1. Shiva Samhita Venkateswara Steam Press
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शिवसंहितास्थविपयानुक्रमणिका ।.
विषया: पृष्ठांका: विषया: पृष्ठांका: प्रथम: पटलः १८ वन्ोलीमुद्ाकथनम. ११३ अथ मंगलाचरणम्. १ १९ शकिचालनकथनम्. १२१ १ अथ लयपकरणम्. २ पश्चमः पटल: द्वितीयः पटल: २० अथ योगविभादिकथनम्. १२४ २ अथ तत्त्वज्ञानोपदेश: २६ २१ धर्मरूपयोगविभ्कथनम.१२५ तृताय: पटलः ३ अथ ये गानुष्ानपद्धतिरयों- २३ चतुर् विधबोधकथनम्. १२८
गाभ्यासवर्णनश्र. ५७ २४ मृद्दसाधकलक्षणम्. १२९
४ विद्धासनकथनम्. ८५ २५ अधिमात्रसाधकलक्षणम्. '३० ५ पद्मासनकथनम्. ८६ २६ अधिमात्रतमसाधकलक्ष-
६ उग्रासनकथनम्. ८८ णम्. १३ ७ रवस्तिकासनकथनम्. ८९ १७ पतीकोपासनाकथनम्. १३२ चतुर्थ: पटलः ८ अथ मुद्राकथनम्. ९० २९ स्वाधिष्ठानचनविवरणम्. १५५
९ योनिमुद्धाकथनम्. १३ ३० मणिपूरचक्रविवरणम्.१५७
१० महामुद्राकथनम्. ९७ ३१ अनाहनचकविवरणम्. १५८
१' महाबंधकथनम्. १०० ३२ विशुद््चक्विवरणम्- १६१ १२ महावष कथनम्. १.२ ३३ आज्ञाचक्रविवरणम्. १६३ १३ खचरी मुद्राकथनम्. १०५ ३४ सहसारपद्मविवर णम्. १७२ १४ जालन्धरबन्धकयनम्. १०८ ३५ राजयोगकथनम्. १८२ १५ मूलयन्धकथनम्. १५९ ३६ राजाधिराजयोगकथनम. १९५ १६ विपरीतकरणीकथनम् १० ३७ शिवसहिताफलकथनम्. २०३ १७ उड्डाणबन्धकथनम्, १११ ३८ उमामहेश्वरमाहात्म्यम्. १०५ इत्यनुकमगिका।
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ओ ३ म् श्रीगणेशाय नमः। अथ शिवसंहिता।
मंगलाचरणम्। विभ्रहरण गणनाथजी, वुद्धिगेह तुअ माहिं।। विभ वुद्धि दोनों विकल, नशञत जात जगमाहिं॥१।। बुद्धिराज दीने हमें, बुद्धि पुत्र गौरीश।। योगयुक्ति भाषा करों, धरि गुरुआज्ञा शीज ॥। २ ॥। शिव आलयमें जायके, होत जीव भवपार।। पाय कृपा गुरु शम्भुको, भखजन चहों केवार।। ३ ।। गौरी अव मोरहिं दीजिए, अनुशासन सुत जानि।। शिवभापित भाषा रचों, छूटों भवभ्रम जानि ।।8।। फिर नहिं आवों जगतमें, योग युक्ति सब जानि। मातु कृपा मोपर करहु, शिक्षहुदेहुमोहिज्ञान ॥ ५ ॥ नाम हमारोहै नहीं, नहीं कर्म गुण न्रास।। मातु पुकारत पै भहौं, रामचरणपुरि दास ॥६॥ छोक-यंज्ञातुमेवयतिनो मतिपूर्वमेतत संसारसृत्वरकलत्रसुतादिसर्वम् । त्यक्कासमाधिविधिमेवसमाश्रयन्ते वन्देकमप्यहमजञ्जगदादिवीजम्॥१॥
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शिवसंहिता। भापाटीका।
मथमपटल: । मूलम्-एकंज्ञानं नित्यमाद्यन्तशून्यं ना- न्यत् किश्चिद्वर्त्तते वस्तु सत्यम् ॥ यद्भे- दोस्मि न्निन्द्रियोपाधिना वै ज्ञानस्यायं भासते नान्यथैव ॥१॥ टीका-केवल एक ज्ञान नित्य आदि अन्तरहित है ज्ञानसे अलग अन्य कोई वस्तु सत्य संसारमें वर्तमान नहीं है केवल इन्द्रियोपाधिद्वारा संसार जो भिन्न भिन्न बोध होताहै सो यह ज्ञानमात्रही प्रकाश होता है और कुछ नहीं है अर्थात ज्ञानसे भिन्न कुछ नहीं है॥। १ ।। मूलम्-अथ भक्तानुरक्तोऽहं वक्ष्ये योगान- शासनम्॥ ईश्वरः सर्वभूतानामात्ममुक्ति- प्रदायकः ॥ २॥ त्यक्का विवादशीलानां मतं दुर्ज्ञानहेतुकम्॥ आत्मज्ञानाय भूता- नामनन्यगतिचेतसाम् ॥ ३॥ टीका-सर्व प्राणिमात्रके ईश्वर आत्ममुक्तिप्रदायक भक्तवत्सल जिन मनुष्योंको सिवाय आत्मज्ञानके अन्य गति नहीं है उनके हेतु कृपापूर्वक योगोप-
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पथमपटल: । (३ ) दश करतेहैं विवादशील लोगोंका मत दुजानका हेतु है यह त्यागनेके योग्य है ॥ २ ॥ ॥ ३ ।। मूलम्-सत्यं केचित्प्रशंसन्ति तपः शौचं तथापरे॥ क्षमां केचित्प्रशंसंति तथैव श- ममार्जजवम्॥8॥ केचिद्दानं प्रशंसन्ति पि- तृकर्म तथापरे॥ केचित्कर्म प्रशंसन्ति केचिद्वैराग्यसुत्तमम् ॥५॥ टीका-कोई सत्यकी प्रशंसा करते हैं, कोई तपस्या- की, कोई शौचाचारकी, कोई क्षमाकी प्रशंसा, कोई स- मताकी, कोई सरलताकी, कोई दानकी प्रशंसा, कोई पितृकर्मकी, कोई सकाम उपासनाकी, कोई पुरुष वैरग्यको उत्तम कहतेहैं॥४ ॥५॥ मूलम्-केचिद्ृ हस्थकर्माणि प्रशसन्ति विच- क्षणाः॥ अग्निहोत्रादिकं कर्म तथा केंचि- त्परं विदु: ॥६॥ मन्त्रयोगं प्रशंसन्ति केचित्तीर्थानुसेवनम् ॥ एवं बहुतुपायां- स्तृ प्रवदन्ति विमुक्तये॥७॥ टीका-कोई पुरुप गृहस्थकर्मकी प्र्ंसा करते हैं, कोई बुद्धिमान् पुरुप अगनिहोत्रादिक कर्मकी प्रशंसा करतेहैं कोई मंत्रादिक कोई तीर्थसेवन करना मुख्य
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(४) सित्र्पंहिता भाषाटी का सनेना। समझते हैं इसी प्रकार मनुष्य बहुतसे उपाय मुक्तिके हेतु अपने मतिके अनुसार करते हैं॥ ६।।७ ।। मूलम्-एवं व्यवसिता लोके कृत्याकृत्यवि- दो जनाः॥ व्यामोहमेव गच्छंति विमु- क्ा: पापकर्मभः॥८ ।एतन्मतावलम्बी यो लब्ध्वा दुरितपुण्यके। भ्रमतीत्यव- शः सोऽन् जन्ममृत्युपरम्पराम्॥ ९॥ टीका-इसीतरह विधिनिपेध कर्मके जाननेवाले लोग पापकमसे रहित होके मोहमेंही पड़तेहैं और जो मनुष्य पुण्यपापका अनुष्ठान पहिले जो मत कहा 5 ehe gnc gho " है उसके आसरे होके करते हैं उसका फल यह होता है कि, मनुष्य वारंवार संसारमें जनमता और मरता है अर्थात् शुभाशुभ कर्म करनेसे कदापि मोक्ष नहीं होता परन्तु झुभकर्म करनेसे केवल चित्तकी शुद्धि होतीह।८।। ९ ।। मूलम्-अन्यैर्मतिमरतां श्रेष्ठैर्गपतालोकनतत्प- रैः।। आत्मानो वहवः प्रोक्ता नित्या: सर्व- गतास्तथा॥ १०॥ यद्यत्परत्यक्षविपयं तदन्यन्नास्ति चक्षते॥ कुतः स्वर्गांदयः सन्तीत्यन्ये निश्चितमानसाः ॥१9॥
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पथमपटलः । (५) टीका-कोई कोई बुद्धिमान् गुप्तशास्त्रके जाननेमें तत्पर अर्थात् गूढदर्शी बहुत आत्मा नित्य और सर्व- व्यापक कहते हैं बहुत प्रत्यक्षवादी यह कहते हैं कि, जो वस्तु प्रत्यक्ष देखनेमें आताहै वही सत्य है और कुछ नहीं है जिनकी बुद्धि स्वर्गादिकके न माननेमें निश्चित है॥१०॥३9॥ मूलं-ज्ञानप्रवाह इत्यन्ये शून्यं केचित्परं वि- दुः॥ द्वावेव तत्त्वं मन्यन्तेऽपरे प्रकृति- पुरुषी ॥ १२॥ टीका-कोई मनुष्य कहते हैं कि, सिवाय ज्ञान धाराके और कुछ नहीं है जो वस्तु संसारमें वर्तमान देखने या सुननेमें आती है या किसी प्रकारसे उसका होना निश्चय होताहै वह सब ज्ञानही है कोई पुरुप यही जानता है कि, सिवाय शून्यके और कुछ नहीं है इसीतरह कोई मनुष्य प्रकृतिपुरुप दोनोंको तत्त्व मानते हैं ॥१२॥ मृलम्-अत्यन्तभिन्नमतयः परमार्थपराङ् खाः॥ एवमन्ये तु संचिन्त्य यथामतिय- थाश्ुतम्॥।१३ ॥ निरीश्वरमिदं प्राहुः सेश्वरञ्च तथापरे ।। वदन्ति विविधैर्भेदैः सुयुत्त्यत स्थिकातराः॥१४॥
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(६ ) शिवसंहिता भापाटीकासमेता।
टीका-बहुतसे परमार्थसे वहिर्मुरख जिनकी भिन्न भिन्न मति है अपने मतिके अनुसार क्मोंको मानते और करते हैं कोई कहते हैं कि, ईश्वर नहीं है इसीतरह बहुत लोग कहते हैं कि, यह संसार बिना ईश्वरके नहीं है अर्थात् ईश्वरहीसे है यही निश्चय जानते हैं अपनी युक्तिसे बहुत २ भेद कहते और उसमें स्थिरतासे तत्पर रहते हैं ॥ १३॥ १४ ॥ मूलम्-एते चान्ये च मुनिभि: संज्ञाभेदाः पथग्विधाः॥ शास्त्रेपु कथिता ह्वेते लोक-
नां मतं वक्तुं न शक्यते ॥भ्रमन्त्यास्मि- अनाः सर्वे मुक्तिमार्गवहिष्कृताः ॥१६॥ टीका-ऐसे बहुत मुनिलोगोंने नानाप्रकारके मत शास्त्रमें स्थापन किये हैं यह संसारके मोह भ्रममें पड़नेका हेतु है अर्थात् शास्त्रमें बहुतप्रकारके मत दे- खनेसे मनुष्यके चित्तमें भ्रम उत्पन्न होता है उस भ्रम- का फल यह है कि, अपनी बुद्धिके अनुसार कोई एक मत ग्रहण करके मरणपर्यंत उसमें तत्पर मनुष्य रह- ताहै परंतु अमृत लाभ नहीं होता ऐसे विवादशील लोगोंका मत वर्णन करनेको हम शक्य नहीं हैं।
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मथमपटलः । (७) 4 मुक्तिमार्गस विमुख होके सव मनुष्य संसारमें भ्रमण कर- ते हैं ॥ १५ ॥१६॥ मूलम्-आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ॥ इदमेकं सुनिष्पन्नं योग- शास्त्रं परं मतम् ॥१७॥ टीका-श्रीमहादेवजी कहते हैं कि, सब शास्त्रोंको देखके और वारंवार विचारके यह निश्चित हुआ कि, एक यह योगशास्त्र उत्तम परमसंमत है अर्थात् यह सबसे उत्तम है तात्पर्य यह है कि, ऐसे मतको छोड़कर जिसकी प्रशंसा ईश्वर अपने मुखारविन्दसे करते हैं और जिसके ग्रहण करनेसे ब्रह्म करामलकवत् जानपडता है मनुप्य विक्षि- सके तरह इधर उधर चित्तको दौड़ाते हैं और बहुत लोग यह विचारते हैं कि, यह बड़ा कठिन है आश्चर्यकी बात है कि, मनुष्यशरीरसे जब ऐसा उत्तम श्रम न होगा तो जान पडता हैकि, रोगादिकसे शरीरके नाश़ होनेसे पीछे फिर जब पशुका जन्म होगा तब कुछ ईशवरके जाननेमें श्रम करेंगे ॥ १७ ॥ मूलमू-यस्मिन्ज्ञाते सर्वमिदं ज्ञातं भवति निश्चितम् ॥ तस्मिन्परिश्रमः कार्यः किमन्यच्छास्त्रभापितम्॥१८ ॥l
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(८) शिवसंहिता आषाटीकासमता।
टीका-निश्चय जिसके जाननेसे सब संसार जाना जाता है ऐसे योगशास्त्रके जाननेमें परिश्रम करना अवश्य उ. चितहै फिर अन्य शास्त्र जो कहेहैं उनका क्या प्रयोजन है अर्थाव कुछ प्रयोजन नहीं तात्पर्य यह है कि, पंडित लोग वृथा विवाद करके जो लोग सुमार्गमें जानेकी इच्छा करतेहें उनको भी भ्रष्ट कर देते हैं ॥ १८॥ मूलम्-योगशास्त्रमिदं गोप्यमस्माभि: परि- भापितम्॥ सुभक्ताय प्रदातव्यं त्रैलोक्ये च महात्मने ॥१९॥ टीका-यह योगशास्त्र जो हमने कहाहै सो परम गोपनीय है यह तैलोक्यमें महात्मा और अच्छे भक्त जनोंको दे- ना उचित है तात्पर्य यह है कि, विना ईश्वर- के भक्तिके यह शुभकर्म सिद्ध नहीं होता न उधर चित्तकी वृत्ति जातीहै इस हेतुसे अभक्तजनोंको देना उचित नहीहै॥ १९॥ मूलम्-कर्मकाण्डं ज्ञानकाण्डमिति वेदो द्वि- धा मतः॥ भवति द्विविधो भेदो ज्ञानका ण्डस्य, कर्मणः ॥ २० ॥ द्विविधः कर्म काण्ड: स्यान्निपेधविधिपूर्वकः॥ निपिद्ध- कर्मकरणे पापं भवति निश्चितम्॥ विधि-
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पथमपटलः । (९)
ना कर्मकरणे पुण्यं भवति निश्चितमू॥२१। टीका-कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड वेदके दो मत हैं इसमेंभी दो दो भेद कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्डमें भये हैं॥२०॥ उस कर्मकाण्डमें दो प्रकार हैं एक निषेध दूसरा विधि तहाँ निषेध कर्म करनेसे निश्चय पाप होता है विित कर्म करनेसे निश्चय करके पुण्य होताहै ॥२१॥ मूलम्-त्रिविधो विधिकूट:स्यान्नित्यनैमित्ति- काम्यतः।। नित्येऽकृते किल्बिपं स्यात्का- म्ये नैमित्तिके फलम् ॥ २२॥ टीका-विधि कर्ममें तीन प्रकारका भेद कहाहै नित्य १ नैमित्तिक २ सकाम ३ नित्यकर्म संध्या देवार्चन आदि न करनेसे पाप होता है सकाम अर्थात् जो कर्म फलके इच्छासे किया जाताहै और नैमित्तिक जो तीथों में पर्वादिकमें स्नानादिक करते हैं इनके न करनेसे पाप नहीं होता परन्तु करनेसे फल होताहै ॥ २२ ॥ मूलं-द्विविधन्तु फलं ज्ञेयं स्वर्गो नरक एव च॥ स्वर्गो नानाविधश्चैव नरकोपि तथा भवेत् ॥ २३ ॥ टीका-फल दो प्रकारका होताहै स्वर्ग और नरक स्वर्ग नानाप्रकारका है ऐसेही नरकभी बहुत प्रकारका
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(१०) शिवसंहिता भापाटी कासमेता। है तात्पर्य यह है कि, जैसा जो मनुप्य शुभाशुभ कर्म करता है वैसेही नरक वा स्वर्गमें जाताहै ॥ २३।। मूलम्-पुण्यकर्मणि वै स्वर्गो नरकः पापक- र्मणि ॥ कर्मबंधमयी सृष्टिर्नान्यथा भव- ति ध्रुवम् ॥ २४॥ टीका-पुण्यकर्म करनेसे स्वर्गमें जाताहै और पापक- मैसे नरकमे जाताहै. संसार कर्मसे निश्चय करके बंधाहै दूसरा हेतु नहीं है तात्पर्य यह है कि, जो ईश्वरको जानके कर्माकर्मसे अपनेको रहित समझेगा वह इस वंधसे छूटजायगा ॥ २४ ॥ मूलम्-जन्तुभिश्चानुभूयंते स्वर्गे नानासुखा- नि च। नानाविधानि दुःखानि नरके दु :- सहानि वै॥२५ ॥ टीका-प्राणी स्वर्गमें नानाप्रकारके सुखका अनुभव करता है ऐसही बहुत प्रकारके दुःसह दुःख नरकमें भी भोगता है ॥ २५ ॥ मूलम्-पापकर्मवशाङुःखंपुण्य कर्मवशात्सुखं तस्मात्सुखार्थी विविधं पुण्यं प्रकुरुते ध्रुवं२६ टीका-पापकर्म करनेसे दुःख होता है और पुण्यकर्म करनेसे सुख होताहे इस हेतुसे निश्चय करके मुखार्थी पुरुप नानाप्रकारके पुण्य करते हैं। २६ ।।
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प्रथमपटलः । (११) मूलम्-पापभोगावसाने तु पुनर्ज्जन्म भवे- त्खलु॥ पुण्यभोगावसाने तु नान्यथा भवति ध्रुवम् ॥२७॥ टीका-पापका फल भोगनेके पीछे अवश्य फिर जन्म होताहै ऐसही पुण्यफल भोगनेके अंतमें निश्चय फिर जन्म होता है अन्यथा नहीं होता ॥२७॥ मूलम्-स्वर्गेऽपि दुःखसंभोगः परस्तीदर्शना- ुषम्॥ ततो दुःखमिदं सर्वे भवेन्रास्त्यत्र संशयः॥२८॥ टीका-स्वर्गमेंभी दुःखहैं इस कारणसे कि, उस स्था- नमें परस्त्रीका दर्शन अवश्य होता है उसकी अपाप्तिमें मानसिक व्यथा उत्पन्न होती है अन्य भी राग द्वेपादि बहुतसे कारण हैं कि, प्राणीके चित्तको स्वर्गमें भी स्थिर नहीं रहने देते इस हेतुसे संसारमें सिवाय दुःखके सुख नहीं है॥ २८॥। मूलम्-तत्कर्मकल्पकैः प्रोक्तं पुण्यंपापमि- ति द्विधा।। पुण्यपापमयो बन्धो देहिनां भवति क्रमात्॥२९॥ टीका-चुद्धिमान् लोगोंने पुण्य और पाप दोप्रकारक
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(१२ ) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। कर्म कहाहे इसी पुण्य पापसे शरीर वंधायमान है अर्थात् वारंवार शरीरधारण करनेका कारण है॥२९॥ मूलम्-इहामुत्र फलद्वेपी सफलं कर्म सं- त्यजेत् ॥I नित्यनैमित्तिके संगं त्यक्का योगे प्रवर्तते॥३०॥ टीका-इस लोकका भोग वा परलोकके फलकी इच्छा और नित्य नैमित्तिक आदि कर्मोंको फलसहित त्यागके योगाभ्यास अर्थात् परत्रह्मके विचारमें महात्मा जनोंके तत्पर रहना उचित है॥ ३०॥ मूलं-कर्मकाण्डस्य माहात्म्यं ज्ञात्वा यो- गी त्यजेत्सुधीः॥पुण्यपापद्वयं त्यक्का ज्ञानकाण्डे प्रवर्तते ॥३१ ॥ टीका-कर्मकाण्डके माहात्म्यको जानके योगीको उचितहै कि, पुण्य पाप दोनोंको तृणवत् विचारके त्याग दे और ज्ञानकाण्डमें तत्पर होरहे॥३१॥ मूलम्-आत्मा वारे च श्रीतव्यो मंतव्य इति यच्छुतिः॥ सा सेव्या तत्प्रयत्नेन मुक्तिदा हेतुदायिनी॥ ३२॥ टीका-यह श्ुतिका वाक्य है कि, आत्माको सुनो और आत्माको मनन करो अर्थात् जो कुछ द
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मथमपटल: । ( १३) है सो आत्माही है सो श्रुति मुक्तिकी देनेवाली यत्न करके सेवनके योग्य है ॥ ३२ ॥। मूलम्-दुरितेपु च पुण्येपु यो धीवृत्तिं प्रचो- दयात्॥ सोऽहं प्रवर्तते मत्तो जगत्सर्वै चराचरम्॥ ३३ ॥ सर्व च दृश्यते मत्तः सर्वच मयि लीयते॥न तद्भिन्रोS- हमस्मीह मद्ित्रो न तु किंचन॥ ३४ ॥ टीका-पाप पुण्य दोनोंमें समानरूपकी बुद्धिको जो वृत्ति प्रेरणा करती है सो हम हैं और हमसेही सघ जगत् चराचर उत्पन्न है।। ३३ । और जो देख पड़ताहै वह सब हम हैं हममेंही सब लीन होताहै न वह हमसे भिन्न है न हम उससे किंचित्मात्र भिन्न हैं ता- स्पर्य यह है कि, वह आत्मा जिससे यह जगत् उत्पन्नहै हमसे भिन्न नहीं है इस हेतुसे इस संसारके स्थिति संहार कर्त्ता हम हैं ऐसी वृत्ति योगीकी रहती है॥३४॥ मूलम्-जलपूर्णेष्वसंख्येषु शरावेषु यथा- भवेत॥। एकस्य भात्यसंख्यत्वं तद्वेदोऽत्र न दृश्यते ॥। ३५॥ उपाधिपु शरावेषुया संख्या वर्तते परा॥ सा संख्या भवति यथा रवौ चात्मनि तत्तथा॥३६ ॥
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(११४) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । टीका-जलसे भरा असंख्य शगव अर्थात् मृत्तिका आदिके पात्रमें एक सूर्यका अनेक प्रतिविंब देख- पडता है वास्तवमें भेद नहीं है जो भेद देख- पडता है वह शरावके संख्याका भेद है॥। ३५, ।। जिस प्रकारसे शरावके संख्यासे सूर्यमें भेद जान पडता है उसी प्रकार मायाकी उपाधिस संसार भिन्न भिन्न जान पड़ता है वस्तुतः केवल एक ब्रह्म है ॥३६।। मूलम्-यथैकः कल्पकः स्वप्ने नानावि- धतयेष्यते॥ जागरेपि तथाप्येकस्तथैव बहुधा जगत् ॥ ३७॥ टीका-जैसे स्वम अवस्थामें एकसे अनेक कल्पना होतीहै निद्राच्युत होजानेपर कुछ नहीं रहता उसी प्रकार मायाके आवरणसे अनेक संसार जान पडता है जब ज्ञानरुपी खङ्गसे मायाका पटल कटजाता है तव सिवाय शुद्धब्रह्मके और कुछ नहीं रहजाता॥३७ ॥ मूलम्-सर्पबुद्धिर्यथा रज्नौशुक्तौवा रजतम्र- मः॥३८॥ तद्रदेवमिदं विश्वं विदृतं पर- मात्मनि॥ रज्जुज्ञानाद्यथा सर्पो मिथ्या रूपो निवर्तते॥ ३९॥ आत्मज्ञानात्तथा याति मिथ्याभूतमिदं जगत्॥ रौप्यभ्रा न्तिरियं याति शुक्तज्ञानादथा,खलु ४०
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प्रथमपटलः । (१५) टीका-रस्सीमें सपकी भ्रान्ति और सीपीमें चाँदीकी भ्रान्ति होती है ।।३८।उसी प्रकार शुद्धब्रह्ममें संसारकी झूँठी भ्रान्ति होती है रस्सीके ज्ञान होनेसे झूँठे सर्पका अभाव होजाता है।।३९।। उसी तरह आत्मज्ञान होनेसे यह संसार नहीं रहजाता सीपीकोभी अच्छी तरह निश्चय जानलेनेसे चाँदीकी भ्रांति दूर होती है॥ ४० ।। मूलम्-जगद्धान्तिरियं याति चात्मज्ञानादय- था तथा ॥ यथा रज्ूरगभ्रान्तिर्भवेद्दे दवशाज्जगत्।। ४१ ॥ तथा जगदिदं भ्रांतिरध्यासकल्पनाज्नगत्॥ आत्मज्ञा- नादथा नास्ति रज्जुज्ञानाड्टुजङ्गम:।४२॥ टीका-वैसेही आत्मज्ञान होनेसे जगतकी भ्रान्ति दूर होती है जैसे रस्सीमें सर्पकी भ्रांति होतीहै॥४॥ उसी तरह आत्मामें अध्यास कल्पनामात्र जगत्की भ्रांति है रज्जुवत् ज्ञान होनेसे फिर जगत्का तीनों कालसे अभाव हो जाताहै॥ ४२॥ मूलम्-यथा दोषवशाच्छक:पीतोभवति ना- न्यथा॥ अज्ञानदोपादात्मापि जगद्भवति दुस्त्यजम ॥४३॥ दोपनाशे यथा शुक्का
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(१६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता।
गृह्यते रोगिणा स्वयंम्॥। शुक्कज्ञानात्तथाS- ज्ञाननाशादात्मा तथा कृतः ।। ४४॥ टीका-जैसे मनुष्यको कवलकी व्याधि अर्थात् पित्तादिकके दोपसे सब वस्तु निश्चय पीतवर्ण देख पड़ती हैं उसी प्रकार अज्ञानरूपी दोपसे शुद्ध आत्मा नहीं प्रतीत होताहै परन्तु यह झूँठा संसार देख पड़ता हे ऐसा अज्ञान बड़े कप्टसे दूर होताहै जैसे पित्तादिक दोपके नाश होनेसे फिर यथार्थ देखपडता है उसी प्रकार अज्ञान दूर होनेसे शुद्धव्रह्म निर्विकार जानप- डता है तात्पर्यं यह है कि, मनुष्यके पीछे एक अज्ञान की व्याधि बहुत बडी लगी है इसकी औपधि आत्म- ज्ञान है यह बात निश्चय है कि, व्याधि बिना औपधिके दूर नहीं होती ॥४३।। ४४ ।। मूलम्-कालत्रयेपिन यथा रज्जुःसर्पो भवे- दिति॥ तथात्मा न भवेद्विश्रं गुणातीतो निरसनः॥४५॥ टीका-जिस तरह रस्सी तीनों कालमें सपे नहीं हो सकती उसी तरह आत्माभी तीनों कालमें कदापि सं- सार नहीं हो सक्ता अर्थात नहीं है इस हेतुसे कि, भा- त्मा गुणातीत है अर्थात् गुणसे रहित है।। ४५।।
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मथमपटल: । (१७)
श्वरादयः॥ आत्मवोधेन केनापि शास्त्रा- देतद्विनिश्चितम् ॥४६॥ टीका-वह शास्त्र जिसमें आत्मवोधका निरूपण किया है उससे निश्चय है कि, इंद्रादि देवताभी जो ईश्वर कहे जाते हैं नित्यभावसे रहित हैं अर्थात् उनकाभी जनन मरण होता है ॥ ४६ ॥ मूलम्-यथा वातवशात्सिन्धावुत्पन्नाः फेन- बुदुदाः ॥ तथात्मनि समुद्भूतं संसारं क्षणभंगुरम् ॥४७॥ टीका-जैसे वायुकी उपाधिसे समुद्रमें फेन और बुद्वुदे उत्पन्न होते हैं क्षणभरमें फिर उसीमें लय हो- जाते हैं तैसेही आत्मासे संसार मायाकी उपाधिस क्षण- भंगी उत्पन्न होताहै फिर उसीमें लय होजाताहै।।४७ ॥ मूलम्-अभेदो भासते नित्यं वस्तुभेदोन भासते॥ द्विधात्रिधादिभेदोऽयं भ्रमत्वे पर्यवस्यति॥ ४८॥ टीका-परमात्माका संसारसे सदा अभेद है और किसी वस्तुमें भेद नहीं है एक दो तीन ऐसा जो वस्तु का भेद जानपडताहै वह भ्रमका कारण है॥। ४८ ॥।
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(१८) शिवस्रंहिता भापाटीकासमेता। मूलम्-यद्धूतं यञ्च भाव्यं वै मूर्तामूर्त तथैव च । सर्वमेव जगदिदं विद्ृतं परमा- त्मनि॥४९॥ टीका-जो भया है और जो होगा मृर्तिमान् वा अमूर्तिमान् यह सव जगत् आत्मासे मिलाहै अर्थात् उससे भिन्न नहीं है॥ ४९॥ मूलम्-कल्पकैः कल्पिता विद्या मिथ्या जाता मृपात्मिका ॥ एतन्मूलं जगदिदं A कथं सत्यं भविप्यति॥५०॥ टीका-यह संसार मिथ्याभूत अविद्याकल्पनासे कल्पित भया है बडे आश्चर्यकी बात है कि जिसकी जड मिथ्या है वह आप कव सत्य होसका है अर्थात सब झुँठ है॥५० ॥ मूलं-चैतन्यात्सवमुत्पन्नं जगदेतच्चराच- रम्॥ तस्मात्सर्व परित्यज्य चैतन्यं त समाश्रयेत् ॥५१॥ टीका-केवल एक चैतन्य ब्रह्मसे जरायुज, अंडज, स्वेदज, उद्भिज् आदि सकल चराचर संसार उत्पन्न भया है इस हेतुस सबको त्यागिके केवल उसी एक
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प्रथमपटलः । (१९)
चतन्य आत्माके आसरे होना उचित है क्यों कि वही चैतन्य सनका कारण है ।।५१।। मूलम्-घटस्याभ्यंतरे वाह्ये यथाकाशं प्रव- तते ।। तथात्माभ्यंतरे वाह्ये ब्रह्मांडस्य प्रवर्तते॥५२॥ टीका-जैसे घटके भीतर बाहर आकाश व्याप्त है तैसही इस ब्रह्माण्डके भीतर वाहर आत्मा परिपूर्ण व्याप्त है।। ५२।। मूलम्-सततं सर्वभूतेपु यथाकाशं प्रवर्तते। तथात्माभ्यंतरे बाह्ये ब्रह्मांडस्य प्रवर्त- ते॥५३॥ वर्तते सर्वभूतेपु यथाकाशं स- मंततः॥ तथात्माभ्यंतरे वाह्ये कार्यवर्गेषु नित्यशः॥५४॥ टीका-जिसप्रकार आकाश सब चराचरमें व्याप्त है उसीतरह आत्माभी इस जगत्में व्याप्त है अर्थात् आका- शवत् सब वस्तुमें आत्मा परिपूर्ण व्याप है॥।५३॥५४। मूलम्-असंलग्रं यथाकाशं मिथ्याभूतेपु पं चसु॥ असंलग्रस्तथात्मा तु कार्यवर्गेपु नान्यथा॥५५॥।
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(२२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेना । दुःखका आदि अंत शून्य है इस हेतुसे निश्चय आत्मा सुखस्वरूप है॥ ६१ ॥ मूलम्-यस्मान्नाशितमज्ञानं ज्ञानेन विश्व कारणम्॥ तस्मादात्मा भवेज्ज्ञानं ज्ञानं तस्मात्सनातनम् ॥ ६२ ॥ टीका-जिसकरके अज्ञान नाश होताहै और यह जान पडताहै कि अज्ञानही संसारका कारण है सोई आत्मज्ञान है और ज्ञानही नित्य है॥ ६२ ॥ मूलम्-कालतो विविधं विश्वं यदा चैव भवे- दिदम्॥ तदेकोऽस्ति स एवात्मा कल्प- नापथवर्जितः ॥६३।। टीका-काल पायके अनेक प्रकारका संसार उत्पन्न होताहै, सो वह एक आत्मा है वह कल्पनापथवर्जित है अर्थात कल्पना नहीं होसकी ॥ ६३ ५ सूलम्-चाह्यानि सर्वभूतानि विनाशं यान्ति कालतः ॥ यतो वाचो निवर्त्तते आत्मा द्वैतविवर्जितः ॥ ६४॥ टीका-आत्मासे जो अतिरिक्त वस्तु उत्पन्न है वह काल पायके नाश होजाती हैं आत्मा द्वैतरहित है,
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प्रथेमपटलः। (२३ ) अर्थात् एक है इसका वर्णन नहीं होसका तात्पर्य यह है कि यावत् वस्तु उत्पन्न होती है उसको काल खाजा- ताहै परन्तु आत्मामें कालकाभी नाश होजाताहै ॥६४॥ मूलम-नं खं वायुर्न चायिश्च न जलं प्टथिवी न च । नैतत्कार्य नेश्वरादि पूर्णैकात्मा भवेत्खल ॥६५।। टीका-वह आकाश नहीं है इस हेतुसे कि उसमें शब्द नहीं है वायु नहीं है क्यों कि उसमें स्पर्श नहीं है अगि नहीं है काहेसे कि उसमें तेजभाव नहीं है जल नहीं है क्यों कि उसमें रस नहीं है वह पृथ्वी नहीं है क्यों कि गन्धरहित है वह कार्य नहीं है क्यों कि उसक़ा कारण नहीं है वह ब्रह्मा इंद्र आदि ईश्वर नहीं है इस हेतुसे कि उसका नाश नहीं होता अर्थात वह भात्मा न आकाश न वायु न अग्नि न जल न पृथ्वी कुछ नहीं है निश्चय केवल एक परिपूर्णब्रह्म है ॥ ६५ ॥ मूलम् -- आत्मानमात्मनो योगी पश्यत्या- त्मनि निश्चितम्॥ सर्वसंकल्पसंन्यासी त्यक्तमिथ्याभवग्रहः॥६६॥ टीका-यह मिथ्यासंसाररूपी गृहको त्यागके सर्व
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(२४) शिवसंहिता भापाटी कासमेता'। संकल्पसे रहित होके योगी आत्मासे आत्माको आत्मामें देखता है॥ ६६ ॥ मूलम्-आत्मनात्मनि चात्मानं दद्वानन्तं सुखात्मकम्॥विस्मृत्य विश्वं रमते समा- धेस्तीवतस्तथा ॥ ६७ ॥ टीका-संसार विस्मृति करके अथात भुलाके आत्मासे आत्माको आत्मारूप होके देखता और आत्माके आनन्द सुखरूपी तीव्रसमाधिमें योगी रम- ण करता है ।! ६७ ।। मूलम्-मायैव विश्वजननी नान्या तत्त्वधिया परा। यदा नाशं समायाति विश्वं नास्ति तदा खलु ॥ ६८ ॥। टीका-माया संसारकी माता है अर्थात् मायासेही संसार उत्पन्न भयाहै यह निश्चय है कि दुसरा हेतु इस जगत्के उत्पत्तिका नहीं है ज्ञान करके इस मायाके नाश होनेसे संसारका अभाव निश्चय जानपडताहै।।६८।। मूलम्-हेयं सर्वमिदं यस्य मायाविलसितं यतः ॥ ततो न प्रीतिविपयस्तनुवित्तसु- खात्मकः ॥६९॥
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प्रथमपटलः । (२५) . टीका-यह जूँठा मायाका प्रपंच विपयसुख धन शरीर है इनमें प्रीति करना उचित नहीं है यह सब त्यागनेके योग्य है ॥ ६९ ॥ मूलम्-अरिमिंत्रमुदासीनस्तिविधं स्यादिदं जगत्।। व्यवहारेषु नियतं दृश्यते नान्यथा पुनः॥७0॥ टीका-शु मित्र उदासीनता यही तीन प्रकारके व्यवहारका प्रवाह इस संसार में निश्धय देखपड़ता है।।७०।। मूलम्-प्रियाप्रियादिभेदस्तु वस्तुपु नियतः स्फुटम्॥ आत्मोपाधिवशादेवं भवेत्पुत्रा- दि नान्यथा॥७१। सायाविलसितं विश्वं ज्ञात्वैवं श्रुतियुक्तितः ॥अध्यारोपापवा- दाभ्यां लयं कुर्वन्ति योगिनः ॥। ७२ ॥। टीका-और प्रिय अप्रिय यही दो भेदसे जगत् बँधा है।। आत्माके उपाधिसे पिता पुत्रादि होतेहैं यह जगत् मायासे विलसितहै यह श्रुति प्रमाणसे जानके योगी लोग अध्यारोप अपवादसे आत्मामें लय करतेहैं अ- थात शुद्धचैतन्यका मनन करते हैं ॥ ७१ ॥। ७२॥ मूलम्-कर्मजन्यं विश्वमिदं नत्वकर्मणि २
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(२६ ) शिवसंहिता भापाटी कासमेता । वेदना ।। निखिलोपाधिहीनो वै यदा भवति पूरुप: ॥ ७३ ।। टीका-इस जगत्की स्थिति कर्मसे है अर्थात् सुख दुःख जन्म मरण आदि केशोंका कारण कर्मही है अकर्म होजानेसे फिर कुछ दुःख नहीं है यावत् मायाके उपाधिको जन पुरुप जीतके उससे रहित होजाताहै॥ ७३॥ मूलम्-तदा विजयतेऽखंडज्ञानरूपी निरं- जनः ॥ स हि कामयते पुरुपः सृजते च प्रजा: स्वयम् ॥७४॥ टीका-तब अखंडज्ञानरूपी निरंजनका भान हो- ताहै। आत्मा अपने इच्छासे जगत् सृजता अर्थात उत्पन्न करता है।। ७४ ॥ मूलम्-अविद्या भासते यस्मात्तस्मान्मि- थ्या स्वभावतः ॥ शुद्धे ब्रह्मणि संवद्धो विद्यया सहजो भवेत् ॥ ७५॥ टीका-यह इच्छा अविद्याका कार्य है अविदया नाम मिथ्याका है तो जय इच्छाही मिथ्या मायासे उत्पन्न है तो उस इच्छाका कार्य कब सत्य होसकाहै तात्पर्य यह है कि, मायाके उपाधिसे आत्माका यह इच्छाभूत
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प्रथमपटलः । (२७ ) संसार मनोराज्यवत् है. जैसे मनुष्यका मनोराज्य मि- थ्या है, उसी प्रकार आत्माका इच्छाभूत यह जगत्भी मिथ्याहै शुद्धब्ह्ममें ज्ञानरूपी विद्याका संबन्ध है।।७३।।
मूलम्-ब्रह्मतेजोंऽशतो याति तत आभास ते नभः ॥ तस्मात्प्रकाशते वायुर्वायोर- ग्रिस्ततो जलम्॥ ७६॥ प्रकाशते ततः पृथ्वी कल्पनेयं स्थिता सति॥ आकाशा-
टीका-उस न्रझ्मके तेजअंशसे आकाश उत्पन्नभया, आकाशसे वायु उत्पन्न भया, वायुसे अनि उत्पन्न भया अग्निसे जल भया, जलसे पृथ्वी उत्पन्न भई, यह कल्प- ना है आकाइसे वायु उत्पन्न भया और आकाश वायुसे तेज उत्पन्न भया ॥७६ ॥७0॥
