से ही पदार्थ चुनते या चुन सकते हैं तथा एक ही रूप को विभिन्न पदार्थों में तथा विभिन्न शैलियों में रूपायित भी करते या कर सकते हैं। पदार्थ, रूप तथा शैली का संबंध इसी प्रकार का है। अतः यदि रूप कुछ दी गयी अवस्थाओं में स्थिरांक है, तो शैली उसका परिवर्तनांक।"283 शैली और विषयवस्तु के पारस्परिक संबंध का उल्लेख भी उन्होंने किया है। उनकी यह धारणा है कि "शैली और विषयवस्तु की संबंधात्मकता बेहद जटिल है। मूलतः दोनों परस्पर पूरक और अन्योन्याश्रित हैं। विषयवस्तु की दृष्टि से 'एक समस्त संस्कृति के सामूहिक चिंतन तथा संवेगात्मक प्रवाह का प्रतिबिब या प्रक्षेपण शैली में ही होता है। अतः शैली इनका मूर्त आधार है। एक संस्कृत के एक विशेष युग में तदनु- रूप एक प्रधान शैली या उपशलियों या स्वीकृति शैलियों का एक मापन क्षेत्र होता है। एक ही विषयवस्तु का विभिन्न शैलियों में तथा विभिन्न विषयवस्तुओं का एक ही शैली में अंकन ऐतिहासिक विपर्यय का परिणाम है। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि
46/ सौंद्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 61
विषयवस्तु के अनुरूप ही नवीन शैली का उत्पादन, परंपरागत शैली का परिष्कार तथा अनुकूल शैली का उत्कर्ष होता है।"284 शैली का पदार्थ और रूप तथा विषयवस्तु के साथ संबंध स्पष्ट करते हुए रमेशकुंतल मेघ ने शैली का 'इतिहास' और 'काल' में भी प्रवाह दर्शाया है। शैली संबंधी निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए वे लिखते हैं, "शैली के द्वारा हम कला के उद्गम और समय (काल) तथा 'स्थान' (देश) तो जान ही सकते हैं, कलाकार का भी अनुमान कर सकते हैं। शैलियों का वितरण देश तथा काल में आद्यंत होता है।"285 शैली पर प्रासंगिक रूप से चर्चा हिंदी में कृष्णलाल शर्मा भी करते हैं। अपनी *स्तक 'साहित्य अन्य कलाओं के संदर्भ में' वे शैलीगत प्रवृत्तियों के आधार पर कलाओं की परस्पर तुलना करते हुए, पश्चिम में शैली के प्रयोग की दो परंपराओं का उल्लेख करते हैं। 286 इनमें एक परंपरा प्लेटो की है तथा दूसरी अरस्तू की। प्लेटो की चिंतन- पद्धति के अनुयायी शैली को अभिव्यक्ति का एक गुण मानते हैं, अर्थात् वे शैली को अभिव्यक्ति का मूलतत्त्व मानते हैं। अरस्तू की चिंतन पद्धति के अनुयायी यह मानते हैं कि जितनी कृतियां हैं उतनी ही शैलियां हो सकती हैं तथा इसके व्यापक वृत्त में कुछ सौ सालों का युग और संपूर्ण विश्व भी समा सकता है और इसके लघुतम रूप में केवल एक कृति की ही विशेषता ली जा सकती है। इस वैविध्य को देखते हुए ही कृष्णलाल शर्मा सुविधा के विचार से शैली के निम्नलिखित सात वर्ग भी करते हैं-रचयिता के नाम से; समय अथवा युग के नाम से; माध्यम के नाम से; विषय के आधार पर; प्रदेश के आधार पर; सामाजिकता के आधार पर तथा उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ।287 सारांश रूप में हम यह कह सकते हैं कि भले ही हिंदी के सभी कलामनीषियों ने कलाकार के साथ शैली का घनिष्ठ संबंध माना है तथापि वे इस विषय पर अधिक विस्तार से चर्चा नहीं कर सके हैं। रमेशकुंतल मेघ ने अवश्य इस पर विस्तृत चर्चा की है। लेकिन अन्य सौंदर्यतत्त्वेत्ताओं द्वारा विवेचित 'शैली' विषय उतना निखर नहीं पाया है। संभवतः इसका कारण यह माना जा सकता है कि 'शैली-विज्ञान' नामक एक अलग प्रणाली के जन्म हो जाने के कारण अनेक शैली वैज्ञानिकों ने विस्तारपूर्वक शैली का विवेचन किया है। अतः सौंदर्यबोधशास्त्र में इस विषय का विवेचन नाम मात्र ही हो पाया है।
माध्यम कलाकृति के विकास की दृष्टि से दो चरण होते हैं। कलाकार के लिए प्रक्रिया (प्रासेस) और निरीक्षक के लिए उत्पत्ति (प्राडक्ट) इन दोनों चरणों के बीच 'माध्यम' की स्थिति है। सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन के लिए 'माध्यम' एक आवश्यक इकाई है, इसकी उपयोगिता का रहस्य इस बात से उद्घाटित हो जाता है कि एक ओर तो ये कला के 'भौतिक तत्त्वों' (फलक और रंग), पत्थर और आकृति का समावेश करता है तथा
कला और कलाकृति का व्यापार / 47 21
Page 62
दूसरी ओर प्रत्येक कला के अपने विलक्षण प्रधर्म (यूनीक फंक्शन) का निर्धारण करता है ।288 मानविकी पारिभाषिक कोश में 'मध्यवर्ती या साधन रूप में कार्य संपादन, प्रभाव संप्रेषण का सहायक'289 माना गया है। 'मानक हिंदी कोश'290 तथा हिंदी शब्दसागर'291 में माध्यम- 1. ऐसा तत्त्व जिसके द्वारा कोई कार्य संपन्न होता है, कोई परिणाम या फल निकलता है अथवा किसी प्रकार का प्रभाव उत्पन्न होता है। 2. कार्य सिद्धि का आधार उपाग्र या साधन। 3. कला के क्षेत्र में वह पदार्थ जिसके आधार या सहायता से कोई कृति प्रस्तुत की जाय, कहलाता है। हिंदी की कला तथा सौंदर्यबोधशास्त्रीय पुस्तकों में इस विषय पर बालसीताराम मर्ढ़ेकर, हरद्वारीलाल शर्मा, रमेशकुंतल मेघ, रामकीर्ति शुक्ल तथा कृष्णलाल शर्मा ने चिंतन किया है। माध्यम के विषय में चर्चा बालसीताराम मर्ढेकर ने अपनी पुस्तक 'कला और मानव' (Arts and man) में की है। इनका प्रयत्न माध्यम का केवल साधारण रूप में अन्वेषण करना ही रहा है। उन्होंने केवल यही स्पष्ट किया है, कि जब लोग किसी कला के माध्यम का जिक्र करते हैं तो इससे उनका क्या अभिप्राय रहता है तथा वास्तव में क्या होना चाहिए। उन्होंने 'न्यू ऑक्सफोर्ड इंगलिश डिक्शनरी' में दिये गये 'माध्यम' शब्द के विभिन्न अर्थों को स्पष्ट किया है। कला के प्रति दृष्टिकोण में जो भ्रामकता है, उसका कारण बालसीताराम मर्ढ़ेकर ने 'माध्यम' शब्द की परिभाषाओं में गड़बड़ तथा कला-समीक्षा में इस शब्द के विभिन्न अर्थों में अविवेकपूर्ण प्रयोग को माना है। 'माध्यम' को परिभाषित करते हुए मर्ढेकर ने इसे 'त्रिपदात्मक प्रवृत्ति का बीच का पद'292 कहा है तथा इस नियम को कला के क्षेत्र में यानी कला का उत्पादन करने वाली प्रवृत्तियों पर लागू करने के लिए उन्होंने पहले और तीसरे पद को एक दूष्टांत द्वारा इस प्रकार स्पष्ट किया है- यदि पहला पद ऐसा पदार्थ है जो ध्वनि पैदा करता है जैसा कि ग्रामोफोन का रिकार्ड, और तीसरा पद आरामकुर्सी में बैठे हुए श्रोता का कान या श्रवण करने वाली पेशी हो, तब वायु को माध्यम कहना ठीक होगा परंतु यदि गायक को प्रथम और श्रोता को तीसरा पद माना जाये तो रिकार्ड ही माध्यम बन जाता है।293 शब्द, स्वर, पत्थर, लकड़ी, रंग तथा रेखा आदि वस्तुएं किसी भी काम आ सकती हैं, लेकिन कला में इनका माध्यम के रूप में उपयोग कब होता है, इस प्रश्न को हरद्वारीलाल शर्मा ने उठाया है। वे लिखते हैं कि इन पदार्थों का 'माध्यम' के रूप में उपयोग उसी अवस्था में कहा जाता है जब ये कलाकार और कृति के मध्य में, और, कृति और रसिक के मध्य में स्थित होकर चेतना के एक ध्रुव-बिंदु से भावों का भार लेकर दूसरे चेतना के बिंदु तक उसे पहुंचा सके। दूसरे शब्दों में, ये 'माध्यम' उसी दशा
48 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परपरा
Page 63
में हो सकते हैं जब ये चेतना भावों को ग्रहण, वहन कर सकें, और तांबे के तार की भांति, चेतना तरंगों को इस छोर से उस छोर तक द्रुतगति से ले जा सकें। भावों का सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप और जीवन के हलके-से-हलके स्पंदन, 'माध्यम' में उतर आयें, और द्विगुणित होकर एक ध्रुव से दूसरी ओर चल सकें। 294 इस तरह हरद्वारीलाल शर्मा 'माध्यम' को तांबे की तार की भांति सरल, निर्बाध और ऐसा प्रबल एवं पारदर्शी (Transparent) मानते हैं जो जीवन-विश्रुत का अखंडित प्रवाह भर सके। वे मानते हैं कि बिना इन गुणों के 'माध्यम' कलाकार की भावनाओं को अभिव्यक्त करने में पूर्णतः सफल नहीं हो सकता है।295 कलाकृति की प्रक्रिया तथा उत्पत्ति के मध्य में 'माध्यम' की स्थिति देखते हुए रमेशकुंतल मेघ ने इस विषय पर सर्वाधिक चिंतन किया है। 'माध्यम' की परिभाषा, कला में उसके महत्त्व तथा गुणों पर विस्तार से चर्चा करते हुए, वे इससे संबंधित ऐसी व्यावहारिक और सैद्धांतिक समस्याओं को उठाते हैं जिन पर हिंदी के अन्य किसी भी सौंदर्यतत्त्ववेत्ता ने विचार नहीं किया है। 'माध्यम' की परिभाषा तथा उसके प्रयोजन को स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं, "माध्यम' वह है, 'जिसके द्वारा' या 'जिसमें' या 'जिससे' किसी वस्तु विशेष का संवहन अथवा परिवहन हो। माध्यम का धर्म केवल वस्तु विशेष का संकेत करना ही नहीं बल्कि उसके (वस्तु विशेष के) बारे में कर्ता (इस संदर्भ में कलाकार) की कल्पना, भावना तथा स्वप्नादि का भी संवहन करना हैं।"296 इस तरह कला में माध्यम के 'भौतिक' (फिजिकल) 'आधार' (पत्थर, रंग, कागज, फलक, लकड़ी आदि) तथा 'मनोवैज्ञानिक आधार' (ठोस आकृति, वर्ण, प्रतीक, शब्द, ध्वनि आदि) ही शामिल हैं। इन्हीं दोनों आधारों पर वे माध्यम के गुणों को चार खंडों में बांटते हैं। वे पहला खंड भौतिक गुणों का मानते हैं जो भौतिकबोध प्रदान करता है। दूसरा खंड इंद्रियबोधात्मक गुणों का जो मनोवैज्ञानिक बोध प्रदान करता है। तीसरा खंड विमर्शक (सजेस्टिव) गुणों का है जो अन्य कलाओं की विशेषता का भी वहन करता है। चौथा खंड तकनीकी गुणों का है जिनका सीधा संबंध केवल सृजनरत कला- कार से ही होता है।297 रमेशकुंतल मेध द्वारा निर्धारित माध्यम के उक्त चारों गुण तकनीकी वस्तुविशेष, उपयोगी वस्तुविशेष तथा कलात्मक वस्तुविशेष की ओर संकेत करते हैं तथा कलाओं के वर्गीकरण का एक बुनियादी आधार भी बनाते हैं। 'माध्यम' के गुणों की चर्चा करते हुए वे आगे उससे संबंधित कई व्यावहारिक तथा सैद्वांतिक समस्याओं को उठाते हैं तथा उनकी पृष्ठभूमि में चिंतन करते हुए अंत में वे इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि 'माध्यम' एक स्थूल तथा सूक्ष्म तरलता मात्र है जोकि देश को काल में (पुनर्प्रस्तुतीकरण को संवेगों में) तथा काल को देश में (संवेगों तथा विचारों के पुनर्प्रस्तुतीकरण में) बदलता है। इस प्रकार वह कला के धर्म को स्थूल से सूक्ष्म तथा सूक्ष्म से सूक्ष्म विषयवस्तु की ओर अग्रसर करने का सतत साधन सिद्ध होता है :298 रामकीर्ति शुक्ल ने 'माध्यम' का उल्लेख करते हुए उसे कलाकृति के अंतिम कला और कलाकृति का व्यापार / 49
Page 64
पार्थिव तत्त्व की ओर संकेत करने वाला ऐसा शब्द कहा है जो आसान होने के साथ- साथ उलभा हुआ है। उनके अनुसार यह पार्थिव तत्त्व 'कलाकार के निजी स्वप्न और हमारे द्वारा उस स्वप्न को ग्रहण करने के बीच मध्यस्थ का कार्य करता है। लेकिन इसके साथ ही वे माध्यम की यह सीमा भी मानते हैं कि वह कलाकार के उस स्वप्न को उसकी पूरी समग्रता में प्रदर्शित नहीं कर पाता है।"299 साहित्य को चित्र, मूर्ति तथा वास्तुकला के संदर्भ में देखते हुए माध्यम पर विस्तृत चर्चा कृष्णलाल शर्मा ने भी की है। उन्होंने माध्यम को 'दो को जोड़ने वाली बीच की कड़ी' माना है।300 शब्द-अर्थ, रंग-रेखाएं और लकड़ी-पत्थर आदि चूंकि सर्जक और उपभोक्ता के बीच तथा भीतरी और बाहरी संसार के मध्य कड़ी जोड़ते हैं इसलिए वे माध्यम कहलाते हैं। सभी कलाएं मूलतः एक हैं लेकिन माध्यम भेद तथा प्रयोगविधि भिन्न होने के कारण ही कला का स्वरूप बदल जाता है, इसलिए कृष्णलाल शर्मा ने कला की आलोचना करते हुए माध्यम की प्रकृति, शक्ति और भावार्थ से उसके संबंध का ज्ञान अत्यंत आवश्यक माना है। एक कला के विषय को हम दूसरी कलाओं के माध्यम से क्यों नहीं व्यक्त कर सकते ? इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न को भी उन्होंने उठाया है। साहित्य, चित्र, मूर्ति तथा वास्तुकला के संदर्भ में इस प्रश्न को देखते हुए उन्होंने प्रत्येक कला के माध्यम पर विस्तृत विवेचन-विश्लेषण किया है तथा उनमें परस्पर साम्य और वैषम्य दर्शाया है। 301 उक्त सौंदर्य तथा कलाविचारकों के अतिरिक्त हिंदी में अन्य कई विद्वानों ने भी इस विषय पर चिंतन अवश्य किया है, लेकिन उन्होंने इसे प्रसंग रूप में ही लिया है। कलाओं की परस्पर तुलना करते हुए, उन्होंने उनके माध्यम की विशेषताओं को ही उद्घाटित किया है। 'रामविलास शर्मा'302, रामानंद तिवारी303 तथा ए० टी० नरसिंहाचारी304 आदि का माध्यम के विषय में चिंतन इसी रूप में दृष्टिगोचर होता है।
कलाओं का वर्गीकरण कला का सौंदर्यबोधशास्त्र के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण स्थान है। अनेक कलाचितकों ने तो इस महत्त्व को देखते हुए अंगरेजी शब्द 'एस्थेटिक्स' का हिंदी अनुवाद ही 'कलास्वरूप- शास्त्र', 'स्वतंत्रकलाशास्त्र', 'कलादर्शन', 'कलाशास्त्र' तथा 'कला मीमांसा' करना उचित समझा है। अतः कला तथा कलाकृति के सर्वेक्षण के उपरांत हिंदी के सौंदर्य- तत्त्ववेत्ताओं ने कलाओं के वर्गीकरण के प्रश्न को अनिवार्य समझका है। इस अध्याय में हमारा मुख्य उद्देश्य हिंदी के कलाचितकों द्वारा भारतीय कलाओं के वर्गीकरण के प्रति हुए चिंतन को ही विवेचित करना है। लेकिन जैसा कि हमारे शोध का विषय 'हिंदी में सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन का विकास और उप- 50/ सौदर्यंबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 65
लब्धियां,' हमें यह स्पष्ट करता है कि हमारे लिए हिंदी सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं द्वारा अपने लेखों और पुस्तकों में उल्लेखित पाश्चात्य मनीषियों के 'कलाओं के वर्गीकरण' को विवेचित करना भी कुछ सीमा तक अनिवार्य है। अतः हम यहां प्रासंगिक रूप में पाश्चात्य मनीषियों द्वारा किये गये कलाओं के वर्गीकरण का भी उल्लेख करेंगे। कलाओं के वर्गीकरण संबंधो दो विचारधाराएं कलाओं के वर्गीकरण के प्रश्न को लेकर कलाचिंतकों की दो विचारधाराएं दृष्टिगोचर होती हैं। एक विचारधारा के विचारक कला को अविभाज्य मानते हैं। इनके अनुसार कलाओं के वर्गीकरण का प्रश्न ही नहीं उठता है। इस प्रकार के चिंतकों में पश्चिम के बेनेदेत्तो क्रोचे, डी० डब्ल्यू० पाल तथा जान ड्यूई का नाम लिया जाता है। कोचे तात्त्विक दृष्टि से कलाओं के वर्गीकरण को असंगत तथा बेहूदगी मानते हैं। वे तो आवेश में यहां तक कहते हैं कि कलाओं के वर्गीकरण से संबद्ध संसार की सभी पुस्तकों को यदि जला दिया जाये तो कोई हानि न होगी। हिंदी में इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक हंसकुमार तिवारी हैं। वे अपनी पुस्तक 'कला' में कलाओं के वर्गीकरण के अनौचित्य को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं, "एक ही प्रेरणा को रूपगत पराकाष्ठा तक पहुंचाने के लिए समान रूप से स्वर, रंग-रेखा, छेनी-हथौड़ी या वर्ण-विग्रह की साधना होती रही है। अतः ऐसी जिन चेष्टाओं को भी सफलता छू गयी है, उनके बीच जाति या श्रेणी की कोई विभाजन-रेखा खींचना संभव नहीं।"305 ठीक इसी रूप में तो नहीं लेकिन उपयोगी और ललित कला को लेकर भोलानाथ तिवारी,306 भगीरथ मिश्र307 तथा महादेवी वर्मा308 ने भी कला के क्षेत्र में इस अत्यधिक प्रचलित वर्गीकरण को वैज्ञानिक नहीं माना है। दूसरी विचारधारा के विचारकों का कलाओं के वर्गीकरण में विश्वास है। क्योंकि उन्होंने अपने कलासंबंधी लेखों तथा पुस्तकों में यह विभाजन किया है। पश्चिम के कलामनीषियों ने कलाओं के वर्गीकरण पर विस्तार से विचार किया है जबकि भारतीय मनीषियों ने इस पर गहराई से चिंतन नहीं किया है। क्योंकि भारतीय साहित्य में किसी भी विषय को लेकर उसके वैज्ञानिक तथा तर्कपूर्ण विभाजन और वर्गीकरण के आधार पर भेदोपभेद करने की प्रवृत्ति बहुत ही कम रही है। यहां तो वर्गीकरण के नाम पर केवल कलाओं की गणना ही की गयी है। भोलानाथ तिवारी के अनुसार यह संभावना हो सकती है कि प्राचीन भारतीय चिंतकों ने कलाओं का तातत्विक वर्गीकरण असंभव मानकर छोड़ दिया हो ।309 कलाओं के वर्गीकरण का कारण तथा औचित्य कला का मानव-जीवन के साथ गहरा संबंध है। यह एक ऐसी मानवीय क्रिया है जो मानव-व्यवहार में जाने-अनजाने अभिव्यक्त होती है। मानवीय क्रिया के रूप में कला के स्रोत (अलंकरण, अनुकरण, क्रीड़ा, इच्छापूर्ति, भावाभिव्यक्ति आदि) सभी देशों और कालों में समान रहे हैं। परिणामस्वरूप व्यापक स्तर पर कलाओं के परस्पर घुल- कला और कलाकृति का व्यापार / 51
Page 66
मिल जाने की संभावना सदैव ही रही है। ऐसी स्थिति में जब किसी एक कला के विशेष अध्ययन के लिए उसे अन्य असंख्य कलाओं से अलग करके देखने की आवश्यकता महसूस होती है तो विभाजन या वर्गीकरण का कोई-न-कोई ऐसा आधार ढूढ़ना ही पड़ता है जो प्रेरणास्रोत की भांति आत्मनिष्ठ और अस्पष्ट न होकर वस्तुनिष्ठ स्पष्ट और व्यावहारिक हो310 रमेशकुंतल मेघ कलाओं के इस वर्गीकरण को स्वाभाविक मानते हैं। उनका यह तर्क है कि जब कला कलाकृति बनती है तो उसे कई प्रकार के बाह्य रूप धारण करने पड़ते हैं, कई माध्यम चुनने पड़ते हैं, अभिव्यक्ति के लिए कई मनोवैज्ञानिक संदर्भों से गुजरना पड़ता है, विषयवस्तु के लिए कई दर्शनों तथा विचार- धाराओं पर आश्रित होना पड़ता है, विज्ञान तथा टैक्नालॉजी के विकास के अनुरूप अपने आधार या नयी विधाएं भी अधिक परिष्कृत बनानी पड़ती हैं, नये औजारों तथा उपकरणों के उपयोग से नया अभिव्यंजना कौशल विकसित करना पड़ता है, भौतिक आवश्यकता की पूर्ति करने के कारण उपयोगितावादी होना पड़ता है तथा अंतर्मुखी असंपुक्त आनंद देने के कारण ललित होना पड़ता है। बाद में यही पहलू कलाओं के भेद करते हैं और फलस्वरूप उनके वर्गीकरण के निमित्त भी बनते हैं।311 कलाओं के वर्गीकरण के इन कारणों तथा औचित्य को स्पष्ट करते हुए हिंदी के कला-मनीषियों ने जब-जब कलाओं के वर्गीकरण के प्रश्न को उठाया है, उन्होंने मुख्यतः अरस्तू, कांट, हीगेल, कूल्पे, एतियेन्न सूरियों, उरीज-ई-आजरा, देसुआर, कोल्विन आदि पाश्चात्य मनीषियों द्वारा किये गये कलाओं के वर्गीकरण को विवेचित करना ही उचित समझा है। स्वयं अपनी ओर से ये कलाचितक कोई विशेष मौलिक प्रयास करते हुए दृष्टिगोचर नहीं होते हैं। सर्वप्रथम इन कलाचितकों ने वात्स्यायन प्रणीत चौंसठ कलाओं की सूची व अन्य सूचियों को प्रस्तुत करना ही उचित समझा है। हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता कुमार विमल312 ने भी कलावर्गीकरण के नाम पर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी313 का अनुसरण करते हुए 'ललित बिस्तर' की कला सूची (86 कलाएं) वात्स्यायन के 'कामशास्त्र' की कला सूची (चौंसठ कलाएं), 'शुकनीति- सार' की कलासूची (चौंसठ कलाएं) तथा 'प्रबंधकोश' की कला सूची (बहत्तर कलाएं) ही प्रस्तुत की हैं। रमेशकुंतल मेघ ने भी अपनी पुस्तक 'अथातो सौंदर्य जिज्ञासा' में इन्हीं कला- सूचियों को प्रस्तुत किया है, लेकिन उन्होंने इन कलासूचियों को गोलाकार चित्रों में चित्रित करके उन्हें समझने में अत्यधिक सुविधाजनक बना दिया है तथा कलाओं के वर्गीकरण को अंतिम रूप में एक चार्ट के रूप में प्रस्तुत किया है। साथ ही उन्होंने तत्कालीन समाजव्यवस्था के संबंध में कुछ निष्कर्ष भी निकाले हैं। 314 रमेशकुंतल मेघ ने कलाओं के परंपरा से चले आ रहे वर्गीकरण (ललित और उपयोगी) को अधिक संगत न मानते हुए तथा आज की संपूर्ण जीवनप्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए अपनी ओर से भी कलाओं के वर्गीकरण के पांच आधार प्रस्तुत किये हैं।315 वर्गीकरण के इन आधारों की अपनी खबियां तथा कमियां हैं तथा इनमें मनोवैज्ञानिक, तकनीकी, सौंदर्यात्मक, स्वस्थरेचन अथवा सामाजिकता से संबद्ध बोधादि सक्रिय हैं। कलाओं के 52 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 67
इन अनेक वर्गीकरणों के कारण का स्पष्टीकरण करते हुए वे लिखते हैं, "आज कलाओं का क्षेत्र (कौशल व क्रिया व्यापार को समान महत्त्व मिलने से) इतना व्यापक तथा इनकी विधाएं इतनी अनंत होती जा रही हैं कि किसी एक आधार पर यह विभाजन हो ही नहीं सकता।"316 हिंदी के अन्य कलाचितकों ने कला की चर्चा करते हुए या तो 'कलाओं के वर्गी- करण' के प्रश्न को छुआ ही नहीं है, यदि छुआ भी है तो वे चिंतक पाश्चात्य मनीषियों द्वारा किये कलाओं के वर्गीकरण का ही उल्लेख कर पाये हैं। अपनी ओर से इन्होंने कोई मौलिक प्रयास न करके अंतिम रूप में, परंपरा से चले आ रहे (ललित और उपयोगी कला) वर्गीकरण को ही मान्यता प्रदान की है तथा इसी आधार पर भारतीय कलाओं को बांटा है। ललित तथा उपयोगी कलाएं कला-मनीषियों ने सर्वप्रथम कलाओं का वर्गीकरण उपयोगिता के आधार पर किया है। उन्होंने इस आधार पर कला के दो रूप माने। एक तो वह जिसकी मनुष्य को आवश्यकता नहीं है, फिर भी उसका अस्तित्व है। इसे हम ललित कला कहते हैं। असितकुमार हालदार के अनुसार इस कला का वास्तविक अर्थ है, "ऐसी खोज की ओर प्रवृत्ति जिसमें मानसिक अथवा काल्पनिक शक्ति विशेष कर लगी रहे।"317 दूसरे प्रकार की कला वह है जिसका संबंध मनुष्य के भौतिक सुख तथा समृद्धि से है। यद्यपि ललित और उपयोगी, कला नाम के आगे लगने वाले ये दोनों विश्लेषण यह भ्रांति पैदा करते हैं कि ललित कला की उपयोगिता नहीं होती तथा उपयोगी कला में लालित्य नहीं होता, तथापि सुविधा की दृष्टि से हिंदी के कलाचिंतकों ने यह वर्गीकरण अनिवार्य समझा है। इन्होंने ललित कला के अंतर्गत स्थापत्यकला, मूर्तिकला, चित्र- कला, संगीतकला तथा काव्यकला की; और उपयोगी कला के अंतर्गत बढ़ई, लोहार, सुनार तथा वस्त्र बुनने आदि की गणना की है। कलाचिंतकों ने इन दोनों कलाओं के अंतर पर चर्चा भी की है। 'हिंदी साहित्य कोश' में इन दोनों में अंतर स्पष्ट करते हुए यह माना गया है कि उपयोगी कला व्यवहारजनित और सुविधाबोधी है तथा ललितकला मन के संतोष के लिए है और उसमें उस विशिष्ट मानसिक सौंदर्य की योजना है, जो उपयोगितावाद से भिन्न वस्तु है।318 असितकुमार हालदार ने इन दोनों में अंतर स्पष्ट करते हुए उपयोगी कला में परिश्रम, वंशानुगत कुशलता तथा थोड़ी-बहुत अजित कुशलता का गुण आवश्यक माना है।319 कुमार विमल ने इन दोनों कलाओं में दो प्रमुख अंतर माने हैं। सर्वप्रथम वे उपयोगी कला का संबंध हमारे भौतिक आवश्यकताओं की संपूर्ति तथा सभ्यता के क्रमिक विकास से मानते हैं, जबकि ललित कला का संबंध वे हमारे सौंदर्यबोध, सांस्कृतिक विकास और आध्यात्मिक चेतना से मानते हैं।320 उपयोगी और ललित
कला और कलाकृति का व्यापार / 53
Page 68
कला में दूसरा अंतर वह यह मानते हैं कि ललित कला के नियम और शैली में उप- योगी कला की अपेक्षा शीघ्र परिवर्तन होते रहते हैं।321 प्रभुदयाल मीतल ने कुमार विमल के उक्त दोनों अंतरों का समर्थन करते हुए इनमें तीसरा अंतर यह माना है कि उपयोगी कलाओं का मूल्य निर्धारित किया जा सकता है, चाहे वह मांग और पूर्ति के आधार पर घटता-बढ़ता रहे जबकि ललितकलाओं का मूल्यांकन करना बड़ा कठिन है।322 इस प्रकार इन दोनों कलाओं का अंतर स्पष्ट करते हुए हिंदी के कला-चिंतकों ने इन कलाओं को किसी भी देश और समाज की क्रमशः उन्नत सभ्यता और समृद्ध संस्कृति की सूचक माना है। कुमार विमल इन दोनों कलाओं में अंतर करते हुए भी इस वर्गीकरण को अधिक तर्कसंगत नहीं मानते हैं। "क्योंकि उपयोगिता और सौंदर्य में न तो परस्पर विरोध है और न इनकी युगपत, स्थिति में कर्कश रसबोध; प्रत्युत इनकी उभयनिष्ठता कान को कर्णफूल और कर्णफूल को कान प्रदान करती है।"323 रमेशकुंतल मेध भी ललित और उपयोगी कलाओं के इस वर्गीकरण को अधिक संगत न मानते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि आज न तो ललित और उपयोगी कलाओं की रूढ़ियां कायम रह सकी हैं और न ही इनके विशुद्ध भेद। आजकल संगीत जैसी ललितकला का उपयोग मानसिक बीमारों के क्लिनिकों में होता है, उपदेशात्मक काव्य या राष्ट्रीय उपन्यास आदि का उपयोग राजनीतिक या नैतिक शिक्षा के लिए होता है-कांच या चीनी मिट्टी के कटोरों सुराहियों, कलशों आदि को 'अंदरूनी सज्जा' के लिए इस्तेमाल किया जाता है अतएव इन कलाओं के उपयोगितावादी एवं लालित्यमूलक दोनों प्रकार के कार्य होते हैं। हम इनके बीच के अंतर को स्पष्ट करने के लिए 'प्रधानता' को आधार मान सकते हैं : उपयोगितावादी कला प्रधान रूप से भौतिक आवश्यकताओं एवं सुविधाओं तक सीमित होती है, जबकि ललितकला प्रधान रूप से सौंदर्यबोध को लक्ष्य बनाती है।324 इस प्रकार हम यह देख सकते हैं कि कलाओं का यह वर्गीकरण हिंदी कला- चिंतकों के लिए विवादास्पद बनकर रह गया है। क्योंकि कुछ ऐसी कलाएं हैं जो ललित होकर उपयोगी बन जाती हैं तथा कुछ उपयोगी होकर भी लालित्य के गुण से युक्त रहती हैं। कलाओं का स्वतंत्र कलाओं और ललित कलाओं के रूप में आधुनिकतम वर्गीकरण करते हुए, रामाश्रय शुक्ल करुणेन्द्र ने लिखा है कि "जिन्हें कभी उपयोगी कलाएं कहा जाता था, उन्हें अब ललित कलाएं कहा जाने लगा है। दूसरे शब्दों में ललितकलाओं का तात्पर्य उपयोगी कलाओं से है। वास्तुकला, मूर्निकला, चित्रकला, संगीतकला, काव्यकला, नाट्यकला, सभी कलाएं वस्तुतः स्वतंत्र कलाएं हैं और इनसे भिन्न सभी कलाएं वस्तुतः ललित कलाएं।"325 रामाश्रय शुक्ल करुणेन्द्र ने जहां वास्तु- कला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीतकला तथा काव्यकला आदि कलाओं को स्वतंत्र कलाएं मानकर हिंदी के प्रसिद्ध कलाचिंतक कांतिचंद्र पांडेय का समर्थन किया है वहां इन्होंने ललित कलाओं को ही उपयोगी कला कहकर इस विषय को और भी उलभा दिया है। यह सत्य है कि कांतिचंद्र पांडेय की यह मौलिक देन हिंदी में सौंदर्यबोधशास्त्र के लिए अत्यधिक सहायक रही है, परंतु करुणेन्द्र द्वारा किये गये कलाओं के नामों के 54 / सौंदयबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 69
हेरफेर से उतना स्पष्टीकरण नहीं हो पाता है। फिर भी इस मत का स्पष्टीकरण कुमार विमल के इस मत से हो सकता है कि "उपयोगिता में भी लालित्य का समावेश संभव है और वस्तुतः जब उपयोगी सामानों को बढ़िया समाप्ति संस्पर्श(फिनिशिंग टच) मिलता है तब उसमें लालित्य आ ही जाता है। इसी तरह लालित्य में भी उपयोगिता छिपी रहती है। और लालित्य का भी उपयोग विशेष प्रयोजनों के लिए किया जा सकता है।"326 निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि कलाओं के इस वर्गीकरण की कोई वैज्ञानिक कीमत नहीं है। यह केवल सुविधा के लिए किया गया है तथा महज व्यावहारिक है। मनुष्य बुद्धिजीवी जीव है, बिना किसी लाभ से उसकी प्रवृत्ति किसी वस्तु में सहज ही नहीं रमती। अतः उपयोगिता की खोज वह करता है। इसी उपयोगिता के साथ वह अपने मन की आनंद तथा सौंदर्य की प्रवृत्ति की भी तृप्ति किये बिना नहीं रह सकता। स्वभावतया उसकी सौंदर्यभावना में उपयोगिता और उपयोगिता में सौंदर्यभावना अंतर्निहित होती है। ललित कलाएं और उनका क्रम-निर्धारण प्राचीन काल से ही व्यावहारिक सुविधा के लिए ललित कलाओं की संख्या पांच मानी गयी है-वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीतकला तथा काव्यकला। हीगेल ने इस कला सूची को सर्वाधिक मान्यता प्रदान की है। हिंदी के अधिकतर कलाचितकों को भी यही संस्था मान्य है। कतिपय कलाचिंतक जिनमें मदनगोपाल,327 भगीरथ मिश्र,328 प्रभुदयाल मीतल329 तथा रामलखन शुक्ल330 का नाम उल्लेखनीय है, नृत्य- कला को ललित कला में स्वतंत्र स्थान देते हैं जबकि हिंदी के अन्य चिंतक नृत्यकला को संगीतकला में ही समाविष्ट करते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ कलाविचारकों ने कला की बदलती परिभाषा और समय की आवश्यकता को देखते हुए फोटोग्राफी को भी ललित कलाओं में शामिल करने का आग्रह किया है। उनकी यह धारणा है कि "फोटो- ग्राफी भी अन्य कलाओं की तरह इतनी व्यापक, तकनीकी और कलापूर्ण हो गयी है कि अब उसे ललित कलाओं की श्रेणी से अलग नहीं रखा जा सकता।"331 परंतु हम अपने इस अध्ययन में ललित कला के नाम पर वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीतकला तथा काव्यकला इन पांच कलाओं का ही उल्लेख करेंगे। कोंकि हिंदी में कला संबंधी निबंधों तथा प्रबंधों में इसी संस्था को निर्विवाद मान्यता प्राप्त हो चुकी है। अपने इस अध्ययन में हमने ललित कलाओं का जो क्रम (वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीतकला, काव्यकला) निर्धारित किया है उसका निश्चय मूर्ताधार की स्थूलता एवं सूक्ष्मता के अनुसार किया गया है। इस क्म में स्थूल मूर्ताधार एवं अधिक साधन सामग्री की कलाएं निम्न कोटि की मानी गयी हैं। और सूक्ष्म मूर्ताधार तथा कम साधन वाली कलाएं उच्चकोटि की समझी गयी हैं। वैसे भी अभिव्यक्ति वस्तु की अपेक्षा मूर्ति, मूत्ति की अपेक्षा चित्र, चित्र की अपेक्षा संगीत तथा संगीत की अपेक्षा काव्य में अधिक होती है। इसलिए काव्यकला को इस क्रम-निर्धारण में सबसे कला और कलाकृति का व्यापार / 55
Page 70
उच्च तथा वास्तुकला को निम्न स्थान प्राप्त है। हिंदी में ललित कलाओं का यही क्रम प्रचलित है। कतिपय चिंतक इस क्रम को भंग करते हैं तथा वे अपने अनुसार एक नया तथा वैज्ञानिक क्रम प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। सर्वप्रथम बालसीताराम मर्ढेकर ने अपनी पुस्तक 'कला और मानव' (Arts and man) में इस प्रचलित क्रम को तोड़ा है। उन्होंने संगीतकला को सबसे उच्च तथा काव्यकला को सबसे निम्नकोटि की कला मानते हुए स्पष्ट रूप से लिखा है, "महान् कवियों को यह बुरा लगेगा क्योंकि कलाओं में उन्होंने अनाधिकारपूर्ण प्रधान स्थान को हथिया लिया है। परंतु कला के अभिमूल्यन के प्रनियमों को नष्ट एवं दूषित करने में उनका परोक्ष या अपरोक्ष रूप से इतना हाथ है कि अंत में अब न्याय उन्हें दंड दे तो किसी को शिकायत करने का भी हक न होना चाहिए।"332 यद्यपि बालसीताराम मर्ढेकर की इस प्रकार की मिथ्या प्रकल्पनाएं भारतीय काव्य और कलाशास्त्र के प्रति अज्ञान को सूचित करती हैं तथापि इस दिशा में उनका यह मौलिक प्रयास है। बालसीताराम मर्ढेकर की भांति रामनाथ सुमन ने भी ललित कलाओं के इस प्रचलित क्रम को तोड़ा है, लेकिन वे ललित कलाओं का क्रम-निर्धारण उच्च या निम्न कोटि के आधार पर नहीं अपितु कलाओं के क्रमिक विकास के आधार पर करते हैं। उन्होंने संगीत कला को प्रथम तथा काव्यकला को अंतिम ललित कला माना है। वे लिखते हैं, "पहले मन में निगूढ़ स्पंदन हुआ, भाव में गति आयी। संगीत का जन्म हुआ। तब जिसको लेकर हृदय में तूफान उठता है, उसके रूप दर्शन की प्यास चटखी। अशरीरी संगीत को रूप और नयन प्राप्त हुए। रूप जगत बना। चित्रकला की उत्पत्ति हुई। दर्शन से स्पर्श-सुख की प्रेरणा हुई। कुछ ठोस, स्थूल जिसे हम देख ही न सकें, छू भी सकें। इस प्रकार वस्तु की सत्ता स्थापित हुई। सूक्ष्म को देह मिली। भास्कर्य या मूर्तिकला का उद्भव हुआ। पर-भाव, दर्शन (रूप) और स्पर्श का सुख, सब मूक थे। इसलिए अंत में कला को वाणी प्राप्त हुई। काव्य का जन्म हुआ और कव्य में आकर सब कलाओं का समाहार हुआ।"333 इस प्रकार काव्य के क्रमिक विकास की शृंखला रामनाथ सुमन ने इस प्रकार स्पष्ट की है; भावोद्वेग-स्वर सामंजस्य से-संगीत प्रत्यक्षीकरण भावना से-चित्र स्थूलता-स्पर्श भावना से -- मूर्त्ति मुखराभिव्यक्ति वाणी से-काव्य कलाओं के क्रम-निर्धारण का एक अन्य प्रयास बंगाल के साहित्यालोचक श्री नलिनीकांत गुप्त ने भी किया है। उन्होंने कलाओं का क्रम-निर्धारण वर्ण-व्यवस्था के अनुसार किया है। उन्होंने काव्यकलाओं को ब्राह्मण, वास्तुकला तथा भास्कर्य कला को क्षत्रिय, चित्रकला को वैश्य तथा संगीतकला को शूद्र गिनाया है। संगीतकला को शद्र वे इसलिए नहीं कहते कि वह निकृष्ट या अधम है, बल्कि इसलिए कि संगीत सभी कलाओं के मूल में प्रतिष्ठित है, वह सबकी सेवा में संलग्न है, प्रत्येक ललित कला को 56/ सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 71
वह एक गति, एक अभिनव भंगिमा, एक सुर का दान देती है। उनके मत से ब्राह्मणों के समान काव्य का प्राण ज्ञान है, ब्राह्मण के ही समान काव्य का उद्भव सहस्रशीर्ष पुरुष के मुख से हुआ। ज्ञान की प्रेरणा से बाक्यों के सहारे सुंदर सत्य की उपलब्धि एवं अभिव्यक्ति करता है, इसलिए ललित कलाओं में काव्यकला ब्राह्मण है। स्थापत्य और भास्कर्य अंतरात्मा की एक संगठित शक्ति-चेतना के ही दान हैं, इसीलिए कलाओं में वे क्षत्रिय हैं-सहस्रशीर्ष पुरुष के बाहुबल पर आधारित होकर ही मानो उसका उदय हुआ है। चित्र को कलाओं में वैश्य कहा जा सकता है। वैश्य का धर्म जो नैपुण्य है, जो कौशल और सजावट की वृत्ति है चित्र में मानो वही प्रस्फुटित है और संगीत है शूद्र, सबको धारण किये हुए है, सबकी सेवा करता है।"334 कला के इस वर्गीकरण का भी कोई वैज्ञानिक मूल्य नहीं है। फिर भी इसकी जो चेष्टा है, वह इसलिए है कि हमारे संस्कार में ऐसी बात है कि हम प्रत्येक वस्तु को दूसरों के आगे-पीछे, एक श्रेणी या क्रम में देखने के आदी हैं। विभिन्न कलाचितकों द्वारा किये गये ललित कलाओं के क्रम-निर्धारण का उल्लेख करने के उपरांत हम प्रत्येक कला की चर्चा परंपरा से प्रचलित क्रम के आधार पर ही करना उचित समभेंगे, क्योंकि हिंदी में अब यही क्रम सभी कलाचितकों को मान्य है। वास्तुकला : ललितकलाओं में वास्तुकला एक ऐसी रूपप्रधान कला है, जिसमें नगर, प्रासाद, भवन, स्तंभ, लिंग, पीठिका, सभामंडप, उद्यान, कूप, शैल, मंदिर आदि का निर्माण शामिल है। इसे भवन-निर्माण कला अथवा स्थापत्य कला भी कहा जाता है। हरद्वारीलाल शर्मा ने इसे परिभाषित करते हुए ऐसी ललित कला के रूप में देखा है जिसमें हमें जीवन की क्षणिकता, इसके परिवर्तन और विचार के स्पर्श से रहित शुद्ध चिरंतन तत्त्वों का मूर्त, साक्षात्, अनुभव, ज्यामितिक आकारों के संकेत से कराया जाता है।"335 रमेशकुंतल मेघ के अनुसार यह एक स्थापित, नितांत अचल, जड़ और तीन आयामों वाली ऐसी कला है जिसमें पदार्थ (मैटर) के प्रति अभिरुचि की अहमियत होती है।"336 माध्यम की सूक्ष्मता न होने के कारण हिंदी के सभी कलाचितक इसे निम्न कोटि की कला मानते हैं। हीगेल की इस कला के प्रति यह धारणा है कि मानव-चेतना अपनी सत्ता के पूर्ण ज्ञान की ओर बढ़ती हुई जिस सीढ़ी पर पहला कदम रखती है, वह स्थापत्य कला है, अर्थात् वे स्थापत्य कला को प्रथम सोपन या कलाओं की जननी के रूप में मानते हैं। हिंदी में सूर्यप्रसाद दीक्षित भी इसी धारणा का समर्थन करते हैं।337 लेकिन रामविलास शर्मा ने हीगेल की इसी धारणा को ऐतिहासिक विकास की दृष्टि से अनैतिहासिक और अवैज्ञानिक माना है। वे वास्तुकला का जन्म चित्र और संगीत के उपरांत मानते हुए अपने एक निबंध में लिखते हैं, "मानव-समाज के इतिहास में स्थापत्य कला का जन्म चित्र और संगीतकलाओं से पहले नहीं होता। मनुष्य अपनी आदिम समाज व्यवस्था का आरंभ नृत्य और संगीत से करता है। इनके लिए उत्पादन के साधनों को विकसित करना, कला के नये उपकरणों का आविष्कार करना अनिवार्य कला और कलाकृति का व्यापार / 57
Page 72
नहीं। किसी बाह्य उपकरण की सहायता के बिना भी शरीर के अंगों और कंठ से मनुष्य नृत्य और संगीत आरंभ कर सकता है। निवास-निर्माण की क्षमता कला रूप में बहुत देर से विकसित होती है। मनुष्य गुफाओं में रहते हुए भी चित्रकारी आरंभ कर देता है किंतु कलात्मक गृह-निर्माण चाहे अपने लिए हो, चाहे देवता के लिए उसके बाद की मंजिल से आरंभ होता है।"338 भवन-निर्माण की इस कला का विकास मानव सभ्यता के विकास के साथ होने के कारण आरंभ में इस कला में उपयोगिता का दृष्टिकोण ही महत्त्वपूर्ण रहा है। शनैः- शनैः मानव की सभ्यता का विकास और उसके साथ ही आवास स्थानों के निर्माण की विधि और स्वरूप भी विकसित हुए। यह विकासक्रम इस कला में उपयोगिता के साथ-साथ सौंदर्य की आवश्यकता का भी अनुभव करने लगा। जिससे यह कला ललित कलाओं में स्थान लेने लगी। कुछ कलाचिंतक इसकी उपयोगिता को देखते हुए इसे आज भी आंशिक रूप में ही ललितकला की कोटि में स्थान देते हैं। उनके अनुसार यह एक ऐसी "उभयविध और तटवर्ती कला है जो सौंदर्य और उपयोग की सीमा रेखा पर स्थित है।"339 हरिवंशसिंह शास्त्री इस कला को पूर्ण रूप से ललित मानने में दो प्रधान बाधाएं देखते हैं। प्रथम तो वे यह मानते हैं कि इस कला के अंतर्गत जो मकान, दुर्ग आदि निर्मित होते हैं, वे मनुष्य के उपयोग की दृष्टि से बनाये जाते हैं। दूसरी बाधा वे वास्तुकला में यह मानते हैं कि इसके उपकरण समूह में साधारण तथा निसर्ग से ही व्यक्त होने वाले भावों के अतिरिक्त कोई बाहरी भाव उनके द्वारा व्यक्त करना अत्यधिक कठिन है।340 रमेशकुंतल मेघ भी इस कला में सौंदर्य और उपयोगिता का मेल देखते हुए, इसे शुद्ध ललित कला मानने में संकोच करते हैं। उनके अनुसार, "यह ललित ही नहीं, बल्कि एक मिश्रित कला है क्योंकि शिल्प, फनींचर, गृह सज्जा, भित्ति चित्रण आदि अनेक कलाएं इसमें शामिल हो जाती हैं। अतः एक ओर तो यह पूर्णतया स्थानिक और दृश्यकला है, दूसरी ओर उपयोगितावादी, मिश्श्रित और तीसरी ओर वैज्ञानिक तकनीक भी।"341 इस प्रकार हम देखते हैं कि वास्तुकला एक ऐसी परिनिष्ठित कला है, जिसमें एक वर्गीय कलाकारों से काम नहीं चलता है। अपितु इसमें भवन-निर्माता, मूर्ति-निर्माता तथा चित्रकार आदि सभी की समन्वित साधना की अपेक्षा रहती है। वास्तुकला की इसी विशेषता को देखते हुए कांतिचंद्र पांडेय342 तथा द्विजेन्द्रनाथ शुक्ल343 ने मूर्तिकला तथा चित्रकला को वास्तुकला के अंश स्वरूप अथवा उसकी आश्रित कलाओं के रूप में प्रतिपादित किया है। अन्य ललित कलाओं की तुलना में वास्तुकला एक ऐसी कला सिद्ध होती है जो व्यक्तिगत अनुभूतियों तथा विचारों को प्रकाशित करने में असमर्थ है। संगीतकला तथा काव्यकला की भांति यह कला एक अंतर्निरीक्षक कला नहीं हो सकती है। यह जिन आंतरिक मूल्यों का प्रदर्शन करती है वे सामूहिक जीवन के हैं, इसके भाव तथा राग व्यक्तियों से सिर्फ इसलिए संबद्ध हैं क्योंकि ये समाज के पैटनों में सहभागी हैं।
58/ सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 73
मूर्तिकला : मूर्तिकला जिसे कि भास्कर्य, तक्षण या शिल्पकला भी कहा जाता है' 'देहात्मबोध' और सामंजस्य की कला है।344 कलाशास्त्रियों ने इसे क्लासिक कला माना है। 'क्लासिक' से उनका अभिप्राय ऐसी कला से है जिसमें कल्पना और आवेग की प्रचुरता, पुरातन-प्रतिपादित मान्यताओं का विरोध तथा सपनों की रंगीनी के साथ गीले प्रेम का गायन न होकर जातीय विवेक, पारंपरीण संस्थिति (ट्रेडिशनल एट्टीच्यूड) तथा शास्त्रीयता की सुरक्षा है।"315 वास्तुकला की अपेक्षा यह कला अधिक उत्कृष्ट है क्योंकि इसके साधन अपेक्षा- कृत अधिक सूक्ष्म हैं। "इसमें उपकरण के नैसगिक गुणों की अपेक्षा उसके भीतर से व्यक्त होने वाले व्यक्तित्व की प्रधानता होती है अर्थात् इसमें उपकरण की अपेक्षा आकृति की अधिकता होती है।"346 इस कला का उद्भव आदिम मानव-समाज की स्वाभाविक कलाभिरुचि को मूर्त रूप देने से हुआ था। मूर्ति बनाने में आरंभ से मनुष्य के मुख्यतः दो उद्देश्य रहे हैं। एक तो किसी स्मृति व अतीत को जीवित बनाये रखना, दूसरे अमूर्त को मूर्त रूप देना, अव्यक्त को व्यक्त करना अर्थात् किसी भाव को आकार प्रदान करना। हिंदी के कलामनीषियों ने मूर्तियों के निर्माण के पीछे इन्हीं प्रेरणाओं को देखा है। मूर्त्तिकार किसी भी भावना को पत्थर में या धातु में, मंदिर की दीवारों में या उसके भीतरी भाग में जमा देता है। इसके अतिरिक्त वह अलग मूर्त्तियां भी बनाता है जो गोल भी हो सकती हैं या फिर उत्कीर्ण मूर्त्तियां हो सकती हैं। हरद्वारीलाल शर्मा ने इसकी परिभाषा देते हुए इसे 'जीवन के प्रवाह को' 'स्थिर रूप में देखने वाली कला' माना है।347 रायकृष्णदास ने इसकी परिभाषा देते हुए लिखा है, "सोना, चांदी, तांबा, कांसा, पीतल, अष्टधातु आदि सभी प्रकार के प्राकृतिक तथा कृत्रिम धात्, पारे के मिश्रण, रत्न, उपरत्न, कांच, कड़े और मुलायम पत्थर, मसाले, कच्ची व पकायी मिट्टी, मोम, लाख, गंधक, हाथी के दांत, शंख, सीप, अस्थि, सींग, लकड़ी एवं कागज के कुट आदि उपादानों को उनके स्वभाव के अनुसार गढ़कर, खोद- कर, उभारकर, कोरकर, पीटकर, हाथ से व औजार से डौलियाकर, ठप्पा करके व सांचा छाप के (अर्थात् जो प्रक्रिया जिस उपादान के अनुकूल हो एवं जिस प्रक्रिया में जो खिलता हो), उत्पन्न हुई आकृति को मूर्ति कहते हैं।"348 कांतिचंद्र पांडेय ने मूर्ति की उपादान सामग्री के रूप में नौ धातुएं स्वर्ण, रजन, ताम्र, प्रस्तर, काष्ठ, लेप, प्रस्तर-चूर्ण, शीशा एवं पकायी गयी मिट्टी आदि प्रयुक्त मानी हैं।349 रमेशकुंतल मेघ ने इस कला में मुद्राओं की प्रधानता देखते हुए इसे एक ऐसी स्थानिक और अचल कला माना है, जो तीन आयामों वाले रूप को पुनः प्रस्तुत करती है।350 इनके अनुसार इस कला के तीन कार्य हैं (1) यथार्थ अथवा कल्पित वस्तु व्यक्ति, दृश्य या इनमें से किसी एक या अनेक के समूह को स्थान (स्पेस) में पुनर्प्रस्तुत करना। (2) सामान्य विचारों, अनुभूतियों या दूसरे तरह के अनुभवों का 'विमर्श' देना। (3) ऐतिहासिक करम में जादुई, धार्मिक, राजनीतिक, आलंकारिक, स्मारकपरक कलात्मक और अन्य प्रयोजनों को सिद्ध करना।351 T5p कला और कलाकृति का व्यापार / 59
Page 74
15 मूर्त्तिकला की एक बड़ी कठोर सीमा यह है कि यह कला केवल एक ही क्षण को स्थिर रूप देती है लेकिन दूसरी तरफ इसमें यह विशेषता भी है कि कला विशारद अपनी इच्छानुसार जहां जैसी आवश्यकता हो, मोटाई, गोलाई, उतार-चढ़ाव आदि बना सकता है। वह कला जिस प्रकार मानव अथवा अन्य जीवों के घनत्व को, रूप के अतिरिक्त उनके सर्वांगीण आकार सौंदर्य को व्यंजित कर सकती है, इस प्रकार चित्रकला भी नहीं कर सकती है। यह इसकी विशेषता है तथा यहां मूर्तिकला सब कलाओं से श्रेष्ठ सिद्ध होती है। मूर्त्तिकला का माध्यम विभिन्न आकार ले सकने में समर्थ तीन आयाम वाला पदार्थ है-जैसे, लकड़ी, पत्थर या मिट्टी आदि। कृष्णलाल शर्मा के अनुसार ये वस्तुएं प्रधानतः दो कारणों से महत्त्वपूर्ण हैं-(1) अपने स्वयं के आकार तथा दूसरी वस्तु के आकार से मिलकर नये आकार को जन्म देने में समर्थ होने के कारण तथा (2) अपनी सतह पोत के कारण ।352 मूर्ति चाहे दीवार से उभरी हो, चाहे पाद पीठ पर स्वतंत्र खड़ी हो, उसका अस्तित्व तीन आयाम वाले देश में ही होता है। अतः चित्रकला के विपरीत मूर्तिकला में तीन आयाम वाले देश का अंकन प्रतीकात्मक ढंग से ही नहीं होता वरन् वह मूर्ति के कलात्मक गुणों को व्यक्त करने में उसी प्रकार सहायक होता है जिस प्रकार से कोई अन्य भौतिक तत्त्व। उक्त माध्यमों के अतिरिक्त कृष्णलाल शर्मा प्रकाश को भी इस कला का माध्यम मानते हैं। उनके शब्दों में "तीन आयाम वाले देश तथा अन्य ठोस आकारों के साथ-साथ प्रकाश भी परिवेश का एक अभिन्न अंग है। अतः द्वितीय माध्यम की अभि- व्यक्ति में प्रकाश का योगदान भी महत्त्वपूर्ण है। इसके लिए मूर्तिकार या तो प्रकाश की दिशा, तीव्रता आदि को ध्यान में रखकर मूर्ति में आवश्यक परिवर्तन करे अन्यथा मूर्त्ति स्थापित करने के बाद उचित प्रकाश की व्यवस्था करे। कुछ मूर्त्तियां ठीक सामने से प्रकाश की अपेक्षा करती हैं, कुछ ऊंचाई से आते हुए प्रकाश में ठीक दिखती हैं। मूर्ति के उभरे और दबे हुए भागों से छाया प्रकाश की जो संतुलित रचना होती है उसको बिना ध्यान में रखे कोई मूर्त्तिकार सफल नहीं हो सकता।353 रमेशकंतल मेघ भी इस कला में प्रकाश के महत्त्व को मानते हुए यह लिखते हैं कि-"आकृतियों पर भिन्न-भिन्न कोणों से पड़े 'प्रकाश और छाया' की मोहक भंगिमाओं का उद्घाटन हमें उसके प्रति भावात्मक तथा इंद्रियबाधात्मक ढंग से सचेत कर देता है।"354 इस तरह स्पष्ट है कि मूर्त्ति के विषय की व्याख्या में कलाचितकों ने प्रकाश को भी भूर्तिकला का माध्यम माना है। उपर्युक्त तत्त्वों के अतिरिक्त रंग-रोगन, सुचिक्वणता तथा खुरदरापन, लकड़ी या पत्थर की धारियां आदि भी सहायक होकर आती हैं। इनका कितना और कैसा उपयोग किया गया है, यही मूर्त्तिकार की प्रतिभा का परिचायक है। भारतीय परंपरा में इस कला को स्वतंत्रकला के रूप में नहीं स्वीकार किया गया है अपितु उसका परिगणन वास्तुकला के अंतर्गत ही किया गया है और इसका 60 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 75
निरूपण भी वास्तुकला के अंग में ही किया गया है। हिंदी के कलाचिंतकों ने भी इस बात को स्वीकारा है। कांतिचद्र पांडेय355 तथा द्विजेन्द्रनाथ शुक्ल356 दोनों ने वास्तुकला के अंतर्गत ही इस कला का उल्लेख किया है। रामलखन शुक्ल ने भी इसी बात की ओर इंगित करते हुए लिखा है, 'भारतीय मूर्ति-निर्माण कला वास्तुकला से सर्वदा प्रभावित रही है। वास्तव में मूर्तिकला वास्तुकला की आश्रित कला मानी गयी है। अतः इस रूप में उसका प्रभावित होना सहज स्वाभाविक है।"357 चित्रकला : कलाचितकों ने मूर्ततिकला की भांति चित्रकला को भी वास्तुकला के ही अंश स्वरूप अथवा उसकी आश्रित कला प्रतिपादित किया है। यह कला वास्तुकला तथा मूर्तिकला की अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट तथा सूक्ष्म कला है। कतिपय चिंतकों ने तो सभी कलाओं से इस कला का स्थान अत्युच्च माना है।358 यद्यपि इस बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता तथापि इसके माध्यम के अधिक विकसित होने के कारण यह अवश्य माना जा सकता है कि वास्तुकला एवं मूर्तिकला की अपेक्षा इसमें भावों की अभिव्यक्ति अधिक सशक्त हो जाती है। वास्तुकला तथा मूर्तिकला की भांति स्थान का उपयोग इसमें भी होता है, परंतु वहां प्रस्तर, मिट्टी, लकड़ी आदि के स्थान पर रेखाएं व रंगों का प्रयोग होता है। चित्रकार चित्र में गति उत्पन्न करने के लिए तथा ओज, माधुर्य आदि गुणों की अभिव्यक्ति के लिए रेखा की गति, उतार-चढ़ाव तथा वर्णों के छाया प्रकाश, घनत्व और विरलता आदि कौशलों का प्रयोग करता है। इस कला के आयाम तीन लंबाई, चौड़ाई, और मोटाई न होकर केवल दो लंबाई और चौड़ाई ही होते हैं। लेकिन चित्रकला की यह विशेषता होती है कि इसमें कलाकार समतल धरातल पर ऊंचाइयां, गहराइयां, दूरियां और नैकट्य आदि सुगमता से दिखा पाता है। वह मानस चित्रों को रेखा और रंगों के माध्यम से अपने सामर्थ्यानुसार चाक्षुष चित्र में प्रस्तुत करता है। जबकि वास्तुकला तथा मूर्त्तिकला में कलाकार को यह सुविधा प्रदान नहीं होती है। विभिन्न कलाविचारकों ने इसकी परिभाषाएं इस प्रकार दी हैं, "किसी एक तल पर, जो सम हो या खमदार, पानी, तेल अथवा अन्य माध्यम में घोले अथवा सूखे एक व एकाधिक रंग की रेखा एवं रंगामेजी द्वारा किसी रमणीय आकृति के अंकन की ओर इसी प्रसंग में निम्नोन्नत तथा एकाधिक तल और पहलू दरसाने को चित्रण कहते हैं और ऐसी प्रस्तुत वस्तु को चित्र। उक्त आधारभूत सतह मुख्यतः भित्ति, पत्थर, काठ, पकायी मिट्टी के पात्र व फलक, हाथी दांत, चमड़ा, कपड़ा व कागज होती है।359 अविनाश बहादुर वर्मा के शब्दों में, "किसी धरातल-जैसे, भित्ति, काष्ठ-फलक आदि पर रंग तथा रेखाओं की सहायता से लंबाई, चौड़ाई, गोलाई तथा ऊंचाई को अंकित कर किसी रूप का आभास कराना चित्रकला है।"360 रामचंद्र शुक्ल मनुष्य की उस रचना को चित्रकला कहते हैं जिसमें मनुष्य अपनी कल्पना को अथवा किसी प्राकृतिक वस्तु या किसी भी वस्तु को रंग के माध्यम से किसी भित्ति पर उरेहता है।"361 हिंदी के कलाविचारकों ने चित्रकला को श्रेष्ठ रोमांटिक तथा सूक्ष्म कला के रूप में काव्यकला के अत्यधिक निकट माना है। जयसिंह नीरज ने काव्यकला और कला और कलाकृति का व्यापार / 61
Page 76
चित्रकला का संबंध अक्षुण्ण मानते हुए इन दोनों कलाओं को एक-दूसरे के प्रेरक और सहायक ही नहीं अपितु एक-दूसरे के पूरक भी माना है। वे लिखते हैं, "हम चाहे शास्त्रीय ढंग से विचार करें या स्वतंत्र ढंग से, काव्य एवं चित्रकला में अभिव्यक्ति के माध्यम का ही अंतर है, कला की आत्मा तो एक ही है। काव्य बोलता हुआ चित्र है और चित्र मूक काव्य है।"362 हिंदी में इन दोनों कलाओं के प्रति इसी तरह की विचार- धाराएं रामचंद्र शुक्ल,363 महादेबी वर्मा364 तथा कुमार विमल365 ने भी दी हैं। काल से संबंधित होने के कारण चित्रकला की रूप-योजना में एक स्थिरता रहती है। इस स्थिरता के कारण अथवा मस्तिष्क के साथ रूप की सहज संगति होने के कारण मस्तिष्क में चित्र की धारणा अधिक स्थायी होती है तथा उसका स्मरण भी अधिक सरलता और सजीवतापूर्वक संभव है। इसके विपरीत कालक्रमागत होने के कारण शब्द नश्वर है। चाहे संगीत का तात्कालिक प्रभाव कितना ही तीव्र हो, किंतु उसकी धारणा में स्थिरता नहीं होती। इस रूप में रामचंद्र तिवारी ने चित्रकला को संगीतकला एवं काव्यकला से भी उत्कृष्ट माना है।366 संगीतकला : चित्रकला से भी अधिक सूक्ष्म कला संगीत है। इस कला का माध्यम नाद तथा स्वर होता है। इसमें भावों की अभिव्यक्ति माध्यम की सूक्ष्मता और अंतर्मुखता के कारण अधिक सफलता के साथ होती है। यह कला स्थान (Space) को अतीत कर केवल 'काल' में व्यक्त होती है। चित्र में स्थान के उपयोग के कारण अंतर्मुखता नहीं आ पाती यद्यपि सांकेतिकता अवश्य आ जाती है। स्थूल जड़तत्त्व (जिसे भवन मूर्त्ति आदि में प्रयुक्त किया गया था) यहाँ गति में बदल जाते हैं। 'गति' स्थूल जड़तत्त्व से अधिक विकसित और 'सत्य' के निकटतर होने के कारण संगीत कला चित्रकला से उच्चतर कोटि की कला बन जाती है। यह कला भाव को जड़तत्त्वों-स्थान, दिक, तथा स्थूल माध्यमों से मुक्त कर देती है। इसीलिए इसमें मानसिक अंतर्मुखता अधिक होती है। हरिवंश सिंह शास्त्री ने इसकी मुख्य विशेषता यह मानी है कि इस कला का विषय जीवन का कोई एक भाग अथवा किसी व्यक्ति या जाति का चरित्र नहीं है, बल्कि श्रोता का अपना ही अंतःकरण है।367 हिंदी के कलाविचारकों ने इसे परिभाषित करते हुए गायन, वादन तथा नृत्य के समाहार में इसकी स्थिति देखी है। सामान्य रूप से आनंद और उल्लास के क्षणों में गा उठना मानव मात्र की सामान्य प्रवृत्ति रही है लेकिन इसे कला नहीं कहा जा सकता है। 'कला में एक व्यवस्थित प्रयत्न की अपेक्षा रहा करती है। संगीतकला के क्षेत्र में भी यही प्रक्रिया हुई। चिंतन का सभ्य सहारा पाकर प्राचीन काल में ही एक पद्धति का उदय हुआ और धीरे-धीरे, नृत्य और वाद्य के संयोग से उसने कला का रूप धारण किया।'368 भगवतशरण उपाध्याय369 तथा रामलखन शुक्ल 370 ने भी संगीत कला को इसी रूप में परिभाषित किया है। रामानंद तिवारी ने 'स्वर-संवेदनाओं के संयोजन' को संगीत कला कहा है।371 उन्होंने इस कला की विशेषता को उजागर करते हुए यह माना है कि यदि कला सृजनात्मक सौंदर्य है तो संगीत पूर्णतः सृजनात्मक है। इसकी रूपयोजना का कोई आधार प्रकृति में नहीं है। केवल स्वर की इकाइयों की
62 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 77
संभावना मुक्त आकाश में है, किंतु सौंदर्यमयी रूप योजनाओं की रचना मनुष्य अपनी सृजनात्मक कलावृत्ति के द्वारा करता है। इसके विपरीत चित्रकला की रूपयोजना का बहुत कुछ आधार प्रकृति में है। प्रकृति के तद्रूप अंकन का चित्रकला में बहुत महत्त्व है। संभवतः इसी आधार पर कुछ विचारक अनुकरण को कला की परिभाषा भी मानते हैं। संगीत पूर्णतः रचनात्मक ही है, उसकी स्वर योजनाओं का कोई प्राकृतिक आधार नहीं है। कला को अनुकरण मानने वाली परिभाषाएं संगीत की कसौटी पर आकर ही खंडित होती हैं।372 इसी विशेषता का समर्थन करते हुए एक अन्य कलाविचारक ने यह माना है कि 'भले ही संगीत के कुछ प्राथमिक चिह्न, स्व्र व साधन-तथ्य जानवरों तथ। पक्षियों की ध्वनियों से प्रेरित प्रतीत होते हैं तथापि संगीतकला किसी भी प्रकार से अनुकरण या विडंबना नहीं है। चित्रकला के नितांत काल्पनिक चित्र या रेखाकृतियां भी थोड़ी-बहु त उन उद्देश्यों के अनुरूप होती हैं जो प्रकृति क्षेत्र में यत्रतत्र विद्यमान हैं, जबकि संगीत ही एक मात्र ऐसी कला है जिसका विषय तत्त्व प्राकृतिक व मानव क्रिया- कलापों से सर्वथा भिन्न है।373 ललित कलाओं का क्रमिक विकास स्पष्ट करते हुए रामनाथ सुमन ने संगीत कला को पहली ललित कला माना है374 तथा ललित कलाओं का क्रम-निर्धारण करते हुए हरिवंश सिंह शास्त्री375 और बालसीताराम मर्ढेकर376 ने इस कला को काव्यकला से भी श्रेष्ठ माना है। इस कला के द्वारा व्यक्त भाव अधिक सूक्ष्म तथा स्पष्ट होते हैं जिससे यह कला का सबसे अधिक लोकप्रिय रूप माना जाता है। कांतिचंद्र पांडेय भी संगीत कला की इसी विशेषता को देखते हुए लिखते हैं कि "संगीतगत स्वर की तात्कालिक भावोत्पादकता के कारण ही संगीत काव्य से अधिक व्यापक रूप में हृदयाग्रही होता है। क्योंकि काव्य उन्हीं को प्रभावित करता है जिनमें अभिधेयार्थ के ज्ञान के कारण काव्य को सुनने अथवा पढ़ने से अर्थों अथवा विचारों का अबाध एवं विशाल-प्रवाह उद्भूत हो सकता है। परंतु संगीत अपनी ओर सबको आकर्षित करता है क्योंकि संगीत के स्वर उस श्रोता को भी प्रभावित कर सकते हैं जो अभिधेयार्थ के ज्ञान से सर्वथा रहित है।"377 यही कारण है कि संगीत कला भौगोलिक सीमाओं के बंधन से परे रहती है तथा प्राणी ही नहीं वनस्पतियों तक में स्पंदन भरा करती है। काव्यकला : हिंदी में सभी कलाचितकों को अंतिम रूप से यह मान्य है कि ललित कलाओं में काव्यकला का स्थान सर्वोत्कृष्ट है। इसके आधार शब्द और अर्थ हैं। मस्तिष्क की समुद्ध संपत्ति का सूक्ष्म और सुगम वाहक होने के कारण ही 'काव्य' कला का सबसे अधिक समुद्ध और समर्थ रूप है। इसके माध्यम की सूक्ष्मता को देखते हुए विद्वान यह मानते हैं कि यह कला अन्य ललित कलाओं का भी सुगमता से रूप ले सकती है ।378 यद्यपि संगीत कला में भी शब्द का स्वरूप ही साधन होता है। किंतु उसमें शब्द के अर्थ का उतना महत्त्व नहीं, जितना लय-तालबद्ध स्वरों के आरोह-अवरोह का। इसलिए काव्य के शब्द में सूक्ष्मता अर्थ के धरातल पर है, श्रुत-मधुर स्वर-लहरी पर नहीं। संगीतविशेषज्ञ एक-दो स्वरों के आरोह और अवरोह के द्वारा श्रोता को भाव- कला और कलाकृति का व्यापार / 63
Page 78
विभोर कर सकता है, किंतु यह भावविभोर की स्थिति स्थायी नहीं होती, जबकि कवि व्यंजनों और स्वरों के प्रयोग तथा उनके अर्थ के द्वारा चिरस्थायी प्रभाव डाल सकता है। "संगीत में केवल हार्दिक स्पर्श रहता है। काव्य में भी केवल 'स्वर' ही माध्यम के रूप में गृहीत है परंतु इसमें स्वर-सौंदर्य नहीं रह जाता। अपितु स्वर-संकेतों में बदलकर 'शब्द' बन जाते हैं। संकेत स्वतः अपने में असमर्थ वस्तु है किंतु यही संकेत आइडिया के मूर्त्तिकरण में सबसे अधिक समर्थ रहते हैं। संगीत में रहने वाली स्वरों की अनि- रिचितता काव्य में शब्दों की निश्चित शक्ति में बदल जाती है। काव्य में भाव व कल्पना संगीत की तरह अनिश्चित रूप में व्यक्त न होकर निश्चित रूप में व्यक्त होते हैं। इस प्रकार काव्य स्वर (Sound) को शब्द (Word) में बदल देता है। शब्द 'विचार' को संकेतित करता है और शब्द के अतिरिक्त विचार को मूर्त रूप में अन्य कोई माध्यम व्यक्त नहीं कर सकता। 'शब्द' स्थान, दिक्, काल सबको अतीत कर जाता है और किसी भी प्रकार के सूक्ष्मातिसूक्ष्म विचार तत्त्व को मूर्त कर देने की शक्ति रखता है।379 इस प्रकार अन्य कलाओं को तुलना में काव्य ही वह कला है। जिसमें वस्तु, रूप एवं भाव तीनों का पूर्ण समन्वय मिलता है तथा काव्य के विभिन्न उपकरणों जैसे विचार, राग, कल्पना तथा शब्द व अर्थ आदि में उचित अनुपात, संतुलन एवं सामं- जस्य के निर्वाह से उसमें आह्लाद और रमणीयता की सृष्टि की जा सकती है। अन्य कलाओं की अपेक्षा जहां इसका क्षेत्र सर्वाधिक व्यापक है वहां इसके अर्थ का अधिकांश केवल बुद्धिगम्य होने के कारण तथा पूरी तरह शैक्षणिक अध्ययन पर निर्भर रहने के कारण, कतिपय कलामनीषियों ने इसकी प्रभावित करने की शक्ति को अत्यंत सीमित भी माना है। कांतिचंद्र पांडेय380 तथा कृष्णकुमार शर्मा381 दोनों ने इस दृष्टि से इसका क्षेत्र सीमित बताया है इसका यह तर्क है कि हिंदी भाषा की कविता का आनंद केवल वही ले सकता है, जो हिंदी जानता हो। दूसरी ओर संगीत का रसास्वादन एक अशिक्षित व्यक्ति भी कर सकता है। तथा एक सुंदर फूल का चित्र केवल भारत में नहीं सारी दुनिया में प्रशंसित होगा। दुनिया के किसी भी कोने से आया हुआ व्यक्ति ताजमहल से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। यद्यपि आज काव्य को कलाओं में स्थान देकर उसे सर्वश्रेष्ठ ललित कला माना गया है तथापि आरंभ में कुछ कलाचिंतकों ने इसे कला के क्षेत्र से पृथक भी रखा है। इस दृष्टि से उल्लेखनीय नाम आचार्य रामचंद्र शुक्ल,382 जयशंकर प्रसाद,383 नंददुलारे वाजपेयी,384 रामदहिन मिश्र,385 गुलाबराय386 तथा नवलकिशोर मिश्र387 आदि के हैं। इन चिंतकों के अनुसार भारतीय दृष्टि से विधा और उपविधा ज्ञान के दो अलग क्षेत्र हैं। इनमें काव्य का स्थान विधा में है, जबकि कला का उपविधा में। इस प्रकार इन विद्वानों ने काव्य को कला न मानने के कोई ठोस आधार नहीं प्रस्तुत किये हैं, अपितु परंपरा के आधार पर ही काव्य की कला के रूप में परिगणना करने का विरोध किया है। इन विद्वानों के अतिरिक्त कुछ ऐसे कलाविचारक भी हैं जो काव्य को कला
64 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 79
तो मान लेले हैं लेकिम अन्य कलाओं की तुलना में उसे निम्न कोटि की कला खवीकारले हैं। इस मत के प्रबल समर्थक बालसीताराम मर्ढेकर हैं। 'ललितकला के रूप में कविता के स्थान' को गौण मानते हुए उन्होंने अपनी पुस्तक कला और मानव' (Arts and man) में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि "काव्यकला का आनंद उतना गहरा नहीं है जितना कि अन्य ललित कलाओं से हमें प्राप्त होता है। वे इसके दो कारण मानते हैं। पहला तो यह है कि कविता बिना किसी जांच-पड़ताल के संवेदनाओं के सब गुणों का प्रयोग कर लेती है और सब इंद्रियों के युगपत क्रियारत होने के लिए बाध्य करती है। दूसरा कारण यह है कि काव्यमय संवेदनाएं असली संवेदनाएं बिलकुल नहीं हैं, केवल प्रतिकृतियां मात्र हैं और क्योंकि इनमें असली संवेदनाओं की गहरी वास्तविकता नहीं रहती अतः इनकी आनंदायिनी शक्ति भी कम होती है।"388 इस प्रकार हम यह देखते हैं कि अपनी विशिष्ट प्रकृति के कारण यह कला आरंभिक कलाचिंतकों द्वारा भिन्न दृष्टि से देखी जाती रही है। शनैः-शनैः विचारकों का इसके प्रति दृष्टिकोण बदला है तथा उन्होंने कला के वर्गीकरण पर नये सिरे से विचार किया है। यों भी अब कला का मूल्यांकन परंपरागत मानदंडों के आधार पर नहीं किया जा सकता। कृति में कलात्मक गुण ही विशेष देखे जाने चाहिए। ये गुण कहीं कम हो सकते हैं कहीं अधिक, किंतु जहां भी हैं, वहां कला है और इस दृष्टि से कला में कम सफलता या अधिक सफलता, पूर्णता या अपूर्णता हो सकती है, ऊंच-नीच का भाव नहीं। जिन कलाचितकों ने काव्य को कला नहीं माना है उनके कारणों को स्पष्ट करते हुए विश्वंभरनाथ उपाध्याय का यह तक दिया जा सकता है कि "हिंदी के इन विद्वानों के समय तक हिंदी में हीगेल के कला-विभाजन वाले सिद्धांत का सही विवेचन नहीं हो सका था। लेकिन इधर परवर्ती कलाचितकों ने इस विषय पर पर्याप्त प्रकाश डाला है।"389 अब पश्चिम की देखादेखी हिंदी में सौंदर्यशास्त्र पर भी सोचा-समझा जाने लगा है। ऐसी स्थिति में काव्य को कला के अंतर्गत न रखने पर सौंदयशास्त्रीय अवधारणा ही खंडित हो जायेगी। काव्य से जो सौंदर्यानुभूति प्राप्त होती है वह संगीत, नृत्य, चित्र आदि से भी होती है। भारतीय मत भी इसकी पुष्टि करता है। सभी कलाओं में सामान्य गुणों का अनुसंधान ही तो सौंदर्यशास्त्र है। अतः बदली हुई धारणा के अनुरूप काव्य को कला में अंतर्भुक्त करना युग के अनुरूप है।390 सारांश यह कहा जा सकता है कि काव्य को कला मानने में और कला में भी सर्वश्रेष्ठ ललित कला मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हिंदी के सभी कलाचितक आज इस तथ्य को निर्विवाद रूप से स्वीकार करते हैं। श्रष्ठ कला का प्रश्न : उपर्युक्त पांचों कलाओं के विवेचनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि वास्तुकला एक बाह्य कला है। मूर्तिकला वस्तुपरक (objective) कला है तथा चित्र, संगीत और काव्यकला अंतर्मुखी (Subjective) कलाएं हैं। चित्र, संगीत तथा काव्यकला को समष्टि रूप से रूमानी कला कहा गया है। काव्य इस रूमानी कला की अंतिम परिणति है। माध्यम की दृष्टि से वास्तु से काव्यकला तक क्रमशः माध्यम
कला और कलाकृति का व्यापार / 65
Page 80
सूक्ष्म होता चला जाता है। जिस कला में माध्यम जितनी सीमा तक अनिवार्य रहता है, वह कला उसी सीमा तक निम्नकोटि की कला होती है। क्योंकि कलाकार माध्यम की अनिवार्यता के कारण अपने को स्वच्छंद रूप में व्यक्त नहीं कर पाता। हिंदी के कला- विचारकों ने अपनी पुस्तकों तथा लेखों में इसी सिद्धांत को आधार बनाकर वास्तुकला को सबसे हेय तथा काव्यकला को श्रेष्ठ स्थान प्रदान किया है। वास्तुकला के निर्माण में इंट, पत्थर, गारा, चूना इत्यादि जिन पदार्थों की आवश्यकता होती है उनमें भौतिक नाप-जोख की लंबाई, चौड़ाई और मोटाई-तीन आयाम रहते हैं। अतएव उनको नाप- कर आकार देने में कोई अधिक कौशल की अपेक्षा नहीं होती। मूर्तिकार को वास्तुकार से श्रेष्ठ इसलिए बतलाया गया है क्योंकि उसमें वास्तुकार की अपेक्षा सजीवता की अनुरूपता लाने का प्रयास कलाकार को करना पड़ता है। सजीवता में प्रतिक्षण की संचरणशीलता रमन करती है जिसके उत्पादन जड़ पदार्थ-मिटटी, पत्थर, लोहा अथवा उस धातु में नहीं मिलते जिससे मूर्ति बनायी जाती है। चित्रकार के पास लंबाई- चौड़ाई तो है पर मोटाई का नियोजन रंग द्वारा ही करना पड़ता है। अतएव वह वास्तुकला और मूर्तिकला दोनों से उत्तम कही गयी है। संगीतकला में आकर तूलिका और रंग का भी बाह्य आश्रय मिट जाता है। अतएव यह उससे भी श्रेष्ठ कला है काव्यकला में उन स्वर-सांचों का भी नितांत अभाव हो जाता है, जिनके सहारे संगीत कला का आविर्भाव होता है अतः इस रूप में काव्यकला सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होती है। 50p3 माध्यम की सूक्ष्मता के आधार पर यद्यपि हिंदी के अधिकांश विद्वान वास्तुकला को निम्नकोटि की तथा काव्यकला को श्रेष्ठ कला घोषित करते हैं, तथापि कुछ विचारक इस निर्णय से असहमति प्रकट करते हुए अपने आधार पर किसी कला के श्रेष्ठ होने का निर्णय देते हैं। इन विचारकों में भगवतशरण उपाध्याय391 मूर्तिकला को, अवध उपाध्याय392 चित्रकला को तथा संपूर्णानंद,393 हरिवंशसिंह शास्त्री,394 बालसीताराम मर्ढेकर 395 और पुरुषोत्तमदास अग्रवाल396 संगीतकला को अन्य कलाओं से श्रेष्ठ घोषित करते हैं। हिंदी में कुछ कलाचिंतक ऐसे भी हैं जो कलाओं में किसी भी एक कला को श्रेष्ठ या हेय सिद्ध करना अनुचित समभते हैं। उनका यह तर्क है कि "कलाकार के मन में पहले यह रूप जन्म लेता है जिसे वह बाह्य साधनों द्वारा व्यक्त करता है। साधनों की सफलता और निर्बलता पर आभ्यंतर के स्वरूप की महत्ता को तोलना शुद्ध भ्रम है। साधन तो स्वरूप-दान के लिए उपादान मात्र है। महत्ता तो कला की उस मूर्ति की है जो कलाकार के भीतर जन्म लेती है।397 अतः माध्यम के आधार पर किसी भी कला के श्रेष्ठ या हेय होने का निर्णय नहीं किया जा सकता यद्यपि यह सही है कि सूक्ष्म माध्यम के द्वारा भाव को अधिक सुविधा के साथ मूर्त किया जा सकता है और यह क्षमता काव्यकला में सर्वाधिक दृष्टिगोचर होती है तथापि यह भी मानना पड़ता है कि मन की गहराइयों में उतरकर प्राणों के मर्म को स्पर्श करके उसे भाव से आंदोलित कर देने की जो क्षमता संगीतकला में है, रूप और भावों के लक्षणों को व्यक्त करने की जो शक्ति चित्रकला में है, मानव शरीर की चतुर्दिक भंगिमा, शरीर की पृथुलता, भारीपन आदि मूर्त भावों को आकार और अभिव्यक्ति देने की जो क्षमता मूर्तिकला में है तथा 66 / सौंद्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 81
कठोर साध्यम के द्वारा रूप का वित्यास अधिक स्थिर और इंद्रियों के लिए अधिका स्पष्ट बनाने की जो क्षमता वास्तुकला में है वह अन्य किसी कला में नहीं हो सकती है। क इसी प्रकार सभी कलाएं अपने स्वरूप में श्रेष्ठ और सुंदर हैं। मनुष्य के सांस्कृतिक जीवन में सभी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। माध्यम स्वरूप आदि की दृष्टि से सभी कलाओं की अपनी विशिष्टता है। इस विशिष्टता के कारण ही एक कला दूसरे का स्थान नहीं ले सकती है और न ही दूसरे के अभाव की पूर्ति कर सकती है अतः हेयता और श्रेष्ठता के स्थान पर यदि उनकी विशिष्टता का विवेचन किया जाये तो वह अधिक तर्कसंगत तथा वैज्ञानिक होगा।F FF कि। 5ल ललित कल।ओं का वर्गीकरण तथा उनके निम्न तथा उच्च होने का जो कम ए हिंदी के अधिकांश कलामनीषियों को मान्य है (वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीतकला, काव्यकला) वह वास्तव में हीगेल के कलासिद्धांत के अनुसार है। पाश्चात्य मनीषी हीगेल ने आधार की सूक्ष्मता के अनुसार ही ललित कलाओं की पारस्परिक उत्कृष्टता का निर्धारण किया है। हिंदी के कलाविचारकों ने इसी कला। सिद्धांत से प्रभावित होकर कलाओं के निम्न तथा उच्च होने का निर्णय दिया है। इसके साथ ही हिंदी में बहुत से कलाविचारक ऐसे भी हैं जो हीगेल के इस कलासिद्धांत के अनौचित्य को देखते हुए इसका कड़ा विरोध करते हैं। सर्वप्रथम हंसकुमार तिवारी ने काव्यकला और संगीतकला की तुलना के सहारे हीगेल की इस मान्यता का खंडन अच्छी तरह किया है। वे स्पष्ट रूप से मानते हैं कि "हीगेल द्वारा निर्धारित कलाओं की श्रेष्ठता के क्रमनिर्देश का वास्तव में तातत्विक मूल्य नहीं है।"398 कुमार विमल भी इसी मत का समर्थन करते हुए अपनी पुस्तक 'कला- विवेचन' में हीगेलीय कला-समीक्षा के अनुसार आधार की अमूर्तता की कसौटी पर ललित कलाओं की पारस्परिक श्रेष्ठता का निर्धारण भ्रामक मानते हैं। वे लिखते हैं कि "आधार की क्मिक सूक्ष्मता की दृष्टि से ललित कलाओं की पारस्परिक या सापेक्षिक उत्कृष्टता का निर्धारण अधिक न्याय नहीं है। कारण, कला की उत्कृष्टता मात्र आधार की सूक्ष्मता पर निर्भर न रहकर प्रभविष्णुता के अधीन है। आधार की दृष्टि से स्थूल- तम वास्तुकला का निदर्शन-ताजमहल-प्रभविष्णुता के कारण उत्कृष्टतम कलाकृतियों में एक है। विषय के किसी भी महान संगीत अथवा काव्य की तुलना में उसकी श्रेष्ठता पंगु नहीं है। अतः आधार की सूक्ष्मता के कारण काव्यकला को सर्वश्रेष्ठ घोषित करना उसी प्रकार भावना की भूल है, जिस प्रकार सांप्रदायिक दृष्टि से धर्म-साधना के क्षेत्र में बहुदेवोपासना के बीच किसी एक देवता को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करना।"399 इसी बात का विरोध विश्वंभरनाथ उपाध्याय भी करते हैं। उनके शब्दों में : "ललित कलाओं में माध्यम की दृष्टि से विभाजन मात्र व्यावहारिक है। अनुभूति और आनंद की दृष्टि से सभी ललित कलाएं जिस प्रकार अपने माध्यमों की विशिष्टता रखती हैं, वैसे ही अपने सौंदर्य और तज्जन्य आनंद में भी वे विशिष्ट हैं। भारतीय दृष्टि से सभी कलाओं का लक्ष्य रसानुभूति है। यूरोप में तर्क की रक्षा में विचारक वास्तविक अनुभव से बहुत दूर चले जाते हैं। इसके विपरीत हमारे यहां I>P कला और कलाकृति का व्यापार/ 67 80
Page 82
,अनुभव' को ही सबसे अधिक प्रामाणिक माना गया है। 'अनुभव' सभी ललित कलाओं को समकक्ष रखता है। सरस्वती के 'मंदिर' में सरस्वती की 'मूर्ति', सरस्वती के 'चित्र' सरस्वती की 'पूजा' के समय के 'संगीत' तथा सरस्वती के 'काव्यमय' वर्णन में से उपासक किसे हीन तथा किसे श्रेष्ठ माने ? और किस आधार पर ? जबकि सभी से कला की अधिष्ठात्री देवी की आनंदमय अभिव्यक्ति होती है।"400 इन विद्वानों के अतिरिक्त नंददुलारे वाजपेयी, 401 प्रभुदयाल मीतल,402 तथा रामविलास शर्मा भी हीगेल के कला-सिद्धांत तथा माध्यम की दृष्टि से कलाओं के श्रेष्ठ या हेय सिद्ध करने के निर्णय को अनुचित मानते हैं। रामविलास शर्मा तो अपने मत में, कलाओं को निम्न तथा उच्च मानने वाले विद्वानों को यह सुभाव देते हैं कि ललित कला में कौन निम्न है तथा कौन उच्च, इसका निर्णय करने से अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य यह है कि हम सामाजिक जीवन में उन सभी के सामंजस्य, उपयोग और विकास का प्रयत्न करें।"403 वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि हमारे लिए हीगेल के दृष्टिकोण की अपेक्षा यह दृष्टिकोण अपनाना अधिक युक्तिसंगत होगा कि कलाएं एक-दूसरे की पूरक हैं; उनका यह अस्तित्व हमारे सौंदर्यबोध को समृद्ध करता है, कलाजन्य आनंद में बाधक नहीं होता।404 निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि कलाओं की प्रत्येक इकाई चाहे वर्ण हो या शब्द, रंग हो या लकड़ी, पत्थर का टुकड़ा, अपने-आप में महत्त्वपूर्ण है। उसका संबंध एक ओर अंतस के किसी निश्चित भाव या विचार से है तथा दूसरी ओर वस्तु सत्य के किसी निश्चित पक्ष से। इसलिए यद्यपि सभी कलाएं मूलतः भिन्न हैं क्योंकि उनमें प्रत्येक सत्य के उस पक्ष का उद्घाटन करने में समर्थ है जो दूसरों के लिए असंभव है तथापि वे सभी पक्ष हैं एक ही सत्य के। संगीत उसी को स्वर देने की चेष्टा है। अरूप के उसी आभास को निश्चित अर्थ और विशेष रूप में बांधने की चेष्टा चित्र है, उसी को शरीरी बना देने की चेष्टा वास्तु और मूर्ति है और रूप के उसी अचल मूक विग्रह को गति और वाणी देने की चेष्टा काव्य है। यहीं आकर सभी कलाएं समान तथा एक हो जाती हैं। अतः हिंदी के कलाविचारकों ने उनके मनमाने भेद और प्रकार, श्रेणी और वर्ग-विभाजन तथा पारस्परिक हेयता और श्रेष्ठता का जो प्रश्न उठाया है वह अनुचित है। इसके स्थान पर यदि वे कलाओं की विशिष्टताओं पर विचार करें तो वह अधिक तर्कसंगत तथा वैज्ञानिक होगा।
संदर्भ
- संस्कृत इंगलिश डिक्शनरी, संपादक-मोनियर-विलियम्स (दिल्ली : मोतीलाल बनारसीदास, जवाहर नगर, प्रथम भारतीय संस्करण, 1970), पृ० 261 2. अमरकोश, संपादक-पं० हरगोविंद शास्त्री (वाराणती : चौखंवा संस्कृत सीरीज ऑफिस, प्रथम संस्करण, 1970), पृ० 93 3. सीताराम चतुर्वेदी, समीक्षाशास्त्र (काशी : अखिल भारतीय विक्रम परिषद, संवत् 2010 विक्रमाब्द), पृ० 205
68 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 83