मूलम्-खवातायेर्जलं व्योमवातागिवारि तोमही॥ खंशव्दलक्षणं वायुश्चंचल: स्प- र्शलक्षणः ॥ ७८।। स्याद्पलक्षणं तेजः सलिलं रसलक्षणम् । गन्धलक्षणिका पथ्वी नान्यथा भवति धुवम् ॥७९ ॥
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(२८) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। विशेपगुणा: प्रस्फुरंति यतः शास्त्रादि निर्णयः ॥ शन्दैकगुणमाकाशं द्विगणो वायुरुच्यते।। ८० ॥तथैव त्रिगुणं तेजो भ वन्त्यापश्चतुर्गणाः॥ शब्द: स्पर्शश्च रूपं च रसी गन्धस्तथेव च ।८१॥ एतत्पंच- गुणा पृथ्वी कल्पकैः कल्प्यतेऽधुना।।चक्षु- पा गृहते रूपं गन्धो घ्राणेन गृह्यते।।८२।।
टीका-और आकाश वायु अग्निसे जल उत्पन्न भया और इन चारोंसे पृथ्वी उत्पन्न भई, शब्दगुण आकाश- काहै और स्पर्श गुण वायुका है, रूपगुण तेजका rhe she gho H है, रसगुण जलका है और पृथ्वीका गुण गंध है. इन पांच तत्त्वोंमें यह गुण जो ऊपर कहा है विशेप है यह शास्त्रसे निर्णय भयाहै अन्यथा नहीं है निश्चय है कि, भाकाशमें एक शब्द गुणहै, वायुमें दो गुण हैं, अग्निमें तीन गुण हें और जलमें चार गुण हैं, पृथ्वीमें शन्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, यह पाँचों गुण कल्पित हैं नेत्र रूपको ग्रहण करताहै और नासिका गंध ग्रहण करती ftwe मूलम्-रसो रसनया स्पर्शस्त्वचा संगरह्यते
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प्रथमपटल: । (२९)
परम्।श्रोत्रेण ग्ृह्यते शब्दो नियतं भाति नान्यथा। ८३॥ टीका-और जिह्वासे रस ग्रहण होताहै और स्पर्श त्वंचा अर्थात् शरीरके चर्मसे ग्रहण होताहै वा बोध होताहै और शब्द कर्णसे ग्रहण होता है यह निश्चयहै इसमें अन्यथा नहीं है।। ८३।। मूलम्-चैतन्यात्सर्वमुत्पन्नं जगदेतच्चराच- रम॥ अस्तिचेत्कल्पनेयं स्यान्नास्ति चेदस्ति चिन्मयम् । ८४॥ टीका-सन जगत् चराचर उसी एक चैतन्यसे उत्पन्न भयाहै यदि संसार सत्य मानाजाय तो इस प्रका- रसे कल्पना भइहै और जो संसारका अभावहै अर्थात् नहीं है तो वही एक चैतन्य आत्माहै और कुछ नहीं है।। ८४ ।। मूलम्-पृथ्वी शीर्णा जले मगा जलं मग्रञ्च तेजसि॥ लीनं वायौ तथा तेजो व्योमि वातो लयं ययौ।। ८५ ॥ टीका-पृथ्वी जलमें मग्र अर्थात् लय होजाती है जला
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(३०) शिवसंहिता भापाटीका समेता। अग्निमें लयभावको प्राप्त होताहै और आये वायुमें लय होजाताहै और वायु आकाशमें लीन होजाताहै ॥ ८५॥ मूलम्-अविद्यायां महाकाशो लीयते परमे पढे ॥। विक्षेपावरणाशक्तिर्दुरन्ता दुःख- रुपिणी॥८६।।जडरूपा महामाया रजः- सत्त्वतमोगणा ॥सा मायावरणाशत्तया- वृताविज्ञानरूपिणी॥ ८७॥ टीका-और आकाश अविद्यामें लयभावको प्रात्त होजाताहै और यह अविद्या मायाभी परमपदको पहुँच जाती है अर्थात् आत्मामें लय होजातीहै. तात्पर्य यह है कि, जो उत्पन्न भयाहै उसका अवइय नाशहै. ईश्वरकी यह दो शक्ति विक्षेप और आवरण हैं, इनका अंत नहींहें यह महामाया दुःखरूपिणोमें रज, सत्त्व, तम, तीनों गुण हैं समय समयपर इन गुणोंको धारण कर लेतीहै सो माया आवरणशाक्ति ज्ञानको आवृत करके अर्थात् छिपाके अज्ञानरूपिणी होजा- तीहै।। ८६।। ८७।। मूलम्-दर्शयेज्नगदाकार तं विक्षेपस्वभाव- तः।तमोगुणाधिकाविद्या या सा दुर्गा भवे- त्स्वयम्॥८८।इश्वरं तदुपहितं चैतन्यं तद-
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प्रथमपटलः । (३१ ) भृद्धुवम्॥सत्वाधिका च या विद्या लक्ष्मी: स्यादिव्य रुपिणी।।८९।।चैतन्यं तदुपहितं विष्णुर्भवति नान्यथा। रजोगुणाधिका विद्या ज्ेया सा वै सरस्वती। यश्चि- त्स्वरूपो भवति ब्रह्मातदुपधारकः॥९०॥ टीका-और संसारके आकारको देखातीहै यह विक्षेप करना उसका स्वभाव है माया जब तमोगुण धारण करतीहै तब दुर्गारूप होके चैतन्य ईश्वरको उत्पन्न कर- तीहै और जब सतोगुणको धारण करतीहै तब लक्ष्मी रूप होके चैतन्य जो विष्णु हैं उनको उत्पन्न करतीहै जव रजोगुणको धारण करतीहै तब सरस्वतीरूप होके चैतन्य जो त्रह्मा हैं उनको उत्पन्न करती है अर्थात् सबके उत्पत्तिका कारण यही जगन्माता महा- माया है।।८८।।८९ ।1९0 ॥ मूलम्-ईशादाः सकला देवा दृश्यन्ते पर- मात्मनि॥ शरीरादिजडं सर्व सा विद्या तत्तथा तथा।।९१।।एवंरुपेण कल्पन्ते क- लपका विश्वसम्भवमू॥।तत्त्वातत्त्वं भवंती हकल्पनान्येन नोदिता॥९२॥
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(३२ ) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । टीका-हमारे आदि सकल देवता उसी एक परमा- त्मामें देख पड़ते हैं और शरीरआदि सब जड पदार्थ उसी एक विद्या अर्थात् आत्मामें भिन्न भिन्न जान पड़ते हैं इसी तरह बुद्धिमान् लोगोंने संसारके स्थितिकी कल्पना कियाहै कि, तत्त्व अतत्त्व दोनों भयाहे अर्थात आत्मासेही सब सृष्टिकी उत्पत्ति केवल कल्पनामा- नहै और कुछ किसीने कहा नहीं है ॥।९१॥ ९२।। मूलम्-प्रमेयत्वादिरूपेण सर्व वस्तु प्रका- श्यते।।तथैव वस्तुनास्त्येव भासको वर्त- क: परः॥९३॥स्वरूपत्वेन रूपेण स्वरूपं वस्तु भाष्यते ॥ विशेपशब्दोपादाने भेदो भवति नान्यथा।।९४।। टीका-प्रमेयरूप अर्थात् यावत् वस्तु संसारमें दशयमान हैं वह सबके प्रकाशका कारण वही एक आात्मा है उपाधिभेदसे भिन्न भिन्न स्वरूपदे खपड़ता है विशेप करके नामभेदसे भेद है अर्थात् ज्ञान और ज्ञेय दोनों वहींहै और कुछ नहीं है।।९३।।९४।। मूलम् -- एक: सत्तापूरितानन्दरूप: पूर्णो व्यापी वर्त्तते नास्ति किश्चित्॥एतज्ज्ञानं 4
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पथमपटल:। यः करोत्येव नित्यं मुक्त: स स्यान्मृत्युसं- (३३ )
सारदुःखात् ॥ ९५॥ टीका-एक सत्तामात्र पूरित आनन्दस्वरूप परि- पूर्ण व्यापी सर्वदा वर्त्तमानहै और दूसरा कुछ नहीं है एसा ज्ञान जिसको है और सर्वदा वह यही मनन कर- ताहै सो मुक्त है अर्थात् संसारके जन्ममरणआदि दुःखसे वह रहित है॥ ९५॥। मूलम्-यस्यारोपापवादाभ्यां यत्र सर्वेलयं गताः॥ स एको वर्तते नान्यत्तच्चित्तेना- वधार्यते॥ ९६॥ टीका-जहां ज्ञानद्वारा संसारके कार्योंका लय होजाता है अर्थात् उससे अभेद होजाते हैं उसी एक सर्वेदा वर्तमान आत्मामें मनको लय करे अर्थात् आत्माकाही ध्यान धारण करे॥ ९६॥ मूलम्-पितुरन्नमयात्कोशाज्जायते पूर्वक- र्मणः ॥ शरीर वै जडं दुःखं स्वप्राग्भोगाय सुन्दरम् ॥ ९७॥ टीका-पूर्वकर्मके अनुसार प्राणी पिताके अन्न- मय कोशसे दुःख भोगनेके कारण जड शरीर सुन्दर भोगरूप उत्पन्न होताहै।। ९७॥
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(३४) शिवसंहिता भापाटीकासमेना । मूलम्-मांसास्थिस्नायु मज्जादिनिर्मितं भो गमन्दिरम्॥ केवलं दुःखभोगाय नाडीसं. ततिगंफितम् ॥९८॥ टोका-मांस अस्थि सायु मज्ा आदि नाडियोंसे बँधाहुआ यह भोगमन्दिर अर्थात शरीर केवल दुःखका कारण है, तात्पर्य यह है कि, ऐसा शरीर जिसके उत्पत्ति स्थितिके स्मरण करनेसे घृणा होतीहै उसमें व्यर्थ मनु- व्य मायामें फँसके मोह और अभिमान करताहै ।।९८। मूलम्-पारमेष्ठयमिदं गात्रं पंचभूतविनि- र्मिंतम् ब्रह्माण्डसंज्ञकं दुःखसुखभोगाय कल्पितम् ॥९९ ॥ टीका-यह शरीर ब्रह्माके द्वारा पंचभूतसे निर्मिंत न्रह्मांडसंज्ञा सुख दुःख भोगनेके हेतु कल्पितहै ॥९९॥ मूलम्-विन्दुः शिवो रजः शक्तिरुमयोर्मि- लनात्स्वयम् ॥ र्वप्नभूतानि जायन्ते स्वशत्त्या जडरूपया। १००॥ टीका-शिवरूप बिन्दु और शक्तिरूप रज इन दो- नोंके संचन्धसे ईश्वरकी शक्ति जडरूपा महामाया अ- पनी प्रभुतास शरीरोंको उत्पन्न करती है॥। १०० ॥
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प्रथमपटलः । (३५) मूलम्-तत्पश्चीकरणात्स्थूलान्यसंख्यानि चराचरम्॥ ब्रह्मांडस्थानि वस्तूनि यत्र जीवोऽस्तिकर्ममः॥१०१॥ तद्दूतपश्च- कात्सर्व भोगाय जीवसंञिता॥१०२ ॥ टीका-उसी पंचीकरणसे अनेक स्थूल वस्तु इस संसारमें चराचर उत्पन्न होती हैं यह जीवभी अपने कर्मके अनुसार भोग भोगनेके हेतु उसी पांच भूतसे जीवसंज्ञा करके प्रगट होता है॥ १०१॥१०२॥ मूलम्-पूर्वकर्मानुरोधेन करोमि घटनामहं॥ अजडः सर्वभूतान्वै जडस्थित्या भुनक्ति तान् ॥ १०३॥ टीका-ईश्वर कहते हैं कि, प्राणीको पूर्व कर्मके अनु- सार हम उत्पन्न करतेहैं और सर्व भूतोंसे हम भजड अर्थात् भिन्न और अविनाशी हैं परंतु जडरूप होके सब- को हम खाजाते हैं अर्थात् सबका नाश करतेहैं॥१०३॥ मूलम्-जडात्स्वंकर्मभिर्वद्ो जीवाख्यो वि- विधो भवेत्। भोगायोत्पद्यते कर्म ब्रह्मा- डाख्ये पुनः पुनःजीवश्च लीयते भोगाव- साने च स्वकर्मणः ॥ १०४ ॥
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(३६) शिवसंहिता भापाठीकासमेता । टीका-जीव अपने कर्ममें वंधके नाना प्रकारके जड शरीर धारण करता है और अपने कर्मके फल भोगनेके हेतु संसारमें वारंवार उत्पन्न होता है और सब कर्मोंके अवसानमें अर्थात जब ज्ञानद्वारा सब कर्मोसे रहित होजाता है तब उसी ज्ञानस्वरूप आ. त्मामें लय होजाताहै॥। १०४॥ इति श्रीशिव संहितायां हरगौरी संवादे लयप्रकरणे भापाटीकायाँ प्रथम: पटल:॥१॥
अथ द्वितीयपटलः। मूलम्-देहेऽस्मिन्वर्तते मेरुःसप्तद्वीपसमन्वि तः॥सरितःसागराः शैलाकक्षेत्राणि क्षेत्रपा- लकाः॥9॥ऋपयो सुनयः सर्वे नक्षत्राणि ग्रहास्तथा॥ पुण्यतीर्थांनि पीठानि वर्त- न्ते पीठदेवताः। २॥ टीका-प्राणीके इस शरीरमें सप्द्वीपसहित सुमेरु है और नदी समुद्रआदि पर्वत और क्षेत्र क्षेत्रपाल ऋपि मुनि और सब नक्षत्र गह पुण्यतीर्थ और पीठ देवता आदि सब इसी शरीरमें वर्तमान हैं। तात्पर्य यह है कि, मनुष्य तीथोंमें स्नान दर्शनके हेतु भटकता फिरता है, परंतु इस शरीरस्थ तीर्थ और देवताको नहीं जानता न
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द्वितीयपटल: । (३७ ) मनको शुद्ध करके उनके जाननेमें प्रयास करताहै॥।१॥२॥ मूलम्-सृष्टिसंहारकर्तारी भ्रमन्तौ शशि- भास्करी।नभो वायुश्च वह्विश्च जलं पृथ्वी तथव च ॥ ३ ॥ टीका-सृष्टिके स्थिति संहारके कर्ता चन्द्रमा और सूर्य इस शरीरमें भ्रमण करते हैं और आकाश, वायु, अगनि, जल, पृथ्वी, अर्थात् पांचों तत्त्व सर्वदा शरीरमें वर्तमान रहतेहैं तात्पर्य यह है कि, सब इसी शरीरमें हैं परंतु बिना गुरुकी कृपाके देख नहींपड़ते ।। ३।। मूलम्-त्रैलोक्ये यानि भूतानि तानि सर्वा- णि देहतः॥ मेरुं संवेष्ठ्य सर्वत्र व्यवहार: प्रवर्तते॥ जानाति य: सर्वमिदं स योगी नात्र संशय:॥४।। टीका-जो त्रैलोक्यमें चराचर वस्तु हैं सो सब इसी शरीरमें मेरुके आश्रय होके सर्वत्र अपने २ व्यवहार को वर्तते हैं जो मनुष्य यह सब जानताहै सो योगी है इसमें संशय नहीं है॥४॥ मूलम्-ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे यथादेशं व्यव- स्थितः॥ मेरुशृंगे सुधारश्मिर्वहिरष्टक- लायुतः॥ ५॥
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(३e) सिवसंहिता भापाटीकासमेता। टीका-यह शरीर त्रह्माण्डसंज्ञकहै जिस तरह संसा- रमें सन देश और सुमेरु पर्वतहै उसी तरह शरीरमें मेरु है उसके ऊपर सुधाकर अर्थात् चन्द्रगा आठ क- लासे स्थितहै॥ ५॥ मूलम्-वर्ततेऽहर्निशं सोऽपि सुर्धावर्पत्य- धोमुखः ॥ ६॥ततोऽमृतं द्विधाभूतं याति सूक्ष्मं यथा च वै। इडामार्गेण पुष्टचर्थ याति मन्दाकिनीजलम्॥पुष्णाति सकलं देहमिडामार्गेण निश्चितम् ॥ ७॥ टीका-सोई चन्द्रमा रात्रि दिवस अधोमुख होके अमृतकी वर्पा करते हैं वह अमृत सक्ष्म दो भाग हो- जाता है सो मन्दाकिनीके जलके समान देहके रक्षार्थ इडा जो वामनाडी है उसके रन्नसे सकल शरीरको पोपण करता है। ६।।७ ।। मूलसू-एप पीथूपरश्मिरहि वामपाश्वें व्य वस्थितः ॥८॥ अपरः शुद्धदुग्धाभो ह- ठात्कर्पति मण्डलात् ॥ रन्ध्रमार्गेण स- प्टयर्थ मेरौ संयाति चन्द्रमाः ।९ ।। टीका-वही सुधाफिरण संयुक्त इडा नाडीकी स्थिति वामभागमें है और शुद्ध दूधके समान मेरुमें चन्द्रम
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द्वितीयपटलः । (३९) प्रसन्नतापूर्वक अपने मण्डलसे इडाके रन्धमागसे आा- यके देहीका पोषण करते हैं।। ८।।९।। मूलम्-मेरुमूले स्थितः सूर्य: कलाद्वादशसं- युतः॥ दक्षिणे पथ रश्मिभिर्वहत्यूर्ध्व प्र- जापतिः॥१0॥ टीका-मेरुदण्डके मूलमें अर्थात् नीचे वारह कला- संयुक्त सूर्य स्थित हैं दक्षिणपथ अर्थात पिङ्गलानाडी द्वारा प्रजापति स्वरूपकी गति ऊपरको है॥। १० ॥ मूलम्-पीयूपरश्मिनिर्यासं धातूंश्च ग्ररुति ध्रुवम् ॥ समीरमण्डले सूर्यो भ्रमते सर्व- विग्रहे॥ ११॥ टीका-सूर्य अमृतधातुको अपने किरण शक्तिसे ग्राप करजातेहैं और वायुमण्डलके साथ सब शरीरमें भ्रमण करतेहैं॥११ ॥ मूलम्-एपा मूर्यपरा मूर्तिर्निर्वाणं दक्षिणे प- थि।। वहते लग्नयोगेन सृष्टिसंहारका- रक. ५ १ २ ॥ टीका-यह सूर्यकी अपर निर्वाण मूर्ति है अर्थात् पिङ्गलानाडी दक्षिणभागमें स्थितहै सूर्य सृष्टिसंहार करता लग्नयोगसे नाडीद्वारा प्रवाह करतेहैं॥ १२ ॥
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(४०) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । मूलम्-सार्धलक्षत्रयं नाड्यः सन्ति देहान्तरे नृणाम् ॥ प्रधानभृता नाड्यस्तु तासु मु- ख्याश्चतुर्दश॥ १३॥सुपुम्णेडा पिंगला च गांधारी हस्तिजिह्विका ।। कुहूः सरस्व- ती पूपा शंखिनी चपयस्विनी॥१४॥ वा- रुणालम्बुसा चैव विश्वोदरी यशस्विनी॥ एतासु तिस्रो मुख्या: स्यु: पिङ्गलेडा सु- पुम्णिका॥१५॥ टीका-शरीरमें बहुत नाडी हैं परंतु उनमें प्रधान नाडी साढेतीन लक्षहैं उनमेंसे सुख्य यह चौदह ना- डी हैं१ सुपुम्णा २ इडा ३ पिङ्गला ४ गान्धारी ५ हस्ति- जिह्वा ६ कुहू ७ सरस्वती ८ पूपा ९ शंखिनी १० पय- स्विनी ११ वारुणा १२ अलंबुसा १३ विध्वोदरी१४ यश- स्विनी इन चौदहमें भी तीन नाडी मुख्यहैं इडा, पिङ्ग- ला सुपुम्णा ॥ १३॥४॥ मूलम्-तिसृष्वेका सुपुम्णैव मुख्या सा योगिवललभा॥ अन्यास्तदाश्रयं कृत्वा नाड्य: सन्ति हि देहिनाम्॥ १६ ॥ टीका-इडा, पिङ्गला, सुपुम्णा इन तीन नाडियोंमें
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द्वितीयपटल: । (४१) भी एकही सुपुम्णा सुख्य है इस कारणसे कि, परमपदकी दाताहै योगो लोगोंको हितकारी है अन्य नाडी उसके आश्रय शरीरमें रहती हैं ॥ १६ ॥ मूलमं-नाडचस्तु ता अधोवदनाःपद्मतन्तु- निभा: स्थिताः ॥ पष्ठवंशं समाश्रित्य सोमसूर्यागिरुपिणी ॥ १७॥ टीका-यह तीनों नाडी अघोवदनाहैं अर्थात नीचेको सुख कमलतन्तुके सदश है और चन्द्र सूर्य अग्िके समान हैं अर्थात् इडा चन्द्ररूप और पिङ्गला सूर्यरूप और सुपुम्णा अगनिरूप है यह तीनों नाडी मेरुदंडके आश्रय स्थित हैं॥१७॥ मूलम्-तासां मध्ये गता नाडी चित्रा सा मम वला॥ त्रह्मरन्प्रश्न तत्रेव सूक्ष्मा- त्सूक्ष्मतरं शुभम् ॥१८॥ टीका-उन तीनों नाडियोंके मध्यमें जो चित्रा नाडी है वह हमको प्रिय है उसी स्थानमें बहुत सूक्ष्म ब्रह्मरंभ्र शोभायमान है॥ १८।। मूलम्-पञ्चवर्णोज्जवला शुद्धा सुपुम्णा मध्यचारिणी॥ देहस्योपाधिरूपा स सपुम्णा मध्यरूपिणी ॥ १९ ॥
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(४२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । टीका-वह चित्रानाडी पंचवर्ण अतिउज्जवल शुद्ध. है और देहके उपाधिका कारणभी वही सुपुम्णान्त- गता अर्थात् चित्रा नाडी है. तात्पर्य यह है कि, आत्म- स्वरूप वही है।। १९ ।। मूलम्-दिव्यमार्गमिद प्रोक्तममृतानन्द- कारकम्॥ ध्यानमात्रेण योगींद्रो दुरि- तौघं विनाशयेत्॥ २०॥ टीका-यह मार्ग बहुत श्रेष्ट अमृतानन्दकारक मु- क्तिका दाता हमने कहा है जिसके ध्यानमान्रसे योगी लोगोंके पापका समूह नाश होजाताहै॥२०॥ मूलम्-गुदात्तु द्यंगलादू्ध्व मेद्रात्तु दयंगुला- दधः ॥ चतुरंगलविस्तारमाधारं वर्तते समम् ॥ २१॥ टीका-गुदासे दो अंगुल ऊपर और मेठ्ूसे दो अं- गुल नीचे मध्यमें चार अंगुल विस्तार आधारपझ्म है॥। २१ ॥। मूलम्-तस्मिन्नाधारपन्ने च कर्णिकायां सु- शोभना ॥ त्रिकोणा वर्त्तते योनिः सर्वतं- त्रेषु गोपिता ।। २२ ॥ टीका-उस आधारपद्मके कणिकामें अर्थात डंड़ीमें
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द्वितीयपटलः। (४३) त्रिकोण योनि है यह योनि सव तंत्रों करके गोपित है अर्थात् इसके प्रकाशकरनेकी भाज्ञा किसी शास्त्रमें नहीं है।। २२ ।। मूलम्-तत्र विशुल्लताकारा कुण्डली परदे- वता।सार्द्धत्रिकरा कुटिला सुपुम्णा मार्ग संस्थिता ॥ २३।। टीका-उसी स्थानमें कुण्डलिनी देवता साढेतीनं हात कुटिला अर्थात् टेढी जिसकी प्रभा विद्युत्के समान है सुघुम्णाके मार्गमें स्थित है॥। २३ ॥ मूलम्-जगत्संसृष्टिरूपा सा निर्माणे सत- तोदयता॥ वाचामवाच्या वारदेवी सदा देवैर्नमस्कृता॥ २४॥ टीका-सोई कुण्डलिनी जगत्के बहुत प्रकारसे उत्साहपूर्वक रचना करनेकी रूप है और वाग्देवी है अर्थात् उसीसे वाक्यका उच्चारण होताहै इस कुण्डलिति नी देवीको देवतालोग नमस्कार करते हैं।। २४।। मूलम्-इडानाम्नी तु या नाडी वाममार्गे व्यवस्थिता॥ सुपुम्णायां समाश्किष्य दक्षनासाषुटे गता॥ २५॥ टीका-जो इडा नाम नाडी वामभागमें है वह सु-
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(४४) शिवसंहिता आापाटीकासमेता । पुम्णाको भवृत करती हुई अर्थात् उससे मिलीहुई नासिकाके दक्षिणद्वारको गई है ।। २५ ।। मूलम्-पिड्गला नाम या नाडी दक्षमार्गे व्यवस्थिता॥ सुपुम्णा सा समाष्िप्य वामनासापुटे गता ॥२६ । टीका-दक्षिणमार्गमें जो पिङ्ला नाडी है वह सुषु- म्णाके आसरे होके नासिकाके वामद्वारको गई है॥।२६॥। मूलम्-इडापिंगलयोर्मध्ये सुपुम्णा या भ- वेत्खलु। पटस्थानेपुं च पट्शकति पट्- पद्मं योगिनो विदुः ॥२७।। टीका-इडा पिङ्गलाके मध्यमें सुपुम्णा है इस सुपु- म्णाके छः स्थानमें छः शक्त हैं इनके नाम यह हें डा- किनी, हाकिनी, काकिनी, लाकिनी; राकिनी, शाकिनी, और इन्हीं छः स्थानोंमें छः पद्म हैं उनके नाम यह हैं आधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, भज्ञा यह अपने ज्ञानसे योगी लोग जानते हैं॥२७॥ भूलम्-पंचस्थानं सुपुम्णाया नामानि स्युवहूनि च।। प्रयोजनवशात्तानि ज्ञात-
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द्वितीयपदलः । (४५) टीका-सुपुम्णाके पांच स्थान हैं उनके नाम बहुत हैं प्रयोजनसे शास्त्रकर के जाना जाताहै॥ २८॥ मूलम्-अन्या याऽस्त्यपरा नाडी मूलाधा- रात्समुत्थिताः॥रसनामेढूनयनं पादांगुष्ठे च श्रोत्रकम् ।२९॥ कुक्षिकक्षांगष्ठकर्ण सर्वोगं पायुकुक्षिकम्।।लव्ध्वातां वै निव- र्तन्ते यथादेशसमुद्धवाः ॥ ३० ॥ टीका-और अन्य नाडी मूलाधारसे उठीहैं और जिह्वा, मेठू, नेत्र, पादका अङ्गुष्ट, कर्ण, कुक्षि, कक्ष, हस्ताङ्गुष्ट, पायु, उपस्थ, इन सब भङ्गोंमें इनका अन्त भयाहै अर्थात् मूलाधारसे उत्पन्न होके अपने अपने स्थानमें जाके निवृत्त होगई हैं ॥२९॥३० ॥ मूलम्-एताभ्य एव नाडीभ्य: शाखोपशा- खतः क्रमात्॥ सार्धलक्षत्रयं जातं यथा- भागं व्यवस्थितम ॥३१॥एता भोगवहा नाडयो वायुस्चारदक्षकाः ॥ओतप्रोताः सुसंव्याप्य तिष्ठन्त्यस्मिन्कलेवरे ॥३२॥ टीका-इन्हीं नाडियोमेंसे झाखोपशाख कमसे साढेतीनलक्ष नाडी उत्पन्न होके अपने अपने स्थानमें स्थित हैं यह सब भोगवहानाडी वायुके संचारमें
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(४६) शिवसंहिता भापाटीका समेता । दक्षहैं ओतप्रोत अर्थात संयोग वियोगसे इस शंररमें व्यात हैं॥ ३॥ ३२ ।। मूलम्-सूर्यमण्डलमध्यस्थः कलाद्वादश- संयुतः।।वस्तिदेशे ज्वलद्वह्निर्वर्तते चान्न- पाचकः॥ ३३॥ वैश्वानराग्रिरेपो वै मम तेजोंशसम्भवः ॥ करोति विविधं पाकं प्राणिनां देहमास्थितः॥ ३४ ॥ टीका-द्वादशकलासंयुक्त सूर्यमण्डलके मध्यमें प्ज्वलित अगि है सो व्तिदेशमें अन्नका पाचन करती है वह वैश्वानर अग्नि हमारे तेजसे उत्पन्न है प्राणीके शरीरमें स्थित होकर नाना प्रकारका पाक करती है।। ३३॥ ३४ ।। मूलम्-आयु:प्रदायको वह्निर्बलं पुष्टिं द- दाति सः ॥ शरीरपाटवश्चापि ध्वस्तरोग समुद्धवः॥३५॥ टीका-सो वैश्वानर अग्नि आयु, वल और पुष्टता और शरीरमें कान्तिका देनेवाला है और यावत् रोगोंको नाश करनेवाला है॥ ३५ ।। मूलम्-तस्माद्वैश्वानरामिश्च प्रज्वाल्य वि-
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द्वितीयपटलः । (४७) घिवत्सुधीः ॥ तस्मिन्नन्नं हुनेद्योगी प्रत्य- हं गरुशिक्षया ॥ ३६ ॥। टीका-इस वैश्वानर अगिको गुरुके शिक्षापूर्वक प्रज्वलित करके नित्य उसमें अन्नका होम करै अर्थात् भोजन करै ॥। ३६ ॥ मूलम्-ब्रह्माण्ड संजञके देहे स्थानानि स्युर्व- हूनि च ॥ मयोक्तानि प्रधानानि ज्ञात- व्यानीह शास्त्रके ।।३७। नानाप्रकारना- मानि स्थानानि विविधानि च ॥ वर्तन्ते विग्रहे तानि कथितुं नैव शक्यते ॥ ३८॥ टीका-यह शरीर ब्रह्माण्डसंज्ञक है इसमें बहुत स्थान हैं हमने प्रधान प्रधान स्थान कहे हैं ये शास्त्रसे जाने जाते हैं बहुत प्रकारके स्थान और नाम उन स्थानोंके हैं जो इस शरीरमें वर्तमानहैं उनके वर्णन करनेको हम शक्य नहींहै अर्थात् बहुत विस्तारदै उसके कहनेमें व्यर्थ परिश्रम है॥ ३७॥३८ ।। मूलम्-इत्थं प्रकल्पिते देहे जीवो वसति सर्व्वगः ॥ अनादिवासनामालाऽलंकृतः कर्मशृङ्गलः ॥३९॥ टीका-इसी तरह शरीर कल्पित है और जीव पूर्व-
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(४८) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। वासनारूपी वेडीमेँ फँसके मालाके तरह घूमा करता है॥ ३९॥ मूलम्-नानाविधगुणोपेतः सर्वव्यापारका- रक: ॥ पूर्वार्जितानि कर्माणि भुनक्ति विविधानि च॥। ४० ॥ टीका-सोई जीव नानाप्रकारके गुण ग्रहण करताहै और संसारमें बहुत प्रकारके व्यापार करताहे यह सब पूर्वा्जित शुभाशुभ कर्मके फल भोगताहै॥ ४ ॥ मूलम्-यद्यत्संदृश्यते लोके सर्वै तत्कर्मस- म्भवस्॥ सर्व: कर्मानुसारेण जन्तुर्भोगा- न्भुनक्ति वै ॥४१॥ टीका-जो जो शुभाशुभ कर्म संसारमें देखपड- ताहै वह सबका आदिकारण कर्मही है प्राणीमात्र अपने कर्मके अनुसार भोग भोगता है॥ ४१॥ मूलम्-ये ये कामादयो दोपाः सुखदुःख- प्रदायकाः॥ ते ते सर्वे प्रवर्तन्ते जीवकर्मा- नुसारतः ॥४२॥ टीका-जो जो काम क्रोध आदिसे सुख दुःख होताहै से सब जीवके कर्महीके अनुसार वरतताहै॥ ४२॥
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द्वितीयपटलः । (४९) मूलम्-पुण्योपरक्तचैतन्ये प्राणान्प्रीणाति केवलम्। वाह्ये पुण्यमयं प्राप्य भोज्यव- स्तु स्वयम्भवेत् ॥ ४३ ॥ टीका-पुण्यकमके अनुष्ठान करनेसे प्राणीको सुख होता है और वाह्य वस्तु श्रेष्ठ भोजनआदि नानाप्र- कारकी वस्तु आपही मिल जाती है॥ ४३ ॥ मूलम्-ततःकर्मबलात्पुंसः सुख वा दुःखमे- व च॥ पापोपरक्तचैतन्यं नैव तिष्ठति नि- श्वितम् ॥४8॥ न तद्भिन्नो भवेत्सोऽपि त- द्विन्नो न तु किश्चन । मायोपहितचैत- न्यात्सवे वस्तु प्रजायते ॥४ ॥ टीका-यह प्राणी अपने कर्मके वलसे सुख वा दुःख भोगताहै, जीव जव पापमें आसक होताहै तब दुःख भोगताहै, फिर उसको सुखलाभ नहीं होता. जीव अपने कर्मके अनुसार सुख वा दुःख भोगताहै इसमें भिन्नता नहीं है अर्थात् कता भोक्तामें भेद नहीं चैतन्य आत्मा जब मायोपहित होताहै तन सब वस्तु उत्पन्न होताहै ॥४४॥ ४५ ॥ मूलम्-यथाकालेपि भोगाय जन्तूनां विवि- MY
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(५०) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । धोद्धवः॥ यथा दोषवशाच्छुक्तौ रजता- रोपणं भवेत्॥ तथा स्वकर्मदोपाद्वै ब्रह्म- ण्यारोप्यते जगत् ॥४६ ॥ टीका-जैसा काल भोगके हेतु निश्चय रहता है उसमें प्राणी नानाप्रकारसे भोग भोगनके लिये उत्पन्न होताहै जैसे नेत्रके विकारके कारणसे सीपीमें चाँदीका आरोप होताहै वैसेही अपने कर्मके दोपसे ग्राणी त्र- हमें मिथ्या जगत्का आरोप करताहै॥ ४६ ॥
मर्थनम् ॥ उत्पन्नश्चेदीदृशं स्याज्ज्ञानं मोक्षप्रसाधनम ॥४७॥ टीका-वासनासे भ्रम उत्पन्न होताहै जवतक यासनाकी जड नहीं जाती तवतक कदापि भ्रम दूर नहीं होता इसी तरह जय ज्ञान उत्पन्न होताहै तब कुछ नहीं रहजाता इस हेतुसे ज्ञानही मोक्षका साधन है॥। ४७ ।। मूलम्-साक्षाद्वैशेपदष्टिस्तु साक्षात्कारिणि विभ्रमे। करणं नान्यथा युत्त्या सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥४८॥ टीका-विशप करके दष्टिसे साक्षात् जो देखपद-
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द्वितीयपटलः । (५१) ताहे वही साक्षात् भ्रमका कारणहै अर्थात् इसी साक्षा- तमें मनुष्य फँसाहै मायाके आवरणसे बुद्धि आगे नहीं जाती और दूसरा कारण कुछ नहीं है यह हम सत्य कहते हैं ।।४८ ।। साक्षात्साक्षा- त्कारिणि नाशयेत्॥ सो हि नास्तीति संसारे भ्रमो नैव निवर्तते॥ ४९॥ टीका-यह साक्षात् घटपट आदिका भ्रम त्रह्मके अत्यक्ष होनेसे नाश होताहे विना आत्माके प्रत्यक्ष भये ब्रह्म संसारमें नहीं है यह भ्रम निवृत्त नहीं होता॥४९॥ मूलम्-मिथ्याज्ञाननिवृत्तिस्तु विशेपदर्शना- ददवेत् ॥ अन्यथा न निवृत्तिः स्याहृश्य- ते रजतभ्रमः ॥५0॥ टीका-यह मिथ्या संसारका ज्ञान आत्माका विशे- प दर्शन होनेसे निवृत्त होता है और किसीप्रकार इस भज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती. जैसे सीपीमें चाँदीका भ्रम विना सीपीके निश्चय भये दूर नहीं होता ॥ ५०॥ मूलम्-यावन्नोत्पद्यते ज्ञानं साक्षात्कारे निरञ्जने॥ तावत्सर्वाणि भूतानि दृश्य- न्ते विविधानि च ॥५१॥
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(५२) शिवसंहिता आपाटीकासमेता। टीका-जवतक आत्माका साक्षात्कार ज्ञान नहीं होता तवतक सब प्राणी संसार आदि नाना प्रकारके देखपडते हैं॥ ५१॥ मूलम्-यदा कर्माजिंतं देहं निर्वाणे साधनं भवेत्॥ तदा शरीरवहनं सफलं स्यान्र चान्यथा ॥ ५२॥ टीका-जो यह कमाजित शरीर है इससे निर्वाण अर्थात् आत्मज्ञानका साधन होयतब इसका जन्म और स्थिति सुफल है नहीं तो व्यर्थ है. तात्पर्य यह है कि, जिस मनुष्यको आत्मज्ञान नहीं हुआ या इस वि- पयका उसने साधन नहीं किया उसका जन्म केवल माताके दुःख देने और पृथ्वीपर भारके हेतु भया॥।५२।। मूलम्-याददशी वासना मूला वर्त्तते जीवसं- गिनी॥ तादशं वहते जन्तु: कृत्याकृत्य- विधौ भ्रमम् ॥ ५३ ॥ टीका-जैसी वासना जीवके संग रहती है वैसेही माणी शुभाशुभ कर्म अमके वश होके करताहै और उ- सी वासनासे उत्पन्न और नाड होता रहताहै॥ ५३॥ मूलम्-संसारसागरं तूर्त्त यदीच्छेद्योगसा- धकः॥ कृतवा वर्णाश्रमं कर्म फलवर्ज तदाचरेत् ॥५४॥
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द्वितीय पटलः । (५३) टीका-योगसाधक यदि संसारसे तरनेकी इच्छा करे तो यावत् वर्णाश्रमका कर्म फलरहित करना उचित है॥ ५४ ।। मूलम्-विपयासक्तपुरुपा विपयेपु सुखेप्स- वः॥ वाचाभिरुद्वनिर्वाणा वर्लन्ते पापक- र्मणि ॥ ५५॥ टीका-विपयासक्त पुरुप सुख और विपयकी इच्छा में सर्वदा रहते हैं और पापकर्ममें ऐसे तत्पर रहते हैं कि, वाक्यभी उनका परमार्थ विपयमें रुद्ध रहता अर्थात् मोक्षका साधन तो बहुत दूर है परन्तु परमार्थकी चर्चासभी उनको ज्वर चढ़ताहै॥ ५५॥ मूलम्-आत्मानमात्मना पश्यन्न किश्विदि- हु पश्यति।तदा कर्मपरित्यागे न दोपोड- स्नि मतं मम ॥५६ ॥ टीका-जब ज्ञानी आत्मासे आत्माको देखे और सय वस्तुका अभाव जानपडे तव कमको त्यागदेनेमें कुछ दोप नहीं है यह हमारा मतहै ऐसा श्रीशिवजी जगन्माता पार्वतीजीसे कहते हैं ॥ ५६ ॥ मूलम्-कामादयो विलीयन्ते ज्ञानादेव न चान्यथा॥ अभावे सर्वतत्त्वानां स्वयं त- त्वं प्रकाशते ॥ ५७॥
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(५४) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । टीका-ज्ञानमें काम क्रोधादि सकल पदार्थ लय होजाते हैं इसमें अन्यथा नहीं है, जव स्वयंतत्त्व' अ- थात् आत्मज्ञान प्रकाश होताहै तच सब तत्त्वोंका अभाव होजाताहै॥ ५७॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे योगप्रकथने तत्त्वज्ञानोपदेशो नाम द्वितीय: पटलः॥२॥ अथ तृतीयपटलः। मूलम्-हद्यस्ति पङ्कजं दिव्यं दिव्यलिद्गेन भूषितम्॥ कादिठान्ताक्षरोपेतं द्वादशार्ण विभूपितम् ॥ १। . टीका-प्राणीके हृदयस्थानमें एक पद्म सुन्दर दि- व्यलिङ्गसे शोभायमानहै यह पद्म क-से-ठ-तक द्वादश वर्ण करके शोभित है अर्थात् क-ख-ग-घ-ङ-च-छ-ज- झ-मनटठ ॥ १॥ मूलम्-प्राणो वसति तत्नैव वासनाभिरलंकृ- तः॥ अनादिकर्मसाश्िष्टः प्राप्याहङ्गार- संयुतः ॥२॥ टीका-उसी पद्ममें प्राणकी स्थितिहै और अनादि कर्म अहंकारसंयुक्त वासनासे अलंकृतहै॥ २॥
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तृतीयपटलः । (५५) मूलम् -- प्राणस्य वृत्तिभेदेन नामानि विवि- धानि च। वर्तन्ते तानि सर्वाणि कथतुं नैव शक्यते ॥ ३ ॥ टीका-प्राणके वृत्तिभेदसे जो इस शरीरमें वायु व- र्तमान हैं उनके बहुतप्रकारके नाम हैं जिनके वर्णन . करनेको हम शक्य नहीं हैं अर्थात् यहाँ उनके वर्णन का प्रयोजन नहीं है।। ३ ।। मूलम्-प्राणोऽपानः समानश्चोदानो व्यान- श्र पश्चम:। नाग: कूर्मश्चकृकरो देवदत्तो
योक्तानीह शास्त्रके।। कुर्वन्तितेSत्रकार्या- णि प्रेरितानि स्वकर्मभिः॥५॥ टीका-प्राणके मुख्य भेदोंका नाम प्राण, अपान, समान, उदान, पाचवाँ व्यान और नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनञ्जय, यह दश वायु मुख्य हैं हम शास्त्रप- माणसे कहते हैं शरीरमें यह वायु अपने कर्मसे प्रेरित होके कार्य करते हैं।४ ।।द।। मूलम्-अत्रापि वायवः पश्च मुख्याः स्युर्द- शतः पुनः ॥तत्रापि श्रेष्ठकत्तारी प्राणा- पानौ मयोदितौ॥६॥
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(५६) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। टीका-वह दश वायुमें पांच सुख्य हैं फिर उनमेंभी निश्चय करके श्रेष्ठ करता श्रीमहादेवजी कहते हैं कि, हमने प्राण और अपानको कहाहै॥ ६ ॥ मूलम्-हृदि प्राणोगुदेऽपानः समानोनाभि- मण्डले। उदान: कण्ठदेशस्थो व्यान: सर्वेशरीरगः॥७॥ नागादिवायवः पञ्च कुर्वन्ति ते च विग्रहे॥ उद्गारोन्मीलनंक्षु- तृड्ज़म्भा हिक्का च पश्चमः॥८।। टीका-हृदयस्थानमें प्राणकी स्थिति है और गु- दामें अपान और नाभिमण्डलमें समान और कण्ठ- में उदान और व्यान सब शरीरमें व्यातहै और नाग आादि जो पांच वायु हैं वह शरीरमें डकार, हिचकी, जँभाई, कुधा, पिपासा, उन्मीलन अर्थात् निद्रासे जागत् होनेके समय जो नेत्रके खुलनेका हेतु है यह सब कार्य करतेहैं॥ ७॥८ । ूलम्-अनेन विधिना यो वै न्रह्माण्डं वेत्ति • विग्रहम्॥ सर्वपापविनिर्मुक्त: स याति परमां गतिमू॥९ ॥ टीका-इस विधानसे जो पहिले कहा है शरीरको जो मनुप्य ब्रह्माण्ड जानता है वह सर्व पापोंसे मुक्त होके
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तृतीयपटलः । (५७) परमगतिको प्राप्त होताहै अर्थात् मोक्ष होताहै ॥ ९ ॥ मूलम्-अधुना कथायष्यामि क्षिप्रं योगस्य सिद्धये॥। यज्ज्ञात्वा नावसीदन्ति योगि- नो योगसाधने ॥१०॥ टीका-अव जो हम कहते हैं इस विधिसे बहुत शीभ्र योग सिद्ध होता है और इसके जान लेनेसे योगोंको योगसाधनमें कष्ट नहीं होता ॥१॥ मूलम्-भवेद्ीर्यवती विद्या गुरुवक्तसमुद्ध- वा।। अन्यथा फलहीना स्यान्निर्वीर्याप्य- तिदुःखदा॥११ ॥ टीका-जो विद्या गुरुके मुखसे सुनी वा जानी जाती है वह वीर्यवती होतीहै और अन्य प्रकारसे विद्या फलहीन निर्वीर्या और अतिदुःखकी देनेवाली होती है. तात्पर्य यह है कि, योगविद्या वा अन्यविद्या भलेप्रकार गुरुसे जानकरके करना उचित है जो लोक पुस्तकसे वा किसीको करते देखते योगादिक क्रिया आरम्भ करदे- ते हैं उनका कल्याण नहीं होता यथार्थ न जाननेसे कष्टही होताहे॥११॥ मूलम्-गुरुं सन्तोष्य यत्नेन ये वैं विद्याम- पासते ॥ अवलम्बेन विद्यायास्तस्याः फलमवापुयु:॥१२॥
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(५८) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। टीका-गुरुको सब तरहसे प्रसन्न करके जो विद्या मिलतीहै उस विद्याका फल शीघ्र होताहै अर्थात् थोडे कालमें सिद्ध होजातीहै॥ १२॥ मूलम्-गुरु: पितागरुर्माता गुरुर्देवो नसंश- यः ॥ कर्मणा मनसा वाचा तस्मात्सर्वैः प्रसेव्यते ॥१३॥ गुरुप्रसादतः सर्व लभ्य- ते शुभमात्मनः ॥ तस्मात्सेव्यो गुरुर्नि- त्यमन्यथा नशुभं भवेत्॥। १४॥ प्रद्षि- णत्रयं कृत्वा स्पृद्टा सव्येन पाणिना ॥
टीका-गुरु पिता और गुरु माता और गुरु देवता है इसमें संशय नहीं है इस हेतुसे गुरुको कर्मसे मनसे चाक्यसे सब प्रकारसे सेवा करना उचितहै गुरुके प्र- सादसे आात्माका सब शुभ होजाता है. इंसलिये गुरु- की नित्य सेवा करना उचित है. दूसरी तरह शुभ नहीं है गुरुको तीन प्रदक्षिणा करके दक्षिण हाथसे स्पर्श करके गुरुके चरणकमलमें साष्टांग नमस्कार करना उचित है । १३।। १४॥१५॥ मूलम्-श्रद्धयात्मवतां पुंसां सिद्धिर्भवति नान्यथा ॥ अन्येषाश्च न सिद्धि: स्यात- स्माद्यत्न साधयेत् ॥१६॥
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तृतीयपटलः । (५९-): टीका-जिस पुरुपको श्रद्धा है उसको निश्चप कर- के विद्या सिद्ध होती है दूसरेको नहीं होती. इस हेतुसे साधकको उचित है कि यत्नसे साधन करे॥ १६ ॥ मूलम्-न भवेत्संगयुक्तानां तथाऽविश्वासि- नामपि। गुरुपूजाविहीनानां तथा च व- हुसंगिनाम् ॥९७॥ मिथ्यावादरतानां च तथा निष्ठुर भाषिणाम्॥ गुरुसन्तोपहीना- नां न सिद्धि: स्यात्कदाचन ॥१८॥ टीका-जिस पुरुपका किसी व्यवहारी मनुष्यसे अतिसङ्ग है उसको योगविद्या सिद्ध नहीं होती ऐसेही अविश्वासी और जो गुरुपूजासे हीन हैं और जिनका बहुत लोगोंसे संग है और वह लोग जो झूठ और कठोर वचन बोला करते हैं और वह लोग जो गुरुको प्रसन्न नहीं करते इन लोगोंको कदापि सिद्धि नहीं होती ॥१७॥१८॥1 मूलम्-फलिष्यतीति विश्वासः सिद्धे:प्रथम- लक्षणम्। द्वितीयं श्रद्धया युक्त तृतीयं गु- रुपूजनम्॥१९॥चतुर्थ समताभावं पञ्चमे- न्द्रियनिग्रहम्॥ पष्ठंच प्रमिताहारं सप्त- मं नैव विद्यते॥२०॥
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(६०) शिवसंहिता आपाटीकासमेवा। टीका-योगसिद्धि होनेका प्रथम लक्षण यह है कि, उसके सिद्धिमें विश्वास हो दूसरे श्रद्धायुक्त तीसरे गुरु- पूजारत हो चौथे प्राणीमात्रमें समताभाव रकखे पांचवें इन्द्रियोंका निग्रह रहे छठवें परिमित भोजन करै यह छः लक्षण योनसिद्धिके हैं और सातवाँ नहीं है॥१९।।२०।। मूलम्-योगोपदेशं संप्राप्य लब्घवा योग विदं गुरुम्॥ गुरूपदिष्टविधिना धिया निश्चित्य साधयेत् ।।२१ ।। टीका-योगवेत्ता गुरुसे योग उपदेश लेके जिस विघिसे गुरु उपदेश करे उस विधिसे बुद्धि निश्चय क रके साधन करे॥२१ ॥ मूलम्-सुशोभने मठे योगी पझ्मासनसम- न्वितः॥ आसनोपरि संविश्य पवनाभ्या- समाचरेत् ॥ २२ ॥ टीका-उपद्रवरहित सुन्दर स्वच्छ और उसका सू- क्ष्म रन्न् होय उस मठमें पझ्मासनसंयुक्त आसनपर वैठके योगी पवनका अभ्यास करे॥ २२ ॥। मूलम्-समकायः प्राअ्जलिश्च प्रणम्य च गुरून सुधीः।दक्षे वामे च विभ्रेशं क्षेत्रपा- लांबिकां पुनः॥।२३।।
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तृतीयपटलः । (६१)
टोका-समकायः अर्थात सीधा शरीर करके हाथ जोडके गुरुको प्रणाम करे और दक्षिण वामभागमें गणेशजीको प्रणाम करे और क्षेत्रपाल और जगन्माता देवीको प्रणाम करना उचित है॥ २३।। मूलम्-ततश्च दक्षाडष्टेन निरुद्धय पिंगलां सुधीः॥ इडया पूरयेद्वायुं यथाशत्त्या तु कुम्भयेत् ॥। २४॥ ततस्त्यक्क्ता पिंगलया शनैरेव न वेगतः॥ पुनः पिंगलयाऽडपूर्यं यथाशत्त्या तु कुम्भयेत्।।२५।इडया रे- चयेद्रायुं न वेगेन शनैःशनैः।इदं योगवि- धानेन कुर्याद्विंशतिकुम्भकानू॥ सर्वद्र- न्द्विनिर्मक्त: प्रत्यहं विगतालसः॥२६।। टोका-इसके पश्चात् दहिने हाथके अंगप्टसे पिंग- लाको रोककरके इडासे वायुपूरक करे अथात ग्राह करे और यथाशक्ति वायुको रोके फिर पिंगलासे शनैः शनै: रेचक अर्थात् वायुको बाहरकरे इसीप्रकार फिर पिंगलासे पूरक करके यथाशक्ति कुम्भक करे फिर इडा से धीरे धीरे रेचक करे वेगसे कदापि न करे इस योगविधा- नसे वीस कुम्भक करे और सर्वद्न्द्रसे रहेत होजाय अर्थात् एकाकार वृत्ति रक्खे और नित्य आलस्यको त्याग करके अभ्यास करे ॥२४॥२५॥२६॥
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(६२) , शिवसंहिता भापाटीकासमेता। मूलम्-प्रातःकाले च मध्याह्वे सूर्यास्ते चार्द्धरात्रके। कुर्यादेवं चतुर्वारं कालेष्वे- तेपु कुम्भकान् ॥ २७।। टीका-पूर्वोक्त विधिमे प्रातःकाल और मध्याह्रमें और सायकालमें और अर्द्धरात्निमें इसीतरह चार वार नित्य कुम्भक करना उचित है॥ २७।। मूलम्-इत्थं मासत्रयं कु्यादनालस्योदिने दिने॥ ततो नाडीविशुद्धिः स्यादविल- म्वेन निश्चितम् ॥२८॥ टीका-इसाप्रकार आलस्यको छोडकरके तीन मास नित्यकरे तो उस पुरुपकी नाडी बहुत शीत्र शुद्ध होजाय यह निश्चय है ॥ २८ ।। मूलम्-यदा तु नाडीशुद्धि: स्याद्योगिन- स्तत्त्वदशिनः ॥ तदा विध्वस्तदोपश्च भवेदारम्भसम्भवः ॥२९॥ टीका-तत्त्ददर्शी योगीकी जव नाडी शुद्ध होगी तब सर्व दोपका नाश होगा और आरम्भका सम्भव होगा ॥ २९ ॥ मूलम्-चिह्नानि योगिनो देहे दश्यन्ते ना- डिशुद्धितः ॥ कथ्यन्ते तु समस्तान्यङ्गा- निसंक्षेपतो मया॥३०॥
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तृतीयपठलः । (६३) टीका-नाडी शुद्ध होनेपर जो योगीके शरीरमें चिह्न देखपडतेहैं उन सबको हम संक्षेपसे वर्णन करते हैं ॥ ३५ ॥ मूलम्-समकाय: सुगन्धिश्चसुकान्तिःस्वर- साधकः ॥३१॥ आरम्भघटकश्चैव यथा परिचयस्तदा ॥ निष्पत्तिः सर्वयोगेयु योगावस्था भवन्ति ताः ॥ ३२॥ टीका-जब योगीकी नाडी शुद्ध होगी तब समकाय होजायगा अर्थात् न स्थूल न कृश न वक रहेगा और शरीरमें सुगंधिसंयुक्त अच्छी कान्ति अर्थात् तेज रहेगा और वायुस्वरका साधन होजायगा और आरम्भका लक्षण जान पडेगा और सब योगका ज्ञान होजायगा इसको योगावस्था कहते हैं॥ ३१॥ ३२ ॥ मूलम्-आरम्भ:कथितोऽस्माभिरधुना वा- युसिद्दये।। अपरः कथ्यते पश्चात्सर्वदुः- खौघनाशनः ॥।३३।। टीका-अभी जो हमने कहा है सो प्राणवायु सिद्ध होनेके आरम्भमें यह चिह्न होता है और इसके पीछे जो सर्व दुःखका नाश होता है सो कहते हैं॥ ३३ ।। मूलम्-प्रौढवह्निःसुभोगी च सुखीसर्वांङ्गस-
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(६४) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। न्दरः॥ संपूर्णहृदयो योगी सर्वोत्साहव- लान्वितः । जायते योगिनोऽवशयमेत- त्सर्वै कलेवरे॥ ३४ ॥ टोका-साधकके शरीरमें जठराम्ि विशेष मज्वलित होगी और सर्व अङ्ग सुन्दर सुखपूर्वक सुन्दर भोजन करेगा और वलसंयुक्त सर्व उत्साहसे हृदय योगीका प्रसन्न रहेगा इतने गुण योगीके शरीरमें अवश्य होगे॥३४ मूलम्~अथ वर्ज्य प्रवक्ष्यामि योगविघकरं परम्॥ येन संसारदुःखान्धि तीत्वा या- स्यन्ति योगिन: ॥। ३५।। टीका-अब जो योगमें विघ्न हैं उनको हम कहते हैं जिनको त्यागके यह संसाररुपी जो दुःखका समुद्र है योगी उसके पार होजाताहै॥। ३५ ॥ मूलम्-आम्लं रुक्षं तथा तीक्ष्णंलवणंसार्प- पं कटुमू॥ वहुलं भ्रमणं प्रातः स्नानं तैल- विदाहकम्॥३६॥स्तेयं हिंसां जनद्वेपश्चा- hc श्र प्राणिपीडनम्॥३७॥ स्त्रीसङ्गमग्रिसेवां च वह्वालां प्रियाप्रियम्सअतीव भोजनं योगी त्यजेदेतानि निश्चित ।।३८।।
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तृतीयपटल:। (६५) टीका-खट्टा रुखा तीक्षण लोन सरसों कडुआ बहुत भ्रमण करना प्रातःकाल स्नान शगीरमें तेल म- देन करना॥ ३६॥ स्वर्णभादिककी चोरी हिंसा म- नुप्यसे द्वेप व अहंकार अनार्जव अर्थात मनुष्यसे प्रेम न रखना,उपवास, झूठ, ममता, प्राणीको पीडा देना।।३७।। स्त्रीका सङ्ग, अग्निसेवन, प्रिय, अप्रिय, बहुत वोलना, बहुत भोजन करना योगीको उचित है कि, यह सब अवश्य त्यागदे॥ ३८ ।। मूलम्-उपायं च प्रवक्ष्यामि क्षिप्रं योगस्य सिदधूये।। गोपनीयं साधकानां येन सि- दिर्भंवेत्खलु॥ ३९॥ टोका-अव हम बहुत शीम योग सिद्ध होनेका उपा- य कहते हैं इसको गोप्य रखनेसे साधकको योग निश्च य सिद्ध होजायगा॥ ३९॥ मूलम्-घृतं क्षीरं च मिष्टान्नं ताम्बूलं चूर्णव- र्नितम्॥ कर्पूरं निष्ठुरं मिष्टं सुमठं सूक्ष्मव- स्त्रकम् ॥४•। सिद्धान्तश्रवणं नित्यं वैरा- ग्यगृहसेवनम्॥ नामसङ्गर्तर्न विष्णोः सु- नादश्रवणं परम् ॥४१। धृतिः क्षमा तपः शौचं ह्वीर्मतिर्गरुसेवनम्॥ सदैतानि परं योगी नियमेन समाचरेत् ॥ ४२ ॥
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(६६) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। टीका-घृत दूध मधुर पदार्थ ताम्बूल कर्पूरवासित चूर्णरहित, कठोर शब्दरहित मधुर बोलना, सुन्दर सू- क्ष्मरन्ध्रके स्थानमें रहना, सूक्ष्म वस्त्र अर्थात् महीन और - थोडा वस्र धारण करे नित्य सिद्धांत अर्थात् वेदान्त श्रवण करे और वैराग्यसे गृहमें रहे ईश्वरका स्मरण करे अच्छा शब्द श्रवण करे घैर्य क्षमा तप शौच लज्जा गुरु- की सेवा योगी सदेव इसप्रकार नियमसंयुक्त रहे तो कल्याण होगा॥ ४ ॥ ॥४२ ॥ मूलम्-अनिलेडर्क प्रवेशे च भोक्तव्यं योगि- भिः सदा॥ वायौ प्रविष्टे शशिनि शयनं साधकोत्तमैः॥ ४३॥ टीका-जब मर्यनाड़ी अर्थात् पिंगलानाडीका प्रवाह रहे तब योगी सदैव भोजन करे और जब चन्द्र अर्थात् इडानाडीसे वायुका प्रवाह रहे तव साधकके प्रति शायन करना उचित है॥। ४३ ॥। मूलम्-सद्यो भुक्तेऽपि क्षुधिते नाभ्यासः क्रियते वुधैः॥ अभ्यासकाले प्रथमं कुर्या- त्क्षीराज्यभोजनम्॥४४॥ टीका-भोजन करके तुरंत उसी समय अथवा जब क्षुधित होय तब साधक कदापि अभ्यास न करे और अभ्यास कालमें प्रथम दूध घृत भोजन करे॥४४ ॥
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तृतीयपटलः । (६७ )
मूलम्-ततोऽभ्यासे स्थिरीभूते न ताहड़िय- मग्रहः॥ ४५॥ अभ्यासिना विभोक्तव्यं स्तोकं स्तोकमनेकधा॥ पूर्वोक्तकाले कुर्यात्तु कुम्भकान्प्रतिवासरे ॥४६ ॥ टीका-जब अभ्यास स्थिर होजाय त पूर्वोक्त निय- मका कुछ प्रयोजन नहीं है।। ४५।। और अभ्यासीको उचित है कि, थोडा थोडा कईवार भोजनकरे और जिस- प्रकार पहिले कहा है उसीतरह नित्य कुम्भक करे॥४६॥ मूलम-ततो यथेष्टा शक्ति: स्याद्योगिनो वा- युधारणे॥ यथेष्टं धारणाद्वायो: कुम्भकः सिद्धयति धुवम्॥ केवले कुम्भके सि- द्दे किं न स्यादिह योगिनः॥४७॥ टीका-योगीको वायु धारण करनेकी शक्ति इच्छा- के अनुसार होजायगी. जव इच्छानुसार धारणशक्ति होजायगी तब कुंभक निश्चय सिद्ध होगा और केवल कुम्भक सिद्ध होनेसे योंगी क्या नहीं करसकता अर्थात् सब सिद्ध करसकता है॥४७ ॥ मूलम्-स्वेद:संजायते देहे योगिन: प्रथमो- द्यमे॥४८॥ यदा संजायते स्वेदो मर्दनं
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(६८) शिवसंहिता आापाटीकासमेता। कारयेत्सुधीः॥ अन्यथा विग्रहे धातुर्न- ष्टो भवति योगिन: ॥। ४९ ॥ टीका-योगीके शरीरमें प्रथम स्वेद अर्थात् पसीना उत्पन्न होता है जब स्वेद उत्पन्न होय तो उसको शरी- रमें मर्दन करे अन्यथा अर्थात् मर्दन नकरनेसे योगी- के शरीरका धातु नष होजाता है॥४८ ॥ ४९॥ मूलम्-द्वितीये हि भवेत्कम्पो दार्दुरी मध्यमे मतः ॥ ततोऽधिकतराभ्यासा- दगनेचरसाधकः ॥५० ॥ टीका-दूसरे भूमिकामें कंप होताहै तीसरेमें दार्दु- रीवृत्ति होती है अथांत् आसन उठता है फिर भूमिपर आपजाता है उससे अधिक अभ्यास होनेसे योगी गगनमें स्वेच्छाचारी होज़ाताहै॥ ५० ॥ मूलम्-योगी पद्मासनस्थोऽपि भुवमुत्सृज्य वर्तते। वायुसिद्धिस्तदा ज्ञेया संसारध्वा- न्तनाशिनी ॥५१ ॥ टीका-योगी पद्मासनस्थ होके पृथ्वीको त्यागके आकाशमें स्थिर रहे तव जाने कि, संसारके अन्धकार नाश करनेवाली वायु सिद्ध होगई ॥ ५१ ॥ मूलम्-तावत्कालं प्रकुर्वीत योगोक्तनियम-
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तृतीयपटलः । (६९) ग्रहम्॥ अल्पनिद्रा पुरीषं च स्तोकं मूत्रं च जायते ॥ ५२॥ टीका-उस कालतक योगके हेतु पूर्वोक्त नियम करना उचित है जयतक वायु न सिद्ध होय और यो- गीको थोड़ी निद्रा और थोड़ा मलमूत्र होता है॥५२॥ मूलम्-अरोगित्व मदीनत्वं योगिनस्तत्त्वद- र्शिनः।स्वेदो लाला कृमिश्चैव सर्वथैव न जायते॥ ५३॥ कफपित्तानिलाश्चैव सा- धकस्य कलेवरे॥ तस्मिन्काले साधक- स्य भोज्येष्वनियमग्रहः॥५४॥ टीका-तत्त्वदर्शी योगीको कायिक वा मानसिक व्यथा उत्पन्न नहीं होती और स्वेद लाला कृमिआदि उत्पन्न नहीं होते और साधकके शरीरमें कफ पित्त वातका दोपभी नहीं होता पूर्वोक्त कालतक साधक भोजन आदिका नियम करे ॥५३॥५४॥ मूलम्-अत्यल्पं बहुधा भुक्त्वा योगी न व्यथते हि सः।अथाभ्यासवशाद्योगी भू- चरीं सिद्धिमाप्टुयात्॥ यथादर्दुरजन्तूर्ना गतिःस्यात्पाणिताडनात् ॥५५॥ टीका-योगी को बहुत थोड़ा या विशेष भोजन क-
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(७0) शिवसंहिता आापाटीकासमेता। रनेसे कष्ट न होगा और योगीको अभ्याससे भूचरी सिद्धि होजायगी जैसे दर्दुरजन्तु पाणि ताडन करनेसे पृथ्वीपर उड्डान करताहै उसी प्रकार योगीभी पृथ्वीपर उड्डान करता है ॥ ५५ ॥ मूलम्-सन्त्यत्र वहवो विघ्ना दारुणा दुर्नि- वारणाः ॥ तथापि साधयेद्योगी प्राणैः कंठगतैरपि॥ ५६॥ टीका-इस योगसाधनमें बहुत दारुण विभ्र होते हैं जिसका निवारण बहुत कठिन है. परन्तु साधकको उचित है कि, यदि कंठगतभी प्राण होजाँय तोभी साधन न छोड़े ॥५६॥ मूलम्-ततो रहस्युपाविष्टः साधकः संयते- न्द्ियः॥प्रणवं प्रजपेद्दीर्घ विन्नानां नाशहे- तवे ॥५७॥ टीका-साधकको उचित है कि, विघ्ोंके नाशके हेतु इन्द्रियोंके संयममें अर्थात् उनके कार्यको रोकके विधि- पूर्वक एकान्तमें बैठके दीर्घमात्रासे अर्थात् स्पष्ट अक्ष- रके उच्चारणसे पणवका जप करे ॥ ५७॥ मूलम्-पूर्वार्जितानि कर्माणि प्राणायामेन निश्चितम् ॥ नाशयेत्साधको धीमानिह लोकोद्धवानि च ॥५८॥
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तृवायपटलः । (७१)
टीका-पूर्वार्जित कर्म और जो इस जन्ममें किया है यह दोनोंके फलको बुद्धिमान् साधक प्राणायामसे निश्चय है कि नाश करदेता है॥५८॥ मूलम्-पूर्वार्जितानि पापानि पुण्यानि विवि- धानि च । नाशयेत्पोडशप्राणायामेन योगिपुंगवः॥५९।। टीका-श्रे्योगी पूर्वार्जित नानाप्रकारका पाप और पुण्य केवल सोलह प्राणायामसे नाश कर- देताहै॥ ५९॥ मूलम्-पापतूलचयानाहो प्रलयेत्प्रलयाग्रि- ना । ततः पापविनिमुक्त: पश्चात्पुण्या- नि नाशयेत् ॥ ६० ॥ टीका-साधक पाप राशिको तूलके समान प्राण- यामरूपी अग्निसे प्रलय करदेताहै अर्थात् जलादेताहै. इसप्रकारसे मुक्तहोके पश्चात् पुण्यकोभी उसी अगिमें नाश करदेताहै॥ ६० ॥ मूलम्-प्राणायामेन योगीन्द्रो लब्ध्वैश्वर्या- ष्टकानि वै।। पापपुण्योदधि तीर्त्वा त्रैलो-
टीका-योगी प्राणायामके प्रभावसे आठ ऐश्वर्य
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(७२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। जिसको अष्टसिद्धि कहते हैं अर्थात् अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिता और वशिता प्राप्त करता है अव इन आठों सिद्धिके लक्षण कहते हैं योगीका शरीर इच्छामात्रसे परमाणुवत् होजाय उस- को अणिमा कहते हैं और योगी इच्छापूर्वक प्रकृति- को अपनेमें करके आकाशवत् स्थूल होजाय उसको महिमा कहतेहैं और अति हलके शरीरका पर्वतके समान भारी होजाना उसको गरिमा कहते हैं और बहुत भारी पर्वतके समानको रुईके सदश होजाना इसको लषिमा कहते हैं और सर्व पदार्थ इच्छामात्रसे योगीके समीप होजाय उसको प्राप्ति कहते हैं और हृयादृश्य अर्थात् कभी देस पडे कभी न देसपडे इसको प्राकाम्य कहनहें और भृत भविष्य पदार्थको जन्म मरणकी रचना करनेमें समर्थ होय उसको ईशि- ता कहते हैं और भूत भविष्य वर्तमान पदार्थको इच्छा से अपने गाधीन करलेना इसको वश्ित्वसिद्धि कहते है और योगी पाप पुण्यके समुद्रको तरके अपनी इच्छा पूर्वक नैलोक्यमें विचरताहै॥६१ ॥ मूलम्-ततोडभ्यासक्मेणैव घटिकात्रितयं भवेत् ।। येन स्यात्सकलासिद्धियोंगिन: स्वेप्सिता ध्रुवम् ॥६२।।
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तृंतीयपटलः । (७३)
टीका-पूर्वोंक्त कमस प्ाणायाम जब तीन घडीतक स्थिर होजायगा तब योगीको उसके इच्छाके अनुसार सब सिद्ध होजायगा यह निश्चय है॥ ६२ ॥ मूलम्-वाक्सिद्वि: कामचारित्वं दूरदृष्टि- स्तथैव च। दूरश्रुतिः सूक्ष्मदृाष्टिः परका- यप्रवेशनम् ॥६३॥ विण्मूत्रलेपने स्वर्णम- दृश्यकरण तथा ॥ भवन्त्यतानि सर्वा- णि खेचरत्वं च योगिनाम् ॥६४।। टीका-वाक्यसिद्धी स्वेच्छाचारी दूरदष्टी दूर शब्द श्रवण अतिसूक्ष्म दर्शन दूसरके शरीरमें प्रवेश करने- की शक्ति होय और योगी अन्यधातुमें अपने मल मूत्र लेपनमात्रसे स्वर्ण करे और योगीको अदृशय होजाने की शक्ति और आकाशमें गमन करनेकी सिद्धि यह सब योगीको कुम्भक सिद्ध होजानेसे स्वयं सिद्ध हो- जायगा इसमें संशय नहीं है ॥ ६३ । ६४ ।। मूलम्-यदा भवेद्धटावस्था पवनाभ्यासने परा ॥ तदा संसार चक्रेऽस्मिस्तन्नास्ति यन्न साधयेत् ॥६५ ॥ टीका-जब योगीकी घटावस्था होगी अर्यात् उसमें
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(७४ ) शिवसंहिता: आपाटीक्रासमेता ।
योगकी घटना होगी तब यह संसारचक्र योगीको कुछ असाध्य न रहैगा॥ ६६ ॥ मूलम्-प्राणापाननादविंदुजीवात्मपर मात्म नः॥ मिलित्वा घटते यस्मात्तस्माद्वै घट उच्यते ॥६६॥ टीका-प्राण अपान नाद बिन्दु जीव आत्मा और परमात्मा इनको एकत्र घटना होनेसे इसको घटावस्था कहते हैं ॥ ६६ ।। मूलम्-याममात्रं यदा धर्तु समर्थः स्यात्त- दाद्ुतः ॥ प्रत्याहारस्तदैव स्यान्नांतरा भवति ध्रुवम् ॥६७॥ टीका-एक प्रहर मात्र जंब वायु धारण करनेकी सामर्थ्य होगी तब अद्भुत प्रत्याहारकी शक्ति होगी और साधनसे न होगी निश्चय है॥ ६७ ॥ मूलम्-यं यं जानाति योगीन्द्रस्तं तमात्मे- ति भावयेत्॥ यैरिन्द्रियैर्यद्विधानस्तदि ान्द्रयजयो भवेत् ॥ ६८ । टीका-योगी जो जो पदार्थ जाने सो सो पदार्थमें भात्माकाही भावना करे जो इंदियसे जिस पदार्थका बोध होगा उस पदार्थमं वही आत्मभावनासे वह इंद्रिय
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तृतीयपटल:। (३५) जय हो जायगी अर्थात् जैसे नेत्रसे रूपका बोध होताहै तो जब रूपमें आत्मभावना होगी तब उस भावनासे चक्षु इन्द्रिय रूपमें कदापि आसक न होगी जब वह आसक न भई तब वह इन्द्रिय आपही जय होगई ॥६८। मूलम्-याममात्रं यदा पूर्ण भवेदभ्यासयो- गतः। एकवारं प्रकुर्वीत तदा योगी च कु- म्भकम्॥६९।दण्डाष्टकं यदा वायुर्निश्र- लो योगिनो भवेत् ॥ स्वसामर्थ्यात्तदांग- ष्ठे तिष्ठेद्धातुलवत्सुधीः॥७॥ टीका-जब एकवारमें पूर्ण एक प्रहरतक योगीका अभ्याससे कुम्भक स्थिर रहेगा अर्थात आठ घडीतक योगीका वायु निश्चल रहे तब वह अपने सामर्थ्यते अङ्ग- समात्रके बलसे अचल वोधवत् खडा रहसक्ता अर्थात यह सामर्थ्य भी योगीको होगी और अपने सा- मर्थ्यको गोप्य रखनेके हेतु विक्षिप्तकी चेष्टा योगी दिख लावैगा ॥ ६९ ॥ ७0 ॥ मूलम्-ततःपरिचयावस्था योगिनोऽभ्यास- तो भवेत।यदा वायुश्चंद्रसूये त्यक्का ति- ष्ठति निश्चलम् ॥.७9 । वायुः परिचितो वायुः सुषुम्ना व्यो्नि संचरेत्।
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(७६) शिवसंहिता भापाटी कासमेता । टीका-इस अन्तरमें योगीकी अभ्याससे परिचया- वस्था होगी जब वायु इडा पिङ्गलाको त्यागके निश्चल स्थिर रहेगा॥ ७१ ॥ तव परिचित होके सुपुम्नाके र- नधसे प्राणवायु आकाशको गमन करेगा ॥ मूलम्-क्रियाशक्ति गृहीत्वैव चक्रान्भित्त्वा सुनिश्चितम् ॥ ७२॥ यदा परिचयावस्था भवेदभ्यासयोगतः ॥ त्रिकूटं कर्मणां योगी तदा पश्यति निश्चितम् ॥७३॥ टीका-कियाशक्तिको ग्हण करके योगी निश्चय सब चक्रको वेधेगा॥७२। और जव योग अभ्याससे परिचया वस्था होगी तब त्रिकूट कर्मोंको योगी निश्चय देखेगा तात्पर्य यह है कि, जब योगीका पूर्वोक्त अभ्यास सिद्ध होजायगा तव त्रिकूट अर्थात् आध्यात्मिक आधिभौ- तिक आधिदैविक मानसिक दुःखको आध्यात्मिक कह- ते हैं और भूत पिशाचादिसे जो कष्ट होता है उसको आधिभौतिक कहते हैं और देवता आदिसे जो कर्मानु- सार कष्ट होताहै उसको आधिदैविक कहते हैं यह त्रिकूटकमोंका ज्ञान योगीको होजाता है॥ ७३॥ मूलम्-ततश्चकर्मकूटानि प्रणवेन विनाश- येत्॥ स योगी कर्मभोगाय कायव्यूहं समाचरेत् ॥७४ ॥
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तृतीयपटल:। (७७) टीका-इस कर्मकूटको योगी प्रणवद्वारा नाश कर- देताहै और यदि पूर्वकृत कर्मफल भोगनेकी इच्छा करे तो अपने इच्छानुसार इसी जन्ममें इसी शरीरसे भोगलेगा॥७8॥ मूलमू-अस्मिन्कालेमहायोगी पंचधा धा- रणं चरेत् ॥। येन भूरादिसिद्धि: स्यात्ततो भूतभयापहा।।७५।।आधारे घटिकाः पंच- लिंगस्थाने तथैव च॥ तदूर्ध्व घटिकाः पञ्च नामिहन्मध्यके तथा ॥७६॥ भ्रूम- ध्योर्ध्व तथा पंच घटिका धारयेत्सुघीः॥ तथा भूरादिना नष्टो योगीन्द्रो न भवे त्खलु॥ ७७ ॥ टीका-जिसकालमें महायोगी पञ्चधाधारणा सिद्ध करलेगा तब यह पश्चभूत सिद्ध होजायँगे और इनसे कोई कष्टका भय नहोगा. अव धारणाका निर्णय करतेहैं कि, आधारचक्में पांचघडी वायू धारणकरे इसी कमसे स्वाधिष्ठान मणिपूर अनाहत विशुद्ध भज्ञाचकमें अर्थात् गुदा लिङ्ग नाभि हृदय कंठ भृकुटीके मध्यमें ऊपर कहेहुए प्रमाणसे वायु धारणकरेगा तो योगी पश्च भूतसे निश्चय नाझ न होगा॥ ७ ॥७६॥७७॥
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(७) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। मूलम्-मेधावी सर्वभूतानां धारणायः सम- भ्यसेत ॥l शतत्रह्ममृतेनापि मृत्युस्त- स्य न विद्यते॥ ७८ ॥ टीका-वुद्धिमान् योगी अभ्याससे पश्चभूतकी धार- णा करेगा तो यदि एकश़त त्रह्माभी मृत्युको प्राप्त होंगे तबभी उसकी मृत्यु न होगी॥।७८ ॥ मूलम्-ततोऽभ्यासक मेणैव निष्पत्तियोगि- नो भवेत् ।। अनादिकर्मवीजानियेन ती- रत्वाडमृतं पिवेत्॥ ७९ ॥ टीका-इस अभ्यासकमसे योगीको ज्ञान होता है और अनादिकर्म बीजको तरके अर्थात ना करके योगी अमृतपान करताहै ॥। ७९॥ मूलम्-यदा निष्पत्तिर्भवति समाधे: स्वेन कर्मणा॥ जीवन्मुक्तस्य शांतस्य भवेद्दी- रस्य योगिनः ॥ ८०॥ यदा निष्पत्तिसं- पन्नः समाधिःस्वेच्छया भवेत् ॥८१ ॥ गृहात्वा चेतनां वायुः क्रियाशक्ति च वेग- वान् ।। सर्वाश्चकान्विजित्वा च ज्ञान- शक्तो विलीयते ॥ ८२ ॥
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तृतीयपटल:। (७२) टोका-जब अपने अभ्यासकमसे योगीको समाधी- का ज्ञान होगा तब जविन्मुक्त शान्त होके योगीको ज्ञानसम्पन्न स्वेच्छासमाधी होगी और मन वायु क्रिया- शक्तिसहित सर्व चक्रोंको वेधके ज्ञानशक्तीमें लीन हो- जायगा ॥ ८० ॥८१ || ८र |1 मूलम्-इदानीं क्ेशहान्यर्थ वक्तव्यं वायु- साधनम् ॥ येन संसारचक्रेस्मित्रोगहा- निर्भवेष्ुवम् ॥ ८३ ॥ टीका-हे देवि! अव केशहानीके अर्थ वायुसाधन कहते हैं जिससे इस संसारचक्रमें निश्चय रोगादिक नाश होजाय और साधकको कष्ट न हो ।। ८३॥ मूलम्-रसनां तालुमूले यः स्थापयित्वा विचक्षणः।। पिवेत्प्राणानिलं तस्य रोगाणां संक्षयो भवेत् ।। ८४ ॥। टीका-जिह्वाको तालुके मूलमें स्थितकरके बुद्धि- मान साधक यदि प्राणवायुको पान करे तो उसके सर्व रोगोंका नाश होजायगा॥। ८४ ॥ मूलम्-काकचंच्वा पिबेद्ायुं शीतलं यो वि- चक्षणः ॥ प्राणापानविधानज्ञः स भवे- न्मुक्तिभाजन: ॥ ८५ ।।