- सदगुरुशरण अवस्थी, साहित्य तरंग (इलाहाबाद : इंडियन प्रेस प्राइवेट लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1956), पृ० 2 5. कांतिचंद्र पांडेय, स्वतंत्र कलाशास्त्र (प्रथम भाग) (वाराणसी : चौखंबा संस्कृत सीरोज ऑफिस, प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 5 6. नगेन्द्र, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1978), पृ० 73 7. कांतिचंद्र पांडेय, स्वतंत्र कलाशास्त्र (प्रथम भाग) (वाराणसी: चोखंबा संस्कृत सीरीज ऑफिस, प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 5 8. वही, पृ० 6 9. कांतिचंद्र पांडेय, स्वतंत्र कलाशास्त्र (प्रथम भाग) (वाराणसी : चौखंबा संस्कृत सीरीज ऑफिस, प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 6 10. रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तात्विक विवेचन एवं ललित कलाएं (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, श्रथम संस्करण, 1978), पृ० 18 11. हिंदी विश्वकोश (खंड 2) संपादक धीरेन्द्र वर्मा (वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, प्रथम संस्करण, 1962), ५० 378 12. वासुदेवशरण अग्रवाल, कला और संस्कृति (इलाहाबाद साहित्य भवन प्राइवेट लिमिटेड, द्वितीय संस्करण, 1958), पृ० 263 13. नीशररंजन राय, भारतीय कला का अध्ययन (दिल्ली : दि मैकर्मिलन कंपनी ऑफ इंडिया लि मटेड, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 88 14. ब्रजगोपाल तिवारी, कला और कलपना पर एक दार्शनिक दृष्टि, (समालोवक) : (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक रामविलास शर्मा, अंक 1, वर्ष 1, फरवरी, 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृ० 22 15. वही 16. इनसाइक्लोपीडिया ब्रिट्रेनिका (खंड 2) (शिकागो : विलियम बैंटन पब्लिशर्स, 1972), प० 484 17. रामकुमार वर्मा, 'सुंदर और असुंदर', 'कला और साहित्य' (आकाशवाणी से प्रसारित पंद्रह वार्ताओं का संग्रह), संपादक अनुल्लिखित (दिल्ली : निदेशक प्रकाशन विभाग, द्वितीय संस्करण, 1966), पृ० 24-25 18. कुमार विमल, कला विवेचन (पटना : भारती भवन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 26 19. प्रभुदयाल मीतल, ब्रज की कलाओं का इतिहास (दिल्ली : साहित्य प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 1 20. "आलदो दिस इज ए यूनिवर्सल ह्य मन एक्टीविटी, आर्ट इज वन ऑफ दि हार्डेस्ट थिंग्ज इन दि वर्ल्ड टू डिफाइन।" ऑक्सफोर्ड जूनियर इनसाइक्लोपोडिया (भाग-12) लंदन 21. हिंदी विश्वकोश (खंड 2) संपादक धीरेन्द्र वर्मा (वाराणसी: नागरी प्रचारिणी सभा, प्रथम संस्करण 1962), पृ० 378 22. हिंदी साहित्य कोश (भाग 1) संपादक धीरेन्द्र वर्मा (वाराणसी: ज्ञानमंडल लिमिटेड, द्वितीय संस्करण, संवत् 2020), पृ० 220 [23. हरिवंशसिंह शास्त्री, सौंदर्य विज्ञान (काशी : मंत्री, श्री काशी विद्यापीठ, प्रथम संस्करण, 1936), पृ० 732 24. जयकांत झा श्रृतधर, कला (काशी : त्रिवेणी कला मंदिर, प्रथम संस्करण, 1952), पृ० 15
कला और कलाकृति का व्यापार / 69
Page 84
- कुमार विमल, कला विवेचन (पटना : भारती भवन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 25 26. हरद्वारीलाल शर्मा, साहित्य और कला (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, (nकthe 1959), प्र० ख० (प्रस्तावना)(। 27. ब्रजभूषण पांडेय, कला : शिल्प : शैली, (सम्मेलन पत्रिका) (कला अंक), संपादक रामप्रताप आत त्रिपाठी शास्त्री, संख्या 2-3, भाग 44. मई, 1959 (प्रयाग: हिंदी साहित्य समेलन), प० 367 F1 28. भगवतशरण उपाध्याय, विश्वकला की मंजिलें (सम्मेलन पत्रिकाः) कला अंक, वही, पृ 33 29. भोलानाथ तिवारी, 'कला', (सम्मेलन पत्रिका) (कला अंक), वहो, पृ० 24-25 30. जयसिंह नीरज, राजस्थानी चित्रकला और हिंदी कृष्णकाव्य (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 3 31. मदनगोपाल, भारत की पांच कलाएं (बड़ौदा : शिव पुस्तकालय, प्रथम संस्करण, 1960), : (2)पृ० 1 32. रामानंद तिवारी, सत्यं शिवं सुन्दरम् (द्वितीय भाग) (भरतपुर: भारती मंदिर गोविद भवन, PF ,।प्रथम संस्करण, 1963) 33. जगदीश गुप्त, भारतीय कला दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, ,>9P/I | 1961) पृ० 20 34. रामचंद्र शुक्ल, कला और आधुनिक प्रवृत्तियां (लखनऊ: हिंदी समिति उत्तर प्रदेश शासन. iT प्रथम संस्करण, 1958), पृ० 30 35. व सुदेव उपाध्याय, प्राचीन भारतीय स्तूप, गृहा एवं मंदिर (पटना : बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, (गाण प्रथम संस्करण, 1972), पृ० क। 36. नोहाररंजन राय भारतीय कला का अध्ययन (हिंदी : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 59 37. कांतिचंद्र पांडेय, स्वतंत्र कलाशास्त्र (प्रथम भाग) (वाराणसी : चौखंबा संस्कृत सीरीज ऑफिस, .(ctel प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 6 (ग ल।) 38. रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तात्विक विवेवन एवं ललित कलाएं (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 18 39. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 5 40. हिंदी साहित्य कोश (भाग 1), संपादक धीरेन्द्र वर्मा (वाराणसी : ज्ञानमंडल लिमिटेड, द्वितीय उe संस्करण संवत् 2020), पृ० 221 41. मानविकी पारिभाषिक कोश (साहित्य खंड), संपादक नगेन्द्र (दिलली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम क8 1n संस्करण, 1965), पृ० 26 42. वही क (SI 1. 43. हरिवंशसिंह शास्त्री, सौंदर्य-विज्ञान (काशी : मंत्री, श्री काशी विद्यापीठ, प्रथम संस्करण, 1936), पृ० 132 44. संपूर्णानंद, कला का परंपरा से संबंध, कला : संदर्भ और प्रकृति, संपादक प्रेमचंद गोस्वामी (जयपुर : लोक संपर्क प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1971), पृ० 11505 45. कुमार विमल, कला-विवेचन (पटना : भारती भवन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 52 46. रामचंद्र शुक्ल, कला और आधुनिक प्रवृत्तियां (लखनऊ: हिंदी समिति, उत्तर प्रदेश शासन, (sae1 तृतीय संस्करण, 1974), पृ० 29 I: FIBW :A0
70 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 85
- ब्रजगोपाल तिवारी, 'कला और कल्पना पर एक दार्शनिक दृष्टि', (समालोचक: सौंदर्यशास्त्र : 1 विशेषांक), संपादक रामविलास शर्मा, अंक 1, वर्ष 1, फरवरी, 1958 (आगरा: विनो: पुस्तक मंदिर), पृ० 22 (48 लक्ष्मीनारायण लाल, 'उपन्यासकला की आंतरिक समीक्षा, (सम्मेलन पत्रिका): (कला अंक), संपादक रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्री, संख्या 2-3, भाग 33, मई, 1959 (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन), पृ० 378 .80 49. जगदीश गुप्त, सौंदर्य के नये आयाम, (आजकल), संपादक केशव गोपाल निगम, अंक 11, वर्ष 28, मार्च, 1973 (दिलली : प्रकाशन विभाग, पटियाला हाउस), पृ० 13 50. नगेन्द्र, आस्था के चरण (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1968), प० 104 51. प्रभाशंकर ओ० सोमपुरा, भारतीय शिल्प संहिता (बंबई : सामैया पब्लिकेशंस, प्रथम संस्करण, 1975), पृ० 5 52. "सौंदर्य की प्रेरणा ही कला-रचना का मूल और सुंदर की प्रतिष्ठा ही कला का आदर्श है।" (doe हंसकुमार तिवारी, कला (गया : मानसरोवर प्रकाशन, प्रथम संस्करण सन् अनुल्लिखित), पृ० 98 53. "प्रत्येक प्रकार की कलात्मक प्रक्रिया का ध्येय है-सौंदर्य तथा आनंद की उपलब्धि।" वासुदेव उपाध्याय, प्राचीन भारतीय स्तूप, गृहा एवं मंदिर (पटना : बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्रथम feसंस्करण 1972), पृ० क 54. "समस्त कलाओं का उद्दैश्य सौंदर्यानुभूत कराना है।"-वीणा माथुर, प्रसाद का सौंदर्य दर्शन (जयपुर : वाफना प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1971), पृ० 209 55. हरदवारीलाल शर्मा, साहित्य और कला (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, Tv1959), पृ० ख (प्रस्तावना) 56. हजारीप्रसाद द्विवेदी, कला प्रयोजन, कला और साहित्य (आकाशवाणी से प्रसारित पंद्रह वार्ताओं Th f का संग्रह (दिल्ली : निदेशक प्रकाशन विभाग, द्वितीय संस्करण, 1966), पृ० 14 57. नीहाररंजन राय, भारतीय कला का अध्ययन (दिल्ली :दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 164 58. वाचस्पत्यम् कश (षष्ठ भाग), संकलनकर्त्ता-तारानाथतर्कवाचस्पति भट्टाचार्य (वाराणसी : TVT 1. चौखंबा संस्कृत सीरीज ऑफिस, तृतीय संस्करण, 1970), पृ० 5314 '59. नगेन्द्र, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दितली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण THS 1974), पृ० 32la 60. सूर्यप्रसाद दीक्षित, छायावादी कवियों का सौंदर्य विधान (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ -IST इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1974), पृ० 27। 61. सुरेशचंद्र त्यागी, छायावादी काव्य में सौंदर्य दर्शन (मेरठ: अनुराधा प्रकाशन, प्रथम संस्करण irpis 1976), पृo 19 62. रामाश्रय शुक्ल करुणेंद्र, शास्त्र (कानपुर: ओरियंटल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण fi1977), पृ० 35 63. संस्कृत हिंदी कोश (भाग 3), संपादक पी० के० गौड़, सी० जी० कार्व (पूना: प्रसाद प्रकाशन, Bbiसंस्करण, 1959), पृ० 1693 64. जगदीश शर्मा, 'सौंदर्यशास्त्र संज्ञा की उपयुक्तता का प्रश्न', 'आलोचना', संपादक नामवरसिंह, नवांक 20, वर्ष 19, जनवरी-मार्च, 1972 (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन), पृ० 16 65. शब्द कल्पद्रुम (पंचम भाग), संकलनकर्ता-राजा राधाकान्त देव (वाराणसी : चौखंबा संस्कृत (orer सीरीज ऑफिस, तृतीय संस्करण, सं० 2024 वि०), पृ० 373 कला और कलाकृति का व्यापार / 71 01 p
Page 86
- रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्य शास्त्र का तात्विक विवेचन एवं ललित कलाएं (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 23-24 67. एस० टी० नरसिंहाचारी, सौंदर्य तत्त्व निरूपण (दिल्ली : वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 2 68. फतहसिंह, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली: नेशनल पब्लिशिंग हाउस,प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 7 69. वही, पृ० 127 70. रामेश्वरलाल खंडेलवाल, जयशंकर प्रसाद, वस्तु और कला (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 288 71. सूर्यप्रसाद दीक्षित, छायावादी कवियों का सौंदर्य विधान (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1974), पृ० 31 72. लालताप्रसाद सक्सेना, मंझन का सौंदर्यदर्शन (जयपुर : निर्मल प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1966), पृo 18 73. (क) " ... 'सुंदर' नामक विशेषण की कोई कटी-कटाई परिभाषा वैज्ञानिक अर्थ में असंभव है।" प्रभाकर माचवे, 'परिभाषा-प्रश्न: रम्य, सुंदर, भव्य चित्रोपम आदि', 'कलानिधि', संपादक रायकृष्णदास, अंक 4, वर्ष 1 (बनारस : भारत कला भवन काशी हिंदू विश्वविद्यालय), पृ० 45 (ख) "हमारे मत में 'सुंदर' परिभाषा की सीमा से इसलिए बाहर है कि वह हमारी सरलतम और निकटतम अनुभूति है। वह विरल और विचित्न नहीं अपितु सरल और साधारण है।" हरद्वारीलाल शर्मा, साहित्य और कला (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्भेलन, प्रथम संस्करण, 1959), पृ० 17 (ग) "प्रत्येक मनुष्य सोंदर्य का अनुभव करता है, परंतु सौंदर्य क्या वस्तु है, इस विषय में बता सकना किसी भी व्यक्ति के लिए कठिन है।" हजारीप्रसाद द्विवेदी; कालिदास की लालित्य योजना (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1970), पृ० 116 (घ) " 'कला' की तरह 'सौंदर्य' को भी कुछ धुंधली सीमाओं से घेरने के अलावा इसका पूरा विवरण नहीं दिया जा सकता। अतः इसकी भी पूर्ण परिभाषा देना नामुमकिन-सा है।" रमेशकंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया (p लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 5 (ङ) "सौंदर्य शब्द का प्रयोग जितना ही सामान्य एवं व्यापक है, इसका अर्थ उतना ही रहस्य- पूर्ण और विवादास्पद है-सौंदर्य को परिभाषित नहीं किया जा सकता, परिभाषा अथवा गुण के आधार पर इसको विश्लेषित नहीं किया जा सकता।"-रामकीति शुक्ल, सौंदर्य का तात्पर्य (लखनऊ : उत्तर प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्रथम संस्करण, 1975), पृ० 1 (च) "वास्तव में 'सौंदर्य' शब्द जितना व्यापक और सामान्य लगता है, उसका अर्थ उतना ही रहस्यपूर्ण और विवादास्पद है-उसके मूल्य, उसकी सापेक्षता, उसके परिणाम और गुण, उसकी परिभाषा आदि अनिश्चित और अविश्लेषित हैं।" शलभ, संवेदना और सौंदर्यबौध (अजमेर : कृष्णा ब्रदर्स, प्रथम संस्करण, 1982), पृ० 25 (छ) "सौंदर्य क्या है, हम नहीं जानते; सौंदर्य की परिभाषा बड़े-बड़े मर्मज्ञ नहीं कर सके और हम 'गहि-गहि गरब गरुर' इस कटकाकीर्ण पर्थ! पर चलने वाले नहीं हैं।" सच्चिदानन्द वात्स्यायन, आधुनिक हिंदी साहित्य (दिल्ली : राजपाल एंड संज, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 10 72 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 87
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल, चितामणि (भाग-एक) (प्रयाग : इंडियन प्रेस प्राइवेट लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 132 75. हरिवंशसिंह शास्त्री, सौंदर्य-विज्ञान (काशी : मंत्री श्री काशी विद्यापीठ, प्रथम संस्करण, 1936), F पृ० 56-57 L76. अवध उपाध्याय, भारतीय ललितकला (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1948), पृ० 1-2 77. हरद्वारीलाल शर्मा, सौंदर्यशास्त्र (इलाहाबाद : मधु प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1979), पृ० 8 78. तारिणी चरणदास 'चिदानंद', कला और साहित्य (दिल्ली : राजपाल एंड संज, प्रथम संस्करण, 1960), पृ० 26 79. रामदत्त भारद्वाज, 'सौंदर्य की परिकल्पना', 'सम्मेलन पत्रिका', संपादक रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्री, संख्या 4, भाग 59, अश्विन-मार्गशीष, शक 1895 (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन), पृ० 5 80. हजारीप्रसाद द्विवेदी, कालिदास की लालित्य योजना (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1970), पृ० 122 81. हजारीप्रसाद द्विवेदी, 'कला में तथ्य सत्य एवं यथार्थ', 'परिषद पत्रिका', संपादक भुवनेश्वरनाथ मिश्र माधव, अंक 1, वर्ष 3, अप्रैल, 1963 (पटना: बिहार राष्ट्र भाषा परिषद), पृ० 49 82. रामविलास शर्मा, आस्था और सौंदय (इलाहाबाद: किताब महल, प्रथम संस्करण, 1883 शकाब्द), पृ० 20 83. वही, पृ० 20-21 84. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० ix (प्रस्तावना) 85. वही, पृ० 17 86. फतहसिंह, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 1967), पृ० 1 87. रामानंद तिवारी, सत्यं शिव सुंदरम् (भाग-2) (भरतपुर : भारती मंदिर गोविंद भवन, प्रथम संस्करण, 1963), पृ० 844 88. एस०टी० नरसिंहाचारी, सौंदर्य तत्त्व निरूपण (दिल्ली : वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), प्ृ० 6 89. सुरेन्द्रनाथ दासगुप्त, सौंदर्य तत्त्व, अनुवादक-आनंदप्रकाश दीक्षित (इलाहाबाद : भारती भंडार, लीडर प्रेस, प्रथम संस्करण, सं० 2017 वि०), पृ० 253 90. "सौंदर्य मन, आत्मा एवं मानव, प्रकृति अथवा वस्तु जगत के बाह्य रूपाकार की वह विशेषता है जो प्राणी को आनंद-विह्वल एवं आत्मतिभोर करने की क्षमता रखती है।"-लालताप्रसाद सक्सेना, मंझन का सौंदर्य दर्शन (जयपुर: निर्मल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1966), पृ० 23 91. "सौंदर्य वह गुण है जो वस्तु और व्यक्ति के बाह्य और अंतर के सामंजस्य से उत्पन्न होता है। यह गृण वस्तु पर आरोपित होते समय सुंदर और चित्त में अनुभूत होते समय सुखद प्रतीत क होता है।"-शिवबालक राय, काव्य में सौंदर्य और उदात्त तत्त्व (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 15 92."सौंदर्य प्रकृति के कुछ दृश्यों अथवा कला कृतियों और मानव मन के मध्य एक विशिष्ट संबंध का द्योतक नाम है।"-लीलाधर गुप्त, पाश्चात्य साहित्यालोचन के सिद्धांत (इलाहाबाद : हिंदुस्तान एकेडेमी, द्वितीय संस्करण, 1967), पृ० 206 93. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, चिंतामणि (प्रथम भाग) (प्रयाग: इंडियन प्रेस प्राइवेट लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 131
कला और कलाकृति का व्यापार / 73
Page 88
- रामबिलास शर्मा, आस्था और सौंदर्य (इलाहाबाद : किताब महल प्राइवेट लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1883 शकाब्द), पृ० 23 10y201 95. वही, पृ० 34 nीs .er 96. रामानंद तिवारी, सत्यं शिव सुंदरम् (भाग 2) (भरतपुर : भारती मंदिर गोविंद भवन, प्रथम
.(8101 संस्करण, 1963), पृ० 933 97. वही, पृ० 934 98. " ... सौंदर्य रूप के अनुभव तक ही सीमित है-रूप से नियंत्रित वस्तु हमें सौंदर्य की अनुभूति 8 of देती है और कला को सामग्री में रूप का आरोपण ही एस्थटिक क्रियाशीलता का सार है।" लीलाधर गुप्त, पाश्चात्य साहित्यलोघन के सिद्धांत (इलाहाबाद : हिंदुस्तानी एकेडेमी, द्वितीय हिमा संशोधित संस्करण, 1967), पृ० 206 99. लालताप्रसाद सक्सेना, मंझन का सौंदर्य दर्शन (जयपुर : निर्मल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1966), पृ० 32 100. हरद्वारीलाल शर्मा, साहित्य और कला (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण FI1959), पृ० 18 .18 101. फतहसिंह साहित्य और सौंदर्य, संपादक हरिवल्लभ (कोटा: संस्कृति सदन, संस्करण E881 ,Tछ अनुल्लिखित), पृ० 114 102. सुरेन्द्र बारलिंगे, सौंदर्य तत्त्व और काव्य सिद्धांत, अनुवादक मनोहरकाले (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1963), पृ० 109 15-01 .E8
-
रामदत्त भारद्वाज, सौंदर्य की परिकल्पना, सम्मेलन पत्रिका, संपादक रामप्रताप त्िपाठी शास्त्री,सं०-4, भाग 59, आश्विन-मार्गशीर्ष, शक 1895 (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन), पृ० 17 .28
-
शिवबालक राय, काव्य में सौंदर्य और उदात्त तत्त्व (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 15 F105. नगेन्द्र, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1974), पृ० 26 (106. राजेन्द्र वाजपेयी, सौंदर्य (कानपुर : सुम्मिट पब्लिकेशंस, द्वितीय संस्करण 1981), पृ० 40 107. सुरेशचंद्र त्यागी, छायावादी काव्य में सौंदर्य दर्शन (मेरठ : अनुराधा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, गभ fi) 1976), पृ० 227 BB 108. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), S mpपo 1241 00 109. एस० टी० नरसिंहाचारी, सौंदर्य तत्त्व निरूपण (दिल्ली : वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 66 110. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली; दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, EC
प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 8 111. बजनाथ सिंहल, काव्यशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र में अंतःसंबंध, साहित्यानुशीलन, संपादक शशिभूषण सिंहल, अंक 4, वर्ष 1983 (रोहतक : महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय), पृ० 127 112. रामाश्रय शुक्ल करुणेन्दु, सौदर्यशास्त्र (कानपुर ओरियंटल पब्लिशिंग हाउस,प्रथम संस्करण 1977), पृ० 2 113. सुरेशचंद्र त्यागी, 'हिंदी में सौंदर्यशास्त्रीय चिंतन : सामान्य सर्वेक्षण', 'शोध पत्रिका' (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक सुरेशचंद्र त्यागी, 1979 (मेरठ : मेरठ, विश्वविद्यालय हिंदी परिषद), पृ० 153
74 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 89
- प्रोफेमर वाण, 'सौंदर्यशास्त्र', 'माधुरी', संपादक दुलारेलाल भागव, रूपनारायण पांडेय, 1839 सं० 1, खंड 2, वर्ष 2, फरवरी, 1924, (लखनऊ: नवलकिशोर प्रेस, पृ० 2-9 115. हरिवंशसिंह शास्त्री, सौंदर्य-विज्ञान (काशी : मंत्री, श्री काशी विद्यापीठ, प्रथम संस्करण 134
iin al 1936), पृ० 158 EE1
- वही Ie 117. प्रवासजीवन चौधरी, सौंदर्य दर्शन (बंगाली) (कलकत्ता : द्वारकानाथ ठाकुर लेन बंगाली), संवत् 1961) are [5118. राजेन्द्र वाजपेयी, सौंदर्य (कानपुर : सुम्मिट पब्लिकेशंस, प्रथम संस्करण, 1974) 119. सुरेन्द्रनाथ दासगुप्त, सौंदर्य तत्त्व, अनु० आनंद प्रकाश दीक्षित (इलाहाबाद: भारती भंडार लौडर प्रेस, प्रथम संस्करण, सं० 2011 वि०), पृ० 70 881 120. दि० के० बेडेकर, 'सौंदर्य और साहित्यिक समीक्षा' 'समालोचक', (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक रामविलास शर्मा, अंक 1, वर्ष?1, फरवरी, 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृo 150 121. कांतिचंद्र पांडेय, स्वतंत्र कलाशास्त्र (वाराणसी: चोखंबा संस्कृत सीरीज ऑफिस, प्रथम संस्करण, 1967) 122. (क) हजारीप्रसाद द्विवेदी, कालिदास की लालित्य योजना (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1970), पृ० 122 pi(ख) परेश, सूरदास की लालित्य चेतना (नयी दिल्ली : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1972), पृ० 3 123. गणपतिचंद्र गुप्त, रस सिद्धांत का पुनर्विवेचन (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1971), पृ० 134 124. जगदीश शर्मा, सौंदर्यशास्त्र : संज्ञा की उपयुक्तता का प्रश्न, 'आलोचना' संपादक नामवर सिंह, नवांक 20, वर्ष 19, जनवरी-मार्च 1972 (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन), पृ० 16 125. शिवकरणसिंह, आलोचना के बदलते मानदंड और हिंदी साहित्य (इलाहाबाद : किताब महल, -ी। प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 2 126. शिवकरणसिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969) 127. (क) शिवबालक राय, काव्य में सौंदर्य और उदात्त तत्त्व (इलाहाबाद: वसुमती प्रकाशन epप्रथम संस्करण, 1968), पृ० 9। (ख) नंददुलारे वाजपेयी, 'नया साहित्य : नये प्रश्न' 128. ब्रजगोपाल तिवारी, कला और कल्पना पर एक दार्शनिक दृष्टि, 'समालोचक' (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक, रामविलास शर्मा, अंक 1, वर्ष 1, फरवरी 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृ० 16 129. रामचंद्र शुक्ल, कला का दर्शन (मेरठ: करोना आर्ट पब्लिशर्स, प्रथम संस्करण, 1964) पृ० 23 130. लीलाधर गुप्त, पाश्चात्य साहित्यालोचन के सिद्धांत (इलाहाबाद : हिंदुस्तानी एकेडेमी, द्वितीय संस्करण, 1967), पृ० 185 131. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया, लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 46 132. गुरुचरणसिंह मोंगिया, असौंदर्य-संवेदनशास्त्र की परिकल्पना, 'आलोचना' संपादक नामवर सिंह, नवांक 32, वर्ष 23, जनवरी-मार्च' 1975 (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन), पृ० 60। 133. उद्धृत, कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 27 Esi og fan .801 कला और कलाकृति का व्यापार / 75 DPYP PolaDiy : 1RP PIF
Page 90
- रामाश्रय शुक्ल करुणेन्द्र, सौंदर्यशास्त्र (कानपुर : ओरियंटल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 9 135. अशोक रा० वेलकर, भाषा और साहित्य, 'आलोधना' संपादक नामवरसिंह, नवांक 16, वर्ष 16, जुलाई-सितंबर, 1971 (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन), पृ० 16-17 136. उद्धृत-नगेन्द्र, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 2 137. इनसाईक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटानिका (खंड 1) (शिकागो : विलियम बैंटन पविशर्स 1972), पृ० 221 138, 'सौंदर्यशास्त्र' एक भ्रामक नाम है। इस संज्ञा का प्रयोग एक प्रकार से 'कला के स्वरूप और महत्त्व पर पर्दा डाल देता है। यूनानी भाषा में 'सुंदर' (Kalon) का अर्थ है" भोग के लिए उपयुक्त 'स्तुत्य' तथा 'श्रेष्ठ', किंतु इन विशेषणों का 'कला' से कोई विशेष संबंध नहीं है और न कला की विषय वस्तु, उपयुक्त, स्तुत्य तथा श्रेष्ठ विषयों तक ही सीमित है, उसका विषय क्षेत्र, इन विषयों की अपेक्षा, बहुत विशाल एवं व्यापक है। अतः 'कला-विज्ञान' को 'सौंदर्यशास्त्र' की सेंज्ञा देना उचित नहीं है।"-ब्रजगोपाल तिवारी, 'कला और कल्पना पर एक दार्शनिक दृष्टि', 'समालोचक' (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक रामविलास शर्मा, अंक 1, वर्ष 1, फरवरी, 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृ० 16 139. दि० के० बेडेकर, 'सौंदर्य और साहित्यिक समीक्षा', समालोचक : सौंदर्यशास्त्र विशेषांक, वही, पृ० 150 140. रामचन्द्र शुक्ल, कला का दर्शन (मेरठ: करोना आर्ट पब्लिशर्स, प्रथम संस्करण, 1964), पृ० 23 141. शिवबालक राय, काव्य में सौंदर्य और उदात्त तत्त्व (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 9 142. "एस्थेटिक अंग्रेजी में अब कलामीमांसा के अर्थ में प्रयुक्त होता जा रहा है। इस शब्द का अनुवाद सौंदर्यशास्त्र हो सकता है परंतु हमें यह अनुवाद बिल्कुल ठीक न मालूम हुआ। इसी- लिए हमने इसका अनुवाद कलामीमांसा किया।"-लीलाधर गुप्त, पाश्चात्य साहित्यालोचन के सिद्धांत (इलाहाबाद : हिंदुस्तानी एकेंडेमी, द्वितीय संस्करण, 1967), पृ० 185 143. "अंग्रेजी में 'फाइन' और 'एस्थेटिक' कभी-कभी एक ही तत्त्व के बोधक विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं। हिंदी में ललित इनका समानार्थी बन गया है।"-कृष्ण लाल शर्मा, साहित्य : अन्य कलाओं के संदर्भ में (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 11 144. रामाश्रय शुक्ल करुणेन्द्र, सौंदर्यशास्त्र (कानपुर: ओरियंटल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 24 145. जगदीश शर्मा, साहित्य और कला की पहचान (इलाहाबाद : किताब महल, प्रथम संस्करण, 1982-83) 146. (क) हरद्वारीलाल शर्मा, सौंदर्यशास्त्र (इलाहाबाद : मधु प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1979), पृ० 9 (ख) शिवबालक राय, काव्य में सौंदर्य और उदात्त तत्त्व (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 9 147. गणपतिचंद्र गुप्त, रस सिद्धांत का पुनर्विवेचन (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1971), पृ० 122 148. वही, पृ० 123
76 / सौदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 91
- गणपतिचंद्र गुप्त, रस सिद्धांत का पुनर्विवैचन (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1971), पृ० 122 150. वही, पृ० 134 151. मानक हिंदी कोश (पांचवां खंड) संपादक रामचन्द्र वर्मा (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1966), पृ० 462 152. मानविकी पारिभाषिक कोश (साहित्य खंड), संपादक नगेन्द्र (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1965), पृ० 13 153. भारतीय साहित्य कोश, संपादक नगेन्द्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1981), पृ० 1394 154. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, चितामणि (द्वितीय भाग) (वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, द्वितीय संस्क ण, संवत् 2035), पृ० 142 155. ब्रजगोपाल तिवारी, कला और कल्पना पर एक दार्शनिक दहिट, 'समालोषक' (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक) संपादक रामविलास शर्मा, अंक अनुल्लिखित, वर्ष 1, फरवरी, 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृ० 16 156. जगदीश शर्मा, 'सौंदर्यशास्त्र और समीक्षा', 'आलोचना', संपादक नामवरसिंह, अंक 22, वर्ष 19, जुलाई-सितंब्रर, 1972 (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन), पृ० 33 157. हरद्वारीलाल शर्मा, सौंदर्यशास्त्र (इलाहाबाद : मधु प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1979), पृ० 11 158. रामविलास शर्मा, आस्था और सौंदर्य (इलाहोबाद : किताब महल प्राइवेट लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1883 शकाब्द), पृ० 19 159. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय, जलते और उबलते प्रश्न (जयपुर : बोहरा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 126 160. शिवबालक राय, काव्य में सौंदर्य और उदात्त तत्व (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 9 161. "सौंदर्यबोधशास्त्र अभिव्यंजक (निरूपक या कल्पनात्मक) क्रियाओं का विज्ञान है-" Croce Benedetto, Aesthetic, Translated by-A, [Duglas (London Vision Press, 1953), p. 155 162. सौंदर्यबोधशास्त्र ललित कलाओं का दर्शन है : Hegel, the philosophy of Fine Art (Valume-I), Translated by F. P. B. Osmaston, G. Bell and Sons (London : 1920), p. 2 163. कांतिचंद्र पांडय, स्वतंत्र कला शास्त्र (प्रथम भाग) (वाराणसी : चौखंबा संस्कृत सीरीज, प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 5 (भूमिका) 164. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 28 165. कुमार विमल, कला-विवेचन (पटना : भारती भवन, प्रथम संसकरण, 1968), पृ० 127 166. सुरेशचंद्र त्यागी, छायावादी काव्य में सौंदर्य दर्शन (मेरठ: अनुराधा प्रकाशन, प्रथम संरकरण, 1976), पृ० 12-13 167. नगेन्द्र, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1974), पृ० 4 168. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी आफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण 1977), पृ० vii 169. सुधा कौल, 'सौंदर्य शास्त्र का क्षंत्र', 'शोध पत्रिका', (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक) संपादक सुरेशचंद्र त्यागी (मेरठ : मेरठ विश्वविद्यालय हिंदी परिषद, 1979), पृ० 33
कला और कलाकृति का व्यापार / 77
Page 92
- रामविलास शर्मा, आस्था और सौदर्य (इलाहाबाद: किताब महल प्राइवेट लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1883 शकाब्द, पृ० 19 021 171. प्रो० वाण, 'सौंदर्य शास्त्र', 'माधुरी', संपादक दुलारेलाल भार्गव, रूपनारायण पांडेय संख्या 1, खंड 2, वर्ष 2, फरवरी, 1924 (लखनऊ: नवल किशोर प्रस), पृ० 7 सर 172. जगदीश शर्मा, 'सौंदर्यशास्त्र और समीक्षा', (आलोचना', संपादक नामवर सिंह, अंक 22, वर्ष। 19, जुलाई-सितंबर, 1972 (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन), पृ० 330९। 173. बैजनाथ सिंहल, 'काव्यशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र में अंतःसंबंध' साहित्यानुशीलन (शोध विशेषांक) संपादक शशिभूषण सिंहल, अंक 4, वर्ष 1983 (रोहतक : हिंदी विभाग, महर्षि ग दयानंद विश्वविद्यालय), पृ० 129 174. सुरेशचंद्र त्यागी, छायावादी काव्य में सौंदर्थ दर्शन (मेरठ : अनुराधा प्रकाशन, प्रथम क संस्करण, 1976), पृ० 261 efeww 221 175. शिवबालक राय, काव्य में सौंदर्य और उदात्त तत्त्व (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 9 वकी 176. करांतिचंद्र पांडेय, स्वतंत्र कलाशास्त्र (प्रथम भाग) (वाराणसी : चोखंबा संस्कृत सीरीज ऑफिस, प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 4ल 177. कांतिचंद्र पांडेय, स्वतंत्र कलाशास्त्र (द्वितीय भाग) (वाराणसी चोखंबा विद्या भवन, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 4-5 I10 ए 178. रमेशकंतल मेघ, 'सौंदर्यबोधशास्त्र के नये आयाम', 'आलोचना', संपादक शिवदानसिंह चौहान, नवांक 7, पूर्णांक 33, जून, 1965 (दिल्ली : 'राजकमल प्रकाशन), पृ० 56 179. कुमार विमल, कला-विवेचन (पटना : भारती भवन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 127 180. कृष्णकुमार शर्मा, 'धवनि सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्रीय संदर्भ', 'परिषद पत्रिका' संपादक उगशर रमाशंकर चौबे, अंक 3, वर्ष 14, अक्टूबर, 1974 (पटना : बिहार राष्ट्र भाषा परिषद), पृ० 16 181. रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तात्तिरिक विवेचन एवं ललित कलाएं (दिल्ली: noia नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 3 182. नगन्द्र, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 2111974, पृ० 5 [eV) 183. परेश, पाश्चात्य लालित्य मनीषा-एक 'पुनरन्वेषण', 'परिशोध',संपादक इद्रनाथ मदान, क अंक 13, नवंबर 1970 (चंडीगढ़ : हिंदी विभाग, पंजाब यूनिवर्सिटी), पृ० 22 184. प्रोफेसर वाण, 'सौंदर्यशास्त्र', 'माधुरी', संपादक दुलारे लाल भागव, रूपनारायण पांडेय, (10 संख्या 1, खंड 2, वर्ष 2, फरवरी, 1924 (लखनऊ : नवल किशोर प्रेस), पृ० 6 185 कुमार विमल, कला विवेचन (पटना : भारती भवन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 129 186. रमेशकंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया मा लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 48 187. नगेंद, भारतीय सौंदर्यंशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 1974), पृ० 11 188. वही, पृ. 11-12 189. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 39 190. सुरेशचंद्र त्यागी, छायावादी काव्य में सौंदर्य दर्शन (मेरठ : अनराधा प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1976, पृ० 15 78 / सौंदर्यबोधशांस्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 93
- Geroge Sintayana, the Sense of Beauty (New York : Dover Publicatione 1955), p. 16 192. S. K. De. Some Problems of Sonskrit Poetics (Calcutta : 1956), p. 2 193. रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तात्त्विक विवेचन एवं ललित कलाएं (दिल्ली 215
नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 8 194. कृष्णकुमार शर्मा, 'ध्वनि सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्रीय संदर्भ', 'परिषद पत्रिका', संपादक रामशंकर चौबे, अंक 3, वर्ष 14, अक्टूबर 1974 (पटना : बिहार राष्ट्र भाषा परिषद), कपी। पृ० 16-17:(ा) FRIFP 195. नगेन्द्र, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1974), पृ० 82 196. वही, पृ० 199 19 197. फतहसिंह, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1967), दो शब्द 198. कुमार विमल, कला-विवेचन (पटना : भारती भवन, प्रथम संस्करण 1968), पृ० 140।९5 199. बलदेव उपाध्याय, भारतीय साहित्यशास्त्र (प्रथम खंड) (वाराणसी : नंदकिशोर एंड संस, द्वितीय संस्करण, 1963), पृ० 4-5 .0SS 200. विश्वंभरनाथ उपाध्याय शैवदर्शन और सौंदर्यशास्त्र', 'समालोचक' : (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक रामविलास शर्मा, अंक 1, वर्ष 1, फरवरी, 1958 (आगरा : विनोद 9ी पुस्तक मंदिर), पृ० 75-76 जी : हजही) मगालनी 201. कुमार विमल, कला विवेचन (पटना: भारती भवन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 139। 202. प्रोफेसर वाण, 'सौंदर्यशास्त्र', 'माधुरी', संपादक दुलारे भार्गव, रूपनारायण पांडेय, संख्या 1, खंड 2, वर्ष 2, फरवरी, 1924 (लखनऊ: नवलकिशोर प्रेस), पृ० 6ए FPFI 203. नगेन्द्र, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पल्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1974), पृ० 12 204. वही, पृ० 12-13 205. रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तातत्विक विवेचन एवं ललित कलाएं : (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 1978), पृ० 3 206. प्रोफेसर वाण, 'सौंदर्यशास्त्र', 'माधुरी', संपादक दुलारे भार्गव, रूपनारायण शंडेय, संख्या 1, खंड 2, वर्ष 2, फरवरी, 1924 (लखनऊ : नवल प्रेस), पृ० 6 207. नगेन्द्र, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 1974), पृ० 13 208. वही, 209. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981),
- प्रोफेसर वाण, 'सौंदर्यशास्त्र', 'माघुरी', संपादक दुलारे भार्गव, रूपनारायण पांडिय, संख्या 1, 12o 31
खंड 2, वर्ष 2, फरवरी, 1924 (लखनऊ : नवल प्रेस), पृ० 6-7 211. रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तातत्विक विवेचन एवं ललित क्लाएं (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 3 212. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 28 213. एस० टी० नरसिंहाचारी, सौंदर्य तत्त्व निराण (दिल्ली : वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० (दृष्टिकोण)
कला और कलाकृति का व्यापार / 79
Page 94
- हरद्वारीलाल शर्मा, साहित्य और कला (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1959), पृ० 101 215. हरद्वारीलाल शर्मा, चिंतन के नये आयाम (इलाहाबाद: परिमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 17 216. शिवकरणसिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1969), पृ० 143-144 217. धर्मवीर भारती, 'अंतःप्रेरणा और पलायन' 'कला और साहित्य' (आकाशवाणी से प्रसारित पंद्रह वार्ताओं का संग्रह) (दिल्ली : निदेशक प्रकाशन विभाग, द्वितीय संस्करण, 1966), पृ० 62 218. डी० प्रेमपति, 'चर्नोशेवस्की यथार्थवाद की विकास प्रक्रिय।', 'मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र', संपादक कमलाप्रसाद, ज्ञानरंनन (पहल पत्रिका द्वारा प्रकाशित प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 179 219. नगेन्द्र, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 118 220. वही 221. हरद्वारीलाल शर्मा, काव्य और कला (अलीगढ़ : भारत प्रकाशन मंदिर, प्रथम संस्करण, वर्ष अनुल्लिखित), पृ० 154-156 222. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी आफ इ डिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण 1977), पृ० 53-109 223. (क) मानक हिंदी कोश (चौथा खंड) संपादक-रामचन्द्र वर्मा (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1666), पृ० 520 (ख) हिंदी शब्द सागर (भाग आठ), संपादक-श्यामसुंदर दास (वाराणसी काशी नागरी प्रचारिणी सभा, संशोधित संस्करण, 1971), पृ० 4197 224. रूप वह केंद्र है जिसमें इ द्रियां, मन, बुद्धि और आत्मा आकर मिलते हैं, जिससे सौंदर्य का साक्षात् अनुभव निष्पन्न होता है।"-हरद्वारीलाल शर्मा, चिंतन के नये आयाम (इलाहाबाद : परिमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 15 225. "जिन वस्तुओं में रूप, रंग, आकार तथा सज्जा नहीं, उनमें सौंदर्य दृष्टिगोचर नहीं होता।" रामचंद्र शुक्ल, 'आधुनिक चित्रकला का मूलाधार', 'सम्मेलन पत्रिका', कला अंक, संपादक रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्री (संख्या 2-3, भाग 44, मई 1959) (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन), पृ० 184 226. "सौंदर्य का मूर्त रूप ही कलाकृति है।"-नगेन्द्र, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 118 227. "रूप पाठक की सौंदर्यानुभूति का कारण है।"-सुरेशचंद्र त्यागी, छायावादी काव्य में सौंदर्य दर्शन (मेरठ : अनुराधा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 85 228. "रूप सौंदर्य की बाह्य अभिव्यक्ति है। रूप विन्यास की आंतरिक संपति को ही सौंदर्य कहा गया है।" सूर्यप्रसाद दीक्षित, छायावादी कवियों का सौंदर्य विधान (दिलली : दि मैकमिलन कंपनी आफ इ डिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1974), पृ० 35 229. "सौंदर्य रूपाश्रित है। रूप रहित उसकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। ईश्वरीय सृष्टि और कला- कृति दोनों में सौंदर्य का प्रकाशन रूप के माध्यम से ही संभव है।"-एस० टी० नरसिंहाचारी, सौंदर्य तत्व निरूपण (दिलली . वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 56।
80 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 95
- रामानंद तिवारी, सत्यं शिवं सुंदरम् (भाग-2) (भरतपुर : भारती मंदिर गोविंद भवन, प्रथम संस्करण, 1963), पृ० 840 231. वही, पृ० 841-42 232. गणपतिचंद्र गुप्त, साहित्य शैली के सिद्धांत (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, तथम संस्करण, 1971), पृ० 13 233. हरद्वारीलाल शर्मा, सौंदर्यशास्त्र (इलाहाबाद: मधु प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1979), पृ० 59 234. हरद्वारीलाल शर्मा, काव्य और कला (अलीगढ़ : भारत प्रकरशन मंदिर, संस्करण, अनुल्लिखित), पृ० 90 235. हरद्वारीलाल शर्मा, सुंदरम् (लखनऊ: हिंदी समिति उत्तर प्रदेश शासन, प्रथम संस्करण, 1975), पृ० 80 236. रामानंद तिवारी, सत्यं शिवं सुंदरम् (भाग-2) (भरतपुर : भारती मंदिर गोविंद भवन, प्रथम संस्करण, 1975), पृ० 842 237. गणपतिचंद्र गुप्त, साहित्य शैली के सिद्धांत (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 1971), पृ० 13 238. नीहाररंजन राय, भारतीय कला का अध्ययन (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण 1978), पृ० 116 239. रमेश कुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण 1977), पृ० 53 240. ब्रजभूषण पांडेय, 'कला : शिल्प : शैली', 'सम्मेलन पत्रिका' (कला अंक), संपादक रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्री, संख्या 2-3, भाग-44, मई, 1959 (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन) पृ० 371 241. हरद्वारीलाल शर्मा, चिंतन के नये आयाम (इलाहाबाद : परिमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1976), पृ० 15 242. हरद्वारीलाल शर्मा, काव्य और कला (अलीगढ़ : भारत प्रकाशन मंदिर, प्रथम संस्करण, अनुल्लिखित), पृ० 158 243. रामअवध द्विवेदी, 'प्रभाव ग्रहण करने की प्रक्रिया', 'समालोचक', (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक) संपादक रामविलास शर्मा, अंक 1, वर्ष 1 फरवरी, 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृo 10-11 244. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिलली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 256 245. नीहाररंजन राय, भारतीय कला का अध्ययन (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण 1978), पृ० 115 246. हरद्वारीलाल शर्मा, चिंतन के नये आयाप (इलाहाबाद: परिमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 28-29 247. (क) रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 59-65 (ख) कोमलसिंह सोलंकी, सौंदर्यबोध (आगरा: गुप्ता पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1962), पृ० 6 248. एस० टी० नरसिंहाचारी, सौंदर्य तत्त्व निरूपण (दिल्ली : वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1977), पृ० 57-65
कला और कलाकृति का व्यापार / 81
Page 96
- नीहाररंजन राय, भारतीय कला का अध्ययन (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण 1978), पृ० 119-24 250. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमटेड, प्रथम संस्करण 1977), पृ० 269-71 251. निर्मला जैन, रस-सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 280-86 252. मानक हिंदी कोश, (पांचवां खंड), संपादक : रामचंद्र वर्मा (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1966), पृ० 95 253. मानविकी पारिभाषिक कीश (साहित्य खंड), संपादक नगेंद्र (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1975), पृ० 75 254. शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 142 255. वही, पृ० 143 256. वही, पृ० 145 257. नीहाररंजन राय, भारतीय कला का अध्ययन (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 112 258. वही 259. निर्मला जैन, रस-सिद्धांत और सौंदर्यशांस्त्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 275 260. रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तातत्विक विवेचन एवं ललित कलाएं (दिल्ली : नेगनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 125 261. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली :दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 86 262. रामविलास शर्मा, 'कला का माध्यम', 'समालोचक' संपादक रामविलास शर्मा, अंक 2, वर्ष 1, मार्च, 1958 (आगरा: विनोद पुस्तक मंदिर), पृ० 4 263. निर्मला जैन, रस पिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 281 264. वही, पृ० 282-86 265. रामविलास शर्मा, 'कला का माध्यम', 'समालोवक' संवादक रामविलास शर्मा, अंक 2, वर्ष, 1, मार्च, 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृ० 4 266. वही, पृ० 5 267. शिवबालक राय, काव्य में सौंदर्य और उदात्त तत्त्व (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1968), पृ० 80 268. नीहाररंजन राय, भारतीय कला का अध्ययन (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 115 269. रामकीति शुक्ल, सौंदर्य का तात्पर्य (उत्तर प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्रथम संस्करण, 1975), पृ० 80 270. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑक इंडिया लिमिटेड, 1977), पृ० 52
82 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 97
- निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र(दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस,द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 285 272. (क) मानक हिंदी कोश(पांचवां खंड), संपादक: रामचंद्र वर्मा (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1966), पृ० 193 (ख) हिंदी शब्दसागर (भाग-9), संपादक : श्यामसुंदर दास (काशी नागरी प्रचारिणी सभा, संस्करण, 1971), पृ० 4792 273. भारतीय साहित्य कोश, संपादक : नगेंद्र (दिलली नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1981), पृ० 1270 274. हिंदी साहित्य कोश (भाग-1) संपादक : धीरेंद्र वर्मा (वाराणसी : ज्ञानमंडल लिमिटेड, द्वितीय संस्करण, संवत् 2020), पृ० 37 275. कृष्णलाल शर्मा, साहित्य अन्य कलाओं के संदर्भ में (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया, लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 36 276. हरद्वारीलाल शर्मा, सुंदरम् (लखनऊ: हिंदी समिति उत्तर प्रदेश शासन, प्रथम संस्करण 1975), पृ० 238 277. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 95 278. ब्रणभूषण पांडेय, 'कला : शिल्प : शैली', 'सम्मेलन पत्रिका' (कला अंक) संपादक : रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्री, संख्या 2-3, भाग 44, मई, 1959 (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन), पृ० 368 279. वही, पृ० 371 280. शिवकरणसिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 142 281. जगदीश गुप्त, भारतीय कला के पदचिह्न (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 1961), पृ० 19 282. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिलली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण 1977), पृ० 89 283. वही, पृ० 90 284. वही, पृ० 92 285. वही, पृ० 101 286. कृष्णलाल शर्मा, साहित्य : अन्य कलाओं के संदर्भ में (दिल्ली : दि मैफुमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 37 287. वही, पृ० 37 288. रमेशकुं ल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञामा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 103 289. मानविकी वारिभाषिक कोश (साहित्य खंड) संपादक : नगेंद्र (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1975), पृ० 164 290. मानक हिंदीकोश (चौथा खंड) संपादक : रामचंद्र वर्मा (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1966), पृ० 338 291. हिंदी शब्द सागर(भाग आठ), संपादक : श्यामसुंदर दास (वाराणसी : काशी नागरी प्रचारिणी सभा, संशोधित द्वितीय संस्करण, 1971), पृ० 3902
कला और कलाकृति का व्यापार / 83
Page 98
292 बाल सौताराम मर्ढेकर, कला और मानव, अनुवादक : अंजना मर्ढेकर(नयी दिल्ली : न्यू इंडिया, प्रेस, प्रथम संस्करण, 1952), पृ० 6 293. वही, पृ० 7 294. हरद्वारीलाल शर्मा, साहित्य और कल (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1959), पृ० 97-98 295. वही, पृ० 98 296. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 103 297, वही, पृ० 103 298. वही, पृ० 109 299. रामकीति शुक्ल, सौंदर्य का तात्पर्य (लखनऊ: उत्तर प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्रथम संस्करण, 1975), पृ० 27-28 300. कृष्णलाल शर्मा, साहित्य : अन्य कलाओं के संदर्भ में (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 44 301. वही, पृ० 46-76 302. 'स्थापत्य और शिल्प-कलाओं का माध्यम चित्र और संगीत कलाओं के माध्यम से अधिक स्थूल है।' रामविलाम शर्मा, आस्था और सौंदर्य (इलाहाबाद : किताब महल, प्रथम संस्करण,1983 शकाब्द), पृ० 46 303. 'भाषा के द्वारा व्यंग्य अर्थ में रूप-स्वर और गति भी सम्मि लित हैं। इस दृष्टि से भी भाषा का माध्यम अधिक समर्थ और संपन्न है। वह चित्रकला, संगीत और नृत्य की व्यंजनाओं को भी आकार दे सकता है, साथ ही वह उनकी व्यंजनाओं को अधिक स्थायी बना सकता है।"-रामानंद तिवारी, सत्यं शिवं सुंदरम् (द्वितीय भाग) (भरतपुर : भारती मंदिर, प्रथम संस्करण, 1973), पृ० 942 304. "कलाओं के माध्म भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं, जिनमें साहित्य का, भाषा का माध्यम सबसे अधिक सूक्ष्म और सशक्त है।" -एस० टी० नरसिंहाचारी, सौंदर्य तत्त्व निरूपण (दिल्ली : वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 111 305. हंसकुमार तिवारी, कला (गया : मानसरोवर प्रकाशन, संस्करण, अनुल्लिखित), पृ० 44 306. भोलानाथ तिवारी, 'कला', 'सम्मेलन पत्रिका'(कला अंक)संपादक: रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्री, संख्या 2-3, भाग 44, मई, 1959 (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन), पृ० 32 307. "ललित कलाएं जो पांच रूपों में पाश्चात्य पंडितों द्वारा प्रस्तुत की गयी हैं, क्या अपना उपयोगिता से नितांत शून्य हैं। क्या वास्तु-स्थापत्य कला, मूर्तिकला, संगीत कला, चित्रकला और काव्यकला कोई उपयोगिता नहीं रखती हैं। ललित कलाओं या फाईन आर्ट्स की अपनी निश्चित उफ्योगिता है। ऐसी दशा में इन्हें स्थूल और सूक्ष्म कलाएं कहा जाता तो शायद अधिक वैज्ञानिक होता"-भगीरथ मिश्र, 'कला का स्वरूप और काव्य', 'वीजा' संपादक : श्यामसुंदर व्यास, अंक 5, वर्ष 49, मई, 1916 (इ दौर : मध्य प्रदेश हिंदी समिति प्रेस), पृ० 99
84 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन: ऐतिहासिक परंपरा
Page 99
-
"उपयोग की कला और सौंदरय की कला को लेकर बहुत से विवाद संभव होते रहे हैं, परंत् कला के ये भेद मूलतः एक-दूसरे से बहुत दूरी पर नहीं ठहरते।"-महादेवी वर्मा, दीपशिखा (झांसी : सेतु प्रकाशन, संस्करण, 1970), पृ० 4 309. भोलानाथ तिवारी, 'कला','सम्मेलन पत्रिकाः' (कला अंक), संपादक : रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्री, संख्या 2-3, भाग 44, मई, 1959 (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन), पृ० 29 310. कृष्णलाल शर्मा, साहित्य : अन्य कलाओं के संदर्भ में (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 3 311. रमेशकंतल मेध, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली: दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 110 312. कुमार विमल, कला-विवेचन (पटना : भारती भवन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 29-41 313. हजारीप्रसाद द्विवेदी, प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, तृतीय संस्करण,1970), पृ० 181-91 314. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैक मलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 121-34 315. वही, पृ० 112 316. वही, पृ० 114 317. असित कुमार हालदार, ललित कला की धारा (इलाहाबाद: चंद्रलोक प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1960), पृ० 96 318. हिंदी साहित्य कोश (भाग-1), संपादक : धीरेंद्र वर्मा (वाराणसी : ज्ञानमंडल लिमिटेड, द्वितीय संस्करण, सं.त् 2020), पृ० 221 319. असित कुमार हालदार, ललित कला की धारा (इलाहाबाद: चंद्रलोक प्रकाशन, प्रथम संस्क रण, 1960), पृ० 31 320. कुमार विमल, कला-विवेचन (पटना : भारती भवन, संस्करण, 1968), पृ० 44-45 ONE
-
वही, पृ० 45-46 322. प्रभुदयाल मीतल, ब्रज की कलाओं का इतिहास (दिलती : साहित्य प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1977), पृ० 6 323. कुमार विमल, कला-विवेचन (पटना : भारती भवन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 45 324. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 111 325. रामाश्रय शुक्ल करुणेंद्र, सौंदर्यशास्त्र (कानपुर : ओरियंटल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 107 326. कुमार विमल, 'सौंदर्यशास्त्रीय कला धारणा के नये आयाम' 'शोध पत्रिका' (सौंदर्यशास्त्र, विशेषांक) संपादक : सुरेशचंद्र त्यागी, 1979 (मेरठ: मेरठ विश्वविद्यालय, हिंदी परिषद), पृ० 64 327. मदनगोपाल, भारत की पांच कलाएं (बड़ौदा : शिव पुस्तकालय, कला मंदिर, प्रथम संस्करण, 1960), पृ० 6 328. भगीरथ मिश्र, कला का स्वरूप और काव्य' 'वीणा' संपादक : श्यामसुंदर व्यास, अंक 5, वर्ष 49, मई, 1976 (इ दोर : मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सीमित प्रेस), पृ० 12] कला और कलाकृति का व्यापार / 858
Page 100
- प्रभुदयाल मौतल, ब्रज की कलाओं का इतिहास (दिल्ली : साहित्य प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 10 330. रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तातत्विक विवेचन एवं ललित कलाएं (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 173 331. रूपनारायण बाथम, 'कला और कलाकार' अंक 13, नवंबर, 1982 (नोएडा : कला मित्र प्रकाशन), पृ० 12 332. बाल सीताराम मर्ढेकर,कला और मानव, अनुवादक-अंजना मर्ढेकर (नयी दिवली :न्यू इडिया प्रेस, प्रथम संस्करण, 1952), पृ० 19 333. कला और साहित्य (आकाशवाणी से प्रसारित पंद्रह वार्ताओं का संग्रह) (दिबली : निदेशक प्रकाशन विभाग, द्वितीय संस्करण, 1966), पृ० 41-42 334. उद्धृत, हंसकुमार तिवारी, कला (गया : मानसरोवर प्रकाशन, प्रथम संस्करण, अनुल्लिखित), पृ० 64 335. हरद्वारीलाल शर्मा, साहित्य और कला (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण 1959), पृ० 127 336. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 83 337. सूर्यप्रसाद दीक्षित, छायावादी कवियों का सौंदर्य विधान (दिल्ली : दि मैक मिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1974), पृ० 251 338. रामविलास शर्मा, 'कला का माध्यम', 'समालोचक', संपादक : रामविलास शर्मा, अंक 2, वर्ष 2, मार्च, 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृ० 2 339. इरविन एडमैन, ललित कलाएं और मनुष्य, अनुवादक : विश्वनाथ मिश्र (दिल्ली : नेशनल पबब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1966), पृ० 60 340. हरिवंशसिंह शास्त्री, सौंदर्य विज्ञान (काशी: मंत्री श्री काशी विद्यापीठ, प्रथम संस्करण, 1936), पृ० 133 341. रमेशकुंतल मंघ, अथाती सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली: दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इ डिया, लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 83 342. कांतिचंद्र पांडेय, स्वतंत्र कला शास्त्र (भाग-1) (वाराणसी : चौखंबा संस्कृत सीरीज ऑफिस, प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 619 343. द्विजेंद्रनाथ शुक्ल, भारतीय स्थापत्य (लखनऊ: हिंदी समिति उत्तर प्रदेश, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 7 344. सूर्यप्रसाद दीक्षित, छायावादी कवियों का सौंदर्यविधान (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इ डिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1974), पृ० 253 345. कुमार विमल, छायावाद का सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन (दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1978), पृ० 25 346. हरिवंशसिंह शास्त्री, सौंदर्यविज्ञान (काशी : मंत्री श्री काशी विद्यापीठ, प्रथम संस्करण, 1936), पृ० 136 347. हरद्वारीलाल शर्मा, साहित्य और कला (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1959), पृ० 127 348. रायकृष्णदास, भारतीय मूर्तिकला (काशी: नागरी-प्रचारिणी, सभा, षष्ठ संस्करण, संवत् 2030), पृ० 11
86 / सौदयबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 101
- कांतिचंद्र पांडेय, स्वतंत्र कलाशास्त्र (भाग-1) (वाराणसी : चौखंबा संस्कृत सीरीज ऑॉफिस प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 617 350. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिलली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 82 351. वही, पृ० 83 352, कृष्णलाल शर्मा, साहित्य : अन्य कलाओं के संदर्भ में (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 53 353. वहो, पृ० 55 354. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 83 355. कांतिचंद्र पांडेय, स्वतंत्र कलाशास्त्र (भाग-1) (वाराणसी : चौखंबा संस्कृत सीरीज ऑफिस, प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 617 356. द्विजेंद्रनाथ शुक्ल, भारतीय स्थापत्य (लखनऊ : हिंदी समिति, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 7 357. रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तात्त्विक विवेचन एवं ललित कलाएं (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 1978), पृ० 204 358. अवध उपाध्याय, भारतीय ललितकला (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1948), पृ० 3 359. रायकृष्ण दास, भारत की चित्रकला (इलाहाबाद : भारती भंडार लीडर प्रेस, छठा संस्करण, 1974), पृ० 1 360. अविनाश बहादुर वर्मा, भारतीय चित्रकला का इतिहास (बरेली : प्रकाश बुक डिपो, तृतीय संस्करण, 1977), पृ० 3 361. रामचंद्र शुक्ल, कला और आधुनिक प्रवृत्तियां (लखनऊ:हिंदी समिति, तृतीय संस्करण. 1974), पृ० 70 362. जयसिंह नीरज, राजस्थानी चित्रकला और हिंदी कृष्णकाव्य (दिलली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 10 363. "कविता वास्तव में एक ऐसी व्यापक कला है जो मूत्त-विधान के लिए चित्रकला का आश्रय लेती है।"-रामचंद्र शुक्ल, चिंतामणि (प्रथम भाग) (इलाहाबाद: इंडियन प्रेस, संस्करण, 1965), पृ० 179-80 364. "कलाओं में चित्र ही काव्य का अधिक विश्वस्त सहयोगी होने की क्षमता रखता है।" -महादेवी वर्मा, दीपशिखा (इलाहाबाद : भारती भंडार प्रेस, संस्करण, संवत् 2022), पृ० 8 365. "शास्त्रीय परंपरा के अनुसार काव्य और चित्र दोनों का आधार 'अनुकरण' है, जिस अनुकरण के सिद्धांत को प्रवर्तित करने में अरस्तू अग्रणी है। अतः आधार-अनुकरण की एकता रहने के कारण इन दोनों कलाओं में साम्य का रहना स्वाभाविक है। इसी प्रकार शास्त्रीय(क्लासिकल) परंपरा के अनुसार 'संकलनत्रय' का नियम काव्यकला और चित्रकला-दोनों के लिए अनिवार्य माना जाता है।" -कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 55 366. रामानंद तिवारी, सत्यं शिवं सुंदरम्(भाग द्वितीय) (भरतपुर : भारती मंदिर, प्रथम संस्करण, 1963), पृ० 638
कला और कलाकृति का व्यापार / 87
Page 102
- हरिवंश सिंह शास्त्री, सौंदयं विज्ञान (बनारस : मंत्री श्री काशी विद्यापीठ, प्रथम संस्करण, 1935), पृ० 139 368. मदनगोपाल, भारत की पांच कलाएं (बड़ौदा: शिव पुस्तकालय, प्रथम संस्करण, 1960), पृ० 111 369. रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का ताश्विक विवेचन एवं ललित कलाएं (दिल्ली: नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 144 370. भगवतशरण उपाध्याय, भारतीय कला की भूमिका (दिल्ली : पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, संस्करण, 1980), पृ० 95 371. रामानंद तिवारी, सत्यं शिवं सुंदरम् (द्वितीय भाग)(भरतपुर : भारती मंदिर, प्रथम संस्करण, 1963), पृ० 910 372. वहो, पृ० 938 373. बनवासी, 'राग रागिनियों का चित्रांकन' 'धर्मयुग' : दीपावली रूप कला विशेषांक, संपादक : सत्य काम विद्यालकार, अंक 45, वर्ष 7, नवंबर 4, 1956 (बंबई : टाइम्स ऑफ इडिया प्रेस), पृ० 39 374. रामनाथ सुमन, 'यथार्थ और कल्पना', 'कला और साहित्य' (आकाशवाणी से प्रसारित पंद्रह वार्ताओं का संग्रह) (दिल्ली : निदेशक प्रकाशन विभाग, द्वितीय संस्करण, 1966), पृ० 41 375. हरिवंश सिंह शास्त्री, सौंदर्य विज्ञान (बनारस : मंत्री श्री काशी विद्यापीठ, प्रथम संस्करण, 1936), पृ० 139 376. बाल सीताराम, मर्ढेकर, कला और मानव, अनुवादक-अंजना मर्ढेकर (दिल्ली : न्यू इडिया प्रेस, प्रथम संस्करण, 1952), पृ० 16 377. कांतिचंद्र पांडेय, स्वतंत्र कलाशास्त्र (भाग-1) (वाराणसी : चौखंबा संस्कृत सीरीज ऑफिस प्रथम संस्करण 1967), पृ० 527 378. (क) "कलाओं के जितने भी भेद हैं, सबके मूल तत्त्व काव्य में आ जाते हैं। वास्तु और मूर्ति का संतुलन, अनुपात, एकता, चित्र की रूप योजना, संगीत की लय और गति, काव्य में सब कुछ हैं। काव्य की इस विस्तृति से ही संभवतः कलाओं में उसे श्रेष्ठ गिना गया है।"-हंसकुमार तिवारी, कला (गया : मानसरोवर प्रकाशन, संस्करण, अनुल्लिखित), पृ० 63 (ख) "भाषा के द्वारा व्यंग्य अर्थ में रूप-स्वर और गति भी सम्मिलित हैं। इस दृष्टि से भी भाषा का माध्यम अधिक समर्थ और संपन्न है। वह चित्रकला, संगीत और नृत्य की व्यंजनाओं को भी आकार दे सकता है। साथ ही वह इनकी व्यंजनाओं को अधिक स्थायी बना सकता है।" : रामानंद तिवारी, सत्यं शिवं सुंदरम् (द्वितीय भाग) (भरतपुर : भारती मंदिर, प्रथम संस्करण, 1963), पृ० 942 (ग) "कविता हर दृष्टि से मूर्तिकला, चित्रकला या संगीतकला का रूप ले सकती है" रेनेबेलेक, साहित्य सिद्धांत, अनुवादक-बी० एस० पालीवाल (इलाहाबाद: लोक भारती प्रकाशन, संस्करण अनुल्लिखित), पृ० 168 (घ) "साहित्य में संगीत की ध्वन्यात्मकता, चित्र की रूप-चेतना तथा सौंदर्यवृत्ति एवं शिल्पकला की शृंखला-गुंफन एवं छंदबद्धता (रिद्म) विद्यमान होने के कारण उसे अन्य कलाओं से श्रेष्ठ माना जाता है।"-तारिणी चरणदास चिदानंद, कला और साहित्य (दिल्ली : राजपाल एंड संज, प्रथम संस्करण, 1960), पृ० 11
88 / सौंद्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 103
(च) "साहित्य, माध्यम की दृष्टि से, भाषा की कला या भाषिक संरचना है। अन्य कलाओं से साहित्य की विशिष्टता इसी माध्यम के सर्जनात्मक और सतर्क प्रयोग में निहित रहती है। फिर भी जब हम काव्य में मूर्तता की, रूप-विधान की बात करते हैं या फिर 'बर्बल आईकोन' जैसी शब्दावली के सहारे उसकी मूर्तता का संकेत करना चाहते हैं, तो कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह शब्दावली चित्र और मूर्तिकला के क्षेत्र से आयात की जाती है। इसी तरह शब्दों की ध्वन्यार्थ-व्यंजना, लय, नाद-सौंदर्य आदि का विश्लेषण संगीत कला का उपजीवी होता है, और कृति की संरचना-स्थापत्य या वस्तुविन्यास का विश्लेषण स्थापत्य कला का।"-निर्मला जैन, आधुनिक साहित्य : मूल्य और मूल्यांकन (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1980), पृ० 30-31 (छ) "कोई भी कला अपने वास्तविक स्वरूप की अभिव्यक्ति काव्य में पा सकती है।" बैजनाथ सिंहल, काव्यशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र में अंतःसंबंध 'साहित्यानुशीलन', संपादक : शशिभूषण सिंहल' अंक 4, वर्ष 1983 (रोहतक : महर्षि दयानद विश्वविद्यालय), पृ० 133 379. राजनाथ शर्मा, 'कलाओं का वर्गीकरण' 'समालोचक': (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक) संपादक रामविलास शर्मा, अंक 1, वर्ष 1, फरवरी, 1958 (आगरा : विनोद पुस्त मंदिर), पृ० 165 380. कांतिचंद्र पांडेय, स्वतंत्र कलाशास्त्र (भाग-1) (वाराणसी : चोखंबा संस्कृत सीरीज ऑफिस, प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 527 381. कृष्णकुमार शर्मा, साहित्य : अन्य कलाओं के संदर्भ में (दिल्ली : दि मैंकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 48 382. "सारा उपद्रव काव्य को कलाओं के भीतर लेने से हुआ। इमी कारण काव्य के स्वरूप की भावना भी धीरे-धीरे बेलबूटे और नक्काशी की भावना के रूप में आती गयी। हमारे यहां 'काव्य' की गिनती चौं.ठ कलाओं में नहीं की गयी।"-आचार्य रामचंद्र शुक्त, चितामणि (द्वितीय भाग) संपादक : विश्वनाथ प्रसाद मिश्र (वाराणसी : नागरी प्रवारिणी सभा, द्वितीय संस्करण, संवत् 2035), पृ० 144 383. "इससे प्रकट हो जाता है कि काव्य और कला भिन्न वर्ग की वस्तु है"-जयशंकर प्रसाद, काव्य और कला तथा अन्य निबंध (इलाहाबाद : भारती भंडार लीडर प्रेस, सातवीं आवृत्ति संवत् 2032), पृ० 39 384. 'कला' शब्द का भारतीय व्यवहार पाश्चात्य व्यवहार से भिन्न है। यहां कला केवल छंद- रचना के अर्थ में व्यवहृत हुई, इसीलिए काव्य की नहीं, सगस्या-पूर्ति की गणना कला में की गयी है।"-नंददुलारे वाजपेयी, 'प्राक्कथन', काव्य और कला तथा अन्य निबंध, वही, पृ० 20 385, "काव्य और कला दो भिन्न वस्तुएं हैं। प्राचीन काल में काव्य की कला में गणना होने का कारण अनूठापन या। समस्यापूर्ति भी एक प्रकार का काव्य-कौशल ही था, जिससे यह भी कलाओं में पैठ गयी। सारांश यह है कि सहृदयों के मनोविनोदार्थ जो कवि का रचना- कौशल था, वह कलाओं में गिन लिया गया। इस प्रकार काव्य कला नहीं हो सकता।" -रामदहिन मिश्र, काव्य विमर्श (पटना : ग्रंथमाला कार्यालय, प्रथम संस्करण, 1951), पृ० 317-18 386. "वास्तव में हमारे यहां काव्य कलाओं के अंतर्गत नहीं है।"-गुलाबराय, सिद्धांत और अध्ययन(दिल्ली : आत्माराम एंड संज, छठा संस्करण, 1965) पृ० 54 387. "काव्य के कतिपय उपकरण तो कला माने गये किंतु अपनी संपूर्णता में उसे कला नहीं माना
कला और कलाकृति का व्यापार / 89
Page 104
गया। इससे स्पष्ट है कि अधिकांश कलाओं की तुलना में काव्य की स्थिति अनुपम है, क्योंकि वह समस्त कलाओं के सार को उपयोग करती हुई भी उन सबसे पृथक और व्यापक स्तर पर प्रतिष्ठित होती है।"-नवलकिशोर मिश्र, 'काव्यानुभूति का स्वरूप"शोध-पत्निका', संपादक : देवीलाल पालीवाल, अंक 1, वर्ष 18, 1967 (उदयपुर : साहित्य संस्थान राजस्थान विद्यापीठ), पृ० 77 388. बाल सीताराम मढेकर, करा और मानव, अनुवादक : अंजना मर्ढेकर (दिल्ली : न्यू इंडिया प्रेस, प्रथम संस्करण, 1952), पृ० 19 389. विश्वंभरनाथ उपाध्याय, जलते और उबलते प्रश्न (जयपुर : बोहरा प्रकाशन, प्रथन संस्करण, 1969), पृ० 139 390. बच्चनसिंह, आधुनिक हिंदी आलोचना के बीज शब्द (नयी दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1983), पृ० 31 391. "अन्य कलाओं में सौंदर्य की कमी नहीं, व्यंजना की भी असीम क्षमता है, व्यापक प्रभाव की भी वह धनी है पर ये सारी प्रवृत्तियां एकत्र कम मिलती हैं, इस मात्रा में तो कहीं नहीं जिस मात्रा में यहां (मूर्तिकला) मिलती हैं।"-भगवतशरण उपाध्याय, 'कला', हिंदी साहित्य का वृहत् इतिहास, संपादक : राजबली पांडेय(काशी : नागरी प्रवारिणी सभा, प्रथम संस्करण, संवत् 2014 वि०), पृ० 613 392. "ललितकला में वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत कला और काव्य कला है। इन ललित कलाओं के अंतर्गत चित्रकला का स्थान अत्युच्च है। .. विष्णु धर्मोत्तरम् नामक ग्रंथ में यह माना गया है कि कलाओं में चित्रकला सर्वश्रेष्ठ है और प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली है. अर्थात् जिस प्रकार पर्वतों में सुमेरु पर्वत सबसे श्रेष्ठ गिना जाता हैं, पक्षियों में गरुड़ सर्वप्रधान है तथा मनुष्यों में राजा सर्वश्रेष्ठ है, उसी प्रकार कलाओं में चित्र- कला सर्वमान्य है।"-अवध उपाधयाय, भारतीय ललित कला (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, संवत् 2005), पृ० 3 393. उद्धत प्रभुदयाल मीतल, ब्रज की कलाओं का इतिहास (दिल्ली : साहित्य प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977),पृ० 7 394. "संगीत उच्चतम कोटि की कला है। यह शब्दों की भी सहायता नहीं लेता। इसका उपकरण केवल स्वर है। ... इस प्रकार हम देखते हैं कि स्थापत्य, भास्कर्य, चित्र, काव्य, एवं संगीत द्वारा कलाविशारः उत्तरोत्तर अधिक स्पष्टता से रत्य को व्यक्त करने की चेष्टा करता है।"-हरिवंश सिंह शास्त्री, सौंदर्य विज्ञान (बनारस : मंत्री काशी विद्यापीठ, प्रथम संस्करण, 1936), पृ० 139-41 395. " ... इस प्रकार ललित कलाओं का नया तथा अधिक वैज्ञानिक क्रम निकाला जा सकता है जिसमें संगीत सबसे ऊपर और सबसे नीचे कविता होगी।"-बाल सीताराम मर्ढेकर, कला और मानव, अनुवादक : अंजना मर्ढेकर, (दिल्ली : न्यू इंडिया प्रेस, प्रथम संस्करण, 1952), पृ० 19 396. "अतः समस्त सूक्ष्न कलाओं में संगीतकला को ही श्रेष्ठ कह सकते हैं। काव्य कला का स्थान इसके बाद ही समझना चाहिए।"-पुरुषोत्तमदास अग्रवाल, 'ललिपकला', 'साहित्य संदेश' संपादक : गुलाबराय, अंक 6, भाग 16, दिसंबर 1954) (आगरा : साहित्यरत्न भंडार), पृ० 216 397. सद्गुरुचरण अवस्थी, साहित्य तरंग (इलाहाबाद: इंडियन प्रेस प्राइवेट लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1956), पृ० 7 398. हंसकुमार तिवारी, कला (गया : मानसरोवर प्रकाशन, प्रथम संसकरण, अनुल्लिखित), पृ० 55-56
90 / सौंदयंबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 105
- कुमार विमल, कला-विवेचन(पटना : भारती भवन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 89 400. विश्वंभरनाथ उपाध्याय, 'जलते और उबलते प्रश्न' (जयपुर : बोहरा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 149 401. नंददुलारे वाजपेयी, 'प्राक्कथन' काव्य और कला तथा अन्य निबंध, जयशंकर प्रसाद (इलाहावाद : भा ती भंडार लीडर प्रेम, सातवीं आवृत्ति, संवत्, 2032), पृ० 21 402. "यह वर्गीकरण ब्यावहारिक हो सकता है, किंतु कलाओं की श्रष्ठता अथवा लघुता का निर्भ्रांत निर्णायक नहीं है। सौंदर्य की दृष्टि से काव्यकला की कोई रचना स्थापत्य की किसी कृति से भी निम्न कोटि की हो सकती है, और स्थापत्य की कोई कृति काव्यकला की किसी रचना से श्रष्ठ भी हो सकती है। उदाहरणार्थ, आगरा का 'ताजमहल' और जयपुर का 'हवामहल' स्थापत्य कला के ऐमे नमूने हैं, जिनका सौंदर्य अनेक काव्यकृतियों की अपेक्षा श्रेष्ठतर माना जाएगा।" प्रभुदयाल मीतल, ब्रज की कलाओं का इतिहास (दिल्लौ : साहित्य प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 7-8 403. रामविलास शर्मा, 'कला का माध्यम', 'समालोचक', संपादक : रामविलास शर्मा, अंक 2, वर्ष 1, मार्च, 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृ० 5 404. वही, पृ० 6
कला और कलाकृति का व्यापार / 91
Page 106
अध्याय-2
आशंसक और कलाकार का वृत्त
हिंदी में 'कला और कलाकृति के व्यापार' का अवलोकन करने के उपरांत हम 'आशंसक और कलाकार के वृत्त' से परिचित होना चाहेंगे। इस अध्याय में विवेचन को व्यवस्थित रूप देने के लिए हम क्रमशः आशंसक से आरंभ करके कलाकार पर चिंतन करते हुए कला-सृजन-प्रक्रिया का विवेचन करेंगे। इसके औचित्य के संबंध में हम यह कह सकते हैं कि विवेचक के लिए सर्वप्रथम सहृदयनिष्ठ अनुभूति ही अध्ययनसामग्री के लिए सुलभ होती है। सहृदय अथवा आशंसक का जिज्ञासु मन कला और कलाकृति के स्वरूप को जान लेने तथा अपनी अनुभूति का विश्लेषण करने के उपरांत ही उसके स्रष्टा कलाकार के मनोगत अभिप्रायों को जानने की दिशा में अग्रसर होता है और इसी प्रयत्न में वह प्रायः अपनी प्रतिक्रिया को कलाकार के मूलभाव के सान्निध्य में रख कर, दोनों के बीच साम्य-वैषम्य को पहचानने का प्रयत्न करता है। सहृदय अथवा आशंसक के इसी प्रयास की परिणति अंततः कला-सृजन-प्रक्रिया के विश्लेषण में होती है। यह सही है कि कला-सृजन की प्रक्रिया इसके सवथा विपरीत होती है, अर्थात् पहले सृजनप्रक्रिया, फिर कलाकार और उसकी कलाकृति का निर्मित रूप और अंत में इस निर्मित संपूर्ण कलाकृति की आशंसा अथवा आस्वाद की स्थिति आती है, किंतु विवेचन के लिए आशंसक की दृष्टि को स्वीकार करते हुए आशंसक से कला-सृजन-प्रक्रिया की ओर अग्रसर होना ही अधिक समीचीन प्रतीत होता है। इस दृष्टि से हम सर्वप्रथम आशंसक, फिर कलाकार तथा उसके उपरांत सृजन-प्रक्रिया का उल्लेख करना उचित समझेंगे।