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(८०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। टीका-जो बुद्धिमान साधक प्राण अपानके विधा- नका ज्ञाता कावचञ्चू अर्थात अधरको काकके चोंचके समान लम्बा करके शीतल वायु पान करता है सो योगी सुक्तिभाजन हे अर्थात् मुक्तिपात् है॥। ८५॥ मूलम्-सरसं यः पिवेद्रायुं प्रत्यहं विधिना सुधीः॥नश्यंति योगिनस्तस्य श्रमदाह- जरामया:॥। ८६।। टकिा-जो साधक नित्य विधानपूर्वक रससहित वायुपान करता है उसके सर्व रोग और श्रम दाह जरा अर्थात् वृद्धावस्थादि नाश होजाते हैं अर्थात् यह सब उसके समीप नहीं आते।। ८६ ॥ मूलम्-रसनामूर्ध्वगांकृत्वा यश्चन्द्रे सलिलं पिवेत।। मासमात्रेण योगीन्द्रो मृत्युं ज- यति निश्चितम् ॥८७॥ टीका-जो योगी जिह्वाको ऊपर करके चंद्रमासे विगलित सुधारसको पान करताहै सो योगी एक मासमें निश्चय मृत्युको जीत लेता है इस जगहं जिह्वा ऊपर करनेसे तात्पर्य खेचरी मुद्धासे है सो खेचरीमुद्धा गुरु मुखसे जानना उचितहै।। ८७॥ मूलम्-राजदंतबिलं गाढं संपीडय विधिना
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तृतीयपटल: १ (c9) पिषेत्ं।। ध्यात्वा कुण्डलिनीं देवीं पण्मा- सेन कविर्भवेत् ॥ ८८ ॥l टीका-जो साधक राजदन्तको नीचेके दांतसे द- बायके उसके रन्धद्वारा विघिसे वायुपान करे और उस कालमें कुण्डलिनी देवीका ध्यान करेगा तो निश्चय छः मासमें कवि होगा।। ८८॥l मूलम्-काकचंच्चा पिवेद्वायुं सन्ध्ययोरुभ- योरि॥ कुण्डलिन्या मुखे ध्यात्वा क्षयरोगस्य शान्तये॥।८९॥ टीका-पूर्वोक्त काकचञ्चूसे विधिसे दोनों सन्ध्यामें जो कुण्डलनीकी मुखका ध्यान करके वायुपान करे- गा उसका क्षयरोग नाश होजायगा ॥।८९॥ मूलम्-अहर्निशं पिवेद्योगी काकचंच्वा वि- चक्षणः ॥ पिवेत्प्राणानिलं तस्य रोगाणां संक्षयो भवेत् ॥ दूरश्चतिर्दरद्दष्टिस्तथा स्यादर्शनं खलु॥९० ॥ टीका-जो योगी बुद्धिमान् शत्रि दिवस काकच- मचूसे प्राणवायु पान करतेहैं उनके रोगोंका नाश हो- जाताहै और दूरका शब्द श्रवण होताहै और दूरकी व- स्तु देख पडती है तथा निश्चय सूक्ष्म दर्शन होताहै।९०॥
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(८१) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। मूलम्-दन्तैर्दन्तान्समापीडय पिवेद्रायुं शनैः शनैः ॥ ऊ्ध्वजिह्ः सुमेधावी मृत्युं जयति सोचिरात ॥९१ ॥ टीका-जो बुद्धिमान् दांतसे दाँतको पीडित करके धीरे धीरे वायुपान करेगा और जिह्वा ऊपर करके अ- मृतपान करेगा सो शीघ्र मृत्युको जीतलेगा ॥९१ ॥ मूलम्-पण्मासमात्रमभ्यासं यः करोति दि- नेदिने ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो रोगान्नाश- यते हि सः॥९२॥ सं्वत्सरकृताभ्या- सान्मृत्युं जयति निश्चितम्॥ तस्मादति- प्रयत्नेन साधयेद्योगसाधकः ॥९३॥वर्ष- त्रयकृताऽभ्यासान्दैरवो भवति घृवम्। अणिमादिगुणालव्ध्वा जितभूतगण: स्वयम् ॥९४ ॥ टीका-जो पहिले कहेहुए अभ्यासको नित्य छः मास करे तो सब रोगोंका नाश होजायगा और सब पापसे मुक्त होजाय और उसी अभ्यासको एकवर्ष करे तो मृत्युको निश्चय जीतले इस हेतुसे साधक इस क्रि- याका यत्र करके अवइ्य साधन करे और यदि इसका अभ्यास तीनवष करे तो निश्चम भेखव होजाय और
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तृतीयपटलः । (८ ३) अष्टसिद्धिका लाभ होय और सर्व भूतगण आपही वश में होजाय ॥ ९२॥९३॥९४॥ मूलम्-रसनामूर्ध्वगां कृत्वा क्षणार्ध यदि तिष्ठति॥क्षणेन मुच्यते योगी व्याधिमृ- त्युजरादिभिः॥९५॥ टीका-योगीकी जिह्वा यदि क्षणमात्र ऊपर स्थिर होजाय तो उसी क्षणसे सर्वव्याधि और वृद्धावस्था और मृत्युका नाश होजाय. तात्पर्य यह है कि, खेचरीसुद्रासे किश्चित्मात्र भी अमृतपान करलेगा तो उसकी मृत्यु न होगी ॥ ९५॥ मूलम्-रसनां प्राण संयुक्तां पीडयमानां वि- चिंतयेत् ॥ न तस्य जायते मृत्युः सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥९६ ॥ टीका-जिह्वाको प्राणसहित पीडित करके जो पुरुप ब्रह्मरन्तमें ध्यानसंयुक्त स्थिर करेगा. हेदेवी 1 हम वारं- वार कहतेहैं कि, निश्चय उसकी मृत्यु न होगी॥ ९६॥ मूलम्-एवमभ्यासयोगेन कामदेवो द्विती- यकः॥ न क्षुधा न तृषा निद्रा नैव सूच्छा प्रजायते ॥९७॥ टीका-इस योगअम्याससे जो पहिले कहाहै वह
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(८४) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। पुरुप दूसरा कामदेव होजायगा अर्थात कामदेवके समान शोभितहोगा और उसको क्षुधा तृपा निद्रा मूर्च्छा कभी न उत्पन्न होगी॥ ९७॥ मूलम्-अनेनैव विधानेन योगीन्द्रोऽवनिम- ण्डले।I भवेत्स्वच्छन्दचारी च सर्वाप- त्परिवर्जितः॥९८॥ न तस्य पुनरावृत्ति- मौदते ससुरैरपि। पुण्यपापैन लिप्येत एतदाचरणेन सः॥९९॥ टीका-इस विधानसे योगी संसारमें सर्व दुःखसे रहित होके स्वेच्छाचारी होजायगा और इस आचर- गसे योगी पुण्यपापमें लिप नहीं होगा न फिर संसा- रमें उसका जन्म होगा और देवतोंके साथ आनन्दपूर्वक विचरेगा ॥ ९८॥ ९९॥ मूलम्-चतुरशीत्यासनानि सन्ति नानावि- धानि च ॥ १०० ॥ तेभ्यश्चतुष्कमादाय 4 मयोक्तानि त्रवीम्यहम्॥ सिद्धासनं ततः पझ्मासनश्चोग्रं च स्वस्तिकम् ॥ १०१॥ टीका-चहुत प्रकारके चौन्याशी आसनहें उनमें उत्तम जो चार आसन हैं उनको हम कहतेहैं, सिद्धासन, पद्मासन, उग्रासन, स्वस्तिकासन, तात्पर्य यह है कि, और
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तृतीयपटलः। (८५) आसन करनेसे नाडी शुद्ध होतीहै परन्तु यह चार आ- सनसे वायु धारण करके बैठनेमें कष्ट नहीं होता और प्रधान नाडी शीघ वश होजाती है॥१००॥१०५॥ मूलम्-योनिं संपीड्य यत्नेन पादमूलेन सा- धकः ॥ मेट्रोपरि पादमूलं विन्यसद्योग- वित्सदा॥ १०२॥ ऊर्ध्व निरीक्ष्य भ्रूम- ध्यं निश्चलः संयतेन्द्रियः॥ विशेषोऽवक कायश्च रहस्युद्वेगवर्जितः ॥ एतत्सिद्धा- सनं ज्ञेयं सिद्धानां सिद्धिदायकम्॥१०३॥ टीका-योगवेत्ता साधक पादमूल अर्थात् एडीसे योनिस्थानको पीडित करे और दूसरे पादके एंडीको मेद्र अर्थात् लिंगके मूलस्थानपर खकखे और ऊपर भ्रृके मध्यमें निश्चल दृ्टि रकखे जितेन्द्रियपुरुष विशेष सोधा शरीर करके विधानपूर्वक वेगवर्जित सावधान होके बैठे इसको सिद्धासन कहते हैं यह भासन सिद्धों- को सिद्धि देनेवालाहै॥ १०२॥१०३॥ मूलम्-येनाभ्यासवशाच्छीघं योगनिष्पत्ति माघुयात्॥सिद्धासनं सदा सेव्यं पवना- भ्यासिना परम्॥१०४॥ टीका-इस अभ्याससें जो पहिले कहाहै शीघ्र योग-
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( ८ ६ ) शिवसंहिता भषाटी कासमता । का ज्ञान होताहै इस हेतुसे यह सिद्धासन पवनाभ्या- सीको सदा सेवनेके योग्यहे॥ १०४ ॥ मूलम्-येन संसारमुत्सृज्य लभते परमां गतिम् ॥१०५॥ नातः परतरं गुह्यमासनं विद्यते भुवि॥ येनानुध्यानभात्रेण योगी पापाद्विमुच्यते ॥ १०६॥ टीका-इस सिद्धासनके प्रभावसे साधक संसारको छोडके परमगतिको पाताहै और इससे उत्तम वा गोप्य संसारमें दूसरा आसन नहीं है जिसके ध्यानमात्रसे यो- गी सर्व पापसे मुक्त होजाताहै॥१०५॥१०६॥ मूलम्-उत्तानौ चरणौ कृत्वा ऊरुसंस्थौ प्रयत्नतः ॥ ऊरुमध्ये तथोत्तानौ पाणी कृत्वा तु तादृशौ ॥ १०७॥ नासाग्रे वि- न्यसेद्दष्टिं दन्तमूलश्च जिह्या ॥ उत्तोल्य चिवुक वक्ष उत्थाप्य पवनं शनैः ।१८। यथाशत्त्या समाकृष्य पूरयेदुदरं शनैः।। यथा शक्त्यैव पश्चात्तु रेचयेदविरोधतः ।। १०९॥ इदं पद्मासनं प्रोक्तं सर्वव्याधि- विनाशनम्॥ दुर्लमं येन केनापि धीमता लभ्यते परम् ॥११०॥
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तृतीयपटलः । (८0)
टीका-दोनों चरणोंको उत्तान करके यत्नसे ऊरू अर्थात् जंघापर रक्खे उसीप्रकार दोनों हाथको सीधा करके ऊरूके मध्यमें खकखे और नासिकाके अग्रभागमें दृष्टि और दांतके मूलमें जिह्वा स्थितकरे और वक्ष अर्था- त् हृदयस्थानपर चियुक अर्थात् ठोडी स्थापन करे और अपानवायुको उठाके प्राणको शनैःशनैः यथाशक्ति पूरक करके धारणाकरे पश्चात् धीरे धीरे रेचक अर्थात् वायुको त्यागदे इसको पद्मासन कहतेहैं यह सर्व व्याधिका ना- शक है यह आसन बहुत दुलभहै परंतु कोई बुद्धिमान् साधकको प्राप्त होताहै|90७119061190311990 मूलम्-अनुष्ठाने कृते प्राणः समश्चलति त- रक्षणात् ।I भवेदभ्यासने सम्यक्साध- कस्य न संशयः॥१११॥ टीका-पूर्वोक्त अनुष्ठान करनेसे उसी समय म्राण सम होके सुपुम्णामें प्रवेश करेगा अभ्याससे साधक- का चायु सम होजायगा इसमें संशय नहीं।। १११॥ मूलम्-पद्मासने स्थितो योगी प्राणापान विधानतः ॥ पूरयेत्स विमुक्त: स्यात्सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ११२॥ टीका-ईश्वर श्रीपार्वतीजोसे कहते हैं कि पझ्मासन-
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(८c) शिवसंहिता आपाटीकासमेना।
स्थित योगी प्राण अपानके विधानसे वायु पुरण करेगा सो संसाश्वनधसे मुक्तहोजायगा इसमें संशय नहीं है हम सत्य कहते हैं॥ ११२ ॥ मूलम्-प्रसार्यं चरणद्वन्द्वं परस्परमसंयुतं। स्वपाणिभ्यां दढं धृत्वा जानूपरि शिरो न्यसेत् ॥। ११३ ॥ आसनोग्रमिदं प्रोक्तं भवेदनिलदीपनम् ॥ देहावसानहरणं प- शिमोत्तानसंज्ञकम् ॥११४॥यएतदासनं श्रेष्ठं प्रत्यहं साधयेत्सुधीः॥ वायुः पश्चि- ममार्गेण तस्य सश्चरति प्राम् ॥११५॥ टीका-दोनों चरणोंको संग परस्पर लम्बाकरके दोनो हाथोंसे बलसे धरे और जानुपर शिरको स्थिनकरे उसको उग्रापतन कहतेहैं, और पश्चिमतान भी संज्ञा इससे वायुदीपन होताहै और मृत्युक्ता नाशकरता है यह सब आसनोंमें श्रेष्ठ है और बुद्धिमान् इसको नित्य साधन करे तो उसका वायु पश्चिम मार्गसे अवश्य सश्चार करेगा ॥ ११३॥ ११४॥१॥ मूलम्-एतदभ्यासशीलानां सवेसिद्धि: प्र- जायते ॥ तस्माद्योणी प्रयत्नेन साथये-
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तृतीयपटल:। (८९) टीका-ऐसे पूर्वोंक्त अभ्यासमें जो लोग तत्परहैं उन- को सर्व सिद्धि उत्पन्न होती है. इस हेतुसे यत्न करके योगी आत्माके सिद्धहोनेकी साघना करे॥ ११६ ॥ मूलम्-गोपनीयं प्रयत्नेन न देयं यस्यकस्य चित्॥। येन शीघ्रं मरुत्सिद्धिर्भवेद्डःखौ- घनाशिनी॥११७॥ टीका-यह आासन जो पहिले कहा है यत्नसे गोप- नीयहै सबको देना उचित नहीं हे परंतु अधिकारीको देना योग्यहे इससे बहुत शीम वायु सिद्ध होजाताहै और यह सिद्धि दुःखके समूहको नाश करने- वाली है।।११७॥। मूलम्-जानूर्वोरन्तरे सम्यग्धृत्वा पादतले उभे॥ समकायः सुखासीनः स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते॥ ११८॥अनेन विधिना यो- गी मारुतं साधयेत्सुधीः ॥ देहे न क्रमते व्याधिस्तस्य वायुश्च सिध्यति ॥११९॥ सुखासनमिदं प्रोक्तं सर्वदुःखप्रणाशनम्॥ स्वस्तिकं योगिभिर्गोष्यं स्वस्तीकरण- मुत्तमम्॥ १२०॥ टीका-जानु और उरूके मध्यमें बरावर पादको
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(९० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। ऊपर नीचे धरे और समकाय अर्थात् बराबर शरीर करके सुखपूर्वक बैठे उसको स्वस्तिकासन कहतेहैं. इस विधानसे वुद्धिमान् योगी वायुका साधनकरे तो उसके शरीरमें व्याधी प्रवेश नहीं करती और उसको वायु सिद्धहोजातीहै इसको सुखासन कहतेहैं यह सर्वदुःखका नाशक है यह स्वस्तिकासन योगी लोगोंको गोप्य रख- ना उचितहै इसकारणसे की उत्तम कल्याणका का- रक है॥। १९८॥११९॥१२०॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे योगाभ्यासतत्त्व- कथनं नाम तृतीय: पटलः समापः ॥३॥ अथ चतुर्थपटलः। मूलम्-आदौ पूरकयोगेन स्वाधारे पूरये- न्मनः ॥ गुदमेद्रान्तरे योनिस्तामाकुंच्य प्रवर्तते॥ १ ॥ टीका-पहिले पूरक योगविधानसे आधारपद्ममें वायुको मन सहित पूरक करके स्थित करे और गुदामे- ढ़के मध्यमें जो योनिस्थान है उसको यत्नसे आकुश्चन करनेमें प्रवृत्तहोय ।। १ ॥ मूलम्-ब्रह्मयोनिगतं ध्यात्वा कामं कन्दुक- सन्निभम्॥सूर्यकोटिप्रतीकाशंचन्द्रकोटि-
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चतुर्थपदलः । (९१) सुशीतलम्॥।२॥तस्योर्ध्वेतु शिखामूक्ष्मा चिद्रूपा परमाकला॥तया सहितमात्मा- नमेकीभूतं विचिन्तयेत्।।३।। टीका-त्रह्मयोनिके मध्यमें कामपुष्प अर्थात् काम- वाणके समान कोटिसूर्यके सदश प्रकाश और कोटि चन्द्रमाके समान शीतल कामदेवका ध्यान करे और उसके ऊर्ध्व भागमें सूक्ष्म ज्योति शिखा चैतन्यस्वरू- पा परमाशक्तिसहित एक परमात्माका चिन्तन करै॥२॥३ ॥ मूलम्-गच्छतिव्रह्ममार्गेण लिंगत्रयक्रमेण वै। सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसुशी तलम्॥४॥अमृतं तद्ि स्वर्गस्थं परमान - न्दलक्षणम्।।श्वेतरक्तं तेजसाढयं सुधाधा- राप्रवर्षिणम् ॥५॥ पीत्वा कुलामृतं दि- व्यं पुनरेव विशेत्कुलम्॥ टीका-उसी ब्रह्मयोनिसे जीव सुधुम्णा रन्ध्रद्वारा कमसे तीन लिद्ग अरथोत् स्थूल सूक्ष्म कारणस्वरूपसें प्रस्थान करताहै और स्वगस्थ अमृत परम आनन्द- का लक्षण श्रेत रक्त वर्ण कोटि सूर्यके सदश तेज प्रकाश और कोटि चन्द्रमाके समान शीतल
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(९२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। वर्षी दिव्यकुलामृतको पान करके फिर योनिमंडल- में स्थित होजाताहै॥४॥५॥ मूलम्-पुनरेव कुलं गच्छेन्मान्रायोगेन ना- न्यथा॥ साच प्राणसमाख्याता ह्यस्मि- स्तन्त्रे मयोदिता॥६॥ टीका-फिर ब्रह्मयोनिसे प्राणायामयोग करके प्राण कुल मंडलमें जाताहै इस तंत्रमें जो हमने कहाहै हे देवी! उस ब्रह्मयोनिको प्राणके समान कहते हैं ॥ ६ ॥ मूलम्-पुनःप्रलीयते तस्यां कालाग्न्यादि शिवात्मकम् ॥ ७॥योनिमुद्रा पराह्येपा बन्धस्तस्याः प्रकीर्तितः ॥तस्यास्तु बन्धमात्रेण तन्नास्ति यन्न साधयेत्॥८।। टीका-फिर तीसरे बार काल अग्नि आादि शिवा- त्मक जीव प्रस्थानपूर्वक चंद्रमण्डलमें दिव्य अमृत- पान करके फिर ब्रह्मयोनिमें लय होजाता है हे देवी! इस बन्धको योनिमुद्रा कहते हैं केवल बन्धमात्रसे संसारमें अस्षाप्य कोई वस्तु नहीं है अर्थात् सप सिद्ध होसक्ताहै।।७॥८॥। मूलम्-छिन्नरुपास्तु ये मन्त्राः कीलिताः स्तंभिताश्च ये॥ दग्धा मन्त्रा: शिरोहीना
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चतुर्थपटलः। (१३) मलिनास्तु तिरस्कृताः ॥९॥ मन्दा वा- लास्तथा वृद्धा: प्रौढा यौवनगर्विताः।भें- दिनो भ्रमसंयुक्ता: सप्ताहं मूर्चिछताश्चं ये॥ १०॥ अरिपक्षे स्थिता ये च निर्वी- र्या: सत्त्ववर्जिताः।। तथा सत्त्वेन हीनाश्च खण्डिताः शतधाकृताः ॥११.॥ विधानेन च संयुक्ता: प्रभवन्त्यचिरेण तु । सिद्धिमोक्षप्रदाः सर्वे गुरुणा वि- नियोजिताः ॥१२॥ यद्यदुच्चरते योगी मंत्ररूपं शुभाशुभम्।।तत्सिद्धिं समवामो- ति योनिमुद्रानिबन्धनात्॥१३॥दीक्ष- यित्वा विधानेन अभिषिच्य सहस्रधा॥। ततो मंत्राधिकारार्थमेपा मुद्रा प्रकी- ्तिता॥ १४॥
दीका-जो मन्त्र छित्ररूप हैं और कीलित हैं स्तम्भि- त हैं और जो मन्त्र दग्ध हैं शिरहीन हैं मलीन हैं और जिनका अनादर है और मन्द हैं बाल हैं वृद्धहैं ौठहैं और जो यवनगर्वित हैं और भेदितहैं भ्रमसंयुक्त हैं सताइसे मूर्च्छित हैं और जो शत्रुके पक्षमें हैं निर्वीरय हैं
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(९४) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । सत्वरहित हैं खण्ड़ितहैं सौ खण्ड होगएहैं इस विधिसे युक्त ह़ोके साधन करनेसे शीघ्र प्रकर्ष करके सिद्ध होजायगा गुरुशिक्षासे सब सिद्ध और मोक्षमद होजाताहै योगीसे जो मन्त्र शुभ वा अशुभरूप उच्चा- रण होताहै सो सब योनिमुद्धाके वन्धनमात्रसे सिद्ध होजाताहै विधानपूर्वक मंत्रके अधिकारार्थ गुरुको उचि- तहै कि इस योनिमुद्राके दीक्षाका अभिषेक सहस्रधा शिष्यक़ो क़रे ॥९l9०॥99॥ १२/१ ॥ मूलम्-ब्रह्महत्यासहस्राणि त्रैलोक्यमपि घातयेत्॥ लासौ लिप्यति पापेन योनि- मुद्रानिवन्धनात् ॥१५॥ टीका-यदि एक सहस्र ब्रह्महत्याकरके और वैलो- क्यकामी घात करदे अर्थात् प्राणिमात्रका नाश करदे तो भी वह इस योनिमुद्राके बन्धमात्रसे पापमें लिस न होगा अर्थात् उसको पाप नलगेगा ।। १५ ।। मूलम्-गुरुहा च सुरापी च स्तेयी च गुरुत- ल्पग:॥ एतैः पापैने बध्येत योनिमृद्रा- निवन्धनात् ॥१६॥ टीका-गुरुघातक मद्यपाई चोर गुरुकी शय्यामें रमण करनेवाला ऐसे अनेक पातकमेभी माधक थो- निमुद्रा के बन्धप्रभावसे बन्धायमान नहोगा ।। १६॥
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चतुर्थपटलः। (९५) मूलम्-तस्मादम्यसनं नित्यं कर्तव्यं मोक्ष- रकाक्षिमिः॥ अभ्यासाज्जायते सिद्धिर-
टीका-इस हेतुसे मोक्षकांक्षीको उचित है कि, नित्य अभ्याप करे अभ्याससे सिद्धि होती है और अभ्यासही- से मुक्ति प्राप्त होती है॥ १७॥
वर्तते॥ मुद्राणां सिद्धिरभ्यासादभ्यासा- द्वायुसाधनम् ॥१८ ॥ कालवश्चनमभ्या- सात्तथा मृत्युञ्जयो भवेत् ॥ वाक्सिद्ि: कामचारित्वं भवेदभ्यासयोगतः ।१९॥ टीका-अभ्याससे ज्ञान प्राप्त होताहै और अभ्याससे योगमें प्रवृत्ति होती है और अभ्याससे मुद्रा सिद्ध होती हैं और अभ्याससे वायुका साधन होताहै और अम्याससे मनुष्य कालते बचताहै और अभ्याससे मृत्युंजय होजाताहै और अभ्यासयोगसे वाक्यसिद्धि और मनुष्य इच्छाचारी होजाताहै. तात्पर्य यह है कि, सब वस्तुके सिद्धिका कारण अभ्यास है. इस हे तुसे अ- उस्यको छोडके जिस वस्तुमें मनुष्य अभ्यासकरेगा वह अवश्य सिद्ध होजायगा।१८॥7९॥
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(९६) शिवसंहिता भापाटी कासमेता । मूलम्-योनिमुद्रा परं गोप्या न देया यस्य कस्यचित् ॥ सर्वथा नैव दातव्या प्राणैः कण्ठगतैरपि॥ २० ॥ टीका-यह योनिमुद्दा परमगोपनीय है अनधिका- रीको कदापि न दे यह सर्वथा देनेके योग्य नहीं है यदि कण्ठगत प्राण होजायँ तो भी देना उचित नहीं है॥२०॥ मूलम्-अधुना कथयिष्यामि योगसिद्धि- करं परम्॥ गोपनीयं सुसिद्धानां योगं परमदुर्लेभम् ॥२१ ॥ टीका-ह देवी ! अब जो योग कहेंगे वह परमपिद्धिका देनेवाला है सिद्ध लोगोंको इस परम दुर्लभ योगको गोप्य रखना उचितहै॥ २१॥ मूलम्-सुप्ता गुरुप्रसादेन यदा जागर्ति कु- ण्डली ॥ तदा सर्वाणि पद्मानि भिद्यन्ते ग्रन्थयोपि च ॥ २२॥ टीका-गुरु के प्रसादसे निद्धिता कुण्डलिनी देवी जब जागृत होती है तब सर्व पद्म और सर्व ग्रंथी वेधित हो जाती हैं अर्थात् सुपुम्णा रन्नद्वारा प्राणवायु न्हारन्त्र- पर्यन संचार करने लगजाताहै॥२२॥ मूलम्-तस्मात्सर्वप्रयत्नेन प्रबोधयितुमीश्व-
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चतुर्थपटलः। (९७)
रीम्॥ त्रह्मरन्ध्रमुखे सुप्ां मुद्राभ्यासं स माचरेत् ॥ २३ ॥ टीका-इसकारणसे यत्नपूर्वक ब्रह्मरन्ध्रके सुखमें जो ईश्वरी कुण्डलिनी देवी शयन करती हैं उनको उठानेके अर्थ मुद्राका अभ्यास उंचित है॥। २३।। मूलम्-महामुद्रा महाबन्धो महावेधश्च खे- चरी। जालंघरो मूलबंधो विपरीतकृति- स्तथा ॥२४॥ उड्डानं चैव वज्रोली दशमे शक्तिचालनम्॥ इदं हि मुद्रादशकं सुद्रा णामुत्तमोत्तमम् ॥ २५॥ टीका-अब उत्तम मुद्राबन्ध वेध कहते हैं महामुद्रा, महावन्ध, महावेध, खेचरीमुद्रा, जालन्धरवन्ध, मूल- वन्ध, विपरीतकरणीमुद्रा, उड्डानबन्ध, वज्रोलीमुद्रा और दशवीं शक्तिचालनमुद्रा, यह दशों मुद्रा सबमें अतिउत्तम हैं ॥ २४ ॥ २५॥ अथ महामुद्राकथनम्। मूलम्-महामुरद्रा प्रवक्ष्यामि तन्त्रेऽस्मिन्म- मवलभे॥ यां प्राप्य सिद्धाः सिद्धिं च कपिलाद्या: पुरा गताः ॥२६॥ ५
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(१८) शिवसंहिता नापाटीकासमेता। टीका-हे प्रिये पार्वती। इस तन्त्रमें महामुद्दा जो हम कहतेहैं इसको लाभ करके पूर्व कपिलआदिक सिद्ध- वरको सिद्धि प्राप्त भई ॥ २६ ॥ मूलम्-अपसव्येन संपीडय पादमूलेन सा- दरम्॥ गुरूपदेशतो योनिं गुदमेद्रान्तरा- लगाम् ॥२७॥सव्यं प्रसारितं पादं घृत्वा पाणियुगेन वै॥ नवद्वाराणि संयम्य चि- बुकं हृदयोपरि ॥ २८ ॥ चित्तं चित्तपथे दत्त्वा प्रभुवेद्धायुसाधनम्॥ महामुद्रा भ- वेदेषा सर्वतन्त्रेपु गोपिता।। २९ ॥वामाङ्गे न समभ्यस्य दक्षाङ्गेनाभ्यसेत्पुनः ॥ प्रा- णायामं समं कृत्वा योगी नियतमा- नसः ॥३० ॥ टीका-चामपादके एडीसे गुदा और मेद्रके मध्यमें जो योनि है उसको आदरसहित गुरुके उपदेशपूर्वक पीडितकरे अर्थात् दबाचे और दक्षिणपाद प्रसारके अ- र्थात लम्बा करके दोनों हाथोंसे घरे और नवद्ारोंको रोक करके चिबुक अर्थात् ठोडीको हृदयपरस्थित करे और चित्तवृत्तिको चैतन्यमें स्थिर करके वायुका साधन कर- ना उचित है यह महामुद्रा सर्वतन्त्रोंके प्रमाणसे गो-
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चतुर्थपटलः। (९९) व्यहै पहिले वामांगस अभ्यास करके फिर दक्षिण अं- गसे अभ्यास करे योगी स्थिरुद्धिको उचित है कि, इस प्रकारसे प्राणायामको समकरे ॥२७॥२८।२९॥३०।। मूलम्-अनेन विधिना योगी मन्दभाग्यो- पि सिध्यति॥ सर्वासामेव नाडीनां चालनं I
बिन्दुमारणम्॥३१॥जीवनन्तुकपायस्य 4 पातकानां विनाशनम्॥ कुण्डलीतापनं वायोर्ब्रह्मरन्ध्रप्रवेशनम् ॥ ३२॥ सर्वरो- गोपंशमनं जठराग्निविवर्धनम्॥ वपुषा कान्तिममलांजरामृत्युविनाशनम्॥३३॥ वांछितार्थफलं सौख्यमिन्द्रियाणाञ्च मा- रणम्।।एतदुक्तानि सर्वाणि योगारुढस्य योगिनः ॥ ३४॥ भवेदम्यासतोऽवशयं नात्र कार्या विचारण॥ टीका-इस विधानसे मन्दभाग्य योगीभी सिद्ध होजा- यगा और इस महामुद्राके प्रभावसे सर्व नाडीका च- लन सिद्ध होजायगा और बिन्दु स्थिर होगा और जी- वनको आकर्पित रकखेगा और सर्व पातकका नाश हो- जायगा और कुण्डलिनीको हठात् उठाय वायुको ब्रह्मर- नधमें प्रवेश करेगा और जठरागि प्रज्वलित होके सर्वरो-
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(१00) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। गोंका नाश करदेगा और शरीरमें सुन्दर कान्ति होगी और वृद्धावस्थासहित मृत्युका नाश होजायगा और सुखसहित वाञ्छित फल लाभ होगा और इन्द्रियोंका निग्रह रहेगा यह सब जो कहा है सो योगारूढ यो- गीको अभ्याससे वश होजाताहै इसमें संशय नहीं है निश्चय है।। ३१।। ३२।।३३।।३४।। मूलम्-गोपनीया प्रयत्नेन मुद्रेयं सुरपूजि- ते॥ यां तु प्राप्य भवाम्भोधे: पारं गच्छ- न्ति योगिनः॥ ३५ ॥ टीका-हेसुरपूजिते देवी। यह मुद्रा यत्न करके गो- पनीय है योगीलोग इसको लाभ करके संसाररूपी स- मुद्रके पार होजाते हैं ॥ ३५ ॥ मूलम्-मुद्रा कामदुघा ह्येपा साधकानां म- योदिता॥ गुप्ताचारेण कर्त्तव्या न देया यस्य कस्यचित्॥३६॥ टीका-हेदेवी। यह मुद्रा जो हमने कही है साधकोंको कामधेनुरूप है अर्थात् वाञ्छितफलकी दाता है इसको गुप्त करके अभ्यास करना उचित है और सबको अर्थात् अनधिकारीको देना उचित नहीं है। ३६॥। अथ महाबन्धकथनम्। मूलम्-ततः प्रसारितः पादो विन्यस्य तमुरू-
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चतुर्थपटलः । (१०१) परि॥३७॥ गुदयोनिं समाकुंच्य कृत्वा चापानमूर्ध्वगम्॥। योजयित्वा समानेन कृत्वा प्राणमधोमुखम् ॥ ३८॥ बन्धयेदू- ध्वंगत्यर्थ प्राणापानेन य: सुधीः॥ कथि- तोऽयं महावन्धः सिद्धिमार्गप्रदायकः ॥ ॥। ३९ ॥ नाडीजालाद्रसव्यूहो मूर्धानं याति योगिन: ॥ उभाभ्यां साधयेत्प- द्वयामेकैकं सुप्रयत्नतः॥४०।। टीका-तदनन्तर पादको प्रसारके अर्थात् फैलाके दक्षिणचरणको वाम ऊरूपर स्थित करके और गुदा और योनिको आकुश्चन करके अपानको ऊर्ध्व करके समानवायुके साथ सम्न्ध करके और प्राणवायुको अधोमुख करे यह बन्ध प्राण अपानके उर्द्धगतिके हेतु बुद्धिमान् साधकके प्रति कहाहै और यह महाबन्ध सिद्धिमार्गका दाता है और योगीलोगोंके नाडियोंका रससमूह इस बन्धसे ऊपरको गमन करताहै यह दोनों मुद्रा और बन्ध एक एकको दोनों अगसे यत्न करके करना उचितहै॥ ३७॥। ३८॥ ३९॥४ ॥ मूलम्-भवेदभ्यासतो वायुः सुपुस्नामध्य Y
सङ्गतः।।अनेन वपुप: पुष्टिर्ेढबन्धोडस्थि S N
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(१०२) शिवसंहिता भाषाटी कासमेता। पख्जरे॥। ४१॥। संपूर्णहृदयो योगी भव- न्त्येतानि योगिनः॥ बन्धेनानेन योगी- न्द्रः साधयेत्सर्वमीप्सितम्॥४२.॥ टीका-अभ्याससे प्राणवायु सुपुम्णाके मध्यमें स्थित होगा और इस महावंधके प्रभावसे शरीर पुष्ट रहैगा और अस्थिपंजर और शरीरका सब बन्ध दढ अर्थात बलिष्ठ होजायगा और योगीका हृदय सन्तोपसे पूर्ण और आनन्दित रहेगा. यह सब योगीको इस महा- बन्धके प्रभावसे स्वयं लाभ होजायगा और इसा बन्धके साधनसे योगी अपनी इच्छाके अनुसार सब सिद्ध करलेगा ॥४१ ॥ ४२ ॥ अथ महावेधकथनम्। मूलम्-अपान प्राणयोरैक्यं कृत्वा त्रिभुवने- श्वरि॥महावेधस्थितो योगी कुक्षिमापूर्य वायुना॥ स्फिचौ संताडयेदीमान्वेधो- ऽ्यं कीर्तितो भया॥४३॥ टीका-हे त्रिभुवनेश्वरी। अपान और प्राणको एक करके महावेधस्थित योगी उदरको वायुसे पूर्ण करके बुद्धिमान् दोनों स्फिच अर्थात् पार्श्वको ताडन करे इसको हमने वेध कहा है।। ४३ ।।
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चतुर्थपटलः। ('१०३) मूलम्-वेधेनानेन संविध्य वायुनायोगिपुंग- वः ॥ ग्रंथि सुपुम्णामार्गेण ब्रह्मग्रंथि भि- नत्त्यसौ ॥४8॥ टीका-वुद्धिमान् योगी इस वेधद्वारा वायुसे सर्वे ग्रन्थीको वेधन करके सुषुम्णारन्ध्रद्वारा ब्रह्मगरंथीको भेदन करताहै।। ४४॥ मूलम्-यःकरोति सदाभ्यासं महावेधं सुगो- पितम्॥ वायुसिद्धिर्भवेत्तस्य जरामरण नाशिनी॥ ४५॥ टीका-जो मनुष्य इस उत्तम महावेधको गोपित करके सर्वेदा अभ्यास करेगा उसकी जरामरण नाशि- नी वायुसिद्धि होजायगी ॥ ४५ ॥ मूलम्-चक्रमध्ये स्थिता देवा: कम्पन्ति वायुताडनात् ॥। कुण्डल्यपि महामाया कैलासे सा विलीयते ॥४६ ॥ टीका-शरीरस्थ चक्रमें जो देवता हैं वह वायुके ताडनसे कम्पायमान होते हैं और महामाया कुण्डलि- नी देवी कैलास अर्थात ब्रह्मस्थानमें लय होती है तात्प- र्य यह है कि, चक्रस्थित देवता अर्थात् गणेशजी, त्रह्मा, विष्णु, महादेवजी, मायाधीश ज्योतिस्वरूप ईश्वर क्रमसे
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(१०४) शिवसंहिता भाषाटी कासमेता। आधार, स्वािष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञाच- कमें जो स्थित हैं वायुके वेगसे चक्ररन्धको छोडदेते हैं तब वायुका प्रवेश होताहै इसहेतुसे यह महावेध अवश्य करना उचित है॥ ४६ ॥ मूलम्-महामुद्रामहावन्धौ निप्फलौ वेधव- जिंतौ। तस्माद्योगी प्रयत्नेन करोति त्रितयं क्रमात् ।४७॥ टीका-महामुद्रा और महावन्ध विना वेधके निष्फ- ल हैं अर्थात् वेध न करनेसे मुद्रा और बन्धका कुछ फल नहोगा इसहेतुसे योगीको उचित है कि, यत्नपूर्वक क्रम- से मुद्रा, बन्ध, वेध तीनोंका अभ्यास करे॥ ४७ ॥ मूलम्-एतत्त्रयं प्रयतनेन चतुर्वारं करोति यः ॥ पण्मासाभ्यन्तरं मृत्युं जयत्येव न संशयः ॥४८।। टीका-जो यह मुद्रा वन्ध वेध तीनोंका अभ्यास यत्न करके रत्रि दिवसमें चारवार करेगा सो छःमास- में निश्चय मृत्युको जीतलेगा इसमें संशय नहीं है॥।४८।। मूलम्-एतच्रयस्य माहात्म्यं सिद्धो जाना- तिनेतरः ॥ यज्ज्ञात्वा साधका: सर्वे सिद्धिं सम्यग्लभन्ति वै ॥४९॥
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चतुर्थपटलः । (१०५)
टीका-यह तीनोंके माहात्म्यको सिद्धलोक जानते हैं इतरलोग अर्थात् सांसारिक मनुष्य नहीं जानते इसके जानलेनेसे साधकलोगोंको सर्वासिद्विलाभ होती है॥४९॥ मूलम्-गोपनीया प्रयत्नेन साधकैः सिद्धि- मीप्सुभिः ॥ अन्यथा च न सिद्धि: स्यान्मुद्राणामेष निश्चयः॥५०॥ टीका-सिद्धिकांक्षी साधकको उचित है कि, यह सब मुद्राको यत्नपूर्वक गोष्य रक्खे इनको प्रकाश करनेसे कदापि सिद्धि नहोगी यह निश्चय है॥ ५० ॥ अथ खेचरीमद्राकथनम्। मूलम्-भ्रवोरन्तर्गतां दृष्टि विधाय सुदृढां सुधीः॥५१॥ उपविश्यासने वज्े नानो- पद्रववर्जितः ॥ लम्विकोर्ध्व स्थिते गर्ते रसनां विपरीतगाम् ॥५२ ॥ संयोजये- त्प्रयत्नेन सुधाकूपे विचक्षणः ॥ मुद्रैपा खेचरी प्रोक्ता भक्तानामनुरोधतः।।५३।। टीका-चुद्धिमान् साधक दोनों भ्ू अर्थात् झ्ुकुटी- के मध्यमें हढ करके दृष्टिको स्थिर करके और नाना उपद्रवरहित होके वज्रासन अर्थात सिद्धासनसे स्थित होयके जिह्वाको विपरीत अर्थात् ऊपर सुधाकूप स्वरूप