आशंसक या सहृदय
आशंसक या सहृदय की सौंदर्यशास्त्र में स्थापना तथा भारतीय एवं पाश्चात्य मनीषियों द्वारा बोध प्रयुक्त शब्दावली सौंदर्यानुभूति अथवा काव्यानुभूति का निर्णय अंततः कला के ग्राहक पर निर्भर है, इसलिए पाश्चात्य साहित्य में सौंदर्यानुभूति तथा भारतीय काव्यशास्त्र में काव्यानुभूति का परिनिष्ठत रूप स्थिर करने के लिए पाश्चात्य तथा भारतीय मनीषियों ने एक
/ 92 /
Page 107
'आदशं ग्राहक' अथवा 'आदर्श पाठक' की परिकल्पना की है। संस्कृत काव्यशास्त्र में इसे 'सामाजिक', 'सहृदय', 'अधिकारी' और 'रसिक' की संज्ञा प्रदान की गयी है तथा पाश्चात्य सौंदर्यबोधशास्त्र में इसी को 'आदर्श प्रेक्षक', 'आदर्श ग्राहक' एवं काव्यशास्त्र में 'आदर्श पाठक' के नाम से अभिहित किया गया है। संस्कृत में 'सहृदय' संबंधी अवधारणा के लिए निर्माण का व्याख्यान एवं प्रचलन का श्रेय निर्मला जैन ने 'ध्वन्यालोक' के रचयिता आनंदवर्धन को दिया है।1 संस्कृत काव्यशास्त्र के अनुसार सहृदय कोई काव्य-बाह्य व्यक्ति न होकर काव्य का अपरिहार्य एवं अभिन्न अंग है। सहृदय की अवधारणा के बिना रस के स्वरूप का ठीक-ठीक निरूपण असंभव है। जैसाकि गणेश त्र्यंबक देशपांडे का कथन है, "रस में समूहाव- लंबनता होने से ही रसिक दर्शक रस-प्रयोग से बाहर नहीं रह सकता। इस संपूर्ण रस- व्यापार में रसिक भी एक अपरिहार्य अंश है। रसिक को रस-प्रयोग-बाह्य समझकर विवेचक भी रस-विवेचन नहीं कर पाता। रसिक को बाह्य मानकर यदि विवेचक काव्य- नाट्य का विवेचन करता है तो वह लौकिक घटना का विवेचन होता है, रस का नहीं। काव्यगत अर्थों को विभावत्व प्राप्त ही रसिकानुभूति की दृष्टि से होता है, रसिक- निरपेक्षता से नहीं।"2 आचार्य भरतमुनि का 'प्रेक्षक' अथवा 'सामाजिक' भी नाट्य का अपरिहार्य अंग था। उनके नाट्यशास्त्र का यह सामाजिक ही कश्मीरी शैव आचार्यों के यहां आकर सहृदय के रूप में रूपांतरित हो गया। 'सहृदय' शैवागम में सामान्य शब्द के रूप में नहीं अपितु विशेष अर्थसंपन्न पारिभाषिक शब्द रूप में व्यवहृत हुआ है। 'सामाजिक', 'रसिक' आदि शब्दों का प्रयोग करते हुए भी कश्मीरी शैव आचार्यों ने 'सहृदय' शब्द के प्रति अपना विशेष भुकाव दिखाया है। इसका एक विशेष कारण रहा है जिसकी ओर निर्मला जैन ने इंगित किया है। वे लिखती हैं, "कश्मीरी शैव-परंपरा में 'सहृदय' शब्द की लोकप्रियता का एक प्रमाण तो यही है कि ग्रंथों के नाम तक 'सहृदय-हृदय-दर्पण', 'सहृदयालोक' अथवा 'सहृदय-हृदयालोक' जैसे हुआ करते थे। अनेक प्राचीन ग्रंथों में 'धवन्यालोक' को 'सहृदयालोक' और 'सहृदय-हृदयालोक' भी कहा गया है। अभिनवगुप्त ने 'लोचन' में आनंदवर्धन को 'सहृदय चक्रवर्ती' नाम से सादर स्मरण किया है। कुछ विद्वानों का तो यहां तक कहना है कि ध्वनि-कारिकाओं के निर्माता का नाम सहृदय था।"3 ध्वनिवादी आचार्यों ने व्यंग्यार्थ को ग्रहण करने के लिए सहृदय में प्रतिभा का होना अनिवार्य माना है। इसी विशेषता को देखते हुए मम्मट 'सहृदय' को 'प्रतिभाजुष' तथा अभिनव गुप्त 'विमल प्रतिभाशाली' कहते हैं। इसके साथ ही अभिनवगुप्त उसके लिए 'अधिकारी' शब्द का भी प्रयोग करते हैं। जिसका अर्थ यह है कि सहृदय ही सही अर्थों में काव्य का अधिकारी है। रस ज्ञाता को प्रमुखता देने वाले आचार्य सहृदय को 'रसिक' भी कहते हैं। भोज 'रसिक' शब्द पर ही बल देते हैं। निर्मला जैन अभिनवगुप्त के 'सहृदय' तथा भोज के 'रसिक' शब्द की परस्पर
आशंसक और कलाकार का वृत्त /93
Page 108
तुलना करते हुए अभिनवगुप्त की सहृदय संबंधी मान्यता को अधिक संतोषप्रद तथा निर्दोष मानती हैं।4 वे स्वयं भी 'सहृदय' शब्द का ही प्रयोग करती हैं। जबकि रमे- कुंतल मेघ भोजसम्मत 'रसिक' को आनंदवर्धन एवं अभिनवगुप्त सम्मत 'सहृदय' की तुलना में अधिक यथार्थोन्मुख किंतु अधिक वातावरण पराङ्मुख मानते हैं।5 हिंदी में आशंसक अथवा सहृदय के विषय को सर्वप्रथम निर्मला जैन ने उठाया है। उन्होंने अपनी पुस्तक 'रस-सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र' में काव्य के अधिकारी के लिए 'सहृदय' शब्द का प्रयोग किया है। आशंसक अथवा सहृदय पर चर्चा करते हुए यद्यपि उन्होंने कोई मौलिक विचार नहीं रखे हैं तथापि प्राचीन भारतीय एवं पाश्चात्य मनीषियों के मतों को प्रस्तुत करते हुए उनका तुलनात्मक अध्ययन अवश्य किया है। निर्मला जैन के उपरांत हिंदी में रमेश कुंतल मेघ ही एक मात्र ऐसे सौंदर्य-तत्त्ववेत्ता हैं जो इस विषय पर चर्चा करते हुए अपनी मौलिकता का परिचय देते हैं। 'अथातो सौंदरय जिज्ञासा' में सहृदय की स्थापना व उसके लिए प्रयुक्त शब्दावली का अतिविस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए वे सहृदय को इस रूप में परिभाषित करते हैं : "निरीक्षक या सहृदय (तथा अन्य नाम) कलात्मक संस्कारों अथवा मनोवृत्तियों वाला वह प्रत्यक्ष या परोक्ष व्यक्ति है जो तैयार की हुई या प्रस्तुत की जाने वाली कला- कृति के प्रति अपनी 'तात्कालिक', 'ऐंद्रियक' 'सौंदर्यबोधात्मक' रुचियों का तकबहिर्भूत प्रस्तुतीकरण करे, जो पेशेवर अथवा केवल दार्शनिक तार्किक न हो बल्कि कृति के सौंदर्य अथवा आनंद अथवा कामना का एक 'अंतर्मुखी' भोक्ता भी हो। उसमें शिक्षा, अध्ययन- अभ्यास (वातावरण) आदि के संयोग से काल एवं स्थान के अनुरूप विकास या परिष्कार या परिवर्तन की गुंजाइश हो।"6 उक्त परिभाषा को देने के उपरांत रमेशकुंतल मेघ सहृदय की मूल स्थापनाओं को विस्तार से स्पष्ट करते हैं तथा भारतीय साहित्यशास्त्र के अनुसार सहृदय की विशेषताओं को उद्घाटित करते हुए हिंदी में 'आशंसक' शब्द को उचित ठहराते हैं। उनके अनुसार आज संस्कृत आचार्यों द्वारा प्रयुक्त 'सहृदय', 'सामाजिक', 'रसिक', 'अधिकारी' आदि शब्द काव्य, नाटक, संगीत तथा अन्य सभी कलाओं के लिए पर्याय जैसे हो गये हैं अतः इन सबके लिए 'आशंसक' शब्द का प्रयोग उचित है।7 जिस प्रकार भारतीय विद्वानों ने काव्यानुभूति के स्वरूप पर विचार करते हुए प्रतिमान के रूप में एक आदर्श पाठक की परिकल्पना की है, उसी प्रकार पाश्चात्य मनीषियों ने भी सौंदर्यानुभूति का परिनिष्ठित रूप स्थिर करने के लिए पाश्चात्य कला- चिंतन में 'आदर्श ग्राहक' की कल्पना की है। यह आदर्श ग्राहक वही है जिसे अन्य चिंतकों ने 'आदर्श प्रेक्षक' एवं काव्यशास्त्र में 'आदर्श पाठक', 'सार्वभौम पाठक', 'विशिष्ट पाठक', 'कुशल पाठक', 'पूर्ण पाठक' अथवा 'सामान्य पाठक' की संज्ञा प्रदान की है। पाश्चात्य चिंतकों में जिन विद्वानों ने आदर्श पाठक की विशेषताओं पर विस्तार से उल्लेख किया है उनमें एडवर्ड बुलो, कांट, ज्यां पाल सार्तर, सूजन लेंगर, एफ० आर० लीबिस तथा टी० एस० इलियट आदि के नाम प्रमुख हैं। इन चिंतकों ने कलाकृति को
94 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 109
रचनाकार और पाठक दोनों के सहयोगी प्रयास का परिणाम कहा है। कांट तो यह मानते हैं कि कोई कलाकृति अपना अस्तित्व तभी प्राप्त करती है जब उसे कोई देखता है। किसी कृति की सार्थकता इसी बात में है कि वह ग्रहण की जाये या पढ़ी जाये। एक पाठक की चेतना के द्वारा ही लेखक अपने कृतित्व के लिए अपने-आपको आवश्यक मानता है। यह धारणा इतनी स्वतःसिद्ध है कि इसे अधिक बलपूर्वक प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं है। रचना के लिए पाठक के सहयोग का महत्त्व इतना अधिक है कि पाश्चात्य सौंदर्यशास्त्र में पाठक की ग्रहणशीलता को भी एक प्रकार की सृजनशीलता कहा गया है।8 भारतीय तथा पाश्चात्य चिंतकों के अनुसार सहृदय के अपेक्षित गुणों में अंतर यह स्पष्ट है कि भारतीय एवं पाश्चात्य दोनों ही चिंतन-परंपराओं में आशंसक अथवा सहृदय को समान रूप से महत्त्व दिया गया है। लेकिन इसके साथ ही यह भी सत्य है कि इस महत्त्व के अधिकारी सभी पाठक नहीं होते। चिंतकों ने कला के समुचित ग्रहण के लिए सहृदय में कतिपय अपेक्षित गुणों का विधान किया है, जिससे संपन्न होने पर ही वह कला का सच्चा अधिकारी कहला सकता है। पूर्व और पश्चिम के मनीषियों ने सहृदय में जिन गुणों की अपेक्षा की है उनमें पर्याप्त दृष्टिभेद है, जिसका उल्लेख हिंदी में निर्मला जैन ने विस्तार से किया है।9 भारतीय आचार्यों ने 'सहृदय' में जिन गुणों पर जोर दिया है, उनका रूप 'प्रातिभ' अधिक है, अरजित कम। इसकी तुलना में पाश्चात्य चिंतक 'आदर्श पाठक' में ग्रहणशीलता के गुण को सतत साधना, शिक्षा एवं प्रयास का परिणाम मानते हैं। पाठक में वे सहज या नैसरगिक भावयित्री प्रतिमा को स्वीकार अवश्य करते हैं परंतु उनके अनुसार यह अभिजात वंशानुक्रम परंपरा से विरासत में प्राप्त होने वाला संस्कार ही अधिक है, आशु प्रतिभा नहीं। संस्कृत के विद्वानों ने काव्य-रचना के संदर्भ में मुख्य रूप से तीन हेतुओं की चर्चा की है-प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास। इन तीनों में से काव्यास्वाद के संदर्भ में शब्दभेद से अनेक रूपों में वे पहली, अर्थात् 'प्रतिभा' के ही स्वरूप की प्रतिष्ठा बार- बार करते हैं, शेष दो की नहीं। अभिनवगुप्त ने इसी को 'रसज्ञता' या समर्पण की नैसर्गिक सामर्थ्य कहा है। राजशेखर इसे 'भावयित्री प्रतिभा' की संज्ञा प्रदान करते हैं तथा ध्वनिवादी आचार्यों ने इसी को 'सवासन' के नाम से अभिहित किया है। पश्चिम में जहां सात्र, लैंगर, एफ० आर० लीविस तथा टी० एस० इलियट आदि विद्वानों ने 'आदर्श पाठक' में ग्रहणशीलता, अनुभव-सामर्थ्य आदि नैसगिक गुणों की आवश्यकता का निर्देश किया है, वहां वे कला-ग्रहण की क्षमता को दीर्घ अभ्यास, कला शिक्षा एवं सतत प्रयास के आधार पर अर्जित भी मानते हैं। इनके अनुसार कला का ग्रहण एक प्रकार की पुनर्रचना ही है, अतः इसके लिए एक निश्चित प्रकार के अभ्यास की आवश्यकता स्वयं सिद्ध है। यदि यह कहें कि पाश्चात्य चिंतकों के अनुसार कला आशंसक और कलाकार का वृत्त /95
Page 110
ग्रहण भी एक प्रकार का कलात्मक प्रयास है तो कोई अनुचित न होगा। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि भारतीय मनीषियों के अनुसार यदि काव्या- स्वाद नैसरगिक प्रतिभा के द्वारा काव्य का भावन है, तो पश्चिमी विचारकों के अनुसार वह प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास के द्वारा काव्य का पुनस्सृजन है, भले ही उसमें प्रतिभा का महत्त्व सर्वाधिक हो। इसीलिए पश्चिम में काव्य और कलाएं एक और भी अधिक संकुचित और ऐसे परिसीमित दायरे के ग्राहकों का प्राप्य हो जाती हैं, जिन्होंने कुछ तो वंशानुक्म-संस्कार के आधार पर और कुछ शिक्षा और सतत अभ्यास से एक प्रकार की कलात्मक रुचि का विकास कर लिया हो।
रुचि या अभिरुचि अभिरुचि मानवसृष्टि के साथ उत्पन्न हुई है और उसके क्रिया-कलापों के साथ विकसित, यह मनुष्य के रहन-सहन, रीति-रिवाज और सोचने-विचारने की क्रिया के मोड़ों के साथ अपना स्वरूप निर्धारित करती गयी है। कला के क्षेत्र में इसका विशेष महत्त्व है। यह देशकाल और स्थान के अनुसार परिवर्तित होने के बावजूद हर काल की सर्जनात्मक क्षमता को अभिव्यक्ति करती है। प्रायः आशंसक या सहृदय इस तथ्य को भूल जाते है कि विभिन्न काल की कला के मूल में विभिन्न प्रकार की अभिरुचियां विद्यमान रहती हैं। इस भूल के कारण वे हर देश और काल की कला को अपनी दृष्टि से मूल्यांकित करने लगते हैं जिससे कई समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। इस रूप में आशंसक के लिए अभिरुचि का विशेष महत्त्व सिद्ध होता है। इसके अभाव में हम कला-सृजन और आस्वादन को सरलता से नहीं समझ सकते हैं। हिंदी मे जिन कला चिंतकों ने इस विषय पर चिंतन किया है उनमें शिवकरण सिंह तथा रमेशकुंतल मेघ का नाम प्रमुख है। इन चिंतकों के अतिरिक्त इस विषय पर प्रासंगिक रूप से चर्चा हरद्वारीलाल शर्मा, राजेत्द्रप्रताप सिंह, रामकीर्ति शुक्ल तथा सुरेन्द्रनाथ त्रिपाठी ने भी की है। हिंदी में 'रुचि' शब्द पसंद (लाइकिंग), रुझान (हॉवी) तथा अभिरुचि (टेस्ट)-इन तीनों अर्थों में प्रचलित है लेकिन चिंतक सुविधा हेतु 'रुचि' को पसंद तथा 'अभिरुचि' को रसज्ञाता तथा ऐंद्रियक सौंदर्यात्मक भोग के अर्थ में ग्रहण करते हैं। विभिन्न भाषाओं में इसके लिए प्रयुक्त शब्द : हिंदी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में इस शब्द का प्रयोग किस रूप में हुआ है, इसका उल्लेख शिवकरण सिंह अपनी पुस्तक 'कला-सृजन-प्रक्रिया' में करते हैं। उनके अनुसार अभिरुचि को इतालवी और स्पेनिश भाषा में 'Gusto', फ्रांसीसी भाषा में 'Gout' तथा जर्मन भाषा में 'Geshmack' कहा जाता है। इटली और स्पेन के अभ्युदयकाल में इस शब्द को आनंद, मनोरंजन और मानसिक भुकाव का पर्याय माना जाता था। सर्वप्रथम स्पेन के विचारक 'बाल्यसर ग्रेसिअन' ने इस शब्द का प्रयोग विशिष्ट मानसिक क्रिया के अर्थ में किया। इसके उपरांत फ्रांस में इसका प्रयोग निश्चित अर्थ का परिचायक बना। अब यह शब्द कला के क्षेत्र में पूर्णतया प्रतिष्ठित हो चुका है। 96 / सौंदयबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 111
क । अंग्रेजी में इसके लिए 'टेस्ट' शब्द का प्रचलन है। 'टेस्ट' शब्द टेंजीर(Tangere) से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है स्पर्श करना। बाद में यह शब्द केवल स्पर्श करने अथवा स्वाद लेने तक ही सीमित नहीं रह गया। इसका अर्थ-विस्तार हुआ और इस क्षेत्र में विविध स्वरूपों को समाहित करने का प्रयत्न भी किया गया। 'कलात्मक अभिरुचि', 'आलोचनात्मक अभिरुचि' और 'सर्जनात्मक अभिरुचि' इसके प्रमाण हैं। ये सभी शब्द मूलतः अभिरुचि के नये अर्थ-संदर्भ और अनुषंग के परिचायक हैं।10 अभिरुचि की परिभाषा : अर्थ-वैविध्य और प्रयोग-वैविध्य के कारण यद्यपि इस शब्द को किसी निश्चित परिभाषा में समेटना कठिन लगता है तथापि हिंदी के कुछ कला मनीषियों ने इसे परिभाषित करने का प्रयास अवश्य किया है। शिवकरण सिंह ने कला-सृजन में अभिरुचि को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान करते हुए इसे 'विगत आकांक्षा, अभिलाषा, प्रेम तथा घृणा का इतिहास' कहा है।11 एक अन्य स्थल पर वे अभिरुचि को 'साहित्य, कला और जीवन के महत्त्वपूर्ण स्वरूप को समझने और प्राप्त करने का प्रमुख साधन' मानते हैं।12 सुरेन्द्रनाथ त्रिपाठी के अनुसार, "रुचि मानव-संस्थान की अदृष्ट ग्रंथि है जिसका व्यापार अहर्निश सुंदर वस्तुओं अथवा जीवनगत सौंदर्य के निरखने-परखने और उसके मूल्यांकन में चलता रहता है।"13 रमेशकुंतल मेघ ने इसे परिभाषित करते हुए इसे एक ऐसी मूल प्रवृत्तिमूलक क्षमता कहा है जिसके द्वारा आशंसक अथवा सहृदय कलाकार के संवेगात्मक आवेश को 'तात्कालिक' 'व्यक्तिगत' स्तर पर समभता तथा उसमें भाग लेता है।14 कला और अभिरुचि : सौंदर्यचितक रमेशकुंतल मेघ ने अभिरुचि की जो परिभाषा दी है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि अभिरुचि का संबंध चाहे कलाकार से हो या कलाकृति से वह मूल रूप से कलाकार तथा आशंसक के स्वभाव के मध्य तादात्म्य पर ही आश्रित है और इस रूप में इसका मुख्य कार्य सहृदय तथा कलाकार के स्वभावों के बीच समन्वय तथा सहअस्तित्व कायम करना है। शिवकरण सिंह ने अभिरुचि की तुलना एक छलनी से करते हुए इसकी सार्थ- कता कलात्मक सामग्री से अनावश्यक तत्त्वों को हटाने में देखी है। वे लिखते हैं, "जिस प्रकार छलनी अनावश्यक तत्त्वों को छानकर अलग कर देती है, उसी प्रकार अभिरुचि कलात्मक सामग्री से अनावश्यक तत्त्वों को हटाने का कार्य भी संपादित करती है। इन अनावश्यक तत्त्वों को हटाने के पश्चात् जो भी शेष रह जाता है वही कलात्मक सृजन का उपजीव्य बनता है। इसी छनाव के कारण कला में एकरूपता, स्पष्टता और सरसता आती है।"15 अभिरुचि के इस महत्त्वपूर्ण कार्य का समर्थन रामकीर्ति शुक्ल भी अपनी पुस्तक 'सौंदर्य का तात्पर्य' में करते हैं।16 अभिरुचि का स्वरूप : शिवकरण सिंह, रमेशकुंतल मेध तथा रामकीर्ति शुक्ल के अतिरिक्त हिंदी में इस विषय पर प्रारंभिक रूप से चर्चा हरद्वारीलाल शर्मा तथा राजेन्द्रप्रसाद सिंह भी करते हैं। राजेन्द्रप्रसाद सिंह अपनी पुस्तक 'सौंदर्यशास्त्र की पाश्चात्य परंपरा' में मार्क्सवादी सौंदर्यबोधशास्त्र का उल्लेख करते हुए अभिरुचि की आशंसक और कलाकार का वृत्त / 97 6
Page 112
दो विशेषताओं को उद्घाटित करते हैं। उनके अनुसार रुचि की पहली विशेषता यह है कि वह वैयक्तिक चेतना से संबंध रखती है। लेकिन जिस प्रकार अन्य क्षेत्रों में, राज- नीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां चेतना को प्रभावित करती हैं, उसी प्रकार वे रुचि को भी प्रभावित करती हैं तथा उसमें परिवर्तन लाती रहती हैं। इसी आधार पर राजेन्द्रप्रसाद सिंह एक राष्ट्र की रुचि को दूसरे राष्ट्र से भिन्न मानते हैं।17 हरद्वारीलाल शर्मा तथा रमेशकुंतल मेघ भी अभिरुचि को परिवर्तनशील मानते हुए उसके पीछे धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा जलवायवीय कारणों को देखते हैं तथा किसी भी युग की या किसी भी व्यक्ति की आद्योपांत एक ही अभिरुचि न होने का समर्थन करते हैं।18 राजेन्द्र प्रसाद सिंह रुचि की दूसरी विशेषता यह मानते हैं कि इसमें कभी भी स्थायित्व नहीं आता है। वे लिखते हैं, "प्रत्येक अगली पीढ़ी अपनी पिछली परंपरा की रुचि की आलोचना करती है और उसे सुधारने का प्रयत्न करती है। यही नहीं, प्रत्येक युग में परंपरागत कलात्मक मूल्यों की तत्कालीन मानदंडों, आवश्यकताओं और प्रति- मानों के अनुसार व्याख्या की जाती है।"19 लेकिन अब प्रश्न उठता है कि अभिरुचि में स्थायित्व न होने का क्या कारण है। इसके शिवकरण सिंह ने दो कारण बतलाये हैं। पहला कारण वे यह मानते हैं कि अभिरुचि तुलना पर आश्रित होती है और तुलना में साम्य और वैषम्य पाया जाता है। काल गतिशील होता है, यह अपने प्रवाह के साथ व्यक्ति में नवीन इच्छाएं और आकांक्षाएं उत्पन्न करता है। इस क्रिया से अभिरुचि संबंधी प्राचीन प्रतिमानों के समक्ष नये प्रश्न खड़े हो जाते हैं, उनके आश्रय का आधार बदल जाता है और नयी अभिरुचि का आविर्भाव होता है। इसका दूसरा कारण यह है कि अधिक समय तक बने रहने के कारण रुचि रूढ़ हो जाती है और विकासोन्मुख तथा अधिक महत्त्वपूर्ण जीवन-स्पंदनों को प्रतिच्छायित करने में असमर्थ सिद्ध होने लगती है। इस रूढ़िग्रस्तता से मुक्त होना आवश्यक है। इसी के परिणामस्वरूप रुचि में स्थायित्व नहीं होता है तथा नयी अभिरुचियों का आविर्भाव होता रहता है।20 अभिरुचि और फैशन : 'फैशन' को अभिरुचि की भावात्मक अनुकृति मानते हुए रमेशकुंतल मेघ इन दोनों में पर्याप्त अंतर देखते हैं। उनके शब्दों में : "अभिरुचि में स्वरुचि की प्रधानता होती है किंतु फैशन में सामूहिक औचित्य की; अभिरुचि में नितांत वैयक्तिकता भी कायम रहती है किंतु फैशन में एक व्यक्तिगत यांत्रिक अनुकरण-सा होने लगता है, अभिरुचि में आशंसक कलाकार की मूल संवेदना से प्रभावित होता है; अभिरुचि का विकास शनः-शनैः होता है लेकिन फैशन का प्रसार आकस्मिक और बहुत तेज होता है। अतः अभिरुचि की अपेक्षा फैशन बहुत तेजी से बदलता-बनता-ठनता है। मूलतः अभिरुचि और फैशन में गुण-भेद कम तथा मात्रा-भेद अधिक होता है। अभिरुचि संपन्न आशंसकों में कारयित्री भावना भी हुआ करती है किंतु फैशन संपन्न आशंसक बहुत ज्यादा असर्जनात्मक, बहुत जल्दी प्रभावित हो जाने वाले हुआ करते हैं। अभिरुचि की तरह फैशन भी समाज के एक विशेष स्तर पर प्रभाव डालता है, किंतु यहां पर आशंसक भावात्मक अनुकर्त्ता अधिक होते हैं।"21
98 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 113
'फैशन' और अभिरुचि के अंतर को शिवकरण सिंह22 तथा रामकीर्ति शुक्ल23 भी स्पष्ट करते हैं। इनके अनुसार फैशन और अभिरुचि में जातिगत भेद न होकर परिमाणात्मक भेद है। फैशन 'टेपो' की दृष्टि से अभिरुचि से भिन्न है तथा सौंदर्य के क्षेत्र में घटित होने वाली घटताओं का व्यापक रूप से सामान्य स्तर पर प्रस्तुत करने का उपकम माना गया है। इसकी गति भी अभिरुचि से तीव्र है। यही कारण है कि नये फैशन के उपस्थित होते ही पुराने फैशन बेकार सिद्ध होते हैं जबकि अभिरुचि का परिवर्तन न तो इतनी तीव्रता से होता है और न ही उसे उतनी सरलता से ही देखा जा सकता है। फैशन और अभिरुचि में इन भेदों के होते हुए भी कभी-कभी अभिरुचि फैशन हो जाया करती है। जब एक ही प्रकार की रुचियों तथा अभिरुचियों वाले व्यक्ति एक असंघटित समूह के रूप में आदान-प्रदान करते हैं और उस तब्दीली का दायरा आशंसकों के आपसी अनुकरण पर आधारित होता है तब यह अनुकरणमूलक अभिरुचि फैशन हो जाया करती है।24 अभिरुचि और बुद्धि : अभिरुचि का बुद्धि से क्या संबंध है, इसका उल्लेख सुरेन्द्रनाथ त्रिपाठी करते हैं। इन दोनों शक्तियों के अंतसंबंध को देखते हुए वे लिखते हैं, "दोनों ही शक्तियों के संघटन और उनके मंतव्यों की स्पष्ट भिन्नता या विरोधा- भास के बावजूद उनमें वस्तुतः आपस में एक सौहारद है। अलग-अलग विचार करने पर, रुचि का धरातल मंजुल है, बुद्धि का कठोर; रुचि में सौंदर्य-निरीक्षण की क्षमता प्रधान रूप से स्वीकृत है और बुद्धि का आग्रह तथ्य दशन पर होता है। बुद्धि की शक्ति तर्क पर अवलंबित है और रुचि लावण्यमय, स्निग्ध लोक-आस्था और विश्वास पर टिकी होती है। बुद्धि अपनी सीमाओं के कारण जहां तक पहुंचकर रुक जाती है, रुचि वहां अपने ताने-बाने सहित उपस्थित हो एक ऐसा मधुमय वितान बुनती है जिसकी सत्यता सभी को स्वीकार होती है। इस प्रकार भिन्न आधारों पर खड़े होते हुए भी बुद्धि और रुचि एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं बल्कि आपस में सहयोगी हैं या किसी सीमा तक प्रतिस्पर्द्धी हैं, जिससे मैत्री का ही भाव टपकता है।"25 निष्कर्ष : अभिरुचि पर हिंदी के विभिन्न कला-चिंतकों के चिंतन को देखने के उपरांत हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि: 1. कलाकृति की उत्कृष्टता का निराकरण करने वाली महत्त्वपूर्ण शक्ति को अभिरुचि कहते हैं। 2. इसका आरंभ मानवसृष्टि के साथ हुआ। 3. व्युत्पत्ति की दृष्टि से अभिरुचि शब्द टेंजीर (Tangere) से निष्पन्न हुआ है। आरंभ में इसका अर्थ स्पर्श करना या छूना था। कालांतर में इसका अर्थ-विस्तार हुआ और यह आधुनिक अर्थ-संदर्भ से संबद्ध हुआ। 4. इसका मुख्य कार्य कलात्मक सानग्री को छानना तथा कलाकार और आशंसक के बीच में समन्वय तथा सह-अस्तित्व्र कायम करना है।
आशंसक और कलाकार का वृत्त /99
Page 114
- वैयक्तिक चेतना से संबंधित होने के साथ-साथ यह सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक आदि परिस्थितियों से भी प्रभावित होती है। 6. इसमें स्थायित्व नहीं होता है अर्थात् अभिरुचि के सार्वजनीन और सार्वभौम मानदंड नहीं होते हैं। 7. आशंसक की अभिरुचि सामान्य व्यक्ति की अभिरुचि से भिन्न होती है। 8. अभिरुचि और फैशन तथा अभिरुचि और बुद्धि में पर्याप्त अंतर है।
आशंसा एवं आलोचना जब किसी निश्चित शास्त्रीय अथवा अन्य प्रकार के साहित्यिक सिद्धांत अथवा कसौटी के आधार पर मूल्यांकन करने की अपेक्षा अभिरुचि और रसास्वादन की प्रवृत्ति के फलस्वरूप रचना की प्रशंसा अथवा पाठकों से उसका अनुमोदन करवाया जाये तो वह आशंसा कहलाती है।26 संस्कृत आचार्यों ने इसे काव्यानुशीलनाभ्यासजन्य माना है। रमेशकुंतल मेघ के अनुसार आशंसा 'अभिरुचियों की शिक्षा है।27 अभिरुचियों की शिक्षा से उनका तात्पर्य संस्कारों का प्रकाशन, अभ्यास और संवेगात्मक प्रशिक्षण है जो ग्राहिकाशविति और सूक्ष्मदृष्टि को अधिक उत्तम बनाते हैं। अतः आशंसा में अभिरुचि की जो शिक्षा होती है, वह हमें एक ओर तो परंपरा से संबद्ध करती है तथा हमारे संस्कारों को आलोकिता प्रदान करती है तो दूसरी ओर संस्कारजन्य क्षमता को कौशलयुक्त या दक्ष भी बनाती है। आशंसा अपने-आप में तभी परिपूर्ण होती है जब आशंसक में कलाकृति से सर्वांगीण तादात्म्य स्थापित करने की क्षमता का उन्मेष हो जाता है अर्थात् कलाकृति को समझने के उपरांत वह कलाकार के संवेगात्मक आवेश से भी एक भाव हो जाता है। इसके अतिरिक्त आशंसा के परिपूर्ण होने की दो और भी शर्ते हैं। पहली शर्त यह है कि आशंसित व्यक्ति अथवा कृति के स्वभाव, जीवन-दर्शन या मनोदशा से हमारा सान्निध्य हो तथा दूसरी, सामाजिक ढांचे में सापेक्ष स्थिरता हो। यहां पहली शर्त कलाकार और आशंसक के बीच विश्वासों की एकता-मतभेद तथा दूसरी 'युग की प्रमुख अभिरुचि' का हेतु है ।28 आशंसा के स्वरूप को पूर्णतः स्पष्ट करने के लिए तथा आलोचना से उसका पार्थक्य दिखलाने के लिए रमेशकुंतल मेघ आलोचना की भी प्रासंगिक चर्चा करते हैं। उनके अनुसार आलोचना में कलाकृति का ग्रहण, पहचान अनुभूतियों में तन्मय होने की योग्यता के साथ-साथ मूल्यांकन और दृष्टिकोण प्रदान करने का सामर्थ्य तथा उसके उपरांत विश्लेषण, सिद्धांत स्थापन आदि का सामर्थ्य भी शामिल होता है। इस रूप में वे आलोचक को कलाप्रेमी, मर्माभिभूत होने वाला, तार्किक, विश्लेषक, अपने क्षेत्र का अनुभवी, सौंदर्यात्मक परंपरा में पगा हुआ, भावयित्री प्रतिभा वाला तथा किसी विचारधारा या दार्शनिक दृष्टिकोण से जाने-अनजाने जुड़ा हुआ आदि गुणों से युक्त मानते हैं।29
100 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 115
आशंसक और आलोचक के उपर्युक्त गुणों को देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि आशंसा की अपेक्षा आलोचना में क्रमशः वैयक्तिक अभिरुचि की बजाय व्यक्ति निरपेक्ष निर्णय, तात्कालिक ऐंद्रियक बोधों के बजाय चिंतनमूलक मूल्यांकन, आत्म- दृष्टि के बजाय बाह्यदृष्टि तथा स्वतुष्टि के बजाय महत् के परिज्ञान का उत्तरोत्तर उन्मेष होता चलता है। आशंसा और आलोचना के अंतर को मानविकी पारिभाषिक कोश के साहित्य खंड में भी स्पष्ट किया गया है। इस कोश के अनुसार आशंसा नियमित साहित्या- लोचन अथवा मूल्यांकन की अपेक्षा अधिक सरस और सहृदयतापूर्ण होती है। उसमें रचना की दुर्बलताओं की अपेक्षा उसकी उपलब्धि को ही अन्य पाठकों तक पहुंचाने का प्रयत्न अधिक रहता है। इसके अतिरिक्त इन दोनों में एक अन्य अंतर यह भी है कि जहां शास्त्रीय अथवा सिद्धांतपरक आलोचना या मूल्यांकन के लिए आलोचक में बौद्धिकता, सजगता, ज्ञान और विश्लेषण-बुद्धि का होना अनिवार्य है, जो केवल अधिकारी व्यक्ति में ही हो सकती है, वहां आशंसा केवल अनुशीलन और अभिरुचि के बल पर कोई भी साहित्य-रसिक अथवा पाठक कर सकता है।30 आशंसा और आलोचना के इस पार्थक्य को देखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि आशंसक सही अर्थों में आलोचक का अगुआई होता है। रमेशकुंतल मेघ के शब्दों में वास्तव में आशंसा में शिक्षा के कांत संयोग की अगली श्रेणी ही विवेकयुक्त होकर आलोचना या निर्णय या मूल्यांकन में परिणत हो जाती है। इस वजह से आशंसक ही आलोचक हो जाता है और बिना आशंसक की अगुआई के आलोचना नहीं हो सकती।31 इसके साथ ही हम यह भी देखते हैं कि आशंसक जब आलोचक होकर कृति में नये सौंदर्यबोध या तथ्य या दिशा या व्यंजना का अन्वेषण करता है तब वह सर्जनात्मक भी हो जाता है। एक प्रकार से आशंसक अपनी असर्जनात्मक दशा की क्षतिपूर्ति आलोचक होकर कर लेता है। वहां एक साथ उसमें कवित्व, सहृदयत्व, तर्क तथा दर्शन चारों का मेल हो जाता है। इस रूप में वह कृति का न केवल रसास्वादन, विश्लेषण, अन्वेषण और मूल्यांकन ही करता बल्कि पुनसृ जन भी करता है। सारांशतः आशंसा की यह उदात्त अवस्था पुनसृ जनात्मक कहलाती है।
आशंसा एवं रचना सामान्यतः हम रचना उस कलाकृति को कहते हैं जो सर्जना का परिणाम होती है तथा आशंसा से अभिप्राय वह कार्य है जो रचना के सौंदर्य को अनवरित, विश्लेषित या विवेचित करता है। पहला व्यापार निर्माण प्रक्रिया लिये हुए है। इसमें कलाकार विशेष के अंतरंग का बहिरंग प्रकाशन होता है। दूसरा व्यापार रचता विशेष के बाह्याभ्यंतर तत्त्वों को आत्मसात करता हुआ अनुभूत सौंदर्य का निरूपण करता है। इन दोनों के अंतर्संबंध को लेकर हिंदी में रमेशकुंतल मेघ के अतिरिक्त अन्य किसी भी सौंदर्यतत्त्ववेत्ता ने विचार नहीं किया है। यद्यपि आशंसा और रचना के अंतसबंध का दायरा प्रेषणीयता से लेकर आशंसक और कलाकार का वृत्त /101
Page 116
सौंदर्यबोधानुभव तक काफी फैला हुआ है तथापि रमेशकुंतल मेघ ने इन्हें मुख्यतः कला- कार की कारयित्री तथा सहृदय अथवा आशंसक की भावयित्री शक्तियों से संबंधित मानते हुए इनमें निम्नलिखित अंतर्संबंध दर्शाये हैं।32 1. रचना और आशंसा क्रमशः कलाकार की कारयित्री तथा सहृदय अथवा आशंसक की भावयित्री शक्तियों से संबंधित एक कलातत्त्व की ही दो प्रकार की रचनाएं हैं। पहली कलाकार की मूल रचना कहलाती है तो दूसरी आशंसक द्वारा मानस में उस मूलरचना की पुनर्रचना (अनुकृति नहीं)। 2. कलाकार माध्यम, तकनीक, यंत्र और औजार आदि की मदद से कलाकृति को मू्त या प्रकट रूप में प्रस्तुत करता है और उसे इस रूप में रचना की तकनीकी बारीकियों से सक्रिय ढंग से उलभना पड़ता है, जबकि आशंसक को न तो किसी भौतिक कलाकृति को प्रस्तुत करना पड़ता है और न ही रचना की तकनीकी बारीकियों से सक्रिय ढंग से ही उलभना पड़ता है। इस प्रकार कलाकृति की सृजन-प्रक्रिया में कलाकार की सृजनशक्ति का जो व्यय, अपव्यय या अतिव्यय होता है उसे आशंसक सुरक्षित, अव्यवहृत या अनजाना रखता है। जिसका परिणाम यह होता है कि आशंसक कभी भी कलाकार के मूल भाव या विचार तथा तदनुरूप सृजनात्मक 'प्रक्रिया' को पुनरुत्पादित नहीं कर सकता क्योंकि वह तो 'अंतिम तैयार की हुई कलाकृति' को आधार बनाता है। उसे भाव या विचार तथा माध्यम के बीच अन्योन्याश्रित प्रभावों तथा तकनीकी क्रियाओं की जटिलताओं का तो बिलकुल भी व्यावहारिक बोध नहीं होता। अतः वह स्रष्टा के अनुभवों का हू-ब-हू पुनरुत्पादन कर ही नहीं सकता। इस रूप में आशंसा और रचना एक नहीं हैं। 3. कलाकार जब कलाकृति का सृजन करता है तो उसमें उसके विचार, अनुभव, अनुभूति, विवेक तथा दार्शनिक सिद्धांत आदि अनुस्यूत होते हैं लेकिन एक आशंसक कलाकृति की पुनर्रचना नहीं करता, बल्कि कलाकार की परिपूर्ण कलाकृति ही उसके लिए माध्यम का काम करती है तथा इसके द्वारा वह कलाकार के विचार, अनुभव, अनुभूति, विवेक तथा दार्शनिक सिद्धांत आदि से हृदय संवाद करता है। 4. कलाकार और आशंसक दोनों ही दो खंडों में रचना करते हैं। कलाकार की रचना के दो खंडों में पहला मूल स्वयं प्रकाश्य, भावनात्मक तथा अर्मूत रचना है तथा दूसरा पहले खंड की भौतिक माध्यममूलक मूत पुनर्रचना। इसी प्रकार आशंसक के भी दो खंड हैं। पहला, मूर्त रचना का आशंसक के अनुसार बोध; तथा दूसरा, आशंसक के पहले खंड के अनुभव का कलाकार की स्वयं प्रकाश्य, भावात्मक तथा अमूतं रचना के अनुभवों के साथ तादात्मीकरण। इस तरह कलाकार की रचना के खंडों में एक अमूर्त है तथा दूसरा मूर्त जबकि आशंसक के दोनों ही खंड अमूर्त एव भावनात्मक (पहला अनुभवमूलक, दूसरा स्वयं प्रकाश्य) हैं जो कि कलाकार की भौतिक कलाकृति पर अनिवार्यतः आश्रित रहते हैं। एक कलाकार अपने सृजन के क्षणों में आशंसक के मस्तिष्क से प्रत्यक्ष रूप से कोई सरोकार नहीं रखता है जबकि आशंसक को मूल रूप से एवं प्रत्यक्ष तौर पर 102 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 117
कलाकार के मस्तिष्क से अपने मस्तिष्क का तादात्मीकरण करना ही पड़ता है। दूसरे शब्दों में आशंसक कलाकार के अनुरूप अपने मस्तिष्क का एवं अपने अनुरूप कलाकार के मस्तिष्क का ऐच्छिक रूपांतर करता है। लेकिन अपने इस ऐच्छिक रूपांतर से आशंसक न तो कलाकार को ही सीधे बदलता है और न ही कलाकृति को। वैसे वह इन दोनों को अधिक आलोकित अवश्य करता है। लेकिन यदि आशंसक और कलाकार दोनों ही समसामयिक हों तो युग की अभिरुचियों के निर्माता के रूप में आशंसक कलाकार तथा कलाकृति दोनों को ही बदलने में सफल होता है। निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि आशंसा निश्चय ही रचना पर निर्भर करती है; क्योंकि यही उसका विषय है और रचना भी उसके अभाव में न तो आत्म- निरीक्षण कर पाती है, न पुनः-पुनः परिशोधन और न ही नव्य परीक्षण। रचना आशंसा के विकास का पथ प्रशस्त करती है और आशंसा अधिकांशतः रचनाकार्य की गति- प्रेरक शक्ति सिद्ध होती है अतः यह दोनों ही परस्पर संबद्ध हैं; पर एक-दूसरे के अधीन नहीं।
कलाकार कलाकार को विभिन्न परिभाषाएं तथा कलाचिंतकों द्वारा अपेक्षित गुण सामान्यतः हम कलाकार उस व्यक्ति को कहते हैं जो कला का निर्माण करता है। इस रूप में वह स्रष्टा तो होता ही है लेकिन इसके साथ ही वह और भी कई गुणों की अपेक्षा रखता है जिनका उल्लेख हिंदी के कला मनीषियों ने समय-समय पर अपनी पुस्तकों तथा लेखों में किया है। 'विशाल-भारत' पत्रिका के कला अंक में शांतिप्रिय द्विवेदी लिखते हैं, "ईश्वर की इस चमत्कारमयी विशाल सृष्टि में क्या सत्य है, क्या कल्याणकर है, क्या सुंदर है-जब कोई सहृदय समीक्षक इस तथ्य को अधिक-से-अधिक सरस-सुबोध रूप में प्रदर्शित कर देता है, तब उसे एक सफन कलाकार का गौरव मिलता है।"33 'समालोचक' पत्रिका के सौंदर्यशास्त्र विशेषांक में भी एक कलाचिंतक "वलाकार प्रकृत्या सौंदर्यशिल्पी होकर भी सत्यं-शिव का उपासक और संवर्द्धक है, इसमें किंचित् मात्र भी संदेह नहीं है।"34 कहकर शांतिप्रिय द्विवेदी के उक्त मत का ही समर्थन करते हैं। इस मत का समर्थन रामचंद्र शुक्ल भी करते हैं। उन्होंने भी यह स्वीकार किया है कि कलाकार वही बन सकता है जो सत्यं-शिवं और सुंदर का ज्ञाता हो। उन्होंने लिखा है कि "कलाकार हम उसे कहते हैं जो कोई विलक्षण रचना करता है, जैसा सभी व्यक्ति नहीं करते, जैसे संगीत का कार्य, चित्र का कार्य, नृत्य का कार्य, मूर्नि का कार्य, काव्य का कार्य, साहित्य का कार्य इत्यादि। इतने से ही हम संतुष्ट नहीं होते और कलाकार का अर्थ हम और संकुचित करते हैं। उसी को कलाकार समभते हैं जो सत्यं-शिवं-सुंदरं का ज्ञाता होता है।"35 आशंसक और कलाकार का बृत्त / 103
Page 118
इस प्रकार इन तीनों परिभाषाओं में कलाचितक कलाकार से यह अपेक्षा रखते हैं कि वह सत्यं-शिवं-सुंदर, के ज्ञान से परिचित हो। कलाकार की एक अन्य परि- भाषा रामचंद्र शुक्ल यूं भी देते हैं : "जो ज्ञानी है, शिक्षित है, सामंजस्यपूर्ण व्यक्तित्व वाला है, जो रचना का कार्य करता है, वही कलाकार है।"36 कलाकार को इस रूप में परिभाषित करते हुए रामचंद्र शुक्ल उसमें इन गुणों का होना आवश्यक मानते हैं कि वह पूर्णतः शिक्षित हो, उसे बहुमुखी ज्ञान हो, उसका व्यक्तित्व सामंजस्यपूर्ण हो तथा उसमें मस्तिष्क, हृदय तथा कार्यकुशलता के सभी गुण मौजूद हों। 'सम्मेलन पत्रिका' के कला अंक में सूर्यनारायण व्यास, प्रकाशचंद्रगुप्त, ब्रजभूषण पांडेय तथा संपादक रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्री ने इस विषय पर चिंतन किया है। इनमें सूर्यनारायण व्यास ने कलाकार को 'तत्त्वान्वेषी, तत्त्वरचितक तथा तत्त्व- दर्शी और अगम्य का शोधक'37 तथा प्रकाशचंद्र गुप्त ने एक ऐसा व्यक्ति माना है जो केवल आत्माभिव्यक्ति करके ही संतुष्ट होना नहीं चाहता है, अपितु अपने अनुभव को समाज तक पहुंचाना भी आवश्यक समझता है। इस रूप में उसके सामने सबसे बड़ी समस्या साधारणीकरण की रहती है। इस समस्या को देखते हुए प्रकाशचंद्र गुप्त कला- कार से यह अपेक्षा रखते हैं कि वह हमेशा कला में ऐसे प्रयोगों का आदर करे जो उसकी अभिव्यक्ति को अधिक गहराई तथा अभिव्यक्ति के साधनों को नया बल प्रदान करे।38 राम प्रताप त्रिपाठी शास्त्री जो कि 'सम्मेलन पत्रिका' के कला-विशेषांक के संपादक हैं, संपादकीय में भारतीय कला की विशेषताओं को उद्घाटित करते हुए, कला- कार पर प्रासंगिक रूप से टिप्पणी करते हैं। उनके अनुसार, "कलाकार की यह विशेषता है कि वह केवल शारीरिक अनुरंजन को ही कला का विषय न मानकर सांस्कृतिक, मानसिक और बौद्धिक विकास का ध्यान रखकर कला का सर्जन करता है।"39 इसी अंक में ब्रजभूषण पांडेय अपने लेख 'कला : शिल्प : शैली' में कलाकार को सामान्य स्थिति से ऊपर का आदमी बतलाते हैं क्योंकि वह अपनी ही नहीं हमारी भी सही अभिव्यक्ति करता है। वह हमारा सही रूप कला में प्रस्तुत करके हमें मुग्ध कर देता है। इस प्रकार वह एक ऐसा आदमी साबित होता है जो दूसरों को गहराई से देखता है, गुनता है और अपनी कला में उसे उतारकर रख देता है। उसकी अनुभूतियां और भावनाएं सौंदर्य का सृजन करती हैं।40 जहां कुछ कलाचिंतक कलाकार के प्रति यह दृष्टिकोण रखते हैं कि कलाकार अपनी स्वतंत्र इच्छा-शक्ति से सृष्टि करने के लिए उन्मुख होता है, उसकी कला-सर्जना पर किसी प्रकार का बाहरी दबाव नहीं होता है अर्थात् उसकी कला-सर्जना का कारण उसकी स्वच्छंद प्रवृत्ति होती है;41 वहां कुछ कलाविचारक कलाकार पर सामाजिक दायित्व देखते हुए उसे अपने समाज का सही द्रष्टा मानते हैं। प्रभुदयाल मीतल का कलाकार के प्रति ऐसा ही दृष्टिकोण है। दे लिखते हैं, "सच्चा कलाकार स्रष्टा तो है ही किंतु वह अपने समकालीन समाज का द्रष्टा भी है। वह सामाजिक परिस्थितियों का 104 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 119
मूल्यांकन करने के उपरांत अपनी सर्जनात्मक अनुभूति द्वारा जिस कला की सृष्टि करता है, उससे समाज का परिष्कार होता है, और उसे सही दिशा का निर्देश मिलता है। यदि कोई कलाकार अपनी कृति द्वारा समाज को गलत दिशा की ओर मोड़ता है तो वह अपने दायित्व की गुरुता की ही अवहेलना नहीं करता, वरन बहुत बड़ा सामाजिक अपराध भी करता है। '42 'कला कला ही के लिए है' के नारे से असहमति प्रकट करते हुए ब्रजगोपाल तिवारी भी कलाकार का समाज व जनता से संपर्क रखना आवश्यक मानते हैं। "कला शून्य में नहीं टंगी रहती है। कलाकार का जीवन से, समाज व जनता से संपर्क रखना परमावश्यक है। आत्माभिव्यक्ति या आत्मप्रकाशन खोखले मस्तिष्क और उथले हृदय की पाशविक क्रिया का नाम नहीं है। कलाकार को वादों का अध्ययन करना चाहिए, लिखना, सीखना चाहिए तथा समाज के जीवन से संपर्क रखना ही नहीं, वरन समाज को अपनी रचनाओं का साझीदार भी, लोगों से मिलने-जुलने और उनसे परामर्श द्वारा बनाना चाहिए।"43 कलाकार के प्रति कुछ सीमा तक इन्हीं गुणों की अपेक्षा पाश्चात्य चिंतक आर० बी० कलिंगवुड ने भी की है। वे भी यह मानते हैं कि "कलाकार का अपने श्रोताओं से संबंध उसके कलाकार होने के लिए अत्यंत आवश्यक है।"44 जैसाकि आरंभ में हमने देखा है कि हिंदी के कुछ कलाचिंतक कलाकार को सत्यं-शिवं-सुंदर का ज्ञाता मानते हैं और इस रूप में वे चितक कलाकार से यह अपेक्षा रखते हैं कि वह अपनी कला में उन्हीं वस्तुओं को ले, जो जीवन का समर्थन करती हैं, जिनमें प्रकृत सौंदर्य है तथा जो समाज के लिए कल्याणकारी सिद्ध होती हैं। इस तरह वे कला का विषय उन शक्तियों को नहीं मानते हैं जो जीवन को कुंठित और उत्पीड़ित करती हैं। कलाकार के प्रति इस दृष्टिकोण को हिंदी के कुछ चिंतक स्वस्थ नहीं मानते हैं। उनके अनुसार कला में रूप-कुरूप जैसा कुछ भी नहीं होता है। अतः कलाकार का यह भी दायित्व होता है कि वह जीवन में जो कुंठित और उत्पीड़ित शक्तियां हैं तथा जो कुरूप और कुत्सित है उसे भी अपनी कला में अभिव्यक्त करे। लेकिन उनकी अभिव्यक्ति इस प्रकार से हो कि हम उनसे घृणा करें, उनका विरोध करें तथा जीवन का समर्थन करने वाली शक्तियों को बल प्रदान करें।45 का कलाकार के लक्ष्य की ओर इंगित करती हुई छायावादी कवयित्री महादेवी कहती हैं, "कलाकार का लक्ष्य जीवन की कुरूपता तथा सौंदर्य, दुर्बलता तथा शक्ति, पूर्णता और अपूर्णता सबकी सामंजस्यपूर्ण रागात्मक अभिव्यक्ति है और उसकी चरम सफलता जीवन तथा विश्व में छिपे हुए सत्य को सब और से स्पर्श कर लेने में निहित है।"46 कलाकार किन गुणों से युक्त होना चाहिए ? परोक्ष रूप में आचार्य हजारी- प्रसाद द्विवेदी47 तथा नीहाररंजन राय48 भी इस प्रश्न पर टिप्पणी करते हैं। कला का प्रयोजन स्पष्ट करते हुए ये दोनों कला-मनीषी उस व्यक्ति को कलाकार मानते हैं जिसकी कला मनुष्य के स्वत्व को सुसंस्कृत करने का कारगर साधन सिद्ध होती है, उसे पशु सामान्य धरातल से ऊपर उठाकर मनुष्यत्व के महान आसन पर बैठाती है। दूसरे
आशंसक और कलाकार का वृत्त / 105
Page 120
शब्दों में जिसके द्वारा मनुष्य अपनी इंद्रियों और संवेदनशक्ति, भावनाओं और संवेगों, विचारों और सिद्धांतों, तथ्यों और वस्तुओं, घटनाओं और स्थितियों आदि के प्रति अपनी बोधदृष्टि और अनुक्रियाओं को संयमित, पवित्र, तीक्ष्ण और परिष्कृत करता है। हरद्वारीलाल शर्मा कला-मीमांसा के लिए ऐतिहासिक दृष्टि को अनिवार्य मानते हुए कलाकार के लिए इतिहास का विशेष महत्त्व सिद्ध करते हैं। वे उन विचारकों को संकुचित मानते हैं जो कलासृजन को व्यक्तिगत घटना बतलाते हैं। वे लिखते हैं कि "कलाकार जिस अनुभूति को पार्थिव माध्यम के द्वारा सौंदर्य का वैभव और प्रभाव प्रदान करता है, उस अनुभूति का संबंध कलाकार के व्यक्तित्व से तो है ही, साथ ही, वह देश-काल-परिस्थितियों की भी उपज है। कलाकार का स्वयं व्यक्तित्व इनके द्वारा पूर्ण और परिपकव हुआ है। कलाकार अपने संवेदनशील स्वभाव, प्रखर चेतना और सृजनोन्मुखी प्रतिभा के बल से जनजीवन के तल में लहराती हुई युग-चेतना तक पहुंचता है और अपने व्यक्तित्व की गहराइयों में उसको पलने देता है। वह समाज और जीवन की दैनिक घटनाओं के ऊपरी रूप को न देखकर उनके मेल में अंतर्निहित चेतन और अर्द्धचेतन शक्तियों के क्रीड़ा-विलास को अपनी पैनी आंखों से देखता है। वह इतिहास के उस अंतराल में प्रवेश करता है जहां अनादि और अनंत चेतना और जीवन शक्ति घटनात्मक इतिहास का सृजन करती हुई विकास और विनाश, उत्थान और पतन, विस्तार और संकोच, जय और पराजय, शांति और युद्ध, निर्माण और ध्वंस की पद-गति से रुनभुन करती हुई, श्वासोच्छ्वास भरती हुई, सदैव अज्ञात की ओर बढ़ती चली जाती है। कलाकार इतिहास के इस महाप्राण के साथ श्वास लेता है, और विश्व-चेतना को अपनी चेतना बना लेता है। वस्तुतः कला-सृजन की घटना, जैसे ताजमहल का निर्माण, रामायण की रचना या मूर्ति चित्र राग या नृत्य आदि के आविष्कार इत्यादि इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाएं हैं।"49 इस तरह हिंदी के ये कला विचारक कलाकार के लिए इतिहास के महत्त्व को सिद्ध करते हुए इस बात पर बल देते हैं कि सही अर्थों में इतिहास ही कलाकार को प्रेरणा और भावों की सामग्री प्रदान करता है। इतना ही नहीं, वे यह भी मानते हैं कि इतिहास ही कलाकार को अभिव्यक्ति के लिए उपकरण, अवसर, मार्ग और साधन प्रदान करता है तथा उसके युग की सभ्यता उसकी कला को अपना संपूर्ण वैभव, कौशल का विकास, राजनीति के द्वारा सुरक्षा, संपन्न समाज का संरक्षण, जनता की रुचि, खनिजों और विविध यंत्रों का संग्रह, शिल्पों का विकास, बिक्री के लिए बाजार तथा और भी कई साधन उपलब्ध कराती है।50 कलाकार की उत्तमता के लिए कुछ विचारक कलाकार का साधक होना भी अनिवार्य मानते हैं। "अपनी कला को उचित रूप देने एवं उसका परिष्कार करने के लिए उसमें साधना का मंत्र-बल होना चाहिए, उसमें वह जादू होना चाहिए कि सारे संसार के हृदय में वह अपना स्थान बना सके। इसी साधना से उसकी विशिष्ट पद्धति का विकास होता है, उसकी शैली बनती है, उसकी रचना में कुशलता आती है।"51 106 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 121
रमेशकुंतल मेघ सतही ढंग से, कलाकार को 'कला निर्माण करने वाला विशिष्ट व्यक्तित्वपूर्ण भावक' कहते हैं52 लेकिन उसकी कला अथवा सर्जना का रूप किस प्रकार का हो, इसका उल्लेख वे नहीं करते हैं। एक अन्य चिंतक इस विषय में लिखते हैं कि "कलाकार प्रकाश डालता है ऐसी चीजों पर जो प्रायः अदृश्य होती हैं; ऐसी मनोवृत्तियों पर जो प्रायः विस्मृत होती है, ऐसे स्वर सामंजस्यों पर जिनका रसास्वादन कोई नहीं करता। इसीलिए कलाकार सर्जना करता है। वह अपने संसार का पुनः सर्जन करता है। वह अपनी प्रतिभा के द्वारा प्रकृति के विधानों को अविलंब समझ लेता है। इसलिए वह केवल बाह्य साम्य या फोटोग्राफी की यथातथ्यता तक सीमित नहीं रहता। वह अपनी कृतियों को सजीव बनाता है-प्रकृति का वास्तबिक प्रतिचित्रण करके नहीं अपितु आकृतियों और रंगों के सामंजस्य की गहराई में पैठकर और प्रकृति के अंतरतम तथा तास्विक रूप का साक्षात्कार करके।"53 रामरतन भटनागर के शब्दों में कलाकार समाज का ऐसा व्यक्ति सिद्ध होता है जो अपनी कला द्वारा हमारी बिवरी हुई जीवनानुभूति को सक्षम और तीव्र बनाने के साथ उसे और भी स्पष्ट करता है। "क्योंकि जीवन तथ्यमात्र है, गतिमात्र है, उसमें अपनी ओर से न कोई सार्थकता है, न उसे कोई निजी दिशा प्राप्त है। कलाकार बहिर्जगत की दुर्ग्राह्य अनेकरूपता और निरर्थक गतिशीलता को अंतरंगी रूप-रंग देकर महार्घ बनाता है। कवि चित्रकार और मूर्तिकार वस्तुओं को और कथाकार तथा नाटक- कार घटनाओं को अपनी अनुभूतियों में रंगकर ऐसी एकान्विति देता है कि उनका रूप ही बदल जाता है। विधाता की सृष्टि से होड़ करने वाला कलाकार वस्तुओं और घटनाओं को नयी वास्तविकता प्रदान करता है।"54 एक अन्य कला-विचारक के अनुसार, "कलाकार वह है जो भोगे हुए सौंदर्य को मर्मस्पर्शी ढंग से नवीनीकृत रूप में प्रस्तुत करने में समर्थ है। भागती हुई जिदगी की तड़पन और टूटती इकाइयों की बेबसी भोगते हुए भी वह उसे उसी रूप में नहीं रखता-अपनी कल्पना के बल पर उसका एक अन्य रूप बनाता है और फिर उस संवारे हुए रूप को अपने माध्यम से उतारता है।"55 इस प्रकार हम यह देखते हैं कि हिंदी कला-मनीषी तथा सौंदर्य-तत्त्ववेत्ताओं ने मुख्यतः प्रासंगिक रूप से ही कलाकार पर विभिन्न टिप्पणियों तथा कला-आलोचना के कम में भाष्य दिये हैं। यद्यपि उनके ये भाष्य पूरी तरह समृद्ध, सांगोपांग तथा क्रमबद्ध नहीं हैं तथापि इससे कलाकार तथा उसके गुणों पर पर्याप्त प्रकाश तो पड़ता ही है।
कला मीमांसा में कलाकार के अंतर्गत कवि की सर्वाधिक विवेचना होने का कारण कलाकार की परिभाषा तथा कलाचितकों द्वारा उसके अपेक्षित गुणों का उल्लेख करने के उपरांत, यह बात स्पष्ट रूप से हमारे सामने आती है कि हिंदी के अधिकतर कला- चिंतकों ने कलाकार के नाम पर केवल कवि पर ही सर्वाधिक चर्चा की है। ऐसा लगता
आशंसक और कलाकार का वुक्त /107
Page 122
है कि जिस प्रकार सभी कलाओं के आशंसकों के लिए 'सहृदय' शब्द ही रूढ़ हो गया है उसी प्रकार बहुत सीमा तक सभी कलाओं के निर्माता के लिए 'कवि' शब्द ही प्रयुक्त हुआ है। न केवल भारतीय अपितु पाश्चात्य कला मनीषियों ने भी कला-मीमांसा करते हुए कलाकार के अंतर्गत कवि की ही सर्वाधिक विवेचना की है। प्रश्न उठता है कि इस प्रकार कला-मीमांसा में कवि का सर्वाधिक उल्लेख होने का क्या कारण है ? हिंदी के किसी भी सौंदर्यतत्त्ववेत्ता ने इस प्रश्न का समाधान करने का प्रयास नहीं किया है। इतिहास के आलोक में कलाकार को आलोकित करते हुए केवल रमेशकुंतल मेघ ही इस प्रश्न का सही समाधान निकालते हैं।56 उनके अनुसार आदिम समाजों का मनुष्य अपनी स्वानुभूति का बहिर्गत यथार्थता में प्रक्षेपण करता रहा है, जिससे वह वातावरण को मानवीय तथा स्वयं को वातावरणात्मक बनाता था। बहिर्गत यथार्थता में वह अपनी स्वानुभूतियों को प्राकृतिक शक्तियों, जैसे-देवी- देवता, भूत-प्रेत, परियों-अप्सराओं के रूप में प्रक्षेपित करता था। मनुष्य की बहिर्गत यथार्थता अर्थात् प्रकृति में स्वानुभूति के प्रक्षेपण की यह प्रक्रिया ही जादू कहलाती थी जो एक विराट शक्ति थी तथा जिस पर वह अधिकार नहीं कर पाया। लेकिन इस पर विश्वास करके ही वह दुःसाध्य काम करता चला गया। इसी जादू ने मनुष्य के अंतर्मन में उसकी अनुभूतियों को पुनर्जाग्रत किया तथा यह जादू ही 'विज्ञान' और कला' दोनों का जनक हुआ। ज्यों-ज्यों आर्थिक उत्पादन का विकास तथा श्रम का बंटवारा होता गया, त्यो-त्यों यह जादू खंडित होता गया तथा मनुष्य के प्रकृति के साथ सीधे संबंध को प्रतिबिंबित करना बंद करता गया। ज्ञानात्मक संगठन में विभाजित अंश विज्ञान बना तथा भावात्मक संगठन में विभाजित अंश कला, नृत्य, नाटक आदि बना जो कि पहले-पहल जादू का परिवेश ही पहने हुए थे। श्रम के विभाजन और कृषि समाजों के विकास के साथ ही पुरोहित, योद्धा, व्यापारी तथा महासम्नाटों का अभ्युत्थान हुआ। आदिम समाज में पुरोहित अथवा कवि एक ही व्यक्ति था जो धार्मिक कर्मकांड की जुदाई शक्ति का उत्तराधिकारी तथा जाति के आदर्शों-विश्वासों का व्याख्याता बना। अपनी विशेषताओं के कारण वह मनीषी (वैज्ञानिक, चिंतक) परिभू (नियामक), स्वयंभू (लीलाकर्ता) तीनों ही था अर्थात पुरोहित, वैज्ञानिक, दार्शनिक और कवि एक ही व्यक्ति था जिनमें प्रधान कवि ही था। इसीलिए भारत के प्राचीन ऋषि कवि थे या कवि ऋषि। यही कारण था कि आरंभिक कलाचिंतकों ने जब भी कलाकार पर चर्चा की तो उसके लिए 'कवि' शब्द को ही उपयुक्त माना। उस समय कवि अन्य कलाओं के निर्माता के लिए भी प्रयुक्त होता था अतः समग्र कला मीमांसा में, चाहे वह भारतीय कलाशास्त्र हो अथवा पाश्चात्य, ऐसा होना स्वाभाविक था। कालांतर में संगीतकार, चित्रकार, शिल्पकार, वास्तुकार तथा नाटककार आदि ने अपनी-अपनी कलाओं के माध्यम के अनुशासन के कारण धीरे-धीरे विशेषज्ञता प्राप्त कर, अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाया है, जिससे अब उनका विवेचन कवि से अलग हटकर किया जाने लगा है।
108 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 123
कलारों के भेद-प्रभेद कलाकारों के नामकरण तथा भेद-प्रभेद करने का श्रेय भी हिंदी में रमेशकुंतल मेघ को ही जाता है। इनके अतिरिक्त अन्य किसी भी मनीषी ने इस विषय पर चर्चा नहीं की है। अपनी पुस्तक 'अथातो सौंदर्य जिज्ञासा' में वे कलाकारों के नामकरण तथा भेद- प्रभेद के तीन आधार स्पष्ट करते हैं। पहला आधार कलाओं, माध्यमों तथा उपकरणों का है, दूसरा मनोवैज्ञानिक तथा तीसरा सामाजिक और सांस्कृतिक आधार है।57 कलाओं, माध्यमों तथा उपकरणों के आधार पर कलाकारों को चार वर्गों में बांटा गया है। पहला महत्त्वपूर्ण वर्गीकरण विभिन्न कलाओं अथवा कलाकृति के आधार पर होता है; जैसे-कवि, संगीतकार, चित्रकार, सूर्तिकार, नर्तक आदि। दूसरा वर्गी- करण भौतिक माध्यम एवं पदार्थ के आधार पर होता है; जैसे-स्वर्णकार, लौहकार, कुंभकार, गायक तथा संगीतज्ञ आदि। तीसरा वर्गीकरण विशेष उपकरणों पर आधारित है, जिसमें तबलची, सितारवादक, कठपुतली के कलाकार आदि को लिया जाता है। चौथा वर्गीकरण तकनीक के आधार पर है जिसमें कलाकारों का शैलीगत-कौशलगत विभाजन हो सकता है। जैसे-बुनने, रंगने, छापने वाले कलाकार, उपन्यासकार, वेणुगीतिकार, मणिपुरी नर्तक, कथकली नर्तक आदि। उक्त चारों उपवर्गीकरण कलाक्र्कम पर आधारित हैं जो एक ओर तो सूजन प्रक्रिया की ओर संकेत करते हैं, दूसरी ओर कलाकारों तथा सामीप्य को स्पष्ट करते हैं, तीसरी ओर व्यक्तिगत एवं सामाजिक पक्षों का तकरीबन लोप करते हैं तथा अंत में यह साबित करते हैं कि कलाकार अपनी आंतरिक अनुभूति को बहिर्गत भौतिक कला- रूपों या भाव रूपों, दोनों में ही अभिव्यक्त किया करते हैं।58 दूसरा आधार मनोवैज्ञानिक है जो 'कुछ' विलक्षण कलाकारों के वर्गीकरण में सहायक है। यह आधार एक ओर तो कलाकार को असामान्य मनुष्य मानता है लेकिन दूसरी ओर उसके 'दैवी उन्माद' के मिथक को नष्ट करके उसे सामान्य मनुष्य तथा आशंसक की तरह प्रकट भी कर देता है। इस आधार की एक सीमा यह है कि यह सामाजिक तथा सांस्कृतिक पहलुओं को दूसरे दर्जे का महत्त्व देता है एवं सभी कलाओं माध्यमों, उपकरणों पर एक समान लागू होता है। मूलतः यह व्यक्तित्व पर आधारित है। इस आधार पर जुंग ने कलाकारों के दो भेद किये हैं जिनका उल्लेख रमेशकुंतल मेघ करते हैं: (1) अंतर्मुखी, जो बहुत जल्दी यथार्थ से पराङ्मुख होकर अपने मूल्यों तथा वैयक्तिक आत्मीकरण का बोध अपने अंतर में ही कर लेते हैं और (2) बहिर्मुखी, जो तात्कालिक वातावरण के परिवेश में अपने अनुभवों को मूल्यांकित करते हैं।59 कलाकारों के वर्गीकरण का तीसरा आधार सामाजिक और सांस्कृतिक है। यह आधार कला और कलाकार तथा समाज के अंतर्संबंधों के मार्क्सवादी विश्लेषण मूल्यों से संबंधित है। इसमें विभिन्न विचारधाराओं और सामाजिक परिस्थितियों से निसृत दर्शनों के आधार पर कलाकारों का वर्गीकरण होता है, जैसे-मार्क्सवादी, आशंसक और कलाकार का वृत्त /109
Page 124
गांधीवादी, अस्तित्ववादी, ईसाई, हिंदू, बौद्ध, जैन, क्लासिकल, रोमांटिक, पुराने, नये, समसामयिक, पुनरुत्थानवादी आदि।60 रमेशकुंतल मेघ द्वारा किये गये उक्त तीनों वर्गीकरण मंडलों में कलाकार के तीन प्रकार के बिंब मिलते हैं। इनमें से पहला वर्गीकरण मंडल पूर्णतः सौंदर्यबोधशास्त्र के निकट है, दूसरा शारीरिक गठन तथा अंतर्वृत्तियों से संबद्ध है तथा तीसरा पहले दो का आदान-प्रदान करता है। वस्तुतः इनमें एक ओर व्यक्तित्व का समाजीकरण मिलता है तथा दूसरी ओर संस्कृति का मनोवैज्ञानीकरण।
प्रतिभा प्रतिभा : व्युत्पत्तिपरक तथा कोशगत अर्थ : बुद्धि के तीन रूप माने गये हैं : (1) स्मृति, (2) मति और (3) प्रज्ञा। अतीत के विषय का स्मरण कराने वाली बुद्धि 'स्मृति' कहलाती है। वर्तमान का ज्ञान कराने वाली बुद्धि 'मति' है तथा अनागत का ज्ञान देने वाली बुद्धि 'प्रज्ञा' है। बुद्धि के ये तीनों रूप कवि अथवा कलाकार के उपकारक हैं। संस्कृत आचार्यों ने 'प्रतिभा' को इसी प्रज्ञा का एक विशेष प्रकार माना है।61 'प्रतिभा' शब्द की व्युत्पत्ति प्रति+भा-भावे अङ् के द्वारा निष्पन्न करते हुए वे इसका अर्थ बुद्धि या व्युत्पन्न बुद्धि से लेते हैं तथा इसी व्युत्पन्न बुद्धि को सृजन का उपजीव्य भी मानते हैं।62 इस शब्द की व्याख्या करते हुए नगेन्द्र लिखते हैं, 'प्रतिभा' में मूल शब्द है- 'भा', जिसका अर्थ है चमक या झकलक। 'प्रति' उपसर्ग के संयोग से प्रतिभा से अभिप्राय ऐसी ज्योति अथवा प्रकाश विशेष का हो जाता है जिसके द्वारा किसी वस्तु का रूप प्रतिभासित हो उठे।"63 'हिंदी साहित्य कोश' के अनुसार प्रतिभा 'मनुष्य की नवोन्मेषशालिनी'64 तथा 'मानविकी पारिभाषिक कोश' के अनुसार ऐसी श्रेष्ठतम मौलिक शक्ति है जो शिक्षा, अभ्यास आदि से सर्वथा भिन्न एक सहजशक्ति मानी जाती है।"65 'मानक हिंदी कोश'66, 'हिंदी शब्द सागर'67 तथा 'भारतीय साहित्य कोश'68 में भी इसे शाब्दिक अर्थ के रूप में प्रकाश, दीप्ति या चमक तथा लाक्षणिक अर्थ में ऐसी विलक्षण बौद्धिक शक्ति का समानार्थी कहा गया है जिसमें असाधारण तीव्रता या प्रखरता हो, और इसके फलस्वरूप मनुष्य अपनी कल्पना के द्वारा कला, विज्ञान, साहित्य आदि के क्षेत्रों में उच्चकोटि की बिलकुल नयी या मौलिक तथा रचनात्मक कृतियों को प्रस्तुत करने में समर्थ होता है। हिंदी सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं के अनुसार प्रतिभा: हिंदी में जिन चिंतकों ने इस विषय पर चर्चा की है, उनमें हरद्वारीलाल शर्मा, कांतिचंद्र पांडेय, शिवकरण सिंह, निमला जैन, रमेशकुंतल मेघ तथा भगीरथ दीक्षित आदि का नाम उल्लेखनीय है। रमेशकुंतल मेघ के अतिरिक्त इन सभी चितकों ने इस विषय पर कोई भौलिक चिंतन न करके मुख्यतः संस्कृत आचार्यों के विचारों की ही पुनरावृत्ति की है। इन्होंने प्रतिभा को शक्ति विशेष के रूप में पारिभाषित किया है।
110 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 125
हरद्वारीलाल शर्मा 'रचने की शक्ति' को प्रतिभा मानते हैं।69 कांतिचंद्र पांडेय के अनुसार किसी सौंदर्यात्मक पदार्थ के स्पष्ट अंतर्दर्शन करने वाली शक्ति को प्रतिभा कहा जाता है।70 प्रतिभा को सृजन-प्रक्रिया के अंतर्गत विवेचित करते हुए शिवकरण सिंह लिखते हैं, "कवि के अंतःकरण में कोई शक्ति है जो उसे काव्य करने की प्रेरणा देती है। इसी शक्ति को प्रतिभा कहा जाता है।"71 एक अन्य चिंतक के अनुसार, "यह इस प्रकार की शक्ति है जिससे पदार्थ या विषयों का बोध तथा प्रतिभास होता है।"72 भारतीय और पाश्चात्य मनीषियों के मतों को प्रस्तुत करते हुए निर्मला जैन ने प्रतिभा को सृजन-शक्ति के अंतर्गत विवेचित किया है। इनके अनुसार, "प्रतिभा वह प्रज्ञा है, जो नये-नये अर्थों का ज्ञान कराने के साथ ही नये-नये रूपों का निर्माण भी करती है।"73 रमेशकुंतल मेघ ने इस विषय पर मौलिक चिंतन करते हुए आरंभ में इसकी परिभाषा इस प्रकार दी है, "प्रतिभा व्यक्ति के हृदय और मस्तिष्क की जन्मजात तथा वातावरण अर्जित विशेष योग्यता है जो औसत से श्रेष्ठतर सामान्य से विलक्षण, मनो- देहिक और वैयक्तिकता के लक्षणों से युक्त है।"74 भारतीय साहित्य शास्त्र में प्रतिभा का विवेचन किस रूप में हुआ है, इसका उल्लेख भी रमेशकुंतल मेघ करते हैं। संस्कृत आचार्यों ने काव्य हेतु (अभ्यास, व्युत्पत्ति, प्रतिभा) के अंतर्गत इसका विवेचन करते हुए अन्य हेतुओं की अपेक्षा सर्वोपरि स्थान दिया है तथा इसके अभाव में काव्य-सृजन को उपहास योग्य माना है। कुछ आचार्य तो काव्य का कारण केवल प्रतिभा को ही मानते हैं (प्रतिभव केवला कविगता काव्य हेतुः)। रमेशकुंतल मेघ आचार्यों के इस दृष्टिकोण को सीमित मानते हुए, इस तथ्य का समर्थन तो अवश्य करते हैं कि प्रतिभा का स्थान सर्वोपरि है तथा व्युत्पत्ति और अभ्यास उसके सहकारी हेतु हैं, लेकिन वे इस बात को पूर्णतः नकारते हैं कि काव्य का कारण केवल प्रतिभा ही है। व्युत्पत्ति और अभ्यास को प्रतिभा के सहकारी हेतु सिद्ध करते हुए वे लिखते हैं, "प्रतिभा को सर्वोच्च पद देना तो सही है क्योंकि वह आंतरिक संस्कार मूलक है तथा व्युत्पत्ति और अभ्यास बाह्य अथवा संस्कार परिष्कारमूलक हैं। प्रतिभा कला- कारों को स्वयं उनके सम्मुख उद्घाटित करती है, तो व्युत्पत्ति और अभ्यास 'कलात्मक प्रतिभा' को हम अपने सम्मुख उद्घाटित करते हैं। इस प्रकार प्रतिभा कलाकार की अपूर्व योग्यता का संस्कार है और आंतरिक है। व्युत्पत्ति और अभ्यास कलाकार की प्रतिभा में बाद में जुड़ने वाले प्रतिभासंवर्धक हेतु हैं तथा बाह्य हैं जो क्रमशः सांस्कृतिक संचित कोश या साहित्यिक विरासत और तकनीकी कौशल या महत अनुकरण का आधान करते हैं। प्रतिभा संबंधी ऐसा ही दृष्टिकोण भगीरथ दीक्षित का भी है। अपनी पुस्तक 'अभिनव साहित्य चिंतन' में प्रतिभा को मूल हेतु तथा व्युत्पत्ति और अभ्यास को सहकारी हेतु सिद्ध करते हुए वे भी संस्कृत आचार्यों के इस मत से असहमति प्रकट करते हैं कि "काव्य का कारण केवल प्रतिभा ही है।"75 प्रतिभा पर कलाचिंतकों के उक्त विचारों को देखने के उपरांत अंततोगत्वा आशंसक और कलाकार का वृत्त /111
Page 126
रमेशकुंतल मेघ की यह परिभाषा मान्य है कि "प्रतिभा हृदय और मस्तिष्क का वह संयुक्त तथा विशिष्ट संस्कारमूलक रूपांतर है जो व्युत्पत्ति एवं अभ्यास से पोषित होता हुआ प्रज्ञारूप में गतिमान, व्यापारमान तथा आवेशयुक्त होता है। यह प्रज्ञारूप व्यक्तित्व की असाधारणता, प्रेरणा और कलपना की अतिशयता तथा निपुणता एवं अनुसंधान की नवीनतादि के प्रकाशन व स्फुरण को आयत्त करता है।"76 प्रतिभा के कार्य : 'हिंदी साहित्य कोश' में प्रतिभा को नवोत्वेषशालिनी शक्ति मानते हुए इसके कार्यों का स्पष्टीकरण भी किया गया है। "प्रतिभा का कार्य ससीम के द्वारा असीम की, परिमित और प्रत्यक्ष के द्वारा अपरिमित और परोक्ष की तथा ज्ञेय के द्वारा अज्ञेय की अभिव्यक्ति करना है। अलौकिक और आनंदमयी अभिव्यंजना प्रतिभा का मुख्य कार्य है। कला में सुंदर वस्तु किसी बाह्य पदार्थ की प्रतिच्छाया नहीं होती, अपितु यह कलाकार के मानसिक और आध्यात्मिक अनुभवों की आवश्यकताओं को, उसके जीवन की वेदना, शालीनता, गंभीरता तथा उसकी कल्पना के स्वातंत्र्य, शक्ति और उज्ज्वलता को अनुभव में आने वाले साधारण उपकरणों द्वारा अभिव्यक्त करती है। 'अनुभूति' को 'पार्थिव', 'आध्यात्मिक' को 'भौतिक', 'आंतरिक' को 'बाह्य' रूा देना प्रतिभा का कर्त्तव्य है। प्रकृति ने शब्द, ध्वनि, रंग, रेखा, पत्थर, लकड़ी आदि अनेक द्रव्य प्रदान किये हैं, जिनकी आध्यात्मिकता प्रकट नहीं होती। प्रतिभा इन द्रव्यों को अपनी अनुभूति का माध्यम बनाती है, जिससे इन पदार्थों में दया, प्रेम, ओज, शालीनता, आत्मविजय, उल्लास, लज्जा आदि ही नहीं, वरन इससे भी अधिक गंभीर अनुभूतियां प्रत्यक्ष हो उठती हैं। इस प्रकार वह सौंदर्य-सृजन के क्षेत्र में 'आदि' से लेकर 'इति' तक की क्रियाएं संपन्न करती हैं।"77 कांतिचंद्र पांडेय ने प्रतिभा शक्ति के तीन कार्य स्पष्ट किये हैं : (1) आंशिक रूप से उस अस्थिर बने पर्दे को हटा देती है जो उपचेतनांश से चेतनांश को विलग करता है, (2) उपचेतनांश से चेतनांश में आये हुए विचारों को प्रत्यक्षी-क्रियमाण वस्तु से सम्मिलित करती है, एवं (3) इस प्रकार से रचित मानसिक प्रतिच्छाया को बुद्धि विरचित पृष्ठभूमि से संबंधित करते हुए कल्पना के लोक का सृजन करती है।"78 एक अन्य कलाचिंतक ने प्रतिभा के चार प्रमुख कार्यों का स्पष्टीकरण किया है: 1. प्रतिभा से पदार्थों का प्रत्यक्षीकरण किया जाता है। 2. प्रतिभा के द्वारा पदार्थों का नवीकरण किया जाता है। इसके द्वारा वस्तुओं पर ऐसे गुणों का आरोप कर दिया जाता है जो उन वस्तुओं के स्वाभाविक गुण नहीं होते हैं। 3. प्रतिभा से कलाकार में भावलीन होने तथा सौंदर्यानुभूति की क्षमता आती है। 4. प्रतिभा के द्वारा अभिव्यंजना-कौशल की सिद्धि होती है।79 यद्यपि इन कलाचितकों के अतिरिक्त हिंदी के अन्य चिंतकों ने इस विषय पर स्वतंत्र रूप से चिंतन नहीं किया है तथापि उनकी परिभाषाओं से प्रतिभा के उक्त कार्यों का संकेत अवश्य मिल जाता है। 112 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 127
प्रतिभा की प्रकृति के सिद्धांत : प्रतिभा की प्रकृति के संबंध में कई सिद्धांत प्रचलित हैं। जहां कुछ विचारक इसे कुछ विशेष कलाकारों की ही विरासत मानते हैं, वहां अन्य चिंतक इसकी क्षमता संपूर्ण मानव जाति में देखते हैं। कुछ चिंतक इसे पूर्वजन्म के संस्कार या पुण्यकर्मों की देन मानते हैं तो कुछ इसका उद्गम शारीरिक रसायन में निहित समझते हैं। इसके अतिरिक्त मनोवैज्ञानिकों की यह धारणा है कि प्रतिभा के मूल में तीव्र प्रेरक हैं जो अवचेतना से उभरकर और उदात्तीकरण के भीने चेतन पर्दे से छनने के बाद निवैयक्तिक तथा सृजनात्मक हो जाते हैं। इस प्रकार प्रतिभा की प्रकृति के कई सिद्धांत प्रचलित हैं, जिनका उल्लेख हिंदी में केवल रमेशकुंतल मेघ ने ही किया है। यद्यपि उन्होंने प्रतिभा की प्रकृति के सिद्धांतों का वर्गीकरण करने का स्वयं कोई प्रयास नहीं किया है तथापि उन्होंने एने अनास्तासी द्वारा किये वर्गीकरण का उल्लेख करते हुए अपने मौलिक चिंतन का परिचय अवश्य दिया है।80 एने अना- स्तासी ने प्रतिभा की प्रकृति के सिद्धांतों की चार कोटियां निर्धारित की हैं : 1. मात्रात्मक श्रेष्ठता के सिद्धांत। 2. गुणात्मक श्रेष्ठता के सिद्धांत । 3. रोग निदान शास्त्रीय सिद्धांत। 4. मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत। इनमें से भारतीय प्रतिभा मीमांसा पहले दो सिद्धांतों पर तथा पाश्चात्य प्रतिभा मीमांसा अंतिम दो सिद्धांतों पर आधृत है। 1. मात्रात्मक श्रष्ठता के सिद्धांत : मात्रात्मक श्रेष्ठता के सिद्धांत के अनुसार प्रतिभा केवल कुछ कलाकारों की ही विरासत न होकर संपूर्ण मानव-जाति की क्षमता है। कलाकारों में इस योग्यता का वितरण बहुधा निरंतर और अधिक और ऊंचे स्तर पर होता है। यह सिद्धांत एक कलाकार, एक तार्किक और एक वैज्ञानिक के बीच में अंतर तो स्पष्ट नहीं कर पाता है, लेकिन व्यापक रूप में यह अवश्य प्रतिपादित कर देता है कि कलाकार कोई विशेष टाइप के मनुष्य नहीं हैं, अपितु उनमें मर्मबोध तथा अभि- व्यंजना की योग्यता एक साधारण मनुष्य की अपेक्षा अधिक होती है, जिससे वे गहरी छाप वाले अनुभवों को प्रकट कर देते हैं। जबकि साधारण मनुष्य अपने अनुभवों को वैयक्तिक आसक्ति से अलग नहीं कर पाते तथा दूसरी ओर उनका 90% भाग सुव्य- वस्थित न कर सकने के कारण प्रशमित कर देते हैं। कलाकार एक ओर तो वैयक्तिक आसक्ति से स्वयं को असंपृक्त कर लेते हैं तथा दूसरी ओर अनुभवों की राशि को व्यवस्थित करके अभिव्यक्त कर सकते हैं। 2. गुणात्मक श्रष्ठता के सिद्धांत-प्रतिभा के गुणात्मक श्रेष्ठता के सिद्धांत के अनुसार मनुष्य को विशेष योग्यता के आधार पर शेष मानव जाति से पृथक माना जाता है। इन सिद्धांतों में प्रतिभा की उपलब्धियां जिन ढंगों से हासिल होती हैं वे साधारण लोगों में पूरी तरह से गायब हैं। यहां कलाकार की प्रतिभा किसी हीन भावना की पूर्ति नहीं अपितु किसी 'स्फुल्लिंग' का परिणाम है। भारतीय कला मनीषी इसे पूर्वजन्म के संस्कार अथवा पुण्यकर्मों की देन मानते हैं। एक चिंतक के अनुसार,
आशंसक और कलाकार का वृत्त /113
Page 128
"प्रतिभा में पूर्वजन्म के संस्कारों को मान्यता देना इसलिए आवश्यक है कि कतिपय ऐसे भी कवि हुए हैं जो इस जन्म में अंधे थे परंतु उन्होंने काव्य में नेत्रवान व्यक्तियों की भांति पदार्थों का प्रत्यक्षात्मक वर्णन किया।"81 कालांतर में धार्मिक सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं तथा रोमांटिक सौंदर्यशास्त्रियों ने कलाकार की गुणात्मक श्रेष्ठता का ही यशोगान किया है। इस प्रकार गुणात्मक श्रेष्ठता के सिद्धांतों में संस्कार तथा वंशानुक्र्म पर बल दिया जाता है जबकि मात्रात्मक श्रेष्ठता के सिद्धांतों में 'व्युत्पत्ति' या 'अनुशीलन' या 'अध्ययन' तथा 'अभ्यास' पर भी बल दिया जाता है। इसके अतिरिक्त इन दोनों सिद्धांतों में एक अंतर यह भी है कि जहां मात्रात्मक श्रेष्ठता के सिद्धांतों में कलाकार को ईश्वरदूत का प्रतिनिधि माना गया है वहां दूसरे सिद्धांतों में उसे कोमलकांत कल्पना का प्रेमल फरिश्ता बना दिया गया है। साथ ही इसमें कलाकार की सृजनात्मक योग्यता के विश्लेषण की गंभीर चेष्टाएं भी नहीं हो पायी हैं। यदि कहीं हुई भी हैं तो उन्हें दैवी प्रेरणा, विलक्षण अद्वितीयता तथा अलौकिकतादि से सटा दिया गया है। उक्त दो कोटियों के अतिरिक्त रमेशकुंतल मेघ 'रोगनिदान शास्त्रीय सिद्धांतों' तथा 'मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांतों' का भी उल्लेख करते हैं। रोगनिदानशास्त्रीय सिद्धांतों को मानने वाले चिंतक प्रतिभा को उन्माद या शारीरिक लांछन से संबद्ध मानते हैं तथा मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांतों को मानने वाले बौद्धिक घटकों की अपेक्षा प्रेरकतामूलक वैशिष्ट्यों पर जोर देते हैं। चूंकि सिद्धांतों की यह दोनों कोटियां पाश्चात्य प्रतिभा मीमांसा से संबंधित हैं इसलिए यहां इनका उल्लेख अधिक विस्तार से करना उचित नहीं समझा गया है। यद्यपि भारत में प्रतिभा संबंधी दार्शनिक आख्यानों के कारण इस तरह का विवेचन नहीं हुआ है तथापि रमेशकुंतल मेघ के शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि "कालांतर की प्रतिभा और शक्ति, प्रेरणा और मर्मबोध आदि के उद्गम इन सिद्धांतों में भी निहित हैं। इस प्रकार से प्रतिभा में शक्ति और अभ्यास का भी संयोग होता है। उसके निर्धारण में उत्तेजना और प्रतिक्रिया के साथ-साथ परिस्थिति और प्रेरणा का भी महत्त्व होता है। यह सारा सामान्य मनुष्यों के व्यक्तित्वों में भी होता है तथा कलाकारों जैसा ही होता है, लेकिन कलाकार उन्हें सुव्यवस्थित तथा निवैयक्तिक ढंग से अपनी कला में अभिव्यक्त करने में पूर्णतः समर्थ होते हैं जबकि सामान्य मनुष्य ऐसा नहीं कर पाते।"82
प्रेरणा "केवल प्रतिभा का होना ही मनुष्य को कलाकार बनाने के लिए काफी नहीं है। प्रतिभा का मूल-प्रवृत्ति से तीव्र संवेग में ऊर्जस्वन, चेतन में सामग्री की भीड़, तथा दिशोन्मुखता अर्थात प्रेरणावयव ही उसे एक दूसरी दशा-अलौकिकदशा या रसदशा या सौंदर्यात्मक उन्मेष में प्रतिष्ठित करती है।"83 इस तरह कलाकार के लिए प्रेरणा का भी उतना ही महत्त्व है जितना कि प्रतिभा का। यदि कलाकार में प्रेरणा का अभाव है तो बड़ा तथा 114 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 129
प्रतिभाशालो और छोटे से छोटा सर्वसाधारण व्यक्ति भी श्रेष्ठ या सामान्य कृति नहीं दे पाता है। रमेश कुंतल मेघ के अनुसार : "प्रेरणा एक ओर तो प्रतिभा का संवेगात्मक चरमोत्कर्ष एवं दिशा-निर्देश है, तो दूसरी ओर अलौकिक, सौंदर्यबोधात्मक या रसात्मक दशा की अग्रदूती।"84 एक अन्य कलाचितक तो कला में प्रेरणा के महत्त्व को देखते हुए यहां तक लिखते हैं, "जब तक कलाकार में अंतः प्रेरणा नहीं जागती, तब तक वह सजीव कला- कृति नहीं प्रस्तुत कर पाता।"85 कलाकार की रचना चाहे शब्दों में हो या संगीतात्मक ध्वनियों में, चाहे रंगों और रेखाओं में हो या स्थापत्य में, उससे कलाकार के अंतर्जगत् का निकटतम संबंध रहता है। प्रत्येक कविता, गीत, चित्र या मूर्ति का उद्गम कलाकार के मानस से होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। वे चिंतक, जो कला को तो दैवी शक्तियों या सामाजिक शक्तियों द्वारा उद्भूत मानते रहे हैं, वे भी इतना तो मानते ही हैं कि ये शक्तियां भी मनुष्य के अंतर्जगत् में संस्कार या अवतरण या अन्य किसी रूप में पहले प्रतिष्ठित होती हैं और तभी उसकी रचना-प्रक्रिया को प्रभावित कर पाती हैं और कलाकार के अंतर्जगत् में घटित होने वाली इस रचना-प्रक्रिया का मूल अंतःप्रेरणा है। इस अंतःप्रेरणा का मूल स्रोत और प्रकृति इतनी जटिल और गूढ़ है कि आदि- काल से अधिकांश विचारक इसके विश्लेषण से बचते ही आये हैं। आदिकाल और मध्यकाल में समस्त कलाचिंतक इस प्रेरणा को दैवी स्तरों से संबद्ध करते हैं। वे मानते हैं कि सरस्वती या कोई भी अन्य बुद्धि या कला का देवता मनुष्यों के हृदय में अपनी एक किरण प्रेरणा के रूप में उद्भासित कर देता है और उस समय कलाकृति की सर्जना करने वाला कलाकार मात्र माध्यम बनकर रह जाता है। शैवों की यह कल्पना है कि समस्त शब्द और ध्वनियां अंततोगत्वा शिव के डमरू से उत्पन्न हुई हैं, तांत्रिकों की यह कल्पना है कि समस्त अक्षर बीजाक्षर हैं और दैवी शक्तियों से संपन्न हैं, इसी तरह वैष्णवों की कल्पना है कि प्रभु की लीला का गायन करने वाला प्रत्येक कवि किसी-न-किसी अंश में उनकी वंशी का अवतार है जिसमें फूंक या अंतःप्रेरणा दैवी शक्ति से जाग्रत होती है।86 भारतीय मनीषियों की भांति प्लेटो, डिमोक्रीट्स, लांजाइनस आदि पाश्चात्य मनीषी भी दैवी प्रेरणा का उल्लेख करते हैं। वे मस्तिष्क की सम्मोहक दशा, देवताओं की चुंबकीय शक्ति, दैवीतत्त्व के उफान, दैवी प्रभाववश महान कविताओं और वेणु- गीतियों का उवाच, महान आत्माओं की शक्ति आदि के जरिये प्रेरणा की व्याख्या करते हैं।87 हिंदी कलाचितकों में रमेश कुंतल मेघ प्रेरणा पर स्वतंत्र रूप से चर्चा करते हुए, इसे पूर्णतः एक मानवीय करिया मानते हैं, तथा उन भारतीय एवं पाश्चात्य मनीषियों से असहमति प्रकट करते हैं जो इसे दैवी स्तरों से संबद्ध मानते हैं। उनके शब्दों में : "प्रेरणा उतनी कला से नहीं, जितनी कि व्यक्ति की संचित ऊर्जा, प्रवाही ऊर्जा एवं संगृहीत ऊर्जा से साक्षात होती है। अतएव यह एक मानवीय सामर्थ्य है और वैयक्तिक आशंसक और कलाकार का वृत्त /115
Page 130
क्षमता के अनुकूल सामर्थ्य भी। यह 'देवताओं की प्रेरणा' (प्लेटो), 'अविवेकशील स्रोत' (फ्रायड), 'दवीतत्त्व का उफान' (डिमोकीट्स), 'देवताओं के प्रसाद' (पंडितराज जगन्नाथ), 'पुण्यजन्मों का फल' (अभिनवगुप्त) आदि नहीं हैं। ये पुराने सौंदर्यवेत्ताओं की शब्दावलियां हैं।"88 यद्यपि दैवी प्रेरणा से संबद्ध उक्त सभी कथन सर्वमान्य नहीं हैं तथापि इतना तो स्वतः कलाकारों की साक्षी से ज्ञात है कि उनकी अंतःप्रेरणा मन के सचेत स्तरों की अपेक्षा उनके अवचेतन या अचेतन स्तरों पर जाग्रत होती है। अकसर वे अपने व्याव- हारिक जीवन के किसी अत्यंत शुष्क नीरस व्यापार में संलग्न रहते हैं, पर उनके मन के गहन स्तरों में कुछ और ही घटित होता रहता है, और जब उसका विस्फोट होता है, तब उनका सचेत मानस विवश हो जाता है। उनके हाथ से जैसे भाव प्रत्रिया के सत्र छूट जाते हैं और जैसे स्वतःप्रेरित कलाकृति उनकी समस्त कल्पना, बुद्धि, ज्ञान को सहायक उपादान बनाकर अपने को अभिव्यक्त कर डालती है और उस समय कला- कार का बाह्य व्यक्तित्व इतना विवश हो जाता है जैसा डी० एच० लारेंस ने अपनी कृतियों के बारे में कहा, "घटनाओं की तरह कृति भी घटिन हो जाती है और मैं खड़ा देखता रह जाता हूं।"89 इसी बात का समर्थन अरविंद भी करते हैं। उन्होंने अंतःप्रेरणा की कार्य- प्रणाली को रहस्यमय मानते हुए लिखा है : "अंतःप्रेरणा बहुत अनिश्चित चीज है। इस विषय में उन्होंने स्वयं अपने अनुभव को व्यवत किया है : "मैं मन के ऊपर से अंतः- प्रेरणा प्राप्त करता हूं तथा अनायास ही मस्तिष्क के श्रम के बिना परिवर्तन और शुद्धियां भी प्राप्त करता हूं। यदि मैं सौ बार भी कविता में परिवर्तन करूं तो उसमें मस्तिष्क की सक्रियता नहीं होती, वह तो केवल प्राप्त करता है। मेरी कविताएं एक निर्भर की तरह प्रथम पंक्ति से अंतिम शब्द तक आती हैं'।"90 इस तरह जहां रमेशकुंतल मेघ प्रेरणा को एक पूर्णतः मानवीय क्रिया समभते हैं, वहां धर्मवीर भारती तथा अरविंद इसे कुछ सीमा तक मानवीय पकड़ से बाहर की क्रिया सिद्ध करते हैं। आधुनिक काल में जिन विशिष्ट विचारधाराओं ने कला की प्रकृति का व्यापक पृष्ठभूमि में समभने का प्रयास किया तथा जिनसे आधुनिक कला सबसे अधिक प्रभा- वित और प्रेरित हुई है उनमें मार्क्सवाद तथा फ्रायड का मनोविश्लेषण सिद्धांत सबसे प्रमुख माना गया है।91 मार्क्स ने कलाकार की समाजसापेक्ष स्थिति पर और कलाकृति की सामाजिक उपयोगिता पर अधिक बल दिया तथा अपने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के आधार पर इस ओर विशेष रूप से इंगित किया कि कला-सृजन सामाजिक शक्तियों से प्रभावित होता है। जहां तक फ्रायड का प्रश्न है उसने इस तथ्य पर अधिक बल दिया कि मनुष्य का अवचेतन जगत् उसकी दमित इच्छाओं का सुरक्षित कोष है, जहां से वे अज्ञात रूप में, छिपकर मनुष्य के समस्त व्यवहारों को तथा उसके सृजन को प्रभावित करता है। फ्रायड ने अंतर्जगत् में दमित आकांक्षाओं के कारण बनी हुई ग्रंथियों से कलाकार की 116 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 131
अंतःप्रेरणा का संबंध जोड़ा। उनके अनुसार कलाकार का अंतर्जगत् अपनी शक्ति के द्वारा भावनाओं की अभिव्यक्ति ऐसे नये प्रतीकों द्वारा करता है जिससे मूल दमित वासनाओ से संबद्ध रूपाकृतियां व्यंजित भी हो जाती हैं तथा छिप भी जाती हैं। इस प्रकार फ्रायड ने कलाकार अयवा सृजनकार को मूलतः एक रुग्ण मानस वाला व्यक्ति तथा उसकी कला की प्रेरणा का कारण अचेतन मन की ग्रंथियों को माना। चूंकि मार्क्स और फ्रायड का दृष्टिकोण कलारसिकों का दृष्टिकोण नहीं था इसलिए हिंदी के जो कलाविचारक इनसे प्रभावित रहे हैं तथा इन्हीं के अनुसार कला की प्रेरणा सिद्ध करते हैं; धर्मवीर भारती के शब्दों में, "उनके विश्लेषण में कला की अंतःप्रेरणा की व्याख्या कई दिशाओं में एकांगी हो गयी है।"92
कल्पना वस्तुजगत् के ही मात्र आधार से कला सृष्टि नहीं होती, अपितु इसमें बहुत कुछ जोड़ना और घटाना भी पड़ता है। कला में कलाकार का अपनी ओर से यह जोड़ना और घटाना ही कल्पना है। इस रूप में कल्पना कलाकार की सर्जनात्मक शक्ति सिद्ध होती है। अर्थात् कला में कल्पना ही वह शक्ति है, जिसके आधार पर कलाकार अपनी नवीन सृष्टि को रूप प्रदान करता है। कल्पना में वस्तुजगत् और प्रकृति के स्वाभाविक रूप में मनुष्य के अपने भाव-विचार, अपने दोष-गुण आरोपित करने की क्षमता होती है। इसके बिना कला में वस्तुजगत अपने सही और मूल रूप में नहीं आता है। अतः किसी भी कलाकार के लिए कल्पना का अत्यधिक महत्त्व सिद्ध होता है। हिंदी के लगभग सभी कलाचिंतकों ने कला-मीमांसा करते हुए इस विषय पर चर्चा की है। इसके महत्त्व को देखते हुए हरद्वारीलाल शर्मा3 ने इसे 'कला का प्रधान साधन', कुमार विमल94, सुरेशचंद्र त्यागी9 तथा रामलखन शुक्ल96 ने 'ललित कलाओं का एक प्रमुख तत्त्व', शिवकरण मिंह97 ने 'सृजन का प्रमुख उपस्कारक' तथा एस० टी० नरसिंहाचारी98 ने 'रूप और सौंदर्य का साधक तत्त्व' कहा है। कल्पना : व्यृत्पत्तिमूलक एवं कोशगत अर्थ: हिंदी के कला-विचारकों द्वारा 'कल्पना' शब्द का प्रयोग अंग्रजी के 'इमेजिनेशन' शब्द के समानार्थ किया गया है। अतः उन्होंने इसके सर्वांगीण महत्त्व को समझने के लिए 'इमेजिनेश' शब्द के मूल अर्थ को भी समझा है। 'भारतीय साहित्य कोश' में इसे 'इमेज' से 'इमेजिनेशन' का ही पर्याय माना गया है। 'इमेज' का अर्थ है- चित्र अथवा छवि। आधुनिक साहित्या- लोचन में इसके लिए 'बिब' शब्द का प्रयोग किया जाता है। अतः काव्य के संदर्भ में कल्पना का अर्थ हुआ सृष्टि अथवा रूप सृष्टि करने में समर्थ कवि को उद्भावन- शक्ति 199 कुमार विमल,100 सुरेशचंद्र त्यागी,101 तथा शिवकरण सिंह102 ने भी 'इमेजिनेशन' शब्द को 'इमेज' से निष्पन्न मानते हुए इसका शाब्दिक अर्थ 'सृष्टि करना' बतलाया है। रामलखन शुक्ल के अनुसार 'इमेजिनेशन' का कोशगत अर्थ है, "वह मानसिक क्रिया जिससे उन बाह्य वस्तुओं के बिंब का निर्माण होता है जो इंद्रियों के सामने उपस्थित नहीं रहतीं; मस्तिष्क की रचनात्मक शक्ति।"103
m आशंसक और कलाकार का वृत्त / 117
Page 132
नगेन्द्र104, कुमार विमल,105 रमेशकुंतल मेघ,106 शिवकरण सिंह,107 रामनाथ 108 तथा सुरेशचंद्र त्यागी109 आदि विद्वानों ने हिंदी में, 'कल्पना' शब्द की व्युत्पत्ति 'क्लृप्'(+अन +आ) धातु से मानी है। इससे भी 'कल्पना' शब्द का व्युत्पत्ति- मूलक अर्थ-क्रिया का सामर्थ्य, प्रकारांतर से सृजन कला या सृष्टि करना ही सिद्ध होता है। हिंदी के विभिन्न कोशों110 में इस शब्द की जो व्याख्याएं तथा परिभाषाएं की गयी हैं वे इस प्रकार हैं- ० किसी वस्तु का बनाना, सजाना या रचना। ० वह क्रियात्मक मानसिक शक्ति, जिसके द्वारा मनुष्य अनोखी और नयी बातों या वस्तुओं की प्रतिमाएं या रूप-रेखाएं अपने मानस-पटल पर बनाकर उनकी अभिव्यक्ति काव्यों, चित्रों, प्रतिाभाओं आदि के रूप में अथवा और किसी प्रकार के मूर्तरूप में करता है। ० विगत प्रत्यक्ष ज्ञानात्मक अनुभवों (पास्ट पर्सोप्चुअल एक्सपीरिएंसेज) का बिबों और विचारों (इमेजेज एंड आइडियाज) के रूप में विचारणात्मक स्तर पर, रचनात्मक नियोजन। ० दृश्य-बिंबों की एकांगी एवं साहचर्यगत योजना प्रस्तुत करने की शक्ति। ० पूर्व-अनुभूतियों की पुनर्योजना से अपूर्व की अनुभूति उत्पन्न करने की क्रिया या शक्ति। ० क्षीरसागर, मलयागिरि, जंबूद्वीप, स्वर्ण-शृंग इत्यादि अननुभूत पदार्थों को बोधगम्य करने की शक्ति। ० अचेतन मानस की अव्यवस्थित अनुभूतियों का संकलन एवं व्याख्या करने की क्रिया। ० कलाकार द्वारा कथावस्तु एवं पात्रों के तादात्म्य स्थापित करने की शक्ति। • रहस्यवादी सहानुभूति का काव्यपरक यथार्थ। ० कलाकार की सर्जनात्मक शक्ति। हिंदी कला-चिंतकों द्वारा कल्पना की परिभाषा तथा स्वरूप का स्पष्टीकरण : हिंदी में जिन विद्वानों ने कल्पना पर विस्तृत चिंतन किया है उनमें आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाम प्रमुख है। आचार्य शुक्ल हिंदी में कल्पना के आरंभिक विचारक कहलाते हैं। वे ऐसे एकमात्र चिंतक हैं जिन्होंने पाश्चात्य मनीषियों के विचारों का अनुगमन न करके शास्त्रीय दृष्टि तथा अपनी मौलिक प्रतिभा के योग से इस विषय का विवेचन किया। उन्होंने पश्चिम के चिंतन को ज्यों-का-त्यों नहीं रखा है, अपितु उन्हें पचाकर और समीकृत कर अपने मौलिक चिंतन के सहयोग से एक नया रूप दे दिया है। इनसे पूर्व श्यामसुंदरदास ने भी कल्पना पर विचार किया है, लेकिन उनके चिंतन में कल्पना के विचार-विश्लेषण के निमित्त कोई तात्त्विक निष्कर्ष नहीं निकलता है। उन्होंने लिखा
118 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 133
है, "विज्ञान में जो बुद्धि है, दर्शन में जो दृष्टि है, वही कविता में कल्पना है।"111 आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'रस-मीमांसा' में 'रसात्मक बोध' शीर्षक निबंध में तीन प्रकार के रूपविधान माने हैं जिनमें रसानुभूति होती है : (1) प्रत्यक्ष रूपविधान, (2) स्मृत रूपविधान, (3) संभावित या कल्पित रूपविधान। वे तीसरे प्रकार के रूप- विधान को पूर्णतः कल्पना का पर्याय मानते हैं क्योंकि यह हृदय की प्रेरणा से प्रवृत्त तथा हृदय पर प्रभाव डालने वाला है; विभाव पक्ष के अंतर्गत है तथा भाव-वयंजना के क्षेत्र में पूर्णतः स्व्रच्छंद रहता है।112 उनके अनुसार, 'तीनों प्रकार का रूपविधान मन के भीतर होता है, लेकिन केवल संभाविन या कल्पित रूपविधान ही भावों का सर्वदा रसदशा तक उद्दीपन करने में समर्थ है। 'नूतन सृष्टि' इसी की कृति है। यह हृदय की 'प्रेरणा' से निकली हुई, विभाव-पक्ष को पुष्ट करने वाली और मौलिक रूपायन करने वाली होती है। रमेश कुंतल मेध शुक्ल के इस कल्पना संबंधी चिंतन को देखते हुए मानते हैं कि आचार्य शुक्ल कल्पना को आद्योपांत यथार्थ (भूत और वर्तमान के भी) पर आश्रित मानते हैं जो वस्तुओं के नाना भांति के साहचर्यों-संबंधों को अंतर्मन में पुनर्गठित करके नवीन रचना करती है; जो एक व्यक्ति के जीवन-अनुभवों से लेकर एक समग्र राष्ट्र (इतिहास), एक विश्व मानवता (अनुमान) और एक व्यक्ति की रहस्यवत्ता (स्वयं प्रकाश्य) तक मन का विराट विस्तार करती है।"113 रामलाज सिंह भी आचार्य रामचंद्र शुक्ल के चितन को देखते हुए यही टिप्पणी देते हैं, "शुक्ल जी कल्पना का आधार लौकिक मानते हैं। इसीलिए उन्होंने कल्पना की लोकोत्तर, अलौकिक अथवा इलहामी व्याख्या का खंडन किया है।"114 कुमार विमल ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के कल्पना-विवेचन पर विस्तार से विचार करते हुए तथा उनकी कल्पना संबंधी मुख्य मान्यताओं को स्पष्ट करते हुए अंत में यह निष्कर्ष दिया है कि शुक्ल जी ने केवल कल्पना की सीमा-रेखाओं का निर्धारण और उसके सामान्य स्वरूप का ही विश्लेषण किया है। कल्पना के विभिन्न भेदों तथा प्रकारों का निर्धारण वे नहीं कर सके हैं। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि उन्होंने कल्पना पर केवल काव्य की दृष्टि से ही विचार कया है, संपूर्ण ललित कलाओं के विस्तृत संदर्भ में नहीं। अतः कल्पना को ललित कला का एक प्रमुख तत्त्व मानकर उसका सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत करते समय हिंदी के सौंदर्यतत््ववेत्ताओं को शुक्ल जी के कल्पना संबंधी चिंनन से आंशिक प्रकाश ही मिल पाता है।115 आचार्य शुक्ल के उपरांत हिंदी में इस विषय पर कई कला मनीषियों ने विस्तृत चिंतन किया लेकिन उनमें मौलिकता का अभाव दिखाई देता है। "इन विचारकों ने या तो शुकल जी के कल्पना सिद्धांत की शब्द-भेद से आवृत्ति की है या कालरिज के कल्पना निरूपण की छाया ग्रहण की है अथवा शुक्ल जी और कालरिज के निरूपणों को एकसाथ मिला-जुलाकर उपस्थित कर दिया है। अतः शुक्लोत्तर हिंदी आलोचना में कल्पना पर तात्त्विक विचार की दृष्टि से कोई नवीन उल्लेख्य सामग्री नहीं मिलती है।"116 आशंसक और कलाकार का वृत्त / 119
Page 134
कुमार विमल का उक्त कथन कहां तक मान्य है, इसका अनुमान हम शुक्लोत्तर हिंदी कला-मनीषियों के कल्पना संबंधी विचारों को देखने के उपरांत ही लगा सकते हैं। हिंदी के प्रमुख सौंदर्यवेत्ता हरद्वारीलाल शर्मा ने कल्पना पर स्वतंत्र रूप से कोई चितन नहीं किया, लेकिन प्रासंगिक रूप में अपनी दो पुस्तकों 'कला-विज्ञान' तथा 'सुंदरम्' में इस पर चर्चा अवश्य की है। स्मृति के संचित अनुभवों में परिवर्तन के द्वारा जो नवीनता का उदय होता है।117 उसे ही उन्होंने कल्पना कहकर परिभाषित किया है। इस कल्पना के द्वारा ही सारे अलंकार, चित्रों में रेखा रंगों की गति इत्यादि कला के संपूर्ण अंग-प्रत्यंग कल्पना से उत्पन्न और पुष्ट होते हैं।118 'सुंदरम्' में कल्पना के महत्त्व को उद्घाटित करते हुए वे लिखते हैं कि कला में सौंदर्य का अवगाहन, आस्वादन एवं साक्षात्कार कल्पना की सर्जनात्मक क्रिया के बिना संभव नहीं। कल्पना मन की एक वैसी ही क्रिया है जैसी प्रत्यक्षीकरण, स्मृति-विस्मृति, विचार-विमर्श, तर्क-ऊहापोह-अर्थबोध, भावप्रवणता अथवा रागात्मक वृत्ति, स्वप्न एवं चेतन और अंतश्चेतन की अनेक प्रक्रियाएं। इस रूप में वे यह मानते हैं कि मानव-मन की सर्जनोन्मुखी कल्पना सत्य का ही उद्घाटन करती है, उस सत्य का जो साक्षात्कार और प्रत्यक्षीकरण के लिए अगम्य और दुर्लभ है।"119 'सम्मेलन पत्रिका' के कला अंक में रविशंकर रावल ने कल्पना की परिभाषा इस प्रकार दी है, "मनुष्य के आसपासअपार जीवन-लीला का विस्तार होता रहता है। रंगों और स्वरूपों के आघात-प्रत्याघात का भी वह अनुभव करता ही रहता है। इसी प्रकार उनका संचय भी मन में होता रहता है। अतएव उनका पुनः-पुनः स्मरण कर मानव बार-बार उस जीवन की प्राप्ति का जो प्रयत्न करता है उसे हम 'कल्पना' कह सकते हैं।120 हंसकुमार तिवारी ने कल्पना को कलाकार की आत्मीयता कहा है। वे लिखते हैं, "जहां तक हम समभते हैं, कल्पना को कवि की आत्मीयता कहना अधिक उपयुक्त है क्योंकि वस्तु से तदाकारता स्थापित कर उसके आंतरिक रूप-मर्मवाणी को हृदयंगम करना पड़ता है। यह काम आत्मीयता का ही है, जिसे काव्य के क्षेत्र में, कला की दुनिया में हम कल्पना नाम से जानते हैं। इस तन्मयता के बिना अभूतपूर्व की प्रतिष्ठा सत्यरूप में हो ही नहीं सकती।"121 कला में कलाकार की कल्पना किस रूप में सहायक होती है, इस विषय में उनका दृष्टिकोण है कि कला में सर्वथा नवीन रचना कल्पना के द्वारा ही होती है। इसके बिना कला में वस्तुजगत् अपने सही और मूलरूप में नहीं आ पाता है। अतः वे कला में वस्तुजगत् को सवथा नवीन रूप में प्रस्तुत करना ही कल्पना का मुख्य प्रयोजन मानते हैं ।122 हिंदी के अन्य चिंतकों में मोहितलाल मजूमदार,123 रामचंद्र शुक्ल,124 कुमार विमल,125 सुरेशचंद्र त्यागी126 तथा रामलखन शुक्ल127 ने इसी प्रयोजन की ओर इंगित किया है। 120/ सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 135
नगेनद्र के अनुसार, "कल्पना का एक मुख्य कार्य है-रिक्त स्थानों का भरना अर्थात् विषमताओं को एकसार करना। जगत् में हम देखते हैं कि वस्तुएं पूर्ण नहीं हैं, उनमें न्यूनताएं एवं दोष हैं अर्थात् उनमें बीच बीच में स्थान रिक्त रह गये हैं। बस, हमारी कल्पना आप-ही-आप उनको भरने का प्रयत्न करने लगती है। ..... परंतु यह आवश्यक नहीं कि ऐसा जान बूझकर ही किया जाये। अनजाने में ही हमारी कल्पना प्रायः यह कार्य करती रहती है।"128 कुमार विमल ने अपनी पुस्तक 'सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व' में कल्पना को सौंदर्य- बोधशास्त्र का प्रमुख तत्त्व मानते हुए उसकी सर्वाधिक चर्चा की है। उन्होंने कल्पना का विवेचन न केवल विशुद्ध साहित्यिक धरातल पर रखकर ही किया है अपितु सौंदर्य- बोधशास्त्र, दशन और मनोविज्ञान के अन्योन्याश्रय संबंध को ध्यान में रखकरविवेचन की व्यापक भूमिका पर प्रस्तुत किया है, और यह स्पष्ट किया है कि हिंदी में कलाचिंतन ज्ञान की साहित्येतर शाखाओं से भी लाभान्वित हो सकता है। उन्होंने कल्पनातत्व के विवेचन में बड़ी सतर्कता से काम लिया है। समस्त विवेचन सांगोपांग एवं तुलनात्मक बन पड़ा है। उससे न केवल कवि एवं काव्य के लिए ही कल्पना की महत्त्वपूर्ण स्थिति एवं अलौकिक शक्ति का पता चलता है अपितु उसका सत्य अंश अधिक उभरकर सामने आता है। उनके विवेचन में भारतीय एवं पाश्चात्य चिंतन दोनों का योग बन पड़ा है। वे कल्पना को एक ऐसी मानसिक शक्ति कहते हैं, "जिसके द्वारा हम अप्रत्यक्ष वस्तुओं के बिबों को प्रत्यक्ष करते हैं और इन बिंबों को संयोजित, परिवर्तित अथवा परिवद्धित कर एक कलात्मक रूप प्रदान करते हैं। अतः कला के अंतर्गत आलंबन- विधान, उद्दीपन-योजना और व्यापार-विधान में इस कल्पना-शक्ति का प्रचुर महत्त्व है।"129 कुमार विमल के उक्त कथन से कल्पना के तीन विशिष्ट कार्यों का संकेत मिलता है-(i) अप्रत्यक्ष वस्तुओं के बिबों का मानसिक पुनराह्वान, (ii) इन बिंबों का पुनः प्रत्यक्ष, और (iii) इन बिंबों के समीकरण से कला-सृष्टि में योगदान। मनोविज्ञान, जीवविज्ञान, पाश्चात्य तथा भारतीय आचार्यों एवं आधुनिक आलोचकों के कल्पना संबंधी विचारों का विवेचन करने के उपरांत, सभी ललित- कलाओं को दृष्टिगत रखते हुए कुमार विमल ने कल्पना की परिभाषा इस प्रकार की है, 'कल्पना एक प्रकार की मानसिक सृष्टि है, जो अपने सम्मूर्तन के लिए साधन या माध्यम के रूप में इंट, पत्थर, रंग, तूली, स्वरया बिंब-किसी को भी ग्रहण कर सकती है।"130 हिंदी में जो विचारक कल्पना को मानसिक बिंब-विधान कहते हैं, वे कल्पना को केवल काव्य तक ही सीमित कर देते हैं, जिससे अन्य ललित कलाओं का विस्तृत परिसर कुमार विमल की उक्त परिभाषा के अनुसार कल्पना से असंपृक्त रह जाता है। किंतु कल्पना को केवल 'मानसिक सृष्टि' कहने से भी इसमें अतिव्याप्ति का दोष आ जाता है। अतः संपूर्ण ललित कलाओं को दृष्टिगत रखते हुए कुमार विमल का यह कहना निरापद प्रतीत होता है कि कल्पना एक ऐसी मानसिक सृष्टि है, जिसमें नंदतिक बोध के साथ सम्मूर्त्तन की क्षमता और भावोद्बोधन का गुण रहता है। रामलखन शुक्ल ने कल्पना की परिभाषा में कोई मौलिकता नहीं दिखायी है।
आशंसक और कलाकार का वृत्त /121
Page 136
उन्होंने कुमार विमल के विचारों की ही शब्द-भेद से आवृत्ति की है। वे लिखते हैं, "कल्पना एक प्रकार की मानसिक सृष्टि है। कल्पना से सृजन-व्यापार का बोध होता है और उसका संबंध मन से है। कल्पना का मानसिक स्वरूप अत्यंत व्यापक है, जिससे सभी प्रकार की कल्पनाएं आ जाती हैं। सौंदर्यशास्त्र में केवल उसी कल्पना का महत्त्व होता है जो सम्मूर्तन-क्षम हो तथा जो भाव या संवेग से संपुष्ट हो। समस्त प्रकार की कलाओं में जो रूपविधान होता है, सम्मूर्तन होता है। प्रस्तुत या अप्रस्तुत का विधान होता है, उन सबके मूल में कल्पना ही रहती है।"131 प्रश्न उठता है कि क्या सभी ललित कलाओं में कल्पना के विनियोग की मात्रा समान होती है। इस बारे में रामलखन शुक्ल132 तथा कुमार विमल133 दोनों की यह धारणा है कि सभी ललित कलाओं में कल्पना के विनियोग का स्वरूप भिन्न होता है। जिस कला का मूर्त आधार जितना ही स्थूल होता है उस कला में कल्पना के विनियोग की मात्रा उतनी ही कम रहती है। इस दृष्टि से कल्पना का निम्नतम विनियोग वास्तु- कला में तथा सर्वोत्तम विनियोग काव्यकला में मिलता है। इसके साथ ही कुमार विमल यह भी मानते हैं कि "विभिन्न कालों और विभिन्न कलाओं में कल्पना के स्वरूप और स्तर भिन्न होते हैं। कल्पना के स्वरूप-निर्माण और स्तर-निर्धारण में युग, मूल्य-दृष्टि और परिवेश का उल्लेखनीय योग रहता है। ...... युग दृष्टि और परिवेश के परिवर्तन के साथ ही कल्पना के अनेक आयाम बनते, बिगड़ते और बदलते रहते हैं।"131 एक कलाकार के लिए कल्पना किस सीमा तक सहायक होती है इसका स्पष्टी- करण करते हुए कुमार विमल ने लिखा है, "कल्पना के सहारे ही कलाकार गुण-साम्य, धर्म-साम्य, प्रभाव-साम्य इत्यादि (मनसालब्ध) समताओं के आधार पर प्रस्तुत में अप्रस्तुत के आरोप से रमणीय भाव-लोक की सृष्टि करता है। पुनः वैषम्य के द्वारा वस्तु विशेष के गुण-विवर्द्धन या उत्कृष्टता स्थापन में प्रस्तुत-अप्रस्तुत के बीच गुण, धर्म, प्रभाव और व्यापार का प्रतीप प्रस्तुत करने के लिए कल्पना ही कलाकार को दृष्टि- विस्तार देती है।"135 कल्पना की परिभाषा तथा उसके स्वरूप का स्पष्टीकरण शिवबालक राय ने भी किया है। उन्होंने अपनी पुस्तक 'काव्य में सौंदर्य और उदात्त तत्त्व' में कल्पना को मनकी ऐसी शक्ति कहा है, "जिससे सहृदय या कलावंत के मानस में बिब-विधान संपन्न होता है, जिससे सर्जना का तत्त्व क्रियाशील होता है, और जिससे आनंद का संपादन होता है। कल्पना मन के विभिन्न संवेदनों को निचोड़कर उनसे एक प्रभाव की अन्विति उत्पन्न करती है। विविध प्रकार के विचारों और भावों का संशोधन कर उन सबों पर किसी एक प्रमुख विचार या भाव का आधिपत्य स्थापित करती है। वह अनेकता को एकता में पिरोना जानती है। मन के भावों को मथकर, छितराकर उन्हें फिर एक नवीन रूप प्रदान करना कल्पना का काम है। वह अभिनव सृजन की शक्ति से संपन्न है। कल्पना विचारविहीना नहीं होती। वह आगे-पीछे, आंख खोलकर चलती है। वह ऊपर-नीचे आंख मूंदकर भी देखती है। मन की यह शक्ति भावना और बुद्धि का मेल कराती है।"136 122/ सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 137
भारतीय प्रतिभा तथा पाश्चात्य कल्पना की परस्पर तुलना करते हुए शिवकरण सिंह ने यद्यनि कलपना को किसी निश्चित परिभाषा में बांधना कठिन माना है तथापि उन्होंने मनोविज्ञान, जीवविज्ञान और पाश्चात्य सौंदर्यबोधशास्त्र के विचारकों के कल्पना संबंधी विचारों को प्रस्तुत करते हुए कल्पना को एक ऐसी मानसिक क्रिया कहा है जिसके आधार पर कलाकार नूतन सृजन और अभिनव रूप-व्यापार के विधान की शक्ति प्राप्त करता है।137 कला तथा कलाकार के लिए इसके महत्त्व से परोक्ष में कुछ ऐसे अपरोक्ष तथ्यों, अथवा दृश्य में कुछ ऐसे अदृश्य संबंध-सूत्रों को जोड़ देता है कि उसका सृजन पहले से अधिक उपयुक्त, वैभवपूर्ण और आकर्षक बन जाता है। और अपनी इसी विशेषता के कारण कल्पना सृजन का प्रमुख उपस्कारक सिद्ध होती है। 138 एस० टी० नरसिंहाचारी ने कल्पना को कलाओं में रूप और सौंदर्य का ऐसा साधक तत्त्व माना है जो कला को अनुकृति के धरातल से सर्जना के धरातल पर पहुंचा देता है।139 वे इसके कार्यों की ओर संकेत करते हुए लिखते हैं, "रचना में कल्पना का कार्य बहुमुखी होता है। कल्पनाशील कलाकार अंतर्दृष्टि संपन्न होकर जीवनजगत् का सूक्ष्म अनुशीलन कर पाता है। व्यक्त रूप से परे अव्यक्त का अंतर्दर्शन कर लेता है जिसके कारण उसकी रचना में ज्ञात वास्तविकता भी नवीन-सी लगती है। इसी अंत- दंशन से नवीन सौंदर्य की अनुभूति होती है।"140 रमेशकुंतल मेघ ने कल्पना पर विस्तृत चर्चा की है। उन्होने कल्पना पर स्वयं अपना कोई मत देने से पूर्व भारतीय और यूरोपीय साहित्य में कल्पना की स्थिति को स्पष्ट किया है, साथ ही मनोवैज्ञानिक ढंग से कल्पना के कतिपय पहलुओं को प्रकाशित किया है। वे कल्पना की परिभाषा इस प्रकार देते हैं, "कल्पना वैयक्तिक संस्कार शक्ति (प्रतिभा), अवचेतन में निहित स्मरणों को अप्रकट विचारों से जोड़कर उद्भूत करने वाली साहचर्यात्मक शक्ति (साहचर्यमूलक), और उन्हें पुनर्गठित करने वाली ज्ञान- शक्ति (कौशल) है। सब मिलाकर यह एक मानसिक वृत्ति ही रहती है जो संस्कारों, रुचियों, सामाजिक संभावनाओं का उपयोग करती हुई 'काव्यात्मक सत्य' रच देती है जहां हम अपने विश्वासों का स्थगन कर देते हैं।"141 रमेशकुंतल मेघ उन बहुमुखी कार्यों का उल्लेख भी करते हैं जो कला में कल्पना द्वारा किये जाते हैं। वे लिखते हैं : "कल्पना प्रत्यक्ष को अयथार्थ में रूपांतरित करने वाली (अतिशयता विधान), अयथार्थ को यथार्थवत बनाने वाली (संभावना), स्मृति और वस्तु को नया रूप देने वाली (बिब विधान), और एकताविधान, संतुलन आदि के द्वारा अविश्वास का स्थगन करने वाली (इंद्रजाल विधान) होती है। इन्हीं धर्मों के कारण कल्पना ज्ञात से अज्ञात की ओर, अतीत से-वर्तमान अतीत (इतिहास) से पुरातीत (मिथक) की ओर, वर्तमान से भविष्य की ओर (क्रांति) संचरण करने वाली, और संग-संग दर्शन एवं तर्क के विधानों से संचलित होने वाली भी होती है। सूत्र यही है कि कल्पना अतीत ही नहीं (स्मरण), भविष्य (संभावनाएं) भी है, भावना ही नहीं, विवेक भी है।"14:
आशंसक और कलाकार का वृत्त / 123
Page 138
हिंदी के कलाचितकों के अतिरिक्त कल्पना के बहुमुखी कार्यों का संकेत कोश ने भी किया है। 'हिंदी साहित्य कोश' में यह माना गया है कि "संगीत, मूर्ति, चित्रकारों, स्थापत्य आदि कलाओं में ध्वनि आदि का नवीन संयोजन कल्पना पर निर्भर रहता है। सुंदर वस्तुओं में अंगों का विन्यास और संतुलन तथा अंगांगी भाव और भाव की एकता, 'रेकरेंट मोटिफ' इसी के परिणाम हैं।"143 'भारतीय साहित्य कोश' में कल्पना के कार्यक्षेत्र का प्रसार काव्यसृजन से लेकर काव्यास्वादन तक स्वीकार किया है। कल्पना नूतन उद्भावना तो करती है, वह विशृंखलता में सामजस्य और विसंगति में संगति भी स्थापित करती है। कल्पना के अन्य कार्य हैं अमूर्त को मूर्त एवं निर्जीव को सजीव बनाना, पूर्वपरिचित विषयों का नवसंस्कार तथा प्रचलित उपकरणों का नवीन प्रयोग। काव्य-सृजन के संदर्भ में कल्पना शक्ति कवि को अभिव्यंजना-वक्ता, चारुत्व, कौशल और अप्रस्तुत-विधान की सामर्थ्य प्रदान करती है। काव्य भाषा का विशिष्ट और सटीक प्रयोग भी कवि की उर्वर कल्पना का परिणाम होता है। काव्यास्वादन के लिए प्रमाता में भी कल्पना- शक्ति का होना आवश्यक है क्योंकि इसके बिना वह काव्य में निहित सूक्ष्म अर्थ- व्यंजनाओं और वक्रताओं को ग्रहण नहीं कर सकता। इस प्रकार कल्पना के कर्म-क्षेत्र का प्रसार काव्य-सृजन से लेकर काव्यास्वादन तक है।144 हिंदी कलाचिंतकों की कल्पना संबंधी परिभाषाओं का सर्वेक्षण करने के उपरांत हम कल्पना संबंशी कुछ बहुधा विचारित प्रश्नों का विवेचन भी अनिवार्य समझेंगे। वह है-कल्पना और प्रतिभा, कल्पना और फैंसी, कल्पना और स्मृति, कल्पना और यथार्थ, कल्पना और स्वप्न तथा कल्पना और बुद्धि का स्वरूप-भेद, पार्थक्य-निरूपण और व्यपदेश-निर्धारण। कल्पना और प्रतिभा : "पाश्चात्य काव्यशास्त्र का इतिहास एक प्रकार से कल्पना की व्या्या-पुनर्व्याख्या का ही इतिहास है,"145 इस तथ्य को देखते हुए हिंदी के लगभग सभी कला मनीषियों ने पाश्चात्य काव्यशास्त्र में कल्पना पर विचार करने वाले विचारकों की सुदीर्घ परंपरा का उल्लेख किया है। इसी प्रसंग में उन्होंने प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्र में विवेचित प्रतिभा के विषय में भी चिंतन करना आवश्यक समझा है। भामह, राजशेखर, रुद्रट, अभिनवगुप्त आदि संस्कृताचार्यों ने प्रतिभा को काव्य का हेतु मानते हुए उसका जो महत्त्व स्पष्ट किया है, उसका उल्लेख विस्तृत रूप से किया है। इसी अध्याय में हमने प्रतिभा का विवेचन किया है। अतः ऐसी स्थिति में यहां कल्पना की विवेचना करते हुए, इस बात को स्पष्ट करना भी अनिवार्य जान पड़ता है कि हिंदी के कलाचितकों ने भारतीय प्रतिभा और पाश्चात्य कल्पना में साम्य और वैषम्य किस सीमा तक देखा है। आधुनिक सौंदर्यंबोधशास्त्र में कल्पना का अर्थ जिस रूप में ग्रहण किया जाता है उस रूप में यह अर्थ प्राचीन भारतीय साहित्य में प्रचलित नहीं था। वहां इसका अर्थ सर्वथा भिन्न था। प्राचीन काव्यशास्त्रियों ने इसका प्रयोग मिथ्या ज्ञान या मिथ्या रचना के रूप में किया है। आज कल्पना का प्रयोग जिस अर्थ में ग्रहण किया जाता है
124/ सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 139
उस अर्थ को अभिप्रेत करने के लिए प्राचीन साहित्यशास्त्रियों ने 'प्रतिभा' शब्द का प्रयोग किया है। हिंदी के लगभग सभी चिंतकों ने इस बात को उन्मुक्त रूप से स्वीकार किया है कि आधुनिक सौंदर्यबोधशास्त्र अथवा पाश्चात्य साहित्य की कल्पना को हम भारतीय काव्यशास्त्र की 'प्रतिभा' ही कह सकते हैं। हिंदी के जिन विद्वानों ने भारतीय प्रतिभा तथा आधुनिक सौंदर्यबोधशास्त्र या पाश्चात्य कल्पना में पर्याप्त साम्य देखा है, उनमें सत्यव्रत सिंह, बलदेव उपाध्याय, नगेन्द्र, रमेन्द्रकुमार सेन, रमेशकुंतल मेघ, गणपतिचंद्र गुप्त, बच्चन सिंह, रामलखन शुक्ल तथा सुरेशचंद्र त्यागी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन चिंतकों ने कल्पना और प्रतिभा में साम्य देखते हुए अपने मत इस प्रकार दिये हैं। सत्यव्रत सिंह ने हिंदी 'काव्य-प्रकाश' में भारतीय और पाश्चात्य दोनों दृष्टि- कोणों से विचार करते हुए लिखा है, "काव्य में रस-ध्वनि-तत्त्व के द्रष्टा आचार्यों की 'प्रतिभा' संबंधी धारणा अपने-आप में इतनी पूर्ण है कि पाश्चात्य काव्यालोचकों की 'कवि-कल्पना' (Poetic Imagination) संबंधी सभी विश्लेषण दृष्टियां इसमें समा जाती हैं।"146 नगेन्द्र का यह कथन है कि "संस्कृत काव्यशास्त्र में जिसे 'अभिनवगुप्त' आदि ने 'कवि प्रतिभा कहा है उसका विवेचन पाश्चात्य आलोचनाशास्त्र तथा मनोविज्ञान में कल्पना के प्रसंग में किया गया है।" 147 रमेन्द्रकुमार सेन का कहना है कि "अभिनवगुप्त ने अपने प्रतिभा के विवेचन में उसी बात को महत्त्व दिया है जो कलात्मक सृजन की स्वतंत्रता के रूप में 'कॉलरिज' की उत्तरजात कल्पना का प्रमुख प्रतिपाद्य है।"148 कुमार विमल ने इन दोनों में साम्य देखते हुए कहा है, "आधुनिक सौंदर्यशास्त्र या पाश्चात्य कला-चिंता की कल्पना को हम भारतीय काव्यशास्त्र की 'प्रतिभा' कह सकते हैं।"149 सुरेशचंद्र त्यागी का मत है, "भारतीय साहित्यशास्त्र में काव्य-हेतुओं के अंतर्गत जिस 'प्रतिभा' या शक्ति का विवेचन दीर्घ काल तक हुआ है, वह कल्पना ही है और वहां भी इसका असंदिग्ध महत्त्व स्वीकार किया गया है।"150 शिवकरण सिंह ने कल्पना और प्रतिभा में समानता उनके प्रमुख कार्य व्यापार एक होने के कारण मानी है। वे लिखते हैं, "बिब-निर्माण, आत्मेतर व्यक्तियों की मनःस्थिति के सहानुभूतिपूर्ण चयन, असंबद्ध वस्तुओं के संश्लेषण और परस्पर विरोधी वस्तुओं के समंजन आदि क्रियाओं की दृष्टि से ये एक-दूसरे के अधिक निकट हैं।" 151 रमेशकुंतल मेघ ने लिखा है, "संस्कृत के कलाविषयक ग्रंथों में कल्पना के हेतु की चर्चा नहीं हुई है ... किंतु साहित्यशास्त्र में इसे 'प्रतिभा' में विन्यस्त किया जा सकता है।"152 रामलखन शुक्ल ने प्रतिभा और कल्पना में साम्य देखते हुए अपनी पुस्तक 'भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तात्विक विवेचन एवं ललित कलाएं' में कहा है, "यद्यपि
आशंसक और कलाकार का वृत्त। 125
Page 140
प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्र में 'कल्पना' पर अलग से विचार नहीं हुआ है, किंतु प्रतिभा निरूपण इस रूप में हुआ है कि उसमें 'इमेजिनेशन' और 'जीनियस' दोनों के मूलभूत तत्त्व अंतर्भूत हो जाते हैं। आचार्यों ने कवि-व्यापार को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान किया है और उसमें कल्पना का अत्यंत महत्त्वपूर्ण योग रहता है।"153 'शोध-पत्रिका' के सौंदर्यशास्त्र विशेषांक में अभिमन्यु ने प्रतिभा की विभिन्न परिभाषाओं के तत्त्वों का आकलन करते हुए यह स्पष्ट माना है कि "भारतीय काव्य- शास्त्र में वर्णित प्रतिभा और पाश्चात्य काव्यशास्त्र में विवेचित कल्पना में कितना अद्भुत साम्य है।"154 भारतीय काव्यशास्त्र में व्णित प्रतिभा को पाश्चात्य चिंतकों ने कल्पना के रूप में स्वीकार किया है। इस मत को गणपतिचंद्र गुप्त ने भी पाश्चात्य मनीषियों द्वारा दी गयी कल्पना की परिभाषाओं को उद्धृत करते हुए प्रमाणित किया है।155 'भारतीय साहित्य कोश' में भी यह स्पष्ट लिखा है कि "भारतीय काव्यशास्त्र में कल्पना को प्रतिभा का गुण माना गय। है। प्रतिभा को अपूर्व वस्तु का निर्माण करने वाली प्रज्ञा अथवा 'नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा' कहा गया है जो पाश्चात्य साहित्यलोचन में प्रतिपादित 'सर्जनात्मक कल्पना' (क्रिएटिव इमेजिनेशन) तथा 'उद्भावन-शक्ति' (इन्वेंटिव फैकल्टी) के समकक्ष है।"156 उक्त सभी विद्वानों के अतिरिक्त आनंद कुमार स्वामी157, बाबू श्यामसुंदर दास153 तथा वलदेव उपाध्याय159 ने भी कल्पना और प्रतिभा के साम्य को निरूपित किया है। हिंदी कलाचिंतकों के उक्त सभी मत जहां कल्पना और प्रतिभा के साम्य को निरूपित करते हैं वहां आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा निर्मला जैन ऐसे भी कला-विचारक हैं जिन्होंने इनमें साम्य देखने की अपेक्षा वैषम्य देखा है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रसमीमांसा में लिखा है : "कलना' और 'व्यक्तित्व' की पाश्चात्य समीक्षा क्षेत्र में इतनी अधिक मुनादी हुई है कि काव्य के और सब पक्षों से दृष्टि कटकर इन्हीं दो पर जा जमी है। 'कल्पना' काव्य का बोधपक्ष है। कल्पना में कोई आयी हुई रूप-व्यापार- योजना का कवि या श्रोता को अंतःसाक्षात्कार या बोध होता है। पर इस बोध पक्ष के अतिरिक्त काव्य का भाव-पक्ष भी है। कल्पना को रूप-योजना के लिए प्रेरित करने वाले और कल्पना में आयी हुई वस्तुओं में श्रोता या पाठक को रमाने वाले रति, करुणा, करोध, उत्साह, आश्चर्य इत्यादि भाव या मनोविकार होते हैं, इसी से भारतीय दृष्टि ने भावपक्ष को प्रधानता दी और रस के सिद्धांत की प्रतिष्ठा की। पर पश्चिम में 'कल्पना' 'कल्पना' की पुकार के सामने धीरे-धीरे समीक्षकों का ध्यान भावपक्ष से हट गया और बोधपक्ष ही पर भिड़ गया।"160 संस्कृत काव्यशास्त्र में विशेषतः रससिद्धांत के अंतर्गत विवेचित प्रतिभा और पाश्चात्य चिंतन की परंपरा में विवेचित कल्पना में अंतर स्पष्ट करते हुए निर्मला जैन ने भी यह निष्कर्ष दिया है कि प्रतिभा में भावपक्ष प्रधान है और कल्पना में बोधपक्ष प्रधान होता है। "इसके अतिरिक्त पश्चिम में कल्पना जिस नूतन-सृष्टि-विधायिनी शक्ति
126/ सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहाहिक परंपरा
Page 141
के रूप में निरूपित की गयी है, वह भारतीय प्रतिभा की अपूर्व सृष्टि की तुलना में नवीनता के प्रति अधिक आग्रहशील है। 'कल्पना' और 'प्रतिभा' का यह अंतर वस्तुतः आधुनिक रोमांटिक और प्राचीन क्लासिकी दृष्टि का है। एक नवोन्मेष संबंधी सीमा के अतिरिक्त संस्कृत काव्यशास्त्र 'प्रतिभा' पाश्चात्य 'कल्पना' से अधिक व्यापक अवधारणा है; क्योंकि उसमें कल्पना के साथ ही सहजानुभूति का भी समावेश हो जाता है, यही नहीं बल्कि एक ओर वह बोधपक्ष के साथ भावपक्ष का समाहार करती है तो दूसरी ओर बिब-निर्माण, भाषा का आलंकारिक प्रयोग, आत्मेतर व्यक्तियों की मनःस्थितियों का सहजानुभूतिपूर्ण चित्रण, असंबद्ध समभी जाने वाली वस्तुओं का संयोजन, परस्पर विरोधी तत्त्वों का समंजन आदि कार्यों को भी संपन्न करने में समर्थ है।"161 इस प्रकार हम यह देखते हैं कि हिंदी में सर्वप्रथम आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा उसके उपरांत निर्मला जैन ने उनका समर्थन करते हुए भावपक्ष और बोधपक्ष के विभेद को स्पष्ट किया है। इनके अतिरिक्त शिवकरण सिंह ने भी अपनी पुस्तक 'कलासृजन- प्रक्रिया' में इन दोनों में थोड़ा अंतर देखते हुए यह धारणा व्यक्त की है कि "कल्पना के संमूर्तन-विधान और नृतन-सृष्टि-विधायिनी-शक्ति में प्रतिभा की तुलना में नवीनता का विशेष आग्रह रहता है तथा इन दोनों का दार्शनिक पक्ष भी एक-दूसरे से भिन्न है।"162 हिंदी कलाचितकों के कल्पना और प्रतिभा संबंधी उपर्युक्त उद्धरणों को देखने के उपरांत हमें यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि कल्पना और प्रतिभा दोनों में सामंजस्य की अद्भुत क्षमता पायी जाती है। अधिकतर कला-मनीषियों की दृष्टि भी प्रतिभा और कल्पना में भिन्नता देखने की अपेक्षा उनमें सादृश्यपूर्ण गुणों को देखने की ओर ही गयी है तथा उन्होंने इसे सही दिशा में विवेचित करने का सफल प्रयत्न भी किया है। उनका यह प्रयास तुलनात्मक दृष्टि से श्लाध्य माना जा सकता है। कल्पना और फैसी : कल्पना और फैंसी में क्या अंतर है ? इस प्रश्न के संबंध में हमें बहुत भिन्न एवं विलक्षण मान्यताएं मिलती हैं। कुछ विचारक 'फेंसी' को कल्पना का निम्न अथवा अल्परूप मानते हैं तथा कुछ फैंसी को कल्पना से श्रेष्ठ सिद्ध करते हैं। कुछ ऐसे भी चिंतक हैं जो इन दोनों को एक ही अर्थ का द्योतन करने वाला पर्यायवाची मानते हैं। यूरोपीय कला मीमांसा में सत्रहवीं शताब्दी तक ये शब्द एक दूसरे के पर्याय माने जाते थे। कालांतर में यदा-कदा इन्हें भिन्न मानकर विवेचित और विश्लेषित करने की प्रथा चल पड़ी। अभ्युदयकाल में आकर इन शब्दों को Imagination और Phantasia के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता था।163 यूरोपीय साहित्य में कल्पना की इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए रमेशकुंतल मेघ लिखते हैं, "वहां पहले 'फैंटसी' शब्द का प्रचलन था; फिर फेंसी अर्थात् सज्जात्मक कल्पना और वैदग्ध्य (विट) भी प्रयुक्त हुए। अंत में 'कल्पना' शब्द मंजूर किया गया जिसका मूल रिश्ता कला एव साहित्य से है.प्रारंभ में फैंटसी (अर्थात् इंद्रजाल और
आशंसक और कलाकार का वृत्त /127
Page 142
कर्मकांड वाली अतिप्राकृतिक आस्था) कलाओं को भ्रांति (इल्यूजन) की ओर ले जाने वाली मानी गयी। रिनेसाकाल में पेरासेल्सस ने इसमें तत्कालीन विज्ञान (जैसे-फलित ज्योतिष) और दवीशक्ति (जैसे इंद्रजाल) को मानवमन के धरातल पर जोड़ा, इति- हास क्रम की दृष्टि से फैंटसी को सज्जात्मक कल्पना के बजाय सृजनात्मक सज्जामूलक कल्पना (क्रिएटिव फेंसी) का आख्यान किया ..... कालांतर में रोमांटिक कवियों एवं आलोचकों ने 'फैंसी' शब्द को वनवास देकर राजकुमारी-सी 'कल्पना' अर्थात् 'मूर्ति या बिब-विधायनी शक्ति' को मुकुट पहनाया। उन्होंने कल्पना को (बाह्य प्रकृति पर अपना वैशिष्टय तथा रचना की छाप और बिब डालने वाली) कलाकार की अर्द्ध- रहस्यात्मक, अर्द्धदार्शनिक प्रेरक शक्ति समझा। उन्होंने कल्पना को मात्र लक्ष्यहीन दिवास्वप्न अथवा निष्क्रिय स्मृति नहीं माना; बल्कि वह एक रचनात्मक तथा मौलिक शक्ति के रूप में प्रशंसित हुई।164 इन दोनों पर चिंतन करते हुए हिंदी के अधिकतर कला-मनीषियों की मान्यता इसी पक्ष को मिल सकी है कि 'फैंसी कल्पना का एक निम्न रूप है। उनके द्वारा फैंसी के लिए प्रयुक्त 'उपकल्पना' या 'अतिकल्पना' शब्द इसी मान्यता का समर्थन करता है।165 कुमार विमल ने फैंसी को कल्पना से निम्न मानने का कारण तथा इन दोनों के अंतर को भी स्पष्ट किया है। वे लिखते हैं, "कल्पना के बिब जहाँ इकहरे, विशिष्ट और आशु होते हैं, वहां 'फैंसी' के बिंब्र स्थिर और चाकचिक्य से भरे होते हैं। पुनः कल्पना में दो तत्वों की आत्यतिक आवश्यकता रहती है-भावना एवं स्मृति की। किंतु, 'फैंसी' में स्मृति का अंश नगण्य रहता है और भावना रहती भी है, तो आवेशयुक्त एवं तत्पर नहीं, शिथिल और निर्बल। इसलिए 'फैसी' सर्वत्र नांदतिकबोध की निम्न आस्थाओं से संबंधित रहती है। इसमें लावण्य रहता है और यह अधिक-से-अधिक 'रंजक' अथवा 'सुंदर' की कोटि तक पहुंच सकती है, किंतु इससे कभी भी 'उदात्त' की सृष्टि नहीं हो सकती। तदनंतर 'फैंसी' में वस्तुबोध नहीं के बराबर रहता है। ...... इस प्रकार वस्तुबोध की कमी के साथ ही 'फैंसी' में स्थिरता, निश्चय तथा देशकाल के बंधनों का अभाव रहता है। इसके अलावा कल्पना में बोध के साथ प्रतिबोध भी रहता है, जबकि 'फैंसी' में केवल बोध सारांश यह है कि 'फैंसी' में केवल अव्यवस्थित उड़न- शीलता रहती है, बौद्धिक संतुलन नहीं ।166 देवराज का इन दोनों के प्रति यह मत है कि "यदि कल्पना बाह्य एवं आंतरिक वास्तविकता का पुनर्गठन स्वय यथार्थ के नियमों के अनुसार करती है, तो फेंसी यथार्थ के तत्त्वों को अनियत्रित स्वच्छंदता से एकत्र कर डालती है।"167 कल्पना और स्मृति: कल्पना और फैंसी पर विचार करने के उपरांत हिंदी कला विचारकों ने कल्पना और स्मृति के स्वरूप-भेद पर भी चर्चा की है। स्मृति और कल्पना में इतनी समता तथा निकटता है कि विचारकों ने कल्पना को स्मृति का ही एक विकसित रूप कहा है। हरद्वारीलाल शर्मा ने इन दोनों को ज्ञान के मूल स्रोत प्रत्यक्ष की दो विकसित प्रवृत्तियां कहा है जिनमें अतीत की ओर चलने वाली 'स्मृति' कहलाती
128 / सौंदयबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 143
है तथा अनागत को अवगम करने वाली कल्पना। इस रूप में वे स्मृति को कल्पना का आश्रय बतलाते हैं।168 कुमार विमल ने भी इसी बात को स्पष्ट करते हुए अपनी पुस्तक 'सौंदर्शशास्त्र के तत्त्व' में लिखा है, "कल्पना और स्मृति दोनों का आधार प्रत्यक्ष ज्ञान है। स्मृति प्रत्यक्ष ज्ञान द्वारा प्राप्त अनुभव को चेतना के समक्ष सुरक्षित रखती है और कल्पना उन अनुभूत विषयों का स्वेच्छानुसार पुनर्निर्माण करती है। अतः कल्पना में सदैव स्मृति का योग रहता है।"169 कुमार विमल ने इन दोनों प्रवृत्तियों में दो अंतर भी स्पष्ट किये हैं। पहला अंतर तो यह है कि कल्पना भूत पर आधारित होती हुई भी भविष्योन्मुख रहती है, जबकि स्मृति का संबंध मात्र भूतकाल की घटनाओं और अनुभूतियों से रहता है। दूसरा अंतर वे यह मानते हैं कि स्मृति में हमें किसी पूर्वानुभव की वस्तु का संचित संस्कारों के उद्बोध से स्मरण होता है, जबकि कल्पना में हमें स्मृति के मात्र आलंबन का ही नहीं, उसके आसंगों और साहचर्य का भी स्मरण होता है।170 स्मृति और कल्पना के अंतर को शिवबालक राय ने भी स्पष्ट किया है। वे लिखते हैं,, "स्मृति के लिए अतीत का प्रसंग, बीती घटना की याद, आवश्यक है। मन के द्वारा बीती घटना के दुहराये जाने में स्मृति का जन्म होता है। घटनाओं को दुहराते समय मन में थोड़ी-थोड़ी अनुभूति भी होती रहती है। रटी हुई कविता को बेधड़क दुहराने में स्मृति पूरा काम नहीं करती है; यह तो अनायास आप-ही-आप होता चलता है। कल्पना बहुतेरी स्मृतियों का कोई बंडल नहीं है। वह स्मृतियों को सज्जा, क्रमत्व और शृंखला प्रदान करती है। वह अतीत के आधार पर भविष्य का चित्र अंकित कर सकती है। बीती घटना का विवरण स्मृति का काम है; उसका नव-संघटन कल्पना का। सर्जन कल्पना की विशेषता है। कल्पना में कोई विश्वास या प्रतीति प्रत्यक्ष रूप से काम नहीं करती है। प्रतीति के खूंटे में बंधी कल्पना खुलकर किलोल नहीं कर सकती। स्मृति में व्यक्ति के मन की प्रतीति मौजूद रहती है। गलत या सही कोई स्मृति हो व्यक्ति की प्रतीति वहां काम करती है। कल्पना में प्रतीति की अपेक्षा नहीं, यहां तो मन के उपकरणों का संघटन और उनका अभिनवीकरण आवश्यक है।"171 उक्त चिंतकों से पूर्व आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कल्पना के संदर्भ में स्मृति पर व्यवस्थित विचार करते हुए इन दोनों के अंतर का निरूपण किया है तथा स्मृति के आधार पर कल्पना की एक नूतन कोटि (स्मृत्याभास कल्पना) निरूपित की है।172 कल्पना और यथार्थ : इनके विषय में लोगों में बड़ा भ्रम है और अधिकांश का दृष्टिकोण अवैज्ञानिक या अतिरंजित है। कल्पना से आमतौर पर वे यथार्थ-विरोधी अर्थ ही ग्रहण करते हैं यानी ऐसी मनगढ़ंत घटना जिसका परंपरा से कोई संबंध न हो। लेकिन वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है। वास्तव में ये दोनों कला में आकर कलाकार के लिए एक-दूसरे के विरोधी नहीं अपितु, पूरक सिद्ध होते हैं। रामनाथ सुमन ने इन दोनों को सत्य के दो पहलू मानते हुए लिखा है, "जो
आशंसक और कलाकार का वृत्त / 129
Page 144
हम देखते-सुनते हैं, जिसका अनुभव या अनुमान करते हैं, जिसकी कल्पना करते और बुद्धि से जिसको ग्रहण करते हैं, सब सत्य है। क्योंकि वह है ... वह सत् है। हम किसी ऐसी वस्तु की कल्पना ही नहीं कर सकते जो असत् है या नहीं है। यह हो सकता है कि वह इंद्रियलब्ध न हो, वस्तु जगत् में उसका साक्षात्कार हमें न हो। व्यक्त सत्य यथार्थ है, अव्यक्त सत्य कल्पना है। वस्तुतः यथार्थ और कल्पना एक ही सत्य के दो पहलू हैं। अदृश्य सत्य ही कल्पना है। कल्पना जब शरीरी हो जाती है तब वही यथार्थ है।"173 हंसकुमार तिवारी ने भी कल्पना को कलाकार की आत्मीयता मानते हुए, कला के कक्ष में सत्य के इन दोनों पहलुओं-यथार्थ और कल्पना - का महत्त्व देखा है। वे लिखते हैं कि कला में वस्तु जगत् अर्थात् यथार्थ अपने सही और मूलरूप में तब तक नहीं आ सकता, जब तक कि उसमें कल्पना अथवा कलाकार की आत्मीयता का समावेश नहीं होता है। अर्थात् वस्तुजगत् के ही मात्र आधार से कलासृष्टि नहीं होती है, अपितु उसमें बहुत कुछ जोड़ना और घटाना भी पड़ता है और यह जोड़ना और घटाना ही कल्पना है।174 कला में कल्पना और यथार्थ के महत्त्व को उद्घाटित करते हुए रामनाथ सुमन ने यह भी माना है कि वास्तविक कला तभी जन्म लेती है, जब यथार्थ कल्पना के सौंदर्य से मंडित होकर प्रकट होता है। वे लिखते हैं, "यदि ऐसा न होता तो अनुकृति (फोटो) और चित्रकला में कुछ अंतर न होता। फोटो और चित्र में जो अंतर है, वही प्रकृति और कला में है। प्रकृति यथार्थ है, कला उस यथार्थ में कल्पना की प्रतिक्रिया है। फोटो प्रकृति की ठीक अनुकृति है, चित्र अनुकृति नहीं, एक नवीन सृष्टि है। चित्रकार यथार्थ के पीछे जो एक अंतर्जगत है, दृश्य के पीछे जो अदृश्य है, उसे कल्पना के सहारे पकड़ता है।"175 कलाचितकों के उक्त मतों को देखने के उपरांत हम यह कह सकते हैं कि कला- कार के लिए इन दोनों का एक जैसा महत्त्व है। उसकी कला में दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं अपितु पूरक बनकर आते हैं। दोनों मिलकर एक सत्य को प्रकट करते हैं। कला की वस्तु, उसके साधन, उसके आधार यथार्थ हैं तथा उसकी प्रेरक शक्ति कल्पना है। दोनों के एकीकरण से ही कलाकार श्रेष्ठ कला को जन्म दे सकता है। कल्पना और स्वप्न : प्रत्यक्ष और परोक्ष इन रूपों में मुख्यतः व्यक्ति की इच्छा- पूर्ति होती है। लेकिन सामाजिक परिस्थितियों तथा मर्यादाओं के कारण और व्यक्ति की स्वयं की सीमाओं के कारण उसकी सभी इच्छाएं पूरी नहीं हो पाती हैं। ऐसी स्थिति में वह उनकी पूर्ति कल्पना या स्वप्न के माध्यम से करता है। इस रूप में कल्पना या स्वप्न दोनों ही अधूरी इच्छाओं की पूर्ति के साधन सिद्ध होते हैं। लेकिन इन दोनों में यह समानता होते हुए भी इसमें कुछ अंतर है जिसकी ओर शिवबालक राय176 तथा रमेशकंतल मेघ177 ने इंगित किया है। 1. कल्पना और स्वप्न दोनों ही मन के साहचर्य और मनोवृत्ति के कारण आविरभूत होते हैं लेकिन इनमें कल्पना का जाग्रत दशा में तथा स्वप्न का निद्रा में
130 / सौंदर्यवोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 145
आविर्भाव होता है। 2. स्वप्न अचेतन मन की रचना है और कल्पना चेतन मन की सृष्टि। अर्थात् स्वप्न में व्यक्ति पूरी तरह से अचेतन मन के अधीन होता है जबकि कल्पना में तर्क, संकल्प तथा विचार भी होते हैं। 3. कल्पना वास्तविकता की पूरी उपेक्षा नहीं कर सकती, जबकि स्वप्न में ऐसा होता है। 4. व्यक्ति का स्वप्न असृष्टि है, उससे सामाजिक कल्याण का काम नहीं हो सकता क्योंकि वह समाज से निरकुश होता है जबकि कलाकार की कल्पना सामाजिकता के प्रहरियों से नियंत्रित होती है और वह लोक-संग्रह के लिए होती है। 5. स्वप्न एक क्रीड़ामात्र है जबकि कल्पना सक्रिय रचना भी है। 6. स्वप्न क्षणिक, शृंखलाहीन और गोपनीय है लेकिन कल्पना से युक्त कला शाश्वत, रमणीय और लोकोपयोगी है। कल्पना और स्वप्न के संदर्भ में ही रमेशकुंतल मेघ ने कल्पना और दिवास्वप्न की भी तुलना की है। वे लिखते हैं, "हम अपनी अतृप्त इच्छाओं की तृष्टि के लिए दिवास्वप्न की गोद में खो जाते हैं-पराजित होकर;अथवा हम अपनी इच्छाओं के नीड़ रचने लगते हैं-विजयी होकर। दोनों ही परिस्थितियों में हम स्वयं ही नायक होते हैं किंतु कल्पना में केवल ऐसी परिस्थितियां नहीं होतीं। निष्क्रिय दिवास्वप्न बहुधा वास्त- विकता की उपेक्षा करने वाले, सामाजिकता से निश्चित होते हैं; जबकि कल्पना सक्रिय होती है और नितांत वैयक्तिक होने के साथ-साथ वास्तविकता-प्रभावित एवं सामा- जिकता सापेक्ष्य होती है। दिवास्वप्न सक्रिय रचना में ढलकर कल्पना द्वारा निवैयक्तिक और सामाजिक बनाये जा सकते हैं। बहुधा दिवास्वप्न का उद्गम अस्वस्थ था असफल मन होता है जबकि कल्पना के लिए यह शर्त नहीं है। सारांश यह है कि स्वप्न या दिवा- स्वप्न 'निष्क्रिय कल्पना' (पैसिव इमेजिनेशन) है जिनमें इच्छापूर्ति होती है178, रचना नहीं।"179 कल्पना और चिंतन : कल्पना और चिंतन के गहरे संबंध हैं। रमेशकुंतल मेघ ने इनके संबंध को देखते हुए कल्पना द्वारा किसी मानस-चित्र का मूर्तिकरण मार्मिक प्रसंगों की योजना, जीवंत चरित्रों का विकास, कृति का शिल्प, नये आदर्शों या विषय की खोज आदि में चिंतन की अहम् साझीदारी देखी है। उनके अनुसार, "चिंतन परि- स्थिति के द्वारा तथा कल्पना इच्छा के द्वारा निर्धारित और नियंत्रित होती है। चिंतन द्वारा हम विभिन्न तथ्यों के आपसी संबंधों को जानकर समस्या का समाधान करते हैं जबकि कल्पना द्वारा हम नये संबंधों की उद्भावना करके नयी परिस्थितियों का पुनर्निर्माण एवं खोज करते हैं। अर्थ और प्रतिक्रिया के धरातल पर दोनों सन्निहित हो जाते हैं।"180 T ब्र जगोपाल तिवारी ने कल्पना पर दार्शनिक दृष्टि से विचार करते हुए उनके संबंधों की चर्चा की है। लेकिन जहां रमेशकुंतल मेघ ने कल्पना और चिंतन के परस्पर गहरे संबंध को स्पष्ट किया है वहां ब्रजगोपाल तिवारी बुद्धि अथवा चिंतन को कल्पना
आशंसक और कलाकार का वृत्त / 131
Page 146
से पूर्णतः भिन्न तथा निम्न मानते हैं। उनका कथन है, "कल्पना', 'बुद्धि', 'विचार', या 'प्रज्ञा' से भिन्न अथवा निम्न है। जब आगे चलकर, किसी प्रत्यक्ष प्रतीति का अन्य प्रतीतियों से संबंध स्थापित होने लगता है; एक प्रतीति की दूसरी प्रतीतियों से तुलना होने लगतो है और समानता और भेद स्थापित होने लगता है; वर्गीकरण होने लगता है अथवा कांट की बतलायी हुई संज्ञा, प्रत्यय द्वारा, प्रत्यक्ष प्रतीति (Percept) प्रत्यय (Concept) का रूप लेने लगती है, तब विचार अथवा 'बुद्धि' की क्रिया दृष्टिगोचर होने लगती है। पर 'कल्पना' का स्तर 'बुद्धि' के स्तर से पूर्व व निम्न हैं; 'कल्पना' 'बुद्धि' से भिन्न है। सारांश यह है कि 'कल्पना' (मानस-प्रत्यक्ष) बुद्धि अथवा योजना निर्माण, इच्छा, संकल्प आदि के पूर्व और उनसे स्वतंत्र है, कल्पना ही से बुद्धि और संकल्प को विषय सामग्री मिलती है।"181 कल्पना और बुद्धि पर संक्षेप में विचार कुमार विमल ने भी किया है। वे सांख्य दर्णन, गीता तथा शास्त्रों के आधार पर बुद्धि के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए मानते हैं, "इन स्वरूपों से कला-जगत् की कल्पना का कोई ऋजु अथवा अनृजु संबंध नहीं है लेकिन बुद्धि की पांच वृत्तियों-प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति-ये वे विपर्यय, विकल्प और स्मृति का कल्पना के साथ सीधा संबंध अवश्य जोड़ते हैं।182 कल्पना के प्रकार : हिंदी में मुख्यतः कुमार विमल तथा रमेशकुंतल मेघ ही कल्पना के प्रकार भेदों का निर्धारण करते हैं। कुमार विमल यह मानते हैं कि जिस प्रकार विभिन्न कलाओं में कल्पना के विनियोग का स्वरूप भिन्न होता है उसी प्रकार विश्लेषणात्मक दृष्टि धारण करने पर कला के अंतर्गत कल्पना के कई प्रकार प्रतीत होते हैं। वे विचार-दृष्टि, गुण-दृष्टि तथा क्रिया-दृष्टि से कल्पना के विभिन्न प्रकारों का निर्धारण करते हैं। विचार-दृष्टि से वे-जीवनोन्मुख और जीवनमुक्त कल्पना, गुण-दृष्टि से - असंकल्पित और संकल्पित कल्पना तथा क्रिया-दृष्टि से पुनरा- वृत्यात्मक (रिपोडक्टिव) और सर्जनात्मक (प्रोडक्टिव) के भेद संभव मानते हैं।183 लेकिन वे इन प्रकारों पर विस्तार से चर्चा न करते हुए सौंदर्यबोधशास्त्रीय दृष्टि से नंदतिक आधार को स्वीकारते हुए कल्पना के प्रमुख प्रकारों का निर्धारण करते हैं। यहां वे आचार्य शुक्ल द्वारा किये गये विधायक कल्पना और ग्राहक कल्पना184 जैसे स्थूल विभाजन के अतिरिक्त कल्पना के तीन स्पष्ट प्रकार-पूरक कल्पना, मुक्तयादृच्छिकी कल्पना तथा तिर्यक कल्पना मानते हैं। उनके अनुसार पूरक कल्पना पाठक अथवा भावक के पास रहती है। इस कल्पना के सहारे पाठक कला-निबद्ध कल्पना के शेषांश की पूर्ति अपनी ओर से करता है। मुक्तयादृच्छिकी कल्पना कलाकार के मानसिक स्वतः चालन से निर्गत होती है। इस कल्पना में उड़ान अधिक रहती है और केंद्रगामिता का अभाव रहता है। इसी तरह तिर्यक कल्पना एक प्रकार की वक्र कल्पना है। यह सहज- सरल गति में चलकर तिरछी काट करती है। अतः इस कल्पना से निर्मित कृतियां प्रायः पहेलियों की तरह अनबूभ हो जाती हैं। कुमार विमल के अनुसार इन तीनों प्रकार की कल्पनाओं को सभी ललित कलाओं में समान रूप से देखा जा सकता है।185 इन
132/ सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 147
तीनों प्रकारों के अतिरिक्त भी वे काव्यकला के अनुकूल पड़ने वाले कल्पना-प्रकारों पर विचार करते हैं।186 रमेशकुंतल मेघ बुनियादी तौर पर कल्पना के दो भेद स्पष्ट करते हैं- (i) निष्क्रिय निर्माणात्मक कल्पना (ii) सक्रिय निर्माणात्मक कल्पना। उनके अनुसार इन दोनों ही प्रकारों में निर्माण प्रक्रिया की प्रधानता है। पहली के द्वारा जो निर्माण होता है वह व्यक्ति के अवचेतन से इतना ऊपर नहीं उभर पाता कि उसका नियंत्रण होकर एक प्रेषणीय तथा कला तथ्य भी सामने आये। इस कल्पना की निर्माण प्रक्रिया केवल इच्छातुष्टि के लिए बुने गये दिवास्वप्नों, निद्रास्वप्नों में कार्यरत रहती है। यहां वास्तविकता एवं सामाजिकता के बंधन नहीं रहते हैं। इसमें कल्पनाकार का लक्ष्य किसी व्यावहारिक ध्येय की पूर्ति न होकर मात्र इच्छापूर्ति होता है। इसकी तुलना में सक्रिय निर्माणात्मक कल्पना में कलाकार वास्तविकता की परवाह करता है। उसका लक्ष्य किसी व्यावहारिक ध्पेय की पूर्ति करना होता है। यह कल्पना एक तो पूर्णतः नियंत्रित होती है अर्थात् चिंतन के तत्त्वों से गर्भित होती है, दूसरे, वास्विकता से प्रभावित होती है अर्थात् विशिष्ट प्रभावक अंश को ग्रहण करके प्रेषणीयता को भी लक्षित करती है, तीसरे इसका एक मात्र उद्देश्य नवीन रचना भी होता है अर्थात् यह कलावस्तु की विषयवस्तु एवं रूप माध्यम का उपयोग करने में संतुलन, एकताविधान, शिल्प आदि के ध्यान पर भी केंद्रित होती है। इस प्रकार की कल्पना का उपयोग कलाकार, आशंसक और आलोचक, वैज्ञानिक तथा कारीगर आदि करते हैं। बहुधा यह कल्पना अपेक्षाकृत दीर्घ समय वाली होती है और कार्यरत होने पर कई अवस्थाओं (अर्थात् सृजनात्मक प्रक्रिया) से होकर गुजरती है।187
कलाकार तथा आशंसक यद्यपि हम इस अध्याय में कलाकार और आशंसक की पृथक-पृथक् चर्चा कर चुके हैं तथा रचना और आशंसा के अंतर्संबंध का उल्लेख भी प्रासंगिक रूप से इनके पारस्परिक संबंध को ही स्पष्ट करता है तथापि इनके संबंधों पर स्वतंत्र रूप से चर्चा भी अपेक्षित जान पड़ती है। हिंदी में कलाकार और आशंसक के संबंधों का उल्लेख करने वाले एकमात्र चिंतक रमेशकुंतल मेध हैं। वे कला को एक कार्यिकी (ऐक्टिविटी) और कलाकृति को उत्पत्ति (प्रोडक्ट) मानते हुए कार्यिकी को क्रियान्वित करने वाले व्यक्ति को 'कलाकार' तथा क्रियान्वित कार्यिकी अर्थात् माध्यम में प्रस्तुत कलाकृति से संबंध रखने वाले व्यक्ति को 'आशंसक' कहते हैं।188 इन दोनों के संबंधों का उल्लेख करते हुए वे लिखते है: "कलाकार पहले बहिर्जगत के प्रत्यक्षों और अंतलोक के स्मरणों तथा अनुभवों का ध्यानयोग करता है। सृजन के क्षणों में जब माध्यम उसे चुनौती देता है, यंत्रणा देता है, निमंत्रण देता है, सुख देता है तब वह ध्यानयोगावस्था (कांटेप्लेशन) में न होकर उद्वेलित दशा में होता है। कलाकृति के निर्माण के पश्चात् जब वह पुनश्च ध्यानयोग करता है तब वह आशंसक का प्रभाव-धर्म निबाहता है। इसकी तुलना में आशंसक कृति
आशंसक और कलाकार का वृत्त / 133
Page 148
के माध्यम से भावों को मूर्तित करने की पीड़ा से वंचित रह जाता है अथवा इस प्रक्रिया से मुक्त होकर वह सीधे अधिक गहरा ध्यानयोग कर सकता है। इस प्रकार वह आद्यंत ध्यानयोग की अवस्था में होता है। वह कलाकृति के माध्यम से कलाकार के साहचर्यों और, इस बहाने अपने साहचर्यों का भी आह्वान-प्रत्याह्वान करता है। इसलिए कवि की अपेक्षा आशंसक को अधिक सारवत्ता मिलती है।"189 इस अंतर को देखते हुए यह प्रश्न उठता है कि क्या हम कलाकार और आशंसक दोनों को अलग-अलग मानें ? संस्कृत आचार्यों ने इस विषय पर चिंतन करते हुए मुख्यतः कारयित्री प्रतिभा के कारक व्यापार से युक्त व्यक्ति को कलाकार तथा भाव- यित्री प्रतिभा के भावन-व्यापार से युक्त व्यक्ति को आशंसक कहा है। वैसे इन दोनों में ही भावन और कारक व्यापार, तथा भावयित्री और कारयित्री दोनों प्रकार की क्षमताएं होती हैं लेकिन एक की प्रधानता होने के कारण इनमें अंतर आ जाता है। कभी-कभी एक व्यक्ति कलाकार होने के साथ आशंसक भी होता है तथा एक आशंसक आलोचक होकर सृजनकार अथवा कलाकार भी बन जाता है। रमेशकुंतल मेघ ने इन दोनों ही स्थितियों को स्पष्ट किया है। वे मानते हैं कि जब कलाकार अपनी रचना का निर्माण करने के उपरांत पुनः उस पर विचार करता है तब वह आशंसक का कार्य करता है।190 इसी प्रकार एक आशंसक जब किसी विचारधारा तथा दार्शनिक दृष्टिकोण के आधार पर जाने-अनजाने अपने आलोचनात्मक निर्णय प्रस्तुत करता है तथा कलाकृति में नये सौंदर्यबोध या तथ्य या दिशा का अन्वेषण करता है तो वह सृजन- कार अथवा कलाकार का धर्म निबाहता है।191 कलाकार तथा आशंसक दोनों के बोध में एक 'मध्यस्थ व्यक्ति' की कल्पना रमेशकुंतल मेघ ने की है। कलाकार और आशंसक के बीच कौन 'मध्यस्थ व्यक्ति' हो सकते हैं, इसका पूर्ण स्पष्टीकरण उन्होंने एक तालिका द्वारा किया है।192
सृजनप्रक्रिया और सृजनात्मक कृत्य किसी भी कलाकार की कलाकृति के आरंभ से अंत तक के रचने के रहस्य को जानने में ही सृजनप्रक्रिया छुपी रहती है। अतः सौंदर्यबोधशास्त्र के अंतर्गत इस विषय को अत्यधिक महत्त्वपूर्ण ढंग से उठाया गया है। हिंदी में सृजन-प्रक्रिया अंग्रेजी के Creative Process के अनुवाद क्रम में आगत शब्दावली है। 'सृजनप्रक्रिया' अथवा 'रचनाप्रक्रिया' के अतिरिक्त इस प्रसंग में 'सृजनशीलता', 'सर्जनात्मकता', 'सिसृक्षा' तथा 'सर्जकत्व' शब्दों का भी प्रयोग किया जाता है। सृजन-प्रक्रिया का सर्वप्रथम प्रयोग कला-समीक्षा के प्रसंग में ही हुआ है। अंग्रेजी में हरबर्ट रीड ने इस क्षेत्र में कार्य किया है।193 हिंदी में अंग्रेजी की प्रभावपीठिका पर सूजनप्रक्रिया का उल्लेख हुआ है, जिसे संस्कृत काव्य-शास्त्र संपदा ने समृद्ध किया है। अतः हिंदी में इसके स्वरूप
134 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 149
को जानने से पूर्व यह जानना भी आवश्यक है कि संस्कृत एवं पाश्चात्य साहित्य में सूजन प्रक्रिया संबंधी चिंतन किस रूप में हुआ है।
संस्कृत काव्यशास्त्र में सृजनसंबंधी चिंतन इस पर दो विरोधी मत मिलते हैं। एक ओर इटली के संस्कृतज्ञ विद्वान प्रोफेसर रेनिशे नोली हैं जो यह मानते हैं कि आस्वादपक्ष पर विशेष ध्यान देते हुए भी संस्कृत काव्य- शास्त्र में सृजन-पक्ष की उपेक्षा नहीं की गयी है। दूसरी विचारधारा रखने वाले भारत के संस्कृत काव्य-शास्त्र के मनीषी प्रोफेसर एस० के० डेहैं। इनके अनुसार संस्कृत काव्यशास्त्र में सृजन-पक्ष की उपेक्षा की गयी है। निर्मला जैन ने अपनी पुस्तक 'रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र' में उक्त दोनों मतों को प्रस्तुत करते हुए प्रोफेसर नोली के मत को उचित ठहराया है। वे लिखती हैं : "प्रोफेसर डे संस्कृत काव्यशास्त्र में निरूपित कवि-प्रतिभा संबंधी विचारों से पूरी तरह अवगत नहीं हैं, यह कहना अनुचित होगा। इसलिए अधिक-से अधिक यही अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रोफेसर डे प्रतिभा विषयक संपूर्ण विवेचन को अपर्याप्त एवं अपूर्ण समझते हैं। तथ्य यही है कि संस्कृन आचार्यों ने प्रतिभा के 'कारयित्री' और 'भावयित्री' दोनों रूपों पर विचार किया है। भावयित्री प्रतिभा पर स्वभावतः अधिक विचार किया गया है किंतु 'कारयित्री' प्रतिभा की सर्वथा उपेक्षा नहीं हुई है। 'काव्य- हेतु' प्रकरण के अंतर्गत आचार्यों ने काव्य की सृजनशक्ति पर यथासंभव गहराई से विचार किया है। 'ह अवश्य है कि उन्होंने प्रत्येक कवि के सृजनसंबंधी निजी अनुभवों का विस्तृत विवरण देते हुए सृजन-प्रक्रिया के लौकिक एव काव्येतर प्रसंगों की चर्चा नहीं की है।"194 विश्वंभरनाथ उपाध्याय का यह कथन भी कि "भारतवर्ष में काव्य-सृजन- प्रक्रिया का उल्लेख सर्वप्रथम भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में मिलता है,195 उक्त मत का ही समर्थन करता है। शिवकरण सिंह ने उस विचाराधारा को भ्रामक और तथ्यहीन कहा है जो यह मानते हैं कि सृजन की परिकल्पना भारतीय काव्यशास्त्र में नहीं है।196 निशांत केतु ने भी अपने एक लेख में इसी मत का समर्थन करते हुए लिखा है, "संस्कृत काव्यशास्त्र में बहु प्रयुक्त 'काव्य-सिसृक्षा' का अर्थ काव्य लिखने की इच्छा है; काव्य-प्रयोजन का अर्थ काव्य का उद्देश्य है और काव्य-हेतु का तात्पर्य काव्य-रचना के कारण से संबद्ध है। ये तीनों पद काव्य की रचना-प्रक्रिया की ओर ही अंशतः संकेत करते हैं।"197
पश्चिम में सृजन की अवधारणा का विकास इस पर निर्मला जैन ने विस्तार से चर्चा की है। पाश्चात्य सौंदर्यबोधशास्त्र में कला को प्रायः 'सृजन' कहा जाता है और कलाकार को 'स्रष्टा'। कला का वाचक शब्द 'आर्ट' जिस लैटिन शब्द 'Ars' से बना है, उसकी मूल धातु 'Ar' है, जिसका अर्थ है-
आशंसक और कलाकार का वृत्त / 135
Page 150
'जोड़ना' और इस तरह कला मूलतः एक 'निर्मित' है और कलाकार निर्माता। इसी प्रकार कवि का अर्थ भी निर्माता या निर्माण करने वाला होता है। पाश्चात्य चिंतन परंपरा में इस आधारभूत अवधारणा को निरंतर विचार-विवेचन के द्वारा विकसित करके ही सृजनसंबंधी व्यवस्थित सिद्धांत का रूप दे दिया गया है। वैसे तो सृजनसंबंधी धारणा बीज रूप में प्लेटो और अरस्तू में ही विद्यमान है, किंतु जिस आधुनिक अर्थ में सृजन का प्रयोग होता है, उसका जन्म यूरोपीय पुन- र्जागरण के साथ हुआ। पाश्चात्य चिंतन परंपरा में अब तक कला को सृजन न मानने का कारण यह था कि ईश्वर की प्रतिस्पर्धा में कलाकार को स्रष्टा और कला को सृजन मानना क्रुफ समझरा जाता था। कैथोलिक चिंतकों का यह दृष्टिकोण था कि "मनुष्य में सृजन की क्षमता नहीं हो सकती है; क्योंकि सृजन का अर्थ है-विश्व में किसी सर्वथा नवीनता या निरपेक्ष परिवर्तन की सृष्टि करना और यह कार्य निश्चित रूप से मनुष्य के वश का नहीं है। वे समभते थे कि जिसे आजकल 'सृजन' कहा जाता है, वस्तुतः वह ज्ञात अथवा ज्ञातव्य नियमों के अनुसार पूर्वपरिचित तत्त्वों का थोड़ा भिन्न क्म स्थापना है। इसलिए उसे 'रचना' या 'कंपोजीशन' कहना अधिक उपयुक्त है।"198 कालांतर में पुनर्जागरण के व्यापक और क्रांतिकारी मानवदर्शन ने मानवमन की रुद्ध शक्तियों को मुक्त करके सृजन की समस्त संभावनाओं के नये द्वार खोल दिये। अब मनुष्य ने वास्तविकता को सीखकर उसका अनुकरण करने की बजाय सृजन के द्वारा नयी वास्तविकता के निर्माण का संकल्प किया, जिससे कला और चिंतन के क्षेत्र में एक नये युग का सूत्रपात हुआ।"199 इस तरह निर्मला जैन यह मानती हैं कि आज पाश्चात्य साहित्य में जिस अर्थ में 'सूजन' शब्द का प्रयोग होता है, उसका कारण यूरोपीय पुनर्जागरण है। सारांश यह है कि पाश्चात्य काव्य-सिद्धांत की तुलना में संस्कृत काव्यशास्त्र में सृजन-पक्ष पर कम विचार किया गया है, किंतु काव्य-सृजन की सवथा उपेक्षा नहीं की गयी है। पश्चिमी चिंतन में विशेष ध्यान काव्य की सृजनप्रक्रिया पर दिया गया है, जबकि संस्कृत काव्यशास्त्र में सृजन-शक्ति की विशेषताओं के निरूपण पर बल है।
हिंदी के विभिन्न चिंतकों की सृजन-प्रक्रिया संबंधी अवधारणाएं हिंदी में इस विषय को लेकर आजकल चर्चा बहुत जोर पकड़ रही है। यद्यपि हिंदी के अधिकतर विद्वानों ने सूजन-प्रक्रिया को अपरिभाष्य, अस्पष्ट और दुरूह कहा है200, तथापि उन्होंने इस विषय पर अपने विभिन्न लेखों और पुस्तकों में भाष्य अवश्य दिये हैं। जिन मनीषियों ने इस विषय पर चर्चा की है उनमें निर्मला जैन, शिवकरण सिंह, कुमार विमल, मुक्तिबोध, गणपतिचंद्र गुप्त तथा रमेशकुंतल मेघ आदि का नाम विशेष उल्लेखनीय है। निर्मला जैन ने इस विषय पर सर्वप्रथम विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने
136/ सौंदयबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 151
भारतीय और पाश्चात्य दोनों विचारकों के विचारों को आधार बनाकर चिंतन किया है। संस्कृत और पाश्चात्य काव्यशास्त्र में सृजनसंबंधी चिंतन किस रूप में हुआ है। इस पर विचार करते हुए तथा विभिन्न विद्वानों के मतों को प्रस्तुत करते हुए वे इस निष्कर्ष पर पहुंची हैं कि पाश्चात्य की तुलना में भारतीय काव्यशास्त्र में सृजनपक्ष पर कम विचार किया गया है। 201 संस्कृत एवं पाश्चात्य मनीषियों की सृजनसंबंधी अवधारणाओं को स्पष्ट करने के उपरांत उन्होंने सृजनसंबंधी कतिपय मुख्य सिद्धांतों का उल्लेख किया है। उन्होंने कला-सृजन की व्याख्या करने वाले सौंदर्यबोधशास्त्रीय सिद्धांतों को दो वर्गों में विभाजित किया है -- वस्तुनिष्ठ और आत्मनिष्ठ।202 उनके अनुवार वस्तुनिष्ठ सिद्धांत वे हैं, जो कला का विवेचन बाह्य वास्तविकता के संदर्भ में करते हुए विश्व या प्रकृति से कला के संभव संबंध पर प्रकाश डालते हैं। यह संबंध बहुत कुछ प्रत्येक चिंतन की वास्तविकता संबंधी धारणा पर निर्भर है। इस वर्ग के अंतर्गत प्लेटो और अरस्तू के अनुकरण-सिद्धांत से लेकर उन्नीसवीं शती के विविध प्रकृतवादी और यथार्थवादी कला-सिद्धांत आते हैं। कला को अनुकरण माना जाये या भाषागत तत्त्वों के निरक्षेप संघटन की प्रक्रिया-ये सभी मान्यताएं प्रकारांतर से कला-सृजन की वस्तुनिष्ठ प्रक्रिया की ओर संकेत करती हैं। इसके विपरीत आत्मनिष्ठ वर्ग के अंतर्गत रोमांटिक कवियों और विचारकों की आत्माभिव्यंजना अथवा आत्माभिव्यक्ति से लेकर क्रोचे के अभिव्यंजनावाद तक के वे सिद्धांत आते हैं जो कला-सृजन की व्याख्या कलाकार वे संदर्भ में करते हुए कला और कलाकार के संबंध पर प्रकाश डालते हैं। इस वर्ग के विचारकों का ध्यान कलाकार के मानस में घटित होने वाली उस आंतरिक प्रक्रिया पर होता है, जिसके द्वारा कला अंतरंग से बहिरंग रूप ग्रहण करती है। इस वर्ग के सिद्धांतों का प्रभाव आधुनिक युग में भी इतना प्रबल है कि कला की सृजन-प्रक्रिया का प्रश्न उठने पर प्रायः इन आत्मनिष्ठ सिद्धांतों में से ही किसी एक अथवा अधिक या सभी सिद्धांतों का उल्लेख किया जाता है। निर्मला जैन यह मानती हैं कि इस सिद्धांत के द्वारा ही सच्चे अर्थों में सृजन-प्रक्रिया पर गहराई से विचार करने की परंपरा का सूत्रपात हुआ।203 आगे लेखिका ने दोनों वर्गों के कला-सिद्धांतों (अनुकरण सिद्धांत, प्रतिभास- सिद्धांत, आत्माभिव्यक्ति सिद्धांत तथा इच्छापूर्ति सिद्धांत) की मुख्य स्थापनाओं का विवरण प्रस्तुत करते हुए यह निष्कर्ष दिया है कि कला-सृजनसंबंधी जो वस्तुनिष्ठ और आत्मनिष्ठ सिद्धांत प्रचलित हैं, उनके अतिवादी आग्रहों को यदि अलग करके संतुलित दृष्टि से विचार करें तो यही निष्कर्ष निकलता है कि कवि या कलाकार जो सृजन करता है, उसमें आत्माभिव्यक्ति के साथ ही अनुकरण का तत्त्व भी मिश्रित रहता है। तात्पर्य यह है कि कला सृष्टि न तो सर्वथा स्वतंत्र आविष्कार है और न ही पूर्णतः यथार्थानुकृति ही; बल्कि उन दोनों का अतिक्रमण करती हुई ऐसी विलक्षण अथवा अलौकिक सृष्टि है, जिसमें ये दोनों तत्त्व किसी-न-किसी रूप में विद्यमान रहते हैं।204 आशंसक और कलाकार का वृत्त / 137
Page 152
भारतीय तथा पाश्चात्य चिंतकों द्वारा सृजन-शक्तिसंबंधी जो धारणाएं प्रस्तुत की गयी हैं उनकी चर्चा भी निर्मला जैन ने की है। संस्कृत काव्यशास्त्र में काव्य की सृजन-शक्ति पर प्रायः 'काव्य-हेतु' प्रकरण के अंतर्गत विचार करने की परंपरा रही है। आचार्यों ने काव्य-हेतु के रूप में प्रतिभा, व्युत्पति एवं अभ्यास तीनों-तत्त्वों को मान्यता प्रदान की है लेकिन प्रायः सभी में प्रतिभा को प्रधान माना गया है। प्रतिभा जैसी भारतीय अवधारणा के समान पाश्चात्य चिंतन में कोई अकेली एक अवधारणा नहीं है। पश्चिम में सृजन-शक्ति संबंधी कुछ विवेचन 'सृजनात्मक सहजानुभूति' (क्रिएटिव इंट्यूशन) के अंतर्गत हुआ है, तो कुछ विवेचन 'सृजनात्मक कल्पना (क्रिएटिव इमेजिनेशन) के अंतर्गत, जिन्हें संक्षेप में निर्मला जैन ने 'सहजानुभूति' और 'कल्पना' कहा है।205 इस तरह सृजन-शक्ति के अंतर्गत लेखिका ने प्रतिभा तथा प्रतिभा जैसी भारतीय आवधारणा के समान पाश्चात्य चिंतन की अवधारणा 'सहजानुभूति' और 'कल्पना' का उल्लेख किया है। उन्होंने प्रतिभा की तुलना भी पाश्चात्य चिंतन में निरूपित 'सहजानुभूति' और 'कल्पना' से की है। इसके अतिरिक्त उन्होंने सृजन-शक्ति के स्वरूप को निश्चित करने के लिए विज्ञान के नवीन आविष्कारों और अनुसंधानों के आधार पर वैज्ञानिकों ने जो प्रयास किये हैं, उनका भी विवेचन किया है।206 कुमार विमल ने सृजन प्रक्रिया को सौंदर्यबोधशास्त्र और मनोविश्लेषणपरक आलोचना का एक समादृत शीर्षक कहा है।207 इसके महत्त्व को देखते हुए उन्होंने इस विषय पर 'काव्य-रचना-प्रत्रिया' शीर्षक से एक पुस्तक का संपादन किया है। इस विषय की धारणा और संकलना को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने संपूर्ण पुस्तक को तीन खंडों में विभाजित किया है-(1) विवेचना, (2) तात्त्विक विश्लेषण तथा (3) व्याव- हारिक रिशीलन। विभिन्न कोणों से प्रस्तुत की गयी इस पुस्तक की सामग्री हिंदी पाठकों के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। इस पुस्तक का पहला लेख कुमार विमल का है जो कि 'रचना-प्रक्रिया का सामान्य स्वरूप' शीर्षक से लिया गया है। उन्होंने अपने इस लेख में 'रचना-प्रक्रिया' को कला-विवेचन या साहित्यालोचन का एक अनिवार्य अंग माना है। इस लेख में उनकी कतिपय मुख्य धारणाएं इस प्रकार हैं : 1. रचना-प्रक्रिया के विश्लेषण से आशय है-रचयिता के सर्जन-कर्म में लीन मन का ऐसा विश्लेषणात्मक अध्ययन जिससे रचना में 'मेकनिज्म' को समझने की चेष्टा की जाती है। 2. साहित्यालोचना के संदर्भ में 'रचना-प्रक्रिया-विमश' की मुख्य सीमा यह है कि अब तक इसमें मुख्यतः कविता को दृष्टिगत रखते हुए भी विचार किया गया है जबकि इसमें उचित यह था कि साहित्य की सभी विधाओं को ध्यान में रखकर विचार किया जाता। 3. रचना-प्रक्रिया के अध्ययन पर बहुत अधिक बलाधिक्य व्यर्थ है, क्योंकि रचना-प्रक्रिया के प्रति बहुत सजग हुए बिना भी अच्छी रचनाएं लिखी जाती रही
138 / सौंदयबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 153