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(१०६) शिवसंहिता न्ापाटीकासमेता । तालूविवरमें यत्नसे बुद्धिमान् साधक संयोजित करे अर्थात् संबन्धकरे हेपार्वती! भक्तोंके प्रति हमने प्रकाश करके यह खेचरीमुद्रा कही है।। ५१।।५२।।५३। मूलम्-सिद्धीनां जननी ह्येपा मम प्राणा- धिकप्रिया ॥। निरन्तरकृताभ्यासात्पी- यूपं प्रत्यहं-पिवेत् ॥। तेन विग्रहसिद्धिः स्यान्मृत्युमातङ्गकेसरी॥५४॥ टोका-यह खेचरीमुद्रा स्विद्धिकी माता है और - हेदेवी! हमको प्राणसेभी अधिक प्रिय है जो निरंतर इ- सके अम्याससे नित्य अमृतपान करताहै उस कारणसे शरीर सिद्ध होजाताहै अर्थात नाश नहीं होता और मृत्युरूप हस्तीको यह खेचरीरूपी सिंह हन्ताहै॥ ५४॥ मूलम्-अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ॥ खेचरी यस्य शुद्धातु स शुद्धो नात्र संशयः॥ ५५॥। टीका-अपवित्र होय वा पवित्र होय अथवा किसी अवस्थामें होय जिसको यह खेचरीमुद्रा सिद्ध है वह सर्वदा शुद्ध है इसमें संशय नहीं है॥५५॥ मूलमू-क्षणार्ध कुरुते यस्तु तीर्त्वा पापम- हणवम ॥1. दिगेणातगरमुखा। सत्कुले स प्रजायते ॥५६॥
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चतुर्थपटलः। (१०७) टीका-जो इस खेचरीमुद्राको क्षणार्धभी करेगा वह महापापसागरके पार होके सुखपूर्वक स्वर्गका भोग भोगेगा पश्चात् उत्तमकुलमें उसका जन्म होगा ॥५६॥ मूलम्-सुद्रैषा खेचरी यस्तु स्वस्थचित्तो ह्यतन्द्रितः ॥ शतब्रह्मगतेनापि क्षणार्ध मन्यते हि सः॥५७ ॥ * टीका-जो मनुष्य इस खेचरीमुद्राको स्वस्थचित्त ब्रह्मपरायणहोके करेगा उसको यदि शतव्रह्माभी गत भावको प्राप्तहों क्षणार्ध प्रतीत होगा ॥५७॥ मूलम्-गुरूपदेशतो मुद्रां यो वेत्ति खेचरी- मिमाम् । नानापापरतो धीमान्स याति परमां गतिम् ॥५८ ॥ टीका-गुरूपदेशसे जिसको यह खेचरीमुद्रा लाभ होगी वह यदि नानापापरत होगा तो भी बुद्धिमान् साधक परमगतिको प्राप्तहोगा अर्थात् मोक्ष होजा- यगा॥५८ ॥ मूलम्-सा प्राणसदशी मुद्रा यस्मिन्क- स्मिन्न दीयते। प्रच्छाद्यते प्रयत्नेन- मुद्रेयं सुरपूजिते ॥ ५९॥ टीका-हे सुरपूजिते पारवती। यह खचरीमुद्रा प्राणके
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(१०८) शिवसंहिता आपाटीकासमेता। वरावर है सामान्य मनुष्यको देना उचित नहीं है इस मुद्राको यत्न करके गोपित रखनेमें कल्याण है ।५९॥ अथ जालन्धरवन्ध। मूलम्-बद्दागलशिराजालं हृदये चिुकं न्यसेत्।। वन्धो जालन्धर: प्रोक्तो देवाना-
सहस्रक मलच्युतम्॥पिवेत्पीयूप विस्तारं तदर्थ वन्धयेदिमम् ॥६१॥ टीका-गुरूपदेशद्वारा गलशिराजालको बांधके चिवुक अर्थात् ठोडीको हृदयमें स्थित करे इसको जा- लन्घरवन्ध कहते हैं यह देवतोंकोभी दुर्लभ है नाभी- स्थित जीव जठरानल सहस्रदल कमलसे जो अमृत स्नवताहै उसको पान करजाताहै इस हेतुसे यह जाल- न्घरबन्ध करना उचित है तात्पर्य यह है कि, नाभिस्थित सूर्य अमृतको पान करजाते हैं इसीकारणसे मृत्यु हो- तीहै इस जालन्धरबन्धके करनेसे चंद्रमण्डलच्युत अमृत सुर्यमण्डलमें नहीं जाता योगी आपही पान करके चिर- जीव रहताहै ॥६० ॥ ६१ ॥ मूलम्-बन्धेनानेन पीयूपं स्वयं पिवति बु- द्विमान् ॥ अमरत्वश्च सम्प्राप्य मोदते भुवनत्रये ॥६२ ॥
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चतुर्थपटलः। (90९)
टीका-इस जालन्धरवन्धके प्रभावसे बुद्धिमान् योगी स्वयं अमृत पान करताहै और अमर्त्वको पाय- के तीनोंलोकमें आनन्दपूर्वक विचरता है॥ ६२ ॥ मूलम्-जालन्धरो बन्ध एप सिद्धानां सि- द्िदायकः। अभ्यासः क्रियते नित्यं यो- गिना सिद्धिमिच्छता ॥६३ ॥ टीका-यह जालन्धरबन्ध सिद्धोंको सिद्धिदेनेवाला है इस कारणसे सिद्धिकांक्षी योगीको इसका नित्य अ्र- भ्यास करना उचित है।। ॥ ६३ ॥ अथ मूलबन्धः। मूलम्-पादमूलेन संपीडय गदमार्गेषु य- न्त्रितम् ॥६४॥ वलादपानमाकृष्य कमा- दूर्ध्व सुचारयेत्॥ कल्पितोऽयं मूलबन्धो जरामरणनाशनः ॥ ६५॥ टीका-पादमुल अर्थात् एडीसे गुदामार्गको भाकु धवन करके पीडितकरे और बलसे अपानवायुको आक- र्ण करके ऊर्ध्वको लेजाय अर्थात प्राणके साथ सम्बन्धकरे इसको मूलबन्ध कहतेहैं यहबन्ध जरा मरणका नाश करनेवालाह॥ ६४ ॥ ६द ॥ मूलम्-अपानप्राणयोरैक्यं प्रकरोत्यधि-
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(११०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। कल्पितम्॥ बन्धेनानेन सुतरां योनिमृद्रा प्रसिद्धयति ॥६६ ॥ टीका-इस कल्पितबन्धसे अपान और प्राणको एक करे और इसी मूलबन्धके प्रभावसे योनिमुद्धा आपही सिद्ध होजायगी ॥ ६६॥ मूलम-सिद्धार्यां योनिमुद्रायां किं न सिध्य- ति भृतले ॥। बन्धस्यास्य प्रसादेन गगने विजितानिलः ॥ पद्मासने स्थितो योगी भुवमुत्सृज्य वर्तते ॥६७॥ टीका-योनिमुद्राके सिद्ध होनेसे सिद्ध लोगोंको इस संसारमें सब सिद्ध होसकाहै इस मूलबन्धके प्रसा- दसे वायुको योगी जीतके पद्मासनस्थित होके भूमिके त्याग देगा और आकाशमें गमन करेगा ॥ ६७ ॥ मूलम्-सुगप्ते निर्जने देशे बन्धमेनं सम- भ्यसेत्।। संसारसागरं तर्तु यदीच्छेद्यो- गिपुंगवः ॥६८ ।। टीका-पवित्र योगी यदि संसारसागरसे पार होने- की इच्छा करे तो निर्जनदेश और गुप्तस्थानमें इस मूलबन्धका अभ्यास करना उचित है॥। ६८ ॥। अथ विपरीतकरणी मुद्रा। मूलम्-भूतले स्वशिरोदत्त्वा खे नयेच्चरणद्व
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चतुर्थपटलः । (११.१ ) यम्॥ विपरीतकृतिश्चैपा सर्वतन्त्रेषु गो- पिता ॥ ६९। 4 टोका-साधक अपने शिरको भूमिपर धरे और दोनों चरणोंको ऊपर आकाशमें निरालम्ब स्थिर करे यह विपरीतकरणी मुद्रा सर्वतन्त्रोंकरके गोपित है अर्धात् प्रकाश करने योग्य नहीं है ॥ ६९ ।। मूलम्-एतद्य: कुरुते नित्यमभ्यासं याम- मात्रतः ॥ मृत्युं जयति योगीशः प्रलये नापि सीदति॥७० ॥ टीका-इसप्रकारसे इस मुद्राका अभ्यास नित्य एक प्रहर करे तो योगी निश्चय मृत्युको जीतलेगा और पलयमेंभी उसको कुछ कष्ट न होगा।७० ॥ मूलम्-कुरुतेऽमृतपानं यः सिद्धानां सम- तामियात्॥ स सेव्य: सर्वलोकानां बन्ध- मेनं करोति य: ॥ ७१ ॥ टीका-जो पुरुष शरीरस्थअमृतपान करता है उस- को सिद्धोंकी समता प्राप्त होती है और इस मुद्राबन्ध- को जो करताहै वह सर्वलोकमें पूजनीय है।। ७१ ॥ सूलम्-नाभेरुर्ध्वमधश्चापि तानं पश्चिम- माचरेत्॥ उड्डयानबंध एष स्यात्सर्वदु :-
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(११:) शिवसंहिन। जानाटी कासमेना। चैनाक:। ७२॥ उदरे,पश्चिमं तानं नामेरर्ध्व तु कारयेत्॥ उड्डयानाख्यो- Sत्र बन्धोयं मृत्युमातङ्गकेसरी॥ ७३ ॥ टीका-नाभिसे ऊपर और नीचे को आकुञ्चन करे इसको उड्डयानबन्ध कहते हैं यह दुःखके समूहको नाशकरनेवाला है उदरको पीछे आकर्पण करे और नामिस ऊपर भागमें आकुश्चन करे यह उड्डचानबन्ध है और मृत्युरूपी मातङ्गका नाशकरनेवाला यह वंध- रूपी सिंह है॥ ७२ ॥७३॥ मूलम्-नित्यं यः कुरुते योगी चतुर्वारं दिने दिने। तस्य नाभेस्तु शद्धि:स्याद्येन सिद्धो भवेन्मरुत्॥ ७४ ॥ टीका-जो योगीं नित्य इस बंधको चारवार अ- भ्यास करेगा उसका नाभिचक शुद्ध होके वायु सिद्ध होजायगा ॥ ७४॥ मूलम्-पण्मासमभ्यसन्योगी मृत्युं जयति निश्चितम्॥ तस्योदराग्निर्ज्वलति रसवृ- द्विः प्रजायते ॥ ७ ॥ टीका-योगी यदि छः मास इस वंधका अभ्यास करे तो निश्चय मृत्युको जीतलेगा और उसका जठरा-
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4 तुचर्थपटलः । (११३) नल विशेष प्रज्वलित होगा और रसकी वृद्धि उत्पन्न होगी॥७६ ॥ मूलम्-अनेन सुतरां सिद्धिर्विग्रहस्य प्रजा- यते॥ रोगाणां संक्षयश्चापि योगिनो भव- तिधुवम्॥ ७६॥ टीका-इस उड्डयानबंधके प्रभावसे योगीका शगीर आपही सिद्ध हो जायगा अर्थात् अमर होजायण और सर्व रोगोंका निश्चय क्षय होजायगा॥ ७६॥ मूलम्-गरोर्लब्ध्वा प्रयत्नेन साधयेत्तुविच- क्षणः॥ निर्जने सुस्थिते देशे वन्धं परम- दुर्लभम्॥७७॥ टीका-गुरुसे यत्नपूर्वक इस परमदुर्लभ बन्धको लाभ करके बुद्धिमान् साधक एकांतस्थानमें सवस्थ- चित्त होके साधन करे॥७७॥ अथ बजोलीमुद्रा। मूलम-वज्रोलीं कथयिष्यामि संसारध्वा- न्तनाशिनीम् ।I स्वभक्तेभ्यः समासेन ग्ह्याह्ुह्यतमामपि॥ ७८॥ टीका-हे देवी। संसारतमनाशिनी परमगोपनीय वञ्चोली मुद्रा भक्तलोगोंके प्रति हम कहते हैं।। ७८ ।।
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(११६) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । मूलम्-बिन्दुर्विधुमयो ज्ञेयो रजः सूर्यमय- स्तथा॥ उभयोर्मेलनं कार्य स्वशरीरे प्र- वेशयेत॥ ८६ ।। टीका-विन्दुरूपी चन्द्र और रजरूपी सूर्य यह जानकर दोनोंका सम्बन्ध करके अपने इरीरमें प्रवेश करना उचित है।। ८६ ॥ मूलम्-अहं विन्दू रजः शक्तिरुभयोर्मेलनं यदा। योगिनां साधनावस्था भवेदिव्यं वपुस्तदा॥। ८७।। टीका-यदि शिवरूपी बिन्दु और रजरूपी शाकि यह दोनोंका सम्बन्ध होगा तब योगीका साधनसे दिव्य शरीर अथीत् देवतोंके समान शरीर होगा तात्पर्य यह है कि शिवशक्ति अर्थात् माया ईश्वरके सम्बन्ध वा मायाको ईश्वरमें लय करनेसे जिसको अध्यारोप अप- वाद कहते हैं योगी मोक्ष होता है अभिप्राय यह है कि, रजविन्दुका सम्बन्ध जिस साधकको सिद्ध होजाताहै वह मुक्त है।। ८७।। मूलम्-मरणं विन्दुपातेन जीवनं विन्दुधा- रणे॥ तस्मादतिप्रयत्नेन कुरुते विन्दुधा- रणम् ॥ ८८ ॥
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चतुर्थपटलः। (१९७) टीका-बिन्दुपात होनेसे मृत्यु होती है और बिन्दु- के धारणसे प्रापी जीवताहै इस कारणसे यत्नसे बिन्दु- को धारण रखना उचित है।।८८।। मूलम्-जायते म्रियते लोके बिन्दुना नात्र संशयः॥ एतज्ज्ञात्वा सदा योगी बिन्दु- धारणमाचरेत्॥८९॥ टीका-प्राणीका जन्म मरण बिन्दुसे होताहै इसमें संशय नहीं है. इस हेतुसे इसको विचारके योगीको उ- चित है कि, बिन्दुको सर्वेदा धारण रखे ।।८९ ।। मूलम्-सिद्धे विन्दौ महायत्ने कि न सिध्य- ति भूतले ।। यस्य प्रसादान्महिमा ममा- प्येतादशो भवेत् ॥ ९० ॥ टीका-हे पार्वती ! यत्नपूर्वक बिन्दुके सिद्ध होनेसे संसारमें क्या नहीं सिद्ध होसकता अर्थात् सब सिद्ध हो सक्ताहै इसीके प्रसादसे हमारी ऐसी महिमा है॥ ९० ॥ मूलम्-विन्दुः करोति सर्वेपां सुखं दुःखश्च संस्थित:॥ संसारिणां विमूढानां जरामर- णशालिनाम् ॥ ९१ ॥ अयंच शांकरो योगो योगिनामुत्तमोत्तम: ।।९२॥। टीका-बिन्दु संसारी मनुष्योंके सुख और दुःखका
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(११८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । कारण है और मूढलोगोंके मूढताका और जरामरण शील लोगोंका अर्थात सबका यही बिन्दु हेतु है योगी लोगोंके प्रति यह हमारा उत्तम योग है॥९१॥ ९२।। मूलम्-अभ्यासात्सिद्धिमाप्ोति भोगयु- क्तोऽपि मानवः ॥ सकलः साधितार्थोपि सिद्धो भवति भूतले ॥ ९३ ॥ टीका-भोगयुक्त मनुष्योंकोभी अभ्याससे सिद्धि प्राप्त होतीहै और सकल वाच्छितफल संसारमें सिद्ध होजाते हैं ॥९३॥ मूलम्-भुक्ता भोगानशेपान् वै योगेनानेन निश्चितम्।। अनेन सकला सिद्धिर्योगिनां भवति ध्ुवम्॥ सुखभोगेन महता तस्मा- देनं समभ्यसेत्। ९४ ॥
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चतुर्थपदलः। - (११९) टीका-वज्रोलीके भेदसे सहजोली और अमरोली मुद्राकी संज्ञा है योगीको उचित है कि सचप्रकारसे बिन्दुको धारण करे ॥ ९५ ॥ मूलम्-दैवाच्चलति चेद्रेगे मेलनं चन्द्रसूर्य- योः॥ अमरोलिरियं प्रोक्ता लिंगनालेन शोपरयेत् ॥ ९६ । टीका-यदि हठात् वेगवश बिन्दु चले और रजविन्टु- का सम्बन्ध होजाय तो इसको अमरोली कहते हैं परंतु लिङ्गनालद्वारा रजविन्दु दोनोंको शोपण करे॥ ९६॥ मूलम्-गत बिन्दुं स्वकं योगी बन्धयेद्योनिम- द्रया॥ सहजोलिरियं प्रोक्ता सर्वतन्त्रेषु गोपिता॥ ९७॥ टीका-निजबिन्दु चलायमान होय तो योगी योनि- सुद्राके बन्धसे अवरोध करे इसको सहजोली कहते हैं यह सर्वतन्त्रों करके गोपनीय है॥ ९७॥ मूलम-संज्ञाभेदाद्वेद्वेद: कार्य तुल्यग तिर्यदि॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन साध्यते योगिभि: सदा ॥ ९८ ॥ टीका-यदि कार्य एक समान है परन्तु संज्ञासे अपरोली और सहजोली दो भेद भया है इस हेतुसे
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(१२०) शिवसंहिता नापाटीकासमेता । योगीको उचित है कि, यह दोनों अमरोली और सहजो लीका यत्रपूर्वक सर्वदा साधन करे ॥ ९८ ॥ मूलम्-अयं योगो मया प्रोक्तो भक्ताना स्नेहतः प्रिये॥ गोपनीयः प्रयत्नेन न देयो यस्य कस्यचित्।। ९९।। टीका-हेपरिये पार्वती! हम भक्तोंपर प्रेम करके यह योग जो कहा है यत्नपूर्वक गोपनीय है सामान्य मनुष्य- को कदापि देना उचित नहीं है॥। ९९॥ मूलम्ं- एतद्वह्यतमं ग्रह्यं न भृतं न भविष्य ति।। तस्मादेतत्प्रयत्नेन गोपनीयं सदा वुधैः॥१०0॥ टीका-इस वञ्ोलीमुद्रासे अधिक गोपनीय न कुछ भया है न होगा. इसकारणसे बुद्धिमान साधकको यत्नपूर्वक इसको गो्य रखना उचित है॥ १०० ॥ मूलम-स्वमूत्रोत्सर्गकाले यो वलांदाकृ- ष्य वासना॥ स्तोकं स्तोकं त्यजेन्मूत्रमू- र्द्धमाकृष्य तत्पुनः॥।१०१॥गुरूपदिष्टमा- गेण प्रत्यहं य: समाचरेत्॥ बिन्दुसिद्धि- र्भवेत्तस्य महासिद्धिप्रदायिका॥ १०२॥
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चतुर्थपटलः। (१२१) टीका-गुरूके उपदेशपूर्वक सर्वदा मूत्रत्यागनेके समय वलकरके वायुसे आकर्पणपूर्वक थोडा थोडा मूत्र त्यागकरे फिर ऊपरको आकर्षण करे तो उसका बिन्दु सिद्ध होजायगा यह बिन्दुकी सिद्धी महासिद्धीकी दाता है अर्थात् परमपदको प्राप्त करती है॥ १०१॥१०२॥। मूलम्-पण्मासमभ्यसेद्यो वै प्रत्यहं गुरु- शिक्षया॥ शतांगनेपि भोगेपि तस्य बि- न्दुर्न नश्यति॥१०३॥ टीका-गुरुके शिक्षापूर्वक योगी यदि छःमास नि- त्य इसका अभ्यासकरे तो इत स्त्रीसे भोगकरेगा तो भी उसका विन्दुपात नहोगा ॥ १०३॥ मूलम्-सिद्धे विन्दौ महायत्ने किं न सिद्धच- ति पार्वति॥ ईशत्वं यत्प्रसादेन ममापि दुर्लभं भवेत् ॥ १०४॥ टीका-हेपार्वती! जब महायत्नसे बिन्दु सिद्ध होजा- यगा तब क्या नहीं सिद्धहोगा अर्थात् सब सिद्ध हो- जायगा इसके प्रसादसे यह दुर्लभ ईशत्व इमको प्राप्त भयाहै॥। १०४॥ अथ शक्तिचालनमुद्रा। मूलम्-आधारकमले सुप्तां चालयेत्कुण्ड-
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(१२२) शिवसंहेता भापाटीकासमेता। लीं दृढ़ाम्। अपानवायुमारुह्य वलादाकृ- ष्य बुद्धिमान ॥१०५॥ शक्तिचालनमु- द्रेयं सर्वशक्तिप्रदायिनी॥१०६॥ टीका-आधारकमलमें घोर निद्वित कुण्डलिनीको बुद्धिमान् अपानवायुपर आरुढहोके आकर्पणपूर्वक हठात चलावे अर्थात् भ्रमावे यह शक्तिचालनमुद्रा सर्वशक्तिकी दाता है ॥०५॥१०६॥ मूलम्-शक्तिचालनमेवं हि प्रत्यहं य: स- माचरेत्॥ आयुर्वृद्धिर्भवेत्तस्य रोगाणां च विनाशनम् ॥१०७॥ टीका-यह शक्तिचालनमुद्रा जो प्रतिदिन करे तो उसके आायुकी वृद्धी होगी और सर्वरोगोंका इस मुद्राके प्रभावसे नाश होजायगा ॥ १०७॥ मूलम्-विह्ाय निद्रां भुजगी स्वयमूध्वें भवेत्खलु॥ तस्मादभ्यासनं कार्य योगि- ना सिद्धिमिच्छता ॥१०८॥ टीका-इस शक्तिचालन के साधनसे कुण्ड लिनी नि- द्राको त्यागके आपही उर्ध्वगामी होजायगी यह नि- श्रय है. इस हेतुसे सिद्धिकी इच्छा करनेवाले योगीको उचित है कि, इसका अभ्यास करे॥ १०८॥
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चतुर्थेपटलः। (१२३) मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं शक्तिचाल- नमुत्तमम् ॥ येन विग्रहसिद्धि: स्यादणि- मादिगुणप्रदा॥ गुरूपदेशविधिना तस्य मृत्युभयं कुतः॥ १०९ ॥ टीका-यदि इस उत्तमशक्तिचालनमुद्राका सदा अभ्यासकरे तो उसका शरीर सिद्ध अर्थात् अमर हो- जायगा और यह मुद्रा अणिमादिक सिद्धिकी दाता है. गुरूके उपदेशपूर्वक विधानसे जो इसका अभ्यास करे तो उसको मृत्युका भय नहीं है॥।१०९॥ मूलम्-मुहूर्तद्रयपर्यन्तं विधिना शक्ति- चालनम्॥११०॥यः करोति प्रयत्नेन त- स्य सिद्धिरदूरतः ॥ युक्तासनेन कर्तव्यं योगिभि: शक्तिचालनम्॥ १११॥ टीका-जो विधानपूर्वक यत्नसे यदि दोमुहूर्तपर्यत शक्तिचालन करे तो उसको सर्वेसिद्धिकी प्राप्ति होगी. योगीको उचित है कि, गुरुके उपदेशानुसार योगासनसे युक्त होके शक्तिचालनका अभ्यास करे॥१9॥ मूलम्-एतत्सुमुद्रादशकं न भूतं न भविष्य- ति। एकैकाभ्यासने सिद्धि: सिद्धो भव- ति नान्यथा।। ११२॥
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(१२४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-हे पार्वती! यह दशमुद्रा जो हमने कहा है इसके समान न कुछ भया है न होगा इसके एक एकके अ- भ्यास सिद्ध होनेसे साधक सिद्ध होजायगा॥ ११२॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे मुद्राकथनं नाम चतुर्थपटल: समापः॥8।। अथ पञ्चम: पटलः । मूलम्-श्रीदेव्युवाच ॥ ब्रृहि मे वाक्यमी शान परमार्थधियं प्रति।। ये विघ्नाःसन्ति लोकानां वद मे प्रिय शङ्कर॥ १ ॥ टीका-श्रीपार्वतीजी कहती है कि, हे ईश्वर। हे प्रिय शङ्कर ! योगाभ्यासी लोगोंके प्रति जो विन्र संसारमें हैं सो भक्तोंपर कृपा करके हमको कहो ॥१ ॥ मूलम्-इंश्वर उवाच।। शणु देवि प्रवक्ष्या मि यथा विघ्ाः स्थिताः सदा ॥ मुक्ति प्र- ति नराणाञ्च भोगः परमवन्धनः ॥२ ॥। टीका-श्रीईश्वर कहते हैं कि, हे देवी। योगसाधनमें जो विघ्न हैं सो हम कहते हैं सुनो मनुष्योके मुक्तिके प्रति भोग परमचन्धन है॥। २ ॥ अथ भोगरूपयोगविभ्नविद्याकथनम्॥ मूलम्-नारी शय्यासनं वस्त्रं धनमस्य विड-
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पंचमपटलः । (१२५) म्बनम्॥ ताम्बूलभक्षयानानि राज्यैश्वर्य विभूतयः ॥३॥हैमं रौप्यं तथा ताम्रं रत्न- श्चागुरुधेनवः।।पाण्डित्यं वेदशास्त्राणि नृ- त्यं गीतं विभूषणम्॥४।। वंशी वीणा मृद- दाश्च गजेंद्रश्चाश्ववाहनम्॥ दारापत्यानि विषया विन्ना एते प्रकीर्तिताः। भोगरूपा इमे विघ्ा धर्मरूपानिमाळ्छणु ॥ ५॥ टीका-नारीसंसर्ग शय्या उत्तमआसन चस्त्र धन यह सब मोक्षके प्रति विडम्बना हैं ताम्बूलसेवन रथ शिविका आदि सवारी राजऐश्वर्य भोग स्वर्ण रजत ताम्र अनेकप्रकारके रत्न गोधन आदिका संग्रह पा- ण्डित्य करना वेदशास्त्रमें तर्क करना नृत्य गीत भूपण वंजञी वीणा मृदङ्गादिक वाद्य वजाना गज अश्व आदि चाहन स्री पुत्र केवल गुरुकी सेवा छोडके हे पार्वती यह जो कहा है सो भोगरूप विन्न है अव धर्मरूप विन्न कहतेहैं श्रवण करो ॥ ३ ॥४॥५॥ अथ धर्मरूपयोगविन्नकथनम्। मूलम्-स्नानं पूजाविधिहोंमं तथा मोक्ष- मयी स्थितिः ॥ त्रतोपवासनियममौ-
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(१२६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । नमिन्द्रियनिग्रहः॥६॥ध्येयो ध्यानं तथा मन्त्रो दानं ख्यातिर्दिशासुच। वापीकूप- तडागादिप्रासादारामकल्पना।।७।। यजञं चान्द्रायणं कृच्छं तीर्थानि विविधानिच।। दृश्यनते च इमे विन्ना धर्मरूपेण सं- स्थिताः॥।८।। टीका-स्नानविधि पूजा होम और सुखपूर्वक स्थिति व्रत उपवास नियम मौन इन्द्रियनिय्रह ध्येय किसीका ध्यान करना मन्त्र जप दान सर्वत्र प्रसिद्धहोना वावडी कूप तालाव मंदिर बगीचाआदिक बनवाना यज्ञ करना पापक्षय के हेतु चांद्रायण कृच्छू त्रत करना तीथों में भ्रमण करना यह सब धर्मरूप चिभ्र हैं ॥६।।७।।८।। अथ ज्ञानरूपविघ्रकथनम्। मूलम्-यत्तु विध्नंभवेज्ज्ञानं कथयामि वरा- नने॥ ९॥ गोमुखं स्व्रासनं कृत्वा धौति- प्रक्षालनं च तत् ।। नाडीसञ्चारविज्ञानं प्रत्याहारनिरोधनम्॥१०॥कुक्षिसंचालनं क्षिप्रं प्रवेश इन्द्रियाध्वना ॥ नाडीकर्मा- णि कल्याणि भोजनंश्रूयतांमम् ॥११॥ टीका-हे देवी। हे वरानने। अवज्ञानरूप विभ् कहतेहैं
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पंचमपटल:। (१२७) सुनो-अन्तःशुद्धिके अर्थ गोमुखके सदश वस्त्र भक्षण करके तब धौति प्रक्षालन करना अर्थात् धौतियोग करना नाडीचालनका ज्ञान वायुका प्रत्याहार निरोध करना कुण्डलिनीके बोधार्थ उदरको भ्रमावना इन्द्रिय- द्वारा शोघ्र प्रवेश नाडीकर्म अर्थात् नाडीशुदद्धिके हेतु आहारीय विचार यह सब ज्ञानरूप विन्न हैं हेदेवी क- ल्याणी । नाडीशुद्धिके अर्थ जो भोजनविधि है सो हम कहतेहैं सुनो॥९॥१॥१9॥ मूलम्-नवधातुरसं छिन्धि शुण्ठिकास्ता- डयेत्पुनः॥ एककालं समाधि: स्यालिं- गभूतमिदं शृण ॥ १२॥ टीका-नवीन रससहित भोजन वस्तु और शुण्ठी- चूर्ण भोजनकरे इससे शीघ्र समाधि होजायगी. हे देवी। अव उसका चिह्न कहतेहैं सुनो ॥। १२॥ मूलम्-सङ्गमं गच्छ साधूनां सङ्गोचं भज दुर्जनात् ।। प्रवेशनिर्गमे वायोर्गरुलक्षं विलोकयेत् ॥१३ ॥ टीका-साधुके सङ्की अभिलापा और दु्जनसे अ- लग रहनेका विचार रखना और वायुके प्रवेश निगममें और वायुके निरोध समय मात्रासे गुरुलघुके विचा- रार्थ संख्या करना ॥ १३॥
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(१२८) शिवसंहिता ापाटीकासमेता।
मूलम्-पिण्डस्थं रूपसंस्थश्च रुपस्थं रूप- वर्जितम्। त्रह्मैतस्मिन्मतावस्था हृदयश्च प्रशाम्यति॥ इत्येते कथता विघ्ना ज्ञान- रूपे व्यवस्थिताः॥१४ ॥ टीका-शरीरस्थरूपका विचार रखना और रूप कु- रूपका निर्णय करना और यह जगत् ब्रह्म है ऐसे वि- चारसे हृदयमें स्थिरता रखना. हेपार्वती ! यह जो कहा है सो सव ज्ञानरूप विभ् हैं।। १४ ।। अथ चतुर्विधयोगकथनम्। मूलम्-मन्त्रयोगोहठ श्चैवलययोगस्तृतीय- कः ॥ चतुर्थो राजयोगः स्यात्स द्विधा भाववर्जिंतः ॥१५॥। टीका-योग चार प्रकारका है-मन्त्रयोग, हठयोग, और तीसरा लययोग और चौथा राजयोग है. यह राज- योग द्वैतभावसे रहित है अर्थात् राजयोग सिद्धहो जानेसे जीव ईश्वरमें लयहोजाता है और कुछ बोध नहीं होता ।। १६॥ भूलम्-चतुर्धा साधको ज्ञेयो मृदुमध्याधि- मात्रका: ॥ अधिमात्रतमः श्रेष्ठो भवा- व्धौ लंघनक्षमः॥१६॥
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पंचमपटलः । (१२९) टीका-यह योगचतुष्टयके साधकभी चार प्रकारके होते हैं अर्थात् मृदु मध्यम अधिमात्र और अिमात्र- तम यह अधिमात्रतम साधक सनमें श्रेष्ठ है एही सा- धक संसाररूपी समुद्रके पार होनेमें समर्थ होताहै।१६॥ अथ मृदुसाधकलक्षणम्। मूलम्-मन्दोत्साही सुसंमूढो व्याधिस्थो गु- रुदूपकः॥ लोभी पापमतिश्चैव वहाशी वनिताश्रयः॥१७॥चपलः कातरो रोगी पराधीनोडतिनिप्ठुरः॥मन्दाचारो मन्द- वीर्यो ज्ञातव्यो मृदुमानवः ॥१८॥ द्वाद- शाब्दे भवेत्सिद्धिरेतस्य यत्नतः परम्। मन्त्रयोगाधिकारी स ज्ञातव्यो गुरुणा ध्रुवम् ॥१९ ॥ टीका-अब मृदुसाधकलक्षण कहते हैं मन्द उत्सा- की मूढचित्त व्याधिग्रसित गुरुनिन्दक लोभी जिसकी सर्वदा पापबुद्धि रहै बहुत भोजन करनेवाला सत्रीके वज्में हो चच्चल हो कातर हो रोगी हो पराधीन हो कठोर बोलनेवाला हो जिसके मन्द कर्महों मंदवीर्यवाला हो ऐसे पुरुपको मृदु मानव कहते हैं यह मन्त्रयोगका अधिकारी है यत्रकरनेसे और गुरुकी कृपासे इसकोभी
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(१३०) शिवसंहिता आपाटीकासमेता । वारह वर्षमें सिद्धि प्राप्त होगी ॥ १७॥॥॥ मूलम्-समवुद्धि: क्षमायुक्त: पुण्यकांक्षी प्रियँव्वदः॥। मध्यस्थः सर्वकार्येपु सामा- न्यः स्यान्न संशयः॥२०॥एतज्ज्ञात्वैव गुरुभिर्दीयते मुक्तितो लयः॥२१॥ टीका-अब मध्यसाघकलक्षण कहतहैं-सामान्य बुद्धि हो क्षमावानहो। पुण्यकर्म करनेमें इच्छा रखताहो प्रिय बोलताहो सर्वकार्यमें मध्यस्थ रहताहो अर्थात म हर्प न विपाद इसको मध्यसाधक कहतेहैं यह निश्च य है गुरु इसको विचारके मुक्तिमार्ग जो लययोग है उसका उपदेश करे॥ २० ॥२१॥ अथ अधिमात्रसाधकलक्षणम्। मूलम्-स्थिरवुद्दिलये युक्त: स्वाधीनो वी र्यवानपि॥ महाशयो दयायुक्त: क्षमावा- न् सत्यवानपि ॥२२।शूरो वयःस्थः श्र- द्वावान् गुरुपादाब्जपूजकः ॥ योगाभ्या- सरतश्चैव ज्ञातव्यश्चाधिमात्रक: ॥२३।। एतस्य सिद्धि: पड्वर्पेमवेदभ्यासयोग- तः ॥ एतस्मै दीयते धीरो हठयोगश्च साङत: ॥ २४॥ टीका-अब अधिमात्र साधक लक्षण कहतेहैं स्थिर
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पंचमपटलः । ( १३१ ) बुद्धि हो लययोगमें समर्थहो स्वतन्त्र हो अर्थात् किसीके आधीन न हो वीर्यवान हो महाशय हो दयावान हो क्षमा- वान हो सत्यवादी हो शूर हो समाधियोगमें श्रद्धा हो गुरुपादपझ्मपूजक हो योगाभ्यासरत हो ऐसे गुणवाले पुरुपको अधिमात्र कहतेहैं योगाभ्याससे ऐसे पुरुष- को छःवर्पमें सिद्धि प्राप्त होगी. गुरुको उचित है कि, ऐसे धीर पुरुपको अङ्गसहित हठयोगका उपदेश करे ॥। २२॥ २३॥२४ ॥ अथ अधिमात्रतमसाधकलक्षणम्। मूलम्-महावीर्यान्वितोत्साही मनोज्ः शौ र्यवानपि। शास्त्रज्ञोऽभ्यासशीलश्च निर्मो- हश्च निराकुलः॥२५॥नवयौवनसम्पन्नो मिताहारी जितेंद्रियः॥ निर्भयश्च शुचि- दक्षो दाता सर्वजनाश्रयः ॥२६॥ अधि- कारी स्थिरो धीमान यथेच्छावस्थितः क्षमी॥ सुशीलो धर्मचारी च गुप्तचेष्टः प्रि- यव्वदः॥२७ ॥ शास्त्रविश्वाससम्पन्नो देवतागुरुपूजकः ॥ जनसंगविरक्तश्च म- हाव्याधिविवर्जितः ॥ २८।। अधिमात्र- तमो ज्ञेयःसर्वयोगस्य साधकः॥ त्रिभि:
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(१३२ ) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। सँव्वत्सरैः सिद्धिरेतस्य नात्र संशयः॥ सर्वयोगाधिकारी स नात्र कार्या विचा- रणा ॥ २९॥ टीका-महावीर्यवान् उत्साहयुक्त स्वरूपवान् शूर- तासम्पन्न शास्रज्ञ अभ्यासशील अर्थात् श्रुतिधर मो- हसे हीन आकुलतारहित अर्थात् सावधान नवीन यावनसम्पन्न अर्थात् तरुण प्रमाणभोजी जितेन्द्रिय निर्भय पवित्रआचार सर्वकर्ममें निपुण दानशील शरणागतपालक स्थिरचित्त बुद्धिमान् सन्तोषयुक्त क्षमावान् शीलवान् धार्मिक कमोंको गोप्य रखनेवाला प्रियसत्यवादी शास्त्रमें विश्वास देवता और गुरुपूजक जनसङ्गाहित महाव्याधिरहित ऐसे गुण जिसमें हो वह अधिमात्रतम है और सर्व योगका साधक है इसको तीनवर्पमें सिद्धि प्राप्त होगी इसमें संशय नहीं है. यह सर्वयोगका अधिकारी है ऐसे पुरुपको गुरु समस्त योगका उपदेश करदें इसमें विचारका कुछ प्रयोजन नहीं है।२९।।२६।। २७।।२८।।२९ ।। अथ प्रतीकोपासनम्। मूलम्-प्रती कोपासना कार्या दष्टादष्टफल- प्रदा॥ पुनाति दशनादत्र नात्र कार्या विचारणा ॥ ३०॥
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पंचमपटलः । ( १२३) टीका-अब प्रतीकउपासना कहतेहैं प्रतीकउपास- नासे दष्टाहष्टफल लाभ होताहै और उसके दर्शनसे मनुष्य पवित्र होताहै इसमें संशय नहीं है॥३०॥ मूलम्-गाढातपे स्वप्रतिविम्बितेश्वरं निरी- क्ष्य विस्फारितलोचनद्यम्॥ यदा नभः पश्यति स्वप्रतीकं नभोङ्गणे तत्क्षणमेव पश्यति ॥ ३१ ॥ टीका-गाढआतपमें अर्थात् गहरेघूपमें स्वईश्वरका प्रतिबिम्ध नेत्रस्थिरकरके देखे जब अपने छायाका प्रतिबिम्ब शून्यमें देखपडे तब ऊपर आकाशमें अपना प्रतिबिम्ब अवश्य देखेगा ॥ ३१ ॥ मूलम्-प्रंत्यहं पश्यते यो वै स्वप्रतीकं नभो- ङणे॥ आयुर्वृद्धिर्भवेत्तस्य न मृत्यु: स्या- त्कदाचन ॥ ३२ ॥। टीका-जो नित्य आकाड़में स्वप्रतीक अर्थात् अपना प्रतिबिम्ब देखेगा उसके आयुकी वृद्धि होगी और उसकी मृत्यु कभी न होगी अर्थात् चिरंजीवी हो जायगा ॥ ३२ ॥ मूलम्-यदापश्यतिसम्पूर्णस्व प्रतीकंनभो-