हैं। कतिपय अच्छी कलाकृतियां अथवा रचनाएं इसे स्पष्टतः सिद्ध भी करती हैं कि किसी भी रचना की उत्कृष्टता उसकी सर्जन-प्रक्रिया के पूर्वचचितित सुलभाव या तातत्विक निदिध्यासन पर निर्भर नहीं करती। रचना की उत्कृष्टता तो भावावेग की तीव्रता और अनुभूति की ईमानदारी पर निर्भर करती है। 4. रचना-प्रक्रिया पर गहन विमर्श का प्रारंभ आलोचना में विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान के प्रवेश के साथ हुआ। 5. रचना-प्रक्रिया का मुख्य कार्य रचयिता के अमूर्त भावों को इंद्रियग्राह्य बिंबों के द्वारा मूर्त बनाना है। 6. रचना-प्रक्रिया की भावना और सृजन दो विशिष्ट स्थितियां हैं। इन दोनों विशिष्ट स्थितियों से प्रत्येक रचनाकार को गुजरना पड़ता है। 7. रचना-प्रक्रिया एक मिश्रित या संकुल व्यापार है इसलिए इसका विश्लेषण कठिन होता है। 8. रचना-प्रक्रिया का प्रश्न काव्यशास्त्र या आलोचना के अतिरिक्त मनोविज्ञान के साथ भी है। 9. रचना-प्रक्रिया के तीन महत्त्वपूर्ण अंगभूत घटक हैं-(i) अंतःकेंद्रण, (ii) अंतःप्रेरणा, (iii) स्मरण ।208 कुमार विमल के उपरांत इस विषय पर चर्चा करने वाले चितकों में शिवकरण सिंह का नाम उल्लेखनीय है। शिवकरण सिंह ने 'सृजन-प्रक्रिया' को आधुनिक साहित्य चिंतन का एक अभिन्न अंग माना है। वे आलोचना के क्षेत्र में तथा मूल्यांकन के संदर्भ में, कृति को समझने के लिए, कृतिकार के जीवनपरक और परिवेशसंबंधी आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक अथवा मनोवैज्ञानिक तथ्यों के विश्लेषण को एकांगी तथा उचित सामग्री के प्रभाव और तर्क के आश्रय में पलने के कारण निरर्थक मानते हैं। उनके अनुसार किसी कृति का सही मूल्यांकन इस बात को समझने में है कि कृति के सृजन के मूल में कृतिकार के मन में किस प्रकार की चिंताधारा क्रियाशील रहती है तथा वह किस तरह अपने विचारों को तोड़-मरोड़कर उन्हें कलात्मक ढांचा प्रदान करता है। इस प्रकार उनकी यह एक महत्त्वपूर्ण धारणा है कि सृजन-प्रक्रिया के विश्लेषण से ही सर्जक और उसकी सृष्टि का उचित मूल्यांकन किया जा सकता है। उनकी अन्य कुछ धारणाएं इस प्रकार हैं : 1. सृजन-प्रक्रिया के अंतर्गत कलात्नक सृजन की वे समग्र विशेषताएं आ जाती हैं जिनके माध्यम से कलाकृति का निर्माण होता है। 2. सृजन-प्रक्रिया संबंधी विचार आज के सतत परिवर्तनशील साहित्यिक परिवेश में एक बहुत बड़े प्रश्नवाची चिह्न के साथ अवतरित होता है। यह प्रस्तुत बौद्धिक चेतना के लिए सदैव चैलेंज सिद्ध हुआ है। इसे हर काल में सुलझाने का प्रयत्न किया गया है पर 'ज्यों-ज्यों सुरकित भज्यो चहत त्यों त्यों उरभत जाय' की ही कहावत चरितार्थ होती है। 3. सृजक-मस्तिष्क और समाज में सीधा संबंध होता है। कलाकार समाज
आशंसक और कलाकार का बृत्त / 139
Page 154
का पुरोहित या समाजसुधारक न होकर सृजन की विशिष्टताओं से अलंकृत व्यक्ति होता है। 4. सजन-प्रक्रिया बाह्य यथार्थ के स्थान पर आभ्यंतरिक यथार्थ के उदात्तीकृत रूप का अभिव्यक्तिकरण है। 5. सृजन की परिकल्पना पौरस्त्य काव्यशास्त्र में नहीं है, यह विचार भ्रामक और तथ्यहीन है। 6. सृजन की क्रिया रहस्यमय करिया है। 7. कला-सृजन संश्लेषण का पर्याय माना जा सकता है। वह स्पष्ट रूप में अमुभूति के घटकों-अवबोध, स्मृति, मानसिक स्व्रूप को कलात्मक स्वरूप प्रदान करने का प्रमुख साधन है। 8. कलाकृति केवल स्थायी भावों की निरूपक नहीं होती। कलाकार तो अपनी अनुभूतियों को सुनिश्चित माध्यम से निश्चित परिवेश में प्रकट करता है। उसकी यह क्रिया बुद्धि की मुखापेक्षी होती है। इस रूप में सृजन और बुद्धि का अभिन्न संबंध है। 9. कला सृजन के लिए कलाकार के अवधान के केन्द्रीकरण का भी महत्त्व है। 10. सृजन-प्रक्रिया में कलाकार के जीवन की पूर्व अनुभूतियों, परिस्थितियों और वातावरण का भी महत्त्व है। 11. सृजन के संदर्भ में 'प्रकृति' और अनुषंग (Association) का भी विशेष महत्त्व है। प्रकृति कलाकार की सृजक चेतना के निर्माण का प्रमुख साधन है। वह इसी के माध्यम से अपने हर्ष और विषाद को अभिव्यक्त करता है। 12. सृजन वायवी, शून्य और अमूत नहीं अपितु सार्थक, मूर्त और भावना विशेष का अभिव्यंजक होता है।209 रचना-प्रक्रिया पर मुक्तिबोध ने भी चर्चा की है लेकिन उनकी चर्चा केवल काव्यकला तक ही सीमित है। उन्होंने रचना-प्रक्रिया को जीवन के विराट कंनवस के साथ देखा है। यही कारण है कि इस विषय में उनके चिंतन का क्षेत्र काफी व्यापक है, वह मात्र साहित्य तक ही सीमित नहीं है, उसके अनेक पक्ष हैं-सामाजिक- सांस्कृतिक भी, राजनीतिक-आर्थिक भी। रचना-प्रक्रिया के अध्ययन की जटिलताओं से गजानन माधव मुक्तिबोध अच्छी तरह परिचित हैं। उन्होंने लिखा है, "रचना-प्रक्रिया का तत्त्वपरक विश्लेषण, मेरे खयाल से अत्यंत कठिन है, दुष्कर है।"210 उसका एक महत्त्वपूर्ण कारण उनकी दृष्टि में यह है कि रचना-प्रक्रिया एक नहीं अनेक हैं, विविध हैं और उनकी विभिन्नता अत्यधिक है।211 रचना-प्रक्रिया के वैविध्य का उन्होंने अपनी तीनों पुस्तकों-'एक साहित्यिक की डायरी', 'नयी कविता का आत्मसंघर्ष' तथा, अन्य निबंध' और 'साहित्य का सौंदर्यशास्त्र' में उल्लेख किया है। अलग-अलग पुस्तकों में उन्होंने विभिन्नता के कई आधार बताये हैं :
140 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 155
(i) "विभिन्न व्यक्तियों के लिए सृजन-प्रत्रियाएं भिन्न-भिन्न हैं, विभिन्न युगों में सृजन-प्रक्रियाएं अलग-अलग होती हैं। विभिन्न साहित्य-प्रकारों के लिए भी सृजन-प्रक्रियाएँ भिन्न-भिन्न होती हैं।"212 (ii) "काव्य की रचना-प्रत्रिया के अंतर्गत तत्त्व-बुद्धि, भावना, कल्पना इत्यादि एक होते हुए भी प्रभाव संगठन आंतरिक उद्देश्यों की भिन्नता के साथ ही रचना-प्रक्रिया भी वस्तुतः बदल जाती है।"213 (iii) "रचना-प्रक्रिया एक नहीं, अनेक हैं, विविध हैं और उनकी विभिन्नता अत्यधिक है। रचना-प्रक्रिया, सृजन की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। कवि-स्वभाव, कवि- दृष्टि और विषयवस्तु (या कहिए कथ्य) के अनुसार, वह बनती, बदलती है।"214 (iv) "रचना-प्रक्रिया के संबंध में मतों की भिन्नता स्वाभाविक है। इसका एक कारण नो यह है कि रचना-प्रत्रियाएं स्वयं भिन्न-भिन्न होती हैं। वे कवि-स्वभाव, कवि-दृष्टि और विषयवस्तु के अनुसार, बनती-बदलती रहती हैं। रचना-प्रक्रिया का कोई निर्विशिष्ट सामान्य रूप नहीं है, यद्यपि यह सही है कि उस प्रक्रिया के मूल तत्त्व सर्वसामान्य हैं।"215 (v) "जीवन-परिस्थिति में परिवर्तन से और यथार्थ के नये-नये पहलुओं के खुलने से उनके आभ्यंतरीकरण द्वारा लेखक का जो संवेदनात्मक वैयक्तिक इतिहास बनता है वह इतिहास पूर्ववर्ती प्रवृत्ति के कवियों से सर्वथा भिन्न होता है, अतएव इस नवीन प्रवृत्ति वाले की रचना-प्रक्रिया भी बदल जाया करती है और तदनुसार अभिव्यक्ति शैली भी।"216 (vi) "रचना-प्रक्रिया की विविधताओं के होते हुए भी मुक्तिबोध के अनुसार उमके मूलतत्त्व सर्वमान्य हैं और वे मूलतत्त्व हैं-संवेदनात्मक उद्देश्य, कल्पना, भावना तथा बुद्धितत्त्व। इनके कार्य के बिना रचना-प्रक्रिया संभव नहीं।"217 निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि भले ही मुक्तिबोध की चर्चा मात्र काव्य- कला तक ही सीमित है तथापि उन्होंने काव्य की रचना-प्रक्रिया पर पहली बार इतना काम किया कि आधुनिक कविता के इस तकनीकी पहलू पर सोचने को विवश कर दिया और परंपरा से चली आती हुई रचना-प्रक्रिया की शास्त्रीय धारणाओं को बेकार साबित किया। गणपतिचंद्र गुप्त ने कलाकार की सृजन-प्रक्रिया को रस-सिद्धांत के पांच अवयवों (स्थायी भाव, संचारी भाव, आलंबन, उद्दीपन, अनुभाव) के आधार पर विवेचित किया है। उनकी यह परिकल्पना है कि "साहित्यकार या कवि अपनी स्थायी भावनात्मक प्रवृत्ति अर्थात् मूल प्रकृति, रुचि, मनोवृत्ति, प्रेरणा आदि के अनुसार आलंबन या विषय- वस्तु के प्रति संदर्भ-विशेष, परिवेश, वातावरण (उद्दीपन) के प्रभाव से आकर्षित होकर इसमें प्रवृत्त होता है तथा जब उस विषय में उसकी प्रवृत्ति इतनी गहरी हो जाती है कि उसका आधारभूत विषय के साथ आंतरिक सामंजस्य या तारतम्य स्थापित हो जाता है, तो वह विभिन्न सहयोगी तत्वों (संचारी तत्त्वों) संबंधित अनुभूतियों, अनुभवों, बोध व विचारसूभ्रों के सहयोग से उसे वाणी (भाषा), चेष्टा (अभिनय) आदि विभिन्न प्रकार
आशंसक और कलाकार का वृत्त / 141
Page 156
के अनुभावों या कलात्मक माध्यम से व्यक्त कर देता है। संक्षेप में यही कलाकार की सर्जन-प्रक्रिया है।"218 आगे लेखक ने अपनी इस परिकल्पना की पुष्टि तथा उसके औचित्य की परीक्षा मनोविज्ञान व मनोविश्लेषण के आधार पर की है। सृजन-प्रक्रिया को शुद्ध मनो- वैज्ञानिक विषय मानते हुए वे लिखते हैं, "अभी तक मनोविज्ञान के क्षेत्र में कला एवं साहित्य से संबंधित प्रवृत्तियों का अध्ययन स्वतंत्र रूप से नहीं हुआ अर्थात् विभिन्न मानसिक प्रवृत्तियों का अध्ययन लोक-व्यवहार की दृष्टि से हुआ है। कला-संदर्भ में उनके विश्लेषण का प्रयास न के बराबर ही है, किंतु मनोविज्ञान की ही एक शाखा, मनोविश्लेषण (Psycho-Analysis) में अवश्य इस प्रकार का प्रयास अनेक शोध- कर्ताओं द्वारा गंभीरतापूर्वक हुआ है। इन शोधकर्ताओं में फ्रॉयड, एडलर, युंग के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।"219 कलाकार की सर्जन-शक्ति को सर्जन के लिए प्रेरित एवं उद्दीप्त करने के लिए गणपतिचंद्र गुप्त ने बाह्य कारण व परिस्थितियों के योग को भी अनिवार्य माना है। वे स्पष्ट लिखते हैं कि "कलाकार की सर्जन-शक्ति एक तो किसी रुचिकर विषय का संधान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष में करती रहती है, तो दूसरी ओर विभिन्न स्थितियां, परिस्थितियां, वातावरण परिवेश एवं संदर्भ के प्रभाव के कारण भी विषय-विशेष में उसकी रुचि एवं प्रवृत्ति अधिक होती है। जीवन और जगत् में नाना प्रकार के विषय हैं, किंतु वे स्थिति विशेष या परिस्थिति विशेष में ही हमें रुचिकर प्रतीत होते हैं।"220 इस तरह वे सर्जन-शक्ति की उद्दीप्ति एवं सक्रियता के लिए दो तत्त्व आवश्यक मानते हैं-एक आधारभूत विषय तथा दूसरा परिस्थिति या वातावरण। गणपतिचंद्र गुप्त के इस विषय के विवेचन से उपलब्ध निष्कर्षों को यहां संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है : 1. सर्जन-प्रक्रिया की मूल शक्ति हमारे सामूहिक अचेतन मन की वंश परंपरा- गत एवं जातीय वृत्तियों, संस्कारों, भावनाओं में निहित है, जिसे युंग ने सामूहिक अवचेतन मन की शक्ति के रूप में स्वीकार किया है। इसी को रस की शब्दावली में 'स्थायीभाव' या 'केंद्रीय तत्त्व' कहा जा सकता है। 2. बाह्य विषय एवं परिस्थितियों व वातावरण के प्रभाव से ही अचेतन मन की सर्जन-शक्ति प्रेरित और उद्दीप्त होकर सर्जन-कार्य में प्रवृत्त होती है। 'बाह्य विषय' को रस-शास्त्रीय शब्दावली में 'आलंबन' एवं परिस्थितियों व वातावरण को 'उद्दीपन' कहा जाता है। 3. सामूहिक अचेतन मन की भाव-प्रतिभाएं, वैयक्तिक मन की अनुभूतियों के सहयोग से बिंबों व प्रतीकों के माध्यम से व्यक्न होती हैं। बिबों व प्रतीकों के कारण ही भाषा-शैली में अभिधा के स्थान पर लक्षणा व व्यंजना का संचार हो जाता है। 4. सामूहिक अचेतन मन की सर्जन-शक्ति उद्दीप्त होकर वैयक्तिक अचेतन मन की सामग्री-अनुभूतियां, अनुभव, बोध आदि का उपयोग करती है, जिससे सामूहिक
142 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 157
मन की वृत्तियां वैयक्तिक मन की अनुभूतियों से समन्वित हो जाती हैं।221 इस प्रकार गणपतिचंद्र गुप्त ने रससिद्धांत के अवयवों के आधार पर सर्जन- प्रक्रिया की विवेचना करते हुए अंत में इसकी परिभाषा इस प्रकार दी है, "कविता का स्थायी भाव' (केंद्रीय तत्त्व, विचार, प्रयोजन) 'आलंबन' से प्रेरित एवं 'उद्दीपन' से उद्दीप्त होकर 'संचारी भाव' के सहयोग से 'अनुभावों' के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप में व्यक्त (व्यंजित) होता है। इसी क्रिया को काव्य-सर्जन या कला-सर्जन-प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।"222 सृजन-प्रक्रिया पर विस्तारपूर्वक चर्चा करने वाले हिंदी के अन्य चिंतक रमेश कुंतल मेध हैं। उन्होंने इसे मूलतः मनोविज्ञान तथा शरीर-विज्ञान का विषय कहा है।223 इस विषय से संबंधित उनकी पहली धारणा यह है कि सृजन-प्रक्रिया 'सृजनात्मक कृत्य' की आत्मकथा होने के कारण सर्वाधिक विलक्षण, अपरिभाषाएं, अस्पष्ट और दुरूह है। लेकिन इसके साथ ही वे यह भी मानते हैं कि मनोवैज्ञ निकों, दार्शनिकों, सौंदर्यबोधशास्त्रियों तथा अन्य वैज्ञानिकों ने इस विषय की निरपेक्ष छानबीन कर हमें विपुल सामग्री प्रदान की है, जिसके आधार परसृजन-प्रक्रिया के कुछ निर्धारित चरणों की आयोजना हो सकी है और इसके चारों ओर का रहस्यभरा लोक भी यथेष्ट रूप से उद्घाटित हो गया है।224 सृजन-प्रक्रिया के स्वरूप तथा उसके क्षेत्र को स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं कि "सृजनात्मकता में कृति या कर्ता (एजेंट) के अंतर्मुखी चरण तथा पदार्थ (मैटीरियल) के विनिवेश के बहिमुखी चरण का संयोग होता है जो पर्यावरण (एन्वायरनमेंट) की भूमिका में निवेदित होता है। इस पूरे कलात्मक व्यापार का परिणाम एक भौतिक वस्तु अर्थात् 'कलाकृति' होती है, और इस पूरी कलात्मक निपुणता को 'कला' की संज्ञा दी जाती है। कला अर्थात् जो कौशल द्वारा अभिव्यजनात्मक रूपों के विशिष्ट लक्ष्य को प्राप्त करे। इस रूपावदान में 'माध्यम' अंतर्मुखी चरण को बहिमुखी चरण में रूपांतरित कर देता है। वह रूपांतरण किस प्रकार होता है, यही सृजन-प्रक्रिया का क्षेत्र है। इसलिए 'कला' (क्रिया) की कृति (संज्ञा) अर्थात् 'कलाकृति' की रचना करने वाला संपूर्ण व्यापार सृजन-प्रक्रिया है जो कला और विज्ञान दोनों में क्रियान्वित होता है।"225 रमेशकुंतल मेघ ने 'साईनेक्टिक्स' और 'साइबरनेटिक्स' के आधुनिक ज्ञान के आधार पर सृजन-प्रक्रिया के क्षण में मानव्र-मस्तिष्क की गति प्रक्रिया का भव्य वर्णन किया है। यहां पूर्वपक्ष चूंकि स्पष्टता के साथ प्रस्तुत किया गया है इसलिए उत्तरपक्ष में अधिक स्पष्टता है। सृजन-प्रक्रिया, प्रतिभा और अंतःप्रेरणा के विषय में पूर्वपक्ष यह है कि उन्हें अध्यात्मवादियों और उनसे प्रभावित रोमाटिक कलाशास्त्रियों ने अलौकिक या दिव्यशक्ति माना है। फ्रॉयड ने अवचेतन के आधार पर उन्हें समझाया है। मार्क्स- वाद अथवा वैज्ञानिक भौतिकवादी दृष्टि से यही उचित था कि इन्हें मानव मस्तिष्क की बनावट और गति के भौतिक आधार पर समझाया जाता और इस विषय में मानव मस्तिष्क विज्ञान की जानकारी का प्रयोग ही हमारा अवलंब हो सकता है। रमेश
आशंसक और कलाकार का वृत्त / 143
Page 158
कुंतल मेघ ने पावलोव मनोविज्ञान का सहारा लिया है। लेकिन समस्या यह रही है कि पावलोवी मनोविज्ञान को स्पष्ट करते हुए कई स्थलों पर लेखक ने वाक्यों का अत्यधिक सघनीकरण किया है226 जिससे बौद्धिक गद्य की सृष्टि होती है। लेखक यदि चाहते तो वे वाक्यों को तोड़कर मूनकथ्य को सरल शब्दों में कह सकते थे, क्योंकि ऐसे स्थलों को पढ़ते समय सामान्य पाठक यह सोच सकता है कि पावलोव को सीधे पढ़ना अधिक उपयोगी होता है। जहां लेखक तकनीकी ज्ञान का अपनी भाषा से तारतम्य देते हैं वहां विषय पूर्णतः स्पष्ट होने लगता है। "कौंध का अभ्युदय तब होता है जब व्यक्ति विश्रांत तनाव की दशा में होता है, जब चौकसी से बेखबर होता है, जब उसे सृजन की आजादी होती है। ...... स्वप्न तथा दिवास्वप्न इस दशा के सर्वोत्तम उदाहरण हैं।"227 इस प्रकार रमेशकुंतल मेघ ने पावलोव के अनुकूलित प्रतिवत्तन के सिद्धांत की भित्ति पर, कला-प्रक्रियासबधी सभी प्रत्यय (सूझ, मुक्त आसंग, स्वप्न, दिवास्वप्न, फेंटसी, मिथक, बिंब आदि) स्पष्ट कर दिये हैं। उन्होंने अपनी योग्यता से शारीरिक शास्त्र (फिजियालॉजी) के आधुनिक ज्ञान द्वारा विभक्त मानस असामान्यता, क्रमहीन उछालें, अंतश्चेतना, चेतना-प्रवाह, भ्रम, इद्रजाल, ललित कल्पना, अतिकल्पना, संवेग, संवेदन और इनके विभिन्न संयोजनों को समझाया है। उन्होंने मानव मस्तिष्क का विशद विवरण दिया है और पावलोव के अतिरिक्त वेलेस, गिसेलिन, गोर्डन आदि मनीषियों के अभिमत दिये हैं। इसके साथ ही उन्होंने सृजन-प्रक्रिया के विकासमान चरणों पर भी प्रकाश डाला है, जो आलोचकों के कल्पित या अवैज्ञानिक प्रत्ययों का खंडन कर कलाकार की मनोगतियों के रहस्य को प्रकाशित करते हैं। कलासृजन-प्रत्रियासंबंधी कतिपय एकांगी धारणाओं का भी रमेशकुंतल मेघ ने खंडन किया है। ये धारणाएं इस प्रकार हैं : । सृजन-प्रक्रिया मूलतः मानसिक है। 2 सृजन-प्रक्रिया मात्र अवचेतन का आवेश है जिसमें संवेग ही प्रमुख होते हैं। 3. कला आत्मविमोही (आर्टिस्टिक) मानस का गतिशास्त्र (डाइनेमिक्स) है इसलिए कना-सृजन में प्रतिभा, प्रेरणा और संस्कार को रोमांटिक तथा अतिशयोक्तिपूर्ण प्रभामंडल में रहस्य दीपित किया गया है। 4. सृजन-प्रक्रिया चिंतन बनाम अनुभूति या संवेगों का दुहराव है। उक्त चारों धारणाओं को एकांगी मानते हुए उन्होंने इनसे अपनी असहमति प्रकट की है। पहली धारणा का खंडन करते हुए वे मानते हैं कि "प्रत्येक सृजनात्मक मानवीय प्रतिबोध 'शरीर मस्तिष्क इकाई' का प्रतिफलन है। केवल स्नायु ही नहीं सोचते, संपूर्ण मनुष्य सोचता है, केवल मस्तिष्क ही सृजन नहीं करता, संपूर्ण मनुष्य रचना करता है। हम 'सारे' शरीर के 'साथ' सोचते हैं। हमारी प्रतिक्रिया में क्रियात्मक गठन, भाषागठन और आंत्रिक गठन सभी प्रतिक्रिया करते हैं।"228
144 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 159
दूसरी धारणा का खंडन करते हुए वे स्पष्ट करते हैं कि "सूजनात्मक कार्य का भेद न तो चेतन मानस में है और न ही अवचेतन में। इसकी स्थिति इन दोनों के बीच के नेपथ्य प्रकोष्ठ की 'देहरी' पर है। चेतन और अवचेतन, दोनों में ही सृजन दीप्ति का प्रतिहारी अथवा 'नियंत्रक' (सेंसर) होता है। सृजन प्रक्रिया में स्वतंत्रता अनिवार्य है और सेंसर इसको अवरुद्ध करते हैं। अवचेतन में इसे अवरुद्ध करने वाली संवेगात्मक भग्नाशाएं हैं; तथा चेतन में इसे ऐंद्रियिक उत्तेजनाएं और घिसे-पिटे प्रत्यक्षीकरण अव- रुद्ध करते हैं। केवल मध्यस्थ देहरी में ही सृजनात्मक मस्तिष्क स्वतंत्र होता है।"229 इसी प्रकार वे तीसरी और चौथी एकांगी धारणाओं से असहमति प्रकट करते हुए उनका भी खंडन करते हैं। सृजन कार्य में कलाकार की स्थिति को स्पष्ट करते हुए सृजन प्रक्रिया के दो चरण माने गये हैं-बहिर्मुखी तथा अंतर्मुखी।230 माध्यम को ढालने से लेकर भौतिक कृति तक की अवस्था सृजन प्रक्रिया का बहिर्गत और बहिरमुखी चरण है जहां अन्वेषक अथवा सर्जक एक 'ललित कलाकार' होने के साथ-साथ 'सुदक्ष कारीगर' भी होता है। सृजन प्रक्रिया के बहिमुखी चरण के पूर्व अंतमुखी चरण होता है। इस चरण में कलाकार की जटिल आंतरिक चेतना में बहुत कुछ' घट चुका होता है अर्थात् वह भौतिक सामाजिक जगत् के अभिज्ञान में प्रतीकों और बिबों को आयत्त कर चुका होता है। इस प्रकार अनुक्रम और सहकम से आंतरिक सृजन और बाह्य सृजन होता है। पाश्चात्य कलामनीषी कोचे केवल आंतरिक सुजन तक ही सूजन प्रक्रिया का अंत मानते हैं। वे कलाकृति द्वारा बहिर्गत प्रेषणीयता को नहीं मानते। उनकी दृष्टि में कलानुभव एक विशुद्ध मानसिक अनुभव है। कलाकृति उस अनुभव का भौतिक स्मारक है और वह केवल तकनीकी मुकाबला है। रमेशकुंतल मेघ करोचे की इस धारणा का भी खंडन करते हैं। वे लिखते हैं, "कोचे तो कला रूपों को भौतिक और सामाजिक स्रोतों से काट देते हैं। अंतमुखी सृजन तो महज अंग है। सारा सृजन तो शरीर मस्तिष्क की इकाई होकर ही उन्मीलित होता है। अंतर्मुखी सृजन शून्य से नहीं उत्पन्न होता इसके लिए भी प्रशिक्षण तथा भौतिक सामाजिक जगत के प्रतीकों की अपेक्षा होती है। 'तथ्यों' एवं 'अनुभवों' को प्रतीक में रूपांतरित करने की प्रक्रिया वैयक्तिक से अधिक सांस्कृतिक है। कच्चे पदार्थ (पत्थर, रंग, ध्वनि) या गति (मुद्रा, नृत्य) का रूनांतरण, या आकृति विधान, सहज स्फूर्त अथवा सुविचारित हो सकता है। इसके समारंभ करने में कोई आवेश या तीव्र संवेदना होती है। लेकिन कलाकार के सृजनात्मक सामर्थ्य को माध्यम से अलहदा नहीं किया जा सकता। शरीर से मस्तिष्क को अविच्छिन्न करना असंभव है।"231 इस प्रकार हम यह देखते हैं कि सृजन प्रक्रिया पर रमेशकुंतल मेघ द्वारा किये गये चिंतन में नवीनता तथा मोलिकता का आभास होता है। अन्य सौंदर्य तत्त्ववेत्ताओं की तुलना में उन्होंने, इस विषय की एकांगी धारणाओं का खंडन करते हुए तथा 7 आशंसक और कलाकार का वृत्त /145
Page 160
विभिन्न पाश्चात्य विचारकों के मतों को स्पष्ट करते हुए रेखाचित्रों द्वारा इस विषय को वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करना उचित समझा है। उक्त सभी विद्वानों के अतिरिक्त हिंदी में इस विषय पर प्रासंगिक रूप से चर्चा हरद्वारीलाल शर्मा तथा नगेन्द्र ने भी की है। हरद्वारीलाल शर्मा ने अपनी पुस्तक 'सुंदरम्' में 'आनंद व आश्चर्य से परिपूर्ण भ्रमों को प्रस्तुत करने की प्रक्रिया, प्रयास और क्षमता' को सृजन कहा है।232 एक अन्य स्थान पर वे लिखते हैं कि "मन की यह एक विचित्र घटना है जिससे विश्व में अभिनव और अभिराम का उदय होता है। जीवन का कोई क्षेत्र इससे अछूता नहीं। ..... सृजन में मुक्ति का उल्लास, बुद्धि की परिधि के पार अभिनव आलोक का उदय, अनेक को एक में समाहित करके समंजन से उत्पन्न अंतःप्रसाद और अहंकार के जड़बंधनों से मुक्त मन का बिहार में सब अनुभूतियां अनुस्यूत रहती हैं।"233 नगेन्द्र ने रचना प्रक्रिया को स्वतंत्र रूप प्रदान न करके, कलाकृति को प्रमुख रखकर उसके अंतर्गत इस विषय को उठाया है। उनके अनुसार, "कला की रचना यांत्रिक करिया अथवा शिल्प-नैपुण्य मात्र न होकर मानसी सृष्टि है-अर्थात् कलाकार की भावना या मानसिक बिब की सृष्टि है।"234 इसके साथ ही वे यह भी मानते हैं कि "कलाकृति की रचना में शिल्प प्रविधि का महत्त्व तो है ही, पर व्यक्ति तत्त्व का महत्त्व और भी अधिक है। कृति में प्राण का संचार व्यक्ति की प्रतिभा के संस्पर्श से ही होता है।"235 नगेन्द्र ने कलाकृति की रचना प्रक्रिया के अंतर्गत केवल काव्य-कला को ही नहीं लिया है अपितु उन्होंने मूर्ति, चित्र, संगीत इत्यादि की रचना प्रत्रिया का भी विवेचन भारतीय वाङमय के अंतर्गत किया है। सृजन प्रक्रिया पर हिंदी के उक्त सभी विद्वानों के मतों को देखते हुए हम यह वह सकते हैं कि अधिकतर मनीषियों ने कलामीमांसा के संदर्भ में सृजन प्रक्रिया की चर्चा अन्य विचारणीय विषयों की भांति केवल काव्य-कला को ही दृष्टिगत रखते हुए की है। रमेशकुंतल मेघ, नगेन्द्र आदि ही ऐसे चिंतक हैं, जिन्होंने सभी कलाओं के संदर्भ में इस विषय को उठाया है। इन दिनों सृजन प्रक्रिया के अध्ययन विश्लेषण की ओर हिंदी कला तथा सौंदय चिंतकों का ध्यान पाश्चात्य मनीषियों की अपेक्षा अधिक आकृष्ट हुआ है। क्योंकि पाश्चात्य साहित्य में अब यह स्वर मुखर है कि कला-आलोचक का स्थान भावक का स्थान होता है। वे इस बात पर बल देते हैं कि उसे भावक के रूप में अपनी सीमा को समभना चाहिए। अगर वह अपनी सीमा को छोड़कर सृजक की दृष्टि से कला पर विचार करना चाहेगा, तो अपने प्रयत्न में असफल हो जायेगा। अतः पाश्चात्य मनीषी यह जरूरी समझते हैं कि वे भावक-पक्ष को ही अधिक-से-अधिक समर्थ, सक्षम और सशक्त बनायें। यद्यपि उनका यह दृष्टिकोण अपने-आपमें महत्त्वपूर्ण है तथा वे सृजन प्रक्रिया को यथार्थ रूप में निरूपित करना कठिन मानते हैं तथापि हिंदी के कला-
146 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 161
चितकों की यह स्पष्ट धारणा है कि सृजन प्रक्रिया के विश्लेषण का अभिन्न अंग स्वीकार करते हुए, सृजन प्रक्रिया के प्रति कला चिंतकों की पूर्वापेक्षया अधिक सावधानी अथवा जागरूकता को कलाशास्त्रीय चैतन्य एवं सर्जन-नैपुण्य की दृष्टि से एक शुभ लक्षण मानते हैं।
संदर्भ
- निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 242 2. गणेश तयंबक देशपांडे, भारतीय साहित्यशास्त्र (बंबई : पापुलर बुक डिपो, प्रथम संस्करण, 1960), पृ० 324 3. निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र, पृ० 241 4. वही, पृ० 245 5. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : द मैकमिलन कंपनी ऑफ इ डिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 139-140 6. वही, पृ० 135 7. वही, पृ० 140 8. उद्धृत-निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली: नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 248 9. वही, पृ० 253-54 10. शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद: वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 205 11. वही, पृ० 202 12. वही, पृ० 203 13. सुरेन्द्रनाथ त्रिपाठी, साहित्य कला और रुचि (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 129 14. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 142 15. शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृo 203 16. रामकीति शुक्ल, सौंदर्य का तात्पर्य (लखनऊ : उत्तर प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्रथम संस्करण, 1975), पृ० 54 17. राजेन्द्र प्रताप सिंह, सौंदर्यशास्त्र की पाश्चात्य परंपरा (इलाहाबाद: नया साहित्य, प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1962), पृ० 192-93 18. (क) रमेशकुंतल मेघ, अथाती सौंदर्य जिज्ञासा (दिब्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 141 (ख) हरद्वारीलाल शर्मा, साहित्य और कला (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1959), पृ० 103
आशंसक और कलाकार का वृत्त / 1478
Page 162
- राजेन्द्रप्रसाद सिंह, सौंदर्यशास्त्र की पाश्चात्य परंपरा (इलाहाबाद: नया साहित्य प्रकाशन प्रथम संस्करण, 1962), पृ० 194 20. शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद: वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 217 21. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 145-46 22. शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 207 23. रामकीति शुक्ल, सौंदर्य का तात्पर्य (लखनऊ: उत्तर प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्रथम संस्करण, 1975), पृ० 57-58 24. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 142 25. सुरेन्द्रनाथ त्रिपाठी, साहित्य, कला और रुचि (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 127-28 26. मानविकी पारिभाषिक कोश (साहित्य खंड), संपादक-नगेन्द्र (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1965), पृ० 23 27. रमेशकृंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 145 28. वही, पृ० 147 29. वही, पृ० 149 30. मानविकी पारिभाषिक कोश (साहित्य खंड) संपादक-नगेन्द्र (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1965), पृ० 23 31. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी आफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 149 32. वही 33. शांतिप्रिय द्विवेदी, 'भारतीय कला का संरक्षण', विशाल भारत (कला अंक), संपादक- बनारसीदास चतुर्वेदी, अंक 1, भाग 7, जनवरी 1931 (कलकत्ता : अपर सरक्यूलर रोड), प० 97 34. रामरतन भटनागर, 'सौंदर्य चेतना और नीति', समालोचक (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक) संपादक- रामविलास शर्मा, अंक 1, वर्ष 1, फरवरी 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृ० 154 35. रामचंद्र शुक्ल, कला और आधुनिक प्रवृत्तियां (लखनऊ: पुरुषोत्तम दाम टंडन, हिंदी भवन, तृ तीय संस्करण, 1974), पृ० 64 36. वही, पृ० 66 37. सूर्यनारायण व्यास, 'कला और कलाकार', सम्मेलन पत्रिका (कलाअंक), संवादक-रामप्रतप त्रिपाठी शास्त्री, संख्या 2-3, भाग 44, मई 1959 (प्रयाग : हिंदी सारित्य सम्मेलन), पृ० 270 38. प्रकाशचंद्र गुप्त, 'कला और मौलिकता,' सम्भेलन पत्रिका (कला अंक), वही, पृ० 49 39. रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्री, 'संपादकीय', सम्मेलन पत्रिका (कला अंक), वही, पृ० ड 40. ब्रजभूषण पांडेय, 'कला : शिल्प : शैली', वही, पृ० 370 41. विश्वभरनाय उपाध्याय, जलते और उबलते प्रश्न (जयपुर : बोहरा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 128 148/ सौदयबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 163
- प्रभुदयाल मौतल, ब्रज को कलाओं का इतिहास (दिल्ली : साहित्य प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 8 43. ब्रजगोपाल तिवारी, 'कला और कलपना पर एक दार्शनिक दृष्टि', समालोचक (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक-रामविलास शर्मा, अंक 1, वर्ष 1, फरवरी, 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृ० 22 44. आर० जी० कलिंगवुड, कला के सिद्धांत, अनुवादक-ब्रजभूषण पालीवाल (जयपुर: राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्रथम संस्करण, 1972), पृ० 288 45. मोहदत्त, 'हिंदी की वाम कविता का सौंदर्यशास्त्र', मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र, संपादक-कमला प्रसाद, ज्ञानरंजन (पहल पत्रिका द्वारा प्रकाशित, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 139 46. ओंकार शरद, संपादक-महादेवी, साहित्य (भाग-1) (झांसी : सेतु प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 309 47. हजारीप्रसाद द्विवेदी 'कला प्रयोजन' कला और साहित्य (आकाशवाणी से प्रसारित पंद्रह वार्ताओं का संग्रह) संफादक-अनुल्लिखित (दिल्ली : निदेशक, प्रकाशन विभाग, द्वितीय संस्करण, 1966), पृ० 14 48. नीहाररंजन राय, भारतीय कला का अध्ययन (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 164 49. हरद्वारीलाल शर्मा, साहित्य और कला (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1959), पृ० 102-103 50. वही, पृ० 103-104 51. पुरुषोत्तम दास अग्रवाल, 'ललित कला', साहित्य संदेश, संपादक-गुलाबराय, अंक 6, वर्ष 16, दिसंबर 1954 (आगरा, : साहित्य रत्न भंडार), पृ० 207 52. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 155 53. दीनू कौशिक, 'कला के विषय में कुछ भ्रांत धारणाएं' कल्पना, संपादक-आर्येन्द्र शर्मा, अंक 3, वर्ष 2, जून 1951 (हैदराबाद : बेगम बाजार), पृ० 112 54. रामरतन भटनागर, 'सौंदर्य चेतना और नीति,' समालोचक (सौंदर्यशास्त्र विशेशांक), संपादक-रामविलास शर्मा, अंक 1, वर्ष 1, फरवरी 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृ० 154-55 55. नवलकिशोर मिश्र, 'काव्यानुभूति का स्वरूप', शोध पत्रिका, संपादक-देवीलाल पालीवाल, अंक 1, वर्ष 18, 1967 (उदयपुर : साहित्य संस्थान राजस्थान विद्यापीठ), पृ० 76 56. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 158-60 57. वही, पृ० 155-58 58. चही, पृ० 155.56 59. वही, पृ० 156 60. वही, पृ० 157 61. अभिमन्यु, 'भारतीय काव्यशास्त्र में प्रतिभा विवेचन', शोध-पत्रिका : (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक-सुरेशचंद्र त्यागी, 1979 (मेरठ: विश्वविद्यालय हिंदी परिषद), पृ० 67 62. शिवकरण सिंह, कला सूजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 230
आशंसक और कलाकार का वृत्त / 149 120
Page 164
- हिंदी वकरोक्तिजीवित, व्याख्याकार आचार्य विश्वेश्वर, संपादक-नगेन्द्र (दिल्ली : आत्माराम एंड संस, संस्करण, 1955), पृ० 43 (भूमिका) 64. हिंदी साहित्य कोश (भाग-1), संपाइक-धीरेन्द्र वर्मा (वाराणसी : ज्ञानमंडल लिमिटेड, द्वितीय संस्करण, संवत् 2020), पृ० 513 65. मानविकी पारिभाषिक कोश (साहित्य खंड), संपादक-नगेन्द्र (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1965), पृ० 132 66. मानक हिंदी कोश (तीसरा खंड), संपादक-रामचंद्र वर्मा (प्रयाग : हिंदी साहित्य, सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1964), पृ० 607 67. हिंदी शब्द सागर (छठा भाग), संपादक-श्यामसुंदर दास (दाराणसी : काशी नागरी प्रचारिणी सभा, नवीन संस्करण 1969), पृ० 3155 68. भारतीय साहित्य कोश, संपादक-नगेन्द्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 19811, पृ० 749 69. हरद्वारीलाल शर्मा, काव्य और कला (अलीगढ़ : भारत प्रकाशन मंदिर, प्रथम संस्करण, अनुल्लिखित), पृ० 81 70. कांतिचंद्र पांडेय, स्वतंत्र कलाशास्त्र (प्रथम भाग), (वाराणसी : चोखंबा संस्कृत सीरीज ऑफिस, प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 188 71. शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 230 72. अभिमन्य्, भारतीय काव्यशास्त्र में प्रतिभा-विवेधन', शोध-पत्रिका : (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक) संपादक-सुरेशचंद्र त्यागी, 1979 (मेरठ : विश्वविद्यालय हिंदी परिषद), पृ० 67 73. निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय आवृत्ति, 1977), पृ० 397 74. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिय लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 164 75. भगीरथ दीक्षित 'अभिनव साहित्य चिंतन (दिल्ली : इंद्रप्रस्थ प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 96 76. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिय। लिमिटेड, प्रयम संस्करण; 1977), पृ० 173 77. हिंदी साहित्य कोश (भाग-1), संपादक-धीरेन्द्र वर्मा (वाराणसी : ज्ञानमंडल लिमिटेड, द्वितीय संस्करण, संवत् 2020), पृ० 513-14 78. कांतिचंद्र पांडेय, स्वतंत्र कलाशास्त्र (प्रथम भाग), (वाराणसी : चोखंबा संस्कृत सीरीज ऑफिस, प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 198 79. अभिमन्यु, 'भारतीय काव्यशास्त्र में प्रतिभा-विवेचन', शोध-पत्रिका : (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक-सुरेशचंद्र त्यागी, 1979 (मेरठ : विश्वविद्यालय हिंदी परिषद), पृ० 70 80. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 163-67 81. अभिमन्यु, 'भारतीय काव्यशास्त्र में प्रतिभा-विवेचन', शोध पत्रिका : (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक-सुरेशचंद्र त्यागी, 1979 (मेरठ : विश्वविद्यालय हिंदी परिषद), पृ० 68 82. रमेशकुंतल मेव, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी आफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 167 83. वही, पृ० 175 84. वही
150/ सौंदर्य बोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 165
- धर्मवीर भारती, 'अंतःप्रेरणा और पलायन' कला और साहित्य (आकाशवाणी से प्रसारित पंद्रह वार्ताओं का संग्रह), संपादक-अनुल्लिखित (दिल्ली : निदेशक प्रकाशन विभाग, द्वितीय संस्करण, 1966), पृ० 61 86. वही, पृ० 61-62 87. रमशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 176 88. वही, पृ० 175 89. धर्मवीर भारती, 'अंतःप्रेरणा और पलायन', कला और साहित्य (आकाशवाणी से प्रसारित पंद्रह वार्ताओं का संग्रह), संपादक-अनुल्लिखित (दिल्ली: निदेशक प्रकाशन विभाग, द्वितीय संस्करण, 1966), पृ० 62 90. प्र मत्यागी, 'भविष्य का सौंदर्यशास्त्र'. शोध पत्रिका (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक- सुरेशचंद्र त्यागी, 1979 (मेरठ : विश्वविद्यालय हिंदी परिषद्), पृ० 179-80 91. धमवीर भारती, 'अतःप्रेरणा और पलायन', कला और साहित्य (आकाशवाणी से प्रसारित पंद्रह वार्ताओं का संग्रह), संपादक-अनुलिलिखित (दिल्ली : प्रकाशन विभाग, द्वितीय संस्करण, 1966), पृ० 62 92. हरद्वारीलाल शर्मा, साहित्य और कला (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1959), पृ० 113 93. वही 94. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 129 95. सुरेशचंद्र त्यागी, छायावादी काव्य में सौंदर्य दर्शन (मेरठ : अनुराधा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 108 96. रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तात्विक विवेवन एवं ललित कलाएं (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 74 97. शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969) पृ० 261 98. एस० टी० नरसिंहाचारी, सौंदर्य तत्त्व निरूपण (दिल्ली : वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 111 99. भारतीय साहित्य कोश, संपादक-नगेन्द्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1981), पृ० 213 100. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ०129 101. सुरेशचंद्र त्यागी, छायावादी काव्य में सौंदर्य दर्शन (मेरठ : अनुराधा त्रकाशन, प्रथम संस्करण 1976), पृ० 100 102. शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969) पृ० 262 103. रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तात्विक विवेचन एवं ललित कलाएं (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 74 104. नगेन्द्र, आस्था के चरण (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 114 105. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 129
आशंसक और कलाकार का वृत्त / 151
Page 166
- रमेशकुंतल मेघ, अथ तो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 182 107. शिवकरण सिंह, कला सूजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण; 1969), पृ० 262 108. रामनाथ सुमत, 'यथार्थ और कल्पना' कला और साहित्य (आकाशवाणी से प्रसारित पंद्रह वार्ताओं का संग्रह) संपादक-अनुल्लिखित (दिलली : निदेशक प्रकाशन विभाग, द्वितीय संस्करण 1966), पृ० 43 109. सुरेशचंद्र त्यागी, छायावादी काव्य में सौंदर्य दर्शन (मेरठ: अनुराधा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 100, 110. (क) हिंदी विश्वकोश (खंड-2) संरादक-धीरेन्द्र वर्मा (वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, प्रयम संस्करण, 1962), पृ० 386 (ख) हिंदी शब्द सागर (द्वितोय भाग), संपादक-श्यामसुंदर दास (वाराणती: नागरी प्रचारिणी सभा, नवीन संस्करण, 1967), पृ० 856 (ग) मानक हिंदी कोश (पहला खंड), संपादक-रामचंद्र वर्मा (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1962), पृ० 484 (घ) हिंदी साहित्य कोश (भाग-1), संपादक-धीरेन्द्र वर्मा (वाराणसी : ज्ञानमंडल लिमिटेड, द्वितीय संस्करण, संवत् 2020), पृ० 227 (च) मानविकी पारिभाषिक कोश (साहित्य खंड), संपादक-नगेन्द्र (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1965), पृ० 227 111. श्यामसुंदरदास, साहित्यालोचन (इलाहाबाद : इंडियन प्रेस, संस्करण, 1959), पृ० 78 112. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, रसमीमांसा, संपादक-विश्वनाथ प्रसाद मिश्र (वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, चतुर्थ संस्करण, संवत् 2023), पृ० 211-98 113. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977) पृ० 194 114. रामलाल सिंह, आचार्य शुक्ल के समीक्षा-सिद्धांत (वाराजसी: नागरी प्रचारिणी सभा, प्रथम संस्करण, संवत् 2026), पृ० 242 115. कुमार विसल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्त (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृo 170-71 116. वही, पृ० 71 117. हरद्वारीलाल शर्मा, कला विज्ञान (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1951), पृ० 57 118. वही, पृ० 59-60 119. हरद्वारीलाल शर्मा, सुंदरम् (लखनऊ: हिंदी समिति उत्तर प्रदेश शासन, प्रथम संस्करण 1975), प्रृ० 74 120. रविशंकर रावल 'चित्रकला का मर्म', सम्मेलन पत्रिका (कला अंक), संपादक-रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्रो, संख्या 2-3, भाग 44, मई, 1959 (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन), पृ० 150 121. हंसकुमार तिवारी, कला (गया : मानसरोवर प्रकाशन, संस्करण अनुल्लिखित), पृ० 29 122. वही, पृ० 30-31 123. किसी भी वस्तु या तथ्य को एक विशेष भावदृष्टि की सहायता से अभिनव रूप में प्रकट करने की जो कवि-वृत्ति है, उसी का नाम कल्पना है। उद्धृत, अभिमन्यू, 'भारतीय काव्यशास्त्र में
152 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 167
प्रतिभा-विवेचन' शोध-पत्निका (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक) संपादक-सुरेशचंद्र त्यागी, 1979 (मेरठ : विश्वविद्यालय हिंदी परिषद), पृ० 74 124. 'प्रकृति का अनुसरण करना कला का उद्दैश्य नहीं है। यदि हमें कला का विकास करना है, तो अपनी कल्पना की प्रखर प्रतिभा को पल्लवित करना होगा। तब हमें स्वतः सृजन का सामर्थ्य सुलभ हो जायेगा, जिससे हमारी नवीन सृष्टि का श्रीगणंश होगा।' -रामचंद्र शुक्ल, कल और आधुनिक प्रवृत्तियां (लखनऊ : राजर्षि पुरुषोत्तमदास ठंडन, हिंदी भवन, तृतीय संस्करण, 1974), पृ० 87 125. 'कल्पना ही वह तत्व है, जिससे कलाकार को नूतन सृजन और अभिनव रूप-व्यापार-विधान की शक्ति प्राप्त होती है।' -कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : रामकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 129 126. 'कल्पना कवि-कलाकार की सृजन शक्ति का नाम है जिसके बिना नवनिर्माण कर सकना संभव नहीं।' -सुरेशचंद्र त्यागी, छायावादी काव्य में सौंदर्य दर्शन (मेरठ : अनुराधा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, T1976), पृ० 101 127. 'कलपना ही वह शक्ति है, जिसके आधार पर कलाकार अपनी नवीन सृष्टि को रूप प्रदान करता है।' -रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तातत्विक विवेवन एवं ललित कलाएं (दिल्ली नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 74 128. नगेन्द्र, आस्था के चरण (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 117 129. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 130 130. वही, पृ० 193 131. रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तात्विक विवेचन एवं ललित कलाएं (दिलली नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 81 132. वही 133. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 194 134. वही, पृ० 193-94 135. वही, पृ० 195 136. शिवबालक राय, काव्य में सौंदर्य और उदात्त तत्त्व (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 97-98 137. शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद: वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 262 138. वहो, पृ० 261 139. एस० टी० नरसिहाचारी, सौंदर्य तत्व निरूपण (दिल्ली : वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 112 140. वही, पृ० 112-113 141. रमेशकुतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया: लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 190 142. वही, पृ० 192 100 07.06 .201
आशंसक और कलाकार का वृत्त / 153 A21
Page 168
- हिंदी साहित्य कोश (भाग-1), संपादक-धीरेन्द्र वर्मा (वाराणसी : ज्ञानमंडल लिमिटेड, द्वितीय संस्करण, संवत् 2020), पृ० 227 144. भारतीय साहित्य कोश, संपादक-नगेन्द्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1981), पृ० 213 145. मानविकी पारिभाषिक कोश (साहित्य खंड), संपादक-नगेन्द्र (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1965), पृ० 141 146 हिंदी काव्य प्रकाश, व्याख्याकार-सत्यव्रत सिंह, (वाराणसी: चौखंबा विद्या भवन, चतुर्थ संस्करण, 1973), पृ० 30 (भूमिका) 147. हिंदी वकोक्ति जीवित, व्याख्याकार-आचार्य विश्वेश्वर, संपादक-नगेन्द्र (दिल्ली : आत्मारम एंड संम, संस्करण, 1955), पृ० 49 (भूमिका) 148. शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रत्रिया (इलाहाबाद: वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 291 149. कुपार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 142 150. सुरेशचंद्र त्यागी, छायावादी काव्य में सौंदर्य-दर्शन (मेरठ : अनुराधा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 101 151. शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969) : पृ० 292 152. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 182 153. रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशारत्र का तास्विक विवेचन एवं ललित कलाएं (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 76 154. अभिमन्यु, 'भारतीय काव्यशास्त्र में प्रत्रिया-विवेचन', 'शोध-पत्रिका' : (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक-सुरेशचंद्र त्यागी, 1979 (मेरठ: विश्वविद्यालय हिंदी परिषद), पृ० 76 155. गणपतिचंद्र गुप्त, साहित्य विज्ञान (चंडीगढ़ : भारतेन्दु भवन, संस्करण, 1963-64), पृ० 177 156. भारतीय साहित्य कोश, संपादक-नगेन्द्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1981), पृ० 213 157. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 142 158. वही 159. बलदेव उपाध्याय, भारतीय साहित्यशास्त्र (प्रथम खंड), (वाराणसी : नंदकिशोर एंड संस, द्वितीय संस्करण, 1963), पृ० 332 160. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, रसमीमांसा, संपादक-विश्वनाथ प्रसाद मिश्र (वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, चतुर्थ संस्करण, संवत् 2023), पृ० 250 161. निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउत, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 415 162. शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969) पृ० 292 163. वही, पृ० 261 154 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 169
- रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 182-83 165. (क) (1) "कुछ विचारक 'फैसी' को कल्पना का निम्न, कृश या अल्प रूप मानते हैं, कुछ विचारक 'फैसी' को कलपना से श्रष्ठ मानते हैं और कुछ विचारक दोनों को एक ही अर्थ का द्योतन करने वाला पर्यायवाची सानते हैं। किंतु, अधिक मान्यता इसी पक्ष को मिल सकी है कि 'फैसी' कल ना का एक अवर या निम्न रूप है, अर्थात् 'फैसी' उपकल्पना या अतिकल्पना है। अतः हम सर्वाधिक मान्य इसी पक्ष को लेकर अपनी विवेचना प्रारंभ करेंगे और शेष दो पक्षों की प्रसंगानुसार यथा- स्थान संक्षिप्त चर्चा कर देंगे।" -कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1981), पृ० 172 (II) "हमें इस महत्त्वपूर्ण बात को स्वीकार कर लेना है कि काव्य एवं ललित कलाओं के नंदतिक बोध की दृष्टि से 'फँसी' की तुलना में कल्पना को निर्विवाद ऊचा स्थान दिया गया है।" -कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), ५० 180-81 (ख) "इस प्रसंग में फैंसी के स्वरूप पर भी विचार कर लेना आवश्यक जान पड़ता है। क तिपय चिंतक फैंसी को कल्पना का निम्न रूप मानते हैं तथा कुछ दोनों को एक ही अर्थ के द्योतक पर्यायवाची मानते हैं। इसमें पहला मत ही अधिक मान्य है।" -सुरेशचंद्र त्योगी, छायावादी काव्य में सौंदर्य दर्शन (मेरठ : अनुराधा प्रकाशन प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 108 (ग) ........... किंतु सामान्य धारणा यह है कि फैसी कल्पना की तुलना में अवर और हीन होती है। हिंदी में सामान्यतः फैसी के लिए अति कल्पना का व्यवहार होता है।" -रायलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तात्विक विवेचन एवं ललितकलाए (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 80 166. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 174 167. देवराज, संस्कृति का दार्शनिक विवेचन (लखनऊ : सूचना विभाग उत्तर प्रदेश, प्रथम संस्करण, 1957), पृ० 231 168. हरद्वारीलाल शर्मा, कला-विज्ञान (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1951), पृ० 57 169. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 181-82 170 वही, पृ० 188 171. शिवबालक राय, काव्य में सौंदर्य और उदात्त तत्त्व (इलाहाबाद: वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 98 172. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, रस मीमांसा, संपादक-विश्वनाथप्रसाद मिश्र (वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, चतुर्थ संस्करण, संवत् 2023), पृ० 229-36
आशंसक और कलाकार का बृत्त / 155
Page 170
- रामनाथ सुमन, 'यथार्थ और कल्पना', 'कला और साहित्य' (आकाशवाणी से प्रसारित पंद्रह वार्ताओं का संग्रह), संपादक : अनुल्लिखित (दिल्ली : निदेशक, प्रकाशन विभाग, द्वितीय संस्करण, 1966), पृ० 44-45 174. हंसकुमार तिवारी, कला (गया : मानसरोवर प्रकाशन, प्रथम संस्करण, सन् अनुल्लिखित), पृ० 31 175. रामनाथ सुमन, यथार्थ और कल्पना 'कला और साहित्य' (आकाशवाणी से प्रसारित पंद्रह वार्ताओं का संग्रह, संपादक-अनुल्लिखित (दिल्ली : निदेशक, प्रकाशन विभाग, द्वितीय संस्करण, 1966), पृ० 44 176. शिवबालक राय, काव्य में सौंदर्य और उदात्त तत्त्व (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 99 177. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 188 178. वही 179, वही 180. वही 181. ब्रजगोपाल तिवारी, 'कला और कल्पना पर एक दार्शनिक दृष्टि', समालोचक : (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक-रामविलास शर्मा, अंक 1, वर्ष 1, फरवरी, 1958) (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृ० 19 182. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 189 183. वही, पृ० 196: 184. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, रस मीमांसा, संपादक-विश्वनाथ प्रसाद मिश्र (वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, चतुर्थ संस्करण, संवत् 2023), पृ० 21 185. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्लौ: राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 197-99 186. वही, पृ० 199-211 187. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977) पृ० 190-91 188. वही, पृ० 194 189. वही 190. वही, पृ० 194 191. वही 192. वही, पृ० 196 193. निशांत केतु, 'काव्य, रचना प्रक्रिया तथा शब्दानुबंध', काव्य रचना प्रक्रिया, संपादक-कुमार विमल (पटना : बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी प्रथम संस्करण 1974), पृ० 233 194. निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 356 195. विश्वंभरनाथ उपाध्याय, जलते और उबलते प्रश्न (जयपुर : बोहरा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 37 196. शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद: वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 11 156 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन: ऐतिहासिक परंपरा
Page 171
- निशांत केतु, 'काव्य, रचना प्रक्रिया तथा शब्दानुबंध, काव रचना प्रक्रिया, संपादककुमार विमल (पटना : बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्रथम संस्करण, 1974), पृ० 233 198. निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 359 199. वही, पृ० 360 200. (क) 'वस्तुतः काव्य सृजन की बुद्धिसंगत व्याख्या की दिशा में निरंतर किये जाने वाले प्रयासों के दौरान प्रायः यह अनुभव होता रहा है कि सृजन व्यापार में कुछ ऐवा है, जो बुद्धि की पकड़ में नहीं आता।' -निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्विपीय संस्करण, 1977), पृ० 418 (ख) 'सृजन प्रक्रिया संबंधी विचार आज के सतत परिवर्तनशील साहित्यिक परिवेश में एक बहुत बड़े प्रश्नवाची चिह्न के साथ अवतरित होता है। यह प्रस्तुत बौद्धिक चेतना के लिए सदैव चैलेंज सिद्ध हुआ है। इसे हर काल में सुलझाने का प्रयत्न किया गया, पर 'ज्यों-ज्यों सुरझि भज्यो चहत त्यों-त्यों उरझत जाय' की ही कहावत चरितार्थ होती है।' -शिवकरण सिंह, कला-सृजन-प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 3 (ग) "रचना प्रक्रिया का तत्वपरक विश्लेषण मेरे खयाल से अत्यंत कठिन है, दुष्कर हैं।" -गजानन माधव मुक्तिबोध, नये साहित्य का सौंदर्यशारत्र (दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन सं करण, 1971), पृ० 69 (घ) "रचना प्रक्रिया एक संकुल और पक्षबहुल व्यापार है तथा उसका स्वरूप विश्लेषण आसान नहीं है। -कुमार विमल 'रचना प्रक्रिया का सामान्य स्वरूप', काव्य रचना प्रक्रिया, संपादक- कुमार विमल (पटना : बिहार हिंदी ग्रंथ अकादनी, प्रथम संस्करण, 1974', पृ० 8 (च) "रचना प्रक्रिया एक आत्मनिष्ठ चीज है जिस तक रचिता के अलावा किसी की पहुंच नहीं होती।" -देवराज, 'रचना प्रक्रिया : सामग्री, दृष्टि और स्तर,' वही, पृ० 42 शा (छ) रचना की प्रत्रिया शुद्ध, निरपेक्ष और निश्चित नहीं होती। इसके अंतर्गत अनुभव और चिंतन के अनेक व्यक्ताव्यक्त आयाम कर्मशील होते हैं, सापेस्ताएं सक्रिय रहती हैं और रचनाकार विशेष की आत्मनिष्ठता के आधार पर वैविध्य की पद्धतियां सिलती हैं। कुल मिलाकर, रचना प्रत्रिया मिश्रित और दुर्बोध्य है। कर :- निशांत केतु, 'काव्य, रचना प्रक्रिया तथा शब्दानुबंध', वही, पृ० 248 (ज) "कई कलाकार और सृजनात्मक व्यक्ति अपनी सृजन प्रक्रिया के विषय में काफी मुखर भी रहे हैं। फिर भी सृजन प्रक्रिया 'सृजनात्मक कृत्य (क्रिएटिव ऐक्ट)' की आत्मकथा होने के कारण सर्वाधिक विलक्षण, अपरिभाषय, अस्पष्ट और दुरूह रही है।" - रमेशकु तल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिलली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 191 201. निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिलली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 358 202. वही, पृ० 364 203. वही
आशंसक और कलाकार का वृत्त / 1578
Page 172
204, निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 391-92 205. वही, पृ० 397 206. वही, पृ० 399-401 207. संगादक-कुमार विमल, काव्य रचना प्रक्रिया (पटना. बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्रथम संस्करण, 1974), पृ० क (प्राक्कथन) 208. वही, पृ० 3-12 209. शिवकरण सिंह, कला सूजन प्रक्रिया (इलाहाबाद: वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 3-18 210. गजानन माधव मुक्तिबोध, नये साहित्य का सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1971), पृ० 69 211. वही, पृ० 69 212. गजानन माधव मुक्तिबोध, एक साहित्यिक की डायरी (दिल्ली : भारतीय ज्ञानपीठ, चतुर्थ संस्करण 1976), पृ० 12 213. गजानन माधव मुक्तिबोध, नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध (नागपुर : विश्व भारती प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 22 214. गजानन माधव मुक्तिबोध, नये साहित्य का सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1971/, पृ० 69 215. वही, पृ० 82 216. वही, पृ० 89 217. वही, पृ० 82 218. गणपतिचंद्र गुप्त, रस सिद्धांत का पुनर्विवेचन (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1971), पृ० 379 219. वही, पृ० 380 220. वही, पृ० 384 221. वही, पृ० 386 222. वही, पृ० 387 223. रमेशकु तल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकसिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण 1977), पृ० 199 224. वही, पृ० 197 225. वही, पृ० 198 226. "अवरोधन का 'सेरिब्रल' केंद्रों से जो प्रवाह होता है वह उत्तेजना (एक्साइटेशन) की अपेक्षा अधिक मंद होता है; और जब अवरोधन 'सेरिबरल गोलक' में छा जाता है तब निद्रा आ जाती है अर्थात् कोशाओं (सेल) का विकीर्ण अवरोधन घटित हो जाता है। इसके विपरीत केंद्र में उत्तेजना को प्रगाढ़ता की उच्चकोटि (जब केंद्र उत्तेजना की दुर्बल नाभियों से आने वाली उत्तजना को आकर्षित कर लेता है) को 'अधिपति' (डोमिनेंट) कहते हैं। संगठित काम (बर्क) में 'अधिपतियों' की महत्त्वपृर्ण भूमिका होती है। जब अन्य सभी उत्तजक (स्टिमुलाइ) किसी विशिष्ट परिणाम को प्राप्त करने की कामना, किसी समस्या के समाधान करने के महत्व, किसी विचार की सिद्धि के अनुवर्ती हो जाते हैं तब मस्तिष्क में उत्तजना का एक सशक्त केंद्र बन जाता है। फलतः अनुकूलित संपर्क अधिक आसानी से कायम हो जाते हैं, और काम अधिक प्रयोजनपूर्ण और अधिक निपुण हो जाता है।' अभिविन्यासी प्रतिवर्त (ओरिएंटिंग
158 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 173
रिफ्लेक्स) अर्थात् नये बाह्य उत्तेजक (स्टिमुलाइ) के प्रति रिपलक्प के उदित होने पर संवेदनामूलक 'अनुकूलित प्रतिवर्त' (कांडीशंड रिफ्लेक्स) शिथिल हो जाते हैं।" वही, पृo 212-13 227. रमेशकुतल मंघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण 1977), पृ० 213 228. वही 229. वही, पृ० 200-201 230. वही, पृ० 202 231. वही, पृ० 203 232. हरद्वारीलाल शर्मा, सुदरम् (लखनऊ: हिंदी समिति उत्तर प्रदेश शासन, प्रथम संस्करण, 1975), पृ० 72 233. वही, पृ० 156-57 234. नगेन्द्र, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण 1978), पृ० 120 235. वही, पृ० 122
ही
आशंसक और कलाकार का वृत्त 159
Page 174
अध्याय-3
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम
संपूर्ण कला संसार प्रमुख रूप से अनुभूति और अभिव्यजना का ऋणी है। हरद्वारीलाल शर्मा ने इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए "सच्ची बात को सीधे प्रकार कहना"1 ही कला की उचित परिभाषा मानी है। उनकी इस परिभाषा से दो तत्त्व स्पष्ट होते हैं-सच्ची बात अर्थात् कलाकार की सच्ची अनुभूति तथा सीधा प्रकार अर्थात् अभिव्यंजक सामग्री और उसका विन्यास। कला का पहला तत्त्व कलाकार का मानस है, जिसके किसी कोने में ही सर्व- प्रथम इसका स्फुरण होता है। चाहे वह उसकी अंतरात्मा की कोई प्रखर वेदना हो, बुद्धि की कोई सूझ हो, मन का कोई मर्म हो, अहंभाव हो या उल्लास, आत्मविजय, निर्वेद विषाद जो कुछ भी हो। कला का दूसरा तत्त्व मन की इसी अनुभूति की अभि- व्यंजना अर्थात् अभिव्यक्ति है। कलाकार मन की अनुभूति को उचित सामग्री और रूप में अभिव्यक्त करके ही संतुष्ट होता है तथा किसी कलाकृति को जन्म दे पाता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि कला की संभावना के लिए अनुभूति और अभि- व्यंजना अनिवार्य है। जहां ये दोनो मिलते हैं वहां ही कला की सृष्टि होती है। "कितने ही ऐसे व्यवित संसार में हैं-और सारा संसार ही क्यों नहीं है ?- जो वेदना का भार लिये फिरते हैं, नाना भाव-निधियों को वहन किये हैं, अनेक सरस अनुभूतियों को दबाये हुए हैं, माधुर्य और प्रेम के मधु में सराबोर हो चुके हैं, उदात्त आदर्शो का आलोक देख चुके हैं, निराशा की तपोमय गुहा में रहे हैं। आशा का उदय देखा है; और न जाने क्या-क्या देखा, सुना और सहा है। किंतु वे गाना चाहते हैं पर उनके पास स्वरों का साधन नहीं, लिखना चाहते हैं पर तूलिका मनोभाव का साथ नहीं देती, कह देना चाहते हैं परंतु शब्द उनकी अनुभूति को नहीं पकड़ पाते, तबीयत नाच उठने को करती है पर पद गति में लय नहीं, जी चाहता है कि अपनी दिवंगता प्रियतमा की स्मृति में ताज से भी मनोहर महल बना दूं परंतु वह शाहजहां का वैभव कहां और न उनकी कला-मर्मज्ञता, और न है समरकंद, हिरात के कलाकारों का सहयोग"2 अतः स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति तब तक किसी कला को जन्म नहीं दे पाता है, जब तक कि वह अपनी अनुभूतियों को उचित सामग्री और रूप में अभिव्यक्त नहीं कर पाता है अर्थात् कला की संभावना के लिए इन दोनों का होना अनिवार्य है। हिंदी के कुछ चिंतकों ने इन दोनों में से किसी एक की प्रधानता का प्रश्न भी 160
Page 175
उठाया है। जयशंकर प्रसाद ने अनुभूति एवं अभिव्यंजना को सौंदर्य के दो पक्ष मानते हुए अनुभूति को अधिक महत्त्व प्रदान किया है। उनका यह त्क है कि अनुभूति ही मुख्य है, अभिव्यक्ति तो केवल उसका परिणाम है, अनुभूति की मात्रा के अनुसार ही अभि- व्यक्ति भी सुंदर हो उठती है। जहां अभिव्यक्ति में कुछ अस्पष्टता अथवा प्रभावहीनता प्रतीत हो, वहां अनुभूति की अपूर्णता ही समझी जानी चाहिए। उन्होंने इन संबंधों में हिंदी के दो सर्वश्रेष्ठ कवियों, सूरदास तथा तुलसीदास का दृष्टांत सामने रखा है। वे पूछते हैं, "कहा जाता है कि वात्सल्य की अभिव्यक्ति में तुलसीदास सूरदास से पिछड़ गये हैं, तो क्या यह मान लेना पड़ेगा कि तुलसीदास के पास वह कौशल या शब्द- विन्यास-पटुता नहीं थी, जिसके अभाव के कारण ही वे वात्सल्य की संपूर्ण अभिव्यक्ति नहीं कर सके?"3 आगे इस प्रश्न का उत्तर भी वे स्वयं देते हैं, "मैं तो कहूंगा कि यही प्रमाण है आत्मानुभूति की प्रधानता का। सूरदास के वात्सल्य में संकलात्मक मौलिक अनुभूति की तीव्रता है, उस विषय की प्रधानता के कारण श्रीकृष्ण की महा- भारत में युद्ध-काल की प्रेरणा सूरदास के हृदय में उतने समीप न थी, जितनी शिशु गोपाल की वृंदावन की लीलाएं। रामचद्र के वात्सल्य-रस का उपयोग प्रबंध-काव्य में तुलसीदास को करना था, उस कथानक की क्म-परंपरा बनाने के लिए। तुलसीदास के हृदय में वास्तविक अनुभूति तो रामचंद्र की भक्त-रक्षण समर्थ दयालुता है, न्यायपूर्ण ईश्वरता है, जीव की शुद्धावस्था में पाप-पुण्य-निर्लिप्त कृष्णचंद्र की शिशु-मूर्ति का शुद्धाद्वैतवाद नहीं।"4 इस तरह जयशंकर प्रसाद अनुभूति को प्रधान मानते हुए अभिव्यक्ति को केवल रचना-कौशल समझते हैं। दूसरी तरफ आचार्य नंददुलारे वाजपेयी जैसे चिंतक हैं जो कि यह मानते हैं कि "अनुभूति चाहे जितनी हो, काव्य का निर्माण नहीं हो सकता। काव्य-निर्माण के लिए काव्यात्मक अभिव्यक्ति ही आवश्यक है। अभिव्यक्ति केवल रचना-कौशल नहीं है, अनुभूतिपूर्ण रचना-कौशल है।"5 अनुभूति और अभिव्यंजना को लेकर उठाया गया यह प्रश्न कि इन दोनों में कौन महत्त्वपूर्ण है, अधिक सार्थक नहीं लगता है। न तो अनुभूति उपेक्षणीय है और न अभिव्यक्ति अवहेलनीय। इन दोनों तत्वों का अपना-अपना महत्त्व है। कला के कलेवर में ये दोनों ही तत्त्व आत्मा और शरीर की भांति संपूक्त रहते हैं। हजारीलाल शर्मा6 तथा शिवकरण सिंह7 के अनुसार अनुभूति उसकी आत्मा है तथा अभिव्यक्ति उसका शरीर। जिस प्रकार शरीर से आत्मा प्रतिच्छायित होती है उसी प्रकार अभिव्यक्ति से कलाकार के अंतःस्पंदनों अर्थात् उसकी अनुभूति का ज्ञान हो जाता है। अभिव्यक्ति कलाकार की अनुभूति को प्रभावोत्पादन एवं प्रभाव-सक्षम कलापक्ष में परिणत करने की प्रमुख साधन भी है। कला में अनुभूति अभिव्यंजना के इसी महत्त्व को देखते हुए हमने इस अध्याय में उनके विभिन्न आयामों का उल्लेख किया है। अभिव्यंजना
हिंदी के विभिन्न कला-मनीषियों ने कला को परिभाषित करते हुए, किसी एक बिंद, पर
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 161
Page 176
पहुंचकर कहीं-न-कहीं यह माना है कि कला भावों अथवा अनुभूतियों की अभिव्यंजना अथवा अभिव्यक्ति है (देखें, अध्याय 2.1.1.2)। दूसरे शब्दों में, उन्होंने अनुभूति की अभिव्यंजना अथवा अभिव्यक्ति के रूप में कला की परिभाषा दी है। इस मान्यता के अनुसार और भाव अथवा अनुभूति के बीच अभिव्यंजना का संबंध है। लेकिन प्रश्न उठता है कि जब कला मनीषी कला या काव्य को भावों अथवा अनुभूति की अभिव्यंजना कहते हैं तो अभिव्यंजना से इनका क्या तात्पर्य सिद्ध होता है ? दूसरे शब्दों में, अभि- व्यंजना की प्रकृति क्या है ? यदि इसी बात को और भी निश्चित शब्दावली में कहें तो अभिव्यंजित और अभिव्यंजक में क्या संबंध होता है? इस विषय पर चितन हिंदी के कला तथा सौंदर्यचितकों ने किस रूप में किया है, इसे जानने से पूर्व 'अभिव्यंजना' शब्द के व्युत्पत्तिपरक तथा कोशगत अर्थ को जान लेना भी आवश्यक होगा।
अभिव्यंजना: व्युत्पत्तिपरक तथा कोशगत अर्थ व्युत्पत्ति के अनुसार 'अभिव्यंजना' शब्द अभि उपसर्गपूर्वक व्यज् धातु में अनट् प्रत्ययोपरांत टापू के योग से बना है। लेकिन साहित्यिक दृष्टि से 'अभिव्यजना' शब्द 'अभि' ('किसी की ओर गमन' अर्थ का वाचक) तथा 'वि' ('बिना या अलग' अर्थात्, विशद्ध या निर्मल अर्थ का वाचक) उपसर्गपूर्वक 'अंजन' (नेत्र को निर्मल, स्वच्छ व ज्योतिमान् बनाने वाला द्रव्य-विशेष और अंजना ....-. अर्थात्, अंजन करने की क्रिया या पद्धति) शब्द से बना हुआ जान पड़ता है। इसका साहित्य के परिवेश में रामेश्वर लाल खंडेलवाल ने इस प्रकार अर्थ किया है, "वह प्रक्रिया या व्यापार विशेष जिसके द्वारा कवि अथवा लेखक अपनी कला-कुशलता से अपनी विवक्षित या वणित वस्तु के प्रति पाठक या श्रोता के मनश्चक्षुओं को ध्वनि, रीति, गुण वक्रोक्ति, औचित्य आदि सामग्रियों के मेल से ऐसा निर्मल बना दे कि जिससे वर्णित पदार्थ अपनी पूर्ण कला में उनके समक्ष खिल उठे।8 हिंदी कोशों में अभिव्यंजना शब्द कई अर्थों में प्रयुक्त होता है। 'हिंदी विश्वकोश' के अनुसार, इस शब्द का अर्थ है-'विचारों का प्रकाशन'। इसके द्वारा मनुष्य अपने मनोभावों को प्रकाशित करता तथा अपनी भावनाओं को रूप देता है।"9 'हिंदी शब्दसागर' में अभिव्यंजन शब्द के प्राकट्य, अभिव्यक्ति, प्रकाश और विकास तथा अभिव्यंजना शब्द का 'मन के भावों का शब्दों में चित्रण या रूपविधान' अर्थ किया गया है।10 'मानक हिंदी कोश' तथा 'मानविकी पारिभाषिक कोश' में अभिव्यंजन, अभिव्यंजना तथा अभिव्यक्ति शब्द को अंग्रेजी शब्द 'एक्सप्रेशन' के हिंदी रूपांतर के रूप में देखा गया है। 'मानक हिंदी कोश' ने इसके दो अर्थ इस प्रकार स्पष्ट किये हैं : 1. विचारों या भावों को शब्दों या संकेतों द्वारा ठीक तरह से तथा स्पष्ट रूप से प्रकट करने की क्रिया या भाव।
162/ सौंदयबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 177
- भाषिक क्षेत्र में, कोई बात शब्दों द्वारा बहुत ही सुंदर ढंग से व्यक्त करना।11 इसी प्रकार 'मानविकी पारिभाषिक कोश' में भी साहित्य के संदर्भ में अभिव्यक्ति के दो अर्थ बतलाये गये हैं : 1. किसी आंतरिक अनुभव, भाव विचार, आकांक्षा आदि का बाह्य प्रकाशन। 2. किसी एक वस्तु द्वारा किसी दूसरी वस्तु का संकेत।12 चूंकि हिंदी कोश में अभिव्यंजन, अभिव्यंजना अथवा अभिव्यक्ति शब्द का अंग्रेजी शब्द 'एक्सप्रेशन' के हिंदी रूपांतर के रूप में प्रचलित सुपरिचित है इसलिए यहां 'एक्सप्रेशन' के शब्दकोशीय अर्थ को भी देख लेना उचित होगा। वामन शिवराम आप्टे ने 'इंग्लिश-संस्कृत कोश' में 'एक्सप्रेशन' शब्द के जो अर्थ दिये हैं उन्हें वर्गीकृत करके सावित्री सिन्हा ने इस प्रकार रखा है : 1. व्यजना, प्रकाशन, बोधन, ज्ञापन, आविष्करण, ख्यापन, निरूपण। 2. निष्पीडन, निष्कर्षण। 3. वदन, आस्य, आकृति। 4. कथन, वचन, उक्ति, वाक्य, पद, शब्द। 5. रीति, मार्ग, पद्धति, सरणि।13 अभिव्यंजन, अभिव्यंजना या अभिव्यक्ति तथा उसके अंग्रेजी पर्यायवाची शब्द 'एक्सप्रेशन' के उपर्युक्त व्युत्पत्तिपरक तथा शब्दकोशीय अर्थों से यह स्पष्ट है कि सामान्यतः यह शब्द मनुष्य के द्वारा अपने विचारों या अनुभूतियों को बाहर प्रकट करने के किसी भी क्रियाकलाप या साधन के लिए प्रयुक्त होता है। किंतु अपने विशेष अर्थ में इन शब्दों का प्रयोग किसी भी कलाकृति की उन विशेषताओं के लिए होता है जिनके साथ 'बाह्य' विशेषण जोड़ा जा सकता है। दूसरे शब्दों में 'अभिव्यंजना' शब्द कलाकार के आंतरिक अनुभव की संपूर्ण भौतिक या बाह्य अभिव्यक्ति का वाचक है।
हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का अभिव्यंजना संबंधी चिंतन यद्यपि 'अभिव्यंजना' शब्द हमारी अपनी भाषा का प्राचीन शब्द है तथा इसके प्राचीन अर्थ के साथ ही पाश्चात्य संपर्क के कारण कुछ नयी अर्थ-छायाएं आकर संबद्ध हो गयी हैं।14 तथापि आधुनिक युग में, सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतन में इस शब्द को सम्मानित पद और व्यापक प्रचलन का श्रेय निर्मला जैन ने इतालवी चिंतक बेनदेतो क्रोचे को दिया है। उनके अनुसार, क्रोचे के सीधे, सरल एवं संक्षिप्त सूत्र 'कला अभिव्यंजना है' ने ही इस शब्द को प्रचलित किया है।15 पाश्चात्य मनीषियों ने अभिव्यंजना शब्द का कोई स्पष्ट तथा निश्चित अर्थ निर्धारित करना कठिन माना है। सूजन लेंगर तथा जेरोम स्तोलनित्ज जैसे विचारकों ने इस शब्द के प्रयोग की व्यापकता और अराजकता का जो उल्लेख किया है वह निर्मला जैन के शब्दों में इस प्रकार है, "सौंदर्यशास्त्र के ग्रंथों में इस शब्द का प्रमुख स्थान है,
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 163
Page 178
क्योंकि वह एकाधिक अर्थों में प्रयुक्त होता है और परिणामस्वरूप पुस्तक-पुस्तक में ही नहीं बल्कि एक ही पुस्तक के अंतर्गत अनुच्छेद-अनुच्छेद में इसका अर्थ परिवर्तित होता रहता है। इसी प्रकार की कठिनाई का अनुभव करते हुए एक अन्य विचारक स्तोलनित्ज ने लिखा है कि 'अभिव्यंजना' शब्द अत्यंत अस्पष्ट है और उसका एक स्पष्ट निश्चित अर्थ निर्धारित करना कठिन है। इधर 'अभिव्यंजना' के अर्थ संबंधी विश्लेषण की दिशा में व्यवस्थित प्रयास हुए हैं, किंतु इनमें से किसी भी प्रयास को कदाचित पूर्ण सफल नहीं कहा जा सकता।"16 पाश्चात्य चिंतकों की भांति भले ही हिंदी के कुछ चिंतकों ने भी इस शब्द की व्यापकता और अराजकता को देखते हुए इसे विविधार्थी कहा है तथा इसके किसी निश्चित तथा स्पष्ट अर्थ को बताने में कठिनाई महसूस की है,17 तथापि वे इस पर चर्चा अवश्य करते हैं। हिंदी के प्रथम सौंदर्यतत्त्ववेत्ता हरिवंशसिंह शास्त्री ने अपनी पुस्तक 'सौंदर्य- विज्ञान' के प्रथम अध्याय में 'जीवन में सौंदर्य का स्थान' निर्धारित करते हुए प्रासंगिक रूप से इस विषय पर चर्चा की है। उन्होंने केवल यही टिप्पणी की है कि "प्रत्येक मनुष्य चाहे वह सभ्य हो या असभ्य उसमें सौंदर्य को अभिव्यक्त करने की प्रवृत्ति अवश्य पायी जाती है। वह अपनी अभिव्यक्ति कविता, संगीत तथा चित्र आदि कलाओं में शुरू से ही करता आ रहा है।"18 मनुष्य अपने सौंदर्यानुभव की अभिव्यंजना किस रूप में करता है इसके उन्होंने तीन प्रकार बतलाये हैं : 1. बाह्य सौंदर्य को ग्रहण करके। 2. अनुकरण करके। 3. सौंदर्य-सृष्टि करके। सौंदर्याभिव्यंजना के उक्त तीनों रूप न केवल एक सभ्य मनुष्य में ही अपितु एक बच्चे में भी देखे जाते हैं।19 इस विषय पर इससे अधिक चर्चा हरिवंश सिंह शास्त्री नहीं कर पाये हैं। इनके उपरांत इस विषय पर कुछ विस्तार से चर्चा हरद्वारीलाल शर्मा ने की है। सुंदर वस्तु का विश्लेषण करते हुए हरद्वारीलाल शर्मा ने उसके तीन तत्त्व (भोग, रूप तथा अभिव्यक्ति) माने हैं। तीसरे तत्त्व अभिव्यक्ति अथवा अभिव्यंजना के प्रश्न को उन्होंने 'काव्य' और 'कला' तथा 'सौंदर्यशास्त्र' इन दोनों पुस्तकों में उठाया है। 'काव्य और कला' में अभिव्यक्ति की परिभाषा देते हुए वे लिखते हैं, "रूप अपने अतिरिक्त किंतु अपने माध्यम से जिन तत्त्वों को प्रस्तुत करता है। कला के क्षेत्र में उसे अभि- व्यक्ति कहते हैं।"20 यहां वे इस विषय पर अधिक चिंतन तो नहीं करते हैं, लेकिन 'सौंदर्यशास्त्र' पुस्तक में इसकी एक अन्य परिभाषा, 'अमूर्त अनुभूति को मूर्त करना अभिव्यक्ति है' देते हुए, इससे संबधित तीन प्रश्नों का विस्तार से उल्लेख करते हैं : 1. अमूर्त्त को मूर्त करना कैसे संभव होता है ?
164/ सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन: ऐतिहासिक परंपरा
Page 179
- इसके लिए प्रेरणा कहां से मिलती है? 3. हम किन अमूत्त अनुभूतियों को मूर्त करना चाहते हैं ? 21 पहले प्रश्न के बारे में उनका मत है कि "हम मूर्त करने के लिए किसी भौतिक पदार्थ को माध्यम बनाते हैं। सबसे उत्तम माध्यम वही हो सकता है जो हमारी अनुभूति को सबसे अधिक ग्रहण कर सके, जिसमें हमारी आत्मा का सबसे स्पष्ट प्रतिबिब उतर सके, जिसमें सर्वाधिक 'लोच' हो।"22 इसी प्रकार दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए वे लिखते हैं, "अभिव्यजना के लिए प्रेरणा के दो केंद्र मानव-इतिहास में रहे हैं। एक तो अंतर्जगत की घटनाएं, जैसे-उल्लास, उत्साह, आत्मविजय, गौरव-समर्पण, प्रेम, क्रोध आदि ...... साधारण जीवन के अनुभव नहीं जिनके लिए हमें दैनिक जीवन में ही तुप्ति के साधन मिल जाते हैं ...... वरन् ऐसे गंभीर अनुभव जिनमें वेदना की इतनी तीव्रता रहती है कि इनकी पूर्ति साधारणतया संभव ही नहीं-ये अनुभव मनुष्य को अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित करते हैं। कला, विज्ञान, साहित्य यहां तक कि धर्म व नीति और दार्शनिक सिद्धांतों का आविष्कार इन्हीं अनुभूतियों की अभिव्यंजना के लिए होता है। प्रेरणा का दूसरा केंद्र बाह्य जगत् का सौंदर्य ही है। संसार में पर्याप्त रंग, ध्वनि है जिसके चित्रण के लिए स्वाभाविक प्रवृत्ति 'अनुकरण' के रूप में विद्यमान है। बाह्य जगत् के चित्रण और अंतर्जगत् के प्रतिर्बिबन के लिए हमें निरंतर स्वाभाविक प्रेरणा मिलती है।"23 हम किन अनुभूतियों को मूर्त करना चाहते हैं, इसके उत्तर में उनका कथन है कि "हम उन अमूर्त अनुभूतियों को मूर्त करना चाहते हैं, जिनसे हमें आनंद का लाभ होता है तथा जिनसे हमारा मानव-जीवन समृद्ध और पुष्ट होता है।"24 हरद्वारीलाल शर्मा ने सुंदर वस्तु का विश्लेषण करते हुए जो तीन तत्त्व (रूप, भोग, अभिव्यक्ति) माने हैं, उनका समर्थन हिंदी में मक्खनलाल शर्मा तथा वीणा माथुर ने भी किया है। मक्खनलाल शर्मा ने 'समालोचक' पत्रिका के सौंदर्यशास्त्र-विशेषांक में अपने लेख 'सौंदर्य और रूपतत्त्व' में मुख्यतः रूपतत्त्व की चर्चा करते हुए प्रासंगिक रूप से अभिव्यक्ति तत्त्व के महत्त्व को उद्घाटित किया है। वे लिखते हैं, "भोग और रूपतत्त्व के समन्वय से ही हमें आनंद आने लगता है किंतु वह आनंद अपनी चरमकोटि पर बिना अभिव्यक्ति के पहुंच नहीं पाता और 'रसदशा का अनुभव चरमावस्था में ही स्वीकार किया गया है अतः यह स्वीकार किया गया है कि मंदिर, मस्जिद, मूर्ति, चित्र, संगीत और काव्य आदि सभी कलाभिव्यक्तियों में गंभीर मानव अनुभूतियां हमें सबसे अधिक प्रभावित करती हैं। किसी मानव-भाव को व्यंजित न करने वाली अभिव्यक्ति कला की सीमा में नहीं आती है। महात्मा बुद्ध के उज्ज्वल मुख पर जो पवित्र भाव प्रदर्शन कराया गया है वही उस मूर्ति का सर्वस्व है और वही हमारे आनंद का मूल कारण है तथा कला की श्रेष्ठता सिद्ध करने में उसका मुख्य हाथ है। इसी तत्त्व को अभिव्यक्ति कहा जाता है।"25 इसी तरह वीणा माथुर की भी यह धारणा है कि "भोग और रूप वस्तु के पार्थिव तत्त्व होते हैं, जिनसे उद्भूत भावों की व्यंजना द्वारा अभिव्यक्ति
सौंदर्यानुभूति एवं सीदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 165
Page 180
ततत्व का आभास होता है। कवि अथवा कलाकार अपनी सौंदर्यानुभूति को जिस रूप में प्रकट करता है, वही अभिव्यक्ति तत्व है। सौंदर्य के साक्षात्कार से व्यक्ति को आश्चर्य, उल्लास और आनंद आदि की विभिन्न अनुभूतियां होती हैं, जिन्हें कलाकार अपने विभिन्न रंगों अथवा रेखाओं की संयोजना द्वारा सजीव बनाता है। साहित्यिक अनुभव भी इसी अभिव्यक्ति तत्त्व का ही एक रूप है।"26 हरद्वारीलाल शर्मा के बाद इस विषय पर चिंतन 'सम्मेलन पत्रिका' के कला अंक में रामानंद तिवारी तथा भोलानाथ तिवारी द्वारा हुआ है। रामानंद तिवारी ने 'सत्यं शिवं सुंदरम्' का स्वरूप स्पष्ट करते हुए 'अभिव्यक्ति को सुंदरम् का मूल स्वरूप' तथा समस्त साहित्य और कला को इसी अभिव्यक्ति के बीज से उत्पन्न कल्पवन कहा है।27 उन्होंने अभिव्यक्ति के आंतरिक और बाह्य दो रूपों का स्पष्टीकरण भी किया है। अभिव्यक्ति के इन दोनों रूपों में उन्होंने एक आंतरिक समन्वय माना है। उनके शब्दों में, "कलाकृति के संवंध में अधिक विश्वास के साथ यह कहा जा सकता है कि आंतरिक अभिव्यक्ति में आह्लादित होने वाली चेतना अन्य चिद्बिंदुओं में अभिव्यक्ति और आह्लाद का विस्तार करके अभिव्यक्ति को अधिक पूर्ण और आह्लाद को अधिक संपन्न बनाती है। यह उचार नहीं वरन् उसके स्वभाव का ही पूर्ण प्रकाश है। विश्व के प्रायः सभी कवि और कलाकार बाह्य कृतियों में अपनी आंतरिक अभिव्यक्ति को साकार बनाते रहे हैं। यह सामाजिक तादात्म्य में कलात्मक अभिव्यक्ति के आंतरिक सौंदर्य और आह्लाद की पूर्णता का पर्याप्त प्रमाण है ...... इसी प्रकार कला कृतियों के बाह्य और सामाजिक रूप में कलात्मक अनुभूति (आंतरिक अभिव्यक्ति) की संपन्नता विदित होती है। यह सत्य है कि जिस प्रकार सृष्टि में शक्ति का समस्त सौंदर्य व्यक्त नहीं हो सकता, उसी प्रकार कलाकृतियों में भी आंतरिक अनुभूति की समस्त विभूति अनुवादित नहीं हो सकती। हमारा तात्पर्य केवल इतना ही है कि अभिव्यक्ति के दोनों रूपों में एक आंतरिक संबंध है। आंतरिक अभिव्यक्ति बाह्य कृति में साकार और संपन्न होती है तथा बाह्य अभिव्यक्ति को आंतरिक अभिव्यक्ति से शक्ति और सौंदर्य प्राप्त होते हैं।"28 अभिव्यक्ति के इन्हीं दो रूपों का उल्लेख 'सम्मेलन पत्रिका' के कला अंक में भोलानाथ तिवारी ने भी किया है। उन्होंने कला पर विभिन्न विद्वानों की परिभाषाओं को देते हुए उसकी अंतिम परिभाषा यह मानी है कि "कला अभिव्यक्ति है।" लेकिन यह अभिव्यक्ति कहां होती है ? इस प्रश्न को लेकर उन्होंने उन विद्वानों का खंडन किया है जो केवल इसके आंतरिक रूप को ही महत्त्व प्रदान करते हैं। उन्होंने अभिव्यक्ति के दोनों ही रूपों को महत्त्व दिया है। वे लिखते हैं, "अभिव्यक्ति कहां होती है, इस बात को लेकर थोड़ा-सा मतभेद अवश्य है। करोचे के अनुसार, यह अभिव्यक्ति बाहर न होकर मनुष्य के मन में होती है। इसीलिए बाहर दिखाई पड़ने वाली वस्तु, मूर्ति, चित्र, संगीत तथा काव्य आदि कलाओं को यह यथार्थ कला की प्रतिकृति मात्र मानता है। अन्य विद्वान कला के इस बाह्य मूर्त रूप को ही कला अर्थात् अभिव्यक्ति मानते हैं। वस्तुतः यह प्रश्न मनोविज्ञान का है। कला की एक अमूर्त अभिव्यक्ति मानस में होती है
166/ सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 181
और इसमें भी संदेह नहीं कि रंग, स्वर, शब्द आदि द्वारा अभिव्यक्ति कला जिसका रसास्वादन दूसरे भी कर पाते हैं, उसकी प्रतिकृति ही है। पर प्रत्यक्षतः या व्यवहारतः यह तथाकथित प्रतिकृति ही सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ है अतएव तात्त्विक दृष्टि से आंतरिक अभिव्यक्ति को स्वीकार करते हुए भी बाह्य अभिव्यक्ति को क्रोचे की भांति महत्त्व न देना उचित नहीं कहा जा सकता। इसका आशय यह है कि दोनों ही अभि- व्यक्तियां कला हैं। तात्त्विक दृष्टि से पहली और व्यावहारिक दृष्टि से दूसरी।"29 इस विषय पर चर्चा करने वाले अन्य मुख्य विचारक निर्मला जैन तथा शिवकरण सिंह हैं। इन दोनों चिंतकों ने अभिव्यंजना पर विचार करने के लिए पाश्चात्य विद्वानों के मतों को आधार रूप में लिया है। निर्मला जैन ने संवेगों की अभिव्यंजना का विवरण काव्य के अंतर्गत करने का अत्यधिक सफल प्रगास किया है। अभिव्यंजित और अभिव्यंजक में क्या संबंध है, इस विषय पर उन्होंने तो कोई मौलिक चिंतन नहीं किया है, लेकिन पाश्चात्य मनीषियों के मतों को उद्धृत करते हुए वे इस निष्कर्ष पर अवश्य पहुंचे हैं कि "अभिव्यंजित और अभिव्यंजक के निश्चित संबंध पर अभी तक प्रकाश नहीं पड़ सका है।"30 शिवकरणसिंह भी यह मानते हैं कि "कलाकृति क्या अभिव्यक्त करती है और अभिव्यंजित और अभिव्यंजन में क्या संबंध है, आदि को लेकर लालित्यबोध (Aesthetic) के क्षेत्र में पर्याप्त विवाद हुआ है और अभिव्यंजित पर प्रश्नवाची चिह्न ही नहीं लग गया है, अपितु इस शब्द को अंत्यज मानकर कला के क्षेत्र से बहिष्कृत करने का प्रयत्न भी हुआ है। इस मान्यता की उपयुक्तता और अनुपयुक्तता पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।"31 शिवकरणसिंह ने 'अभिव्यंजना' शब्द को विविधार्थी मानते हुए इसे कला- सृजन का प्रमुख उपस्कारक माना है तथा इससे संबंधित विविध मतों का उल्लेख करते हुए इसके महत्त्व को प्रतिपादित किया है। इसकी परिभाषा तथा इसके कार्य की ओर इंगित करते हुए वे लिखते हैं, "अभिव्यक्ति मूलतः कलाकार के अंतःसंबंध को स्पष्ट करने का माध्यम है ..... जब व्यक्ति को विचार-संप्रेषण या वैचारिक आदान-प्रदान की आवश्यकता होती है तो वह अभिव्यक्ति का माध्यम स्वीकार करता है।32 कला में अभिव्यक्ति का क्या महत्त्व है, इस संबंध में उनकी यह धारणा है कि यह "भावपक्ष को प्रभावोत्पादक एवं प्रभाव-सक्षम कलापक्ष में परिणत करने का प्रमुख साधन है। जिस प्रकार शरीर से आत्मा प्रतिच्छयित होती है, उसी प्रकार अभिव्यक्ति से कला के अंत :- स्पंदों का अभिज्ञान हो जाता है।"38 शिवकरण सिंह के उपरांत इस विषय पर स्वतंत्र रूप से चर्चा रमेशकुंतल मेध ने की है। उन्होंने अभिव्यंजना के विविध आयामों को स्पष्ट करते हुए अभिव्यंजना का अत्यधिक विस्तृत रूप में उल्लेख किया है। लेकिन इनसे पूर्व भी हिंदी के कुछ विचारकों ने प्रासंगिक रूप से इस विषय को उठाया है तथा इसे परिभाषित करने का प्रयास किया है। सावित्री सिन्हा ने अपने शोध प्रबंध 'ब्रजभाषा के कृष्णभक्तिकाव्य में अभि-
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 167
Page 182
व्यंजना शिल्प' में अभिव्यंजना की परिभाषा इस प्रकार दी है। "भौतिक उपादानों के जिस संगठन द्वारा कवि अथवा कलाकार अपने अभिप्रेत की अभिव्यक्ति करता है वही अभिव्यंजना है। इन उपादानों में अंतस्थ व्यंजक शक्तियों को संकलित तथा संगठित करके कवि अपनी भावगाओं को आबद्ध करता है। इस संगठन द्वारा आविर्भूत रूपात्मक विन्यास ही कलाकृति का आयाम है और यही अभिव्यंजना है।"34 इसी तरह हरदयाल ने अपने शोध प्रबंध 'आधुनिक हिंदी कविता का अभिव्यंजना शिल्प' में अभिव्यंजना शब्द को कवि या कलाकार के आंतरिक अनुभव की संपूर्ण भौतिक या बाह्य अभिव्यवित का वाचक कहा है। वे लिखते हैं, "अभिव्यजना शब्द कवि के अनु- भव की बाह्य अभिव्यक्ति का द्योतक है। इसमें कोरी अभ्यास साध्यता ही लक्षित नहीं होती वरन् अंतःप्रेरणा एवं स्वतः प्रवर्तिता (स्पांतेनीइटी) भी लक्षित होती है। इसमें अभिव्यक्ति के सूक्ष्म तत्त्वों का संकेत मिलता है।"35 शिवबालक राय क्रोचे के अभिव्यंजनावाद का विवेचन करते हुए सौंदर्य को मात्र अभिव्यंजना कहना उचित समझते हैं।36 कोचे के अभिव्यंजनावादी सिद्धांत का विवेचन रामलखन शुक्ल द्वारा भी किया गया है। इन्होंने करोचे के अभिव्यंजनावादी सिद्धांत के प्रति उठे आक्षेपों का निवारण तो विभिन्न विद्वानों के मतानुसार अवश्य किया है।37 लेकिन स्वयं अपनी ओर से अभिव्यंजना पर कोई टिप्पणी नहीं कर पाये हैं। रमेशकुंतल मेघ ने अभिव्यंजना पर सर्वाधिक चिंतन किया है। वे जिस प्रकार 'शरीर-मस्तिष्क इकाई' के आधार पर सृजन-प्रक्रिया की मीमांसा करते हैं, उसी प्रकार 'पदार्थ रूप अभिव्यंजना की एकता' के आधार पर अभिव्यंजना की छानबीन करते हैं। उन्होंने सृजन प्रक्रिया के अंतर्मुखी दो चरण मानते हुए दोनों चरणों से इसका संबंध माना है। "कलाकार अपना चेतन, या/और अवचेतन, दोनों प्रकार की अंतर्मुखी अनुभूतियों (फीलिंग), अनुभवों तथा संवेगों (इमोशंस) को एक ऐंद्रियिक माध्यम (मीडियम) में पेश करके उन्हें कलाकृति में स्थापित करता है जहां नाध्यम की भी अभिव्यंजना-शक्ति तथा पर्यावरण का प्रभाव मिलकर 'अभिव्यंजना' का एक रूपाकार (पैटन) रखते हैं। सारांश में, कलाकार कलाकृति में अपने अंतर्मुखी अनुभवों-संवेगा- त्मक, बौद्धिक, कल्पनात्मक या परंपराग्राही का (कृति में) बाह्यीकरण (एकसटर्न- लाइजेशन) करता है। अभिव्यंजना 'प्रक्रिया' (प्रासेस), 'प्राकृतित्व' (प्रॉडक्ट) तथा 'वस्तु' (आब्जेक्ट), इन तीनों के संबंधों से अन्वित है।"20 इस रूप में अभिव्यंजना के तीन संदर्भ स्पष्ड होते हैं-(क) यह कलाकार की सृजनात्मकता क्रियात्मकता है और यहां 'कलात्मक अभिव्यंजना' प्राप्त होती है। कलात्मक अभिव्यंजन एक 'प्रक्रिय' है। अभिव्यंजना का दूसरा संदर्भ उसका (ख) कला- कृति का गुणधर्म होना है। इस रूप में हम 'वस्तुगत अभिव्यंजना' पाते हैं और यह प्रकृतित्वसंभूत है। अभिव्यंजना का तीसरा (ग) संदर्भ उसका सौंदर्यबोधात्मक वस्तु
168 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 183
का चारित्र्य होता है। इस रूप में हमें 'सौंदर्यबोधात्मक अभिव्यंजना' प्राप्त होती है, जो वस्तुसंभूत है। इस भांति अभिव्यंजना प्रक्रिया और प्राकृतित्व के उभय छोरों में स्थित है तथा उन्हें एक सूत्र में पिरोती भी है। इन छोरों के बीच में 'वस्तु' की भी स्थिति है।39 रमेशकुंतल मेघ ने अभिव्यंजना के तीन छोरों-(1) कलाकार, (2) कलाकृति तथा (3) आशंसक-को देखते हुए इसे विविधार्थी भी कहा है। इस स्थिति में वे एक मुख्य प्रश्न यह भी उठाते हैं कि क्या अभिव्यंजना कलाकार के भावों की होती है, या यह कलाकृति का स्वकीय गुणधर्म है अथवा आशंसक में व्युत्पन्न होती है ? क्योंकि यह मुमकिन है कि कलाकार को जो अनुभूति हो, वह उसे अभिव्यक्त नहीं करे, या जो अनुभूति नहीं हो उसे अभिव्यक्त करे। यह भी हो सकता है कि सृजन के आरंभ में उसकी अनुभूति अपूर्ण हो, लेकिन अनुभवों को परिवर्तित तथा रूपांतरित अर्थात् कलात्मक-प्रकृति वाला कर दे। आशंसक की दृष्टि से यह भी माना जा सकता है कि यदि उसकी मनोदशा अनुकूल नहीं है तो वह अभिव्यंजना का भी समुचित ग्रहण नहीं कर सकेगा। इन सब प्रसंगों के कारण ही हमें अभिव्यंजना के कई अर्थ मिलते हैं तथा कोई निश्चित अर्थ ढूंढ़ने में कठिनाई महसूस होती है। लेकिन रमेशकुंतल मेघ द्वारा स्पष्ट किया गया 'अभिव्यंजना-त्रिकोण' हमारी इस समस्या का समाधान कर देता है।40 इस सारी ऊहापोह के उपरांत उन्होंने यह निष्कर्ष दिया है कि अभिव्यंजित अर्थात् आंतरिक को बहिर्गत बनाना ही अभिव्यंजना है। इसलिए इसके अंतर्गत प्रति- निवेदन (रप्रेजेंटिंग) प्रतीकीकरण (सिंबोलाइजिंग), उद्घाटन (रिवीलिंग) अन्वयन (मोनिफेटिंग) अनुभव-सृजन इत्यादि शामिल हो जाते हैं।41 अब तक के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने तो अभिव्यंजना के सामान्य स्वरूप को स्पष्ट करते हुए इसे केवल परिभाषित करने का ही प्रयास किया है। लेकिन रमेशकुतल मेघ ने इसे एक नयी दिशा की ओर मोड़ते हुए कलाकार, कलाकृति तथा आशंसक के संदर्भ में भी देखा है। कलाकार के संदर्भ में अभिव्यंजना को देखते हुए उन्होंने सामान्य व्यक्ति और कलाकार की अभिव्यंजना में क्या अंतर है तथा माध्यम किस प्रकार कलाकार के अभिव्यंजक अनुभवों की सभी संभावनाओं का उद्घाटक बनने में सहायक होता है? इन दो प्रश्नों पर विस्तृत चर्चा की है। कलाकार और अभिव्यंजना के संबंधों के विश्लेषण में उन्होंने अंत में अपने दृष्टिकोण विशेष के कारण यह निर्देश दिया है कि "कलाकार के व्यक्तित्व पर भौतिक तथा मानवीय पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है जिसके कारण उसकी अभिव्यंजना केवल व्यक्तिगत ही नहीं होती, बल्कि उसके समाज तथा उसके वर्ग की धारणाएं और प्रतिक्रियाएं भी होती हैं। उसका समाज तथा वर्गीय चरित्र मूल अनुभवों तक को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निर्धारित संचालित करता है जिसकी वजह से उसके अनुभवों में तत्कालीन सामाजिक संबंधों की चेनना, और उसके विचारों में वर्गीय चरित्र के दृष्टिकोण अनिवार्यतः आ जाते हैं। इसी वजह से अभि-
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 169
Page 184
व्यंजना 'सामाजिक अभिव्यंजना' भी होती है।42 कलाकृति मनुष्य अथवा कलाकार की एक विशिष्ट कायिकी का नतीजा है अतः कलाकृति में भी अभिव्यंजना के गुण होते हैं, जिनका उल्लेख रमेशकुंतल मेघ ने 'कलाकृति और अभिव्यंजना' के संबंधों को देखते हुए किया है।43 'कलाकार और अभिव्यंजना' तथा 'कलाकृति और अभिव्यंजना' के साथ-साथ उन्होंने 'आशंसक और अभिव्यंजना' के संबंधों का विश्लेषण भी किया है तथा यह माना है कि "अभिव्यंजना आशंसक की चेतना का विकास करती है, कृति की निहित क्षमताओं का उद्घाटन करती है तथा प्रत्यक्षीकरण का अधीक्षण करके आशंसा को पूर्णधर्मा बनाती है।"44 इस तरह हम देखते हैं कि हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं में रमेशकुंतल मेघ ही एक मात्र ऐसे चिंतक हैं जिन्होंने अभिव्यंजना पर स्वतंत्र रूप से चर्चा करते हुए इसे विभिन्न संदर्भों में देखा है तथा कई नये तथ्यों को उद्घाटित किया है। विश्वंभरनाथ उपाध्याय ने भी उनके अभिव्यंजना संबंधी चिंतन को देखते हुए यह लिखा है, "अभि- व्यंजना में पुनः प्रस्तुति, विरूपीकरण, अन्यथाकरण, रूपांतरण, बिबायन, रूपाकार और संप्रेषण से संबंधित अनेक नये तथ्य यहां मिल सकते हैं और अभिव्यक्ति-विज्ञान की संभावना बनती है। कोचे ने अभिव्यंजनावाद में जो आत्मवाद द्वारा रहस्यीकरण कर दिया है, वह डॉ० मेघ के ग्रंथ में छिन्न-भिन्न हो जाता है और हिंदी में पहली बार कलाभिव्यवित के विषय में, वस्तुगत विवेचन-पद्धति का शुभारंभ होता है।"45 सारांश रूप में हम यह कह सकते हैं कि हिंदी के विभिन्न सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं द्वारा विवेचित यह विषय सौंदर्यबोधशास्त्र में नवीनता का प्रदर्शन करता है। हालांकि इस विषय पर विद्वानों ने अधिक नहीं लिखा है। अधिकतर विद्वानों ने इस विषय पर चर्चा प्रासंगिक रूप से ही की है। केवल हरद्वारीलाल शर्मा, शिवकरणसिंह तथा रमेशकुंतल मेघ ने ही इस पर स्वतंत्र रूप से चर्चा की है। रमेशकुंतल मेघ का योगदान सर्वाधिक है। हिंदी के अन्य सौंदर्य-तत्त्ववेत्ताओं ने तो कला को भावों की अभिव्यंजना मात्र कहकर ही संतोष कर लिया है। इससे आगे जानने की आवश्यकता उन्होंने नहीं समझी है।
संप्रेषणीयता
कला की सार्थकता उसके ग्रहणशील पाठक, श्रोता या दर्शक तक संप्रेषण होने में है। जिस प्रकार कला-सृजन कलाकार के मानस का एक अत्यंत रहस्यमय क्रिया-व्यापार है। उसी प्रकार कला ग्रहण भी ग्राहक के मन का अत्यंत रहस्यमय क्रिया-व्यापार है। कलाकृति में अभिव्यक्ति कलाकार की अनुभूति का ग्रहण कोई दूसरा कैसे करता है अथवा कैसे कलाकार अपनी अभिव्यक्ति को ग्रहणशील पाठक, श्रोता, दर्शक के मन में भी उसी तरह संप्रेषित करने में समर्थ है और कैसे वह अनुभूति उसके लिए आस्वाद्य बन जाती है ? यह प्रश्न कला मूल्यांकन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। आई० ए० 170 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 185
रिचर्ड्स के अनुसार तो संप्रेषण का सर्वाधिक उयोग कलाओं के प्रसंग में ही है, क्योंकि कलाएं संप्रेषण क्रिया का श्रेष्ठ रूप है।46 टाल्सटाय ने भी इसी बात को ध्यान में रखते हुए एक भाव का अनुभव कर लेने पर सोद्देश्य उसे अन्यों तक पहुंचाया है।"47 हिंदी में निरमला जैन ने इसके महत्त्व को देखते हुए इसे कला की सृजन प्रक्रिया और कलास्वाद इन दो बिंदुओं को परस्पर जोड़ने वाला ऐसा सूत्र माना है "जिसमें कलाकार के द्वारा कला-माध्यम के प्रयोग की विशेषता और ग्राहक की ग्रहणशीलता दोनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।"48 यह वास्तव में आश्चर्य का विषय है कि जिस ग्रहणशील पाठक, श्रोता या दर्शक से कला की सार्थकता है, उसकी आस्वादन प्रक्रिया अथवा संप्रेषण प्रक्रिया पर न तो प्रारंभिक भारतीय काव्यशास्त्रियों का ही ध्यान गया है और न ही पाश्चात्य सौंदरय- तत्त्ववेत्ताओं ने ही इस विषय पर चिंतन किया है। भारतीय काव्यशास्त्र के प्रथम उपलब्ध महत्त्वपूर्ण ग्रंथ भरत के 'नाट्यशास्त्र' में सामाजिकता के संबंध में संक्षिप्त विचार अवश्य किया गया है। परंतु यह विचार भी उनके काव्य-स्वाद के स्वरूप से ही संबंधित है, उसकी आस्वादन प्रक्रिया से नहीं। बाद के आचार्यों ने भी इस संबंध में कोई विशेष चर्चा नहीं की है। यदि किसी ने चर्चा की भी है तो उससे किसी सम्यक सिद्धांत का बोध नहीं होता है। केवल भट्टनायक ने ही सर्वप्रथम 'साधारणीकरण-सिद्धांत' का प्रतिपादन करते हुए इस विषय पर गंभीर रूप से विचार किया है। हिंदी में भी इस विषय पर बहुत कम चिंतन हुआ है। केवल रमेशकुंतल मेघ ही एकमात्र ऐसे सौंदर्यतत्त्ववेत्ता हैं जिन्होंने इस पर अतिविस्तारपूर्वक चिंतन किया है। इनके उपरांत इस विषय पर प्रासंगिक रूप से चर्चा कृष्णलाल शर्मा ने की है। इन्होंने अपनी पुस्तक 'साहित्य अन्य कलाओं के संदर्भ में' संप्रेषण पर विचार करते हुए इसके दो प्रकार (प्रस्तुत और अप्रस्तुत) बतलाये हैं तथा संप्रेषण को मानवीय क्रिया के रूप में कला का स्रोत माना है।49 संप्रेषणीयता अथवा कम्युनिकेशन पर स्वतंत्र रूप से विचार करते हुए रमेशकुंतल मेघ ने लिखा है, "मूलतः संप्रेषण एक सामाजिक व्यापार है। मानवीय 'संप्रेषणीयता' सामाजिक जीवन को व्यावहारिक बनाती है। क्योंकि यह 'संबंधता है। प्रेषणीयता का मतलब 'संगठन' है। मानवीय प्रेषणीयता भाषा-संकेतों द्वारा प्रसारित तथा ग्रहण की जाती है। अतः प्रेषणीयता एक प्रतिबोधात्मक संबंधता (रेस्पोंसिव रिलेशनशिप) पर आधृत है।50 प्रेषणीयता के अंतर्गत रमेशकुंतल मेघ ने कलाकार के मंतव्य की छानबीन भी आवश्यक मानी है। इनके अनुसार कलाकार सप्रेषण करना चाहता है या कि नहीं। वह किस समूह, किस रुचि और किस संस्कार के व्यक्ति समूहों तक अपने अनुभवों या मंतव्यों को प्रेषित करना चाहता है, और ग्राहक या आशंसक किस गहराई तक प्रेषणीयता ग्रहण करता है या ग्रहण कर सकता है या ग्रहण करना चाहता है आदि
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 171
Page 186
इस विषय से जुड़े हुए महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं। एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न इन्होंने यह भी उठाया है कि कलाकार अपने या सामान्य 'अनुभवों' को अभिव्यंजित करता है अथवा अर्थों को ? दूसरे शब्दों में सप्रेषण बौद्धिक-प्रक्रिया है या कि भावात्मक ? इस प्रेषणीयता के महत्त्व को स्वीकार करने के उपरांत रमेशकुंतल मेघ ने इसकी अस्पष्टता (एंबिग्विटी) की समस्या को भी उठाया है। यहां अस्पष्टता का अर्थ वे मतिभ्रम (कन्फ्यूजन) या संकुलता से नहीं अपितु बहुलता (मल्टीप्लिसिटी) से लेते हैं जो रचना में कई बार चमत्कार को जन्म देती है। कई स्तरों पर उसकी विशिष्टता को प्रतिफलित करती है। अस्पष्टता के इन्होंने छः प्रधान घटक गिनाये हैं : 1. शब्दार्थ ज्ञान का भावदशा की ओर प्रयाण (संकेत, रूपक, प्रतीक आदि।) 2. माध्यम का असामर्थ्य। 3. प्रकथन की व्याख्या में अंतर्विरोध का समातोलन (साइनेस्थीसिस) । 4. अर्थ मीमांसात्मक अपूर्णताएं और निपुणताएं। 5. प्रकरण की विविधता या अज्ञानता; और 6. कलाकार के मंतव्य।51 इनके पीछे एंपसन की स्मृति है। उनकी मान्यताओं की ओर इशारा भी है। इसी अध्याय के अतर्गत रमेशकुंतल मेघ ने संप्रेषण की कड़ी को आगे बढ़ाते हुए शब्द, अर्थ और वाक्य के विषय में कैसीरर, विटगेंस्टाइन आदि को उद्धृत करते हुए, उनके अध्ययन की वस्तुगत विधि खोजी है। इन्होंने यहां भाषा संकेत, प्रतीक, सादृश्य व्यंजना या ध्वनि आदि की प्रभावक व्याख्या की है।
साहित्य तथा कला की भाषा का स्वरूप साहित्यभाषा हो या कलाभाषा, भाषा की सफलता प्रमुख रूप से प्रेषणीयता में स्वीकार की जाती है। अतः 'संप्रेषणीयता' के संदर्भ में 'भाषा' का स्वरूप जनता व सौंदर्यतत्त्व- वेत्ताओं का इसके प्रति हुए चिंतन को परखना भी आवश्यक समझा जाता है। रस से ध्वनि तक प्रेषणीयता के विभिन्न अवगुणों को जांचते हुए रमेशकुंतल मेघ साहित्य तथा कलाभाषा के स्वरूप को विस्तृत रूप से स्पष्ट करते हैं। इनसे पूर्व कलाभाषा पर जगदीश गुप्त तथा राजेन्द्र वाजपेयी ने भी प्रासंगिक रूप से टिप्पणी की है। जगदीश गुप्त ने कलाभाषा की विशेषता की ओर इगित करते हुए अपने एक लेख में लिखा है, "कला की भाषा मेरी दृष्टि में सबसे अधिक मानवीय और सार्वभौम भाषा है, क्योंकि इसका संबंध सीधे मनोभावों से होता है जिनको समझने की प्रातिभ क्षमता प्रकृति की ओर से ही सब मनुष्यों को प्राप्त हुई रहती है। यह दूसरी बात है कि किसी में वह अस्फुट हो और किसी में स्फुट।"52 राजेन्द्र वाजपेयी के अनुसार, "कला ही एक मात्र वह भाषा है जो सबको बिना पढ़े समभ में आती है। इसलिए सही मायने में केवल यही भाषा विश्वभाषा या अंतर्राष्ट्रीय भाषा स्वाभाविक रूप से मानी जा सकती है।"53
172 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 187
संप्रेषण के संदर्भ में भाषा के विशिष्ट महत्त्व को स्वीकार करते हुए रमेशकुंतल मेघ लिखते हैं, "भाषा तत्त्वतः प्रकथनात्मक (डिस्कर्सिव) है जिसमें शब्दार्थ की इकाइयां चिह्न या 'संवेत' (साइन) 'बिंब' (इमेज) तथा 'प्रतीक' (सिबल) के रूप में स्थिर एवं स्थित हैं। इन इकाइयों के संकेतान्वयन (डिनोटेशन) तथा धारणान्वयन (कनोटेशन) के द्वारा ही हम 'यथार्थता' को पहचानते हैं, 'सत्य' का अन्वेषण करते हैं, 'अनुभवों' की अभिव्यंजना करते हैं तथा आशयों (इंटेशंस) एवं विश्वासों (बिलीफ्स) का विनिमय करते हैं। भाषा जगत के प्रति हमारी सामाजिक और अंतर्मुखी प्रतिबोध की देन है। यह प्रतिबोध 'सिद्धांत धारणात्मक' (थियोरिटिकल) तथा सौंदर्यबोधात्मक' के बीच कायम है और इसकी परिणति वैज्ञानिक-व्यावहारिक प्रतिबोध में हुई है। अतः भाषा एक 'सांस्कृतिक रूप' में अर्थ के ज्ञान अथवा अर्थ की मानवीय अभिव्यजना की दशा है। भाषा या तो अनुभव को अथवा सत्य को अर्थ देती है। इसलिए 'साहित्य एवं कला की भाषा' का संविधान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।"54 साहित्य और कलाभाषा में अंतर है। "कला भाषा केवल शब्दार्थी को ही नहीं, शारीरिक मुद्राओं, भंगिमाओं, अनुभवों, फिल्म फोटो, रंगों, रेखाओं, सुरों, तालों, बिबों आदि ऐंद्रिय तथ्यांकों के प्रतीकात्मक चरित्र की भाषा है।"55 रमेशकुंतल मेघ ने इन दोनों के अंतर्संबंध को स्पष्ट करते हुए लिखा है, "साहित्य और काव्य की भाषा 'कला की महाभाषा' का ही एक अंग है। साहित्य के शब्द की तरह चित्र के बिंब, नृत्य की भंगी, मूर्ति की मुद्रा, संगीत की सरगम, वास्तु के उपस्थान (द्वार, स्तंभ, गोपुर, कलश, कक्ष, अट्टालिका इत्यादि) भी होते हैं। साहित्य एवं काव्य के प्रतिनिवेदन की भांति कलाओं में भी प्रतिनिवेदन, प्रत्यक्षीकरण होते हैं, साहित्य एवं काव्य के प्रतीकों की भांति कलाओं में भी प्रतीक बिंबों को परिवृत्त किये रहते हैं तथा साहित्य एवं काव्य की भांति कलाएं भी अभिव्यंजना और प्रेषणीयता के व्यापारों से बंधी हैं। अतः साहित्य एवं काव्य और कला मानवीय अनुभवों की अभिव्यंजना हैं तथा अर्थ ज्ञान कराती हैं। इनके परस्पर अन्वयन में मूल अंतर दिक (स्पेस) एवं काल (टाइम) अर्थात् दृश्य-श्रव्य प्रकृति का ही हो जाता है, और यह एक जटिल तथा आंदोलक अंतर है।"56 अंत में कला भाषा की एक निश्चित परिभाषा देते हुए वे लिखते हैं, "कलाभाषा एक प्रतीकात्मक भाषा है जिसकी ऐंद्रियिक इकाई (माध्यम के अनुसार) भिन्न-भिन्न है। लेकिन इस कलाभाषा में रूपकात्मक सादृश्य, काव्यात्मक सादृश्य, देव-प्राकृतिक सादृश्य, शरीर उपयोगिता सादृश्य, स्वरमूलक सादृश्य विद्यमान है; जिसकी अपनी- अपनी 'संरचना' तथा शैलीगत 'अभिव्यंजना' है। इस भाषा के साधन तो भिन्न-भिन्न हैं, लेकिन लक्ष्य अभिन्न है। हम इस कलाभाषा में 'रू' का अन्वेषण करते हैं और उसकी गहराई में पहुंचते हैं। यह कलाभाषा प्रतीकों का उपयोग करके 'यथार्थता का एक अधिक प्रचुर, अधिक दृष्टिवंत तथा अधिक रंगीन बिंब प्रदान करती है।" .... यह भाषा यथार्थता की अनेकानेक सभावनाओं की अन्वेषिका है। इस कलाभाषा का संप्रेषण
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 173
Page 188
भावात्मक तथा प्रभावात्मक है। इस भाव-प्रभाव की अभिव्यंजना का चरम लक्ष्य सौंदयंबोधानुभव है।" इस प्रकार हम देखते हैं कि हिंदी में संप्रेषणीयता पर चर्चा करने वाले एकमात्र सौंदर्यतत्त्ववेत्ता रमेशकुंतल मेघ ही हैं। अन्य चिंतकों ने या तो इस विषय को छुआ ही नहीं है, यदि छुआ भी है तो केवल प्रासंगिक रूप से ही इस पर टिप्पणी करके संतोष कर लिया है। अधिक विस्तार से चिंतन वे इस विषय पर नहीं कर सके। अतः इस विषय में रमेशकुंतल मेघ का कार्य अत्यधिक सराहनीय तथा नयी दिशाओं को प्रदशित करने वाला कहा जा सकता है।
सौंदर्यानुभूति सौंदर्यबोधशास्त्र की चर्चा के अंतर्गत यह प्रश्न भी कम विवादास्पद नहीं है कि सौंदर्यानुभूति जिसे अन्य चिंतकों ने सौंदर्यानुभव, सौंदर्यबोधानुभव, लालित्यबोधीय अनुभूति, कलानुभूति अथवा कलास्वादन का नाम दिया है, का स्वरूप क्या है? सौंदर्यानुभूति तथा सामान्य अनुभूति में क्या अंतर है ? सौंदर्यानुभूति की प्रकृति तथा स्वरूप को प्रभावित करने वाले तत्त्व कौन-कौन से हैं ? तथा क्या हिंदी के सौंदर्य- तत्त्ववेत्ताओं ने सौंदर्यानुभूति व रसानुभूति को एक ही माना है अथवा इन दोनों में वे किसे श्रेष्ठतर मानते हैं? यहां हम हिंदी सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं द्वारा उठाये गये इन्हीं प्रश्नों पर विचार करेंगे।
हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का सौंदर्यानुभूति संबंधी चिंतन सौंदर्यानुभूति जिसे कि हरिवंशसिंह शास्त्री ने सौंदर्यानुभव कहा है, ने इस संबंधी अपने दृष्टिकोण का स्पष्टीकरण करते हुए लिखा है, "नाना प्रकार के साधनों एवं ध्यान, धारणा, समाधि द्वारा जिस आत्मरूप का पुरुष को ज्ञान होता है, जिस अपने कैवल्य एवं आनंद का उसे साक्षात्कार होता है, वही केवल्यरूप, वही अपना निर्गुण स्वरूप कभी-कभी प्रकृति में दिखाई पड़ जाता है। इसी को हम सौंदर्यानुभव कहते हैं।"57 इस सौंदर्यानुभव के लिए इन्होंने यह आवश्यक माना है कि हमारी बुद्धि निष्काम हो। हम वस्तुओं को निःस्वार्थभाव से देखें, अर्थात् हमारी बुद्धिवृत्ति बहिर्मुख न होकर अंतर्मुख हो। इनकी स्पष्ट धारणा है, "जब कभी हमारी बुद्धि निष्काम होगी, तभी हमें सौंदर्यबोध होगा, क्योंककि उस समय हमारी दृष्टि वस्तुओं के नाम-रूप पर, बाहरी बनावट पर नहीं पड़ती प्रत्युत उस नामरूप के आधार पर, उस परब्रह्म पर पड़ती है जिससे ये सब नामरूप कल्पित हैं एवं जो हमारा अपना स्वरूप है।"58 सौंदर्य के 'अतरंग गुण' को प्रधानता देने के कारण इन्होंने सौंदर्यानुभूति और सौंदर्याभिव्यक्ति का संबंध संप्रज्ञात समाधि की अवस्था से जोड़ा है। इनके अनुसार संप्रज्ञात समाधि के अंतर्गत सवितर्क योग, सविचार योग और आनंदयोग की अवस्था
174 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 189
में सादर्यनुभव होता है तथा संप्रज्ञात की अंतिम अवस्था अस्मिता योग में सौंदर्या- भिव्यक्ति होती है।59 इम प्रकार हरिवंश सिंह शास्त्री ने सौंदर्य जन्य आनंद को निष्काम आनंद सिद्ध करते हुए, सौंदर्यानुभूति अथवा सौंदर्यानुभव को 'शृतंभरा प्रज्ञा' से संबंधित माना है। हरद्वारीलाल शर्मा ने सौंदर्यानुभूति को अपनी पुस्तक 'कला-विज्ञान' में कला की अनुभूति के रूप में विवेचित किया है। वह यह मानकर चलते हैं कि 'कला एक विशेष अनुभूति उत्पन्न करती है जिमे हम 'आनंद' कह सकते हैं।"60 कला के अनुभव तथा अनुभूति के लिए उससे संपर्क अवश्यंभावी है। यह संपर्क इनके अनुसार दो तरह का होता है। साधारण संपक और कलात्मक संपर्क। इन दोनों संपर्कों में भेद है क्योंकि प्रथम संपर्क का प्रयोजन व्यव्रहार के उपयोगी ज्ञान का संपादन और दूसरे के द्वारा हृदय में रस और माधुर्य का संचार होता है। सौंदर्यानुभूति अथवा कलानुभूति का संबंध इन्होंने इसी द्वितीय संपर्क से माना है। इसे परिभाषित करते हुए वे लिखते हैं, "कलानुभूति मानो दो ध्रुवों पर स्थित एक प्रक्रिया है जिसका एक ध्रुव कला-कृति और दूसरा रसिक है।"61 'कला-विज्ञान' के अतिरिक्त हरद्वारीलाल शर्मा ने इस विषय पर चर्चा अपनी अन्य पुस्तकों, 'रस और रसास्वादन', 'सौंदर्यशास्त्र' तथा 'सुंदरम्' में भी की है। इन पुस्तकों में इस विषय से संबंधित इनकी कतिपय धारणाएं इस प्रकार हैं : 1. "सुंदर' वस्तु 'पूर्णं' और 'सकल' होती है। जो अपूर्ण और विकल है वह 'सुंदर' नहीं। सुंदर की अनुभूति में रूप की पूणंता और समग्रता का ज्वलंत बोध रहता है। यहां यह नहीं, वहां रसोन्मेष में अवश्य बाधा पड़ती है।"62 2. "हमारी सौंदर्यानुभूति केवल व्यक्तिगत ही नहीं होती, उसका एक सामूहिक रूप भी है।"63 3. सौंदर्य के संपूर्ण अनुभव में सुंदर वस्तु का पार्थिव रूप और इसका आनंदमय आध्यात्मिक रूप इतने संश्लिष्ट रहते हैं कि इनके वियुक्त करने से ये दोनों ही तिलीन हो जाते हैं। कोई वस्तु स्वतः सुंदर नहीं होती जब तक आनंद का अनुभव नहीं है, और आनंद का स्वतः वस्तु बिना अनुभव सौंदर्य का अनुभव नहीं होता। सौंदर्यानुभूति में पार्थिव रूप और अध्यात्मरूप का इतना घनिष्ठ संबंध है कि एक यदि चेतन आत्मा है तो दूसरा उसका रूपवान व्यक्त शरीर है, एक यदि पुष्प है तो दूसरा उसका आह्लादमय सौरभ है, एक यदि स्रोत है तो दूसरा उसका वेग है, एक यदि अग्नि है तो दूसरा उसकी दाहकता है। सुंदर वस्तु मूर्तिमती अनुभूति है, और अनुभूति स्वयं वस्तु के सौंदर्य से स्वरूप पाती है।"64 4. "सुंदर की अनुभूति बहुत समृद्ध एवं समर्थ होती है, क्योंकि सुंदर के सबल संकेतों से तन-मन में अनंत अर्थ-ज्योति, अर्थदीप्ति अथवा सार्थकता का विस्तार होता है। मन स्वयं अर्थमय है। अतएव सुंदर से मन समृद्ध होता है और मन की समृद्धि से ही सुंदर सचमुच सुंदर होता है। मन और सुंदर का सहजात संबंध है। अतएव सुंदर
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 175
Page 190
की अनुभूति में मन के सुख और स्वास्थ्य, ओज एवं ऊर्जा, विस्तार एवं गांभीर्य की वृद्धि होती है।"65 हरद्वारीलाल शर्मा की इस धारणा का समर्थन सूर्यप्रसाद दीक्षित66 ने भी किया है। फतहसिंह ने प्रमाता और प्रमेय दोनों को दृष्टि में रखकर सौंदर्यानुभूति का विवेचन किया है। इन्होंने इसके दो पक्ष माने हैं। 1. प्रमेय (विषय) का आकर्षत्व तथा 2. प्रमाता का आवर्षणीयत्व। इन दोनों का पारस्परिक संबंध निम्नलिखित अवस्थाओं में प्रकट होता है : 1. सचेतन इंद्रिय-सन्निकर्ष। 2. अनुभूति। 3. अभिव्यक्ति। 4. अपनाने की चाह ।67 सौंदर्यानुभूति को परिभाषित करते हुए फतहसिंह लिखते हैं, "साधारणतया जिस वस्तु से मानव के मन में कोई सुखद अनुभूति होती है उसको वह सुंदर कहता है तथा इसी सुखद अनुभूति को सौंदर्यानुभूति कहा जाता है।"68 यह अनुभूति यद्यपि हृदय में तत्त्वतः एक रूप होती है तथापि फतहसिंह ने माध्यम भेद के आधार पर इसके चक्षु-ग्राह्य, श्रोत्र-ग्राह्य, जिह्वा-ग्राह्य, नासिका-ग्राह्य और त्वचा-ग्राह्य भेद किये हैं और अंत में इन समस्त भेदों को एक ही मानस-ग्राह्य सौंदर्य का रूप प्रतिपादित किया है। फतहसिंह ने सौंदर्यानुभूति में विभाव-पक्ष की अपेक्षा प्रमाता पक्ष को अधिक महत्त्व दिया है। इनके विचारानुसार प्रमाता को इंद्रिय-सन्निकर्ष द्वारा सुम् नामक आनंद या मोद की अनुभूति कराने की सामथ्य से वस्तु ही सुंदर कही जायेगी। इस प्रकार सुंदर वस्तु की आनंदप्रदायकता को ही सौंदर्य कहना चाहिए। इन्होंने सौंदर्य के विषय में वैदिक दृष्टि का आधार अधिक स्वाभाविक माना है।69 लगभग इसी रूप में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी सौंदर्यानुभूति के स्वरूप तथा प्रक्रिया को समझाया है। वे लिखते हैं, "कुछ रूपरंग की वस्तुएं ऐसी होती हैं जो हमारे मन में आते ही थोड़ी देर के लिए हमारी सत्ता पर ऐसा अधिकार कर लेती हैं कि उसका ज्ञान ही हवा हो जाता है और हम उन वस्तुओं की भावना के रूप में ही परि- णत हो जाते हैं। हमारी अंतःसत्ता की यह तदाकार परिणति सौंदर्य की अनुभूति है।'70 इसके साथ ही इन्होंने यह भी माना है कि "किसी वस्तु के प्रत्यक्ष ज्ञान या भावना से हमारी अपनी सत्ता के बोध का जितना ही अधिक तिरोभाव और हमारे मन की उस वस्तु के रूप में जितनी ही पूर्ण परिणति होगी उतनी ही बढ़ी हुई हमारी सौंदर्य की अनुभूति कही जायेगी।"71 कुमार विमल ने इस विपय पर प्रासंगिक रूप से चर्चा अपनी पुस्तक 'सौंदर्य- शास्त्र के तत्त्व' में की है। इन्होंने इसे हरद्वारीलाल शर्मा की भांति कला की अनुभूति 176 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 191
के रूप में विवेचित किया है। सर्वप्रथम इन्होंने 'सौंदर्यानुभूति की अवस्था क्या है?' इस प्रश्न को उठाया है। इस प्रश्न को लेकर इन्होंने स्वयं तो कोई मौलिक चिनन नहीं किया है लेकिन पाश्चात्य चिंतकों की दो भिन्न विचारधाराओं को प्रस्तुत करते हुए इनमें से एक का समर्थन किया है।72 (हली विचारधारा को मानने वाले आई० ए० रिचर्ड्स हैं जिनका मत है कि सौंदर्यानुभूति अन्य अनुभूतियों के साथ गाढ़ सादृश्य रखती है। इसके विपरीत दूसरी कोटि के चिंतक रोजर फ्राय, आनंदकुमार स्वामी तथा जार्ज संतायना ने सौंदर्यान्भूति को सर्वथा आनंदोन्मुख मानते हुए इसे विशिष्ट माना है। कुमार विमल ने इसी मत से अपनी सहमति प्रकट की है।) इस विश्लेषण के उपरांत कुमार विमल ने सौंदर्यानुभूति को समझने के लिए कलानुभूति की परख अनिवार्य समझी है। इन्होंने इस विषय से संबंधित अपनी धारणाएं इस प्रकार व्यक्त की हैं : 1. सौंदर्यानुभूति जब सृजन की ओर सक्रिय होती है, तब वह कलानुभूति बन जाती है। 2. कलानुभूतत एक ऐसी सुखद अनुभूति है, जो सत्यमिथ्या के विधि निषेधों से किंचित् ऊपर है। प्रवृत्ति की दृष्टि से यह अनुभूति चयनशील होती है। क्योंकि इसका संबंध आलंबन के संपूर्ण रसर से न होकर उसके संवेद् अंश तक सीमित रहता है अतः कलानुभूति वस्तु-विशेष के संवेद् अंशों के चयन पर जीवित रहती है और सुखद, अतः रसात्मक होती है। 3. कलानुभूति कुछ अर्थों में अन्य अनुभूतियों से विशिष्ट होती है। सामान्य अनु- भूतियों में मनुष्य अपने व्यक्तित्व और वैयक्तिकता की परिधि से आबद्ध रहता है, किंतु कलानुभूति के क्षणों में वह इन सीमाओं से ऊपर उठ जाता है, अतः कलानुभूति एक विशिष्ट संवित है, जो भावक में सत्वोद्रेक पैदा करती है। 4. काल की दृष्टि से कलानुभूति क्षणिक होती है और उसका सातत्य उद्दीपन सापेक्ष होता है। अधिक सुष्ठ कथन यह होगा कि कलानुभूति की अवधि विभावों की विभावनशील उपस्थिति के ठहराव पर निर्भर करती है। 5. कलानुभूति की दो मुख्य किस्में हैं - उपज्ञान और प्रेरित। प्रथम कला-सृष्टि के क्षणों की अनुभूति है। इसका संबंध कारयित्री प्रतिभा, अर्थात् सहृदय से है। द्वितीय अनुभूति कला-दर्शन के क्षणों की है। यह भोगीकरण प्रधान होती है जबकि कलानुभूति में भोग से अधिक महत्त्व इन तीन कार्यों का रहता है-अनुभूति का निबिड़ीकरण, अनुभूति का मार्जन और अनुभूति की व्याख्या। 6. वय के आधार पर कलानुभूति के दो प्रकार और हैं-सहज और संकुल। शिशु अथवा कशोर कलानुभूति 'सहज' होती है। इसके विपरीत जो व्यक्ति जितना ही परिपक्व बुद्धि और आवेष्टनों के प्रति सजग होता है, उसकी कलानुभूति उतनी ही 'संकुल' होती है।73 तुलनात्मक सौंदर्यबोधशास्त्र (भारतीय रस सिद्धांत और पाश्चात्य सौंदर्यबोध-
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 177
Page 192
शास्त्र) की दशा में अनुसंधान करते हुए निर्मला जैन ने काव्यानुभूति तथा सौंदर्यानुभूति की तुलनात्मक समीक्षा प्रस्तुत की है। इन दोनों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए इन्होंने यह माना है कि सौंदर्यानुभूति कलामात्र के संदर्भ में निर्मित होने के कारण व्यापक रूप से समस्त कलाओं से संबद्ध होने का आभास देती है। जबकि काव्यानुभूति प्रायः काव्य-बोधक शब्दावली में ही निरूपित हुई है।74 यद्यपि दोनों ही परंपराओं की इस पारिभाषिक शब्दावली की पृथक्ता को लेखिका ने सुरक्षित रखा है तथापि अंत में तुलनात्मक निष्कर्ष के समय इन्होंने उभयनिष्ठ तत्त्व के रूप में रसशास्त्रीय काव्यबोधक शब्दावली 'काव्यानुभूति' संज्ञा को ही आधार बनाया है तथा इसी के अंतर्गत अपने निष्कर्ष दिये हैं। सौंदर्यानुभूति के अंतर्गत निर्मला जैन ने सौंदर्यानुभूति की अवधारणा, सौंदर्या- नुभूति : सामान्य और विशिष्ट, सौंदर्यानुभूति और आध्यात्मिक अनुभूति, सौंदर्यानुभूति की आनंदरूपता, सौंदर्यानुभूति की ज्ञानरूपता तथा सौंदर्यानुभूति की प्रक्रिया आदि प्रश्नों पर पाश्चात्य सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं द्वारा हुए चिंतन को विस्तृत रूप में स्पष्ट किया है। इन्होंने स्वयं इन प्रश्नों पर कोई चिंतन नहीं किया है। शिवकरण सिंह जिन्होंने कि सौंदर्यानुभूति को कलानुभूति अथवा लालित्य- बोधीय अनुभूति की संज्ञा प्रदान की है, इसे कला सृजन का प्रमुख उपजीव्य माना है।75 इस विषय पर चर्चा इन्होंने दो अध्यायों में की है। पहले अध्याय में अनुभूति की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उसके लालित्यबोधीय पक्ष की चर्चा की गयी है तथा दूसरे अध्याय में अनुभूति को उद्घाटित करने वाले ग्यारह काव्य सिद्धांतों का उल्लेख किया गया है। सर्वप्रथम इन्होंने 'अनुभूति' शब्द पर चिंतन किया है। अनुभूति शब्द की व्यापकता को दर्शाते हुए शिवकरण सिंह ने यह माना है कि "अंग्रेजी साहित्य में अनुभूति का व्यापक प्रयोग हुआ है। कभी तो इसे चेतना के अर्थ में ग्रहण किया गया है और कभी अनुभव के अर्थ में। मनोविज्ञान में 'फीलिंग' या 'मेंटल एक्सपीरियंस' के रूप में इसे मानस अनुभव स्व्रीकार किया गया है। इसके अनुसार यह आंतरिक क्रिया है जो बाह्य परिणाम नहीं उत्पन्न करती। मनोविज्ञान के अतिरिक्त साहित्य के क्षेत्र में भी इसका विशद विवेचन हुआ है-यथा, काव्यानुभूति, भावानुभूति, रसानुभूति, प्रातिभ अनुभूति, विलक्षण अनुभूति, रहस्यानुभूति, लौकिक अनुभूति, प्रत्यक्षानुभूति, समानुभूति, सहानुभूति आदि। इन विविध प्रयोगों और उनसे संबद्ध अर्थ-संदर्भों से इनकी व्यापकता पर शक करने की गुंजाइश नहीं रह जाती।76 अनुभूति के (1) कलात्मक अनुभूति (जो कलाकार को होती है) तथा (2) आशंसक की अनुभूति, दो पक्ष मानते हुए शिवकरण सिंह ने उन विद्वानों से अपनी असहमति प्रकट की है, जो यह मानते हैं कि पाठक या आंशसक भी उसी अनुभूति के बीच होकर गुजरता है जिसके बीच सृजन की स्थिति से कलाकार गुजरता है। वे स्पष्ट रूप से इस बात पर बल देते हैं कि "लेखक और पाठक भिन्न व्यक्ति होते हैं,
178 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 193
उनकी चित्तवृत्तियों और संस्कारों में कुछ अंतर होता है। दोनों की व्याख्या के तरीके कुछ भिन्न हुआ करते हैं अतः उनके दृष्टिकोण में भिन्नता का होना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है।"77 निमला जैन की भांति इन्होंने भी इस विषय पर अपनी ओर से अधिक न कहकर, पाश्चात्य मनीषियों द्वारा हुए चिंतन को ही स्पष्ट किया है। इन्होंने अनुभूति की अवधारणा को 'येरिक न्यूटन', 'होग्रेफ', 'हेनरी जेम्स', 'रिल्के', 'जी रोस्ट्रीवर हैमिल्टन', 'एक्विनास', 'जेम्स ज्वायस', 'डी० जी० मूर' आदि पाश्चात्य विद्वानों के मतों के आधार पर स्पष्ट करते हुए, अनुभूति के लालित्यबोधीय पक्ष की चर्चा की है। लालित्यबोधीय अनुभूति को त्रिकोणात्मक-(1) द्रष्टा (2) दृश्य और (3) द्रष्टा और दृश्य का अंतःसंबंध-मानते हुए शिवकरण सिंह ने इस संदर्भ में निम्नलिखित आठ बातों को ध्यातव्य माना है। 1. सुनियोजित, सुसंबद्ध और समन्वित ऐंद्रियबोध ही लालित्यबोध का जनक है। 2. उपादान से ऐंद्रिय प्रभावों का प्रवाह, उससे संपर्क की स्थिति में, निरंतर गतिशील रूप से प्रवाहित होता रहता है और हमारे संपूर्ण जीवन पर छा जाता है। यह स्थिति कुछ अस्पष्ट, संकुल और उलभी हुई होती है। इमका प्रमुख कारण यह है कि यह क्रिया मानस के धरातल पर स्थान ग्रहण करती है जिसमें शारीरिक संवेदन भी किसी-न-किसी रूप में सक्रिय रहते हैं। 3. इस आंतरिक क्रिया का कलात्मक संयोजन आवश्यक होता है, जो अमूर्त संवेदनों को मूर्त रूप में प्रकट कर सके। 4. ऐंद्रिय अनुभूति में कलादृष्टि से अनावश्यक अनुभूतियों का स्वरूप भी निहित रहता है। लालित्यबोधीय अनुभूति को इनसे मुक्त होना आवश्यक है। 5. कुछ ऐंद्रियबोध अस्पष्ट होते हैं। ये लालित्यबोधीय अनुभूति के उपादान तभी बन सकते हैं जब हम इन्हें कम-से-कम अभिव्यक्ति के धरातल पर पूर्णतया स्पष्ट कर सकें। 6. लालित्यबोधीय अनुभूति की दृष्टि से सृजन के समय एक ऐसी भी स्थिति आती है जब कलाकार बाह्य जगत् में अंतःसंबंधों के प्रति कुछ अन्यमनस्क होकर अपने आंतरिक जगत के अंतःसंबंधों पर विशेष रूप से बल देने लगता है। इस क्रिया से लालित्यबोधीय अनुभूति सशक्त, सप्राण एवं दीप्तिमय हो जाती है। 7. कलाकार के उपादान विशेष को देखने और प्रभाव ग्रहण करने की क्रिया तथा सामान्य व्यक्ति को उसे देखने और प्रभाव ग्रहण करने की क्रिया में अंतर होता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि कलाकार की दृष्टि उपयोगिता और वैयक्तिक स्वार्थ से अंशतः मुक्त होने के साथ ही चिंतन एवं चर्वणाप्रधान होती है। 8. इस दृष्टि से लालित्यबोधीय अनुभूति विशेष रूप से चिंतन प्रधान मानी
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम/ 179
Page 194
जा सकती है।"78 इन बातों का संकेत करने के उपरांत शिवकरण सिंह ने सौंदर्यानुभूति अथवा लालित्यबोथीय अनुभूति के संदर्भ में 'पेपिटा हिज्राही' के निष्कर्षों तथा लालित्यबोधीय अनुभूति और आनंद के संबंध को भी स्पष्ट किया है। गणपतिचंद्र गुप्त ने सौंदर्यानुभूति को रसानुभूति का पर्याय माना है। सौंदर्यानभूति के अंतर्गत सौंदर्यबोधशास्त्र में जो सूक्ष्म एवं विस्तृत विवेचन-विश्लेषण हुआ है, उसका उपयोग इन्होंने अपनी पुस्तक 'रस सिद्धांत के पुनर्विवेचन' में सम्यक रूप से किया है। पाश्चात्य सौंदर्यतत्त्ववेत्ता तथा भारतीय रसवादी आचार्यों के विचारों के आधार पर इसके स्वरूप के संबंध में गणपतिचंद्र गुप्त ने निम्नांकित निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं : 1. प्रायः सभी भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों ने रसानुभूति का स्वरूप आनंदात्मक ही स्वीकार किया है। 2. आनंद के विभिन्न भेदों में से कुछ विद्वानों ने रसानुभूति में बौद्धिक आनंद की प्रमुखता मानी है तो कुछ ने कल्पनाजन्य आनंद की भी बात कही है। हमारे विचार में कलानुभूति में बुद्धि, भावना एवं कल्पना-तीनों का ही योग रहता है। इतना अवश्य है कि कला विशेष की प्रकृति के अनुसार किसी रचना में भावना की प्रमुखता रहती है, किसी में बुद्धि की और किसी में कल्पना की तथा इसी के अनुसार उनमें क्रमशः भावात्मक, बौद्धिक एवं कल्पनाजन्व आनंद की प्रमुखता रहती है। 3. सभी प्रकार की कलाकृतियों में एक ही स्तर की या एक ही प्रकार की अनुभूति संभव नहीं। कलाकृतियों की प्रकृति के अनुरूप ही उनकी अनुभूति का भी स्तर-भेद किया जा सकता है। सौंदर्गानुभूति में मतभेद कलाकृतियों की प्रकृति एवं उनकी अनुभूति के स्तर-भेद के ही द्योतक हैं। 4. यह निर्विवाद रूप से स्वीकार किया जा सकता है कि रसानुभूति प्रत्यक्षानुभूति से भिन्न प्रकार की होती है। उसमें प्रत्यक्षानुभूति की अपेक्षा अधिक काल्पनिकता एवं अधिक स्वतंत्रता रहती है। रसानुभूति में लौकिक भावनाएं एक परिष्कृत, उदात्त एवं सौंदर्यात्मक रूप प्राप्त कर लेती हैं। सौंदर्यानुभूति या रसानुभूति के स्वरूप के संबंध में पाश्चात्य सौंदर्यशास्त्री एवं भारतीय आचार्यों के मतों में गहरी समानता परिलक्षित होती है-जहां उनमें परस्पर सूक्ष्म अंतर भी है, वहां वे प्रायः एक दूसरे के पूरक सिद्ध होते हैं।79 इस प्रकार गणपतिचंद्र गुप्त ने सौंदर्यानुभूति को रस से जोड़ा है। नगेन्द्र का दृष्टिकोण भी ऐसा ही रहा है। इन्होंने तो इस बात का स्पष्ट समर्थन किया है कि "भारतीय वाङ्मय में सौंदर्यानुभूति का प्रामाणिक विवेचन काव्यशास्त्र में रस प्रसंग के अंतर्गत हुआ है।"80 भारतीय सिद्धांत के अनुमार इन्होंने सौंदर्यानुभूति को काव्य अथवा कला के आस्वाद का प्राणतत्त्व माना है। यही कारण है कि नगेन्द्र ने भारतीय काव्यशास्त्र में निरूपित सौंदर्यानुभूति के स्वरूप का निर्णय करने के लिए रस-विवेचन को आधार माना है। भारतीय काव्यशास्त्र के अनुसार इन्होंने सौंदर्यानुभूति को एक
180 : सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 195
प्रकार के अतींद्रिय आनंद अथवा लौकिक शब्दावली में, आत्मोपलब्धि की ऐसी स्थिति माना है, जो कला के द्वारा परिशुद्ध-विशदीकृत भावनाओं के माध्यम से प्राप्त होती है।81 इस विषय पर चिंतन करने वाले अन्य चिंतक सुरेशचंद्र त्यागी हैं। इन्होंने सौंदर्य की चर्चा करते हुए, इसी के अनंतर सौंदर्यानुभूति को भी विवेचित किया है। सौंदर्यानुभूति का स्वरूप क्या है? क्या सौंदर्यानुभूति व रसानुभूति एक ही है ? इन दोनों में कला और काव्य की दृष्टि से कौन श्रेष्ठतर है, आदि प्रश्नों पर इन्होंने संक्षेप में विचार तो अवश्य किया है, लेकिन इन्होंने कोई नयी बात नहीं की है, अपितु पूर्ववर्ती चिंतकों के मतों का ही पिष्टपेषण कर दिया है। सौंदर्यानुभूति को परिभाषित करते हुए वे 'सौंदर्य की आनंदमयी अनुभूति' को सौंदर्यानुभूति कहते हैं।82 सौंदर्यानुभूति व रसानुभूति के सबंध को देखते हुए वे उन विद्वानों से अपनी असह्मति प्रकट करते हैं जो परंपरा के मोह से ग्रस्त होकर इन्हें एक दूसरे से श्रेष्ठतर, व्यापक, गहन और समीचीन सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। इनके अनुसार, "ऐसे प्रयास बहुत गहरे चिंतन के परिणाम नहीं हैं। सौंदर्य को स्थूल मानना और रस को सूक्ष्म सिद्ध करना उचित नहीं प्रतीत होता।"83 सौंदर्यानुभूति विषय पर चर्चा करने वाले अन्य प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता एस० टी० नरसिंहचारी हैं। इन्होंने अपनी पुस्तक 'सौंदर्य तत्त्व निरूपण' में, सौंदर्यानुभूति के स्वरूप, सौंदर्यानुभूति और रसानुभूति, सौंदर्यानुभूति के महत्त्व आदि विषयों पर जो महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष दिये हैं, वे इस प्रकार हैं : 1. "कलाओं की रूप-कल्पना से प्राप्त ग्राहक की अनुभूति को पाश्चात्य सौंदर्यानुभूति कहते हैं। काव्य-साहित्य की अनुभूति को भारतीय आलंकारिकों ने रसानुभूति की संज्ञा दी है। वस्तुनिष्ड दुष्टि से सौंदर्यानुभूति कलाकृति के रूप की है और रसानुभूति काव्यगत अभिव्यंजना की। अनुभूति की दृष्टि से दोनों की प्रकृति में साम्य का अभाव नहीं है ।84 2. सौंदर्यानुभूति और रसानुभूति की धारणाएं विभिन्न परिस्थितियों में भिन्न भिन्न दृष्टियों को लेकर विकसित हुई हैं, इसलिए इनमें अंतर हो जाना स्वाभाविक है।85 3. सौंदर्यानुभूति रूप या बिब की शुद्ध मानसिक अनुभूति है। रसानुभूति रूप की अनुभूति के साथ उत्पन्न भावनाओं की संवेद्य आनुषंगिक अनुभूति की सम्मिलित व्यवस्था है। दोनों का अपना-अपना महत्त्व है और पूरक रूप में दोनों मिलकर अनुभूति को पूर्णता प्रदान करते हैं।86 4. सौंदर्यानुभूति का आधार आश्रय है। आश्रय का व्यक्तित्व तथा मानसिक विशेषताएं ही वस्तु रूप की सौंदर्यानुभूति को निर्धारित करती हैं। दूसरे शब्दों में सौंदर्यनुभूति का आश्रय के व्यक्तित्व, प्रकृति, चरित्र, मानसिक स्थिति और शारीरिक- मानसिक विकास की अवस्था से घनिष्ठ संबंध है। इसके साथ ही बाह्य परिस्थितियों की अनुकूलता भी आवश्यक है।87 .