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(१३२ ) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । सव्वत्सरैः सिद्धिरेतस्य नात्र संशयः॥ सर्वयोगाधिकारी स नात्र कार्या विचा- रणा ॥ २९ ॥ टीका-महावीर्यवान् उत्साहयुक्त स्वरूपवान् शूर- तासम्पन्न शास्त्रज्ञ अभ्यासशील अर्थात् श्रुतिधर मो- इसे हीन आकुलतारहित अर्थात् सावधान नवीन योवनसम्पन्न अर्थात् तरुण प्रमाणभोजी जितेन्द्रिय निर्भय पवित्रआचार सर्वकर्मेमें निपुण दानशील शरणागतपालक स्थिरचित्त वुद्धिमान् सन्तोपयुक्त क्षमावान् शीलवान् धार्मिक कमोंको गोप्य रखनेवाला प्रियसत्यवादी शास्त्रमें विश्वास देवता और गुरुपूजक जनसङ्गरहित महाव्याधिरहित ऐसे गुण जिसमें हो वह अधिमात्रतम है और सर्व योगका साधक है इसको तीनवर्पमें सिद्धि प्राप्त होगी इसमें संशय नहीं है. यह सर्वयोगका अधिकारी है ऐसे पुरुपको गुरु समस्त 'योगका उपदेश करदें इसमें विचारका कुछ प्रयोजन नहीं है॥ २५। २६।। २७।।२८।।२९।। अथ प्रतीकोपासनम्। मूलम्-प्रती कोपासना कार्या दष्टाटष्टफल- प्रदा॥ पुनाति दर्शनादत्र नात्र कार्या विचारणा॥ ३० ॥
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- पंचमपटलः । ( १३३ ) टीका-अब पतीकउपासना कहतेहैं प्रतीकउपास- नासे दश्टाटष्टफल लाभ होताहै और उसके दर्शनसे मनुष्य पवित्र होताहै इसमें संशय नहीं है॥ ३०॥ मूलम्-गाढातपे स्वप्रतिविम्वितेश्वरं निरी- क्ष्य विस्फारितलोचनद्यम्॥ यदा नभः पश्यति स्वप्रतीकं नभोङ्गणे तत्क्षणमेव पश्यति॥३१ ॥ टीका-गाढभातपमें अर्थात् गहरेघूपमें स्वईश्ररका प्रतिबिम्ब नेत्रस्थिरकरके देखे जव अपने छायाका प्रतिबिम्ब शून्यमें देखपडे तब ऊपर आकाशमें अपना पतिबिम्ब अवश्य देखेगा ॥३१॥ मूलम्-प्रंत्यहं पश्यते यो वै स्वप्रतीकं नभो- ङ्णे॥आयुर्वृद्धिर्भवेत्तस्य न मृत्यु: स्या -र त्कदाचन ॥ ३२॥ टीका-जो नित्य आकाशमें स्वप्रतीक अर्थात् अपना प्रतिबिम्ब देखेगा उसके आयुकी वृद्धि होगी और उसकी मृत्यु कभी न होगी अर्थात् चिरंजीवी हो जायगा ॥ ३२ ।। मूलम्-यदापश्यतिसम्पूर्णस्व प्रतीकंनभो-
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(१३४) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । ङणे॥ तदा जयं सभायाश्च युद्धे निर्जित्य सश्चरेत् ॥३३ । टीका-जब सम्पूर्ण अपना प्रतििम्ब आकाशमें देखे तब सभामें उसकी जय होय और युद्धमें शत्रुको जीतलेगा ॥ ३३ ॥ मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं चात्मानं वन्दते परम्॥ पूर्णानन्दैकपुरुपं स्वप्रती- कप्रसादतः॥३४। टीका-जो सर्वदा स्वप्रतीक उपासनाका अभ्यास करे तो उसको आत्माकी प्राप्ति होगी और उसी स्वप्र तीकके प्रसादसे पूर्णानन्द स्वरूप अर्थात् आत्माका दर्शन होगा. तात्पर्य यह है ककि, जब हृदयाकाशमें अपने स्वरूपका अनुभव होगा तव आत्माकी पगम ज्योतिका प्रकाश होगा ॥ ३४ ॥ मूलम्-यात्राकाले विवाहे च शुभे कर्मण सङ्कटे ।। पापक्षये पुण्यवृद्धौ प्रतीकोपा- सनश्चरेत्॥ ३५ ॥ टीका-यात्ाकालमें और विवाहके समयमें और शुभकममें और पापक्षयमें और पुण्यवृद्धिके अर्थ स्वप्र- तीक अर्थात अपने प्रतिबिम्बका दर्शन, करे, तो सर्वदा. कल्याण होगा ॥ ३५ ॥
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1 पंचमपटलः । (१३५) मूलम्-निरन्तर कृताभ्यासादन्तरे पश्यति ध्रुवम्॥ तदा मुक्तिमवापोति योगी नि- यतमानसः॥ ३६ ॥ टीका-सर्वदा प्रतीकोपासनाके अभ्यास करनेसे निश्चय हृदयाकाशमें अपना प्रतिबिंन भान होगा तव निश्चयआात्मा योगीको सुक्ति प्राप्त होगी॥ ३६ ॥ मूलम्-अंगष्ठाभ्यामभे श्रोत्रे तर्जनीभ्यां दविलोचने।। नासारन्धे च मध्याभ्याम- नामाभ्यां मुखं हृढम् ॥ ३७॥ निरुध्य मारुतं योगी यदैव कुरुते भृशम्॥ तदा तत्क्षणमात्मानं ज्योतीरूपं स पश्यति३८ टीका-दोनों अंगुप्ठसे दोनों कर्ण बंद करे और दो- नों तर्जनीसे दोनों नेत्रोंको वंद करे और दोनों मृष्य- मा अंगुलीसे दोनों नासारंत्रको बंद करे और दोनों अनामिका अंगुली और कनिश्ठासे मुखको बंद करे यदि इसप्रकार योगी वायुको निरोध करके इसका चारंवार अभ्यास करे तो आत्मा ज्योतिस्वरूपका हृदयाकाशमें भान होगा ॥ ३७॥ ३८ ॥। मूलम्-तत्तेजो दृश्यते येन क्षणमात्रं निरा- कुलम् ॥ सर्वपापविनिमुक्त: स याति परमां गतिम् ॥३९॥
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(१३६) शिवसंहिता भापाटी का समेता । टीका-आत्माका यह परमतेज जो पुरुष स्थिर- चित्त होके क्षणमात्रभी देखेगा वह सर्वपापसे मुक्त होके परमगतिको प्राप्तहोगा॥३९॥ मूलम् -- निरन्तरकृताभ्यासाद्योगीविगतक- लमपः ॥ सर्वदेहादि विस्मृत्य तदभिन्नः स्वयं गतः॥ ४० ॥ टीका-निरंतर जो योगी शुद्धचित्त होके यह प्र- तीकोपासनाका अभ्यास करेगा वह सर्व देहादिक- मैसे रहित होके आत्मासे अभिन्न होजायगा अर्थात् आत्मास्वरूप होजायगा ॥४० ॥ मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं गुप्ताचारेण मानवः।। स वै ब्रह्म विलीनः स्यात्पापक में- रतो यदि॥४१ ॥ टीका-जो मनुप्य गुप्ताचारसे इसका सर्वदा अभ्या- स करताहे सो यदि पापकर्मरतभी हो तथापि उसका मोक्ष होगा॥४१ ॥ मूलम-गोपनीयः प्रयत्नेन सदः प्रत्यय- कारकः॥ निर्वाणदायको लोके योगोयं मम वल्लभः ॥ नाद: संजायते तस्य क्रमे णाभ्यासतश्च यः ॥।४२॥
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पंचमपटलः । (१३७ )
टीका-जो इसका अभ्यास करेगा उसको कमसे नाद उत्पन्न होगा. हैदेवी! यह प्रतीकोपासना निर्वाण योगका दाता है इसहेतुसे हमको अतिप्रिय है यह शीघ्र फलदाता है इसको यत्नसे गोप्य रखना उचि- त है-।। ४२ ।। मूलम्-मत्तभृङ्गवेणवीणासदृशः प्रथमोध्व- निः॥४३॥ एवमभ्यासतः पश्चात् संसा- रध्वान्तनाशनम्॥ घण्टानादसम: पश्चात् ध्वनिमेंघरवोपमः॥४४॥ धवनौ तस्मि- न्मनो दत्त्वा यदा तिप्ठति निर्भरः॥तदा संजायते तस्य लयस्य मम वल्लभे ॥।४५॥ टीका-योगअभ्यासद्वारा प्रथम मत्त अमरकी नाई शब्द और वेणु और वीणाके समान शब्द उत्पन्न होगा इसी तरह संसारतम नाशक योगअभ्याससे फिर घंटानाद समान शब्द होगा. फिर मेध गर्जनके समान ध्वनि होगी. हे प्रिये पार्वती। उस ध्वनिमें यदि मन निश्चल स्थित हो जाय तब मोक्षका दाता लय उत्पन्न होगा ॥ ४३ ॥ ४8 ॥ ४4 ॥ मूलम्-तत्र नादे यदा चित्तं रमते योगिनो भृशम्॥ विस्मृत्य सकलं वाह्यं नादेन सह शाम्यति ॥४६ ॥
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(१३८) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। टीका-जब योगीका चित्त उस नादमें निरंतर रम- णकरेगा तब सकल विपयसे स्मरणरहित होके चित्त समाधिमें लय होजायगा ॥ ४६ ॥ मूलम्-एतदभ्यासयोगेन जित्वा सम्य-
काशे विलीयते॥ ४७॥ टीका-इसीप्रकार योगअभ्यासद्वारा सर्व गुणोंको जीतके और सब कार्योंके आरंभको त्यागके योगी आनंदपूर्वक चैतन्यस्वरूप हृदयाकाशमें लय होजायगा॥। ४७॥. मूलम्-नासनं सिद्धसदृशं न कुम्भसददशं वलम्॥ न खेचरीसमा भुद्रा न नादसह- शोलयः॥ ४८ ॥ टीका-हेदेषी! सिद्धासनके समान कोई और भास- न नहीं है और न कुम्भकके समान कोई बल है और न खेचरीके समान कोई मुद्रा है और न नादके समान कोई दूसरा लप है ॥। ४८ ॥ अथ मूलाधारपझ्मविवरणम्। मूलम्-इदानीं कथयिष्यामि मुक्तस्यानुभवं
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पंचमपटलः । (१३९ ) प्रिये॥। यज्ज्ञाला लभते मुक्तिं पापयुक्तो- पि साधकः॥ ४९ ॥ .टीका-हेप्रिये पार्वती। अव सुक्तिका अनुभव तुमसे कहत हैं जिसके ज्ञानसे पापयुक्त साधकभी मुक्तिलाभ करंताहै॥ ४९ ॥ मूलम्-समभ्यर्च्येश्ररं सम्यककृत्वा च. योगमुत्तमम्॥ गृहीयात्सुस्थितो भूत्वा गुरुं सन्तोष्य बुद्धिमान् ॥५० ।। टीका-योगाकांक्षी साधक सम्यक्प्रकारसे ईश्वरकी पूजा करके स्वस्थचित्तसे योगासनपर बैठके बुद्धिमान् गुरुको सर्वप्रकारसे प्रसन्न करके यह उत्तम योग अद्द- जकरे।। ५० ।। मूलम्-जीवादि सकलं वस्तु दत्त्वा योग- विदं गुरुम्। सन्तोष्यादिप्रयत्नेन योगोयं गृह्यते वुधैः ॥ ५१ ॥ टीका-चुद्धिमान् साथक जीवादि सकल पदार्थ योगविद गुरुके अर्पण करके उनके प्रसन्नतापूर्क यत्न करके यह योग ग्रहण करते हैं ॥ ५१॥ मूलम्-विप्रान्सन्तोष्य मेधावी नानामं- गलसंयुतः॥ ममालये शुचिर्मृत्वा गृह्नी- याच्छुममात्मनः॥५२॥
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(१४०) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । टीका-योगग्रहणके समय बुद्धिमान् साधक बाह्- णको सन्तोष करके अर्थात् द्रव्यादिक प्रदानपूर्वक प्रसन्न करके अनेक आशीर्वाद श्रवण करके पवित्रता से शिवमंदिरमें बैठके आत्माके अर्थ जो यह शुभयोग है इसको ग्रहणकरे ॥५२॥ मूलम्-संन्यस्यानेन विधिना प्राक्तनं विग्रहादिकम्॥ भूत्वा दिव्यवपुर्योगा गृह्लीयाद्वक्ष्यमाणकम् ॥ ५३॥ टीका-साधक इस विधानसे पूर्व शरीर गुरुकी कृ. पासे त्यागके दिव्य शरीर होके जो आगे कहैं गे वह योग ग्रहण करे. तात्परय यह है कि, योगग्रहणके समपसे साधकका शरीर दिव्य होजांताहे व्याधि और अज्ञान- का शरीर नहीं रहजाता इस हेतुसे योगग्रहणके समय साधक यह चिंतन करे कि, पूर्व शरीरको हमने त्यागके दिव्यशरीर धारण किया ॥५३॥ मूलम्-पझ्मासनस्थितो योगी जनसंगविव-
निरोधयेत्॥५४॥ टीका-योगी संगरहित पद्मासनमें स्थित होके दो- नों विज्ञाननाडी भर्थात् इडा और पिंगलाको दो अंगु- लीसे निरोध करे ॥५४ ॥
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·पंचमपटलः । (१४१) मूलम्-सिद्धेस्तदाविर्भवति सुखरूपी निर- अञनः॥ तस्मिन्परिश्रमः कार्यो येन सि- द्वो भवेत्खलु॥५५ ।। टीका-यह योग सिद्ध होनेसे साधकके हृदयमें सुखरूपी निरंजन परव्रह्म चैतन्यस्वरूपका प्रकाशहोगा इस हेतुसे यह योगमें साधकको परिश्रम कर्तव्य है, इससे निश्चय यह योग सिद्ध होजायगा ॥५५।। मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं तस्य सिद्धि- न दूरतः ॥ वायुसिद्धिर्भवेत्तस्य क्रमादेव न संशयः॥५६॥ टीका-जोमनुष्य इस योगका सर्वदा अभ्यास करे- गा उसको सर्वसिद्धि प्राप्त होगी और निश्चय आपही कमसे वायु सिद्ध होजायगा ॥ ५६॥ मूलम्-सकृद्य: कुरुते योगी पापौघं नाशये- डुवम् । तस्य स्यान्मध्यमे वायो: प्रवेशो नात्र संशयः॥५७।। टीका-जो योगी प्रतिदिन एकवार यह अभ्यास करे तो उसके सर्व पापोंका नाश होजायगा और उसका प्राणवायु निश्चय सुपुम्णामें प्रवेश करेगा ॥ ५७॥ मूलम्-एतदभ्यासशीलो यः स योगी देव-
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(१४२) शिवसंहिता भापाटाकासमता । पूजितः ॥ अणिमादिगणाँलव्ध्वा विचरे- डुंवनत्रये॥ ५८॥ टीका-यह अभ्यासशील योगी देवतोंसे पूजित है और अणिमादिक सिद्धि लाभ करके तीनों लोकमें इच्छापूर्वक चिचरेगा ॥ ५८ ॥ मूलम्-यो यथास्यानिलाभ्यासात्तद्भवेत्त- स्य विग्रहः॥ तिष्ठेदात्मनि मेधावी संयुत: कीडते भृशम् ॥५९॥ टीका-जिस प्रकार वायुका अभ्यास करेगा उसी तरह साधकका शरीर सिद्ध हो जायगा और बुद्धिमान पुरुप आत्मामें स्थितहोके सर्वदा क्रीडा करेगा ॥५९॥ मूलम्-एतद्योगं परं गोप्यं न देयं यस्य कस्यचित्॥ यःप्रमाणैः समायुक्तस्तमेव कथ्यते ध्रुवम् ॥ ६० ॥ टीका-यह योग परमगोपनीयहै अनधिकारीको कदापि देनेके योग्य नहीं है परन्तु प्रमाणयुक्त अर्थात् पूर्वोक्त लक्षणयुक्त साधकको अवइ्य देना उचितहै।।६॥ मूलम्-योगी पझमासने तिष्ठेत्कण्ठकूपे य- दा स्मरनू।जिह्वां कृत्वा तालुमूले क्षुत्पि- पासा निवर्तते॥ ६१ ॥
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पंचमपटलः । ( १४३ ) टीका-पद्मासनस्थित योगी जब कण्ठकूपका स्मरण अरथांत् उस स्थानमें मनको लय करके जिह्वा- को तालुमूलमें स्थित करेगा तब क्षुधा और पिपासा- से रहित हो जायगा ॥ ६१ ॥ मूलम्-कण्ठकूपादधः स्थाने कूर्मनाडच- स्ति शोभना। तस्मिन् योगी मनो दत्त्वा चित्तस्थैर्य लभेदृशम् ॥६२ ॥ टीका-कंठकूपके नीचे कूर्मनाडी शोभित है उस नाडीमें योगी मनको स्थिर करके अत्यंत चित्तकी स्थिरता पावेगा ॥ ६२ ॥ मूलम्-शिरःकपाले रुद्राक्षं विवर चिन्तये- ददा।तदा ज्योतिःप्रकाशः स्याद्विद्यत्पु- असमप्रभः॥६३॥ एतच्चिन्तनमात्रेण पा- पानां संक्षयो भवेत्॥ दुराचारोऽपि पुरुपो लभते परमं पदम् ॥६४ ॥ टीका-शिर कपालमें जो रुद्राक्ष विवर है उसमें यदि चिंतना करे तो विद्युत्पुञ्जके समान आत्मज्यो- तिका प्रकाश होगा और इसके चिन्तनमात्रसे योगीका सर्व पाप नष्ट होजायगा यदि दुरचारमेंभी जो पुरुप आासकत है वहभी परमगतिको प्राप्त होगा ॥६३॥ ६ु४ ॥
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(१४६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-बुद्धिमान् योगी भूमिमें उत्तानशयन करके निरन्तर ध्यान करे तो तत्काल भापही श्रमका नाश होजायगा और शिरके पृष्ठभागका ध्यान करनेसे योगी मृत्युका जीतनेवाला होजायगा और भ्रूके मध्यमें जो दृष्टिमात्रसे फल होताहै सो हेदेवि। हम पहले कह- चुके हैं । ७१ ॥। ७२।। भूलम्-चतुर्विधस्य चान्नस्य रसस्रेधा वि- भज्यते॥तत्र सारतमो लिंगदेहस्य परि- पोपकः ॥ ७३ ॥ सप्तधातुमयं पिण्डमे- ति पुष्णाति मध्यगः ॥ याति विण्मूत्र- रूपेण तृतीयः सप्ततो वहिः॥७४॥ आ- द्यभागद्यं नाड्यः प्रोक्तास्ताः सकला अपि। पोपयन्ति वपुवायुमापादतल- मस्तकम् ॥ ७५॥ टीका-चार विधि अन्नभोजन करनेसे तीनप्रकार- का रस उत्पन्नहोताहै उसमें जो प्रथम सारभूत रस है वह लिङ्गशरीरको पोपण करता है और जो दूसगा रस है वह सप्तधातुमय पिण्डको पोपण करताहै और तीसरा रस समधातुके वाहर मल मूत्ररूप है पददिले जो दोभाग रस कहाईे वही सकल नाडीरूप है और
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पंचमपटलः । (१४७) पादसे लेकर मस्तकपयैत शरीरके वायुका पोपणक- रते हैं॥ ७३ ॥ ७४॥ ७ ॥ मूलम्-नाडीभिराभि: सर्वाभिर्वायुः सश्चर- ते यदा। तदैवान्नरसो देहे साम्येनेह प्रव- तते॥ ७६॥ टीका-जब सब नाडीके साथ वायु चलताहै तब अन्नका गस झरीरमें समभावसे प्रवृत्त होता है।७६।। मूलम्-चतुर्दशानां तत्रेह व्यापारे मुख्य- भागतः ॥ ता अनुग्रत्वहीनाश्च प्राणस- श्चारनाडिकाः।७७॥ टीका-सर्व नाडियोंमें पूर्वोंक्त चौदह नाडी श़रीर- के सुख्य व्यापारको करती हैं यह प्राण सच्चार करने- वाली चौदह नाडीमें परस्पर कोई किसीसे न्यून अधिक नहीं है।।७७॥ मूलम्-गुदाद्यंगुलतश्चोर्ध्व मेद्ैकांगुलत- स्त्वध:॥ एवश्चास्ति समं कन्दं समता चतुरंगलम्॥७८ ॥ टीका-गुदासे दो अङ्डल ऊपर और मेढ्र अर्थात लिङ्गमूलसे एक अंगुल नीचे चार अंगुल विस्तारक- न्दका प्रमाण है।। ७८ ।।
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(१४८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-पश्चिमाभिमुखी योनिर्गुदमेद्रान्त- रालगा॥ तत्र कन्दं समाख्यातं तत्रास्ति कुण्डली सदा॥ ७९॥ संवेष्टय सकला नाडी: सार्द्धत्रिकुटिलाकृतिः॥मुखे निवे- शय सा पुच्छं सुपुम्णाविवरे स्थिता॥।८०॥। टीका-गुदा और मेढ्रके मध्यमें जो योनि है वह पश्चिमाभिमुखी अर्थात् पीछेको मुख है उसी स्थानमें कन्दहै और उसी स्थानमें सर्वदा कुण्डलनीकी स्थिति है यह कुण्डलनी सकल नाडीको घेरके साढे तीन फेरा कुटिल आकृतिसे अपने मुखमें पुच्छको लेके सुपुम्णा विवरमें स्थित है।। ७।।८0 । मूलम्-सुप्ता नागोपमा ह्येपा स्फुरन्ती प्रभया स्वया॥ अहिवत्सन्धिसंस्थाना वाग्देवी वीजसंजिका ॥ ८१ ॥ टीका-यह कुण्डलिनी सर्पके समान निद्धिता प्रभासे प्रकाशमान है और सर्पके सदश संधि- स्थित है और वाग्देवी है अर्थात् कुण्डलिनीहीसे उच्चारण होताहै और वीज संज्ञक है अर्थात् सं- "वीज है।।८१।। मूलम्-जया शक्तिरियं विष्णोर्निर्मला स्वर्ण
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पंचमपटलः । (१8९) भास्वरा।सत्त्वं रजस्तमश्र्रेति गुणत्रयप्र- सुतिका ॥ ८२ ॥ रोका-यह कुण्डलिनी देवी ईश्वरकी शक्तिमें तप्त स्वणके समान निर्मल तेजप्रभा है और सत्व, रन, तम, यह तीनों गुणकी माता है।। ८२ ।। मूलम्-तत्र बन्धूकपुष्पाभं कामबीजं प्रकी- र्तितम्॥ कलहेमसमं योगे प्रयुक्ताक्षररू- पिणम् ॥ ८३ ॥ टीका-जिस स्थानमें कुण्डलिनी है उसी स्थानमें बन्धूकपुष्पके समान रक्तवर्ण कामवीजकी स्थिति कहीगई है वह कामबीज तप्तस्वर्णके समान स्वरूप- योगयुक्तद्वारा चिंतनीय है।। ८३।। मूलम्-सुपुम्णापि च संश्षिष्टा बीजं तत्र वरं स्थितम्॥ शरचंद्रनिभतेजस्स्वयमेतत्स्फु रत्स्थितम्॥८४ ॥ सूर्यकोटिप्रतीकाशं च- न्द्रकोटिसशीतलम्।। एतत्रयं मिलित्वैव देवी त्रिपुरभैरवी॥वीजसंज्ञं परंतेजस्तदे- व परिकीर्तितम॥ ८५॥ टीका-जिस स्थानमें कुण्डलिनी स्थित है सुषुम्णा उसी स्थानमें कामबीजके साथ स्थित है और वह बीज
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(१५०) शिवसंहिता भापाटीकासमेवा । शरचन्द्रके समान प्रकाशमान तेज है और वह आप- ही कोटि सूर्यके समान प्रकाश और कोटिचंद्रके समान शीतल है यह तीनों मिलके अर्थात् कुण्डालिनी सुपुम्णा, वीजकुण्डलिनीका नाम त्रिपुरभैरवी देवी है यह कुण्ड- लिनी परमतेजमानहै और उसकी वीजसंज्ञाहै।।८४।।८५।। मूलम्-क्रियाविज्ञानशक्तिभ्यां युतं यत्प-
सूक्ष्मं शोणशिखायुतम्।।योनिस्थं तत्परं तेज: स्वयंभूलिंगसंज्ञितम्॥।८७॥ टीका-वह वीज क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्तिसे युक्त होके शरीरमें भ्रमण करताहे और कभी ऊर्प्वगामी हो- ताहै और कभी जलमें प्रवेश करताहै और सूक्ष्म प्रज्व- लित अग्निके समान शिखायुत परमतेजवीर्यकी स्थिति योनिस्थानमें है और स्वयम्भू लिङ्ध-संज्ञा है॥।८६।।८७।। मूलम्-आधार पद्ममेतद्वि योनिर्यस्यास्ति कन्दतः ॥ परिस्फुरद्वादिसान्तचतुर्वर्ण चतुर्दलम् ॥ ८८ ॥ टीका-यह जो कहाहै इसको आधारपद्म कहते हैं और इस पझमके मूलमें योनिकी स्थितिहै यह पद्म परम प्रकाशमान-व-से स-तक अर्थात व्श-प-स चारवर्ण और चारदल करके शोभित है।। ८८॥
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पंचमपटलः। (१५१) मूलम्-कुलाभिधं सुवर्णाभं स्वयम्भूलि- ङ्रसंगतम् ॥ द्िरण्डो यत्र सिद्धोस्ति डाकिनी यत्र देवता॥८९।। तत्पन्नमध्य- गा योनिस्तत्र कुण्डलिनी स्थिता ॥ त- स्याऊर्ध्वे स्फुरत्तेज: कामवीजं भ्रमन्मत- म॥९०॥ यः करोति सदा ध्यानं मूला- धारे विचक्षणः ॥ तस्य स्यादार्दुरी सिद्धि- र्भृमित्यागक्रमेणवै॥९१॥
टीका-वह कमल कुलाभिध है सर्थात कुलनाम है और स्वर्णके समान कांतिहै और स्वयंभूलिङ्गसे युक्त है और उस पझ्ममें द्विरण्डनामक सिद्ध और डाकिनी देवता अधिषावी है और गणेश देवता है और उस पझ्मके मध्यमें योनि है उस योनिमें कुण्डलिनीकी स्थि- तिहै और उस कुण्डलिनीके ऊपर दीप्तिमान् तेजस्व- रूप कामचीज भ्रमण करताहै जो बुद्धिमान् पुरुप इस मूलाधार पद्मका सर्वदा ध्यान करते हैं उनको दार्दुरी वृत्ति सिद्ध होती है और कमसे भूमिको त्यागके भा- काशगमन करते हैं॥८९॥९॥९9॥ मूलम्-वपुपः कान्तिरुत्कृष्टा जठराग्रिविव-
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(१५२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । धनम्॥ आरोग्यश्च पटुत्वश्च सर्वज्ञत्वश्च जायते ॥९२ ॥ टीका-यह ध्यान करनेसे शरीरमें उत्तम कांति होती है और जठराग्रि वर्धित होताहै और शरीर आरोग्य रहताहै और पटटता और सर्वज्ञता अर्थात् सर्व वस्तुका ज्ञान उत्पन्न होता है॥। ९२।। मूलम्-भूतं भव्यं भविष्यच्च वेत्ति सर्वै सका- रणम् ॥ अश्षुतान्यपि शास्त्राणि सरहस्यं वदेहुवम् ॥९३॥ टीका-फिर भूत, भविष्य, वर्तमान तीनोंकाल और सर्व वस्तुके कारणका ज्ञान होताहै और जो शास्त्र कभी श्रवण नहीं कियाहे उसको रहस्यसहित व्या- ख्या करनेकी शक्ति निश्चय उत्पन्न होती है। ९३॥ मूलम्-चक्रे सरस्वती देवी सदावृत्यति नि- र्भरम्। मन्त्रसिद्धिर्भवेत्तस्य जपादेव न संशयः ॥९४॥ टीका-योगीके मुखमें सर्वंदा निरंतर सरस्वती दे- वी नृत्य करती है और योगीकी जपमात्रसे मन्त्रादिकी सिद्धि होती है इसमें संशय नहीं है।। ९४ । मूलम्-जरामरणद्ःखौघान्नाशयति गरोर्व-
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पंचमपटलः । (१५३) चः।इदं ध्यानं सदा कार्य पवनाभ्यासि- ना परम॥ ध्यानमात्रेण योगीन्द्रो सु- च्यते सर्वकिल्विपात् ॥९५॥ टीका-गुरुका वचन जगा मृत्यु आदि जो दुःखका समूह है उसको नाश करदेताहै पवनाभ्यासी साधकको यह परमध्यान सर्वदा करनेके योग्य है ध्यानमात्रसे योगीन्द्र सर्वपापसे मुक्त होजाताहै॥ ९५॥ मूलम्-मूलपझमं यदा ध्यायेद्योगी स्वायं म्भुलिङ्गकम्॥ तदा तत्क्षण मात्रेण पापौ- घं नाशयेखुवम् ॥ ९६ ॥ टीका-योगी जब मूलाधार पद्म स्वयम्भूलिङ्गसंयु- क्तका ध्यानकरे तो उसीक्षण निश्धय पापके. समूहका नाश करदेगा ॥ ९६ ॥ मूलम्-यं यं कामयते चित्ते तं तं फलमवा- पुयात्।। निरन्तरकृताभ्यासात्तं पश्यति विमुक्तिदम ॥९७। वहिरभ्यन्तरे श्रेष्ठं पू- जनीयं प्रयत्नतः । ततः श्रेष्ठतमं ह्यतन्ना- न्यदस्ति मतं मम ॥ ९८॥ टीका-जो साधक मूलाधार पद्मका ध्यान करते हैं वह अपने चित्तमें जोजो वस्तुकी इच्छा करते हैं सो सेो
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(१५४) शिवसंहिता भाषाटीका समेता । सर्वं वस्तु उनको प्राप्त होती हैं और सर्वदा यत्नपूर्वक यह अभ्याप करनेसे बाहर भीतर श्रेष्ठ पूजनीय सुक्ति- दायी परमात्माको देखते हैं हे पार्वति। इससे श्रेष्ठतम दूसरा योग नहीं है यह हमारा मतहे॥ ९७॥ ९८ ॥ मूलम्-आत्मसंस्थं शिवं त्यक्का वहिःस्थं य: समर्चयेत्॥ हस्तस्थं पिण्डमुत्सज्य भ्रमते जीविताशया ॥९९॥ टीका-मनुष्य शरीरस्थ शिवको त्यागके वाहरके देवताको पूजते हैं जैसे हाथके पिंडको त्यागके जीवके रक्षार्थ अन्य पिंडके हेतु लोग भ्रमण करतेहैं ॥ ९९॥ मूलम्-आत्मलिंगार्चनं कुर्यादनालस्यं दि- ने दिने॥ तस्य स्यात्सकलासिद्धिनात्र कार्या विचारणा ॥१००॥ निरन्तरकृता- भ्यासात्पण्मासैः सिद्धिमाप्यात्॥ तस्य वायुप्रवेशोपि सुपुम्णायाम्भवेद्धवम् ॥ ॥ १०१॥ मनोजयश्च लभते वायुविन्दु- विधारणात्। ऐहिकामुष्मिकीसिद्धिर्भ- वेन्नैवात्र संशयः ॥१०२॥ टीका-जो आठस्पको त्यागके शरीरस्थ परमा- त्माका नित्य पूजन करेगा उसको सकलसिद्धि प्राप्त-
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पंचमपटल: । (१५५) होगी इसमें संशय नहीं है यदि इसका अभ्यास निर- न्तर करे तो छामासमें सिद्धि पाप्तहोगी और उसके सुषुम्णानाडीमें निश्चय वायु प्रवेश करेगा और मनको जीतलेगा और वायु बिन्दुका धारण सिद्धहोगा और इसलोक और परलोककी सिद्धि प्राप्त होगी इसमें संशय नहीं है ॥१०0॥ अथ स्वाधिष्ठानचक्रविवरणम्। मूलम्-द्वितीयन्तु सरोजश्च लिंगमूले व्य- वस्थितम। वादिलान्तं च षड़वर्ण परिभा- स्वरपड्दलम्॥ १०३॥ स्वाधिष्ठानाभिधं तत्तु पंकजं शोणरूपकमू। वाणाख्योय- त्रसिद्धोऽस्ति देवी यत्रास्ति राकिणी १०४ टीका-दूसरा पद जो लिङ्गन्मूलमें स्थितहै वह-व से
है और छः दलसे शोभित है.यह रक्तवर्णपझ्मका नाम स्वा- घिष्ठानहै और इस स्थानमें वाणनामक सिद्ध और राकि- णी देवी अधिष्ठावीहै और ब्रह्मा देवता हैं॥१०३॥१०४॥ मूलम्-यो ध्यायति सदा दिव्यं स्वाधिष्ठा नारविन्दकम् ॥ तस्य कामाड़ना: सर्वा -भजन्ते काममोहिताः॥१०५॥
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(१५६) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । टीका-जो पुरुप यह दिव्य स्वाधिष्ठानपझ्मका सवेदा ध्यान करते हैं उनको कामरूपिणी स्त्री कामसे मोहित होके भजतीहैं अर्थात् सेवा करती हैं॥ १०५॥ मूलम्-विविधश्चाशुतं शास्त्रं निःशङ्गोवे व- • देद्ुवम्॥ सर्वरोगविनिर्मुक्तो लोके चरति निर्भयः ॥ १०६॥ टीका-विविधशास्त्र जो कभी श्रवण नहीं किय हो उसकोभी इस पझमके ध्यानके प्रभावसे निःशंक कहेगा और सर्वरोगसे मुक्तहोके आनन्दपूर्वक संसारमें विचरेगा॥ १०६॥ मूलम्-मरणं खाद्यते तेन स केनापि न खा- दयते।। तस्य स्यात्परमा सिद्धिरणिमादि- गुणप्रदा ॥१०७। वायुः सञ्चरते देहे रस- वृद्दिर्भवद्वुवम्॥ आकाशपङ्गजगलत्पीयू- पमपि वर्द्ते ॥ १०८॥ टीका-यह साधक मृत्युको नाश करदेताहै और वह किसीसे नष्ट नहीं होता और उस साधकको गुण देनेवाली अणिमादि सिद्धि प्ाप्त होती हैं और उसके शरीरमें वायु संचार करताहै अर्थात् सुपुम्णामें प्रवेश करताहै और निश्चय रसकी वृद्धि होतीहै और सह-
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- पंचमपंटल: । .(१५७ ) सनदलकमलसे जो अमृत स्त्रवताँहे उसकी वृद्धि होती है ।१०७॥१०८॥ अथ मणिपूर चक्रविवरणम्। मूलम्-तृतीयं पङ्गजं नाभौ मणिपूरकसंज्ञ- कमू॥दशारंडादिफान्तार्ण शोभितं हेमवर्ण कम॥ १०९॥ रुद्राख्यो यत्र सिद्धोऽस्ति सर्वमङ्गलदायकः ॥ तत्रस्था लाकिनी- नास्नी देवी परमधार्मिका॥११०॥ टीका-मणिपूरनामक तीसरा पद्म जो नाभिस्थलमें है वह हेमवर्ण दशदलकरके शोभितहै और-ड-से फ-तक अर्थात् ड-ढ-ण-त-थ-द-ध-न-प-फ-यह दश- वर्णसे युक्त है और उस स्थानमें सर्वमंगलदाता रु- द्रनामक सिद्ध और लाकिनी देवी अधिष्ठात्री और विष्णुदेवता हैं॥१०९॥११०॥ मूलम्-तस्मिन् ध्यानं सदा योगी करोति मणिपूरके॥ तस्य पातालसिद्धि: स्यान्नि- रन्तरसुखावहा॥१११॥ इप्सितश्च भवे- लोके दुःखरोगविनाशनम्॥ कालस्य व- ञ्रनञ्चापि परदेहप्रवेशनम्॥ ११२॥ टीका-जो साधक इस मणिपूर चक्रको सर्वदा ध्या-
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(१५८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। न करतेहैं सो स्वसिद्धिदात्री जो पातालसिद्धि उसको लाभ करते हैं और चनका दुःख रोगविनाश होके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और कालको नि- रादर कर देतेहैं और परदेहमें प्रवेश करनेकी शक्ति उत्पन्न होती है॥ १११॥११२॥ मूलम्-जाम्बूनदादिकरणं सिद्धानां दर्शनं भवेत्। ओपधीदर्शनञ्चापि निधीनांद- शैनं भवेत् ॥ ११३॥ टीका-यह साधकको स्वर्णआदि रचना करने की शक्ति होतीहै और देवतोंका दर्शन और निधि और ओपधीका दर्शन होताहै। ११३॥ मूलम्-हृदयेऽनाहतंनाम चतुर्थ पङ्गजं भ- वेत्॥११४॥कादिठान्तार्णसंस्थानं द्वाद- शारसमन्ितम् ॥ अतिशोणं वायुबीजं प्रसादस्थानमीरितम् ॥११५॥ टीका-हृदयस्थानमें जो अनाहतनामक चतुर्थ पद्म है वह-क-से-ठनतक अर्थात् क-ख-ग-च-डनचछ- ज-झ-न-टन-यह बारह वर्ण और वारहदलसे युक्त है और अति उज्जवल रक्तवर्णसे शोभायमान है और
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पंचमपटलः । (१५९) वह प्रसन्नस्थान वायुका वीज अर्थात प्राणवायुका आधार है।। ११४॥११६॥ मूलम्-पद्मस्थं तत्परं तेजो वाणलिंगं प्रकीर्तितम ॥ यस्य स्मरणमात्रेण हष्टा- दृष्टफलं लभेत् ॥ ११६। टीका-उस हदयकमलमें जो परमतेज है उसीको वाणरिङ्ग कहते हैं जिसके ध्यानमात्रसे साधक इस लोक और परलोकका उत्तमफल आनंदपूर्वक लाभ करते हैं॥ ११६॥ मूलम्-सिद्ध: पिनाकी यत्रास्ते काकिनी यत्र देवता॥ एतास्मिन्सततं ध्यानं ह- त्पाथोजे करोति यः ॥ क्षुभ्यन्ते तस्य कान्ता वै कामार्ता दिव्ययोपितः ॥११७॥ टीका-जिस पद्ममें पिनाकी सिद्ध और काकिनी देवी अधिष्ठाती हैं उस हृदयस्थपद्ममें जो साधक सर्वेदा ध्यान करताहै उसके समीप कामाता सुन्दर स्त्री अप्सरा भादि मोहित होजाती हैं॥ ११७ ॥ मूलम्-ज्ञानश्चाप्रतिमं तस्य त्रिकालवि- पयम्भवेत्॥ दूर श्रुतिर्दूरदष्टिः स्वेच्छया खगरता बजेत्॥१९८॥