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 181
Page 196
- सौंदर्यानुभूति और उसकी प्रक्रिया दोनों बिशिष्ट प्रकार की हैं। यह आनंदात्मक है तथा लौकिक ऐंद्रिय और मानसिक अनुभूतियों से भिन्न होती है। इसकी पूर्णता ऐंद्रिय और मानसिक अनुभूतियों के सामंजस्य में है।88 6. ग्राहकता की दृष्टि से सौंदर्यानुभूति के तीन धरातल हैं-(1) ऐंद्रिय, (2) मानसिक और (3) आध्यात्मिक।89 7. सौंदर्यानुभूति का महत्त्व वैयक्तिक, मानसिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक चेतना के विकास की दृष्टि से है,90 हिंदी के सौंदर्यतत्त्व्रवेत्ताओं ने अब तक : 'अनुभूति' और 'अनुभव' शब्द, जो कि क्रमशः अंग्रेजी शब्द 'फीलिंग' और 'एक्सपीरिएंस' के हिंदी अनुवाद हैं, को गड्डमड्ड किया है। अनुभूति वह होती है जब हम अपनी पांच इंद्रियों के द्वारा कुछ ग्रहण करते हैं, इसी कार्य को बार-बार दोहराना ही 'अनुभव' बन जाता है। लेकिन हिंदी मनीषियों ने इन दोनों शब्दों को लगभग एक ही अर्थ में प्रयुक्त किया है। अनुभूति और अनुभव को समान मानते हुए नगेन्द्र का यह कथन उल्लेखनीय है। "अनुभूति या अनुभव में मूल पद है 'भूति' या 'भव' और 'अनु' उपसर्ग है। पदार्थ के सन्निकर्ष से, इंद्रियों के माध्यम से, मन में जो एक बिंब या आकार उत्पन्न हो जाता है वह 'भूति' या 'भव' है और उसके परिणामस्वरूप आत्मा में जो अनुभवी चेतना जाग्रत होती है वही 'अनुभूति' या 'अनुभव' है।"91 कुमारविमल, सुरेशचंद्र त्यागी, निर्मला जैन, शिवकरण सिंह, गणपतिचंद्र गुप्त, राजेन्द्र वाजपेयी, तथा 'हिंदी साहित्य कोश' द्वारा एस्थेटिक्स एक्पपीरिएंस' का हिंदी अनुवाद 'सौंदर्यानुभूति' (सौंदर्य+अनुभूति) शब्द भी लगभग इसी बात को स्पष्ट करता है। लेकिन रमेशकुंतल मेघ जिन्होंने इस विषय पर अब तक सर्वाधिक चिंतन किया है, अनुभूति और अनुभव को अलग-अलग रूप में विवेचित करते हुए, इसके लिए 'सौंदर्यबोधानुभव' शब्द का प्रयोग किया है। इन्होंने सौंदर्यबोधानुभव की अवधारणा को स्पष्ट करने से पूर्व ऐसे बिदुओं का परिचय प्राप्त करना अनिवार्य समझा है जिनकी सहायता से सौंदर्यबोधानुभव तक पहुंचा जा सकता है। मध्य में पड़े हुए ये बिंदु हैं-प्रत्यक्षीकरण तथा प्रेक्षण, अनुभूति और अनुभव, संकेत विज्ञान, सौंदर्यतात्त्विक वृत्ति तथा सौंदर्यतात्त्विक प्रक्रिया या रस निष्पत्ति। इन सब बिदुओं को स्पष्ट करने के उपरांत ही रमेशकुंतल मेघ सौंदर्यबोधा- नुभव जैसे अंगारी प्रश्न को उठाते हैं। इस प्रश्न पर इन्होंने आशंसक और कलाकार दोनों ही दृष्टियों से विचार करते हुए भारतीय काव्यशास्त्रियों के मतों का विवरण इतने विस्तारपूर्वक और सजगता से किया है, कि इस विषय की चर्चा करते हुए अनेक नये विषयों का उद्घाटन होता है। आशंसक की दृष्टि से सौंदर्यबोधानुभव की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए रमेशकुंनल मेघ ने इसका सबसे सरल प्रतीत होने वाला किंतु सबसे कठिन एक मात्र उत्तर यह माना है कि 'सौंदर्य बोधानुभव' एक 'सौंदर्यबोधात्मक पुनस्'जन' है, न कि 'कलापुन्स जन'।92 वे इसे अनुभव का ही एक रूप मानते हुए लिखते हैं, "यह अनुभव
182/ सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 197
न तो निर्विकल्प है, न कला का पुनसृ जन, और न ही प्रमापन। यह तुष्टि का प्रत्यक्षी- करण अर्थात् 'प्रत्यक्षानुभव' है। इस अनुभव में कम-से-कम दो शर्ते होनी चाहिए : (क) प्रेक्षक का आत्मगत लक्ष्य इसे साध्य या श्रेय रूप में अनुभव करना होता है। (ख) इसमें नार्मिल लक्ष्य और दैनिक जीवन के प्रयोजन निलंबित (सस्पेड) हो जाते हैं, समाप्त नहीं।"93 परंतु जिस महत्त्वपूर्ण बात को इन्होंने रेखांकित किया है वह यह हैं कि "सौंदर्य- बोधानुभव एक गैरअमली अनुभव है।"94 आशंसक की दृष्टि से सौंदर्यबोधानुभव को स्पष्ट करते हुए रमेशकुंतल मेघ ने आदर्शात्मक-आनंदवादी अनुभव, यथार्थपरक सुखदुखात्मक एवं त्रासद अनुभव, अश्लीलता के कुरूप अनुभव तथा अस्तित्ववादी फूहड़ अनुभवादि सौंदर्याबोधात्मक आयामों का निरूपण-अनुशीलन भी किया है तथा यह सिद्ध किया है कि "विश्व की संस्कृतियों में संक्रांतिपूर्ण (क्रिकटिकल) मसलों के उभरने पर सौंदर्यबोधानुभव का दर्शन बदल गया है, और उनकी व्याख्याओं में नये-नये मूल्य शामिल हो गये हैं। आनंद के बजाय चिंता, साधारणीकरण के बजाय वैयक्तिकता, प्रत्यक्ष यथार्थ के बजाय उत्तेजना (नग्नता में), सहृदयत्व के बजाय पागलपन और पैरानोइया आदि तक के 'ध्रुवांतों में हम भटक चुके हैं। इन सभी प्रकार के सौंदर्यबोधानुभवों के केंद्र में मनुष्य की धारणा' का दर्शन एवं मनोविज्ञान रहा है। जिसे समाज, इतिहास तथा व्यक्ति परि- वर्तित करते रहे हैं।"95 लेकिन इसके साथ ही इन्होंने यह भी माना है कि सौंदर्यबोधानुभव के विभिन्न प्रकारों में कतिषय समानताएं भी प्राप्त की जा सकती हैं, जोकि इस प्रकार हैं : 1. प्रेक्षक का आत्मगत लक्ष्य इसे साध्य या श्रेय के रूप में अनुभव करना होता है। 2. इससे नार्मिल लक्ष्य एवं दैनिक जीवन के प्रयोजन निलंबित हो जाते हैं। 3. इसमें तात्कालिकता होती है। 4. इसमें तन्मयीभवन के बजाय असंपृक्ति अवश्य होती है, तथा 5. इसमें तर्कशीलता की अपेक्षा भावना या अनुभूति की प्रमुखता तथा प्राथमिकता होती है। यही सौंदर्यबोधानुभव का शाप तथा श्रेय है।"96 आशंसक के मुख से सौंदर्यबोधानुभव की व्याख्या करने के उपरांत रमेशकुंतल मेघ ने कलाकार के मुख से भी सौंदर्यबोधानुभव की व्याख्या की है। यहां इन्होंने तीन प्रश्नों को उठाया है-(1) 'शब्द', 'बिंब', 'मुद्रा' तथा 'भाव' आदि की सौंदर्यतातत्विक इकाइयों का निर्माण कैसे होता है तथा कलाकृति का जेस्टाल्ट बनने के पूर्व वे किस तरह संपूर्ण की परिपूर्ण भावाभिव्यंजना करती हैं ? (2) जब कलाकार आत्माभिव्यंजना करके भी सौंदर्यबोधानुभव का भागी हो सकता है तो आशंसक में यह क्यों रसविध्न हो जाता है ? (3) क्या अंतमुखी अभिव्यंजना ही सौंदर्यबोधानुभव है? कलाकार को
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 183
Page 198
इस प्रश्नचकर के केंद्र में रखकर ही इसके सौंदर्यबोधानुभव की व्याख्या की गयी है तथा यह निष्कर्ष दिया गया है कि "कलाकार यथार्थता के एक 'संशोधित' बिब का अनुभव करके यथार्थता की पूरकता करता है। वह संशोधित बिब को कलामाध्यम के द्वारा एक कलात्मक रूप प्रदान करता है। अतः उसका सौंदर्यबोधानुभव गुणात्मक एवं मात्रात्मक, सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक, अनुभूति एवं चिंतन, व्यक्ति विशेष एव निर्विशेष आदि दोनों हैं। कलाकार अपनी स्वयं प्रकाश्य 'प्रज्ञा' को नमनीय माध्यमों (प्लास्टिक मीडियम्स) के जानिब अभिव्यंजित करता है। (नृत्य के शरीर माध्यम में एक दूसरी स्थिति है)। बिना माध्यम के ऐसी प्रज्ञा अभिव्यंजनीय है। अतः कलाकार का सौंवर्यबोधानुभव नित्य (हेविसस) न होकर कर्मशील्पिक (प्रेक्टिस) है। बिना माध्यम के यह अमूर्त एवं सूक्ष्म है। सक्रियान्वित माध्यम की वजह से ही कृति के बिना माध्यम रूप में सौंदर्य' या 'रभणीयता' या 'रस' का अभिषेक होता है। 'रूप' के कारण ही कलाकार का सौंदर्यबोधानुभव सामाजिक संप्रेषण के काबिल है और अनुभूति से परिपकव है।"97 सौंदर्यबोधानुभव के उपरांत रमेशकुंतल मेघ ने सौंदर्यबोधात्मक पश्चात्प्रभाव का उल्लेख किया है। पश्चात्पभाव को अंग्रेजी में 'ऑफ्टर-इफेक्ट' (After effect) और 'ऑफ्टर-सेंसेशन' (After Sensation) तथा हिंदी में 'उत्तर-संवेदन' भी कहा जाता है। 'मानविकी पारिभाषिक कोश' के अनुसार 'उत्तेजक के समाप्त होने के पक्चात् ज्ञानेंद्रियों में अनुभद-प्रक्रिया का इस प्रकार जारी रहना कि संवेदना होती रहे इसे 'ऑफ्टर इफेक्ट' कहते हैं।"98 हिंदी में किसी भी सौंदर्यतत्त्ववेत्ता ने इस विषय को छुआ नहीं है। जबकि रमेशकुंतल मेघ ने इस विषय को सौंदर्यबोधानुभव चक्र् के लिए आवश्यक माना है।99 सौंदर्यबोधात्मक पश्चात्प्रभाव को स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं, "सौंदर्यबोधात्मक पश्चात्प्रभाव कलाकृतिकारण का 'लोक गामक' प्रभाव है जो समाधि, विश्रांति, तन्मयीभवन, साधारणीकरण, स्वयंसिद्धि आदि के घटकों के शांत हो जाने पर प्रबुद्ध होता है तथा हमारे सामाजिक व्यवहार, मानसिक विकास तथा लोकानुभव को गुणात्मक ढंग से तब्दील करता है। इसका संबंध अनुभव से आगे 'निर्णय' तथा 'पालन' से है।"100 इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न को और अधिक स्पष्ट इनके इस कथन से किया जा सकता है : "जब कला के मंतव्य या प्रवृत्ति की पकड़ हो जाती है तब यह संघटना होती है अतः इसका संबंध एक ओर तो कला के सामाजिक संप्रेषण अर्थात् 'सामाजिक कला' से है, और दूसरी ओर कलाकार एवं सामाजिक के दो अथवा दुहरे अथवा द्वितीयक व्यक्तित्व से है।"101 इस प्रकार हम यह देखते हैं कि रमेशकुंतल मेघ ने इस विषय पर अब तक सर्वाधिक चिंनन किया है। इन्होंने 'अथातो सौंदर्य जिज्ञासा' के एक लंबे अध्याय (सौंदर्यतात्विक वृत्ति तथा सौंदर्यबोधानुभव) में एक संपूर्ण सौंदर्यबोधानुभव चक्र् का प्रवर्तन किया है। इन्होंने इसे भारत के नाट्यशास्त्र से शुरू करके फिल्म तथा एक्शन
184 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 199
पेंटिंग तक, बैले तथा नृत्य तक, चित्र तथा नग्न (न्यूड) तक समाहित किया है। इन्होंने कला की दृष्टि से मध्यकालीन सौंदर्यबोधानुभव के दर्शनों तथा आधुनिक सौंदर्यबोधा- नुभव की दृष्टियों के बीच के गहरे अंतर एवं अंतर्विरोध उद्घाटित किये हैं। 'आधुनिक सौंदर्यबोधानुभव' के अंतर्गत इन्होंने अतियथार्थवादी 'फेटेसी-अनुभव' तथा 'अस्तित्वादी' फूहड़ता-'अनुभव' को भी लिया है तथा सारांश रूप में यही पाया है कि सौंदर्य- बोधानुभव-रस अथवा ब्यूटी का परिपूर्ण परिपाक नाट्य में ही हो पाया है क्योंकि यह सामूहिक सवेगों को उभारने वाली सामूहिक एवं कर्मपरक कला है।"102 इसके साथ ही इन्होंने यह भी देखा है कि दो ऐतिहासिक चरणों में सौंदर्यबोधानुभव के परिदृश्य में तीन क्रांतियां हुई हैं जो इस प्रकार हैं : 1. कलाकार, पात्र तथा सहृदय-तीनों के व्यक्तित्व संश्लिष्ट एवं आस्थापूर्ण होने के बजाय विघटित (डिसइंटिग्रेटेड) एवं परकीयकृत (ऐलिएनेटेड) हो गये हैं। 2. समाधि अथवा प्रत्यक्ष दशा वाला संदर्शन (विजन) अपनी मुकुर जैसी विमलता का परित्याग करके आज फूहड़, व्यंग्यविद्रूप, कुरूप, अतिययार्थवादी तथा धुंधला हो गया है। 3. 'काल' की आदि, मध्य, अंत की इकाई खंडित, विभक्त, स्थगित संतुलित आदि हो चुकी है। मूलतः यह मध्य ('अभी') अर्थात् तात्कालिकता से प्रतिबद्ध हो गयी है। इन युगांतकारी परिवर्तनों ने सौंदर्यबोधानुभव के स्वभाव को ही बदल दिया है। हमने यह भी पाया है कि 'आशंसा' में सौंदयबोधानुभव का प्रशांत एवं संतुलित (निर्मलचित्त; सात्त्विक) होना संभव भी है, लेकिन 'रचना' में यह संभव प्रतीत नहीं होता क्योंकि पहले चरण में अनुभव सीधा प्रत्यक्ष (साक्षात्कार) है जिसके लिए तन्मयी- भवन तथा वीतविघ्नता लाजमी है लेकिन दूसरे चरण में यह अंतमुखी संदर्शन तथा बहिर्गत तथ्यीकरण है जिसके लिए वैयक्तिक अनुभव तथा निर्माण श्रम अनिवार्य है।103 इन सब सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं के अतिरिक्त हिंदी में और भी ऐसे चिंतक हैं जिन्होंने इस विषय पर प्रासंगिक रूप से टिप्पणियां की हैं। लेकिन उन्होंने कोई नयी बात न कहकर इन सबका पिष्टपेषण ही किया है अतः उनका उल्लेख यहां अनिवार्य नहीं समझा गया है। सौंदर्यानुभूति तथा सामान्य अनुभूति सौंदर्यानुभूति मूलतः आनंदप्रद अनुभूति है। इस बात को हिंदी के लगभग सभी सौंदय- तत्त्ववेत्ताओं ने स्वीकार किया है।104 लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या सौंदर्यानुभूति से प्राप्त आनद सामान्य अथवा अन्य अनुभूतियों से भिन्न है? अथवा वही है। पाश्चात्य चिंतकों की इस संबंध में दो विचारधाराएं स्पष्ट होती हैं। पहली विचार- धारा को मानने वाले आई०ए० रिचर्डस हैं। इन्होंने सौंदर्यानुभूति और सामान्य अनु- भूतियों के बीच का फासला मिटाने का प्रयास किया है। इनका मत है कि सौंदर्यानुभूति अन्य अनुभूतियों के साथ गाढ़ सादृश्य रखती है। अंतर है विकास की मात्रा में।
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 185
Page 200
अर्थात् किसी सामान्य अनुभूति का विकसित रूप ही सौंदर्यानुभूति है, फलतः उनमें प्रकार भिन्नता नहीं है। दूसरे वर्ग के विचारकों ने सौंदर्यानुभूति को अन्य अनुभूतियों से विशिष्ट माना है। रोजर फ्राय, जार्ज संतायन तथा आनंदकुमार स्वामी इस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन चिंतकों ने सौंदर्यानुभूति को अन्य अनुभूतियों से किस रूप में भिन्न माना है। इसे कुमार विमन के शब्दों में इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है, "रोजर फ्राय का एक तर्क यह है कि सौंदर्यानुभूति सर्वथा और सर्वदा आनंदोन्मुख होती है, जबकि अन्य अनुभूतियों का आनंद से अबिनाभाव संबंध नहीं है। वस्तुतः यह स्वीकार्य सत्य है कि सौंदर्यानुभूति का, अगर आनंद से वर्तमान संबंध न भी हो, तो आगमिष्यत संबंध अवश्य ही रहता है। इसलिए आनंदकुमार स्वामी ने सौंदर्यानुभूति को 'प्रज्ञानघन आनंदमयी' अवस्था के रूप में स्वीकार किया है। पुनः सौंदर्य से प्राप्त आनंदानुभूति और अन्य सुखों में अंतर है। अन्य सुखों में इंद्रियानुभूति सीमा बन जाती है, किंतु सौंकर्यं प्रदत्त आनंदानुभूति में इंद्रियां अधिकरण मात्र रहती हैं, उसकी सीमा नहीं बनतीं।"105 हिंदी के चिंतकों ने सौंदर्णनुभूति को सामान्य अनुभूति से विलक्षण मानते हुए इसी विचारधारा से अपनी सहमति प्रकट की है। कुमार विमल ने सौंदर्यानुभूति के सामान्य अनुभूति से विशिष्ट होने के तीन कारण माने हैं, "एक तो सौंदर्यानुभूति की अवस्था भावक के धन संवेग (केथोकिसस) की दशा होती है। दूसरे सौंदर्यानुभूति में चमत्कार (संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रयुक्त अर्थ में) की अनिवार्य उपस्थिति रहती है। तीसरी, सौंदर्यानुभूति की उत्पन्न प्रक्रिया के विधायक तत्त्व अनेक, किंतु क्रमबद्ध होते हैं। जैसे, वस्तु-प्रत्यक्ष, उसका मानस-चित्रांकन, इन दोनों का एक विधान में ग्रंथन, इस समीकृत रूप के प्रति आश्रय के मन का प्रतिसंवेदन और सौंदर्यास्वादन की लब्धि।"106 आगे इन दोनों में अंतर स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं, "सामान्य अनुभूतियों में मनुष्य अपने व्यक्तित्व और वैयक्तिकता की परिधि से आबद्ध रहता है, किंतु कलानुभूति के क्षणों में वह इन सीमाओं से ऊर उठ जाता है। अतः कलानुभूति एक विशिष्ट संवित् है, जो भावक में सत्वोद्रेक पैदा करती है।"107 सामान्य अनुभूति और सौंदर्यानुभूति के प्रश्न को यद्यपि शिवकरण सिंह ने कठिन माना है तथापि इन्होंने इतना अवश्य कहा है कि "कलात्मक अनुभूति सप्राण और दुर्बोध होती है और सामान्य अनुभूतियों में ये विशेषताएं नहीं पायी जातीं।"108 "विशुद्ध कल्पना का आनंद देने वाली मानव गतिविधियों को 'ऐस्थेटिक्स एक्सपीरियंस' कहकर, राजेन्द्र वाजपेयी ने भी इनमें अंतर देखा है। वे लिखते हैं "यह अनुभूति जीवन की अन्य अनुभूतियों से भिन्न है। यह ऐंद्रिय या रागात्मक अनुभूति नहीं है। व्यक्तिगत रागद्वेष की सीमाओं से परे है। भारतीय मनीषियों ने इसलिए इस अनुभूति को 'अनिर्वचनीय' घोषित किया है।"109 इसी मत का समर्थन हिंदी में एस० टी० नरमिहाचारी110 तथा सुरेन्द्र शर्मा पंकज111 ने भी किया है। इन दोनों चिंतकों ने भी यह माना है कि सौंदर्यानुभूति और
28 186 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 201
उसकी प्रक्रिया विशिष्ट है। जिस प्रकार रसानुभूति लौकिक और अलौकिक से परे स्वयं में एक ही विशिष्ट प्रकार की विलक्षण आनंदानुभूति है, उसी प्रकार सौंदर्य की अनुभूति भी आनंदात्मक और लौकिक, ऐंद्रिय और अन्य मानसिक अनुभूतियों से विलक्षण है। इस प्रकार हम देखते हैं कि हिंदी के जिन चिंतकों ने भी इस प्रश्न को उठाया है, प्रायः सभी ने इन दोनों में पर्याप्त अंतर देखते हुए, सौंदर्यानुभूति को सामान्य अनुभूतियों से विशिष्ट तथा विलक्षण माना है।
सौंदर्यानुभूति को निर्धारित करने वाले तत्त्व सौंदर्यानुभूति की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए हिंदी के सौंदय तथा कला चिंतकों ने उन तत्त्वों का उल्लेख भी किया है जो सौंदर्यानुभूति की प्रकृति तथा स्वरूप को निर्धारित करते हैं। सौंधर्यानुभूति का मुख्य आधार प्रमाता या आश्रय है इसीलिए एस० टी० नरसिंहाचारी ने किसी वस्तुरूप की सौंदर्यानुभूति को निर्धारण करने वाला पहला तत्त्व आश्रय को माना है। इनके अनुसार सौंदर्यानुभूति सर्वप्रथम आश्रय के व्यक्तित्व, प्रकृति, चरित्र, मानसिक स्थिति और शारीरिक-मानसिक विकास की अवस्था पर निर्भर करती है। आश्रय सौंदर्य का ग्रहण किस प्रकार करता है. इसे स्पष्ट करते हुए वे मानते हैं कि बहिरमुखी व्यक्तित्व का स्वामी वस्तु के बाह्य रूप और उसके सामाजिक मूल्य को ही महत्त्व देता है जबकि अंतर्मुखी व्यक्तित्व प्रधान आश्रय रूप के अंतर्दर्शन के साथ-साथ उसके सौंदर्य का भावन करने में भी सफल होता है। बौद्धिक तथ्यपरक दृष्टि सौंदर्यानुभूति में बाधा होती है जबकि भावनाशील एवं कल्पनाशील दृष्टि, रूपगत सूक्ष्म सौंदय का मन में पुनर्भावन कर पाती है। आश्रय के जन्मजात संस्कार उसकी अनुभूति में वैयक्तिक वैचित्र्य की समुद्भावना करते हैं और सौंदर्य संबंधी अरजित सामाजिक संस्कारों के कारण अनुभूति को सार्वजनीन भावभूमि प्राप्त होती है। चारित्रिक रूढ़ आदर्शों की दृढ़ता के आश्रय में व्यक्ति अपनी निजी मान्यताओं के अनुसार सौंदर्य को ग्रहण करता है, उसके लिए स्वच्छंद सौंदर्यानुभूति की संभावनाएं कम हो जाती हैं। मानसिक स्थिति की अनुकूलता एवं प्रतिकूलता से भी प्रमाता या आश्रय की सौंदर्य के प्रति प्रतिक्रिया प्रभावित होती है। सौंदर्यानुभूति के लिए मन की प्रसादपूर्ण स्थिति अनुकूल प्रतिक्रिया विधायक होती है। संवेगात्मक-प्रकृति के प्रमाता के लिए सौंदर्य की निर्लिप्त और संयमित अनुभूति दुर्लभ होती है, सौंदर्य उसके मन में सात्त्विक अनुभूति के स्थान पर वासना को उभारता है।"112 सौंदर्यानुभूति की सीमाओं का नियमन करने से एस० टी० नरसिंहाचारी ने आश्रय के आयुजन्य सौंदर्य संबंधी संस्कारों को भी महत्त्वपूर्ण माना है। इस संबंध में उनका तर्क है कि "बचपन में सौंदर्यानुभूति सीमित होती है, संस्कारों की अविकसित अवस्था में अनुभूति की गहराई और पूर्णता की अनेक सीमाएं हो जाती हैं। बचपन
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 187
Page 202
का भोलापन सरल रूप में ही सौंदय देखता है या सरल सौंदर्य को ही वह ग्रहण कर पाता है। यौवन में सौंदर्य के संस्कार पूर्ण विकास पाते हैं, लेकिन उसका भावोद्वेग सौंदर्य को निरलिप्त नहीं होने देता। यौवन में कामना सौंदर्यानुभू त को आक्रांत करती है। इसलिए शद्ध सौंदर्यान्भूति सयमित प्रौढ़ावस्था की ही होती है। वार्द्धक्य में मन और इद्रियों की शिथिलता के साथ सौंदर्य के संस्कार भी दुर्बल हो जाते हैं।"113 प्रमाता अथवा आश्रय की आयु उसकी सौंदर्यानुभूति को निर्धारित करती है, इसका समर्थन कुमार विमल द्वारा भी हुआ है। अपने एक लेख में इसे स्पष्ट करते हुए वे खिखते हैं, "एक कविता या चित्रकृति पचास वर्ष की उम्र में एक सहृदय को वही आनंद नहीं देती, जो आनंद उस सहृदय को उसी रचना से बीस वर्ष की उम्र में मिला था या पचास वर्ष की उम्र में उस रचना से मिली अनुभूति की पुनरावृत्ति पचहत्तर वर्ष की उम्र में उसी रचना के आस्वादन से नहीं हो पाती।" सौंदर्यानुभूति को निर्धारित करने वाले इस तत्त्व का उल्लेख 'समालोचक' पत्रिका के सौंदर्यशास्त्र विशेषांक में नर्मदेश्वर चतुर्वेदो द्वारा भी हुआ है, "सौंदर्य की ललक मनुष्य में जन्मना है जो वयःवृद्धि के साथ-साथ विकसित होकर भावना तथा अनुभूति के माध्यम से दार्शनिक चेतना तक का रूप धारण कर लेती है। रंग, रूप, ध्वनि और स्पर्श का आकर्षण स्थूल से सूक्ष्मतर होता हुआ मनुष्य को तद्वत बना देता है। भोले शिशु की सहजानुभूति, किशोर की स्वप्निल कल्पना बन युवक के मांसल प्रदेश में रमण करती हुई वृद्ध के चिंतन का विषय बन जाती है।"114 इसके साथ ही इन्होंने यह भी माना है कि "सौंदर्यानुभूति मात्र व्यक्तिगत न होकर समाजसापेक्ष भी है। प्रत्येक युग विकास-क्र्म में भावना-विशेष से प्रभावित होता है और उस युग की प्रत्येक अभिव्यक्ति में उक्त भावना की प्रेरणा रहती है। यही भावना युग आदर्श का रूप ग्रहण कर लेती है और यह क्रम युग-परिवर्तन के पूर्व तक सजीव रूप में चला करता है।'115 इसी अंक के एक अन्य चिंतक अंबाप्रसाद सुमन ने सौंदर्यानुभूति पर प्रासंगिक रूप से चर्चा करते हुए सौंदर्यानुभूति को निर्धारित करने में व्यक्ति के संस्कारों का महत्त्वपूर्ण योगदान माना है। वे लिखते हैं, "सौंदर्यानुभूति में व्यक्ति के संस्कार अवश्य काम करते हैं। जिस देशकाल में मनुष्य रहता है, उसी के अनुसार उस मनुष्य के सौंदर्य का मानदंड बनता है। वही मानदंड किसी वस्तु की सुंदरता और असुंदरता पर अपना निर्णय दिया करता है। जिस प्रकार हमारे हृदयों में स्थायी भाव नित्य निवास करते हैं और कविनिबद्ध पात्रों के विभावादि से जागरित होकर रसरूप में हमें आनंदानुभूति कराते हैं, ठीक उसी प्रकार हमारी मनोभूमि पर हमारे संस्कार भी सौंदर्य का एक परिनिष्ठित रूप चित्रित कर देते हैं।"116 इसी बात का समर्थन करते हुए, सुरेशचंद्र त्यागी भी लिखते हैं, "व्यक्ति का निर्माण जिन परिस्थितियों में होता है. उसके जैस संस्कार होते हैं, उसी आधार पर वह अनुभूति करता है, न तो वह परिवेश से असंपृक्त रह सकता है और न संस्कारों से। 188 / सौंदर्यवोघशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 203
इसी कारण प्रत्येक व्यक्ति की अनुभूति में अंतर है। एक ही कलाकृति के दर्शन से सर् व्यक्तियों को सौंदर्य की समतुल्य अनुभूति नहीं होती। और एक ही काव्य के अनुशीलन से सब श्रोताओं या पाठकों को एक-सा रस नहीं मिलता।"117 'सम्मेलन-पत्रिका' के कलाअंक में रामचंद्र शुक्ल ने भी यह जिज्ञासा उठायी है कि क्यों किसी वस्तु के प्रति हमारी सौंर्यानुभूति सहज ही जाग्रत हो जाती है तथा क्यों कोई वस्तु हमें बिलकुल भी अच्छी नहीं लगती है ? मयूर तथा कौवे-इन दो पक्षियों का दृष्टांत देते हुए, इन्होंने किसी वस्तु के प्रति हमारी सौंदर्यानुभूति जाग्रत होने के चार कारण माने हैं : 1. रूप रंग, आकार तथा सज्जा। 2. मनुष्य के स्वभाव से मेल खाती प्रकृति । 3. मनुष्य के लिए उपयोगी हो। 4. पुराने संबंध तथा धारणाएं।118 निर्मला जैन तथा गणपतिचंद्र गुप्त ने सौंदर्यानुभूति में स्तर-भेद होने के कारण कलाकृति की प्रकृति को भी माना है। "माध्यम-भेद कलाओं की सौंदर्यानुभूति में भी भेद होता है। लगभग एक ही विषय की कविता और चित्रकला के कलात्मक प्रभावों का अनुभवपरक विश्लेषण किया जाये तो कदाचित् यही निष्कर्ष निकलेगा कि दोनों की सौंदर्यानुभूति पर्याप्त भिन्न है।"119 इसी बात से सहमति प्रकट करता हुआ गणपतिचंद्र गुप्न का यह कथन भी द्रष्टव्य है, "सभी प्रकार की कलाकृतियों से एक ही स्तर या एक ही प्रकार की अनुभूति संभव नहीं, कलाकृतियों की प्रकृति के अनुरूप ही उनकी अनुभूति का भी स्तर-भेद किया जा सकता है। सौंदर्यानुभूति में मतभेद कलाकृतियों की प्रकृति एवं उनकी अनुभूति के स्तर-भेद के ही द्योतक हैं।"1:0 इस प्रकार हम देखते हैं कि हिंदी के सौंदर्यचितकों ने प्रमाता या आश्रय के मन में सौंदर्यानुभूति को प्रगाढ़ करने में, उसके अपने व्यक्तित्व्र, प्रकृति, चरित्र, मानसिक स्थिति, उसके आयुजन्य सौंदर्य संबरंधी संस्कारों तथा कलाकृति की प्रकृति को महत्त्वपूर्ण माना है। इन तत्वों के अतिरिक्त एस० टी० नरसिंहाचारी ने सौंदर्या- नुभूति को प्रगाढ़ करने में वस्तु के देशकालगर संबंधों का हाथ, स्थानगत बाह्य परिवेश की अनुकूलता तथा प्रमाता और प्रमेय में संतुलित अंतराल को भी आवश्यक माना है।"121 एक अन्य चिंतक की भी यह धारणा है कि "अवस्था (आयु), वातावरण, सामाजिक संस्कार, साहचर्य, दूरी आदि अनेक तत्वों से प्रभावित काम के विकास- प्रसार को लेकर सौंदर्यानुभूति की प्रकृति और स्वरूप का निर्धारण होता है।"122 इन वितकों के अतिरिक्त रमेशकंतल मेघ123 तथा सूर्यप्रसाद दीक्षित124 ने भी सौंदर्यानुभूति को निर्धारित करने वाले तत्त्वों का संकेत किया है। सौंदर्यानुभूति और रसानुभूति हिंदी के विभिन्न सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं के सौंदर्यानुभूति संबंधी चिंतन को देखने के सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 189
Page 204
उपरांत यह स्पष्ट हो जाता है कि जिस क्रिया को सौंदर्यबोधशास्त्र की शब्दावली में सौंदर्यानुभूति, कलानुभूति, लालित्य-बोधीय अनुभूति, कलास्वादन, सौंदर्यानुभव अथवा सौंदर्यबोधानुभव कहा गया है, उसे ही भारतीय काव्यशास्त्र में अथवा रसशास्त्र की शब्दावली में रसानुभूति, रस की आस्व्रादन प्रक्रिया या काव्यानंद की अनुभूति का नाम दिया है। हिंदी में श्यामसुंदरलाल दीक्षित, फतहसिंह, निर्मला जैन, आनंदप्रकाश दीक्षित, गणपतिचंद्र गुप्त, नगेन्द्र, चौथीराम यादव तथा प्रेमस्वरूप गुप्त आदि विद्वानों के निम्नलिखित उद्धरण इस बात का स्पष्ट रूप से समर्थन करते हैं कि सौंदर्यानुभूति और रसानुभूति एक-दूसरे के पर्याय हैं। दूसरे शब्दों में सौंदर्यबोधशास्त्र में जिसे 'सौंदर्यानुभूति की संज्ञा प्रदान की गयी है वही भारतीय काव्यशास्त्र में' रसानुभूति के नाम से अभिहित हुआ है : 1. "भारतीय मनीषी की चेतना अंतर्गामिनी रही है। वह सौंदर्य का संबंध आनंद' अथवा 'रसानुभूति' से मानता है। पाश्चात्य देशों के विद्वज्जनों ने बहिर्मुख प्रभविष्णु आलंबन के अन्वेषण में श्रेयस माना, अतएव उन्होंने सौंदर्य का आकलन किया। एक ने कहा 'रसानुभूति' तो दूसरे ने पुकारा सौंदर्यानुभूति।"125 2. "चक्षु, श्रोत, जिह्वा, नासिका तथा त्वचा के माध्यम से जिस सौंदर्य की अनुभूति होती है उसकी तुलना हम उस सौंनर्यानुभूति से भी कर सकते हैं जो हमें काव्य के माध्यम से प्राप्त होती है और जिसे प्रायः रसानुभूति की संज्ञा दी जाती है।"126 3. "काव्य एवं अन्य कलाओं से होने वाला एक प्रकार का आस्वाद है। पूर्व में काव्य के संदर्भ में 'रसानुभूति' के रूप में, और पश्चिम में समग्र कलाओं के व्यापक संदर्भ में 'सौंदर्यानुभूति' के रूप में इस अनुभूति का विवेचन किया गया है।"127 4. "अतः सौंदर्य की अनुभूति सुखकर होती है, या कहना ठीक होगा-सुखकर ही होती है। स्वाभाविक है कि ऐसी वस्तु जिसे हम सुंदर कहते हैं, स्त्रपक्षीय और प्रीति-उत्पादक हो जाती है, प्रतिपक्ष और अप्रीति का सत्कार वहां नहीं होता। दुःख- भाव की स्थिति में मृदुलता का घनीभूत सुख आत्मपक्षीय होने से इतना तरल हो उठता है कि उससे अनुभवयिता की आत्मा ही भीग उठती है। सुख आत्मानंद का रूप धारण कर लेता है और यहीं आकर सौंदर्यानुभूति तथा रसानुभूति दोनों एक हो जाती हैं।"128 5. "सौंदर्यशास्त्र की दृष्टि से 'रस' कलानुभूति या सौंदर्यानुभूति (Aesthetic Experience) का पर्याय है।"129 6. "भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि से 'रस' कलास्वादन से प्राप्त अनुभूति है जिसे पाश्चात्य सौंदर्यशास्त्रीय शब्दावली में सौंदर्यानुभूति (Aesthetic Experience) कहा जा सकता है।"130 7." ...... इस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, रससिद्धांत-जिसमें रसानुभूनि सौंदर्यानुभूति या कलानुभूति का पर्याय है अतः यहां रस के आस्वाद अथवा यों कहें
190 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 205
कि आस्वादरूप रस के स्वरूप-विवेचन के अंतर्गत सौंदर्यानुभूति का विवेचन हुआ है।"131 8. "भारतीय वाङ्मय में सौंदर्यानुभूति का प्रामाणिक विवेचन काव्यशास्त्र में रस प्रसंग के अंतर्गत हुआ है।"132 9. "सौंदर्यानुभूति को भारतीय काव्यशास्त्र में रसानुभूति के नाम से अभिहित किया जाता है।"133 10. "अच्छा सौंदर्यानुभूति और रसानुभूति को थोड़ी देर के लिए, बिना विवाद उठाये, पर्याय मान लें। कोई हरज न होगा।"134 11. "मुझे लगता है, अपनी बात तुम तक पहुंचा चुका हूं। सौंदर्यानुभूति और रसानुभूति की एक 'कामन' भूमि है ...... ।"135 जहां कुछ चिंतकों ने सौंदर्यानुभूति को रस से जोड़ते हुए उन्हें एक-दूसरे का पर्याय माना है, वहां कुछ परंपराप्रिय मनीषियों ने इन्हें एक-दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने के प्रयास में इनमें पर्याप्त अंतर भी देखा है। इस वर्ग के विचारकों ने सौंदर्यानुभूति को स्थूल तथा रसानुभूति को सूक्ष्म बनाकर, अपने निष्कर्ष दिये हैं। इन चिंतकों में रामदहिन मिश्र का नाम उल्लेखनीय है। इन्होंने सौंदर्यानुभूति और रसानुभूति में अंतर स्पष्ट करते हुए लिखा है, "अन्यान्य कलाओं से हमें रसानुभूति नहीं, बल्कि सौंदर्यानुभूति होती है। सौंदर्यानुभूति हमें मुग्ध कर सकती है, पर उसका कोई स्थायी प्रभाव हमारे हृदय में नहीं होता क्योंकि भाव-तन्मयता की शक्ति उसमें नहीं होती। काव्य की जो शक्ति अपनी अभिव्यक्ति से हमें आकर्षित और अधिक काल के लिए प्रभावित करती है, वह उसकी भाव-विदग्धता या रसानुभूति है। कविता को केवल सुंदर बनाना उसका महत्त्व नष्ट करना है। कवि या पाठक जो सुंदरता पर मुग्ध होते हैं वह उसका बाह्य गुण है, जिस पर पाश्चात्य समीक्षक चर्चा करते हैं और उसी को सर्वेसर्वा मान बैठे हैं।"136 सौंदर्यान्भूति और रसानुभूति के अंतर को 'समालोचक' पत्रिका के सौंदर्यशास्त्र विशेषांक में अंबाप्रसाद सुमन ने भी देखा है। "भारतीय काव्यशास्त्री काव्य में रसानुभूति और कलाओं (मूर्ति-चित्र आदि में) सौंदर्यानुभूति मानते हैं। मेरी मान्यता है कि जहां रसानुभूति होती है वहां सौंदर्यानुभूति भी पूर्वपीठिका में अवश्य ही होती है। हां, केवल सौंदर्य की स्थिति में रस का पाया जाना आवश्यक नहीं।"137 हिंदी साहित्यकोश' में भी सौंदर्यानुभूति की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए सौदर्यानुभूति और रसानुभूति में अंतर देखा गया है। "सुंदर के द्वारा रसानुभूति की बराबरी नहीं की जा सकती। भारतीय पक्ष की रमणीयता के अंतर्गत ग्रहीता का भी विचार हुआ है और इस प्रकार वह सौंदर्यवाद से पृथक स्थिनि रखता है। भारतीय पक्ष के अनुसार सुंदर का संबंध केवल कला से माना जा सकता है, जो काव्य से सर्वथा पृथक मानी जाती है। सौंदर्यानुभूति में हमें मुग्ध करने की शक्ति अवश्य है पर उसका हृदय पर स्थायी प्रभाव नहीं पड़ता है।"138
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 191
Page 206
इस प्रकार हम यह देखते हैं कि सौंदर्यबोधशास्त्र तथा रस सिद्धांत दोनों ही चिंतन-परंपराओं में अपने-अपने ढंग से काव्य और कला संबंधी इस अवधारणा पर चिंतन करते हुए इनका संतोषप्रद समाधान ढूंढ़ने का प्रयास किया गया है। असल बास यह है कि पाश्चात्य सौंदर्यबोधशास्त्र एवं भारतीय काव्यशास्त्र भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक परिस्थितियों में विकसित हुए हैं, इसलिए इनके चिंतनक्रम में निर्मित होने वाली अवधारणाओं में भी भिन्नता होनी स्वाभाविक है। सौंदर्यानुभूति और रसानुभूति में अंतर होने का कारण भी यही माना जा सकता है।"139 सौंदर्यबोधशास्त्र में कला का मूल तत्त्व 'सौंदर्य' माना गया है और काव्यशास्त्र में काव्य का मूलतत्त्व 'रस'। विभिन्न सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने परंपरा के मोह के कारण ही इन्हें एक को दूसरे से श्रेष्ठ, व्यापक, गहन और समीचीन सिद्ध करने का प्रयास किया है। इस संबंध में निर्मला जैन का यह मत उचित प्रतीत होता है, "वस्तुतः 'रस' और 'सौंधर्य' जितने विरोधी कहे जाते हैं, उतने हैं नहीं, स्वयं रसवादी आचार्यों ने भी 'रस' के अंतर्गत किसी-न-विसी रूप में सौंदर्यबोधतत्त्व को सन्निविष्ट करने का प्रयास किया है ...... इस प्रकार पाश्चात्य, सौंदर्यशास्त्र में निरुपित 'सौंदर्य की सीमा यह नहीं है कि वह स्थल है, बल्कि वह केवल कलागत सौंदर्य का ही द्योतन करता है और उसे ग्राहक की अनुभूति का बोध नहीं होता।"140 निर्मला जैन के अतिरिक्त सुरेशचंद्र त्यागी ने भी सौंदर्य और रस के इस अंतर को अनुचित ठहराते हुए लिखा है कि "ऐसे प्रयास बहुत गहरे चितन के परिणाम नहीं हैं। सौंदर्य को स्थूल मानना और रस को सूक्ष्म सिद्ध करना उचित नहीं प्रतीत होता।"141 अंत में सौंदर्यानुभूति के इस वाद-विवाद को, कि इनमें परस्पर कौन व्यापक, श्रेष्ठ, गहन और समीचीन है, एस० टी० नरसिंहाचारी के इस कथन से समाप्त किया जा सकता है। सौंदर्यानुभूति रूप या बिंब की शुद्ध मानसिक अनुभूति है। रसानुभूति रूप की अनुभूति के साथ उत्पन्न भावनाओं की संवेद्य आनुषंगिक अनुभूति की सम्मिलित व्यवस्था है। दोनों का अपना-अपना महत्त्व है और पूरक रूप में दोनों मिलकर अनुभूतियों को पूर्णता प्रदान करते हैं।"142
192 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 207
एड i fo Sres feसंबर्भ 1. हरद्वारीलाल शर्मा, साहित्य और कला (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1959), पृ० 88 2. वही, पृ० 88-89 3. जयशंकर प्रसाद, काव्य और कला तथा अन्य निबंध (इलाहाबाद : भारती भंडार, लीडर प्रेस सातवीं आवृत्ति, संवत् 2032), पृ० 44 4. वही 5. नंददुलारे वाजपेयी, 'प्राक्कथन' काव्य और कला तथा अन्य निबंध, जयशंकर प्रसाद (इलाहाबाद : भारती भंडार, लीडर प्रेस, सातवीं आवृत्ति, संवत् 2032), पृ० 22 6. हरद्वारीलाल शर्मा, साहित्य और कला (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1959), पृ० 89 7. शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 123 8. रामेश्वरलाल खंडेलवाल, जयशंकर प्रसाद वस्तु और कला (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 395 9. हिंदी विश्वकोश (खंड-1) संपादक-सुधाकर पांडेय (वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, प्रथम संस्करण, 1960), पृ० 185 10. हिंदी शब्दसागर, (प्रथम भाग) संपादक-श्यामसुंदर दास (वाराणसी : नागरी प्रचारिणी (Ive सभा, नवीन संस्करण, 1965), पृ० 227 11: मानक हिंदी कोश (पहला खंड) संपादक-रामचंद्र वर्मा (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, संवत् 2019 वि०), पृ० 154 12. मानविकी पारिभाषिक कोश (साहित्य खंड) संपादक-नगेन्द्र (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1965), पृ० 117 13. सावित्री सिन्हा, ब्रजभाषा के कृष्ण भक्ति-काव्य में अभिव्यंजना-शिल्प (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1961), पृ० 2 14. हरदयाल, आधुनिक हिंदी कविता का अभिव्यंजना शिल्प (दिल्ली: सरस्वती प्रेस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 1 15. निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 310-11 16. वही, पृ० 311 17. (क) इस बात का संकेत किया जा चुका है कि अभिव्यंजना को लेकर 'मुंडे-मुंडे मतिभिन्ना' की कहावत चरितार्थ होती है। एक ही भाषा में इसके लिए एकाधिक शब्द मिल जाते हैं। अंग्रेजी में 'वेरोन' ने इसे मोनिफेस्टेशन 'स्पाशार्ट' ने 'अर्टिकुलेशन' और 'लेविस' ने 'कांकीटनेस' के प्रयोग द्वारा अभिव्यक्त किया है। हिंदी में भी अभिव्यक्ति, अभिव्यंजना, व्यंजना, प्रकटीकरण निरूपण, मूर्तिकरण, रूपायन आदि शब्द देखने को मिल जाते हैं"- शिवकरण सिंह, कलासृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रयम संस्करण, 1969), पृ० 111 (ख) "पाश्चात्य चिंतक और सौंदर्यशास्त्री कोचे, बोसांके, ब्रैडल, केरिट, सांतायन, इलियट, रिचड्स आदि किसी-न-किसी रूप में काव्यकला को संवेगों की अभिव्यंजना स्वीकार करते
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 193
Page 208
हैं परंतु अभिव्यंजना का निश्चित और स्वष्ट अर्थ अभी तक भी सामने नहीं आया।"- सुरेशचंद्र त्यागी, छायावादी काव्य में सौंदर्य दर्शन (मेरठ : अनुराधा प्रकाशन सस्करण, 1976), पृ० 82 (ग) "अभिव्यंजना के कई अर्थ प्रकाशित होते हैं जिनके प्रसंग विविध और विपरीत हैं"-रमेश कुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली: दि मैकमिलन कंपनी आफ इंडिया BR sate, लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 249 18. हरिवंश सिंह शास्त्री, सौंदर्य-विज्ञान (बनारस : मंत्री श्री काशो विद्यापीठ, प्रथम संस्करण, 1936), पृ० 7 19. वही, पृ० 9 20. हरद्वारीलाल शर्मा, काव्य और कला (अलीगढ़ : भारत प्रकाशन मंदिर, प्रथम संस्करण, सन् अनुल्लिखित), पृ० 163 21. हरद्वारी लाल शर्मा, सौंदर्यशास्त्र (इलाहाबाद : मधु प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1979), पृ० 67 22. वही, पृ० 67. 23. वही, पृ० 67-68 24. वही, पृ० 68 25. मक्खनलाल शर्मा, सौंदर्य और रूपतत्त्त्र 'समालोचक' (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक-राम विलास शर्मा, अंक 1, वर्ष 1, फरवरी, 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृ० 125-26 26. वीणा माथुर, प्रसाद का सौंदर्य दर्शन (जयपुर : बाफना प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1971), पृ० 26 27. रामानंद तिवारी, 'सत्यं शिवं सुंदरम् का स्वरूप', सम्मेलन पत्रिका (कला अंक), संपादक- राम्रताप त्रिपाठी शास्त्री, संख्या 2-3, भाग 44, मई, 1959 (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन), पृ० 8-9 28. वही, पृ० 11 29. भोलानाथ तिवारी, 'कला' सम्मेलन पत्रिका : (कला अंक), वही, पृ० 25 30. निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 313 31 शिवकरण सिंह, कला सूजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 112 32. वही, पृ० 106 33. वही, पृ० 123 34. सावित्ी सिन्हा, ब्रजभाषा के कृष्ण भक्ति काव्य में अभिव्यंजना-शिल्प (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1961), पृ० 6 35. हरदयाल, आधुनिक हिंदी कविता का अभिव्यंजना शिल्प (दिल्ली : सरस्वती प्रेस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 5 36. शिवबालक राय, काव्य में सौंदर्य और उदात्त तत्त्व (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 80 37. रामलखन शुक्ल, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तातत्विक विवेचन एवं ललित कलाएं (दिल्ली : नेशनन पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 37-42
Ee1194 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 209
- रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 248 39. वही, पृ० 248-49 40. अ तम खी या 'कलात्मक अभिव्यंजना,' कलाकार से संबद्ध है और प्रत्रियासंभूत है; वस्तुमखी या 'वस्तुगत अभिव्यंजना' कलाकृति पर आश्रित है, और आशंसक से संबंधित तथा प्रकृतित्व- संभूत है एवं 'सौंदर्यबोधात्मक अभिव्यंजना' संवेग, विषयवस्तु, रूप, पात्र, प्रतोक बिब, रीति, वक्रोक्ति अलंकार आदि के चारित्र्य से संबंधित है और कलावस्तु संभूत है-वही, पृo 249-50 41. वही, पृ० 250 42. वही, पृ० 260-61 43. वही, पृ० 261-71 44. वही, पृ० 276 45. विश्वंभरनाथ उपाध्याय, 'अथातो सौंदर्य जिज्ञासा मूल्यांकन', पहल, संपादक-ज्ञानरंजन, अंक 15, अक्तूबर, 1980 (जबलपुर : अग्रवाल कांलोनी), पृ० 98 46. शंभुदत्त झा, रिचड्स के आलोचना-सिद्धांत (पटना : भारती भवन, प्रथम संस्करण), पृ० 83 47. टाल्सटाय, कला क्या है, रूपांतरकार-इंदुकांत शुक्ल (वाराणसी : हिंदी प्रचारक प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1955), पृ० 2 48. निर्मला जैन, आधुनिक साहित्य : मूल्य और मूल्यांकन (दिल्ली : राजकसल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1980), पृ० 32 49. कृष्णलाल शर्मा, साहित्य : अन्य कलाओं के संदर्भ में (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑँफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० 32 50. रमेश कं तल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 302 51. वही, पृ० 307 52. जगदीश गुप्त, भारतीय कला के पदचिह्न (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1961), पृ० छः मनोभूमि) 53. राजेन्द्र वाजपेयी, सौंदर्य (कानपुर: सुम्मिट पब्लिकेशंस, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 73 54. रमेश कुतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 280 55. वही, पृ० 329-30 56. वही, पृ० 329 57. हरिवंश सिंह शास्त्री, सौंदर्य विज्ञान (बनारस : मंत्री श्री काशी विद्यापीठ, प्रथम संस्करण, 1936), पृ० 75 58. वही, पृ० 118 59. वही, पृ० 122-23ली। 08 60. हरद्वारी लाल शर्मा, कला विज्ञान (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1951), पृ० 31 61. वही, पृ० 32 62. हरद्वारीलाल शर्मा, रस और रसास्वादन (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1985), पृ० 4
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 195
Page 210
- हरद्वारी लाल शर्मा, सौदर्यशास्त्रं (इलाहाबाद : मधु प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1979), पृ० 14 64. वही, पृ० 70 65. हरद्वारीलाल शर्मा, सुंदरम् (लखनऊ: उत्तर प्रदेश शासन, हिंदी भवन, प्रथम संस्करण, 1975), पृ० 123-24 66. "सौंदर्यानुभूति द्वारा मन में सम्यक् आत्म-विश्रांति, समापत्ति और अतःचेतना का सन्निवेश होता है।"-सूर्यप्रसाद दीक्षित, छायावादी कवियों का सौंदर्यविधान (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1974), पृ० 31 67. फतह सिंह, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिदिग हाउस, प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 2 68. वही, पृ० 1 69. यद्यपि प्रारंभिक वैदिक साहित्य में सुदर, सौंदर्य आदि शब्दों का प्रयोग भी नहीं हुआ है परंतु आनंद, नंद, मोद, आमोद, मुद, प्रमुद, प्रिय आदि शब्दों द्वारा जिस अनुभूति की और संकेत किया गया है, वह वस्तुतः वही आनंदानुभूति है जिसे हम सौंदर्यानुभूति मानते आये हैं। वही, पृ० 18 70. रामचंद्र शुक्ल, रस मीमांसा, संपादक-विश्वनाथ प्रसाद मिश्र (काशी: नागरी प्रचारिणी सभा, चतुर्थ संस्करण, संवत् 2023), पृ० 24 71. वही, पृ० 24-25 72. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व, (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1971), वही, पृ० 120-22 73. वही, पृ० 123-25 74. निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 124 75. "सृजन के संदर्भ में लालित्यबोधीय अनुभूति का विशेष महत्त्व है। यह चर्वण के क्षेत्र को सरल, सघन और तीव्र बनाकर विधायक कल्पना को ऐसी सामग्री प्रदान करती है, जिससे सृजन संभव होता है। इस दृष्टि से कलानुभूति कला सृजन का प्रमुख उपजीव्य है।" -शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 61 76. वही, पृ० 39 77. वही, पृ० 42 78. वही, पृ० 58 79. गणपतिचंद्र गुप्त, रस सिद्धांत का पुनर्विवेचन (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1971), पृ० 170-71 80. नगेन्द्र, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिक। (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, (12e11978), पृ० 92 81. नगेन्द्र, आस्था के चरण (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 123 82. सुरेशचंद्र त्यागी, छायावादी काव्य में सौंदर्य दर्शन (मेरठ : अनुराधा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 33 83. वही, पृ० 37
196 / सौंदयबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 211
- एस० टी० नरसिंहाचारी, सौंदर्य तत्त्व निरूपण (दिल्ली : वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 39 85. वही, पृ० 39-40 86. वही, पृ० 43 87. वही, पृ० 87 88. वही, पृ० 92 89. वही, पृ० 96 90. वही, पृ० 104 91. नगेन्द्र, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1978), पृ० 95 92. रमेशकुतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑँफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 411 93. वही 94. वही 95. वही, पृ० 446 96. वही 97. वही, पृ० 450 98. मानविकी पारिभाषिक कोश (मनोविज्ञान खंड), संपादक-पद्मा अग्रवाल (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 21 99. "सौंदर्यबोधात्मक पश्चात्प्रभाव से सौंदर्यबोधानुभव का वह चक्र पूरा हो जाता है जो लौकिक अनुभव से चलकर पुनः लौकिक यथार्थता में पहुंच जाता है।"-रमेशकु तल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 450 100. वही, पृo 451 101. वही, पृ० 450 102. वही, पृ० 452 103. वही 104. (क) "सौंदर्य की अनुभूति में आनंद की अनुभूति भी होती है।"-लीलाधर गुप्त, पाश्चात्य साहित्यालोचन के सिद्धांत (इलाहाबाद : हिंदुस्तानी एकेडमी, द्वितीय संस्करण, 1967), पृ० 206 (ख) "सौंदर्यानुभूति का आनंद से अनिवार्य संबंध है।"-कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 125 (ग) ... इस प्रकार कलानुभूति भावना के कलात्मक पुनःसृजन की आनंदमयी अनुभूति है।"-नगेन्द्र, आस्था के चरण (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 131 11 (घ) "सत्य यह है कि सौंदर्य आनंदप्रद होता है, अतएव लालित्यबोधीय अनुभूति और आनंद का संबंध स्वतः सिद्ध है।"-शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1969), पृ० 60
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 197
Page 212
(च) :सौंदर्यानुभूति अन्य अनुभूतियों से भिन्न है। अत्निहित 'आनंद' की भावना इस अनुभूति की सबसे बड़ी विशेषता है। दूसरे शब्दों में, सौंदर्यानुभूति विशुद्ध आनंदा- नुभूति है।"-राजेन्द्र वाजपेयी, सौंदर्य (कानपुर : सुम्मिट पब्लिकेशंस, द्वितीय संस्करण, 1981), पृ० 19 (उ) "सौंदर्य की आनंदमयी अनुभूति को सौंदर्यानुभूति कहते हैं।"-सुरेशचंद्र त्यागी, छायावादी काव्य में सौंदर्य दर्शन (मेरठ : अनुराधा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 33 ae (ज) "सौंदर्यानुभूति और उसकी प्रत्रिया दोनों विशिष्ट प्रकार की है। रस की तरह सौंदर्य की अनुभूति भी आनंदात्मक है।"-एस० टी० नरसिंहाचारी सौंदर्य तत्त्व निरूपण (दिल्ली : वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 92 (झ) "सौंदर्य की अनुभूति बड़ी चमत्कारक होती है, जो आनंदायिनी होती है।" -हिंदी साहित्यकोश (भाग-1) संपादक-धीरेन्द्र वर्मा (वाराणसी : ज्ञान मंडल लिमिटेड, द्वितीय संस्करण, संवत् 2020), पृ० 943 105. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितय संस्करण, 1981), पृ० 121-22 106. वही, पृ० 122 107. वहो, पृ० 123 108. शिवकरण सिंह, कला सृजन प्रक्रिया (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 51 109. राजेन्द्र वाजपेयी, सौंदर्य (कानपुर : सुम्मिट पब्लिकेशंस, द्वितीय संस्करण, 1931), पृ० 20 110. एस० टी० नरसिंहाचारी, सौंदर्यतत्त्व निरूपण। दिल्ली : वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 92 111. सुरेन्द्र शर्मा पंकज, सौंदर्यानुभूति, 'शोध-पत्रिका' (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक-सुरेश, चंद्र त्यागी, (मेरठ : हिंदी परिषद् मेरठ विश्वविद्यालय, 1979), पृ० 46-47 112. एस० टी० नरसिंहाचारी, सौंदर्य तत्त्व निरूपण (दिल्ली: वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृo 87-88 113. वही, पृ० 88 114. कुम र विमल, सौंदर्यशास्त्रीय कला-धारणा के नये आयाम : 'शोधपत्रिका' (सोदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक-सुरेशचंद्र त्यागी, (मेरठ : हिंदी परिषद् मेरठ विश्वविद्यालय, 1979), पृ० 61 115. नर्मदेश्वर चतुर्वेदी, 'वैष्णव कवियों की सौंदर्योपासना' समालोचक : (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक-रामविलास शर्मा, अंक 1, वर्ष 1, फरवरी, 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृ 51 116. अ बाप्रसाद सुमन, सौंदर्यशास्त्र और रसनिष्पत्ति, समालोचक : (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), वही, पृ० 56 117. सुरेशचंद्र त्यागी, छायावादी काव्य में सौंदर्य दर्शन (मेरठ: अनुराधा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 39 118. रामचंद्र शुक्ल, 'आधुनिक चित्रकला का मूलाधार', 'सम्मेलन-पत्रिका' (कला अंक), संपादक- रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्री, संख्या 2-3, भाग-44, मई, 1959 (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन), पृ० 183-84
198 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 213
- निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिव्ली : नैशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 79 120, गणपतिचंद्र गुप्त, रस सिद्धांत का पुनर्विवेवन (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1971), पृ० 171 121, एस० टी० नरसिहाचारी, सौंदर्यतत्व निरूपण (दिल्ली : वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 91-92 122. सुषमा भसीन, 'सौंदर्य : स्वरूप-विवेचन,' 'शोध पत्रिका' (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक) संपादक- सुरेशचंद्र त्यागी, (मेरठ : हिंदी परिषद मेरठ विश्वविद्यालय, 1979), पृ० 27 123. " ... चरित्र, मनोवृत्ति तथा वातावरण की वजह से कलावस्तु के प्रति हमारा अनुभव बदलता है।"-रमंशकू तल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिलली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 411 124. सौंदर्यबोध दिक्काल, आत्मसंस्कार, वस्तुनिष्ठगुण, गुणग्राहकता आदि पर निर्भर है-सूर्य प्रसाद दीक्षित, छायावादी कवियों का सौंदर्य विधान (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1974), पृ० 30 125. श्यामसुंदर लाल दीक्षित, सौंदर्यशारत्र और शब्दविज्ञान, 'समालोचक' (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक-रामविलास शर्मा, अक 1, वर्ष 1, फरवरी, 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृ० 105 126. फतह सिंह भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिलली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 5 127. निर्मला जैन, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 124 128. आनंद प्रकाश दीक्षित, भूमिका, काव्य में सौंदर्य और उदात्त तत्त्व, शिवबालक राय (इलाहाबाद : वसुमती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1958). पृ० 1 129. गणपतिचंद्र गृप्त, रस सिद्धांत का पुनर्वि वेचन (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1971), पृ० 4 130. वही, पृ० 163 131. नगेन्द्र, भारतीय सौंदयशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1978), पृ० 99 132. वही, पृ० 92 133. चौथीराम यादव, मध्यकालीन भक्तिकाव्य में विरहानुभूति की व्यंजना (इलाहाबाद: रचना प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1974), पृ० 37 134. प्रेमस्वरूप गुप्त, सौंदर्यबोध, रसबोध और मूल्यबोध, 'शोधपत्रिका' (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक-सुरेशचंद्र त्यागी, (मेरठ: हिंदी परिषद्, मेरठ विश्वविद्यालय, 1979), पृ० 16 135. वही, पृ० 17-18 136. रामदहिन मिश्र, काव्य दर्पण (पटना: ग्रंथमाला कार्यालय, चतुर्थ संस्करण, 1960), पृ० 122-123 137. अंबाप्रसाद सुमन, सौंदर्यशास्त्र और रसनिष्पत्रि 'समालोचक' सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक -रामविलास शर्मा, अक 1, वर्ष 1, फरवरी, 1958 (आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर), पृ० 59 138. हिंदी साहित्यकोश (भाग-1) संपादक-धीरेन्द्र वर्मा (वाराणसी : ज्ञानमंडल लिमिटेड, द्वितीय संस्करण, संवत् 2020), पृ० 943
सौंदर्यानुभूति एवं सौंदर्याभिव्यंजना के विभिन्न आयाम / 199
Page 214
- "सौंदर्यानुभूति और रसानुभूति की धारणाएं विभिन्न परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न दृष्टियों को लेकर विकसित हुई हैं; इसलिए उनमें अतर हो जाना स्वाभाविक है।" -एस० टी० नरसिहाचारी, सौंदर्यतत्त्व निरूपण (दिल्ली : वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 39-40 140. निर्मला जैन, रससिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1977), पृ० 436 141. सरेशचंद्र त्यागी छायावादी काव्य में सौंदर्यदर्शन (मेरठ: अनुराधा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 37 142. एस० टी० नरसिंहाचारी, सौंदर्यतत्व निरूपण (दिलली : वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977), पृ० 43
8201 0557
RPP ,POJE 6@ LOSI
ohely F5g
ere!
.agt
212 og , (020c pr) pas
200 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 215
ग्री अध्याय-4
हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता
सौंद्यबोधशास्त्र की अवधारणा पाश्चात्य मानी जाने के कारण अधिकतर विद्वान यही मानते हैं कि भारत में, विशेषकर हिंदी में सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन का विधिवत निरूपण नहीं हुआ है। परंतु यह अवधारणा भ्रममूलक कही जा सकती है। वास्तव में भारतीय साहित्य में सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतन उस रूप में विकसित नहीं हुआ है, जिस रूप में पश्चिम में विकसित हुआ है। यहां सौंदयबोधशास्त्रीय चिंतन का आरंभ सर्वप्रथम वास्तुकला, मूर्तिकला तथा चित्रकला आदि कलाओं के वृत्त में हुआ है। भारतीय कला का उल्लेख करते हुए हमारे समक्ष मोहनजोदड़ो, हड़प्पा तथा अजंता-एलोरा आदि के ध्वंसावशेषों से प्राप्त हुई सामग्री वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला आदि कलाओं के रूप में उभरकर सामने आती है। अतः प्रमुख रूप से इन तीन कलाओं का अध्ययन ही भारतीय साहित्य में सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतन का रूप धारण कर सका है। भारतीय परंपरा में मूर्तिकला और चित्रकला को वास्तुकला की आश्रित कला माना गया है इसलिए इन दोनों कलाओं पर आरंभिक चिंतन भी वास्तुकला के ही संदर्भ में हुआ। सर्वप्रथम भारतीय कलाओं पर सर मोर्टिमर व्हीलर, कनिधम(1814-1893); फर्गुसन (18081886) जैसे पाश्चात्य मनीषियों ने चिंतन किया। इन्होंने भारतीय कलाओं पर एक साथ कार्य किया। ये मनीषी वास्तुकला के महान इतिहासकार के रूप में प्रसिद्ध हुए। इन्होंने भारतीय वास्तुकला का सर्वेक्षण करते हुए स्तूपों, मंदिरों, स्तंभों दुरगों, मुख्य द्वारों तथा मठों आदि की बनावट का पूरा निरीक्षण कर भारतीय कलाओं के प्रति सही और संतोषजनक कार्य प्रस्तुत किया। इन पाश्चात्य मनीषियों का यह कारय न केवल सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतन का रूप धारण करने में ही सहयोगी सिद्ध हुआ अपितु इसने भारतीय कला-मर्मज्ञों एवं सौंदर्य-चिंतकों को भी इस ओर कार्य करने के लिए प्रेरित किया। ई० बी० हैवेल, सर जान मार्शल तथा आनंदकुमार स्वामी आदि कला-चिंतकों का भी वास्तुकला के संदर्भ में किया गया चिंतन इसी परंपरा में सराहनीय रहा। आनंदकुमार स्वामी एक प्रतिभाशाली कला ममज्ञ और अध्येता थे। भारतीय कला चिंतकों के लिए उनका योगदान अत्यधिक महत्त्वपूर्ण साबित हुआ। उन्होंने भारत की प्राचीन कला को मानवता के बहुमूल्य उत्तराधिकार /201
Page 216
तथा निधि के रूप में प्रस्थापित किया। अब तक के कला-चिंतकों में आनंदकुमार स्वामी के सिवाय दूसरा कोई भी कला-चिंतक ऐसा नहीं था, जिसने भारतीय परंपरागत दृष्टिकोण को बिना शर्त और पूर्णतया स्वीकारा हो। उनकी कला-समीक्षा का मूल आधार शुद्ध भारतीय है तथा समस्त विवेचन ब्राह्मण और श्रमण पौराणिक उपाख्यानों के आधार पर निर्मित मूर्तियों, चित्रों तथा शिल्पशास्त्र आदि के आश्रित और पूरा का पूरा परंपरागत है।1 इसी परंपरा में रायबहादुर दयाराम साहनी, नंदलाल बोस, अ.नीन्द्रनाथ ठाकुर तथा रायकृष्ण दास आदि ने कला-चिंतन किया। आगे चलकर इन्हीं के प्रभावों से हिंदी में ललित कलाओं के विषय में विपुल सामग्री उपलब्ध होने लगी जो कि सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतन का रूप धारण कर सकी। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी तक यह चिंतन मुख्यतः वास्तुकला, मूर्तिकला तथा चित्रकला के वृत्त में ही हुआ। द्विवेदी जी ने सर्वप्रथम काव्यशास्त्र के कलापक्षीय वृत्त में सौंदयबोधशास्त्रीय चिंतन की शुरुआत की। उन्होंने नाट्यशास्त्र और काव्य शास्त्र के आधार पर भारतीय कलाओं की प्राचीनता के साथ-साथ उनकी ऐतिहासिक तथा सौंदर्यबोधात्मक भूमिकाएं निवेदित कीं। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि आरंभ में भारतीय कलाओं के ध्वंसावशेषों को खोदकर उन पर किया गया चिंतन ही हिंदी सौंदर्यतत्ववेत्ताओं को इस ओर अग्रसारित कर सका है। आज जब कि हिंदी में गत तीस वर्षों से सौंदयबोधशास्त्र पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं तथा कई सौंदर्य-चिंतकों ने अपने लेखन के द्वारा सौंदर्यबोधशास्त्र को एक स्वतंत्रशास्त्र के रूप में विकसित कर दिया है, हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं की गिनती भी कम नहीं है। इस अध्याय में हम हिंदी के सभी सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का परिचय न देकर केवल उन प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का ही उल्लेख करेंगे, जिन्होंने इस विषय पर एक से अधिक पुस्तकें लिखी हैं तथा पाश्चात्य साहित्य, पाश्चात्य संस्कृति और पाश्चात्य विचारधारा से प्रभावित न होकर इस विषय पर सूक्ष्म गहन अनुशीलन, गंभीर अध्यवसाय और सशक्त लेखन द्वारा इस विषय को संपन्न बनाने में योगदान दिया है तथा इस विषय से संबंधित कई नयी दिशाओं और संभावनाओं के द्वार खोले हैं। इस अध्याय में उनकी सौंदर्यबोधशास्त्र एवं कला संबंधित सभी पुस्तकों को एक साथ रखकर देखा गया है तथा इस विषय से संबंधित उनकी महत्त्वपूर्ण देन को भी स्पष्ट कर दिया गया है। अध्याय के अनावश्यक विस्तार तथा पुनरावृत्ति के दोष से बचने के लिए हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का परिचय संक्षेप में ही देने का प्रयास किया गया है। सभी प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का परिचय अकारांत क्रम से अथवा आयु के क्रम से नहीं अपितु सौंकयंबोधशास्त्र एवं कला पर प्रथम प्रकाशित पुस्तक के ऐतिहासिक काल- कम को ध्यान में रखकर दिया गया है। फीस
202 / सौंदयंबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 217
हरिवंश सिंह शास्त्री 'सौंदरय विज्ञान' पुस्तक की सूचना के अभाव में अभी तक हरद्वारीलाल शर्मा को ही हिंदी के प्रथम सौंदर्यतत्त्ववेत्ता के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है। हरद्वारी लाल शर्मा की प्रथम पुस्तक 'कला विज्ञान' सन् 1951 में प्रकाशित हुई है जबकि यह पुस्तक काशी विद्यापीठ के प्रकाशन विभाग द्वारा सन् 1936 ई० में प्रकाशित की गयी है। यद्यपि इससे पूर्व हिंदी में सौंदरयबोधशास्त्र पर पहला लेख फरवरी, सन् 1924 की 'माधुरी' पत्रिका में 'वाण' नामक व्यक्ति द्वारा लिखा गया है तथापि 'सौंदय विज्ञान' हिंदी में सौंदर्यबोधशास्त्र की प्रथम पुस्तक है और इस रूप में हम हरिवंश सिंह शास्त्री को हिंदी का प्रथम सौंदर्यतत्त्ववेत्ता स्वीकार करते हैं। 'सौंदर्यविज्ञान' लेखक द्वारा सन् 1930 में शास्त्री परीक्षा के लिए लिखे गये एक निबंध का संशोधित एवं परिवर्धित रूप है, जिसकी प्रेरणा उन्हें अपने गुरु संपूर्णानंद से मिली है। संपूर्णानंद जी की यह उत्कट इच्छा थी कि शास्त्री परीक्षा में सम्मिलित होने वाला कोई विद्यार्थी सौंदर्य पर दार्शनिक दृष्टि से निबंध लिखे। हरिवंश सिंह शास्त्री ने यह पुस्तक लिखकर न केवल उस इच्छा को मूर्त रूप ही दिया अपितु हिंदी में सौंदयबोधशास्त्र विषयक चितन-परंपरा की नींव भी रखी। लेखक की जीवनसंबंधी कोई भी सूचना प्राप्त नहीं है। 'सौंदर्यविज्ञान' पुस्तक के 'दो शब्द' में यह संकेत अवश्य मिलता है कि इन्होंने अपना आरंभिक जीवन आर्थिक अभावों में काटा है तथा सितंबर, 1929 तक इन्होंने पंजाब की नाभा स्टेट में एक मिडिल स्कूल के प्राधानाध्यापक के रूप में कार्य किया है।2 यद्यपि इस विषय पर लेखक की यह एकमात्र पुस्तक है और इसमें भी कोई संदेह नहीं कि उन्होंने पाश्चात्य सौंदर्य दर्शन के नयेपन का प्रलोभन तथा वहां से उधार ली गयी सामग्री का ही प्रदर्शन अधिक किया है। दूसरे शब्दों में उन्होंने पश्चिमी सौंदर्य तत्त्ववेत्ताओं की दृष्टियां देकर इसे कोश बना दिया है तथापि यह पुस्तक चिंतन की नयी दिशाएं प्रदान करने की क्षमता रखती है तथा हरिवंश सिंह शास्त्री को हिंदी के प्रथम सौंदर्यतत्त्ववेत्ता के पद पर आसीन करती है।
रायकृष्ण दास रायकृष्ण दास एक प्रसिद्ध कला इतिहासकार, प्रतिभाशाली कला मर्मज्ञ कलाकृतियों के संग्रहकर्त्ता और संरक्षक, संग्रहालय विशेषज्ञ आदि के रूप में प्रसिद्ध हैं। चित्रकला तथा मूर्तिकला में इनकी विशेष रुचि है तथा इन्हीं दोनों ललित कलाओं के वृत्त में उन्होंने सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतन को प्रस्तुत किया है। इनका जन्म 7 नवंबर, 1892 में काशी के भारत प्रसिद्ध राय खानदान में हुआ। इनके पिता रायप्रहलाद दास जी भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी के फुफेरे भाई थे। वे बहुत बड़े विद्या-व्यसनी एवं कला-मर्मज्ञ थे। अतः इस विषय में पिता की सजीव छाप राय कृष्णदास जी पर पड़ी है। यों उनकी औपचारिक शिक्षा अधिक नहीं हुई, लेकिन हिंदी के प्रमुख सौंदय तत्त्ववेत्ता / 203 405
Page 218
धर्म और दर्शन, इतिहास और पुराण, साहित्य और कला-सभी क्षेत्रों में उनका ज्ञान और उनकी सूझ अद्भुत थी। भारतेन्दु जी के परिवार से रक्त का संबंध होने के कारण उनमें हिंदी-प्रेम नस-नस में व्याप्त था। मूर्तिकला और चित्रकला पर लिखी गयी उनकी पुस्तकें 'भारतीय मूर्ति कला' (1939)3 तथा 'भारत की चित्रकला' (1949)4 हिंदी के कला संबंधी गौरव ग्रंथों में गिनी जाती हैं। इन दोनों पुस्तकों में लेखक ने हिंदी पाठकों को उनकी उस कला से परिचित करवाया है जिसमें युग-युग की संस्कृति और आध्यात्मिकता के संदेश भरे पड़े हैं और जो संसार के हजारों कोस में फैली हुई है तथा आज तक हमारे लिए उपेक्षा की वस्तु रही है। हिंदी में अब तक यह भ्रांति फैली हुई थी कि यह भाषा, विज्ञान और कला जैसे विषयों को लिखने के लिए समर्थ नहीं हैं। परंतु रायकृष्ण दास के लेखन से यह प्रकट हो जाता है कि हिंदी में कला लेखन को हिंदी के अपने ही गुणों और भारतीय भाषाओं का मुखापेक्षी होना श्रेयकर है। उनकी उक्त पुस्तकों में एक जगह भी ऐसी नहीं है जहां पाठक को यह अहसास हो कि किन्हीं विचारों, पारिभाषिक शब्दों आदि का अनुवाद भर किया जा रहा हो। इसी से यह स्पष्ट है कि उन्होंने कला लेखन के लिए भाषा के मौलिक स्वरूप को पहचाना है। उनकी पुस्तकों का पठन करने के उपरांत यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने कला पर लिखने के लिए पारिभाषिक शब्दों के स्रोत पारंपरिक, प्राचीन और लोक-साहित्य तथा लोक-जीवन में से ढूंढ़े हैं। अगर हम उनकी पुस्तकों से कतिपय उदाहरण रखें तो यह मानना पड़ेगा कि "पारि- भाषिक शब्दों में वह इतना बड़ा काम कर गये हैं कि उनका ऋण कई पीढ़ियां स्वीकार करेंगी।"5 उन्होंने भारतीय जमीन पर खड़े होकर भारतीय ढंग से सोचकर भारतीय अनुभव को वाणी देने वाली भाषा हमारे लिए उबारी है। भारतीय कलाओं को प्रोत्साहन देने के लिए रायकृष्णदास ने अनेक महत्त्वपर्ण कला संस्थाओं एवं संग्रहालयों को स्थापना भी को है। बनारस विश्वविद्यालय में स्थित कला-भवन उनके इसी कला-प्रेम का जीवित स्मारक है। "कृतियां संग्रहीत हों, संरक्षित हों और अपने देश में ही रहें, देसी भाषा में भी उनकी व्याख्या हो, हम उन्हें देखें-जानें और उन पर बात करें-इस दिशा में रायकृष्ण दास जी के प्रयत्न अब जग-जाहिर हैं।"6 स्वतंत्रता के उपरांत भारत में जो कला संस्थाएं बनीं उनमें राय- कृष्णदास का योगदान अत्यधिक महत्त्वपूर्ण रहा। वे भारत सरकार की संग्रहालयों संबंधी सलाहकार समिति के सक्रिय सदस्य थे। आज अगर हमारे यहां यह सजगता पहले से अधिक हुई है कि कलाकृतियां संरक्षित करने की, परखने की तथा संग्रहालयों में जन-साधारण के लिए सुलभ की जाने वाली वस्तुएं हैं तो इनका श्रेय बहुत कुछ रायकृष्ण दास जी को ही जाता है। इसी तरह कला-चेतना बढ़ाने के लिए कला-लेखन, खासकर देसी भाषाओं में, कितना आवश्यक है, इस ओर हमारा ध्यान दिलाने वाले भी रायकृष्ण दास ही हैं। 204/ सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 219
उन्होंने 1948 में 'कलानिधि" नाम से हिंदी पत्रिका निकाल कर हिंदी के सौंदर्यंतत्व- वेत्ताओं को इस भाषा में कार्य करने के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि रायकृष्ण दास ने मुख्यतः मूर्तिकला और चित्रकला के वृत्त में ही सौंदर्यबोध- शास्त्रीय चिंतन को विकसित किया है।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी भारतीय मनीषियों की उस उज्जवल परंपरा में से हैं जो अब लुप्तप्राय हो रही है। सरल स्वभाव, सहज व्यवहार और निरभिमान पांडित्य उनके चुबकीय व्यक्तित्व के मुख्य आकर्षण हैं। उनमें कालिदास की सहृदयता, बाणभट्ट की मस्ती, कबीर की निश्चलता और कवींद्र रवीन्द्र की सौंदर्य- चेतना है। उनकी बहुमुखी प्रतिभा प्राचीन और नवीन, दर्शन और साहित्य, कला और विज्ञान का अपूर्व संगम है। उन्होंने अपने कई शोधपरक ग्रंथों, विचारोत्तेजक निबंधों तथा श्रेष्ठ उपन्यासों के यशस्वी प्रणेता के रूप में अद्भुत ख्याति अरजित की है। वे पद्मभूषण से अलंकृत, डी० लिट० की उपाधि और अनेक साहित्यिक पुरस्कार प्राप्त किये हुए थे। इनका जन्म 19 अगस्त, 1907 ई० को उत्तर प्रदेश स्थित बलिया जिले के एक गांव में हुआ। इनका बचपन का नाम बैजनाथ द्विवेदी था। हिंदी शिक्षक के रूप में इन्होंने 1930 ई० में शांतिनिकेतन में कार्यारंभ किया था। इनकी मूल प्रेरणा शांतिनिकेतन रही है जिस कारण इन पर दो प्रकार के संस्कारों का विशेष प्रभात पड़ा है। एक तो सांस्कृतिक संस्कारों का, दूसरे आचार्य रवीन्द्रनाथ ठाकुर के माध्यम से मानवतावादी संस्कारों का। अपने संस्कारों के प्रभाव स्वरूप ही इन्होंने सौंदर्यबोध- शास्त्र को संस्कृति और मानवतावाद से जोड़ा और इन्हीं दो बिदुओं को आधार बना कर सौंदर्य और कला की चर्चा की। यद्यपि कला और सौंदर्य पर उनके विचार उनकी कई पुस्तकों एवं निबंधों में मिलते हैं तथापि इस विषय पर उनकी मुख्य पुस्तकें दो ही हैं-'प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद' (1952) तथा 'कालिदास की लालित्य योजना' (1962)। 'प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद' उनकी पुरानी पुस्तक 'प्राचीन भारत के कला- विलास' का ही परिवर्धित और परिवर्तित रूप है। इसमें उन्होंने गुप्त काल के कुछ सौ वर्षों से पूर्व से लेकर कुछ सौ वर्षों बाद तक के साहित्य का अवगाहन करते हुए उस काल के भारतवासियों के उन कलात्मक विनोदों का वर्णन किया है जिन्हें जीने की कला कहा जा सकता है। काव्य, नाटक, संगीत, चित्रकला तथा शिल्पकला से लेकर शृंगार-प्रसाधन, द्यूत करीड़ा तथा मल्ल विद्या आदि नाना कलाओं की दार्शनिक व्याख्याएं की गयी हैं तथा यह स्पष्ट किया गया है कि वे 'महामाया की रूप-विधायिनी शक्ति हैं।8 उन्होंने नाट्यशास्त्र और काव्यशास्त्र के आधार पर भारतीय कलाओं की हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता / 205
Page 220
प्राचीनता के साथ-साथ उनकी ऐतिहासिक तथा सौंदयंबोधात्मक भूमिकाएं भी निवेदित की हैं। द्वितीय पुस्तक 'कालिदास की लालित्य योजना' में कालिदास का अध्ययन साहित्यशास्त्रीय न होकर लालित्यशास्त्रीय है। कुछ लेख साहित्यशास्त्र से जुड़े हैं तथा कुछ लालित्यशास्त्र से। इसमें इनको सबसे बड़ी प्रेरणा मिथक से मिली है। मिथक उनके चिंतन की दूसरी सीढ़ी है। इन्होंने मिथक को भाषा से जोड़ते हुए अद्भुत सौंदयंबोधशास्त्र की नींव रखी है। सौंदर्यतत्त्वान्वेषक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की रचनाओं में सांस्कृतिक चेतना का उद्बोधन व्याप्त है। वे पाश्चात्य संस्कृति और साहित्य से प्रभावित होकर नहीं लिखते हैं अपितु भारतीय जीवन से अनुप्राणित साहित्य को भारतीय दृष्टि से देखना ही न्यायसंगत एवं उपयुक्त मानते हैं। वे यह स्वीकार करते हैं कि हजारों सालों से हमारे ऋषियों-मुनियों, चिंतकों, कलाकारों और राजपुरुषों ने जो महान् चीजें हमें दी हैं, उनमें पशुसुलभ धरातल से ऊपर उठने की सामर्थ्य है।9 कालिदास ने पूर्वजों की इस ज्ञानराशि को ही सशक्त रूप में व्यक्त किया है। कालिदास की इस अभिव्यक्ति को ही द्विवेदी जी उनकी लालित्य-योजना मानते हैं। इनके सौंदर्य बोध पर टिप्पणी करते हुए यदुनाथ चौबे लिखते हैं, "आद्या शक्ति, सृष्टिकर्त्री ललित की सिसृक्षा और मनुष्य निर्मित या व्णित सौंदर्य में एकरूपता का दर्शन करना, द्विवेदी जी का सौंद्यबोध है।"10 महाकवि कालिदास की कृतियों में वे सर्वत्र इसी रूप का दर्शन करते हैं। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि हिंदी में अब तक सौंदर्यबोधशास्त्र का जो चितन मूर्तिकला तथा चित्रकला में वृत्त में हुआ उसे आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने काव्यशास्त्र के कलापक्षीय वृत्त में प्रस्तुत कर भावी सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का ध्यान इस ओर दिलाया तथा एक अद्भुत सौंदर्यबोधशास्त्र की नींव रखी।
हरद्वारीलाल शर्मा हरद्वारीलाल शर्मा हिंदी के सुयोग्य, यशस्वी कृतिकार तथा ऐसे आरंभिक सौंदयं- तत्त्ववेत्ता हैं जो कि पिछले तीस वर्षों से भी अधिक समय से सौंदर्य एवं कला के विभिन्न पक्षों पर लिख रहे हैं। वे हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत और कौरवी बोली में समान अधिकार के साथ लिखते हैं। इन्होंने सर्वप्रथम हिंदी में सौंदयंबोधशास्त्रीय चिंतन के बिखरे हुए सूत्रों को एक स्थल पर इकट्ठा किया तथा विषय पर मौलिक एवं गंभीर विवेचन करने का प्रयास किया। इनका दृष्टिकोण मुख्यतः दारशनिक एवं मतोवैज्ञानिक रहा है। हिंदी में यह एक मात्र ऐसे सौंदर्यतत्त्ववेत्ता हैं जिनकी इस विषय पर सर्वाधिक पुस्तकें प्रकाशित एवं पुरस्कृत हुई हैं। इनकी प्रथम पुस्तक 'कला विज्ञान' है11 जो सन् 1951 में हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से प्रकाशित हुई है। यह पुस्तक कला संवंधी निबंधों 206 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 221
का एक ऐसा संग्रह है जो कि कला तत्वों के ऊपर वैज्ञानिक आलोचना करने का प्रथम प्रयास है। सन् 1953 में उनकी दूसरी पुस्तक 'सौंदर्यशास्त्र'12 प्रकाशित हुई। जैसा पुस्तक का नाम है, वास्तव में वैसे गूढ़ शास्त्रीय विवेचन का भारी-भरकम स्वरूप तो इसका नहीं है, परंतु यह एक ऐसी परिचयात्मक कृति कही जा सकती है जो सौंदर्य- संबंधी नवीन उद्भावनाओं के क्रमिक रूप और इतिहास, रूप और स्वरूप, भौतिक और आध्यात्मिक विचार परंपरा और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आदि पर उपयोगी प्रकाश डालती है और कला सौंदर्य के पारंपरिक संबंध के बारे में संक्षेप में विचार करती है। इसी विषय पर इनकी अन्य महत्त्वपूर्ण पुस्तक 'सुदरम'13 1975 में प्रकाशित हुई। 'सौंदर्यशास्त्र' की तुलना में यह पुस्तक सौंदर्य को विभिन्न रूपों में परिभाषित करते हुए सौंदर्य की बहुत गंभीर और बिस्तृत व्याख्या करती है साथ ही कतिपय विशिष्ट कलाकृतियों की सौंदर्य दृष्टि से मीमांसा भी करती है। कम उक्त तीनों पुस्तकों के अतिरिक्त इनके तीन निबंध संग्रह-'साहित्य और कला' (1959),14 'काव्य और कला' (सस्करण अनुल्लिखित)15, 'चिंतन के नये आयाम' (सन् 1976)16 भी मिलते हैं जो कि सौंदर्य एवं कला से संबंधित सभी प्रश्नों का समाधान अथवा समाधान की दिशाएं स्पष्ट करने का प्रयास करते हैं। हरद्वारीलाल शर्मा की इन सभी पुस्तकों की मूल प्रेरणा उनका अंग्रेजी में प्रकाशित शोध प्रबंध 'ए क्रिटिकल एंड कंपेरेटिव स्टडी ऑफ इंडियन एस्थेटिक्स' रहा है। यह शोध प्रबंध सन् 1949 में डॉक्टरी की उपाधि के लिए स्वीकृत हुआ है। इसमें सौंदर्यंबोधशास्त्र पर प्रचुर सामग्री संग्रहीत है। अभी लेखक इस विषय के अन्य अछूते पक्षों पर भी लिख रहे हैं। 'हमारी सौंदर्य संपदा' उसका अगला प्रयास है। अपनी पश्चिमी और संयुक्त राज्य अमरीका की अध्ययन यात्रा के उपरांत वे 'विश्व कला की झ्वलक' पुस्तक भी लिख रहे हैं। इनकी अब तक प्रकाशित पुस्तकों पर कतिपय लेखकों का यह आरोप रहा है कि 'इनके निबंध मुख्यतः अंग्रेजी लेखकों की मान्यताओं, उनके अनुभवों, सिद्धांतों और ग्रंथों के आधार पर ही लिखे गये हैं।17 कुछ सीमा तक उनका यह कथन सही है लेकिन अगर देखा जाये तो यह अनिवार्य एवं युग धर्म कहा जा सकता है। क्योंकि हिंदी में अभी तक सौंदयबोधशास्त्रीय चिंतन का अभाव रहा है। अगर कहीं हमारे प्राचीन साहित्य में यह मिलता भी है तो वह वेदों-पुराणों की रहस्यमयी भाषाओं में इस प्रकार से घुला-मिला है कि उसे समेटने के लिए कौशल और काल दोनों की आवश्यकता पड़ती है। ऐसी कठिन परिस्थिति में हरद्वारीलाल शर्मा ने हिंदी पाठकों एवं सौंदर्य-चितकों को जो कुछ भी दिया है वह अपने आप में महत्त्वपूर्ण साबित होता है। लेखक ने स्वयं अपनी एक पुस्तक के निवेदन में यह स्वीकार भी किया है कि "संस्कृत और अंग्रेजी में सौंदर्यशास्त्र के ऊपर पर्याप्त साहित्य लभ्य है। हमें इसे अपनाना चाहिए। हिंदी में इस विषय पर अधिक रचनाएं प्रकाश में नहीं आयीं, ऐसा प्रतीत होता है। पुराने संस्कारों हिंदी के प्रमुख सौंदर्यंतत्त्ववेत्ता / 207
Page 222
के प्रभाव से अभी हम पश्चिमी विद्वानों के विचारों को ही हिंदी में अनुवाद के रूप में लाते हैं। मानना होगा कि हमें अभी स्वतंत्र विचार करने का साहस कम है।"18 मछा निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि भले ही हरद्वारीलाल शर्मा ने अंग्रेजी लेखकों की मान्यताओं एवं सिद्धांतों को अपनाया है तथा कहीं-कहीं उनके निष्कर्ष भ्रांति- पूर्ण एवं अस्पष्ट लगते हैं तथापि इनकी पुस्तकें भावी सौंदर्यतत्त्ववेताओं को प्रभावित करती हैं तथा सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतन की नयी दिशाओं को आलोकित करती हैं।
रामचंद्र शुक्ल हिंदी के प्रमुख सौंदर्यवेत्ताओं में रामचंद्र शुक्ल एक ऐसे सौंदर्यान्वेषक हैं जिन्होंने केवल चित्रकला के वृत्त में ही सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतन को विकसित किया है। चित्र कला की सूक्ष्म, गहनतम अत्यंत जटिल तथा सैद्धांतिक समस्याओं को अत्यंत सरल तथा स्पष्ट रूप में व्यक्त करने में उनकी लेखन शैली बेजोड़ है। रामचंद्र शुक्ल स्वयं एक कुशल चित्रकार हैं। चित्रकला में अपने नवीनतम प्रयोगों के द्वारा उन्होंने भारतीय कला को नयी दिशाएं दी हैं। काशी चित्रशैली के नाम से इन्होंने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर एक नवीन सांस्कृतिक भारतीय चित्रशैली को विकसित किया है। भारतीय चित्रकला को नये आयाम देने के कारण वे फ्रांस सरकार द्वारा पुरस्कृत भी किये जा चुके हैं। पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाले इनके आधुनिक चित्रों ने नये चित्रकारों को बड़ी प्ररणा प्रदान की है। वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कला-संगीत भारती महाविद्यालय के ललित कला विभाग में कार्यकारी अध्यक्ष रह चुके हैं तथा बिहार सरकार ने इन्हें अपने राज्य में सहायक निर्देशक (कला- कौशल) के पद पर आमंत्रित भी किया है। चित्रकला शिक्षणशास्त्र के मान्य मर्मज्ञ होने के कारण इस विषय की उनकी सभी पुस्तकें विद्वानों द्वारा प्रशंसित हो चुकी हैं। चित्रकला पर उनकी पुस्तक 'कला और आधुनिक प्रवृत्तियां' (सन् 1958)19 उत्तर प्रदेश द्वारा पुरस्कृत तथा सम्मानित की जा चुकी है। इस पुस्तक में पाठकों को चित्र-जगत् की विशेषताओं और उपलब्धियों का परिचय तो मिलता ही है, साथ ही इस दिशा में कहां और किस प्रकार के नये प्रयोग हो रहे हैं तथा चित्रकारों में किस भावना और सिद्धांत का प्रचार हो रहा है- इसकी भी भलक मिलती है। चित्रकला के नये प्रयोगों तथा चित्रकारों की सभी गतिविधियों से परिचित होने के कारण वे चित्रकला की मुख्य प्रवृत्तियों के अतिरिक्त प्रतीकवादी, आदर्शवादी, यथार्थवादी, आभासात्मक, वैज्ञानिक, अभिव्यंजनात्मक, स्वप्तिल तथा काल्पनिक आदि प्रवृत्तियों की भी विस्तृत चर्चा करते हैं। विषय संबंधित अनेक चित्रों को देकर लेखक ने इस पुस्तक को अत्यधिक उपयोगी बनाया है। इसी विषय पर उनकी अन्य महत्त्वपूर्ण कृति 'कला प्रसंग'20 है जो सन् 1964 में प्रकाशित हुई है। इसमें चित्रकला से संबंधित उन प्रसंगों की चर्चा की गयी है जो अत्यंत मार्मिक, रोचक और ज्ञानवर्धक होते हुए भी अक्सर सामने नहीं आ पाते हैं, 208 / सौंदर्य बोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 223
यद्यपि कला और कलाकार को समझने में बड़े सहायक होते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें भारतीय चित्रकला की उन विशेष प्रगतियों पर भी प्रकाश डाला गया है जो अब तक प्रकाश में नहीं आ सकी हैं। इन पुस्तकों के अतिरिक्त उनकी तीन अन्य पुस्तकें-'नवीन भारतीय चित्रकला', 'चित्रकला का रसास्वादन', तथा 'कला का प्रदर्शन'21 भी चित्रकला-संबंधित विभिन्न लेखों तथा निबंधों का ही संकलन है। इस प्रकार रामचंद्र शुक्ल की चित्रकला पर अब तक पांच पुस्तकों तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में पांच सौ निबंध प्रकाशित हो चुके हैं। अपने सभी लेखों में, जहां वे शब्दों के द्वारा अपनी बात को स्पष्ट नहीं कर पाते हैं वहां चित्रकार होने का लाभ उठाते हुए चित्र के द्वारा अपने कथन का स्पष्टीकरण करते हैं, यही कारण है कि इनकी पुस्तकों में अत्यधिक चित्र उपलब्ध होते हैं। चित्रकला ही इनके जीवन का मूल बिंदु रही है तथा इसकी परिधि में वे हिंदी में सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतन का विकास करते हैं। वे स्वयं अपनी पुस्तक 'कला प्रसंग' के 'लेखकीय' में लिखते हैं, "मेरी सारी चेतना इसी केंद्र बिंदु से बंधी इसके चारों ओर की दुनिया को देखती, समझती और परखती है। इतना ही नहीं मेरे सारे कार्य भी जाने-अनजाने इसी केंद्र के द्वारा संचालित होते हैं।"2
जगदीश गुप्त