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(१६२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । वशो भवेत्॥तदा समस्तं त्रैलोक्यं कम्प- ते नात्र संशयः॥१२५॥ टीका-यह विशुद्धपद्ममें जब योगी मन और ना- णको स्थित करके यदि क्रोध करे तो अवश्य चराचर ञैलोक्य कम्पायमान होजाय इसमें सन्देह नहीं॥१२५॥ मूलम्-इह स्थाने मनो यस्य दैवाद्याति लयं यदा। तदा वाह्यं परित्यज्य स्वा- न्तरे रमते भुवम् ॥१२६ ॥ टीका-यह कमलमें साधकका मन देवात् जव लय होताहै तव सकल बाह्यविपयको त्यागके योगी- का मन और प्राण झरीरके अंतरहीमें निश्चय रमण करताहै॥ १२६ ॥ सूलम्-तस्य न क्षतिमायाति स्वशरीरस्य शक्तितः ॥ संवत्सरसहस्रेऽपि वज्रातिक- ठिनस्य वै ॥ १२७॥ यदा त्यजति त- द्वयानं योगींद्रोऽवनिमण्डले॥ तदा वर्प- सहस्राणि मन्यते, तत्क्षणं कृती॥१२८॥ टीका-उस योगीका शरीर वञ्नसेभी कठोर होजा- ताहे और उसको स्वशरीरकी शक्तिसे कितीप्रकारकी दानि नहीं होतीहै और सहस्रवर्ष समाघिके पीछे जब
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पंचमपटलः । (१६३) उस ध्यानको छोडके योगीकी चित्तवृत्ति संसारमें आ- वेगी तब उस सहस्रवर्षके योगी एकक्षण व्यतीत भया मानेगा ॥ १२७॥ १२८॥ अथ आज्ञाचकविवरणम्। मूलम्-आज्ञा पद्मं भ्रुवोर्मध्ये हक्षोपेतं द्विप- त्रकम्॥शुकाभं तन्महाकाल: सिद्धो दे- व्यत्र हाकिनी ॥ १२९ ॥ टीका-सूके मध्यमें जो आज्ञापद्म है उसमें हं-सें- दो बीज हैं और सुंदर श्वेतवर्ण दो पत्र हैं और उस स्था- नमें महाकाल सिद्ध है और हाकिनीदेवी अधिछ्ठात्री और परमात्मा देवता है॥ १२९॥ मूलम्-शरच्ंद्रनिभं तत्राक्षरबीजं विजृंभितं।। पुमान् परमहंसोडयं यज्ज्ञात्वा नावसी दति॥ १३०॥ तत्र देवः परन्तेजः सर्वत- न्त्रेषु मन्त्रिणः॥ चिन्तयित्वा परां सिद्धिं लभते नात्र संशयः॥ १३१॥ टीका-उस आज्ञापद्मके मध्यमें शरचंद्रके समा- न परमतेज चंद्रबीज अर्थात् ठं बीज विराजमान है इसके ज्ञान होनेसे परमहंस पुरुपको कभी कष्ट नहीं होता यह परमतेजका प्रकाश सर्वतंत्रोंकरके गो-
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(१६४) शिवसंहिता भापादीकासमेता । पित है इसके चिंतनमात्रसे अवश्य परम सिद्धिलाभ होताहे॥ १३० ॥१३१ ॥ मूलम्-तुरीयं त्रितयं लिंग तदाहं मुक्तिदा- यक:॥ ध्यानमात्रेण योगीन्द्रो मत्समो भवति ध्रुवम्॥१३२॥ टीका-हे पार्वती ! उस स्थानमें तुरीया तृतीयलिंग हमों मुक्तिके दाता हैं इसके ध्यानमात्रसे योगीन्द्र निश्चय इमारे तुल्य होजायगा ॥ १३२ ॥ मूलम्-इडा हि पिंगला ख्याता वरणासीति होच्यते।। वाराणसी तयोर्मध्ये विश्वना- थोत्र भापितः ॥। १३३।। टीका-इस शरीरमें जो दो इडा और पिंगला ना- डी हैं उनको वरणा और असी कहते हैं यह वरणा और असीके मध्यमें स्वयं विश्वनाथजी विाजमान हैं. ता- त्पर्य यह है कि, यह इडा और पिंगलाके मध्यमें जो स्थानहै उसीको शिवजीने वाराणसी कहाहै॥ १३३॥ मूलम्-एतत्क्षेत्रस्य माहात्म्यमृपिभिस्त- त्वदर्शिभि: ॥शास्त्रेपु बहुधा प्रोक्तं परं तत्त्वं सुभापितम् ॥१३४ ॥ टीका-यह वाराणसी क्षेत्रके माहात्म्यको तत्त्वद-
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पंचमेपटलः । (१६५ ) र्शी ऋपिलोगोंने अनेक शास्त्रोंमें बहुत प्रकारसे परम- तत्त्व कहाहै ॥ १३४॥ मूलम्-सुपुम्णा मेरुणा याता ब्रह्मरन्ध्रं य- तोऽस्ति वै। ततश्रैपा परावृत्त्य तदाज्ञा- पझदक्षिणे॥ १३५॥ वामनासापुटं या- ति गंगेति परिगीयते ॥१३६॥ टीका-सुपुम्णानाडी मेरुदंडद्वारा जहां ब्रह्मरन्त है उस स्थानमें गई है और इडानाडी मेरुतक जायके लौटीहै और आज्ञाचक्र के दक्षिणभाग होके वामनासापु- * टको गई है इसको गङ्गना कहतेहैं ॥ १३५॥ १२६॥ मूलम्-ब्रह्मरन्ध्रे हि यत्पझ्मं सहस्त्रारं व्यव- स्थितम्।।तत्र कन्देहि या योनिस्तस्यां च- न्द्रो व्यवस्थितः ॥१३७। त्रिकोणाकार- तस्तस्या: सुधा क्षरति सन्ततम्।।इडाया- ममृतं तत्र समं स्रवति चन्द्रमाः।।१३८।। अमृतं वहति द्वारा धारारुपं निरन्तरम्।। वामनासापुटं याति गंगेत्युक्ता हि यो- गिमिः॥१३९॥ टीका-ब्रह्मरन्त्रमें जो सहस्रदल पद्म है उस पझ्मके कन्दमें योनि है उस योनिमें चन्द्रमा विराजमान है
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(१६६) शिवसहिता भाषाटी का समेता । और वही त्रिकोणाकार योनीसे चन्द्रविगलित अमृत सर्वदा स्त्रवता है सो अमृत चंद्रमासे इडानाडीद्वारा समभावसे निरन्तर धारारूप गमन करता है और उस इडानाडीकी गति वामनासापुटमें है उस हेतुसे योगी लोग इस नाडी को गंगा कहतेहैं ॥१३७॥३३८॥ मूलम-आज्ञापङ्कजदक्षांसाद्वामनासा पुटंग- ता। उदग्वहेति तत्रेडा गंगेति समुदा- हता॥ १४० ॥ टीका-वह इडानाडी आज्ञापझके दक्षिणभागसे वामनासापुटको गमन करती है इसीको उदग्वाहिनी गंगा कहते हैं ॥। १४०॥ मूलम्-ततो द्वयोर्हि मध्ये तु वाराणसी वि- चिन्तयेत्॥ तदाकारा पिंगलापि तदाज्ञा- कमलोत्तरे॥। दक्षनासापुटे याति प्रोक्ता- स्माभिरसीति वै ॥ १४१ ॥ टोका-यह इडा और पिङलाके मध्यस्थानको वाराणसी चिन्तनाकरे और इडानाडीके समान पि- डलाभी उस आज्ञाकमलके वामभागसे दक्ष नासा- पुटको गई है इस हेतुसे हैदेवी ! इस पिङ्गलाको इमने असी कहाहै ॥। १४१ ॥
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पंचमपटलः। (१६७ ) मूलम्-मूलाधारे हि यत्पझ्ं चतुष्पत्रं व्यव- स्थितम्॥तत्र कन्देस्ति या योनिस्तस्यां मूर्यो व्यवस्थितः ॥ १४२।। टीका-जो मूलाघारषम चारदलसे युक्तहै उस कमल- के कन्दमें जो योनिहै इस योनिमें सूर्य स्थितहै॥१४२॥
सन्ततम्॥१४३॥।पिंगलायां विपं तत्र सम- क्षरति
पयति तापनः ॥ विपं तत्र वहन्ती या धा- रारूपं निरन्तरम् ॥ दक्षनासापुटे याति कल्पितेयन्तु पूर्ववत् ॥१४४ ॥ टीका-वही सूर्यमण्डलसे निरन्तर विष स्त्रवताहै और पिङ्लाद्वारा गमन करताहै और वह विप सर्वदा धारारूप पिङ्गलानाडीसे प्रवाहित रहताहै और यह पिङ्लानाडी दक्षिणनासापुटमें गई है॥ १४३॥ मूलम्-आज्ञापङ्गजवामास्यादक्षनासापुटं गता ॥ उदग्वहापिंगलापि पुरासीति प्रकीर्तिता ॥ १४५॥ टीका-यह नाडी आज्ञाकमलके वामभागसे दक्षिण नासिकाघुटको गई है इस हेतुसे यह पिड्गलानाडीको असी कहते हैं॥ १४५॥
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(१६८) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। मूलम्-आज्ञा पन्ममिदं प्रोक्तं यत्र देवो महे- श्रवरः॥१४६॥ पीठत्रयं ततश्चोर्ध्व निरु- क्तं योगचिन्तकैः॥ तद्विन्दुनादशत्त्या- ख्यं भालपन्मे व्यवस्थितम्॥१४७॥ टीका-इस स्थानमें महेश्वर देवताहै इसको आज्ञापझ कहते हैं और योगचिन्तक लोग कहते हैं कि, इस पद्मके ऊपर पीठत्रथकी स्थिति है अर्थात् नाद, बिंदु, शक्ति, यह तीनों इस भालपझ्ममें विराज- मान हैं॥। १४६॥ १४७॥ मूलम्-यः करोति सदाध्यानमाज्ञापझ्मस्य गोपितम्। पूर्वजन्मकृतं कर्म विनश्येद- विरोधतः ॥१४८॥॥ टीका-जो पुरुप सर्वदा गोपित करके इस भाज्ञा- * कमलका ध्यान करते हैं उनका पूर्वजन्मकृत कर्मफल सकल निर्विन्न नाश होजाताहै। १४८॥. मूलम्-इह स्थितः सदा योगी ध्यानं कर्या- न्निरन्तरमू॥ तदा करोति प्रतिमां प्रति- जापमनर्थेवत्॥१४९॥ टीका-जब योगी यह ध्यान सर्वदा निरन्तर करे
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पंचमपटलः । . (१६९) तो उसका प्रतिमापूजन करना वा जप करना सर्वथा अनर्थवत् है॥ १४९॥ मूलम्-यक्षराक्षसगन्धर्वा अप्सरोगणकिन्न- राः। सेवन्ते चरणौ तस्य सर्वे तस्य व- शाजुगाः ॥१५०॥ वीका-यक्ष और गक्षस और गन्धर्वे और अप्सरा और किन्नर आदि सब इस ध्यानयुक्त योगीके वशमें होजाते हैं और उसके चरणकी सेवा करते हैं ॥१५·॥ मूलम्-करोति रसनां योगी प्रविष्टां विपरी- तगामू।। लम्बिकोर्ध्वेपु गर्तेषु धृत्वा ध्या- • नं भयापहम् ॥ १५१ ॥ अस्मिन स्था- ने मनो यस्य क्षणार्धे वर्ततेऽचलम्। तस्य सर्वाणि पापानि संक्षयं यान्ति तत्क्ष- णातू ॥१५२।। टीका-जो योगी विपरीतगामी जिह्वाको ऊपर तालुमूलमें प्रवेश करके यह भयनाशक आज्ञाकमल- का ध्यान अर्धक्षणभी मन अचल स्थिरतापूर्वक करते हैं उनका सकल पातक उसीक्षण नाश होजाताहै॥ १५१॥ १५२॥ मूलम्-यानि यानि हि प्रोक्तानि पंचपझ्मे फ- ८
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(१७०) शिवसंहिता नापाटीकासमेता। * लानि वै॥ तानि सर्वाणि सुतरामेतज्ज्ञा- नाद्दवन्ति हि॥ १५३॥ टीका-पंच पद्मका जो जो फल पहिले कहाहे सो सनका समस्त फल आपही इस आज्ञाकमलके ध्यान- सेही प्राप्त होजायगा॥ १५३॥ मूलम्-यः करोति सदाभ्यासमाज्ञापझ्मे वि- चक्षणः॥ वासनाया महावन्धं तिरस्कृ- त्य प्रमोदते ॥ १५४॥ टीका-जो बुद्धिमान् सर्वेदा मन स्थिर करके यह आाज्ञापझ्मका अभ्यास करते हैं वह वासनारूपी मद्दा- बन्धको निरादर करके आनन्द लाभ करते हैं॥१५४॥ मूलम्-प्राण प्रयाणसमये तत्पझ्मं.यः स्मर- न्सुधीः।। त्यजेत्प्राणं सधर्मात्मा परमा- त्मनि लीयते ॥ १५५॥ टीका-नो वुद्धिमान् मृत्युके समय उस आज्ञापद्म- का ध्यान करेगा सो धर्मात्मा प्राणको त्यागके परमा- त्मामें लय होजायगा ॥ १५५॥ मूलम्-तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् जाग्रत यो- ध्यानं कुरुते नरः ॥ पापकर्म विकुर्वाणो नहि मज्जति किल्विषे॥ १५६ ॥
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पंचमपटलः । (१७१) टीका-जो मनुष्य बैठे चलते जाग्रतमें स्वम्रमें सर्वंदा इस कमलका ध्यान करते हैं सो यदि पापकर्म रतभी हों तोभी मोक्षको प्राप्त होते हैं॥ १५६॥। मूलम-राजयोगाधिकारी स्यादेतच्चिन्तन- तो ध्रुषम्॥योगी बन्धाद्विनिर्मुक्त: स्वीयया प्रभया स्वयम्॥१५७॥ द्विदलध्यानमा- हात्म्यं कथितुं नैव शक्यते॥ ब्रह्मादिदे- वताश्रैव किश्चिन्मत्तो विदन्ति ते ॥१५८॥ टीका-जो इस कमलका ध्यान करता है वह निश्चय राजयोगका अधिकारी है योगी स्वयं अपने प्रभासे सकलबन्धसे मुक्त होजाता है है देवि! इस द्विदलपझ्मके माहात्म्यको कोई कहनेमें समर्थ नहीं है व्रह्मा आदि देवता इस पझ्मके माहात्म्यको किश्चित हमारे द्वारा जानते हैं ॥ १५७॥ १५८॥ मूलम्-अत ऊध्वे तालुमूले सहस्रारं सरोरु- हम्। अस्ति यत्र सुपुम्णाया मूलं सविव- रं स्थितम् ॥१५९॥। टीका-इस आज्ञापझके ऊपर तालुमूलमें सहस्र- दल कमल शोभायमान है उसी स्थानमें ब्रह्मरन्त्रके विवरमूलमें सुपुम्णा स्थित है॥ १५९॥
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(१७२) शिवसंहिता भाषाटी कासमेता। मूलम्-तालुमूले सुपुम्णास्य अधोवक्का प्रव- तते॥ मूलाधारेण योन्यस्ताः सर्वनाडयः समाश्रिताः ॥ ता वीजभूतास्तत्त्वस्य त्र- ह्ममार्गप्रदायिकाः ॥ १६०॥ टीका-वह सुपुम्णाका मुख तालुमूल अर्थात् त्र -- ह्ारन्रमें नीचेको वर्तमान है और मूलाधारसे योनि पर्यत जो सकल नाडी हैं वह इस तत्त्वज्ञानवीजस्वरूप ब्रह्ममार्गकी दाता सषुम्णाके अधोवदनके अवलम्बसे स्थित हैं ॥ १६०॥ मूलम्-तालस्थाने च यत्पन्मं सहस्रारं पुरो- दितम्।तत्कन्दे योनिरेकास्ति पश्चिमा- भिमुखी मता॥ १६१॥ तस्य मध्ये सुपु- म्णाया मूलं सविवरं स्थितम। ब्रह्मरन्ध्रं तदेवोक्तमामूलाधारपङ्गजम् ॥१६२॥ टीका-तालुस्थानमें जो सहस्त्रदल कमल कहाग- या है उसके कन्दमें एक योनि पश्चिमाभिमुखी है अर्थाव पीछेको मुख है उस योनिके मध्यमें जो मूलविवर है उसमें सुपुम्णा ज्ञाननाडी स्थित है हे देवी! इसको ब्रह्मरन्ध् और इसीको मूलाधारपझ्ममी कहते हैं॥ १६१॥ १६२ ।। मूलम्-तत्रांतरन्ध्रे चिच्छक्ति: सुपुम्णा कु-
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पंचमपटलः । (१७३)
ण्डली सदा॥१६३॥ सुषुम्णायां स्थिता नाडी चित्रास्यान्मम वल्लभे॥ तस्यां म- म मते कार्या ब्रह्मरन्ध्रादिकल्पना॥१६४।। टीका-यह सुषुम्णानाडीके रनध्रमें कुण्डलिनी शक्ति सर्वदा विराजमान है वह सुपुम्णा अन्तर्गता शक्तिको चित्रानाड़ी कहते हैं हे परिये पार्वति ! हमारे मतमें इसी चित्रासे व्हारन्त्र आदि कल्पना भई हैं ॥१६३॥१६४।। मूलम्-यस्या: स्मरणमात्रेण ब्रह्मज्ञत्वं प्र- जायते।। पापक्षयश्च भवतन भूय: पुरु- षो भवेत् ॥१६५ ॥ टीका-यह चिन्रानाडीके ध्यानमान्रसे ब्रहमज्ञान उत्पन्न होता है और पाप क्षय होजाता है और फिर संसाररूपी बन्धमें योगी नहीं पडता अर्थात् मोक्ष होजाता है॥ १६६ ॥ मूलम्-प्रवेशितं चलाड्एं सुखे स्वस्य निवे- शयेत्॥ तेनात्र न वहत्येव देहचारी स- मीरणः ॥ १६६ ॥ टीका-दक्षिणहाथके अदगुष्टको सुखमें प्रवेश कर- के मुखको वन्द करलेनेसे देहचारी जो प्राणवायु है वह निश्चप स्थिर होजाता है॥१६६ ॥
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(१७४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-तेन संसारचक्रेस्मिन्न भ्रमन्ते चस- र्वदा।।तदर्थ ये प्रवर्तन्ते योगिन: प्राणधार- णे॥१६७तत एवाखिला नाडी निरुद्धा चाष्टवेष्टनम्॥ इयं कुण्डलिनी शक्ती रन्ध्रं त्यजति नान्यथा ॥ १६८॥ टीका-यह प्राणवायुके स्थिर होजानेसे इस संसार चक्रमें सर्वदा भ्रमण करना छूटजाता है अर्थाद मोक्ष होजाता है इसहेतुसे योगी प्राणवायुके धारण करनेमें प्रवृत्त होते हैं और इसधारणसे सकलनाडी जो मल और काम कोधादि आठप्रकारसे वन्धनमें हैं वह खुल जाती हैं तब यह कुण्डललिनीशक्ति ब्रह्मरन्ध्रको निश्चय त्याग देती है इसके त्यागदेनेसे जीव ब्रह्मका सम्बन्ध होजाता है॥। १६७॥ १६८। मूलम्-यदा पूर्णासु नाडीपु सन्निरुद्धानिला- स्तदा॥ वन्धत्यागेन कुण्डल्या मुखं र- नध्राद्वहिर्भवेत्॥ सुपुम्णायां सदैवायं वं- हेत्प्राणसमीरणः ॥ १६९ ॥ टीका-जब वायु निरोध होके सकलनाडीमें पूर्ण होजायगा तव कुण्डलिनी अपने बन्धको त्याग- के त्रह्मरन्त्के मुखको त्यागदेगी तब प्राणवायुका
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पंचमपटल. । (१७५) प्रवाह सदैव सुपुम्णामें होजायगा।। १६९ ॥ मूलम्-मूलपझ्मस्थिता योनिर्वामदक्षिण- कोणतः।।इडापिगलयोरमध्ये सुपुम्णा यो- निमध्यगा॥ १७० ॥ ब्रह्मरध्रन्तु तत्रैव सुपुम्णाधारमण्डले ॥ यो जानाति स मुक्त: स्यात्कर्मवन्धाद्विचक्षणः॥१७१॥। टीका-मूलापारपहस्थित जो योनि है उस योनिके वाम दक्षिण भागमें इडा और पिंगला नाडी स्थित हैं और दोनों नाडीके वीचमें अर्थात योनिके मध्यमें सुषुम्णाकी स्थिति है उसी सुपुम्णाके आधारमंडलमें अर्थात् उसके मध्यमें ब्रह्मरन्त्र है जो इसको जानता है सो बुद्धिमान् कर्मवन्धसे मुक्त है॥ १७०॥ १७१ ॥। मूलम-ब्रह्मरन्ध्रमुखे तार्सा संगम: स्याद- संशयः॥ त्मिन्स्नाने स्नातकानां मुक्ति: स्यादविरोधतः॥१७२।। टीका-्रह्मरन्त्के मुखमें इन तीनों नाडीका नि- श्रय सम्बन्ध है इसमें स्नान करनेसे ज्ञानीलोगोंको मुक्तिलाभ होगी॥ १७२ ॥ सूलम्-गंगायमुनयोर्मध्ये वहत्येपा सरस्व- ती।तासां तु संगमे स्नात्वा धन्यो याति. परांगतिम् ॥ १७३ ॥
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(१७६) शिवसंहिता भापाटी का समेता । टीका-गंगा यमुनाके मध्यमे सरस्वतीका प्रवाद है यह त्रिवेणीसंगममें स्नान करनेसे मनुष्य परमगतिको प्राप्त होता है। १७३। मूलम्-इडा गंगा पुरा प्रोक्ता पिंगला चार्कपु- त्रिका। मध्या सरस्वती प्रोक्ता तासां
टीका-इडा गंगा है और पिंगला यमुना है और मध्यमें सुपुम्णा सरस्वती है यह त्रिवेणी संगम कहा गया हैं इसका स्नान अतिटुर्लभ है॥। १७४ ॥ मूलम्-सितासिते संगमे यो मनसा स्ना- नमाचरेत् ॥ सर्वपापविनिर्मक्तो याति ब्रह्मसनातनम् ॥ १७५॥ टीका-यह इडा और पिंगलाके संगममें मानसिक खनान करनेसे साधक सर्व पापसे मुक्त होके सनातन ब्रह्ममें लय होजाताहै॥ १७5 ॥ मूलम्-त्रिवेण्यां संगमे यो वै पितृकर्म स- माचरेत्॥ तारयित्वा पितृन्सर्वान्स याति परमां गतिम् ॥१७६ ॥ टीका-जो पुरुप इस त्रिवेणीसंगममें पितृकर्मका
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पंचमपटल: । (१७७) अनुध्वान करते हैं वह सर्व पितृकुलको तारके परम गतिको लाभ करते हैं ॥ १७६ ॥ मूलम्-नित्यं नैमित्तिकं काम्यं प्रत्यहं यः समाचरेत्।।मनसा चिन्तयेत्वा तु सोऽक्ष- यं फलमाशुयात् ॥१७७॥ टीका-उसी संगमस्थानमें जो साधक नित्य और ने- मित्तिक और काम्य कर्मका अनुष्ठान सर्वदा मनसे चिन्त- नपूर्वक करते हैं सो अक्षय फललाभ करते हैं॥ १७७ ॥ मूलम्-सकृद्य: कुरुते स्नानं स्वर्गे सौख्यं भु- नक्ति सः॥दग्ध्वा पापानशेपान्वै योगी शुद्धमतिः स्वयम्॥१७८॥अपवित्रः पवि- त्रोवा सर्वावस्थां गतोपि वा॥स्नानाचर- णमात्रेण पूतो भवति नान्यथा।। १७९॥ टीका-जो पवित्रमति योगी एकवार इस संगममें स्न्नान करते हैं वह सर्व पापको दग्घकरके स्वर्गका दिव्य भोग भोगते हैं और यह साधक पवित्र हो वा अपवित्र हो वा किसी अवस्थामें हो यह संगमके ध्यानरूपी स्नानमान्रसे निश्धय पवित्र होजायगा॥१७८।।१७९॥ मूलम्-मृत्युकाले पलतं देहं तिवेण्या-सलि-
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(१७८) शिवसंहिता नाषाटीकासमेता। ले यदा॥ विचिन्त्य यस्त्यजेत्प्राणान्स तदा मोक्षमाप्रुयात्॥ १८० ॥ टीका-मृत्युके समयमें साधक जो यह चिंतन करे कि हमारा शरीर त्रिवेणीके सलिलमें मग्न है तो उसी क्षण प्राणको त्यागके मोक्षगतिको प्राप्त होगा॥१८०॥ मूलम-नात: परतरं ग्रह्यं त्रिपु लोकेपु विद्य- ते। गोप्तव्यं तत्प्रयत्नेन न व्याख्येयं कदाचन ॥ १८१॥ टीका-इस तीर्थसे परे त्रिभुवनमें दूसरा गुप्त तीर्थे नहीं है इसको यत्नसे गोपित रखना उचित है यह कदा- पि प्रकाश करनेके योग्य नहीं है।। १८१॥ मूलम्-ब्रह्मरन्ध्रे मनो दत्त्वा क्षणार्ध यदि तिष्ठति। सर्वपापविनिर्मुक्त: सयाति परमां गतिम् ॥ १८२ ॥ टीका-ब्रह्मरन्ध्रमें मन देकरके यदि क्षणार्धभी स्थिर खसे तो सर्वपापसे मुक्त होके साधक परमगतिको अर्थात् मोक्षको प्राप्त होजाय ॥। १८२॥ मूलम्-अ्मिन् लीनं मनो यस्य स योगी मय लीयते।। अणिमादिगणान्भुक्ता स्वे- च्छया पुरुपोत्तम: ।।१८३ ।।
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पंचमपटलः । (१७९) टीका-हे पार्वती। इस ब्रह्मरन्त्रमें जिसका मन लीन होय सो पुरुपोत्तम योगी अणिमादिगुणों को भोगके इच्छापूर्वक हमारेमें लय होजायगा ॥१८३॥ मूलम्-एतद्रन्ध्रध्यानमात्रेण मर्त्यः संसारे स्मिन्वलभो मे भवेत्सः ॥ पापान् जि- त्वा मुक्तिमार्गधिकारी ज्ञानं दत्त्वा तार- यत्यद्धुतं वै॥ १८४॥ टीका-हे देवी। इस ब्रह्मरन्त्रके ध्यानमात्रसे यह सं- सारमें प्राणी हमको प्रिय होजाता है और पापराशिको जीतके यह साधक मुक्तिमार्गका अधिकारी होजाता है और अनेक मनुष्योंको ज्ञान उपदेश करके संसार- से परित्राण करदेता है।।१८४।। मूलम्-चतुर्मुखादित्रिदशैरगम्यं योगिवल- भम्॥ प्रयत्नेन सुगोप्यं तद्रह्मरन्घ्रं म- योदितम् ॥१८५॥ टीका-हे देवी! यह ब्रह्मरन्धका ध्यान जो हमने कहा है इसको यत्न करके गोपित रखना उचित है यह ज्ञान योगीलोगोंको अतिप्रिय है इसका मार्ग ब्रह्मा आादि देवताओंकोभी अगम्य है॥ १८५॥ मृलम्-पुरा मयोक्ता या योनि: सहस्ारे स-
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(१८०) शिवसंहिता भापाटी कासमेता । रोरुहे ॥ तस्याऽधी वर्तते चन्द्रस्तद्चानं क्रियते वुधैः ॥ १८६॥ टीका-हे देवि। पहिले जो सहस्रदलकमलके मध्यमें योनिमण्डल हमने कहा है उस योनिक अधोभागमें चन्द्रमा स्थित हैं यह चन्द्रमण्डलका बुद्धिमान् लोग *
सर्वदा ध्यान करते हैं॥ १८६॥ मूलम्-यस्य स्मरणमात्रेण योगीन्द्रोऽव- निमण्डले।।पूज्यो भवति देवानां सिद्धानां सम्मतो भवेत् ।। १८७ ॥. टीका-इस चन्द्रमंडलके ध्यानमात्रसे योगीन्द्र संसारमें पूजनीय होजाता है और देवता और सिद्ध- लोगोंके तुल्य होजाता है॥। १८७॥ मूलम्-शिरःकपालविवरे ध्यायेद्ुग्घमहो- दधिम्। तत्र स्थित्वा सहसरारे पद्मे चन्द्रं विचिन्तयेत्॥१८८॥ टीका-शिरस्थित जो कपालिवर है उसमें क्षीर समुद्रका ध्यान करे उसी स्थानमें स्थितिपूर्वक सहस्र- दलकमलमें चन्द्रमाका चिन्तन करे॥ १८८ ॥ सूंलम्-शिर:कपालविवरे द्विरष्टकलयायु- तः ॥ पीयूपभानुहंसाख्यं भावयेत्तं निरं-
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पंचमपटल: (१८१) जनम्॥१८९॥ निरन्तरकृताभ्यासात्नि- दिने पश्यति ध्रुवम्। दृष्टिमात्रेण पापौघं दहत्येव स साधकः ॥१९०॥ टीका-वह शिरःस्थित कपालविवरमें सोलह कलास- युक्त अमृतकिरणसे युक्त हंससंज्ञक निरंजनका चिन्तन करे निरन्तर तीन दिन यह अभ्यास करनेसे निरजनका साक्षात् साघकको अवश्य प्रकाश होगा सो साधकदप्टिमा- जसे सर्व पातकोंको दहन करडालेगा ॥ १८९॥१९०॥ मूलम्-अनागतश्च स्फुरति चित्तशुद्दिर्भवे- त्खलु।। सद: कृत्वापि दहति महापात- कपश्चकम् ॥ १९१ ॥ टीका-यह ध्यान करनेसे अनागतविपयकी स्फू- र्ति होगी अर्थात् जो विपय कभी उत्पन्न नहीं भया है उसकी स्फूर्ति होगी और चित्तकी शुद्धि होगी और सा- धक ध्यानमात्रसे उसी क्षण पश्चमह्पातक दहन कर- डालेगा ॥ १९१ ॥ मूलम्-आनुकूल्यं ग्रहा यान्ति सर्वें नश्य- न्त्युपद्रवाः॥ उपसर्गाः शमं यान्ति युद्धे जयमवाप्नुयात् ॥१९२॥खेचरीभूचरी सिद्धिर्भवेत्क्षीरेन्दुदशनात्। ध्यानादेव
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(१८२) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। भवेत्सर्व नात्र कार्या विचारण ॥ १९३॥ सन्तताभ्यासयोगेन सिद्धो भवति मा- नवः॥ सत्यं सत्यं पुनः सत्यं मम तुल्यो भवे्ुवम्॥ योगशास्त्रं च परमं योगिनां सिद्धिदायकम् ॥१९४॥ टीका-शिरःस्थचन्द्रमाका ध्यान करनेसे सर्व ग्रह अनुकूल होजाते हैं और समस्त उपद्रवका नाझ होजा- ताहै और उपसर्ग प्रशमित होते हैं और युद्धमें जय लाभ होता है और खेचरी भूचरीकी सिद्धि प्राप्त होती है इसमें सन्देह नहीं है और निरन्तर यह योगाभ्यास करनेसे अवश्य साधक सिद्ध होजाता है हे पावती! हम सत्य सत्य वारंवार कहते हैं कि हमारे तुल्य होजाय गा इसमें सन्देह नहीं है यह परमयोग योगीलोगोंके सिद्धिका दाता है ॥१९२ ॥ १९३॥ १९४॥ अथ राजयोगकथनम्। मूलम्-अत ऊर्ध्व दिव्य रूपं सहसत्ारं सरोरु- हम् ॥ त्रह्माण्डाख्यस्य देहस्य वाह्ये तिष्ठति मुक्तिदम् ॥१९५॥ कैलासो नाम तस्यैव महेशो यत्र तिष्ठति॥अकुलाख्योड- विनाशी च क्षयवृद्धिविवर्ितः ॥१९६॥
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पचमपटलः । (१८३) टोका-तालुके ऊपरभागमें दिव्य सहस्रदल कमल है यह कमल मुक्तिदाता ब्रह्माण्डरूपी इरीरके वाहर स्थित है अर्थात् शरीरके ऊपर अंतमें है इसी कमल- को कैलास कहते हैं इसी स्थानमें महेश्वरकी स्थिति है यह ईश्वर निराकुल अविनाशी और क्षयव द्धिरहित है ॥ १९५॥ १९६॥ मूलम्-स्थानस्यास्य ज्ञानमात्रेण नृणां सं- सारेऽस्मिन्सम्भवो नैव भूयः ॥ भूतग्रा- मं सन्तताभ्यासयोगात्कर्तु हर्तु स्याच्च शक्ति: समग्रा॥ १९७॥ टीका-इस स्थानके ज्ञानमात्रसे जीवका यह सं- सारमें फिर जन्म नहीं होता और सर्वदा यह ज्ञानयोग अभ्यास करनेसे जीवमात्रके स्थिति संहार करनेकी शक्ति उत्पन्न होती है॥ १९७॥ मूलम्-स्थाने परे हंसनिवासभूते कैलासना- म्नीह निविष्टचेताः।।योगी हतव्याधिरधः कृताधिर्वायुश्चिरं जीवति मृत्युमुक्त:१९८।। टीका-यह कैलासनामक स्थानमें परमहंसका निवास है सो सहस्रदलकमलमें जो साधक मनको स्थिर करता है उसकी सकल व्याधि नाश होजाती है और मृत्युसे छूटके अमर होजाताहै॥ १९८॥
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(१८४) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। मूलम्-चित्तवृत्तिर्यंदा लीना कुलाख्ये पर- मेश्वरे।तदा समाधिसाम्येन योगी निश्च- लतां ब्रजेत ॥१९९॥ टीका-जब साधक यह कुलनामक ईश्वरमें चित्त- को लीन करदेगा तव योगीकी समाधि निश्चल सम होजायगी ॥ १९९ ॥ मूलम्-निरन्तरकृते ध्याने जगद्विस्मरणं भवेत् ॥ तदा विचित्रसामर्थ्य योगिनो भवति ध्रुवम् ॥२००॥ टीका-यह निरन्तर ध्यान करनेसे जगत् विस्मरण होजायगा तब योगीको अवश्य विचित्र सामर्थ्य हो- जायगी ॥ २०० ॥ मूलम्-तस्माह्गलितपीयूपं पिवेद्योगी निर- न्तरम्॥ मृत्योरमृत्युं विधायाशु कुलं जि- त्वा सरोरुहे॥ २०१॥ अत्र कुण्डलिनी शक्तिर्लयं याति कुलाभिधा॥ तदा चतु- विधा सृष्टिलीयते परमात्मनि॥२०२॥ टीका-सदसत्रदलकमलसे जो अमृत स्त्रवता है उ- सको योगी निरन्तर पान करता है सो योगी अपने मृ- त्युका मृत्युविधानपूर्वक कुलसहित जय करके चिरं-
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पैचमपटलः । (१८५) जीवी होजाता है और यही सहस्रद्लकमलमें कुलरूपा कुण्डलिनी शक्तिका लय होजाता है तव यह चतुर्विध सृष्टिभी परमात्मामें लय होजाती है॥२०१॥२०२॥ मूलम्-यज्ज्ञात्वा प्राप्य विपयं चित्तवृत्ति- र्विलीयते॥ तस्मिन्परिश्रमं योगी करो- ति निरपेक्षकः ॥ २०३॥ टीका-यह सहस्रदलकमलके ज्ञान होनेसे अर्थात् इस विषयको प्राप्त करनेसे चित्तवृत्तिका लय होजाता है इस हेतुसे इसके ज्ञानार्थ निरपेक्षरूपसे योगी परिश्र मकरे॥ २०३ ॥ मूलम्-चित्तवृत्तिर्यंदा लीना तस्मिन्योगी भवेद्ुवम्। तदा विज्ञायतेऽखणडज्ञानरूपो निरञ्जनः॥२०४॥ टीका-जन योगीकी चित्तवृत्ति इसमें निश्चय लय होजायगी तब अखण्ड ज्ञानरूपी निरअनका प्रकाश होगा अर्थात ज्ञान होगा॥ २०४॥ मूलम्-ब्रह्मांडवाह्ये संचिंत्य स्वप्रतीकं य- थोदितम्। तमावेश्य महच्छून्यं चिन्त- येदविरोधतः॥२०५॥ टीका-त्रह्माण्डके बाहर अर्थात् त्रहमांडरूप शरीरके
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(१८४) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। मूलम्-चित्तवृत्तिर्यंदा लीना कुलाख्ये पर- मेश्वरे।तंदा समाधिसाम्येन योगी निश्च- लतां ब्रजेत् ॥१९९॥ टीका-जव साधक यह कुलनामक ईश्वरमें चित्त- को लीन करदेगा तब योगीकी समाधि निश्चल सम होजायगी ॥ १९९ ॥- मूलम्-निरन्तरकृते ध्याने जगद्विस्मरणं भवेत्॥। तद्रा विचित्रसामर्थ्य योगिनो भवति ध्रुवम् ॥२००॥ टीका-यह निरन्तर ध्यान करनेसे जगत् विस्मरण होजायगा तब योगीको अवश्य विचित्र सामर्थ्य हो- जायगी ॥ २०० ॥ मूलम्-तस्माद्वलितपीयूषं पिवेद्योगी निर- न्तरम्॥ मृत्योरमृत्युं विधायाशु कुलं जि- त्वा सुरोरुहे॥ २०१॥ अत्र कुण्डलिनी शक्तिर्लयं याति कुलाभिधा। तदा चतु- विधा सृष्टिर्लीयते परमात्मनि॥ २०२॥ टीका-सइस्रदलकमलसे जो भमृत सत्वता है उ- सको योगी निरन्तर पान करता है सो योगी अपने मृ- त्युका मृत्युविधानपूर्वक कुलसहित जय करके चिर-
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पॅचमपटलः। (१८५) जीवी होजाता है और यही सहस्रदलकमलमें कुलरूपा कुण्डलिनी शक्तिका लय होजाता है तब यह चतुर्विध सृष्टिभी परमात्मामें लय होजाती है॥२०१॥२०२॥ मूलम्-यज्ज्ञात्वा प्राप्य विपयं चित्तवृत्ति- र्विलीयते। तस्मिन्परिश्रमं योगी करो- ति निरपेक्षकः ॥ २०३॥ टीका-यह सहस्रदलकमलके ज्ञान होनेसे अर्थीत इस विपय को प्राप्त करनेसे चित्तवृंत्तिका लय होजाता है इस हेतुसे इसके ज्ञानार्थ निरपेक्षरूपसे योगी परि्र मकरे ॥२०३॥ मूलम्-चित्तवृत्तिर्यंदा लीना तस्मिन्योगी भवेद्वम्।। तदा विज्ञायतेऽखण्डज्ञानरूपो निरसन:॥२०४॥ टीका-जब योगीकी चित्तवृत्ति इसमें निश्चय लय होजायगी तब अखण्ड ज्ञानरूपी निरअनका प्रकाश होगा अर्थात् ज्ञान होगा ॥ २०४॥ मूलम्-ब्रह्मांडवाह्ये संचित्य स्वप्रतीकं य- थोदितम्॥ तमावेश्य महच्छून्यं चिन्त- येदविरोधतः॥२०५॥ टीका-त्रह्माण्डके चाहर अर्थात् ब्रह्मांडरूप शरीरके
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(१८६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। बाहर पूर्वोंक्त स्वप्रतीकका चिन्तन करे उससे चित्तको स्थिर करके महत शून्यका शुद्धवृत्तिसे चिन्तन करे२०५ मूलम्-आद्यन्तमध्यशून्यं तत्कोटिसूर्यस- मप्रभम् ॥ चन्द्रकोटि प्रतीकाशमभ्यस्य सिद्धिमाघुयात् ॥२०६ ।। टीका-आदि अंत मध्य शून्य यह सर्वत्र शून्यमें कोटि सूर्यके समान प्रभा और कोटिचन्द्रके समान शीतलप्रकाशके देखनेका अभ्याप्त करनेसे साधकको परमसिद्धि लाभ होगी ॥ २०६॥। मूलम्-एतदचानं सदा कुर्यादनालस्यं दिने दिने॥ तस्य स्यात्सकला सिद्धिर्व- त्सरान्नात्र संशयः ॥२०७॥ टीका-जो पुरुप आलस्यको त्यागके सर्वदा प्रति- दिन इस शून्यका ध्यान करेगा उसको निश्चय एकवर्ष में सकल सिद्धि लाभ होगी ॥२०७॥ मूलम्-क्षणार्ध निश्चलं तत्र मनो यस्य भ- वेद्दवमू॥स एव योगी सद्भक्त: सर्वेलोकेपु पूजितः ॥ तस्य कल्मपसङ्गातस्ततक्षणा- देव नश्यति ॥ २०८॥ टीका-जो साधक इस शून्यमें अर्धक्षणभी मनको
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पंचमपटल:। (1८७) निश्चल स्थिर रकखेगा वही निश्चय यथार्थभक्त योगी है और वह सर्वलोकमें पूजित होता है और उसके पाप- का समूह उसी क्षण नष्ट होजाता है॥२०८ ॥ मूलम्-यं दृद्वा न प्रवर्तते मृत्युसंसारव- तर्मनि॥अभ्यसेत्तं प्रयतेन स्वाधिष्ठानेन चत्मैना॥ २०९ ॥ टीका-इसके अवलोकन करनेसे मृत्युरूप जो सं- सारपथ है इसमें भ्रमण करना छूट जायगा अर्थात जन्ममरणसे रहित होजायगा इसका अभ्यास स्वाधि- ष्ानमार्ग से यत्न करके करना उचित है।। २०९। मूलम्-एतद्चानस्य माहात्म्यं मया वक्तुं न शक्यते ॥ यः साधयति जानाति सोस्माकमपि सम्मतः ॥२१०॥ टीका-हे देवी! इस शून्यके ध्यानके माहात्म्यको हम नहीं कहसकते अर्थात् बहुत विशेष है जो योगी इसका अभ्यास करते हैं सो जानते हैं और वह हमारे बरावर हैं॥२१०॥ मूलम्-ध्यानादेव विजानाति विचित्रफल- सम्भवम् ॥ अणिमादिगणोपेतो भवत्ये- व न संशयः ॥२११॥
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(१९०) शिवसंहिता भापाटीकासमेता। रता है सो मुक्त है इसमें संशय नहीं है और निश्चय वद्दी योगी सद्भक्त है और सर्वलोकमें पूजनीय है२१७॥२१८॥ मूलम्-अहमस्मीति यन्मत्वा जीवात्मपर- मात्मनोः।अहं त्वमेतदुभयं त्यक्काखण्डं विचिन्तयेत्॥२१९। अध्यारोपापवादा- भ्यां यत्र सर्व विलीयते॥ तद्रीजमाश्रये- द्योगी सर्वसंगविवर्जितः ॥। २२० ।। टीका-योगी अपनेको और जीवात्मा और परमा- त्माको तुल्य माने अर्थात् भेदरहित होजाय और हम और तुम यह दोनों भावको त्यागके एक अखण्ड ब्रह्मका चिन्तन करे अध्यारोपअपवादद्वारा जिसमें सर्व वस्तुका लय होजाता है योगी सर्वसङगसे रहित होके उसी बीजके आश्रय होजाय अर्थात् चित्तवृति- को आत्मामें लय करदे ॥२१९॥२२०॥ मूलम्-अपरोक्षं चिदानन्दं पूर्ण त्यत्का भ्र माकुलाः ॥ परोक्षं चापरोक्षं च कृत्वा मूढा भ्रमन्ति वै॥ २२१॥ टीका-मूढबुद्धिके मनुष्य अपरोक्ष अर्थात् प्रत्यक्ष परि- पूर्णम्रह्मको छोड करके म्रममें पडके परोक्ष और अप- रोक्षका रात्रि दिवस निर्णय करते फिरते हैं॥२२१॥
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पंचमपटलः । (१९१) मूलम्-चराचरमिदं विश्वं परोक्षं यः करो- ति च॥ अपरोक्षं परं ब्रह्म त्यक्तं तस्मिन् प्रलीयते ॥ २२२॥ टीका-जो मनुष्य यह चराचरसंसारको शास्त्रसे विवाद करके परोक्ष करते हैं और अपरोक्ष परब्रह्मको त्यागदेते हैं अर्थात् ब्रह्मभी प्राप्त नहीं होता वह अज्ञानी संसारमें लय होते हैं अर्थात् उनका मोक्ष नहीं होता है।। २२२।। मूलम-ज्ञानकारणमज्ञान यथा नोत्पद्यते भृशम्॥ अभ्यासं कुरुते योगी सदा सङ्गघिवर्जितम् ॥२२३।। टीका-जिससे ज्ञान उत्पन्न होता है और अज्ञान- का नाश होता है इसी योगअभ्यासको योगी सर्वदा सङ्गरहित होके अभ्यास करे ॥ २२३॥ मूलम्-सर्वेन्द्रियाणि संयम्य विपयभ्यो विचक्षण॥ विपयेभ्यः सुपुप्येव तिष्ठेत्संग- विवर्जितः ॥२२४।। टीका-बुद्धिमान् योगी विपयोंसे इंद्रियोंको रोकके सङ्गरहित होके विपयके त्यागमें सुपुतिके समान स्थिर रढ़ते हैं॥२२४॥
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(१९२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। मूलम्-एवमभ्यासतो नित्यं स्वप्रकाशं प्र- काशते॥ श्रोतुं बुद्धिसमर्थार्थ निवर्तन्ते गुरोर्गिरः॥ तदभ्यासवशादेकं स्वतो ज्ञा- नं प्रवर्तते ॥२२५॥ टीका-इसी प्रकार नित्य अभ्यास करनेसे साधक- को आपही ज्ञानका प्रकाश होगा तब गुरुके वचनकी निवृत्ति होगी अर्थात् गुरुके उपदेशका अंत हो जा- यगा जब इतरवाक्य श्रवण करनेकी इच्छा निवृत्त होजायगी तब यह योगअभ्यासद्वारा आपही एक अद्वैवज्ञानमें प्रवृत्ति होगी॥ २२५ ॥ मूलम्-यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मन- सा सह।। साधनादमलं ज्ञानं स्वयं स्फुरति तद्रुवम् ॥ २२६ ॥ टीका-यह ब्रह्म किसी प्रकार प्राप्त नहीं होता मन वाक्यकाभी गमन नहीं है परन्तु यह योगसाधनसे अ- पही निर्मेल ज्ञान प्रकाश होता है॥ २२६.।। मूलम्-हठं विना राजयोगो राजयोगं विना हठ ॥ तस्मात्प्रवर्तते योगी हठे सहुरु- मार्गतः॥ २२७॥
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पंचमपटलः । (१९३) टीका-हठयोगकें विना राजयोग और राजयोगके विना हठयोग सिद्ध नहीं होता इस हेतुसे योगीको उचित है कि, योगवेत्ता सद्धरुद्वारा हठयोगमें प्रवृत्त हो॥ २२७ ॥ मूलम्-स्थिते देहे जीवति च योगं न श्रि- यते भृशम्॥ इन्द्रियार्थोपभोगेषु सजी- वति न संशयः॥२२८।। टीका-जो मनुष्य इस शरीरसे योगका आसग नहीं ग्रहण करते हैं वह केवल इंद्रियोंके भोग भोगनेके अर्थ संसारमें जीते हैं इसमें संशय नहीं है॥। २२८।। मूलम्-अभ्यासपाकपर्यन्तं मितान्नं स्मर- णं भवेत् ॥ अन्यथा साधनं धीमान्कर्तु पारयतीह न ॥ २२९॥ टीका-बुद्धिमान् साधक योग अभ्यासके आरंभसे अभ्याससिद्धिपर्यत मिताहारी रहे अर्थात् प्रमाणका भोजन करे अन्यथा अर्थात् अप्रमाण भोजन करनेसे योग अभ्यासके पार न होगा अर्थात् सिद्ध न होगा ॥।२२१॥ मूलम्-अतीवसाधुसंलापं साधुसम्मति- बुद्िमान्॥करोति पिण्डरक्षार्थ वह्वालाप-
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(१९४) शिवसांहिता भाषाटीकासमेता। विवर्जितः॥२३०।। त्याज्यते त्यज्यते स- ङ्गं. सवथा त्यज्यते भृशम्॥अन्यथा न ल- भेन्मुक्तिं सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥२३१।। टीका-बुद्धिमान् साधक सभामें साधुके समान थोडा और प्रमाण वाक्य बोले और शरीरके रक्षार्थ थोडा भोजन करे और संगको सर्व प्रकारसे तजदे कदापि किसीके संगमें लिप्त न होय हे पार्वति ! और दूसरे प्रकार कदापि मुक्ति नहीं पावेगा यह हम सर्वथा सत्य कहते हैं इसमें संशय नहीं है ॥२३० ॥। २३१।। मूलम्-ग्रप्यैव क्रियतेऽभ्यास: संगं.त्यक्का तदन्तरे॥ व्यवहाराय कर्तव्यो वाह्यसं- गो न रागतः॥ २३२॥ स्वे स्वे कर्मण वर्तन्ते सर्वे ते कर्मसम्भवाः। निमित्तमात्रं करणे न दोपोस्ति कदाचन ॥ २३३॥ टीका-साधक संगरहित होके एकान्त स्थानमें योगसाधन करे यदि संसारी मनुष्योंसे व्यवहार वर्त- नेकी इच्छा करे तो अन्तर प्रीतिरहित होके वाह्यसंग करे और अपना आश्रम धर्म कर्मभी इसी प्रकार कर- ता रहै इस हेतुसे कि, ज्ञानादि यावत कर्म हैं सब कर्मा- सुसार होते हैं फलइच्छारहित होके केवल निमित्त
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पंचमपटलः । (१९५) मात्र कर्म करनेसे कदापि दोप नहीं है।।२३२।।२३३।। सूलम्-एवं निश्चित्य सुधिया गृहस्थोपि यदाचरेत् ।। तदा सिद्धिमवापोति नात्र कार्या विचारणा ॥ २३४ ॥ टीका-इसी प्रकार निश्धयवुद्धिसे यदि गृहस्थभी योगअभ्यास करे तो वह अवश्य सिद्धि लाभ करेगा इसमें संशय नहीं है।। २३४॥। मूलम्-पापपुण्यविनिर्मुक्त: परित्यक्ताङ्गसा- धकः॥यो भवेत्स विमुक्त: स्यादहे ति- एन्सदा गृही॥ २३५ ॥ न पापपुण्यैर्लि- प्येत योगयुक्तो यदा गृही॥ कुर्वन्नपि तदा पापान्स्वकार्ये लोक संग्रहे ॥२३६॥ - टीका-जो साधक पाप पुण्यसे निर्लित इन्द्रियसं- गत्यागी है सोई गृही साधक गृहमें रहके मुक्त है योग- युक्त गृही पाप पुण्यमें बद्ध नहीं होता यदि संसारके संग्रहमें पापभी करेगा तो वह पाप उसको स्पर्श न करेगा ॥ २३५ ॥। २३६।। मूलम्-अधुना संप्रवक्ष्यामि मन्त्रसाधन- मुत्तमम्॥ ऐहिकामुष्मिकसुखं येन स्था- दविरोधतः ॥२३७॥
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(१९६ ) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । टीका-हे देवि ! अब उत्तम मन्त्रसाधन हम कहते हैं जिससे इस लोक और परलोक दोनों स्थानमें साधक आानन्दपूर्वक सुख भोगेगा ॥ २३७ ॥ सूलम्-यस्मिन्मन्त्रे वरे ज्ञाते योगसिद्धिर्भं- वेत्खल।। योगेन साधकेन्द्रस्य सर्वैश्वर्य- सुखप्रदा ॥ २३८ । टीका-यह उत्तम मन्त्रके ज्ञान होनेसे निश्चय योग सिद्ध होता है साधकेन्द्रको यह योग सर्वे ऐश्र्य सुखका दाता है॥ २३८ ।। मूलम्-मूलाधारेस्ति यत्पझनं चतुर्दलसम- न्वितम् ॥ तन्मध्ये वाग्भवं वीजं विस्फु- रन्तं तडित्प्रभम् ।।२३९।। हृदये कामबी- जंतु बन्धूककुसुमप्रभम्॥ आज्ञारविन्दे शक्त्याख्यं चन्द्रकोटिसमप्रभम्॥२४०॥ वीजत्रयमिदं गोप्यं भुक्तिमुक्तिफलप्र- दम्॥ एतन्मन्त्रन्रयं योगी साधयेत्सि- द्विसाधकः ॥ २४१ ॥ टीका-जो मूलाधार चतुर्दलसंयुक्त पझ्म है उसमें विद्युत्के समान प्रभायुक्त वाग्वीजकी स्थिति है और हृदयकमलमें वन्धूकपुष्पके समान प्रभायुक्त कामवी-
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पंचमपटलः । (१९७) जकी स्थिति है और आज्ञाकमलमें कोटिचन्द्रके समान प्रभायुक्त शक्तिवीजकी स्थिति है यह बीजत्रय परम गोपनीय भोग और मुक्तिके दाता हैं यह तीनों मन्त्रका सांधक योगी अवश्यसाधन करे॥२३९॥२४०॥२४१॥ मूलम्-एतन्मन्त्रं गरोर्लव्ध्वा न द्गुतं न वि- लम्बितम्॥। अक्षराक्षरसन्धानं निःसन्दि- ग्घमना जपेत् ॥ २४२ ॥ टीका-साधक गुरुसे यह मन्त्रका उपदेश लेके धी- रे धीरे अक्षर अक्षर स्पष्ट उच्चारणपूर्वक स्थिर मन हो- के जप करे॥ २४२ ॥ मूलम्-तद्रतश्चैकचित्तश्र शास्त्रोक्तविधिना सुधी।। देव्यास्तु पुरतो लक्ष हुत्वा लक्ष- त्रयं जपेत् ॥ २४३ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक एकाग्रचित्तसे शास्त्रवि- घिअनुसार देवीके समीपमें एक लक्ष होम करके ती- नलक्ष जप करे॥। २४३॥ मूलम्-करवीरप्रसूनन्तु गुडक्षीराज्यसंयु- तम्। कुण्डे योन्याकृते धीमाञ्जपान्ते जुहुयात्सुधीः॥ २४४॥ टीका-बुद्धिमान् साधक जपके पीछे योन्याकार-
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(१९८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। कुण्ड बनायके कनेरपुष्पके साथ गुड और दूध और घृत मिलायके होम करे ॥ २४४॥ .मूलम्-अनुष्ठाने कृते धीमान्पूर्वसेवा कृता भवेत्॥ ततो ददाति कामान्वै देवी त्रिपु- रभैरवी ॥ २४५ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक इसीप्रकार अनुष्ठानपूर्वक आराधना करके त्रिपुरभैरवी देवीको सन्तुष्ट करे तो उसको इच्छापूर्वक देवी फल देती है ॥ २४५॥ मूलम्-गुरुं सन्तोप्य विधिवल्लव्ध्वा म- न्त्रवरोत्तमम् ॥ अनेन विधिना युक्ती म- न्दभाग्योऽपि सिद्धयति॥ २४६ ॥ टीका-साधक विधिपूर्वक गुरुको संतोप करके यह उत्तम मन्त्र ग्रहण करे इस विधानसंयुक्त ग्रहण कर- नेसे मन्दभाग्य साधकभी सिद्धि लाभ करते हैं ॥२४६॥ मूलम्-लक्षमेके जपेद्यस्तु साधको विजिते- न्द्रियः॥ २४७॥ दर्शनात्तस्य क्षुभ्यन्ते योपितो मदनातुराः ॥ पतन्ति साधक- स्याग्रे निर्लज्जा भयवर्जिताः।। २४८। टीका-योगी इन्द्रियनिग्रह्पूर्वक एक लक्ष जप करे तो उसके दर्शनमात्रसे कामातुर त्रियें मोहित
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पंचमपटलः । (१९९) होपके साघकके आगे निर्लेज और भयरहित होके गिरती हैं ॥ २४७।।२४८॥ मूलम्-जप्तेन च द्विलक्षेण ये यस्मिन्विपये स्थिताः॥आगच्छन्ति यथातीर्थ विमुक्त- कुलविग्रहाः ॥ ददति तस्य सर्वस्वं तस्यै- व च वशे स्थिताः ॥ २४९॥ टीका-यह मन्त्र दो लक्ष जप करनेसे कामिनी स्त्रियें साधकके समीप इसप्रकार मातीहैं कि, जैसे कुलीना तीथों में भय लज्ना रहित होके जाती हैं और साधकके वशमें होके अपना सर्वस्व उसको देती हैं॥ २४९॥
मण्डलाः॥ २५०॥ वशमायान्ति ते सवे नात्र कार्या विचारणा। पड़िर्लक्षैमहीपालं सभृत्यवलवाहनम् ॥२५१ । रीका-तीन लक्ष जप करनेसे मंडलसहित मंडल- पती राजा साधकके बश़में होजाँयगे इसमें संक्ञय नहीं है और छः लक्ष जप करनेसे वल वाहन संयुक्त राजा साधकके वश होजायगा॥ २५०॥२५१॥ मूलम्-लक्षैरद्रदश भिर्जतैर्यक्षरक्षोरगेश्व-
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(१९८) शिवसंहिता आषाटीकासमेता। कुण्ड बनायके कनेरपुष्पके साथ गुड़ और दूध और धृत मिलायके होम करे ॥ २४४ ॥ . मूलम्-अनुष्ठाने कृते धीमान्पूर्वसेवा कृता भवेत्। ततो ददाति कामान्वै देवी त्रिपु रभैरवी॥ २४५ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक इसोप्रकार अनुष्ठानपूर्वक आराधना करके त्रिपुरभैरवी देवीको सन्तुष्ट करे तो उसको इच्छापूर्वक देवी फल देती है ॥। २४५॥ मूलम्-गुरुं सन्तोप्य विधिवलव्ध्वा म- न्त्रवरोत्तमम् । अनेन विधिना युक्तो म- न्दभाग्योऽपि सिद्धयति॥२४६॥ टीका-साधक विधिपूर्वक गुरुको संतोप करके यह उत्तम मन्त्र ग्रहण करे इस विधानसंयुक्त ग्रहण कर- नेसे मन्दभाग्य साधकभी सिद्धि लाभ करते हैं ॥२४६॥ मूलम्-लक्षमेकं जपेद्यस्तु साधको विजिते- न्द्रियः ॥ २४७॥ दर्शनात्तस्य क्षुभ्यन्ते योपितो मदनातुराः ॥ पतन्ति साधक- स्याग्रे निर्लज्ना भयवर्जिताः।। २४८।। टीका-योगी इन्द्रियनिगहपूर्वक एक लक्ष जप करे तो उसके दर्शनमातसे कामातुर स्त्ियें मोहित
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पंचमपटल: । (१९९) होयके साघकके आगे निर्लन और भयरहित होके गिरती हैं॥ २४७।। २४८॥। मूलम्-जप्ेन च द्विलक्षेण ये यस्मिन्विपये स्थिताः॥आगच्छन्ति यथातीर्थ विमुक्त कुलविग्रिहाः ॥ ददति तस्य सर्वस्वं तस्यै- व च वशे स्थिताः ॥ २४९।। टीका-यह मन्त्र दो लक्ष जप करनेसे कामिनी स्तियें साधकके समीप इसप्रकार आतीहैं कि, जैसे कुलीना तीथोंमें भय लज्जा रहित होके जाती हैं और साधकके वश़में होके अपना सर्वस्व उसको देवी हैं॥ २४९॥ मूलम्-त्रिमिर्लक्षैस्तथाजपैर्मण्डलीका स- मण्डलाः॥२५०॥ वशमायान्ति ते सरवे नात्र कार्या विचारणा।। पड़िलक्षैर्महीपालं सभृंत्यवलवाहनम् ॥२५१ ॥ टीका-तीन लक्ष जप करनेसे मंडलसहित मंडल- पती राजा साघकके वशमें होजाँपगे इसमें संशय नहीं है और छः लक्ष जप करनेसे वल वाहन संयुक्त राजा साधकके वश होजायगा॥ २५०॥२५१॥ मूलम्-लक्षैर्द्धांदश भिर्जपैर्यक्षरक्षोरगेश्व-
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(२0० ) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । राः।वशमायान्ति ते सव,आज्ञां कुर्वन्ति नित्यशः॥२५२॥ टीका-यह मन्त्र वारह लक्ष जप करनेसे यक्ष और राक्षस और पन्नग यह सब वशमें होके साधककी नि० त्य आज्ञा पालन करतेहैं॥ २५२॥ मूलम्-त्रिपश्चलक्षजप्तैस्तु साधकेन्द्रस्य धीमतः।।सिद्धविद्याधराश्च्ैव गन्धर्वाप्सर- सांगणाः ॥२५३॥ वशमायान्ति ते सर्वे नात्र कार्या विचारणा॥ हठाच्छवणवि- ज्ञानं स्वेजत्वं प्रजायते ॥२५४ ॥ टीका-पन्द्रहलक्ष जप करनेसे सिद्ध और विद्याघर और गंधर्व और भप्सरा यह सब बुद्धिमान् साधकके वशर्में होजाते हैं इसमें संदेह नहीं है और साधकको हठसे विशेष श्रवणशक्ति होगी और सर्ववस्तुका ज्ञान उत्पन्न होगा॥२५३॥२५४॥ सूलम्-तथाष्टादशभिर्लक्षैदैहेनानेन साध- कः॥ उत्तिष्टेन्मेदिनीं त्यक्का दिव्यदेह- स्तु जायते। भ्रमते स्वेच्छ्या लोकें छि- द्रां पश्यति मोदिनीम्॥ २५५। टीका-जो साधक अठारह लक्ष जप करेगा वह भू-
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पंचमपटलः । मिको त्यागके दिव्य देह होके आकाशमार्गस संसारमें इच्छापूर्वक भ्रमण करेगा और पृथ्वीके छिद्रोंको देखे- गा अर्थात् पृथ्वीमें प्रवेश करनेके मार्ग देखेगा ॥२५५॥ मूलम्-अष्टाविशतििलक्षैविद्याधरपतिर्भ- वेत्॥साधकस्तु भवेददीमान्कामरूपो म- हावलः॥ २५६॥ त्रिशलक्षेस्तथाजप्तैव- ह्राविष्णुसमो भवेत्॥ रुद्रत्वं पष्टिमिर्लक्षै- रमरत्वमशीतिभिः॥२५७॥ कोटयैकया महायोगी लीयते परमे पदे॥ साधकस्तु भवद्यागी त्रैलोक्ये सोऽतिदुर्लभः॥।२५८। टीका-जो बुद्धिमान् साधक अट्ठाईस लक्ष जप करे- गा वह महावल कामरुपी और विद्याघरपति होजायगा और तीस लक्ष जप करनेसे साधक ब्रह्मा विष्णुके समान होजायगा और साठ लक्ष जप करनेसे रुढ़के समान हो- जायगा और अस्सी लक्ष जप करनेसे साधक सर्व भृतोंको प्रिय देव होजायगा और एककोटि जप करनेसे साधक महायोगी होयके परमपदमें लीन होजाताहै हे पार्वति ! इसप्रकार योगी तरिभुवनमें दुर्लभहै॥२५६२५७२५८।। मूंलम्-त्रिपुरे त्रिपुरन्त्वेकं शिवं परमकार- णम्॥२५९॥ अक्षयं तत्पदं शान्तमप्र-
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(२०२) शिवसंहिता भाषाटी कासमेता। मेयमनामयम्। लभतेऽसौ नसन्देहोधी- मान्सर्वमभीप्सितम् ॥ २६०॥ टीका-हे पार्वति! त्िपुरस्थानमें एक शिवही परमका- पर स्वरूप हैं उनका चरणकमल अक्षय शान्त अग्रमेय अर्थात् प्रमाणरहित अनामय अर्थात रोगरहित है उनका पद बुद्धिमान् योगीलोगही इच्छापूर्वक लाभ करहते हैं इसमें संदेह नहीं है॥ २५९॥२६०॥ मूलम्-शिवविद्या महाविद्या गुप्ता चाग्रे महे- श्वरी॥ मद्भाषितमिदं शास्त्रं गोपनीयमतो बुधः ॥ २६१ ॥ टीका-हे महादेवि। यह हमारी कहीहुई महाविद्या- कोही शिवविद्या कहते हैं यह विद्या सर्वप्रकार गोपनीय है इस योगशास्त्रको बुद्धिमान् लोग कदापि प्रकाश नहीं करते हैं॥। २६१ ।। मूलम्-हठविद्या परंगोप्या योगिना सिद्धि- मिच्छता॥ भवेद्ीर्यवती गुप्ता निर्वीर्या च प्रकाशिता ॥ २६२।। टीका-सिद्धिकांक्षी योगीलोग इस हठविद्याको अतिगोपित रकखें यह गोप्य रखनेसे वीर्यवती रहतीहै और प्रकाश करनेसे निर्वीरयां होजातीहै॥२६२॥
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पंचमपटल: । (२०३)
मूलम्-य इदं पठते नित्यमाद्योपान्तं विच- क्षणः॥ योगसिद्धिर्भवेत्तस्य क्रमेणैव न संशयः॥स मोक्षं लभते धीमान्य इदं नित्यमर्चयेत् ॥ २६३ ॥ टीका-जो विद्वान् यह शिवसंहिताका नित्य आ घ्योपान्त पाठ करेगा उसको कमसे अवश्य योगसिद्धि होगी और जो बुद्धिमान् इस ग्रन्थका नित्य पूजन क- रेगा उसको मुक्ति लाभ होगी॥ २६३॥ मूलम्-मोक्षार्थिभ्यश्च सर्वभ्यः साधुभ्यः श्रावयेदपि॥२६४॥क्रियायुक्तस्य सिद्धि: स्यादक्रियस्य कथम्भवेत्॥तस्माल्किया विधानेन कर्तव्या योगिपुंगवैः ॥२६५॥ यहच्छालाभसन्तुष्टः सन्त्यक्तान्तरसंग- क।। गृहस्थश्चाप्यनासक्त: स मुक्तो यो- गसाघनात् ॥ २६६ । टीका-मोक्षार्थी और सर्व साधु मनुष्य उनको यह शिवसंहिताग्रंथ सुनाना. जो कियासे युक्त होगा उसको सिद्धि प्राप्त होगी कियाहीन मनुष्यको क्या होसका है अर्थात् सिद्धि लाभ नहीं होसकती विधानपूर्वक क्रियाका अनुष्ठान करे तो इच्छापूर्वक लाभसे सन्तुष्ट होगा और
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(२०४) शिवसंहिता भापाटी कासमेता ।
जो गृहस्थ होगाऔर इन्द्रियोंमें भासक न होगा सो मनु ष्य योगसाधनसे मुक्तहोगा॥ २६४। २६५ ॥ २६६। मूलम्-गृहस्थानां जपेन वै।। योगक्रियाभियुक्तानां तस्मा- त्संयतते गृही ॥ २६७॥ टीका-योगकियावान् गृहस्थ लोगोंको जप करनेसे सिद्धि प्राप्तहोगी इस हेतुसे योगसाधनमें गृहस्थ मनु- ज्यको यत्न करना उचित है॥ २६७ ।। मूलम-गेहे स्थित्वा पुत्रदारादिपूर्णः सङ्ग त्यक्का चान्तरे योगमारगे।। सिद्धेशिह्नं वी- 1
क्ष्य पश्चाद् गृहस्थः क्रीडेत्सो वै सम्मतं साधयित्वा ॥ २६८ ॥ टीका-जो गृहस्थ गृहमें रहके स्त्रीपुन्नादिसे पूर्ण होके अंतरीय सवसे त्यागपूर्वक योगसाधनसे प्रवृत्त होय सो सिद्धिचिह्न अवलोकनपूर्वक साधना करके सर्वदा आानन्दमें क्रीडा करेगा ॥ २६८ ।। इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे योगशास्त्रे पंचमः पटलः समाप्तः ॥५॥ शुभम् ॥ समाप्तोऽयं अ्रन्थ: । पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकष्णदास, "श्रीवेइटेश्वर" छापाखाना, खेतवाड़ी-बंबई.
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उमामहेश्वरमाहात्म्यम्। उमा भगवतीियं ब्रह्मविद्यति कीर्तिता ॥ रूपयौवनसम्पन्ना वधूर्भूत्वात्र सा स्थि- ता।१॥ नानाजातिवधूनां हि विंवभूताम- हेश्वरी॥२॥ यस्या: प्रसादतः सर्वः स्वर्ग मोक्षं च गच्छति।इह लोके सुखं तद्ज्जं- तुर्देवादिकोपि वा॥ ३॥ ब्रह्मा विष्णुस्त- था रुद्र:शक्राद्या:सर्वदेवताः॥ कटाक्षपा- ततो यस्या भवंति न भवंति च।।४॥पीनो- त्नतस्तनी प्रौढजघना च कृशोदरी।चंद्रा- नना मीननेत्रा केशभ्रमरमंडिता।५।। सर्वागसुंदरी देवी धैर्यपुंजविनाशिनी।। कांचीगुणेन चित्रेण वलयांगदनपुरैः॥६॥। हारैर्मक्तादिसंजातैः कंठाद्याभरणैरपि।। मुकुटेनापि चित्रण कुंडलादैः सहस्त्र- शः। ७। विराजिता ह्यनौपम्यरूपा भूप- णृभृपणा।। जननी सर्वजगतो द्यष्टव- र्पा चिरंतनी ॥।c।। तया समेतं पुरुपं तत्प-
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(२०६) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । xं तहुणाधिकम्॥ ब्रह्मादीनां प्रमुं नाना- सर्वभूपणभृपितम् ॥९॥ द्वीपिचमावृतं शश्वदथवापि दिगंवरम्।।भस्मोढ्ठलितस- र्वांगं ब्रह्ममूर्धौघमालिनम्॥१०॥तथैव चं- द्रखंडेन विराजितजटातटम् ॥ गंगाघरं स्मरमुखं गोक्षीरधवलोज्ज्वलम्॥११॥ कंदर्पकोटिसदृशं सूर्यकोटिसमप्रभम्॥ सृ्टिस्थित्यंतकरणं सृष्टिस्थित्यंतवर्जि- तम्॥ १२॥ पूर्णेन्दुवदनांभोजं मूर्यसो- माग्रिवर्चसम्॥सर्वागसुंदरं कंघुग्रीवं चा- तिमनोहरम्॥ १३॥ आजानुवाहुं पुरुपं नागयज्ञोपवीतिनम्॥ पझ्मासनसमासी- नं नासाग्रन्यस्तलोचनम्॥ १४॥ वाम देवं महादेवं गुरुणां प्रथमं गुरुम्॥ स्वयं- ज्योतिःस्व्ररूपं तमानंदात्मानमद्यम् ॥१५॥ यतो हिरण्यगर्भोयं विराजो जनकः पुमान् ॥ जातः समस्तदेवानाम- न्येषां च नियामकः ॥१६॥ नीलकंठम- मुं देवं विश्वेशं पापनाशनम् ॥ हृदि पदमे
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उमामहेश्वरमाहात््यम्। (२०७) थवा सूर्ये वहौ वा चंद्र मंडले॥१७कैला सादिगिरौ वापि चिंतयेद्योगमाश्रितः॥ एवं चिंतयतस्तस्य योगिनो मानसंस्थि- रमू॥१८।।यदा जातं तदा सर्वेप्रपंचरहितं शिवम्॥ प्रपंचकरणं देवमवाङ्मनसगो- चरम् ॥१२॥ प्रयाति स्वात्मना योगी पु- रुपं दिव्य मद्धतमू।।तमसः स्वात्ममोहस्य परं तेन विवर्जितम्॥२०॥सा्षिणं सर्वतु- द्ीनां बुद्दचादिपरिवर्जितम्। उमासहा- यो भगवान्सगण: परिकीर्तितः।।२१।।नि- ्गुणश्च स एवायं न यतोन्योस्ति कश्चन॥ ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्र: शक्रो देवसमन्ति तः॥ २२॥ अभि: सूर्यस्तथा चंद्र: कालः मृष्टयादिकारणम्॥। एकादशद्रियाण्यंतः करणं च चतुर्विधम्॥२३।प्राणा: पंचम- हाभृतपंचकेन समन्विताः॥ दिशश्च प्र- दिशस्तद्वद्ठपरिष्टादधोपि च ।२४॥स्वे- दजादीनि भूतानि ब्रह्मांडं च विराडपुः
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(२०८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । विराड्हिरण्यगर्भश्च जीव ईश्वर एव च ॥२५॥ मायातत्कार्यमखिलं वर्तते स दसच्च यत्॥ यच्च भूतं यच्च भव्यं तत्सर्व स महेश्वरः ॥ २६ ॥ इति श्रीमदुमामहेश्वरमाहात्म्यं संपूर्णम्।
पुस्तक मिलनेका ठिकाना. खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेङ्गटेश्वर छापखाना (मुंबई.)
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1
नाम पातंजलयोगदर्शन-अत्युत्तम भाषानुवाद सहित १-० की. रु. आ.
सांख्यदर्शन अत्युत्तम मापानवाद साहित वैशेषिकदर्शन सुबोध भाषानवाद समेत ... १-4
हठयोगप्रदीपिका उत्तम भाषाटीका सहित ... 0-१२
शिवस्वरीद्य भापाटीका ... ... १-४ ... 016 शिवसंहिता भापाटीका सह (योगशास्त्र) गोरखपद्धति भापाटीका (योगसाधनविधि ) ०-१२ स्वरोदयसार चरणदासकृत ... ०-२ योगतत्त्वपकाशभापा (योगाभ्यासकी प्रणाली परमोपयोगी है) ... ... स्वरदर्पण सटीक १ स्वर प्रश्नवर्णित हैं ... 0-Y वेदान्तग्रन्थाः। ब्रह्मसूत्र (शारीरक) वेदान्ततत्वप्रकाश भाषा- भा्य समेत श्रीमभुदयालविरचित पहुत सरल सुबोध है ... ... ४-० ब्रह्ममूच (शारीरक)भापाटीका ... वेदान्तपरिभाषा शिखामणि टीका और मणि- १-८
प्रभा टीकासमेत वेदान्तपरिभाषा अर्थदीपिका टीकासमेल ... वेदान्तपरिभाषा अत्युत्तम भाषाटीका समेन .. वेदान्तसार संस्कृत मूल और संस्कृतटीका १-४
तथा भापाटीकासहित ... पंचदशीसटीक (संस्कृत टीका) ... २-०
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२ जाहिरात.
पंचदशी पं० मिहिरचंद्रकृत अत्युत्तम भाषाटीका सहित ... ४-१ पंचदशी भाषा-आत्मस्वरूपजीकृत ... शारीरक ब्रह्मसुनम्-मध्वभाप्यसमेतं तत्त्वपका- ... ३-०
शिका टीकोपेतं च ... ... ५-० गीता चिदघनानंदस्वामिकृत गूढ़ार्थदीपिका मूल अन्वय पदच्छेदके सहित भाषाटीका ... 9-0 गीता आनंदगिरिकृतभाषाटीका .. श्रीमद्भगवद्गीता सान्वय ब्रजभापा दोहा सहित १-४ ... २-८
गीतामृततरं गिणी भापाटीका ( रघुनाथप्रसा. दकृत) अक्षरबड़ा .. ... १-० गीतामृततरंगिणी भापाटी का पाकिटयर ०-२२ श्रीरामगीता मूल ... ..* .. .. ०-२ श्रीरामगीता भापाटीका पदपकाशिका अनुवा- दसमुच्चय और विपमपदीक सहित ... 0-6 श्रीमद्भगवद्गीतापंचरत्न अक्षर मोटा गटका रेशमी ... ... ... .. १-० "पंचरत्न अक्षरबड़ा खुलापत्रा छोहीसंची १-८ "पंचरत्न अक्षरबड़ा लंबीसंची सुला १-० "पंचरत्न भाषाटीका ... .. गीता श्रीधरीटीका सित ... २-०
गीता बड़े अक्षरकी १६ पेजी गुटका १-०
... गीता बड़े अक्षरकी खुली १२ पेजी ... ०-१२
... गीता गुटका विष्णुसहस्त्रनाम सहित ०-१० 0-6 गीता पंचरत्न और एकादशरत्न ... .. "पंचरत्न द्वादशरत्न ०-१२ ० १०
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जाहिरात. ३
गीतापंचरत्न नवरत्न पाकिटवुक्क ... ... 0-9 गीता गुटका पाकिट बुकू .... .. ०-५ अष्टावक्रगीता अत्युत्तम सान्वय भाषाटीका ... १~० शिवगाता मापाटीकासहित ... ० -- १२ गणेशगीता भाषाटीकासहित ... ... ०-६ गीतापंचदश भाषाटीका [काश्यपगीता, शान- कगीता, अष्टावक्रगीता, नहुपगीता, सरस्व्- तीगीता, युविष्ठिरगीता, बकगीता, धर्मव्या- धगीता, श्रीकृष्णगीतादि ] पाण्डवगीता भापाटीका सह ... ०-१२
... तथा मूल ४ रत बड़ा अक्षर देवीगीता भाषाटीका ... ... अपगेक्षानुभूति संस्कृतटीका भापाटीका सहित ०-१० आत्मवोध भाषाटीका .. 0-३ तत्त्वबोध भाषाटीका ०-२ वेदांतमंथपंचकम् (वाक्यप्रदीप: वाक्यसुधारस:, हस्तामलका, निर्वाणपंचक,मनीपापंचर्क स० ०-८ वेदस्तुति माषाटीका सह ... ... ... 0-6 गीता रामानुजमाष्य * .. .. .. २-० भगवद्गीता भावमकाशटीकाया: ... ३- वैराग्यभास्कर भाषाटीका ... ... सिद्धांतचंद्रिका सटीक (वेदांत) द्वादशमहावाक्यविवरण ... ... .. वेदांतरामायण भापाटीका सदद ... १-८ वेदान्तसंज्ञा भाषाटीका ... 0-6 मश्नोत्तरमुक्तावली भाषाटीका (वेदान्त) ०-३
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४ जाहिरात.
जीवन्मुक्तगीता भाषाटीका ... ... 0 -! आचार्य स्वमेश्वरविरचितेन भाप्येण संयुता ... 0-C योगवासिष्ठ सटीक संस्कृत ... ... २०० कंपिलगीता भाषाटीका .. .. ... ०~६ अवधूतगीता गुटका रेशमी ... ... ... ०-५ नारद्गीता मूल ... मश्रोत्तरी भापाटीका ... ...
वेदान्त भापा-I आत्मपुराण भाषा [चिद्धनानन्द स्वामिकृत ] १२-० योगवासिष्ठभाषा बड़ा संपृर्ण ... १२-० योगवासिष्ठगुटका वैराग्य मुमुक्षु प्रकरण वेदान्त ...
उत्तम कागज अक्षर बड़ा ... ... ०-१२ वासिष्ठसार भापा वेदान्त ६ पकरण ... .... ... २ -- ० मोक्षगीता (सवालक्ष ) रामनाम :2 १-० वृत्तिभभाकर स्वामी निश्चलदासकृत (वेदान्तका प्रंथ शुद्धकर नया छपा है) . - विचारसागर सटीक निश्चलदासजीकृत .... ... ३-० .२-० एकादशस्कंध भाषा चतुरदासकृत ... ०-१२ अमृतधारा वेदान्त .... .. ... ०-१२ संतोपसुरतरु वेदांत ... ... संतप्भाव वेदांत ... ... ०-६ विचारमालासटीकश्रीगोविन्ददासजीकीटीकास. ०-१२ .. भाषा (वेदात) .... १-८ संपूर्ण पुस्तकोंका "बढ़ासूचीपत्र" अलगहे मॅगालीजिये। खेमराज श्रीकष्णदास "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीयू पेस-चंबई.