जगदीश गुप्त हिंदी में आधुनिक कवि, आलोचक, कला-चिंतक, चित्रकार तथा पुरातत्त्वान्वेषी के रूप में प्रसिद्ध हैं। यह सभी रुचियां इनमें एक साथ विकसित होती गयी हैं। वे अपने शिक्षा काल में प्रथम श्रेणी के विद्यार्थी तथा स्कालर रहे हैं। ललित कलाओं के अंतर्गत चित्रकला में इनकी रुचि अन्य कलाओं की अपेक्षा अधिक रही है। भावात्मकता जब सबल हो उठती है तो उनकी तूलिका रंगों में डूब जाती है। सौंदर्य के प्रति इनकी गहरी आस्था रही है तथा वह इन्हें कुरूप कही जाने वाली वस्तुओं में भी दिखाई पड़ती है। इसके बड़े प्रभावशाली रूप इनके चित्रों में दिखाई पड़ते हैं। भावपक्ष जितना उभरकर उनके चित्रों में सामने आया है, शायद ही किसी अन्य समकालीन चित्रकार की कला में मिले। कवि के मस्तिष्क में प्रतीकों का एक अमूल्य भंडार हुआ करता है जो अक्सर चित्रकार नहीं पाता है परंतु जगदीश गुप्त के कवि और चित्रकार दोनों ही होने के कारण इनकी कला में अत्यंत जोरदार तथा अर्थपूर्ण प्रतीकों का एक अत्यंत निखरा रूप हमारे सामने आता है। इनकी इसी विशेषता को देखते हुए रामचंद्र शुक्ल ने इन्हें सही अर्थों में प्रतीकवादी कलाकार कहा है तथा आधुनिक भारतीय चित्रकला में इनको वही स्थान दिया है जो गोगां का फ्रेंच कला में रहा है। 23 प्राचीन तथा पाश्चात्य आधुनिक चित्रकला का इन्हें गहन अध्ययन प्राप्त है परंतु दोनों से अलग इन्होंने अपना एक नया ही रास्ता अपनाया है जिसमें प्रयोग ही
हिंदी के प्रमुख सौंदर्यंतत्त्ववेत्ता / 209
Page 224
मुख्य आधार रहा है। वे चित्रकारों के कवि तथा कवियों के चित्रकार हैं। इनका 'युग्म' (1973)24 काव्य संग्रह, जिसमें आदिम मानव की चित्रांकन क्षमता का सहारा लेकर संवेदना को समसामयिक संदर्भ में उभारने का प्रयास किया गया है, इनके कवि और चित्रकार दोनों ही रूपों का परिचायक है। इनके व्यक्तित्व का भेद इन दो स्तरों पर इस रूप में कर पाना अत्यंत कठिन है कि इनका कविरूप चित्रकार से बड़ा है या कि चित्रकार कवि से बड़ा है। 'युग्म' में इन्होंने शब्द और रेखाचित्रों-दोनों की साधना का लक्ष्य उस आदिम आकर्षण को बनाया है जिसे काम कहा जा सकता है और जो पुरुषार्थों में एक है, घटिया अर्थों में जिसे 'यौन' कहकर आधुनिक बनाया जा सकता है।25 'युग्म' के रेखाचित्रों की प्रेरणा इन्हें आदिम मानव के भित्ति-चित्रों खजुराहो की सुर-सुंदरियों, अभिचार मूर्तियों और मिथुन मूर्तियों से मिली है। जहां 'युग्म' और 'हिमविद्ध' काव्य संग्रह उनके कवि और चित्रकार दोनों रूपों का परिचय देते हैं वहां 'भारतीय कला के पदचिह्न' (1961)26 तथा 'प्रागतिहासिक भारतीय चित्रकला' (1967) पुस्तकें पाठकों को इनके कला चिंतकों एवं पुरातत्वान्वेषी रूप से परिचित करवाती हैं। 'भारतीय कला के पदचिह्न' इनके लगभग पंद्रह वर्षों में लिखे गये ललित कला संबंधी लेखों का संकलन है। ललित कलाओं में भी इन्होंने सभी कलाओं को न लेकर चित्रकला तथा मूर्तिकला का ही उल्लेख किया है। संपूर्ण कला-विषयक सामग्री को इस पुस्तक में कला-चित्र, कला-मूर्ति, कला-शिल्प एवं कला संस्कृति इन चार भागों में विभाजित किया गया है। यह कला-चिंतक जगदीश गुप्त की प्रथम ऐसी कृति है, जिसमें भारतीय चित्रकला और मूर्तिकला का मात्र परिचय ही नहीं अपितु ऐतिहासिक विवेचन और मूल्यांकन भी किया गया है। युग की बदलती हुई मान्यताओं में इन कलाओं की क्या स्थिति रही है, इस पर जगदीश गृप्त ने विस्तृत चर्चा की है। इनकी इस विषय पर दूसरी महत्त्वपूर्ण पुस्तक 'प्रागैतिहासिक भारतीय चित्रकला' है जो कि प्रथम पुस्तक के छः वर्ष उपरांत प्रकाशित हुई है यू तो इन्होंने 'भारतीय कला के पदचिह्न' पुस्तक के प्रथम लेख में ही 'प्रागैतिहासिक भारतीय चित्र- कला का परिचय दिया है परंतु एक चित्रकार होने के नाते प्रागैतिहासिक चित्रों की शक्ति और सहज सौंदर्य ने इन्हें विशेष आकर्षित किया, जिससे इन्होंने इस विषय पर एक स्वतंत्र पुस्तक लिखने की आवश्यकता महसूस की। इस प्रकार हम देखते हैं कि जगदीश गुप्त ने रायकृष्णदास की भांति हिंदी में सौंदयबोधशास्त्रीय चिंतन को केवल चित्रकला तथा मूर्तिकला के वृत्त में ही विकसित किया। वास्तुकला तथा संगीत कला का उल्लेख इन्होंने बिलकुल नहीं किया। चित्रकला और मूर्तिकला के साथ वास्तुकला की चर्चा न कर पाने के कारण को स्पष्ट करते हुए वे एक स्थल पर लिखते हैं, "भारतीय वास्तुकला की समृद्धि का अपना स्वतंत्र क्षेत्र है, पर मुझे उसमें इतनी रुचि नहीं है।"27 210 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 225
भगवतशरण उपाध्याय सुविख्यात इतिहासज्ञ, पुराविद और कला-चिंतक भगवत शरण उपाध्याय का जन्म सन् 1910 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के उजियार गांव में हुआ। इनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गांव की पाठशाला में हुई। उच्च शिक्षा के लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। प्राचीन इतिहास और पुरातत्त्व में गहरी रुचि होने के कारण एम.ए. में इसी विषय को स्वीकार कर उपाधि प्राप्त की। इन्होंने शोधकार्य को भी मुख्य रूप से इतिहास पर केंद्रित किया और भारतीय इतिहास का गहन वैज्ञानिक अध्ययन कर अनेक निष्कर्ष सामने रखे जो मनुष्य की ऐतिहासिक अवस्थाओं को समकने के लिए नितांत महत्त्वपूर्ण हैं। इतिहास को इन्होंने मात्र कुछ व्यक्तियों के उत्थान- पतन के विवरण की तरह नहीं लिया, बल्कि उसे संपूर्ण जाति की सामाजिक-सांस्कृतिक हलचलों और परिवर्तनों के रूप में रखा। विश्व-सभ्यताओं के पुरातात्विक अध्ययन और सांस्कृतिक इतिहास की खोज में भी इनकी गहरी रुचि रही। इस सिलसिले में इन्होंने न सिर्फ भारत का कई बार भ्रमण किया, अपितु मध्य पूर्व तथा पश्चिमेशिया के भी कई प्राचीन स्थानों पर जाकर रहे। विश्व-संस्कृति के प्रति इनका दृष्टिकोण मानवतावादी था। संस्कृति को इन्होंने 'समान प्रयत्नों से उत्पन्न विरासत' तथा 'समस्त के लिए समस्त का योगदान' माना है। इनकी पुरातत्त्व एवं प्राचीन इतिहास विषयक गहरी रुचि को देखकर ही इन्हें प्रयाग तथा लखनऊ के संग्रहालयों का क्रमशः अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। इनके कार्यकाल में इन दोनों संग्रहालयों में स्थापत्य और मूर्तिकला से संबद्ध पर्याप्त सामग्री एकत्र हुई, जिससे इन दोनों संग्रहालयों का रूप ही बदल गया। भगवतशरण उपाध्याय की इतिहास, पुरातत्त्व तथा संस्कृति विषयक विद्वता से प्रभावित होकर विश्व के कई विश्वविद्यालयों ने इन्हें भाषणों के लिए भी सादर निमंत्रित किया था। न्यूयार्क, वाशिगटन, शिकागो, विसकांसेन, लंदन, पीकिंग, मास्को आदि विश्वविद्यालयों में इन्होंने भाषण दिये हैं। भारतीय मनीषा की प्रतिष्ठा में इन्होंने अपने भाषणों, लेखों और पुस्तकों से जो कार्य किया, वह बहुत कम भारतीय विद्वान कर सके हैं। अंग्रेजी भाषा पर असाधारण अधिकार के कारण विषय-प्रतिपादन में भी इन्हें पूर्ण सफलता मिलती थी। इनके अध्ययन और लेखन की परिधि बहुत विस्तृत थी। भारतीय विद्या (इ'डालॉजी), पुरातत्त्व, इतिहास, कला, द्शन, वैदिक वाङ्मय, संस्कृत साहित्य, हिंदी साहित्य आदि से संबद्ध विषयों पर इन्होंने असंखय पुस्तकें लिखी हैं। भारत और भारतीयता के प्रति इनके मन में परंपरागत प्रतिक्रियावादी भाव न होकर आधुनिक वैज्ञानिक नवोन्मेष का भाव था। भारत को समभने के लिए इन्होंने लगभग डेढ़ दर्जन पुस्तकें लिखी हैं। इनमें इतिहास के साथ भारत के पहाड़, नदी, स्थापत्यकला, मूर्ति- कला, चित्रकला, संगीतकला, नृत्यकला तथा रंगमंच आदि सबको बड़े प्रामाणिक रूप से चित्रित किया गया है। इनसे पूर्व किसी भी कला-चिंतक का ध्यान भारतीय कला-
हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता /211 al sts
Page 226
संसार के इस विराट व्यापक स्वरूप को कलम के माध्यम से अंकित करने की ओर नहीं गया था। भगवतशरण उपाध्याय ने भारतीय ललित कलाओं को प्रायः एक साथ एक ही परिवेश में देखने का सफल प्रयास अपनी पुस्तक-'भारतीय कला और संस्कृति की भूमिका' में किया है। इनकी यह पुस्तक दो स्वतंत्र खंडों में विभक्त है। प्रथम खंड भारतीय ललित कलाओं पर है जिसमें स्थापत्य कला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीतकला तथा रंगमंच पर पांच अध्याय हैं। इस पुस्तक से पूर्व यह खंड सन् 1957 में प्रकाशित 'हिंदी साहित्य का बृहद् इतिहास' (प्रथम भाग) में हिंदी साहित्य की पीठिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक का यही खंड सन् 1980 में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नयी दिल्ली से 'भारतीय कला की भूमिका' शीर्षक से भी प्रकाशित हो चुका है। इसमें भगवतशरण उपाध्याय ने सिंधु-सभ्यता काल से प्रारंभ कर भारतीय कला के अनेक रूपों-स्थापत्यकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीतकला और रंगमंच का काल-क्रमानुसार व्यवस्थित विवरण प्रस्तुत किया है। यद्यपि यह खंड अपने नाम के अनुसार भारतीय ललित कलाओं का इतिहास नहीं अपितु उसके अध्ययन की भूमिका मात्र ही कहा जा सकता है तथापि भारतीय ललित कलाओं को एक साथ एक ही परिवेश में देखने का जो सफल प्रयास इस पुस्तक में भगवतशरण उपाध्याय ने किया है, उससे यह भूमिका भारतीय ललित कलाओं का एक अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है। इस स्वतंत्र खंड की महत्ता इस तथ्य में भी है कि यह कला के जिज्ञासु के लिए नहीं, वरन् इतिहास, साहित्य, संस्कृति और समाजशास्त्र के अध्येताओं के लिए भी समान रूप से उपयोगी सिद्ध होता है। 'संस्कृति के अध्ययन का दुरुपयोग जितना इस देश में हुआ है उतना अन्यत्र कहीं नहीं हुआ,'28 इसी बोध से भगवतशरण उपाध्याय ने दूसरे खंड में भारतीय संस्कृति का अध्ययन करना उचित समझा है। भारतीय संस्कृति ने संसार को क्या दिया है, इस पर पर्याप्त भात्रा में अब तक लिखा जा चुका था, परंतु उसने संसार से पाया कितना, इस पर बहुत कम लिखा गया था, इसी अभाव को इन्होंने इस पुस्तक के दूसरे खंड में पूरा किया है। भारतीय संस्कृति ने संसार को कितना कुछ दिया है, इस प्रसंग से वे अपरिचित नहीं थे। उसके परिमाण29 वे अभिभूत थे, परंतु वे समभते थे कि यह प्रसंग भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का केवल पाक्षिक सत्य है यदि इतिहास को सांगोपांग प्रस्तुत करना है तो इस दूसरे पक्ष का उद्घाटन भी अनिवार्य है। पुस्तक के अंत में इन्होंने भारतीय संस्कृति की विशेषता की ओर इस प्रकार इंगित किया है। "भारत की यह विराटरूपता थी जिसने वह, सब जो उसकी राह आया, आत्मसात् कर लिया। द्रविड़ों के उस आदिम काल से उसकी राह जातियां निरंतर आती रहीं और भारत उन्हें अपनी काया में उदार बुद्धि से पचाकर उसके तेज से उज्ज्वलतर होता गया उसने संसार को दिया बहुत, पर उससे लिया भी कम नहीं, और वही उसकी गुरुतर शालीनता थी। उसकी संस्कृति में अनेक जातियों का योग है, पर वह योग जोड़ की भांति नहीं है। उसके रग-रग में समाया हुआ है, उसकी प्राण-वायु बन गया है।"30 212 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 227
कला पर भगवतशरण उपाध्याय की एक अन्य पुस्तक -- 'भारतीय कला का इतिहास'31 शीर्षक से प्रकाशित हुई है। यह पुस्तक इनकी पहली पुस्तक-'भारतीय कला की भूमिका' की अगली कड़ी कही जा सकती है। प्राचीन भारतीय कला से संबंधित हिंदी में यह फहली ऐसी वैज्ञानिक कृति है जिसमें वास्तुकला, मूर्तिकला तथा चित्रकला तीनों कलाओं का यथासंभव सांगोपांग इतिहास (प्रागैतिहासिक काल से पंद्रहवीं सदी तक) प्रस्तुत किया गया है। भारतीय कला के इतिहास के अतिरिक्त इसमें भारतेतर, पर भारतीय संस्कृति से प्रभावित दूसरे देशों नेपाल, तिब्बत, लंका, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान, चीन आदि तथा दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों की कला को भी समाहित कर लिया गया है। इस दृष्टि से यह पुस्तक भगवतशरण उपाध्याय की अब तक की कला संबंधी पुस्तकों से अधिक महत्त्वपूर्ण बन गयी है। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि हिंदी के इस प्रमुख कलावेत्ता ने जहां सौंदर्य- बोधशास्त्रीय चिंतन को, सभी ललित कलाओं को एक साथ एक ही परिवेश में देखते हुए विकसित किया है, वहां इन कलाओं का एक संगम प्रस्तुत कर, इनके माध्यम से भारत के सांस्कृतिक गौरव तथा उसके उत्थान का भी परिचय दिया है। भगवतशरण उपाध्याय जीवन भर विद्यार्थी, अनुसंधाता और लेखक बने रहे। जीवन के अंतिम वर्ष में, जब उन्हें मॉरिशस में उच्चायुक्त का पद मिला तब भी उनके मन में प्रवासी भारतीयों के संबंध में एक प्रामाणिक ग्रंथ लिखने की इच्छा थी। अपने एक स्वागत समारोह में नयी दिल्ली में उन्होंने यह विचार व्यक्त किया और कहा था, "मैं राजनयिक के उत्तरदायित्व को स्वीकार कर इसलिए मारिशस जा रहा हूं कि दोनों देशों के मध्य सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ बना सक और इस स्नेह-संबंध से राजनीतिक तथा आर्थिक आदान-प्रदान में कभी गतिरोध उत्पन्न न होने दूं। मैं मारिशस, फीजी, सुरीनाम, थाइलैंड आदि देशों में बसे भारतीयों की स्थिति पर एक पुस्तक भी लिखने की योजना मस्तिष्क में लेकर जा रहा हूं। आशा है मेरी इस पुस्तक से अनेक भ्रांतियों का निराकरण होगा और सुदूर देशों में बसे प्रवासी भारतीय अपने- अपने स्वीकृत देशों में अपनी स्थिति सुदृढ़ बना सकेंगे।"32 लेकिन खेद है कि भगवत- शरण उपाध्याय का यह शुभ संकल्प पूरा न हो सका और उनका असामयिक एवं असंभावित निधन 8 अगस्त, 1982 को मारिशस की राजधानी पोर्टलुई में हो गया।
कांतिचंद्र पांडेय हिंदी में तुलनात्मक सौंदर्यबोधशास्त्र की दिशा में व्यवस्थित एवं सांगोपांग अध्ययन प्रथम विस्तृत प्रयास कांतिचंद्र पांडेय द्वारा किया गया है। अभिनव गुप्त पर इनका विशेष अध्ययन था। हिंदी में लिखने से पूर्व ही वे 'कंपरेटित्र एस्थेटिक्स' तथा 'अभिनव गुप्त : एन हिस्टोरिकल एंड फिलासोफिकल स्टडी' जैसी पुस्तकें अंग्रेजी माध्यम से लिखकर काफी यश प्राप्त कर चुके थे। आधुनिक विद्वानों के समक्ष अभिनव गुप्त के विचारों को व्यवस्थित एवं
हिंदीं के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता / 213
Page 228
प्रामाणिक रूप से उपस्थित करने का श्रेय इनको ही है। इनके इस अध्ययन ने भारतीय सौंदर्यबोधशास्त्र संबंधी विवेचन को नया आयाम प्रदान किया। अभिनव गुप्त के दारशनिक विचारों को स्पष्ट कर उनके संदर्भ में काव्यकला संबंधी मान्यताओं की प्रामाणिक व्याख्या प्रस्तुत की, जिससे भारतीय सौंदर्यबोधशास्त्र का गहन दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक मर्म उद्घाटित हुआ। संस्कृत साहित्य और दर्शन के मूर्धन्य विद्वान कांतिचंद्र पांडेय का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में सन् 1898 में एक कान्यकुब्ज परिवार में हुआ। इनकी शिक्षा उत्तर प्रदेश, पंजाब तथा बंगाल में हुई। इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में प्राध्यापक के रूप में जीवन शुरू किया और वहीं अध्यक्ष तथा आचार्य पद पर कार्य करने के उपरांत सन् 1953 में अवकाश प्राप्त किया। तत्पश्चात् इन्होंने विश्वविद्यालय आयोग तथा उत्तर प्रदेश सरकार की मदद से लखनऊ विश्वर्विद्यालय में 'अभिनव गुप्त सौंदर्यशास्त्र एवं शैव दर्शन' संस्थान की स्थापना की तथा आजीवन इसके अवैतनिक निदेशक के रूप में कार्य किया। 24 जुलाई, 1974 को इनका देहावसान हो गया। कांतिचंद्र पांडेय ने न केवल हिंदी तथा भारतीय चिंतन जगत को ही अनेक महत्त्वपूर्ण कृतियां प्रदान की हैं, अपितु विदेशों में भी इन्होंने कई शोधपत्र पढ़े हैं तथा वहां की शोधपत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाये हैं। 1964 ई० में उन्हें अतर्राष्ट्रीय सौंद्यबोधशास्त्र सम्मेलन में इंटरनेशनल कांग्रेस में व्याख्यान देने के लिए एम्स्टरडम आमंत्रित किया गया। इसी वर्ष ब्रिटिश काउंसिल की ओर से भी इनको लंदन में सौंदर्यबोधशास्त्र पर बोलने के लिए बुलाया गया। इसी दौरान इन्होंने फ्रांस, जर्मनी, यूनान तथा रोम की यात्राएं कीं और अनेक विश्वविद्यालयों तथा शोध केंद्रों में सौंदयबोधशास्त्र तथा शैव दर्शन पर व्याख्यान दिये। 1966 ई० में यूनेस्को द्वारा आयोजित विश्व के सौंद्यबोधशास्त्रियों के सम्मेलन में ये आमंत्रित किये गये। इसमें विश्व की अनेक सौंदर्यबोधशास्त्रीय धाराओं को लेकर बीस खंडों में एक ग्रंथ निकालने का निश्चय किया गया। कांतिचंद्र पांडेय को भारतीय सौंदर्यबोधशास्त्र खंड निकालने का कार्य सौंपा गया। 1968 में ये पुनः अंतर्राष्ट्रीय सौंदर्यबोधशास्त्र सम्मेलन में भाग लेने के लिए स्वीडन गये यहां बुल्गारिया, रूमानिया तथा हंगरी सरकारों ने भी इन्हें अपने देश में आने पर सौंदर्यबोधशास्त्र तथा शैव दर्शन पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया। मृत्यु से पूर्व वे यूनेस्को की एक योजना के लिए 'भारतीय सौंदर्य- शास्त्र' खंड तैयार कर रहे थे। इस प्रकार हिंदी के इस प्रसिद्ध सौंदर्यतत्त्ववेत्ता से न केवल भारतीय अपितु विदेशी चिंतक प्रभावित रहे हैं। इनके 'स्वतंत्रकला शास्त्र' शीर्षक से प्रकाशित दो भाग हिंदी में तुलनात्मक सौंदर्यबोधशास्त्र की दिशा के प्रथम प्रयास माने जाते हैं। ये दोनों भाग हिंदी में प्रकाशित होने से पूर्व 'इंडियन एस्थेटिक्स' (1950) तथा 'वेस्टर्न एस्थेटिक्स' (1959) शीषंक से अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुके हैं। हिंदी में इसका प्रथम भाग 214 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 229
सन् 196733 में तथा द्वितीय भाग 197834 में प्रकाशित हुआ है। यहां इसके प्रथम भाग में कला विवेचन नाट्यशास्त्र, रस सिद्धांत, संस्कृत नाटकों की रचना-विधान, संगीतकला तथा वास्तुकला का गहन अध्ययन किया गया है, वहां इसके दूसरे भाग में प्लेटो के पूर्ववर्ती सोफिस्ट गोरजिआस (470 ई० पू०) एवं सुकरात (469-399 ई० पू०) आदि से लेकर क्रोचे (1866-1952) तक सुप्रसिद्ध पाश्चात्य सौंदयंबोधशास्त्री मनीषियों की विचारधाराओं का विवरण ऐतिहासिक दृष्टिकोण से दिया गया है। द्वितीय भाग के अंत में लेखक ने यह संकेत दिया है कि पाश्चात्य सौंदयबोध- शास्त्रीय चितकों के विचारों की, भारतीय सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतकों के मतों की विशद रूप से तुलना की योजना, इस ग्रंथ के तृतीय भाग 'भारतीय एवं पाश्चात्य स्वतंत्र कला शास्त्र' में है।35 यद्यपि इसका तीसरा भाग प्रकाशित नहीं हुआ है तथा इस तुलनात्मक भाग के अभाव में भी प्रस्तुत दोनों भागों में (मुख्यतः द्वितीय भाग के चतुर्दश अध्याय में) तुलनापरक अनेक संकेत मिल जाते हैं। सौंद्यबोधशास्त्र जैसे विषय के स्पष्टीकरण के लिए जिस गहन साहित्यिक एवं दार्शनिक अध्ययन, तात्विक चिंतन तथा तुलनात्मक दृष्टिकोण की अपेक्षा है, कांतिचंद्र पांडेय में उन सबका सहज परिपाक हुआ है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि तुलनात्मक सौंदर्यबोधशास्त्र के क्षेत्र में इनका ऐतिहासिक महत्त्व असंदिग्ध है, भारतीय एवं पाश्चात्य विचारधाराओं को लेकर किया गया तुलनात्मक अध्ययन कला चिंतन इतिहास में एक नवीन घटना है तथा विषय की सार्वभौमिकता की दिशा में अग्रसारित होने के लिए एक नया कदम है। हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता के रूा में इनकी उपलब्धि यह है कि इन्होंने शव दर्शन के आधार पर काव्य, संगीत, चित्र, मूर्ति एवं वास्तुकला संबंधी विचारों को एकत्र करके व्यापक कला-दर्शन अथवा सौदर्यबोधशास्त्र की रूप-रेखा पुननिमित की है। इसके साथ ही इन्होंने पाश्चात्य विचारकों के मन में भारतीय सौंदर्यबोधशास्त्र विषयक इस भ्रम को भी दूर किया है कि भारत में संपूर्ण ललित कलाओं के विवेचन में समर्थ कोई व्यवस्थित सौंदर्यबोधशास्त्र नहीं।
फतह सिंह हिंदी के अधिकतर सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने पाठकों को जो कुछ भी दिया है वह मुख्यतः पाश्चात्य साहित्य, पाश्चात्य संस्कृति और पाश्चात्य विचारधारा से प्रभावित होकर ही दिया है। वे पाश्चात्य कला दर्शन के नयेपन के प्रलोभन में ही फंसे रहे तथा उन्होंने वहां से उधार ली गयी सामग्री का ही प्रदर्शन अपनी सौंदर्यबोधशास्त्र संबंधी पुस्तकों में किया। परिणामस्वरूप वे सभी सौंदर्यतत्त्ववेत्ता उद्धरणों की चकाचौंध में खो गये जिससे हिंदी में सौंदर्यबोधशास्त्र की निजता को पूरी तरह खोज न पाये। कांतिचंद्र पांडेय ने सर्वप्रथम दर्शन के आलोक में विकसित 'स्वतंत्र कलाशास्त्र' के रूप में इसे व्याख्यायित किया और प्रथम बार 'इंडियन एस्थेटिक्स' की स्थापना सन् 1950
हिंदीं के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता / 215
Page 230
में की। लेकिन अभी तक यह कार्य अंग्रेजी में ही हुआ था। फतह सिंह ने सवं प्रथम 'भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका' (1967)36 लिखकर भारतीय सौंदर्यबोधशास्त्र की कल्पना की तथा उसे 'स्वस्ति' और 'सोम' से जोड़ते हुए उसकी वैदिक पृष्ठभूमि अंकित की। फतह सिंह ने हिंदी के अन्य सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं की भांति पाश्चात्य सिद्धांतों के सांचों में हमारे साहित्य को ढालने में अपनी कृत्कृत्यता नहीं समझी है। वे भारतीय जीवन में अनुप्राणित साहित्य को भारतीय दृष्टि से देखना ही न्यायसंगत एवं उपयुक्त समभते हैं। वे मानते हैं कि काव्य, संगीत, चित्र, मूर्ति आदि संपूर्ण कलाओं पर जाति और देश की छाप अनिवार्य रूप से रहती है। अतः साहित्य को उसी की संस्कृति के मापदंड से नापना श्रयष्कर है। विदेशी फीतों और पैमानों से साहित्य को नापने से उसका समुचित मूल्यांकन कभी नहीं हो सकता।37 फतह सिंह ने अपनी सभी प्रकाशित पुस्तकों में इसी दृष्टिकोण को अपनाया है। इन्होंने हिंदी में 'वैदिक दर्शन', 'कामायनी सौंदर्य', 'भारतीय समाजशास्त्र', 'साहित्य और सौंदर्य', 'एशियाई संस्कृति को संस्कृत की देन', 'वैदिक समाजशास्त्र में यज्ञ का स्थान' आदि पुस्तकें लिखी हैं। हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी में भी इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। फतह सिंह की प्रसिद्ध पुस्तक 'भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका' हमारे सामने मुख्यतः सौंदर्य की लोकोत्तरवादी मीमांसा प्रस्तुत करती है तथा लेखक के इस आग्रह को सिद्ध करने में पूर्णनः सफल होती है कि भारत के प्राचीन और मध्यकालीन वाङ्मय में सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतन से संबंधित सामग्री विपुल राशि में उपलब्ध होती है। इन्होंने भारतीय सौंदयबोधशास्त्र की जिस रूप में कल्पना की है, वह मुख्यतः अधि-दार्शनिक है। ललित कलाओं की रचना प्रक्रिया अथवा रूप पक्ष से उसका आंशिक एवं गौण संबंध है। जैगीषव्य शास्त्री के शब्दों में यह कहा जा सकता है कि लेखक फतह सिंह इस ग्रंथ में पुरातन प्रतिवादन और स्वदेशिकता के मोह से ग्रस्त दिखाई देता है जिससे उनका मूल दृष्टिकोण धुंधला हो गया हो।38
कुमार विमल कुमार विमल बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति हैं। वे एक अध्ययनशील, निष्ठावान, जिज्ञासु तथा सहृदय विद्वान हैं। इन्होंने प्राच्य, पाश्चात्य साहित्य और दर्शन का गहरा अध्ययन किया है। हिंदी में सौंदर्यबोधशास्त्र का अध्ययन कर इन्होंने सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक समीक्षा के स्तर पर सौंदर्यबोधशास्त्रीय दृष्टि का उन्मेष किया है। ललित कलाओं के तात्त्विक अतःसंबंध को देखते हुए कुमार विमल ने व्यक्तिगत आत्मविश्वास के साथ छायावादी कविता का सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन किया जो कि सौंध्यबोधशास्त्रीय चिंतन की नयी संभावनाओं को उजागर करता है। हिंदी के इस प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता की यह आकांक्षा है कि भारत की सभी
216 / सौंद्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 231
भाषाओं के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं को पत्र-पत्रिकाओं के 'सौंदर्यबोधशास्त्र विशेषांक' निकालकर एक मंच पर लाया जाये। मेरठ शोधपत्रिका के 'सौंदर्यशास्त्र विशेषांक' के प्रकाशन पर इन्होंने उसके संपादक सुरेशचंद्र त्यागी को पत्र लिखते हुए यह सुझाव दिया था, "मैं चाहूंगा कि इस विशेषांक के द्वारा आप सौंदर्यबोधशास्त्र पर काम करने वाले भारतीय विद्वानों को एक मंच पर लायें। हिंदी के अलावा भारत की अन्य भाषाओं में भी इन दिनों सौंदर्यशास्त्र पर बढ़िया काम हो रहा है।"39 कुमार विमल ने सौंदर्यबोधशास्त्र से संबंधित तीन महत्त्वपूर्ण पुस्तकें 'कला- विवेचन' (1968),40 'सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व' (1967)41 तथा 'छायावाद का सौंदर्य- शास्त्रीय अध्ययन (1970)42 लिखकर हिंदी पाठकों को समृद्ध किया है। इसके अतिरिक्त हिंदी की कई महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में भी इस विषय से संबंधित उनके लेख प्रकाशित हुए हैं। 'कला विवेचन' में लेखक ने 'कला' के विभिन्न पहलुओं पर सौंदर्यबोधशास्त्रीय संदर्भ में विचार किया है। यह विचार चार अध्यायों में है, 'कला का स्वरूप विवेचन', 'ललित कलाओं का वर्गीकरण और विभाजन', 'भारतीय कला : एक सर्वेक्षण', 'कला- विवेचन : सौंदर्यशास्त्र और काव्यशास्त्र'। लेखक का इस पुस्तक में यह प्रयास रहा है कि पश्चिम में कला के विवेचन के संबंध में जो कुछ चिंतन हुआ है उसका एक सर्वेक्षण प्रस्तुत कर दे, साथ ही भारतीय प्राचीन चिंतन में कला के संबंध में जो निर्धारण है उसका तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत हो जाये। कुमार विमल की 'सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व' तथा 'छायावाद का सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन' दोनों पुस्तकें पटना विश्वविद्यालय की डी०लिट० उपाधि के लिए प्रस्तुत और स्वीकृत 'काव्य एवं अन्य ललित कलाओं के प्रमुख तत्त्वों का सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन : छायावादी कविता के संदर्भ में' शीर्षक शोध प्रबंध के ही सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक अंश हैं। यहां उन्होंने प्रथम पुस्तक में चार प्रमुख कला तत्त्वों (सौंदर्य; कल्पना, बिब और प्रतीक) का सैद्धांतिक आधार पर सौंदयंबोधशास्त्रीय अध्ययन किया है, वहां दूसरी पुस्तक में सौंदयबोधशास्त्रीय तत्त्वों के सैद्धांतिक निरूपण का छायावादी कविता के विशेष संदर्भ में व्यावहारिक अध्ययन किया है। उनका यह शोध कार्य न केवल काव्य के अध्ययन को व्यापक परिपाश्वं प्रदान करता है अपितु सौंदर्य- बोधशास्त्रीय शोध की परंपरा में एक नये क्षितिज का उद्घाटन भी करता है। स्वयं लेखक के शब्दों में, "यह शोध कार्य हिंदी साहित्य में सौंदर्यशास्त्रीय या कलाशास्त्रीय मान्यताओं के साहाय्य से निष्पन्न एक ऐसे अद्यतन काव्यशास्त्र का रूप उपस्थित करता है, जिसमें परंपरागत प्रणालियों के अनुशीलन से आगे बढ़कर नवीन चिंतन और अत्याधुनिक वैज्ञानिक उद्भावनाओं का भी उपयोग किया गया है।"43 कुमार विमल की पुस्तकों का अनुशीलन करने के उपरांत कतिपय आलोचकों का यह आरोप रहा है कि उन्होंने हिंदी में विदेशी विद्वानों का ही सारांशीकरण कर दिया है,44 अंग्रेजी ग्रंथों से लिये गये विचारों को हिंदी में ढालने का असफल प्रयास
हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता /217
Page 232
किया है,45 पाश्चात्य साहित्य में लिखे गये कला-विषयक विश्लेषण का हिंदी-अवतरण किया है46 तथा पाश्चात्य विचारों को ही 'छायावाद का सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन' करते हुए आरोपित किया है।47 वास्तव में कुमार विमल का अध्ययन बहुत व्यापक है। उन्होंने अंग्रेजी के अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया है तथा उससे सामग्री भी एकत्रित की है। परंतु इस सामग्री से भारतीय लालित्यशास्त्र के सिद्धांतों को गुँफित कर उसे इस रूप में प्रस्तुत किया है कि एक नव्य सौंदर्यबोधशास्त्र की रचना हुई जो मौलिकता के निकष पर पूरा उतरता है। हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता के रूप में इनकी महत्त्वपूर्ण देन यह भी रही है कि इन्होंने सौंदर्यबोधशास्त्र के तत्त्वों का विवेचन विशुद्ध साहित्यिक धरातल पर ही नहीं किया अपितु सौंदर्यबोधशास्त्र, दर्शन, मनोविज्ञान और जीवविज्ञान के अन्योन्या- श्रय संबंध को ध्यान में रखकर उनके विवेचन को व्यापक भूमि भी प्रदान की है, ताकि उन तत्वों के सौंदर्यबोधशास्त्रीय स्वरूप के वैशिष्ट्य को समझने में कोई मूल भ्रांति न रहे तथा हिंदी समीक्षा ज्ञान की साहित्येतर शाखाओं से लाभान्वित भी हो सके। कुमार विमल ने सर्वप्रथम हिंदी मनीषियों का ध्यान इस ओर दिलाया कि 'कविता का अध्ययन केवल काव्यशास्त्रीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टि से भी किया जाना चाहिए, ताकि कविता के गुणावगुणों का परीक्षण समग्र कलाओं के व्यापक निकष पर हो सके और कविता की कुछ गण्य विशेषताएं ललित कला के मानक के रूप में उद्घाटित हो सकें,48 रमाशंकर जैतली के शब्दों में हम निष्कर्षतः यह कह सकते हैं कि हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता के रूप में कुमार विमल का 'सौंदर्यशास्त्रीय चिंतन सर्वथा प्रामाणिक है तथा समीक्षा और सौंदर्यशास्त्र के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक तत्त्वों की अयुतसिद्ध रूप में मीमांसा करने के कारण अपना विशेष ऐतिहासिक महत्त्व रखता है। विवेचन इतना हृदयग्राही है और शैली इतनी रोचक और प्रौढ़ि प्रकर्ष को आत्मसात् किए हुए हैं कि सौंदर्यशास्त्र की पूरी संभ्रांतता भाषा में भी उतर आयी है-यद्यपि यह सफल प्रयास छायावाद के संदर्भ में ही संपन्न हुआ है, पर इससे अन्य प्रकार के प्रयासों के लिए मार्ग अवश्य प्रशस्त हुआ है।'49
रमेश कुतल मेघ सौंदर्यबोधशास्त्र को एक स्वतंत्र विद्यानुशासन के रूप में विकसित करने की, और उसे आज के संपूर्ण ज्ञान विज्ञान समाजशास्त्र से लेकर टेक्नॉलाजी तक की आधुनिक खोजों के साथ देखने-परखने की जो कोशिशें अब तक हिंदी साहित्य में हुई हैं, इनमें रमेश कुंतल मेघ की अनिवार्य साभेदारी रही है। 'मार्क्सवादी मूलाधार पर अनेक समाजविज्ञानों तथा मानविकी शास्त्रों के धारणात्मक औजारों के इस्तेमाल से ही हमारा साहित्य भी बेहतर इंसान और सही
218 / सौंदयबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 233
समाज की अभिरचना में सक्रिय हस्तक्षेप कर सकता है, वरना वह महज एक सम्मोहक मिथक बनकर निरर्थक हो जायेगा।' अपने इसी विश्वास के आधार पर रमेश कुतल मेघ अब तक कई पुस्तकें लिख चुके हैं। सौंदर्यबोधशास्त्र पर इनकी चार पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। 'मध्ययुगीन रस दर्शन और समकालीन सौंदर्यबोध' (1969)50, 'सौंद्य मूल्य और मूल्यांकन' (1975)51, 'अथातो सौंदर्य जिज्ञासा' (1977)52 तथा 'साक्षी है सौंदर्य प्राश्निक' (1980)।53 इसके अतिरिक्त हिंदी के कई शोधपत्र पत्रिकाओं में भी इस विषय पर उनके लेख वाद-विवाद छेड़ते हैं। 'मध्ययुगीन रसदशन और समकालीन सौंदर्यबोध' में लेखक ने भारत (ई० पू० 330-375) से लेकर पंडितराज जगन्नाथ (1627-1655) तक लगभग पंद्रह शताब्दियों के दौरान में भारतीय मध्यकालीन मानस का वह सौंदर्यबोधात्मक इतिहास दिया है, जिसमें मध्यकालीन संस्कृति प्रतिबिंबित है। 'सौंदर्य मूल्य और मूल्यांकन' में 'मूल्य' और मूल्यसंबंधी मूल्य परिवर्तन, मूल्य कोटियां, मूल्यानुभव, मूल्यांकन, मूल्य निर्णय, मूल्यगत कला-सिद्धांतों आदि का विशद विवेचन किया है। अब तक मूल्य के संबंध में जो भ्रांतियां तथा अव्यवस्थाएं साहित्य और सौंदर्य क्षेत्र में फैली हैं वे इस पुस्तक से स्पष्ट होती हैं। इनकी तीसरी पुस्तक 'अथातो सौंदर्य जिज्ञासा' हिंदी में सौंदर्यबोध शास्त्र के अध्ययन और अन्वेषण की तथा साहित्य कला-सौंदर्य के अधुनातन पाठ्यक्रम की महत्त्वपूर्ण पुस्तक मानी जाती है। इसमें सौंदर्य बोधात्मक वृत्ति तथा सौंदर्यबोधानुभव की दोनों महाधुरियों का सामंजस्य करके भारतीय तथा पाश्चात्य संदर्भ में 'कला' और 'सौंदर्य' से संबद्ध सभी पक्षों का एकतान निरूपण तथा अनुशीलन लेखक ने इन अध्यायों में किया है। इसी पुस्तक के पूरक रूप में 'साक्षी है सौंदर्य प्राश्निक' प्रकाशित हुई है। यह पुस्तक लेखक रमेश कुतल मेध के लगभग बीस वर्षों के 'आत्मसंघर्ष का दस्तावेज' है जिसमें इन्होंने करीब ढाई हजार वर्षों की वैचारिक विरासत तथा सांस्कृतिक इतिहास को ग्रहण करने में भरतमुनि से लेकर उदयशंकर और अमृताशेरगिल तक तथा सुकरात- प्लेटो से लेकर क्लॉड लेवी-स्ट्रास और वाल्टर बेंजामिन तक की उपलब्धियों का समाहार किया है। सामाजिक इतिहास तथा सौंदर्यबोधात्मक जीवन को बदलने की इच्छा रखने वाले पाठकों के लिए यह ग्रंथ निस्सदेह उपयोगी सिद्ध होता है। प्रतिबद्ध विचारों की व्यापकता तथा ज्ञानदीपों की विविधता के संयोजन के कारण रमेशकुतल मेघ का कृतित्व शुरू से ही विवादपूर्ण और चुनौती भरा बना रहा है। इन पर कतिपय आलोचकों का यह आरोप रहा है कि इनकी पुस्तकें सामान्य पाठकों के लिए न होकर विशेष अभ्यासेच्छुकों के लिए हैं,54 तथा उनके निष्कर्ष भ्रामक हैं और वे कोई ठोस स्थापना करने में समर्थ नहीं दीखते हैं।55 वास्तव में हिंदी
हिंदी के प्रमुख सौंदयंतत्त्ववेत्ता /219
Page 234
के इस प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता की प्रतिभा विविध ज्ञानानुशासनात्मक है, उनको संस्कृत काव्यशास्त्र तथा पाश्चात्य लेखन की व्यापक जानकारी है। अंग्रेजी के पारिभाषिक शब्दों की भरमार तथा विभिन्न अवधारणाओं को स्पष्ट करने के लिए दी गयी तालिकाओं को देखकर सामान्य पाठक आतंकित तो अवश्य हो जाता है परंतु इनकी प्रत्येक पुस्तक में उठाये गये प्रश्नों को देशी-विदेशी विचारों, विश्लेषणों और स्थापनाओं के साथ जिस तरह प्रस्तुत किया गया है तथा संपूर्ण भारतीय साहित्यशास्त्र और पाश्चात्य काव्यशास्त्र, कला-चिंतन, शिल्प स्थापत्य, दर्शन व्याकरण, शरीरविज्ञान और टेक्नालॉजी की नवीनतम सूचनाओं का आलोकन करते हुए जो निष्कर्ष एवं परिभाषाएं प्रस्तुत की गयी हैं, वे भावी सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं के लिए व ई नयी दिशाओं को आलोकित करती हैं तथा इनके हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता होने का प्रमाण देती हैं।
रमानाथ मिश्र रमानाथ मिश्र पिछले तेईस वर्षों से भारतीय मूर्तिकला के अध्ययन में संलग्न हैं। इन्होंने सन् 1959 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से 'प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व' में एम० ए० करने के उपरांत 1959 से 1968 तक सागर विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति तथा पुरातत्त्व विभाग में अध्यापन का कार्य किया। सन् 1968 में इन्होंने 'यक्ष संप्रदाय एवं मूर्तियां' विषय पर सागर विश्वविद्यालय से पी-एच०डी० को उपाधि ग्रहण की। मार्च, 1973 से जून, 1976 तक ये शिमला के भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में क्रमशः विजिटिंग फेलो तथा एफीलियेटेड फेलो रहे। इस दौरान इन्होंने प्राचीन डाहल एवं दक्षिण कौंसल (मध्य प्रदेश) की मूर्तिकला का व्यापक अध्ययन किया। संप्रति ये जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर की प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति तथा पुरातत्त्व अध्ययनशाला में प्रोफेसर तथा अध्यक्ष पद पर नियुक्त हैं। ये अंग्रेजी, संस्कृत तथा हिंदी तीनों भाषा के अच्छे ज्ञाता हैं। हिंदी में रमानाथ मिश्र ने केवल मूर्तिकला के वृत्त में ही सौंदयबोधशास्त्रीय चिंतन को विकसित किया है। इस विषय में इनकी महत्त्वपूर्ण पुस्तक 'भारतीय मूर्ति- कला' है। इससे भी पूर्व मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी से इनकी एक लघु पुस्तक 'भरहुत' (1971) शीर्षक से प्रकाशित हुई है।56 यह पुस्तक मध्यप्रदेश के प्राचीन ऐतिहासिक ग्रंथों से सबंधित ग्रंथमाला की एक कड़ी है। मोनोग्राफ के आकार को ध्यान में रखते हुए इसमें लेखक ने भरहुत स्तूप से ज्ञात, कला तथा जीवन के विभिन्न पक्षों को तत्कालीन साहित्यिक सामग्री के परिवेश में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। आकवी इस विषय पर हिंदी में अब तक कोई पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई थी। सन् 1889 में करनिघम के 'दि स्तूप ऑफ भरहुत' के प्रकाशन के साथ भारतीय विद्वानों
220/ सौंदयबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 235
का ध्यान भरहुत की ओर आकृष्ट हुआ और वे पालि-ग्रंथों एवं तत्कालीन साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर भरहुतीय अंकनों एवं अभिलेखों की व्याख्या करने में संलग्न हो गये। अब्र तक अनेक विद्वानों ने इस पुरानिधि से केवल सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन ही प्रस्तुत किया था, जिससे कुछ गुत्थियां अभी तक नहीं सुल भ पायी थीं। रमानाथ मिश्र ने उन गुत्थियों को कला और तत्कालीन लोक-जीवन, धार्मिक विश्वास, सामाजिक एवं धार्मिक जीवन, उत्सद आदि के विभिन्न आयामों में देखा तथा उन्हें तत्कालीन साहित्यिक सामग्री के परिवेश में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। अभी तक हिंदी में स्तूप स्थापत्य पर बहुत ही कम चर्चा हुई थी। रमानाथ मिश्रने यह मोनोग्राफ लिखकर भरहुत स्तूप की स्थापत्यकला पर विस्तृत चर्चा की और इस अभाव को भी पूरा किया। इनकी द्वितीय महत्त्वपूर्ण पुस्तक 'भारतीय मूर्तिकला' (1978) शीर्षक से प्रकाशित हुई है, जिसमें इन्होंने प्राचीन भारतीय मूर्तिकला की व्याख्या नवीन दृष्टि- कोण से की है। प्रारंभिक इतिहासकारों ने भारतीय कला के इतिहास को धर्म अनु- शासित युगों में विभाजित कर, हिंदू, मुस्लिम, जैन आदि विशेषणों से उसका वर्गीकरण किया है। उनका यह विभाजन धर्मांध प्रकृति का परिचायक रहा है। इसका प्रभाव यह हुआ है कि भारतीय कला का स्वरूप धर्मों की परिधि में घिर गया। मूलतः यह विभाजन अनैतिहासिक था। रमानाथ मिश्र ने अपनी यह पुस्तक लिखते हुए इन बातों पर विशेष ध्यान रखा। इन्होंने भारतीय मूर्तिकला में यह स्पष्ट करने का भरसक प्रयास किया कि भारतीय मूर्तिकला को धर्म अथवा राजवंशों के मूल्य से पूर्णतः शापित करने के बजाय कला के आधारों यानी शैली की व्याख्या एवं उसके क्षेत्रीय स्वरों के मूल्यांकन पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। इनका यह मत है कि "कला स्वतः पूर्ण है किंतु इन घटकों (राजवंशों अथवा विभिन्न धर्मों अथवा संप्रदायों के घटक) अथवा अभ्य नियामक तत्त्वों की परिधियों में उसे सीमित करने की अद्यतन परिपाटी ने कला की स्वायत्तता को छिन्न-भिन्न कर दिया है।"57 इस पुस्तक की अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता यह भी रही है कि इसमें रमानाथ मिश्र ने मूर्तिकला के नियामकों के रूप में प्राचीन भारतीय शिल्पियों से संबंधित परंपरा का विवरण भी दिया है। यद्यपि इन्होंने यह विवरण परिशिष्ट में दिया है तथापि अध्ययन की दृष्टि से यह खंड अपरिहार्य है। इस प्रकार इन्होंने इस महत्त्वपूर्ण ग्रंथ में भारतीय मूर्तिकला की व्याख्या परंपरा से हटकर एक नये दृष्टिकोण से की है।यह नवीन तथा मौलिक प्रयास भावी कला-चिंतकों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है। इन पुस्तकों के अतिरिक्त रमानाथ मिश्र के भारतीय मूर्तिकला पर अनेक शोधपत्र भी समय-समप पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि रमानाथ मिश्र ने हिंदी में सौंदयंबोध- शास्त्रीय चिंतन को केवल मूर्तिकला की परिधि में ही विकसित किया है अन्य कलाओं पर इनकी लेखनी नहीं उठी है। हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ता / 221
Page 236
जयसिंह नीरज जयसिंह नीरज का जन्म राजस्थान के जिला अलवर के एक छोटे से गांव तोलावास में 11 फरवरी, 1929 को हुआ। इनके पिता एक अल्प आयु वाले जागीर- दार परिवार से संबंधित हैं। वे जाति के हिसाब से राजवंशी हैं, फिर भी उन्होंने एक सामान्य अध्यापक के रूप में आजीविका अजित की। जयसिंह नीरज को एक ओर सामंती-राजपूती परिवेश की परंपरा मिली है तो दूसरी ओर वे अभाव की जिंदगी से भी आरंभ से परिचित रहे हैं। अपने जीवन में उन्होंने काफी संघर्ष और परिश्रम किया और पर्याप्त संघर्ष तथा अनिश्चय की स्थिति के उपरांत ही उन्हें प्राध्यापक की सुरक्षित व सम्मानप्रद जिंदगी हासिल हो सकी है। जीवन में इन्होंने जो कुछ भी पाया है वह इनका स्वयं का अर्जन है। इन परिस्थितियों ने जयसिंह नीरज के जिस व्यक्तित्व का निर्माण किया उसमें एक और सघर्षशीलता के तत्त्व हैं तो दूसरी ओर व्यावहारिक चतुराई भी है। एक ओर इनमें सामंतीय सांस्कृतिक अभिरुचि है तो दूसरी ओर सामान्य जन की पीड़ा के प्रति सजगता भी है। एक ओर ये गांव के साधारण व्यक्ति से जुड़ना चाहते हैं तो दूसरी ओर इन्हें आधुनिक कला, शास्त्रीय संगीत, सौंद्य तथा उच्चस्तरीय समारोह सह- भोजों की दुनिया भी पसंद है। आश्चर्य नहीं कि इनके साहित्य में यह सब कुछ मिलता है। इनके द्वारा रचित दो महत्त्वपूर्ण काव्य संग्रह हैं, 'नील जल सोई परछाइयां' (1963) तथा 'दुखांत समरोह' (1971)। जिन सुधी पाठकों ने इनकी कविताओं को पढ़ा-सुना है, उन्होंने इस बात को सहज ही स्वीकार किया होगा कि इनका रचना संसार साहित्य संगीत व चित्रकला का संगम है जिसे वे निरंतर विस्तार देते रहे हैं। इनके कवि रूप पर चित्रकला और संगीतकला के प्रभाव को देखते हुए प्रेमचंद गोस्वामी लिखते हैं, "डॉ० जयसिंह नोरज ने कवि मन को रंगों और रेखाओं से बने चित्रों की संवेदना ने बराबर प्रभावित किया है, चाहे वे पारंपरिक शैलियों में बने हों अथवा आधुनिक शैली में। कवि नीरज संगीत के भी गायन और वादन-दोनों पहलुओं के प्रशंसक रहे हैं,। अच्छे शास्त्रीय संगीत को सुनकर विभोर होने तथा उससे प्रेरणा प्राप्त करके कविता रूप में अपनी अनुभूति को मुखर बनाने में वे कभी नहीं चूकते। उनकी अनेक कविताओं में संगीत की स्वरलहरी को सहज भाव से सुना जा सकता है तथा उनकी बहुत-सी रचनाओं में किसी सुदर चित्र को देखकर स्वाभाविक ढंग से उपजने वाले संवेदनशील भावों की अनुभूति की जा सकती है।"58 साहित्य के साथ चित्रकला और संगीत का मोह इन्हें शुरू से ही रहा है। इस मोह को विगत अनेक वर्षों की अपनी सृजन यात्रा में इन्होंने कभी नहीं छोड़ा। स्नातकोत्तर अध्ययन के उपरांत जब वे अपने शोध कार्य में प्रवृत्त हुए तब भी यही मोह प्रमुख रहा और इन्होंने कृष्ण काव्य को अपना विषय बनाया। इनका शोध विषय 222 / सौंदयबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 237
था-'राजस्थानी चित्रकला (सन् 1600-1900) के परिपाश्व में हिंदी कृष्ण काव्य का अध्ययन'। सन् 1967 में इन्हें इस विषय पर राजस्थान विश्वविद्यालय से पी-एच०डी० की उपाधि प्राप्त हुई तथा सन् 1976 में यह शोधकार्य 'राजस्थानी चित्रकला और हिंदी कृष्ण काव्य' शीर्षक से राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुआ। भारतीय कला एक प्रकार से साहित्य की ही मार्मिक व्याख्या है। समय-समय पर संस्कृत, हिंदी, राजस्थानी आदि ग्रथों की चित्रों के माध्यम से व्याख्या होती रही है। इन सचित्र ग्रंथों, लघु-चित्रों, पटचित्रों, भित्तिचित्रों में काव्य कला एवं चित्रकला की समस्याओं का जो राज छिपा है उसे ही जयसिंह नीरज ने अपनी इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक में स्पष्ट करने का सफल प्रयास किया है। वास्तव में मध्यकालीन साहित्य और कला को बिना इस प्रकार के तुलनात्मक अध्ययन के पूरी तरह समझा ही नहीं जा सकता। स्वयं जयसिंह नीरज ने इस पुस्तक की भूमिका में इस बात का समर्थन करते हुए लिखा है, "राजस्थानी चित्रकला का आधार प्रमुखतया काव्य रहा है। कृष्ण चरित्र अपनी सरसता, विविधता एवं चित्रोपयोगिता के कारण चित्रण का प्रमुख आधार रहा है, इसलिए 'सूरसागर', 'रसिकप्रिया', 'कविप्रिया' 'बिहारी-सतसई', 'नागर-समुच्चय' आदि ग्रथों एवं स्फुट पदों के आधार पर उपर्युक्त 300 वर्षों में राजस्थानी चित्रकला की विभिन्न शैलियों में जो चित्रण हुआ है, वह मध्यकालीन काव्य के नये आयाम खोलता है। चित्राध्ययन के अभाव में मध्यकालीन कृष्ण काव्य का अध्ययन सम्यक्र परिपुष्ट न होता, क्योंकि तत्कालीन कृष्ण-काव्य और चित्रांकन में बड़ी गहनता ही नहीं, पारंपरिकता भी रही है।"60 भमिका में दिये गये इस कथन से स्पष्ट हो जाता है कि जयसिंह नीरज ने कथ्य की एकता के तर्क से ही काव्य और चित्रकला के संबद्ध सूत्रों का अध्ययन किया है। इन्होंने अनवरत बारह वर्षों के कठोर परिश्रम तथा भारत के विभिन्न संग्रहालयों एवं सांस्कृतिक स्थलों के अध्ययन के फल- स्वरूप चित्रकला के परिपार्श्व में काव्य का और काव्य के परिपाश्व में चित्रकला का जो गहन और विस्तृत विवेचन किया है, उससे दोनों कलाओं के अध्ययन की समस्याओं का एक नवीन परिप्रेक्ष्य हमारे सामने रखा है। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि हिंदी के इस सौंदर्यतत्ववेत्ता ने भावी सौंदरय तथा कला चिंतकों के लिए कुछ नये आयाम खोले। काव्यकला का जो अध्ययन अब तक काव्यकला तक ही सीमित था, वह अब चित्रकला के संदर्भ में भी हो सकता है, इस तथ्य को इन्होंने पूर्णतः प्रमाणित किया। इतना ही नहीं इस नयी परिस्थिति में इन्होंने भावी सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं के सम्मुख यह उम्मीद भी रखी कि इन दो कलाओं के अतिरिक्त अन्य ललनित कलाओं के भी परस्पर समानतामूलक या विरोधमूलक अध्ययन किये जा सकते हैं।
निष्कर्ष हिंदी के प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं का परिचय प्राप्त कर लेने के उपरांत हम हिंदी के प्रमुख सौंदयतत्त्ववेत्ता / 223
Page 238
आलोचकों की इस धारणा का खंडन कर सकते हैं कि सौंदर्यबोधशास्त्र की अवधारणा पाश्चात्य रही है तथा हिंदी में इसका विधिवत निरूपण नहीं हुआ है। यह सही है कि हिंदी के सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतन को उस रूप में विकसित नहीं किया जिस रूप में वह पाश्चात्य साहित्य में विकसित हुआ है। हिंदी के आरंभिक सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने जो चिंतन किया वह मुख्यतः ललित कलाओं के वृत्त में ही हुआ। वास्तुकला, मूर्तिकला तथा चित्रकला इन कलाओं का अध्ययन ही हिंदी में सौंदर्यबोधशास्त्रीय चिंतन का रूप धारण कर पाया। सर्वप्रथम आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने काव्यशास्त्र के कलापक्षीय वृत्त में सुविचारित और सुव्यवस्थित सौंदर्यबोधशास्त्र की नींव डाली और सौंदर्यबोधशास्त्र को संस्कृति एवं मानवतावाद से जोड़ा। कांतिचंद्र पांडेय, फतहसिह तथा नगेन्द्र ने हिंदी में सौंदर्य- बोधशास्त्र की निजता को खोजा तथा इसका स्थानांतरण किया। कालांतर में इसी परंपरा को हरद्वारीलाल शर्मा, कुमार विमल तथा रमेशकुंतल मेघ आदि प्रमुख सौंदर्यतत्त्ववेत्ताओं ने आगे बढ़ाया और सौंदयबोधशास्त्र से संबद्ध नयी संभावनाओं के द्वार खोले तथा सौंदर्यबोधशास्त्र को एक स्वतंत्रविधानुशासन के रूप में प्रतिष्ठापित किया।
संदर्भ
- छगन मेहता, 'कुमार स्वामी और परंपरा', नया प्रतीक, संपादक-स० ही० वात्स्यायन, अंक- 11-12, वर्ष 5, नवंवर-दिसंबर, 1978 (दिलली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस), पृ० 14 2. हरिवंश सिंह शास्त्री, सौंदर्य विज्ञान (बनारस छावनी: मंत्री श्री काशी विद्यापोठ, प्रथम संस्करण, 1936), पृ० 1-2 3. रायकृष्ण दास, भारतीय मूर्तिकला (काशी : नागरी प्रचारिणी सभा, प्रथम संस्करण, 1939), पृ० 92 4. रायकृष्ण दास, भारत की चित्रकला (इलाहाबाद: भारती भंडार लीडर प्रेस, संस्करण, 1949), पृ० 84 5. प्रयाग शुक्ल, 'यह केवल इतिहास नहीं', दिनमान, संपादक-रघुवीर सहाय, अंक 31, भाग 16, 3-9 अगस्त, 1980 (दिल्ली : टाइम्स आफ इंडिया प्रकाशन), पृ० 42 6. वही, पृ० 42 7. कलानिधि, संपादक-रायकृष्ण दास (बनारस : भारत कला भवन, काशी हिंदू विश्वविच्ालय, 1948) 8. हजारीप्रसाद द्विवेदी, प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद (दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, संस्करण, 1970), पृ० 11 9. हजारीप्रसाद द्विवेदी, कालिदास की लालित्य योजना (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1970), पृ० 9 224 / सौदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 239
- यदुनाथ चौबे, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का समग्र साहित्य : एक अनुशीलन (कानपुर: अनुभव प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1980), पृ० 224 11. हरद्वारीलाल शर्मा, कला विज्ञान (प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1951), पृ० 82 12. हरद्वारीलाल शर्मा, सौंदर्यशास्त्र (इलाहाबाद : साहित्य भवन, प्रथम संस्करण, 1953), पृ० 240 13. हरद्वारीलाल शर्मा, सुदरम (लखनऊ: हिंदी समिति उत्तर प्रदेश शासन, प्रथम संस्करण, 1975), पृ० 250 14. हरद्वारीलाल शर्मा, साहित्य और कला (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1959), प० 148 15. हरद्वारीलाल शर्मा, काव्य और कला (अलीगढ़ : भारत प्रकाशन मंदिर, प्रथम संस्करण, अनुल्लिखित), पृ० 198 16. हरद्वारीलाल शर्मा चिंतन के नये आयाम (इलाहाबाद: परिमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 195 17. देवदत्त शास्त्री, सम्मेलन पत्रिका, संपादक-रामनाथ सुमन, संख्या 4, भाग 39, आश्विन शुक्ल प्रतिपदा, संवत् 2010 (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन), पृ० 92 18. हरद्वारीलाल शर्मा, सौंदर्यशास्त्र (इलाहाबाद : मधु प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1979), पृ० 3-4 (निवेदन)। 19. रामचंद्र शुक्ल, कला और आधुनिक प्रवृत्तियां (लखनऊ: हिंदी समिति उत्तर प्रदेश शासन, प्रथम संस्करण, 1958), पृ० 193 20. रामचंद्र शुक्ल, कला प्रसंग (मेरठ : करोना आर्ट पब्लिशर्स, प्रथम संस्करण, 1964), पृ० 133 21. रामचंद्र शुक्ल, कला का दर्शन (मेरठ : करोना आर्ट पब्लिशर्स, प्रथम संस्करण, 1964) 22. रामचंद्र शुक्ल, कला प्रसंग (मेरठ : कारोना आर्ट पब्लिशर्स, प्रथम संस्करण, 1964), पृ० अनुल्लिखित (लेखकीय)। 23. वही, पृ० 68 24. जगदीश गुप्त, युग्म (दिल्ली : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1973), पृ० 301 25. स० ही० वात्स्यायन, नया प्रतीक, संपादक-स० ही० वात्स्यायन, अंक 6, वर्ष 1, जून, 1974 (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस), पृ० 10-11 26. जगदीश गुप्त, भारतीय कला के पदचिह्न (नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1961), पृ० 136 27. वही, पृ० 2 (मनोभूमि)। 28. राजबली पांडेय, संपादक-हिंदी साहित्य का बृहत् इतिहास (प्रथम भाग) (वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, संस्करण, 1965), पृ० 563-673 29. भगवतशरण उपाध्याय, भारतीय कला और संस्कृति की भूमिका (दिल्ली : रणजीत प्रिंटर्स एंड पन्लिशर्स, प्रथम संस्करण, 1965), पृ० अनुल्लिखित (वक्तव्य)। 30. वही, पृ० 255 31. भगवतशरण उपाध्याय, भारतीय कला का इतिहास (दिल्ली : पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, सथम संस्करण, 1981), पृ० 234 32. विजयेन्द्र स्नातक, 'स्वर्गीय भगवतशरण उपाध्याय', साप्ताहिक हिंदुस्तान, संपादक-मनोहर श्याम जोशी, अंक 6, वर्ष 32, 12 सितंबर, 1982 (दिल्ली : हिंदुस्तान टाइम्स प्रेस, पृ० 36
JPyP हिंदी के प्रमुख सौंदयंतत्त्ववेत्ता / 225
Page 240
- कांतिचंद्र पांडेय, स्वतंत्र कलाशास्त्र (भाग-1) (वाराणसी : चौखंभा संस्कृत सीरीज, प्रयम संस्करण, 1967), पृ० 670 34. वही, (भाग-2) (वाराणसी : चौखंभा विद्या भवन प्रथम प्रकाशन, 1978, पृ० 580 35. वही, पृ० 645 36. फतहसिंह, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका (दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1967), पृ० 127 37. श्री हरिवल्लभ, संपादकीय, 'साहित्य और सौंदर्य' फतहसिंह (कोटा : संस्कृति सदन, संस्करण, अनुल्लिखित), पृ० 1-2 38. जंगीषव्य शास्त्री, 'समीक्षा' संपादक-देवेन्द्रनाथ शर्मा, अंक 2-3, वर्ष 1 जनवरी, 1968 (पटना : ग्रंथ निकेतन रानीघाट), पृ० 52 39. 'शोध पत्रिका' (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), संपादक-सुरेशचंद्र त्यागी (मेरठ: मेरठ विश्व- विद्यालय हिंदी परिषद, 1979), पृ० 5 40. कुमार विमल, कला विवेचन (पटना : भारती भवन, प्रथम संस्करण, 1968), पृ० 163 41. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1967), प० 306 42. कुमार विमल, छायावादी का सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, 1970), पृ० 266 43. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), प० 9 44. विश्वंभर नाथ उपाध्याय, 'पहल' संपादक-ज्ञान रंजन, अंक 15, अक्तूबर, 1980 (जबलपुर : अग्रवाल कॉलोनी), पृ० 94 45. गोपाल राय, हिंदी साहित्यान्द कोश : 1968, संपादक-देवेन्द्रनाथ शर्मा (पटना : ग्रथ निकेतन, रानीघाट, प्रथम संस्करण, 1958), पृ० 177 46. सिद्धनाथ कुमार, हिंदी साहित्याब्दकोश, 1970, संपादक-देवेन्द्रनाथ शर्मा (पटना : ग्रंथ निकेतन, रानीघाट, प्रथम संस्करण, 1971), पृ० 116 47. जयशंकर त्रिपाठी, सम्मेलन पत्रिका, संपादक-ज्योतिप्रसाद मिश्र निर्मल, संख्या 1, अंक 54, पोष-फाल्गुन, शक 1889 (प्रयाग : हिंदी साहित्य सग्मेलन), पृ० 96 48. कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1981), 49. रमाशंकर जैतली, 'कल्पना', संपादक-बदरी विशाल पित्ती, अंक 12, वर्ष 23, दिसंबर, पृ० 40
1972 (हैदराबाद : सुल्तान बाजार, 4-5-46), पृ० 62 50. रमेशकुंतल मेघ, मध्ययुगीन रसदर्शन और समकालीन सौंदर्यबोध (दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969), पृ० 265 51. रमेशकुंतल मेघ, सौंदर्य मूल्य और मूल्यांकन (अमतसर : गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी, प्रथम संस्करण, 1975, पृ० 61 52. रमेशकुंतल मेघ, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा (दिल्ली : मैकमिलन कंपनी, प्रथम संस्करण, 1977), प० 504 53. रमेशकुंतल मेघ, साक्षी है सौंदर्य प्राश्निक (दिल्ली: नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1980), पृ० 420 54. आनंद प्रकाश दीक्षित, 'प्रकर' संपादक-वि० सा० विद्यालंकार, अंक 7, वर्ष 10, जुलाई, 1978 (दिल्ली : विशाल प्रिंटर्स, रूपनगर), पृ० 30 226 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 241
- सुरेशचंद्र त्यागो, 'हिंदी में सौंदर्यशास्त्रीय चिंतन : सामान्य सर्वेक्षण', शोधपत्रिका (सौंदरय- शास्त्र विशेषांक), 1979 (मेरठ : मेरठ विश्वविद्यालय हिंदी परिषद), पृ० 165 56. रमानाथ मिश्र, भरहुत, (भोपाल : मध्य प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्रथम संस्करण, 1971), पृ० 84 57. रमानाथ मिश्र, भारतीय मूर्तिकला (दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी आफ इंडिया लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1978), पृ० अनुल्लिखित (प्राक्कथन) 58. प्रेमचंद्र गोस्वामी, डॉ० जयसिंह नीरज 'मधुमती' संपादक-प्रकाश आतुर, अक 6, वर्ष 21 जून, 1982 (उदयपुर : राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी), पृ० 9 59. जयसिंह नीरज, राजस्थानी चित्रकला और हिंदी कृष्ण काव्य (दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976), पृ० 280 60. वही, पृ० भूमिका।
हिंदी के प्रमुख सौंदयंतत्त्ववेत्ता / 227
Page 242
संदर्भ ग्रंथ सूची
हिंबी पुस्तकें
अग्रवाल, वासुदेवशरण, कला और संस्कृति, इलाहाबाद : साहित्य भवन प्राइवेट लिमिटेड, द्वितीय संस्करण, 1978 अवस्थी, सदगुरुशरण, साहित्य तरंग, इलाहाबाद : इंडियन प्रेस प्राइवेट लिमिटेड, प्रथम संस्करण, 1956 उपाध्याय, अवध भारतीय ललितकला, प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1948 उपाध्याय, बलदेव, भारतीय साहित्यशास्त्र (प्रथम खंड), वाराणसी : नंदकिशोर एंड संस, द्वितीय संस्करण, 1963 उपाध्याय, भगवतशरण, भारतीय कला और संस्कृति की भूमिका, दिल्ली : रणजीत प्रिंटर्स एण्ड पब्लिशर्स, प्रथम संस्करण, 1965 उपाध्याय, भगवतशरण, भारतीय कला का इतिहास, दिल्ली : पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1981 उपाध्याय, भगवतशरण, भारतीय कला की भूमिका, दिल्ली : पीपुलस पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1980 उपाध्याय, वासुदेव, प्राचीन भारतीय स्तूप गृहां एवं मंदिर, पटना : बिहार हिंदी ग्रंथ अका- दमी, प्रथम संस्करण, 1972 उपाध्याय, विश्वंभरनाथ, जलते और उबलते प्रश्न, जयपुर : बोहरा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969 करुणेन्द्र, रामाश्रय शुक्ल, सौंदर्यशास्त्र, कानपुर: ओरियटल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1977 V कुमार विमल, कला-विवेचन, पटना : भारतीय भवन एक्जिबीशन रोड, प्रथम संस्करण, 1968 कुमार विमल, छायावाद का सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन, दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1970 कुमार विमल, सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व, दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1967 खण्डेलवाल, रामेश्वरलाल, जयशंकर प्रसाद वस्तु और कला, दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस. प्रथम संस्करण, 1968 गुप्त, गगपतिचंद्र, रस सिद्धांत का पुनर्विवेचन, दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1971 गुप्त, गणपतिचंद्र, साहित्य विज्ञान, चंडीगढ़ : भारतेन्दु भवन, संस्करण, 1963-64 गुप्त गणपतिचंद्र, साहित्यशैली के सिद्धांत, दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1971 गुप्त, जगदीश, भारतीय कला के पदचिह्न, दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1961
22819
Page 243
गुप्त, जगदीश, युश्म; दिल्ली : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1973 गुप्त, लीलाधर, पाश्चात्य साहित्यालोचन के सिद्धांत, इलाहाबाद : हिंदुस्तान एकेडमी, द्वितीय संस्करग, 1967 गुलाबराय, सिद्धांत और अध्ययन, दिल्ली : आत्माराम एंड संस, छठा संस्करण, 1965 चतुर्वेदी, सीताराम, समीक्षाशास्त्र, काशी : अखिल भारतीय विक्रम परिषद, संवत् 2010 विक्रमाब्द। चिदानंद, तारिणी चरणदास, कला और साहित्य, दिल्ली : राजपाल एंड संस, प्रथम संस्करण, 1960 चोधरी, प्रवासजीवन, सौंदर्यदर्शन (बंगाली) कलकत्ता : द्वारकानाथ ठाकुरलेन, बंगाली संवत् 1361 चौबे, यदुनाथ, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का समग्र साहित्य : एक अनुशीलन, कानपुर : अनुभव प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1980 जैन, निर्मला, आधुनिक साहित्य : मूल्य और मूल्यांकन, दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1980 जैन, निर्मला, रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र, दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1967 झा, शम्भुदत्त, रिचड़र्स के आलोचना सिद्धांत, पटना : भारती भवन, प्रथम संस्करण। तिवारी, रामानंद, सत्यं शिवं सुंदरम् (द्वितीय भाग), भरतपुर : भारती मंदिर गोबिंद भवन, प्रथम संस्करण, 1963 तिवारी, हंसकुमार, कला, गया : मानसरोवर प्रकाशन, प्रथम संस्करण, वर्ष अनुल्लिखित। त्यागी, सुरेशचंद्र, छायावादी काव्य में सौंदर्यदर्शन, मेरठ : अनुराधा प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976 त्रिपाठी, सुरेन्द्रनाथ, साहित्य कला और रुचि, दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1971 दीक्षित, भगीरथ, अभिनव साहित्य चिंतन,दिल्ली : इंद्रप्रस्थ प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1960 दीक्षित, सूर्यप्रसाद, छायावादी कवियों का सौंदर्य विधान, दिल्ली : मैकमिलन कंपनी, प्रथम संस्करण, 1974 देवराज, संस्कृति का दार्शनिक विवेचन, लखनऊ : सूचना विभाग उत्तर प्रदेश, प्रथम संस्करण, 1957 देशपांडे, गणेश तयंबक, भारतीय साहित्यशास्त्र, बंबई : पापुलर बुक डिपो, प्रथम संस्करण, 1960 द्विवेदी, हजारोप्रसाद, कालिदास की लालित्य योजना, दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1970 द्विवेदी, हजारीप्रसाद, प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद, दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1970 नगेन्द्र, आस्था के चरण, दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1968 नगेन्द्र, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका, दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय संस्करण, 1978 नरसिहाचारी, एस० टी०, सौंदर्यतत्त्व निरूपण, दिल्ली : वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977
संदर्भ ग्रंथ सूची / 229
Page 244
नीरज, जयसिंह, शजस्थानी चित्रकला और हिंदी कृष्णकाव्य, दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976 परेश, सूरदास की लालित्य चेतना, दिल्ली : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1972 पांडेय, कांतिचंद्र, स्वतंत्र कलाशास्त्र (प्रथम भाग) वाराणसी : चौखंभा संस्कृत सीरिज ऑफिस, प्रथम संस्करण, 1967 पांडेय, कांतिचंद्र, स्वतंत्र कलाशास्त्र (द्वितीय भाग) वाराणसी : चौखंभा विद्या भवन, प्रथम संस्करण, 1978 प्रसाद, जयशंकर, काव्य और कला तथा अन्य निबंध, इलाहाबाद : भारती भंडार लीडर प्रेस, सातवां संस्करण, 1975 फतहसिंह, भारतीय सौंदर्यशास्त्र की भूमिका, दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 1967 फतहसिंह, साहित्य और सौंदर्य, कोटा : संस्कृति सदन, प्रथम संस्करण, वर्ष, अनुल्लिखित। बच्चनसिंह, आधुनिक हिंदी आलोचना के बीज शब्द, दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन, त्रथम संस्करण, 1983 बोरा, राजमल, संवेदना और सौंदर्य, औरंगाबाद : नमिता प्रकाशन आनंदनगर, प्रथम संस्करण, 1976 मदनगोपाल, भारत की पांच कलाएं, बड़ौदा : शिव पुस्तकालय मंदिर, प्रथम संस्करण, 1960 माथूर, वीणा, प्रसाद का सौंदर्य दर्शन, जयपुर : वाफना प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1971 मिश्र, रमानाथ, भरहुत, भोपल : मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्रथम संस्करण, 1971 मिश्र, रमानाथ, भारतीय मूर्तिकला, दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी, प्रथम संस्करण, 1978 मिक्ष, रामदहिन, काव्य विमर्शपटना : ग्रंथ माला कार्यालय, प्रथम संस्करण, 1951 मीतल, प्रभुदयाल, ब्रज की कलाओं का इतिहास, दिल्ली : साहित्य प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1977 मुक्तिबोध, गजानन माधव, एक साहित्यिक की डायरी, दिल्ली : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, चतुर्थ संस्करण, 1976 मुक्तिबोध, गजानन माधव, नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध, नागपुर : विश्व भारती प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1977 मुक्तिबोध, गजानन माधव, नये साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1971 मेघ, रमेश कुंतल, अथातो सौंदर्य जिज्ञासा, दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी, प्रथम संस्करण, 1977 मेघ, रमेश कुंतल, मध्यकालीन रसदर्शन और समकालीन सौंदर्यबोध, दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969 मेघ, रमेश कुंतल, साक्षी है सौंदर्य प्राश्निक, दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1980 मेघ, रमेश कृंतल, सौंदर्य मूल्य और मूलयांकन, अमृतसर : गुरु नानकदेव विश्वविद्यालय, प्रथम संस्करण, 1975 यादव, चोथीराम, मध्यकालीन भक्तिकाल में विरहानुभूति की व्यंजना, इलाहाबाद : रचना प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1974
230 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 245
सिंह राजेन्द्र प्रताप, सौंदर्यशास्त्र की पाश्चात्य परंपरा इलाहाबाद : नया साहित्य प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1962 सिंह रामलाल, आचार्य शुक्ल के समीक्षा सिद्धांत, वाराणसी : नागरी प्रचारणी सभा, प्रथम संस्करण, संवत् 2006 रायकृष्णदास, भारत की चित्रकला, इलाहाबाद : भारती भंडार लीडर प्रेस, षष्ठ संस्करण, 1974 रायकृष्णदास, भारतीय मूर्तिकला, काशी : नागरी प्रचारिणी सभा, षष्ठ संस्करण, 1973 राय, नीहाररंजन, भारतीय कला का अध्ययन, दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी, प्रथम संस्करण, 1978 राय, शिवबालक, काव्य में सौंदर्य और उदात्त तत्व, इलाहाबाद : वसुमति प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1968 वर्मा, अविनाश बहादुर, भारतीय चित्रकला का इतिहास, बरेली : प्रकाशन बुक डिपो, तृतीय संस्करण, 1977 वर्मा, महादेवी, दीपशिखा, झांसी : सेतु प्रकाशन, संस्करण, 1970 वाजपेयी, राजेन्द्र, सौंदर्य, कानपुर : सुम्मिट पब्लिकेशंस, प्रथम संस्करण, 1974 शर्मा, कृष्णलाल, साहित्य : अन्य कलाओं के संदर्भ में, दिल्ली : दि मैकमिलन कंपनी, प्रथम संस्करण, 1978 शर्मा, जगदीश, काव्य सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र, गुलावपुरा : राजस्थान शोध संस्थान, गांधी शिक्षण समिति, प्रथम सं०, 1978 शर्मा, जगदीश, साहित्य और कला की पहचान, इलाहाबाद : किताब महल, प्रथम सँस्करण, 1982-83 शर्मा, रामविलास, आस्था और सौंदर्य, इलाहाबाद: किताब महल, प्रथम संस्करण, 1883 शर्मा, हरद्वारीलाल, कला विज्ञान, प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1951 शर्मा, हरद्वारीलाल, काव्य और कला, अलीगढ़ : भारती प्रकाशन मंदिर, संस्करण, वर्ष ce अनुल्लिखित। शर्मा, हरद्वारीलाल, चितन के नये आयाम, इलाहाबाद : परिमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1976 शर्मा, हरद्वारीलाल, रस और रसास्वादन, प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1963 शर्मा, हरद्वारी लाल, साहित्य और कला, प्रयाग: हदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1959 शर्मा, हरद्वारी लाल, संदरम, लखनऊ : हिंदी समिति उत्तर प्रदेश शासन, प्रथम संस्करण, 1975 शर्मा, हरद्वारी लाल, सौंदर्यशास्त्र, इलाहाबाद : मधु प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1979 शलभ, संवेदना और सौंदर्यबोध, अजमेर : कृष्ण व्रदर्स, प्रथम संस्करण, 1982 शास्त्री, हरिवंशसिंह, सौंदर्यविज्ञान, काशी : मंत्री श्री काशी विद्यापीठ, प्रथम संस्करण, 1936 शिवकरण सिंह, आलोचना के बदलते मानदंड और हिंदी साहित्य, इलाहाबराद : किताब महल, प्रथम संस्करण, 1967 शिवकरण मिंह, कला सूजन प्रक्रिया, इलाहाबाद : वसुमति प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969 शुक्ल, (आचार्य) रामचंद्र, चितामणि (प्रथम भाग), प्रयाग : इंडियन प्रेस प्राइवेट लि०, प्रथम संस्करण, 1969 शुक्ल, (आचार्य) रामचंद्र, चितामणि (द्वितीय भाग) संपादक-विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, द्वितीय संस्करण, 2035
संदर्भ ग्रंथ सूची / 231
Page 246
शुक्ल, (आचार्य) रामचंद्र, रसमीमांसा, संपादक-विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, चतुर्थ संस्करण, संवत् 2003 शुक्ल, द्विजेन्द्रनाथ, भारतीय स्थापत्य, लखनऊ : हिंदी समिति उत्तर प्रदेश, प्रथम संस्करण, 1968 शुक्ल, रामकीर्ति, सौंदर्य का तात्पर्य, लखनऊ: उत्तर प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्रथम संस्करण, 1975 शुक्ल, रामचंद्र, कला और आधुनिक प्रवृत्तियां, लखनऊ: हिंदी समिति उत्तर प्रदेश शासन, द्वितीय संस्करण, 1963 शुक्ल, रामचंद्र, कला का दर्शन, मेरठ: करोना आर्ट पब्लिशर्स, प्रथम संस्करण, 1964 शुक्ल, रामचंद्र, कला प्रसंग, मेरठ : करौना आर्ट पब्लिशर्स, प्रथम संस्करण, 1964 शुक्ल, रामलखन, भारतीय सौंदर्यशास्त्र का तातत्विक विवेधन एवं ललित कलाएं, दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1978 श्यामसंदर दास, साहित्यालोचन, इलाहाबाद : इंडियन प्रेस, प्रथम संस्करण, 1959 श्रुतधर, जयकांत झा, कला, काशी : त्रिवेणी कला मंदिर चेतगंज, प्रथम संस्करण, 1952 सकसेना, लालता प्रसाद, मंझन का सौंदयदर्शन, जयपुर : निर्मल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1966 सच्चिदानंद, वात्स्यायन, आधुनिक हिंदी साहित्य, दिल्ली : राजपाल एंड संस, प्रथम संस्करण, 1976 सत्यव्रत सिंह, (व्याख्याकार) हिंदी काव्य प्रकाश, वाराणसी : चौखंभा विद्याभवन, चतुर्थ संस्करण, 1973 सिन्हा, सावित्री, ब्रजभाषा के कृष्णभक्ति काव्य में अभिव्यंजना शिलप, दिलली : नेशनल पब्लि- शिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1961 सोमपुरा, प्रभाशंकर, ओ० भारतीय शिल्प संहिता, बंबई : सोमैया पब्लिशिंग, प्रथम संस्करण, 1980 सोलंकी, कोमल सिंह, सौंदर्यबोध, आगरा : गुप्ता पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1962 हरदयाल, आधुनिक हिंदी कविता का अभिव्यंजना शिल्प, दिल्ली : सरस्वती प्रेस, प्रथम संस्करण, 1978 हालधार, असितकुमार, ललित कला का धारा, इलाहाबाद : चंद्रलोक प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1960 संपावित पुस्तकें ओंकार शरद, संपादक, महादेवी साहित्य (भाग-1), 'झांसी : सेतु प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1969 कुमार विमल, संपादक, काव्य-रचना-प्रक्रिया, पटना : बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्रथम संस्करण, 1974 गोस्वामी, प्रमचंद, संपादक, कला : संदर्भ और प्रकृति, जयपुर : लोक संपर्क प्रकाशन प्रथम संस्करण, 1974 नगेन्द्र, संपादक, हिंदी वत्रोक्तिजीवित, व्याख्याकार-आचार्य विश्वेश्वर, दिल्ली : आत्माराम एंड संस, संस्करण, 1955 पांडेय, राजबली, संपादक हिंदी साहित्य का बृहत् इतिहास (प्रथम भाग), वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, संस्करण, 1965 शर्मा, देवेन्द्रनाथ, संपादक हिंदी साहित्याकोश : 1968, पटना : ग्रंथ निकेतन रानीघाट, प्रथम संस्करण, 1969 232/ सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 247
शर्मा, देवेन्द्र नाथ, संपादक, हिंदी साहित्याकोश : 1970, पटना : ग्रथ निकेतन रानोघाट, प्रथम संस्करण, 1971 अनुल्लिखित (संपादक का नाम) कला और साहित्य, आकाशवाणी से प्रसारित पंद्रह वार्ताओं का संग्रह) दिल्ली : निदेशक प्रकाशन विभाग, द्वितीय संस्करण, 1966
अनदित पुस्तकें : इरविन एड़मैन, ललित कलाएं और मनुष्य, अनुवादक-विश्वनाथ मिश्र, दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1969 कलिंगवुड, आर० जी० कला के सिद्धांत, अनुवादक-ब्रजभूषण पालीवाल, जयपुर: राजस्थानी हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्रथम संस्करण, 1972 ताल्स्ताय, कला क्या है, अनुवादक-इंदुकांत शुक्ल, वाराणसी : हिंदी प्रचारक प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1955 दासगुप्त, सुरेन्द्रनाथ, सौंदर्यतत्त्व, अनुवादक-आनंदप्रकाश दीक्षित, इलाहाबाद : भारती भंडार लीडर प्रेस, प्रथम संस्करण, 1960 बारलिंगे, सुरेन्द्र, सौंदर्यतत्त्व और काव्य सिद्धांत, अनुबादक-मनोहर काले, दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1963 मर्ढेकर, बालसीताराम, कला और मानव, अनुवादक-अंजना मर्ढेकर, दिल्ली न्यू इंडिया प्रेस, प्रथम संस्करण, 1952 रेनेवेलक, साहित्य सिद्धांत, अनुवादक-बी० एस० पालीवाल, इलाहाबाद : लोकभारती प्रकाशन, संस्करण वर्ष, अनुल्लिखित
कोश ग्रंथ : अमरकोश, संपादक-पं० हरगोविंद शास्त्री, वाराणसी : चोखंभा संस्कृत सीरीज आँफिस, प्रथम संस्करण, 1970 आक्सफोर्ड जूनियर इनसाइक्लोपीडिया (भाग-2), लंदन। इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका (खंड-1), शिकागो : बिलियम बेंटन, पब्लिशर्स, संस्करण, 1972 इनसाइक्लोसीडिया ब्रिटेनिका (खंड-2), शिकागो : विलियम बेंटन पब्लिशर्स, संस्करण, 1972 भारतीय साहित्य कोश, संपादक-नगेन्द्र, दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1981 मानक हिंदी कोश (पहला खंड), संपादक-रामचंद्र वर्मा, प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, संस्करण, 2019 वि० मानक हिंदी कोश (तीसरा खंड), संपादक-रामचंद्र वर्मा, प्रयाग: हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1964 मानक हिंदी कोश (चौथा खंड), संपादक-रामचंद्र वर्मा, प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1966 मानक हिंदी कोश (पांचवा खंड), संपादक-रामचंद्र वर्मा, प्रयाग; हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रथम संस्करण, 1966 मानविकी पारिभाषिक कोश (मनोविज्ञान खंड), संपादक-पद्मा अग्रवाल, दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1968
संदर्भ ग्रंथ सूची / 233
Page 248
मानविको पारिभाषिक कोश (साहित्य खंड), संपादक-नगेन्द्र, दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1965 वाचस्पत्यम कोश (षष्ठ भाग), संकलनकर्ता-तारानाथ तर्कवाचस्पति भट्टाचार्य, वाराणसी : चोखंबा संस्कृत सीरीज ऑफिस, तृतीय संस्करण, 1970 शब्द कल्पद्रुम (पंचम भाग), संकलनकर्ता-राजाराधाकांत देव, वाराणसी : चौखंबा संस्कृत सीरिज ऑफिस, तृतीय संस्करण, 2024 वि० संस्कृत इंगलिश डिक्शनरी, संपादक-मोनियर विलियम्स, दिल्ली : मोतीलाल बनारसीदास जवाहरनगर, प्रथम भारतीय संस्करण, 1970 संस्कृत हिंदी कोश (भाग-3), संपादक-पी० के० गोड, सी० जी० कार्वे, पूना : प्रसाद प्रकाशन, संस्करण, 1959 हिंदी विश्वकोश (खंड-1), संपादक-सुधाकर पांडेय, वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, नवीन संस्करण, 1973 हिंदी विश्वकोश (खंड-2), संपादक-धीरेन्द्र वर्मा, वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, प्रथम संस्करण, 1970 हिंदी शब्दसागर (प्रथम भाग), संपादक-श्यामसुंदर दास, वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, नवीन संस्करण, 1965 हिंदी शब्दसागर (द्वि तीय भाग), संपादक-श्यामसुंदर दास, वाराणसी : नागरी प्रचारिणी सभा, नवीन संस्करण, 1967 हिंदी शब्दसागर (छठा भाग), संपादक-श्यामसुंदरदास, वाराणसी : नागरी प्रचारिणो सभा, नवीन संस्करण, 1969 हिंदी शब्दसागर (आठवां भाग), संपादक श्यामसुंदरदास; : वारारणसी नागरी प्रचारिणी सभा, संशोधित सँस्करण, 1971 हिंदी शब्दसागर (नवां भाग), संपादक-श्यामसूंतरदास, वाराण सी : नागरी प्रचारिणी सभा, संशोधित संस्करण, 1971 हिंदी शब्दकोश (भाग-1), संपादक-धीरेन्द्र वर्मा, वाराणसी : ज्ञानमंडल लिमिटेड, द्वितीय संस्करण, सवत् 2020
हिंदी पत्र-पत्रिकाएं आजकल, वर्ष 28, अंक 11, मार्च, 1973, संपादक-केशवगोपाल, दिल्ली : प्रकाशन विभाग पटियाला। आलोचना, पूर्णंक 33, नवांक 7, जून, 1965, संपादक-शिवदान सिंह चौहान वर्ष 19, नवांक 18, जुलाई-सितंबर, 1971 वर्ष 19, नवांक 20, जनवरी-मार्च, 1972 वर्ष 19, नवांक 22, जुलाई-सितँबर, 1972 वर्ष 23, नवांक 32, जनवरी-मार्च, 1975 संपादक-नामवर सिंह, दिल्ली : राजकमल प्रकाशन कला और कलाकार, अंक 13, नवंबर 1982, संपादक-रूपनारायण बाथम, नोएडा : कलामित्र प्रकाशन डी-19, सेक्टर-6 कलानिधि, वर्ष 1, अंक 4, संपादक-रायकृष्णदास, बनारस : भारत कला भवन काशी हिंदू विश्वविद्यालय।
234 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 249
कल्पना, वर्ष 1, अंक 3, जून, 1951, संपादक-आर्येन्द्र शर्मा, वर्ष 23, अंक 12, दिसंबर, 1972 संपादक-बदरीविशाल पित्ती, हैदराबाद : सुल्तान बाजार 4-5-46 दिनमान, अंक 31, भाग 16, 3-9 अगस्त, 1980, संपादक-रघुवीर सहाय, दिल्ली : टाइम्स आफ इंडिया प्रकाशन। धर्मयुग (दीपावली रूप कला विशेषांक), वर्ष 7, अंक 45, 4 नवंबर, 1956, सत्यकाम विद्या- लंकार, बंबई टाइम्स आफ इंडिया प्रेस। नया प्रतीक, वर्ष 1, अंक 6, जून 1974/वर्ष 5, अंक 11-12, नवंबर-दिसंबर, 1978, संपादक-स० ही० वात्स्यायन, दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस। पहल (मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र), अंक 10-11, जनवरी-मार्च, 1978 संपादक-कमलाप्रसाद, ज्ञानरंजन/अंक 15, अक्टूबर, 1980, संपादक-ज्ञानरंजन, जलपुर: 763 अग्रवाल कालोनी। परिशोध, अंक 13, नवंबर, 1970, संफादक-इंद्रनाथ मदान, चंडीगढ़: हिंदी विभाग, पंजाब यू निवर्सिटी। परिषद पत्रिका, वर्ष 14, अंक 3, अक्टूबर, 1974, संपादक-रमाशंकर चौबे, पटना : बिहार राष्ट्रभाषा परिषद। प्रकर, वर्ष 10, अंक 7, जुलाई, 1978, संपादक-वि० स० विद्यालंकार, दिल्ली : विशाल प्रिटर्स रूपनगर। मधुमती, वर्ष 21, अंक 6, जून, 1982, संपादक-प्रकाश आतुर, उदयपुर : राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी। माधुरी, वर्ष 2, खंड 2, संख्या-1, फरवरी, 1924, संपादक-दुलारेलाल भार्गव, लखनऊ नवलकिशोर प्रेस। विशाल भारत (कला) अंक वर्ष-4, अंक 1, जनवरी, 1931, संपादक-बनारसी दास चतुर्वेदी, कलकत्ता : प्रवासी प्रेस, सरक्यूलर रोड। वीणा, वर्ष 49, अंक 5, सई, 1976, इंदौर : मध्यप्रदेश हिंदी समिति प्रेस। शोध पत्रिका (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक) 1979, संगादक-सुरेशचंद्र त्यागी, मेरठ : हिंदी परिषद मेरठ विश्वविद्यालय। शोध पत्रिका, वर्ष 18, अंक 1, 1967, संपादक देवीलाल पालीवाल उदयपुर: साहित्य संस्थान राजस्थान विद्यापीठ। साप्ताहिक हिंदुस्तान, वर्ष 32, अंक 6, 12 सितंबर, 1982, संपादक-मनोहरश्याम जोशी, दिल्ली : हिंदुस्तान टाइम्स प्रेस। समालोचक (सौंदर्यशास्त्र विशेषांक), वर्ष 1 अंक 1, फरवरी : 1958/वर्ष-1, अंक 2, मार्च, 1958, संपादक-रामविलास शर्मा, आगरा : विनोद पुस्तक मंदिर। सम्मेलन पत्रिका, भाग 39, संख्या 4, अश्विनी शुक्ल प्रतिपदा, संवत् 2010, संपादक- रामनाथ सुमन। (कला अंक), भाग 44 संख्या 2.3, मई, 1959, संपादक-रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्री/भाग 54, संख्या 1, पोष-फाल्गुन शक 1889, संपादक-ज्योतिप्रसाद मिश्र निर्मल। भाग 59, संख्या 4, अश्विनी-मार्ग शीर्ष शक 1895, संपादक-रामप्रताप त्िपाठी शास्त्री, प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन। समीक्षा, वर्ष 1, अंक 2.3, जनवरी, 1968, संपादक-देवेन्द्रनाथ शर्मा, पटना : ग्रंथ निकेतन रानीघाट साहित्य सदेश : भाग 16, अंक 6, दिसंबर, 1954, संपादक -गुलाबराय, आगरा : साहित्य- रत्न भंडार। संदर्भ ग्रंथ सूची / 235
Page 250
अंग्रेजी पुस्तकें Benedetto, Croce, Aesthetic, Translated by-A Duglas, London: Vision Press 1953-1 Hegel, G. W. F. The Philosophy of Fine Art (Volume-1) Translated by F. P. B. Osmastan, London : G Bell and Sons, 1920 De, S. K. Some Problems of Sanskrit Poetics, Calcutta : 1959 Santayana, George, The Sense of Beauty, New York : Dover Publications 1955.
236 / सौंदर्यबोधशास्त्रीय अध्ययन : ऐतिहासिक परंपरा
Page 252
A
नेशनल पब्लिशिंग हाउस (स्थापित १९५०) २३, दरियागंज नयी दिल्ली-११०००२
Page 253
नेशनल पब्लिशिंग हाउस (स्थापित १९५०) २३, दरियागंज नयी दिल्ली-११०००२